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#टॉक.. सेक्स स्त्री यौनिकता का उत्सव अभियान

इन दिनों हैश टैग टाक सेक्स सोशल मीडिया पर वाइरल हो रहा है. यह लन्दन के 23, पॉल स्ट्रीट के “स्कारलेट लेडिज” के भव्य बुटिक से उठ रही महिलाओं की आवाजें हैं जो 23 अगस्त को औपचारिक रूप से हैश टैग टॉक सेक्स अभियान शुरू करने वाली हैं. “आवाज़ अनेक सन्देश एक” के नारे के साथ इस अभियान से जुड़ने का आह्वान किया गया है. इसमें हर जगह की “सामान्य” महिलाओं के जीवन और शरीर की फोटो प्रदर्शनी के साथ-ही-साथ वैसी मज़बूत और सक्षम महिलाओं से बातचीत और जुड़ने का मौक़ा है जो इस दुनिया को बदलने के लिए कृत संकल्प हैं. इसमे लिखा हुआ है ए टूर ऑफ़ 23, पॉल स्ट्रीट, स्कारलेट लेडिज होम एंड लन्दन मोस्ट इथिकल हॉउस ऑफ़ स्ट्रिप टीज. ( 23,पॉल स्ट्रीट की यात्रा  लंदन के  सबसे नैतिक स्ट्रिप टीज घर की सैर). अपनी आपबीती साझा कीजिए #TalkSex वाल  (क्लिक करें)  पर.

इस वैभवशाली बुटिक घर से आ रही आवाजें उनकी हैं, जहाँ पर स्कारलेट लेडिज की सदस्य स्त्रियाँ प्रत्येक बुद्धवार को अपनी यौनिकता पर खुल कर बहस करती हैं, सेक्स के उपर बातचीत करती हैं, आराम फरमाती हैं, अपनी निजी और गुप्त बातें साझा करती हैं. अपनी यौनिकता से उभरे दाग-धब्बों और समस्याओं पर खुलकर चर्चा ही नहीं करती बल्कि अपनी खूबसूरती और अपने यौनिकता के आनंद और अपने शरीर से प्रेम के सन्देश को दुनिया तक पहुंचाना चाहती हैं जिससे दुनिया के हर हिस्से की महिलाएं स्वयं को सार्वभौम बहनापे से खुद को जोड़ते हुए अपने आप को सशक्त कर सकें. ताकि इस पितृसत्तात्मक समाज द्वारा स्त्रियों को उनकी ही यौनिकता से कैद कर दिए जाने की साजिश से मुक्त हो सकें.

यौनिकता की विश्वसनीय दृश्यता

स्कारलेट लेडिज के इस वैभवशाली घर के पीछे का इतिहास भी बड़ा रोचक है. 18 वीं सदी में एक कुख्यात फ़्रांसिसी दार्शनिक-साहित्यकार हुए, जिनका नाम था मर्क़ुएश दि सादे ( Marquis De Sade ). ये सुखवाद के पक्के समर्थक और यौनिक नैतिकता के सबसे बड़े आलोचक थे. ये अपने कामुक और रत्यात्मक लेखन के लिए जाने जाते हैं. जिसमें पोर्नोग्राफी का दार्शनिक विमर्श, यौन फंतासियों– जिसमें  हिंसा, अपराध, ईश निंदा के साथ -साथ क्रिश्चानिटी का विरोधी साहित्य भी शामिल था. “सैडिज्म” और “सैडिस्ट” शब्द भी इन्हीं के नाम पर बने हैं.

 इनकी एक बहुत प्रसिद्द पुस्तक का नाम है “फिलोसोफी इन द बेडरूम”. इसमें इन्होंने एक ऐसे छोटे कमरे या जगह के बारे में लिखा है जो महिलाओं की गुप्त और रहस्यमयी बातों की जगह है. और इस जगह ने समय के साथ एक ऐसी ख्याति प्राप्त कर ली है जहाँ स्त्रिया गंदे काम करती हैं, गन्दी बातें करती, केलि करती हैं जो समाज में लज्जाजनक हैं. आधुनिक समय में इस तरह से स्त्रियों का सुसज्जित निजी बैठका या सलून जहाँ सिर्फ स्त्रियों का वर्चस्व है, जहाँ अपनी मर्ज़ी की हर चीज़ करने को वह स्वतंत्र हैं. आधुनिक अर्थों में बुटीक या सलून जहाँ उच्च घराने की स्त्रियाँ स्नान करती हैं, सजती-संवरती हैं और अपने आनंद का समय बिताती हैं. फ़्रांसिसी शब्द बौदियार (boudoir)  अंग्रेजी के बोवर (bower) का समतुल्य है जिसका अर्थ भी यही है.



रीतिकाल में स्त्रीं-यौनिकता का सवाल उर्फ देह अपनी बाकी उनका
तो इस घर ने मूलत: एक ऐसी ख्याति प्राप्त की हुई है जो तथाकथित नैतिकता और सामाजिक मान्यताओं को तार-तार करता रहा है. जहाँ पुरुषों का प्रवेश पूर्णत: वर्जित है बिना किसी अपवाद के. दुनिया की वह हर एक स्त्री जो पुरुषों द्वारा और इस पितृसत्ता द्वारा बनाई धारणाओं और उनके द्वारा थोपी गई वर्जनाओं की वजह से त्रस्त है वह स्त्री अपनी यौनिकता पर आरोपित बदनुमा दाग से, मानसिक गुलामी, झिझक, अनावश्यक रूप से सचेत रखने और एक अलग अनुशासन के बोझ तले दबी हुई है, जिसकी वजह से स्त्रियाँ स्वयं अपनी खूबसूरत देह का ध्यान नहीं कर पातीं, उसका उल्लास और आनंद नहीं मना पातीं, वे इसी तरह के स्थान से मुक्ति की शुरुआत कर सकती हैं. स्कारलेट औरतें मानती हैं कि स्त्री यौनिकतता प्रकृति की एक अनुपम देन है जो विशिष्ट रूप में स्त्रियों को ही मिला है. लेकिन इस समाज ने हमारे इस प्राकृतिक अधिकार पर बेड़ियाँ बाँध रखी हैं. मनुष्य होने के नाते यह सहज और प्राकृतिक है. हम ये नहीं कहती कि जीवन में सब कुछ सेक्स ही है. लेकिन जहाँ तक हमारी निजी पहचान और अस्मिता का सवाल है महिलाओं का कोई सशक्तिकरण अबतक नहीं हो पाया है और ना ही समाज में जेंडर समानता आई है. क्यूंकि इसे अबतक छुपाकर और दबाकर रखा गया है.



हैश टैग टॉक सेक्स से सोशल मीडिया पर वायरल इस अभियान का केंद्रीय विषय है कि स्त्री यौनिकता कोई गंदा रहस्य नहीं है जिसे गुप्त रखा जाए बल्कि यह हमारा भाग है जिससे हमारा वजूद जुड़ा है. इस अभियान का उद्देश्य है कि केवल बातचीत की ताक़त के माध्यम से औरतों की एकता बने और वे खुलकर अपनी उन भावनाओं को, चाहतों को उजागर कर सके जो वास्तव में उनके भीतर है और वैसा ही वो चाहती भी हैं पर समाज के बनाए नीति-नियमो और लोक-लाज के भय से अपनी यौनिकता का उत्सव मनाने और उसके आनंद से वंचित रह जाती हैं. स्कारलेट लेडिज यह समझती और मानती हैं कि दुनिया के हर हिस्से की महिलाएं अपनी  सेक्स जरूरतों, अपनी पसंद-नापसंद और अपने अनुभवों को साझा करें. सिर्फ बातचीत के माध्यम से उनके अन्दर एक आत्मविश्वास और मजबूती का भाव जगे और वे खुद को, अपने शरीर को, अपनी यौनिकता से प्रेम करना सीख सकें जिसका वे वास्तव में अंग हैं.

बलात्कार पीड़ित स्त्री से लेकर दाम्पत्य जीवन में सिर्फ सेक्स गुलामी भर करनेवाली औरतों और वे जो अपने को तथा अपनी बेटियों को मजबूत बनाना चाहती हैं और ऐसी लड़कियां जो अपने शरीर के खुबसूरत लोच को बरकरार रखना चाहती हैं उन सबके लिए यह अभियान है. इसकी सह संस्थापिका  जेनेट डेविस मानती हैं कि सेक्स पर बात करो “क्यूंकि यह मुझे पसंद है”… “क्यूंकि बलात्कार मेरा हुआ”…”क्यूंकि कुचली मैं गई”…..”क्यूंकि लैंगिक भेदभाव और शोषण की शिकार मै होती हूँ रोज़”—ये सब अनेक कारणों में कुछ हैं जिनकेलिए हमारा अभियान या विश्वास करता है कि सेक्स के बारे में बात करना ही महत्वपूर्ण है.
इस हैश टैग सेक्स टाक अभियान के साथ दो प्रसिद्द बौदियार फोटोग्राफर फैबी और कार्लो भी जुडी हैं जिनका मानना है कि स्त्री सशक्तिकरण में उनकी महती भूमिका हो सकती है क्यूंकि वह अपनी संवेदनशील फोटोग्राफी के जरिये वह उन महिलाओं की निजी, सुन्दर और सौम्य फोटो दिखाकर उनके भीतर आत्मविश्वास भर सकती हैं ताकि वे स्वयं से प्यार कर सकें और अपनी यौनिकता का सम्मान कर सकें और उनका आनंद ले सकें.


राजीव सुमन स्त्रीकाल के संपादन मंडल में है.
संपर्क:9650164016

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सीवर में मौत: सर्वोच्च न्यायालय की अवहेलना

रजनीतिलक

रविवार (20 अगस्त) को जब सारी दुनिया अपने घर में बैठ कर अपने बच्चों के साथ छुट्टी मनाती है तब लोक नायक जयप्रकाश नारायण अस्पताल के सीवर सफाई हेतु चार कर्मचारियों को सीवर में सफाई के लिए उतारा गया जिनको कोई सुरक्षा उपकरण उपलब्ध नहीं कराये गए. बहुत ही गैर जिम्मेदाराना कृत्य बार-बार दुहराया जा रहा है.पिछली बार 6 अगस्त को भी रविवार था जब लाजपतनगर में तीन लोगो को सीवर में उतारा गया था.


12 अगस्त को आनंद विहार में दो कबाड़ा चुनने वाले दो भाइयो को गटर में उतारा गया,जबकि सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के अनुसार किसी भी कर्मचारी को बिना सुरक्षा उपकरण के सीवर में नहीं उतारा जा सकता.दूसरा, विशेषतः रविवार जो किसी भी तरह से वर्किंग डे नहीं होता, प्राइवेट ठेकेदारों द्वारा इस तरह का अभ्यास सफाई कर्मचारियों के जीवन से न केवल खिलवाड़ है,बल्कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवमानना भी है.

जिन चार लोगों को अस्पताल के गेट न. दो, वार्ड न. 14 के सामने उतारा गया था, वे थे  ऋषिपाल उम्र 40 व, विशन पाल 30 वर्ष, किरण पाल- 25 वर्ष और सुमित 30 वर्ष के थे,अंदर जाते ही सफाईकर्मियों के साथ हमेशा के हादसे की तरह वे लोग जहरीली गैस की चपेट में आकर बेहोश हो गये.दिल्ली पुलिस एवं अग्नि शमन की मदद से उन्हें बाहर निकाल कर अस्पताल में दाखिल कराया गया. उनमें से इक ऋषिपाल को मृत घोषित कर दिया बाकी तीन का इलाज चल रहा है.  मौत के गटर में उतारने की या कोई पहली घटना नहीं है राजधानी  दिल्ली में इन घटनाओं की पुनरावृत्ति सरकारी असक्षमता और इन कर्मचारियों के प्रति गहरी असंवेदना प्रकट होती है.

12 अगस्त 2017 को आनंदविहार इलाके में शापिंग माल के सीवर की सफाई कर रहे तीन कर्मी जहरीली गैस के कारण बेहोश हो गये. तीनो को निकालने गये दमकल विभाग से सीवर में उतरे हवलदार महिपाल भी बेहोश हो गये.  सीवर में मौत कोई नयी घटना नहीं है. प्रभात खबर के अनुसार (9 अगस्त 2017 )एक सरकारी रिपोर्ट बताती है कि अब तक  22,327  सफाई कर्मी लोगो की मौत सीवर में दम घुटने से हुई  है. 14  जुलाई 2017  को दक्षिण दिल्ली के घिटरोली गावं में चार सफाईकर्मी जिनका नाम, स्वर्णसिंह, अनिल कुमार, दीपू, बलविंदर था की मृत्यु सैप्टिक टैंक सफाई में दम घुटने की वजह से हुई थी. अभी एक माह भी नहीं हुआ कि दूसरी घटना लाजपत नगर में 6 अगस्त 2017 की सुबह फिर से दुहरा दी गयी. सीवर, सैप्टिक टैंक सफाई का चार्ज दिल्ली जलबोर्ड के आधीन होता है, जिसकी जिम्मेदारी सम्बन्धित इन्जिनियर और जलबोर्ड अधिकारियों की होती है.



निजीकरण के दौर में आजकल अनुभवहीन सवर्ण ठेकेदारों के जिम्मे इस काम को सौप कर अधिकारी व इंजीनियर निश्चिन्त हो गये है. ज्ञातव्य है सन 2013  में सर्वोच्च न्यायालय ने मैनुअल स्क्वैन्जर एंड रिहैब्लटेशन एक्ट 2013  के  तहत किसी भी कर्मचारी को बिना किसी सुरक्षा कवच के सीवर में उतारना गैर क़ानूनी कर दिया था.  सीवर में मरने वालो के लिए सुप्रीम कोर्ट ने 10 लाख की राशि परिवार के लिए निश्चित भी की थी. लेकिन सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश की खुले आम अवहेलना और अवमानना जा रही है, यंहा तक कि सफाईकर्मी को धडल्ले से सीवर में उतार दिया जाता है जिसका परिणाम उनकी भयंकर मौत के रूप में आये दिन देखने को मिल रही है. हर घटना में सफाई कर्मी की मृत्यु के बाद दो दिन की सुर्खियों  पर बहस होती है उस बहस और उनकी मौत को नजरअंदाज करके फिर से सफाईकर्मी को कहीं पर भी बेधड़क सीवर में उतार दिया जाता है. ठेकेदारों और जलबोर्ड के अधिकारियो की संवेदनहीनता दृष्टिगत हो उठती है, उनका जातिवादी चेहरा भी उभर कर आता है.

लाजपतनगर में सीवर में उतरे तीनो युवक डेली वेजेज पर थे. उन्हें इस काम के बदले 300-350/ रूपये दीये जाते थे. एक कर्मचारी  मंथली सैलरी पर था, जिसकी तनख्वाह 8000/ थी लेकिन उसे 2000-5000/  रूपये तक ही मिलते थे. सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम वेतन भी इस अस्वच्छ कार्य हेतु नहीं दिया जाता. तीनो कर्मचारियों  की उम्र 20 -32 वर्ष थी. चौथा कर्मचारी राजेश, जो तीनो की खोज खबर लेने सीवर में उतरा था,  वह भी  उतर कर  कर बेहोश हो गया जिसे आम जनता एवं पुलिस ने अपनी मशक्कत से बाहर निकालाकर अस्पताल में दाखिल किया गया तत्पश्चात इलाज के बाद थोडा स्वस्थ हुआ.

चार सदस्यीय दल सफाई कर्मचारी आयोग के नेतृत्व में तीनो कर्मचारियों के घर पर उनके परिवारों से मुलाक़ात करने और मौके पर घटी घटना की जानकारी लेने पहुंचा. सबसे पहले हम लोग पूछ-पूछ कर कल्याणपुरी मन्नू के घर गये. छोटी-छोटी तंग गलियों से गुजरते हुए हमें एसा लगा की हम स्वयं किसी गटर से गुजर रहे है. इन गलियों से एक साथ तीन व्यक्ति एक साथ नहीं चल सकते. ऊपर की छतों से गलिया पटी हुई थी. गलियां पार करके हम एक पार्क में पहुंचे. पार्क तो नाम का था दरअसल वह एक खुली जगह थी, जिसके एक तरफ वाल्मीकि समाज रहता है. एक हजार परिवार का वाल्मीकि समाज इस दमघोटू माहौल  में रहने का अभ्यस्त दीखा.



