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दम तोड़ते रिश्ते

कौशल पंवार

   रचनाकार, सामाजिक कार्यकर्ता ,  मोती लाल नेहरू कॉलेज , दिल्ली विश्वविद्यालय, में संस्कृत  की  असिस्टेंट प्रोफ़ेसर संपर्क : 9999439709

“फ़िर, फ़िर क्या हुआ?”


उसने ठण्डी आह भरते हुए कहा- “मैं भाग रही थी, बेसुध, सपाट और सुनसान सड़क पर. हिरण जैसे कश्तूरी की सुंगध पाने के लिए मारा मारा फ़िरता है, मैं भी उसी तरह थी. जैसे कोई शिकारी हिरण का शिकार करने के लिए उसके पीछे-पीछे दौड़ता है. हिरण आगे -आगे और शिकारी पीछे पीछे. उसके पैर आगे की ओर बढते है और गर्दन बार- बार मुड मुड़कर शिकारी को देखती है. मैं भी उसी तरह थी. मैं भाग रही थी आगे की ओर, और गर्दन बार -बार पकड़े जाने के डर से अपने आप पीछे मुड़- मुड़कर देखती रही थी. सामने देखती तो कान पीछे लगी पदचापों को सुनने के लिए घोड़े के कान की तरह सीधे खड़े होकर पदचापों की दूरी नापने लगते. कानों पर भी आंखों को विश्वास नहीं हो रहा था तो झट से भागते -भागते पीछे की ओर घूमती. तरह-तरह के ख्याल मन में उमड़ रहे थे. एक तरह मेरे सामने मेरी मंजिल, मेरी दुनिया थी तो दूसरी ओर…मेरा पूरा परिवार. अगर घरवालों के हत्थे चढ गयी तो..तो…… क्या होगा, सोचकर ही मेरी रुंह कांपने लगती थी. मैं रूकी नही. बेइन्तहाशा दौड़ती रही.”

“सूरज की रोशनी ढल गयी थी, अंधेरा फ़ैलने लगा था. मेरे साथ देने के लिए मानो कायनात भी चाहती थी कि मैं पा लूं उसे, जिसके लिए मैं सब रश्मों को तोड़कर आगे बढने का निर्णय कर चुकी थी. सड़क पर स्ट्रिटलाइट नहीं थी. गांव देहात में लाइट अक्सर आती भी नहीं है. कहने को तो पूरी सड़क पर लाइटें लगी हुई थी परन्तु जलती नहीं थी. मुझे धुंधलके ने घेर लिया था. सड़क भी साफ़ नजर नहीं आ रही थी परन्तु मैने अपनी प्रेम की आंखों की रोशनी में उसकी बाइक देख ली थी. मुझे पूरा यकीन था कि वही होगा जो सड़क किनारे घने पेड़ के नीचे खड़ा था. भीतर तूफ़ान उमड़ रहा था. मेरे सामने कुछ कदम पर ही मेरी मंजिल थी. आज एक नये रिश्ते की ओर मैं बढ रही थी. आज मै अपने नये रिश्ते में बंध जाऊंगी इसी का जनून मुझे उस ओर खींच रहा था.

मेरे पीछे की पदचाप और नजदीक आती जा रही थी. हाथ की दूरी थी बाईक तक पंहुचने की और इतनी ही दूरी घरवालों की पदचाप की. अंधेरा घना हो चुका था. बादलों ने चांद की रोशनी को भी ढक लिया था. तारे टिमटिमाते हुए आंखमिचौली खेल रहे थे जिनकी रोशनी में मैं बाइक को देख पा रही थी और घरवाले मुझे. धुंधलका बढ गया था. इसी का फ़ायदा उठाकर मैं बाइक पर बैठ जाऊंगी, कुछ कदम और. मैने पूरा दम लगा दिया अपनी सांसों को बंद करके. पदचाप बहुत नजदीक आ गयी थी. मैने हाथ बढाकर बाइक के पीछे की सीट पकड़नी ही चाही थी कि…”

“फ़िर फ़िर क्या हुआ?”

उसने मुझसे पूछा तो मैने अपने अंदर की टूटन को समेटा और कहा कि “बाइक घर्र घर्र की आवाज करती हुई मुझे पीछे धकेलती हुई छोड़कर चली गयी, इतनी तेज कि मेरी दौड़ उसके आगे बौनी थी. मेरे पास अपनी आवाज निकालने तक का वक्त नहीं था. मेरा मन किया कि मैं रमेश को आवाज लगाकर रोक लूं. उसे पकड़कर जोरदार तमाचा लागाऊं. क्या यही रिश्ता था. ..? मुझे इतना सोचने तक की फ़ुर्सत नहीं थी ओर मैं झट से उसी पेड़ की ओट में छुप गयी. तारों ने भी टिमटिमाना बंद कर दिया था.

इससे पहले कि घरवाले बाइक को पकड़ पाते वह भाग गया था. थोडी दूर दौड़ कर उसका पीछा भी किया पर वह उनकी पहुंच से बाहर था. वे बाइक के पड़े निशान पर तेज-तेज पैर पटक रहे थे. हाथ मल रहे थे कि मैं बाइक पर बैठकर उनकी आंखों के सामने भाग गयी. और मैं बेजान पेड़ की ओट से आंखें फ़ाड़े सब परिवार वालों को अपने सामने सड़क पर देख रही थी- मेरी मां जिसने मुझे पैदा किया, मेरा भाई जो बचपन में मेरे साथ गुड्डे गुडिया का खेल खेलता था, नाराज होने पर चीजें बाहर से लाकर देता था, पिता और ताऊ जो कभी अपने कंधे पर बिठाकर मुझे झुलाते थे-सब आज मेरी आंखों के सामने होते हुए भी मुझसे दूर जा चुके थे. मन किया कि मां से लिपटकर रोऊं. चीख-चीखकर बताऊं कि मुझे रमेश ने धोखा दिया. इस मोड़ पर लाकर मेरा साथ छोड़ दिया. साथ जीने-मरने की कस्में खायी थी लेकिन जीना तो दूर वह मेरे साथ मर भी न सका. मैं फ़िर भी जिंदा थी. मां अब मां रही ही कहां थी? मैं संभली. भावनाओं से बाहर निकली, हकीकत मेरे सामने थी. सबकी आंखे आग उगल रही थी. सब कुछ भस्म करने को तैयार. जरा सी नजर मुझ पर पड़ी तो घरवाले मुझे जिंदा गाड़ देंगे, सोचकर ही मैं कांप गयी थी. अपने सामने मुझे मौत नजर आ रही थी.

थोड़ी देर पहले के सपने अपना दम तोड़ चुके थे. बहुत कुछ बिखर गया था, टूट गया था. उस टूटन की आवाज केवल मैं ही सुन सकती थी या फ़िर वह पेड जो मेरा एकमात्र सहारा था उस वक्त. वे बादल जो उमड़ उमड़कर चांद की चांदनी को ढक रहे थे. टुटन अगर बाहर आयी तो इसकी किमत मेरे शरीर को जान देकर चुकानी पड़ेगी.
मेरे ताऊ ने दहाडकर मेरे छोटे भाई को घर से बाइक उठाकर लाने को कहा. वह दौडकर गया और गांव के भीतर जाने वाली सड़क की ओर मुड़ गया. घरवाले अभी भी सड़क पर कुछ ढूंढ रहे थे मानो मुझे बाइक की लकीरों से बाहर निकालकर ही छोड़ेंगे. मुझे अब अपनी जान बचानी थी. अपने आपको बचाना था. अचानक मुझे अपने आपसे प्यार हो आया था. जो मुझे बीच मझधार छोड़ गया उसके नाम पर सजा मुझे भी मंजूर नहीं थी. जो पकड़े जाने के डर से ही भाग गया, क्या पता वह मेरे साथ अपना जीवन बिता भी पाता या नहीं. थोड़ा सा हवा का झौंका क्या आया, सब प्यार-व्यार अपने साथ उड़ा ले गया.

अंधेरे से छिपी मैं उन सब को ही देख रही थी कि सबका ध्यान सड़क पर पड़ी किसी चीज पर गया. आंखे गाड़े सबके सब नीचे की ओर देख रहे थे. मेरे लिए यहीं मौका था वहां से हटकर कहीं ओर छुप जाने का. बिना नजरों में आये मैं ज्यादा देर नहीं छुपी रह सकती थी वहां. इक्का-दुक्का वाहन सड़क से गुजर ही रहे थे. उनकी लाईट से रोशनी फ़ैल रही थी जिससे देखे जाने का डर था. जब सबका ध्यान नीचे जमीन की ओर था मैं उस ओट से वहां से हट गयी. पेडों की छांव मे छुपते-छुपाते मैं घर की ओर जाने वाली सड़क की ओर मुड़ी ही थी कि मुझे झट से एक बार फ़िर पेड़ की ही ओट लेनी पड़ी. सामने गली से भाई बाइक लेकर आ गया था. मैं छुप गयी. उसके रोड पर आने तक वहीं छुपी रही. जब वह मेरे पास से गुजर रहा था मन किया कि अपने भाई को बता दूं कि मैं भागी नहीं हूं बल्कि रमेश मुझे छोड़कर भाग गया है. मैं तो यहीं हूं अपने भाई के बिल्कुल नजदीक. मैं ऐसा केवल सोच ही सकती थी. भाई जब रोड पर पंहुच गया तो मैं अन्दर घर की ओर जाने वाली गली में घुस गयी.

अपने घर के नजदीक पंहुच, मैं ठीठक गयी थी. मन किया कि भाग कर अपने घर में चली जाऊं. पर इसके बाद क्या होगा मैं जानती थी. मेरे घर के पीछे ही एक प्लाट खाली पड़ा था जिसमें ज्वार खडी थी- आदमकद ज्वार. वह मेरे छुपने के लिए माकूल जगह थी. मैं भागकर उसके अंदर घुस गयी. जान तो बचानी ही थी मुझे.
जहां छुपी, इस जगह तो मैं दिन में भी कभी नहीं आती थी लेकिन आज यही मेरी जान बचाने का साधन बनी थी. मैं ज्वार के अंदर मचान की पीठ से अपनी पीठ को सहारा देकर बैठ गयी थी. रात और गहरी होती जा रही थी. सन्नाटा बढ गया था. मैं डर के मारे कांप रही थी. रात के इस सन्नाटे से कहीं ज्यादा डर घरवालों के मुझे पकड़े जाने का था.

मैंने जो किया था उसका मुझे कोई अफ़सोस नहीं हो रहा था. अंदर से सब कुछ निकल गया था. मैने रमेश को चाहा था. जीने-मरने तक साथ निभाने का वायदा मैने भी तो किया था. उसने नहीं निभाया तो यह उसकी गलती थी जिसकी सजा मैं क्यूं भुगतूं ? यही सोचकर मैने अपने आपको शांत कर लिया था. घरवालों की नजर में यह  उनकी पगड़ी उछालने का सवाल था. मान मर्यादा का मसला था. पर मेरे लिए नहीं था. अपना माना था उसे..! इसलिए उसके साथ भागना क्या जुर्म था ?

घरवालों से इस रिश्ते के बारे में बात करना “आ बैल, मुझे मार” वाला था. उनकी रजामंदी होने का सवाल ही नहीं था. जातीय दम्भ के आगे मेरा रिश्ता दम तोड़ जाता. कभी साहस भी तो नहीं किया था कि इस बारे में खुलकर बात करूं. “इश्क और मुश्क छुपाये नहीं छुपते” पता लग ही गया था कि कुछ है जो ठीक नहीं चल रहा था. बात यहां तक पंहुच जायेगी इसका अंदाजा सगाई के लिए मेरे ना करने से साफ़ हो गया था. मैने रजनी जो मेरे सरपंच ताऊ की बेटी थी, सब बता दिया था. वह भी डर गयी थी. खूब समझाया था मुझे कि मैं रमेश के चक्कर में पड़कर अपने आपको आग में न झोकूं. पर दिल कहां इन बंदिशों का मान रहा था. मैं जोर-जोर से दहाड़ मारकर रोना चाहती थी. रमेश ने ऐसा क्य़ूं किया. रमेश- रमेश- रमेश….. करते-करते मुझे कब नींद आयी, पता ही नहीं चला. मैं सो गयी थी वहीं ज्वांर में घुटनों को मोडकर मुंह को छिपाये हुए. दिन निकल आया था. आंख खुली तो अपने आपको हिलते हुए ज्वार के पौधों के बीच में पाया. सारी रात एक ही मुद्रा में बैठे- बैठे जुड़ गयी थी, सो पैर पसार लिये.

मेश का चेहरा फ़िर आंखों के सामने छा गया था. एक बारगी तो उसकी मासूमियत और शरारत भरी नजरों ने मन में एक झुरझरी सी पैदा कर दी परन्तु दूसरे ही पल रात का एक-एक सीन फ़िल्म की तरह आंखों के आगे आ गया. मेरा चेहरा कठोर हो गया था. उस आदमी के नाम का कलंक नही लगने दूंगी जो बुजदिल था, कायर था. घरवालों को देखते ही भाग खड़ा हुआ. एक बार भी नहीं सोचा कि मैं सबको क्या जवाब दूंगी?  सबका सामना मैं अकेले कैसे करुंगी? एक हाथ से भी कम की दूरी रमेश ने जीवन भर की दूरी बना दी. मैने सोच लिया था कि मैं हर हालत में अपने आपको बचाकर रहूंगी.

ज्वार में बैठे-बैठे यही सोचती रही. कभी घरवालों का चेहरा तो कभी रमेश की कायराना हरकत. धीरे-धीरे दिन बढ रहा था. सूरज ने अपनी रोशनी से आग उगलना शुरु कर दिया था. ज्वार में भी उमस बढ रही थी. जैसे ही ज्वार की कोई बली मेरे नंगे हिस्से पर पड़ती तो बिजली की तार जैसे चुबती. पैर उठने को होते तो तुरंत पकड़े जाने के डर से दुबक जाती. अपनी धड़कनों तक को रोक रही थी कि कहीं गली से गुजरते हुए कोई मेरी धड़कन तक की आवाज न सुन ले. मेरे पास अपनी जान बचाने का कोई साधन नहीं था. एक बार मन में आया कि अपने आपको खत्म कर लूं, फ़िर लगा कि किस अपराध के लिए, वो अपराध जो किया ही नही, और किसके लिए अपनी जान दूं.

ज्वार से छनकर आयी रोशनी में से मैं बाहर गली में झांक रही थी कि रजनी दिखाई दी. मैं अपनी सांस रोकर उसे गुजरते हुए देख रही थी. मन किया मैं उसे पुकार लूं फ़िर पकडी जाऊंगी, नही आवाज लगा पायी. पता नहीं क्या सोचकर मैने अपने जम्फ़र (कमीज की झालर) को धीरे धीरे फ़ाड़कर उस झरनी से बाहर की ओर सरका दी. जाने कौन सी शक्ति थी जो मुझे ऐसा करवा रही थी या फ़िर मेरी जरुरत ने मेरा साथ देना शुरु कर दिया था. रजनी ने जैसे ही जम्फ़र की झालर देखी, झट पहचान ली कि ये तो मेरी कमीज का कपड़ा है. वह मेरी ओर ही बढ गयी. मैने झालर को वापिस खीच लिया. हमारी आंखे एक दूसरे से टकरा चुकी थी. उसने इधर-उधर देखा और घर के प्लाट से लगे ज्वार के खेत में बनी इस चार दिवार को फ़ांद कर मेरी ओर कूद गयी. हम दोनों बहने एक दूसरे से लिपट गयी. उसे विश्वास ही नहीं हो रहा था कि मैं हूं उसकी बहन जिसे हमारे घरवाले कुत्ते की तरह सुंघते मारे-मारे फ़िर रहे हैं. मरे हुए को जिंदा देखकर जो खुशी मिलती है, ऐसी खुशी पाकर हम एक दूसरे से काफ़ी देर लिपटे रहे. रजनी की सिसकियां बढ रही थी. मैने उसे अपने से अलग किया और उसके मुंह पर अपनी हथेली रख दी. ना में मैने गर्दन हिलाई और चुप करा दिया. वैसे उसे भी बहुत सी शिकायतें थी मुझसे. वह फ़ूट फ़ूटकर रोना चाहती थी. मैं उसे चुप रहने का ईशारा करती रही. शांत होने के बाद उसने मुझे पिछली रात से लेकर और आज दिन भर में क्या – क्या घरवालों ने किया, सब कुछ एक सांस में बता दिया.

रोड पर पड़े हुए जो घरवालों ने देखा था, वह रमेश का फ़ोन था जिसे ट्रैक कर लिया गया था. पडोस के गांव का पूरा पता घरवालों को लग गया था. इससे पहले कि वे उसे पकड़ पाते वह वहां से भाग निकला था. घरवालों के हाथ फ़िर खाली थे. पर इतना पता उन्हे लग गया था कि मैं उसके साथ नहीं गयी थी. पर उनकी इज्जत तो शरेआम नीलाम हो ही गयी थी. इसलिए बड़े संयत होकर अब वे मुझे ही ढूंढ रहे थे कि मैं आखिर गयी कहां हूं?
पूरा परिवार मेरे इस कदम से नाराज था. वह भी नाराज है, मैने चुहलबाजी करते हुए रजनी से पूछा तो उसने मुझे प्यार से छिड़क दिया और बच्चों की तरह रो पडी. मेरी आँखें तो सुख ही चुकी थी. उससे मेरी हालत नहीं देखी जा रही थी. मैं रात भर इसी खेत में थी, जानकर वह दुखी हो गयी थी पर वह कुछ खास कर भी नहीं पा रही थी इसलिए और दुखी हो गयी थी. जब वह शांत हुई तो मैंने उसे कहीं से सरोज का फोन नम्बर लाने के लिए कहा. यहा ज्यादा देर तक रुकना ठीक नहीं था इसलिए मैने उसे घर भेज दिया. सबकी नजरों से छुपकर वह घर चली गयी.

सरोज जिसके बारे में मैंने अपने कालेज के दिनों में एक अखबार में पढा था. हम लड़कियों के बीच वह चर्चा का विषय कई दिनों तक बना रहा था. इस समय मेरी जान को बचाने का केवल यही एक रास्ता था.  सरोज और रजनी मेरी उम्मीद बन गयी थी. दिन ढलने लगा था. मैं खामोश दिवार से सटी ज्वार के एक कोने में पड़ी-पड़ी सोच रही थी. किस्से किस्से होते हैं हकीकत नहीं. इन्हीं किस्से कहानियों ने मेरे अंदर प्यार का पौधा रोप दिया था. यही सच होता है, मैने ये मान लिया था. बलविंदर कौर और रोशन के प्यार की कहानी मुझे आज भी याद थी. दिवार के सहारे सहारे धस कर मैं अपने अतीत में धस गयी थी.”

…बलविंदर कौर और रोशन की यादें ताजा हो आयी थी. दूर ऊपर आसमान में बादल घिर आये थे और मैं भी अपने ख्यालों में घिर गयी थी. गड़्गड़ की आवाज करते बादल गरजने लगे. बलविंदर कौर और रोशन का प्रेम मेरी आंखों के आगे तैर गया था. बलविंदर कौर मेरे ही गांव से अगले गांव के ढेरे से आती थी. बस अड्ड़ा मेरे ही गांव का था. जहां से हम कालेज जाने के लिए बस पकड़ती थीं. कई बार वह टम्पू मे अकेले आती तो कई बार उसका भाई उसे मोटरसाइकिल से मेरे गांव के अड्ड़े तक छोड़कर आता था. वह बहुत सुंदर थी. गौरा-गौरा गेहूआं रंग था उसका. भोली सी सूरत जो किसी का भी मन मोह ले. बडी-बड़ी सी गहरी सी काली काली आंखे, लम्बी सी नाक ठीक अपनी लम्बाई की तरह, छरहरा बदन, गुलाबी से होंठ और उन पर प्यारी सी पंजाबी बोली. बहुत कम बोलती और जब बोलती मानो फ़ूल झड़ रहे हों. नीला सूट और फ़ुलकारी वाला दुप्पटा पहनकर जब आती तो गजब की सुंदर लगती. अक्सर सफ़ेद रंग की हिल वाली बैली पहनती. उस पर हिल वाली बैली जचती भी खूब थी. उसे पहनकर वह और पतली व लम्बी लगती.

