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प्रेम के भीतर देह ने केंद्रीय विमर्श खड़ा किया है: अनामिका

रानी कुमारी 

“स्त्री क्या है? क्या स्त्री, पुरुष का अन्य है/ अदर है। जो पुरुष को पूरा करते हुए निस्तेज हो जाती है। क्या स्त्री एक कोरी स्लेट है कि कोई भी उस पर, कोई भी इबारत लिख दे! साहित्य में स्त्री का चित्रण कैसे हुआ है?’ ये सवाल वरिष्ठ आलोचक रोहिणी अग्रवाल ने दिल्ली विश्वविद्यालय में संजीव चन्दन के कहानी संग्रह के विमोचन समारोह में विशिष्ट अतिथि के रूप में बोलते हुए किये.

जनवरी माह में सर्दियों के आगमन के साथ ही साहित्य के मौसम में अनेक पुस्तकें आई। बहुत-सी किताबों का लोकार्पण हुआ और परिचर्चा हुई। इसी समय ‘स्त्रीकाल’ पत्रिका के संपादक और स्त्रीवादी कार्यकर्ता संजीव चंदन के पहले कहानी संग्रह ‘546 वीं सीट की स्त्री’ का लोकार्पण 17 जनवरी 2018 को पी. जी. मेंस हॉस्टल दिल्ली विश्वविद्यालय में हुआ तथा इस अवसर पर ‘कथा में स्त्री’ विषय पर परिचर्चा भी हुई। कार्यक्रम के शुरुआत में दूधनाथ सिंह और रोहित वेमुला (17 जनवरी को ही रोहित ने आत्महत्या की थी ) की स्मृति में 2 मिनट का मौन रखा गया। परिचर्चा की अध्यक्षता कवयित्री अनामिका जी ने की।

रोहिणी अग्रवाल ने आगे कहा कि हिंदी साहित्य की प्रसिद्ध कहानी ‘उसने कहा था’ को हम एक प्रेम कहानी के रूप में पढ़ते हैं इस कहानी को सोचकर लहनासिंह याद आता है और सूबेदारनी याद आती है। इस कहानी में सूबेदारनी प्रेम का प्रतिदान मांगती है ना कि प्रतिदान देती है। लेकिन शायद आज ऐसा नहीं होता। उन्होंने कहा कि स्त्री लेखन मिथकों को रचता है। स्त्री लेखन उसके तलघर की दमित आकांक्षाओं और सपनों को कुरेदता है। हालांकि स्त्री लेखन के एक हिस्से में दिखता है कि पुरुष कितना खलनायक है। जबकि पुरुष लेखन करता है तो स्त्री को हीन और दोयम दर्जे के रूप में चित्रित करता है। स्त्री और पुरुष दोनों प्रतिपक्ष के दो पाले में ही रहेंगे? पुरुषों के लेखन से स्त्री गायब होती जा रही है । स्त्रियों में प्रेम का कुचला हुआ और दमन का रुप ही क्यों आता है! लेखक स्त्री में आत्मविश्वास क्यों नहीं भरता ? संजीव मेरे प्रिय कथाकार है। उनके उपन्यास मुझे छूते हैं, झकझोरते हैं पर उनके यहां एक भी अविस्मरणीय स्त्री पात्र नहीं मिलता। उदय प्रकाश की कहानियों में स्त्री पितृसत्ता, वर्ण-व्यवस्था को मजबूत करती नजर आती है। उनके यहां भी स्त्री के निजता का सवाल नहीं मिलता। ऐसे दो लेखक हैं जिनके यहां पर स्त्री लड़ती हुई दिखाई देती है एक शिव मूर्ति और दूसरे भगवानदास मोरवाल। लेकिन जब मैं संजीव चंदन की कहानियां पढ़ती हूं तो लगता है कि वह सार्थक हस्तक्षेप कर रही हैं. संजीव चंदन के इस कहानी संग्रह की कहानियों में स्त्रियों से जुड़े विविध पहलू और मुद्दे, उसकी सच्चाइयां व्यक्त होती हैं। स्त्री का व्यक्तित्व समग्रता में आकार लेता है इन कहानियों में। इस संग्रह को आज के समय की बहुत बड़ी दस्तक के रूप में याद किया जाना चाहिये।

रोहिणी ने कहा कि संजीव चंदन की कहानियों में बार-बार आता है कि ये वो समय था जब ये हुआ, जब वो हुआ। हम भूमंडलीकरण के दौर में जी रहे हैं।आधुनिक समाज में जी रहे हैं जहां सूचनाओं पर अधिकार का दंभ हम भरते हैं। दुनिया नहीं सिकुड़ी हमारी सोच सिकुड़ी है, वापस हम कबीलाई हो गए हैं। इस विडंबना को ये कहानियां व्यक्त करती हैं. ‘तुम्हीं से जनमूं तो पनाह मिले’  की नायिका कह रही है कि मैं अब बेटी को जन्म ही नहीं दूंगी बल्कि मेरे रौंदे हुए, कुचले हुए सपनों, ऊर्जा, अरमानों को उसमें उकेर दूंगी।आर्ची की कहानी यौन शोषण से उत्पन्न उत्पीड़न की कहानी भर नहीं है. इसके खिलाफ मोर्चाबंदी रूमी ले रही है।

इन कहानियों में लेखक पात्र भी है, कथावाचक भी है और कथा पाठक के रूप में आनंद भी लेता है। तीनों रूपों में वह अपने आप को बांटकर चल रहा है। शिल्प में कथा का आनंद भी ले रहा है। कथा के ताने-बाने में परंपरागत ढांचे को तोड़-फोड़ करके स्त्री के मन में घुसता ही इस तरह से है कि स्त्री का त्रिआयामी चित्रण कर सके। यह कहानी संग्रह कोई समाधान नहीं दे रहा है। यह कहानी संग्रह एक डिबेट का आह्वान करता है। इस डिबेट के लिए दूसरे की आवश्यकता नहीं बल्कि अपने अंदर विचार विमर्श करने की जरूरत है। यह जो पुरुषों की लेखनी में जो चुप्पी पसरी हुई है स्त्रियों को लेकर। उसको यह कहानी संग्रह बहुत ही सृजनात्मक और बहुत ही अविस्मरणीय ढंग से तोड़ने वाली धमक है।

पैनल के पहले वक्ता और युवा आलोचक कवितेंद्र ने अपने वक्तव्य में कहा कि अभी तक मैं संजीव को स्त्रीवादी कार्यकर्ता के रूप में ही जानता था। संजीव चंदन ने 22 साल में 11 कहानियां लिखी। इससे ऐसा लगता है कि बहुत कम लिखते हैं ,या जम कर लिखते हैं। ‘546 वीं सीट की स्त्री’ कहानी में ऋचा, भविष्य की स्त्री नहीं है। अपने जीवन में दमन झेलती हुई आखिरकार राजनीति में सत्ता पा लेती है। लेकिन एक स्त्री की राजनीति सत्ता, पितृसत्ता के मुकाबले हार जाती है और कहानी बखूबी यह चीज दिखाती है। संजीव चंदन की कहानी स्त्रीवादी लेखन में उपलब्धि है।’इनबॉक्स में रानी सारंगा : धइले मरदवा के भेस हो’ और ‘प्रेमकथा में हाड़ा रानी की पुनर्वापसी बनाम बैताल…’ कहानियों में विवाहेतर प्रेम को दर्शाया गया है। शादी के बाद भी प्रेम की क्या आवश्यकता पड़ती है। अभी तक हमारा समाज प्रेम को ही स्वीकार नहीं कर पाया है! अब तक विवाहेत्तर प्रेम में पति खलनायक चित्रित होता रहा है लेकिन संजीव की कहानियों में विवाहेतर प्रेम में पति खलनायक नहीं है। यह ख़ास बात है. संजीव की कहानियां हल नहीं सूझा पाती, वह हम पाठकों पर छोड़ देते है। तबस्सुम सवाल पूछती है कि रूमी का पात्र ऐसे क्यों गढ़ा? ऐंगल्स ने कहा है यौन प्रेम स्वभावत: एकांतिक होता है। संजीव चंदन की कहानियां मुक्ति का सवाल उठाती है।

आलोचक बजरंग बिहारी तिवारी ने अपने वक्तव्य में कहा कि ‘कथा में स्त्री’ पद काफी मानीखेज है। बाणभट्ट से ही ‘कथा’ की शुरुआत होती है। दंडी ने दो भेद बताए है कथा (काल्पनिक) और आख्यान। आख्यायिका में स्त्रियां नहीं है। लेकिन वास्तविकता में स्त्रियां गायब होती है काल्पनिक कथाओं में स्त्रियां होती है।संजीव चंदन अपनी कहानियों में मिथकों का बहुत इस्तेमाल करते हैं। हमारे यहां पुरुष, स्त्रियों को गढ़ते हैं। संजीव चंदन भी इस कहानी संग्रह को वास्तविक और आभासी स्त्रियों को समर्पित करते हैं। आर्ची नाम के पात्र की कहानी, आगे की कहानियों में भी मिलती है। इनकी कहानियों में अंतः सूत्र और डिटेल्स अधिक है। जो कई बार बेमतलब की लगती है।अधिकांश कहानियों में स्त्रियां सुनती है वह पैसिव है, जो एक्टिव हैं वे हाइपर एक्टिव हैं।

लेखिका रजनी दिसोदिया ने अपने वक्तव्य में कहा कि संजीव चंदन उस युवा पीढ़ी के रचनाकार है। जिनका बचपन भूमंडलीकरण से पहले वाले दौर में बीता और उनकी युवावस्था बाद वाले  की है। युग परिवर्तन के इस दौर को युवा होते खुली आंखों से देखा है.  यह पूरा दौर मीडिया, सिनेमा, कला यहां तक कि प्रत्येक क्षेत्र में भूमंडलीकरण के असर का दौर है। संजीव की कहानियों के कथानक कहीं पीछे छूट जाता है वह अनायास आता है। डिटेल्स खूब हैं, जबकि इसके प्रति लेखक सजग है। भूमंडलीय दौर में जो परिवर्तन हो रहे हैं तो  चरित्र ऐसे आ रहे हैं इसलिए डिटेल्स भी जरूरी है। यहाँ स्त्री दृष्टि की कहानी को  पुरुष देख रहा है स्त्री की तरह। स्त्रियां, प्यार में बंधन नहीं चाहती इसी संदर्भ में सारंगा वाली कहानी डिस्टर्ब करती है। यह कहानी सोशल मीडिया पर आधारित  है। पहला पुरुष थोपा हुआ होता था, लेकिन रूमी के साथ ऐसा नहीं है। रूमी बंधनहीन प्रेम की मांग करती है। तमाम प्रेम उसे अकेला कर रहे हैं, यह यात्रा उसे अकेला ही बनाती है। इस मायने में दलित स्त्री अलग है वह समझती है कि अकेले होते ही शिकार बन सकती है इसलिए वह सामूहिक रहना पसंद करती है। इस मुक्ति की कोई सामाजिकता नहीं है।’वह ट्रेन निरंजना को जाती है’ कहानी में नायिका को मुंबई जाना था लेकिन वह निरंजना चली जाती है। मां की दो आंखें उसे निरंतर देखती रहती है, पिता का विश्वास नजर रखता है। यह एक खूबसूरत कहानी है, भूमंडलीकरण के प्रवाह को थामने की कहानी।

कथाकार टेकचंद ने अपने वक्तव्य में कहा कि संजीव चंदन की कहानियां आज की जिस स्त्री को केंद्र में लेकर आती है उसकी मानसिक संरचना बेहद जटिल और संश्लिष्ट है। जिसका प्रमाण इन कहानियों में मिलता है। हिंदी कथा -साहित्य में स्त्री कैसी है? जब हम प्रेमचंद के लेखन को देखते है तो सचेत स्त्रियां दिखायी देती हैं, आजादी के बाद महानगर की स्त्रियां, और उसके बाद मोहन राकेश की ‘सावित्री’। संजीव की कहानियों में मिथक आज के जीवन को भी व्याख्यायित करते हैं।

कथाकार अल्पना मिश्रा ने अपने वक्तव्य में कहा कि हम संजीव चंदन को स्त्री के संघर्ष में एक साथी, एक्टिविस्ट के रूप में देखने को अभ्यस्त रहे हैं। मैंने यह कहानियां वैज्ञानिक दृष्टि से देखी और पढी है। इनकी कहानियां औपन्यासिक क्लेवर की है। जब इनकी कहानियों को पढ़ती हूं तो देखती हूं कि 70 से लेकर आज तक की राजनीति पर बात की गई है। इतना बड़ा क्लेवर है। पात्र सुदृढ़ है। क्लेवर और मार्मिकता साहित्य का प्राण है। हर विधा में मार्मिकता की जगह है। संजीव चंदन वैज्ञानिक दृष्टिकोण और चेतना को लेकर आते हैं कहानियों में। परकाया प्रवेश हिन्दी की कहानियों में पहले भी हुआ है. जैनेंद्र की पत्नी कहानी, अज्ञेय की रोज़। जब हम अज्ञेय की रोज़ कहानी के उस घंटे की आवाज को आज भी महसूस करते हैं, वह आवाज कितनी तकलीफदेह है.

अल्पना मिश्र ने हिन्दी आलोचना में स्त्रियों के प्रति दोयम व्यवहार को चिह्नित किया. आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने अपने इतिहास में बंग महिला और महादेवी वर्मा पर 3 लाइनें लिखी। बंग महिला के लेखन के बारे में कुछ नहीं लिखा, उनका कुल-खानदान खूब लिखा.  कथा में स्त्रियों ने हस्तक्षेप करना शुरू किया, तो उन्हें जगह नहीं मिली।क्या शिवरानी देवी को कभी कथाकार शिवरानी कहा गया? अल्पना ने कहा कि स्त्रियों का संघर्ष निरंतर जारी है. सावित्रीबाई फुले के साथ क्या-क्या हुआ। जब उनका साथ रानाडे ने दिया। हम केरल के चान्नार विद्रोह को भी देख सकते हैं। तब स्त्रियां कमीज नहीं पहन सकती थीं.  मिशनरियों आने के बाद उन्होंने विश्वास दिलाया कि ऐसा हो सकता है। ऊपरी वस्त्र पहनने का लंबा आन्दोलन चला. दबाया कुचला हुआ व्यक्ति जब बोलता है तो वह प्रतिरोध की भाषा ही होती है। आज नई चुनौतियां भी हमारे सामने हैं, जिसमें मुख्य रूप से बाजार का दबाव है और दूसरी ओर  पितृसत्ता है।

रंगकर्मी और लेखिका नूर जहीर ने अपने वक्तव्य में कहा कि परिकथा में से परी, रूपकथा से रूप, लोक कथा से लोक और मिथक से उसका छुपा हुआ चेहरा लेकर जब दास्तानगोई की मिटटी की हंडिया में धीमी आंच पर देर तक दम दिया जाए तो जो सोंधी महक लिए बनके सामने आएगा वह “पांचसौ छियालिस्वीं सीट की स्त्री” होगी —-मेरी मुराद सिर्फ इस नाम की कहानी से नहीं इस पूरे मजमुए से है।इनकी कहानियाँ  चलती हुई कहानी किसी निर्धारित अंत तक पहुंचे, यह जरूरी नहीं। संजीव की कहानी चलती हुई तो महसूस होती है। वह एक ही डगर या पात्र के सहारे नहीं चलती है। एक कहानी कई सवाल खड़े करती हैं।

नूर ने कहा कि कहीं न कहीं हर कहानी सवाल खड़े करती है, एक प्रश्न नहीं, एक साथ कई सवाल—–समय को, अपने समय को, बीते वक़्त को हम कैसे याद करेंगे? क्या उस समय में पड़ा अकाल, जेल भरो आन्दोलन, बढ़ते बलात्कार, छिछली,भ्रष्ट राजनीति, समय को परिभाषित और रेखांकित नहीं करेंगे? किस खांचे में किस केटेगरी में हम डालेंगे एक समय को? क्या मुद्दे हैं जो हमें उस वक़्त की याद दिलाएंगे? प्रचलित रीती  रिवाज? जिसमे बट सावित्री व्रत तो रख रही हैं स्त्रियाँ और साथ ही पंखों का भी ढेर लगता जा रहा हो, या प्रधान मंत्री के इस वाक्य से “कुंवारा हूँ, ब्रह्मचारी नहीं,” स्त्री के बढ़ते हुए आत्मविशवास से या उनपर बढ़ते हुई हिंसा और यौन उत्पीडन से या इस समझ से कि राजनीति में आने वाली स्त्रियाँ,  हाँ, वामपंथी राजनीति से जुडी हुई स्त्रियाँ भी किसी की पत्नी, बहु, बेटी होती हैं?

अध्यक्षीय वक्तव्य में अनामिका ने कहा कि नये लड़के और लड़कियां स्त्रीवाद के गर्भ से जन्मे हुए हैं। ‘तुम्हीं से जनमूं तो पनाह मिले’ कहानी स्त्रीवाद से जन्मे लेखक की दृष्टि की कहानी है. स्त्री को बहुत सारी खिड़कियों से देखने की कोशिश की है संजीव चंदन ने। और बहुत सफल कोशिश की है । संजीव को मैं दो दशक से जानती हूँ. 20-22 के उम्र के वह होंगे, तब से जानती हूं। स्त्री अध्ययन की कक्षा में बैठकर जिस तरह के प्रश्न उठाते थे। उसी समय लगा था कि यह प्रश्न इन्हें कहीं ले जाएंगे। लंबी उड़ान और लंबी थकान का सिलसिला पैदा करेंगे। इन 20 वर्षों में जो इन पर गुजरी है मैं उसकी साक्षी रही हूं। जब मैं ये कहानियां पढ़ती हूं तो एक तरह से भूमिगत, जैसे गर्भ गत 9 महीने होते हैं, वहाँ से लिखी कहानियां दिखती हैं। जो भी राजनीति में सक्रिय रहता हैप्रतिरोध की राजनीति में, उसके लिए एक गर्भ और हो जाता है.  भूमिगत जब मनुष्य रहता है, कई तरह की परिस्थितियों में, तो एक नए तरह का गर्भ  समय भी बन जाता है। आप सब के जीवन में वह समय जरूर आता होगा। आप सबसे छुपकर अपने भीतर, अपने को ही दोबारा जन्म देने की कोशिश में एक गर्भ की संरचना कर लेते हैं। वह जो एकांत होता है अंग्रेजी में उसके लिए एक शब्द है ऑल -अलोन। कच्ची पक्की नौकरियां करते हुए, कच्चे-पक्के संबंध जीने का यह समय एकांत पैदा करता है। त्रास पैदा करता है। कितने सवाल उठाता है इसका प्रबल साक्ष्य इस संग्रह में मिलेगा। सभी वक्तव्यों में एक सवाल उठा है प्रेम क्या है? जब हम अन्ना कैरेनिना के बरक्स रुमी को रखते हैं या चेखव की कहानी डार्लिंग को लेते हैं।तो देखते हैं यह कहानी 19वी शताब्दी की लड़की की है, जो अकेली हैं। जब हम इसके बरक्स संजीव चंदन की रुमी को रखते हैं तो समझ आता है कितना पानी बहा. यह भी मुझे लगता है हर व्यक्ति अपने आप में विशिष्ट है उसका वैशिष्ट्य अंदर ही अंदर को कुम्हला रहा है ,उसकी पत्तियां गिर रही हैं। प्रेम ही वह संभावना है जो उसके भीतर छिपे वैशिष्ट्य को, उसकी संभावना को मुकुलित करने का आभास देता है। आपके भीतर जो था वह पूरी तरह खिल गया है। ऐसे समय में प्रेम श्रृंखलाओं से कैसे निपटा जाए क्योंकि प्रेम श्रृंखलाएं फिर अपमान की उस राजनीति से हमें रूबरू करती है, जिसको हम सामाजिक संदर्भ में समझ चुके हैं, लेकिन निजी संदर्भ पर इतनी चर्चा नहीं की।

अनामिका ने कहा कि  बुद्ध ने मैत्री की चर्चा की है, स्त्री -आंदोलन ने सिस्टरहुड की बात कही। हम सब बंधुता की बात करते हैं। तो कैसे प्रेम करें कि बंधुता क्षरित ना हो या मैत्रीभाव क्षरित ना हो। प्रेम की क्षमता का शुभ पक्ष, सबसे प्यारा पक्ष है। ऐसा प्रेम कैसे करें एक बार वह खिलकर मुरझाए ना, हमेशा खिला रहे यह बहुत बड़ी चुनौती है हमारे सामने। कच्ची पक्की नौकरियों के चलते कच्चे-पक्के संबंध बना रहे हैं कहीं छोड़ा कहीं पकड़ा, कभी यहां कभी वहां हम एक विराट घूर्णन जैसे भंवर के शिकार हो गए हैं और मक्खन कहीं ऊपर नहीं आ रहा। यह जिस समय की आहट है उसे बेहतर ढंग से इस लड़के (संजीव चंदन) ने पकड़ी है जिसे मैं 20 साल की उम्र से जानती हूं।

पिछले 10 साल में जब एक व्यक्ति किशोर से युवा हो रहा है। उसके समय के विडंबनात्मक पक्ष सूचना के माध्यम से आ रहे हैं। हम एक आतंक विह्वल समय में रह रहे हैं। प्रेम की तलाश नैसर्गिक है। प्रेम अब दिखाई नहीं देता। इन कहानियों में प्रेम श्रृंखलाएं हैं एक से दूसरी, दूसरे से तीसरी। प्रेम के भीतर देह ने केंद्रीय विमर्श खड़ा किया है। इस कहानी संग्रह में भी छोटे शहरों से बड़े शहरों में आई लड़कियां है। एक नए तरह का संबंध जीती स्त्रियां है। संजीव चंदन की कहानियों के चरित्रों में पारस्परिकता है, कोई भी पात्र विक्टिम नहीं है। साथी पुरुष से स्त्रियां खुल कर बात करती है, साथी पुरुष भी उनकी बात सुनते हैं। सहजीवन की कल्पना है, यूटोपिया है। जहां दोनों अपने मन की बात कह सकते हैं। इस तरह की कल्पना के लिए संजीव चंदन ने अपने समय के द्वंद, नई तकनीक और शिल्प का प्रयोग किया है। मंच संचालन धर्मवीर ने किया। शिक्षकों, विद्यार्थियों और शोधार्थियों से पी. जी. मेंस सभागार खचाखच भरा हुआ था। जो स्त्रीवादी मुद्दों की संवेदनशीलता और प्रतिबद्धता को दर्शाता है। धन्यवाद ज्ञापन रानी कुमारी ने किया ।

रानी कुमारी दिल्ली विश्वविद्यालय के कॉलेज में तदर्थ प्राध्यापिका हैं. 

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महिलाओं को संसद में होना ही चाहिए : वेंकैया नायडू

नवल कुमार

उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने  को कहा कि महिलाओं को अवसर दीजिये और देखिये कि वे किस तरह खुद को साबित करती हैं. वे जहां भी चुनी गई हैं, जहाँ भी उन्हें आरक्षण मिला है उन सदनों में उन्होंने साबित किया है कि  वे महत्वपूर्ण योगदान दे रही हैं. उन्हें उच्च सदनों में भी आरक्षण मिलना चाहिए। ये बातें नायडू ने 3 जनवरी को द  मार्जिनलाइज्ड  प्रकाशन द्वारा प्रकाशित भारत के राजनेता सीरीज की किताब ‘रामदास आठवले’ का स्पीकर हॉल, कांस्टीट्यूशन क्लब में विमोचन करते हुए कही. उन्होंने समाजिक न्याय मंत्री ‘रामदास  आठवले’ की राजनीति को समाज में समता और शान्ति स्थापित करने वाला बताया। उन्होंने कहा कि इस सीरीज में यह दूसरी किताब है और अन्य राजनेताओं पर भी किताब आ रही है, यह महत्वपूर्ण है कि जनता तक राजनेताओं की बात जाये।

इस अवसर पर केंद्रीय मंत्री रामदास आठवले ने कहा कि दुनिया में शान्ति और समन्वय से ही समता स्थापित हो सकती है संघर्ष जरूरी है लेकिन अहिंसक रास्ते से. पैनल डिस्कसन में बोलते हुए सीपीआई के सांसद डी  राजा ने रामदास आठवले द्वारा क्रिकेट में भी आरक्षण की मांग किये जाने को याद दिलाया। राजा ने कहा कि समता का सन्देश देने वाले नेताओं में डा.  अम्बेकडर के योगदान को कम करके देखा जाता है अभी उनका अर्थशास्त्री के रूप में मूल्यांकन होना बाकी है. प्रकाशक संजीव चंदन ने कहा कि  किताब की श्रृंखला जारी रहेगी। यह इस सीरीज की दूसरी किताब है, पहली किताब ‘अली अनवर’ थी.  कार्यक्रम में पूर्व सांसद अली अनवर भी उपस्थित थे तथा बड़ी संख्या में रामदास आठवले के समर्थक भी शामिल हुए. सञ्चालन सामाजिक कार्यकर्ता मनीष गवई ने किया। स्वागत भाषण सर्व समाज संघर्ष समिति के अध्यक्ष वेदपाल तंवर ने किया।
 इस श्रृंखला  के तहत देश 30 प्रमुख समाज-राजनीति कर्मियों पर किताबें प्रकाशित की जानी हैं। इसमें ऐसे  सामाजिक-राजनीतिक नेताओं को जगह दी गई है, जिनका न सिर्फ समाजिक परिवर्तन में महत्वपूर्ण योगदान रहा हो, बल्कि जिनकी वैचारिकी मौलिक और भारतीय समाज और  राजनीति की गतिकी की दिशा मोड़ने वाली रही हो।

किताब से कुछ कोट : 
1. मैंने अटल जी की बीजेपी सरकार गिरायी थी. 1999 में 13 महीनों के बाद अटल जी सरकार एक वोट से गिर गयी थी. तब हमारे पीछे प्रमोद महाजन और दूसरे भाजपा नेता लगे थे कि सरकार को समर्थन दीजिये. वे हम चारो को मंत्री बनने के लिए तैयार थे, प्रकाश अम्बेडकर उनसे सहमत भी थे, लेकिन हम तीन- गवई साहेब, योगेन्द्र कबाड़े और मैं तैयार नहीं थे. (पृष्ठ 25)
2. मुझे लगता है कि यदि सिर्फ राम मंदिर की बात करती रहेगी तो मुझे लगता है कि सत्ता में रहना या बाद में आना मुश्किल है. लेकिन नरेंद्र मोदी आरएसएस को बदल देंगे. मुझे लगता है कि अभी तक वे अपना लाइन नहीं छोड़ रहे हैं ‘ सबका साथ-सबका विकास .’ पृष्ठ 29
3. नानकचंद रत्तू और सोहनलाल शास्त्री ने माई साहब ( बाबा साहेब की दूसरी पत्नी सविता अम्बेडकर)को बदनाम करने की कोशिश की. ( पृष्ठ 36-3
4. शिक्षा और जमीन का सराकारीकरन जरूरी
किताब के बारे में
किताब का नाम : ‘रामदास आठवले’
पुस्तक श्रृंखला : भारत के राजनेता
संपादक : राजीव सुमन
श्रृंखला संपादक : प्रमोद रंजन
प्रकाशन : द मार्जिनलाइज्ड, दिल्ली
पृष्ठ : 122
मूल्य : 200 रूपए (पेपर बैक), 400 रूपए (हार्डबाऊंड)
संपर्क : 8130284314,9968527911 (प्रकाशक)