ज्यादातर लोग सफाई के काम में लिप्त है यंहा करीब 200 महिलायें भी बाहर जा कर सफाई का काम करती है.  मोनू के घर के सामने भरी धुप में एक सस्ता सा सामियाना टंगा हुआ था. एक तरफ महिलाए बैठ कर रो रही थी, तो थोड़ी दूरी पर परिवार व समाज के कुछ पुरुष बैठ कर बीडी पी रहे थे. मोनू, पुत्र श्री फूल सिंह उम्र 22 वर्ष के दो बच्चे हैं-गोद में एक बेटी जो अभी केवल ढाई महीने की है और एक बेटा  जो डेढ़  साल का है. उसकी पत्नी प्रीति 20 वर्ष की हैं,  जिसने अभी जीवन के कोई सुख नहीं देखे हैं,  गोद में दो बच्चो को ले कर विधवा हो गयी. अन्नू बेरोजगार था अतः डेली वजेज पर इसी तरह के काम करने चले जाता था. बीबी बच्चो के साथ साथ बुजुर्ग माँ-बाप की जिम्मेवारी भी उसके सर पर थी. सरकार और ठेकेदारों की मिली भगत से इस परिवार का एक जिम्मेदार कमाने वाला नौजवान जवानी आने से पहले ही दुनिया से सिधार चुका है.


मोनू के घर की हालत जान कर दुखी मन से हम सीवर सफाई के दूसरे शिकार जोगिन्दर के घर खिचड़ीपुर की झुग्गियो में गये, जहां पहले से ही केंद्र सरकार के एक संसद सदस्य, अनुसूचित जाति आयोग के अध्यक्ष वंहा पहुंचे हुए थे. उनके वंहा जाने के बाद जोगिन्दर के बारे में पता चला कि उसकी उम्र 32 वर्ष थी और बेरोजगारी के आलम की वजह से उसने शादी ही नहीं की थी. खिचड़ीपुर में वाल्मीकि समाज की करीब 600 घर थे. यंहा भी ज्यादातर लोग सफाई के काम में लिप्त है. यंहा की 60 प्रतिशत महीलायें भी बाहर काम करने जाती रही हैं.
जोगिन्दर के घर से निकल कर हम लोग तीसरे केस दल्लू पूरा के दुर्गा पार्क में अन्नू के घर गये. यह एक मिक्स आबादी का घर था. कोन पर एक दूकान है. हमने उनके घर के बारे में पूछा तो गली में खड़े एक नौजवान ने इशारा करके हमें घर बताया, यह युवक दैनिक जागरण का फोटो ग्राफर था, सरकार की टीम का इन्जार कर रहा था. हमने घर पर दस्तक दी तो एक युवक बहर आया तो हमने बाते की किहम अन्नू के बारे में जाननेआये है. हम जैसे ही घर में प्रवेश कर रहे थे तो बीच में ही हमे खुला शिट देखा, हम उसे पार करके घर में बैठे तो पता चला कि अन्नू की उम्र 28 वर्ष थी उसकी पत्नी की उम्र 27 साल है. उनका  छ साल का बेटा भी है. अन्नू मासिक तनख्वाह पर था लेकिन उसे कभी पूरी तनख्वाह नहीं मिली- कभी  2000/, कभी 4000/, कभी 5000/ से ज्यादा उसे तनख्वाह नहीं मिली. उसकी पत्नी ने बताया कि घर खर्च चलने के लिए वो अपने मायके से वितीय मदद लगातार लेती रही है, यहाँ तक कि बिजली का बिल और बच्चे की ५००/ फीस अपनी माँ और भाई से लेती है.

रक्षाबंधन पर मिली भाई की लाश, बहने बाँध न सकी राखी

6 अगस्त की सुबह तीनो कर्मचारी घर से यह कह कर निकले कि कल रक्षाबंधन है बहनें घर आएंगी तो काम करके थोडा पैसा हाथ में आ जाएगा तो त्यौहार मना लेंगे. अनुसूचित जातियों में ज्यादातर उप-जातियां हिन्दू परम्परा और त्यौहार मनाने के अभ्यस्त हैं, क्योंकि वे खुद को हिन्दू ही मानते रहे है. तीनो कर्मचारी जब शाम तक घर नहीं लौटे तो यही समझा गया कि अपने दोस्तों के साथ मौज मस्ती कर रहे होंगे. रात के दस बजे पुलिस का फोन अन्नू की पत्नी रेखा को आया कि आपके पति बीमार हैं,  लाजपत नगर अस्पताल में, सुबह आ जाना. पता पूछने पर कोई जबाब नहीं दिया गया. सुबह 10 बजे दुबारा से किसी का फोन आया कि अस्पताल से बॉडी ले जाओ. दिनभर और रात भर पुलिस और जलबोर्ड ने यह सूचना  घरवालों से छुपा  कर रखी कि उनकी जीवन लीला 6 अग्स्त की दोपहर समाप्त हो चुकी थी. ये कैसी विडंबना है? 7 अगस्त जब बहनें राखी बाँधने भाइयों के घर आई तो उन्हें भाई की कलाई पर राखी नहीं कफन देखने को मिला. यह खबर क्यों छुपायी गयी? क्यों परिवार को अँधेरे में रक्खा गया? ऐसा सदमा परिवार को क्यों दिया?

सीवर में मौत शाहदत क्यों नहीं मानी जाती?


देश में तीन लोग महत्वपूर्ण है. सफाई कर्मचारी- किसान और बार्डर पर सैनिक. किसान अन्न उगा कर देश का पेट भरता है और सफाई कर्मचारी देश के भीतर खुद अस्वच्छ प्रक्रिया से गुजर कर देश को साफ सुथरा रखता है, नाली, सीवर, सैप्टिक टैंक, गटर मैनहोल साफ रखता है. बॉर्डर पर सैनिक को सम्मान जनक तनख्वाह, पेंशन, शहीद होने पर विधवा को कोटे से पैट्रोलपम्प आदि दिया जाता है ताकि उसका परिवार एक सम्मानजनक जिन्दगी जी सके और और उसके बच्चों का भविष्य उज्जवल हो सके. पिछले वर्ष बॉर्डर पर 60 जवान शहीद हुए जबकि उनकी तुलना में देश के भीतर 1471 सफाईकर्मी मौत के घाट उतर गये. यह दोगला व्यवहार क्यों? सफाई कर्मी को न यूनिफार्म है, न ईएसआई सुविधा, न नयूनतम वेतन, न सम्मानजनक व्यवहार, न ही मरने के बाद उनके बच्चो के भविष्य की सुरक्षा ? ऐसा क्यों? क्या हम आज के लोकतांत्रिक व्यवस्था में पुश्तैनी धंधो को क्या जातिगत पेशे में  सुरक्षित रखना चाहते है? क्या सफाई कर्मचारी इस देश का नागरिक नहीं? सफाई कर्मचारियों के लिए  सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गये आर्डर की अवहेलना क्यों की जा रही है ? आनदविहार, लाजपत नगर और घिटोरनी में हुई लोगो की मौत के बाद उनकी पत्नियां जो विधवा हो गयी हैं, गोद में छोटे-छोटे बच्चे जिन्हें अभी अपने पिता के होने न होने का अहसास भी नहीं है तमाम उम्र बिना पिता के रहना पड़ेगा, इन सबका जिम्मेवार कौन है? वर्तमान सरकार का दायित्व है कि इस पर अपनी पैनी नजर रख कर पीडितो को न्याय दिलाये और अपराधियों को सख्त से सख्त सजा दिलाये.

कुछ सवालों पर विचार किये जाने की सखत जरुरत है

 -गटर, सीवर, मैनहोल, सैप्टिक टैंक की सफाई अनिवार्य रूप से मशीनों से करवाई जाए.

– ठेकेदारी व्यवस्था समाप्त की जाए, सफाई कर्मियों की भर्ती स्थायी की जाए. सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लागु किया जाए. महिला कर्मचारियों  के लिए शौचालय, खाना खाने व बैठने की जगह की व्यवस्था की जाए. उनके बच्चो के लिए क्रेच व बच्चो  के लिए खेलने व पढने की व्यवस्था की जाए. महिलाओ को प्रसूति अवकाश वेतन सहित दिया जाए, एवं एबोरशन लीव भी मुहैय्या हो. रोजी जिदारो एवं अस्थायी कर्मचारियो  को न्यूनतम वेतन दिया जाए  चिकित्सा सुविधा, युनिफोर्म, जूते ,एवं कार्यस्थल पर उपयोगी वस्तुए उपलब्ध हों. जीपीएफ,लोन, एच.आर.ए एवं अन्य वितीय सुविधा अन्य सेवाओ की तरह सुगम की जाए  रिटायर्मेंट पर उनका पूरा पैसा दिया जाए और पेंशन भी नियमित रूप से दी जाए.

 रिपोर्ट : रजनी तिलक (लेखिका एक्टिविस्ट दलित स्त्रीवादी ) 
(जांच दल के सदस्य :- सफाई कर्मचारी आयोग के अध्यक्ष श्री संतलाल चावारियाजी
श्री राजपाल , अ.भा. मजदुर संघ . पवन परचा 
सन्दर्भ : प्रभात खबर , जनसत्ता, और भुक्तभोगी परिवारों से सीधी मुलाकात 



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सुधा अरोड़ा की कहानियाँ :स्त्री नारी अस्मिता की संघर्ष-गाथा



पूर्णिमा रानी
प्रस्तावना
“हे स्त्री ! तू स्वयं को पहचान, तू सिंहस्वरूपा है। तू शत्रु रूपी मृगों का मर्दन करने वाली है। स्वयं में सामर्थ्य उत्पन्न कर। हे नारी ! तू अविद्या आदि दोषों पर सिंहनी की तरह टूटने वाली है। दिव्य गुणों के प्रचारार्थ स्वयं को शुद्ध कर। हे नारी ! तू दुष्कर्म एवं दुर्व्यसनों का सिंहनी के समान विध्वंस करने वाली है। धार्मिक जनों के हितार्थ स्वयं को दिव्य गुणों से अलंकृत कर।”1

यजुर्वेद के पाँचवें सूक्त के दसवें मंत्र का उक्त उद्बोधन इस तथ्य की ओर संकेत करता है कि भारतीय संस्कृति में वैदिक युग से ही नारी महत्त्वपूर्ण भूमिका में थी। धार्मिक कर्मकाण्ड हो या शिक्षा का क्षेत्र, सामाजिक संस्कार हो या परम्परागत आयोजन, नारी को प्रत्येक क्षेत्र में विशिष्ट स्थान प्राप्त था। स्त्री के कर्तव्य एवं अधिकार पुरुषों के समकक्ष थे। सिन्धुघाटी सभ्यता से प्राप्त मातृदेवी की मूर्तियाँ, वैदिक मंत्र एवं पौराणिक आख्यान नारी के शक्तिशाली तथा दैवीय स्वरूप को व्याख्यायित करते हैं। पौराणिक पुरुष राम शत्रु पर विजय प्राप्त करने हेतु शक्ति का आह्वान करते हैं और शक्ति के सहयोग से ही शत्रु पर विजय प्राप्त कर पाते हैं.

स्त्री की इस प्रतिष्ठित सामाजिक स्थिति में परिवर्तन का संकेत पहले-पहल महाभारत काल में देखने में आता है जहाँ परम्पराओं व रूढ़ियों में उलझी द्रौपदी सहधर्मिणी नहीं वरन् व्यक्तिगत संपत्ति है जिसे निस्संकोच दाँव पर लगा दिया जाता है। मध्ययुगीन समाज में नारी की दशा अपेक्षाकृत अधिक शोचनीय हो गई। अब उसके हिस्से में अधिकार के नाम पर मात्र दासता थी और कर्तव्य के नाम पर पुरुष व परिवार की सेवा। उन्नीसवीं शताब्दी तक आते-आते नारी मानवी से उपभोग की वस्तु बन गई। अपनी शारीरिक दुर्बलता और पितृसत्तात्मक समाज की अहंवादी सोच के कारण नारी की जीवन-यात्रा सामाजिक बन्धनों, कठिनाइयों तथा शोषण के दौर से गुजरी।

स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् विभिन्न नारी-सुधारवादी आन्दोलनों के प्रयासों तथा शिक्षा के प्रचार-प्रसार के कारण समाज और विशेष रूप से नारी वर्ग की सोच में क्रान्तिकारी परिवर्तन आया। विरोधों के मकड़जाल से संघर्ष करती नारी अब ताल ठोककर नारी-अस्मिता के रक्षार्थ प्रयास करने लगी। यह प्रयास समस्त नारी-वर्ग के लिए एक जागरण गीत बन गया। चूँकि, साहित्य समाज सापेक्ष होता है, इसलिए बदलते परिवेश में वह नारी विषयक दशा में परिवर्तन की उपेक्षा नहीं कर सका तथा इस चुनौती का सामना करने के लिए तत्पर हो गया। नारी के उत्पीड़न तथा संघर्ष ने साहित्यकारों को उद्वेलित कर दिया। उन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से नारी की स्वाधीनता व पराधीनता से जुड़े रहस्यों पर से पर्दा हटाते हुए पुरुष-प्रधान समाज में नारी की वास्तविक स्थिति और उसमें नारी की भूमिका पर साफगोई के साथ अपने विचार प्रकट किए।

सातवें दशक की कथा लेखिका सुधा अरोड़ा ने स्त्री-जीवन के विविध पक्षों को बड़ी संवेदनशील दृष्टि से देखा, परखा और अत्यन्त सादगी के साथ अभिव्यक्त किया। “सुधा अरोड़ा की कहानियाँ स्त्री जीवन के किसी अनछुए कोमल पक्ष को अभिव्यक्त करती कर्णप्रिय लोकगीत-सी लगती है। …….. इन कहानियों में लेखिका ‘दर्दमंद’ स्त्रियों की दरदियाँ बनकर अगर एक हाथ से उनके घाव खोलती हैं तो दूसरे हाथ से उन्हें आत्मसाक्षात्कार के अस्त्र भी थमाती हैं जिससे ये स्त्रियाँ भावात्मक आघात और संत्रास से टूटती नहीं बल्कि मजबूत बनती हैं।”2

सुधा अरोड़ा ने समाज के वर्चस्ववादी केन्द्रों पर निशाना साधा। उन्होंने स्वयं के देखे व भोगे हुए यथार्थ को अपनी कहानियों में अभिव्यक्त किया मानो वह रचना नहीं वरन् आईना हो। अपने लेखन में सुधा अरोड़ा ने पारिवारिक, सामाजिक, आर्थिक, पारम्परिक व पितृसत्तात्मक व्यवस्था के मुद्दों एवं चुनौतियों को आधार बनाकर नारी-जीवन के प्रति चिन्ता प्रकट की और नारी-जीवन की विसंगतियों, आर्थिक स्वायत्तता, स्त्री-पुरुष अन्तःसम्बन्ध, परम्पराओं एवं आधुनिकता के द्वन्द्व को अपनी कहानियों के माध्यम से प्रस्तुत किया।

सुधा अरोड़ा के नारी-पात्र शिक्षित हैं, वे आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर भी हैं किन्तु कहीं-न-कहीं अपने ही निर्णयों के प्रति असमंजस की स्थिति में है। उनकी कहानी ‘महानगर की मैथिली’ की नायिका चित्रा एक ऐसी नारी है जो अर्थसंघर्ष व ममता के बीच जूझती रहती है। मैथिली की देख-रेख के लिए अच्छी आया न मिलने के कारण चित्रा बार-बार नौकरी छोड़ने का विचार करती है किन्तु “हर बार महानगर का अर्थशास्त्र उसे मात दे जाता था।”3 यद्यपि चित्रा को यह दोहरा व्यक्तित्व व्यथित कर रहा था फिर भी उसका आत्मबल उसे टूटने नहीं देता।