जब भी हम बस में बैठते तो कोई उसे बड़े प्यार से निहारता. कॉलेज के बीच में पड़ने वाले रास्ते के गांव से वह चढता था. उसी बस में आता-जाता जिस बस में वह होती. अगर किसी दिन छुट्टी मारती तो वह भी कालेज नहीं जाता था. उसे न देखकर बस में से उतर जाता था,  चलती बस में से, कई बार तो नीचे पड़ते-पड़ते बचा था.
हम बलविंदर को छेड़ते तो वह झूठ मूठ की नाराज होती, नीचे पलके झुकाती और मंद-मंद मुस्कराती. वह भी उसे चोरी छुपी निहारने लगी थी. ऐसे ही दोनो का चोरी- चोरी, चुपके-चुपके चलता रहा. हमारा कालेज लड़कियों वाला था और वह कॉमन कालेज में पढता था. हमारी एन.सी.सी. की परेड उसी के कॉलेज में होती थी. बलविंदर ने एन.सी.सी नहीं ले रखी थी. एक दिन हम सब कालेज के ग्राउंड से परेड करके लौट रहे थे कि हमने पार्क में बैठे हुए बलविंदर और रोशन को देख लिया, जोर से हुक लगायी. “उड़ गये तोते उड़ गये तोते” जोर-जोर से चिल्लाये और अपनी एन.सी.सी. की टोपियां हवा में उछाली. खुशी से या छेड़खानी से पता नहीं. ये हमारा बचपना था या शरारत, या दोनों थी. उन्होंने भी हमे देख लिया था. दोनों थोड़ा सा शर्माये और हमे देखकर मुस्काराये भी.

धीरे-धीरे कालेज में आग की तरह ये खबर फ़ैल गयी थी, जैसे उन दोनों ने साथ बैठकर कोई बड़ा गुनाह कर दिया हो. ये आग उनके घर तक भी फ़ैली. बलविंदर ने कॉलेज आना बंद कर दिया था. हम लोग कुछ नहीं कर पाये थे.
एक दिन उसका भाई शादी का कार्ड दे गया यह कहते हुए कि मुझे शादी में जरुर आना है. बिना मुझसे बात किये बाइक पर बैठकर चला गया. शादी की सूचना रमेश को भी मिल गयी थी. उसने मुझे सिर्फ़ एक बार उससे मिलवाने के लिए कहा जो मैं नहीं कर पायी थी. थोड़े दिनों बाद ही शादी थी. उसकी शादी में हम सब गये थे. यह शादी नहीं एक समझौता था जो उसने किया था.

सब अपने अपने कामों में व्यस्त हो गये थे. बलविंदर भी अपने आपसे समझौता कर आगे बढ गयी थी. नहीं बढा था तो वह था रौशन . उसका जीवन ठहर सा गया था. उसने बलविंदर के साथ बिताये उन क्षणों को ही अपना जीवन दे दिया था. उसने कभी किसी से दोबारा प्यार नहीं किया और न ही विवाह ही किया. मैने भी ऐसे ही प्रेम को पाने की कल्पना कर ली थी जो रौशन ने किया था.

बादल बरस रहे थे जैसे मेरी आंखों से आंसू झर रहे थे. मेरे दुःख में मेरा साथ दे रहे थे. ज्वार के  खेत में पानी भरना शुरु हो गया था. मेरे प्यार का नशा अब बादलों की तरह झड़ गया था. मुझे उन दोनों के प्रेम से भी कोफ़्त हो आयी थी. आखिर रोशन ने भी तो बलविंदर को अकेला छोड़ ही दिया था, क्यों नहीं दिया था उसका साथ, उसका हाथ थामकर. उसे भी तो अपने परिवार, समाज का खौफ़ था, उन्हे खोने का डर था, जमीन से बेदखल कर दिये जाने का ड़र था. हालांकि उसने इसकी सजा अपने आपको जरुर दी ताउम्र शादी न करके. दूसरी ओर बलविंदर थी जिसने अपने प्रेम को पाने के लिए कुछ नहीं किया था, समझौता कर लिया था, परिस्थितियों के आगे हार मानकर.

मेरे साथ क्या हुआ मैं सोचने लगी थी. मेरी आंखों के पानी की तरह बादल भी बरस कर थम गये थे. ठण्डी हवा चलने लगी थी जिससे शरीर में ठण्डक होने लगी थी. पानी की निकासी न होने के कारण खेत में पानी भर कर घुटनों तक आ गया था. मैं अब बैठ भी नहीं सकती थी. पर रात तो काटनी ही थी, इसलिए दिवार का सहारा लिये खड़े खड़े ही जैसे-तैसे दूसरी रात भी बिताई.

दो रातें गुजर गयी थी. तीसरा दिन निकल आया था. मैं बार-बार रजनी के आने की बाट जो रही थी. पर वह नहीं आयी थी अभी तक. रात तो बारिश के कारण नहीं आयी होगी पर अब तो दिन चढ गया है अब तो आ ही सकती थी. मेरा दिल बैठा जा रहा था कि तभी ज्वार की बली तेजी से हिली. मैं डर गयी थी . मेरी सांसे हल्क में अटक गयी थी. परछाई आगे बढ रही थी. रजनी थी. उसके हाथ में फोन भी था. हम दोनों ने सरोज को नम्बर मिलाया. लैण्डलाईन का नम्बर था. किसी ने फोन उठाया तो एक आदमी की आवाज सुनाई दी. मैने “हैलो” भी नहीं बोला था जान बुझकर. मैं सतर्क थी. दोबारा फ़िर से फोन मिलाया पर इस बार भी आदमी की ही आवाज आयी. समझ नहीं आ रहा था क्या करूं? पर बात करना भी बहुत जरूरी था. मैने हिम्मत करके “हैलो” बोल ही दिया. मेरी आवाज मुझे खुद ही अजनबी जैसी लग रही थी. आवाज में कंपन था शायद उसने भांप भी लिया होगा. ’कोई मेसेज हो तो दे दीजिए’, वह तो अभी यहां नहीं है.”. मैने फ़िर जोर देकर उससे कहा कि “उन्हीं से बात करनी है, कब हो पायेगी”. जवाब मिला -“आधे घण्टे बाद फोन कीजिए तब तक वह आ जायेगी.” फोन कट चुका था. अब इंतजार करने के अलावा और कोई चारा नहीं था.

रजनी का इतनी देर तक मेरे साथ ठहरना ठीक नहीं था. घरवालों को शक हो सकता था. घरवाले अपने रसूख के दम पर थाने भी जाकर आ चुके थे पर बिना कोई रिपोर्ट लिखवाये. ताऊ सरंपच था और उनकी इज्जत का सवाल था. थाने वाले सब समझ रहे थे. इसलिए बिना गांव वालों को भनक लगे सब खोजबीन जारी थी. पर उन्हे अभी तक कोई सुराग नहीं मिला था. इसलिए रजनी को मैंने वापिस घर भेज दिया. दोपहर ढलने को थी. रजनी मौका देख फ़िर आ गयी थी. मैने फोन मिलाया तो सरोज ने ही उठाया. सरोज एक सामाजिक कार्यकर्ता थी और स्त्रीवादी, जनवादी आन्दोलनों में काम कर रही थी. मैने एक सांस में पूरी बात उसे बता दी. पर ये नहीं बताया कि मैं कहां से बोल रही हूं. वह ध्यान से मेरी बात सुनती रही. पूरी बात सुनकर उसने सिर्फ़ इतना कहा कि “मैं देखती हूँ कि क्या हो सकता है.” मैने उससे केवल इतना कहा कि “वह मुझे फ़ोन न करे, मैं खुद करूंगी. मेरी जान को खतरा है. मुझे बचा लो.” रजनी घर जाकर फ़िर आ गयी थी.

शाम को  मैने फ़ोन किया तो सरोज ने मेरी बात विजय से करवायी. मैने उसे भी सब कुछ बता दिया. उसने मुझे हौसला दिया कि वे मुझे कुछ नहीं होने देंगे. मैं जहां छिपीहूं, वही रहूं. बाहर ना निकलूं. जब तक वे लोग मुझे खुद वहां से बाहर निकलने के लिए न कहे. मेरी बातों को सुनकर वे सब हैरान रह गये कि “मैं तीन दिन से अकेली खेत में छिपी हुई हूं.” पिछली रात को तो बारिश भी खूब हुई थी ऐसे में अकेली लड़की अपनी जान बचाने के लिए बारिश में पूरी रात बिता रही है. भूखी-प्यासी. उन्हे मेरी हालत सुनकर ही घबराहट होने लगी थी. फोन रख दिया गया.

विजय अपनी टीम के साथ थाने गये. थानेदार को पूरा केस पहले ही पता था. विजय को वह बहुत अच्छे से जानता था कि ये लोग अगर कोई केस हाथ में लेते हैं तो छोडते नहीं है. उनकी ईमानदारी का कायल वह थानेदार भी खुद था. एक तरह ताऊ जी -गांव का सरपंच और रस रसूख वाला दूसरी ओर विजय की टीम. विजय व्यक्तिगत और कानूनी दोनो तौर पर इसे सुलझाने में लगा था जिससे थानेदार भी सहमत था. थानेदार ताऊ से भी दबता था. एक तरफ ताऊ और दूसरी ओर विजय. ताऊ मेरे घर लौटने और अपनी इज्जत बचाकर मुझे सजा देने के लिए तैयार था तो दूसरी ओर विजय थानेदार के सामने अड़ा हुआ था कि मुझ पर कोई आंच न आये. थानेदार को अब बीच का रास्ता ही अपनाना था, उसने ताऊ और विजय की एक मीटिंग रखवा दी.
विजय ने पुलिस, सरपंच और परिवार वालों से मुझे खतरा बता कर सबको पार्टी बना लिया था. दूसरी ओर थानेदार को भी इसमे उसने पार्टी बनाया कि कहीं थानेदार दवाब में न आ जाये. उसने थानेदार के बड़े साहब को भी कार्यवाही करने के लिए तैयार कर लिया था. स्थितियां कुछ भी बन सकती थी इसलिए विजय कोई रिस्क नहीं लेना चाहता था. थानेदार अपनी नौकरी जाने के डर के कारण वही सब करने के लिए बाध्य हो गया था जो विजय चाहता था.

चौथा दिन निकल आया था. थाने में ही थानेदार और एस.एच.ओ. के सामने मीटिंग हुई. दोनों आमने- सामने थे. विजय ने कहा-“अगर लड़की को एक खरोंच भी आयी तो पूरा परिवार जेल की चक्की पीसेगा. थानेदार की भी नौकरी जायेगी, सब बंधे-बंधे फ़िरोंगे. गांव में बात फ़ैलने और पूरी बिरादरी में अपनी नाक कटने के डर से ताऊ राजी हो गया था. सारी शर्ते मान ली थी. मुझे कोई कुछ नहीं कहेगा और मैं वापिस घर आ जाऊं- बात फ़ैल ना जाये. विजय ने इस बारे में निश्चिंत रहने के लिए कहा तो ताऊ ने आखिर में पूछा ही लिया कि “मैं हूं कहां” ? विजय ने जवाब दिया कि “हमारे पास ही है और सुरक्षित है. आपको चिंता करने की आवश्यकता नहीं”. अप्लिकेशन पर सबके हस्ताक्षर करवा लिये गये थे. तय हुआ कि अब मुझे परिवार वालों को दे दिया जाना चाहिए. रजनी आ गयी थी और बहुत खुश थी. उसने विजय की सारी कही बातों को मुझे बता दिया था और साथ ही ये भी कहलवाया था कि मैं यहीं रहूं जब तक वह मुझे मेरा नाम लेकर न बुला ले.

पुलिस की जीप के साथ मेरा पूरा परिवार मुझे लेने के लिए आ रहा था. विजय और सरोज भी साथ थे. जैसे ही जीप रोड़ पर आयी तो विजय ने जीप को गांव की ओर चले जाने के लिए कहा. सब हैरान थे. जीप को गांव की ओर मेरे घर के पास मुड़ने वाली गली में रोक दिया गया. ताऊ ने गुस्से से भरकर विजय की ओर देखकर कहा- “क्यूं घर की ओर पंचायत को लेकर जा रहे हो, थोड़ी बहुत इज्जत बची हुई है, उसे भी नीलाम करके छोड़ोंगे”. विजय ने उसे धर्य रखने के लिए कहा और खुद मेरे घर की पीठ की ओर लगने वाली चाहरदिवारी की ओर खड़ा हो गया. सब उसी ओर मुंह फ़ाड़े देखने लगे थे. विजय ने तीन बार मेरा नाम पुकारा. मैं सांसे रोके अपना नाम सुन रही थी. इन चार दिनों में तो मैं अपना नाम तक भूल गयी थी. मैं उठी और लड़खड़ाती हुई आवाज की ओर बढ गयी. विजय ने लपककर मुझे सहारा दिया और बच्चे की तरह अपने सीने से लगा लिया, कहा-“मेरी फ़ूलन” सब अवाक रह गये.

तस्वीरें गूगल से साभार
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इजाडोरा डंकन: नृत्य की महान साम्राज्ञी और स्त्री-स्वतंत्रता की प्रवक्ता!

ज्योति प्रसाद

 शोधरत , जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय. सम्पर्क: jyotijprasad@gmail.com

आज 29 अप्रैल है। आज ही के दिन अंतरराष्ट्रीय  नृत्य दिवस (इंटरनेशनल डांस डे) मनाया जाता है। जो इस कला से जुड़े हैं उन्हें इसकी पहले से ही जानकारी होगी पर जो इस कला को सिर्फ सिनेमा, टीवी कार्यक्रमों या अन्य माध्यमों से वाकिफ़ हैं उन्हें आज के दिन घर आए अखबारों या अन्य माध्यमों से पता चल रहा है।

नृत्य, नाच, झूमना, गाना या डांस इन्सानों की नैसर्गिक प्रवृत्तियों में से एक प्रवृत्ति है। यह माना जा सकता है। इसमें बहस मुबाहसे की जरूरत नहीं है। भारत में तो क्लासिक संगीत की तरह क्लासिक नृत्य भी हैं। पर उनकी चर्चा यहाँ करना इस लेख का उद्देश्य नहीं है। इस लेख का उद्देश्य अमरीका की आधुनिक नृत्य की जननी महान इज़ाडोरा की आत्मकथा के बहाने स्त्रीत्व को समझना होगा। गौरतलब हो कि इस महान नृत्यांगना को इतिहास में कई तरीक़ों से याद किया जाता रहा है। इसके साथ ही उनकी मुक्त विचारधारा और जीवनशैली को भी निशाने पर लिया जाता रहा है। हैरत की बात है कि जिस नृत्य को लेकर अमरीका बीसवीं शताब्दी में माइकल जैकसन को लेकर दीवाना रहा वहीं इस मशहूर नृत्यांगना का ज़िक्र भी नहीं सुनाई देता या बहुत बड़े पैमाने पर सुनाई नहीं देता। ज़िक्र होता भी है तो बहुत ही धीमी आवाज़ में।

भारत में भी तमाम तरह की नृत्य प्रतियोगिताओं के कार्यक्रमों के दौरान माइकल जैकसन का नाम आता रहता है पर इज़ाडोरा का नाम सुनाई भी नहीं देता। यह भी सच है कि सत्ताओं ने जिस इतिहास को दिखाना चाहा,लोगों तक वही पहुंचा भी। जिसे स्कूली किताबों में जगह मिली उनका मनमाना चेहरा दिखाया गया। या कहूँ इतिहास की एक परिभाषा मनगड़ंत महान घटनाओं और चरित्रों का हनन भी हैं। जो लोग/व्यक्तित्व/समाज बनाई गई लीक पर चले उन्हें फ्रेम में लिया गया। पर जो लीक पर चलने को राज़ी न हुए उन्हें एक अंधेरा और लंबी खामोशी दी गई। यह हर जगह के इतिहासों के साथ है। महिलाओं और दबाये गए लोगों के साथ यह काम और भी क्रूरता से किया गया। लेकिन ये लोग इतिहास में किसी भी तरह मारे नहीं जा सके और उभर आए।

एंजेला इज़ाडोरा डंकन का जन्म 27 मई 1878 को अमरीका के सेन फ्रांसिस्को में हुआ था। बेहद छोटी अवस्था में उनके माता पिता के बीच तलाक हो गया था। उनके परिवार में उनकी माँ को मिलाकर पाँच लोग थे। माँ ने ही अकेले अपने चारों बच्चों की परवरिश की। इज़ाडोरा ने अपनी आत्मकथा ‘माय लाइफ’ में अपने बचपन का बेहद प्रभावपूर्ण वर्णन किया है। वह आत्मकथा में नृत्य के बारे में लाजवाब बात कहती हैं- “अगर लोग मुझसे पूछते हैं कि मैंने नाचना कब शुरू किया तब मैं जवाब देती हूँ- ‘अपनी माँ के गर्भ में। शायद शहतूतों और शैम्पेन के असर की वजह से, जिन्हें प्रेम की देवी एफ़्रोदिती की खुराक कहा जाता है।”

वह यह भी कहती हैं- “मुझे इस बात का शुक्रगुजार होना चाहिए कि जब हम छोटे थे तब मेरी माँ गरीब थी। वह बच्चों के लिए नौकर या गवर्नेस नहीं रख सकती थी।। इसी वजह से मेरे अंदर एक सहजता है, ज़िंदगी को जीने की एक कुदरती उमंग है, जिसे मैंने कभी नहीं खोया।” बीसवीं शताब्दी के आरंभ में इज़ाडोरा का इस तरह से ज़िंदगी के प्रति मुखर होना सचमुच आकर्षित करता है।

स्कूली जीवन, गरीबी और खुद का नृत्य स्कूल 
वे स्कूल में भी इस कदर पेश आती थी कि परंपरा में ढली टीचर की निगाह में वे चुभ जाया करती थीं। आत्मकथा में वे लिखती हैं कि एक बार टीचर ने अपनी जिंदगी का इतिहास लिखकर लाने को कहा। अपने दिये जवाब में वे कहती हैं- “जब मैं पाँच वर्ष की थी तब तो तेइसवीं गली में हमारा एक कॉटेज था। पर किराया न दे पाने के कारण हम वहाँ नहीं रह सके और सत्रहवीं गली में चले गए। पर पैसों की तंगी के कारण जल्दी ही मकान मालिक यहाँ भी तंग करने लगा और हम बाइसवीं गली में शिफ्ट हो गए। वहाँ भी शांति से नहीं रह सके और वहाँ से भी खाली करके दसवीं गली में जाना पड़ा। इतिहास इसी तरह चलता रहा और हम लोगों ने जाने कितनी बार घर बदले।” टीचर ने जब यह सुना तो वह गुस्से से लाल हो गई और नन्ही इज़ादोरा को प्रिन्सिपल के पास भेज दिया गया। प्रिन्सिपल ने माँ को बुलाया। जब माँ ने यह देखा तो वह खूब रोने लगीं और कसम खाकर कहा कि यह सच है।

सभी बच्चों के लिए टीचर की एनक में एक ही फ्रेम है। एक ही साँचे में ढालने की कोशिश। आज भी यही शिक्षा है। टीचर को किसी भी विद्यार्थी की स्वतंत्र स्वतन्त्रता को सम्मान देते बहुत हद तक नहीं देखा गया। उसकी मूल दिलचस्पी या चाहत की समझ बहुत से कम शिक्षकोंको हो पाती है। यह स्कूली शिक्षा की एक कड़वी सच्चाई भी है। इसलिए जब इज़ाडोरा का स्कूल चल पड़ा तब उन्होंने इस पढ़ाई को नकार दिया। पर व्यक्तिगत रूप से परिवार के अन्य लोगों के साथ उन्होंने जगह-जगह की लाइब्रेरी में बहुत सा समय बिताया।
बेहद कम उम्र से आसपड़ोस के बच्चों को इज़ाडोरा ने नृत्य सिखाने की शुरुआत की और लगभग दस वर्ष की होते होते उन्हों ने एक बढ़िया नृत्य प्रशिक्षण स्कूल खोल लिया। इसकी मूल प्रेरणा उनकी माँ रहीं जो नृत्य और संगीत की गहराई से समझ रखती थीं। उन्हों ने अपने बच्चों में भी उसका पर्याप्त प्रवाह किया।

इज़ाडोरा और आधुनिक नृत्य 
इज़ाडोरा दो शताब्दियों के बीच के बिन्दु पर विख्यात रहीं। इस प्रसिद्धि की मूल वजह उनका आधुनिक नृत्य था। कहना न होगा कि उन्होंने नितांत अपनी शैली विकसित की बल्कि उसे नए आयामों तक भी पहुंचाया। इसी शैली ने उन्हें यूरोप और अमरीका में विख्यात कर दिया। उनके लिए लोग दीवाने हो जाया करते थे। उनके नृत्य के बाद लोग घंटों सम्मोहन में रहते थे। इंग्लंड के मशहूर नृत्य समीक्षक रिचर्ड ऑस्टिन के मुताबिक- “एक तरह से वह एक ऐसी नृत्यांगना थी जो किसी शास्त्रीय अध्ययन और प्रशिक्षण की देन होने की बजाय विशुद्ध प्रकृति की पैदाइश थी।” खुद इज़ादोरा आत्मकथा में यह कहती भी हैं कि उनका बचपन संगीत और काव्य से भरा था। इसका स्रोत उनकी माँ थी जो पियानो पर संगीत बजाने में इतनी खो जाती थी कि कई बार रात से सुबह हो जाया करती थी।