‘रामदास आठवले’ शीर्षक श्रृंखला की इस दूसरी किताब में केन्द्रीय मंत्री रामदास आठवले का एक लंबा साक्षात्कार व उनके भाषणों को संकलित किया गया है, ताकि राजनीति विज्ञान के अध्येता उनके मूल विचारों को समझ सकें। श्रृंखला के तहत आठवले का चयन मुख्य रूप से दलित पैंथर से उनके आरंभिक जुड़ाव तथा दलित राजनीति के लिए शहरी जमीन में उगाने की रचनात्मक कोशिशों के कारण किया गया है। उन्होंने अपने आंदोलनों से मुम्बई जैसे महानगर में दलित राजनीति के लिए ठोस संभावनाएँ पैदा कीं।

इस किताब में निम्नांकित मामलों की जानकारी पाठकों को मिलती है : 
सविता आंबेडकर को दिलाया सम्मान
रामदास आठवले के लिए आंबेडकर महत्वपूर्ण रहे हैं। इसी किताब में संकलित एक साक्षात्कार में वे बताते हैं कि ब्राह्मण परिवार में पैदा हुईं सविता आंबेडकर(जिन्हें वे सम्मान से माई साहब कहते हैं) लंबे समय तक दलित कार्यकर्ताओं द्वारा बहिष्कृत रहीं। कुछ नेताओं ने  उन्हें बाबा साहब का हत्यारा बता दिया। वे महाराष्ट्र नहीं जाती थीं, दिल्ली के महरौली में रहती थीं। आठवले जी बताते हैं कि उन्होंने एक अभियान चलाकर उन्हें दलित समाज में स्थापित किया।

                                                               
दलित पैंथर कार्यकर्ता से शुरू हुई संघर्ष की कहानी
रामदास आठवले ने अपनी राजनीतिक यात्रा कैसे शुरू की, यह उनके लिए समझना और जानना रूचिकर होगा जो दलित आंदोलन से सरोकार रखते हैं। नामदेव ढसाल, जे बी पवार,राजा ढाले आदि द्वारा शुरू किया गया दलित पैंथर आंदोलन दलित युवाओं के बीच जंगल में लगी आग की तरह फैला। आठवले भी इस आंदोलन में सक्रिय हुए। लेकिन बाद के दिनों में अनेक कारणों से यह आंदोलन अपेक्षित लक्ष्य हासिल नहीं कर सका और राजनीतिक मोर्चे पर बिखर गया। आठवले सक्रिय रहे। उन्होंने पहल करते हुए पैंथर्स पार्टी आफ इंडिया का गठन किया।

महाराष्ट्र में दलित आंदोलन के चेहरा बने आठवले
बाबा साहब के निधन के बाद महाराष्ट्र में दलित आंदोलन की गति धीमी पड़ गई थी। दलित पैंथर्स के कारण आग तो लगी लेकिन राजनीतिक मोर्चे पर बिखराव के बाद संकट गहराने लगा था। रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया जिसकी स्थापना बाबा साहब ने की थी वह नेतृत्वहीनता का शिकार थी। रामदास आठवले ने महाराष्ट्र में रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया को शिवसेना और कांग्रेस के समानांतर खड़ा करने की कोशिश की। वह सफल भी रहे। यह किताब उस कालखंड के बारे में बकौल रामदास अठावले राजनीतिक संघर्ष की गाथा कहती है जिसकी बुनियाद बाबा साहब ने डाली थी।
यह किताब रामदास आठवले की राजनीतिक यात्रा के बारे में बताती है। शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे से उनका जुड़ाव का प्रसंग इसकी बानगी है। लेकिन स्वयं आठवले कहते हैं कि शिवसेना के साथ चुनाव में जाने से पहले उन्होंने अपने दल के नेताओं व कार्यकर्ताओं के साथ करीब 6 महीने तक बैठकें की। सबके विचार जान तब उन्होंने यह फैसला लिया था। यह किसी एक व्यक्ति का फैसला नहीं था। हालांकि आठवले स्वीकार करते हैं कि यह एक राजनैतिक जुड़ाव था। वैचारिक मतभेद बने रहे।
आरपीआई की राजनीति का इतिहास 
आठवले ने इस किताब में संकलित अपने साक्षात्कार में महाराष्ट्र में आरपीआई की भूमिका, उसके अपने इतिहास और अंदरुनी राजनीति की चर्चा की है. उन्होंने कई अवसरों पर आरपीआई के सभी धड़ों के साथ आने और बिखरने के अंदरखाने की दिलचस्प बातें इस किताब में बतायी हैं
नवल कुमार फॉरवर्ड प्रेस के हिन्दी संपादक हैं.


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शोधार्थियों ने मनाई सावित्रीबाई फुले जयंती

डेस्क 



किसी भी समाज में क्रांतिकारी बदलाव तब ही आ सकता है जब प्रत्येक स्वाभिमानी व्यक्ति एक ईकाई के रूप में स्वतंत्र एवं व्यापक समाज के हित में चिंतन तथा कार्य करे. यह कार्य निश्चित रूप से शोषण एवं शोषक वर्ग के खिलाफ जाने वाला साबित होगा.  3 जनवरी को भारत की प्रथम महिला शिक्षिका माता सावित्री बाई फुले की 187वीं जयंती के अवसर पर बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के विश्वनाथ मंदिर परिसर एक संगोष्ठी का आयोजन में किया गया. इस कार्यक्रम में सभी उपस्थित काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, महात्मा गाँधी काशी विद्यापीठ एवं अन्य शैक्षणिक संस्थाओं से सम्बंधित शोध छात्राओं, शोध छात्रों एवं स्नातक, परास्नातक कक्षाओं के विद्यार्थियों ने आपस में एक सामाजिक-शैक्षणिक संवाद किया. इस संवाद का केंद्र माता सावित्री के जीवन संघर्ष एवं उनके समय की सामाजिक-धार्मिक ठेकेदारों की कुटिल नीतियों की चर्चा की गयी. प्रतिभागियों ने अपने निजी अनुभव भी इसमें साझा किये.

इस सघन संवाद का परिणाम निकल कर आया कि आज सावित्री माता के समय जैसी स्थितियां और चुनौतियाँ तो हमारे सम्मुख नहीं हैं किन्तु युवा पीढ़ी में वो चेतना नहीं है जिसकी जरुरत आज भारत के नब्बे फीसदी समाज को है. बंगाल तथा महाराष्ट्र में हुए सामाजिक आंदोलनों की चर्चा करते हुए विकाश सिंह मौर्य ने कहा कि बंगाल के आन्दोलन जहाँ समाज के उच्च तबकों के नेतृत्व में था वहीं महाराष्ट्र का लगभग समूचा आन्दोलन किसान एवं अन्य सहायक जातियों के नेतृत्व में किया गया. भारत की प्रथम मुस्लिम शिक्षिका फ़ातिमा शेख़ और उनके भाई उस्मान शेख़ के बारे में बताया कि किस तरीके से उन्होंने सर्व समाज विशेषकर महिला शिक्षा के लिए सर्वस्व योगदान किया था. सुनील कश्यप ने इस अवसर पर जयपाल सिंह मुंडा एवं एकलव्य को भी प्रासंगिक बताया. शिवेंद्र कुमार मौर्य ने सावित्री माता का जीवन परिचय बताया. शुभम जायसवाल ने आधुनिक शिक्षा खासतौर पर लड़कियों की शिक्षा के पुरुष सत्ता के प्रति संकीर्ण दृष्टिकोण पर व्यंग करते हुए कहा कि इसलिए बच्चियों को पढ़ाया जाता है कि बी.ए. कर लेने पर शादी ठीक से हो जाएगी.
निर्मला वर्मा ने अपना अनुभव सुनाते हुए बताया कि ‘समाज में किस तरह से बेटियों के साथ भेदभाव किया जाता है?’ उन्होंने अब तक की अपनी सफलता का श्रेय अपने भाई को दिया. राहुल सिंह राजभर ने देश की वर्तमान राजनीतिक स्थितियों के बारे में बताया कि किस तरह से देश के टुकड़े-टुकड़े हो जाने की संभावना दिख रही है. सभी अपनी ढपली अपना राग लिए हुए अपने-अपने राष्ट्र की लड़ाई लड़ रहे हैं. उन्होंने इतिहास लेखन पर भी सवाल उठाये एवं इतिहास के पुनर्लेखन की जरुरत पर बल दिया.

अध्यक्षता करते हुए रामायण पटेल ने चेतना निर्माण एवं सम्यक इतिहास बोध पर बल दिया. उन्होंने 1920 के दशक को आधुनिक भारतीय इतिहास का निर्णायक दशक बताया. इस दौरान राजर्षि शाहूजी महाराज की हत्या, गीता प्रेस एवं राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की स्थापना, साइमन कमीशन का आगमन आदि घटनाएँ घटी, जिसका निर्णायक प्रभाव स्वतंत्रता पश्चात् के भारत पर सर्वाधिक पड़ा है. इस संगोष्ठी में अनीता, विनय पटेल, अनुराग पटेल, योगेश राज, सोनिया कुमारी, उदय भान सिंह, राजू पटेल, चन्दन सागर और राम करन सहित तीन दर्जन से अधिक लोग उपस्थित रहे. कार्यक्रम का संयोजन विकाश सिंह मौर्य ने किया.

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मुस्लिम महिला संरक्षण विधेयक

अरविंद जैन

स्त्री पर यौन हिंसा और न्यायालयों एवम समाज की पुरुषवादी दृष्टि पर ऐडवोकेट अरविंद जैन ने महत्वपूर्ण काम किये हैं. उनकी किताब ‘औरत होने की सजा’ हिन्दी में स्त्रीवादी न्याय सिद्धांत की पहली और महत्वपूर्ण किताब है. संपर्क : 9810201120
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सुप्रीम कोर्ट के पांच न्यायमूर्तियों की संविधान-पीठ द्वारा 22 अगस्त, 2017 को मुस्लिम समाज में प्रचलित ‘तीन तलाक’ को निरस्त करने के आदेश के बाद, केंद्र सरकार ‘तीन तलाक’ संबंधी ‘मुस्लिम महिला विवाह का अधिकार संरक्षण विधेयक, 2017’ शीतकालीन अधिवेशन में पेश करने के लिए सूचीबद्ध कर दिया है। हालाँकि, फैसले के तत्काल बाद केंद्रीय कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने फैसले का स्वागत करते हुए कहा था कि फैसले के क्रियान्वयन के लिए अलग से कानून बनाए जाने की कोई आवश्यकता नहीं है। उस समय केंद्र सरकार, कानून बनाए जाने के पक्ष में नहीं दीख रही थी। दरअसल, सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बावजूद, ज़मीनी स्तर पर ‘तीन तलाक़’ की प्रथा जारी रही और कोई आमूल-चूल बदलाव दिखाई नहीं दे रहा था। लगता है कि सरकार इस विधेयक के माध्यम से, 2019 के चुनावी बेड़े को पार ले जाना चाहती है।


सुप्रीम कोर्ट के पांच न्यायमूर्ति- जस्टिस जे.एस. खेहर, जस्टिस कूरियन जोसेफ, जस्टिस यू.यू. ललित, जस्टिस आर.एफ. नरीमन और जस्टिस अब्दुल नजीर की संविधान-पीठ ने, ‘तीन तलाक’ को निरस्त करने का आदेश दिया था। इस फैसले के बाद, पूरे देश में ऐसा लगा कि मुस्लिम महिलाओं की आजादी का नया युग शुरू हो गया है। अब मुस्लिम स्त्रियों पर दमन, अत्याचार या अनाचार का सिलसिला एकदम खत्म जाएगा। केंद्र सरकार ने इसका भरपूर श्रेय लिया और  विपक्षी दल फैसले का विरोध भी नहीं कर पाए, शायद इस डर से कि विरोध कहीं उनके ‘वोट बैंक’ में सेंध न लगा दे।

 तीन तलाक़ पर, उच्चतम न्यायालय के पांच न्यायधीशों की संविधान पीठ के ‘ऐतिहासिक फैसले’ को, आने वाली पीढ़ीयाँ किस रूप में देखेंगी- क्रांतिकारी फैसला या मील का ‘पत्थर’। अभी कहना कठिन है। 1400 साल पुरानी प्रथा की वैधानिकता-संवैधानिकता पर, न्यायविद सालों बहस करते रहे हैं, करते रहेंगे. क्या निर्णय से औरत की गरिमा बढ़ेगी, महिलाओं का सशक्तिकरण होगा और लैंगिक समानता की दिशा में सार्थक शुरुआत हो पाएगी? सवाल यह भी है कि महिला याचिकाकर्ताओं को क्या ‘हासिल’ हुआ. उसी पति के रहने का आदेश, जो उसे रोज़ तरह-तरह से प्रताड़ित करता रहा है। क्या ज़मीनी स्तर पर आमूल-चूल बदलाव से स्त्रियों की ज़िन्दगी खुशहाल होगी? बहुत से सवाल, संदेह और आशंकाएं तब तक रहेंगी, जब तक आधी-आबादी को सामान न्याय और सम्मान से जीने-मरने के अधिकार नहीं मिलते। ‘आधी-दुनिया’ बहुत आशा और विश्वास के साथ, न्यायपालिका कि तरफ देखती (रही) हैं.

395 पेज के फैसले में तीन तलाक को निरस्त करने का फैसला 3-2 के बहुमत से लिखा गया। 1937 के शरियत लॉ में तीन तलाक का प्रावधान सेक्शन 2 में था, जिसे पांच जजों की बेंच ने निरस्त कर दिया। जस्टिस खेहर और जस्टिस अब्दुल नजीर तीन तलाक को निरस्त करने के पक्ष में नहीं थे। दोनों ने इस प्रावधान को असंवैधानिक नहीं माना। लेकिन साथ ही यह भी कहा कि चूंकि यह महिलाओं के हितों के खिलाफ है, इसलिए इस पर सरकार और संसद को कानून बनाना चाहिए। यानी केवल दो जजों ने कानून बनाये जाने की बात कही थी। इसका सीधा सा अर्थ है कि सरकार के लिए कानून बनाए जाने की को बाध्यता नहीं थी। तीन तलाक का प्रावधान खत्म हो गया और नया कानून बनने तक, यदि कोई अपनी पत्नी को तीन तलाक दे देता है, तो उसे सजा या ज़ुर्माना नहीं! पति पत्नी से कहेगा कि वह नहीं मानता सुप्रीम कोर्ट के फैसले को, जाओ अदालत। ऐसे में मुस्लिम महिलाएं (जिनमें से अधिसंख्य अशिक्षित-गरीब और गांव कस्बों में रहने वाली हैं) अदालतों के चक्कर काटती रहती।

तीन तलाक को निरस्त करने के फैसले को, महिलाओं की ‘विजयघोष’ के रूप में प्रचारित किया गया। कहा जाता  रहा कि दुनिया के लगभग 22देशों ने पहले ही तीन तलाक को निरस्त कर दिया है। भारत ने महिलाओं को ‘यह आजादी’ देने में 70 बरस लगा दिये। पाकिस्तान जैसे देश में 1961 में तीन तलाक को रद्द किया जा चुका है। जिन देशों में तीन तलाक की यह असंवैधानिक परंपरा नहीं है, वहां तो महिलाएं सशक्त होनी ही चाहिए। लेकिन क्या ऐसा है? अन्य देशों को छोड़ दीजिए, सिर्फ पाकिस्तान और बांगला देश में ही महिलाओं के सामजिक-आर्थिक स्थिति से अंदाजा लगाया जा सकता है।

तीन तलाक अंसवैधानिक है, तो बहुविवाह, करेवा, बाल विवाह, वैवाहिक बलात्कार, लैंगिक असमानता, भ्रूण हत्या को आप क्या कहेंगे-मानेंगे? विवाह संस्था में हिंदू महिलाओं के साथ भी हिंसा-हत्या, दमन-अत्याचार, अनाचार-दुराचार कम नहीं। तलाकशुदाओं में 68 प्रतिशत हिन्दू, 22 प्रतिशत मुस्लमान और दस फीसदी अन्य मजहबों के हैं। मुस्लमानों में तीन तलाक के महज 0.01 प्रतिशत मामले ही तो पाये जाते हैं। तो क्या हमारे सरोकार सिर्फ इन 0.01फीसदी महिलाओं से जुड़े हैं, बहुमत की महिलाओं के अधिकारों की संवैधानिकता और असंवैधानिकता पर हमें कुछ नहीं कहना है? एक दबा-ढका-छिपा सच यह है कि मर्दवादी समाज स्त्रियों को कोई अधिकार नहीं देना चाहता. पंचायत (संसद-अदालत) में मर्द ही, स्त्रियों के भाग्य का फैसला करते रहे हैं। महिलाओं के विषय में इतना बड़ा फैसला करते समय, कोई महिला न्यायाधीश नहीं दिखती-मिलती? ऐसा पहली बार तो नहीं हुआ।

1955 में देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने जब हिंदू कानून के तहत महिलाओं के अधिकारों को लेकर प्रयास किया, तो उन्हें भी भारी विरोध का सामना करना पड़ा था। आज नारी स्वतंत्रा की वकालत करने वाले, उस समय विरोध में खड़े थे। लेकिन राजनीतिक दृढ़ता के कारण ही कुछ कानून पास हो सके । उस समय तमाम हिंदुवादी नेताओं ने घोर विरोध किया था। वे नहीं चाहते थे कि हिंदू कानून के अंतर्गत महिलाओं को मर्दों के सामान अधिकार मिलें। हिंदू कानून के तहत महिलाओं को जो भी अधिकार मिले हैं, वे तब कि राजनीतिक इच्छा और मजबूती के कारण ही मिल पायें हैं।

 सरला मुद्गल मामले में सुप्रीम कोर्ट ने ही समान नागरिक संहिता बनाने के लिए कहा था। उसे बनाने की पहल कोई नहीं कर रहा। भाजपा ने तो अपने चुनावी घोषणा पत्र में भी, समान नागरिक संहिता बनाने का वादा किया था। एक देश, एक कानून की वकालत करने वाली सरकार, महिला सामान अधिकारों के लिए एक कानून क्यों नहीं बनाती या बना सकती। समान नागरिक संहिता में तलाक, विवाह, मेंटनेंस,संपत्ति आदि के अधिकार, सभी महिलाओं-हिंदू मुस्लिम,सिख, ईसाई, जैन के लिए समान होने चाहिए। तब समान न्याय-क़ानून होंगे भी और दिखाई भी पड़ेंगे। समान नागरिक संहिता के साथ-साथ, यदि महिला आरक्षण बिल भी पास कर-करवा दें, तो सचमुच महिलाओं के सशक्तिकरण की प्रक्रिया शुरू होगी। लेकिन ऐसा कब हो पायेगा, कौन कह सकता है। महिलाओं को भी सामजिक-आर्थिक-राजनीतिक इंसाफ, सामान न्याय, संवैधानिक बराबरी देने के लिए, एक ही कानून होना चाहिए…क्यों नहीं होना चाहिए। अगर सरकार सचमुच महिला सशक्तिकरण की पक्षधर है, तो महिला आरक्षण बिल पास करे-करवाए, सामान नागरिक संहिता लाए….पता चल जाएगा।

आप-हम सिर्फ मुस्लिम महिलाओं के लिए, तीन तलाक को निरस्त किये जाने पर खुश होते रहेंगे लेकिन अगर उनके पति ने सोच लिया कि पत्नी को छोड़ना है या तंग करना है, तो बिना कानून समाज-अदालत के पास क्या विकल्प है/होगा। आज भी अदालतों में रोजना ऐसे मामले आते हैं (अधिकांश हिंदू लड़कियों के) जिनमें पति पत्नियों को उत्पीड़ित-प्रताड़ित करते रहते हैं और आजादी से घूमते रहते हैं। हम कहते हैं ‘दहेज़ मामलों में गिरफ्तारी मत करो’। किसी से छिपा नहीं है कि किसी भी अदालती मामले को निपटाने में, सालों का समय-पैसा लगता है। अलग रहने के लिए ही नहीं, साथ रहने के लिए भी। उदाहरण के लिए, 1955 में सरोज रानी ने, हिंदू मैरिज एक्ट, 1955 की धारा 9 के तहत पति के साथ दोबारा रहने के लिए याचिका दाखिल की। इसका फैसला सुप्रीम कोर्ट ने 1983-84 में सुनाया। यानी साथ रहने के लिए भी फैसला देने में अदालत को 28-29 साल का समय लग गया। ऐसे में तलाक से पीडि़त महिलाओं की अदालतों में क्या स्थिति होगी या हो सकती है, इसका सहज अंदाजा लगाया जा सकता है। तीन तलाक को निरस्त करके मुस्लिम महिलाओं को, कोर्ट-कचहरी के उन्ही गलियारों में धकेल रहे हैं, जहां जाने के रास्ते तो कठिन हैं ही, वहां से बाहर निकलने के रास्ते कमोबेश बंद या अंतहीन ही हैं।

तीन तलाक को निरस्त करने का फैसला और प्रस्तावित विधेयक कुछ और सवाल मन में पैदा करता है। आखिर हम किस तरह का समाज बनाना चाहते हैं। एक तरफ हम महिलाओं को सहजीवन, सिंगल वुमन, बिना विवाह पैदा किये बच्चा पैदा करने का अधिकार, सेक्स का अधिकार दे रहे हैं और दूसरी तरफ समाज के एक बहुत ही छोटे तबके को तलाक से रोकने के आदेश पर उत्सव मान रहे हैं। आंकड़े बताते हैं कि जब देश आजाद हुआ, तो सिंगल वुमन की संख्या महज चार फीसदी थी, जो आज बढ़ कर 21 फीसदी हो गई हैं।

 विश्व इतिहास और सामजिक अनुभव साक्षी है कि एक समय पूरे यूरोप में तलाक के पक्ष में स्त्री आंदोलन हुए और वहां की संसद-सरकार-अदालतों ने तलाक को कानून बना कर आसान बनाया। यूरोप में महिलाएं इसलिए सशक्त हुईं कि वे पढ़ी लिखीं थीं, आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर थीं, विवाह को सात जन्मों का बंधन नहीं मानती-समझती थीं, अपने फैसले खुद लेती थीं। इसलिए धार्मिक आस्थाओं का यह अभियान भी खत्म होना चाहिए . महिलाओं को भी खुले मन से यह सोचना होगा कि क्या सचमुच (तीन) तलाक रुकने से उनका जीवन जन्नत बन जाएगा? क्या उनके जीवन की एकमात्र त्रासदी यही है कि उनके पति उन्हें एक साथ तीन तलाक दे रहे हैं?  तीन तलाक को निरस्त किये जाने के परिणाम, दिखाई देने लगें हैं और यह भी साफ है कि ऐसे फैसले या कानून से कितनी महिलाओं का उद्धार, कल्याण या सशक्तिकरण हो सकेगा। स्त्री-पुरुष को विवाह बंधन में बांध कर रखना, पितृसत्ता के हितों को पोषित करती विवाह संस्था को ही बनाए-बचाए रखना है…होता है. यह रास्ता ‘स्त्री मुक्ति’ या ‘सशक्तिकरण’ का रास्ता तो नहीं! वास्तव में दमित-उत्पीड़ित-शोषित स्त्री के लिए मुक्ति का मार्ग तो, तलाक के बाद…आत्मनिर्भर होना है। लाखों मुकदमें अदालतों में तलाक के लिए लंबित पड़े हैं, अगर इन लोगों को तलाक मिल जाए..न्याय मिल जाए..थोड़ा जल्द और आसानी से मिल जाए तो, ये सब अपना जीवन अपनी शर्तों और निर्णयों के साथ या अपने तरीके से जी सकेंगी/सकेंगे। निश्चित रूप से असली मुक्ति यहां से आरम्भ होगी।

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भारतीय उपमहाद्वीप का स्त्री लेखन: स्त्री सशक्तीकरण की अनुगूंजें(अंतिम किस्त)

रोहिणी अग्रवाल

रोहिणी अग्रवाल स्त्रीवादी आलोचक हैं , महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर हैं . ई मेल- rohini1959@gmail.com



मैं मर्द नहीं, सर्जक होना चाहती हूँ


गौरतलब है कि आत्मसाक्षात्कार आयु एवं अनुभव के साथ मानव जीवन में स्वाभाविक रूप से आने वाली नैसर्गिक स्थिति नहीं है। यह एक दुर्गम-दुष्कर यात्रा है जिसके लिए पहले पात्रता हासिल करनी पड़ती है। इसके लिए जरूरी है स्व एवं अहं का विसर्जन जो सभी तामसी प्रवृत्ति का उद्गम òोत है। दूसरे, अपने भीतर संवेदन, सकारात्मक दृष्टि एवं सृजन की आकांक्षाओं से अंतर्गुम्फित व्याकुलता पैदा करना जो जड़ता को चेतना, चेतना को प्रेरणा और प्रेरणा को पुनर्निर्माण में बदलने का माद्दा रखती हो। इनके बिना आत्मसाक्षात्कार की कोशिश प्रतिशोध के लिए तैयार की गई सुविचारित रणनीति का पर्याय बन कर रह जाती है। प्रतिशोध चूंकि सृजनात्मक सम्भावनाओं को मार कर खुद को नकारना है, अतः यहाँ टारगेट के रूप में व्यक्ति प्रमुख हो जाता है, समाज, इतिहास और परम्परा में मौजूद वे रूढ़ियां और विसंगतियां नहीं जो रुग्ण व्यक्तित्व का निर्माण करती हैं। जाहिर है आत्मसाक्षात्कार जहाँ अंतिम परिणति में सामाजिक निवेश ;ेवबपंस पदअमेजउमदजद्धका उपक्रम बन जाता है, वहीं प्रतिशोध तात्कालिक बाध्यताओं से उपजा आत्मपरक उपभोग। इसलिए ऊर्जा का क्षय करने के बावजूद अतृप्ति एवं भूख को कायम रखना इसका स्वभाव है। आश्चर्य है कि जहाँ अधिकांश भारतीय स्त्री लेखन अपने नारी पात्रों को प्रतिशोध की व्यूहधर्मी संरचनाओं से बचा कर निर्माण की चिंताओं में संलिप्त करता है, वहीं तसलीमा नसरीन और विशेष रूप से तहमीना दुर्रानी प्रतिशोध में अपनी नायिकाओं की हीरॉइक उपलब्धि दर्ज कराती हैं। पीर साईं की हत्या में शरीक होकर ‘कुफ्र’ की हीर देर तक इस गफ़लत में रहती है कि उसने शैतान को मार कर ‘धर्म’ को आज़ाद करा लिया है। लेकिन पीर साईं द्वारा तवायफ के रूप में हीर की अन्य पुरुषों के साथ बनाई गई ब्लू फिल्मों को उन्हीं रसूख वाले पुरुषों को दिखा कर मकबरे के प्रति अनास्था व्यक्त करने का जो मार्ग उसने चुना है, वह अंततः उसे कहीं नहीं ले जाता। सवाल उठता है कि पीर साईं के पाप में भागी व्यक्ति जो स्वयं मकबरे के संरक्षण में अपनी ताकत का दुरुपयोग करते रहे है।, अब हीर का साथ क्यों देंगे? क्यों नहीं राजाजी के रूप में वे नए पीर साईं की बुतपरस्ती का समर्थन करेंगे? दूसरे, शक्ति का केन्द्रीकरण भले ही कुछेक हाथों में हो, आस्था और समर्थन के जरिए उसे अवाम ही ताकतवर बनाता है। इसलिए क्या बेहतर नहीं था कि अम्मा साईं के हजूर में आने वाली स्त्रियों को वह मकबरे के भीतर पलने वाली सच्चाइयों से वाकिफ कराती? तब उसका यह कदम पहला न होकर सखी बीवी के कुचल दिए गए प्रचार की अगली कड़ी बन कर शायद व्यापक जनाधार जुटा पाता। तहमीना मानती हैं कि मकबरे के वर्चस्व में जी रहे बंद कबीलाई समाज में औरत के लिए ”ज़िंदगी या तो ठहरी हुई है, या सब कुछ तबाह करता तूफान।” (पृ0 133) इसलिए दो अतिरेकों में निरंतर दोलायमान वह किसी दीर्घकालिक विकल्प पर विचार नहीं कर सकती। लेकिन तालिबानी शासन के दौरान अफगानिस्तान में अंडरग्राउंड ‘रावा’ संस्था के अस्तित्व और योगदान तथा हाल ही में ‘ऑनर किलिंग’ के विरोध में पाकिस्तानी महिलाओं के आंदोलन  को देखते हुए यह वक्तव्य क्या वैवाहिक अमानुषिकताओं से खौफजदा हीर उर्फ तहमीना दुर्रानी उर्फ बेगम मुस्तफा खार की संकुचित आवेगपूर्ण दृष्टि का स्वीकार नहीं? खास कर तब जब ‘कुफ्र’ में ही तहमीना जादुई यथार्थवाद का सहारा लेकर तोती के रूप में गढ़ी गई प्रेरणा और फौलादी जीवन की स्वामिनी चील के रूप में मिशन को निरंतर पुष्टतर कर स्त्री सशक्तीकरण का महाख्यान रचने का सर्जनात्मक दायित्व भी बखूबी निभती हैं?

