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ऐसी पोशाकें पहनने वाली लडकियां नंगी घूमें: हरियाणा सीएम

हमारा देश कितना घोषित पितृसत्तात्मक देश है ! 


 ‘#मेरीरातमेरीसड़क अभियान के तहत आज लडकियां (12 अगस्त) 12 बजे रात को सड़कों पर  निकलकर अपने स्पेस पर क्लेम कर रही हैं.  आइये समझते हैं लड़कियों की मोबिलिटी से कैसे घबडाते हैं पुरुष शासक. प्रधानमंत्री से लेकर सभी दलों के नेताओं के सेक्सिस्ट बयानों की एक लम्बी फेहरिश्त है.
महिलाओं पर दिए गए ऐसे फूहड़ बयान बड़े बड़े राजनेताओं के मुंह से कितनी आसानी से झरते हैं

1. लड़की बारह बजे के बाद बाहर क्यों थी ! — रामवीर भाटी ( हरियाणा, भाजपा )
2. अगर उनको ऐसी पोशाक ही पहननी है तो फिर वे नंगी घूमें – मनोहरलाल खट्टर ( मुख्य मंत्री , हरियाणा )
3. महिला आरक्षण बिल पास करवाकर ,परकटी महिलाओं को सदन में लाना चाहते हैं आप ? – शरद यादव (जेडीयू)
4. डेंटेड-पेंटेड महिलाएं सड़कों पर विरोध कर रही हैं। दिन में विरोध करेंगी रात में डिस्को जाएँगी। – अभिजीत मुखर्जी    (सांसद और राष्ट्रपति के बेटे)

5. 90 फीसदी मामलों में रेप नहीं बल्कि लड़कियां सहमति से सम्बन्ध बनाती हैं। – धर्मवीर गोयल (हरियाणा कांग्रेस प्रवक्ता)
6. लड़कियों को इतना ऐडवेंचर्स नहीं होना चाहिए कि देर रात को अकेले घर से बाहर निकलें। – शीला दीक्षित (पूर्व सीएम, दिल्ली)
7. ये महिलाएं लिपस्टिक पाउडर लगाकर क्या विरोध करेंगी ? – मुख़्तार अब्बास नक़वी (केंद्रीय कैबिनेट मंत्री)
8. लड़कियों को फिगर की ज्यादा चिन्ता होती हैं इसलिए कम खाती हैं। कुपोषण का यही कारण है। – नरेंद्र मोदी (प्रधानमंत्री)
9. महिला आरक्षण विधेयक पास होने से ऐसी महिलाएं सदन में आएँगी जिन्हें देखकर लोग सीटियां मारेंगे। – मुलायम सिंह यादव (सपा प्रमुख)
10. रेप के लिए लड़कियां भी जिम्मेदार हैं क्योंकि हर रोज उनकी स्कर्ट का साइज़ छोटा होता जा रहा है। फ़िल्म में विलेन का होना जरूरी है वरना फ़िल्म कैसे चलेगी? – चिरंजीत चक्रवर्ती (टीएमसी MLA)
11. ममता बनर्जी रेप के लिए कितना चार्ज करेंगी ? – अनीसुर दास ( CPM के सीनियर नेता और पूर्व मंत्री)
12. जब मर्यादा का उल्लंघन होता है तो सीताहरण होता ही है। औरतों को लक्ष्मण रेखा को नहीं लांघना चाहिये। – कैलाश विजयवर्गीय (बीजेपी नेता, एमपी)
13. मैं अपने कार्यकर्ताओं को माकपा की महिलाओं के रेप करने के लिए भेजूंगा। – तापस पाल (टीएमसी सांसद)
14. वेस्टर्न कल्चर की वजह से रेप हो रहे हैं। भारतीय संस्कृति तो महान है। – मुरली मनोहर जोशी (भाजपा के सीनियर लीडर)
15. कोई बताकर तो रेप नहीं करता…अगर बताकर जाता तो हम पकड़ लेते। – बाबूलाल गौर (ग्रह मंत्री, एमपी)
16. कोई जानबूझकर रेप नहीं करता… धोखे से हो जाते हैं। – राम सेवक पैकरा (ग्रह मंत्री, छत्तीसगढ़)
17. आपको तो खतरा नहीं हुआ ना? गूगल करके देखिये और भी जगह रेप हो रहे हैं। (बदायूं रेप पर पत्रकार के सवाल पर)- अखिलेश यादव (सीएम, यूपी)
18. रेप सिर्फ इंडिया में होते हैं भारत में नहीं। – मोहन भागवत, (प्रमुख, आरआरएस)
19. अगर मुसलमान तुम्हारी एक बेटी को ले जाते हैं तो तुम उनकी सौ महिलाओं को ले आओ। – योगी आदित्यनाथ (सांसद, बीजेपी)

20. रेप के लिए फांसी की सजा न हो। लडके हैं ! जवानी में गलती हो जाती है। लड़कियां भी झूठे आरोप लगाती हैं। – मुलायम सिंह यादव (प्रमुख, समाजवादी पार्टी)
21. लड़कियों को मोबाइल नहीं देने चाहिए। जब मोबाइल नहीं था तो क्या हमारी माताएं बहनें मर गई थी। – राजपाल सैनी (सांसद, बीएसपी)
22. जो महिलाएं शादी से पहले और शादी के बाहर सेक्स करती हैं उन्हें फांसी दे देनी चाहिए।- अबु आज़मी (विधायक और नेता, समाजवादी पार्टी)
23. ऐसी रिपोर्ट्स आ रही हैं  कि 20-25 हजार के सरकारी मुआवजे के लिए लड़कियां खुद को रेप विक्टिम बता रही हैं। – अम्बिका चौधरी (पिछड़ा एवं विकलांग कल्याण मंत्री, यूपी)
24. लड़के-लड़कियों को माँ-बाप द्वारा दी गई आज़ादी ही रेप का कारण हैं। – ममता बनर्जी (सीएम, प. बंगाल)
25. अगर मैं अपने घर की लड़की को किसी दूसरे लड़के के साथ देखूंगा तो अपने फार्म हाउस में उसको जिन्दा जला दूंगा। – ए पी सिंह ( निर्भया रेप के दोषियों का वकील)
26. मैडम आप जरा सुनिए ये कोई फ़िल्मी इशू नहीं है। — जया बच्चन से सुशील कुमार शिंदे (पूर्व ग्रह मंत्री)

प्रस्तुति : सुधा अरोड़ा 

मेधा पाटकर का सरकारी उत्पीड़न जारी

  नर्मदा बचाओ आंदोलन 

1.मेधा पाटकर को इंदौर के बॉम्बे हॉस्पिटल से छुट्टी मिलने के चार घंटे बाद, इंदौर से बड़वानी जाने के क्रम में  गिरफ्तार कर शाम 7:30 बजे धार जेल ले जाया गया, शाम तक नहीं पेश किया कोर्ट में मजिस्ट्रेट के सामने 

2.नर्मदा घाटी के हज़ारों की संख्या में लोगो ने किया धार जेल का घेराव, कहा गैर कानूनी गिरफ्तारी और  सरकार का दमन नही सहेंगे 


3.सैकड़ों नर्मदा के विस्थापितों ने दी गिरफ्तारी, सांकेतिक गिरफ्तारी के बाद सबको रिहा किया धार पुलिस ने 


 4.इंदौर हाई कोर्ट, नर्मदा विस्थापितों की याचिका पर अगली सुनवाई 21 अगस्त 2017 के दिन करेगी 


5.27 जुलाई से चल रहा अनिश्चितकालीन उपवास आज भी जारी, 7 अगस्त के दिन मेधा पाटकर व 9 अन्य          अनशनकारियों के गिरफ्तारी के बाद जुड़े 10 अन्य साथी 
  
6.27 जुलाई से अनशन पर बैठी भगवती बहन और रुकमनी बहन के साथ अनशन में जुड़े 10 साथियों का आज    चौथा  दिन 


बड़वानी, मध्य प्रदेश, 11 अगस्त 2017 

9 अगस्त को दोपहर  में अस्पताल से रिहाई के 4 घंटे बाद मेधा पाटकर को दुबारा पुलिस ने इंदौर बड़वानी रास्ते पर घेरा और इसबार धाराओं की सूची के साथ उनको धार जेल में शाम 7:30 बजे बंद कर दिया। जिसके खिलाफ  पूरे गाँव गाँव से अहिंसक उदगार आया और हजारों की संख्या में लोग अपना विरोध प्रदर्शन करने धार जेल पहुंचे। घंटों बातचीत के बाद कोई समाधान ना होता देख घाटी के सैकड़ों लोगों ने मेधा पाटकर व अपने चार अन्य लोगों के गिरफ्तारी के विरोध में 10 अगस्त को सामूहिक गिरफ्तारी दी।

पुलिस ने सभी की सांकेतिक गिरफ़्तारी लेते हुए उन्हें शाम में रिहा कर दिया। आज शाम तक मेधा पाटकर को कोर्ट में उपस्थित नहीं किया गया था, और पहले से अलग अलग झूठे आरोपों में गिरफ्तार करने के बाद कई अन्य धाराएं जोड़ दी गयी है। पिछले 10 दिन भारत के इतिहास में नर्मदा घाटी के लोगों की जलहत्या के लिए सरकारी नियोजन की तरह याद रखा जाएगा। इसी के साथ नर्मदा बचाओ आंदोलन पुलिस के आरोपों का खंडन करते हुए जाहिर करना चाहती है कि नर्मदा घाटी के लोग पिछले 32 सालों से अहिंसक सत्याग्रही मार्ग पर चलते आ रहे हैं और शासन को उसकी गलतियों और चूक से अवगत कराते आये है। नर्मदा बचाओ आंदोलन हमेशा नर्मदा घाटी के लोगों के हक़ के लिए संघर्ष करता आया है और करता रहेगा। हिंसा करना सरकारों का रवैया रहा है जैसा कि हम इस बार ही नही इससे पहले भी कई बार देख चुके हैं। कोई भी सरकार सेहत को चिंतित होकर कील लगे डंडे लेकर पुलिस नही भेजती अगर उनकी मंशा हिंसा के इतर होती। सरकार लोगों के ऊपर दमन कर रही है और जब नर्मदा घाटी के लोगों ने सरकार के झूठ को दुनिया के सामने उजागर कर दिया तो वो बौखलाहट में मेधा बहन और अन्य साथियों पर हिंसक दमन करने को उतारू हो गयी है। हमारा आज भी कहना है और हम यह साबित कर चुके है कि घाटी में लाखों लोग पुनर्वास से वंचित है अभी भी, लाखो पेड़ डूब में आ रहे है, मंदिर, मस्जिद, शालाएं, स्थापित गांव, लाखों मवेशी व कई अन्य जीव डूबने वाले हैं। ऐसी त्रासदी पर कौन सा उत्सव मनाना चाहती है मध्य प्रदेश, गुजरात और केंद्र सरकार। क्या सिर्फ भारत में अब सत्ता की राजनीति रह गयी है? क्या कभी ग्राम सभा की लोकनीति और वास्तविक न्याय की पराकाष्ठा स्थापित हो पाएगी? आज भी नर्मदा घाटी के लोग महात्मा गांधी, अंबेडकर के सपनों और उसूलों पर चलते हुए देखना चाहते है। ऐसे समय में सरकार को झूठे आरोप लगाने से बाज आना चाहिए और 32 सालों के अहिंसक सत्याग्रही आंदोलन के सामने नतमस्तक होकर प्रेरणा लेते हुए लोगों की भलाई के बारे में सोचना चाहिए। हम यह सरकार की बेशर्मी भरे कदमों के बाद भी उनसे मांग करते हैं कि फौरन मेधा पाटकर व अन्य गिरफ्तार किये गए साथियों को बिना किसी शर्त के रिहा किया जाए और बांध के गेट्स फौरन खोलकर मध्य प्रदेश की नर्मदा घाटी की जनता का सम्पूर्ण और न्यायपूर्ण पुनर्वास किया जाए। इसी दौरान आज इंदौर हाई कोर्ट के समक्ष सुनवाई को आई विस्थापितों की याचिका की अगली सुनवाई 21 अगस्त के दिन तय की गयी।

कैलाश अवस्या, मुकेश भगोरिया, श्यामा बहन, केसर बहन, मोहन भाई
 संपर्क : 9179617513 / 9867348307

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मेरी रात मेरी सड़क आखिर क्यों?



