अनुवाद

अरविंद जैन
स्त्री पर यौन हिंसा और न्यायालयों एवम समाज की पुरुषवादी दृष्टि पर ऐडवोकेट अरविंद जैन ने महत्वपूर्ण काम किये हैं. उनकी किताब 'औरत होने की सजा' हिन्दी में स्त्रीवादी न्याय सिद्धांत की पहली और महत्वपूर्ण किताब है. संपर्क : 9810201120
bakeelsab@gmail.com
यह महिला न्यायशास्त्र पर कागद कारे करने वाले वकील साहब की प्रेम कहानी है. ना, इसमें वकील साहब का अतीत न ढूंढें ......... !
संपादक

दफ्तर लौटा तो आंसरिंग मशीन बोली, “प्लीज कांटेक्ट संकट लाल...फौरन।” फोन मिलाया। घंटी बजती रही। मोबाइल पर डायल किया।
संकट गुर्राया, “तुम रखो मैं अभी मिलाता हूं।”
सिगरेट सुलगाई ही थी कि टर्न...टर्न...होने लगी। हैलो...हैलो....के बाद रहस्यमय स्वर में संकट ने कहा, “तुम्हें एक बात बताऊं?”

मैंने थोड़ी लापरवाही से कहा, “हां बताओ।” और मन ही मन सोचा पता नहीं क्या बताएगा? सब जानते हैं कि संकटलाल जी रोते से जाएंगे और मरो की खबर लाएंगे। चिट्ठी देकर भेजो तो नायिका की मम्मी को देकर चले आएँगे- हंसते-हंसते।
वह बोला,  “अरे वो दो चोटियों में सफेद रिबन वाली, ”बॉबी” सी एक लड़की हमारे साथ पढ़ती थी ना...भई। वही...छवि....” मैं तुमसे मिलने आई, मंदिर जाने के बहाने” गाने की तरह तुमसे मिला करती थी...याद आ गई या कुछ और बकना पड़ेगा?”
मैंने लंबा कश लेकर कहा, “हां!...हां!! मगर हुआ क्या?”

आंखों में पच्चीस साल पीछे छूटा कस्बा और कॉलेज की स्टाफ कालोनी घूमने लगी। कॉलेज कैंपस क्या पूरा विश्वविद्यालय था। नर्सरी स्कूल से इंजीनियरिंग कॉलेज तक। बैंक, डाकघर, हॉस्टल, हॉकी- फुटबाल-क्रिकेट ग्राउंड, स्टेडियम, ट्यूबवैल, बाग बगीचे और मीलों लंबी सड़क। मेन गेट से बाहर निकलते ही रेलवे स्टेशन “चाय गर्म”... “पूरी गर्म।” सुबह हजारों लोग कस्बे से शहर जाते और शाम को लौट आते। ऐसे ही एक दिन मैं भी कस्बा छोड़, राजधानी भाग आया था। सोचा था लौट जाऊंगा, लेकिन वो शाम कभी नहीं आई।

सिगरेट बुझाते-बुझाते लगा, “अब वहां है भी कौन? क्या? कस्बा...केवल स्मृतियों में ही आबाद है!”

कस्बे की इस “हवाई यात्रा” के दौरान संकट को फोन पर संदेशा- “मैं आ रहा हूं” के अलावा और कुछ भी तो याद नहीं। मैंने सोचा, बहुत सोचा, मगर समझ में कुछ भी नहीं आया। पीछे मुड़ कर देखा तो आंख भर आई। स्कूल, कॉलेज, जलसे, जुलूस, प्रदर्शन, घेराव, ह़ड़ताल, पथराव, लाठी-गोली-आंसूगैस, जलती बसें, ध्वस्त गाडि़यां, खंडहर, आग में जलकर राख हुआ ऑडिटोरियम, छात्र-शिक्षक-मजदूर आंदोलन, भयंकर असंतोष, हिंसा, आगजनी, लूटपाट, छावनी में बदलते कॉलेज और मुठभेड़” का आतंक। लगता है जैसे कल ही की बात है। मगर जमाना बीत गया।
मैंने सोचा और पानी का गिलास उठा गट्ट...गट्ट...पी गया।

