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वेश्यावृत्ति का समुदायिकरण और उसका परंपरा बनना

राहुल 

सेक्स वर्क (sex work) विशेषकर वेश्यावृत्ति (prostitution) समाज के यौनिक संगठन में ‘यौनिक आनंद’ की एक विशेषीकृत संस्था के बतौर मौजूद रहा है। वेश्यावृत्ति का कोई देशजता तलाशना काफी समस्यामूलक है, परंतु ऐतिहासिकता में गैर औद्योगिक वेश्यावृत्ति और औद्योगिक वेश्यावृत्ति के फर्क को समझना आवश्यक जान पड़ता है। वेश्यावृत्ति अपने सामाजिक, राजनीतिक व सांस्कृतिक संदर्भ को स्वयं प्रदर्शित करता है। जाहिर है ऐसे में वेश्यावृत्ति का कोई सार्वभौमिक स्वरूप नहीं बनेगा, पर इसकी उपस्थिति सार्वभौमिक रहेगी। राजनैतिक आर्थिक संदर्भ में इसका स्वरूप लगातार बदलते रहे हैं। वेश्यावृत्ति में समाज की सत्ता संरचना (जेंडर, वर्ग और जाति) की घुसपैठ बनी रहती है और जिसके केंद्र में हमेशा स्त्री की यौनिकता है।


नारीवादी आंदोलन के दूसरी लहर यौनिक मौन (sexual silence) को तोड़ती हैं, जहां ‘वेश्यावृत्ति’ जैसे शब्दावली को सेक्स वर्क (sex work) के विमर्श  द्वारा उभारा जाता है, तभी यह क्षेत्र यानी वेश्यावृत्ति (प्रतिरोध एवं शोषण) मजबूत गठजोड़ के साथ में समस्याग्रस्त होता है। वेश्यावृत्ति के विविध आयाम के इतिहास, भूगोल को जानने और व्याख्यायित करने की प्रक्रिया यौनिक अर्थ व्यवस्था और यौनिकता के विमर्श को और प्रगाढ़ करती है। बावजूद इसके दक्षिण एशिया एवं अफ्रीकी समाजों में सामुदायिक वेश्यावृत्ति और औद्योगिक वेश्यावृत्ति जो कि परिवार के सहयोग और उसके समर्थन पर टिकी है, और वह परंपरा  और आधुनिकता के बीच रिश्ता बनाती है। दरअसल इस तरह के समुदायों को एक सेक्सुअल वजूद के साथ देखा जाता है और उपनिवेशवाद की प्रक्रिया, नीति, नियम और कारण के जरिए कई बंधन लगा देता है। जाहिर है ऐसे में यह पूरा का पूरा समुदाय ही यौनिक अपराधी के रूप में मुख्य धारा के सामने प्रस्तुत होता है।



अंग्रेजों ने कुछ ऐसी जातियों को प्रतिबन्ध के लिए चिन्हित किया जो खानाबदोश थे, घुमक्कड़ थे। जिनके जीवन में बंजारापन था। और यह बंजारापन उन्होंने उन्मुक्त जीवन के लिए तय नहीं किया था बल्कि यह उनकी मजबूरी थी। संपत्ति के नाम पर इनके पास कुछ पशु (एक दो भैंस) और कुछ बर्तन रहता था। नाचना-गाना और करतब दिखाना पेशा था जिससे इनका जीवन निर्वाह होता था। औपनिवेशिक काल में राज्य सत्ता (विक्टोरियन नैतिकता का  चोला ओढ़े ) का मनना था कि इन खानाबदोश जातियों से समाज में नैतिकता का पतन हो रहा है और इनके वजह से समाज में यौन संबन्धों में खुलापन आ रहा है।  इन खानाबदोश जातियों के पुरुषों को ठगी  के तहत जेलों में बंद कर दिया गया, और महिलाओं को एक जगह रहने के लिए बाध्य कर दिया गया।  1871 में ‘अपराधिक जनजाति अधिनियम’ ने इन खानाबदोश जातियों को अपराधिक घोषित कर दिया गया। और इनका जीवन दूभर होता चला गया।  पितृसत्तात्मक सामंती समाज में इस तरह की खानाबदोश समुदायों ने जीवन –निर्वाह के लिए  परिस्थितियों से समझौता किया और वह पारिस्थितिक समझौता धीरे-धीरे परंपरा में तब्दील होता चला गया जो आज एक सामाजिक बुराई बन गयी है। भारत में भी ऐसी कई जातियां व समुदाय हैं जिन्होंने पूरी तरह से सामुदायिक वेश्यावृत्ति को अपना लिया है और साथ ही इसे परंपरा का नाम दे दिया है। इस संदर्भ में नट, कंजर, सौंसिया, बेड़िया, बाछड़ा आदि जातियों/ समुदायों को देखा जा सकता है। इस आलेख में बेड़िया समुदाय को केंद्र में रखकर बात की गई है।


बेड़िया समुदाय के बारे में कोई लिखित जानकारी नहीं मिलती और न ही मौखिक इतिहास में इसके बारे में कोई विशेष जानकारी है। बेड़िया समुदाय की उत्पत्ति के बारे में दो कथाएं प्रचलित है। पहली कथा के अनुसार आज से लगभग 300 वर्ष पूर्व राजस्थान के भरतपुर में दो भाई रहते थे। एक का नाम था सैंसमुल और दूसरे का नाम था मुल्लानुर। सैंसमुल के वंशज सांसी (सांसिया) और मुल्लानुर के वंशज बेड़िया या कोल्लासी कहलाए। इनके यहां यौन संबंधों को लेकर खुलापन था या कहें की स्वच्छंद यौनाचार की प्रथा थी। इस समुदाय की सभी स्त्रियां सभी पुरूषों के साथ यौन संबंध बना सकती थी।


 डॉ. शरद सिंह अपनी पुस्तक ‘पिछले पन्ने की औरतें’ में लिखती हैं कि ‘‘इनके दल में स्त्री-पुरूष के बीच विवाह की बाध्यता नहीं रहती थी। कोई भी स्त्री आज एक पुरूष के साथ यौन संबंध बनाती थी तो कल दूसरे और परसो तीसरे के साथ। इसी प्रकार पुरूष भी किसी एक स्त्री के साथ संसर्ग में विश्वास नहीं रखते थे। ये लोग धार्मिक मामलो में भी निर्बंध थे। बेड़िया हिंदू अथवा मुसलमान कुछ भी हो सकते थे।” बेड़िया समुदाय की तरह ही भारत में बाछड़ा, नट, कंजर, संसिया, बोदिया, लोहरगढ़िया आदि समुदाय व जातियां हैं। इन जातियों ने भी नृत्य-संगीत के पेशे से होते हुए वेश्यावृत्ति तक का सफर तय किया है। इन जातियों व समुदायों के यहां भी यौनाचार पर बहुत कड़ा पहरा नहीं है बल्कि स्वछंद यौनाचार है। वैसे भी यौनिकता का सवाल संपत्ति के सवाल से जुड़ा हुआ है। भारत में ऐसे कई समुदाय या जातियां रही हैं जिनमें स्वछंद या मुक्त यौनाचार की व्यवस्था सहजता से रही है। बेड़िया, बाछड़ा, सांसी, कंजर आदि इसके उदाहरण हैं। कंजरों के बारे में ‘भगवान दास मोरवाल’ अपने उपन्यास ‘रेत’ में लिखते हैं ‘कंजर का अर्थ होता है कानन (जंगल) में विचरण करने वाला।’ इससे यह पता चलता है कि कंजर जंगल में रहने वाले नहीं हैं, बल्कि वे केवल विचरण करने वाले होते हैं या विचरण करते हैं।  लेकिन सवाल यह उठता है कि कोई भी जाति या समुदाय जंगलों में विचरण क्यों करेगी? इसका एक ही कारण हो सकता है कि वह किसी के डर से जंगल में छुपने के लिए ऐसा कर रही हो, ताकि वह अपने शत्रु से बच सके। कंजर अपने आप को राजपूत मानते हैं। इनके यहां भी युद्ध और राजपूत सेना में होने का जिक्र मिलता है। ऐसा जान पड़ता है कि युद्ध में पराजित हो जाने पर जो कुछ लोग बच गए थे उन्होंने जंगलो में शरण लिया। जंगल यानी कानन में शरण लेने की वजह से ही ये कंजर कहलायें। बाद में यह समुदाय भी जीविका के लिए वाया नाच-गाने से होता हुआ वेश्यावृत्ति तक पहुंचा। कंजरों के अलावा बाछड़ा, नट व सांसी जातियों का जीवन मूल्य व संस्कृति आपस में काफी मिलता-जुलता है।


यह पूर्णतया सत्य है कि सामुदायिक वेश्यावृत्ति करने वाली जातियां पूरी तरह से घुमक्कड़ एवं खानाबदोश रही हैं। अंग्रेज अधिकारी आर।बी। रसेल ने बेड़ियों के बारे में सन 1916 ई में टिप्पणी करते हुआ लिखा था कि ‘जिप्सियों की भांति पीढ़ी-दर-पीढ़ी खानाबदोश एवं जन्मजात घुमक्कड़ समूहों को बेड़िया कहा जाता है।



पद्मावत में मलिक मुहम्मद जायसी लिखते हैं ‘जानि गति बेड़िन दिखराई, बांह डुलाय जीऊ लेइ जाई’  यानी अपने नाचने की कला से बेड़नी दिल ले जाती है। यदि हम जायसी के रचना काल की बात करें तो वह 1570 के आस-पास ठहरता है। इससें पता चलता है कि बेड़िया समुदाय की मौजूदगी पूर्व से थी। ये नाचने-गाने के काम में पहले से संलग्न थे। यदि इन सब चीजों को आधार मान लिया जाय तो यह तय हो जाता है कि ये राजपूतों से ही निकला हुआ एक समुदाय है जो युद्ध और जिंदगी से जूझते हुए वाया नाचने-गाने से वेश्यावृत्ति का रास्ता तय करता है जो कि ये खुद भी मानते हैं।


किसी भी समुदाय या समाज का जीवन आय के स्रोत्रों पर ही निर्भर होता है। आय के स्रोत जीवन-निर्वाह को प्रभावित करते हैं। जीवन-निर्वाह स्वास्थ्य के साथ-साथ पुनरूत्पादन को भी प्रभावित करता है। जीवन-यापन केवल आय के स्रोत पर ही निर्भर नहीं होता, बल्कि भौगोलिक स्थितियां व जीवन के अन्य पहलू व युद्ध की विभीषिका व सांस्कृतिक आयाम भी जीवन-यापन को तय करते हैं। बेड़िया समुदाय ने भी विभिन्न परिस्थितियों से संघर्ष के बाद ही इसे पेशे के रूप में शुरू किया और बाद में यह परंपरा बन गई।

वर्तमान समय में बेड़िया समुदाय का जीवन-निर्वाह पूरी तरह से स्त्रियों पर टिका हुआ है। इस समुदाय की आमदनी का स्रोत राई नृत्य है। राई नृत्य के साथ ही साथ ये स्त्रियां वेश्यावृत्ति भी करती हैं या कहें कि इन्हें ऐसा करने के लिए विवश किया जाता है। औपनिवेशिक काल में बेड़िया समुदाय के पुरूष चोरी और राहजनी पर निर्भर थे लेकिन अंग्रेजी हुकूमत के सख्ती के बाद इनको इससे पीछे हटना पड़ा और ये पूरी तरह से अपनी स्त्रियों की कमाई पर आश्रित होते चले गए। स्त्रियां जो कि अभी तक नाचने-गाने तक ही सीमित थी लेकिन अत्यधिक दबाव होने व पुरूषों की स्वीकार्यता के कारण वेश्यावृत्ति को चुना। ‘समाज में जारज कही जाने वाली संतानों से विकसित बेड़िया समुदाय के पुरूषों ने मेहनत-मजदूरी से बड़ी जल्दी नाता तोड़ लिया था। उन्हें औरतों के द्वारा कमाकर लाये जाने वाले धन के उपयोग की आदत पड़ चुकी थी।’ सामाजिक बदलाव का ताना-बाना गणितीय फार्मूले पर निर्भर नहीं करता। यह राजकीय प्रयासों पर भी उतना निर्भर नहीं होता जितना की विकास के नारे लगाए जाते हैं। सामाजिक बदलाव की कड़ी विकास से जुड़ती तो जरूर है, लेकिन यह पूरी तरह से इस पर लागू नहीं होती। सामाजिक बुराईयों को दूर करने के लिए सबसे जरूरी चीज है कि बुराई जिस समाज या समुदाय में व्याप्त हो उसको पता होना चाहिए की यह एक बुराई है तभी वह इसे दूर करने का प्रयास करेगा। अंबेडकर के शब्दो में ‘‘जिस दिन गुलामों को यह पता लग जाए कि वे गुलाम है और उनका शोषण किया जा रहा है वे उसी दिन आजाद हो जाएगें।’’ यही बात सामाजिक बुराईयों/ कुरीतियों पर भी लागू होती है।

बेड़िया समुदाय की सामाजिक स्थिति भूमंडलीकरण व विकास की गढ़ी गयी परिभाषा में दम तोड़ रही है। सामाजिक समरसता इनके लिए बेमानी है। वैसे भी समाजिक समरसता ‘अर्थगत’ होता है जो इनके पास नहीं है। बेड़िया समुदाय आर्थिक रूप से मजबूत नहीं है। बेड़िया समुदाय का सामाजिक विकास अभी तक नहीं हो पाया है, लेकिन परिवर्तन जरूर हुआ है। यह परिवर्तन सामंती व्यवस्था के कुछ कमजोर पड़ने के कारण हुआ है, लेकिन अभी अधिकांश बेड़िया समुदाय जिन स्थानों पर रहते हैं वहां की सामाजिक संरचना में सामंती व्यवस्था दृढ़ता के साथ मौजूद है। राजस्थान, मध्य प्रदेश व बुंदेलखंड में बेड़िया समुदाय आज भी उसी दंश को झेल रहा है। इसके सामाजिक ताने-बाने में अभी भी बहुत ज्यादा फर्क नहीं आया है।

परंपरा के नाम पर जो परिस्थितियां पहले से तैयार की गई थी वहीं परिस्थितियां आज भी यथावत है। जीविका के साधन व रहने तक के लिए जमीन नहीं है। सरकारी योजनाएं इनकी पहुंच से बाहर है और यदि कुछ है भी तो, वह इतना कठिन है कि वे इसे करना नहीं चाहते। पूंजीवाद ने बेड़नियों को अपनी आर्थिक संपन्नता की शरण देने के बदले उन पर जो परिस्थितियां आरोपित की उसे कोई भी सामान्य स्त्री किसी भी मूल्य पर स्वीकार नहीं करेगी। बेड़िया समुदाय की स्त्रियों ने न केवल इसे स्वीकार किया बल्कि इसका मूल्य भी चुकाया, जो आज भी जारी है। पूंजीवाद के बारे में कहा जाता है कि इसने सबसे अधिक स्वतंत्रता स्त्रियों को दी है। स्त्रियों को इसने ड्योढ़ी से बाहर निकाला है और काम के अवसर मुहैया कराया है। पूंजीवाद का यह एक पक्ष है। अपने लाभ व पितृसत्ता के लिए इसने स्त्रियों को वस्तु बना दिया है।



पूंजीवादी, सामंतवादी, जातिवादी व्यवस्था व पितृसत्ता किसी भी ऐसी परंपरा का विरोध नहीं करती जिसमें उसका लाभ निहित हो। लाभ का यह सिद्धांत आज भी पंरपरा के नाम पर जीवित है। समय के साथ भले ही इसका स्वरूप बदल गया हो या बदल दिया जाय लेकिन उद्देश्य नहीं बदलता। सामाजिक बदलाव, आर्थिक विपन्नता एवं परंपरा की कड़िया आपस में जुड़ती है। बिना परंपरा के बदले सामाजिक संपन्नता नहीं आ सकती और बिना अर्थिक संपन्नता के सामाजिक बदलाव करना बेमानी है। बेड़िया समुदाय अभी भी पूरी तरह से अपने पारंपरिक वेश्यावृत्ति और राई नृत्य पर ही निर्भर है।


राई नृत्य ‘मशाल’ की रोशनी से बाहर निकलकर ‘हाईलोजन’ के दूधिया प्रकाश  में आ गई है, लेकिन सोहवतिया से लेकर गाने के बोल तक वहीं हैं और राई नृत्य का प्रयोजन भी। कैसी विचित्र बात है कि स्त्रियों की कला को स्त्री-देह से जोड़कर ही देखा जाता है। देवदासियों का भरतनाट्यम भी देह से ही जोड़कर देखा गया। भले ही इसे मंदिरों में देवताओं को खुश करने के लिए किया जाना वाला नृत्य का नाम देकर पर्दा डाला जाता रहा हो। इसकी शुरूआत भी कला के नाम पर नहीं बल्कि दैहिक शोषण के साथ हुई। भरतनाट्यम मंदिर से बाहर निकलकर संभ्रांत ब्राह्मणवादियों के हाथों में आया। इसे कला और व्यवसायिक बनाकर ब्राह्मणों ने देवदासियों को इससे दूर रखा। अभी तक राई नृत्य को अभी तक किसी ने कला के रूप में नहीं देखा है। इसे केवल अश्लीलता और देह से ही जोड़कर देखा जाता है। डॉ शरद सिंह लिखती हैं- ‘कितनी विचित्र हैं! न दिन के उजाले में जिस औरत के साथ पुरूष अछूत-सा व्यवहार करते हैं, रात के अंधेरे में वे ही पुरूष उस औरत की देह पर बिछे मिलते हैं। इस दोहरेपन के अंधेरे को जीने के लिए विवश रहती हैं वह औरत जिसे वेश्या, गणिका, नगरवधू, बेड़नी और न जाने कितने नामों से पुकारा जाता है। प्राचीन काल में सामाजिक श्रेष्ठता धारण करने वाले युवक काम शास्त्र के आसन सीखने इन्हीं औरतों के पास जाते थे। वापस आकर वे सीखी हुई कला को अपनी पत्नी अथवा प्रेमिका पर आजमाते थे। ये औरतें चौसठ कलाओं में निपुण होती थीं जिनमें से एक कला कामशास्त्र थी तो दूसरी नृत्य थी।’ इस संदर्भ में ‘राई नाचने वाली अनीता कहती हैं कि कभी भी पुरूष उसके कला पर ध्यान नहीं देते। वे कमर की लोच और गाने के बोल पर लट्टू होते हैं जबकि उसके जैसी ही अभिनेत्री माधुरी दीक्षित भी नाचती है। यहां कला का कोई मोल नहीं है। इसी कला से माधुरी दीक्षित लाखों रूपए कमाती है। वह कहती है कि केवल राई नाचकर परिवार का खर्च नहीं चलाया जा सकता। इसमें बहुत कम पैसे मिलते हैं और कोई भी केवल राई नृत्य की कला देखने के लिए हमें नहीं बुलाता।’


नृत्य जो एक मानवीय संवेग की अह्लादकारी अभिव्यक्ति रही है या होती है, वह चैसठ कलाओं में निपुण नगरवधुओं, देवदासियों एवं कोठों पर ही विकसित हुई है। जिस नृत्य के बदले पैसा प्राप्त किया गया उसे बजारू कहा जाता है और इसे वेश्या से जोड़कर देखा जाता है। लेकिन ‘बजारू’ की स्थिति सदैव जीवित रही क्योंकि मनोरंजन के नाम पर इसे धन देकर जीवित रखने वाले हमेशा उपस्थित रहे और आर्थिक विपन्नता के कारण यह पंरपरागत होता गया जो आज भी अपने उसी रूप में है। प्राचीन काल में जो गणिका अथवा वेश्या थी, वह आधुनिक काल में कॉर्ल गर्ल अथवा सेक्स वर्कर कहलाने लगी हैं। इसके अलावा कुछ नहीं बदला। केवल नाम बदल दिया गया। काम जस का तस। सभ्य समाज के लोग उनसे कामकलाएं तो ली लेकिन उनको उपेक्षित रखा। कोठों व तवायफों से कुछ कलाएं बाहर आयी। इसे कलागुरूयों ने शास्त्रीय रूप में ढाल दिया। इन कला के असली हकदारों के पास कला के नाम पर अब कुछ नहीं बचा है। इसका पेटेंट कलागुरूओं ने अपने नाम करा लिया है। राई नृत्य के साथ अभी वह स्थिति नहीं आई है। इसे अभी बाजार में उस तरह नहीं भुनाया जा रहा है जिस तरह से अन्य नृत्य कलाओं को भुनाया गया। राई नृत्य के अधिकांश  स्टेप माधुरी दीक्षित ने अपने नृत्य में शामिल किया है। बेड़नी स्त्रियां इसे जानती तो हैं लेकिन इनके पास इसका कोई पेटेंट नहीं है। इनकी स्थिति तीसरी दुनिया के देशों की तरह हो गई है जिनका सब कुछ होते हुए भी उस पर अधिकार किसी और का होता है। बेड़िया समुदाय का भी यही हाल है। राई ये खुद नाचती है लेकिन इन पर अधिकार किसी और का होता है। यहां भी शोषण के सभी रूप मौजूद है। ‘आयोजक या उसके दलालों के बिस्तर पर से गुजरने वाली को अच्छे कार्यक्रम मिलते हैं। जब बेड़नियां किसी गांव में नाचने को बुलाई जाती है तो यह पहले ही तय हो जाता है कि बुलाने वाले में से किसको खुश  करेंगी।’


लोक संस्कृति जिसे हम अपनी बुनियादी एवं वास्तविक संस्कृति का मूलाधार मानते हैं, उनके संरक्षण और संवर्द्धन के लिए मात्र उन लोगों को उत्तरदायी ठहराया जाता है जो अशिक्षित या आर्थिक रूप से कमजोर हैं। बार-बार इनके पिछड़ने का कारण अशिक्षित होना बताया जाता है जबकि पिछड़ने का कारण मनोरंजन के नाम पर चला आ रहा दैहिक शोषण है। यदि लोक-संस्कृति बदलाव की कड़ी से गुजरती है तो उसे स्वीकार नहीं किया जाता। आधुनिक बोध जैसे ही उसमें समाहित होता है उसे लोक से कटा हुआ मान लिया जाता है। वैसे भी समाज के नियंता आधुनिकता को संदेह के नजरिए से देखते हैं। इसलिए वे नहीं चाहते कि उनकी इच्छा के विपरीत कोई भी परिवर्तन हो और जब प्रश्न  किसी कला को लेकर हो जिससे पुरूष अपनी कुंठाओं को शांत करता हो तो यह संभव ही नहीं कि इसमें बदलाव की चाह उसके अंदर हो। प्रदर्शित की जाने वाली किसी भी कला का स्वरूप चाहें परंपरागत हो या आधुनिक वह पूरी तरह से कला प्रेमियों, कला-ग्राहको व दर्शकों के चरित्र पर निर्भर करता है। यदि  दर्शक कला के माध्यम से किसी विचार को प्राप्त करना चाहता है तो कला का स्वरूप शास्त्रीय होगा। जैसा कि फिल्मों के बारे में भी कहा जाता है कि कला फिल्मे व मनोरंजन फिल्में। और यदि कला के माध्यम से दर्शक  अपनी कुंठाओं को शांत करना चाहता है तो कला अशास्त्रीय हो जाती है। इस तरह के कला को प्रदर्शित करने वाले कलाकार की यह विवशता हो जाती है कि या तो वह कला का प्रदर्शन  न करे और यदि करे तो दर्शक  की इच्छा के अनुरूप। यदि उसकी जीविका उसी कला पर निर्भर हो और अन्य कोई साधन नहीं है तो वह कला को दर्शक  के अनुरूप ही प्रस्तुत करेगा। पितृसत्ता, राज्य व सामाजिक ढाचें का आपसी ताना बाना, शोषण के जिस बुनियाद पर टिका है उसके पड़ताल के लिए बने-बनाये ढाचे से काम नहीं चलता। इसके लिए पड़ताल तो जरूरु है लेकिन पड़ताल के लिए नजरिया व टूल्स वर्तमान सामाजिक संदर्भों व श्रम की मान्य परिभाषा अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) एवं श्रम का मार्क्सवादी दृष्टिकोण जरूरी है। वेश्यावृत्ति व ‘सेक्स वर्क’ में श्रम की उपयोगिता, राज्य का नियंत्रण, पितृसत्ता का दबाव भी काम करता है।



परंपरा के नाम पर हो रहा शोषण जिसे स्त्रियों के लिए ऐसा माहौल बना दिया गया है जिसमें वे इसे अपनी नियति मानती हैं। बेड़िया समुदाय की स्त्रियों के साथ पूरी साजिश के साथ ऐसा किया जाता रहा है जो अभी भी जारी है। परंपरा के नाम पर देह व्यापार शुरू करना आसान है लेकिन इससे निकलना मुश्किल। भारत में ऐसे समुदायों की स्थिति बहुत कम है जिनमें देह के धंधे को सामान्य माना जाता है। बेड़िया समुदाय में वेश्यावृत्ति को हेय दृष्टि से नहीं देखा जाता जबकि सामान्य समाज में वेश्यावृत्ति को एक कलंक माना जाता है। यौन दासता में औरतों को जिन मुश्किलों से जुझना पड़ता है वे उसमें मुक्ति या पलायन के बाद भी खत्म नहीं होती।

मानवता के खिलाफ होने वाले किसी भी कार्य की निंदा होनी चाहिए और वेश्यावृत्ति की तो होनी ही चाहिए। वेश्यावृत्ति मनुष्यता की बदतरीन असफलताओं की एक मिसाल है। यह स्त्री शोषण की इंतहा है। पैसे के ताकत का खेल है। वेश्यावृत्ति एक ऐसा पेशा है जिसमें स्त्रियां एक दिन में 10 पुरूषों को यौन संतुष्टि प्रदान करने के बाद भी उन्हें अच्छा भोजन व रहने के लिए एक अदद मकान की समस्या बनी रहती है। वेश्यावृत्ति व सेक्स वर्कर बनने व बनाने के सवाल पर नारीवादियों में गहरा द्वंद है। लेकिन इतना तो सभी का मानना हैं कि यह स्त्रियों के शोषण के बुनियाद पर टिका हुआ है। यह अंतरंगता और वर्चस्व की संबंध की खरीददारी करने का मामला भी है। आधुनिक वेश्यावृत्ति या ‘सेक्स वर्क’ श्रम शोषण की आधुनिक पद्धति है। ‘सेक्स वर्कर’ और समुदायिक वेश्यावृत्ति करने वाली स्त्रियों में काफी अंतर है। बेड़िया स्त्रियों ने अपनी मर्जी से इस पेशे का चुनाव नहीं किया है, बल्कि सामंती पितृसत्तात्मक व्यवस्था ने परंपरा के नाम पर चली आ रही इस प्रथा को पेशागत  बना दिया है। बेड़िया स्त्रियों के यहां स्वतंत्रता के जो मायने हैं वह पूंजीवादी वेश्यावृत्ति यानी ‘सेक्स वर्क’ से भिन्न है। बेड़िया स्त्रियां जिस स्थान पर रहती हैं वहां सामंतवादी संरचना का आधार काफी मजबूत है। और सामंतवादी संरचना अपने उपभोग के लिए परंपरा के नाम पर इसे बचाये रखना चाहता है।                                                                                                                                                                                                   
 बेड़िया स्त्रियों को इस पारंपरिक पेशे से निकालने के लिए राज्य ने अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन करने के लिए केवल कागजी खानापूर्ति की है। कोई ठोस कदम नहीं उठाया है। बेड़िया स्त्रियों को एक आम स्त्री में बदलने के लिए उनके वातावरण को बदलना आवश्यक है, जिससे वे विवशता के उन बंधनों से मुक्त हो सकें जिसे पुरूषों ने परंपरा के नाम पर अभी तक कायम रखा है।

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बेड़िया समुदाय की ज्योति, सुहागरानी व पुष्पा से बातचीत 
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परिचय :- पी-एच. डी.(स्त्री अध्ययन विभाग) महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा 
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स्त्री देह पर लड़े जाते हैं युद्ध

गरिमा श्रीवास्तव

भारतीय भाषा विभाग जेएनयू, में प्राध्यापक हैं. सम्पर्क : drsgarima@gmail.com

मूल शीर्षक:-‘बनमाली गो तुमि पर जनमे होइयो राधा’’

दिल्ली से मास्को की हवाईयात्रा बहुत सुखद नहीं रही है, शेरमेट हवाईअड्डे पर बर्फ की मोटी चादर ने ज्यों दृष्टि बाधित कर दिया है जहाज के चौडे पंखों पर जमी बर्फ को लगातार गर्म पानी की बौछारों से पिघलाया जा रहा है। बर्फ की सफेदी और विस्तार भयकारक सा है। ढेर सारे टर्मिनल और उनके बीच की लम्बी दूरियां जो अपने पैरों ही तय करनी हैं प्रतीक्षा पंक्तियां, सम्प्रेषण की भाषा रशियन, अब तक की सीखी भाषाएं दामन छुड़ा असहाय कर गयी हैं कदम कदम पर कड़ी सुरक्षाजांच आपकी मनुष्यता पर विश्वास करने को कोई तैयार नहीं। जाग्रेब के लिए यहीं से दूसरी उड़ान लेनी है, पर अभी तक मालूम नहीं कि पहुंचना किस टर्मिनल पर है, यूरोप जाने का उत्साह मंद हो चला है जबकि यात्रा तो अभी शुरू ही हुई है। टी.एस. इलियट ने कभी पूछा था  डू आई डिस्टर्ब द यूनिवर्स, वही बात खुद से पूछती हूं मेरे लिखने न लिखने से क्या फर्क पड़ता है। दुनिया में सैकड़ों लोग अपने अनुभव, सुख दुख, उपलब्धि, संघर्ष, राग द्वेष की गाथाएं लिख कर चले गये उन्हें यह कभी मालूम ही नहीं चला होगा कि उनका लिखा किसने पढ़ा, किसका जीवन उससे बना बिगड़ा या किसी को जीवन पाथेय मिला। जो भी हो अनुभूतियां बांटने के लिए ही होती हैं लेकिन उन्हें व्यवस्थित और तरतीबवार ढंग से रख पाना सम्भव होता है क्या? क्योंकि तरतीब तो उनके आने में भी नहीं होती।