इज़ाडोरा ‘माय लाइफ’ में कई जगह अपनी कला यानि नृत्य से जुड़े अपने विचार रखती हैं। वे कई घंटों तक आत्म केन्द्रित होकर उस आयाम को खोजती रही थीं जो मनुष्य की सर्वोच्च आकांक्षाओं को अभिव्यक्त कर सके। उन्हों ने गति के उस सिद्धान्त की खोज की जो मन, मस्तिष्क और संवेगों से जुड़ा हुआ था। वे कहती हैं- “… मन की, आत्मा की वह जागृति चाहिए जिसके द्वारा हम अपने शरीर के सभी संवेगों को और अपने अंगों की सभी क्रियाओं को महसूस कर सकें। एक तरह से मन, शरीर औए मस्तिष्क का पूरा तालमेल।” एक जगह इज़ाडोरा ‘प्रिमाविरा’ पेंटिंग से प्रभावित होकर अपने ‘डांस ऑफ फ्यूचर’ की ईजाद भी करती हैं। इसमें इस नृत्य के माध्यम से ज़िंदगी की भव्यता और उसके चरम आनंद का संदेश देना उनका लक्ष्य था।

ऐसे ढेरों उदाहरण उनकी आत्मकथा में भरे पड़े हैं जहां वे अपनी कला के प्रति पूरी तरह से समर्पित और आत्मा से जुड़ी हुई दिखाई देती हैं। खुली खर्ची और स्कूल को बनाए रखने के कारण उन्हें हर जगह अपने नृत्य कार्यक्रम पेश करने होते थे। पूरी आत्मकथा में कहीं भी वे यह नहीं कहती कि इस ज़िंदगी से वे ऊब गई हैं। बल्कि ज़िंदगी से मिले दुखों में वे हमेशा नृत्य की ओर मुड़ती हैं।

इज़ाडोरा के विवाह को लेकर विचार
जरा सोचिए कि आज के समय में हमारे समाज में उन लड़कियों या औरतों को लेकरहम क्या सोच बनाते हैं जिनके बिना विवाह के बच्चे हो जाते हैं। आज के दौर में तो फिर भी एक समझ धीरे धीरे विकसित हो रही है। पर नीना गुप्ता (अभिनेत्री) ने जब बिना विवाह अपनी बेटी को जन्म दिया तब उन्हें क्या क्या सुनना पड़ा था। अपने कई इंटरव्यूज़ में वे बार बार इसका ज़िक्र भी करती हैं। आज भी यदि कोई महिला पिता के नाम के बिना अपने बच्चे का स्कूल में दाखिला करवाने जाती है तब कितनी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। कितने ही गलत विचारों और मानसिकता से टकराना पड़ता है।

इज़ाडोरा ने बचपन से अपनी माँ की दुखद और दयनीय स्थिति देखी थी। इसलिए वे शादी जैसी संस्था को कड़े/आलोचनात्मक नज़रिये से देखती थीं। वे स्वतंत्र मस्तिष्क वाली स्त्री की बात करती हैं। ‘माय लाइफ’ में वे लिखती भी हैं- “आज से बीस वर्ष पहले (1905 में) जब मैंने विवाह करने से इंकार किया और बिना विवाह के बच्चे पैदा करने के अधिकार का इस्तेमाल करते हुए दिखाया तब अच्छा-खासा हँगामा हुआ था।” उनके मुताबिक,“विवाह संस्था की नियम संहिता को निभा पाना किसी भी स्वतंत्र दिमाग की स्त्री के लिए संभव नहीं है।”

इतना ही नहीं वे समाज और परिवार के संकुचित विचारों को भी निशाना बनाती हैं। उनकी मौसीऑगस्टा के जीवन की बरबादी वे परिवार के संकुचित विचारों के कारण ही मानती हैं। मौसी को नृत्य-नाटिकाएँ करने का शौक था। वह थिएटर में काम को लेकर उत्साहितरहती थीं। पर उनके नाना नानी को यह पसंद नहीं था। मौसी की कलात्मक प्रतिभा के खत्म होने को इज़ाडोरा इसी संकुचित सोच को मानती हैं। अपनी मृत्यु के कुछ वर्षों पहले जब वे रूसी नौजवान कवि से विवाह भी करती हैं तब उसके पीछे की वजहों को जानकार पता चलता है कि उनके मन में विवाह के प्रति विचारों में कोई खास अंतर नहीं आया था।

इज़ाडोरा और उनके अन्य भाई-बहन ने अपनी भावनाएँ और कला को दबाने के बजाय उसे निखारा और ताउम्र उसके प्रति समर्पित भी रहे। अपनी कला और उसको और ऊंचाई तक ले जाने के लिए वे लगभग योरोप भ्रमण से लेकर रूस तक घूमे। अपने संघर्ष के दिनों में वे शिकागो, न्यूयॉर्क और लंदन तक ठोकरे खाते रहे।इस दरमियान वे कई बार भूखे रहे तो कई बार बिना छत के इधर उधर भटकते रहे।

इज़ाडोरा, प्रेम और प्रेमी
इज़ाडोरा की आलोचना का एक कारण उनके और कई पुरुषों के बीच के संबंध भी रहे। उनकी ज़िंदगी में कई पुरुष आए और गए। उनका पहला प्रेम का भाव पोलिश चित्रकार इवान मिरोस्की के लिए था। वह उम्र में काफी बड़ा था और इज़ाडोरा बेहद कम उम्र की थीं। लेकिन यह प्रेम प्रसंग आगे न बढ़ पाया क्योंकि इज़ाडोरा को कुछ बनने के जुनून ने कला की कदर के लिए दूसरे शहर में जाने को मजबूर कर दिया। बाद में उनके भाई ने जब इस चित्रकार के बारे में छानबीन की तो पाया कि यह पहले से शादीशुदा है। इसके बाद हंगेरियन अभिनेता ऑस्कर बरजी से उनके प्रेम संबंध रहे। इतिहासविद् हेनरीख थोड से भी गहराई में प्रभावित हुई और आध्यात्मिक प्रेम के पक्ष को भी जाना। मंच सज्जाकार गार्डन क्रेग से प्रेम संबंध काफी सुखद रहे और इन्हीं से सन् 1905 में अपनी पहली संतान द्रेद्रे को जन्म दिया।

गार्डन क्रेग का साथ लंबा चला. पर उसके साथ रहने के लिए इज़ाडोरा को तालमेल बिठाना पड़ा। ‘माय लाइफ’ में वह एक जगह जिक्र करती हैं- “यह मेरी नियति थी कि मैं इस जीनियस के महान प्रेम को प्रेरित करूँ और यह भी मेरी नियति थी कि उसके प्रेम के साथ अपने करियर का तालमेल बिठाने का अथक प्रयत्न करूँ।” क्रेग कई बार इज़ाडोरा को अपने काम और कला को छोड़ने की बात कहता था। उसकी सलाह थी कि घर पर रह कर वह उसकी पेंसिलों की नोकें तैयार करे। यही वजह भी रहे कि उनके सम्बन्धों में खटास भी मिलती चली गई।
एक बड़े नृत्य स्कूल खोलने के सपने ने उन्हें सिंगर मशीन कंपनी के वारिस पेरिस सिंगर से मिलाया। सिंगर के साथ इज़ाडोरा ने अपने चरम पर जाकर एश्वर्य का जीवन जिया और इन्हीं से सन् 1911 में एक बच्चे पेट्रिक को भी जन्म दिया। सिंगर से हुए मन मुटाव के बाद भी कई लोग आए और गए। पर इज़ाडोरा इनसब के साथ अपने नृत्य और स्कूल को कभी नहीं भूलीं। नृत्य उनके लिए जीवन था।

इस सब प्रेम सम्बन्धों के चलते उन्हें बहुत कुछ सहना भी पड़ा। लेकिन उन्हों ने इसकी ज़्यादा परवाह नहीं की और अपने काम में लगी रहीं। एक आकस्मिक दुर्घटना में उनके दोनों बच्चों के डूब के मर जाने का सदमा उनके साथ ताउम्र रहा और वह इस सदमे से कभी भी उबर नहीं पाईं। यह समय 1913 का था। इस बीच वह तमाम जगह राहत पाने के लिए भटकती रहीं। वे एक बार फिर गर्भवती हुईं पर यह तीसरा बच्चा भी जल्दी ही मृत्यु को प्राप्त हुआ। इसके बाद मानसिक रूप से वह बहुत टूट चुकी थीं। मरने के खयाल तक ने उनके दिमाग में दस्तक दे थी। पर फिर भी वे वापसी करती हैं। यही वजह है कि इज़ाडोरा मामूली चरित्र बनकर नहीं रह जातीं।
हालातों से टकराते हुए वे रूस से आए न्योते को स्वीकार करती हैं और वहीं के एक युवा कवि से सन् 1922 में विवाह भी करती हैं। यह चौंका देने वाली घटना थी। लेकिन इसके पीछे की पृष्ठभूमि को समझना होगा। उनकी एक प्रिय शिष्या इस बारे में अहम जानकारी देती है। 1922 को इज़ाडोरा की माँ का निधन अमरीका में होता है। इसके साथ ही उन्हें रूस में स्कूल चलाने की दिक्कतें और रुपयों की कमी ने आ घेरा था। इसके अलावा सेर्जी एसेनिन जो उनका युवा पति था, काफी बीमार रहने लगा था। इसलिए उसे एक बेहतर इलाज़ और अमरीका और यूरोप की यात्रा के जरिये रचनात्मकता का बेहतर माहौल देना चाहती थीं। बिना विवाह के पासपोर्ट या यात्रा मुश्किल थी। अत: उन्हों ने मई में इस युवा कम उम्र कवि से विवाह कर लिया। एक वजह यह भी थी वे इस व्यक्ति में अपने बेटे का चेहरा भी पाती थीं और मोहित भी थीं।

इस विवरण से स्त्री पुरुष सम्बन्धों की झलक भी मिलती है। उनके आलोचक उनके वफादार न होने का उन पर इल्ज़ाम लगते हैं। पर वहीं पुरुषों को इस तरह की आलोचनात्मकता का सामना नहीं करना पड़ता। उनकी आत्मकथा के हिन्दी अनुवादक युगांक धीर लिखते भी हैं कि इज़ाडोरा अपने समय से काफी आगे थीं। अनुवादक की ओर से लिखे नोट में वे लिखते हैं“…एक सहज स्वाभाविक स्वतंत्र स्त्रीत्व की तलाश। एक ऐसी स्वतन्त्रता जिसका अर्थ सिर्फ ‘पुरुषों से मुक़ाबला’नहीं—‘स्त्रीत्व को त्यागकर ‘पुरुषत्व’ अपना लेना नहीं—बल्कि एक स्त्री के रूप में जीते हुए, अपने स्त्रीत्व का पूरा आनंद उठाते हुए,‘प्रेमत्व’ और ‘मातृत्व’ दोनों का सुख भोगते हुए, अपनी क्षमताओं और प्रतिभाओं की, अपनी आकांक्षाओं और अपने सपनों की असीम संभावनाएँ तलाशना।” इज़ाडोरा कुल मिलाकर यही चरित्र थीं।

लेखिका के रूप में इज़ाडोरा 
इजाडोरा एक प्रतिभा थीं। अपने संघर्ष के दिनों में वे जितना ज़िंदगी में ऊपर उठीं उतना ही कला के उच्चतम मुकाम पर भी पहुंचीं। उनकी आत्मकथा में जगह जगह महान कवियों, नाटककारों, संगीतज्ञों, पेंटरों, नृत्यांगनाओं, मूर्तिकारों, दार्शनिकों आदि का ज़िक्र किया गया है। ज्यां ज़ाक रूसो,व्हीटमन, बिदोवन और नीत्शे को महान पाया है। इसलिए यह कहा जा सकता है कि उनको लगभग कला और कला से इतर क्षेत्रों की बहुत बेहतर जानकारी थी। वह कई बार लंदन की लाइब्रेरी में कई दिनों तक बैठकर पढ़ने का जिक्र भी करती हैं।यह पढ़ना और जीवन के अनुभव मिलाकर ‘माय लाइफ’ जैसी आत्मकथा का रूप लेते हैं। यह भी खास बात है कि इस किताब में उनकी नृत्य के प्रति एक तरह की आस्था, ललक, जुड़ाव, सम्मोहन, नृत्य के नए प्रयोग एक आत्मिक धारा है जो पूरी किताब में बह रही है। इसलिए जब पाठक इस किताब को पढ़ने के लिए उठाकर उसे वापस नहीं रखा जा सकता। किताब में एक लय है जो बाँधें रखती है। दिलचस्प वर्णन हैं जो कभी चौंकाते हैं तो कभी ऐसे भाव हैं जो रुला भी देते हैं।

इज़ाडोरा और हम  
हम औरतों का इतिहास खाली डिब्बा नहीं है। इतिहास में बहुत सी औरतें ऐसी हैं जिन्हों ने इतिहास में हम औरतों को खाली होने भी नहीं दिया है। इज़ाडोरा उनमें से एक हैं। वह एक कलाकार थी। दुनिया को खोजने और जाने वाली यात्री थीं। लेखक थीं। घंटों लाइब्ररी में पढ़ने में समय बिता देने वाली पक्की पाठिका थीं। नृत्य स्कूल खोलने वाली महान नृत्यांगना थीं। कला और जीवन में आत्मा को जानने और समझने वाली प्रबुद्ध औरत थीं। अपने जीवन को अपने शर्तों पर जीने वाली साहसी औरत थीं। अपने विचार खुलकर रख देने वाली विचारक थीं। इतना ही नहीं प्रथम विश्वयुद्ध की विभीषिका को देखने के बाद उन्होंने भरसक मानवता की सेवा करने की कोशिश की। वह ऐसी महिला थी जिसने उन्माद का आनंद भी भोगा और असमय मृत्यु का शिकार हुए अपने तीनों बच्चों का सदमा भी झेला। फिर भी जीने की जिजीविषा बनाए रखी। ऐसे महान चरित्रों का हाथ थामकर समाज और समय में घूम लेना चाहिए। कहीं न कहीं से हौंसला बना रहेगा।
बहुत ही कम उम्र में एक दुर्घटना में उनकी मृत्यु हुई थी। लेकिन अपने पीछे एक पूरी विरासत छोडकर गई हैं, जो बेहद अहम है। उनके ही शब्दों में इस लेख को पूरा करना ठीक रहेगा- “मैं जीवन में विश्वास करती हूँ, प्रेम में और प्रकृति के नियमों की महानता में!” यह सूत्र वाक्य हम पर लागू हो सकता है।

पढ़ें: एक बार फिर नाचो न इज़ाडोरा

(यह लेख इज़ाडोरा की आत्मकथा‘माय लाइफ’ के हिन्दी अनुवाद ‘इज़ाडोरा की प्रेमकथा’ पढ़कर लिखा गया है। उसी किताब से उद्धरण लिए गए हैं। किताब के अनुवादक, युगांक धीर हैं और प्रकाशक, संवाद प्रकाशन(2002) है।)

तस्वीरें गूगल से साभार
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इन बिटवीन द एलिमेण्ट्स ऑफ़ पेण्टिंग, द बॉडी एंड द स्पेस (जयपुर में नवीन कलात्मक आगाज)

कृष्णा महावर


सहायक प्रवक्ता, चित्रकला, राजस्थान विश्वविद्यालय संपर्क:krish_mahawer@yahoo.co.in

 पिछले दिनों  राजस्थान ललित कला अकादमी द्वारा आयोजित 20वें कला मेले में कई नवीन व मौलिक कलात्मक कार्यों का प्रदर्शन हुआ। ‘‘इन बिटवीन द एलिमेण्ट्स ऑफ पेण्टिंग, द बॉडी एण्ड द स्पेस‘‘ शीर्षक से मेर द्वारा परिकल्पित आर्ट पर्फोमेन्स भी हुआ। यह परफ़ॉर्मेंस कई विषयों व पक्षों को छूती है। यह आर्ट पर्फोमेन्स कला शिक्षा व कला दोनों के जुड़ाव के साथ नवीन कलात्मक पहलुओं का एक नवीन आगाज उजागर करती है। जिसमें कला की प्रकृति पर भी सवाल उठाया गया है, साथ ही कला की शिक्षा में किताबी पढ़ाई पर भी प्रश्न खड़े किये गये।

कला शिक्षिका होने के नाते मेरी सर्वप्रथम प्राथमिकता विद्यार्थी ही होते है और उन्हें एक खुला और स्वतंत्र माहौल देने के लिये कई बार मुझे सिस्टम से बाहर भी आना पड़ता है। मैं बहुत गहराई से सोचती हूँ कि आर्ट थ्योरि को भी विजुअल तरीके से पढ़ाया जाना चाहिये। इस आर्ट के लिये मेरी पहली पसंद विद्यार्थी ही थे ताकि उनका सीधा संबंध स्थापित हो सके। आरम्भिक रूप में यह क्लासरूम का हिस्सा था बाद में एक आर्ट वर्क के रूप में विकसित हो गया। इस परफ़ॉर्मेंस में साउण्ड व म्यूजिक ने भी बहुत असर छोड़ा है।

वास्तव में परफ़ॉर्मेंस आर्ट की उत्पत्ति ही, कला की सीमाओं को तोड़ने व कला बाजार को खत्म करके तथा कला को मात्र वस्तु मानने जैसी अवधारणाओं के विरोध स्वरूप होती है। जहाँ पारम्परिक कलाओं (चित्रकला व मूर्तिकला) में दर्शक के पास मात्र देखने के अतिरिक्त कुछ नहीं रह जाता व कलाकार बेहद एकांतिक माहौल में सृजन करता है। इसके विपरीत आज के उत्तर आधुनिक समय में जिन नवीन कलाओं ने जन्म लिया उनमें इन्स्टोलेशन आर्ट, साइट स्पेसिफिक आर्ट, डिजिटल आर्ट, लैण्ड आर्ट, पर्फोमेन्स आर्ट है। ये सभी क्षणिक प्रकृति की है अतः अन्तिम वस्तु के रूप में मात्र डाक्युमेण्टेशन ही उपस्थित रहता है। इन तमाम कलाओं में दर्शकों की भागीदारी अतिमहत्वपूर्ण होती है।

परफ़ॉर्मेंस कला की प्रकृति प्रत्ययवादी (कान्सेप्चुअल) है तथा उच्च स्तरीय दार्शनिक भी होती है। पर्फोमेन्स कला में कलाकार की सशरीर उपस्थिति व उसका दर्शक के साथ संबंध अतिआवष्यक माना जाता है। व किसी विशिष्ट स्थान व समय की भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। इसी क्रम में उक्त आर्ट पर्फोमेन्स में सभी कलाकार स्नातक व स्नातकोत्तर के विद्यार्थी ही थे। और कला के तत्वों- रेखा, रूप, रंग, तान, पोत अन्तराल आदि को मूल विषय या विचार बनाकर मानवीय शरीरों द्वारा एक अमूर्त व नॉन लिनियर परफोर्मेंस की गई इसके प्रथम दृश्य में विद्यार्थी अपने दायें हाथ पर ब्रश बांधे व बांये हाथ में ‘‘फण्डामेण्टल ऑफ़ विजुअल आर्ट‘‘ नामक काल्पनिक पुस्तक पकड़े हुये दर्शकों के समक्ष उपस्थित होते हैं। वे सभी बैठ जाते है, लेट जाते है और पुस्तक में एकाग्रता तथा ब्रश वाले हाथ को कई बार ऊपर नीचे होना कई प्रश्न पैदा करते हैं। यकायक सभी पुस्तकों के पृष्ठों को खीज वाली स्थिति में आकर फाडना आरम्भ करते है और देखते ही देखते वहाँ कागजों का ढेर लग जाता है। मैंने पुस्तकीय ज्ञान की कला क्षेत्र में अपर्याप्तता पर सवाल खड़ा कया है और आज की कला शिक्षा प्रद्धति को भी निशाना बनाया है।

आगे के दृश्य में स्वयं कलाकार अपने कमर पर बहुत सी रस्सियाँ बांधे हुए झुककर मुंह से ब्रश पकड़े अमूर्त आकृतियाँ उकेरती है। इसी प्रकार आगामी दृश्य में एक विद्यार्थी एक मोटी रस्सी के साथ कई-कई बार गुत्थमगुत्था होता दिखाई देता है वह रस्सी के फर्श पर ऊलट पुलट कर कुछ खोजता, कुछ सोचता, कभी उछालता, कभी लपेटता है और कुछ अमूर्त पंक्तियाँ भी बुदबुदाता है:- ‘‘वो वहाँ लटकती रेखा, क्या कहना था उसे, उसका कोई प्रेम, प्रिय रूपाकार, अटका गया उसे, वो वहाँ लटकती रही, लटकती रही, लटकती रही।‘
इसी प्रकार एक दृश्य में चार छात्राएं एक पेन्सिल को लेकर व कुर्सी पर बैठकर विभिन्न मुद्राऐं बनाती है। वे सिर पर स्केच फाइल को रखकर प्रवेश करती है व पेन्सिल को कभी कानों में फंसाती है, कभी मुंह में लेती है और सामने की ओर एकाग्र, एकटक देखती रहती है। शायद कुछ अवलोकन कर रही है या विषय की तलाश में है जिसे अपनी स्केच फाइल में उकेर सकें। इसी क्रम में आगे एकदम से बहुत सारे (सारे ही) कलाकार, विद्यार्थी, अलग-अलग दिशा में मुंह किये खड़े हो जाते हैं और कला की परिभाषाऐं ऊंचे स्वर में बोलने लगते है जैसे आर्ट इज लाइफ, सत्यम् शिवम सुन्दरम, कला मानव की सहज अभिव्यक्ति है, कला मन के भावों का प्रदर्शन है आदि और इस अन्तराल को बीच-बीच में एक प्रश्न तोड़ता है कि व्हाइट इज आर्ट? व्हेयर इज आर्ट? व्हाई इज आर्ट?। यह दृश्य तमाम कलात्मक परिभाषाओं पर आक्रामक तरीके से वार करता है कि अन्तिम रूप में कला है क्या? आखिर कला का उद्देश्य क्या है? व किसे कला माना जाये?

