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क्या सच में गिरफ्तार होगा भाजपा समर्थक पिंटो परिवार: रायन स्कूल मर्डर केस

गुडगाँव के रायन स्कूल में 7 साल के बच्चे की ह्त्या के मामले में पूछताछ के लिए हरियाणा पुलिस मुम्बई पहुँच चुकी है. इतने गाजे-बाजे के साथ पुलिस रवाना हुई कि स्कूल के प्रबंधक रायन पिंटो और उनके परिवार ने अपनी अग्रिम जमानत की याचिका बॉम्बे हाई में आज ही डाल दिया. रायन इंटरनेशनल की मैनेजिंग डायरेक्टर ग्रेस पिंटो भाजपा के महिला मोर्चे की राष्ट्रीय सचिव हैं. सत्ता के गलियारे का पावरफुल कनेक्शन ही है कि इस मामले में पुलिस कर कुछ रही है, दिख कुछ रही है. 2015 में भी जब दिल्ली के रायन इंटरनेशनल में एक बच्चे की संदिग्ध मौत हुई थी, तब भी पिंटो परिवार पर आंच नहीं आई. जब उनपर 18 सौ करोड़ रूपये की कर चोरी का मामला आया तो उन्होंने खुद तथा अपने स्कूल के स्टाफ को भाजपा की सदस्यता दिलवा दी.

रायन पिंटो

स्कूल में बच्चे की हत्या के मामले में मृतक प्रद्युम्न के पिता वरुण ठाकुर की अर्जी पर सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार की सुबह सुनवाई की. वरुण ठाकुर ने अपनी याचिका में मामले की सीबीआई जांच कराने की मांग की थी. इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने हरियाणा सरकार, सीबीआई और केंद्र सरकार से सवाल पूछा कि क्यों न मामले की जांच सीबीआई को सौंप दी जाए?

इस बीच पुलिस ने स्कूल मैनेजमेंट के दो पदाधिकारियों को गिरफ्तार किया है. दोनों पदाधिकारियों को दो दिन की पुलिस रिमांड पर भेजा गया. पुलिस ने तीन दिन की रिमांड मांगी थी. पेशी के दौरान कोर्ट ने कहा कि स्कूल की खामियों के कारण छात्र की जान गई.

प्रद्युम्न के पिता वरुण ठाकुर ने कहा, “सर्वोच्च  न्यायलय ने हमारी याचिका पर केंद्र सरकार, हरियाणा सरकार और सीबीआई को नोटिस जारी किया है और तीन हफ्ते के भीतर जवाब देने को कहा है. ये नोटिस केवल एक स्कूल तक सीमित नहीं है, देश के सभी स्कूल को लेकर है. जिम्मेदारी तय हो, सीबीआई जांच हो ये हमारी मांग थी.” उन्होंने कहा कि उन्हें सुप्रीम कोर्ट और हरियाणा सरकार पर पूरा भरोसा है.

ग्रेस पिंटो

सवाल है कि प्रद्युम्न के पिता और सुप्रीम कोर्ट की सक्रियता के कारण पुलिस पिंटो परिवार तक पहुँचने का अहसास मात्र दे रही है, या POSCO कानून के तहत उनकी गिरफ्तारी के प्रति गंभीर है. सुप्रीम कोर्ट में अधिवक्ता अरविंद जैन कहते हैं कि बच्चे की ह्त्या और यौन शोषण के प्रयास के मामले में पिंटो परिवार की पूरी जवाबदेही है.

वाम गठबंधन की जीत, बापसा का शानदार प्रदर्शन, कन्हैया कुमार पर बरसे संगठन के ही लोग



स्त्रीकाल डेस्क 


पिछले कुछ सालों से जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के भगवाकरण की मुहीम को झटका लगा. विद्यार्थी समुदाय ने भारतीय जनता पार्टी के छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद को बुरी तरह नकार दिया, यहाँ तक कि मतदान के लिए भारी संख्या में डे स्कॉलर को लाना भी उनके काम न आया, जेएनयू विद्यार्थियों की मानें तो वे जितने डे स्कॉलर को गाड़ियों में भरकर लाये उतने भी वोट उन्हें नहीं मिले. इस चुनाव के और उसके परिणाम के कई और रंग  हैं .



 वाम   गठबंधन (अइसा, एसएफई और डी एस एफ) ने सेन्ट्रल पैनल की सभी सीटों, यानी अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, महासचिव और संयुक्त सचिव, पर अपना कब्ज़ा जमा लिया. इन पदों पर वाम गठबंधन के उम्मीदवार गीता कुमारी, सीमओं जोया खान, दुग्गीराला श्रीकृष्णा और शुभांशु सिंह क्रमशः 464,848, 1107 और 835 मतों के मार्जिन से जीते.

जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय का यह चुनाव कई मायने में अभूतपूर्व था. एक तो यह चुनाव भगवा ताकतों की जेएनयू प्रशासन के साथ मिलकर विश्वविद्यालय के भगवाकरण की कोशिशों के दौरान हुआ, तब जब जेएनयू में बड़े पैमाने पर सीट कट हुआ है. सभी संगठनों ने अध्यक्ष पद के लिए महिला उम्मीदवार खड़े किये, यह जेएनयू में पहली बार संभव हुआ.

छात्र संगठन बिरसा-फुले-अम्बेडकर स्टूडेंट्स असोसिएशन (बापसा) के लिए जेएनयू का यह दूसरा चुनाव था. पिछले चुनाव में बापसा ने अध्यक्ष पद के लिए वाम संगठनों को जबरदस्त टक्कर दी थी और दूसरे पोजीशन पर रहा था. हालांकि तब उसे सेन्ट्रल पैनल के अन्य सीटों पर अपेक्षाकृत कम वोट मिले थे. इस बार बापसा का पैनल वोट बेहतर रहा और हर पद के लिए  800 से अधिक वोट मिले. हालांकि इस बार सभी संगठनों को पैनल वोट बेहतर मिले.

चुनाव पर नजर रखने वाले जेएनयू के सीनियर विद्यार्थियों ने बताया कि इस बार नोटा और निर्दलीय उम्मीदवार को तुलनात्मक रूप से काफी वोट मिले. उन्होंने बताया कि निर्दलीय विद्यार्थी चुकी इस स्थिति में होते हैं कि वे बिना किसी जिम्मेवारी के सभी संगठनों पर हमला कर सकते हैं इसलिए अध्यक्षीय डिबेट में वे खूब तालियाँ बटोरते हैं, लेकिन पहली बार एक निर्दलीय उम्मीदवार को 400 से अधिक वोट मिले.

चुनाव की गिनती के दौरान कई अजीबोगरीब वाकये हुए. जेएनयू के पूर्व अध्यक्ष और देश भर में अपने भाषणों के लिए चर्चित कन्हैया कुमार को उनके  ही संगठन के लोगों ने सार्वजनिक तौर पर खूब भला-बुरा कहा. वे सार्वजनिक तौर पर आलोचना न करने की दुहाई देते रहे. विद्यार्थियों का आरोप था कि कन्हैया ने अपने संगठन के उम्मीदवारों के लिए प्रचार नहीं किया, बल्कि एंटी कैम्पेन करते हुए भी पाये गये.  जेएनयूएसयू की एक पूर्व  उपाध्यक्ष  को उसे यह कहते हुए सुना गया कि वह चाहता तो एसआईएस के काउंसिलर पद के लिए, यानी जो उसका अपना स्कूल है, उसके काउंसिलर पद के लिए उसके संगठन  की उम्मीदवार जीत जाती. फेसबुक पर एआईएसएफ के सदस्य उसपर व्यंग्य भरे पोस्ट लिखते रहे. एआईएसएफ के ही एक सदस्य ने कहा कि “इस बार संगठन में गैर सवर्ण सदस्य सक्रिय थे, पैनल में भी गैर सवर्ण सदस्यों की संख्या बड़ी थी, शायद इसीलिए कन्हैया कुमार न सिर्फ इनएक्टिव रहे बल्कि मौक़ा मिलने पर एंटी प्रचार भी किया. हमलोग सबूत इकट्ठा कर रहे हैं और इस मामले को संगठन में उठायेंगे.”

जेएनयू के पूर्व छात्र, जीतेन्द्र कुमार, जिनका दावा है कि उन्होंने एआईएसएफ के पूर्व में सफल रहे उम्मीदवार लेनिन कुमार और कन्हैया के लिए भी प्रचार किया था, ने कहा कि ‘यह संगठन यह विश्वास दिलाने में असफल रहा कि इनकी उम्मीदवार अपराजिता लेफ्ट गठबंधन  और एबीवीपी दोनो को हारने में सक्षम है. पहले वे तभी जीते हैं जब वे ऐसा विश्वास दिला पाये.” उन्होंने कन्हैया कुमार का बिना नाम लिये कहा कि ‘ऐसा संगठन के वरिष्ठ और लोकप्रिय विद्यार्थी भी ने नहीं किया, न करने का प्रयास किया.’

