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पांच रूपये और पांच मिनट का क्रूर फेयर और लवली व्यापार

दक्षम द्विवेदी

content writer संवाद 24 वेब पोर्टल. सम्पर्क : mphilldaksham500@gmail.com



स्त्रियों की स्थिति और दशा को लेकर पिछले कई दशकों से एक वैचारिक क्रांति देखने को मिली किन्तु उस चिंतन का केंद्र बिन्दु प्रायः यौनिकता पर आधारित हिंसा ही रहा। अगर हमें स्त्रियों की दशा का समग्र विकास करना है तो हमें रंगभेद को भी ध्यान में रखना अति आवश्यक है जो एक अत्यंत महत्वपूर्ण पहलू होकर भी प्रायः मुख्य चर्चा से छुट जाता है। रंगभेद यानि गोरे और साँवले का भेद । वैसे ये रंगभेद का असर स्त्री-पुरूष दोनों से सबंधित होता है पर पर एक स्त्री को रंगभेद का दंश पुरुष से ज्यादा झेलना पड़ता है ख़ासकर शादी जैसे अवसरों पर आप सबको याद होगा कि स्टार प्लस पर 2007 में एक धारावाहिक प्रारंभ हुआ था जिसकी मुख्य किरदार एक सांवली लड़की थी और वह धारावाहिक इसीलिये चर्चा में रहा था कि उसकी मुख्य क़िरदार का रंग सांवला था .इसी बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि रंगभेद के बारे में समाज की क्या सोच है एक दुःखद पहलू ये भी है कि पूंजीवाद की इस जकड़न से लड़कियां भी प्रभावित हैं उन्हें भी गोरेपनका प्रभाव अपनी जकड़न में ले रहा है वो जानते हुए भी उन उत्पाद का प्रयोग करती है जो त्वचा के लिए हानिकारक होता है जिस द्रुतगति से पूंजीवादी समाज आगे बढ़ रहा है उसी गति से रंगभेद की ये खाई भी बढ़ रही है। पूंजीवादी समाज आर्थिक असमानता तो बढ़ा ही रहा है रंगभेद की असमानता को भी उसी गति से बढ़ा रहा है। गोरेपन का पागलपन हमारे ऊपर तेज़ी से हावी हो रहा है । ये पागलपन बहुत पहले से चला आ रहा है।


अगर कोई लड़की गोरी पैदा नहीं हुई तो उसमें उस लड़की का क्या दोष है ?उसके अंदर भी वो सारे गुण अंतर्निहित है जो अन्य लोगों में है किन्तु हमारा ये समाज उन गुणों को इसलिए नहीं देख पाता क्योंकि बचपन से हमारे अंदर गोरेपन को ही सुंदरता के मानक के रूप में हमारे दिमाग में स्थापित कर दिया जाता है। इकीसवी सदी में प्रवेश करता हुआ यह समाज रंगभेद के इस विकृत विचार से कब बाहर निकलेगा? एक लड़की जो गोरी नहीं है सारी प्रतिभाओं से परिपूर्ण होने के बावजूद क्यों अपने को क्यों कुंठित महसुस करती है?

आप हिन्दी सिनेमा का उदाहरण देख ले, कुछ चुनिन्दा अभिनेत्रियों को छोड़ कर सब गोरे रंग के प्रभाव से सराबोर हैं या बहुराष्ट्रीय कंपनियों में कार्य कर रहीं रिसेप्शनिष्ट ज़्यादातर गोरेपन का ही वर्चस्व दिखेगा। हमारे समाज को एक और जागरूकता दिखानी होगी एक और व्यापक मानसिकता को स्थापित करना होगा। ये सोचने का वक़्त आ गया है कि जो लड़की गोरी नहीं है उसकी भी अपनी एक सोच होती है, उनके भी सपने भी होते, उनकी भी आगे बढने की ललक है ,उनकी भी आगे बढ्ने की कसक है,वो भी जिंदगी से अपेक्षा करती है उनकी भी आकांक्षाएँ हैं।

विज्ञापनों की भूमिका इस भेद को और बढ़ा रही है हर जगह यही विज्ञापन कि एक हफ्ते में गोरापन पाइए, एक महीने में गोरापन पाइये. क्या कभी हमने कोई भी ऐसा विज्ञापन देखा जिसमें ये बताया जा रहा हो कि आप जैसे हो अपने में विशिष्ट हो. सादगी में ही सुंदरता होती है, जो प्राकृतिक है वह अनमोल है. शायद ही कभी ऐसा विज्ञापन देखा देखने को मिलता है. विज्ञापन बाज़ार को इस ओर ध्यान देना चाहिए क्योंकि आप ही लोग ग्राहकों की रुचि तय करते हैं अगर आप ही गोरेपन को सर्वोपरि रख देंगे तब समाज उसी ओर आकर्षित होगा.


वैसे रंगभेद को लेकर जब भी बात होती है तब अफ्रीका का ही उदाहरण दिया जाता है. लेकिन भारत भी रंगभेद से ज्यादा अछूता नहीं है, बहुत दूर जाने की ज़रूरत नहीं है नज़र दौड़ाइए और अपने अगल बगल किसी छोटे से कार्यक्रम या पुरस्कार वितरण समारोह को देखिए आपको वहीं गोरापन नज़र आ जायेगा एक थाली लिए हुए एक लड़की खड़ी रहती है जो प्रायः गोरी ही होती है फिर अतिथि महोदय उसी थाली में से पुरस्कार उठाकर वितरित करते हैं.ये उदाहरण बस एक बानगी है औऱ गहराई से समझना हो तो आप विवाह को देख सकते हैं, जिसमें लड़की वालों को दहेज़ की राशि बस इसलिए ज्यादा देनी पड़ती है क्योंकि लड़की का रंग थोड़ा सा दबा रहता है .मेरा ऐसा लिख देने मात्र से आप इसको मत मानिये कभी खुद अपने अगल-बगल इसको महसूस करने का प्रयास करिये, तस्वीर ख़ुद ब ख़ुद आपके सामने होगी.



इसका सबसे दुःखद पहलू यह होता है कि ढेर सारी प्रतिभाओं औऱ गुणों से संपन्न होने के बाद भी रंग की वजह से एक कुंठा जन्म लेती है, जो अंदर ही अंदर उसको खोखला करती है. सच में समाज की ये रंगभेद की सोच खोखली है जो एक इंसान को बस इसलिए नज़रअंदाज़ कर रही है क्योंकिं उसकी चमड़ी का रंग आपसे अलग है.जब ये बुराई हमारे बीच की है तो खत्म भी हमें ही करना चाहिए. आवश्यकता है अपनी समझ को विकसित करने की, लोगों को जागरूक करने की, ये समझाने की कि किसी का आकलन उसके व्यक्तित्व से करिये उसके स्वभाव से करिये उसके रंग से नहीं, तभी हम शिक्षित कहलाने के हकदार हैं, अन्यथा हम लोग एक पढ़े-लिखे बेवकूफ हैँ. अपने मन में ये निश्चय करिये की अगर आपके सामने कोई रंगभेद की इस गलत सोच का शिकार हो रहा तो आप उसे समझाएंगे भले ही वह कितना करीबी क्यों ना हो.अगर आप हिंदी फिल्मों के गानों पर भी नज़र डालें तो उनके बोल इस प्रकार के रहते हैं जैसे “गोरे गोर मुखड़े पे काला काला चश्मा, गोरी है कलाईयां, गोरी तेरी आंखे कहें, ये गोरे-गोरे से छोरे इत्यादि गाने गोरेपन की मानसिकता को विकसित करने में सहायक होते हैं. अतः रंगभेद की इस मानसिकता को गहराई से समझना होगा तभी गहराई से अपने मन मस्तिष्क से इसको निकाला जा सकता है.

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अंजना टंडन की कविताएँ

अंजना टंडन

विजिटिंग प्रोफेसर, राजस्थान विश्वविद्यालय. आई क्रिएट नामक संस्थान में मास्टर ट्रेनर. छः काव्य संग्रह प्रकाशित. सम्पर्क :anjanatandon87@gmail.com
मो.09314881179

1
प्रेम 
जो मुझ से लिखा गया
वो सहज नैसर्गिक स्वभाव था
प्रेम
जो रूप तुम से पढ़ा गया
वो दुर्लभ विशिष्ट सम्भावना थी
प्रेम की यह दुहरी प्रकृति
एक तरफ
सम्प्रेषणीय होने की आकांक्षा
साथ ही
निजी अनुभव में रूपायित होने की विवशता ने
एक सम्पूर्ण दैविक गुण को
अभिशप्त अधूरे अनुभव में बदल दिया
गूँगे को गुड़ से मधुमेह होने पर
इलाज में सिर्फ नजर धोनी चाहिए….

2
देखना
एक दिन
समय से पहले
तैयार हो जाएँगी सारी स्त्रियाँ ,
और तब
पुरूष
द्रवित सा
दाड़ी खुजला कर
तिनके ढूँढ रहा होगा…..

3
कभी किसी
स्त्री के बोद्घिसत्व तक पहुँचने की यात्रा लिखी जाएगी
तो हर बार
निकले क़दम
का लौटना लिखा होगा
पीछे के आती पुकार पर
…..सुनो……..
हर बार वो लौटती रही
किसी और की
जातक कथाएँ
लिखने को…

4.

महानगर के किसी छोटे घर में
लथपथ थकहार कर
रात के खाने के बाद
वो स्त्री
जब आँखें बंद करती है
तुम्हारे साथ
दरअसल वो
दौड़ आती है सरसराते ईखों के खेतों के आरपार

गाँव में चाँदनी में पगे किसी संगीतमय टीले पर
पैर हिलाती प्रेम के शगुन रोप रही होती है
जब तुम दम्भ से खींचते हो उसके वस्त्र
उसका हाथ खींच कर मनचाही जगह रखते हो
ठीक उस समय
उसकी निर्वस्त्र आत्मा
लिपट रही होती है
अपने प्रेमी के छाती के बालों की स्निग्धता में
जब तुम गतिशील हो डूब रहे होते हो
ख़ुद के आनन्द की आख़िरी प्रक्रिया में
कोई हल्के हाथों से
सुलझा रहा होता है उलझी अलकें
हौली नजरों से चूमता है उनींदी पलके

जब तुम पौंछ रहे होते हो
गर्वित गाढ़ा पुरूषत्व
वो रोप रही होती है
ख़ालिस प्रेम की छुअन
छातियों के बीच बहते पसीने में
तुम थोड़ा परे खिसक करवट ले
सुलग रहे होते हो गोल लाल सिगरेट की कगार के साथ
उसी समय कहीं
उसके होंठों की गोलाई
गहरी डूबी होती है
शुरूआती किसी रससिक्त चुम्बन में
ठीक जहाँ तुम खत्म करते हो
वहीं से वो अपनी
कलाएँ सिद्ध करती है
जिन्हें कभी वात्स्यायन भी नहीं लिख पाया
उसके लिए मुश्किल है रखना
महज जिस्मानी प्रक्रिया और प्रेम एक क़तार में

5
सृष्टि के
तमाम वृक्षों की जड़े
धरा के मनपसंद घाव
झरते सूखे पत्ते
लौटाया गया नमक
नमक
स्त्री देह की लोनाई मात्र नहीं
स्त्रीत्व का लौटाया गया उधार है
तमाम वर्जनाएँ जकड़न नही थी
तमाम पीड़ाएँ
कृतज्ञता के ककहरे सी लौटी
मोल केवल दूध का ही नहीं
ह्रदय के कृत्य सब
अपनी दक्षिणा ले लौटे
जिसके पास जो हैसियत थी
आखिर वो ही तो वो लौटता
किसी नांदा बच्चे की तरह
परमार्थ की किसी आदिम गुफ़ा में
अब भी बचने के
सारे अलोने वास उपवास
जैसे इलाज में प्रगाढ़ विश्वास
नमक के संतुलन का सम्पादन

रसोईघर से अधिक मन में है
छाती के रसघन की रसालता को
इस क्षारता से बचाने का हुनर
प्रत्येक बेटी के नाम माँ की वसीयत
ऋृणी है विज्ञान
दुनिया की हर औरत का
जिससे ज्ञात हुआ कि
जहर को मारने के लिए
नमक का लोहा चाहिए
पुरूषों की रंगशाला का सबसे खूबसूरत
और संतुष्टिप्रदत चित्र
मन की पेशानी पर उभरे स्वेद कणों के साथ दिखती स्त्री
अब बहुत दुर्लभ होता जा रहा
भरते भरते आत्मा
नोनसारी समंदर बन बैठी
खून में मिलते नमक से
ललछौंही से डेड सी में
अब कोई डूब कर नहीं मरता

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इतिहास में पहली बार गृहणियों के पारिश्रमिक के हक़ में कोर्ट का फैसला

कादम्बरी

फ्रीलांस पत्रकार.स्त्री मुद्दों पर केन्द्रित पत्रकारिता करती है. सम्पर्क : kadambari1992@gmail.com

कुछ ऐतिहासिक फैसले चुपके से आते हैं और बिना चर्चा के ओझल हो जाते हैं.  न चर्चा की भी अपनी राजनीति होती है. कादम्बरी बता रही हैं महिलाओं के हक़ में मद्रास हाई कोर्ट के फैसले को, जिसे मुख्य मीडिया ने तवज्जो नहीं दिया. 
संपादक 

बाथरूम की सफाई से लेकर, कपड़े धोने, इस्त्री करने, खाना बनाने, सफाई करने, बर्तन धोने, झाड़ू पोछा लगाने के साथ-साथ खिड़कियों से लेकर, टेबल, बिछौना, कार आदि की सफाई तक,  महिलाएं सभी घरेलू अनगिनत प्रकार के काम करती हैं जिनकी न तो कोई गणना होती है न ही कोई मूल्यांकन किया जाता है। अब तक इन कार्यों के लिए उचित वेतन व्यवस्था का प्रस्ताव भी नहीं किया गया है। इन सबके बावजूद महिलाएं इन  अप्रत्यक्ष  श्रम को अंजाम दे रही हैं. परंतु  रोजगार और सामाजिक सुरक्षा नीतियां घर में महिलाओं के श्रम की उपेक्षा, अनदेखी करती आई हैं।
लेकिन स्वतंत्र भारत के न्यायिक इतिहास में पहली बार, एक अदालत ने एक गृहिणी के कार्य को पहचाना, सत्यापित किया तथा उसकी आय को आंका। गत 28 जून को न्यायमूर्ति के.के.शशिधरन और न्यायमूर्ति एम.मुरलीधरन की एक डिवीज़न बेंच ने अप्रत्यक्ष कार्यों और देखभाल का मूल्यांकन किया उसे स्वीकृत किया,  जो हर रोज महिलाएं अपने घरों में करती हैं। ऐसे समाज में जहां गृहिणियों का काम कभी भी ‘काम’ के रूप में नहीं माना गया है, इस फैसले ने घरेलू कार्यों के प्रति एक उन्नत और बेहतर दृष्टिकोण पेश किया है।

मद्रास हाईकोर्ट का केस


एक मामले में, मद्रास हाईकोर्ट में पुडुचेरी इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड ने अपील की, जिसमें उन्हें मालती नाम की एक गृहिणी के पति को 5 लाख के मुआवजे का भुगतान करना था। मालती की मौत 2009 में इलेक्ट्रोक्यूशन यानि बिजली के खुले तार की चपेट में आने से हुई थी। इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड ने अपील की कि मालती एक गृहिणी थी और उनकी कोई आय भी नहीं थी, इसलिए मुआवजे की रक़म बहुत अधिक है।

गृहिणी को परिवार का ‘वित्त मंत्री‘  बताते हुए उच्च न्यायालय ने कहा कि वह एक कर्तव्यनिष्ठ पत्नी और अपने दो बच्चों को प्यार करने वाली ममतामयी मां थी। वह परिवार की न केवल चार्टर्ड एकाउंटेंट थी, जो आय और व्यय का ध्यान रखती थी, बल्कि शेफ भी थी। मासिक आय का मूल्यांकन करते हुए अदालत ने उक्त महिला की आय 3,000 रूपये प्रति माह माना। अदालत ने एक गृहिणी के गैर मान्यता प्राप्त, अवैतनिक कार्य को वैतनिक, स्वीकृत श्रम के समान माना और एक गृहिणी के कार्य को बराबरी का दर्जा दिया है। इस बराबरी के दर्जे को सामने लाना अदालत, न्यायाधीश और मालती के केस के वकील का एक युगारंभ करने वाला और महत्त्वपूर्ण क़दम है। चाहे एक महिला के पास नौकरी हो या नहीं, वह सभी वार्षिक, मासिक, साप्ताहिक, दैनिक घरेलू काम करती है। हालांकि 3000 रूपये मात्र मासिक आया मानना भी कम है लेकिन देर से ही सही एक स्वीकृति तो यह है ही.

परंपरा या रुढ़िवाद

बरसों से चली आ रही परंपराओं के अनुसार इन कार्यों को माता, पत्नी, बहन या बेटी का किसी भी वेतन की उम्मीद किए बगैर अकथित ‘कर्तव्य’ माना जाता है। यह घरेलू कामगारों को न्यूनतम मजदूरी भी न  मिलने के प्रमुख कारणों में से एक है। विनिर्माण क्षेत्र, परिवहन क्षेत्र जैसे विभिन्न क्षेत्रों को देश के कुल श्रम में जोड़ा जाता है। श्रम और रोजगार मंत्रालय, देहाड़ी मजदूर और घरेलू श्रमिकों जैसे असंगठित क्षेत्रों को भी शामिल करता है, लेकिन इसमें दिन-रात अपने घरों में काम करने वाले गृहिणियों के श्रम को शामिल नहीं किया जाता है।

संयुक्त राष्ट्र के आठवें महासचिव बान की मून कहते हैं, “घरेलू स्तर पर, देखभाल सहित अवैतनिक काम अदृश्य बने हुए हैं”। गृहिणियां एकमात्र ऐसी श्रमिक हैं जिनको नियमित या अनियमित छुट्टी नहीं मिलती है, एक बड़ा वर्ग जो अवकाश-रहित काम करता है और जो बच्चों के साथ-साथ बुजुर्ग माता-पिता की भी देखभाल करता है। उनके पास कोई निश्चित आय स्रोत नहीं है, न कोई स्वास्थ्य जांच, प्रसूति या आकस्मिक बीमा या पेंशन जैसे कोई अन्य लाभ भी नहीं हैं।

दलित और आदिवासी महिलाओं की स्थिति और भी बद्तर है। वे न केवल खाना पकाने, सफाई, देखभाल जैसे घरेलू काम करती हैं, बल्कि बाहरी काम भी करती हैं जैसे खेती, बाज़ार जाकर घर के लिए भाजी तरकारी और अन्य सामान को खरीदना, कोसों दूर स्थित कुएं से बाल्टियों में पानी भरकर लाना, जानवरों की देखभाल करना और चूल्हे के लिए लकड़ी को एकत्रित करना आदि ।
‘अदृश्यता’ के कारण उत्पन्न विषमताएँ

घरेलू कार्यों की ‘अदृश्यता’ के कारण कई विषमताएँ उत्पन्न हो रही हैं जैसे देश के आर्थिक और सामाजिक विकास में अपर्याप्त योगदान, आवश्यक व ज़रूरी होने के बावजूद प्रजनन का कोई महत्त्व न होना, लैंगिक असमानता, भेदभाव, लिंग के बीच श्रम विभाजन में असंतुलन और रूढ़िवादी धारणाओं में वृद्धि जिसमें महिलाओं को सिर्फ देखभाल करने वाली मानना और पुरुषों को कमाने वाला मानना शामिल है।

सामाजिक विकास के लिए 2008 के एक प्रोजेक्ट में संयुक्त राष्ट्र शोध संस्थान ने भारत और कुछ अन्य देशों को कवर किया था। इस प्रोजेक्ट से यह सामने आया कि अवैतनिक देखभाल में महिलाओं द्वारा बिताया गया समय पुरुषों द्वारा बिताए गए वैतनिक देखभाल के समय से दो गुणा अधिक था। 16 जून, 2011 को अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) ने घरेलू श्रमिकों के लिए सभ्य काम से संबंधित सम्मेलन संख्या 189 को अपनाया। यह घरेलू श्रमिकों के लिए विशिष्ट संरक्षण प्रदान करता है, और उनके अधिकारों, सिद्धांतों और आवश्यकताओं का ध्यान रखता है।


सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. सर्वेश जैन का कहना है कि जब तक महिलाओं के काम का मूल्यांकन एवं आकलन नहीं होगा तब तक महिलाओं के साथ भेदभाव एवं नाइंसाफ़ी होती रहेगी। अब समय आ गया है कि हम लैंगिक रूढ़िवादी धारणाओं को खत्म करने के उपायों का विकास करें, कार्य वातावरण और व्यवस्था में लचीलेपन को बढावा दें, पुरुषों और महिलाओं की भूमिकाओं और उनकी जिम्मेदारियों को समानता दें, तथा सकल घरेलू उत्पाद के मूल्यांकन  में घरेलू काम शामिल करें।

स्त्रीकाल का प्रिंट और ऑनलाइन प्रकाशन एक नॉन प्रॉफिट प्रक्रम है. यह ‘द मार्जिनलाइज्ड’ नामक सामाजिक संस्था (सोशायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत रजिस्टर्ड) द्वारा संचालित है. ‘द मार्जिनलाइज्ड’ मूलतः समाज के हाशिये के लिए समर्पित शोध और ट्रेनिंग का कार्य करती है.
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महिला पत्रकारों को अपनी सलाहकार समिति में शामिल करेगी बिहार विधानसभा (!)

