भारतीय उपमहाद्वीप का स्त्री लेखन: स्त्री सशक्तीकरण की अनुगूंजें

रोहिणी अग्रवाल
रोहिणी अग्रवाल स्त्रीवादी आलोचक हैं , महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर हैं . ई मेल- rohini1959@gmail.com

''स्त्री शून्य के समान पुरुष की इकाई के साथ सब कुछ है, परंतु उससे रहित कुछ नहीं।'' (महादेवी वर्मा,॰शृंखला की कड़ियां, पृ0 115)
''स्त्री के स्वभाव, विश्वास, मान्यताएं, नैतिकता, रुचि और व्यवहार का विवेचन उसकी स्थिति द्वारा होता है। चूंकि वह जानती है कि वह सर्वोपरि स्थान नहीं प्राप्त कर सकती, इसलिए वह वीरता, विद्रोह, सृजन और कल्पना के ऊँचे आदर्शों से अलग रहती है।'' (सिमोन द बुववार, स्त्री उपेक्षिता पृ0 287)

''मजबूत काली स्त्री का मिथ भोंदू सोनकेशी के मिथ के सिक्के का दूसरा पहल है। गोरे मर्द ने गोरी औरत को कमदिमाग, कमजोर शरीर वाली, नाजुक विकृति और एक रति-उन्मादिनी में बदल कर उसे एक पीठिका पर बैठा दिया। काली औरत को उसने एक मजबूत आत्मनिर्भर अमेज़न में बदला और उसे रसोईघर में भेज दिया . . . गोरे मर्द ने खुद को सर्वशक्तिमान प्रशासक बना कर खुद को फ्रंट ऑफिस में स्थापित कर लिया।'' - एल्ड्रिज क्लीवर, द एलेगॅरी ऑफ द ब्लैक यूनॅक्स (जर्मेन ग्रीयर, विद्रोही स्त्री, पृ0 58)

महादेवी वर्मा, सिमोन द बुववार और जर्मेन ग्रीयर - स्त्रीवाद के तीन आधार स्तम्भ! तीन अलग-अलग देशकाल मे आधी दुनिया की नियति पर विचार करके स्त्रीवाद का एक पूरक पाठ प्रस्तुत करने में तल्लीन तीन स्वतंत्रचेता प्रबुद्ध स्त्रियां! तीनों की संवेदनशील बौद्धिकता का उत्प्रेरक घटक है एक ही सवाल कि 'यह दुनिया हमेशा पुरुषों की रही, मगर क्यों? महादेवी की दृष्टि में इसके मूल में है समाज द्वारा सुकुमारता को नारीत्व का पर्याय समझे-समझाए जाने का आदिम संस्कार , तो सिमोन संस्कार को मिथ यानी मिथ्या भ्रम  का नाम देकर पुरुष षड्यंत्र को बेनकाब करती हैं कि ''पुरुष अपनी इन सुविधाओं का पूरा और अबाध भोग तब तक नहीं कर सकता जब तक कि अपनी श्रेष्ठता को वह अधिकार के रूप में न रखे। पुरुष होने का यह अर्थ था कि वह अपने वर्ग की सुविधा के लिए कानून बनाए, अपने वर्गहित का ध्यान रखे और साथ ही वह ऐसा जूरी बने जो इन कानूनों को सिद्धांत में परिणत कर दे।'' (स्त्री उपेक्षिता पृ0 28) जर्मेन ग्रीयर चूंकि किसी भी अंश में इस षड्यंत्रकारी पाखंडपूर्ण व्यवस्था का हिस्सा बनने की बजाय इसे ध्वस्त कर देना ही श्रेयस्कर समझती हैं, इसलिए ध्वंस के उपाय बताने में चूकती नहीं - ''पूरे समूह की पैतृकता बनाए रखने पर जोर देकर - सब पुरुष सब बच्चों के पिता हैं - पितृसत्तात्मक परिवार को असंभव बना देना चाहिए।'' (विद्रोही स्त्री, पृ0 293) विवाह को स्त्री जीवन की सार्थकता के अंतिम सोपान के रूप में देखे जाने का सामाजिक-सांस्कृतिक आचार यदि महादेवी वर्मा के मन में जुगुप्सा पैदा करता है  तो सिमोन उन परिस्थितियोें का विश्लेषण करती हैं जो औरत को औरत बनाना सिखाती हैं  और बचपन से ही उसमें बेहद आक्रामक तेज़ी के साथ ''नारीत्व की निष्क्रियताजन्य मौलिक विशेषताएं'' (स्त्री उपेक्षिता पृ0 125) विकसित कर देती हैं। जर्मेन ग्रीयर सहमति के बावजूद प्रतिकूल परिस्थितियों का शिकार होने की बजाय सघन एवं सामूहिक भाव से अनुकूल परिस्थितियों की रचना का आह्नान करती हैं जहाँ ''बोली और भंगिमा की उद्धतता से पंडितों और विशेषज्ञों को बौखला देने'' (विद्रोही स्त्री, पृ0 286), ''विशालहृदयता, उदारता और साहस के मर्दाना गुणों पर दावा पेश'' (वही, पृ0 298) करने के बाद ''अपनी ऊर्जा को खुद के चुने हुए उद्यम में उद्देश्यपूर्ण ढंग से लगाना'' (वही, पृ0 298) ही नारीत्व की परिभाषा और पर्याय बन जाता है। यह वह स्थिति है जो औरत के हक में स्त्री की धर्मसम्म्त रूढ़ छवि को तोड़ कर मनुष्यभाव से ओतप्रोत एक नई जीवंत छवि गढ़ने का दुस्साहस करती है, यकीनन उससे भी कहीं विकटतर स्थिति जो तसलीमा नसरीन के जलावतन का कारण बनी। घृणा, हिंसा, दमन और उत्पीड़न निस्संदेह किसी भी व्यक्ति का मनोबल तोड़ने में अहम भूमिका निभाते हैं, लेकिन बकौल सिमोन ये तो वे भोंथरे हथियार हैं  जिनका स्त्री के खिलाफ वही पुरुष इस्तेमाल करता है जो ''मानसिक रूप से स्वयं अपमानित होने की आशंका से ग्रस्त रहता है।'' (स्त्री उपेक्षिता पृ0 29) तो क्या स्त्री की लड़ाई 'स्वस्थ' और 'सम्पूर्ण' पुरुष से नहीं, 'हीनग्रंथि के शिकार' मनोरोगी से है जो लगातार 'न्यायाधीश और अपराधी' दो विपरीत भूमिकाओं में एक असंवेदनशील असभ्य समाज की सृष्टि में लगा हुआ है? आमने-सामने की लड़ाई का परिणाम जहाँ तुरत-फुरत और शारीरिक एवं सांसाधनिक शक्ति पर टिका होता है, मनोरोगी से लड़ाई लड़ाई न रह कर उपचार की लम्बी जटिल धैर्यशील प्रक्रिया में तब्दील हो जाती है जहाँ उसे परास्त करने की बजाय गढ़ने तथा ''दूसरों से उनकी और अपनी संगति में आनंद पर आधारित संवाद और सहयोग''  स्थापित करने का भाव प्रमुख हो जाता है। जाहिर है इस प्रक्रिया में 'अपने' मनोरोगों और मानसिक दुर्बलताओं का निर्भीक साक्षात्कार भी है और संघर्ष में आनंद खोजने का अनिर्वचनीय किंतु नैसर्गिक भावोच्छ्वास भी।