पिछले डेढ़ महीने से यहां हूं। दक्षिण मध्य यूरोप के एड्यिाट्रिक समुद्र के किनारे छोटे से शहर जाग्रेब में। परिचितों, मित्रों में से कुछ क्रोएशिया को एशिया समझते हैं, उनका कहना है इतनी ठंड में यूरोप जाने की जरूरत भी क्या है? कैसे बताऊँ ही कदमों से दुनिया को नाप लेने की ’ओ कृष्ण तुम अगले जन्म में राधा बनना’- बाउल गीत की पंक्ति 190 / तमन्ना मुझे यहां ले आयी है। बचपन में चार साल बड़ी बहन को स्कूल ड्रेस, जूते बस्ते समेत स्कूल जाता देख मेरा मन मचल जाता, मां ने ढाई साल की उम्र में स्कूल भेजना शुरू कर दिया था। समय के पहले, पांव में पहने कद से बड़े जूतों ने स्कूल के बंद अनुशासन के बीच खड़ा कर दिया। बचपन का खेल तो हो ही नहीं पाया। भारतीय सांस्कृतिक सम्बंध परिषद्, जाग्रेब विश्वविद्यालय में हिन्दी विभाग खोलना चाहता थाµ मुझे वही अवसर मिला है कि मैं दो वर्ष तक यूरोप में रह सकूं। छात्रा उत्साहित हैं। अतिथिगृह से विश्वविद्यालय सिर्फ दो किलोमीटर पर है इसलिए पैदल चलना अच्छा लगता है।यातायात और संचार सुविधा काबिले तारीफ है, समूचा क्रोएशिया आंतरिक तौर पर आठ राष्ट्रीय राजमार्गों से सम्बद्ध है। विश्वविद्यालय इवाना चेलाचीचा में है और भारतीय दूतावास कुलमरेस्का पर। गनीमत है कि दूतावास बार बार जाने की जरूरत नहीं पड़ती। राजदूत प्रदीप कुमार विनम्र और अनुशासनप्रिय हैं, जो अकसर भारत के दौरे पर रहते हैं और द्वितीय सचिव दूतावास की व्यवस्थादेखते हैं। कर्मचारी और अधिकारी शालीन हैंµ श्रीमती पासी हैं, आर्यन हैं, जिनसे हिन्दी में बात करने का सुख है। तीन मंजिला सफेद इमारत, साफ सुथरी सजी संवरी लेकिन जिन्दगी ज्यों धड़कना भूल गयी हो यहां, इसलिए इंडोलाॅजी विभाग के मुखिया प्रो. येरिच मिस्लाव से अनुरोध किया है कि वे मेरी व्यवस्था विश्वविद्यालय के नजदीक ही करें। सिएत्ना सेस्ता (फूलों की गली) की पांचवी मंजिल परएलविश मेस्त्रोविच के फ्लैट में मुझे ठहरने को कहा गया है फ्लैट सुंदर और सुख सुविधा वाला है। यह पर्याप्त है मेरे लिए। भारत से लायी सभी चीजें जमा ली गयी हैं। लैपटाॅप को विशेष जगह दी गयी है क्योंकि आने वाले दिनों में वही एकमात्रा दोस्त बचा रहने वाला है। अकसर तापमान शून्य से चार छह डिग्री कम रहता है। धूप कभी कभी निकलती है वो भी थोड़ी देर के लिए। धूप में भी कंपा देने वाली ठंड होती है। रविवार का दिन है। घड़ी को अभी मैंने भारतीय समय पर ही रहने दिया है। भारतीय समय से साढ़े चार घंटे पीछे नाश्ता लिया है दलिया और फ्रूट कर्ड। थोड़ा सोने को जी चाहा है। नींद में अपने देश में हूं, कभी भाई बहनों के साथ, कभी शांतिनिकेतन में मंजू दी के साथ। रतनपल्ली वाले घर में चैताली दी के साथ साईं बाबा को लेकर उनकी शाश्वत अडिग आस्था का मजाक उड़ाना चल रहा है। दूध के पतीले में अचानक उबाल आने पर वे ‘जयसांईं’, ‘जयसाईं’ कहते हुए फूंक मारने लगतीं, मेरे कहने पर कि गैस की नाॅब बंद कीजिए, उसके लिए साईं बाबा अवतार नहीं लेंगे, वे मुझ पर नाराज हो जाया करती हैं। दिल्ली में मां होली पर पुए बना रही है मैदा, घी,चीनी, दूध, मेवे के घोल को खूब फेंट कर सधे हाथों से गर्म घी में छोड़ती है छन्न की आवाज के साथ फूल जैसा पुआ आकार लेने लगता है, उसके बाद बारी आती है गर्म मसाले में पके कटहल के सालन की। और लिट्टी वह जो दादी बनाती हैं, उसका कोई जवाब नहीं। बैंगन के चटखदार चोखे के साथ खूब सत्तू, लहसुन और अजवायन से भरीपुरी जवां लिट्टी ये सारे व्यंजन अपने रूप रस गंध के साथ आंखों के आगे परसे चले आ रहे हैं। मंजू दी शांतिनिकेतन में मटर की कचैड़ी बनाती थीं, गांधी पुण्याह पर हरिश्चंद्र जी का बनाया सुगंधित सूजी का हलवा… जुबां पर स्वाद के कण अभी बाकी हैं… जोर की घरघराहट के साथ चौंक कर आंखें खुलती हैं कमरे में घुप्प अंधेरा कहीं कोई नहीं, अपना होना ही शंकालु बना रहा है

काबे की है हवास कभी कुए बुतां की है
मुझको खबर नहीं, मेरी मिट्टी कहां की है
                                          दाग देहलवी

कहां हूं मैं? मेडिकल की तैयारी कर रही दीदी ने कहीं बत्ती तो नहीं बुझा दी, वो दिन में सोती है, सारी रात पढ़ती है, मुझे पुकार कर कहती है सोनी तू सोती ही रहेगी पढ़ेगी कब? उक्की कहां  / 191 है? अमरूद के पेड़ के नीचे सहेली के साथ लकड़ी का स्कूल उल्टा करके गुड़िया का खेल रच रही होगी… देखो उसने फिर उल्टी चप्पल पहन ली, इतनी छोटी है लेकिन बहुत स्वाभिमानी और स्वतंत्रा चेता, किसी के साथ नहीं सोती… मम्मी के जाने के बाद बुआ के साथ भी नहीं। चार साल की उम्र में ही उसकी अकेली दुनिया है। चप्पल पहनूं, उठूं कि हिन्दू काॅलेज के दोस्त बुलाने चले आये हैं दो अध्यापकों डाॅ. हरीश नवल और सुरेश ऋतुपर्ण ने अपने घर बुलाया है खाना पीना, मौज मस्ती करके शाम ढले स्मिता दी के साथ घर लौटती हूं। लो आज आ गयी शामत डाॅ. कृष्णदत्त पालीवाल की क्लास है उन्होंने दुर्वासा सी भविष्यवाणी कर दी है तुम सब कहीं नहीं पहुंचोगे… कहीं नहीं… कहीं नहीं… तो पहुंची कहां हूं… करवट बदल कर, जोर लगा कर उठने की कोशिश में आंखें मुंदी चली जा रही हैं टोंस वैली से लगातार बंदूक की गोलियां दागने की आवाजें आ रही हैं। यह मेरी पहली नौकरी है भारतीय सैन्य अकादमी में अफसर बनाने के लिए जेंटिलमैन कैडेट्स को पढ़ाना है सुबह का सायरन बज रहा है, बैरक से निकल कर आर्मी कैडेट काॅलेज विंग की ओर जाने वाली गीली सड़क पर अंधेरे में चल रही हूं। सड़क के किनारे लैम्प पोस्ट टिमटिमा रहे हैं। बारिश की बूंदें पोस्ट पर चिपक सी गयी हैं। कैडेट्स सस्वर कदमताल करते हुए सैल्यूट देकर आगे बढ़ जाते हैं। झुंड के झुंड गुजर रहे हैं… कहां हूं मैं , घंटी की आवाज है, उठ कर दरवाजा खोलना पड़ता है। मुझे भौंचक देख मुस्करा कर क्रेशो कर्नित्ज हाथ मिलाते हैं यह दोस्ती की गर्माहट से भरा पुरसुकून स्पर्श है वे जाग्रेब विश्वविद्यालय में संस्कृत पढ़ाते हैं कांट्रेक्ट पर। दरवाजे के खुलने से ठंडी बर्फीली हवा का झोंका भीतर आ गया है, जिसने अवचेतन से चेतन में ला पटका है क्रेशो मेरी छोटी मोटी दिक्कतें समझते हैं, लैपटाॅप पर स्काइप इंस्टाल कर रहे हैं और भारत में फोन पर बात करने के लिए व्हाइप भी। अभी दिन के सिर्फ तीन बजे हैं लेकिन अंधेरा घिर आया है, कौआनुमा एक बड़ा सा पक्षी लैम्प पोस्ट पर आ बैठा है। ओवरकोट में ढंके लिपटे इक्का दुक्का लोग सड़क पर दीख रहे हैं मैं जाग्रेब में हूं और यहीं रहना है दो साल तक। सोचती हूं दो साल बहुत लम्बा समय है मौसम हमेशा धुंधलाया सा रहता है कैण्टीन में शाकाहारी भोजन की दशा ठीक नहीं। यहां के लोगों को भारतीय व्यंजन बहुत पसंद हैं। कहते हैं कभी तुर्केबाना येलाचीचा (जाग्रेब का केन्द्र) में किसी ने भारतीय रेस्टोरेण्ट खोला था किसी वजह से कालकवलित हो गया। वैसे मांसाहारी भोजन के लिए क्रोएशिया पूरे यूरोप में प्रसिद्ध है। ताजा पानी की मछली, गोमांस, सुअर का मांस और मेडिटेरियन ढंग से बनी सब्जियां यहां की खासियत हैं। ठंडे मौसम में पशु मांस के बड़े बड़े टुकड़ों को लोहे के हैंगरों में टांग दिया जाता है। बंद कमरे में जलती लकड़ियों के धुएं में वह टंगा मांस पकता है। धुएं की परत संरक्षक का काम करती है। इसे ‘स्मोक्ड मीट’ कहा जाता है। इसकी पाक विधि काफी प्राचीन है और लोकप्रिय भी। जैतून का तेल भी यहां काफी प्रयोग होता है।

सिएत्ना सेस्ता में घरों के दरवाजे काफी चौडे़ और मोटे हैं, मुख्यद्वार स्वतः बंद हो जाते हैं। अभ्यास न होने के कारण फ्लैट का दरवाजा बाहर से दो बार लाॅक हो चुका है। सामने के फ्लैट में द्रागित्सा रहती हैं जिन्हें अंग्रेजी नहीं आती और मुझे क्रोएशियन। उनका लम्बा समय इटली में बीता है, जर्मन और इतालवी जानती हैं, वे क्रोएशियन, अंग्रेजी शब्दकोश खरीद लायी हैं, लगभग सत्तर वर्ष की चाक चौबंद। हां युवा ही, क्योंकि जीवन के इस पड़ाव पर ही पहली बार तनावमुक्त, उन्मुक्त जीवन जी रही हैं। सुंदर गोल चेहरा, रोमन नाक और कटे हुए सुनहरे बालµ हमेशा व्यस्त रहती हैं। उन्होंने फ्लैट के सामने फूलों के पौधे लगा रखे हैं, बेटी तान्या और नातिन नादिया सप्ताहांत में आती हैं। पैंतीस वर्षीय बेटा इगोर कलाकार है जिसे बेरोजगारी के आलम ने उदास और तिक्त बना दिया है। द्रागित्सा के पास फ्लैट की अपनी चाभी है, इगोर की अनियमित दिनचर्या का ज्यादा 192 / प्रभाव उस पर नहीं पड़ता। ऐसा वे कहती हैं लेकिन आंखें कुछ और कहती हैंµ ये धुर पश्चिम है जहां माता पिता 17 वर्ष की उम्र के बच्चों को मित्रा मानते हैं। देख रही हूं, दिनांेदिन यह अंतराल कम ही होता जा रहा है। नादिया के उ$पर इम्तहान पास करने का तनाव इतना है कि सिगरेट के बिना नहीं रह पाती। इम्तहान में फेल होने पर क्या करेगी, वह जानती नहीं। कहती है ‘‘आप क्या सोचती हैं, सिर्फ बड़े लोग ही तनावग्रस्त होते हैं। मुझे घर में रहना, पढ़ना बिल्कुल पसंद नहीं, सोचती हूं कब बड़ी होकर संगीतकार बनूं या फिल्म में काम करूं।’’ उसकी मां तान्या बेटी के लिए बहुत चिन्तित रहती है। वह दुबरावा के सरकारी अस्पताल में रेडियोलाॅजी विभाग में तकनीकी सहायक है। दो तलाक हो चुके हैं और ‘रिएका’ के म्लादेन नाम के व्यक्ति से भावनात्मक जुड़ाव है। अपने सम्बंध को लेकर सदैव सशंकित रहती है, नौकरी से छुट्टी मिलते ही ‘रिएका’ चली जाती है। इधर उसकी बेटी नादिया रात भर घर से गायब रहने लगी है। तान्या कहती है जो गलतियां मैंने कीं, चाहती हूं मेरी बेटी न करे, तुम्हारा देश अच्छा है जहां बच्चों पर अभिभावकों का कठोर नियंत्राण रहता है। वह नादिया को
डांटने फटकारने से डरती है।


 हम समुद्र के किनारे किनारे लांग ड्राइव पर जा रहे हैं। बायीं तरफ ड्राइविंग ह्वील अटपटा लगता है। पास में अंतरराष्ट्रीय लाइसेंस भी नहीं है। तान्या लगातार अपनी व्यथा कथा कह रही है, उसे अंगे्रजी में बात करना सुहाता है, कई बार क्रोएशियन शब्दों के अंग्रेजी पर्याय ढूंढ़ने के चक्क्र में बातचीत बाधित भी होती है। समुद्र के किनारे किनारे लैवेंडुला (लैवेंडर) की झाड़ियां हैं। पौधे दो से ढाई फुट ऊँचे। लैवेंडर की गंध समुद्र की नमकीन गंध के साथ मिल कर पूरे दक्षिणी यूरोप की हवा को नम बनाये रखती है। फ्रांस में तो लैवेंडर को भोजन में भी प्रयुक्त किया जाता है। कीटाणुनाशक सुगंधित लैवेंडर क्रोएशिया और यूरोप के अन्य भागों में निद्राजनित रोगों की औषधि है। वैसे क्रोएशिया पर्यटन और शराब उत्पादन के लिए मशहूर है। तान्या ने यह सूचित करते हुए पीने की इजाजत मांगी है कि उसका गला सूख रहा है। लगभग 641.355 वर्गमील में फैला जाग्रेब क्रोएशिया का सांस्कृतिक प्रशासनिक केन्द्र है जो मूलतः एक रोमन शहर था जो सन् 1200 में हंगरी के नियंत्राण में आ गया। सन् 1094 ई. में पहली बार पोप ने जाग्रेब में चर्च की स्थापना कर जाग्रेब नाम दिया। जर्मन में इसे ‘अग्रम’ कहा जाता है।


जाग्रेब और क्रोएशिया का इतिहास युद्ध का इतिहास है, सन् 1991 तक संयुक्त यूगोस्लाविया का अंग रहा क्रोएशिया अपने भीतर युद्ध की अनगिन कहानियों को लिए हुए मौन है। स्लोवेनिया,हंगरी, सर्बिया, बोस्निया, हर्जेगोविना और मांटेग्रो से इसकी सीमाएं घिरी हैं। आज के 21,851 वर्गमील में फैले क्रोएशिया ने एक तिहाई भूमि युद्ध में खो दी। 15 जनवरी 1992 को यूरोपीय आर्थिक संगठन और संयुक्त राष्ट्रसंघ ने इसे लोकतांत्रिक देश के रूप में मान्यता दी। इसके बाद भी तीन वर्ष तक अपनी भूमि वापस पाने के लिए 1 अगस्त 1995 तक उसे सर्बिया से लड़ना पड़ा और यूरोपीय यूनियन की सदस्यता तो उसे अभी हाल में 1 जुलाई 2013 को मिल पायी। इतने लम्बे युद्ध के निशान अभी तक धुले पुंछे नहीं हैं। उनकी शिनाख्त के लिए मुझे दूर नहीं जाना पड़ा। इटली और फ्रांस घूमने की इजाजत मिलने पर दूतावास ने मुझको दुशांका सम्राजिदेता की दूरिस्ट कम्पनी का पता दिया।

दुष्का का जीवन क्रोएशियाई सर्ब युद्ध का जीता जागता इतिहास है। कहीं पढ़ा था, युद्ध कहीं भी हो, किसी के बीच हो, मारी तो औरत ही जाती है। युद्ध ने दुष्का के जीवन को ही एक युद्ध बना दिया। युद्ध में सर्बों ने क्रोआतियों को मारा उनके घर जला दिये, बदले में क्रोआतियों ने पूरे क्रोएशिया को सर्बविहीन करने की मुहिम छेड़ दी। लोग भाग गये या मारे. दुष्का के मां बाप युद्ध के दौरान बेलग्रेड होते हुए अपनी बेटियों के पास पहुंच नहीं पाये। दुष्का को बिना नोटिस दिये नौकरी से निकाल  / 193 दिया गया। अब वह केवल ‘सर्ब’ थी मनुष्य नहीं, अड़ोसी पड़ोसी घृणा से इन दो सर्ब बहनों को देखते थे। जंग जोरों पर थी, अमेरिका की पौ बारह थी उस पर से युद्धविराम और भीतर से घातक हथियारों की आपूर्ति युद्धविराम होते थे, वायदे किये जाते जो तुरंत ही तोड़ भी दिये जाते। राजधानी होने के नाते जाग्रेब शहर में पुलिस और कानून व्यवस्था कड़ी थी, लेकिन लोगों के लिए दिमाग से घृणा और नफरत को निकालना असम्भव था। बसों में, ट्रामों में लोग सर्बों को देखते ही वाहीतबाही बकते, थूकते, घृणा प्रदर्शन करते। दुष्का ने कई साल पहले अपनी ट्रैवल एजेंसी का सपना पाला था। युद्ध ने दुनिया बदल दी। कुछ लोग रातोंरात अमीर हो गये और कुछ सड़क पर आ गये। युद्ध के थमने और गर्भ ठहरने दोनों की सूचना दुष्का को एक साथ मिली। दौड़ी थी उस दिन वह त्रायेशंवाचकात्रा से यांकोमीर तक, पैदल चल कर गयी सेवेस्का तक, कोई डाक्टर सर्ब लड़की का केस हाथ में लेने को तैयार नहीं हुआ। क्रोएशियन प्रेमी ने दुष्का को पहचानने से इनकार कर दिया। सर्ब कह कर गाली दी और उससे बात तक न की। दुष्का अविवाहित मां बनी और पिछले पंद्रह वर्षों में अपने मां बाप का सहारा भी।

इवाना, मिरता, वैलेंटीना, बोजैक अक्सर मिलने जुलने वाले विद्यार्थी हैं। लेकिन सप्ताहांत में जब चारों ओर बर्फीला सन्नाटा पसर जाता है, इनमें से कोई फोन नहीं उठाता। वृहस्पतिवार की शाम से ‘वीकएंड’ की तैयारी शुरू हो जाती है। भारत की अपेक्षा लड़कियां यहां ज्यादा स्वतंत्रा और उन्मुक्त हैं। रोजगार के अवसर सीमित हैं, ये आर्थिक तंगी के दौर का यूरोप है, बहुराष्ट्रीय कम्पनियां अपने पूरे तामझाम के साथ मैकडोनाॅल्ड्स, रीबाॅक, वाॅन हुसैन, एडीडास जैसे ब्रांडों में मौजूद हैं, सप्ताह के पांच दिन यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाले छात्रा सप्ताहांत में दुकानों के कर्मचारी बन जाते हैं। पचीस तीस कूना (मुद्रा) प्रति घंटे के हिसाब से। उनसे खूब जम कर काम लिया जाता है। मेरी प्रतिभाशाली छात्रा कार्मेन वुग्रिन मैकडोनाॅल्डस में सप्ताहांत और ग्रीष्मावकाश में बर्तन धोती, झाड़ू पोंछा कर खाना पकाती है। मरियाना जिसके घर में अभिभावक के नाम पर सिर्फ एक नाशपाती का पेड़ है, नाक कान में असंख्य बालियां पहने, बालों में बहुरंगी रिबन बांधे दुब्रोवा और तुर्केबाना येलाचीचा की गलियों में गिटार बजाती है। उसने कई भारतीय गाने सीख रखे हैं, धुन बजाती है, आने जाने वाले लोग सड़क पर बिछे कपड़े पर कुछ सिक्के डाल कर आगे बढ़ जाते हैं। अंद्रियाना और बोजैक तरह तरह की पोशाकें पहन कर, नकली नाम लगा कर पर्यटकों को रिझाते हैं। बोजैक तुर्केबाना में मुझे देख कर चैंकता है फिर लजा कर गलियों में गायब हो जाता है। यहां ‘क्रेशो’ नाम बहुत आम है जो यहां के राजा क्रेशीमीर के नाम का संक्षिप्त रूप है। रोमन नाक नक्श, गोरा रंग, लम्बी स्वस्थ कद काठी और सीधी सतर चाल क्रोएशियंस का वैशिष्ट्य है। हम भारत में रहते हुए यूरोप की समृद्धि की कल्पना से कुंठित होते रहते हैं, यहाँ आकर देखती हूं बाजार है, खरीददार नहीं, बड़ी बड़ी दुकानें, जिनमें जूते की दुकानें बहुतायत में हैं, वे वीरान हैं। सामान है, सजावट भी… खरीदने वालों से निहारने वालों की संख्या कई गुना ज्यादा है। आम आदमी की क्रयशक्ति कमजोर हो चली है। छात्रा छात्राएं ‘सेल’ के मौसम की प्रतीक्षा करते हैं। पुराने कपड़ों को खूब जतन से पहनते हैं, जाग्रेब के बाहरी हिस्से में पूर्व की रेलवे लाइन के किनारे ‘सेकेण्ड हैण्ड’ मार्केट लगती है, जिसे देख कर लालकिले के पीछे का बाजार याद आता है। मृतकों के इस्तेमाल किये हुए कपड़े, बैग, जूते, बेल्ट, चादरें, तकिये सब मिलते हैं। अच्छी अच्छी कमीजें पांच कूना में उपलब्ध हैं, देखती हूं इस बाजार में खरीददारों की संख्या बहुत बड़ी है। काला, सफेद और सलेटी यहां के प्रचलित रंग हैं, विशेषकर सर्दियों में, जो वर्ष के लगभग सात महीने रहती हैं।

यूरोप के आंतरिक भागों में सफर के लिए रेल अपेक्षाकृत सस्ता और सुरक्षित माध्यम है। 194 / जाग्रेब स्लोवेनिया से सटा हुआ है लेकिन वहां जाने के लिए शेनसंग वीसा की जरूरत है। मैंने दूतावास में वीसा की अर्जी दे दी है। तान्या के साथ मुझे स्लोवेनिया जाना है, लेकिन उससे भी पहले ‘रिएका’ शहर जहां क्रेशो कर्नित्स और उनकी पत्नी साशा के प्रकाशनगृह से रवीन्द्रनाथ टैगोर के नाटक ‘चित्रा’ का क्रोएशियन रूपांतरण छपा है।

हमें कार से दिन भर का सफर करना पड़ा। समुद्र तट पर धूप खिली हुई है और तट के समानांतर चैड़ी सड़क ‘रिएका’ की ओर जा रही है। साशा और क्रेशो बारी बारी से कार चला रहे हैं। एक दो जगह हम पेट्रोल लेने के लिए रुकते हैं, साशा दुबली पतली हैं , निरंतर सिगरेट पीने से उन्हें भूख भी कम ही लगती है। उनके पास कार में वाइन है, लेकिन मुझे तेज भूख लगी है, पेट्रोल स्टेशन पर ही मैंने सैंडविच खरीदा है कभी कभी घर की सूखी रोटी और आलू की भुजिया अपनी साधारणता में भी कितनी असाधारण और दुर्लभ हो जाती है। राजा क्रेशीमिर का किला रास्ते में पड़ा है और किले के भीतर बाजार लगा है गहने, तस्वीरें, मदर मेरी की मूर्तियां, खूब मोटी मुगदरनुमा जंघाओं वाले मध्यकालीन सैनिकों के बुत, किताबें, कैसेट्स, गीत संगीत और पर्यटक। यहां ‘बैक वाटर’ पोर्ट है जहां से ‘वेनिस’ के लिए नावें चलती हैं, जहां कुछ ही घंटों में पहुंचा जा सकता है। दोपहर तीन बजे हम लोग विमोचन स्थल पर पहुंचते हैं, पुस्तक के विमोचन के साथ नाश्ते का भी इंतजाम है। लोग पंक्ति में खड़े होकर प्लेटों में नाश्ता ले रहे हैं, सबकी आंखें व्यंजनों पर केन्द्रित हैं, मिलना जुलना बाद में पहले पेटपूजा। नाश्ते का इंतजाम न होता तो इतनी भीड़ जुट पाती यहां  पता नहीं। भीड़ में एक बुजुर्ग ललछौंहें चेहरे और चौड़ी नाक लिए इधर उधर देख कर जेब में बिस्किट के टुकड़े छिपाते जा रहे हैं। कोट की जेबें फूलती चली जा रही हैं, मैंने जल्दी से, उधर से नजर हटा ली है मन करुणा से भर आया है।



‘रिएका’ या ‘रिजेका’ क्रोएशिया का तीसरा बड़ा शहर है। समुद्र के किनारे बसा यह शहरबड़े बड़े पानी के जहाज बनाने के लिए प्रसिद्ध है, अपने भीतर बड़ा दिलचस्प बहुभाषिक इतिहास लिए हुए है। पांचवीं शताब्दी से ही यहां आॅस्टोगोथ, लोंबार्ड, अवार, फ्रैंक और क्रोआत रहे हैं, इसलिए रिएका में बहुत सी भाषाएं और बोलियां बोली जाती हैं। द्वितीय विश्वयुद्ध के पहले तक यह पूरी तरह इतालवी शहर था। गोरिल्ला युद्ध और छापामार झड़पों में बहुत से नागरिक हताहत हो गये, और लगभग 800 लोगों को यातनाशिविरों में बंद कर दिया गया। आज इस शहर में लगभग बयासी प्रतिशत क्रोआत, छह प्रतिशत सर्ब, दो ढाई प्रतिशत बोस्नियाई और दो प्रतिशत इतालवी रहते हैं। ‘चित्रा’ के विमोचन का कार्यक्रम रिएका के सार्वजनिक पुस्तकालय में है, पुस्तकालय बड़ा और व्यवस्थित है, लेकिन उपरी मंजिल पर कई कमरे बंद हैं जिनमें प्राचीन पांडुलिपियां सुरक्षित हैं। पुस्तकालयाध्यक्ष का कहना है कि सरकारी अनुदान इतना कम है कि सभी कमरों का रखरखाव सम्भव नहीं। विमोचन कार्यक्रम की भाषा क्रोएशियन है, इतना तय है कि टैगोर यहां बहुत लोकप्रिय हैं। मुझे बताया गया है कि सन् 1926 में टैगोर जब जाग्रेब आये थे तब उन्होंने ‘रिएका’ का दौरा भी किया था। दार्शनिक पावाओ वुक पाब्लोविच (1894-1976) ने ‘गीतांजलि’ का क्रोएशियन में अनुवाद किया था जो जाग्रेब के दैनिक ‘भोर का पत्ता’ में 1914 की जनवरी में धारावाहिक रूप में छपा था। बाद में पावाओ ने ‘चित्रा’, ‘मालिनी’ और ‘राजा’ का भी अनुवाद किया। ‘चित्रा’ का मंचन क्रोएशियन नेशनल थियेटर में 1915 में कई बार हुआ। यहां के उदारवादी बौद्धिक प्रथम विश्वयुद्धोत्तर अवसानकाल में टैगोर को आध्यात्म और शांति के प्रतिनिधि के रूप में देखते थे। विमोचन समारोह में ‘चित्रा’ के पहले प्रदर्शन में अभिनय करने वाले क्रेशिमीर बारनोविच (1894-1975) का स्मरण किया जा रहा है। टैगोर की लोकप्रियता के जो भी कारण रहे होंµ एक बात तो तय है कि प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान उन्हें नोबेल / 195
मिलना और स्काटलैण्ड में नोबेल के लिए जर्मन राष्ट्रवादी लेखक पीटर रोसेगर का नाम चलना ये दो कारण थे जिन्होंने टैगोर को इस क्षेत्रा में लोकप्रियता दिलायी। भले ही टैगोर इस बात से अनभिज्ञ रहे हों, फिर भी यहां के लोग बताते हैं कि नोबेल की घोषणा के बाद जर्मन प्रेस ने टैगोर पर हमला बोल दिया था। आज क्रोएशियंस पीटर को भूले से भी याद नहीं करते और उनकी पूरी सहानुभूतिके पात्रा रवीन्द्रनाथ टैगोर हैं। ईसाई बौद्धिकों में से बहुत कम ऐसे थे, जो ‘गीतांजलि’ को केवल एक साहित्यिक कृति के रूप में सराहते थे, वे तो टैगोर के रहस्यवाद से प्रभावित थे। सन् 26 में यूरोप की यात्रा के दौरान रवीन्द्रनाथ टैगोर को क्रोएशियंस ने युद्धोत्तर क्षत विक्षत मानस को आध्यात्मिक नेतृत्व देने वाले व्यक्ति के रूप में देखा, उनकी कई कृतियों, मसलन ‘घरे बाइरे’, का क्रोआती में अनुवाद इसी दौर में हुआ, क्रोएशियन म्यूजिक कंजरवेटरी के सभागार में उन्होंने दो दिन भाषण दिये, जिनका आशु अनुवाद क्रोआती में किया गया, लेकिन रवीन्द्रनाथ को यह नागवार गुजरा। ये प्रसंग इसलिए क्योंकि यहां मुझे जो बातें कहनी हैं, उनका क्रोआती में सतत आशु अनुवाद होगा। गुरुदेव के रचनाकर्म और क्रोएशिया से उनके सम्बंधों पर टिप्पणी करते हुए मुझे बार बार रुकना पड़ रहा है। मेरे वक्तव्य पर श्रोताओं के चेहरे निर्विकार और भावशून्य हैं, आशु अनुवादक की बात पर ही उनकी आंखें झपकती और कभी चौड़ी होती, कभी सिकुड़ती हैं। श्रोता वक्ता का सम्बंध उचित सम्प्रेषण पर टिका होता है। मुझे मालूम ही नहीं चल रहा था कि मेरी बातें कहां और किस सीमा तक सम्प्रेषित हो रही हैं। साशा मंच संचालन कर रही हैं और मुझे बताया जाता है कि श्रोता टैगोर की कविता सुनना चाहते हैं। मालूम नहीं टैगोर के कई गीतों को छोड़ कर मुझे ‘ध्वनिलो
आह्वान’ सुनाने की इच्छा ही क्यों हो आयी है


