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वासना नाजायज नहीं होती: लिपिस्टिक अंडर बुर्का बनाम बुर्के का सच

कुमारी ज्योति गुप्ता


कुमारी ज्योति गुप्ता भारत रत्न डा.अम्बेडकर विश्वविद्यालय ,दिल्ली में हिन्दी विभाग में शोधरत हैं सम्पर्क: jyotigupta1999@rediffmail.com

‘लिपिस्टिक अंडर माय बुर्का’ स्त्री जीवन की सच्चाइयों को कई पर्तों में हमारे सामने रखती है। यह फिल्म परंपरा और आधुनिकता की उलझन में उलझी स्त्रियों की ज़िंदगी की दासतान है। जो न तो पूरी तरह से आधुनिक बन पाती हैं और न ही पूरी तरह से परंपरा को खारिज कर पाती हैं। ‘लिपिस्टिक’ आधुनिकता,रंगीन ख्वाइश और बाज़ार का प्रतीक है जबकि ‘बुर्का’ परंपरा और स्त्रियों पर लगाए गए पितृसत्तात्मक पहरे का। यहां अपने सपनों को पूरा करने की लालसा में परंपरा और आधुनिकता का मिलन दिखता है पर चोरी-चोरी। चोरी-चोरी इसलिए क्योंकि हमारे समाज को खुलापन पसंद है लेकिन स्त्रियों के संदर्भ में नहीं। चार स्त्रियों की ज़िदगी बुर्के के अंदर कैद है जिससे बाहर निकलने की छटपटाहट उन्हें चोरी छिपे वह सबकुछ करने को मजबूर करती है जो समाज के नज़र में गलत है।

बुआजी (रत्ना साह) की कहानी फिल्म में ऐसी औरत के रूप में सामने आई है जो परिवार की मुखिया है। साहसी है लेकिन साहस उसके व्यापार और परिवार तक है जहां वह हवाई महल की मालकिन के रूप में सामने आती है। उसकी बौद्धिकता और परिपक्वता के सामने बड़े-बड़े बिल्डर भी खुद को हारा हुआ मानते हैं। चौकाने वाली बात यह है कि बात जब उनके सपने की आती है तो वे खुद को इतना कमजोर क्यों समझती हैं। एक लड़का सामने से उनकी इज्जत उछाल कर चला जाता है और बदले में वे उसे कुछ नहीं कहती। क्या बड़े उम्र की औरत का मन भी बूढ़ा हो जाता है? उम्र तो शरीर की बढ़ती है मन की नहीं। जवानी में विधवा हो गई बुआजी  का कसूर क्या था कि उनसे उनके सपने देखने का अधिकार छीन लिया जाता है। कृष्णा सेबती ने ‘मत्रों मरजानी’ में भी इस अहम प्रश्न को उठाया था। गौर करने वाली बात यह है कि बुआजी को स्वीमिंग सिखाने वाले उस लड़के में ऐसा क्या दिखता है कि वे उम्र का लिहाज भूल जाती हैं। क्या वे व्यभिचारी थीं, क्या उन्होंने कभी किसी और के साथ संबंध स्थापित किया था , नहीं बिल्कूल नहीं। वे अपनी उम्र और कायदे को जानती थीं। उन्हें सभी (बच्चे, बूढ़े,जवान) बुआजी के नाम से ही बुलाते थे जिसमें सिर्फ बड़ा हाने का अहसास और रिश्ता है। पर जब वे स्वीमिंग पूल में डूबती हैं और बचाने वाला युवक उनका नाम पूछता है तो थोड़ी देर वे सोचने लगती हैं फिर अचानक कहती हैं ‘बुआजी’ जबकि यह उनका नाम नहीं । युवक के फिर से पूछने पर वे अपना नाम बताती हैं ‘उषा’। उषा नाम में पहली बार उन्हें अपनी पहचान का अहसास होता है। यह नाम एक महिला का है जो कि सिर्फ एक स्त्री है किसी की बुआ नहीं। इसलिए सिर्फ एक स्त्री के रूप में वह अपने अरमानों के अहसास में बहने लगती हैं। एक स्त्री मन जिसे सपने देखने की आज़ादी नहीं वह बुर्के के अंदर लिपिस्टिक लगा कर रंगीन जीवन के सपने देखने लगती है। उसने सामने से उस लड़के को कभी अपनी सच्चाई नहीं बताई क्योंकि अपनी उम्र का लिहाज उसे है। लेकिन क्या करे उस मन का जो बिन पानी सफरी सी छटपटाता है। ऊपर से परंपराओं का इतना सख्त पहरा। इसमें बुआजी परंपरा नहीं तोड़ती न ही युवक के सामने कोई अपील करती हैं। परंपरा से बिना टकराए अपने रंगीन पंख से ख्वाइशों  की दुनियां में उड़ना चाहती हैं।

शीरीन अस्लम(कोनकोना सेन) के माध्यम से ऐसी स्त्री चरित्र को सामने लाया गया है जो हमारे समाज में भरी पड़ी हैं। जिन्हाने अपने शरीर का मालिक अपने शौहर कों बना रखा है। धूमिल की एक प्रसिद्ध पंति इस संदर्भ में याद आती है कि ‘हर तीसरे गर्भपात के बाद , औरत धर्मशाला हो जाती है।’ शीरीन अस्लम एक सेल्स गर्ल होते हुए भी बच्चा पैदा करने की मशीन के रूप में जानी जाती है। वह सिर्फ शरीर बनकर पति के साथ रहती है। छिप कर काम करती है। नौकरी करना कोई बुरी बात नहीं लेकिन पति की पितृसत्तात्मक सोंच के आगे वह मजबूर है। नौकरी करके वह अपनी ख्वाइश और सपने तो पूरी करती है लेकिन पति को पता चलते ही हार मान लेती है। ये एक ऐसी औरत है जो पितृसत्ता और परंपरा का विरोध नहीं करती, ज़िंदगी तो जीती है लेकिन अपनी शर्तों पर नहीं। हमारे समाज की सच्चाई यही है क्योंकि शर्तों की ज़िंदगी जीने के लिए जो अधिकार उसे चाहिए वो उसके पास नहीं है।



लीला (अहाना कुमरा) परंपराओं को चुनौती देकर अपने सपनों को पूरा करना चाहती है लेकिन सपनों तक पहुंचने के लिए जो सीढ़ी वह चुनती है वह बीच में ही उसे गिरा देता है। वह परंपरा की नहीं परिस्थिति की गुलाम बन कर रह जाती हैं। दो नांव पर सवार यात्री की तरह वह बीच भंवर में ही फंस जाती है।

लिपस्टिक अंडर माय बुर्का : क़त्ल किए गए सपनों का एक झरोखा

रेहाना अबीदी (प्लाबिता बोर्थाकुर) एक ऐसी नौजवान लड़की है जो निहायत परंपरावादी परिवार से है। इसके परिवार में पढ़ने की छूट है पर विाचारों में बदलाव की कोई गुंजाइश  नहीं। आधुनिकता से इस परिवार का दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं इसलिए शीरीन बुर्का पहनकर कॉलेज के लिए निकलती है जबकि बुर्के के अंदर की सच्चाई कुछ और है। संगीत में रचा बसा  उनका मन उसे वो सबकुछ करने की इजाजत देता है जो उसकी परंपरा के खिलाफ है। वह अपने को आधुनिक भी दिखाती है और अपने सपनों को भी पूरा करना चाहती है इसलिए वह सिगरेट, शराब भी पीती है। म्यूजिक बैंड में षामिल होने के लिए खुद को मार्डन लड़की के रूप में पेश भी करती है और सारी हदे पार करके चोरी तक करती है। आज कल स्कूल-कॉलेज में भी कई छात्र-छात्राएं आधुनिकता की चकाचौंध  में शामिल होने के लिए गलत रास्ता अपना लेते हैं जैसा कि रेहाना अबीदी करती है। इसके पीछे उसका कोई गलत इरादा नहीं होता क्योंकि उसे सिर्फ अपने सपने दिखते हैं जो उसके अब्बू-अम्मी कभी पूरे नहीं होने देते।

अतः हम कह सकते हैं कि ये चारों स्त्रियां बिना परंपरा से पंगा लिए अपनी-अपनी सपनों की दुनियां में निकल पड़ती हैं लेकिन सपना टूटते ही जब वे हकीकत की दुनियां में आती हैं तो इस समाज की जिल्लत झेलती हैं। बंद कमरे में जीने के लिए बेबस सिगरेट के धूएं में अपनी परेशानियां उड़ाती नज़र आती हैं। कहीं न कहीं पितृसत्तात्मक समाज मुंह उठाए उन्हें चुनौती देता है कि हमारी बनाई दुनियां में तुम्हें बुर्के में ही जीना होगा। तुम्हारी कामना, तुम्हारा लस्ट, तुम्हारी वासना नाजायज है. यह सच है कि वासना नाजायज नहीं एक व्यक्ति की देह का जायज सच है, लेकिन जीना हकीकत  की दुनियां में है जहां परंपरा, आदर्श और नैतिकता का दावेदार पुरुष है। हां ये सच है कि ये औरतें खुला विद्रोह नहीं करती लेकिन औरत और उसके जीवन की जमीनी सच्चाई को पूरी ईमानदारी के साथ प्रस्तूत करती हैं। फिल्में समाज का आइना होती हैं वे हमें आइना दिखाती हैं। निर्णय हमें करना होता है। इस अर्थ में ये स्त्रियां स्त्री संसार की सच्चाइयों का आइना प्रस्तुत  करती हैं।

सावधान ! यहाँ बुर्के में लिपस्टिक भी है और जन्नत के लिप्स का आनंद लेती उषा की अधेड़ जवानी भी

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जेंडर और विज्ञान: एक नारीवादी परिप्रेक्ष्य

अतुल कुमार मिश्र

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा  में शोधार्थी है. सम्पर्क :  atulmishra.mediagroup@gmail.com

Representation of the world like the world itself is the work of men; they describe it from their own point of view, which they confuse with the absolute truth. : Simone de Beauvoir


Science, it would seem, is not sexless: he is a man, a father and infected too. : Virginia Woolf

ज्ञान को एक सत्ता के रूप में व्याख्यायित करते हुए (Knowledge is power) मिशेल फूको जब समाज में व्याप्त श्रेणीबद्ध ज्ञानात्मक विभाजन की बात करते हैं, तो ज्ञान की प्रभुत्वशाली सत्ता-संरचना और इससे निर्मित भेदभावपूर्ण सत्ता-संबंधों का यह सैद्धांतिक विश्लेषण अब तक शाश्वत माने जाते रहे मुख्यधारा के ज्ञान-विज्ञान को अचानक से कुछ मूलभूत सवालों के घेरे में खड़ा कर देता है। मसलन ‘किसका ज्ञान’ और ‘किसके बारे में ज्ञान’ जैसे सवाल हाशिए के नए विमर्शों द्वारा बड़े पैमाने पर सामने आते हैं और इन सवालों की रोशनी में ही हाशिए के विमर्शों का नया ज्ञानशास्त्र आकार लेता है। क्योंकि ज्ञान अगर ‘जानने’ और ‘न जानने’ वाले के बीच एक भेदभाव पूर्ण फर्क पैदा करता है तो एक ज्ञानमूलक समाज अपनी आधारभूत निर्मिति में ही ऊंच-नीच के भेद पर आधारित (hierarchical) समाज होगा और चूंकि सभ्यता की ‘तथाकथित’ विकास-यात्रा ज्ञान की ही यात्रा रही है, इसलिए ज्ञान के विकास के साथ ज्ञानात्मक समाज में अंतर्व्याप्त यह विभाजन और भी गहरा होता जाएगा, खासकर तब अगर सभी को ‘ज्ञान’ तक पहुँच के समान अवसर न मिलें या फिर कुछ खास तरह के ‘ज्ञान’ को ही वैधता दी जाए और शेष लोगों/समूहों के ज्ञान को ‘ज्ञान’ के बतौर मान्यता ही न मिले। इस प्रकार फूको के मुताबिक ‘ज्ञान’, एक ताकत के रूप में सामाजिक संरचना की श्रेणीबद्धता को निर्धारित करता है और एक सत्ता संरचना के बतौर सामाजिक विभेदों को जन्म देने या उन्हें समयानुसार नए सिरे से अनुकूलित करने का काम भी करता है। अब चूंकि विज्ञान; हर तरह के ज्ञान का चरम है, इसलिए वस्तुनिष्ठता एवं सार्वभौमिकता के अपने दावों और विशिष्टता एवं प्रायोगिकता की अपनी क्षमताओं के चलते यह विज्ञान, ज्ञान के सर्वश्रेष्ठ प्रतीक के रूप में  हमारे सामने आता है और आधुनिकता के साथ हम इस ‘वैज्ञानिक ज्ञान’ के ‘आभामण्डल’ को हर तरफ फैलते हुए भी देख सकते हैं। इसके अंतर्गत जहां एक तरफ ‘ज्ञान-संस्थानों’ के जरिए ज्ञान-समाज (नॉलेज सोसाइटी) बनाने की प्रक्रिया शुरू होती है तो वहीं ज्ञान की विभिन्न शाखाओं में भी खुद को ज्यादा से ज्यादा ‘वैज्ञानिक’ साबित करने की एक होड़ सी दिखती है। इस दौरान ज्ञान के सर्वश्रेष्ठ प्रतीक के बतौर विज्ञान की चकाचौंध से व्यापक समाज की आक्रान्तता का अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता हैकि धर्म को अफीम कहने वाले मार्क्स भी, मार्क्सवाद को वैज्ञानिक दर्शन (वस्तुनिष्ठ एवं एकमात्र सत्य) कहने के मोह से ख़ुद को बचा नहीं पाते। वैज्ञानिक ज्ञान का यह आभामण्डल इतना विशाल था कि इसके चलते विज्ञान के अपने (इनबिल्ड) सत्तात्मक संबंधों, जो शासन सत्ता पर किसी वर्ग के कब्जे से अधिक गहरे हैं, को नहीं देखा जा सका। दूसरी तरफ आगे चलकर दो विरोधी चरित्रों के बावजूद धर्म और विज्ञान का अद्भुत गठजोड़ अगर इतनी आसानी से सर्वस्वीकार्य हो गया तो इसके पीछे सिर्फ़ पूंजीवादी शासन सत्ता की ज़रूरत भर नहीं थी, बल्कि विज्ञान का यह आभामंडल भी था जिसकी चकाचौंध में तमाम अंतर्विरोधों का छिप जाना स्वाभाविक था।


आधुनिकता की संरचना में विज्ञान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह यथार्थ की प्रकृति और वस्तुगत ज्ञान की सम्भावना पर जैसी रोशनी डालता है,वह इससे पहले सम्भव नहीं थी। यह न केवल प्रकृति का ज्ञान सम्भव बनाता है,बल्कि ज्ञान-मीमांसा (Epistemology) में भी क्रांतिकारी परिवर्तन लाता है और समूचे मानव-ज्ञान के लिए एक प्रतिमान प्रस्तुत करता है और यह सब होता है,उसकी विशिष्ट प्रविधि (Methodology) के बल पर। विज्ञान ज्ञान प्राप्त करने की एक निश्चित प्रणाली निर्धारित करता है जिसमें प्रेक्षण,प्रयोग,सिद्धांत निर्माण,निगमन (Deduction) पूर्वानुमान (Prediction) और जांच का व्यवस्थित इस्तेमाल किया जाता है। वैज्ञानिक प्रणाली वस्तुगत ज्ञान का निश्चित साधन बनती है और यथार्थ की प्रकृति के निर्धारण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।  प्राकृतिक विज्ञान से पैदा हुई यह प्रणाली कुछ संशोधनों और नये तत्वों के साथ सामाजिक विज्ञान की प्रणाली का भी आधार बनती है। यहाँ एक और महत्वपूर्ण बात यह भी है कि विज्ञान इसलिए विज्ञान है, क्योंकि यह मानव समाज की प्रकृति के साथ अंतर्क्रिया में पैदा होता है। बाकी सभी क्रियाएं-प्रक्रियाएं मानव समाज की आंतरिक क्रियाएं-प्रक्रियाएं हैं, जहाँ समाज ही कर्ता (subject) है और समाज ही वस्तु (object) है। प्राकृतिक विज्ञान में प्रकृति वस्तु है और मानव समाज इस वस्तु पर कार्य करता है,जिससे ‘वस्तुगत ज्ञान’का सुनिश्चित मॉडल बनता है और प्रकृति पर नियंत्रण और उसके योजनाबद्ध इस्तेमाल की परिस्थिति पैदा होती है ,जिसका अगला चरण तकनीकी के उत्तरोत्तर विकास द्वारा प्रकृति पर नियंत्रण और उसके इस्तेमाल की क्षमता में वृद्धि के रूप में सामने आता है।

लेकिन विज्ञान के क्रमिक इतिहास ने आज यह साबित कर दिया है कि विज्ञान सामाजिक परिप्रेक्ष्यों से मुक्त नहीं है,बल्कि सामाजिक (जरूरी नहीं कि समाज के सारे हिस्से इसमें शामिल हो) आवश्यकताओं के क्रम में और तत्कालीन सामाजिक परिस्थितियों के दायरे में ही विज्ञान का सम्पूर्ण विकास देखा जा सकता है। इसी संदर्भ में डी.डी. कोसंबी अपने एक लेख ‘विज्ञान समाज और स्वतंत्रता’ में सवालिया लहजे में कहते हैं कि,“सोचने की बात है कि क्या यह मात्र संयोग था कि उस शताब्दी ने जिसमें कि दो क्रांतियाँ हुईं,इंग्लैण्ड में बुर्जुआजी को सत्तारूढ़ किया,न्यूटन को जन्म दिया?यह कैसे है कि फ्रांसीसी क्रांति ने जिसने कि फ्रांस में सामंतवाद के कूड़े को साफ किया,फ्रांस और यूरोप के महानतम वैज्ञानिकों जैसे कि लांग्राज,लाप्लास, एंपरे,बर्थलो को देखा?वे बुर्जुआजी के साथ आगे बढे और नेपोलियन के बाद भी बने रहे। जर्मनी के विज्ञान का महान नाम गाउस लगभग उसी समय अवतरित होता है जब कि उस देश में बुर्जुआजी वास्तविक ताकत बन जाते हैं;और वह अकेला नहीं है। अगर हम इन को मात्र संयोग कह कर दरकिनार कर दें तो हम विज्ञान की उत्पत्ति को वैज्ञानिक आधार की संभावना से वंचित कर विज्ञान के इतिहास को सौभाग्यशाली संयोगों की श्रृंखला मान कर हास्यास्पद स्थिति में पहुँच जायेगें,जबकि विज्ञान स्वयं अपना इतिहास है और यह सदा संदेहास्पद संयोगों के पीछ तर्क खोजता हुआ आगे बढ़ा है”।

इस प्रकार यह नहीं माना जा सकता कि विज्ञान ऐसे प्रतिभाशाली लोगों की रचना है,जो कि विशुद्ध वैज्ञानिक कारणों पर उन समस्याओं के साथ सोचते रहते हैं जो उनके दिमाग के किसी कोने से उपजती हैं। यद्यपि हर युग और समाज में कुछ प्रतिभाशाली लोग होते हैं,लेकिन वे किस तरह अपनी प्रतिभा का इस्तेमाल करेंगें, यह उनके वातावरण परिवेश, परिस्थितियों एवं उस भाषा पर निर्भर करता है, जिसे वे विचार के लिए चुनते हैं। मस्तिष्क के लिए बिना विचार के बने रहना उतना ही असम्भव है,जितना कि शरीर के लिए बिना गति के बने रहना ,लेकिन विचार भाषा के बग़ैर सम्भव नहीं है और न ही भाषा अपनी सामाजिक बुनावट एवं सांस्कृतिक राजनीति से मुक्त है। नारीवादी सिद्धांतकार एवलेन फॉक्स केलर (Evelyn Fox Keller) पियाजे एवं अन्य मनोविश्लेषकों के आधार पर कहती हैं कि मनुष्य के रूप में एक बच्चे के बड़े होने की पूरी प्रक्रिया न केवल सामाजिक वरन् संज्ञानात्मक स्तर पर भी,सांस्कृतिक रूप से भाषा और परिवेश द्वारा निर्देशित होती है  और इस तरह सिमोन की प्रसिद्ध उक्ति “स्त्री पैदा नहीं होती,बनायी जाती है”और भी व्यापक स्तर पर मनुष्य मात्र के अपने सांस्कृतिक परिवेश के मुताबिक गढ़े जाने की इस नई बात तक पहुँचती है कि “मनुष्य पैदा नहीं होता,गढ़ा जाता है”।चूंकि किसी विशिष्ट सामाजिक परिवेश के अन्तर्गत जन्मा कोई भी ज्ञान उस परिवेश से परे नहीं हो सकता,विज्ञान भी इसका अपवाद नहीं है। चौदहवीं से उन्नीसवीं सदी के बीच यूरोपियन रेनेसां के साथ जिस आधुनिक विज्ञान की नींव पड़ी,वह कोई अचानक से पैदा हुई चीज नहीं थी बल्कि उससे पहले के वैज्ञानिक विकासों के साथ उसकी घनिष्ठ सम्बद्धता थी। आधुनिक विज्ञान की खास बात सिर्फ़ यह थी कि उसके पास अपनी एक विशिष्ट प्रविधि थी जिसके बल पर वह प्रकृति के नियमों की ‘तथाकथित’ वस्तुनिष्ठ व्याख्या कर सकने में सक्षम था। आधुनिक विज्ञान द्वारा वस्तुनिष्ठता एवं सार्वभौमिकता के दावों के पीछे छिपे सत्ता सम्बधों और वर्ग चरित्र को आधार (Base) और अधिसंरचना (Superstructure) के आधार पर व्याख्यायित करने और दुनिया के सामने लाने का काम सबसे पहले मार्क्स ने किया,लेकिन मार्क्स ने सत्ताधारी वर्ग के हथियार के रूप में विज्ञान की निरपेक्षता पर सवाल नहीं उठाया बल्कि सब कुछ प्रयोगकर्ता (वर्ग के रूप में) की नीयत पर छोड़ दिया,पर दरअसल बात इतनी आसान नहीं थी –



अपनी किताब ‘परिवार, निजी संपत्ति और राज्य की उत्पत्ति’ में एंगेल्स बताते हैं कि दुनिया का पहला वर्ग विभाजन स्त्री और पुरूष के बीच हुआ, लेकिन यह नहीं बताते कि उत्पादन पद्धतियों में हुए बदलावों और शोषक-शोषित के बदलते संबंधों के बावजूद स्त्री और पुरुष का यह जेंडरगत विभाजन, जहाँ पुरुष शासक और स्त्री शासित के रूप में थी, लगातार कैसे कायम बना रहा? सहमतिमूलक वर्चस्व पर आधारित पुरुष की यह सत्ता इतिहास की क्रांतियों,समाज में हुए आमूलचूल परिवर्तनों और विज्ञान में पैराडाइमों के ‘शिफ्ट’होने के बावजूद नहीं बदली बल्कि इसने लगातार परिस्थितियों के हिसाब से ख़ुद को ढाला और मजबूत किया। मार्क्सवाद की सीमा यही रही  कि स्त्री और पुरुष के बीच वर्ग विभाजन को स्वीकार करने के बावजूद यह शोषक एवं शोषित दोनों ही वर्गों के भीतर शासित स्त्री के परिप्रेक्ष्य को नजरंदाज कर देता है और शासक वर्ग के साथ हितबद्ध विज्ञान के सत्ता संबंधों को व्याख्यायित करने के बावजूद अधिक व्यापक स्तर एवं अधिक गहरे तक जड़ जमाये पितृसत्ता एवं पुरुष श्रेष्ठताबोध की धारणा के विज्ञान पर पड़े प्रभाव और इस तरह निर्मित ‘पुरुषीय विज्ञान’ (MasculineScience) की समझ को भी नहीं पकड़ पाता। ज्ञानशास्त्रीय स्तर पर यह विज्ञान को निरपेक्ष एवं अंतिम सत्य मान लेता है और प्रकृति के निश्चित नियमों की अपने परिप्रेक्ष्य से गढ़ी गई हितबद्ध व्याख्या में ‘कर्ता’ (बुर्जुआ या सर्वहारा के अतिरिक्त स्त्री या पुरुष,श्वेत या अश्वेत, उपनिवेशक या उपनिवेशित,सवर्ण या अवर्ण) की सचेतन अथवा अचेतन भूमिका पर ध्यान नहीं देता जबकि आधुनिक विज्ञान यदि बुर्जुआ के लिए एक हथियार था जिसे उसने अपने फायदे के लिए एक काल विशेष (रेनेसां) में गढ़ा था तो यह पितृसत्ता के लिए भी खु़द को वैध ठहराने का (मनगढन्त व्याख्याओं द्वारा) एक ज़रिया था जैसे कि धर्म।

