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दलित स्त्री-लेखन का पहला दस्तावेज: मांग महारों का दुःख (1855)

मुक्ता सालवे/अनुवाद: संदीप मधुकर सपकाले 


फुले-दम्पति (महात्मा फुले-सावित्री बाई फुले) द्वारा स्थापित देश के पहले बालिका-विद्यालय में मात्र 3 सालों की पढ़ाई के बाद मांग जाति की 14 लड़की मुक्ता सालवे  ने यह लेख 1855 में लिखा था, जो पहला दलित-स्त्री लेखन माना जाता है. यह लेख तत्कालीन समाज में व्याप्त ब्राह्मणवाद का दस्तावेज है और उसपर करारा प्रहार. हिन्दी के पाठकों के लिए अनुवाद किया है संदीप मधुकर सपकाले ने. 

ज्ञानोदय के कर्ता से
विशेष बिनती के साथ | यह निबंध मांग  जाति की एक लड़की ने लिखा है | कुछ दिन पहले मैं पुणे गया था | पुणे में अतिशूद्र विद्यार्थियों की पाठशाला के संस्थापक राजश्री जोतिबा माली  ने उस लड़की से यह निबंध हमारे सामने पढ़वाया था | उसी समय हमारी आँखों के सामने रा.जोतिबा द्वारा किए गए श्रमका फल साक्षात् दिखाई दिया |अभी उनकी पाठशाला के विषय में बताने का अवकाश नहीं हैं किंतु हमारे सुधि पाठकों को यह निबंध पढ़कर उनकी पाठशाला की प्रगति का अहसास हो जाएगा | इस निबंध की भाषा और उसकी विषयवस्तु के पहले छह बिन्दुओं में थोड़े बहुत सुधार किए गए थे लेकिन जब इस निबंध को दुनियाके सामने लाने को हुआ तब जिसे उसने अपनी स्वबुद्धि से लिखा हैं वही लोगों द्वारा पढ़कर समझा जाए जिसपर उसके अध्ययन और बुद्धिमानी का अनुमान लगाया जा सकें इसीलिए इस निबंध में किसी भी प्रकार का बदलाव नहीं करते हुए उसे जस के तस प्रस्तुत किया गया हैं |

चित्रकार राजा कांबले द्वारा निर्मित मुक्ता सालवे का चित्र

सिर्फ चौदह वर्ष की उम्र और तीन वर्ष की पढ़ाई में इस लड़की ने यह निबंध लिखा हैं | इस निबंध की कुछ बातें और विचार जैसे अत्यंत शुद्ध होने चाहिए वैसे नहीं हैं | इसके कारण को समझा जाए तो हिन्दू  राज्यऔर हिन्दू धर्म की सत्ता के आधिपत्य में नीच माने गए इन लोगों को पराकाष्ठा तक दुःखों को भोगना पड़ा हैं और आज भी वे उन दुःखों को भोग रहे हैं | इस लड़की ने अपने माँ-पिता से अपनी जाति की जिन बदत्तर स्थितियों को सुना हैं उससे उसके भीतर एक सच्ची वेदना पैदा हुई है जिसे उसने बड़ी निर्भयता और निष्पक्ष ढंग से दिखाया हैं |

पहले मांग और महार जाति को कितने दुःख भोगने पड़ते थे | इस विषय का वृत्तांत इस लड़की के पिता ने हमसे बताया था | आगे किसी अवकाश में ज्ञानोदय के माध्यम से वह प्रकट किया जाएगा | लेकिन अब उस लड़की को उसके स्वयं के विषय में बोलने दे रहा हूँ |
सम्पादक ज्ञानोदय

निबंध
ईश्वर ने मुझ जैसी दीन-दुर्बल के अंतःकरण में हम दुर्दैवी, पशु से भी नीच माने गए दरिद्र मांग-महारों के दुःखों के विषय में वेदना भरी हैं | उस परमपिता परमेश्वर का चिंतन करते हुए मैंने इस निबंध के विषय में अपनी शक्तिनुसार इस विषय पर लिखने का काम अपने हाथों लिया हैं | परंतु बुद्धिदाता और इस निबंध को फल देने वाले मांग, महार और ब्राह्मणों के उत्पन्नकर्ता वे एकमात्र जगन्नाथ हैं |

2. महाराज, वेदों को आधार बनाकर हमारा द्वेष करनेवाले इन लोगों के मतों का खंडन करने पर हमसे ऊँचे माने जानेवाले ये लड्डूखोर पेटू ब्राह्मण लोग कहते हैं कि वेद सिर्फ हमारी बपौती हैं जिसे सिर्फ हम ही देख सकते हैं | इस बात को देखने से स्पष्ट हो जाता हैं कि हम अछूत लोगों की कोई धर्म पुस्तक नहीं हैं | यदि वेद ब्राह्मणों के लिए हैं वेदों के अनुरूप जीवन जीना ब्राह्मणों का धर्म हैं |इन धर्म पुस्तकों को देखने मात्र की छूट  भी हमें नहीं हैं तब ये साफ़ हो जाता हैं कि हम धर्मरहित हैं | ब्राह्मणों के मतानुसार वेदों को हमारे द्वारा पढ़े जानेपर महापातक घटित होता हैं फिर उसके अनुसार आचरण किए जानेपर तो हमारे पास कितने दोष पैदा हो जाएँगे ? मुसलमान लोग कुरआन को, अंग्रेज लोग बाइबल को और ब्राह्मण लोग वेदों को आधार बनाकर चलते हैं इसलिए वे अपने अपने सच्चे-झूठे धर्म के नाते हमसे कुछ कम-अधिक सुखी है ऐसा लगता हैं | तब हे भगवान, तेरी ओर से आया हुआ ऐसा कौन सा धर्म है हमें बता यानी हम सब उसकी रीति से अनुभव लेंगें | लेकिन जिस धर्म का केवल किसी एक ने अनुभव लेना और बाकि के पेटू लोगों के मुहँ तांकते रहने वाले जैसे दूसरे धर्म इस पृथ्वी से नष्ट हो जाए | बल्कि इन जैसे धर्म के अभिमान का लेश मात्र भी हमारे मन में कभी न आए |
3. उदक ईश्वर की देन हैं उसका उपभोग गरीब से लेकर अमीरों तक एक समान सभी कर सकते हैं | परंतु कहा जाए कि वेद यदि देवों की ओर से आए हुए हैं तब उनका अनुभव ईश्वर से उत्पन्न हुए मनुष्य भला क्यों नहीं कर सकते | हैं ना ये आश्चर्य की बात ! इस विषय में बोलनेपर भी शर्म महसूस होती हैं | देखिए एक पिता से चार पुत्रों का जन्म हुआ | सभी के धर्मशास्त्रों का ऐसा सुझाव हैं कि उस पिता की संपत्ति को चारों में एक समान बाँट दिया जाए || लेकिन किसी एक को ही यह संपत्ति मिलें और बाकि बचे हुए लोग पशुवत अपनी बुद्धि और चातुर्य के उपयोग के बिना ही अपना जीवन जीते रहें यह सबसे बड़ी अन्याय की बात हैं | अब जिन वेदों के योग पर ईश्वर के विषय में और मनुष्यों के विषय में कैसा बर्ताव किया जाए और शास्त्र, और कला कौशल के योग से अपने जीवन के क्रम को उत्तम रीति से इस जगत में जिए जानेवाली इस प्रणाली को हमसे दबावपूर्वक छीन बैठना कितना बड़ा क्रूर कर्म हैं ?

4. लेकिन इतना ही नहीं हम महारमांग लोगों को हांककर इन लोगों ने बड़ी-बड़ी इमारतें बना ली और उसमें बैठ गए हैं |और इन इमारतों की नींव में हमें तेल पीलाकर और सिंदूर लगाकर दफन करते हुए हमारे वंश के नाश करने का क्रम भी चलाया हैं इन लोगों ने | सुनो बता रही हूँ कि हम मनुष्यों को गाय भैंसों से भी नीच माना हैं इन लोगों ने | जिस समय बाजीराव का राज्य था उस समय हमें गधों के बराबर ही माना जाता था | आप देखिए, लंगड़े गधे को भी मारने पर उसका मालिक भी आपकी खबर लिए  बिना नहीं रहेगा लेकिन मांग-महारों को मत मारो ऐसा कहने वाला भला एक भी नहीं था |उस समय मांग या महार गलती से भी तालिमखाने के सामने से यदि गुजर जाए तो गुल-पहाड़ी के मैदान में उनके सिर को काटकर उसकी गेंद बनाकर और तलवार से बल्ला बनाकर खेल खेला जाता था | जब ऐसे पवित्र राजा के द्वार से गुजरने कि भी पाबंदी हो तब विद्या अध्ययन की आजादी भला कैसे मिलेगी ?कदाचित किसी मांग-महार ने पढ़ना सीख भी लिया और ये बात बाजीराव को पता चल जाए तो वह कहता “तुम महार-मांग होकर भी पढ़ने लगे हों तब क्या ब्राह्मणों के दफ्तर का काम तुम्हें सौप दिया जाए और ये ब्राह्मणक्याबगल में थैला दबाएँ विधवा स्त्रियों की हजामत बनाते फिरे?” ऐसा फरमान देकर वह उन्हें दण्डित करता था |

5. दूसरी बात यह कि लिखाई-पढ़ाई की पाबंदी मात्र से इनका समाधान नहीं हुआ| बाजीराव साहब तो काशी में जाकर धूल-मिट्टी में तद्रूप हो गए लेकिन उनके साथ रहकर प्राप्त गुणों (!) से यहाँ का महार भी मांग जाति की छाँव पड़ जाने की छूत से दूर रहने की कोशिश कर रहा है |सोवळे  अंगवस्त्र को परिधान कर नाचने वालें इन लोगों का हेतु मात्र इतना ही हैं कि अन्य लोगों से पवित्र एकमात्र वे हैं | ऐसा मानकर वे चरम सुख की अनुभूति भी करते हैं लेकिन वही हमसे बरते जानेवाली छुआछुत से हमपर बरसने वाले दुखों से इन निर्दय लोगों के अंतःकरण भी नहीं पिघलते | इस अस्पृश्यता के कारण हमें नौकरी करने पर भी पाबंदी लगी हुई हैं | नौकरी की इस बंदी से हम धन भी भला कहाँ कमा पाएँगे ?इससे यह खुलासा भी होता हैं कि हमारा दमन और शोषण चरम तक किया जाता हैं | पंडितों तुम्हारें स्वार्थी, और पेटभरु पांडित्य को एक कोने में गठरी बांधकर धर दो और जो मैं कह रही हूँ उसे कान खोलकर ध्यान से सुनों |जिस समय हमारी स्त्रियाँ जचकी हो रही होती हैं उस समय उन्हें छत भी नसीब नहीं होती इसीलिए उन्हें धूप, बरसात और शीत लहर के उपद्रव से होनेवाले दुःख तकलीफों का अहसास खुद के अनुभवों से जरा करके देखोंयदि ऐसे में उन्हें जचकी से जुड़ा कोई रोग हो जाए तब उसकी दवा और वैद्य के लिए पैसा कहाँ से आएगा ! आप लोगों में ऐसा कौन सा संभावित वैद्य था जिसने लोगों का इलाज भी किया हो और मुफ्त में दवाएँ भी बाँटी हों ?

6. ब्राहमणों के लड़के पत्थर मारकर जब किसी मांग-महार के बच्चों का सिर फोड़ देते हैं तब भी ये मांग-महार सरकार में शिकायत लेकर नहीं जाते क्योंकि उनका कहना हैं कि उन्हें जूठन उठाने के लिए इन्हीं लोगों के घूरे पर  जाना पड़ता हैं | हाय हाय, हे भगवन ये दुःखों का हिमालय ! इस जुल्म की दास्ताँ को विस्तार से लिखूं तो रोना आता हैं | इसी कारण भगवान ने हमपर कृपा करते हुए दयालु अंग्रेज सरकार को यहाँ भेज दिया जिस कारण हमारे दुःखों का निवारण शुरू हो गया हैं जिसे अनुक्रम से आगे भी लिखती रहूंगी |(पुढें चालू होईल / आगे जारी होगा)

ज्ञानोदय,DNYANODAYA,(RISE OF KNOWLEDGE)मुंबई, 1 मार्चसन1855,पुस्तक-14,अंक-5

वीरता दिखाने का दंभ भरने वाले  और घर में चूहा मारनेवाले ऐसे गोखले, आपटे, त्रिमकजी,आंधळा, पानसरा, काळे, बेहरे इत्यादि लोगों ने निरर्थक ही मांगमहारों पर चढ़ाई करते हुए अपने कुँए भर रहे थे उसपर और गर्भवती औरतों पर किए जानेवाले देहांत अत्याचार पर भी बंदी आयी |पुणे प्रांत में मांग- महारों के कल्याणकारी दयालू बाजीराव महाराज के राज्य में ऐसी अंधाधुंध थी कि जिसके भी मन जब आए तब वह मांग महारों पर किसी आसमानी तूफान और  टिड्डीदल सिपाहियों की तरह टूट पड़ते और जुल्म करते थे वह भी बंद हुआ | (किले की) नींव में दफना दिए जाने की प्रथा भी बंद हुई | हमारा वंश भी बढ़ रहा हैं | मांगमहारों में यदि कोई बढ़िया से ओढ़कर चलता था तब भी इनकी आँखों फूटे नहीं सुहाता “ये तो चोरी का है ये इसने चुराया होगा” ऐसा बढ़िया ओढ़ना तो सिर्फ ब्राह्मण ही ओढ़ सकते हैं | यदि मांगमहार ओढ़ लेंगें तो धर्म भ्रष्ट हो जाएगा ऐसा कहकर वे उसे खंबे से बाँधकर पीटते थे लेकिन अब अंग्रेजी राज में जिसके पास भी पैसा होगा वह खरीदेगा| ऊँचे वर्ण के लोगों द्वारा किए गए अपराध का दंड मांग और महारों के सिर मढ़ दिया जाता था वह भी बंद हुआ | जुल्म से भरी बेगारी को भी बंद किया गया | कहीं-कहीं पर छू जाने,स्पर्श हो जाने का खुलापन भी आया हैं |
अब इस निःपक्षपाती दयालु अंग्रेज सरकार के राज्य बन जाने से एक ऐसी चमत्कारिक बात हुई है जिसे लिखते हुए मुझे बड़ा आश्चर्य होता हैं वह यह कि जो ब्राह्मण पहले उपर कही गयी बातों के अनुसार हमें दुःख दे रहे थे आज वही स्वदेशीय-प्रिय-मित्र-बंधु हमें इन दुःखों से उबारने में रात-दिन सतत मेहनत कर रहे हैंलेकिन सभी ब्राह्मण ऐसा कर रहे है ऐसा भी नहीं | उनमें से भी जिनके विचार शैतान ले गया हैं वे पहले जैसा ही हमारा द्वेष करते हैं | और ये जो मेरे प्रिय बंधु जब हमें इस व्यवस्था से उबारने में प्रयासरत हैं उन्हें जाति से निकालने की धमकी दी जा रही है |