सच तो यह है कि मैं और संकटलाल, यानी हम दोनों और वो सफेद रिबन वाली भी एक ऐसे प्रदेश के हैं, जहां सिर्फ ”डेढ़ आदमी” पढ़े लिखे हैं। होने को संकट के पिता डॉक्टर और मेरे दर्शनशास्त्र  के प्राध्यापक लेकिन पूरे प्रदेश में पढ़े लिखे तो ”डेढ़ लाल” ही माने जाते हैं। हालांकि कस्बा, प्रदेश की राजनीतिक ही नहीं सांस्कृतिक राजधानी भी माना जाता था, परन्तु यौन क्रांति की खबर तो उस समय यहां तक पहुंची ही नहीं थी। हां, ! गली-गली में कुछ लोग “हीरो” साइकिल चलाते हुए जरूर गाने लगे थे- “हम तुम इक कमरे में बंद हों और....”मगर गाना सुन स्कर्ट पहने कोई “छोरी”बाजार में से गुजरती तो सारे शहर में सायरन बजने लगते थे।

ऐसे समय की प्रेम कथा में  न “सेक्स और हिंसा” का कोई स्कोप है और न किसी “अमर प्रेम” की संभावना। हीराइन छोटे से कस्बे की सुंदर और सुशील कन्या है। हाथ लगाते ही मैली हो जाए। दिन-रात, चौबीस घंटे “चैस्टिटी बैल्ट” पहने रहती है। घर से बाहर निकलते ही अंगुली पकड़ “कमांडो” साथ हो लेता है। नींद में सारी रात भले ही, सपनों के राजकुमार के साथ “रोज गार्डन” घूमती रहे या “मॉड्ल टाउन” में पीपल के पेड़ तले बैठ बसाती रहे घर-गृहस्थी। यह एक “बोल्ड एंड ब्यूटीफुल” लड़की का कथादेश भले ही न हो, मगर एक कमजोर लड़की की कहानी भी नहीं है।


कस्बे की लड़की भी क्या करे? छोटे से कस्बे से बीसियों स्कूल कॉलेज और सात-सात सिनेमा घर परंतु मेडिकल और बी.एड.कॉलेजों के अलावा सह शिक्षा कहीं नहीं। फिल्म देखने का शौक हो तो “जय संतोषी मां” लगी है। हाउस फुल...। लड़के-लड़कियों के सब स्कूल कॉलेज अलग-अलग। सरकारी  हो या गैर सरकारी। यही नहीं, बनियों, ब्राह्मणों, जाटों, जैनियों और सैन्नियों से लेकर आर्यसमाजियों तक के अलग-अलग स्कूल कॉलेज।

जाटों के स्कूल या कॉलेज में आचार्य से प्रधानाचार्य तक अधिकांश जाट, ब्राह्मणों के यहां ब्राह्मण, बनियों के यहां बनिये और जैनियों के यहां जैन। लड़कों के स्कूल कॉलेज कस्बे से थोड़ा दूर मगर लड़कियां इतनी दूर कैसे जाएंगी? कुछ उल्टा सीधा हो गया तो? नहीं...नहीं...लड़कियों के स्कूल कॉलेज कस्बे के मुख्य बाजारों के बीच, मेन रोड़ पर ही रहेंगे और हर दुर्ग द्वार पर बड़ी-बड़ी मूछों वाले प्रहरी प्रायः सभी “गुरुकुलों” के “परधान जी” अंगूठा टेक और मंत्री मास्टर जी या वकील साब। प्रबंध कमेटी में नत्थू पंसारी, कालीचरण हलवाई, मंगल सुनार से लेकर लाल लखमी चंद तक चरित्र निर्माण और ब्रह्मचर्य पर विचार विमर्श करते रहते हैं। ब्राह्मणों, बनियों या जैनियों के “सरस्वती मंदिरों” में हरिजनों या पिछड़ों का क्या काम?

कभी स्कूल कॉलेज के प्रांगण में बैलों की जोडि़यां घूमती दिखाई देतीं, और कभी दीपक जगमगाने लगते। कभी क्रिकेट ग्राउंड में खाकी निक्करों का ढेर लगा होता और कभी सफेद टोपियों का। बाद में तो खैर आकाशवाणी केंद्र से लेकर विश्वविद्यालय तक की स्थापना हुई और प्रदेश के एक पढ़े लिखे “लाल” को कुलपति बनाया गया। धर्म, जाति, संप्रदाय और लिंग के आधार पर न जाने कितने स्तरों पर विभाजित है छोटा सा कस्बा।