परम्परागत पुरुष-प्रधान समाज में नारी एक मूक पशु की तरह जीवन जी रही है। ‘नमक’ कहानी की नायिका सिया अपनी इच्छा को कह नहीं पाती। सिया शिक्षित है और स्कूल में नौकरी करना चाहती है किन्तु उच्च पदस्थ साहब अपनी पत्नी को घर की चौखट लाँघने नहीं देना चाहते। वे कहते हैं – “स्कूल में नौकरी ? ….. तुम्हारे नाम से कंपनी खोल दी मैंने। मेरा दोस्त उस कंपनी का सब कुछ देखेगा। तुम्हें सिर्फ मालिक की तरह चेक दस्तखत करने होंगे।”4

एक ओर पितृसत्तात्मक समाज अपनी अहंवादी सोच से नारी जीवन को प्रभावित कर रहा है तो दूसरी ओर नारी-शोषण की सक्रिय एजेंट के रूप में नारी ही नारी की शत्रु बन बैठी है। वंश चलाने की धारणा ने एक ऐसा चक्रव्यूह रच दिया है जिससे नारी की मानसिकता उबर ही नहीं पा रही है। सुधा अरोड़ा की कहानी ‘बड़ी हत्या, छोटी हत्या’ में सास को जब दाई ने लड़की होने की सूचना दी तो “सास ने चिलम सरकाई और बँधी मुठ्ठी से अँगूठे को नीचे झटके से फेंककर मुठ्ठी खोलकर हथेली से बुहारने का इशारा कर दिया – ‘दाब दे’। ………. जैसा बोला वैसा कर। बीस बरस पाल-पोस के आधा घर बाँध के देवेंगे, फिर भी सासरे वाले दाण-दहेज में सौ नुक्स निकालेंगे और आधा टिन मिट्टी का तेल डाल के फूँक आएँगे। उस मोठे जंजाल से तो यो छोटो गुनाह भलो।”5


 ऐसी मानसिकता से स्वयं नारी प्रभावित है। सुधा अरोड़ा की कहानी ‘तीसरी बेटी के नाम – ये ठण्डे, सूखे, बेजान शब्द’ में सुनयना के जन्म पर बूढ़ी बुआ ने जैसे ही चद्दर हटाई तो अपनी कुत्सित मानसिकता का परिचय देती हुई बोली – “हाय मेरे रब्बा ! इक होर कुड़ी? बनाण वाले दे घर मिट्टी थुड़ गई सी ?”6 किन्तु सुनयना की माँ इन दकियानूसी बातों को ख़ारिज करती हुई कहती है – “बुआ, ऐसे मत बोल ! यह मेरी बेटी भी है और बेटा भी ! बेटा होता तो भी इतनी ही तकलीफ देकर, इतना ही खून बहाकर पैदा होता।”7

सुधा अरोड़ा ने अपने चारों ओर के परिवेश को समझा और प्रत्येक वर्ग की नारी को अपनी कहानियों में स्थान दिया। चाहे उच्च वर्ग हो, मध्यम वर्ग या सामान्य से निचले स्तर का वर्ग, सुधा अरोड़ा ने प्रत्येक तबके की नारियों के प्रति होने वाली हिंसा तथा प्रतिक्रियास्वरूप होने वाले संघर्ष को पाठकों के सम्मुख रखा। उनके अनुसार हिंसा सभी वर्गों की औरतों के साथ होती है। उच्च वर्ग में मौन रहकर मानसिक प्रताड़ना दी जाती है तो मध्यम और निम्न वर्ग में शारीरिक रूप से औरत को प्रताड़ित किया जाता है। सामान्य तौर पर संभ्रांत पति मामूली-सी बात पर पत्नी के प्रति व्यंग्य बाणों की वर्षा करता है और उसके बाद चुप्पी साध लेता है। उसका यह मौन-व्रत पत्नी के दिल व दिमाग को विचलित करने के लिए काफी होता है। सुधा अरोड़ा की कहानी ‘काला शुक्रवार’ एक धनाढ्य वर्ग के पति-पत्नी की कहानी है जहाँ दोनों में कोई आपसी सामंजस्य नहीं है। पत्नी ड्राइवर मिराज के साथ बाजार जाती है और वहाँ नगर में हो रहे दंगों में फँस जाती है। ड्राइवर के बुद्धि-कौशल से वह सकुशल घर लौट आती है किन्तु जब दिन-भर की बैचेनी और तनाव को पति के समक्ष व्यक्त करना चाहती है तो पति कहता है कि “तुम्हें वहाँ जाने की जरूरत क्या थी …….. आगे से ये सब एडवेंचर्स मत करना।”8 धनाढ्य वर्ग के पुरुष का यह अहंकार औरत के अन्तर्मन को आहत कर देता है।

जहाँ शिक्षित वर्ग में पुरुष द्वारा मानसिक हिंसा के उदाहरण देखने को मिलते है वहीं निम्न स्तर पर जीवनयापन करने वाली नारी शारीरिक हिंसा की भयावह स्थिति से जूझ रही है। हिंसक पुरुष अपनी तमाम कुंठाओं का विरेचन अपनी पत्नी पर करता है। सुधा अरोड़ा की कहानी ‘ताराबाई चाल : कमरा नंबर एक सौ पैंतीस’ के पति-पत्नी के बीच सम्बन्धों में एक ओर क्रूरता है तो दूसरी ओर घृणा। “हमेशा की तरह उसके मरद ने सहवास के बाद आदतन बीड़ी सुलगाई थी और आखिरी कश खींच कर उसके बाएँ वक्ष पर जलती सलाई-सा चुभो दिया था।”9

सुधा अरोड़ा का यह उद्देश्य कदापि नहीं है कि वे अपनी कहानियों के नारी पात्रों को पीड़ित, अबला या बेचारी बनाकर प्रस्तुत करें। उनके नारी-पात्र पारम्परिक हैं और दोहरी भूमिका का निर्वहन करना जानते हैं किन्तु जहाँ पीड़ाओं का अतिरेक होता है वहाँ वे विद्रोही स्वरूप में सामने आते हैं। ‘भागमती पंडाइन का उपवास यानी करवाचौथ पर भरवां करेले’ कहानी में परम्परा का निर्वाह करती भागमती जीवनपर्यन्त अपनी जिम्मेदारियों से मुक्त नहीं हो पाती और अपने पति को परमेश्वर मानती है किन्तु जैसे ही पति-पत्नी के सम्बन्धों के मध्य सुमेधा का आगमन होता है और पांडेजी भागो से छल करते हैं तो भागमती उनकी हत्या कर देती है किन्तु उसे इसका कोई पछतावा नहीं है। वह जज साहब को कहती है – “बाकी ये बात बताओ ! सब कुछ बरदास करे का मेवा क्या मिला ? ये तो हमारे लिए ही सोच लिए – ना रही बाँस, न बजी बंसरी। आज नहीं तो कल, दूनों मिलकर हमरा काम तमाम कर देते। वो ही काम हमरे हाथ से हो गया तो कौन गुनाह हो गया ? बताओ साहेब …….. बताओ …….. बताओ ?”10

समाज का चाहे कोई भी वर्ग क्यों न हो ! छल हमेशा औरत के साथ होता ही है और इसका मुख्य कारण है प्रतिवाद की अनुपस्थिति। सुधा अरोड़ा अपने आलेख ‘सहनशील धारित्री का आत्मपीड़क आनन्द’ में कहती हैं – “एक औरत के संस्कार उसे सात फेरों की मर्यादा और गरिमा में इस कदर जकड़ लेते हैं कि वह बहुत-सा अनचाहा स्वीकार करती चलती है।प्रतिरोध वह तभी करती है, जब चीजें उसकी बर्दाश्त के बाहर चली जाती हैं।”11

सुधा अरोड़ा की कहानियों की नायिकाएँ जब अपनी अस्मिता की रक्षा के लिए संघर्ष करती हैं, परिवार और विवाह का विरोध करती हैं तो वे केवल पुरुष-वर्चस्व से ही विद्रोह नहीं करती बल्कि परम्परा से चली आ रही तमाम बासी रूढ़ियों से भी संघर्ष करती हैं। ‘स्वप्नजीवी’ कहानी की नायिका ‘मित्रा दी’ आधुनिक नारी का प्रतिनिधित्व करती है। वैवाहिक जीवन के संस्कारों के प्रति उसके मन में आक्रोश है। वह कहती है – “हिन्दुस्तानी लड़कियों के दिमाग ही मजबूत नहीं होते। हुंह एकनिष्ठ बनती हैं। पूछो भला! वह उधर विदेशी लड़की के साथ गुलछर्रे उड़ा रहा है और यह उसके नाम को रो रही है। जिसके साथ इतने महीने ‘टेंशन’ में काट दिए उसके प्रति भावुकता ?”12 नारी धैर्य व साहस की प्रतिमूर्ति है किन्तु उसकी यह सहिष्णुता धीरे-धीरे विद्रोह में बदल रही है। ‘सत्ता संवाद’ कहानी की नायिका घर की तमाम जिम्मेदारियाँ निभाती है किन्तु नाकारा पति की जेब से जब प्रेम-पत्र मिलता है तो वह स्पष्ट कह देती है – “इसे कह दो, आने को तैयार है तो मेरी ओर से कोई रुकावट नहीं। आए संभाले तुम दोनों को। मेरी जान छूटे।”13 आधुनिक नारी पति के प्रेम-प्रसंग का पता लगने पर मजबूर होकर अपमानित होने की बजाय छल-छद्म से युक्त रिश्तों से मुक्ति चाहती है। वह अब उस पारम्परिक पत्नी-बोध से मुक्त हो गई है जिसमें केवल पतिव्रता धर्म ही उसके जीवन का सार था।

सुधा अरोड़ा की कहानी ‘अविवाहित पृष्ठ’ की नायिका सुधा वैवाहिक जीवन के बजाय अकेलेपन का जीवन जीने की प्रबल इच्छा रखती है। वह कहती है – “मेरा मन कई बार होता है कि इसी तरह अकेले-अकेले, चौरंगी भीड़ भरी शाम में अकेले घूम लें।”14  नारी स्वातंत्र्य की प्रबल समर्थक ‘अविवाहित पृष्ठ’ कहानी की नायिका सुधा न केवल पारिवारिक बन्धन से मुक्त होना चाहती है अपितु वह तो अपनी भावनाओं को डायरी में लिखते समय शब्दों की भी स्वतन्त्रता चाहती है। उसका मानना है – “हमारी भाषा ऐसी हो जिसमें अभिव्यक्ति के लिए शब्दों का सहारा न ढूँढना पड़े, भाव स्वतः अंकित होते चले जाएँ।”15 परिवर्तित युग प्रवाह में नारी का स्वरूप भी बदला है। कल तक स्वयं को सीता बनाने में प्रयासरत नारी आज आदर्शवादी बनकर कष्ट सहन करने को कमजोरी मानती है। ‘स्त्री-शक्ति की भूमिका से उठते कई सवाल’ आलेख में स्वयं सुधा अरोड़ा कहती हैं – “जाहिर है स्त्री की भूमिका भी बदली है और स्वरूप भी। अब सीता बेवजह अग्नि-परीक्षा देने के लिए तैयार नहीं है, धोबी के लांछन से वह घर छोड़ने से इन्कार करती है। स्त्री मुखर हुई है, उसकी शक्ति ज्यादा धारदार हुई है।”16


निष्कर्ष
आधी दुनिया कही जाने वाली आबादी आज भी संघर्ष के रास्ते पर है । स्त्री के अधिकारों का अधिकांश हिस्सा अभी भी पुरुषों के अतिक्रमण की त्रासदी झेल रहा है । इन स्थितियों में सुधा अरोड़ा की कहानियाँ संजीवनी का काम करती हैं । त्रिभुवन राय के शब्दों में, “सुधा अरोड़ा की चर्चित कहानियाँ सवाल ही नहीं उठातीं, मौजूदा विद्रूप के खिलाफ कारगर मुठभेड़ भी करती दीखती हैं । प्राप्त स्थितियों के दंश के चलते इनकी स्त्रियाँ रोती-कलपती नहीं, इसके विपरीत उनका इस तरह से मुकाबला करती हैं कि पाठकीय चेतना आन्दोलित एवं क्षुब्ध हुए बिना नहीं रहती । इस तरह सुधा अरोड़ा का स्त्री विमर्श यथार्थ का विस्फोटक चित्र ही उपस्थित नहीं करता, भविष्य के पथ को संकेतित करने के कारण आश्वस्त भी करता है।”17
सन्दर्भ सूची 
01. यजुर्वेद, सूक्त क्रमांक : 5, मंत्र क्रमांक : 10.
02. अरोड़ा, सुधा, बुत जब बोलते हैं (कहानी संग्रह), आवरण पृष्ठ, लोकभारती प्रकाशन, नई दिल्ली.
03. अरोड़ा, सुधा, रहोगी तुम वही (कहानी संग्रह), पृ.क्र. 22, रेमाधव पब्लिकेशंस प्रा.लि., नोएडा.
04. अरोड़ा, सुधा, एक औरत : तीन बट्टा चार (कहानी संग्रह), पृ.क्र. 49, बोधि प्रकाशन, जयपुर.
05. अरोड़ा, सुधा, 21 श्रेष्ठ कहानियाँ (कहानी संग्रह), पृ.क्र. 184, डायमंड पॉकेट बुक्स, नई दिल्ली.
06. अरोड़ा, सुधा, एक औरत : तीन बट्टा चार (कहानी संग्रह), पृ.क्र. 51, बोधि प्रकाशन, जयपुर.
07. वही, पृ.क्र. 51.
08. अरोड़ा, सुधा, काला शुक्रवार (कहानी संग्रह), पृ.क्र. 27, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली.
09. अरोड़ा, सुधा, एक औरत की नोटबुक (कथा विमर्श), पृ.क्र. 43, मानव प्रकाशन, कोलकाता.
10. अरोड़ा, सुधा, भागमती पंडाइन का उपवास यानी करवाचौथ पर भरवां करेले, बुत जब बोलते हैं, पृ.क्र. 114,          लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद.
11. अरोड़ा, सुधा, एक औरत की नोटबुक (कथा विमर्श), पृ.क्र. 46, मानव प्रकाशन, कोलकाता.
12. अरोड़ा, सुधा, काँसे का गिलास (कहानी संग्रह), पृ.क्र. 120, आधार प्रकाशन, हरियाणा.
13. अरोड़ा, सुधा, एक औरत : तीन बट्टा चार (कहानी संग्रह), पृ.क्र. 35, सुधा अरोड़ा, बोधि प्रकाशन, जयपुर.
14. अरोड़ा, सुधा, बगैर तराशे हुए (कहानी संग्रह), पृ.क्र. 69, इकाई प्रकाशन, इलाहाबाद.
15. वही, पृ.क्र. 71
16. अरोड़ा, सुधा, स्त्रीर शक्ति की भूमिका से उठते कई सवाल (विमर्श), स्त्रीकाल पत्रिका.
17. राय, त्रिभुवन, पीड़ित के पक्ष की कहानी, अंक : मार्च-अप्रैल 2009, पृ.क्र. 11, पुस्तक-वार्ता,                                म.गां.अं.हिं.वि., वर्धा.

पी-एच॰ डी॰ शोधार्थी, हिन्दी विभाग, जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय, जोधपुर, राजस्थान
संपर्क: Email address: poornima.rani19@yahoo.in


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क्यों नाराज हैं किसान महिलायें लोकसभा अध्यक्ष से?