बहुत कम ऐसे मौके आते हैं जब हिन्दी स्फीअर की लडकियां सोशल मीडिया या मीडिया में कोई मुद्दा ट्रेंड करा ले जाती हों. आज भी ट्वीटर और फेसबुक में अंग्रेजी ट्रेंड को पर लग जाते हैं. लेकिन श्वेता यादव, गीता यथार्थ और अन्य लडकियां इस मामले में उल्लेखनीय हैं जिन्होंने कई मुद्दे सोशल मीडिया और मीडिया में ट्रेंड कराये. सेल्फ़ी विदाउट मेकअप की मुहीम हो या अमेजन का स्त्री की योनि में सिगरेट बुझाने की प्रतीक वाला ऐश ट्रे का विज्ञापन और उसकी बिक्री वापस लेना, यह सब इन लड़कियों ने सफलता पूर्वक अंजाम दिया. और अब 12अगस्त को ‘अगस्त क्रान्ति दिवस’ के तीन दिन बाद और आजादी के दिन के तीन दिन पूर्व की आधी रात को #मेरीरातमेरीसड़क का आह्वान किया है-उस रात लड़कियों को अपने-अपने शहरों में सड़क पर निकलने का आह्वान. श्वेता बता रही हैं इस अभियान को शुरू करने के पीछे का मकसद: 
संपादक

फेसबुक पर लिखने के बाद बहुत सारे लोगों ने पूछा कि #मेरीरातमेरीसड़क आखिर क्यों? क्या यह वर्णिका के साथ जो हुआ उसके विरोध में है? ज्यादातर ने बिना कहे खुद से कयास लगा लिया कि यह वर्णिका केस के विरोध में ही है, जिसमें एक राजनेता ने विवादित बयान देते हुए कहा कि “लड़कियों को देर रात में घर से बाहर निकलना नहीं चाहिए”|

पर रुकिए जरा सोचिये क्या सिर्फ यह एक अकेली घटना है? जहाँ किसी घटना के बाद ऐसा बयान आया? क्या ऐसा पहली बार हुआ है कि किसी लड़की को इस तरह के अपमान से गुजरना पड़ा? क्या समाज में, घर-परिवार में आये दिन यह सुनना नहीं पड़ता कि घर से निकलो तो भाई को लेकर निकलो, आधी रात में मत जाओ, ऐसे मत बोलो, वैसे मत उठो, वैसे मत बैठो ऐसी न जाने कितनी बातें हैं जो सिर्फ लड़कियों के लिए है|  न जाने कितनी ऐसी घटनाएँ हैं जिनके बाद हमने कितने उल-जलूल बातें लड़की के मत्थे आती सुनी हैं|

उन तमाम बातों के विरोध में यह कैम्पेन है, एक छोटी सी गह्तना से आपको बताती हूँ शायद आपके लिए समझना आसन हो जाए कि हम लड़कियां आधी रात को भी सड़क अपने लिए सुरक्षित क्यों चाहती हैं|

यूँ तो आधी रात को घर से निकलने के बहुत वाकये हैं जहाँ झेलना पड़ा लेकिन कुछ वाकये ऐसे हैं जो आज भी नहीं भूलते उनमें से एक यह भी है……

दिसंबर 2015 हमारे पूरे परिवार के लिए आज भी क़यामत ही है. 7 दिसंबर रविवार सुबह अचानक दी का फोन आया उसने बताया कि पापा को ब्रेन हैमरेज हो गया है| तमाम उठा-पठक में पापा को लखनऊ सुषमा हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया| पिता कोमा में और हम सब बदहवास, मैं आनन्-फानन में दिल्ली से लखनऊ पहुंची| होस्पिटल में माँ और भाई थे उनके अलावा तीसरी मैं| चूँकि दिमाग बिलकुल सुन्न पड़ गया था पापा का सुनकर तो जो कपड़े पहन रखे थे उन्हीं में जनरल से भागी थी दिल्ली से, लिहाजा पास में कुछ नहीं था| तीन दिन बाद भईया ने कहा हम तीनों में से किसी एक को घर जाना होगा, चूँकि तुम्हारे पास कपड़े वगैरह भी नहीं है एक काम करो तुम घर चली जाओ, वहां का सारा इंतज़ाम भी देख लेना और अपने कपड़े भी लेना आना| मैं घर चली गई, लखनऊ से हमारे घर की दूरी लगभग 220 किलोमीटर है| सब कुछ जल्दी -जल्दी निपटाते भी दुसरे दिन शाम हो गई, सर्दियों में सूरज यूँ भी घर जाने की जल्दी में होता है| दीदी और भाभी दोनों ने कहा कि रुक जाओ मत जाओ, लेकिन हालात रुकने वाले नहीं थे सो मैंने लखनऊ का रूख किया एक तो वैसे ही लेट हो गया था दूसरे कोई बस नहीं और कोहरा उसकी तो पूछिये मत इतना भयानक था उस दिन की हाथ को हाथ न दिखे .. समझ लीजिये  बस रेंग रही थी| भईया के चाचा ससुर उस समय हर पल साथ खड़े थे, हमारे लिए पिता समान| उनका मुझे फोन आया और उन्होंने कहा बेटा बस अड्डे तक मत जाना बेवजह की दूरी जायेगी और समय भी| चाचू ने मुझसे कहा बेटा तुम शहर में प्रवेश करने से पहले ही जो फ्लाई ओवर पड़ता है वहां उतर जाना मैं वही रहूँगा तुम्हें रिसीव कर लूँगा| खैर वह बेहद जिम्मेदार हैं आज तक कभी अपनी जिम्मेदारियों से नहीं चूके| लेकिन एक कहावत है न कि जब समय ही बुरा चल रहा हो तो फिर सारे सितारे उलटे पड़ जाते हैं|

अभी तक रॉड, तेज़ाब, मोमबत्ती और अब औरत के गुप्तांग में सिगरेट भी: सोशल मीडिया में आक्रोश

बस फ़्लाइओवर पर पहुंची और मैं उतर गई , एक तो कुहरे की वजह से सही जगह का अंदाजा न लग पाने के कारण मैं चाचू को सही समय का आइडिया नहीं दे पाई दूसरी मार यह पड़ी की कुहरे की वजह से चाचू मिस गाइड हो गए और गलत रूट ले लिया| अब कुछ नहीं हो सकता था सिवाय इंतज़ार के| मुझे याद है उसी फ़्लाइओवर से हाइवे शुरू होने के चलते गाड़ियों जिनमे ज्यादातर ट्रकों का ताता लगा हुआ था, बराबर आ जा रही थी या यूँ कह लीजिये रेंग रही थी| मैं डर और ठंढ के मारे लगभग सुनना पड़ चुकी थी क्योंकि मुझे अंदाजा हो गया था कि मैं बहुत गलत जगह फंस गई हूँ|

मैंने हुड उठाया सिर को ऐसे ढका की ठीक से बाल ढँक जाए आधे चेहरे को रूमाल से बाँधा पर शायद फिर भी मैं अपना लड़की होना छुपा नहीं पाई| जहाँ मैं थी वहां एक ट्रक आकर रुकी मैंने अपने आपको भरसक छिपाने की कोशिश की लेकिन मैं नाकाम थी| उस ट्रक में तीन लोग थे उन्होंने मुझे कैसे देखा, क्या सोचा मुझे नहीं पता लेकिन वह मेरी तरफ बढ़ रहे थे| मैंने इस बात को कन्फर्म करने के लिए अपनी जगह छोड़ा और थोड़ी अलर्ट होते हुए आगे की तरफ बढ़ गई| वे अब और तेजी से मेरी तरफ बढ़ने लगे मेरे पास सोचने का समय नहीं था बस बचाना था खुद को| पीठ पर सामान से लदा बैग और डरी सहमी मैं अपने आपको चाचा के आने से बिलकुल उलटी दिशा में भागी जा रही थी| मैं आगे और वो मेरे पीछे, मैं मार्शल आर्ट जानती हूँ पर मैं जानती थी कि मैं अकेली और डरी हुई हूँ और वे तीन मैं लड़ नहीं पाउंगी तो भागकर बचाना उचित लगा| भागते-भागते कुछ छोटी गुमटियां दिखी उन्ही में छिप कर खुद को बचाया| वह रात तो बीत गई लेकिन उस भयानक रात का जिक्र मैं अपने घर में किसी से नहीं कर पाई आज तक नहीं| पर जब भी सोचती हूँ सिहर उठती हूँ अगर उस रात मैं उनके हाथ लग गई होती तो क्या हुआ होता? क्या करते वे मेरे साथ?


कुछ हो जाने पर कौन ये मानता कि उस दिन और उसके बाद भी कई रातें मुझे देर रात घर से बाहर निकलना पड़ा अपनी इच्छा या घूमने के शौक के चलते नहीं अपनी जरूरत के चलते| ऐसी ही न जाने कितनी लड़कियां हैं जिन्हें अकेले निकलना होता है रात में जरूरत के वक्त, उन्मन कुछ अकेली रहती हैं, कुछ नौकरी करती हैं, कुछ सिंगल मदर हैं| सबके पास अपने-अपने कारन है पर इसका यह मतलब कत्तई नहीं होना चाहिए कि कोई लडकी रात को घर से निकले तो वह रेप कर दी जाए, मार दी जाए और उस पर यह आधे तिरछे बयान आएं| बस अब बहुत हुआ इनका विरोध करना ही होगा| लोगों को यह बताना ही होगा कि यह सड़क जितनी किसी आदमी के लिए सुरक्षित है उतनी ही किसी महिला के लिए भी होनी चाहिए| यह कैम्पेन उसी के विरोध में उठाया गया छोटा सा कदम है| शुरू में हम कुछ लड़कियां थी अब तो लगभग देश का हर कोना जुड़ चुका है|

मान लीजिये कि हम लड़कियां खुरापाती हो गई हैं .. आपके हिसाब से बहुत भयानक आइडिया हम लड़कियों के दिमाग में घूम रहा है.. जल्द ही हम आधी रात को सडको पर निकलेंगी .. नहीं नहीं हमारा इरादा किसी भी सरकार को चुनौती देना नहीं है.. बस इस समाज को समझाना चाहते हैं कि सड़कें हमारे लिए भी सुरक्षित कर दीजिये .. मैं यह मानती हूँ कि हम अपराध युक्त समाज का हिस्सा बन चुके हैं इसलिए आधी रात को सड़कें किसी के लिए भी सुरक्षित नहीं है फिर चाहे वह महिला हो या पुरुष.

नैचुरल सेल्फी की मुहीम: सौन्दर्य बाजार को लड़कियों की चुनौती

लेकिन जानते हैं आधी रात में निकलने पर पुरुष और महिला के डर में बड़ा अजीब अंतर है| अगर अपनी कहूँ तो मैं बिना वजह खुद रात को निकलने से बचती हूँ| लेकिन जब जरूरत होती है तो निकलने से घबराती भी नहीं बिना हिचक निकल जाती हूँ| हजारों अनुभव हैं मेरे पास ऐसे जब आधी रात को घर से बाहर निकलना पड़ा है वो भी अकेले.. आप जानते हैं क्या होता? नहीं ?? रुकिए बताती हूँ हाँथ, पैर कांपते हैं एक अनजाना डर दिमाग में भरा रहता है और वह डर बहुत वाहियात है क्योंकि वह डर सिर्फ लड़की होने से उपजता है.. रेप कर दिए जाने का डर, मार दिए जाने का डर, मोलेस्ट किये जाने का डर| और इस सब के साथ अगर आपके साथ कुछ गलत हो जाए तो लोगों की नसीहत निकली ही क्यों थी आधी रात को .. इन सब वर्जनाओं को तोडना है .. फिलहाल हम कुछ लड़कियां मन बना चुकी हैं .. आप सब का भी मन करे तो आ जाइए साथ …

कई लोगों का यह सवाल भी आया कि एक दिन से क्या होगा क्या बदलेगा| उनसे मेरा एक सवाल कुछ नहीं किया तो भी क्या बदलेगा? आज नहीं तो कल कुछ न कुछ तो करना होगा| बड़ी नहीं तो छोटी ही सही शुरुआत तो होनी चाहिए| तो बस समझ लीजिये यह शुरुआत ही है


श्वेता यादव  टेढ़ी  उंगली वेब पोर्टल के संपादक है.
संपर्क :yasweta@gmail.com


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क्यों खबर ली स्मृति ईरानी ने ‘पहरेदार पिया की’: बंद हो सकता है प्रसारण !

