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भारतीय उपमहाद्वीप का स्त्री लेखन: स्त्री सशक्तीकरण की अनुगूंजें(दूसरी किस्त)

रोहिणी अग्रवाल

रोहिणी अग्रवाल स्त्रीवादी आलोचक हैं , महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर हैं . ई मेल- rohini1959@gmail.com


धर्म और कानून: समदरसी है नाम तिहारो?


बचपन की स्मृतियों को ‘फेरा’ उपन्यास में व्यापक परिप्रेक्ष्य देते हुए तसलीमा नसरीन एक सवाल उठाती हैं कि स्त्रियों की भाँति पुरुष अपने अस्तित्व और अस्मिता को लेकर शंकित नहीं होता? क्या इसलिए कि समस्त कर्मक्षेत्र का वही एकमात्र केन्द्रबिंदु है? या इसलिए कि समूची आचार संहिताएं, नियम-कानून, शास्त्र उसके कर्म, श्रम, व्याख्या, पसंद, सत्ता और स्वत्व पर टिके हैं, और इस प्रकार वह अनायास समूची संस्कृति का कर्त्ता और कारक तत्व बन जाता है? साथ ही यहाँ वे ‘मेरे बचपन के दिन’ की ईदुल को मयमनसिंह (बांग्लादेश) की शरीफा और स्वयं को कलकत्ता में निर्वासन का त्रास भोगती कल्याणी के रूप में चित्रित कर स्त्री जीवन को बदरंग कर देने वाली बिछोह और विस्थापन जैसी भावनात्मक मजबूरियों को धार्मिक जनूनों और राष्ट्र-राज्यों की कूटनीतियों में अनूदित भी करती चलती हैं। ‘फेरा’ उपन्यास बांग्लादेश में हिंदू विरोधी अभियान तीव्रतर होने की सूरत में सत्रह वर्ष की अवस्था में अंतरंग सहेली शरीफा से बिछुड़ कर कलकत्ता आ बसने वाली कल्याणी की कहानी है जो शरणार्थी और विस्थापित होने के दर्द के बीच अपने को कभी सम्पूर्णता में नहीं देख पाती। तीस वर्ष बाद बेटे दीपन के साथ पुरानी स्मृतियों में जीने और जड़ों की तलाश में लौटी कल्याणी पग-पग पर मोहभंग का शिकार होकर जिस सघन ऐकांतिक टीस और परिताप को झेलती है, वह असल में हर उस विवाहिता लड़की की मनोवेदना की झांकी है जो ससुराल के ‘पराएपन’ के बीच मायके के ‘आत्मीय’ क्षणों को जी लेने का भरपूर उत्साह भीतर संचित कर अपनी मिट्टी की ओर लौटती है और पाती है कि वहाँ उसके अस्तित्व का आखिरी नामोनिशाँ तक मौजूद नहीं। राजनीतिक सरहदों की वजह से उगा यह विभाजन का दर्द अमूमन हर स्त्री का दर्द बन जाता है जिसे पितृसत्तात्मक व्यवस्था ने संस्कृति और आचार के नाम पर मजबूत किया है।

भौगोलिक और परिवेशगत परिस्थितियों के आमूलचूल परिवर्तन के बीच कल्याणी यह देख कर स्तब्ध है कि उन्मुक्त शरीफा कैसे एक ठस्स बंदिनी में कायांतरित हो गई है। परिचय के बावजूद घोर असम्पृक्ति! भिन्न आयु-वर्ग के बच्चों से लदी-फंदी शरीफा में जीवन का स्पंदन तक नहीं। हर बात में पति की अनुमति की चिंता! यहाँ तक कि कालीबाड़ी (मायका) घूम आने की स्वतंत्रता भी नहीं – ”बच्चों के बाप से पूछे बिना मैं निकल नहीं सकती।” (पृ0 67) ”शरीफा भी नमाज पढ़ती है?.. इस सूचना मात्र से चकित रह जाने वाली कल्याणी उस समय शरीफा की अन्यमनस्कता के पीछे छिपी विवशता समझ पाती है जब शहर में घूमते हुए वह दो घटनाओं की साक्षी बनती है। एक, शरीफा के बच्चों द्वारा ‘चींटी-चींटी’ खेल खेलते हुए अट्टहासपूर्वक लाल चींटियों को हिंदू कह कर मारना; और दूसरा, सिंदूर-बिंदी वाली कल्याणी को देख कर गली के बच्चों द्वारा आवेशपूर्वक पीछा किया जाना – ”हिंदू हिंदू तुलसी पत्ता, खाते हैं वे गाय का माथा”। (पृ0 94) विदाई के अत्यल्प क्षणों में शरीफा के हाथ का हल्का सा स्पर्श कल्याणी के समक्ष धर्म एवं समाज द्वारा स्त्री को ‘उन्माद’ एवं ‘पत्नी’ बनाए जाने की कठोर यातनाओं का पूरा इतिहास खोल कर रख देता है जिन्हें एक स्तर पर अनिर्वाण के साथ वैवाहिक सम्बंध जीते हुए उसने महसूस किया है और दूसरे स्तर पर मयमनसिंह में ही रुखसाना के भाई स्वप्न द्वारा कल्याणी को पहचान कर घर लिवा लाने में जहाँ उसकी पत्नी एक अलग आइडेंटिटी न रह कर ठीक शरीफा की तरह अपने पति की पसंद का विस्तार बन जाती है।

पहली किस्त :- भारतीय उपमहाद्वीप का स्त्री लेखन: स्त्री सशक्तीकरण की अनुगूंजें

वास्तविक जीवन में इस्लामी कट्टरताओं का विरोध करने के जुर्म में निर्वासन का संत्रास भोगने के कारण तसलीमा धर्म के दुष्प्रभावों को स्त्री जीवन के नारकीय विधान तक सीमित नहीं रखतीं, वरन् पूरी मनुष्यता को उसके चंगुल से मुक्त कर बंधुत्व के प्रसार का स्वप्न भी देखती हैं -” धर्मांधता का यह खेल कब तक चलेगा? धर्म को क्या हम लोग जीवन भर लादे रहेंगे? एक भाषा और एक संस्कृति धर्म की दीवार को एक दिन ज़रूर तोड़ने में सफल होगी।” (पृ0 89)  तहमीना दुर्रानी भी मकबरे के वर्चस्व को ध्वस्त कर देना चाहती हैं। रौशन ख्यालों वाली आधुनिक महिला सखी बीवी के जरिए वे हर खासो-आम को चेता देना चाहती हैं कि ”मकबरे के हुक्मरान अल्लाह के नाम पर तिजारत करते हैं”; कि ”मकबरेवाले झूठों पर पलने वाले फरेबी हैं। तुम्हारे लिए दुआ मांगने के वास्ते पीरों को पैसे की दरकार नहीं होती। . . .उनकी ताकत का òोत तुम हो। तुम शैतान को मजबूत करते हो।” (कुफ्र, पृ0 100) लेकिन बेहद तंज के साथ वे इस सच्चाई को रेखांकित करना भी नहीं भूलतीं कि मजहबी शिक्षा, अंधविश्वासों और सियासत के साथ गठबंधन करके धार्मिक ताकतें खुदा के नाम और न्याय की आड़ में जैसा नृशंस दमन चक्र चलाती हैं, वह ”मकबरे के खिलाफ मौजूद ख्यालात को लोगों के ज़हनों और दिलों में ही कुचल” (पृ0 144) देने को काफी है। मकबरे की मुखालफत करने वाली सखी बीवी को सपरिवार जला देना; मकबरे की रजामंदी के खिलाफ ब्लोच प्रेमी से विवाह करने को आमादा तोती को प्रेमी सहित मर्मांतक यातनाएं देकर मार डालना इसके उदाहरण हैं। तसलीमा की तरह कुरान की आयतों का हवाला देकर वे धर्म के संरचनात्मक ढांचे पर विवाद नहीं उठातीं, बल्कि इस असंलग्न तटस्थता के साथ उसके दरिंदगी से भरपूर व्यावहारिक पक्ष का पर्दाफाश करती हैं कि ”एक ज़िंदा वली/बेआसरों का आसरा/मजलूमों और मुफलिसों का सहारा” (पृ0 153) पीर साईं के साथ-साथ उसके कफ़-थूक, पीक-जूठन को पाने के लिए  आखिरी दमड़ी तक लुटाती अज्ञानी जनता को भी कटघरे में खड़ा कर देती हैं। अपनी सत्ता कायम रखने के लिए अपने ही बेटे फ़कीर छोटे साईं को ज़िना (इन्सेस्ट) के झूठे इल्ज़ाम में मरवा डालने वाले पीर साईं के प्रति लेखिका की घृणा अछोर है। वे बेहद लाउड होकर उन पोशीदा सच्चाइयों को अवाम के सामने ला देना चाहती हैं जहाँ बांझ औरतों को औलाद बख्श कर सिद्धि कमाने के हथकंडे के साथ-साथ पीर साईं उन नवजात शिशुओं के सिर को लोहे के पिंजड़े में फंसा कर उनके बौद्धिक-मानसिक विकास को अवरुद्ध करने की युक्तियां भी निकालता है ताकि बदशक्ल चूहेनुमा भिखारियों की एक पूरी फौज को मकबरे के निजाम में शामिल किया जा सके। (पृ0 54) पत्नी के रूप में तहमीना ने कोट अद्दू (पंजाब) के खारल कबीले के मुस्तफा खार के साथ तेरह वर्ष के लम्बे वैवाहिक जीवन में लगभग हर रोज़ अमानुषिक शारीरिक-मानसिक-भावनात्मक यंत्रणा झेली है, अतः हीर के साथ ‘कुफ्र’ में अपने जख्मों को हरा करते हुए वे पीर साईं के भीतर के शैतान को ज़र्रा-ज़र्रा उघाड़ने में नहीं चूकतीं जो सैक्स और आतंक में ही जीवन का भरपूर लुत्फ उठाना चाहता है। आठ-दस साल की बच्चियों के साथ बलात्कार से लेकर पत्नी हीर को प्यारी तवायफ के रूप में रईस दोस्तों/मेहमानों के मनोरंजनार्थ प्रस्तुत करने तक; ब्लू फिल्में बनाने से लेकर हंटरों की फटकार और कैदी की चीत्कार के पृष्ठभूमि में संभोग करने तक पीर साईं की मानसिक रुग्णताओं और विकृतियों की एक लम्बी सूची तैयार की जा सकती है जिसे उसकी ताकत, सम्पत्ति और पोशाक (अल्लाह के नब्बे नाम कढ़ी हरे रंग की चादर) कभी उघड़ने नहीं देती। हीर महसूस करती है कि छोटी-छोटी लाचारगियों, लालचों, रंजिशों और कायरताओं में विभक्त होकर आम आदमी ने मकबरे की ताकत को इतना पुख्ता कर दिया है कि सबूत सहित पीर साईं की घिनौनी हरकतों को पेश करने की हर कोशिश में ”बदनाम मकबरा नहीं, मैं हो रही थी।” (पृ0202) हीर की हताशा में यकीनन धर्म के इस अजीबोगरीब खेल का बहुत बड़ा हाथ है जो किसी अबूझ गणित का सहारा लेकर आदम की पसली से बनी हव्वा के वजूद को नकराने के लिए उसके बड़े से बड़े झुंड की गिनती को भी शून्य पर ले आता है। (पृ0 42) मकबरे के मिथ को तोड़ने के लिए वैयक्तिक स्तर पर इक्का-दुक्का प्रयासों की नहीं, वरन् व्यापक स्तर पर जनजागरण और संगठित लोकशक्ति की ज़रूरत है – यह अनुगूंज उपन्यास के बाद भी देर तक मन में बनी रहती है।

भारतीय उपमहाद्वीप के स्त्री लेखन का तुलनात्मक अध्ययन करने पर एक दिलचस्प तथ्य उभर कर सामने आता है कि भारतीय स्त्री लेखन में अक्सर धर्म एक उत्पीड़क शक्ति के रूप में चित्रित नहीं हुआ है, हालांकि यहाँ भी ‘मनुस्मृति’ जैसा आर्ष ग्रंथ जीवन की तीनों अवस्थाओं में स्त्री को पुरुष के अधीन रहने का संस्कार देकर उसे ‘देह’ अथवा ‘वस्तु से भिन्न कोई स्वतंत्र इयत्ता नहीं देता। मंदिरों में देवदासी प्रथा, काशी-वृंदावन में विधवाओं की दारुण स्थिति तथा देश के विभिन्न भागों में सती प्रथा की पुनर्प्रतिष्ठा धर्म की आड़ में होने वाले यौन शोषण और उत्पीड़न की कथा कहते हैं, लेकिन आश्चर्य कि भरतीय हिंदी लेखन में इन्हें मुख्य विषय बना कर गंभीरतापूर्वक विचार नहीं किया गया है। अलबत्ता अखबारों में रपटों और फीचर लेखों के जरिए जनजातियों एवं कबीलों में पाई जाने वाली ऐसी धार्मिक नृशंसताओं को अवश्य बेबाकी से प्रश्नचिन्हित किया जा रहा है ; या फिर महाश्वेता देवी ‘छुक छुक, छुक छुक आ गेल गाड़ी’ जैसी लम्बी कहानी में कोल्हाटी समाज में पाई जाने वाली उन धार्मिक रूढ़ियों पर प्रहार करती हैं जो घर की बड़ी बेटी को बाज़ार में बैठा कर पुरुष वासनापूर्ति के नए-नए द्वारों को खोलती है।  लेकिन तहमीना और तसलीमा की तरह उनका बलाघात धार्मिक नृशंसताओं के यथातथ्य उद्घाटन की अपेक्षा उनके प्रति विद्रोह चेतना जगाने में अधिक रहा है। इस भिन्नतामूलक दृष्टि के दो कारण हो सकते हैं। एक, इस्लाम की अपेक्षा हिंदू धर्म में स्त्री की किंचित बेहतर स्थिति जहाँ सिद्धांत रूप में उसे देवी/जननी के रूप में पूजा जाता है और अर्धांगिनी के रूप में हर शुभ कार्य में उसकी उपस्थिति अनिवार्य मानी जाती है। (यह अलग तथ्य है कि काली के रूप में उसकी असीमित शक्ति का मनचाहा उपयोग करने के बाद पति परमेश्वर के मिथ को सरे-राह डाल उसके बढ़ते कदमों को वहीं फ्रीज़ कर दिया जाता है।) दूसरे, स्वतंत्र भारत द्वारा हिंदू कोड बिल अपनाया जाना जो अपने बुनियादी ढांचे में लोकतांत्रिक और मानवीय है। लेकिन जहाँ तक भारतीय मुसलमान स्त्री की नियति पर लिखे गए भारतीय उर्दू लेखन का सवाल है, वह शरीअत के हस्तक्षेप और शाहबानो विवाद से उठे मसलों को लेकर चुप है। कुर्रतुल ऐन हैदर ‘अगले जनम मोहे बिटिया न कीजो’ उपन्यास में रश्के कमर और उसकी बेटी की त्रासदी के जरिए ‘मुताअ’ प्रथा (सीमित अवधि का निकाह) के दुष्परिणामों का ज़िक्र अवश्य करती हैं जो आठवें दशक में गुजरात में प्रचलिम ‘मैत्री करार’ का ही रूप है, लेकिन मुस्लिम समाज को जड़ कर देने वाली सामाजिक समस्याओं का गहन विश्लेषण करने की बजाय उन सपाट स्थितियों का चित्रण करने में अधिक रमी हैं जो पुरुष की वासना का शिकार बना कर स्त्री को ख.ानगी (रखैल बनने वाली वेश्या) बनने को मजबूर करती हैं। उल्लेखनीय है कि कुर्रतुल ऐन हैदर और जीलानी बानो (ऐवाने-ग़ज़ल) दो भिन्न-भिन्न वर्गों की कथा कहती हैं। कुर्रतुल गरीबी, अशिक्षा और जहालत की मार झेलती निम्नवर्गीय रश्के कमर, जमीलुन बी और सदफ़ आपा की ज़िंदगियों में जहाँ आग़ा साहब और वर्मा साहब की मौजूदगी को ज़रूरी बना देती हैं, वहीं जीलानी बानो हैदराबाद के नवाबी खानदानों के अभिजात दंभ और जंग खाई माली हालत के परिप्रेक्ष्य में राशिद मामू और अब्बा जान हुमायूं जैसे  अतिमहत्वाकांक्षी धनलोलुप पुरुष पात्रों की सृष्टि करती हैं जो अपने ऐशो-आराम के लिए चांद और ग़ज़ल को पर-पुरुषों के आगोश में समा जाने को मजबूर करते हैं। गौरतलब है कि दोनों उपन्यास स्त्री की नियति पर निष्क्रियात्मक टिप्पणियां करने के बाद उन सकारात्मक संभावनाओं की ओर ध्यान देने की ज़रूरत नहीं समझते जिन्हें तलाश कर स्त्री को अकेले अपने दम पर लड़ाई लड़नी है। इस दृष्टि से नासिरा शर्मा के हिंदी उपन्यास ‘ठीकरे की मंगनी’ का उल्लेख अनिवार्य जान पड़ता है जहाँ महरूख न केवल मुस्लिम परिवारों की रिवायतों का विरोध करती है, बल्कि आत्मसम्मानपूर्वक जीवन जीते हुए भावी पीढ़ी के लिए एक मिसाल बन जाती है। बेशक महरूख ने भी हीर की तरह ‘शताब्दी की चाल से सरकते’ (ठीकरे की मंगनी, पृ0 11) लम्हों में जीवन के ठहराव को जिया है और पैदा होते ही ठीकरे की मंगनी जैसी गलीज़ रिवायतों का शिकार होकर अपनी ज़िंदगी को निरर्थक होते देखा है, लेकिन फिर भी दोनों की स्थिति में काफी अंतर है। हीर की तुलना में महरूख का पारिवारिक माहौल न केवल उदार है बल्कि मंगेतर रफ़त भाई पीर साईं का विलोम बन कर उसके व्यक्तित्व को एक नई तराश भी देते हैं। यह ठीक है कि अततः कुल परिणति में ‘साम्यवादी’ रफ़त भाई ‘अहंवादी’ पीर साईं से भिन्न नहीं, लेकिन उच्च शिक्षा एवं लोकतांत्रिक माहौल देकर उन्होंने महरूख के भीतर की ‘स्त्री’ को अपदस्थ कर जिस स्वतंत्रचेता निर्णय सक्षम ‘मनुष्य’ को प्रतिष्ठित करने की दृढ़ता दी है, वही महरूख की कुल जमापूंजी है। इसी कारण हीर के विपरीत महरूख के पैरों तले ठोस ज़मीन है और सिर के ऊपर अनंत आसमान जो शौहर से अलग स्त्री की अलग पहचान की पुष्टि करता है।

1956 में लागू हिंदू कोड बिल तथा भारतीय संविधान की धारा 15 तथा 16 ने हालांकि कानूनी एवं संवैधानिक तौर पर भारतीय स्त्री के मानवीय एवं मौलिक अधिकारों की रक्षा का दायित्व लिया है और मिताक्षरा तथा दाय संप्रदाय की विषमतामूलक सिफारिशों को निरस्त करते हुए ‘हिंदू उत्तराधिकार कानून’ ने बीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध की तुलना में स्वातंत्रयोत्तर भारत की स्त्री को अपेक्षाकृत अधिक स्वतंत्रता एवं समानता प्रदान की है, लेकिन फिर भी वस्तुस्थिति यह है कि न्याय पाने की जटिल एवं सुदीर्घ प्रक्रिया में सामंती संस्कारों से ग्रस्त कानून के पुरुषवादी चेहरे को नज़रअंदाज नहीं किया जा सकता। बेशक उपर्युक्त आपत्तियों को निरस्त करने के प्रयास में उन तमाम कानूनी फैसलों को गिनाया जा सकता है जो पिछले पचास वर्षों में किसी महिला/महिला संस्था द्वारा अदालत का दरवाजा खटखटाने पर पूरे स्त्री समाज को मिले हैं जैसे पिता के जीवित होते हुए भी मां को संतान की प्राकृतिक गार्जियनशिप का अधिकार, पुत्री को गोद लेने का अधिकार, विवाहिता पुत्री द्वारा लाचार माता-पिता की देखरख का अधिकार, औपचारिक प्रपत्रों में संतान के अभिभावकत्व का हवाला देते हुए पिता के साथ-साथ मां का नामोल्लेख करने की बाध्यता आदि (और इस प्रकार ‘दीवारों से पार आकाश’ की वसुधा की आक्रोशभरी मायूसी एक अंश तक बेमानी हो जाती है कि परिवार के वंशवृक्ष में मां कहीं नहीं, पृ036) लेकिन यह भी सत्य है कि 48 प्रतिशत जज घरेलू हिंसा को जायज मानते हैं। दूसरे, सैद्धांतिक स्वतंत्रता व्यवहार में भी मुक्ति का संदेश लेकर आए, जरूरी नहीं। यही कारण है कि तमाम कानूनी बाध्यता के बावजूद समाज में प्रत्येक संवेदनशील वसुधा ‘स्वत्वहीन’ कर दिए जाने की वेदना भोग रही है कि ”बच्चे बड़े होंगे तब अपनी पहचान वे व्योमकेश मेहता के पुत्र कह कर ही देंगे। पूरी ज़िंदगी वे खुद के नाम के साथ पिता का नाम जोड़ कर दुनिया में घूमेंगे। वंशावली बनेगी तब व्योमकेश नाम की डाली में से तीन पत्ते फूटेंगे। उसमें मां का नाम कहीं नहीं होगा। गर्भ धारण करने से लेकर जन्म देकर बड़े करने तक मां की सही हुई तकलीफोंका आलेखन कहीं न होगा। अंतहीन कामों में जर्जरित शरीर और मन लेकर वह गुमनामी में विलीन हो जाएगी।” (दीवारों से पार आकाश, पृ0 36)



नारीवाद के भाष्य के रूप में रचा गया उपन्यास ‘कठगुलाब’ (मृदुला गर्ग) स्मिता एवं मारियान तथा प्रख्यात उपन्यासकार स्कॉट फिटजे.राल्ड की पत्नी जेल्डा फिटजेराल्ड के जरिए इस तथ्य का सामान्यीकरण करता है कि प्रत्येक देशकाल का कानून सदा से पुरुषवादी रहा है। अमरीकी समाज में पति प्रताड़िता स्मिता बनाम जिम जारविस केस हो (पृ0 108-110), इर्विंग द्वारा पत्नी मारियान का भावनात्मक शोषण कर उसके उपन्यास को अपने नाम से छापने का छल हो (पृ0 91-93) या भारतीय समाज में पैतृक संपत्ति में बेटी के हिस्से को बेदखल कर सारी जायदाद पुत्र के नाम लिख देने का प्रपंच (पृ0 215), कानून हमेशा पुरुष का ही पक्ष लेता है। ”फैमिनिन वाइल्स से मुक्त हो, सिर ऊँचा करके, अपने हाथों अपने जीवन की रूपरेखा तैयार करने की कोशिश कीजिए, फिर देखिए, वही कानून कैसे आपको पटखनी देता है”  – गहरी घृणा से भर कर मृदुला न्याय व्यवस्था पर व्यंग्य करती हैं तो ‘चाक’ उपन्यास में सारंग के साथ पेचीदा न्यायिक प्रक्रिया से गुज़र कर मैत्रेयी पुष्पा न्याय व्यवस्था को लेकर रंजीत के अनुभव और सामान्य जन की अनास्था को जोड़ कर एक गहरी सच्चाई रेखांकित करती हैं -”कानून! किसे सिखा रही हो कानून? . . .कानून-कायदे पैसा देकर कागज के ऊपर पोंछ देने वाली इबारत के सिवा कुछ नहीं। और औरत के हक में तो बिल्कुल नहीं। पीढ़ियों से चले आ रहे रीति-रिवाजों से ऊपर हो जाएगी कचहरी? बिरादरी की मर्यादा भंग करने का अधिकार किसी को नहीं।” (पृ0 16) बिरादरी की मर्याद को सर्वोपरि मानने का सामंती दंभ चूंकि घर की देहरी से ही स्त्रियों के लिए न्याय के पट बंद कर देता है, इसलिए जिस तत्परता से वह अंतरजातीय प्रेम विवाह करने वाली लड़की की हत्या का फैसला करता है , उसी तत्परता से ससुराल द्वारा सताई गई बेटी (केका) की दुर्दशा को छुपाने के सैंकड़ों उपक्रम करता है। (चाक, पृ0 262) सवाल उठता है कि लड़की को गांव की इज्ज़त मानने वाला समाज उसकी रक्षा के लिए क्या इसलिए एकजुट नहीं होता कि हमाम में सब नंगे हैं?