विज्ञान की वस्तुनिष्ठता,सार्वभौमिकता एवं निरपेक्षता की धारणाएं इसीलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि ये उसे अंतिम,प्रमाणिक एवं एकमेव सत्य की उसी परम स्थिति में पहुँचा देती हैं,जो धर्म के माध्यम से ईश्वर तक पहुँचती थी और जिसे प्रश्नांकित कर सकना उस समय सम्भव नहीं था। इस प्रकार जिस तरह एक लम्बे समय तक धर्म अपने नैतिक नियमों एवं मूल्यों के माध्यम से पितृसत्ता को मजबूत करता रहा था,उसी तरह विज्ञान भी अपने नियमों एवं सिद्धांतों की आड़ में पितृसत्ता को लगातार बनाये और बढ़ाये रहने की कोशिशे जारी रखता है। विज्ञान की श्रेष्ठता को लेकर एक आम धारणा यह है कि प्रबोधन की परियोजना में विज्ञान का सबसे महत्वपूर्ण गुण आत्मप्रश्नेयता (Reflexivity) का है।  विज्ञान और तर्कबुद्धि दोनों की प्रकृति अपने आप को हमेशा कठघरे में खड़े रखने की है। विज्ञान अपने आप को गलत सिद्ध करने के प्रयास में आगे बढता है और अधिक व्यापक और अधिक गहरे सिद्धांतों तक पहुँचता है लेकिन विज्ञान में आत्मप्रश्नेयता का यह गुण जो उसे धर्म से अलग करता है,इसलिए सम्भव है क्योंकि आधुनिकता (जो आधुनिक विज्ञान के साथ अंतर्गुम्फित है) में आत्मप्रश्नेयता का तत्व अपने सतत परिमाणात्मक रूपान्तरण के लिए जरूरी है। मार्क्स के शब्दों में कहें तो “बुर्जुआ,तकनीक और अर्थव्यवस्था में लगातार परिवर्तन किए बिना जिंदा नहीं रह सकता”।अर्थात आधुनिकता, मध्ययुग से व्यतिक्रमिक और उसके साथ अर्थ व तकनीक स्तर पर तो आलोचनात्मक रवैये पर ही आधारित विकास है,लेकिन दार्शनिक स्तर पर स्वयं की अपनी संरचनात्मक प्रक्रिया या कमियों की ओर आलोचनात्मक होने के बजाय आत्ममुग्ध ही नज़र आती है।  रविन्द्र कौत्सायन कहते हैं कि यदि प्रबोधन या आधुनिकता की अन्तर्भूत दार्शनिक बनावट में आत्मप्रश्नेयता का तत्व समाहित होता तो फिर प्रबोधन की कथित सबसे अग्रणी समाजवादी संरचनाएं क्यों आत्मप्रश्नेयता के संदर्भ में लगातार विकसित होने के बजाय या कि स्वयं को प्रश्नों के घेरे में रखने के बजाय प्रश्नाकुलता से नाता तोड़ आस्थावादी बंद संरचनाओं में तब्दील होकर अंततः ढह जातीं?दरअसल यह धर्म या विश्वास की तरह बंद छोर वाली संरचनात्मक प्रक्रिया में तब्दील होने से ही सम्बंधित मसला है,जहाँ आत्म प्रश्नेयता के सर्व अन्वेषी खुले छोर वाले चरित्र का नकार हो जाता है।



इस प्रकार हम पाते हैं कि जिस तरह धर्म,पूर्व आधुनिक समाज की सत्ता संरचना से हितबद्ध था,उसी तरह विज्ञान आधुनिक सामाजिक संरचना का मूल आधार बनता है। अपने आप में धर्म का मूल एजेण्डा ईश्वर को स्थापित करना भले ही नज़र आता हो,लेकिन उसका असली और छिपा हुआ एजेण्डा आचार संहिता को स्थापित कर लोगों के आचार-व्यवहार को तय करना है ,जो कि ईश्वरीय कथनों और धार्मिक मूल्यों के नाम पर तर्कातीत,निरपेक्ष, सार्वभौमिक और परम सत्य घोषित किया जाता है। विज्ञान भी आधुनिकता के साथ नई आचार संहिता गढता है और प्रायोगिक,वस्तुनिष्ठ,सार्वभौमिक एवं वैज्ञानिक सत्य के रूप में धार्मिक मूल्यों पर वैज्ञानिक मूल्यों की विजय और उनके स्थानापन्न के बतौर सामने आता है। यह कुछ वैसा ही था, जैसा कि इब्राहिम लोदी को हराकर बाबर का दिल्ली की सल्तनत पर कब्जा कर लेना,जिसका शासकों, सल्तनतों और वंशों का इतिहास लिखने वाले इतिहासकारों की नज़र में तो बड़ा महत्व था,लेकिन आम उत्पीड़ित जनता (प्रजा) के लिए,यह कोई महत्वपूर्ण घटना नहीं थी। धर्म और विज्ञान दोनों ही अपनी संरचना में एक ख़ास वर्ग (बुर्जुआ), ख़ास नस्ल (श्वेत यूरोपियन) और ख़ास जेंडर (पुरुष) के द्वारा एक ख़ास समय में निर्मित हुए और दोनों का ही घोषित उद्देश्य मनुष्य मात्र का कल्याण और विकास था लेकिन इन घोषित उद्देश्यों के पीछे सत्ता संरचना में अन्तर्निहित कुछ अघोषित लक्ष्य भी थे। नारीवादी परिप्रेक्ष्य से कहें तो ‘ईश्वरीय सत्य’एवं ‘वैज्ञानिक ज्ञान’दोनों ही पुरुष के नज़रिए से पुरुष का देखा हुआ ‘यथार्थ’था और स्त्री का ‘सच’ इस पूरे परिदृश्य से बाहर था। चूंकि ज्ञान-विज्ञान की धारणाएं और उनकी विकास प्रक्रिया सामाजिक संरचनाओं से मुक्त नहीं हो सकती और प्राकृतिक दर्शन से लेकर आधुनिक विज्ञान के उद्भव तक स्त्री और पुरुष के बीच जेंडरगत विभाजन और स्त्री पर पुरुष की सत्ता लगातार बरकरार रही है, इसलिए जैसाकि केलर कहती हैं कि तथाकथित निरपेक्ष आधुनिक विज्ञान जन्म के साथ ही पुरुष के पक्ष में ‘जेंडराइज्ड विज्ञान’रहा। केलर इस जेंडराइज्ड विज्ञान को ‘मैस्कुलिन साइंस’ (पुरुषीय विज्ञान) कहती हैं, जो सामाजिक संरचना में अंतर्व्याप्त विश्वासों (systemofbeliefs) से जन्मता है और ये विश्वास उस सांस्कृतिक बनावट का हिस्सा होते हैं जो भाषा,विचार एवं परिवेश से किसी मनुष्य को गढ़ती है। सामाजिक संरचना में पुरुष की श्रेष्ठता जहाँ धर्म के अन्तर्गत ईश्वर को पुरुष साबित करती है, वहीं विज्ञान भी ‘वस्तुनिष्ठ’ होने के कारण पुरुषीय सिद्ध होता है जबकि पेंटिंग,लेखन या मानविकी के अन्य विषय स्त्रैण घोषित कर दिए जाते हैं।

अपने-अपने समय में धर्म और विज्ञान दोनो ही अंतिम सत्य के रूप में ख़ुद का जो आभामण्डल रचते हैं, उसकी आक्रान्तक चकाचौंध से बच सकना आसान नहीं होता। विशेषतया उनके शुद्ध एवं आदर्श रूपों में उनकी सत्ता संरचना एवं हितबद्धता को समझना (विशेष रूप से विज्ञान की) एक मुश्किल काम है,लेकिन सैद्धांतिक नियमों के व्यवहारिक अनुप्रयोग अपेक्षाकृत अधिक स्पष्टता के साथ हमें एक नए परिप्रेक्ष्य से नया सच दिखाते हैं। जैसे कि धर्म के मूल पाठ (टेक्स्ट) की परिस्थितियाँनूकूल विभिन्न व्याख्याओं के बजाय धार्मिक कर्मकांड,मिथक,मान्यताएं और क्रियाकलाप उसकी संरचना में निहित तत्वों को खोजने में अधिक आसान विकल्प होंगें। इसी तरह तकनीकी विकास के जेंडर विश्लेषण के आधार पर विज्ञान के जेंडराइज्ड एवं मैस्कुलिन होने की बात अधिक आसानी से कही जा सकती है। केलर के अनुसार विज्ञान के ‘जेंडराइजेशन’का आधार सिर्फ वे तरीके नहीं हैं,जिन्हें वह प्रयोग करता है बल्कि ‘यथार्थ’की वे व्याख्याएं है,जो विज्ञान देता है और जिसके साथ वैज्ञानिक की निर्मिति का घनिष्ठ अन्तर्सम्बंध होता है। विज्ञान दुनिया को समझने के क्रम में उसे दो भागों में बांटता है- पहला Known (Mind) यानि ज्ञाता और दूसरा Knower (Nature) यानि जानने योग्य। स्वयं को ज्ञाता (कर्ता) की स्थिति में रखते हुए वह प्रकृति को ‘जाने जा सकने वाले’एक ‘ऑब्जेक्ट’ की तरह देखता है। प्रकृति एक स्त्री है,जिसके रहस्यों (नियमों) को जानना विज्ञान (पुरुष) का अधिकार है ताकि उस पर नियंत्रण कायम किया जा सके। प्रकृति और विज्ञान के बीच का सम्बंध स्त्री-पुरुष के पारम्परिक संबंधों की तरह ही है जहाँ प्रकृति (स्त्री) नियंत्रित एवं विज्ञान (पुरुष) नियंत्रक की भूमिका में है और यह पितृसत्ता की मजबूती के साथ लगातार और भी दृढ़ हुआ है जैसे कि अपनी प्रारम्भिक अवस्था से आज के आधुनिक विज्ञान तक पूरा विकास प्रकृति के साथ सामंजस्य से शुरू होकर उस पर अधिकाधिक नियंत्रण हासिल करने की महत्वाकांक्षा तक पहुँचा हैं। उन देशज समुदायों में जहाँ पितृसत्ता की जड़ें बहुत मजबूत नहीं है विज्ञान आज भी प्रकृति पर नियंत्रण की बजाय,प्रकृति के साथ समन्वयवादी संबंधों पर आधारित दिखता है।



फ्रायड,पियाजे एवं अन्य मनोविश्लेषकों के कामों के आधार पर जहाँ केलर वस्तुनिष्ठता एवं जेंडर के विकास का संज्ञानात्मक स्तर पर विश्लेषण करते हुए विज्ञान को पुरुषीय (मैस्कुलिन) साबित करती हैं,वहीं सैन्ड्रा हार्डिंग ऑब्जेक्टिविटी (वस्तुनिष्ठता) के विरूद्ध सब्जेक्टिविटी (विषयनिष्ठता) को “स्ट्रांग ऑब्जेक्टिविटी”के बतौर पेश करती है और ‘मेथडोलॉजी’के बल पर खुद को श्रेष्ठ साबित करते विज्ञान के ‘मेथड्स’पर ही सवाल उठाते हुए फेमिनिस्ट स्टैंडप्वांइट की अवधारणा देती हैं, लेकिन न तो फेमिनिस्ट आंदोलन कोई एक दिन की बात थी और न ही विज्ञान के जेंडर विश्लेषण के अन्तर्गत सैन्ड्रा हार्डिंग और केलर द्वारा वैज्ञानिक ज्ञान की वस्तुनिष्ठता एवं निरपेक्षता को चुनौती कोई आकस्मिक घटना थी। यह सब एक क्रमिक विकास प्रक्रिया के अन्तर्गत ही था। यह अनायास नहीं था कि ‘मैरी वोल्ट्सनक्राफ्ट’और ‘जे. एस. मिल’ जब स्त्रियों की मुक्ति और उनकी स्थितियों में सुधार की आवाज उठा रहे थे,उस समय औद्योगिक क्रांति और पूंजीवाद को अपने विकास के लिए स्त्री को घर की चारदीवारी से बाहर निकालना आवश्यक था। इस बात में कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि प्रकृति,समाज,विज्ञान औरसामाजिक-सांस्कृतिक संरचनाएं एक-दूसरे से घनिष्ठ रूप से अंतर्संबंधित हैं और एक-दूसरे के विकास को प्रभावित करती और उससे प्रभावित होती हुई आगे बढ़ती हैं और यह प्रक्रिया सिर्फ चेतन स्तर पर ही नहीं, बल्कि अचेतन/अवचेतन स्तर पर भी चलती है। कई जटिल एवं संश्लिष्ट चरणों में सम्पन्न यह प्रक्रिया कई बार अनेक अन्तर्विरोधों को जन्म देती है,जिसके अप्रत्याशित परिणाम सामने आते हैं। उदाहरण के लिए धर्म और आधुनिकता की बात की जा सकती है। यद्यपि धर्म और आधुनिकता का सम्बंध विरोधी नज़र आता है क्योंकि आधुनिक मूल्य, धार्मिक एवं रूढ़िवादी बंधनों को तोड़कर ही पैदा होते हैं,लेकिन आधुनिकतावादी राज्य से औपचारिक सम्बंध विच्छेद के बावजूद यह “निजी मामले”की आचार-संहितापरक ‘छूत’की तरह परिवार से लेकर सामाजिक-सांस्कृतिक संरचना तक गहन रूप से मौजूद रहता है और इस तरह शीघ्र ही आधुनिकता के साथ नया अधिसंरचनात्मक सम्बंध स्थापित कर लेता है। महत्वपूर्ण यह है कि आधुनिकता एवं धर्म के गठजोड़ की यह प्रक्रिया सिर्फ़ कोई राजनैतिक प्रक्रिया नहीं है,बल्कि यह सांस्कृतिक वर्चस्व की जटिल संरचनात्मक प्रक्रिया है,जो कि रोजमर्रा के क्रियाकलापों, मूल्यों आदि के साथ-साथ मानसिक बनावट से भी सम्बंधित है।  इस प्रक्रिया में कई रोचक अन्तर्विर्रोध भी सामने आते हैं,जिसके अन्तर्गत आधुनिक भौतिकी के महान नाम आइजेक न्यूटन जितना समय विज्ञान और गणित के सिद्धांतों पर लगाते हैं,उससे कई गुना ज्यादा बाइबिल की व्याख्या और अंधविश्वास से प्रेरित अलकीमियाई (alchemist) प्रयोगों पर खर्च करते हैं। अल्बर्ट आइंसटीन ईश्वर की दुहाई देने से बाज नहीं आते और कई भारतीय वैज्ञानिक व्रत एवं उपवास रखते हुए प्रयोगशालाओं में काम करते हैं।  इसका कारण वह संस्कृति-परम्परा है,जिसका व्यक्ति की बनावट में महत्वपूर्ण योगदान होता है किसी निश्चित संस्कृति से निर्मिति व्यक्ति उस संस्कृति का वाहक भी होता है और इस प्रकार उस संस्कृति का पुनरूत्पादन होता रहता है लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि सब कुछ यथास्थित बना रहता है। वर्चस्व के भीतर से ही वर्चस्व के विरूद्ध प्रतिरोधी स्वर भी सामने आते है जिनका उद्देश्य नये सांस्कृतिक मूल्यों की रचना करना होता है। इन नये सांस्कृतिकमूल्यों की स्थापना की कोशिशें अन्य सामाजिक-आर्थिक अन्तर्प्रभावों के साथ मिलकर नया ज्ञान-विज्ञान रचती हैं। उदाहरण स्वरूप धर्म और विज्ञान दोनों के ही सांस्कृतिक वर्चस्व का जरिया होने के बावजूद पूर्व आधुनिक धार्मिक मूल्यों से आधुनिक वैज्ञानिक चेतना का विकास इसी रूप में हुआ है। बुर्जुआ आधुनिकता की आवश्यकता के रूप में ही सही,आधुनिक विज्ञान का आत्मप्रश्नेयता का गुण,उसे धर्म के आगे का कदम तो साबित करता ही है। नारीवाद और सबाल्टर्न के अन्य विमर्श यदि विज्ञान की सांस्कृतिक वर्चस्वता को चुनौती दे सके तो इसके पीछे विज्ञान की आत्मप्रश्नेयता का वह गुण ही था,जिसने पहले तो स्त्री-पुरुष के बीच की धर्म द्वारा गढी असमानता का वैज्ञानिक आधारों पर खंडन किया,जिसके फलस्वरूप नारीवादी आंदोलन का शुरूआती आधार खड़ा हुआ और आगे चलकर वस्तुनिष्ठता,निरपेक्षता एवं सार्वभौमिकता के अपने ही दावों का खंडन किया (सापेक्षता सिद्धांत) जिसने नारीवादी ज्ञानशास्त्र का आधार तैयार किया। इसी क्रम में वह अपनी प्रविधि पर सवाल उठाते हुए किसी ‘निश्चित’एवं ‘निर्धारित’एकमेव सत्य से ‘अनिश्चित’एवं ‘अनिर्धारित’‘बहुल सत्यों’तक पहुँचा,  (क्वांटम भौतिकी की नील्स बोर द्वारा की गई अर्थ-व्याख्या) ,जिससे ज्ञान-विज्ञान शक्ति संबंधों (ज्ञान ही शक्ति है) को समझते एवं सामने लाते उत्तर आधुनिक विमर्शों से लेकर सबाल्टर्न तक का वैज्ञानिक आधार तैयार होता है। चूंकि सामाजिक एवं वैज्ञानिक विकासों के मध्य एक घनिष्ठ अन्तर्सम्बंध होता है,इसलिए वैज्ञानिक वस्तुनिष्ठता एवं निरपेक्षता का खंडन करता सापेक्षता सिद्धांत नारीवादी ज्ञानशास्त्र में फेमिनिस्ट स्टैंडप्वांइट का आधार देता है, जो आगे चलकर नारीवाद के भीतर ही अलग-अलग धाराओं के रूप में विकेन्द्रित स्टैंडप्वांइट्स अख्तियार करता है।



विज्ञान और सबाल्टर्न के बीच वस्तुगतता और विषयगतता की पूरी बहस का मूल आधार विज्ञान की उस आत्मप्रश्नेयता से ही जन्मता है,जो सापेक्षता सिद्धांत के अन्तर्गत अपनी ही ‘वस्तुगतता’को नकारता है। यद्यपि विज्ञान की इस आत्मप्रश्नेयता का यदि व्यापक सामाजिक प्रभाव नहीं दिखता तो इसका कारण आधुनिक विज्ञानवाद की वे विश्लेषणात्मक और विखंडित सीमाएं हैं,जिसके कारण कथित सामाजिक विज्ञान प्राकृतिक सरोकारों से बेगाने नज़र आते हैं  और जिसके पीछे आर्थिक,राजनीतिक सांस्कृतिक सत्ता संरचनाओं की एक जटिल प्रक्रिया काम करती है। विज्ञान की आत्मप्रश्नेयता विज्ञान तक ही सिमट कर रह जाती है और उसके दार्शनिक सामाजिक पहलुओं को नज़र अंदाज कर दिया जाता है। लेकिन सापेक्षता सिद्धांत इस मामले में अपवाद साबित होता है,क्योंकि सापेक्षता की धारणा के व्यापक सामाजिक निहितार्थ तत्कालीन सामाजिक परिस्थितियों में स्पष्टतया दृष्टिगोचर होते हैं। चूंकि यह दौर उपनिवेशवादी मुक्ति आंदोलनों एवं समाजवादी क्रांति के सर्वहारा संघर्षों का थाऔर मार्क्स इसके पहले विज्ञान की वर्ग सापेक्षता को सिद्ध कर चुके हैं,ऐसे में सापेक्षता सिद्धांत दरअसल मार्क्स की वर्ग-सापेक्ष सैद्धांतिक अवधारणा की वैज्ञानिक पुष्टि की तरह ही सामने आता है और 20 वीं सदी की क्रांतिकारी परिस्थितियों में नये ज्ञानशास्त्र के निर्माण की दिशा में महत्वपूर्ण सैद्धांतिक आधार देता है। महत्वपूर्ण बात यह है कि प्राकृतिक विज्ञान और समाज एवं सामाजिक परिस्थितियों के बीच अंतर्संबंधों को लगातार नज़रअंदाज़ किया गया है और चीजों को उनकी सम्पूर्णता में देखने के बजाय बंद दायरों में ही देखने की कोशिशें हुई हैं। स्वाभाविक है कि इसके पीछे भी सत्ता संबंधों की अपनी संरचना है,जिसके अन्तर्गत पितृसत्तात्मक समाज में पुरुष का सच ही सार्वभौमिक बना दिया जाता है। आज जब हम ‘फेमिनिस्ट साइंस’की बात कर रहे हैं तो इसका तात्पर्य पितृसत्तात्मक सामाजिक संरचना से गुंथे इस विज्ञान के बरक्स एक ऐसे वैकल्पिक विज्ञान का ख़ाक़ा ख़ींचना है,जो विभिन्न सत्ता संरचनाओं के तहत निर्मित भेदभावपूर्ण ज्ञानात्मक संबंधों से मुक्त हो। मानव समाज और प्रकृति की अंतर्क्रिया के संदर्भ में आधुनिक विज्ञान कितने खरे उतरे हैं,इस बात की आलोचनात्मक पड़ताल आज महत्वपूर्ण है। साथ ही मानवीय या सांस्कृतिक-सामाजिक सरोकारों से विज्ञान की निर्लिप्तता के चलते सामाजिकता और वैज्ञानिकता के बीच भौतिक-सांस्कृतिक अंतर्संबंधों की पड़ताल आज वर्तमान विज्ञान की मूल समस्या और उसका मुख्य कार्यभार है। फेमिनिस्ट साइंस इसी दिशा में एक प्रयास है।


संदर्भ सूची 


1. .Keller,Evelyn Fox.(1985). Reflections on Gender and Science. New Haven and London: Yale          University Press. P-3.
 2.Harding,Sandra.(1986). Science Question in Feminism. Ithaca and London: Cornell University      Press. P-135.
 3.सिन्हा, रवि. (2001, अक्तूबर-दिसंबर). आधुनिकता और आधुनिकताएं. संधान. (लाल बहादुर वर्मा,          सुभाष गाताड़े सं.) अंक-3. पृ.15.
 4. वही, पृ.16. 
 5. कोसंबी, डी.डी. (2004, फरवरी). विज्ञान, समाज और स्वतंत्रता. (पंकज बिष्ट, अनु). समयान्तर. पृ.18 
  6.  वही,
  7.   Keller,Evelyn Fox.(1985). Reflections on Gender and Science. New Haven and London: Yale             University Press. P-92.
  8.  चूंकि कोई भी सिद्धांत या दर्शन अपने देश-काल की सीमाओं से परे नहीं हो सकता, अतः मार्क्सवाद        भी  उसका अपवाद नहीं हैं। मार्क्सवाद की सीमा दरअसल उस स्थान-काल की सीमा है, जब यह              पैदा हो रहा है। स्त्री या अन्य उत्पीड़ित समुदायों के दृष्टिकोण से दुनिया तब तक नहीं देखी जा                 सकती थी जब तक संरचनावाद और उसके अगले चरण के रूप में उत्तर संरचनावाद का अविर्भाव            ना होता।
   9.   सिन्हा, रवि. (2001, अक्तूबर-दिसंबर). आधुनिकता और आधुनिकताएं. संधान. (लाल बहादुर वर्मा,          सुभाष गाताड़े सं.) अंक-3. पृ.9 
   10. कौत्सायन, रविंद्र.(2001, अक्तूबर-दिसंबर). आधुनिकता: प्रबोधन की अपरिपक्वता. संधान. (लाल          बहादुर वर्मा एवं सुभाष गाताड़े सं.) अंक-3. पृ.182.
   11.  वही.
   12.  वही, पृ.183. 
   13. Keller,Evelyn Fox.(1985). Reflections on Gender and Science. New Haven and London:                 Yale University Press. P-79.
  14. वही,
  15.   सिन्हा, रवि. (2001, अक्तूबर-दिसंबर). आधुनिकता और आधुनिकताएं. संधान. (लाल बहादुर                       वर्मा, सुभाष गाताड़े सं.) अंक-3. पृ.10 
  16.  हॉब्सबॉम, एरिक (2009). अतिरेकों का युग. मेरठ: संवाद प्रकाशन. पृ.373
  17. बोर ने ‘संपूरकता सिद्धांत’ के अन्तर्गत बताया कि प्रकृति की समग्रता की व्याख्या एकमात्र विवरण                 से  अभिव्यक्त करने का कोई मार्ग नहीं है क्योंकि मनुष्य अलग-अलग भाषाओं में बोलता है। एक ही                प्रत्यक्षतः सम्पूर्ण प्रादर्श संभव नहीं है। यथार्थ को पकड़ने का एकमात्र तरीका यह है कि विवरण                        भिन्न-भिन्न तरीकों से दिया जाए और उन्हें एक-दूसरे के पूरक के रूप में एक स्थान पर रख कर देखा                जाए।
 18. कौत्सायन, रविंद्र.(2001, अक्तूबर-दिसंबर). आधुनिकता: प्रबोधन की अपरिपक्वता. संधान. (लाल                बहादुर वर्मा एवं सुभाष गाताड़े सं.) अंक-3. पृ.84.

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सावधान ! यहाँ बुर्के में लिपस्टिक भी है और जन्नत के लिप्स का आनंद लेती उषा की अधेड़ जवानी भी

संजीव चंदन 

पुरुषों के मुकाबले हमारी यौनिकता अधिक दमित है. हमपर आचरण के जितने कड़े नियम आरोपित किये गये हैं उतने कभी भी पुरुषों पर आरोपित नहीं रहे.
केट मिलेट, सेक्सुअल पॉलिटिक्स
We’re more sexually repressed than men, having been given a much more strict puritanical code of behavior than men ever have.

“हमारी सामाजिक परिस्थितियों के कारण, पुरुष और महिला वास्तव में दो संस्कृतियां हैं और उनके जीवन के अनुभव बिल्कुल अलग हैं- और यह महत्वपूर्ण है. अंतर्निहित ”
केट मिलेट, सेक्सुअल पॉलिटिक्स
“Because of our social circumstances, male and female are really two cultures and their life experiences are utterly different—and this is crucial. Implicit”
― Kate Millett, Sexual Politics

निदेशक अलंकृता श्रीवास्तव और निर्माता प्रकाश झा की फिल्म ‘लिपस्टिक अंडर माय बुर्का’ स्त्री के यौन-अधिकार को केंद्र में रखकर बनी फिल्म है. फिल्म की कहानी एक समग्र स्त्री ‘रोजी’ की कहानी है- अपने लस्ट, अपनी यौन-कामनाओं से लबरेज स्त्री. वह काल्पनिक है, वह हर स्त्री में है, वह इस कहानी की हर पात्र के भीतर है, खुद एक पात्र नहीं है. वह किसी कामुक किताब की नायिका है, लेकिन कहानी की नैरेटर, एक फीमेल आवाज, कुछ अंतराल पर रोजी की कहानी सुनाती है, उसकी कामना, वासना की कहानी, जिसे दृश्य पात्रों के  जीवन में घटित होते  हैं.