सावित्रीबाई फुले की तस्वीर

हमारे प्रिय बंधुओं ने मांगमहारों के बच्चों के लिए पाठशालायें लगाई हैं और इन पाठशालाओं को दयालू अंग्रेज सरकार मदद करती हैं | इसीलिए इन पाठशालाओं का बहुत सहाय है | दरिद्रता और दुःखों से पीड़ित,हे मांग महार लोगों,तुम रोगी हो,तब अपनी बुद्धि के लिए ज्ञानरुपी औषधि लो, यानी तुम अच्छे ज्ञानी बनोगे जिससे तुम्हारे मन की कुकल्पनाएँ जाएंगी और तुम नीतिवान बनोगे तब तुम्हारी जिस जानवरों जैसी रातदिन की हाजरी लगायी जाती हैं वह भी बंद होगी | अब पढ़ाई करने के लिए अपनी कमर कस लो | यानी तुम ज्ञानी बनकर कुकल्पनाएँ नहीं करोगे; लेकिन तब भी मुझसे यह सिद्ध नहीं किया जा सकता क्योंकि इसके लिए उदाहरण हैं, जो शुद्ध पाठशालाओं में पढ़कर निपुण हुआ हैं और अपने आप को सुधरा हुआ मानता हैं वह भी किसी समय शरीर पर रोमटे खड़े कर देने जितने बुरे कर्म करता है फिर तुम तो मांग-महारहो|

अनुवादक का नोट 
(15 फरवरी 1855 और 1 मार्च 1855 में मुंबई से ‘ज्ञानोदय’ पत्रिका की पुस्तक-14 के अंतर्गत क्रमशः अंक-4 और अंक-5 में  प्रकाशित मुक्ता सालवे के इस मराठी निबंध को दिनांक 15 फरवरी और 1 मार्च 2018 को 163 वर्ष पुरे हो जाएँगे | इस निबंध के हिंदी अनुवाद के लिए ज्ञानोदय में प्रकाशित मूल निबंध की प्रति प्रो.डॉ.दिलीप चव्हाण, अंग्रेजी विभाग, स्वा.रा.तीर्थ विश्वविद्यालय, नांदेड द्वारा अनुवादक को उपलब्ध कराने के लिए हार्दिक आभार साथ ही हमेशा की तरह स्त्री प्रश्नों में हाशिए के स्त्री लेखन को प्रकाशित करनेवाले और इस निबंध का हिंदी अनुवाद प्रकाशित करने के लिए प्रिय मित्र और संपादक,स्त्रीकाल का शब्दों में आभार व्यक्त नहीं किया जा सकता | इस अनुवाद पर किसी सुझाव के लिए अनुवादक को sandeepmadhukarsapkale@gmail.com पर मेल कर सकते हैं | अनुवादक-  संदीप मधुकर सपकाले, सहायक प्रोफेसर, दूर शिक्षा निदेशालय,म.गां.अं.हिं.वि., वर्धा) 

फोटो: गूगल से साभार 
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सिगरेट और खाली डिबिया

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सुशील मानव


स्वतंत्र पत्रकारिता और लेखन तथा एक्टिविज्म. सम्पर्क: susheel.manav@gmail.com
फोन- 0639349135

सिगरेट और खाली डिबिया

1
लड़की की स्कर्ट से
कितना मेल खाती है ये शाम
आसमान भी घूमने निकला है
लड़के के शर्ट सा शर्ट पहनकर
कि पिछले ही हफ्ते खरीदी है दोनों ने
आज के दिन पहनकर एक-दूजे को रिझाने के लिए
एक दूजे की नजरों में सिगरेट सा फँसे
अंगार हो रहे दोनों राख भी
कि सिगरेट की एक खाली डिब्बी आज इनकी तलाश में है

2
मैक्डोनाल्ड के रेस्टोरेंट में
आमने सामने की सीट पर बैठ
एकदूजे को खिला रहे हैं आइसक्रीम
जुठार जुठारकर
बीच बीच में जुड़ जाते हैं दोनों के होंठ
मेज के ऊपर से
मेज के नीचे
पाँवों में पाँवों की लंगी लगी है
बीच में फँसा है बेचारा मेज
दुनियादारी की तरह
कि उनके करतूतों से खिसियाया रेस्टोरेंट मैनेजर
देता है वार्निंग बीच में फँसे टेबल की तरह
कि बंद करो ये लपर-झपर
कि अब फिर किए ये सब तो
फौरन बुलाऊँगा पुलिस
और फिर निकल जाते हैं दोनों

बाहर, जलते हुए सिगरेट की मानिंद
पीछे रह गया रेस्टोरेंट
सिगरेट के खाली डिब्बे की तरह
मेज पर रखी कटोरी में पिघल रही है आइसक्रीम
एक दूजे में लिपटे
नंगे पड़े हैं दो जूंठे चम्मच
बाकी रह गए अरमानों की तरह

3
बिल्कुल सँटकर बैठे हैं दोनो
रिक्शे पे जाँघ पे जाँघ चढ़ाए
लड़के का हाथ लड़की के कंधे से होते हुए पहुंच रहा है स्तनों तक
नैतिकता के पेंचोख़म से खीझा लड़का
दबा रहा पुरजोर उसका स्तन
ज्यों मर्यादा की जान बसी हो उसमें
लड़की कुरेद रही है लड़के की जाँघ
दुनिया की जख़्मों पर पड़ी पपड़ी की मानिंद
लड़का उठाता है अपनी नज़र
भरनज़र लड़की को देखने के लिए
ठीक तभी लड़की मारती है आँख और शरमाकर नजरें झुका लेता है लड़का
लड़की लपककर भिड़ा देती है लड़के के होठों से होठ
और मूँद लेते हैं दोनों अपनी -अपनी आखें
रिक्शे वाला साइड मिरर से देखता जाता है चुपचाप सब
कि चौराहे की ट्रैफिक रोक देती ही रिक्शे की गति
रिक्शेवाला कहता है बाबूजी लोग देख रहे हैं
चौराहे पर बाबस्ता सैंकड़ों नज़रें
उन्हें रोक रहीं घूर घूरकर वैसा करने से
अधजले सिगरेट सा दोनों फिर समेट लेते हैं अपने होंठ
खंजरी नज़रे छूट जाती हैं पीछे सिगरेट के खाली डिब्बे की तरह

4

बैठे हैं दोनों मंदिर में
हाथ जोड़े, शीश नवाए, घुटनों पे
प्रार्थना के ताईं जब जब मूँदते हैं वो आँखें
बंद आंखों में एक दूजे का ही चेहरा दिखाई देता है
पुजारी देता है जब दोनों के हाथों में प्रसाद के फूल
चूमकर वो फूल खोंस देता है लड़का लड़की के जूड़े में
लड़की चूमकर अपने हाथ का फूल रख देती है लड़के की मुट्ठी में
लड़का याचक नजरों से देखता है लड़की की ओर
जल उठती है प्रेम ज्योति
यूं बाती सी बरर जाती है लड़की लड़के संग आलिंगन में
प्रेम के प्रकाश में काँपने लगते हैं क्रुद्ध पुजारी
हटो, भागो ओ पापियों
कि अपवित्र कर दिया तुम दोनों ने भगवान का घर
आस्था के चैनस्मोकरों ने उठा फेंका मंदिर के बाहर
दोनों को, बुझे हुए सिगरेट की तरफ
पीछे रह गए भगवान और उनका मंदिर
सिगरेट की खाली पैकेट की तरह

5

लड़का लड़की बैठें हैं
एक पार्क में झाड़ियों के पीछे
एक लंबी कश की तरह एक दूजे को अपने भीतर ज़ज़्ब कर लेने की खातिर
कि हिल उठती हैं तभी मदमस्त हुई झाड़ियां
हर फूँक में दहक उठता लड़का
धुएं के छल्ले सा सीत्कार छोड़ती लड़की
कि लाज लिहाज तक न किए संस्कृति की दुहाई देने वाले
और संस्कृति का दुईहथा शिश्न लिए
दनदनाते जा घुसे झाड़ियों में
और खींच लाए दोनों को झाड़ियों के बाहर
वहां क्योंकर न कोई बाल्मीकि हुआ
जो शरापता प्रेमीजोडों को विलगाने वाले उन शिकारियों को
कि कितनी बेदर्दी से फेंककर कुचल दिया उन्होंने
खत्म हुए सिगरेट की तरह
पीछे छूटी रही संस्कृति
बेकार की खाली डिबिया की तरह

6
ये हवा जो इतनी थकान लिए भटक रही
शायद ये उन दो साँसों की कैद से भागी है
किसी सिगरेट की डिब्बी में बैठकर तनिक सुस्ता तो ले ये
कि दो जवाँ साँसें फिर इनकी तलाश में हैं
उनके पास माचिस नहीं है शायद
कि फिर रखे हैं लड़की ने लड़के के होठों पे होंठ
सिगरेट पे रख जलाते सिगरेट की तरह

7
एक काली बाइक आ रुकी गली के मुहाने पे
पीछे सीट से उतरी लड़की
लड़के ने बाइक पे बैठे बैठे ही उतारा सिर से हेलमेट
फिर एंड़ी उठाकर बिल्कुल पंजो पर तनेन होकर
लड़की ने उसके होंठों की बोसागोई की
और फिर एक बार भी बिना पलटे देखे
बेतहासा बदहवास सी भागी गली में
लड़के ने बाइक स्टार्ट की और रात के हरे पत्तों में तोता हो गया
पीछे छूट गया समाज और उसकी कुत्सित मर्यादाएं
फ्लैटों के बार्जे से उँगली दिखाते हुए
खाली और नंगे
सिगरेट के खाली डब्बे की तरह

तस्वीरें: साभार गूगल

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प्रिया वरियर तुमने ऐसा क्या किया कि मशहूर हो गई!

सुधा सिंह

 मलयाली फिल्म ‘ओरु आडार लव’ की नई अदाकारा प्रिया वरियर का दो दिन पहले जारी वीडियो आज तक का सबसे बड़ा हिट रहा है। इसने कई देशी विदेशी मशहूर हस्तियों के रिकॉर्ड्स को तोड़ा है। वीडियो मात्र 36 सेकेंड्स का है। फेसबुक और सोशल मीडिया की ताक़त को भी यह दर्शाता है कि यहां क्लिप अपलोड किया गया और वह रातों रात वायरल हो गया। नेताओं और राजनेताओं के साथ प्रिया प्रकाश के इस वीडियों क्लिप के मेम्स बनाए जा रहे हैं। प्रिया और उसके सहअभिनेता रोशन अब्दुल रउफ की चुलबुली अदाएं देखनेवाले का मन मोह रही हैं और मीडिया की भाषा में ‘नेशनल क्रश’ बन गई है।

 इस वीडियो को देखनेवाले दर्शक से कोई नहीं पूछ रहा कि उसे इस वीडियो में क्या अच्छा लग रहा है। प्रिया के साक्षात्कार से धन्य होनेवाले चैनल नहीं पूछ रहे या बता रहे कि इस वीडियो में ऐसा क्या दिख रहा है कि वह सबका पसंदीदा बन गया। मोहब्बत और शरारत की अदाएं पहले भी आईं हैं, देखी गईं हैं लेकिन इतने लाइक्स दो दिन में मिलना, इतना देखा जाना और पसंद किया जाना , शायद पहली बार हो रहा है। यह भी ध्यान रखिए कि वीडियो क्लीपिंग 14 फरवरी 2018 के दो दिन पहले जारी किया गया। जिस देश में 14 फरवरी 2018 की शिवरात्रि की ऑफिसियल छुट्टी का प्रयोग, 14 फरवरी 2018 को पूरी दुनिया में मनाए जानेवाले ‘वैलेंटाइन डे’ पर बात न करने के एक बहाने के रूप में चालाकी किया जाता हो, वहां स्कूली जीवन की पृष्ठभूमि में किशोर प्रेम का यह वीडियो पसंद किया जा रहा है, तो यह सोचने वाली बात है कि आखिर इसमें पसंद की जाने वाली बात कौन सी है।