भारतीय स्त्री लेखन कानून व्यवस्था में अंतर्निहित दुर्बलताओं (लूपहोल्स) को ही नहीं देखता, वरन् उन स्थितियों से दो-चार होने की कोशिश भी करता है जो वर्तमान कानूनों के प्रभाव को निष्प्रभ बना देती हैं। मसलन, तलाक के अधिकार से सम्पन्न स्त्री द्वारा सिर्फ इसलिए विवाह सम्बंध बनाए रखना कि तलाक के बाद पिता को बेटे का स्वाभाविक संरक्षणत्व मिलने के प्रावधान के कारण वह संतान से हाथ धो बैठेगी (छिन्नमस्ता, पृ0 13) तथा बलात्कार के मामलों को न्यायालय तक न जाने देना क्योंकि सुनवाई के दौरान अश्लील भाव-भंगिमाओं के कारण फरियादी को बार-बार सामूहिक तौर पर बलात्कृत होने की कटु अनुभूति होती है। (यहाँ भंवरीबाई प्रकरण में सवर्ण एवं अभिजात अदालत के पुरुषवादी अहं से छलकते निर्णय को नहीं भूलना चाहिए कि सवर्ण युवक ऐसा घृणित कार्य कर ही नहीं सकते) हालांकि बलात्कार कानूनन जुर्म है और अपराधी को कड़ा दंड दिए जाने का कानूनी प्रावधान भी है, किंतु समाज तक आते-आते हर कानून के ‘डाइल्यूट’ होते चलने की अनिवार्य प्रक्रिया को देखते हुए ज़रूरी है एक ऐसी जनचेतना विकसित करना जहाँ नैतिकता के दोहरे मानदंडों को नकारते हुए स्त्री की यौन शुचिता को उसके जीवन का पर्याय न माना जाए। सामाजिक कार्यकर्त्री की हैसियत से कुंदनिका कापड़ीआ ‘दीवारों से पार आकाश’ में कानून की नपुंसकता को जन चेतना द्वारा प्रतिस्थापित करने का आह्नान करती हैं -”स्वयं स्त्री को हमें समझाना होगा कि वह मात्र शरीर नहीं है। उसकी सारी मान-प्रतिष्ठा मात्र शरी पर ही आधारित नहीं है।  . . .बलात्कार की घटना की तरफ देखने की समाज की जो दृष्टि है, उसे (भी) बदलना होगा। . . . गुनाह करने वाले को कोई कुछ नहीं कहता, किंतु गुनाह का शिकार हुई महिला के माथे पर ज़िंदगी भर का कलंक लग जाता है।” (पृ0 252) ठीक इसी प्रकार न्यायिक अधिकारों की अनुपस्थिति में घृणित एवं तिरस्कृत समझी जाने वाली रखैल की स्थिति पर सहानुभूतिपूर्वक विचार करने की व्याकुलता भी भारतीय स्त्री के लेखन में दिखाई देती है। मराठी लेखिका उर्मिला पवार की कहानी ‘औरतजात’  तथा हिंदी लेखिका प्रभा खेतान का उपन्यास ‘छिन्नमस्ता’  इसका उदाहरण हैं। यहाँ रखैल को स्त्री (पत्नी) की शत्रु तथा घर उजाड़ू रूप में न देख कर पुरुष के शारीरिक-भावनात्मक शोषण की शिकार के रूप में देखा गया है जिसके अपने स्टेटस और संतान के भविष्य के प्रति समाज की हृदयहीनता पुरुष की भोगपरक मानसिकता को कभी प्रश्नचिन्हित नहीं करती।

जा तन की झांई परत

अजीब विडम्बना है कि 1942 में महादेवी वर्मा ने स्त्री की नियति को जिन शब्दों – जन्म से अभिशप्त और जीवन से संत्रस्त – में दर्ज किया था, उतनी ही सघन और मर्मांतक वेदना से पूरित वे शब्द आज भी स्त्री जीवन का सच बने हुए हैं। कन्या जन्म के समय परिवार का शोक संतप्त हो उठना, नई वैज्ञानिक तकनीक के साथ कन्या भू्रण के बढ़ते आंकड़े, घृणित इन्सेस्ट सम्बंध और घरेलू हिंसा  – परिवार संस्था के स्वस्थ स्वरूप को विकृत कर देने वाली कुछ ऐसी सच्चाइयां हैं जिनका भारतीय उपमहाद्वीप के तीनों देशों के स्त्री लेखन में समान रूप से अंकन हुआ है। हालांकि वैज्ञानिे शोधें सिद्ध कर चुकी हैं कि कन्या जन्म के लिए न स्त्री उत्तरदायी है और न ही कन्या जन्म का अर्थ पुरुष की मर्दानगी का स्खलन है, किंतु सांस्कृतिक परंपराओं में जकड़े तीनों देशों के अनुदार समाज में कन्या जन्म को अभिशाप रूप में स्वीकारने का संस्कार आज भी शेष है। ”बेटा पैदा करने के कारण मां मुँह दिखाने लायक रह गई थी अन्यथा खानदान का चिराग कौन जलाता? लड़कियों से तो वंश नहीं चलता। वे सिर्फ घर की शोभा बढ़ाती हैं . . .घर-बार साफ रखके पुरुषों को खुश रखती हैं।” (मेरे बचपन के दिन, पृ028) तसलीमा नसरीन ने सीधे-सधे शब्दों में जिन सच्चाइयों का बयान किया है, उन्हीं सचाइयों से खौफ खाकर ‘कुफ्र’ की हीर को जहाँ पहली बेटी के जन्म पर पीर साईं की नाराज़गी न भड़काने के हरचंद प्रयास में अपनी चीखों को दबाने के लिए ”मुँह में कपड़ा ठूंस लेना” (70) पड़ा, वहीं बेटे को जन्म देने के बाद सार्वजनिक तौर पर बधाई देते हुए नाते-रिश्तेदारों द्वारा व्यावहारिक सलाह भी सुनने को मिली कि ”इस कामयाबी” पर अब उसे ”ज्यादा ताकतवर हो जाना चाहिए।” (83) ”हमारी सास तो पहले जता देती थीं कि देखो दुलहिन, मुझे पोता चाहिए। अगर छोकरी हुई तो मायके में फिंकवा दूँगी। मैं सास की नसीहत सुनती और उस पर अमल करती।” (ऐवाने-ग़ज़ल, पृ0 44) बतूल की जचगी के दौरान बतूल को ऐसा ही आदेश सुनाने वाली बतूल की सास की इस गर्वोक्ति में जहाँ पुरुषवादी व्यवस्था के संवाहक होने का दर्प है, वहीं कन्या शिशुओं की अकाल मृत्यु के लिए उत्तरदायी कारकों-व्यक्तियों को लेकर एक प्रच्छन्न स्वीकारोक्ति भी जिसे आंकड़ों में अनूदित करें तो भारतीय संदर्भ में प्रति हज़ार 932 के असंतुलित लिंगानुपात को नज़रअंदाज करना संभव नहीं।


उल्लेखनीय है कि जब जीलानी बानो ‘ऐवाने ग़ज़ल’ में यह कहती हैं कि ”कोई औरत यह नहीं चाहती कि उसके बतन (गर्भ) से उसकी की तरह मजबूर और बेबस हस्ती जन्म ले” (पृ0 45) तब स्त्री की परवशता का मार्मिक आख्यान करने की अपेक्षा वे वस्तुपकर ढंग से उन मनोवैज्ञानिे और सामाजिक संरचनात्कमक कारणों को विश्लेषित करने का आग्रह करती हैं जो बेटी के रूप में ‘स्व’ का विस्तार कर एक ओर मां को आह्लादित करते हैं तो दूसरी ओर अपनी नियति की वारिस जान कर अवसाद की गहराइयों में डुबो देते हैं। इस दृष्टि से मां द्वारा अपने ‘स्व’ के प्रति घृणा और आसक्ति की परस्पर विरोधी मनोवृत्तियों का बेटी में प्रत्यारोपण जितना स्वाभाविक है, उतना ही जरूरी लगता है निजी जीवन की असुरक्षा और असंतोष से सबक लेते हुए बेटी को वे सब ‘कौशल’ सिखा देना जिन्हें हस्तगत कर पुरुषों को ‘नचाने’ की कुट्टनी कला में वह प्रवीण हो सके। जाहिर है इस प्रक्रिया में जहाँ एक स्तर पर वह उसके अक्षत कौमार्य की चौकसी में उसकी स्वतंत्रता, स्वाभाविकता और निजता को निरे शैशव से ही बाधित करती है, वहीं दूसरे स्तर पर उसकी कुल सोच को पुरुषकेन्द्रित कर सदा हाशिए पर रहने का संस्कार भी देती है। ढेर से मनोरम झूठों, आवरणों और वर्जनाओं को गढ़ कर वह स्वयं प्रवंचनाओं और आत्मछलनाओं के जिस इंद्रजाल में जीती आई है, उससे उत्कट घृणा के बावजूद बेटी को उसमें रमा देना उसके मातृत्व का अहम दायित्व बन जाता है। इसका मुख्य कारण है उसकी दृष्टि एवं संवेदना मेंउन विकल्पों और संभावनाओं का अभाव जो उस इंद्रजाल के अस्तित्व और सम्मोहन को काट कर उसके समक्ष एक नई और विराट दुनिया के द्वार खोल सकते हैं। दरअसल परिवार में बेटी के अभिशप्त अस्तित्व के मूल में पुरुषवादी व्यवस्था का आभ्यंतरीकरण करने वाली मां है जो अपनी निष्क्रियता से त्रस्त भी है और उसका विस्तार भी करना चाहती है। हर ज्यादती पर बेटी को दुत्कारने और बेटे को दुलारने वाली मां बेशक खान-पान की ज़रूरतों से बंधे अपने भौतिक अस्तित्व को बचाए रख पाने में सफल होती है, लेकिन इस प्रक्रिया में बेटे को ‘मर्द’ और बेटी को ‘देह’ बनने की दीक्षा देकर भविष्य को बेहद बीहड़ और संकटापन्न बना डालती है। स्त्री की मानसिक निष्क्रियता, मनोविज्ञान और सामाजिक जकड़बंदी से वाकिफ पुरुष हर वार से उसे चित्त कर देने की कला जान जाता है। वरना प्रतिकार की ज़रा भी गुंजाइश होने पर क्या घर-परिवार की अंदरूनी परतों में इन्सेस्ट अतिचार का जारी रह पाना संभव हो पाता? ‘छिन्नमस्ता’ की प्रिया का अपने ही बड़े भाई द्वारा, ‘मेरे बचपन के दिन’ की तसलीमा का मामा और  चाचा द्वारा  तथा ‘फेरा’ की कल्याणी का ममेरे भाई द्वारा यौन शोषण क्या इसलिए संभव नहीं हो पाया कि स्त्री समाज द्वारा इसे कलंक कह कर छुपाने की भयजनित बाध्यता पुरुष को निरंतर कामोन्मादी भूखे भेड़िए में तब्दील करती रहती है? बेशक एक सुरक्षात्मक फासले पर खड़े होकर ऐसी टिप्पणियों को क्रूर सच्चाइयों से मुँह मोड़ने की सुविधाजनक कोशिश कह कर खारिज भी किया जा सकता है, लेकिन प्रिया द्वारा आत्महत्या की धमकी देकर भाई साहब को सदा के लिए चुप करा देना (छिन्न्मस्ता, पृ0 55) और पीर साईं की कामलोलुप दृष्टि से गुप्पी को बचाने के लिए हीर का किन्हीं ‘संभव विकल्पों’ पर विचार करना क्या इस बात का प्रमाण नहीं कि विरोध और विद्रोह के जरिए ही यथास्थितिवाद के खिलाफ जंग छेड़ी जा सकती है? बेशक गुप्पी की जगह उसकी हमउम्र यतीमड़ी को पीर साईं की सेवा में प्रस्तुत करके हीर चकलेदारिन से वेश्या तक की रपटीली ढलानों का सफर करती है, किंतु यह भी तय है कि शोषण की इन्हीं अतल गहराइयों के बीच उसे पीर साईं के वर्चस्व को तोड़ने की प्रेरणा और शक्ति मिलती है।

मुक्त करती हूँ तुम्हें मेरे सुन्दर भीषण भय 

मृदुला गर्ग की विशेषता है कि ‘कठगुलाब’ में शुरुआती तौर पर इन्सेस्ट को सामाजिक कलंक और सांघातिक हादसे के रूप में देखने के बाद वे इसे टर्निंग प्वाइंट के रूप में चित्रित करती हैं जहाँ आईनों और तेज़ रोशनियों से घबरा कर पलायन कर जाने वाली स्मिता अपने को चीन्हने के प्रयास में भीतरी कमज़ोरियों और वर्जनाओं से जूझती हुई एक ऐसी स्त्री के रूप में निखर कर सामने आती है जो आत्ममुग्धता और अपराधबोध से अछूती एक स्वस्थ स्त्री है; जिम जारविस की नज़र में ”किसी भी मनोविश्लेषज्ञ के लिए चुनौती।” (पृ0 32) स्मिता के कायांतरण में मृदुला गर्ग की व्यग्रता को ढूँढना कठिन नहीं जो उन्हें स्त्री के पारम्परिक मिथ  को तोड़ कर एक नया रचनात्मक विन्यास देने को विवश करती है।


पितृसत्तात्मक व्यवस्था की आधारभूत संस्थाओं के तटस्थ विश्लेषण के बाद स्त्री सशक्तीकरण, दूसरे चरण में, स्त्री द्वारा मनुष्य के रूप में अपने अस्तित्व और व्यक्तित्व का ईमानदार आत्मसाक्षात्कार है। आत्मसाक्षात्कार चूंकि दूसरों के संदर्भ में अपनी स्थिति/नियति का विश्लेषण न होकर स्व, समाज और समय को संवारने के लिए अंतर्निहित कमज़ोरियों और शक्तियों की पहचान और संचयन की दुष्कर साधना है, अतः यहाँ भारतीय उपमहाद्वीप के तीनों देशों के स्त्री लेखन में पाई जाने वाली दो समानताओं की ओर ध्यान खींचना खासतौर से जरूरी हो जाता है। एक, लगभग सभी उपन्यासों में पुरुष को स्त्री की दुर्दशा के लिए जिम्मेदार मान कर उसे नर-सूअर, हरामी (कठगुलाब), मि0 कोबरा (छिन्नमस्ता), शैतान (कुफ्र) जैसी उपाधियों से नवाजा गया है और इस प्रकार प्रथम दृष्ट्या इसे आत्मसाक्षात्कार से बचने की सतही कोशिश का नाम भी दिया जा सकता है। दूसरे, लेखिकाओं ने स्वयं स्वीकार किया है कि गाली-गलौज अपनी हीनता और बेचारगी की मुखर स्वीकृति है। अतः आवेश का उफान थमते ही बहिर्जगत की कड़वाहटों के बीच वे अपने-अपने स्त्री पात्रों की भीतरी दुनिया में उतरने लगती हैं क्योंकि जानती हैं कि कुछ पाने से पूर्व अपने को थहा कर पुनर्संयोजित करना आत्मोपलब्धि का अहम बिंदु है। इस प्रक्रिया में उच्च शिक्षिता, अभिजात उदार पृष्ठभूमि और खुले विदेशी माहौल में पली नीरजा, स्मिता, असीमा, मारियान जैसी आधुनिकाओं को दरकिनार कर जब मृदुला गर्ग ‘कठगुलाब’ में दर्जिन बीबी को आत्मसाक्षात्कार की अग्नि परीक्षा से गुजरते हुए अस्तित्व से अस्मिता तक की भास्वर ऊँचाइयों का संस्पर्श करते देखती हैं तो वस्तुतः वे आत्मसाक्षात्कार से आत्मविस्तार की छोटी सी इच्छा के व्यापक स्तर पर फलीभूत होने का रचनात्मक वितान बुनती हैं। दर्जिन बीबी यानी ”सतयुगी काल से चली आ रही संतोषी भारतीय नारी” जिसेे ”आधुनिक तो किसी हिसाब से नहीं कहा जा सकता था। न पहरावे से, न खानपान, रहन-सहन और न विचार-भावना से। वही पोंगापंथी धुतल्ली का पहरावा। सिर पर पल्लू मेकअपविहीन चेहरा, त्योहारों में आस्था, मां-बाप की आज्ञाकारिणी पुत्री, तयशुदा विवाह की पात्रा, खाना बना-खिला कर तृप्त, बच्चे पैदा करके खुश। . . .(पृ0 155) ”ठीक-ठाक संतुलित दरम्याने किस्म की औरत” लेकिन ”स्वाभिमान का शीरा कुछ ज्यादा मिकदार में”। ठीक ‘ऐवाने-ग़ज़ल’ की बीबी की तरह जो जबरदस्ती हवेली में ब्याह दिए जाने के प्रतिशोध में पुत्र-पौत्रवती होकर भी मृत्युपर्यन्त पति-परिवार को अपने वजूद का अंतरंग हिस्सा न बना सकी। लेकिन जहाँ परस्त्रीगामी ऐय्याश पति का भीगी बिल्ली की तरह पहलू में आ सिमटना उसके अहं को सहला जाता है, वहीं दर्जिन बीबी औसत भारतीय स्त्री के लिए निर्धारित आचार-संहिता की धज्जियां उड़ाते हुए पति के स्वेच्छाचार को अपनी नियति नहीं बना सकती -”मेरे सिद्धांत मुझे ऐसे पति से एक पैसा लेने की इजाजत नहीं देते जो किसी और का पति बन चुका हो।” (पृ0 157) एक अदद फैशन डिजाइनर मशीन के साथ दो छोटे बच्चों को पालने का संकल्प लेकर अलग हो जाने वाली दर्जिन बीबी का स्वाभिमान की आधारभूमि पर पैर टिकाते ही सामान्य से विशिष्ट स्त्री बन जाना संयोग या साभिप्राय लेखन का नमूना नहीं, वरन् ‘मनुष्य’ के रूप में अपनी जीवन शर्तों और फैसलों का स्पष्ट स्वीकार है -‘मुझे मात्र शरीर बन कर जीना पसंद नहीं था और मैं दया का पात्र भी नहीं बनना चाहती थी।” (पृ0 160)


स्वाभिमान की विशेषता है कि तानों-उलाहनों की विद्वेषपूर्ण संकीर्णताओं में गर्क होने की बजाय वह चुनौतियों से जूझते हुए सतत उन्न्यन का कठिन लक्ष्य चुनता है। इसलिए पूरे उपन्यास में एकमात्र दर्जिन बीबी ही पति प्रवंचिता ऐसी स्त्री हैं जो पति की गरिमा के खिलाफ एक शब्द भी मुँह से नहीं निकालतीं। ठीक यही बात ‘ठीकरे की मंगनी’ की महरूख के लिए भी कही जा सकी है जो परनिर्भर अवस्था में दूसरों को कोसने की बजाय स्वयं अपने जीवन की नियंता बन गई है -”एक घर औरत का अपना भी हो सकता है जो उसके बाप और शौहर के घर से अलग उसकी मेहनत और पहचान का हो।” (पृ0 197) गौरतलब है कि आत्मसम्मान और आत्मनिर्भरता से दिपदिपाता यह मानवीय बोध न जीवनभर यातनाओं की अटूट शृंखला झेलने के बाद ‘कुफ्र’ की हीर अर्जित कर पाई है, न ‘मेरे बचपन के दिन’ की ईदुल। अलबत्ता पति पर आश्रित रहने की सामाजिक-सांस्कृतिक-आर्थिक मजबूरियों ने दोनों के असंतोष को प्रतिशोध में जरूर तब्दील कर दिया है। ईदुल कुटने-पिटने के बावजूद पति की रसिकता और नास्तिकता को कोस कर और हीर चील के साथ पीर साईं की हत्या के षड्यंत्र में शामिल होकर अपनी-अपनी मुक्ति के रास्ते तलाशती हैं। भारतीय स्त्री के मुकाबले वे पाती हैं कि मुक्ति के द्वार उनके लिए हैं ही नहीं, न उड़ान भरने के लिए आंगन जितना छोटा आकाश, बल्ेिक मृत पति के आतंक में सेंध लगाते हुए हीर ने तारा के साथ मिल कर जो छोटा सा रोशदान खोला है, उसे भी पुत्र के अंकुश ने ईंटों से चिनवा दिया है। अपने ही खून-दूध से लड़ाई लड़ने के औजार और तकनीक किसी भी स्त्री के पास पहीं।



फिर स्त्री (मातृत्व) की नियति और रुदन का महिमामंडित बखान! आत्मपड़ताल की घाव-कुरेद निर्मम प्रक्रिया में मृदुला गर्ग स्त्री को छल कर पछाड़ने वाले इस संस्कार से मुक्ति दिलाना बेहद जरूरी समझती हैं। एक बार फिर उनकी प्रवक्ता और प्रतिनिधि दर्जिन बीबी जो अहसानफरामोश स्वार्थी बेटे असीम की अपने तईं की गई ज्यादतियों को तब तक बर्दाश्त करती हैं जब तक सामाजिक मर्यादा और सौमनस्य को भंग करने वाले संस्कारहीन नर-पशु के रूप में उभर कर सामने नहीं आता। जीवनभर मालदार पिता की दौलत पर गुलछर्रे उडा.ने के लिए छोटी मां (पिता की दूसरी पत्नी) को मस्का मारने वाले असीम का पिता की मृत्यु के बाद उस ‘रखैल’ को घर से निकाल देने का दंभ भरा ऐलान और नर्मदा के प्रेमी को डरा-धमका कर भगा दिए जाने का दर्प दर्जिन बीबी को गहरी हताशा के साथ अपने भीतर झांकने को विवश करता है। इतनी संस्कारहीन औलाद! परवरिश में कहाँ चूक हुई? ऐसी औलाद को गले लगाने का अर्थ क्या उसकी ज्यादतियों में बराबर की शिरकत नहीं? ”उसे (पति की दूसरी पत्नी) लेकर आ सके तो आ, वरना फिर कभी मत आना यहाँ” (पृ0 186) – दर्जिन बीबी का आदेश जिसके एक छोर पर मां के रूप में अपनी असफल भूमिका पर गहरा अवसाद है तो दूसरे छोर पर ममता की मोहक कंटीली तारों के सम्मोहन को तोड़ डालने का निर्णय भी। अनिवार्य परिणति के रूप में स्त्री जीवन को आच्छादित कर लेने वाली मातृत्व महज एक निष्क्रिय स्थिति या अल्पकालिक स्टेज नहीं, बल्कि एक पूरी पीढ़ी के साथ-साथ पूरे समाज एवं काल को गढ़ने की महती जिम्मेदारी है। इसलिए मृदुला स्त्री से वानरी मोह त्याग कर एक बुनियादी ज़रूरत के तौर पर मानवीय मूल्यों एवं दायित्व को पहचानने का आग्रह करती हैं। क्षिप्र गति से घूमते चाक पर कुम्हार की उंगलियों के कोमल स्पर्श की ही तरह बेहद नामालूम लेकिन सतर्क भूमिका है मां की। असीमा के साथ दर्जिन बीबी के सतत संवाद और साहचर्य के जरिए मातृत्व की सैद्धांतिकी की पुनर्रचना करते हुए मृदुला ने इक्कीसवीं सदी की जागरूक और व्यक्तित्वसम्पन्न मां की कुछ अर्हताओं को इस प्रकार रेखांकित किया है। एक, ”तुम्हें आज़ाद ख्याल होना चाहिए। पहले से खुद को सीमाओं में बाँध कर नहीं रखना चाहिए” (पृ0 160) क्योंकि बंद अनुदार दृष्टि हमेशा मानसिक-वैचारिक रुग्णताओं को संक्रामक रोग की तरह फैलाती है। दूसरे, ”धीरज रखे बगैर कोई काम नहीं हो सकता” (पृ0 176) अर्थात् स्थिति पर आवेगपूर्ण प्रतिक्रिया करने से पहल जरूरी है ठंडे दिमाग से गहन और पूर्ण छानबीन क्योंकि अधीरता मनुष्य जीवन को कठिनतर बना देने वाली असहिष्णुता और विवेकहीनता की अग्रजा है। तीसरे, ”दुश्मन को दुख पहुँचा कर खुश होना गलत है, खुद हमारी आत्मा के लिए नुक्सानदेह” (पृ0 168) अर्थात् क्षमा एवं उदारता की पक्षधरता जिसके मूल में सदैव सक्रिय रहती है संवेदनशीलता और विवेकशीलता जैसी सकारात्मक अभिवृत्तियां। चौथे, ”उस (नर्मदा) का हौसला बढ़ाने की बजाय यह क्या खटराग ले बैठी” (पृ0 176) अर्थात् राग-द्वेष से मुक्त सहयोग, सहानुभूति और बंधुत्व के प्रसार की तत्परता जहाँ घटनाओं में बंधा अतीत, मृत सम्बन्ध या स्मृतियांे में अटके दुखद प्रकरण महत्वपूर्ण नहीं। महत्वपूर्ण है नई परिस्थितियों के विश्लेषण के बाद नई रणनीति तैयार कर प्रतिकूलताओं से जूझने की निर्भीकता। प्रभा खेतान जहाँ स्त्री मुक्ति का सिरा ”अपने कहे जाने वाले रिश्तों के घेरे के सम्मोहन से मुक्त” (छिन्नमस्ता, पृ0 209) होने में मानती हैं, वहीं निरपेक्ष संलग्नता (कमजंबीमक ंजजंबीउमदज) के साथ मृदुला इस घेरे का इतना प्रसार कर लेना चाहती हैं कि ‘स्व’ और ‘पर’ सारी विभाजक रेखाओं का अतिक्रमण कर एक-दूसरे में लय हो जाएं।


गौरतलब है कि मृदुला गर्ग गहरी सूझबूझ के साथ मातृत्व की जो सैद्धांतिकी गढ़ती हैं, उससे वाकिफ न होने के कारण अधिकांश लेखिकाएं या तो स्त्री के मातृत्व का सूर की हुलसाती-दुलराती जसोदा की तरह महिमामंडन करती हैं या कुंदनिका कापड़ीआ की तरह मोहभंग से उत्पन्न हताशा को व्यक्त करती हैं -”पूरा शरीर, पूरा मन, पूरा समय और निजी जरूरतों व व्यक्तिगत इच्छाओं का पूर्ण समापन चाहने वाली इस स्थिति (मातृत्व) का यह आनंद किस बात का आनंद है? किसी जीवन के सृजन का? यदि वह सृजन का ही शुद्ध आनंद है तो एक के बाद दूसरी लड़की होने पर दूसरों के साथ-साथ मां का चेहरा भी क्यों मुरझा जाता है?” (दीवारों से पार आकाश, पृ0 37)