खैर इससे पहले कि संकटलाल जी पधारें, मैंने अपनी कंप्यूटर ऑपरेटर की छुट्टी कर दी। बेसिर-पैर के सवालों का कौन जवाब देगा? स्कूल के दिनों से अब तक संकटलाल हमेशा ऐसी ही परेशान करता रहा है। बिना शपथ उठाये भी “जो कहूंगा सच कहूंगा। सच के सिवा कुछ नहीं कहूंगा।” उससे पूछो दारू पी? जवाब-हां जी! मुर्गा खाया? हां जी! जुआ खेला? हां जी!...हां जी....! हां जी...दिल दिमाग से साफ मगर यारों का यार है-संकट लाल।
शादी के बाद आकांक्षा हुई तो अपंग। बहन, डॉक्टरनी ने कहा, ”सुई लगा देती हूं। क्या करेगा ऐसी बेटी का?”
भाई धीरे से बोला, ”हां ! लगा सकती हो तो लगा दो।” और लगा अपनी चप्पल ढूंढ़ने।
पूछा कि कहां जा रहे तो कहने लगा, ”थाने रिपोर्ट लिखवाने।”

संकट की अनंत गौरव गाथाएं हैं और दोस्ती के ढेरों किस्से। वो सब फिर कभी। वरना आप कहेंगे- “इधर -उधर भटक रहा है।” चलते-चलते इतना और बता दूं कि सारी मुसीबतों की शुरुआत का कारण होता था संकट लाल और जब पेशी होती तो हर बार खुद वायदा माफ गवाह बन जाता था।

दफ्तर में ही दस बज गये और संकट लाल का कुछ अता-पता ही नहीं चल रहा। हो सकता है पीने बैठ गया हो और जनता क्लब में ललिता, समता, सुषमा या मोनिका का भूत-भविष्य बता रहा हो। मुझे लगा कि वह अब नही आएगा। मैं घर के लिए चल पड़ा। रास्ते भर मेरे दिमाग में संकट, दो चोटियों में सफेद रिबन बांधे उछल कूद मचाता गाता रहा-
”छैल रंग डार गयौ री मेरी बीर
भीज गयौ मेरा अतलस लहंगा, हरित कुंचुक चीर
घायल कुंकुम डार कुचन पर, ऐसौ निपट बेपीर।”

मैं सचमुच नहीं जानता कि ऐसा क्यों और कैसे हुआ? लाल बत्ती पर महसूस हुआ कि खद्दर का सफेद कुर्ता, चूड़ीदार पायजामा और काली अचकन पहने कुछ आदमी पूछ रहे थे ”रेसकोर्स” का रास्ता। फिर अचानक ध्यान आया कि छवि कहा करती थी, “मेरे महबूब कहीं और मिला कर मुझसे। यहां दरख्तों के साये में धूप लगती है।”
मैं मन ही मन हंसता रहा। बहुत देर तक हंसता रहा।


चुपके से एक शरारती सहेली ने चुटकी ली, “लव लैटर्स और स्पेलिंग मिस्टेक वाली बात भूल गये?”
मैंने कहा,  “नहीं, नहीं...याद है। अच्छी तरह याद है कि हर बार संकट समझाता था-प्यार में स्पेलिंग मिस्टेक नहीं देखी जाती-पगले!”

उन दिनों मैं कॉलेज में पढ़ता था। अंतिम वर्ष में। ”युवा महोत्सव” में गया हुआ था। मैं वाद विवाद प्रतियोगिता में भाग लेने आया था। और छवि “आषाढ़ का एक दिन” देखने। मंच से ईनाम लेकर बाहर आया तो छवि, छाया की तरह पीछे-पीछे। छवि ने सिगरेट छीन कर एक तरफ फेंक दी और गले में लटके स्वर्ण पदक को चूमते हुए कहा, ”मुबारक हो!” मैं हैरान। “मिल्की व्हाईट गर्ल” सामने खड़ी मुस्करा रही थी।

तभी संकट आ गले से लिपट गया और बोला, “भई ! मैडल भी मुबारक हो और जन्म दिन भी। मगर कमीज पर लगी इस “लिपस्टिक” का क्या होगा?”
मृगनयनी ने एक बार संकट की तरफ देखा और फिर मेरी तरफ ठुनकते हुए कहने लगी , “आई एम सॉरी...मगर तुमने बताया क्यों नहीं?”
मैंने कहा,  “क्या बताता?”
”फेयर एंड लवली गर्ल” थोड़ा गंभीर हो बोली,  “चलो कोई बात नहीं ”गिफ्ट” उधार रहा।”

उसके बाद मैं और छवि अक्सर जब कैंटीन के कोने में बैठे चाय पीते रहते तो संकट चुपचाप “लव गेम” देखता रहता। दोस्त जब संकट से पत्ता मांग खेलने को कहते तो संकट जवाब देता , “नो, नो...आ प्ले फॉर लव।” दरअसल संकट बेहतरीन विकेटकीपर था।


