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युवा कवयित्री ने की आत्महत्या

स्त्रीकाल डेस्क 

युवा कवयित्री और पर्यावरण एवं धारणीय विकास संस्थान, बीएचयू की शोधछात्रा ख्याति आकांक्षा सिंह ने मंगलवार की सुबह साढ़े चार बजे अपने किराये के कमरे में छत के पंखे से फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली.

ख्याति

वह लंका थाना क्षेत्र के नगवां के रहने वाले नागेश्वर सिंह के मकान में एक महीने से बतौर पीजी रह रही थी। बताया जा रहा है कि आत्महत्या के पहले व हअपने मंगेतर के साथ वीडियो चैटिंग कर रही थी, किसी बात पर अनबन हुई और तभी दुप्पटे को फंदा बनाकर फांसी पर झूल गई। उसका मंगेतर रामनगर से तत्काल पीजी हास्टल पहुंच गया और इसकी जानकारी मकान मालिक को दी। मकान मालिक के सहयोग से दरवाजा खोलकर तत्काल उसे फंदे से उतारा गया। प्राक्टोरियल बोर्ड के अधिकारी एवं पुलिस भी मौके पर पहुंच गये।

मौके से बरामद सुसाइड नोट में लिखा है कि ‘वह अपनी मौत की खुद जिम्मेदार है और इसके लिए किसी को परेशान न किया जाए. मंगेतर को संबोधित करते हुए लिखा है कि श्वेतांक मैं माफी मांगती हूं और मेरा अंतिम संस्कार बनारस में ही किया जाए.’

ख्याति सिंह ने भोपाल से एमए किया था और हाल ही में 20 अप्रैल को बीएचयू में प्रवेश लिया था। इस बीच परिवार वालों ने राम नगर निवासी नेवी में इंजीनियर श्वेतांक कुमार के साथ 30 अप्रैल को बनारस में सगाई कराई। पुलिस के अनुसार ख्याति की मां ने बताया है कि उनकी बेटी माइग्रेन से पीडि़त थी।

ख्याति सिंह का एक काव्य संग्रह ‘कहीं तो होगा’ प्रकाशित हो चुका है. भोपाल के एक साहित्यकार के अनुसार उसकी एक कविता पुस्तक (पांडुलिपि) साहित्य अकादमी के पास स्वीकृति के लिए पेंडिंग है.

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पत्रकारिता के निम्नतम स्तर पर पहुंचा टाइम्स नाउ : महिला पत्रकार और कानूनविद

अविका 

गोवा में यौन-शोषण का वीडियो फुटेज दिखाकर टाइम्स नाउ ने किया महिला का अपमान और क़ानून का उल्लंघन.



 तहलका में काम करने वाली पत्रकार का उसके पूर्व सम्पादक तरुण तेजपाल द्वारा यौन-शोषण के संबंध  में 28 मई 2018 को वीडियो फुटेज दिखाने के बाद टाइम्स नाउ विवादों के घेरे में है. महिला पत्रकारों के समूह ने इस पर रोष व्यक्त किया है वहीं कई कानूनविद इसे पीडिता की छवि खराब करने की कोशिश बता रहे हैं. ‘द नेटवर्क ऑफ़ वीमेन इन मीडिया’ ने इस संबंध में टाइम्स के प्रबंधक समूह को पत्र लिखकर 28 मई को क्रमशः 8 और 9 बजे शाम की शो को अनैतिक और गैरकानूनी बताया है. महिला पत्रकारों के अनुसार वे शो धारा 327(2) और (3) का उल्लंघन है.  ‘द नेटवर्क ऑफ़ वीमेन इन मीडिया’ इसे  रेप सर्वायावर महिला का अपमान और उसकी छवि खराब करने का प्रयास मानता है.

पढ़ें  ‘द नेटवर्क ऑफ़ वीमेन इन मीडिया’  का पूरा  पत्र 


सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता और महिला कानूनों के विशेषज्ञ अरविंद जैन भी कहते हैं “मामला न्यायालय के अधीन है. सत्र न्यायालय ने आरोप तय कर दिया है. अभियुक्त आरोप के खिलाफ हाई कोर्ट गया, जहां अपील निरस्त हो गयी है तो अब सुप्रीम कोर्ट पहुंचा है. चार्ज के लिए प्रथम दृष्टया देखा जाता है कि कोई ऑफेंस बनता है कि नहीं. सुप्रीम कोर्ट में लिफ्ट के सीसीटीवी फुटेज के आधार पर अपील की गयी है. टाइम्स नाउ को वह फुटेज मिला है तो जाहिर है कहाँ से मिला होगा.