पहली किस्त :- भारतीय उपमहाद्वीप का स्त्री लेखन: स्त्री सशक्तीकरण की अनुगूंजें

प्रतिशोध का स्वर तसलीमा नसरीन के
यहाँ भी है, लेकिन महज इस तथ्य को रेखांकित करने के लिए कि प्रतिशोध के मूल में है अपने को कमतर मानने की गं्रथि जिसे ईदुल (मेरे बचपन के दिन) के असंतोष, द्वंद्व, असुरक्षा और दिशाहीनता में बेहतर समझा जा सकता है। लेकिन प्रतिशोध के साथ सु-प्रयोजन जुड़ जाए तो यह नकारात्मक न रह कर सकारात्मक विकल्पों के संधान का प्रयास बन जाता है। जाहिर है लड़कियों की खरीदफरोख्त के घृणित व्यापार को देखते हुए स्वयं लड़का खरीद कर उसका मनमाना भोग करने  तथा पुरुषों की तरह चार ब्याह रचाने की लालसा में दरअसल नियमों को उलटाने की अपेक्षा उनकी खामियां दिखा कर लोगों में चेतना पैदा करने का जज्बा है – ”नियम को जब बेहतर बातों से नहीं बदला जा सकता तो उसकी खामियां भी विपरीत नियम के सहारे ही समझनी पड़ेंगी।” (तसलीमा नसरीन, नष्ट लड़की नष्ट गद्य, पृ0 88)
‘मता-ए-दर्द’ में पाकिस्तानी लेखिका रज़िया फसीह अहमद तथा ‘कठगुलाब’ में मृदुला गर्ग प्रतिशोध को सशक्तीकरण में ढालने वाली मानसिकताओं का बखान करती हैं। तसलीमा के विश्लेषण को कथा में विन्यस्त कर रज़िया और मृदुला निष्फल प्रतिशोध के भीतर सिमटी सर्जनात्मक संभावनाओं को उघाड़ कर बेचारगी से फूट कर सशक्तीकरण की ओर बढ़ने वाली दिशाओं का संकेत करती हैं। ‘मता-ए-दर्द की निम्नवर्गीय बेसहारा अशिक्षित गुल ने संघर्ष (अर्थोपार्जन के लिए छोटी-छोटी नौकरियां करके तालीम के जरिए समाज में अपनी जगह बनाने की लालसा)  और प्रवंचना (प्रेमी द्वारा झूठी शादी का प्रपंच रचा कर गर्भावस्था के दौरान छोड़ कर सूडान चले जाना)    के परस्पर विरोधी अनुभवों को झेलने के बाद डॉ0 शहनाज की मदद से नर्स के रूप में बेशक एक नया नाम और शख्सियत पाई है, लेकिन गरीबी और सतीत्व के अपमान से पीड़ित गुंचा आज भी उसके भीतर जी रही है। फलतः अधेड़ ब्रिगेडियर शम्सी से विवाह करके अभिजात वर्ग में शामिल होना और पति की चाहतजन्य अतिशय निर्भरता का लाभ उठा कर पिकनिक और सैर सपाटे के बहाने होटल के एकांत में पुरुषों की कामवासना को भड़का कर अतृप्त छोड़ देना उसके प्रतिशोधात्मक अस्त्र हैं। यदि कुलीनता, सम्पन्नता और सामाजिक प्रतिष्ठा ही व्यक्ति जीवन की सफलता के मापदंड हैं तो गुल संतुष्ट क्यों नहीं? क्या संतुष्टि तक पहुँचने की दिशाएं और द्वार अलग हैं – लौकिक आकर्षण-विकर्षण से परे नितांत निगूढ़ और निस्सीम? प्रतिशोध की ज्वाला से अपमान के अग्निदाह को बुझाने में तल्लीन बेवकूफी को दृष्टिगत करते ही गुल जिन बुनियादी सवालों से जूझती है, दरअसल वे आत्मसाक्षात्कार के लिए अनिवार्य त्रिक् के तीसरे तत्व – सृजन की आकांक्षा – को रेखांकित करते हैं। तब पति (छद्म आवरण) को छोड़ कर कौमार्यावस्था में जन्म देने के तुरंत बाद विलगे पुत्र को अपना कर अपनी निजता को खूबियों-खामियों सहित सम्पूर्णता में पाना जितना अनिवार्य हो जाता है, उतना ही अपरिहार्य हो जाता है बेसहारा गरीब रोगियों की सहायता के लिए खोले गए अस्पताल से जुड़ना। उल्लेखनीय है कि अपने होने के मर्म को  समझे बिना खुद अपनी ज़िंदगी का नियंता बनना कठिन है। हालांकि ऐसे किसी फलसफे को सिरे से नकारते हुए असीमा हरामी मर्दों की पिटाई में ”नारीसुलभ कोमलता और करुणा” से मोक्ष प्राप्ति का कारगर नुस्खा तलाशती है और स्मिता ‘जलील, गलीज, घिनौने’ जिम जारविस के चेहरे पर पडे नकाब को तार-तार कर देने में, लेकिन शून्य और हताशा के अतिरिक्त उनकी उपलब्धियां कुछ नहीं। असीमा कराटे किक की तमाम चामत्कारिक शक्तियों के बावजूद महज ”एक जलूस, एक अभियान या विचार” (कठगुलाब, पृ0 220) बन कर रह गई है, और स्मिता बंजर धरती। मारियान को सम्बोधित स्मिता का सवाल – ‘तू मर्द होना चाहती है? -प्रतिशोध की गिरफ्त मे जकड़े विवेक को आज़ाद करने की लेखकीय कोशिश है जहाँ एक तटस्थ दर्शक की तरह अपनी स्थिति और संभावित नियति को आमने-सामने रख कर उलटने-पलटने की युक्तिसंगत तार्किकता है। स्मिता के बहाने मृदुला दो बातों की ओर विशेष ध्यान दिलाना चाहती हैं। एक, प्यार बांटे बिना दर्द नही छंटता और प्यार बांटने की उदारता प्रकृति ने सिर्फ स्त्री को दी है। दूसरे, अमूमन साइकोपैथ की तरह आत्मकेन्द्रित पुरुष ”अपने लिए जितना संवेदनशील होता है, दूसरों के लिए उतना ही संवेदनशून्य।” (पृ0 31) लेकिन नारी पक्ष प्रधान होने के कारण यदि वह संवेदनशील है तो दर्द को पीते रहने की ‘पुरुष छवि’ में कैद वह अपनी पीड़ाओं का विस्तार ही कर सकता है – विराट अकेलापन और गहन शून्य। यानी संवाद, सहयोग और सृजन -यही है सार्थक मानव जीवन का रहस्य और स्त्रीत्व की सटीक परिभाषा। ”मैं मर्द नहीं, सर्जक होना चाहती हूँ। . . .यही मेरा प्रतिशोध होगा और यही मेरी क्षमा।” (पृ0 107) अपने को भीतर तक खंगाल कर पाया गया मूलमंत्र जो मारियान को डाहभरी आत्मपीड़ा से मुक्त कर लेखन के सहारे ‘आधी दुनिया’ के प्यार का  पात्र बनाता है तो स्मिता और असीमा को ‘कुटुम्ब’ का आत्मीय संरक्षण देता है जहाँ स्मिता सहिष्णु मां है और असीमा कार्यदक्ष बड़ा भाई।



पितृसत्ताक व्यवस्था की संरचनात्मक जटिलताओं की तटस्थ समझ और आत्मविश्लेषण से तीनों देशों का स्त्री लेखन इस निष्कर्ष पर पहुँचा है कि पुरुष समाज द्वारा अपनी सुविधा के लिए गढ़े गए मिथ ‘औरत ही औरत की दुश्मन है’ को तोड़ कर स्त्री वैश्विक भगिनीवाद का प्रसार करते हुए समूची मनुष्यता को आत्मीयता के घेरे में ले आना चाहती है। ‘कुफ्र’ में हीर की सहायता के लिए तोती, चील और तारा का समय-असमय प्रस्तुत होना, ‘मता-ए-दर्द’ में डॉक्टर शहनाज द्वारा पुरुष प्रवंचिता कुंवारी मांओं की लोकलाज और मर्यादा की रक्षा हेतु अस्पताल चलाना, ‘अगले जनम मोहे बिटिया न कीजो’ की सदफ़ आरा द्वारा रश्के कमर और जमीलुन बी की भरसक सहायता करना, ‘चाक’ की सारंग की लड़ाई में समूची स्त्री जाति का एकजुट होना, ‘ठीकरे की मंगनी’ में महरूख के साथ पसरता सखी भाव विस्तार, ‘कठगुलाब’ में इमीग्रंट स्त्रियों की एक सी सार्वकालिक-सार्वदेशिक नियति के आख्यान के साथ संस्था के रूप में खड़ी दर्जिन बीबी के स्वावलम्बी प्रयासों को जोड़ना इसके उदाहरण हैं। कुंदनिका कापड़ीआ भगिनीवाद को स्त्री धर्म की नई व्याख्या के रूप में प्रस्तुत करती हैं -”हर एक पीड़ित स्त्री हमारी बहन है और उसके कंधे से कंध लगा कर खड़े रहना हमारा स्त्री धर्म है।” (दीवारों से पार आकाश, पृ0 253) निस्संदेह भगिनीवाद पुरुष/व्यवस्था के खिलाफ स्त्री का शक्ति प्रदर्शन नहीं, वरन् स्त्री सशक्तीकरण का सृजनात्मक आयाम है जो उसकी मिशनबद्ध ऊर्जा को समाज कल्याण के रास्ते सभ्यता के स्वस्थ विकास और पुनर्निर्माण के संकल्प के साथ जोड़ता है।


उल्लेखनीय है कि तसलीमा की नायिकाएं – ‘फेरा’ की शरीफा और ‘मेरे बचपन के दिन’ की ईदुल -जहाँ उन्मुक्त उदार दृष्टि के अभाव में आत्मसाक्षात्कार नहीं कर पातीं (जिसकी क्षतिपूर्ति वे निश्चय ही अपनी कविताओं और टिप्पणियों मे करती हैं) और तहमीना की हीर एवं तारा स्वस्थ विकल्पों के अभाव में अपने विद्रोह को रचनात्मक बाना नहीं दे पातीं, वहीं भारतीय स्त्री लेखन आत्मसार्थकता की तलाश में स्त्री सशक्तीकरण की दुर्लभ मिसाल प्रस्तुत करता है। ‘कठगुलाब’ की दर्जिन बीबी अशिक्षित/अर्धशिक्षित निम्न एवं मध्यवर्गीय स्त्रियों में स्वाभिमान एवं स्वावलम्बन की चेतना का प्रसार कर रही हैं -”मेरा काम संभालेगी तो कितने ज़रूरतमंद बच्चों को काम सिखला कर, अपने पैरों पर खड़ा कर सकेगी। . . . मुझे देख, बीसियों बच्चे हैं मेरे। तभी इतने विश्वास के साथ कह सकती हूँ, एक बच्ची मेरा काम संभालेगी, एक चिता को आग देगी, बाकी सम्मानजनक जीवन जिएंगी। किसी एक की खातिर मुझे कलपने की जरूरत नहीं है।” (पृ0 186) तो ‘छिन्नमस्ता’ की प्रिया के चमड़े के निर्यात व्यवसाय में उसकी अस्मिता के साथ उस जैसी हाशिए पर फेंकी गई बहुतेरी स्त्रियों की अस्मिता जुड़ी है। ग्राम प्रधान द्वारा अपनी शक्तियों के दुरुपयोग से ग्राम समाज को दिन-ब-दिन खोखला करने वाली प्रधान पद की दावेदार ताकतों के खिलाफ सारंग से परचा भरवा कर मैत्रेयी पुष्पा न केवल राजनीति में स्त्रियों की भागीदारी की वकालत करती हैं, बल्कि उसकी निष्ठा, निर्भीकता और रचनात्मकता को उदाहरण के रूप में प्रस्तुत कर समाज द्वारा स्त्री शक्ति के अधिकाधिक उपयोग (नजपसपेंजपवद) पर बल भी देती हैं, तो कुंदनिका कापड़ीआ स्त्री की जद्दोजहद के क्षेत्र का विस्तार करते हुए बलात्कार जैसे घिनौने सामाजिक अपराध के विरोध में समूची स्त्री शक्ति को संगठित कर व्यवस्था का चक्का जाम कर देने की संभावनाओं को रेखांकित करना नहीं भूलतीं। बेशक बलात्कार से उपजे सदमे का महिमामंडन प्रकारांतर से पुरुष द्वारा स्त्री की यौन शुचिता की मांग का पुरजोर समर्थन है, लेकिन डकैती-हत्या जैसे संज्ञेय अपराधों की कोटि में रख कर प्रत्येक विकृति के खिलाफ आवाज़ उठाने का दायित्व क्या स्त्री का नहीं?


नहीं। घनघोर असहमति – मृदुला गर्ग, प्रभा खेतान, मैत्रेयी पुष्पा और कुंदनिका कापड़ीआ की। स्त्री को ‘आधी दुनिया’ कह देने का अर्थ यह नहीं कि समाज में पुरुष की इयत्ता के बरअक्स अपनी स्वतंत्र सत्ता प्रतिष्ठित कर वे ताउम्र रेल की पटरियों की तरह दौड़ते रहें – समानान्तर और साथ-साथ। ”मर्द न हमारा दुश्मन है, न हरीफ़ – वह हमारी तरह इंसान है” (ठीकरे के मंगनी, पृ0 179) . . . ”औरत की ज़िंदगी के सारे करीबी व जज़बाती रिश्ते मर्द से ही होते हैं। बाप, भाई, शौहर, महबूब, बेटा जैसी अहमियत को नकार कर औरत कहाँ जाएगी?” (वही, पृ0 126) -नासिरा शर्मा बेहद आग्रहपूर्वक इस बुनियादी सच्चाई को रेखांकित कर देना चाहती हैं। परस्पर सहयोग और पूरकता के बिना चूंकि कोई भी साझा मिशन संभव नहीं, अतः जरूरी है स्त्रीसुलभ गुणों से सम्पन्न अर्धनारीश्वर पुरुष (कठगुलाब, पृ0 205) क्योंकि आदर्श मनुष्य व आदर्श सम्बन्ध तभी संभव है जब स्वतंत्रता और दायित्व बोध दोनों हों व्यक्ति के पास। मान लो, समाज में रंजीत, पीर साईं, व्योमकेश, जिम जारविस, इर्विंग, नरेन्द्र, अनिर्वाण, डॉक्टर रजब अली जैसे पुरुषों की बजाय विपिन, फिलिप, श्रीधर, स्वरूप, आदित्य, गगनेन्द्र, विनोद जैसे नारीवादी पुरुषों की तादाद बढ़ जाए, तो? तो यकीनन पूरी सृष्टि में सत् शिव और सौन्दर्य के प्रतिरूप आनंदग्राम का विस्तार हो जाएगा – कुंदनिका कापड़ीआ का विश्वास। आनंदग्राम जो एक बृहद् परिवार है, लेकिन परिवार संस्था के बुनियादी स्वरूप के ठीक विपरीत जहाँ ”साथ रहने से आत्मीयता और बल मिलते हैं”; जहाँ ”किसी का किसी पर वर्चस्व नहीं” (पृ0 156); जहाँ ऐसे प्रेम का साम्राज्य है जो ”शक्ति दे किंतु पराश्रयी न बनाए” (पृ0 165); जहाँ पूर्वाग्रहों को छोड़ कर सत्यान्वेषण जीवन की पहली शर्त बन जाता है” (पृ0 177)। उल्लेखनीय है कि इस आनंदग्राम को बाहर नहीं, ”अपने भीतर से प्रकट करना है”। पृ0 165) -एक यूटोपियन स्थिति कि ”पूर्ण में से पूर्ण निकल भी जाए तो भी जो बाकी रहता है, वह पूर्ण ही है।” (पृ0 276) असंभव, अविश्वसनीय लेकिन बेहद काम्य! मृदुला गर्ग यूटोपिया की बात नहीं करतीं (क्या इसलिए कि उनके पास एक ही अर्धनारीश्वर पुरुष है-विपिन?) , यूटापिया की पूर्वपीठिका हेतु जिस दुर्धर्ष संघर्ष, अनंत श्रम और अपराजेय सामंजस्य की आवश्यकता होती है, उसे गुजरात के सूखाग्रस्त बंजर गोधड़ इलाके में रोप-सींच कर नई फसल का इंतजार करती हैं। लेकिन स्थिति की इस विडम्बना की ओर संकेत करना भी नहीं भूलतीं कि ”एकांत में स्मिता कठगुलाब जी रही थी और कुटुम्ब में लहसुन उगा रही थी।” (पृ0 241) स्मिता की इस विडम्बना में हर उस स्त्री की त्रासदी छिपी है जो परस्पर पूरकता और सम्पूर्णता की तलाश में सहचर पुरुष का स्नेहसिक्त सान्निध्य भर पाना चाहती है। सौन्दर्य और सुवास की निधि उसके पास है, भरपूर और अद्वितीय! जरूरत पानी के तरल स्पर्श की है, फिर वह भी खिल उठेगी कठगुलाब की तरह – झनन हुम्म! झनन हुम्म!

मृदुला गर्ग स्त्री सशक्तीकरण को नारे से अलगा कर आत्म-संज्ञान की एक स्थिति मानती हैं। इसलिए एक ओर वे पुरुषवादी स्त्री संगठनों की तथाकथित कल्याणकारी भूमिका के पुनरीक्षण की मांग करती हैं, वहीं इक्कीसवीं सदी की स्वतंत्र प्रबुद्ध कैलकुलेटिंग स्त्री के रूप में उभरी नीरजा की यंत्र-मानवी मूर्ति का स्वयं अपने हाथों खंडन करती हैं। ”इस जन्म में, अगले जन्म में, पूर्व-पश्चिम में, किसी देशकाल में, हम औरत ही रहना चाहती हैं। दर्द और पीड़ा से घबरातीं तो मर्द क्यों, मशीन न होना चाहतीं?” (कठगुलाब, पृ0 107) वे अपनी इस कामना को नीरजा के मां न बन पाने की असफलता मंे खारिज नहीं कर सकतीं, क्योंकि मातृत्व अपने हाड़-मांस से अपना प्रतिरूप पैदा करना नहीं, अपनी वैचारिक विरासत को जर्रे-ज़र्रे तक फैलाना भी है। इसलिए किसी भी मानवीय उद्वेग से शून्य नीरजा को एक टुकड़ा भर ज़मीन भी नहीं देतीं। मशीन यदि कभी अपना विस्तार करना भी चाहे तो मशीन के अतिरिक्त क्या देगी?

भारतीय उपमहाद्वीप का स्त्री लेखन: स्त्री सशक्तीकरण की अनुगूंजें(दूसरी किस्त)

भारतीय स्त्री लेखन की तुलना में पाकिस्तान एवं बांग्लादेश के स्त्री लेखन के प्रतिशोधात्मक एवं आवेशपूर्ण स्वर को देखते हुए दो बातें जेहन में कौंधती हैं। एक, धार्मिक कट्टरता का आतंक और अशिक्षा का घुप्प अंधकार बहुत देर तक चेतना की टिमटिमाती रोशनियों को नहीं लील सकता। दूसरे, दमघोंटू प्रतिबंधों एवं वर्जनाओं के खिलाफ लड़ाई में मुक्ति की कामना जिस अनुपात में जीवन का आत्यंतिक लक्ष्य बन जाती है, उसी अनुपात में गौण होता चलता है मुक्ति की दिशा और स्वरूप पर विचार। हालांकि यह बात भी उतनी ही सत्य है कि दोनों देशों की एक-एक लेखिका के लेखन के आधार पर वहाँ के समूचे स्त्री लेखन पर ऐसी कोई टिप्पणी करना अपने ही अल्प ज्ञान से उपजे निष्कर्षों का सामान्यीकरण है। अतः स्त्री सशक्तीकरण की मुकम्मल तस्वीर पेश करने के लिए बेहद ज़रूरी है भारतीय भाषाओं के प्रतिनिधि स्त्री लेखन की भाँति दोनों देशों के विभिन्न प्रान्तों, कबीलों, समाजों, संस्कृतियों की तस्वीर प्रस्तुत करने वाले स्त्री लेखन का गहन विश्लेषण।


पाकिस्तान एवं बांग्लादेश के स्त्री लेखन के बरअक्स भारतीय स्त्री लेखन में कुछ न्यूनताएं साफ तौर पर दिखाई देती हैं। एक, जोखिम उठा कर भी जिस बेबाकी से दोनों देशों की लेखिकाओं ने स्त्री जीवन को पंगु कर देने वाली इस्लामी रिवायतों के खिलाफ आवाज बुलंद की है, वह भारतीय स्त्री लेखन में नहीं। पिछले कुछ वर्षों से हिंदू राष्ट्रवाद के उठान ने धर्मनिरपेक्ष भारतीय मानस में धार्मिक आडम्बरों और कर्मकांडों की प्रतिष्ठा करते हुए जिस प्रकार धीरे-धीरे सती प्रथा का महिमामंडन किया है , वह निस्संदेह स्त्री नियति को पराधीन करने की सुविचारित साजिश है जिसे लेकर भारतीय लेखिकाओं की चुप्पी न केवल चौंकाती है, बल्कि उनके सरोकारों की सघनता पर सवालिया निशान भी लगाती है, खासकर तब जब तसलीमा नसरीन ‘नष्ट लड़की नष्ट गद्य’ में इसके खिलाफ व्यापक आंदोलन छेड़ने की बात करती हैं। (पृ0 171)

भारतीय स्त्री लेखन की दूसरी दुर्बलता है अपने आसपास के खुरदरे यथार्थ को अनदेखा कर वर्चुअल रिएलिटी का निर्माण करने की प्रवृत्ति। सामाजिक संस्थाओं का सर्वेक्षण करना आत्म पड़ताल का पहला चरण है जो रणनीति बनाने हेतु आधारभूमि और दृष्टि देता है, लेकिन वह लेखन और जीवन की कुल उपलब्धि नहीं हो सकता। विडम्बना है कि भारतीय लेखिकाओं ने इसे वांछित गम्भीरतापूर्वक नहीं लिया। घरेलू हिंसा समाज के प्रत्येक तबके में फैली ऐसी बुराई है जो अमूमन प्रत्येक गंभीर साहित्यिक रचना में अपनी पूरी भयावहता के साथ उपस्थित है लेकिन साथ ही यह तथ्य भी काबिले-गौर है कि घरेलू हिंसा के मुखर विरोध को केन्द्रीय विषय बना कर सोद्देश्यपूर्ण ढंग से कोई रचना नहीं रची गई। धैर्यपूर्वक कुटते-पिटते रहना या तंग आकर सम्बन्धविच्छेद करना – यकीनन एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। ठीक यही बात कन्या भ्रूण हत्या, परिवार में लड़कियों के दोयम दर्जे की व्यापक स्वीकृति और जातिगत विषमता के कारण प्रेमी युगल की हत्या जैसे समस्याओं को लेकर भी कही जा सकती है जो प्रखर विरोध के सकारात्मक हस्तक्षेप के अभाव में अंततः अरण्य रोदन बन कर ही रह जाती हैं। यह ठीक है कि आग उगलने के बावजूद साहित्य समाज में क्रांति नहीं ला सकता, लेकिन क्रांतिधर्मी सेच का संस्कार तो देता ही है। अतः पहले चरण पर स्थिति के प्रतिकार के लिए हीर की तरह फुंफकार जरूरी हो जाती है।



तीसरे, स्त्री की ‘भोग्या’ छवि का विरोध करते हुए भी उसकी लैंगिक पहचान बनाए रखने का आग्रह जो स्त्री द्वारा अर्जित देह सम्बन्धों की स्वतंत्रता को एक उपलब्धि के रूप में प्रतिष्ठित करना चाहता है। सवाल उठता है कि बाजार की नव-उपनिवेशवादी ताकतें ‘ब्यूटी विद ब्रेन’ के नाम से उत्तर आधुनिक स्त्री के रूप में जिस मिथ को गढ़ रही हैं, और साहित्य वर्षा वसिष्ठ (मुझे चांद चाहिए) तथा मीडिया नित्यप्रति होने वाली सौन्दर्य प्रतियोगिताओं के जरिए जिसे पुष्टतर कर रहा है, क्या वह नखशिख वर्णन के लिए लालायित रीतिकालीन रमणी की छवि का पोषण नहीं? क्या दाम्पत्येतर सम्बन्धों में दैहिक तृप्ति के लिए उत्कंठित स्त्री अंततः पुरुष की सामंती रुचि और भोग विलास की सामग्री बन कर नहीं रह जाएगी? जो स्वाधीनता पराधीनता की प्रच्छन्न हदबंदियों का तत्परतापूर्वक निर्माण कर रही हो, उसे प्रश्नचिन्हित न करने में स्त्री लेखन की किस प्रवृत्ति को जिम्मेदार माना जाए – लापरवाही या दूरदृष्टि का अभाव? उल्लेखनीय है कि तसलीमा नसरीन ताल ठोंक कर ऐलान कर चुकी हैं कि ”स्त्री के नाम पर प्रचलित गृहिणी, रमणी, अंगना आदि अश्लील शब्दों को प्रतिबंधित करने की हिमायत करती हूँ” (नष्ट लड़की नष्ट गद्य, पृ0 97) और जर्मेन ग्रीयर ‘विद्रोही स्त्री’ में फीमेल यूनक के रूप में स्त्री की लैंगिक पहचान से मुक्ति का विकल्प भी प्रस्तत कर चुकी हैं।


फिर भी, भारतीय उपमहाद्वीप के तीनों देशों की स्त्री में निष्क्रिय भूमिका त्याग कर जीवन की बागडोर खुद अपने हाथ में लेने का बोध एवं साहस आया है, वह सुखद है। साथ ही इस अहम सच्चाई का रेखांकन भी कि आर्थिक स्वावलम्बन के बावजूद स्त्री तब तक स्वतंत्र नहीं जब तक परंपरागत संस्कारों से मुक्ति का नैतिक एवं मानसिक साहस अपने भीतर न जुटा ले। इसी ‘नष्ट’ लड़की के कंधे पर है इक्कीसवीं सदी के समाज के गठन का गुरु दायित्व जिसकी चारित्रिक विशेषताओं को गढ़ कर भासमान व्यक्तित्व दिया है तसलीमा नसरीन ने – ”यदि कोई स्त्री अपने दुख, दैन्य, दुर्दशा को दूर करना चाहती है, धर्म, समाज और राष्ट्र के अभद्र नियमों के खिलाफ डट कर खड़ी होना चाहती है; हेय ठहराने वाली प्रथाओं-व्यवस्थाओं का विरोध करके अपने अधिकारों के प्रति सजग होने लगती है तो समाज के ‘भद्र पुरुष’ उसे ‘नष्ट लड़की’ करार देते हैं। ठीक भी है, स्त्री के ‘मुक्त’ होने की पहली शर्त ही है, नष्ट होना। ‘नष्ट’ हुए बिना इस समाज के नागपाश से किसी भी स्त्री को मुक्ति नहीं मिल सकती।” हाँ, वक्तव्य में इतना क्षेपक और कि ‘नागपाश’ से मुक्ति की दरकार स्त्री और पुरुष दोनों को है – स्वस्थ मानसिकता और नई ऊर्जा के साथ नई राहों के अन्वेषण में रत एक अनुकरणीय युगल!

