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हिंदुत्व की आलोचक वरिष्ठ पत्रकार गौरी लंकेश की गोली मारकर हत्या

वरिष्ठ पत्रकार गौरी लंकेश की उनके घर के बाहर गोली मारकर हत्या, हिंदुत्व की थीं घोर आलोचक.
वे साप्ताहिक पत्रिका ‘गौरी लंकेश पत्रिके’ की सम्पादक थीं। उनके शरीर पर गोलियों के कई निशान हैं, जिससे जाहिर होता है कि उनकी हत्या के लिए उन पर कई बार फायरिंग की गई।

वरिष्ठ पत्रकार गौरी लंकेश की आज बेंगलुरु स्थित उनके घर के बाहर गोली मार कर हत्या कर दी गई। न्यूज एजेंसी एएनआई ने यह जानकारी दी। उनका घर राजाराजेश्वरी नगर में था। उनके शरीर पर गोलियों के कई निशान हैं, जिससे जाहिर होता है कि उनकी हत्या के लिए उन पर कई बार फायरिंग की गई। गौरी लंकेश को हिंदुत्ववादी राजनीति का घोर आलोचक माना जाता था। डीसीपी वेस्ट एनएन अनुचेथ ने इसकी पुष्टि करते हुए कहा कि आज शाम गौरी के घर पर शूट आउट हुआ, जिसमें उनकी मौत हो गई। उनका शव घर के वरांडा में पाया गया।  इस बारे में ज्यादा जानकारी का इंतजार है।

 वैचारिक मतभेदों को लेकर वह कुछ लोगों के निशाने पर थीं. वह कन्नड़ भाषा में एक साप्ताहिक पत्रिका निकालती थीं.


पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या पर कर्नाटक के सीएम सिद्धारमैया ने कहा है कि इस जघन्य अपराध की निंदा करने के लिए मेरे पास शब्द नहीं हैं. यह लोकतंत्र की हत्या है.



केरल के मुख्यमंत्री पी. विजयन ने इस घटना पर क्षोभ व्यक्त करते हुए कहा है कि बहादुर पत्रकार और कार्यकर्ता गौरी लंकेश की हत्या से स्तब्ध हूं. दोषियों को जल्द से जल्द पकड़ा जाए.

खबर इनपुट: जनसत्ता,एन डी टीवी इंडिया,न्यूज़ 18

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दूसरी महिला रक्षामंत्री और पहली पूर्णकालिक महिला रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण:प्रतिनिधित्व का अपना महत्व

वाणिज्य मंत्रालय  में स्वतंत्र प्रभार मंत्री निर्मला सीतारमण को देश का नया रक्षामंत्री बनाया गया है. इंदिरा गांधी के बाद सीतारमण देश की महिला रक्षामंत्री बनी हैं। इंदिरा जी ने प्रधानमंत्री रहते हुए रक्षा मंत्रालय को भी सम्भाला था। इस तरह  वे पहली पूर्णकालिक महिला रक्षा मंत्री हैं।



जेएनयू की छात्रा रहीं निर्मला सीतारमण ने वाणिज्य मंत्रालय में रहते हुुए कई अच्छे  काम किए, कहा जा रहा है कि प्रधानमंत्री ने उन्हें इसका पुरस्कार दिया है। हालांकि वे अपनी नियुक्ति को दैवीय कृपा भी बता रही हैं।
रक्षा विशेषज्ञ मेजर जनरल पीके सहगल ने तो कहा कि महिलाओं को आप कम करके मत आंकिए.


रक्षा मंत्रालय देश के चार शीर्ष मंत्रालयों में से एक है और यहां चुनौतियां उतनी ही कठिन भी हैं. ख़ुद को साबित करने के लिए निर्मला सीतारमण के पास ज़्यादा समय नहीं है.

निर्मला सीतारमन 2003 से 2005 तक राष्ट्रीय महिला आयोग की सदस्या रह चुकी हैं। 2006 में उन्होंने भाजपा ज्वाइन किया।

निर्मला सीतारमण ने 1980 में सीतालक्ष्मी रामास्वामि कॉलेज, तिरुचिरापल्ली, तमिलनाडु से ग्रेजुएशन किया है. उसके बाद जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से एमफ़िल किया है.

भले ही वे अपनी नियुक्ति का श्रेय ईश्वर को दे रही हैं। लेकिन जनता की अपेक्षाएं खुद उनसे होंगीं। रक्षा विशेषज्ञ मेजर जनरल पीके सहगल ने तो कहा कि महिलाओं को आप कम करके मत आंकिए. मुझे तो लगता है कि जो काम पिछले कई रक्षा मंत्री नही कर पाए वो ये कर पाएंगी .एक महिला रक्षा मंत्री की नियुक्ति सेना में महिलाओं की भूमिका को बढ़ाने का भी रास्ता खोलती है. फिलहाल क़रीब साढ़े चौदह लाख सैनिकों वाली भारतीय सेना के तीनों अंगों में कुल क़रीब चार हजार ही महिलाएं हैं. उसमें भी कॉम्बैट रोल अभी सिर्फ़ एयरफोर्स में ही महिलाओं को दिया गया है. निर्मला सीतारमण के आने के बाद इसमें विस्तार की उम्मीद है. तभी तो निर्मला ने कहा कि मंत्रालय में आने के बाद वो इस मामले को खुले तौर पर देखेगी फिर फैसला लेगीं .

निर्मला सीतारमण ने  जेएनयू में एमफिल की पढा़ई के दौरान  सहपाठी पराकला प्रभाकर से प्रेम विवाह किया है। विवाह के बाद वे लन्दन चली गई थीं।1991 में बेटी के जन्म के बाद वह हैदराबाद में बस गईं निर्मला सीतारमण मुदरई की रहने वाली है और ज्यादातर अंग्रेजी का ही इस्तेमाल करती हैं।

सीतारमण की छवि विवाद रहित और साफ सुथरी रही है

अभी तक देश में रक्षा मंत्रालय हमेशा पुरुषों को ही दिया जाता रहा है. हालांकि दुनिया के कई देश हैं जहां पर महिलाएं रक्षा मंत्रालय को संभाल रही हैं

किन देशों में हैं अभी महिला रक्षामंत्री

बांग्लादेश : शेख हसीना इस समय रक्षामंत्री हैं. वह देश की प्रधानमंत्री भी हैं इस समय.

दक्षिण अफ्रीका : एनएम नकुला इस समय यहां की रक्षामंत्री हैं.

नीदरलैंड : जेएस प्लैसचार्ट इस देश की रक्षामंत्रीं हैं. 2012 में उनको यह जिम्मेदारी दी गई थी.

केन्या : आर. ओमामो केन्या की रक्षामंत्री हैं.

अल्बानिया : एम कोढेली अल्बानिया देश की रक्षामंत्री हैं. वह तीन सालों से इस देश की रक्षामंत्री हैं.