वाम गठबंधन की जीत को उसके विरोधी अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की जीत का खौफ पैदा कर जीतने की रणनीति को श्रेय दे रहे हैं. जाहिर है कि अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद को जेएनयू के खिलाफ जेएनयू में ही अपनी राजनीति पर पुनर्विचार करना होगा. बापसा के सामने भी चुनौती लगातार दो असफलताओं के बाद भी कैम्पस में अपनी धमक बनाये रखने की होगी.

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दो-दो बच्चों की ह्त्या फिर भी भाजपा की महिला नेता और स्कूल प्रबंधक को बचा रही मोदी-खट्टर सरकार

पिछले दिनों रायन पब्लिक स्कूल में 7 साल के बच्चे प्रदुम्न की हत्या हो गई.  हरियाणा के पुलिस तुरत ह्त्या की गुत्थी सुलझाने की दावा करते हुए हत्या के आरोप में स्कूल के एक बस कंडक्टर को गिरफ्तार कर उससे यह भी कबूल करवा लिया कि बाथरूम में बच्चे की ह्त्या यौन शोषण में नाकाम रहने के बाद उसीने किये हैं. लेकिन प्रदुम्न के माता-पिता उसे हत्यारा मानने से इनकार कर रहे हैं.

प्रधानमंत्री के साथ ग्रेस पिंटो

रायन पब्लिक स्कूल में बच्चे की ह्त्या के तुरत बाद मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावेडकर ने त्वरित कार्रवाई की घोषणा कर मामले के प्रति भाजपा सरकार की गंभीरता का भ्रम देने की कोशिश जरूर की, लेकिन उनके इन प्रयासों के बावजूद स्कूल की मैनेजिंग डायरेक्टर ग्रेस पिंटो के भारतीय जनता पार्टी के महिला मोर्चे की राष्ट्रीय सचिव होने की बात दब नहीं सकी और न ही उनके महाराष्ट्र कनेक्शन की बात. ग्रेस पिंटो मुम्बई रहती हैं और भाजपा के बड़े नेताओं के साथ उनका उठना-बैठना होता है. इसकी तस्वीरें सोशल मीडिया में जरूर तैर रही हैं लेकिन मुख्य मीडिया ने इसे दबा रखा है. गौरतलब है कि पिछले साल रेयान स्कूल के वसंत कुंज दिल्ली में एक छोटे बच्चे की लाश स्कूल की पानी की टंकी में मिली थी. तब भी आशंका थी कि गुड़गांव के प्रद्युम्न की तरह  उसका यौन शोषण हुआ था. स्पष्ट है कि तब भी अपने रसूख के कारण ग्रेस पिंतों स्कूल प्रबंधन को साफ़-साफ़ बचा ले गई थीं.

उनके रसूख को देखकर ही पुलिस और मंत्री हाइपर एक्टिव जरूर दिख रहे हैं लेकिन बच्चे के माँ-बाप के इनकार के बावजूद कंडक्टर को बलि का बकरा बना रखा है. सवाल यह भी उठ रहा है कि सच में यदि उसने ह्त्या की होती तो वह वहाँ से भाग जाता, न कि पुलिस के हत्थे चढने के लिए वहाँ मौजूद होता. सवाल कई और हैं. बच्चा जिसकी कस्टडी में है यानी स्कूल का प्रबंधन उसके यहाँ लगातार दो घटनायें घाट रही हैं, लेकिन प्रबंधन साफ़ बच कैसे रहा है? यहाँ कस्टडी में होने के कारण जिम्मेवारी उसकी भी है कानूनन. एक परिजन ने स्कूल पर यह भी आरोप लगाया है कि उसके बच्चे से खून के धब्बे साफ कराए गये थे. फिर स्कूल की भूमिका प्र सवाल क्यों नहीं. सवाल यह है कि स्कूल की मैनेजिंग डायरेक्टर और भाजपा नेता  ग्रेस पिंटो को कौन बचा आरहा है?

गृहमंत्री राजनाथ सिंह के साथ ग्रेस पिंटो

साहित्यकार पंकज चतुर्वेदी अपने फेसबुक पेज पर लिखते हैं:  “रायन  के माली, कंडक्टर से ले कर सभी टीचरों के लिए भाजपा का सदस्य बनना अनिवार्य है. सभी को, यहां तक कि भर्ती होने वाले बच्चों के पालकों को भी, सभी को दस दस सदस्य बनाना अनिवार्य है, जो कंडक्टर गिरफ्तार हुआ उसे भी । पिछले चुनाव में स्कूल ने भाजपा के पक्ष में फतवा भी जारी किया था. यह है रेयान स्कूल की अंतर्कथा लेकिन गोदी मीडिया इस पर चुप रहेगा. ये 1800 करोड़ के कर चोरी में भी चर्चित रहीं. हैं.

भारतीय महिला मोर्चा (भाजपा) की राष्ट्रीय अध्यक्ष विजया रहटकर से स्त्रीकाल के लिए  यह सवाल  पूछा गया कि रेयान की मैनेजिंग डायरेक्टर ग्रेस पिंटों भारतीय महिला मोर्चा की राष्ट्रीय सचिव हैं और उनके स्कूलों में बच्चों की ह्त्या का यह दूसरा मामला है, तो उनपर और स्कूल पर कार्रवाई को लेकर आपकी क्या राय है. फिलहाल उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया है.

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आसाम की भाजपा विधायक ने शुरू की विधानसभा में ब्रेस्ट फीडिंग रूम की मुहिम



विधायक को नवजात बेटी को दूध पिलाने हर घंटे जाना पड़ा घर, शुरू की विधानसभा में फीडिंग रूम की मुहिम
अंगूरलता ने कहा कि उन्हें हर एक घंटे में विधानसभा छोड़कर घर बेटी नमामी को दूध पिलाने जाना पड़ता है।
इस साल की शुरुआत में आस्ट्रेलियन सांसद लरिस्सा वॉटर्स देश की ऐसी पहली महिला राजनेता बन गई थीं जिन्होंने अपनी नवजात बच्ची को संसद में ही दूध पिलाया था। पिछले साल ऑस्ट्रेलिया में संसद में महिलाओं को संसद में दूध पिलाने की अनुमति दी गई थी। ऑस्ट्रेलिया के बाद भारत में भी इस प्रकार का कानून लाने की मांग उठने लगी है। असम की भाजपा  विधायक ने विधानसभा में बच्चों को दूध पिलाने के लिए एक कमरा बनाने की मांग उठाई है। विधायक अंगूरलता डेका का कहना है विधानसभा में फीडिंग रूम होना चाहिए ताकि घर में मौजूद उनकी एक माह की बेटी को भूखा न रहने पड़े।

आसाम से लेकर आस्ट्रेलिया तक एक मुद्दे पर बहनों का सखियापा



अंगूरलता ने कहा कि मैं ये नहीं कह रही हूं कि ऑस्ट्रलिया जैसा ही कानून यहां भी बनाया जाए लेकिन मैं चाहती हूं कि तनज़ानियन सांसद की तरह हमारे लिए के स्पेशल कमरा बनाया जाए जहां मेरी जैसी मां अपने बच्चों की देखभाल कर सकें। पहली बार विधायक बनीं अंगूरलता ने 3 अगस्त को एक बेटी को जन्म दिया था। संडे एक्सप्रेस से बातचीत के दौरान अंगूरलता ने असम विधानसभा में फीडिंग रूम बनाने की मांग की। असम फिल्मों की मशहूर 31 वर्षीय अदाकारा अंगूरलता ने कहा कि 4 सितंबर से शुरु हुए मानसून सेशन के दौरान उन्हें विधानसभा से अपने घर तक काफी चक्कर लगाने पड़ रहे हैं।