कुंदनिका कापड़ीआ की विशेषता है कि संतान के लिंग को मातृत्व की सार्थकता के साथ जोड़ देने वाली रुग्ण सामाजिक-सांस्कृतिक मान्यताओं को रेखांकित करते-करते वे अनायास बहुत गहरे सवाल की ओर इशारा करती हैं कि क्यों हर बार स्त्री ‘बेटा’ नहीं जनती, ‘मर्द’ पैदा करती है? इस प्रश्न के नुकीलेपन से तीनों देशों का स्त्री लेखन हैरान-परेशान है। ”मेरे बचपन के दिन’ की ईदुल समझ नहीं पाती कि उसकी जो सख्ती तसलीमा को पांचों वक्त की नमाज पढ़ने के लिए मजबूर कर देती है, वही बेटों तक पहुँचते-पहुँचते बेअसर क्यों हो जाती है? (पृ0 125) ‘कुफ्र’ की हीर तहेदिल से बेटा-बेटी में फर्क न करने की इच्छा के बावजूद पाती है कि बाप का वरदहस्त और परिवार का माहौल गुप्पी और राजाजी को किस तेजी से दो अलग शख्सियतों में गढ़ता जा रहा है। बकौल तसलीमा यह वही फर्क है जो बचपन में लड़कों को तेज़ गति से दौड़ते अत्याधुनिक खिलौने और बड़ा मैदान देने तथा लड़कियों को एक टुकड़ा आंगन आकाश देने की रीति की अनुपालना में बाद में चाह कर भी उनकी गति और दिशा नहीं बदल पाता। ‘छिन्नमस्ता’ में बड़े भाई साहब और ‘ऐवाने-ग़ज़ल’ में नसीर के अधिकारों और मनमर्जियों के विस्तार में ठीक यही संस्कार निहित है। ‘ऐवाने-ग़ज़ल’ में बेटे को मर्द बनाने की प्रक्रिया का विस्तृत ब्यौरा देते हुए जीलानी बानो निस्संतान उजाला बेगम की उन कारगुजारियों को निर्ममतापूर्वक उघाड़ती चलती हैं जहाँ अपनी जायदाद का वारिस पाने के लिए वे गर्भवती कुंवारी नौकरानी बी जानी का अपने शौहर अहमद हुसैन से निकाह पढ़वाती हैं और फिर उस अवैध संतान नसीर को हुसैन खानदान का सच्चा वारिस बनाने और मनवाने की कूटनीति में ऐय्याशी, फिजूलखर्ची और उद्दंडता से लेकर शायरी का शौक भी सिखाती हैं। बेशक इस प्रक्रिया में हवेलियों के भीतर पेचीदगियों को बुनतीं जालसाजियों को अनदेखा नहीं किया जा सकता जो सबसे पहले स्त्रियों को मुहरा बना कर अस्तित्वहीन करती हैं, फिर सत्ता हस्तांतरण की अनिवार्य परंपरा के नाम पर पुश्त दर पुश्त पुत्र बनने का आदिम संस्कार देती हैं। अतः जरूरी हो जाता है आत्मसाक्षात्कार के निर्भीक क्षणों में स्त्री अपनी भूमिका और पारिवारिक-सामाजिक दबावों पर नज़र रखते हुए संस्कार और परम्परा के क्षेत्र में सार्थक एवं सशक्त हस्तक्षेप करे।



आश्चर्य है कि ‘कुफ्र’ और ‘मेरे बचपन के दिन’ में ऐसा कोई सार्थक हस्तक्षेप न कर पाने वाली तहमीना दुर्रानी और तसलीमा नसरीन क्रमशः ‘माई फ्यूडल लार्ड’ और कविताओं में पहले ही अपने भीतर की स्त्री का खुर्दबीनी विश्लेषण कर चुकी हैं। अपने को सान पर चढ़ा कर निरंतर परखते रहने की प्रक्रिया बेहद कष्टकर और जोखिमपूर्ण होती है, लेकिन तसलीमा की दृष्टि में इसके बिना मुक्ति द्वारों का निर्माण संभव नहीं। तसलीमा मृदुला गर्ग की तरह अपने झोले से रेडीमेड सैद्धांतिकी नहीं निकालतीं, स्त्री की दुविधा-द्वंद्व-दुर्बलताओं के साथ कदम-दर-कदम चलते हुए उसे अपनी कमज़ोरियों को पहचानना और पछाड़ना सिखाती हैं। ”इतनी दूर तक जाती हूँ/फिर भी नहीं टूटता घेरा” (तसलीमा नसरीन की प्रतिनिधि कविताएं, पृ0 35) – हर स्त्री की चिरंतन दुख कथा! कामना और उपलब्धि के बीच नाकामयाबी बुनने वाले तत्व हमेशा समाज/पुरुष सापेक्ष नहीं होते, अपनी अंतर्भूत कायरताओं का परिणाम भी होते हैं जिन्हें कुंदनिका कापड़ीआ सुरक्षा की खातिर पहने सैंकड़ों मुखौटों और हज़ारों बख्तर (दीवारों से पार आकाश, पृ0 206) का नाम देती हैं तो तसलीमा मुक्ति की आकांक्षिणी स्त्री के मन की भीतरी परतों का भेदन कर इस कटु सत्य से परिचय करा देना चाहती हैं कि ”खुले मैदान में खूबसूरत लड़कियां आंखमिचौली खेलती हैं/जाना चाहती हूँ, पर न जाने कौन पीछे से पुकारता है/क्या कोई सचमुच पुकारता है?/या फिर मैं खुद ही पुकारती हूँ।” (तसलीमा नसरीन की प्रतिनिधि कविताएं, पृ0 35) तसलीमा सुविधा-संस्कार तथा स्वतंत्रता-अधिकार के बीच द्वंद्वग्रस्त स्त्री   को अंतर्विरोधी स्थितियों और प्राथमिकताओं के चयन का पाठ पढ़ाती हैं तो प्रभा खेतान ‘छिन्नमस्ता’ में उन्हें रचनात्मक परिप्रेक्ष्य देकर प्रिया के ईमानदार ऊहापोह में व्यक्त करती हैं -”विद्रोह में कपूर की तरह भभक उठना और तुरंत आंसुओं में उमड़ कर शांत हो जाना . . . अपनी इस प्रवृत्ति को मैं कभी दया, कभी उपेक्षा, कभी अन्य कोई विशेषण देती, पर अपने इस खंडित व्यक्तित्व की परिसीमा से क्या मैं परिचित नहीं थी? नरंेद्र को मैं छोड़ नहीं सकती थी। क्यों? क्या इसका कारण है -सुरक्षा का मोह? व्यवस्था की स्वीकृति?” (पृ0 147) यकीनन यह स्त्री जानती है कि वह निरी देह नहीं; कि देह से परे दिल और दिमाग में ही उसका अस्तित्वमूलक वजूद धड़क रहा है -”स्त्री को कोई छुएगा तो जानती हूँ शरीर ही छुएगा, हृदय नहीं” , लेकिन फिर भी ”एक छुईमुई खामखा चुराती है अपना चेहरा और आँखें” ।


सवाल उठता है कि यह स्त्री यौन शुचिता के शुद्धतावादी नैतिक आग्रहों को नकारने के बावजूद क्या सबसे पहले स्वयं को पातिव्रत्य की लौह शृंखलाओं में नहीं जकड़ लेगी? स्थिति के विपर्यय को गहराई से समझते हुए मृदुला गर्ग आत्मोपलब्धि हेतु अपराध बोध से मुक्ति पाकर आत्मबल संचित करने तक की जटिल मानसिक प्रक्रिया को कोढग्रस्त रतनू माली के बिंब के जरिए साक्षात् करती हैं। ”मैं पापी हूँ। पिछले जन्म के करमों का फल भुगत रहा हूँ।” (पृ0 32) कोढ़ी होने के पाप मात्र से जीवन क्षेत्र में उतरने के लिए सक्रिय सकारात्मक दृष्टि की अपेक्षा बिल्कुल स्त्रियों सी आत्मदया एवं आत्मपीड़ा का वितान। अपने ‘स्वस्थ’ साथी मालियों की उपेक्षा और कोप से बचने के लिए अनुर्वरता के बंद संसार में जीता रतनू माली! लेकिन बाध्य कर दिए जाने पर ‘बीमारी’ के बावजूद जब सर्जक के रूप में अपनी अंतर्निहित क्षमताओं से परिचित होता है तो सामान्य नहीं रह पाता -”मैं पापी नहीं हूँ। पापी नहीं हूँ। मेरे लगाए पौधों पर तरकारी फल गई। . . . मैं पापी नहीं।” (पृ0 33) आत्मविश्वास का निखरता-पसरता आलोक पुंज! ज़रूरत सिर्फ ‘स्वस्थ’ साथियों द्वारा प्रत्यारोपित कर दिए गए पूर्वग्रहों से मुक्ति पाने की है। नियति के स्वीकार और स्थिति के अस्वीकार के बीच गंुझलक मार कर बैठी शंकाएं, संदेह, भय और विवशताएं असल में अपने आत्मबल को परखने की कसौटियां मात्र हैं। प्रश्न-प्रतिप्रश्न और स्पष्टीकरण की उलझी-कंटीली डगर पर कदम बढ़ाए बिना कुछ पाना संभव नहीं। यहाँ ‘चाक’ की सारंग की मानसिक संरचना और व्यक्तित्व के लौहमर्षक रूपांतरण का आख्यान एकाएक अनिवार्य हो जाता है। दो स्थूल सच्चाइयों का गहरा बोध है सारंग को कि ”जानवरों के बाद अगर किसी को खूंटे से बांधा जाता है तो वे है घर-गृहस्थी में उलझी-रमी स्त्रियां (पृ0 345); और कि हर पति के भीतर जीती निरंकुश सत्ता शून्य में तब्दील पत्नी की पूजा-अर्चना में अपने हीनता बोध और अहं दोनो को भुला-सहला लेना चाहती है।  गोबर-चूल्हे और परदे में सिमटी सारंग ग्यारह वर्षों से रंजीत की गृहस्थी चलाते-चलाते-चलाते गुरुकुल की शिक्षा और अपने तेजस्वी स्वभाव को सबकी सुविधा के लिए भूल बैठी है। लेकिन एक के बाद एक द्रुत गति से घटने वाली तीन घटनाओं ने उसे आत्मावलोकन के लिए विवश किया है।


एक, फुफेरी बहन रेशम की दिन-दहाड़े नृशंस हत्या और समूचे गांव की रहस्यमयी चुप्पी जो स्वत्व और स्वाभिमान की लड़ाई लड़ने वाली अकेली स्त्री की खौफनाक परिणति की कथा कह कर आम औरत की बिंधी नियति से उसका साक्षात्कार कराती है। दूसरे, डोरिया जैसे असामाजिक तत्वों की धमकियों से बचने के लिए रंजीत द्वारा चंदन को आगरा भेज दिया जाना जो सारंग को अपने मातृत्व का सीधा अपमान जान पड़ता है। मां का दायित्व क्या बच्चे को जन्म देकर पालने-पोसने की बिंदु भर यात्रा तक ही सिमटा है? उसके भविष्य को लेकर लिए जाने वाले अहम फैसलों में उसकी कोई भूमिका नहीं? जाहिर है दोयम स्थिति का साक्षात्कार उसके भीतर असंतोष और विद्रोह के बीज रोपता है। तीसरे, स्कूल मास्टर श्रीधर से भेंट जो ”चट्टानों से टकरा-टकरा कर पानी की तरह रास्ता बनाने वाली” (पृ0 404) चेतना और ऊर्जा से सम्पन्न सारंग को बताता है कि भविष्य निर्माता के रूप में प्रत्येक स्त्री का दायित्व है ”मर्दों के कुसंस्कारों और अहं की अशिक्षा को मिटाना और निजी स्वार्थों से मुक्त होना।” (पृ0 345) असल में सारंग ‘कस्तूरी कुडल बसै’ की मां कस्तूरी के साहस, हौसले, निर्भीकता और दुर्धर्ष जिजीविषा का जीवंत रूप है जिसमें रंजीत से अलग अपने रास्तों का संधान करने की व्यग्रता है -”तुम्हें बेदाग रहने की लालसा है, मैं दागदार जीवन से डरती नहीं” (185) तो ”अपना फैसला, जुझारुपन और आज़ादी” बनाए रखने का आत्मविश्वास भी। इस सारंग से बेहद भयभीत हैं रंजीत -”गुस्से से लाल हुई औरत! सचमुच पहली बार देख रहा हूँ। अब तक तो औरतों को रोते-मिनमिनाते ही देखा है।” (पृ0 184) एक नई स्त्री छवि गढ़ती सारंग!
मैत्रेयी पुष्पा की तरह प्रभा खेतान स्वीकार करती हैं कि आत्मस्थ होकर अपने प्रति आश्वस्त होना ही दरअसल असंतोषजन्य विद्रोह को ऊर्ध्व चेतना में ढाल कर रचनात्मक परिप्रेक्ष्य देना है। यही वह बिंदु है जहाँ तंज और पीड़ा से मुक्त होकर यह मुक्तिकामी स्त्री निर्विकार भाव से अपनी चारित्रिक उदारता और निस्पृहता को ‘स्त्रियोचित गुण’ कह कर महिमामंडित करने वाली पितृक व्यवस्था के अस्तित्व को नकारती है – ”विनम्र होने का अर्थ यह नहीं कि वर्जनाएं सही जाएं/ताल से लेती हूँ यदि बूंद भर तो इसका यह अर्थ नहीं/कि अधिक के प्रति मेरा आग्रह कुछ कम है/ . . . लोहा पाकर नाचने लगती हूँ तो क्या हीरे को नहीं पहचानती?”’ (तसलीमा नसरीन की प्रतिनिधि कविताएं, पृ0 63) तो ”यौनांग को अकाम बनाए रखने के उद्यम में जुटे ‘सतीत्व’ को चखना-हेरना चाहती है -”सुना है सतीत्व बहुत स्वादिष्ट चीज़ है/कभी पहनावे की लाल साड़ी, चूड़ी-फीता, नाक की नथ/खोल कर नहीं देखा सतीत्व/वह आखिर दिखता कैसा है/अस्पृश्य उंगली से छूना चाहती हूँ सतीत्व का सतलड़ा हार”। (पृ0 40) यही नहीं, आत्मविश्वास से भर कर वह अपनी लड़ाई के स्वरूप और मिशन पर बात करने को भी तैयार है -”हमारी लड़ाई अपनों से संघर्ष की लड़ाई है, यानी भूमिगत, अपने अंदर अपने को समझने और मज़बूत बनाने की -हमें मर्द नहीं बनना है, न ही मर्द को औरत बनाना है -एक दूसरे का लबादा पहनने की यह ललक ही मुसीबत बन रही है। ज़रूरत है अपनी-अपनी जगह खड़े होकर अपने-आप को समझने और दूसरे को समझाने की।” (ठीकरे की मंगनी, पृ0 181)

जाहिर है नब्बे के दशक का भारतीय उपमहाद्वीप का स्त्री लेखन जिस नई स्त्री छवि को गढ़ता है, वह वस्तुतः ममता कालिया की कामना का प्रत्यक्षीकरण है कि ”अगर वह इन्हें (घुटे शब्दों को ) लिख दे तो एक बहुत तेज एसिड का आविष्कार हो जाए”  जिसे सकारात्मक संदर्भ देकर एक छोर पर स्त्री सशक्तीकरण का नया मुहावरा गढ़ती है अशिक्षित, निम्नवर्गीय, आत्मनिर्भर नर्मदा – ”तब कहाँ जानती थी कि सारा परिवार छोड़ कर भी जी सके है औरत।” (कठगुलाब, पृ0 139) तो दूसरे छोर पर है उच्चशिक्षिता बिजनेस टाइकून प्रिया – ”लगता है मैंने अभी-अभी जीना सीखा है। धरती पर मेरी जरूरत के मुताबिक धूप है, हवा है, पानी है। मेरी अपनी एक गति है और उस गति से दौड़ रही हूँ।” (छिन्नमस्ता, पृ0 207) और तीसरे स्तर पर तसलीमा नसरीन की ”बहुत डरते-डरते और चुपके-चुपके ज़िंदा रहने वाली स्त्री” – ”सामने कुछ भी नहीं, एक नदी है/मैं तैरना जानती हूँ/भला क्यों नहीं जाऊँ/मैं जाऊँगी/जाऊँगी जरूर”। (तसलीमा नसरीन की प्रतिनिधि कविताएं, पृ075) आत्मसाक्षात्कार! आत्मस्वीकार/ आत्मोपलब्धि! किसी भी ऊर्ध्व मानवीय यात्रा के तीन अनिवार्य सोपान!

क्रमशः


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भारतीय उपमहाद्वीप का स्त्री लेखन: स्त्री सशक्तीकरण की अनुगूंजें

रोहिणी अग्रवाल

रोहिणी अग्रवाल स्त्रीवादी आलोचक हैं , महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर हैं . ई मेल- rohini1959@gmail.com

”स्त्री शून्य के समान पुरुष की इकाई के साथ सब कुछ है, परंतु उससे रहित कुछ नहीं।” (महादेवी वर्मा,॰शृंखला की कड़ियां, पृ0 115)
”स्त्री के स्वभाव, विश्वास, मान्यताएं, नैतिकता, रुचि और व्यवहार का विवेचन उसकी स्थिति द्वारा होता है। चूंकि वह जानती है कि वह सर्वोपरि स्थान नहीं प्राप्त कर सकती, इसलिए वह वीरता, विद्रोह, सृजन और कल्पना के ऊँचे आदर्शों से अलग रहती है।” (सिमोन द बुववार, स्त्री उपेक्षिता पृ0 287)

”मजबूत काली स्त्री का मिथ भोंदू सोनकेशी के मिथ के सिक्के का दूसरा पहल है। गोरे मर्द ने गोरी औरत को कमदिमाग, कमजोर शरीर वाली, नाजुक विकृति और एक रति-उन्मादिनी में बदल कर उसे एक पीठिका पर बैठा दिया। काली औरत को उसने एक मजबूत आत्मनिर्भर अमेज़न में बदला और उसे रसोईघर में भेज दिया . . . गोरे मर्द ने खुद को सर्वशक्तिमान प्रशासक बना कर खुद को फ्रंट ऑफिस में स्थापित कर लिया।” – एल्ड्रिज क्लीवर, द एलेगॅरी ऑफ द ब्लैक यूनॅक्स (जर्मेन ग्रीयर, विद्रोही स्त्री, पृ0 58)


महादेवी वर्मा, सिमोन द बुववार और जर्मेन ग्रीयर – स्त्रीवाद के तीन आधार स्तम्भ! तीन अलग-अलग देशकाल मे आधी दुनिया की नियति पर विचार करके स्त्रीवाद का एक पूरक पाठ प्रस्तुत करने में तल्लीन तीन स्वतंत्रचेता प्रबुद्ध स्त्रियां! तीनों की संवेदनशील बौद्धिकता का उत्प्रेरक घटक है एक ही सवाल कि ‘यह दुनिया हमेशा पुरुषों की रही, मगर क्यों? महादेवी की दृष्टि में इसके मूल में है समाज द्वारा सुकुमारता को नारीत्व का पर्याय समझे-समझाए जाने का आदिम संस्कार , तो सिमोन संस्कार को मिथ यानी मिथ्या भ्रम  का नाम देकर पुरुष षड्यंत्र को बेनकाब करती हैं कि ”पुरुष अपनी इन सुविधाओं का पूरा और अबाध भोग तब तक नहीं कर सकता जब तक कि अपनी श्रेष्ठता को वह अधिकार के रूप में न रखे। पुरुष होने का यह अर्थ था कि वह अपने वर्ग की सुविधा के लिए कानून बनाए, अपने वर्गहित का ध्यान रखे और साथ ही वह ऐसा जूरी बने जो इन कानूनों को सिद्धांत में परिणत कर दे।” (स्त्री उपेक्षिता पृ0 28) जर्मेन ग्रीयर चूंकि किसी भी अंश में इस षड्यंत्रकारी पाखंडपूर्ण व्यवस्था का हिस्सा बनने की बजाय इसे ध्वस्त कर देना ही श्रेयस्कर समझती हैं, इसलिए ध्वंस के उपाय बताने में चूकती नहीं – ”पूरे समूह की पैतृकता बनाए रखने पर जोर देकर – सब पुरुष सब बच्चों के पिता हैं – पितृसत्तात्मक परिवार को असंभव बना देना चाहिए।” (विद्रोही स्त्री, पृ0 293) विवाह को स्त्री जीवन की सार्थकता के अंतिम सोपान के रूप में देखे जाने का सामाजिक-सांस्कृतिक आचार यदि महादेवी वर्मा के मन में जुगुप्सा पैदा करता है  तो सिमोन उन परिस्थितियोें का विश्लेषण करती हैं जो औरत को औरत बनाना सिखाती हैं  और बचपन से ही उसमें बेहद आक्रामक तेज़ी के साथ ”नारीत्व की निष्क्रियताजन्य मौलिक विशेषताएं” (स्त्री उपेक्षिता पृ0 125) विकसित कर देती हैं। जर्मेन ग्रीयर सहमति के बावजूद प्रतिकूल परिस्थितियों का शिकार होने की बजाय सघन एवं सामूहिक भाव से अनुकूल परिस्थितियों की रचना का आह्नान करती हैं जहाँ ”बोली और भंगिमा की उद्धतता से पंडितों और विशेषज्ञों को बौखला देने” (विद्रोही स्त्री, पृ0 286), ”विशालहृदयता, उदारता और साहस के मर्दाना गुणों पर दावा पेश” (वही, पृ0 298) करने के बाद ”अपनी ऊर्जा को खुद के चुने हुए उद्यम में उद्देश्यपूर्ण ढंग से लगाना” (वही, पृ0 298) ही नारीत्व की परिभाषा और पर्याय बन जाता है। यह वह स्थिति है जो औरत के हक में स्त्री की धर्मसम्म्त रूढ़ छवि को तोड़ कर मनुष्यभाव से ओतप्रोत एक नई जीवंत छवि गढ़ने का दुस्साहस करती है, यकीनन उससे भी कहीं विकटतर स्थिति जो तसलीमा नसरीन के जलावतन का कारण बनी। घृणा, हिंसा, दमन और उत्पीड़न निस्संदेह किसी भी व्यक्ति का मनोबल तोड़ने में अहम भूमिका निभाते हैं, लेकिन बकौल सिमोन ये तो वे भोंथरे हथियार हैं  जिनका स्त्री के खिलाफ वही पुरुष इस्तेमाल करता है जो ”मानसिक रूप से स्वयं अपमानित होने की आशंका से ग्रस्त रहता है।” (स्त्री उपेक्षिता पृ0 29) तो क्या स्त्री की लड़ाई ‘स्वस्थ’ और ‘सम्पूर्ण’ पुरुष से नहीं, ‘हीनग्रंथि के शिकार’ मनोरोगी से है जो लगातार ‘न्यायाधीश और अपराधी’ दो विपरीत भूमिकाओं में एक असंवेदनशील असभ्य समाज की सृष्टि में लगा हुआ है? आमने-सामने की लड़ाई का परिणाम जहाँ तुरत-फुरत और शारीरिक एवं सांसाधनिक शक्ति पर टिका होता है, मनोरोगी से लड़ाई लड़ाई न रह कर उपचार की लम्बी जटिल धैर्यशील प्रक्रिया में तब्दील हो जाती है जहाँ उसे परास्त करने की बजाय गढ़ने तथा ”दूसरों से उनकी और अपनी संगति में आनंद पर आधारित संवाद और सहयोग”  स्थापित करने का भाव प्रमुख हो जाता है। जाहिर है इस प्रक्रिया में ‘अपने’ मनोरोगों और मानसिक दुर्बलताओं का निर्भीक साक्षात्कार भी है और संघर्ष में आनंद खोजने का अनिर्वचनीय किंतु नैसर्गिक भावोच्छ्वास भी।

निस्संदेह स्त्रीवाद स्त्री सशक्तीकरण का प्रबल पैरोकार है। ”अब तक औरत के बारे में पुरुष ने जो कुछ भी लिखा, उस पूरे पर शक किया जाना चाहिए क्योंकि लिखनेवाला न्यायाधीश और अपराधी दोनों है”  -वह न केवल कहता है, बल्कि पितृसत्तात्मक समाज व्यवस्था के विषमतामूलक संरचनात्मक ढांचे का परत दर परत विश्लेषण कर अपने आक्रोश और रोष को निरंतर दर्ज भी कर रहा है। लेकिन यह भी तय है कि इस व्यवस्था के प्रतिस्थापन हेतु कोई ठोस विकल्प उसके पास नहीं। बल्कि इसके विपरीत बार-बार डैड एंड पर आ खड़े होने की हताशा ने उसकी मान्यताओं (बवदअपबजपवदे) को कहीं न कहीं क्षतिग्रस्त अवश्य किया है। स्त्री सशक्तीकरण के अर्थ, लक्ष्य और प्रयोजन को व्यापक स्तर पर प्रचारित करने की अपेक्षा उसे स्त्री कल्याण कार्यक्रमों, आर्थिक स्वतंत्रता या अधिकाधिक राजनीतिक प्रतिनिधित्व में रिड्यूस करने की बौखलाहट इसका प्रमाण है। लेकिन यह भी तय है कि समय-समय पर अंशतः जो विचार किया गया है, उसे जोड़ कर स्त्री सशक्तीकरण की मुकम्मल सैद्धांतिकी तैयार करना कठिन नहीं। इस दृष्टि से स्त्री सशक्तीकरण की अवधारणा को मोटे तौर पर ‘मुक्ति की सामूहिक चेष्टा’ में परिभाषित करते हुए इसकी कुछ मान्यताओं को गिनाया जा सकता है:

1 यह स्त्री को अपने ‘होने’ की स्थिति पर इस तरह विचार करना सिखाती है कि वह सबसे पहले वस्तुपरक ढंग से ‘स्त्री’ (प्राणी) तथा ‘स्त्रीत्व’ (रूढ़ छवि) में पाए जाने वाले सूक्ष्म अंतर को समझ सके, और फिर ‘स्त्री’ होने के कारण स्वयं को अपराधी महसूस करने की अपेक्षा आत्मसम्मान और आत्मगौरव से दीप्त हो सके।

2 अंधानुकरण का पोषण करने वाली परंपरागत अतार्किक दृष्टि की अपेक्षा प्रत्येक व्यक्ति/स्थिति/सम्बन्ध को विश्लेषणात्मक ढंग से जानने-परखने का आत्मविश्वास अपने भीतर पैदा कर सके।

3 स्थित्यानुसार स्वतंत्र निर्णय लेने और उसे क्रियान्वित करने की क्षमता से सम्पन्न हो सके।


4 आर्थिक आत्मनिर्भरता अर्जित कर एक स्वतंत्र एवं जिम्मेदार नागरिक के रूप में अपनी स्थिति मजबूत करे।


5 जिस तरह जोत से जोत जल कर पूरा मंज़र रोशन कर देती है, उसी तरह स्त्री उद्बोधन और स्त्री चेतना का क्रमिक विस्तार कर परिवर्तन की लहर से पूरे समाज को आंदोलित करे।

6 चूंकि पुरुष की सोच और दृष्टि में अपेक्षित परिवर्तन के बिना स्त्री मुक्ति बेमानी है, अतः जरूरी है कि आत्मोन्नयन के ऊर्ध्व द्वारों को खोलते हुए स्त्री जेंडर सेंसीटाइजेशन जैसे आधार मुद्दे को अपने सफलता अभियान की कुंजी माने। किसी भी स्टेज पर उसे यह नहीं भूलना होगा कि घर ही उसकी प्रयोगशाला है और घर ही उसका पहला कर्मक्षेत्र क्योंकि यही वह स्थल है जहाँ अनजाने ही लड़के और लड़कियों को ‘मर्द’ एवं ‘औरत’ बन कर रूढ़ छवियों में ढलना सिखाया जाता है। जाहिर है इस क्रम में स्त्री सशक्तीकरण महज स्त्री मुक्ति का प्रवक्ता न रह कर मानव मुक्ति का सूत्रधार बन जाता है जो समाज के दृष्टिकोण में सिरे से परिवर्तन कर स्त्री को स्त्री या पुरुष के संदर्भ में देखने की अपेक्षा स्त्री एवं पुरुष को ‘मनुष्य’ के संदर्भ में देखने का संस्कार पैदा करता है।

लेकिन यहाँ एक प्रश्न विशेष रूप से विचारणीय है कि स्त्री सशक्तीकरण का संवाहक कौन है? क्या स्त्री जो न केवल सामाजिक-आर्थिक-सांस्कृतिक पराधीनताओं में जकड़ी हुई है बल्कि पुरुष की सत्ता में अपने अस्तित्व का विलयन कर प्रभुता हासिल कर लेना चाहती है? क्या पुरुष जो इस विषमतामूलक व्यवस्था के लाभों का एकमात्र फलभोक्ता (इमदमपिबपंतलद्ध है? चूंकि नारीवाद अपने मूल रूप में लैंगिक लड़ाई को बढ़ावा देने की बजाय सह- अस्तित्वपरक समाज की परिकल्पना है, अतः प्रत्येक संवेदनशील-विवेकशील स्त्री एवं पुरुष स्वयमेव स्त्री सशक्तीकरण का अनिवार्य एवं वांछित संवाहक बन जाता है।

यह तय है कि लम्बे संघर्ष के बावजूद स्त्रीवाद अब तक स्त्री के लिए पुरुष सी निरपेक्ष एवं स्वाधीन सत्ता अर्जित नहीं कर पाया है। स्त्री की नियति आज भी देश के साथ-साथ वहाँ की सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक- सांस्कृतिक मान्यताओं से परिभाषित एवं परिचालित हो रही है। अतः स्त्री के अस्मिता संघर्ष का अध्ययन देश-काल के रूप में एक सुपरिभाषित फ्रेम की अपेक्षा करता है। अजीब विडम्बना है कि 1947 से पूर्व अखंड भारत का हिस्सा होते हुए और भारतीय उपमहाद्वीप में निकटस्थ पड़ेसी होते हुए भी भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश भिन्न-भिन्न राजनीतिक शासन प्रणालियों और धार्मिक वर्चस्व के फलस्वरूप जिन तीन राष्ट्रीय अस्मिताओं में उभरे हैं, वे न केवल अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनके  कद को निर्धारित करती हैं बल्कि राष्ट्रीय स्पर पर ऐन घर-परिवार में घुस कर स्वस्थ समाज की चूलों को हिला देने वाली रणनीतियों का बखान भी करती हैं। साहित्य राजनीति एवं समाजशास्त्र की तरह घटनाओं, तथ्यों एवं लम्हों को उपजीव्य अवश्य बनाता है, लेकिन इतिहासकार से त्रिकालदर्शी दृष्टि लेकर वह उन्हें परिप्रेक्ष्य भी देता है और सृजन की अकूत संभावनाओं, सदिच्छाओं और संवेदनाओं से प्रदीप्त हो एक बेहतर समाज का ब्लू प्रिंट भी प्रस्तुत करता है जिसका होना आशा, जिजीविषा और उत्साह की ऊर्जा को कभी चुकने नहीं देता। बेशक प्लेटो अपने ‘गणतंत्र’ से कवि को निष्कासित करने का फरमान जारी करते हैं, किंतु यह निर्विवाद है कि पृथ्वी के किसी भी कालखंड और भूखंड में यदि ऐसा गणराज्य स्थापित हुआ होता तो वह अपनी ही भितरघाती ताकतों और वंध्या महत्वकांक्षाओं का शिकार हो महान दार्शनिक के यूटोपिया को डिस्टोपिया में स्खलित कर देता। फासीवादी मनोवृत्ति और तालिबानी संस्कृति का सामना यदि शस्त्रधारी फौजें ही करने में समर्थ होतीं तो स्वप्नजीवी भविष्यद्रष्टा राजनीतिज्ञों से लेकर दार्शनिकों, बुद्धिजीवियों, कलाकारों एवं साहित्यकारों की लम्बी शृंखला इतिहास के पन्नों में देदीप्यमान न होती। चूंकि मनुष्य ही साहित्य का विषय और लक्ष्य दोनों है, अतः उसकी गरिमा की रक्षा में स्वयं साहित्य, मनुष्य , समाज और समय की गरिमा सन्निहित है। बर्बर प्रतिगामी प्रतिरोधक शक्तियों से जूझते हुए साहित्य निमिष मात्र को भी इस सत्य से आँख नहीं चुरा सकता – इसे भारतीय उपमहाद्वीप के स्त्री लेखन के संदर्भ में बखूबी समझा जा सकता है।1

स्त्री लेखन के विषय में अक्सर अभियोग की मुद्रा में कहा जाता है कि ‘तदर्थवाद से ग्रस्त’ ‘स्त्री मुक्ति को लेकर लिखा गया अधिकांश कथा साहित्य व्यावसायिक क्षेत्र में पुरुष से प्रतिस्पर्धा और उसकी ईर्ष्या, पारंपरिक विवाह प्रथा का खंडन . . . यौन शुचिता की अवधारणा का प्रत्याख्यान, दहेज प्रथा की विकरालता आदि जैसे अलग-अलग मुद्दों पर ही केन्द्रित होकर रह जाता है। . . . भारतीय समाज में समग्र रूप में नारी की स्थिति का नक्शा देते-देते उसी तरह चूक जाता है जिस तरह इस दिशा में पूरे समाज और राजनीति का चिंतन चूक रहा है।”  बात किसी अंश तक सत्य है, लेकिन अर्धसत्य ही अक्सर घातक और गुमराह किया करते हैं। निस्संदेह स्त्रीवादी संवेदन और सरोकार उपर्युक्त समस्याओं के इर्द गिर्द ही बुने गए हैं जो मिल कर एक पूरी व्यवस्था के पुनरीक्षण का सरंजाम तैयार करते हैं। अतः इन्हें अलगा कर देखना लाठी से नदी के पानी को बांटने का उपक्रम मात्र है। स्त्री लेखन चूंकि पहले चरण में पितृसत्तात्मक समाज व्यवस्था के बुनियादी ढांचे का तटस्थ विश्लेषण है, अतः परिवार, विवाह, धर्म, कानून जैसी संस्थाओं के औचित्य पर व्यापक बहस का आह्नान करने से पूर्व वह विशेष बलाघात देकर इनके वर्तमान स्वरूप को बृहत्तर पाठक समुदाय के समक्ष पुनर्प्रस्तुत कर देना चाहता है क्योंकि चहुँ ओर की सुपरिचित सच्चाइयों को देखने के लिए न केवल वांछित दूरी अपेक्षित है, बल्कि आँख को ‘ज्योतित’ करने वाली किसी तीसरी एजेंसी की भी।

अगले जनम मोहे बिटिया न कीजो

”उस रात (सुहागरात) क्या मैं सोई थी या यह एक किस्म की मौत थी? हमने क्या इसके लिए ही खुशियां मनाईं थीं? जो मेरे अपने बिराने थे, वे क्या इसी के लिए नाचे-गाए थे, हर मुमकिन तरीके से इसमें हाथ बंटाया था? क्यों? किसी जादूगर की तरह ललचाने और मेरे ऊपर इस किस्म के पागलपन का कहर ढाने के लिए? इस जुल्म के लिए?”  चालीस वर्षीय पीर साईं से ब्याह दी गई पंद्रह वर्षीय हीर के इस हाहाकार में पति की जिबह कर डालने वाली कामुकता से उपजा खौफ मात्र नहीं है, वरन् मौत से सर्द कमरे में अपने अंधेरे भविष्य का दीदार है- ”मैं ताजिंदगी के लिए उसके नाम लिख दी गई थी”  और बाहरी सजधज से शून्य विवाह संस्था के हैबतनाक भीतरी स्वरूप का साक्षात्कार भी जो ‘जिंदगी जैसी बड़ी चीज़ को सूई की डिबिया में बंद कर देता है।’

‘कुफ्र’ की भूमिका में पाकिस्तानी लेखिका तहमीना दुर्रानी स्वीकार करती हैं कि दक्षिण पाकिस्तान की एक स्त्री की सच्ची और दर्दनाक कहानी ने ही उन्हें ‘परंपराओं की चुप्पी’ तोड़ कर इस्लामी देश में वर्जित माने जाने विषय पर कलम चलाने के लिए उकसाया है। हालांकि ‘कुफ्र’ की हीर और उनकी आत्मकथा ‘माई फ्यूडल लार्ड’ की तहमीना उर्फ बेगम मुस्तफा खार शिक्षा, संस्कार और पारिवारिक पृष्ठभूमि की दृष्टि से परस्पर विलोम हैं, लेकिन एक-दूसरे को सम्बल देकर पुष्टतर होते कठमुल्ला धर्म और निरंकुश राजनीति की गिरफ्त में फंस कर अंततः एक ही सिक्के के दो पहलू बन जाती हैं। निस्संदेह यही वह स्थल है जो हीर और तहमीना को दो अलग चरित्रों की अपेक्षा पाकिस्तान के कबीलाई समाज की स्त्री का प्रतिनिधि बना देता है।

हीर पीर साईं की परिणीता है। पीर साईं यानी पैगम्बर का सीधा वारिस, ‘अल्लाहताला और गरीब-मजलूमों के बीच की सीधी कड़ी’ (कुफ्र, पृ0 54) जिसकी पाकीज़गी को लेकर बुर्कापरस्त मुस्लिम समाज में कोई संदेह नहीं -”पीर साईं के सामने तुम्हें चेहरा ढंक कर रखने की कोई जरूरत नहीं। वह बेहद पाक इंसान है।” (पृ0 19) लेकिन सच्चाई यह है कि जिसने अपने स्वार्थों की खातिर इलाके के बदनाम दहशतगर्ज़ ऐयाश जागीरदार के साथ मिल कर ”इस्लाम को बेहद छोटे कद के इंसानों की हथेली में समा जाने के काबिल” (पृ0 95) कर दिया है। इस पीर साईं के साथ विवाह सम्बन्ध से हीर ने दो चीजें हासिल ही है। – तीस वर्ष की आयु तक पांच बच्चों का मातृत्व, और निरंतर दहशत में जिंदा रहने की दीक्षा। वह नहीं जानती गृहस्थी के जुए में अविराम जुते रहने पर भी उसकी कौन सी क्रिया कब गलती बन कर पीर साईं के कोप का कारण बन बैठे। लेकिन इतना ज़रूर जानती है कि यह कोप हमेशा कहर बन कर उस पर टूटता है। कभी फुफेरी बहन के छः वर्षीय बेटे से पर्दा न करने के गुनाह में  टूटी चूड़ियों के टुकड़ों से बाहें जख्मी कर देने के रूप में; कभी काली की दुर्गति की कथा जानने के अपराध  में सिर और भौंहों के बालों को उस्तरे से मूंड दिए जाने के रूप में; कभी लम्पट देवर द्वारा चोरी-चोरी भिजवाए गए प्रेम-पत्र को पाने के अपराध में  खज्जी कोड़े की मर्मांतक मार के रूप में तो कभी यतीमड़ी को मुकर्रर तोहफा न देने की ‘भूल’ का सबक सिखाने के लिए लकड़ी की भारी चारपाई के पायों के नीचे दोनों हथेलियों को देर रात तक कुचलते रहने के रूप में । साथ ही धमकदार चेतावनी कि ”एक भी आवाज निकली तो मैं तुम्हारी गर्दन तोड़ दूँगा और तुम्हारे भेजे के दो टुकड़े कर डालूँगा” (पृ0 111) और प्रत्युत्तर में पत्नी की आह-कराह न सुनने पर सज़ा और बढ़ाने की दरिंदगी। हीर की विडंबना है कि वह न सास से पति की क्रूरता का बखान कर सकती है (क्योंकि बेटे यानि मर्द की निरंकुश शक्ति से परास्त अम्म साईं की अनुभव संपदा में बस एक ही वशीकरण मंत्र है -”शौहर की जरूरतों को पेशेवर तवायफों” की तरह पूरा करके ‘रात के अंधेरों में इस्तेमाल की जाने वाली जादुई ताकतों से दिन में हाकिमाना” ताकत हासिल करो”, पृ0 47), न मां से किसी सहायता की अपेक्षा कर सकती है जो बेटी की मां होने के अपराध बोध में दब कर सच का सामना करने की ताब अपने भीतर नहीं पाती। वरना क्या वजह है कि हीर के भौंहों तक सफाचट बाल, गहरे जख्मों और गर्भस्थ शिशु की अकाल मौत जैसे दर्दनाक हादसों को नज़रअंदाज कर वह उसके कपड़ों, जेवर और रुतबे की चकाचौंध में चुंधियाती रहे? विवाहिता बेटी की निजी ज़िंदगी में दखल न देने का संस्कार ही असल में स्त्री को इतना ‘अकेला’ और ‘असुरक्षित’ बना देता है कि तंग आकर या तो वह ‘अन्नपूर्णा मंडल की आखिरी चिट्ठी’ कहानी (सुधा अरोड़ा) की अन्नपूर्णा की तरह अंतिम विकल्प के रूप में आत्महत्या कर बैठती है, या जीलानी बानो के उर्दू उपन्यास ‘ऐवाने-ग़ज़ल’ की बीबी की तरह आजन्म प्रतिशोध की गूंगी गुड़िया बनी रहता है, या मेरे बचपन के दिन’ (तसलीमा नसरीन) की मां (ईदुल) की तरह दोजख की आग में जलते-जलते नकार और अनास्था का पुंजीभूत रूप बन जाती है।

तहमीना दुर्रानी की विशेषता है कि वे बंद मुस्लिम समाज की वैचारिक-मानसिक विकृतियों का पर्दाफाश करने के लिए एक कार्टूनिस्ट की तरह अतिरेकपूर्ण चित्रण पद्धति का सहारा लेती हैं जहाँ पति को हिंò बनैले जानवर और पत्नी को रीढविहीन केंचुए के स्टीरियोटाइप में प्रस्तुत कर खुल्लमखुल्ला विवाह संस्था के प्रति अपनी घृणा और अनास्था प्रकट करती हैं। इसके विपरीत भारतीय स्त्री लेखन विषम वैवाहिक सम्बंधों की प्रामाणिक बानगियां प्रस्तुत करते हुए स्त्री की त्रासदी को आत्मपीड़ा या आत्मदया से बचाते हुए उस बिंदु पर ले आता है जहाँ अनास्था असंतोष में तथा घृणा अस्मितामूलक सवाल में तब्दील हो किन्हीं सकारात्मक विकल्पों के अन्वेषण हेतु बेचैन हो जाती है। गुजराती लेखिका कुंदनिका कापड़ीआ का उपन्यास ‘दीवारों से पार आकाश’ तथा हिंदी लेखिका मृदुला गर्ग का ‘कठगुलाब’ इसके प्रमाण हैं। ‘दीवारों से पार आकाश’ की नायिका वसुधा के पैंतीस वर्ष के लम्बे वैवाहिक जीवन की उपलब्धि है हर रोज़ अपनी इस मान्यता को पुष्टतर होते देखना कि विवाह ”स्त्री के लिए प्रतिबंधों के क्षेत्र में कदम रखना है” (पृ0 20)। जड़ता की ओर अग्रसर सोच पर नियंत्रण पा वह स्वयं को भीतर तक नरख-परख कर असंतोष के कारण को खोज निकालती है कि ”उसके पंख हैं, वही दुख है। बाहर कहीं आकाश है और आकाश में उड़ा जा सकता है, यह उसे मालूम है’।’ लेकिन सुख पाने का अर्थ अपने हाथों पंख कतर कर पिंजरे को आनंदलोक मानना नहीं, वरन् पंख कतरने की सूक्ष्म प्रक्रियाओं की ओर उंगली उठाना है कि ”एक ही आदमी घर का केंद्र क्यों होना चाहिए?”(पृ0 15) ; कि ”नशीली आंखों का लाल रंग, क्या यही प्रेम का रंग है?” (पृ022) ; कि ”क्यों वैवाहिक सम्बंध में ”शरीर के उपयोग की, शरीर की सुख-सुविधाओं की, शरीर की शोभा की चीजों के बारे में ही सोचा जाता है?” (पृ0 19) ; कि क्यों विवाहोपरांत स्त्री को नाम के साथ-साथ अपने सपने बदलने को भी मजबूर किया जाता है? (पृ0 45) ; कि विवाह नामक संस्था के संरक्षण में पलते इतने सतही, भौतिक इकतरफा व्यापारिक सम्बंध क्या मानवीय गरिमा एवं मानवीय अस्मिता की रक्षा कर सकेंगे? ; कि विवाह संस्था क्या प्रकारांतर से समाज में विषम आर्थिक सम्बंधों का पोषण करने वाली पूंजीवादी व्यवस्था का ही प्रतिरूप नहीं? ”वसुधा को अर्थशास्त्र का रिकार्डो सिद्धांत याद आता। मज़दूरों को हमेशा कम वेतन देना चाहिए जिससे उनकी संतानें ऊँची शिक्षा न पा सकें। परिणामतः वे भी मज़दूर बने रहें और उद्योगों को मज़दूरों की कभी कमी न पड़े। स्त्री की दुनिया को भी मर्यादित रखा गया है जिससे वह जैसी है, चुपचाप वैसी बनी रहे। उसी में संतुष्ट रहे, सवाल न पूछे, परिवर्तन की हवा के लिए न तरसे . .  और दूसरों का साम्राज्य जैसा चल रहा है, वैसा ही चलता रहे।”( पृ0 64)


लेखिका से पहले सामाजिक कार्यकर्ता होने के कारण कुंदनिका कापड़ीआ का लेखन सहानुभूति, सामंजस्य एवं समाधान पर अधिक बल देता है जबकि मृदुला गर्ग के लेखन का केन्द्रीय स्वर व्यंग्य और आत्मविश्लेषण है। अतः ‘कठगुलाब’ में विपिन और नीरजा दो प्रमुख पात्रों के जरिए विवाह संस्था का मखौल उड़ाने के बाद  वे नुकीले सवाल उठाती हैं कि क्यों ”ये औरतें मरजानियां दूसरी औरत का साथ देने की बजाय जल्लद मरद को ही पल्लू में समेटने लगती हैं?” (पृ0 138) और ”अपना खालीपन भरने के लिए हम हमेशा पति या प्रेमी की खोज क्यों करती हैं? . . . इसलिए न कि वह हमें बच्चा दे सकता है?” (पृ0 107) उल्लेखनीय है कि स्त्री विमर्श को वैश्विक एवं सार्वकालिक परिप्रेक्ष्य देकर मृदुला गर्ग जिस तरह विश्वभगिनीवाद की अवधारणा को उपन्यास में क्रमशः अवस्थित करती चलती हैं, उससे उपर्युक्त  प्रश्नों के सम्भावित जवाब पुनः कुछ प्रतिप्रश्न पैदा करते हैं कि जल्लाद मरद को पल्लू में बांधने की कुट्टनी कला यदि उन्हें सुरक्षा चक्र देती है तो क्यों वे ‘कठगुलाब’ की नमिता, गंगा, वरजीनिया की तरह; ‘कुफ्र’ की अम्मा साईं, हीर और गुप्पी की तरह; ‘छिन्नमस्ता’ की मां और सासू मां की तरह; ‘मेरे बचपन के दिन’ की ईदुल की तरह ‘सुख-सौभाग्य’ के बीच भी गहरी मानसिक रिक्ति का शिकार हैं? कि यदि संतान प्राप्ति ही विवाह सम्बंध का एकमात्र लक्ष्य है तो कृत्रिम गर्भाधान और स्पर्म बैंक के रूप में विकसित होती नई वैज्ञानिक तकनीक और समलैंगिकता को क्या स्वस्थ विकल्प के रूप में स्वीकार किया जा सकता है? न, बिल्कुल नहीं। मृदुला गर्ग व्यंग्य-विनोद-विद्रूप और कटाक्ष के औज़ारों से ‘कैरीकेचर’ भर प्रस्तुत नहीं करतीं, वरन् संवेदनशील विवादास्पद सवालों को लेकर बेहद संजीदगी के साथ अपनी स्पष्ट राय भी देती हैं। संतान-दान के अनुबंध रूप में शुरु हुए विपिन-नीरजा सम्बंध में असफल नीरजा के यंत्रमानव में तब्दील होते जाने तथा संतान प्राप्ति की अपेक्षा सम्बंध के सौन्दर्य और अनन्यता को बनाए रखने हेतु विपिन की उत्कंठा को भले ही आलोचकों ने लेखिका के बौद्धिक व्यापार का नाम दिया है, लेकिन इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि संकटापन्न स्थितियों में घिर कर ही व्यक्ति काल और सभ्यता को आक्रांत कर देने वाली सच्चाइयों की पड़ताल कर पाता है। जाहिर है विपिन के ऊहापोह के क्षणों में जब मृदुला कठिन विश्लेषणपरक भाषा का इस्तेमाल कर कहती हैं कि हम प्राणी मात्र (बायलॉजिकल यूनिट) को नहीं, व्यक्ति (अस्मिता, पैशन, लावण्य, तिलिस्म से युक्त प्राणी) को सहचर चुनते हैं और उसकी रहस्यात्मकता में ही आकर्षण और माधुर्य के अजò òोतों की तलाश करते हैं (पृ0 234), तो वे तमाम भोगपरक ऐहिक ऐषणाओं से दूर एक-दूसरे को पाकर समृद्धतर होने की स्थितियों को ही स्त्री-पुरुष मिलन (विवाह) का आधारबिंदु स्वीकार करती हैं। बेशक यह वह यूटोपियन स्थिति है जहाँ न ‘चाक’ की सारंग के इस सवाल का औचित्य शेष रहता है कि क्यों बंधनों में जकड़ी स्त्री को समाज सती और बंधनमुक्त होकर जीवन जीने को आकुल स्वाभिमानिनी स्त्री को कुलटा कहता है (पृ0 225); न ‘दीवारों से पार आकाश’ की वसुधा की वेदना कि ”स्वयं को खोकर जो पाया, उसका नाम क्या है? उसका मूल्य क्या है?” (पृ0 76); न ‘छिन्नमस्ता’ की प्रिया की विवशता कि आंसू में संपूर्ण स्त्री जीवन की सार्थकता क्यों? (पृ0 114)

आक्रामक और कंटीले लेखन के लिए विख्यात बांग्लादेश की लेखिका तसलीमा नसरीन औरतों की आंसू भरी दास्तानें कह कर अपने वक्त और ऊर्जा का क्षय नहीं करना चाहतीं। ”जंजीरें तोड़ दी हैं मैंने/ पान के पत्ते से हटा दिया है संस्कार का चूना” (तसलीमा नसरीन की प्रतिनिधि कविताएं, समर्पण पृष्ठ) का उद्घोष कर वे उस लड़की की गतिविधियों में ज्यादा दिलचस्पी लेती जान पड़ती हैं जो लोगों की टेढ़ी नज़रों, कामुक सीटियों और ‘बदचलन’ सरीखा गालियों से बिना घबराए निर्द्वंद्व अपने रास्ते आगे बढ़ रही है। अलबत्ता इस लड़की को वे सावधान ज़रूर कर देना चाहती हैं कि रैबिसयुक्त कुत्तों के आक्रमण की ही तरह हर देह के लिए घातक होता है सिफलिसयुक्त मर्दों का आक्रमण। (वही, पृ0 14) लेकिन यही तसलीमा कविताओं और टिप्पणियों के संसार से बाहर आकर जब गाढ़ी रूमानियत के साथ अपने बचपन की यादों में डूबती हैं तो मां ईदुल की कथा कहते-कहते बेहद वस्तुपरक ढंग से औसत औरत की नियति का बखान करने लगती हैं। हालांकि ‘मेरे बचपन के दिन’ में किशोरी होती बच्ची की नज़र से माता-पिता के कलहपूर्ण सम्बंधों का चित्रण किया गया है, किंतु समूचा प्रकरण मुखर होकर इस बात की पुष्टि करता है कि मां के श्याम वर्ण और कुरूपता तथा पिता के दाम्पत्येतर सम्बंधों के बीच मां जिस असुरक्षा बोध से ताउम्र पगलाई रही, वह दो तथ्यों की उपज थे। एक, डॉक्टर पति की तुलना में अल्पशिक्षित होना, और दूसरा इस्लाम द्वारा पुरुष को बहुविवाह का अधिकार देना।