नार्वे : नार्वे की रक्षामंत्री एनएमई सोर्रडिया हैं. सोर्रडिया तीन सालो से यहां की रक्षामंत्री हैं.

जर्मनी : यूवी लेयन जर्मनी की रक्षामंत्री हैं. वह यहां पर 3 सालों से रक्षा मंत्रालय संभाल रही हैं.

इटली : रॉबर्टा पिंटो इटली की रक्षामंत्री हैं जो कि 3 सालों से इस मंत्रालय को संभाल रही हैं.

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जेएनयू में दलित-ओबीसी छात्राएं चुनाव मैदान में: ऐतिहासिक चुनाव



ज्योति प्रसाद 

महिला आरक्षण बिल का एक फेसबुक पेज़ है जिसे गिनती के लाइक्स मिलते हैं। कई लोगों को यह भी नहीं मालूम कि डबल्यूआरबी (WRB) किस चिड़िया का नाम है। मगर इसका यह मतलब बिल्कुल नहीं कि राजनीति के क्षेत्र में महिलाओं की दस्तक नहीं हो रही है। पिछले दिनों दिल्ली में हुए नगर निगम चुनावों में लगभग सभी छोटी बड़ी पार्टियों की पहली पसंद महिला उम्मीदवारों के युवा एवं ताज़ा चेहरे थे। भारतीय राजनीति में यदि महिलाओं के चेहरे खोजें जाएँ तो उँगलियों में गिनने लायक उदाहरण ही मिलते हैं। ममता बनर्जी, महबूबा मुफ़्ती और वसुंधरा राजे सिंधिया वर्तमान में तीन राज्यों में मुख्यमंत्री के चेहरे हैं। इसके अलावा भारतीय राजनीति के इतिहास में कुछ ऐसे चेहरे हैं जो काफी वक़्त तक टिके रहे और आज भी उदाहरण के रूप में आते हैं।

अपराजिता राजा

सुर्खियों में रहने वाले जवाहरलाल विश्वविद्यालय में आगामी 8 सितंबर को छात्र संघ चुनाव होने वाला है। चुनाव में हिस्सा ले रहे छात्र संगठनो ने महिला उम्मीदवारों को मैदान में उतारा है, जिनमें अधिकांश दलित-ओबीसी  लडकियां हैं। यह वास्तव में एक सकारात्मक सक्रिय कदम भी है जिसमें महिलाओं को एक पूरी पिक्चर वाला फ्रेम मिल रहा है। महिला उम्मीदवारों के चुनाव में भाग लेने से विश्लेषण, परिस्थिति और शब्दावली बदलती है या नहीं इसका पता धीरे धीरे चल जाएगा। फिर भी यह चुनाव दिलचस्प साबित होने जा रहा है।

जेएनयू छात्रसंघ चुनाव इसलिए भी खास होगा क्योंकि ‘9 फरवरी’ की घटना होने के बाद यहाँ पढ़ने वाली छात्राओं को लेकर अभद्र टिप्पणियाँ तो की ही गईं साथ ही साथ कुछ फुरसतिए नेताओं द्वारा कूड़ा करकट में झांक कर कंडोम भी गिने गए। छात्र-छात्राओं को निशाना भी बनाया गया और उन पर देशद्रोह का लेबल भी चिपकाया गया। छात्राओं के लिए उन तमाम शब्दों का इस्तेमाल हुआ जो किसी भी सभ्य समाज में निंदनीय हैं। इसलिए हर मुश्किल का सामना करते हुए भी मुद्दों के साथ अपनी पार्टी की सोच को ये महिला उम्मीदवार रख रही हैं साथ ही साथ एक औरत की नज़र में तमाम विषय किस रूप में ढल जाते हैं, यह भी सामने निकल कर आ रहा है। आइये छात्रसंघ चुनाव में खड़ी होने वाली सभी महिला उम्मीदवारों से एक परिचय किया जाये। सबसे महत्वपूर्ण है कि छात्रसंघ के अध्यक्ष पद के लिए तीन छात्र संगठनों की उम्मीदवार दलित-पसमांदा छात्राये हैं.




1. अपराजिता राजा- प्रेसिडेंट पद के लिए ऑल इंडिया स्टूडेंट फेडरेशन (एआईएसएफ)
की  उम्मीदवार अपराजिता राजा हैं। वह राजनीति विभाग में ही पीएचडी की द्वितीय वर्ष की छात्रा हैं। उनके मुताबिक़ जेएनयू प्रबंधन के खराब प्रबंधन, इस साल एम. फ़िल. एवं पीएचडी सीट कट को बड़ा मुद्दा मानती हैं। बहुत बड़ी संख्या में सीटों की कटौती को वह बड़ा मसला मानती हैं। वे यह भी मानती हैं कि यह चुनाव बेहद कठिन दौर में हो रहा है जबकि विश्वविद्यालयों पर लगातार हमले हो रहे हैं। अपनी बातचीत में वह विभिन्न विषयों पर आलोचना और आत्म आलोचना जैसे शब्दों की बात करती हैं। उनके मुताबिक उनके पास राजनीति में रहने का और करीब से देखने का लंबा अनुभव भी है। वे पिछले दिनों जेएनयू में चले सारे छात्र आन्दोलन के अगले दस्ते में थीं और दिल्ली तथा दिल्ली के बाहर भी छात्र आंदोलनों में काफी सक्रिय रहीं, कई बार पुलिस की बेरहम लाठियों की मार उन्हें झेलनी पड़ी थी. अपराजिता कम्युनिष्ट माँ (एनऍफ़आईडवल्यू की महासचिव एनी राजा) और पिता (सीपीआई के राष्ट्रीय सचिव नेता और राज्यसभा सांसद डी राजा) की इकलौती संतान हैं. अपराजिता अपने चुनावी संबोधनों और सवालों में कश्मीर से लेकर जेंडर जस्टिस के सारे सवाल कैम्पस, के भीतर और बाहर दो से जुड़े सवाल उठा रही हैं. जेएनयू से गायब हो गया छात्र नजीब एबीवीपी को छोड़कर सभी छात्र संगठनों का मुद्दा है. अपराजिता अपने छात्र संगठन एआईएसएफ के भीतर भी विभिन्न मुद्दों पर बहसें तेज करने की बात कह रही हैं, यदि वे जीत कर आती हैं.


