सिवाय साम्यवाद के महिलाओं की मुक्ति संभव नहीं:लेनिन


आज से लगभग 100 साल पहले 1920 में मार्क्सवादी स्त्रीवादी क्लारा जेटकिन ने रूसी क्रांति के विराट नेता लेनिन से यह बातचीत की थी. इस बातचीत का एक हिस्सा (बीच का हिस्सा), जो महिला श्रम के सन्दर्भ में है स्त्रीकाल के पाठक 1 मई (मजदूर दिवस) को पहले ही पढ़ चुके हैं, इस लिंक को क्लिक कर पढ़ सकते हैं. 

लेनिन: कम्युनिस्ट नेतृत्व महिलाओं के आन्दोलन के सवाल पर निराशावादी, रुको और देखो वाला रुख अपना लेता है

प्रारम्भ इस लिंक से होता है: भारतीय संतों के हमेशा कुंडलिनी जागरण की तरह हमेशा सेक्स की समस्याओं में उलझे रहने वालों पर भी मैं अविश्वास करता हूं: लेनिन

दूसरी क़िस्त : कम्युनिस्ट महिलाओं, कामगार महिलाओं के विचार सर्वहारा की क्रांति पर ही केंद्रित होना चाहिए: लेनिन

इस ‘पानी के ग्लास’ वाली थ्योरी को मैं न सिर्फ गैर मार्क्सवादी बल्कि समाज विरुद्ध भी मानता हूं। मामला बस इतना भर नहीं है कि प्रकृति ने क्या दिया है, लेकिन जो संस्कृति निर्मित हुई है-चाहे अच्छी या बुरी, वो सेक्स-जीवन में भी आती है। ‘परिवार की उत्पत्ति’ किताब में एंगेल्स ने इस महत्वपूर्ण बात की तरफ इशारा किया है कि किस तरह साधारण यौन-संबंध, व्यक्तिगत यौन प्रेम में विकसित होकर अधिक पवित्र बने। लिंगों के बीच के संबंध महज आर्थिक और भौतिक जरूरतों के आपसी प्रभावों की ही अभिव्यक्ति नहीं है, जिसे दैहिक रूप में जानबूझकर लिया जाता है। इन संबंधों में होने वाले परिवर्तन के लिए समाज की पूरी विचारधारा से जोड़े बगैर अकेले उसके अर्थिक आधार से जोड़ देना मार्क्सवाद नहीं, सिर्फ तर्कवाद है। तय है कि प्यास को बुझाना है, लेकिन क्या साधारण तौर पर कोई व्यक्ति नाली में उतरकर कीचड़युक्त पानी पियेगा? या कि ऐसे ग्लास से भी पानी पियेगा जिसे कई लोग जूठा कर चुके हो? लेकिन किसी भी अन्य कारण की अपेक्षा सामाजिक कारण महत्वपूर्ण है।

पानी पीना हर किसी का व्यक्तिगत मामला है। लेकिन प्यार करने के लिए दो लोगों का होना जरूरी होता है। इससे एक तीसरे जीवन के आने की आशा भी होती है। इस काम में एक सामाजिक जटिलता है। समाज के प्रति एक जिम्मेदारी भी। एक कम्युनिस्ट होने के नाते मेरा इस ‘पानी के ग्लास’ वाली थ्योरी से कोई संबंध नहीं है। बावजूद उसके आकर्षक शीर्षक ‘प्यार की मुक्ति’ के अलावा इसके प्यार की मुक्ति न तो कोई नया या कम्युनिस्ट विचार ही है। तुम्हें याद होगा कि पिछली सदी के मध्य में ‘हृदय की मुक्ति’ की बात को महान साहित्य में बढ़ाया गया था। बुर्जुआ व्यवहार में यह बात दैहिक मुक्ति में बदली। अभी के मुकाबले तब यह बात अधिक प्रतिभा के साथ समझाई गई थी। फिर भी मैं बता नहीं सकता कि व्यवहार में यह किस तरह आती थी। अपनी इस आलोचना को मैं सन्यासी भाव बढ़ाने के लिए उपयोग नहीं कर रहा हूं। मेरे विचारों में दूर तक ऐसी बात नहीं है। साम्यवाद, सन्यास लाने के लिए नहीं है, बल्कि आनंद, शक्ति और एक प्रेमपूर्ण जीवन के लिए है। जबकि मेरे विचार से, आज के सेक्स की अधिकता वाला जीवन न तो शक्ति ही दे पा रहा है, न ही आनंद, उल्टे यह तो उन्हें नष्ट ही कर रहा है। यह बुरी बात है, क्रांति के इस युग में बहुत-ही बुरी बात है।