इसमें कोई दो राय नहीं कि वर्तमान समय में प्रेम और प्रेम को लेकर समझ के भिन्न भिन्न आयाम मौजूद हैं। एक ही समय और समाज में लखनऊ विश्वविद्यालय की ख़बर भी आती है कि वहां प्रशासनिक आदेश से विश्वविद्यालय के गेट पर ‘वैलेंटाइन डे’ पर विद्यार्थी विश्वविद्यालय परिसर में न आ सकें, इस हेतु ताला जड़ दिया गया है। उच्चशिक्षा संस्थान में पढ़नेवाले विद्यार्थियों के माता-पिता को चेताया गया है कि वे 14 फरवरी, वैलेंटाइन डे पर अपने बच्चों को विश्वविद्यालय न आने दें, घर में रखें। इस तरह की अभिभावकीय निगरानी स्कूलों में हुआ करती थी, अब वह उच्चशिक्षा प्राप्त कर रहे वयस्क विद्यार्थियों के जीवन में भी घुसी चली आ रही है। ऐसा समाज हम बना चुके हैं कि जिसमें विद्यार्थी कब ‘बच्चा-बच्ची’ बन जाते हैं , पता नहीं चलता। ऐसे में स्कूल की पृष्ठभूमि पर बनी इस प्रेमकहानी का हिट होना ग़ौरतलब है। अचानक संदेह होने लगता है, हम बदल तो नहीं गए। सामाजिक समझदारी और परिपक्वता बढ़ने तो नहीं लगी। पर यह ध्यान करते ही कि यह खाप पंचायतों वाला समाज है, धार्मिक और जातिगत कट्टरता वाला समाज है, संदेह को काफूर होते समय नहीं लगता।

 टेलीविजन और सिनेमा माध्यम, जिसके विस्तार के रूप में यू-ट्यूब और फेसबुक लाइव तथा अन्य दृश्य प्रसारणों को रख सकते हैं, की खूबी है कि वह सबसे बड़ा स्टोरी टेलर है। लेखक, कहानीकार, कलाकार , सब उसके आगे बौने हैं। यह बांधे रखता है। बांधता है अपनी स्टोरी के जरिए। टेलीविज़न पर स्टोरी चलती है, जीवन में स्टोरी चलती है, रस बनता है फिर रस सामाजिक संरचना में घुलकर समरस बन जाता है, स्टोरी का यह हश्र या अंत है। किसी ने ग़लत प्रचलित नहीं किया है कि ‘कहानी खत्म पैसा हजम’ ! स्टोरी को पैसा वसूल करने वाला होना चाहिए। पैसा तभी वसूल होगा जब सामाजिक-रसिक उसमें आनंद लेगा। लेकिन प्रेम के लिए एक निरंतर क्रूर और असहिष्णु बनता जा रहा समाज, एक विशेष दृश्य में बन रहे प्रेम को कैसे स्वीकार कर रहा है ! क्या यह समाज बदल गया या टेलीविजन और सिनेमा के दृश्य-प्रतीक परिवर्तन के वाहक बन गए। यही वह दृश्य माध्यम है जिसमें एक बांग्ला फिल्म के गाने के जरिए, पॉपुलर संगीतकार और गायक बप्पी लाहड़ी ने कहा था, ‘प्रेम करॉर जायगा नाइ’ ! इस समाज में प्रेम के लिए जगह नहीं है !

याद कीजिए सिनेमा में लड़की ने पहली बार आंख नहीं मारी है। यानि दृश्य प्रतीकों में आंख मारने के सीन रहे हैं, गाने भी बने हैं, पर कोई इतना हिट नहीं हुआ ! इतना पसंद नहीं किया गया, इतनी त्वरित प्रतिक्रिया सिर्फ एक 36 सेकेंड के दृश्य पर नहीं आई।  क्यों ? ‘अंखियों से गोली मारे, लड़की कमाल रे कि अंखियों से..’ गीत याद है न। यह गीत बहुत हिट हुआ था लेकिन इसकी अदाकारा के नाज-नखरों की वैसी चर्चा नहीं हुई जैसी प्रिया प्रकाश की हो रही है। कारण एक तो यह है कि तब यह गीत सीधे सिनेमा के पर्दे पर आया था ; यानि सिनेमा, सिनेमा के मीडियम में ही संप्रेषित हुआ था। वह दृश्य विशेष के रूप में सोशल मीडिया के जरिए वायरल नहीं हुआ, इतनी जल्दी उसके ‘मेम्स’ अन्य नेताओं और अभिनेताओं के साथ बनाकर सोशल मीडिया और व्हाट्सअप पर भेजे नहीं गए। ये नए प्रचार माध्यम हैं, इनकी गति तीव्र है, इनका दखल सीधे वर्तमान समय में है। ये रियल टाइम कम्युनिकेशन का हिस्सा हैं। प्रभाव में फर्क का एक बड़ा कारण स्वंय मीडियम है, इसमें संदेह नहीं।

लेकिन यह नया मीडियम जो रियल टाइम और स्पेस में संप्रेषित कर रहा है, 36 सेकेंड में एक कंप्लीट स्टोरी की तरह नज़र आ रहा है, स्वतंत्र और अन्य से असम्बद्ध नज़र आ रहा है, इसलिए उतने क्षण में रस वर्षा कर आनंद की सृष्टि कर रहा है। इसमें कहीं तनाव या द्वन्द्व नज़र नहीं आ रहा बल्कि उल्टा एक चिर सनातन भाव – ‘प्रेम’ के साथ जोड़कर कुछ नए भावों को पेश किया गया है। आधुनिक लड़की और आधुनिक लड़का प्रेम कर रहे हैं, शरारत और हंसी कर रहे हैं, लुभा रहे हैं और समझ लिए जाने पर शर्मा रहे हैं। सब कुछ संतुलन में है। यहां तक कि लड़की का आंख मारना भी संतुलन में है। साथ ही वह एक नए भाव को भी संप्रेषित कर रहा है कि लड़की केवल ‘बोल्ड’, ‘ब्यूटीफुल’ भर नहीं है बराबरी और स्वतंत्रता के भाव से भी भरी है। लडके ने आंख मारी तो लड़की ने भी आंख मारी ! बात बराबर। ये ‘निर्भया कांड’ और ‘निर्भया क़ानून’ के बाद की लड़की है, आज के जमाने की है। शाबास। लेकिन याद कीजिए रीतिकालीन श्रृंगारी कवियों की पूरी परंपरा को, नायक-नायिका के प्रेम वर्णन को और हमारे प्रसिद्ध कवि सात सौ दोहे वाले बिहारीलाल को- ‘कहत नटत रीझत खिजत’ या ‘भरे भौन में करत है नैनन ही सों बात’ । नैनों से बात करने की यह श्रृंगारी परंपरा बहुत पुरानी और समाज स्वीकृत है। देखा यह जाना चाहिए कि यह 36 सेकेंड का वायरल दृश्य, अपने प्रतीकों और चिह्नों में उस समाज स्वीकृत दायरे से आगे बढ़ा है, कुछ नई बात ‘कोडिफाई’ हुई है या यह श्रृंगार के परंपरित हाव-भाव की स्टीरियोटाइप प्रस्तुति भर है।

यह दृश्य जिन प्रतीकों से निर्मित हो रहा है , वे प्रतीक बहुत सहज और सामान्य नज़र आ रहे हैं। एक लड़का लड़की को देखकर उसकी तरफ भौंहें नचाता है, आंख मारता है। लड़की भी उसके जवाब में तुर्की-ब-तुर्की वही भंगिमाएं करती हैं और इस चुहल से आनंद पैदा होता है। लेकिन अगर सतह के नीचे पढ़ने की कोशिश करें तो यह सहज पाठ अपनी संरचना में बहुत जटिल है। इसमें सामाजिक शक्ति संरचना के उस मिथ की रक्षा की गई है, जिसमें कामुक पहलक़दमी का अधिकार पुरुष को है। प्रेम में पहल करने वाला पुरुष साहसी और स्त्री बदचलन होती है। यह दृश्य, इस सामाजिक रूढ़ि के इर्द-गिर्द ही बुना गया है। स्त्री के हाव-भाव पुरुष की कामुक इच्छाओं को जगाने में सहयोगी होने चाहिए, यह दृश्य इस धारणा के भी अनुकूल है। यानि आंख मारती स्त्री सिर्फ उस पुरुष को सहमति का संकेत दे रही है, इससे ज़्यादा नहीं। हां, अपनी वेशभूषा और हाव-भाव के लिहाज से वह आज की युवा-भाषा में बिंदास भी लग रही है। लेकिन यह स्वतंत्र स्त्री का प्रतीक न होकर स्त्री की रूढ़ छवि है। इस छवि को तोड़ना मीडिया के वश की नहीं।

सुधा सिंह दिल्ली विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में प्राध्यापिका हैं.  सम्पर्क: singhsudha.singh66@gmail.com

सभी तस्वीरें गूगल से साभार

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दलित स्त्रीवाद , मेरा कमराजाति के प्रश्न पर कबीर

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बसंत के विदा होने से पहले

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अमृता सिन्हा


स्वतंत्र लेखन, विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित संपर्क: a.sinhamaxnewyorklife@ymail.com



बसंत के विदा होने से पहले 

सुनो
थोड़ी सी धूप
थोड़ी सी कोयल की कूक
थोड़ी उजास फूलों की
थोड़ा सा इत्र इश्क़ का
अँजुरी भर हसीन यादें
शर्मीले से एक बोसे का चिराग़
भेजा है मैंने
हवाओं के साथ
तितलियों की कोमल पंखों के साथ
फुदकती गिलहरियों के साथ
और
थोड़ा इस जाते हुए
बसंत के साथ
तुम
महसूस करना
आँखें मूँद कर
मन के हर कोने में
पाओगे पहरा, मेरी यादों का
मेरी मुस्कुराहटों का
क्योंकि ये दिन तुम्हारे नाम का है
ओ ! प्यारे बसंत मेरे !

अस्तित्व

तुम्हारा प्रेम उस आधार- कार्ड
की तरह है
जिसके बिना मेरा कोई अस्तित्व ही नहीं
जिसे रखती हूँ मैं ख़ूब संभाल कर
किसी प्रेम-पत्र की तरह
हर पल इस क़दर
जैसे मेरा वजूद
सिमटा हो इस अदने से काग़ज़
के टुकड़े में ।
जैसे,
मेरी पूरी पहचान, मेरा परिचय
मेरे होने का सच ,,,, हो सिर्फ इतना ही
यह वही काग़ज़ का टुकड़ा है
जो दिखाता है समय समय पर
हमें हमारी औक़ात
कि इसका छूट जाना , गुम हो जाना
कितना ख़तरनाक हो सकता है
यह उस प्रसूता से पूछो
जिसकी इच्छाओं पर ताला जड़ गया था
और उम्मीदें संदूकों में दम तोड़ रही थीं
जिसका प्रसव इस आधार – कार्ड के
आगे छोटा पड़ गया था
सचमुच ,आधार-कार्ड के जेब में ना होने
का अहसास भी
कितना भयावह है,
ठीक उसी तरह ,जैसे
भूलने की सोचना तुम्हें
आज के बदलते परिवेश में
इसकी उपस्थिति उतनी ही प्रासंगिक है
जितना कि
सपने देखने से
सपने उगने तक
आवश्यक है
आँखों से झरे आँसू में बरक़रार रहे
नमक का स्वाद ।

सपनों के उगने तक

सुबह हो रही थी
पर बिटिया
अब तक सो रही थी
स्कूल जाना था उसे
सो ज़ोर से झिंझोड़कर
जगाया
तकिये में मुँह छुपाते हुए
कहा उसने
सोने दो न माँ
अभी देख रही हूँ सपने
सपना पूरा होनेतक
सोना चाहती हूँ मैं ।
मैं किंकर्तव्यविमूढ़
खड़ी रही
कुछ देर
बिटिया के सपने में
ख़लल नहीं बनना चाहती थी
सो देखने दिया उसे सपना
एक दिन जागती आँखों से
भी ज़रूर देखेगी सपने
इसी उम्मीद के साथ
दिया उसे सपनों की सौग़ात ।
क्योंकि
उसका हर सपना पूरा हो
यही तो मेरा भी सपना है ।

फ़ितरत इंसानों की       

परिंदे भयभीत थे
वे चीख़ रहे थे समवेत स्वरों में
भाग रहे थे इन्सानों से
उनका चौकन्ना रहना जायज़ था
क्योंकि वे जानते थे फ़ितरत इन्सानों कीं
उनको डर था
उन बहेलियों से जो न जाने
कब से ताक़ लगाये बैठे थे
जाल बिछाये पेड़ों के पीछे
पंखों के दुश्मन हैं ये

बाज़ नहीं आते पंख कतरने से
उनकी वहशियाना हरकतें
तो तब भी बेपर्दा होती हैं जब
जब बिना पंखों वाली चिड़िया
आज़ाद की जाती है और वे भागती हैं
सरसराती हुई, निकाली जाती हैं ज़बरन
कभी
मंदिरों के तहख़ाने से
कभी मस्जिद से सटे गंधाते कमरों से
कभी पाकिस्तान की बख्तरबंद  गाड़ियों में मिलती हैं ठूँसी हुई
कभी निकाली जाती हैं अफ़ग़ानिस्तान में सफ़ेदपोश
घरों के अंडरग्राउंड कमरों से
कभी भेजी जाती हैं इराक़
कभी साऊदी अरब
होती हैं ये शिकार कबूतर बाज़ों की
कुछ ही नसीबों वाली होती हैं
जिनकी होती है रिहाई
उन मासूमों की चीख़ें
दहशत से भरी, ख़रगोश सी सहमी
ख़ामोश हो जाती हैं
और
उनकी मौन चीख़े
नहीं पहुँच पाती
देश के किसी कोने में
यहाँ तक कि
संसद के अतिसुरक्षित
बंद ,वातानुकूलित कमरों तक भी नहीं
जहाँ सियासतदां
मसरूफ होते हैं
अपने मुख़्तसर
अट्टाहासों में, अनर्गल बहसों में
और
ग़ैरज़रूरी कहकहों में ।