एक राजधानी: जहाँ टॉयलेट ढूंढते रह जाओगे. महिलाओं ने बयान किया दर्द

अंगूरलता ने कहा कि उन्हें हर एक घंटे में विधानसभा छोड़कर घर बेटी नमामी को दूध पिलाने जाना पड़ता है। इस कारण मैं विधानसभा में होने वाली काफी बहस और चर्चाएं छोड़ चुकी हूं। विधानसभा और घर के बीच फंसी अंगूरलता ने पार्लियामेंटरी अफेयर्स मिनिस्टर चंद्र मोहन से मांग की है  कि विधानसभा में ब्रेस्ट फीडिंग के लिए स्पेशल कमरा बनवाया जाए। कानूनन  महिलाओं को 6 महीनों के मेटर्निटी लीव मिलती है लेकिन यह कानून विधायकों और सांसदों पर लागू नहीं होता है। इसके साथ ही अंगूरलता चाहती हैं कि सरकार सरकारी और गैर-सरकारी संगठनों में भी महिलों के लिए स्पेशल रूम  बनाया जाए।

महिला सशक्तिकरण के लिए: ‘एक देश, एक कानून’
इन्डियन एक्सप्रेस/जनसत्ता से साभार 

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जातिवाद का दंश: दिल्ली विश्वविद्यालय की प्राध्यापक को राजधानी में नहीं मिल रहे फ़्लैट



रजनी अनुरागी 
पिछले लगभग 10 दिन से किराए पर दो शयनकक्ष वाला फ्लैट देख रही हूं। रोहिणी दिल्ली में डीडीए की और अन्य कई ग्रुप हाउसिंग सोसायटीज़ के आवासीय परिसर हैं। रोहिणी हर लिहाज से बढ़िया जगह है। मैं, जैसा कि सभी जानते हैं दिल्ली विश्वविद्यालय के जानकी देवी मेमोरियल कॉलेज में पढ़ाती हूँ। मेरे पापा रूप नगर , नम्बर 1 के सीनियर सेकेंड्री बॉयज स्कूल से उपप्रधानाचार्य पद से सेवानिवृत्त हुए। पेशे की दृष्टि से मेरी जाति/ वर्ण क्या होना चाहिए?? जबकि मैं इस जाति व्यवस्था की घोर विरोधी हूँ।

अपने कॉलेज में रजनी अनुरागी

यह सब मैं क्यों लिख रही हूं?? इसका कारण यह है कि मकान मालिकों को मेरे पेशे की बजाय जाति जानने में दिलचस्पी का होना है। आपका सरनेम क्या है ? किस जाति से हैं? वैसे तो हम जाति वाति मानते नहीं , पर कौन कैसा आ जाए? (क्योंकि जाति विशेष के लोग ‘सत्धर्मी’ होते है!!!) मकान मालिक तो मकान मालिक प्रोपर्टी डीलर के पानी पिलाने वाले और मकान की तालियां लेकर मकान दिखाने का संयुक्त काम करने वाले सहायक तक(यहां मार्क्सवाद लाने की आवश्यकता नहीं) ने पहले सीधे कास्ट फिर मेरे ये कहने पर कि क्या मतलब… उसने सकपकाते हुए पूरा नाम जानने की कोशिश की।

रजनी अनुरागी की कवितायें

 प्रॉपर्टी डीलर परिचित था सो उसने तुरंत उसे मकान पता करने और दिखाने को कहा।डीलर ने बात सम्भालते हुए कहा,” जी क्या करें मकान मालिक पूछते हैं!! मैंने कहा ऐसे किसी जातिवादी का मकान हम बिल्कुल नहीं लेंगे और हम वहां से आ गए। जबकि दूसरा वाकया ये है कि दिल्ली के सरकारी स्कूल से प्रधानाचार्य पद से सेवानिवृत्त जातिवादी ने मुँह खोलकर जाति पूछी और हमने अपनी जाति उनके मुँह पर फेंक दी । जाति को हाथ में लिए वे बोले….जाति से क्या होता है!! हे हे हँसने लगे। जब कुछ होता नहीं तो पूछते क्यों हो ??

अभी तक फ्लैट नहीं मिला है जबकि 30 सितम्बर तक वर्तमान फ्लैट खाली करना है।


रजनी अनुरागी का फेसबुक पोस्ट 


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‘संघियों तुम बलात्कार से पैदा हुए हो’ : क्यों कहा था गौरी लंकेश ने



संघियों, यदि आपकी माँ ने ‘फ्री सेक्स’ यानी ‘अपनी स्वतंत्र इच्छा से सेक्स’ नहीं किया है तो उसके दो मायने हैं. 
1. आप बलात्कार से पैदा हुए हो
2. या फिर तुम एक सेक्स वर्कर से पैदा हुए हो, जिसने सेक्स पैसे लेकर किये, अपनी इच्छा से और निःशुल्क नहीं. 
संघियों अब यह तुम पर निर्भर करता है कि तुम दो में से एक चुन लो या तो कहो कि तुम्हारी माँ ने ‘फ्री सेक्स किया’ या मेरे द्वारा ऊपर बताये गए दो ऑप्शन मान लो. मैं कविता कृष्णन और उसकी बहादुर माँ के साथ हूँ. 
यह अच्छा है कि मेरी माँ ने मेरे पिता के साथ ‘फ्री सेक्स’ किया है. और मुझे उनकी बेटी होने पर गर्व है. 


‘गौरी लंकेश पत्रिके’ की सम्पादक गौरी लंकेश की हत्या के बाद दक्षिणपंथी उपद्रवियों ने हत्या की जिम्मेवारी तो नहीं ली लेकिन उन्होंने ह्त्या का खूब जश्न मनाया. गौरी लंकेश को गालियाँ दी. उनके संघ विरोधी फेसबुक ट्वीटर पोस्ट खोजकर उनके खिलाफ राय बनाने की कोशिश की जा रही है. इसी क्रम में उपरोक्त फेसबुक पोस्ट भी वायरल किया गया है.

इस जमात को ऐसे मुद्दों को मोड़ने में महारत हासिल है. पहले यह कोशिश की गयी कि गौरी लंकेश की ह्त्या को माओवादियों द्वारा की गयी हत्या कहकर प्रचारित की जाये, लेकिन यह जमात ऐसा इसलिए नहीं कर पाया कि एक ओर तो वह यह कोशिश करते रहे दूसरी ओर ह्त्या का जश्न मनाते रहे. इस तरह यह पहली माओवादी हत्या होती जिसकी खुशी में हिंदुत्व के उपद्रवी समर्थक पटाखे फोड़ रहे हैं. जब उनकी खुशी उनके प्रोपगंडा पर भारी पडी तो अब यह कवायद है.

कवायद की तीर इतनी मारक है कि कल तक जो कुछ संवेदनशील लोग गौरी लंकेश की ह्त्या पर उपद्रवियों के खिलाफ मुखर थे वे इस पोस्ट के साथ आहत हैं. हालांकि इस पोस्ट में आपत्तिजनक कुछ भी नहीं है. इस पोस्ट की पृष्ठभूमि है 2016 में कविता कृष्णन द्वारा लिया गया स्टैंड. जेएनयू में फ्री सेक्स के  हिंदुत्ववादियों, भाजपाइयों और संघियों के आरोप में कविता ने ‘फ्री सेक्स’ को कुछ इसी अंदाज में व्याख्यायित किया था, जिसके बंद उपद्रवी ट्रॉल्स उन्हें और उनकी माँ को गालिया दे रहे थे. तब कविता की माँ लक्ष्मी कृष्णन ने भी विस्तृत लेख लिखकर कहा ‘फ्री सेक्स’ को इसी मायने में व्याख्यायित किया था जिस मायने में गौरी लिख रही हैं, बल्कि उन्होंने यह भी कहा था कि वे ‘फ्री सेक्स’ करती हैं.

गौरी लंकेश ने कविता के ट्रॉल्स के जवाब में यह पोस्ट लिखा था.

विचारों के पक्ष में तर्क और कटु तर्कों का सिलसिला न ह्त्या को जायज ठहरा सकता है और न मारे गये व्यक्ति को नरेंद मोदी के समर्थकों द्वारा कुतिया कहा जाना जायज सिद्ध होता है.