राजीव सुमन

देश भर से आयी महिला पत्रकारों ने लैंगिक असमानता और घरेलू हिंसा जैसे संवेदनशील मुद्दे को समवेत स्वर से चिह्नित किया, वहीं बिहार विधानसभा के अध्यक्ष विजय नारायण चौधरी को बाध्य किया कि वे घोषित करें कि बिहार विधानसभा में पत्रकारों की सलाहकार समिति में महिलाओं को शामिल किया जायेगा. ऐसा होता है तो बिहार में यह पहली बार होगा. उस राज्य में जहाँ महिलाओं को भागीदारी देने में कई स्तरों पर पहल की गई है. विजय नारायण चौधरी को कहना पड़ा कि समिति की अगली कोई भी बैठक बिना महिलाओं को शामिल किये नहीं होगी. हालांकि तब भी  50% भागीदारी का सवाल बचा ही रह गया. यह सब घटित हुआ साउथ एशियन वीमेन इन मीडिया (SAWM)और जेंडर समानता पर काम करने वाली संस्था (OXFAM) के संयुक्त तत्वाधान में   पटना के पाटलिपुत्र होटल के कांफेरेंस रूम में  15 जुलाई को आयोजित एक  दिन की  कार्यशाला में.  विषय था घरेलू हिंसा, सामाजिक मूल्य और मीडिया की भूमिका।

कार्यशाला में  खुद मीडिया घरानों में लैंगिक भेदभाव और पुरुष पत्रकारों द्वारा लैंगिक और घरलू हिंसा की रिपोर्टिंग को लेकर उनके पुरुषवादी सोच और असंवेदनशील व्यवहार पर खुलकर चर्चा की गई । सबने माना कि इन मुद्दों पर रिपोर्टिंग के लिए अक्सरहां महिलाओं को ही भेजा जाता है और तबतक इन मुद्दों को तरजीह नहीं दी जाती जबतक कि इसके दायरे में निर्भया काण्ड या एसिड अटैक जैसी कोई भयावह घटना न घटित हो। मीडिया के इस असंवेदनशील पुरुषवादी  चरित्र को चिन्हित कर खुद केलिए स्पेस बनाने और घरेलू हिंसा के विरुद्ध खुद को अधिक ताकत के साथ खड़ा करने की जरुरत को इस कार्यशाला में आए वक्ताओं ने अपने-अपने अनुभवों के माध्यम से साझा किया।  महिला पत्रकारों ने खुद भी इन मुद्दों को संवेदनशीलता के साथ कैसे देखा जाए और इसकी रिपोर्टिंग किस तरह की हो आदि प्रश्नो पर गंभीरता से विचार किया। मीडिया की भूमिका को समाज में ही नहीं बल्कि खुद मिडिया के भीतर लैंगिक विभेद के प्रति संवेदनशील  होने की जरुरत को भी चिन्हित किया  और  श्रोताओं के मुखर प्रतिसाद ने इस विषय को जन-जन तक  ले जाने की दिशा तय कर दी।

तीन सत्रों में बंटे इस कार्यक्रम की शुरुआत  इप्टा के वरिष्ठ  रंगकर्मी तनवीर अख्तर और उनकी टीम की युवा महिला साथियों  ने एक के बाद एक तीन जनगीत प्रस्तुत कर की.  इसके बाद मंच संचालिका दक्षा वडकर ने माक्सिम  गोर्की की “माँ” से उद्धरण देते हुए हिंसा या पशुता को व्यवस्था की  देन मानते हुए कार्यशाला के विषय “घरेलू हिंसा, सामजिक मूल्य और मीडिया की भूमिका” के मूल बिंदु को चिन्हित किया। प्रथम सत्र का उद्घाटन वक्तव्य ऑक्सफाम की क्षेत्रीय प्रबंधक रंजना दास ने दिया। वरिष्ठ  पत्रकार राजनी शंकर ने इस बात पर चिंता व्यक्त की कि हमारा चौथा स्तम्भ मीडिया एक विवाद क्षेत्र  के भीतर काम कर रहा है। मीडिया पर हुए हमले की भर्त्सना करते हुए और महिला पत्रकारों का प्रतिनिधित्व बिहार विधान सभा में नहीं होने की बात रजनी शंकर ने इस सत्र में मुख्य अतिथि के रूप में आए बिहार विधान सभा के अध्यक्ष विजय कुमार चौधरी के सामने ही उठाई और इसके परिणामस्वरूप विधान सभा अध्यक्ष श्री चौधरी  को मंच से ही यह घोषणा करनी पड़ी क़ि विधान सभा की पत्रकार कमिटी में महिला पत्रकार के प्रतिनिधित्व के लिए स्वाम के आवेदन का वह स्वागत करेंगे और तत्काल एक वचन दिया कि जबतक उनके प्रेस कांफ्रेंस में महिला पत्रकार का प्रतिनिधित्व नहीं होगा तबतक वे प्रेस कांफ्रेंस शुरू नहीं करेंगे। लेकिन जाते-जाते पितृसत्ता के दरवाजे से यह बात बोल गए कि “घरेलू हिंसा में स्त्री ही स्त्री की दुश्मन ज्यादा दिखती है।” उनके इस वक्तव्य को उनके बाद के वक्ताओं ने बेहद गंभीरता से लिया .

स्वाम- बिहार  चैप्टर की अध्यक्ष और वरिष्ठ पत्रकार निवेदिता ने  अपने तेज और बुलंद लहजे में इस कार्यशाला के एजेंडे को पवन करण की कविता की पंक्तियों से शुरू किया–
“किसी रोज इस पृथ्वी के किसी एक हिस्से पर
इक्कट्ठा हो जाएं वे सारी चार करोड़
और उनके साथ- साथ वे भी जो छूट गई इस आंकड़े से
और वे वहां शुरू कर दें एकसाथ विलाप
और कहें यही हमारा सविनय अवज्ञा आंदोलन
‌यही हमारा विरोध मार्च—-

निवेदिता ने कहा कि महामारी, भूकंप या युद्ध में इतने लोगों की मौत नहीं होती, जितनी घरेलू हिंसा के कारण हर साल महिलाओं की मृत्यु हो रही है। उन्होंने कहा कि स्त्री को अपनी दुनिया खुद बनानी होगी, उसके लिए लड़ना होगा। निवेदिता द्वारा स्त्री हिंसा के स्याह पक्ष को बड़े  ठोस, तार्किक और मार्मिक तरीके से उठाया गया जिसे अन्य वक्ताओं ने गंभीरता से लेते हुए पितृसत्ता की जड़ें कितनी गहरी हैं, कीओर इशारा करते हुए अपनी बातें कहीं।

पितृसत्ता पर चोट करते हुए वरिष्ट पत्रकार और लेखिका गीताश्री ने विवाह को अंतिम ठिकाना मानने से साफ़ इनकार करते हुए सवाल दागा कि ” कोख भी, किचेन भी और सेक्स गुलामी भी हमहिं संभालें..!”
चमेली देवी सम्मान से सम्मानित पत्रकार नेहा दीक्षित ने मिडिया के भीतर भेदभावपूर्ण नजरिये को रेखांकित करते हुए कहा कि सेक्सुअल हिंसा और मैटर्निटी यही दो विकल्प होते हैं महिला पत्रकारों के समाचार के लिए। लैंगिक मुद्दोंसे सम्बंधित न्यूज  पुरुष पत्रकार करना नहीं चाहते।

जनसत्ता के संपादक मुकेश भारद्वाज ने घरेलू हिंसा के उन पहलुओं की ओर सबका ध्यान खींचा जिसमें उन्होंने बड़े ही  संवेदनशील दृष्टान्तों द्वारा दिखाया कि पुरुष अब भी कितने  शातिर तरीके से अपने पार्टनर पर मानसिक और मनोवैज्ञानिक हिंसा करने से बाज़ नहीं आता, अपने अंतरंग भावनात्मक पलों में भी। SAWM की राष्ट्रीय महासचिव स्वाति भट्टाचार्य ने SAWM के कार्यों और प्रयासों का उल्लेख करते हुए बताया कि स्वाम घरेलू हिंसा और लैंगिक भेदभाव के प्रति कितना संवेदनशील है और संयुक्त राष्ट्र संघ और राष्ट्रीय आंकड़ो द्वारा देश के भीतर इसकी चिंताजनक तस्वीर उपस्थित की। कट्टरपंथी ताकतों द्वारा मीडिया पर होते हमले को लोकतंत्र पर हमला बताया और स्त्री पत्रकारों की मीडिया घरानो के भीतर इतने कम प्रतिनिधित्व को देश के लोकतांत्रिक स्पेस में कमी के रूप में रेखांकित किया। बी. बी. सी. की भारतीय भाषा प्रमुख रूपा झा ने तीन ऑडियो क्लिप के माध्यम से यह दिखाया कि लैंगिक असमानता के आधार पर होनेवाली घरेलू हिंसा की जड़ें हमारे समाज-संस्कृति और जीवन में इतनी गहरी पैठीं हैं कि वह हमें परेशान नहीं करती, विचलित नहीं करती, सांस्कृतिक अनुकूलन इतना जबरदस्त है कि पिटने वाली स्त्री इसे अपनी नियति और पति का कर्त्तव्य मानती है, इससे भी आगे जाकर वह उसी पति का आगे के जन्म में भी वरण करना चाहती है।

दूसरे सत्र में  मुंबई से आईं श्रुति गणपतये, गुवाहाटी से  दुर्बा घोष और मानवाधिकारों के लिए काम करनेवाली संस्था ब्रेक थ्रू की पूर्वा क्षेत्रपाल ने सामाजिक मान्यताओं और घरेलू हिंसा पर अपने-अपने   क्षेत्र में कर रहे कार्यों व अनुभवों को साझा किया। सत्र की अध्यक्षता स्त्रीवादी मुद्दों के प्रति संवेदनशील माने जाने वाले वरिष्ठ पत्रकार नसीरुद्दीन हैदर खान ने की। नसीरुद्दीन हैदर ने वर्तमान पत्रकारिता पर गंभीर सवाल उठाए।  इसी सत्र में ” न्यूज बनाती महिलाएं” थीम पर पांच महिला पत्रकारों के ऊपर, चार देशों की छह महिला निर्देशकों द्वारा पांच देशों के अलग अलग हिस्सों में निर्देशितऔर आई ए डब्ल्यू आर टी द्वारा निर्मित अनूठी फ़िल्म “वेलवेट रिवोल्यूशन”  ने दर्शकों को तनाव में डाल दिया। कश्मीर विश्व फ़िल्म महोत्सव में फ़ीचर लेंथ की सबसे अच्छी  डाक्यूमेंटरी फ़िल्म का पुरस्कार जितने वाली इस फ़िल्म में विपरीत परिस्थितियों और युद्ध जैसे माहौल में काम करने वाली महिला पत्राकारों के संघर्षों और चुनौतियों को जीवंत तरीके से दिखाया गया है। इस फ़िल्म की कार्यकारी निर्माता और निर्देशक नुपुर बासु कहती हैं कि इस फ़िल्म का उद्देश्य यह भी दिखाना है कि महिलाएं भी खतरे और जोखिम भरी रिपोर्टिंग पुरुषों की ही तरह कर सकती हैं और इसलिए इस विभेदक  रेखा को ख़त्म होते देर नहीं लगेगी कि यह महिला पत्रकार है, बल्कि पुरुषवादी और यौनकुंठित समाज में उनपर दोहरे हमले और आक्रमण का जोखिम है। इस फिल्म के एक हिस्से में सीरियन महिला पत्रकार जेना एरहेम कहती है कि- “मैं युद्ध संवाददाता नहीं होना चाहती थी पर युद्ध मेरे घर के दरवाजे पर था”। जरुरी है दुनिया को यह जानना कि दुनिया के इस हिस्से में क्या हो रहा है। इसी फ़िल्म के एक अन्य हिस्से में कट्टरपंथियों द्वारा बांग्लादेशी ब्लॉगर अभिजीत रॉय की हत्या और उनकी पत्नी बोन्या अहमद को फिल्माया गया है। इस फ़िल्म ने इस विषय को और जीवंत बना दिया।यह सत्र अपने निर्धारित समय से लगभग  दो घंटे ज्यादा देर तक चलता रहा।

तीसरे सत्र की अध्यक्षता जेंडर  रिसोर्स सेंटर के मुख्य परामर्शी आनंद माधव ने की। इस सत्र  में सामाजिक कार्यकर्ता पद्मश्री सुधा वर्गीज ने अपने ही  सरल, सीधे किंतु दृढ अंदाज़ में घरलू हिंसा को चिन्हित किया और साथ में महिलाओं को खुद ही अपने तरीके से इसका प्रतिकार करने का उपाय भी सुझाया। इसके अलावा , भुवनेश्वर से वरिष्ठ पत्रकार शारदा लहांगीर  ने आदिवासी स्त्रियों पर हो रहे घरेलू हिंसा के कई जीवंत दस्तावेज प्रस्तुत किये और कोलकाता से सीनियर फोटो जर्नलिस्ट देबोस्मिता भट्टाचार्या ने अपने मोहक अंदाज़ से फ़ोटो जर्नलिस्म की महत्ता को रेखांकित किया और अपने कैमरे को यौनिक हिंसा के खिलाफ मज़बूत हथियार के रूप में इस्तेमाल करने का नायाब तरीका भी महिला पत्रकारों के सामने रखा, पटना महिला महाविद्यालय की पत्रकारिता विभाग की  प्रोफेसर एवं हेड मिनती चकलानविस ने घरेलू हिंसा को बड़े ही सरल किन्तु आकर्षक तरीके से   समझाया, सामाजिक कार्यकर्ता शैलेंन्द्र ने बड़े ज़ोरदार तरीके सैद्धांतिक रूप से सामाजिक मूल्य और घरेलू हिंसा के सम्बन्ध पर अपनी बात कही।सामाजिक कार्यकर्ता  और स्त्रीकाल के संपादकीय सदस्य राजीव सुमन ने भी  अपने विचार और अनुभव साझा किये। इस सत्र का संचालन आभा रानी ने किया. स्वागत भाषण सुमिता जायसवाल ने किया। कार्यक्रम का संचालन सीटू तिवारी ने किया।

सवाल- जवाब के सेशन का संचालन इति शरण और प्रिया ने किया। झारखण्ड से आई सुमेधा चौधरी ने नुपुर बासु से फ़िल्म बनाने के क्रम में आई मुश्किलों के बारे में सवाल किये। इसके अलावा कई अन्य लोगो ने भी महत्वपूर्ण सवाल पूछे।

राजीव सुमन स्त्रीकाल के सम्पादन मंडल के सदस्य है.
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महिलायें राजनीति में आयें आर्थिक-आत्मनिर्भर बनें

चिपको आंदोलन की सशक्त हस्ताक्षर कमलापंत नशामुक्ति आंदोलन की भी अगुआ रही हैं. आजकल स्वराज पार्टी की उत्तराखंड की राज्य संयोजक  कमला पंत महिलाओं को सक्रियता और आत्मनिर्भरता का सन्देश दे रही हैं.

अनागत का भविष्य

योगेश गुप्त 
योगेश गुप्त की कहानियों के बारे में जैनेंद्र कुमार ने कहा था, “योगेश की कहानियां निश्चय ही हिंदी साहित्य की उपलब्धि हैं…लीक से हटकर…इनकी विशेषता यह है कि इनके कथ्य का सम्प्रेषण वाक्यों से नहीं, पूरे वातावरण में से होता है…इसे डायरेकट कम्यूनिकेशन कहा जाता है…कहानियां व्यक्ति को बेहद डिस्टर्ब करती हैं…और इनकी निशब्द कराह पाठक को अपने में समेत लेती है”…अनागत का भविष्य ऐसी ही एक कहानी है, जिसमें नायिका विवाह से पहले गर्भवती हो जाती है…. प्रेमी में स्वीकार के साहस का अभाव है… ….तब नायिका एक क्रूर फैसला करती है….उसका फैसला, अकारण, अनायास, उपसंहार, छविनाथ जैसे अनेक उपन्यास लिखने वाले योगेश गुप्त की यह लम्बी कहानी बहुत कुछ सोचने पर बाध्य  करती है….



आधी रात निकल चुकी है। रेल तेज चाल से चली जा रही है। लक्सर का स्टेशन आने वाला है। यहां काफी देर गाड़ी रुकेगी। फर्स्ट क्लास के डिब्बे में एक बर्थ पर सिल्क की चादर ओढ़े छाया लेटी है। उसकी बर्थ पर की रोशनी बुझी है। पास ही शैलेन्द्र बैठा कोई किताब पढ़ रहा है। रोशनी की कमी में किताब उसने बिल्कुल आंखों से लगा रखी है। पता नहीं वह पढ़ भी रहा है या नहीं। पर काफी देर से वह कुछ बोला नहीं, न ही किताब पर से नजर हटाई है। छाया जाग रही है, इस बात का उसे पता है.

