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देहसत्ता का रहस्य ( दूसरी क़िस्त)

प्रमीला केपी

 प्राध्यापिका, श्रीशंकराचार्य संस्कृत विश्वविद्यालय,
कालडी, केरल
प्रोफेसर . संपर्क :prameelakp2011@gmail.com


पढ़ें पहली क़िस्त : देहसत्ता का रहस्य (पहली क़िस्त)



देहलेखन के महत्व को स्त्रीवादियों  ने काफी पहले ही पहचान लिया था और उन्होंने देह से लेखन करने का आह्वान किया था। मूक बहनें जब आवाज निकालती थीं तबसे उनकी आवाज में देह का बोधाबोध भी प्रच्छन्न ढंग में ही सही, अभिव्यक्त होता था। स्त्रैणानुभवों तथा देहसंवेदनाओं पर जाने-अनजाने सोचती हुई स्त्रियों में देहास्तित्व का बोध जाग उठता है। देह को सामाजिक दबाव में हेय समझा जाता था, लेखन व सोचविचार द्वारा स्त्री उस निराधार निष्कर्ष को पलटना चाहती है। अब तक उसकी देह की परिभाषा एवं उसके व्यापारों की व्याख्या कोई दूसरा कर रहा था तो अब वह खुद करने लगती है। स्वाभाविक तौर पर उसके विश्लेषण में स्त्रीपक्षीय तथा स्त्रीविरोधी पक्ष उभर आते हैं। अर्थात् पुंससमाज में जीवित-परिपोषित जीव होने के कारण उसके कार्यों में वर्चस्ववादी छाप लगना संभव्य है। स्त्रीवादी लेखन इस स्वाभाविकता को धीरे धीरे ही सही, टालने का काम भी है। विनिर्मित वस्तु से जीवित-प्रस्फुटित आत्मा और देहयुक्त स्त्री का विकास यहॉ से शुरू होता है। देह की नई व्याख्या देखकर दुनिया झुंझलाती है। मोली हेट ने बताया था कि ऐसी स्त्रियॉ पुंस संसार केलिए सिरदर्द बन जाती हैं, जो स्वात्म देह संबन्धी नव व्याख्याओं के साथ लेखन करती हैं। क्योंकि उनके द्वारा प्रयुक्त एवं प्रक्षेपित देहार्थ भिन्न या अलग है।7  गजब नहीं कि चालू तथा व्यवहृत परिभाषा पर प्रश्नचिह्न लगानेवाली स्त्री-यौनाभिव्यक्तियों पर पुंसभृकुटियॉ चढ लेती हैं। इस क्रम में परंपरागत अर्थसंसार में नवार्थ जोडा जाता है, जो बंद अर्थ के सामने मुक्त-अर्थ प्रसारित रखता है।

हेलेन सिसु जैसी नारीवादिनों ने स्त्रियों से शरीर को देखने-परखने-स्वीकार करने का आह्वान इसलिए किया था कि पितृदायक समाज, स्त्रियों की देह और यौनिक वृत्तियों से अलग होने-रहने का अभिनिर्णय सुनाता है। दैहिक शुद्धता एवं नैतिक पवित्रता के पुंसमापदंडों में स्त्रीदेह का घोर-अपमान किया जाता है। सिसु के मतानुसार इस अपमान को समाप्त करने केलिए नई भाषा में अभिव्यंजना अनिवार्य है, जिसमें बेधने की शक्ति एवं धिक्कार की उूर्जा हो।8  गर्भ, प्रजनन, मातृत्व आदि देहकार्यों के सही वर्णन से दैहिक दासता व पारिवारिक गुलामी का अहसास स्त्रियों में संक्रमित होता है। यहॉ तक शौच्य तथा प्रसाधन संबन्धी कठिनाईयॉ उसपर मानसिक अन्यता थोपती हैं और उसे दूसरे खेमे पर धकेलती हैं। इन मानसिक स्थितियों को खोल रखनेवाली रचनाएं स्त्रियों केलिए अनिवार्य हैं। स्वाभाविक रूप से इनपर अश्लीलता, यौनता, असभ्यता के आरोप लग जाते हैं। शरीर व शारीरिक अवयवों के चित्रण में खतरा इसलिए है कि सामान्य समाज में इनके पुंस निर्मित अर्थ में ही प्रचलित व स्वीकृत हैं। उदाहरणार्थ योनि शब्द सुनते या पढते ही लोग उसके पूवार्थ पर ही सोचते हैं। इस क्रम में दूसरी विडम्बना यह है कि स्त्रियों के संदर्भ में इंसान का इंगित अक्सर देह मात्र रह जाता है।  उसपर यौनदृष्टि से देखा जाता है मानो यौनता के अलावा उसकी कोई दूसरी उपादेयता या कर्म है ही नहीं है। प्रेम में हो या मातृत्व में, स्त्रीदेहवर्णन में हर कवि अपनी मर्दवादी फान्टसियों में गोता लगाता है। विपरीत में सोचता है तो एकाधिक पुरूषों से संपर्क रखनेवाले स्त्रीपात्रों को, लेखिकाएं भी सदाचारविरोधिनी चित्रित करती हैं। हो सकें तो कहानी व उपन्यास के अंत में उनका नाश, पूर्वनिश्चित सा प्रस्तुत करती हैं। ऐसे उदाहरणों से कुलस्त्री व कुलच्छनी, स्वकीया व परकीया का द्वन्द्व खडा करके सामाजिक सदाचार व पारिवारिक सद्भाव को निर्दिष्ट किया जाता है। इस तरह अधीशत्व के परंपरागत पुरूषमूल्य को परोक्षतया स्त्रियॉ भी स्वीकार करती हैं। स्त्रीचरित्र को अहम स्थान देनेवाली भारतीय सभ्यता ने, कबसे, क्यों और कैसे इस तरह की स्त्रीनिंदा या सामाजिक दोहरापन चालू किया है, यह देखने के बजाय, अपनी परिधि खोलनेवालियों पर प्रत्यक्ष या परोक्ष निंदा प्रकट की जाती है। आसार की बात है कि कई संदर्भों पर ये रचनाएं, मात्र स्त्रियों को नैतिक नियमों की संरक्षक बनानेवाली सामाजिक विडम्बना पर परोक्षता प्रश्न करती हैं। उनसे प्रतिकार करनेवालों के अनुसार सभी सामाजिक परिसंपत्तियों का स्वामित्व पुरूषों को दिया जाता है तो नैतिकता का दायित्व भी उसे ही देना और संभालना है।

स्त्रियों के देह विषयक आकलनों को नवसांस्कृतिक विश्लेषण केलिए उपयुक्त करना है। भले ही इनमें कई, यौनचित्रण के नाम पर मशहूर हैं, उनका साहित्यिक कार्य इस विषय को सिर्फ खोल देने भर में नहीं है। उनपर जीवन व मानवीय संबन्धों का बृहद् पाठविमर्श तैयार किया जा सकता है, जिनसे स्थापित-प्रवर्तित मापदंडों पर शंकाएं उभर आ सकती हैं। आधुनिकता के द्वन्द्वात्मक दर्शन से अभिप्रेरित व्यवहारों के कारण पुरूष पर जीत हासिल करने की इच्छा पालनेवाली स्त्री भी समाज में है। इसका कारण यह नहीं है कि वह स्वामिनी बनना चाहती है, कारण यह है कि वह हमेशा हारी हुई पाती है। उसका प्रयास पुंसाधिपत्य की दुनिया में कठिन है, कई संदर्भों पर असंभव है। समाज, संस्कृति, राजनीति व संबन्धों के सभी तत्व पुरूष के साथ और हाथ में हैं। इस कथन का यह भी अर्थ निकलता है कि उपर्युक्त सामाजिक अधिकारव्यवस्था में ही पुरूष बलशाली है, अन्यथा वह भी अकेला और दुर्बल इंसान है। अतः पुरूष को अधिकारी बना कर रहनेवाले सामाजिक-संजाल को विखंडित एवं विघटित करना है ताकि पुरूष और स्त्री समकक्ष के प्राणी होकर जीवित रह सकते हैं। अधीशत्व के जाल में हमेशा शिकार और शिकारी का द्वन्द्व होता है, जिसे तोड देने केलिए द्वन्द्व का फासला कम करना है। स्त्रदेखल से कम से कम, फासला कम होने की उम्मीद बनी रहती है।

द्वन्द्वात्मक दृष्टि से देखा जाता है तो पुरूष को हराने या वश में करने केलिए यौनता स्त्री का सहायक उपकरण बन सकती है। इस तरह की कहानियॉ पुराण व इतिहास में उपलब्ध भी हैं। इनमें संस्थागत स्वरूप में यौनता का उपयोग वर्णित है, जहॉ पर उसका संवेदनापक्ष गौण या सीमित है। आंखों से नायक को नियन्त्रित रखनेवाली नायिकाएं पुरातन काल से साहित्यिक रचनाओं में आती हैं। पुंसत्व को वशीभूत करके, उससे समकक्ष का अस्तित्व स्थापित करनेवाली नायिकाएं बाद में उभर आती हैं। मर्दवादी, हिंसाप्रेमी, स्त्रीशोषक खलनायक को अपने वश में करनेवाली स्त्री का प्रतिपादन पहले सकारात्मक माना जाता था। बाद में इस दृष्टिकोण का उतना स्वागत नहीं किया जाता है। राष्ट्र् या समुदाय के हित में खलनायक को काबू में लेनेवाली नायिका, पाठकों या दर्शकों को गहरा छू लेती है। उसका सम्मान किया जाता है। परवर्ती विरचना में स्त्रीराजनीति के आख्यानों के बल पर ऐसी रचनाओं की यही व्याख्या की गई कि ये सब सत्ता एवं संरक्षकों द्वारा किए गए स्त्रीशोषण के उदाहरण हैं। स्त्रीयौनता के साहित्यिक एवं कलात्मक उदाहरणों के द्वारा स्त्री व पुरूष के बीच विद्यमान इस विषयक दृष्टिभेद की चर्चा आज संभव है। कठोर अवमानना और उपेक्षा के बावजूद, बच्चे या परिवार की खातिर त्याग सहनेवाली गृहस्थिनों व औरतों की कहानियॉ बहुत हैं। स्त्रियॉ भी इस मानसिक अभिभूतता या सामाजिक अनुकूलन की शिकार होती हैं कि प्रशासन या सत्ता की खातिर आत्मत्याग व देहत्याग में बड्डप्पन है।

बताया जाता है कि जहॉ पर स्त्री अपनी यौनता खोल रखती है वहॉ पर पुरूष भयभीत हो जाता है। इस कारण से भी वह निषेधों का संस्थागत जाल बुनता है और स्त्री को परिधिबद्ध कर देता है। अपनी इच्छा और मर्जी में विकल्पों की तलाश करनेवाला पुरूषसमाज, उन स्त्रियों को बदचलन घोषित कर देता है जिसके पास वह जाता है। प्रेम तिरस्कार के मारे आसिड अटैक, आक्रमण या हत्या कर देनेवाले प्रसंगों में यह स्वार्थ पाशवीयता, अमानवीयता और सादवाद में परिणत हो जाता है। तमाशा यह है कि सामाजिक व सांस्कृतिक जगत में स्त्री द्वारा यदि चयन किया जाता है तो उसे तुरंत यौनकुंठित घोषित किया जाता है, यह जरूरी नहीं कि वह यौनता संबन्धी मामला हो। मतलब है कि पितृदायक संसार में चालू स्त्रीनिंदा के सभी शब्द, यौनसूचक भी हैं। विपर्यय यह भी है कि यौनता के प्रसंग में पुरूष का वशीभूत होना स्वाभाविक माना जाता है, वहॉ पर स्त्री खलनायिका है, शिकारी है। उसका कार्य बोधनियन्त्रित है, सदाचार के खिलाफ भी है, जबकि सकल बलशाली घोषित पुरूष भोलाभाला है, जो किसी की कनखियों पर फिसल जाता है।

यह बताना होगा कि यौनता विषयक या सूचक रचनाएं, उस संबन्धी सदाचारवादी नियमों के उल्लंघन या अतिलंघन की प्रेरणा में ही लिखी नहीं जाती हैं। कई प्रसंगों में, स्त्रीपक्षीयता का विश्लेषण और परंपरागत यौनता के विखंडन केलिए उन्हें उपयुक्त किया जा सकता है। इसलिए संदेह नहीं होना चाहिए कि ’प्यार में डूबी हुई मॉं’9  जैसा विषय जब तक किसी एक व्यक्ति तक की नजर में असभ्य एवं अश्लील है, तब तक उस कविता का सृजनात्मक व वैचारिक मूल्य सामाजिक एवं साहित्यिक जगत पर स्वीकृत होता रहता है। सच यह है कि सभी काल व समय में, सभ्यता ने प्यार में डूबनेवाली मॉओं व पत्नियों को सामने पाया है। उनपर, उनकी देहाकांक्षाओं पर ऑखें मूंदने से कोई विशेष लाभ नहीं है, बस इससे सामाजिक कपटता का परिचय मिलता है। यह सहज है कि कोई मॉ या पत्नी, किसी आदमी या औरत के प्यार में डूब जाती है। सदाचारवादी निष्कर्ष देने में नहीं, वैचारिक उद्वेलन छेडने में रचनाओं का कार्य है। यौनता को अश्लीलता या श्लीलता के परे सांस्कृतिक एवं सृजनात्मक बनाए रखने में खुली तथा व्यावहारिक दृष्टि की महती भूमिका है।

यौनता का भी अपना स्वनिर्णीत जैविक परिधियॉ हैं, होनी चाहिए। वह किसी धर्म या समाज के निर्दिष्ट नियमों के अधीन नहीं हैं। वासना से लैस आंखों से स्त्री देह को देखनेवाली पुंसदुनिया से लेखिकाएं यह बताना चाहती हैं कि उनमें भी यौनता है, देह संवेदना है, जो जैविक प्रवृत्त होती है। यह बताती हुई उसे कोई बदचलन पुकारता है तो उससे उसका कोई लेनादेना नहीं है। क्योंकि जो व्यक्ति इस विषय पर गत्यात्मक नहीं है, उसपर सकारात्मक सोचता तक नहीं है, तो उसकी किसी राय या अपशब्द से परेशान होने का कोई अर्थ नहीं है। दांपत्य के बाहर जाने की नियति हो या कुलमहिमा से भागने की कोशिश, स्त्रियों की यौन-यात्रा संस्थागत गुलामी से बाहर होने की नीयत रखती है। उसमें खुद की देहमहिमा को सुरक्षित रखने की नीयत भी शामिल है। इसलिए कहानियों व उपन्यासों में हो या कला या फिल्मों में, परिवार के भीतर होनेवाले बलात्कार, माने मेरिटल रेप का वे वितृष्णापूर्वक बखान करती हैं, जिसके अतिरेकों व आक्रमणों पर धर्म, समाज व सत्ता हमेशा मौन रहती है। धीरे धीरे ही सही, स्त्रीपक्षीय कला व साहित्य में वैवाहिक संस्था के भीतर चालू अतिरेकों व शोषणों का परिचय हो ही रहा है। पति सहित समस्त पुरूषों के देहशोषण पर प्रतिकार करनेवाली औरतें, वैवाहिक यौनता के संस्थागत अधीशत्वों को बाहर रखना चाहती हैं। बताया जाता है कि बलात्कार से पीडित लडकी या स्त्री को जीवनभर उसकी खौफनाक याद सताती है। यौनता से प्रेरित समझाए जाने के कारण उस कृत्य पर वह जुगुप्सात्मक ही सोच सकती है। असल में यौनता के साथ बलात्कार का संबन्ध पुर्नविश्लेषित करने का समय आया है। मनोवैज्ञानिकों व समाजवैज्ञानिकों का मत है कि बलात्कार शिकारी मानसिकता से प्रेरित पाशविक आतंक है, उसमें देहानंद नहीं है। बदले में यौनता तन-तन की संवेदनात्मक स्फूर्ति है, जिससे इंसानों को अनंद मिलता है। अतः शारीरिक निंदा, चाहे वह घर के बाहर घटित हो या भीतर, उसे अलग-अलग देखने की पुंसवादी कपटता को स्त्रीविमर्श खोलने का प्रयास करता है। भर्ता के सामने खुली व त्यागमयी रहने का हठ सुनानेवाली पुंसदुनिया सार्वजनिक जगहों पर स्त्री से बंद और सीमित रहने का जिद् करती है। यह देहसहित स्त्री की भी निंदा बन जाती है। फिर भी पति के सामने ’सबकुछ’ प्रस्तुत करनेवाली कुलवधु औरत को छोडकर पति बाहर जा सकता है, जाता भी है। पर पत्नी का किसी भी कारण पर बाहर झांकना, सामाजिकता के खिलाफ होनेवाली यौनिक उच्छृंखलता है। अतः जब तक उसका बदन है, तब तक उसपर घरेलू भावशुद्धि का आवरण बना रहता है।

कात्यायनी की एक कविता है-’देह न होना’। उस कविता में देह को स्त्री मानने की दुनियाई अतिरेकता का बयान है-देह नहीं होती है/ एक दिन स्त्री/ और/ उलट-पुलट जाती है/ सारी दुनिया/ अचानक!10  देहजन्य यह अन्यताबोध, किसी पुरूष की कलम से इस तरह अभिव्यक्त होता नहीं है। काया, कभी उसे इस प्रकार का कचोटता अनुभव नहीं देती है। बदले में वह कर्ता एवं भोक्ता की जिस्मानी खुशी एवं मजा व्यक्त करता है। कालबोध की नवधारा में कभी उसे अपराधबोध महसूस होता है कि वह ठीक नहीं कर रहा है-मैं उसे प्रेम नहीं करता था/ मैं उसे अब भी प्रेम नहीं करता/ मैं उसे पसंद करता था/ मैं उसे पाना चाहता था/ दरअसल मैं उसकी देह को पाना चाहता था।11

स्त्री का स्त्री के प्रति जो स्नेह या प्रेम हो सकता है, होता है, उसपर मात्र यौनदृष्टि डालना सदैव ठीक नहीं रहता है। आपसी साझेदारी लिंगस्तर के द्वन्द्वपूर्ण मिश्रण का मात्र कमाल नहीं है। समान लिंगजीवियों के बीच में भी जीवन की साझेदारी हो सकती है। उनके बीच में यौनिक साझेदारी भी है तो उसे संवेदनात्मक परिणति के रूप में देखने की विशाल मानसिकता, लोकतंत्रीय जगत को स्वायत्त होनी चाहिए। इंसानी रिश्तों को व्यापक मानने व बनाने केलिए लोकतंत्रीय यौनदृष्टि की सख्त जरूरत है। यौनता की विभिन्न रीतियों पर युक्तिसंगत देखना-समझना है। शीला किटसिंजर के मतानुसार समलिंगस्तरीय जीवों के बीच का संबन्ध, आत्मविश्लेषण केलिए उन्हें तैयार करता है, जिससे प्रेम को लेकर उनकी परंपरागत जानकारियों व संस्थागत सीमित अभिरूचियों में विस्तार आ जाता है।12  ठीक तरह देखा जाता है तो यह मालूम होता है कि इस विषयक रचनाएं साझेदार लोगों केलिए ही नहीं, परिवार और समाज के सदस्यों को भी आत्मविमर्श, समाज विमर्श एवं सत्ताविमर्श का अवसर देती हैं। पवन करण की कविता ’मौसेरी बहनें’ की पंक्तियॉ इस प्रसंग में किंचित परिचय सामने रखती हैं, जिनपर स्त्रीपक्षीय व विरोधी वाचन संभव हो सकते हैं-’दरअसल उन्हें उपेक्षाओं ने मौसेरी बहनें बनाया है/ निराशा ने बनाया है उन्हें एक-दूसरे के प्रति विश्वसनीय/ एक-दूसरे केलिए दीवार की तरह डटकर खडे हो जाना/ उन्हें चाटने को लपलपाती जीभों ने सिखाया है।’ 13 संदर्भवश यह जोड देना है कि कवि की पंक्तियों में गुंफित पुरूषदृष्टिकोण की सीमाएं खोल देनेवाली पाठिका का यह दायित्व भी है कि उसमें या उससे प्रवाहमान स्त्रीवादी दृष्टि को अग्रषित करे और उसे अपनी दृष्टि से मिलाकर व्यापक बनाए। पूरी प्रक्रिया में यह ध्यान रखे कि नकारात्मक या विपरीत पक्षों पर पाठकीय-जश्न संपन्न न हो, जिससे अंततः पुंसवादी रवैया मजबूत बनने का सामाजिक खतरा व्यापृत होता है।

परिवर्तित दुनिया के अनुकूल, इंसानी संबन्धों की विविधता एवं व्यापकता को समझाने की खातिर ऐसे प्रसंगों का स्त्रीपक्षीय वाचन अनिवार्य है। इंसानी रूचियॉ और भावात्मक संवेदनाएं स्थायी नहीं हैं, उन्हें निर्दिष्ट बताने का श्रम असंगत है। यौनता भी जीवन भर की स्थायी संवेदना नहीं है। पुरूषदुनिया से अपनी स्नेहाकांक्षाओं की पूर्ति नहीं होती है, तो यह सहज संभव्य है कि कोई इंसान उसका विकल्प तलाश करे। घरेलू क्षेत्र में प्रताडनाएं और उत्पीडन सहना पडता है तो कोई स्त्री, अपनी सहेली से सांत्वना खोजती है, जो उसकेलिए स्वाभाविक आसार बन सकती है। पति व घर की सुरक्षा होते हुए भी यदि स्त्रियॉ इस तरह की बाहरी सांत्वना चाहती हैं तो यह भी समझ लेना चाहिए कि उनकी यौनता, मात्र देहकेन्द्रित कार्य नहीं है। संवेदनात्मक दुनिया में देह के साथ मन की अभेद्य अनुभूतियों का समवाय है। पारस्पर्य की खोज में स्त्री बाहर झांकती है। यदि उसे वह घर के भीतर मिलता है तो वह बाहर झांकने की नीयत नहीं रखती है। सामान्य अर्थ में ही परिवार के बाहर झांकनेवाली स्त्रियॉ पुंसव्यवस्था और पुंसकेन्द्रित कुटुम्बव्यवस्था पर प्रश्नचिह्न लगाती हैं। इसलिए स्त्रियों के घनीभूत संवेदनात्मक आदर्श में एक साथी हमेशा बना रहता है, जिसके साथ उसका प्यार और आनंद का सपना हमेशा बना रहता है। गतकालीन कवयित्रियों में कई ने उसे ’कृष्ण’ पुकारा था।