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भारतीय उपमहाद्वीप का स्त्री लेखन: स्त्री सशक्तीकरण की अनुगूंजें(दूसरी किस्त)

रोहिणी अग्रवाल

रोहिणी अग्रवाल स्त्रीवादी आलोचक हैं , महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर हैं . ई मेल- rohini1959@gmail.com


धर्म और कानून: समदरसी है नाम तिहारो?


बचपन की स्मृतियों को ‘फेरा’ उपन्यास में व्यापक परिप्रेक्ष्य देते हुए तसलीमा नसरीन एक सवाल उठाती हैं कि स्त्रियों की भाँति पुरुष अपने अस्तित्व और अस्मिता को लेकर शंकित नहीं होता? क्या इसलिए कि समस्त कर्मक्षेत्र का वही एकमात्र केन्द्रबिंदु है? या इसलिए कि समूची आचार संहिताएं, नियम-कानून, शास्त्र उसके कर्म, श्रम, व्याख्या, पसंद, सत्ता और स्वत्व पर टिके हैं, और इस प्रकार वह अनायास समूची संस्कृति का कर्त्ता और कारक तत्व बन जाता है? साथ ही यहाँ वे ‘मेरे बचपन के दिन’ की ईदुल को मयमनसिंह (बांग्लादेश) की शरीफा और स्वयं को कलकत्ता में निर्वासन का त्रास भोगती कल्याणी के रूप में चित्रित कर स्त्री जीवन को बदरंग कर देने वाली बिछोह और विस्थापन जैसी भावनात्मक मजबूरियों को धार्मिक जनूनों और राष्ट्र-राज्यों की कूटनीतियों में अनूदित भी करती चलती हैं। ‘फेरा’ उपन्यास बांग्लादेश में हिंदू विरोधी अभियान तीव्रतर होने की सूरत में सत्रह वर्ष की अवस्था में अंतरंग सहेली शरीफा से बिछुड़ कर कलकत्ता आ बसने वाली कल्याणी की कहानी है जो शरणार्थी और विस्थापित होने के दर्द के बीच अपने को कभी सम्पूर्णता में नहीं देख पाती। तीस वर्ष बाद बेटे दीपन के साथ पुरानी स्मृतियों में जीने और जड़ों की तलाश में लौटी कल्याणी पग-पग पर मोहभंग का शिकार होकर जिस सघन ऐकांतिक टीस और परिताप को झेलती है, वह असल में हर उस विवाहिता लड़की की मनोवेदना की झांकी है जो ससुराल के ‘पराएपन’ के बीच मायके के ‘आत्मीय’ क्षणों को जी लेने का भरपूर उत्साह भीतर संचित कर अपनी मिट्टी की ओर लौटती है और पाती है कि वहाँ उसके अस्तित्व का आखिरी नामोनिशाँ तक मौजूद नहीं। राजनीतिक सरहदों की वजह से उगा यह विभाजन का दर्द अमूमन हर स्त्री का दर्द बन जाता है जिसे पितृसत्तात्मक व्यवस्था ने संस्कृति और आचार के नाम पर मजबूत किया है।

भौगोलिक और परिवेशगत परिस्थितियों के आमूलचूल परिवर्तन के बीच कल्याणी यह देख कर स्तब्ध है कि उन्मुक्त शरीफा कैसे एक ठस्स बंदिनी में कायांतरित हो गई है। परिचय के बावजूद घोर असम्पृक्ति! भिन्न आयु-वर्ग के बच्चों से लदी-फंदी शरीफा में जीवन का स्पंदन तक नहीं। हर बात में पति की अनुमति की चिंता! यहाँ तक कि कालीबाड़ी (मायका) घूम आने की स्वतंत्रता भी नहीं – ”बच्चों के बाप से पूछे बिना मैं निकल नहीं सकती।” (पृ0 67) ”शरीफा भी नमाज पढ़ती है?.. इस सूचना मात्र से चकित रह जाने वाली कल्याणी उस समय शरीफा की अन्यमनस्कता के पीछे छिपी विवशता समझ पाती है जब शहर में घूमते हुए वह दो घटनाओं की साक्षी बनती है। एक, शरीफा के बच्चों द्वारा ‘चींटी-चींटी’ खेल खेलते हुए अट्टहासपूर्वक लाल चींटियों को हिंदू कह कर मारना; और दूसरा, सिंदूर-बिंदी वाली कल्याणी को देख कर गली के बच्चों द्वारा आवेशपूर्वक पीछा किया जाना – ”हिंदू हिंदू तुलसी पत्ता, खाते हैं वे गाय का माथा”। (पृ0 94) विदाई के अत्यल्प क्षणों में शरीफा के हाथ का हल्का सा स्पर्श कल्याणी के समक्ष धर्म एवं समाज द्वारा स्त्री को ‘उन्माद’ एवं ‘पत्नी’ बनाए जाने की कठोर यातनाओं का पूरा इतिहास खोल कर रख देता है जिन्हें एक स्तर पर अनिर्वाण के साथ वैवाहिक सम्बंध जीते हुए उसने महसूस किया है और दूसरे स्तर पर मयमनसिंह में ही रुखसाना के भाई स्वप्न द्वारा कल्याणी को पहचान कर घर लिवा लाने में जहाँ उसकी पत्नी एक अलग आइडेंटिटी न रह कर ठीक शरीफा की तरह अपने पति की पसंद का विस्तार बन जाती है।

पहली किस्त :- भारतीय उपमहाद्वीप का स्त्री लेखन: स्त्री सशक्तीकरण की अनुगूंजें

वास्तविक जीवन में इस्लामी कट्टरताओं का विरोध करने के जुर्म में निर्वासन का संत्रास भोगने के कारण तसलीमा धर्म के दुष्प्रभावों को स्त्री जीवन के नारकीय विधान तक सीमित नहीं रखतीं, वरन् पूरी मनुष्यता को उसके चंगुल से मुक्त कर बंधुत्व के प्रसार का स्वप्न भी देखती हैं -” धर्मांधता का यह खेल कब तक चलेगा? धर्म को क्या हम लोग जीवन भर लादे रहेंगे? एक भाषा और एक संस्कृति धर्म की दीवार को एक दिन ज़रूर तोड़ने में सफल होगी।” (पृ0 89)  तहमीना दुर्रानी भी मकबरे के वर्चस्व को ध्वस्त कर देना चाहती हैं। रौशन ख्यालों वाली आधुनिक महिला सखी बीवी के जरिए वे हर खासो-आम को चेता देना चाहती हैं कि ”मकबरे के हुक्मरान अल्लाह के नाम पर तिजारत करते हैं”; कि ”मकबरेवाले झूठों पर पलने वाले फरेबी हैं। तुम्हारे लिए दुआ मांगने के वास्ते पीरों को पैसे की दरकार नहीं होती। . . .उनकी ताकत का òोत तुम हो। तुम शैतान को मजबूत करते हो।” (कुफ्र, पृ0 100) लेकिन बेहद तंज के साथ वे इस सच्चाई को रेखांकित करना भी नहीं भूलतीं कि मजहबी शिक्षा, अंधविश्वासों और सियासत के साथ गठबंधन करके धार्मिक ताकतें खुदा के नाम और न्याय की आड़ में जैसा नृशंस दमन चक्र चलाती हैं, वह ”मकबरे के खिलाफ मौजूद ख्यालात को लोगों के ज़हनों और दिलों में ही कुचल” (पृ0 144) देने को काफी है। मकबरे की मुखालफत करने वाली सखी बीवी को सपरिवार जला देना; मकबरे की रजामंदी के खिलाफ ब्लोच प्रेमी से विवाह करने को आमादा तोती को प्रेमी सहित मर्मांतक यातनाएं देकर मार डालना इसके उदाहरण हैं। तसलीमा की तरह कुरान की आयतों का हवाला देकर वे धर्म के संरचनात्मक ढांचे पर विवाद नहीं उठातीं, बल्कि इस असंलग्न तटस्थता के साथ उसके दरिंदगी से भरपूर व्यावहारिक पक्ष का पर्दाफाश करती हैं कि ”एक ज़िंदा वली/बेआसरों का आसरा/मजलूमों और मुफलिसों का सहारा” (पृ0 153) पीर साईं के साथ-साथ उसके कफ़-थूक, पीक-जूठन को पाने के लिए  आखिरी दमड़ी तक लुटाती अज्ञानी जनता को भी कटघरे में खड़ा कर देती हैं। अपनी सत्ता कायम रखने के लिए अपने ही बेटे फ़कीर छोटे साईं को ज़िना (इन्सेस्ट) के झूठे इल्ज़ाम में मरवा डालने वाले पीर साईं के प्रति लेखिका की घृणा अछोर है। वे बेहद लाउड होकर उन पोशीदा सच्चाइयों को अवाम के सामने ला देना चाहती हैं जहाँ बांझ औरतों को औलाद बख्श कर सिद्धि कमाने के हथकंडे के साथ-साथ पीर साईं उन नवजात शिशुओं के सिर को लोहे के पिंजड़े में फंसा कर उनके बौद्धिक-मानसिक विकास को अवरुद्ध करने की युक्तियां भी निकालता है ताकि बदशक्ल चूहेनुमा भिखारियों की एक पूरी फौज को मकबरे के निजाम में शामिल किया जा सके। (पृ0 54) पत्नी के रूप में तहमीना ने कोट अद्दू (पंजाब) के खारल कबीले के मुस्तफा खार के साथ तेरह वर्ष के लम्बे वैवाहिक जीवन में लगभग हर रोज़ अमानुषिक शारीरिक-मानसिक-भावनात्मक यंत्रणा झेली है, अतः हीर के साथ ‘कुफ्र’ में अपने जख्मों को हरा करते हुए वे पीर साईं के भीतर के शैतान को ज़र्रा-ज़र्रा उघाड़ने में नहीं चूकतीं जो सैक्स और आतंक में ही जीवन का भरपूर लुत्फ उठाना चाहता है। आठ-दस साल की बच्चियों के साथ बलात्कार से लेकर पत्नी हीर को प्यारी तवायफ के रूप में रईस दोस्तों/मेहमानों के मनोरंजनार्थ प्रस्तुत करने तक; ब्लू फिल्में बनाने से लेकर हंटरों की फटकार और कैदी की चीत्कार के पृष्ठभूमि में संभोग करने तक पीर साईं की मानसिक रुग्णताओं और विकृतियों की एक लम्बी सूची तैयार की जा सकती है जिसे उसकी ताकत, सम्पत्ति और पोशाक (अल्लाह के नब्बे नाम कढ़ी हरे रंग की चादर) कभी उघड़ने नहीं देती। हीर महसूस करती है कि छोटी-छोटी लाचारगियों, लालचों, रंजिशों और कायरताओं में विभक्त होकर आम आदमी ने मकबरे की ताकत को इतना पुख्ता कर दिया है कि सबूत सहित पीर साईं की घिनौनी हरकतों को पेश करने की हर कोशिश में ”बदनाम मकबरा नहीं, मैं हो रही थी।” (पृ0202) हीर की हताशा में यकीनन धर्म के इस अजीबोगरीब खेल का बहुत बड़ा हाथ है जो किसी अबूझ गणित का सहारा लेकर आदम की पसली से बनी हव्वा के वजूद को नकराने के लिए उसके बड़े से बड़े झुंड की गिनती को भी शून्य पर ले आता है। (पृ0 42) मकबरे के मिथ को तोड़ने के लिए वैयक्तिक स्तर पर इक्का-दुक्का प्रयासों की नहीं, वरन् व्यापक स्तर पर जनजागरण और संगठित लोकशक्ति की ज़रूरत है – यह अनुगूंज उपन्यास के बाद भी देर तक मन में बनी रहती है।

भारतीय उपमहाद्वीप के स्त्री लेखन का तुलनात्मक अध्ययन करने पर एक दिलचस्प तथ्य उभर कर सामने आता है कि भारतीय स्त्री लेखन में अक्सर धर्म एक उत्पीड़क शक्ति के रूप में चित्रित नहीं हुआ है, हालांकि यहाँ भी ‘मनुस्मृति’ जैसा आर्ष ग्रंथ जीवन की तीनों अवस्थाओं में स्त्री को पुरुष के अधीन रहने का संस्कार देकर उसे ‘देह’ अथवा ‘वस्तु से भिन्न कोई स्वतंत्र इयत्ता नहीं देता। मंदिरों में देवदासी प्रथा, काशी-वृंदावन में विधवाओं की दारुण स्थिति तथा देश के विभिन्न भागों में सती प्रथा की पुनर्प्रतिष्ठा धर्म की आड़ में होने वाले यौन शोषण और उत्पीड़न की कथा कहते हैं, लेकिन आश्चर्य कि भरतीय हिंदी लेखन में इन्हें मुख्य विषय बना कर गंभीरतापूर्वक विचार नहीं किया गया है। अलबत्ता अखबारों में रपटों और फीचर लेखों के जरिए जनजातियों एवं कबीलों में पाई जाने वाली ऐसी धार्मिक नृशंसताओं को अवश्य बेबाकी से प्रश्नचिन्हित किया जा रहा है ; या फिर महाश्वेता देवी ‘छुक छुक, छुक छुक आ गेल गाड़ी’ जैसी लम्बी कहानी में कोल्हाटी समाज में पाई जाने वाली उन धार्मिक रूढ़ियों पर प्रहार करती हैं जो घर की बड़ी बेटी को बाज़ार में बैठा कर पुरुष वासनापूर्ति के नए-नए द्वारों को खोलती है।  लेकिन तहमीना और तसलीमा की तरह उनका बलाघात धार्मिक नृशंसताओं के यथातथ्य उद्घाटन की अपेक्षा उनके प्रति विद्रोह चेतना जगाने में अधिक रहा है। इस भिन्नतामूलक दृष्टि के दो कारण हो सकते हैं। एक, इस्लाम की अपेक्षा हिंदू धर्म में स्त्री की किंचित बेहतर स्थिति जहाँ सिद्धांत रूप में उसे देवी/जननी के रूप में पूजा जाता है और अर्धांगिनी के रूप में हर शुभ कार्य में उसकी उपस्थिति अनिवार्य मानी जाती है। (यह अलग तथ्य है कि काली के रूप में उसकी असीमित शक्ति का मनचाहा उपयोग करने के बाद पति परमेश्वर के मिथ को सरे-राह डाल उसके बढ़ते कदमों को वहीं फ्रीज़ कर दिया जाता है।) दूसरे, स्वतंत्र भारत द्वारा हिंदू कोड बिल अपनाया जाना जो अपने बुनियादी ढांचे में लोकतांत्रिक और मानवीय है। लेकिन जहाँ तक भारतीय मुसलमान स्त्री की नियति पर लिखे गए भारतीय उर्दू लेखन का सवाल है, वह शरीअत के हस्तक्षेप और शाहबानो विवाद से उठे मसलों को लेकर चुप है। कुर्रतुल ऐन हैदर ‘अगले जनम मोहे बिटिया न कीजो’ उपन्यास में रश्के कमर और उसकी बेटी की त्रासदी के जरिए ‘मुताअ’ प्रथा (सीमित अवधि का निकाह) के दुष्परिणामों का ज़िक्र अवश्य करती हैं जो आठवें दशक में गुजरात में प्रचलिम ‘मैत्री करार’ का ही रूप है, लेकिन मुस्लिम समाज को जड़ कर देने वाली सामाजिक समस्याओं का गहन विश्लेषण करने की बजाय उन सपाट स्थितियों का चित्रण करने में अधिक रमी हैं जो पुरुष की वासना का शिकार बना कर स्त्री को ख.ानगी (रखैल बनने वाली वेश्या) बनने को मजबूर करती हैं। उल्लेखनीय है कि कुर्रतुल ऐन हैदर और जीलानी बानो (ऐवाने-ग़ज़ल) दो भिन्न-भिन्न वर्गों की कथा कहती हैं। कुर्रतुल गरीबी, अशिक्षा और जहालत की मार झेलती निम्नवर्गीय रश्के कमर, जमीलुन बी और सदफ़ आपा की ज़िंदगियों में जहाँ आग़ा साहब और वर्मा साहब की मौजूदगी को ज़रूरी बना देती हैं, वहीं जीलानी बानो हैदराबाद के नवाबी खानदानों के अभिजात दंभ और जंग खाई माली हालत के परिप्रेक्ष्य में राशिद मामू और अब्बा जान हुमायूं जैसे  अतिमहत्वाकांक्षी धनलोलुप पुरुष पात्रों की सृष्टि करती हैं जो अपने ऐशो-आराम के लिए चांद और ग़ज़ल को पर-पुरुषों के आगोश में समा जाने को मजबूर करते हैं। गौरतलब है कि दोनों उपन्यास स्त्री की नियति पर निष्क्रियात्मक टिप्पणियां करने के बाद उन सकारात्मक संभावनाओं की ओर ध्यान देने की ज़रूरत नहीं समझते जिन्हें तलाश कर स्त्री को अकेले अपने दम पर लड़ाई लड़नी है। इस दृष्टि से नासिरा शर्मा के हिंदी उपन्यास ‘ठीकरे की मंगनी’ का उल्लेख अनिवार्य जान पड़ता है जहाँ महरूख न केवल मुस्लिम परिवारों की रिवायतों का विरोध करती है, बल्कि आत्मसम्मानपूर्वक जीवन जीते हुए भावी पीढ़ी के लिए एक मिसाल बन जाती है। बेशक महरूख ने भी हीर की तरह ‘शताब्दी की चाल से सरकते’ (ठीकरे की मंगनी, पृ0 11) लम्हों में जीवन के ठहराव को जिया है और पैदा होते ही ठीकरे की मंगनी जैसी गलीज़ रिवायतों का शिकार होकर अपनी ज़िंदगी को निरर्थक होते देखा है, लेकिन फिर भी दोनों की स्थिति में काफी अंतर है। हीर की तुलना में महरूख का पारिवारिक माहौल न केवल उदार है बल्कि मंगेतर रफ़त भाई पीर साईं का विलोम बन कर उसके व्यक्तित्व को एक नई तराश भी देते हैं। यह ठीक है कि अततः कुल परिणति में ‘साम्यवादी’ रफ़त भाई ‘अहंवादी’ पीर साईं से भिन्न नहीं, लेकिन उच्च शिक्षा एवं लोकतांत्रिक माहौल देकर उन्होंने महरूख के भीतर की ‘स्त्री’ को अपदस्थ कर जिस स्वतंत्रचेता निर्णय सक्षम ‘मनुष्य’ को प्रतिष्ठित करने की दृढ़ता दी है, वही महरूख की कुल जमापूंजी है। इसी कारण हीर के विपरीत महरूख के पैरों तले ठोस ज़मीन है और सिर के ऊपर अनंत आसमान जो शौहर से अलग स्त्री की अलग पहचान की पुष्टि करता है।

1956 में लागू हिंदू कोड बिल तथा भारतीय संविधान की धारा 15 तथा 16 ने हालांकि कानूनी एवं संवैधानिक तौर पर भारतीय स्त्री के मानवीय एवं मौलिक अधिकारों की रक्षा का दायित्व लिया है और मिताक्षरा तथा दाय संप्रदाय की विषमतामूलक सिफारिशों को निरस्त करते हुए ‘हिंदू उत्तराधिकार कानून’ ने बीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध की तुलना में स्वातंत्रयोत्तर भारत की स्त्री को अपेक्षाकृत अधिक स्वतंत्रता एवं समानता प्रदान की है, लेकिन फिर भी वस्तुस्थिति यह है कि न्याय पाने की जटिल एवं सुदीर्घ प्रक्रिया में सामंती संस्कारों से ग्रस्त कानून के पुरुषवादी चेहरे को नज़रअंदाज नहीं किया जा सकता। बेशक उपर्युक्त आपत्तियों को निरस्त करने के प्रयास में उन तमाम कानूनी फैसलों को गिनाया जा सकता है जो पिछले पचास वर्षों में किसी महिला/महिला संस्था द्वारा अदालत का दरवाजा खटखटाने पर पूरे स्त्री समाज को मिले हैं जैसे पिता के जीवित होते हुए भी मां को संतान की प्राकृतिक गार्जियनशिप का अधिकार, पुत्री को गोद लेने का अधिकार, विवाहिता पुत्री द्वारा लाचार माता-पिता की देखरख का अधिकार, औपचारिक प्रपत्रों में संतान के अभिभावकत्व का हवाला देते हुए पिता के साथ-साथ मां का नामोल्लेख करने की बाध्यता आदि (और इस प्रकार ‘दीवारों से पार आकाश’ की वसुधा की आक्रोशभरी मायूसी एक अंश तक बेमानी हो जाती है कि परिवार के वंशवृक्ष में मां कहीं नहीं, पृ036) लेकिन यह भी सत्य है कि 48 प्रतिशत जज घरेलू हिंसा को जायज मानते हैं। दूसरे, सैद्धांतिक स्वतंत्रता व्यवहार में भी मुक्ति का संदेश लेकर आए, जरूरी नहीं। यही कारण है कि तमाम कानूनी बाध्यता के बावजूद समाज में प्रत्येक संवेदनशील वसुधा ‘स्वत्वहीन’ कर दिए जाने की वेदना भोग रही है कि ”बच्चे बड़े होंगे तब अपनी पहचान वे व्योमकेश मेहता के पुत्र कह कर ही देंगे। पूरी ज़िंदगी वे खुद के नाम के साथ पिता का नाम जोड़ कर दुनिया में घूमेंगे। वंशावली बनेगी तब व्योमकेश नाम की डाली में से तीन पत्ते फूटेंगे। उसमें मां का नाम कहीं नहीं होगा। गर्भ धारण करने से लेकर जन्म देकर बड़े करने तक मां की सही हुई तकलीफोंका आलेखन कहीं न होगा। अंतहीन कामों में जर्जरित शरीर और मन लेकर वह गुमनामी में विलीन हो जाएगी।” (दीवारों से पार आकाश, पृ0 36)



नारीवाद के भाष्य के रूप में रचा गया उपन्यास ‘कठगुलाब’ (मृदुला गर्ग) स्मिता एवं मारियान तथा प्रख्यात उपन्यासकार स्कॉट फिटजे.राल्ड की पत्नी जेल्डा फिटजेराल्ड के जरिए इस तथ्य का सामान्यीकरण करता है कि प्रत्येक देशकाल का कानून सदा से पुरुषवादी रहा है। अमरीकी समाज में पति प्रताड़िता स्मिता बनाम जिम जारविस केस हो (पृ0 108-110), इर्विंग द्वारा पत्नी मारियान का भावनात्मक शोषण कर उसके उपन्यास को अपने नाम से छापने का छल हो (पृ0 91-93) या भारतीय समाज में पैतृक संपत्ति में बेटी के हिस्से को बेदखल कर सारी जायदाद पुत्र के नाम लिख देने का प्रपंच (पृ0 215), कानून हमेशा पुरुष का ही पक्ष लेता है। ”फैमिनिन वाइल्स से मुक्त हो, सिर ऊँचा करके, अपने हाथों अपने जीवन की रूपरेखा तैयार करने की कोशिश कीजिए, फिर देखिए, वही कानून कैसे आपको पटखनी देता है”  – गहरी घृणा से भर कर मृदुला न्याय व्यवस्था पर व्यंग्य करती हैं तो ‘चाक’ उपन्यास में सारंग के साथ पेचीदा न्यायिक प्रक्रिया से गुज़र कर मैत्रेयी पुष्पा न्याय व्यवस्था को लेकर रंजीत के अनुभव और सामान्य जन की अनास्था को जोड़ कर एक गहरी सच्चाई रेखांकित करती हैं -”कानून! किसे सिखा रही हो कानून? . . .कानून-कायदे पैसा देकर कागज के ऊपर पोंछ देने वाली इबारत के सिवा कुछ नहीं। और औरत के हक में तो बिल्कुल नहीं। पीढ़ियों से चले आ रहे रीति-रिवाजों से ऊपर हो जाएगी कचहरी? बिरादरी की मर्यादा भंग करने का अधिकार किसी को नहीं।” (पृ0 16) बिरादरी की मर्याद को सर्वोपरि मानने का सामंती दंभ चूंकि घर की देहरी से ही स्त्रियों के लिए न्याय के पट बंद कर देता है, इसलिए जिस तत्परता से वह अंतरजातीय प्रेम विवाह करने वाली लड़की की हत्या का फैसला करता है , उसी तत्परता से ससुराल द्वारा सताई गई बेटी (केका) की दुर्दशा को छुपाने के सैंकड़ों उपक्रम करता है। (चाक, पृ0 262) सवाल उठता है कि लड़की को गांव की इज्ज़त मानने वाला समाज उसकी रक्षा के लिए क्या इसलिए एकजुट नहीं होता कि हमाम में सब नंगे हैं?