ध्वनिलो आह्वान मधुर गम्भीर प्रभात अम्बर माझे
दिके दिगंतरे भुवन मंदिरे शांतिसंगीत बजे
हेरो गो अंतरे अरूपसुंदरे – निखिल संसार परमबंधुरे
ऐशो आनंदित मिलन – अंगने शोभन – मंगल साजे
कलुष – कल्भष विरोध विद्वेष होउक निःशेष
चित्ते होक जोतो विघ्न अपगत नित्य कल्याणकाजे
स्वर तरंगिया गाओ विहंगम, पूर्व पश्चिम बंधु संगम
मैत्राी – बंधन पुण्य मंत्रा पवित्रा विश्वसमाजे।

ये फरवरी का अंतिम सप्ताह है, धूप खिली हुई है, रात को गिरी बर्फ के फाहे सड़कों के किनारे किनारे रुई से रखे हुए हैं, हवा में नर्माहट की जगह तुर्शी है, बिल्कुल ठंडी, बर्फीली हवा जो एड्रियाट्रिक सागर को छूने के पहले पाइन वृक्षों की टहनियों पर जमी बर्फ को थोड़ा हिला भर देती है, सफेदी को झाड़ती नहीं। अंजीर और चेरी वृक्षों की सारी पत्तियां झड़ चुकी हैं, असमय ही बुढ़ाए ठूंठों को बर्फ ने नीचे से उपर तक ढंक लिया है, खिली धूप में ‘सिएत्ना सेस्ता’ के सामने की सड़क के दोनों किनारों पर खड़े पेड़ बेजान से दीख रहे हैं। जब तक हम बर्फ से रूबरू नहीं होते, वह हमारे भीतर अपनी पूरी सफेद मोहकता के साथ पिघलती है, रग रेशों में उतर कर रोमांटिक कल्पना के सहारे, बर्फ के ‘जूते बड़ी जैकेट’ पहने हम उसकी सफेद फिसलन पर उठ गिर रहे होते हैं और जब वही बर्फ दिन रात, सुबहो शाम का हिस्सा बन जाती है, सारे चिड़िया चुरुंग न जाने कहां छिप जाते हैं तो उसकी मोहकता को सन्नाटे में तब्दील होते कतई देर नहीं लगती। खिड़की के पर्दे हटाते ही दिल बैठ जाता है इतनी अफाट, निरभ्र सफेद परत पांचवी मंजिल से नीचे देखती हूं पार्किंग में खड़ी गाड़ियां बर्फ में एकसार हो गयी हैं। एक आदमी हाथ में फावड़ा लिए बर्फ हटाने में जुटा 196 / है, बर्फ खखोर खखोर कर सड़क के किनारे डालता है। जहां भूमिगत नाली का मुहाना है, बर्फ के थक्के बड़े बड़े हो जाते हैं। निचली सड़क गीली हो गयी है, पर बर्फ पिघलाने भर का ताप सूरज में अभी आया नहीं है, और पहर ढलने का समय भी हो गया। ‘सिएत्ना सेस्ता’ और सभी बहुमंजिली इमारतों के पिछवाड़े कतार में लोहे के पहिएदार कंटेनर रखे हुए हैं, ये कूड़ेदान हैं। नगरनिगम शहर के रखरखाव के लिए नागरिकों से कर वसूलता है जिसके निवेश में व्यवस्था और ईमानदारी दोनों हैं, भारत में जिसका अभाव सिरे से महसूस किया जाता है। अलस्सुबह बड़े ट्रकों में पिछले दिन का कूड़ा खाली कर दिया जाता है, खाली कंटेनर दिन भर पेट भरने के इंतजार में वहीं खड़े रहते हैं जिन पर क्रोआती में सूखे और गीले अवशिष्ट पदार्थों के संदर्भ में निर्देश लिखे हुए हैं।

विश्वविद्यालय में सुबह आठ बजे कक्षाएं शुरू हो जाती हैं। प्रोफेसर येरिच ने मुझसे कहा था कि या तो मैं सुबह आठ बजे कक्षा लूं या रात के आठ बजे। रात आठ बजे कक्षा पढ़ाने की अवधारणा ही मुझे अजीब सी लगती है, दिन भर की थकान के बाद अंत में कक्षा पढ़ाना, उफ। मैंने भारत में भी हमेशा सुबह सुबह ही पढ़ाया, दोपहर होते होते कक्षा पढ़ाने का उत्साह मंद हो जाया करता है। शांतिनिकेतन में तो सुबह साढ़े छः बजे ही वैतालिक की प्रार्थना के तुरंत बाद कक्षाएं शुरू हो जाती थीं। दिन का एक बजा नहीं कि कक्षाएं समाप्त। आधा दिन अपना था पुस्तकें पढ़ना, पुस्तकालय जाना, कंकाली तल्ला, अजय नदी का पुल, खोवाई, आमार कुटीर जैसी जगहों पर जाना और शाम ढले लौट आना, उसी अवकाश का सुफल था। भारतीय विश्वविद्यालयों विशेषकर मानविकी और समाज विज्ञान में शाम पांच छः बजे तक पढ़ाई समाप्त हो जाया करती है। सूरज अस्त, अध्यापक मस्त और विद्यार्थी पस्त। अभ्यास ही संस्कार बन जाया करता है। रात देर तक पढ़ना और सुबह उठ कर पढ़ाने को तैयार होना, इससे लगता है एक नया खूबसूरत सा दिन आप शुरू करने जा रहे हैं। सुबह एक नयी उर्जा और मुस्तैदी देती है इसलिए मैंने जाग्रेब में भी सुबह आठ बजे की कक्षाएं ही चुनी हैं। नब्बे मिनट की एक कक्षा, बीच में अवकाश, फिर कक्षा। अक्सर दिन के डेढ़ बजे तक मैं अपने आवास में लौट आती हूं। शाम में अक्सर पुस्तकालय, आजकल वहीं देर हो जाया करती है। पुस्तकालय खूब व्यवस्थित हैµ अंग्रेजी, क्रोआती (हरर्वास्त्की) और फ्रेंच पुस्तकेंµ लाल, नीली जिल्द चढ़ी विपुल, खूबसूरत किताबों का वृहत संसार। तापमान नियंत्रित किया रहता हैµ 20 से 22 डिग्री से. आरामदेह, पुरसुकून माहौल। लगता है इसके बाद कोई दुनिया नहीं, कई विद्यार्थी ‘अर्न ह्वाइल लर्न’ परियोजना के तहत घंटे के हिसाब से काम करते हैं, कैटलाॅग बनाते हैं, किताबें झाड़ते पोंछते हैं बदले में उनका जेबखर्च निकल आता है। सन् 1669 में स्थापित ‘स्वेस्लिस्ते उ जागरेबु’ दक्षिण मध्य यूरोप के प्राचीनतम विश्वविद्यालयों में से एक है। इवाना उलीचीचा के दसवें मार्ग पर यही पुस्तकालय मेरी शरणस्थली है। धूप की हल्की किरणों को, दिन के किसी भी समय घेर कर बादल दिन में अंधेरा कर देते हैं, बर्फीली बारिश बेआवाज टपकती रहती है। सब शांत पेड़ पौधे स्वच्छ और श्वेत बर्फ की चादर तले दिन और रात का फर्क कहीं गुम हो जाता है। आजकल मैंने ‘सीमोन द बोउवार’ को नये सिरे से पढ़ना शुरू किया। उसका लिखा घर से दूर होने की बेचैनी को कभी बढ़ाता तो कभी शांत करता है। उसके उपन्यासों और आत्मकथाओं से गुजरना मधुर त्रासदी से होकर गुजरना है। पुस्तकालय की गर्माहट, सीमोन की किताबेंµ इन्हें छोड़ कर फ्लैट के सन्नाटे की ओर लौटने का जी नहीं करता। काफी हाउस का अपरिचित शोर समझ में आने लगा है धुएं के छल्लों के बीच टेबल पर सिर झुकाये, चाइना क्रेप की फ्राॅक पहने सीमोन लिखती दीखने लगी हैं। मैंने सेर्गेई के कहने से आत्मकथात्मक उपन्यास ‘ए वेरी इजी डेथ’ का हिन्दी अनुवाद शुरू किया है। सीमोन को पढ़ना एक ऐसे अनुभव लोक से गुजरना है जहां से स्त्राीवाद का वैचारिक और राजनीतिक उत्स देखने को  / 197 मिलता है। जहां ‘सेकेण्ड सेक्स’ मनुष्य की स्वतंत्राता की, मनुष्य के रूप में स्त्राी पराधीनता के कारणों की पड़ताल करता है, वहीं ‘ए वेरी ईजी डेथ’, प्राइम आॅफ लाइफ, आॅल सेड एंड डन स्त्राीवाद के व्यावहारिक पक्ष की पड़ताल करती हैं। सीमोन ने सन् 1964 में ‘ऐ वेरी ईजी डेथ’ की रचना की जिसका प्रकाशन उसकी मां की मृत्यु के साल भर बाद हुआ था। छह सप्ताह के कालखंड में मरणशय्या पर मामन और सीमोन के साथ बातचीत में यह आत्मकथा गहरे निजत्व, दुख, पश्चाताप, पीड़ा के क्षणों का आख्यान हैµ मां बेटी की बदलती भूमिकाएं, स्त्राी की यातना में उसकी निज की भूमिका, पति पत्नी सम्बंध, डाक्टर और मरीज का सम्बंध, अस्पतालों की आंतरिक राजनीति के विविध पड़ावों से गुजरती हैं। मामन पिछले चौबीस वर्षों से विधवा और एकाकी है। सीमोन भी अपने स्वतंत्रा लेखन और जीवन में व्यस्त है। मामन को अंत तक मालूम नहीं कि उसे ‘प्राणघातक कैंसर’ है। वह मरना नहीं चाहती ठीक होकर 78 वर्ष की अवस्था में, फिर से जीवन को नये सिरे से जीना चाहती है। सीमोन को पढ़ने और अनुवाद करने की प्रक्रिया मुझे भीतर से कभी कभी बहुत अकेला कर देती है। भीतर कभी कभी घुप्प अंधेरों के साये चहलकदमी करते हैं, कभी सीमोन ही हाथ में कलम पकड़ा कर लिखवाती चलती हैं। नित्यानंद तिवारी जी से बात हुई है अनुवाद के कुछ अंश भेजे थे उन्हें।वे बहुत प्रभावित हैं लेकिन रचनात्मक अवसाद से बचने की सलाह देते हैं। विश्वनाथ त्रिपाठी ने भी अनुवाद का प्रथम प्रारूप पढ़ा है ए वेरी ईजी डेथ उन्हें मर्मस्पर्शी लगा है और सिन्धु आंटी तो पढ़ कर रो ही दी हैं।

शाम ढले सिएत्ना सेस्ता पहुंचती हूं, पिछवाड़े का रास्ता छोटा है। शाम का झुटपुटा है अभी, थोड़ी ही देर में गलियों की बत्तियां जल जायेंगी। हवा तेज और नम है, आकाश ज्यों झुका चला आ रहा हो, लगता है रात में बारिश होगी। बर्फ वाले जूते पहनने के कारण तेज तेज कदम बढ़ाना सम्भव नहीं हो पा रहा, ओवरकोट और कई स्वेटरों की तहें शरीर को अतिरिक्त बोझिल बना देती हैं। रास्ते में ‘माली दुचान’ (छोटी दुकान) पड़ती है।, शीशे के दरवाजे बंद हैं, काउण्टर पर बैठी लड़की के बाल ललछौंहें हैं, शायद ‘बरगंडी कलर’ से रंगे हैं। लाल नेलपालिश वाली पतली, लम्बी गोरी उंगलियों में सिगरेट फंसी है, दुकान में कोई ग्राहक नहीं, उसने ‘दोबरदान’ कह कर एक चलताउ मुस्कान फेंकी है। यह छोटी दुकान है जहां सब्जियां, ब्रेड और वाइन उपलब्ध है। मुझे ब्राउन चाकलेट्स लेनी है, कहीं पढ़ा है कि चाकलेट्स मूड बूस्टर का काम करती हैं। इन दिनों अक्सर चाकलेट्स की जरूरत मुझे पड़ती है। लड़की अंग्रेजी नहीं जानती, मैंने प्लास्टिक ट्रे में फ्रूट कर्ड, रेडवाइन और चाकलेट्स रख ली है। उसने कम्प्यूटर पर हिसाब करके मुझसे कार्ड ले लिया। सामान लेकर ‘ख्वाला’ (धन्यवाद) कहना अब सीख लिया है मैंने। इस हफ्ते दुश्का मेरे घर आमंत्रित हैं, वाइन के बिना आमंत्रण वैसा ही, जैसे लवणहीन भोजन। जल्द पैर बढ़ा कर मैं घर के पिछले हिस्से में हूं, सन्नाटा पसरा है, पड़ोस के फ्लैट की खिड़की के सफेद पर्दों के भीतर से पीली रोशनी छन कर बाहर आ रही है। कूड़ेदानों के पास हल्की खुरखुराहट है, जिज्ञासावश मेरी नजर वहां चली गयी है। काले बूट और लम्बा फ्राॅकनुमा कोट पहने जो औरत अक्सर उस अपार्टमेण्ट में आती जाती दीखती है वो सूखे कूड़ेदान के अंदर लगभग आधी लटकी हुई है। मैं अंजीर वृक्ष की ओट में हूं जहां लगभग अंधेरा है जो दिन के उजाले में, ऊँची एड़ी के जूते चटखाती, तिरछा हैट पहने हाथ में पालतू कुत्ते की चेन पकड़े इठलाती चलती है, वह शाम ढले कूडे़दान में…? मुझे उत्सुकता है थोड़ी ही देर में औरत के दस्ताने पहने हाथ बाहर निकलते हैं और नीचे रखे बड़े से पाॅलीथीन में इस्तेमाल कर फेंके जूते, पुराने कपड़े, छाते, बर्तन और यूं ही कई तरह का सामान रख देते हैं। कूड़ेदान में अधलटकी औरत बाहर आ चुकी है। हौले हौले, बेआवाज, पाॅलिथीन बैग की चुरमुराहट को भरसक नियंत्रित करते हुए बैग उठाती है, बड़ा है, शायद 198 / भारी भी लेकिन संभाल लेती है और सधे कदमों से अपने फ्लैट की ओर। यहां बुजुर्गों को मामूली सरकारी पेंशन मिलती है, बेरोजगारी भत्ता भी लेकिन ‘टैक्स’ का दबाव, मंहगाई में वह पेंशन कुछ ज्यादा काम नहीं आती। द्रागित्सा से पूछने पर उसने मुस्कराते हुए बात को टाल दिया। क्रोएशियन बहुत स्वाभिमानी होते हैं विदेशी के सामने पड़ोसी के बारे में कुछ कहना उन्हें गवारा नहीं। भारत में आबोहवा के कारण घर में कभी कैद होने की नौबत ही नहीं आयी। स्वेच्छा से घर में रहना और बाहरी दबाव से घर में कैद रहना दोनों में बहुत अंतर होता है। तब आप भीतर होकर भी बाहर ही होते हैंµ कभी ठंडी खिड़की के पल्ले से नाक सटाये बारिश देख रहे होते हैं, कभी बर्फ से जम चुकी सावा नदी की ओर देखते हुए उसमें बहते पानी की कल्पना करते हैं। सावा के पुल पर गाड़ियों की आवाजाही है। लोग पार्क में पालतू कुत्ते और बिल्लियों को घुमाने ले आये हैं, बेंचों पर लोग अकेले दुकेले बैठे हैं, कोने के मैदान में कुत्तों को पालतू बनाने का प्रशिक्षण चल रहा है। कुत्ते अलग अलग प्रजाति के हैं जिनकी देखरेख और सरंजाम काबिलेतारीफ है लेकिन लोग इस बात का बहुत ख्याल रखते हैं कि उनका पालतू किसी की परेशानी का सबब न बने, शिकायत दर्ज होने पर जुर्माना बहुत कड़ा है। वैसे तो भारत में भी श्वानप्रिय लोग हैंµ हैदराबाद विश्वविद्यालय परिसर में एक प्राध्यापक इतने श्वानविप्रय हां कि अपने क्वार्टर के सामने रात में कुत्तों के लिए सामूहिक भोज रख देते हैं। परिसर के सारे आवारा कुत्ते अपने भूले भटके साथियों को समवेत स्वर में आमंत्रित करने लगते हैं। भोजन कभी पर्याप्त नहीं, वंचित रह गये, गुर्राते, भूंकते हैं। शक्तिशाली भोजन का बड़ा हिस्सा उदरस्थ कर श्वान सिंह हो जाते हैं और अब मध्यरात्रि तक चलने वाला कर्णभेदी श्वानसंगीत शुरू होता है।यहां की ‘भौंक’ कैम्पस के बाहर वालों को भी भौंकने की कला के प्रदर्शन के लिए प्रेरित उत्तेजित करती है। पशुप्रेमी प्राध्यापक सर्वेभवंतु सुखिनः के भाव से आराम फरमाते हैं, और पड़ोसी संगीत सम्मेलन की समाप्ति की प्रतीक्षा करते हैं क्योंकि श्वानों को प्रताड़ित करना मेनका गांधी की टीम को आंमत्रित करना है। परिसर में श्वानप्रेम ‘सुसंस्कृत’ होने की पहचान भी है। एक अध्यापिका इतनी श्वानप्रेमी है कि कहीं भी रुक कर उन्हें पुचकारने लगती है
अपरिचयीकरण के दौर में शायद यह व्यावहारिक राजनीति का हिस्सा हो, अपने परिचितों की अनदेखी करने का एक हथियार। उस क्षण हो सकता है कई मनुष्य श्वान रूप धरने को तरस जाते हों। जो भी हो एक सप्ताह से तबियत नासाज है, दूतावास ने जिस डाॅक्टर के पास भेजा था उसे तगड़ा बिल बनाने के अलावा सिर्फ मुस्कराना आता है, इसलिए दुबरावा के बड़े अस्पताल जाना पड़ा है। अस्पताल बहुमंजिला, साफ सुथरा, नर्स डाक्टर चाक चैबंद। बाहरी हिस्से में कुछ दुकानें हैं जहां खूबसूरत चीजें बिक रही हैं, खुले आसमान के नीचे बेंचें लगी हुई हैं, क्यारियों में पौधे फूल, लतरें, हवा में लैवेंडर की पत्तियों की गंध फैली हुई है। मैं यहां दो दिनों से हूं। डाॅक्टर मिरनोविचि गले छाती के संक्रमण विशेषज्ञ हैं; बताते हैं कि टांसिलों में सूजन के कारण ज्वर आ रहा है।

अस्पताल का काम खत्म हुआ। अस्पताल की यात्रा मेरे लिए ‘ए वेरी ईजी डेथ’ की यात्रा भी थी, जिसने मुझे सीमोन और उसकी मां के आपसी सम्बंधों को नयी रोशनी में पहचनवाया। सीमोन के उपन्यास ‘शी केम टू स्टे’ और ‘द मेंडरीन’ ने नये दौर के स्त्राीवादी चेहरे को पहचानने में मदद की। उनके आत्मकथात्मक उपन्यासों से होकर गुजरना एक दिलचस्प और ईमानदार अनुभव रहा है।अस्पताल और बीमारी का यह समय मुझे सीमोन के और करीब ले आया हैµ ‘मेमोआयर्स आॅफ अ ड्यूटीफुल डाॅटर’ में विश्वविद्यालय में पढ़ने के दौरान ‘पुरुष की तरह दिमाग’ होने की इच्छा व्यक्त करते हुए अपनी तुलना वह सात्र् से करती हैं और इस निष्कर्ष पर पहुंचती हैं कि स्त्री के लिए पुरुष जैसी सोच होना सम्भव नहीं। ‘प्राइम आॅफ लाइफ’ में सीमोन ने होटलों में रह कर लिखने पढ़ने, एक  / 199 के बाद दूसरा होटल बदलने का जिक्र किया है। सोचती हूं सीमोन अपनी आर्थिक जरूरतें कैसे पूरी करती होंगी, यह भी कि होटलों में रहने का अर्थ हुआ कि आप हमेशा मेहमान हैंµ बिस्तर, परदे, कुर्सी टेबल कुछ भी आपका अपना नहीं। सीमोन के अनुभव पढ़ते हुए पाठक सीखता है कि कैफेटेरिया में कैसे बैठना चाहिए, लोगों से कैसे मिलना चाहिए, बहसें, पढ़ना लिखना और सोचने का सलीका भी। सीमोन कहती हैं कि कैफे में घुसते हुए यदि आप अपने ही दो आत्मीय मित्रों को आपस में बात करते हुए देखें तो उनके निकट बैठ कर बातचीत में बाधा न डालें, बेहतर हो चुपचाप वहां से हट जायें। ‘कहवाघर’ भी पढ़ने लिखने की जगह हो सकती हैµ इसे सीमोन साबित करती हंै और यह भी कि कैसे वह बिना संग साथ की अपेक्षा के सन् 1930 के आसपास मार्सिले और रोउन जैसे कस्बों में अध्यापन के वर्षों में लम्बी सैरों के लिए निकल जाया करती थीं। सोचती हूं कि आज भी स्त्रिायों के लिए उनका अपना ‘स्पेस’ खोजना मुश्किल होता है। भारतीय माहौल में कोई स्त्री काॅफी हाउस में बैठ कर लिखे, वो भी अकेली तो न जाने कितनी जोड़ी आंखें उसे बरजने को तत्पर हो जायेंगी। अब मेरी तबीयत बेहतर हो चली है। इन दिनों ‘फोर्स टू सरकमस्टांसेज’ पढ़ रही हूं जिसमें सीमोन द बोउवार ने युद्धोत्तर पेरिस का चित्रण किया है, जिसमें नये और बेहतर समाज के निर्माण का स्वप्न है, स्वतंत्रता के प्रति उत्तरदायित्व का बोध है। आत्मकथा के इसी भाग में उन्होंने नेल्सन एल्ग्रेन से अपने सम्पर्क की चर्चा की है। नेल्सन के साथ फाॅयरप्लेस के समक्ष संयोग और फिर पेरिस और शिकागो में दोनों का अलग अलग जीवन बिताना भी वर्णित है। भौगोलिक दूरी अपनी सातव्यता में कैसे आत्मीय सम्बंध का अंत कर देती है यह भी कि लिखने के लिए सीमोन ने पेरिस छोड़ना पसंद नहीं किया। इसके साथ बोउवार की उत्तर अफ्रीका, अमेरिका की वे लम्बी यात्राएं जो उसने अकेले कीं। सीमोन को यह चिन्ता भी खाये जा रही थी कि इतने सारे व्यापक जीवनानुभव, जीवन यात्राएं, ये सब उसके साथ ही खत्म हो जायेंगी। ‘आल सेड एंड डन’ में अपने मित्र सिल्विए बान के साथ आत्मीय सम्पर्क की चर्चा करते हुए सीमोन का कहना है कि उसने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि उम्र के साठवें वर्ष में उसे कोई सहयोगी और मित्रा मिलेगा, लेकिन मिला। इन आत्मकथाओं में दो बातें मेरी समझ में आती हैंµ एक तो आत्मनिर्भरता यानी अपनी जिम्मेदारी स्वयं उठाना, दूसरे अपने को हमेशा बेहतर ढंग से समझने का प्रयास। सीमोन ने सात्र्रा के साथ सहजीवन जिया लेकिन विवाह नहीं किया क्योंकि स्वाधीनता के अर्थ दोनों के लिए अलग अलग थे। सीमोन लिखती हैंµ ‘‘अद्भुत थी स्वाधीनता! मैं अपने अतीत से मुक्त हो गयी थी और स्वयं में परिपूर्ण और दृढ़निश्चयी अनुभव करती थी। मैंने अपनी सत्ता एक बार में ही स्थापित कर ली थी, उससे मुझे अब कोई वंचित नहीं कर सकता था, दूसरी ओर सात्र् एक पुरुष होने के नाते बमुश्किल ही किसी ऐसी स्थिति में पहुंचा था, जिसके बारे में उसने बहुत दिन पहले कल्पना की हो… वह वयस्कों के उस संसार में प्रविष्ट हो रहा था, जिससे उसे हमेशा से घृणा थी।’’

 वैसे, मैं अब उस खोज में हूं जिस ओर आंद्रियाना मेस्त्रोविच ने इशारा किया था। लिलियाना के निजी जीवन के बारे में मुझे विशेष जानकारी नहीं थी, वैसे भी किसी के निज की तफ्तीश असभ्यता ही मानी जाती है। प्रेमचंद ने भी कहा है कि ऐसा कोई भी प्रश्न जो सामने वाले को असुविधा में डाल दे, नहीं पूछा जाना चाहिए। सीमोन द बोउवार के लेखन के साथ सफर करते करते युद्धोत्तर यूरोप ओर उसकी बदली परिस्थितियों के बारे में जानना चाहती हूं और इसके लिए एक बंद दरवाजा है मेरे सामने लिलियाना का। वह वार विक्टिम है ऐसी सूचना मरीयाना ने भी दी थी। मुझे जो जानना है वह या तो लिली बता सकती है या दुष्का। दुष्का बहुत भावुक है, पता नहीं मेरी बात का क्या अर्थ निकाले। अपने घावों को खुद नखोरना कुरेदना और बात है और दूसरों के सामने खोल कर रख 200 / देना… लिलियाना को विदेशी पसंद हैं। विशेषकर गंदुमी सांवली रंगत। मेरे पास हैदराबाद से लाये हुए कुछ मोती हैं उन्हें ‘गिफ्ट रैपर’ में लपेट कर मैंने लिलियाना के घर जाना तय किया है। दुष्का साथ है। लिली खूब स्वस्थ लम्बी चैड़ी, लगभग पचास की उम्र छूती महिला है, जो सिर्फ सफेद टायलेट पेपर खरीदती है। रंगीन टायलेट पेपर के इस्तेमाल से कैंसर हो जाता है, ऐसा विश्वास है उसे। सन की तरह सुनहरे सफेद बाल, मैजेंटा रंग की गहरी लिपस्टिक, कड़कती ठंडी शाम में भी वह गर्दन और वक्ष का उ$परी भाग खुला रखती है। लोगों को देख ढलके वक्ष को थोड़ा सहारा देकर, उपर उठा गर्दन अकड़ा कर चलना उसकी आदत में शुमार है। हाई हील और ऊँची स्कर्ट पहने वह सम्भ्रांत लोगों के बीच उठती बैठती है। उसके हाव भाव मेरी अब तक की जानी चीन्ही स्त्रियों से अलग हैं। सन् 1992-95 के दौरान क्रोएशिया बोस्निया हर्जेगोविना में जो स्त्रियां सर्ब सेनाओं के दमन का शिकार हुईं, लिली उनमें से एक है। युद्ध के दौरान बलात्कार, यौन हिंसा के हजारों मामले सामने आये, कुछ मामले सरकारी फाइलों में दब गये, कुछ भुला दिये गये और कुछ शिकायतें वापस ले ली गयीं। कुछ स्त्रियां मार दी गयीं, कुछ अवसाद और अन्य रोगों का शिकार हो गयीं। हालांकि जेनेवा कन्वेंशन में युद्ध के दौरान यौन हिंसा और सैनिकों द्वारा स्त्रियों के एकल या सामूहिक बलात्कार को मानवता के विरुद्ध जघन्य अपराध माना गया लेकिन पूरे विश्व में युद्धनीति के तहत स्त्रियों के प्रति यौन हिंसा एक अलिखित चर्या है। युद्धकाल के बलात्कार सामान्य बलात्कारों से अलग माने जाते रहे हैं, इनमें से बहुत से वाकयों की तहकीकात भी नहीं हो पाती। कई बार शोषिताएं और घर्षिताएं सामने भी नहीं आतीं। लिलियाना उन 68 बोल्ड औरतों में से एक है जिसने व्यापक सामूहिक बलात्कार की घटना की न सिर्फ रिपोर्ट दर्ज की, बल्कि वक्त और परिस्थितियों के आगे हार नहीं मानी, मृत्यु और जीवन, मूकता और बोलने में से जीवन का चुनाव किया, चुप नहीं रही। प्रथम और द्वितीय दोनों विश्वयुद्धों में कई देशों में सैन्य और अर्धसैन्य बलों ने सामूहिक बलात्कार की अनगिनत घटनाओं को अंजाम दिया। प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान बेल्जियम और रशिया औरतों के लिए सामूहिक मरणस्थली बने, वहीं दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान रूस, जापान, इटली, कोरिया, चीन, फिलीपींस और जर्मनी में बड़े पैमाने पर स्त्रिायों को घर्षित किया गया। आपसी छोटी बड़ी मुठभेड़ों में अफगानिस्तान, अल्जीरिया, अर्जेंटीना, बांग्लादेश, ब्राजील, बोस्निया, कम्बोडिया, कांगो, क्रोएशिया, साइप्रस, अल सल्वाडोर, ग्वाटेमाला, हैती, भारत, इंडोनेशिया, कुवैत, कोलम्बो, लाइबेरिया, मोजांबीक, निकारागुआ, पेरू, पाकिस्तान, रवांडा, सर्बिया, सोमालिया, टर्की, युगांडा, वियतनाम और जिम्बाब्वे जैसे देशों की लम्बी सूची है जहां यौन हिंसा और स्त्री की घटनाएं हुईं और बड़े बड़े भाषणों, राजनैतिक समझौतों के बीच प्रतिरोधी आवाजें दबा दी गयीं।