अपराजिता अपने कामरेड के साथ

 


2. शबाना अली-बिरसा अंबेडकर फुले स्टूडेंट असोशिएशन (बापसा) ने
अपना उम्मीदवार शबाना अली को बनाया है जो पश्चिम बंगाल से हैं। उनकी पढ़ाई लिखाई बनारस से पूरी हुई है। यह संगठन दूसरी बार चुनाव मैदान में है। पिछले साल बहुत कम मतों के अंतर से यह विजेता संगठन बनने से रह गया था। शबाना अली, लेफ्ट द्वारा जय भीम और लाल सलाम नारे को लगाने के ये बिलकुल पक्ष में नहीं दिखती। इनका मानना है कि हाशिये के लोगों को अब खुद से ही अपनी आवाज़ दर्ज़ करवानी होगी। इनके मुद्दे संघ और बीजेपी द्वारा किए जा रहे हमले, फिर चाहे वे गौ के नाम की जा रही हत्या हो या फिर दलितों पर किए जारे हमले निशाने पर है। जेएनयू के अंदर इनका मुख्य ध्यान यूजीसी गज़ेट, एम. फ़िल. एवं पीएचडी सीट कट,फ़ंड में की जा रही कटौती की खिलाफत में हैं। इसके अलावाजेएनयू छात्र नजीब अहमद की गुमशुदगी को भी यह एक बड़े मुद्दे के रूप में देखते हैं। टीचर और छात्रों के लिए आरक्षण को फिर से लागू करने की भी इनका लक्ष्य लक्ष्य है। बापासा ने जेएनयू में पिछले चुनाव के दौरान से ही अपनी जबरदस्त उपस्थिति दर्ज कराई है।


शबाना अली

3. गीता कुमारी- ऑल इंडिया स्टूडेंट असोशिएशन(आइसा),
स्टूडेंट फेडरेशन ऑफ इंडिया (एसएफआई) और डमोक्रेटिक स्टूडेंट फेडरेशन (डीएसएफ) जैसे छात्र संगठनों ने एक साथ मिलकर छात्रसंघ चुनाव लड़ने का निर्णय लिया है। इस गठबंधन की उम्मीदवार गीता कुमारी हैं। वह हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं और उनके पिता आर्मी में है। उनकी पढ़ाई इलाहाबाद से हुई है और उनके मुताबिक जेएनयू की अफोर्डेबल फीस और हॉस्टल की व्यवस्था ने उन्हें इस विश्वविद्यालय में आने के लिय प्रेरित किया। वह जेएनयू की तीन पार्टियों के गठबंधन की अध्यक्ष पद की उम्मीदवार हैं। उनके लिए इस चुनाव में अहम मुद्दे नीति के स्तर पर किए जा रहे बदलाव जैसे यूजीसी गज़ेट, हॉस्टल सुविधा, जीएस कैश, डेपरिवेशन पॉइंट्स आदि जैसे मुद्दे हैं। वह खुले तौर पर एबीवीपी को अपना प्रतिद्वंदी मान रही हैं और विश्वविद्यालय के वर्तमान वीसी द्वारा उठाए कदमों के सख्त खिलाफ हैं।
 
गीता कुमार

 



4. निधि त्रिपाठी- एबीवीपी ने अपना उम्मीदवार निधि त्रिपाठी को बनाया है। वह जेएनयू के संस्कृत विभाग की छात्रा हैं। उनका मानना है कि वह स्टूडेंट्स मुद्दों को चुनाव में उठाएंगी। इसके अलावा बीते समय में उनके संगठन द्वारा कैम्पस में की गई भूख हड़ताल और वीसी से अपनी मांगों को मनवाने जैसी बातों को अहम उपलब्धि मान रही हैं। राष्ट्रवाद निधि का प्रमुख एजेंडा है, लेकिन उनके सामने चुनौतियां कम नहीं हैं. यह छात्र संगठन कैम्पस में अति उग्र दक्षिणपंथ और बाहरी लोगों के दखल को बढाने का आरोप झेल रहा है.

 
निधि त्रिपाठी अपने साथियों के साथ

5.
वृष्णिका सिंह-कॉंग्रेस पार्टी की छात्र इकाई एनएसयूआई ने अध्यक्ष पद की उम्मीदवार वृष्णिका सिंह को बनाया है। ये भी सीट कट को एक बड़ा मुद्दा मान रही हैं और इसके अलावा जेएनयू के स्टूडेंट्स को दिये गए लेबल्स जैसे देशद्रोही या नक्सली आदि नामों के खिलाफ हैं। उनका मानना है कि विश्वविद्यालय की एक इमेज बनाई गई है जो खतरनाक है और इससे यहाँ के विद्यार्थियों को पास आउट होने के बाद नौकरी व अन्य जगहों पर दिक्कत का सामना करना पड़ा है। अपना प्रतिद्वंदी लेफ्ट और एबीवीपी दोनों को मान रही हैं।
 
वृष्णिका सिंह अपने साथियों के साथ 
जोड़, तोड़ और मरोड़ कर देखें तो सभी संगठनों के मुद्दों में बहुत बड़ा फेरबदल नहीं है। सीट कट और यूजीसी गज़ेट जैसे बड़े मुद्दों पर सभी के अपने अपने तर्क हैं। राइट विंग को लगभग सभी छात्र नेत्रियाँ अपना बड़ा प्रतिद्वंदी मान कर चल रही हैं। वहीं बापसा जैसा नया संगठन अपनी धमक कैम्पस में मजबूती से दर्ज़ करवा रहा है। इसलिए पहले से ही चुनाव के परिणाम का अंदाज़ा लगाना कठिन है। हालांकि अपराजिता का चुनाव मैदान में होना बापसा और जेएनयू के वाम गठबंधन दोनो के लिए चुनौती होगी. अपराजिता का वामपंथी होना और दलित मुद्दों को एक इंसाइडर की तरह देखना और उसपर लगातार सक्रिय  रहना दोनो संगठनों के पारम्परिक वोट के बीच एक  चुनौती होगा, वहीं एआईएसफ के कन्हैया कुमार की उपस्थिति भी मायने रखती है.म  कि चुनाव के बाद परिणामों का इंतज़ार किया जाये और उन दो पुरुष उम्मीदवारों को भी न अनदेखा किया जाये जो कैम्पस में निर्दलीय के रूप में चुनाव लड़ रहे हैं।


ज्योति प्रसाद नेहरू विश्वविद्यालय के भारतीय भाषा पीठ  में शोधरत है.

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दलित छात्रा को मध्य प्रदेश नाट्य विद्यालय ने चयन के बाद भी नहीं दिया दाखिला

स्त्रीकाल डेस्क 

मध्य प्रदेश नाट्य विद्यालय, भोपाल अपने एक विवादास्पद फैसलों के कारण सुर्ख़ियों में है. इसने अपने यहाँ एक पाठ्यक्रम के लिए चयनित दलित छात्रा, पूनम दहिया को नामांकन न देकर उसकी सीट पर किसी लड़के को नामांकन दे दिया है. यह नाट्य विद्यालय मध्यप्रदेश सरकार के संस्कृति  मंत्रालय के अधीन आता है. दो दिन से छुट्टी के कारण उसके अधिकारियों से बात नहीं हो पायी है. स्त्रीकाल ने मध्य प्रदेश नाट्य विद्यालय के निदेशक संजय उपाध्याय से सम्पर्क किया तो उन्होंने  बताया कि चूकि वह ग्रैजुएशन का अपना सर्टिफिकेट समय जमा नहीं करा पायी इसलिए नामांकन एक लड़के को दे दिया गया. हालांकि उनके पास इस बात का समुचित जवाब नहीं था कि जब विश्वविद्यालय का रिजल्ट ही नहीं आया था तो वह सर्टिफिकेट कहाँ से जमा करायेगी. उसे एक्स्टेंशन दिया जा सकता था. संजय उपाध्याय  के तमाम दावों के बावजूद प्रथम दृष्टया न्याय दाखिला से वंचित की लडकी के पक्ष में है.