भारतीय स्त्री लेखन कानून व्यवस्था में अंतर्निहित दुर्बलताओं (लूपहोल्स) को ही नहीं देखता, वरन् उन स्थितियों से दो-चार होने की कोशिश भी करता है जो वर्तमान कानूनों के प्रभाव को निष्प्रभ बना देती हैं। मसलन, तलाक के अधिकार से सम्पन्न स्त्री द्वारा सिर्फ इसलिए विवाह सम्बंध बनाए रखना कि तलाक के बाद पिता को बेटे का स्वाभाविक संरक्षणत्व मिलने के प्रावधान के कारण वह संतान से हाथ धो बैठेगी (छिन्नमस्ता, पृ0 13) तथा बलात्कार के मामलों को न्यायालय तक न जाने देना क्योंकि सुनवाई के दौरान अश्लील भाव-भंगिमाओं के कारण फरियादी को बार-बार सामूहिक तौर पर बलात्कृत होने की कटु अनुभूति होती है। (यहाँ भंवरीबाई प्रकरण में सवर्ण एवं अभिजात अदालत के पुरुषवादी अहं से छलकते निर्णय को नहीं भूलना चाहिए कि सवर्ण युवक ऐसा घृणित कार्य कर ही नहीं सकते) हालांकि बलात्कार कानूनन जुर्म है और अपराधी को कड़ा दंड दिए जाने का कानूनी प्रावधान भी है, किंतु समाज तक आते-आते हर कानून के ‘डाइल्यूट’ होते चलने की अनिवार्य प्रक्रिया को देखते हुए ज़रूरी है एक ऐसी जनचेतना विकसित करना जहाँ नैतिकता के दोहरे मानदंडों को नकारते हुए स्त्री की यौन शुचिता को उसके जीवन का पर्याय न माना जाए। सामाजिक कार्यकर्त्री की हैसियत से कुंदनिका कापड़ीआ ‘दीवारों से पार आकाश’ में कानून की नपुंसकता को जन चेतना द्वारा प्रतिस्थापित करने का आह्नान करती हैं -”स्वयं स्त्री को हमें समझाना होगा कि वह मात्र शरीर नहीं है। उसकी सारी मान-प्रतिष्ठा मात्र शरी पर ही आधारित नहीं है।  . . .बलात्कार की घटना की तरफ देखने की समाज की जो दृष्टि है, उसे (भी) बदलना होगा। . . . गुनाह करने वाले को कोई कुछ नहीं कहता, किंतु गुनाह का शिकार हुई महिला के माथे पर ज़िंदगी भर का कलंक लग जाता है।” (पृ0 252) ठीक इसी प्रकार न्यायिक अधिकारों की अनुपस्थिति में घृणित एवं तिरस्कृत समझी जाने वाली रखैल की स्थिति पर सहानुभूतिपूर्वक विचार करने की व्याकुलता भी भारतीय स्त्री के लेखन में दिखाई देती है। मराठी लेखिका उर्मिला पवार की कहानी ‘औरतजात’  तथा हिंदी लेखिका प्रभा खेतान का उपन्यास ‘छिन्नमस्ता’  इसका उदाहरण हैं। यहाँ रखैल को स्त्री (पत्नी) की शत्रु तथा घर उजाड़ू रूप में न देख कर पुरुष के शारीरिक-भावनात्मक शोषण की शिकार के रूप में देखा गया है जिसके अपने स्टेटस और संतान के भविष्य के प्रति समाज की हृदयहीनता पुरुष की भोगपरक मानसिकता को कभी प्रश्नचिन्हित नहीं करती।

जा तन की झांई परत

अजीब विडम्बना है कि 1942 में महादेवी वर्मा ने स्त्री की नियति को जिन शब्दों – जन्म से अभिशप्त और जीवन से संत्रस्त – में दर्ज किया था, उतनी ही सघन और मर्मांतक वेदना से पूरित वे शब्द आज भी स्त्री जीवन का सच बने हुए हैं। कन्या जन्म के समय परिवार का शोक संतप्त हो उठना, नई वैज्ञानिक तकनीक के साथ कन्या भू्रण के बढ़ते आंकड़े, घृणित इन्सेस्ट सम्बंध और घरेलू हिंसा  – परिवार संस्था के स्वस्थ स्वरूप को विकृत कर देने वाली कुछ ऐसी सच्चाइयां हैं जिनका भारतीय उपमहाद्वीप के तीनों देशों के स्त्री लेखन में समान रूप से अंकन हुआ है। हालांकि वैज्ञानिे शोधें सिद्ध कर चुकी हैं कि कन्या जन्म के लिए न स्त्री उत्तरदायी है और न ही कन्या जन्म का अर्थ पुरुष की मर्दानगी का स्खलन है, किंतु सांस्कृतिक परंपराओं में जकड़े तीनों देशों के अनुदार समाज में कन्या जन्म को अभिशाप रूप में स्वीकारने का संस्कार आज भी शेष है। ”बेटा पैदा करने के कारण मां मुँह दिखाने लायक रह गई थी अन्यथा खानदान का चिराग कौन जलाता? लड़कियों से तो वंश नहीं चलता। वे सिर्फ घर की शोभा बढ़ाती हैं . . .घर-बार साफ रखके पुरुषों को खुश रखती हैं।” (मेरे बचपन के दिन, पृ028) तसलीमा नसरीन ने सीधे-सधे शब्दों में जिन सच्चाइयों का बयान किया है, उन्हीं सचाइयों से खौफ खाकर ‘कुफ्र’ की हीर को जहाँ पहली बेटी के जन्म पर पीर साईं की नाराज़गी न भड़काने के हरचंद प्रयास में अपनी चीखों को दबाने के लिए ”मुँह में कपड़ा ठूंस लेना” (70) पड़ा, वहीं बेटे को जन्म देने के बाद सार्वजनिक तौर पर बधाई देते हुए नाते-रिश्तेदारों द्वारा व्यावहारिक सलाह भी सुनने को मिली कि ”इस कामयाबी” पर अब उसे ”ज्यादा ताकतवर हो जाना चाहिए।” (83) ”हमारी सास तो पहले जता देती थीं कि देखो दुलहिन, मुझे पोता चाहिए। अगर छोकरी हुई तो मायके में फिंकवा दूँगी। मैं सास की नसीहत सुनती और उस पर अमल करती।” (ऐवाने-ग़ज़ल, पृ0 44) बतूल की जचगी के दौरान बतूल को ऐसा ही आदेश सुनाने वाली बतूल की सास की इस गर्वोक्ति में जहाँ पुरुषवादी व्यवस्था के संवाहक होने का दर्प है, वहीं कन्या शिशुओं की अकाल मृत्यु के लिए उत्तरदायी कारकों-व्यक्तियों को लेकर एक प्रच्छन्न स्वीकारोक्ति भी जिसे आंकड़ों में अनूदित करें तो भारतीय संदर्भ में प्रति हज़ार 932 के असंतुलित लिंगानुपात को नज़रअंदाज करना संभव नहीं।


उल्लेखनीय है कि जब जीलानी बानो ‘ऐवाने ग़ज़ल’ में यह कहती हैं कि ”कोई औरत यह नहीं चाहती कि उसके बतन (गर्भ) से उसकी की तरह मजबूर और बेबस हस्ती जन्म ले” (पृ0 45) तब स्त्री की परवशता का मार्मिक आख्यान करने की अपेक्षा वे वस्तुपकर ढंग से उन मनोवैज्ञानिे और सामाजिक संरचनात्कमक कारणों को विश्लेषित करने का आग्रह करती हैं जो बेटी के रूप में ‘स्व’ का विस्तार कर एक ओर मां को आह्लादित करते हैं तो दूसरी ओर अपनी नियति की वारिस जान कर अवसाद की गहराइयों में डुबो देते हैं। इस दृष्टि से मां द्वारा अपने ‘स्व’ के प्रति घृणा और आसक्ति की परस्पर विरोधी मनोवृत्तियों का बेटी में प्रत्यारोपण जितना स्वाभाविक है, उतना ही जरूरी लगता है निजी जीवन की असुरक्षा और असंतोष से सबक लेते हुए बेटी को वे सब ‘कौशल’ सिखा देना जिन्हें हस्तगत कर पुरुषों को ‘नचाने’ की कुट्टनी कला में वह प्रवीण हो सके। जाहिर है इस प्रक्रिया में जहाँ एक स्तर पर वह उसके अक्षत कौमार्य की चौकसी में उसकी स्वतंत्रता, स्वाभाविकता और निजता को निरे शैशव से ही बाधित करती है, वहीं दूसरे स्तर पर उसकी कुल सोच को पुरुषकेन्द्रित कर सदा हाशिए पर रहने का संस्कार भी देती है। ढेर से मनोरम झूठों, आवरणों और वर्जनाओं को गढ़ कर वह स्वयं प्रवंचनाओं और आत्मछलनाओं के जिस इंद्रजाल में जीती आई है, उससे उत्कट घृणा के बावजूद बेटी को उसमें रमा देना उसके मातृत्व का अहम दायित्व बन जाता है। इसका मुख्य कारण है उसकी दृष्टि एवं संवेदना मेंउन विकल्पों और संभावनाओं का अभाव जो उस इंद्रजाल के अस्तित्व और सम्मोहन को काट कर उसके समक्ष एक नई और विराट दुनिया के द्वार खोल सकते हैं। दरअसल परिवार में बेटी के अभिशप्त अस्तित्व के मूल में पुरुषवादी व्यवस्था का आभ्यंतरीकरण करने वाली मां है जो अपनी निष्क्रियता से त्रस्त भी है और उसका विस्तार भी करना चाहती है। हर ज्यादती पर बेटी को दुत्कारने और बेटे को दुलारने वाली मां बेशक खान-पान की ज़रूरतों से बंधे अपने भौतिक अस्तित्व को बचाए रख पाने में सफल होती है, लेकिन इस प्रक्रिया में बेटे को ‘मर्द’ और बेटी को ‘देह’ बनने की दीक्षा देकर भविष्य को बेहद बीहड़ और संकटापन्न बना डालती है। स्त्री की मानसिक निष्क्रियता, मनोविज्ञान और सामाजिक जकड़बंदी से वाकिफ पुरुष हर वार से उसे चित्त कर देने की कला जान जाता है। वरना प्रतिकार की ज़रा भी गुंजाइश होने पर क्या घर-परिवार की अंदरूनी परतों में इन्सेस्ट अतिचार का जारी रह पाना संभव हो पाता? ‘छिन्नमस्ता’ की प्रिया का अपने ही बड़े भाई द्वारा, ‘मेरे बचपन के दिन’ की तसलीमा का मामा और  चाचा द्वारा  तथा ‘फेरा’ की कल्याणी का ममेरे भाई द्वारा यौन शोषण क्या इसलिए संभव नहीं हो पाया कि स्त्री समाज द्वारा इसे कलंक कह कर छुपाने की भयजनित बाध्यता पुरुष को निरंतर कामोन्मादी भूखे भेड़िए में तब्दील करती रहती है? बेशक एक सुरक्षात्मक फासले पर खड़े होकर ऐसी टिप्पणियों को क्रूर सच्चाइयों से मुँह मोड़ने की सुविधाजनक कोशिश कह कर खारिज भी किया जा सकता है, लेकिन प्रिया द्वारा आत्महत्या की धमकी देकर भाई साहब को सदा के लिए चुप करा देना (छिन्न्मस्ता, पृ0 55) और पीर साईं की कामलोलुप दृष्टि से गुप्पी को बचाने के लिए हीर का किन्हीं ‘संभव विकल्पों’ पर विचार करना क्या इस बात का प्रमाण नहीं कि विरोध और विद्रोह के जरिए ही यथास्थितिवाद के खिलाफ जंग छेड़ी जा सकती है? बेशक गुप्पी की जगह उसकी हमउम्र यतीमड़ी को पीर साईं की सेवा में प्रस्तुत करके हीर चकलेदारिन से वेश्या तक की रपटीली ढलानों का सफर करती है, किंतु यह भी तय है कि शोषण की इन्हीं अतल गहराइयों के बीच उसे पीर साईं के वर्चस्व को तोड़ने की प्रेरणा और शक्ति मिलती है।

मुक्त करती हूँ तुम्हें मेरे सुन्दर भीषण भय 

मृदुला गर्ग की विशेषता है कि ‘कठगुलाब’ में शुरुआती तौर पर इन्सेस्ट को सामाजिक कलंक और सांघातिक हादसे के रूप में देखने के बाद वे इसे टर्निंग प्वाइंट के रूप में चित्रित करती हैं जहाँ आईनों और तेज़ रोशनियों से घबरा कर पलायन कर जाने वाली स्मिता अपने को चीन्हने के प्रयास में भीतरी कमज़ोरियों और वर्जनाओं से जूझती हुई एक ऐसी स्त्री के रूप में निखर कर सामने आती है जो आत्ममुग्धता और अपराधबोध से अछूती एक स्वस्थ स्त्री है; जिम जारविस की नज़र में ”किसी भी मनोविश्लेषज्ञ के लिए चुनौती।” (पृ0 32) स्मिता के कायांतरण में मृदुला गर्ग की व्यग्रता को ढूँढना कठिन नहीं जो उन्हें स्त्री के पारम्परिक मिथ  को तोड़ कर एक नया रचनात्मक विन्यास देने को विवश करती है।


पितृसत्तात्मक व्यवस्था की आधारभूत संस्थाओं के तटस्थ विश्लेषण के बाद स्त्री सशक्तीकरण, दूसरे चरण में, स्त्री द्वारा मनुष्य के रूप में अपने अस्तित्व और व्यक्तित्व का ईमानदार आत्मसाक्षात्कार है। आत्मसाक्षात्कार चूंकि दूसरों के संदर्भ में अपनी स्थिति/नियति का विश्लेषण न होकर स्व, समाज और समय को संवारने के लिए अंतर्निहित कमज़ोरियों और शक्तियों की पहचान और संचयन की दुष्कर साधना है, अतः यहाँ भारतीय उपमहाद्वीप के तीनों देशों के स्त्री लेखन में पाई जाने वाली दो समानताओं की ओर ध्यान खींचना खासतौर से जरूरी हो जाता है। एक, लगभग सभी उपन्यासों में पुरुष को स्त्री की दुर्दशा के लिए जिम्मेदार मान कर उसे नर-सूअर, हरामी (कठगुलाब), मि0 कोबरा (छिन्नमस्ता), शैतान (कुफ्र) जैसी उपाधियों से नवाजा गया है और इस प्रकार प्रथम दृष्ट्या इसे आत्मसाक्षात्कार से बचने की सतही कोशिश का नाम भी दिया जा सकता है। दूसरे, लेखिकाओं ने स्वयं स्वीकार किया है कि गाली-गलौज अपनी हीनता और बेचारगी की मुखर स्वीकृति है। अतः आवेश का उफान थमते ही बहिर्जगत की कड़वाहटों के बीच वे अपने-अपने स्त्री पात्रों की भीतरी दुनिया में उतरने लगती हैं क्योंकि जानती हैं कि कुछ पाने से पूर्व अपने को थहा कर पुनर्संयोजित करना आत्मोपलब्धि का अहम बिंदु है। इस प्रक्रिया में उच्च शिक्षिता, अभिजात उदार पृष्ठभूमि और खुले विदेशी माहौल में पली नीरजा, स्मिता, असीमा, मारियान जैसी आधुनिकाओं को दरकिनार कर जब मृदुला गर्ग ‘कठगुलाब’ में दर्जिन बीबी को आत्मसाक्षात्कार की अग्नि परीक्षा से गुजरते हुए अस्तित्व से अस्मिता तक की भास्वर ऊँचाइयों का संस्पर्श करते देखती हैं तो वस्तुतः वे आत्मसाक्षात्कार से आत्मविस्तार की छोटी सी इच्छा के व्यापक स्तर पर फलीभूत होने का रचनात्मक वितान बुनती हैं। दर्जिन बीबी यानी ”सतयुगी काल से चली आ रही संतोषी भारतीय नारी” जिसेे ”आधुनिक तो किसी हिसाब से नहीं कहा जा सकता था। न पहरावे से, न खानपान, रहन-सहन और न विचार-भावना से। वही पोंगापंथी धुतल्ली का पहरावा। सिर पर पल्लू मेकअपविहीन चेहरा, त्योहारों में आस्था, मां-बाप की आज्ञाकारिणी पुत्री, तयशुदा विवाह की पात्रा, खाना बना-खिला कर तृप्त, बच्चे पैदा करके खुश। . . .(पृ0 155) ”ठीक-ठाक संतुलित दरम्याने किस्म की औरत” लेकिन ”स्वाभिमान का शीरा कुछ ज्यादा मिकदार में”। ठीक ‘ऐवाने-ग़ज़ल’ की बीबी की तरह जो जबरदस्ती हवेली में ब्याह दिए जाने के प्रतिशोध में पुत्र-पौत्रवती होकर भी मृत्युपर्यन्त पति-परिवार को अपने वजूद का अंतरंग हिस्सा न बना सकी। लेकिन जहाँ परस्त्रीगामी ऐय्याश पति का भीगी बिल्ली की तरह पहलू में आ सिमटना उसके अहं को सहला जाता है, वहीं दर्जिन बीबी औसत भारतीय स्त्री के लिए निर्धारित आचार-संहिता की धज्जियां उड़ाते हुए पति के स्वेच्छाचार को अपनी नियति नहीं बना सकती -”मेरे सिद्धांत मुझे ऐसे पति से एक पैसा लेने की इजाजत नहीं देते जो किसी और का पति बन चुका हो।” (पृ0 157) एक अदद फैशन डिजाइनर मशीन के साथ दो छोटे बच्चों को पालने का संकल्प लेकर अलग हो जाने वाली दर्जिन बीबी का स्वाभिमान की आधारभूमि पर पैर टिकाते ही सामान्य से विशिष्ट स्त्री बन जाना संयोग या साभिप्राय लेखन का नमूना नहीं, वरन् ‘मनुष्य’ के रूप में अपनी जीवन शर्तों और फैसलों का स्पष्ट स्वीकार है -‘मुझे मात्र शरीर बन कर जीना पसंद नहीं था और मैं दया का पात्र भी नहीं बनना चाहती थी।” (पृ0 160)


स्वाभिमान की विशेषता है कि तानों-उलाहनों की विद्वेषपूर्ण संकीर्णताओं में गर्क होने की बजाय वह चुनौतियों से जूझते हुए सतत उन्न्यन का कठिन लक्ष्य चुनता है। इसलिए पूरे उपन्यास में एकमात्र दर्जिन बीबी ही पति प्रवंचिता ऐसी स्त्री हैं जो पति की गरिमा के खिलाफ एक शब्द भी मुँह से नहीं निकालतीं। ठीक यही बात ‘ठीकरे की मंगनी’ की महरूख के लिए भी कही जा सकी है जो परनिर्भर अवस्था में दूसरों को कोसने की बजाय स्वयं अपने जीवन की नियंता बन गई है -”एक घर औरत का अपना भी हो सकता है जो उसके बाप और शौहर के घर से अलग उसकी मेहनत और पहचान का हो।” (पृ0 197) गौरतलब है कि आत्मसम्मान और आत्मनिर्भरता से दिपदिपाता यह मानवीय बोध न जीवनभर यातनाओं की अटूट शृंखला झेलने के बाद ‘कुफ्र’ की हीर अर्जित कर पाई है, न ‘मेरे बचपन के दिन’ की ईदुल। अलबत्ता पति पर आश्रित रहने की सामाजिक-सांस्कृतिक-आर्थिक मजबूरियों ने दोनों के असंतोष को प्रतिशोध में जरूर तब्दील कर दिया है। ईदुल कुटने-पिटने के बावजूद पति की रसिकता और नास्तिकता को कोस कर और हीर चील के साथ पीर साईं की हत्या के षड्यंत्र में शामिल होकर अपनी-अपनी मुक्ति के रास्ते तलाशती हैं। भारतीय स्त्री के मुकाबले वे पाती हैं कि मुक्ति के द्वार उनके लिए हैं ही नहीं, न उड़ान भरने के लिए आंगन जितना छोटा आकाश, बल्ेिक मृत पति के आतंक में सेंध लगाते हुए हीर ने तारा के साथ मिल कर जो छोटा सा रोशदान खोला है, उसे भी पुत्र के अंकुश ने ईंटों से चिनवा दिया है। अपने ही खून-दूध से लड़ाई लड़ने के औजार और तकनीक किसी भी स्त्री के पास पहीं।



फिर स्त्री (मातृत्व) की नियति और रुदन का महिमामंडित बखान! आत्मपड़ताल की घाव-कुरेद निर्मम प्रक्रिया में मृदुला गर्ग स्त्री को छल कर पछाड़ने वाले इस संस्कार से मुक्ति दिलाना बेहद जरूरी समझती हैं। एक बार फिर उनकी प्रवक्ता और प्रतिनिधि दर्जिन बीबी जो अहसानफरामोश स्वार्थी बेटे असीम की अपने तईं की गई ज्यादतियों को तब तक बर्दाश्त करती हैं जब तक सामाजिक मर्यादा और सौमनस्य को भंग करने वाले संस्कारहीन नर-पशु के रूप में उभर कर सामने नहीं आता। जीवनभर मालदार पिता की दौलत पर गुलछर्रे उडा.ने के लिए छोटी मां (पिता की दूसरी पत्नी) को मस्का मारने वाले असीम का पिता की मृत्यु के बाद उस ‘रखैल’ को घर से निकाल देने का दंभ भरा ऐलान और नर्मदा के प्रेमी को डरा-धमका कर भगा दिए जाने का दर्प दर्जिन बीबी को गहरी हताशा के साथ अपने भीतर झांकने को विवश करता है। इतनी संस्कारहीन औलाद! परवरिश में कहाँ चूक हुई? ऐसी औलाद को गले लगाने का अर्थ क्या उसकी ज्यादतियों में बराबर की शिरकत नहीं? ”उसे (पति की दूसरी पत्नी) लेकर आ सके तो आ, वरना फिर कभी मत आना यहाँ” (पृ0 186) – दर्जिन बीबी का आदेश जिसके एक छोर पर मां के रूप में अपनी असफल भूमिका पर गहरा अवसाद है तो दूसरे छोर पर ममता की मोहक कंटीली तारों के सम्मोहन को तोड़ डालने का निर्णय भी। अनिवार्य परिणति के रूप में स्त्री जीवन को आच्छादित कर लेने वाली मातृत्व महज एक निष्क्रिय स्थिति या अल्पकालिक स्टेज नहीं, बल्कि एक पूरी पीढ़ी के साथ-साथ पूरे समाज एवं काल को गढ़ने की महती जिम्मेदारी है। इसलिए मृदुला स्त्री से वानरी मोह त्याग कर एक बुनियादी ज़रूरत के तौर पर मानवीय मूल्यों एवं दायित्व को पहचानने का आग्रह करती हैं। क्षिप्र गति से घूमते चाक पर कुम्हार की उंगलियों के कोमल स्पर्श की ही तरह बेहद नामालूम लेकिन सतर्क भूमिका है मां की। असीमा के साथ दर्जिन बीबी के सतत संवाद और साहचर्य के जरिए मातृत्व की सैद्धांतिकी की पुनर्रचना करते हुए मृदुला ने इक्कीसवीं सदी की जागरूक और व्यक्तित्वसम्पन्न मां की कुछ अर्हताओं को इस प्रकार रेखांकित किया है। एक, ”तुम्हें आज़ाद ख्याल होना चाहिए। पहले से खुद को सीमाओं में बाँध कर नहीं रखना चाहिए” (पृ0 160) क्योंकि बंद अनुदार दृष्टि हमेशा मानसिक-वैचारिक रुग्णताओं को संक्रामक रोग की तरह फैलाती है। दूसरे, ”धीरज रखे बगैर कोई काम नहीं हो सकता” (पृ0 176) अर्थात् स्थिति पर आवेगपूर्ण प्रतिक्रिया करने से पहल जरूरी है ठंडे दिमाग से गहन और पूर्ण छानबीन क्योंकि अधीरता मनुष्य जीवन को कठिनतर बना देने वाली असहिष्णुता और विवेकहीनता की अग्रजा है। तीसरे, ”दुश्मन को दुख पहुँचा कर खुश होना गलत है, खुद हमारी आत्मा के लिए नुक्सानदेह” (पृ0 168) अर्थात् क्षमा एवं उदारता की पक्षधरता जिसके मूल में सदैव सक्रिय रहती है संवेदनशीलता और विवेकशीलता जैसी सकारात्मक अभिवृत्तियां। चौथे, ”उस (नर्मदा) का हौसला बढ़ाने की बजाय यह क्या खटराग ले बैठी” (पृ0 176) अर्थात् राग-द्वेष से मुक्त सहयोग, सहानुभूति और बंधुत्व के प्रसार की तत्परता जहाँ घटनाओं में बंधा अतीत, मृत सम्बन्ध या स्मृतियांे में अटके दुखद प्रकरण महत्वपूर्ण नहीं। महत्वपूर्ण है नई परिस्थितियों के विश्लेषण के बाद नई रणनीति तैयार कर प्रतिकूलताओं से जूझने की निर्भीकता। प्रभा खेतान जहाँ स्त्री मुक्ति का सिरा ”अपने कहे जाने वाले रिश्तों के घेरे के सम्मोहन से मुक्त” (छिन्नमस्ता, पृ0 209) होने में मानती हैं, वहीं निरपेक्ष संलग्नता (कमजंबीमक ंजजंबीउमदज) के साथ मृदुला इस घेरे का इतना प्रसार कर लेना चाहती हैं कि ‘स्व’ और ‘पर’ सारी विभाजक रेखाओं का अतिक्रमण कर एक-दूसरे में लय हो जाएं।


गौरतलब है कि मृदुला गर्ग गहरी सूझबूझ के साथ मातृत्व की जो सैद्धांतिकी गढ़ती हैं, उससे वाकिफ न होने के कारण अधिकांश लेखिकाएं या तो स्त्री के मातृत्व का सूर की हुलसाती-दुलराती जसोदा की तरह महिमामंडन करती हैं या कुंदनिका कापड़ीआ की तरह मोहभंग से उत्पन्न हताशा को व्यक्त करती हैं -”पूरा शरीर, पूरा मन, पूरा समय और निजी जरूरतों व व्यक्तिगत इच्छाओं का पूर्ण समापन चाहने वाली इस स्थिति (मातृत्व) का यह आनंद किस बात का आनंद है? किसी जीवन के सृजन का? यदि वह सृजन का ही शुद्ध आनंद है तो एक के बाद दूसरी लड़की होने पर दूसरों के साथ-साथ मां का चेहरा भी क्यों मुरझा जाता है?” (दीवारों से पार आकाश, पृ0 37)