कभी-कभार छोटी सी मुलाकात हो जाती-कभी संकट के घर और कभी किसी सुनसान गली के मोड़ पर। छवि संकट की बहन काजल की सहेली बन गयी थी, इसीलिए अक्सर मेरे पहुंचने से पहले ही वह वहां मेरी प्रतीक्षा कर रही होती। बहानों की कोई कमी नहीं थी। एकाध बार किसी और सहेली (अभिलाषा) को लेकर, मेरे घर भी आई थी-शायद कोई किताब लेने। उन दिनों उस पर विदुषी बनने का भूत सवार था। देखते-देखते सारा समय परीक्षाओं के बुखार में गुजर गया। रिजल्ट आने के बाद मैं, कस्बे से राजधानी भाग आया। पिता चाहते थे कि ”अर्थशास्त्र” पढ़े लेकिन मैं ”संविधान” पढ़ना चाहता था। संविधान।

दिन में नौकरी की तलाश में भटकता और शाम को पढ़ने जाता। रात को कमरे में आ खुद खाना बनाता, कुछ देर पढ़ता-लिखता और थक हार कर सो जाता। वो सचमुच बहुत ”गर्दिश के दिन” थे। महीनों घर नहीं गया। नौकरी मिली नहीं। ऊपर से आपातकाल शुरू होते ही “संपूर्ण क्रांति” की सारी योजनाएं स्थगित। एक-एक दिन जीना मुश्किल। मैं न किसी की हत्या कर सकता था और न आत्महत्या। अजीब मानसिक स्थिति थी। सारा आक्रोश, अंधेरे में अकेले या आदर्श और सिद्धांत के साथ घूमने, बीड़ी पीने, हवा में टीपी वालों का गालियां बकने, बौद्धिक बहस करने या किताबी कानून चाटने में निकलता....जीने की जिद में अपने बाप से “बाक्सिंग” करता और जानबूझ कर सबसे नाराज....जला-कटा सा घूमता रहता। रिंग रोड़ से रिंग रोड़ तक। कभी भीतरी घेरे में और कभी बाहरी घेरे में।

इस बीच छवि की कई चिट्ठियां आईं। हर बार “विद ग्रेट लव-यूअर्ज ओनली” के साथ चेतावनी ”तुम मेरे पास बिल्कुल भी चिट्ठी मत डालना। नहीं तो मैं बिल्कुल ही मर जाऊंगी। या मार दी जाऊंगी।” ”तुम पता नहीं मुझे कब मिलोगे” पढ़ कर परेशान होता और न मालूम क्या-क्या सोचता रहता। हां ! कुछ महीने पहले आखिरी खत में लिखा था, मैंने तुम्हारे और अपने लिए न जाने क्या क्या सोचा था, लेकिन सब कुछ एक हवा के झोंके की तरह उड़ गया। अंत में, “सचमुच तुम एक दिन बहुत बड़े आदमी बनोगे लेकिन उस एक दिन को कौन जानता है। तुम्हारे बड़े बनने के लिए अगर भगवान ने चाहा तो शायद मेरी शुभकामनाएं सदा तुम्हारे ही साथ होंगी।” अन्तर्देशीय पत्र के एक गोने में छोटे-छोटे अक्षरों में रेखांकित करके लिखा था-गिफ्ट उधार है।”

अगर-मगर पढ़ कर मैंने अनुमान लगाया, लगता है हो गई “कुड़माई (सगाई)।” मैं “ड्रीमहोल” ढूंढ़ता रहा और स्टोव पर रखी खिचड़ी जल कर कोयला हो गई। उठा तो दो गिलास टूट गए और तीन कपों के कान कोने में पड़े थे। मटका उठा कर पानी भरने लगा तो हाथ से फिसल गया...चलो इसकी उतनी ही उम्र थी।


मैं अक्सर झल्लाते हुए कहा करता था, “हमें नहीं बनना बड़ा आदमी....बन भी नहीं सकते...डी सी बनने के चक्कर में एल.डी.सी भी नहीं बन पाएंगे...हां...।” इसके कुछ दिन बाद दोस्तों ने मजाक उड़ाते हुए कहा, “सारी खबरें सच हैं।” नौकरी, महानगर और देस-परदेस की भागदौड़ में रोज नया हादसा। क्या भूलता, क्या याद करता।