निस्संदेह स्त्रीवाद स्त्री सशक्तीकरण का प्रबल पैरोकार है। ''अब तक औरत के बारे में पुरुष ने जो कुछ भी लिखा, उस पूरे पर शक किया जाना चाहिए क्योंकि लिखनेवाला न्यायाधीश और अपराधी दोनों है''  -वह न केवल कहता है, बल्कि पितृसत्तात्मक समाज व्यवस्था के विषमतामूलक संरचनात्मक ढांचे का परत दर परत विश्लेषण कर अपने आक्रोश और रोष को निरंतर दर्ज भी कर रहा है। लेकिन यह भी तय है कि इस व्यवस्था के प्रतिस्थापन हेतु कोई ठोस विकल्प उसके पास नहीं। बल्कि इसके विपरीत बार-बार डैड एंड पर आ खड़े होने की हताशा ने उसकी मान्यताओं (बवदअपबजपवदे) को कहीं न कहीं क्षतिग्रस्त अवश्य किया है। स्त्री सशक्तीकरण के अर्थ, लक्ष्य और प्रयोजन को व्यापक स्तर पर प्रचारित करने की अपेक्षा उसे स्त्री कल्याण कार्यक्रमों, आर्थिक स्वतंत्रता या अधिकाधिक राजनीतिक प्रतिनिधित्व में रिड्यूस करने की बौखलाहट इसका प्रमाण है। लेकिन यह भी तय है कि समय-समय पर अंशतः जो विचार किया गया है, उसे जोड़ कर स्त्री सशक्तीकरण की मुकम्मल सैद्धांतिकी तैयार करना कठिन नहीं। इस दृष्टि से स्त्री सशक्तीकरण की अवधारणा को मोटे तौर पर 'मुक्ति की सामूहिक चेष्टा' में परिभाषित करते हुए इसकी कुछ मान्यताओं को गिनाया जा सकता है:

1 यह स्त्री को अपने 'होने' की स्थिति पर इस तरह विचार करना सिखाती है कि वह सबसे पहले वस्तुपरक ढंग से 'स्त्री' (प्राणी) तथा 'स्त्रीत्व' (रूढ़ छवि) में पाए जाने वाले सूक्ष्म अंतर को समझ सके, और फिर 'स्त्री' होने के कारण स्वयं को अपराधी महसूस करने की अपेक्षा आत्मसम्मान और आत्मगौरव से दीप्त हो सके।

2 अंधानुकरण का पोषण करने वाली परंपरागत अतार्किक दृष्टि की अपेक्षा प्रत्येक व्यक्ति/स्थिति/सम्बन्ध को विश्लेषणात्मक ढंग से जानने-परखने का आत्मविश्वास अपने भीतर पैदा कर सके।

3 स्थित्यानुसार स्वतंत्र निर्णय लेने और उसे क्रियान्वित करने की क्षमता से सम्पन्न हो सके।

4 आर्थिक आत्मनिर्भरता अर्जित कर एक स्वतंत्र एवं जिम्मेदार नागरिक के रूप में अपनी स्थिति मजबूत करे।