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विज्ञान पर हावी जातिवाद: ब्राहमण न होने पर नौकरानी के खिलाफ ब्राहमण वैज्ञानिक ने कराया मुकदमा

जातिवाद हमारे खून में किस तरह घुस गया है इसका ताजा उदाहरण है एक बड़े वैज्ञानिक की शिकायत। मेघा खोले भारतीय मौसम विभाग में बड़े पद पर हैं। पुलिस से की गई शिकायत में मेघा ने कहा है कि उसकी नौकरानी ने काम मांगने के दौरान अपनी जाति की पहचान छुपाई।

इससे उसकी भावना को ठेस पहुंची है।  पुणे स्थित आई.एम.डी. में डिप्टी डायरैक्टर (वैदर फॉरकासिंटिंग) मेघा ने पुलिस थाने में दर्ज करवाई एफ.आई.आर. में कहा कि काम मांगते वक्त उसकी नौकरानी ने झूठ बोला कि वह ब्राह्मण है।

यह झूठ बोलकर करीब एक साल तक वह उसके घर में काम करती रही।  गणेशोत्सव और श्राद्ध के दौरान घर में खाना बनाने के लिए मेघा ब्राह्मण नौकरानी चाहती थी। एक औरत ने उसे निर्मला से यह कर मिलवाया कि वह ब्राह्मण है। मेघा ने इसके लिए निर्मला का वैरीफिकेशन भी करवाया। इसके बाद निर्मला कई धार्मिक कार्यक्रम में मेघा के घर काम करने आई। करीब एक साल बाद मेघा की पुजारी ने उसे बताया कि निर्मला ब्राह्मण नहीं है।

साभार:नवोदय टाइम्स
 
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औरत का दिल

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ममता 

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वह औरत का दिल तलाश रही थी। दरअसल एक दिन सुबह सवेरे उसने अखबार में एक खबर पढ़ ली थी जिसके मुताबिक एक जानी-मानी पाक कला मर्मज्ञ ने अपनी पाक कला की एक पुस्तक के लोकार्पण के मौके पर यह कहा कि उन्हीं के शब्दों में ‘‘पुरूषों के दिल का रास्ता पेट से होकर जाता है।’’ और तभी से वह औरत के दिल की तलाश में थी। इस बयानबाजी में वह जाना नहीं चाहती थी कि यह बात इस किस्म के पुरूषों पर खरी बैठती है और उस किस्म के पुरूषों पर नहीं बैठती है। यह बात उसने पहली बार नहीं सुनी थी और उसे यह भी मालूम था कि यह बात वह आखिरी बार  नहीं सुन रही है। उसने कई औरतों के मुँह से यह कहावत सुन रखी थी, वे कई औरतें हर उम्र हर क्लास की थीं, वे औरतें उसके घर की थीं और बाहिर की थी, वे औरतें पढ़ी लिखी थी और बेपढ़ी लिखी थी, वे औरतें घरेलू थीं लेकिन खास बात ये थी कि उन सब औरतों के स्वर एक जैसे थे।अक्सर उसे ताजुब्ब होता औरतें अलग अलग फिर स्वर एक से कैसे!!!! वैसे उसकी तलाश अपनी उम्र के शुरूआती काल में भी जारी थी। फर्क फकत इतना था कि उन दिनों उसके पास शब्दों की ऐसी बाज़ीगरी नहीं थी कि इसे वह कोई नाम दे सके। उन दिनों वह बस कुछ कन्फ्यूज रहने लग गई थी। उन दिनों उसने आलमारियों, रसोइयों, बर्तन, भांडों, चादरों, चूड़ियों और न जाने किस किस जगह औरत का दिल तलाश किया था। उसने मां की ऊँची आवाज़ सुनी तो उसे लगा यूरेका यूरेका, उन दिनों जब मां सुबह सवेरे नहाकर साढ़ी लपेटते हुए गीता के अठारहवें अध्याय का महात्म्य पढ़ती तो उसे लगता शायद यहीं है औरत का दिल। मां फिर आदमकद शीशे के सामने खड़ी होकर बिंदी लगाती तो उसे फिर लगता औरत का दिल तो यहीं है। मां मुंडेर पर बैठे कागे से ऐसे बातें करती जैसे वह घर का कोई मेम्बर हो और उसे उलाहने देती और कभी-कभी तो उसे उसकी शक्ल के बारे में कुछ ऐसा कहती  जो शायद उसे भी महसूस हो जाता और तभी  वह और जोर से कांव कांव करने लग जाता; इन सबके दौरान वह एक बार फिर सोच लिया करती कि यही तो है औरत का दिल। मां  आदमकद शीशे के सामने खड़ी होकर बिंदी लगाते हुए और बाल संवारते हुए और चेहरे को कभी दायें और बाएं करते हुए अपने जूड़े को देखने की कोशिश करती उन दिनों मां के बाल काले थे और उसके काले जूड़े पर सफेद घुंघरूओं के पिन उसे मां की पहचान लगते और उसे लगता यही सब ही तो है औरत का दिल और वह भी कुछ देर के लिए औरत बन जाती; मां की तरह बालों को कंघी से समेटने की विकल कोशिश करती और इन सबके दौरान उसे कई बार बल्कि बार-बार लगता कि यहीं है औरत का दिल………….।


वह तब छोटी ही थी और एक ऐसे स्कूल में पढ़ती थी जहाँ लड़के लड़कियाँ एक साथ पढ़ते थे लेकिन थोड़ी बड़ी होने पर उसका दाखिला लड़कियों के स्कूल में हुआ। दोनों स्कूलों में एक किस्म अंतर था जिसे वह बयान नहीं कर सकती थी पर जिसे वह बड़े ही साफ तौर पर महसूस जरूर कर सकती थी। जहाँ सिर्फ लड़कियां पढ़ती थी वहाँ खुलकर हंसने की आवाज़ आती और उसे लगता कि औरत का दिल यहीं है। जहाँ सिर्फ लड़कियां पढ़ती वहाँ वे गोशे भी करती जो दूर-दूर तक सुनाई तो नहीं पड़ते मगर जिनकी तफसील जानने के लिए कोई बहुत ज्यादा दिमाग लगाने की जरूरत नहीं होती और जिनका लब्बोलुआब आसानी से समझा और महसूस किया जा सकता था। गोशे हमेशा कुछ ऐसी बातों को लेकर किए जाते जिन्हें खुलकर करना लड़कियां मुनासिब नहीं समझती थी और बात यह थी कि वक्त बदल रहा था और जिसे हम सोसाइटी कहते हैं उसमें बहुत से लोग लड़कियों से खुलकर बात करने के पक्ष में थे मगर लड़कियां थी कि कन्विंस ही नहीं होती थी और गोशे करने से बाज़ नहीं आती थी और इसीलिए उसे लगने लगता था कि शायद लड़कियों का यानि कि औरत का दिल………..

कभी कभी लड़कियां स्कूल की उस खिड़की के पास खड़ी होकर गुफ्तगू करती जो बाहर सड़क की तरफ खुलती थी; उस गुफ्तगू के कईं विषय थे जिनमें से एक था कि पांचाली का बाॅयफ्रेंड तय समय पर उस सड़क से गुज़रा करता।  अक्सर लड़कियां ये सब करते हुए पकड़ ली जाती और सिस्टर प्रिंसिपल से 21वीं या 22वीं बार शिकायत करती कि स्कूल की चहारदीवारी को इस समर वैकेशन या उस बड़े दिन की छुट्टियों में ऊँची करना बेहद जरूरी है। हालांकि खिड़कियों पर महीन जालियाँ थी और उन जालियों पर मजबूत ग्रिल  थी जिसके आर-पार देखने वाले को चेहरे छोटे-छोटे टुकड़ों में बंटे हुए ही नज़र आते थ,े चेहरों को आपस में जोडना और फिर एक मुकम्मल तस्वीर बनाना काफी मुश्किल हुआ करता और वह सोच लिया करती कि औरत का दिल शायद …
लड़कियां हमेशा उलझन में रहती कि सिस्टर रोजलीन संत क्यों हो गई। लड़कियां अलग-अलग और रंगीन कपड़ों में सिस्टर रोजलीन की कल्पना करती। सिस्टर रोजलीन को कान्वेंट में सब सिस्टर रोज कहकर पुकारते और दरअसल उनकी खूबसूरती किसी गुलाब की तरह ही थी। वैसे ही कोमल और उतनी ही खूबसूरत और उतनी ही गुलाबी। फिर एक दिन खबर आई कि सिस्टर रोज ने फाइनल वाउ से पहले अपना फैसला बदल लिया और वे नन नहीं बनी। लड़कियां उस दिन बहुत खुश थी। क्यों लड़कियां उन्हें संत नहीं होने देना चाहती थी क्या यहीं बसता है औरत का दिल… वह उस दिन सोचने लग गई थी। हर साल स्कूल में एक एनवल फंक्शन हुआ करता जिसमें लड़कियां रंग बिरंगी चुनरियां पहनती जिनपर सुनहरे बूंदे लगे होते; लड़कियां चुनरियां पहनती और पैरों में घुंघरू बांध कर इधर उधर तेजी से आती जाती तो उनके घुंघरूओं की आवाज़ में एक लय और ताल होते जो दिल में उतर जाते और लड़कियां उस दिन बड़ी खुश नजर आती तो वह सोच में पड़ जाती कि औरत का दिल..