यह आर्ट परफ़ॉर्मेंस उस समय चरम पर होती है जब रिक्त स्थान पर दो छात्रायें आकर रंगीन मिट्टी को फैलाने लगती हैं। माहौल में कुछ धुल सा उड़ता है दर्शकों पर भी जाता है। परन्तु तुरंत ही अन्य कलाकार वहाँ आकर आपकी अंगुलियाँ व पैरों से कुछ रेखायें खिचने से दिखाई देने लगते हैं। यह दृश्य बहुत गंभीर प्रस्तुति देता है। इसी प्रकार एक बार तो रंगीन फर्श भी आ जाता है। पूरी परफ़ॉर्मेंस में फर्श भी तीन चार बार अपना रंग बदलता है। रंगत व टेक्स्चर को प्रदर्शित करते विद्यार्थी जमीन पर लेटकर फर्श को हाथों से अनियमित अन्तराल में छूते हैं व महसूस करते है तभी एक लड़की हाथों में कांच का गिलास, एक अन्य लड़की प्लास्टिक की बोतल व तीसरी लकड़ी को हाथों में लेकर उन्हें सहलाती हुई अन्तराल पर विचरण करती रहती है। मैंने रंगो व पोत को इस तरह से दृश्यमान होते देखा है। इस परफ़ॉर्मेंस की परिकल्पना मैंने जिस भी विचार से की हो परन्तु यह दर्शकों पर नवीन आयामों को उजागर करती अभिव्यक्त होती है। एक ऐसा सैद्धान्तिक विषय जो कक्षाओं में पढ़ाने का है अधिक से अधिक विषय से संबंधित चित्रों को स्लाइड या स्क्रीन पर पढ़ाया जा सकता है। ऐसे ही विषय को कक्षा से बाहर निकाल कर एक पर्फामेन्स द्वारा अभिव्यक्त करना वाकई एक नये विचार का आगाज है। एक विचार, एक कान्सेप्ट होते हुये भी गूढ़ अर्थों में कला शिक्षा के इर्द गिर्द के कई गंभीर मुद्दों को भी परोक्ष रूप में उकेरा गया है। कलात्मकता है। परन्तु माध्यम अलग है। अभिव्यक्ति है परन्तु न कोई रंग, न रेखा, न कैनवास, फिर भी कलाकारों द्वारा अपने शारीरिक मूवमेंट्स तथा हलचलों द्वारा विचार का     एक अमूर्त संप्रेषण किया गया।

यूं तो परफार्मेंस कला, सामाजिक, राजनीतिक, लिंग भेद, समकालीन मुद्दों का संप्रेषण व अभिव्यक्ति स्पष्ट तरीकों से करती है। उसी कला को मैंने अपनी शैक्षणिक पद्धति में समाहित किया और एक कला कार्य के रूप में तैयार कर कला छात्रों व कलाकारों से एक साथ संवाद स्थापित किया। अमूर्त-मूर्त, सृजन-विध्वंस, विश्वास, पॉजिटिव-नेगेटिव के इर्द गिर्द यह पर्फोमेन्स रचित हुआ दिखाई देता है। यह  परफार्मेंस पूरी तरह से बॉडी द्वारा सेल्फ एक्सप्लोरेशन की और एक कदम है, जिसका मूल विचार तो चित्र के छः तत्व हैं, परन्तु प्रक्रिया के दौरान कई बार उस विचार से आगे व परे की यात्रा भी हो जाती है। जो किसी भी सृजन प्रक्रिया में जायज भी है। एक रेखा किस प्रकार अपनी भौतिक सत्ता रखती है। या रंगों और टेक्स्चर की मुठभेड़ जब शरीरों से होने लगे तो क्या कुछ नई संभवनाऐं निकल कर आती हैं। रिक्त स्थल की उर्जा को परोक्ष रूप में स्वयं कलाकार और साथ ही दर्शक भी एक साथ महसूस करने लगते हैं।

परफार्मेंस कला ललित कला की ही एक नवीन कला शैली है और मरीना एबोमोविक को परफार्मेंस कला की ‘ग्रैंडमदर‘ माना जाता है। इसका नाटक या थियेटर से कोई संबंध नहीं होता। बल्कि कलाकार स्वतंत्र रूप में एक विचार को ही आगे बढ़ाता है मात्र  शरीर द्वारा। वह अन्य कलाओं से प्रेरणा ले सकता है। इसमें किसी स्क्रिप्ट या कथा की आवश्यकता नहीं होती। यह पूरी तरह कलाकार स्वयं ही निर्धारित करता है कि उसे क्या चाहिये और कैसे प्रस्तुत होना है। साउण्ड, वस्तुयें, कपड़े आदि हो भी सकते हैं, नहीं भी। कुल मिलाकर इस नवीन कला का प्रदर्शन जयपुर शहर में बहुत शानदार तरीके से हुआ। यह मेरा दूसरा परफार्मेंस था। इससे पूर्व भी  मैं अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस पर 24×7 शीर्षक से परफॉर्म कर चुकी हूँ। मुझे चित्रकला बहुत ही अपर्याप्त माध्यम प्रतीत होता है। परफार्मेंस कला में कहने के लिए बहुत कुछ है और बात बहुत ही सीधे तरीके से दर्शकों व समाज तक तुरंत ही पहुंचती है। इस परफार्मेंस के साथ राजस्थान में मुझे बहुत सी संभावनाएँ प्रतीत हो रही हैं।

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मुश्किल डगर को आसान बनाया दलित महिला उद्यमी कृष्णा कुमारी ने

राजीव सुमन


साधारण ग्रामीण पृष्ठभूमि से आने वाली दलित महिला उद्यमी की कहानी कह रहे हैं राजीव सुमन. डिक्की (दलित इन्डियन चैम्बर ऑफ़ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री) की सदस्य कृष्णा कुमारी यद्यपि दलित शब्द के इस्तेमाल के पक्ष में नहीं हैं, लेकिन अभी तक हम पैंथर आंदोलन से जुड़ी दलित शब्द की ऐतिहासिकता, निहित आक्रामकता, गौरव बोध  और राजनीतिक बयान के कारण इस शब्द का इस्तेमाल करते हैं.

यह कहानी एक ऐसी लड़की की है, जिसके गाँव में लडकियां प्राथमिक या माध्यमिक शिक्षा के बाद स्कूल की पढाई आगे नहीं कर पाती थीं. वह पहली लड़की थी जिसने दसवीं की पढाई पूरी की. 12वीं की पढाई पूरी करने के बाद उसके साथ भी वही हुआ, जो पितृसत्तात्मक जकडन में फंसी लडकी के साथ होता है-शादी, और उसके बाद पढाई का छूटना. यही हाल इस लडकी यानी, कृष्णा कुमारी के साथ भी हुआ- 20 सालों बाद वह स्नातक की अपनी पढाई पूरी कर सकी, घर गृहस्थी में फंसकर.

पति गोविन्द राम, इस मामले में सहयोगी सिद्ध हुए कि वह आगे अपनी मंजिल बनाने के लिए निकल पड़ी. कृष्णा और उनकी बेटी दिव्या, दोनो ने, लगभग  एक साथ स्नातक की परीक्षा दी, यानी बेटी एक साल बाद के बैच में थी.  उसके बाद उन्होंने 2012 में फैशन डिजायनिंग का कोर्स किया. यह सब उन्होंने पीछे मुड़कर देखने के लिए किया नहीं था , इसलिए आज वह कृष्णा क्रिएशन्स नाम से कुशन और बेडशीट का कारोबार कर रही हैं- एक उद्यमी के रूप में अपनी पहचान बनाकर अपने साथ कुछ और महिलाओं को भी रोजगार दे रही हैं.

कृष्णा कुमारी

कृष्णा का जन्म हरियाणा के पलवल जिले के एक गाँव रायदसका में हुआ था. माता-पिता रामश्री और ग्यासी राम की छः संतानों में से एक कृष्णा ने 1991 में 10वीं की परीक्षा पास कर गाँव की अन्य लड़कियों के लिए निर्धारित शिक्षा की सीमा को तोड़ा. गाँव में माध्यमिक से आगे का स्कूल न होने के कारण दूर जाना पड़ता था, उन्होंने माता-पिता से सायकिल खरीदवाई और पढाई की मंजिल पर बढीं.

उन्होंने बताया कि पहली बार जब मैं अपने पति (वित्त मंत्रालय में अंडर सेक्रेट्री पद पर कार्यरत) के साथ एक मॉल में घूमने गयी, वहीं डिजायनर बेडशीट देखकर इसी दिशा में बढ़ने का मन बनाया. उन्होंने उसके बाद कुछ कुशन डिजायन किये, जिसे जब लोगों से प्रशंसा मिली तो एक कारोबारी के रूप में आगे बढ़ने का मन बनाया. शुरुआती पूंजी के लिए उन्होंने एनआईटी-4 के कम्युनिटी सेंटर में नौकरी की और पूंजी जमा की.

बाजार के बारे में वे बताती हैं कि अब तो वे ऑनलाइन मार्केटिंग भी कर रही हैं, इसके पहले दिल्ली हाट या सूरजकुंड मेला, प्रगति मैदान के ट्रेड फेयर अथवा मुम्बई ट्रेड फेयर जैसी जगहों पर अपने उत्पाद बेचती रही हैं. इन दिनों एक्सपोर्ट की प्रक्रिया की ओर कदम बढ़ा रही हैं.

कृष्णा क्रिएशन का उत्पाद

कृष्णा कहती हैं कि ‘महिलाओं को पर्दे से मुक्त होना चाहिए, पर्दा प्रथा का खात्मा जरूरी है.’ इसके बाद वे हर महिला को पढने का आह्वान करती हैं. कहती हैं ‘कभी देर नहीं होती. पढाई कभी भी शुरू की जा सकती है और यदि आर्थिक आत्मनिर्भरता भी हो जाये तब तो उनके व्यक्तित्व के विकास के लिए सबसे बढिया है.’ बताती हैं कि शादी के बाद ससुराल पक्ष पढाई करने देने का समर्थक नहीं था, खासकर सास, बाद में मेरी पढने की इच्छा का सम्मान मेरे पति गोविन्द राम जी ने किया.’  डिक्की (दलित इन्डियन चैम्बर ऑफ़ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री) की सदस्य कृष्णा कुमारी यद्यपि दलित शब्द के इस्तेमाल के पक्ष में नहीं हैं, वे कहती हैं कि ‘हमसब खुद को अम्बेडकरवादी कहें तो बढिया है.’ उनका संकल्प है कि जल्द ही वे हरियाणा और राजस्थान में पर्दा से मुक्ति अभियान की शुरुआत करेंगी.

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राष्ट्रपति के कार्यक्षेत्र में मोदी-सरकार का हस्तक्षेप, बिना सहमति के जारी किया अध्यादेश

स्त्रीकाल डेस्क 


क्या केंद्र सरकार सारी संवैधानिक संस्थाओं  को नष्ट करने की मुहीम पर है या सरकार के मुखिया, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी,  स्वयं को ही सरकार और संविधान दोनो समझते हैं? यह सवाल उठ रहा है सरकार द्वारा हाल में जारी अध्यादेश पर, जिसमें बलात्कार को लेकर फांसी की सजा का प्रावधान किया गया है. सरकार और शासक पार्टी भाजपा वैसे भी सवालों के घेरे में है कि एक ओर कठुआ बलात्कार के मामले में बलात्कारियों के पक्ष में सड़क पर उतरे भाजपा विधायकों पर पार्टी कोई कार्रवाई नहीं कर रही है, कर्नाटक विधान सभा में पोर्न देखने वाले अपने नेताओं को टिकट दे रही है, उन्नाव बलात्कार मामले में गिरफ्तार भाजपा विधायक को निलंबित तक नहीं कर रही है, वहीं दूसरी ओर जनाक्रोश को देखते हए अध्यादेश लेकर आ रही है, जिसकी संवैधानिक वैधता पर ही सवाल उठ रहे हैं.

अध्यादेश की वैधता पर सबसे पहले सवाल उठाते हुए सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता और महिला कानूनविद अरविंद जैन ने अपने फेसबुक पोस्ट पर कल, 24 अप्रैल की देर शाम,   लिखा, ‘ 
 
#अध्यादेश 
बिना राष्ट्रपति की मंजूरी के अध्यादेश जारी!
 
आपराधिक कानून (संशोधन) अध्यादेश, 2018 दिनांक 21अप्रैल, 2018 (शनिवार) को ही जारी हो गया। पर उल्लेखनीय है कि मंत्री मंडल की बैठक शनिवार, 21अप्रैल, 2018 को करीब 11-12 बजे हुई थी और (Hindu में छपी रिपोर्ट के अनुसार) इसके बाद राष्ट्रपति के हस्ताक्षर हुए, रविवार, 22 अप्रैल को।
 
ऐसे में, अध्यादेश 20-21 अप्रैल, 2018 की मध्य रात्रि 00 बजे से कैसे लागू हो सकता है? आजतक नहीं देखा-सुना कि राष्ट्रपति के हस्ताक्षर होने से पहले ही, अध्यादेश जारी हो या कर दिया गया हो। अब इस कानून की क्या संवैधानिक वैधता होगी।

फैक्ट चेक के लिए हमने जब जारी हुआ अध्यादेश देखा तो उसमें 21 तारीख से लागू होने की बात लिखी थी। होना यह चाहिए था कि इसे कैबिनेट और राष्ट्रपति के आदेश के बाद की पहली रात, यानी  22 तारीख की रात, को 12 बजे लागू से लागू होना चाहिए था।

खबर है कि इसकी संवैधानिक वैधता को चुनौती देते हुए कुछ लोग हाई कोर्ट जाने वाले हैं ताकि इसे ठीक तरीके से लागू किया जा सके और अपराधियों को सजा सुनाते वक्त इसकी संवैधानिक वैधता को  आरोपियों का पक्ष चुनौती न दे  पाये. साथ ही हाई कोर्ट से यह अपील भी की जाने वाली है कि सरकार संवैधानिक नियमों और संस्थाओं को खत्म न करे यह सुनिश्चित हो.

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नाबालिग से बलात्कार मामले में आसाराम को मृत्युपर्यंत जेल की सजा

आज की तारीख महिला अधिकार के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है कि आज जोधपुर के एक न्यायालय ने नाबालिग से बलात्कार के आरोपी आसाराम (आसाराम बापू) को  मृत्युपर्यंत जेल की सजा दी है. एक ऐसे रसूखदार आरोपी को सजा दिलवाने में पीड़िता के संघर्ष की सिर्फ कल्पना की जा सकती है, जिसके खिलाफ चलने वाले मामलों के गवाह या तो गायब हो जाते रहे हैं या संदेहास्पद मौत के शिकार होते रहे हैं. इसे एक सीख की तरह लेनी चाहिए कि बेटियों को ऐसे बाबाओं और गुरुओं से दूर रखें.

जोधपुर की एक अदालत ने आसाराम को उम्र कैद की सजा सुनाई है। बाकी दो दोषियों शिल्पी उर्फ संचिता गुप्ता(सेविका), शरदचंद्र उर्फ शरतचंद्र को 20-20 साल की सजा सुनाई है। इससे पहले कोर्ट ने अपना फैसला सुनाते हुए शिवा उर्फ सवाराम (आसाराम का प्रमुख सेवादार), प्रकाश द्विवेदी (आश्रम का रसोइया) को दोषमुक्त कर दिया था। कोर्ट ने माना है कि आसाराम ने ही नाबालिग से बलात्कार किया था।

इस मामले में अंतिम सुनवाई एससी/एसटी की विशेष अदालत में सात अप्रैल को पूरी हुई थी और अदालत ने फैसले को सुरक्षित रखते हुए 25 अप्रैल को सुनाने की बात कही थी। आसाराम को उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर की एक किशोरी की शिकायत पर गिरफ्तार किया गया था। पीड़िता आसाराम के मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा आश्रम में अध्ययन करती थी। पीड़िता का आरोप था कि आसाराम ने जोधपुर के पास मनाई इलाके में अपने आश्रम में बुलाकर उससे 15 अगस्त, 2013 को रेप किया था।

फैसले के बाद नाबालिग के पिता ने कोर्ट के फैसले का स्वागत किया है। पिता ने कहा कि हमें न्याय मिला। जिन लोगों ने हमारा साथ दिया हम उनका शुक्रिया अदा करना चाहते हैं। हम उम्मीद करते हैं कि अब आसाराम  को कड़ी सजा दी जाएगी।

इसके पहले भी कई कथित संतों, बाबाओं पर लगे हैं बलात्कार के आरोप, हुई है सजा. 

गुरमीत राम रहीम :गुरमीत राम रहीम को सीबीआई की विशेष अदालत ने बलात्कार के आरोप में सजा सुनायी थी. राम रहीम के  डेरा सच्चा सौदा पर इसके आलावा आरोप था कि इस केस को दबाने के लिए एक शिकायतकर्ता साध्वी के भाई की हत्या करवा दी और इस केस की रिपोर्टिंग कर रहे एक पत्रकार की भी हत्या करवा दी थी.  25 अगस्त 2017 को इस मामले में पंचकुला की विशेष सीबीआई अदालत ने राम रहीम को दोषी माना और 28 अगस्त 2017 को सज़ा सुनायी, जिसके बाद राम रहीम के लोगों ने हरियाणा में काफी हंगामा, उपद्रव, हिंसा की थी.

बाबा परमानंद : बाराबंकी जिले के देवां कोतवाली क्षेत्र स्थित हर्रई धाम के बाबा परमानंद नाम से प्रसिद्ध बाबा रामशंकर तिवारी पर आरोप है कि वो बच्चे पैदा करने के नाम पर महिलाओं से रेप करता था. पुलिस ने उसे 24 मई 2016 को गिरफ्तार कर लिया था. बाबा परमानंद पर 12 मुकदमे दर्ज हैं जिनकी सजा वो अब भी जेल में काट रहा है.

संत रामपाल : रेप, यौन शोषण जैसे कई आरोपों को लेकर संत रामपाल की गिरफ्तारी 20 नवंबर 2014 को हुई. खबरों के अनुसार रामपाल लड़कियों को अपने एक किले में बंधक बनाकर रखता था, जिन्हें वो साधिकाएं बुलाता था. इनमें से कुछ को वो अपने कमरे में बुलाता और शारीरिक संबंध बनाता था.  बबिता कुमारी रामपाल की सबसे खास साधिका थीं, जिसकी उम्र लगभग 27 साल थी. पुलिस के अनुसार ‘रामपाल के कमरे से प्रेग्नेंसी किट और सेक्स पावर बढ़ाने वाली दवाइयां भी मिली थीं’.

नित्यानंद :बंगलुरु के बिदारी में स्थित अधीनम मठ के 293वें प्रधान नित्यानंद को जून 2012 में रेप और यौन शोषण के आरोप में गिरफ्तार किए थे. नित्यानंद की एक शिष्या ने उनका पूरा काला चिट्ठा खोला था, शिष्या के अनुसार उसके साथ नित्यानंद ने कई बार रेप किया. किसी को बताने पर जान से मारने की धमकी भी दी. उसका दावा था कि नित्यानंद के तमिल हिरोइन के साथ जो सेक्स टेप सामने आए थे, वो शूट उसी ने किए थे.

संत स्वामी भीमानंद : फरवरी 2010 में दो एयरहोस्टेस समेत आठ लोगों को सेक्स रैकेट चलाने के मामले में गिरफ्तार किया गया तो मामले का खुलासा हुआ. तो इन लोगों से पूछताछ हुई तब पता चला कि इस पूरे गिरोह का मास्टरमाइंड 39 साल का शिवमूरत द्विवेदी है. जिसे दुनिया इच्छाधारी संत स्वामी भीमानंद जी महाराज चित्रकूट वाले के नाम से जानती है. भीमानंद 2010 से ही जेल में सजा काट रहा है.