5 जिस तरह जोत से जोत जल कर पूरा मंज़र रोशन कर देती है, उसी तरह स्त्री उद्बोधन और स्त्री चेतना का क्रमिक विस्तार कर परिवर्तन की लहर से पूरे समाज को आंदोलित करे।

6 चूंकि पुरुष की सोच और दृष्टि में अपेक्षित परिवर्तन के बिना स्त्री मुक्ति बेमानी है, अतः जरूरी है कि आत्मोन्नयन के ऊर्ध्व द्वारों को खोलते हुए स्त्री जेंडर सेंसीटाइजेशन जैसे आधार मुद्दे को अपने सफलता अभियान की कुंजी माने। किसी भी स्टेज पर उसे यह नहीं भूलना होगा कि घर ही उसकी प्रयोगशाला है और घर ही उसका पहला कर्मक्षेत्र क्योंकि यही वह स्थल है जहाँ अनजाने ही लड़के और लड़कियों को 'मर्द' एवं 'औरत' बन कर रूढ़ छवियों में ढलना सिखाया जाता है। जाहिर है इस क्रम में स्त्री सशक्तीकरण महज स्त्री मुक्ति का प्रवक्ता न रह कर मानव मुक्ति का सूत्रधार बन जाता है जो समाज के दृष्टिकोण में सिरे से परिवर्तन कर स्त्री को स्त्री या पुरुष के संदर्भ में देखने की अपेक्षा स्त्री एवं पुरुष को 'मनुष्य' के संदर्भ में देखने का संस्कार पैदा करता है।

लेकिन यहाँ एक प्रश्न विशेष रूप से विचारणीय है कि स्त्री सशक्तीकरण का संवाहक कौन है? क्या स्त्री जो न केवल सामाजिक-आर्थिक-सांस्कृतिक पराधीनताओं में जकड़ी हुई है बल्कि पुरुष की सत्ता में अपने अस्तित्व का विलयन कर प्रभुता हासिल कर लेना चाहती है? क्या पुरुष जो इस विषमतामूलक व्यवस्था के लाभों का एकमात्र फलभोक्ता (इमदमपिबपंतलद्ध है? चूंकि नारीवाद अपने मूल रूप में लैंगिक लड़ाई को बढ़ावा देने की बजाय सह- अस्तित्वपरक समाज की परिकल्पना है, अतः प्रत्येक संवेदनशील-विवेकशील स्त्री एवं पुरुष स्वयमेव स्त्री सशक्तीकरण का अनिवार्य एवं वांछित संवाहक बन जाता है।

यह तय है कि लम्बे संघर्ष के बावजूद स्त्रीवाद अब तक स्त्री के लिए पुरुष सी निरपेक्ष एवं स्वाधीन सत्ता अर्जित नहीं कर पाया है। स्त्री की नियति आज भी देश के साथ-साथ वहाँ की सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक- सांस्कृतिक मान्यताओं से परिभाषित एवं परिचालित हो रही है। अतः स्त्री के अस्मिता संघर्ष का अध्ययन देश-काल के रूप में एक सुपरिभाषित फ्रेम की अपेक्षा करता है। अजीब विडम्बना है कि 1947 से पूर्व अखंड भारत का हिस्सा होते हुए और भारतीय उपमहाद्वीप में निकटस्थ पड़ेसी होते हुए भी भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश भिन्न-भिन्न राजनीतिक शासन प्रणालियों और धार्मिक वर्चस्व के फलस्वरूप जिन तीन राष्ट्रीय अस्मिताओं में उभरे हैं, वे न केवल अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनके  कद को निर्धारित करती हैं बल्कि राष्ट्रीय स्पर पर ऐन घर-परिवार में घुस कर स्वस्थ समाज की चूलों को हिला देने वाली रणनीतियों का बखान भी करती हैं। साहित्य राजनीति एवं समाजशास्त्र की तरह घटनाओं, तथ्यों एवं लम्हों को उपजीव्य अवश्य बनाता है, लेकिन इतिहासकार से त्रिकालदर्शी दृष्टि लेकर वह उन्हें परिप्रेक्ष्य भी देता है और सृजन की अकूत संभावनाओं, सदिच्छाओं और संवेदनाओं से प्रदीप्त हो एक बेहतर समाज का ब्लू प्रिंट भी प्रस्तुत करता है जिसका होना आशा, जिजीविषा और उत्साह की ऊर्जा को कभी चुकने नहीं देता। बेशक प्लेटो अपने 'गणतंत्र' से कवि को निष्कासित करने का फरमान जारी करते हैं, किंतु यह निर्विवाद है कि पृथ्वी के किसी भी कालखंड और भूखंड में यदि ऐसा गणराज्य स्थापित हुआ होता तो वह अपनी ही भितरघाती ताकतों और वंध्या महत्वकांक्षाओं का शिकार हो महान दार्शनिक के यूटोपिया को डिस्टोपिया में स्खलित कर देता। फासीवादी मनोवृत्ति और तालिबानी संस्कृति का सामना यदि शस्त्रधारी फौजें ही करने में समर्थ होतीं तो स्वप्नजीवी भविष्यद्रष्टा राजनीतिज्ञों से लेकर दार्शनिकों, बुद्धिजीवियों, कलाकारों एवं साहित्यकारों की लम्बी शृंखला इतिहास के पन्नों में देदीप्यमान न होती। चूंकि मनुष्य ही साहित्य का विषय और लक्ष्य दोनों है, अतः उसकी गरिमा की रक्षा में स्वयं साहित्य, मनुष्य , समाज और समय की गरिमा सन्निहित है। बर्बर प्रतिगामी प्रतिरोधक शक्तियों से जूझते हुए साहित्य निमिष मात्र को भी इस सत्य से आँख नहीं चुरा सकता - इसे भारतीय उपमहाद्वीप के स्त्री लेखन के संदर्भ में बखूबी समझा जा सकता है।1