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दलित स्त्रीवाद , मेरा कमराजाति के प्रश्न पर कबीर

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फिल्म तो हिट होती रहेंगी, माहवारी स्वच्छता को हिट करें

क्वीलिन काकोती

आज मैं अपना सैनिटरी पैड खरीदने एक फार्मेसी गयी. दुकानदार के अलावा तीन अन्य पुरुष और एक महिला वहां खड़े थे। मैंने पैड देखे और मेरी पसंद के दो पैड देने के लिए कहा. दुकानदार ने मेरे सामने उन्हें मेज पर रखा. वह दुकान मेरे घर के पास है. मैं अक्सर खरीदने के पहले उसे देखती हूँ कि यह मेरे अनुरूप है कि नहीं. मैं हमेशा उसके कॉटन और साइज़ को लेकर सजग रहती हूँ, ताकि यह किसी अन्य आंतरिक समस्या का कारण नहीं बन सके। मेरे पीछे खड़े पुरुष बहुत अजीब महसूस कर रहे थे वे मेरी ओर और मुझे देखने में भी झिझक रहे थे. फिर हमेशा की तरह दुकानदार ने इसे एक काले पॉलीथिन बैग में डाल दिया था. मैं खुद को नियंत्रित नहीं कर सकी और आखिरकार बोल ही पड़ी कि “भैया (एक व्यक्ति को संबोधित करने के लिए दिल्ली का सबसे सामान्य शब्द) अब मासिक धर्म की स्वच्छता पर फिल्म आ रही है,  जहां सबसे लोकप्रिय अभिनेता मुख्य भूमिका में है और आप लोगों को अब भी एक पारदर्शी पैकेट में या कागज के बिना इसे देने में शर्मिंदा महसूस करते हैं।



उसने और वहां खड़े अन्य पुरुषों ने मुझे देखा कि जैसे मैंने कुछ अपराध किया है। फिर दुकानदार ने कहा, “मैडम आप सही हैं लेकिन हम अभी भी भारत में रहते हैं और हमारे पास कुछ मर्यादा बनाएये रखना है। हम विदेश में नहीं रहते और हर कोई आप जैसा आधुनिक भी नहीं है। “मैं उसके जवाब पर चकित नहीं थी, मैंने कहा कि हमारी स्वच्छता के लिए है, इसमें छिपाने जैसी क्या बात है? वे मुझे जवाब नहीं दे सकते थे लेकिन मुझे यकीन है कि फार्मेसी छोड़ने के बाद वहाँ मेरी निंदा की गयी होगी. यह पहली बार नहीं है कि मैं ऐसी स्थिति का सामना कर रही हूं। यह हमेशा मेरे साथ होता है और मैंने हमेशा सभी दुकानदारों से पूछा कि वे अखबारों को लपेटे बिना इसे एक पारदर्शी पॉलीथिन में दे सकते हैं। मुझे लगता है कि हर लड़की को अलग-अलग जगहों में इस तरह का सामना करना पड़ता है, जिस तरह से मैं यहां राजधानी में कर रही हूं। इसलिए स्पष्ट रूप से एक दूरदराज के स्थान की स्थिति की कल्पना की जा सकती है। भारत के सबसे सफल और लोकप्रिय नायक अक्षय कुमार अभिनीत फिल्म ‘Pad man’ सभी टेलीविजन चैनलों और रेडियो पर छाया हुआ है. हम बॉलीवुड, टीवी उद्योग और खेल बिरादरी के हर बड़े चेहरे को अक्षय कुमार की स्वीकार करते हुए पेड को हाथ या छाती पर प्रदर्शित करते देख रहे हैं. भारत में अचानक हर कोई मासिक धर्म की स्वच्छता के बारे में चिंतित है।

यह फिल्म अरुणाचलम मुरुगनथम की वास्तविक जीवन की कहानी पर आधारित है। यद्यपि मुझे अभिनेता के रूप में अक्षय कुमार पसंद नहीं है, भले ही वह फिल्म को बढ़ावा देने के लिए एबीवीपी का मंच चुन रहे हैं फिर भी मैं उनका इस समय का समर्थन करती  हूं क्योंकि कम से कम एक प्रतिशत लोग वास्तव में इस फिल्म से शिक्षित होंगे। मैं जानता हूं कि बहुत से लोग फिल्म देखने आएंगे और थियेटर में सीटियाँ बजायेंगे. वे अक्षय के गंभीर प्रयासों की सराहना करेंगे इसे ब्लॉकबस्टर बना देने के लिए। लेकिन थिएटर से आने के बाद लडकियां अपने सैनिटरी पैड को दुनिया से छुपाए हुए एक ब्लैक लेयर बैग में ले जाने को विवश होंगी, दुकानदार इसे अखबार और एक ब्लैक बैग में लपेट कर देगा और आदमी अपनी बहन या पत्नी को एक पैकेट लाने का अनुरोध अस्वीकार कर देगा. यही वास्तविकता है. अचानक मीडिया और मशहूर हस्तियां मासिक धर्म की स्वच्छता के प्रति जागरूक हो गये हैं, लेकिन क्या वे एक नए सुपर हिट को देने के बाद एक महीने बाद भी समान रूप से चिंतित होंगे. भारतीय महिलाओं में ओवरी के कैंसर और सर्वायकल कैंसर की दर बहुत अधिक .है अधिकांश भारतीय महिलाये माहवारी के दौरान कपड़े का इस्तेमाल करती हैं क्योंकि वे पैड नहीं खरीद सकती हैं. ये महिलायें नहीं जानतीं कि मासिक धर्म की स्वच्छता क्या है.  तो क्या हमारा कर्तव्य फिल्म बनाने और कुछ महीनों के लिए प्रचार करने में समाप्त होता है? इसलिए मैं केवल कह सकता हूँ कि स्वच्छता को एक हिट दें  फिल्म को नहीं.

तस्वीरें गूगल से साभार

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आप योनि को किस निगाह से देखते हैं, यह सवाल मेरे लिए बेमानी है…

कल्पना पटोवारी

मुझे नहीं पता कि खलनायक फिल्म का वह गीत आपको कैसा लगता है जिसके बोल हैं – ‘चोली के पीछे क्या है, चुनरी के नीचे क्या है।’ मैं आपसे यह सवाल भी नहीं करने जा रही कि ‘लागल जोबनवा में चोट’और ‘लागल करेजवा में चोट’ के बीच आप क्या अंतर समझते हैं। मेरे लिए यह सवाल भी बेमानी है कि आप योनि को किस निगाह से देखते हैं। मेरा सवाल समाज से है जो देश की राजधानी दिल्ली में आठ माह की बच्ची के साथ उसके चाचा द्वारा दुष्कर्म के बावजूद मौन है।

कोई भी साहित्य व संस्कृति बिना महिलाओं के अधूरी है। फिर चाहे वह लोक संगीत ही क्यों न हो, स्त्री अलग-अलग रूपों में, बिम्बों में नजर आती है। मसलन एक बिम्ब सीता का है तो दूसरा बिम्ब शक्ति का। एक तीसरा बिम्ब भी है जिसका वर्णन न तो पौराणिक गाथाओं में मिलता है और न ही इतिहास में। यह बिम्ब है अनगिनत महिलाओं का जो पुरूष प्रधान समाज में बंद दरवाजों में अपना जीवन कब जी लेती हैं, पता भी नहीं चलता है। बंद दरवाजों में उनके साथ हुए जुल्म कभी-कभार सिसकियों के रूप में बाहर आती भी है तो यह पुरूष प्रधान समाज किसी दूसरे के घर का मामला कह अपने कान बंद कर लेता है। यह तो एक पक्ष है। दूसरे पक्ष तो और भी भयावह हैं। इस भयावह पक्ष को समाज चोली और योनि का पर्याय बता पुरूष प्रधान समाज अपनी सहुलियत के हिसाब से महिलाओं की यौन कुंठा तक करार देता है। लेकिन जाहिर तौर पर यह सच नहीं है।

लोक संगीत की सबसे खुबसूरती यही है कि वह महिलाओं को कहने की आजादी देती है। वह उन्हें जीने का हौसला देती है तो अपने अरमानों को अभिव्यक्त करने का तरीका भी सिखाती है। एक कलाकार के रूप में मेरा संबंध लोकगीतों से है। मेरा जन्म आसाम में हुआ और संगीत मुझे विरासत में मिली। साथ ही यह भी कहना चाहती हूं कि मेरा जन्म कौड़ी-कामख्या की धरती पर हुआ, जिन्हें योनि की देवी भी कहा जाता है। उस समय बहुत छोटी थी जब सार्वजनिक तौर पर मैंने गाना शुरू किया। पिताजी मुझे कार्यक्रमों में ले जाते और मुझे एक एक ऊंचे टेबल पर बिठा देते। उन दिनों एक कलाकार के रूप में मेरी परिवरिश भूपेन हजारिका के गीत-संगीत के साथ हुई, जिसकी बुनियाद ही प्रगतिशीलता थी। साहित्य और संस्कृति मेरे प्रिय विषय रहे। यहां तक कि स्नातक में भी मेरा यही विषय बना रहा। बाद के दिनों में जब मैं मुंबई आयी तब जाना कि लोक संगीत के दूसरे आयाम क्या हैं।

प्रारंभ में टी-सीरीज जैसी बड़ी म्यूजिक कंपनी से जुड़ने का मौका मिला। भोजपुरी में गीत गाने के लिए कहा गया। उन दिनों भोजपुरी मेरे लिए एक अजनबी भाषा थी। गीत के बोल अंग्रेजी में लिखे जाते और मुझे गाने के लिए कहा जाता था। तब हिन्दी भी मुझे नहीं आती थी। उन दिनों भी कई शब्द असमिया भाषा में भी थे। भोजपुरी से नजदीकियां बढ़ने लगीं। लेकिन उन दिनों ही मुझसे एक सोलो एलबम गवनवा ले जा राजा जी गवाया गया। यह एलबम बहुत हिट हुआ। इसके पहले भोजपुरी भाषियों के बीच मेरी पहचान भक्ति गीतों को गाने वाली एक गायिका के रूप में ही थी। लेकिन तब मेरी पहचान में बड़ा बदलाव आया।

अपने अतीत के कुछ पहलु आपके समक्ष रखने का मेरा एक आशय यह है कि आप मेरे और भोजपुरी के बीच के रिश्ते को समझ सकें। मैंने हिन्दी बोलना और लिखना सीखा। भोजपुरी बोली को सीखा। मेरे सामने संगीत की दो धारायें थीं। एक जिसके हर सुर में भूपेन हजारिका थे तो दूसरी और भोजुपरी में एक रिक्त धारा थाी। रिक्त कहने का मेरा आशय यह कि उस समय तक मैं भोजपुरी में भूपेन हजारिका को तलाश रही थी। यही तलाश मुझे भिखारी ठाकुर के पास ले गयी। मैंने बिहार राजभाषा परिषद द्वारा प्रकाशित भिखारी ठाकुर रचनावली को पढ़ा। उसमें उद्धृत नाटकों और उसके पात्रों की सहायता से भोजपुरी संस्कृति के उस पक्ष को समझने का प्रयास कर रही थी जिसकी चर्चा ही नहीं की गई।

मसलन बेटीबेचवा नाटक को ही उदाहरण के रूप में लें। उस नाटक में नायिका अपने पिता से शिकायत करती है कि क्यों उसे एक बुढ़े के हाथों बेच दिया गया। गबरघिचोर की नायिका यौन स्वतंत्रता की बात करती है और अपने बच्चे पर अपना दावा ठोंकती है। वह तर्क देती है कि उसका बच्चा नाजायज नहीं है। ऐसी ही नारी स्वतंत्रता की झलक बिदेसिया में मिलती है। पलायन का दर्द झेलने वाली सुन्दरी उस समय भी पुरूष प्रधान समाज में अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष करती है।

भिखारी ठाकुर पर केंद्रित ‘द लीगेशी ऑफ भिखारी ठाकुर’ एलबम लांच करने के बाद मेरा हौसला बढ़ा। इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सराहा गया। मैंने अपने आपको रोका नहीं। मेरी जिज्ञासा भोजपुरी गीत-संगीत के विभिन्न पहलुओं के प्रति बढ़ती रही। उदाहरणस्वरूप एक पुरबी है – देवरा तुड़ी किल्ली। पिछले वर्ष पैडी फेस्टिवल के दौरान जब मैं इस गीत काे गायी तब यह बात समझ में आयी कि यह गीत भारत के विभिन्न राज्यों में रहने वाली महिलाओं की पीड़ा को संबोधित करती है जो किसी न किसी रूप में पलायन के कारण होने वाली परेशानियों से जुझ रही हैं। जाहिर तौर पर उनकी परेशानियों में घर की चाहरदीवारी के अंदर होने वाले यौनिक जुल्म भी शामिल हैं।

नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़े भी कहते हैं कि महिलाओं के साथ सबसे अधिक अत्याचार करीब 85 फीसदी उनके परिजन करते हैं। यौनिक हिंसा के मामले में भी अपराधी अधिसंख्य अपने ही होते हैं। ‘देवरा तुड़ी किल्ली’ भी एक प्रलाप है। इस गीत के माध्यम से एक महिला अपने पति से शिकायत करती है कि वह तो स्वयं परदेस कमाने गया है लेकिन घर में उसका छोटा भाई उसपर बुरी नीयत रखता है। इस गीत का एक पक्ष यह भी है कि वह अपने उपर हो रही हिंसा की शिकायत अपने गांव-समाज में भी नहीं कर सकती है। गांव-समाज उसे इसकी इजाजत नहीं देता है। मुंह खोलने पर मुमकिन है कि गांव-जवार के लोग उसे ही बदनाम कर दें।
]