पूरे डिब्बे में उन दिनों के सिवाय कोई नहीं है

रेल बहुत तेज चाल से बढ़ी जा रही है। काफी देर उसे चलते हो गए हैं। हवा में हल्की सर्दी महसूस हो रही है। कुछ देर पहले शैलेन्द्र ने आसपास की सब खिड़कियों को बंद करना चाहा था, पर छाया ने मना कर दिया। उसे नींद नहीं आ रही है, रोशनी बुरी लग रही है। वह नहीं चाहती कि शैलेन्द्र इस समय पढ़े। उसकी इच्छा थी कि कुछ बातचीत हो जाए। शैलेन्द्र बातें नहीं कर पा रहा है। इसीलिए वह चुपचाप बत्ती बुझाकर लेट गई है। लेटकर वह एक खास तरह का आनन्द ले रही है। शैलेन्द्र के किताब में दुबके चेहरे को देखकर उसे मजा आ रहा है। बोलना लेकिन वह भी नहीं चाहती।

छाया के ऊपर की खिड़की खुली है। वह उठकर बैठ गई। अपनी पूरी बांह खिड़की में फंसा ली और अपना सिर बांह पर टिका लिया। छाया के काले लम्बे बाल एकदम खुले हैं। धोती के पल्लू में सिमटे बाल पूरी तरह उड़ नहीं पा रहे हैं। हवा में ठण्ड की कुनक बढ़ रही है। छाया ने सिल्कन चादर बदन पर उतार कर पैरों पर रोक ली है। वह एकदम बाहर फैले अंधेरे को देख रही है।

‘‘कितना अंधेरा है।’’
शैलेन्द्र ने किताब रख दी। कुछ देर वह चुपचाप छाया को देखता रहा। फिर बत्ती बुझाकर अपनी बर्थ पर लेट गया। उसके पास ओढ़ने को कोई भी चादर नहीं रखी है।
‘‘कितन अंधेरा है’’, छाया फिर कह रही है।

खिड़की मे टिकी बांह पर थमा उसका सिर जरा ढीला हो गया है। वह बाहर अंधेरे में देख रही है। कहीं जरा भी रोशनी नहीं है। बाहर जरूर पेड़, पौधे, मकान, जानवर होंगे। कुछ नहीं दीख रहा है। रेल के सैकड़ों पहियों की आवाज अंधेरे को और गाढ़ा कर रही है। हवा में चिल और बढ़ गई है। छाया की रह-रहकर धुरधुरी आ रही है, पर बाहर देखना बंद नहीं किया है।
शैलेन्द्र पास आकर खड़ा हो गया।
‘‘सर्दी लग जाएगी, खिड़की बंद कर लो’’
‘‘अच्छा। तुम भी सो जाओ।’’


खिड़की बंद कर छाया भी लेट गई। अंदर डिब्बे में भी अंधेरा है। सिर्फ एक छोटी बत्ती चल रही है। छाया ने आंखें मूंद लीं चादर ऊपर तक खिसका ली। रेल के पहियों की आवाज सुनाई दे रही है। हवा के रूख के हिसाब से आवाज कभी तेज हो जाती है, कभी बिल्कुल मंदी। छाया को एहसास है कि शैलेन्द्र पास ही लेटा है। वह चुप है, एकदम चुप।

छाया और शैलेन्द्र देहरादून जा रहे हैं। वहां दो-तीन महीने रहेंगे। छाया गर्भवती है। आठवां महीना है। एक-डेढ़ महीने में वह निपट जाएगी। एक-डेढ़ महीना सेहत पाने में लगेगा। फिर दोनों अपने-अपने घर चले जाएंगे। छाया और शैलेन्द्र दोनों दोस्त हैं।

रीत को रेल का चलना बहुत अच्छा लगता है। वह वक्त की लम्बी डोरी को कट्-कट् खट्-खट् काटते हुए रेल के पहिये मन में न जाने क्या-क्या जगा रहे हैं। छाया शायद सो गई है। पर रह-रहकर वह करवट ले रही है, उसे शायद गर्मी महसूस हो रही है। शैलेन्द्र भी सोया है और वह करवटें ले रहा है। बाहर चारों तरफ गहरा अंधेरा है। उस अंधेरे में से यह डिब्बा कैसा लग रहा होगा। बिल्कुल अंधेरा डिब्बा कैसा लग रहा होगा। बिल्कुल अंधेरा डिब्बा जिसमें सिर्फ एक छोटी-सी बत्ती जल रही है और बाहर हवा की चिल खूब चढ़ गई है। तेज ठण्डी हवा और उस पर गीदड़ों की आवाजें, तैरती हुई। गीदड़ रो रहे हैं । रेल उस  आवाज को चीरती हुई बढ़ती जा रही है।
लक्सर आया, गाड़ी ने अपनी दिषा बदली और फिर चल दी। छाया और शैलेन्द्र दोनों पड़े सोते रहे और करवटें बदलते रहे।

देहरादून में छाया ने जो मकान किराये पर लिया है वह शहर से काफी दूर है। चारों तरफ घना जंगल है। कोई फर्लांग की दूरी पर एक और कोठी है। उस कोठी की रोशनी तक यहां से दिखाई नहीं देती। मकान के चारों तरफ मजबूत चहारदीवारी है। एक नौकर है। एक कुत्ता है। छाया खाना खुद नहीं बनाती, नौकर बनाता है। शैलेन्द्र को इस सबसे बड़ा संकोच होता है पर छाया हंसकर टाल देती है। छाया को पैसे की कोई चिंता नहीं है।

शैलेन्द्र ज्यादातर चुप रहता है। लम्बा, चौड़ा और खूबसूरत शैलेन्द्र चुप बैठा बहुत अच्छा लगता है। वह हर तरह की कुर्सी पर एक ही तरह से बैठता है और चुप होता है तो उसके होंठ बड़ी नरमी से जुड़े रहते हैं। जो हो चुका है उसको लेकर वह छाया की तरह निश्चिन्त  नहीं है। उसमें बहुत संकोच है। विशेष तौर से इस तरह छाया के साथ आने पर। छाया उसे देखकर हंसती रहती है। ‘‘अरे तो क्या हुआ? तुम तो ऐसे हो रहे हो जैसे जाने क्या हो गया। आदमी के कपड़े क्या मैले नहीं होते। वह धोता है और फिर पहन लेता है। तुम्हारी तरह हीनता से मर थोड़े ही जाता है कोई।’’


शैलेन्द्र बड़े कमरे की खिड़की पर खड़ा चुपचाप यह सब सुनता रहता है। सुनकर वह बाहर देखने लगता है। बाहर शाम होती है। आसमान में धूल-ही-धूल छाई है। एकदम किरकरी रूखी धूल। लाल-लाल। बादल, हों तो मन नम हो। पर यह धूल तो जैसे शरीर के भीतर-बाहर की सब नमी सुखा देती है। खिड़की के नीचे यह गहरी खाई है। सामने मन्सूरी के पहाड़ हैं। मन्सूरी में रोशनी होने लगी है। धूल में से रोशनी कैसी लग रही है। नीचे की खाई में बहुत गहरे जाकर एक छोटी-सा झरना है। उस पर धोबी और एक धोबन अब भी कपड़े धो रहे हैं। धूल उन्हें शायद परेशान नहीं कर रही। नीचे से ऊपर पगडण्डी पर से कई बकरियाँ भागी आ रही हैं।
सूरज डूब रहा है।

शैलेन्द्र खिड़की पर से हट आया है। कमरे में बिछे कीमती सोफा सेट पर आकर बैठ गया है। छाया बाहर कारीडोर में बिछी एक इंजी-चेयर में बैठी है। वह एकदम स्वस्थ है। धीरे-धीरे गुनगुना रही है। अपने ठीक सामने के लॉन पर उसकी दृष्टि है। लॉन मे कुत्ता भाग-भागकर किलोल कर रहा है। नौकर खाना  बना रहा है। कोठी के दरवाजे पर न जाने कौन बैठा सुस्ता रहा है। जाने कौन है?

शैलेन्द्र बहुत देर चुप बैठा रहा है। वह उतावला-सा दीखता है। उठकर बाहर छाया के पास आ गया है। कुछ देर उसकी कुर्सी के पीछे खड़ा उसके कुर्सी में धंसे शरीर को देखता रहता है। फिर एकदम उसके बालों में उंगलियां डालकर कहता है, ‘‘चलो छाया, अंदर चलो।’’
‘‘क्यों ?’’
‘‘बाहर सर्दी बढ़ेगी।’’
‘‘मुझे अच्छा लग रहा है। अभी बढ़ी नहीं है।’’
‘‘जिद बहुत करती हो।’’
‘‘कहां जिद करती हूँ । मैं तो कभी जिद नहीं करती। मुझे जिद करना अच्छा ही नहीं लगता। पर अब तो…’’
छाया जोर-जोर से हंसने लगी है। कुत्ता अब खेल नहीं रहा। चुपचाप एक किनारे खड़ा हो गया है। अंधेरा एकदम घुट गया है। हवा में तेजी आ गई है। ठण्ड भी है। आसमान में अब धूल नहीं है। सामने मन्सूरी के सब चिराग जल गए हैं। सपनों के लोक की तरह दीखती मन्सूरी को देखना छोड़ दोनों अंदर कमरे में आ गए हैं।
‘‘छाया तुम्हें डर नहीं लगता ?’’
‘‘तुमसे ? लगता है । उहं, नहीं लगता।’’


कमरे की तमाम खिड़कियां खुली हैं। छाया एक-एक करके सब बंद कर देती है। ‘‘लो,  अब तो ठण्ड नहीं लगेगी ना। कितनी चिंता करते हो तुम मेरी। सुनो, शैलेन्द्र! चलो यहां से कहीं और चलें। यह जगह खास अच्छी नहीं है। तुम्हारा यहां शायद मन नहीं लगा। है ना ?’’
शैलेन्द्र सिर्फ छाया की तरफ देख रहा है।
‘‘आज तुम्हारा किसी चीज में मन नहीं है ?’’
शैलेन्द्र चुप है।
‘‘मैं कुछ बुरी लगने लगी हूं।’’
शैलेन्द्र उठता है और दोनों हथेलियों में छाया का मुंह दबा लेता है। कहता है, ‘‘तुम बहुत ‘क्रुएल’ हो छाया। खाना आए तो मुझे बुला लेना है।’’
कहकर वह अपने कमरे में अपने पलंग पर जाकर लेट गया है।

छाया बहुत खूबसूरत लड़की है। कॉलिज में वह अकेली लड़की थी जो प्रोफेसरों से लेकर लड़कों में समान रूप से चर्चित रहती। उसकी बेनियाजी पर लोगों को आश्चर्य होता रहा है। उसकी चिकनी सफेद मखमली खाल पर वक्त की कोई बूंद रूक नहीं सकी। उसने किसी को गिनती में नहीं लिया। वह सबकी तरफ मुग्ध दृष्टि से देखती और भूल जाती। उचटती नजरों से देखती तो भी भूल जाती। बातें करती तो कहीं दुविधा न होती। चलती-फिरती तो स्वच्छन्द भाव से। पढ़ती तो जमकर और हमेशा ऊपर की पांच-सात लड़कियों में से एक रही।
शैलेन्द्र हमेशा टॉप करता था।

छाया शैलेन्द में अटक गई। पर निर्द्वन्द्व वह तब भी रही। कोई यह सोच भी नहीं पाया कि वह शैलेन्द्र से प्यार करने लगी है। उससे कोई पूछता तो वह झूठ नहीं बोलती। कहती, ‘‘हां, वह मुझे अच्छा लगता है।’’ पर कार पर एक सैकिण्ड उसका इंतजार नहीं कर सकती थी। वह कहता, ‘‘मैं तो जरा… ‘‘और कार खिसकर आगे चल देती। दोनों घूमने जाते, पिक्चर जाते, शॉपिंग करते और यों ही घूमते। पर छाया ने किसी दिन शैलेन्द्र की घेरलू स्थिति जाननी नहीं चाही। वह कहता, ‘‘मेरे पास तो सुविधा नहीं है कि वहां चलूँ ।’’ वह कहती, ‘‘मेरे पास है, चलो।’’ शैलेन्द्र चल पड़ता। छाया ने कभी अपने अमीर होने का भार शैलेन्द्र पर नहीं डाला। उसका तमाम संकोच भाव वह ऐसे हंस-हंसकर उड़ा देती कि आश्चर्य होता और कभी-कभी तो शैलेन्द्र स्वयं चकित रह जाता। छाया के सामने उसके जन्मजात गुण न जाने कहां चले जाते थे।

एक दिन छाया ने सूचना दी, ‘‘अरे कमाल हो गया। मैंने अपने डॉक्टर को दिखाया था। वह कहता है – यू हैव कन्सीव्ड।’’
शैलेन्द्र छाया के कहने के ढंग में अटककर रह गया था। वह खबर पर स्तम्भित हो ही नहीं पाया था। कहने का ढंग इतना सहज था।

छाया आकर कुर्सी पर बैठ जाती है। हल्की-हल्की बूंदें गिरने लगी हैं । छाया को अच्छा लग रहा है। हवा में सर्दी आ गई है। अभी घंटा भर पहले काफी उमस थी। उमस से घबराकर ही शैलेन्द्र शायद कहीं बाहर निकल गया है। जाने कहां चला गया। तेज बारिश आने वाली है। भीग जाएगा।

छाया चिंतित होते-होते हंस पड़ती है। सोचती है पत्नी की तरह चिंता करने लगी हूँ। पर यह क्या उसका साथ निभा पाएगा ? डरता है। मैं जो इतनी साफ-सुथरी हूँ-उससे डरता है।
बारिश तेज आ गई है। छाया चली गई है।
छाया का मन आज अनमना है।

वह खिड़की के पास आकर खड़ी हो जाती है। नीचे वही गहरी खाई। ऊपर से तेज बारिश की बंूदंे खाई में समा रही हैं। दूर-दूर कोई पंछी तक दिखाई नहीं देता। नीचे न धोबी है, न धोबिन । झरना जरा तेज होकर बह रहा है। कीकर, आक, नीम और बबूल के पेड़ों के पत्ते पानी की बंूदों के दबाव से झुके जा रहे हैं। खिड़की से होकर पानी की बंूदें छाया पर पड़ रही हैं। खिड़की उसे बंद कर लेनी चाहिए। पर वह बाहर देखे जा रही है। आसमान में कुछ दिखाई नहीं दे रहा। सामने भी खूब ध्यान देने से ही कुछ दिखाई देता है। पर खूब ध्यान देने से भी उसे कुछ दिखाई नहीं दे रहा। सामने भी खूब ध्यान देने से ही कुछ दिखाई देता है। पर खूब ध्यान देने से उसे कुछ दिखाई दिया है और एकदम चौंक उठी है। वह वहां क्यों गया ? इतने गहरे में ? मेरे से अलग उसके लिए ‘एडवेन्चर’ के तौर पर कुछ भी क्यों हो? तो क्या मुझसे इतना डरने लगा है? मैं तो उससे नहीं डरती, किसी से नहीं डरती। यह जो है से निपट जाए तो उससे कहूँगी कि घर जाए, आराम करे। मेरे लिए चिंता की जरूरत नहीं है।


कुछ मिनटों को छाया उदास दीखी, पर तत्काल ही उसने अपनी सब उदासी झटककर फेंक दी और स्वस्थ होकर कमरे में घूमने लगी। नौकर को आवाज दी और कॉफी बनाने को कहा। कहा कि कॉफी गर्म रखे और उसकी किसी समय भी जरूरत पड़ सकती है।


वह फिर आकर खिड़की के पास खड़ी हो गई। बारिश अब ढीली पड़ गई है। शैलेन्द्र पेड़ के नीचे से निकल आया है और संभल-संभलकर ऊपर चढ़ रहा है। उसकी कमीज और पैंट उसके ऊंचे सुडौल बदन से चिपट गई है। छाया ने दोनों कुहनियों को खिड़की में फंसा लिया है फिर दोनों हथेलियों में अपना हलका पीला चेहरा टिकाकर वह शैलेन्द्र का संभल-संभलकर ऊपर चढ़ना देख रही है। बारिश बिलकुल रुक गई है। पगडण्डी पर जरूर फिसलन होगी तभी शैलेन्द्र इतना रुक-रुककर चढ़ रहा है।


छाया भीतर आकर फिर कुर्सी पर बैठ गई है। उसने सामने रखी कुर्सी पर अपनी टांगे पसार ली हैं और गर्दन पीछे टिका ली हैं। शैलेन्द्र का इंतजार कर रही है। नौकर को बुलाकर उसने एक बार फिर पूछ लिया है कि कॉफी तैयार है या नहीं। शैलेन्द्र आ रहा होगा।

शैलेन्द्र आ रहा है। उसने डरते-डरते मेनगेट खोला है। वह एकदम भीगा है। कोठी की सपाट सड़क पर भी वह ऐसे ही चल रहा है जैसे पगडण्डी पर चढ़ रहा हो। छाया की आंखों में एक काली छाया तैर गई है। वह चुप होकर बैठ गई है।
शैलेन्द्र कमरे के दरवाजे पर दीखा है।
छाया ने जोर से आवाज दी है, ‘‘कपड़े बदल लो, कॉफी तैयार है।’’
शैलेन्द्र के लिए यह अप्रत्याशित था।
छाया तो कभी किसी की चिंता नहीं करती।
कॉफी पर शैलेन्द्र बताता रहा है कि वह कहां गया था और छाया चुपचाप बैठी सुनती रही। शुरू से आखिर तक कुछ नहीं बोली।
‘‘तुम सुन नहीं रही ?’’
‘‘क्यों, सुन तो रही हूँ ।’’
‘‘कोई ‘रिएक्शन’ नहीं ?
छाया सिर्फ मुस्कुरा दी। कॉफी ‘सिप’ करती रही।

वह कोठी जिसमें छाया और शैलेन्द्र रह रहे हैं काफी बड़ी है। मसूरी के रास्ते पर शहर से कोई दो मील दूर सड़क की दायीं तरफ वह खड़ी है। सड़क छोड़कर कोई आधा फर्लांग पथरीली ऊबड़-खाबड़ पगडण्डी पर चलना पड़ता है। तब कोठी का बाहर का लकड़ी से बना गेट आता है। कोठी के चारों तरफ जंगल है। कीकर की गहरी झाडि़यां। उन झाडि़यों में कोठी बिल्कुल छिप जाती है। लॉन में कुर्सी पर बैठी छाया को उन सब झाडि़यों को चीरकर सड़क पर से गुजरती ट्रक, बस, कार साइकिल और आदमी की एक फटी-सी शक्ल दिखाई देती है। वह कभी-कभी उसे देखती रहती है। देखकर खूब खुश होती है। वह देखकर नहीं पहचान पाती कि सड़क पर क्या जा रहा है तो ध्यान से आवाज सुनने की कोशिश करती है। इसी तरह आवाजों की अब उसे खूब पहचान हो गई है। पहले वह पहचान लेती है। फिर ध्यान से सड़क की तरफ देखती है। लॉन में वह कभी कहीं बैठती है, कभी कहीं बैठती है। इसीलिए आदमी का कभी उसे सिर चलता हुआ दीखता है, कभी खाली टांगें। मोटर का पहिया अकेला सड़क पर भाग रहा है और साइकिल तो है पर ऊपर कोई नहीं है। वह शैलेन्द्र को बुलाती और यह सब दिखाती। शैलेन्द्र अनमना हो उठता। कुत्ते के साथ खेलने लगता।
‘‘तुम्हें यह सब अच्छा नहीं लगता ?’’
‘‘नहीं।’’
‘‘क्यों ?’’
‘‘चीजें पूरी अच्छी लगती है।’’
‘‘अरे वाह, जो दीखता है सो दीखता है। झाडि़यों के पीछे का हम अंदाजा क्यों करें? अच्छा छोड़ो। चलो, उधर चलकर खड़े होंगे। छत पर से चारों तरफ देखेंगे। वह तो ठीक है ना ? शैलेन्द्र, तुम उदास रहते हो। तुम्हें शायद यहां अच्छा नहीं लगता। तुम चाहो तो वापस घर चले जाओ। मैं निपटकर आ जाऊंगी।’’
‘‘चलो, ऊपर चलें।’’
‘‘वापस नहीं जाओगे ?’’
‘‘मुझे मालूम है तुम बहुत निडर हो। तभी तो मुझे डर लगता है।’’