ऊपर के दो कथनों में  सत्तर के दशक की रैडिकल स्त्रीवादी केट मिलेट अपनी किताब ‘सेक्सुअल पॉलिटिक्स’ में स्पष्ट हैं कि स्त्री के ऊपर व्यवहार और आचरण के कड़े नियम आरोपित किये गये हैं, जो उसे समान्य मनुष्य की तरह सहज नहीं रहने देते इच्छाओं का दमन और पेश आने के प्रति सम्पूर्ण सजगता उसकी सहजता के मार्ग की हैं. फिल्म की काल्पनिक नायिका रोजी इन बाधाओं से मुक्त है इसलिए अपनी कामुकता का उत्सव मनाने में सक्षम है, लेकिन जब उसका व्यवहार वास्तविक रूप में सामने आता है, वह फिल्म की अधेड़ नायिका बुआजी (रत्ना पाठक) के रूप में वास्तविक रूप से घटित होती है  तो सामाजिक विस्फोट होता है, उसे छिनाल, कुल्टा, चरित्रहीन सिद्ध कर दिया जाता है.

जन्नत के लिप्स का चुंबन बनाम यौन-आनंद का चरम और वह सीमा जहां से चरित्र शुरू होता है 


बुआजी उस पुरानी इमारत की मालकिन हैं, जहां फिल्म की पात्र रहती हैं. एक दबंग, निर्णयों के मामले में सक्षम, आर्थिक रूप से मजबूत और उदार अकेली स्त्री के पुरुष-स्त्री सभी किरायदारों के बीच रुआब है. वह म्युनिसपल काउन्सिल के अधिकारियों और बिल्डिंग पर नजर गड़ाये बिल्डरों से निपटना जानती हैं- साम-दाम हर कला में निपुण. लेकिन वह अधेड़ स्त्री जब अपनी कामनाओं को जीना चाहती है, तो उसकी सारी छवि एक ‘चरित्रहीन’ में सिमट जाती है. रोजी उसकी प्रिय कामुक नायिका है, जिसे वह फुर्सत के क्षणों में अपने पास पाती है. छिपाकर कामुक किताबें पढ़ते हुए उसके भीतर रोजी के रूप में कामनाओं का एक सोता फूटता है. और फिर वह अपने ऊपर केन्द्रित होती है. इन कामनाओं की पूर्ती के लिए वह तैराकी सीखने पहुँच जाती है और तैराकी के ट्रेनर से फोन पर रोजी बनकर कामुक बातचीत करती है. प्रत्यक्ष में वह बुआजी है तैराक भी बुआजी को जानता है, वह नहीं जानता कि बुआजी और रोजी एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, कि बुआ ही रोजी  बनकर उससे कामुक बातचीत करती हैं. तैराक उसे उसके नाम (उषा) से पुकारकर बुआजी के भीतर सुप्त स्त्री को जाग्रत तो कर देता है, लेकिन एक सम्पूर्ण जाग्रत स्त्री के खिलाफ वह खुद भी कार्रवाई का दूत और गवाह बन जाता है. प्रत्यक्षतः वह बुआजी को अपनी पारंपरिक साड़ी वाली वेशभूषा से तैराकी की वेशभूषा में आकर तैरने के साहस से भर देता है और अनजाने में फोन पर कामुक बातचीत करते हुए उसके कपड़े उतरता हुआ उसे नंगा कर देता है. उसके स्तनों से खेलते हुए पूरे शरीर पर कोमल फूल उगाते हुए उसके जन्नत के लिप्स (योनि, जिसे कामुक बातचीत के आख़िरी हिस्से में वह नाम देता है) तक आते-आते आनंद और उन्माद से भर देता है. इस रूप में बुआजी समग्र रूप से रोजी हो जाती हैं. लेकिन तभी विस्फोट घटित होता है. उसपर यह जाहिर हो जाता है कि रोजी और बुआजी एक ही हैं. वहीं उसका पूर्ण पुरुष खुद को आहत समझता है और बदले में  वह बुआजी को सार्वजनिक रूप से जलील करता है, करवाता है.

पढ़ें : लिपस्टिक अंडर माय बुर्का: क़त्ल किये गये सपनों का एक झरोखा 

कामनाओं की ‘चोरी’ : लिपस्टिक जब बुर्के के अंदर घुटने से मना कर देती  है
रोजी न सिर्फ बुआजी के भीतर  की हकीकत है, वह थोड़ी-थोड़ी हर स्त्री पात्र में घटित होती है. दुहरा दें कि नैरेटर (स्त्री आवाज) कहानी में अलग-अलग पात्रों की कहानियों के दृश्यों से दर्शकों को  रोजी की कहानी के सूत्र से ही जोड़ता है. युवा लडकी रेहाना अबीदी (प्लाबिता ठाकुर ) के भीतर भी रोजी है, जो एक ऐसी मुस्लिम लडकी है जिसका पिता ईमानपरस्त, खुदा से खौफ खाने वाला लेकिन शख्त पैट्रिआर्क है. अबीदी पर भी उतनी ही पाबंदियां हैं, जितनी ऐसे  किसी भी पितृसत्ताक पुरुष द्वारा शासित घर और सम्पूर्णता में स्त्रीविरोधी परिवेश की लडकी पर हो सकती हैं. लेकिन रोजी जैसी कामनाएं इन पाबंदियों के भीतर कितनी देर कैद रह सकती हैं, इसलिए विद्रोह करती हैं. इतनी कि वह अपनी इच्छाओं की पूर्ती के लिए फैशन की वस्तुएं भी चुरा लेती है. लेकिन अंततः उसे युवा सपनों के लिए कीमत चुकानी पड़ती है, वह फिर से कैद कर ली जाती है. उसे कैद करने में न सिर्फ उसके पितृसत्ताक पिता की भूमिका है, बल्कि उसके आजाद ख्याल दोस्तों का भी है. यहीं फिल्म की अपनी कमजोरी भी है, जिसपर आगे बात करते हैं.

ऐसी ही एक रोजी लीला (आहना) और उसकी विधवा मां ( सोनल झा) के भीतर भी है. लीला  पेंटिंग्स के न्यूड मॉडल का काम 17 वर्षों से कर रही है. मां-बेटी आजाद ख्याल हैं तभी देह और सेक्स उनके लिए बहुत हाय-तौबा का विषय नहीं है. मां का भी प्रेमी है, जो उसे फ़्लैट खरीदकर देने वाला है और बेटी भी किसी से प्रेम करती है, सेक्स भी करती है, कई बार अविश्वसनीय मौकों पर भी. मां जब उसे अपने प्रेमी के साथ सेक्स करते हुए देखती है, तो वह उसके लिए कोई अर्थ संदर्भ नहीं रखता, फिल्म के दृश्य इसे स्पष्ट कर देते हैं, जब देखकर वह उसे डांटते हुए नीचे आ गई पैंटी थोड़ा ऊपरकर अपने साथ खीच ले जाती है, क्योंकि बाहर उसकी सगाई हो रही थी. यह घटना बेटी को उसके लिए न तो बदचलन बनाती है और न ही कोई आपात प्रसंग, वह चिंतित है तो सिर्फ उसके भविष्य के लिए ताकि वह एक आर्थिक रूप से सुदृढ़ जीवनसाथी के साथ सुरक्षित हो सके. बेटी को भी अपनी न्यूड मॉडल मां और उसका प्रेम सहज स्वीकार्य है. बेटी अपने प्रेमी और  मंगेतर के बीच फंस बखूबी मैनेज तो कर ले रही है लेकिन वह आखिर तक संभव नहीं हो पाता.  इसपर आगे बात करते हैं.

और एक रोजी घुटती है शीरीन असलम (कोंकना सेन) के भीतर. वह अपने पति से आतंकित है. अपनी इच्छा के विपरीत उससे सेक्स करने को बाध्य है. पति बलात संबंध बनाता है, अप्राकृतिक भी. कंडोम का इस्तेमाल नहीं करता, उसके तीन बच्चे हैं. यह सब सहते हुए पति से छिपाकर नौकरी करती है. एक सफल सेल्स गर्ल है. हर बार बेहतरीन सेल्स गर्ल का सम्मान उसे ही देती है उसकी कंपनी. पति उसके साथ सिर्फ सेक्स करता है और प्रेम दूसरी औरत के साथ. वह अपने होठों पर चुम्बन भी नहीं जानती, छुअन का अहसास भी नहीं, जो दूसरी औरत को सहज हासिल है. जब वह अपने पति के जीवन में दूसरी स्त्री के बारे में जान जाती है तो अपने तरीके से उसपर नियन्त्रण भी चाहती है और अपनी नौकरी के बारे में जाहिर भी करा देती है. जिसका आख़िरी हस्र है पति का यह बताना कि तुम बीबी हो शौहर मत बन और नौकरी भी छूट जाती है.

इन चारो ही शक्लों में रोजी का यथार्थ यही है कि वह कैद कर ली जाती है, उसके ख्वाहिशों के पर काट दिये जाते हैं.

कामनाओं के सोतों के आगे इर्ष्या का दरिया.. सेक्स का क्लाइमेक्स

अपनी कहानी और क्राफ्ट के साथ फिल्म स्त्रीवादी है और उसका विषय स्त्रियों के यौन आनंद  तक सीमित है, इसलिए उससे अधिक मुद्दों की अपेक्षा फिल्म के साथ बेमानी होगी और आलोचना का अतिरेक भी. लेकिन इस सीमित कहानी के भीतर ही ज़रा गौर करते हैं कि किन स्थितियों से बचा जाना अनिवार्य था और कौन सी स्थतियों से बचा जा सकता था, जो सिर्फ दृश्य-रोचकता और उद्दीपन के लिए निश्चित की गई हैं. लीला को  फोटोग्राफर से  प्रेम है, दैहिक प्रेम भी शामिल है, वह और उसकी मां सहज हैं इसे लेकर. जबकि उसका प्रेमी सहज नहीं है एक मर्द की तरह पजेसिव. वह उससे लड़ता है, तब जब वह सेक्स के प्रसंग में ऐसा कुछ कहती है, जिससे वह खुद को आहत महसूस करता है.  गालियाँ देता है, जलील करता है. उसके बाद भी वह उसके पास जाती है, सेक्स करती है  और आख़िरी तौर पर जलील होती है. बाहर उसका मंगेतर  गाड़ी में है, जो उसे बहुत प्यार करता है, सम्मान देता है.

दृश्य का चमत्कार पैदा करने के लिए  शायद एक सेक्स दृश्य उसकी सगाई के दौरान भी है. वह सगाई के लिए अपने मंगेतर के साथ मंच पर है, छोटे से चालनुमा  घर में थोड़ी देर के लिए लाईट चली जाती है और वह अपने प्रेमी के साथ सेक्स करने पहुँच जाती है. क्या किसी लडकी के भीतर ऐसी रोजी हो सकती है, जो अपने परिवेश के भीतर कुछ ऐसा कर जाये. न यह संभव है न और सगाई करती लडकी के पास इतना समय है. लेकिन यह होता है, शायद दृश्यांकन और दृश्यों से प्रभाव की मजबूरियाँ होती होंगी.

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सवाल इससे  आगे भी है और फिल्म की अपनी राजनीति पर सवाल खड़ा करता हुआ भी कि कामानाओं के सोतों के फूटने के बाद आखिर क्या? जींस की आजादी के लिए संघर्ष करती लडकियां, आजाद ख्याल लडकियां, बिंदास म्यूजिक बैंड में गाती और पबों में घूमती लडकियां इस आजादी के बाद भी क्या पितृसत्ता द्वारा सहज बना दिये गये भावों से मुक्त हैं, या वे दूसरी लड़कियों से वैसे ही बदला लेती हैं, जैसे दूसरी सामान्य स्त्रियाँ या लोग. रेहाना के आजादख्याल दोस्त को जब पता चलता है कि वह उसके ही बॉयफ्रेंड के साथ आशिकी में है तो वह उसे बेनकाब करा देती है और सार्वजनिक रूप से जलील करती है. उसका गुस्सा अपने बॉयफ्रेंड पर कम, उसके अनुसार जिसने उसे प्रेग्नेंट कर दिया है, रेहाना पर अधिक है. इसके बाद रेहाना की जिन्दगी समाप्त हो जाती है. शीरीन भी अपने पति को ठीक करने की जगह दूसरी औरत को अपराधी के रूप में देखती है और उसे जलील करती है (मेरा चीज तो तुम अपने मुंह में नहीं ले सकती हो न के व्यंग्य के साथ). एक ओर लीला के साथ कहानी दर्शकों को सहज करती है, इंगेजमेंट के समय सेक्स के उसके अधिकार के प्रति,  प्रेमी और मंगेतर को एक साथ मैनेज करने के प्रति और दूसरी ओर अपने स्त्री पात्रों को  प्रेमी या पति के संबंधों के प्रति पारंपरिक व्यवहार करते हुए दिखाती है. सवाल यही है कि आखिर कामानाओं की आजादी क्या इन्हीं सीमाओ पर जाकर खत्म होगी? क्या कामनाओं के सोतों से आगे आग का दरिया है या शीना बोहरा का हस्र ( शीना बोहरा जेल में हैं, जिनके प्रेम संबंधों की कहानियां टीवी चैनलों की सुर्खियाँ बनी थीं.)

सवाल और भी हैं.  शीरीन असलम रोज प्रताड़ित हो बलात सेक्स झेलते हुए भी एक छुअन, एक मीठे अहसास, प्रेम और सम्मान की भूखी है. दूसरी और लीला का मंगेतर, जो कहानी में एक सीधा-सादा पात्र है अपनी होने वाली पत्नी के साथ पहला यौन संबंध इन्ही अहसासों के साथ बनाना चाहता है. वह पारंपरिक रूप से सुहागरात को यादगार अहसास देना चाहता है और अपनी मंगेतर को पूरा सम्मान भी देता है,  उसके स्वतंत्र व्यवहार के प्रति भी सम्मान. उसके साथ सुनिश्चित जीवन के बावजूद लीला अपने उद्धत जलील करते प्रेमी के साथ सेक्स करने पहुँच जाती है.  तो सवाल यही है कि कामनाओं के विस्फोट का आख़िरी हासिल क्या हो- क्या जेंडर जस्ट आचरण, व्यवहार या……

यह यथार्थ की कहानी नहीं है यह एक स्त्रीवादी स्टेटमेंट के लिए बनी कहानी है, सपनों की रोजी को यथार्ततः घटित होने की कल्पना से बनी कहानी. निश्चित तौर पर स्त्रियों के लिए रूढ़ आचरण संहिता को चुनौती देती कहानी. ऐसी कहानियां हमने और भी पढ़ी होंगी. मैंने तो जरूर पढ़ी-सुनी है. यथार्थतः भी  इस समाज में घटित होती हैं और कहानियों में भी. मैत्रेयी पुष्पा की चाक की अधेढ़ चाची कलावती खुद को अक्षम मानते पहलवान दामाद के साथ सेक्स कर उसकी मनोवैज्ञानिक ग्रंथी तोडती है. एक कहानी पढी थी, पंजाबी की, अंग्रेजी में अनूदित. नियत 15 दिन में मरने वाले देवर की आँखों में मरने के पहले एक बार सेक्स का अनुभव की मांग देखकर भाभी  खुद को ही प्रस्तुत करती है, एक कुंठा रहित निर्णय. रोजियाँ हमारे इर्द-गिर्द भी हैं, उषा बुआ हमारे आस-पास भी.

चेतावनी: संघी उन्माद में फंसे हिन्दू इन गलियों में न फटकें, यहां बुर्के की लड़कियों के अलावा लीला भी हैं और उषा बुआ भी


फिल्म के आख़िरी दृश्य में एक ही इमारत के नीचे जीने वाली नायिकाएं एक कमरे में इकट्ठे मिलती हैं. उषा बुआ जलील हो चुकी हैं. सार्वजनिक रूप से अपमानित शीरीन को नौकरी छोड़ देने का फरमान उसके पति द्वारा दिया जा चुका है. रेहाना के अब्बू ने उसकी पढाई छुड़ा उसे घर बैठा दिया है और लीला का मंगेतर इस बात पर बिफरकर उससे अलग हुआ है कि उसके मोबाइल से वह यह भी जान गया है कि लीला सगाई के दिन भी मौक़ा मिलते ही प्रेमी के पास सेक्स के लिए पहुँच गई थी.  और आख़िरी दृश्य में सारी नायिकाएं एक साथ कमरे में सिगरेट के धुंए में हर फ़िक्र उडाये जा रही हैं. निस्संदेह सिगरेट पीना आजादी नहीं है, लेकिन हाँ यहाँ सिगरेट आजादी के अहसास को जाहिर करने का जरिया जरूर है.

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चेतावनी इसलिए कि सोशल मीडिया में शायद बिना फिल्म देखे संघी उन्माद में फंसे हिन्दू नाम ‘लिपस्टिक अंडर बुर्का’ के आधार पर यहाँ अपने शत्रुओं की स्त्रियों  के कुछ सीक्रेट जाहिर होने के अंदाज में फिल्म का स्वागत कर रहे हैं. वे सावधान हो जाएं उन्हें यहाँ उषा बुआ ‘जन्नत के लिप्स’ पर चूमे जाने के अहसास से ही आनंद-अतिरेक में दिखेंगी और लीला और उसकी विधवा मां सच्चरित्र स्त्रियों के सारे नियम-बंधन तोड़ती दिखेंगी.

लेखक स्त्रीकाल के संपादक हैं. 

लिव-इन- संबंध एवं जातीय संरचना

विकाश सिंह मौर्य

दुनिया भर के मुल्कों के बाशिंदों के लिए इक्कीसवीं सदी की शुरुआत भारी झंझावातों के साथ हुई है. इन झंझावातों की पूर्वपीठिका बीसवीं सदी के आखिरी दो दशकों की बौद्धिक, राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक घटनाक्रमों में निहित कही जा सकती है. इक्कीसवीं सदी के प्रारंभिक प्रघटनाओं  का विश्लेषण करने का प्रयास करें तो पाते हैं कि तीसरी दुनिया के परिधीय देशों का आर्थिक-सांस्कृतिक शोषण बहुआयामी स्वरुप में बढ़ा है. इस बीच दक्षिण एशियाई राष्ट्र-राज्यों के अन्दर कुछ ऐसी परिघटनाएं बहुत स्पष्टता के साथ परिलक्षित हुई हैं, जिन्हें ‘नया’ और ‘विघटनकारी’ की संज्ञा से संज्ञायित किया जा रहा है.

प्रस्तुत शोधपत्र में इन्ही सामाजिक-सांस्कृतिक झंझावातों से उत्पन्न परिघटना (जैसा कि अधिकांश विद्वान मानते हैं) ‘लिव-इन-रिलेशनशिप’ का ‘जातीय संरचना’ के साथ अंतर्क्रियात्मक संबंधों का समाज वैज्ञानिक अध्ययन ऐतिहासिक पूर्वपीठिका में किया गया है. इसका अध्ययन क्षेत्र बनारस लिया गया है. बनारस को अध्ययन क्षेत्र के रूप में चुनने का मेरा प्रमुख कारण यहाँ की जीवंत प्राचीन संस्कृति है, जिसने प्राचीन काल से मध्य काल तक के बौद्धिक एवं आधुनिक भारत के राजनीतिक बुद्धिजीवी वर्ग को खासतौर पर हिंदुत्व कि राजनीति को एक शसक्त नेतृत्व प्रदान किया है. इस नेतृत्व में शामिल हैं, महाकारुणिक तथागत गौतम बुद्ध, पार्श्वनाथ एवं मध्यकाल में सन्त कबीर, रविदास और ब्राम्हणवादी चेतना के जड़त्व के घोर अंधकार के दौर में मीरा बाई का आन्दोलन और उनका प्रेरणास्रोत बनारस के एक फ़क़ीर रविदास का होना. इतना ही नहीं ब्राम्हणों के सत्ता के साथ समझौतों के परंपरा का विस्तृत प्रचार-प्रसार जिस तुलसीदास ने किया, उसकी शुरुआत भी बनारस से ही हुई है. आधुनिक भारतीय समाज, कम से कम हिंदी पट्टी का समाज और यहाँ कि राजनीति (राष्ट्रीय राजनीति सहित) तो इन्ही मान्यताओं, पूर्व मान्यताओं के वशीभूत अपने जीवन दर्शन को भ्रमित आधुनिकताबोध के साये में संचालित कर रहा है.

अवधारणात्मक स्पष्टीकरण

लिव-इन-सम्बन्ध पर कुछ भी लिखने व कहने से पहले इसको अवधारणात्मक स्तर पर समझ लेना आवश्यक है. लिव-इन-सम्बन्ध को लेकर अवधारणा के स्तर पर कतिपय भ्रांतियां हैं, इनके मध्य समन्वय स्थापित करते हुए मैं अपना विश्लेषण प्रस्तुत करने का प्रयास करूँगा. पहली भ्रान्ति तो इसी सवाल को लेकर है कि लिव-इन-सम्बन्ध कहा किसे जाय? इस मुद्दे पर तीन दृष्टियाँ हैं-
1. ऐसे अविवाहित या कोई एक अविवाहित युवक-युवती/स्त्री-पुरुष जो एक साथ एक ही घर में रहते हों तथा उनके मध्य यौन सम्बन्ध हों.
2. ऐसे अविवाहित जोड़े जो एक साथ एक ही आवास में निवास करते हों, परन्तु उनके मध्य यौन सम्बन्ध स्थापित न हों.
3. ऐसे अविवाहित या विवाहेत्तर युवक-युवती/स्त्री-पुरुष जिनके बीच यौन सम्बन्ध सहमति पूर्वक स्थापित हों परन्तु वे साथ में रहते न हों.

इस तरह से हम पाते हैं कि इन तीन दृष्टियों के अलावा कुछ मुद्दों पर सामान्य सहमति भी पाई गयी है. इनमे से भावनात्मक सहयोग, विवाहेत्तर सम्बन्ध, स्थापित सामाजिक संरचना में स्त्री-पुरुष संबंधों में बिखराव, यौन इच्छा की तृप्ति, परस्पर सहयोग, अस्थाई सम्बन्ध होना आदि.

लिव-इन-संबंधों की ऐतिहासिकता का सामान्य विश्लेषण


लिव-इन-सम्बन्ध पारंपरिक भारतीय समाज के लिए अतिसंवेदनशील प्रघटना है जिसे विद्वानों (बौद्धिक कहे जाने वाले भारतीय) ने सामान्य जन के सामने एक चुनौती के रूप में प्रस्तुत किया है. यहाँ पर मैं लिव-इन-संबंधों की ऐतिहासिकता का आलोचनात्मक अध्ययन करना चाहूँगा.

हिन्दुत्ववादी वैचारिकी के समर्थक विद्वान लिव-इन-संबधों को पश्चिमी संस्कृति का उत्पाद मानते हैं तथा इसके भारत में प्रवेश करने के पीछे पश्चिमी सांस्कृतिक मूल्यों का भारत में अविच्छिन्न प्रवाह को कारण मानते हैं. ये विद्वान् लिव-इन-संबधों को भारतीय समाज के लिए नकारात्मक प्रभाव वाली विघटनकारी प्रघटना मानते हैं. किन्तु ऐसे राष्ट्रवादी तथा हिन्दुत्वादी विद्वानों के साथ समस्या यह है कि यह विद्वत मंडली ब्राम्हणवादी परंपरा के श्रेष्ठताबोध से ग्रसित है. ये विद्वान् प्रत्येक उस ज्ञान, वस्तु, परंपरा, संस्था आदि का विरोध करते हैं जो इनकी पारंपरिक सत्ता संरचना को चुनौती प्रस्तुत करता हुआ प्रतीत होता है.  संरक्षणवादी तथा पारंपरिक यथास्थितिवादी ये विद्वान् अपने वर्गहित के लिए कई बार तथ्यों का निर्माण खुद कर लेते हैं तो कई बार तथ्यों को ऐसे तरीके से प्रस्तुत करते हैं कि उन तथ्यों का मूल मंतव्य ही ओझिल हो जाता है. ऐसे में जियाउद्दीन के शब्दों में कई बार बहस (संवाद नहीं) का स्वरूप झूठ बनाम झूठ का हो जाता है और भारतीय समाज का कराहता हुआ सच समूचे बौद्धिक परिदृश्य से सुनियोजित तरीके से बाहर कर दिया जाता है. इसका सामाजिक परिणाम भी घोर नकारात्मक होता है. अतः भारत के इस पारंपरिक सत्ताधारी वर्ग द्वारा प्रत्येक असफलता का जिम्मेदार पश्चिमी संस्कृति को या किसी किसी और को बताना इनके इरादों के प्रति संदेह पैदा करता है.

लिव-इन-संबधों की ऐतिहासिकता की चर्चा में आदिवासी समुदायों में पाए जाने वाले युवागृह काफी प्रासंगिक हैं. आदिवासी समाज के इन युवागृहों में एक निश्चित आयु के बाद युवक-युवतियों को एक विशेष निवास स्थान (यह प्रायः मुख्य बस्ती से दूर होता है) में एक साथ रात्रि विश्राम करने की सामजिक व्यवस्था थी.  इस संस्था के बहुत से कारणों तथा उद्देश्यों में एक प्रमुख उद्देश्य युवक-युवतियों को यौन प्रशिक्षण प्रदान करना होता था. इससे उन युवक-युवतियों को अपना जीवन साथी चुनने तथा साथ रहने की वैवाहिक स्वतंत्रता मिलती थी. ऐसे युवागृह लगभग सभी आदिवासी समाजों में पाए जाते थे. आदिवासी समाजों में महिलाओं की प्रस्थिति तथा महिला उत्पीड़न, बलात्कार आदि के अमानवीय मामलों का सभ्य समाज की तुलना में काफी कम पाया जाने का प्रधान कारण उनके युवागृहों की व्यवस्था को माना जाना चाहिए.