कुंदनिका कापड़ीआ की विशेषता है कि संतान के लिंग को मातृत्व की सार्थकता के साथ जोड़ देने वाली रुग्ण सामाजिक-सांस्कृतिक मान्यताओं को रेखांकित करते-करते वे अनायास बहुत गहरे सवाल की ओर इशारा करती हैं कि क्यों हर बार स्त्री ‘बेटा’ नहीं जनती, ‘मर्द’ पैदा करती है? इस प्रश्न के नुकीलेपन से तीनों देशों का स्त्री लेखन हैरान-परेशान है। ”मेरे बचपन के दिन’ की ईदुल समझ नहीं पाती कि उसकी जो सख्ती तसलीमा को पांचों वक्त की नमाज पढ़ने के लिए मजबूर कर देती है, वही बेटों तक पहुँचते-पहुँचते बेअसर क्यों हो जाती है? (पृ0 125) ‘कुफ्र’ की हीर तहेदिल से बेटा-बेटी में फर्क न करने की इच्छा के बावजूद पाती है कि बाप का वरदहस्त और परिवार का माहौल गुप्पी और राजाजी को किस तेजी से दो अलग शख्सियतों में गढ़ता जा रहा है। बकौल तसलीमा यह वही फर्क है जो बचपन में लड़कों को तेज़ गति से दौड़ते अत्याधुनिक खिलौने और बड़ा मैदान देने तथा लड़कियों को एक टुकड़ा आंगन आकाश देने की रीति की अनुपालना में बाद में चाह कर भी उनकी गति और दिशा नहीं बदल पाता। ‘छिन्नमस्ता’ में बड़े भाई साहब और ‘ऐवाने-ग़ज़ल’ में नसीर के अधिकारों और मनमर्जियों के विस्तार में ठीक यही संस्कार निहित है। ‘ऐवाने-ग़ज़ल’ में बेटे को मर्द बनाने की प्रक्रिया का विस्तृत ब्यौरा देते हुए जीलानी बानो निस्संतान उजाला बेगम की उन कारगुजारियों को निर्ममतापूर्वक उघाड़ती चलती हैं जहाँ अपनी जायदाद का वारिस पाने के लिए वे गर्भवती कुंवारी नौकरानी बी जानी का अपने शौहर अहमद हुसैन से निकाह पढ़वाती हैं और फिर उस अवैध संतान नसीर को हुसैन खानदान का सच्चा वारिस बनाने और मनवाने की कूटनीति में ऐय्याशी, फिजूलखर्ची और उद्दंडता से लेकर शायरी का शौक भी सिखाती हैं। बेशक इस प्रक्रिया में हवेलियों के भीतर पेचीदगियों को बुनतीं जालसाजियों को अनदेखा नहीं किया जा सकता जो सबसे पहले स्त्रियों को मुहरा बना कर अस्तित्वहीन करती हैं, फिर सत्ता हस्तांतरण की अनिवार्य परंपरा के नाम पर पुश्त दर पुश्त पुत्र बनने का आदिम संस्कार देती हैं। अतः जरूरी हो जाता है आत्मसाक्षात्कार के निर्भीक क्षणों में स्त्री अपनी भूमिका और पारिवारिक-सामाजिक दबावों पर नज़र रखते हुए संस्कार और परम्परा के क्षेत्र में सार्थक एवं सशक्त हस्तक्षेप करे।



आश्चर्य है कि ‘कुफ्र’ और ‘मेरे बचपन के दिन’ में ऐसा कोई सार्थक हस्तक्षेप न कर पाने वाली तहमीना दुर्रानी और तसलीमा नसरीन क्रमशः ‘माई फ्यूडल लार्ड’ और कविताओं में पहले ही अपने भीतर की स्त्री का खुर्दबीनी विश्लेषण कर चुकी हैं। अपने को सान पर चढ़ा कर निरंतर परखते रहने की प्रक्रिया बेहद कष्टकर और जोखिमपूर्ण होती है, लेकिन तसलीमा की दृष्टि में इसके बिना मुक्ति द्वारों का निर्माण संभव नहीं। तसलीमा मृदुला गर्ग की तरह अपने झोले से रेडीमेड सैद्धांतिकी नहीं निकालतीं, स्त्री की दुविधा-द्वंद्व-दुर्बलताओं के साथ कदम-दर-कदम चलते हुए उसे अपनी कमज़ोरियों को पहचानना और पछाड़ना सिखाती हैं। ”इतनी दूर तक जाती हूँ/फिर भी नहीं टूटता घेरा” (तसलीमा नसरीन की प्रतिनिधि कविताएं, पृ0 35) – हर स्त्री की चिरंतन दुख कथा! कामना और उपलब्धि के बीच नाकामयाबी बुनने वाले तत्व हमेशा समाज/पुरुष सापेक्ष नहीं होते, अपनी अंतर्भूत कायरताओं का परिणाम भी होते हैं जिन्हें कुंदनिका कापड़ीआ सुरक्षा की खातिर पहने सैंकड़ों मुखौटों और हज़ारों बख्तर (दीवारों से पार आकाश, पृ0 206) का नाम देती हैं तो तसलीमा मुक्ति की आकांक्षिणी स्त्री के मन की भीतरी परतों का भेदन कर इस कटु सत्य से परिचय करा देना चाहती हैं कि ”खुले मैदान में खूबसूरत लड़कियां आंखमिचौली खेलती हैं/जाना चाहती हूँ, पर न जाने कौन पीछे से पुकारता है/क्या कोई सचमुच पुकारता है?/या फिर मैं खुद ही पुकारती हूँ।” (तसलीमा नसरीन की प्रतिनिधि कविताएं, पृ0 35) तसलीमा सुविधा-संस्कार तथा स्वतंत्रता-अधिकार के बीच द्वंद्वग्रस्त स्त्री   को अंतर्विरोधी स्थितियों और प्राथमिकताओं के चयन का पाठ पढ़ाती हैं तो प्रभा खेतान ‘छिन्नमस्ता’ में उन्हें रचनात्मक परिप्रेक्ष्य देकर प्रिया के ईमानदार ऊहापोह में व्यक्त करती हैं -”विद्रोह में कपूर की तरह भभक उठना और तुरंत आंसुओं में उमड़ कर शांत हो जाना . . . अपनी इस प्रवृत्ति को मैं कभी दया, कभी उपेक्षा, कभी अन्य कोई विशेषण देती, पर अपने इस खंडित व्यक्तित्व की परिसीमा से क्या मैं परिचित नहीं थी? नरंेद्र को मैं छोड़ नहीं सकती थी। क्यों? क्या इसका कारण है -सुरक्षा का मोह? व्यवस्था की स्वीकृति?” (पृ0 147) यकीनन यह स्त्री जानती है कि वह निरी देह नहीं; कि देह से परे दिल और दिमाग में ही उसका अस्तित्वमूलक वजूद धड़क रहा है -”स्त्री को कोई छुएगा तो जानती हूँ शरीर ही छुएगा, हृदय नहीं” , लेकिन फिर भी ”एक छुईमुई खामखा चुराती है अपना चेहरा और आँखें” ।


सवाल उठता है कि यह स्त्री यौन शुचिता के शुद्धतावादी नैतिक आग्रहों को नकारने के बावजूद क्या सबसे पहले स्वयं को पातिव्रत्य की लौह शृंखलाओं में नहीं जकड़ लेगी? स्थिति के विपर्यय को गहराई से समझते हुए मृदुला गर्ग आत्मोपलब्धि हेतु अपराध बोध से मुक्ति पाकर आत्मबल संचित करने तक की जटिल मानसिक प्रक्रिया को कोढग्रस्त रतनू माली के बिंब के जरिए साक्षात् करती हैं। ”मैं पापी हूँ। पिछले जन्म के करमों का फल भुगत रहा हूँ।” (पृ0 32) कोढ़ी होने के पाप मात्र से जीवन क्षेत्र में उतरने के लिए सक्रिय सकारात्मक दृष्टि की अपेक्षा बिल्कुल स्त्रियों सी आत्मदया एवं आत्मपीड़ा का वितान। अपने ‘स्वस्थ’ साथी मालियों की उपेक्षा और कोप से बचने के लिए अनुर्वरता के बंद संसार में जीता रतनू माली! लेकिन बाध्य कर दिए जाने पर ‘बीमारी’ के बावजूद जब सर्जक के रूप में अपनी अंतर्निहित क्षमताओं से परिचित होता है तो सामान्य नहीं रह पाता -”मैं पापी नहीं हूँ। पापी नहीं हूँ। मेरे लगाए पौधों पर तरकारी फल गई। . . . मैं पापी नहीं।” (पृ0 33) आत्मविश्वास का निखरता-पसरता आलोक पुंज! ज़रूरत सिर्फ ‘स्वस्थ’ साथियों द्वारा प्रत्यारोपित कर दिए गए पूर्वग्रहों से मुक्ति पाने की है। नियति के स्वीकार और स्थिति के अस्वीकार के बीच गंुझलक मार कर बैठी शंकाएं, संदेह, भय और विवशताएं असल में अपने आत्मबल को परखने की कसौटियां मात्र हैं। प्रश्न-प्रतिप्रश्न और स्पष्टीकरण की उलझी-कंटीली डगर पर कदम बढ़ाए बिना कुछ पाना संभव नहीं। यहाँ ‘चाक’ की सारंग की मानसिक संरचना और व्यक्तित्व के लौहमर्षक रूपांतरण का आख्यान एकाएक अनिवार्य हो जाता है। दो स्थूल सच्चाइयों का गहरा बोध है सारंग को कि ”जानवरों के बाद अगर किसी को खूंटे से बांधा जाता है तो वे है घर-गृहस्थी में उलझी-रमी स्त्रियां (पृ0 345); और कि हर पति के भीतर जीती निरंकुश सत्ता शून्य में तब्दील पत्नी की पूजा-अर्चना में अपने हीनता बोध और अहं दोनो को भुला-सहला लेना चाहती है।  गोबर-चूल्हे और परदे में सिमटी सारंग ग्यारह वर्षों से रंजीत की गृहस्थी चलाते-चलाते-चलाते गुरुकुल की शिक्षा और अपने तेजस्वी स्वभाव को सबकी सुविधा के लिए भूल बैठी है। लेकिन एक के बाद एक द्रुत गति से घटने वाली तीन घटनाओं ने उसे आत्मावलोकन के लिए विवश किया है।


एक, फुफेरी बहन रेशम की दिन-दहाड़े नृशंस हत्या और समूचे गांव की रहस्यमयी चुप्पी जो स्वत्व और स्वाभिमान की लड़ाई लड़ने वाली अकेली स्त्री की खौफनाक परिणति की कथा कह कर आम औरत की बिंधी नियति से उसका साक्षात्कार कराती है। दूसरे, डोरिया जैसे असामाजिक तत्वों की धमकियों से बचने के लिए रंजीत द्वारा चंदन को आगरा भेज दिया जाना जो सारंग को अपने मातृत्व का सीधा अपमान जान पड़ता है। मां का दायित्व क्या बच्चे को जन्म देकर पालने-पोसने की बिंदु भर यात्रा तक ही सिमटा है? उसके भविष्य को लेकर लिए जाने वाले अहम फैसलों में उसकी कोई भूमिका नहीं? जाहिर है दोयम स्थिति का साक्षात्कार उसके भीतर असंतोष और विद्रोह के बीज रोपता है। तीसरे, स्कूल मास्टर श्रीधर से भेंट जो ”चट्टानों से टकरा-टकरा कर पानी की तरह रास्ता बनाने वाली” (पृ0 404) चेतना और ऊर्जा से सम्पन्न सारंग को बताता है कि भविष्य निर्माता के रूप में प्रत्येक स्त्री का दायित्व है ”मर्दों के कुसंस्कारों और अहं की अशिक्षा को मिटाना और निजी स्वार्थों से मुक्त होना।” (पृ0 345) असल में सारंग ‘कस्तूरी कुडल बसै’ की मां कस्तूरी के साहस, हौसले, निर्भीकता और दुर्धर्ष जिजीविषा का जीवंत रूप है जिसमें रंजीत से अलग अपने रास्तों का संधान करने की व्यग्रता है -”तुम्हें बेदाग रहने की लालसा है, मैं दागदार जीवन से डरती नहीं” (185) तो ”अपना फैसला, जुझारुपन और आज़ादी” बनाए रखने का आत्मविश्वास भी। इस सारंग से बेहद भयभीत हैं रंजीत -”गुस्से से लाल हुई औरत! सचमुच पहली बार देख रहा हूँ। अब तक तो औरतों को रोते-मिनमिनाते ही देखा है।” (पृ0 184) एक नई स्त्री छवि गढ़ती सारंग!
मैत्रेयी पुष्पा की तरह प्रभा खेतान स्वीकार करती हैं कि आत्मस्थ होकर अपने प्रति आश्वस्त होना ही दरअसल असंतोषजन्य विद्रोह को ऊर्ध्व चेतना में ढाल कर रचनात्मक परिप्रेक्ष्य देना है। यही वह बिंदु है जहाँ तंज और पीड़ा से मुक्त होकर यह मुक्तिकामी स्त्री निर्विकार भाव से अपनी चारित्रिक उदारता और निस्पृहता को ‘स्त्रियोचित गुण’ कह कर महिमामंडित करने वाली पितृक व्यवस्था के अस्तित्व को नकारती है – ”विनम्र होने का अर्थ यह नहीं कि वर्जनाएं सही जाएं/ताल से लेती हूँ यदि बूंद भर तो इसका यह अर्थ नहीं/कि अधिक के प्रति मेरा आग्रह कुछ कम है/ . . . लोहा पाकर नाचने लगती हूँ तो क्या हीरे को नहीं पहचानती?”’ (तसलीमा नसरीन की प्रतिनिधि कविताएं, पृ0 63) तो ”यौनांग को अकाम बनाए रखने के उद्यम में जुटे ‘सतीत्व’ को चखना-हेरना चाहती है -”सुना है सतीत्व बहुत स्वादिष्ट चीज़ है/कभी पहनावे की लाल साड़ी, चूड़ी-फीता, नाक की नथ/खोल कर नहीं देखा सतीत्व/वह आखिर दिखता कैसा है/अस्पृश्य उंगली से छूना चाहती हूँ सतीत्व का सतलड़ा हार”। (पृ0 40) यही नहीं, आत्मविश्वास से भर कर वह अपनी लड़ाई के स्वरूप और मिशन पर बात करने को भी तैयार है -”हमारी लड़ाई अपनों से संघर्ष की लड़ाई है, यानी भूमिगत, अपने अंदर अपने को समझने और मज़बूत बनाने की -हमें मर्द नहीं बनना है, न ही मर्द को औरत बनाना है -एक दूसरे का लबादा पहनने की यह ललक ही मुसीबत बन रही है। ज़रूरत है अपनी-अपनी जगह खड़े होकर अपने-आप को समझने और दूसरे को समझाने की।” (ठीकरे की मंगनी, पृ0 181)

जाहिर है नब्बे के दशक का भारतीय उपमहाद्वीप का स्त्री लेखन जिस नई स्त्री छवि को गढ़ता है, वह वस्तुतः ममता कालिया की कामना का प्रत्यक्षीकरण है कि ”अगर वह इन्हें (घुटे शब्दों को ) लिख दे तो एक बहुत तेज एसिड का आविष्कार हो जाए”  जिसे सकारात्मक संदर्भ देकर एक छोर पर स्त्री सशक्तीकरण का नया मुहावरा गढ़ती है अशिक्षित, निम्नवर्गीय, आत्मनिर्भर नर्मदा – ”तब कहाँ जानती थी कि सारा परिवार छोड़ कर भी जी सके है औरत।” (कठगुलाब, पृ0 139) तो दूसरे छोर पर है उच्चशिक्षिता बिजनेस टाइकून प्रिया – ”लगता है मैंने अभी-अभी जीना सीखा है। धरती पर मेरी जरूरत के मुताबिक धूप है, हवा है, पानी है। मेरी अपनी एक गति है और उस गति से दौड़ रही हूँ।” (छिन्नमस्ता, पृ0 207) और तीसरे स्तर पर तसलीमा नसरीन की ”बहुत डरते-डरते और चुपके-चुपके ज़िंदा रहने वाली स्त्री” – ”सामने कुछ भी नहीं, एक नदी है/मैं तैरना जानती हूँ/भला क्यों नहीं जाऊँ/मैं जाऊँगी/जाऊँगी जरूर”। (तसलीमा नसरीन की प्रतिनिधि कविताएं, पृ075) आत्मसाक्षात्कार! आत्मस्वीकार/ आत्मोपलब्धि! किसी भी ऊर्ध्व मानवीय यात्रा के तीन अनिवार्य सोपान!

क्रमशः


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भारतीय उपमहाद्वीप का स्त्री लेखन: स्त्री सशक्तीकरण की अनुगूंजें

रोहिणी अग्रवाल

रोहिणी अग्रवाल स्त्रीवादी आलोचक हैं , महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर हैं . ई मेल- rohini1959@gmail.com

”स्त्री शून्य के समान पुरुष की इकाई के साथ सब कुछ है, परंतु उससे रहित कुछ नहीं।” (महादेवी वर्मा,॰शृंखला की कड़ियां, पृ0 115)
”स्त्री के स्वभाव, विश्वास, मान्यताएं, नैतिकता, रुचि और व्यवहार का विवेचन उसकी स्थिति द्वारा होता है। चूंकि वह जानती है कि वह सर्वोपरि स्थान नहीं प्राप्त कर सकती, इसलिए वह वीरता, विद्रोह, सृजन और कल्पना के ऊँचे आदर्शों से अलग रहती है।” (सिमोन द बुववार, स्त्री उपेक्षिता पृ0 287)

”मजबूत काली स्त्री का मिथ भोंदू सोनकेशी के मिथ के सिक्के का दूसरा पहल है। गोरे मर्द ने गोरी औरत को कमदिमाग, कमजोर शरीर वाली, नाजुक विकृति और एक रति-उन्मादिनी में बदल कर उसे एक पीठिका पर बैठा दिया। काली औरत को उसने एक मजबूत आत्मनिर्भर अमेज़न में बदला और उसे रसोईघर में भेज दिया . . . गोरे मर्द ने खुद को सर्वशक्तिमान प्रशासक बना कर खुद को फ्रंट ऑफिस में स्थापित कर लिया।” – एल्ड्रिज क्लीवर, द एलेगॅरी ऑफ द ब्लैक यूनॅक्स (जर्मेन ग्रीयर, विद्रोही स्त्री, पृ0 58)


महादेवी वर्मा, सिमोन द बुववार और जर्मेन ग्रीयर – स्त्रीवाद के तीन आधार स्तम्भ! तीन अलग-अलग देशकाल मे आधी दुनिया की नियति पर विचार करके स्त्रीवाद का एक पूरक पाठ प्रस्तुत करने में तल्लीन तीन स्वतंत्रचेता प्रबुद्ध स्त्रियां! तीनों की संवेदनशील बौद्धिकता का उत्प्रेरक घटक है एक ही सवाल कि ‘यह दुनिया हमेशा पुरुषों की रही, मगर क्यों? महादेवी की दृष्टि में इसके मूल में है समाज द्वारा सुकुमारता को नारीत्व का पर्याय समझे-समझाए जाने का आदिम संस्कार , तो सिमोन संस्कार को मिथ यानी मिथ्या भ्रम  का नाम देकर पुरुष षड्यंत्र को बेनकाब करती हैं कि ”पुरुष अपनी इन सुविधाओं का पूरा और अबाध भोग तब तक नहीं कर सकता जब तक कि अपनी श्रेष्ठता को वह अधिकार के रूप में न रखे। पुरुष होने का यह अर्थ था कि वह अपने वर्ग की सुविधा के लिए कानून बनाए, अपने वर्गहित का ध्यान रखे और साथ ही वह ऐसा जूरी बने जो इन कानूनों को सिद्धांत में परिणत कर दे।” (स्त्री उपेक्षिता पृ0 28) जर्मेन ग्रीयर चूंकि किसी भी अंश में इस षड्यंत्रकारी पाखंडपूर्ण व्यवस्था का हिस्सा बनने की बजाय इसे ध्वस्त कर देना ही श्रेयस्कर समझती हैं, इसलिए ध्वंस के उपाय बताने में चूकती नहीं – ”पूरे समूह की पैतृकता बनाए रखने पर जोर देकर – सब पुरुष सब बच्चों के पिता हैं – पितृसत्तात्मक परिवार को असंभव बना देना चाहिए।” (विद्रोही स्त्री, पृ0 293) विवाह को स्त्री जीवन की सार्थकता के अंतिम सोपान के रूप में देखे जाने का सामाजिक-सांस्कृतिक आचार यदि महादेवी वर्मा के मन में जुगुप्सा पैदा करता है  तो सिमोन उन परिस्थितियोें का विश्लेषण करती हैं जो औरत को औरत बनाना सिखाती हैं  और बचपन से ही उसमें बेहद आक्रामक तेज़ी के साथ ”नारीत्व की निष्क्रियताजन्य मौलिक विशेषताएं” (स्त्री उपेक्षिता पृ0 125) विकसित कर देती हैं। जर्मेन ग्रीयर सहमति के बावजूद प्रतिकूल परिस्थितियों का शिकार होने की बजाय सघन एवं सामूहिक भाव से अनुकूल परिस्थितियों की रचना का आह्नान करती हैं जहाँ ”बोली और भंगिमा की उद्धतता से पंडितों और विशेषज्ञों को बौखला देने” (विद्रोही स्त्री, पृ0 286), ”विशालहृदयता, उदारता और साहस के मर्दाना गुणों पर दावा पेश” (वही, पृ0 298) करने के बाद ”अपनी ऊर्जा को खुद के चुने हुए उद्यम में उद्देश्यपूर्ण ढंग से लगाना” (वही, पृ0 298) ही नारीत्व की परिभाषा और पर्याय बन जाता है। यह वह स्थिति है जो औरत के हक में स्त्री की धर्मसम्म्त रूढ़ छवि को तोड़ कर मनुष्यभाव से ओतप्रोत एक नई जीवंत छवि गढ़ने का दुस्साहस करती है, यकीनन उससे भी कहीं विकटतर स्थिति जो तसलीमा नसरीन के जलावतन का कारण बनी। घृणा, हिंसा, दमन और उत्पीड़न निस्संदेह किसी भी व्यक्ति का मनोबल तोड़ने में अहम भूमिका निभाते हैं, लेकिन बकौल सिमोन ये तो वे भोंथरे हथियार हैं  जिनका स्त्री के खिलाफ वही पुरुष इस्तेमाल करता है जो ”मानसिक रूप से स्वयं अपमानित होने की आशंका से ग्रस्त रहता है।” (स्त्री उपेक्षिता पृ0 29) तो क्या स्त्री की लड़ाई ‘स्वस्थ’ और ‘सम्पूर्ण’ पुरुष से नहीं, ‘हीनग्रंथि के शिकार’ मनोरोगी से है जो लगातार ‘न्यायाधीश और अपराधी’ दो विपरीत भूमिकाओं में एक असंवेदनशील असभ्य समाज की सृष्टि में लगा हुआ है? आमने-सामने की लड़ाई का परिणाम जहाँ तुरत-फुरत और शारीरिक एवं सांसाधनिक शक्ति पर टिका होता है, मनोरोगी से लड़ाई लड़ाई न रह कर उपचार की लम्बी जटिल धैर्यशील प्रक्रिया में तब्दील हो जाती है जहाँ उसे परास्त करने की बजाय गढ़ने तथा ”दूसरों से उनकी और अपनी संगति में आनंद पर आधारित संवाद और सहयोग”  स्थापित करने का भाव प्रमुख हो जाता है। जाहिर है इस प्रक्रिया में ‘अपने’ मनोरोगों और मानसिक दुर्बलताओं का निर्भीक साक्षात्कार भी है और संघर्ष में आनंद खोजने का अनिर्वचनीय किंतु नैसर्गिक भावोच्छ्वास भी।

निस्संदेह स्त्रीवाद स्त्री सशक्तीकरण का प्रबल पैरोकार है। ”अब तक औरत के बारे में पुरुष ने जो कुछ भी लिखा, उस पूरे पर शक किया जाना चाहिए क्योंकि लिखनेवाला न्यायाधीश और अपराधी दोनों है”  -वह न केवल कहता है, बल्कि पितृसत्तात्मक समाज व्यवस्था के विषमतामूलक संरचनात्मक ढांचे का परत दर परत विश्लेषण कर अपने आक्रोश और रोष को निरंतर दर्ज भी कर रहा है। लेकिन यह भी तय है कि इस व्यवस्था के प्रतिस्थापन हेतु कोई ठोस विकल्प उसके पास नहीं। बल्कि इसके विपरीत बार-बार डैड एंड पर आ खड़े होने की हताशा ने उसकी मान्यताओं (बवदअपबजपवदे) को कहीं न कहीं क्षतिग्रस्त अवश्य किया है। स्त्री सशक्तीकरण के अर्थ, लक्ष्य और प्रयोजन को व्यापक स्तर पर प्रचारित करने की अपेक्षा उसे स्त्री कल्याण कार्यक्रमों, आर्थिक स्वतंत्रता या अधिकाधिक राजनीतिक प्रतिनिधित्व में रिड्यूस करने की बौखलाहट इसका प्रमाण है। लेकिन यह भी तय है कि समय-समय पर अंशतः जो विचार किया गया है, उसे जोड़ कर स्त्री सशक्तीकरण की मुकम्मल सैद्धांतिकी तैयार करना कठिन नहीं। इस दृष्टि से स्त्री सशक्तीकरण की अवधारणा को मोटे तौर पर ‘मुक्ति की सामूहिक चेष्टा’ में परिभाषित करते हुए इसकी कुछ मान्यताओं को गिनाया जा सकता है:

1 यह स्त्री को अपने ‘होने’ की स्थिति पर इस तरह विचार करना सिखाती है कि वह सबसे पहले वस्तुपरक ढंग से ‘स्त्री’ (प्राणी) तथा ‘स्त्रीत्व’ (रूढ़ छवि) में पाए जाने वाले सूक्ष्म अंतर को समझ सके, और फिर ‘स्त्री’ होने के कारण स्वयं को अपराधी महसूस करने की अपेक्षा आत्मसम्मान और आत्मगौरव से दीप्त हो सके।

2 अंधानुकरण का पोषण करने वाली परंपरागत अतार्किक दृष्टि की अपेक्षा प्रत्येक व्यक्ति/स्थिति/सम्बन्ध को विश्लेषणात्मक ढंग से जानने-परखने का आत्मविश्वास अपने भीतर पैदा कर सके।

3 स्थित्यानुसार स्वतंत्र निर्णय लेने और उसे क्रियान्वित करने की क्षमता से सम्पन्न हो सके।


4 आर्थिक आत्मनिर्भरता अर्जित कर एक स्वतंत्र एवं जिम्मेदार नागरिक के रूप में अपनी स्थिति मजबूत करे।


5 जिस तरह जोत से जोत जल कर पूरा मंज़र रोशन कर देती है, उसी तरह स्त्री उद्बोधन और स्त्री चेतना का क्रमिक विस्तार कर परिवर्तन की लहर से पूरे समाज को आंदोलित करे।

6 चूंकि पुरुष की सोच और दृष्टि में अपेक्षित परिवर्तन के बिना स्त्री मुक्ति बेमानी है, अतः जरूरी है कि आत्मोन्नयन के ऊर्ध्व द्वारों को खोलते हुए स्त्री जेंडर सेंसीटाइजेशन जैसे आधार मुद्दे को अपने सफलता अभियान की कुंजी माने। किसी भी स्टेज पर उसे यह नहीं भूलना होगा कि घर ही उसकी प्रयोगशाला है और घर ही उसका पहला कर्मक्षेत्र क्योंकि यही वह स्थल है जहाँ अनजाने ही लड़के और लड़कियों को ‘मर्द’ एवं ‘औरत’ बन कर रूढ़ छवियों में ढलना सिखाया जाता है। जाहिर है इस क्रम में स्त्री सशक्तीकरण महज स्त्री मुक्ति का प्रवक्ता न रह कर मानव मुक्ति का सूत्रधार बन जाता है जो समाज के दृष्टिकोण में सिरे से परिवर्तन कर स्त्री को स्त्री या पुरुष के संदर्भ में देखने की अपेक्षा स्त्री एवं पुरुष को ‘मनुष्य’ के संदर्भ में देखने का संस्कार पैदा करता है।