छाया ने एकदम ठण्डी आवाज में कहा, ‘‘डरना नहीं चाहिए शैलेन्द्र! जाने कैसा महसूस होता है! चलो।’
दोनों चल दिए। शैलेन्द्र ने छाया का हाथ पकड़ लिया। हाथ कुछ रोज से अधिक ठण्डा था। वह बोला तो कुछ नहीं, हाथ को धीरे-धीरे मसलने लगा। शैलेन्द्र की मुट्ठी में छाया का पूरा हाथ आ जाता है। उसने उसे दबोच लिया है। लॉन पार हो गया है। कोठी का कारीडोर पार करके दोनों सीढि़यों की तरफ जा रहे हैं। कोई पन्द्रह-बीस गोल सीढि़यां। दोनों धीरे-धीरे चल रहे हैं। चुपचाप। चुप्पी वक्त पर बोझ डाल रही है। शाम का वक्त है। सूरज डूब चुका है। धरती बचे-खुचे उजाले को उफक-उफककर पकड़ने की चेष्टा कर रही है। पर हाथ उसके अंधेरा ही आता है। वह शांत हो जाती है। अंधेरा बढ़ रहा है। वक्त की डोर खिंच रही है। छाया और शैलेन्द्र सीढि़यों पर चढ़ रहे हैं। शैलेन्द्र ने छाया का हाथ पकड़ रखा है।
‘‘तुम्हारा हाथ बहुत छोटा है छाया।’’
‘‘शैलेन्द्र, तुम्हें पछतावा हो रहा है।’’
‘‘नहीं तो।’’
‘‘अच्छा।’’

छत की हवा में हल्की ठण्ड है। अगस्त का महीना है। बारिशें हो रही हैं। दिन में धूप निकलती है तो गर्मी महसूस होती है। कभी-कभी बहुत तेज भी होती है। दमघोंट देने वाली। बादल आते हैं तो हल्की ठण्ड महसूस होने लगती है। शाम के वक्त हल्की ठण्ड होती है। इस समय भी ठण्ड है। आसमान में बादलों के छोटे-छोटे टुकडे़ हैं। छत के चारों तरफ का सब दीखता है। दूर तक फैला हुआ देहरादून। चारों तरफ पहाड़। देहरादून में सूरज के डूबने से अंधेरा नहीं होता है। पहाड़ों की छाया से अंधेरा होता है। सूरज तो बहुत देर बाद डूबता। डूबते हुए उसकी किरणें पहाड़ों की चोटियों को और आसमान को रोशन किए रखती हैं। तमाम शहर अंधेरे में डूब जाता है।
कोठी के पीछे की खाई में बिल्कुल अंधेरा छा गया है। धोबी और धोबिन पगडण्डी से ऊपर चढ़ रहे हैं।
‘‘उस दिन मैं वहां तक गया था।’’

शैलेन्द्र ने छाया को अपने से सटा लिया है। उसका हाथ कसकर पकड़ लिया है।
छाया खड़ी है। चुपचाप सामने देख रही है। उसने साड़ी पहन रखी है। अंधेरे में उसका चेहरे कुछ अधिक पीला लग रहा है। उसकी साड़ी रेशमी। खिसककर नीचे गिर रही हैै। उसके पेट का उभार बड़ा स्पष्ट होकर दीख रहा है।
सामने मसूरी में रोशनियां जल रही हैं।
चारों तरफ का अंधेरा गहरा हो गया है।
‘‘छाया!’’
छाया चुप है।
‘‘छाया, बच्चे का क्या करोगी ’’
छाया अब भी चुप है और पूर्ववत् खड़ी है। वह सामने ही देख रही है। सूरज भी डूब चुका है। अंधेरे ने सबको एकदम एकाएक कर दिया है। नौकर ने नीचे कोठी की बत्तियां जला दी हैं। मसूरी खूबसूरत लगने लगी है। पहाड़ पर बसी है मसूरी। पर पहाड़ अंधेरे में छिप गया है। मसूरी की तमाम बत्तियां जगमगा उठी हैं। आसमान में टंका एक परीलोक।
शैलेन्द्र के हाथ की पकड़ ढीली हो गई है।
दोनों के बीच में जरा-सी दूरी आ गई है।
‘‘छाया, हम दोनों कुछ अपरिचिति-से-होते जा रहे हैं । पहले…’’
‘‘छोड़ो, चलो नीचे चलें।’’
रात के जानवरों ने सुर बांधकर पहली आवाज दी है।

दोनों के कॉफी ली और आमने-सामने कोच पर बैठे गए। शैलेन्द्र ने एक सिलकन कमीज और समर की नीले रंग की पैंट पहन रखी है। छाया जामुनी रंग की साड़ी में लिपटी है। दोनों के बीच में एक गोल मेज है जिस पर पानी के दो गिलास आधे खाली रखे हैं। नौकर कॉफी के बर्तन ले गया है और किसी काम में लग गया है। पर गिलास रखे हुए अच्छे लग रहे हैं। शैलेन्द्र ‘फैमिना’ देख रहा है और छाया के हाथ में कोई भारी-सा नॉवल है। कोठी में उस कमरे के सिवाय चारों तरफ अंधेरा है। रसोई में खाना बनाने की आवाज इस कमरे में नहीं आ रही। बाहर से तेज हवा, किसी जंगली जानवर या पेड़ की डालियों के आपस में टकराने की आवाजें आ रही हैं। खाई की तरफ की खिड़की खुली है।
‘‘यह खिड़की बंद कर दें।’’
‘‘हां, ठीक है।’’

योगेश गुप्त



दोनों में से उठकर खिड़की बंद करने कोई नहीं जाता। नौकर आता है। गिलास उठाकर चला जाता है। खिड़की बंद करने का उससे भी जिक्र नहीं आता। खिड़की से तेज ठण्डी हवा भीतर आ रही है।
‘‘ठण्ड कुछ बढ़ती जा रही है।’’
‘‘शॉल ले लो।’’
‘‘हाँ।’’
शैलेन्द्र ने फैमिना रख दिया है। छाया नॉवल में बहुत तत्लीन हो गई है। उसने टांगें जरा फैला ली हैं। शैलेन्द्र की कुर्सी से पैर छू रहे हैं। लम्बा खिंचने से टांगें घुटने से जरा नीचे तक नंगी हो गई हैं। शैलेन्द्र की टांगें उन टांगों के ऊपर से होकर जमीन पर टिकी हैं। छाया का रंग कितना गोरा है।
‘‘तुम्हें इस तरह फैलाकर बैठने में तकलीफ नहीं होती ?’’
‘‘नहीं तो।’’
शैलेन्द्र हंस पड़ता है, ‘‘कितनी भारी हो गई हो। पहले इस तरह टांगे फैलाकर बैठती थी तब भी धोती पैरों तक पहुंचती थी।’’
छाया नजर उठाकर शैलेन्द्र की तरफ देखती है।
‘‘नहीं ?’’
‘‘ठीक तो है, पर क्या करूं ?’’
रात के शायद नौ या दस बज गए हैं… शायद इससे भी ज्यादा हों। बाहर अंधेरा बहुत गहरा हो गया है। छाया बाहर देख रही है। खिड़की में से सारा अंधेरा एक प्रोजेक्शन में कटा हुआ दीख रहा हैं वह ऊपर से गिर रहा है। खिड़की से ऊपर कुछ दिखाई नहीं देता। खिड़की से नीचे देखना भी मुश्किल है। अंधेरा गिर ऊपर से ही रहा है। है भी बहुत गहरा अंधेरा।
‘‘खिड़की बंद कर दो ना?’’
‘‘एकदम ‘पिनड्रॉप साइलेन्स’ अच्छी नहीं लगती।’’
‘‘हां, लगती तो नहीं। रहने दो।’’
छाया कहकर चुप ही रही। कुछ देर बाद फिर बोली, ‘‘तुम्हारा नाम बहुत खूबसूरत है शैलेन्द्र। सॉरी, शैलेन। जी करता है तुम्हें शैल कहा करूं। बुरा तो नहीं मानोगे ?’’
‘‘यह तो लड़कियां का नाम है ?’’
छाया हंस पड़ी। बोली, ‘‘छोड़ो, यह भी कोई बात हुई! बात अच्छा लगने की थी….खाना नहीं आया ? बाहर तो शायद बादल घिर आए हैं। अंधेरे में भी दिखाई देते हैं। बादल अंधेरे से कुछ कम काले होते हैं। तुम्हारी सेहत शैल कुछ गिर नहीं गई है?… लो, खाना आ गया।’’
छाया ने खुद उठकर खान लगा दिया। खिड़की बंद कर आई। नौकर को घंटी देकर बुला लिया, ‘‘यहीं बैठो, किसी चीज की जरूरत पड़े। यहीं बैठना चाहिए… आज मोहन, कोई डाक नहीं आई ? मोहन खाना बहुत अच्छा बनाता है। शैल, कुछ चाहिए? मोहन को छुट्टी दे दें। आज तुम शैल, यहीं सोना, इसी कमरे में।’’
‘‘अच्छा।’’

न जाने कै बजे हैं कि छाया बिस्तरे में से निकलकर ऊपर छत पर आ गई है। शैलेन्द्र पास ही बिस्तरे पर सो रहा था। गहरी नींद में या शायद गहरे सपनों में। उसके दायें पैर का अंगूठा बिस्तर से निकलकर छाया के पलंग को छू रहा था। पर छाया ने कुछ देखा नहीं और अकेली छत पर आकर खड़ी हो गयी है। आसमान साफ है। बादल शायद निकलकर जा चुके हैं। दूर-दूर तक अंधेरा हैं। अंधेरे में भी पहाडि़यों की छायाएँ साफ दिखाई दे रही हैं। क्यों इतना अंधेरा नहीं होता कि दूर का, पास का कुछ भी दिखाई न दे। यह मटमैलापन बुरा लगता है। कई चीजें जिन्हें दीखना नहीं चाहिए, दीखती हैं और रूप बदल-बदलकर दीखती हैं। रूप बदलता हुआ आदमी भयावना होता है। यह मिलावट न हो तो कोई क्यों रूप बदले। पर शायद वह अनिवार्य है। यों ही कभी कोई चीज कैसी, कभी कैसी और सब गड्डमड्ड।
छाया ने अपनी रेशमी साड़ी को पेट पर जरा खिसका लिया। नीचे के पेटीकोट का नाड़ा जरा ढीला किया और अपने बढ़े पेट पर हाथ फेरकर उसे महसूस करने लगी। कितना बढ़ गया है। कितनी अजीब शक्ल है, यह जब खाली हो जायेगा तो इस खाल में बारीक-बारीक सिलवटें पड़ जाएंगी। उन सिलवटों से भय लगने लगेगा। पेट फिर तनेगा फिर खाली होगा। फिर… सिलवटें लम्बी-लम्बी धारियां बन जाएंगी और फिर एक दिन पेट तनना भी बंद हो जायेगा। और ये धारियां सारे शरीर में फैल जाएंगी। तो कैसी लगेंगी ? कैसी क्या लगेंगी? आनन्द रहेगा। एक झुर्रियों बाला बदन पलंग पर लेटा होगा। फिर भी कोई आएगा और पल को उनको टालकर उसमें यौवन भर देगा। उसे छाती से लगा लेगा।
वह कौन होगा ?
शैलेन्द्र ?
नहीं। वह तो अभी से मेरे शरीर से डरता है। वह तो डरता है। सबसे डरता है- वह निकम्मा है। नपुन्सक और किसे कहते हैं? जो उसका है, उसे ही स्वीकृति नहीं दे पाता। पहले तुम कैसी थीं, इसी तरह बैठती थीं तो भी तुम्हारी टांगें नहीं उघड़ती थीं। उसका बस चले तो उघड़ी टांगों को गंड़ासे से तराश कर फेंक दे। अगली दफा थोड़ी और, अगली दफा थोड़ी और। फिर सिर्फ जांघें रहे जाएंगी और फूला पेट और दूध पिलाने को ये दो लम्बी मछलियां, लटकी हुई, थुल-थुल, और हड्डियों वाला मुह। कोई चूमे तो लगे कुत्ता हड्डी चूस रहा है। नहीं, शैलेन्द्र से नहीं चल सकेगा। मैं मरने तक पहुंचने के लिए खुलकर जीना चाहती हूँ । हर समय जीने की लालसा में पल-छिन मृत्यु-सुख का उपयोग करना नहीं।

छाया छत की मुंडेर के पास आ गई है। नीचे की खाई में देख रही है। सामने का विस्तार देख रही है। अंधेरे में उभरी पेड़-पौधों और पहाड़ों की गहरी काली छायाओं को देख रही है। कीकर की झाडि़यों की ओट में बनी मोहन की झोंपड़ी में अब तक चिराग जल रहा है। मसूरी उतनी ही खूबसूरत लग रही है। आसमान में बादल नहीं हैं। यह मोहन की झोंपड़ी में चिराग कैसे जल रहा है। मोहन शादीशुदा है? या कोई आया है ? रंगीन तो लगता है। जाने कोई कितनी दूर से आया होगा। क्या मौसम है, क्या अंधेरा है, और क्या जंगल है। फिर भी चिराग जल रहा है। आने वाले को जरा डर नहीं लगा। जरा डर…

छाया का हाथ मुंडेर पर रखे एक पत्थर पर छू गया है। उसने उसे हाथ में उठा लिया है और धीरे से नीचे छोड़ दिया है। पत्थर खाई में लुढ़कता जा रहा है। जाने-किस-किस चीज़ से टकराता, तेजी से, अनाश्वस्त भाव से, और अंधेरे के भार से दबी छाया खड़ी हुई उस पत्थर के सफर को महसूस कर रही है।
‘‘ओहो, कहीं कोई उस पगडण्डी से ऊपर न चढ़ रहा हो, वह धोबी-धोबिन या कोई बकरी या शैलेन।’’
‘‘मैं ऊपर आयी हूँ और वह कहीं नीचे उतर गया हो।’’
आशंका के बावजूद छाया धीरे-धीरे नीचे उतर रही है। दबे पांव कमरे में आयी है। चुपके से अपने बिस्तर से खिसक गई है। शैलेन्द्र सो रहा है। उसका दायें पैर का अंगूठा अब भी छाया के बिस्तर पर पड़ा है।
छाया को अच्छा महसूस नहीं हो रहा।

अगले दिन सुबह उठकर छाया ने घूमने चलने की बात चलाई।
‘‘कहीं चलें?’’
‘‘सहस्र-धारा चलो, या चलो मसूरी ही चलें।’’
शैलेन्द्र पल भर चुप रहा। बोला, ‘‘तुम्हें कष्ट नहीं होगा ?’’
‘‘नही ंतो’’
‘‘डॉक्टर कहता था, तुम्हें आराम करना चाहिए।’’
‘‘हां, कहता तो था। चलो रहने दो यहीं खिड़की के किनारे बैठेंगे। पूरी पिकनिक का मजा आता है। नीचे घाटी में देखना बहुत अच्छा लगता है। शैलेन्द्र, तुम्हें तो इस जगह बड़ा बोर लग रहा होगा?’’
‘‘नहीं तो, बोर क्यों लगेगा ?’’
‘‘अकेला, सुनसान जंगल!’’
‘‘अकेला कहां हंू, तुम जो हो।’’
‘‘मैं तुम्हारा मन कहां बहला पाती हंू।’’
शैलेन्द्र जाने क्या सोचता हुआ चुप हो रहा।
छाया कोच पर शैलेन्द्र के पास आकर बैठ गई। उसका हाथ अपने हाथ में ले लिया। पल भर को रखा। फिर वही हाथ अपनी गोद में रख लिया और बांह के घने काले बालों को अपनी सफेद कोमल उंगलियों से सहलाने लगी। सहलाती रही। फिर बोली, ‘‘शहर अच्छा होता है। मोटर, टांगे, साईकिल, पैदल, ऊंचे घरों और रेस्ट्रांओं को शोर। आदमी अकेला महसूस करते ही भीड़ में डूब सकता है। भीड़ उसे शांति नहीं देती पर इस तरह सूने-सूने रहने से वह कम भयानक है। मैं तुम्हारे साथ रहते हुए भी साथ नहीं हूँ । हम दोनों के बीच में यह न जाने क्या आ गया। मैं सोचती रही, चलो क्या है, कोई बात भी तो हो, परेशान होने की, सब ठीक हो जाएगा। पर तुम परेशान हो। मुझसे परेशान हो। मैं अकेली तुम्हें भीड़ भी लग रही हंू और तुम्हारा सूनापन भी दूर नहीं कर पा रही हूँ ।’’
शैलेन्द्र छाया की तरफ देखता रहा और चुप बैठा रहा।
‘‘तुम वापस चले जाओ, शैल।’’
‘‘नहीं, वापस नहीं जाऊंगा।’’
‘‘तुम किस कदर दुखी हो!’’
‘‘हूँ वापस नहीं आऊंगा।’’