अब हम कुछ उद्धरण शास्त्रीय  ब्राम्हण ग्रंथों से भी लेते हैं, जहाँ पर विवाह को एक संस्कार के रूप में व्याख्यायित किया गया है. ब्राम्हण धर्मशास्त्रों में आठ प्रकार के विवाहों के की चर्चा मिलती है, जिसमे से एक प्रकार गन्धर्व विवाह का भी है. गन्धर्व विवाह के अंतर्गत स्त्री-पुरुष/ युवक-युवती स्वेच्छापूर्वक अपने जीवन साथी का चुनाव करने को स्वतंत्र थे. इसके अलावा महाभारत में कुंती और सूर्य की प्रेम कहानी और उससे जन्मा कर्ण, कुंती का वायु, इंद्र आदि के साथ संबंधों के अलोक में भी लिव-इन-संबंधों की ऐतिहासिकता परखी जा सकती है.

औद्योगिकीकरण और लिव-इन-सम्बन्ध
भारत में औद्योगिकीकरण के परिणामस्वरूप उत्पन्न सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों एवं सांस्कृतिक संक्रमण के कारण लिव-इन-सम्बन्ध के स्वरूप तथा संख्या में मात्रात्मक एवं गुणात्मक रूप से वृद्धि हुई है. इसे कार्य-कारणत्व स्वरूप में इस तरह से देखा जा सकता है.
औद्योगिकीकरण तथा शिक्षा व्यवस्था में परस्पर सम्पूरकता का सकारात्मक सम्बन्ध है. आधुनिक शिक्षा तथा औद्योगीकरण की प्रक्रियाएं आवश्यक रूप से एक दूसरे की पूरक हैं. शिक्षा और औद्योगीकरण स्वतंत्र तथा गैर पारंपरिक (कई बार तो परम्परा-विरोधी) विचारों तथा प्रक्रियाओं के साथ घनिष्ठ रूप में अंतर्संबंधित हैं. औद्योगीकरण के स्पष्ट परिलक्षित होने वाले परिणामों में औद्योगिक विस्थापन, शैक्षणिक विस्थापन तथा व्यावसायिक विस्थापन प्रमुख हैं. लिव-इन-संबंधों का इन प्रक्रियागत मूल्यों के साथ सकारात्मक सम्बन्ध है.

औद्योगीकरण के ही एक परिणाम के रूप में औद्योगिक प्रतिष्ठानों तथा व्यावसायिक प्रतिष्ठानों में युवक-युवतियों/ स्त्री पुरुषों का एक साथ काम करना है. शिक्षा संस्थानों  में भी युवक-युवतियां एक साथ अध्ययन करते हैं. ऐसे विद्यार्थी तथा औद्योगिक, व्यावसायिक प्रतिष्ठानों में कार्य करने करने वाले व्यक्ति सामान्यतौर पर अपने पैतृक आवासों से विस्थापित होते हैं. ऐसे में एक साथ काम करते हुए मनोभावनात्मक अलगाव से उत्पन्न भावनात्मक सहयोग की इच्छा (विस्थापित व्यक्तियों में भावनात्मक विषाद से ग्रसित होने की सम्भावना हमेशा ही बनी रहती है) के अलावा विपरीत सेक्स के प्रति सहज आकर्षण इनमें परस्पर प्रेम पैदा होने की प्रधान वजहों के रूप में चिन्हित की जा सकती हैं. यह प्रेम समय के साथ-साथ लिव-इन-संबंधों के रूप में परिणति को प्राप्त होता है.

लिव-इन-संबंधों की स्वीकार्यता एवं पुरुष सत्तात्मक मनोग्रंथि


इन दिनों भारतीय सामाजिक विमर्श का एक प्रमुख मुद्दा लिव-इन-संबंधों की स्वीकार्यता का है. अधिकांश मामलों में यह पाया गया है कि लिव-इन-संबंधों की सामाजिक स्वीकार्यता बहुत क्षीण होती है. काढ़ में खोज तो तब होता है जब ये सम्बन्ध जाति और धर्म की जकड़बंदी को स्वीकार करने से नकार रहे होते हैं. जाति-धर्म की दीवारों को तोड़ते हुए बनाये गए लिव-इन-संबंधों की पारिवारिक स्वीकार्यता भी लगभग असंभव हो जाती है. जाति का वर्चस्व पुरुष सत्ता की जकड़बंदी और क्रमिक असमानता की प्रक्रियाओं को बढ़ावा देने वाले प्रकार्यों कि संरचना को निरंतरता में मजबूती से पूरक रूप में सम्बंधित है .

यहां पर मैं लिव-इन-संबंधों के सन्दर्भ में पुरुष सत्तात्मक मनोग्रंथि को भी समझना चाहूँगा. भारतीय सामाजिक संरचना में पुरुष सत्तावादी मानसिकता व्यापक रूप से बहुआयामी स्वरूप में विस्तारित है. स्थिति यह है कि लिव-इन सम्बन्ध में रहने वाला या रहने की इक्षा रखने वाला एक पुरुष तो लिव-इन में रहने को अपने स्वाभिमान से जोड़कर देखता है, वहीं दूसरी तरफ इसी मामले में वह अपने घर की महिलाओं (बहन, पत्नी, बेटी) के प्रति ठीक विपरीत मनोवृत्ति से ग्रस्त रहता है. बहुत कम ऐसे अपवाद मिले हैं जहाँ परिवार के सदस्य इसे पारिवारिक और वैचारिक लोकतंत्र मानते हुए स्त्री-पुरुषों के समान पारिवारिक-सामाजिक नियमावली को स्वीकार करते हैं. उम्मीद की जानी चाहिये कि जैसे व्यक्तियों के अन्दर ‘जनतंत्रीय पवित्रता बोध’ बढ़ता जायेगा, ‘विवेकशील शिक्षा’ का स्तर बढ़ेगा तथा इन जीवन मूल्यों की व्यापकता बढ़ेगी; भारतीयों सहित दक्षिण एशियाई समाज के विचारों तथा व्यवहार में सकारात्मक जनतंत्रीय परिवर्तन उद्घाटित होंगे.

भारतीय समाज में विवाह संस्था प्रकार्यात्मक रूप से बहुत महत्वपूर्ण रही है. विवाह का महत्व बच्चों के समाजीकरण, पारिवारिक प्रकार्यों का निर्वहन, अंतर-पीढ़ीगत संबंधों से लेकर वैयक्तिक व पारिवारिक विघटन को रोकने तक रहा है. विवाह संस्था हिन्दू समाज के संयुक्त परिवार की रीढ़ रही है. स्वतंत्रता पश्चात् हुए आद्योगीकरण के बाद से विवाह संस्था के प्रकार्यों तथा उसकी प्राथमिकताओं में संरचनात्मक परिवर्तन परिलक्षित हुए हैं. तलाक की दरों में भी प्रतिवर्ष वृद्धि दर्ज की जा रही है. मुस्लिम समुदाय से अधिक तलाक हिन्दू परिवारों में हो रहे हैं. इसे स्वतंत्रता और जनतंत्रीय मूल्यों के साथ भी जोड़ने के प्रयास किये जा रहे हैं.

इक्कीसवीं सदी में उच्च शिक्षित युवाओं की संख्या में आशातीत वृद्धि दर्ज की गयी है. यहां पर शिक्षा के मूल्यों तथा शिक्षा पर एक बड़ा सवाल यह है कि, यदि जनतंत्रीय मूल्यों का स्पष्ट सम्बन्ध शिक्षा के साथ है; यदि सामाजिक व व्यक्तिगत जागरूकता के स्तर को तय करने का पैमाना भी शिक्षा है, तब घरेलू हिंसा, दहेज़ प्रताड़ना आदि अमानवीय मामलों में वृद्धि तथा स्त्री शोषण के बढ़ते नए आयामों के सन्दर्भ में इन सभी मूल्यों, मानदंडों का परीक्षण किये जाने की पुरजोर आवश्यकता है. इस आवश्यकता का एक प्रमुख कारण यह भी है कि स्त्री-शोषण के विभिन्न स्तर तथा विभिन्न आयाम उच्च शिक्षित और जागरूक समझे जाने वाले तबके के अन्दर अपनी विशिष्ट उपस्थिति प्रदर्शित कर रहे हैं.

उपरोक्त मुद्दे को लेकर विवाह के स्थानापन्न व्यवस्था के रूप में लिव-इन-संबधों के बारे में कुछ विचारकों तथा एक्टिविस्टों ने कार्य प्रारंभ कर दिया है. इनमें से कुछ नाम इस प्रकार से हैं- राजेन्द्र यादव, तसलीमा नसरीन, अरुंधती रॉय, अनिल यादव, शोभा डे आदि.

लिव-इन-सम्बन्धों के बाद प्रादुर्भूत समस्याएं

लिव-इन-संबंधों के स्थायित्व का विश्लेषण करने का प्रयास करें तो पाते हैं कि, अधिकांश स्वजातीय लिव-इन-सम्बन्ध कालान्तर में विवाह के रूप में परिणत हो जाते हैं, परन्तु इसके अतिरिक्त अन्य लिव-इन-सम्बन्धियों के सम्बन्ध प्रायः अस्थायी होते हैं. प्रायः यह देखने में आया है कि लिव-इन-संबंधों के ख़त्म होने के बाद की जिंदगी पुरुषों की तुलना में महिलाओं के लिए अधिक चुनौतीपूर्ण होती है. संभवतः इसका कारण वर्तमान समाज में भी ‘समाज व परिवार की इज्जत को नारी की योनि में कैद माना जाता है.’ कोई भी महिला या युवती अपनी मर्जी से किसी पुरुष के साथ सम्बन्ध स्थापित कर ले तो वह परिवार और समाज के लिए बहिष्कृत सी हो जाती है. भारतीय समाज की ऐसी ही अस्वीकार्यता तथा असंवेदनशीलता बलात्कार पीड़ित युवतियों/बच्चियों के समक्ष भीषण संत्रासजनक चुनौती के रूप में प्रस्तुत होता है, जब तथाकथित सभ्य समाज ऐसी पीड़ित महिलाओं तथा बच्चियों को अपनी कर्कश तथा व्यंग-मिश्रित टिप्पणियों से मानसिक रूप से प्रताड़ित करता है.

यह प्रवृत्ति भी देखने में आयी है कि यदि लिव-इन-सम्बन्ध में रह रहे युगलों में एक बार यौन सम्बन्ध स्थापित हो गया तो उसके बाद पुरुष वर्ग स्त्री पर अपना वर्चस्व स्थापित करने का प्रयास प्रारंभ कर देता है. इस मानसिक-सांस्कृतिक मनोवृत्ति का कारण भी पुरुष सत्तात्मक मनोग्रंथि में ढूढ़ा जा सकता है.

एक समस्या लिव-इन-संबंधों के बाद पैदा हुए बच्चों को लेकर आती है. यदि स्त्री-पुरुष दोनों ही कामकाजी हैं (अक्सर ऐसा ही होता है) तो बच्चे के समाजीकरण पर नकारात्मक प्रभाव पड़ने की सम्भावना प्रबल हो जाती है. बचपन में उस बच्चे/बच्ची को पड़ोसियों तथा अन्य जान-पहचान के व्यक्तियों के ताने, अश्लील गालियां सुनने को विवश होना पड़ता है. ऐसे में कई बार तो बच्चे के अन्दर विघटनकारी प्रवृत्तियां घर कर जाती हैं. अनाथालयों में अवैध बच्चों की बढ़ती हुई संख्या भी इसी असंवेदनशीलता का परिणाम है.

एक और समस्या तब आती है जब बच्चा पैदा होने के बाद उसके माँ-बाप अलग हो जायें. ऐसे बच्चों के पालन-पोषण की समस्या तो आती ही है, बच्चे का संरक्षकत्व तय करने में भी मुश्किल होती है. उस बच्चे की शिक्षा पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ने की पूरी सम्भावना होती है, क्योंकि उस बच्चे से उसके पिता नाम पूछा जाता है, एक अदृश्य मगर बहुत मजबूत मानसिक भय से बच्चा ग्रसित हो जाता है. यह परेशानी उस बच्चे को युवावस्था के बाद तक झेलनी पड़ती है. लावारिस बच्चों के पाए जाने की प्रधान वजह के रूप में ऐसे माँ-बाप का अलग हो जाना है.

समीक्षात्मक टिप्पणी 
स्वतंत्रता के सत्तर वर्ष बीत जाने के बाद भी भारतीय समाज की सबसे बड़ी कटु सच्चाई जाति व्यवस्था का समय के साथ-साथ अपने स्वरूपों तथा संप्रत्ययों को बदलते हुए अपनी संकीर्णता एवं सामाजिक समता, ममता के विध्वंसक स्वरुप में अपनी अनवरत उपस्थिति को बनाये रखना है. समकालीन भारतीय समाज का दूसरा बड़ा और खतरनाक सच यहां की राजनीतिक-धार्मिक प्रणाली से उत्पन्न साम्प्रदायिक गुटबंदियों को आधार बनाकर नित नए समाज विरोधी प्रयोग किये जाना है.

इन जातीय तथा धार्मिक बाड़ेबंदी से मुक्ति के रूप में भी लिव-इन-संबंधों पर विचार किया जा रहा है. जाति और लिव-इन-संबंधों पर एक दिलचस्प पहलू यह है कि यदि ये सम्बन्ध एक ही जाति के स्त्री-पुरुषों के मध्य बनते हैं तो, उन्हें पारिवारिक व सामाजिक स्वीकार्यता कदाचित आसानी से प्राप्त हो जाती है, किन्तु अन्तर्जातीय संबंधों के मामलों में सामाजिक स्वीकार्यता हासिल कर पाना बहुत मुस्किल होता है. अन्तरधार्मिक सम्बन्ध होने पर स्वीकार्यता का स्तर सर्वाधिक मुश्किल होता है. इस तरह के मामलों में बहुत बार प्रेमियों की हत्या तक कर दी जाती है. लिव-इन-संबंधों के मध्य आर्थिक स्तरों का विभेद और उससे प्रदत्त समस्याएं प्रायः बहुत कम पाई गयी हैं. अतः जातीय व धार्मिक विभाजन के खतरनाक गठजोड़ और लिव-इन-सम्बन्ध के सन्दर्भ में हमारा उद्देश्य ‘जाति विहीन समाज की स्थापना में लिव-इन-संबंधों के कारकतत्व को समझना है.

एक समस्या भारतीय शिक्षितों में आधुनिकता की समझ तथा तत्संबंधित व्यव्हार को लेकर भी आती है, जिस देश में लगभग सत्तर फीसदी आबादी को मानवीय गरिमा के साथ जीवन जीने का अवसर नहीं मिल सका है. ऐसे में आधुनिकता की इस अधकचरी समझ ने स्त्रियों, महिलाओं, बच्चियों को उपभोग की एक वस्तु के रूप में देखे जाने तथा तदनुरूप व्यवहार के मूल्य के मात्रात्मक तथा गुणात्मक विस्तार के दायरे को बढ़ाया है. विस्तार इस दृष्टि से कि तथाकथित सभ्य समाज से अलग, आदिवासी समाज की स्त्रियों को मानवीय अस्मिता तथा मानवीय गरिमा को सुरक्षित रखते हुए जीवन यापन करना उनके आदिवासी जीवन-संस्कृति का अटूट हिस्सा था. उपभोक्तावाद से ग्रसित वर्तमान बाजारवादी समाजव्यवस्था ने आदिवासी स्त्री को भी बाजारू बना दिया है. हिमालय के तलहट में बसे थारु, झारखण्ड के संथाल, मुंडा तथा अन्य आदिवासी जातियों से लेकर उत्तर-पूर्वी भारत की गारो, खासी आदि आदिवासी जातियों के साथ (आधुनिक जीवन मूल्यों से संचालित होने का दावा करने वाले समाज ने) अभी तक उपभोग की एक वस्तु के अनुरूप ही व्यवहार करता रहा है. इन भोले-भाले आदिवासी समाज की युवतियों, बच्चियों को यौन शोषण के साथ-साथ मानसिक, शारीरिक उत्पीड़न का तोहफा हमारे इस सभ्य समाज ने दिया है

ऐसी विषम परिस्थितियों की मारी महिलाओं को यदि किसी युवक/पुरुष की तरफ से सम्मान तथा भावनात्मक सहयोग का भरोसा मिलता है ऐसे में एक सम्भावना बनती है कि उनके बीच का सम्बन्ध लिव-इन-सम्बन्ध के रूप में परिणत हो जायेगा. क्योंकि यह सहज मानवीय स्वभाव है कि जब किसी व्यक्ति को चहुतरफा शोषण का शिकार बनाया गया हो, वह अनेक आयामी वंचनाओं, शोषण, उत्पीड़न, दमन का दैनिक आहार लेने को विवश हो और ऐसे में उसे कहीं से भी अपनापे तथा संवेदनात्मक सहानुभूति मिले और उसको भावनात्मक संबल प्रदान करने वाला सहयोगी मिल जाये जो उसे तमाम तरह की अमानवीय वंचनाओं, शोषण, उत्पीड़न आदि की कष्टदायी यादों से उबरने में उसका मददगार बनता है, तो उनके बीच सहज ही प्रेम, सौहार्द्र तथा अपनेपन की भावना जन्म ले लेती है. और ऐसे में यदि वो विपरीत सेक्स के हुए तो उनमें एक खास तरह का संज्ञानात्मक लगाव विकसित हो जाता है, जो कई बार लिव-इन-सम्बन्ध का रूप ले लेता है.

सन्दर्भ सूची-
*पुस्तकें-
1. ओशो; सम्भोग से समाधि की ओर, डायमंड प्रकाशन, दिल्ली, 2006
2. ज्ञानभेद, स्वामी; ओशो: एक फक्कड़ मसीहा, भाग 2, 4, डायमंड प्रकाशन, दिल्ली, 2001, 2003
3. यादव, राजेन्द्र; आदमी की निगाह में औरत, राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, 2006
4. शास्त्री, सोहनलाल; डॉ. आंबेडकर और हिन्दू कोड बिल, सम्यक प्रकाशन, दिल्ली, 2008
5. दोषी, एस. एल.; आधुनिक समाजशास्त्रीय विचारक, रावत प्रकाशन, जयपुर, 2011
**वैयक्तिक साक्षात्कार तथा परिचर्चायें-
1. सरिता के साथ संवाद, समाजशास्त्र विभाग, बी.एच.यू., अक्टूबर 2014 से अप्रैल 2015.
2. सुबोध कान्त के साथ संवाद, राजा राम मोहन रॉय छात्रावास बी.एच.यू., सितम्बर-अक्टूबर 2016.
3. जियाउद्दीन के साथ संवाद, डॉ. भगवानदास छात्रावास बी.एच.यू., नवम्बर 2016.
5. रामायण पटेल के साथ संवाद, केन्द्रीय ग्रंथालय, बी.एच.यू., नवम्बर 2016.

शोधार्थी, 
इतिहास विभाग, डी.ए.वी.पी.जी. कॉलेज, 
बी.एच.यू. वाराणसी
इमेल: vikashasaeem@gmail.com

लिपस्टिक अंडर माय बुर्का : क़त्ल किए गए सपनों का एक झरोखा

ज्योति प्रसाद
सुनिए, कहानी की शुरुआत पर ध्यान दीजिये। यह किसी लड़की के जीवन में वहीं से शुरू हो जाती है जब दाई या नर्स क्या हुआ है पूछने पर यह बताती है कि लड़की हुई है तभी, ठीक उसी समय से ‘नियम व शर्तें लागू’ हो जाती हैं उस नवजात बच्ची पर। लेकिन वह लड़की तो कुदरत के दिये लक्षणों को अपने अंदर लेकर पैदा होती है। इसलिए उसके अंदर मौजूद उसकी अंदरूनी और रोमानी-रूहानी तमन्नाएँ अपने को ज़ाहिर कर जीने की कोशिश करती है। जैसे ही यह मौक़ापरस्त चाहत बाहर आने को होती है तभी ‘टर्म एंड कंडिशन्स’ लागू हो जाते हैं। निदेशक अलंकृता श्रीवास्तव  की यह फिल्म इसी बिन्दु को पकड़ने की ठीक-ठाक कोशिश है।

स्त्री की यौन इच्छाओं और शुचिता का पूरा अध्याय ही दवाब, शंकाओं और संघर्षों के दायरे में आता है। स्त्री चिंतन को समझने के लिए उन सभी ‘पवित्र शर्तों’ को एक बार देख व सूंघ लेना चाहिए जिन्हें बहुत ऊंचा मुकाम दिया गया। गंदी औरत, बदचलन औरत, बेशर्म औरत, इज्जत मिट्टी में मिला देने वाली औरत…आदि विशेषणों के पीछे की उन सभी तस्वीरों की पड़ताल करने की कोशिश के रूप में यह फिल्म कदम भी उठाती हुई दिखती है।

कुछ दिनों पहले बैंडीट क्वीन फिल्म के बारे में लिखे लेख को पढ़ते हुए मुझे वह क़िस्सा याद आ गया जो हमारे बगल की पड़ोसन सिनेमा हॉल से समेटकर लाई थी। वह फिल्म के फूलन देवी पर फिल्माए गए उस दृश्य को थूक घोट-घोट कर गाली दे रही थीं, जिसमें उनके कपड़े उतार कर घड़ा थमाया जाता है। उन्हों ने मेरी माँ को झँझोड़ झँझोड़ कर कहा- ‘न जाने कैसे लोग पैसे की ख़ातिर नंगे हो जाते हैं। शर्म भी नहीं आती। पैसा ही नहीं होता सब कुछ। इज्जत नाम की भी चीज़ होती है दुनिया में।… जाने क्या मिलता है अपनी इज्जत देकर…ऐसी ही फिल्म देखकर लड़कियां बिगड़ जाती हैं..!’ वह उस दिन काफी बोलीं।

स्त्री शरीर और उससे जुड़ी उसकी बातों और इच्छाओं को हमेशा से ही शर्म और पवित्रता के आवरण में सहेज कर रखने की कोशिश की गई है। राजा एक से अधिक शादियाँ करने के बाद या फिर हरम में एक से अधिक औरतों को रखने के बावजूद गंदा आदमी, बदचलन आदमी बेशर्म आदमी क़रार नहीं दिया जाता। इसके अलावा उस आदमी पर सामाजिक और परंपरा वाला प्रतिबंध भी नहीं होता। ठीक इसके उलट औरत का कृत्रिम चरित्र ही उसके पूरे के पूरे अस्तित्व से जोड़ दिया गया है। इसलिए जब जैसे ही वह अपनी इच्छाओं को ज़ाहिर करती है, ठीक वैसे ही उस पर हमले होते हैं और मिनटों में वह हाशिये पर पड़ी नज़र आती है। इस फिल्म से इस बात को समझा जा सकता है।

बैन की मार झेल चुकी फिल्म ‘लिपस्टिक अंडर माय बुर्का’ के साथ एक बहस तो छिड़ ही गई है। फिल्म रिलीज़ हो चुकी है और तारीफ़/तीखे हमले दोनों ही बटोर रही है। फिल्म के बैन को अगर एक तरफ रख कर फिल्म के किरदारों और कथा पर नज़र डाली जाये तब दर्शकों की ज़िम्मेदारी और समझ किस दिशा में जाएगी, जैसा सवाल उभरता है। चारों किरदारों को अपने ध्यान का विषय बनाया जाना चाहिए। चारों औरतों की उम्र अलग अलग है। चारों का ताल्लुक (निम्न) मध्यम वर्ग का ही मालूम होता है। वास्तव में वे चारों औरतें प्रतीक के रूप में उभरती हुई नज़र आती हैं।

उनकी ज़िंदगी के दो पहलू हैं। एक वह जो उनके परिवार ने उन्हें निश्चित फ्रेम के तौर पर दिया है। दूसरा, जो उन्हों ने खुद को देखने की तमन्ना के साथ विकसित किया है। इसी दूसरे फ्रेम को वे छुपाती फिरती हैं। गौर से देखेंगे तब यह अनुभव होता है कि सारा झगड़ा समाज और परिवार द्वारा दी जाने वाली औरतों को आदर्श और चुप रहने वाली गुड़िया में तब्दील कर देने या फिर उन्हें पालतू बना देने वाली पारिवारिक, सामाजिक और सांस्कृतिक प्रक्रिया को न मानने की वजह से है। फिल्म में इन औरतों ने अपनी खुद की शैली ईजाद करते हुए उस परंपरा को धता बंधा दिया है जो उन्हें आदर्श बने रहने के तरीके थोपती है। जैसे ही वह इस चाकू मार विरासत को धक्का देती हैं और अपने बारे में सोचती हैं वैसे ही समाज और परिवार के धड़े उन्हें धमकाते हुए दिखाई देते हैं।

भोपाल का छोटा मोहल्ला और उसकी ये चारों रंगीन सपने लेकर जीने वाली औरतों में जितना आक्रोश है उतना ही आज़ादी और मनमर्ज़ी को करने की ज़िद्द भी है। सबसे युवा रेहाना अपने को बुर्के  की दम घोंटू ज़िंदगी से आज़ादी की ख़ातिर जोख़िम उठाती है। चाहे वे जूतों, लिपस्टिक या फिर आधुनिक कपड़ों की चाहत (चोरी) हो या फिर देर रात पार्टी में जाने की इच्छा। वह बुर्के सिलने का काम करती है। जो प्रतीक है एक ही ढर्रे की आज़ादी छीनने वाली परवरिश की और माहौल की। वह युवा है और हर उस फल को चखना चाहती है जिसकी उसे सख़्त मनाही है। रेहाना मुस्लिम परिवार से है। इसलिए यहाँ इस बात से बचा जाना चाहिए कि ऐसा केवल मुस्लिम परिवार में होता है। जबकि ऐसा हर धर्म और परिवार में होता है।