बताया जाता है कि स्त्री केलिए यौनता, मात्र लिंगावयवों की कार्यकलापी अभिव्यंजना का आविष्कार नहीं है। स्त्री की पूरी देह उस कर्म में सहायक है। तभी देह का अपमान उसे आत्म का अपमान लगता है। यौनता उसकेलिए आनंद का एकोन्मुखी कार्य नहीं है, बदले में वह उसका प्रेम विनिमय है, जीवन की समग्रता का स्त्री-अनुभव है। लेन-देन के परे विद्यमान समग्र अनुभव के पल तभी उसे स्वायत्त होते हैं जब वह एकाधिक से एक बन जाती है। उन पलों को वह स्थायी बनाना चाहती है। इसलिए वह आदर्श साथी की खोज करती है। मतलब पुरूष केलिए यौनता जहॉ अस्थायी और पलभर का अनुभव है, स्त्रीदेह उसके विपरीत में जाकर उसे समग्र अनुभव बनाना चाहती है। जोड देना है कि पुंसाधिपत्य की दुनिया में वह इस अनुभव से अधिकतर वंचित रहती है। दूसरे स्त्रीसंबन्धी विषयों के समान यौनता पर भी स्त्रीलेखन की परंपरा गौण है। साथ ही इस विषयक पाठों में पुंसदृष्टिकोण मुखर है। इनकी बताई राहों पर ही काफी समय तक स्त्रियों की रचनाएं चली आई हैं, अबकी स्त्रीपक्षीय रचनाएं इनसे भिन्न होकर अलग धारा पकडने लगी हैं। इस धारा की रचनाएं आत्मस्नेह, वर्गप्रेम आदि के साथ स्वत्वविमर्श को भी संभालने का रूख रखती हैं।

मलयालम की मशहूर एवं वरिष्ठ लेखिका ललितांबिका अंतरजनम् की एक विशिष्ट कहानी ;प्रतिशोध की देवीद्ध का जिक्र इस प्रकरण को ठीक तरह से व्यक्त कर सकता है। एक उत्तम पत्नी अपने पति से जीवन की समग्रता में साथीपन चाहती है। लेकिन पति, अपनी मर्दवादी आजादी में दूसरी स्त्रियों के पास जाता है। पत्नी को खाना-पीना और आवास तो देता है। पर जब भी वह उसके पास जाती है, भगा देता है। पुरूष के पास यौनपूर्ति केलिए विकल्पों की गुंजाइश है, वहॉ स्त्री ब्याहे पति से भी वंचना एवं उपेक्षा सहती है। पत्नी से वह बताता है कि उसे शयनेषु वेश्या पसंद है। पति बाहर जाता है, तो उसके पास कोई विकल्प नहीं बचता। वह पति के आदेशानुसार, देह की खुशी खोजती है, वह वेश्या बनने का प्रयास करती है, बदचलन घोषित होती है। उसके खाते में अपना न्याय है। वह सोचती है कि शीलावति अपने पति की इच्छापूर्ति में शीलवति और सुचरिता घोषित हुई थी। यहॉ पर वह अपने देव समान पति की इच्छापूर्ति केलिए ही वेश्या बनती है। अतः वह भी शीलवति और सुचरिता है। सभी उसके पास आते हैं, अब वह सिर्फ उस पुरूष की प्रतीक्षा में खडी है, जिसकेलिए वह वेश्या बन गई। प्र्रतीक्षा की परिणति में एक दिन पति वेश्यागृह पहुॅचता है, पर सामने उसे पाकर भयभीत, चिल्लाता हुआ भाग जाता है। अपनी यौनता पर फैसला करनेवाली स्वाधीन स्त्री को पाकर भागने के अलावा पुरूष के पास दूसरा चारा नहीं है। यह भी बताना उचित है कि यहॉ पर एक स्त्रीकहानीकार सोच समझकर ही अपनी स्त्रीपक्षीय कहानी की परिधि से यौन-स्वार्थी पुरूष को भगा देती है, जो उनकी साहित्यिक प्रतिबद्धता का सही लक्षण है।

संदर्भः 
7. Hite, Molly.1988, Writing and Reading The Body:Female Sexuality and Recent Feminist Fiction, Feminist Studies14.1,p.121
8. Cixous, Helen.1981, The Laugh of the Medusa in, Elain Marks & Isabelle de Courtvron (eds), New French Feminisms, Sessex: The Harvester Press. P.246
9. पवनकरण। 2004, प्यार में डूबी हुई मॉ, स्त्री मेरे भीतर, नईदिल्लीः राजकमल प्रकाशन, पृ 91
10. कात्यायनी। 2008, देह न होना, सात भाईयों के बीच चम्पा, लखनउः परिकल्पना प्रकाशन, पृ 16
11. पवनकरण। मैं उससे अब भी प्रेम नहीं करता, उपरोक्त,पृ 34
12. Kitzinger, Sheila. उपरोक्त P-98
13.पवनकरण। मौसेरी बहनें, उपरोक्त, पृ 22

तस्वीरें गूगल से साभार 
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देहसत्ता का रहस्य (पहली क़िस्त)

प्रमीला केपी

 प्राध्यापिका, श्रीशंकराचार्य संस्कृत विश्वविद्यालय,
कालडी, केरल
प्रोफेसर . संपर्क :prameelakp2011@gmail.com

पितृसत्ता और पुंसवाद की समस्त कारगुजारियों को देखने से यह समझना आसान है कि उनमें सबसे अधिक निजी एवं रहस्यमय स्वभाव रखनेवाला संस्थागत स्वरूप यौनता का है। दूसरे विषयों के समान इसपर सार्वजनिक बयान, वार्ता, चर्चा या संवाद नहीं होता है। दूसरी छोर से देखा जाता है तो यह एक ऐसी सनातन और सार्वजनिक बात है जिसके बिना प्राणिवर्ग का सांसारिक अतिजीवन संभव नहीं है। यौनता जीविवर्ग का नैसर्गिक या जैविक गुण है। यह पुनरूद्पादन का बुनियाद भी है। जानवरों में यह सिर्फ स्वाभाविक देहमिलन है, पर विवेकी सामाजिक जीव मनुष्य केलिए यह उससे ज्यादा बहुतकुछ है। दो व्यक्तियों का समागम, दैहिक मिलन के अलावा उनके व्यक्तित्व, पारस्पर्य, सामाजिक-पारिवारिक रिश्ता, आपसी भरोसा, तदाकारिता, सदाचार अदि अनेकों वैयक्तिक व सामाजिक तत्वों की पहचान भी करा देता  है। जेन रूट के मतानुसार किसी की यौनचेष्टा में इस तरह के कई सामाजिक व सांस्कृतिक अर्थ समाहित रहते हैं।1  अति-यौनेच्छा, यौनेच्छा का अभाव, यौनापभ्रंश, यौन-उच्छृंखलता आदि सबकी कारगुजारियों को सामान्यतया यौनता की परिधि में लिया जाता है। यौनोन्मुखता या विमुखता के नाम पर समाजों में किसी व्यक्ति को हाशिए में डालने की रीतियॉ भी व्यवहृत हैं। अतः यौनता को लेकर कई बनी-बनाए नियम हर समाज में चालू हैं, जो इसको परिभाषित एवं निश्चित रखने में सहायक हैं। इनमें कोई एक सार्वजनिक या सार्वकालिक स्वरूप नहीं है। पर इनके स्वीकृत-व्यवहृत नियमों व रीतिरिवाजों में बडा परिवर्तन जल्दी आता भी नहीं है। हर समुदाय या कबील के अपने नैतिक मापदंड होते हैं, जिनके अनुसार उसके सदस्यों को अपनी यौनवृत्तियॉ संभालनी है। रूचिकर यह है कि विविध समुदायों के इस तरह स्वीकृत यौनिक-मापदंडों में कोई समानता नहीं है। माने संस्थागत रूप में यौनता संबन्धी विधानों व अनुशासनों के व्यवहारों में विविध समुदायों में एकरूपता नहीं है। सबके बावजूद लोग, विविधढंगी यौनता या एक दूसरे से भिन्न यौनरूचियॉ दिखाते भी हैं। फिर भी सामान्य रूप से यह बताना आसान है कि संसार भर में व्यवहृत पितृदायकता में यौनता, पुंसवर्ग की रूचियों व प्राथमिकताओं के अनुसार ही प्रवृत्त होता रहता है।

प्राणिवर्ग की जैविक वृत्ति या मनुष्य के संवेदी अनुभव के रूप में यौनता का इतिहास मनुष्य के इतिहास के बराबर है। लेकिन लैंगिकता या यौनिकता के शब्दों में उस अनुभव का आधुनिक प्रकाशन उन्नीसवीं शती के अंतिम दशकों से ही होने लगा था।2  यद्यपि श्रृंगारी साहित्य में यौनता प्रमुख विषय है, सबसे पुराने साहित्यकार कालिदास से लेकर इस विषयक प्रतिपादन की भाषिक कडियॉ मिलती हैं, तथापि उन सबमें पुंसदृष्टिपूर्ण यौनता प्रकाशित हुई। एक दृष्टि से भारतीय परंपरा एवं इतिहास के विविध कला-सांस्कृतिक समयों में इस विषय का आविष्कारमूलक प्रतिपादन कोई बुरी बात नहीं थी। धीरे धीरे आधुनिक पितृदायकता के अनुरूप यौनता, पुंसकेन्द्रित होती गई। फूको की मान्यता है कि विक्टोरियन समय से लेकर यौनता संबन्धी धारणाएं रूढ, गूढ एवं नियन्त्रित हो गई। 3 इस समय से लेकर यौनता को नैतिक नियमों के बल पर परिवार के भीतर सीमित रखे जाने लगा। परिवार के भीतर सीमित रखी यौनता पर पाबंतियॉ सख्त थोपी गई और उसकी परिभाषा संतानोद्पादन मात्र सूचित रखी गई।4  परिवार के भीतर और बाहर इस विषय पर चर्चा नहीं होती है। परिवार का स्वामी पुरूष है, इसलिए स्त्रियों पर थोपी गई यौन-पाबंयितॉ पुंसानुरूप निर्णीत होती गई। इसी समय में श्रृंगारी साहित्य का चेहरा बदलने लगा, लोग उसे अश्लील मानने-समझने लगे।5  राष्ट्र्रूपायन, नवजागरण तथा औपनिवेशिक शिक्षा के नैतिक मापदंडों के आधार पर स्त्रियॉ यौनता की ही नहीं, दैहिक वृत्तियों पर भी सार्वजनिक बात छोड देती हैं। यहॉ से स्त्रीदेह ढकने और यौनता  छुपाने की दिशा में सदाचार की रीतियॉ स्वीकृत हुई।

पर पिछली सदी के साठ के दशक से लेकर इस पुंसदृष्टिपूर्ण यौनरूचि की लोकतंत्रीय दृष्टि से टक्कर होने लगी और स्त्रीपक्षीय यौनदृष्टि पर सामाजिक एवं सांस्कृतिक ध्यान आकर्षित हो गया। आरंभिक समय से ही स्त्रीयौनता समाज एवं संसार को अचंभित करती रही। क्यों कि तबतक उसपर कोई ऐसी अलग या विशिष्ट स्त्रीपक्षीय दृष्टि मूर्त नहीं थी। पितृसत्तात्मक समाज में स्त्री का बोलना ही मना था। यौनता वर्जित विषय है। अर्थात् यौनता पर स्त्री का बोलना पुंसदायक समाज एवं सत्ता केलिए असमंजसदायक था।

परंपरागत समाजों में यौनाधिकार पुरूष को स्वायत्त है। स्वाभाविक रूप में उन समाजों में स्त्रियों की यौनता दबाई जाती है, दैहिक कामनाओं पर स्त्री का बोलना या उसे स्पष्ट सूचित करना अतिरेक माना जाता है। सामान्यतया इसपर घोर सामाजिक अन्याय के नाते असभ्यवर्षा होती है। छोटी बच्चियों व लडकियों द्वारा अपने यौनावयवों पर प्रकट की जानेवाली शंकाओं पर यातो उपेक्षा की जाती है नहीं तो उन्हें टालने का कोई ’सभ्य’ कारण ढूंढा और बताया जाता है। अपनी इच्छा या परिभाषा के अनुसार पुरूषसमाज उसे वाचित कर रखता है। स्त्रीयौनता को खतरनाक घोषित करने का प्रत्यक्ष या परोक्ष प्रयास विविध धर्म एवं इतिहासग्रंथों में दर्शनीय है। उसे पुरूषों को अशक्त और मोक्ष से वंचित रखनेवाला पाप बताया जाता था।6  स्त्री के लिंग-अवयवों तथा तत्संबन्धी देह-संवेदनाओं के प्रकटीकरण को खतरा, अशुद्ध, अश्लील और उपहास के विषय रखे गए।

चिंतनीय बात यह है कि विज्ञान एवं युक्तिपूर्ण चिंतन-मनन के आधुनिक युग में भी स्त्री यौनता संबन्धी हेय विचारों में बडा सुधार नहीं आया। इतिहास एवं धर्म के ग्रंथों व निष्कर्षों के समान आधुनिक चिकित्साशास्त्र तक की किताबों ने भी कई बातों में स्त्रीदेह की उपेक्षा की। कई समुदायों में आज भी वयसंधि, आर्तव, विवाह, प्रजनन, मातृत्व आदि संबन्धी रीतिरिवाज, युक्तिहीन, निराधार एवं स्त्रीविरोधी चलते रहते हैं। सबसे बडा उलझन यह है कि स्त्रियों के देहानुभव संबन्धी विषय-विवरण भी पुरूष करते रहे हैं और इन पुंसविवरणों में कई ऐसी धारणाएं रूढ होती गई जो स्त्रीस्नेही नहीं हैं। यहॉ तक मानसिक अनुकूलन में पडी स्त्रियों ने भी उसी का अनुकरण एवं अनुसरण किया। फलस्वरूप स्त्री-यौनता गलत बात बन गई, उसका उद्घाटन गलत काम बन गया। यौनता का अर्थ ही हवस या वासना सूचित होता गया। पुसंस्थापनाओं से नियन्त्रित परिवार के संस्थागत स्वरूप के भीतर प्रवृत्त यौनता को ही स्त्रीयौनता समझी जाती है। साहित्य व संस्कृति के रंगों में रंग मिलानेवाली कलाओं में प्रकाशित स्त्रीयौनता इस प्रकार तय होती रही है। खुद स्त्रियॉ उसे ढकती हैं, छुपाती हैं, जहॉ तक संभव है, अप्रत्यक्ष बयान करती हैं। वेन्डी फॉकनेर के मतानुसार परंपरागत समाजों में स्त्रियॉ मेधावी विचारधारा से नियन्त्रित एवं अनुकूलित होकर ही खुद की यौनता को देखती हैं। यह सिर्फ फिल्म या विज्ञापन जगत तक सीमित नहीं हैं, यह जीवन, साहित्य एवं संस्कृति के हर पक्ष में प्रचालित पुंसवादी रवैया है। साहित्यिक परंपरा हो या चिकित्साशास्त्रीय किताबें, सबमें स्त्री देह व उसकी संवेदनाओं का पुंस-विश्लेषण मिलता है। ऐतिहासिक दृष्टि से स्त्रीसंवदेनाओं का एकोन्मुखी प्रतिपादन और मेधावी प्रतिस्थापन इनसे संभव हुआ। अर्थात् स्त्रियों की नजर में स्त्रीसंवेदना, विशेषकर यौनता का प्रतिपादन इतिहास एवं परंपरा में नगण्य रहा। पुंसदृष्टिकोण से युक्त संस्थागत यौनता के रूप में स्त्रियों के देहकार्यांर् को देखने की रीतियॉ प्रचलित हुई। नतीजतन वैज्ञानिक रूप में बेमतलब व अयुक्तिपूर्ण बताए जाने पर भी, स्त्रीयौनता सीमित है, संतुलित रही है। मसलन् पुंसयौनता अति-उत्साही है। तदनुसार परंपरा एवं सामाजिक सख्तियॉ स्त्रियों को आदेश देती हैं कि उन्हें पुंसयौनता की वन्यता के आगे सहिष्णू रहना है। अपनी आग्रहपूर्ति में उसे कभी कुछ नहीं करना चाहिए, निर्णय या चयन की बात सोचना भी नहीं चाहिए। यहॉ तक प्रजनन का भय थोपकर, सार्वजनिक जगहों पर स्वतन्त्र आवाजाही की बुनियादी स्वतन्त्रता से उन्हें वंचित रखा जाता है और नागरिका के रूप में, उसके जीवनभर को दोहरे स्थान पर धकेला जाता है।

दुर्भाग्यपूर्ण समस्या यह है कि स्त्रीदेह संबन्धी ज्ञान और परिभाषाएं, पुंसनिर्मित एवं व्याख्यायित हैं। वात्सायन का ’कामसूत्र’ इसका मूलग्रंथ है। फिर इसकी श्रेणीगत ऐतिहासिक कडियॉ अनन्तिम लिखी जा रही हैं। आधुनिक अणुकुटुम्बव्यवस्था के कायम होने पर यौनता संबन्धी नियम फिर वर्चस्वपूर्ण नैतिक सख्तियों में बिंध गए। पुरूष संसार को सही, माने खून का वारिस मिलने केलिए स्त्रीयौनता को एक पुरूष, माने पति की परिधि में कैद करना अनिवार्य था। इस पद्धति के अनुसार, स्त्री को अपने पतिमात्र से देहमिलन रखना चाहिए। यह नैतिक शर्त है। भर्ता की प्रीति व उसकी संतानों के उत्पादन से उसे खुश होना-रहना चाहिए। इस नैतिक विश्वास के अमल में आते ही स्त्रियॉ अपनी देह पर फैसला लेने की सुविधा से वंचित रह गई और वे देह से अन्य एवं अ-लग रह गई, उसकी देह किसी और के निर्णयों के अनुसार उपकृत व उपयुक्त करनेवाली चीज बन गई। विपर्यय यह है कि यह नियम कभी पुरूष पर लागू नहीं किया गया। यदि नियम में ऐसे सुस्वभाव की सम्मिलित दृष्टि है, तो भी समाजों व देशों में व्याप्त देहव्यापार इसका सही चित्र एवं चरित्र बताता है कि वह कितना खोखला और आधारहीन है। देहविपणन के जगत्विराट व्यवसाय में पुंसवादी दुनिया का ही योगदान है। देहव्यापार पूर्णतः स्त्रीविरोधी व मनुष्य विरोधी काम है और उस दृष्टि से उसे पुंसनिर्मित सामाजिक षडयन्त्र मान लेना है।

इस तरह घर के बाहर-भीतर स्त्रीयौनता संबन्धी जो ज्ञान-विज्ञान मिलते हैं, सब में स्त्री की अन्यता तय होती जा रही है। अधिकार एवं वर्चस्व के आगे अपने देहानुभवों का प्रस्तुतीकरण स्त्री केलिए असंभव-सा हो जाता है। प्रतिकार एवं प्रतिरोध के श्रम में वह कुछ लिखती है, तो भी पुंसदुनिया के भाषा-शब्द एवं शैली-संरचना उसके पक्ष में उतर नहीं आती हैं। अपनी आकांक्षाओं-उत्कंठाओं तथा आत्मनिर्णयों केलिए स्त्रीस्नेही अभिव्यक्तिजन्य स्वरूप के अभाव पाकर, वे यातो पिछड बैठती हैं, नहीं तो आधे व अधूरे प्रयोगों व शैलियों में उतारने का क्लेश उठाती हैं। पुंसभाषा प्रयोगों में वह अपने को ठीक तरह से उतार नहीं पाती है। उूपर से स्त्री के देह-खोल वर्णनों पर आज भी मनाही है। स्त्रीयौनता के प्रकाशन पर सदाचार, अश्लीलता, विपणन तथा निषेध के कोडे पडते हैं। इसलिए जब स्त्री अपनी यौनता पर समाजसिद्ध शब्दों में ही बोलती है, तो भी उसका बयान पुंसरंजक और स्त्रीविरोधी हो जाता है। अभिधात्मक बोलने के बजाय अक्सर स्त्रियॉ अपनी देह व यौनता के प्रकाशनार्थ व्यंजना या लक्षणा का उपयोग करती हैं। गद्यविधाओं में जैसे, उपन्यास व कहानियों के अभिधात्मक प्रयोगों व वर्णनों को देखा जाता है तो यह स्पष्ट होता हैं कि अपनी यौनता एवं देहावयवों पर उपलब्ध स्त्रीलेखन भी कई मायनों पर पुरूषोपयोगी व पुरूषमनोरंजनकारी है। स्त्रीदेह के स्वरूप को पुरूषमनोरंजनकारी सज्जित व उपयुक्त रखनेवाली दुनियादारी में स्त्रीपक्षीय देहविखंडन दूभर कार्य है। कहने का अर्थ यह है कि स्त्री को जब यौनता एवं देहसंवेदना पर लिखना है तब उसे पुंस-यौनाधिपत्य के साथ साहित्य व संस्कृतिक जगत में व्याप्त पुंस-प्रवृत्तियों तथा भाषाशैली के विवेचनात्मक रवैयों से भी भिडंत करना पडता है। संदेह नहीं कि विविध आयामी उलझनों व विपरीतों के बीच ही स्त्री, यौनता एवं देहावयवों की अभिव्यंजना का साहस उठाती है। चारों ओर व्याप्त स्त्रीदेह संबन्धी पुंसफान्टसियों से लडना उसे मुश्किल लगता है। अपने सच एवं संवेदना को उतारने केलिए ठान लेनेवाली लेखिका को यह सिद्ध करना होता है कि देहव्यापार एवं यौनविपणन स्त्री स्वेच्छया नहीं करती है, ऐसे यौनप्रसंग में स्त्री का अनुभव ही अलग है। दुनिया के वर्चस्व के आगे वह अपने को छुपा कर ही प्रस्तुत कर सकती थी, जिस केलिए जिम्मेवार मेधावी पुंसदुनिया है। युगयुगों से होनेवाले इस स्त्रीविरोधी-मनुष्यत्वविरोधी अन्याय से कोई सामाजिक हाथ धो नहीं सकता है। स्त्रीदेहविपणन को लेकर न्याय, नीति व नियम की आंखें पुंसपोषक हैं, जो मात्र स्त्री को पापिनी या बदचलन मानती हैं। अपने मनपसंद पुरूष के ऐन बिंब के रूप में ’कृष्ण’ को प्रतिष्ठापित करती हुई साहित्यरचना में तल्लीन स्त्रियों की बहुभाषापंक्ति यही बताती है कि पुसांधिपत्यवाले संसार में उन्हें कभी ऐसा साथी स्वयत्त नहीं होता है, जो उसे समान हैसियत देता है। इसलिए वे समान साथीपन की कल्पना कृष्ण के रूपकीय संदर्भों में वितरित करती हैं। कुंवारी हो या विधवा, पत्नी हो या प्रेमिका, स्त्रियों की भावना में कृष्ण के रसरंजक साथीपन की अमिट छाप बनी रहती है। जाहिर है इन स्त्रियों में पुरूषविरोध नहीं है। जिसने सदियों से स्त्री का शोषण किया है, कल्पना के रास्ते में ही सही, उससे प्रेमपूर्ण मिलन, साथीपन एवं और आत्मीयता बांटने की आकाक्षाएं तथा कामनाएं वह प्रस्तुत करती है। उनके मिलन के इस काल्पनिक संदर्भों पर अधिकार या यौनता की पाबंतियॉ नहीं हैं। यौनता पर व्यवहृत समस्त पाबंतियों को खोलकर, स्त्री-पुरूष समागम में समजीवियों की जैविकता  स्थापित करने की कामना कृष्णबिंब के प्रति स्त्रियों के आकर्षण के मूल में है। बताना नहीं होगा कि यथार्थ जीवन में स्त्रियों को ऐसा अवसर स्वायत्त नहीं है, इसलिए वह कल्पना में समान दुनिया का संकल्प जुटाती है, जिसमें स्त्रैण्ता के साथ यौनता का भी सही आदर संभव है,  लोकतंत्रीय स्वाधीनताबोध संभव है।