छाया ने हाथ छोड़ दिया। उठ खड़ी हुई और खिड़की के पास जाकर खड़ी हो गई। उसकी साड़ी की सलवटें बहुत गहरी दीख रही हैं। आदत के अनुसार उसने पीठ पर से साड़ी को झटका नहीं है। शैलेन्द्र उसकी पीठ पर देख रहा है। उसे वे सलवटें बहुत ऊब दे रही हैं। छाया का फूला पेट उसे दिखाई नहीं दे रहा पर इन सलवटों में इतना फूहड़पन है कि उसे मितली आ रही है। पर वह बैठा है और पूरे जोर से बैठा रहना चाहता है। उठकर जाना उसे जैसे अपना अपमान लग रहा है। चुप रहना और भी घुटन दे रहा है।
‘‘वहां क्यों खड़ी हो गई ?’’
छाया ने पीछे मुड़कर देखा और हल्के-से मुसकुरा दी।
शैलेन्द्र को धुरधुरी-सी उठी। सारा शरीर एकदम कांटों से भर उठा। उसे लगा जैसे अभी उसे उल्टी हो जाएगी। उसने मुसकराते चेहरे पर से नजर हटा ली।
‘‘हंस क्यों रही हो?’’
छाया जोर से खिलखिकर हंस पड़ी।
शैलेन्द्र के शरीर में से रोमांच खत्म हो गया। वह धीरे से कोच पर से उठा और छाया के पास खिसकर आया।
‘‘डॉक्टर कहती थी, अब खास देर नहीं।’’
‘‘अच्छा ही तो है।’’
‘‘तुम्हारा इस तरह उछलना-कूदना ठीक नहीं है।’’
‘‘अच्छा जी, अच्छा।’’
शैलेन्द्र फिर छोटा होकर रह गया।
कई मिनट दोनों चुपचाप खड़े रहे। मोहन आकर इधर-उधर से कमरे को झाड़ने लगा। बाहर घाटी में खूब धूल फैल गई। सारे पेड़-पौधे पत्थर अभी तक भीगे हैं। धूप ने उन्हें उजला कर दिया। दोनों ने यह सब देखा। मोहन का निर्द्वन्द्व चेहरा देखा। अचानक छाया ने शैलेन्द्र की बांह में बांह डाल ली और उसे घसीटकर कोच पर बैठा दिया। मोहन से कहा, ‘‘मोहन, आज नाश्ता जल्दी ले आओ।’’
फिर शैलेन्द्र से कहा, ‘‘पूछो।’’
‘‘क्या ?’’
‘‘जो तुम पूछना चाहते हो ?’’
शैलेन्द्र एकदम कुछ बोल नहीं सका। छाया भी चुप रही। मोहन नाश्ते का सामान लाकर रखने लगा।
कितनी ही देर बाद शैलेन्द्र ने कहा, ‘‘बच्चे का क्या करोगी?’’
‘‘तुम बताओ, क्या करूं ?’’
‘‘कुछ तो करना होगा।’’
‘‘हां।’’
‘‘यहां किसी आरफेनेज में दें देंगे।’’
‘‘नहीं।’’
‘‘तो….?’’
दोनों चुप रहे। मोहन कॉफी ले आया था। बनाकर उसने एक-एक कप दोनों के सामने रख दिया और चला गया।
छाया ने कहा, ‘‘शैलेन्द्र, तुम मानते हो हमसे गलती हुई है, इसलिए इतनी दुविधा में हो।’’
‘‘नहीं हुई।’’
‘‘ना।’’
‘‘तो बच्चे को पास रखें।’’
‘‘रखना चाहिए था, पर उस हालत में तुम्हें भी पास रहना पड़ेगा। पर वह मैं नहीं चाहती। तुम मुझसे डरते हो, इसलिए उम्र भर डर-डरकर क्यों जिओगे। मैं चाहती हूँ शैलेन्द्र कि बच्चे को एकदम नष्ट कर दो।’’
शैलेन्द्र सिहर उठा। उसने विह्वल भाव से छाया को तरफ देखा।
छाया ने कॉफी का एक सिप लेकर कहा, ‘‘कुंआ-जंगल में छोड़ जाना, आरफेनेज, मुझे बड़े ‘क्रुएल’, बड़े ‘इनह्यूमन’ लगते हैं।’’
‘‘फिर ?’’
‘‘मेरा ख्याल है, हम उसकी अन्त्येष्टि करें, जला दें।’’
‘‘छाया!’’
छाया कॉफी पीती रही और सोचती रही। फिर बोली, ‘‘कुछ दुविधा, कोई डर बाकी नहीं बचेगा। नही तो आदमी जिंदगी भर कुत्ते, बिल्लियों के मुंह की हड्डियों को पहचानता फिरता है। यह कहीं ‘उसकी’ न हो। यह ‘उसकी’ न हो, यह…’’ शैलेन्द्र के सारे शरीर में आग-सी लग उठी। वह एकदम चुप बैठा रहा।
छाया ने घूँट घूँट भरके कॉफी खत्म की। मुंह में नाश्ते में से कुछ डाला। फिर मुंह चलाते-चलाते बोली, ‘‘कितना अमानवीय है कि एक आदमी उम्र भर यही सोचता रहे कि मेरी मां कौन है, बाप कौन है… तो ठीक रहा न शैल ?’’
शैलेन्द्र का शरीर कांपने लगा।
‘‘ऐसा करना, पहले मार देना, फिर सब गंदे रद्दी कपड़ों में रखकर जला देंगे।’’
‘‘ब्रूट, ऐनिमल।’’
छाया खिलखिलाकर हंस पड़ी। बोली, ‘‘तुम मुझसे डरते हो, तुम जानवर नहीं हो ?’’
‘‘तुमसे तो डरना ही चाहिए।’’
‘‘मैं अकेले यह सब नहीं कर सकंूगी शैल, तुम्हें कुछ दिन ठहरना ही पड़ेगा। और कॉफी नहीं पिओगे ?’’
पर शैलेन्द्र कॉफी नहीं पी सका। एक बिल्ली मुंह में चूहा दबाये कूदकर मेज पर से निकलते हुए खून की कुछ बुँदे कॉफी में टपका गई।
छाया पल को सहमी पर फिर हंसने लगी, ‘‘तुम जानवरों से बहुत डरते हो शैलेन्द्र। क्या बात है ?’’

शैलेन्द्र चकित रह गया है। वह जानता है कि छाया जो भी कहती है वही करती है। इसीलिए उसे बहुत डर है। वह छाया से और भी डरने लगा है। छाया कितनी खूबसूरत है। इन दिनों में उसने रह-रहकर उसे बहुत पास से बहुत ध्यान से देखा है। वह उसे अधिक से अधिक खूबसूरत लगी है। अब छाया विशेष इधर-उधर घूमती नहीं है। या तो दिनभर पलंग पर लेटी कोई किताब, पत्र-पत्रिका पढ़ती रहती है। या फिर शाम को खुली छत पर हल्के-हल्के कदम लेती हुई घूमती रहती है। धोती का पल्लू कटि-प्रदेश पर ही लपेट कसकर बांधकर और जम्फर को जरा ढीला छोड़, बाल खोलकर वह छत पर घूमती रहती है। पैरों में हल्की चप्पल। आवाज बिल्कुल नहीं। पूरी बांहें असम्पृकत, लटकी, झूलती हुई और अपनी अवस्था से पूर्णरूपेण निर्विकार। शैलेन्द्र घूमने नीचे घाटी में या उधर पहाड़ों पर निकल  जाता है। जाने कितनी-कितनी रात तक लौटता है। मोहन भी चला जाता है। उनकी झोपड़ी के बाहर रोज एक चिराग जलता है। कभी-कभी सोते-सोते छाया उस चिराग को देखने आती है, और पलंग पर लेटकर, सिरहाने की बत्ती जलाकर वह कोई किताब पढ़ने लगती है। शैलेन्द्र अब दूसरे कमरे में ही सोता है।
छाया ने मोहन से पूछा, ‘‘रात-भर तुम्हारी झोपड़ी का चिराग जलता रहता है।’’
मोहन ने छाया की तरफ देखा। हंसकर बोला, ‘‘आप…!’’
और चला गया।
छाया हल्के-से संकुचित हो गई। मोहन दोनों की मानसिक स्थिति को समझता है। शैलेन्द्र को घर चले जाना चाहिए। जाने क्यों वह अपने आपको यहां रोके है। उसे मुझसे सहानूभूति है। सहानूभूति क्यों है ? छाया ने मोहन को फिर बुलाया, कहा ‘‘मोहन, अच्छा एक टैक्सी तो बुला दो।’’
‘‘जी, अच्छा।’’
‘‘और सुनो, एक बात बताओ।’’
‘‘जी।’’
‘‘तुम हत्या कर सकते हो?’’
मेहन हंस पड़ा।
‘‘किसकी?’’
‘‘किसी की भी?’’
मेहन फिर हंस पड़ा। बोला, ‘‘शैलेन्द्र बाबू की?’’
पल भर के लिए छाया दमित रह गई।
फिर रुककर बोली, ‘‘हां, मान लो।’’
‘‘नहीं।’’
‘‘क्यों ?’’
‘‘वे आपसे बहुत लगाव रखते हैैं।’’
‘‘तूने कैसे जाना?’’
‘‘मुझे कहते थे।’’
‘‘क्या कहते थे कि मैं…’’
‘‘कहते थे, उनका ध्यान रखा कर, कहीं इधर-उधर जाएं, या छत पर अकेले घूमें तो साथ ही रहा कर, कहीं चोट-फोंट न लग जाए। वह आजकल जरा…’’
‘‘रुक क्यों गया?’’
‘‘कहते थे, वह आजकल जरा मुझसे नाराज है।’’
‘‘तू जा मोहन। टैक्सी रहने दे। एक कप कॉफी ले आ।’’
‘‘अच्छा।’’

छाया बाहर आकर लॉन में बैठ गई। उसे कुछ अजीब-सा महसूस हो रहा है। घास-फूस, फूल-पत्ती कुत्ता और झाड़ी के पार सड़क पर चलते लोग नजर में टिक नहीं रहे, तिरमिरा रहे हैं। कभी-कभी हल्की-सी एक तसवीर हिल जाती है तो लॉन में दो कुत्ते दिखने लगते हैं। यही अनुभूति उसके लिए नई है। उसका कारण उसके लिए अस्पष्ट है। क्या उसकी नजरें खराब हो चुकी हैं, या मन बहुत खराब है? शैलेन्द्र से काफी प्रेम किया है। वह धारणा अब टूट गई है। क्यों टूट गई है? कोई जरूरी है कि कोई उसी तरह सोचे जैसे वह सोचती है। उसका निर्णय निर्मम नहीं है? और निर्णय हो ही नहीं सकता। कम से कम इससे कम निर्मम कुछ भी नहीं है। हम फैसले से डरते क्यों हैं? उसे नजरों से बचाकर अपने आपको ‘ग्लोरिफाइड’ क्यों महसूस करते हैं ? निकम्मे, नपुन्सक! ईश्वर के भरोसे छोड़ा। क्यों किसी को किसी के भरोसे छोड़ा। नहीं, ऐसे ही करना होगा।
…यही उचित है, यही सबसे अधिक मानवीय है।
शैलेन्द्र आकर पास खड़ा हो गया।
मेहन ने कुर्सी लाकर रख दी।
शैलेन्द्र बैठ गया।
बहुत देर दोनों चुप बैठे रहे।
आखिर छाया ही बोली, ‘‘कहां गए थे शैलेन्द्र?’’
‘‘डाक्टर की तरफ।’’
‘‘क्या कहती है?’’
‘‘इसी हफ्ते में सब निपट जाएगा।’’
छाया ने सुना और ध्यान से शैलेन्द्र को देखा।
‘‘तो बच्चे के बारे में तो वही फैसला रहा न?’’
‘‘हां… मैं जानता हंू, तुम बदलोगी नहीं।’’
‘‘ऐसा नहीं है, पर कुछ सुझाओ शैल। तुम मेरे पास रह सकते तो मैं उसे लेकर ही पहुंचती। पर उसे मैं किसी के भरोसे छोड़ना नहीं चाहती, वह चाहे जानवर हो, या आदमी हो, या भगवान हो।’’
‘‘तो… यही अंतिम…
‘‘हां।’’
‘‘अच्छा, मैं चाहता था चला जाऊं। पर एक हफ्ते की तो बात है। फिर…।’’
‘‘फिर तुम चले जाना। मैं तो एक महीना बाद जाऊंगी।’’
‘‘हां, तुम्हें तो रहना चाहिए।’’

छाया अब रसोई में बहुत जाने लगी है। रसोई कोठी के एकदम कोने में है। पूरे कारीडोर को पार करके जाना होता है। छाया काफी टाइम खाना बनाने में लगाने लगी है। मोहन को साथ लेकर वह तरह-तरह के खाने बनाती और उन्हें खूब स्वाद से बैठकर खाती है। शैलेन्द्र होता तो बार-बार उससे उस खाने का प्रशंसा कराती। फिर शैलेन्द्र को वहीं छोड़कर दोबारा रसोई में चली जाती और कुछ ही देर में एक और खाने की चीज बनाकर ले आती और पूरे आयोजन से उसे खाना शुरू कर देती।

शैलेन्द्र इस सब आयोजन में थोड़ा हल्का हो आता। पर कुछ पल पश्चात् ही उसे भय लगने लगता। पहले दिन का छाया का स्वरूप याद हो आता। वह नीचे घाटी में था। आधी ही गहराई में। कोठी की छत वहां से साफ ही दिखाई दे रही थी। पगडण्डी पर एक पल को खड़े होकर उसने ऊपर आकाश में और छतों पर सुनहरा प्रकाश छाया था। छाया छत पर खड़ी थी। उसने धोती को पेटीकोट की तरह बांध रखा है। खाली कोटी पहन रखी है। बाल एकदम खुले हैं, बल्कि बिखरे हैं। उसने दोनों हाथ ऊपर कर रख हैं। उसके गोरे चेहरे पर सुनहरी धूप पड़कर चेहरे को प्रकाशमान कर रही है।
पता नहीं क्यों, शैलेन्द्र, एकदम सुन्न रह गया था। भयताडि़त।
छाया सामने बैठी है। अचानक शैलेन्द्र के मंुह से निकल गया, ‘‘छाया, पहले का जमाना भी खूब था।’’
‘‘क्यों ?’’
‘‘वह जो जादूगरिनयां होती थीं न…’’
‘‘हंू।’’
‘‘उन्हें जिंदा जला देते थे।’’
छाया खिलखिलाकर हंस पड़ी। बोली, ‘‘मैं जादूगरनी हंू। मुझे…।’’
‘‘नहीं, वह नहीं, मैं तो….।’’
‘‘यह खाओ शैल, देखो क्या चीज है।’’
दोनों फिर खाने में लग गए। कोई चार बजे होंगे। आज आसमान में बादल नहीं है। गहरी उमस में, शरीर की नसों में, एक खास किस्म का तनाव रहता है। वह अच्छा भी लगता है, बुरा भी। दिमाग की धुंध नशे का मजा देती है। चारों तरफ की चीजें या तो खूबसूरत दिखाई देती हैं या बदसूरत।
छाया और शैलेन्द्र दोनों बैठे अलग-अलग तरह की चीजें खा रहे हैं।
‘‘तुमने कभी गरीबी महसूस की है छाया।’’
‘‘हां, देखी है। भय का दूसरा नाम गरीबी है। मैं उससे बहुत नफरत करती हंू।’’
शैलेन्द्र से जवाब नहीं बन पड़ा।
‘‘चलो, तुम्हें एक तमाशा दिखऊं।’’
शैलेन्द्र ने उसकी तरफ देखा।
‘‘उठो।’’
छाया शैलेन्द्र को उठाकर रसोई में ले गई।
रसोई मंे मोहन काम कर रहा है। जो बनना था बन चुका है। बर्तन-भांडे़ निपटाये जा रहे हैं।
रसोई के एक कोने में टैप है और उसके ठीक नीचे टैप के पीछे से आकर चींटियों की एक कतार धीरे-धीरे बढ़ी चली जा रही है। छाया पल को रुकी फिर उसने अचानक ही टैंप खोल दिया।
पानी की एक धारा बही।
सैकड़ों चीटिंयां अनिच्छा से बह गई।
छाया ने टैप बंद कर दिया।
शैलेन्द्र की तरफ देखकर बोली, ‘‘कैसा रहा खेल?’’
‘‘अच्छा।’’
‘‘कल तुम तो थे नहीं, मैं सारा दिन यही खेल खेलती रही।’’
‘‘अच्छा किया।’’
‘‘चीटियां झिझकती हैं, घबराती हैं, कांपती है फिर डूब जाती हैं।’’
शैलेन्द्र चुप रहा और रसोई से बाहर निकल कमरे में आ कपड़े बदल नीचे घाटी में घूमने निकल गया।

लाल-लाल बादलों के गाले आसमान में छाए हैं। शैलेन्द्र कोठी में कम ही रहता है। इस समय भी नहीं हैं। नीचे घाटी में खड़ा बादलों के लाल कतलों को देख रहा है। छाया को दर्द शुरू हो गया है। वह चुपचाप अपने पलंग पर लेटी है। वही वैजंती रंग की साड़ी। छाती तक सिल्कन चादर और चेहरे पर विकृति। छाया चाहती है कि किसी को खबर न दे। पर यह दर्द उसे घबरा रहा है। वह चारों तरफ देख रही है। बहुत देर से उठा नहीं जा रहा है। वह खिड़की पर जाकर नीचे घाटी में शैलेन्द्र को देखना चाहती है।
मोहन भी घर में नहीं है शायद।
घाटी में शैलेन्द्र नीचे उतरा जा रहा है।
आसमान की गोट पर लाल रंग के धब्बे कुछ काले, कुछ कत्थई होते जा रहे हैं।
हवा बंद है। गर्मी ने तमाम दिन दिमाग को पिघलाए रखा है।
वह खड़ी, सुनसान कोठी इस समय एक ऐसे बड़े अस्पताल जैसी लग रही है, जिसमें सिर्फ एक मरता हुआ मरीज हो, न डॉक्टर हो, न नर्स, न कोई सगा-संबंधी।
छाया का दर्द बढ़ता जा रहा है।
वह उठती है। कारीडोर तक जाती है। मोहन को आवाज देती है। मोहन नहीं है। सामने लॉन में कुत्ता खेल रहा है। एक कुर्सी पड़ी है, सामने की झाडि़यां पार कर सड़क  पर से आदमियों का एक लम्बा काफिला गुजर रहा है। छाया कुत्ते को पास बुलाने की कोशिश कर रही है। शाम को कुत्ता घास पर खेलना बहुत पसंद करता है।
समय बीतता जा रहा है।
आसमान पर खून के धब्बे काले पड़ गए हैं।
घाटी में से जानवरों की आवाजें आने लगी हैं।
छाया कारीडोर में एक कुर्सी पर कराहती हुई बैठी है।
चरों तरफ पीला अंधेरा है।
घास के तिनके अंधेरे में उड़ते हुए दिखाई नहीं दे रहे हैं, सिर्फ आवाजें सुनाई दे रही हैं।
घाटी में मोर, गीदड़, झींगुर, मेंढ़क और गिरगिट बोल रहे हैं।
छाया की दबी कराह कोठी में गंूज रही है।
खट्-खट्, खट्-खट् कोई कोठी में धुस रहा है।
वक्त कभी बहुत तेजी से और कभी बहुत धीमे-धीमे बीत रहा है।
छाया चीख-चीख उठ रही है।
घाटी में से डालियों के एक-दूसरे से टकराने की आवाजें आ रही हैं।
झरने के बहने की घुटी-घुटी आवाजें आ रही हैं।

कोई मोहन को पुकार रहा है।
जानवरों की आवाजों में बहुत-सी आवाजें डूब रही हैं।
शैलेन्द्र छत की मुंडेर पर बैठा है।
उसने आंखे मंूद रखी हैं। चारों तरफ की आवाजें सुन रहा है। छाया के चीखने की आवाज से वह सिहर-सिहर उठ रहा है।
चारों तरफ घनघोर अंधेरा है।
शैलेन्द्र के भीतर कोई हूक देकर रो रहा है।
आवाज दसों दिशाओं में फैल रही है।
कोई रो रहा है।
शैलेन्द्र के भीतर कोई रो रहा है।
कौन रो रहा है। इतनी रात गए, इतने अंधेरे में, सुनसान में कौन, रो रहा है।
मोहन पास आकर खड़ा है।
‘‘चलिए, नीचे डॉक्टर आपको बुलाती हंू।’’
‘‘क्या हुआ?’’
‘‘छाया ठीक है?’’
‘‘चलो।’’
वक्त गुजर रहा है।