एक दिन लड़कियां फिर गोशे करने लग गई कि नौवीं क्लास में पढ़नेवाली पूर्णिमा का व्याह हो गया। लड़कियां उस दिन बहुत व्यस्त नज़र आई। लंच ब्रेक में सारी लड़कियां अपने-अपने तरीके से व्यस्त नज़र आई, कुछ उसे खास दूरी से और खास कोणों से देखता चाहती थी; कुछ उससे खास बातें करना चाहती थीं; कुछ चाहती तो बहुत कुछ थी लेकिन अपनी चाहना को वर्जित समझ कर दूर-दूर रहने को मजबूर थीं; कुछ व्यथित थी क्योंकि वे बचपन में ही जीना और रहना चाहती थीं । सिस्टर मारिया ग्रेस की पैनी नज़र लड़कियों के बीच जो नहीं होता उसे भी सुनने और महसूस करने में माहिर थी और उनकी नज़र कान्वेंट के अंदर होने वाली हर हरकत पर रहती थी। उस दिन वह थोड़ी कन्फ्यूज़ हो गई थी और उसे लगा कि लड़कियों के हर मूव में तो औरत का दिल तलाश किया ही जा सकता है और साथ ही सिस्टर मारिया ग्रेस के बिहेवियर में भी तो एक औरत का ही दिल है…
कुछ ऐसी भी लड़कियां थी इर्द गिर्द जो फिजिक्स, गणित और इतिहास, भूगोल पढ़ती और झांसी की रानी या फिर पुष्प की अभिलाषा और कदम्ब का पेड़ जैसी कविताएं कंठस्थ करती। ऐसा करते हुए वे लड़कियां हेड सिस्टर की नज़रों में थोड़ी ऊपर उठ जाती। लड़कियों को हेड सिस्टर ने ‘ये लड़कियां’ और ‘वे लड़कियां’ जैसे खांचों में डाल दिया था और एक किस्म की लड़कियों को दूसरे किस्म की लड़कियों के सामने एक्ज़ाम्पल बनाकर पेश करना शुरु कर दिया था। उसे समझ नहीं आता था कि हेड सिस्टर ने लड़कियों को अलग-अलग खांचों में विभक्त क्यों कर दिया था और उसे हमेशा यह लगता था कि औरत का दिल तो कहीं भी हो सकता है, पहले किस्म की लड़कियों में या फिर दूसरे किस्म की लड़कियों में और इसमें ऐसी या वैसी बात कहां है ???
स्कूल के दिन जब खत्म हो गए तो सामने काॅलेज के दिन आ गए जहां हेड सिस्टर की बंदिशें नहीं थी। लड़कियां यहां लाइब्रेरी के बाहर बने सीमेंट के चबूतरे पर फील्ड के किनारे लगे बेंचों पर कैंटीन में, आॅडीटोरियम की सीढ़ियों पर या फिर खाली क्लास रूम की लास्ट बेंच पर नज़र आती थीं। लड़कियां वहां रंग बिरंगे कपड़े पहनती थी। तरह-तरह के हेयर स्टाइल अपनाती थी, कक्षा में आजादी की खुशबू सी तारी थी और तब उसे लगने लग गया था कि बस तलाश अब खत्म समझो औरत का दिल..

उसने महसूस किया था कि काॅलेज में आकर अब लड़कियों की बदमाशियों में कुछ इजाफा हो गया था; वे अब चुहलबाजियां करती थीं और उन्होंने सीटियां बजाना भी सीख लिया था। उनकी वोकैबलरी अब थोड़ी बोल्ड हो गई थी, मसलन अब वे कहा करती ‘बड़ी सेक्सी लग रही हो…’ लेकिन कुछ लड़कियां सहमी हुई रहा करती; वे कम बोलती और उनकी नज़रें हमेशा सामने की तरफ रहा करती मानो इधर उधर देखना उनकी आचार संहिता के खिलाफ हो; उनके कपड़े चुस्त नहीं होते और उनके बालों में रूखाई भी नहीं होती। यहां लड़कियों को अलग अलग खांचों में डालने वाला कोई नहीं था। उसे लगता था कि यह सही है और इन दोनों तरह की लड़कियों में कोई ऐसी  या वैसी बात नहीं है और उसे यह भी लगता था कि औरत का दिल तो कहीं भी हो सकता है, इसलिए इस कदर खांचे तैयार करना सही नहीं है। लेकिन एक दिन अंग्रेजी की क्लास में ऐसा कुछ हुआ कि दरअसल उस दिन गुणवंती अरोड़ा ने कुछ लड़कियों को इसलिए क्लास से निकाल दिया क्योंकि बकौल गुणवंती अरोड़ा लड़कियां उनका लेक्चर ध्यान से नहीं सुन रही थी, उनका ध्यान न जाने कहाँ था और वे हौले-हौले मुस्कुरा भी रही थी। गुणवंती अरोड़ा ने यह भी कहा कि इन कुछ लड़कियों के ऐसा करने से बाकी लड़कियों का भी ध्यान भंग होगा। इसलिए उन लड़कियों को बचाने के लिए उसने इन लड़कियों को बाहर निकाल दिया था। उसे लगता था कि लड़कियों को इस कदर ‘इन लड़कियों’ और ‘उन लड़कियों’ में बांटना वाजिब नहीं था और फिर वही बात कि  औरत का दिल तो कहीं भी हो सकता है.

फिर एक कुछ अलग किस्म का हुआ। सेकेंड ईयर की गीता इस्सर के लिए लड़कियां आहें भरने लग गईं। गीता इस्सर के घरवालों को उसके लिए लड़का मिल गया था और उन्हें डर था जब वह डिग्री लेकर निकलेगी तो इतनी बडी और काबिल हो जाएगी कि  लड़का मिलने में दिक्कतें पेश आएंगी। यह सब वैसे लड़कियों की समझ से बाहर था लेकिन लड़कियां इतनी नासमझ भी नहीं थी और वे जोर जोर से आहें भर रही थीं। अनकी आहें काॅलेज के गलियारों में सुनाई दे रही थी; उनकी आहें गलियारों की ऊँची-ऊँची छतों से टकरा-टकरा कर बिखर रही थी और उनकी आहें लाइब्रेरी के बुकशेल्फों के बीच की खाली जगहों में भर जाया करती थीं। गीता इस्सर के चेहरे पर कुछ ही दिनों  में काले काले धब्बे जमा हो गए और लोग कहते थे कि उसे खून की कमी हो गई है। इस सबके दौरान वह बार-बार औरत का दिल तलाश करती रही थी।

इतने दिनों में एक और बात जो उसे खास लगती थी वह ये थी कि औरत का दिल ढूंढ़ने के लिए हमेशा ऊपर की तरफ देखने की जरूरत नहीं थी जैसे कि हमेशा किसी इंदिरा नूई और चंदा कोचर या फिर इन जैसी ही ऊँचाई पर पहुँची हुई औरतों को देखने की जरूरत नहीं थी। और उसे लगता था कि औरत का दिल कहीं भी किसी क ख ग और घ में क्यों नहीं तलाश किया जा सकता है।

मसलन क का केस देखें …
क छह बेटियों को जन्म देने के बाद घर से बेदखल होने की लड़ाई में जीत हासिल कर चुकी थी। क की तुलना किसी सफल उद्यमी से की जा सकती है क्योंकि यह लडाई किसी  जोखिम भरे उद्यम से कम न थी और एक समय तो ऐसा भी आया जब जान जाने का पूरा खतरा था। क ने अपने घर में ऐसा समय देखा था जब छह बेटियां होने की वजह से उसके घरवाले पति की दूसरी शादी की तैयारी कर चुके थे। फिर एक दिन उसने अपना घुंघट हटा कर आसपास की दुनिया को देखा और अपनी आवाज़ में जरा दम भरा। क की घटना को सुनकर उसे थोड़ी राहत मिली थी कि चलो कहीं तो है उसने मजाज का शेर एक कागज पर लिखा कि ‘तेरे माथे पे ये आंचल बहुत ही खूब है लेकिन तू इस आंचल से एक परचम बना लेती तो अच्छा था’उसने उस कागज को अपनी मेज के कांच के नीचे डाल दिया था । क ने अपनी बेटियों को अपनी ताकत बना लिया था। अम्मां हमेशा कहा करती थी कि गुंथे हुए सर पर हर कोई हाथ फेरना चाहता है। तो क ने जब से बेटियों को अपनी ताकत बना लिया था उसके हालात अच्छे हुए थे उसके घरवालों की शिकायतें थी अब तारीफों में बदल  गई थी। लेकिन हर केस क की तरह सफल नहीं हो सकता।