‘ख़ास तौर पर युवाओं को शक्ति और आनंद की जरूरत है। जिम्नास्टिक्स, तैराकी, भ्रमण व हर तरह के शारीरिक मेहनत वाले स्वास्थ्यकारी खेलों के साथ ही व्यापक बौद्धिक रुचियों की उन्हें जरूरत है। साथ ही यथासंभव सामूहिक तौर पर सीखने, पढ़ने और शोध करने की भी। सेक्स समस्याओं पर अंतहीन भाषणों, वाद-विवाद और तथाकथित ‘अपनी तरह जीने’ की अपेक्षा ये बातें युवाओं के लिए कहीं अधिक उपयोगी हैं। समाज के स्वास्थ्य में ही मनुष्य का स्वास्थ्य है। न तो एक भिक्षु बनो ना ही डॉन जुआन, और साथ ही साथ एक जर्मन विषयासक्त की तरह इनके बीच का भी कुछ नहीं। तुम उस युवा साथी ‘एक्स’ को जानती हो? वो एक शानदार प्रतीभाशाली लड़का है। लेकिन मुझे डर है कि वो कुछ नहीं बन पाएगा। उसका एक के बाद दूसरा प्रेम चलता रहता है। यह राजनीतिक संघर्ष और क्रांति के लिए अच्छी बात नहीं है। मैं ऐसी किसी भी महिला की विश्वसनीयता और धैर्य के बारे में दावे से नहीं कह सकता, जिसका प्रेम-प्रसंग राजनीति से गुंथा होता है, न ही ऐसे पुरुष के बारे में जो हर घाघरे के पीछे भागता है, हर जवान महिला के साथ अपने को जोड़ लेता है। ना-ना, ये क्रांति के साथ-साथ नहीं चलेगा।

लेनिन उछलकर खडे़ हुए और हथेलियों से टेबल थपथपाने लगे, फिर कमरे के चक्कर लगाने लगे। फ्क्रांति, समुदाय और हर व्यक्ति से एकाग्रता और हर तरह के बल को जोड़ने की अपेक्षा करती है। वो उस व्याभिचार को बर्दाश्त नहीं करती जो दी- एनुन्जियों के पतनशील नायक-नायिकाओं में बहुत आम है। यौन संबंधों में स्वच्छन्दता बुर्जुआपन है। ये अधःपतन का लक्षण है। सर्वहारा उभरता हुआ वर्ग है। उसे उत्तेजित या सुन्न करने के लिए किसी नशे की जरूरत नहीं है। ना ही सेक्स संबंधों में ढिलाई या शराब के नशे की।
‘उसे पूंजीवाद की चरित्रहीनता, गंदगी और बर्बरता को न भूलना चाहिए, ना ही यह भूलेगी। यह अपने संघर्ष की सबसे प्रबल प्रेरणा, अपनी वर्गीय स्थिति और साम्यवादी आदर्श से हासिल करती है। उसे चाहिए- स्पष्टता, स्पष्टता और अधिक स्पष्टता। इसीलिए, मैं यह बात दोहराता हूं कि किसी भी किस्म से शक्ति को कमजोर, जाया और क्षरित नहीं होने देना है। आत्म-नियंत्रण और आत्मानुशासन का मतलब दासता नहीं है। प्रेम के मामले में भी यही बात है। पर मुझे माफ करना क्लारा, हम अपनी बहस से बहुत दूर आ गए हैं। तुमने मुझे टोका क्यों नहीं? चिंताओं के कारण मैं बोलता ही चला गया। अपने युवाओं का भविष्य मेरे दिल के करीब की बात है। यह क्रांति का अटूट हिस्सा है। जब कभी नुकसानकारी शक्तियां नजर आती हैं, जो बुर्जुआ समाज से सरक कर क्रांति की दुनिया में घुस जाती हैं, और उर्वरक बीजों की जड़ों की तरह फैलने लगती हैं, बेहतर होता है कि तत्काल उनके विरूद्ध कार्रवाई की जाए। जिन प्रश्नों पर हमने बातें कीं, वे भी महिला समस्याओं का ही हिस्सा है।’
लेनिन महान जीवंतता और गहरे विश्वास के साथ बोल रहे थे। मैं महसूस कर सकती थी, उनका हर शब्द उनके दिल की गहराई से आ रहा था। उनके चेहरे पर आने वाले भाव, मेरे इस अहसास को बढ़ा ही रहे थे। समय-समय पर वे ऊर्जात्मक हाव-भाव के साथ कोई विचार व्यक्त करते। मैं चकित थी कि अत्यधिक महत्व की राजनीतिक समस्याओं के साथ-साथ वे साधारण मुद्दों से भी भलीभांति परिचित थे। उन पर भी बहुत ध्यान देते थे। न केवल सोवियत रूस के बारे में ही वे चिंतित थे, बल्कि उन देशों के बारे में भी जो कि अब तक पूंजीवादी ही थे। एक शानदार मार्क्सवादी की तरह वे जिस भी और जैसे भी रूप में जो कुछ प्रगट था, उसे समग्रता में ताड़ लेते। उनका सारा उत्साह और उद्देश्य प्रकृति की विरोधहीन ताकतों की मानिंद इस एकमात्र लक्ष्य, कि क्रांति को जनता के काम की तरह तेज बनाना है, पर बिना विचलित हुए, एकाग्र था। वे हर बात को क्रांति की सचेत क्रियात्मक शक्तियों पर प्रभाव के संदर्भ में ही तौलते। उनकी नजरें हमेशा विश्व स्तर पर अविभाजित सर्वहारा की क्रांति पर टिकी रहती थी।