कृष्ण संबन्धी प्रेम-मिथक के उपयोग व चित्रण में स्त्री व पुरूष साहित्यकारों व कलाकारों में अंतर है। अतिभौतिक ईश्वरीय सत्ता में औरतों की रक्षा करनेवाले संरक्षक के रूप में कृष्ण का वर्णन पुंस-बयानों में मिलता है। रसरंजक एवं प्रेमी के रूप में भी कृष्ण का वर्णन है जिसमें वही लीलालोलुप है। ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य में देखा जाता है तो आधुनिक महिलालेखन के समय में कृष्ण का उपर्युक्त रूप, समस्तरीय साथी में परिणत हो जाता है। उसकी लीलाओं में परिणीता या प्रेमिका की समान साझेदारी है। आदर्श मानक मानने के बदले, यथार्थ दुनिया में जीवित पुरूष को कृष्ण स्वरूप में मानने का दिशात्मक विपरीत स्त्रीपक्षीय लेखिकाओं द्वारा संभव किया गया है। माधविक्कुट्टि या कमलादास इसका उम्दा उदाहरण है। उनकी कहानियों में स्त्री से प्रेम करनेवाला हर पुरूष उसका साथी है, कृष्ण है। उनकी पंक्तियों में उस साथी से देहमिलन का ताप तरंगायित होता है। पारिवारिक यौनता की यन्त्रणात्मक रीतियों पर विभक्ति तथा चयनित यौनता पर अभिभूतता माधविक्कुट्टि के लेखन की खासियतें हैं।

पर यह बताना होगा कि परवर्ती स्त्रीलेखन में यह प्रवृत्ति क्षीण हो गई, इसके कई कारण हैं। यौनता पर बोलना ही परंपरागत समाज में हिम्मतवालियों का कार्य रहा है। उस स्त्री पर कुलच्छनी या कुलटा का आरोप लग जाता है जो अपनी या पात्र की यौनता का बयान करती है। उसे परिवार या समाज से कटुनिंदा और देशनिकाला का सामना करना पडता है। उपर्युक्त लेखिका ने इस संबन्ध में भुगते आत्मसंकटों का खुलासा किया भी है। किंचित अतिवादी या अतियथार्थवादी बयानों व कलात्मक विवरणों को छोडें तो सामान्यतया स्त्री, जीवन तथा लेखन में पुरूष से साथीपन, स्नेह, पारस्पर्य और सहभागीपन ही चाहती है। उसकेलिए यौनपूर्ति सबके बाद में आनेवाली बात है। इस कारण से लेखिकाओं में, कई मायनों पर सामान्य औरतों में भी, साहित्य या कला के साथ जीवन के भी अधिकाधिक संदर्भों पर यौनोन्मुख वृत्तियों के प्रकाशन की तुलना में यौनविमुखता जबरदस्त बाहर आती है। जबतक वह खुली यौनता नहीं चाहती है, वह उसकी प्राथमिकताओं में आगे नहीं आती है, उसके चयन में भी ऐसी बात नहीं है, तब तक उसे यौन-सदाचार एवं परंपरागत यौन-निष्कर्षों से रचनात्मक भिडंत रचने की आवश्यकता महसूस नहीं होती है। लोग इसे कुलस्त्रियों का सदाचार मान बैठते हैं। मगर यह कुलवधु का आचार-आग्रह थोडा ही है। अपने को चयनित, स्वतन्त्र और स्वाश्रयी रखनेवाला स्त्रीत्व यौनता के प्रसंग में भी खुद को संभाल लेती है। उसे कोई अतिक्रमण या आक्रमण की जरूरत नहीं है। दुनियादारी जब उसे चयन व निर्णय से वंचित रखती है तब वह दुनियादारी से प्रतिशोध लेने का साहस जुटाती है और वह साहस कभी कभी खुद को दॉव पर लगाने तक जाता भी है। अतः घरेलू जगह पर हो या प्रेम में, यौनता पर स्त्रियों की चुप्पी का यह अर्थ नहीं है कि वे पुंससंस्था के नियमों के अधीन रहती हैं, न वे तथाकथित त्यागमहिमा को दायर करती हैं। कोई स्त्री देह के साथ अपने को नष्ट करने के आत्मपतन का रास्ता कभी नहीं चुनती है। चारों ंओर व्याप्त खतरों में उसका हर निर्णय सतर्कता पर आधृत है। देह की पण्यता, जश्न और अतिक्रमणों की खबरें व्यापारीयुग के मनुष्यविरोधी एवं अतिवादी कारामतों का परिचय देती हैं, जो पुंस दुनिया में पलनेवालों के रतिभ्रंश का नतीजा हैं।

परंपरावादी समाज में स्त्रियों के दैहिक व यौनिक कार्यों का सदैव अतिप्रतिपादन होता रहता है, क्योंकि उसमें यौनता बिकने का विषय है। अप्रत्यक्ष सूचनाएं देकर लोगों को आकर्षित किया जाता है, जो सर्वथा बाजार में स्वीकृत पद्धति है। खुले में वहॉ पर यौनावयवों व कार्यकलापों का प्रत्यक्षीकरण असभ्य या अश्लील है, अपराध है। इसलिए लेखन में हो या कला में नग्नता संबन्धी सभी प्रकरणों पर विवाद उठ खडा होता है। पाठ से अतिपाठ निर्माण का यह कौशल, कला एवं साहित्य का गुण है। यौनता के विषय में इसका पूरा लाभ पुंसदुनिया को मिलता है। स्त्रियों के लेखन या कलात्मक आविष्कारों को देखें, फिल्म तथा फैशन की चकाचौंध भरी दुनिया में कार्यरत अभिनेत्रियॉ बाजार के दबाव में देहोद्घाटन करती हैं। इनमें कई की जीवनियॉ यही बताती हैं कि कलात्मक जीवन के अतिप्रभावी अनुभवों के बावजूद आत्मनिंदा के मारे वे आत्माहुति कर लेती हैं। कला-साहित्य के अतिवादी कार्य के सिलसिले में वे दैहिक-जश्न प्रस्तुत करती हैं, पर अंतर ही अंतर अकेलापन व असुरक्षा के अहसासों में तिल तिल टूटती हैं। पुंसव्यवस्था के चेहरे पर थूकती हुई वे देहत्याग भी कर देती हैं।
यौनता की पारिवारिक परिधि टूटने का भय समाज के साथ हर पारिवर को भी है। इसलिए परिवार के लोग कलंकबोध के मारे होकर यौनता को, विशेषकर स्त्रीयौनता को नियन्त्रित रखते हैं। अपनी देह पर लगनेवाला कलंक परिवार एवं समाज में व्याप्त होता हुआ पाकर लडकी देहविरोधिन बन जाती है और विविध संदर्भों पर देहत्याग केलिए तैयार होती है। विविध ऐतिहासिक प्रसंगों पर कलात्मक दुनिया में आत्मनिंदा में डूबकर प्राणत्याग करनेवाली महिलाएं हैं। बलात्कार का पाप मिटाने केलिए ब्याह रचने की वार्ताएं सामाजिक नैतिकता को ही नहीं, न्यायव्यवस्था पर भी प्रश्नचिह्न लगाती हैं। परिघटनाओं की जांच कर लेती है तो समस्या यह नजर आती है कि हर संदर्भ की कार्रवाईयों में स्त्रीत्व को ही समझौता करना पडता है। स्त्री की समस्त संवेदनाएं वहॉ पर दॉव पर लग जाती हैं। अस्तित्व, भूख व प्राणरक्षा की खातिर उसे यौनता सहित सभी संवेदनाओं को पीछे छोडना पडता है। फिल्मी दुनिया से इसके ऐतिहासिक उदाहरणों को आसानी से रेखांकित किया जा सकता है। साहित्य के क्षेत्र में भी ऐसे उदाहरण उपलब्ध हैं।

देह पर अत्याचार या उत्पीडन सहनेवाली लडकी पूरे जीवन में पापबोध से ग्रस्त रहती है। साहित्य एवं कला में इसका प्रतिपादन कई दफा एकरसतापूर्ण मौजूद है। इसलिए आजकल साहित्य में प्रतिपादित यौनता की आलोचना की जाती है। पर दूसरी छोर से देखा जाता है तो देह पर अत्याचार की खबरें सामाजिक जगह पर स्त्रीत्व की अन्यता को स्थापित रखती हैं। यहॉ पर स्त्रीलेखन का ऐतिहासिक कार्य दर्ज है। अमृता प्रीतम, माधविक्कुट्टि, इस्मत चुगताई, कृष्णा सोबती जैसों का इस विषयक लेखन सीमित एवं निर्मित पापबोध से औरतों को मुक्त करने में सहायक है। इनका लेखन स्त्रीयौनता के वैविध्यों व वैषम्यों को उजागर करने का प्रयास करता है, जिससे यौनता का पितृदायक व संस्थागत स्वरूप खंडित होता है।

देह स्त्री का अभिमान और अत्मसम्मान का कारक भी है। देहबिना न आत्मा होती है, न स्वत्व। न हैसियत होती है, न गरिमा। पर उसका बाहरी स्वरूप, रंग-ढंग या चमकदमक, आकारसौष्ठव आदि पर रूपायित-व्यवहृत पुंसमानकों के आधार पर स्त्रीदेह की व्याख्या और सौन्दर्य प्रतिपादन किया जाता है तो फिर एक बार वह पुंसनिर्णीत बन जाती है। उपर्युक्त महिला कहानीकारों के लेखन में देहानुभवों के वर्णन द्वारा स्त्रीदेहस्थापना संपन्न होती है। देहानुभव को ये स्त्रीदृष्टि में व्याख्यायित करती हैं। देह को मानना और देहानुभवों की उपस्थिति दर्ज करना परंपरागत समाज में आत्मविमोचन का शक्तिशाली कार्य है, मुक्तिचेतना का प्रकटीकरण उससे संभव होता है। अर्थात् स्त्री देह को भोगवस्तु, पण्यवस्तु तथा मनोरंजनवस्तु बनानेवाले समाज में कोई स्त्री जब अपनी देह से प्यार और प्रेम जाहिर करती है तब वह स्त्रीपक्षीय देहराजनीति का कार्य बन जाता है। यह स्त्रीपक्षीय लेखिका का सांस्कृतिक एवं साहित्यिक कर्तव्य भी है। आत्मप्रेम के विवरणों से स्त्रीजाति की अन्यता को दूर करने का जिद् मर्दवादी समाज के विरोध में जानेवाला का स्त्रीवादी रवैया है। सजग स्त्री का आविष्कार स्त्रीविरोधी राजनीति को खंडित करके जीवित स्त्री के शरीर संबन्धी नवार्थों को समाज के सामने रख देता है।
सन्दर्भ:
1.  Root,
Jane.1984, Pictures of Women, London:
Pandora Press,p.10
2.  Heath, Stephen.1982,The Sexual Fix, London:Macmillian, p11
3. Foucault, Michel.1948, The History of Sexuality vol I,Harmondsworth:Penguin,p.3
4. Gupta, Charu.2012, Sexuality, Obscenity, Community Women, Muslims, and the Hindu Public in Colonial India,    Delhi: Permanent Black, p.8
5. Banerjee, Sumanta.1987, ‘Bogey and Bawdy.Changing concept of Obscenity, in 19th century Bengali Literature’ in E&P Weekly, 22-29 July.p.1197-1206

6. Kitzinger, Sheila.1983, Woman’s Experience of Sex, Newyork: G P Putnam’s sons,p.17

तस्वीरें गूगल से साभार 
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अलीगढ़ विश्वविद्याल का छात्र आन्दोलन : एक आंतरिक विश्लेषण

कमलानंद झा

 अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में प्रोफेसर . संपर्क : 08521912909

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के विद्यार्थी अपने विश्वविद्यालय के अस्तित्व को बचाने के लिए आज भी प्रदर्शन कर रहे हैं. उन्होंने यह भी संकल्प किया है कि विश्विद्यालय के इस संघर्ष को बाहर भी ले जाया जायेगा. विश्वविद्यालय के प्रोफेसर कमलानंद झा  ने अलीगढ़ विश्वविद्यालय में उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी पर हिन्दुत्ववादियों द्वारा  हमले के प्रयास, जिन्ना-विवाद पर अपने विचार रखे हैं. 

सुप्रसिद्ध नाटककार शहीद सफ़दर हाशमी के नाटक की एक पंक्ति है, ‘लड़ो पढ़ाई करने को, पढो लड़ाई करने को.’ पढ़ने का मकसद सिर्फ ज्ञान गरिमा से मंडित होकर छोटी-बड़ी नौकरी प्राप्त कर ‘घर से निकलना काम पर और काम से लौटकर घर आना’ नहीं है. बल्कि पढ़ने का मतलब खुद का विवेक पैदा करना है, सामजिक-सांस्कृतिक विसंगतियों में सार्थक हस्तेक्षेप करना है. समाज को बेहतर बनाने के लिए संघर्ष करना, सपने देखना और उन सपनों को पूरा करने की दिशा में सधे कदम बढ़ाना है. इसी को पढ़-लिखकर स्वस्थ नागरिक बनना कहते हैं. अलीगढ मुस्लिम विश्वविद्यालय अभी भीषण संकट के दौर से गुजर रहा है. विश्वविद्यालय के छात्र-छात्राएं अनिश्चितकालीन धरने पर बैठे हुए हैं. अपनी परीक्षाएं और भविष्य की चिंताओं को धता बताकर यह मांग कर रहे हैं कि देश का विश्वविद्यालय कैसे सुरक्षित रह पाएगा? देश के गरिमापूर्ण शैक्षिक संस्थाओं को गुंडागर्दी से कैसे बचाया जाए? सत्ताधारी पार्टी का मकसद देश के विश्वविद्यालयों को ज्ञान, विज्ञान, बहस, तथा चिंतन परम्परा से काटकर उसे कूपमंडूकता का पर्याय बनाना है. क्योंकि यही वह जगह हैं जहाँ से उनके नापाक इरादे को चुनौतियां मिल रही हैं. यह प्रयास इन चुनौतियों और सवालों को समाप्त करता  है.
सत्ताधारी पार्टी के जो नेता विश्वविद्यालय से जिन्ना साहब की तस्वीर हटाने की बात कर रहे हैं, वे सिर्फ और सिर्फ जिन्ना के नाम पर अपनी राजनीतिक रोटी सेक रहे हैं. ये लोग हमेशा एक ‘अन्य’ की तलाश में रहते हैं. यह सिद्ध करने के लिए कि ये ‘अन्य’ राष्ट्रद्रोही हैं और हम सबसे बड़े राष्ट्रभक्त.

 विधि विशेषज्ञ फैज़ान मुस्ताफ़ा ने बड़े मार्के की बात कही कि, “मैं इतने दिनों तक एएमयू  में पढ़ा कितने दिनों तक यहाँ पढ़ाया लेकिन जिन्ना की वह तस्वीर नहीं देखी, लेकिन आज युवा वाहिनी के लोगों के सौजन्य से जिन्ना की तस्वीर पूरे देश ने देख ली, उनकी तस्वीर पूरे देश में लग गई.” चुनाव पूर्व हिंदू वोटों  के ध्रुवीकरण की छुद्र राजनीति ने एक गुंडागर्दी को जिन्ना-विवाद का नाम देकर अलीगढ विश्विद्यालय को बदनाम करने की कोशिश की है. स्थानीय सांसद सतीश गौतम ने सबसे पहले कुलपति से जिन्ना  की तस्वीर के बाबत पत्र लिखकर कुछ सवाल पूछे. उसके दूसरे-तीसरे दिन युवा वाहिनी के कुछ कार्यकर्ता आपत्तिजनक नारे लगाते हुए तस्वीर उतारने की नीयत से आक्रामक रूप में जबरदस्ती परिसर में प्रवेश करने की कोशिश की जिसे विश्विद्यालय के सुरक्षाकर्मियों  ने पुलिस-थाने के हवाले कर दिया. पुलिस ने उन्हें आनन-फानन में छोड़ दिया. विश्वविद्यालय के छात्र इस बात को लेकर मुख्य गेट पर धरना प्रदर्शन कर कदाचित थाने तक की शांतिपूर्ण मार्च की योजना बना ही रहे थे कि पुलिस ने उनपर बेरहमी से लाठी चार्ज कर दिया, जिसे पूर्व कुलपति जमरुद्दीन शाह ने ‘लाठी अटैक’ की संज्ञा दी है, जिसमें छात्रसंघ के अध्यक्ष मशकूर अहमद उस्मानी एवं उपाध्यक्ष सज्ज़ाद सुभान राथर समेत कई विद्यार्थी गंभीर रूप से घायल हो गए. इस हिन्दू वाहिनी की गुंडागर्दी और पुलिसिया दमन के खिलाफ विद्यार्थी आज भी शांतिपूर्ण धरने पर बैठे हुए हैं.

पूरे देश में जो लोग जिन्ना की तस्वीर से आहत हैं उन्हें वास्तविकता से परिचित नहीं कराया गया है. लोकप्रिय मीडिया का दायित्त्व बनता है कि वे अपने दर्शकों-पाठकों को वास्तविकता से परिचित कराएं और निर्णय करने की ज़िम्मेदारी उनपर छोड़ दें. लेकिन यहाँ मीडिया निर्णायक की भूमिका में होता है. पहली बात तो यह की जिन्ना की यह तस्वीर विश्वविद्यालय के किसी प्रशासनिक या शैक्षिक भवन में नहीं लगी हुई है. यह तस्वीर सन 1938  से छात्र संघ के एक हॉल में लगी हुई है. यहाँ अकेले जिन्ना की ही तस्वीर नहीं लगी हुई है बल्कि देश-विदेश के ऐसे कई महान लोगों की लगी हुई है, जिन्हें छात्र संघ की स्थाई सदस्यता से सम्मानित किया गया है. इस सम्मान से सम्मानित होने वालों में महात्मा गाँधी, जवाहरलाल नेहरु, नोबेल पुरस्कार से सम्मानित साहित्यकार ई एम फास्टर, सी बी रमण, बहुगुणा, के एन मुंशी, शिक्षाविद और न्यायाधीश ए एन मुदालियार आदि कई गणमान्य व्यक्ति रहे  हैं. कहा जाता है कि बम्बई हाई कोर्ट में भी जिन्ना साहब की डिग्री आदि है, शायद तस्वीर भी लगी हुई है.