लेकिन यहाँ एक प्रश्न विशेष रूप से विचारणीय है कि स्त्री सशक्तीकरण का संवाहक कौन है? क्या स्त्री जो न केवल सामाजिक-आर्थिक-सांस्कृतिक पराधीनताओं में जकड़ी हुई है बल्कि पुरुष की सत्ता में अपने अस्तित्व का विलयन कर प्रभुता हासिल कर लेना चाहती है? क्या पुरुष जो इस विषमतामूलक व्यवस्था के लाभों का एकमात्र फलभोक्ता (इमदमपिबपंतलद्ध है? चूंकि नारीवाद अपने मूल रूप में लैंगिक लड़ाई को बढ़ावा देने की बजाय सह- अस्तित्वपरक समाज की परिकल्पना है, अतः प्रत्येक संवेदनशील-विवेकशील स्त्री एवं पुरुष स्वयमेव स्त्री सशक्तीकरण का अनिवार्य एवं वांछित संवाहक बन जाता है।

यह तय है कि लम्बे संघर्ष के बावजूद स्त्रीवाद अब तक स्त्री के लिए पुरुष सी निरपेक्ष एवं स्वाधीन सत्ता अर्जित नहीं कर पाया है। स्त्री की नियति आज भी देश के साथ-साथ वहाँ की सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक- सांस्कृतिक मान्यताओं से परिभाषित एवं परिचालित हो रही है। अतः स्त्री के अस्मिता संघर्ष का अध्ययन देश-काल के रूप में एक सुपरिभाषित फ्रेम की अपेक्षा करता है। अजीब विडम्बना है कि 1947 से पूर्व अखंड भारत का हिस्सा होते हुए और भारतीय उपमहाद्वीप में निकटस्थ पड़ेसी होते हुए भी भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश भिन्न-भिन्न राजनीतिक शासन प्रणालियों और धार्मिक वर्चस्व के फलस्वरूप जिन तीन राष्ट्रीय अस्मिताओं में उभरे हैं, वे न केवल अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनके  कद को निर्धारित करती हैं बल्कि राष्ट्रीय स्पर पर ऐन घर-परिवार में घुस कर स्वस्थ समाज की चूलों को हिला देने वाली रणनीतियों का बखान भी करती हैं। साहित्य राजनीति एवं समाजशास्त्र की तरह घटनाओं, तथ्यों एवं लम्हों को उपजीव्य अवश्य बनाता है, लेकिन इतिहासकार से त्रिकालदर्शी दृष्टि लेकर वह उन्हें परिप्रेक्ष्य भी देता है और सृजन की अकूत संभावनाओं, सदिच्छाओं और संवेदनाओं से प्रदीप्त हो एक बेहतर समाज का ब्लू प्रिंट भी प्रस्तुत करता है जिसका होना आशा, जिजीविषा और उत्साह की ऊर्जा को कभी चुकने नहीं देता। बेशक प्लेटो अपने ‘गणतंत्र’ से कवि को निष्कासित करने का फरमान जारी करते हैं, किंतु यह निर्विवाद है कि पृथ्वी के किसी भी कालखंड और भूखंड में यदि ऐसा गणराज्य स्थापित हुआ होता तो वह अपनी ही भितरघाती ताकतों और वंध्या महत्वकांक्षाओं का शिकार हो महान दार्शनिक के यूटोपिया को डिस्टोपिया में स्खलित कर देता। फासीवादी मनोवृत्ति और तालिबानी संस्कृति का सामना यदि शस्त्रधारी फौजें ही करने में समर्थ होतीं तो स्वप्नजीवी भविष्यद्रष्टा राजनीतिज्ञों से लेकर दार्शनिकों, बुद्धिजीवियों, कलाकारों एवं साहित्यकारों की लम्बी शृंखला इतिहास के पन्नों में देदीप्यमान न होती। चूंकि मनुष्य ही साहित्य का विषय और लक्ष्य दोनों है, अतः उसकी गरिमा की रक्षा में स्वयं साहित्य, मनुष्य , समाज और समय की गरिमा सन्निहित है। बर्बर प्रतिगामी प्रतिरोधक शक्तियों से जूझते हुए साहित्य निमिष मात्र को भी इस सत्य से आँख नहीं चुरा सकता – इसे भारतीय उपमहाद्वीप के स्त्री लेखन के संदर्भ में बखूबी समझा जा सकता है।1

स्त्री लेखन के विषय में अक्सर अभियोग की मुद्रा में कहा जाता है कि ‘तदर्थवाद से ग्रस्त’ ‘स्त्री मुक्ति को लेकर लिखा गया अधिकांश कथा साहित्य व्यावसायिक क्षेत्र में पुरुष से प्रतिस्पर्धा और उसकी ईर्ष्या, पारंपरिक विवाह प्रथा का खंडन . . . यौन शुचिता की अवधारणा का प्रत्याख्यान, दहेज प्रथा की विकरालता आदि जैसे अलग-अलग मुद्दों पर ही केन्द्रित होकर रह जाता है। . . . भारतीय समाज में समग्र रूप में नारी की स्थिति का नक्शा देते-देते उसी तरह चूक जाता है जिस तरह इस दिशा में पूरे समाज और राजनीति का चिंतन चूक रहा है।”  बात किसी अंश तक सत्य है, लेकिन अर्धसत्य ही अक्सर घातक और गुमराह किया करते हैं। निस्संदेह स्त्रीवादी संवेदन और सरोकार उपर्युक्त समस्याओं के इर्द गिर्द ही बुने गए हैं जो मिल कर एक पूरी व्यवस्था के पुनरीक्षण का सरंजाम तैयार करते हैं। अतः इन्हें अलगा कर देखना लाठी से नदी के पानी को बांटने का उपक्रम मात्र है। स्त्री लेखन चूंकि पहले चरण में पितृसत्तात्मक समाज व्यवस्था के बुनियादी ढांचे का तटस्थ विश्लेषण है, अतः परिवार, विवाह, धर्म, कानून जैसी संस्थाओं के औचित्य पर व्यापक बहस का आह्नान करने से पूर्व वह विशेष बलाघात देकर इनके वर्तमान स्वरूप को बृहत्तर पाठक समुदाय के समक्ष पुनर्प्रस्तुत कर देना चाहता है क्योंकि चहुँ ओर की सुपरिचित सच्चाइयों को देखने के लिए न केवल वांछित दूरी अपेक्षित है, बल्कि आँख को ‘ज्योतित’ करने वाली किसी तीसरी एजेंसी की भी।

अगले जनम मोहे बिटिया न कीजो

”उस रात (सुहागरात) क्या मैं सोई थी या यह एक किस्म की मौत थी? हमने क्या इसके लिए ही खुशियां मनाईं थीं? जो मेरे अपने बिराने थे, वे क्या इसी के लिए नाचे-गाए थे, हर मुमकिन तरीके से इसमें हाथ बंटाया था? क्यों? किसी जादूगर की तरह ललचाने और मेरे ऊपर इस किस्म के पागलपन का कहर ढाने के लिए? इस जुल्म के लिए?”  चालीस वर्षीय पीर साईं से ब्याह दी गई पंद्रह वर्षीय हीर के इस हाहाकार में पति की जिबह कर डालने वाली कामुकता से उपजा खौफ मात्र नहीं है, वरन् मौत से सर्द कमरे में अपने अंधेरे भविष्य का दीदार है- ”मैं ताजिंदगी के लिए उसके नाम लिख दी गई थी”  और बाहरी सजधज से शून्य विवाह संस्था के हैबतनाक भीतरी स्वरूप का साक्षात्कार भी जो ‘जिंदगी जैसी बड़ी चीज़ को सूई की डिबिया में बंद कर देता है।’

‘कुफ्र’ की भूमिका में पाकिस्तानी लेखिका तहमीना दुर्रानी स्वीकार करती हैं कि दक्षिण पाकिस्तान की एक स्त्री की सच्ची और दर्दनाक कहानी ने ही उन्हें ‘परंपराओं की चुप्पी’ तोड़ कर इस्लामी देश में वर्जित माने जाने विषय पर कलम चलाने के लिए उकसाया है। हालांकि ‘कुफ्र’ की हीर और उनकी आत्मकथा ‘माई फ्यूडल लार्ड’ की तहमीना उर्फ बेगम मुस्तफा खार शिक्षा, संस्कार और पारिवारिक पृष्ठभूमि की दृष्टि से परस्पर विलोम हैं, लेकिन एक-दूसरे को सम्बल देकर पुष्टतर होते कठमुल्ला धर्म और निरंकुश राजनीति की गिरफ्त में फंस कर अंततः एक ही सिक्के के दो पहलू बन जाती हैं। निस्संदेह यही वह स्थल है जो हीर और तहमीना को दो अलग चरित्रों की अपेक्षा पाकिस्तान के कबीलाई समाज की स्त्री का प्रतिनिधि बना देता है।

हीर पीर साईं की परिणीता है। पीर साईं यानी पैगम्बर का सीधा वारिस, ‘अल्लाहताला और गरीब-मजलूमों के बीच की सीधी कड़ी’ (कुफ्र, पृ0 54) जिसकी पाकीज़गी को लेकर बुर्कापरस्त मुस्लिम समाज में कोई संदेह नहीं -”पीर साईं के सामने तुम्हें चेहरा ढंक कर रखने की कोई जरूरत नहीं। वह बेहद पाक इंसान है।” (पृ0 19) लेकिन सच्चाई यह है कि जिसने अपने स्वार्थों की खातिर इलाके के बदनाम दहशतगर्ज़ ऐयाश जागीरदार के साथ मिल कर ”इस्लाम को बेहद छोटे कद के इंसानों की हथेली में समा जाने के काबिल” (पृ0 95) कर दिया है। इस पीर साईं के साथ विवाह सम्बन्ध से हीर ने दो चीजें हासिल ही है। – तीस वर्ष की आयु तक पांच बच्चों का मातृत्व, और निरंतर दहशत में जिंदा रहने की दीक्षा। वह नहीं जानती गृहस्थी के जुए में अविराम जुते रहने पर भी उसकी कौन सी क्रिया कब गलती बन कर पीर साईं के कोप का कारण बन बैठे। लेकिन इतना ज़रूर जानती है कि यह कोप हमेशा कहर बन कर उस पर टूटता है। कभी फुफेरी बहन के छः वर्षीय बेटे से पर्दा न करने के गुनाह में  टूटी चूड़ियों के टुकड़ों से बाहें जख्मी कर देने के रूप में; कभी काली की दुर्गति की कथा जानने के अपराध  में सिर और भौंहों के बालों को उस्तरे से मूंड दिए जाने के रूप में; कभी लम्पट देवर द्वारा चोरी-चोरी भिजवाए गए प्रेम-पत्र को पाने के अपराध में  खज्जी कोड़े की मर्मांतक मार के रूप में तो कभी यतीमड़ी को मुकर्रर तोहफा न देने की ‘भूल’ का सबक सिखाने के लिए लकड़ी की भारी चारपाई के पायों के नीचे दोनों हथेलियों को देर रात तक कुचलते रहने के रूप में । साथ ही धमकदार चेतावनी कि ”एक भी आवाज निकली तो मैं तुम्हारी गर्दन तोड़ दूँगा और तुम्हारे भेजे के दो टुकड़े कर डालूँगा” (पृ0 111) और प्रत्युत्तर में पत्नी की आह-कराह न सुनने पर सज़ा और बढ़ाने की दरिंदगी। हीर की विडंबना है कि वह न सास से पति की क्रूरता का बखान कर सकती है (क्योंकि बेटे यानि मर्द की निरंकुश शक्ति से परास्त अम्म साईं की अनुभव संपदा में बस एक ही वशीकरण मंत्र है -”शौहर की जरूरतों को पेशेवर तवायफों” की तरह पूरा करके ‘रात के अंधेरों में इस्तेमाल की जाने वाली जादुई ताकतों से दिन में हाकिमाना” ताकत हासिल करो”, पृ0 47), न मां से किसी सहायता की अपेक्षा कर सकती है जो बेटी की मां होने के अपराध बोध में दब कर सच का सामना करने की ताब अपने भीतर नहीं पाती। वरना क्या वजह है कि हीर के भौंहों तक सफाचट बाल, गहरे जख्मों और गर्भस्थ शिशु की अकाल मौत जैसे दर्दनाक हादसों को नज़रअंदाज कर वह उसके कपड़ों, जेवर और रुतबे की चकाचौंध में चुंधियाती रहे? विवाहिता बेटी की निजी ज़िंदगी में दखल न देने का संस्कार ही असल में स्त्री को इतना ‘अकेला’ और ‘असुरक्षित’ बना देता है कि तंग आकर या तो वह ‘अन्नपूर्णा मंडल की आखिरी चिट्ठी’ कहानी (सुधा अरोड़ा) की अन्नपूर्णा की तरह अंतिम विकल्प के रूप में आत्महत्या कर बैठती है, या जीलानी बानो के उर्दू उपन्यास ‘ऐवाने-ग़ज़ल’ की बीबी की तरह आजन्म प्रतिशोध की गूंगी गुड़िया बनी रहता है, या मेरे बचपन के दिन’ (तसलीमा नसरीन) की मां (ईदुल) की तरह दोजख की आग में जलते-जलते नकार और अनास्था का पुंजीभूत रूप बन जाती है।

तहमीना दुर्रानी की विशेषता है कि वे बंद मुस्लिम समाज की वैचारिक-मानसिक विकृतियों का पर्दाफाश करने के लिए एक कार्टूनिस्ट की तरह अतिरेकपूर्ण चित्रण पद्धति का सहारा लेती हैं जहाँ पति को हिंò बनैले जानवर और पत्नी को रीढविहीन केंचुए के स्टीरियोटाइप में प्रस्तुत कर खुल्लमखुल्ला विवाह संस्था के प्रति अपनी घृणा और अनास्था प्रकट करती हैं। इसके विपरीत भारतीय स्त्री लेखन विषम वैवाहिक सम्बंधों की प्रामाणिक बानगियां प्रस्तुत करते हुए स्त्री की त्रासदी को आत्मपीड़ा या आत्मदया से बचाते हुए उस बिंदु पर ले आता है जहाँ अनास्था असंतोष में तथा घृणा अस्मितामूलक सवाल में तब्दील हो किन्हीं सकारात्मक विकल्पों के अन्वेषण हेतु बेचैन हो जाती है। गुजराती लेखिका कुंदनिका कापड़ीआ का उपन्यास ‘दीवारों से पार आकाश’ तथा हिंदी लेखिका मृदुला गर्ग का ‘कठगुलाब’ इसके प्रमाण हैं। ‘दीवारों से पार आकाश’ की नायिका वसुधा के पैंतीस वर्ष के लम्बे वैवाहिक जीवन की उपलब्धि है हर रोज़ अपनी इस मान्यता को पुष्टतर होते देखना कि विवाह ”स्त्री के लिए प्रतिबंधों के क्षेत्र में कदम रखना है” (पृ0 20)। जड़ता की ओर अग्रसर सोच पर नियंत्रण पा वह स्वयं को भीतर तक नरख-परख कर असंतोष के कारण को खोज निकालती है कि ”उसके पंख हैं, वही दुख है। बाहर कहीं आकाश है और आकाश में उड़ा जा सकता है, यह उसे मालूम है’।’ लेकिन सुख पाने का अर्थ अपने हाथों पंख कतर कर पिंजरे को आनंदलोक मानना नहीं, वरन् पंख कतरने की सूक्ष्म प्रक्रियाओं की ओर उंगली उठाना है कि ”एक ही आदमी घर का केंद्र क्यों होना चाहिए?”(पृ0 15) ; कि ”नशीली आंखों का लाल रंग, क्या यही प्रेम का रंग है?” (पृ022) ; कि ”क्यों वैवाहिक सम्बंध में ”शरीर के उपयोग की, शरीर की सुख-सुविधाओं की, शरीर की शोभा की चीजों के बारे में ही सोचा जाता है?” (पृ0 19) ; कि क्यों विवाहोपरांत स्त्री को नाम के साथ-साथ अपने सपने बदलने को भी मजबूर किया जाता है? (पृ0 45) ; कि विवाह नामक संस्था के संरक्षण में पलते इतने सतही, भौतिक इकतरफा व्यापारिक सम्बंध क्या मानवीय गरिमा एवं मानवीय अस्मिता की रक्षा कर सकेंगे? ; कि विवाह संस्था क्या प्रकारांतर से समाज में विषम आर्थिक सम्बंधों का पोषण करने वाली पूंजीवादी व्यवस्था का ही प्रतिरूप नहीं? ”वसुधा को अर्थशास्त्र का रिकार्डो सिद्धांत याद आता। मज़दूरों को हमेशा कम वेतन देना चाहिए जिससे उनकी संतानें ऊँची शिक्षा न पा सकें। परिणामतः वे भी मज़दूर बने रहें और उद्योगों को मज़दूरों की कभी कमी न पड़े। स्त्री की दुनिया को भी मर्यादित रखा गया है जिससे वह जैसी है, चुपचाप वैसी बनी रहे। उसी में संतुष्ट रहे, सवाल न पूछे, परिवर्तन की हवा के लिए न तरसे . .  और दूसरों का साम्राज्य जैसा चल रहा है, वैसा ही चलता रहे।”( पृ0 64)


लेखिका से पहले सामाजिक कार्यकर्ता होने के कारण कुंदनिका कापड़ीआ का लेखन सहानुभूति, सामंजस्य एवं समाधान पर अधिक बल देता है जबकि मृदुला गर्ग के लेखन का केन्द्रीय स्वर व्यंग्य और आत्मविश्लेषण है। अतः ‘कठगुलाब’ में विपिन और नीरजा दो प्रमुख पात्रों के जरिए विवाह संस्था का मखौल उड़ाने के बाद  वे नुकीले सवाल उठाती हैं कि क्यों ”ये औरतें मरजानियां दूसरी औरत का साथ देने की बजाय जल्लद मरद को ही पल्लू में समेटने लगती हैं?” (पृ0 138) और ”अपना खालीपन भरने के लिए हम हमेशा पति या प्रेमी की खोज क्यों करती हैं? . . . इसलिए न कि वह हमें बच्चा दे सकता है?” (पृ0 107) उल्लेखनीय है कि स्त्री विमर्श को वैश्विक एवं सार्वकालिक परिप्रेक्ष्य देकर मृदुला गर्ग जिस तरह विश्वभगिनीवाद की अवधारणा को उपन्यास में क्रमशः अवस्थित करती चलती हैं, उससे उपर्युक्त  प्रश्नों के सम्भावित जवाब पुनः कुछ प्रतिप्रश्न पैदा करते हैं कि जल्लाद मरद को पल्लू में बांधने की कुट्टनी कला यदि उन्हें सुरक्षा चक्र देती है तो क्यों वे ‘कठगुलाब’ की नमिता, गंगा, वरजीनिया की तरह; ‘कुफ्र’ की अम्मा साईं, हीर और गुप्पी की तरह; ‘छिन्नमस्ता’ की मां और सासू मां की तरह; ‘मेरे बचपन के दिन’ की ईदुल की तरह ‘सुख-सौभाग्य’ के बीच भी गहरी मानसिक रिक्ति का शिकार हैं? कि यदि संतान प्राप्ति ही विवाह सम्बंध का एकमात्र लक्ष्य है तो कृत्रिम गर्भाधान और स्पर्म बैंक के रूप में विकसित होती नई वैज्ञानिक तकनीक और समलैंगिकता को क्या स्वस्थ विकल्प के रूप में स्वीकार किया जा सकता है? न, बिल्कुल नहीं। मृदुला गर्ग व्यंग्य-विनोद-विद्रूप और कटाक्ष के औज़ारों से ‘कैरीकेचर’ भर प्रस्तुत नहीं करतीं, वरन् संवेदनशील विवादास्पद सवालों को लेकर बेहद संजीदगी के साथ अपनी स्पष्ट राय भी देती हैं। संतान-दान के अनुबंध रूप में शुरु हुए विपिन-नीरजा सम्बंध में असफल नीरजा के यंत्रमानव में तब्दील होते जाने तथा संतान प्राप्ति की अपेक्षा सम्बंध के सौन्दर्य और अनन्यता को बनाए रखने हेतु विपिन की उत्कंठा को भले ही आलोचकों ने लेखिका के बौद्धिक व्यापार का नाम दिया है, लेकिन इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि संकटापन्न स्थितियों में घिर कर ही व्यक्ति काल और सभ्यता को आक्रांत कर देने वाली सच्चाइयों की पड़ताल कर पाता है। जाहिर है विपिन के ऊहापोह के क्षणों में जब मृदुला कठिन विश्लेषणपरक भाषा का इस्तेमाल कर कहती हैं कि हम प्राणी मात्र (बायलॉजिकल यूनिट) को नहीं, व्यक्ति (अस्मिता, पैशन, लावण्य, तिलिस्म से युक्त प्राणी) को सहचर चुनते हैं और उसकी रहस्यात्मकता में ही आकर्षण और माधुर्य के अजò òोतों की तलाश करते हैं (पृ0 234), तो वे तमाम भोगपरक ऐहिक ऐषणाओं से दूर एक-दूसरे को पाकर समृद्धतर होने की स्थितियों को ही स्त्री-पुरुष मिलन (विवाह) का आधारबिंदु स्वीकार करती हैं। बेशक यह वह यूटोपियन स्थिति है जहाँ न ‘चाक’ की सारंग के इस सवाल का औचित्य शेष रहता है कि क्यों बंधनों में जकड़ी स्त्री को समाज सती और बंधनमुक्त होकर जीवन जीने को आकुल स्वाभिमानिनी स्त्री को कुलटा कहता है (पृ0 225); न ‘दीवारों से पार आकाश’ की वसुधा की वेदना कि ”स्वयं को खोकर जो पाया, उसका नाम क्या है? उसका मूल्य क्या है?” (पृ0 76); न ‘छिन्नमस्ता’ की प्रिया की विवशता कि आंसू में संपूर्ण स्त्री जीवन की सार्थकता क्यों? (पृ0 114)

आक्रामक और कंटीले लेखन के लिए विख्यात बांग्लादेश की लेखिका तसलीमा नसरीन औरतों की आंसू भरी दास्तानें कह कर अपने वक्त और ऊर्जा का क्षय नहीं करना चाहतीं। ”जंजीरें तोड़ दी हैं मैंने/ पान के पत्ते से हटा दिया है संस्कार का चूना” (तसलीमा नसरीन की प्रतिनिधि कविताएं, समर्पण पृष्ठ) का उद्घोष कर वे उस लड़की की गतिविधियों में ज्यादा दिलचस्पी लेती जान पड़ती हैं जो लोगों की टेढ़ी नज़रों, कामुक सीटियों और ‘बदचलन’ सरीखा गालियों से बिना घबराए निर्द्वंद्व अपने रास्ते आगे बढ़ रही है। अलबत्ता इस लड़की को वे सावधान ज़रूर कर देना चाहती हैं कि रैबिसयुक्त कुत्तों के आक्रमण की ही तरह हर देह के लिए घातक होता है सिफलिसयुक्त मर्दों का आक्रमण। (वही, पृ0 14) लेकिन यही तसलीमा कविताओं और टिप्पणियों के संसार से बाहर आकर जब गाढ़ी रूमानियत के साथ अपने बचपन की यादों में डूबती हैं तो मां ईदुल की कथा कहते-कहते बेहद वस्तुपरक ढंग से औसत औरत की नियति का बखान करने लगती हैं। हालांकि ‘मेरे बचपन के दिन’ में किशोरी होती बच्ची की नज़र से माता-पिता के कलहपूर्ण सम्बंधों का चित्रण किया गया है, किंतु समूचा प्रकरण मुखर होकर इस बात की पुष्टि करता है कि मां के श्याम वर्ण और कुरूपता तथा पिता के दाम्पत्येतर सम्बंधों के बीच मां जिस असुरक्षा बोध से ताउम्र पगलाई रही, वह दो तथ्यों की उपज थे। एक, डॉक्टर पति की तुलना में अल्पशिक्षित होना, और दूसरा इस्लाम द्वारा पुरुष को बहुविवाह का अधिकार देना।



तहमीना दुर्रानी (पाकिस्तान के कबीलाई समाज की प्रवक्ता) और तसलीमा नसरीन (इस्लाम धर्म एवं बांग्ला संस्कृति के कम्पोज़िट प्रभाव से बुने समाज की प्रवक्ता) अलग-अलग दृष्टि एवं प्राथमिकताओं के साथ इस्लामी राष्ट्र के दो भिन्न-भिन्न मुस्लिम समाजों का प्रतिनिधित्व करती हैं। लेकिन इसके बावजूद सामाजिक-मानसिक रुग्णताओं की विश्लेषणपरक निष्पत्तियों में एक-दूसरे के बहुत करीब आ खड़ी होती हैं और अशिक्षा तथा धार्मिक कर्मकांडों के प्रसार को स्त्री की मानवीय स्थिति को विकटतर करने वाले घटकों के रूप में चित्रित करती हैं। ‘कुफ्र’ की हीर एक ऐसे रोशन दिमाग उदार परिवार से आई है जो बुर्के की जगह तालीम को स्त्री की धरोहर मानता है। पीर साईं की किलेनुमा हवेली की ऊँची अंधेरी दीवारों में घिरने से पहले चूंकि उसने खुली-डुली दुनिया के ऊपर पसरे अछोर आसमान को चांद-सूरज के वैभव के साथ भरपूर जिया है, इसलिए बेटी गुप्पी को वह कल्पना और शिक्षा के सहारे बृहत्तर दुनिया से जोड़ देना चाहती है। चोरी-छिपे कुरान का उर्दू तर्जुमा सुना कर वह उसे प्रकारांतर से पीर साईं के खिलाफ खड़े होने का हौसला भी देती है, लेकिन चंद कदमों में सिमटी दुनिया की वासी गुप्पी को किन्हीं मुक्ति द्वारों की तलाश नहीं। ठीक उसी तरह जैसे ‘सीमंतनी उपदेश’ की लेखिका द्वारा चित्रित बीसवीं सदी के पूवार्द्ध की परवश हिंदू स्त्री की तरह जिसके विषय में व्यंग्यमिश्रित पीड़ा का सहारा लेकर वे लिखती हैं कि ”जो आदमी जेलखाने में पैदा हुआ हो, या जिसका बाप दादा उसी में कदीम से रहता हो, वह उसी जेलखाने को बहिश्त समझता है”  गुप्पी के पास यथास्थिति को स्वीकारने के अपने तर्क हैं  तो ‘मेरे बचपन के दिन’ की ईदुल के पास वर्तमान की नारकीय विभीषिका से बचने के लिए अंधविश्वास की जमीन पर उगे कुछ दिवास्वप्न कि नौमहल (पीरबाड़ी) के पीर की मुरीद बनने पर वह न केवल कब्र के अजाब से मुक्ति पा लेगी बल्कि पुल से रात पार करने में भी वक्त नहीं लगेगा। (115) बंद बदबूदार माहौल में पली गुप्पी जहाँ शिक्षा के चामत्कारिक प्रभावों से अनभिज्ञ है, वहीं बाल्यावस्था में पिता द्वारा पढ़ाई छुड़ा दिए जाने के कारण ईदुल (‘मेरे बचपन के दिन’) प्रौढा.वस्था में भी उन कसैली यादों से मुक्त नहीं हो पाई है जिन्होंने समान रुतबे और बुद्धिवाले मियां भाई और उसके बीच अलंघ्य फासले खड़े कर दिए थे। यहाँ ईदुल की असहायता में हीर की विवशता समाहित हो जाती है लेकिन हीर की भाँति मकबरे (धर्म) की सड़ांध से वाकिफ न होने के कारण अल्प ज्ञान से उपजने वाले कुतर्कों का सहारा लेकर वह लकीर पीटने की निष्क्रियता में जीवन की सार्थकता समझने लगती है। गुप्पी के रूप में यथास्थितिवादी नई पीढ़ी की रचना कर जहाँ तहमीना विद्रोह की संभावनाओं को विनष्ट कर डालती हैं, वहीं तसलीमा ईदुल में हीर और गुप्पी के अंतर्विरोधों का विलयीकरण दिखा कर उसकी बेटी के रूप में स्वयं को एक ऐसी पीढ़ी के रूप में प्रस्तुत करती हैं जिसने मां के संकीर्ण प्रतिगामी संस्कार और पिता की उदार प्रगतिशील सोच के बीच धर्म, ‘स्व’ और समाज को समझने के लिए तर्कपूर्ण निजी दृष्टि विकसित की है। इसलिए कुरान की विषमतामूलक सच्चाइयों से परिचित होकर वे संज्ञाशून्य नहीं होतीं, बल्कि धर्म के बढ़ते रसूख के साथ घर-समाज से सौहार्द और सामंजस्य छीन लेने वाले उन फतवों और फरमानों का आग्रहपूर्वक विश्लेषण करती हैं जो व्यक्ति से उसकी मानवीय पहचान छीन कर उसे सिर्फ जनून में तब्दील कर देते हैं। ”मां बोलीं, ‘अब से साड़ी नहीं पहनूँगी। साड़ी हिंदुओं की पोशाक है। काफिर की पोशाक। साड़ी पहनने से गुनाह होगा।’ पीरबाड़ी से जो भी फतवा जारी होता, मां सिर झुका कर उस पर अमल करतीं। मां अपने बचपन की सखी अमला की बात भूल गईं। वे भूल गईं कि वे कभी रथ के मेले से लावा, खिलौने और पुतले खरीदा करतीं थीं। लक्ष्मी पूजा के दिन सरस्वती वगैरह के घरों में जाकर मिठाई खातीं थीं और सहेलियों के साथ मुहल्ले के पूजामंडप देखने जाती थीं।” (पृ0 144)
क्रमशः

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स्मृति जी कंडोम के विज्ञापन वल्गर तो डीयो के संस्कारी कैसे?