असल में मेरे हिसाब से भोजपुरी लोक गीत के रूपों में  श्रृंगार और प्रलाप का है। जब मैं श्रृंगार की बात कर रही हूं तो उसमें कई पहलू हैं। अब मेरी ही एलबम गवनवा ले जा राजा जी को देख लिजीये। एक नवविवाहिता अपने पति से अनुरोध करती है कि वह उसे मायके से ले जाय। वह उसके साथ जीना चाहती है। हिन्दी साहित्य में यौन इच्छा की अभिव्यक्ति के तौर-तरीकों पर नजर दौड़ायें, भोजपुरी लोक संगीत आपको सबसे अधिक स्वतंत्रता प्रदान करने वाला और उदार साबित होगा। अब इसकी आलोचना के कई बिंदू हो सकते हैं। लेकिन आलोचना के क्रम में इसका भी ख्याल रखा जाना चाहिए कि भोजपुरी अंचल में महिलाओं को हक ही कितना दिया गया है। वे किस तरह अपनी बात समाज के सामने रख सकती हैं। गांव की एक महिला यदि खड़ी हिन्दी में बात करे तो संभव है कि उसे कई तरह के लांछन सुनने पडे गोया उसने कोई बड़ा अपराध कर दिया हो।

इसी प्रकार भोजपुरी गीत का एक रूप प्रलाप का है। समाज का वंचित तबका रोजी-रोटी और इज्जत के साथ जीने के लिए प्रलाप करता है। सोचिए कि हिन्दी में इस तरह प्रलाप क्यों सामने नहीं आता? यह केवल लोकगीतों में ही क्यों प्रत्यक्ष होता है।

बहरहाल आप जवाब तलाशने की कोशिश करेंगे तो जवाब मिलेंगे भी। लोक संस्कृति कोई पेंडुलम नहीं है जो तत्समता और तद्भवता के बीच डोलती रहे। यह जनता की संस्कृति है जिसकी अपनी परिभाषायें हैं और अपने शब्द और सुर भी। इसमें महिलायें स्वतंत्र हो जीती हैं और मरती भी हैं। यही सकारात्मकता है लोक संस्कृति की। यहां योनि का भी गरिमामय अस्तित्व है और चोली भी भीख में दिया हुआ वस्त्र नहीं।

लेखिका भारत की सुप्रसिद्ध लोक गायिका हैं। मूल रूप से आसाम में जन्मीं कल्पना ने अबतक 30 से अधिक भाषाओं में गीत गाये हैं। साहित्य से उनका गहरा लगाव है। वे अंग्रेजी साहित्य से स्नातक हैं।


तस्वीरें गूगल से साभार

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राष्ट्रीय आंदोलन में महिलायें और गांधीजी की भूमिका पर सवाल

कुसुम त्रिपाठी

स्त्रीवादी आलोचक.  एक दर्जन से अधिक किताबें
प्रकाशित हैं , जिनमें ‘ औरत इतिहास रचा है तुमने’,’  स्त्री संघर्ष  के सौ
वर्ष ‘ आदि चर्चित हैं. संपर्क: kusumtripathi@ymail.com

कुसुम त्रिपाठी


सामंती प्रथा की जकड़न जिन प्रदेशों में आज भी अंगद के पैर की तरह जमाए हुए है। पर्दा प्रथा की दीवारों को लाँघना जिन प्रदेशों में आज भी मुश्किल है, उस उत्तर भारत में गांधीजी के आवाहन पर हजारों की संख्या में औरतें सड़कों पर उतरीं। इलाहाबाद, लखनऊ, दिल्ली, पंजाब, बिहार, लाहौर और पेशावर की महिलाएँ सार्वजनिक प्रदर्शन, जुलूसों में शामिल होने लगीं। भले घर की औरतों को बिना घूँघट-बुर्का, पर्दा के सड़कों गलियों में इससे पहले कभी न उतरते देखने वाली जनता इस परिवर्तन और उत्साह से चकित थी।
गांधीजी के योगदान से इंकार नहीं किया जा सकता, किन्तु इस तथ्य को भी ध्यान में रखना जरुरी है कि जब गांधीजी ने महिलाओं संबंधी अपने विचार रखें, तब महिलाएँ स्वयं भी अपने गुणों को पहचानने लगी थीं। ऐसा केवल उनकी व्यवसायिक जिंदगी-डॉक्टर, शिक्षिका और सामाजिक कार्यकर्ता की तरह ही नहीं वरन् सार्वजनिक, राजनीतिक जीवन में भी, राष्ट्रीय और सुधारवादी आंदोलन में, श्रमिक और किसान आंदोलन में उनकी भूमिकाको देखा जा सकता है।

राष्ट्रीय आंदोलन में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी गांधीजी के प्रभाव से हुई। 1920 तक गांधीजी एक गाथापुरुष बन चुके थे। गांधीजी महिलाओं को इसलिए भी जूटा सके क्योंकि उन्हें पुरुषों के रवैये का भी ध्यान था। गांधीजी के व्यक्तित्व की खासियत थी कि वे न केवल महिलाओं में विश्वास जगाने में सफल थे, वरन् महिलाओं के पुरुष संरक्षकों पति, पिता, पुत्र, भाइयों का भी विश्वास उन्हें प्राप्त था। उनके नैतिक आदर्श इतने ऊँचे थे कि जब महिलाएँ बाहर आकर राजनीति के क्षेत्र में काम करती थी, तो उसके परिवार के सदस्य उनकी सुरक्षा के बारे में निश्चिंत रहते थे। इसका कारण था कि गांधीजी का ध्यान महिलाओं की जुझारू क्षमता पर पहली बार दक्षिण अफ्रीका में खिंचा था। वहाँ उन्होंने देखा कि भारी संख्या में महिलाएँ उनके राजनीतिक विचारों से प्रभावित होती है। उनके नेतृत्व में हुए कई आंदालनों में महिलाएँ जेल गई, बिना किसी शिकायत के जेल की कठोर सजा झेली और खदान श्रमिकों की हड़ताल में शामिल हुई। दक्षिण अफ्रीका के सत्याग्रह आंदोलन से उन्होंने महिलाओं में आत्मत्याग और पीड़ा सहने की अद्भुत क्षमता देखी।

महिलाओं के आत्मत्यागी एवं बलिदानी स्वभाव के हिमायती गांधीजी पहले व्यक्ति नहीं थे, इससे पहले भी समाज सुधारकों और पुनरुद्धारकों ने इस पर कम जोर नहीं दिया था। समाज सुधारकों ने महिला के आत्मत्याग को एक जबरदस्ती थोपे कर्मकाण्ड की तरह देखा।पुनरुद्धारकों की सोच थी कि इन कर्मकांडों से हिन्दू महिलाओं की गौरवमयी छवि बनती है। गांधीजी ने नारी के इन गुणों को हिन्दू कर्मकांड से अलग परिभाषित किया। गांधीजी ने कहा कि यह भारतीय नारीत्व का स्वाभाविक गुण है क्योंकि उनकी अहम भूमिका माँ की है। गांधीजी की सोच थी कि गर्भधारण और मातृत्व के अनुभवों से गुजरने के कारण महिलाएँ शांति और अहिंसा का संदेश फ़ैलाने में ज्यादा उपयुक्त है। गांधीजी के अनुसार स्त्री-पुरुष में जैविक गुणों के अंतर के कारण उनकी अलग-अलग भूमिकाएँ है और दोनों ही समान रूप से महत्त्वपूर्ण है। पुरुष कमाकर लाता है और स्त्री घर और बच्चों की देखभाल करती है। यहाँ भी गांधीजी ने स्त्री की मातृत्व गुणों और स्त्रियों की भूमिका को अलग परिभाषित किया है। गांधीजी को लगता था कि उनकी अहिंसा की लड़ाई में महिलाएँ उनकी विचारधारा के ज्यादा नजदीक है क्योंकि उसमें काफी पीड़ा सहना शामिल है और महिलाओं से ज्यादा बेहतर कुलीन और श्रेष्ठ ढंग से पीड़ा कौन सह सकता है। गांधीजी की नज़रों में पीड़ा सहने का गुण होना बहुत जरुरी है। उनकी नजरों में “स्वैच्छिक विधवा” आदर्श एक्टिविस्ट थी क्योंकि उसमें पीड़ा में सुख का रास्ता खोज लिया। उनकी नज़रों में वह सच्ची सती थी न कि वह जो पति की चिंता में जलकर प्राणों की आहुति दे देती थी।

गांधीजी की व्यक्तिगत छवि संत महात्मा की होने के कारण उनके नेतृत्व में शुरू हुए देशभक्ति आंदोलन की राजनीतिक और धार्मिक मिली-जुली छवि बनी। उसका क्षेत्र राजनीति से ऊपर उठकर धार्मिक हो गया। देशभक्ति को धर्म माना गया, देश को देवी माँ की संज्ञा दी गई, जिसके लिए बड़े से बड़ा बलिदान कम ही था। गांधीजी आंदोलन में महिला भागीदारी के पूर्ण पक्षधर थे। वे महिलाओं की सभाओं में, अपने भाषणों में, आंदोलनों में उनकी भागीदारी अनिवार्य मानते थे और साथ ही यह कहकर प्रेरित करते थे कि देवियों और वीरांगनाओं की तरह आंदोलन में उनकी अपनी अलग भूमिका है और उसमें इस भूमिका को निभाने की शक्ति और हिम्मत भी है। उन्होंने महिलाओं को विश्वास दिलाया कि आंदोलन को उनके महत्त्वपूर्ण योगदान की जरूरत है। वे कहते थे कि जब महिलाएँ सत्याग्रह आंदोलन में शामिल होगी, तभी पुरुष भी आंदोलन में पूरा सहयोग देगा। ८५ प्रतिशत भारतीय महिलाएँ निर्धनता और अज्ञान के अंधकार में डूबी हुई है। उन्होंने महिला नेताओं से कहा कि उन्हें सामाजिक सुधार, महिला शिक्षा एवं महिला अधिकार के लिए कानून बनाने के लिए काम करना चाहिए, ताकि उन्हें एक बुनियादी अधिकार मिल सके! उन्होंने कहाकि महिला नेताओं को सीता, द्रोपदी और दमयंती की तरह सात्विक दृढ़ और नियंत्रित होना चाहिए तभी वह स्त्रियों के भीतर पुरुषों के साथ बराबरी का भाव जगा सकेगी और अपने अधिकारों के प्रति सचेत तथा स्वतंत्रता के प्रति जाग्रत कर सकेगी।
गांधीजी के अनुसार बराबरी का यह अर्थ कदापि नहीं था कि महिलाएँ वे सब काम करें, जो पुरुष करते है। गांधीजी की आदर्श दुनियाँ में स्त्रियों और पुरुषों के अपने स्वभाव व क्षमतानुसार काम के अलग-अलग क्षेत्र निश्चित थे। उन्होंने महिलाओं को “स्वदेशी व्रत” लेने को कहा। वे सारी विदेशी वस्तुओं का परित्याग करे और प्रतिदिन थोड़े समय सूत कातने और खादी पहनने की प्रतिज्ञा करें।

खादी का प्रचार करते हुए उन्होंने कहाकि महिलाओं की धार्मिक और नैतिक जिम्मेदारी है कि वे देश को समृद्ध बनाए। वे कहते थे – “हमें देश को पुराने समय की तरह फिर से समृद्ध बनाना है। यह तभी संभव है जब संपन्न घरानों की महिलाएँ भी अपने वस्त्रों के लिए सूत काते।” खादी द्वारा गांधीजी महिलाओं को श्रम प्रक्रिया में लाना चाहते थे। उनका कहना था भारत इसलिए गरीब हो गया है क्योंकि उसने स्वदेशी हस्तकलाओं का परित्याग करके विदेशी वस्तुओं पर निर्भर रहना शुरू कर दिया है। महिलाएँ गृह निर्माता और पोषक हैं तथा भारत के पुनरुत्थान में उनकी महत्त्वपूर्ण भूमिका है। वे घर में रहकर भी खादी उद्योग चला सकती हैं। इस तरह आंदोलन में भाग लेने के लिए घर से बाहर जाना या परिवार छोड़ना जरुरी नहीं था। सन १९२०-२२ में जब असहयोग आंदोलन शुरू हुआ, पहली बार महिलाएँ भारी संख्या में आंदोलन से जुड़ी। सैकड़ों महिलाएँ खादी और चरखा बेचने गली-गली गई। विदेशी कपड़ों की होली जलाई। मुंबई में महिलाओं ने ‘राष्ट्रीय स्त्री सभा” का गठन किया।यह पहला महिला संगठन था, जो कि बिना पुरुषों की मदद से चलाया जा रहा था। यह संस्था १९२१-३० तक चली। जब तिलक कोष की स्थापना हुई, इन्होंने ४४, ५१९ रु. इकट्ठा कर गांधीजी को दिया। ३०० निर्धन लड़कियाँ वस्त्रों की कटाई कर रही थी, उन्होंने स्कूल खोले और सड़कों पर खादी बेचीं।