अब मुझे लिलियाना का पैर हिलाते हुए कंसर्ट सुनना, अंधाधुंध सिगरेट पीना, एक आंख को हल्का दबा कर हंस देना अटपटा नहीं लगता। स्पिलत के चारसितारा होटल का मालिक आजकल लिली पर दिलोजान से फिदा है। लिली का कहना है इन गर्मियों में वह स्पिलत जाकर पूरे साल का खर्चा निकाल लेगी। वह ‘एस्कोर्ट’ है जिसके साथ के लिए व्यापारी, पर्यटक अच्छी रकम खर्च करते हैं। लिली अपने बारे में गम्भीरता से बात नहीं करती। उसने यौन हिंसा और सामूहिक बलात्कार झेला है, वह हंसती है जिन्दगी पर। उसके साथ की चवालिस स्त्रियां (जो अभी जीवित हैं) सर्ब सैनिकों से कई बार घर्षित हुईं। इनमें से 21 यौनदासियों के रूप में सैन्यशिवरों में रहीं और 18 ऐसी वृद्धाएं थीं जो किसी न किसी बलात्कार की साक्षी रहीं। इनमें से 29 स्त्रियां बलात्कार के कारण गर्भवती हुईं जिनमें से 17 ने शर्म और अपमान से बचने के लिए गर्भपात करा लिया। कुछ ने संतान पैदा करके सरकारी अनाथाश्रम में मुक्ति पायी। लिली का एकमात्रा बेटा जो ड्रग के शिकंजे में सरकारी पुनर्वास योजना का मेहमान बना हुआ है, 1996 में ही जन्मा। लिलियाना को सब कुछ याद है ब्यौरेवार, लेकिन याद  / 201 करना नहीं चाहती। मैं भी उसे ज्यादा परेशान नहीं करती और अपने फ्लैट पर वापस आ जाती हूं। नींद नहीं आ रही क्या हुआ होगा लिलियाना जैसी सैकड़ों लड़कियों का, क्या गुजरी होगी उन पर। मैं घुप्प अंधेरे में हूँ… कोई चेहरा नहीं, सिर्फ कराहें… विक्टर फ्रैंकल ने द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद ‘मैन्स सर्च फाॅर मीनिंग’ शीर्षक पुस्तक लिखी थी, जिसमें आश्वित्स के यातना शिविर की दैनंदिनी है। फ्रैंकल का कहना है कि जिस रूप में बंदी अपने भविष्य के बारे में सोचता था उसकी उम्र उसी पर निर्भर करती थी। उसने ‘लोगोथेरेपी’ का सिद्धांत दिया और बताया कि जिनके पास जीने का कोई कारण होता है, वे कैसे भी जी लेते हैं। इन यौनदासियों के पास जीने का क्या करण होगाµ पति, बच्चों, मां, सास के सामने निर्वस्त्र और बलात्कृत की जातीं, महीने दर महीने साल भर। उनके अपमान और यातना की कोई सीमा नहीं। उनके पास जीने का क्या कारण बच रहा होगा? अर्धनिद्रा में मुझे आश्तविज का यातना शिविर दीख रहा है बेचैनी, पसीना और घबराहट… गोद में बच्चा लिए लिलियाना दौड़ रही रही है, कांटेदार बाड़ के पास सैनिक ही सैनिक… गोरे लाल मुंह वाले लम्बे चैड़े सैनिक लिलियाना को नोच रहे हैं, घसीट रहे हैं, उसके मुंह पर थूक रहे हैं, पैरों को फैला रहे हैं, बछड़ा पैदा करती गाय सी डकरा रही है वह। उसके उपर एक एक करके लद गये हैं लोग… लिलि… लिलियाना…। अपनी चीख से नींद टूट गयी है… उठ कर देखा है फोन पर कुछ संदेश आये हैं… पानी पिया है, कभी की पढ़ी पंक्ति याद आती है


तुमि गुछिए किछू कथा बोलते पारो ना
शुधू समय निजे गल्पो बोले जाये

ठीक ही तो, कहां लिख पा रही हूं खूब व्यवस्था से। लिलियाना जैसी अनेकानेक ने मेरा चैन छीन लिया है, दिन रात उन्हीं के बारे में सोचती हूं और… और जानना चाहती हूं जिनकी कथा समय ही लिखेगा लेकिन कब?

लिलियाना और ईगोर ने मुझे पार्टी में चलने को कहा हैµ मैं थोड़े पेशोपेश में हूं। शाकाहारी और मदिरा से परहेज करने वाला भारतीय संस्कार चोले में मुंह दबाये हंस रहा है। पिता को मालूम चला और पितातुल्य गुरु नित्यानंद तिवारी, वे तो अविश्वस्त नेत्रों से ताकेंगे भर मुझे। लिली बताती है कि वहां कुछ औरतें मिलेंगी मुझे, जो हो सकता है अपने बारे में कुछ बोलें। खैर हम शलाटा जाते हैं जहां से ‘पाॅट पार्टी’ में जाना है। इसके बारे में मुझे कोई विशेष जानकारी नहीं, लेकिन पहंुचते ही लगा, नशीले धुएं से भरा माहौल दम घोंट देगा। कई लोग जिनमें लड़कियों की संख्या बहुत थी, हशीश, चरस, गांजा आदि का सेवन कर रहे हैं, बिना पिये ही सिर चकराने लगा। लोग चुप लेटे हैं, कोई छत ताक रहा है कोई दम लगा रही है, हल्का संगीत बज रहा है, ध्यान से सुना श्री श्री रविशंकर की सभाओं में बजने वाला हरे कृष्णा… राधे राधे यहां की हवाओं में झंकृत है। मैं बाहर जाना चाहती हूं, इस दमघोंटू माहौल में आकर गलती की… उफ नहीं आना चाहिए था। दीवार से सट कर एक जोड़ा खड़ा है, लड़के ने आगे बढ़ कर मुझसे कुछ कहा है और हौले से मेरे बाल छुए हैं। ‘जेलिम डौटाक्नुटी स्वोजे क्रेन ड्लाके’ (मैं तुम्हारे काले बाल छूना चाहता हूं) सुनते ही मैं दौड़ कर बाहर आ गयी हूं जैसे नरककुंड से बच कर लौटी हूं। लिलियाना और ईगोर का कुछ पता नहीं। मैंने तीन ट्रामें बदली हैं और सुरक्षित लौट आने के सुकून ने मुझे गहरी नींद दे दी। अगले रविवार लिलियाना हंस कर कहती हैं ‘नेमोज्ते से प्रेपाला’ यानी डरो मत, यहां जबरदस्ती कोई कुछ नहीं करेगा, तुम्हारे बाल काले हैं जो यहां वालों के लिए कुतूहल है।

तुर्केबाना येलाचीचा जाते हुए ट्राम लोहे की ईटों की सड़क के बीचोंबीच बने हुए ट्रैक पर मुड़ती है। गोल इमारत के ऊँचे-ऊँचे कांचदार दरवाजे जिनके भीतर भांति भांति की दुकानें हैं। उनी, 202 / सूती वस्त्र, जो अधिकतर भारत और चीन के टैग से सुसज्जित हैं, जूते वियतनाम और थाईलैण्ड के बिक रहे हैं, दुकानदार की शक्ल दुमकटे लोमड़ जैसी है। सपाट चेहरे पर लाल नाक और गहरी कंजी आंखें, व्यवहार में विनम्र दीखता है लेकिन लाल भूरे बालों के भीतर रखे सिर में कुछ ऐसा खदबदा रहा है, जिसे मैं ‘रंगभेद’ समझती हूं। सांवली रंगत का मनुष्य उसके बहुत सम्मान का पात्रा नहीं, ऐसी गंध मेरी छठी इंद्रिय को मिल रही है। दुकान के बाहर कोने पर एक छः सात वर्षीय गोरे, चित्तीदार चेहरे वाला लड़का शीशे से अपनी नाक सटाये है। बड़ा सा लबादा पहना हुआ है उसने। पैरों में नाप से बड़े जूते। दुकानदार को बाहर आते देख वह खरगोश की तरह फुदक कर गायब हो जाता है। इसके बाद ही जाग्रेब की मशहूर केक की दुकान है जहां क्रोशियन और जर्मन केक की ढाई सौ से अधिक किस्में अपने पूरे शबाब के साथ शीशे की पारदर्शी अलमारियों में भारी जेब के दिलदार खवैयों का इंतजार कर रही हैं। तुर्की की विजिटिंग प्रोफेसर गुलदाने कालीन ने इस दुकान की पेस्ट्री की तारीफ कई बार की है। आज सोचा खा ही लूं, इन केक्स की खूबी इनकी क्रीम है जो मनुष्य के मेदे और वजन को चुनौती देती है। मनचाहा सजीला संवरा, क्रीम में लिपटा, बारीक डिजाइनदार केक का रसीला बड़ा सा टुकड़ा प्लेट में सामने है, कीमत है पचास कूना यानी लगभग पांच सौ रुपये। अपने यहां भी ‘बरिस्ता’ में लगभग यही दाम है। केक का पहला टुकड़ा खाती हूं कि दुकान का मैनेजरनुमा आदमी बाहर खड़ बच्चे को दुरदुराता हुआ चिल्लाता है। हाथ में आलू चिप्स का फटा पैकेट लिए बच्चा दुकान के बीचोंबीच आ गया है, कर्मचारी लड़का उसका लबादा खींच कर घसीट रहा है। दुकान में सुरक्षा सायरन बजने लगा। बच्चा कुछ बोल नहीं पा रहा है, मेरे पहुंचते पहुंचते बच्चा फुटबाल की तरह सड़क पर फेंका जा चुका है। पूछने पर वह दुकान के कूड़ेदान की ओर इशारा करता है। ‘जा सम गलदना’ (मैं भूखा हूं) कह कर जार जार रो रहा है। अनुमान करती हूं कि किसी के अधखाये चिप्स उठा कर बच्चा पेट भर रहा होगा और दुकान मालिक ने देख लिया होगा। मुझे अब केक नहीं खाना। शायद कभी नहीं? खून से बच्चे की नाक रंग गयी है। केक खरीदती हूं उसके लिए। वह सुबकता हुआ जा रहा है, शायद शरणार्थी है। हाथ की मुट्ठी में दबे केक की सफेद क्रीम लाल हो रही है1 उफ मेरे मौला… ऐसे न जाने कितने बच्चे दरबदर हो भटक रहे हैंµ सम्मानहीन, भोजनहीन, आश्रयहीन। स्वयंसेवी संस्थाएं हैं, सरकारें हैं, लेकिन हम अपना सुखभोग छोड़ कर इनकी तरफ देखते हैं क्या? मन नम है और बाहर बरसात शुरू हो गयी है.

पास रहो, डर लग रहा है
लग रहा है कि शायद सच नहीं है यह पल
मुझे छुए रहो
जिस तरह श्मशान में देह को छुए रहते हैं
नितांत अपने लोग,
यह लो हाथ
इस हाथ को छुए रहो जब तक पास में हो
अनछुआ मत रखो इसे,
डर लगता है
लगता है कि शायद सच नहीं है यह पल
जैसे झूठा था पिछला लम्बा समय
जैसे झूठा होगा अगला अनंत
नवनीता देवसेन / 203

जाग्रेब पुनर्वास केन्द्र में औरतें जीवनयापन के लिए छोटेमोटे काम सीखती हैं जिनमें सामान की पैकेजिंग, मुरब्बे, जैम, अचार, मसाले इत्यादि बनाना शामिल है। बोस्निया, हर्जेगोविना, क्रोएशियाके खिलाफ युद्ध में सर्बिया ने नागरिकों को डराने के लिए उनकी स्त्रिायों पर बलात्कार किये। आक्रमणकारी छोटे छोटे समूहों में गांवों पर हमला करते जिनका पहला निशाना होतीं लड़कियां और औरतें। सामूहिक बलात्कार का सार्वजनिक प्रदर्शन किया जाता ताकि दूसरे गांवों को अपने हश्र का अंदाजा हो जाये। 1991-1995 के दौरान सर्ब सैनिकों ने सैन्य कैम्पों, होटलों, वेश्यालयों में बड़े पैमाने पर यौन हिंसा के सार्वजनिक प्रदर्शन किये। बोस्निया और हर्जेगोविना पर जब तक सर्बिया का कब्जा रहा, किसी उम्र की कोई स्त्री ऐसी नहीं बची जिसका घर्षण या बलात्कार न किया गया हो। लिली और दुष्का तब अपनी नानी के गांव में रहा करती थीं। दुष्का को पर्यटन विभाग में नौकरी मिली और वह जाग्रेब चली आयी। सर्ब होते हुए भी वे दोनों क्रोएशिया की नागरिक थीं और उससे भी पहले थीं लड़कियांµ ताजा, जिन्दा, टटका स्त्री मांस। लिली उन आभागी लड़कियों में से एक थी, जिन्हें नोचा खसोटा और पीट कर कैद में रखा गया। कई लड़कियों को अश्लीलता के सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए बाध्य किया जाता रहा, यौनांगों को सिगरेट से दागा गया और एक दिन में कई बार बलात्कार किया जाता रहा। इन पुनर्वास केन्द्रों ने ऐसी स्त्रिायों को स्वावलम्बी बनने में मदद की थी और यह सिलसिला अब भी जारी है। युद्ध शुरू होते ही परिवार के परिवार गांवों को छोड़ कर भाग जाते, पीछे छूट जाते खेत, ढोर डंगर और पकड़ ली जातीं औरतें जिनकी उम्र दस से लेकर साठ सत्तर वर्ष की हुआ करती। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस तरह के अत्याचारों को युद्ध अपराध की संज्ञा दी गयी, लेकिन युद्ध थमने के बाद भी यौन हिंसा की शिकार इन औरतों के लिए कोई ठोस सरकारी नीति नहीं बनी। विश्व के कई देशों ने द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद जर्मनी पर आधिपत्य जमाने के लिए ‘बलात्कार’ का हथियार के रूप में इस्तेमाल किया। इसी तरह बांग्लादेशी स्त्रिायों का पाकिस्तानी सैनिकों द्वारा बड़े पैमाने पर घर्षण किया गया। युगांडा के सिविल वार और इरान में स्त्रिायों से जबरदस्ती यौन सम्बंध बना कर अपमानित करने की घटनाओं से हम सब वाकिफ हैं। चीन के नानकिंग में जापानी सेना द्वारा स्त्रिायों का सामूहिक यौन उत्पीड़न, दमन और श्रीलंकाई स्त्रिायों के घर्षण के हजारों मामले ‘नवसाम्राज्यवाद’ को फैलाने के लिए जोरदार और कारगर हथियार बने। कई स्त्राीवादियों ने वृत्तचित्रों, फिल्मों द्वारा इस तरह की घटनाओं के खिलाफ जनमत संग्रह के कारगर प्रयास भी किये, लेकिन बोस्निया और हर्जेगोविना की औरतों की बात अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गम्भीर चर्चा का विषय कभी बनी ही नहीं। क्रोएशिया से सटे बोस्निया जाने का निर्णय मैंने किया है, जिसके लिए भारतीय दूतावास से अनुमति अनिवार्य है।

दूतावास में बोस्निया जाने की अनुमति आसानी से मिल गयी लेकिन वहां के अधिकारी बड़े दबे स्वर में उपहास करते हैंµ ‘‘लोग तो पेरिस और इटली, जर्मनी घूमते हैं, मजे करते हैं और आप ‘वार विक्टिम’ के पीछे पड़ी हैं।’’ बोस्निया में लूट, भ्रष्टाचार, झूठ, राहजनी सभी कुछ हैं लेकिन हरियाले खेतों के बीच से जाती सड़क का रास्ता बुरा नहीं। बोजैक बोस्नियाई विद्यार्थी है, जो जाग्रेब में पढ़ता है, साथ ही कुछ रोजगार भी। उसकी उम्र पचास के उ$पर ही है, उसके सामने ही उसकी आठ वर्षीय बेटी और पत्नी को बार बार घर्षित किया गया। बच्ची तीन दिन तक रक्त में डूबी रही, सैनिक उससे खेलते रहे, इस बीच कब उसने अंतिम सांस ली, पता नहीं। बोजाक वह जगह दिखाता है जहां उसकी पत्नी दिल की बीमारी और अवसाद से मर गयी। ‘लाइफ मस्ट गो आॅन’ कह कर बोजाक फटी आंखों से हंसता है और अगला युद्ध कैम्प दिखाने चल पड़ता है। बच्ची को खोकर, बाद के वर्षों में उसकी पत्नी प्रभु ईसू से अपने अनकिये पापों के लिए दिन भर क्षमा मांगा करती। 204 / उसका पाप क्या था? इसके उत्तर में बोजाक कहता है ‘‘औरत होना…।’’ शांति स्थापित होने के बाद भी जिन्होंने युद्ध को अपनी देहों पर रेंगता, चलता, बहता महसूस किया, एक बार नहीं अनेक बार जिनकी कोखों ने क्रूर सैनिकों के घृणित वीर्य को जबरन वहन किया, वे हमेशा के लिए हृदय और मानसिक रोगों का शिकार हो गयीं। रवांडा में तो अकेले 1994 में लगभग 5000 बच्चे युद्ध हिंसा के परिणामस्वरूप जन्मे थे। क्रोएशिया में ऐसे बच्चों की सही संख्या का पता कोई एनजीओ नहीं लगा सका, क्योंकि अधिसंख्य मामलों में लोग चुप लगा गये, पड़ोसी नातेदार सब जान कर भी घाव कुरेदने से बचते रहे। युद्ध सबके दिलो दिमाग में पसर गया। बलात्कार की शिकार या गवाह रही अधिसंख्य स्त्रिायां मृत्युबोध से ग्रस्त हैं। वे सामाजिक सम्बंध भी स्थापित नहीं करना चाहतीं। कई तो बस सालों तक टुकुर टुकुर ताकती रहीं, कुछ बोल नहीं पातीं। कुछ ने अपना घरबार छोड़ दिया और फिर कभी यौन सम्बंध स्थापित नहीं कर पायीं। एक मोटे अनुमान के अनुसार बोस्निया में युद्ध के दौरान लगभग पचास हजार लड़कियां और औरतें बलात्कार का शिकार हुईं और उधर ‘इंटरनेशनल क्रिमिनल ट्रिब्यूनल फाॅर द फार्मर यूगोस्लाविया’ यौन दासता और बलात्कार को मानवता के प्रति अपराध के रूप में दर्ज कर कागज काले करता रहा।

संयुक्त यूगोस्लाविया का विखंडन बोस्निया और हर्जेगोविना, क्रोएशिया, मैसीडोनिया गणतंत्रा,स्लोवेनिया जैसे पांच स्वायत्त देशों में हुआ था, जो बाद में चल कर सर्बिया, मांटेग्रो और कोरनोवो में बंटा। क्रोएशियाई, सर्ब और बोस्नियाई लोगों के बीच जो युद्ध और झड़पें हुईं उनमें से अधिकतर भूमि अधिग्रहण को लेकर थीं। आज भी सात हजार से अधिक क्रोएशियन शरणार्थी बोस्निया और हर्जेगोविना में हैं और इस देश में लगभग 131,600 लोग विस्थापित हैं। क्रोएशिया और बोस्नया की 935 किमी की सीमा साझा है। हमें यहां पर धोखाधड़ी से बार बार क्रोएशियन दूतावास, जो सराजेवा में है, आगाह किया गया है। रास्ते में कई बार पासपोर्ट और वीजा चेक किया गया। मुझे यहां के खस्ताहाल संचार साधनों और सड़कों को देख कर भारत के कई छोटे शहरों की याद आती है। पूरे इलाके में बारूदी सुरंगों का खतरा है, इसलिए पुलिस ट्रैफिक को रो कर घंटों पूछताछ करती है। पुराने लोग अंग्रेजी नहीं समझते, जबकि नयी पीढ़ी अंग्रेजी बोलती और समझती है। युद्ध के दौरान कई
बोस्नियाई जर्मनी भाग गये थे, इसलिए इनकी भाषा में जर्मन शब्दों का आधिक्य है। हमें उना नदी में रिवर राफ्टिंग का आमंत्राण है लेकिन मेरा ध्यान कहीं और है।

कल लिली ने 1993 के लास एंजिल्स टाइम्स में प्रकाशित मिरसंडा की आपबीती दी थी। होटल लौट कर मैंने वही टुकड़ा उठाया हैµ ‘‘रोज रात को सफेद चीलें हमें उठाने आतीं और सुबह वापस छोड़ जातीं। कभी कभी वे बीस की तादाद में आते। वे हमारे साथ सब कुछ करते, जिसे कहा या बताया नहीं जा सकता। मैं उसे याद भी नहीं करना चाहती। हमें उनके लिए खाना पकाना और परोसना पड़ता नंगे होकर। हमारे सामने ही उन्होंने कई लड़कियों का बलात्कार कर हत्या कर दी, जिन्होंने प्रतिरोध किया, उनके स्तन काट कर धर दिये गये।

‘‘ये औरतें अलग अलग शहरों और गांवों से पकड़ कर लायी गयी थीं। हमारी संख्या लगभग 1000 थी। मैंने लगभग चार महीने कैम्प में बिताये। एक रात हमारे सर्बियाई पड़ोसी के भाई ने हममें से 12 को भगाने में मदद की। उनमें से दो को सैनिकों ने पकड़ लिया। हमने कई दिन जंगल में छुप कर बिताये। अगर पड़ोसी हमें न बचाता तो मैं बच ही नहीं पाती, शायद अपने को मार लेती, क्योंकि मैं जिस यातना से गुजरी, उतनी यातना तो मृत्यु में भी नहीं होती।

‘‘कभी कभी मुझे लगता है कि रात के ये दुःस्वप्न मेरा पीछा कभी न छोडेंगे। हर रात मुझे कैम्प के चौकीदार स्टोजान का चेहरा दीखता है। वह उन सबमें सबसे निर्मम था, उसने दस साल की  बच्ची को भी नहीं बख्शा था। ज्यादातर बच्चियां बलात्कार के बाद मर जाती थीं। उन्होंने बहुतों को मार डाला। मैं सब कुछ भूलना चाहती हूं, नहीं तो मर जाउगी।’’

 पढ़ कर मेरा मन घुटन से भर गया है, भूख नींद गायब हो गयी है। स्काइप खोल कर देखा है। कोई मित्र आत्मीय आॅनलाइन नहीं है। इस समय भारत में आधी रात होगी। दिल बहलता नहीं बाल्कन प्रदेश के पार से आती गुमसुम बोझिल हवाओं के घोड़ों पर सवार लम्बे, कद्दावर क्रूर सर्बियाई सैनिक दीखते हैं, हवा में तैरती चीखें और पुकारें हैं। 1992 में फोका की स्कूल जाने वाली लड़की बताती है कि कैसे जोरान वुकोविच नामक आदमी ने उससे जबरदस्ती संसर्ग किया और बाद में दूसरों के आगे परोस दिया। स्कूल में सैनिकों का जत्था घुसा और आठ लड़कियों को चुन कर उनसे निचले कपड़े उतार कर फर्श पर लेटने को कहा। पूरी क्लास के सामने इन आठों का जम कर बलात्कार किया गया। सैनिकों ने बोस्नियाई मुसलमान लड़कियां चुनीं, उनके मुंह में जबरन गुप्तांग ठूंसे और कहा ‘‘तुम मुसलमान औरतें (गाली देकर) हम तुम्हें दिखाते हैं।’’ उसके पास कोई शब्द ऐसा नहीं, जो उसकी यातना व्यक्त करने में सक्षम हो। बार बार यही कहती है ‘एक औरत के साथ इससे बदतर कुछ हो ही नहीं सकता।’

उसे बाद में पाट्रीजन स्पोर्ट्स हाॅल में, अलग अलग उम्र की लगभग साठ अन्य स्त्रिायों के साथ बंधक बना कर रखा गया। वे बारी बारी सर्ब सैनिकों द्वारा ले जायी जातीं और बलात्कार के बाद लुटी पिटी घायल अवस्था में स्पोर्ट्स हाल में बंद कर दी जातीं। सर्ब सेनाओं ने घरों, दफ्तरों और कई स्कूलों की इमारतों को यातना शिवरों में बदल डाला था। एक बोस्नियाई स्त्राी ने बतायाµ ‘‘पहले दिन हमारे घर पर कब्जा करके परिवार के मर्दों को खूब पीटा गया। मेरी मां कहीं भाग गयी, बाद में भी उसका कुछ पता नहीं चल पाया। वे मुझे नोचने खसोटने लगे। भय और दर्द से मेरी चेतना लुप्त हो गयी… जब जगी तो मैं पूरी तरह नंगी और खून से सनी हुई फर्श पर पड़ी थी… यही हाल मेरी भाभी का भी था… मैं जान गयी कि मेरा बलात्कार हुआ है… कोने में मेरी सास बच्चे को गोद में लिए रो रही थीं।… उस दिन से हमें हमारे ही घर में कैद कर दिया गया। यह मेरी जिन्दगी का सबसे बुरा वाकया था… वे हमेशा हमें पंक्तिबद्ध कर सैनिकों के सामने ले जाते और हमें परोस देते। मकान में वापस लाकर भी अश्लील हरकतों के लिए मजबूर करते और हमें रौंदते… हमारे बच्चों के सामने भी हमें खसोटते। ये सब एक साल तक चला, अधिकतर औरतें या तो मर गयीं, पागल हो गयीं या वेश्याएं बन गयीं।’’

युद्ध के बाद ‘डेटन एकाॅर्डस’ नाम से शांति समझौता हुआ था, जिसके अनुसार यौन हिंसा पीड़िताओं को घरवापसी पर मकान और सम्पत्ति दी जानी थी लेकिन ऐसी बहुत कम औरतें थीं, जो घरवापसी के लिए तैयार थीं। अधिसंख्य ने अपने पुराने मकानों में लौटने से इनकार कर दिया क्योंकिवहां उनकी यातना और अतीत के नष्ट जीवन के स्मृतिचिह्न थे।

अप्रैल 1992 के दिन को इतने वर्षों बाद भी हासेसिस नाम मुस्लिम स्कूली छात्रा भूल नहीं पायी है, जब सर्ब सैनिक उसे विजेग्राद के पुलिस स्टेशन के तहखाने में ले गयेµ ‘‘उस कमरे में लकड़ी का बहुत सा सामान था, कुर्सियां वगैरह। वहां मैंने मिलान ल्यूसिक और स्ट्रोजो लूसिक को देखा। मैं मिलान को अच्छी तरह जानती थी। उसने चाकू लहराते हुए कहाµ ‘अपने कपड़े उतारो, लगा वह मजाक कर रहा है… लेकिन सच यही था कि इतना पुराना सर्बियाई पड़ोसी कई सैनिकों के साथ मुझेअपमानित करने पर तुला था…।’


स्पाहोटल ‘विलिना व्लास’, जो आज पर्यटकों के आकर्षण का केन्द्र है, विश्वास नहीं होता पर मुझे बताया जाता है कि यहां दो सौ औरतों को बंद करके रखा गया था। बूढ़ी बाल्कन स्त्री को 206 / तारीख याद नहीं लेकिन वाकया बखूबी याद है ‘‘मैं अपने बेटे को लेकर जंगल में छिप गयी थी। मेरा 16 साल का बेटा मेरे साथ था लेकिन बेटी को मैंने घर के तहखाने में छिपा दिया था, क्योंकि सुनने में आया था कि वे लड़कियां उठा ले जाते हैं। उन्होंने मुझे पकड़ कर धमकाया, बेटे के सामने मेरे कपड़े उतारे और चाकू से बेटे का गला रेत दिया, ‘मम्मी’ यही अंतिम शब्द था जो मेरा बेटा बोल पाया। कभी कभी वे मुझे दो दिन के लिए कैम्प ले जाते फिर होटल वापस छोड़ जाते। मैं गिनती ही भूल गयी कि उन्होंने कितनी बार मुझसे बलात्कार किया। होटल के सारे कमरों में ताले लगे रहते, वे खिड़की के रास्ते हमें रोटी फेंकते, जिसे हमें दांतों से पकड़ना पड़ता क्योंकि हमारे हाथ तो पीछे बंधे रहते। सिर्फ बलात्कार के वक्त ही हमारे हाथ खोले जाते। हमें समय का ज्ञान भूल गया। हमारी देह को सिगरेट से जलाया जाता, जीभ पर चाकू चला कर मांस का टुकड़ा काट लिया जाता। हममें से ज्यादातर औरतें न बोलती थीं, न रोती थीं। कुछ ने अपनी जान भी ले ली और कई तो दर्द और भूख से मर गयीं। कई औरतों का सात से नौ घंटे के बीच नौ बार बलात्कार हुआ। कुछ बलात्कारों की रिकार्डिंग भी की गयी, जिनका इस्तेमाल पोर्नोग्राफी के बाजार के लिए किया गया।’’