पूनम दहिया

पूनम दहिया ने अपने फेसबुक पोस्ट पर लिखा है: 

मध्यप्रदेश नाट्य विद्यालय भोपाल में इस साल मैं भी चयनित हुई थी, लेकिन शिक्षा से वंचित कर दी गई। मुझे कारण बताया गया कि “आप का रिजल्ट नही आया है इस लिए आप को एडमिशन नही मिलेगा ।”
बाद में मेरी ही जैसी स्थिति में एक दूसरे लड़के को एडमिशन दे दिया गया।
मुझे लगातार फोन में कहा गया की ‘इस साल तुम चुप रहो,तुम्हे अगले साल ले लिया जायेगा।
लेकिन मेरा जो ये साल खराब हुआ, उसका क्या? मेरी जगह कोई वेटिंग का पढ़ रहा है,और मैं चयनित हो कर भी अगले साल का इंतेजार करूँ?
एक ही आधार पर एक का चयन कर लिया गया और मेरा नही, ये कैसी रंगशाला है?
और जब मैंने पूछा कि ऐसा क्यों किया गया ये गलत है तो मुझे कहा गया कि ‘हमे सही गलत मत बताओ’
मेरी इस लड़ाई में कोई मेरा साथ नही है मैं अकेली हूँ। क्या आप मेरा साथ देंगे

चयन सूची

पीड़ित छात्रा के पक्ष में नाट्य आलोचक और ‘समकालीन रंगमंच’ के सम्पादक राजेश चन्द्र  ने अपने फेसबुक पेज पर लिखा: 

सीधी, मध्य प्रदेश की अत्यंत प्रतिभाशाली अभिनेत्री और रंगकर्मी Poonam Dahiya को अंतिम परीक्षा पास करने और दाख़िले का औपचारिक पत्र प्राप्त करने के बावज़ूद मध्य प्रदेश नाट्य विद्यालय ने दाख़िला नहीं लेने दिया, जबकि वह रिज़र्व कोटे से थीं। उसी स्थान पर एक सामान्य कोटे के रंगकर्मी का दाख़िला ले लिया गया। कहा जाता है कि यह दाख़िला भोपाल के एक अन्तर्राष्ट्रीय प्रसिद्धि के रंग-निर्देशक की इच्छा से लिया गया, जिनका विद्यालय के प्रशासन पर अप्रत्यक्ष रूप से लगभग वर्चस्व और एकाधिकार रहता आया है।
पूनम ने इस अन्याय के ख़िलाफ़ लड़ने का फ़ैसला लिया और न केवल फेसबुक पर अपनी आपबीती लिखी, बल्कि एमपी के संस्कृति सचिव को एक औपचारिक शिकायत पत्र दिया है, और उसकी प्रतियां सभी सम्बंधित अधिकारियों को भेजी हैं। उसने मामले की जांच करने के साथ-साथ यह भी मांग रखी है कि उसे इसी सत्र में दाख़िला दिया जाये, ताकि उसके जीवन का क़ीमती एक साल बर्बाद होने से बचे।
पूनम की इस सार्वजनिक अपील को समर्थन देते हुए कुछ दिनों पहले मैंने भी एक पोस्ट लिखी थी और उसमें नाट्य विद्यालय के निदेशक तथा वरिष्ठ प्रोफेसर को टैग भी किया। दुखद स्थिति यह है कि इतने दिनों बाद भी विद्यालय प्रशासन का कोई पक्ष सामने नहीं आया। इससे दो बातें सिद्ध होती हैं। पहली, विद्यालय प्रशासन ने यह स्वीकार कर लिया है कि उसने ठगी की है, और दूसरी, वह सत्ता और शक्ति के मद में इतना चूर है कि अपनी कोई जवाबदेही नहीं समझता। उसे लगता है कि रंगमंच की बिरादरी कायर, रीढ़विहीन, लालची, लिजलिजे चाटुकारों तथा सत्ता का गुणगान करने वालों से ही भरी हुई है और इस या ऐसे किसी मामले में पीड़ित या पीड़िता का साथ देने के लिये कोई भी रंगकर्मी आगे नहीं आयेगा। उसका सोचना काफी हद तक सही और तथ्यपरक है।

नामांकन के लिए आमन्त्रण पत्र

सीधी रंगमंच की दृष्टि से कुछ वर्षों में चर्चा में रहा है। वहां के कई रंगकर्मी अपनी पहचान बनाने में कामयाब हुए हैं। सीधी में रंगमंच की गतिविधियां भी नियमित रूप से होती हैं और भोपाल, जहां नाट्य विद्यालय स्थित है, देश के कुछ प्रमुख रंग केन्द्रों में से एक है, वहां अनगिनत ख्याति-प्राप्त रंगकर्मी रहते और रंगकर्म करते हैं।
इतनी लंबी भूमिका के बाद मैं मूल बात पर लौटता हूं कि क्या कारण है कि दो-एक लोगों को छोड़ कर सीधी, भोपाल और मध्य प्रदेश के रंगकर्मी पूनम के साथ हुए अन्याय पर ख़ामोश हैं? क्या सिर्फ़ इसलिये नहीं कि वे पूनम का साथ देकर ताक़तवर संस्थान और लोगों से अपने संबंध ख़राब नहीं करना चाहते हैंं? साथ देना तो दूर की बात, वे तो खुल कर पीड़िता का विरोध करने की भी हिम्मत नहीं जुटा पाते।
एक रंगकर्मी अन्याय को होता हुआ देख कर ख़ामोश रहता है तो वह रंगकर्मी कहलाने की न्यूनतम पात्रता भी पूरी नहीं करता। यही पर आकर लगने लगता है कि आज रंगकर्मी होने के मूल्य में भयावह गिरावट आ गयी है। रंगकर्मी सत्ता और व्यवस्था से मिल-मिला कर रहना चाहता है क्योंकि वह अपने पेट और टुच्ची सुविधाओं से आगे देखता ही नहीं। यह सब देख कर बहुत पीड़ा होती है। हमने रंगकर्म को क्या बना डाला है!