 ख का केस कुछ अलग ऐसे था कि  उसके घर के हालात अच्छे थे वह खुद पुलिस की नौकरी में थी और उसकी दो बड़ी प्यारी बेटियां थीं लेकिन घर के बड़े बुजुर्गों ने एक दिन ख के पति का रिश्ता तय कर दिर्या दरअसल उन्हें एक वारिस की जरूरत थी और इन सब बातों में उनकी कतई दिलचस्पी नहीं थी कि दो प्यारी बेटियां भी तो वारिस ही हैं बहरहाल कुछ लोगों ने उसे साइड से यह सलाह भी दी थी कि ऐसे बेशर्म लोगों के लिए ही तो दरअसल कानून के दरवाजे खोलकर रखे गए हैं लेकिन ख के दिल में कोई भी जरूरत भर हिम्मत नहीं जगा पाया था। ख ने भांडे बर्तन पटके और दरवाजों पर अपना सर  पटका  ख खुले बालों में घर से बाहर सडकों पर बदहवास सी दौडी; ख अपने दफतर के अफसरों से मिली लेकिन ख के ससुर ने उसे साफ हिदायत दे दी कि यह शादी तो होकर रहेगी और अगर ख को यह पसंद नहीं है तो वह जा सकती है। यह एक अजीब सी कहानी थी ख के पास वह सब कुछ था जो एक औरत को ताकतवर बनाता है लेकिन उसके पास बहुत कुछ नहीं था और वह अपनी लड़ाई हार गई। उसे लगता है कि औरत का दिल यहां क्यूं उलझा हुआ है; उसे लगता है कि ख जिसे लड़ाई समझ कर खुद को हारा हुआ महसूस कर रही है क्या वाकई वह कोई लड़ाई है… लेकिन ख को समझाना इतना आसान नहीं है। अब वह वहीं एक तरफ दो कमरों के घर में रहती है अपनी लड़कियों  के बालों को कसकर बांधती है उन्हें सवेरे स्कूल भेजती है और ख़ुद ड्यूटी पर जाती है। मगर ख खुश नहीं रहती है। वह ख के बारे में सोचती है और उसे लगता है कि औरत का दिल किसी सूखे हुए पेड की ऊँची टहनी पर अटका हुआ है जिसे देखा तो जा सकता है लेकिन उतारा नहीं जा सकता।

 ग की कहानी इन दोनों से अलग है उसके पास स्टेटस है, कार है बंगला है एक सफेद पामेरेनियन कुत्ता है और रहने का सलीका है…मोटे तौर पर कह सकते हैं ग के पास भी वह सब कुछ है जो किसी औरत को ताकतवर बना सकता है पैसा, शोहरत एक मजबूत परिवार और अक्ल भी। ग कुछ चीजों के बारे में बड़ी पर्टीकुलर हैं मसलन अगर उसके सफेद छोटे से प्यारे कुत्ते को कोई ‘कुत्ता’  कहता  तो वह उसे गोद में उठाकर पुचकारने लगती है।

ग को देखकर वह वाकई बहुत खुश हुई थी और उसे लगा था थोड़ा सा ही सही मगर कहीं तो मिला… औरत का दिल… उसे खुश हुए थोड़ा ही अरसा हुआ था जब उसने एक दिन देखा ग कुछ छुपाने की कोशिश में लगी है उसके कान खड़े हो गए। उसने ग को बहुत कुरेदा बहुत फुसलाया बहुत बहलाया लेकिन ग खुशी का  इज़हार ही करती रही। दरअसल उसने गौर किया एक दिन कि अपने बाएं कंधे से थोड़ा ऊपर गर्दन जहां शुरू होती है वहां ग अपने दुपट्टे को कसकर लपेट लेती है ग का पूरा ध्यान जैसे दुपट्टे को कसकर लपेटने में लगा हुआ है। उसे लगा  अगर आज कोई उसके कुत्ते को कुत्ता कह देगा तो वह उसे गोद में लेकर पुचकारेगी भी नहीं। ग की दुपट्टा लपेटने की इस जद्दोजहद में कोई राज है क्या? वह ग से इशारे में पूछ ही डालती है ऊँगली के इशारे से वह पूछती है… ‘वहां क्या’… जवाब में ग दो तीन बार पलके  झपकाती है मानो कुछ साफ दिखाई न दे रहा हो… उसे लगता है ग की इस भावना का सम्मान किया जाना भी तो जरूरी है कुछ पल के लिए उसे यह भी लगता है कि शायद औरत का दिल…

 उसे फिर भी शक नहीं होता अगर ग के उस निशान का रंग नीला नहीं होता। ग के पास सब कुछ ऐसा था जिसे देखकर ईष्र्या हो सकती है मतलब कि कुछ ऐसा लग सकता है कि  जिंदगी हो तो ऐसी ही… इस बार उसे लगा था कि कितना अच्छा होता अगर औरत का दिल इस बार उसे मिल पाता  और यह भी कि कितना सुकून है ग की जिंदगी में …आजकल इसे डोमेस्टिक वायलेंस का नाम दिया गया है। एक दिन ग ने खुद ही बात की शुरूआत की थी।हाँ तो क्या आपको इसके खिलाफ कुछ कहना  नहीं चाहिए ? उसनेे  कहा था। शायद कुछ बातें किताबों में ज्यादा आसान लगती हैं… ग ने उत्तर दिया था । कुछ दिनों बाद उसने दुपट्टे को कसकर लपेटना छोड़ दिया था। उसने देखा अब वहाँ कोई निशान नहीं था।

 ‘घ’ का किस्सा तो बिल्कुल ही अलग था और पहली बार उसे लगता था कि ऐसी ही किसी जगह औरत के दिल को होना चाहिए।  ‘घ’ की जिंदगी बड़े कामों के लिए थी।  वह बड़ी-बड़ी बहसों में भागीदार बनने की कोशिश करती थी वह सरोकार वाली फिल्में देखती और उनसे असहज भी हो जाती थी। वह खाली जगहों को पेड़ों से भरना चाहती थी और सर्दियों में गरीबों में कम्बल बांटना चाहती थी। वह कुछ दूसरी औरतों के लिए दिल में जगह रखती थी। वह जैसे चाहे वैसे चलने और रुकने की ताकत रखती थी वह जैसे चाहे बोलने और चुप हो जाने की ताकत भी रखती थी तो यहाँ है औरत का दिल। पूरी तरह दिखाई देने वाला मजबूती से धड़कता हुआ… उसे लगा था बिल्कुल साफ दिख रहा है कि औरत का दिल है और अपनी पूरी ताकत के साथ अपना वजूद लिए हुए दिखाई दे रहा है। फिर उसने माॅरल आॅफ द स्टोरी निकालने की कोशिश की थी और इस नतीजे पर पहुँची थी कि औरत का दिल तो इन सभी के पास था। मतलब क ख ग घ और सिस्टर रोज ; मारिया ग्रेस और खिड़कियों के करीब गोशे करती लड़कियों और कैंपस में यहां वहां घूमती और बैठती लड़कियों के पास और गीता इस्सर के व्याह की सुन आहें भरती लड़कियों के पास… अगर दिखाई नहीं देता या शायद इसकी वजह यही थी कि उन सबके दिल की धड़कन थोड़ी फ्रेजाइल हो गई थी या फिर उन्होंने अपने वजूद को यही खड़ा नहीं होने दिया था शायद या फिर वे चाहती ही नहीं थी कि दिल जैसी किसी चीज का पता लोगों को लगे या फिर उन्हें पता ही नहीं था कि देह के अंदर दिल जैसी कोई चीज भी होती है…

कई दिनों से आपसे एक बात पूछना चाह रही थी अम्माँ उसे मन हुआ था एक दिन अम्मां से सवाल करने का और उसने पूछा था अम्मां से।
‘ मां मुझे एक चीज की तलाश है बड़े दिनों से और वह मिल नहीं रही ।
. कौन सी चीज।
‘औरत का दिल’
उसने मां कोे हमेशा पल्लू में ही देखा या जब कभी मां के सर से पल्लू गिरता तो उनके हाथ बड़े ही स्वाभाविक तरीके से पल्लू की तरफ चले जाते और वह पल्लू को वापस सर पर खींच लेती। उनके सर पर पल्लू होना उतनी ही स्वाभाविक सी बात थी जितनी गिरे हुए पल्लू को तुरंत वापस अपनी जगह पर कर देना… पल्लू कभी उनके लिए परेशानी का सबब रहा हो- ऐसा उन्हें देखकर कभी नहीं लगा।



जिस समय उसने सवाल किया  उस वक्त अम्मां दहलीज़ से बाहर निकल कर चारदीवारी के पास लगे तुलसी के बूटे में पानी देने जा रही थी और उसके हाथ में एक लोटा था; उसका सवाल सुनकर मां ने इस तेजी से पीछे मुड़कर देख कि उनका पल्लू बेतरतीब होकर सर से हट गया और अपने होशोहवास में पहली दफे उसने देखा कि मां ने हटे हुए पल्लू को वापिस अपनी जगह पर लाने की कोई कोशिश नहीं की। वह अपने सवाल से कम और मां की इस बात से ज्यादा भयभीत हो गई थी।
‘औरत का दिल … हूँह … अब तो मुझे लगता है वो है भी या नहीं उसके अंदर…. मुझे तो एनाटाॅमि ही बदल गई लगती है…

उस दिन मां बिना पल्लू ही बाहर निकल ली थी! तो क्या वह सब झूठ था? मां का नहाकर साड़ी लपेटते हुए गीता के अठारहवे अध्याय का महात्मय बांचना और आईने के सामने खड़े होकर मत्थे पर बिंदी लगाना… और फिर तुलसी को भर लोटा पानी डालना और जोत जलाना जो देर तक जलती रहे… और भी वह सब कुछ करना जो वह पिछले 25-30, 31 या 35 बरसों से करती थी….