ये बलात्कार किसी सरकार द्वारा नहीं बल्कि व्यक्ति विशेष द्वारा किये गये थे, इसलिए कई अंतरराष्ट्रीय संगठनों का मानना था कि ये मानवाधिकारों का उल्लंघन नहीं है क्योंकि उन्हें लगता था कि सिर्फ सरकारी संगठन ही मानवाधिकारों का उल्लंघन कर सकते हैं, लेकिन बाद में जब बोस्निया सरकार ने अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में सर्ब सैनिक टुकड़ियों की हिंसा को ‘जेनोसाइड’ कहा और 1993 में संयुक्त राष्ट्रसंघ ने पहली बार ‘अंतरराष्ट्रीय युद्ध अपराध ट्रिब्यूनल’ की घोषणा की, तब ऐसे कुछेक मामलों की सुनवाई आरम्भ हुई। इन सुनवाइयों में कभी आरोपी की पहचान से इनकार किया गया तो कभी मुद्दई ने आरोप वापस ले लिए। दिलचस्प यह भी था कि ट्रिब्यूनल के पास सुनवाइयों की व्यवस्था के लिए धन का नितांत आभाव था, जिसकी पुष्टि 7 दिसम्बर 1994 के न्यूयार्क टाइम्स की रपट करती है। दुखद आश्चर्य था कि ट्रिब्यूनल की 18 सदस्यीय जांच समिति में मात्रा तीन स्त्रियां थीं। लम्बी जांच प्रक्रिया के बाद बोस्निया में यातना शिविर चलाने और हिंसा के लिए 21 सर्ब सैनिक कमांडरों को दोषी पाया गया। न्यायालय ने कहा कि µ ‘ओर्मास्का कैम्प में स्त्रियों को बंधक बनाया गया, बलात्कृत कर जान से मारा गया। कइयों को बुरी तरह पीटा और अन्य बर्बर ढंग से बर्ताव किये गये।’ न्यूयार्क में अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार कानून की विशेषज्ञ रोंडा कोंपलोन का मानना था कि  स्त्रिायों की अनुमति/सहमति के बिना ऐसे मामलों में उनकी पहचान को सार्वजनिक करना गलत है। बोस्निया की मुस्लिम बहुल आबादी में ऐसी स्त्रिायां बहुत कम थीं, जो आरोपियों को पहचानने के लिए आगे आयीं।


बोस्निया युद्ध हिंसा की शिकार अधिसंख्य स्त्रियों को न्याय नहीं मिला। कुछ मर खप गयीं और कुछ दूसरी जगहों पर बस गयीं। युद्ध में शक्ति प्रदर्शन, लिंग विशेष के प्रति संचित घृणा ही बलात्कार जैसे कृत्यों में परिणत होती है। बलात्कार और यौन हिंसा एक तरह की ‘युद्ध रणनीति’ है, जिसके लिए कठिनतम और कठोर दंड का प्रावधान जब तक नहीं होता तब तक बलात्कार के शिकार बच्चों, स्त्रियों या अन्य किसी भी व्यक्ति को न्याय नहीं मिल सकता। युद्धकालीन यौन हिंसा की ओर से आंखें मूंदे रखना अधिसंख्य देशों की अघोषित राष्ट्रीय रणनीति है, लेकिन कागज पर विश्व के तीन चैथाई देशों ने युद्ध के दौरान यौन हिंसा को खत्म करने के लिए ‘डेक्लरेशन आॅफ कमिटमेण्ट टू सेक्सुअल वायलेंस इन काॅनफ्लिक्ट्स’ पर दस्तखत कर रखे हैं। लौटने के पहले बोस्निया के ल्यूकोमीर गांव की तरफ हम घूमने गये हैं। कहा जाता है कि यह यूरोप में सबसे उ$ंचाई पर बसा हुआ गांव है जहां आज भी आदिम सभ्यता सुरक्षित है। बिजली और आधुनिक उपकरणों के बिना जीवनयापन  / 207 आराम से हो रहा है। इसमें मेरे लिए आश्चर्य वाली कोई बात नहीं क्योंकि भारत में आज भी कई गांव बिजली जैसी सुविधा से वंचित हैं। लिलियाना मुझे घुमाने में थक गयी है, मेकअप की गहरी परत के भीतर छिपा विषाद उसके चेहरे पर दीख रहा है। पूरे रास्ते उसने मेरा कंधा पकड़ रखा है, शायद सब कुछ कह देने के बाद मनुष्य कमजोर हो जाता है। रवीन्द्रनाथ ने अंतिम यूरोप यात्रा से लौट कर शांतिनिकेतन में कहा थाµ ‘आमि ओई खाने कंठ ता हारिए ऐशेछी’। आज समझ पायी हूं कि रवि बाबू यूरोप जाकर अपना गान भूल क्यों गये होंगे। क्रोएशियन हाइकू कवि और पेशे से डाॅक्टर तोमिस्लाव मारेतिच जाग्रेब आये हैं। उन्हें मैंने बोस्निया यात्रा वृत्तांत के कुछ टुकड़े सुनाये हैं। बड़ी देर चुप रहने के बाद इटली से मिहिनो का भेजा स्कार्फ मुझे देते हुए दोस्ताना पेशकश करते हैंµ ‘नेमोज्ते पिसाती ओवो। ने ओब्जाविती ओवो’ (कृपया मत लिखो इसे। प्रकाशित मत करो) मैंने मुस्करा कर क्रोएशियन ढंग से सिर हिला दिया है। छपाने न छपाने के द्वंद्व में तीन वर्ष गुजर गये हैं। सन् 2010-2011 की प्रवास दैनंदिनी अब मुक्त हुई है, स्वच्छंद उड़ान के लिए। मित्रा की बात न रख सकी, इसका अफसोस है। डायरी के पन्ने सुधारते सुधारते हर सुबह गुरुदेव गुनगुना जाते हैं
अंध जने देहो आलो
मृत जने देहो प्राण
तुमि करुणामृत सिन्धु
करो करुणादान
जे तोमाए डाके नहीं
तारे तुमि डाको, डाको…
(दृष्टिहीन को प्रकाश दो, मृत देह को दो प्राण, तुम करुणा अमृत के सागर हो, करो करुणा का दान। जिसने तुम्हें पुकारा नहीं उसे भी तुम पुकारो ‘गीतवितान’)

टेलिविजन पर बीबीसी बल्ड चल रहा है। युद्ध के दौरान यौन हिंसा के विवरण जुटाने और जांच करने के बारे में विलियम हेग और एंजेलीना जाॅली द्वारा शुरु किये गये अंतरराष्ट्रीय प्रोटोकोल का प्रारूप प्रसारित हो रहा है.

‘‘हम सभी देशों से अपील करेंगे कि वे बलात्कार और यौन हिंसा सम्बंधी अपने कानूनों को अंतरराष्ट्रीय मानदंडों के अनुरूप बनायें। हम सभी सैनिकों और शांतिरक्षकों के उचित प्रशिक्षण की मांग करेंगे ताकि वे युद्ध क्षेत्रा में यौन हिंसा को समझ और रोक सकें। शरणार्थी कैम्पों में रोशनी के प्रबंध से लेकर जलावन एकत्रा करने बाहर जाने वाली महिलाओं के साथ रक्षाकर्मी के जाने जैसे साधारण उपायों के जरिये हमले की संख्या में भारी कमी लायी जा सकती है और हम चाहते हैं कि ये आधारभूत सुरक्षा उपाय सार्वभौम हों।’’

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पद्मावती फिल्म में ‘सती’ दिखाये जाने के खिलाफ संसदीय समिति के सवाल: स्त्रीकाल में पहली बार दर्ज हुआ था यह सवाल

पिछले दिनों स्त्रीकाल में स्त्रीवादी अधिवक्ता अरविंद जैन ने एक लेख लिखकर पहली बार इस मुद्दे की ओर ध्यान दिलाया था कि फिल्म या कोई टेक्स्ट 1987 के सती क़ानून के बाद क्या सती का महिमांडन करती प्रस्तुति कर सकता है? संसदीय पैनल ने भी यही सवाल पद्मवती फिल्म के निदेशक संजय लीला भंसाली से पूछा कि क्या सती या जौहर दिखाया जा सकता है? हालांकि अधिकांश ख़बरों में इस महत्वपूर्ण सवाल पर चर्चा तक नहीं हुई.

19 नवंबर के अपने लेख में अरविंद जैनसवाल लिखते हैं: 

1987 के ‘सती प्रिवेंशन एक्ट’ ने यह सुनिश्चित किया कि सती की पूजा, उसके पक्ष में माहौल बनाना, प्रचार करना, सती करना और उसका महिमामंडन करना भी क़ानूनन अपराध है.  इस तरह  पद्मावती पर फिल्म बनाना, उसे जौहर करते हुए दिखाना, सती का प्रचार है, सती का महिमामंडन है और इसलिए क़ानून का उल्लंघन भी. यह एक संगेय अपराध है और इसका काग्निजेंस सेंसर बोर्ड को भी लेना चाहिए. क्योंकि सेंसर बोर्ड को भी जो गाइड लाइंस हैं वह स्पष्ट करती हैं कि कोई भी फिल्म ऐसी नहीं हो सकती जो क़ानून के खिलाफ हो या संवैधानिक प्रावधानों के खिलाफ जाती हो.  इसलिए सेंसर बोर्ड को भी देखना चाहिए कि क्या यह फिल्म सती प्रथा का महिमामंडन करती है?  यदि ऐसा है तो उसे फिल्म को बिना कट प्रमाण पत्र नहीं देना चाहिए. अदालतों को भी सुमोटो एक्शन लेना चाहिए था. यह ऐसा ही है कि देश में छुआछूत बैन हो और आप छुआछूत को जस्टिफाय करने वाली फ़िल्में बना रहे हैं. रचना कर रहे हैं.

30 नवंबर  को संसदीय पैनल ने पूछा: 


क्या सती और जौहर दिखाया जा सकता है? इसके अलावा अन्य सवाल थे:  क्या उन्होंने सेंसर बोर्ड को प्रभावित करने के मसकद से कुछ मीडिया समूहों को अपनी फिल्म दिखाई थी और क्या यह कदम उचित और नैतिक है?  ‘आपने 11 नवंबर को आवेदन करने के बाद यह कैसे मान लिया कि फिल्म एक दिसंबर रिलीज हो जाएगी, जबकि सिनेमैटोग्राफी एक्ट के अनुसार किसी फिल्म के प्रमाणन में 68 दिन का समय लग सकता है?’  क्या आजकल फिल्म को चर्चा में लाने के लिए उसके आसपास विवाद खड़ा किया जाता है? ऐसे ही अन्य सवाल.

पढ़ें अरविंद जैन का पूरा लेख: फिल्म पद्मावती पर सेंसर किये जाने की स्त्रीवादी मांग 




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हर्षिता दहिया की हत्या और न्याय का प्रश्न

प्रियंका

हर्षिता दहिया उस समाज की लड़की थी, जहाँ लड़कियों का घर से बाहर निकलना, जींस पहनना, फोन रखना तक बुरी बात समझी जाती है, ऑनर किलिंग जहाँ आम बात है, ऐसे समाज की कोई लड़की पंचायत में बैठकर सामाजिक उत्तरदायित्व और राजनीतिक मसलों पर मुखर होकर बात करे तो यह असाधारण घटना ही है।
17 अक्टूबर 2017 को हर्षिता किसानों के हकों के लिए आयोजित की गई एक सभा को संबोधित करने गई थी। वहाँ उसने बार-बार इस बात पर ज़ोर दिया कि किसानों के हक़ छीने जा रहे हैं और यदि हम समय रहते उनके साथ खड़े नहीं हुए तो हम सब भूखे मरेंगे। उसने लोगों से किसानों के हक़ में जात-पाँत से ऊपर उठकर इंसानियत के नाते एकजुट होने का आग्रह किया। सभा सम्पन्न होने के बाद जब वह लौट रही थी, तब बीच रास्ते में उसकी कार को रोक कर उसपर ताबड़तोड़ गोलियां चलाकर, उसकी हत्या कर दी गयी।

हर्षिता कई मोर्चों पर संघर्षरत थी। हरियाणा की लोक गायिका और डांसर होने के नाते वह कलाकारों के अधिकारों के लिए भी संघर्ष कर रही थी। खबरों के मुताबिक अपने निजी जीवन में भी वह कई तरह के संघर्षों से गुजर रही थी।



अपनी बेबाकी, अपनी चेतना और साहस के कारण हर्षिता एक सशक्त महिला के बतौर उभर रही थी। कायरों ने उसकी हत्या करके अपनी बहादुरी तो साबित कर दी, लेकिन हरियाणा ने एक बहादुर और संभावनाशील लड़की को खो दिया।

हरियाणा के लोगों को इस हत्या के बाद उबल पड़ना चाहिए था और सरकार और कानून के रखवालों से हिसाब मांगना चाहिए था । उन्हें समाज की सड़ी हुई और हिंसक मानसिकता वाले तत्वों का बहिष्कार शुरू कर देना चाहिए था,लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। एक बार यह फिर से सिद्ध हुआ कि हत्या भले ही एक ज़िंदा लड़की की हुई हो, लेकिनबेशक वह मुर्दापरस्तों की बस्ती में रहा करती थी !

हर्षिता दहिया की हत्या की जाँच भी आनन-फानन में बहुत ही अजीब तरीके से हुई । हरियाणा पुलिस ने एक हफ्ते के भीतर इस मामले को सुलझा लेने का दावा किया था। हर्षिता की माँ की हत्या के मामले मेंपहले से जेल में बंद हर्षिता के बहनोई से यह कबूल करवा लिया गया कि उसी ने हर्षिता की भी हत्या करवायी है। खबरों के मुताबिक हर्षिता अपनी माँ की हत्या की एकमात्र चश्मदीद गवाह थी। जेल में पहले से बंद संगीन अपराध के एक आरोपी से यह कबूल करवा लेना कि उसी ने उसपर लगे आरोप के एक चश्मदीद की हत्या करवा दी, क्या बहुत कठिन काम है?


हर्षिता ने अपने कुछ पिछले फेसबुक लाइव में कुछ लोगों सेउसे मिल रही धमकियों की बात की थी। उसे फेसबुक प्रोफाइल पर सार्वजनिक रूप से भी धमकियाँ दी जा रही थीं। उसकी बातों से यह संकेत मिलता है, कि उसे धमकियाँ देने वाले उसके रिश्ते के लोग नहीं थे। यह अफसोसनाक है कि इस मसले पर हरियाणा पुलिस ने सभी ज़रूरी कोणों से जाँच करने की ज़रूरत नहीं समझी। मुमकिन हैकि अपने प्रतिरोधी स्वभाव, साहस और अपनी बढ़ रही लोकप्रियता की वज़ह से वह कुछ लोगों के निशाने पर हो।बहुत मुमकिन है कि हरियाणा पुलिस इस घटना के असल अपराधियों को उनके रसूख की वज़ह से बचा रही हो।

हरियाणा पुलिस के निष्कर्षो पर यकीन कर लेने से पहले हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि हाल ही में हरियाणा पुलिस के द्वारा गुड़गाँव के रेयान इंटरनेशनल स्कूल के एक छात्र प्रद्युम्नकी हत्या का मामला सुलझाने का दावा भी ग़लत साबित हुआ है। स्कूल के बस कंडक्टर अशोक को हरियाणा पुलिस ने न सिर्फ पीडोफ़ाइल और हत्यारा बताया बल्कि कथित तौर पर अशोक को टॉर्चर करते हुए ज़ुर्म भी कबूल करवा लिया था। बाद के सीबीआई जाँच में अशोक को निर्दोष पाया गया और एकदम अलग ही थियरी सामने आयी ।

इस घटना का एक और दुर्भाग्यपूर्ण पहलू मीडिया की खराब रिपोर्टिंग है। हर्षिता दहिया की हत्या को लेकर संवेदनशीलता के साथ न्याय की ज़रूरत पर बात करना तो दूर मीडिया में हर्षिता को लेकर घटिया, अपमानजनक और पूर्वाग्रह से ग्रस्त रिपोर्टिंग की गयी। उदाहरण के लिए न्यूज चैनल ‘आजतक’ की वेबसाइट पर लगायी गयी रिपोर्ट की भाषा पर ग़ौर कीजिए, जो कहती है कि-‘दिल्ली और हरियाणा की महफिलों की जान हुआ करती थी हर्षिता’! स्त्री विरोधी और असंवेदनशील भाषा का प्रयोग तो खैर हमारे देश की मीडिया के लिए कोई बड़ी बात नहीं है, लेकिन पूर्वाग्रह और घटियापने की हद देखिए, जब रिपोर्टिंग आगे कहती है कि ‘हत्या से पहले भी एक शानदार कार्यक्रम देकर लौट रही थी हर्षिता’!

सच्चाई यह है कि वह हरियाणा के पानीपत जिले में ऐसी सभा को सम्बोधित कर के लौट रही थी, जो विभिन्न जाति बिरादरियों में एकता स्थापित कर किसानों के हक़ में संघर्ष को तेज करने के उद्देश्य से आयोजित की गयी थी। उसकी हत्या से दो घंटे पहले के फेसबुक लाइव हर्षिता की फेसबुक वॉल पर मौजूद है, कोई चाहे तो इन्हें देख सकता है।


हरियाणा पुलिस की सुरक्षा व्यवस्था और जाँच प्रक्रिया पर सवाल उठाने के बजाय ‘आजतक’ हरियाणा पुलिस के हवाले से खबरें छाप रही थी कि, हर्षिता एक गैंगेस्टर थी और अपने लिए इंतकाम चाह रही थी! कितनी कमाल की थियरी है, एक इंतकाम चाहने वाली गैंगेस्टर निहत्थी गोलियाँ खाने के लिए निकल पड़ी थीं!

हर्षिता हरियाणा की उभरती लोक गायिका थी लेकिन उसकीजघन्य हत्या के मामले में सत्ता और विपक्ष तो छोड़िये वैकल्पिक राजनीति का दावा करने वाले हरियाणा के मुखर नेताओं में से भी किसी ने संवेदनशीलता के साथ प्रतिक्रिया देना तक ज़रूरी नहीं समझा। इस घटना को अब एक महीने से अधिक बीत चुका है। मीडिया से तो इस घटना से जुड़ीख़बरें तीन-चार दिन बाद ही ग़ायब हो गयी थी,हम सबने भी यह मानकर कि इस मामले में अब कुछ भी नहीं बचा है और यह मामला सुलझाया जा चुका है, उधर से ध्यान हटा लिया है। इस मामले में यदि कुछ बचा रह गया है, तो वह न्याय का प्रश्न है। कानून व्यवस्था का प्रश्न है। जीने के अधिकार का प्रश्न है। इस घटना के ज़िम्मेदारों कोचिह्नित करने का प्रश्न है। आगे से ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए क्या उपायकिये गये, इसका प्रश्न है ।

वैसे हम सब को आदतन यह सब भुला कर प्रसन्न हो जाना चाहिए! एक ‘नाचने गाने वाली’ की जिंदगी के वैसे भी क्या मायने! इंतकाम लेने निकली निहत्थी गैंगेस्टर लड़की का तो यही हश्र होना ही चाहिए था! सच यह है कि हरियाणा पूरी तरह सुरक्षित है। पूरा देश ही बहुत सुरक्षित है। हर तरफ न्याय ही न्याय है! सत्यमेव जयते!

परिचय :-शोधार्थी, हिन्दी विभाग, हैदराबाद विश्वविद्यालय
संपर्क:-priyankatangri@gmail.com
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अबोध पर अपराध थोपने के ख़तरे

प्रियंका
कल से आ रही ख़बरों के मुताबिक दिल्ली के एक स्कूल में नर्सरी में पढ़ने वाले चार साल के एक बच्चे पर, लगभग अपनी ही उम्र की एक सहपाठी के यौन उत्पीड़न का आरोप लगा है। बच्ची के अभिभावकों ने पुलिस में सहपाठी बच्चे के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करायी है। रेप के वास्तविक पीड़ितों के बार-बार गुहार लगाने के बावजूद भी एफआईआर तक दर्ज करने में आनाकानी करने के लिए बदनाम पुलिस ने तत्परता दिखाते हुए, इस आरोप को दर्ज़ भी कर लिया है। अब उस बच्चे पर ‘द प्रोटेक्शन ऑफ़ चिल्ड्रेन फ्रॉम सेक्सुअल ओफेंसस’ (POCSO) एक्ट के तहत मुकदमा चलाने की सम्भावना तलाशी जा रही है। अधिक विचलित करने वाली बात ये है कि मीडिया भी इस घटना की रिपोर्टिंग एक क्राइम रिपोर्ट की तरह कर रही है। चार साल के एक बच्चे को रेपिस्ट की तरह प्रस्तुत करने में कोई कसर नहीं छोड़ी गयी है। उदाहरण के लिए ‘आजतक’ ने इस घटना को एक बच्चे के द्वारा किये गए यौन शोषण की एक चौंका देने वाली घटना कहा है, और ‘जनसत्ता’ ने अपनी खबर में इसे बलात्कार की संज्ञा दी है!

अब तक जो तथ्य उभर कर सामने आये हैं, वो ये हैं कि बच्चे ने स्कूल के वाशरूम में अपनी सहपाठी के वेजाइना में ऊँगली और पेंसिल से चोट पहुँचाने की कोशिश की और बच्ची को इससे चोट पहुंची भी है। बच्ची ने घर जाकर अपनी माँ को पेट के निचले हिस्से में दर्द की बात बतायी और बाद में वह घटना भी बतायी जो उसके साथ घटी। जो कुछ हुआ वह बहुत दुखद है, लेकिन इसे यौन शोषण या बलात्कार की एक घटना की तरह प्रस्तुत करना इससे भी बहुत अधिक दुखद है। इस घटना को बच्चे के यौन दुर्व्यवहार के रूप में देखने की कोई तुक ही नहीं है। इस घटना को उस बच्चे के अपने परिवेश से ग्रहण किये गए नकारात्मक प्रभाव और उसमें विकसित हो रही हिंसक मनोग्रंथि के परिणाम के रूप में देखा जाना चाहिए। चार साल के बच्चे में कांशियस सेक्सुअल सेंस डेवलप नहीं होता, और जब तक ये सेंस डेवलप नहीं है, तब तक के किसी बच्चे की किसी एक्टिविटी को, चाहे वो सेक्सुअल ऑर्गन से ही क्यों न जुड़ी हो, यौन उत्पीड़न या यौन शोषण की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता है। उस बच्चे को काउंसलिंग की ज़रूरत है, और सिर्फ़ उसी बच्चे को नहीं आजकल के माहौल में अधिकतर बच्चों को लगातार ऐसी काउंसलिंग की ज़रुरत है। अगर उस बच्चे को एक अपराधी की तरह प्रस्तुत किया गया तो उसमें सुधार की सम्भावना बहुत क्षीण हो जाएगी। उस बच्चे का विकास अपराधबोध के साथ होगा और उसकी विकास प्रक्रिया इस बात से भी प्रभावित होगी कि उसके साथ होने वाले बर्ताव के पीछे लोगों के बीच बनी उसकी अपराधिक छवि कहीं न कहीं काम कर रही होगी, और यह सब तब होगा जबकि अपराध करने, नहीं करने सम्बन्धी निर्णय लेने की मानसिक क्षमता उसमें है ही नहीं।

इसके अलावा उस बच्ची के भीतर यौन उत्पीड़ित होने की भावना को भर देना, जबकि उसका यौन उत्पीड़न हुआ ही नहीं है, उस बच्ची के लिए भी सकारात्मक नहीं होगा। अपनी ही उम्र के बच्चों के साथ उसका सहज हो पाना कठिन होगा। हम एक फ़ॉर्मूले के तहत बच्चों को ये तो बता देते हैं कि गुड टच और बैड टच क्या है, लेकिन इस बैड टच करने वाले की उम्र और परिपक्वता भी इस मसले पर मायने रखती है, यह स्वयं अभिभावकों के लिए अच्छी तरह समझना बहुत आवश्यक है। इसतरह के टच, बैड टच होते हुए भी उसी श्रेणी में नहीं रखे जा सकते जिस श्रेणी में किसी परिपक्व व्यक्ति के बैड टच को रखा जाता है। कम उम्र के बच्चों को यह समझाना होगा कि उनकी उम्र का कोई बच्चा भी उनके प्राइवेट पार्ट को टच करे तो यह गलत है और उन्हें उसके लिए मना करना चाहिए और अपने अभिभावकों को भी इसके बारे में बताना चाहिए। लेकिन इसके बाद ये अभिभावकों की ज़िम्मेदारी है कि इस घटना पर उनकी प्रतिक्रिया प्रकट-अप्रकट रूप से भी ऐसी नहीं होनी चाहिए कि उनके बच्चे का यौन शोषण हुआ है। इस मसले पर अभिभावकों के बीच बातचीत होनी चाहिए और बिना कोई अपराधबोध स्थापित किये इस तरह के व्यवहार करने वाले बच्चों में सुधार की कोशिश की जानी चाहिए।



जिस उम्र में बच्चों में ठीक से बोध विकसित न हो उस समय तक बच्चों की सारी ज़िम्मेदारी अभिभावकों की होती है, और इसे स्वीकार करना चाहिए। मीडिया और सोशल मीडिया पर भी इस तरह की घटनाओं को लेकर प्रतिक्रिया बहुत संजीदगी के साथ व्यक्त होनी चाहिए। इस तरह का अपराधबोध अगर चार-पांच साल के बच्चों के बीच प्रचारित कर दिया जाए, तो इससे बच्चों के बीच न सिर्फ लैंगिक भेदभाव बढ़ेगा, बल्कि बच्चों की आपसी दुनिया और दायरे में भी एक किस्म की अजनबियत, भय और अविश्वास का माहौल तैयार हो जाएगा, जिस माहौल का शिकार आज लगभग हमारा पूरा समाज है। बच्चों की आपसी दुनिया भी जब बहुत असहज हो जाएगी, तब हमारी दुनिया और कितनी अधिक कृत्रिम, कितनी अधिक बदरंग हो जाएगी, इसकी कल्पना करना भी कठिन है।

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हिन्दुस्तानी शास्त्रीय गायन में महिला कलाकारों का योगदान

राकेश कलोत्तरा


पी.एच.डी. शोधार्थी,संगीत विभाग,दिल्ली विश्वविद्यालय,दिल्ली . सम्पर्क:  rakeshkalotra21@gmail.comमो. 9717655412

भारतीय शास्त्रीय संगीत का इतिहास वैदिक काल से ही माना जाता है. मानव और संगीत का इतना गहरा संबंध है ,जो उसके जन्म के साथ ही चला आ रहा है. प्राचीन साहित्य के उल्लेखों को देखतें हुए यह अनुमान लगाया जा सकता है कि जहां तक धार्मिक अवसर का संबंध था ब्राह्मण एवं क्षत्रिय दोनों वर्ग अपने जातिगत धर्म के अनुसार यज्ञादि में भाग लेते थे. यज्ञ में धार्मिक संस्कारों पर कन्याओं एवं यजमानों की पत्नियों का संगीत से संबंध प्राप्त होता है. साम-गायन जैसे धार्मिक अवसर तथा अन्य यज्ञ एवं धार्मिक संस्कारों के अवसरों से लेकर सामाजिक अवसरों तक में स्त्रियों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है .महाव्रत यज्ञ इत्यादि के अवसर पर साम गायक पुरुषों के साथ–साथ उनकी स्त्रियाँ गायन-वादन करती थीं. दास कुमारियों द्वारा नृत्य तथा  गाथाओं का गायन किया जाता था. संगीत संबंधी सभी अवसरों पर महिलाओं का विशेष सहयोग रहता था. ऋग्वेद में स्त्रियों के गायन और नृत्य की चर्चा गई है.

‘शतपथब्राह्मण’ तैत्तिरीय संहिता’ आदि में भी साम-गान स्त्रियों का विशेष कार्य माना गया तथा उस समय भी संगीत स्त्रियों का विशिष्ट गुण माना जाता था. महाभारत काल में भी स्त्रियों की संगीत में विशेष भूमिका रही है. जिसमें क्षत्रिय वर्ग की स्त्रियों द्वारा विराट पर्व में नृत्य कला की प्रस्तुतियाँ एवं ब्राह्मण कुल की स्त्रियों के साम गायन आदि के उल्लेख मिलतें हैं. देवगंधर्वो के साथ साथ मेनका, रंभा आदि अप्सराओं के नृत्य कारामायण काल में भी उल्लेख मिलता है| अनेक प्रकार के उत्सवों में स्त्रियों द्वारा गायन-वादन तथा नृत्य के कार्यक्रम प्रस्तुत किए जाते थे. महाभारत युग में भी संगीत स्त्रियों के लिए निषिद्ध नहीं था.


हरिवंश पुराण’ में ऐसा उल्लेख मिलता है कि यादवों का अत्यंत प्रिय गान छालिक्य गान था. विष्णु पर्व में ऐसापाया जाता है कि महाराजा अग्रसेन ने अपना राज्य-भार वसुदेव को सौंप कर श्री कृष्ण और यादवों के साथसमुद्र-यात्रा की थी. जिसमें सत्यभामा,रेवती के आलावा सोला सौ रमणियां भी श्री कृष्ण के साथ थीं औरयादवों ने अपनी पत्नियों को भी साथ लिया था. क्रीड़ा के समय विभिन्न नृत्य गीतों का आयोजन हुआ था. इसके लिये अप्सरा आदि नर्तकियां भी साथ थीं. इन अप्सराओं ने नृत्य, गीत,वाद्य में अपना योगदान दिया और नर्तकी रंभा ने असारित नृत्य के बाद अपने नृत्य से सबको विमुग्ध कर दिया था. यह उल्लेखनीय है कि प्रथम और द्वितीय शताब्दी में कई नट-नटिनियों की मूर्तियाँ मिलती हैं, जिससे यह प्रमाणित होता है कि उस कल में भी गीत, वाद्य, नृत्य आदि में महिलाओं का योगदान था. इस प्रकार की मूर्तियाँ हमें हिन्दू मंदिरों व बुद्ध विहारों में भी मिलती हैं. मुगलकाल के मोहम्मद शाह रंगीले के दरबार में गायिकाएं और नर्तकियां गायन, वादन, नृत्य और शास्त्र की विधिवत शिक्षा ग्रहण करतीं थीं. रामपुर की सदारंग परम्परा के प्रतिनधि आचार्य बृहस्पति के अनुसार मुगलकाल में अकबर के राज्य के समय में संगीत का उत्कर्ष चरम पर था. उनके दरबार में कई संगीतज्ञ थे, जिनमें तानसेन का नाम विशेष उल्लेखनीय है. तानसेन की पुत्री सरस्वती बड़ी कलाकार हुई जिसका विवाह मिश्री सिंह (नौबत खां) के साथ हुआ.