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परमानन्द रमन की कविताएँ

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परमानन्द रमन

कला शिक्षक,केंद्रीय विद्यालय टाटानगर ,जमशेदपुर. संपर्क : potter.raman@gmail.com मो.8404804440

गर्भ 
पुरुष
तुम स्त्री नहीं हो सकते
तुम हो सकते हो
एक महान ग्लेशियर
पिघलना तुम्हारी प्रवृति है
तुमने बहना नहीं सिखा
तुम नदी नहीं हो सकते

तुम हो सकते हो
एक विशाल मरुस्थल
फैलना तुम्हारी फितरत है
तुम उगना नहीं जानते
तुम खेत नहीं हो सकते

तुम हो सकते हो
एक जागृत जवालामुखी
उन्माद तुम्हारी संस्कृति है
तुम शीतल होना नही जानते
तुम शैवाल नहीं हो सकते

तुम हो सकते हो ब्रह्माण्ड का
सबसे चमकीला तारा
वैभव तुम्हारा विविरण है
तुम धारण करना नहीं जानते
तुम पृथ्वी नहीं हो सकते

पुरुष
तुम एक साथ
कई रूपाकार होकर
हो सकते हो स्वयं में
उदात्त

तुम हो सकते हो सभ्यता के
प्राचीनतम मंदिर के
गर्भगृह में स्थापित
देव प्रतिमा
अनश्वरता तुम्हारी सत्ता है
किन्तु तुम जन्म देना
नहीं जानते
तुम गर्भ नहीं हो सकते

पुरुष
तुम स्त्री हो ही नहीं सकते


मोसूल की लड़की


एक अस्त-व्यस्त सी लड़की
प्यार करना सीख गई है
और उससे एक अर्से पहले
सीख चुकी है
नाराज़ होना
मोबाईल को फेंककर
डिस्कस की तरह
खिड़कियों के ज़र्द चेहरो पर
परदा पहनाकर
धप्प से धंस जाती है बिस्तर मे
फिर तमतमाते हुए
फेसबुक की स्टेटस लाईन पर
लिखती है
वह प्रतिज्ञा जिसमें द्रौपदी
धोना चाहती है अपने केश
मानव-रक्त से
कुछ नाम और तस्वीरों के चेहरों को
हेयर क्लीप से गोद कर
जला देती है
अपने स्लैम-बुक के कुछ पन्नें
तस्वीरें, चाँकलेट रैपर्स
आई-लाईनर के टुकड़े
धागे और अधजले कार्डस

जैसे धमाकों के बाद
ईराक का कोई सुलगता शहर
वो झुंझलाहट में पोंछ देती है
कायनात के सारे रंग
नेलपेन्ट रिमूवर से
और सो जाती है
तकिए पर सिसकियाँ लिखते-लिखते
फिर उठती है
जब नारंगी फूलों का मौसम आता है
और फिर से सीख लेती है
प्यार करना
तुम अभी तक नाराज़ हो मुझसे
और वो शहर भी ईराक का
अभी तक सुलग रहा है

औरतें उम्र छुपाती है

औरतें उम्र छुपाती है
और फिर उसे ढ़ून्ढतीं रहती हैं
उम्र भर
अचार के मर्तबान
बताशे के डिब्बे
और सिन्दूर-दानी में
बस हड़बड़ाहट में
ढूढँती ही रहती है
दर-असल औरतों को उम्र छुपाना
आता ही नहीं
अगर आता तो बजाए उसे छुपाने के
ले जाकर फेंक आती उम्र
अंतरिक्ष में
मगर औरतें फेंकना भी नहीं जानतीं
उन्हे तो सिखाया जाता है सहेजना
वे उम्र को भी बस सहेजती रहतीं हैं
जबतक वो आ नहीं जाता
किसी उम्रदराज़ की नज़र में
और फिर शुरू हो जाते हैं
उम्र के ताने
तब औरतें उम्र की आड़ मे
छुपाने लग जातीं हैं देह
और फिर से नाकामयाब रहती है
नहीं छुपा पाती है

खुद को देह होने से
ना आँखों के डार्क-सर्कल्स
झाईयाँ,एड़ीयों की दरार
ना प्रेम, सर्मपण और प्रतिकार
चूल्हे के सामने जितनी सहज होती है
इन्सानों में उतनी ही सजग
अपने हैण्डबैग में
दुनियाभर की बेहतरी का
साजो-सामान छुपाए
औरतें
उम्र तो कभी छुपाती ही नहीं
बस जल्दीबाज़ी में
कहीं रख देतीं है
और भूल जातीं हैं

तीसरी स्त्री 

पहली स्त्री
नतमस्तक कर
निज को
पुरूष चरणों में
कहती है
मै दासी हूं

दूसरी स्त्री
पांव रखकर
पुरुष की छाती पर
अठ्ठाहस करती
कहती है
मै शक्ति हूं

तीसरी स्त्री
पग उठाये
लाँघ रही है देहरी
घर-आँगन की
स्वयं से
कह रही है
मैं हूं स्वामिनी
स्वयं की

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स्त्री-पुरुष समता का देश भर में अलख जगा रहे राकेश कुमार सिंह से एक ख़ास बातचीत

पिछले तीन-चार सालों से राकेश कुमार सिंह जेंडर जस्टिस के लिए, महिला-हिंसा के खिलाफ, महिलाओं के प्रति समाज का नजरिया बदलने के लिए, देश भर में सायकल से घूम रहे हैं. वे देश के कई राज्यों में घूम चुके हैं. अगले साल वे इस यात्रा को खत्म करने वाले हैं. अभी इन दिनों हरियाणा से होते हुए दिल्ली पहुँच रहे  हैं, जहाँ वे कई जगह घूमेंगे और अपनी बात युवाओं के बीच रखेंगे.  उनसे स्त्रीकाल के लिए ज्योति प्रसाद की ख़ास बातचीत

अमृता सिन्हा की कविताएँ

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अमृता सिन्हा


स्वतंत्र लेखन, विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित संपर्क: a.sinhamaxnewyorklife@ymail.com