मैंने आह भरते हुए कहा, 'कामरेड लेनिन, मुझे खेद है कि आपके शब्दों को लाखों-करोड़ो लोगों ने नहीं सुना। जैसा कि आप जानते हैं, आपको मुझे बदलने की जरूरत नहीं है। लेकिन दोस्तों और दुश्मनों के लिए भी आपके विचार जानना बहुत ही महत्वपूर्ण होगा।

लेनिन स्नेहभाव से मुस्कुराए। वे बोले, ‘तुम्हारे लिए मेरे पास जो समय था, उसमें से आधा बीत चुका है। मैंने बहुत लंबी बातें कह दी। महिलाओं के बीच प्रमुख कम्युनिस्ट धारणाओं को तुम्हें स्पष्ट करना है। मैं तुम्हारे सिद्धांतवादी रवैये और व्यावहारिक अनुभव को जानता हूं। अतः इस बारे में हमारी बातचीत बहुत छोटी होगी। बेहतर होगा कि तुम व्यस्त हो जाओ। तुम क्या सोचती हो? महिला कम्युनिस्ट धारणाएं क्या हो?’

मैंने उन्हें इस बारे में संक्षेप में बताया। बिना किसी टोका-टाकी के वे बीच-बीच में स्वीकार भाव से सिर हिलाते रहे। अपनी बात कहने के बाद मैंने प्रश्न-मुद्रा में लेनिन की ओर देखा।

‘ठीक है, वे बोले। ‘यह भी अच्छा होगा कि तुम पार्टी की जिम्मेदार महिला साथियों की एक बैठक बुलाकर उनसे इस बारे में बातें करो। साथी इनेसा अभी यहां नहीं हैं। वो बीमार हैं और काकेशस गई हुई हैं। चर्चा के बाद इन धारणाओं को लिख डालो। एक समिति उन्हें देखेगी और कार्यकारिणी अंतिम निर्णय लेगी। मैं अपने विचार कुछ मुख्य मुद्दों पर ही दूंगा। उन पर, जिन पर मैं तुम्हारे विचारों से सहमत हूं। मुझे वे हमारे वर्तमान आंदोलन और प्रचार के लिए भी महत्वपूर्ण जान पड़ते हैं, यदि वे सफल संघर्ष के लिए तैयारी की राह बना सके।