सूचना एवं प्रसारण मंत्री स्मृति ईरानी ने महिलाओं द्वारा चलाये गये ऑनलाइन कैम्पेन का संज्ञान लेते हुए ब्रॉडकास्टिंरग कंटेंट कप्लेंट्स काउंसिल (BCCC) को पत्र लिखा है. इस धारवाहिक को स्त्री विरोधी बताते हुए मानसी जैन ने आनलाइन कैम्पेन चलाया था, जिसपर लगभग 1 लाख से अधिक हस्ताक्षर किये गये. इसे सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के शिकायत विभाग में बाज्बता दर्ज भी करवाया गया .

सोनी टीवी पर 17 जुलाई 2017 से साढ़े आठ बजे से प्रसारित होनेवाला यह धारावाहिक अपने शुरुआत से ही सुर्ख़ियों में है. बेमेल विवाह और बाल विवाह पर बने धारावाहिकों से तो हम सब परिचित हैं, “बालिका बधु” ने दर्शको की प्रसंशा भी बटोरी थी, लेकिन इस धारावाहिक ने लोगो को अपने अटपटे कथानक से आहत कर रखा है.  9 वर्ष के लडके और अपने से दुगनी उम्र की लड़की के बीच प्रेम और विवाह के अवगुंठन से गुम्फित यह कहानी किसी को भी बेचैन कर रही है.

राजे-रजवाड़ों के ठसक और राजस्थान के पारिवारिक पृष्ठभूमि में निर्मित यह धारावाहिक सैकड़ो आम टीवी धारावाहिकों की तरह ही होता यदि पुरुष प्रेमी बच्चा न होता और प्रेमिका उससे दुगने उम्र की ना होती. सामंतवाद की रस्सी जल जाने के बाद भी उसके ऐंठन के हैंगोवर को दर्शाती पृष्ठभूमि में बने इस धारावाहिक को हर तरफ से आलोचना झेलनी पड रही है. 11 साल का बाल कलाकार अफाक खान 9 साल के राजकुमार की भूमिका में है और 25 वर्षीया तेज़स्वीसाल की दीया की भूमिका में है जो राजकुमार रतन के सपनों की परी जैसी आकर्षक और खुबसूरत है. राजकुमार रतन को दीया के प्रेम में पड़कर उसका पीछा करता हुआ और छुपकर तस्वीरें  लेता हुआ दिखाया गया है. दर्शक इस प्रेम के अतिरंगी रूप को नहीं पचा पा रहे हैं और बाल विवाह तथा  सामाजिक नैतिकता के विपरीत देख रहे हैं.



दर्शकों के गुस्से को आवाज देते हुए मानसी जैन ने change.org पर ऑनलाइन पिटीशन के माध्यम से  सूचना एवं प्रसारण मंत्री को लिखा है, जिसपर एक लाख से भी ज्यादा लोगों के हस्ताक्षर हैं. पिटीशन में कहा गया है कि यह धारावाहिक गन्दी और विकृत मानसिकता को बढ़ावा देनेवाला है और इसे तत्काल बंद कर दिया जाना चाहिए. नौ साल के बच्चे का 19 साल की लड़की की मांग में सिन्दूर के नाटकीय और सुहागरात और हनीमून के दृश्यों से कुत्सित इस धारावाहिक ने बाल विवाह के दुष्परिणामों को दिखने के विपरीत रहस्य-रोमांच और रोमांस को परोस रही है. पिटीशन में कहा गया है कि इस तरह के कुत्सित दृश्य हमारे बच्चो के कोमल मानस पर स्थायी प्रभाव डाल सकते हैं. हम नहीं चाहते कि  हमारे बच्चे इस बीमार मानसिकता से ग्रसित हों.

दीया (तेजस्वी प्रकाश) ने सफाई देते हुए कहा है कि नाहक ही लोग इसे मुद्दा बना रहे हैं, यह धारावाहिक वास्तव में कुरीतियों के खिलाफ है और किसी भी तरह से बाल विवाह को बढ़ावा नहीं देती, न ही इसमे कोई आपत्तिजनक दृश्य हैं. जिस शादी के दृश्य को देखकर जनता विरोध कर रही है (नाबालिग राजकुमार रतन द्वारा मांग में सिन्दूर भरे जाने का) वह शादी किसी कारण से हुई है ना कि दाम्पत्य सुख के आनंद के लिए. इस धारावाहिक से ‘जिम्मेदारी” का स्पष्ट सन्देश समाज में देना चाहते हैं पर लोग बेकार में ही यह पिटीशन कर रहे हैं. यह पूरी तरह अनावश्यक और अन्यायपूर्ण है. हालांकि यह समाजिक जिम्मेवारी क्या है.

धारावाहिक में मुख्य किरदार की भूमिका तेजस्वी प्रकाश (दीया), अफान खान(रतन), सुय्याश राय(अभय), परमीत सेठी(हर्षवर्धन मान सिंह) और किशोरी शहाने(पद्मा सिंह) आदि निभा रहे हैं. धारावाहिक के लेखक नीरज आयंगर हैं और शशि सुमित प्रोडक्शन द्वारा निर्मित है.
राजीव सुमन स्त्रीकाल के संपादन मंडल के सदस्य है.
संपर्क :9650164016

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प्रधानमंत्री जी, राखी को लफ्फाजी न बनायें: बहनों को बलात्कारी भाजपाइयों से बचायें

खुला पत्र 

आदरणीय प्रधानमंत्री जी 


आज जब देर रात आपको बड़ी व्यथा के साथ पत्र लिखने बैठी तो सोशल मीडिया में आपको राखी बांधती कुछ बहनों की तस्वीर भी देख रही हूँ. मोदी जी एक ओर आपकी पार्टी की महिला नेता सायना एनसी आपकी पार्टी के हरियाणा प्रदेश अध्यक्ष के बेटे की लम्पटता का शिकार बनी लडकी का ही डॉक्टरड फोटो के जरिये उसे  बदनाम करने में लगी है, और आपकी पार्टी के अन्य भाई लोग उसका साथ दे रहे हैं तब आपकी पार्टी की कुछ बहनें आपको राखी बांधती दिखीं. सोचा शायद आपके भीतर एक-आध छटांक भाई ही बचा हो. बेटा तो आप अच्छे होने के सबूत देते रहते हैं. इसीलिए आपको यह पत्र लिख रही हूँ.


अब देखिये न आप कितने व्यस्त रहते हैं. आपको सारी बातों का पता तो नहीं होता है न. आपको पता होता तो गुजरात में एक लडकी की जान और इज्जत बचाने के लिए आपने जिस तरह अपने गृहमंत्री से लेकर पूरे राज्य की पुलिस मशीनरी को लगा दिया था, उसका फोन टेप होने लगा था  वैसे ही इधर भी चंडीगढ़ में आपने वैसे ही सुरक्षा पीडिता लड़की को दे दी होती. उसे और उसके आईएएस पिता को क्यों भला फेसबुक पर आना पड़ता, आ भी नहीं पाते पुलिस वाले उन्हें इतनी सुरक्षा दे चुकी होती  कि …

आजतक पर जारी वीडियो



घटना के बारे में 


अरे हाँ, आप तो व्यस्त बहुत रहते हैं. लगता है आपको हरियाणा में आपकी पार्टी अध्यक्ष के बेटे की करतूत की किसी ने खबर न दी होगी. देता भी भला कौन अमितशाह भाई जिन्होंने गुजरात वाली लडकी को पूरी सुरक्षा मुहैया कराई थी वे अभी गुजरात में ही राज्यसभा चुनाव में चाणक्य वाली भूमिका निभा रहे हैं. एक अकेली जान,  क्या करें बेचारा अमित भाई तो लीजिये ये पत्र आपको मिले तब आप जान जायेंगे, मैं ही बता देती हूँ तफसील से.


मामला बीते शुक्रवार की आधी रात का है। जगह चंडीगढ़, जिसे कुर्बुज़ियर ने नियोजित शक्ल और कमाल की सूरत दी। आधी रात को जब आईएएस अधीकारी वीरेन्द्र कुंडू की बेटी वर्णिका कुंडू कार से ड्राइविंग करते हुए अपने गंतव्य पर जा रही थी उसी समय हरियाणा क्षेत्र के भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष सुभाष बराला का बेटा विकास बराला अपने एक दोस्त के साथ उन्हें तंग करते हुए उनका पीछा कर रहा था। लड़की ने अपनी फेसबुक पोस्ट द्वारा इस घटना का ब्यौरा दिया है। आपकी सुविधा के लिए एक वीडियो लिंक दे देती हूँ ताकि घटना उसकी ज़ुबानी ही सुन लें. यह वीडियो आपके प्रिय चैनल जी न्यूज का है :

वास्तव में यह वर्णन बहुत खौफ़नाक है। लडकी हूँ न मोदी सर तो पढ़ते हुए एक डर अंदर घुस आता है। वर्णिका का पीछा बहुत देर तक किया जाता रहा। इतना ही नहीं उनका अपहरण करने की भी कोशिश की गई। मौक़े पर पहुंची पुलिस ने फौरी कार्रवाई करते हुए दोनों लड़कों को गिरफ़्तार कर लिया। वर्णिका  ने खुद इस बात को स्वीकार किया है कि शायद पुलिस न आती तो वह बच न पाती।


मोदी जी सोचिये वर्णिका एक आइएएस अधिकारी की बेटी नहीं होती तो उसे क्या पुलिस की मदद इतनी आसानी से मिल जाती? नहीं न, वैसे इस लडकी को भी कोई ख़ास न्याय नहीं मिला. घटना के चौबीस घंटे के भीतर आरोपियों को जमानत पर रिहा भी कर दिया गया है। आम लड़की या महिला का तो थानों में एफ़ आई आर (FIR) भी दर्ज़ नहीं होता। लड़का आपकी पार्टी के अध्यक्ष का बेटा है इसलिए कुछ ही देर में जेल से जमानत पर रिहा भी हो गया।



वर्णिका ने एक सवाल भी आपसे, हमसब से पूछा है कि जब चंडीगढ़ जैसी सेफ सिटी का यह हाल है तो ग्रामीण इलाकों में क्या होता होगा। उसने यह भी कहा कि वह एक अच्छे घर से ताल्लुक रखती है इसलिए इस केस को इतना कवरेज़ मिल रहा है जबकि एक आम लड़की का क्या हाल होता होगा !


मोदी जी आपको क्या याद दिलाना, फिर भी दिला देती हूँ, चंडीगढ़ एक केंद्र शासित शहर है न. यानी पुलिस आपके गृह मंत्रालय के सीधे अधीन है. समझती हूँ कि अमितशाह भाई साहब उधर गुजरात में व्यस्त हैं, लेकिन यह कैसे हो गया कि आपकी खोजी पुलिस को उस रास्ते के सीसीटीवी फुटेज  पहले मिले नहीं, फिर पता नहीं कहाँ से मिल भी गये. खबरों के मुताबिक़ जिन रास्तों पर यह घटना घटी उन रास्तों पर 9 सीसी टीवी कैमरे लगे थे जिनमें 5 खराब हैं। बचे हुए 4 कैमरे की फुटेज़ में भी गड़बड़ी की बात सामने आ रही है।  ऐसे में कई सवाल उठ रहे हैं। इसके अलावा दोनों आरोपियों का घटना के कुछ समय बाद मामूली कानूनी धारा लगाकर छोड़ दिया जाना भी सरकार व पुलिस पर उंगली उठाने की वजह देता है।


सच में आज आपकी कलाई पर राखी बंधी देखकर बहुत खुशी हुई कि इस देश की बहनें आपको कितना मान देती हैं. आप जरूर कार्रवाई करेंगे. मुझे पक्का यकीन है कि अमितशाह भाई आपकी व्यस्तता देखते हुए यह नहीं बता पाते होंगे कि दिन-ब-दिन आपकी पार्टी के लोग सेक्स रैकेट चलाने से लेकर न जाने कितने आरोपों से घिर रहे हैं. और अबकी बार आपके राज्य हरियाणा में, ‘कहाँ बेटी बचाओ, बेटी पढाओ’ का नारा दिया गया है वहाँ आपके राज्य के पार्टी अध्यक्ष ही अपने लम्पट बेटे को बचाने में लगे हैं. उधर आपके प्रिय संगठन संघ में शिक्षा-दीक्षा प्राप्त मुख्यमंत्री पीडिता को ही उपदेश दे रहे हैं.