तस्वीरें गूगल से साभार 

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आदिवासी युवती की हत्या को आत्महत्या करार देने की पुलिसिया साजिश (सामूहिक बलात्कार की भी आशंका)

किसके दवाब में वर्धा, महाराष्ट्र  की पुलिस, महिला एसपी सहित, आदिवासी युवती की हत्या को आत्महत्या करार देने में लगी है? लाश जिस हालत में मिली है उससे उसके साथ सामूहिक बलात्कार की भी आशंका जता रहे आदिवासी नेता और उसके परिवार के लोग.  शुभांगी संभरकर  एवं डॉ. मुकेश कुमार की रिपोर्ट: 

वर्धा, 24 अप्रैल, 2018. महाराष्ट्र के वर्धा जिले के दहेगाव में एक 19 वर्षीय आदिवासी युवती शुभांगी ऊईके की गैंगरेप के बाद बर्बरतापूर्ण हत्या का मामला सामने आया है। युवती की नग्न और क्षत-विक्षत लाश बरामद हुई, किन्तु पुलिस ने उसे आत्महत्या का मामला ठहराकर दबाने की कोशिश की। आदिवासी भूमिहीन किसान परिवार की यह बेटी अपने पूरे गाँव में पढ़ाई में काफी होशियार और हिम्मती लड़की मानी जाती थी। वर्ष 2016 में उसने दसवीं कक्षा में दहेगाव के यशवंत स्कूल में टॉप किया था। गाँव की अन्य लड़कियों के माता-पिता भी अपनी लड़कियों की सुरक्षा के प्रति शुभांगी पर भरोसा रखते थे और कहते थे कि चलो शुभांगी के साथ पढ़ने जा रही है तो चिंता की कोई बात नहीं। उसे पेड़-पौधे, पशु-पक्षी और प्रकृति से काफी लगाव था।

ज्ञात हो कि शुभांगी का 19 मार्च 2018 की शाम को अपहरण कर उसके साथ सामूहिक दुष्कर्म किया गया। उसके बाद साक्ष्य मिटाने की मंशा से जालिमों ने पहले उसकी हत्या कर निर्वस्त्र अवस्था में ही उसकी लाश को रेल पटरी पर लिटा दिया। मुम्बई- नागपुर रेल मार्ग पर ट्रेन के गुजरने से उसका शव टुकड़ों में बंट गया। कमर से ऊपर और नीचे दो टुकड़ों में शव बरामद हुआ। उसका सिर इतनी बुरी तरह से कुचला हुआ था कि लाश को पहचानना भी मुश्किल था। प्रथम द्रष्टया ही यह पूरा मामला ठंढे दिमाग से रची गई गैंगरेप-ह्त्या की साजिश मालूम पड़ती है। इस पूरे घटनाक्रम को तफसील से समझने पर पूरा चित्र सामने आ जाता है। मृतक युवती के परिजन बताते हैं कि 13 मार्च 2018 को शुभांगी अपने पूरे परिवार के साथ जोगा गाँव (तालुका- सावनेर, जिला- नागपुर) अपने रिश्तेदार के यहाँ एक शादी में गई थी। शादी के बाद 15 मार्च 2018 को शुभांगी के परिजन घर लौट आए। चार दिन बाद यानी 19 अप्रैल 2018 को अपने चचेरे भाई के साथ मोटर साइकिल से तकरीबन 11:30 बजे दिन में वह दहेगाव अपने गाँव की ही एक सहेली की बड़ी बहन की सगाई में शामिल होने के लिए आई। दहेगाव पहुँचने के बाद वह दहेगाव चौक पर ही उतर गई और गाँव की अपनी अन्य दो सहेलियों से मिली। उसके कुछ देर बाद अपनी एक सहेली के साथ वह दोपहर में यशवंत कॉलेज माहाविद्यालय दहेगाव कॉलेज अपने काम से गई। उसके गाँव के एक व्यक्ति सुनिल नारायण खंडाते ने लगभग 1:30 बजे के दौरान उसे गाँव के दो युवक (विवेक लोटे और कुळसंगे) के साथ बातचीत करते हुए देखा भी था। इस दौरान उसके साथ उसकी एक सहेली भी पूरे समय तक मौजूद थी।

पुलिस द्वारा शुभांगी की सहेलियों और उक्त दोनों युवकों से ली गई गवाही के मुताबिक़ उनकी मुलाकात हुई और बातचीत खत्म होने के बाद शुभांगी ने उसमें से एक युवक को अपना मोबाइल चार्ज करने के लिए दे दिया। और फिर वहां से दोनों सहेलियां सगाई में पहुँची। शाम के लगभग 4:30 बजे तक शुभांगी अपनी सारी सहेलियों के साथ सगाई में रही। इसके बाद शुभांगी की सारी सहेलियां अपने-अपने घर चली गईं और शुभांगी अपने घर की तरफ रहने वाली एक सहेली के साथ अपने घर को निकल गई। दोनों दहेगाव के गुरुदेव चौक पहुँची, वहाँ से उसकी सहेली अपने घर चली गई। गुरुदेव चौक से शुभांगी का घर लगभग डेढ़ किमी की दूरी पर है। शुभांगी अकेली अपने घर की ओर चल पड़ी लेकिन वह घर नहीं पहुँच पाई।

शाम लगभग 6:30 बजे के आस-पास शुभांगी की बड़ी बहन ने उसकी एक सहेली को फोन किया और पूछा कि शुभांगी अभी तक घर क्यों नहीं आयी? इसपर उसकी सहेली ने बताया कि वह तो घर के लिए लगभग 4:45 बजे ही निकल गई थी। मृतक की बहन ने उसकी सहेली को सूचित किया कि शुभांगी अभी तक घर नहीं पहुँची है। इसके बाद शुभांगी की उस सहेली ने विवेक लोटे नामक युवक को कॉल करके बताया कि शुभांगी अभी तक घर नहीं पहुँची है। शुभांगी के लापता होने की खबर सुनकर उसकी सहेलियां भी उसे ढूंढने के लिए निकल पड़ी। लेकिन शुभांगी का कोई पता नहीं चल पाया।

रिजनों ने बताया कि इस घटना की जानकारी मिलने पर शुभांगी की सहेलियाँ उसके घर आई और शुभांगी के न मिलने पर सभी चिंतित हो उठे। और उसके पिता, भाई और चचेरा भाई 19 तारीख को ही लगभग 9:30 से 10:30 रात्रि के बीच दहेगाव पुलिस स्टेशन एफआईआर कराने पहुँचे। ‘शुभांगी का आवासीय प्रमाण-पत्र लेकर आओ तब 24 घंटे के बाद एफआईआर दाखिल करेंगे’- यह कहकर पुलिस द्वारा शुभांगी के परिजनों को वापस भेज दिया गया। निराश व बेबस होकर परिजनों को घर लौटना पड़ा।

20 अप्रैल 2018 को सुबह परिजनों को पता चला कि रेलवे ट्रैक पर रात में किसी 35 वर्ष के आस-पास के उम्र की महिला का कटा हुआ शव मिला है। इस सूचना पर परिजनों को लगा कि शुभांगी तो सिर्फ उन्नीस साल की है, इसी कारण लाश को देखने कोई नहीं गया। पुलिस ने लाश को तब तक पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया। किन्तु 9 बजे सुबह के आसपास शुभांगी का भाई और उसकी एक सहेली के पिता जिस जगह से लाश बरामद हुई थी, वहां देखने पहुंचे तो उन्हें एक सफ़ेद स्टॉल, चप्पल और पैर का कटा हुआ पंजा दिखा। हालांकि इसके आधार पर वे लोग भी इसकी शिनाख्त नहीं कर पाए और वहां से लौट आये। कुछ देर बाद शुभांगी की मां भी घर आ गई, जो अपने किसी रिश्तेदार के यहाँ गई हुई थी। मां को जब इसकी जानकारी मिली तो वह रेलवे पटरी पर यह देखने पहुँची कि कहीं वह शुभांगी के ही कपड़े आदि तो नहीं हैं। जब कटे हुए पंजे और दुपट्टे को उन्होंने देखा तो मानो उनके पैरों के निचे से जमीन खिसक गई। उन्होंने तुरत अपनी लड़की के पैर का पंजा, सफेद दुपट्टा और चप्पल पहचान ली। उन्हें लेकर वे पुलिस स्टेशन पहुँचे, लेकिन फिर भी पुलिस ने उनकी एफआईआर दर्ज नहीं किया और उलटा लड़की की माँ को यह कहते हुए डांट-फटकार लगानी शुरू की कि- ‘अपनी लड़की को तुमने किस तरह के संस्कार दिये हैं!’ इससे भी पुलिस की पितृसत्तात्मक स्त्रीविरोधी मानसिकता का पता चलता है। उसके बाद पुलिस ने उनके पास से शुभांगी के पैर का पंजा और अन्य बरामद सामान लेकर पैर के पंजे को भी वर्धा के सरकारी अस्पताल भेज दिया। पुलिस के द्वारा यह कहा गया कि पोस्टमार्टम के बाद पहले शव का अंतिम संस्कार कर लो उसके दो- तीन दिन बाद एफआईआर होगा।

शुभांगी की माँ के अनुसार बीस अप्रैल की शाम को उसकी कुछ सहेलियां भी एफआईआर दर्ज कराने पुलिस थाने गई थी किन्तु पुलिस ने उनकी भी एफआईआर दर्ज नहीं की। इन लड़कियों का कहना था कि गाँव का एक लड़का शुभांगी को पहले से ही छेड़ता रहता था।

मृतक शुभांगी जिस हालत में रेलवे पटरी पर पाई गयी थी वह अत्यंत  संदेह पैदा करती है। लाश पूरी तरह से नग्न थी और लाश के दो टुकड़े ऐसी जगह से हुए थे कि बलात्कार के मेडिकल रिपोर्ट की जांच ही न हो पाये। इतने सारे प्राथमिक सबूतों के बावजूद शुरू से ही पुलिस इस पूरे मामले को आत्महत्या करार देकर रफा-दफा करने की कोशिश में जुटी रही। युवती की लाश निर्वस्त्र स्थिति में पायी गई थी। इससे अहम् सवाल तो यह पैदा होता है कि कोई लड़की निर्वस्त्र होकर आत्महत्या क्यों करेगी? मृतक के बदन पर एक भी कपड़ा नहीं था, सिर्फ उसकी समीज हाथ में टंगी थी जिस पर खून का एक कतरा तक नहीं था। शव कमर के नीचे से कटी हुई थी और सिर पूरी तरह से तहस-नहस था। सिर से भेजा व नसें पटरी पर बिखरी पड़ी थीं और सिर के बाल बिखरे पड़े थे। आंख सफेद होकर बाहर निकल आई थीं और मानो कुछ कह रही थी। उसके अंगों मे नुकिले पत्थर धंस गए थे। एक पैर के दो टुकड़े और दूसरे पैर का सिर्फ एक पंजा और कुछ छोटे-छोटे टुकड़े बिखरे पड़े थे।

इसके बावजूद पुलिस युवती के निर्वस्त्र शव की बरामदगी को छिपाने में लगी हुई है। पूरे मामले में स्थानीय पुलिस की खुलकर लापरवाही सामने आई है। एक तो पुलिस ने पहले एफ़आईआर दर्ज करने में ही आनाकानी की और जब सामाजिक दबाव बना तब पुलिस ने घटना के सात दिन बाद दर्ज की। दर्ज एफआईआर में पुलिस ने शातिराना ढंग से झूठी कहानी गढ़ते हुए इसे आत्महत्या करार देने की ही कोशिश की। इसके लिए पुलिस ने कई गवाह भी तैयार कर लिए। पुलिसिया एफ़आईआर के मुताबिक़ अनिल कुमार सचान (स्टेशन प्रबंधक) तुलजापुर तहसील सेलू इनके जरिए राष्ट्रपाल दादाजी माटे (उम्र 53 वर्ष) साल, काम नौकरी (काटेवाले) निवासी दहेगाव (ग्रामीण) ने पुलिस स्टेशन में जाकर लिखित पत्र दिया कि तुलजापुर से सेलू रोड स्टेशन के दरम्यान अप मार्ग पर एक महिला की लाश (लगभग उम्र 35 साल) पड़ी है। इसके अनुसार स्टेशन डायरी अमलदार पुलिस हवलदार संतोष कामडी (बैच नम्बर-713) ने 19 अप्रैल को लगभग 18:10 (शाम 6 बजकर 10 मिनट पर) दर्ज किया। ड्यूटी पर तैनात पुलिस हवलदार संघपाल इंगोले (बैच नम्बर-1065) और सिपाही रवि पुरोहित (बैच नम्बर-1245) दो पंचों के साथ घटना स्थल पर जाकर पंचनामा कर लाश को वर्धा स्थित सरकारी अस्पताल भेज दिया। दर्ज एफआईआर में पुलिस ने यह भी लिखा कि अँधेरे की वजह से मृतक के शरीर के सारे अंग बरामद नहीं हो पाए थे, जिसे अगले दिन यानी 20 मार्च को प्रातः कुछ पंचों के साथ घटना स्थल पर जाकर इकठ्ठा कर पुनः वर्धा अस्पताल पोस्टमार्टम हेतु भेज दिया। जबकि सच्चाई यह थी कि मृतक युवती के परिजनों ने यह सब रेलवे ट्रैक के आसपास से बरामद कर स्थानीय पुलिस को सौंपा था।

अखिल भारतीय गोंडवाना पार्टी के विदर्भ अध्यक्ष चंद्रशेखर मडावी ने बताया कि जब 24 तारीख को वे मृतक के परिजनों से मिलने गये तो परिजनों ने उनके समक्ष पूरी घटना बयान की। इसके बाद वे दहेगाव पुलिस स्टेशन पुलिस से मामले की जानकारी लेने पहुंचे। पूछताछ के दरम्यान पुलिस कर्मियों ने कई निराधार बयान दिए, जो घटना से मेल नहीं खा रहे थे। तब तक पुलिस ने कोई एफआईआर तक दर्ज नहीं किया था। चंद्रशेखर के कहने पर भी पुलिस ने एफआईआर दर्ज नहीं किया। इसके बाद 26 मार्च को मृतिका के परिजन वर्धा जिले के जिला परिषद अध्यक्ष नितिन मडावी से मिलने उनके वर्धा स्थित कार्यालय पहुंचे। युवती के माता-पिता ने जिप. अध्यक्ष को पूरे मामले की विस्तृत जानकारी दी। सारी बात जान लेने के बाद जिला परिषद अध्यक्ष ने एसपी को फोन पर घटना के बारे में बताया। तदुपरांत एसपी ने उन्हें उक्त गाँव जाने का आश्वासन दिया। इस संदर्भ में वर्धा जिला पुलिस अधीक्षक (एसपी) निर्मला देवी 26 मार्च की शाम 4 बजे दहेगाव पहुँची। पुलिस स्टेशन पर पहले से ही अखिल भारतीय गोंडवाना पार्टी के चन्द्रशेखर मडावी मौजूद थे। उस वक्त सभी लोगों ने पुलिस थाने को घेर कर रखा था। एसपी ने पुलिस थाने के दरवाजे पर आकर सबके सामने लोगों से बातें की। चंद्रशेखर ने 24 मार्च को पुलिस विभाग द्वारा दिए गए निराधार बयानों को एसपी के सामने उजागर किया था कि किस तरह उनके पुलिस अधिकारी और कर्मचारी घटना के पहले दिन से ही इस हत्या को आत्महत्या का रूप देना चाह रही थी जिसमें स्थानीय पुलिस अब तक कामयाब रही। पुलिस ने शुरू से ही लापरवाह एवं पितृसत्तात्मक दुर्भावना से ग्रस्त होकर घटना की छानबीन ही नहीं की और झूठी कहानी गढ़कर जांच को उस दिशा में जाने ही नहीं दिया। जिसके कारण पूरा मामला ही डायल्यूट हो गया। थानेदार विलास काळे, केस के जांच अधिकारी रामकृष्ण गजानन भाकडे तथा पुलिस कांस्टेबल रवि पुरोहित ने घटना को कभी गंभीरता से लिया ही नहीं। इतना ही नहीं पुलिस ने उलटी दिशा में काम करते हुए मृतक की लाश निर्वस्त्र प्राप्त होने के बावजूद इस बात को दबाते हुए उसे कपड़े पहने हुए बताने का षड्यंत्र रचती रही।

चंद्रशेखर ने हमें बताया कि इस बारे में उन्होंने जब एसपी को जानकारी दी कि 19 से 24 मार्च तक मृतक की मृत देह पर कोई कपड़े न मिलने की बात सर्वविदित थी, किन्तु जैसे ही हमने इसपर सवाल उठाया उसके आधा घंटे बाद पुलिस मृतक के कपड़े प्राप्त होने और उसे परिजनों को सौंपने की बात कहने लगी। स्थानीय पुलिस ने पहले बताया कि कपड़े मृतक के मामा को दे दिया गया था। लेकिन जब परिजनों ने मृतक के मामा को पुलिस की मौजूदगी में ही फोन लगाकर इसके सम्बन्ध में पूछा तो इस बात से मामा ने साफ़ इन्कार किया। तब पुलिस बताने लगी कि मामा को नहीं बल्कि मृतक के पिता को कपड़े सौंपे गए। स्थानीय पुलिस के क्षण-क्षण बदलते इन बयानों को देखते हुए गोंडवाना पार्टी ने इस हत्या को आत्महत्या का रुप देने के जिम्मेदार पुलिस कान्सटेबल रवि पुरोहित को घटना के दिन मृतक की लाश को उठाने के बाद आये फोन कॉल की उच्चस्तरीय जांच किए जाने की मांग उठाई है।

पुलिस के समक्ष चंद्रशेखर ने दुष्कर्म के बाद हत्या कर लाश को रेलवे ट्रैक पर फेंके जाने की आशंका व्यक्त की। चन्द्रशेखर ने हमें बताया कि घटना स्थल पर जिस जगह शुभांगी के साथ दुष्कर्म हुआ उस स्थल से रेल-लाईन केवल आठ सौ मीटर की दूरी पर है। उनके बताए हुए बातों की सच्चाई जानने के लिए स्वयं एसपी अपनी टीम, चंद्रशेखर और अन्य चार लड़कों के साथ रात के समय मोबाईल टार्च की रौशनी में घटना स्थल पर पहुँची। उस जगह को देखने के बाद चंद्रशेखर ने थानेदार काळे के समक्ष यह पूछा कि उस स्थल पर मृतक शुभांगी खुद आयी थी या लायी गई थी? क्योंकि खोजी कुत्ते ने वो जगह पहले ही थानेदार को दिखाई थी। किन्तु थानेदार ने अपनी छान-बीन में उस जगह को अनदेखा कर दिया था। जबकि एसपी के सामने उन्होंने कबूल किया कि उन्हें खोजी कुत्ते ने यहाँ लाया था। वहाँ से जहाँ शुभांगी की लाश रेलगाड़ी से कटी थी वह दूरी मात्र 800 से 900 मीटर दाहिने तरफ थी, उसके ठीक बाईं ओर गाँव है। इस कारण गाँव की तरफ के ट्रैक पर न ले जाकर उसे दाहिने तरफ के रेल ट्रैक पर लाया गया। इससे साफ़ जाहिर होता है कि उसी स्थल पर उसे निर्वस्त्र कर सामूहिक दुष्कर्म के बाद उसकी हत्या कर दी गई। अगर युवती को ट्रेन से कटकर आत्महत्या ही करनी थी तो फिर उसे न तो इतनी दूर आने की ही जरुरत थी और दूसरी बात तो यह भी कि निर्वस्त्र होकर किसी लड़की के आत्महत्या करने का कोई कारण नहीं हो सकता है! एसपी ने भी कबूल किया कि इतनी दूर आकर कोई आत्महत्या क्यों करेगा?

