‘दर्दजा‘: हव्वा को पता होता तो वह बेऔलाद रह जाती

प्रो. चन्द्रकला त्रिपाठी
प्रोफेसर, बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय, बनारस. वरिष्ठ आलोचक. सम्पर्क :
मो.9415618813

दर्दजा’ पढ़ते हुए आप हर्फ ब हर्फ़ खुद को स्त्री पर हमलावर यातनाओं को जिंदा अनुभवों की शिद्दत में भोगने से रोक नहीं सकते। ऐसी ही एक और किताब थी तहमीना दुर्रानी की कुफ्र। ‘दर्दजा’ और ‘कुफ्र’ दोनों का संबंध ‘धर्म की स्त्री दमन वाली फितरत’ से है। दोनों जगह स्त्री नापाक़ है। वह भोगा जाने वाला ही नहीं शैतानियत के साथ जिब़ह किया जाने वाला शरीर है। धर्म के भीतर घुसी हुई पाशविकताओं का अट्टाहास आपको सकते में डाल सकता है। तुर्रा, यह है कि औपन्यासिक पाठ में बदल कर आया यह सब कुछ असली है। किरदार, देशकाल, घटनाएँ सबके सब असली। वे आपको अपनी नसों में बहते खून की धड़कती सिफ़त के साथ महसूस होंगे । ‘दर्दजा’ पढ़ी गई और खूब पढ़ी गई। हर पाठक ने अपनी विचलित स्तब्ध स्थिति का बयान किया।

जयश्री राय के इस उपन्यास ने लेखिका के परिपक्व होते रचनात्मक विस्तार का पता दिया। समाजशास्त्रीय शोध यू.एन.ए., एन.जी.ओज, विश्व मानवाधिकार कार्यकर्ताओं या स्त्री संगठनों द्वारा अफ्रीकी, दक्षिण अमेरिकी, मध्य-पूर्व में कुछ देशों में कबीलाई क्रूरता के साथ घटित होने वाली स्त्रियों की सुन्नत के मामलों पर जाहिर सामग्री भरपुर है। चाहने पर आप उन स्थितियों  और उनके  विश्लेषणों  को जान सकते हैं। आधुनिक से अत्याधुनिक होते विश्व के हिस्सों में बची हुई आपसी बर्बरता विश्लेषणों का यथार्थ देख सुन सकते हैं, मगर उपन्यास में इस यथार्थ का असर बहुत दारुण होकर आता है। ये स्त्री के दर्द और यातना की जिंदा गवाहियाँ हैं। स्त्री होने के गुनाह की मिसालें परत-दर-परत उघड़ कर उसकी देह को ही नहीं मन औ र आत्मा की लहूलुहान स्थितियों का बयान करती हैं।

 ‘दर्दजा’ में आपको ‘माहरा’ मिलेगी। सोमालिया (अफ्रीका) की घुमंतू जाति की ‘माहरा’ जिसका संबंध इस कबीलाई बनजारा जाति की ‘समाल’ जनजाति से है। इस प्रजाति के भीतर भी श्रेष्ठता सिद्धांत के बंटवारे हैं औ र ये बड़े कट्टर रूपों में हैं। माहरा अपनी कहानी मेअपनी उम्र के तेरहवें वर्ष में है। माहरा के भीतर अपने समाज की अमानुषिक परिपाटियों से बगावत और संघर्ष के साथ-साथ दुनिया के विकसित विधान के ज्ञान से प्राप्त आलोचना दृष्टि का अक्स देख कर हम चकित हो सकते हैं कि सुदूर आदिम इलाके में अपने बेठीहेपन के साथ घूमती जनजातियों की उस लड़की में ऐसा रूपांतरण कैसे संभव हुआ। क्रमशः जाहिर होता है कि ‘माहरा’ खुद को दुनिया के बदलावों से जुडे ज्ञान के साथ सशक्त करने का निरंतर संघर्ष करती है। माहिरा के आत्मसंघर्ष का अक्स देखिए-‘एक तरफ मेरे संस्कार थे, परवरिश थी, दूसरी तरफ मेरे सवाल, मेरे संशय.... बीच में मैं परेशान, भ्रमित। कहाँ जाउँ, किससे बात करूँ, समझ नहीं पाती थी। अंदर ही अंदर घुटती रहती थी। कभी-कभी सोचती थी, खुदा ने मुझे भी औ रों की तरह क्यों नहीं बनाया। क्यों मैं अपनी उम्र की दूसरी लड़कियों की तरह निश्चिंत खुश नहीं रह पाती। काश मैं भी दूसरों की तरह यह मान पाती कि दुख हम औरतों की नियति है, कि हमें इसी में जीना और इसी में मरना है...........’(पृ0 45)