-तू एक्जीबिशन में जाती रहती है न ... कहीं तुलसी के लिए सुंदर सा पाॅट दिखे  तो मेरे वास्ते एक लेती आना… आजकल’ सुना है बड़े सुंदर-सुंदर निकले हैं वो सृष्टि की मां है न  वह बता रही थी……………………..’
.मां बिल्कुल नार्मल थी बिल्कुल ही नार्मल!!!

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सलवार-कमीज़ में पहलवानी ! भारत की पहली महिला रेसलर

हरियाणा की कविता दलाल डब्ल्यूडब्ल्यूई के रेसलिंग रिंग में जब सलवार कमीज पहनकर उतरीं तो उन्होंने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा.


न्यूजीलैंड की रेसलर डकोटा काई के ख़िलाफ़ उनकी पहली लड़ाई का वीडियो इंटरनेट पर वायरल हो रहा है.
कविता भारत की पहली महिला रेसलर हैं जो डब्ल्यूडब्ल्यूई में पहुंची हैं.

यूट्यूब पर अपलोड किए गए उनके वीडियो को पांच दिनों के भीतर 35 लाख से ज्यादा लोग देख चुके हैं.
अपनी ताकत का लोहा मनवाने वालीं कविता कभी इतनी कमज़ोर पड़ गई थीं कि उन्होंने आत्महत्या की भी कोशिश की थी.


बीबीसी से बात करते हुए कविता ने बताया, “यह वक्त तब आया था जब मेरा बच्चा आठ या नौ महीने का था. परिवार की तरफ़ से भी सपोर्ट नहीं मिल रहा था. एक समय आया जब मैंने खेल छोड़ने का फ़ैसला किया. मुझे जिंदगी भारी लगने लगी थी. मैं सांस नहीं ले पा रही थी.”

वो बताती हैं, “मैंने बचपन से जो सपने पाले थे उसे एक क्षण में ख़त्म होते नहीं देखना चाहती थी. साल 2013 में मैंने आत्महत्या करने की कोशिश की. हालांकि मैं इसमें असफल रही. मैं इतनी परेशान थी कि बच्चे का भी ख्याल नहीं आया.”

कविता बताती हैं कि उनकी आत्महत्या की सोच ग़लत थी. वो परिवार, बच्चे और खेल के बीच समन्वय नहीं बिठा पा रही थी. उनके ससुराल से भी उन्हें सपोर्ट नहीं मिल रहा था.

वह कहती हैं, “मैं खेलना चाहती थी. पर मेरे पति तैयार नहीं थे. शायद उन पर पारिवारिक जिम्मेदारियां ज्यादा थी. आज मेरे पति मुझपर गर्व करते हैं और मेरा साथ देते हैं.”

सूट सलवार पहनकर क्यों लड़ा?


डब्ल्यूडब्ल्यूई के रिंग में सूट सलवार पहनकर लड़ने के पीछे क्या मकसद था, इस सवाल पर कविता कहती हैं, “मैं अपने देश की संस्कृति को बढ़ावा देना चाहती थी. दूसरी सोच यह थी कि मैं ये बताना चाहती थी कि पहनावा रेसलिंग के आड़े नहीं आता.”

वे कहती हैं, “आप सूट सलवार में भी रेसलिंग कर सकते हैं. ऐसी धारणा है कि डब्ल्यूडब्ल्यूई में एक ख़ास तरह के कपड़े पहनकर लड़ा जा सकता है. मैं इसे बदलना चाहती थी.”

कविता वेट लिफ्टिंग में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई मेडल जीत चुकी हैं. वो डब्ल्यूडब्ल्यूई के पूर्व चैंपियन द ग्रेट खली से ट्रेनिंग लेती हैं.

ऐसे आईं रेसलिंग में


वेट लिफ्टिंग से रेसलिंग में आने का उनका सफर भी काफ़ी रोचक रहा है. उन्होंने बताया, “रेसलिंग में आने की योजना नहीं थी. एक बार मैं द ग्रेट खली के कोचिंग सेंटर में फ़ाइट देखने गई थी. एक पुरुष रेसलर ने फ़ाइट जीतने के बाद पूरी भीड़ को ललकारा.”

कविता आगे कहती हैं, “उसकी आवाज़ में घमंड था. उस समय मैं सूट सलवार में थी. मैं अपने परिवार के साथ थी. मैंने अपना हाथ उठा दिया. मैं रेसलिंग रिंग में गई और जोश में उसे पटकनी दे दी. खली सर को यह बात अच्छी लगी और उन्होंने मुझे ट्रेनिंग लेने को कहा. वहीं से मैं रेसलिंग करने लगी.”

कविता अपनी सफलता का श्रेय अपने बड़े भाई संजय दलाल को देते हुए कहती हैं, “मेरी करियर की शुरुआत साल 2002 में फरीदाबाद से हुई. मेरे बड़े भाई संजय दलाल मुझे कई जगहों पर ट्रेनिंग दिलाई. फरीदाबाद के बाद बरेली, लखनऊ तक गई. वहां वेट लिफ्टिंग की ट्रेनिंग ली. साल 2007 में पहली बार नेशनल चैंपियनशिप ओडिशा में जीती. वो हमेशा मेरे साथ रहे.”

अब विदेशी ट्रेनर कविता को रेसलिंग के दाव-पेंच सिखा रहे हैं. वह हर रोज़ ढाई घंटे प्रैक्टिस करती हैं. एक महिला के तौर पर वे अपने सफर को चुनौतियों से भरा बताती हैं.

वह कहती हैं, “एक लड़की के लिए सफर आसान नहीं होता है. हमारे समाज में लड़कियों का घर से निकलना बहुत मुश्किल होता था. यहां तक कि घर में तेज़ आवाज़ में बात करने की भी इजाज़त नहीं होती थी.”

वो कहती हैं, “ऐसे माहौल में मैं साल 2002 में घर से बाहर पढ़ने के लिए निकली थी. घर, परिवार, समाज, हर तरह से तकलीफें आईं. घरवालों को जितनी चिंता नहीं होती है, उससे ज्यादा आस-पड़ोस, परिवार और रिश्तेदारों को होती है. वो ज्यादा सवाल खड़ा करते हैं. “आने वाले दिनों में कविता देश के लिए डब्ल्यूडब्ल्यूई चैंपियनशिप जीतना चाहती हैं.

साभार: बी.बी.सी.
 
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वे कहती थी :’आवेग पूर्वक कथन सबसे ईमानदार प्रतिक्रिया है’



चैतन्य  के.एम


“सोशल मीडिया पर आप जो पोस्ट करती हैं उसमें सावधानी बरतें. हम खतरनाक समय में जी रहे हैं” मैंने पिछले सप्ताह गौरी लंकेश से कहा था. उसने जवाब में कहा, “हम इतने भी मृत नहीं हो सकते. व्यक्त करना और प्रतिक्रिया देना मानवीय कृत्य है.हम जो आवेगपूर्वक महसूस करते हैं वह प्राय: हमारी सबसे ईमानदार प्रतिक्रिया होती है।”

हत्या के विरुद्ध में जुटे पत्रकार (दिल्ली)

मंगलवार की रात को, निर्दयता से उनको गोली मारकर हत्या कर दी गई. यह हत्या आवेग/आवेश में आकर नही की गई थी. यह सुविचारित और योजनाबद्ध थी. जैसे कि महाराष्ट्र और कर्नाटक में तर्कवादी और विचारक नरेंद्र दाभोलकर, गोविंद पानसरे और एम.एम. कलबुर्गी की हत्याएं थी जिनकी ख़ुद लंकेश ने निंदा की और विरोध किया था.