पिछले दिनों लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन ने कहा कि किसान महिलायें आत्महत्या नहीं करती हैं. उनके इस बयान को भ्रम फैलाने और किसान महिलाओं की दुःस्थिति पर पर्दा डालने की कवायद मानते हुए महाराष्ट्र के अमरावती जिले में तेजस्विनी  बारब्दे के नेतृत्व में किया गया प्रदर्शन.

ये लडकियां दे रही राष्ट्रवादी आतंकवादियों को चुनौती

देश हमारे आपका, ये नहीं किसी के बाप का /सरकार हमारी आपकी ये नहीं किसी के बाप की 
14 अगस्त,2017  को (NFIW) के एक कार्यक्रम में लडकियों ने कहा  ये दिल मांगे मोर पीएम जी, ये दिल मांगे मोर) लोग इस गाने पर झूम उठे.

कर्मानंद आर्य की कविताएँ

कर्मानन्द आर्य

कर्मानन्द आर्य मह्त्वपूर्ण युवा कवि हैं. बिहार केन्द्रीय विश्वविद्यालय में हिन्दी पढाते हैं. संपर्क : 8092330929



बलात्कारी कहाँ से आये थे द्रोपदी !

फँसी हुई
जैसे फड़फड़ाती है बंसी की मछली
वैसे फड़फड़ा रही है देह

मिट्टी होने का अर्थ
पानी होने का अर्थ
हवा होने का अर्थ
बदल रहा है धीरे धीरे

एक पति, दो पति, तीन पति
चार पति, पांच पति
क्या फर्क पड़ता है
कंचन काया के लिए

द्रोपदी चीखती है
मिट्टी होने के लिए
पानी होने के लिए
हवा होने के लिए

और देह छटपटाती है लगातार


लड़की

मैं खुद में ही जवान होती
एक भारतीय लड़की
जिसे सन्दर्भ की
शब्दार्थ की आशा नहीं

दोस्तों के संग-संग घूमना
बतियाना या छत पर जाना
सब पर ही हावी है
मेरा शारीरिक दोष

उपेक्षा अनदेखी के बीच खिली
मेरी अपनी ही जिन्दगी में
कितना अघुलनशील है
मेरा अपना ही अस्तित्व

बचपन को लेकर
नही है,
अतिरिक्त उच्छवास मेरे पास
न ही कोई स्पर्धा है
अपने ही छोटे भाई से
पर हाँ, मैं समझने लगी हूँ
मां की चिंतायें
इन दिनों माँ मुझे चुन्नी ओढ़ने को क्यों कहती है


देह

जिन्दगी का एहसास
अधूरेपन में खो गया
द्रष्टा और दृश्य
एकाकी हो गया

तुम्हारा शब्द
जिसको न मिल पायी पूर्णता
भावना की कोख
न उर्वर हो पायी
न बो पायी, शब्द बीज

प्यार पलता रहा
चलता रहा
अहर्निशं सेवामहे

तुमने जो पूछा था
यक्ष प्रश्न
देह का अर्पण क्या
प्रेम नही
मै सब जानता था,पर
तवायफ की देह!

शब्द वृत्त का आज भी
अपराधी हूँ

सीता स्वयंवर की तरह
मैंने शब्द चुना था
जिसे मेरे सिले होंठो ने
अचानक बुना था

शब्द दृश्य थे
हम द्रष्टा
था सत्य पर कड़वा

सच बोलो,
प्रिय बोलो
पर न बोलो
अप्रिय सच
जिसे
तब हमने जाना था
अब जी रहे हैं गीले अहसासों के साथ

चरित्रहीन

क्या तुम जानती हो/
चरित्रहीन होने का मतलब
शायद!
पर तुम्हारे सिवा/सब जानते हैं
अधूरे प्रेम की प्रस्तावना लिखना

तुम्हारे लिए 

धरती जो महकती है
लोबान की खुशबू से
घर जो कस्तूरी की गंध से भर आता है
वह कमरा जो महकता है
दुनिया के सबसे बेहतरीन इत्र से
चाहता हूँ तुम्हें देना
कई स्थाई सुख
जिसकी चाह में चिड़िया नाप आती है आसमान
पंडुको की टोली
एक दूसरे को लगा आती है गुलाल
एक दूसरे के पास जाकर पूछ आती है हाल चाल
देना चाहता हूँ तुम्हें वही चाँद

दुनिया की सबसे बेहतरीन किताबें
दर्शन और सौन्दर्यशास्त्र
जिन्होंने सिर्फ प्यार बांटा है
मैं तुम्हें ट्रेन देना चाहता हूँ
बहुत सारी खदाने, बहुत सारे उपनिवेश
तुम्हारी पसंदीदा मणिपुरी साड़ी
यानी की सारे भौतिक संसाधन
अपने सारे खेत जिसमें तुम्हारे नाम का पट्टा लिखा हो
महानगर विस्तार के इस चार बाई छः के कमरे में बैठा
सोचता हूँ
इतना सब पाकर तुम कितनी खुश होंगी !!!!!
जिन्दगी की संचित निधियां तुम्हें भी मिलनी चाहिए

मधुबनी पेन्टिंग्स

विदा होते वक्त/
उसने पूछा-
मुझे याद रखोगे हमेंशा ?
मैंने/ उसे विदा कर दिया/
और/भूल गया/ बचपन/
अपना भी / उसका भी

पहली बार वह ससुराल से लौटी/
तो साथ ले आयी/अपना घर/
घर के साथ आयी मधुबनी पेन्टिग्स्
फिर भाव को विस्तार मिला/
वह दीवार पर टांग दी गई/

दुनिया इन दिनों स्याह है

देह की गिरहें उठाऊं तो
फफोलों पर गवाही देता है मन
अकाल का सारस दुर्दिन में बढ़ा लेता है दुःख
दर्द रिसता है, लोहित होता है लहू
यहाँ मन की बात कौन सुने
कोई है भी तो नहीं
जिसे लगा सकूं आवाज
जिससे दिल के तार जोड़ सकूं
जिसपर चीख सकूं जी भर, फिर मांग लूँ मुआफ़ी
अकाल के दिन हैं

भूख भूत हुई जाती है
अकेलापन डसने लगता है
निराशा में भर आता है मन
कुंठा का ताल लबालब उतिराता है
पसीजती हैं मुट्ठियाँ
दूर दूर तक एक चिड़िया पर नहीं मारती
पंडुको की तरह जबान सिल
तरणताल में गोते लगाता है एक अजनबी मन
राततीन बजे तक किसी चाँद का इन्तजार
जो पिछले कई दिनों से
किसी पथिक की तरह भटक गया है जंगल में
करता हूँ इन्तजार
एक बड़ा पत्थर रख लिया है सीने पर
मन है कि गिरहें तोड़ता है
फफोलों से भरती जाती है रात
स्याह रात !!!!!!

तुम भी हो!
इन दिनों तुम्हें भी फुरसत कहाँ है


लिखो

कवि प्यार से मत छुओ
उस औरत को

मत निहारो उसकी जंघाओं में
उपजा हुआवनपाखी

उसे मत बताओ
अजन्ता कला का एक नमूना मात्र

स्त्री जो तुम्हारे पड़ोस में
जल उठी उस रोज
उसके बारे में भी लिखो

कविता ने स्त्री को पतनशील बनाया है
स्त्री देह से आगे की चीज है
लिखो………मैथ….साइंस……

तुम्हारी दो तस्वीरें 

मेरे पास तुम्हारी दो तस्वीरें हैं
हमेशा की तरह
एक थोड़ी खंडित है
थोड़ी नाराज सी
थोड़ी ढुलमुल
पलाश के फूल सी जो है दूसरी
ढीठ बहुत कोमल
ले लेती है जान
खुद को उन्हीं फोटुओं में चिपकाये हुए
मैं विचरता हूँ
एक देशांतर से दूसरे देशांतर
बिना यह परवाह किये हुए
तुमने आज रोटी खाई कि नहीं
तुम आज स्कूल गईं की नहीं
बाबू सच कह रहा हूँ
ये दो ही तस्वीरें हैं
इस धरती पर सबसे अकेली
सब से अलहदा
जोगनिया सी
जो बार बार आँखों में खुलती हैं
और घुल जाती हैं आँखों में
बार बार

तुम्हारे शहर से वापस आकर 

इस काली अँधेरी रात में
तुमसे नाभिनाल का जुड़ना
चरम तक पहुँचना
और वापस चले आना, जहाँ से शुरू किया था फिर वहीँ
फिर तुमसे जुड़ना, फिर वापस आना
ऊष्मा से भरी किसी बर्फीली गुफा में एक दो रोज
किसी थके हुए पथिक सा सुस्ताना
सोचता हूँ क्या यही है प्यार

देह के भीतर देह को महसूस करना
जीवन की एक लम्बी श्रृंखला का राही होना
मैंने ऐसे जी ली
भटकाव और अनंत में किसी योगी सा ध्यानस्थ
ढूंढ़ता हुआ तुम्हें
सोचता हूँ क्या यही है प्यार

रात का गहराना
जब और गहरा रही है रात
जब नाभिनाल विखंडित हो रहा है

मैं पुनः एक लम्बी यात्रा पर निकल पड़ा हूँ

सोचता हूँ तब
क्या यही है प्यार

उधार की कोख

आओ देवी! स्वागत !!
स्वागत !!
ममत्व भरी इस रात में
पहरेदारों के बीच
खेल रहे इस बच्चे कि तरफ से
तुम्हारा स्वागत!
स्वागत !!

तुमने उधार दी गर्भ की चाहत
ममत्व का सुख दिया बंध्या रात को
अपने हाथ से छुआ तुमने
कोमल, मांसल भ्रूण
रात ने महसूस किया
कोई टहलता है उसके भीतर
उससे बतियाता है
दिलाता है अहसास

गंधक सुलगती थी
तूतिया नीली हो जाती थी सांझ
गुबार भर आता था भीतर
कहते हैं जम आई थी
तुमने नोच फ़ेंक दिया
व्यंग्य की तीखी चर्बी

तुमने माँ बनाया है !
कोमल भाव भरे हैं
तुमने माँ होने का अहसास दिया है
स्तनों में उडेला है दूध
स्वागत ! स्वागत! स्वागत
स्वागत जननी !!

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प्रथम आधुनिक कविता ‘स्वप्न‘ में स्त्री चेतना

मीनाक्षी

‘‘19वीं सदी के भारतीय साहित्य और विशेष रूप से हिन्दी साहित्य में  स्वप्न के रचनात्मक उपयोग का उद्देश्य है नये युग की सम्भावनाओं की खोज करना और उसके साथ ही आत्म-सजग होकर सामाजिक रूप से जाग्रत होना। ऐसी रचनाओं में यथार्थ और स्वप्न का जो सम्बन्ध दिखाई देता है, उसमें पराधीनता के यथार्थ और स्वप्न की द्वन्द्वात्मकता व्यक्त हुई है। यथार्थ और स्वप्न की यही द्वन्द्वात्मकता महेश नारायण की कविता ‘स्वप्न‘ में मिलती है और गहरे तथा व्यापक अर्थ में पहली आधुनिक कविता बनाती है।”

प्रस्तुत पंक्तियाँ एक ऐसे रचनाकार और रचना के लिए है जो हिंदी साहित्य जगत में प्रमुख नाम नहीं है किंतु एक लंबे समय के संघर्ष के बाद इन्होंने हिन्दी साहित्य के इतिहास में स्थान न सही, पर हिन्दी साहित्य के विचारकों को सोचने पर विवश अवश्य कर दिया है। आज करीब-करीब हिन्दी साहित्य के सभी विचारकों ने इसके महत्व को स्वीकारना आरम्भ कर दिया है। इन विचारकों में कृष्णदेव प्रसाद गौड, उमाशंकर, महाकालेश्वर, अयोध्याप्रसाद खत्री, डाॅ. मैनेजर पाण्डेय, डाॅ. देवेन्द्र कुमार चैबे, डाॅ. रश्मि चौधरी, डाॅ. सुदीप्ति आदि प्रमुख हैं। ज़ाहिर है अब वह समय दूर नहीं जब हिन्दी साहित्य के इतिहास में महेशनारायण और उनकी कविता ‘स्वप्न‘ की गिनती की जा सकेगी।

हिन्दी साहित्य के इतिहास में आधुनिक काल का सूत्रपात उन्नीसवीं शती के मध्य से माना जाता है। आरंभिक अवस्था के इस दौर के नेतृत्व का श्रेय भारतेंदु हरिश्चंद्र को जाता है। सम्पूर्ण भारतेंदु युगीन परम्परा को दृष्टिपात करने पर यह स्वतः ही ज्ञात हो जाता है कि महेशनारायण ही वह अकेले व्यक्ति हैं जिन्होंने आधुनिक हिन्दी कविता की वास्तविक शक्ति और स्वरूप को पहचानने का प्रयास किया। साधारणतः किसी भी रचना के लिए यथार्थ का गहन बोध आवश्यक होता है। इसी के द्वारा कविता अपने तत्कालीन विमर्शों से जुड़ती हुई तत्कालीन विषमताओं, रूढ़ियों, मान्यताओं का विरोध करती है। यह कविता तत्कालीन विमर्शों से तो जुड़ी ही रहती है, साथ ही आधुनिक विमर्शों को भी आत्मसात कर चलती है। पिछले कई दशकों से नक्सलवाद, दलित चेतना, स्त्री मुक्ति, मजदूर आन्दोलन, किसान आन्दोलन आदि स्वाधीनता संबंधी आकांक्षा को लेकर जो जन-आन्दोलन हो रहे हैं। ‘स्वप्न‘ में उसी प्रकार की आकांक्षा से उत्प्रेरित आन्दोलन दिखलाई पड़ता है और जो मुक्ति पाने की जद्दोजहद में आधुनिक जन-आन्दोलन से जुड़ती है। इस संदर्भ में माओत्से-तुंग की पंक्तियाँ याद आ जाती है जिसमें उन्होंने कहा है-‘‘हर वह कला श्रेष्ठ है जो जन संघर्षों में तथा क्रान्ति में जनता का साथ देती है।‘‘


‘कला‘ कला होती है फिर वह किसी भी रूप में क्यों न हो? बशर्ते वह जन-आन्दोलित करे। ‘स्वप्न‘ कविता में जन संघर्ष, जन क्रांति या जन-आन्दोलित करने की वह क्षमता मौजूद है। यह कविता जितनी तत्कालीन संदर्भों से जुड़ती है उतनी ही समकालीन संदर्भों से जुड़ने का प्रयास करती है। आज जिस प्रगति से साहित्य में स्त्री विमर्श की खोज की जा रही है उस दृष्टि से यह कविता और महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि यह कविता वैयक्तिक चेतना को सचेत करती है, मानवीय अधिकारों के प्रति जाग्रत करती है विशेषकर स्त्री को। सुदीप्ति के शब्दों में-‘‘अगर इस बात की पड़ताल की जाए कि हिंदी कविता में आधुनिक स्त्री की उपस्थिति कब से हुई तो ‘स्वप्न‘ ही इसका उत्तर साबित होगा।‘‘

आधुनिक हिन्दी साहित्य के आरंभिक काल से महेशनारायण संबंद्ध है। इस बहुआयामी व्यक्तित्व वाले व्यक्ति की वाणी का प्रमुख स्वर सामाजिक, राजनैतिक और सांस्कृतिक जागरण है। इन्हीं विशेषताओं के कारण महेशनारायण भारतेंदु युगीन परम्परा में अग्रणीय दिखलाई पड़़ते हैं क्योंकि इन्होंने भारतेंदु की परम्परा का न केवल संरक्षण किया बल्कि अपनी निजी प्रतिभा के योग से खड़ी बोली में काव्य सृजन किया। खड़ी बोली आन्दोलन और मुक्त छंद परम्परा को सम्वर्द्धित किया तथा उसे नये आयाम प्रदान किये। उनकी यह कविता भारतेंदु-युग के कवियों के समक्ष कुछ न कुछ समानता के साथ-साथ कुछ विविधता भी लिए हुए है जो महेशनारायण को भारतेंदु युगीन कवियों से अलगाती है। महेशनारायण इस समस्या प्रधान कविता को सामाजिक और राष्ट्रीय कविता के रूप में नई दिशा देते हैं। महेशनारायण की ‘स्वप्न‘ कविता से कविता में एक नया मोड़ आया। आधुनिक कविता जिस लीक को लेकर चल रही थी उस लीक से विपरीत महेशनारायण एक नये मार्ग को, एक नए उद्देश्य के साथ प्रकट करते हैं। वे स्वयं नायिका से कहलवाते हैं-