मीडिया का काम सिर्फ वर्तमान को छेड़ना नहीं बल्कि इतिहास की सच्चाइयों से रूबरू कराना और समय समय पर उससे मुठभेड़ करना भी है. खासकर ऐसे प्रसगों से जिनके सन्दर्भ और तार सीधे सीधे इतिहास से जुड़ते हैं. जिन्ना साहब के व्यक्तित्व के दो मुख्य पडाव हैं. पहले पड़ाव पर वे अत्यंत दृष्टिसंपन्न देशभक्त के रूप में हमारे सामने आते हैं. शहीद भगत सिंह और बाल गंगाधर तिलक के लिए अंग्रेजों के ख़िलाफ़ अदालत में केस लड़ते हैं. हिंदू -मुस्लिम एकता के मिसाल माने जाते थे जिन्ना साहेब. 1920 के बाद भारतीय राजनीति की दिशा जैसे-जैसे मुड़ती है, जिन्ना की राजनीति भी करवट लेती है. यह उनकी राजनीति का दूसरा पड़ाव है. दो राष्ट्र के सिद्धांत के जितने दोषी जिन्ना और उनके सहयोगी हैं, उतने ही दोषी हिदूवादी संगठनों के नेता भी हैं. इन नेताओं का कहना था कि मुसलमान हिन्दुस्तान में नहीं रह सकते, अगर वे हिन्दुस्तान में रहगें तो उन्हें दोयम दर्जे की नागरिकता मिलेगी. दूसरी तरफ़ जिन्ना का भी कहना था कि हिन्दुस्तान में भारतीय मुसलमान सुख और चैन से नहीं रह सकते. इसलिए पाकिस्तान के रूप में अलग मुल्क चाहिए. और इस तरह दोनों तरफ़ के उग्रवादी नेताओं की बदौलत देश का विभाजन हो गया. छात्र संघ के हॉल में जो जिन्ना साहेब की तस्वीर लगी हुई है वह उनके पहले वाले छवि के आधार पर लगी हुई है. भारत को आज़ाद कराने में उनकी भी ‘आभा’ है, इससे इनकार नहीं किया जा सकता है. इतिहास को न भुलाया जा सकता है, न ही निगला जा सकता है. और यही वज़ह है कि उनकी मृत्यु के बाद भारत के संविधान सभा ने उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि दी थी. यह भारत की उदारतापूर्ण गौरवशाली परम्परा है. इस परंपरा में जिसका जितना देय हैं, हम उसमें कृपणता नहीं करते.
जिस देश में गाँधी के हत्यारे गोडसे की मूर्ति बनाई जा सकती है, उसपर माल्यार्पण हो सकता है, उस देश में जिन्ना की तस्वीर से परहेज क्यों? वे मूक, शांत और स्थिर तस्वीरें क्या बिगाड़ रहीं हैं, उनसे इतना भय क्यों? अगर अस्सी वर्षों से इस तस्वीर ने कुछ नहीं बिगाड़ा तो इतने वर्षों बाद गड़े मुर्दे को उखाड़ने का मतलब? और अगर किसी को इस तस्वीर से परेसानी है तो उसका वैधानिक तरीका अपनाया जाना चाहिए. सरकार की ओर से दिशा-निर्देश लिया जाना चाहिए. इन हथियारबंद मवालियों को किसने अधिकार दिया कि वे अनधिकारपूर्वक विश्विद्यालय में प्रवेश करें.

दरअसल अलीगढ़ के सांसद अपने घृणित लक्ष्य में कामयाब रहे हैं. उन्हें देश में आम नागरिकों के चित्त में मुसलमानों की छवि को विकृत करना था, सो वे कर चुके. देश के कई स्थानों पर अलीगढ़ के ख़िलाफ़ वातावरण बन गया है. सांसद जी पार्टी के अन्दर नायकत्व प्राप्त करने में बहुत हद तक सफल रहे हैं. अगले चुनाव में टिकट हेतु प्रतिद्वंदी को मात करने की यह चाल कहाँ तक सफल होती है, यह तो भविष्य ही बता पाएगा. अगर जिन्ना की तस्वीर उतार ली जाती तो विधायक जी के एजेंडे की हवा निकल जाती. पद्मश्री काजी अब्दुल सत्तार ने अपने एक साक्षात्कार में कहा कि “आज़ाद हिन्दुस्तान में जिन्ना की जरुरत नहीं है. ए एम यू ही नहीं देश भर में जहाँ भी जिन्ना की तस्वीर लगी है, उन्हें उतारा जाना चाहिए. जिन्ना हमारे आदर्श नहीं हैं, जो उनकी तस्वीर लगाने के लिए धरना प्रदर्शन किया जाए.” गौर करने की बात यह है कि विद्यार्थी भी जिन्ना को आदर्श नहीं मानते हैं. उनका आन्दोलन तस्वीर के लिए नहीं गुंडागर्दी के ख़िलाफ़ है. सत्ताधारी पार्टी एक शैक्षिक संस्थान बना तो सकती नहीं. लेकिन बनी हुई संस्थाओं को नष्ट करने से उन्हें परहेज नहीं. मैथिली भाषा में एक कहावत है, ‘लिखने आता है- नहीं, और मिटाने आता है- दोनों हाथों से. तो यह सरकार दोनों हाथों से इस ‘पुण्य’ कार्य में लगी हुई है.

यह मात्र संयोग नहीं है कि ठीक परीक्षा के वक्त इस विवाद को हवा दी गई है. वे जानते हैं कि इस विवाद में उलझकर वे पढ़ना- लिखना छोड़कर आन्दोलन में अपना समय गवाएंगे. कुछ विद्यार्थियों का पुलिस में नाम दर्ज़ कराकर उनके भविष्य को अंधकारमय करने की कोशिश की जाएगी. लेकिन ये विद्यार्थी आन्दोलनधर्मी हैं, आज आन्दोलन का नवां दिन है. इनकी कई मांगे मान ली गई हैं. दो युवा वाहिनी के कार्यकर्ता गिरफ्तार हो चुके हैं. दोषी पुलिस कर्मियों के ख़िलाफ़ कारवाई और मसले की न्यायिक जांच इनकी मुख्य मांगें हैं. फैज़ान मुस्तफ़ा ने विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों से सीनियर के नाते आह्वान किया है कि “वे अब अपना आन्दोलन वापस ले लें, क्योंकि सरकार ने नर्म रुख अपनाया है और उनकी अधिकांश मांगें मान ले गई हैं.”

इस प्रकरण की एक और पृष्ठभूमि है, जिसे नज़रंदाज़ करने की कोशिश की गई है. 2 मई को जिस दिन यह घटना घटी, भारत के पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी विश्वविद्यालय अतिथि गृह में थे. यह अतिथि गृह मुख्य गेट से मात्र 50 से 100 मीटर की दूरी पर है, जहाँ उपद्रवकारी उपद्रव मचाने पहुँच गए थे. पूर्व उपराष्ट्रपति को छात्र संघ की स्थाई सदस्यता देने हेतु आमंत्रित किया गया था. शाम को यह कार्यक्रम होना था और सामाजिक बहुलता जैसे विषय पर महत्वपूर्ण व्यख्यान उन्हें देना था. जब से अंसारी साहेब ने देश में असहिष्णुता के माहौल की बात कही है, वे भाजपा के निशाने पर रहे हैं. इस तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता है कि अंसारी साहेब के उक्त कार्यक्रम को न होने देने की नीयत से उपद्रव को अंजाम दिया गया हो. सोचने की बात है कि देश के माननीय पूर्व उपराष्ट्रपति अतिथि गृह में हों, और अलीगढ़ प्रशासन की सुरक्षा व्यवस्था ऐसी हो कि उपद्रवकारी विश्वविद्यालय में प्रवेश कर जाएँ.

देश के महत्वपूर्ण विश्वविद्यालयों के विद्यार्थियों और शिक्षकों मे वर्तमान सरकार की शिक्षा और छात्र विरोधी नीतियों को लेकर भारी असंतोष और आक्रोश व्याप्त है. सचेत, सार्थक और सकारात्मक युवा आन्दोलन ही देश की शिक्षा व्यवस्था को बचा सकती है. अपने अपने  विश्वविद्यालय का स्थानीय संघर्ष तात्कालिक संघर्ष भर बनकर रह जाता है. महत्वपूर्ण यह है कि देश के अन्य वास्तविक मुद्दों के प्रति युवा कितने संवेदनशील हैं? वे इन मुद्दों के प्रति कितने चौकन्ने हैं? जिस दिन देश के युवाओं की सोच में यह बात आ जाएगी कि हम अपने निजी मुद्दों के प्रति जितने सचेत हैं उतना  ही सचेत हमें  देश के मुद्दे या अन्य विश्विद्यालयों के आन्दोलन के प्रति होना है, तो देश की दशा निश्चित रूप से बदल सकती है. वर्तमान सरकार की शिक्षा विरोधी नीतियों के ख़िलाफ़ सामूहिक रूप से छात्रों की लामबंदी  से ही सकारात्मक नतीजे की संभावना बन सकती है . स्त्रियों के प्रति हो रहे अत्याचार और उनपर लगी सामाजिक पाबंदियों को देश के युवा ही चुनौती दे सकते हैं. संघर्ष और आन्दोलन एक जज़्बा होता है, खूबसूरत सपना होता है, युवाओं की धमनियों में दौड़ते खून सभी तरह के प्रगतिशील आन्दोलन को दिशा देने के लिए मचलता है. चुने हुए संघर्ष से सामाजिक परिवर्तन संभव नहीं. यथास्थितिवाद से लड़ने और एक मज़बूत सत्तातंत्र को टकराने के लिए युवाओं को अपने संघर्ष  और आन्दोलन को व्यापक बनाने की आवश्यकता है. अगर चुनी हुई खामोशियाँ और चुप्पियाँ खतरनाक होती हैं तो चुने हुए संघर्ष का परिणाम भी सीमित और संकुचित होता है. आमजन को साथ लिए बगैर कोई भी आन्दोलन सफल नहीं हो सकता. और आमजन के बीच कोई आन्दोलन तभी विश्वसनीयता अर्जित कर सकता है जब उसका उद्देश्य व्यपाक हो.

तस्वीरें गूगल से साभार 
स्त्रीकाल का संचालन ‘द मार्जिनलाइज्ड’ , ऐन इंस्टिट्यूट  फॉर  अल्टरनेटिव  रिसर्च  एंड  मीडिया  स्टडीज  के द्वारा होता  है .  इसके प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें : 
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महिलाओं के मुद्दे (लेनिन से क्लारा जेटकिन की बातचीत की आख़िरी क़िस्त)

आज से लगभग 100 साल पहले 1920 में मार्क्सवादी स्त्रीवादी क्लारा जेटकिन ने रूसी क्रांति के विराट नेता लेनिन से यह बातचीत की थी. इस बातचीत का एक हिस्सा (बीच का हिस्सा), जो महिला श्रम के सन्दर्भ में है स्त्रीकाल के पाठक 1 मई (मजदूर दिवस) को पहले ही पढ़ चुके हैं, इस लिंक को क्लिक कर पढ़ सकते हैं. 

लेनिन: कम्युनिस्ट नेतृत्व महिलाओं के आन्दोलन के सवाल पर निराशावादी, रुको और देखो वाला रुख अपना लेता है

प्रारम्भ इस लिंक से होता है: भारतीय संतों के हमेशा कुंडलिनी जागरण की तरह हमेशा सेक्स की समस्याओं में उलझे रहने वालों पर भी मैं अविश्वास करता हूं: लेनिन

दूसरी क़िस्त : कम्युनिस्ट महिलाओं, कामगार महिलाओं के विचार सर्वहारा की क्रांति पर ही केंद्रित होना चाहिए: लेनिन

तीसरी क़िस्त: सिवाय साम्यवाद के महिलाओं की मुक्ति संभव नहीं:लेनिन 

एक पखवाड़े के बाद महिला आंदोलन को लेकर मेरी लेनिन से दूसरी बातचीत हुई। हमेशा की तरह, उनकी भेंट अप्रत्याशित और एक अनायास मुलाकात थी। एक विजयी क्रांति के महान नेता द्वारा किए जा रहे भारी-भरकम कामों के बीच मिले अंतराल के दौरान हुई। लेनिन बहुत थके हुए और चिंतित लग रहे थे। रैंगेल अभी खत्म भी नहीं हुआ था, बड़े शहरों को खाद्यान्न पूर्ति का प्रश्न, किसी निर्दयी स्फिंक्स की तरह सोवियत सरकार के समक्ष था। लेनिन ने पूछा, ‘धारणाएं  कैसी बन रही हैं?’ मैंने उन्हें बताया कि एक बड़ी बैठक आयोजित की गई। जिसमें, मास्को में तब जितनी प्रमुख कम्युनिस्ट महिलाएं थी, वे आई। वहां उन्होंने अपने विचार रखे। थिसिसें तैयार है, जिन पर अब एक छोटी समिति में चर्चा होना है।

लेनिन ने सुझाया, ‘हमें कोशिश करना चाहिए कि इस समस्या की तीसरी विश्व कांग्रेस में व्यापक परीक्षा हो। सिर्फ सत्य ही हमारे कई साथियों के पूर्वाग्रह खत्म करेगा। किसी भी तरह, पहले कम्युनिस्ट महिलाओं को काम अपने हाथ में पूरी मजबूती से लेना होगा।

‘सिर्फ बातूनियों की तरह मत बतियाना! बल्कि जोर देकर और स्पष्टता से बोलना, जैसा कि एक लड़ाकू को करना चाहिए।’ लेनिन ने एक जीवंत निःश्वास छोड़ी।

‘कांग्रेस , एक ऐसी बैठक नहीं है जिसमें महिलाएं अपने आकर्षकता का प्रदर्शन करें, जैसा कि हम उपन्यासों में पढ़ते हैं। बल्कि कांग्रेस तो एक रणभूमि होती है। जिसमें क्रांतिकारी गतिविधियों के लिए जो ज्ञान हमें चाहिए, उसके लिए हम लड़ते हैं। यह दिखा दो कि तुम संघर्ष कर सकती हो। पहले तो, बेशक अपने दुश्मनों से, फिर जरूरत हो तो पार्टी के भीतर भी। आखिर, ज्यादातर महिलाओं का जीवन दांव पर लगा हुआ है। हमारी रूसी पार्टी इन समुदायों को साथ लाने के लिए जिन प्रस्तावों, कामों से सहायता होगी, करेगी। यदि महिलाएं हमारे साथ नहीं आएंगी, तो क्रांति के विरोधी उन्हें अपने पक्ष में कर हमारे विरुद्ध करने में सफल हो जाएंगे। हमें यह बात हमेशा अपने दिमाग में रखना चाहिए।’

जैसा कि स्ट्रालसुंड कहता है, ‘यदि महिलाओं को स्वर्ग में भी जंजीरों से जकड़ कर रखा गया है, तो भी हमें उन्हें जीतना होगा।’ लेनिन के विचार के अनुसार मैंने कहा, ‘यहाँ, क्रांति के केंद्र में, इसके भरपूर आंदोलित जीवन, और मजबूत तेज धड़कनों के साथ कामकाजी महिलाओं के लिए एक संयुक्त अंतरराष्ट्रीय कार्रवाई का विचार मेरे दिमाग में आया है। इसकी सूझ, आपके विशाल पक्षपातहीन महिला अधिवेशनों और सम्मेलनों से मिली। हमें उन्हें राष्ट्रीय से अंतररार्ष्ट्रीय में बदलने की कोशिश करना चाहिए। यह एक सच्चाई है कि विश्व युद्ध और उसके प्रभावों ने समाज के विभिन्न वर्गों और तबकों की अधिकांश महिलाओं को गहरे तक हिलाकर रख दिया है। वे उत्तेजित हैं और गति में आ चुकी हैं। आजीविका सुरक्षित रखने की उनकी कष्टमय चिंता और जीवन के उद्देश्य की खोज ने उनकी मुठभेड़ ऐसी समस्याओं से करा दी है, जिनके बारे में अधिकतर ने पहले कभी सोचा तक न होगा, या बहुत थोड़े लोगों ने सोचा होगा। उनके प्रश्नों का समाधानकारक जवाब देने में बुर्जुआ समाज असमर्थ है। सिर्फ कम्युनिस्ट ही ऐसा कर सकते हैं। पूंजीवादी देशों की महिलाओं की व्यापक आबादी को हमें संवेदनशील और सचेत बनाना होगा। इसके लिए हमें एक पक्षपातहीन अंतर्राष्ट्रीय महिला सम्मेलन करना चाहिए।’

लेनिन ने तुरंत कोई जवाब नहीं दिया। वे समस्या पर सोचते हुए गहरी सोच में डूब गए। उनके ओठ कस गए, जिससे निचला ओठ हल्का-सा बाहर लटक आया था। ‘हाँ, हमें यह करना होगा,’ अंततः वे बोले। ‘योजना अच्छी है। एक अच्छी, बल्कि बेहतरीन योजना भी बेकार रहती है यदि उसे ठीक से अंजाम न दिया जाए। क्या तुमने सोचा है कि इसे कैसे किया जाएगा? इस बारे में तुम्हारे क्या विचार हैं?’

मैंने विस्तार से अपने विचार लेनिन को बताए– ‘शुरुआत के लिए, हमें विभिन्न देशों की कम्युनिस्ट महिलाओं की एक समिति बनानी होगी, जिसका अपने देशों के समूहों से नजदीकी और लगातार सम्पर्क रहेगा। यह समिति सम्मेलन की तैयारी करेगी, संचालन करेगी और उनका उपयोग करेगी। यह तय करना होगा कि क्या शुरुआत से ही इस समिति का खुले और आधिकारिक तौर पर काम करना उपयुक्त होगा? किसी भी दशा में, इस समिति के सदस्यों का मुख्य काम हर देश की संगठित महिला कामगारों, सर्वहारा महिलाओं के राजनीतिक आंदोलनों, हर तरह के बुर्जुआ महिला संगठनों के नेताओं और अंततः प्रसिद्ध महिला चिकित्सकों, अध्यापकों, लेखकों आदि से सम्पर्क करना होगा। पक्षपातहीन आयोजन-समितियों का राष्ट्रीय स्तर पर गठन करना होगा। इन्हीं समितियों के सदस्यों में से एक अंतर्राष्ट्रीय समिति गठित करनी होगी, जो अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन की तैयारी और आयोजन करेगी। उसके लिए समय, स्थान और एजेण्डा तय करेगी।

‘मेरे ख्याल से सम्मेलन में महिलाओं के नौकरियों और धंधों में आने के अधिकार पर चर्चा होना चाहिए। ऐसा करते समय बेरोजगारी, समान काम के लिए समान वेतन, आठ घण्टे के काम और महिलाओं की श्रम-सुरक्षा के कानून, मजदूर संघों का गठन, मां और बच्चे की सामाजिक देखभाल, घरेलू महिलाओं और माताओं की मुक्ति के लिए सामाजिक उपाय आदि-आदि प्रश्नों पर विचार करना होगा। इससे भी बढ़कर सम्मेलन के एजेण्डे में विवाह और परिवार कानूनों और राजनीतिक नियमों में महिलाओं की स्थिति पर बातचीत भी शामिल होना चाहिए।’

ये प्रस्ताव रखने के बाद मैंने यह बात विस्तार से रखी कि, ‘बैठकों और प्रेस में नियोजित प्रचार के जरिए, विभिन्न देशों में राष्ट्रीय समितियां इस सम्मेलन के लिए जमीन तैयार करेंगी। यह प्रचार, चर्चा में उठने वाली समस्याओं पर एक गंभीर अध्ययन की शुरुआत करने, इस सम्मेलन की तरफ और उससे साम्यवाद और कम्युनिस्ट इंटरनेशनल के दलों की तरफ बड़ी तादात में महिलाओं का ध्यान आकर्षित करने के लिए खास तौर पर महत्वपूर्ण है। इस प्रचार अभियान को हर स्तर की कामकाजी महिला तक पहुंचाना होगा। इसे हर संबंधित संगठन और महिलाओं की सार्वजनिक सभाओं से, सम्मेलन में हिस्सेदारी हेतु प्रतिनिधियों की उपस्थिति हासिल करनी होगी। ये सम्मेलन, बुर्जुआ  संसदों से बिल्कुल अलग एक लोकप्रिय प्रतिनिधि गठन होगा।

‘कहना ना होगा कि शुरुआती काम में कम्युनिस्ट महिलाएं महज कारण नहीं होगी, बल्कि नेतृत्वकारी ताकत भी होंगी, जिन्हें हमारे ऊर्जावान विभागों की सहायता मिलेगी। जाहिर है कि यही बात अंतर्राष्ट्रीय समिति के काम, सम्मेलन के खुद के काम पर लागू होगी, यह उनके लिए बहुत उपयोगी होगी। कम्युनिस्ट थिसिसों और एजेण्डा में शामिल तमाम मुद्दों पर प्रस्तावों को सम्मेलन में भेजना चाहिए। उन्हें सावधान भाषा में तार्किकता और विद्वता से प्रासंगिक सामाजिक तथ्यों के साथ बनाया जाना चाहिए। इन थिसिसों पर कमिन्टर्न की कार्यकारिणी समिति में पहले ही बहस होकर पारित किया जाना चाहिए। कम्युनिस्ट निदान और नारे मुख्य आकर्षण होने चाहिए जिन पर सम्मेलन और लोगों का ध्यान केंद्रित हो। सम्मेलन के बाद उन्हें आंदोलन एवं प्रचार के द्वारा महिलाओं के व्यापक समूहों के बीच ले जाया जाना चाहिए, ताकि वे महिलाओं की अंतर्राष्ट्रीय कार्रवाही के लिए निर्णायक बन सकें। यह कहना अतिआवश्यक है कि इन सबके लिए जरूरी शर्त यह है कि कम्युनिस्ट महिलाओं को सभी समितियों में और सम्मेलन में भी एक स्थिर और ठोस उपस्थिति के साथ रहना पड़ेगा। ताकि वे एक साथ, एक स्पष्ट और मजबूत योजना पर काम कर सकें।’

मेरे द्वारा उपरोक्त खुलासे के दौरान, लेनिन बीच-बीच में स्वीकार भाव से सिर हिलाते और कहीं-कहीं अपने विचार रखते रहे।

‘मुझे लगता है, प्रिय कॉमरेड कि तुमने मसले के मुख्य बिन्दुओं को राजनीतिक अर्थों और सांगठनिक दृष्टिकोण से गहराई से देखा है।’ वे बोले। ‘मैं पूरी तरह सहमत हूं कि वर्तमान स्थिति में ऐसा सम्मेलन कुछ ज्यादा हासिल कर सकता है। ये हमें महिलाओं की व्यापक संख्या, खासतौर पर विभिन्न धंधों और नौकरियों में काम कर रही महिलाओं, औद्योगिक महिला मजदूरों और घरेलू कामगारों, अध्यापकों और अन्य व्यवसायों में काम कर रही महिलाओं को जीतने का अवसर देता है, यह शानदार होगा। बड़े आर्थिक संघर्षों या राजनीतिक हड़ताल की सोचो! वर्गीय चेतना से सम्पन्न महिलाओं के सहयोग से क्रांतिकारी सर्वहारा को क्या ताकत मिलेगी! बशर्ते हम उनके दिल जीतने और उन्हें अपनी तरफ बनाए रखने के योग्य हों।

‘हमारी उपलब्धि शानदार और विशाल होगी। लेकिन निम्न प्रश्नों के बारे में तुम्हारा क्या कहना है? प्रभुत्वकारी शक्तियां शायद इस सम्मेलन के विचार पर बहुत अप्रसन्नता दिखाएं शायद उसे रोकने की कोशिश करे। हालांकि वे इसे क्रूरता से दबाने की हिम्मत नहीं दिखाएंगे। जो कुछ वे करेंगे, तुम्हें डराने वाला नहीं होगा। लेकिन क्या यह बात तुम्हें नहीं डराती कि समितियों या सम्मेलन में ही कम्युनिस्ट महिलाएं, बुर्जुआ  और सुधारवादी प्रतिनिधियों की बड़ी तादाद और उनके बेशक अधिक अनुभव से हार नहीं जाएंगी? इसके अलावा, सबसे महत्वपूर्ण बात तो यह है कि क्या तुम्हें हमारे कम्युनिस्ट साथियों के मार्क्सवादी शिक्षण पर भरोसा है? क्या तुम निश्चिंत हो कि इस बिखराव में से एक ऐसा समूह तैयार किया जा सकता है, जो इस संघर्ष से सम्मान सहित बाहर निकल आए?’