स्त्री लेखन के विषय में अक्सर अभियोग की मुद्रा में कहा जाता है कि 'तदर्थवाद से ग्रस्त' 'स्त्री मुक्ति को लेकर लिखा गया अधिकांश कथा साहित्य व्यावसायिक क्षेत्र में पुरुष से प्रतिस्पर्धा और उसकी ईर्ष्या, पारंपरिक विवाह प्रथा का खंडन . . . यौन शुचिता की अवधारणा का प्रत्याख्यान, दहेज प्रथा की विकरालता आदि जैसे अलग-अलग मुद्दों पर ही केन्द्रित होकर रह जाता है। . . . भारतीय समाज में समग्र रूप में नारी की स्थिति का नक्शा देते-देते उसी तरह चूक जाता है जिस तरह इस दिशा में पूरे समाज और राजनीति का चिंतन चूक रहा है।''  बात किसी अंश तक सत्य है, लेकिन अर्धसत्य ही अक्सर घातक और गुमराह किया करते हैं। निस्संदेह स्त्रीवादी संवेदन और सरोकार उपर्युक्त समस्याओं के इर्द गिर्द ही बुने गए हैं जो मिल कर एक पूरी व्यवस्था के पुनरीक्षण का सरंजाम तैयार करते हैं। अतः इन्हें अलगा कर देखना लाठी से नदी के पानी को बांटने का उपक्रम मात्र है। स्त्री लेखन चूंकि पहले चरण में पितृसत्तात्मक समाज व्यवस्था के बुनियादी ढांचे का तटस्थ विश्लेषण है, अतः परिवार, विवाह, धर्म, कानून जैसी संस्थाओं के औचित्य पर व्यापक बहस का आह्नान करने से पूर्व वह विशेष बलाघात देकर इनके वर्तमान स्वरूप को बृहत्तर पाठक समुदाय के समक्ष पुनर्प्रस्तुत कर देना चाहता है क्योंकि चहुँ ओर की सुपरिचित सच्चाइयों को देखने के लिए न केवल वांछित दूरी अपेक्षित है, बल्कि आँख को 'ज्योतित' करने वाली किसी तीसरी एजेंसी की भी।

अगले जनम मोहे बिटिया न कीजो

''उस रात (सुहागरात) क्या मैं सोई थी या यह एक किस्म की मौत थी? हमने क्या इसके लिए ही खुशियां मनाईं थीं? जो मेरे अपने बिराने थे, वे क्या इसी के लिए नाचे-गाए थे, हर मुमकिन तरीके से इसमें हाथ बंटाया था? क्यों? किसी जादूगर की तरह ललचाने और मेरे ऊपर इस किस्म के पागलपन का कहर ढाने के लिए? इस जुल्म के लिए?''  चालीस वर्षीय पीर साईं से ब्याह दी गई पंद्रह वर्षीय हीर के इस हाहाकार में पति की जिबह कर डालने वाली कामुकता से उपजा खौफ मात्र नहीं है, वरन् मौत से सर्द कमरे में अपने अंधेरे भविष्य का दीदार है- ''मैं ताजिंदगी के लिए उसके नाम लिख दी गई थी''  और बाहरी सजधज से शून्य विवाह संस्था के हैबतनाक भीतरी स्वरूप का साक्षात्कार भी जो 'जिंदगी जैसी बड़ी चीज़ को सूई की डिबिया में बंद कर देता है।'

'कुफ्र' की भूमिका में पाकिस्तानी लेखिका तहमीना दुर्रानी स्वीकार करती हैं कि दक्षिण पाकिस्तान की एक स्त्री की सच्ची और दर्दनाक कहानी ने ही उन्हें 'परंपराओं की चुप्पी' तोड़ कर इस्लामी देश में वर्जित माने जाने विषय पर कलम चलाने के लिए उकसाया है। हालांकि 'कुफ्र' की हीर और उनकी आत्मकथा 'माई फ्यूडल लार्ड' की तहमीना उर्फ बेगम मुस्तफा खार शिक्षा, संस्कार और पारिवारिक पृष्ठभूमि की दृष्टि से परस्पर विलोम हैं, लेकिन एक-दूसरे को सम्बल देकर पुष्टतर होते कठमुल्ला धर्म और निरंकुश राजनीति की गिरफ्त में फंस कर अंततः एक ही सिक्के के दो पहलू बन जाती हैं। निस्संदेह यही वह स्थल है जो हीर और तहमीना को दो अलग चरित्रों की अपेक्षा पाकिस्तान के कबीलाई समाज की स्त्री का प्रतिनिधि बना देता है।