आमतौर पर घरों में लड़कियों को परवरिश के साथ ही बचाव वाले गलियारे में ठूँसा जाता है। अपने को कैसे बचा कर रखना है, अपने शरीर को ढक कर रखने की सीख, सुंदर दिखने से परहेज, नाच गाने से दूर रहने के आदेश आदि, यही सिखायेजाते हैं। और यह एक महत्वपूर्ण वजह है जिसके कारण वे बहुत बड़ी संख्या में हिंसा और अपराध की शिकार बनती हैं। रेहाना को कॉलेज में इस उम्मीद से दाखिल करवाया गया है कि वह उससे जुड़ी आशाओं को पूरा कर पाये। लेकिन इसके साथ ही क़ायदा उसके सामने रख दिया गया है कि वह कौन से सपने देख सकती है और कौन से नहीं। जो यह ‘नियम व शर्तें लागू’ वाली दशा है, वह उसे चुभती है और वह इससे बाहर निकलने के लिए कुछ रास्ते अपनाती है।

दूसरा किरदार ब्युटिशियन लीला का है। जो अपने अंदर की तीव्र इच्छा को तो पूरा करना ही चाहती है साथ ही शादी से ही जुड़ी बड़ी प्लानर-व्यवसायिका बनना चाहती है, प्रेमी अरशद के साथ। पर अपनी माँ के चुने हुए लड़के से शादी करना, उसको एक दूसरे किनारे पर ले जाता है। दोनों माँ बेटी के चरित्रों में उन स्त्री विडम्बना को देखा जा सकता है जो उन्हें जीवन में सामाजिक व पारिवारिक स्ट्रक्चर से मिली है। विधवा माँ और बेटी के जोड़े में, माँ ने भी उतने ही ग़म उठाए हैं पर फिर भी वह अपनी बेटी को उसी रूप में देखना चाहती है जिसमें वह विधवा बनने से पहले थी। उसके मुताबिक शादीशुदा होना अहम है।

तीसरी किरदार शिरीन अपने शरीर को अपनी ही मर्ज़ी के विरुद्ध जाकर, पति के हवाले करती एक पत्नी के किरदार में दबी हुई औरत है। वह हर तरह से दबती है। पारिवारिक जिम्मेदारियों के सवाल पर, घरेलू काम को लेकर, पति के दूसरी औरत से संबंध को लेकर, निरंतर होते अबॉर्शन से शरीर में होती परेशानियों के कारण, तीन बच्चों की परवरिश को लेकर और नौकरी की बात को छुपाते हुए। शिरीन इन सब बातों से पल पल जूझ रही है तो दूसरी तरफ उसका पति बिना किसी दबाव के जी रहा है और पत्नी की लगाम हर तरह से कस रहा है, फिर चाहे शारीरिक स्तर पर हो या मानसिक स्तर पर। शिरीन की कहानी लगभग हर भारतीय औरत की ही कहानी है।

घर के अंदर जिसे नितांत निजी ज़िंदगी कहा जाता है, वह वास्तव में शोषण के साथ दिखाई पड़ता है। अपने ही शरीर पर हक़ न होना आज भी एक बहुत बड़ा बहस का मुद्दा भी है। कब सेक्स करना है कब नहीं करना है, पत्नी की मर्ज़ी है भी अथवा नहीं, उसे किन शारीरिक और मानसिक दिक़्क़तों से गुज़रना पड़ रहा है, क्या वह बच्चे को जन्म देना छाती है अथवा नहीं, क्या वह अपने शरीर से जुड़े फैसले ले सकती है या नहीं.., सुध लेने वाला कोई नहीं दिखता। दूसरी तरफ लीला, रेहाना और उषा का किरदार सेक्स संबंधी चाहतों को पूरा करने की कोशिश में दिखते हैं, जिन्हें लोग हरगिज़ स्वीकार नहीं करते।

चौथा और एक और महत्वपूर्ण किरदार उषा जी का है जो ‘हवाई मंजिल’ में बुआ जी ही बन कर रह गई हैं। पति की मृत्यु के बाद एक लंबा सफर अकेलेपन में गुज़ार चुकने वाली उषा जी के मन में आज भी वही ताज़ा तरंगें मौजूद हैं जो किसी भी औरत में होती हैं। उनके इर्द गिर्द ऐसे लोगों का जमावड़ा है जिन्हों ने बुआ जी को एक औरत की नज़र से देखने की कभी कोशिश नहीं की। उन्हें वृद्ध और धार्मिक महिला का लिबाज़ पहना दिया गया है। पर कमरे के भीतर वह एक ऐसी औरत का चरित्र जीती हैं जो आज भी इच्छाएं रखती हैं। अपनी तृप्ति को वह प्रेम और रस से भरे हुए उपन्यास पढ़कर और अपने ही जिम ट्रेनर से फोन पर इश्क़िया बातें कर के पूरा करती हैं। औरत के मन में क्या चल रहा है, यह जानने की कभी कोशिश नहीं की जाती। उसे खुद के लिए उस चुनाव से महरूम कर दिया जाता है, जिसे वह चाहती है। उससे वह जिंदगी जीने की उम्मीद की जाती है जो हजारों साल से उसके लिए निर्धारित की गई है। लेकिन उषा, इस निर्धारित भूमिका को न सिर्फ तोड़ती है, बल्कि वह वैसे ही जीती हैं जैसे उनका मन कहता है।
इस फिल्म पर बवाल आख़िर क्यों?

थोड़ी देर के लिए यदि महिला मिथक कहानियों की यात्रा की जाये तब हमारे सामने पंचकन्याओं और अप्सराओं की छवियाँ उभरती हैं, जिन्हें धार्मिक, सामाजिक स्वीकार्यता प्राप्त नहीं हो पाई कभी। अपनी यौनिक इच्छाओं की पूर्ति उनको इतनी महंगी पड़ी कि उन्हें पत्थर में तब्दील होते दिखाया गया। उद्धारकर्ता भी एक पुरुष ही बना। अप्सराओं का पूरा स्केच ही परिवार और समाज के बनाए गए संस्थानों के खिलाफत में खड़े हुए दिखते हैं। उनकी शक्ति, यौनिकता, रूप-सौन्दर्य और रिश्तों से परे जीवन की परिकल्पना उनके चरित्रों की ख़ूबी है जिसे रह रह कोसा गया, पाप द्वार, माया, मोहिनी, तपस्या भंग कर देने वाली आदि नामों से नवाजा गया। लेकिन फिर भी उनके नामों को मिटाया नहीं जा सका। ‘लिपस्टिक अंडर माय बुर्का ’ के चरित्रों में इन्हीं मिथकों की हल्की छवियाँ देखी जा सकती हैं। ये सभी छवियाँ आकर्षित तो करती ही हैं साथ ही साथ उस जमे हुए पैटर्न को तोड़ती भी हैं जो उनके लिए तय किए जाने की कोशिश की जा रही है। इसलिए यह फिल्म सेंसर और समाज के तथाकथित तबको की आँखों में सुई की तरह चुभ रही है।

चरित्रों में आत्मविश्वास का स्रोत
इन आम स्त्री चरित्रों की बुनावट में एक दिलचस्प आयाम को जोड़ा गया है, उसे रेखांकित करना जरूरी भी होगा। रेहाना का कॉलेज गोइंग लड़की होना, उसकी स्कूल के बाद की शिक्षा की तरफ एक संकेत है। इसके अतिरिक्त उसका बुर्खें सीने के काम को उसके इनकम के स्रोत के रूप में देखा जा सकता है। शिक्षा और उसका खुद के लिए देखे गए सपने उसे एक रोज़ पूरी तरह से दकियानूस पम्परा के विरोध में खड़ा कर देने की संभावना भी दिखाते हैं। वह अंग्रेज़ी गीतों को पसंद करने वाली भावी आर्थिक रूप से स्वतंत्र लड़की की संभावना का वहन करने वाली चरित्र है। इससे अलग लीला और शिरीन पहले से ही कामगार हैं और आर्थिक क्षेत्र में अच्छा कर रही हैं। उषा उर्फ़ बुआ जी भी इसी तरह काम से जुड़े सारे निर्णय लेती हैं और चाभियों का गुच्छा अपने पास रखती हैं। उनके द्वारा लिए गए फैसले आखिरी होते हैं और उनकी राय के बिना कोई भी कदम नहीं उठाया जा सकता। यह सभी विशेषताएँ इन औरतों की आर्थिक मजबूती की तरफ तो इशारा करते ही हैं साथ ही उनके आत्मविश्वास को उजागर भी करते हैं।

फिल्म का कमजोर पक्ष
फिल्म के अंत में यदि चारों किरदार दस मिनट के लिए सिगरेट पीने की बजाय एक बेमिसाल प्रतिक्रिया देते तो फिल्म अपने लक्ष्य को पूरा करने में सफ़ल हो जाती। सिगरेट आज़ादी का प्रतीक नहीं है। इस बात को खुद सिगरेट भी जानती है जो एक चेतावनी देती है- ‘सिगरेट पीना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है।’ आदमी सिगरेट पीता है इसलिए औरतें भी पी सकती हैं, वाला मामला स्त्री विमर्श को कमजोर ही करता है। महिला सशक्त किरदारों की विशेषता आदमी की बराबरी या उससे तुलना करने में नहीं है। आठ मार्च अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर एक हिन्दी अखबार हर बार बाइक रैली का आयोजन यह कह कर करता है कि दुनिया (आदमियों) को दिखा दो कि औरतें भी बाइक चला सकती हैं। यह केवल एक संदर्भ है। असली सशक्तिकरण हर तरह के शोषण से मुक्त पारिवारिक, सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक माहौल, मानसिक और शारीरिक स्वस्थता, बराबर की आय समान कामों के अंतर्गत, अपने को अभिव्यक्त करने की आज़ादी, सुरक्षित, बराबरी के मौकें, काम करने व जीने के लिए उचित माहौल…आदि आदि है। हजारों साल से जमी सत्ता को सिगरेट पी कर चुनौती नहीं दी जा सकती। इसलिए फिल्म का अंत थोड़ा खटकता भी है।

यौन सम्बन्धों पर बनी महिला प्रधान फिल्मों को क्यों शिकार किया जाता है?
फिल्म फायर, बैंडिट क्वीन, कामसूत्र, डर्टी पिक्चर, इंडियाज़ डॉटर, वॉटर आदि फिल्मों को सेंसर और सरकार ने अपना निशाना बनाया है। सभी फिल्मों में महिलाओं से जुड़े मुद्दे हैं।  इस फिल्म के साथ भी ऐसा ही है। यह फिल्म भी महिला प्रधान फिल्म है। सभी के विषय में स्त्री देह, उसकी यौनिकता व उनके शोषण के विभिन्न पहलू हैं। सेक्स आज भी बंद कमरे का मुद्दा है। समाज और उसकी प्रणाली में औरत-मर्द-बराबरी की बात हवा में तैरती है जबकि वास्तविक स्तर पर ऐसा नहीं है। औरत को अपनी अभिव्यक्ति की क़ीमत आज भी चुकानी पड़ती है। रात को घूमती औरत, जीन्स पहनने वाली औरत, बियर या शराब पीने वाली औरत, सेक्स की चाहत रखने वाली औरत इत्यादि श्रेणी में रख दी जाती हैं जो आदर्श औरत के सांचें में नहीं आतीं। ये सभी समाज को चुनौती देने वाली लगती हैं। इसलिए इन पर भरसक हमले किए जाते हैं।

परंपराओं पर सवाल कर देने वाली ‘वॉटर’ फिल्म की चुहिया सभी को पचाये नहीं पचती, क्योंकि वह सीधा सवाल करती है कि आदमी क्यों नहीं विधवा होता? अजीबो गरीब यह भी है कि ‘इंडियाज़ डॉटर’ जैसी डॉक्युमेंट्री फिल्म जो निर्भया घटना की जड़ की पड़ताल की कोशिश पर बनी फिल्म थी, उसे लेकर सरकार को देश की छवि की चिंता हो गई और उस पर आनन-फानन पररोक लगा दी गई। पर यू-ट्यूब के ज़माने में इसका फायदा सरकार को हो नहीं पाया। ठीक इसी तरह अन्य महिला प्रधान फ़िल्मों के साथ भी किया गया।

दिलचस्प यह भी है कि जो इसका विरोध करते हैं वे ही सरकारी खर्चे और ‘हॉलिडेज़’ में स-परिवार सहित खजुराहो की मूर्तिकला देखने जाते हैं। संभव हुआ तो वहीं से या फिर लौटकर फेसबुक पर अमेज़िंग ट्रिप इन अ अमेज़िंग प्लेस की हैडिंग के साथ फ़ोटो साझा करते हैं। ऐसे लोगों की मानसिकता को बॉलीवुड ने बखूबी कैश भी किया है। इन्हीं के लिए आदर्श माँ, प्रेमिका, बहन, बेटी, बहू की छवियों को गढ़ा गया। ये सभी लोकप्रिय चरित्रों की श्रेणी में आते हैं। लेकिन लिपस्टिक अंडर माय बुर्का  की चारों किरदार आदर्श-परिधान से परहेज़ करती हैं इसलिए वह सम्भ्रात जमाने के निशाने पर आ जाती हैं।
लेखिका , जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में शोधरत हैं. सम्पर्क: jyotijprasad@gmail.com

स्त्री लेखन का स्त्रीवादी पाठ

सर्वेश पांडेय


सर्वेश पांडेय ने स्त्री अध्ययन में शोध किया है , अभी महिला आयोग में कार्यरत हैं . संपर्क : मोबाइल न.- 08756754651

हिन्दी साहित्य में 60-70 के दशक के दौरान लेखिकाओं  का आगमन स्त्री-प्रश्नों  पर सार्वजनिक बहस छेड़ देता है। इन लेखिकाओं द्वारा स्त्री पर आरोपित सामाजिक मर्यादाएँ, यौन वर्जना इत्यादि की आलोचना करते हुए स्त्री के व्यक्ति प्रदत्त अधिकारों को बड़ी संजीदगी से उठाया गया है। यह दौर स्वाधीनता के बाद स्वाधीनता के सपनो से मोहभंग का दौर था। स्वतंत्रता आंदोलन में महिलाओं ने सक्रिय भागीदारी की थी। इन्हें यह आशा थी कि देश  की स्वतंत्रता के पश्चात वह अपनी उपेक्षित स्थिति से निजात पा सकेगी। परंतु भारत की स्वतंत्रता उपरांत उन्हे वापस घरों में भेज दिया गया। यद्यपि शिक्षित महिलाओं का एक वर्ग अभी-भी समाजसेवी संस्थाओं व अध्यापन जैसे कार्यों  में लगा हुआ था।

1947 में स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद के भारत के सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक ढ़ांचे तथा सांस्कृतिक परिवेश पर पितृसत्तात्मक का प्रभुत्व था। जो कि आज भी पूर्ववत् स्वरूप के साथ-साथ कुछ अन्य नये रूपों में अपने को पुनर्संगठित कर चुका है। स्वतंत्रता उपरांत देश की कानून-व्यवस्था एवं न्यायपालिका ने भी स्त्री की स्थिति को लेकर कोई परिवर्तनगामी रूख नही दिया। स्त्री-पुरूष समानता के सवाल पर संविधान की स्थिति भी असंगत रही। जैसे कि अनुच्छेद 15 द्वारा समानता के सिद्धांत को स्वीकारा गया, मगर साथ ही धर्म के आधार पर बने परिवारिक कानूनों को मान्यता देकर स्त्री-पुरूष समानता के सिद्धांत का विरोध किया गया, ये कानून विवाह, परिवार तथा संपत्ति मे स्त्रियों को पुरूषो से कमतर व भेदभाव पूर्ण अधिकार देते हैं। हिंदू कोड बिल पर हुए विरोध पर गौर करें तो देखेंगे कि यह विरोध मूलरूप से इस बात पर केंद्रित था कि हिंदू परिवारिक कानून मे सुधार करके स्त्रियों के अधिकारों को बेहतर करने से हिंदू परिवार के टूटने का खतरा पैदा होगा। यह भी कहा गया कि इस प्रकार के परिवर्तन पाश्चात्य सोच से प्रेरित है क्योकि हिंदू सोच में स्त्री-पुरूष समानता का अर्थ एक जैसे अधिकार न होकर अलग-अलग प्रकार के अधिकार है। इसकी वजह परिवार में स्त्रियों और पुरूषो  की जिम्मेवारियाँ अलग-अलग होना है। अर्थात् यह सारा विरोध स्थापित परिवार के ढांचे में बदलाव से उत्पन्न खतरों से था। स्त्रियों और पुरूषो की अलग-अलग भूमिकाओं और अधिकारों पर आधारित परिवार की यह छवि स्वतंत्रता प्राप्ति के उपरांत की विकास की सोच और नीति पर छाई रही। पचंवर्षीय योजनाओं (1950-75) में स्त्रियो के लिए प्रस्तावित शिक्षा और रोजगार कार्यक्रम महिलाओं को केवल उनकी पारिवारिक भूमिकाओं में सीमित करते है। इस दृष्टिकोण के अनुसार स्त्रियाँ अर्थिक रूप से पुरूषों  पर निर्भर है और सरकारी नीतियों और कार्यक्रम का उदेश्य औरत को इस तरह की सेवाएँ उपलब्ध करवाना, जिससे वे इन परिवारिक भूमिकाओं को और अधिक कुशलता से पूरा कर सके। वैचारिक स्तर पर इससे स्त्री की एक ऐसी छवि बनी जो कि घर व बाहर दोनो जगहों के कार्यों को समुचित ढंग से संपादित करे। औरतों की इसी छवि को मीडिया पाठयक्रमों द्वारा बहुत जोर-शोर से आगे बढ़ाया गया। अभी तक की चर्चा मे सरकारी तंत्र की स्त्री के प्रति दृष्टि को उजागर किया गया। लेकिन समाज में स्त्री की कौन सी भूमिका को मान्यता दी जा रही थी, उसको रखने की जरूरत जान पड़ती है। परंपरागत मध्यवर्गीय मान्यवर्गीय मान्यताओं से थोड़ा भिन्न होकर अब मध्यवर्ग में स्त्रियों का नौकरी करना असम्मानजनक नहीं समझा जा रहा था। (भले ही आर्थिक आवश्यकताओ के जगह से यह सम्भव हुआ हो) आर्थिक लाभ की भावना ही सही पति पत्नियो से नौकरी बुरा नहीं समझते। किन्तु पत्नी में यह अपराध बोध की पैदा किया जाता कि वह पारिवारिक दायित्वों को निर्वाहन ठीक से नहीं कर रही हैं। सीमाओ के बावजूद सामाजिक आर्थिक परिस्थितियों ने स्त्री को एक स्पेस तो उपलब्ध कराया। 60-70 के दशक में शिक्षित स्त्रियों का एक बड़ा वर्ग निकला, जो कि मुख्यता अध्यापन, नर्सिग, जैसे कार्यो में शामिल हुआ। फलत: उनमें आत्मविश्वास भी पनपा।

60-70 के दशक  के स्त्री लेखन में भी इसी मध्यवर्गीय शिक्षित व कामकाजी स्त्रियों का अक्स साफ तौर पर दिखाई पड़ता है। परिवार, विवाह जिसे समाज में प्राकृतिक रूप में देखा जाता हैं । जबकि यह मानव निर्मित कृत्रिम संस्थाए है। जिसके उत्पत्ति के इतिहास को एंगेल्स  ने अपनी पुस्तक ‘परिवार, व्यक्तिगत संपत्ति व राज्य का उदय ’ द्वारा हमारे सामने लाते है। विवाह व परिवार दोनों महिलाओं के लिए बेहद उत्पीड़नकारी रहे हैं। परिवार वह संस्था है जिसके द्वारा शासक वर्ग पुरुषों के बीच में अपनी पितृसत्तात्मक विचारधारा के लिए समर्थन हासिल करते हैं । वर्ग उत्पीड़न के समाज में जाति उत्पीड़न से भरे समाज में पितृसत्तात्मक एकनिष्ठ विवाह उत्पीड़ित वर्गीय पुरूषो को जो विशेष अधिकार देता है, वही शासक वर्गों के लिए पितृसत्ता को संस्था को जिन्दा और बरकरार रखता है। आज के उत्पीड़नकारी परिवारिक ढ़ांचे के बिना, ऐसे परिवारों को बांधनेवाली शादियों के ढकोसलों के बिना शासक वर्गों के पितृसत्तात्मक विचारों के लिए सामाजिक मान्यता नहीं मिल सकती थी। एक लड़की होने के नाते वह परिवार में दबना सीख जाती है और परिवार में लड़का होने के नाते वह दबाव डालना सीख जाता है। स्त्री को पितृसत्ता ने रिशतो से व्याख्यायित किया। वह मां, बहन, बेटी व पत्नी से जानी जाने लगी, लेकिन व्यक्ति के रूप उसकी कोई पहचान नहीं स्वीकारी गई। वहीं 60-70 के दशक के कई स्त्री कथाकारों द्वारा रचित कहानियाँ व उपन्यास स्त्री के स्वतंत्र पहचान व उनके अधिकारों को सार्वजनिक पटल पर लाते है। विशेष संदर्भित उपन्यासो के क्रम में ‘पचपन खम्भे लाल दीवारें’ है उषा प्रियवंदा की काफी चर्चित कृति है। इसमें उपन्यास की प्रमुख स्त्री पात्र सुषमा समाज के इन धारणा को तोड़ती है कि लड़की घर नही चला सकती। पुत्र का दर्जा समाज में इस कारण से भी उच्च माना जाता है कि वह ही परिवार को आर्थिक आधार मुहैया कराता है। (इसके अतिरिक्त कि पुरूष को पितृवंशात्मक समाज व्यवस्था का संवाहक माना जाता है।) इस उपन्यास में सुषमा न केवल आर्थिक तौर पर आत्मनिर्भर है बल्कि अपाहिज बाप, माँ, भाई-बहनों के दैनिक जीवन के खर्चों व उसकी शिक्षा का खर्च भी वहन करती है।1 भारतीय परिदृश्य  बढ़ती जरूरतों ने पुरूष की मानसिकता में परिवर्तन किया और स्त्री हेतु असम्मानजनक समझी जाने वाली नौकरी ही परिवार की पद, प्रतिष्ठा व इज्जत बढ़ाने लगी। विवाह व नौकरी समानांतर संभव हो सकी।1 माताओं-पिताओ ने भी आर्थिक सहयोग हेतु बेटी के कामकाजी होने को प्रोत्साहित किया। इस उपन्यास के संदर्भ में देखा जायें, तो सुषमा की नौकरी केवल अपने परिवार के दायित्व का निर्वहन करने के लिए है। यहां वह घर कि जिम्मेदारी को उठाते हुए यानि यह सिद्ध करते हुए कि इस घर में पुत्र की भूमिका वह भी निभा रही है। जैसा कि सुषमा कहती है ‘‘अगर मैं सबसे बड़ा लड़का होती तो क्या न करती? उसी तरह मैं अब भी करती हूँ’’.2 लेकिन कहीं न कहीं सुषमा का अपना भी मन है, स्त्री के अपने भी तो कोने हैं। उसको लगता है कि यह घर जिसके लिए वह समर्पित है, वह उसके बारे में क्यों नहीं सोचता है। वह सोचती है कि यदि मेरे जगह बेटा होता तो माँ बेटे के लिए स्वप्न तो देखती है कि बहू घर लाना है।

परिवार के लिए कमाऊ बेटी होने की वजह से उसके माँ-बाप ने कभी चाहा ही नही उसकी शादी हो। ‘‘यदि पिताजी चाहते तो क्या उसका विवाह नहीं कर सकते थे। लोग लाख प्रयत्न कर बेटी के ब्याह का सामान जुटाते है। क्या उसी के पिता अनोखे थे? बात असल यह थी कि उन्होंने यह चाहा ही नहीं कि सुषमा की शादी हो, उनके अंतर्मन में यह बात अवश्य होगी कि सुषमा से उन्हें सहारा मिलेगा।3  वैसे सुषमा का विवाह न करना उसके माँ बाप की विवशता भी है। क्योंकि भारतीय समाज में विवाहोपरान्त लड़की को पति के निर्णयों के हिसाब से चलना पड़ता है। और जहाँ हिन्दू विवाह पद्धति में कन्यादान की प्रथा हो, वहाँ दान की गई वस्तु पर माँ-बाप का क्या अधिकार, और उस वस्तु को स्वयं क्या अधिकार है। वह तो पति की संपत्ति होती है। और पति ही उसके जीवन का निर्धारक होता है। जैसा कि उसका प्रेमी नील बोलता है, ‘‘मुझे लगता है सुषमा कि तुम्हारा परिवार तुम्हारा अनड्यू एडवांटेज लेता है। तुम्हारे भाई बहन तुम्हारे माता-पिता की जिम्मेदारी है। तुम्हारी नही।’’ 4   वही सुषमा की माँ उसके इतनी उम्र में भी विवाह न होने पर कहती है कि ‘‘अब मैं क्या करूं? सयानी लड़की है, कोई बच्चा तो है नहीं जो समझाने-बुझाने से मान जाएगी। वह शादी करने को राजी ही नहीं होती तो मैं क्या करूं? और मुहल्ले-पडोसवाले उनकी बात मान जाते। पर अम्मा भी जानती थी और सुषमा भी, इसलिए ऐसे मौकों पर एक-दूसरे से आँखे चुरा जाती थी। इस घर की मुख्य आय सुषमा का वेतन था।’’ 5