इसी काल में ग्वालियर घराना अपनी अष्टांग गायकी के लिये प्रसिद्ध रहा है. इस घराने की शिष्य परम्परा बहुत
बड़ी है. अन्य सभी संगीत घरानों का उद्गम भी इसी घराने से मन जाता है. इस घराने के काशीनाथ बुवा की
शिष्या सुशीला मराठे, बलदेव जी बुवा की शिष्या डॉ. सुमति मुटाटकर, गजानन बुवा जोशी की शिष्या मांजरेकर, पंडित ओंकारनाथ ठाकुर की शिष्या बिजनवाल, विनायक राव पटवर्धन की शिष्या कमल केलकर,कालिंदी केलकर एवं सुनंदा पटनायक, बलवंत राय भट्ट की शिष्या सुभद्रा चौधरी. पंडित गोविन्द राव राजुरकर की शिष्या मालिनी राजुरकर, पंडित कुमार गंधर्व की पत्नी वसुंधरा कोमकाली एवं शिष्या मीरा राव, पंडितशंकर राव बोडस  की पुत्री एवं शिष्या वीणा सहस्त्रबुद्धे, लक्ष्मण पंडित की शिष्या चित्रा चक्रवर्ती तथा आशालता करल्गीकर के नाम उल्लेखनीय हैं. इन गायिकाओं ने हिन्दुस्तानी शास्त्रीय गायन में अच्छी ख्याति आर्जित की. हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत के इतिहास के बारे में चर्चा की जाये तो इस क्षेत्र में अनेक महान विदुषी गायिकाएं हुई हैं. जिन्होंने शास्त्रीय संगीत को विकसित किया. इतिहास का कोई कालखंड ऐसा नहीं है जब महिलाओं ने अपनी कलाप्रियता एवं सृजन कौशल का परिचय न दिया हो. स्त्री और कला एक दूसरे की पर्यावाची हैं. स्त्री सृष्टि की वह सुंदर रचना है  जिसका संबंध ललित कलाओं से होना स्वाभाविक है. अर्थात गायन-वादन और नृत्य के गुण उसमें स्वभावतः पाये जाते हैं. गायन के क्षेत्र में महिला कलाकारों ने क्रियात्मक संगीत के साथ-साथ नित्य नवीन रागों का निर्माण एवं गायन शैलियों में नये जोड़ का समावेश कर अपनी सृजनात्मक प्रतिभा को अनन्त विस्तार दिया है.

इन महान गायिकाओं की निरंतर कठोर साधना, रियाज़, शिक्षातथा जिस लगन के साथ इस कला को उन्होंने अपनाया है उसे देखकर हम उनकेसामने नतमस्तक हो जाते हैं.हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत की अनमोल गायन परम्परा को आधुनिक काल में भी अनेक संगीत साधिकाओं ने अपनी योग्यता और सृजन क्षमता से भारतीय संगीत को अति उच्च स्थान पर पहुँचाया है. इनमें प्रमुख नाम हैं-सुश्री केसरबाई केरकर, किराना घराने की गान कोकिला हिराबाई बडोदेकर, जयपुर घराने की गायिका मोगुबाई कुर्डीकर, मल्लिका-ए- ग़ज़ल बेग़म अख्तर, गंगूबाई हंगल, डॉ. प्रभा आत्रे, गान सरस्वती किशोरीअमोनकर, शोभा गुर्टू, मालिनी राजुरकर, परवीन सुलताना और सुगम संगीत की अलौकिक आवाज़ की गायिका लता मंगेशकर आदि हिन्दुस्तानी संगीत के जगमगाते सितारे हैं. इन सब गायिकाओं ने अपने जीवन में अनेक कठिनाइयों का सामना करते हुए अपनी लगन तथा मेहनत से गायिकी में अपने आपको निपुण बनाने के लिए कठोर साधना की और शास्त्रीय गायन की समृद्ध परम्परा को आगे बढ़ाने में विशिष्ट भूमिका निभायी.

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“रूह कंपाने वाली यात्रा–डायरी”

चैताली सिन्हा 


शोधार्थी – जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय, भारतीय भाषा केंद्र
(हिंदी विभाग) . सम्पर्क:  .chaitalisinha4u@gmail.com


‘बनमाली गो तुमि पर जनमे होइयो राधा’
बांगला में गाया जानेवाला यह बाउल गीत बंगाली समाज में बहुत प्रचलित एवं कृष्ण को उलाहना देने के संदर्भ में है. बनमाली अर्थात् कृष्ण को राधा बनने और राधा के माध्यम से एक स्त्री के दर्द या स्त्री मन को समझने की ओर संकेत किया गया है. जिस प्रकार कृष्ण राधा को जीवनभर एक प्रेमिका ही बनाकर रखे और शायद कभी राधा की पीड़ा को नहीं समझ सके ठीक उसी प्रकार जब आप इस यात्रा डायरी को पढेंगे तो आप भी आश्चर्यचकित रह जाएंगे कि अंततः इस शीर्षक का कितना गहरा अर्थ है, जो अपने शीर्षक के अर्थ को सार्थक करती नज़र आती है. अक्सर हम एक ही स्थान पर रहते – रहते ऊबने और छटपटाने लगते हैं और हमें उस स्थान की हर चीज़ बुरी लगने लगती है, और एकबारगी को मन ऐसा भी होने लगता है कि बस यहाँ से दूर बहुत दूर किसी अनजान जगह पर जाकर सुख और चैन के दिन बिताएं ! परन्तु जब आप इस यात्रा डायरी को पढेंगे, उसी क्षण आपका मोहभंग और उस अनजान जगह जाने का सपना दिल से निकल जाएगा . ठीक उसी तरह जिस तरह की एक कहावत हमारे देश में प्रचलित है – “दूर के ढोल सुहावने होते हैं .” कहने का तात्पर्य वह नहीं जो अबतक आप समझ रहे थे, बल्कि वह जो अब आप समझ सकेंगे . इस ‘यात्रा’ को पढ़ते हुए भारत से इतर उन तमाम देशों में घटित होनेवाली ऐसी मार्मिक और रोंगटे खड़े कर देने वाली घटनाएं जिनके बारे में सुनकर और सोचकर कलेजा मुँह को आ जाता है . कल्पना मात्र से शरीर का पोर-पोर एक भयानक टीस का अनुभव करने लगता है. इसे पढ़ते हुए मन और शरीर के भीतर जो कोलाहल मची हुई थी उसे शब्दों में बयाँ करना बहुत-बहुत मुश्किल है . दिल्ली से आरम्भ होकर कब यह बोस्निया एवं क्रोएशिया की भावभूमि पर ठहर जाती है, पता ही नहीं चलता . सीमोन द बोउआर से आरम्भ होकर कब क्रोएशियन हाइकू कवि तोमिस्लाव मारेतिच तक पहुँच जाते हैं इसका भी ज्ञान बहुत बाद में होने लगता है. यूरोप की यात्रा करना किसे प्रिय नहीं होगा, यहाँ तक कि विश्व कवि रवीन्द्रनाथ टैगोर को भी प्रिय लगा होगा परन्तु इसी यात्रा के दौरान जो रचनाकार अपना अनुभव संसार उठा लाते हैं वह अद्भुत, रहस्यमय,अद्वितीय एवं अतुलनीय होते हैं. इस यात्रा डायरी में तमाम ऐसी घटनाएं उद्धृत की गई हैं जो साक्ष्य एवं आंकड़े सहित हैं. रचनाकार जब कुछ लिखते हैं तो तथ्यों सहित लिखते हैं, जिससे उनकी तटस्थता का आभास होता है. इतना ही नहीं बल्कि अपने अंतर्मन में न जाने कितने ही प्रश्नों के अंबार लगाए हुए वे अपनी घुमक्कड़ी प्रवृत्ति को अंजाम तक पहुंचाने को निकलते हैं. लिखने की सार्थकता पर विचार करते हुए गरिमा श्रीवास्तव एक बहुत बड़ा प्रश्न आज की उन युवापीढ़ी के बरक्स खड़ा करती नज़र आती हैं जब वह कहती हैं कि –“मेरे लिखने न लिखने से क्या फर्क पड़ता है . दुनिया में …………..किसी को जीवन पाथेय मिला .” (तद्भव/189). स्वयं के अनुभव से हम समाज को कितना कुछ दे सकते हैं, इस ओर भी इसका संकेत स्पष्ट है जहाँ वे अपनी बात भी टी.एस.इलियट के कथन से आरंभ करती हैं. यदि टी.एस.इलियट यह न कहते तो आज हमें भी यह वाक्य लेखिका के माध्यम से सुनने या पढने को नहीं मिलता – “डू आई डिस्टर्ब द यूनिवर्स .” परन्तु रचनाकार की घुमक्कड़ी प्रवृत्ति उन्हें विवश करते हैं अपने ही क़दमों से दुनिया को नाप लेने की . इस यात्रा डायरी को पढ़ते हुए सबसे पहला भ्रम तो यह टूटा कि अब तक जहाँ हम केवल अपनी डफली,अपना राग आलापते रहते थे, वह डफली इस यात्रा डायरी को पढ़ते हुए फट चुकी थी . यानी हमारी सीमित बुद्धि परिधि केवल भारतीय परिदृश्य तक ही फैली हुई होती है परन्तु यहाँ आप देश से ऊपर उठकर विश्व फ़लक में पहुँच जाते हैं और न केवल भारत देश में स्त्रियों की मार्मिक दशा का आपको ज्ञान होता है बल्कि विश्व की प्रायः प्रत्येक भूमि स्त्री पीड़ा की गाथा सुनाती नज़र आती है. आधी-आबादी कही जानेवाली स्त्री वास्तव में कितनी आधी-अधूरी और हीन भाव से देखी और समझी जाती है इसकी जानकारी हमें इस यात्रा डायरी से होने लगता है.

 प्रथम विश्वयुद्ध से लेकर द्वितीय विश्वयुद्ध तक जितने भी देशों ने एक-दुसरे देशों पर विजय पताका फहराई वहां हर पराजित देश ने न केवल अपना साम्राज्य खोया बल्कि वस्तुओं के साथ-साथ स्त्री अस्मिता को भी खाया, लूटा . क्या कारण है कि जिस उद्देश्य से युद्ध लड़ा जाता है वह उद्देश्य वहां की केंद्रबिंदु से हटकर स्त्री शोषण पर केन्द्रित हो जाती है? युद्ध में स्त्री अस्मिता का लूटा जाना क्या इस ओर संकेत नहीं कि आज भी स्त्री देह मात्र एक संपत्ति समझी जाती है. स्त्री देह ही स्त्री की दीन-हीन दशा का कारण है. तो क्या आधी आबादी कहा जानेवाला यह वेद वाक्य थोथा साबित नहीं हो जाता? और कितना समय अभी बाक़ी है स्त्री को मनुष्य समझने में? उसे मानव श्रेणी में रखने में? रचनाकार इस यात्रा में तमाम ऐसे आंकड़े बताती नज़र आती हैं जहाँ स्त्री का शोषण सर्व सैन्यों द्वारा बड़ा ही क्रूरता एवं वहशियाना तरीके से किया गया था – “सन 1992-95 के दौरान क्रोएशिया, बोस्निया, हर्जेगोविना में जो स्त्रियाँ सर्व सेनाओं के दमन का शिकार हुईं, लिली उनमें से एक है. युद्ध के दौरान बलात्कार, यौन हिंसा के हज़ारों मामले सामने आए कुछ मामले सरकारी फाइलों में दब गए,कुछ भुला दिए गए और कुछ शिकायतें वापस ले ली गयीं .” वहीं प्रथम विश्वयुद्ध एवं द्वितीय विश्वयुद्ध में कई देशों में सैन्य और अर्धसैन्य बलों ने सामूहिक बलात्कार की अनगिनत घटनाओं को अंजाम दिया . “प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान बेल्जियम और रशिया औरतों के लिए सामूहिक मरणस्थली बने, वहीं   कोरिया,चीन,फिलीपींस और जर्मनी में बड़े पैमाने पर स्त्रियों को घर्षित किया गया .” (तद्भव;पृ.200).सदियों से कुचली गई स्त्री अस्मिता का इतना भयानक एवं वीभत्स रूप देखकर आज स्त्री विमर्श की बात करना बेमानी सा लगता है. कौन-सी ऐसी मिट्टी है इस जहाँ में, जहाँ औरत को नंगा न किया गया हो? उसकी लुटी-पिटी अस्मिता में भी रस न लिया गया हो? मरकर फ़िर से मरने का मर्म केवल स्त्री समझती है, वह पितृसत्ता समाज नहीं जो आज स्त्री विमर्श जैसे शब्द से परहेज़ करता नज़र आता है.



अफ्गानिस्तान,अल्जीरिया,अर्जेन्टीना,बांग्लादेश,ब्राज़ील,बोस्निया,क्रोएशिया,सर्बिया आदि ऐसे अनेक देशों की लम्बी सूची है – जहाँ यौन हिंसा और स्त्री घर्षण की घटनाएं हुईं और बड़े-बड़े भाषणों,राजनैतिक समझौतों के बीच प्रतिरोधी आवाजें दबा दी गयीं . युद्ध के दौरान स्त्री का बलात्कार होना एक बड़ा प्रश्न यह खड़ा करता है कि क्या स्त्री पूरे परिवार के साथ-साथ उस समाज की धूरी का भी प्रतिनिधित्व नहीं करता ? जिसको विजित करने के लिए सर्वप्रथम उस परिवार या समाज की स्त्री को टारगेट किया जाता है. लेखिका के अनुसार सन 1991-1995 के दौरान सर्ब सैनिकों ने सैन्य कैम्पों, होटलों, वेश्यालयों में बड़े पैमाने पर यौन हिंसा के सार्वजनिक प्रदर्शन किए . बोस्निया और हर्जेगोविना पर जब तक सर्बिया का कब्जा रहा, किसी उम्र की कोई स्त्री ऐसी नहीं बची, जिसका शोषण  या बलात्कार न किया गया हो . इसी तरह इस यात्रा डायरी में लेखिका ने न जाने कितने ही ब्यौरे क्रमवार से हमारे समक्ष प्रस्तुत किए हैं,जिन्हें पढ़कर मन बजबजा जाता है और दुःख एवं आक्रोश से भर उठता है. फिर चाहे वह बांग्लादेशी स्त्रियों का पाकिस्तानी सैनिकों द्वारा किया गया घर्षण हो या युगांडा के सिविल वार और ईरान में स्त्रियों से ज़बरदस्ती यौन संबंध बनाने की घटना ? या फिर चीन के नानकिंग में जापानी सेना द्वारा स्त्रियों का सामूहिक यौन उत्पीड़न आदि . विकसित एवं प्रगतिशील कहे जाने वाले देशों में भी स्त्री के साथ इतना क्रूर व्यवहार होना संभव हो पाया है इससे बड़ा आश्चर्य और कुछ नहीं हो सकता . भूमंडलीकरण का दौर नया नहीं है,आज विश्वबंधुत्व की परिकल्पना भी नयी नहीं है बल्कि बीसवीं सदी में ही इसका शोर ज़ोर पकड़ चुका था . कहने का अर्थ यह है कि यदि विकसित देशों में भी स्त्री की इतनी भयावह स्थिति रह चुकी है तो विकासशील कहे जानेवाले देश (भारत) की स्थिति का सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है. परन्तु एक सच्चाई यह भी है जिस ओर लेखिका ने इशारा किया है कि इन देशों में किस क़दर बेरोजगारी एवं गरीबी है. जिसका आधार है ख़राब अर्थव्यवस्था .  इतनी ग़रीबी एवं बेरोज़गारी की समस्या कि छात्रों को अपने जेब खर्च हेतु दिहाड़ी पर काम करना पड़ता है, वह भी एक सीमित सीमा एवं ऋतु में . परन्तु यहाँ एक दूसरा तथ्य हमारे समक्ष यह भी है कि वहां के बाज़ारों में उत्पाद तो है परन्तु उपभोक्ता (क्रेता) वर्ग की कभी है. तुर्केबाना का ज़िक्र करते हुए लेखिका बताती हैं कि – “बाज़ार है,खरीददार नहीं . बड़ी – बड़ी दुकानें, जिनमें जूते की दुकानें बहुतायत में हैं,वे वीरान हैं. सामान है, सजावट  भी…..खरीदने वालों से निहारने वालों की संख्या कई गुना ज़्यादा है. आम-आदमी की क्रयशक्ति कमज़ोर हो चली ही . छात्र-छात्राएं ‘सेल’ के मौसम की प्रतीक्षा करते हैं.” (पृ.193).

इसी संदर्भ में आगे जाग्रेब के ‘सेकेण्ड हैण्ड’ मार्केट का ज़िक्र हमें मिलता है जहाँ की तुलना हम दिल्ली की ‘सरोजिनी’ अथवा ‘करोलबाग़’ मार्केट से कर सकते हैं. दिखावे की संस्कृति केवल भारत में ही नहीं जाग्रेब जैसे देशों में भी देखने को मिलती है. जहाँ खरीदारों की भीड़ दिल्ली के फुटकर विक्रेताओं की तरह लगी रहती है. एक बार प्रयोग में लाए जा चुके वस्तुओं को पुनः प्रयोग में लाने का प्रचलन, वह भी बड़े सस्ते एवं चाव से . यह ‘सो कॉल्ड शो ऑफ़ कल्चर’ ही तो है! यहाँ देखनेवाली बात यह है कि प्रवास में रहकर या घूम कर ही आप अपने देश के साथ साम्यता और वैसम्यता का ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं. इस यात्रा डायरी में आप पाएंगे कि रवीन्द्रनाथ ठाकुर का यूरोपीय देशों में उस समय यानी सन 1926 से ही कितना प्रभाव पड़ चुका था कि उनकी ‘गीतांजलि’ को लोग साहित्यिक कृति के रुप में सराहने लगे थे . सन 1926 में रवीन्द्रनाथ ठाकुर जाग्रेब गए और वहां से ‘रिएका’ का दौरा भी किया . लेखिका बताती हैं कि – “दार्शनिक पावाओ वुक पाब्लोविच (1894-1976) ने ‘गीतांजलि’ का क्रोएशियन में अनुवाद किया था जो जाग्रेब के दैनिक ‘भोर का पत्ता’ में 1914 की जानकारी में धारावाहिक रूप में छपा था . बाद में पावाओ ने ‘चित्रा’, ‘मालिनी’ और ‘राजा’ का भी अनुवाद किया . ‘चित्रा का मंचन ‘क्रोएशियन नेशनल थियेटर’ में 1915 में कई बार हुआ .” समय कितना मूल्यवान होता है इसका अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि आज कवि गुरु न जाने कहाँ होंगे परन्तु उनकी साहित्यिक योगदान आनेवाली पीढ़ी तक भी याद रखेगी . मुझे याद नहीं कि निम्नलिखित पंक्तियाँ किसकी है, परन्तु इतना याद है कि बचपन में मैं इसे अक्सर अपनी माँ और बड़ी माँ के मुँह से सुना करती थी –
“समय  चोलिया जाए, नोदिर स्रोतेर पांए                                                                                               जे जोन न बुझे तारे धिक्-शत-धिक् 
    बोलेछे सोनार घोड़ी (घड़ी),टिक-टिक-टिक
          जा किछु बाकी आछे कोरे फेलो ठीक
            बोलेछे सोनार घोड़ी टिक-टिक-टिक……….!”


संपूर्ण यात्रा डायरी स्त्री-यातना एवं उसकी करुण आहः और चीत्कार से भरा हुआ है. प्रायः हर देश का ज़िक्र मात्र ही है स्त्री दासता की कहानी, उसकी दयनीय दशा का चित्रण . यह यात्रा हमें उन देशों का सैर कराते हुए चलती हैं,जहाँ स्त्री को ग़ुलाम और यौन दासी बनाकर रखने का सिलसिला बहुत लम्बे समय तक चलता रहा . चाहे वह देश बोस्निया हो या हर्जेगोविना . इन दोनों देशों पर जब तक सर्बिया का कब्ज़ा रहा, किसी उम्र की कोई स्त्री ऐसी नहीं बची जिसका घर्षण या बलात्कार न किया गया हो . (पृ.203) इसका उदाहरण देख सकते हैं – “बोजैक बोस्नियाई विद्ध्यार्थी है, जो जाग्रेब में पढ़ता है, साथ ही कुछ रोजगार भी . उसकी उम्र पचास के ऊपर ही है, उसके सामने ही उसकी आठ वर्षीय बेटी और पत्नी को बार – बार घर्षित किया गया . बच्ची तीन दिन तक रक्त में डूबी रही, सैनिक उससे खेलते रहे,इस बीच कब उसने अंतिम सांस ली,पता नहीं .”
    

ओह! वाकई ‘लाइफ मस्ट गो ऑन’….……..! ऐसे ही न जाने कितनी हृदय विचलित कर देनेवाली घटनाओं का उल्लेख लेखिका ने इस यात्रा में किया है,जिसे पढ़ते ही आँखें शून्य और भीतर गहरे एक भयानक चीत्कार, हाहाकार से भर उठता है. दिल को यकीन दिलाना कठिन हो जाता है यह पढ़कर कि किस तरह का क्रूर एवं अमानवीय व्यवहार सर्ब सैनिकों द्वारा मुस्लिम स्कूली लड़कियों के साथ किया गया . किस प्रकार यौन हिंसा एवं उन्हें ग़ुलाम बनाकर रखा जाता था . नस्लीय एवं जातीय भेद का कडुवा अनुभव यहाँ पढने को मिलता है. बोस्नियाई बच्चियों के साथ जो दुर्व्यवहार सैनिकों द्वारा किया गया उसे पढ़कर वाकई कभी – कभी यह एहसास होने लगा था कि एक औरत के साथ इससे बदतर और कुछ हो ही नहीं सकता . इन घटनाओं को पढ़ते हुए ऐसा अनुभव हुआ कि स्त्री न केवल अपने देश में बल्कि वैश्विक धरातल पर भी कितनी कुचली एवं प्रताड़ित की जाती रही है. इस पूरे यात्रा वृतांत से एक बात हमें यह भी जानने को मिलती है कि लेखिका का भाषा पर ज़बरदस्त अधिकार है, जो स्थान विशेष पर बोली जानेवाली भाषा का प्रयोग करती जान पड़ती हैं . दिल्ली की खड़ी बोली से शुरू होकर कोलकाता की बांगला,बिहार की भोजपुरी,अंग्रेजी,बोस्निया,क्रोआतिन (क्रोएशियाई) और न जाने क्या – क्या . यह एक ख़ास विद्वता है जो प्रतिभाशाली व्यक्तित्व की पहचान है. जब हम क्रोएशिया की बात करते हैं तो वहां की भयावह स्थिति का ज्ञान होता है जहाँ लेखिका इस यात्रा डायरी में बतातीं हैं कि असल में क्रोएशिया का इतिहास युद्ध का इतिहास है. सन 1991 तक संयुक्त युगोस्लाविया का अंग रहा क्रोएशिया अपने भीतर युद्ध की अनगिनत कहानियों को लिए मौन है.

स्लोवेनिया,हंगरी,सर्बिया,बोस्निया,हर्जेगोविना और मांटेग्रो से इसकी सीमाएं घिरी हैं. आज के 21,851 वर्ग मील में फैले क्रोएशिया ने एक तिहाई भूमि युद्ध में खो दी . लेखिका इसका उदाहरण प्रस्तुत करते हुए लिखतीं हैं –“भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद् की ओर से क्रोएशिया के जाग्रेब विश्वविद्यालय में जब उन्हें अध्यापन के लिए भेजा गया तो पूर्वी यूरोप के इस भाग में युद्धोत्तर यूरोप के जीते-जागते साक्ष्यों से उनके सामने एक ऐसा चेहरा प्रस्तुत किया गया जो उनकी दैनन्दिनी का हिस्सा बना .” क्रोएशिया के संदर्भ में जो सबसे चौंकाने वाली बात लेखिका बताती हैं कि किस प्रकार यह सेक्स ट्रेफिकिंग के लिए पश्चिमी यूरोप के प्रमुख द्वार का काम करता है,जहाँ  स्लोवेनिया,बोस्निया और सर्बिया से औरतों,लड़कियों को आसानी से लाया जाता है. बहुत ही भयावह!
  



उपर्युक्त जानकारियाँ किसी भी सभ्य समाज एवं देश की संस्कृति के लिए सबक लेने जैसा कार्य हो सकता है, जहाँ एक ओर तो स्त्री को देवी एवं पूज्या बनाई जाती हैं और वहीं दूसरी ओर उसी स्त्री की अस्मिता की चिंदी-चिंदी उड़ाई जाती है. उसे केवल मात्र एक देह एवं भोग्या समझकर उसका दलन किया जाता है. जिस स्त्री के सम्मान मात्र से देवता  के वास होने के वेद-वाक्य कहे गए हैं वहीं स्त्री का केवल और केवल अपमान एवं शोषण होता दिखाई देता है. उसे मानव समझने में जब तक समाज सक्षम नहीं होगा, तब तक स्त्री अस्मिता लुटती रहेगी . )
“फिर भी कहते हो कह डालूं, दुर्बलता अपनी बीती
                 तुम सुनकर सुख पाओगे, देखोगे यह गागर रीति .”