आपको भाजपा की बहनों द्वारा बांधी गई राखी की कसम आप थोड़ा समय निकालकर मेरे इस पत्र के माध्यम से जान सकेंगे कि हरियाणा में आपकी पार्टी कैसे बेटी बचा रही है.


घटना के बाद आए बयानों और प्रतिक्रियाओं पर नज़र डालने पर भाजपा के ही हरियाणा प्रदेश उपाध्यक्ष ने टिप्पणी या फरमान सुनाया कि लड़की रात को बाहर क्यों घूम रही थी?…लड़कियों को बाहर नहीं जाना चाहिए…! ऐसे में बहुत हैरत होती है इस तरह के बयानों को सुनकर। जहां आज देश में रक्षा और सुरक्षा के नाम पर रक्षाबंधन मनाया जा रह है वहीं नेता इस तरह का बयान दे रहे हैं। जब रजीनीति के लोगों को जिन्हें मतदान देकर चुना गया है, ऐसे बयान दें तब इस देश की आधी आबादी को अपने मत को डालने से पहले ज़रूर एक बार सोच लेना चाहिए। मत देने के समय हम एक मूल्यवान मतदाता होती  हैं लेकिन घर से बाहर निकलने के नाम पर कैसे एक पीड़ित और बेशर्म लड़की में तब्दील हो जाती हैं, इन राजनेताओं को यह बात सोचनी ही चाहिए।

आरोपी विकास बारला और पीडिता वर्णिका



आपको एक और दर्दनाक खबर देती हूँ. आज ही के नवभारत टाइम्स (हिन्दी) में यह खबर पढी कि दिल्ली के मंगोलपुरी इलाक़े में शनिवार देर शाम एक महिला को चलती कार में अगवा कर बलात्कार करने की कोशिश की गई।


सच कहूं मोदी भाई जान, लडकी होने के नाते बहुत डर लगता है कि छोटी बच्चियों से लेकर बुज़ुर्ग महिलाएं तक लम्पटों से पीड़ित हैं और जब लम्पट आपकी पार्टी के होते हैं तो हमारी चुनी हुई सरकारें (अधिकाँश राज्यों में अब आपकी पार्टी राज कर रही है) अपने ही लोगों को बचाने में जुटी है। कब तक 70 साल के जुमले में अपनी बहनों को आप बहला पायेंगे भाई जान.


आपका विकास कहीं विकास बारला ही तो नहीं है 


सच कहूं तो आज आपसे पूछने का मन हो रहा है कि क्या ‘विकास बराला’ नामक ‘विकास’ की ही बात आप करते रहे हैं? क्या विकास का रूप अपराधियों की शक्ल वाला है? क्या विकास असुरक्षित माहौल को बनाने वाला है? क्या विकास ‘देर रात घर से बाहर न निकलने’ या ‘संस्कारी कपड़े’ पहनने के सुझाव वाला है? क्या विकास निरंतर महिलाओं के शोषण और हिंसक हमलों का है? क्या विकास का मतलब आपकी पार्टी में लम्पटों को मिलने वाली सुरक्षा और संरक्षण का विकास है?


देखिये न, आपकी कलाई में राखी कितनी फब रही है. लेकिन यह तब और फबेगी जब आप वाकई पीडिता को न्याय दिलवाएंगे. उसे उसकी बहादुरी के लिए अपने यहाँ बुलाकर सम्मानित करेंगे. बहादुरी का जज़्बा दिखाने वाली उस लड़की ने अपनी सूझबूझ से काम लिया और अपने को बचाया। सबसे बेहतरीन बात यह भी रही कि उसने एक लंबी फेसबुक पोस्ट लिखकर इस हादसे के बारे में ब्यौरा दिया जिसे मिनटों में हजारों लोगों ने बिना मीडिया के चटखारे वाली खबरों के जाना। उसने इस सोशल साइट के जरिये अपने अनुभव और डर को रखा और साथ ही अपील भी की कि कैसे इन हमलों में खुद को सुरक्षित रखा जा सकता है। यह ज़रूरी भी है कि लाज-शर्म और बिना डर के अपने साथ हुए हादसों को साझा किया जाये। डर या चुप्पी हमलों का जवाब कतई नहीं होते।


आप इस राखी की लाज रखिये जो बीजेपी की बहनों ने आपकी कलाई पर बांधी है. आप विकास बारला को अपहरण की कोशिश के लिए गिफ्तार करवाइए, जेल भिजवाइये, पुलिस आपकी है. उसके पिता और आपकी पार्टी के हरियाणा प्रदेश अध्यक्ष को तत्काल पार्टी से बर्खास्त कर पुलिस पर दवाब लाने के लिए जेल भेजिये, आखिर पार्टी आपकी है. और भाजपा की नेता सायना एनसी जो पीड़िता को फर्जी तस्वीरों के जरिये बदनाम कर रही है उसे पार्टी से बर्खास्त करिये तथा ट्वीटर पर आपको फ़ॉलो करने वाले उन लम्पटों पर भी कारवाई करिये जो पीडिता को ही बदनाम कर रहे हैं.

सच में मोदी जी इस राखी की लाज रखिये, इसे लफ्फाजी न बनाइये और बेटियों को सबसे पहले बलात्कारी भाजपाइयों से बचाइये. घर के अंदर सफाई अभियान से ही सूरत बदलेगी . पत्र अनाम लिख रही हूँ क्योंकि डर है कि आपके भाजपा के सायना एनसी जैसी  नेता  या आपको ट्वीटर पर फॉलो करने वाले या आप जिन्हें फॉलो करते हैं वैसे भक्त मुझे भी न टार्गेट कर  लें
 आपकी बहन  
अच्छे दिन की बाट जोहती 
चंडीगढ़ 

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पंडिता रमाबाई की स्मृति में शुरू होगी व्याख्यानमाला

प्रेस विज्ञप्ति

भारत में महिला अधिकारों की प्रबल प्रवक्ता  रही हैं पंडिता रमाबाई. प्रयास संस्थान प्रतिवर्ष उनके नाम पर आयोजित व्याख्यानमाला के वक्ताओं को देगा एक लाख रुपये मानदेय

साहित्य, संस्कृति और सामाजिक सरोकारों के लिए राजस्थान के चुरू जिले में  काम कर रहा  प्रयास संस्थान भारत में स्त्री अधिकारों की प्रबल प्रवक्ता  रही पंडिता रमाबाई की स्मृति में वर्ष 2018 से व्याख्यानमाला शुरू करेगा। प्रयास संस्थान के अध्यक्ष दुलाराम सहारण ने बताया कि प्रतिवर्ष देश-दुनिया के किसी एक चुनिंदा वक्ता को व्याख्यान हेतु आमंत्रित किया जाएगा और पंडिता रमाबाई के काम को प्रकाश में लाते हुए उनके महिला-उत्थान तथा शिक्षा के प्रति संकल्प से जुड़े विषय पर व्याख्यान करवाया जाएगा।

प्रयास संस्थान के सचिव कमल शर्मा ने बताया कि संस्थान व्याख्यान के मानदेय के रूप में व्याख्यान देने आए विद्वान को एक लाख रुपये प्रदान करेगा। प्रयास संस्थान को यह राशि शिक्षाविद प्रो. घासीराम वर्मा द्वारा संस्थान के नाम करवाई जा रही इक्कीस लाख रुपये की सावधि जमा राशि के ब्याज से प्राप्त होगा। शर्मा ने बताया कि संस्थान यह व्याख्यान प्रतिवर्ष चूरू जिला मुख्यालय पर करवाएगा और प्रथम व्याख्यान वर्ष 2018 के अगस्त माह में होगा।

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कौन काट रहा उनकी चोटियाँ: एक तथ्यपरक पड़ताल

रजनीतिलक 


आजकल एक खबर ने पूरे देश में दहशत फैला दी है वह है रात के समय सोती हुई महिलाओं की उनके ही घर में चोटी का कट जाना. पिछले कई दिनों से अखबारों से लेकर टीवी चैनल में इस पर लम्बी बहसें चल रही है और महिलायें सहमी हुई सी इन खबरों को लगातार देख रही है, हम भी इस खबर की तह तक पहुंचना चाहते थे अतः पांच सदस्यों  का एक दल- संजीव चंदन भिखुनी  समांदीक्की, मनीषा कुमारी एवं रजनी तिलक- रविवार 6 अगस्त को दिल्ली देहात के रणहोला, तिलंगपुर कोटला (नजफगढ़) पहुंचा,यह जानने के लिए कि इन गावों में
जिन महिलाओं की चोटी काटी गयी है उनका सत्य क्या है?

हम लोगों  ने गाँव के बाहर एक चाय की दुकान पर बैठ कर चाय पी और वही से जानने की कोशिश की चोटी काटने की घटना कहाँ हुई है? हमारी बात को लापरवाही से उड़ाते हुए चाय वाले ने कहा हमें तो नहीं पता, बार बार पूछने पर उसने हाथ का इशारा गाँव की और किया और हम लोग कार में बैठ कर गावं की ओर गये फिर वहाँ किसी आदमी से पूछा कि चोटी वाली घटना कहाँ  हुई है उसने भी मुस्कुरा कर कहा हमें तो नहीं पता कहाँ हुई है .

गावं से निकलते हुए हमने एक औरत से पूछा तो उसने हमें सहजता से बताया कि गाँव में नया हनुमान मंदिर बन रहा है उसके पीछे एक औरत की चोटी कटी है. हम खोजते-खोजते हनुमान मंदिर पहुंचे, उस हनुमान मंदिर में पहले से ही छठ पूजा स्थल को तोड़ने के विरुद्ध कोई बैठक हो रही थी. 15-20  आदमी बैठ कर विचार कर रहे थे. संजीव चन्दन और मैं  हम दोनों पहले मंदिर में गए और उनसे चोटी काटने की घटना पर बात की तो उन्होंने कहा कि उससे भी बड़ा हमारा मुद्दा है पहले हमारी बात सुनें. उन्होंने बताया कि आम आदमी पार्टी की सरकार ने हमारे छठ पूजा स्थल तोड़ दिया है और उसे स्कूल के लिए दे दिया है, जबकि यहाँ पहले से ही दो स्कूल है.