अब तो इतना ही याद है या शेष सब भूल गया हूं कि एक शाम “टैलेक्स” पर संकट लाल ने समाचार भेजा था ”बहन को ब्लड कैंसर। स्टॉप। फौरन भारत आओ...स्टॉप।” उसी रात ब्रिटिश एअरवेज से राजधानी और सुबह राजधानी से कस्बे के अस्पताल पहुंचा था। अन्दर तक किसी अनहोनी से आतंकित। दो महीने घर से अस्पताल और अस्पताल से घर...कभी खून चढ़ेगा और कभी रेडियोथैरेपी। देशी-विदेशी सब दवाइयां बेकार। पहली बार जाना कि कितना भयावह है मौत का इंतजार। उन दिनों बहुत हंसता-मुस्कुराता और मजाक में छेड़-छाड़ करता रहता था। हंसता रहता था कि कहीं रो न पड़ूं।

मैंने उस साल की डायरी में हीं लिखा थाः “आज दोपहर अस्पताल से घर लौटते हुए, रास्ते में छवि मिल गई। दो चोटियों की जगह जूड़ा था और खरगोश के कानों जैसे सफेद रिबन गायब।” लाल पल्लू की सफेद साड़ी, मांग में गहरा सिंदूर, गले में मंगलसूत्र और होंठों पर “डीप, डार्क एंड डेंजर्स मैरून” लिप्स्टिक। गोदी में साल भर का प्यारा सा सुंदर बच्चा था। बढ़ी हुई दाढ़ी और चश्मे के बावजूद, उसने भी मुझे पहचान लिया था।

सड़क पर एक तरफ छांव में खड़े हो, उसने सबसे पहले पूछा, सिस्टर कैसी है? मैंने कहा, “ठीक ही है।” उसने फिर सवाल किया, “और तुम?”
मैंने दोहरा दिया, मैं भी।
कुछ देर बाद मैंने सन्नाटा तोड़ते हुए कहा,  “बेटा है ना !...कब हुआ?”
वह बोली,  “पिछले साल....पच्चीस दिसंबर को यह एक साल का हो जाएगा और...।”
मैं एकदम हैरान...परेशान। मगर फिर भी बच्चे के गाल थपथपाता पूछ ही बैठा, क्या नाम रखा है हीरो का?
उसने सिर उठा कर मेरी ओर देखा, निचला होंठ दांतों से दबाया और फिर गर्दन घुमाकर धीरे से बोली, हमनाम है तुम्हारा।

 मैंने चश्मा उतार, आंखें पोछने के बाद देखा तो वह बराबर की मंदिरवाली गली के उस पार जा चुकी थी।
सुबह फोन उठाते हुए डर सा लगा-कहीं संकट का न हो।

“हैल्लो ! हैल्लो!!” के बाद संकट ने उंघते हुए शुरू किया,  “सॉरी यार ! रात कहीं फंस गया था। सुनो ! वो मेरे बगल वाली सोसायटी में रहती है। अभी कुछ दिन पहले “फायर” फिल्म देखते हुए मिल गई। बहुत देर तक “पूछताछ” करती रही और फिर लगी तुम्हारा इतिहास पढ़ाने। अभी खरीदा है फ्लैट। पति अब ठेकेदारी करता है। एक बेटा और दो बेटियां हैं। बेटिया बी.ए. में पढ़ रही हैं। खुद किसी स्कूल में अंग्रेजी पढ़ाती है। भया ! पार्टी वार्टी दो तो बात करवाऊं? ”

मैं चुपचाप सुनता, सोचता और सिगरेट फूंकता रहा। मेरे कुछ कहने से पहले ही संकट ने कहा, ”अच्छा.... एक मिनट बात करो....।”


मैंने कुछ देर बाद, “हैल्लो...हैल्लो” किया....तो एक अनजानी सी आवाज में किसी ने कहा, “नहीं पहचाना ना? कैसे पहचानोगे? बहुत समय हो गया। खैर...मैं छवि...तुम्हें लगातार पढ़ती-सुनती रही हूं...लिखा-अनलिखा...कहा-अनकहा एक-एक शब्द..पूरी किताब कई बार पढ़ चुकी हूं...चाहती हूं कि अनुवाद करूं।”
मैंने कहना चाहा “पगली कहीं की” मगर चुप रहा। फिर उसने कहा था, ”मुझे विश्वास था कि सचमुच एक दिन तुम.....”

और मैं सिर्फ लेकिन...कह कर खामोश हो गया। फोन रखने के बाद तक सफेद रिबन, रजनीगंधा से महकते रहे। और मैं सोचता रहा, ऐसे मूल जीवन का पता नहीं अनुवाद कैसा होगा?

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