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महिला सरपंच : संप्रभुता का सवाल (प्राथमिक डाटा के आधार पर महिला सरपंचों की वास्तविक स्थिति का अध्ययन)

शंभु गुप्त / अस्मिता राजुरकर

भूमिका :
भारत गणराज्य के महाराष्ट्र राज्य में पंचायती राज्य विधेयक 1992 के तहत ग्रामपंचायतों में महिलाओं को 50 प्रतिशत आरक्षण प्राप्त है। इसमें सरपंच तथा ग्राम पंचायत समिति सदस्य दोनों पदों पर महिलाओं को आरक्षण प्राप्त है।

उक्त आरक्षण के तहत समस्त ग्राम पंचायतों के सरपंचों की कुल संख्या का आधा हिस्सा महिला सरपंच है। गत कई वर्षों से हम वर्धा जिले की कुछ तहसीलों की ग्राम पंचायतों की महिला सरपंचों का एक व्यापक प्रश्नावली के तहत अध्ययन कर रहे हैं। इस प्रश्नावली में जाति तथा वर्ग के अतिरिक्त जेंडरगत दृष्टि को सर्वेक्षणात्मक अध्ययन का आधार बनाया गया है। महिला सरपंचों की सामाजिक और  राजनीतिक के साथ-साथ व्यक्तिगत जेंडरगत अस्मिता का परिप्रेक्ष्य प्रधानता के साथ लिया गया है।

प्रस्तुत आलेख में हमने वर्धा जिले की वर्धा तहसील की बोरगांव (मेघे) ग्राम पंचायत की महिला सरपंच योगिता देवढे के साथ कई बैठकों (06 जुलाई, 2017, 18 जुलाई, 2017 तथा 27 जुलाई, 2017) में पूरी हुई लंबी बातचीत में प्रमुखता के साथ उभरकर सामने आए मुद्दों को उजागर किया है। इस आलेख में पहले इस बातचीत में उभरे प्रमुख मुद्दों की चर्चा होगी तथा उसके बाद इस साक्षात्कार के संपादित अंश प्रस्तुत किए जाएंगें।

सुश्री योगिता देवढे न केवल अन्य सरपंचों (इनमें महिला सरपंच भी शामिल हैं) में अत्यधिक सक्रिय, कार्य-तत्पर तथा समर्पित महिला सरपंच हैं, बल्कि अपेक्षाकृत एक बड़ी ग्राम पंचायत (बोरगांव (मेघे) ) की महिला सरपंच हैं। इस ग्राम पंचायत में छः वार्ड हैं और कुल जनसंख्या तीस हजार से उपर है।

प्रस्तुत आलेख महाराष्ट्र राज्य की महिला सरपंचों संबंधी हमारे विस्तृत अध्ययन का एक बानगी-स्वरूप सर्वेक्षण है। योगिता देवढे से प्राप्त सूचनाएँ , आंकड़े, स्थिति-विवरण इत्यादि सामान्य रूप से इस तथ्य की पुष्टि करते हैं कि महाराष्ट्र राज्य में अधिकांश सक्रिय महिला सरपंच लगभग इन्हीं स्थितियों में कार्यरत हैं। योगिता देवढे के साथ लंबी बातचीत में जो तथ्य, मुद्दे, समस्याएँ, स्थितियाँ आदि उभरकर सामने आयी है, वे लगभग सर्वसामान्य स्थितियाँ हैं। (इस बातचीत में प्रो. शंभु गुप्त, डॉ. सर्वेश जैन, सुश्री अस्मिता राजुरकर शामिल थे)।

योगिता देवढे के सार्थ तीन बैठकों में हमारी आमने-सामने यह मौखिक बातचीत हुई, वह एक विस्तृत प्रश्नावली पर आधारित थी। बाद में योगिता जी से इन प्रश्नों के लिखित उत्तर भी लिए गए जो विस्तार के साथ मराठी में लिखकर उन्होंने हमें दिए।

साक्षात्कार की इस लंबी और व्यापक प्रक्रिया एवं प्रविधि के जो परिणाम हमें उपलब्ध हुए. उनका विवरण निम्नलिखित बिंदुओं के रूप में समेकित किया जा सकता है।

1. राजनीतिक सहभागिता एवं नेतृत्व का प्रश्न

हमारी साक्षात्कार अनुसूची के प्रथम नौ प्रश्न महिला नेतृत्व से संबंधित ही थे जिनमें हमने यह जानने की कोशिश की कि सरपंच बनने की इच्छा उनकी स्वयं अपनी थी या किसी और के कहने, किसी और की इच्छा के अनुसार उन्होंने सरपंच का चुनाव लड़ने का निश्चय किया था। इसी से जुड़ा हुआ दूसरा सवाल यह था कि क्या चुनाव के दौरान केवल उनका नाम चलाया गया था? क्या एक उम्मीदवार के रूप में वे स्वयं व्यक्तिगत तौर पर चुनाव प्रचार में सक्रिय थीं? चुनाव पंचार की रणनीति किसने बनायी? उसमें उनका खुद का कितना योगदान रहा? चुनाव प्रचार में इनकी उपस्थिति वास्तविक थी या प्रतीकात्मक-मात्र? चुनाव जीवने के बाद उसका श्रेय और स्वागत किसे दिया गया? इत्यादि।

इन सभी प्रश्नों के उत्तर के रूप में जो कुछ योगिता जी ने कहा उसका निष्कर्ष लगभग यही है कि उनकी स्वयं की इच्छा भी थी और उनके पिता, भाई, मामा आदि भी चाहते थे जिनकी सामाजिक कार्यों एवं राजनीति में पहले से सक्रियता थी। विशेषतः उनके पिता चाहते थे कि उनकी बेटी सरपंच बने।

वह आईएएस की पत्नी नहीं निर्वाचित मुखिया हैं, महिला-नेतृत्व की मिसाल

कह सकते हैं कि उन्हें अपने पितृ-परिवार की ओर से पूरा-पूरा सहयोग मिला किन्तु बाद में उनमें स्वयं भी सरपंच बनने की राजनैतिक इच्छाशक्ति जागृत हुई जो उनके चुनाव प्रचार कार्यक्रम, रणनीति, कार्य-विधि इत्यादि के रूप में उजागर हुई। उनकी बातचीत से स्पष्ट होता है कि चुनाव प्रचार के दौरान नेतृत्व उनके स्वयं के हाथ में था या उसे उन्होंने अधिकांशतः अपने स्वयं के हाथ में रखने की कोशीश की थी।

हालांकि 18 जुलाई, 2017 को उनके साथ हुई एक अनौपचारिक बातचीत में उन्होंने मौजूदा राजनीतिक माहौल के अपराधी प्रवृतत्ति वाले लोगों से भरे होने की शिकायत की थी और बताया था कि आज राजनीति में अपराधी प्रवृत्ति हावी है। राजनीतिक हल्कों की भाषा उद्दंडता-भरी और गंदी हो गई है। इस तरह की भाषा में दक्ष होना मुझे अप्रिय था इसलिए कई बार राजनीति में आने का मन नहीं होता था।

चूँकि योगिताजी के मन में राजनीति में सक्रिय होने और सरपंची का चुनाव लड़ने और उसकी कमान अपने हाथ में रखने की आकांक्षा और अनुभव अर्जित हो गया था इसलिए जब चुनाव जीतकर वे आईं तो उन्हें यह ठीक ही लगा कि एक महिला राजनितिकर्मी के रूप में यह उनको अपनी ही जीत हुई है। हालांकि बातचीत में उन्होंने यह भी माना था कि चूँकि उनके पितृ-परिवार, पिता, भाई इत्यादि की सामाजिक सक्रियता के कारण एक व्यक्ति के रूप में गांव के लोग पहले से उन्हें जानते थे, अतः जब वो सरपंची का चुनाव लड़ीं तो लोगों ने उन्हें अपना ही समझा।

उक्त विवरण से यह स्पष्ट होता है कि जब तक महिलाओं को यह महसूस नहीं होगा कि एक व्यक्ति के रूप में राजनीतिक नेतृत्व की आकांक्षा वे अत्मसात कर सकती हैं तब तक रजनीति में उन्हें स्वायत्त पहचान नहीं मिल सकती। योगिता जी को यह पहचान इसलिए मिली कि उन्हें शीघ्र ही यह महसूस हो गया कि वे राजनीति में सहजसा के साथ आगे बढने की इच्छा रख सकती हैं।

2. पारिवारीक हस्तक्षेप एवं पारिवारीक दायित्व और राजनीतिक सक्रियता –

हमारी साक्षात्कार अनुसूची के अगले छः प्रश्न इस सन्दर्भ से जुड़े हुए थे कि सरपंच बनने के बाद एक स्त्री (पुत्री, पत्नी एवं माँ) के रूप में उनके दायित्वों में क्या बदलाव आया? उनके राजनैतिक कार्यक्रलापों में, निर्णयों में, उनके पारिवारिक संबंधी (पिता, पति एवं अन्य कुटुम्बीजन) कितना हस्तक्षेप करते हैं तथा उनकी राजनीतिक गतिविधियों पर अंकुश लगाने की कोशिश करते हैं।

भारतीय पितृसत्तात्मक समाज एवं राज्य-व्यवस्था का यह कटुतम सत्य है कि यहाँ स्त्रियों की पहचान एक व्यक्ति के स्थान पर उनके सामाजिक संबंधों के माध्यम से होती है। पुत्री, पत्नी और माँ इत्यादि की सीमा-रेखाएँ उसे अपनी अस्मितागत पहचान से सदैव महरूम रखती हैं। पंचायती राज व्यवस्था में महिलाओं के लिए किया गया आरक्षण भी इस स्थिति को तोड़ नहीं पाया है। इसीलिए जब भी कोई महिला राजनीति में सक्रिय होती है और किसी पद पर पहुँचती है तो उसके स्वयं के पारिवारिक लोग उस पर हावी होने, उसे एक रबर स्टाम्प बनाने तथा उसके कंधे पर रखकर बंदूक चलाने की हैसियत में उसे ले आने का हर संभव प्रयास करते हैं। हालाँकि यंत्र-तत्र, यदा-कदा इसके कुछ अपवाद भी मिल जाते हैं। किंतु वे अपवाद ही हैं। इसीलिए जब हमने योगिता जी से यह सवाल किया कि सरपंच बनने के बाद आपके पारिवारिक दायित्वों में क्या गुणात्मक एवं मात्रात्मक परिवर्तन आया तो उन्होंने हमें कई ऐसे तथ्यों से अवगत कराया जो राजनीति में एक महिला की अन्तहीन संघर्षशील दिनचर्या की सूचना देते हैं। इस बातचीत में उन्होंने हमें बताया कि जब वे घर पर होती हैं तो एक माँ और पत्नी के रूप में होती हैं और पंचायत में होती हैं तो एक राजनीतिक कार्यकर्ता के रूप में होती हैं। इस बातचीत में उन्होंने हमें यह भी बताया कि कभी-कभी जब बहुत अधिक राजनीतिक व्यस्तता होती है तो घर और बच्चों की जिम्मेदारी वे पति के सहारे छोड़कर अपने काम पर निकल जाती हैं; हालाँकि घर और बच्चों की चिन्ता लगातार उन्हें रही आती है. लेकिन इससे यह तो सूचना मिलती ही है कि पुरूष वर्ग ने अब इस हकीकत को स्वीकार कर लिया है कि यदि उनकी पत्नी राजनीति में है तो उन्हें घर के उसके दायित्वों में सहभागी होना पड़ेगा।

पंचायतों में महिलाओं के आरक्षण का यह असर तो हुआ है कि पुरुषों में स्त्रियों के साथ सहकारिता, सहयोग की भावना बढ़ी है। शायद यही कारण है कि योगिता जी के पति (श्री राजू देशमुख) घर की जिम्मेदारियों से लेकर बच्चों की पढ़ाई-लिखाई का ज़िम्मा भी स्वयं सँभालते हैं और अपनी पत्नी को यह अवसर देते हैं कि वह अपने सार्वजनिक राजनीतिक दायित्वों को बख़ूबी निभा सके। श्री राजू देखमुख ने इस हकीक़त को जल्दी पहचान लिया तो इसका एक कारण यह भी है कि वे स्वयं सुशिक्षित हैं और एक पॉलीटेक्नीक कॉलेज में व्याख्याता हैं। हालाँकि सभी सुशिक्षित पति इतने खुले दिल के और  उदार नहीं होते किन्तु महिला आरक्षण व्यवस्था की सफलता के लिए यह आवश्यक है कि पति लोग अपना अंकुश ढीला करें। योगिता देवढे एक मानक महिला सरपंच के बतौर इसलिए भी हमें प्रतीत होती हैं कि एक व्यक्ति के रूप में वे सुदृढ़ इच्छाशक्ति और निर्णय-क्षमता की योग्यता से सम्पन्न हैं। उनके व्यक्तित्व में ढुलमुलपन, दुविधाग्रस्तता की प्रवृत्ति नहीं है इसीलिए उनके प्रति उनका परिवार, पति एवं अन्य कुटुम्बीजन आश्वस्त रहते हैं तथा उन पर पूरा भरोसा करके चलते हैं। एक बार की बातचीत में (06/05/2017) में उन्होंने बताया था कि परिवार के लोग मुझे जिम्मेदार मानते हैं। अपने दृढ़निश्चयी और प्रबल इच्छाशक्ति के बल पर ही वे यह मनवा पायी हैं कि बौद्धिकता में महिलाएँ पुरुषों से कमतर नहीं होतीं। स्पष्टतः कहा जा सकता है कि योगिता देवढे जैसी जिम्मेदार महिलाएँ ही पंचायती राज विधेयक के इन उद्देश्यों और प्रतिज्ञाओं को वास्तविक रूप में अमली जामा पहना सकती हैं  जो महिला-समानता और सशक्तीकरण हेतु निश्चित की गई हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि यहाँ हमें ‘सरपंच-पति’ जैसी उस बीभत्स और हास्यास्पद स्थिति से निज़ात मिलती दिखायी दे रही है जो आज कई राज्यों में एक भयावह रूप ले चुकी है। पत्नी कहने भर को सरपंच है किन्तु उसके सारे काम यहाँ तक कि उसके एवज़ में बैठकों में शामिल होना, उच्च अधिकारियों से मिलने जाना, आम जनता से संपर्क इत्यादि सभी कार्यों में सरपंच जी के पति महाशय मूँछों पर ताव देकर सक्रिय रहते हैं। महाराष्ट्र में अन्य राज्यों की अपेक्षा ‘सरपंच-पति’ ‘प्रधान-पति’ जैसी स्थितियाँ अपेक्षाकृत कम हैं। जब तक सरपंच-पति, प्रधान-पति जैसी स्थितियाँ पूरी तरह समाप्त नहीं होंगी; पंचायती राज व्यवस्था में महिलाओं के आरक्षण का ठोस और सकारात्मक परिणाम आगे नहीं आ पायेगा।
3. राजनीति में महिलाएँ: संप्रभुता का सवाल

योगिता देवढे के साथ लम्बी बातचीत में जिस मुद्दे पर सबसे ज्यादा चर्चा हुई और जो सबसे बड़े  सवाल के रूप में उभरकर आया वह था- राजनीति में महिलाओं की संप्रभु स्थिति। अन्य शब्दों में संप्रभुता को स्वायत्तता भी कहा जा सकता है। कानून अपनी जगह होता है, उसके प्रावधान, उसकी मंशाएँ अपनी जगह होती हैं किन्तु जो मनुष्य-समाज, राजनीतिक व्यवस्था, शासकीय यंत्रणा (मशीनरी) इत्यादि उसे अपनाती और क्रियान्वित करती हैं, वे अपने स्वरूप में अलग होती हैं। यानी कि क़ानून के प्रावधानों और उसे अपनाने और क्रियान्वित करने वाली इकाइयों के बीच पारस्परिकता और सहकारिता की स्थितियाँ यदि नहीं हैं तो कितना भी अच्छा कानून हो और कितने भी अच्छे उसके प्रावधान हों: वे एक ज़मीनी हकीक़त के रूप में दृष्टिगोचर नहीं हो सकते।

महिला अधिकारः वैधानिक प्रावधान

पंचायती राज व्यवस्था में महिलाओं के आरक्षण से सम्बन्धित बहुत ही महत्वपूर्ण और ज़रूरी यह क़ानून भी भारतीय समाज के इसी गुंजलक में फँसा नज़र आता है। इस सर्वेक्षण एवं अलग-अलग महिला सरपंचों से हमारी बातचीत का ज़्यादातर सम्बन्ध इसी सन्दर्भ से था। यह कितनी विचित्र और अफ़सोसनाक स्थिति है कि राजनीति में सक्रियता के हमारे पैमाने, प्रस्तावनाएँ, प्रविधियाँ इत्यादि  महिलाओं और पुरुषों के सन्दर्भ में कितने अलग-अलग और दोगले हैं। मंच पर हम स्त्री-जाति को न जाने किस-किस रूप में कितना-कितना महान बताने में कोई कसर नहीं उठा रखते लेकिन मंच से उतरते ही और फिर घर पहुँचते ही हम वही सर्वशक्तिमान बन जाते हैं जिसके अधीन सारी क़ायनात होनी चाहिए! यह कितना विचित्र है कि पुरुष जब राजनीति में सक्रिय होता है तो उसके संबंध में हम ‘संप्रभुता’ का सिद्धान्त निरूपित करते हैं लेकिन जब स्त्री की राजनीतिक सक्रियता की बात आती है तो उसे ‘स्वायत्तता‘ में रिड्यूस कर देते हैं। इस संदर्भ में स्वायत्तता (Autonomy) की उत्पत्ति के इतिहास का सन्दर्भ लिया जा सकता है। यह सन्दर्भ स्पष्ट करता है कि स्वायत्तता पूर्ण स्वतन्त्रता के स्थान पर एक सीमित स्वाधीनता है। पंचायती राज व्यवस्था में महिला सरपंचों की राजनीतिक नियति अपने उच्चतम रूप में भी इस स्थिति से आगे नहीं जा पाती। इसे एक विडंबना ही कहा जाएगा कि राजनीति में संप्रभुता का स्वप्न देखने वाली महिलाएँ अपनी उच्चतम स्थिति में भी संप्रभुता के स्थान पर मात्र स्वायत्तता को छू पाती हैं। आखिर  इसका क्या कारण है? क्या भारत सरकार, राज्य सरकारों के पंचायती राज विधेयकों में कोई इस तरह के अव्यक्त छिद्र हैं, जिनका लाभ पितृसत्तात्मक व्यवस्था उठाती है? क्या इन विधेयकों के इन हिडन लूप-होल्स की तहकीकात नहीं की जानी चाहिए जो जाने-अनजाने यहाँ रखे गए हैं ? क्योंकि असमानता, उँच-नीच, छोटा-बड़ा जैसे प्रत्यय स्त्री और पुरुष पर लागू नहीं होते। इन दोनों की भिन्न इयत्ताएँ हैं जो एक तरफ नैसर्गिक हैं तो दूसरी तरफ अपने-आप में पूर्ण अर्थात संपूर्ण हैं। अतः एक श्रेष्ठ पंचायती राज क़ानून वही हो सकता है जो स्त्री को अपनी राजनीतिक सक्रियता में संप्रभुता की स्थिति तक पहुँचा सके।

योगिता देवढे के साथ इस लम्बी बातचीत में हमने यह पाया कि बावजूद अपनी प्रबल इच्छा-शक्ति, दक्षता और कार्यशीलता की योग्यता रखने के एक स्त्री किस तरह राजनीति के क्षेत्र में हीन समझी जाती है और हतोत्साहित की जाती है! यह एक भारी विडम्बनात्मक स्थिति है.

4. राजनीति और लैंगिकता 


इस आलेख में यहाँ ‘संप्रभुता’ की जो बात की जा रही है उसका एक विशिष्ट संदर्भ है। वह संदर्भ है – लैंगिकता। जेंडर-दृष्टि। जेंडर गेज। अर्थात वह पैमाना जिसके आधार पर स्त्री और पुरुष के बीच श्रेष्ठता और हीनता का विभेद करके हम चलते हैं। लैंगिकता जैसे नैसर्गिक तत्व के आधार पर श्रेष्ठता और हीनता का विभेद करना न केवल प्रकृति बल्कि समाज की भी एक श्रेष्ठ व्यवस्था के विरुद्ध है। योगिता देवढे की बातचीत में बार-बार यह तथ्य सामने आता है कि लैंगिकता के आधार पर परिवार, समाज, सरकारी मशीनरी, साथ में काम करने वाले लोग इत्यादि सब के सब स्त्री और पुरुष को अलग-अलग निगाह से देखते हैं। अपने एक संवाद में योगिता कहती हैं, ‘‘राजनीतिज्ञ और अधिकारी वर्ग पुरुषों को अधिक महत्व देते हैं। पुरुष अधिकारीगण, सरपंच अगर महिला है तो, उसे महत्व न देकर उप-सरपंच पुरुष को महत्व देते हैं।’’ (18 जुलाई, 2017 को हुई बातचीत के आधार पर)। इसका एक पहलू यह भी है कि सरपंच यदि महिला है तो अधिकारीगण उसके साथ असहयोग करते हैं। पुरुष अधिकारियों की यह दृढ़  मान्यता होती है कि महिलाएँ सही निर्णय नहीं ले सकतीं, उनमें बौद्धिकता का अभाव होता है; आदि-आदि। जबकि वस्तुस्थिति यह है कि जान-बूझकर ऐसा माहौल बनाया गया है कि महिला सरपंच स्वतन्त्र रूप से कोई निर्णय न ले सकें। वे हर स्तर पर पुरुषों से पूछ-पूछकर काम करें और यदि ऐसा न करें तो उन्हें सबक सिखाया जाए! योगिता ने एक स्थान पर कहा “सभी महिलाएँ निर्णय नहीं ले सकतीं क्योंकि वे अधिकारियों से डरती हैं। उन्हें लगता है कि यह अधिकारी जो पुरुष है वह कुछ भी कर सकता है। महिलाओं में काम करते वक्त पुरुषों को लेकर एक डर-सा पैदा हुआ रहता है।’’ (27 जुलाई, 2017)। योगिता देवढे ने अपनी बातचीत में कई बार इस तथ्य को रेखांकित किया कि राजनीति में सक्रिय महिलाओं को पुरुषों के लैंगिक अहंकार का बार-बार सामना करना पड़ता है। महिला राजनीति की यह एक सामान्य चुनौती मानी जा सकती है कि उसे सबसे पहले लैंगिकता की लड़ाई लड़नी पड़ती है, जिसके लिए वह उत्तरदायी नहीं है।

योगिता देवढे की बातचीत में यह तथ्य सामने आया कि एक महिला सरपंच चाहे कितना भी अच्छा काम कर ले उसे पुरुष अधिकारियों की ओर से कभी योग्य ‘प्रतिसाद’ (उत्साहवर्द्धन/प्रशंसा) नहीं मिलता। यह योगिता का अपना अनुभव भी है और यह लगभग अधिकांश महिला सरपंचों का अनुभव भी है। यह सचमुच घनघोर दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है और पंचायती राज में महिलाओं के आरक्षण संबंधी बिल की मूल भावना के खिलाफ है।

पुरुष किस तरह से अपनी श्रेष्ठता-ग्रंथि की गिरफ्त में रहते हैं तथा एक कर्मठ व योग्य महिला सरपंच को भी ढंग से काम नहीं करने देते; इसका बहुविध उल्लेख योगिता देवढे ने अपनी बातचीत में किया है। उन्होंने कहा कि कई पुरुष यह कोशिश करते हैं कि ग्रामसभा आयोजित न हो और यदि हो भी तो पंवाड़ा शुरू कर देते हैं। यह पंवाड़ा इस रूप में होता है कि वे कुछ ऐसे मुद्दे, विषय सामने ले आते हैं जिनकी न तो कोई सामूहिक प्रासंगिकता होती है और न ही जिनका असल समस्याओं से कोई लेना-देना होता है। पंवाड़ा करने वाले ये लोग असामाजिकता की हद तक चले जाते हैं, असामाजिक तत्वों के साथ इनका उठना-बैठना होता है और ये दबंगई करते हैं। कुछ नागरिक, अन्य सदस्य तथा कुछ दूसरे पुरुष इनका सहयोग करते हैं। महिला सरपंचों को इस स्थिति का सामना कई बार करना पड़ता है। कई बार स्थिति यहाँ तक पहुँच जाती है कि पुलिस की सहायता लेनी पड़ती है। योगिता देवढे ने लैंगिकता के आधार पर महिला सरपंचों को हतोत्साहित किए जानेवाला एक तथ्य यह भी उजागर किया कि पुरुषों का एक समूह एक स्त्री के रूप में उन्हें बदनाम करने, चरित्र पर सवाल उठाने, अपशब्दों से भरी भाषा का उपयोग करने, उनके विषय में गलत और झूठा प्रचार करने जैसे कामों में लगा रहता है। इसे सामान्यीकृत भी किया जा सकता है क्योंकि स्त्रियों के प्रति पुरुषों की दृष्टि और रवैया ग्रामीण क्षेत्रों में ज़्यादातर लगभग यही है। इन सारी स्थितियों को देखते हुए कोई गरिमामय, आत्मसम्मान-युक्त महिला आखिर कितने दिन तक राजनीति में बनी रह सकती है और आगे बढ़ सकती है? या तो  राजनीति से उसका मोह भंग हो जाएगा या फिर उसमें स्वयं को अनफिट मानते हुए वह उससे किनारा कर लेगी। राजनीति से महिलाओं का अलगाव और कुछ समय के बाद उससे उनका ‘ड्रॉप-आउट’ भारत में गाँव से लेकर महानगर तक की एक आम समस्या है। योगिता देवढे ने अपनी बातचीत में हमें यह महसूस कराया कि आगे राजनीति में उनकी सक्रिय रहने की इच्छा मर चुकी है। बातचीत में उन्होंने एक बार कहा ‘राजनीति के मेरे अनुभव अच्छे नहीं है इसलिए अब मेरी इच्छा नहीं है।’ उनका यह भी कहना था कि उनके बच्चों पर इसका बुरा प्रभाव पड़ रहा है। उनके संस्कार बिगड़ रहे हैं। महिला राजनीति के संदर्भ में भाषा का अपना एक विशेष महत्त्व है। वैसे तो हमारी भाषा अधिकांशत: पुरुष वर्चस्वकारी और स्त्री के प्रति दुराग्रही रवैया लेकर चलती है किन्तु हमारे राजनीतिक व्यवहारों में यह अपनी सारी सीमाएँ और मर्यादाएँ लाँघकर असामाजिकता और अश्लीलता की हद तक जा पहुँचती है और यदि महिलाएँ  राजनीति में कुछ करना चाहें और अपनी योग्यता और दक्षता से आगे बढ़ना चाहें तो लैंगिक दुराग्रहपूर्ण भाषा का हथियार उनके स्वागत में तैयार बैठा रहता है! योगिता देवढे ने भी राजनीतिक भाषा की इस समस्या को अपनी बातचीत में उठाया है और इसे ‘टपोरीशाही’ कहा है। उनके शब्दों का विवरण इस प्रकार है – “सरपंच पद  पर रहने के लिए एक विशिष्ट भाषा का प्रयोग करना पड़ता है जिस भाषा को मैं पसंद नहीं करती। राजनीति की भाषा खराब हो गई है। राजनीति में ‘टपोरीशाही’ या ‘टपोरीगिरी’ ज्यादा है। ऐसे टपोरी लोगों की निगाह में महिला सरपंच की किसी भी मेहनत का कोई मूल्य नहीं है। इस ‘टपोरीगिरी’ के पीछे लैंगिक दुराग्रह तो होते ही हैं; राजनैतिक विरोधियों की कुछ दुरभिसन्धियाँ भी होती हैं जो अपने स्वरूप में नकारात्मक होती हैं।

यह कितना दुर्भाग्यपूर्ण है कि योगिता देवढे जैसी साहसी, कर्मठ और सक्षम महिला सरपंच को भी अंतत: इस निर्णय पर पहुँचना पड़ता है कि ‘‘परिवार की सुरक्षा को देखकर अब मेरी आगे किसी भी राजनीतिक पद को लेने की इच्छा नहीं है।’’

5.  राजनीति में महिलाएँ : राजनीति के लिए वरदान 

यों, ‘वरदान’ एक अतिशय अध्यात्मवादी शब्द-संरचना है लेकिन आज के टपोरीशाही राजनीतिक माहौल का मुक़ाबला करने के लिए इस प्रकार के प्रत्येय आवश्यक प्रतीत होते हैं। यह बिलकुल भी आश्चर्य जनक नहीं है कि महिलाएं यदि राजनीति में अधिक से अधिक संख्या में और आगे से आगे बढ़कर सक्रिय हो जाएँ तो उनकी उपस्थिती राजनीति के मौजूदा चरित्र में मौलिक परिवर्तन ला दे!

5.1. सामान्यत: यह देखा गया है कि पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियाँ ज्यादा कर्मठ, सहनशील, कार्य के प्रति समर्पित तथा निर्णयक्षम होती हैं, शायद इसका कारण हमारी समाजिकीकरण की वह विशिष्ट प्रक्रिया हो जिसमें स्त्री हमेशा खराद-सी  पर चढ़ाए रखी जाती है। हमेशा उसे किसी न किसी चुनौती का सामना करना होता है । इस समाजीकरण के परिणामस्वरूप वह अत्यधिक धैर्यशील, शालीन व संघर्षशील हो जाती है। अत: यह कहा जाना गलत नहीं होगा कि यदि स्त्रियों को राजनीति में अपेक्षाकृत अधिक अवसर मिले, उनके कार्यों को प्रोत्साहन मिले, तो राजनीति का चरित्र काफी कुछ बदल सकता है। योगिता देवढे ने अपनी बातचीत में कुछ ऐसे तथ्य स्पष्ट किए जो हमारी इस बात की पुष्टि करते हैं। जैसे उन्होंने कहा कि “महिलाएं अगर राजनीति में ज्यादा रहेंगी तो भ्रष्टाचार कम होगा क्योंकि महिलाएँ नियमों से डरती हैं। इसलिए नियमों का पालन करके ही वह काम करती हैं।”

मंडल और महिला आरक्षण

इस मामले में मायावती को वे अपने व अन्य महिलाओं के लिए आइकॉन जैसा मानती है। उनका कहना है कि मायावती राजनीति में काम करनेवाली आम महिलाओं के लिए एक आइकॉन के रूप में काम करती हैं। मायावती पर भ्रष्टाचार के अनेक आरोप लगे हैं, इस संबंध में प्रतिप्रश्न किए जाने पर योगिता देवढे ने कहा कि राजनीति में आने के बाद वे वैसी हो गईं। मीडिया भी उन्हें इस रूप में ज्यादा दिखाता है किंतु एक महिला राजनीतिज्ञ के रूप में मायावती एक मानक हैं।


5.2.  दूसरा महत्वपूर्ण तथ्य इस बातचीत में यह निकलकर आया कि यदि महिलाओं की भागीदारी राजनीति में बढ़ती है तो राजनीति की प्राथमिकताएँ तथा मुद्दे काफी कुछ बदल सकते हैं। उदाहरण के लिए योगिता देवढे ने अपनी बातचीत में बताया कि पुरुष सरपंचों की अपेक्षा महिला सरपंच विकास कार्यों को लेकर अच्छा निर्णय ले सकती हैं। इसके अलावा महिलाएँ जब कोई काम अपने हाथ में लेती हैं तो उसे पूरा करने के बाद ही साँस लेती हैं। महिलाएँ चूँकि अधिक संवेदनशील होती हैं इसलिए वे लोकहित की दृष्टि से ज्यादा सोचती हैं। (27/07/2017 के लिखित उत्तर के आधार पर)।

5.3. तीसरा महत्वपूर्ण बिंदु इस बातचीत में यह उभरकर आया कि राजनीति में यदि महिलाएँ ज्यादा सक्रिय होंगी तो महिलाओं से संबंधित समस्याओं, महिलाओं के मुद्दों पर ज्यादा ध्यान दिया जा सकता है यानी कि विकास के लैंगिक संतुलन को बचाने और बनाए रखने की दृष्टि से महिलाओं का राजनीति में आना अत्यावश्यक है, जैसे कि योगिता देवढे ने एक बातचीत में यह कहा कि सरपंच यदि महिला होती है तो ग्राम पंचायत में ज्यादा महिलाएँ अपने काम को लेकर आती हैं जबकि सरपंच यदि पुरुष है तो उन्हें आने में संकोच होता है। ग्रामसभाओं में भी महिलाओं की संख्या अधिक होती है। स्त्रियों को ऐसा लगता है कि पुरुष की अपेक्षा एक स्त्री उनकी बात पर ज्यादा ध्यान देगी और वे भी उससे खुलकर बात कर सकेंगी। एक जगह उन्होंने कहा, ‘‘महिलाएँ खुद बोलती हैं कि हम अब तक ग्रामपंचायत की सीढ़ियाँ नहीं चढ़े थे, अब हमें लगता है कि हमारा यहाँ प्रतिनिधि है’’। (27/07/2017)। इस मत में दो राय हो सकती हैं किंतु इस तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता कि महिलाएँ महिलाओं की समस्याओं, मुद्दों को ज्यादा अच्छी तरह समझ सकती हैं। एक महिला होने के नाते महिला मुद्दों के प्रति वे संवेदनशील होती हैं इसलिए महिलाओं का यदि विकास करना है तो राजनीति में महिलाओं का अधिक से अधिक संख्या में आना जरूरी है, यह देखकर आश्चर्य होता है कि किसी दक्ष स्त्रीवादी कार्यकर्ता की भाँति योगिता देवढे ने भी कहा कि ‘‘महिलाओं का अगर विकास करना है तो महिलाओं का राजनीति में आना जरूरी है, क्योंकि महिलाओं के विकास का पक्ष महिलाएँ ही अच्छी तरह से रख सकती हैं’’। (27/07/ 2017 को दिए गए लिखित उत्तर में)।