परिवार के दायित्वों को निभाते हुए वह अपना जीवन कहाँ जी सकी। उसका जीवन उपेक्षित व एकाकी ही बना हुआ है। उसके विषय में न तो उसकी माँ सोचती और न परिवार के अन्य सदस्य। ‘‘अपने परिवार का सारा बोझ अपने ऊपर लिए सुषमा कांपने लगती। तब वह चाह उठती कि दो बाँहे उसे भी सहारा देने को हों, इस नीरवता के कुछ अस्फुट शब्द उसे भी संबोधन करे।’’ 6   उसके जीवन के 19 वें वर्ष में जब उसका प्रेम नारायण के लिए प्रस्फुटित भी हुआ था तो विवाह की स्थिति तक न पहुँच पाया। दहेज इसके आड़े गया। दहेज का उदेश्य बेटी को घर में रखने के लिए रिशवत के तौर पर दिया जाता है। ‘‘वकील साहब की बहुत प्रतिश्ठा थी। वह नारायण की शादी बड़े ऊचे घर में करना चाहते थे। उनकी पत्नी ने सुषमा के लिए बहुत हठ किया पर वकील साहब ने नरायण की शादी कहीं और तय कर दी। सुना नारायण को भी वह लड़की पसंद थी। सुना उस लड़की के पिता सिविल सर्जन थे और दहेज से घर आगन भर गया।’’7  और उसका निम्न आर्थिक पृष्ठभूमि का परिवार दहेज देने में अक्षम होने के कारण पुत्री का विवाह न कर पाया। आज तो दहेज प्रथा समाज में अपनी व्याप्ति पहले से भी कही ज्यादा फैला चुका है। यद्यपि दहेज विरोधी ऐक्ट 1961 में ही पारित हो चुका है, लेकिन इस कुप्रथा को समाज की वैधता मिली होने के कारण यह निषेधित होने के बजाय और विस्तारित होती हुई ही दिखती है। वर पक्ष में यह दहेज एक मानी हुई बात मानी जाती है और आज के सामाजिक परिवेश में दहेज की मात्रा ही ससुराल पक्ष की प्रतिष्ठा का निर्धारक बन गया है। उपभोक्तावादी संस्कृति ने दहेज प्रथा जैसी कुरीतियों को और पल्लिवित पुष्पित ही किया है।

मृदुला गर्ग

उसकी जिंदगी में आगे चलकर उससे उम्र में 5 वर्ष छोटा नील आता है, नील उससे प्रेम करता है और सुषमा भी। वह उससे देह संबंध भी बनाती है। उसमें नील से अपने देह संबंध को लेकर किसी तरह का कोई अपराध बोध नहीं है। लेकिन सुषमा यौन शुचिता की मनोग्रंथि से नहीं निकली हुई है। वह नील से कहती है कि ‘‘तुमने कभी यह भी सोचा नील, कि मैं तैतीस साल के बाद भी अछूती और बेदाग तुम्हारी ही बाँहो में कैसे आई?’’8  लेकिन जिस वक्त नील उससे विवाह का प्रस्ताव रखता हैं, सुशमा के आड़े एक बहुत बड़ा सवाल खड़ा हो जाता है कि पहले तो अपने कुटुंब को छोड़ने का तो दूसरी ओर अपने लिए भी सपने है। लेकिन यह सब होते हुए भी सुषमा कहीं से कमजोर पड़ती है, और अनिर्णय की स्थिति को बनाये रखकर कहीं अंत में नील को चले जाने देती है। इस उपन्यास में दिखता है कि स्त्री अभी किस दुविधा में जी रही है, वह आत्मनिर्भर हो गई है और साबित कर रही है कि वह परिवार का दायित्व निभा सकती है। लेकिन कहीं-न-कहीं रूढ़ियों से जकड़ी हुई है। यहां लेखिका की conditioning हुई दिखती है। लेखिका के भीतर भी परंपरायें एवं रूढ़िया बैठी हुई है, जो उपन्यास का अंत लिखते हुए बाहर आ जाती है।

‘पचपन खम्भे लाल दीवारे’ के उपरान्त ‘मित्रो मरजानी’ और ‘सुरजमुखी अंधरे के’ स्त्री विषयक चिन्ता व चिंतन का केन्द्र बिंदु है। ये दोनों कृतियां प्रख्यात लेखिका कृष्णा सोबती की है। उनका अनुभव संसार बहुत व्यापक है तथा इस संसार का अनुभव करने के लिए उनके पास नारी माध्यम है। स्वभावतः वंचना और पीड़ा के प्रति उनके कथा साहित्य में सहज झुकाव है। अपने साहसी विषय चुनाव और उद्दाम चरित्रों के लिए भी कृश्णाजी पहचानी जाती हैं। खासकर स्त्री चरित्रों के लिए और स्त्री जीवन की अछूती समस्याएं उठाने के कारण। मित्रो मरजानी के रूप में जो अविस्मरणीय चरित्र उन्होंने हिंदी को दिया, वह उनके सृजनात्मक साहस का प्रमाण है जो समूचे अनुभव और जीवन को सृजन की सामग्री बनाकर हर निषेध से इंकार करता है। मित्रो का चरित्र लेखिका ने बहुत ही जटिल ताने-बाने से बुना है। वह पारंपरिक मूल्यों को जीते हुए मध्यवर्गीय परिवार से एक युवती के विद्रोह की कथा है। मित्रो मरजानी की नायिका मित्रो का ब्याह होता है और वह ससुराल आती है। सास, जिठानी, उसके तेवर से सहमकर भी उससे प्रेम करते है। उसके यौवन कामना को उसका पति कोई तरजीह नही देता है वह ससुराल में खुलेआम इसके खिलाफ बगावत पर उतर जाती है। इस बगावत में उसकी पीड़ा स्पष्ट है। मित्रों के इसी अधिकार पर केंद्रित कर लिखी गई कथावृत्ति है। मित्रों जब अपने पति से यौन सुख नही पाती तो अपने सास से कहती है कि ‘‘अम्मा अपने बेटे को किसी नीम-हकीम के यहां जाकर दिखा दो। ‘‘मित्रों का यह वक्तव्य स्त्री के उन अधिकारों का पैरवी करता है कि यौन संबंधो में संतुष्टि  का हक उसे भी मिलना चाहिए।

मन्नू भंडारी

‘मित्रो’ स्त्री के यौन अधिकार का प्रश्न  उठाकर दाम्पत्य जीवन की पितृसत्ताक धारणाओं को कटघरे में रख देती है। हालांकि मित्रो विद्रोह करके माँ के घर चली जाती है। लेकिन अंत में वह ससुराल वापस लौटती है और इस नुक्ते के साथ उपन्यास खत्म होता है कि यौन सुख ही सब कुछ जीवन में नहीं है। बहुत सी अन्य बाते हैं, जोकि बेहद जरूरी है। आपसी समझ यौन सुख से कही ज्यादा महत्वपूर्ण है और दाम्पत्य इस तरह टूटने से बच सकता है। पति के घर वापस लौटकर मित्रो दाम्पत्य जीवन को टूटने से बचाती है। इस तरह स्त्री यौन अधिकार विषयक यह प्रशन भी अंतत परिवार व विवाह (यानि पितृसत्ताक व्यवस्था के मूल आधार) को बचाने के प्रयास में तिरोहित हो जाता है।

कृष्णा सोबती की ही प्रसिद्ध रचना ‘सूरजमुखी अंधेरे के’ (1972 ई.) बचपन में बलात्कार की त्रासदी को झेली स्त्री पात्र ‘रत्ती’ की जीवन गाथा है। रत्ती उन सभी लड़कियों, स्त्रियों की प्रतिनिधी चरित्र है जो कि बलात्कार की त्रासदी तो झेलती ही है और साथ ही साथ सामाजिक लांछनाएं भी इन्हे ही झेलती पड़ती है। समाज के कोण से देखे तो बलात्कार ही मात्र ऐसा अपराध है, जिसमें समाज की दृष्टि बलात्कार करनेवाले अपराधी के स्थान पर बलात्कार की शिकार स्त्री की ओर टिकती है, स्त्री दोषी भी ठहराई जाती है, सामाजिक लाँछना, अपमान स्त्री के हिस्से में आता है। जिस अपराध की जिम्मेदार रत्ती नहीं है, उसकी सजा उसे मिलती है। यह पुरूष वर्चस्व का ‘संभ्रांत’ संस्कार है।

उसके स्कूल के बच्चे तक उसे गंदी लड़की कहकर चिढ़ाते रहते है। उसके बारे में तरह-तरह की झूठी अफवाहें फैलाते रहते हैं। जैसे कि ‘‘लड़कियों को पीटती हो और लड़को से चाकलेट खाती हो। उनके सामने अपना फ्राक उठाती हो।…..तुम बुरी लड़की हो।’’ 9 इस तरह की बातें सुनकर रत्ती को गुस्सा आता है, और वह किसी न किसी की जमकर पिटाई कर देती है। वह बचाव के लिए आक्रमण का इस्तेमाल करती है। रत्ती मानो न सुन रही हो न देख रही हो। देखते-देखते दोनों हाथ श्यामली के कंधो पर जा जमे। छोड़ दो रत्ती छोड़ो मुझे…‘‘रत्ती के हाथ कुछ ऐसे हिले झटके से श्यामली औंधे मुँह जा गिरी।’ 10 बलात्कार का प्रशन अब यद्यपि सौ पर्दों में छिपाने का विषय नही रह गया है। रिपोर्ट की जा रही है, प्रकरण सामने आ रहे है परंतु समाज की मानसिकता में अधिक फर्क नहीं आया है ‘सब कुछ लुटा जाने’ का अहसास स्त्री को पुरूषवादी व्यवस्था द्वारा दिया जाता है। ‘आवा’ में बचपन में मौसा द्वारा किया गया यौन दुराचार दस वर्ष की नमिता को जड़ करता है किंतु माँ कि प्रतिक्रिया उसे अधिक तोड़ती है कि चुप रह जाए। बलात्कार को यदि चुपचाप सहा गया तो सिलसिला कभी खत्म नहीं होगा, वह ‘इदन्नमम्’ की सगुना की शक्ल में या तो शव में बदल जायेगा अथवा सुन्नर पांडेय की पतोह को बेघर करता रहेगा।

बलात्कार भारत में स्त्री के प्रति होने वाले अपराधों में सबसे बड़ा अपराध है। जिसके आकड़े प्रतिबर्ष बढ़ ही रहे हैं बावजूद इसके कि स्त्री के मन में बैठाए गए अपराध बोध के कारण अधिकांशतः अपराधों की रिपोर्ट नही की जाती। एक बार का बलात्कार स्त्री को जीवन ‘‘खराब’ होने का अपराध बोध देता है। नारीवादियों का मानना है कि बलात्कार एक राजनैतिक कृत्य होता है। जिसमें सेक्स का नजरिया कम होता हैं जबकि जेन्डर राजनीति अधिक होती है। इस तरह बलात्कार पुरूषवादी प्रभुत्व दिखाने का माध्यम है। पूँजीवादी देशो में बलात्कार को शारीरिक मानसिक  trauma के रूप में माना जाता है। वहीं भारत में सामंतवादी मूल्यों के कारण अभी भी इसको इज्जत मर्यादा के लूट जाने के रूप में देखा जाता है। समाज में बलात्कृत स्त्री को  पीड़ित के रूप में देखा ही नहीं जाता है, बल्कि उसके प्रति ऐसी लिंग विभेदी धारणा बना दी जाती है जैसे कि स्त्री द्वारा पुरूष को ऐसा कृत्य करने हेतु प्रेरित किया गया होगा या उसका चाल-चलन ही ऐसा है इत्यादि। पितृसत्तात्मक स्त्री को यौन वस्तु के रूप में ही परिभाषित का विशिष्ट  हो। चूँकि सामाजिक संरचना में स्त्री की अवस्थिति वंचित, उपेक्षित व अधीनस्थ की है। इस कारण पुरूष स्त्री देह पर अपना मालिकाना हक समझता है। और मानता है कि स्त्री समाज में अपनी गुलाम परक व वंचित स्थिति के कारण उसको दण्डित नहीं करवा सकती है। फलस्वरूप पितृसत्ताक पुरूष  उन्हें अपना शिकार बनाता है। सुसान ग्रिफिथ लिखती हैं ‘‘कानून की निगाह से देखा जाए तो बलात्कार को शारीरिक अपराध के पहलू के रूप में ही समझा जाता है। इसके बजाय, यह एक इन्सान के रूप में महिला के वजूद को मिटाने वाला अपराध होता है।’’ कृष्णा सोबती के उपन्यास ‘सूरजमुखी अंधेरे के’ की रत्ती बचपन में हुए बलात्कार का दंश  युवावस्था में देह संबंधो के मध्यफ्रीज्ड होने में और गन्दी लड़की समझे जाने में भोगती है। वह बलात्कार को स्त्री के इज्जत लुट जाने व सर्वस्व समाप्त हो जाने की मनोग्रंथि में ही जीती हुई स्त्रीपात्र है। हिंदी लेखिका उषा  महाजन लिखती है कि ‘‘बचपन में घटी दुःसह्य घटनाएं स्त्री के भीतर की सारी प्रतिरोधात्मक शक्ति नष्ट  कर देती है, अनेक मामलों में उन्होंने पाया है कि बचपन में अथवा विवाहपूर्व अत्याचार (इनसेस्ट ) उन्हें भविष्य जीवन नहीं जीने देता। 11

रत्ती के जीवन में उसके सभी मित्र जगतधर, रंजन, रोहित, बाली, डेविड, भानुराव, सुब्रामनियम, राजन, श्रीपत उसे षरीर से पाना चाहते है और सफल न होने पर उसके स्त्रीत्व को अपमानित करते है। जिसे वह चीज की तरह इस्तेमाल करना चाहते है। जबकि वही रत्ती की दृष्टि ‘‘पाने के लिए दोनों को एक दूसरे को चाहना होता है रोहित’’12 रत्ती के जीवन में (असद व दिवाकर को छोड़कर) जितने पुरूष  मित्र आते हैं उनके लिए रत्ती देह ही है जो कि आसानी से प्राप्त हो सकती है। और जब रत्ती की अपनी ंहमदबल उन्हें दिखती है तो, वह उसे लांछित करने का पितृसत्तात्मक हथियार इस्तेमाल करते हुए दिखाई देते हैं। ‘सूरजमुँखी अंधेरे के’ पितृसत्ताक पुरूष में स्त्री के प्रति दैहिक मनोवृत्ति की धारणा को और स्त्री के लिए संबंध की परिधि में मात्र दैहिजरूरत ही नहीं बल्कि उससे बढ़कर भावनात्मक व मानसिक संसर्ग होने की सोच को बहुत माकूल तरीके से रखा गया है।
इस दौरे में कृष्णा सोबती के रचना कर्म के पश्चात् मन्नु भण्डारी की प्रसिद्ध कृति ‘आपका बंटी’ का नारीवादी दृष्ठि से अवलोकन करते है। मन्नू  भण्डारी ने स्वंय को सृजन-सक्रिय व्यक्तित्व के रूप में परिभाषित किया, उन बहुत सी सीमाओं को फैलाया और लांघा है जो स्त्री के सृजन के साथ जुड़ी है और जिसके कारण उसका यह कर्म बाधा-दौड़ का पर्याय है। उस दौर के स्त्री की कथा साहित्य की उभरती स्वतंत्र पहचान, उसके व्यक्तिगत सोच और व्यक्तित्व संबंधी उपलब्धियों के आधार पर बनी है। इस नई स्त्री की पहचान ही स्त्री के लेखन की एक अलग कोटि हमें दिखाई पड़ती है। अर्थोपार्जन स्त्री के लिए स्वायत्त व्यक्तित्व के विकास की सीढ़ी व साधन है। महादेवी वर्मा भारतीय समाज में स्त्री की पुरूषों पर आर्थिक निर्भरता को उल्लिखित करते हुए कहती हैं कि ‘‘समाज ने स्त्री को निर्भर कर दिया है कि उसके सारे त्याग, सारा स्नेह, संपूर्ण आत्म-समपर्ण बंदी के विवश कर्तव्य के समान है।’’ 13 महादेवी भी स्त्री की आर्थिक स्वाधीनता को उसकी सामाजिक स्वाधीनता के लिए आवश्यक मानती है। आर्थिक स्वतंत्रता के बगैर स्त्री कोई भी लड़ाई नहीं लड़ सकती। आजादी के बाद मध्यवर्ग का तेजी से विस्तार हुआ, जिसने अपनी जरूरतों के मुताबिक कामकाजी व शिक्षित स्त्री की नई भूमिका को स्वीकार्यता दी। यद्यपि बाहरी दायरे में भी स्त्री के स्वतंत्र इयत्ता को मान्यता नही दी गई लेकिन इसके बावजूद भी इस दायरे में उसे स्वयं का नाम और आर्थिक व सामाजिक भूमिका तो निश्चय ही मिली। जिससें वह अपनी स्थिति को मूल्यांकित भी करने लगी, और अपनी आकांक्षाओं की प्राप्ति की दिशा में प्रयास भी करने लगी। उसमें संघर्षशीलता का विकास भी हुआ। नतीजन एकल परिवारों में भी ‘विघटन’ की घुसपैठ हो गई। ‘आपका बंटी’ (1971 ई.) शिक्षित आत्मनिर्भर स्त्री के संघर्शषील तेवर और एकल परिवारों के टूटन को रेखांकित करता हुआ उपन्यास है। इस उपन्यास का महत्व इसलिए भी है कि इस कथ्य को आधार बनाकर कोई कृति इससे पहले हिंदी में नहीं रची गई थी। इस उपन्यास में अजय और शकुन पति-पत्नी है। शकुन कॉलेज में प्रिंसिपल है। अजय भी अच्छे पद पर कार्यरत है। उनका छोटा सा बेटा बंटी है। अजय-शकुन के बीच के तनावों के कारण दोनो अलग-अलग रहते है। अजय मीरा नाम की स्त्री से प्रेम करने लगता है। अजय मीरा से विवाह करना चाहता है। फलतः अजय व शगुन में तलाक हो जाता है। ‘आपका बंटी’ में अजय व शकुन में एक दूसरे के प्रति प्रेम की रिक्तता की वजह पर तो चर्चा नहीं की गई है। लेकिन यदि उस दौर की सामाजिक स्थितियों का दृश्टिगत रखे तो मिलता है कि शहरों में शिक्षित नौकरीशुदा स्त्री का एक अच्छा खासा तबका अपनी उपस्थिति दर्ज कराने लगा था। और यह स्त्री सार्वजनिक दुनिया में अपनी दखल बनाने लगी थी, तो यह भी बहुत संभव नहीं था कि वह भीतरी दुनिया की अपनी निर्धारित अवस्थिति को यथावत स्वीकार कर लेती। वही पुरूश भीतरी दुनिया में स्त्री की पारंपरिक छवि को इस में भी रखना चाहता था और यही परिवार में उनकी टकराहट का कारण भी बनी है।

आपका बंटी में शकुन व अजय के तनाव का यही कारण मुझे प्रतीत होता है। संभवत् यही कारण है कि शकुन से तलाक लेने के पश्चात् वह मीरा (जोकि कामकाजी महिला नहीं है) से विवाह करता है।
घर बाहर दोहरे कार्यभार और नैतिकता के दोहरे मापदण्डों ने स्त्री के शरीर व मन को तोड़कर रख दिया है और परंपरागत सहिष्णुता वाली उसकी छवि मन्नू जी के ‘आपका बंटी’ में बिल्कुल चरमरा गई है। आप देख सकते है कि शकुन परंपरागत छवि वाली नारी नहीं है। उसका अस्तित्व पूरी तरह समानता और प्रतिस्पर्धा की भावना से भरा हुआ है। वह ऐसा कर सकता है तो मैं क्यों नहीं? की सहज इच्छा में जीती हुई वह औरत जिस छवि का निर्माण करती है वह औरत के बदलते रूप का प्रमाणिक इतिहास है। शकुन इस निर्णय पर पहुंच जाती है कि मैं उस व्यक्ति के साथ रहूँगी, जिससे मैं प्रेम करती हूँ। उससे मैं ब्याह करूंगी। अर्थात स्त्री अपने को केन्द्र में रखकर निर्णय लेती हुई ‘आपका बंटी’ में व्यक्त होती है। यहां शकुन के इस निर्णय में बंटी भी कोई बाधा नहीं बन पाता अर्थात् मातृत्व की त्यागमयी, पारंपारिक मान्यता से मुक्त होते हुए वह अपने जीवन का निर्णय स्व-केन्द्रियता के आधार पर लेती हुई दिखती है। यह इस उपन्यास का सबसे सशक्त पक्ष है। वहीं यह उपन्यास समाज में अकेली तलाकशुदा स्त्री के प्रति संकीर्ण धारणाओं को उल्लिखित करता है। जहाँ स्त्री की स्वतंत्र भूमिका न तो समाज को स्वीकार्य है और न ही नियोक्ता या संस्थानों को। स्वतंत्र स्त्री के प्रति समाज में सदैव भय की धारणा रही है। पितृसत्तामक व्यवस्था इन्हें विद्रोहिणी के रूप में इंगित कर उनके चरित्र पर सदैव लांछन ही लगाता रहा है ताकि इस बहिश्करण व उपेक्षा से भयभीत होकर वह पुनः परिवार व विवाह यानि पितृसत्ता की मूल धूरी में आ जाये। यह भी एक कारण बन जाता है कि शकुन डा. जोशी से अपने प्रेम संबंध को अंततः पति-पत्नी संबंध में परिवर्तित करने को विवश हो जाती है। अर्थात् वह एक सुरंग से निकलकर दूसरे सुरंग में चली जाती है।

अनामिका

विवाह स्त्री-जीवन की नियति रहीं है। विवाह पितृसत्तात्मक व्यवस्था की निरन्तरता को कायम रखने हेतु अनिवार्य होता है। इसी कारण विवाहित को समाज में सम्मान का दर्जा दिया गया है वहीं तलाकशुदा स्वतंत्र स्त्री के सम्मान पर सदैव प्रश्न  चिन्ह लगाया जाता है। विवाह संस्था के ढ़ाँचे में पुरूष वर्चस्वता के रेशे इतने सघन रूप व विवाह जैसी संस्थाओं के द्वारा स्त्री-पुरूष के बीच पदानुक्रम व असमानता को कायम रखा जाता है। जिसमें महिलाओं की श्रम-शक्ति, यौनता व प्रजनन शक्ति आदि पर पुरूषों  का नियंत्रण होता है।
मन्नू भण्डारी की यह कृति भारतीय कानून के पितृसत्तात्मक झुकाव को सामने लाती है। जैसे कि बच्चे का प्राकृतिक संरक्षक उसका पिता माना गया है न कि उसकी माता। शकुन के मन में सदैव यह भय है कि अजय उसके जीवन के एकमात्र सहारे ‘बंटी’ को भी कभी भी उससे छीन सकता है। यह कानून का क्रूर स्त्री-विरोधी पहलू है जो स्त्री संतान को जन्म दे, और पालन पोषण कर उसको पढ़ा लिखा रही हो (वह भी बिना पति के सहारे के) उसी स्त्री को ही अपने संतान पर कोई अधिकार नहीं मिलता है। अर्थात यह राज्य के पुरूषवादी चरित्र को परिलक्षित करता है। जहां राज्य परिवार के भीतर पुरूश की उच्च स्थिति को मान्यता प्रदान करता हुआ दिखता है। गर्डा लर्नर ने मानव सभ्यता के प्रारंभिक कानूनी व्यवस्थाओं के पितृसत्तात्मक पक्ष को उजागार किया है। 14 जिनसे आधुनिकता के साथ उद्भूत हुए ‘राष्ट्र-राज्य’ भी मुक्त न हो सके है।

मन्नू भण्डारी, कृश्णा सोबती, उषा प्रियंवदा के साथ-साथ ममता कालिया भी 60-70 के दशक की सशक्त हिंदी लेखिका है। जिन्होंने लेखन में स्त्री जीवन के विभिन्न पहलुओं को अपना विषय-वस्तु बनाया। फिलहाल उनके सबसे चर्चित उपन्यास ‘बेघर’ को विचार चिंतन का केंद्र बिंदु बनाकर उनमें स्त्री-परिप्रेक्ष्य की जाँच पड़ताल करते है। यह उपन्यास 1971 में प्रकाशित हुआ था। इस उपन्यास का मूल कथ्य स्त्री हेतु पुरूष वर्चस्वषाली समाज में स्त्री की ‘यौन शुचिता’ के मिथ को चुनौती देता है। पितृसत्तात्मक समाज में कौमार्य का एक नैतिक, धार्मिक और रहस्यात्मक महत्व रहा है और आज भी है। वस्तुतः प्राचीन काल से लेकर आज तक यौन संबंधो के नियमन में जितनी सतर्कता और चिंता जताई गई है। उतना किसी और कार्य में नहीं .अभद्र दैहिक व्यवहार और यौन कुंठाए स्त्री-पुरूष के जीवन संबंध को प्रारंभ से ही विकृत करते रहे है। स्त्रियां कालक्रम में अगर घरों की चार दिवारी में कैद हुई तथा आर्थिक परिस्थितियों में शरीक होने से वंचित रह गई तो यह मूलतः योनि शुचिता तथा शरीर और नस्ल की शुद्धता के बोझिल मूल्य बोध का परिणाम है।