जवाब में मैंने लेनिन से कहा कि, ‘प्रभुत्वशाली लोग सम्मेलन के विरूद्ध कार्रवाई करना पसंद नहीं करेंगे। इसके विरूद्ध किए गए षड़यंत्र या बुद्धू किस्म के हमले हमारे पक्ष में ही होंगे। गैर कम्युनिस्टों की अधिकता और अनुभव से हम कम्युनिस्ट, ऐतिहासिक भैतिकवाद की सामाजिक समस्याओं के अध्ययन और उन्हें समझने की वैज्ञानिक श्रेष्ठता से मुकाबला करेंगे। आखिर में हम मांग करेंगे कि रूस में सर्वहारा की क्रांति और महिलाओं की मुक्ति को पूरा करने के मूलभूत काम को पूरा किया जाए। हमारे कुछ साथियों की कमजोरियों और प्रशिक्षण की कमी को योजनाबद्ध तैयारियों और सामूहिकता द्वारा पाटा जा सकता है। इस मामले में मैं रूस की महिला कामरेडों से सर्वश्रेष्ठ पहलकदमी की अपेक्षा करती हूँ। वे हमारे व्यूह का लौह केंद्र बनाएंगी। उनकी संगत में मैं सम्मेलन के संघर्षों के मुकाबले कहीं ज्यादा खतरनाक मुठभेड़ों से जूझने की हिम्मत रखती हूं, चाहे हम हार
ही जाएं। यह तथ्य कि हमने संघर्ष किया, साम्यवाद खुलकर सामने आ जाएगा और इसका बड़ा प्रचारात्मक प्रभाव दिखेगा। सबसे बढ़कर यह हमें आगे के कामों के लिए शुरुआत देगा।’ लेनिन मुक्तभाव से हंसे।

‘तुम हमेशा की तरह रूस की महिला क्रांतिकारियों के प्रति उत्साहित हो। सच है, पुराना प्रेम भुलाया नहीं जाता। मैं सोचता हूं, तुम सही हो। एक अडि़यल संघर्ष के बाद की पराजय भी, एक उपलब्धि ही है। ये कामकाजी महिलाओं के बीच भविष्य की उपलब्धियों के लिए जमीन तैयार करेगी। सब कुछ सोचने के बाद यह ऐसा जोखिम है, जिसे उठाया जाना चाहिए। यह बेकार सिद्ध नहीं होगा। लेकिन जाहिर है कि मैं विजय की आशा करता हूं। यह हमारी शक्ति में पर्याप्त वृद्धि करेगा। संघर्ष के हमारे मोर्चे को व्यापक करेगा। उसकी किलेबंदी करेगा। यह हमारी कतारों में जीवन भर देगा। ऐसा हमेशा उपयोगी होता है। साथ ही यह सम्मेलन, बुर्जुआ  और उनके सुधारवादी दोस्तों में भड़काव, बेचैनी, अनिश्चितता, विरोधाभास और टकराव बढ़ाएगा। कल्पना करो कि कौन ‘क्रांति के लकड़बग्घों’ के साथ बैठेगा और सब कुछ ठीक हुआ तो उनके नेतृत्व में विमर्श करेगा! वे
शाइडमैन, डिटमॉन और लेगिन के सर्वोच्च मार्गदर्शन में बहादुर, अनुशासित, सामाजिक जनवादी महिलाएं, पोप का आशिर्वाद लिए हुई, या लूथर को समर्पित धार्मिक क्रिश्चियन महिलाएं, सर्वोच्च न्यायाधीशों की बेटियां, राज्य के नवनियुक्त सभासदों की पत्नियां, अंग्रेज शांतिवादी और उत्कट फ्रेंच नारी मताधिकारवादी महिलाएं होंगी! यह सम्मेलन बुर्जुआ  दुनिया की भगदड़ और सड़ांध दिखाने के लिए बाध्य है। उसकी आशाहीन स्थितियों का कैसा चित्र! सम्मेलन प्रतिक्रांति की ताकतों में विभाजन कर उन्हें कमजोर बनाएगा। दुश्मन की हर कमजोरी, उतनी ही मात्र में हमारी ताकत बढ़ाएगी। मैं सम्मेलन के पक्ष में हूं। तुम्हें हमारा भरपूर सहयोग मिलेगा। तो चलो शुरू हो जाओ। मैं तुम्हारे संघर्ष के लिए तुम्हें शुभकामना देता हूं।’

फिर हमने जर्मनी की स्थितियों, खासतौर पर पुराने स्पार्टावादियों और स्वतंत्र वामपक्ष के बीच आसन्न ‘एकता सम्मेलन’ पर बातें की। फिर लेनिन उस कमरे में, जिसे उन्हें पार करना था, काम कर रहे कुछ साथियों के साथ अभिवादनों का आदान-प्रदान करते हुए जल्दी-जल्दी वहां से चले गए। मैं बहुत आशाओं के साथ शुरुआती तैयारियां करने लगी। हालांकि सम्मेलन लड़खड़ा गया, क्योंकि जर्मनी और बुलगारियां की महिला साथियों ने इसका विरोध किया, जो कि उस समय सोवियत रूस के बाहर कम्युनिस्ट महिलाओं के सबसे बड़े आंदोलन की नेता थीं। वे सम्मेलन बुलाए जाने के एकदम विरुद्ध थी। जब मैंने लेनिन को इस बारे में सूचित किया, उनका जबाव था- ‘यह दुखद है, बहुत दुखद! इन साथियों ने महिलाओं की आशा को एक नया और बेहतर रूप देने और इस तरह उन्हें सर्वहारा के क्रांतिकारी संघर्ष में साथ लाने का एक शानदार अवसर गवां दिया है। कौन कह सकता है कि निकट भविष्य में ऐसा माकूल मौका फिर मिलेगा कि नहीं? जब लोहा गरम हो तभी उस पर चोट करनी चाहिए। लेकिन काम बचा रह गया है। तुम्हें उन महिलाओं तक पहुंचने की राह तलाशना है, जिन्हें पूंजीवाद ने घोर जरूरतों में फंसा रखा है। तुम्हें हर तरह से इसे देखना होगा। इस अनिवार्य काम को टाला नहीं जा सकता।
कम्युनिस्ट नेतृत्व के तहत संगठित कार्यवाही के बिना पूंजीवाद पर जीत हासिल नहीं की जा सकती, ना ही साम्यवाद की नीव ही रखी जा सकती है। इसीलिए निष्क्रिय पडे़ महिला समुदाय को अंततः गतिवान बनाना ही होगा।’

लेनिन के बिना क्रांतिकारी सर्वहारा ने एक वर्ष पूरा कर लिया है। इसने, उनके उद्देश्य की शक्ति को बता दिया है। इसने, नेता की महान प्रतिभा सिद्ध कर दी है। इसने यह बताया है कि नुकसान कितना बड़ा और अपूरणीय है। एक बरस पहले, जब लेनिन ने अपनी दूरदर्शी और भेदने वाली आंखें हमेशा के लिए मूंद ली थी, उस दुखद समय में जैसे दुख की बाढ़ आ गई थी। मैंने शोक मनाते कामगारों का अंतहीन प्रवाह देखा था, जो लेनिन की कब्र पर जा रहा था। उनका शोक, मेरा शोक है, लाखों का शोक है। मेरे नवजात दुःख ने मेरे भीतर, उस यथार्थ की, जिसने त्रसद वर्तमान को पीछे लौटा दिया था, अनेक स्मृतियां भर दी। मैंने फिर से उस प्रत्येक शब्द को सुना, जो लेनिन ने बातचीत के दौरान मुझसे कहे थे। मैं उनके चेहरे के हर बदलाव को देख रही थी। लेनिन के मकबरे से ध्वाजाएं उतारी जा रही थी। ध्वाजाएं, जो क्रांति के लड़ाकुओं के रक्त से भीगी हुई थी। जयपत्रें की मालाएं रखी जा रही थी। उनमें से एक भी अतिरिक्त नहीं थी और मैं, उनमें अपनी ये विनम्र पंक्तियां जोड़ती हूं।

भारत विज्ञान समिति द्वारा ‘महिलाओं के मुद्दे’ शीर्षक से प्रकाशित किताब से साभार. हिंदी में अनुवाद मनोज कुलकर्णी ने किया है. 

तस्वीरें गूगल से साभार 

स्त्रीकाल का संचालन ‘द मार्जिनलाइज्ड’ , ऐन इंस्टिट्यूट  फॉर  अल्टरनेटिव  रिसर्च  एंड  मीडिया  स्टडीज  के द्वारा होता  है .  इसके प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें : 
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सिवाय साम्यवाद के महिलाओं की मुक्ति संभव नहीं:लेनिन

आज से लगभग 100 साल पहले 1920 में मार्क्सवादी स्त्रीवादी क्लारा जेटकिन ने रूसी क्रांति के विराट नेता लेनिन से यह बातचीत की थी. इस बातचीत का एक हिस्सा (बीच का हिस्सा), जो महिला श्रम के सन्दर्भ में है स्त्रीकाल के पाठक 1 मई (मजदूर दिवस) को पहले ही पढ़ चुके हैं, इस लिंक को क्लिक कर पढ़ सकते हैं. 

लेनिन: कम्युनिस्ट नेतृत्व महिलाओं के आन्दोलन के सवाल पर निराशावादी, रुको और देखो वाला रुख अपना लेता है

प्रारम्भ इस लिंक से होता है: भारतीय संतों के हमेशा कुंडलिनी जागरण की तरह हमेशा सेक्स की समस्याओं में उलझे रहने वालों पर भी मैं अविश्वास करता हूं: लेनिन

दूसरी क़िस्त : कम्युनिस्ट महिलाओं, कामगार महिलाओं के विचार सर्वहारा की क्रांति पर ही केंद्रित होना चाहिए: लेनिन

इस ‘पानी के ग्लास’ वाली थ्योरी को मैं न सिर्फ गैर मार्क्सवादी बल्कि समाज विरुद्ध भी मानता हूं। मामला बस इतना भर नहीं है कि प्रकृति ने क्या दिया है, लेकिन जो संस्कृति निर्मित हुई है-चाहे अच्छी या बुरी, वो सेक्स-जीवन में भी आती है। ‘परिवार की उत्पत्ति’ किताब में एंगेल्स ने इस महत्वपूर्ण बात की तरफ इशारा किया है कि किस तरह साधारण यौन-संबंध, व्यक्तिगत यौन प्रेम में विकसित होकर अधिक पवित्र बने। लिंगों के बीच के संबंध महज आर्थिक और भौतिक जरूरतों के आपसी प्रभावों की ही अभिव्यक्ति नहीं है, जिसे दैहिक रूप में जानबूझकर लिया जाता है। इन संबंधों में होने वाले परिवर्तन के लिए समाज की पूरी विचारधारा से जोड़े बगैर अकेले उसके अर्थिक आधार से जोड़ देना मार्क्सवाद नहीं, सिर्फ तर्कवाद है। तय है कि प्यास को बुझाना है, लेकिन क्या साधारण तौर पर कोई व्यक्ति नाली में उतरकर कीचड़युक्त पानी पियेगा? या कि ऐसे ग्लास से भी पानी पियेगा जिसे कई लोग जूठा कर चुके हो? लेकिन किसी भी अन्य कारण की अपेक्षा सामाजिक कारण महत्वपूर्ण है।

पानी पीना हर किसी का व्यक्तिगत मामला है। लेकिन प्यार करने के लिए दो लोगों का होना जरूरी होता है। इससे एक तीसरे जीवन के आने की आशा भी होती है। इस काम में एक सामाजिक जटिलता है। समाज के प्रति एक जिम्मेदारी भी। एक कम्युनिस्ट होने के नाते मेरा इस ‘पानी के ग्लास’ वाली थ्योरी से कोई संबंध नहीं है। बावजूद उसके आकर्षक शीर्षक ‘प्यार की मुक्ति’ के अलावा इसके प्यार की मुक्ति न तो कोई नया या कम्युनिस्ट विचार ही है। तुम्हें याद होगा कि पिछली सदी के मध्य में ‘हृदय की मुक्ति’ की बात को महान साहित्य में बढ़ाया गया था। बुर्जुआ व्यवहार में यह बात दैहिक मुक्ति में बदली। अभी के मुकाबले तब यह बात अधिक प्रतिभा के साथ समझाई गई थी। फिर भी मैं बता नहीं सकता कि व्यवहार में यह किस तरह आती थी। अपनी इस आलोचना को मैं सन्यासी भाव बढ़ाने के लिए उपयोग नहीं कर रहा हूं। मेरे विचारों में दूर तक ऐसी बात नहीं है। साम्यवाद, सन्यास लाने के लिए नहीं है, बल्कि आनंद, शक्ति और एक प्रेमपूर्ण जीवन के लिए है। जबकि मेरे विचार से, आज के सेक्स की अधिकता वाला जीवन न तो शक्ति ही दे पा रहा है, न ही आनंद, उल्टे यह तो उन्हें नष्ट ही कर रहा है। यह बुरी बात है, क्रांति के इस युग में बहुत-ही बुरी बात है।

‘ख़ास तौर पर युवाओं को शक्ति और आनंद की जरूरत है। जिम्नास्टिक्स, तैराकी, भ्रमण व हर तरह के शारीरिक मेहनत वाले स्वास्थ्यकारी खेलों के साथ ही व्यापक बौद्धिक रुचियों की उन्हें जरूरत है। साथ ही यथासंभव सामूहिक तौर पर सीखने, पढ़ने और शोध करने की भी। सेक्स समस्याओं पर अंतहीन भाषणों, वाद-विवाद और तथाकथित ‘अपनी तरह जीने’ की अपेक्षा ये बातें युवाओं के लिए कहीं अधिक उपयोगी हैं। समाज के स्वास्थ्य में ही मनुष्य का स्वास्थ्य है। न तो एक भिक्षु बनो ना ही डॉन जुआन, और साथ ही साथ एक जर्मन विषयासक्त की तरह इनके बीच का भी कुछ नहीं। तुम उस युवा साथी ‘एक्स’ को जानती हो? वो एक शानदार प्रतीभाशाली लड़का है। लेकिन मुझे डर है कि वो कुछ नहीं बन पाएगा। उसका एक के बाद दूसरा प्रेम चलता रहता है। यह राजनीतिक संघर्ष और क्रांति के लिए अच्छी बात नहीं है। मैं ऐसी किसी भी महिला की विश्वसनीयता और धैर्य के बारे में दावे से नहीं कह सकता, जिसका प्रेम-प्रसंग राजनीति से गुंथा होता है, न ही ऐसे पुरुष के बारे में जो हर घाघरे के पीछे भागता है, हर जवान महिला के साथ अपने को जोड़ लेता है। ना-ना, ये क्रांति के साथ-साथ नहीं चलेगा।

लेनिन उछलकर खडे़ हुए और हथेलियों से टेबल थपथपाने लगे, फिर कमरे के चक्कर लगाने लगे। फ्क्रांति, समुदाय और हर व्यक्ति से एकाग्रता और हर तरह के बल को जोड़ने की अपेक्षा करती है। वो उस व्याभिचार को बर्दाश्त नहीं करती जो दी- एनुन्जियों के पतनशील नायक-नायिकाओं में बहुत आम है। यौन संबंधों में स्वच्छन्दता बुर्जुआपन है। ये अधःपतन का लक्षण है। सर्वहारा उभरता हुआ वर्ग है। उसे उत्तेजित या सुन्न करने के लिए किसी नशे की जरूरत नहीं है। ना ही सेक्स संबंधों में ढिलाई या शराब के नशे की।
‘उसे पूंजीवाद की चरित्रहीनता, गंदगी और बर्बरता को न भूलना चाहिए, ना ही यह भूलेगी। यह अपने संघर्ष की सबसे प्रबल प्रेरणा, अपनी वर्गीय स्थिति और साम्यवादी आदर्श से हासिल करती है। उसे चाहिए- स्पष्टता, स्पष्टता और अधिक स्पष्टता। इसीलिए, मैं यह बात दोहराता हूं कि किसी भी किस्म से शक्ति को कमजोर, जाया और क्षरित नहीं होने देना है। आत्म-नियंत्रण और आत्मानुशासन का मतलब दासता नहीं है। प्रेम के मामले में भी यही बात है। पर मुझे माफ करना क्लारा, हम अपनी बहस से बहुत दूर आ गए हैं। तुमने मुझे टोका क्यों नहीं? चिंताओं के कारण मैं बोलता ही चला गया। अपने युवाओं का भविष्य मेरे दिल के करीब की बात है। यह क्रांति का अटूट हिस्सा है। जब कभी नुकसानकारी शक्तियां नजर आती हैं, जो बुर्जुआ समाज से सरक कर क्रांति की दुनिया में घुस जाती हैं, और उर्वरक बीजों की जड़ों की तरह फैलने लगती हैं, बेहतर होता है कि तत्काल उनके विरूद्ध कार्रवाई की जाए। जिन प्रश्नों पर हमने बातें कीं, वे भी महिला समस्याओं का ही हिस्सा है।’
लेनिन महान जीवंतता और गहरे विश्वास के साथ बोल रहे थे। मैं महसूस कर सकती थी, उनका हर शब्द उनके दिल की गहराई से आ रहा था। उनके चेहरे पर आने वाले भाव, मेरे इस अहसास को बढ़ा ही रहे थे। समय-समय पर वे ऊर्जात्मक हाव-भाव के साथ कोई विचार व्यक्त करते। मैं चकित थी कि अत्यधिक महत्व की राजनीतिक समस्याओं के साथ-साथ वे साधारण मुद्दों से भी भलीभांति परिचित थे। उन पर भी बहुत ध्यान देते थे। न केवल सोवियत रूस के बारे में ही वे चिंतित थे, बल्कि उन देशों के बारे में भी जो कि अब तक पूंजीवादी ही थे। एक शानदार मार्क्सवादी की तरह वे जिस भी और जैसे भी रूप में जो कुछ प्रगट था, उसे समग्रता में ताड़ लेते। उनका सारा उत्साह और उद्देश्य प्रकृति की विरोधहीन ताकतों की मानिंद इस एकमात्र लक्ष्य, कि क्रांति को जनता के काम की तरह तेज बनाना है, पर बिना विचलित हुए, एकाग्र था। वे हर बात को क्रांति की सचेत क्रियात्मक शक्तियों पर प्रभाव के संदर्भ में ही तौलते। उनकी नजरें हमेशा विश्व स्तर पर अविभाजित सर्वहारा की क्रांति पर टिकी रहती थी।

मैंने आह भरते हुए कहा, ‘कामरेड लेनिन, मुझे खेद है कि आपके शब्दों को लाखों-करोड़ो लोगों ने नहीं सुना। जैसा कि आप जानते हैं, आपको मुझे बदलने की जरूरत नहीं है। लेकिन दोस्तों और दुश्मनों के लिए भी आपके विचार जानना बहुत ही महत्वपूर्ण होगा।

लेनिन स्नेहभाव से मुस्कुराए। वे बोले, ‘तुम्हारे लिए मेरे पास जो समय था, उसमें से आधा बीत चुका है। मैंने बहुत लंबी बातें कह दी। महिलाओं के बीच प्रमुख कम्युनिस्ट धारणाओं को तुम्हें स्पष्ट करना है। मैं तुम्हारे सिद्धांतवादी रवैये और व्यावहारिक अनुभव को जानता हूं। अतः इस बारे में हमारी बातचीत बहुत छोटी होगी। बेहतर होगा कि तुम व्यस्त हो जाओ। तुम क्या सोचती हो? महिला कम्युनिस्ट धारणाएं क्या हो?’