5.4. जैसा कि उल्लेख किया गया, महिलाएँ यदि राजनीतिक नेतृत्व में होती हैं तो विकास कार्यक्रमों की प्राथमिकताएँ अधिक जनहितकारी हो जाती हैं। उदाहरण के लिए, योगिता देवढे ने बताया कि स्त्री में परिवार की देखभाल, बच्चों के भरण-पोषण, प्रबंधन इत्यादि का एक विशेष गुण होता है जो पुरुषों में नहीं होता। वह जैसे अपने परिवार को अपना समझती है उसी तरह समस्त पंचायत भी, उसके समस्त नागरिक भी उसके लिए एक परिवार की तरह ही होते हैं। इस भावनात्मक संबंध की परिणति काफी सकारात्मक होती है और महिलाएँ पंचायत को ही अपना घर समझने लगती हैं। इसका तात्पर्य है कि जैसे परिवार या घर का हित एक स्त्री के लिए सर्वोपरि होता है उसी तरह लोकहित भी उसके लिए सर्वोपरि होता है।

इस दृष्टि से विचार करने पर हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि महिलाएँ अपनी विकास योजनाओं की प्राथमिकताओं में अपेक्षाकृत अधिक जनोन्मुख होती हैं, जैसे कि जब हमने योगिता देवढे से महिला सरपंचों के विकास मुद्दों की प्राथमिकताओं के बारे में पूछा तो यों उन्होंने वही बातें कहीं जो एक घाघ पुरुष नेता अपने बयानों में कहता है किंतु हमने देखा कि योगिता जब अपनी इन प्राथमिकताओं को गिना रही थीं तो उनके चेहरे पर गहरा आत्मविश्वास का भाव और आँखों में उत्साह था। उन्होंने महिला सरपंचों की जो विकास संबंधी प्राथमिकताएँ गिनाईं, वे इस प्रकार थीं –
1. नागरिकों को बुनियादी सेवाएँ प्रदान करना।
2. महिला सशक्तीकरण।
3. आँगनबाड़ी सेविका, स्वास्थ्य सेविका, आशा वर्कर इनको ग्राम विकास के प्रवाह में लाना।
4. महिलाओं सम्बन्धी विकास योजनाओं पर प्रभावी रूप से अमल करना।
5. महिलाओं के लिए स्वास्थ्य शिविरों का आयोजन करना।
6. सरकारी योजनाओं पर प्रभावी रूप से अमल करना।
7. युवकों के लिए मार्गदर्शन शिविर लगाना।
8. ग्राम के सामाजिक संगठनों की ग्राम विकास के लिए सहभागिता को बढ़ावा देना।
स्पष्ट है कि महिलाओं का वर्चस्व अगर राजनीति में बढ़ता है तो यह लोकहित की दृष्टि से श्रेयस्कर होगा। पुरुषों को इससे भय खाने की जरूरत नहीं है क्योंकि स्त्रियाँ अधिक समावेशी और सहयोगी होती हैं।

6. अपेक्षाएँ, आवश्यकताएँ एवं सुझाव  


6.1. योगिता देवढे ने अपनी बातचीत में अपनी वे अपेक्षाएँ और आवश्यकताएँ व्यक्त कीं जो वे इस व्यवस्था से चाहती हैं । सबसे पहले तो उन्होंने यह बताया कि महिला सरपंचों को सरपंच होने के बाद पर्याप्त आवश्यक प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। ग्राम पंचायत में कई पेचीदा रेकॉर्ड्स होते हैं, कार्य निष्पादन की प्रक्रियाएँ होती हैं अत: इस सबको समझने के लिए नवनिर्वाचित महिला सरपंचों को यथोचित प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। अभी मात्र तीन दिन का प्रशिक्षण नवनिर्वाचित सरपंचों के लिए होता है जिसे बढ़ाकर कम से कम एक माह का किया जाना चाहिए। पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं के लिए लंबी अवधि का यह प्रशिक्षण ज्यादा आवश्यक है क्योंकि वे नई-नई सत्ता में आ रही हैं। उनसे गलतियाँ न हों, पुरुष अधिकारी उनकी गैर जानकारी का गलत फायदा न उठा सकें इसलिए भी महिला सरपंचों को यह प्रशिक्षण दिया जाना लाज़िमी है।


6.2. पूर्व में ‘शासकीय यंत्रणा’ का उल्लेख किया गया। यहाँ पुनः उसका संदर्भ दिया जाना आवश्यक है क्योंकि महिला सरपंचों का यह मानना है कि ‘शासकीय यंत्रणा’ (गवर्नमेंट मशीनरी) में पुरुषों का दबदबा होने की वज़ह से महिलाओं को पूरा स्पेस नहीं मिलता। उनकी बात नहीं सुनी जाती। इसीलिए योगिता देवढे का सुझाव है कि ग्राम पंचायत स्तर पर ग्रामसेवक इत्यादि पदों पर महिलाएँ पदस्थ की जाएँ तथा उच्च अधिकारियों में भी महिलाओं की संख्या पर्याप्त हो ताकि महिला सरपंच खुलकर अपनी बात उनसे कह सकें।


शंभु गुप्त , प्रोफ़ेसर , स्त्री अध्ययन विभाग, महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीयकरण हिंदी विश्वविद्यालय , वर्धा फ़ोन:- 8600552663, 9414789779
e-mail- shambhugupt@gmail.com 
 अस्मिता राजुरकर : स्त्री अध्ययन विभाग, महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीयकरण हिंदी विश्वविद्यालय , वर्धा,में शोध-कार्य पूर्ण.
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खुर्राट पुरुष नेताओं को मात देने वाली इंदिरा प्रियदर्शिनी

ऋचा मणि

दिल्ली विश्वविद्यालय में इतिहास पढ़ाती हैं और जेएनयू से पीएचडी कर रही हैं. संपर्क :
maniricha@gmail.com

इंदिरा गांधी की जन्मशती पर विशेष

इंदिरा गाँधी (19 नवंबर 1917 – 31 अक्टूबर 1984 ) आधुनिक भारतीय इतिहास की एक ऐसी पात्र हैं,जिन्हें विस्मृत करना कठिन है. जनवरी 1966 से लेकर 31 अक्टूबर 1984, पौने तीन वर्षों के एक अंतराल (24 मार्च 1977 से 10 जनवरी 1980) तक वह भारत की प्रधानमंत्री रहीं.उनका शासनकाल उपलब्धियों और घटनाओं से खचित रहा . उनकी उपस्थिति सबको महसूस होती थी. उन्होंने अपनी पार्टी कांग्रेस को तोड़ा और पडोसी देश पाकिस्तान को भी.अपने ही देश के संविधान की खूब ऐसी-तैसी की और उसे कुछ समय केलिए तो अपना खिलौना बना लिया. उन्नीस महीने तक तानाशाह बनने का खेल भी खेला.निजी जिंदगी और राजनीति में अनेक मुश्किलों और संघर्षों से गुजरते -जूझते, प्रधानमंत्री रहते,अपने ही आवास परिसर में,अपने ही अंगरक्षकों द्वारा मारी गयीं. इसलिए कहा जाना चाहिए कि वह इतिहास भी हैं और किंवदंती भी. उनका चरित्र अंतर्विरोधों का एक जटिल पुंज है,और उनके व्यक्तित्व का मूल्यांकन महा -मुश्किल कार्य.

मैं उन लोगों में हूँ जिनका जन्म इंदिरा गाँधी के गुजर जाने के बाद हुआ है. लेकिन आज करोड़ों लोग हैं,जिन्होंने उन के समय को देखा है. बहुत से लोगों ने उन्हें देखा -सुना है और वे आज भी उनके बारे में एक राय रखते हैं. उन के समय में उनके राजनीतिक विरोधियों की संख्या भी कम नहीं थी. लेकिन सब यह स्वीकार करते थे कि वह असाधारण थीं. हमलोग तो उस पीढ़ी के हैं जिन्होंने उन्हें चर्चाओं और किताबों से जाना,चित्रों से झांकती उनकी शख्सियत देखी,लेकिन कह सकती हूँ कि वह केवल मुल्क की प्रधानमंत्री नहीं थीं, बल्कि उसकी धड़कन थी.हालांकि उनके समय के एक चापलूस ने उनके लिए यह बात कही थी. वह होतीं तो इन पंक्तियों के लिखे जाने तक,सौ साल की होतीं. लेकिन यह उनका पार्थिव रूप होता और तब शायद उस इंदिरा गाँधी से दूर होतीं,जिसे रखांकित करने केलिए मैंने कलम उठाई है.

दादा मोतीलाल नेहरू जब उदास हो गये


इंदिरा गाँधी का सब कुछ राजनीतिक था.जन्म, घर -परिवार से लेकर मृत्यु तक. वह उस साल और उस महीने जन्मीं,जिस वर्ष और जिस महीने बोल्शेविक क्रांति हुई. मशहूर राजनेता,लेखक और थोड़े दार्शनिक अंदाज़ के जिंदादिल इंसान जवाहरलाल नेहरू की इकलौती बेटी. जब इंदिरा दो वर्ष की ही थीं,तब नेहरू ने पहली जेलयात्रा की.उनके परिवार को एक महात्मा का साया लग चुका था. 1916 में, दक्षिण अफ्रीका से समाज,जीवन और विचारके कुछ सूत्र तलाश कर लौटे एक ‘साधु ‘-जिन्हे लोग गाँधी कहते थे, से जवाहरलाल की पहली मुलाकात हुई और नेहरू परिवार में एक बहस शुरू हो गई. युवा जवाहरलाल पर गाँधी का जादू धीरे -धीरे चढ़ने लगा. उसी वर्ष कमला से उनका विवाह हुआ.अगले ही वर्ष इंदिरा का पदार्पण हो गया .

नयापन नाम में भी था. कुछ ही साल पहले इतिहासकारों और पुरातत्ववेत्ताओं को ‘अशोक ‘ के बारे में ढंग की कुछ जानकारी मिली थी.इतिहास के दीवाने जवाहरलाल की नज़र से यह जानकारी कैसे छुप सकती थी.तीस साल बाद 1947 में भारत की संविधान सभा में नेहरू भारत के राष्ट्रीय झंडे में जिस अशोक चक्र को रखने की वकालत करते हुए खूबसूरत और इतिहास की जानकारियों से भरपूर भाषण दे रहे थे,उस अशोक से वह इंदिरा के जन्म के पूर्व ही प्रभावित हो चुके थे. ‘Indira: the life of Indira Nehru Gandhi’की अमेरिकी लेखिका कैथरीन फ्रैंक की मानें तो मोतीलाल नेहरू का पूरा परिवार बेटे की उम्मीद लिए बैठा था. 19 नवंबर 1917 की रात के 11 बजे व्हिस्की की घूंट ले रहे अपने वकील शौहर मोतीलाल नेहरू को जब स्वरूप रानी ने पोती होने की जानकारी दी,तब वह थोड़े उदास हो गए. शायद वह जमाना ही ऐसा था. जवाहरलाल शायद उदास होने वालों में न थे.हालांकि खुश होने के भी कोई सबूत उन्होंने नहीं छोड़े हैं. अपनी आत्मकथा से भी उन्होंने इस प्रसंग को अलग ही रखा है. हालांकि अपनी संतान केलिए उन्होंने नाम शायद पहले से ही ‘प्रियदर्शी’ चुन रखा था.अशोक के साथ जुड़े रहने वाले ‘पियदस्सी’का तत्सम रूप. जब बेटी हुई तब इसका स्त्री रूप दे दिया गया होगा ‘प्रियदर्शिनी ‘. इंदिरा प्रियदर्शिनी नाम रखा गया.प्राचीनता का  नवीनता के साथ एक जुड़ाव और प्राचीन दुनिया में भी अपनी अलग परंपरा का समर्थन इस नाम में भी जुड़ा था .

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राजनीति नियति भी चुनाव भी

1921 के दिसम्बर में,जब इंदिरा के पिता और दादा जेल में थे,और वह केवल चार साल की थी,उनकी माँ और दादी ने साबरमती की यात्रा जेल के तीसरे दर्ज़े में बैठकर की. इंदिरा माँ की गोद में थी. साबरमती गाँधी जी का आश्रम था. गोद में ही सही,लेकिन इंदिरा गाँधी की यह पहली राजनीतिक यात्रा थी.उसके लिए सब कुछ अजनबी रहा होगा.साबरमती में शायद उसे तितलियों की तलाश होगी. मेरे कहने का तात्पर्य यह की इस उम्र से ही राजनीतिक उथल -पुथल से जुड़ जाना उनकी नियति बन गई थी.

पिता नेहरू ज्यादातर जेल में रहे और बाहर रहे तब राजनीतिक व्यस्तताओं और यात्राओं में. माँ कमला का अपना स्वभाव था.माता -पिता के बीच सबकुछ खुशनुमा ही नहीं था.लेकिन इन्दु की परवाह दोनों को थी. नौ -दस साल की इंदिरा को उनके पिता ने जेल से ही चिट्ठियां लिखनी शुरू की.इन चिट्ठियों की एक किताब छपी -‘फादर्स लेटर टू हिज डॉटर’.चिट्ठियों का दूसरा सिलसिला इन्दु के तेरहवें साल में शुरू हुआ.इन चिट्ठियों का तो एक एक ग्रन्थ ही बन गया –‘ग्लिम्प्सेस ऑफ़ वर्ल्ड हिस्ट्री’.इस तरह इतिहास अनेक रूपों में उनके वजूद का हिस्सा बनने लगा.

हर इंसान की निजी जिंदगी होती है,इंदिरा की भी थी.यह जाहिर बात है कि उन्होंने अपनी मर्जी से विवाह किया और जमाने की नहीं,अपने दिल की सुनी. 1946 में ही उनके पिता अंतरिम सरकार के प्रधानमंत्री बन गए और ऑफिस में ही उन्होंने आखिरी सांसें ली. पिता के जीवन में ही 1959में वह कांग्रेस अध्यक्ष बनीं.इसके पूर्व 1958 में वह विधवा हो गई थीं. 27 मई 1964 को पिता की मृत्यु के बाद वह बीस और अठारह साल के दो बच्चों की माँ भर थीं. 1962 में चीनी आक्रमण के बाद देश में नेहरू की लोकप्रियता को करारा झटका लगा था.देश की शर्मनाक हार केलिए नेहरू की नीतियों को जिम्मेदार ठहराया जा रहा था. उनके विरोधियों को जनता में जगह मिलने लगी थी. लाल बहादुर शास्त्री देश के नए प्रधानमंत्री थे. उन्हें महसूस हुआ इंदिराजी को कैबिनेट में रखा जाना चाहिए. इंदिरा गाँधी सूचनाऔर प्रसार मंत्री बनीं. लेकिन 11 जनवरी 1966 को जब शास्त्रीजी का हृदयाघात से अचानक निधन हो गया तब एक नाटकीय घटनाक्रम के बाद इंदिरा गाँधी मुल्क की प्रधानमंत्री बनीं. यह एक नयी इंदिरा थीं .

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भारत असाधारण देश है.भूगोल और जनसंख्या के हिसाब से तो बड़ा है ही,सांस्कृतिक विविधताएं इसे बेहद जटिल और इसीलिए खूबसूरत बना देती हैं. ऐसे देश का शासक होना आसान नहीं होता. कवियों और दार्शनिकों ने बतलाया है इस देश का नाम भारत उस भरत के नाम पर पड़ा है,जो शकुंतला की संतान था और जिसे पिता ने अपनाने से इंकार कर दिया था. हमारे संत -दार्शनिकों ने हमेशा ही उदारता की वकालत की है. उदारचरितांतु वसुधैव कुटुंबकम.  उदार हृदय वालों केलिए पूरी दुनिया परिवार है. जवाहरलाल नेहरू ने अपनी किताब ‘डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया’ में जिस भारत की खोज की है,वह ऐसा ही बड़ा और उदार भारत  है. नेहरू ने अपने प्रधानमंत्रित्व में ऐसे ही भारत को विकसित करने की कोशिश की.इंदिरा ने पिता की नीतियों पर चलने की कोशिश जरूर की,लेकिन नेहरू बनना आसान नहीं था .

वह आधुनिक रजिया


इंदिरा के साथ दूसरी कठिनाइयां भी थी. उनके मूल्यांकन कर्ताओं ने उनके इस स्वरूप पर बहुत ध्यान नहीं दिया. वह स्त्री भी तो थीं. भारत की उदार परम्पराएं है,तो रूढ़ियाँ भी हैं. एक स्त्री केलिए दुनिया भर के समाजों में कठिनाइयां है. हमारे भारतीय समाज में कुछ ज्यादा. मनु ने स्त्रियों के मामले में शूद्रों की तरह ही अनुदारता बरती है. मा भजेतस्त्रीस्वतंत्रताम. स्त्रियों को स्वतंत्रता मत दो. सार्वजानिक -राजनीतिक जीवन में स्त्रियों केलिए कोई स्थान नहीं है.  उन्नीसवीं सदी में पंडिता रमाबाई ने कितने कष्ट नहीं झेले. मध्यकाल में रजिया हिंदुस्तान की  सुल्तान (1236 -1240) तो बन गयीं,लेकिन मर्दों ने उन्हें चैन से रहने नहीं दिया. इंदिरा गाँधी की भी वही स्थिति थी. उनकी ही पार्टी में उनके खिलाफ खुर्राट नेताओं का सिंडिकेट विकसित होने लगा. कदम -कदम पर उन्हें अपमानित करने की कोशिश की गयी. 1969 में राष्ट्रपति जाकिर हुसैन की अचानक मौत के बाद नए राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार तय करने केलिए कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक(बंगलुर 10 -12 जुलाई 1969) हुई.इंदिरा गाँधी ने जगजीवन राम का नाम प्रस्तावित किया. सिंडिकेट ने इसके मुकाबले नीलम संजीव रेड्डी का नाम प्रस्तावित किया और उसे बहुमत की स्वीकृति मिल गई. यह इंदिरा को अपमानित करने केलिए किया गया था. लेकिन इस अपमान को उन्होंने चुनौती के रूप में लिया. उन्होंने निर्दलीय उम्मीदवार वी वी गिरी को समर्थन दिया और वह जीते. यह एक नई रजिया का अवतार था,जो हारने वाली नहीं थी. इंदिरा गाँधी,जिसे लोगों ने गूंगी गुड़िया कहा था,अब बोलने लगी थी और उनकी बातें सुनी जाने लगी थीं. उन्होंने बैंकों के राष्ट्रीयकरण किये,राजाओं को मिलने वाले प्रिवी पर्स को खत्म कर दिया.विपक्ष ने उन्हें चुनाव की चुनौती दी,उन्होंने 1971 में मध्यावधि चुनाव करवाए और विपक्ष को धूल चटा दी.. चुनाव से उठीं तब बांग्ला देश के मुक्ति संग्राम को समर्धन दिया,नतीजतन  पाकिस्तान दो हिस्सों में विभक्त हो गया.इस अभियान में एक लाख पाकिस्तानी फ़ौज का आत्मसमर्पण करवाकर युद्ध के इतिहास में एक मिसाल कायम कर दिया. यह सब इंदिरा गाँधी का साहस था.एक स्त्री का साहस .

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लेकिन वही इंदिरा गाँधी तानाशाह भी बनी. 1975 के जून में मुल्क पर इमरजेंसी थोपकर उन्होंने जनतंत्र का गला घोंटने का प्रयास किया.संविधान से मनमानी की.1977 में उन्हें इसकी चुनावी सजा मिली. वह बुरी तरह पराजित हुईं. ऐसा लगा कि उनकी राजनीति ख़त्म  हो गयी. लेकिन उनके साहस को रेखांकित करना ही पड़ेगा कि वह उस तरह विचलित नहीं हुईं,जैसे दूसरे राजनेता हो जाते हैं. उन्होंने मुश्किलों का मुकाबला किया. उनकी गिरफ़्तारी हुई,उपचुनाव जीत जाने के बाद सदस्य्ता रद्दकी गई.लेकिन चतुराई से ऐसी चाल चली कि जनता पार्टी सरकार छिन्न -भिन्न हो गई. 1980 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने अपने विरोधियों को तहस -नहस कर दिया. वह पुनः प्रधानमंत्री बनीं और शानदार बहुमत के साथ .

और वे नहीं रहीं


जून 1984 में सिक्ख उग्रवादियों के खिलाफ आपरेशन ब्लूस्टार उनकी आखिरी लड़ाई थी,जिसमे वह सफल हुईं,लेकिन उन्हें अपनी आहुति देनी पड़ी. 31 अक्टूबर1984 को अपने अंगरक्षकों द्वारा ही वह मारी गईं.1948 में महात्मा गाँधी मारे गए थे और 1984 में इंदिरा गाँधी. दोनों साम्प्रदायिक वैमनस्य के कारण मारे गए.लेकिन दोनों घटनाओं में एक बड़ा फर्क था.1948 में गाँधी के मारे जाने पर सांप्रदायिक दंगे बंद हो गए थे,लेकिन 1984 में शुरू हो गए.क्यों?जवाब देना आसान नहीं है. इससे इंदिरा गाँधी और कांग्रेस का चरित्र भी परिभाषित होता है.

निसंदेह इंदिरा गाँधी नेहरू नहीं थी.हो भी नहीं सकती थी. नेहरू होना इतना आसान नहीं है. जैसा कि उन्होंने स्वयं एक बार कहा था -‘हमारे पिता संत थे ,लेकिन मैं  राजनीतिज्ञ हूँ’. सचमुच इंदिरा जी राजनीतिज्ञ ही थी.लेकिन,मर्दों के बीच काम करती एक ऐसी राजनीतिज्ञ,जिन्हे अपने स्त्री होने का थोड़ा गुमान था.
उनके जन्म-शती समापन वर्ष में यथोचित सम्मान.

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फिल्म पद्मावती पर सेंसर किये जाने की स्त्रीवादी मांग


अरविंद जैन 

फिल्म पद्मावती के खिलाफ एक ओर तो समाज के भीतर परंपरावादी ताकतों और सत्ता तन्त्र के गठजोड़ के साथ उग्र प्रदर्शन  इतिहास और फिक्शन के खांचे में बहस के विषय हैं लेकिन क्या दोनो ही पक्ष-फिल्मकार और प्रदर्शनकारी सती क़ानून 1987 के दायरे में सजा के हकदार नहीं हैं. एक ओर जौहर/सती का महिमामंडन करता फिल्मांकन  और दूसरी ओर ‘जो रोज बदलते शौहर वे क्या जानें जौहर’ जैसे नारों के साथ प्रदर्शन के जरिये जौहर/सती का महिमामंडन करते प्रदर्शन. अरविन्द जैन का विश्लेषण:

इतिहास अपनी जगह, परम्पराएं अपनी जगह और राजपूती आन-बान अपनी जगह. लेकिन 1987 के सती एक्ट के बाद, यानी रूप कंवर सती काण्ड के बाद  देश भर में महिलाओं  के आक्रोश के बाद बने क़ानून के आलोक में फिल्म बनने और उसके प्रदर्शन को समझना चाहिए और फिल्म के विरोध के प्रदर्शनों को भी. भारत में सती प्रथा पर रोक तो लार्ड विलियम बेंटिक और राजाराम मोहन राय के जमाने में ही लग गयी थी. लेकिन 1987 के ‘सती प्रिवेंशन एक्ट’ ने यह सुनिश्चित किया कि सती की पूजा, उसके पक्ष में माहौल बनाना, प्रचार करना, सती करना और उसका महिमामंडन करना भी क़ानूनन अपराध है.  इस तरह  पद्मावती पर फिल्म बनाना, उसे जौहर करते हुए दिखाना, सती का प्रचार है, सती का महिमामंडन है और इसलिए क़ानून का उल्लंघन भी. यह एक संगेय अपराध है और इसका काग्निजेंस सेंसर बोर्ड को भी लेना चाहिए. क्योंकि सेंसर बोर्ड को भी जो गाइड लाइंस हैं वह स्पष्ट करती हैं कि कोई भी फिल्म ऐसी नहीं हो सकती जो क़ानून के खिलाफ हो या संवैधानिक प्रावधानों के खिलाफ जाती हो.  इसलिए सेंसर बोर्ड को भी देखना चाहिए कि क्या यह फिल्म सती प्रथा का महिमामंडन करती है?  यदि ऐसा है तो उसे फिल्म को बिना कट प्रमाण पत्र नहीं देना चाहिए. अदालतों को भी सु मोटो एक्शन लेना चाहिए था. यह ऐसा ही है कि देश में छुआछूत बैन हो और आप छुआछूत को जस्टिफाय करने वाली फ़िल्में बना रहे हैं. रचना कर रहे हैं.

उस आख़िरी दृश्य में अनारकली !

उधर जो विरोध भी हो रहा है वह भी सती का ही महिमामंडन कर रहा है. परम्परा के नाम पर. लोग सती के पक्ष में नारे लगा रहे हैं.  वे जौहर को आन-बान-शान बता रहे हैं. यह खेल वर्तमान शासक समूह को भी खूब भा रहा है. राज्य और केंद्र में बैठे शासक-प्रशासक इसे हवा दे रहे हैं. उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सहित भाजपा के कई नेता  फिल्म निर्माता और अभिनेत्री को धमकियां दे रहे लोगों के साथ हैं या उनकी भावना का दोहन कर रहे हैं. अब तो राजस्थान की मुख्यमंत्री विजयाराजे सिंधिया ने भी अपना मुंह खोला है. ये वो लोग हैं जो 1987 में राजस्थान के ‘देवराला सती काण्ड’ के समर्थन में थे और उसके खिलाफ बन रहे क़ानून की मुखालफत कर रहे थे. सिर्फ भाजपा नेता भैरों सिंह शेखावत ने सती प्रथा का तब विरोध किया था.  यह दोधारी मामला है. एकतरफ अभिव्यक्ति की आजादी की आड़ में अमानवीय परम्पराओं का महिमामंडन हो रहा है और दूसरी तरफ लोग इस अभिव्यक्ति के खिलाफ प्रदर्शन इसका महिमामंडन कर रहे हैं – संजय लीला भंसाली और राजपूत संगठन इस मामले में एक सिक्के के दो पहलू हैं और इन सबका फायदा शासक समूह उठा रहा है.

  ‘पिंक’एक आज़ाद-ख्याल औरत की नज़र से

पिछली जो भी फ़िल्में बनी हैं चाहे 1963 में बनी हों..  आज वे रिपीट करना चाहते हैं तो उसपर भी 1987 का क़ानून लागू हो जायेगा. बना लिया ठीक है, लेकिन अब वह सती के प्रचार और महिमामंडन के दायरे में आयेगा. पद्मावती पर इक्का-दुक्का फिल्में ही बनी हैं। डायरेक्टर चित्रापू नारायण मूर्ति निर्देशित तमिल फिल्म चित्तौड़  रानी पद्मिनी 1963 में रिलीज हुई थी। फिल्म में वैजयंतीमाला ने रानी पद्मावती, शिवाजी गणोशन ने चित्ताैड़ के राजा रतन सिंह और उस समय के प्रमुख विलेन एमएन नाम्बियार ने अलाउद्दीन खिलजी का किरदार किया था। फिल्म असफल रही। हिंदी में जसवंत झावेरी के 1961 में फिल्म ‘जय चित्तौड़’  बनी.  1964 में रिलीज ‘महारानी पद्मिनी’ में जायसी के पद्मावत को पूरी गंभीरता से परदे पर उतारा था। महारानी पद्मिनी (1964) में जयराज, अनीता गुहा और सज्जन ने राणा रतन सिंह, रानी पद्मिनी और अलाउद्दीन खिलजी के किरदार किए थे। इस फिल्म में झावेरी ने खिलजी को बतौर विलेन नहीं दिखाया था। फिल्म में खिलजी पद्मिनी से माफी मांगता है। पद्मिनी उसे माफ कर देती और खुद जौहर कर लेती है। इस फिल्म के निर्माण में तत्कालीन राजस्थान सरकार ने सहयोग किया था। सोनी पर सीरियल ‘चित्तौड़ की रानी पद्मिनी का जौहर’ 2009 में प्रसारित हुआ था। पद्मावती से पहले भंसाली ने ओपेरा पद्मावती का निर्देशन किया था। साठ के दशक की किसी भी फिल्म का विरोध नहीं किया गया। ( फिल्म के इतिहास का इनपुट राष्ट्रीय सहारा से)

लग रहे हैं नारे: जो रोज बदलते शौहर वे क्या जानें जौहर 

जाघों से परे ‘पार्च्ड’ की कहानी: योनि नहीं है रे नारी, वह भी मानवी प्रतिष्ठित

एक दूसरा प्रसंग भी इसमें है. यह फिल्म जायसी के ‘पद्मावत’ पर आधारित है. इसके पहली भी इस तरह की फिल्म बनी है. सवाल है कि क्या जायसी के पद्मावत को तोड़-मरोड़ कर अपने हिसाब से परिवर्तित कर फिल्म बनायी जा सकती है? यह कॉपीराइट एक्ट की धारा 57 के खिलाफ है. इस धारा के तहत न तो ऐसी रचनानों को संशोधित किया जा सकता है, न तोड़ा-मरोड़ा जा सकता है-चाहे वह रचना जायसी की हो, प्रेमचन्द की हो या शरत चन्द्र की या किसी और की.  हालांकि ये रचनाएं पब्लिक डोमेन में आ गयी हैं लेकिन उन रचनाओं को भी कॉपीराइट क़ानून के तहत मोडीफाय नहीं किया जा सकता.

स्त्रीवादी क़ानूनविद अरविंद जैन से बातचीत पर आधारित. सम्पर्क: 9810201120

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