हमारी टीम के सदस्यों ने जब गाँव के कुछ लोगों से बात की तो पता चला कि शुभांगी काफी होनहार और निडर लड़की थी। वह किसी से भी डरती नहीं थी। लोगों ने तो इतना तक बताया कि किसी अकेले निहत्थे आदमी का उस पर काबू पाना संभव नहीं था। ग्रामीणों का स्पष्ट मानना था कि यह आत्महत्या न होकर सामूहिक बलात्कार कर की गई हत्या का मामला है। स्थानीय लोगों ने यह भी बताया कि शुभांगी का गाँव के ही एक युवक के साथ प्रेम संबंध था, किन्तु कोई अकेला आदमी ऐसा काम नहीं कर सकता।

30 मार्च 2018 को वर्धा की एसपी निर्मला देवी ने भी मीडिया को दिए अपने वक्तब्य में दहेगांव पुलिस की बात को सही ठहराते हुए इसे आत्महत्या करार दिया। एसपी की ओर से जारी वक्तब्य के अनुसार दिनांक 19 मार्च 2018 को 18:00 बजे यानी शाम 6 बजे पुलिस स्टेशन दहेगाव (गोसावी) के अंतर्गत तुलजापुर रेलवे स्टेशन के सामने थपकी क्षेत्र में रेलवे ट्रैक अप मार्ग पर एक अनजान स्त्री का मृत देह मिलने के आशय का मामला पुलिस स्टेशन दहेगाव (ग्रामीण) में दर्ज किया गया था। मृतक की शिनाख्त दिनांक 20 मार्च 2018 को शुभांगी पिलाजी उईके, उम्र 19 वर्ष रहिवासी दहेगाव (गो) तहसील सेलू, जिला वर्धा के रूप में हुई। एसपी ने आगे कहा कि इस घटना की छानबीन में यह पाया गया कि यह घटना केस नम्बर- 028/2018, भारतीय दंड विधान की धारा-306, 201, 501 के तहत दर्ज किया गया था।

मृतक के परिजनों व कुछ सामाजिक संगठनों ने यह आरोप लगाया था कि ‘मृतक की लाश घटना स्थल पर निर्वस्त्र स्थिति में प्राप्त हुई थी। इसलिए यह घटना सामूहिक दुष्कर्म के बाद हत्या कर मृतक को रेलवे ट्रैक पर फेंक देने का है।’ उक्त पुलिसिया बयान में इसकी सफाई पेश करते हुए कहा गया है कि इस घटना की छानबीन पुलिस अधिक्षक निर्मलादेवी, उपविभागीय पुलिस अधिकारी माधव पड़ीले के मार्गदर्शन में पुलिस निरिक्षक विलास काले, प्रभारी पुलिस निरिक्षक दहेगाव, पुलिस उपनिरिक्षक भाकडे, पुलिस हवलदार जावेद धामीया, पवन देवगिरकर, सुनील चावरे आदि ने किया। इस जांच से यह साबित हुआ कि शुभांगी उईके का दहेगाव के एक 19 वर्षीय युवक के साथ 2 साल से प्रेम संबंध था और इन दोनों के आपसी झगड़े के कारण मृतक ने बिलासपुर से एर्नाकुलम की ओर जानेवाली ट्रेन नम्बर-22815 के सामने चलकर आत्महत्या की है। पुलिस ने साक्ष्य के बतौर प्रत्यक्षदर्शी गवाह के रूप में इस ट्रेन के लोको-पायलट एवं सहायक लोको-पायलट का बयान पेश करने का दावा किया है।

पुलिस ने आगे अपने वक्तब्य में कहा है कि मृतक और आरोपी युवक के मोबाइल सीडीआर का भी विश्लेषण किया गया है। मृतक ने कथित प्रेमी युवक को अपने मोबाइल से कुछ मैसेज भी भेजे थे, जिसे बतौर साक्ष्य सुरक्षित रखा गया है। युवक ने मृतक के व्हाट्सएप पर दोनों के एक साथ का फोटो डी.पी डाल रखा था। उस फोटो को हटाने के लिए शुभांगी ने उसे बार-बार आग्रह किया और कहा कि उस डीपी को कोई देख लेगा तो मेरी बदनामी होगी। इसके कारण मृतक दु:खी थी और इसी कारण से ही दोनों में मनमुटाव हुआ और पीड़िता ने आत्महत्या कर ली। पूरी पुलिसिया जांच फिलहाल इसी बात को सही ठहराते हुए अपनी लापरवाही को छिपा रहा है और युवती के कातिलों को बचा रहा है।

मृतक का जो पोस्टमार्टम रिपोर्ट प्राप्त हुआ है उसमें भी मृत्यु का कारण अति रक्त स्राव एवं गंभीर चोट बताया गया है। जिला मुख्यालय के पुलिस अधिकारी जन-आक्रोश को ठंढा करने और लापरवाही के दोषी स्थानीय पुलिसकर्मियों को बचाने का दोहरा खेल खेल रहे हैं। जिला पुलिस एक तरफ तो स्थानीय पुलिस द्वारा युवती की मौत की गढ़ी गई झूठी कहानी को सच मान रही है वहीं दूसरी तरफ युवती की गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराने गए परिजनों की शिकायत को दर्ज न करने तथा प्राथमिक स्तर पर केस की छानबीन में लापरवाही बरतने वाले स्थानीय पुलिसकर्मियों पर कार्यवाही का ढोंग भी कर रही है। जन दबाव के कारण इस घटना के आरोपी युवक को पुलिस ने गिरफ्तार कर जेल भेज दिया है। 3 अप्रैल को 5 हजार से ज्यादा लोगों ने वर्धा शहर में सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन किया था, उसके दबाव में मामले की आगे की छानबीन का जिम्मा पुलिस उप अधीक्षक पराग पोटे को सौंपा गया है। किन्तु पुलिस महकमे के रवैये से जाहिर होता है कि इस पुलिसिया जांच से मृतक के परिवार को इन्साफ मिलेगा, इसकी संभावना कम ही है। 19 अप्रैल को अनुसूचित जनजाति आयोग, नई दिल्ली की सदस्य मायाताई इवनाथे द्वारा इस केस को सीबीआई को सौंपे जाने का एसपी को सूचित किया है।
अब तक इस मामले को लेकर 1 अप्रैल 2018 को आदिवासी और अन्य जनसमुदाय के द्वारा नागपुर के संविधान चौक पर कँन्डल जलाकर न्याय की आवाज बुलंद की। वर्धा शहर में 3 अप्रैल 2018 को इस सवाल पर विशाल प्रदर्शन हुआ, जिसमें तकरीबन पांच हजार लोग सड़कों पर उतरे और जुलूस निकालते हुए कारला चौक से बजाज चौक होते हुए जिलाधिकारी कार्यालय तक की लगभग 6 किमी की दूरी तय करते हुए पहुंचे। जिलाधिकारी कार्यालय में ज्ञापन सौंपा और कार्यालय के समक्ष एक सभा के माध्यम से जोरदार तरीके से इन्साफ की आवाज उठाई। सभा में नेताओं ने इस घटना की जांच सीबीआई से कराये जाने की भी मांग की है। सभा में आरोपियों को कड़ी सजा देने तथा दोषी पुलिस कर्मियों पर कार्यवाही की मांग भी मांग की गई। मामले को तूल पकड़ता हुआ देख वर्धा के स्थानीय विधायक ने भी इस मामले पर मुख्यमंत्री से हत्यारों की गिरफ्तारी और दहेगाव पुलिस थाने के थानेदार काले, भाकडे, रवि पुरोहित आदि अधिकारियों पर कार्यवाही की मांग की है। जिला परिषद अध्यक्ष नितिन मडावी ने अपने  निवास स्थान पर आयोजित पत्रकार वार्ता में दहेगाव (गोसावी) पुलिस थाना अंतर्गत शुभांगी उईके की हत्या मामले की सीबीआई  से जांच कराने की मांग की है। 20 अप्रैल को आसिफा के न्याय के लिए वर्धा शहर में निकाले गए विशाल मार्च में भी शुभांगी के हत्यारों की गिरफ्तारी व सजा देने की मांग उठाई गई थी।

(यह रपट महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के समाज कार्य विभाग के स्नातकोत्तर की छात्रा शुभांगी संभरकर  एवं सहायक प्राध्यापक डॉ. मुकेश कुमार ने तैयार की है।)

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सांप्रदायिक, जातिवादी, भाषा-वर्चस्ववादी ‘बिहार संवादी’ (दैनिक जागरण का आयोजन) छोड़ गया कई सवाल



अनन्त
पटना में आयोजित दैनिक जागरण के ‘बिहार संवादी’ कार्यक्रम को जहां लेखक ‘अनंत’ साम्प्रदायिक, दलित विरोधी बता रहे हैं, भाषा के सवाल पर वर्चस्ववादी बता रहे हैं, वहीं कठुआ बलात्कार मामले में आरोपियों के समर्थन में निर्णायक शीर्षक के साथ दैनिक जागरण में रिपोर्ट छपने के आधार पर लेखकों के बहिष्कार के तरीके  पर भी सवाल  उठा रहे हैं. लेख में बिहार की पत्रकारिता के सवर्णवादी और साम्प्रदायिक चरित्र पर लेखक संगठनों की पुरानी चुप्पी को याद दिलाते हुए उनकी भूमिका पर सवाल उठा रहे हैं. उदाहरणों से भरे इस लेख के सभी मुद्दों से स्त्रीकाल की अनिवार्य सहमति नहीं है. लेखक संगठन के लोग या इस लेख में उल्लिखित कोई भी व्यक्ति या समूह इस लेख में उठाये बिन्दुओं और तथ्यों का खंडन भेज सकता है. यह एक दृष्टिकोण है दूसरे दृष्टिकोण भी आमंत्रित हैं. 

उदघाटन सत्र में बिहार के मुख्यमंत्री  नीतीश कुमार

काफी प्रतिरोध के बीच शुरू हुआ दैनिक जागरण का ‘बिहार संवादी’ कार्यक्रम नोक-झोंक और हल्ला-हंगामा के साथ समाप्त हुआ। जागरण का संवादी आयोजन भले ही समाप्त हो गया हो लेकिन पटना का साहित्यिक महकमा शांत बैठने वाला नहीं है। संवादी कार्यक्रम के पक्ष और विपक्ष में अभी नये सिरे से गरमा गरम बहस जारी रहेगा। संभव है कुछ साहित्यकार इसे शीत युद्ध का रूप देने का प्रयास करें। सोशल मीडिया में और जसम के आहवान पर बहिष्कार करने वाले साहित्यकार अंतर्मन कुढ़न में दिख रहे हैं। इन साहित्यकारों का गुस्सा हिन्दुत्ववादी हिन्दी का ध्वजवाहक बना जागरण के प्रति कम और ‘बिहार संवादी’ का विरोध करने वालों के प्रति ज्यादा है। विरोध अभियान को खुला समर्थन देने वाले लेखक जसम के खिलाफ भले ही मुखर होकर कुछ नहीं बोले लेकिन बातों ही बातों में अपनी खिन्नता जाहिर कर बैठते हैं। बहरहाल जसम का कठुआ दुष्कर्म कांड पर दैनिक जागरण की स्त्रीविरोधी और सत्तापक्षी वृति से प्रेरित पत्रकारिता का मुखर विरोध और हिन्दी भाषा के सवाल पर मौन रहना भी उनके भाषाई दृष्टिकोण का आइना है। उधर बिहार की आंचलिक भाषा मैथिली को बोली की श्रेणी में रखने का विरोध कर रहे भाषाई अस्मिता के रणबांकुरों की हुड़दंगई ने मिथिला की सभ्य संस्कृति के दामन को ही दागदार बना दिया है।

पढ़ें: दैनिक जागरण द्वारा आयोजित ‘बिहार संवादी ‘ का साहित्यकार करेंगे बहिष्कार (!)

यहां उल्लेखनीय है कि  मीडिया समूह दैनिक जागरण का ‘बिहार संवादी’ नामक लिटरेचर फेस्टिवल का आयोजन 21-22 अप्रैल को होना तय था। इसकी जानकारी पटना के साहित्यिक बिरादरी को काफी पहले से थी। आयोजक ने महीना दो महीना पहले ही प्रतिष्ठित साहित्यकारों और कथित लेखकों से कार्यक्रम में शिरकत करने से संबंधित प्रस्ताव पर सहमति प्राप्त कर ली थी। हिन्दी को लेकर दैनिक जागरण की वैचारिक दृष्टि क्या है ? इससे वाकिफ कई लेखक भले ही न हों प्रतिष्ठित साहित्यकार तो हैं ही। फिर भी तमाम प्रगतिशील साहित्यकारों ने आयोजन में शिरकत करने की अनुमति दे रखी थी। कार्यक्रम की तिथि नजदीक आते ही अचानक छोटी-छोटी बच्चियों के साथ बलात्कार की घटनाएँ सामने आने लगीं। कठुआ और उन्नाव की घटना ने तो मानवता को ही शर्मसार कर दिया। फिर बेशर्म हिन्दुवादी राष्ट्रवादी सेनानियों को शर्म नहीं आई। उतर पड़े तिरंगा लेकर सड़को पर। लगने लगा कि सचमुच देश बदला है- डिजिटल भारत में तिरंगा का इस्तेमाल बलत्कृत पीड़िता के खिलाफ होगा। कठुआ से लेकर उन्नाव तक की घटनाओं पर भाजपा सरकार और खासतौर से मोदी की चुप्पी से भी देशवासी खफा थे। फिर भी दैनिक जागरण के संवादी कार्यक्रम को लेकर कोई विवाद उत्पन्न होने की संभावना नहीं थी। साहित्यिक उत्सव शुरू होने के सप्ताह भर पहले से ही ‘बिहार संवादी’ कार्यक्रम का निमंत्रण पत्र बांटा जा रहा था। निमंत्रण पत्र का मुख्य सलोगन था – ‘हिन्दी हैं हम’ और स्थानीय भाषा पर केन्द्रित कार्यक्रम के सत्र का टैग लाइन था  – ‘ बिन बोली भाषा सून ?’ आमंत्रित लेखकों की सूची में एक भी दलित और मुस्लिम समुदाय के साहित्यकार, पत्रकार और लेखक का नाम शामिल नहीं था, हालांकि बाद में खानापूर्ती के लिए एक मुस्लिम लेखक को आमंत्रित किया गया । इसकी सूचना बुद्धिजीवियों को पहले से थी, मिले आमंत्रण के आधार पर। संवेदनशील, बुद्धिजीवी और खुद को प्रगतिशील व क्रांतिवीर कलमकार कहने तथा कहलाने वाले साहित्यकार प्रतिनिधित्व के सवाल पर मौनी बाबा बने रहे। और ‘बिहार संवादी’ कार्यक्रम की तैयारी भी अपनी रफतार से आगे बढ रही थी। खासतौर से पटना के कथित लेखकों के बीच मंच लूट लेने की भी तैयारी चल रही थी। इसी बीच दैनिक जागरण ने कठुआ दुष्कर्म मामले में बलात्कार के आरोपियों को पाक-साफ और बलात्कार नहीं होने से संबंधित खबर प्रकाशित कर ही दी। जजमेंटल हेडिग के साथ प्रकाशित यह खबर ‘कठरार वृति पत्रकारिता’ का प्रतीक बन गया। दैनिक जागरण की पत्रकारिता पर चहुँ ओर सवाल खड़े होने लगे। अखबार पर लोगों का गुस्सा भड़कने लगा। फेसबुक से लेकर टयूटर तक पर दैनिक जागरण की ‘कठरार वृति पत्रकारिता’ की भर्त्सना की जाने लगी।

यह मामला जहां एक डगमग हो चुकी पत्रकारिता के खंभे को गतलखाने में फेंक रहा  था तो दूसरी ओर हाशिये के समाज को न्याय से वंचित रखने के लिए षडयंत्र भी रच रहा था। लोग अपने-अपने तरीके से दैनिक जागरण का विरोध कर रहे थे। इसी बीच जन संस्कृति मंच के पटना जिला के संयोजक राजेश कमल ने कठुआ मामले पर संज्ञान लेते हुये ‘बिहार संवादी’ कार्यक्रम का विरोध और उसमें शिरकत नहीं करने से संबंधित अपील जारी की। जसम के आहवान के साथ ही साहित्यिक बिरादरी में हड़कंप मंच गया। अरूण कमल, आलोकधन्वा, ध्रुव गुप्त, प्रेम कुमार मणि, संजय कुमार, निवेदिता सरीखे साहित्यकारों ने ‘बिहार संवादी’ कार्यक्रम में नहीं जाने का एलान कर दिया। वही कुछ लोगों ने कार्यक्रम में शिरकत करते हुये जागरण द्वारा सजाये गये बिहार संवादी के मंच से कठुआ मामले पर विरोध जताने का फैसला लिया। असली मार्क्सवादी और क्रांतिकारी कौन ? यह सवाल भी साहित्यिक फिजां में तैरने लगा।

जेएनयू में मैथिली भाषा के पक्ष में दैनिक जागरण के खिलाफ प्रदर्शन

‘जसम’ के विरोध से इतर मिथिला स्टूडेंट यूनियन ने ‘बिन बोली भाषा सून? अर्थात आंचलिक भाषा को बोली साबित करने के मामले को लेकर बिहार संवादी के विरोध में आ गया। यहां बता देना आवश्यक है कि बिहार की आंचलिक भाषाओं का इतिहास हिन्दी से बहुत पुराना है। मगही का अस्तित्व तो मगध की स्थापना से पहले से है। मगध की स्थापना के पहले इस क्षेत्र को ‘किकट’ कहा जाता था। मगही की प्राचीनता का जिक्र अश्विनीकुमार पंकज ने अपने उपन्यास ‘खाॅटी किकटिया’ में किया है। ‘मागधी सा मूल भाषा’ का सूत्र साहित्य में प्रसिद्ध है और इसे माईभाषा कहा जाता है। मैथिली के कवि विद्यापति आदिकाल में पैदा हुये थे। इसी प्रकार अन्य स्थानीय भाषाओं का भी इतिहास काफी प्राचीन है। हिन्दी का जन्म तो हाल साल के दशकों और शतकों में हुआ है। ‘बिहार संवाद’ के माध्यम से दैनिक जागरण ने भाषाई लठैती करने का प्रयास तो किया ही है। फिर भी साहित्यकारों का ध्यान सिर्फ कठुआ पर अटका रहा। खैर मैथिली के सम्मान में साहित्यकार तारानंद वियोगी और विभूति आनंद ने बिहार संवादी के आयोजन से दूरी बनाने की घोषणा कर बिहार की लाज बचा ली। वहीं वोटिंग के जरिये मैथिली भाषा में साहित्य अकादमी प्राप्त लेखिका उषा किरण खान ने बिहार संवादी के मंच से जागरण की भाषा-नीति की आलोचना का  आश्वासन मैथिली भाषियों को दिया, पर अंततः गयी नहीं.

बिहार संवादी का विरोध तो बड़े ही धूमधाम  से हुआ। लेकिन ‘हिन्दी हैं हम’ में छिपी भाषाई सांप्रदायिकता का सवाल विरोध का विषय नहीं बन पाया ? अब सवाल यह उठता है कि भाषाई सांप्रदायिकता जसम के लिये मुद्दा नहीं है? जसम ने इस सवाल को अपने एजेडे में क्यों नहीं शामिल किया? क्या जनवादी जसम भी हिन्दी को लेकर वही सोच रखती जो आरएसएस की है ? वैसे माकर्सवादी, प्रगतिशील और जनवादी साहित्यकार भाषाई साप्रदायिकता का उदाहरण पहले भी पेश कर चुके हैं। उर्दू का विरोध करते हुये बाबा नागार्जुन ने कहा था – ‘अगर उर्दू का विरोध करना जनसंघी होना है तो मै एक सौ बार जनसंघी होना स्वीकार करूंगा।’’ जहां तक हिन्दी भाषा का सवाल है तो यह भाषा घोर मर्दवादी और ब्रहमणवादी है। आपको भरोसा नहीं होता तो कुछ शब्दों पर गौर कर लें। ज्यादा पृष्ठों के लिए पुस्तक तो कम शब्द के लिए पुस्तिका शब्द का उपयोग किया जाता है। अंग्रेजी में एडिटर स्त्री हो या पुरूष स्त्री लिखा जाता है। लेकिन हिन्दी पुरूष के लिये संपादक तो स्त्री के लिये संपादिका का भी चलन है-हालांकि अब संपादक भी लिखा जाने लगा है। कहने का आशय है कि जो मर्दवादी और ब्राह्मणवादी होगा वह सांप्रदायिक भी होगा। क्योंकि यह मानसिकता श्रेष्ठताबोध से प्रेरित है। इस हिन्दी को जनवादी बनाने का प्रयास अमर कथाकार रेणु ने किया। रेणु ने न तो गांव की भाषा को लिखी है और ना ही खड़ी बोली हिन्दी का प्रयोग किया है। रेणु की हिन्दी खड़ी बोली हिन्दी से भिन्न है। जो देशज दुनिया में बसे समाज की हिन्दी है। रेणु की हिन्दी मगही, मैथिली, भोजपुरी, अंगिका, नेपाली, अंग्रेजी, बंगला आदि से निर्मित हुई है। रेणु की हिन्दी बहुभाषिकता का प्रतीक है। बहुभाषिक और बहुसांस्कृतिक भारत के लिये रेणु की हिन्दी को आगे बढ़ाने की जरूरत है। रेणु के यहां स्थानीय भाषायें अपने स्वतंत्र अस्तित्व के साथ हिन्दी को समृद्ध करती है। रेणु की परंपरा को अन्य कथाकारों ने भी आगे बढ़ाया है और उसे जनभाषा का स्वरूप प्रदान किया है। लेकिन हिन्दी के अमिताभ बच्चन बाबा नामवर सिंह ने हाल-साल के वर्षो में रेणु की हिन्दी पर क्या टिप्पणी की है यह भी आप पढ ले – ‘‘ रेणु जैसे आंचलिक कथाकारों ने हिन्दी भाषा पर नाकारात्मक प्रभाव डाला है।’’ दरअसल नामवर उसी हिन्दी को बढावा देने के पक्षधर है जहां श्रमिको की बोलियों और भाषाओं का कोई स्थान न हो-जिसमें संघी आसानी से सेंध लगाने में सफल हुए हैं, ‘शुद्ध हिन्दू राष्ट्र की भाषा विशुद्ध हिन्दी होगी। ऐसे राष्ट्र में ‘पाटल’ कहने वाले को सजा दी जायेगी और गुलाब कहने वाले को मौत की सजा। बहरहाल रेणु की हिन्दी के संबंध में नलिन विलोचन शर्मा 1954 में ही हिन्दी भाषा को समृद्ध करने का खिताब दे चुके हैं। इसलिये रेणु को नामवर सिंह से प्रमाण पत्र लेने की जरूरत नहीं है। खैर दैनिक जागरण ने हिन्दी को लेकर जो दृष्टि पत्र का नमूना पेश किया है, वह बेहद खतरनाक है। मंटो, राही मासूम राजा जैसे मुस्लिम समुदाय के लेखक पैदा हुये है। बिहार संवाद से जुड़े भाषाई मर्मज्ञ इन्हें हिन्दी का कथाकार मानेगें ? यह सवाल उठना भी लाजिमी है कि प्रेमचंद हिन्दी के मूल लेखक हैं कैसे ? प्रेमचंद की शुरूआती बहुत सारी रचनायें तो पहले उर्दू में प्रकाशित हुई है। बदलते वक्त के साथ हिन्दी को और प्रगतिशील बनाने की जरूरत हे तो दैनिक जागरण ने संवादी कार्यक्रम के माध्यम से हिन्दी को संकीर्ण दायरे में समेटने का पहला प्रयास किया है। फिर भी जसम को यह बात क्यों नहीं समझ में आई।