हव्वा की बेटी: उपन्यास अंश 

उसे बताया जाता है कि बेटियों पर, औरतों पर हव्वा के गुनाह की सजा टूटेगी ही टूटेगी उसे भुलाया नहीं जा सकता। साबीला की दादी अक्सर औरत के गुनाह और उस पर कहर की अच्छाइयां बताने के लिए सामने आ
जाती हैं। वे उसके दोजख  को ही उसका स्वर्ग बताने से बाज नहीं आतीं।‘स्त्री’ उनके लिए ‘ख़ता की पुतली’ है। गुनाह उसकी फितरत है।साबीला की दादी ही उन तीन दुखों के बारे में बताती हैं जिन्हें भोगना हर औरत पर फर्ज है, इसमें पहला सुन्नत है। स्त्री योनि का ऐसा विरूपीकरण कि उसका प्रसव के अलावा कोई काम न बचे। दूसरा विवाह के बाद संभोग के लिए उसकी योनि चीर दी जाती है और प्रसव के लिए उसे फिर काटा-पीटा जाता है।


योनि का ऐसे क्षत-विक्षत किया जाना स्त्री के लिए सबाब का काम है। माहरा साबीला की दादी से कैसा भी इत्तेफाक नहीं रखती है। उसे मालूम है कि उसमें वफा है, प्यार है, सच्चाई है। उसे लगता है कि उसका स्त्री होना गुनाहनहीं है। वह अपनी माँ के सामने ऐसा बोल जाती है। माँ को लगता है कि वह कुफ्र बोल रही है। माहरा का ऐसा रूपांतरण, इन आमनुषिकता विश्लेषणों के विरोध का संघर्ष उस ‘मेम’ से घुलने-मिलने से हो रहा है। मेम ही उसकी दूसरी बड़ी दुनिया की ओर खुली खिड़की है।