‘चन्द्रलोक’ है देश मेरा
वो एक अमीर की कन्या हूँ कुमारी;
कुमारी नहीं, कुमारी, हाँ, कुमारी ही हूँ मैं।
सांस एक लेके-’ओह क्या कहूँ मैं,
समझो तुम्हें जो बूझे पड़े,
पर मैं एक विधवा हूँ कुमारी।

एक स्त्री द्वारा इस तरह का प्रतिरोध सामाजिक रूढ़ियों और परम्पराओं के खिलाफ केवल एक प्रगतिशील विचारक ही करा सकता है। यह बड़े दुर्भाग्य की बात है कि हिन्दी साहित्य के क्षेत्र में ऐसे व्यक्ति को प्रायः उपेक्षित दृष्टि से देखा गया। यह साहित्येत्हिासकारों की कमी कहे या समय एवं परिस्थितियों का प्रभाव कि महेशनारायण की कविता ‘स्वप्न’ हिन्दी साहित्य के किसी भी इतिहास में स्थान नहीं बना पाई। महेशनारायण की कविता ‘स्वप्न’ का अध्ययन करने पर ज्ञात होता है कि ‘स्वप्न’ सामाजिक, ऐतिहासिक, राजनैतिक, आर्थिक, साहित्यिक और सांस्कृतिक आदि सभी संदर्भों से एक महत्वपूर्ण कविता है। यह कविता समकालीन समय में प्रासंगिक तब हो जाती है जब इसमें स्त्री चेतना के बीज तत्व दिखलाई पड़ते है।



इस प्रथम आधुनिक कविता में स्त्री चेतना के बीजत्व का होना आधुनिक हिन्दी साहित्य के लिए साधारण बात नहीं है। यह कविता आधुनिकता की परिभाषिक शब्दावली पर खरी उतरती है। इस बात की पुष्टि डाॅ. मैनेजर पाण्डेय के इन शब्दों से होती है-‘‘सामान्य रूप से हिन्दी साहित्य में और विशेष रूप से हिन्दी कविता के सन्दर्भ में आधुनिकता की बात करते समय भाषा का प्रश्न सामने आता है। कविता के प्रसंग में खड़ी बोली में लिखी गयी कविता ही आधुनिक कविता मानी जाती है। भारतेन्दु युग से खड़ी बोली में हिन्दी कविता की शुरूआत होती है। लेकिन उस समय काव्य-भाषा के रूप में ब्रजभाषा ही अधिक प्रचलित थी। लम्बे समय तक इस बात पर विवाद होता रहा कि क्या ब्रजभाषा को छोड़कर खड़ी बोली में हिन्दी कविता लिखी जा सकती है। धीरे-धीरे यह विवाद समाप्त हुआ और खड़ी बोली हिन्दी गद्य के साथ कविता की भाषा के रूप में भी स्वीकृत हुई।…………हिन्दी में आधुनिक होने के लिए आचार्य शुक्ल के अनुसार अपने समय और समाज के प्रति सजगता आवश्यक है। भारतेन्दु युग की सबसे बड़ी सच्चाई यह थी कि देश उपनिवेशवाद का शिकार था, इसलिए उपनिवेशवाद की स्थिति, भारत की गुलामी और उससे स्वाधीन होने की चेतना आधुनिकता की अनिवार्य शर्त थी। उस समय जो कवि अपने समाज की सबसे बड़ी वास्तविकता अर्थात देश की पराधीनता और उसके विरोध में क्रियाशील स्वाधीनता की भावना के बारे में सजग नहीं होगा वह आधुनिक भी नहीं होगा।…………हिन्दी की पहली आधुनिक कविता वही होगी जो एक तो खड़ी बोली में लिखी हुई हो दूसरे भारत की पराधीनता की पहचान के साथ ही स्वाधीनता की चेतना की अभिव्यक्ति उसमें भी हो।‘‘

डाॅ. मैनेजर पाण्डेय आधुनिक कविता के लिए जिस आधुनिकता की खोज-बीन करते हैं उसमें भारत की पराधीनता का बोध और स्वाधीन चेतना की अभिव्यक्ति अनिवार्य पक्ष है। आधुनिक हिन्दी साहित्य और आधुनिक कविता के लिए आधुनिकता का अर्थ-पराधीनता का बोध और स्वाधीन चेतना के परिप्रेक्ष्य में होना चाहिए। वह चाहे राष्ट्र के प्रति हो या एक स्त्री के प्रति। ‘स्वप्न‘ कविता में इन दोनों के प्रति विशेष आग्रह है। इस अर्थ में यह कविता अधिक आधुनिक और प्रासंगिक हो जाती है।

भारतीय सामाजिक इतिहास में स्त्रियों का इतिहास जितना पुराना है उतना ही स्त्रियों का शोषण भी बहुत पुराना है। सृष्टि की रचना से लेकर आज तक उसका शोषण होता आया है। समस्त धर्मशास्त्र ऋग्वेद, गीता, रामचरितमानस, मनुस्मृति आदि सभी स्त्री को कमतर ही आँकते हैं। इन ग्रंथों के अनुसार स्त्री केवल भोग्या है चाहे वह किसी भी रूप में प्राप्त हो। इन ग्रंथों ने ही स्त्री को संयमित जीवन जीने के मजबूर किया गया है। स्त्रियों पर सदियों से हो रहे अत्याचारों के कारण आज स्थिति यह हो गयी है कि उसे एक अलग जाति के रूप में देखा जाने लगा है। यद्यपि आज समाज में स्त्री जागृति को लेकर नई चेतना का विकास हुआ है, लेकिन यह जाग्रति अनायास नहीं आई। इसकी पृष्ठभूमि सदियों से बन रही थी और समय समय पर इसने समाज को अपनी दस्तक से परिचित कराया है, वह भी एक तीखे स्वर में । गार्गी, मैत्रेयी, मीरा, महादेवी आदि उसका विस्फोटक रूप का ही तो परिणाम था। करोडों में विरल होकर उन्होंने अपनी जागरणवादी चेतना से इतिहास में अपना नाम दर्ज़ कराया और समाज से अपना परिचय कराया। महेशनारायण की कविता ‘स्वप्न‘ में भी स्त्री जाग्रति को लेकर नई चेतना का संचार हुआ है। महेशनारायण की सम्पूर्ण कविता ‘स्वप्न‘ स्त्री केन्द्रित कविता है। एक स्त्री का अपने समाज के विपरीत प्रतिगामी शक्तियों को चुनौती देना यह बतलाता है ‘स्वप्न‘ कालीन समाज में स्त्रियों की स्थिति अच्छी नहीं थी। वह प्रतिगामी शक्तियों के विरूद्ध खड़ी ही नहीं होती बल्कि उनका भरसक सामना भी करती है।

‘स्वप्न‘ कविता में स्त्रियों की स्थिति बड़ी विचारणीय थी। माता, पत्नी और पुत्री तीनों रूपों में उसका महत्व नाममात्र का था। माता और पत्नी की अपेक्षा पुत्री की स्थिति अधिक निम्न दर्जे की थी। उसे विमाता के स्नेह से तो वंचित रहना ही पड़ा साथ ही पिता के अपशब्दों और दण्ड को भी सहन करना पड़ा। बाल्यावस्था से लेकर वृद्धावस्था तक जिस परिधि में उसे ढाला गया उसी परिधि में सहर्ष ढल गयी। वह प्रत्येक अधिकारों एवं आकांक्षों से दूर आरम्भ से लेकर अंत तक किसी न किसी के अधीन रही है। पुत्री के रूप में न पिता की सम्पत्ति में कोई अधिकार था, न पति की सम्पत्ति में। केवल पति की मृत्यु के बाद ही पति की सम्पत्ति में अधिकार मिलता था। यह अधिकार किसलिए? क्योंकि उसके लिए परिवार में आश्रय पाना संभावनाओं से अति परे की बात थी। डाॅ. वीरभारत तलवार विधवाओं की स्थिति व्यक्त करते हुए कहते हैं कि-‘‘हिंदी नवजागरण का गढ़ विधवाओं का भी गढ़ था। सारे हिंदुस्तान से विधवाएँ काशी में आती थीं जो दशाश्वमेध घाट की सीढ़ियों से लेकर मुमुक्ष भवन जैसी बड़ी इमारतों तक में बसी हुई थीं। पर इनके लेखे बनारस में कोई विद्यासागर नहीं हुआ।”  जिस समाज के साहित्यकारों , समाजसुधारकों  और राष्ट्रीय नेताओं  के मूल में स्त्रियों के उद्धार का प्रश्न हो, न कि उसके अधिकारों का। उस समाज में विधवाओं के लिए कोई विद्यासागर हो भी कैसे सकता है?


उच्चवर्गीय परिवार हो या निम्नवर्गीय परिवार, स्त्री का प्रेम विवाह और विधवा विवाह वर्जित ही नहीं निंदनीय भी था। उसके लिए शिक्षण एक दुर्लभ वस्तु के समान थी। परिवार में उसकी स्थिति ऐसी थी कि पिता अपनी पुत्री को मारपीट भी सकता था। त्याग, सहनशीलता, समर्पण, कर्तव्य परायणता यही स्त्री जीवन की मयादाएँ थीं। इन्हीं के माध्यम उसे आँका जाता था और मर्यादाएँ तोड़ने पर दण्डित भी किया जाता था। विवाह के विषय में उसके अपने किसी प्रकार के अभिमत का प्रश्न ही नहीं उठता था। पिता की इच्छानुसार उसे विवाह करना पड़ता। ये वे परिस्थितियां थी जिनसे विवश होकर ‘स्वप्न’ की नायिका एक अलग इकाई के रूप में प्रकट होती है। ‘स्वप्न’ की निम्नलिखित पंक्तियाँ तत्कालीन समय और समाज में व्याप्त विद्रूपताओं की सूचक है साथ ही नायिका को एक अलग इकाई के रूप में व्यक्त करती है-

‘चन्द्रलोक’ है देश मेरा
वो एक अमीर की कन्या हूँ कुमारी;
कुमारी नहीं, कुमारी, हाँ, कुमारी ही हूँ मैं।‘
सांस एक लेके-’ओह क्या कहूँ मैं,
समझो तुम्हें जो बूझे पड़े,
पर मैं एक विधवा हूँ कुमारी। माता नहीं हमें हैं। जीते मेरे पिता है। जो आँखें खुली मेरी उस भूमि में, एक दूसरी माता शीघ्र आई पर मेरे लिए प्रीत न लाई। सच है मैं प्रीत के योग नहीं, आशा इसकी है यह भूल हमारी। यां तो लड़की कभी ऐसी नहीं होती होगी। प्रीत के योग वेमाता के यह होती होंगी।


महेशनारायण ने अपने युग से पूर्णतः परिचय पाया और समझा कि स्त्रियों की बड़ी दयनीय स्थिति है। इसीलिए महेशनारायण स्त्री स्वाधीनता के लिए चेतनावादी मार्ग को चुनते हैं। महेशनारायण स्त्री को समाज में स्थान दिलाने के उद्देश्य से सामाजिक प्राचीन रूढ़ियों से प्रतिरोध नहीं करते अपितु एक जुझारू व्यक्तित्व होने के कारण एक स्त्री द्वारा प्रतिरोध करवाते हैं। वे स्त्री सम्बन्धी सभी समस्याओं को आत्मसात कर उनसे स्वयं जूझते हैं तथा उसके निवारण हेतु उपाय भी खोजते हैं। स्त्री सामाजिक व्यवस्थाओं के नाम पर शोषित होती रहती है। वे सामाजिक व्यवस्थाएँ कौन सी हैं जो व्यवस्थाएँ स्त्री समाज की जड़ें ही नहीं हिला रही थी बल्कि स्त्री को जड़हीन भी बना रही थीं। महेशनारायण की यह कविता ‘स्वप्न‘ उसी जड़हीनता के कारकों को ज्ञात करने का प्रयास है। स्त्री का पूर्णत‘ हाशिए पर रखने वाले प्रमुख कारक भारतीय सामाजिक व्यवस्था में निहित है जिसका महेशनारायण ने ‘स्वप्न’ कविता में खुलकर विरोध किया है.

भारतीय सामाजिक व्यवस्था में सबसे प्राचीन पितृसत्तात्मक व्यवस्था और वर्णव्यवस्था है। यह दोनों व्यवस्थाएँ धर्म पर आधारित पालित-पोषित है। पुरुष द्वारा पत्नी, पुत्री और बहन की रक्षा करना उसे सुरक्षित रखना उसका परम् धर्म है। स्त्री पर अपना वर्चस्व रखना मानों पुरुष समाज का जन्मसिद्ध अधिकार हो। स्त्री पर यह नियंत्रण बहुत कड़ा होता है क्योंकि परिवार की मानर्यादा उसी पर टिकी होती है। यह कविता उसके सारे तथ्यों को उजागर करती है। यह व्यवस्थाएँ प्रत्येक धर्म में विद्यमान है। आरम्भ से ही यह स्त्री के विरोध में रही है जिसके फलस्वरूप यह स्त्रियों के लिए एक बड़ा खतरा बन गयी है। इसी खतरे से अवगत होकर महेशनारायण ‘स्वप्न’ कविता को हथियार बनाकर इस व्यवस्था पर प्रहार करते हैं। आज समाज में स्त्री का शोषण जो खुलेआम हो रहा है महेशनारायण ने उसे ‘स्वप्न’ कविता में जगह-जगह चिहिन्त किया है-

‘एक रोज पिता ने हमको देखा
उस प्यार के साथ वन में तनहा।
भूलूंगी नहीं उस दृष्टि को हर्गिज
छाई जिससे जीवन भर अन्धियारी।
प्यारा मेरा जिस घड़ी हुआ मुझसे जुदा
समझा कि कुमारी ही हुई मैं विधवा
कहते हुए बाप ने मुझे पकड़ा
‘तू बेहया है घर को जा।‘
और दाँतों प‘ दाँत मसमसा के बोले,
‘कुछ तू भी जहेज में अबे ले.