1920 के अंतिम दशक में गाँधी ने अपने स्वर में परिवर्तन करते हुए महिलाओं को घर से निकालकर ‘नागरिक अवज्ञा आंदोलन’ में शामिल होने की अपील की, किन्तु उन्होंने उनकी सहभागिता को विदेशी दवाओं, शराब की दुकानों की घेराबंदी करने तक सीमित कर दिया क्योंकि गांधीजी की नज़रों में स्त्रियों का यह कार्य स्वाभाविक रूप से खबता था, इसलिए नहीं कि शराब की दुकानों की वजह से महिला अपने पतियों की नशाखोरी से त्रस्त थी बल्कि इसलिए भी कि वह निजी जीवन में नैतिकता एवं शुचिता का मुद्दा था। सविनय अवज्ञा आंदोलन से राष्ट्रीय आंदोलन में महिलाओं की भागीदारी का नया चरण शुरु हुआ। १९३० को इस आंदोलन में महिलाओं की भागीदारी संख्यात्मक और गुणात्मक दोनों दृष्टियों से भिन्न था। मार्च १९३० में अहमदाबाद में दाण्डी तक २४० मील की दांडी यात्रा से शुरू हुई। इस यात्रा में किसी भी महिला को शामिल नहीं किया गया था। डब्लू.आई.ए. ने तथा मार्गरेट बहनों, दादाभाई नौरोजी की पौत्री खुर्शीद नौरोजी व कमलादेवी चट्टोपाध्याय ने गांधीजी से अनुरोध किया कि उन्हें भी दांडी यात्रा में शामिल किया जायें। गांधीजी ने यह कहकर आग्रह ठुकरा दिया कि अंग्रेज उन्हें औरतों की आड़ में छिपनेवाला कायर कहेंगे, पर अन्त में गांधीजी मान गये।नमक सत्याग्रह में गिरफ्तार होने वाली पहली महिला सरोजिनी नायडू थी। इस सत्याग्रह में कुल ८०,००० लोग गिरफ्तार हुए, जिसमें १७,००० महिलाएँ थी।

इस बीच देशसेविका संघ, नारी सत्याग्रह समिति, महिला राष्ट्रीय मंच, लेडीज पिकेंटिग बोर्ड, स्त्री स्वराज्य संघ और स्वयंसेविका संघ आदि बनें। इन सबने महिलाओं की लामबंदी, जुलूस व प्रभात फेरी निकाले, धरने आदि का आयोजन करने के साथ खादी का प्रचार प्रसार, चरखा चलने का प्रशिक्षण, खादी बेचना, शराब बन्दी, देश की स्वाधीनता का प्रचार, सभाएँ करना, छुआछूत मिटाने संबंधी उपदेश देना, कांग्रेस की सदस्यता बढ़ाना।
१९२८ में लतिका ने बंगाल में महिला राष्ट्रीय संघ की स्थापना की। बंगाल का पहला महिला संगठन, जो राजनीतिक क्षेत्र में काम करता था। लतिका का महिलाओं के लिए संदेश था “उठो, जागो, अपने देश को अच्छी तरह देखो!” चूँकि महिलाएँ आंदोलन में तभी सक्रिय हो सकती थी, जब उन्हें घर के पुरुष सदस्यों का समर्थन प्राप्त हो। इसके लिए जरुरी था उनके पति, पिता या भाई कांग्रेस या क्रान्तिकारी आंदोलन में हों। उनके केंद्र का नाम था – “शांति मंदिर”। उनका नेटवर्क था। यहाँ महिलाओं को पढ़ना, लिखना, घरेलु हस्त-कलाएँ, प्राथमिक चिकित्सा, स्वयं-रक्षा करने के साथ स्वाधीनता के महत्त्व को बताया जाता था।लतिका तथा अन्य महिला नेताओं को यह स्पष्ट हो गया था कि महिलाएँ देश के सभी मामले से कटी हुई है।

1930 तक आते-आते भारतीय स्त्रियों ने परदा उठाकर फेंक दिया और राष्ट्र के काम के लिए भारी संख्या में बाहर आई। गांधीजी ने सार्वजनिक गतिविधियों की सहभागिता के औचित्य को सिद्ध करते हुए उसे विस्तार दिया ताकि वे वर्ग एवं सांस्कृतिक बंधनों को तोड़कर आगे बढ़े। १९३० के दशक में हजारों की संख्या में महिलाएँ सविनय अवज्ञा और असहयोग आंदोलन में भाग ले रही थी। ऑल इंडिया विमेंस कांफ्रेंस को भी अपने उच्चवर्गीय दायरे से बाहर आना पड़ा। उन्होंने ग्रामीण किसान और गरीब महिलाओं के बीच काम करना शुरू किया। अब यह संस्था एक एक्टिविस्ट संस्था बन गई थी, और इसकी १९३१ में अध्यक्षा सरोजनी नायडू बनी। इसके पहले तक अध्यक्षा महारानियाँ होती थी।

सन् 1940 के दशक में क्षितिज पर स्वाधीनता का इंद्रधनुष दिखाई दे रहा था और शायद यही कारण है कि स्त्रियों का आंदोलन पूरी तरह स्वाधीनता संग्राम में तब्दील हो गया और नारी मुक्ति के मुद्दे को भारत की स्वाधीनता के साथ जोड़कर देखा जाने लगा। माना जाने लगा कि स्वाधीनता के साथ ही पुरुष एवं स्त्री के मध्य मौजूदा असमानताएँ दूर हो जायेंगी तथा स्वतंत्र भारत में सबकुछ ठीक हो जाएगा। सन १९४२ के भारत छोड़ो आंदोलन में हजारों की संख्या में महिलाओं ने भाग लिया। हजारों महिलाएँ भूमिगत हुई, समानान्तर सरकारें बनाने में सहायक रही, रेल की पटरी उखाड़ने से लेकर कचहरियों पर झण्डा फहराने में अग्रणी रही। इस दौरान लाठी-गोली, बलात्कार तक की भारी संख्या में औरतें शिकार हुई। कईयों की हत्याएँ की गई। अरुणा आसक अली ने ग्वालिया टैंक मुंबई में झण्डा फहराते हुए “अंग्रेजों भारत छोड़ो” तथा “करो या मरो’ की उद्घोषणा की, तो डॉ. उषा मेहता तथा उनके साथियों ने मुंबई में समानान्तर रेडियो स्टेशन चलाया। भारी संख्या में किसान महिलाओं ने भूमिकारों और भूस्वामियों के अधिकारों के खिलाफ आवाज उठाई। उस आंदोलन में “जेल भरो आंदोलन” भी शामिल था।’वर्धा’ सेवाग्राम में महिला आश्रम की संचालिका रमाबेन रुइया का कहना था कि – “सन् १९४२ में सेवाग्राम में गांधीजी ने उन सभी महिलाओं को जो जेल जाने वाली थी, उन्हें अपने पिता, पतिया भाई से लिखित सहमति-पत्र मंगवाया था।“जिन लोगों के पास सहमति पत्र था, वे ही जेल भरो आंदोलन में शामिल हो सकती थीं।”

इसी तरह कमला देसिकन, जो १५ वर्ष की आयु में आंध्र प्रदेश से भागकर वर्धा सेवाग्राम गांधीजी के स्वाधीनता आंदोलन में शामिल होने के लिए आई थी, जो बाद में डॉ. सुशीला नैय्यर (प्रथम स्वास्थ मंत्री) की सेक्रेटरी बनी और आजीवन कस्तूरबा हॉस्पिटल से जुड़ी रही। उनका कहना था – गांधीजी ने मुझे सेवाग्राम आश्रम में रहने के लिए मेरे पिता से अनुमति-पत्र लिखवाया था। पिता की आज्ञा के बाद ही मैं सेवाग्राम आश्रम में रह सकी।
इस तरह गांधीजी ने महिलाओं की आर्थिक स्वतंत्रता के बारे में स्पष्ट रूप से कभी कुछ नहीं कहा। गाँधी के अनुसार स्त्री त्याग और पीड़ा की प्रतिमा है। सूत कातना और वस्त्र बिनना उसके लिए धार्मिक कार्य थे और महिलाओं के स्वभाव के अनुकूल थे। इस तरह राष्ट्रीय आंदोलन में महिलाओं को नई पितृसत्ता तले बाध्य रहने को मान्यता मिली। राष्ट्रवादियों को महिलाओं की मुक्ति तथा उत्थान से कोई सरोकार नहीं था। इसके विपरीत महिलाओं की पत्नी, पुत्री और माँ की भूमिकाओं की पुष्टि हुई। केवल राष्ट्रीय आंदोलन की आवश्यकताओं को देखते हुए उसे थोड़ा बहुत विस्तार मिल गया। इस तरह पारंपरिक इतिहास में महिलाओं की संख्या थोड़ी और बढ़ गई।’राष्ट्रीयता के इतिहास में महिलाओं का योगदानकेवल उनकी पारम्परिक भूमिका का विस्तार मात्र है। राष्ट्रीय आंदोलन में महिलाओं का कहीं कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं दिखता।

तस्वीरें गूगल से साभार 

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सजर्नर ट्रुथ : क्या पश्चिम की इस सावित्रीबाई को आप जानते हैं?

 प्रेमकुमार मणि

 प्रेमकुमार मणि चर्चित साहित्यकार एवं राजनीतिक विचारक हैं. अपने स्पष्ट राजनीतिक स्टैंड के लिए जाने जाते हैं. संपर्क : manipk25@gmail.com

प्रेमकुमार मणि

भारतीय उपमहाद्वीप के समाज में जात-पात की अवस्थिति के कारण कुछ लोगों को लगता है कि गैरबराबरी और शोषण की जटिलताएं केवल हमारे यहां है और बाकि दुनिया में केवल अमीरी -गरीबी का भेद है . ऐसा वही लोग कहते हैं ,जिन्होंने दुनिया के सामाजिक इतिहास को नहीं जाना है ,या कम जाना है . गैरबराबरी की जटिलताएं दुनिया भर में अपने -अपने तरीके से रही हैं .शोषण भी कई जगह बहशी ढंग के रहे हैं . दुनिया भर के उत्पीड़ित इंसानों ने अपने -अपने तरीके से ; बराबरी और मानवता की स्थापना केलिए अपने -अपने समाजों में संघर्ष किये हैं . इनके ब्योरे दिलचस्प और शिक्षाप्रद हैं .

आज हम संयुक्त राज्य अमेरिका की उस महिला के बारे में बात करना चाहेंगे जिन्हे Sojourner Truth के नाम से जाना गया ; – जिसने रंगभेद के खिलाफ और महिलाओं की आज़ादी केलिए उन्नीसवीं सदी में यादगार संघर्ष किया . उनके संघर्ष हमे आज भी उत्साहित करते हैं . सोजॉर्नर ट्रुथ का पूर्व नाम Isabella Van Wagener था , अपने उम्र के अट्ठाईसवें साल में उन ने अपना नामान्तर किया . दरअसल यह भी उनका एक विद्रोह ही था .
Isabella का जन्म 1797 में न्यूयोर्क के अल्स्टर काउंटी में एक गुलामं परिवार में हुआ . माँ का नाम एलिज़ाबेथ था -जिन्हे लोग माउ-माउ बेट के नाम से पुकारते थे . पिता का नाम था जेम्स बौम्फ्री . माता -पिता उन्हें प्यार करते थे ,लेकिन गुलामों का बचपन क्या हो सकता था . बाद में अपने उदासी भरे बचपन का ब्यौरा त्रुथ ने बेबाकी के साथ अपनी आत्मकथा में व्यक्त किया है .

अमेरिका में गुलामी का विचित्र इतिहास रहा है . पुराना अमेरिका वहां के आदिवासियों का था . समुद्री रास्तों की खोज का जनून जब यूरोप में गहराया ;तब नए -नए देशों और द्वीपों की तलाश होने लगी . पंद्रहवी सदी के आखिर में कोलम्बस ने भारत की खोज करते -करते अमेरिका की खोज कर ली थी . जिस हिस्से में वह पहुंचा था उसे आज भी वेस्ट इंडीज (पश्चिम का भारत ) कहते हैं . यूरोपियनों के वहां पहुँचते ही आदिवासियों के दुर्दिन की शुरुआत हो गयी . हमारे देश में भी यह हुआ . लेकिन वहां जो हुआ वह अवर्णनीय है . जो विवरण लेखन के माध्यम से उपलब्ध है वे रोंगटे खड़े करने वाले हैं .

गुलाम प्रथा का केंद्र न्यूयार्क  था . यह न्यूयार्क  पहले न्यू एमस्टर्डम कहा जाता था . 1664 में इंग्लैंड ने डचों से इसे छीन लिया और इसका नाम न्यूयार्क कर दिया . अंग्रेजों ने यहां अपने उपनिवेश बनाने शुरू किये . वे अफ्रीका से काले नीग्रो लोगों को जहाज में भर -भर कर लाते और जानवरों की तरह नीलामी लगाते . जो लोग इन्हे खरीदते उनके ये गुलाम या दास होते थे . इसे ही गुलामगिरी या दासप्रथा कहा जाता है . 1720 ई. तक न्यूयार्क की कुल इकतीस हज़ार की आबादी में चार हज़ार दास थे . इनकी सामाजिक स्थिति भारत के दलितों से भी बदतर थी . जानवरों की तरह इनकी खरीद -बिक्री होती और इसके लिए मंडियां लगती . नीलामी की बोलियां लगती ,जिनमे पुरुषों की शारीरिक ताकत और स्त्रियों की ताकत के साथ उनकी प्रजनन क्षमता का हवाला दिया जाता . स्त्री के होने पर अधिक कीमत मिलती ,जैसे बैल के मुकाबले गाय की कीमत अधिक होती है .यह इसलिए कि गुलाम औरतों से हुए बच्चों पर मालिकाना हक इनके मालिक का होता था . ये मालिक इन बच्चों को बेच कर धन कमाते थे . इन गुलामों को कोई नागरिक अधिकार प्राप्त नहीं थे .