उन्होंने बताया कि यहाँ टोटल वोट 1800 हैं हम बिहारियों के 1350 वोट हैं और इस बार हमने अपने वोट भाजपा को दे दिए हैं इसलिए हमारा छट स्थल तोड़ दिया है, आप हमारी बात मिडिया तक पहुंचायें. हालांकि उनकी बात में आंशिक सत्यता थी. दरअसल आम आदमी पार्टी पूरी दिल्ली में व्यवस्थित छठ घाट बना रही है और जमीनें जो स्कूल या डिस्पेंसरी से लगकर हैं, उसे उन्हें दे दे रही है. लगा की यहाँ भाजपा बिहारी मतदाताओं की धार्मिक भावनाओं को सहला रही है. हमने उनसे फिर चोटी काटने वाली बात पूछी तो उन्होंने  किसी को फोन करके बुलाया. एक दुबला पतला लड़का मोटर साईकिल पर एक दुबली पतली लड़की को बैठा कर लाया. लड़की गर्भवती थी उसका चेहरा उतरा हुआ था. हमने जब उनसे पूछा कि आपकी चोटी कैसे कटी? तो उसने बताया मैं सो रही थी रात को साढ़े तीन बजे मेरे भाई को सपने में बिल्ली दिखी तो वह घबरा कर उठा तो उसने लाईट जलाई तो देखा मेरी चोटी के बालों की लट कटी पड़ी है उसने ही मुझे बताया.’ हमने पूछा घर बंद था तो उसने बताया कि दरवाजा थोडा सा खुला हुआ था. हमने पूछा कि क्या हम आपका घर चल सकते है ओ वे हमें अपने घर ले गये. इस घटना की विक्टिम का नाम सुनीता था (बदला हुआ नाम)जिसकी उम्र 27 वर्ष थी. अपनी जाति उन्होंने राजपूत बतायी और ये लोग यूपी के रहने वाले थे. घर में एक कोने में एक छोटा सा मंदिर भी था. इस  छोटे से कमरे में पति पत्नी और उनके दो बच्चे व पत्नी का भाई रहता था. सुनीता के चेहरे पर दोनों गालो पर आयरन की कमी के निशान काफी गहरे थे. संजीव चन्दन ने उनसे सवाल करने शुरू किये कि क्या आपको पता चला कि बाल कटे है? तो उसने कहा कि नहीं मैं तो सो रही थी. हमने पूछा ‘तो क्या आपने पुलिस में शिकायत की?’ पति पत्नी दोनों ने कहा, ‘नहीं क्या फायदा? अब जो हो गया सो हो गया पुलिस इसमें क्या करेगी? मनीषा ने पूछा ‘क्या आपको पहले से पता था कि महिलाओ की चोटी कटी जा रही है?’ सुनीता ने कहा, ‘हाँ कल ही तीन नम्बर गली में एक औरत की चोटी कटी थी मैं और मेरी पड़ोसन हम दोनों देखने गये थे.’ संजीव ने फिर पूछा ‘क्या आप लोग टीवी पर ये खबर देख रही हो ? दोनों औरतो ने कहा कि हम ये खबरें टीवी पर देख रहे है और डर भी लगता है.’ हमने पड़ोसन से भी कुछ बात करने की कोशिश की तो उसने जबाब देने से इनकार कर दिया. हमने सुनीता की कटी चोटी देखी तो हमें थोडा अजीब लगा कि एक लट तो उसकी थी पर दूसरी लट दोनों तरफ से मूछों जैसी पैनी थी, जैसे यह लट बाहर  से ला कर मिला दी गयी हो, क्योंकि बालो की ये लट उसके बालो से मिल नहीं रही थी और कटे बाल दोनो ओर से नुकीले नहीं हो सकते. यह बात सही है कि बहार का दरवाजा बंद था, परन्तु इस मकान में तीन चार किरायेदार रहते थे सबके दरवाजे सटते हुए थे. इस परिवार ने पुलिस में शिकायत तो दर्ज नहीं करायी लेकिन हैरानी की बात है कि मीडिया में खबर पहुँचाने की उत्सुकता उनमे देखी गयी.

सुनीता को पीर बाबा का झाडा लगवाया गया ताकि कोई बुरी शक्ति से उसका बचाव हो सके. सुनीता का भाई हमें घर पर नहीं मिला. सुनीता ने यह भी बताया कि किसी बूढ़े  आदमी की झलक उसे सपने में दिखी हम जब लौट रहे थे तो हमने सीढियों पर एक बूढ़े आदमी को खड़ा देखा था. सुनीता के घर से निकल कर हम दूसरे केस तीन नम्बर वाली गली के पास गये. घर कच्ची ईंटो  का बना था और लोहे का गेट लगा था. हमने गेट थपथपाया तो एक छोटे से लड़के ने गेट खोला और हमने कहा कि आपकी मम्मी से मिलना है. उसकी मम्मी कमरे से बाहर आई और हम आँगन में जा कर खड़े हुए तो वह एक कुत्ता था जिसके बारे में हमने कहा पहले इसे बाँध दो, उन्होंने कुत्ते को बाँध कर हमारे लिए खाट बिछा दी. यह परिवार पाल जाति से था इनके दो बच्चे थे एक लड़का जो सातवी में पढता था और लड़की नौवीं में थी. रेखा (बदला हुआ नाम) के पति राज मिस्त्री का काम करते हैं,  बल्कि ठेकेदारी भी करते हैं. इनके घर में बालाजी भगवान पूजे जाते हैं. हमारे पूछने पर कि चोटी कैसे कटी, रेखा ने बताया कि ‘रात एक बजे तक मियां बीबी जागे हुए थे और चाय बना कर पी. एक खाट पर बेटा और पति सो गये और एक पर हम माँ-बेटी सो गयीं. सुबह पांच बजे मैं पेशाब के लिए उठी तब तक भी सब ठीक था. सुबह उठी तो देखा मैंने सर पर हाथ फेरा तो एक लट हाथ में आ गयी, मैंने अपने बच्चों को ही बताया था. बच्चों  ने बच्चों को बताया तो लोगो को पता चला. हम उस दिन किसी काम से गये थे शाम को चार बजे आये तो लोगो ने समझा हम पुलिस में शिकायत करने गये है .हमने कहा कि पुलिस में क्यों नहीं शिकायत दर्ज करायी? रेखा ने कहा क्या फायदा पुलिस के चक्कर में? हमारा बचाव तो हमारे बालाजी बाबा ने कर दिया वो हम पर आंच नहीं आने देता. हमने बाल की लट देखनी चाही तो उसने बताया, ‘हमने आज कूड़े में फेक दिये.’ रेखा बड़ी दबंग टाईप औरत थी उसके थोड़े से ही बाल नुचे थे. कुत्ता भी उसकी खाट के नीचे ही बंधा हुआ था. उससे पूछा क्या आपक सर में दर्द है या आपको डर लग रहा है उसने कहा न मुझे डर लगता न सर में दर्द है.

इस केस के बाद हम श्यामवती (बदला हुआ नाम) का घर खोजते हुए उसके घर पहुंचे तो पता चला कि वो अपने भाई के घर राखी बंधने गयी है है. घटना का ब्यौरा इस प्रकार था कि इनके घर में जन्मदिन था. जन्मदिन के बाद श्यामवती बाथरूम में गयी फ्रेस होने तो वह  वहा बेहोश हो गयी और उसकी चोटी कटी हुई थी उसके सर में दर्द था और उसे उल्टियां हो रही थीं. इस मामले में केस दर्ज करवाया गया. हमने आसपास बात की तो लोगो ने कहा पता नहीं क्या बात है , विश्वास तो नहीं होता पर केस बढ़ तो रहे हैं. पुलिस जांच क्यों नहीं कर रही.  यहाँ से निकल कर हम पुलिस स्टेशन पहुंचे.

 वहां हमे ए.एस.आई संदीप से मिलना था. वे हमें वहाँ नहीं मिले.  हमने उनके ही चैंबर के बगल में दूसरे चैम्बर में बैठे एक अन्य पुलिस अधिकारी से इस मुद्दे पर बातचीत की तो उसने कहा, ‘ये कोई भ्रम है या कोई मानसिक दबाब द्वारा होने वाली घटनाए हैं. उन्होंने शिवनगरी में एक अन्य केस के बारे में बताया कि एक 18 वर्ष की लड़की की चोटी उसके घर में ही कटी, घर चारो तरफ से बंद था. जब हमने तलाशी ली तो बहुत सारी  छोटी-छोटी कैंची हमें मिली. हमने लड़की से बात की उससे बार-बार पूछा उसके सही जबाब न देने पर झूठ बोलने की मशीन पर ले जाने की बात की तो उसने हमारे साथ आने से मना कर दिया.’

जादू टोने की बात मैंने अपने बचपन से अपने आसपास की महिलाओं से खूब सुनी थी. मुझे याद है कि औरतें कभी कभी जिनको बच्चे नहीं होते थे उन्हें तांत्रिक यह सुझाव देते थे कि कि किसी की चोटी काट लाओ मैं पूजा कर दूंगा तुम्हारे बच्चे हो जाएंगे. कभी-कभी औरतें  किसी का बुरा करने के लिए भी ऐसे टोटको का सहारा लेती थी. बेबसी, अनपढ़ता, उपेक्षा, प्रताड़ना, इच्छा पूरी करने की जिद्द, अंधविश्वास, मिथ्या विश्वास, इर्ष्या, भावनात्मक ठेस, कुंठा के साथ-साथ अतृप्त इच्छाए भी मनोविकार बन जाती है. महिलाओं के शारीर हार्मोन परिवर्तित होने पर भी हिस्टीरिया के दौरे पड़ते हैं, कुछ मामलों में महिलायें अपने प्रति बरती जा रही उपेक्षा को दूर करने के लिए, सबका ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने के लिए भी कुछ ऐसे कृत्य कर बैठती हैं कि न केवल परिवार का बल्कि आसपास के लोगों का ध्यान भी उसकी तरफ खीचा चला आता है.


चोटी काटने के पूरे देश में 100 से ज्यादा केस हुए, उनमें ज्यादातर 40 से उपर की महिलायें हैं, कुछ नवयुवतियां और किशोरियां. एसा अचानक क्या हुआ जो रातो रात सोते सोते स्त्रियों की चोटियों को काटे जाने की घटनाए बढ़ने  लगी? सबसे पहला केस जोधपुर में हुआ उसके बाद हरियाणा- मेवात, पलवल,फरीदाबाद ,नुहू. महेंदरगढ,रेवाड़ी, उतरप्रदेश- आगरा, नौएडा, बुलंदशहर, कुशी नगर,खुर्जा हापुड़ ,मोदी नगर, मध्यप्रदेश में छतरपुर. बुंदेलखंड,और दिल्ली के देहातों में ऐसी घटनाओं के कारण महिलाओ में भय और दहशत फैल रहा है वे घर से बाहर निकलना बंद कर रही है. आगरा में चोटी काटने के शक में एक वृद्ध महिला की ह्त्या भी कर दी गई. हैरानी की बात ये है कि ये सब घटनाए भाजपा शासित राज्यों में ही क्यों सर उठा रही है ? क्या ये सुनियोजित षड्यंत्र है या प्रायोजित ड्रामा ?

या हम ये मान ले ये कोई वायरस है जो सोती हुई औरतो की चोटियों को काट रही है और उनेह बेहोश करके उनके दिमागों को त्रस्त कर रही है ?

समय पर ऐसे डरावने और शोक संतप्त करने वाले कृत्य समाज में आते हैं और नागरिकों  को डराते हैं. उनके साथ लूट खसोट करते हैं.  परन्तु इस बार महिलाओं पर इस तरह का हमला उन्हें नियंत्रण में लेने की कोशिश की कोई सुनियोजित कार्यवाई है. हमारा समाज अंधविश्वास में जल्दी ही फँस जाता है क्योंकि हमारी धार्मिक शिक्षायें ही इसका स्रोत है.


पैटर्न:
इस फैक्ट फाइंडिंग प्रक्रम के दौरान कुछ ख़ास पैटर्न हमें दिखे, जिससे इस घटना के पीछे काम कर रही मानसिकता को समझा जा सकता है.


1. लगभग सारे मर्द इस घटना के प्रति उपेक्षा भाव रख रहे हैं, वे कायदे से इसके बारे में बात करने के प्रति भी          उदासीन दिखे. महिलाओं और बच्चों के बीच इसकी चर्चा है और बात फैलने के माध्यम भी वही हैं.
2. जिन महिलाओं की चोटियाँ कट रही हैं वे मीडिया को सबसे पहले खोजती हैं. पुलिस को इस मामले में नकारा      मानती हैं.
3. पीड़ित महिलायें प्रायः निम्न मध्यवर्ग की घरेलू कामकाजी महिलायें हैं.
4. प्रायः सभी टीवी, इन्टरनेट पर चोटी कटने की घटनाओं को लगातार देख रही हैं और ऐसा खुद के साथ होने        को  लेकर आशंकित  रही हैं.
5. प्रायः सभी पीड़िता आस्थावान और तांत्रिकों, बाबाओं या किसी ख़ास देवता को मानने वाली हैं.
6. पुलिस इसे मॉस साइको समस्या के रूप में देख रही है और यह मान कर चल रही है कि वे स्वयं ऐसा कर रही        हैं इसलिए पुलिस का जूरिसडिक्शन नहीं बनता. 