वक्त क्यों गुजर रहा है? कोई आवाज चलते वक्त को रोक नहीं पाती। एक आवाज हवा में गंूज रही है। रोने की आवाज में खुशी है। कोठी से उतरकर आवाज घाटी में उछलती-कूदती जा रही है। झरना क्या रुक गया है? झरना कब रुक सकता है? ढलान क्या नहीं रहेगा ? ‘‘सुनो छाया, तुम ठीक हो तो मैं घूम आऊं?’’ ‘‘मैं ठीक हूँ।’’ छाया क्यों ठीक है, वह हमेशा क्यों ठीक रह सकती है? वह यहां न रहे या वह नहीं ही रही रहे तो ठीक होगा…. प्यारा बच्चा है ? हां, वह तो है। है तो सही। शैलेन्द्र घाटी में एक बेल के नीचे बैठा है। बेल का चढ़ना देखना उसे अच्छा लग रहा है। बेल चढ़ रही है। शैलेन्द्र को हंसी आ रही है।
धोबी और धोबिन कपड़े धो रहे हैं।
शैलेन्द्र एक पत्थर पर बैठा मैले पानी की बूंदों  को अपने ऊपर सहन कर रहा है।
पानी पर एक छोटी सी नाव तैर रही है। उस पर कुछ बैठा है। कुछ छोटा सा।
छाया अपने पलंग पर चित्त लेटी है।
उसके पास बच्चा नहीं है। मोहन उसे रसाई में ले गया है।
छाया के पास एक छोटी सी शीशी है, स्टूल पर। एक सुराही है। सिरहाने। एक शीशे का गिलास है। पलंग के नीचे। छाया को प्यास लगी है। उसका सिर तकिये से हटकर टिका है। उसके होंठों पर पपड़ी जमी है। उसे प्यास लगी है।
‘‘मोहन, ओ मोहन!’’
मेहन सुन नहीं पा रहा है। बच्चा रो रहा है।

छाया कुछ देर आंखें मूंदे  लेटी रहती है। वह आंखें खोलती है। उसके पैरों के पास चादर नहीं है। वह अपने बदन को एक करवट देकर नीचे की चादर का आधा हिस्सा मोड़ लेती है। फिर तेजी से दूसरी तरफ करवट लेती है। दूसरा हिस्सा भी स्वतंत्र हो जाता है। वही चादर वह ओढ़ लेती है। सिर तक ओढ़ लेती है। सपाट बहुत देर तक पड़ी रहती है। उसका दम घुट रहा है। चादर से छनकर रोशनी उस तक पहुंच रही है। छाया को डर लग रहा है। वह आंखें खोल लेती है और चादर को उलट देती है। डर लगता है। गहरी शिथिलता है। वो प्यास से मरी जा रही है।
‘‘मोहन, ओ मोहन’’
मेहन नहीं सुन पा रहा। बच्चा रो रहा है।
पनी उसे खुद ही पीना पड़ेगा।
बच्चा रो रहा है।
वह झुककर गिलास उठाती है। उठकर सुराही से पानी उंडेलती है। सुराही से पानी के गिरने की आवाज तैरती हुई नीचे घाटी में चली गई है। छाया गिलास मुंह तक ले जाती है। खाली पानी कड़वा होता है।
दो गोलियां सटकने के लिए सिर्फ दो घूंट पानी पीती है। और वह नहीं पीती। प्यास से उसका दम निकला जा रहा है।
वह लेट जाती है।
‘‘मोहन, ओ मोहन।’’
मोहन सुन नहीं पा रहा है…. बच्चा रो रहा है।
हवा में रेत रमय होती है। तेज धूप में वह खूब चमकाती है। तेज धूप पड़ रही है। ऊपर छत पर से सारा देहरादून दीखता है। छत पर पानी छिड़क दिया गया है। एक कोने में छाया एक मूढ़े पर बैठी है। छत के चारों तरफ मुंडेर है। मुंडेर पर काफी मोटी काई जमी है। काई का रंग काला और हरा है।

छाया मूढे में बैठी है। उसने अपनी दोनों बांहें मूढ़े की बांहों पर टिका रखी हैं। छाया कमजोर हो गई है। इस समय उसका रंग गहरा पीला है। उसका शिथिल बदन सरकण्डों पर भारी बोझ की तरह पड़ा है।
आसमान में सूरज चमक रहा है। गर्म और उत्तेजित। सुबह बारिश बरसी है। सूरज नाराज है, दुखी है। तमाम घाटी के पेड़, पौधों, पत्थरों पर का सुबह का पानी सुन्त गया है। वह फिर प्यासे दीखने लगे हैं।
छाया के पैरों में पानी का एक गिलास रखा है।
‘‘मोहन, ओ मोहन।’’
मेहन सीढि़यां चढ़ रहा है।
पस आकर खड़ा हो जाता है।
‘‘उसे वह पिला दिया है।’’
मोहन शायद ‘हूँ ’ कहता है।
‘‘शैलेन्द कहां है ?
मोहन फिर कहता है, ‘‘हैं नहीं।’’
‘‘नपुंसक!’’
मोहन फिर कहता है, ‘‘पत्ता-पत्ता कांप रहा है।’’
‘‘नहीं मोहन, नहीं। मैं नपुंसक के पुत्र को नहीं बचा सकती। तुम उसे ले आओ।
मोहन चुप है।
‘‘मेरी…. वह शीशी और पानी भी।’’
मोहन चला जाता है।
छाया उठकर खड़ी हो जाती है। उसकी टांगे अभी कांपती हैं। चार ही दिन तो हुए हुए है। ब्लीडिंग अभी खूब हो रही है। आए आधा घंटे बाद कपड़े बदलने पड़ते हैं। छाया को वह सब घिनौना लता है। जुगुप्सा होती है। और औरतें जाने कैसे करती हैं। बड़ा घृणित है।
सभी कुछ घृणित है।
शैलेन्द्र नीचे घाटी में होगा। उस पर जाने क्या दबाव है कि नीचे घाटी में उतर जाता है। वह वहां बैठा होगा। नपुंसक ।
मेरा पुत्र नपुंसक का पुत्र है।
मैं उसे नष्ट कर दूंगी…
भागा फिरता है।

झुकने से छाया को तकलीफ होती है। वह फिर आकर कुर्सी पर बैठ जाती है। नीचे से उठाकर दो घूँट पानी पीती है। फिर बैठकर इंतजार करने लगती है। मोहन का, बच्चे का, अपनी दवा की शीशी का, पानी का।
उसके कान में कोई फुसफुसा रहा है, ‘तुमने नपुसंक के पुत्र को पैदा किया।’’
‘तुम नपुंसक की पत्नी हो।’
‘तुम नपुंसक के बेटे की मां हो।’
‘तुम्हारे शरीर से आज एक नपुंसक के कारण खून बह रहा है। तुम भी… चारों तरफ सब शांत है। मोहन की सीढि़यों पर चढ़ने की आवाज आ रही है। वह दबे पांव आ रहा है। छाया अपने मूढ़े में सतर्क हो गई है।
‘‘सो रहा है ?’’
‘‘हां।’’
‘‘वहां रख दो।’’
‘‘…’’
‘‘मेरी गोलियां नहीं लाएं?’’
‘‘…’’
‘‘उसे रख दो, पहले लेकर आओ, और सुनो, माचिस। वह सब कपड़े भी जो इससे सबंधित है।
मोहन दवे पांव नीचे चला गया है।

छाया को मोहन का यह दबे पांव चलना अच्छा नहीं लगता है। कोई चोरी कर रहे हैं? मैंने इसे पैदा किया है। नष्ट सिर्फ इसलिए कर रही हूँ कि स्वीकार नहीं कर सकती। फिर यह मोहन दवे पांव क्यों चल रहा है ? कहीं यह शैलेन्द्र को बुलाने तो नहीं गया? गया होगा। शैलेन्द्र आ जाए तो अच्छा है। पर जिसके रोंगेटे ही खड़े नहीं होते, उसे क्या…।
‘‘मोहन, ओ मोहन…’’
मोहन आ गया है और सब कुछ ले आया है।
‘‘मोहन देखना, घाटी में से कोई आ तो नहीं रहा ? आ रहा हो तो जरा आवाज देकर कहो कि जल्दी आए। कहीं उसके आने से पहले सब निपट न जाए।’’
मोहन घाटी की तरफ जाकर खड़ा हो जाता है।
‘‘नीचे का गेट बंद कर आए हो ना?’’
‘‘हां।’’
‘‘सुनो, नीचे जाकर डॉक्टर से कहो कि अब उसकी जरूरत नहीं हैं’’
‘‘…’’
‘जाओ..’
मोहन फिर दवे पांव नीचे जा रहा है।
छत के बीेचोबीच कपड़ों के एक ढेर पर बच्चा लेटा है…. वह सो रहा है। एक कोने में मूढे पऱ छाया बैठी है। उसने अभी-अभी शीशी में से निकालकर चार गोलियां एक साथ खाई हैं।
छाया उठती है और फिर छत के बीचोबीच आकर खड़ी हो गई है।
बच्चे के चारों तरफ के कपड़ों को संगवाती है।
बच्चे के कमीज का बटन बंद करती है। माथे पर लगे एक दाग को पोंछ देती है। छाया को कुछ नींद-सी आ रही है।
कोई दवे पांव आ रहा है।
मोहन है।
छाया फुर्ती से हट मूढ़े पर आ जाती है। खून से लथपथ एक कपड़ा अचानक उसकी धोती में से चू पड़ता है।
छाया उस कपड़े को देखकर डर रही है।
‘‘मोहन, तुम दबे पांव क्यों चलते हो?’’
‘‘मैं फोन कर आया।’’
‘‘मैं, मोहन, बच्चे तक इसलिए गई थी कि ये सूखे कपड़े…. मोहन एक बोतल मिट्टी का तेल ले आओ। और इस तरह दबे पांव न चलो। तुम्हारे चलने फिरने की खूब आवाज आनी चाहिए। हम कोई चोरी नहीं कर रहे हैं। अपना घर जला रहे हैं। इसलिए कि…. तुम जाओ, तेल लाओ।’’
मेहन फिर दवे पांव नीचे आता है।
छाया उठती है। खून से सने कपड़े को हाथ से उठाकर कपड़ों के ढेर के नीचे दबा देती है। पानी का एक गिलास पीती है। खाली पानी कड़वा होता है। इसलिए दो गोलियां और सटक जाती है।
डसकी पलकें झुकी जा रही हैं।
वह घाटी में देखती है।
पेड़ ही पेड़, पौधे ही पौधे, झरने ही झरने, पत्थर ही पत्थर और शैलेन्द्र ही शैलेन्द्र ! पर सब घाटी में उतरते हुए !… छाया निशिचंत भाव से फिर आकर मूढ़े पर बैठ जाती है।

कपड़ों के ढेर पर अब उसे कोई दिखाई नहीं दे रहा है। सिर्फ खून से लथपथ कपड़े दिखाई दे रहे हैं।
घाटी में शैलेन्द्र एक पत्थर पर चुपचाप बैठा है। बायीं तरफ की सड़क पर एक कटे-फटे लोगों का काफिला जा रहा है। लॉन में कुत्ता अकेला खेल रहा है। छत के एक कोने में मोहन घुटनों में सिर दिए बैठा है। कपड़ों के ढेर पर बच्चा लेटा है। सो रहा है। दोनों घुटने मुड़े हैं। मुंह छाया की तरफ है। एक हाथ सीधा खड़ा है। एक में कुछ करेव है। छाया अपने मूढ़े में बैठी है। उसने दो गोलियां और खा ली हैं। उसकी पलकें झुकी जा रही हैं। उसके हाथों में दियासलाई है। वह तीली जलाती है। लौ से डरती है और दूर फेंक देती है। दियासलाई खाली हुई जा रही है। छाया की पलकें झुकी जा रही है।
डसे गहरी नीं आ रही है।
सूरज ठण्डा है, बर्फ की तरह।
सब शांत है।


शैलेन्द्र नीचे घाटी में झरने के किनारे बैठा है और कोठी की तरफ देख रहा है। इतने नीचे से वह इतनी बड़ी कोठी एक पिंक रंग की गुडि़यां-सी लग रही है। बीच में कितने ही पेड़-पौधे आ रहे हैं। आदमी-जानवर आ रहे हैं। पर कोठी साफ दीख रही है।
शाम आने वाली है।
कोई रो रहा है।
शैलेन्द्र के खूब भीतर कोई रो रहा है।
डसका सारा शरीर एकदम शिथिल है।
चारों तरफ जाने कैसी बदबू फैल रही है।
…रो रहा है।
बदबू से आसमान ढंक गया है।
अंधेरा छाने लगा है।
शैलेन्द्र वहीं लेट गया है।
कोठी की छत पर कोई आया है। उसने पोटली भर राख हवा में बिखेर दी है।
अब सब चुप है, सब सुनसान है।
शैलेन्द्र लेटा है।
रात का जाने कौन-सा पहर है। छाया की नींद टूटी है। मोहन पास खड़ा है। उसके हाथ में खाली दियासलाई है।
‘‘उठिए। हवा में ठण्ड बढ़ गई है।’’
‘‘क्या हुआ?’’
‘‘सब समाप्त हो गया ।’’
‘‘बाबू नहीं आए।’’
छाया निढ़ाल हो गई है। उसके मुंह से कोई शब्द नहीं निकलता।
‘‘तुम जा रहे हो, शैल।’’
‘‘हां।’’
‘‘जाओ, मिलना।’’
‘‘अच्छा।’’
बाहर टैक्सी खड़ी है। शैलेन्द्र आज वापस जा रहा है। छाया अभी महीना भर ठहरेगी। एक नर्स उसने अपनी देखभाल के लिए तयकर ली है।
‘‘ठीक हो गया न शैल ?’’
शैलेन्द्र चुप है
‘‘तुम्हें मैंने सब भयों से बचा दिया।’’
शैलेन्द्र की आंखें खुश्क हैं।
‘‘तुम कुछ सोच रहे हो शायद।’’
‘‘नहीं।’’
‘‘अच्छा, जाओ।’’
शैलेन्द्र टैक्सी में बैठ गया है।
‘‘तुम मन पर मैल क्यों लाते हो शैल, जो किया है मैंने किया है।’’
शैलेन्द्र पलभर को छाया को देखता है और नजरें झुका लेता है। टैक्सी चल देती है।
शैलेन्द्र चला गया।
छाया बुदबुदा रही है।
‘‘न स्वीकार… न हत्या!’’
मोहन रसोई में कुछ बना रहा है।

लॉन में पड़ी एक कुर्सी पर कुत्ता बैठा है। कारीडोर एकदम खाली पड़ा है। कोठी की सफेद दीवारों पर पीली रोशनी पड़ रही है। छाया छत की मुंडेर पर बैठी है झरने के पास बकरियां हैं, धोबी है, धोबिन है। एक तख्ता है, थोड़ी रेती है। और कपड़े पटक-पटककर साफ कर रहे हैं।
छाया ने अपनी छातियां में दूध निकालने की बोतल लगा रखी है। बोतल भर जाती है तो छाया उसे घाटी में उंडेल देती है।
हवा में कुछ राख के टुकड़े उड़ रहे हैं।
हवा में कुछ दूध के कतरे फैल जाते हैं।

स्त्रीकाल का प्रिंट और ऑनलाइन प्रकाशन एक नॉन प्रॉफिट प्रक्रम है. यह ‘द मार्जिनलाइज्ड’ नामक सामाजिक संस्था (सोशायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत रजिस्टर्ड) द्वारा संचालित है. ‘द मार्जिनलाइज्ड’ मूलतः समाज के हाशिये के लिए समर्पित शोध और ट्रेनिंग का कार्य करती है.
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मृत्युशैया पर एक स्त्री का बयान

डॉ. आरती  

संपादक , समय के साखी ( साहित्यिक पत्रिका ) संपर्क :samaysakhi@gmail.com



मृत्युशैया पर एक स्त्री का बयान


1.
सभी लोग जा चुके हैं
अपना अपना हिस्सा लेकर
फिर भी
इस महायुद्ध में कोई भी संतुष्ट नहीं है
ओ देव! बस तुम्हारा हिस्सा शेष है
तीन पग देह
तीन पग आत्मा
मैं तुम्हारा आवाहन करती हूँ

2.
ओ देव अब आओ
निसंकोच
किसी भी रंग की चादर ओढ़े
किसी भी वाहन पर सवार हो
मुझे आलिंगन में भींच लो
अब मैं अपनी तमाम छायाओं से मुँह फेर
निद्वंन्द हो चुकी हूँ

3.
धरती की गोद सिमटती जा रही
मैं किसी अतल लोक की ओर फिसलती जा रही हूँ
प्रियतम का घर
दोनों हाथ खालीकर
बचे खुचे प्रेम की एक मुट्ठी भर
लो पकड़ लो कसकर हाथ मेरा
जल्दी ले चलो अब कहीं भी
हाँ मुझे स्वर्ग के देवताओं के जिक्र से भी घृणा है

4.
अब कैसा शोक
कैसा अफसोस
कैसे आँसू
यह देह और आत्मा भी
आहुतियों का ढेर मात्र थी
एक तुम्हारे नाम की भी
स्वाहा!!

5.
ओह पहली बार, अप्रतिम सुख का साक्षात्कार
चिरमुंदी आँखों का मौन सुख
सभी मेरे आसपास हैं
सभी वापस कर रहे हैं
मेरी आहुतियाँ
अब तक की यादें
आँसू
वेदना
ग्लानि
बूँद बूँद स्तनपान

6.
अधूरी इच्छाओं की गागरें
हर कोने में अभी भी रखी हैं
सर उठातीं जब भी वे
एक एक मुट्ठी मिट्टी डालती रही
बाकायदा ढंकी मुंदी रहीं
उसी तरह जैसे चेहरे की झुर्रियाँ और मुस्कानें
आहों आँसुओं और सिसकियों पर भी रंग रोगन
आज सब मिलकर खाली कर रहे हैं
अंजुरी भर भर
आत्माएँ गिद्धों की मुर्दे के पास बैठते ही दिव्य हो गईं

7.
मेरी इच्छाओं का दान चल रहा है
वे पलों-क्षणों को भी वापस कर रहे हैं
तिल चावल
जौं घी दूध
सब वापस
सब स्वाहा
उनकी किताबों में यही लिखा है
यह समय मेरा नहीं है फिर भी
यह समय मेरा नहीं है
फिर भी मैं समय में हूँ
यह समय कुछ खास किस्म के बुद्धिजीवियों
का समय घोषित हो चुका है
फिलहाल छोटे से छोटा विश्लेषण जारी है
दरो-दीवारों के किसी भी कोने में लगे
मकड़ी के जालों पर भी शोधकार्य हो सकता है
बशर्ते मकडिय़ों की मौत की साजि़शों का जिक्र न आये
नाटक अभी भी जारी है
मंच पर मेरे प्रवेश का समय वह था जब
चारों ओर घुप्प अंधेरा
बेफिक्री से गहरी नींद फरमा रहा था
कुछ देर बाद थोड़ा-सा अँधेरा छँटा
एक हलके प्रकाशपुंज का प्रवेश हुआ कि
दबी घुटी एक चीख सुनाई पड़ी
प्रकाश गोलाकार वृत्त से होता हुआ समूचे मंच पर फैलने लगा
और चीखें भी
प्रकाश की आँख मिचौनी, फैलना-सिकुडऩा
वैसे तो तकनीकी कौशल का नमूना था
कुछ उंगलियाँ हरकतें करतीं और
अँधेरा उजाले में और
उजाला अँधेरे में कायांतरित हो जाता
इन दिनों इन कौशलों का विधिवत प्रशिक्षण दिया जाता है
तकनीक परदा उठाने-गिराने की जहमत से मुक्ति दिलाती है
फिर भी चीखें गले से ही निकलकर आ रही थीं
भरपूर साहस के बाद ही संभव हो पाता है
इस प्रकार चीख सकना
तरह तरह के बनते बिगड़ते चेहरे
मेरी आँखों के सामने से आ जा रहे थे
एक बदहवास लडक़ी चीख में सनी हँसी हँसती
दाएं अँधेरे कोने में जाकर गुम हो गई
कुछ औरतें
नकाब ढंके भयाक्रांत चेहरे
ऊपर की ओर हाथ फैलाए
चीख में लिपटी रुलाई रो रही थीं
थके हारे, बीमार से पुरुषों का एक दल
कोई अदृश्य रस्सी उन्हें खींचे जा रही थी
थामे हुए हाथ कहीं नजर न आ रहे थे
दृश्य निरंतर बदल रहे हैं
एक के बाद एक आ-जा रहे थे
कभी सडक़ तो कभी अस्पताल
कभी चौराहा तो कभी संसद भवन
स्कूल दफ्तर रसोई छत बरामदा
न्यायालयों के भीड़ भरे परिसर
नगरपालिका के नल के आगे लगे पीले डिब्बों की कतारें
सुपर बाजार