‘महिला कम्युनिस्ट धारणा में इस बात को जोरदार तरीके से कहना होगा कि सिवाय साम्यवाद के महिलाओं की मुक्ति संभव नहीं है। तुम्हें महिलाओं की मानवीय और सामाजिक स्थिति तथा उत्पादन के साधनों पर निजी मिल्कियत के बीच के अटूट संबंधों पर जोर देना होगा। इससे बुर्जुआ  के ‘नारी मुक्ति’ आंदोलन के खिलाफ एक मजबूत और पक्की धारा बनेगी। यह हमें महिलाओं के प्रश्न को सामाजिक, कामकाजी वर्ग के प्रश्न के तौर पर जांचने का आधार भी देगा। सर्वहारा के वर्ग संघर्ष और क्रांति के साथ इसे जोड़ेगा। कम्युनिस्ट महिला आंदोलन अपने में एक जनआंदोलन होगा, साधारण जनआंदोलन का हिस्सा, न सिर्फ सर्वहारा वर्ग का, बल्कि पूंजीवाद या शोषक वर्ग द्वारा हर शोषित और दमित वर्ग का। सर्वहारा के वर्ग संघर्ष और एक कम्युनिस्ट समाज बनाने के उसके ऐतिहासिक मिशन में महिला आंदोलन का महत्व है। इस बात पर हमारा गर्व करना कि कांमिन्टर्न में, हमारी पार्टी में, क्रांतिकारी नारीवाद का उत्तम अंश है। लेकिन यह निर्णायक नहीं है। नगरों और देश की लाखों कामकाजी महिलाओं के मन को, हमें अपने संघर्ष और खासकर समाज के साम्यवादी पुनर्गठन के लिए, जीतना होगा। महिलाओं के बगैर कोई सच्चा जनआंदोलन हो ही नहीं सकता।



‘हम अपनी वैचारिक अभिकल्पनाओं से अपने सांगठनिक विचार तय करते हैं। हमें कम्युनिस्ट महिलाओं के अलग संगठनों की चाहत नहीं है! जैसे पार्टी में एक पुरुष सदस्य होता है, वैसे ही एक महिला भी रहेगी। उन्हें समान अधिकार के साथ-साथ कर्त्तव्य भी समान होंगे। इस मसले पर कोई मतभेद नहीं हो सकता। फिर भी हमें सच्चाई से अपनी आंखें नहीं फेरनी चाहिए। पार्टी के पास ऐसे कामकाजी समूह समितियां, जत्थे या जो कुछ भी उन्हें हम नाम दें, होने चाहिए, जो महिलाओं के व्यापक हिस्से को सचेत करने, उन्हें पार्टी के सम्पर्क में लाने और उसके प्रभाव में रखने का विशेष लक्ष्य लेकर चले। जाहिर है इसके लिए जरूरी होगा कि हम महिलाओं के बीच व्यवस्थित काम करें। हम जागरुक महिलाओं को शिक्षित करें और उनके दिल जीतें। उन्हें कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में सर्वहारा के वर्ग संघर्ष के लिए तैयार करें। जब मैं यह कहता हूं तो मेरे दिमाग में सिर्फ सर्वहारा महिलाएं नहीं होती-चाहे वे कारखानों में कार्यरत हो या घर में भोजन पका रही हो।

‘मेरे दिमाग में तो किसान महिलाएं और निम्न मध्यवर्ग के विविध हिस्सों की महिलाएं भी रहती हैं। वे भी पूंजीवाद की पीडि़त हैं। खासतौर पर युद्ध के बाद तो और भी। इन महिलाओं की राजनीति में अरुचि और अन्यथा असामाजिक और पिछड़ी मानसिकता, उनकी गतिविधियों की सीमित संभावनाएं और पूरी जीवन शैली, न झुठलाए जाने वाले तथ्य हैं। उनकी अनदेखी करना नादानी होगा, सरासर नादानी। उनके बीच काम करने के लिए हमारे अपने समूह होने चाहिए। आंदोलन के विशेष तरीके और विशेष तरह के संगठन होने चाहिए। यह बुर्जुआ  ‘नारीवाद’ नहीं है। यह एक व्यावहारिक क्रांतिकारी अभियान है।’

मैंने लेनिन से कहा कि उनके तर्क मेरे लिए मूल्यवान और उत्साहजनक हैं। कई अच्छे साथी भी महिलाओं के बीच व्यवस्थित काम करने के लिए विशेष समूह बनाने का घोर विरोध करते हैं। वे इसे उस चालाक ‘नारीमुक्ति’ आंदोलन की तरफ, सामाजिक जनवादी परम्पराओं की तरफ वापसी करार देते हैं। वे कहते हैं कि, चूंकि कम्युनिस्ट पार्टी ने महिलाओं को बराबरी का दर्जा दिया है, उन्हें साधारणतया कामकाजी लोगों के साथ, बिना किसी भेदभाव के, काम करना चाहिए। पुरुषों और महिलाओं के प्रति समान रवैया होना चाहिए। लेनिन द्वारा आंदोलन और संगठन को लेकर जो स्थितियां देखी गई, उन्हें स्वीकार करने की किसी भी कोशिश को ऐसे दृष्टिकोण वाले लोग अवसरवाद, आत्मत्याग और मूल सिद्धांतों से भटकाव करार देंगे।