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मेधा का आंदोलन अभी भी जारी है, सरकार ने उन्हें नजरबंद कर रखा है

कामायनी स्वामी/आशीष रंजन 


7 अगस्त की शाम को जब देश के अलग-अलग इलाकों में लोग राखी की खुशियाँ मना रहे थे और भाई बहन एक दुसरे का मुंह मीठा कर रहे थे, मध्य प्रदेश के सुदूरचिखल्दा गाँव में पिछले 12 दिनों से अनशन पर बैठे नर्मदा बचाओ आन्दोलन के 12  साथियों को करीब 2000 की संख्या में पहुंचे पुलिस बल ने घेर लिया | हजारों समर्थकों के बीच से उनके विरोध के बावजूद पुलिस मेधा पाटकर और अन्य साथियों को जबरन उठा कर ले गयी | धरनास्थल को तोड़ा गया और स्थल पर मौजूद दर्जनों लोग घायल हुए | मेधा पाटकर और नर्मदा बचाओ आन्दोलन के साथी 27 जुलाई से अनिश्चितकालीन अनशन पर बैठे थे | वह सरकार से मांग कर रहे थे कि हजारों परिवार जिनका पुनर्वास नहीं हुआ है उनका सुप्रीम कोर्ट के आदेशनुसार सम्पूर्ण पुनर्वास किया जाए और सरदार सरोवर बाँध के फाटक को खोल दिया जाए – फाटक बंद होने से बाँध की लम्बाई 138 मीटरहै, जिसके चलते मध्य प्रदेश में दर्जनों गाँव डूब जायेंगेऔरडूब क्षेत्र में बसे हजारों लोगों की जल ह्त्या होगी |

सुप्रीम कोर्ट ने 08.02.2017 केअपने आदेश में सरकार को निर्देश दिया था कि विस्थापित हो रहे लोगों का पुनर्वास किया जाय| कोर्ट ने यह भी कहा था कि सभी विस्थापित 31.07.2017 तक गाँव खाली कर दें नहीं तो उन्हें जबरन हटाया जाएगा | कोर्ट के इस निर्णय की आड़ में प्रशासन गाँव- गाँव जाकर बिना पुनर्वास की व्यवस्था किये गाँव खाली करने का नोटिस दे रहा है और जबरन गाँव खाली करने की पूरी तैयारी चल रही है | सरकार की नीति को देखते हुए मेधा पाटकर और अन्य साथी आमरण अनशन पर बैठे | उनका कहना है कि जब सुप्रीम कोर्ट ने गेट बंद करके पूरे क्षेत्र को डुबोने के लिए नहीं कहा तो सरकारनेगेट बंद क्यूँ कर दिया ? वह भी ऐसे समय में जब गुजरात में बाढ़ आयी है वहगुजरात में पानी पहुंचाने के नाम पर मध्य प्रदेश के लाखों लोगों को क्यूँ डुबोना चाहती है ?

नर्मदा बचाओ आन्दोलन का तीन दशक से अधिक का संघर्षशील इतिहास रहा है | पूरी तरह शांतिपूर्ण और अहिंसक आन्लोदन ने पूरी दुनिया में विकास केमॉडल पर बहस छेड़ दी| यहप्रश्न कि विकास किसके लिए और किसके कंधे पर हो एक बड़ा सवाल बन कर लोगों के बीच उभरा | बड़े बांधों द्वारा हो रहे विस्थापन और पर्यावरण कीअपूरणीय क्षति पर पूरे विश्व के लोगों का ध्यान आकृष्ट किया गया | पूरे विश्व में बड़े बांधों के खिलाफ एक वातावरण बना और तमाम सरकारों ने अपनी नीति में परिवर्तन किया | आन्दोलन के चलते 90 के दशक में विश्व बैंक, जिसके पैसे से सरदार सरोवर बाँध बनाना था, ने पैसा देने से मना कर दिया था | इस आन्दोलन ने भारत सरकार को पुनर्वास को लेकर कानून बनाने पर बाध्य किया और जमीन अधिग्रहण में लोगों की सहमति एवंअन्य जनपक्षी  प्रावधानों (जैसे सोशल इम्पैक्ट असेसमेंट का प्रावधान)को कानून में लाने में सफल रही| करीब 15 हजार विस्थापित परिवारों को जमीन के बदले जमीन मिली |

तीस साल से भी अधिक से चल रहे इस आन्दोलन ने कई विपरीत परिस्थिति को भी झेला है | सुप्रीम कोर्ट का बाँध को मंजूरी देना, और उसके बाद बाँध के गेट बनने की स्वीकृति ने इस आन्दोलन के लिए बहुत मुश्किल हालात पैदा किये हैं | हालांकि आन्दोलन की सफलता रही है कि दोनों हाई कोर्ट और सुप्रीमकोर्ट ने बार-बार पुनर्वास पूरा करने का निर्देश दिया है और अभी भी मध्य प्रदेश की हाई कोर्ट प्रदेश में पुनर्वास को मॉनिटर कर रही है |मध्य प्रदेश सरकार झूठे आंकड़े दिखाकर कोर्ट को अपने पक्ष में कामयाब करने में बहुत हद तक सफल रही है | न्याय की इस लड़ाई ने पूरे तंत्र, जिसमे कोर्ट भी शामिल है, की सीमा को बखूबी उजागर कर दिया है | हमारे गाँव में किसका राज होगा ? ग्राम सभा का या किसी और का ? लोगों की बात सही है या सरकारी आंकड़ों की? असलियत की जांच कैसे होगी जैसे सवालों ने सभी को परेशान किया है | अगर पुनर्वास हो गया है तो हजारों लोगों के पास पुनर्वास की जमीन क्यूँ नहीं ?

सरकार ने मेधा पाटकर को इंदौर  के अस्पताल में कैद कर रखा है | उन्हें किसी से मिलने नहीं दिया जा रहा है | सरकार का कहना है कि मेधा पाटकर के बिगड़ते स्वास्थ को देखते हुए यह कदम उठाया गया और उनका इलाज किया जा रहा है | सरकार संवाद करने में रूचि नहीं दिखा रही | 12 अगस्त को प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी भाजपा के 12 मुख्यमंत्रियों एवं 2000 पुजारियों के समक्ष सरदार सरोवर बाँध का उद्घाटन करने वाले हैं | वहीँ देश-विदेश के नामी गिरामी बुद्धिजीवी जिसमें नोम चोमस्की शामिल हैं ने मेधा पाटकर और आन्दोलन के समर्थन में वक्तव्य जारी किया है | देश भर के बीस से भी अधिक शहरों में आन्दोलन के समर्थकों ने अलग अलग तरीके से अपना समर्थन जाहिर किया है | उधरचिखल्दा में अनशन टूटा नहीं नहीं, दस साथी अनशन पर बैठ गए हैं|

लेखकद्वय जन आन्दोलनों का राष्ट्रीय समन्वय (एनएपीएम )से जुड़े हैं . सम्पर्क: ashish.ranjanjha@gmail.com

स्लीपिंग पार्टनर

अरविंद जैन

स्त्री पर यौन हिंसा और न्यायालयों एवम समाज की पुरुषवादी दृष्टि पर ऐडवोकेट अरविंद जैन ने महत्वपूर्ण काम किये हैं. उनकी किताब ‘औरत होने की सजा’ हिन्दी में स्त्रीवादी न्याय सिद्धांत की पहली और महत्वपूर्ण किताब है. संपर्क : 9810201120
bakeelsab@gmail.com

शताब्दी अपनी रफ्तार से भागी जा रही थी। मैं सारे रास्ते जाने क्या-क्या सोचता समझता रहा और समीक्षा, सामने सीट पर पैर पसारे ‘कैट स्केनिंग’ करती रही।


 मेरे दिमाग में सालों पीछे छूटा गाँव, घर, खेत, खलिहान और गुरुकुल बसते-उजड़ते रहे, लहंगा-ओढ़नी पहने नानी माँ किस्से-कहानियाँ सुनाती रही और बहुत से नंग-धडंग बच्चे दूर जंगल में भेड़-बकारियाँ चराते रहे।


बीच-बीच में ऐसा लगता जैसे बिना बताए डाकिया, बंद दरवाजे के नीचे से कोना फटा पोस्टकार्ड सरका कर चला गया हो। हर बार कोना फटा पोस्टकार्ड। उस समय ममता, करुणा, स्नेह, प्रेरणा, प्रतिभा और स्मृति के शवों और शवों की स्मृतियों में चौतरफा घिरा मैं,   शमशान सा उदास और अकेला हो जाता। बता नहीं सकता कितना बैचैन…. कितना परेशान।

अनुवाद


समीक्षा-कोई मिथक, कल्पना या सपना नहीं, हाड़-मास की जीती-जागती, हँसती-खेलती और घूमती-फिरती लड़की है। लेकिन पता नहीं क्यों कभी लगता कल्पना या सपना भी हाड़- मांस की जिन्दा लड़की हो सकती हैं और कभी लड़की भी मिथक, कल्पना या सपना सी लगने लगती। ‘मेकअप’ में वह मुझे भी ऐसी जासूस लगती जो मेरी क्या मेरे महाजनक तक की जन्मपत्री बांचे हुए हो और कभी जादुई काहानियों वाली साक्षात् जादूगरनी, चुडैल या डायन जो मौका लगते ही मुझे तोता, बुलबुल, मैना या कबूतर बना कर सोने के पिंजरे में बन्द कर देगी। ऐसे में मुझे उस खतरनाक लड़की से बेहद डर लगता ओर बार-बार मन करता कि सब कुछ छोड़-छाड़ कर कहीं दूर पहाड़ी जंगलों में जा साधु-संन्यासी बन जाऊँ, घोर तपस्या करुँ, और मोक्ष प्राप्त करके जीवन जीवन-मरण के दुष्चक्र से सदा-सदा के लिए छुटृी पाऊं। लेकिन ‘किन्तु-परन्तु’ और ‘अगर-मगर” ने  मुझे पूजा साधना या अराधना में ही उलझाए रखा और कभी कुछ करने ही नहीं दिया।

समीक्षा की भाषा में मैं अपने पिता और वह अपनी मम्मी की कार्बन-कॉपी हैं।  मुझे नहीं मालूम माँ कब, कहाँ, कैसे और क्यूँ मरी या मार दी गयी हैं। हाँ! जब भी कोई पूछता, ‘‘आपका नाम, बाप का नाम?’’ तो मैं बिना सोचे-समझे बता लिखा देता वाही नाम जो मेरे स्कूल सर्टिफिकेट में लिख लिखा दिया गया था। मम्मी-पापा के प्रेत, हर समय हमारे आस-पास मंडराते रहते और पता नहीं हम कभी इनसे मुक्त हो भी पाएंगे या नहीं।
मैं अक्सर कहता-काश! हम मम्मी-पापा होते।


नानी माँ के जाने के बाद कई-कई बार सोचना पड़ता स्थायी अता-पता और सोचते-सोचते आकाश बयां के घोसलों सा लटका नजर आता। उजाड़ और सुनसान। ऐसे समय में सुबह से शाम तक मैं हर कुछ देर बाद माचिस की एक तिल्ली जलाता और रोज यह फैसला करके सोता या सो जाता कि कल पूरी माचिस में ही आग लगा दूँगा, …. आग। लेकिन कह नहीं सकता क्यों?  समीक्षा जब भी चश्मा उतार लाड़ से कहती, ‘‘तुम बिल्कुल पापा जैसे लगते हो।’’ तो मुझे महसूस होता कि या तो उसके पापा ही मेरे पिता होंगे या फिर मेरे पिता उसके भी पापा। मैं अनुमान लगाता- ‘हो सकता है उसकी मम्मी ने मरते समय सच बता दिया हो’ और कान में नानी माँ कहने लगती, ‘‘कोई भी आदमी या औरत, मरते समय झूठ नहीं बोलता।’’ मुझे नहीं मालूम उसकी ‘मेम साहब’ सी मम्मी ने सच बोला या झूठ । मुझमें जब पालतू पिल्ले से पापा नहीं मिलते तो वह अक्सर ‘स्माइल प्लीज’ जैसी हँसी दिखाते हुए कहती, ‘‘ यू सन् ऑफ ए गन’’ और बिलियर्ड खेलने लगती। कई बार जीती जाती तो उसे शक होता  कि मैं उसे जानबूझ कर जीतने देता हूँ। शायद इसलिए उसने एक दिन झल्ला कर कहा भी, ‘‘हाई यू आलवेज गिव ए मिस?’’ मैं सिर्फ ‘‘ ओह नो… मिस…. नो’ कह कर टालने की कोशिश करता रहा।


वह दुधिया रोशनी में दुनिया भर के चमड़ा उघोग के शेयरों के भाव बताते-बताते अचानक अपना पर्स उठाती और यह कह कर ठक…. ठक…. ठक… करती मेरी समझ से बाहर चली जाती- ‘‘यू आर ट्राइंग टू किस ए गनर्ज डॉटर।’’

मैं दुधिया रोशनी में गालियाँ देता, कार्टून बनाता, प्रेम कविताएँ लिखता, इन्द्रजाल फैलता, सफेद कमीज को लाल-काली  करता, और सारा दिन बू…बू… करता प्याज के छिलके उतारता रहता। अपने को “वाईज” और उसे “अदरवाईज” समझता मैं, कभी गिटार बजाता ओर कभी जोर-जोर से गाता‘‘इट… इज ए मैड… मैड मैड वर्ल्ड…..’’