हीर पीर साईं की परिणीता है। पीर साईं यानी पैगम्बर का सीधा वारिस, 'अल्लाहताला और गरीब-मजलूमों के बीच की सीधी कड़ी' (कुफ्र, पृ0 54) जिसकी पाकीज़गी को लेकर बुर्कापरस्त मुस्लिम समाज में कोई संदेह नहीं -''पीर साईं के सामने तुम्हें चेहरा ढंक कर रखने की कोई जरूरत नहीं। वह बेहद पाक इंसान है।'' (पृ0 19) लेकिन सच्चाई यह है कि जिसने अपने स्वार्थों की खातिर इलाके के बदनाम दहशतगर्ज़ ऐयाश जागीरदार के साथ मिल कर ''इस्लाम को बेहद छोटे कद के इंसानों की हथेली में समा जाने के काबिल'' (पृ0 95) कर दिया है। इस पीर साईं के साथ विवाह सम्बन्ध से हीर ने दो चीजें हासिल ही है। - तीस वर्ष की आयु तक पांच बच्चों का मातृत्व, और निरंतर दहशत में जिंदा रहने की दीक्षा। वह नहीं जानती गृहस्थी के जुए में अविराम जुते रहने पर भी उसकी कौन सी क्रिया कब गलती बन कर पीर साईं के कोप का कारण बन बैठे। लेकिन इतना ज़रूर जानती है कि यह कोप हमेशा कहर बन कर उस पर टूटता है। कभी फुफेरी बहन के छः वर्षीय बेटे से पर्दा न करने के गुनाह में  टूटी चूड़ियों के टुकड़ों से बाहें जख्मी कर देने के रूप में; कभी काली की दुर्गति की कथा जानने के अपराध  में सिर और भौंहों के बालों को उस्तरे से मूंड दिए जाने के रूप में; कभी लम्पट देवर द्वारा चोरी-चोरी भिजवाए गए प्रेम-पत्र को पाने के अपराध में  खज्जी कोड़े की मर्मांतक मार के रूप में तो कभी यतीमड़ी को मुकर्रर तोहफा न देने की 'भूल' का सबक सिखाने के लिए लकड़ी की भारी चारपाई के पायों के नीचे दोनों हथेलियों को देर रात तक कुचलते रहने के रूप में । साथ ही धमकदार चेतावनी कि ''एक भी आवाज निकली तो मैं तुम्हारी गर्दन तोड़ दूँगा और तुम्हारे भेजे के दो टुकड़े कर डालूँगा'' (पृ0 111) और प्रत्युत्तर में पत्नी की आह-कराह न सुनने पर सज़ा और बढ़ाने की दरिंदगी। हीर की विडंबना है कि वह न सास से पति की क्रूरता का बखान कर सकती है (क्योंकि बेटे यानि मर्द की निरंकुश शक्ति से परास्त अम्म साईं की अनुभव संपदा में बस एक ही वशीकरण मंत्र है -''शौहर की जरूरतों को पेशेवर तवायफों'' की तरह पूरा करके 'रात के अंधेरों में इस्तेमाल की जाने वाली जादुई ताकतों से दिन में हाकिमाना'' ताकत हासिल करो'', पृ0 47), न मां से किसी सहायता की अपेक्षा कर सकती है जो बेटी की मां होने के अपराध बोध में दब कर सच का सामना करने की ताब अपने भीतर नहीं पाती। वरना क्या वजह है कि हीर के भौंहों तक सफाचट बाल, गहरे जख्मों और गर्भस्थ शिशु की अकाल मौत जैसे दर्दनाक हादसों को नज़रअंदाज कर वह उसके कपड़ों, जेवर और रुतबे की चकाचौंध में चुंधियाती रहे? विवाहिता बेटी की निजी ज़िंदगी में दखल न देने का संस्कार ही असल में स्त्री को इतना 'अकेला' और 'असुरक्षित' बना देता है कि तंग आकर या तो वह 'अन्नपूर्णा मंडल की आखिरी चिट्ठी' कहानी (सुधा अरोड़ा) की अन्नपूर्णा की तरह अंतिम विकल्प के रूप में आत्महत्या कर बैठती है, या जीलानी बानो के उर्दू उपन्यास 'ऐवाने-ग़ज़ल' की बीबी की तरह आजन्म प्रतिशोध की गूंगी गुड़िया बनी रहता है, या मेरे बचपन के दिन' (तसलीमा नसरीन) की मां (ईदुल) की तरह दोजख की आग में जलते-जलते नकार और अनास्था का पुंजीभूत रूप बन जाती है।