अन्य गुलामों की तरह इसाबेल्ला को भी बचपन में ही इनके मालिक ने बेच दिया . वह माँ -पिता से दूर हो गई . यही गुलामी का रिवाज़ था . जब वह तेरह साल की हुई ,तब उसे एक दूसरे मालिक ने खरीद लिया . इस नए मालिक का नाम था जॉन डूमोंट . यह मालिक पहले वाले की अपेक्षा उदार था .इसके साथ इसाबेल्ला सत्रह साल रहीं . जॉन डूमोंट ने जिस दिन इसाबेल्ला को ख़रीदा ,उस ने अपनी डायरी में लिखा -” She was about thirteen , but stands nearly six feet tall ” मनुष्य के मापने का तब यही रिवाज़ था .

ट्रुथ

इसाबेल्ला बचपन से जुझारू थीं .अन्याय का संभव विरोध वह करतीं . एक गुलाम साथी थॉमस ,जिसे वह टॉम कहती थीं ,से उन्होंने एक जद्दोजहद के उपरांत विवाह किया और पांच बच्चों की माँ बनीं . जैसा की गुलामी का दस्तूर था , सभी बच्चे बचपन में ही बेच दिए गए . लेकिन जितना संभव हुआ , इसाबेल्ला ने उन्हें पढ़ाया था .

अट्ठाइस साल की उम्र में इसाबेल्ला ने अपना नाम बदलकर सोजॉर्नर ट्रुथ कर लिया ,क्योंकि वह गुलामी के नाम से मुक्ति चाहती थीं . इस बीच अमेरिका में सामाजिक क्रांति धीरे धीरे ही सही ,लेकिन हो रही थी . बुद्धिजीवियों का ध्यान इस अन्यायपूर्ण सामाजिक व्यवस्था के खात्मे पर था ,लेकिन यथास्थिवादी लोग , जैसे कि हमारे भारत में भी ताकतवर हैं , वहां भी थे और वे परिवर्तन के विरोधी थे . 4 जुलाई 1776 को अमेरिका आज़ाद हुआ और वहां डेमोक्रेसी स्थापित हुई .लेकिन डेमोक्रेसी तो बहुमत का होता है और कम संख्या वाले लोगों का शोषण होने की सम्भावना यहां ज्यादा हो जाती है; यदि इसपर नैतिकता या वैचारिकता की नकेल न हो . 1799 में वहां एक कानून बना कि 4 जुलाई 1799 के बाद जन्मे हुए गुलाम बच्चे पच्चीस (मर्द ) और अट्ठाइस (स्त्री ) की उम्र में गुलामी से मुक्त हो जायेंगे . इस कानून के पास होते वक्त Truth केवल दो साल की थी . उन्हें इसका लाभ नहीं मिलने वाला था . बाद में , 1817 में 1799 के पूर्व जन्मे बच्चों पर भी यह कानून लागू हुआ और इसके अनुसार अपने अट्ठाईसवें साल में वह गुलामी से मुक्त हुईं .

गुलामी से मुक्त होते ही सोजॉर्नर त्रुथ सक्रिय हो गईं . वह न तो पढ़ना जानती थीं ,न लिखना . लेकिन उनकी चेतना जाग्रत थी . वह मनुष्य की गरिमा को समझती थीं . ईसाइयत में उनकी आस्था थी और वह कहती थीं कि ईश्वर की नज़र में सब बराबर हैं . जैसे भारत में भक्तिकाल के कवियों ने राम या हरि के नाम लेकर ब्राह्मणशाही पर जोरदार हमला किया था और बराबरी का शंखनाद किया था ; वैसे ही सोजॉर्नर ट्रुथ  ने गोरे वर्चस्ववाद के खिलाफ हल्ला बोल दिया . यह अमेरिकी वर्चस्ववाद भारतीय वर्चस्ववाद से कहीं अधिक क्रूर और अमानवीय था .Truth ने पहले स्वयं को तैयार किया ,अपने परिवार को व्यवस्थित किया और फिर सामाजिक क्रांति केलिए कूद गईं . गुलाम बस्तियों में वह दौरा करने लगीं . वह लोगों से बातें करतीं और विश्वास दिलातीं कि ईश्वर उनके साथ है .उनकी नज़र में काले -गोरे सब बराबर हैं . यह गैर बराबरी चाहे वह काळा -गोरा का हो या मर्द -औरत का ;शैतानों की कारस्तानी है . वह पढ़ना -लिखना बिलकुल नहीं जानती थी ,लेकिन अपनी आध्यात्मिकता के आधार पर वह लोगों से कहतीं कि ईश्वर से उनकी बातें होती हैं . लोग उन्हें ध्यान से सुनते थे .उन्हें सुनने केलिए भीड़ जुटने लगी और वह दूर -दूर जाने लगीं .पूरे अमेरिका के गुलामों को उन्होंने शोषण के खिलाफ जाग्रत किया . सम्मान से लोग उन्हें आंटी त्रुथ कहने लगे .

1850 में ओलिव गिल्बर्ट के साथ मिलकर उन्होंने अपने जीवन की कहानी लिखवाई – Narrative of Sojourner Truth . जब किताब छपी तब खूब बिकी . इसकी आमदनी से त्रुथ ने बेंटले क्रिक में घर बनवाया और जमीन का टुकड़ा ख़रीदा . जब अमेरिका में दासप्रथा की समाप्ति के सवाल पर गृहयुद्ध हुआ ,तब उन्होंने उस में बढ़ -चढ़ कर हिस्सा लिया .वह गुलाम बस्तियों में घूम घूम कर लोगों को जाग्रत करती रहीं . 1864 में वह अब्राहम लिंकन से मिलीं और उन्हें अपना समर्थन दिया . लिंकन ट्रुथ का बहुत सम्मान करते थे और उन्हें आंटी कहते थे . जैसा कि सब जानते हैं गुलामी की प्रथा दूर करने के फैसले के के कारण लिंकन को 1865 में गोली मार दी गई थी .

26 नवम्बर 1883 को 86 साल की उम्र में ट्रुथ का निधन मिचिगन के बैटल क्रीक में हुआ .

किसी की तुलना दूसरे से ठीक -ठीक तो नहीं हो सकती ,लेकिन भारतीय सन्दर्भ में सावित्री बाई फुले को हम उनके साथ रख सकते हैं . निसंदेह ट्रुथ का काम और संघर्ष कठिन था ,लेकिन उनकी ही तरह विपरीत स्थितियों में सावित्रीबाई ने भी स्त्रियों और शूद्रों की मुक्ति केलिए संघर्ष किया . जोतिबा फुले ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘गुलामगिरी ‘ उन अमेरिकी लोगों को समर्पित किया है , जिन्होंने दासप्रथा के खिलाफ संघर्ष किया है . निश्चय ही टूथ  उसमे शामिल हैं . यह किताब 1873 में लिखी गई है . ट्रुथ  तब जीवित थीं . यह दो देशों के संघर्ष के आत्मीय सूत्र हैं .

तस्वीरें गूगल से साभार

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असमा जहाँगीर, तुम्हे सलाम !

नूर जहीर 

तुम्हारा कद बहुत ऊँचा नहीं, बल्कि देखा जाए तो दरमियाने से कम ही था; भीड़ में होती तो तुम अक्सर नज़र न आती . जब तक जलूस उस जगह तक नहीं पहुँच जाता जहाँ पुलिस या रेंजेर्स(पाकिस्तन की पैरा-मिलिट्री फ़ोर्स) उसे रोकते. तब तुम सबसे आगे होती, पुलिस अफसर से हाथ भर छोटी, मगर उसकी लाठी को दोनों हाथ से पकडे, साथियों पर बरसने से रोके, हमकदम कार्यकर्ताओं का हौसला बढ़ाती, शासकों की ताकत को ललकारती, मार खाने को उपस्थित, मार खाने वालों की तरफ से लड़ने के लिए तत्पर, छोटे कद और बुलंद ख्यालों की असमा जहाँगीर ; नामी वकील, ह्यूमन राइट्स के लिए लड़ने वाली इंसान, औरतों की बराबरी की लड़ाई की मज़बूत सिपाही.

तुमसे एक बार की ही मुलाक़ात है. वैसे दो बार और भी मिलना तय हुआ था, लेकिन आखिरी लम्हे में तुमने फोन करके बताया कि तुम्हे कहीं और जाना है. कहाँ जाना है, जब यह सुना तब विशवास हो गया की तुम्हारा वहां रहना ज्यादा ज़रूरी है; किसी निरपराध की बेल की कोशिश या ‘ब्लासफेमी ‘ में फंस गए मासूम के लिए उपस्थित रहकर, जनगन की आवाज़ बनना ज्यादा ज़रूरी काम तो है ही. न मिल पाने का दुःख तुम्हारी हिम्मत पर गर्व में दब गया. तीसरी बार मिली भी तो बस बीस एक मिनट के लिए, मुस्कुराती हुई, थोड़ी थकी क्योंकि दिनभर कोर्ट में लग गया था,ज़रा अस्त व्यस्त खिचड़ी बाल ठीक करने की कोशिश करती, क्षणों में सामने वाले का जायजा ले लेने वाली,मोटे चश्मे के पीछे से तेज़, बहुत ज़हीन आँखे. धीमी आवाज़ में बात करती, जो कचेहरी में शेरनी की दहाड़ की तरह गूंजती.

कब तय किया था तुमने की जीवन जाएगा तुम्हारा संघर्ष में? छात्र जीवन में तुमने जिया-उल-हक का समय झेला और महिलाओं को सिर ढँक कर रहना होगा जैसे फरमान के खिलाफ खड़ी हुई; बेहया कहलाई क्योंकि तुमने लाहौर शहर के मुख्य चौराहे पर दुपट्टों के अम्बार लगाकर आग लगाईं थी. क्या तब तुम्हे मालूम था कि तुम जद्दोजहद का वह सिपाही बनोगी जो कभी मोर्चा छोड़ नहीं पायेगा?

कहते हैं कि तुम्हारा उस कबीले से तालुक है जो कुकेज़ी कहलाते हैं और जिनका काम चट्टानों को काट कर, पत्थर की सिले ढोने से लेकर, मूर्तियाँ तराशने तक होता है. देखने वाले तो शायद यही कहे की तुमने अपने खानदानी काम से कोई तालुक़ नहीं रखा. लेकिन समझने वाले जानते हैं की तुमने बिलकुल वही किया; जिंदिगी भर तुम समाज और कानून नाम के कठोर पत्थर को तराशकर जिंदिगी की खूबसूरती को उकेरती रही. नहीं, न छैनी न हथोडा कोई औजार कोई साधन नहीं था तुम्हारे हाथ, बस एक जिद थी की जो बेजान है, नीरस है उसमे जान फूंकनी है; जो अन्याय तले कुचला है, शासकों का दमन सह रहा है, उसके साथ खड़ा होना है.

लोग यह भी कहेंगे की तुम्हे भला यह सब करने की ज़रूरत ही क्या थी? अच्छे, खाते पीते घर में जन्म लिया, वकील बनी, ज़मीन जायदाद के झगडे निपटाती, खुद कमाती, आराम की जिंदिगी जीती, क्यों बेकार उन लोगों के लिए लड़ने की ठानी जो तुम्हारी फीस तो दूर, तुम्हारी टैक्सी का भाड़ा भी नहीं दे सकते थे. कुछ लोग यह भी कहेंगे की अपने देश के मजलूमों की लड़ाई लडती वहां तक भी ठीक था. सरहद पार से अमन हो, शान्ति रहे इसकी कोशिश करने की तो बिलकुल तुम्हे ज़रूरत नहीं थी. भला इस सब में औरत का क्या काम, जो करेगा सो शासक वर्ग करेगा. लेकिन तुम्हारा यकीन की महिलायें ही सबसे ज्यादा अमनपसंद होती हैं, क्योंकि ‘युद्ध में लडे चाहे कोई भी हारती केवल औरत है.’ यह वाक्य तुम्हारा उस छोटी सी मुलाक़ात में दिल में आजतक गूंजता है.
इतने पर भी तुमने बस कहाँ किया; उठी लड़ने के लिए उनके लिए  जिन्हें उनका देश ही भेजकर कहाँ याद रखता है? भला भेजे हुए जासूस भी कोई देश अपनाता या स्वीकारता है? तुम्हारा हठ की जासूस हो या मुखबिर, सबसे पहले तो इंसान है.

कितने मोर्चे पर मौजूद रहती थीं तुम, कितने लाम पर लड़ रही थीं? सवाल यह भी करते लोग, की क्या जीत रही हो? मज़ाक उड़ाते ‘कभी तो जीता भी करो कोई मुक़दमा!’ शायद सौ में से 2-3 % जीत नसीब होती हो, या शायद उतनी भी नहीं. लेकिन अपने संघर्ष इंसान इसलिए भी चुनता है कि वह अपने ज़मीर का कैदी होता है, वह अन्याय देख नहीं सकता, दमन सह नहीं सकता. जीत मिले या न मिले, दुनिया को यह दिखाना और जताना ज़रूरी होता है की हम अभी मोर्चे पर मौजूद हैं, हम अभी हारे नहीं हैं, हम बाकी हैं; और जब तक हमारा यह जज्बा बाकी है तुम अन्यायी इस ग़लतफ़हमी में न रहना की तुम जीत गए हो !
नहीं, तुम कहीं गई नहीं हो, इसलिए तुम्हे अलविदा नहीं कहा जा सकता!

असमा जहाँगीर, तुम्हे सलाम !
लड़ाई जारी है साथी!


नूर जहीर लेखिका और सामाजिक कार्यकर्ता हैं.