खेत खदान
फैक्ट्री मकान
अनगिनत जर्जर बूढ़े बीमार
टूटी चप्पलें हाथ में लिए चीख रहे थे
शायद पुकार रहे थे…
मेरे हाथों में एक डायरी थी अभी
वहाँ आखिरी पृष्ठ पर मेरे देश के साथ ही
तमाम देशों के नक्शे उकेरे थे
मैं वहीं कहीं उंगली रखने के लिए
कोई सुरक्षित जगह ढूँढऩे लगी
हर जगह रक्त के लाल-काले धब्बे दिखे
भयावह चीखों से भरी दास्तानें मिलीं
कर्ण की तरह भी नहीं मिली मुझे सुईभर सुरक्षित जमीन
इतनी चीखों सिसकियों और भयंकर अट्टहासों के बीच भी
ऐसा लग रहा है कि सब बहरे हो गए हैं
किसी के चेहरे पर बेचैनी और आक्रोश का कोई चिन्ह दिखाई नहीं दे रहा
अब तक की दबी घुटी चीखों का समवेत स्वर
मंच पर यूँ उभरा कि
वे संगीत की तरह ही कानों को सहन होने लगे
मंच के सामने पहली पंक्ति में बैठे लोग टेबिलों पर
और बाकी के अपनी जंघाओं पर
तीन तीन थापें दे रहे थे
यह तो पहला दृश्य था
दूसरा दृश्य- दर्शकों का एक दल चीखता हुआ दीर्घा के बाहर निकल गया
और दूसरा मंच की समवेत चीखों में शामिल हो गया
अब आप भी बताएं यह नाटक का सुखांत है या दुखांत
वैसे नाटक अभी जारी है

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वित्तमंत्री को सेनेटरी पैड भेजने की मुहीम: एसएफआई और कई संगठनों ने देश भर में आयोजित किया कैम्पेन

क्वीलिन  काकोती

आधी आबादी महिलाओं की है, लेकिन उन्हें अपने छोटे से हक के लिए भी पुरुष तंत्र से लड़ना पड़ता है. इस देश में महिलाओं के स्वास्थ्य से ज्यादा उनका कथित सुहाग, श्रृंगार जरूरी है. सरकार ने जहां सिन्दूर और पूजा पाठ की चीजों को टैक्स फ्री रखा है वहीं महिला-स्वास्थ्य से जुड़े सेनेटरी नैपकिन पर 12% का लक्जरी टैक्स लगाया गया है.

28 मई को माहवारी-स्वच्छता दिवस मनाया जाता है. लगभग तब से ही सरकार की मंत्री मेनका गांधी, कांग्रेस की सांसद सुष्मिता देव आदि ने वित्तमंत्री से अनुरोध किया है कि सेनेटरी नैपकिन पर जीएसटी नहीं लगाया जाये, लेकिन 1 जुलाई से जब जीएसटी लागू की गई तो इन अनुरोधों पर कोई ध्यान नहीं दिया गया. 1 जुलाई को जीएसटी लागू होने के बाद इस टैक्स के खिलाफ स्त्रीकाल में प्रकाशित एक खबर में महिलाओं ने प्रधानमंत्री और वित्तमंत्री को सेनेटरी पैड भेजकर इसका विरोध जाताने की योजना बताई थी. इसके बाद देश के पश्चिमी हिस्से में वर्धा से, जो गांधी जी की कर्मभूमि रही है, कुछ छात्राओं ने 7 जुलाई को, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और वित्तमंत्री अरुण जेटली को सेनेटरी पैड भेजकर अपना विरोध जताया. वर्धा में संचालित युवा नामक संगठन की वनश्री वनकर ने न सिर्फ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और वित्तमंत्री अरुण जेटली को सेनेटरी पैड भेजा बल्कि इस आशय का वीडियो जारी  कर अपील की कि देश भर से सेनेटरी पैड इन्हें भेजा जाये.

देखें वीडियो: देश भर से लड़कियों का अभियान

10 जुलाई को  दिल्ली विश्ववविद्यालय की राजनीति विज्ञान की छात्रा और स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ़ इंडिया (एसएफआई) की सदस्य अनुराधा कुमारी ने इसे एक व्यवस्थित मुहीम की शक्ल देते हुए अपील जारी की कि ‘ब्लीड विदाउट फीअर, ब्लीड विदाउट टैक्स’ हैश टैग के साथ देश भर से वित्तमंत्री को सेनेटरी पैड भेजकर टैक्स वापस लेने का दवाब बनाया जाना चाहिए.’

एसएफआई की विभिन्न शाखाओं ने इस मुहीम में 12 जुलाई को देश भर में हिस्सा लिया और उन्होंने स्कूल/ कॉलेज में फ्री सेनेटरी नैपकिन उपलब्ध कराने की मांग करते हुए उसपर से 12% जीएसटी हटाने की मांग की.
तिरुवनंतपुरम में स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ़ इंडिया (एसएफआई) के 300 से भी अधिक विद्यार्थियों ने सेनेटरी पैड पर ‘ब्लीड विदाउट फीअर ब्लीड विदाउट टैक्स’ लिखकर अरुण जेटली के ऑफिस में भेजा. एसएफआई और आल इंडिया डेमोक्रेटिक असोसिएशन (आयडवा) ने दिल्ली विश्ववविद्यालय में इसी प्रोटेस्ट को का आयोजन किया तो 12 जुलाई को ही एसएफआई की आसाम यूनिट ने गुवाहाटी के दिघली पुखुरी में ऐसा ही प्रोटेस्ट किया. आसाम से एसएफआई की स्टेट ज्वाइंट सेक्रेटरी संगीता दास ने कहा ‘सेनेटरी नैपकिन  इस्तेमाल करने से बीमारियाँ नहीं होती हैं. इसपर टैक्स लगाने से महिलाओं को एक स्वस्थ जीवन जीने से वंचित किया जा रहा है.’ संगीता ने कहा कि आसाम में गर्मी की छुट्टी खत्म होते ही मुहीम को और तेज करेंगे. अगस्त के पहले सप्ताह से शुरू होकर 17 अगस्त तक यह मुहीम चलेगी.’ कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस के विद्यार्थी एवं महिला संगठनों ने ऐसे आंदोलन कई शहरों में किये हैं.

7 जुलाई को वनश्री वनकर द्वारा जारी की गई अपील

प्रियबंधु नामक एक संस्थान, जो आसाम में माहवारी-स्वच्छता अभियान चलाता है,  की सदस्य अर्चना बोरठाकुर ने भी सरकार के इस कदम को निराशा जनक बताया. उनकी संस्था फ्री में सेनेटरी पैड भी बांटती है. देखना यह है कि पश्चिम से पूरब तक बहाने वाली यह हवा क्या रंग लेकर आती है!

गांधी के गाँव से छात्राओं ने भेजा वित्तमंत्री और प्रधानमंत्री को सेनेटरी पैड 

हालांकि इसी बीच इस मुहीम के खिलाफ प्रतिक्रियाएं भी आने लगी हैं. कन्नड़ की अभिनेत्री और भारतीय जनता पार्टी की सदस्य मालविका अविनाश ने जहां सेनेटरी पैड को भारत में पश्चिमी साजिश बताया वहीं सरकार भी अपना बयान जारी कर भ्रामक जानकारियाँ दे रही है.

सरकार के अनुसार इसपर 5% वित पहले से ही लागू था. हालांकि वैट सारे राज्य नहीं लगाते. सेनेटरी नैपकिन पर 12% जीएसटी के पक्षधर लोगों का कहना है कि इसमें उपयोग आने वाले कच्चे माल की श्रेणी हाई जीएसटी की है इसलिए इसपर भी जीएसटी लगनी चाहिए. इसके निर्माण में इस्तेमाल होने वाले सुपर ऐब्जोर्मेंट पोलिमर, पोली एथीलीन फिल्म, ग्लू , रिलीज पेपर और वुड पल्प पूरे कॉस्ट का 20% है, जो अपने आप में हाई जीएसटी की दायरे में है. 80% कॉटन इस्तेमाल होता है जो अपने आप में 5% जीएसटी के दायरे में है.

क्या महिलायें भेजेंगी वित्तमंत्री और प्रधानमंत्री को सेनेटरी पैड 

आज भी ग्रामीण इलाके में महिलायें सेनेटरी नैपकिन का इस्तेमाल नहीं करती हैं. सरकार को चाहिए था कि महिलाओं-स्वास्थय को देखते हुए वह इन्हें टैक्स फ्री करे, लेकिन वह इसे विलासिता कैटगरी में रखकर 12 % टैक्स लगा रही है.

क्वीलिन काकोती स्वतंत्र पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता हैं.  संपर्क: kakoty.quiline@gmail.com 

अनुवाद

अरविंद जैन

स्त्री पर यौन हिंसा और न्यायालयों एवम समाज की पुरुषवादी दृष्टि पर ऐडवोकेट अरविंद जैन ने महत्वपूर्ण काम किये हैं. उनकी किताब ‘औरत होने की सजा’ हिन्दी में स्त्रीवादी न्याय सिद्धांत की पहली और महत्वपूर्ण किताब है. संपर्क : 9810201120
bakeelsab@gmail.com

यह महिला न्यायशास्त्र पर कागद कारे करने वाले वकील साहब की प्रेम कहानी है. ना, इसमें वकील साहब का अतीत न ढूंढें ……… !
संपादक

दफ्तर लौटा तो आंसरिंग मशीन बोली, “प्लीज कांटेक्ट संकट लाल…फौरन।” फोन मिलाया। घंटी बजती रही। मोबाइल पर डायल किया।
संकट गुर्राया, “तुम रखो मैं अभी मिलाता हूं।”
सिगरेट सुलगाई ही थी कि टर्न…टर्न…होने लगी। हैलो…हैलो….के बाद रहस्यमय स्वर में संकट ने कहा, “तुम्हें एक बात बताऊं?”


मैंने थोड़ी लापरवाही से कहा, “हां बताओ।” और मन ही मन सोचा पता नहीं क्या बताएगा? सब जानते हैं कि संकटलाल जी रोते से जाएंगे और मरो की खबर लाएंगे। चिट्ठी देकर भेजो तो नायिका की मम्मी को देकर चले आएँगे- हंसते-हंसते।
वह बोला,  “अरे वो दो चोटियों में सफेद रिबन वाली, ”बॉबी” सी एक लड़की हमारे साथ पढ़ती थी ना…भई। वही…छवि….” मैं तुमसे मिलने आई, मंदिर जाने के बहाने” गाने की तरह तुमसे मिला करती थी…याद आ गई या कुछ और बकना पड़ेगा?”
मैंने लंबा कश लेकर कहा, “हां!…हां!! मगर हुआ क्या?”

आंखों में पच्चीस साल पीछे छूटा कस्बा और कॉलेज की स्टाफ कालोनी घूमने लगी। कॉलेज कैंपस क्या पूरा विश्वविद्यालय था। नर्सरी स्कूल से इंजीनियरिंग कॉलेज तक। बैंक, डाकघर, हॉस्टल, हॉकी- फुटबाल-क्रिकेट ग्राउंड, स्टेडियम, ट्यूबवैल, बाग बगीचे और मीलों लंबी सड़क। मेन गेट से बाहर निकलते ही रेलवे स्टेशन “चाय गर्म”… “पूरी गर्म।” सुबह हजारों लोग कस्बे से शहर जाते और शाम को लौट आते। ऐसे ही एक दिन मैं भी कस्बा छोड़, राजधानी भाग आया था। सोचा था लौट जाऊंगा, लेकिन वो शाम कभी नहीं आई।


सिगरेट बुझाते-बुझाते लगा, “अब वहां है भी कौन? क्या? कस्बा…केवल स्मृतियों में ही आबाद है!”

कस्बे की इस “हवाई यात्रा” के दौरान संकट को फोन पर संदेशा- “मैं आ रहा हूं” के अलावा और कुछ भी तो याद नहीं। मैंने सोचा, बहुत सोचा, मगर समझ में कुछ भी नहीं आया। पीछे मुड़ कर देखा तो आंख भर आई। स्कूल, कॉलेज, जलसे, जुलूस, प्रदर्शन, घेराव, ह़ड़ताल, पथराव, लाठी-गोली-आंसूगैस, जलती बसें, ध्वस्त गाडि़यां, खंडहर, आग में जलकर राख हुआ ऑडिटोरियम, छात्र-शिक्षक-मजदूर आंदोलन, भयंकर असंतोष, हिंसा, आगजनी, लूटपाट, छावनी में बदलते कॉलेज और मुठभेड़” का आतंक। लगता है जैसे कल ही की बात है। मगर जमाना बीत गया।
मैंने सोचा और पानी का गिलास उठा गट्ट…गट्ट…पी गया।

सच तो यह है कि मैं और संकटलाल, यानी हम दोनों और वो सफेद रिबन वाली भी एक ऐसे प्रदेश के हैं, जहां सिर्फ ”डेढ़ आदमी” पढ़े लिखे हैं। होने को संकट के पिता डॉक्टर और मेरे दर्शनशास्त्र  के प्राध्यापक लेकिन पूरे प्रदेश में पढ़े लिखे तो ”डेढ़ लाल” ही माने जाते हैं। हालांकि कस्बा, प्रदेश की राजनीतिक ही नहीं सांस्कृतिक राजधानी भी माना जाता था, परन्तु यौन क्रांति की खबर तो उस समय यहां तक पहुंची ही नहीं थी। हां, ! गली-गली में कुछ लोग “हीरो” साइकिल चलाते हुए जरूर गाने लगे थे- “हम तुम इक कमरे में बंद हों और….”मगर गाना सुन स्कर्ट पहने कोई “छोरी”बाजार में से गुजरती तो सारे शहर में सायरन बजने लगते थे।

ऐसे समय की प्रेम कथा में  न “सेक्स और हिंसा” का कोई स्कोप है और न किसी “अमर प्रेम” की संभावना। हीराइन छोटे से कस्बे की सुंदर और सुशील कन्या है। हाथ लगाते ही मैली हो जाए। दिन-रात, चौबीस घंटे “चैस्टिटी बैल्ट” पहने रहती है। घर से बाहर निकलते ही अंगुली पकड़ “कमांडो” साथ हो लेता है। नींद में सारी रात भले ही, सपनों के राजकुमार के साथ “रोज गार्डन” घूमती रहे या “मॉड्ल टाउन” में पीपल के पेड़ तले बैठ बसाती रहे घर-गृहस्थी। यह एक “बोल्ड एंड ब्यूटीफुल” लड़की का कथादेश भले ही न हो, मगर एक कमजोर लड़की की कहानी भी नहीं है।

कस्बे की लड़की भी क्या करे? छोटे से कस्बे से बीसियों स्कूल कॉलेज और सात-सात सिनेमा घर परंतु मेडिकल और बी.एड.कॉलेजों के अलावा सह शिक्षा कहीं नहीं। फिल्म देखने का शौक हो तो “जय संतोषी मां” लगी है। हाउस फुल…। लड़के-लड़कियों के सब स्कूल कॉलेज अलग-अलग। सरकारी  हो या गैर सरकारी। यही नहीं, बनियों, ब्राह्मणों, जाटों, जैनियों और सैन्नियों से लेकर आर्यसमाजियों तक के अलग-अलग स्कूल कॉलेज।

जाटों के स्कूल या कॉलेज में आचार्य से प्रधानाचार्य तक अधिकांश जाट, ब्राह्मणों के यहां ब्राह्मण, बनियों के यहां बनिये और जैनियों के यहां जैन। लड़कों के स्कूल कॉलेज कस्बे से थोड़ा दूर मगर लड़कियां इतनी दूर कैसे जाएंगी? कुछ उल्टा सीधा हो गया तो? नहीं…नहीं…लड़कियों के स्कूल कॉलेज कस्बे के मुख्य बाजारों के बीच, मेन रोड़ पर ही रहेंगे और हर दुर्ग द्वार पर बड़ी-बड़ी मूछों वाले प्रहरी प्रायः सभी “गुरुकुलों” के “परधान जी” अंगूठा टेक और मंत्री मास्टर जी या वकील साब। प्रबंध कमेटी में नत्थू पंसारी, कालीचरण हलवाई, मंगल सुनार से लेकर लाल लखमी चंद तक चरित्र निर्माण और ब्रह्मचर्य पर विचार विमर्श करते रहते हैं। ब्राह्मणों, बनियों या जैनियों के “सरस्वती मंदिरों” में हरिजनों या पिछड़ों का क्या काम?

कभी स्कूल कॉलेज के प्रांगण में बैलों की जोडि़यां घूमती दिखाई देतीं, और कभी दीपक जगमगाने लगते। कभी क्रिकेट ग्राउंड में खाकी निक्करों का ढेर लगा होता और कभी सफेद टोपियों का। बाद में तो खैर आकाशवाणी केंद्र से लेकर विश्वविद्यालय तक की स्थापना हुई और प्रदेश के एक पढ़े लिखे “लाल” को कुलपति बनाया गया। धर्म, जाति, संप्रदाय और लिंग के आधार पर न जाने कितने स्तरों पर विभाजित है छोटा सा कस्बा।

खैर इससे पहले कि संकटलाल जी पधारें, मैंने अपनी कंप्यूटर ऑपरेटर की छुट्टी कर दी। बेसिर-पैर के सवालों का कौन जवाब देगा? स्कूल के दिनों से अब तक संकटलाल हमेशा ऐसी ही परेशान करता रहा है। बिना शपथ उठाये भी “जो कहूंगा सच कहूंगा। सच के सिवा कुछ नहीं कहूंगा।” उससे पूछो दारू पी? जवाब-हां जी! मुर्गा खाया? हां जी! जुआ खेला? हां जी!…हां जी….! हां जी…दिल दिमाग से साफ मगर यारों का यार है-संकट लाल।
शादी के बाद आकांक्षा हुई तो अपंग। बहन, डॉक्टरनी ने कहा, ”सुई लगा देती हूं। क्या करेगा ऐसी बेटी का?”
भाई धीरे से बोला, ”हां ! लगा सकती हो तो लगा दो।” और लगा अपनी चप्पल ढूंढ़ने।
पूछा कि कहां जा रहे तो कहने लगा, ”थाने रिपोर्ट लिखवाने।”



संकट की अनंत गौरव गाथाएं हैं और दोस्ती के ढेरों किस्से। वो सब फिर कभी। वरना आप कहेंगे- “इधर -उधर भटक रहा है।” चलते-चलते इतना और बता दूं कि सारी मुसीबतों की शुरुआत का कारण होता था संकट लाल और जब पेशी होती तो हर बार खुद वायदा माफ गवाह बन जाता था।

दफ्तर में ही दस बज गये और संकट लाल का कुछ अता-पता ही नहीं चल रहा। हो सकता है पीने बैठ गया हो और जनता क्लब में ललिता, समता, सुषमा या मोनिका का भूत-भविष्य बता रहा हो। मुझे लगा कि वह अब नही आएगा। मैं घर के लिए चल पड़ा। रास्ते भर मेरे दिमाग में संकट, दो चोटियों में सफेद रिबन बांधे उछल कूद मचाता गाता रहा-
”छैल रंग डार गयौ री मेरी बीर
भीज गयौ मेरा अतलस लहंगा, हरित कुंचुक चीर
घायल कुंकुम डार कुचन पर, ऐसौ निपट बेपीर।”

मैं सचमुच नहीं जानता कि ऐसा क्यों और कैसे हुआ? लाल बत्ती पर महसूस हुआ कि खद्दर का सफेद कुर्ता, चूड़ीदार पायजामा और काली अचकन पहने कुछ आदमी पूछ रहे थे ”रेसकोर्स” का रास्ता। फिर अचानक ध्यान आया कि छवि कहा करती थी, “मेरे महबूब कहीं और मिला कर मुझसे। यहां दरख्तों के साये में धूप लगती है।”
मैं मन ही मन हंसता रहा। बहुत देर तक हंसता रहा।

चुपके से एक शरारती सहेली ने चुटकी ली, “लव लैटर्स और स्पेलिंग मिस्टेक वाली बात भूल गये?”
मैंने कहा,  “नहीं, नहीं…याद है। अच्छी तरह याद है कि हर बार संकट समझाता था-प्यार में स्पेलिंग मिस्टेक नहीं देखी जाती-पगले!”