तहमीना दुर्रानी (पाकिस्तान के कबीलाई समाज की प्रवक्ता) और तसलीमा नसरीन (इस्लाम धर्म एवं बांग्ला संस्कृति के कम्पोज़िट प्रभाव से बुने समाज की प्रवक्ता) अलग-अलग दृष्टि एवं प्राथमिकताओं के साथ इस्लामी राष्ट्र के दो भिन्न-भिन्न मुस्लिम समाजों का प्रतिनिधित्व करती हैं। लेकिन इसके बावजूद सामाजिक-मानसिक रुग्णताओं की विश्लेषणपरक निष्पत्तियों में एक-दूसरे के बहुत करीब आ खड़ी होती हैं और अशिक्षा तथा धार्मिक कर्मकांडों के प्रसार को स्त्री की मानवीय स्थिति को विकटतर करने वाले घटकों के रूप में चित्रित करती हैं। ‘कुफ्र’ की हीर एक ऐसे रोशन दिमाग उदार परिवार से आई है जो बुर्के की जगह तालीम को स्त्री की धरोहर मानता है। पीर साईं की किलेनुमा हवेली की ऊँची अंधेरी दीवारों में घिरने से पहले चूंकि उसने खुली-डुली दुनिया के ऊपर पसरे अछोर आसमान को चांद-सूरज के वैभव के साथ भरपूर जिया है, इसलिए बेटी गुप्पी को वह कल्पना और शिक्षा के सहारे बृहत्तर दुनिया से जोड़ देना चाहती है। चोरी-छिपे कुरान का उर्दू तर्जुमा सुना कर वह उसे प्रकारांतर से पीर साईं के खिलाफ खड़े होने का हौसला भी देती है, लेकिन चंद कदमों में सिमटी दुनिया की वासी गुप्पी को किन्हीं मुक्ति द्वारों की तलाश नहीं। ठीक उसी तरह जैसे ‘सीमंतनी उपदेश’ की लेखिका द्वारा चित्रित बीसवीं सदी के पूवार्द्ध की परवश हिंदू स्त्री की तरह जिसके विषय में व्यंग्यमिश्रित पीड़ा का सहारा लेकर वे लिखती हैं कि ”जो आदमी जेलखाने में पैदा हुआ हो, या जिसका बाप दादा उसी में कदीम से रहता हो, वह उसी जेलखाने को बहिश्त समझता है”  गुप्पी के पास यथास्थिति को स्वीकारने के अपने तर्क हैं  तो ‘मेरे बचपन के दिन’ की ईदुल के पास वर्तमान की नारकीय विभीषिका से बचने के लिए अंधविश्वास की जमीन पर उगे कुछ दिवास्वप्न कि नौमहल (पीरबाड़ी) के पीर की मुरीद बनने पर वह न केवल कब्र के अजाब से मुक्ति पा लेगी बल्कि पुल से रात पार करने में भी वक्त नहीं लगेगा। (115) बंद बदबूदार माहौल में पली गुप्पी जहाँ शिक्षा के चामत्कारिक प्रभावों से अनभिज्ञ है, वहीं बाल्यावस्था में पिता द्वारा पढ़ाई छुड़ा दिए जाने के कारण ईदुल (‘मेरे बचपन के दिन’) प्रौढा.वस्था में भी उन कसैली यादों से मुक्त नहीं हो पाई है जिन्होंने समान रुतबे और बुद्धिवाले मियां भाई और उसके बीच अलंघ्य फासले खड़े कर दिए थे। यहाँ ईदुल की असहायता में हीर की विवशता समाहित हो जाती है लेकिन हीर की भाँति मकबरे (धर्म) की सड़ांध से वाकिफ न होने के कारण अल्प ज्ञान से उपजने वाले कुतर्कों का सहारा लेकर वह लकीर पीटने की निष्क्रियता में जीवन की सार्थकता समझने लगती है। गुप्पी के रूप में यथास्थितिवादी नई पीढ़ी की रचना कर जहाँ तहमीना विद्रोह की संभावनाओं को विनष्ट कर डालती हैं, वहीं तसलीमा ईदुल में हीर और गुप्पी के अंतर्विरोधों का विलयीकरण दिखा कर उसकी बेटी के रूप में स्वयं को एक ऐसी पीढ़ी के रूप में प्रस्तुत करती हैं जिसने मां के संकीर्ण प्रतिगामी संस्कार और पिता की उदार प्रगतिशील सोच के बीच धर्म, ‘स्व’ और समाज को समझने के लिए तर्कपूर्ण निजी दृष्टि विकसित की है। इसलिए कुरान की विषमतामूलक सच्चाइयों से परिचित होकर वे संज्ञाशून्य नहीं होतीं, बल्कि धर्म के बढ़ते रसूख के साथ घर-समाज से सौहार्द और सामंजस्य छीन लेने वाले उन फतवों और फरमानों का आग्रहपूर्वक विश्लेषण करती हैं जो व्यक्ति से उसकी मानवीय पहचान छीन कर उसे सिर्फ जनून में तब्दील कर देते हैं। ”मां बोलीं, ‘अब से साड़ी नहीं पहनूँगी। साड़ी हिंदुओं की पोशाक है। काफिर की पोशाक। साड़ी पहनने से गुनाह होगा।’ पीरबाड़ी से जो भी फतवा जारी होता, मां सिर झुका कर उस पर अमल करतीं। मां अपने बचपन की सखी अमला की बात भूल गईं। वे भूल गईं कि वे कभी रथ के मेले से लावा, खिलौने और पुतले खरीदा करतीं थीं। लक्ष्मी पूजा के दिन सरस्वती वगैरह के घरों में जाकर मिठाई खातीं थीं और सहेलियों के साथ मुहल्ले के पूजामंडप देखने जाती थीं।” (पृ0 144)
क्रमशः

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स्मृति जी कंडोम के विज्ञापन वल्गर तो डीयो के संस्कारी कैसे?



श्वेता यादव


अष्टभुजा शुक्ल की लाइनें हैं एक हाथ में पेप्सी कोला दूजे में कंडोम, तीजे में रमपुरिया चाकू चौथे में हरिओम, कितना ललित ललाम यार है, भारत घोड़े पर सवार है. देखा जाए तो भारत सही में ललित ललाम ही हुआ जा रहा है. यहाँ जिन चीजों पर रोक लगनी चाहिए, जिन मामलों में कड़े कदम उठाने चाहिए उन पर कदम नहीं उठाये जाते या फिर उठाये जाते हैं तो उनका पालन नहीं हो पाता और जिन चीजों की आवश्यकता नहीं या कम है उन पर कड़े क़ानून बनाए जाते हैं और उनका पालन भी किया जाता है.

क्या है पूरा मामला?


सरकार ने सोमवार कंडोम को प्रमोट करने वाले विज्ञापनों को लेकर टीवी चैनलों को निर्देश जारी किया. सरकार का कहना है कि उसने ऐसा बच्‍चों के लिए स्‍वस्‍थ माहौल और विकास को देखते हुए किया कि टीवी चैनलों पर कंडोम के विज्ञापन केवल रात 10 बजे से सुबह छह बजे तक ही चलाए जाएंगे. सूचना एवं प्रसारण मंत्रालयकी तरफ से जारी एडवाइजरी में कहा गया है कि, ‘कंडोम के विज्ञापन सुबह छह से रात 10 बजे के बीच नहीं दिखाए जाएंगे, ताकि बच्चों को इनसे दूर रखा जा सके. साथ ही 1994 के केबल टेलीविजन नेटवर्क नियमों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित किया जा सके.’  नियमों के उलंघन पर कार्यवाही का प्रावधान है.

मंत्रालय ने कहा कि कंडोम के ऐसे विज्ञापन का प्रसारण न किया जाए जो बच्‍चों की मानसिकता को प्रभावित करें. मंत्रालय ने ऐसा लोगों की शिकायत पर किया है कि कुछ टीवी चैनल विशेषकर बच्चों के लिए, कंडोम के विज्ञापन दिखा रहे हैं. मंत्रालय ने केबल टेलीविजन नेटवर्क नियमावली के नियम 7(7) का हवाला दिया है। इसमें कहा गया है कि कोई भी केबल सेवा प्रदाता ऐसे विज्ञापन का प्रसारण नहीं कर सकते जिससे बच्चों की सुरक्षा खतरे में पड़ती हो या गलत व्यवहार के प्रति उनमें रुचि पैदा हो अथवा जिनमें उन्हें भीख मांगते हुए, अभद्र या अपमानजनक परिस्थितियों में दिखाया गया हो.

कंडोम से इतना डरते क्यों हैं?


ताजा मामला कंडोम को बैन करने को लेकर है. खबर पर बात करने से पहले, इस बात पर बात जरूरी है कि आखिर कंडोम पर बैन क्यों? कंडोम का नाम लेते ही लोगों को सांप सूंघ जाता है कोई भी खुल कर इस बारे में बात करना नहीं चाहता. हम जनसँख्या बढ़ा सकते हैं पच्चीस बच्चे पैदा करके उस पर बधाई ले और दे सकते हैं लेकिन कंडोम पर बात नहीं कर सकते. हम खुले में शौच तो बड़े आराम से कर लेते हैं लेकिन खुले में कंडोम पर या सेक्स पर बात नहीं कर सकते. आखिर क्यों? इसका कुछ हद तक जवाब है हमारे समाज और उसकी सामजिक संरचना. यहाँ सेक्स पर बात करना लगभाग बैन ही है. यहाँ बलात्कार होते हैं बड़े पैमाने पर होते हैं यहाँ तक की लड़कियां खुद के घर तक में सुरक्षित नहीं हैं. लेकिन सेक्स पर बात करने वाला चरित्रहीन हो जाता है. जहाँ इस देश में गर्भपात कानूनन अपराध हैं वहीं कानूनों की अनदेखी करते हुए यहाँ खुलेआम गर्भपात होते हैं. इन गर्भपातों में सबसे ज्यादा संख्या में होने वाले गर्भपात कन्या भ्रूण हत्या और दूसरे नंबर पर अनवांटेड चाइल्ड के लिए करवाए जाते हैं. अब बड़ा सवाल यह है कि ये आनचाहा गर्भ ठहरने की आखिर वजह क्या है? वजह साफ़ है या तो लोगों को सुरक्षा के उपाय पता नहीं हैं या फिर वे अपनाना नहीं चाहते.



 फिमेल कंडोम पर कोई विज्ञापन क्यों नहीं? 


पिछले दिनों बिग बॉस के एक एपिसोड में हिना खान और शिल्पा दूसरी प्रतिभागी सपना चौधरी को ये बताती हैं कि सिर्फ मेल कंडोम ही नहीं होता बल्कि फिमेल कंडोम भी होता है. सपना उनकी बातों पर हैरान थी क्योंकि उन्हें पता नहीं था कि फिमेल कंडोम भी होता है, सपना के साथ मैं भी हैरान होती रही कि क्या सच में फिमेल कंडोम होता है और फिर शुरू हुआ गूगल . यह बहुत आश्चर्य की बात नहीं है कि सपना और मेरी जैसी तमाम लड़कियां ऐसी हैं जिन्हें फिमेल कंडोम के बारे में पता ही नहीं है. अब सवाल है आखिर क्यों? क्यों नहीं पता है तो जवाब बहुत सीधा सा ही होगा कि जानकारी नहीं है. आप खुद सोचिये मेल कंडोम के बारे में न जाने कितने विज्ञापन हैं जो जानकारी देते हैं लेकिन क्या कोई एक विज्ञापन है जो फिमेल कंडोम के बारे में हो? मुझे तो याद नहीं पड़ता आपको याद हो तो बताइयेगा. आखिर यह भेदभाव क्यों यह समझने की जरूरत है शायद इस एक छोटी बात को समझ लेने से आपको भारतीय समाज की संरचना भी समझ में आ जाए.


 कंडोम बंद किया तो फिर डीयो क्यों नहीं 


चलिए एक मिनट को मान लेते हैं कि कंडोम के विज्ञापन गलत हैं और उन्हें बंद करना चाहिए तो फिर कंडोम ही क्यों डीयो के विज्ञापन क्या सरकार ने नहीं देखे हैं? खासकर मेंस डीयो के विज्ञापन जिनमें ज्यादातर विज्ञापन यही दिखाते हैं कि जैसे ही लड़का डीयो लगाता है लड़की नहीं “लड़कियां” उस पर मरने लगती हैं क्या यह समाज के पतन का कारण नहीं है. क्या इससे सामजिक संस्कार और नैतिकता प्रभावित नहीं होते. बंद करना ही है तो फिर उन विज्ञापनों को भी बंद करना चाहिए जो सीधे सीधे लैंगिक भेदभाव को बढ़ावा देते हैं और स्त्री को बाजार में उपभोग या वस्तु के रूप में प्रचारित करते हैं. अगर इस लिहाज से देखें तो हकीकत यही है कि आधे से अधिक विज्ञापनों को बंद कर देना चाहिए. और सिर्फ विज्ञापन ही क्यों टीवी पर आने वाले कम से कम दर्जन भर सीरियल्स ऐसे हैं जो न सिर्फ बच्चों पर बल्कि बड़ों पर भी बुरा असर डाल रहे हैं. उदाहरण के लिए कुछ दिन पहले सोनी पर प्रसारित होने वाले धारावाहिक “पहरेदार पिया की” बात करें जिसमें एक बच्चा  अपने से दुगनी उम्र की लड़की को प्रेम करता है और फिर उससे उसकी शादी भी हो जाती है, तो क्या वह धारावाहिक बच्चों के मन पर बुरा प्रभाव नहीं डाल रहा था. हालांकि तमाम विरोध के बाद सीरियल बंद हुआ लेकिन सोचने वाली बात यह है कि इसके लिए सरकार की तरफ से कोई पहल नहीं की गई. इस धारावाहिक के अलावा भी न जाने कितने ऐसे सीरियल है जो खुलेआम सरकारी नियमों का उलंघन कर रहे हैं फिर ऐसी कहानियों पर रोक क्यों नहीं?


ऐतराज इस बात से है कि एड को बंद करने की जरूरत क्या है? हाँ यह सच है कि अभी जिस तरह के कंडोम के एड दिखाए जा रहे हैं उनके कंटेंट अवेयरनेस कम और वल्गेरिटी ज्यादा फैलाते हैं तब भी सवाल वही उठता है कि इसको रोकने के लिए एड पर बैन की जरूरत है या फिर कंटेंट फ़िल्टर करने की जरूरत है?


 सरकार ने खुद किया था शुरू


एक और जरूरी बात आज सरकार जिस एड को यह कह कर बंद कर रही है कि इससे समाज का नैतिक पतन हो रहा है उसे एक समय में जागरूकता अभियान के अंतर्गत शुरू करने वाली भी सरकार ही है. इन एड को बंद करने के पीछे यह तर्क दिया जा रहा है कि कंडोम के एड परिवार के साथ बैठ कर देखने लायक नहीं है तो सिर्फ एक सवाल आज के जमाने की एक पिक्चर ऐसी बता दीजिये जो परिवार के साथ बैठ कर देखी जा सकती हो छोड़िये फिल्म की बात आजकल तो सीरियल्स में भी बेड सीन,  चपिचपा आशिकी के सीन खुलेआम फिल्माए जा रहे हैं, उन पर सरकार कोई एक्शन क्यों नहीं ले रही?  क्या वे क़ानून के दायरे से बाहर आते हैं?  एक आखिरी बात भारत एक ऐसा देश है जहाँ सरकार को लोगों को यह तक बताना पड़ता है कि खुले में शौच मना है और स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है वहां सरकार अगर प्राइम टाइम जोन में अवेयरनेस के एड मसलन गर्भनिरोधक गोलियां, कंडोम ये सब बैन कर देगी तो वह लोगों को जागरूक कैसे करेगी? इस पूरे मुद्दे पर बात करते हुए हमें यह भी ध्यान रखना होगा कि अनियमितताओं के इस देश में हजारों की जनसँख्या ऐसी है जो मजदूर वर्ग से आते हैं और उनके लिए मनोरंजन के कुल मिला कर दो ही साधन है पहला टीवी और दूसरा सेक्स और इस चक्कर में वह तमाम बच्चे पैदा करते हैं. उनके पास टीवी भी देखने का सीमित समय होता है वह है प्राइम टाइम ऐसे में अगर इसी समय पर इस तरह के एड पर बैन लगा दिया जाता है तो फिर इस वर्ग के पास अवेयरनेस का क्या माध्यम बचेगा?

इस देश में बलात्कार पर रोक नहीं लेकिन कंडोम पर रोक

अगर आंकड़ों की माने तो भारत एक ऐसा देश है जहाँ यौन अपराधों में सबसे ज्यादा अपराधी नाबालिग होते हैं. एक बार फिर आंकड़े की बात करें तो भारत का आज का युवा 14-16 साल की उम्र तक सेक्स कर चुका होता है अब इन आकड़ों के आधार पर बात करें तो यह बैन किसे बचाने के लिए है. यह इंटरनेट का युग है सो काल्ड मार्डन युग जहाँ इंटरनेट के माध्यम से आप कुछ भी देख सकते हैं कुछ भी सीख सकतें हैं ऐसे में सिर्फ टीवी पर कुछ समय के लिए एड को बंद करके सरकार क्या बदल लेगी? उलटे इस बैन के बाद अब उत्सुकता वश और भी ज्यादा लोग उन विज्ञापनों को सर्च करके देखेंगे जिन्हें बैन किया जा रहा है. क्योंकि कहते हैं ना जिस चीज को जितना छिपाया जाता है वह उतना ही उत्सुकता का विषय बनती है. इसमें कोई शक नहीं कि कंडोम के कुछ विज्ञापन सच में देखने लायक नहीं हैं क्योंकि उनमें वास्तविक मैसेज कहीं खो जाता है और सिर्फ शरीर की नुमाइश बचती है. लेकिन सरकार को यह देखना होगा कि ऐसे कंटेंट पर रोक लगाए ना कि अवेयरनेस पर.

साभार :- टेढ़ी उंगली


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लालू प्रसाद से महिला आरक्षण पास कराने की स्त्रीकाल की अपील: कहा कोटे के साथ पास करवायें महिला आरक्षण

राजद के राष्ट्रीय अध्यक्ष लालू प्रसाद ने पटना पुस्तक मेले में शनिवार को पूर्व सांसद अली अनवर पर केंद्रित ‘अली अनवर’ शीर्षक पुस्तक पर विचार-गोष्ठी तथा परिचर्चा को संबोधित किया. इस दौरान उन्हें पुस्तक के प्रकाशक द मार्जिनलाइज्ड पब्लिकेशन के संयोजक और स्त्रीकाल के संपादक संजीव चंदन ने महिला आरक्षण पर केन्द्रित स्त्रीकाल के ताजा अंक की प्रति देते हुए उनसे सार्वजनिक तौर पर आग्रह किया कि वे दलित-ओबीसी स्त्रियों के लिए कोटा के साथ महिला आरक्षण पास करवाने की पहल करें.

परिचर्चा में लालू प्रसाद पूरे रौ में दिखे . उन्होंने अपने संबोधन में कहा कि ‘देश की जनता अब सांप्रदायिक ताकतों के खिलाफ मन बना चुकी है। गुजरात की जनता ने नरेंद्र मोदी के सब्जबाग और नफरत व घृणा की राजनीति को नकार दिया है। ‘अली अनवर’ शीर्षक  किताब का संपादन पत्रकार व सामाजिक कार्यकर्ता  तथा स्त्रीकाल के संपादक मंडल के सदस्य राजीव सुमन ने किया है। यह किताब  ‘भारत के राजनेता’ नामक पुस्तक श्रृंखला का हिस्सा है, जिसके श्रृंखला -संपादक फारवर्ड प्रेस पत्रिका के प्रबंध संपादक प्रमोद रंजन हैं।

अपने संबोधन में राजद प्रमुख ने पूर्व सांसद अली अनवर को जनता के लिए लड़ने वाला सिपाही बताया। उन्होंने कहा कि अली अनवर पत्रकार के रूप में भी खासे लोकप्रिय रहे। वहीं गुजरात चुनाव के मद्देनजर लालू प्रसाद ने कहा कि देश और गुजरात की जनता नरेंद्र मोदी का सच जान चुकी है। उन्होंने कहा कि देश की जनता अब धर्म के अाधार पर देश को बांटने वाली ताकतों को बर्दाश्त करने को तैयार नहीं है। उन्होंने कहा कि देश का संविधान खतरे में है। ऐसा कहते हुए उन्होंने चेतावनी दी कि भाजपा इसी संविधान बदल सकती है और ऐसे में मेरा संसद में न होने का मुझे अफ़सोस है.

वहीं अपने संबोधन में पूर्व सांसद अली अनवर ने लालू प्रसाद को धर्मनिरपेक्षता का महान योद्धा कहाा। उन्होंने कहा कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने जनादेश का अपमान कर सांप्रदायिक ताकतों के साथ मिलकर षडयंत्र रचा, जिसे देश और बिहार की जनता ने अपनी आंखों से देखा। उन्होंने कहा कि उन्होंने हमेशा हाशिए पर रहने वालों के लिए आवाज उठायी। राज्यसभा में भी उन्होंने वंचित तबके के सवालों को रखा। श्री अनवर ने कहा कि सत्ता का मतलब केवल कुर्सी या कोई पद नहीं है। वे हमेशा वंचितों के लिए आवाज उठाते रहेंगे।

अपने संबोधन में पुस्तक के प्रकाशक द मार्जिनलाइज्ड के संयोजक संजीव चंदन ने कहा कि ‘भारत के राजनेता’ पुस्तक श्रृंखला के तहत देश के विभिन्न हिस्सों से चयनित 30 प्रमुख समाज-राजनीति कर्मियों पर किताबें प्रकाशित की जानी हैं। इसमें ऐसे  सामाजिक-राजनीतिक नेताओं को जगह दी गई है, जिनका न सिर्फ सामजिक परिवर्तन में महत्वपूर्ण योगदान रहा हो, बल्कि जिनकी वैचारिकी मौलिक और भारतीय समाज और  राजनीति की गतिकी की दिशा मोड़ने वाली रही हो।

इस श्रृंखला के तहत बिहार से लालू प्रसाद यादव, महाराष्ट्र से आरपीआई के नेता रामदास अठावले, तमिलनाडु से सीपीआई के नेता डी. राजा व सीपीएम के सीताराम येचूरी पर किताबें शीघ्र प्रकाशित होंगी। अन्य पुस्तकों के लिए चयन-प्रक्रिया जारी है

कार्यक्रम में राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद के अलावा जन संस्कृति से जुड़े लेखक मदन कश्यप, पूर्व सांसद शिवानंद तिवारी ने भी अपने विचार रखे। शिवानन्द तिवारी ने कहा कि इस तरह की किताबें पढ़ी जानी चाहिए. अली अनवर से लम्बी बातचीत, जो किस किताब में संकलित है, कई अनजाने पहलुओं को सामने लाता है. राजनीति की वैसी घटनाओं को भी जो मैं अपने समकाल के बावजूद नहीं जानता था. मदन कश्यप ने संपादक, प्रकाशक के इस श्रृंखला प्रयास को एक जरूरी पहल बताया. उन्होंने जनप्रतिनिधियों की संसदीय भूमिका पर अपनी बात रखी.   मंच से बीएचयू के शोधार्थी नरेश राम ने भीम गीत गाये. सम्यक प्रकाशन ने लालू प्रसाद एवं अन्य वक्ताओं को जगदेव प्रसाद और रामस्वरूप वर्मा की जीविनियाँ भेट की.  परिचर्चा का संचालन युवा साहित्यकार अरूण नारायण ने किया।

इस कार्यक्रम का देश भर में मीडिया ने बड़े पैमाने पर कवरेज किया. लिंक को क्लिक करें और ख़बरें देखें: 

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स्त्री के खिलाफ घर परिवार और विवाह संस्था को मजबूत करते सत्तावान: अरविंद जैन

स्त्रीकाल डेस्क

स्त्रीवादी क़ानूनविद अरविन्द जैन को  जन्मदिन (7 दिसंबर) की शुभकामनायें… !