तस्वीरें गूगल से साभार

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दुश्मनी से परे जन की बात: पाकिस्तानी जनांदोलन की किताब

 “पीपल्स  मूवमेंट्स इन पाकिस्तान’” पर एक चर्चा इंडिया इंटरनेशनल सेंटर के कांफ्रेंस हॉल में, आठ फरवरी को रखी गई. पुस्तक पाकिस्तान के जाने माने वामपंथी विचारक और सामाजिक कार्यकर्त्ता की लिखी हुई है जिसे नूर ज़हीर के प्राक्कथन के साथ द मर्जिनलाइज्ड ने प्रकाशित किया है.

लेखिका और एक्टिविस्ट तथा योजना आयोग की पूर्व सदस्य डॉ. सईदा हमीद की अध्यक्षता में इस कार्यक्रम में अन्य वक्ता थे  वायर के एडिटर सिद्धार्थ वरदराजन,  सांसद डी राजा और अली  अनवर तथा वार्ता का संचालन  नूर ज़हीर ने किया.  सभी वक्ताओं ने पुस्तक की प्रशंसा की और ख़ास करके इस बात की सराहना की लेखक ने इतना समय आर्काइव्ज में बिताया, सामग्री जमा की, उसका सम्पादित कर, वर्ग और समय के अनुसार उसका सूचीकरण किया और तथ्यों की जांच पड़ताल और शोध करके एक पुस्तक तैयार की. सिद्धार्थ वरदराजन  ने अपने वक्तव्य में कहा कि  वृतान्त इतिहास के हिसाब से नहीं बल्कि विषय और प्रसंग के अनुकूल विभाजित किया गया है. यह एक तरह से पुस्तक को और रोचक बनाता है और पाठक को पूरे माहौल, समय और घटना क्रम को समझने में सहायक होता है. वरदराजन   ने बताया कि असलम ख्वाजा ने अपने विश्लेषण में पूर्ण रूप से निष्पक्ष रह कर तथ्यों को रखा है, जिसमे उन्होंने नामी वामपंथी कवि  फैज़ अहमद फैज़ को भी बक्शा नहीं है, और प्रमाणित किया है कि इतना बड़ा क्रांतिकारी शायर भी राष्ट्रवादिता की अंधभक्ति का शिकार हो सकता है, जैसे फैज़ हुए थे 1971  में पूर्वी पाकिस्तान के भाषा आन्दोलन के समय. वरदराजन  के अनुसार अपने समय और सोच के  आइकॉन पर ऊँगली उठाना बहुत ही साहस का काम है .

सिद्धार्थ वरदराजन  ने पूरी पुस्तक का एक ब्यौरा पेश किया और खासकरके बलोचिस्तान वाले अध्याय की बहुत प्रशंसा की. लेकिन उन्होंने साथ ही यह भी कहा कि यह अध्याय राष्ट्रपति मुशर्रफ के समय पर आकर समाप्त हो जाता है जबकि बोलिचिस्तान के सन्दर्भ  में बहुत कुछ उसके बाद घटित हुआ है, जिसकी जानकारी ज़रूरी है. उनका सुझाव था की इस अध्याय को अपडेट किया जाना चाहिए. उन्होंने इस बात पर भी श्रोताओं का ध्यान दिलवाया कि भारत में पाकिस्तान के बारे में रूचि तो है लेकिन उसके जानकार एक भी नहीं; मसलन बलोच भाषा का जानकार विरले ही कोई हो भारत में; उसी तरह जब वर्तमान सिन्धी जाने वालों को पीढ़ी नहीं रहेगी तब कितने लोग निजी रूचि से सिन्धी सीखेंगे. उन्होंने इस और भी ध्यान दिलाया कि पाकिस्तान में पहले भारतीय अख़बारों और भारत में पाकिस्तान के अख़बारों के तीन तीन संवादाता थे लेकिन आज दोनों देशों में एक भी नहीं है.

डॉ. सईदा हमीद ने अपनी बात महिलाओं वाले अध्याय पर रखी. महिलाओं के संघर्ष ज़्यादातर नकार दिये जाते है जबकि उनका योगदान हस आन्दोलन में होता है और अपने मुद्दे तो केवल वही उठाती हैं. सईदा  ने इस बात की सराहना  करते हुए कहा कि लेखक ने महला आंदोलनों को भी दर्ज किया है और जिन क्षेत्रों में महिलायें शामिल रही वहां भी उन्हें स्थान देकर उनकी मौजूदगी दर्ज की है. सईदा  ने कहा कि यह एक अफसोसनाक हालात है कि पाकिस्तान में हुए अल्पसंख्यक लड़कियों के अपहरण और धर्मपरिवर्तन की बात तो भारत में मीडिया बहुत उछालता है लेकिन वहां ऐसी घटनाओं के विरोध में कितने जलूस निकले, कितना लिखा गया और न्यायपालिका को आदेश देने पर मजबूर किया गया कि उन लड़कियों की वापसी हो इसकी कोई खबर नहीं छपती. उनके शब्दों में ‘भयानक है वहां पर विद्रोही महिला होना’ क्योंकि ज़मीनी स्तर पर बहुत ख़ामोशी से काम करने वाली परवीन रहमान को भी इसलिए मार दिया जाता है क्योंकि वह ज़मीन के नाजायज़ दखल के खिलाफ़ आवाज़ बुलंद कर रही थीं. सईदा ने नूर ज़हीर की किताब में छपी भूमिका की भी तारीफ करते हुए कहा कि उसे पढने के कारण वह सो नहीं पाई और उसी से किताब कि गति निर्धारित होती है.

डी. राजा ने कहा कि  इस पुस्तक से उन्हें अपनी जवानी के दिन याद आये क्योंकि वह भी छात्र आन्दोलनों से निकले हुए कार्यकर्ता हैं और अखिल भारतीय छात्र संगठन के सदस्य रहे हैं. उन्हें इस बात की ख़ुशी थी की छात्र आन्दोलन पर एक अध्याय इस पुस्तक में शामिल है क्यों छात्र समुदाय का संघर्ष अपनी गतिशीलता के चलते कम ही दर्ज होता है; अक्सर इन संघर्षों से हासिल किये हुए बदलाव भी जल्दी ही प्रशासन मिटा देता है. इस किताब द्वारा उन्हें याद आये वे सब कामरेड जो मूलतः उस हिस्से के थे जो आज पाकिस्तान है और जिनके भारत आजाने पर उन्होंने खुद उनके साथ काम किया है जैसे कामरेड पेरिन बरुचा, कामरेड रोमेश चन्द्र और बेगम हाजरा . डी राजा ने कहा कि इस पुस्तक से भारत के लोगों के दिमाग में पनप रही पाकिस्तानियों के बारे में गलतफहमियां कम हो जाएँगी.

राज्य सभा सदस्य अली अनवर ने प्रकाशकों की सराहना करते हुए कहा की द मार्जिनलाइज्ड ने इस किताब को छापकर बड़े साहस का काम किया है और उन्हें उम्मीद थी की इससे  भारत और पाकिस्तान दोनों के बीच  बेहतर समझदारी बनेगी.

बातचीत की शुरुआत करते हुए नूर ज़हीर ने कहा की भारतवासियों के पास पाकिस्तान का केवल वही चेहरा है जो भारतीय सरकार पेश करना चाहती है. इसका मूल आधार उसकी अपनी सुरक्षा और शासन में बने रहने की इच्छा होती है. इसलिए गाली गलौज, सीमा पर गोलीबारी, जनता में डर उकसाया जाता है ताकि मतदानों में विजय पाई जा सके. उन्होंने यह भी कहा कि किसान और मजदूर आन्दोलन तो दर्ज किये जाते हैं लेकिन कलाकारों, लेखकों, महिलाओं, मीडिया और प्रेस, छात्रों के जलूस, आन्दोलन, और प्रशासकों से मुठभेड़ कभी दर्ज नहीं होते.  उन्होंने यह भी कहा की कश्मीर और बलूचिस्तान में चल रही जद्दोजहद को तुलनात्मक दृष्टि से देखने की ज़रूरत है और बलोचिस्तान वाले अध्याय से बहुत कुछ सीखा और समझा जा सकता है .

चर्चा के दो बहुत ही महत्वपूर्ण हासिल रहे और कुछ सुझाव भी आये; 1. किताब का हिंदी और उर्दू में अनुवाद होना चाहिए; श्रोताओं में से ही दो ने अपनी रूचि जताई इस कार्य को फ़ौरन करने में. 2.इस पुस्तक को अंग्रेजी में और फिर अनुवाद को भी इतनी बड़ी पुस्तक के रूप में छपने के बजाये, हर अध्याय को अलग पुस्तिका की शक्ल में छापा जाना चाहिए. इससे पाठक का ध्यान हर विषय पर केन्द्रित रहेगा और शोध की भी संभावना बढ़ेगी.

चर्चा के दौरान ही नूर ज़हीर के पास कन्नड़ के प्रकाशक ‘नव कर्नाटका’ का सन्देश आया कि वे महिला आन्दोलन और लेखक, कलाकारों वाले अध्यायों को पुस्तिकाओं के रूप में अनुवाद करके छापना चाहते हैं.

PEOPLE’S MOVEMENTS IN PAKISTAN

A discussion on the book PEOPLE’S MOVEMENTS IN PAKISTAN was held at the Conference Hall 1, of India International Centre. The book has been written by Aslam Khwaja, senior journalist, leftist thinker and activist based in Karachi, Pakistan and published in India by THE MARGINALISED PUBLICATION, with an introduction by Noor Zaheer.

The Conference Hall was full with a responsive audience that had a number of young people and scholars. Dr. Syeda Hameed chaired the discussion and the speakers were (chair), Siddharth Vardhrajan (speaker),D.Raja, MP, Rajya Sabha, Ali Anwar, MP, Rajya Sabha and Noor Zaheer moderated the discussion.

The book was appreciated by one and all, and especially admired was the way author must have spent time in the archives, gathering material and sources, cataloguing and categorizing it, sorting and editing and rechecking the facts and then finally putting it together in eight chapters. Equally well received was the fact that even though the account is not chronological, the author has made it a theme-based divisions.

SidhharthVardarajan’s observed that this makes the reading both interesting and it also helps the reader in many ways to understand and visualize the complete scenario. Mr. Vardarajan also made a pointed reference to the way Aslam Khwaja has brought out the well-known poet Faiz Ahmed Faiz’s weakness, at a couple of times in terms of his pro-Statist stance and thus taken an objective view of the most revolutionary poet Pakistan has produced. Vardhrajan appreciated the unbiased position taken by the author who had the courage to take a stand and point out the flaws in one of icons of our times.

Aslam Khwaja and Noor Zaheer

Siddharth Vardrajan who had thoroughly read the book gave a good ‘tour’ of the whole book, almost a bird’s eye view and was especially all praise for the Balochistan chapter. However, he pointed out that this chapter ends at the President Musharraf’s period, though a lot has happened since then which has focused International attention on the Baloch movement. He also expressed anguish at the fact that even though Pakistan is an immediate neighbor, there is no serious research being conducted on any area that falls within Pakistan; he was doubtful that after the present generation of Sindhis had passed on, knowledge of Sindhi would also recede.He also pointed out that earlier there were three representative journalists of India in Pakistan and three of Pakistan in India, but now there were none.

 Dr. Sayeeda Hameed concentrated on the chapter on the women’s struggles. She pointed out that this is one aspect that often gets ignored when movements or struggles are documented. She elaborated how the media ignores news from Pakistan and often sensationalizes issues like the kidnapping and forced conversions of girls from minority communities but does not highlight the protests and demonstrations undertaken by women’s organizations which often force the judiciary to recover these girls. She also mentioned the low key activists like Parveen Rehman who documented land and land reforms and legally contested the forced occupancy of land from its rightful dwelled and was killed for that. SyedaHameed  was also all praise for Noor Zaheer’s Introduction to the book which she said sets the pace for the book and had kept her awake through the night.

Comrade D.Raja said that the book reminded him of his own student days and the student movements, because he was himself a product of the All India Students Federation. He was also happy that a chapter had been included on the students movements since the students are a mobile population and hence the movements they undertake are often not documented or recorded; often the changes that they bring about are also nullified by the management once a set of students passes out. The account he said made him remember and recall many comrades under whom he had worked like Perinbaricha, Ramesh Chandra and Begum Hajra. He also said that this book would help to remove the misconception in the minds of the Indians about the people of Pakistan.

Rajya Sabha MP, Ali Anwar said that he thought it was extremely brave of the Publishers to bring out this book at a time when war rhetoric was considered as a form of nationalism. He said he was sure that the book would pave the way for better understanding between the Indian and Pakistani people.

Opening the discussion Noor Zaheer said that people in India have only the Indian States version of what Pakistan is. This version is often based on the governments own need for survival; so it often indulges in war jingoism, which leads to border skirmishes, which leads to a fear in the public that tranforms itself in the ballot victory. She also introduced the book pointing out that often workers and peasant movements are documented but not the movements of writers, artistes and performers, or movements launched by the media and press or women’s movements. She elaborated that comparison can be drawn between what is happening in Balochistan in Pakistan and Kashmir in India and in the chapter on Balochistan there are lessons to be learnt for both the people and the governments.
But perhaps the best result were two suggestions – (i) the book should be translated into Hindi and Urdu – for Hindi, a couple of people volunteered immediately, publicly announcing their desire to be involved in this. (ii) The second suggestion was that these translations can be brought out not as a complete book but in parts – for example, one chapter could form one booklet. This would focus the interest on one subject at a time and open up room for even more in-depth research.
While the discussion was in process, a message was received by Noor Zaheer, from
NAVAKARNATAKA, a leading, leftist Publishing House of Kannada to publish two chapters: Women’s Movements and Art and Literature in Kannada as separate books.

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