 
        यक्ष-प्रश्न

हाँ, याद है उसे
माँ की दी हुई नसीहतें ।
कूदती-फाँदती , दरख़्तों की दरारों
से झाँकती, गिलहरियों सी,
कभी रंग – बिरंगी तितलियों सी
उड़ जाती हैं बेटियाँ ।
बात- बात में टोकती , आँखें तरेरती
माँ की हिदायतों के बीच
बचपन में ही बड़ी , बहुत बड़ी
होती जाती हैं , बेटियाँ ।
भूल ही नहीं पाती वो ,बचपन
की हँसी , बेबाक़ , बेसाख़्ता , बेमानी
रोक दिया था माँ ने तब, बतलाया था उसे
यूँ बेसाख़्ता हँसा नहीं करती हैं ,बेटियाँ ।
मालूम है , सीखना होगा उसे
हर सलीक़ा ज़िन्दगी का
रखना होगा ख़्याल हर सलवटों का
ढकना होगा दुपट्टे से बदन अपना
लगाना होगा चेहरे पर
दही बेसन का मिश्रण
बचना होगा धूप के तांबई रंग से
सहेजना होगा लंबे बालों को
क्योंकि पराया धन होती हैं , बेटियाँ ।
जुगनू से टिमटिमाते सपनों  को
भरना होगा काजल की डिबिया में ,
लपेटना होगा , चुपचाप ,पनीली आँखों से,
छितरे बचपन के ऊनी गोले को ।
एक देहरी अनजान सी,संकरी है गली जिसकी,
बेग़ाना है समूचा शहर, आँखों से झरता समंदर
विस्मृत सी , सोचती है वह अक्सर
कहीं अम्माँ  भूल तो नहीं गईं, भेजना
उसकी हँसी की गठरी ,छोड़ आई थी जिसे वहीं पर,
इसी ऊहापोह में तय करती जाती हैं ,
करछी और कढ़ाही के बीच का सफ़र , बेटियाँ ।

         अस्तित्व

यायावर मन
भटकता, पहुँचा है
सुदूर , संभावनाओं के शहर में
बादलों से घिरा
ऊँचाईयों में तिरता, फिसलता सा
वर्षा की बूँदों को चीरता
उतर आया है मेरा इन्द्रधनुष
काली सर्पीली सड़कों पर
दौड़ता, भागता, बेतहाशा
नदी के बीचों- बीच सुनहरे
टापू को एकटक निहारता ।
करवटें लेती लहरों से खेलता
ऊँचे – ऊँचे दरख़्तों में समाता
जाने कहाँ-कहाँ विचर रहा
मेरा इन्द्रधनुष ।
तभी नन्हा सा छौना, बेटा मेरा
काटता है चिकोटी , बाँहों में मेरे
अनायास ही टूटती है तंद्रा मेरी
पूछता है मुझसे
माँ क्या बना  ?
जागती हूँ मैं स्वप्न से
कटे वृक्ष की तरह
और परोस देती हूँ, थाली में
हरे-भरे मायने और रंग- बिरंगे शब्द ।

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महिलाओं को साहस से भर देते हैं बलात्कारियों के खिलाफ ऐसे निर्णय

आये दिन समाचारपत्र बलात्कार की खबरों से भरे-पड़े होते हैं. उनमें से कुछ ख़बरें, नियमित अंतराल पर, टीवी मीडिया की सुर्खियाँ भी बनती हैं. न्यायालय के फैसले बलात्कारियों को कठोर दंड भी देते हैं. पढ़ें ऐसे फैसले देते हुए कोर्ट की टिप्पणियाँ, जो समाज के तलछट और समाज में धार्मिक-राजनीतिक वर्चस्व बनाये हस्ती के खिलाफ उदाहरण पेश करते हैं. लडकियां अपनी लड़ाई लड़ें तो बलात्कारी के रसूख काम नहीं आते.

राम रहीम केस 
डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख गुरमीत राम रहीम सिंह को सजा सुनाते हुए सीबीआई के स्पेशल जज जगदीप सिंह ने तीखी टिप्पणियां भी कीं। उन्होंने गुरमीत राम रहीम को किसी तरह की दया के काबिल न मानते हुए उसकी तुलना जंगली दरिंदे से की।

कोर्ट इस नतीजे पर पहुंचा कि अगर अभियुक्त ने अपनी पवित्र शिष्याओं को ही नहीं बख्शा और उनके साथ जंगली दरिंदे की तरह बर्ताव किया तो वह किसी तरह दया का पात्र नहीं है। जिस आदमी का मानवीयता से कोई नाता नहीं हो और जिसकी प्रवृत्ति में कतई रहम न हो, वह कोर्ट की नरमी का पात्र नहीं हो सकता है।


 कोर्ट ने कहा कि अपनी शिष्याओं का यौन शोषण करने और उन्हें खौफनाक हश्र की धमकी देने वाला शख्स कोर्ट की सहानुभूति के लायक नहीं है। सुप्रीम कोर्ट कह चुका है कि रेप केवल शारीरिक आघात नहीं है। यह पीड़िता के संपूर्ण व्यक्तित्व को नष्ट कर देता है। दोनों पीड़िताओं ने अभियुक्त को `भगवान` की जगह बैठा रखा था और उसे इसी तरह पूजती थीं। लेकिन अभियुक्त ने ऐसे मासूम और अंध अनुयायियों के साथ यौन हिंसा कर विश्वास को भयावह रूप से खंडित किया। एक अभियुक्त जो एक धार्मिक संस्था डेरा सच्चा सौदा का प्रमुख बताया गया है, की ऐसी आपराधिक कारगुजारी इस देश में स्मृति से भी पहले से चली आ रही पवित्र, पूज्य, आध्यात्मिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक संस्थाओं की छवि को तोड़ देगी। अभियुक्त के कृत्य ने इस प्राचीन धरा की धरोहर को अपूर्णीय क्षति पहुंचाई है।

कोर्ट ने महात्मा गांधी को भी उद्धृत किया, “नारी को अबला कहना उसकी निंदा करना है; यह पुरुष का नारी के प्रति अन्याय है। यदि शक्ति का अर्थ पाशविक शक्ति है तो सचमुच पुरुष की तुलना में स्त्री में पाशविकता कम है। और यदि शक्ति का अर्थ नैतिक शक्ति है तो स्त्री निश्चित रूप से पुरुष की अपेक्षा कहीं अधिक श्रेष्ठ है। क्या उसमें पुरुष की अपेक्षा अधिक अंतःप्रज्ञा, अधिक आत्मत्याग, अधिक सहिष्णुता और अधिक साहस नहीं है? उसके बिना पुरुष का कोई अस्तित्व नहीं है। यदि अहिंसा मानव जाति का नियम है तो भविष्य नारी जाति के हाथ में है… हृदय को आकर्षित करने का गुण स्त्री से ज्यादा और किसमें हो सकता है?“

निर्भया केस 
दोपहर 2.03 बजे 


सुप्रीम कोर्ट के तीनों जज- जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस अशोक भूषण और जस्टिस आर. भानुमति कोर्ट में आए। जस्टिस मिश्रा और जस्टिस भूषण ने हर चीज को रिकॉर्ड में लिया। जस्टिस मिश्रा और जस्टिस भूषण दाेषियों को फांसी के फेवर में थे। कोर्ट ने 20 मिनट में फैसला सुनाया।

. बेंच ने अपने फैसले में हर डिटेल पर गौर किया, जैसे गैंगरेप के बाद पीड़िता ने दर्द झेला, उसके प्राइवेट पार्ट में लोहे की रॉड तक घुसाई गई और उसे फ्रेंड के साथ बस से बाहर फेंक दिया गया।