उन दिनों मैं कॉलेज में पढ़ता था। अंतिम वर्ष में। ”युवा महोत्सव” में गया हुआ था। मैं वाद विवाद प्रतियोगिता में भाग लेने आया था। और छवि “आषाढ़ का एक दिन” देखने। मंच से ईनाम लेकर बाहर आया तो छवि, छाया की तरह पीछे-पीछे। छवि ने सिगरेट छीन कर एक तरफ फेंक दी और गले में लटके स्वर्ण पदक को चूमते हुए कहा, ”मुबारक हो!” मैं हैरान। “मिल्की व्हाईट गर्ल” सामने खड़ी मुस्करा रही थी।

तभी संकट आ गले से लिपट गया और बोला, “भई ! मैडल भी मुबारक हो और जन्म दिन भी। मगर कमीज पर लगी इस “लिपस्टिक” का क्या होगा?”
मृगनयनी ने एक बार संकट की तरफ देखा और फिर मेरी तरफ ठुनकते हुए कहने लगी , “आई एम सॉरी…मगर तुमने बताया क्यों नहीं?”
मैंने कहा,  “क्या बताता?”
”फेयर एंड लवली गर्ल” थोड़ा गंभीर हो बोली,  “चलो कोई बात नहीं ”गिफ्ट” उधार रहा।”

उसके बाद मैं और छवि अक्सर जब कैंटीन के कोने में बैठे चाय पीते रहते तो संकट चुपचाप “लव गेम” देखता रहता। दोस्त जब संकट से पत्ता मांग खेलने को कहते तो संकट जवाब देता , “नो, नो…आ प्ले फॉर लव।” दरअसल संकट बेहतरीन विकेटकीपर था।

कभी-कभार छोटी सी मुलाकात हो जाती-कभी संकट के घर और कभी किसी सुनसान गली के मोड़ पर। छवि संकट की बहन काजल की सहेली बन गयी थी, इसीलिए अक्सर मेरे पहुंचने से पहले ही वह वहां मेरी प्रतीक्षा कर रही होती। बहानों की कोई कमी नहीं थी। एकाध बार किसी और सहेली (अभिलाषा) को लेकर, मेरे घर भी आई थी-शायद कोई किताब लेने। उन दिनों उस पर विदुषी बनने का भूत सवार था। देखते-देखते सारा समय परीक्षाओं के बुखार में गुजर गया। रिजल्ट आने के बाद मैं, कस्बे से राजधानी भाग आया। पिता चाहते थे कि ”अर्थशास्त्र” पढ़े लेकिन मैं ”संविधान” पढ़ना चाहता था। संविधान।


दिन में नौकरी की तलाश में भटकता और शाम को पढ़ने जाता। रात को कमरे में आ खुद खाना बनाता, कुछ देर पढ़ता-लिखता और थक हार कर सो जाता। वो सचमुच बहुत ”गर्दिश के दिन” थे। महीनों घर नहीं गया। नौकरी मिली नहीं। ऊपर से आपातकाल शुरू होते ही “संपूर्ण क्रांति” की सारी योजनाएं स्थगित। एक-एक दिन जीना मुश्किल। मैं न किसी की हत्या कर सकता था और न आत्महत्या। अजीब मानसिक स्थिति थी। सारा आक्रोश, अंधेरे में अकेले या आदर्श और सिद्धांत के साथ घूमने, बीड़ी पीने, हवा में टीपी वालों का गालियां बकने, बौद्धिक बहस करने या किताबी कानून चाटने में निकलता….जीने की जिद में अपने बाप से “बाक्सिंग” करता और जानबूझ कर सबसे नाराज….जला-कटा सा घूमता रहता। रिंग रोड़ से रिंग रोड़ तक। कभी भीतरी घेरे में और कभी बाहरी घेरे में।

इस बीच छवि की कई चिट्ठियां आईं। हर बार “विद ग्रेट लव-यूअर्ज ओनली” के साथ चेतावनी ”तुम मेरे पास बिल्कुल भी चिट्ठी मत डालना। नहीं तो मैं बिल्कुल ही मर जाऊंगी। या मार दी जाऊंगी।” ”तुम पता नहीं मुझे कब मिलोगे” पढ़ कर परेशान होता और न मालूम क्या-क्या सोचता रहता। हां ! कुछ महीने पहले आखिरी खत में लिखा था, मैंने तुम्हारे और अपने लिए न जाने क्या क्या सोचा था, लेकिन सब कुछ एक हवा के झोंके की तरह उड़ गया। अंत में, “सचमुच तुम एक दिन बहुत बड़े आदमी बनोगे लेकिन उस एक दिन को कौन जानता है। तुम्हारे बड़े बनने के लिए अगर भगवान ने चाहा तो शायद मेरी शुभकामनाएं सदा तुम्हारे ही साथ होंगी।” अन्तर्देशीय पत्र के एक गोने में छोटे-छोटे अक्षरों में रेखांकित करके लिखा था-गिफ्ट उधार है।”

अगर-मगर पढ़ कर मैंने अनुमान लगाया, लगता है हो गई “कुड़माई (सगाई)।” मैं “ड्रीमहोल” ढूंढ़ता रहा और स्टोव पर रखी खिचड़ी जल कर कोयला हो गई। उठा तो दो गिलास टूट गए और तीन कपों के कान कोने में पड़े थे। मटका उठा कर पानी भरने लगा तो हाथ से फिसल गया…चलो इसकी उतनी ही उम्र थी।

मैं अक्सर झल्लाते हुए कहा करता था, “हमें नहीं बनना बड़ा आदमी….बन भी नहीं सकते…डी सी बनने के चक्कर में एल.डी.सी भी नहीं बन पाएंगे…हां…।” इसके कुछ दिन बाद दोस्तों ने मजाक उड़ाते हुए कहा, “सारी खबरें सच हैं।” नौकरी, महानगर और देस-परदेस की भागदौड़ में रोज नया हादसा। क्या भूलता, क्या याद करता।

अब तो इतना ही याद है या शेष सब भूल गया हूं कि एक शाम “टैलेक्स” पर संकट लाल ने समाचार भेजा था ”बहन को ब्लड कैंसर। स्टॉप। फौरन भारत आओ…स्टॉप।” उसी रात ब्रिटिश एअरवेज से राजधानी और सुबह राजधानी से कस्बे के अस्पताल पहुंचा था। अन्दर तक किसी अनहोनी से आतंकित। दो महीने घर से अस्पताल और अस्पताल से घर…कभी खून चढ़ेगा और कभी रेडियोथैरेपी। देशी-विदेशी सब दवाइयां बेकार। पहली बार जाना कि कितना भयावह है मौत का इंतजार। उन दिनों बहुत हंसता-मुस्कुराता और मजाक में छेड़-छाड़ करता रहता था। हंसता रहता था कि कहीं रो न पड़ूं।

मैंने उस साल की डायरी में हीं लिखा थाः “आज दोपहर अस्पताल से घर लौटते हुए, रास्ते में छवि मिल गई। दो चोटियों की जगह जूड़ा था और खरगोश के कानों जैसे सफेद रिबन गायब।” लाल पल्लू की सफेद साड़ी, मांग में गहरा सिंदूर, गले में मंगलसूत्र और होंठों पर “डीप, डार्क एंड डेंजर्स मैरून” लिप्स्टिक। गोदी में साल भर का प्यारा सा सुंदर बच्चा था। बढ़ी हुई दाढ़ी और चश्मे के बावजूद, उसने भी मुझे पहचान लिया था।

सड़क पर एक तरफ छांव में खड़े हो, उसने सबसे पहले पूछा, सिस्टर कैसी है? मैंने कहा, “ठीक ही है।” उसने फिर सवाल किया, “और तुम?”
मैंने दोहरा दिया, मैं भी।
कुछ देर बाद मैंने सन्नाटा तोड़ते हुए कहा,  “बेटा है ना !…कब हुआ?”
वह बोली,  “पिछले साल….पच्चीस दिसंबर को यह एक साल का हो जाएगा और…।”
मैं एकदम हैरान…परेशान। मगर फिर भी बच्चे के गाल थपथपाता पूछ ही बैठा, क्या नाम रखा है हीरो का?
उसने सिर उठा कर मेरी ओर देखा, निचला होंठ दांतों से दबाया और फिर गर्दन घुमाकर धीरे से बोली, हमनाम है तुम्हारा।

 मैंने चश्मा उतार, आंखें पोछने के बाद देखा तो वह बराबर की मंदिरवाली गली के उस पार जा चुकी थी।
सुबह फोन उठाते हुए डर सा लगा-कहीं संकट का न हो।

“हैल्लो ! हैल्लो!!” के बाद संकट ने उंघते हुए शुरू किया,  “सॉरी यार ! रात कहीं फंस गया था। सुनो ! वो मेरे बगल वाली सोसायटी में रहती है। अभी कुछ दिन पहले “फायर” फिल्म देखते हुए मिल गई। बहुत देर तक “पूछताछ” करती रही और फिर लगी तुम्हारा इतिहास पढ़ाने। अभी खरीदा है फ्लैट। पति अब ठेकेदारी करता है। एक बेटा और दो बेटियां हैं। बेटिया बी.ए. में पढ़ रही हैं। खुद किसी स्कूल में अंग्रेजी पढ़ाती है। भया ! पार्टी वार्टी दो तो बात करवाऊं? ”

मैं चुपचाप सुनता, सोचता और सिगरेट फूंकता रहा। मेरे कुछ कहने से पहले ही संकट ने कहा, ”अच्छा…. एक मिनट बात करो….।”

मैंने कुछ देर बाद, “हैल्लो…हैल्लो” किया….तो एक अनजानी सी आवाज में किसी ने कहा, “नहीं पहचाना ना? कैसे पहचानोगे? बहुत समय हो गया। खैर…मैं छवि…तुम्हें लगातार पढ़ती-सुनती रही हूं…लिखा-अनलिखा…कहा-अनकहा एक-एक शब्द..पूरी किताब कई बार पढ़ चुकी हूं…चाहती हूं कि अनुवाद करूं।”
मैंने कहना चाहा “पगली कहीं की” मगर चुप रहा। फिर उसने कहा था, ”मुझे विश्वास था कि सचमुच एक दिन तुम…..”

और मैं सिर्फ लेकिन…कह कर खामोश हो गया। फोन रखने के बाद तक सफेद रिबन, रजनीगंधा से महकते रहे। और मैं सोचता रहा, ऐसे मूल जीवन का पता नहीं अनुवाद कैसा होगा?

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इस्मत आपा को पढ़ते हुए

निवेदिता

पेशे से पत्रकार. सामाजिक सांस्कृतिक आंदोलनों में भी सक्रिय .एक कविता संग्रह ‘ जख्म जितने थे’. भी दर्ज कराई है. सम्पर्क : niveditashakeel@gamai



इस्मत आपा को पढ़ते हुए मैं आग, बारिश और तूफानों से घिर गयी हूँ.अचानक जैसे भीतर कोई बांध बिना सूचना दिए टूट गया और मैं बहने लगी,गहरे जल में. उनसे मेरी इस कदर दोस्ती हो गयी कि मैं  हाथ बढ़ाकर उनकी हरारत महसूस कर रही हूँ सारे अफसाने मेरे सिराहने बैठ गए हैं.मैंने मुस्कुराने की कोशिश की, मेरे हलख सूख गए जैसे किसी ने मेरे जबड़े और होठ भींचकर बंद कर दिए हों.कहानियों के सारे किरेदार बाहर निकल आये हैं और मुझ से पूछने लगे हलक में तीर क्यों मारा? मैंने हकलाते हुए कहा नहीं तो हमने तो तीर नहीं मारा. इस्मत आपा मुस्कुराने लगी, उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा और हमदोनों उनके बचपन की यादों में डूबते उतरते रहे गुब्बारे.. कारवां..क्या लिखा है आपा ने. पाठकों की रूह में उतर गयीं हैं. मजाल है आपकी गिरफ्त से कोई अफसाना निकल जाये ! एक दिन एक मुहर्रम की शोकसभा में पहली बार  उन्हें मर्सिया और नौहें का मतलब समझ आया और जब अली असगर के हलक में तीर पैवस्त होने का जिक्र आया तो खौफ से उनकी घिग्धी बांध गयी. उन्होंने दहाड़े मारकर रोना शुरू किया. मातम करने वाली बीबियाँ एकदम चुप हो गयीं.बड़ी हैरत से उन्हें देखने लगी.वो थी कि जारो.कतार रोये  जा रही थीं. क्यों मारा हलक में तीर क्यों मारा मचल मचल कर पूछने लगीं.तीर क्यों मारा? हाथ में मार दिया होता. बेचारे के हलक में क्यों मारा. रोते हुए शेखानी बुआ की बगल में सिसककर पूछा?
“ऊ अजिद हरामी रहे !उन्होंने समझाया
‘तो उसके पास  बच्चे को क्यों ले गए?’
“बच्चा पियासा रहे”
“तो उसे दूध दिया होता?
“दूध माँ का  खुश्क होई गवा रहे”
“तो पानी ही दे दिया होता”
“पानी कहाँ रहे? नहर पे  तो ओकी फौज का पहरा रहे’
“क्यों” अब हम ई का जाने रहे. कुछ गडबड”
“फिर”
“बच्चा का पानी पियाय खातिर नाहर पा ले के गए तो उतार दिहिस तीर”
“हलक में”
“हाँ”
और मेरे हलक में बड़े बड़े काटेदार डोले फंसने लगे…..

ओह इस्मत आपा ! आपकी स्याही में ज़हर है और अमृत भी ! शब्द ऐसे जैसे आसमान पर सुलगते सितारे कहानियाँ जब हमारे दिलो में उतरती हैं तो नस्तर बन चुभती  हैं. आपा से  ज्यादा साफबयानी, गहरी तनकीदी और तहज़ीबी कौन हो सकता है. उनकी  बातें बड़ी वाजेह होती हैं. पूरे सब्र और तहम्मुल से बात करतीं हैं.किसी को बख्श नहीं देती अपनी माँ को भी नहीं… “हम इतने सारे बच्चे थे कि हमारी माँ को हमारी सूरत से कै आती थी, एक के बाद एक हम उनकी कोख को रौंदते – कुचलते चले आये थे उल्टियां सह.सह कर वह हमें एक सज़ा से ज्यादा अहमियत नहीं देती थीं. कम उम्र में ही फैलकर चबूतरा हो गयी थीं”मैं नहीं जानती उनको पढ़ते हुए कब मैंने उनके साथ यारी कर ली. उनके आजाद ख्याल और मेरी आवारागर्दी में कुछ तो ताल्लुक है सच को बिना किसी मिलावट के कहने की कला तो कोई आपा  से सीखे. रगों के भीतर कहानियां दौड़ने लगतीं हैं. मानवीय सच को पूरी प्रमाणिकता के साथ प्रस्तुत करती हैं. उनकी कहानियों से हमारे दिमाग की नसें चटकने लगती हैं समाज के कितने फोड़े,मवाद,  पीप बहने लगते हैं.  उसके भीतर से  मुकम्मल कहानियां निकलती है. उन्होंने वैसी. वैसी जगह अपनी कलम चलायी जहाँ आज भी किसी लेखक को जाने की हिम्मत नहीं होती. उनकी कहानियों की तरह उनकी जिन्दगी भी कम दिलचस्प नहीं है. अपनी कहानियों पर लगे अश्लीलता के आरोप में आपा और मंटो मुकदमा के लिए लाहौर गये वहां भी उन्होंने किसी कि नहीं बक्शा शाहिद साहब के साथ मैं भी एम असलम साहब के यहाँ ठहरी थी. सलाम और दुआ भी ठीक से नहीं हुई थी कि उन्होंने झाड़ना शुरू कर दिया मेरे अश्लील लेखन पर बरसने लगे.मुझ पर भी भूत सवार शाहिद साहब ने बहुत रोका.मगर मैं उलझ पड़ी,और आपने जो गुनाह की रातें में इतनी गन्दी गन्दी पंक्तियाँ लिखी हैं. सेक्स एक्ट का वर्णन किया है. सिर्फ चटकारे के लिए  “मेरी बात और है मैं मर्द हूँ ” तो इसमें मेरा क्या कसूर क्या मतलब वह गुस्से से लाल हो गए. मतलब ये कि आपको खुदा ने मर्द बनाया है इसमें मेरा कोई दखल नहीं मुझे औरत बनाया है उसमें आपका कोई दखल नहीं. मैं आजादी से लिखने का हक़ आपसे मांगने कि जरुरत नहीं समझती. आप एक शरीफ मुसलमान खानदान की पढ़ी लिखी लड़की हैं और आप भी पढ़े. और शरीफ खानदान से हैं. इस्मत आपा को पढ़ती रहीं हूँ और उनपर मरती रही हूँ, मेरे जैसे लाखों.लाख पाठक उनके मुरीद रहे होंगे. मुझे लगता है वे लोग जो जिन्दगी से मुहब्बत करते हैं. जो अपनी आजादी से मुहब्बत  करते हैं जो पाठकों की नब्ज़ पर पकड़ रखते हैं. उनके बुखार में  तपते रहते हैं और ताप के ताए ये हुए दिन में जो  लिखते हुए कभी थकते नहीं वही तो हैं हमारी आपा. मेरे  हाथों में उनकी किताब है और बाहर आसमान सूर्ख है. जर्द तितलियाँ उड़ रहीं हैं.दूर दूर तक अमलताश के दहकते हुए फूल हवा में लहरा रहे हैं रंग बिरंगी कागजी चरखियां हवा में तेजी से घूम रही हैं मैंने कहा आपा नींद आ रही है अपनी कहानियों से कह दो मेरी नीद में आकर मुझे ६ डिग्री के बुखार का एहसास न कराएँ. आपा तुम और मंटो अफ़सानानिगारी के हर्फे आखिर हो !

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