तहमीना दुर्रानी की विशेषता है कि वे बंद मुस्लिम समाज की वैचारिक-मानसिक विकृतियों का पर्दाफाश करने के लिए एक कार्टूनिस्ट की तरह अतिरेकपूर्ण चित्रण पद्धति का सहारा लेती हैं जहाँ पति को हिंò बनैले जानवर और पत्नी को रीढविहीन केंचुए के स्टीरियोटाइप में प्रस्तुत कर खुल्लमखुल्ला विवाह संस्था के प्रति अपनी घृणा और अनास्था प्रकट करती हैं। इसके विपरीत भारतीय स्त्री लेखन विषम वैवाहिक सम्बंधों की प्रामाणिक बानगियां प्रस्तुत करते हुए स्त्री की त्रासदी को आत्मपीड़ा या आत्मदया से बचाते हुए उस बिंदु पर ले आता है जहाँ अनास्था असंतोष में तथा घृणा अस्मितामूलक सवाल में तब्दील हो किन्हीं सकारात्मक विकल्पों के अन्वेषण हेतु बेचैन हो जाती है। गुजराती लेखिका कुंदनिका कापड़ीआ का उपन्यास 'दीवारों से पार आकाश' तथा हिंदी लेखिका मृदुला गर्ग का 'कठगुलाब' इसके प्रमाण हैं। 'दीवारों से पार आकाश' की नायिका वसुधा के पैंतीस वर्ष के लम्बे वैवाहिक जीवन की उपलब्धि है हर रोज़ अपनी इस मान्यता को पुष्टतर होते देखना कि विवाह ''स्त्री के लिए प्रतिबंधों के क्षेत्र में कदम रखना है'' (पृ0 20)। जड़ता की ओर अग्रसर सोच पर नियंत्रण पा वह स्वयं को भीतर तक नरख-परख कर असंतोष के कारण को खोज निकालती है कि ''उसके पंख हैं, वही दुख है। बाहर कहीं आकाश है और आकाश में उड़ा जा सकता है, यह उसे मालूम है'।' लेकिन सुख पाने का अर्थ अपने हाथों पंख कतर कर पिंजरे को आनंदलोक मानना नहीं, वरन् पंख कतरने की सूक्ष्म प्रक्रियाओं की ओर उंगली उठाना है कि ''एक ही आदमी घर का केंद्र क्यों होना चाहिए?''(पृ0 15) ; कि ''नशीली आंखों का लाल रंग, क्या यही प्रेम का रंग है?'' (पृ022) ; कि ''क्यों वैवाहिक सम्बंध में ''शरीर के उपयोग की, शरीर की सुख-सुविधाओं की, शरीर की शोभा की चीजों के बारे में ही सोचा जाता है?'' (पृ0 19) ; कि क्यों विवाहोपरांत स्त्री को नाम के साथ-साथ अपने सपने बदलने को भी मजबूर किया जाता है? (पृ0 45) ; कि विवाह नामक संस्था के संरक्षण में पलते इतने सतही, भौतिक इकतरफा व्यापारिक सम्बंध क्या मानवीय गरिमा एवं मानवीय अस्मिता की रक्षा कर सकेंगे? ; कि विवाह संस्था क्या प्रकारांतर से समाज में विषम आर्थिक सम्बंधों का पोषण करने वाली पूंजीवादी व्यवस्था का ही प्रतिरूप नहीं? ''वसुधा को अर्थशास्त्र का रिकार्डो सिद्धांत याद आता। मज़दूरों को हमेशा कम वेतन देना चाहिए जिससे उनकी संतानें ऊँची शिक्षा न पा सकें। परिणामतः वे भी मज़दूर बने रहें और उद्योगों को मज़दूरों की कभी कमी न पड़े। स्त्री की दुनिया को भी मर्यादित रखा गया है जिससे वह जैसी है, चुपचाप वैसी बनी रहे। उसी में संतुष्ट रहे, सवाल न पूछे, परिवर्तन की हवा के लिए न तरसे . .  और दूसरों का साम्राज्य जैसा चल रहा है, वैसा ही चलता रहे।''( पृ0 64)