इन देशों में सुन्नत की प्रथा की शिकार अकेली माहरा नहीं है किंतु इस यातना से लड़ने के भरपूर संघर्ष की जिंदा आवाज वही है। उसके जरिए कई-कई दबी हुई जुबानें फूट पड़ती हैं। उपन्यास में सुन्नत की प्रथा के अफ्रीकी, एशियाई खाड़ी देशों में प्रचलित रूपों के प्रामाणिक हवाले हैं। ये वो दुनियाएं हैं जहाँ औ रत के लिए एक अंध्¨री खत्म दुनिया तय है। इन दुनियाओं में स्त्री के बचपन की मियाद बहुत छोटी है, जवानी को छूने भर की मोहलत नहीं कि उस तंग दुनियाँ के अंधेरे में वह रक्त और मवाद से भर कर रेंगने के लिए छोड़ दी जाती है। जयश्री राय ने इन कबीलाई समाजों में धर्म के बर्बर पितृसत्तात्मक चलना को उजागर किया है। स्त्री के प्रति घृणा से भरे इस धर्म में जरा सी भी कोई मानवीय फाँक नहीं है। ‘स्त्री’ यहाँ यदि शिकार है तो पुरूष, पिता, पति और भाई हो भी क्रूरताओं की वैधता स्थापित करने वाली सत्ता। ‘माहरा’ का इलाका रेगिस्तान के नैसर्गिक सौन्दर्य से भरपूर है। यह सूखा, गर्म उन्मुक्त और सुंदर है। इसे कुदरत की गर्म कोंख कहा जा सकता है। स्त्री में भी यह कुदरत समूची ढ़ल कर इतनी ही सुंदरतम है। काले  बलिष्ठ शरीर भरे-भरे होंठ, घुंघराली लटें, निष्पाप आँखें और प्रकृति के प्रकृत से घुल-मिल कर कटता हुआ जीवन। बारिशें, नदियाँ, हरियालियों के कई-कई रंग, वनस्पतियाँ, भूरे पहाड़, घने जंगल पशुओं औ र जानवरों की अनेक प्रजातियाँ, चमकती बिजली और छोटा से बड़ा होता चांद, अंधेरी रातों में सरकते रेत के ढूहे, पक्षी और जीवन के हंसमुख कलरव चारों ओर। माहरा के चारों ओर ऐसी ही प्रकृति है। बंजारापन के चलते वे ‘पानी’ के हिसाब से अपनी रिहाइशें बदलते चलते हैं मगर जहाँ जाते हैं अपने समाज के साथ जाते हैं। झोपड़ियाँ बनाते हैं, पशु पालते हैं, व्यापार भी करते हैं औ र उसी के भीतर अमीर-ग़रीब, ऊँच-नीच भी होते हैं । इसी के भीतर औरत अपनी परछाईं की तरह बिना जिस्म और रूह के जीना सीख लेती है। प्रकृति की अपार ऊर्जा और संपदा के बहुत करीब बसे इन इलाकों में ‘स्त्री’ सिर्फ प्रजनन के काम की उस देह में बदल जाती है जिसके लिए ‘देह’ को यौनेच्छा और यौन समागम के लिए महसूस करना गुनाह है। इनकी गृहस्थियाँ कितनी भी चलायमान क्यों न हों इनके सामाजिक उसूल और मान्यताएं पत्थर की लकीर हैं। समूचीदुनिया का शिक्षित सुसंस्कृत सभ्य स्वरूप इनकी बंद पद्धतियों के बीच कहीं से प्रवेश नहीं कर सकता।

 हव्वा की बेटी : उपन्यास अंश, भाग 2

‘इस्लाम’ का ये अपना एक बर्बर मनचाहा पाठ कर लेते हैं। ‘स्त्री’ को बरतने में उनकी क्रूरताएं उन आदिम रूपों में करीब हैं। एक तरफ निसर्ग का प्रकृत अपने संुदरतम उर्वर रूपों में बहता रहता है दूसरी तरफ उसी के भीतर अपने समाजों के कठिन बंद रूपों को वे सख्त करते जाते हैं। स्त्री की सुन्नत के तरीकों में इस प्रकृत की ही सबसे ज्यादा पैठ है। स्त्री को यौनसुख देने वाली चीज़ के लिए उन औ रतों का धिक्कार पढ़ें, यह अपनी ही देह के प्रति घृणा और हिंसा का जटिलतम रूप है जिसे पितृसत्तात्मक स्त्री विरोधी मूल्यों के अनुकूलन ने निर्मित किया है। उनके हिसाब से योनि की वह दो अंगुल चीज स्त्री की भी है ही नहीं क्योंकि कामनावासना विषयक आनंद का अधिकार केवल पुरुष को है। इसीलिए सुन्नत के जरिए उस ‘दो अंगुल’ चीज को काट कर निकाल दिया जाता है। इसे निकालने के औज़ार सब आदिम हैं। पुराना ब्लेड, चाकू औ र पत्थर ही नहीं उसे निकालने वाली स्त्री के गंदे नाखून भरे हाथ भी योनि के भीतर पूरी क्रूरता के साथ घूमते हैं । ‘माहरा’  अपने इस हश्र को शब्दशः कहती है और उस यातना का सारा ऐन्द्रिक अपनी भीषण पीड़ा समेत पाठक की नसों में धँस जाता है-
‘‘उस समय आग की सलाइयों सी मेरे जांघों के बीच चल रही थी। लग रहा था ढेर सारी विषैली चीटियां मेरे अंदर घुस गई हैं  औ र मुझे खोद-खोद कर खा रही हैं। या फिर कोई बिच्छू लगातार डंक मार रहा है। तेज जलन हो रही है। मेरे दोनों  पैर बुरी तरह थरथरा रहे हैं, पूरा शरीर पसीने से भींग गया है। ........... मेरे मुडेहुए हाँथ शायद टूट गए हैं और कमर के नीचे का शरीर शून्य पड़ गया है।’’ (पृ0 16)