पिछले दिनों वर्धा प्रवास के दौरान भारत  के प्रमुख जेंडर विशेषज्ञ,  महिलाओं के संवैधानिक अधिकारों और उनकी कानूनी लड़ाई की मुहिम में प्रमुखता से शामिल प्रसिद्ध कानूनविद श्री अरविंद जैन से महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के स्त्री अध्ययन विभाग के शोधार्थियों, प्रीतिमाला सिंह, गीतेश, मनोज गुप्ता और  विभागाध्यक्ष प्रो. शंभु गुप्त ने  विस्तृत बातचीत की।


 जेंडर समानता, यौन हिंसा अथवा महिलाओं के पक्ष में बने कानूनों की जमीनी हकीकत, कानूनों के विधिसम्मत अनुपालन में जेंडर पक्षपात से भरी राजनीतिक, सामाजिक एवं सामुदायिक मान्यताओं के बीच न्यायपालिका की भूमिका पर बात की गई। डॉ. जैन का मानना है कि बिना कानून और संविधान की जानकारी के इंसान अधूरा है। जेंडर समानता के पक्ष में हुए कानूनी सुधारों की पारिभाषिक शब्दावलियों उसकी सामाजिक एवं विधिक स्वीकार्यताओं के बीच अंतर्विरोधों के सवाल पर श्री जैन ने बड़ी सटीकता से जवाब देते हुए कहा कि चूंकि कानून बनाने वाली, उसे व्याख्यायित करने वाली और उसे लागू करने वाली संस्थाओं में निर्णयकारी भूमिकाएँ पुरुषों की हैं। संसदीय ढांचे में 92 प्रतिशत, ऊपरी अदालतों में 98 प्रतिशत न्यायाधीश पुरुष हैं ऐसे में यदि कुछ गिनी चुनी जगहों पर महिलाए हैं भी तो उन्हें निर्णय की भूमिका में प्रभावी रूप में शामिल ही नहीं किया जाता। सत्ता पर बैठे लोग घर, परिवार और विवाह संस्था के उसी मूल ढांचे से अपने रिश्ते मजबूत करते दिख रहे हैं जो आज भी सामंती बना हुआ है। जे. एस. वर्मा और लीला सेठ की कमेटी द्वारा सौंपी गयी रिपोर्ट को जिस तरह सरकार ने अपने तरीके से पेश किया उस पर भी लंबी बात-चीत हुई। रेप को परिभाषित करने वाले 2013 के कानून में स्त्री की सहमति-असहमति की परिस्थितियों के आलोक में वैवाहिक बलात्कार को देखते हुए अरविंद जैन ने खेद प्रकट करते हुए कहा कि इसने पुरुषों को असीमित अधिकार दे दिए हैं जो आने वाले समय में अपराधियों के लिए एक ढाल के रूप में साबित होंगे। महिलाओं के लिए वैवाहिक बलात्कार कानून की महत्वपूर्ण भूमिका, संपत्ति अधिकार कानून, तीन तलाक और महिला आरक्षण बिल पर भी शोधार्थियों ने उनसे सवाल किए। किसी भी कानून को लागू करने अथवा बिल पास करने की सरकारों की राजनीतिक इच्छा पर ज़ोर देते हुए उन्होंने कहा कि इन इच्छाओं का निर्धारण तत्कालीन सरकारें अपने हितों को ध्यान में रखते हुए करती हैं।

वर्तमान संदर्भ में उन्होंने उदाहरण स्वरूप कहा एक तरफ नोटबंदी, जी.एस.टी., या रेप लॉ आदि पर रातों रात फैसले और कमेटियाँ बना ली जाती हैं, वहीं महिला आरक्षण बिल जैसे कई महत्वपूर्ण मुद्दे वर्षों से ठंडे बस्ते में पड़े हैं। विश्वविद्यालयी परिवेश में जेंडर समानता से जुड़ेकानूनी और व्यवहारिक पक्षों पर बात रखते हुए स्त्री  अध्ययन जैसे अनुशासन में स्त्री-पुरुष की मौजूदगी और उनके साझा प्रयासों से जेंडर समानता की बहस और आंदोलनधर्मी भूमिकाओं को आगे बढ़ाने की भी बात कही। आज के समय के पद्मावती विवाद पर अपनी बेबाक राय रखते हुए उन्होंने कहा कि इस फिल्म को बनाने वाले तथा इसका विरोध करने वाले दोनों ही पक्ष सती तथा सती-प्रथा का महिमा-मंडन कर रहे हैं, जो कि सती निरोधक कानून के हिसाब से संविधान विरोधी कार्य है।


उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट को 17 साल लगे अपने यहां सेक्सुअल हैरासमेंट पर कमेटी बनाने में लग गए। जबकि 1997 ई. में सुप्रीम कोर्ट ने विशाखा जजमेंट में इस आशय का निर्णय दिया था। अंततः 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने अपने यहां यह कमिटी बनाई। इसी से देश के बाकि जगहों पर इस मसले पर के हालात को समझा जा सकता है।



डॉ. जैन ने आगे कहा कि आज भी देश-समाज-परिवार के लोकतंत्रीकरण का एजेंडा अधूरा है। दहेज हत्या, यौन हिंसा से लेकर बालिका भ्रूण हत्याएं देश में थमने का नाम नहीं ले रही है। विश्वविद्यालय और कॉलेजों में सेक्सुअल हरासमेंट से लेकर हत्या-आत्महत्याएं जारी है। उन्होंने तल्ख लहजे में कहा कि विश्वविद्यालयों में सेक्सुअल हरासमेंट पर जीरो टॉलरेंस की महज औपचारिकता पूरी की जा रही है। ज्यादातर विश्वविद्यालयों में छात्र-छात्राओं को एकांगी ज्ञान दिए जा रहे हैं, उन्हें समग्र ज्ञान से मरहूम रखा गया है। ज्यादातर विश्वविद्यालयों में दस बजे रात्रि के बाद छात्राओं के छात्रावास में ताला लगा दिया जाता है, जबकि छात्रों को खुली छूट रहती है। उन्होंने आगे कहा कि विश्वविद्यालयों के छात्रावास लड़कियों के लिए कैदखाने बने हुए हैं।

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सामूहिक चेतना का ही प्रतिबिम्ब है स्त्रीविरोध का अनफेयर गेम



ज्योति प्रसाद


इसी बेसर्दी के महीने दिसंबर में द इक्नॉमिक्स टाइम्स ने एक सूचना छापी है कि विनी कॉस्मेटिक्स जो फॉग सेंट भी बनाती है अब एक प्रिटी 24 क्रीम बाज़ार में लेकर आई है।कंपनी के मैनिजिंग डायरेक्टर का मानना है कि अब बाज़ार में उपलब्ध उन ब्राण्ड्स का पर्दाफाश होगा जो कथित रूप से गोरापन बेचते हैं। कंपनी के मुताबिक प्रिटी 24 क्रीम भारतीय महिलाओं को उनके त्वचा के रंग के आधार पर हो रहे भेदभाव से मुक्त करेगी। दिलचस्प यह भी है कि यही कंपनी एक अन्य उत्पाद व्हाइट टोन फेस पाउडर भी बनाती है जिसको लगा लेने के बाद चेहरा निखरा निखरा, ईवन टोन और ऑइल फ्री दिखने लगता है। खैर आप उत्पाद के नाम पर ध्यान ज़रूर दें।



बाज़ार और रंगभेद


मेरे एक बहुत अच्छे मित्र ने एक बार एक पंक्ति कही थी जिसके द्वारा बाज़ार की वास्तविक मंशा समझी जा सकती है। उसने कहा था ‘गंजे को कंघी बेचना ही सेल करना होता है।’ बाज़ार एक वह जगह मानी जाती थी जहां से आपको अपना ज़रूरत का सामान लेना होता था। लेकिन भूमंडलीकरण और उदारीकरण के बहुत आगे निकल चुके हम लोग अब किसी दूसरे माहौल में रह रहे हैं। बहु-राष्ट्रीय कंपनियाँ सामान खरीदने की हर संभव
सुविधा देकर मनुष्य को उस उपभोक्ता में तब्दील कर चुकी हैं जो केवल मुंह से उपभोग न कर के हर अंग से उपभोग कर रहा है। सेवाएँ और वस्तु घर तक पहुंचा दिये जा रहे हैं। एक तरह से आप सामान खरीदने को बाध्य हैं। इस बाध्यता का ग्राहकों को रत्ती भर एहसास भी नहीं है। अमेज़ोन कंपनी का भारतीयकरण का लिबास पहना हुआ विज्ञापन हर तीसरे मिनट पर आ रहा है। अब टीवी देखने वाला और वाली इसके प्रभाव से कैसे बच सकते हैं? बाज़ार उत्पादन करता है और लोग उसके मुख्य उपभोक्ता हैं। वह अपने सामान को बेचेगा और मुनाफा कमाएगा। बाज़ार एक भीड़ जैसा हैं जिसमें कई कंपनियाँ अस्तित्व में होती हैं। भीड़ को समझना है तब उसके मिजाज को समझना होगा और बाज़ार को समझना है तो कंपनियों की रणनीतियों को समझना होगा। कंपनियाँ अपने उत्पाद के रंग से लेकर उसे बाज़ार में उतारने तक की रणनीति बनाती हैं। कंपनियाँ किसी भी क्षेत्र और जनता का अध्ययन करने के बाद विज्ञापन के मैदान में उतरती हैं और छा जाती हैं। इसलिए अब अगर कोई कंपनी गहरे या साँवले या फिर काले रंग के भेदभाव के मद्देनजर अपना एक उत्पाद ला रही है तो इसका दूसरा मतलब क्रीम को रंग के सहारे बेचने के पीछे एक सोची समझी रणनीति का होना है। उदाहरण के लिए फेयर एंड लवली क्रीम की ट्यूब गुलाबी और सफ़ेद रंग का इस्तेमाल करती हैं। गुलाबी का रंग सीधे महिलाओं और युवा लड़कियों को टारगेट करता है और सफ़ेद रंग त्वचा के रंग को। यह उत्पाद की सहज पहचान और पहुँच बनाने की रणनीति है।

साल 2015 में एक महत्वपूर्ण घटना घटी थी, जिसे बहुत जल्दी भुला दिया गया। कल्याण ज्वेलर्स ने ऐश्वर्या राय को लेते हुए एक विज्ञापन जारी किया था जिसमें वह गहनों से लदकर रानी के रूप में बैठी हुई हैं और एक अश्वेत लड़के ने जो गुलाम भी है, उनके ऊपर छाता लगा रखा है। बाद में लोगों की गहरी नाराजगी के चलते कंपनी ने माफी मांगते हुए विज्ञापन वापस ले लिया। इसके पीछे की मानसिकता को समझने के लिए आपको उस युग की
मानसिक और ऐतिहासिक सैर करनी होगी जब दुनिया में अश्वेत लोगों को गुलाम बनाया जाता था। उनकी खरीद फरोख्त होती थी। उन्हें प्रताड़ित किया जाता था। उन्हें जंजीरों से बांधा जाता था ताकि कहीं वे गुलाम(मनुष्य) भाग न जाये। भारत में जाति के नाम पर भेदभाव का पुराना इतिहास रहा है। चार वर्णों की व्यवस्था इसका सबूत है। आर्य जाति से अपने को जोड़ने वाले लोगों की कमी भी नहीं है। आर्य शब्द का एक अन्य अर्थ गोरा रंग भी
बताया जाता है। अतः जो आर्य नहीं है उन्हें कमतर अथवा निम्न माना जाता है, अभी भी। हाल ही में सोशल मीडिया पर आम आदमी पार्टी के नेता कुमार विश्वास ‘शर्मा’ का एक वीडियो फैल रहा है जिसमें वे आरक्षण, एक बंदे और मेहतरानी जैसे शब्दों का खूब इस्तेमाल कर रहे हैं। आज जब यह पोस्ट लिख रही हूँ यह सन् 2017 है और आज तक कुमार विश्वास ‘शर्मा’ जैसे लोगों के दिमाग में से चार वर्ण व्यवस्था नहीं निकल पाई है। इनके लिए
आदर्श आज भी मनु ही है। एक बहुत बड़े मनुष्य तबके को गुलाम बनाए रखने की मानसिक कीड़े ने दम नहीं तोड़ा है। यह वही मानसिकता है जो एश्वर्या राय के विज्ञापन में दिखी थी। गुलाम काले होते हैं और गोरे राज करने वाले, क्या इस विज्ञापन को देखकर आसानी से इस भयानक असमानता को नहीं समझा जा सकता?



अभिनेत्री तनिष्ठा चटर्जी जब अपनी फिल्म ‘पार्च्ड’ का प्रमोशन करने एक टीवी चैनल के कॉमेडी शॉ में पहुंची थीं तब उनके रंग को लेकर शॉ में भद्दी पंक्तियों का इस्तेमाल किया गया और वे तुरंत ही शॉ को छोड़कर चली गईं। तनिष्ठा के वक्तव्यों पर यदि नज़र डालें तो वे कहती हैं कि कई लोग उन्हें इस बात का उलाहना देते हैं कि ब्राह्मण होकर भी आपका रंग गहरा क्यों हैं? मतलब यह है कि ब्राह्मण होने का एक और मतलब गोरा रंग होना है।


अखबारों में शादी के विज्ञापन साफ तौर पर गोरी, टॉल और वेल एजुकटेड लड़की/लड़के की मांग रखते हैं।इतना ही नहीं वे ब्राह्मण, बनिया, खत्री, अग्रवाल, जाट, चमार आदि खंडों में बंटे होते हैं। इसलिए भारत में जाति और रंग को पूरी तरह से अलग कर के नहीं देखा जा सकता। हिन्दी सिनेमा द्वारा किया जाने वाला रंगभेद
रुकिए बात यहीं खत्म नहीं हुई। निर्देशक शेखर कपूर की अति प्रसिद्ध फिल्म मि. इंडिया सन् 1987 में आई थी और बहुत बड़ी हिट भी रही थी। उसमें हवा हवाई गीत में एक ऐसा पड़ाव भी आता है जिसमें गोरी श्री देवी बीच में(आगे भी) नाच रही हैं और उनके पीछे कई युवक अपने ऊपर काला रंग पोत कर नाच रहे हैं। लेकिन भारतीय दर्शकों का ध्यान गाने और नाच पर कुछ इस तरह से टिका दिया जाता है कि वे इसको किसी भी तरह से
हिंसात्मक नहीं लेते। बल्कि वे भी श्री देवी के साथ गाने लगते हैं, कहते हैं मुझको हवा हवाई! जी हाँ, आप ठीक समझे कि फिल्में भी रंगभेद को जाने अनजाने बढ़ावा देती आई हैं। यदि कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाये तब अधिक से अधिक सिने तारिकाएँ गोरे रंग की ही हैं। जिन अभिनेत्रियों ने सांवले रंग के साथ अपने करीयर की शुरुआत की थी वे भी बाद में ट्रीटमेंट लेते लेते गोरी हो चुकी हैं। ठीक यही दशा अभिनेताओं की भी है। गीतकार शैलेंद्र ने 1967 में तीसरी कसम फिल्म का निर्माण किया था। फिल्म फणीशवरनाथ रेणु की चर्चित कहानी तीसरी कसम उर्फ मारे गए गुलफाम पर आधारित थी। फिल्म का मुख्य पात्र हीरामन कथा साहित्य में काले रंग का है पर सिल्वर स्क्रीन पर वह गोरे शॉमैन राजकपूर में बदल जाता है। यह फिल्मों का वह पक्ष है जो बड़ी बारीकी से घातक खेल, खेल जाता है और फिल्मों के दीवाने पागल बन जाते हैं।


प्रियंका चोपड़ा को अपनी फैशन फिल्म के लिए बहुत तारीफ़ें मिली थीं पर उसी फिल्म में उस दृश्य के बारे में उन्हें अभी तक अफसोस नहीं हुआ जब वे एक अफ्रीकी मूल के व्यक्ति के साथ एक रात अंतरंग होती हैं और सुबह उठकर ग्लानि महसूस करती हैं। आधुनिक भारत कुमार यानि अक्षय कुमार अपनी फिल्म कमबख़्त इश्क़ में एक दृश्य में अफ्रीकी मूल की महिला के चेकिंग करवाने के दृश्य में दुखी दिखते हैं। फिल्म में यह दृश्य कॉमेडी दृश्य के रूप में पेश किया गया है। ऐसी रंगभेद फिल्मों और दृश्यों की हिन्दी सिनेमा में भरमार है और आज तक वे इस पर शर्मिंदा भी नहीं हैं।



आगे बढ़ते हैं और अन्य उदाहरणों की बात करते हैं। बॉलीवुड के एक अभिनेता हैं जिनका नाम है अभय देओल। उन्होने इसी साल सोशल मीडिया पर पोस्ट लिखी थी जिसे पढ़कर बहुत से लोगों को बिजली का करंट लग गया था। उन्होने शाहरुख खान, सोनम कपूर, जॉन अब्राहम, दीपिका पादुकोण, विद्या बालन, सिद्धार्थ मल्होत्रा, इलियाना डिक्रूज़ कलाकारों केगोरा बनाने वाली क्रीम के प्रचार करने को लेकर अच्छी क्लास लगाई थी।शाहरुख खान इसी दिसंबर में टेड टॉक्स लेकर आ रहे हैं जिसमें वे प्रेरणा की बात करते नज़र आ रहे हैं तो दूसरी तरफ विद्या बालन महिला सशक्तिकरण पर आधारित फिल्में बेगम जान और तुम्हारी सुलू जैसी फिल्में कर रही हैं। यही नहीं शौच से जुड़े विज्ञापन पर भी वे देश को बता रही हैं कि शौचालय का इस्तेमाल क्या है? दीपिका पादुकोण और शाहिद कपूर अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता की बात करते नज़र आ रहे हैं। जब अभय देओल ने अपनी पोस्ट के द्वारा रंगभेद पर निशाना लगाया था तब श्री लंका की सुंदरी जैकलीन फर्नांडीस ने उनका साथ दिया था और कहा था कि रंगभेद करना गलत है। लेकिन वे इस बात को न जाने कैसे भूल गईं कि खुद उनकी फिल्म ‘रॉय’ में वे चिल्ला-चिल्लाकर चिट्टियाँ कलाइयाँ पर नाच रही हैं। इस पूरे बोझिल वर्णन का तात्पर्य यह है कि ये सभी फिल्मी सितारे कला को कला की नज़र से कम बल्कि आय की नज़र से अधिक देखते हैं। युवा जमात को इन बातों को ध्यान से समझना चाहिए और आँख बंद कर के इनके पीछे नहीं जाना चाहिए।


राजनीति में रंगभेद के उदाहरण


पिछले साल 8 नवंबर को भारतीय इतिहास में एक असंभव राजनीतिक और आर्थिक घटनाको अंजाम दिया गया। नोटबंदी हुई और भारत में एक अफरा-तफरी का माहौल रहा। इसघटनाक्रम के दौरान ‘काला धन’ जैसे शब्द-जोड़े ने अपनी जगह हर किसी की जुबान पर बना ली थी। आमफहम बोलचाल में अगर शब्द बिना समझे इस्तेमाल होते हैं तब कुछ हद तकउसे समझा जा सकता है पर राजनीतिक स्तर पर भी इस शब्द का खूब प्रयोग हुआ वह भी बिना सोचे समझे। वह आगत जो गैर-जिम्मेदाराना तरीके से कमाई जाती है, जिसके पीछे लालच का बड़ा हाथ होता है, जो नैतिकता को दरकिनार करके कमाई जाती है वह कमाई और आगत गैर लोकतान्त्रिक, गैर-संवैधानिक होती है। अंग्रेज़ी में इसे ईल-लीगल मनी से समझा जा सकता है। लेकिन भारतीय सरकार और विपक्ष ने इसे काला धन कहकर संबोधित किया जो कि निहायती असमानता वादी लफ़्फ़ाज़ी है। राजनीतिक रूप से हमारे पास दुनिया का शानदार संविधान है और इस महान भाषाओं के देश में बार बार काला धन जैसे शब्दों
का इस्तेमाल यह दर्शाता है कि हमारे राजनेता अभी भी सोच नहीं पा रहे हैं।


इससे पहले बीजेपी सांसद तरुण विजय ने अलजजीरा को दिये इंटरव्यू में दक्षिण भारत के लोगों को लेते हुए विवादित रंगभेद टिप्पणी की थी। इस बयान के बाद बहुत से लोगों कीतीखी प्रक्रियाएँ सामने आई थीं। लेकिन कुछ ऐसे नेता भी हैं जो मुद्दों को काफी हदटक गंभीरता से लेते हैं। सयुंक्त राष्ट्र अमरीका के पूर्व राष्ट्रपति ने ट्विटर पर अपनी एक तस्वीर साझा की थी जिसमें वे खिड़की के पास खड़े हैं और खिड़की में चार बच्चे दिखाई दे रहे हैं।
उनमें एक बच्चा अश्वेत भी है। वे दिवंगत दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति नेल्सन मंडेला की उक्ति को लेते हुए लिखते हैं- “कोई भी किसी दूसरे व्यक्ति के लिए त्वचा के रंग, पृष्ठभूमि और धर्म के आधार पर नफ़रत लेकर जन्म नहीं लेता…” (No one is born hating another person because of the color of his skin or his background or his religion…) इसलिए भारत में जब इस तरह की सुलझी हुई मानसिकता के शब्द नहीं दिखते तब चिंता होना लाजिमी हो जाता है।



सुंदरता- एक मिथ


घर में बच्चे के जन्म से लेकर उसकी समझ बनने तक की प्रक्रिया में सुंदरता से जुड़े कितने ही प्रतिमान जाने अनजाने प्रदर्शित किए जाते हैं। उसे काजल लगाया जाता है। बच्चे के रंग को लेकर कितने ही शब्द बोले जाते हैं। कन्हैया का मिथक उठाकर लाया जाता है। संगीत से पता चलता है कि राधा क्यों गोरी मैं क्यों काला! धीरे धीरे  बाहर की दुनिया में (स्कूल) जाकर वह तरह तरह के रंग देखता है। सांवला और गहरा और गोरा आदि आदि। मज़ाक-मज़ाक में उसे चिढ़ाया जाता है…ओ काली, ओ काले कौवे..! हमारे यहाँ सुंदरता के प्रतिमान बहुत ही दकियानूस रहे हैं। गोरा रंग इसमें बहुत महत्वपूर्ण होता है। बाज़ार इस बात को अच्छे से अध्ययन करता है और इसलिए वह विश्व सुंदरी प्रतियोगिता करवा देता है। आप घर में बैठे बैठे गौरव करते रह जाते हैं और आपको पता भी नहीं चलने दिया जाता कि आप को रद्दी माना जा रहा है। इसमें मीडिया की कंपनियों के संग मिलीभगत वाले एंगल कोनज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।


सुंदरता वह समझी जाती है जो बाहर के पक्षों द्वारा सरासर आरोपित की जाती है। जबकि व्यक्ति को यह समझने का मौका ही नहीं दिया जाता है कि वास्तव में उसके स्वयं के लिए सुंदरता का वास्तविक अर्थ क्या है? व्यक्ति को बताया गया कि फलां महिला चूंकि विश्व सुंदरी है तो वह दुनिया की सबसे सुंदर औरत है। बताए जाने और आपको वह समझ पूरी तरह से ग्रहण करने के बीच बेहद उत्तेजक साधनों का प्रयोग होता है इसलिए आप खुद की सुंदरता की एक स्व-निर्मित समझ विकसित ही नहीं कर पाते। सुंदरता को आपके आँखों की देखने की क्रिया से ही जोड़ा जाता है, इसमें बाकी इंद्रियों को गौण बना दिया जाता है।

हर स्तर पर रंग को लेकर भेदभाव दिख जाता है। समझदार पाठक खुद मुझसे अधिक उदाहरण रोजाना देखते होंगे और उनका संज्ञान भी लेते होंगे। सारांश में कहूँ तो समानता की राह बहुत कठिन है। अगर वास्तव में हर तरह का भेदभाव मिटाना है तो एक प्रबुद्ध जनता का निर्माण करना होगा जो नैतिक मूल्य को आत्मसात किए हो। जहां एक बराबरी का माहौल हर किसी के लिए हो। यह सब ऐसे ही नहीं हो जाएगा। इसके लिए बेहतर समझ कीआवश्यकता होगी। इसके लिए राजनीतिक, सांस्कृतिक, सामाजिक इच्छा शक्ति की जरूरत है। हमें एक ग्राहक और उपभोक्ता के नज़रिये से यह समझना होगा कि हमारी जरूरतें क्या हैं और क्या नहीं हैं। कोई क्रीम यदि हमारे चेहरे को सफ़ेदकर भी दे तो उससे क्या फर्क पड़ जाएगा। हम भोजन खाते हैं न कि क्रीम। नन्दिता दास की फोटो वाला अभियान स्टे अनफेयर तब तक कोई मायने नहीं रखता जब तक हम अपनी सोच में भेदभाव को ढोते हैं।

बाज़ार को अपना सामान बेचना है इसलिए उपभोक्ता को यह समझना होगा कि यदि आप गोरा बनाने वाली क्रीम खरीद रहे हैं तो भी कंपनी का फायदा है और यदि आप साँवले रंग की त्वचा की चमक के लिए उत्पाद खरीद रहे तो भी यह कंपनी का फायदा है आपका नहीं। (अगर साल 2018 की शुरुआत करनी ही है और इस लेख को पढ़कर यदि कोई प्रभावित होता है तब, मेरे जैसे अश्वेत लोग किसी भी तरह की गोरापन वाली क्रीम खरीदना बंद करदें। यह बहुत मुश्किल काम भी नहीं है।)

परिचय :-ज्योति जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के भाषा अध्ययन विभाग में शोधरत हैं. 
सम्पर्क: jyotijprasad@gmail.com 

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‘एक था गुल…’अलविदा शशि कपूर



स्वरांगी साने 


अचानक वाट्स एप्प पर संदेश आता है..न्यूज चैनल्स पर फ्लैश होने लगता है..फिर स्क्रोल चलने लगता है, शशि कपूर नहीं रहे…


पहली प्रतिक्रिया तो यही आती है- अरे, और उसके बाद हर जगह चाहे फेसबुक हो या वाट्सएप्प…नमन,श्रद्धांजलि और आरआईपी घूमने लगते हैं…इन सबकी परवाह किए बिना एक अभिनेता चुपचाप जा चुका होता है..