मैंने उन्हें इस बारे में संक्षेप में बताया। बिना किसी टोका-टाकी के वे बीच-बीच में स्वीकार भाव से सिर हिलाते रहे। अपनी बात कहने के बाद मैंने प्रश्न-मुद्रा में लेनिन की ओर देखा।

‘ठीक है, वे बोले। ‘यह भी अच्छा होगा कि तुम पार्टी की जिम्मेदार महिला साथियों की एक बैठक बुलाकर उनसे इस बारे में बातें करो। साथी इनेसा अभी यहां नहीं हैं। वो बीमार हैं और काकेशस गई हुई हैं। चर्चा के बाद इन धारणाओं को लिख डालो। एक समिति उन्हें देखेगी और कार्यकारिणी अंतिम निर्णय लेगी। मैं अपने विचार कुछ मुख्य मुद्दों पर ही दूंगा। उन पर, जिन पर मैं तुम्हारे विचारों से सहमत हूं। मुझे वे हमारे वर्तमान आंदोलन और प्रचार के लिए भी महत्वपूर्ण जान पड़ते हैं, यदि वे सफल संघर्ष के लिए तैयारी की राह बना सके।

‘महिला कम्युनिस्ट धारणा में इस बात को जोरदार तरीके से कहना होगा कि सिवाय साम्यवाद के महिलाओं की मुक्ति संभव नहीं है। तुम्हें महिलाओं की मानवीय और सामाजिक स्थिति तथा उत्पादन के साधनों पर निजी मिल्कियत के बीच के अटूट संबंधों पर जोर देना होगा। इससे बुर्जुआ  के ‘नारी मुक्ति’ आंदोलन के खिलाफ एक मजबूत और पक्की धारा बनेगी। यह हमें महिलाओं के प्रश्न को सामाजिक, कामकाजी वर्ग के प्रश्न के तौर पर जांचने का आधार भी देगा। सर्वहारा के वर्ग संघर्ष और क्रांति के साथ इसे जोड़ेगा। कम्युनिस्ट महिला आंदोलन अपने में एक जनआंदोलन होगा, साधारण जनआंदोलन का हिस्सा, न सिर्फ सर्वहारा वर्ग का, बल्कि पूंजीवाद या शोषक वर्ग द्वारा हर शोषित और दमित वर्ग का। सर्वहारा के वर्ग संघर्ष और एक कम्युनिस्ट समाज बनाने के उसके ऐतिहासिक मिशन में महिला आंदोलन का महत्व है। इस बात पर हमारा गर्व करना कि कांमिन्टर्न में, हमारी पार्टी में, क्रांतिकारी नारीवाद का उत्तम अंश है। लेकिन यह निर्णायक नहीं है। नगरों और देश की लाखों कामकाजी महिलाओं के मन को, हमें अपने संघर्ष और खासकर समाज के साम्यवादी पुनर्गठन के लिए, जीतना होगा। महिलाओं के बगैर कोई सच्चा जनआंदोलन हो ही नहीं सकता।

‘हम अपनी वैचारिक अभिकल्पनाओं से अपने सांगठनिक विचार तय करते हैं। हमें कम्युनिस्ट महिलाओं के अलग संगठनों की चाहत नहीं है! जैसे पार्टी में एक पुरुष सदस्य होता है, वैसे ही एक महिला भी रहेगी। उन्हें समान अधिकार के साथ-साथ कर्त्तव्य भी समान होंगे। इस मसले पर कोई मतभेद नहीं हो सकता। फिर भी हमें सच्चाई से अपनी आंखें नहीं फेरनी चाहिए। पार्टी के पास ऐसे कामकाजी समूह समितियां, जत्थे या जो कुछ भी उन्हें हम नाम दें, होने चाहिए, जो महिलाओं के व्यापक हिस्से को सचेत करने, उन्हें पार्टी के सम्पर्क में लाने और उसके प्रभाव में रखने का विशेष लक्ष्य लेकर चले। जाहिर है इसके लिए जरूरी होगा कि हम महिलाओं के बीच व्यवस्थित काम करें। हम जागरुक महिलाओं को शिक्षित करें और उनके दिल जीतें। उन्हें कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में सर्वहारा के वर्ग संघर्ष के लिए तैयार करें। जब मैं यह कहता हूं तो मेरे दिमाग में सिर्फ सर्वहारा महिलाएं नहीं होती-चाहे वे कारखानों में कार्यरत हो या घर में भोजन पका रही हो।

‘मेरे दिमाग में तो किसान महिलाएं और निम्न मध्यवर्ग के विविध हिस्सों की महिलाएं भी रहती हैं। वे भी पूंजीवाद की पीडि़त हैं। खासतौर पर युद्ध के बाद तो और भी। इन महिलाओं की राजनीति में अरुचि और अन्यथा असामाजिक और पिछड़ी मानसिकता, उनकी गतिविधियों की सीमित संभावनाएं और पूरी जीवन शैली, न झुठलाए जाने वाले तथ्य हैं। उनकी अनदेखी करना नादानी होगा, सरासर नादानी। उनके बीच काम करने के लिए हमारे अपने समूह होने चाहिए। आंदोलन के विशेष तरीके और विशेष तरह के संगठन होने चाहिए। यह बुर्जुआ  ‘नारीवाद’ नहीं है। यह एक व्यावहारिक क्रांतिकारी अभियान है।’

मैंने लेनिन से कहा कि उनके तर्क मेरे लिए मूल्यवान और उत्साहजनक हैं। कई अच्छे साथी भी महिलाओं के बीच व्यवस्थित काम करने के लिए विशेष समूह बनाने का घोर विरोध करते हैं। वे इसे उस चालाक ‘नारीमुक्ति’ आंदोलन की तरफ, सामाजिक जनवादी परम्पराओं की तरफ वापसी करार देते हैं। वे कहते हैं कि, चूंकि कम्युनिस्ट पार्टी ने महिलाओं को बराबरी का दर्जा दिया है, उन्हें साधारणतया कामकाजी लोगों के साथ, बिना किसी भेदभाव के, काम करना चाहिए। पुरुषों और महिलाओं के प्रति समान रवैया होना चाहिए। लेनिन द्वारा आंदोलन और संगठन को लेकर जो स्थितियां देखी गई, उन्हें स्वीकार करने की किसी भी कोशिश को ऐसे दृष्टिकोण वाले लोग अवसरवाद, आत्मत्याग और मूल सिद्धांतों से भटकाव करार देंगे।

यह नई बात नहीं है, न ही निर्णायक है,’ लेनिन बोले। ‘इस बात से परेशान ना हो। ऐसा क्यों है कि कहीं भी पार्टी में उतनी महिलाएं नहीं हैं, जितने पुरुष हैं? यहां तक कि सोवियत रूस तक में नहीं है? मजदूर संघों में भी महिलाओं की संख्या इतनी कम क्यों है? यह बात विचार करने योग्य है। महिलाओं के बीच काम करने के लिए बेहद जरूरी विशेष समूहों को नकारना, हमारी कम्युनिस्ट मजदूर पार्टी के बहुत ही सिद्धांतवादी, क्रांतिप्रिय मित्रें का रुख है। उनका मानना है कि सिर्फ मजदूर यूनियन जैसा एक ही संगठन रहना चाहिए। मैं जानता हूं, जब भी समझदारी की कमी होती है, यानी जब भी दिमाग ध्यान दिए जाने वाले तथ्यों को समझने से इंकार कर देता है, तब क्रांतिवादी मानसिकता वाले लेकिन भ्रमित साथी सिद्धांतों को ओढ़ लेते हैं।

‘सिद्धांतों की पवित्रता के ये रखवाले हमारी क्रांतिकारी नीतियों की ऐतिहासिक जरूरतों से कैसे कदम मिला पाएंगे? उनकी तमाम बातें कठोर आवश्यकताओं के सामने धराशायी हो जाती हैं। हमारी तरफ जब तक लाखों महिलाएं न हो जाए, हम सर्वहारा की तानाशाही नहीं लागू कर पाएंगे। ना ही हम उनके बगैर कम्युनिस्ट निर्माण में ही जुट पाएंगे। हमें, उन तक पहुंचने की राह ढूंढनी ही होगी। उसे पाने के लिए हमें अध्ययन और शोध करना होगा। फ्इसीलिए हमारे लिए यह बिल्कुल ही उचित होगा कि हम महिलाओं की भलाई के लिए मांगें रखें। यह कोई न्यूनतम कार्यक्रम नहीं है, न ही दूसरी इंटरनेशनल के ‘सामाजिक जनवादी’ अर्थ में सुधार का कार्यक्रम। यह ये दर्शाने नहीं जा रहा कि हम मानते हैं कि बुर्जुआ और उनका राज्य हमेशा रहेगा, या लंबे समय तक रहेगा। ना ही ये महिलाओं में सुधार की गति बढ़ाकर, उन्हें क्रांतिकारी संघर्ष से भटकाने का ही प्रयास है। यह ऐसे किसी तरह का काम नहीं है। ना ही किसी सुधारवादी गपोड़ की तरह है। हमारी मांगें तो उन व्यवहारिक नतीजों पर आधारित हैं, जो हमने कमजोर और वंचित महिलाओं के असभ्य निरादर के कारण निकली जरूरतों से निकले हैं। वो निरादर जो उन्होंने बुर्जुआ व्यवस्था में सहा। इस तरह हम बता पाएंगे कि हम उन जरूरतों को जानते हैं, साथ ही महिलाओं के दमन से परिचित हैं। हमें पुरुषों के वर्चस्व की जानकारी है। इन सबसे हम घृणा करते हैं, हां घृणा करते हैं, और जो कुछ भी कामकाजी महिलाओं, मजदूरों की पत्नियों, किसान महिलाओं, साधारण व्यक्ति की पत्नी और यहां तक कि कई मामलों में सम्पन्न वर्ग की महिलाओं का दमन करे, उन पर अत्याचार करे, उसे दूर करना चाहते हैं। बुर्जुआ  समाज से हम महिलाओं के लिए जो अधिकारों और सामाजिक मानदंडों की मांग करते थे, वो इस बात का सबूत है कि हम महिलाओं की स्थिति और हितों को जानते हैं, और हम सर्वहारा की तानाशाही में उसका ख्याल रखेंगे। जाहिर है, कि सोये हुए और संरक्षक सुधारवादी की तरह नहीं। ना! किसी भी तरह नहीं। बल्कि ऐसे क्रांतिकारियों की तरह जो आर्थिक तंत्र और विचारधारात्मक ढांचे के निर्माण में महिलाओं को समान रूप में शामिल कर रहे हैं।’

मैंने लेनिन को आश्वस्त किया कि मैं भी इसी विचार की हूं, और इसका विरोध जरूर होगा। अनिश्चित और कायर दिमाग इसे संदिग्ध अवसरवाद कहकर खारिज कर देंगे। इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि महिलाओं के लिए हमारी वर्तमान मांगों को गलत समझा जाए, उनका गलत अर्थ निकाला जाए।
‘तो क्या?’ थोड़े गुस्से में लेनिन ने गहरी सांस ली। ‘हर बात जो हम कहते और करते हैं, सब में यह खतरा रहता ही है। यदि हम इससे डर गए तो यह हमें अनुशंसित और आवश्यक काम करने से रोकेगी, हम भारतीय स्तम्भनिवासियों में बदल जाएंगे। हमें डिगना नहीं है। किसी भी कीमत पर डिगना नहीं है। अन्यथा हम अपने सिद्धांतों के आधार-स्तम्भों से हिल जाएंगे। हमारे मामले में बात सिर्फ इतनी-भर नहीं है कि हम क्या मांग रहे हैं, बल्कि हम कैसे मांग रहे है। मुझे लगता है मैंने वो बिल्कुल स्पष्ट कर दिया है। ये अकारण नहीं है कि हमारे प्रचार में हम महिलाओं के लिए हमारी मांगों की देवमूर्ति न बनाएं। नहीं! हमें अब उसके लिए लड़ाई लड़ना चाहिए, अभी के हालात अनुसार, निश्चित ही सर्वहारा के साधारण हितों के साथ-साथ ही अब अन्य मांगों के लिए भी संघर्ष करना चाहिए।

‘इस तरह का हर द्वंद हमें आदरणीय बुर्जुआ समूह और पिछलग्गुओं के समक्ष प्रतिद्वंद्वी बना देता है।  यह आदरणीय सुधारवादी पिछलग्गू किसी तरह कम नहीं हैं। हमारा द्वंद्व उन्हें हमारे नेतृत्व में लड़ने के लिए बाध्य करता है या फिर अपना छप्रवेश उतारने के लिए, जो वे नहीं चाहते। इस तरह, संघर्ष हमारे और उनके बीच फर्क करता है। हमारे कम्युनिस्ट चेहरे को दिखाता है। ये हमें, महिलाओं का विश्वास दिलाता है, जो कि पुरुषों, उनके नियोक्ताओं की शक्ति और सारे बुर्जुआ -समाज के वर्चस्व से खुद को शोषित, बंधक और दमित पाती हैं। सभी के द्वारा छली गई और अकेली छोड़ दी गई कामकाजी महिलाएं महसूस करती हैं कि उन्हें हमारे साथ आकर संघर्ष करना चाहिए। मैं स्वीकार करता हूं, तुम भी मानों कि महिलाओं के हकों की लड़ाई को, सर्वहारा की तानाशाही की सत्ता और व्यवस्था लाने के हमारे मुख्य लक्ष्य से भी जोड़ा जाना है। फिलहाल तो यही हमारा आदि और अंत है और यही रहेगा भी। यह स्पष्ट है, बिल्कुल स्पष्ट। लेकिन यदि हम सिर्फ इसी एक मांग को दोहराते रहेंगे या उसकी गर्जना भी करेंगे तो महिलाओं की बड़ी संख्या अपने-आप, राज्य सत्ता के लिए हो रहे संघर्ष से नहीं जुड़ेंगी। नहीं! हजार बार कहूंगा नहीं। हमें हमारी अपील कामकाजी महिलाओं की पीड़ाओं, जरूरतों और इच्छाओं के साथ राजनीतिक रूप से उनके दिमाग में बिठानी पड़ेगी। उन सभी को यह बताना पड़ेगा कि उनके लिए सर्वहारा की तानाशाही का क्या मतलब होगा। कानूनी और व्यावहारिक दोनों ही तौर पर, पुरुषों के बराबर हक- परिवार में, राज्य और समाज में। यह भी कि इसका मतलब है बुर्जुआ  सत्ता का पूरा सफाया।’

 मैंने कहा, ‘सोवियत  रूस ने सिद्ध किया है कि यह हमारा महान उदाहरण होगा!’
क्रमशः


भारत विज्ञान समिति द्वारा ‘महिलाओं के मुद्दे’ शीर्षक से प्रकाशित किताब से साभार. हिंदी में अनुवाद मनोज कुलकर्णी ने किया है 


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पटना में धर्मांतरण के नाम पर ईसाई परिवार की प्रताड़ना: जांच दल

निवेदिता 


बिहार से लगातार ऐसी खबरें आ रही हैं, जो बिहार में बढ़ते साम्प्रदायिक तापमान की सूचक हैं. कई जिलों में साम्प्रदायिक तनाव पैदा करने की खबरों के बीच इस बार राजधानी से हिंदूवादी जमातों के दवाब में पुलिस प्रशासन द्वारा एक ईसाई परिवार की प्रताड़ना की खबर है, परिवार का मुखिया बिहार मिलिट्री पुलिस में सब इन्स्पेक्टर हैं. ऐसा लगता है कि हिंदूवादी संगठनों के आगे नीतीश सरकार पूरी तरह बेवश है. इस मामले की जांच के लिए बने जांच दल की रिपोर्ट:

रुपसपुर घटना की जांच करने गयी टीम के सदस्यों के नाम
1. निवेदिता  ( बिहार महिला समाज की कार्यकारी अध्यक्ष)
2. रुपेश (सामाजिक कार्यकर्ता)
3. निशा पटना (उच्य न्यायालय की अधिवक्ता)
4. सुशील कुमार (छात्र संगठन)
5. इशतियाक (सामाजिक कार्यकर्ता)

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ नीतीश कुमार

बिहार की राजधानी अभी तक धार्मिक और साम्प्रदायिक आग से बची हुई है, पर इस आग को लहकाने की पूरी तैयारी की जा रही है। पिछले दिनों पटना में भी धर्म के नाम पर जहर घोलने की कोशिश हुई। इस कोशिश में एकबार फिर आर.एस.एस और विश्व हिन्दू परिषद का नाम आ रहा है। यह काम काफी बारीकी से किया जा रहा  है। इसबार उनके निशाने पर एक ईसाई परिवार है।

यह घटना 29 अप्रैल सुबह 10. 30 बजे की है। जिसमें एक ईसाई परिवार को पुलिस ने धर्म परिवर्तन के नाम पर  गिरफ्तार किया। पुलिस द्धारा दर्ज एफ.आई.आर को देखने से स्पष्ट होता है कि बिना किसी जांच-परख के पुलिस ने किसी दबाव में आकर आनन-फानन में ईसाई दंपत्ति को गिरफ्तार किया है। उनपर आईपीसी धारा 298, 504, 505, 120बी के तहत रुपसपुर थाना में एफआईआर लॉज किया गया है।  पुलिस के पास न तो गिरफ्तारी का वारंट था ना ही उच्चतम न्यायलय के दिये गए निर्देर्शो का पालन किया गया। उच्चतम न्यायालय के एक महत्वपूर्ण फैसले और सीआरपीसी में किए गये संशोधन के अनुसार अगर किसी केस के धारा के अंर्तरगत सात साल से कम की सजा का प्रावधान है तो पुलिस स्वयं गिरफ्तार नहीं कर सकती। गिरफ्तारी के लिए मजिस्ट्रेट से अनुमति सहित उसकी कुछ ‘शर्ते हैं। क्या उन ‘शर्तो का पालन किया गया?

इस पूरे मामले की जांच के लिए हमारी टीम के सदस्य रुपसपुर गए और वहां रहने वाले लोगों से मुलाकात की। टीम के लोग ईसाई परिवार से भी मिले जिनपर जबरन धर्म परिर्वतन कराने का आरोप है। रुपसपुर घनी आबादी वाला मुहल्ला है। जहां हिन्दुओं की मिली-जुली आबादी रहती है। आबादी का एक बड़ा हिस्सा दलितों का है। हिन्दू बहुल इस इलाके में मात्र एक परिवार ईसाई है। जो पिछले सात सालों से यहां रह रहा है।  सुभाष कुमार परियार ईसाई हैं। उनके पूर्वज नेपाल में रहते थे। बाद में वे बिहार आकर बस गए। सुभाष कुमार बीएमपी में सब इंस्पेक्टर की नौकरी करते हैं। उनकी पत्नी दुर्गा परियार प्रेरणा फाउन्डेशन के नाम से एक ट्रस्ट चलाती हैं। जिसके तहत महिलाओं को सिलाई-कढ़ाई की ट्रेनिंग दी जाती है।

पिछले 29 अप्रैल को करीब 10 बजकर 30 मिनट के आस-पास सुभाष कुमार परियार, उनकी पत्नी दुर्गा परियार और उनकी बहन रजनी प्रधान अपने घर में प्रार्थना कर रही थी । प्रार्थना में कई दूसरे लोग भी ‘शामिल थे उसी समय विश्व हिन्दू परिषद और आर.एस.एस से जुड़े हुए लोग उनके घर में धुस आये और हंगामा करने लगे। उन्होंने यह कहते हुए मार-पीट ‘शुरूकर दी कि ये लोग जबरन धर्म परिवर्तन करा रहे हैं।

जब प्राथना में मौजूद लोगों ने विरोध किया तो वे वापस गए और कुछ ही देर बाद अपने साथ पुलिस को लेकर आये। पुलिस ने बिना किसी वांरट के सुभाष कुमार परियार, दुर्गा परियार और उनकी बहन रजनी को गिरफ्तार कर लिया। दोनों महिलाओं की गिरफ्तारी के समय कोई महिला पुलिस साथ में नहीं थी।  रजनी प्रधान की गोद में पांच साल का बच्चा था जिसे बेरहमी मां से अलग कर दिया गया। विरोध करने पर रजनी की पुलिस द्धारा पीटाई की गयी। सुभाष कुमार बी.एम.पी में सब इन्सपेक्टर के पद पर कार्यरत हैं। जिनकी गिरफ्तारी के बाद उन्हें निलंबित कर दिया गया है.

जांच टीम ने रुपसपुर का दौरा किया और सुभाष परियार के परिवार से मुलाकात की। सुभाष परियार की 16 साल की बेटी इस घटना से काफी डरी हुई है। उसने बताया कि 29 अप्रैल को यह घटना घटी उस समय वह भी प्राथना में ‘शामिल थी। उसी समय कुछ नौजवान आये और मेरे माता-पिता को गंदी-गंदी गालिया देने लगे। विरोध करने पर उनकी पीटाई करने लगे। उसने बताया कि इस घटना के पीछे पारवारिक विवाद भी है जिसका फायदा आर.एस.एस ने उठाया है। उसके फूफा भीम सिहं ने आरएसएस से जुड़े नागेश राणा से उसके पिता के खिलाफ शिकायत की थी। उसके बाद ही धर्म परिर्वतन का आरोप लगाते हुए पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार किया। उसके फूफा उनकी बुआ के साथ अक्सर मार-पीट करते हैं जिसका विरोध उसके मां, पिता करते हैं।

उसी मुहल्ले के मिही लाल ने कहा कि उन्होंने पुलिसवालों से ही सुना कि ये लोग 10 हजार रुपये लेकर धर्म परिवर्तन कराते हैं। मिही लाल ने स्वीकार किया कि धर्म परिवर्तन की कोई घटना नहीं घटी है। आजतक इस मुहल्ले के किसी व्यक्ति नें ईसाई परिवार पर ये आरोप नहीं लगाया है।

मुन्ना देवी भी उसी मुहल्ले में रहती हैं। उन्होंने कहा कि कभी किसी के साथ किसी तरह की जबरदस्ती नहीं हुई है। वे लोग काफी अच्छे और ‘शांतिप्रिय लोग हैं। छोटे लाल और जितेन्द्र कुमार रुपसपुर के निवासी हैं। ने कहा कि कभी भी इस मुहल्ले में धर्म परिवर्तन को लेकर कोई बात-चीत नहीं हुई । वे लोग हमेशा मददगार रहते हैं। और काफी धार्मिक लोग हैं। उनका ट्रस्ट महिलाओं को रोजगार से जोड़ने का काम करता है।

जांच टीम के सदस्यों ने श्री आलोक राज ए.डी.जी (लॉ एण्ड आर्डर) से मुलाकात की और इस मामले से अवगत कराया। उन्होंने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए तत्काल आई.जी से बात की। आई .जी ने इस मामले की जांच तुरत डी.आई.जी से कराने का आदेश दिया है। हालांकि कल निचली अदालत से ईसाई परिवार की जमानत याचिका खारिज कर दी गयी है और खबर है कि पुलिस गवाह प्लांट कर रही है, क्योंकि एफआईआर में जो चार गवाह लिखे गये थे, वे उस मोहल्ले से बाहर के लोग थे अब पुलिस मोहल्ले से भी गवाहों को प्लांट कर रही है.