‘स्त्री’ को वहाँ ऐसी ही जघन्यता के साथ बरता गया है। उसके शरीर का यह हश्र ऐसा प्रचलित अनुष्ठान है कि उसे बदलने पर आमादा यू.एन.ओ समेत अनेक वैश्विक संगठनों की लगातार कोशिशों के बाद भी इस सुन्नत प्रथा के प्रचलन में आई कमी का प्रतिशत बेहद कम है। अपने कबीलाई रिवाजों में बंधी हुई ऐसी प्रजातियाँ इसे बाहरी समाजों का हस्तक्षेप मानती हैं और यह उन्हें कतई गवारा नहीं। माहरा का जनना अंग उस भोथरी मरणांतक प्रक्रिया के बाद पूरा बदल दिया जाता है। उसकी जगह अब एक ज़रा सा सूराख है जिससे पेशाब तक अपने प्रवाह में नहीं बह सकती। माहवारी के दिनों की यातना और दुसह है। तमाम औ रतें इस जंगली तरीके के कारण एड्स, टिटनेस जैसी बीमारियों की चपेट में आ जाती हैं। कितनी ही युवतियों को ऐसे भयानक इंफैक्शन्स हो चुके हैं कि वे शव की तरह सड़ती और बदबू करती हैं।

 ‘सबा’ ऐसी ही एक चुलबली युवती है। बातूनी सबा खुशदिल और उन्मुक्त है मगर सुन्नत से उसकी जिंदगी बदल जाती है। रिसते हुए पेशाब की गंध से घिरी सबा के नज़दीक कोई नहीं बैठता। ये औरतें ख़त्म होने की राह पर हैं। माहरा के करीब की सबा, मासा माहरू फातिमा बीबी, खाला माहरा का माँ जैसी कितनी ही औरतें इस दोजख में सड़ते हुए जीने के लिए अमिशप्रत हैं। माहरा के  संघर्ष में बाहरी दुनिया से मिली रोशनी शामिल होती है और वह इन औ रतों के लिए नई दुनिया खोजने के संघर्ष की राह पकड़ लेती है। उसकी तफसीलों में
उन देशों के हवाले आते हैं  जहाँ यह नृशंसता अलग-अलग तरीके से प्रचलित है और जिसे लेकर उन समाजों का रवैया अडिग है। माहरा बताती है कि केन्या, इथियोपिया, सोमालिया समेत विश्व के 28 देशों में स्त्री में ऐसे वक्षस्थल धर्म के नाम पर जारी हैं जिनसे 14 करोड़ औरतें प्रभावित हैं और इनमें अफ्रीकी औरतों का अनुपात सबसे ज्यादा है।


‘मासा’ का भी वही हश्र होता है। माहरा के विरोध को देखते हुए उसका परिवार मासा को बचपन में ही उसी तरह कुचल देता है। मेम जो मासा को गोद लेना चाहती थीं स्तब्ध रह जाती हैं। मासा बीमार रहने लगती है। माहरा
लाचार हुई सी- ‘‘मासा की चमकीली आँखों को बुझते हुए, गालों के प्यारे गड्ढों में मुस्कराहट की नर्म कलियों को कुम्हलाते हुए ............... एक शरीर तितली का रेंगता हुआ कीड़ा बन जाना.....................’’ देखती है। मासा ख़त्म होती ‘दर्द की गांठ’ बन चुकी ह ै। मेम मासा को ले जाती है। वे उसका इलाज भी करते हैं मगर उस नन्हीं सी जान में एड्स फल-फूल कर कैंसर हो चुका है। सितारे देखना चाहने वाली और लंबी उम्र में हंसते-खेलते जीना चाहनेवाली मासा मर जाती है। माहरा ‘मासा’ को अपने वजूद में बचाकर बंद कर लेती है। वह पुनर्जन्म पर विश्वास करना चाहती है और अपनी ‘बेटी’ को वही नाम देती है- ‘मासा’। उस मासा को वह पूरी नर्मी से अपने गर्भ में संभालती है।

