जानें न्यायालय के निर्णय से कैसे महिलायें लटकीं अधर में, बढ़ेगी उनकी परेशानी

स्त्रीवादी कानूनविद  अरविंद जैन से स्त्रीकाल की बातचीत पर आधारित

सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों, जस्टिस जेएस खेहर, जस्टिस कुरियन जोसफ, जस्टिस यूयू ललित, जस्टिस आरएफ नरीमन और जस्टिस अब्दुल नजीर की बेंच ने शायरा बानो, मुस्लिम वीमेनस क्वेस्ट फॉर इक्वालिटी, आफरीन रहमान, गुलशन परवीन, इशरत जहां, अतिया सबरी आदि  द्वारा दायर स्पेशल लीव पेटीशन, जिसमें भारत सरकार, जमायते-उलमा-ए-हिन्द आदि पार्टी बनाये गये थे की सुनवाई करते हुए 22 अगस्त, 2017 को तुरत दिया जाने वाले तीन तलाक को समाप्त करने का निर्णय दिया.

इंडिया टाइम्स से साभार 


9 बिन्दुओं में समझें तीन तलाक पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला 

395 पेज के ऑर्डर में तीन तलाक को निरस्त करने का फैसला तीन-दो के बहुमत से लिखा गया है. 1937 के शरियत लॉ में यह प्रोविजन (तीन तलाक का) सेक्शन 2 में था, जिसे 5 जजों के बेंच ने आज निरस्त कर दिया. जस्टिस जेएस खेहर और जस्टिस अब्दुल नजीर ने इस प्रोविजन को असंवैधानिक नहीं माना लेकिन यह भी कहा कि यह चूकि महिलाओं के हितों के खिलाफ है इसलिए इस पर सरकार और संसद को क़ानून बनाना चाहिए. इस बीच उन्होंने छः महीने के लिए इस पर रोक लगा दी तथा कहा कि इसे आगे भी बढ़ाया जा सकता है. जस्टिस जोसफ ने लिखा कि सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही शमीम आरा मामले में कहा है कि शरीयत क़ानून ठीक नहीं है और गैरइस्लामिक है तो फिर बाकी मुद्दों पर बात करने की जरूरत ही नहीं है, इसी आधार पर यह असंवैधानिक भी है. जस्टिस नरीमन और जस्टिस ललित ने कहा कि 1937 का क़ानून 1950 में संविधान बनने के बाद पूरी तरह संविधान के दायरे में आ गया. यह मर्दों को अवैध रूप से तलाक देने का अधिकार देता है इसलिए संविधान की धारा 14 में उल्लिखित मौलिक अधिकारों का हनन करता है, इसलिए यह असंवैधानिक है.

तीन तलाक, समान नागरिक संहिता और मोदी सरकार:

मेरा कहना है कि सरकार द्वारा क़ानून बनाने का जो आदेश दो जजों का है, वह इस पूरे जजमेंट के अल्पमत का निर्णय है, अब सरकार पर निर्भर करता है वह क़ानून बनाये या न बनाये. बहुमत ने कानून बनाने का कोई निर्देश तो दिया नहीं सिर्फ तीन तलाक को निरस्त कर दिया. अब चूकि तीन तलाक का प्रोविजन ही आपने खत्म कर दिया तो कोई और क़ानून तो है नहीं, न तलाक देने का, न लेने का कोई प्रावधान. कोई यदि तीन तलाक दे दे तो फिर सजा का कोई प्रावधान कहाँ है? सारी चीजें हवा में हैं. पति तलाक देगा और औरत बोलेगी कि यह असंवैधानिक है तो पति बोलेगा जाओ कोर्ट. कोर्ट क्या करेगी, क़ानून ही नहीं है. पहले जो मौलवी करते थे, पंच  करते थे, घर-परिवार के लोग करते थे, वे कहेंगे हम भी कुछ नहीं करेंगे जी. पहले मौलवी वैलिड या इनवैलिड कह तो देते थे, अब वे भी नहीं कहेंगे. अब सरकार का क़ानून बनाने की प्रक्रिया जटिल है. क़ानून ड्राफ्ट होगा, समितियां देखेंगी, राज्यों की राय ली जायेंगी. कुछ राज्य स्वीकार करेंगी, कुछ नहीं करेंगी, मामला लटकेगा. तो फिर आप उस कानून को बनायेंगे भी तो 2 साल में बनेगा 3 साल में बनेगा. और अगर सरकार बहुत सीरियस है तो वह ऑर्डिनेंस ला सकती है. भजापा की जो फितरत है उसके अनुसार ये कानून बनाने का एक नाटक करेंगे लेकिन अंततः कोई कानून नहीं बनायेंगे यह सच्चाई है.