यह नई बात नहीं है, न ही निर्णायक है,’ लेनिन बोले। ‘इस बात से परेशान ना हो। ऐसा क्यों है कि कहीं भी पार्टी में उतनी महिलाएं नहीं हैं, जितने पुरुष हैं? यहां तक कि सोवियत रूस तक में नहीं है? मजदूर संघों में भी महिलाओं की संख्या इतनी कम क्यों है? यह बात विचार करने योग्य है। महिलाओं के बीच काम करने के लिए बेहद जरूरी विशेष समूहों को नकारना, हमारी कम्युनिस्ट मजदूर पार्टी के बहुत ही सिद्धांतवादी, क्रांतिप्रिय मित्रें का रुख है। उनका मानना है कि सिर्फ मजदूर यूनियन जैसा एक ही संगठन रहना चाहिए। मैं जानता हूं, जब भी समझदारी की कमी होती है, यानी जब भी दिमाग ध्यान दिए जाने वाले तथ्यों को समझने से इंकार कर देता है, तब क्रांतिवादी मानसिकता वाले लेकिन भ्रमित साथी सिद्धांतों को ओढ़ लेते हैं।



‘सिद्धांतों की पवित्रता के ये रखवाले हमारी क्रांतिकारी नीतियों की ऐतिहासिक जरूरतों से कैसे कदम मिला पाएंगे? उनकी तमाम बातें कठोर आवश्यकताओं के सामने धराशायी हो जाती हैं। हमारी तरफ जब तक लाखों महिलाएं न हो जाए, हम सर्वहारा की तानाशाही नहीं लागू कर पाएंगे। ना ही हम उनके बगैर कम्युनिस्ट निर्माण में ही जुट पाएंगे। हमें, उन तक पहुंचने की राह ढूंढनी ही होगी। उसे पाने के लिए हमें अध्ययन और शोध करना होगा। फ्इसीलिए हमारे लिए यह बिल्कुल ही उचित होगा कि हम महिलाओं की भलाई के लिए मांगें रखें। यह कोई न्यूनतम कार्यक्रम नहीं है, न ही दूसरी इंटरनेशनल के ‘सामाजिक जनवादी’ अर्थ में सुधार का कार्यक्रम। यह ये दर्शाने नहीं जा रहा कि हम मानते हैं कि बुर्जुआ और उनका राज्य हमेशा रहेगा, या लंबे समय तक रहेगा। ना ही ये महिलाओं में सुधार की गति बढ़ाकर, उन्हें क्रांतिकारी संघर्ष से भटकाने का ही प्रयास है। यह ऐसे किसी तरह का काम नहीं है। ना ही किसी सुधारवादी गपोड़ की तरह है। हमारी मांगें तो उन व्यवहारिक नतीजों पर आधारित हैं, जो हमने कमजोर और वंचित महिलाओं के असभ्य निरादर के कारण निकली जरूरतों से निकले हैं। वो निरादर जो उन्होंने बुर्जुआ व्यवस्था में सहा। इस तरह हम बता पाएंगे कि हम उन जरूरतों को जानते हैं, साथ ही महिलाओं के दमन से परिचित हैं। हमें पुरुषों के वर्चस्व की जानकारी है। इन सबसे हम घृणा करते हैं, हां घृणा करते हैं, और जो कुछ भी कामकाजी महिलाओं, मजदूरों की पत्नियों, किसान महिलाओं, साधारण व्यक्ति की पत्नी और यहां तक कि कई मामलों में सम्पन्न वर्ग की महिलाओं का दमन करे, उन पर अत्याचार करे, उसे दूर करना चाहते हैं। बुर्जुआ  समाज से हम महिलाओं के लिए जो अधिकारों और सामाजिक मानदंडों की मांग करते थे, वो इस बात का सबूत है कि हम महिलाओं की स्थिति और हितों को जानते हैं, और हम सर्वहारा की तानाशाही में उसका ख्याल रखेंगे। जाहिर है, कि सोये हुए और संरक्षक सुधारवादी की तरह नहीं। ना! किसी भी तरह नहीं। बल्कि ऐसे क्रांतिकारियों की तरह जो आर्थिक तंत्र और विचारधारात्मक ढांचे के निर्माण में महिलाओं को समान रूप में शामिल कर रहे हैं।’