पिछले कितने ही सालों से वे डायलिसिस पर थे, एकाकी जीवन जी रहे थे…और कल जब अमूमन सबकी दोपहर की चाय का समय था, वे चले गए…



शशि कपूर का जाना…हमारी पीढ़ी के लिए क्या मायने रखता है, वे हमारी पीढ़ी के हीरो नहीं थे, जबकि सत्तर और अस्सी के दशक में जब हममें से कई लोग जन्मे या अपने बचपन को जी रहे थे वे तब बड़े परदे के हीरो थे…तब बड़ा परदा, बड़ा ही होता था, घरों में टीवी नहीं थे, टॉकिजों में जाकर फिल्में देखी जाती थी या किसी त्योहार,मेले-मौके पर किसी मैदान में बड़ा सफेद पर्दा लगाकर सबके लिए पिक्चर दिखाने का आयोजन होता था। तब पिक्चर देखना इतना कैजुअल नहीं था, कि जब मन हुआ चल दिए…बल्कि एक आयोजन ही होता था..और उस आयोजन की याद से जुड़े थे शशि कपूर…


बड़े भारी-भारी संवाद और उनके अर्थ समझ पाने की उम्र नहीं थी लेकिन ‘मेरे पास माँ है…’ का रुतबा तब भी बहुत ‘भारी’ लगता था, ऐसा लगता था जैसे सच में हम कितने अमीर है।


अपने बचपन के दौर में वह नायक था वह अल्हड़ सा शशि कपूर, गालों के गड्ढे और मासूम हँसी, और गीत.. ‘एक था गुल…’



तब हम जो बच्चे थे, वो किसी गीतकार आनंद बक्शी को नहीं जानते थे, हमें तो लगता था शशि कपूर सुना रहा है, मतलब उसी की कहानी होगी…और आज वह गीत जब हकीकत में बदल गया, शशि कपूर खुद अतीत हो गए तो पूरा दौर याद हो आया एक ही गीत के साथ कि ‘एक था गुल…’


कुछ बड़े हो जाने पर जाना कि अभिनेताओं के उस दौर में अपनी पहचान बना पाना शशि कपूर के लिए कितना कठिन रहा होगा… पृथ्वीराज कपूर के घर पर जन्म लेना और राज कपूर, शम्मी कपूर जैसे दोनों बड़े भाइयों के ऊँचे फिल्मी कद के साथ खुद को बैठा पाना उतना भी आसान नहीं रहा होगा। वर्ष 2011 में भारत सरकार ने पद्म भूषण से सम्मानित किया तो एक बार फिर इस अभिनेता का बहुआयामी जीवन रेखांकित हो गया। कुछ सालों बाद ही वर्ष 2015 में उन्हें वर्ष 2014 का दादा साहेब फाल्के पुरस्कार मिला।



केवल चॉकलेटी हीरो यह उनकी पहचान नहीं थी, सत्तर के दशक में उनके जैसा कोई व्यस्त कलाकार नहीं था। उन्होंने हर भूमिका के साथ न्याय किया, भूमिका चाहे हीरो की हो, बाल कलाकार की, सह कलाकार की या निर्माता-निर्देशक की, उन्होंने ब्रितानी फिल्मों में काम किया किसी ब्रिटिश की तरह, उन्होंने गैर परंपरागत फिल्मों में काम किया किसी समांनतर फिल्मों के अभिनेता की तरह, थियेटर के लिए खड़े हुए रंगकर्मी की तरह…भूमिकाएँ जो भी हो, उन्होंने दिलों-जान से निभाई…केवल 20 साल की उम्र में ब्रिटिश अभिनेत्री जेनिफर से शादी हो या संजना, करण, कुणाल के पिता की या रणधीर-ऋषि कपूर के चाचा या करिश्मा-करीना के दादा की… या अपने पिता के पृथ्वी थियेटर को नव संजीवनी देने की..उनका जीवन ‘आग (1948)’ से शुरू हुआ था, जिसकी ज्वाला ताउम्र उनके भीतर धधकती रही..1965 के बाद भी ‘जब-जब फूल खिले’ तब-तब उन्हें याद किया जाता रहेगा..अंतर्राष्ट्रीय सिनेमा के मंच पर वे ‘सिद्धार्थ (1972)’थे,..वे एक ‘विजेता’ थे, जिसने इस ‘शान’ से जीवन जीया था, कि उनका जीवन ‘जुनून’ भी था और ‘उत्सव’ भी…लेकिन ‘कभी-कभी’ ही ऐसे लोग हुआ करते हैं…


जन्म- 18 मार्च 1938
मृत्यु – 04 दिसंबर 2017


परिचय :-वरिष्ठ साहित्यकार, पत्रकार और अनुवादक विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित. 
संपर्क :-swaraangisane@gmail.com

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उसने पद्मावतियों को सती/जौहर होते देखा है ..

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विलियम डैलरिम्पल/अनिता आनंद 

सती/ जौहर के फिल्मांकन से एक पक्ष अपना अर्थ-व्यापार कर रहा है तो दूसरा पक्ष उससे अपने जाति गौरव को जोड़कर राजनीति-व्यापार. इस खेल में क़ानून दाँव पर है और स्त्री के हक़ में लड़ाइयों का हासिल भी दाँव पर. इस द्विपक्षीय हुतूतू खेल के बीच क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि जब पद्मवतियाँ सती/जौहर होती थीं, जब उनके साथ उनकी दासियाँ भी जला दी जाती थीं तब आसमान में करूण आर्तनाद की गूँज से धरती-आकाश की करुणा विदीर्ण हो जाती होगी. और यह सब होता रहा है रतनों/ रणजीतों की सामंती ऐय्याशियों को सांस्कृतिक आवरण देने के लिए. पद्मावती के लिए हो-हल्ला करते हुए जब थक गये हों तो राणा रणजीत सिंह और उनके वशंजों की मौत के बाद के उस करूण दृश्य को देखें, जो सामंतों की शान से बनी राख की ढेर और धुल से पैदा होता रहा है…. 


राख का शहर 18 जून 1839


तीन दिन और तीन रातों तक महाराजा की चिता की आग जलती रही। महल के बाग समेत पूरा परिसर चिता में जल रही चंदन की लकड़ी और महाराजा के पार्थिव शरीर की महक से भरा हुआ था। वैसे तो महाराजाओं की ज़िंदगी की तरह उनके अंतिम संस्कार किसी भी मायने में कमतर नहीं होते। पर भारतीयों ने खुद माना कि एक शेर की विदाई इसी तरह होनी चाहिए।


महाराजा के अंतिम संस्कार में हुए असंख्य रीति-रिवाजों का सबसे अच्छा विवरण एक यूरोपीय ने किया है जो लाहौर दरबार में कार्यरत था। आॅस्ट्रिया-हंगरी का मूल निवासी जान मार्टिन होनिगबर्गन एक होमियोपैथी का डाॅक्टर होने के साथ ही एक यात्री था जो दस साल पहले रणजीत सिंह के दरबार में पहुंचा था। रणजीत सिंह उससे इतने प्रभावित हुए कि उसे वापस नहीं जाने दिया और अपने दरबार में जगह दे दी।

 

महाराजा के दरबारी में बतौर बड़े ओहदेदार उस पर एक महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी थी, उसे यह सुनिश्चित करना था कि चिता की आग ठंडी होने पर अस्थि विसर्जन के लिए चिता की राख को इकट्ठा कराया जाए। उसके मुताबिक जो उसने देखा वह यह था कि कुछ डोम या महाब्राह्मण जैसे लोग, जिनकी त्वचा सूरज में रहने की वजह से पूरी तरह झुलस चुकी है, राख इकट्ठी कर उसमें से अस्थियां जमा कर रहे थे। किसी समय दुश्मनों के लिए दहशत और दुनिया को अपने वैभव और भव्यता से दंग कर देने वाला उनका मरीज महाराजा रणजीत सिंह अब राख और अस्थियों में तब्दील हो चुका था। वह भी उसकी नज़रों के सामने।


तीन दिन पहले जब महाराजा का अंतिम संस्कार शुरू हुआ था तो लाहौर किले को बाहरी दीवार और महल के बीच की जगह में उनकी चिता सजाई गई थी। उस दिन लग रहा था कि सारा का सारा पंजाब अपनी राजधानी में उमड़ रहा है। वेदना में डूबे हुए लोगों का एक सागर था और होनिगबर्गर के कान के पर्दे वहां होने वाले शोर से गूंज रहे थे।

होनिगबर्गर को अपनी गर्दनें ताने हुए खड़ी भीड़ में किसी रास्ता दिलाकर उनकी जगह तक पहुंचाया गया। उनके आसपास सिख सरदारों के सामंत सफेद कपड़ों में, नंगे पैर मौजूद थे। वहां पर उस दिन महाराजा के दरबार के सबसे बड़े सिख सामंतों, दरबार के मंत्रियों, अधिकारी और महाराजा के वजीरों के सिवाय हर वह शख्स मौजूद था जिसे वहां होना चाहिए था। दरअसल इन उच्चपदस्थ सिख दरबारियों को एक खास सम्मान मिला था। वे अपने महाराजा की अंतिम यात्रा को लेकर द्रवित थे पर उनका सहचर बनने के सम्मान से गौरवान्वित भी थे। होनिगबर्गर वहीं इंतजार करते रहे, उनका इंतजार खत्म हुआ जब उन्होंने दूर से अंतिम यात्रा को आते देखा। चौथाई मील लंबी  इस यात्रा के दोनों तरफ बंदूकधारी सैनिक मौजूद थे। अंतिम यात्रा करीब करीब जनमानस के सागर को दो भागों में चीरती हुई दूर से आती दिख रही थी। इसी रेखा के बीचोबीच महाराजा रणजीत सिंह का पार्थिव शरीर दिख रहा था। एक सोने के मंच पर रखा हुआ यह शरीर मानों एक सोने के पाल वाले जहाज़ की तरह दिख रहा था।1 दरअसल इसे जहाज कहना उस समय सबसे उपयुक्त लग भी रहा था। क्योंकि वह रोती बिलखती महाराजा की प्रजा के अपार जनसमुद्र के बीच से आता हुआ जो दिख रहा था। अंतिम यात्रा में संगीतकारों की धुनें इस करुण रुदन को और कातर बना रही थी।


महाराजा के पार्थिव शरीर के पास ही होनिगबर्गन की नज़र एक महिला की तरफ पड़ गई। वह रानी महताब देवी थीं जिन्हें महाराजा प्यार से गुड्डन बुलाते थे। वे सोने की एक पालकीनुमा कुर्सी पर बैठी थीं जिसे पसीने में लथपथ कहारों ने ऊपर उठा रखा था। उनके पीदे तीन और रानियां इस तरह की कुर्सियों पर सवार थीं।2 उसने सभी रानियों को देखा पर उसकी निगाह सिर्फ रानी गुड्डन पर ही टिकी रही। इसकी वजह भी थी। दरअसल वह और रानी पहली बार लाहौर समान वर्ष में आए थे। उस समय वह एक युवा डाॅक्टर और यात्री था जिसे शोहरत कमाने की भूख थी वहीं गुड्डन एक राजपूत राजकुमारी थीं। उनके साथ ही उनकी बहन रानी राज बंसो का विवाह भी महाराजा से ही कर दिया था।



रानी गुड्डन को देखकर होनिगबर्गर को अनायास ही उनके विवाह का दिन याद आ गया, जब वह शादी  के समारोह में दाखिल हो पाने में कामयाब रहा था। उसे यह भी याद आया कि रानी की बेपनाह खूबसूरती के चर्चे थे, जिनकी पुष्टि वह कर पाने में अक्षम था। शादी के दिन रानी घूंघट में थीं और उसके बाद से वो घूंघट में ही रही थीं। अब जाकर, दस बरसों के बाद, उनकी मौत के दिन वो सार्वजनिक रूप से उनका चेहरा देख पा रहा था। होनिगबर्गर ने देखा कि वे अभी भी खूबसूरत थीं।जैसे-जैसे गुड्डन और उनके साथ की तीन रानियां चिता के पास आती जा रही थीं वे अपने कंगन उतार कर उस भीड़ में फेंक रही थी जहां से हज़ारों हाथ उन कंगनों को प्रसार समझ कर लेने को आतुर थे।


सिख दरबार में उनके सहयोगियों ने होनिगबर्गर को बताया कि ये रानियां (महाराजा की 17 में से चार) स्वेच्छा से सदियों पुरानी परंपरा का हिस्से बनने वाली हैं। इसके बावजूद जो कुछ सामने आया, उसने उसे वितृष्णा से भर दिया। अपने पति के प्रति उसके जीवन और उसके बाद भी समर्पित ये औरतें सती थीं और उनकी सार्वजनिक आत्महत्या-या हत्या, जो आपके नजरिये पर निर्भर करता है-को चारों ओर सराहा जा रहा था। शाही इतिहासकार सोहनलाल, जिनका काम महाराजा के दरबार में हो रही घटनाओं को दर्ज करना था, ने आगे चल कर लिखा कि रानियां अपनी चिता के लिए तैयार होते समय ‘नशे में डूबी हाथियों की तरह नाचती और हंसती हुई’ प्रसन्नचित थीं।


वैसे होनिगबर्गर को सोहनलाल सूरी द्वारा वर्णित प्रसन्नता का कोई भी भाव उन अभागी औरतों के चेहरे पर नहीं दिखा। रानियों की गोद में महाराजा का सिर रखा गया, मानो वह सो रहे हों, रानियां बाकायदा उनके पार्थिव शरीर के आसपास सलीके से बैठी हुई थीं और उन्होंने अपनी आंखें बंद कर रखी थीं। उन्होंने युवराज खड़क सिंह को भले ही न देखा हो पर आग लिए हुए चिता को अग्नि देने आ रहे युवराज की मौजूदगी का अहसास उन्हें ज़रूर हुआ होगा। होनिगबर्गर यह तो सुन और समझ नहीं पास कि चिता में आग लगते ही क्या सती हो रही रानियों में से कोई चीखा। उन सबको जैसे ही चिता की आग ने अपनी आगोश में लिया तो ढोल नगाड़े और वहां मौजूद जनसमुद्र की गर्जना ने होनिगबर्गर के होश उड़ा दिए। सिर्फ होनिगबर्गर ही अकेला नहीं था जिस पर वहां का घटनाक्रम हावी हो रहा था। एक जोड़ी कबूतरों ने भी महाराजा की चिता में छलांग लगा दी। इस घटना ने तो जैसे पूरे जनसमूह को आह्लादित कर दिया। कहा गया कि इन्सान तो इंसान पशु पक्षी भी महाराजा रणजीत सिंह के लिए सती होना चाहते थे।


चिता की आग ठंडी होने में पूरे दो दिन और दो रातें लगीं। इस दौरान होनिगबर्गर अगले बीस घंटों तक चिता पर अपनी निगाहें गड़ाकर रखने को बाध्य था। दरबार के हर वरिष्ठ सदस्य से अपेक्षा थी कि वो अस्थियां प्रवाहित होने तक वहीं रहेगा। जब चिता की आग इतनी ठंडी हो गई कि उनमें गट्ठे पड़ी हुई उंगलियां काम कर सकें तो डोम लोगों ने, जो लाशों का प्रबंध करने वाली एक जाति है, अपना काम शुरू कर दिया। वे यह कैसे जानते थे कि कहां महाराजा की अस्थियां खत्म हुईं और रानियों की शुरू हुईं, यह एक राज ही था। सदियों से आम लोग और राजा-महाराजा डोमों की माहिर उंगलियों के बीच से गुज़रते रहे थे और उनके तौर-तरीकों पर आज तक कभी उंगली नहीं उठी। डोम अस्थियों को राजा और चार रानियों के पांच ढेरों में अलग-अलग कर रहे थे, लेकिन जब यह हो रहां था तो कोई भी उन सात गुलाम लड़कियों की अस्थियों की परवाह करता हुआ नहीं दिख रहा था जो उस स्याह राख में मिल गई थीं, रानियों की तरह वे भी अपने राजा के साथ जल कर मर गई थीं। लेकिन रानियों से उलट चिता तक उन्हें अपने पैरों पर चल कर आना था।

होनिगबर्गर के मन मस्तिष्क में ताउम्र उन सात लड़कियों का चेहरा दर्ज हो गया। वह भूल ही नहीं पा रहा था कि किस तरह से महाराजा की सात दासियां पालथी मारकर बैठी थीं उनके सिर पर तेल से पूरी तरह भीगी सरकंडे की चटाई रखी गई और फिर वो सती हो गईं। इन सात दासियों के बारे में कोई बात नहीं कर रहा था, उनका मातम कोई नहीं मना रहा था। यहां तक कि होनिगबर्गर के पता लगाने के बाद भी उनका नाम तक पता नहीं चल पाया। इस ‘घृणित समारोह’ को देखने के बाद होनिगबर्गर उनके लिए दयाभाव और लोगों के लिए घृणा से भर गया। बाद में जब होनिगबर्गर से पूछा गया कि वह इस समारोह के पहले ही पंजाब छोड़कर क्यों नहीं चला गया तो होनिगबर्गर ने अपने मित्र और महाराजा रणजीत सिंह के दरबार में उनके सहयोगी यूरोपीय जनरल ज्यां-फ्रांसुआ अलार्ड के शब्दों को उद्धत किया, ‘यहां पर आना बहुत मुश्किल है पर जाना उससे भी ज़्यादा मुश्किल है।’


दस साल पहले 1829 में होनिगबर्गर 34 साल का ऐसा युवक था जो एक उपनिवेशी आॅस्ट्रिया से मजबूत इरादों और उम्मीदों के साथ मेडिकल की पढ़ाई कर बाहर निकला था। उसके पास अपने पेशे के लिए ऐसे विचार थे जो उस समय के खांचे में फिट नहीं बैठते थे। एक घुमंतू युवक के तौर पर वह लाहौर पहुंचा जिसके पास दवाइयों का एक बक्सा और अनुशंसा का पत्र था। उसके इरादे बहुत ऊंचे थे, पर उसकी तरक्की की उड़ान को पंख नहीं मिल पा रहे थे। महाराजा रणजीत सिंह ने अपने आसपास ‘गोरे’ को डाॅक्टर रखने से इन्कार कर दिया था। लिहाजा उसे दरबार के छोटे अधिकारियों का ही इलाज करना पड़ रहा था। जब बहुत से लोगों का उसने सफल इलाज कर दिया तो उसे महल में तलब किया गया। होनिगबर्गर को यह उम्मीद तो कभी नहीं थी कि महल में उसके पहले शाही मरीज खुद महाराजा होंगे पर उसे यह उम्मीद तो कम से कम थी कि महल में उसका मरीज कोई इंसान होगा। उसका पहला मरीज एक बहुत ऊंचा घोड़ा था जिसे देखकर चिकित्सक के तौर पर वह बहुत आश्चर्य में था। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या करे। यह घोड़ा महाराजा को इंग्लैंड के राजा किंग जाॅर्ज चतुर्थ ने दोस्ती के बतौर उपहार दिया था। शाही अस्तबल में रहने के बावजूद इस घोड़े के पैर में फोड़े निकल आए थे। हकीमों ने उसका इलाज करने की बहुत कोशिश की पर जब सब हार गए तो अंतिम विकल्प के तौर पर होनिगबर्गर को बुलावा भेजा गया था। उसने घोड़े को बचाने के लिए हर मुमकिन कोशिश की पर घोड़े को बचा नहीं पाया। इस तरह के नतीजे के बाद यह आशंका थी कि होनिगबर्गर के लाहौर से बोरिया बिस्तर बांधने के दिन आ गये थे पर जिस तरह से होनिगबर्गर ने बीमार पशु की सेवा की और उसे बचाने की हर मुमकिन कोशिश की वह महाराजा रणजीत सिंह को भा गया। महाराज ने युवा डाॅक्टर को अपने दरबार में शामिल कर लिया और उसे इंसानों के इलाज की अनुमति दे दी। साथ ही उसके प्रयासों के लिए उसे उपहार भी दिए। इस उदारता के बाद भी होनिगबर्गर की महाराजा के बारे में व्यक्तिगत राय बहुत खराब थी। यहां तक वह महाराजा को निचले दर्जे का मानता था और घोड़े पर सवार महाराजा की तुलना वह हाथी पर सवार लंगूर से करता था।


महाराजा ने उसे अपनी तोपखाना बटालियन में एक ओहदा देने की पेशकश की। उनका मानना था कि वह भी दूसरे गारों की तरह सेना में उनके लिए भाग्यशाली साबित होगा। दूसरे गोरों को उन्होंने महत्वपूर्ण जगहों पर तैनात किया था क्योंकि वह गोरों को भाग्य का प्रतीक मानता था। होनिगबर्गर ने बिना सोचे ही इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया। उसने कहा, ‘मैंने महाराजा से कह दिया कि जिस पद के लायक आप मुझे समझ रहे हैं उसकी मैं सलाहियत ही नहीं रखता हूं।’

महाराजा कहां मानने वाले थे। उन्होंने इस इन्कार का जवाब पहले से ही सोच रखा था। उन्होंने तुरंत दूसरा प्रस्ताव दिया। उन्होंने उसे शाही बारूदखाने में अधीक्षक बना दिया। इस पद में नाम और पैसा यानी दौलत और शोहरत दोनों ही इफरात में थी। होनिगबर्गर ने इस प्रस्ताव को महज इसीलिए स्वीकार कर लिया क्योंकि वह बहुत दिन तक पंजाब में रुकने वाला नहीं था। वह जल्द से जल्द अपने घर वापस जाना चाहता था। उसने लिखा है, ‘मैं इस ख्याल से ही इतना परेशान था कि अगर कोई मुझसे यह कहता कि कोहिनूर ले लो और यहीं पर बस जाओ तो मैं उसे भी मना कर देता।’ यह भी कम दिलचस्प नहीं है कि वही होनिगबर्गर अगले दस साल तक महाराजा की इच्छा के मुताबिक दरबार में टिक गया।

पीढ़ी-दर-पीढ़ी सती 


राजतिलक होने से बहुत पहले ही खड़क सिंह ने महाराजा की पदवी धारण कर ली थी। जून 1839 में अपने पिता के अंतिम संस्कार के तुरंत बाद यह पदवी धारण करने वाला खड़क सिंह जल्दी ही सत्ता के दुर्गुणों से घिर गया। वह आलीशान दावतें करने लगा, जिनके अंत में वह नशे में पूरी तरह धुत इंसान के सिवा कुछ नहीं रहता था। उसने अपने शातिर वज़ीर ध्यान सिंह को नज़रअंदाज़ करना शुरू कर दिया और अपने सभी मंत्रियों और ताकतवर दरबारियों को हाशिए पर डाल दिया। धार्मिक खालसा जल्द ही नए महाराजा के व्यवहार से घृणा करने लगा था और ऐसा करने वाला वह अकेला नहीं था। नए महाराजा के तौर पर उसके सलाहकारों और सेनापतियों को जल्द ही उससे वितृष्णा हो गई, क्योंकि महाराजा के तौर पर उसकी रुचि राज्य के किसी भी मामले में नहीं थी बल्कि वह नशे, सुरा और सुन्दरी में ज़्यादा व्यस्त रहता था। उसके सिंहासन पर बैठने के चार महीने के भीतर ही उसकी हत्या की साजिश रच दी गई।


यह तय किया गया कि सफेदा कस्करी (सफेदा सीसा) और दस काफूर (पारे का मिश्रण) की खुराक महाराजा के रोज़ के खाने और शराब में मिलाई जाएगी। पहले तो इस ज़हर का असर कुछ खास नहीं दिखा। सिर्फ महाराजा की नशे में धुत रहने की अवधि बढ़ गई और उसकी आवाज़ हल्की लड़खड़ाने लगी। उसे अपने हाथ पांव में तालमेल करने में भी अब सामान्य से ज़्यादा समय लगने लगा था। इसके बाद धीरे-धीरे महाराजा अंधा होने लगा। इसके बाद उसके पूरे शरीर में एक रहस्मय लेकिन गंभीर पीड़ादायक खुजली मचने लगी और कुछ ही हफ्तों बाद उसके जोड़ों में दर्द और उसकी त्वचा में जगह-जगह से खून रिसने लगा। ज़हर की खुराक शुरू करने के छह मीने के भीतर ही महाराजा का एक-एक अंग धीरे-धीरे काम करना बंद करने लगा। खड़क सिंह अब सिंहासन से शय्या पर पहुंच चुका था। तिलतिल कर मर रहा वह मौत का इंतज़ार करने लगा था।


इस धीमी हत्या में ग्यारह महीने और लगे। इस दौरान खड़क सिंह के 18 साल के बेटे नौनिहाल सिंह को राजधानी बुलाकर युवराज बना दिया गया था। एक आकर्षक व्यक्तित्व और साहसी सेनानायक के तौर पर नौनिहाल सिंह वैसे तो सबकी पसंद था लेकिन उसे दरबारी सियासत का बिलकुल इल्म नहीं था। लिहाज़ा उसे अपने पिता के नाम और अपने वज़ीर की सलाह पर शासन संभालना पड़ा। अफवाहें इस तरह की भी रहीं कि खड़क सिंह को ज़हर देने की साज़िश शातिर वज़ीर ध्यान सिंह ने रची थी। हालांकि इसकी कभी पुष्टि नहीं हो सकी।


इस साज़िश में नौनिहाल सिंह के शामिल होने के कोई संकेत तो नहीं मिलते लेकिन उसने भी अपने पिता के प्रति कोई विशेष स्नेह या आदर नहीं दिखाया। जब खड़क सिंह जीवित और शय्या पर पड़ा था तो वह हर दिन अपने बेटे को देखने की भीख मांगता था। लेकिन होनिगबर्गर के लिखे संस्करण में यह साफ है कि नौनिहाल सिंह अपने पिता के पास बहुत कम अवसरों पर गया। खड़क सिंह की मौत 5 नवंबर 1840 को हुई और उसकी मौत को लोगों ने उस पर कुदरत का रहम माना। महाराजा की मौत के आधिकारिक एलान मंे बताया गया कि एक रहस्मय बीमारी से महाराजा की अचानक मृत्यु हो गई। इस एलान में महाराजा की महीनों से चल रही बीमारी का कोई ज़िक्र नहीं किया गया।