‘दर्दजा’ की कथा का प्रवाह इस ‘मासा’ की मुक्ति के रास्ते उन्हीं रक्त रंजित पैरों से बढ़ता है। ज़हीर से ब्याही गई माहरा की जिंदगी में यौन संबंध उसी जिबह की यंत्रणा की पुनरावृत्ति है। पन्द्रह वर्ष के कच्चे शरीर वाली माहरा को उसका प्राैढ़ पति अपनी पाशविक उत्तेजना में रौंद डालता है। उसकी योनि को चाकू से खोलकर संभोग के लायक बनाया जाता है-’तेज भयानक पीड़ा के साथ मैने इतना ही समझा था, माँ मेरे जननांग के लगभग  बंद पड़ गए छेद को उस भोथरे चाकू से काट कर खोलने का प्रयास कर रही हैं .............’’ (पृ. 85)
फिर वही ‘जंग खाया भोथरा चाकू’। जहीर इसके बावजूद सम्भोग में सफल नहीं हो पाता। माहरा का जीवन- ‘नरक से बदतर’ हो चुका था। अथक परिश्रम, पीड़ा औ र आतंक......... बस यही और इतना ही’ (पृ. 90) माहरा
जहीर की फातिमा की तरह ही एक गुलाम थी। फातिमा अपंग हो चुकी थी। माहरा के प्रतिहिंसा से भरी फातमा के चरित्र की बारीकियों को लेखिका ने बखूबी उद्घाटित किया है। फातिमा के जख़्मी तन-मन को पहचानने में माहरादेर नहीं लगाती और उनके बीच एक यकीन भरी मानवीय दुनिया दमक उठती है। खासकर खाला के साथ माहरा के रिश्ते यकीन के उस चरम तक पहुँचते हैं कि खाला ही उसे उस नरक से मुक्त होने में मदद करती है। खाला का अपना एक निस्संग एकांत है। बारह वर्ष की उम्र में उनकी शादी हुई थी, चौदह साल की उम्र में वे बेवा हो गईं। उस छोटे से विवाहित जीवन में दो मरे हुए बच्चे भी हुए। जहीर का घर ही उनका आसरा बचा था। घर-बाहर का संसार खाला को कहीं नहीं जोड़ता। वे काम करती हैं, थकती हैं , अपनापन खोजती हैं। ‘उसकी दोस्ती किसी से नहीं, बस दोस्ती न होने का मलाल है’। (पृ. 92)

खाला पेड़ों से वनस्पतियों से, जीव जंतु विश्लेषणों और चिड़ियों तक से बात करती हैं। इस तरह लेखिका स्त्री के सामाजिक अलगाव के कठिन मर्म को उजागर करती है। यह एक बहिष्कृत स्थिति है, सम्बन्धों की उदासीनता से बना हुआ अकेलापन। माहरा ने उस एकांत में प्रवेश कर लिया तो वहाँ जैसे सख्त पत्थरों के भीतर का स्वाभाविक वेग से बह निकला। माहरा के लिए ये रूहानी रिश्ते महत्त्वपूर्ण होते जाते हैं। उन बंदिशों और यातना विश्लेषणों के बीच आजादी के सपने के साथ जूझती माहरा स्त्री सख्य का एक विरल रूप पा लेती है। इस सखीपन में सभी जुड़ती है, माहरा की माँ भी अपनी मौत से पहले उन यातनाओं के संदर्भ में अपना विवशताओं पर बिलखती है। अपनी मजबूरियों का बयान करती है। जहीर से मिलती जिबह की सी यातनाओं की सारी तफसीलें नृशंसता की पराकाष्ठा है। माहरा औरत के लिए ऐसी नियति तय करने वाली पाक किताबों को खुद देखना चाहती है। उसे कतई यकीन नहीं  कि खुदा अपने ही सृजन के साथ ऐसी क्रूरता बरतने वाले रिवाज बना सकता है। माहरा को ऐसे कई सवाल घेरते हैं और हर सवाल का टेक यही है कि- ‘यहाँ सबठीक नहीं है, कुछ बहुत गल़त है। औरतों के जीवन में दुख ही दुख है और ये सारे दुख केवल कुदरत के दिए हुए नहीं हैं । जैसा कि मेम कहती थी, हमारे अधिकतर दुख इंसानों  के खुद के बनाए हुए दुख हैं और जिस दिन हम चाहेंगे.हमारे आधे से अधिक दुख खत्म हो जाएंगे। ........मनुष्य ने अपने लिए ये नर्क खुद रचे हैं। जब मैं रेतों के सुनहरे टीले देखती हूँ, उनके पीछे निकलता चाँद और कैक्टस पर खिले तरह-तरह के फूलों को देखती हूँ, मुझे ख्याल आता है कि इन खूबसूरत चीज़ों को बनाने वाला मालिक बहुत उदार और दयालु होगा।’’ (पृ. 102-103)