होश आता तो समीक्षा….. समीक्षा प्लीज समीक्षा करने लगता। वह जितना पढ़ाती- समझाती- रिझाती मैं अपने पिताजी की तरह उतना ही उलझता ऐंठता चला जाता। उस समय वह एकदम मम्मी सी लगती। हर बार वह ब्रह्माण्ड सुन्दरी सी हँसती हुई आती मगर जाते-जाते बच्चों की तरह रोने लगती। कई दिनों तक वह मन में गुलाबी मछली सी तैरती रहती और मैं ऑइस बॉकस से बेडरुम में पड़ा-पड़ा ‘शो पीस’ देखता रहता। नींद में चूल्हे पर चाय का पानी रख शान्ति की तलाश में निकल पड़ता। हाथी दांत से बने द्वार तक पहुँचते-पहुँचते ऐसा लगता जैसे धरती से अम्बर तक आग लगी है…. आग लगी है इस कोने से उस कोने तक दुनिया भर में। चारों ओर चंदन वन में विष वृक्षों पर फन फैलाये सांप, टहनियों से लटके लिपे-पुते भयावाह चेहरे और आगे-पीछे टहलते हाथियारबन्द शिकारी नजर आते।


सुबह-सुबह अखबार सी समीक्षा आ दरवाजा खटखटाती तो मैं हड़बड़ा कर उठता। दरवाजा खोलता ओर देखता कि कमरे में धुआँ ही धुँआ भरा है। चौखट पर खड़ी समीक्षा काफी देर तक दमें के मरीज की तरह खांसती रही और मैं ग्रर्भग्रह से बाहर निकल सड़क पर जहर खाकर मरे चूहों की शवयात्रा में शमिल हो कहने लगता- ‘‘ राम नाम सत है, सत बोलो गत है..’’

यस पापा


शवयात्राओं से लौटता तो “घर सूना बिन कामिनी’ के आदेश- उपदेश देते ‘हैंड लैटर्स’ पढते- पढ़ाते मन में मिट्टी के घरौंदे बनाते- तोड़ते बच्चे खेलने लगते और आँखों में सजा शामियाना धूँ… धूँ कर जलने लगता। सामने शीशे में बणी – ठणी सी समीक्षा आ खड़ी होती और मैं जाने- अनजाने नाखून चबाते-चबाते अंगूठा चूसने लगता। दोनों आमने-सामने अड़े टिक…. टिक सुनते रहते और चुपके-चुपके हवाई जहाज बनाते – उड़ाते शाम हो जाती।
‘ड्राईक्लीन’ कर बाहर निकलता और बस स्टॉप पर पहुँचकर घंटों  सोचता- ‘कहाँ चला जाए? घूम-फिर कर क्लब पहुँचाता और रात देर गए टैक्सी पकड़ वापस आ जाता। नशे में कभी-कभी लगता बिस्तर में बेसिर -पैर की समीक्षा सोई पड़ी है- अँधेरे में सिर पैर ढूँढते-ढूँढते बेहद भयभीत और आतांकित हो चीखने की कोशिश करता लेकिन गले से आवाज नहीं निकलती। आँख खुलती तो पता लगता कि फर्श पर रजाई में दुबका पड़ा हूँ। बहुत देर तक समझ ही नहीं आता कि ऐसा कैसे हुआ? फिर सोचता शायद रात कुछ ज्यादा हो ही गई और रजाई उठा पलंग पर सोने की कोशिश करता लेकिन नींद न आती। सिरहाने रखे ‘मार्निंग गिफ्ट’ को बार-बार उलट-पुल्ट कर देखता और फिर से पैक करके रख देता। मैं करवटें बदलता गिनता-गिनाता रहता दिन, महीने, साल और हर साल अपने आपको समझाता- ‘ जो होगा, देखा जाएगा’ पर बार-बार ख्याल आता बचपन में बिछुड़े बसन्त से न जाने कब मिलना होगा?’’ होगा… नहीं होगा’…. शायद हो… शायद नहीं। सोकर उठता तो बहुत देर तक सिर पकड़ कर बैठा रहता। ‘हैंग औवर’में पानी पीते-पीते याद आता- ऐसे ही एक रात वह भी पीकर आई थी। न जाने कहाँ से और कितनी ।  सुबह हुई तो पता चला वह नहा-धोकर कब की चली गई और मैं उल्टियों से गन्धाते बिस्तर में पड़ा सपने देखता रह गया…. सपने।’


उस दिन के बाद सालों मेरे दिमाग में सारी-सारी रात वह भेष बदल-बदल कर फेरे  लगा  रही। कभी सार्थक के साथ ठहका लगा हँसती हुई, कभी वैभव और समर्थ के साथ रोती-पीटती हुई और कभी मोहित या प्रतीक की बाँहो में बेहोश। मैं नशे मैं बड़बडाता । चीखता-चिल्लाता और अमावस की रात में उसका पीछा करता लेकिन वह बहुत तेजी से भूरी- जंगली बिल्ली की तरह छलांग लगाते-लगाते सारी दीवारें तोड़ती, सरहद के उस पार भाग जाती और मैं बरामदे में पड़ी बैसाखियाँ समटेते-समटेते अपने बाल नोचने लगा।



लोग कहते-सुनते रहते। मैं गमले तोड़ता, फूल नोचता, किताबें फैंकता, नंग-धडंग, नाचता, लड़ता-झगड़ता, तितलियाँ पकड़ता, बारुद बिछाता और आग लगाता- लगाता पागलखाने पहुँच जाता। महीनों तक डाक्टर विद्याधर दिमाग ठीक करते मगर ऐसे दौर पड़ते ही रहे। शायद सिर्फ कारण बदलते रहते। कभी कुछ….. कभी कुछ।


समीक्षा पागलपन का पोस्ट…. पोस्ट….पोस्टमार्टम करती रहती और मैं बोर्डरुम में बैठे-बैठे एक भरी-पूरी और खेली खाई औरत का कच्चा चिट्ठा तैयार करते-करते सपनो की परिभाषा में उलझ जाता । मैं अक्सर चाय-कॉफी के साथ सिगरेट, कभी सिगार और और कभी पाइप पीते-पीते विरासत में मिले किसी पुराने प्लॉट पर ‘मल्टी स्टोरी” का नक्शा बनाने लगता। मालूम नहीं कितनी बार हवादार हवेली सा मन्दिर, किले की मजिस्द , शानदार कोठी या चर्च और एयरकंडिशंड बंगले सा गुरुद्वारा बनाता‘- मिटाता रहा या हवेली को किले और कोठी को बंगले में अदलता- बदलता या खरीदता-बेचता रहा।


समीक्षा मिलती तो खेलकूद से लेकर दर्शनशास्त्र तक पर शास्त्रार्थ करने लगती ओर मैं किले सी कोठी के ड्राईंगरुम में सिगरेट सुलगाता और लम्बा कश खींच धुँआ उंडेलते मन ही मन आत्मसर्मप्ण कर सोचता- छोड़ो! अभी बहस में पडूँगा तो सारा मामला और उलझ जाएगा। लेकिन आहत और अपमानित इतना कि ठांय! ठांय !! हवा में बन्दूक दागता रहता।


कभी वह समाजशास्त्र पढ़ाने- समझाने लगती और कभी भ्रूणहत्या से सती तक का इतिहास। बलात्कार हत्या और आत्महत्याओं के आंकड़े बताते-गिनाते उसका मुहँ गुस्से में लाल हो जाता। मैं दो घूँट  ले समझता- पगाल है…. पागल। जब देखो पता नहीं क्या- क्या पढ़ती लिखती बोलती रहती है।


सुलगती सिगरेट को ऐशट्रे में मसलता और उठकर धूमने- घुमाने चला जाता। घंटों गोल गुम्बद के नीचे बैठा-बैठा योजनाएँ बनाता- बिगाड़ता  रहता। समीक्षा किताबों की धूल झाड़ती या फटी- पुरानी धुन लगी पोथियों पर नरम और चिकने चमड़े का ‘कवर’ चढाती रहती। लौटने के बाद मैं  पड़ोस में गीता और मनु के साथ उनके लॉन मैं बैठा शतरंज खेलता- खिलाता रहता।

समीक्षा एक दिन भी नहीं मिलती तो मैं बैचेन हो जाता। वह नहीं आती तो मैं उसके यहाँ जा पहुँचता। जब कभी नहीं मिलती और दरवाजे पर ताला लगा होता तो मैं आशंकित हो अन्दाज लगाता- सार्थक…. समर्थ…. प्रतीक… वैभव … मोहित। सब जगह चक्कर काटकर वापस आता तो वह बाहर सीढियों पर बैठी ‘वॉर अगेंस्ट विमेन’ या भविष्य फल पढ़ रही होती। एक दूजे को देख मेरी सांस में सांस आती और उसके सांवले चेहरे पर मोर नाचने लगते। ताला खोलने के लिए चाबियाँ ढूँढते- ढूँढते ध्यान आता- अरे। आज तो ‘यहाँ’ जाना था… आज तो “वहाँ” जाना था… समीक्षा को देख मन कहता, ‘ नहीं…. आज कहीं नहीं जाना था।’ इसके बाद मुझे कुछ भी याद नहीं रहता या मैं खुद ही जानबूझ कर सब भूल जाता। कभी समीक्षा मुझे ‘ आत्महत्या के विरुद्ध ’ कविता जैसी लगती और कभी हत्या होने से बची कथा – नायिका सी।


कई बार सोचा कह दूँ ‘लेट अस गो टू द वर्ल्ड’ लेकिन कभी अध्यादेश जारी करते पापा सामने आ खड़े होते और कभी डॉलर, पाउंड या दीनार उछालती प्रतीक एण्ड कम्पनी। उस दिन समीक्षा का जन्म दिन था (पता नहीं कौन सा? ) और रात को  चौराहे पर खड़े-खड़े बहुत हिम्मत बटोर मैंने ही कहा था, ‘‘ सभी …. क्षा… आज मेरे साथ चलो ना! ….. क्या हम लाइफ पार्टनर नहीं बन सकते?’ सोचा एक बार ‘हाँ’कह दे, फिर तो मैं देख लूँगा अच्छी तरह।
समीक्षा ने गौर से सुना…. थोड़ा सोचा और शब्दों को तौलते हुए बोली ‘‘ आज से तुम्हारा मतलब? … मैं रोज किसी न किसी….’’
मैं सकपकाया और ‘‘नो प्लीज… नो करता रहा।