होनिगबर्गर के मुताबिक शायद किसी को महाराजा की मौत का न तो कोई दुख था, न ही कोई दिक्कत। लोगों ने उनकी मौत के कारण और उसके एलान पर सवाल उठाने की ज़हमत भी नहीं की। एक बार फिर से होनिगबर्गर पंजाब के शाही अंतिम संस्कार को इतनी जल्दी देख रहा था। उसका विवरण वह कुछ इस तरह लिखता है: ‘महाराजा के साथ उनकी तीन पत्नियां सती हो गईं। मैं एक बार फिर से यह भयावह दृश्य का साक्षी बना। यह भयावह ज़रूर था लेकिन इसकी तड़क-भड़क और धूमधाम में कोई कमी नहीं थी।’ उनके साथ उनकी ग्यारह दासियां भी सती हुईं लेकिन शायद यह विदेशी चिकित्सक सती के खौफनाक मंज़र का इस कदर आदी हो गया था कि वह उनके बारे में लिखना ही भूल गया।


खड़क सिंह ने जिस तरह अपने पिता को मुखाग्नि दी थी, नौनिहाल सिंह ने उस परंपरा का निर्वाह किया लेकिन खड़क सिंह से ठीक उलट, ऐसा करते समय नौनिहाल एक राजा की तरह व्यवहार कर रहा था। अपने पिता की रहस्यमय बीमारी के दौरान ही दरबारियों में लोकप्रिय हो चुका नौनिहाल सिंह नैसर्गिक नायक के तौर पर दरबार और जनता के बीच स्थापित हो चुका था। उसकी उम्र भले ही 18 वर्ष रही हो लेकिन उसकी परिपक्वता उसकी उम्र से कहीं आगे थी। और जो लोग अपने राजा में नायक और नेतृत्व तलाशते हैं उनके पैमान पर भी नौनिहाल सिंह कोहिनूर के असली हकदार के तौर पर खरा उतरा था।


पिता की चिता की राख ठंडी होने के बाद एक महाराजा अपने सभी दरबारियों को लेकर, जिनमें होनिगबर्गर शामिल था, रावी नदी के तट पर, ‘अस्थियां प्रवाहित करने पहुंचा जो पंबा की रवायत थी। इस बीच सबसे नज़रें बचाकर होनिगबर्गर वहां से निकल गया। उसने पंजाब की काफी ‘भयावह’ प्रथाएं देख ली थीं और अब उसके मरीज़ों को उसकी ज़रूरत थी। घर पहुंचकर उसने मरीज़ों को देखना शरू ही किया था कि महल से एक बेहद बौखलाया हुआ हरकारा उसके पास आया। नौनिहाल सिंह और उसके साथी रावी नदी से हजूरी बाग से होकर वापस लौट रहे थे, जिसे 1818 में रणजीत सिंह ने कोहिनूर हासिल करने की खुशी मेें बनवाया था। जब शाही काफिला हजूरी बाग के द्वार के नीचे से गुज़र रहा था, तो एक मेहराब से एक बड़ा सा पत्थर रहस्यमय तरीके से उनके ऊपर गिर पड़ा। पत्थर नौनिहाल और उसके दो साथियों पर गिरा, जिनमें से एक की तो मौके पर ही मौत हो गई। किस्मत से नौनिहाल को ज़्यादा चोट नहीं लगी और ब्योरे के मुताबिक वे पैदल वहां से चल कर गए। होनिगबर्गर अपनी दवाओं का बक्सा और मलहम लेकर आनन फानन में महल पहुंचा। उसे उम्मीद थी कि वह हल्की-फुल्की चोट खाए लेकिन सदमें में आए एक युवा महाराजा से मिलेगा। लेकिन उसका स्वागत दरबारियों के पीले पड़े चेहरों ने किया। वज़ीर राजा ध्यान सिंह ने होनिगबर्गर को अपने पीछे आने का इशारा किया:
एक मंत्री मुझे एक तंबू में ले गया। मंत्री ने मुझे निर्देश दिया कि मैं इस बारे में किसी को कुछ ना बताऊं। शिविर में नौनिहाल सिंह अपने पलंग पर थे। उनका सिर बुरी तरह कुचला हुआ था और उनकी हालत ऐसी थी कि अब उनके बचने की उम्मीद ही नहीं थी। इस विचार के साथ मैं शिविर से बाहर निकला और मंत्री से फुसफुसाकर कहा, ‘दबाएं अब इस अभागे राजकुमार का कोई भला नहीं कर सकतीं।’

नौनिहाल के साथ हुई इस ‘दुर्घटना’ के हालात पूरी तरह से अस्पष्ट थे और चश्मदीदों के बयान भी एक दूसरे से मेल नहीं खा रहे थे। वज़ीर का अपना भतीजा पत्थर के गिरने से घटनास्थल पर ही मारा गया था। और ब्योरे से उलट, ध्यान सिंह ने शपथ लेकर कहा कि नौनिहाल को हजूरी बाग में उनके भतीजे के समान ही चोट लगी थी। वहीं रणजीत सिंह की सेना में तोपची कर्नल एलेक्जैं़डर गार्डनर ने कुछ और ही कहानी सुनाई। जब ढांचा गिरा था तो गार्डनर युवराज के ठीक पीछे थे और उनके अपने आदमियों ने स्ट्रेचर पर ढो कर घायल नौनिहाल को महल तक पहुंचाया था। जैसा कि गार्डनर ने बताया, युवराज अपने पैरों पर चल कर जाने के लायक होशोहवास में थे और पानी मांग रहे थे। सिर्फ गार्डनर के आग्रह पर ही उन्हें स्ट्रेचर पर रख कर उनके बिस्तर तक पहुंचाया गया।


वहीं महज़ कुछ मिनटों बार होनिगबर्गर ने जिस युवराज को देखा वह न चलने के काबिल था और न ही बोल पा रहा था। नौनिहाल की खोपड़ी चकनाचूर हो गई थी और उसके बिस्तर की चादर उसके खून और भेजे के हिस्सों से सनी हुई थी। उसके जख्म इतने गंभीर थे कि वह कुछ घंटों बाद ही मर गया, हालांकि इस खबर को जनता से तीन दिनों तक छिपाकर रखा गया। नौनिहाल की चिता के लिए चंदन की लकड़ियां भी गोपनीय ढंढ से इकट्ठा की गईं और दिशाहीन पंजाब के आतंक की आगोश में समाने से पहले दरबार में खाली पड़ी गद्दी को भरने का खेल शुरू हो गया था। दरबारी मंत्री गद्दी पर अपना अपना दावा पेश कर रहे थे।


तीन दिन बाद जब इस ‘अनोखी दुर्घटना’ की खबर जनता को दी गई तो गार्डनर ने यह खबर देते हुए अटकलों को और हवा दी कि जिन पांच तोपचियों ने नौनिहाल को स्ट्रेचर पर ढोकर उसके पलंग तक पहुंचाया था, उनमें से रहस्मय ढंग से दो की मृत्यु हो गई, दो छुट्टी मांग कर गए और कभी नहीं लौटे और एक अजीबोगरीब ढंग से लापता हो गया। जब पंताब एक बार फिर से खुद को एक शाही अंतिम संस्कार के लिए तैयार कर रहा था-दो साल में तीसरी बार-तो ऐसे मंे कोहिनूर पर शक जाना स्वाभाविक था। क्या यह कोहिनूर का शाप था जो एक एक कर रणजीत हसंह के उत्तराधिकारियों को निगल रहा था?


9 नवंबर 1840 को नौनिहाल का अंतिम संस्कार हो रहा था तो उसकी किशाोर उम्र की दो पत्नियां उसके साथ सती होने के लिए उसकी चिता तक पहुंची। उसकी सबसे बड़ी पत्नी गर्भवती थी, इसलिए उसे सती नहीं होने दिया गया वहीं एक बेहद छोटी रानी को नौनिहाल के चाचा शेर सिंह ने सती होने से बचा लिया। होनिगबर्गर इस घटना को इस तरह दर्ज करता है: ‘दो बेहद खूबसूरत लड़कियां उसके साथ (नौनिहाल) लपटों की शिकार हो गईं। 12 साल की एक लड़की को बचा लिया गया… इसलिए कि उसकी उम्र बहुत कम थी और वह सती समारोह के लिए परिपक्व नहीं थी।’

 

इस बच्ची को बचाने वाले शेर सिंह खड़क सिंह के भाई थे। कद में नाटे, काली दाढ़ी, पैनी निगाहों और ओजस्वी दिखने वाले शेर सिंह ने अपने अधिकार का प्रयोग करते हुए इस बच्ची को चिता की आग से बचा लिया था पर कोहिनूर और सिंहासन पर दावा जताना उनके अधिकार में नहीं था। अब वे अपने भतीजे नौनिहाल को चिता में जलते देख कर दुखी तो थे पर एक बच्ची को बचाने का आत्मसंतोष ज़रूर उनमें रहा होगा।


बालक राजा

शेर सिंह रणजीत सिंह के दूसरे सबसे बड़े बेटे थे, जो खड़क सिंह से पांच साल छोटे थे। 1807 में पैदा हुए शेर सिंह जुड़वां हुए थे। दोनों बेटों में शेर सिंह 5 मिनट बड़े थे जबकि उनके जुड़वां भाई तारा छोटे। पर इन दोनों भाइयों और सिंहासन के बीच एक खाई थी। उनकी मां, महारानी मेहताब कौर, जिनकी सगाई रणजीत सिंह के साथ तब हो गई थी जब वह चार साल की थीं और महाराजा छह साल के थे। उनका नमा मेहताब इसलिए रखा गया था क्योंकि इसका मतलब चांदनी होता है और रानी के गोरे और बेदाग चेहरे और काया से यह नाम पूरी तरह न्याय करता था। उनके अप्रतिम सौंदर्य के सामने महाराजा कहीं नहीं ठहरते थे। महाराजा बेहद दुबले और कुरुप थे जिन्हें चेचक ने दागदार बना दिया था और उनकी एक आंख छीन ली थी। बहरहाल उनका विवाह 1796 में हुआ।


शादी सफल नहीं हो सकी। अमीर घराने में पैदा हुई मेहताब कौर एक स्वाभिमानी महिला थीं, उन्हें यह बिलकुल गवारा नहीं था कि महाराज रणजीत सिंह पूरे पंजाब के एक छत्र राजा बनने की ललक में शादी के एक दशक तक सिर्फ युद्ध करते रहें। दरअसल महाराज के पास उन पर ध्यान देने का ज़रा भी वक्त नहीं था। उन्होंने युद्ध में जीतने के बाद अपने हरम में बहुत सी सुंदरियों को जगह दे दी थी। यह मेहताब को बर्दाश्त नहीं हो सकता और वह राजधानी से 65 मील उत्तर पूर्व में स्थित अपनी मां के घर बटाला रियासत लौट गईं। भले ही रणजीत सिंह मेहताब के घर यानी अपने ससुराल जाते रहे पर वास्तविकता यह थी कि दोनों के बीच रिश्ता सिर्फ नाम का ही बचा था। इसके बाद के कुछ सालों में महाराजा रणजीत सिंह ने बहुत सी महिलाओं से शादी की और बहुत सी दूसरी खूबसूरत महिलाओं को अपने हरम में रखा। जब महाराजा की दूसरी पत्नी दतर कौर ने खड़क सिंह को जन्म दिया तो मेहताब की मां ने उन्हें महाराजा के साथ संबंध सुधारने की सलाह दी। दरअसल खड़क सिंह के जन्म ने राजशाही में मेहताब की स्थिति कमज़ोर कर दी थी और यह न तो मेहताब के लिए मुफीद थी न ही उनके परिवार के लिए। महराजा के रहमोकरम पर पल रहे उनके परिवार के लिए तो यह बिलकुल अनुकूल नहीं था।


संबंध सुधारने के अच्छे परिणाम अपने भी लगे थे क्योंकि 1803 में मेहताब ने एक बच्चे इशर सिंह को जन्म दिया था पर उसकी एक साल का होते ही मौत हो गई। इस सदमे से वह उबर भी नहीं पाई थी कि उसकी मां ने उसे फिर से महाराजा को लुभाने के लिए कहा। इस बार महाराजा का ध्यान आकर्षित करना आसान नहीं था क्योंकि अब महाराजा एक मुस्लिम तवायफ मौरन के इश्क़ में अंधे हो चले थे। सिर्फ मेहताब ही नहीं मौरन के आगे महाराजा को पूरा हरम फीका लगने लगा था। अब सारा प्यार महाराजा उसे पर लुटाते थे। बावजूद इसके तीन साल बाद मेहताब ने महाराजा को फिर से हासिल कर लिया और जल्दी ही जुड़वां बच्चों शेर सिंह और तारा को जन्म दिया।

इस दोहरी खुशी की उम्र ज़्यादा लंबी नहीं थी। बटाला में चल रहे जश्न थमने लगे थे। बच्चों की पहली किलकारियों के साथ एक भयावह अफवाह ने भी जन्म ले लिया था। यह आरोप लगाए गए कि मेहताब ने लड़की को जन्म दिया था पर क्योंकि लड़कियां सिंहासन की उत्तराधिकारी नहीं हो सकतीं, इसलिए उन्होंने अपनी बेटी को किसी को दे दिया था और बदले में वे एक बुनकर और एक बढ़ई के दो बच्चे ले आई थीं। रानी पर अपनी बेटी बदलकर आम जनता के दो बेटे लेने का आरोप सही हो या गलत पर रणजीत सिंह ने इन दोनों को अपना कानूनी उत्तराधिकारी मानने से इन्कार कर दिया था। यह बात और थी कि रणजीत सिंह ने उन दोनों लड़कों को बेदखल नहीं किया था और उनका पालन-पोषण राजकुमारों की तरह महल में ही हुआ। पर सार्वजनिक तौर पर इन दोनों को उत्तराधिकारी न मानने से यह तय हो गया था कि तारा और शेर सिंह दोनों कभी भी राजा नहीं बन सकते थे। पिता की चुप्पी ही उनकी नियति बन गई थी। इसी के सहारे उन्होंने बचपन काटा और बाद में ताकतवर और समृद्ध भी बने, लेकिन शर्मिंदगी ने उनका पीछा नहीं छोड़ा।

यह हिस्सा लेखक द्वय की किताब ‘कोहिनूर’ (जगरनाट प्रकाशन) से उद्धृत है. 


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दिल्ली सरकार के खिलाफ आगे आये रंगकर्मी: मनीष सिसोदिया सवालों से बचते नजर आये



रंगकर्मियों के प्रदर्शन कभी-कभी के ही दृश्य होते हैं. रंगकर्म की अस्मिता और उसकी स्वायत्तता बचाये रखने के लिए रंगकर्मियों के एक समूह ने राजधानी के मंडी हाउस स्थित श्रीराम सेंटर के सामने आज (4दिसम्बर)  उस वक्त प्रदर्शन किया जब दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया साहित्य कला परिषद के युवा महोत्सव  का उदघाटन करने वहाँ पहुंचे. शांतिपूर्ण तरीके से हाथों में तख्तियां लिये रंगकर्मी श्रीराम सेंटर के गेट के पास खड़े थे लेकिन लोकतंत्र की कथित अगुआई करने वाली, उसकी बात करने वाली पार्टी के नम्बर दो मनीष सिदोदिया उन्हें नजरअंदाज कर आगे बढ़ते गये. यहाँ तक कि मीडियाकर्मियों ने जब उनसे इस बावत बात करनी चाही तो उन्होंने सिरे से मना कर दिया.



रंगकर्मियों का दिल्ली सरकार पर आरोप है कि वह मनमाने तरीके से रंगकर्म को नियंत्रित करने की कोशिश कर रही है. उनके अनुसार दिल्ली सरकार के साहित्य कला परिषद के युवा महोत्सव में अपनी दलगत राजनीति को बढ़ावा देने के लिए विषय नियंत्रित किये गये.

नाट्य निदेशक ईश्वर शून्य ने कहा कि ‘ इस तरह यह कोशिश रंगकर्म को अपने प्रचार तन्त्र में बदल देने की है, जो आने वाली सरकारों में और भी असर डालेगी .’  उन्होंने कहा कि देश भर के रंगकर्मियों की इस पर आपत्ति के बावजूद सरकार अपने निर्णय पर अडिग है.



दिल्ली सरकार के इस पहल को रंगकर्म के लोकतंत्र पर सीधा हमला बताते हुए समकालीन रंगमंच के संपादक राजेश चन्द्र ने कहा कि ‘ सरकार रंगकर्मियों को पर्याप्त मंचन सुविधा उपलब्ध कराने जैसे अपनी मुख्य भूमिका की जगह उसे अपने नियंत्रित माध्यम में बदलना चाहती है. उसे विभिन्न माध्यमों से बताया गया है कि सस्ती दर पर सरकार से जमीन लेकर श्रीराम सेंटर जैसे सभी थिएटर रंगकर्मियों से खूब पैसे वसूल करते हैं.’ गौरतलब है कि दिल्ली की मंहगी जगह में बना श्रीराम सेंटर एक रूपये के टोकन अमाउंट के बदले दी गयी जमीन पर बना है.

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आदिवासी बच्चों के स्कूल बंद कर रही सरकार और लूट लिये आदिवासी मद के पैसे

महाराष्ट्र में आदिवासी मद के पैसों  के  बड़े बंदरबाँट  का मामला सामने आया है. संघ प्रायोजित स्कूलों  और निजी स्कूलों के हित में सरकारी आदिवासी स्कूल बंद करने के आरोप स्थानीय आदिवासी समाज के लोग भाजपा सरकार पर लगा रहे हैं. पढ़ें पूरी रपट. मनीषा के साथ नितिन राउत और अशोक काम्बले. 

इन्डियन एक्सप्रेस से साभार

बच्चों की पढाई धीरे-धीरे सरकारों की प्राथमिकता सूची से गायब होती जा रही हैं और बच्चा यदि गरीब परिवार से, दलित या आदिवासी हो तब तो उसे और भी उदासीनताओं का सामना करना पड़ता है. शिक्षा अब सरकारों के सरोकार से ज्यादा पूंजी उगाहने का निजी तन्त्र बन चुका है और पैसा उगाहने के तंत्र को सत्ता में बैठे लोग अपने निर्णयों से बढ़ावा दे रहे हैं. हालांकि देश की राजधानी के स्कूलों से अच्छी खबरें आ रही हैं,  सरकार द्वारा नियंत्रित और संचालित स्कूल निजी स्कूलों को मात दे रहे हैं और इसका वाजिब श्रेय आम आदमी पार्टी की सरकार को जाता है. लेकिन देश के दूसरे हिस्सों में, जहां से विकास का ज्यादा शोर-शराबा है ख़बरें बेहद निराशाजनक और बुरी हैं.

फोटो अशोक कांबले

करोड़ो के बारे-न्यारे और फिर स्कूल पर ताला
शानदार भवन किसी कॉलेज का नहीं है, बल्कि बच्चों के स्कूल का बना नया भवन है, जिसे बनते ही ताला डाल दिया गया और स्कूल किसी दूसरे स्कूल में मर्ज कर दिया गया. हाँ, महाराष्ट्र के विदर्भ इलाके में यह सरकार द्वारा संचालित ‘आदिवासीशाला’ का भवन है, जिसके निर्माण में करोड़ो खर्च हो गये, ठेकेदार को अपना हिस्सा मिला और दूसरों को अपना. फिर फरमान आया कि यह आश्रामशाला शिफ्ट किया जा रहा है. यह भवन वर्धा जिले के नवरगाँव का है. जिले के ही सिंडीविहरी सहित जिले और विदर्भ (हमारे पास अमरावती प्रकोष्ठ की सूची है) के दो दर्जन  से अधिक स्कूल बंद किये जा रहे या किसी दूसरे स्कूल में शिफ्ट किये जा रहे हैं. वहीं महाराष्ट्र के आदिवासी इलाकों में यह संख्या 50 से भी ऊपर है.

पढ़ें : संघ प्रमुख की सुरक्षा पर हंगामा , आगे आये दलित संगठन 

शासकीय आदेश

लोगों में आक्रोश
इन स्कूलों के शिफ्ट किये जाने पर स्थानीय जनता में भारी आक्रोश है. आदिवासी अभिभावक सवाल कर रहे हैं कि आखिर हमारे बच्चे कहाँ जायेंगे, वहीं वे दूसरा सवाल भी सरकार से दाग रहे कि जब इन स्कूलों को शिफ्ट ही करना था तो फिर इनके भवन निर्माण में आदिवासी विकास के पैसे खर्च क्यों और किसके इशारे पर किये गये. आदिवासी नेता अवचित सयाम कहते हैं कि ऐसे दर्जनों स्कूल के भवन बनाये गये और उन्हें या तो बंद कर दिया गया है या एक दूसरे में समायोजित किया जा रहा है. उनके अनुसार आदिवासी मद के पैसों का बंदरबांट करने के लिए अफसरों-नेताओं और ठेकेदारों की मिलीभगत से इन स्कूलों के भवन बने और बनते ही यहाँ पढाई बंद कर दी गयी.

स्कूलों की सूची

अफसरों के बहाने 
आश्रमशालाओं के संचालन का  जिम्मेवार विभाग के अफसर इस मसले पर कई तर्क देते हैं. वे कहते हैं कि स्कूल बन गये तो कई स्कूलों के इलाके अभयारण्य में घोषित हो गये, इसलिए उन्हें शिफ्ट करना पड़ा तो कई स्कूल इसलिए एक समायोजित हो रहे हैं कि वहां बच्च्चे पढने नहीं आते. इन शालाओं के प्रशासन के सबसे बड़े अधिकारी महाराष्ट्र के आदिवासी कमिश्नर आर जे कुलकर्णी से जब इस बावत बात की गयी तो उन्होंने मामले को अमरावती जोन में असिस्टेंट ट्राइवल कमिश्नर की तरफ बढ़ा दिया, यानी उनसे बात करने की सलाह दे दी. हालांकि आदिवासी अभिभावक प्रतिप्रश्न पूछते हैं कि ‘क्या इलाकों का अभ्यारण्य घोषित होना कोई अचानक से लिया गया निर्णय है?’  वे कहते हैं कि विभागों में सम्बंधित फाइलें जब घूम रही होंगी तो सारे अफसर इस बात से अवगत थे लेकिन उन्हें आदिवासी मद का पैसा मिलजुलकर खाना था इसलिए उन्होंने बंद होने वाले स्कूलों के भवन बनवाये.

पढ़ें : बाल विवाह के लिए अभिशप्त लड़कियाँ

निजी और संघ संचालित आश्रामशालायें
जहां  सरकार का दायित्व है कि अपने स्कूलों में वह बच्चों को आकर्षित करे, उन्हें पढने के लिए प्रेरित करे वहीं वह स्कूलों को समायोजित करने के निर्णय ले रही है. राज्य की भाजपा सरकार का कहर इन स्कूलों पर निजी स्कूलों और संघ संचालित स्कूलों में आदिवासी बच्चों को जाने के लिए प्रेरित करने का षड्यंत्र है. विदर्भ में कुल सरकारी आश्रम स्कूल (आदिवासी बच्चों के लिए ) 502 हैं और अनुदानित स्कूल 543, जो निजी हाथों में हैं या संघ के लोगों के नियन्त्रण में.

आदिवासी नेता सयाम  कहते हैं ‘ संघ हमारे बच्चों को उनकी संस्कृति से दूर कर हिन्दू संस्कृति में ढालता है, उनके कच्चे मानस पर शबरी और निषादराज का त्याग समर्पण आदि के आदर्श भरे जाते हैं ताकि वह कथित रामराज्य के लिए मरे. वे पूछते हैं कि वे ‘एकलव्य का उत्पीडन क्यों नहीं पढ़ाते? संघ ‘एकल विद्यालय’  ‘वन बंधु परिषद’ आदि नामों से कई स्कूल आदिवासी इलाकों में चलाता है. धरनी में एक छात्रावास हेडगेवार के नाम से है, इस नाम से कई स्कूल संचालित हो रहे हैं. स्थानीय इलाकों में घूमने पर बजरंग दल की सक्रियता के कई प्रमाण मिलते हैं. एक आदिवासी कार्यकर्ता ने बताया कि भाजपा नेता नितिन गडकरी ने नागपुर में अपने जन्मदिन पर संघ के वैसे कार्यकर्ताओं के बीच पैसे बांटे जो इन इलाकों में स्कूल संचालित करते हैं और उनसे और भी स्कूल खोलने का आग्रह भी किया.

दो-दो बच्चों की ह्त्या फिर भी भाजपा की महिला नेता और स्कूल प्रबंधक को बचा रही मोदी-खट्टर सरकार

साभार google

महाराष्ट्र में और भी स्कूल किये जा रहे बंद या समायोजित 

किसान नेता अविनाश काकड़े ने बताया कि आदिवासी इलाकों के अलावा भी कई स्कूल बंद किये जा रहे हैं. सैकड़ो स्कूल पूरे महाराष्ट्र में या तो बच्चों की कमी के नाम पर बंद किये जा रहे हैं या समायोजित. वे कहते हैं इन सरकारी स्कूलों में गरीब परिवारों के बच्चे  किसानों के, दलितों के आदिवासियों के बच्चे पढ़ते हैं. स्कूल के इलाकों के बच्चों को पर्याप्त व्यवस्था न देकर स्कूल बंद करना सबके लिए शिक्षा की नीति पर प्रहार करता है.

संपर्क:nraut5@gmail.com

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