जांच टीम इस निष्कर्ष पर पहुंची है कि:
– रुपसपुर में रहने वाले ईसाई परिवार के खिलाफ एक साजिश के तहत यह कार्रवाई हुई है।
– इसके पीछे राजनीतिक पार्टियों का हाथ है
– आएएसएस और विश्व हिन्दू परिषद के कार्यकाओं का नाम आ रहा है
– धर्म के नाम पर उन्माद पैदा करने की कोशिश की जा रही है
– पुलिस द्धारा किए गये एफआईआर में भी यह कहीं दर्ज नहीं है की किन लोगों का जबरन धर्म परिवर्तन कराया गया।
– पुलिस द्धारा घटना की बगेर छान-बीन किए गिरफ्तारी से लगता है कि पुलिस के उपर कोई उपरी दबाव काम कर रहा है
– गिरफ्तारी का वारेंट भी पुलिस के पास नहीं था
– गिरफ्तारी के समय कोई महिला पुलिस अधिकारी भी मौजूद नहीं थी।
– जांच टीम यह मांग करती है कि इस मामले में पुलिस की भूमिका की जांच की जाय।
– बिना किसी सबूत के गिरफ्तारी के विरुद्ध पुलिस पर आपराधिक मुकदमा दर्ज हो।
– धर्म के नाम पर उन्माद पैदा करने और साम्प्रदायिक सौहार्द बिगाडने के लिए जिन लोगों ने यह साजिश रची उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई हो
– आरएसएस और विश्व हिन्दू  परिषद द्धारा रची गयी इस साजिश की जांच की जाय।
– ईसाई दम्पति  को बिना किसी ‘शर्त के रिहा किया जाय।
– सुभाष कुमार को उनकी नौकरी में फिर से बहाल किया जाय।

इस बीच एडीजी लॉ एंड आर्डर ने आलोक राज ने स्पष्ट किया कि उन्होंने डीजीपी से बात की तो उन्होंने सेंट्रल रेज के डीआईजी को इस मामले को सुपरवाईज करने का निर्देश दिया है. 


निवेदिता वरिष्ठ पत्रकार हैं और स्त्रीकाल के सम्पादन मंडल की सदस्य हैं. सम्पर्क: 9835029152

तस्वीरें गूगल से साभार 

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अनुराधा अनन्या की कविताएं ( पति प्रेम और अन्य)

अनुराधा अनन्या

स्वतंत्र लेखिका, रंगमंच से जुड़ी हैं.:anuradha.annanya@gmail.com

पति प्रेम 

पतियों से दुखी औरतें
अपने सुकून टटोलती हैं
कभी  अपनों के दुलार में
कभी पुराने प्रेमियों की याद में
बेहद निजी समय में

निजी समय जो वे चुराती हैं
बुनती हैं अपने एकांत में

एकांत, किसी बंद कमरे में नहीं
जंगल में नही, छत पर भी नहीं
जहाँ मिल जाता है आसानी से एकांत किसी को भी
वहां  भी नही

औरतों का एकांत चलते-फिरते जीवन में
घर के काम करते हुए
बच्चे संभालते हुए.
बिस्तर पर ढेर औरतें
उतरती है अपने निजी समय में
नींद में होने के बावजूद

इस तरह खुद को बचाती हैं
संदिग्ध होने से
कई बार तो  एकांत को भी काटती हैं
इसी कोशिश में

मगर सुकून टटोलती रहती है पूरी शिद्दत से
ताकि बना रहे पति प्रेम
यहां तक  कि
उन्हें पति की मार में भी
प्रेम नजर आने लगता

एक पन्ना और बस मैं 

मैंने सारे क्षोभ को बटोरा
और कलम उठाई
फिर अपने दुखों को,निराशा को,थकान को
शब्दो मे पिरो कर
कागज़ पर रसीद कर दिया
जैसे पूरा मन खाली हो गया हो कोरे कागज़ पर

राहत बुनती चली गई एक- एक हर्फ़ के साथ
पूरा मन खाली हो गया
लबालब भरा हुआ था मन
प्यार से,धोखे से,निराशा से,थकान से, दुःख से,आस से
खाली हो गया एक काग़ज़ पर

दिमाग परत दर परत खुलता चला गया
केंचुली सी उतरती गई सारी परतें
परतों में छिपा एक गाना,एक कहानी,एक रहस्य,एक याद,एक धोखा,प्यार,कुछ योजनाएं,कुछ,दृश्य ,कुछ शब्द और एक क़लम
भाषा के रूप में उतरते गए
उधड़ता गया लबालब भरा हुआ मन और परत दर परत दिमाग एक ही पन्ने पर

एक नींद कमाऊंगी अब
अपने आलिंगन से ही
खुद को सुनाते हुए लोरी
बुनूँगी एक सपना,एक गाना,एक कहानी,एक याद,एक अहसास, प्यार,ढेरों इच्छाएं,योजनाएं,कुछ शब्द,एक क़लम, एक पन्ना और बस एक मैं

सहेलियों  सी कविता 


कविताएं मेरी सहेलियां  हैं
जिंदा रखती है मुझे
कागज़ पर
समेटे हुए अंदर के अवसाद मेरे
दुःख मेरे ,शिकायते भी
बचाकर रखती हैं आंच दिल मे आस की
फूट पड़ेगीं ठीक दुःख  की तरह ही
खुशी में भी
मन की पतझड़, वसन्त दोनो ही दिखेंगें
इन कविताओं में
ज़िंदा रहूंगी मैं,जिंदा कविताओं की  छिपी आस में

झांक लेंगी वे औरतें भी इनमें
जो छिपाकर रखती है जिंदा कविताएँ
कविताएँ, जीवन की यात्राओं की ,बादलों की,आसमानों की
असीम कल्पनाओं की और अधूरी इच्छाओं की भी

कविताएँ,छिपाकर रखी है उन औरतों ने
मन के किसी कोने में
दुप्पटे की गाँठ में
लटकते हुए छिके में
एक याद की तरह
महफूज है किसी खजाने सी

कविताएँ , जो जबान से ना कही गई
ना लिखी गई, किसी जबान में
दुनिया की चलताऊ भाषा से दूर
अपनी ही भाषा में

डूबी कविताएँ

पहचान जाएंगी औरतें देखते ही
सहेलियों की तरह
खोज लेंगी पीड़ अपनी, प्रीत अपनी
मेरी कविताओं में भी
उनकी कविताओं की तरह

ये कविताएँ जो कही गयीं
जो अनकही भी रही
भाषाओं में

4. 
कहना सुनना 

उसने कहा
तुम पागल हो
और निपट भी

मैं पागल हूँ…?
वह यह भी न कह पाई
पागल नहीं हूँ
न कह पाने की तरह

वह अभ्यस्त है
सिर्फ सुनने की
मगर कोशिश करती है
कहने की भी

मगर वह न कभी अभ्यस्त ही  रहा
सुनने का
न कोशिश ही की कभी

5. 
भाषा का अंतर 

मेरी भाषा को पता है
कब क्या कहना है

तुम्हारी भाषा को पता है
कब क्या कहलवाना है

इस कदर अभ्यस्त हैं
इस संवाद में हम
कि तुम सिर्फ इशारा भी करते हो
तो मैं मशीन सी चालू हो जाती हूँ

तस्वीरें गूगल से साभार 

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कम्युनिस्ट महिलाओं, कामगार महिलाओं के विचार सर्वहारा की क्रांति पर ही केंद्रित होना चाहिए: लेनिन

आज से लगभग 100 साल पहले 1920 में मार्क्सवादी स्त्रीवादी क्लारा जेटकिन ने रूसी क्रांति के विराट नेता लेनिन से यह बातचीत की थी. इस बातचीत का एक हिस्सा (बीच का हिस्सा), जो महिला श्रम के सन्दर्भ में है स्त्रीकाल के पाठक 1 मई (मजदूर दिवस) को पहले ही पढ़ चुके हैं, इस लिंक को क्लिक कर पढ़ सकते हैं. 

लेनिन: कम्युनिस्ट नेतृत्व महिलाओं के आन्दोलन के सवाल पर निराशावादी, रुको और देखो वाला रुख अपना लेता है

प्रारम्भ इस लिंक से होता है: भारतीय संतों के हमेशा कुंडलिनी जागरण की तरह हमेशा सेक्स की समस्याओं में उलझे रहने वालों पर भी मैं अविश्वास करता हूं: लेनिन

“मैंने जहां जोड़ा कि जहां निजी सम्पत्ति और बुर्जुआ सामाजिक व्यवस्था है, वहां सेक्स और विवाह ने प्रत्येक सामाजिक वर्ग और स्तर की महिलाओं के लिए जटिल समस्याएं, द्वंद और दुःख ही दिए हैं। जहां तक सेक्स-संबंधों के मसले पर महिलाओं का सवाल है, युद्ध और उसके नतीजों ने पहले से मौजूद टकराहट और दुखों को बहुत बढ़ा दिया है। जो समस्याएं पहले महिलाएं छिपा जाती थी, अब खुलकर प्रगट हो गई है। क्रांति की शुरुआत के माहौल ने इसे बढ़ा दिया है। पुरानी भावना और खयालात टूट रहे हैं। पुराने सामाजिक संबंध ढीले होकर टूट रहे हैं। जनता के बीच नए रिश्ते पैदा होते नजर आ रहे हैं। ये बुर्जुआ  समाज की विरूपताओं और नकलीपन के विरूद्ध एक प्रतिक्रिया भी हैं। इतिहास में विवाह पद्धतियों और परिवारों की बनावट में हुए बदलावों, और इन बदलावों आर्थिक व्यवस्था पर निर्भरता आदि के बारे में जानने पर कामकाजी महिलाओं के मन में, बुर्जुआ  समाज की ‘सनातन’ रहने वाली धारणा भी टूटेगी। इनके प्रति एक ऐतिहासिक आलोचकीय रुख बुर्जुआ समाज के कठोर विश्लेषण की तरफ ले जाएगा और सेक्स के प्रति गलत नैतिकताओं के साथ-साथ इसके मर्म और प्रभावों को खोलकर रख देगा। सभी रास्ते रोम की तरफ जाते हैं। समाज के दार्शनिक ढांचे के एक महत्वपूर्ण अंग विशेष का हर सच्चा मार्क्सवादी विश्लेषण, बुर्जुआ समाज और उसके आधार, यानी निजी सम्पत्ति, के विश्लेषण की तरफ ले जाता है। ये एक ही नतीजे की ओर ले जाता है कि ‘कार्थेज को नष्ट करना ही होगा।’’

लेनिन ने मुस्कुराते हुए सिर हिलाया।

‘’बहुत खूब! तुमने अपनी पार्टी और उसके सदस्यों का एक वकील की तरह बचाव किया। जो कुछ तुमने कहा, बेशक सच है। तो भी जर्मनी में जो गलती की जा चुकी है, यह उसका बचाव नहीं कर सकती। वो गलती तो हो चुकी है। क्या तुम पूरी गम्भीरता के साथ मुझे आश्वस्त कर सकती हो कि उन पाठ और चर्चा गोष्ठियों में परिपक्व और मजबूत ऐतिहासिक भौतिकवादी नजरिए से सेक्स और विवाह के प्रश्नों पर विचार किया गया? इसके लिए भौतिकता की व्यापक, गहन और पूर्णतः मार्क्सवादी पकड़ की जरूरत होगी। इसके लिए अभी क्या तुम्हारे पास जरूरी ताकत है? वो पर्चा जिसके बारे में हमने पहले बात की थी, बांटा गया था तो शाम की पाठ और चर्चाओं में पढ़ाने के काम आया ही होगा। आलोचना के बावजूद। उसे प्रचारित किया गया। इस समस्या पर ऐसा अधूरा और गैर मार्क्सवादी रुख क्यों?  क्योंकि  सेक्स और विवाह को मुख्य सामाजिक समस्या के एक अंग के तौर पर नहीं देखा गया। इसके विपरीत मुख्य सामाजिक समस्या को सेक्स समस्या के एक हिस्से, एक उपांग के तौर पर बताया गया। मुख्य मुद्दा तो कहीं पीछे छूट गया। न सिर्फ यह प्रश्न अस्पष्ट हो गया, बल्कि साधारण तौर पर कामगार महिलाओं के विचार और वर्गीय चेतना भी धीमी पड़ गई।

‘’इसके अलावा, यह कम महत्वपूर्ण मुद्दा नहीं है, जैसा कि सोलोमन का कहना है कि, ‘प्रत्येक काम के लिए एक समय होता है।’ मैं पूछता हूं कि कामगार महिलाओं को ऐसे प्रश्नों- कि कैसे प्यार करें या करवाएं या कैसे प्रेम निवेदन करें या चाहें आदि पर महीनों व्यस्त रखने का क्या यह उचित समय है? और निश्चित ही ये सब ‘भूत, वर्तमान और भविष्य’ तथा विभिन्न नस्लों के परिप्रेक्ष्य में! इसे गर्वपूर्वक ऐतिहासिक भैतिकवाद का स्वरूप दे दिया गया है। अभी, इन दिनों तो कम्युनिस्ट महिलाओं, कामगार महिलाओं के विचार सर्वहारा की क्रांति पर ही केंद्रित होना चाहिए, जो अन्य मसलों के साथ भौतिक और सेक्स संबंधों के सुधार हेतु जरूरी आधार तैयार करेगी। अभी तो हमें इन मसलों पर कि- आस्ट्रेलिया की आदिम जातियों में विवाह कैसे होते थे या प्राचीन काल में भाई-बहनों के बीच विवाह होते थे या नहीं, आदि के बजाय दूसरी समस्याओं को प्राथमिकता देना चाहिए।

जर्मनी के सर्वहारा के लिए तो इस समय- सोवियतों की समस्या, वर्सेल्स का समझौता और उसका महिलाओं के जीवन पर असर, बेरोजगारी की समस्या, वेतन में कमी आना, कर और अन्य ऐसी समस्याएं हैं, जिन पर पहले सोचना होगा। थोड़े में कहूं, तो मेरा मानना है कामगार महिलाओं को सेक्स, विवाह आदि के मसलों की राजनीतिक और सामाजिक शिक्षा देना गलत है। बिल्कुल गलत, तुम इस बारे में चुप कैसे रह सकती हो? तुम्हें इसके खिलाफ अपने प्रभाव का उपयोग करना चाहिए।’’

मैंने अपने उत्साही दोस्त को बताया कि विभिन्न जगहों पर नेतृत्वकारी महिलाओं की आलोचना करने या अपना विरोध दर्ज कराने से मैं पीछे नहीं हटी हूं। पर जैसा कि वो भी जानता है कि किसी भी मसीहा का अपने देश या घर में सम्मान नहीं होता। आलोचना करने से मैं खुद इस शक के दायरे में आ गई कि मेरे दिमाग में सामाजिक-लोकतांत्रिक रुख और पुराने दोमुंहेपन के अंश आज भी मजबूत हैं। हालांकि अंत में मेरी आलोचना कारगर साबित हुई। अब शाम की सभाओं में सेक्स और विवाह चर्चा के मुख्य विषय नहीं है।

लेनिन ने अपनी दलीलों की कड़ी को फिर पकड़ लिया।

‘हाँ, हां, मुझे पता है।’ वो बोले। ‘इस मामले में कई लोग मुझ पर दोमुहा होने का शक करते हैं, हालांकि मेरे लिए ऐसा रुख घृणास्पद है। वे बहुत संकीर्ण सोच और नकलीपन से भरपूर हैं। यूं, मैं इससे उत्तेजित नहीं होता। बुर्जुआओं द्वारा दूषित उनके अण्डों में से जो पीली चोंच वाले पक्षी ताजा-ताजा बाहर आए हैं, बहुत-ही चालाक हैं। हमें अपनी राहों पर इनके बावजूद चलना होगा। सेक्स की समस्या के प्रति ‘आधुनिक’ नजरिए और उस पर जरूरत से ज्यादा रुचि दिखाई जाने से युवा आंदोलन भी प्रभावित हो रहा है।

एक उपहास और निंदापूर्ण हाव-भाव के साथ लेनिन ने ‘आधुनिक’ शब्द पर जोर दिया।

“मुझे यह भी बताया गया है कि तुम्हारे युवा संगठनों में भी सेक्स समस्याएं रुचि का विषय है, जबकि इस विषय पर बहुत व्याख्यान नहीं हुए हैं। ये बेतुकापन युवा आंदोलन के लिए बहुत खतरनाक और नुकसानकारी है। ये सेक्स की अधिकता, सेक्सजीवन के अधिक उपयोग और युवा लोगों की शक्ति और स्वास्थ्य की नष्टता की तरफ जा सकती है। तुम्हें इससे भी जूझना होगा। युवा आंदोलन और महिला आंदोलन के बीच दूरी न हो। हर कहीं हमारी कम्युनिस्ट महिलाओं को युवाओं के साथ सलीके से सहयोग करना चाहिए। यह व्यक्तिगत तौर से हटाकर उसे सामाजिक स्तर तक बढ़ाने वाली मातृत्व की निरन्तरता होगी। महिलाओं के शुरुआती सामाजिक जीवन और गतिविधियों को और भी बढ़ावा दिया जाना चाहिए। जिससे कि घर और परिवार पर केंद्रित उनकी संकीर्ण दोमुंहेपन और व्यक्तिवादी मानसिकता से वे बाहर निकल सकें।’’

‘हमारे देश में भी अच्छी संख्या में युवा हैं, जो सेक्स के प्रश्न पर ‘बुर्जुआ  विचारों और नैतिकताओं को संशोधित’ करने में व्यस्त हैं। मैं यह भी बताना चाहूंगा कि इसमें हमारे बेहतरीन लड़के-लड़कियों का, हमारे सचमुच संभावनाशील युवावर्ग का एक अच्छा-खासा हिस्सा शामिल है। ऐसा, जैसा कि तुमने अभी-अभी कहा। युद्ध की समाप्ति के बाद और क्रांति की शुरुआत में जो वातावरण बना है, उसमें पुराने वैचारिक मूल्य अपने आपको एक ऐसे समाज में पाते हैं, जिसका आर्थिक आधार आमूलचूल बदल रहा है। तो वे खत्म होने लगते हैं और अपने नियंत्रण की ताकत को खो देते हैं। संघर्ष में ही नए मूल्य ठोस होते जाते हैं। लोगों के बीच, महिला-पुरुषों के बीच के संबंधों के अनुसार भावनाओं और विचारों में क्रांतिकारी बदलाव आता है। व्यक्ति और समाज के अधिकारों की नई सीमाएं तय होने लगती हैं, जाहिर है कि व्यक्ति के कर्तव्यों की भी। मामला अब भी अधूरा, असमंजसपूर्ण और उत्तेजित है। विविध विरोधाभासी प्रवृत्तियों की दिशा और ताकत अभी भी साफ-साफ नहीं दिख रही है। नष्ट होकर पुनः जीवन में आने की प्रक्रिया बहुत ही धीमी और अक्सर ही तकलीफदेह होती है। ये सारी बाते सेक्स-संबंधों, विवाह और परिवार पर भी लागू होती है। बुर्जुआओ के विवाह के सड़न-गलन, और उसके विघटन, पति के लिए लायसेंस और पत्नी के लिए दासता, और उनकी गलत सेक्स नैतिकता और संबंधों ने बेहतरीन और आध्यात्मिक तौर पर सबसे ज्यादा सक्रिय लोगों को बेहद घृणा से भर दिया है।

बुर्जुआ विवाह में निहित दमन और बुर्जुआ कानून परिवार में बुराई और द्वंद को और भी बढ़ा देते हैं। ये जबरदस्ती और दमन ‘अतिपावन’ होते हैं, जो धनलोलुपता, नीचता और कीचड़ को ‘पवित्रता’ प्रदान करती है। ‘आदरणीय’ बुर्जुआ  समाज का रूढ़ीवादी दम्भ बाकी बातों की व्यवस्था करता है। चली आ रही घृणा और विकृतियों के विरुद्ध लोग विद्रोह कर देते हैं। एक समय में जब शक्तिशाली देश नष्ट किए जा रहे हों, पहले के सत्ता संबंध तोडे़ जा रहे हो, जब एक पूरा सामाजिक संसार गिरता जा रहा हो किसी भी व्यक्ति की भावनाएं तेजी से बदलने लगती हैं। आनंद के विविध रूपों को हासिल करने की इच्छा आसानी से विरोधहीन ताकत बन जाती है। सेक्स और विवाह के मामलों में बुर्जुआ भावनाओं में सुधार काम नहीं करेंगे। यौन संबंधों और विवाह आदि मसलों पर सर्वहारा की क्रांति के साथ एक और क्रांति हो रही है। परिणाम स्वरूप जो जटिल समस्याएं उठ खड़ी हुई हैं, निश्चित ही महिलाएं और युवा लोग उसमें गहरी दिलचस्पी ले रहे हैं। यौन-संबंधों की वर्तमान खराब स्थिति से दोनों ही तरह के लोगों पर खासा असर पड़ा है। युवा लोग पूरे जोर से विद्रोह करते हैं, यह स्वाभाविक ही है। युवाओं को मठवासियों की तरह आत्मा-तिरस्कार और मैली बुर्जुआ  नौतिकताओं के उपदेश देने से बड़ी गलती कोई दूसरी नहीं हो सकती। हालांकि यह कोई अच्छी बात नहीं है कि सेक्स, जो कि भौतिक तौर पर विकटता से महसूस किया जाता है, ऐसे समय में युवाओं की मानसिकता में गहरे पैठ गया है। इसके घातक परिणाम होंगे। साथी लीलिना से इस बाबत् पूछो, विभिन्न तरह की शिक्षण संस्थानों में बहुत काम करने के उनके पास अनेक अनुभव हैं। तुम जानती हो कि वे कम्युनिस्ट और सिर्फ कम्युनिस्ट है, उन्हें कोई पूर्वग्रह नहीं है।’’

‘सेक्स के प्रश्न पर युवाओं का बदला हुआ रुख बेशक आधारभूत और थ्योरी पर आधारित है। बहुत सारे लोग इसे ‘क्रांतिकारी’ और ‘कम्युनिस्ट’ कहते हैं। वे गंभीरता से मानते हैं कि ऐसा है भी। मैं एक बूढ़ा व्यक्ति हूं, इस बात को पसन्द नहीं करता। लोकप्रथा के अनुसार मैं एक योगी माना जा सकता हूं, लेकिन युवाओं का और बहुदा बुजुर्गों का भी, यह ‘नया सेक्स जीवन’ मुझे अक्सर पूरा बुर्जुआ महसूस होता है, और पुराने किस्म के बुर्जुआ  वेश्यालय का विस्तार ही लगता है। जैसा कि हम कम्युनिस्ट समझते हैं, इसका ‘मुक्त-प्रेम’ से कुछ लेना-देना नहीं है। बेशक तुमने उस प्रसिद्ध थ्योरी के बारे में सुन रखा होगा, जिसके अनुसार कम्युनिस्ट समाज में सेक्स की इच्छापूर्ति और प्रेम की याचना ‘एक ग्लास पानी पीने’ की तरह सरल और तुच्छ है। इस ‘पानी के ग्लास’ वाली थ्योरी पर हमारे युवाओं का एक वर्ग पागल हो चुका है, पूरा पागल। बहुत से युवा लड़के-लड़कियों के लिए यह घातक साबित हुआ है। इसके अनुयायी कहते हैं कि यह एक मार्क्सवादी थ्योरी है। मुझे इस किस्म के मार्क्सवाद की जरा-सी जरूरत नहीं है जो समाज की वैचारिक अधिरचना की हर प्रक्रिया, हर परिवर्तन में उसके आर्थिक आधार में बुरी तरह से हस्तक्षेप करे। क्योंकि मामला इतना आसान नहीं है। ऐतिहासिक भौतिकवाद के मामले में फ्रेडरिक एंगेल्स इस बात को बहुत पहले ही स्थापित कर चुके हैं।