कुछ क्षणों के बाद उसने कहा, सॉरी डियर… मैं तुम्हारे साथ चलती … सात जन्म तक चलती…. अगर तुमने ‘आज’ न कहा होता। तुम हमेशा पार्टनरशिप की बात करते हो….. बात। मुझे लगता हैं तुम्हें लाइफ पार्टनर नहीं, ‘स्लीपिंग पार्टनर’ चाहिए…. स्लीपिंग पार्टनर’ चाहिए…. हर जगह स्…लीपि. ग…. पार्ट…. नर,’’ उसने काँपती आवाज और भेदती नजर से मेरी और घूर कर देखा तो मुझे ऐसा आभास हुआ जैसे लाल-पीली बत्तियाँ उसकी आँखों में जल-बुझ रही थीं। इससे पहले कि मैं कुछ कहता वह ‘पोनी टेल’ हिलाती हुई सड़क के उस पार जा चुकी थी।


मैंने सोचा ‘ उसका पीछा’ करने या समझाने – बुझाने से कोई फायदा नहीं’ और पंचर हुए पिछले पहिए को उतार ‘स्टेपनी’ बदलने लगा। कहना मुश्किल है कब तक, ‘स्टेपनी’ बदलता रहा… ‘स्टेपनी’। सुबह आँगन से सड़क तक- सिन्दुर, काँच की चूडियाँ, लाल-साड़ी, मंगल सूत्र और ‘मार्निंग गिफ्ट’ बिखरे पड़े थे।
और शताब्दी अपनी रफ्तार से भागी जा रही थी।

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सुनो पुरुष: असुंदर और वेश्यायें भी लेखिका हो सकती हैं, कवि, आलोचक और निर्णायक भी

Literary sexism has been wreaking havoc on the self-esteem of women writers for centuries — even in our seemingly more enlightened times. And now, suddenly, it’s become fashionable to openly dismiss notions of gender inequality and brand complainants as “privileged whingers”.
Jane Sullivan


साहित्यिक लिंगवाद सदियों से महिला लेखकों के आत्मसम्मान पर कहर बरपा रहे हैं – यहां तक कि हमारे प्रबुद्ध रूप से अधिक प्रबुद्ध समय में। और अब लैंगिक असमानता और ब्रांड शिकायतकर्ताओं को “विशेषाधिकार प्राप्त कातिल” के रूप में खारिज करना फैशन हो गया है

मंटों वेश्याओं की कहानियां लिखते थे, महान कथाकार थे. पुरुष साहित्यकार प्रेम की कथाएं पढ़ते, रचते हैं वे महान हैं. वे सब महान हैं जो पुरुष हैं और महिलाओं के साथ विशेषाधिकार प्राप्त प्रेमी का आचरण करते रहे हैं. ये सब अपनी रचनाओं से मूल्यांकित होंगे. लेकिन जब स्त्री लिखेगी तो उसके निजी रिश्ते किससे कैसे रहे, वह दिखती कैसी है, उसके सेक्स आचरण कैसे हैं, आदि उसके मूल्यांकन के आधार होंगे.

यह कोई नया सिलसिला नहीं है, लेकिन उस समय में जब सनी लियोन के लेखन का हमसब स्वागत कर रहे हैं लेखिकाओं के खिलाफ पुरुष साहित्यकारों, आलोचकों के एक खेमे से, जिनकी प्रगतिशील दावेदारी भी है, मूल्यांकन और आलोचना के सेक्सिस्ट हमले हो रहे हैं. एक बार फिर हिन्दी साहित्य के महारथियों ने सिद्ध कर दिया है कि मूलरूप से जातिवादी और स्त्रीविरोधी हैं-हाई कास्ट मेल हैं.


पिछले तीन दिन से हिन्दी साहित्य की दुनिया सोशल मीडिया पर स्वयं अपनी परतें खोल रही है. हालांकि सोशल मीडिया में सक्रिय लेखिकाओं ने जब जमकर प्रतिरोध किया तो परदे के पीछे भी डैमेज कंट्रोल की कवायाद शुरू हो गई है. इस दशक की शुरुआत में ही हिन्दी के एक लेखक और बड़े मठाधीश के रूप में तब उभरे और हिन्दी विश्वविद्यालय के कुलपति विभूति नारायाण राय ने लेखिकाओं को छिनाल और कामदग्ध कुतिया कहा था. काफी विरोध हुआ उनका. तब भी डैमेज कंट्रोल के खेल शुरू हो गये थे. अभी भी उनकी साम्रदायिकता विरोधी चैम्पियन की छवि से उनके इस सेक्सिस्ट आचरण का डैमेज कंट्रोल होता है. तब जो पर्दे के पीछे सक्रिय लोग थे उनमें से कुछ अभी भी हैं, लेकिन चूकी  मठ बड़ा नहीं है, गिरोह बड़ा नहीं है इसलिए उसकी संख्या भी उतनी बड़ी नहीं है. हालांकि विरोध भी उतना बड़ा नहीं है.

कवि कृष्ण कल्पित ने एक सम्मान में निर्णय के बहाने निर्णायक अनामिका के खिलाफ एक निहायत आपत्तिजनक टिप्पणी की, जिसका स्वाभाविक रूप से विरोध हुआ. विरोध के जवाब में कल्पित विरोध करने वाली लेखिकाओं के खिलाफ भी उसी अंदाज में हमलावर हुए. शुरू में उनसे माफी की मांग भी उठी जो धीरे-धीरे उनके अपने गिरोह की सक्रियता के असर से कमजोर भी होने लगी है. कल्पित के हमले न सिर्फ सेक्सिस्ट हैं उनकी प्रशंसाएं भी उतनी ही सेक्सिस्ट हैं. मसलन उनके तीन पोस्ट की बानगी है:

अनामिका के खिलाफ: 

अनामिका पिछले एक वर्ष से बहुत से युवा कवियों को अपनी कविता के साथ घर बुलाती रही हैं । उन्होंने उनमें से एक जवान कवि का चुनाव किया है । इसमें किसी को क्यों ऐतराज़ हो रहा है ? यह उनका व्यक्तिगत फ़ैसला है, जिसका हमें सम्मान करना चाहिये !
#भारतभूषणअग्रवालपुरस्कार_2017 १.
किसी को दाढ़ी वाला पसन्द आता है तो किसी को सफाचट – अपनी-अपनी सौंदर्याभिरुचि है !

लेखिका गीता श्री के खिलाफ: 

अपने छोटे से जीवन में मेरा सामना विकट औरतों से हुआ है, लेकिन गीताश्री जैसी फूहड़, बदतमीज, और गंवार औरत, जिसको लेखिका होने का भरम भी है; दूसरी नहीं देखी.
सुबह से यह औरत मुझे कुंजडियों की तरह गालियाँ दिये जा रही है. कुंजडी सुंदर हो तो गालियाँ भी मीठी लगती है, लेकिन यहाँ तो दीवार से सिर मारना ठहरा……

और लेखिका वंदना राग की प्रशंसा में: 


वंदना राग जी मैं आपके लिखे का कायल हूँ, आपको ध्यान से पढ़ता रहता हूँ. आपकी संवेदना, पारदर्शी गद्य, आपकी मुस्कराहट और घुंघराले बालों का मैं प्रशंसक हूँ.
……………………………………………………………..मेरी स्त्री सम्मान को कम करने की मंशा नहीं थी. कुछ बदमाश औरतों और मेरे दुश्मनों ने बात का बतंगड बना दिया.

ये तीनो ही उद्धरण भाषा और समझ के स्तर पर लेखक के स्त्रीविरोधी और जातिवादी मानसकिता को सामने लाते हैं. और तुर्रा यह कि वे अपने बचाव में या फिर उनके बचाव में दूसरे लोग यह समझाने की कोशिश कर रहे हैं कि भले मानुष का यह आशय नहीं था. आशय यदि पुरस्कार के चयन का विरोध ही था यदि मान लिया जाये तो क्या पुरस्कारों के निर्णायकों का विरोध इसी भाषा के साथ अब तक होता रहा है. पिछले साल इसी भारतभूषण अग्रवाल सम्मान के निर्णायक उदय प्रकाश थे, उनके निर्णय का भी विरोध हुआ, लेकिन विरोध की भाषा वह क्यों नहीं थी जो अनामिका के प्रसंग में है. क्या कल्पित या दूसरे लोग  पुरुष रचनाकारों के लेखन की प्रशंसा करते हैं तो उसके रूप सौन्दर्य, मुस्कान और घुंघराले बालों की प्रशंसा करते हैं, या अपनी प्रशंसा की कसौटी बनाते हैं. वंदना राग की प्रशंसा की भाषा क्या कल्पित जी के पद्य-गद्य की प्रशंसा की भाषा हो सकती है. क्या मुस्कराहट और बिना घुंघराले बालों के वंदना राग के गद्य की पारदर्शिता और उनकी संवेदना कुछ कम जाती हैं ?

समर्थन की भाषा और भंगिमा भी सेक्सिस्ट


यह तो हुई विरोध की भाषा और भंगिमा अनामिका के समर्थन में भी सोशल मीडिया में जो पोस्ट हो रहे हैं वे भी अंततः स्त्रीविरोधी वक्तव्य और भंगिमा ही हैं. कोई उन्हें स्नेहिल बहन बता रहा है, कोई ममतालू माँ. यदि वे ये दोनों ही नहीं होतीं तो उससे उनके लेखन का क्या संबंध होने वाला है या उनके उस निर्णय से. अनामिका इन रिश्तों के अलावा किसी की पत्नी, किसी की प्रेमिका या किसी की दोस्त भी हो सकती हैं. इन सबसे बढ़कर वे किसी की कुछ भी नहीं हो सकती हैं वे सिर्फ अनामिका हो सकती हैं तो इस होने से लेखन और आलोचना का क्या संबंध है?

समर्थन और विरोध की इस भाषा और भंगिमा में हमारी लेखिकाएं भी पीछे नहीं हैं. उषा किरण खान ने लिखा:

कृष्ण कल्पित जी,मैं एक प्रगल्भ माँ थी और आप बीए में पढ़ने वाले किशोर ।मेरी कहानी और आपकी कालजयी कविता “बेटा इकलौता” आदरणीय भारती जी ने बड़े विज्ञापन करके छापा था। तबले आपकी प्रतिभा की मैं क़ायल हूँ । आपने भी सदा बड़ी बहन वाला आदर दिया है।आप हमारे शहर में दो बार अधिकारी बन दूरदर्शन में आये जो साहित्यकारों के विचरण का स्थल है ज़ाहिर है हम मिलते रहे। कभी आपको अभद्र नहीं पाया। आपने यहाँ परिश्रम किया यह हम देखते रहे। आपने कई बार जिसे पसन्द नहीं किया उसे भी बुलाते रहे ।आपकी छवि मेरे मन में सदा एक किशोर की रही। साहित्य आपका ओढ़ना बिछाना है । उसके सहित को लेकर चलने में क्या हर्ज है? मुझे पता है आपकी मात्र एक बिटिया है ,क्या उसे महिलाओं के सम्बन्ध में आपके ये विचार (जिसे अपशब्द कहे और जिसका नखशिख वर्णन किया)रुचेंगे?
आपने विराट अध्ययन किया है उसका मान रखें। कुछदिन मौन रहकर मनन करें। आप शेखावटी के हैं , राखी के समय का ध्यान रखें।
मैं यात्री काका(नागार्जुन ) से भी कहती और रोकने में सफल होती थी.

हिन्दी साहित्य और समाज का लिटमस 


उषा किरण खान अपने पोस्ट में कुछ यूं लिख रही हैं मानो कल्पित कोई एक ऐसा पीडित गुट हों, जिनसे दूसरा गुट लड़ रहा है. मैं इस पोस्ट  के साथ दांग रह गया कि क्या हमारी सम्मानित लेखिकाएं भी इसे एक साहित्यिक संघर्ष के रूप में देख रही हैं? क्या मामला इतना भर है. नहीं. यह प्रसंग साहित्य के भीतर हाई कास्ट मेल की दृष्टि का है. इसकी आलोचना होनी चाहिए थी और इसे एक हिन्दी साहित्य और समाज के लिटमस की तरह देखा जाना चाहिए था.

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