मैं लेखकों के एक परिवार में बड़ा हुआ हूँ. मेरे पिता के. मारुलाससिद्धप्पा और गौरी के पिता पी लंकेस, सहकर्मी और करीबी मित्र थे। लंकेश  अंग्रेजी के एक व्याख्याता थे और मेरे पिता ने कन्नड़ पढ़ाई.

हम एक ही पड़ोस में रहते थे. मेरी मां अक्सर मुझे  लंकेश परिवार की देखभाल में छोड़ दिया करती थीं। जब कभी मैं गौरी के साथ तर्क करता था, वह मजाक करते हुए कहती थीं, “मगन(बेटा )जब तुमको बोलना भी नहीं आता था तब से मैं तुमको गोद में खिला रही हूँ.”

बेंगलूर में विरोध प्रदर्शन

लेकिन गौरी में सबसे अच्छी ख़ूबी यह थी कि कोई उसके साथ कभी भी बहस कर सकता था, विचार-विमर्श कर सकता था तथा बता सकता था कि वह ग़लत हैं. और हमारे तर्क कितने भी उग्र क्यों न हो, हमने जो भी कहा हो, उन्होंने हमारे बोलने के अधिकार का हमेशा सम्मान किया. हम करीबी मित्र थे क्योंकि हम एक-दूसरे से असहमत हो सकते थे. यह एक ऐसा गुण था जो कि उन्हें अपने पिता से विरासत में मिला था.

गौरी के पिता एक तेजतर्रार लेखक और विचारक थे। 1980 में उन्होंने काले और सफेद रंगों में लंकेश पत्रिके , एक लघु समाचार-पत्र प्रारंभ किया था. यह विज्ञापन-रहित समाचार-पत्र था.  लंकेश का मानना था कि प्रकाशन समृद्ध घरानों या शक्तिशाली सरकारी अधिकारियों और राजनेताओं का पक्ष करने के अधीन हो चुके हैं क्योंकि ये विज्ञापनों को प्रायोजित करते  हैं जो कि एक अख़बार के अस्तित्व को बचाए रखने के लिए ज़रूरी है. लंकेश का मानना था कि यह पत्रकारिता की प्रमाणिकता और सत्यनिष्ठा को ख़तम कर देगा. उन्होंने फैसला किया कि लंकेश पत्रिके पुर्णता: प्रसार और वितरण  पर चलेगी।

वह भारत के मीडिया के लिए एक अलग युग था। प्रिंट माध्यम शक्तिशाली था। दूरदर्शन टेलीविजन और आकाशवाणी पर राज्य का स्वामित्व था और  नीर्जिवाणुक सरकार के समाचारों संस्करणों को प्रसारित करते थे. प्रिंट ही एकमात्र स्वतंत्र अन्तराल था.

एक समाजवादी और तर्कसंगत विचारक, लंकेश उदार विचारों की एक पथप्रदर्शक बने। जहां भी उन्होंने जातिवाद और सांप्रदायिकता को देखा, उसको उन्होंने उजागर किया। उन्होंने विद्रोही और मुखर युवा विचारकों को ढूँढा और उन्हें संरक्षित किया जेसे विद्वान डी.आर. नागराज और कवि सिद्दलिंगेह जो आगे चलकर कन्नड़ संस्कृति और राजनीतिक विचारों में महत्वपूर्ण आवाज बने। लेकिन उन्होंने कभी अपने बच्चों को उनकी कार्यों का संचालन करने के लिए तैयार नहीं किया.

गौरी लंकेश ने एक बार कहा था कि वह डॉक्टर बनना चाहती हैं। जब ऐसा नहीं हुआ, तब वह पत्रकारिता की ओर मुड़ गईं। उन्होंने अंग्रेजी प्रेस में अपना करियर शुरूआत की और टाइम्स ऑफ इंडिया, सन्डे और इंडिया टुडे जैसे प्रतिष्ठित प्रकाशनों के साथ काम करने के बाद इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में ईनाडू टीवी के साथ उन्होंने धावा बोल दिया.

उनके भाई-बहन इंद्रजीत और कविता ने सिनेमा में कदम रखा। 24 जनवरी 2000 को, पी. लंकेश ने उस सप्ताह के लंकेश पत्रिक के लिए अपना स्तंभ लिखा और उस संस्करण को पूर्ण कर दिया। अगली सुबह, उनकी म्रत्यु हो गयी थी. यह आकस्मिक और अकल्पित था. वे हमारे बीच नहीं थे परन्तु उन्होंने पत्रकारिता में सम्मानित और श्रद्धेय छाप अपने पीछे छोड़ी थी।

भाई-बहन मणि के पास गए, संज वाणी और दिना सुदर्श के प्रकाशक, जो कि लंकेश पत्रिके  भी प्रकाशित करते थे, और उनसे कहा कि वे अपने पिता के लघु समाचार-पत्र को बंद करना चाहते हैं. गौरी ने महसूस किया कि उनके पिता ने अपने बच्चों को कभी भी अख़बार का कार्यभार संभालने के लिए तैयार नहीं किया।  उन्होंने यह नहीं सोचा था कि वे इसके “स्वाभाविक” उत्तराधिकारी  थे. वे लोग जो उनके क़रीबी थे, उन्होंने कहा, “हम उनकी जगह कभी नहीं ले सकते”.

माना जाता है कि मणि ने उन्हें डांट लगा दी थी। उन्होंने उनसे कहा कि उन्हें अख़बार को एक ओर जुझारू मौका देना चाहिए। उसके भाई इंद्रजीत ने यह फैसला किया कि वे अपने पिता के नाम पर अख़बार को जारी रखेंगे। गौरी ने अपना स्वयं का अख़बार शुरू किया, और इसका नाम था गौरी लंकेश पत्रिके। जब तक उसने इसे शुरू किया, तब तक वे 16 साल की पत्रकारिता भी कर चुकी थीं. मीडिया का इलेक्ट्रॉनिक पक्ष तेजी से बढ़ रहा था. ज्यादातर कन्नड़ लघु समाचार-पत्रों का संचलन घट रहा था। वह एक ऐसे उद्यम पर काम कर रही थी, जो दिन-प्रतिदिन आर्थिक रूप से कमजोर होता चला जा रहा था।

गौरी अपने पिता के आदर्शों के प्रति सजग थी  उनका अखबार धर्मनिरपेक्षता, दलितों के अधिकार, पीड़ितों और महिलाओं के मुद्दों पर मुखर था. और उसने अपने पिता की तेजतर्रार प्रकृति को अपने लेखन में जीवित रखा। जबकि दक्षिणपंथी और जाति आधारित राजनीति की आलोचना करते हुए लंकेश ने कभी शब्दों को नहीं भरा.

उन्होंने फेसबुक और ट्विटर पर विभिन्न राजनैतिक मुद्दों पर अपने निडर और स्पष्ट विचारों को प्रदर्शित किया है। वह लोगों या विचारों के बारे में भावुक होने पर शर्मिन्दा नहीं होती थीं। पिछले साल, कन्हैया कुमार के भाषण सुनने के बाद, उन्होंने उसे बेंगलुरु में आमंत्रित किया था। उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा और उसे अपना बेटा कहा।

लंकेश को कई दफा ट्रोल किया गया और कई नामों से बुलाया जाता था. ये वही लोग थे जो उनको उनको छोटा दिखाना चाहते थे और वह सिर्फ अपने पिता की प्रतिष्ठता का आनंद उठा रही थी। उन्हें नक्सल सहानुभूति, राष्ट्र विरोधी, हिंदू-विरोधी और अन्य नामों के ना से बुलाया गया है। लेकिन इनमें से किसी भी बात ने उन्हें विक्षुब्ध नहीं कर पाया.

पिछले हफ्ते मैंने उनसे मजाक में कहा था कि “वह सोशल मीडिया और टेक्नोलॉजी नहीं समझती है”। उन्होंने कहा, “जो लोग टेक्नोलॉजी को समझते हैं वे चुप हैं। मैं जो कर सकती हूं मैं करूँगी और मैं कहूंगी जो कि मुझे कहना चाहिए। असहिष्णु आवाजें हमारी चुप्पी में कारण ताकतवर होती हैं. उनको तर्क करने में धमकियों के बजाय शब्दों का उपयोग करना सीखें। ”

साभार:द वायर 
अनुवाद: कादम्बरी जैन

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