‘दर्दजा’ का यह विपर्यय बड़ा ही सधा हुआ है। सृजनात्मक क्षमता से भरपूर दो चीजें आमने-सामने हैं। उन्मुक्त उदात्त भरी पूरी और उर्वर प्रकृति और सड़ जाने की हद तक बांधा गया स्त्री जीवन। प्रकृति की निर्मल अकृत्रिमता उस समाज की आंतरिक रचना में कहीं दाखिल नहीं। यहाँ तक कि पवित्र किताबों का मानवीय भाष्य भी उनके यहाँ उलट कर क्रूरतम हो उठा है। हज करने गए ज़हीर की मौत की अफवाह माहरा का सुकून बन जाती है, उसके भीतर इन यातनाओं से निजात चाहने वाली औरत करवटे बदलने लगती है। ज़हीर की मौत पर रोने के लिए गाँव उमड़ आता है मगर माहरा को रुलाने के लिए खाला को बार-बार चिकोटी काटनी पड़ती है। इस ग़म में उसके भीतर का कोई भाव शामिल होना नहीं चाहता। इन तीन औरतों का बहनापा अपनी मुक्ति के सुख को सकते की तरह सहने के लिए मजबूर है। माहरा की भूख में स्वाद की ललक जाग जाती है औ र बहुत दिनों बाद वह स्वाभाविक नींद सोती है- ‘बहुत गहरी नींद। ऐसी नींद जिसमें सपने नहीं होते, दरारें होतीं। होता है तो बस एक सपाट मुलायम अंधेरा। जाने कितने समय बाद में इस तरह से सोई थी। मृत्यु की तरह सुखद थी यह। (पृ. 105)

माहरा मातम पुर्सी करने आई अपनी माँ के सामने खाला के बहुत बार चिकोटी काटने पर भी नहीं रोती। अपने भीतर वह एक ‘जलती हुई अंगीठी’ महसूस करती है। माँ के आगे न रोना ही जैसे उसका सबसे मजबूत विरोध है। उसे जैसे अपने भीतर बची हुई आग का पता मिलता है। इस तरह उपन्यास के भीतर स्त्री मुक्ति चेतना के स्वाभाविक स्पंदित हिस्सों को लेखिका स्पर्श करती है। तकलीफों के समंदर में अनवरत डुबाये जाने के बावजूद‘माहरा’ में बचे संघर्ष के जीवित हिस्से को वह उद्घाटित करती है। माहरा वैधव्य के शाप को वरदान की तरह जीने के सुख में है कि ज़हीर लौट आता है। गर्भवती माहरा से ज़हीर अप्राकृतिक यौन संबंध बनाता है। इस तरह उपन्यास स्त्री यौनिकता के अपमान के सारे सिलसिलों को उधेड़ कर रख देता है। हर बार यह संबंध चीरने वाली वह आरी है जिससे देह ही नहीं आत्मा भी क्षत-विक्षत है।