‘स्वप्न‘ कविता भारतीय स्त्री की प्रतीकात्मक कविता है। एक ही स्त्री में भारतीय स्त्री की सभी पीड़ा ;अर्थात् नायिका को ही भारतीय स्त्रियों का प्रतीक बनाकरद्ध व्यक्त की गई है। वह अपने अधिकारों को लेकर समाज व्यवस्था से प्रतिरोध करती है। जिस पितृसत्तात्मक व्यवस्था ने स्त्री को अधिकारहीन बना उसे प्रत्येक अधिकारों से वंचित कर दिया, ‘स्वप्न‘ कविता की नायिका उन अधिकारों के लिए लड़ती है। आज आवश्यकता स्त्री के भीतर चेतना जाग्रत करने की है ताकि वह मानवीय अधिकारों के प्रति सचेत हो सके। स्त्री को उसकी आन्तरिक शक्ति से परिचित कराने में ‘स्वप्न‘ कविता अहम् भूमिका निभाती है। ‘स्वप्न’ की नायिका का बार-बार शोषण और प्रताड़ना का शिकार होने के बावजूद विपरीत प्रतिगामी शक्तियों के विरूद्ध जाना उसके अटूट संघर्ष की कहानी व्यक्त करता है। एक उदाहारण दृष्टव्य है-
एक दिन बैठे यह ख्याल आया /ख्याल क्या आया एक जवाल आया /कि योगिन बन के विभूत रमा
और कहके मैं ‘हा‘ पितृगृहि से सिधारी /वां से निकली तो फिर गई वन /वही वन जो कि फिरता था मन-मन/      घूमने मैं लगी इधर वो उधर /कि एकाएक पड़ी नजर किस पर ? /ज्यों हि बिछुड़ी-सी थी, मिल जाके /नोच डाला पिता ने फिर आके /जोर से और घुमाके दे चक्कर / शून्य में फेंका यां गिरी आकर /‘हाय ! वह देश चन्द्रलोक मेरा  हाय ! प्यारा मेरा कहाँ है पड़ा। हाय ! जब वां से मैं निकाली गई। हाय ! तब बिजली मुझ प‘ क्यों न गिरी ?        ज्यों ही यह कलाम निकला था कि सन से /बिजली त्यों ही गिरी प‘ हम चौंक उठे, /कहानी मेरी, प्यारे पढ़नेवाले सब स्पप्न ही था, जो देखते थे।

 हालांकि पितृसत्तात्मक सामंती व्यवस्था में अधिकार पूर्ण स्वच्छंद रहना एक स्वप्न से अधिक कुछ नहीं है। ‘स्वप्न‘ की नायिका का ऐसे स्वप्न को साकार करने का प्रयास तत्कालीन समाज के लिए चुनौती है। चुनौती है स्त्री को नियंत्रित करने साधन ‘परिवार‘ और ‘विवाह‘ के लिए क्योंकि ये व्यवस्थाएँ व्यक्ति के बाह्य रूप पर प्रतिबंध लगा सकती है किंतु आंतरिक रूप से प्रतिबंध लगाना इनकी क्षमता के विरूद्ध है। कविता में नायिका अंतर्मन से अपने प्रेमी को अपना पति मान चुकी है। सामाजिक वर्जनाओं के चलते भी वह अंतर्मन से कभी अपने प्रेमी का त्याग नहीं कर पाती बल्कि वह वहीं से स्वयं को विधवा समझने लगती है-

‘एक रोज पिता ने हमको देखा/उस प्यार के साथ वन में तनहा। भूलूंगी नहीं उस दृष्टि को हर्गिज/छाई जिससे जीवन भर अन्धियारी।प्यारा मेरा जिस घड़ी हुआ मुझसे जुदा / समझा कि कुमारी ही हुई मैं विधवा

जब यह संस्था या व्यवस्था नायिका को आंतरिक रूप से कमजोर करने में असमर्थ होती है तब उसे बाह्य रूप से कमजोर करने का षड्यंत्र किया जाता है। और विवाह द्वारा उसकी स्वच्छंद प्रवृत्ति पर प्रतिबंध लगाया जाता है परन्तु नायिका पर आंतरिक प्रतिबंध लगाना किसी भी संस्था या व्यवस्था के लिए संभवता से परे की बात है। हो सकता है वह सामाजिक दबाव के कारण कत्र्तव्यबद्ध हो जिसकारण अपने पति की मृत्यु के बाद स्वयं को विधवा मान लेती है किन्तु वह अपने पति को मन से स्वीकार कर नहीं कर पाती है तभी वह स्वयं को विधवा तो कहती परन्तु कुमारी विधवा। इसका परिचय वह अपनी कहानी व्यक्त करते हुए कविता के अंतिम पृष्ठों पर देती हुई कहती हैं कि-
‘हाय! शादी हुई थी/ बेहोश जब मैं थी /मैं सोलह बरस की /वह अस्सी बरस के / देख इनको मैं रोती, /देख हमको वह हँसते। क्या करो मुझे प्यार करो, माता ने बनाया है तुमको हमारी /मैं ही अमीर मर जाऊँगा जब, तब दौलत होगी हमारी तुम्हारी / मर ही गये वह विचारे, उसी दिन हो गई मैं विधवा; पर कुमारी /माता मेरी संतुष्ट हुई और घर लाई वह दौलत सारी,

एक स्त्री का अविवाहित होकर स्वयं को विधवा कहना और फिर उसी का विवाह उपरांत स्वयं को कुमारी विधवा कहना प्रतिरोधात्मक प्रवृत्ति का सूचक है। महेशनारायण स्त्री पीड़ा को भली-भाँति समझते हुए किस स्तर तक प्रत्येक स्त्री के लिए प्रतिरोधात्मक प्रवृत्ति को आवश्यक मानते हैं यह इस कविता के माध्यम से समझा जा सकता है। वे धर्म की आड़ में हो रहे स्त्री शोषण को चुपचाप नहीं देखते बल्कि ‘स्वप्न’ कविता की नायिका के माध्यम से प्रतिरोध करवाते हैं। वह यह सोचने पर विवश करते हैं. कि स्त्री जड़ता का कारण क्या है? एक तरह से यह कविता स्त्रियों में आत्म-चेतना उत्पन्न करती है। इस कविता में सामाजिक मान-मर्यादाओं, रूढ़ियों, मान्यताओं के प्रति तीव्र आक्रोश का भाव है। क्योंकि ये मान्यताएं स्त्री स्वाधीनता के लिए सबसे बड़ा खतरा है। अनादि काल से स्त्री उपेक्षिता को चरितार्थ करने वाली उक्तियाँ प्रयुक्त की जाती रही है ये उक्तियाँ स्त्री शोषण और पराधीनता की गाथा गाती रहती हैं और उसकी स्वाधीनता की दुहाई देती रहती हैं। यह हमारे समाज की संकीर्ण मानसिकता का फल है कि आज तक स्त्री को स्वतंत्र प्राणी का अधिकार नहीं मिल पाया। राजेन्द्र यादव लिखते हैं ‘‘हमने स्त्री को हमेशा पुरूष के संदर्भ में ही देखा है, न कि स्वतंत्र प्राणी के रूप में। उसका सारा जीवन उसका अपना नहीं होता, किसी न किसी पुरूष के साथ जुड़कर ही उसका अस्तित्व बनता है। यहाँ तक कि उसका नाम भी नहीं होता। वह किसी की बहन है, तो किसी की बेटी, किसी पत्नी है, तो किसी की प्रेयसी। अब ऐसे में यदि स्वतंत्र स्त्री की अवधारणा पर बात की जाए तो वह एक बिल्कुल नई चीज है।’

स्वतंत्र स्त्री की अवधारणा नई हो सकती है लेकिन स्त्री स्वाधीनता संघर्ष का इतिहास बहुत पुराना है। भारतीय समाज में स्त्री गुलामी का इतिहास जितना पुराना है, उस गुलामी से मुक्ति के लिए स्त्री के संघर्ष का इतिहास भी उतना ही पुराना है, इस इतिहास की एक झलक ‘‘विमेन राइटिंग इण्डिया’ (1991)नामक पुस्तक में मिलती है जिसमें ईसा पूर्व 600 से वर्तमान काल तक के स्त्री-लेखन के नमूनों का संकलन है और साथ में लगभग ढाई हजार वर्षों के इतिहास में फैले लेखन के विभिन्न रूपों में व्यक्त पराधीनता का बोध और स्वाधीनता की कामना का विवेचन भी है।’’  स्त्री स्वाधीनता क्या है? यह प्रश्न प्रत्येक साहित्यकार के लिए विचारणीय बना हुआ है। सभी ने इसे अपने-अपने अर्थो में ग्रहण किया है। किसी ने इसे आर्थिक स्वावलम्बन से जोड़ा, किसी ने शरीर मुक्ति से, कोई स्त्री स्वाधीनता को शोषण विहीन समाज से जोड़ता है, कोई मानवीय अधिकार और कोई परम्पराओं से मुक्ति। किन्तु ये धरणाएँ तब तक निरर्थक हैं जब तक कोई स्त्री स्वयं अपने निर्णय लेने में सक्षम नहीं हो जाती। राजेन्द्र यादव ‘स्त्रीकाल’ में लिखते हैं ‘‘स्वतंत्र स्त्री वही है जो अपनी बुद्धि का इस्तेमाल करें, अपनी शक्ति का अर्जन करें।’’
भक्तिकाल में मीरा अपने निर्णय लेने में पूर्णतः सक्षम थी। वह अपने निर्णयों द्वारा सम्पूर्ण सामंतवादी व्यवस्था को अपना विरोधी बना लेती है और छायावाद में महादेवी का सम्पूर्ण जीवन स्त्री स्वाधीनता के लिए संघर्षरत था। चन्द्रा सहाय के शब्दों में-‘‘भारतीय समाज में स्त्री की स्वाधीनता के लिए जो चिंता और बैचेनी आज है वह महादेवी वर्मा के लेखों में 30 के दशक में व्यक्त हुई थी।’’  लेकिन हिंदी साहित्यकार भक्तिकाल और छायावाद की कड़ी को क्यों भूल जाते हैं जिसमें स्वाधीनता आन्दोलन और नवजागरण के मूल में स्त्री स्वाधीनता की चिंता भी बखूबी दिखाई पड़ती है। हिंदी साहित्य में मीरा की स्वाधीनता अथवा मुक्ति का प्रयास प्रथम चरण और भारतेन्दु युग में ‘स्वप्न’ कविता में नायिका द्वारा मुक्ति की आंकाक्षा को द्वितीय चरण माना जा सकता है क्योंकि महादेवी ने एक स्त्री की जिन समस्याओं का विवेचन किया है लगभग वैसी ही समस्याएँ ‘स्वप्न’ कविता में स्त्री जीवन को विचलित करती है। यह कविता काल की दृष्टि से 1881 की कविता है। इस काल में स्त्रियों को लेकर बहुत कुरीतियाँ व्याप्त थीं जिन्हें लेकर भारतीय समाज सुधारकों ने स्त्री सुधारों के लिए विभिन्न आन्दोलन चलाए हुए थे.


‘स्वप्न’ की नायिका भी ‘स्त्री स्वाधीनता की लड़ाई के लिए सामाजिक प्राचीन रूढ़ियों, कुरीतियों से अपना संघर्ष आरंभ करती है जैसे-अनमेल विवाह, सती प्रथा, प्रेम विवाह, विधवा समस्या, आर्थिक स्वावलम्बन आदि। यद्यपि सभी प्रथाएँ स्त्री जाति के लिए एक अभिशाप थी लेकिन सती प्रथा समाज की बड़ी ही क्रूर और निर्मम प्रथा थी, जिसमें किसी स्त्री के पति की मृत्यु पर उसे ;स्त्री कोद्ध जिन्दा अग्नि में भस्म कर दिया जाता था। ऐसे समय में राजा राममोहन राय आगे आए और सती प्रथा का पुरजोर विरोध किया जिसके फलस्वरूप 1829 में सती प्रथा को समाप्त करने का कानून पास किया गया। किन्तु कानून पास होना और कानून लागू होना दोनों अलग-अलग बातें है। देश में कानून पास होने के बावजूद भी सती प्रथा जैसी क्रूर  कुरीति छिट-पुट घटनाओं के रूप में मिलती रही है।  कहना न होगा कि उस स्थिति में ‘स्वप्न’ की नायिका अपने अधिकारों को पहचानते हुए सती नहीं होती। वह स्त्री अधिकारों और स्वाधीनता की भली-भाँति समझ रखती है। स्त्रियों को विधवा होने पर जो संयमित जीवन व्यतीत करना पड़ता है उससे उसका कोई सरोकार नहीं है। वह समस्त नियमों को तोड़ते हुए प्राचीन रूढ़ियों, परम्पराओं अथवा कुरीतियों का बहिष्कार कर; स्त्रियों में नवीन चेतना का संचार अथवा स्त्री मुक्ति की ओर अग्रसर हेतु प्रेरक शक्ति बनती है।

प्रेम व्यक्ति की निजी अनुभूति है। सामाजिक प्रतिबंधनों के कारण यह अनुभूति भारतेन्दु युग में विकसित नहीं हो पाई। साहित्य में इस अनुभूति का आरम्भ छायावाद से माना गया। भारतेन्दु युग और द्विवेदी युग में यह अनुभूति नगण्य है। नामवर सिंह इसका कारण देते हुए कहते हैं ‘‘द्विवेदी-युग में सुधारवादी नैतिकता का इतना आतंक था कि प्रेम की कविता लिखते हुए कवि-जन संकोच करते थे, क्योंकि उन्हें रीतिकालीन कहे जाने का डर था।’’  लेकिन महेशनारायण ने समस्त खतरों पर ध्यान न देते हुए उन सभी तथ्यों को उजागर किया जिनसे अक्सर भारतेन्दु और द्विवेदी युगीन कवियों ने बचना श्रेयस्कर समझा। यद्यपि श्रीधर पाठक और प्रसाद ने इस प्रेम अनुभूति का आभास अपनी रचनाओं के माध्यम से कराया लेकिन श्रीधर पाठक को स्वच्छंदतावाद का प्रवर्तक या छायावाद को स्त्री और पुरूष के वैयक्तिक प्रेम का उदय मानना तर्कसंगत प्रतीत नहीं होता क्योंकि श्रीधर पाठक की ‘एकांतवासी योगी’ और प्रसाद की ‘प्रेम पथिक’ जैसी रचनाओं से भी पहले महेशनारायण ने नवीन काव्य स्वरूप का पुनर्विधान सामंजस्य के रूप में और प्राकृतिक आधार पर किया और वैयक्तिक प्रेम को भी स्थान दिया। एक ऐसे समय एवं समाज में जहाँ प्रेम के नाम को हीन दृष्टि से देखा जाता था, स्त्री और पुरूष के आपसी प्रेम की बात तो दूर की बात थी।

‘स्वप्न’ कविता की प्रेमपद्धति के विषय में महाकालेश्वर कहते हैं ‘‘स्वप्न’ रोमाण्टिक या स्वच्छन्दतावादी पद्धति की प्रेम कथा है। केवल कथानक के विचार से भी यह हिन्दी में अपने ढंग की रचना है। इस पद्धति का विकास आगे चलकर श्रीधर पाठक की ‘एकांतवासी योगी’ और प्रसाद की ‘प्रेम पथिक’- जैसी रचनाओं में हुआ है। आचार्य शुक्ल जिसे छायावाद के पूर्व का स्वाभाविक स्वच्छन्दतावाद कहते हैं।’’  महेशनारायण की कविता ‘स्वप्न’ की नायिका समाज की प्राचीन रूढ़ियों, मान्यताओं, परम्पराओं को न मानते हुए प्रेम मार्ग को अख्तियार करती है। पे्रम मार्ग का चुनाव नायिका की आकांक्षाओं को नये सोपान प्रदान करने का सा्रेत है। वह उन्मुक्त रूप से प्रेमी के साथ वनों में विहार करती हुई वह कहती भी है-
उस दिन से हुई गले का उसका मैं हार,
और खूब ही मैं उसको करती थी प्यार।
मिलती थी मैं रोज उससे जा एक वन में
फिरती थी मैं साथ उसके उस कानन में।
थे बीतते दिन इसी तरह से
वह प्यार के दिन अहा। इसी तरह से।
दुनिया से हमें नहीं था कुछ सरोकार,
हम उसके, हमारा था वह संसार।
बेलों के वह झूड़ों में देखाके छिपना
मुख-चुम्बन बाद फिर वन से निकलना
नयनों की चमक को देखकर उसकी जीती मैं थी।
आगोश में उसके जाके फिर भी जीती मैं थी।
वह था हमसे खुश
हम थे उससे प्रसन्न
दिल थे मेरे खुश
मन थे मेरे प्रसन्न।’‘

छायावाद में प्रकृति को विशेष महत्व दिया है। वास्तविक अर्थों में प्रकृति ही वह तत्व है जो मनुष्य को उन्मुक्त स्वच्छंदता का आभास कराती है। नामवर सिंह कवि की प्रकृति विशेष रूचि का कारण मानते हुए लिखते हैं ‘‘पुरानी समाज-व्यवस्था के घुटते हुए वातावरण की अपेक्षा आधुनिक युवक को प्रकृति के बीच खुला वातावरण मिला; प्रकृति के राज्य में उसे पशु, पक्षियों, नदी, नालों, हवा-बादल सब में उन्मुक्त और निरंकुश स्वच्छंदता के दर्शन हुए। इसी स्वाधीनता की टोह में आधुनिक कवि प्रकृति के क्षेत्र में आया। पुरानी समाज-व्यवस्था में उसकी वैयक्तिकता खो गई थी।’’