मैंने लेनिन को आश्वस्त किया कि मैं भी इसी विचार की हूं, और इसका विरोध जरूर होगा। अनिश्चित और कायर दिमाग इसे संदिग्ध अवसरवाद कहकर खारिज कर देंगे। इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि महिलाओं के लिए हमारी वर्तमान मांगों को गलत समझा जाए, उनका गलत अर्थ निकाला जाए।
‘तो क्या?’ थोड़े गुस्से में लेनिन ने गहरी सांस ली। ‘हर बात जो हम कहते और करते हैं, सब में यह खतरा रहता ही है। यदि हम इससे डर गए तो यह हमें अनुशंसित और आवश्यक काम करने से रोकेगी, हम भारतीय स्तम्भनिवासियों में बदल जाएंगे। हमें डिगना नहीं है। किसी भी कीमत पर डिगना नहीं है। अन्यथा हम अपने सिद्धांतों के आधार-स्तम्भों से हिल जाएंगे। हमारे मामले में बात सिर्फ इतनी-भर नहीं है कि हम क्या मांग रहे हैं, बल्कि हम कैसे मांग रहे है। मुझे लगता है मैंने वो बिल्कुल स्पष्ट कर दिया है। ये अकारण नहीं है कि हमारे प्रचार में हम महिलाओं के लिए हमारी मांगों की देवमूर्ति न बनाएं। नहीं! हमें अब उसके लिए लड़ाई लड़ना चाहिए, अभी के हालात अनुसार, निश्चित ही सर्वहारा के साधारण हितों के साथ-साथ ही अब अन्य मांगों के लिए भी संघर्ष करना चाहिए।



‘इस तरह का हर द्वंद हमें आदरणीय बुर्जुआ समूह और पिछलग्गुओं के समक्ष प्रतिद्वंद्वी बना देता है।  यह आदरणीय सुधारवादी पिछलग्गू किसी तरह कम नहीं हैं। हमारा द्वंद्व उन्हें हमारे नेतृत्व में लड़ने के लिए बाध्य करता है या फिर अपना छप्रवेश उतारने के लिए, जो वे नहीं चाहते। इस तरह, संघर्ष हमारे और उनके बीच फर्क करता है। हमारे कम्युनिस्ट चेहरे को दिखाता है। ये हमें, महिलाओं का विश्वास दिलाता है, जो कि पुरुषों, उनके नियोक्ताओं की शक्ति और सारे बुर्जुआ -समाज के वर्चस्व से खुद को शोषित, बंधक और दमित पाती हैं। सभी के द्वारा छली गई और अकेली छोड़ दी गई कामकाजी महिलाएं महसूस करती हैं कि उन्हें हमारे साथ आकर संघर्ष करना चाहिए। मैं स्वीकार करता हूं, तुम भी मानों कि महिलाओं के हकों की लड़ाई को, सर्वहारा की तानाशाही की सत्ता और व्यवस्था लाने के हमारे मुख्य लक्ष्य से भी जोड़ा जाना है। फिलहाल तो यही हमारा आदि और अंत है और यही रहेगा भी। यह स्पष्ट है, बिल्कुल स्पष्ट। लेकिन यदि हम सिर्फ इसी एक मांग को दोहराते रहेंगे या उसकी गर्जना भी करेंगे तो महिलाओं की बड़ी संख्या अपने-आप, राज्य सत्ता के लिए हो रहे संघर्ष से नहीं जुड़ेंगी। नहीं! हजार बार कहूंगा नहीं। हमें हमारी अपील कामकाजी महिलाओं की पीड़ाओं, जरूरतों और इच्छाओं के साथ राजनीतिक रूप से उनके दिमाग में बिठानी पड़ेगी। उन सभी को यह बताना पड़ेगा कि उनके लिए सर्वहारा की तानाशाही का क्या मतलब होगा। कानूनी और व्यावहारिक दोनों ही तौर पर, पुरुषों के बराबर हक- परिवार में, राज्य और समाज में। यह भी कि इसका मतलब है बुर्जुआ  सत्ता का पूरा सफाया।'

 मैंने कहा, 'सोवियत  रूस ने सिद्ध किया है कि यह हमारा महान उदाहरण होगा!’
क्रमशः

भारत विज्ञान समिति द्वारा 'महिलाओं के मुद्दे' शीर्षक से प्रकाशित किताब से साभार. हिंदी में अनुवाद मनोज कुलकर्णी ने किया है 

तस्वीरें गूगल से साभार 

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