‘जिस्म का हर जोड़ घाव की तरह दुखता-टीसता और सूरज के डूबते ही रात का काला लबादा ओढ़े किसी प्रेतात्मा की तरह ज़हीर मेरे सीने पर उतर आता। चूँकि मैं बच्चे की वजह से पेट के बल बिल्कुल लेट नहीं पाती थी, वह मुझे हमेशा दीवार के सहारे खड़ी करके अत्याचार करता’। (पृ. 110) इस तरह देखें तो इन समाजों  में स्त्री जितनी गुलाम और उत्पीड़ित है पुरुष उतना ही पाशविक है। पुरुष की ऐसी नृशंसता के लिए उस पवित्र किताब में या तो कोई रोक है ही नहीं या फिर उस ‘भाष्य’ में से ऐसे हिस्से निकाल दिये गये हैं। धर्म और संस्कृति की गतिशीलता के पक्ष यहाँ नदारद हैं। इन उत्पीड़नों से प्रताड़ित माहरा को मरा हुआ बच्चा पैदा होता है। दुबारा  हमला होने पर वह अपनी बहन मासा का पुनर्जन्म अपनी कोख में महसूसकरती है। ‘मासा’ के रूप में बेटी का जन्म उसकी जिंदगी में सुख की जगह बनाता है मगर ‘मासा’ की सुन्नत का भय उसे जीने नहीं देता। ज़हीर अशक्त औ र बूढ़ा हो चला था मगर ज़हीर का बेटा उसकी क्रूरताओं का ही अवतार साबित होता है। ज़हीर की जगह अब उस कय्यूम की निगरानियाँ हैं। बेटी बड़ी हो रही है, उस पर कय्यूम के अत्याचार बढ़ते जा रहे हैं। कय्यूम मासा का विवाह एक बूढ़े के साथ करने पर आमादा होता है। मासा के भीतर अपनीमाँ की सारी आग है। माहरा मासा को लेकर वहाँ से भागने में कामयाब तो होती है, मेम के ठिकाने पर आकर उसके जीवन में नये रंग भी दाखिल होते हैं, मगर फिर धोखे से बुला ली जाती है। खाला फिर उस नरक से उन दोनों माँ-बेटी को भगाने में कामयाब तो होती है किंतु ‘मासा’ को उसके मुक्त भविष्य की ओर भागने की शक्ति देकर माहरा लगभग ‘मौत’ के लिए छूट जाती है।


इस तरह यह उपन्यास हिंदी के औपन्यासिक संसार का महत्वपूर्ण विस्तार साबित होता है। स्वयं लेखिका की परिपक्व रचनात्मकता की भी यह एक सुखद उपलब्धि है। उपन्यास में जयश्री राय ने अनुभवों का निजी लगतासास्पंदित प्रवाह संभव किया है और यह वाकई बेजोड़ है। किसी भी उपन्यासकार के लिए उपन्यास का महाकाव्यात्मक शिल्प एक सम्मोहन की तरह होता है। यथार्थवाद की रूढ़ियाँ इस महाकाव्यात्मकता से ही टूटती हैं।दरअसल महाकाव्यात्मकता गहरे अर्थ में एक रूढ़ गढ़न भर नहीं है और न ही यह यथार्थ विरोधी संरचना है। इसके जरिये जीवनानुभवों का वे खूबियाँ निखरती हैं जिनकी संवेद्यता असरदार होती है। कला की चमक का तो कहना ही क्या है। जयश्री राय ने इस उपन्यास में यथार्थ को ऐसी ही खूबियों के साथ निर्मित किया है। इस उपन्यास में दर्ज जीवन भारतीय अनुभवों की दृष्टि से नितांत सुदूर और अपरिचित है। स्त्रियों की सुन्नत का यथार्थ बहुतायत  सामान्य रूप से बहुत जाना-समझा गया यथार्थ नहीं है। उससे जुड़ी हुई कुछेक जिंदा दास्तानें आई जरूर हैं किंतु ऐसी सुन्नत की प्रथा वाले देशों का स्त्री के प्रति दरिंदगी की भयानकताओं का यथार्थ सूचना की सपाटता को तोड़  कर ऐन्द्रिक तफसीलों के साथ यहाँ व्यक्त होता है और माहरा के जरिए कहा जाता है। कथा में लेखिका का स्त्रीपक्षधरता का विवेक भी उसी गहराई के साथ सक्रिय दिखाई देता है। लेखिका माहरा के संघर्ष में स्त्री की सचेत दृष्टिवानता का निर्वाह बड़ी खूबी के साथ करती है। कहना न होगा कि ‘दर्दजा’ की कथाभूमि चौकाने की हद तक नई मौलिक और विचारोत्तेजक  है।