टाइम्स नाऊ उसी फुटेज को बार-बार दिखा रहा है. हालांकि उसमें बार-बार यह कहा जा रहा है, ऐंकर द्वारा कहा जा रहा है कि फुटेज से यह सिद्ध तो होता है कि कुछ हुआ है और यह भी सिद्ध नहीं होता कि कंसेंट था. लेकिन उसने जो पैनल बैठा रखा है, वह अभियुक्त का वकील है. वह कह रहा है कि लडकी ने सौ करोड़ रूपये की मांग की थी.कुल मिलकर जब मामला चार्ज के स्तर पर है, निर्णय बाकी है तब फुटेज दिखाकर बार-बार विवरण दिया जा रहा है, लड़की की छवि भी खराब करने की कोशिश हो रही है. दिखता हुआ यह कार्यक्रम तेजपाल के खिलाफ है लेकिन वास्तव में यह पीडिता को ही कठघरे में खडा करने की मंशा से दिखाया जा रहा है.

यह सारा प्रकरण कंटेम्प्ट ऑफ़ कोर्ट है. आप चार्जशीट फ़ाइल होने के बाद और ट्रायल शुरू होने के बाद ऐसा नहीं कर सकते. साथ ही वह जो वकील सौ करोड़ मांगने की बात बिना प्रूफ के कह रहा है वह भी प्रोफेशनल एथिक्स के खिलाफ है, मानहानि इसमें बनता है.

क्या था तरुण तेजपाल के खिलाफ आरोप 
तहलका के पूर्व संपादक तरुण तेजपाल के खिलाफ पश्चिमी गोवा के मापुसा की एक निचली अदालत ने सितंबर 2017 में ही आरोप तय कर दिये थे. इस मामले की पीड़िता ने यह आरोप लगाया था कि नवंबर, 2013 में तहलका मैगज़ीन की तरफ़ से आयोजित एक इवेंट में उनके साथ बदसलूकी की थी. लिफ्ट में उनके साथ जबरदस्ती ओरल की कोशिश की. तरुण तेजपाल को इस केस में 30 नवंबर 2013 को गिरफ़्तार किया गया था. उन पर आईपीसी की धारा 341 (ग़लत तरीक़े से नियंत्रण), धारा 342 (ग़लत तरीक़े से बंधक बनाना), धारा 354-ए (किसी महिला के साथ यौन दुर्व्यवहार और शीलभंग की कोशिश), धारा 376 (बलात्कार) लगाई गई है. बाद में आपराधिक कानून (संशोधन) अधिनियम, 2013 की धारा 376 (2)(के) के तहत भी आरोप लगाया गया है, जिसका मतलब है कि एक ऐसे व्यक्ति के द्वारा बलात्कार की कोशिश जो महिला का संरक्षक हो.

तरुण तेजपाल भारत में स्टिंग पत्रकारिता के शिखर लोगों में से एक रहे हैं. तेजपाल के तहलका मैगज़ीन के एक स्टिंग ने अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार को काफ़ी परेशान किया था. तत्कालीन रक्षा मंत्री जॉर्ज फ़र्नांडिस को अपने पद से इस्तीफ़ा देना पड़ा था.

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इकाई नही मैं करोड़ो पदचाप हूँ मैं: रजनी तिलक की काव्य-चेतना

अनिता भारती 


रजनी तिलक  होतीं तो आगामी 27 मई को 60वां सालगिरह मना रही होतीं. पिछले 30 मार्च 2018 को उनका परिनिर्वाण हो गया. प्रथमतः सामाजिक कार्यकर्ता की छवि वाली राजनीतिलक को हिन्दी दलित साहित्य की प्रथम कवयित्री बताते हुए अनिता भारती ने उनकी काव्य-चेतना पर यह लेख लिखा है. 27 मई को उनके जन्मदिवस के पूर्व पठनीय यह लेख. रजनी तिलक  की छोटी बहन अनिता भारती स्वयं लेखिका, विदुषी और सामाजिक कार्यकर्ता हैं: 

रजनी तिलक संभवत हिन्दी दलित साहित्य की पहली कवयित्री हैं,  जिनकी कविताएं 80 के दशक में विभिन्न दलित पत्र- पत्रिकाओंं में छपने लगी थीं और लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने लगी थी। हालांकि उनका पहला काव्य संग्रह पदचाप’ बहुत बाद में छपकर आया। काव्य संग्रह देरी से आने का कारण शायद रजनी तिलक का स्वयं अपने आप को साहित्यकार से अधिक सामाजिक राजनैतिक कार्यकर्ता मानना रहा होगा । चूकि रजनी तिलक अपने जीवन के अधिकतम सालों में  सामाजिक जीवन व दलित व स्त्री आंदोलन में सक्रिय रहीं, इसी कारण शायद किताब छपना न छपना उनके लिए कोई मायने  नही रखता था ।