राजनीतिलक

भारतीय परिदृश्य में देखे तो यहाँ ब्राह्मणवादी पितृसत्ता के स्वरूप ने स्त्री की यौन शुचिता की धारणा को और ज्यादा मजबूती दी है। फलतः हम यौन शुचिता के मिथकीय मनोग्रंथि को इस उपन्यास के नायक परमजीत में देख सकते है।’ पहला न होने की निराशा के सन्नाटे के साथ-साथ उसे अपनी जिन्दगी का सारा नक्शा  मुचड़ा हुआ दिखायी दे रहा था।….वह दुर्घटनाग्रस्त आदमी की तरह सन्न बैठा रहा। संजीवनी को देखकर वह चकित हो रहा था। वही लड़की थी, बिल्कुल वही पर कितनी अलग लग रही थी। इतनी थोड़ी दूर पर बैठे हुए भी वह मीलों दूर जो पड़ी थी।’’15 परमजीत ने संजीवनी के साथ विवाह कर एक सुन्दर सा घर बसाने को जो स्वप्न देखा था, वह एक पल में चकनाचूर हो गया। कौमार्य भंग स्त्री को वह अपनी पत्नी के रूप में कैसे स्वीकार कर सकता था। परमजीत के प्रेमाभिव्यक्ति में स्त्री देह दृष्ठि ही ज्यादा दिखाई देती है। इसके कई संदर्भ उपन्यास में दिखाई पड़ते है। ‘अकेले मे तुम्हारे तलुवे सहलाकर, तुम्हारे बाल खोलकर, ……….तुम्हे एक ही पल में लड़की से औरत बना दूँगा संजी।’’ 16 ‘‘ये ओठ भी मेरे हैं , आँखे भी मेरी हैं , ठोढी भी मेरी है।’’17 ‘‘हमें इतना पास बैठना चाहिए कि मैं तुम्हे गोद में डाल तुम्हारे ऊपर हाथ फेर सकूँ कही भी।’’18 यह निश्चित रूप से किसी प्रेमी के वाक्य नहीं हो सकते, बल्कि यह तो पुरूश वर्चस्वपरक व्यवस्था के किसी प्रतिनिधि चरित्र के ही वाक्य हो सकते हैं जो कि स्त्री देह को अपनी संपत्ति के रूप में प्राप्त करना चाहता है।

इस तरह से ये पांचो उपन्यास ‘बेघर’, ‘मित्रो मरजानी’, ‘सूरजमुखी अंधेरे के’, ‘आपका बंटी’ व ‘पचपन खम्भे लाल दीवारे’ स्वतंत्रोपरान्त भारत में स्त्री की अधीनस्थता के विभिन्न पहलुओं व स्त्री विरोधी धारणाओं को प्रश्नांकित करते हुए स्त्री-जीवन के अनुभव खण्ड को लाकर हिंदी सृजन संसार में सशक्त पदार्पण करते हुए स्त्री लेखन की एक प्रवाहमान धारा विकसित करते हैं। ये उपन्यास इसलिए भी अपनी महत्ता रखते हैं क्योंकि यह लगभग 10 बर्षो के भीतर की ही प्रकाशित रचनाएँ हैं और विशेषकर हिंदी पट्टी के सामाजिक परिवेश को केन्द्रित करके बुनी गई हैं और संबोधित भी हिंदी पट्टी समाज को ही की गई हैं। इस प्रकार यह रचनाएं तत्कालीन परिवेश में स्त्री की उपेक्षित अवस्थित को अभिव्यक्ति देते हुए स्त्री सरोकारो से पाठक को जोड़ने वाले पुल की भूमिका में आती है।

संदर्भः
1   प्रमिला कपूर, कामकाजी भारतीय नारी, पृ. 52
2  पचपन खम्भे लाल दीवारे , उशा प्रियवंदा, पृ.11, संस्क-1991, राजकमल प्रकाशन प्रा. लि. नई दिल्ली।
3   वही, पृ.33
4   वही, पृ.48
5    वही, पृ.11
6   वही, पृ.26
7   वही, पृ.36
8    वही, पृ.55
9   सूरजमुखी अंधेरे के,कृष्णा सोबती, पृ. 50, राजकमल प्रकाशन प्रा.लि. नई दिल्ली
10    वही, पृ.50
11  उषा महाजन, उठो अन्नपूर्णा साथ चलें, हिमालय पुस्तक भण्डार, 1998. पृ.117
12    सूरजमुखी अंधेरे के, कृष्णा सोबती, पृ.70
13   श्रृखला की कड़ियां, महादेवी वर्मा.
14  नारीवादी राजनीति संघर्ष एवं मुद्दे, संपा-साधन आर्य, निवेदिता मेनन, जिनी लोकनीता, पृ.3 संस्करण 2001, हिंदी माध्यम कार्यान्वय निदेशालय, दिल्ली विशवविद्यालय।
15    बेघर, पृ.72
16   वही, पृ.63
17    वही, पृ.79
18   वही, पृ.59

बलात्कार को सिर्फ परिचर्चा का विषय नहीं बनायें

कुमारी ज्योति गुप्ता 

बलात्कार सिर्फ एक स्त्री के खिलाफअपराध नहीं बल्कि यह पूरी मानव सभ्यता और इंसानियत के खिलाफ अपराध है। कुछ दिनों पहले शिमला की गुड़िया के साथ जो हुआ  वह कुछ नया नहीं है।अब तो ऐसा लगता है हमारे कानों को इस तरह की खबर  सुनने की आदत सी हो गई है। मैंने सोशल मीडिया पर देखा भी और सुना भी। एक संगीनअपराध को महज बहस बनाया जा रहा है। गनीमत है कि बहस का मुद्दा बलात्कार रखा जाता है। भले ही वह अपने उद्देश्य  से भटका हो।बहस का मुद्दा बलात्कार तो है लेकिन इसमें न्याय दिलाने की बात या स्त्रियों के खिलाफ इस अमानवीयता की शिकायत कम,अपने पक्ष को कितने कलात्मक ढ़ंग से हम पेश कर रहे हैं यह ज्यादा महत्त्वपूर्ण हो गया है।

जब इस तरह की कोई बहस होती है सोशल मीडिया पर तो बोलने के लिए जितने भीमहानुभाव आते हैं उनका सिर्फ यही ध्यान होता है कि हम बेहतर बोलें, टी.वी पर सुन्दर दिखे और किसी बात पर श्रोताओं ने ताली बजा दी तब तो कहना ही क्या। समझो आना सार्थक हो गया भले ही सार्थक बोले या न बोले। मुद्दे की गंभीरता पर चर्चा हो या न हो । भई हमने तो बात रख दी । बहस के दौरान अगर कोई महत्त्वपूर्ण बात निकलती है तो उसे तुरंत  रोककर ‘ब्रेक’ ले लिया जाता है।ब्रेक के बाद लौटते ही महत्त्व पूर्ण बात दब जातीहैऔर बहस सिर्फ बहस रह जाती है।पूरा मीडिया व्यापार बन कर रह गया है।कहीं किसी का बलात्कार हो जाता है तो यह गंभीर मुद्दा कम होता है। खुले शब्दों में कहें तो मीडिया को अपनी कमाई के लिए मसाला मिल जाताहै। दो-चार दिन बाद चर्चा बिल्कुल बंद हो जाती है।जनता का आक्रोश भीधीरे-धीरे दब जाता है।आक्रोश  खत्म हो जाता है यह तो नहीं कहूंगी क्योंकि यही दबा हुआ आक्रोश इसी तरह की किसी और घटना पर उभर आता है। जनताअपनाआक्रोश ही व्यक्त कर सकती है क्योंकि सारे नियम कनून किसीऔर के हाथमें है।जनता में कानून का डर है लेकिन सोचने वाली बात यह है कि अपराधी को कानून का कोई डर नहीं क्योंकि उसका गॉडफादर उसेबचाने के लिए मौजूद है।इसलिए वह डर की सारी सीमा पार कर चुका है।

हमारे देश में जो इस तरह की घटनाए हो रही हैं इसके लिए दोषी कौनहै? क्या कानून व्यवस्था दोषी है? अगर हां तो फिर क्या नया कानून बनाने की जरूरत है।प्रश्न महत्त्वपूर्ण है क्योंकि  कानून का डर आम सीधी-साधी जनता में हैअपराधियों में नहीं है।इस तरह तो डरे हुए कोऔर डराया जा रहा है।सुरेन्द्र वर्मा नेआ मजनता की स्थिति परअपने एक वक्तव्य में कहा था-
‘‘ कोई फर्क नहीं पड़ता राजा राम है कि रावण,
जनता तो सीता है
राजा राम हुआ तो वनवास दी जाएगी
राजा रावण हुआ तो हरण की जाएगी।’’

अखबारों में रोज़ किसी न किसी जगह एक -दो बलात्कार की खबर पढ़ने को मिल जाती है। यह कोई खबर मात्र नहीं जिसे इतने हल्के में डेली रूटीन की तरह छाप दिया जाता है।यह स्त्री की संपूर्ण मनोभावना को ध्वस्त कर देने वाला संगीनअपराध है जो पीड़िता से उसके जीने काअधिकार छीन लेता है। यह वह अमानवीय अपराध है जो हैवानियत की सारी हद पार कर देता है।हमारे समाज की संरचना कुछ इस प्रकार की है कि यहां हर हाल में स्त्री को ही दोषी माना जाता है।इसलिए अरविंद जैन नेअपनी पुस्तक‘औरत होने की सज़ा’में लिखा है ‘‘समाज, सत्ता, संसद और न्यायपालिका पर पुरुषों काअधिकार रहने की वजह से सारे  कानून और उनकी व्याख्याएं इस प्रकार से की गई हैं कि आदमी के बच निकलने के हजा़रों चोर दरवाजे मौजूद हैं जबकिऔरत के लिए कानूनी  चक्रव्यूह से निकल पाना एकदम असंभव’’ इसलिए पीड़िता खुद को दोषी मानकर सम्मानपूर्ण जीवन नहीं जी पाती।

इस तरह के अपराध को कैसे रोका जाए।कई संस्थाए हैं जो इस तरह के अपराध के खिलाफ आवाज उठाने का काम कर रही है, जागरूकता अभियान भी चला रही है जो कि सराहनीय है। कई संस्थाएं स्कूल, कालेज और सामाजिक स्तर पर बहस का भीआयोजन करती है मगर दुर्भाग्यवश  ये बहस इस बात पर सिमट जाती है कि पीड़िता सुनसान जगह परअकेले क्या कर रही थी, अगर जाना जरूरी था तो अपने साथ अपने भाई या पिता को साथ लेकर क्यों नहीं गई, उसने क्या पहन रखा था , उसका आचरण कैसा हैआदि-आदि. ये प्रश्न पीड़िता को दोषी साबित करने के लिए र्प्याप्त होते हैं।क्या हमारा समाज एक स्त्री को शरीर और भोग से ऊपर नहीं देखना चाहता या फिर अपनी ओछी सोंच की गुलामी से ऊपर नहीं उठना चाहता।

एक और महत्त्वपूर्ण बात यह है कि नागरिक कहीं की भी हो उसे राजनीतिक इस्तेमाल का  मुद्दा न बनाया जाए। जरूरी यह है कि  उसे उसके मौलिक अधिकारों के तहत न्याय मिलना चाहिए। घटना किसी भी शहर, प्रदेश ,नगर ,गांव की हो, जगह महत्त्वपूर्णन हीं जो हुआ , जो हो रहा है उसका रूकना जरूरी है।

डा.अम्बेडकर विश्वविद्यालय ,दिल्ली के  हिन्दी विभाग में शोधरत हैं सम्पर्क: jyotigupta1999@rediffmail.com

यस पापा

अरविंद जैन

स्त्री पर यौन हिंसा और न्यायालयों एवम समाज की पुरुषवादी दृष्टि पर ऐडवोकेट अरविंद जैन ने महत्वपूर्ण काम किये हैं. उनकी किताब ‘औरत होने की सजा’ हिन्दी में स्त्रीवादी न्याय सिद्धांत की पहली और महत्वपूर्ण किताब है. संपर्क : 9810201120
bakeelsab@gmail.com



महाज्ञान बाबू का इकलौता बेटा चेतन अप्पूघर-पप्पूघर ही नहीं, स्कूल, कॉलेज और दफ्तर से वापस घर तक सारी उम्र पापा की उगँली पकड़े-पकड़े गाता रहा ‘‘यस पापा, यस पापा, पापा-पापा, यस पापा,।’’ इस बीच लीलाओं, नाटकों और नौटंकियों में सीता, राधा और द्रौपदी का पात्र जीते-जीते, चेतन न जाने कब चेतना बन गया था।


चेतना को घर बेगाना किला लगता था और उस पर हर समय पापा का पहरा, पापा की अध्यक्षता में सारा दिन पंचायत और मीटिंग चलती ही रहती थी। चेतना महसूसती कि रात-दिन चेतन का आतंक उसका पीछा कर रहा है। उसे चेतन की छाया छूने से भी डर लगने लगता था। इसलिए ज्यादातर वह अपने कमरे में बंद ही रहती। देखते-देखते कमरा कैमरे में बदल जाता और कैमरे में चेतना को चूहे कुतरने लगते। अँधेरे में चीखती, चिल्लाती, भागती, भटकती, चेतना बेहोशी के बिस्तर में बड़बडाती रहती- ‘‘ नो पापा- नो पापा, प्लीज पापा – नो पापा।’’

होश आता तो ‘रिहर्सल’ खत्म हो चुकी होती। सामने पत्थरों की दीवार पर, चंदन की चौखट में शीशे के दरवाजे और जाली के बीचों-बीच एक सिन्दूरी छिपकली, कोने में हल्दी पुता चाँद और काले धुएँ के बादलों से ढका आकाश नजर आता। कभी- कभी, कुछ भी नजर नहीं  आता।

चेतना अपने माँसल बिस्तर से उठती और नहा धोकर किले से बाहर निकलती, तो हवा में हवन की गंध सी महसूस होती। उसका कम्पयूंटर  बताता, ‘‘ अरे! आज तो शूटिंग पर जाना था।’’ वह खटाखट पाँवों में पहिए लगती और स्टूडियों पहुँचती, तो बाहर चक्कर काटता चेतन डाँटने की मुद्रा में झिड़कता, ‘‘ऐसे तो ‘मॉडल क्या टाइपिस्ट’ भी नहीं बन पाओगी। समझी कुछ।“

चेतना अन्दर जाती, बुर्का उतारती, पैंट शर्ट बदलती, जादुई रंगरोगन लेपती और गोली खाते  ही, किसी बेहद सुन्दर गुड़िया में बदल जाती। गुडि़या गाती ‘‘ शूट मी… शूट मी… प्लीज’’ और उसकी उत्तेजक भाव भंगिमाओं को पकड़ते-पकड़ते, लैंस की लार टपकने लगती। सबसे ऊपर ‘क्रेन’ पर लटके पापा कांट-छांट करते रहते। वह जब थक जाती, तो ‘गुड़िया’ को वहीं किसी अनाथ कोने में छुपा कर, किले में लौट आती।

रास्ते में उसे एक बार लगता ‘कहीं जंगली कुत्ते गुडि़या को फाड़ ना खाएं’ और पलक झपकते ही शान्त हो जाती- “शायद इसलिए तो छोड़ आई हूँ। कुत्ते ढूँढते फिरेंगे गुडि़या को….. गुडि़या चेतन को….. चेतन अपने पापा को…. पापा मुझे… ओर मैं… हा…. हा…. हा।“


चेतन सन्नाटे में संवाद बोलता, ‘‘गुडि़या सुन्दर है….. सुन्दरी है….. विश्व सुन्दरी है। जिस ‘ब्रांड’ को भी छुएगी, सोना बन जाएगा।’’ गूंगी-बहरी गुडि़या चुपचाप लेटी रहती। चेतना हँसती, ‘‘माँस का खिलौना है…है नहीं दिखती है। खेलोगे तो गुडि़या है…. खाओगे तो मिटृी।“


सुबह सवेरे ‘देवी-देवतओं’ को मनाने जाते-जाते पापा समझाते, ‘‘ न गुडि़या है…. न खिलौना है। मूर्ति है माँ की…. देवी माँ की। कुछ धर्म, दर्शन, इतिहास, गीता, रामायण, वेद, पुराण, कुरान पढो, तो पता लगे। सारा दिन टी.वी फिल्में और वाहियात नॉवल पढ़ोगे तो यहीं होगा।’’ श्लोक सुनते-सुनते चेतन हुँकार भरता रहता, ‘यस पापा, यस पापा’ और चेतना जब तक जोर से चीखती, ‘नो पापा, नो’, तब तक पापा अयोध्या पहुँच चुके होते।



चेतना के शहर में शिकारी ‘ठाँय.. ठाँय’ करते और कुछ दिन कर्फ्यू रहता। अखबारो में कभी घोटालों और कभी सेंसर फैल जाता। रोज कुछ ‘स्टेनगनें’ पकड़ी जाती; सिरफिरे पुलिस मुठभेड़ में मारे जाते और शाम को कुछ लाल-सफेद टोपियाँ मंत्री पद की शपथ लेती दिखाई पड़ती। अफवाहें गशत पर घूमती रहती…. संस्कृति खतरे में… विदेशी प्रचार-तंत्र से सावधान। खतरे का सयारन बजता, तो पापा मौन व्रत धारण कर आमरण उपवास पर बैठ जाते।


चेतन की दुनिया सुबह से शाम तक गुड़ियों भरी गाड़ी लेकर, कोठियों से कोठो तक घूमती रहती। कभी-कभी कुछ गाडि़यों को कुत्ते उइा ले जाते और कुछ खुद ही भाग जाती। वह घर से धोती-कुर्ता पहन कर निकलता। मगर देर रात तक गए नशे में धुत्त झूमता-झामता लौटता, तो सूट-बूट और टाई पहने होता। पापा पूछते, ‘‘ आ गए बेटा,’’ तो वह कभी हिन्दी, अंग्रेजी, उर्दू, पंजाबी, अरबी में या कभी फ्रेंच, जर्मन या जापानी वगैरा-वगैरा में ‘यस पापा’ कहकर अपने कमरे में घुस जाता।


पापा सुबह तक सोने के सिक्के तौलते, शेयर गिनते और बजट बनाते रहते। लाईफ पढ़ते-पढते, वसीयत लिखने लगते और आत्म-कथा लिखते-लिखते, पड़ोसी की पत्नी संग हनीमून पर चले जाते। उनका हनीमून कभी खतम नहीं होता।


चेतन नींद में फुसफुसाता ‘‘ फॉदर – फॉदर… गॉड फादर।’
चेतना झल्लाती, ‘‘ फ्रॉयड नहीं, फ्रॉड।’’
चेतना संवदेना का संगीत सुनते-सुनते, न जाने कब समाधि में चली जाती। तीर्थयात्रियों से लौटती, तो चंदन की चौखट में शीशे और जाली के बीच लटके ‘मंगल-सूत्र’ और पृष्ठभूमि में रेतीले अंधड़ नज़र आते।
नींद में चेतना के चारों ओर बम-पटाखों की धड़ाम….. धड़ाम और बारुदी धुँआ भर जाता। ऐसा लगता जैसे सारी रात शरीर पर साँप रेंगते रहे और सुबह अपनी केंचुलियाँ कमरे में ही भूल गए।

एक दिन पापा को खोजते- खोजते, चेतना ने खोज निकाली महाज्ञान बाबू की जन्म कुण्डली। किसी अनाम चीनी ज्यातिषी ने वर्षों पहले लिखा था- “जातक बंदर की तरह बुद्द्धीमान, चालाक, हाजिर जवाब, रंगीन मिजाज और शरारती स्वभाव का होगा। ज्ञान की तीव्र जिज्ञासा में देश-विदेश की यात्राँए निश्चित हैं। शास्त्रार्थ में सदा विजयी रहेगा। अधिकांश लोग तो बालक की घुड़की भर से भयभीत रहेंगे। बहुमुखी प्रतिभा के बल पर, हर क्षेत्र में सफलता मिलेगी। कला, साहित्य, दलाली, सटृा, राजनिती या वकालत में अनेको सम्मान, अपार सम्पति और अजेय सत्ता  का अनंत सुख हासिल होगा।’’

भविष्यवाणी पढ़कर चेतना बहुत देर तक गुदगुदाती रहीं और मन ही मन गुनगुनाती रही, ‘‘ मोंकी-मोंकी  यस पापा…… डोंकी-डोंकी, यस पापा।’’

चेतन के कान बजबजाए तो खीझ कर बोला, ‘‘पापा इज ए मोंक, नॉट ए मोंकी….. ब्ल्डीफूल।’’
चेतना ने शीतयुद्ध छोड़, मोर्चा सम्भाल हमला किया, ‘‘चेतन! तू चूहा है चूहा…. और चूहे से ज्यादा अवसरवादी और घिनौना और कोई नहीं होता।


चेतन के चेहरे पर अपराध बोध सा प्लेग फैलने लगा और अपमानित चेतन ने पाँव पटकते हुए अखिरी हथियार चलाया, ‘‘इफ आई एम ए रैट, यू आर ए कैट एण्ड मेयरली ए स्टिकिंग होल।’’
चेतना को ऐसा लगा जैसे चेतन ने तेजाब छिड़क दिया हो। लेकिन दूसरे ही क्षण झपटृा मार नोंचते हूए बोली, ‘‘ सुनो मिस्टर यस पापा, यू नो… दि कैट कैंन कैच एंड किल दि रैट।’’



चेतन डर के मारे, “पापा-पापा, ओ पापा, कैट बिल किल मी ओ पापा,’’ गाते-गाते चिल्लाने लगा।
आँख खुली तो चेतना की एक मुटृी में भरा चूहा और दूसरी में चेतन का चेहरा था। सामने चंदन की टूटी चौखट पर बैठे बंदर को जैसे लकवा मर गया था। लेकिन अभी भी वह खों…. खों करता खोपड़ी खुजला रहा था। खु….ज…. ला…. र….. हा….. है……!

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और मैं फूलनदेवी से जुड़ गई

श्वेता यादव

सामाजिक कार्यकर्ता, समसामयिक विषयों पर लिखती हैं. संपर्क :yasweta@gmail.com

2002- 04 के आसपास की बात है| यह समय मेरा हाईस्कूल-इंटर का है| शुरू से ही स्वभाव मेरा काफी अक्खड़ है| किसी भी गलत बात पर चुप नहीं रहना, किसी से भी भीड जाना चाहे वह बात मेरी हो या किसी और की ये मेरा स्वभाव था, जो आज भी बदस्तूर जारी है| मेरे स्कूल में सवर्ण लड़के (जी हाँ पूरी जिम्मेदारी से कह रही हूँ, सवर्ण लड़के, जिसमें ज्यादातर ठाकुर थे|) मुझे फूलन देवी बुलाते थे| सोशल मीडिया में उस समय की एक ही दोस्त दिखती है, प्रिया जयसवाल, शायद उसे याद हो!

 तब मैं भी छोटी थी और फूलन को ज्यादा नहीं जानती थी लिहाजा बुरा लगना लाज़मी था| क्योंकि फूलन देवी को लेकर जिस तरह की छवि बना दी गई है उससे जानने वालों को भले ही फूलन देवी संबोधन अच्छा लगे लेकिन ना समझने वालों को और गलत तरीके से जानने वालों को तो अच्छा नहीं ही लगेगा| एक बार कि बात है इन लड़कों से कुछ बहस हो गई बहस क्या हम दो लड़कियों ने मिलकर बड़ा काण्ड कर दिया| हुआ यूँ कि ये बदतमीज  लड़के क्लास में भी बहुत हुल्लड़ करते थे और किसी भी टीचर को पढ़ाने नहीं देते थे| चूँकि वह दौर था कि अगर टीचर ने कुछ भी बोल दिया या क्लास के बाहर कर दिया तो, स्कूल के बाहर तेचार का पीटना तय| इस डर के चलते कोई भी टीचर इन बच्चों से पंगा नहीं लेता था| हमारे फिजिक्स के सर दुर्गा प्रसाद मिश्र जो की बहुत ही सीधे थे लेकिन पढ़ाते बहुत अच्छा थे, उन्हें ये लड़के क्लास ही नहीं लेने देते थे| हम दो लड़कियों ने इन्हें सबक सिखाने की सोची और केवाछ खरीद कर लाये (केवाछ एक ऐसी दवा जो अगर शरीर को कहीं छू जाए तो बहुत भयानक खुजली होती है, कहते हैं केवाछ से उत्पन्न खुजली सिर्फ एक ही चीज से रूकती है वह है गोबर)| जब सब प्रार्थना सभा में इकट्ठे हो कर प्रार्थना कर रहे थे तब मैं और ज्योति इनके बैग, सीट हर जगह पर केवाच छिडक रहे थे| थोड़ी देर बाद ही क्लास शुरू हुई अमूमन यह आदत होती है कि सीट पर बैठते वक्त हम सब आगे की तरफ झुकते हैं और बैग पर हाथ रख कर बैठ जाते हैं, यही हुआ उस दिन भी, उसके थोड़ी देर बाद जो हुआ वो मंज़र आज भी आँखों के सामने आता है तो हंसी छूट जाती है| लड़कों का पूरा शरीर खुजला खुजला कर बुरा हाल| इधर हम दो लड़कियां भी इसी हालत में थी .. चूँकि तमाम सुरक्षा लेने के बाद भी केवाच हमें भी छु गई थी तो बुरा हाल होना लाज़मी था| अच्छा भी हुआ इससे मैनेजमेंट की नज़र में लड़कियां भी बरी हो गई कि लड़कियां तो खुद खुजली से परेशान से परेशान हैं इसलिए यह ये शैतानी नहीं कर सकती| स्कूल शुरू होते ही हम लोग अपना अपना बैग लेक्कर घर वापस|

खैर लड़के घर गए और उस दिन और उसके बाद लगभग हमेशा के लिए क्लास शांत हो गई| मुझे आज भी याद है दुर्गा सर समझ गए थे क्योंकि उनकी आँखों में झलक रहा संतोष का भाव बहुत कुछ समझा गया था| मुझे नहीं पता कि लड़कों को यह बात कैसे पता चली कि यह काण्ड मैंने किया था| जिस दिन वे लौट कर स्कूल आये उस पूरे दिन मुझे बहुत परेशान किया स्कूल से बस स्टॉप जाते वक्त पूरे रास्ते उन्होंने मेरा पीछा किया और रास्ते भर जोर-जोर से आवाज़ लगाते रहे फूलन देवी- फूलन देवी| उस दिन मैं वापस घर लौट कर बहुत ही दुखी होकर बैठी थी तो पापा ने वजह पूछी मैंने सब बताया और कहा ” सब ठीक है लेकिन जब कोई मुझे फूलन देवी बुलाता है तो मुझे अच्छा नहीं लगता”…
‘पापा ने पूछा क्यों?’ क्यों अच्छा नहीं लगता?
मेरा जवाब था- ‘क्योंकि वह अच्छी नहीं थी’ तभी तो लड़के मुझे फूलन बुलाते हैं!
पापा ने कहा- तुम्हें पता है फूलन कौन थीं? और उनकी हत्या क्यों हुई?