स्त्री विमर्श  के सांचे में आये ग़म और सहनशीलता के कितने ही भाववादी पैटर्न यहाँ ध्वस्त होते दिखाई देते हैं । ‘माहरा’ को पढ़ते हुए स्पष्ट होता जाता है कि स्त्री सशक्तता की असली परीक्षा दरअसल क्या है? माहरा को  दिशाऔर शक्ति देने वाले स्रोत उसके अपने समाज में अनुपस्थित हैं। वहाँ हर स्त्री अपनी यातना में निहत्थी और अकेली है किंतु ज्ञान और बुद्धि के लिए माहरा की ललक उसके आलोचनात्मक विवेक की धार बनती है और वह अपने समाज की इन जड़ताओं के विरूद्ध तनती चली जाती है। वह ईश्वर, ईश्वरीय किताब, कानून, रीति-रिवाज सबको अपने प्रश्नों के दायरे में ले आती है। इस तरह लेखिका बड़ी स्वाभाविकता से इस उपन्यास की संघर्ष भरी गतिशीलता का पक्ष रचती है। यह मानना पड़ेगा कि नरक को खोलने के लिए उसके अनुभवों के प्रकृत में उतरना ही पड़ता है, लेखिका ने इसीलिए स्त्रीदमन के समूचे यथार्थ में ऐन्द्रिक वर्णन का उपयोग किया है। उसे समूचा उसी प्रकृत रूप में उधेड़ देना उसे सही लगा है। यौन प्रसंगों की जघन्यताएं यहाँ इस तरह जाहिर होती हैं कि वहाँ सिर्फ यातना विश्लेषणों को समूचा समझने का आस्वाद बनता है, इसके अतिरिक्त किसी विलासिता या उपभोगपरक अर्थ की गुंजाइश कतई नहीं बनती। कहना न होगा कि यह बहुत ही सधी हुई कलम का ही कमाल है।

‘दर्दजा’ के लिए जयश्री राय नयी सौन्दर्य दृष्टि के लिए संघर्ष करती है। इस दृष्टि का संबंध केवल अश्वेत प्रजाति के रूप रंग व्यवहार से मान लेना ठीक नहीं होगा। उस जीवन की पतनोन्मुखता विश्लेषणों के बीच से श्रम से सँवरते मामूली जीवन की अनेक छवियों  को रचते हुए लेखिका उस पूरे परिवेश को हमारे परिचित आत्मीय क्षेत्र में बदल देती है। खानाबदोश जीवन की विशेषताएं वैसी ही सहजता के साथ यहाँ दर्ज है। ..... वह पूरा जीवन अपनेस्वाद सौन्दर्य औ र असर के साथ बुना जाकर दर्द की उस दास्तान को हमारे लिए जिंदा कर देता है जिसे पढ़कर शेक्सपीयर वहाँ से याद आते हैं कि ‘नरक खाली हो गया है और सभी शैतान इसी लोक में आ गए हैं।’’


पितृसत्ता की निरंकुशताएं वहाँ ऐसी हैवानियत को जारी रखती हैं जिसे चुनौती देना आज भी कठिन है। जयश्री राय ने माहरा के व्यक्तित्व ¨ उस सबलता को रचा है जिसका संबंध केवल स्त्री से ही नहीं बल्कि स्त्री की  अस्मिता विहीन समझने वाल्¨ उन समूचे बर्बर समाजों से है। स्त्री मुक्ति के इस पाठ में संवेद्यता का वह ताप मौजूद है जिसके चलते वे सारे सुदूर अनुभव हमारे मन और चेतना मे प्रवेश कर नये ढंग की दखलंदाजियों के लिए चुनौती बनते हैं  जिसमें जघन्यताओं को  जाहिर करने के लिए सारी कलाओं ने बड़ी कठिन परीक्षा दी है। यहाँ अर्थ की समग्रता को  रचने की लेखिका की कला अपना सामर्थ्य साबित करती है।

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