. कोर्ट ने कहा, “घटना को बर्बर और बेहद क्रूर तरीके से अंजाम दिया गया। दोषियों ने विक्टिम को अपने एन्जॉयमेंट के लिए इस्तेमाल किया। फैसले में रहम की गुंजाइश नहीं है।”

. “घटना समाज को हिला देने वाली थी। घटना को देखकर लगता है कि ये धरती की नहीं बल्कि किसी और ग्रह की है। घटना के बाद सदमे की सुनामी आ गई।”

. आखिरी फैसले के बाद कोर्ट रूम में तालियां बजीं। ‘पीड़िता के बयान पर शक नहीं किया जा सकता’

.  बेंच ने कहा, “दम तोड़ रही विक्टिम का बयान अभी तक कायम है। उस पर किसी लिहाज से शक नहीं किया जा सकता। उसके हावभाव सारी घटना को बता रहे थे। डीएनए टेस्ट से भी दोषियों के मौके पर होने का पता चलता है।”

. “दोषियों ने विक्टिम को बस से कुचलकर मारने की कोशिश भी की। बाद में सिंगापुर में इलाज के दौरान निर्भया की मौत हो गई। लोगों को तभी भरोसा आएगा, कठोरता से फैसला हो। घटना समाज को झकझोर देने वाली है। ये रेयरेस्ट ऑफ रेयर केस है।”

जस्टिस भानुमति ने क्या कहा?

. अलग से दिए अपने फैसले में जस्टिस भानुमति ने कहा, “मौत की सजा सुनाने के लिए अगर इस केस को रेयरेस्ट ऑफ रेयर नहीं कहा जाएगा तो फिर किसे कहेंगे।”

.  “दोषियों का बैकग्राउंड, उम्र, कोई आपराधिक रिकॉर्ड न होना और जेल में अच्छा बर्ताव जैसी चीजें कोई मायने नहीं रखतीं।”

क्रमशः
janchaowkcom और bhaskacom से साभार 


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दलित छात्रा ने की आत्महत्या मोदी सरकार के फैसले को कोर्ट में उसने दी थी चुनौती

नेशनल एलिजिबिलिटी कम एंट्रेंस टेस्ट यानी नीट के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में बहस करने वाली तमिलनाडु के अरियालुर जिले की दलित लड़की अनीथा  ने आत्महत्या कर ली है.

द हिंदू के मुताबिक अनीथा ने कुझुमुर गांव में स्थित अपने घर में फांसी लगाकर आत्महत्या की. दैनिक मजदूर की 17 वर्षीय बेटी अनीता ने तमिलनाडु स्टेट बोर्ड की बारहवीं की परीक्षा में 1200 में से 1176 नंबर पाये थे. जिसके आधार पर उनका एडमिशन एमबीबीएस में हो जाता लेकिन नीट परीक्षा के चलते ऐसा संभव नहीं हुआ. नीट की परीक्षा में अनीता को केवल 86 नंबर ही मिले थे.

गौरतलब है कि पिछले साल तक तमिलनाडु में मेडिकल कॉलेज में दाखिल बारहवीं में प्राप्त अंकों के आधार पर हो जाता था. हालांकि नीट परीक्षा का आयोजन केंद्र सरकार ने पिछले साल भी किया था लेकिन तब तमिलनाडु को इससे छूट मिल गई थी. इस साल भी तमिलनाडु सरकार ने अध्यादेश लाकर नीट परीक्षा से बाहर होने का प्रयास किया था लेकिन 22 अगस्त को सुप्रीट कोर्ट ने इसे खारिज कर दिया था.

सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु में एमबीबीएस और बीडीएस पाठ्यक्रमों में नामांकन के लिए तमिलनाडु सरकार को नीट के तहत मेडिकल काउंसलिंग कराने का निर्देश दिया था. कोर्ट ने कहा था कि काउंसलिंग प्रक्रिया 4 सितंबर तक पूरी हो जानी चाहिए. इसके बाद केंद्र ने भी कहा था कि इस मामले में तमिलनाडु को छूट नहीं जा सकती है.

इससे पहल केंद्र सरकार ने तमिलनाडु को इस पर राहत देने की बात कही थी. केंद्र ने कहा था कि सरकार इस तरह के अनुरोध पर सिर्फ एक साल के लिए विचार कर सकती है. लेकिन बाद में केंद्र अपने इस बयान से पीछे हट गई.

बता दें नीट का आयोजन मेडिकल और डेंटल कॉलेज में एमबीबीएस और बीडीएस कोर्सेस में प्रवेश के लिए किया जाता है. इस परीक्षा के द्वारा उन कॉलेजों में प्रवेश मिलता है, जो मेडिकल कांउसिल ऑफ इंडिया और डेटल कांउसिल ऑफ इंडिया के द्वारा संचालित किया जाता है.

द वायर से साभार 

धर्मांध होता संसार, डेरों में सिसकती जिंदगी!

कुमारी ज्योति गुप्ता


कुमारी ज्योति गुप्ता भारत रत्न डा.अम्बेडकर विश्वविद्यालय ,दिल्ली में हिन्दी विभाग में शोधरत हैं सम्पर्क: jyotigupta1999@rediffmail.com

‘‘यादव टोली का किसून कहता है ‘‘अंधामहंत अपने पापों का प्राश्चित कर रहा है। बाबाजी होकर जो रखेलिन रखता है, वह बाबाजी नहीं। ऊपर बाबाजी, भीतर दगाबाजी! क्या कहते हो? रखेलिन नहीं, दासिन है? किसी और को सिखाना। पांच बरस तक मठ में नौकरी की है, हमसे बढ़ कर और कौन जानेगा मठ की बात? और कोई देखे या नहीं, ऊपर परमेश्वर तो है। महंत ने जब लक्ष्मी दासी को मठ पर लाया था तो वह एकदम अबोध थी, एकदम नादान। एक ही कपड़ा पहनती थी, कहां वह बच्ची और कहां पचास बरस का बूढ़ा गिद्ध!’’ फणीश्वरनाथ रेणु ने 1954 में मैला आंचल उपन्यास लिखे  जो कि एक आंचलिक उपन्यास है।इसमें अंचल विशेष की कथा के साथ उन तमाम मुद्दों को उठाया गया है जो आज प्रसंगिक है।उदाहरण मठ के महंत का अय्याशीपन।आज हमारे देश में धर्म के नाम पर जो हो रहा है उसे रेणु ने 1954 में ही दिखा दिए थे। महंत सेवादास इलाके के ज्ञानी साधु के रूप में प्रसिद्ध थे।