 ‘स्वप्न‘ कविता में स्त्री का बार-बार वन में भटकना अपनी सामाजिक व्यवस्था के प्रति उदासीनता को दर्शाता है। वह उन्हें तोड़कर ऐसे वातावरण में जाने के लिए उत्सुक रहती है, जहाँ उस पर किसी प्रकार का बंधन न हो। वह पूर्ण रूप से स्वाधीन हो। यह अनुभव सिर्फ नायिका को वन में जाकर ही होता है। नामवर सिंह भी कहते हैं ‘‘आधुनिक व्यक्ति का प्रकृति की ओर दौड़ना व्यक्तिगत स्वच्छंदता की आकांक्षा के लिए तो था ही, व्यक्तिगत स्वाधीनता का परिणाम भी था। यदि यह नूतन प्रकृति-परिचय इस स्वाधीनता का परिणाम था, तो छायावाद युग से पूर्व द्विवेदी युग और द्विवेदी युग से पूर्व भारतेन्दु युग तथा उससे भी पूर्व के पाँच-छः सौ वर्षों के सम्पूर्ण मध्ययुग में ऐसा-प्रकृति प्रेम संभव क्यों नहीं हो सका? प्रकृति तो पहले से ही मौजूद थी और वह लगभग इसी रूप में, बल्कि आधुनिक रूप से अधिक वन्य रूप में।’’  महेशनारायण ने इस वैयक्तिक स्वतंत्रता को बखूबी पहचाना, वह भी एक स्त्री स्वाधीनता के परिप्रेक्ष्य में। इसलिए ‘स्वप्न’ की नायिका व्यक्तिगत स्वछंदता के लिए अवसर तलाशती है और उन अवसरों का समय-समय पर लाभ भी उठाती है। नायिका जब युवक से प्रेम करती है तो वन में ही विहार करती हैं लेकिन पिता को यह ज्ञात होने पर जबरन उसका विवाह एक वृद्ध पुरूष से कर दिया जाता है और वह शादी के कुछेक दिनों बाद विधवा हो जाती है। वह एक बार फिर समाज की वर्जनाओं से उद्वेलित हो वनों में ही आसरा पाती है क्योंकि वन समाज की समस्त वर्जनाओं से मुक्त हैं।
छायावाद में वैयक्तिकता की पहचान प्रकृति के बीच होती है लेकिन भारतेन्दु युगीन कविता में यह अनुभूति भले न हो पाती हो पर भारतेन्दु युग में रहकर महेशनारायण ने इस अनुभूति को पहचाना। ‘स्वप्न‘ कविता में स्त्री द्वारा वैयक्तिकता की पहचान उनका प्रयोग उनकी नवीन दृष्टि और प्रयोगधर्मिता की परिचायक है। एक स्त्री का बार-बार वन में जाना, स्त्री की अव्यक्त भावनाओं को व्यक्त करना नहीं तो क्या है? स्त्री स्वाधीनता की प्रबल आकांक्षा नहीं तो क्या है? नामवर सिंह ने जिस छायावाद में प्रकृति प्रेम को द्विवेदी-युगीन आर्यसमाजी नैतिकता की प्रतिक्रिया का पहला सोपान और नारी-प्रेम की पृष्ठभूमि बताया है, वही भारतेंदु युगीन कविता ‘स्वप्न‘ में प्रकृति प्रेम समस्त नैतिकता की प्रतिक्रिया का प्रतिफलन है। इस कविता में स्त्री-प्रेम की अलग अवधारणा है। यह प्रेम भोग-विलास से कहीं ऊपर उठकर स्त्री-पुरुष के पारस्परिक संबंधों को नवीन अर्थों में परिभाषित करने का प्रयास करता है। यह प्रेम किसी प्रकार से स्त्री आधिपत्य पर आश्रित न होकर आधिपत्य लैस स्त्री अधिकारों का पक्षपाती है। अंततः महेशनारायण की प्रथम आधुनिक कविता ‘स्वप्न‘ एक महत्वपूर्ण कविता है। इसे नकारा जाना इसकी महत्ता पर प्रश्न चिन्ह लगाना है।

    संदर्भ सूची
1.डाॅ. मैनेजर पांडेय, आलोचना की सामाजिकता, वाणी प्रकाशन, प्र. संस्करण 2006, पृ. सं. 230
    2.माओत्से-तुंग, कला, साहित्य और संस्कृति, वाणी प्रकाशन, संस्करण 1994, पृ.द्ध
    3.सम्पादकः नामवर सिंह ,समकालीन भारतीय साहित्य, नवम्बर-दिसंबर 2007, पृ. 24
    4.महेशनारायण, स्वप्नः संपादक प्रो. महाकालेश्वर, अरण्यानी रांची, वर्ष 1984, पृ. 21
   5. डाॅ. मैनेजर पांडेय, आलोचना की सामाजिकता, वाणी प्रकाशन, प्र. संस्करण 2006, पृ. सं. 227-230
   6.वीरभारत तलवार, रस्साकशीः 19वीं सदी का नवजागरण और पश्चिमोत्तर प्रांत, सारांश प्रकाशन, दिल्ली,        संस्करण 2012, पृ. 187
   7.  वीरभारत तलवार, रस्साकशीः 19वीं सदी का नवजागरण और पश्चिमोत्तर प्रांत, सारांश प्रकाशन, दिल्ली,          संस्करण 2012, पृ. 197
   8.‘‘हिन्दी नवजागरण के लेखकों के सामने स्त्रियों की समस्याएँ नहीं थीं। उनके लिए खुद स्त्री ही एक                    समस्या थी जिस पर हर हाल  में काबू पाना था।‘‘
  9. वीर भारत, राष्ट्रीय नवजागरण और साहित्य; कुछ प्रसंगः कुछ प्रवृत्तियाँ, हिमाचल पुस्तक भण्डार,                दिल्ली, प्र सं. 1993, पृ. 125
  10.‘‘19वीं सदी के पुरुष सुधारकों का स्त्री-आन्दोलन कभी भी कस्बों या छोटे शहरों तक नहीं फैला, वह सिर्फ          कुछ बड़े शहरों तक सीमित रहा।‘‘
  11.वीर भारत, राष्ट्रीय नवजागरण और साहित्य; कुछ प्रसंगः कुछ प्रवृत्तियाँ, हिमाचल पुस्तक भण्डार,                 दिल्ली, प्र सं. 1993, पृ. 135
  12.‘‘गांधी तथा अन्य राष्ट्रीय नेता बाल विवाह के दुबारा पक्ष में तो थे, पर युवती विधवा विवाह के विरोधी             थे।‘‘
    13.महेशनारायण, स्वप्नः संपादक प्रो. महाकालेश्वर, अरण्यानी रांची, वर्ष 1984, पृ. 21-22
   14. महेशनारायण, स्वप्नः संपादक प्रो. महाकालेश्वर, अरण्यानी रांची, वर्ष 1984, पृ. 25
   15. महेशनारायण, स्वप्नः संपादक प्रो. महाकालेश्वर, अरण्यानी रांची, वर्ष 1984, पृ. 27-28
   16.महेशनारायण, स्वप्नः संपादक प्रो. महाकालेश्वर, अरण्यानी रांची, वर्ष 1984, पृ. 25
   17. महेशनारायण, स्वप्नः संपादक प्रो. महाकालेश्वर, अरण्यानी रांची, वर्ष 1984, पृ. 26-27
  18.राजेन्द्र यादव, ‘बाजार स्त्री की छवि गढ़ता है‘, स्त्रीकाल, संपादक संजीव-चंदन, अंक-7,अप्रैल, 2010, पृ.                117
  19. राजेन्द्र यादवः संपादक, हंस, अक्ट. 1994, पृ. 36
  20. राजेन्द्र यादव, बाजार स्त्री की छवि गढ़ता है, स्त्रीकाल संपादक संजीव-चंदन, अंक-7,अप्रैल, 2010, पृ.                117
  21. संपादकः राजेन्द्र यादव, हंस, अक्ट‐ 1994, पृ. 36
  22.  राधा कुमार, स्त्री संघर्ष का इतिहास 1800-1900, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण 2011, पृ. 338
         सितम्बर, 1987 में राजस्थान के एक गाँव में हुई सती की एक घटना से इस आंदोलन की शुरूआत हुई।             इस आंदोलन के दौरान बड़ी गर्मागर्म बहस हुई। इस बहस में न केवल हिंदू स्त्रियों के प्रति होनेवाले अच्छे-         बुरे बर्ताव के मुद्दे उठाए गए बल्कि धार्मिक पहचान, सामुदायिक स्वायत्तता तथा भारत के बहुआयामी,             विविध समाज में कानून एवं राज्य की भूमिका के प्रश्न भी उठे।
   23.नामवर सिंह, छायावाद, राजकमल प्रकाशन, संस्करण 2007, पृ. 52  
  24.महेशनारायण, स्वप्नः संपादक प्रो. महाकालेश्वर, अरण्यानी रांची, वर्ष 1984, पृ.द्ध
  25. महेशनारायण, स्वप्नः संपादक प्रो. महाकालेश्वर, अरण्यानी रांची, वर्ष 1984, पृ. 23
  26.नामवर सिंह, छायावाद, राजकमल प्रकाशन, संस्करण 2007, पृ. 36  
  27.नामवर सिंह, छायावाद, राजकमल प्रकाशन, संस्करण 2007, पृ. 37 

शोधार्थी,भारतीय भाषा केंद्र,जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय


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हिन्दी कविता का स्त्रीवादी स्वर: अनामिका

पिछले दिनों स्त्री रचनाकारों पर हमले और स्त्रीवादी संघर्ष दोनो की प्रतीक बनी अनामिका का आज जन्मदिन (17 अगस्त) है. वे हिन्दी साहित्य की उन चुनिन्दा रचनाकारों में हैं जो न सिर्फ स्त्रीवादी लेखन करती हैं, बल्कि खुद को स्त्रीवादी घोषित भी करती हैं. उनकी सात कविताएं उनके स्वर में.

किसने फैलाई गरीबों को विदेशी औरत मुहैया कराने की खबर और कौन काट रहा महिलाओं की चोटी

विकाश सिंह मौर्य

शोधार्थी,
इतिहास विभाग, डी.ए.वी.पी.जी. कॉलेज,
बी.एच.यू. वाराणसी. संपर्क : vikashasaeem@gmail.com

11 अगस्त 2017 को मैं अपने रिसर्च पेपर के लिए फील्ड वर्क पर चित्रकूट जिले के बरगढ़, मानिकपुर के आस-पास भ्रमण पर था, तभी ये दो घटनायें मेरे सामने हुई. पहली घटना इस प्रकार है.  

यह 11 अगस्त को चित्रकूट जिले के बरगढ़ में क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक के पास फिरोज के सब्जी की दुकान के पास की घटना है. 11 अगस्त शुक्रवार को एक खबर पूरे क्षेत्र में बड़ी तेजी से उड़ी कि रात में फिरोज की पत्नी के बाल किसी ने काट लिए हैं, यह खबर सोशल मीडिया में भी काफी तीव्र गति से फैली. इसकी फैक्ट फाइंडिंग रिपोर्ट इस तरह से मिली.

श्री बुद्धराज मौर्य जिन्हें आसपास के लोग बुधराम कहते हैं. यहाँ के जागरूक नागरिक एवं बुंदेलखंड के इस मऊ-मानिकपुर पठारी क्षेत्र के एक प्रगतिशील किसान हैं. अपनी सब्जी (नेनुआ) लेकर सुबह लगभग 11 बजे फिरोज की दुकान के पास पहुंचे और चूँकि उस समय तक यह खबर आग की तरह फ़ैल चुकी थी, तब ऐसे में स्वाभाविक था कि इस पर कुछ चर्चा हो और घर-परिवार के हालात पर कुछ बातचीत हो. प्रस्तुत है उस बातचीत का ज्यों का त्यों विवरण-
बुधराम- और भाई सलाम !
फिरोज- नमो बुद्धाय ! बुधराम भाई. अउर बतावा.
बुधराम- आपन हाल-चाल बतावा. सब ठीक है न.
फिरोज- जसरा अस्पताल से बस अबहिंये चले आवत लाग हन.
बुधराम- फ़िलहाल तबियत तो ठीक है न.
फिरोज- हाँ, अबे (अभी) तो सही है. जल्दी ठीक होइ जयी.
बुधराम-(मजाक में) यार तू त… मुसलमान अह… तोहरे बीबी के साथै ई कइसे होइगा?
फिरोज- हम त अपने बिटिया का अस्पताल मा भरती कराये रहेन. ओकर तबियत कुछ ख़राब रही है. बीबी त ठीक है. ओका कहाँ कुछौ भा है.
बुधराम- सुने हन अउर चारों तरफ हल्लौ मचा है कि तुहरे बीबी के चोटी कट गइ है रात मा.
फिरोज- का बुधराम भाई. अच्छा मजाक है इया. अइसा है, हम आहेन मुसलमान. चोटी काटै वाले के सारे के घुटकी (गर्दन) न काट लेब?

इस घटना के बाद से ही लगभग पांच महिलाएं मारे डर और भय के बेहोस हो गयीं हैं. दो तो अपने छतों से नीचे भी गिर गयीं. इस मामले पर अभिलाष का कहना है कि ‘यहाँ एक बात ध्यान देने योग्य है कि अभी तक किसी भी पढ़े-लिखे, जागरूक और बुद्धिमान घर में चोटी कटने-काटने की कोई घटना नहीं हुई है. और न ही ऐसी कोई घटना समाज व धर्म के ठेकेदारों यथा ब्राम्हण और ठाकुर परिवार में घटित हुई है.’ अभिलाष एक जागरूक परिवार से आते हैं. एवं इन्होने सरदार वल्लभ भाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, मेरठ से एग्रीकल्चर की मास्टर डिग्री हासिल किया है.

दूसरी घटना और दिलचस्प है. इस समय इस क्षेत्र के डभौरा, मानिकपुर, रानीपुर, सकरौंहा, अइलहा, चुरेह कशेरुआ आदि गाँवों में यह अफवाह फैली हुई है कि ‘कुछ विदेशी औरतों को अन्त्योदय कार्ड धारकों के यहाँ भेजा जायेगा. वे लोग इनकी देखभाल और जैसे भी चाहें रखें.’ राशन और मिट्टी का तेल लेने तक भी लोग राशन की सरकारी दूकानों में नहीं जा रहे हैं. क्योंकि यह खबर पूरे क्षेत्र में फैली है कि कोटेदार गल्ला देने के साथ ही इन कार्डधारकों का फार्म भी औरतों के लिए भरवा रहा है. इसके पीछे का सच जानने की कोशिश में अफवाह फ़ैलाने वालों में से ही एक शख्स मानिकपुर तहसील के पास इत्तफाक से मिल गए.

ये क्षेत्र के बहुत सम्मानित व्यक्तियों में से एक हैं. इनके बड़े भाई ब्लाक प्रमुख भी रह चुके हैं. फिलहाल इनका दावा है कि इस प्रकार के काम जिन्होंने किये हैं, उनके इरादे ये अच्छी तरह से जानते हैं. इस अफवाह के पीछे की हकीकत इन्हें मालूम है. इन साहब से किसी ने कहा कि ‘का भैया इया सच आय कि गाँव मा औरत बंट रही हैं?’ इन्होने कहा कि पता नहीं बंट रही हैं कि नहीं पर बढ़ जरुर रही हैं.