श्वेता यादव


अष्टभुजा शुक्ल की लाइनें हैं एक हाथ में पेप्सी कोला दूजे में कंडोम, तीजे में रमपुरिया चाकू चौथे में हरिओम, कितना ललित ललाम यार है, भारत घोड़े पर सवार है. देखा जाए तो भारत सही में ललित ललाम ही हुआ जा रहा है. यहाँ जिन चीजों पर रोक लगनी चाहिए, जिन मामलों में कड़े कदम उठाने चाहिए उन पर कदम नहीं उठाये जाते या फिर उठाये जाते हैं तो उनका पालन नहीं हो पाता और जिन चीजों की आवश्यकता नहीं या कम है उन पर कड़े क़ानून बनाए जाते हैं और उनका पालन भी किया जाता है.

क्या है पूरा मामला?


सरकार ने सोमवार कंडोम को प्रमोट करने वाले विज्ञापनों को लेकर टीवी चैनलों को निर्देश जारी किया. सरकार का कहना है कि उसने ऐसा बच्‍चों के लिए स्‍वस्‍थ माहौल और विकास को देखते हुए किया कि टीवी चैनलों पर कंडोम के विज्ञापन केवल रात 10 बजे से सुबह छह बजे तक ही चलाए जाएंगे. सूचना एवं प्रसारण मंत्रालयकी तरफ से जारी एडवाइजरी में कहा गया है कि, ‘कंडोम के विज्ञापन सुबह छह से रात 10 बजे के बीच नहीं दिखाए जाएंगे, ताकि बच्चों को इनसे दूर रखा जा सके. साथ ही 1994 के केबल टेलीविजन नेटवर्क नियमों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित किया जा सके.’  नियमों के उलंघन पर कार्यवाही का प्रावधान है.

मंत्रालय ने कहा कि कंडोम के ऐसे विज्ञापन का प्रसारण न किया जाए जो बच्‍चों की मानसिकता को प्रभावित करें. मंत्रालय ने ऐसा लोगों की शिकायत पर किया है कि कुछ टीवी चैनल विशेषकर बच्चों के लिए, कंडोम के विज्ञापन दिखा रहे हैं. मंत्रालय ने केबल टेलीविजन नेटवर्क नियमावली के नियम 7(7) का हवाला दिया है। इसमें कहा गया है कि कोई भी केबल सेवा प्रदाता ऐसे विज्ञापन का प्रसारण नहीं कर सकते जिससे बच्चों की सुरक्षा खतरे में पड़ती हो या गलत व्यवहार के प्रति उनमें रुचि पैदा हो अथवा जिनमें उन्हें भीख मांगते हुए, अभद्र या अपमानजनक परिस्थितियों में दिखाया गया हो.

कंडोम से इतना डरते क्यों हैं?


ताजा मामला कंडोम को बैन करने को लेकर है. खबर पर बात करने से पहले, इस बात पर बात जरूरी है कि आखिर कंडोम पर बैन क्यों? कंडोम का नाम लेते ही लोगों को सांप सूंघ जाता है कोई भी खुल कर इस बारे में बात करना नहीं चाहता. हम जनसँख्या बढ़ा सकते हैं पच्चीस बच्चे पैदा करके उस पर बधाई ले और दे सकते हैं लेकिन कंडोम पर बात नहीं कर सकते. हम खुले में शौच तो बड़े आराम से कर लेते हैं लेकिन खुले में कंडोम पर या सेक्स पर बात नहीं कर सकते. आखिर क्यों? इसका कुछ हद तक जवाब है हमारे समाज और उसकी सामजिक संरचना. यहाँ सेक्स पर बात करना लगभाग बैन ही है. यहाँ बलात्कार होते हैं बड़े पैमाने पर होते हैं यहाँ तक की लड़कियां खुद के घर तक में सुरक्षित नहीं हैं. लेकिन सेक्स पर बात करने वाला चरित्रहीन हो जाता है. जहाँ इस देश में गर्भपात कानूनन अपराध हैं वहीं कानूनों की अनदेखी करते हुए यहाँ खुलेआम गर्भपात होते हैं. इन गर्भपातों में सबसे ज्यादा संख्या में होने वाले गर्भपात कन्या भ्रूण हत्या और दूसरे नंबर पर अनवांटेड चाइल्ड के लिए करवाए जाते हैं. अब बड़ा सवाल यह है कि ये आनचाहा गर्भ ठहरने की आखिर वजह क्या है? वजह साफ़ है या तो लोगों को सुरक्षा के उपाय पता नहीं हैं या फिर वे अपनाना नहीं चाहते.



 फिमेल कंडोम पर कोई विज्ञापन क्यों नहीं? 


पिछले दिनों बिग बॉस के एक एपिसोड में हिना खान और शिल्पा दूसरी प्रतिभागी सपना चौधरी को ये बताती हैं कि सिर्फ मेल कंडोम ही नहीं होता बल्कि फिमेल कंडोम भी होता है. सपना उनकी बातों पर हैरान थी क्योंकि उन्हें पता नहीं था कि फिमेल कंडोम भी होता है, सपना के साथ मैं भी हैरान होती रही कि क्या सच में फिमेल कंडोम होता है और फिर शुरू हुआ गूगल . यह बहुत आश्चर्य की बात नहीं है कि सपना और मेरी जैसी तमाम लड़कियां ऐसी हैं जिन्हें फिमेल कंडोम के बारे में पता ही नहीं है. अब सवाल है आखिर क्यों? क्यों नहीं पता है तो जवाब बहुत सीधा सा ही होगा कि जानकारी नहीं है. आप खुद सोचिये मेल कंडोम के बारे में न जाने कितने विज्ञापन हैं जो जानकारी देते हैं लेकिन क्या कोई एक विज्ञापन है जो फिमेल कंडोम के बारे में हो? मुझे तो याद नहीं पड़ता आपको याद हो तो बताइयेगा. आखिर यह भेदभाव क्यों यह समझने की जरूरत है शायद इस एक छोटी बात को समझ लेने से आपको भारतीय समाज की संरचना भी समझ में आ जाए.


 कंडोम बंद किया तो फिर डीयो क्यों नहीं 


चलिए एक मिनट को मान लेते हैं कि कंडोम के विज्ञापन गलत हैं और उन्हें बंद करना चाहिए तो फिर कंडोम ही क्यों डीयो के विज्ञापन क्या सरकार ने नहीं देखे हैं? खासकर मेंस डीयो के विज्ञापन जिनमें ज्यादातर विज्ञापन यही दिखाते हैं कि जैसे ही लड़का डीयो लगाता है लड़की नहीं “लड़कियां” उस पर मरने लगती हैं क्या यह समाज के पतन का कारण नहीं है. क्या इससे सामजिक संस्कार और नैतिकता प्रभावित नहीं होते. बंद करना ही है तो फिर उन विज्ञापनों को भी बंद करना चाहिए जो सीधे सीधे लैंगिक भेदभाव को बढ़ावा देते हैं और स्त्री को बाजार में उपभोग या वस्तु के रूप में प्रचारित करते हैं. अगर इस लिहाज से देखें तो हकीकत यही है कि आधे से अधिक विज्ञापनों को बंद कर देना चाहिए. और सिर्फ विज्ञापन ही क्यों टीवी पर आने वाले कम से कम दर्जन भर सीरियल्स ऐसे हैं जो न सिर्फ बच्चों पर बल्कि बड़ों पर भी बुरा असर डाल रहे हैं. उदाहरण के लिए कुछ दिन पहले सोनी पर प्रसारित होने वाले धारावाहिक “पहरेदार पिया की” बात करें जिसमें एक बच्चा  अपने से दुगनी उम्र की लड़की को प्रेम करता है और फिर उससे उसकी शादी भी हो जाती है, तो क्या वह धारावाहिक बच्चों के मन पर बुरा प्रभाव नहीं डाल रहा था. हालांकि तमाम विरोध के बाद सीरियल बंद हुआ लेकिन सोचने वाली बात यह है कि इसके लिए सरकार की तरफ से कोई पहल नहीं की गई. इस धारावाहिक के अलावा भी न जाने कितने ऐसे सीरियल है जो खुलेआम सरकारी नियमों का उलंघन कर रहे हैं फिर ऐसी कहानियों पर रोक क्यों नहीं?


ऐतराज इस बात से है कि एड को बंद करने की जरूरत क्या है? हाँ यह सच है कि अभी जिस तरह के कंडोम के एड दिखाए जा रहे हैं उनके कंटेंट अवेयरनेस कम और वल्गेरिटी ज्यादा फैलाते हैं तब भी सवाल वही उठता है कि इसको रोकने के लिए एड पर बैन की जरूरत है या फिर कंटेंट फ़िल्टर करने की जरूरत है?


 सरकार ने खुद किया था शुरू


एक और जरूरी बात आज सरकार जिस एड को यह कह कर बंद कर रही है कि इससे समाज का नैतिक पतन हो रहा है उसे एक समय में जागरूकता अभियान के अंतर्गत शुरू करने वाली भी सरकार ही है. इन एड को बंद करने के पीछे यह तर्क दिया जा रहा है कि कंडोम के एड परिवार के साथ बैठ कर देखने लायक नहीं है तो सिर्फ एक सवाल आज के जमाने की एक पिक्चर ऐसी बता दीजिये जो परिवार के साथ बैठ कर देखी जा सकती हो छोड़िये फिल्म की बात आजकल तो सीरियल्स में भी बेड सीन,  चपिचपा आशिकी के सीन खुलेआम फिल्माए जा रहे हैं, उन पर सरकार कोई एक्शन क्यों नहीं ले रही?  क्या वे क़ानून के दायरे से बाहर आते हैं?  एक आखिरी बात भारत एक ऐसा देश है जहाँ सरकार को लोगों को यह तक बताना पड़ता है कि खुले में शौच मना है और स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है वहां सरकार अगर प्राइम टाइम जोन में अवेयरनेस के एड मसलन गर्भनिरोधक गोलियां, कंडोम ये सब बैन कर देगी तो वह लोगों को जागरूक कैसे करेगी? इस पूरे मुद्दे पर बात करते हुए हमें यह भी ध्यान रखना होगा कि अनियमितताओं के इस देश में हजारों की जनसँख्या ऐसी है जो मजदूर वर्ग से आते हैं और उनके लिए मनोरंजन के कुल मिला कर दो ही साधन है पहला टीवी और दूसरा सेक्स और इस चक्कर में वह तमाम बच्चे पैदा करते हैं. उनके पास टीवी भी देखने का सीमित समय होता है वह है प्राइम टाइम ऐसे में अगर इसी समय पर इस तरह के एड पर बैन लगा दिया जाता है तो फिर इस वर्ग के पास अवेयरनेस का क्या माध्यम बचेगा?

इस देश में बलात्कार पर रोक नहीं लेकिन कंडोम पर रोक

अगर आंकड़ों की माने तो भारत एक ऐसा देश है जहाँ यौन अपराधों में सबसे ज्यादा अपराधी नाबालिग होते हैं. एक बार फिर आंकड़े की बात करें तो भारत का आज का युवा 14-16 साल की उम्र तक सेक्स कर चुका होता है अब इन आकड़ों के आधार पर बात करें तो यह बैन किसे बचाने के लिए है. यह इंटरनेट का युग है सो काल्ड मार्डन युग जहाँ इंटरनेट के माध्यम से आप कुछ भी देख सकते हैं कुछ भी सीख सकतें हैं ऐसे में सिर्फ टीवी पर कुछ समय के लिए एड को बंद करके सरकार क्या बदल लेगी? उलटे इस बैन के बाद अब उत्सुकता वश और भी ज्यादा लोग उन विज्ञापनों को सर्च करके देखेंगे जिन्हें बैन किया जा रहा है. क्योंकि कहते हैं ना जिस चीज को जितना छिपाया जाता है वह उतना ही उत्सुकता का विषय बनती है. इसमें कोई शक नहीं कि कंडोम के कुछ विज्ञापन सच में देखने लायक नहीं हैं क्योंकि उनमें वास्तविक मैसेज कहीं खो जाता है और सिर्फ शरीर की नुमाइश बचती है. लेकिन सरकार को यह देखना होगा कि ऐसे कंटेंट पर रोक लगाए ना कि अवेयरनेस पर.

साभार :- टेढ़ी उंगली


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लालू प्रसाद से महिला आरक्षण पास कराने की स्त्रीकाल की अपील: कहा कोटे के साथ पास करवायें महिला आरक्षण

राजद के राष्ट्रीय अध्यक्ष लालू प्रसाद ने पटना पुस्तक मेले में शनिवार को पूर्व सांसद अली अनवर पर केंद्रित ‘अली अनवर’ शीर्षक पुस्तक पर विचार-गोष्ठी तथा परिचर्चा को संबोधित किया. इस दौरान उन्हें पुस्तक के प्रकाशक द मार्जिनलाइज्ड पब्लिकेशन के संयोजक और स्त्रीकाल के संपादक संजीव चंदन ने महिला आरक्षण पर केन्द्रित स्त्रीकाल के ताजा अंक की प्रति देते हुए उनसे सार्वजनिक तौर पर आग्रह किया कि वे दलित-ओबीसी स्त्रियों के लिए कोटा के साथ महिला आरक्षण पास करवाने की पहल करें.

परिचर्चा में लालू प्रसाद पूरे रौ में दिखे . उन्होंने अपने संबोधन में कहा कि ‘देश की जनता अब सांप्रदायिक ताकतों के खिलाफ मन बना चुकी है। गुजरात की जनता ने नरेंद्र मोदी के सब्जबाग और नफरत व घृणा की राजनीति को नकार दिया है। ‘अली अनवर’ शीर्षक  किताब का संपादन पत्रकार व सामाजिक कार्यकर्ता  तथा स्त्रीकाल के संपादक मंडल के सदस्य राजीव सुमन ने किया है। यह किताब  ‘भारत के राजनेता’ नामक पुस्तक श्रृंखला का हिस्सा है, जिसके श्रृंखला -संपादक फारवर्ड प्रेस पत्रिका के प्रबंध संपादक प्रमोद रंजन हैं।

अपने संबोधन में राजद प्रमुख ने पूर्व सांसद अली अनवर को जनता के लिए लड़ने वाला सिपाही बताया। उन्होंने कहा कि अली अनवर पत्रकार के रूप में भी खासे लोकप्रिय रहे। वहीं गुजरात चुनाव के मद्देनजर लालू प्रसाद ने कहा कि देश और गुजरात की जनता नरेंद्र मोदी का सच जान चुकी है। उन्होंने कहा कि देश की जनता अब धर्म के अाधार पर देश को बांटने वाली ताकतों को बर्दाश्त करने को तैयार नहीं है। उन्होंने कहा कि देश का संविधान खतरे में है। ऐसा कहते हुए उन्होंने चेतावनी दी कि भाजपा इसी संविधान बदल सकती है और ऐसे में मेरा संसद में न होने का मुझे अफ़सोस है.

वहीं अपने संबोधन में पूर्व सांसद अली अनवर ने लालू प्रसाद को धर्मनिरपेक्षता का महान योद्धा कहाा। उन्होंने कहा कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने जनादेश का अपमान कर सांप्रदायिक ताकतों के साथ मिलकर षडयंत्र रचा, जिसे देश और बिहार की जनता ने अपनी आंखों से देखा। उन्होंने कहा कि उन्होंने हमेशा हाशिए पर रहने वालों के लिए आवाज उठायी। राज्यसभा में भी उन्होंने वंचित तबके के सवालों को रखा। श्री अनवर ने कहा कि सत्ता का मतलब केवल कुर्सी या कोई पद नहीं है। वे हमेशा वंचितों के लिए आवाज उठाते रहेंगे।

अपने संबोधन में पुस्तक के प्रकाशक द मार्जिनलाइज्ड के संयोजक संजीव चंदन ने कहा कि ‘भारत के राजनेता’ पुस्तक श्रृंखला के तहत देश के विभिन्न हिस्सों से चयनित 30 प्रमुख समाज-राजनीति कर्मियों पर किताबें प्रकाशित की जानी हैं। इसमें ऐसे  सामाजिक-राजनीतिक नेताओं को जगह दी गई है, जिनका न सिर्फ सामजिक परिवर्तन में महत्वपूर्ण योगदान रहा हो, बल्कि जिनकी वैचारिकी मौलिक और भारतीय समाज और  राजनीति की गतिकी की दिशा मोड़ने वाली रही हो।

इस श्रृंखला के तहत बिहार से लालू प्रसाद यादव, महाराष्ट्र से आरपीआई के नेता रामदास अठावले, तमिलनाडु से सीपीआई के नेता डी. राजा व सीपीएम के सीताराम येचूरी पर किताबें शीघ्र प्रकाशित होंगी। अन्य पुस्तकों के लिए चयन-प्रक्रिया जारी है

कार्यक्रम में राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद के अलावा जन संस्कृति से जुड़े लेखक मदन कश्यप, पूर्व सांसद शिवानंद तिवारी ने भी अपने विचार रखे। शिवानन्द तिवारी ने कहा कि इस तरह की किताबें पढ़ी जानी चाहिए. अली अनवर से लम्बी बातचीत, जो किस किताब में संकलित है, कई अनजाने पहलुओं को सामने लाता है. राजनीति की वैसी घटनाओं को भी जो मैं अपने समकाल के बावजूद नहीं जानता था. मदन कश्यप ने संपादक, प्रकाशक के इस श्रृंखला प्रयास को एक जरूरी पहल बताया. उन्होंने जनप्रतिनिधियों की संसदीय भूमिका पर अपनी बात रखी.   मंच से बीएचयू के शोधार्थी नरेश राम ने भीम गीत गाये. सम्यक प्रकाशन ने लालू प्रसाद एवं अन्य वक्ताओं को जगदेव प्रसाद और रामस्वरूप वर्मा की जीविनियाँ भेट की.  परिचर्चा का संचालन युवा साहित्यकार अरूण नारायण ने किया।

इस कार्यक्रम का देश भर में मीडिया ने बड़े पैमाने पर कवरेज किया. लिंक को क्लिक करें और ख़बरें देखें: 

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स्त्री के खिलाफ घर परिवार और विवाह संस्था को मजबूत करते सत्तावान: अरविंद जैन

स्त्रीकाल डेस्क

स्त्रीवादी क़ानूनविद अरविन्द जैन को  जन्मदिन (7 दिसंबर) की शुभकामनायें… !


पिछले दिनों वर्धा प्रवास के दौरान भारत  के प्रमुख जेंडर विशेषज्ञ,  महिलाओं के संवैधानिक अधिकारों और उनकी कानूनी लड़ाई की मुहिम में प्रमुखता से शामिल प्रसिद्ध कानूनविद श्री अरविंद जैन से महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के स्त्री अध्ययन विभाग के शोधार्थियों, प्रीतिमाला सिंह, गीतेश, मनोज गुप्ता और  विभागाध्यक्ष प्रो. शंभु गुप्त ने  विस्तृत बातचीत की।


 जेंडर समानता, यौन हिंसा अथवा महिलाओं के पक्ष में बने कानूनों की जमीनी हकीकत, कानूनों के विधिसम्मत अनुपालन में जेंडर पक्षपात से भरी राजनीतिक, सामाजिक एवं सामुदायिक मान्यताओं के बीच न्यायपालिका की भूमिका पर बात की गई। डॉ. जैन का मानना है कि बिना कानून और संविधान की जानकारी के इंसान अधूरा है। जेंडर समानता के पक्ष में हुए कानूनी सुधारों की पारिभाषिक शब्दावलियों उसकी सामाजिक एवं विधिक स्वीकार्यताओं के बीच अंतर्विरोधों के सवाल पर श्री जैन ने बड़ी सटीकता से जवाब देते हुए कहा कि चूंकि कानून बनाने वाली, उसे व्याख्यायित करने वाली और उसे लागू करने वाली संस्थाओं में निर्णयकारी भूमिकाएँ पुरुषों की हैं। संसदीय ढांचे में 92 प्रतिशत, ऊपरी अदालतों में 98 प्रतिशत न्यायाधीश पुरुष हैं ऐसे में यदि कुछ गिनी चुनी जगहों पर महिलाए हैं भी तो उन्हें निर्णय की भूमिका में प्रभावी रूप में शामिल ही नहीं किया जाता। सत्ता पर बैठे लोग घर, परिवार और विवाह संस्था के उसी मूल ढांचे से अपने रिश्ते मजबूत करते दिख रहे हैं जो आज भी सामंती बना हुआ है। जे. एस. वर्मा और लीला सेठ की कमेटी द्वारा सौंपी गयी रिपोर्ट को जिस तरह सरकार ने अपने तरीके से पेश किया उस पर भी लंबी बात-चीत हुई। रेप को परिभाषित करने वाले 2013 के कानून में स्त्री की सहमति-असहमति की परिस्थितियों के आलोक में वैवाहिक बलात्कार को देखते हुए अरविंद जैन ने खेद प्रकट करते हुए कहा कि इसने पुरुषों को असीमित अधिकार दे दिए हैं जो आने वाले समय में अपराधियों के लिए एक ढाल के रूप में साबित होंगे। महिलाओं के लिए वैवाहिक बलात्कार कानून की महत्वपूर्ण भूमिका, संपत्ति अधिकार कानून, तीन तलाक और महिला आरक्षण बिल पर भी शोधार्थियों ने उनसे सवाल किए। किसी भी कानून को लागू करने अथवा बिल पास करने की सरकारों की राजनीतिक इच्छा पर ज़ोर देते हुए उन्होंने कहा कि इन इच्छाओं का निर्धारण तत्कालीन सरकारें अपने हितों को ध्यान में रखते हुए करती हैं।

वर्तमान संदर्भ में उन्होंने उदाहरण स्वरूप कहा एक तरफ नोटबंदी, जी.एस.टी., या रेप लॉ आदि पर रातों रात फैसले और कमेटियाँ बना ली जाती हैं, वहीं महिला आरक्षण बिल जैसे कई महत्वपूर्ण मुद्दे वर्षों से ठंडे बस्ते में पड़े हैं। विश्वविद्यालयी परिवेश में जेंडर समानता से जुड़ेकानूनी और व्यवहारिक पक्षों पर बात रखते हुए स्त्री  अध्ययन जैसे अनुशासन में स्त्री-पुरुष की मौजूदगी और उनके साझा प्रयासों से जेंडर समानता की बहस और आंदोलनधर्मी भूमिकाओं को आगे बढ़ाने की भी बात कही। आज के समय के पद्मावती विवाद पर अपनी बेबाक राय रखते हुए उन्होंने कहा कि इस फिल्म को बनाने वाले तथा इसका विरोध करने वाले दोनों ही पक्ष सती तथा सती-प्रथा का महिमा-मंडन कर रहे हैं, जो कि सती निरोधक कानून के हिसाब से संविधान विरोधी कार्य है।


उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट को 17 साल लगे अपने यहां सेक्सुअल हैरासमेंट पर कमेटी बनाने में लग गए। जबकि 1997 ई. में सुप्रीम कोर्ट ने विशाखा जजमेंट में इस आशय का निर्णय दिया था। अंततः 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने अपने यहां यह कमिटी बनाई। इसी से देश के बाकि जगहों पर इस मसले पर के हालात को समझा जा सकता है।



डॉ. जैन ने आगे कहा कि आज भी देश-समाज-परिवार के लोकतंत्रीकरण का एजेंडा अधूरा है। दहेज हत्या, यौन हिंसा से लेकर बालिका भ्रूण हत्याएं देश में थमने का नाम नहीं ले रही है। विश्वविद्यालय और कॉलेजों में सेक्सुअल हरासमेंट से लेकर हत्या-आत्महत्याएं जारी है। उन्होंने तल्ख लहजे में कहा कि विश्वविद्यालयों में सेक्सुअल हरासमेंट पर जीरो टॉलरेंस की महज औपचारिकता पूरी की जा रही है। ज्यादातर विश्वविद्यालयों में छात्र-छात्राओं को एकांगी ज्ञान दिए जा रहे हैं, उन्हें समग्र ज्ञान से मरहूम रखा गया है। ज्यादातर विश्वविद्यालयों में दस बजे रात्रि के बाद छात्राओं के छात्रावास में ताला लगा दिया जाता है, जबकि छात्रों को खुली छूट रहती है। उन्होंने आगे कहा कि विश्वविद्यालयों के छात्रावास लड़कियों के लिए कैदखाने बने हुए हैं।

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