पढ़ें: 
आलोक धन्वा, ध्रुव गुप्त, निवेदिता समेत अधिकांश साहित्यकारों ने किया ‘बिहार संवादी’ (दैनिक जागरण द्वारा आयोजित) का बहिष्कार   

और अंत में जसम से एक सवाल: पिछले दिनों की ही तो बात है, आरक्षण विरोधियों के बंद के पक्ष में प्रभात खबर ने कलम तोड़ रिपोर्टिंग की थी। प्रभात खबर के संपादक को भी आरक्षण समर्थकों ने उस रिपोर्टिंग का विरोध करते हुये कई पत्र लिखे थे। इस मुहिम से भी जसम ने खुद को अलग रखा था। क्या ‘जसम’ कामरेड विनोद मिश्र के इस वक्तव्य के साथ आज भी खड़ा है कि – ‘‘जिस प्रकार बाबर की गलतियों की सजा उनके वंशजों को नहीं दी जा सकती। उसी प्रकार मनु की गलतियों की सजा उनके वंशजों को नहीं दी जा सकती’’ इतिहास के पात्र बाबर की गलतियों को प्रचारित तो संघ करता है। ‘जसम’ को या तो विनोद मिश्र की भर्त्सना करनी चाहिये या फिर बाबर की गलतियों की व्याख्या  करनी चाहिये ? क्या आरक्षण विरोधी मुहिम हवा देने की पत्रकारिता को श्रेष्ठ पत्रकारिता की श्रेणी में नहीं रखा जायेगा। बरमेसर मुखिया हत्या कांड पर बिहार के तमाम अखबारों ने वर्चस्ववादी रिपोर्टिग की थी। क्या वह कम कठरार वृति से प्रेरित पत्रकारिता का नमूना था ? आजादी के बाद बिहार में हुये पहले नरसंहार की खबर को यहां के अखबारों ने प्रकाशित किया ही नहीं था। कर्पूरी ठाकुर ने नरसंहार पीड़ित गांव रूपसपुर चंदवा से लौटकर प्रेस को बयान दिया तो अखबारों ने अंदर के पन्नों पर प्रकाशित कर मामले को इतिश्री कर दिया था। गरीब दलित पीड़ित लड़की के साथ हुये बालात्कार की खबरोंको  पटना के अखबार प्रमुखता के साथ नहीं प्रकाशित करते हैं। यह भी जगजाहिर है। पत्रकारिता को शर्मसार करने वाली घटनाओं से भरा-पुरा रहा है बिहार की पत्रकारिता का इतिहास और वर्तमान। जहां तक गलत खबर प्रकाशित करने का सवाल है तो इसमे माले द्वारा प्रकाशित अखबार लोकयुद्ध भी पीछे रहा है क्या ? इसका उदाहरण है एकरासी कांड। इसी वर्ष होली के वक्त की घटना है। सिविल सोसाइटी को लोकयुद्ध में प्रकाशित खबर को पढ़कर एकरासी गांव का दौरा करना चाहिये। तब चलेगा कि लोकयुद्ध बदलते वक्त के साथ कैसे ‘फेक युद्ध’ का पर्याय बन गया है। कुछ वर्ष पहले ‘हिन्दुस्तान’ के तत्कालीन संपादक गिरीश मिश्र ने ‘ अलाउद्दीन का राक्षसी कुकृत्य’ नामक शीर्षक से खबर प्रकाशित की । जिस घटना को अंजाम देने का आरोप लगाया उस वक्त अलाउद्दीन घटनास्थल से लगभग 6-7 किलोमीटर की दूरी पर कुरथौल पुल पर था। पत्रकारिता का इतिहास और वर्तमान गलत और झूठी खबरें प्रकाशित  करने के लिए  कुख्यात रहा है। कभी भी जसम ने ऐसी कारवाई नहीं की थी।

पटना में कार्यक्रम स्थल पर प्रदर्शन

यह मान भी लें  कि कठुआ का ममला तात्कालिक था। इस पर मुखर विरोध जरूरी था। तो सवाल यह उठता है कि जसम ने जागरण विरोधी प्रतिरोध को विस्तृत स्वरूप क्यों नहीं किया ? जसम के पटना जिला संयोजक राजेश कमल वकत की कमी को मुख्य कारण मानते हैं। राजेश कमल की बातों में जितना दम है उतनी ही राजनीति भी। वक्त की कमी तो थी ही लेकिन कुछ लेखकों पत्रकारों नाटककारों की बैठक बुलाई जा सकती थी। प्रतिरोध का रूप-स्वरूप तैयार भी किया जा सकता था। अगर ऐसा करते तो श्रेय जसम और राजेश कमल को नहीं मिलता। संभव है बिहार संवादी कार्यक्रम के विरोध मुख्य बिन्दु भाषाई साप्रदायिकता होता और कठुआ का मामला उससे जुड़ा होता। विरोध का तौर-तरीका अराजक नहीं बल्कि रचनात्मक होता। जैसा कि पिछले दिनों जयपुर में जे0 एल0 एफ0 के विरोध में पी0 एल0 एफ का आयोजन किया गया। समयाभाव में कोई समानान्तर आयोजन नहीं होता। लेकिन विरोध का स्वरूप साकारात्मक और दीर्घकालिक प्रभाव डालने वाला अवश्यहोता। साकारत्मक विरोध से सनसनी भले ही कम फैलता लेकिन भाषाई सांप्रदायकिता के खिलाफ एक विमर्श का जन्म होता है। ऐसी बात नहीं है कि जसम से जुड़े लोगों को इतनी समझ नहीं है। वक्त कमी और अचानक फैसला लेने का जो तर्क दिया जा रहा है। वह बेहद बेतुका है। संवादी कार्यक्रम में नहीं जाने की घोषणा करने वालों को फेसबुक पर ट्रोल करने में कौन लोग जुटे थे। वही लोग थे जो जसम के स्टैंड के साथ खडे थे। फेसबुकिया विरोध के लिये इनके समर्थकों के पास वक्त कैसे था ? तभी तो कुछ लोगों ने सवाल उठाया कि फेसबुक पोस्ट से ही सिर्फ क्रांति हो जायेगी ? भाषा को लेकर धरणा पर बैठे मिथिला स्टूडेंट यूनियन के छात्रों के साथ कंधा से कंधा मिलाकर चलने का भी प्रयास जसम ने नहीं किया? जब मुगलिया फरमान जारी किया था तो सड़क पर झंडा बैनर के साथ थोड़ा चिचिलाती धूप खड़ा होकर पसीना बहाते। जसम अगर सड़क पर कठुआ मामले को लेकर ही भाषाई अस्मिता को लेकर संघर्ष कर रहे छात्रों के साथ खड़ा रहता तो विरोध का स्वरूप रचनात्मक होता। छात्र मगही के हो या भोजपुरी के या मैथिली के। छात्रों का जोश और जुनून सांतवें आसमान पर होता ही है। आखिर गुस्साये छात्र कार्यक्रम के दूसरे दिन अराजक हो ही गये। कार्यक्रम स्थल पर पहूॅचकर हुड़दंग किया और कई लोगो को कालिख पोत डाली। अब इन छात्रों को कौन समझाये कि भाषा की लड़ाई उदंडता से नहीं लड़ी जा सकती।

कठुआ की रिपोर्टिंग को लेकर जसम इतना क्यों संवेदनशील हुआ और इसके राज्य सचिव सुधीर सुमन पूरे
परिदृश्य से बाहर रहे। बताते चलें कि कुछ ही महीने पहले दैनिक जागरण बनाम माले विवाद सामने आया था। माले के राज्य कार्यालय सचिव कुमार परवेज ने दैनिक जागरण पर गलत प्रेस बयान प्रकाशित करने आरोप लगाया था। कुमार परवेज ने प्रकाशित खबर का खंडन प्रकाशित करने का आग्रह भी किया था।  खबर का खंडन छापना तो दूर रिलिज लिखने वाले रिपोर्टर से स्पष्टीकरण भी नहीं पूछा था। इस पृष्ठभूमि में आयोजन के बहिष्कार पर भी सवाल उठने लाजिमी भी है क्योंकि संवादी कार्यक्रम का विरोध अराजक तरीके से हुआ है।

लेखक फणीश्वर नाथ रेणु डॉटकाम के संपादक व मॉडरेटर हैं।  संपर्क: 7461803343

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घोंसला (स्वाति श्वेता) की कहानी

स्वाति श्वेता


सहायक प्रवक्ता, गार्गीकालेज’, दिल्ली वि.वि. कैरेक्टर सर्टिफिकेट ( कहानीसंग्रह),ये दिन कर्फ़्यू के हैं (कविता-संग्रह). संपर्क: swati.shweta@ymail.com

मुझे लगता है कि अब मैं बुढ़ाने लगा हूँ । प्रायः कुछ न कुछ सोचता रहता हूँ । बच्चे बड़े हो गए और सबकी शादी भी हो गई । कहते हैं समय के साथ परिवार बढ़ता है । पर हम चार से दो हो गए और वे दो अब चार-चार हो गए हैं । मेरी पत्नी उम्र से पहले ही बुढ़ा गई । हमारा चौदह साल का कुत्ता जिसने हमारे साथ जिन्दगी के कई सुख-दुःख बाँटे थे, वह भी एक हफ्ते पहले गुजर गया और उसके साथ बच्चों के प्यार की अन्तिम कड़ी भी टूट गई ।

एक हफ्ते से मेरी पत्नी रोती चली जा रही है । मुँह से केवल ‘जैकी’ निकलता है । उसके पास जाता हूँ तो बच्चों की तरह फफक-फफक कर रोती है । उसका सिकड़, खाने का डिब्बा, पानी का बर्तन, उसका बिस्तर सब उसने एक कोने में रख दिया है । फिर भी बार-बार वहाँ जाती है, शायद यह सोचकर कि  ‘जैकी’ घर से बाहर पेशाब करने गया है और फिर आ कर अपना खाना खाएगा । मुझसे उसकी यह हालत कभी-कभी देखी नहीं जाती ।

ऐसा नहीं कि उसकी मौत का मुझे दुःख नहीं पर क्या करूँ ? पुरुष हूँ, पत्नी की तरह फफक-फफक कर रो नहीं सकता । एक अजीब सा खालीपन महसूस करता हूँ और चारों तरफ से हम दोनों अपने आपको एकान्त, बुढ़ापा, यादों और… घिरे महसूस करते हैं ।

खैर छोड़िए इतना बताना जरूरी है कि हम दोनों इस दो मंजिला घर में अकेले रहते हैं । कभी-कभी लड़ते भी हैं पर प्यार भी तो करते हैं । कभी-कभी लगता है कि घर में सब कुछ है फिर भी कुछ नहीं—
“सुनते हो । आज मेरा मन नहीं लग रहा है ।” ये मुझसे कहती हैं ।
“क्या करूँ ? तुम ही बताओ ।” मैं उत्तर देता हूँ ।
“यह भी कोई जवाब हुआ भला ।” ये खीझती हैं ।
‘तो फिर !’ मैं इन्हें और खीझाता हूँ ।
“तुम तो एक दम बुढ़ा गए हो । बिल्कुल अपने बाप की तरह ।”
“नहीं ! उनकी तरह तो बिल्कुल नहीं ।”
“क्यों ? ऐसा कैसे कह सकते हो ।”

“मैं तुम्हे लक्ष्मी जी थोड़े न कहता हूँ । वह तो माँ को सारा दिन लक्ष्मी जी, लक्ष्मी जी कहते थे । एक पल भी आँखों से माँ को ओझल नहीं होने देते थे ।” और ये हँस देती हैं और स्वीकृति भी दे देती हैं कि मैं, मैं ही हूँ, बदला नहीं हूँ ।

ऐसा क्यों होता है कि जैसे-जैसे आदमी की उम्र बढ़ती है वह शारीरिक रूप से कमज़ोर होने तो लगता है पर बाहर से वह निरन्तर प्रयास करता है अपने को मजबूत दिखाते रहने की । मुझे अब भी याद है बच्चे स्कूल से आकर अपनी माँ के आगे-पीछे भागा करते थे और ये उन्हें खाना खिलाने में इतनी व्यस्त हो जाया करती थीं कि प्रायः मैं इनकी चेतना से गायब हो जाता । मेरी बारी हमेशा बच्चों के बाद ही आती थी । बच्चों को खाना खिला ‘ये’ मुझे आवाज़ देतीं और मैं एक रूठे बच्चे की तरह उठ खाने की टेबल पर आ जाता ।

बच्चे कुछ बड़े हुए तो हम सब एक साथ खाने लगे । मालूम ही नहीं हुआ और बच्चे बरसात की घास की तरह बढ़ते चले गये । मैं अपने कार्यों में व्यस्त रहा । चाहते हुए भी अधिक समय बच्चों के पास नहीं बैठ पाया । पर कोई यह नहीं कह सकता कि मैंने उन्हें समय नहीं दिया । उनके हर सुख, हर दुःख में मैं उनके साथ खड़ा था । एक पिता होने का पूरा दायित्व तो मैंने निभाया पर पुरुष होने के कारण बाहरी दायित्व भी अधिक थे । पत्नी ने सब शिक्षा प्राप्त करने के बाद भी नौकरी नही की । हमेशा बच्चों में लिपटी रहतीं ।

“सुनिये ।”
“हाँ कहो ।” मैंने कहा ।
“ये ऊपर बैठकर क्या सोचते रहते हैं ? नीचे आईए ! खाना लग गया है ।”
“आता हूँ ।” मैंने फिर से कहा ।
अगले ही क्षण मैं नीचे आ जाता हूँ ।
“क्या बनाया है ?” मैंने हाथ धोते हुए उत्सुकता दिखाई ।
“कद्दु की सब्जी, बैंगन आलू फोरन और कद्दु का चक्का ।” पत्नी ने बताते हुए कहा ।
“वाह आज तो मजा आएगा । अच्छा ये तो बताओ कल क्या बना रही हो?” मैंने अपनी इच्छा जताई ।
“कल !”
“हाँ कल! अरे बेटा-बहू आ रहे हैं ! अब तो हमारी पोती आठ साल की हो गई होगी । नहीं ?”
“हाँ, आठ साल चौदह दिन ।” मेरी पत्नी ने मुझे सुधारते हुए कहा ।
“तुम हिसाब-किताब में बहुत सही रहती हो ।”
वह कुछ नहीं बोलती हैं ।
“आओ तुम भी तो अपनी प्लेट लगवाओ ।”? मैंने कहा ।
“नहीं मैं बाद मैं खा लूँगी । आप खा लीजिए ।” उसका एक वाक्य का उत्तर था ।
“अरे मेरी स्वीटहार्ट, मेरे साथ भी तो बैठ कर खाओ । जब बच्चे छोटे थे तब भी नहीं खाती थी और अब जब बच्चे सब अपनी-अपनी दुनिया तलाशने निकल चुके हैं तब भी नहीं !”
मैं बोलता रहा पर उसने मेरी किसी भी बात का उत्तर  नहीं दिया । खाना खा मैं उसके पास आया तो देखा कि वह कुछ उदास है । मैंने उसके सिर पर हाथ रखते हुए पूछा-“क्या बात है ? कुछ तो बोलो ।”

“कुछ नहीं । आप कुछ देर आराम कर लीजिए । मैं दीपा के साथ रसोई समेट लेती हूँ ।” इतना कह वह दीपा को आवाज़ लगा कमरे से बाहर चली जाती है ।

कुछ तो है जो आज वह मुझसे छिपा रही है । और उस कुछ को मैं जानता भी हूँ । पर न जाने क्यों चाहता हूँ कि वह उसे स्वर दे । पर वह मेरे हर प्रयास को विफल बना केवल मौन बुनती है ।

सुधीर पूरे दस वर्षों बाद घर आएगा । दस वर्ष कैसे निकले हैं क्या बताऊँ? मेरे पास कम्प्यूटर नहीं हैं और ना ही स्मार्ट फोन  कि मैं अपने बेटे की तस्वीर और आवाज़ उससे बातें करते समय देख -सुन लिया करूँ !ऐसा नहीं कि खरीद नहीं सकता बस चलाने से डरता हूँ , कभी चलाया नहीं न इसलिए I पर अब सोचता हूँ कि खरीद लूँ । सारी जिम्मेदारियों से मुक्त हो चुका हूँ । जो कर्ज आज तक लिये थे सब चुका दिया । अब कम्प्यूटर  भी खरीद सकता हूँ और एक सस्ता स्मार्ट फोन भी और अब तो दाम भी कम हो गए है । पर ये मानती नहीं । कहती हैं कि अब कोई इच्छा नहीं ।

मेरी आँखों के आगे से भुलाए नहीं भूलते वे पल जब सुधीर पी.एच.डी करने कैलिफोर्निया जा रहा था और ये दहाड़े मार-मार कर बेहोश हो रही थीं । सुधीर कहता था माँ मैं तुम से अलग नहीं हो सकता और मैं नहीं जाऊँगा । पर मैं शायद माँ-बेटे के बीच आ गया । “कुछ पाने के लिए कुछ खोना पड़ता है” मेरा यही वाक्य शायद मेरी पत्नी की जिन्दगी का बीज वाक्य बन गया।

हमारा दूसरा बेटा मुम्बई में नौकरी करता है । कोहलापुर से मुम्बई कोई बहुत दूर नहीं फिर भी हम से मिलने तीन-चार साल पर तीन-चार दिनों के लिए आता है । पहले पहल जब बच्चे घर से बाहर गए तो फोन की हर घण्टी के साथ ये दौड़ी आतीं । नौकर को दूर से चिल्लाती बोलती-“उठ, फोन उठा जरूर सुधीर  या अरुण का फोन होगा ।” पर अब फोन बजता रहता है और वह उठाती भी नहीं मानों फोन की आवाज़ अब उन्हें सुनाई ही नहीं देती है ।

मेरी दुनिया मेरी मन्नो जी, मेरी पत्नी मेरा सब कुछ है । मन्नो जी के बिना जीवन की तो मैं कल्पना भी नहीं कर सकता । पर एक दिन इन्होंने कहा-“सुनिए अब हम दोनों सत्तर पार कर चुके । मेरी तबियत भी ठीक नहीं रहती । अपना ध्यान रखना सीख लीजिए । कहीं ऐसा न हो कि एक रात सोऊँ तो अगली सुबह उठ ही न पाऊँ । तब क्या करेंगे ? रसोई में नमक, हल्दी, चावल, दाल, तेल, मसाले, आटा किन-किन डब्बों में पड़े हैं मेरे रहते जान लो । पानी सुबह पाँच से सात ही आता है इसलिए मोटर उसी समय चलाना Iदूधवाला और अखबारवाला इतना ही नहीं प्रेसवाला सब चोर हैं इनकी बातों पर विश्वास कभी मत करना । अपना हिसाब हमेशा रखना । झाडू-पोछे वालियों से अपने सामने काम करवाना । उन पर घर नहीं छोड़ना । नहीं तो पता चलेगा कि सारा घर साफ हो गया । दवाई महीने में दो  बार ले कर आती हूँ और आपके नीले डिब्बे में रहती है । वहाँ से आपके इस छोटे डिब्बे में समय-समय पर भरती रहती हूँ और…”

मन्नों जी उस दिन न जाने और क्या-क्या समझाती रहीं पर मैं मानो बुत बन चुका था । उत्तर में केवल आँखों से आँसू ही निकले ।

“अरे, रो क्यों रहे हो ? जिन्दा हूँ अभी मैं ! मरी नहीं हूँ । मैं नहीं समझाऊँगी तो कौन समझाएगा ।”

बच्चों के चले जाने के बाद मैं ही मन्नो जी का पति और मैं ही उसका बेटा और मैं ही उसका पोता-पोती था । वह कभी पत्नी बन के तो कभी माँ बन के तो कभी दादी बन के मुझसे बातें करती । उसका मुझसे रूठना, मुझे डाँटना और फिर छोटे से बच्चे की तरह मुझे पुचकारना-दुलारना, सब मुझे अच्छा लगता । बच्चे बड़े हो गए और उनके साथ मन्नो जी की ममता भी ।

दोनों बेटों ने अपनी पसंद से शादी की । मन्नों जी के सारे अरमान दिल में ही रह गए । बेटों की खुशी के लिए सब कुछ किया । सुधीर जब अपर्णा को कैलिफोर्निया ले जा रहा था तब मन्नों जी के डर ने शब्दों का रूप ग्रहण किया-“अपर्णा, सुधीर मेरा लाड़ला बेटा है । हम माँ-बेटे को एक कड़ी में बाँधे रखोगी न !”