अत्याचार का अस्वीकार है फूलन की क्रांति गाथा 


मैंने कहा- मुझे नहीं पता बस मैं इतना जानती हूँ वह अच्छी नहीं थी, इसलिए मुझे फूलन बुलाया जाना पसंद नहीं!
पूरी बात सुनकर पापा हँसे और काफी समझाया लेकिन मैं जस की तस स्कूल तक जाने तक को तैयार नहीं| पता नहीं पापा को क्या सूझा और कहा ‘अच्छा रुको तुम्हें कुछ सुनाता हूँ|’ और पापा एक कैसेट खरीद कर ले आए. जहाँ तक मुझे याद है आवाज ‘बेचन राम राजभर’ (जो बिरहा सम्राट के नाम से भी जाने जाते हैं) की  ही थी| बिरहा एक बहुत ही फेमस विधा जिसमें विस्तृत रूप में किसी घटना का जिक्र गीत के माध्यम से करते हैं| बिरहा विधा में ज्यादातर वीर रस का प्रयोग होता है| बेचन अपने बिरहा में फूलनदेवी के बचपन से लेकर संसद तक की कहानी गाते थे. बाद  के दिनों में मैंने इसे विजय लाल यादव की आवाज़ में भी सुना जो मुझे ज्यादा अच्छा लगा|

बेचैन जी का बिरहा:


खैर पापा बेचन की आवाज़ वाली कैसेट ही लाये थे और कैसेट लगाते हुए कहा आओ सुनते हैं| कुछ कहने से पहले पूरा सुनना जरूर फिर बात करेंगे| उसके बाद मेरे घर में डीवीडी आई फूलन पर बनी फिल्म बैंडिट क्वीन जो तब के दौर में एक बड़ी घटना कह सकते हैं आप कि इस फिल्म को पहली बार मैंने अपने घर में देखा| उसको देखा मैंने कहीं न कहीं मन की धुंध साफ़ हुई पूरी तरह से तो नहीं पर हाँ इतना जरूर हो गया कि अब कोई फूलन कह कर आवाज लगता तो पलट कर देखती जरूर और मुस्कुरा कर कहती हाँ बोलो… आज जब फूलन को अच्छे से जान गई हूँ तब ख़ुशी होती है कि लोग किसी ज़माने में मुझे फूलन बुलाते थे| फूलन आपको नमन!

मोदी जी, लहू का लगान आपकी लुटिया न डुबो दे !

ज्योति प्रसाद

 शोधरत , जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय. सम्पर्क: jyotijprasad@gmail.com

कुछ समय पहले टीवी और अखबारों में औरत और उसकी माहवारी को एक खास चित्र से पेश किया जाता था। चित्र में दो महिलायें होती थीं। एक महिला दूसरी के कान में फुसफुसा कर कहती थी। इससे अपने आप एक समझ बन जाती थी कि बात पीरियड्स की हो रही है। हाल के वर्षों तक यही हाल था और आजकल भी ऐसा ही हाल है। देश में ऐसे पूजा-पाठ के स्थान हैं जहां माहवारी के दौरान कोई भी महिला प्रवेश नहीं कर सकती। भगवान अ-पवित्र हो जायेंगे, ऐसा ख़तरा लगातार इस महान संस्कृति के महान रक्षकों को सताता रहता है। बाज़ार ने औरत को कुछ इस तरह से पेश किया है जो एक अदना सेंट को सूंघकर मर्द के साथ हो लेती है। कुछ देशभक्ति का दावा करने वाले अभिनेता तो चड्डी और बनियान के विज्ञापन से भी औरतों को प्रभावित कर लेते हैं। समाज, संस्कृति, बाज़ार आदि-आदि तो औरतों को ठग ही रहे हैं साथ ही साथ सरकार भी अपने नए नियम के साथ ठगने के लिए तैयार बैठी है। पीरियड के दौरान इस्तेमाल किए जाने वाले नैप्किन्स पर 12 प्रतिशत का कर लगाया जा रहा है। इसके बाद ये महंगे तो होंगे ही, साथ ही साथ बहुत सी महिलाओं की पहुँच से दूर हो जाएंगे।

औरतें महीने के कुछ खास दिन असहनीय दर्द और एक महक में गुजारती हैं। इससे वे चाह कर भी पीछा नहीं छुड़ा सकतीं। इससे उन्हें बेहद तकलीफ़ होती है। वे हैं- ‘महीने के उन दिनों में शरीर से रिसते खून की महकऔर अंदरूनी हिस्सों में उपजने वाला दर्द!’महिलाओं के अनुभवों से पता चलता है कि कई सालों से पैड के इस्तेमाल से दर्द व महक से तकलीफ़ थोड़ी बहुत कम हो गई है क्योंकि पैड साफ और सुरक्षित होने के साथ साथ खुशबू वाले होते हैं। इस्तेमाल में भी आसान। यह मामूली सी वस्तु लगने वाला और खून सोखने वाला स्पंज नहीं बल्कि हम आधी दुनिया के लिए अनिवार्य वस्तु है जो बहुत हदतक हमारे उन दिनों को हमारे लिए साफ और बेहतर बनाता है।

शुरू में सेनिटरी पैड पर 12%का कर लगा है उसे सोचकर मैं बहुत हद तक हैरान नहीं हुईथी। पर जब यह मालूम पड़ा कि टिकुली और सेनूर (बिंदी-सिंदूर) पर कर नहीं है तब मुझे दोनों की तुलना करने के बाद अव्वल दर्जे की हैरानी हुई कि लोगों का दिमाग पितृसत्ता के ढांचे में कैसे अनुकूलित हो चुका है! कैसे पढ़ी लिखी सरकार को परंपरा के माम्बा साँप ने डंस लिया है। हाल के वर्षों में हुई कई तरह की घटनाओं को देखते हुए मुझे सरकारों से बहुत उम्मीदें नहीं हुआ करतीं।क्या कर निर्धारण करने वाली सलाहकार टीम में महिलाएं नहीं थीं?उस समूह में औरतों की संख्या कितनी रही होगी? क्या वे एक-दो संख्या में थीं जिस कारण उनकी आवाज़ दबा दी गई? क्या उन्हों ने महिला होने के नाते इस पर कोई आपत्ति नहीं दर्ज़ की? क्या सरकार को नहीं मालूम कि पैड पर कर बढ़ाने के बजाय कम करना चाहिए या फिर कर मुक्त करना चाहिए? क्या टीम में शामिल लोगों ने इस पर तनिक भी बहस नहीं की? क्या सरकार महिलाओं के कल्याण और विकास में उनके शरीर को नहीं जोड़ती? सरकार महिलाओं के लिए किस तरह के विकास की कल्पना करती है? क्या सरकार महिलाओं को हर मोर्चे पर ठगने के लिए योजनाबद्ध है.., कुछ ऐसे ही सवाल ज़ेहन में रह-रह कर आ रहे हैं।

इसी के बहाने मौजूदा दौर में ‘महीने के उन दिनों’ के बारे में बहस होते देख अच्छा भी लग रहा है। जिस महत्वपूर्ण विषय की चर्चा फुसफुसा कर हुआ करती थी अब उस पर सार्वजनिक बहस की जा रही है। इसके चलते माहवारी से जुड़े अहम पक्ष उभर कर सामने आ रहे हैं। लोगों की झिझक में कमी आ रही है। इसके अलावा इस विषय से जुड़ी परेशानियों को गंभीरता से समझने की कोशिश शुरू हो चुकी है। हाल ही में आई एक हिन्दी फिल्म ‘फुल्लू’इसका अच्छा उदाहरण है जिसने इस विषय को बहुत से लोगों तक आसानी से पहुंचाया है।

सबरीमाला के भगवान अय्यप्पा के मंदिर,हाजीअली दरगाह आदि जगहोंपर औरतों कोमाहवारी के दौरान घुसने नहीं दिया जाता। इसका कारण उनके इस समय अ-पवित्र होने को बताया जाता है। जबकि गौर करने पर पता चलता है कि पवित्रता और अपवित्रता की पूरी पृष्ठभूमि ही एक मनगढ़ंत, मनमाने औरतानाशाही रवैये का एक रूप है।जो प्रक्रिया शरीर के अंदर प्राकृतिक रूप से हर महीने होती है वह किस प्रकार से अ-पवित्र हो जाती है? जबकि अ-पवित्रता की श्रेणी में तो किसी का शोषण करना ही आता है। आधी आबादी का शोषण कोई दस या बीस बरस पुराना नहीं है, बल्कि इतिहास के अंदर दबी-घुटी कहानियों में कितने ही भयंकर शोषण के सबूत मिल जाते हैं। क़ायदे से किसी का भी शोषण ही सबसे बड़ी अ-पवित्रता है। औरतों कापारिवारिक,सामाजिक, पारंपरिक, आर्थिक, सांस्कृतिक आदिधड़ों ने बखूबी शोषण किया है साथ ही साथ एक अरसे तक उनकी शारीरिक शक्ति जो नए जीवन का कारण है,को अपवित्र घोषित कर बरसों तक पेश किया है।वास्तव में ये व्यवस्थाएँ उनको कमजोर बनाए रखने के नुकीले औज़ार भी रहे हैं। ऐसा नहीं है कि यह सब बंद हो चुका है। यह इक्कीसवीं सदी में भी जारी है। यहां अभी भी आधी दुनिया की परेशानियाँ कुछ कम तो बिल्कुल नहीं हैं।

इस सब से परे मैं उस 14 या 15 बरस की लड़की की जगह खुद को रखकर सोच रही हूँ जिसे पहली बार महीने के दिन शुरू हुए हैं। सरकार को नहीं मालूम कि जब 15 साल की उम्र में (अब 10 या 12 से पीरियड शुरू हो जाते हैं) एक गर्मी की सुबह आप सो कर उठे हों और आपके पैरों के बीच गीलेपन का अहसास होता है, तब वह बच्ची जो ताज़ा-ताज़ा बड़ी हुई है,अपने को मजबूर पाती है। वह नौजवानी की दहलीज़ पर कब खड़ी हो जाती है उसे इसका तनिक भी अहसास नहीं होता। उस समय उसका शारीरिक और मानसिक स्तर निचले दर्जे पर आ जाता है। यह मानसिक धक्का भी होता है। इससे बाहर आने में उसे कई बरस लग जाते हैं।

वह उस रात से पहले बच्ची ही थी। न जाने रात के कौन से पहर में शरीर यकायक बदल जाता है। सही वक़्त का पता रात की सोई हुई दीवार घड़ी की सुइयां जानती हैं और शरीर के अंदरूनी अंग। किसी गैर लिंग या फिर सरकार को क्या मालूम 14-15 बरस में आपके शरीर का वह अंग जो सबसे अधिक रहस्यमयता लेकर संग जीता है वह अचानक से खून के थूक कैसे उगलने लगता है? कैसे बताया जाये कि खून किसी छोटी गुठली की शक्ल लिए धक से बाहर गिरने लगता है तब मन में कितनी अजीब सी बातें आने लगती हैं! यही चिढ़ में बदल जाती है।डियर सरकार, आपको नहीं मालूम यह चिड़चिड़ाहट कितनी खराब होती है जो हर महीने निश्चित समय पर आ धमकती है।

सरकार को यह भी नहीं पता कि किसी आमफहम परिवार से ताल्लुक रखने वाली लड़कियों के माहवारी के शुरुआती दिन कैसे होते हैं? अगर परिवार में तीन या चार बेटियां होती हैं तब तो और भी मुश्किल हो जाती है, क्योंकि इसमें माँ को मिलाकर माहवारी के दिन बिताने वाली औरतों की संख्या बढ़ जाती है। अकेले पिता के ऊपर ख़र्च का जिम्मा होता है। वह मासूम पिता तो ‘बेटी बचाओ और बेटी पढ़ाओ’ के नारे को सच मानकर उन्हें पढ़ाना ही चाहता है। उसे कई बार यह ख़यालभीनहीं आता कि उसकी सबसे छोटी बिटिया भी अब महीने के उन दिनों वाली दशा में प्रवेश कर चुकी है। दूसरी तरफ माँ जिसे विरासत में ही छुपाने की कला सिखाई जा चुकी है वह पिता से भरसक इस बात को छिपाने की कोशिश करने में व्यस्त रहती है कि छोटी बिटिया भी अब बड़ी हो चली है। यही कला वह मासूम पालतू माँ अपनी बेटियों में भी डालना शुरू कर देती है कि कैसे ‘यह न करना और वह न करना’ आदि आदि। अब हर बार वह अपने हिस्से का पैड अपनी सबसे छोटी बेटी को दे देती है क्योंकि अभी उसे इसे समझना और संभालना नहीं आया है। सरकार को नहीं मालूम कि ‘भारत-माता’ कितनी कुर्बानी देती है। खुद पुरानी सूती साड़ी का इस्तेमाल करती है और बड़ी और अनुभवी हो चुकी बेटियों को भी सूती साड़ी को चिथड़ों में काटकर इस्तेमाल करने के लिए प्रोत्साहित करती है।माँ को ऐसा कर यह लगता है कि कुछ तो बचत होगी ही।

वस्तु एवं सेवा कर उर्फ़ जीएसटी की टीम और वित्त मंत्री को नहीं पता कि किसी युवा होती लड़कियों की कक्षा में वे लड़कियां छुट्टी कर घर में बैठ जाती हैं क्योंकि पहले दिन पेट के निचले हिस्से में दर्द बहुत होता है और बहाव भी तेज़ होता है। इतना तेज़ कि एक पैड बहुत जल्दी ही गीला हो जाता है। एक ही दिन में कई पैड लग जाते हैं। न बदलो तो दाग लगने या फिर अंदरूनी कपड़े खराब होने का भय मन में तैरने लगता है। क्या वित्त मंत्री को पता है कि 32, 34,…(बढ़ते क्रम में),आदि आदि रुपयों की रेंज में मिलने वाले नैप्किंस के पैकेट में 8, 10 या 12 ही संख्या होती है। कुछ औरतों व लड़कियों का खून इतना बहता है कि वे पूरा दिन साफ सफाई और पैड बदलने में बीत जाता है। कई बार एक ही महीने में कई पैकेट ख़रीदने पड़ जाते हैं। तिस पर घर के काम जो कभी अपने में परिवर्तन नहीं लाते मुंह बाए खड़े रहते हैं। घर के काम की कभी छुट्टी नहीं होती मंत्री जी!

रोजाना सफर तय करने वाली लड़कियों के बारे में क्या आपको मालूम है मंत्री जी? कीजिये सिटी बसों में सफर। आपको मालूम चल जाएगा कि बसों में उन दिनों में खड़े होकर सफर करना क्या होता है! बस में धक्के लगने के साथ साथ दर्द को झेलना और बहाव का तेज़ होना, भला एक बेचारा मामूली सा पैड कितना सोख पाएगा। स्कूल, कॉलेज,दफ्तर या कहीं भी काम पर जाने की जल्दी कि कब टॉयलेट मिले कि पैड बदला जाये। सुकून मिले।बसों में इतनी भीड़ होती है कि खड़े होने की जगह भी नहीं मिल पाती। दूर कहाँ जायें, दिल्ली की डीटीसी बसों में ही इतनी भीड़ हो जाती है कि दो सीटों के बीच घुस कर लड़कियां खड़ी होकर अपने को गंदी हरकतों से बचाती हैं और चैन पाती है। सोचिए मंत्री जी उस समय एक पैड कितना सुकून देता है कि खून बाहर नहीं आएगा। दाग नहीं लगेगा। दफ्तर या अन्य जगह पहुँचने तक पैड यह भरोसा देता है कि इत्मीनान रखो, काम चल जाएगा।

आपको नहीं मालूम की 6या 8रुपये के अंतर में ‘पंख वाले पैड’मिल जाते हैं जिसे टीवी पर ‘विंग्स वाले पैड’ बताकर विज्ञापन दिया जाता है। मुझे बताना होगा आपको कि क्या मतलब होता है इन पंख वाले-पैडों का। पंख वाले पैड, पेंटी के दोनों ओर चिपकाए जाते हैं जिससे पेंटी के किनारे पर खून के धब्बे लगने का डर नहीं होता। क्योंकि खून तो निकल कर बहना जानता है इसलिए वह कपड़ों में यहाँ वहाँ छितर जाता है। कसम से बहुत बदबू भी आती है कभी-कभी। लेकिन पंख वाले पैड खुशबू के साथ सुरक्षा देते हैं। दाग लगने के भय से मुक्ति देते हैं। वो पेंटी के साथ चिपके रहते हैं और सोखते हैं हमारी परेशानी को,डर को,असुरक्षा के भय को, शर्म से बचाते हैं।आपको क्या इस बात की खबर है मंत्री जी?

आपको बताऊँ कि पेंटी में कपड़ा नहीं चिपकाया जा सकता। उसके हिलने का या खुल्ली सलवार से गिर जाने का भय बना रहता है। कपड़े को जितना भी धो के इस्तेमाल किया जाये, उसमें एक अ-सुरक्षाऔर अ-स्वस्थता बनी रहती है। लेकिन पैड के साथ ये सब नहीं है। एक अ-साधन सम्पन्न लड़की ने मुझे एक बार अपने साथ घटी घटना साझा की थी। उसने बताया था- ‘दीदी, उस दिन तो मुझे लगा था कि मैं कहीं जाकर मर जाऊँ! नया नया शुरू हुआ था ये। घर में खाने को नहीं था तो पैड-सेड कहाँ से आता! माँ ने कपड़ा दिया था अपनी पुरानी सूती साड़ी में से ‘फाड़कर’…वही लगा लिया था। कहीं जा रही थी उस दिन शाम को। कुछ सामान लाना था। मेरा मन नहीं था। दर्द था। जाना पड़ा। दीदी, मैं क्या बतलाऊँ कि क्या हुआ…दीदी कपड़ा ढीली कच्छी में से गिर गया। … हे भगवान…! मैं घर वापस भाग आई। एक तो दर्द था ही दूसरा यह हुआ कि शर्म से मैं मर गई। सब लोग घूरने लगे थे। माँ ने बहुत पीटा कि शर्म नहीं आती तुझे। इत्ती बड़ी हो गई संभल कर चलना नहीं सीखा। हिरनी बन रही थी।कई दिनों तक मैं घर से नहीं निकली। आज भी सोचकर सहम जाती हूँ।’ मंत्री जी बताइये आपने इसकी कल्पना की है कभी?

स्कूली जीवन के दौरान कक्षा में देखा था कई लड़कियों को दर्द से डेस्क पर ही गिर जाने का दृश्य। कई बार वह रहस्यमयी अंग गंदे कपड़े के इस्तेमाल से संक्रमित हो जाता है जिसका इलाज़ कोई लड़की या स्त्री करवा ही नहीं पाती। जब पैड के रुपये नहीं तो उस नाजुक अंग के इलाज़ के रुपये कहाँ से आएंगे? सर्वेक्षण हो तो पता चल जाएगा कि हर माह कितनी ही लड़कियों और औरतों को संक्रमण हो जाता है। कई तो मर भी जाती हैं। इस संक्रमण से उनकी दशा बहुत ही दयनीय हो जाती हैं। वे दर्द से रोती हैं बिना किसी शिकायत के, कि प्रकृति माँ आपने हमें यह वरदान या अभिशाप क्यों दिया? उन्हें इसके बारे में कोई ख़ास जानकारी नहीं होती।

आंकड़ों पर नज़र डाली जाये तब पता चलता है कि महिलाओं की बहुत बड़ी संख्या ताउम्र संक्रमण से जूझती है। इसके पीछे के कारण गंदे कपड़ों का माहवारी के समय इस्तेमाल करना या फिर कम गुणवत्ता वाले नैप्किंस का इस्तेमाल करना अन्य कारणों के साथ शामिल है। इसके साथ ही सरकार के महिला-हितैषी कार्यक्रर्मों पर सवालिया निशान खुद-ब-खुद लग जाता है। ‘महिला-कल्याण’ में स्लोगन वाली राजनीतिक योजनाएँ क्यों हवा में ही रह जाती हैं, वे जमीनी स्तर तक क्यों कार्यान्वित नहीं हो पातीं, वे योजनाएँ महज़ कागज़ों तक ही क्यों सिमट जाती हैं, ऐसे सवाल सरकार को बार-बार कठघरे में खड़ा करते हैं। माहवारी नैप्किंस पर 12% का कर सरकार की महिला कल्याणकारी छवि को धुंधला ही कर रहा है। इस निर्णय से ऐसा भी आभास होता है कि इस कर का  निर्धारण करने वाली टीम में अवश्य ही महिलाओं की बहुत कम संख्या होगी। इसलिए राजनीतिक हिस्सेदारी में 33% प्रतिशत महिला आरक्षण का हक़ मांगना इस तरह के राजनीतिक-पितृसतात्मक रवैये के खिलाफ़ मोर्चा खोलने के लिए अहम क़दम भी है। आज भी महिला केन्द्रित नीतियों एवं योजनाओं को उभयलिंगी दिमाग अंजाम नहीं देते। केवल और केवल पुरुष सत्तात्मकता की ही बू आती है।

मंत्री जी को कहाँ तो इस अनिवार्य वस्तु को सस्ता करना चाहिए था पर वह तो मुंह में जीएसटी का जाप करते हुए ‘एक कर’ की बात कर के दौड़े जा रहे हैं। आइये आपको दिल्ली से बाहर किसी बस्ती या गाँव का हाल बताया जाये। महोदय, आपको नहीं मालूम कि जब जांघों के दरम्यान कपड़े की मोटी तहें रहती हैं तो वह जांघों के दोनों ओर के हिस्सों को घिस कर छील देता है। जी हाँ, ऐसे छील देता है कि उसमें बेतहाशा जलन होती है और कई दिनों तक चलने में परेशानी और दर्द होता है। बच्चे के जन्म के बाद जच्चा को कई दिनों तक और कभी कभी पूरे एक महीने तक खून का बहाव होता है। सोचिए एक साधारण से परिवार की वह जच्चा कैसे उन दिनों को बावजूद घर को कुछ ही दिन में संभाल लेती है। वह बोलती नहीं तो इसका यह मतलब नहीं कि आपको न बताया जाये कि उसके जांघों के अंदरूनी हिस्से छिल जाते हैं, कपड़े के इस्तेमाल से।पैड के इस्तेमाल से ऐसा कम होता है और बहुत हद तक इससे जूझा जाता है। पर मंत्री जी, कई बार वह जच्चा संक्रमण की चपेट में आकर मर भी जाती है। उसे उचित इलाज़ भी नहीं मिल पाता।ठीक इसी तरह आपने किसान महिला के बारे में भी सुना होगा। ग्रामीण महिलाएं और शहरी हाशिये पर रहने वाली महिलाओं को संक्रमण का खतरा हर पल बना रहता है। सोचिए इनके बारे में!

महिलाओं के स्वास्थ्य के लिए सरकार न जाने कितनी ही योजना रोज़ ही नए नाम से निकालती रहती है। लेकिन वे सब योजना टेबल पर पड़े कागज़ पर दम तोड़ देती हैं। हाल ही के वर्षों में प्रकाश में आए शोधों और लेखों से यह पता चलता है कि सेनीटरी नैप्किंस से भी कुछ बीमारियों के ख़तरे उभर आए हैं। क्या सरकार को इसकी निगरानी नहीं करनी चाहिए? क्या सरकार को इस दिशा में कुछ कठोर कदम नहीं उठाने चाहिए ताकि महिलाओं के स्वास्थ्य को हानिकारक बीमारियों से बचाया जाये। हैरत तो इस बात की है कि हम एक बार में अन्तरिक्ष में कई सैटेलाइट्स का प्रक्षेपण तो कर सकते हैं पर औरतों के सम्मान की खोज रसोईघर के सिलेन्डर से जोड़ने में पाते हैं। आज भी सम्मान रसोईघर की सीमा नहीं लांघ पाया है। नीतियों और योजनाओं के मामले में औरतों की बारी सूची में बहुत बाद में आती है। उन्हें उतनी प्राथमिकता नहीं दी जाती जितनी कि उसे एक नागरिक के नाते मिलनी चाहिए। फिर भी औरतें हर क्षेत्र में बेहतर कर रही हैं। इसकी वजह उनमें मौजूद जिजीविषा है।

महोदय, अगर आप ऐसे अनुभवों से कभी रूबरू हुए हों तो आपको 12 प्रतिशत कर के बारे में हज़ार बार सोचना चाहिए। आपने कर भले ही महावारी नैप्किंस पर लगाया है पर यह आपकी नकारात्मक राजनीति का कदम बनकर रहेगा जो डिजिटल मीडिया में दर्ज़ हो रहा है। बरसों आपकी सरकार को खून पर कर लगाने वाली सरकार के नाम से न सिर्फ जाना जाएगा बल्कि आपको कोट किया जाएगा उदाहरण के साथ। आप अपने अनोखे फैसले से इतिहास में दर्ज़ हो चुके हैं। लेकिन आप यह अभी भी तय कर सकते हैं कि आप अपने को कैसे याद करवाना चाहेंगे? और यह भी कि लहू का लगान आपकी लुटिया न डुबो दे.