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महिलायें पहले से बदतर स्थिति में हैं. पहले कम से कम पता होता था कि तलाक मिल गया, तो दूसरी शादी कर सकती थीं, मुक्त हो सकती थीं,  नौकरी कर सकती थीं,  जो भी करना था कर सकती थीं. अब तलाक मिलेंगे नहीं लेकिन घर में ही नमक की सप्लाई बंद कर देंगे, हम उन्हें रोटी कपड़ा मकान नहीं देंगे, जो दूसरी सुविधाएँ हैं वह नहीं देंगे, भूखी मारेगी घर में. तलाक देंगे नहीं और सुविधाएं सारी छीन लेंगे.  तलाक तलाक दिए बिना दूसरी शादी कर लेंगे. बहुविवाह तो वहां पहले से ही है अब कोई डर भी नहीं रहेगा. अब तलाक ही नहीं होगा तो मेंटेनेंस भी नहीं है या मुकदमे चलते रहेंगे सालों साल लड़ते रहेंगे, 20 साल तक लड़ेंगे.  तो मुझे लगता है कि ये सदियों पुराना तीन तलाक (तालाब) का क़ानून था, उसे बंद कर दिया. नई प्रक्रिया में गड्ढा तो खोद दिया लेकिन उसमें पेड़ (नया क़ानून) कब लगेगा कोई नहीं जनाता. इस बीच बारिश के मिट्टी और पानी से कीचड़ होने का भय है और किसी के भी गिरने का ख़तरा बना रहेगा- टोटल मेस.

"चकरघिन्नी" : तीन तलाक़ का दु:स्वप्न

मैं यह पूछता हूं कि जैसा सरला मुद्गल केस में सुप्रीम कोर्ट ने समान नागरिक संहिता बनाने के लिए कहा था उसे बनाने की बात भाजपा सरकार क्यों नहीं करती है? समान नागरिक संहिता बनती है तो धर्म और जाति से परे सारे पर्सनल क़ानून खत्म हो जायेंगे. जो भी क़ानून बने, तलाक, विवाह, मेंटेनेंस आदि के वह सभी महिलाओं के लिए- हिन्दू महिलाओं के लि , मुस्लिम महिलाओं के लिए, ईसाई महिलाओं के लिए भी, जैन महिलाओं के लिए भी समान हो. तब जाकर कहीं समानता बनेगी.

प्रधानमंत्री को मुस्लिम महिला आंदोलन का पत्र/ तीन तलाक से निजात की मांग

कॉमन सिविल कोड बनाने की बात तो बहुत करती रहती है सरकार या भाजपा ,पर कितनी सीरियस है अभी तक तो नहीं दिखाई देता. वरना तो 3 सालों में वह सिविल कोड बनने में कितनी देर लगाती. वे अपनी राजनीति कर रहे हैं बुर्के की आड़ में वोट बैंक की राजनीति. बहुमत सत्ता में है इसलिए अल्पसंख्यकों की रिवाजों को, धर्मों को कटघरे में खडा किया जा रहा है, इनका इरादा इतना भर है.
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