लेखिका से पहले सामाजिक कार्यकर्ता होने के कारण कुंदनिका कापड़ीआ का लेखन सहानुभूति, सामंजस्य एवं समाधान पर अधिक बल देता है जबकि मृदुला गर्ग के लेखन का केन्द्रीय स्वर व्यंग्य और आत्मविश्लेषण है। अतः 'कठगुलाब' में विपिन और नीरजा दो प्रमुख पात्रों के जरिए विवाह संस्था का मखौल उड़ाने के बाद  वे नुकीले सवाल उठाती हैं कि क्यों ''ये औरतें मरजानियां दूसरी औरत का साथ देने की बजाय जल्लद मरद को ही पल्लू में समेटने लगती हैं?'' (पृ0 138) और ''अपना खालीपन भरने के लिए हम हमेशा पति या प्रेमी की खोज क्यों करती हैं? . . . इसलिए न कि वह हमें बच्चा दे सकता है?'' (पृ0 107) उल्लेखनीय है कि स्त्री विमर्श को वैश्विक एवं सार्वकालिक परिप्रेक्ष्य देकर मृदुला गर्ग जिस तरह विश्वभगिनीवाद की अवधारणा को उपन्यास में क्रमशः अवस्थित करती चलती हैं, उससे उपर्युक्त  प्रश्नों के सम्भावित जवाब पुनः कुछ प्रतिप्रश्न पैदा करते हैं कि जल्लाद मरद को पल्लू में बांधने की कुट्टनी कला यदि उन्हें सुरक्षा चक्र देती है तो क्यों वे 'कठगुलाब' की नमिता, गंगा, वरजीनिया की तरह; 'कुफ्र' की अम्मा साईं, हीर और गुप्पी की तरह; 'छिन्नमस्ता' की मां और सासू मां की तरह; 'मेरे बचपन के दिन' की ईदुल की तरह 'सुख-सौभाग्य' के बीच भी गहरी मानसिक रिक्ति का शिकार हैं? कि यदि संतान प्राप्ति ही विवाह सम्बंध का एकमात्र लक्ष्य है तो कृत्रिम गर्भाधान और स्पर्म बैंक के रूप में विकसित होती नई वैज्ञानिक तकनीक और समलैंगिकता को क्या स्वस्थ विकल्प के रूप में स्वीकार किया जा सकता है? न, बिल्कुल नहीं। मृदुला गर्ग व्यंग्य-विनोद-विद्रूप और कटाक्ष के औज़ारों से 'कैरीकेचर' भर प्रस्तुत नहीं करतीं, वरन् संवेदनशील विवादास्पद सवालों को लेकर बेहद संजीदगी के साथ अपनी स्पष्ट राय भी देती हैं। संतान-दान के अनुबंध रूप में शुरु हुए विपिन-नीरजा सम्बंध में असफल नीरजा के यंत्रमानव में तब्दील होते जाने तथा संतान प्राप्ति की अपेक्षा सम्बंध के सौन्दर्य और अनन्यता को बनाए रखने हेतु विपिन की उत्कंठा को भले ही आलोचकों ने लेखिका के बौद्धिक व्यापार का नाम दिया है, लेकिन इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि संकटापन्न स्थितियों में घिर कर ही व्यक्ति काल और सभ्यता को आक्रांत कर देने वाली सच्चाइयों की पड़ताल कर पाता है। जाहिर है विपिन के ऊहापोह के क्षणों में जब मृदुला कठिन विश्लेषणपरक भाषा का इस्तेमाल कर कहती हैं कि हम प्राणी मात्र (बायलॉजिकल यूनिट) को नहीं, व्यक्ति (अस्मिता, पैशन, लावण्य, तिलिस्म से युक्त प्राणी) को सहचर चुनते हैं और उसकी रहस्यात्मकता में ही आकर्षण और माधुर्य के अजò òोतों की तलाश करते हैं (पृ0 234), तो वे तमाम भोगपरक ऐहिक ऐषणाओं से दूर एक-दूसरे को पाकर समृद्धतर होने की स्थितियों को ही स्त्री-पुरुष मिलन (विवाह) का आधारबिंदु स्वीकार करती हैं। बेशक यह वह यूटोपियन स्थिति है जहाँ न 'चाक' की सारंग के इस सवाल का औचित्य शेष रहता है कि क्यों बंधनों में जकड़ी स्त्री को समाज सती और बंधनमुक्त होकर जीवन जीने को आकुल स्वाभिमानिनी स्त्री को कुलटा कहता है (पृ0 225); न 'दीवारों से पार आकाश' की वसुधा की वेदना कि ''स्वयं को खोकर जो पाया, उसका नाम क्या है? उसका मूल्य क्या है?'' (पृ0 76); न 'छिन्नमस्ता' की प्रिया की विवशता कि आंसू में संपूर्ण स्त्री जीवन की सार्थकता क्यों? (पृ0 114)

आक्रामक और कंटीले लेखन के लिए विख्यात बांग्लादेश की लेखिका तसलीमा नसरीन औरतों की आंसू भरी दास्तानें कह कर अपने वक्त और ऊर्जा का क्षय नहीं करना चाहतीं। ''जंजीरें तोड़ दी हैं मैंने/ पान के पत्ते से हटा दिया है संस्कार का चूना'' (तसलीमा नसरीन की प्रतिनिधि कविताएं, समर्पण पृष्ठ) का उद्घोष कर वे उस लड़की की गतिविधियों में ज्यादा दिलचस्पी लेती जान पड़ती हैं जो लोगों की टेढ़ी नज़रों, कामुक सीटियों और 'बदचलन' सरीखा गालियों से बिना घबराए निर्द्वंद्व अपने रास्ते आगे बढ़ रही है। अलबत्ता इस लड़की को वे सावधान ज़रूर कर देना चाहती हैं कि रैबिसयुक्त कुत्तों के आक्रमण की ही तरह हर देह के लिए घातक होता है सिफलिसयुक्त मर्दों का आक्रमण। (वही, पृ0 14) लेकिन यही तसलीमा कविताओं और टिप्पणियों के संसार से बाहर आकर जब गाढ़ी रूमानियत के साथ अपने बचपन की यादों में डूबती हैं तो मां ईदुल की कथा कहते-कहते बेहद वस्तुपरक ढंग से औसत औरत की नियति का बखान करने लगती हैं। हालांकि 'मेरे बचपन के दिन' में किशोरी होती बच्ची की नज़र से माता-पिता के कलहपूर्ण सम्बंधों का चित्रण किया गया है, किंतु समूचा प्रकरण मुखर होकर इस बात की पुष्टि करता है कि मां के श्याम वर्ण और कुरूपता तथा पिता के दाम्पत्येतर सम्बंधों के बीच मां जिस असुरक्षा बोध से ताउम्र पगलाई रही, वह दो तथ्यों की उपज थे। एक, डॉक्टर पति की तुलना में अल्पशिक्षित होना, और दूसरा इस्लाम द्वारा पुरुष को बहुविवाह का अधिकार देना।