इन दिनों उनके घर में चार सालियाँ (दो इनकी और दो भाइयों की) आई हुई हैं. इस खबर से कई लोग जो बाहर थे. अपने गाँव आ गए. इधर आस-पास के गाँव के लोग भी जिनकी रिश्तेदारी इने गाँव में है, अपनी रिश्तेदारियों में जा-जाकर इस बात की तस्दीक कर आये. और किसानी के इस सर्वाधिक माकूल मौसम में अपना अमूल्य समय और पैसे भी बरबाद कर के आये. अगर एक व्यक्ति कम से कम 200/- रूपये भी खर्च किया होगा तो कम से कम पचास लोग तो आये ही होंगे. ऐसे में कम से कम 10,000/- रुपये बरबाद हुए.

आपको बता दें कि यह इलाका बुंदेलखंड का सर्वाधिक सूखा ग्रस्त क्षेत्र है. पठारी जमीन होने के कारण प्राकृतिक रूप से भी पानी की बहुत कमी है. बीते मार्च महीने से ही पानी के टैंकरों द्वारा पीने के लिए पानी की सप्लाई हो रही थी. ऐसे में इतना समय और पैसा बरबाद करने का मतलब क्या होगा? आसानी से अंदाजा लगाया जा सकता है. इस क्षेत्र में शिक्षा की कमी अत्यधिक कमी है. आज भी कोलों (कोल, आदिवासी समुदाय) और अन्य जातियों यथा यादव, मौर्य आदि जातियों के लोगों में बिरले ही इंटर पास लड़के मिलेंगे. लड़कियों की स्थिति तो और भी ख़राब है. ठाकुरों और ब्राम्हणों की लड़कियां भी बमुश्किल ही इंटर पास मिलती हैं. साथ ही यह इलाका जंगल, पहाड़ और दस्यु बहुल भी है. अब इस तरह की अफवाहों के पीछे क्या मकसद हो सकता है? इसकी पहचान आसानी से की जा सकती है.

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प्रतिमा की कविताएँ ( कहाँ हो विधाता ! और अन्य)

प्रतिमा

विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कवितायेँ प्रकाशित. संपर्क :
rjpratima@gmail.com

सेनाएँ
कभी नहीं जाती
सेनाएँ हड़ताल पर
बेमौत मरने के खिलाफ
नहीं उठाती आवाज़ कभी
न जाने क्यों ?
बुद्ध की असंख्य मूर्तियाँ
नहीं बिछा देती रणभूमि में
नहीं लिखती कविताएँ
मृत्यु के खिलाफ
न जाने क्यों ?
हर देश में कश्मीर होना जरुरी है
जहाँ चलता रहे मौत का प्रशिक्षण अनवरत
जहाँ की उर्वर मिट्टी में
मिला दिए जाते खाद की जगह बारूद
और खिलंदड़ करते युवाओं को
बना दिया जाता सेनाओं का जत्था
प्रेमिकाओं के ख्वाब में डूबे रहनेवाले
कोमल कच्चे मन को
तोपों और बमों के बीच
सिखाया जाता खूनी खेल
बनाया जाता खूंखार
और बाँटा जाता है मौत का तगमा
न जाने क्यों ?

सेनाएँ खामोश खड़ी है
हाथों में लिए बन्दूक
क्यों नहीं सवाल करती
क्यों नहीं हड़ताल करती
क्यों नहीं बन्दूक की नलियों में भर देती स्याही
क्यों नहीं उठाती कूची
और बना देती नवजात शिशु का चित्र
सरहदों के काँटेदार तारों पर
नहीं सुखाती खून से सनी हुई अपनी कमीजें
न जाने क्यों  ?


 जाने क्यों  नहीं टूटती आस !

जाने क्यों ?
लगी रहती है आँखें सड़क के मोड़ पर
टकटकी लगाए करती है इन्तजार
कि अनायास कभी
काका, मौसी, बुआ, मामा…
आ जाएँगे लेने बिटिया का हाल
कि ले आएँगे पोटली में बाँधकर
तिलौड़ी, फुलौड़ी के साथ अथाह दुलार
माया में सिमटकर करेंगे ढ़ेरों इधर-उधर की बातें
ढ़ूँढ़ेंगे घर के कोने में पड़ी मेरी हँसी
उदासी का सबब ढ़ूढ़ेंगे
और मुझसे नजरें बचाकर
नाप लेंगे घर का सन्नाटा
टटोलेंगे किसी रैख पर पड़ी सुख-दु:ख की थैली
टूटी हुई चप्पल को देखकर
लगा लेगें तंगी का हिसाब
तलाशेंगे मेरे रतजगे का कारण
और हिलसकर फेरेंगे मेरे सिर पर
अपना स्नेहमय हाथ
कि माँ-पिता के बाद भी
माँ के घर नहीं सूखा है अभी
तुम्हारे हिस्से का पोखर
आ जाओ जब जी करे
डूब लो उसमें, और भिगा लो अपना मन !

कहाँ हो विधाता !

घनघोर अन्हरिया है विधाता
हाथो-हाथ नहीं सूझ रहा
कौन जलाएगा डिबिया
चित्त उचट गया है, उसके जाने के बाद से
क्यों नहीं सोचा वो जहर खाने से पहले
कि कैसे होगी कटनी, बैल का पैसा कौन भरेगा
कौन चुकाएगा बैंक का कर्ज, और बनिया कैसे मानेगा
मतारी छाती कूट रही है दिन-रात

सबके खेत में हँसिया लहरा रही है
बोझा बन रहा है कतार से
सीस चुन रह हैं बच्चे दौड़ दौड़कर
मेरा खेत उदाम पड़ा है
किसको फुरसत है हाथ बटाने की
कौन सुनेगा मुझ अभागन को
बचे हुए धान का कैसे होगा हिसाब
कितना बटैया मिलेगा
और क्या भेजूँगी बबनी के ससुराल
भोरे भोर महाजन आएगा
नहीं काटने देगा फसल
बैल भी खोलकर ले जाएगा
करेगा मुझे तार-तार
बच्चे देखेंगे टुकुर टुकुर
अधीर हो जाएँगे बिना बाप के
कहाँ से बाँधू धीरज
जाने कहाँ हो विधाता !

 मुंबई मेरी जान 

मुंबई में हाई अलर्ट था
लोग काम में मशगूल थे
माँ बिस्तर पर लेटी हुई थी
बाहर खेल रहा बच्चा
भागा हुआ माँ के पास आया
और सटकर खड़ा हो गया
बताने लगा अपने दोस्तों के बारे में
माँ की नीची झुकी हुई नज़रें उसे देख रही थी
उसकी ठोढ़ी पर हाथ फेरी

वो माँ से और सट गया

मुँह में मुँह सटाकर
अपने दोस्तों की शिकायत करने लगा
झगड़ा के बारे में बताने लगा
माँ के गर्दन में पड़े माला से खेलने लगा
माँ ने कहा ‘बहार जाकर खेलो’
पर उसे अपना दूध याद आया
वो माँ की छाती का कपड़ा खीचकर अन्दर झाँका
और पेट पर चढ़कर बैठ गया
माँ ने कहा ‘बहार जाकर खेलो’
वो छाती से चिपककर लेट गया
माँ थपकियाँ देने लगी और वो सो गया
उसकी बाहें माँ की गर्दन से लटक रही थी
वो सपने में दूध पी रहा था
माँ बाल सहला रही थी
और विस्फोटकों का जखीरा
सही सलामत मुंबई पहुँचा दिया गया

 मुक्त करो इस मानव को

कौन है वो क्रूर मेरे भीतर
जो करता है ममता को शर्मसार
और देता है चुनौती
कि एक संतान को चुनो
या चुनो दूसरे को
ऐसा मुमकिन नहीं कि
एक ही गोद में दोनों का सिर रखकर
साथ में दो थपकियाँ,
एक ही आँचल से पोछो
दोनों के माथे पर छलका पसीना,
और न ही ये संभव है कि
एक ही थाली में सानकर भात
भर दो हम दोनों का पेट

अब तुम्हें चुनना होगा
दोनों में से किसी एक को
किसका भरना चाहोगी पेट
किसे पुचकारोगी प्रेम से
किसकी तकलीफ में
छटपटाओगी रात भर
और अधीर होकर
किसे समेटोगी बार बार सीने में

भले हम एक ही कोख में पले
एक ही छाती से तुमने दूध पिलाई हो भले
पर अब तुम्हे चुनना होगा
किसी एक का सुख-दु:ख
एक का हँसना-गाना
कोख में उलटने-पलटने की यादें
और बचपन की मासूम हरकतें

भले तुम उसी के साथ चली जाओ
जो करती नहीं परवाह उस समाज की
जो देता है मेरे हाथों में
परिवार का बागडोर
जिम्मेदारियों को निभाने की शक्ति
संस्कृति को समझने का नजरिया
दिखाता है सत्ता का रंग
लुभाता है
बताता है पुरुष होने का महत्व
करवाता है खतरनाक काम
और
बदले में ले लेता है
माँ, पिता, भाई, बहन
मेरा सारा बचपन
सारी दुआएँ
सारी लोरियाँ
सारी थपकियाँ

बचपन से ही मेरे पाँव में
बान्धता है कई जँजीरें
तुम्हारी आँचल की छाँव से दूर
फेकता है जलती अलाव पर
बना देता है मुझे क्रूर
जो तय कर सके ममता की आयु
रख सके प्रेम का हिसाब
और देते रहे ब्यौरा
कि किसका करना है बहिष्कार
और किसे स्वीकृति देनी है

मैं करता रहा, मैं करता रहा
मैं मरता रहा, मैं मरता रहा
मैं लड़ता रहा ,मैं लड़ता रहा
सारे मानवी मूल्यों को
‘मनु’ के साँचे में ढ़ालता रहा
सवालों का सिर मरोड़ता रहा
गिरता रहा, सम्भलता रहा
तड़पता रहा, धधकता रहा
तलाशता रहा तेरी आँचल का छोर
जिसे फाड़कर
पाँव की बेड़ियों में तब लपेट लिया था
जब रिवाजों को ढ़ोते हुए
कमजोर पड़ा था मैं

अकेले चलते चलते
अब थक गया हूँ माँ !
लोग आगे निकल गए हैं
मैं छूट गया हूँ बहुत दूर
पीछे जलती धूप है और
आगे है अलाव
आकर सम्भालो मुझे
मुझसे बचा लो मुझे
लोरी सुना दो मुझे
नींद अब आती नहीं
छटपटाती रातों में
बिस्तर के सिलवटों पर
ढूँढ़ता हूँ तुम्हारा स्पर्श
सिरहाने आकर खड़ी होती हो तुम
मुझे पहचानती नहीं
मुझे पुचकारती नहीं
गुनगुनाती नहीं कोई लोरी
नहीं देती हल्की-सी थपकियाँ
मैं सदियों से जाग रहा हूँ
पर अब मुझको सोना है
करो तुम दोनों हाथ उठाकर
एक बार फिर से मेरे लिए प्रार्थना
हाय समाज ! ओ रे समाज !
अब मुक्त करो इस मानव को !



 सभ्यता 

स्कूल जाते हुए बच्चे
ढ़ो रहे हैं पीठ पर

सभ्यताओं का बोझ
झाड़ रहे हैं
बस्ते पर जमी धूल
पोखर के घाट पर जा
धो आते एड़ियाँ बार बार
फिर भी घर लौटते हुए
लथपथ हो जाते उनके तलवे

  स्त्री आन्दोलन

पूरी दुनियाँ की स्त्री अगर
कर दे आन्दोलन अपने शोषक के खिलाफ
अगर खोया हुआ हक माँगे
माँगे अपना पूरा अधिकार
तो ये समाज ढ़ह जाएगा धड़धड़ाकर
लेखकों की कलमें डूब जाएगी नीमरस में
शायर तड़पेंगे रातों को
चाँद नाले में उतर आएगा
प्रेमिकाओं का चेहरा विभत्स हो जाएगा,
डरावना हो जाएगा

देह नहीं रह जाएगा भूल भुलैया
नख से लेकर शिख तक का सफर
सौन्दर्य का गुफा नहीं रह पाएगा
नहीं बन पाएगी विभत्स ब्लू फिल्में
और हाथों में अपना देह लिए स्त्री
नहीं लुभा पाएगी पुरुषों को
नहीं दिखा पाएगी योनि में कोई तिलिस्म

अगर पूरी दुनियाँ की स्त्री
आन्दोलन कर दे अपने शोषक के खिलाफ
तो ढ़ह जाएगा ये समाज
विद्रूप हो जाएगा इतिहासकारों का चेहरा
रंग उतर जाएगा दुनिया के महान चित्रों से
स्त्री सौन्दर्य की देवी नहीं रह जाएगी
बाप और बेटों द्वारा छली नहीं जाएगी
पतियों द्वारा रौंदी नहीं जाएगी
न ही छुपाई जाएगी
न ही दिखाई जाएगी कपड़ों के अलग-अलग हिस्सों से
टांग दी जाएगी दीवारों पर नंगी
या काट दिए जाएँगे स्तन बेहिसाब
भर दिए जाएँगे योनि में शीशा या पत्थर
पर नहीं लिख पाएगा खोखला इतिहास
नहीं गढ़ पाएगा कोई झूठा साहित्य
नहीं लिखेगा कोई “लंगड़ा स्मृति”
नहीं भरेगा कोई पुरुष होने का स्वांग

पूरी दुनिया की स्त्री
अगर वारिस को पालने से इनकार कर दे
गिरा दे गर्भ बिना किसी से पूछे
या नाले में बहा दे छाती का सारा दूध
सोने की कड़ियाँ उछाल दे आसमान में
तो ये समाज ढ़ह जाएगा धड़धड़ाकर
ढ़ह जाएगा ये ढ़ाँचा
बह जाएगी वो सारी उतकृष्ट रचनाएँ
जो रची गई है स्त्रीदेह के आसपास

अगर पूरी दुनिया की स्त्री माँग ले अपना पूरा अधिकार
तो सबसे पहले कठघरे में होंगे पिता और पुत्र
फिर आएँगे बारी-बारी से हर एक पुरष
राजाओं की गद्दियाँ गिर जाएगी
गिर जाएगा पूरा समाज

अगर पूरी दुनिया की स्त्री
अपनी लाश बिछाने से कर दे इनकार
माँगे इन्सान होने का पूरा हक़
तो सबसे पहले मरेंगे देवता
फिर मरेगी सत्ता
मर जाएगी पुरुष की बनाई ये दुनिया
फिर मरेगा सारा झूठ
और सबसे अन्त में मर जाएगा पुरूष
और खत्म हो जाएगा स्त्री आन्दोलन

 भरोसा नहीं 

भरोसा नहीं रहा
कि आनेवाले बच्चों को
दे पाएँगे कोई ढब की ज़िंदगी, लेकिन
शिक्षा पर भरोसा है
भरोसा नहीं कि हो पाएगा अब
किसी के भी साथ न्याय, लेकिन
न्यायपालिका पर भरोसा है
भरोसा नहीं कि अब न आए
कोई जन-विरोधी नीति, लेकिन
व्यवस्था पर भरोसा है
भरोसा नहीं कि ये सभ्यता
बर्बरता को कम कर पाए, लेकिन
सभ्यता पर भरोसा है
भरोसा नहीं कि कोई भी संसद
मनुष्य को संसाधन न समझे, लेकिन
संविधान पर भरोसा है
भरोसा नहीं कि धूप दे हमेशा गर्माहट
और आसमान से केवल पानी ही बरसे, लेकिन
सरकार पर भरोसा है
भरोसा नहीं कि राजनितिक खेल का परिणाम

हो हमारे हित में, लकिन
नेताओं पर भरोसा है
भरोसा नहीं कि हमारा जीना-मरना
अकेले ईश्वर ही तय कर रहे, लेकिन
ईश्वर पर भरोसा है
भरोसा नहीं कि कोई भी स्तम्भ अब
उठाने लायक रहा नई पीढ़ी का भार, लेकिन
लोकतंत्र पर भरोसा है .

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