भारत विज्ञान समिति द्वारा ‘महिलाओं के मुद्दे’ शीर्षक से प्रकाशित किताब से साभार. हिंदी में अनुवाद मनोज कुलकर्णी ने किया है 

क्रमशः
तस्वीरें गूगल से साभार 

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पुरुषों की तुलना में स्त्रियों का नैतिक विकास अधिक : अनामिका



हिन्दी साहित्य में स्त्रीलेखन के भीतर से बहुत कम रचनाकार हैं, जो खुद को स्त्रीवादी रचनाकार क्लेम करती हैं. अनामिका खुद को स्त्रीवादी रचनाकार मानने वाली लेखिकाओं में से एक हैं. उनसे बातचीत की है स्त्रीवाद की शोधार्थी अनुराधा ने 


आपने लिखना कैसे शुरू किया? 
मेरे पिताजी भी कवि थे। मैं उनसे अन्त्याक्षरी खेलती थी। जब वे हारने लगते तो कुछ बना के बोल देते। उन्हीं को देखकर मैं भी जब हारने लगती तो कुछ बना के बोलने लगी, जीतने के लिए, तो कई बार पिताजी हंसने लगते, बोलते ये तो ठीक है। फिर उन्होंने मुझे एक रजिस्टर लाकर दिया, बोले लिखा करो, जो मन में आया करे। उस रजिस्टर में मैंने जो पहली पंक्ति लिखी वह अंगीठी को देखकर लिखी। अंगीठी में आग जलाने के लिए कोयला ऊपर तक भर देते हैं और उसमें से बड़ी देर तक धुंआ निकलता है जबतक आग नहीं जलती। उसे देखकर मैंने लिखा- ‘धुंआ उठा ऐसे जैसे कूबड़ी माई’। हमारे घर के सामने ही एक कूबड़ी माई रहती थी, उन्हीं को देखकर मैंने ये लिखा। मुझे ऐसी समांतर चीज़ें मिलाना अच्छा लगता था, तब मैं 7 साल की थी। वो तो मुझे बाद में पता चला इसे उत्प्रेक्षा अलंकार कहते हैं। फिर पिताजी मुझसे पूछने लगे, तुम्हे ये कैसा लगता है, वो कैसा लगता है, जैसे ‘जाड़े के दिन तुम्हे कैसे लगते हैं?’ तो मैंने कहा ‘जाड़े का दिन जैसे आपस की बात हो अधूरी’। पिताजी ने कहा ये लिख लो, अच्छी लाइन है ये। ऐसे लिखना सीखा।

मतलब, आपको आपके परिवेश और खेल की रोचकता ने लिखने के लिए प्रेरित किया?
हाँ…. कविता बहुत सहज रूप से बातचीत का हिस्सा बनकर उभरी हमारे बीच।  बाद में अंग्रेजी की प्रोफेसर बनने के बाद अंग्रेजी में कविताएं लिखने का मन नहीं हुआ? मैंने शुरू में ही अंग्रेजी में भी कविताएं लिखी। मैं जिस स्कूल में पढ़ती थी वह एक एंग्लो- इंडियन समुदाय का स्कूल था। अंग्रेज जब यहाँ से गए तो उनके जो बच्चे भारतीय लोगों से पैदा हुए थे वे यहाँ छूट गए। उनको एंग्लो-इंडियन समुदाय कहते थे। हमारे मुजफ्फरपुर में रेलवे कॉलोनी है वहां ये लोग रहते थे, क्योंकि अंग्रेज अपने लोगों को रेलवे में आसानी से नौकरी दे देते थे, इसलिए देशभर में ऐसी बहुत सी कॉलोनियां थी, और वहां उनके बच्चों के लिए ऐसे स्कूल भी थे। मेरे घर के पीछे भी एक स्कूल था उसी की एक टीचर मिसेज होलिंक्सवर्ड ने वहां के बच्चों के लिए एक स्कूल खोला था- ‘सेंट फ्रांसिस सीनियर सेकेंडरी स्कूल’, उसी में मुझे प्रवेश दिलाया गया। वह स्कूल इतना भयंकर था कि वहां खेल-खेल में भी हिंदी बोलने पर रूल से मार पड़ती। वहां पर स्कूल की एक पत्रिका निकलती थी, मुझे उसका चाइल्ड एडिटर बना दिया गया, तब मैं शायद सातवीं या आठवीं में थी। उसके लिए मैंने अंग्रेजी में भी कविताएं लिखी। जिनका एक संकलन भी आया। लेकिन बाद में मेरे भीतर ये चेतना जगी कि मुझे अंग्रेजी में नहीं लिखना चाहिए, पर अंग्रेजी में प्रवेश इसलिए लिया क्योंकि उस समय जो विश्व साहित्य था वह ज्यादातर अंग्रेजी में ही था, जिनका परिचय मुझे पिताजी की लाइब्रेरी और एक चलंत लाइब्रेरी उस समय हुआ करती थी, जिसमें ‘पीपल्स पब्लीकेशन हाउस’ द्वारा मुद्रित रूसी साहित्य की किताबें आती थी, से हुआ। ये सब अंग्रेजी में  था, अब तो हिंदी में भी है, पर उस समय नहीं थी इसलिए मुझे लगा अगर विश्व साहित्य की सैर करनी है तो अंग्रेजी पढ़ने से आसानी होगी इसलिए मैंने अपनी पूरी पढ़ाई अंग्रेजी में की और उसके बाद क्योंकि ये मेरा विषय बन गया तो अकादमिक लेखन तो मैंने अंग्रेजी में किया लेकिन सृजनात्मक लेखन के लिए संकल्पपूर्वक मैंने हिंदी को ही चुना। ये मेरा एक सचेतन निर्णय था।

हिंदी में लेखिकाओं  की संख्या तो बढ़ रही है लेकिन महिला आलोचक न के बराबर हैं, इसका क्या कारण हो सकता है?
इसका कारण ये हो सकता है कि बौद्धिकता से स्त्रियों का नाता कम-कम जोड़ा जाता है इसलिए शायद स्त्री भी यही समझती है कि शायद वह बौद्धिक निकष पर उतनी खरी नहीं उतरेगी। अभिव्यक्ति के लिए तो वो रचनाएं लिख लेती हैं, रचनाएं खुद को लिखवा लेती हैं लेकिन अपने को एक बौद्धिक के रूप में सामने लाने का आत्मविश्वास अभी स्त्रियों में आया नहीं है और दूसरी बात कि कविता, कहानी भावों की चीज़ है वो बिना पढ़े भी लिखी जा सकती हैं पर उच्च शिक्षा से भी स्त्रियों का नाता बहुत समय तक नहीं रहा जिसको पाकर सिद्धांत गढ़ने का आत्मविश्वास आता है, जबकि विदेश में स्त्रियों ने भी बड़े-बड़े सिद्धांत दिए हैं पर अपने यहाँ स्त्रियों के लिए शिक्षा की अव्यवस्था और अनेक पूर्वग्रहों के कारण स्त्री के विदुषी रूप का विकास कम हो पाया।

बाएँ से दाएं अनुराधा, अनामिका और प्रज्ञा



स्त्री विमर्श की सैद्धांतिकी और उसके वर्तमान व्यवहारिक रूप में क्या कोई अंतर है? यदि हाँ तो क्या और उसका समाधान क्या हो सकता है?
कोई भी सैद्धांतिकी आंदोलन की पृष्ठभूमि में गढी जाती है। भारतीय स्त्री विमर्श की सैद्धांतिकी में सूप का ‘सार सार को  गहि रखे, थोथा दे उड़ाए’ का गुण रहा है। विदेश से हमने बहुत कुछ लिया जैसे मार्क्सवाद ने लिया वैसे ही स्त्री विमर्श ने भी  लेकिन उसमें से रखी काम की ही चीज़, जो थोथा था उसे छोड़ दिया। जैसे हमारे काम की एक बहुत महत्वपूर्ण धारणा थी, बहनापे की। स्त्रियों में यह बहनापा, हर वर्ण, वर्ग जाति उम्र में भी पाया जाता है, तुममे और मुझमें भी। तुम मेरी बेटी की उम्र की हो लेकिन मुझमें और तुममें बहनापे के दो सूत्र हैं। पहला मेरी और तुम्हारी भाषा, हमारी भाषा अंतरंग भाषा है। एक-दूसरे के कंधे पर हाथ रखकर बात करने वाले ह्रदय की भाषा है और दूसरा जो बहनापे का सूत्र है वह हमारी देह है, जो हमारे शोषण का आधार है। देह से जुड़े जो सुख या जो दुःख मेरे होंगे वही तुम्हारे भी होंगे इसलिए एकदम से जुड़ाव हो जाता है। गर्भधारण, बच्चे को दूध पिलाना, उसे बड़ा करना, ये इतना बड़ा सुख है जिससे पुरुष कभी परिचित नहीं हो सकता लेकिन इसके अलावा भ्रूण-हत्या, मारपीट, गाली गलौज, यौन-शोषण, वेश्यावृत्ति, पोर्नोग्राफी आदि बहुत से बड़े-बड़े दुःख भी हैं जो इसी शरीर से जुड़े हैं और सभी के हैं,ये किसी भी जाति, वर्ग, धर्म, वर्ण, गाँव की, शहर की, बच्ची हो बुजुर्ग हो तो एकदम से जुड़ाव हो जाता है।


आपके जो काव्य-संग्रह है, मैंने तीन शोधकार्य के लिए लिये  हैं- ‘कविता में औरत’, ‘दूब-धान’ और ‘खुरदुरी हथेलियाँ’, में मुख्य रूप से स्त्रियों के प्रतिरोध के स्वर हैं। जैसे ‘दूब-धान’ में गाँव की स्त्रियों के प्रतिरोध का चित्रण है लेकिन ‘दूब-धान’ शीर्षक से ऐसा कुछ ध्वनित नहीं होता, इस शीर्षक का आशय क्या है?
हमारे यहाँ स्त्रियों को खोइंचा दिया जाता है। जिसमें दूब, चावल, चावल न हो तो धान, हल्दी और कुछ पैसे आँचल में डालकर दिया जाता है और गाँठ बांधकर कहा जाता है, हम आते रहेंगे। कविता भी अपने आँचल में दूब-धान बांधकर चलती है क्योंकि वह हमेशा स्मृतियों में लौटती रहती है, वे स्मृतियाँ चाहे वैयक्तिक हों चाहे जातीय, तो मेरा वो मतलब था और मिटटी की याद….स्त्री को विदा होते हुए भी मायका हमेशा याद रहता है। अब तो विस्थापन दोहरा है। पहले स्त्री आसपास के गाँव में ही विदा होती थी। अब तो वो दूर पढने भी जाती है, नौकरी करने भी जाती है, पर उसका परिवेश उसके आँचल में बंधा रहता है, यही एक जुड़ाव है यहाँ।

स्त्री विमर्श पर कुछ लोग आरोप लगाते हैं कि भारतीय सांस्कृतिक सन्दर्भों में यह स्त्री-पुरुष संबंधों को प्रभावित कर रहा है?आपके क्या विचार हैं? 
इसका एक ही लाइन में उत्तर हो सकता है कि पहले की स्त्रियाँ तन-मन से सेवा करती थी और आज की स्त्रियाँ तन-मन-धन से सेवा कर रही हैं। स्त्री विमर्श से उसकी सेवा का भाव कम नहीं हुआ है, मातृत्व भाव मरा नहीं है बल्कि ममता का विस्तार हुआ है। पहले ममता और स्नेह केवल अपने परिवार के लिए ही थी लेकिन अब जैसे-जैसे वो बाहर निकली है उसकी ममता का दायरा भी बढ़ा है। दुनिया की कोई भी ताक़त मुझे ये मानने से मना नहीं कर सकती कि तुमलोग मेरा परिवार नहीं हो। रक्त सम्बन्ध से स्त्री विमर्श के परिवार का कोई लेना-देना नहीं है। पहले यौन सम्बन्ध और रक्त सम्बन्ध परिवार के ही निर्णायक थे अब नयी स्त्री के यहाँ पारिवारिकता का दायरा बढ़ा है और आत्मा का रिश्ता ही पारिवारिकता का निर्धारक है, तो मुझे नहीं लगता इस विमर्श में कोई दम है। लोग सोचते हैं स्त्रियाँ अगर आज़ाद हो जाएंगी तो दिल तोड़ेंगी और घर फोड़ेंगी पर ऐसा नहीं है ये दिल तोड़ने और घर फोड़ने वाली स्त्रियों का वाग्विलास नहीं है। ये अपने संबंधों के क्षितिज को लगातार बढ़ाने का उपक्रम है। इसे उनकी युद्धों, सेनाबलों में सेनानी, पर्यावरण संरक्षिकाओं की भूमिका
बहनापे के सूत्र से देखें तो ग्रामीण महिला भी एक बहन है। हम (स्त्रियाँ) जितनी आसानी से ग्रामीण महिला से बात कर लेते हैं, एक पुरुष से वे इतनी आसानी से नहीं खुलेंगी। दो स्त्रियाँ वे किसी भी संस्कृति या परिवेश की हों आसानी से गप्प कर सकती हैं। यह गप्प ही वह सूत्र है जिसके सहारे वे अपने भीतर के गाँव या शहर को उद्घाटित कर सकती हैं। यदि आप सहज रूप से किसी से बात ही नहीं कर सकते हैं तो उसकी स्मृतियाँ आपके लिए हमेशा अंजान ही रहेंगी और जबतक किसी की स्मृतियाँ और सपने साझा नहीं होते तबतक कोई मनुष्य अपना नहीं बन सकता।


आपकी कविताओं की स्त्रियाँ संवाद करती हैं और उनकी भाषा में एक प्रतिरोध है? यह स्थितियां आपकी आँखों देखी हैं या कल्पना की उपज?
ये दोनों ही स्थितियां मेरी देखी हुई हैं। मेरी एक मामी ने मुझसे कहा था, शादी के समय कि ससुराल में पापड़ जब खाना तो दाल में भिगो के खाना, कुट-कुट नहीं होनी चाहिए। मैंने ये भी देखा है कि स्त्रियों के लिए कहा जाता है कि चुप्पी ही सौंदर्यशास्त्र है लेकिन मैंने ये भी देखा है कि घूंघट के नीचे से भी स्त्रियाँ जीभ दिखा देती हैं, तो ऐसा है कि स्त्रियाँ जब खुलती हैं तो दोम्ब्काचार में कितना अच्छा केरीकेचर करती हैं। वो एक अच्छे बच्चे की तरह चुपचाप बैठी रहती हैं, उनका नटखटपन छुप के रहता है लेकिन जहाँ मौका मिलता है वो खुलकर सामने आ जाता है। उसके बाद बातचीत की लय जब शुरू हो जाती है तो ख़त्म नहीं होती आसानी से। मेरी एक कविता है ‘चिट्ठी लिखती हुई औरत’ उसमें यही सब है, तो ये सब देखा हुआ है मेरा, हवा में मैंने बात नहीं की है और ये स्त्रियों की बड़ी शक्ति है। इसे निखारने का मुझे लगता है हम सबको प्रयास करना चाहिए।

स्त्री विमर्श पर पुरुषों और स्त्रियों का नजरिया अलग-अलग है। आपका इस बारे में क्या मत है?
उत्तर- मैंने कहा न, पुरुष तो समझते हैं कि ये दिल तोड़ने और घर फोड़ने वाली स्त्रियों का वाग्विलास है। इनके जीवन में कोई संकट नहीं है तो घूम-घूम के बात बना रही हैं लेकिन ऐसी बात नहीं है। स्त्रियाँ तो ये चाहती हैं कि पुरुष सदैव प्रेम करने के लायक बनें। स्त्रियाँ अभी तक बच्चों की तरह पुरुषों को देखती आ रही हैं। माफ़ करते हुए, उनके बड़े होने का इंतज़ार करते हुए। आज की स्त्री मन से बहुत अकेली हो गयी है क्योंकि जितना उनका नैतिक विकास हुआ है तुलनात्मक रूप से पुरुषों का कम हुआ है और मेरी एक कविता में तो मैंने ये भी कहा है कि स्त्रीधन कहके जो गहने गिनाए जाते हैं जैसे लज्जा, सहिष्णुता वो गहने स्त्री-पुरुष में बराबर-बराबर क्यों नहीं बंट सकते? ये तो पुरुषों के ही हक की ही बात है कि ये गहने उन्हें अधिक मानवीय, अधिक सहृदय, अधिक दोस्त, अधिक प्रिय ही तो बनाते हैं। इसमें पुरुषों का ही भला होगा न और पुरुषों को वे विकास से बाहर नहीं मानती। वो जानती हैं कि दोष पितृसत्ता का है, पुरुष का नहीं है। उस पितृसत्ता को भेद कर ज्यादा मानवीय रूप में वो अगर सामने आए तो इसमें सबका ही भला है।


अनुराधा, स्त्री-अध्ययन विभाग, म.गा.आ.हिं. वि, वर्धा की शोधार्थी हैं.  संपर्क anuradha.loving91@gmail.com
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कार्ल मार्क्स का प्रेम पत्र (जेनी के नाम)

दुनिया के इतिहास, अर्थव्यवस्था, समाज, राजनीति को समझने के, दुनिया को समझने के भौतिकवादी चिंतन में से एक महान चिंतन कार्ल मार्क्स का है. अपने जीवन का अधिकांश पुस्तकालयों में बिताने वाले, लेखन, चिंतन और सक्रिय राजनीति को समर्पित इस महान बुद्धिजीवी के सीने में एक दिल भी धड़कता था.मार्क्‍स की 200वीं जयन्ती (5 मई) पर पढ़ते हैं उनका एक प्रेम पत्र, जो उन्होंने 21 जून 1865 को अपनी प्रेमिका और बाद  में पत्नी हुईं जेनी को लिखा था. 

मेनचेस्टर, 21 जून  1865


मेरी दिल अज़ीज़,

देखो, मैं तुम्हें फिर से खत लिख रहा हूँ. जानती हो क्यों? क्योंकि मैं तुमसे दूर हूँ और जब भी मैं तुमसे दूर होता हूँ तुम्हें अपने और भी करीब महसूस करता हूँ. तुम हर वक़्त मेरे जेहन में होती हो और मैं बिना तुम्हारे किसी भी प्रतिउत्तर के तुमसे कुछ न कुछ बातें करता रहता हूँ,

जेनी और कार्ल मार्क्स

ये जो क्षणिक दूरियां होती हैं न प्रिय, ये बहुत सुन्दर होती हैं. लगातार साथ रहते-रहते हम एक-दूसरे में, एक-दूसरे की बातों में, आदतों में इस कदर इकसार होने लगते हैं कि उसमें से कुछ भी अलग से देखा जा सकना संभव नहीं रहता. फिर छोटी छोटी सी बातें, आदतें बड़ा रूप लेने लगती हैं, चिडचिड़ाहट भरने लगती हैं. लेकिन दूर जाते ही वो सब एक पल में कहीं दूर हो जाता है, किसी करिश्मे की तरह दूरियां प्यार की परवरिश करती हैं ठीक वैसे ही जैसे सूरज और बारिश करती है नन्हे पौधों की. ओ मेरी प्रिय, इन दिनों मेरे साथ प्यार का यही करिश्मा घट रहा है. तुम्हारी परछाईयां मेरे आसपास रहती हैं, मेरे ख्वाब तुम्हारी खुशबू से सजे होते हैं. मैं जानता हूँ कि इन दूरियों ने मेरे प्यार को किस तरह संजोया है, संवारा है.

जिस पल मैं तुमसे दूर होता हूँ मेरी प्रिय, मैं अपने भीतर प्रेम की शिद्दत को फिर से महसूस करता हूँ, मुझे महसूस होता है कि मैं कुछ हूँ. ये जो पढ़ना-लिखना है, जानना है, आधुनिक होना है ये सब हमारे भीतर के संशयों को उजागर करता है, तार्किक बनाता है लेकिन इन सबका प्यार से कोई लेना-देना नहीं. तुम्हारा प्यार मुझे मेरा होना बताता है, मैं अपना होना महसूस कर पाता हूँ तुम्हारे प्यार में.

जेनी

इस दुनिया में बहुत सारी स्त्रियाँ हैं, बहुत खूबसूरत स्त्रियाँ हैं लेकिन वो स्त्री सिर्फ तुम ही हो जिसके चेहरे में मैं खुद को देख पाता हूँ. जिसकी एक एक सांस, त्वचा की एक एक झुर्री तुम्हारे प्यार की तस्दीक करती है, जो मेरे जीवन की सबसे खूबसूरत याद है. यहाँ तक कि मेरी तमाम तकलीफों और जीवन में होने वाले तमाम अपूरणीय नुकसान भी उन मीठी यादों के साये में कम लगने लगते हैं.

मैं तुम्हारी उन प्रेमिल अभिव्यक्तियों को याद करता हूँ, तुम्हारे चेहरे को चूमते हुए अपने जीवन की तमाम तकलीफों को, दर्द को भूल जाता हूँ…

विदा, मेरी प्रिय. तुम्हें और बच्चों को बहुत सारा प्यार और चुम्बन…


तुम्हारा
मार्क्स

अनुवादक: प्रतिभा कटियार, प्रतिभा की दुनिया ब्‍लाग से साभार

तस्वीरें गूगल से साभार
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