पूर्णिया बिहार का छोटा सा जिला जहां के लोग अपनी अज्ञानता के कारण महंत सेवादास को सभी  शास्त्र-पुराण का ज्ञाता मानते थे।आज के संदर्भ में देखे तो हमारी जनता भी अंध भक्ति के कारण अय्याशों को महात्मा बना डालती है।इस पर कई फिल्में बनी, जागरुक लोग लिख कर , फिल्म बनाकर जनता को आइना दिखाते हैं पर भीड़ धर्म के नामपर जिस तरह बलात्कारियों का सहयोग कर रही है इसका अंजाम भी उसे ही भुगतना पड़ रहा है। शहर जलाए जा रहे हैं, लोग मर रहे हैं. खून की नदियां बह रही हैं लेकिन फर्क किसी को नहीं पड़ रहा। हम ऐसे समय में रहे हैं जहां अपना उल्लू सीधा करने के लिए हजार जानें चली जाए तो कोई फर्क नहीं पड़ता।  हम उस सदीमें , उस व्सवस्था में जी रहे हैं जहां इंसान की जान से ज्यादा धर्म के धोखेबाजों का महत्त्व है।भारत पूरे विश्व में धर्मिक सहिष्णुता और अनेकता में एकता के लिए विख्यात है लेकिन बाबाओं ने जिस प्रकार का आतंक फैला रखा है कि आनेवाले दिन में भारत धामिर्क पाखंडियों  के  नाम से जाना जाएगा। धर्म की आड़ में जनता के विश्वास से खेलनेवाले ढोंगियों जैसे आशाराम बापू, रामपाल और गुरमित राम रहीम आदि ने जो कर्मकाण्ड किया है वह क्षमा योग्य नहीं, इन पर तो हत्या का भी आरोप है फिर जनता ऐसे लोगों का सहयोग करके अपनी किस मानसिकता का परिचय दे रही है?

पंद्रह वर्ष पहले एक साध्वी ने तात्कालीन पी.एम को जो पत्र लिखा था उससे उसकी जैसी कई स्त्रियों की पीड़ा महसूस की जा सकती है ‘‘ डेरे के महाराज द्वारा सैकड़ों लड़कियों से बलात्कार की जांच करे …हमारा यहां शारीरिक शोषण किया जा रहा है। साथ में डेरे के महाराज गुरमीत सिंह द्वारा यौन शोषण किया जा रहाहै।’’क्या इस पत्र में उस साध्वी की पीड़ा लागों को नज़र नहीं आती जबकि रेणु ने तो इस पीड़ा को 1954 में ही महसूस कर लिया था जहां किसुन कहता है ‘‘ रोज़ रात में लक्ष्मी रोती थी ऐसा रोना कि जिसे सुनकर पत्थर भी पिघल जाए। हम तो सो नहीं सकते थे। उठकर भैसों को खोलकर चराने चले जाते थे। रोज़ सुबह लक्ष्मी दूध लेने आती थी, उसकी आंखे कदम की फूल की तरह फूली रहती थीं।रात में रोने का कारण पूछने पर चुपचाप टुकुर-टुकुर मुंह देखने लगती थी ठीक उस गाय की बाछी की तरह, जिसकी मां मर गई हो। ’’

गंभीर सवाल यह भी है कि स्त्रियाँ  कहां सुरक्षित हैं। न घर में, न परिवार में, न समाज में और न ही धार्मिक संस्थाओं में…सचमुच देख तेरे संसार की क्या हालत हो गई भगवान! कितना बदल गया इंसान! अब तो धर्म के नामपर खुलेआम अय्याशी हो रही है पर मूर्ख भीड़ सबकुछ जानते हुए भी चुप है , गलत का साथ दे रही है।मुक्तिबोध की एक पंक्ति आज प्रासंगिक लग रही है-
‘‘अब अभिव्यक्ति के खतरे उठाने होंगे
तोड़ने होंगे मठ और गढ़ सब’’

बुद्धिजीवी साहित्यकारों ने शुरू से ही अन्याय के खिलाफ, धोखे से भरे धर्म के खिलाफ लिखा । जनता को मार्ग दिखाने की कोशिश की और धर्म की आड़ में इंसनियत का चोला ओढ़कर हैवानियत की सीमा पार करनेवाले आतताइयों का मुखौटा भी उतारा जिन्होंने धर्म और आस्था को आड़ बनाकर अपनी रासलीला को अंजाम दिया।लेकिन आज इंसानियत की हार का समय चल रहा है जहां सिर्फ कौम, धर्म, जाति का घंटा बज रहा है और वह  कहावत भी सच होती नज़र आ रही है ‘‘जिसकी लाठी उसकी भैस’’ इसलिए अपराधी साफ कहता है ‘‘हमारी सरकार में बहुत चलती है। हरियाणा व पंजाब के मुख्य मंत्री, केंद्रीय मंत्री हमारे चरण छूते हैं।राजनीतिज्ञ हमसे समर्थन लेते हैं, पैसा लेते हैं , वे हमारे खिलाफ कभी नहीं जाएंगे। हम तुम्हारे परिवार के नौकरी लगे सदस्यों को बर्खास्त कर देंगे।सभी सदस्यों को अपने सेवादारों से मरवा देंगे।सबूत भी नहीं छोड़ेंगे।’’ इनकी ताकत इतनी अधिक है या यूं कहें इनका साहस इतना ज्यादा है कि राजनीति, पुलिस और न्याय व्यवस्था इन्हें अपने सामने बौना लगता है तभी तो ये किसी से नहीं डरते और जनता में  खुद को पैगम्बर बनाकर,नहीं नहीं खुदा बनाकर राज कर रहे हैं।

सवाल यह है कि इसका समाधान क्या है? क्या कानून व्यवस्था में परिर्वतन करने की जरूरत है क्योंकि अंध भक्ति  में लीन जनता कानून को भी तोड़ रही है। या फिर हमारी जनता की सामाजिक,  सांस्कृतिक और नैतिक सोच में बदलाव लाने की जरूरत है। कुछ समझ में नहीं आ रहा बस इतना सूझ रहा है कि सच को पहचाने, सच के हक में खड़े हो, पीड़िता को न्याय दिलाने के हक में आगे आए , सारे पूर्वाग्रहों को, धर्मिक अंधविश्वास को ताख पर रखकर इंसानियत के हक में खड़े हो।वर्ना मुक्तिबोध की तरह यही कहना पड़ेगा-
‘‘ओ मेरे आदर्शवादी मन
ओ मेरे सिद्धांतवादी मन
अबतक क्या किया
जीवन क्या जीया

बहुत-बहुत ज्यादा लिया
दिया बहुत-बहुत कम
मर गया देश
अरे !जीवित रह गए तुम’’

संदर्भ-


डेरों में सिसकती जिंदगी

स्त्रीकाल का प्रिंट और ऑनलाइन प्रकाशन एक नॉन प्रॉफिट प्रक्रम है. यह ‘द मार्जिनलाइज्ड’ नामक सामाजिक संस्था (सोशायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत रजिस्टर्ड) द्वारा संचालित है. ‘द मार्जिनलाइज्ड’ मूलतः समाज के हाशिये के लिए समर्पित शोध और ट्रेनिंग का कार्य करती है.
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