तहमीना दुर्रानी (पाकिस्तान के कबीलाई समाज की प्रवक्ता) और तसलीमा नसरीन (इस्लाम धर्म एवं बांग्ला संस्कृति के कम्पोज़िट प्रभाव से बुने समाज की प्रवक्ता) अलग-अलग दृष्टि एवं प्राथमिकताओं के साथ इस्लामी राष्ट्र के दो भिन्न-भिन्न मुस्लिम समाजों का प्रतिनिधित्व करती हैं। लेकिन इसके बावजूद सामाजिक-मानसिक रुग्णताओं की विश्लेषणपरक निष्पत्तियों में एक-दूसरे के बहुत करीब आ खड़ी होती हैं और अशिक्षा तथा धार्मिक कर्मकांडों के प्रसार को स्त्री की मानवीय स्थिति को विकटतर करने वाले घटकों के रूप में चित्रित करती हैं। 'कुफ्र' की हीर एक ऐसे रोशन दिमाग उदार परिवार से आई है जो बुर्के की जगह तालीम को स्त्री की धरोहर मानता है। पीर साईं की किलेनुमा हवेली की ऊँची अंधेरी दीवारों में घिरने से पहले चूंकि उसने खुली-डुली दुनिया के ऊपर पसरे अछोर आसमान को चांद-सूरज के वैभव के साथ भरपूर जिया है, इसलिए बेटी गुप्पी को वह कल्पना और शिक्षा के सहारे बृहत्तर दुनिया से जोड़ देना चाहती है। चोरी-छिपे कुरान का उर्दू तर्जुमा सुना कर वह उसे प्रकारांतर से पीर साईं के खिलाफ खड़े होने का हौसला भी देती है, लेकिन चंद कदमों में सिमटी दुनिया की वासी गुप्पी को किन्हीं मुक्ति द्वारों की तलाश नहीं। ठीक उसी तरह जैसे 'सीमंतनी उपदेश' की लेखिका द्वारा चित्रित बीसवीं सदी के पूवार्द्ध की परवश हिंदू स्त्री की तरह जिसके विषय में व्यंग्यमिश्रित पीड़ा का सहारा लेकर वे लिखती हैं कि ''जो आदमी जेलखाने में पैदा हुआ हो, या जिसका बाप दादा उसी में कदीम से रहता हो, वह उसी जेलखाने को बहिश्त समझता है''  गुप्पी के पास यथास्थिति को स्वीकारने के अपने तर्क हैं  तो 'मेरे बचपन के दिन' की ईदुल के पास वर्तमान की नारकीय विभीषिका से बचने के लिए अंधविश्वास की जमीन पर उगे कुछ दिवास्वप्न कि नौमहल (पीरबाड़ी) के पीर की मुरीद बनने पर वह न केवल कब्र के अजाब से मुक्ति पा लेगी बल्कि पुल से रात पार करने में भी वक्त नहीं लगेगा। (115) बंद बदबूदार माहौल में पली गुप्पी जहाँ शिक्षा के चामत्कारिक प्रभावों से अनभिज्ञ है, वहीं बाल्यावस्था में पिता द्वारा पढ़ाई छुड़ा दिए जाने के कारण ईदुल ('मेरे बचपन के दिन') प्रौढा.वस्था में भी उन कसैली यादों से मुक्त नहीं हो पाई है जिन्होंने समान रुतबे और बुद्धिवाले मियां भाई और उसके बीच अलंघ्य फासले खड़े कर दिए थे। यहाँ ईदुल की असहायता में हीर की विवशता समाहित हो जाती है लेकिन हीर की भाँति मकबरे (धर्म) की सड़ांध से वाकिफ न होने के कारण अल्प ज्ञान से उपजने वाले कुतर्कों का सहारा लेकर वह लकीर पीटने की निष्क्रियता में जीवन की सार्थकता समझने लगती है। गुप्पी के रूप में यथास्थितिवादी नई पीढ़ी की रचना कर जहाँ तहमीना विद्रोह की संभावनाओं को विनष्ट कर डालती हैं, वहीं तसलीमा ईदुल में हीर और गुप्पी के अंतर्विरोधों का विलयीकरण दिखा कर उसकी बेटी के रूप में स्वयं को एक ऐसी पीढ़ी के रूप में प्रस्तुत करती हैं जिसने मां के संकीर्ण प्रतिगामी संस्कार और पिता की उदार प्रगतिशील सोच के बीच धर्म, 'स्व' और समाज को समझने के लिए तर्कपूर्ण निजी दृष्टि विकसित की है। इसलिए कुरान की विषमतामूलक सच्चाइयों से परिचित होकर वे संज्ञाशून्य नहीं होतीं, बल्कि धर्म के बढ़ते रसूख के साथ घर-समाज से सौहार्द और सामंजस्य छीन लेने वाले उन फतवों और फरमानों का आग्रहपूर्वक विश्लेषण करती हैं जो व्यक्ति से उसकी मानवीय पहचान छीन कर उसे सिर्फ जनून में तब्दील कर देते हैं। ''मां बोलीं, 'अब से साड़ी नहीं पहनूँगी। साड़ी हिंदुओं की पोशाक है। काफिर की पोशाक। साड़ी पहनने से गुनाह होगा।' पीरबाड़ी से जो भी फतवा जारी होता, मां सिर झुका कर उस पर अमल करतीं। मां अपने बचपन की सखी अमला की बात भूल गईं। वे भूल गईं कि वे कभी रथ के मेले से लावा, खिलौने और पुतले खरीदा करतीं थीं। लक्ष्मी पूजा के दिन सरस्वती वगैरह के घरों में जाकर मिठाई खातीं थीं और सहेलियों के साथ मुहल्ले के पूजामंडप देखने जाती थीं।'' (पृ0 144)
क्रमशः


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