“अभी कैसे बता सकती हूँ मम्मी जी, वह तो समय ही बताएगा ।” अपर्णा का यह एक वाक्य मन्नों जी के ऊपर वज्रपात की तरह गिरा ।

तब का गया सुधीर अब आएगा । अपर्णा ने ठीक ही कहा था ।

मन्नों जी के घुटने इन सालों में जवाब दे चुके थे । और एक दिन तो मन्नो जी…

“ऑपरेशन करना पड़ेगा । पाँच से छह लाख रुपये और तीन महीने उनकी सेवा ।” मुझे अच्छे से याद हैं डॉक्टर साहब के वे शब्द । मेरे पास न तो इतने पैसे थे कि मन्नों जी के घुटने बदलवा सकूँ और न ही इतनी शारीरिक क्षमता की दौड़-भाग कर सकूँ ।

दोनों बेटों से फोन पर बात की और स्थिति से अवगत कराया सुधीर ने कहा कि वह तीन लाख तक भेज देगा पर उससे ज्यादा और न भेज पाएगा । वह भी अपनी पत्नी को बिना बताए । मैंने कहा भी कि अपर्णा को बता कर काम करो । पर सुधीर ने कहा कि अपर्णा को बताया तो वह एक भी पैसे नहीं भेजने देगी I किसी भी बात की  जिद करने पर वह तलाक देने की धमकी देती है । ऐसी स्थिति में पैसे छुपा कर ही भेज सकता हूँ और आने का सवाल नहीं क्योंकि अपर्णा जाने नहीं देगी । खैर ! सुधीर के भेजे तीन लाख रुपयों से मदद तो जरूर मिली ।

अरुण आर्थिक और शारीरिक दोनों ही रूप से सहयोग न दे पाया । उसकी भी कोई मजबूरी रही होगी । शायद सुधीर की तरह । मन्नो जी को अपनी अपाहिजता पर इतना रोना नहीं आया जितना रोना अपने बेटों की अपाहिजता पर आया । मैंने बहुत समझाया पर… ।

खैर छोड़िए !

मन्नो जी ठीक हो गईं । अब पहले से कहीं ज्यादा तेज़ चलतीं । अगर मैं यह कहूँ कि मन्नों जी अब तितली की तरह उड़ती हैं तो अतिशयोक्ति नहीं होगी । जिन्दगी के सारे रंग जो धीरे-धीरे मृत होते जा रहे थे उनमें मन्नो जी ने एक बार फिर प्राण फूँक दिए । अब लाल रंग उन्हें लाल ही लगता और सफेद उन्हें सफेद ही । एक बार फिर मन्नो जी ने अपने जीवन के केनवस को रंगों से भरना शुरू किया । मुझे खुशी मिली कि मेरी मन्नों फिर से लह-लहा रही है । अबकी बार रंगौं के विचित्र चयन देखने को मिले । ऐसे रंग जो पहले कभी नही देखे गए थे । मैंने मन्नों जी से जानना चाहा पर उनका जवाब केवल इतना था कुछ रंग जिन्हें उन्होंने अपने चित्रों में भरे थे यह सोचकर कि उनसे चित्र और अधिक निखरेगा और अधिक सजीव हो उठेगा उन्होंने विपरीत परिणाम दिए । इसलिए अब चाह कर भी मैं उन रंगों को भर नहीं सकती –“आदमी उँगली जलाकर ही तो सीखता है न जी, ठीक कह रही हूँ न ।”

और मैं मन्नो जी के उस कथन पर सहमति दिए बिना नहीं रह पाता ।

आज मेरी मन्नो मेरे पास है । मेरा सबसे बड़ा सौभाग्य है । मैं मन्नो के साथ टेलीविजन देखता हूँ, मन्नो के साथ बागवानी करता हूँ । मन्नो के सा थ कसरत करता हूँ । मन्नो के साथ टहलने जाता हूँ पर बच्चों को याद मन्नो के साथ नहीं करता हूँ । या यूँ कहूँ कि बच्चे तो मुझे कभी विस्मृत ही नहीं हुए जो उन्हें याद करूँ । वे तो मेरे साथ पल-प्रतिपल हैं । मन्नो जी आज भी सुधीर और अरुण को प्यार करती हैं । आज भी उनके बचपन को याद करती हैं जब मेरी मार से उन्हें बचाने के लिए वे न जाने क्या-क्या कहानियाँ गढ़ा करती थीं । जब उनकी एक फरमाइश पूरी करवाने के लिए वह निरन्तर मेरे आगे-पीछे घूमती थीं । मन्नो जी कुछ भी तो नहीं भूली हैं । मन्नो जी ने अपने आपको बस इन्ही यादों के सुपुर्द कर रखा है । इन यादों में किसी का भी हस्तक्षेप उन्हें पसन्द नहीं ।

 रात हुई तो मन्नों जी ने दीपा से नए पर्दे, नया टेबल क्लाथ, नया बेडशीट सब निकालने को कहा । मैं खुश था कि सुधीर का स्वागत करने की तैयारियाँ शुरू हो गईं थी । सुबह सब बदल देना था । कल शाम तक सुधीर हम लोगों के बीच होगा । मेरी पोती मेरे पास होगी । अब तक तो फ्लाइट में बैठ चुका होगा । मन्नो जी रात का काम समेट जब सोने आती हैं तो फोन बजता है ।

“अब इस समय किसका होगा?” मैं आश्चर्य से कहता हूँ ।

मन्नो जी चुप बिस्तर पर लेटी रहती हैं ।

मैं ही उठता हूँ । फोन सुनता हूँ और फिर बिस्तर पर आकर लेट जाता हूँ । मुँह में थूक जम चुका है उसे घोंट जाता हूँ ।
“मन्नो ।”
“हूँ ।”
“पूछोगी नहीं किसका फोन था ।”
“किसी अपने का ही होगा ।”
“सुधीर का था । वह नहीं  आ रहा है । कह रहा था कि कोई जरूरी काम आ गया है । अभी व्यस्त है । विस्तार से बाद में बात करेगा ।”

मन्नो जी  की कोई प्रतिक्रिया नही आती है । मैं आधी रात तक छटपटाता रहता हूँ और इस छटपटाहट में कब नींद लग गई पता ही नही चला ।

सुबह जब आँख खुली तो दस बज रहे थे । मैंने देखा घर के सारे पर्दे बदल दिए गए थे, टेबल क्लाथ नये लगा दिए गए थे । उठ कर सुधीर के कमरे में गया तो सब कुछ नया वहाँ व्यवस्थित रूप से दिखाई दिया । मुझे लगा कि शायद रात को मैंने जो कहा था वह मन्नो जी सुन नहीं पाई ।

“मन्नो सुधीर नहीं आ रहा है ।”

“छोड़ दिए घोसलों में चिड़िया के बच्चे फिर नहीं आते । वे अपने नये घोंसले बनाते हैं । पर चिड़िया ये जानते हुए भी आपना घोसला साफ रखती है कि क्या पता कभी वे बच्चे इधर से गुज़रे । मैंने तो बस अपना, घोंसला साफ रखा है” इतना कह मन्नो जी मुझे हाथ-मुँह धोने को कहती हैं ।

“नाश्ता तैयार है ।”
“क्या बनाया है ?”
“पूड़ी और आलू झोर ।”
और हम दोनों टेबल पर एक साथ पूड़ी और आलू झोर खाने बैठ जाते हैं । दीपा गरम-गरम पूड़ियाँ निकालती जाती  है।

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अध्यादेश: बचपन से बलात्कार की सज़ा उम्र कैद या फाँसी!

देखने और सुनने में महिला-पक्षधर लगने वाला नया कानून- यानी बच्चियों से बलात्कार के मामले में फांसी मूलतः पितृसत्तात्मक और स्त्री विरोधी है-खासकर उस देश में जहाँ बलात्कार के अधिकाँश आरोपी परिचित होते हैं और बच्चियों से बलात्कार के मामलों में सजा बमुश्किल 3% होती है. एक ऐसे देश में जहां की सरकार में शामिल मंत्रियों को लगता है कि एक बड़े देश में एक-दो बलात्कार तो होते ही रहते हैं. जानें नये प्रस्तावित कानून पर न्यायविद अरविंद जैन और सामाजिक एवं थिएटर एक्टिविस्ट शुभा के विचार: 

अरविंद जैन

नया कानून ,अध्यादेश जारी होने के बाद हुए अपराधों में ही लागू होगा। अब तक के मामलों में, वही पुराना कानून लागू रहेगा। देखना यह है कि नए कानून के अंतर्गत, कितने अपराधियों को फाँसी की सज़ा मिलती है। कहीं ऐसा ना हो कि अदालतें, ‘दुर्लभतम में #दुर्लभ’ मामला ही ढूँढती रहे और ऐसे अपराधों में सज़ा, पहले से भी कम हो जाये।अदालतों की संवेदनशीलता और गंभीरता के बिना, यह मिशन अधूरा ही होगा।हाँ! अध्यादेश से निश्चितरूप से ‘कठुआ’ और ‘उन्नाव’ बलात्कार कांड के बाद उभरा जनाक्रोश, जरूर ठंडा पड़ेगा। 2012-13 फिर दोहराया गया। अगर सही से अनुपालन हुआ, तो यह अध्यादेश स्वयं (पितृ)सत्ता के गले में, फाँसी का फंदा सिद्ध होगा।

आपराधिक कानून (संशोधन) अध्यादेश, 2018 दिनांक 21अप्रैल, 2018 जारी हो गया और नया कानून लागू। अध्यादेश में भारतीय दंड संहिता, 1860, भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1873, आपराधिक दंड प्रक्रिया संहिता और बाल अपराध संरक्षण अधिनियम, 2012 की कुछ धाराओं में संशोधन किया गया है। संशोधन के अनुसार 12 साल से कम उम्र की बच्चियों के साथ बलात्कार के मामलों में भी, फांसी की सज़ा का भी प्रावधान हो गया।

अध्यादेश जारी होने के बाद, 12 साल से कम उम्र की बच्ची से बलात्कार की सज़ा उम्र कैद या फाँसी।न्यूनतम 20 साल कैद। फाँसी के फंदे से बचने के लिए, अबोध बच्चियों की हत्या की संभावना भी बढ़ेगी ही। अपराधी अपने ख़िलाफ़ सारे सबूत और गवाह भी मिटाने का भरसक प्रयास करता रहा है..करेगा। बाकी कुछ बचा तो, न्यायिक विवेक करता रहेगा, उचित सज़ा का फैसला।

पीड़िता की उम्र 16 से कम हुई, तो सज़ा दस से बीस साल तक और अभियुक्त को अग्रिम जमानत नहीं मिलेगी। जमानत के लिए भी 15 दिन का नोटिस अनिवार्य होगा। अग्रिम जमानत के बारे में दलित कानून में सुनाए, सुप्रीम कोर्ट फैसले की तरह क्या इस कानून का भी  विश्लेषण या व्याख्या करेंगे। कानून की संवैधानिक वैधता पर ही, सालों बहस होती रहेगी। और हाँ! अगर अपराधी 16 साल से कम उम्र का किशोर हो, तो क्या होगा? किशोर की परिभाषा (16 साल से घटा कर 12 साल) भी बदलनी पड़ेगी या नहीं?दूसरी तरफ अगर स्त्री की उम्र 16 साल से अधिक पाई गई, तो सज़ा सिर्फ 7 से 10 साल। क्यों? क्या अब अपराध की गंभीरता भी, उम्र के आधार कार्ड से तय होगी!

निर्भय कांड के बाद, भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 375 में 2013 संशोधन द्वारा सहमति से सहवास की उम्र 16 साल से बढ़ा कर18 साल की गई थी। अब यहाँ फिर से वही ‘सौलहवें साल’ के मानसिक संस्कार, सिर चढ़ बोलने लगे हैं।

प्रावधान तो बन-बना दिया गया है कि दो महीनें में जांच, दो महीनें में मुकदमा, दो महीनें में फैसला यानी छह महीनें में प्रक्रिया पूरी करनी होगी।पर यह सब, बिना नए ढांचे के होगा कैसे? हम जानते हैं कि ‘फ़ास्ट ट्रैक’, कब और कैसे धीरे-धीरे ‘स्लो ट्रैक’ में बदल जाता है।’निर्भया केस’ (2012) को ही देख लो…फाँसी का फैसला होने के बाद भी, ना जाने कहाँ अटका-लटका हुआ है।

कहना न होगा कि बलात्कार के हर मुकदमें में स्त्री शिकायतकर्ता/पीड़िता है या सिर्फ एक गवाह! वो अपने ही साथ हुए दुष्कर्म की गवाह है,चश्मदीद गवाह। उसे बताना है, वो सब कुछ कब,कहाँ,कैसे और क्यों! स्मृतियों के सब छाया-चित्र दिखाने हैं घटना-दुर्घटना के, जिसकी वो गवाह है।एक बार फिर दोहराना है, बलात्कार अध्याय।बार-बार दोहराना है दिमाग में, कि कहीं कुछ छूट ना जाए और न्यायधीश उसे ही ‘झूठी’ ना समझ बैठे। गवाह इतने दबाव-तनाव में और बाकी सब यह जानने की प्रतीक्षा में कि आगे क्या हुआ, कब हुआ और कैसे! इस तरह, हाँ इसी तरह होती है अपने ही खिलाफ़, स्त्री की गवाही।

सच तो यह है कि अभी भी “घटनाघाट से न्यायपुरम के बीच कानून की कच्ची सड़क पर,गहरे गड्ढे और थोड़ी-थोड़ी दूरी पर #टोलटैक्स। सालों बैठे रहो धूप में और करते रहो फैसले का इंतज़ार। फैसला हो जाए तो, अपील दर अपील। सदियों पुराने खंडहर से वातानुकूलित खंडहर तक की अंतहीन यात्रा। मिस्टर इंसाफ और कानून कुमार के बारे में, विस्तार से फिर कभी….!”

स्त्री और बच्चों के विरुद्ध अपराध बढ़ रहे हैं चूंकि कानून कमजोर हैं। व्यवस्था कमजोर है। पुलिस कमजोर है। कोर्ट कचहरी कमजोर है। न्याय व्यवस्था बहुत महंगी है। पुलिस संवेदनशील नहीं है। मीडिया और तमाम मनोरंजन के क्षेत्र महिलाओं को सिर्फ एक वस्तु, एक ऑब्जेक्ट के रूप में पेश कर रहे हैं। छोटे पर्दे से लेकर बड़े पर्दे तक और अखबारों के चिकने पन्नों तक, औरतों को तमाम आकर्षक उत्पादों की तरह ही पेश किया जा रहा है। एक ऐसे उत्पाद के रूप में जिसे भोगा जाना बहुत स्वभाविक है। ऐसे में इस सबका नतीजा अंततः महिलाओं के विरूद्ध अपराध के रूप में ही सामने आता रहा है।समय रहते इसके बारे में भी गंभीरता से विचार करना पड़ेगा, हालांकि पहले ही बहुत देर हो चुकी है।

इस अध्यादेश को भी, एक और कानून समझो। यूँ देश में बहुत से कानून हैं, मगर कोई कारगर कानून नहीं है, कानून है तो उसका अनुपालन नहीं। यह कहना कि केवल कानून बनाने से कुछ नहीं होगा, एक हद तक सही लग सकता है। मगर अपराध रोकने के लिए या उन पर काबू पाने के लिए कुछ कठोर कानून बनाना भी जरूरी है।कानून हो ना हो, तो सोचो कि क्या हालत होंगे! देश में कानून का राज है, तो कानून का वर्चस्व भी बनाए-बचाए रखना होगा। स्त्री के विरुद्ध निरंतर बढ़ रही यौन हिंसा को रोकने के लिए, कुछ कठोर कानून और कुछ कठोर कदम उठाने ही पड़ेंगे….वरना!

शुभा
फांसी की सज़ा किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है।यह बलात्कार के सामने समर्पण ही है।बलात्कार की पक्षधर सरकार और विचारधारा फांसी की सज़ा लाकर समस्या को हल न करने कीअन्तिम और फाईनल घोषणा कर रही है।राजसत्ता और नागरिकों के बीच संवैधानिक माध्यमिकता को कुचलकर न्याय-व्यवस्था को निष्प्राण करते हुए फांसी की सज़ा का प्रावधान कई तरह की आशंकाओं और डर को जगाने वाला है।निरंकुश हिंसक सत्ता, हत्या को कई तरह से आसान और निरापद बनाने की कोशिश में है।बच्चियों के साथ बलात्कार को कम करने या ख़त्म करने के लिए जो काम करने ज़रूरी हैं उनमें से कुछ इस प्रकार हैं—
राजनीति को अपराधीऔर अपराध-तन्त्र से अलग करना।
भ्रष्ट्राचार ख़त्म करना और राजनीति से अपराधिक निजी पूंजी को अलग करना।
जस्टिस वर्मा कमैटी की सिफारिशों को लागू करते हुए पुलिस रिफ़ार्म करना।
लिंग और जाति के आधार पर भेदभाव ख़त्म करने के लिये सकारात्मक भेदभाव के सिद्धांत को अपनाकर इन्सैंटिव देते हुए संसाधनो तक उनकी पहुंच सुरक्षित करना।
बकरवाल समाज सहित सभी जनजातियों को जल, जंगल, जमीन के अधिकार देना।
2002 में हुए नरसंहार के अपराधियों को सज़ा देना और अल्पसंख्यकों को शिकार बनाने वाले हिन्दू धर्म का बहाना बनाकर आतंक फैलाने वाले संगठनों को प्रतिबंधित करना।धर्म के नाम पर नफरत फैलाने वाले सभी संगठन बलात्कार को “बदला लेने ” का औजार बनाते हैं।
ग्रामीण ,भूमिहीन दलित स्त्री-पुरुष को संयुक्त पट्टा देकर भूमि -वितरण।भूमिहीन आबादियों पर लगातार बलात्कार होते हैं।
सभी को रोज़गार और कपड़ा, रोटी ,मकान व शिक्षा की गारंटी।

ये अधिकार न होने कारण ग़रीब आबादियों के बीच से साधन-सम्पन्न अपराधी अपने रंगरूट भर्ती करते हैं,निराशा भी अपराधों को जन्म देती है।ग़रीब आबादी के बच्चों और औरतों का निरन्तर भीषण शोषण और यौन उत्पीड़न होता है।श्रम कानूनों के अभाव में श्रमिक स्त्रियों और उनकी बच्चियों को यौन उत्पीड़न का शिकार बनाया जाता है।स्वतंत्र मीडिया के अभाव में बलात्कारियों और यौन शोषण करने वालों के हौसले बुलन्द रहते हैं। विधान सभा, संसद और कैबिनेट स्तर तक महिलाओं के प्रति अपराध, बलात्कार और हिंसा के आरोपी मौजूद हैं।बलात्कार के पक्ष में बड़ा उत्साहपूर्ण वातावरण बना हुआ है। अभी बहुत बातें रह गई हैं जो फिर कही जाएंगी।

मौजूदा सरकार इनमें से कोई क़दम बलात्कार को ख़त्म करने की दिशा मे नहीं उठा सकती ।वह विपरीत दिशा में यानि बलात्कार के लिए उत्साहवर्धक परिस्थिति तैयार करने में लगी है। इस बात को छुपाने के लिए फांसी का कानून बना रही है।सरकार ख़ुद सभी कानूनों का दुरूपयोग  कर रही है इसलिये हमें इस क़ानून से डरना चाहिए।

बलात्कार पर अभी बात शुरू हुई है। (शुभा का मत उनके फेसबुक पेज से साभार). अरविन्द जैन का मत उसने बातचीत पर आधारित 
तस्वीरें गूगल से साभार 


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