दलित स्त्रीवाद के विभिन्न स्वर समेटे हुए उनका काव्य संग्रह पदचाप कई मायने में महत्वपूर्ण है। सबसे पहली बात तो यही है कि रजनी तिलक कई मोर्चों पर पूरी एक जमात के हक के लिए एक साथ डटी हुई थीं। वह जिनकी हिमायत में खडी थी उनमें  प्रमुख रुप से, दलित,स्त्री , दलित स्त्री, सर्वहारा वर्ग शामिल था. रजनी तिलक लगातार इन शोषित दमित उत्पीडित अस्मिताओं के संघर्ष और अधिकार की लड़ाई के पक्ष में और उनका दमन करने वाली ब्राहम्णवादी पितृसत्तात्मक व्यवस्था के खिलाफ अपनी कविताएं लिख रही  थीं। स्त्री आंदोलन के अन्तर्गत उठने वाले सवाल, उनके अपने अंतर्द्वन्द्व, उनकी सीमाओं को पहचानते हुए उनके अनुभव उनकी कविताओं के मूल विषय रहे हैं। इसी तरह दलित आंदोलन की वैचारिकी के सवाल, उसमें दलित स्त्री की हैसियत, उसकी पीड़ा , उसकी आकांक्षा की बानगी उनकी कविताओं में देखी जा सकती है। सर्वहारा के सवाल वे एक जमात या वर्ग के रुप मे उठाती हैं। उनकी कविताओं मे वर्गीय चेतना, जातीय चेतना, और वैयक्तिक चेतना के स्वर प्रमुख रुप से दिखते हैं।

पदचाप कुल चौसठ पृष्ठों का काव्य संग्रह है। इसमें  कुल 59 कविताएं है . पदचाप का एक संस्करण के बाद दूसरा संस्करण 2008 में निधि बुक्स से आया है। वह अपनी भूमिका में लिखती है – मैं खुश हूँ कि स्पर्धा और छपने-छपाने की होड़ में जहाँ लेखक या प्रकाशक को अपनी पुस्तकों की मार्केटिंग के लिए मशक्कत करनी पडती , मुझे ऐसा नही करना पड़ा। न ही नामचीन व्यक्तियों को सिफारिश करनी पड़ी। पदचाप ने अपने पैरो चलकर अपनी पहचान बनाई है।- पृ-9

पदचाप में लिखे अपने आत्मकथ्य में दलित महिलाओं की स्थिति पर वह कहती है – आजादी की स्वर्ण जयंती और मानव अधिकार की घोषणा के पचास वर्ष बीतने जाने पर भी दलित स्त्रियों की हालत में विशेष परिवर्तन नही आया है।शिक्षा, राजनीति, प्रशासनिक सेवा, वाणिज्यिक क्षेत्र में उसकी पहुँच नगण्य है। अगर वो कहीं  है तो शहर की स्लम, धुूल व बदबूदार दूर-दराज गाँव देहातों के बाहर बनी बस्तियों में। -पृ -11

रजनी तिलक अपनी कविताओं में  प्रगतिशील तबके के छद्म मुखौटाधारियों से सतत टकराती है। अपने आत्मकथ्य में एक अन्य जगह वह लिखती है –  मेरा परिचय 1978 में प्रगतिशील साथियों से हुआ, जिनका विश्लेषण था कि दलितों की विवशता का मुख्य कारण आर्थिक शोषण है जिससे उनकी सामाजिक हैसियत तय होती है।पृ-9  क्या यह सही नही है कि रजनी तिलक ने अपने प्रगतिशील साथियों पर जो सवाल 1978 में खडे किए ,वह सवाल आज भी ज्यों के त्यों ही खडे हुए है उत्तर की आशा में।

एक ऐसा ही दूसरा सवाल दलित सामाजिक राजनैतिक कार्यकर्ताओं के सामने भी वह खड़ा करती हैं – मुम्बई  में नौकरी मिलने के कारण दलित साहित्य, दलित पैंथर, आंदोलन में स्त्रियों की भागीदारी की अनुपस्थिति और पितृसत्तात्मक रवैया भी देखने को मिला-(पृ12)

पदचाप में संकलित रजनी तिलक की कविताओं को मुख्य स्वर के आधार पर  चार भागों में बाँटा जा सकता है. उनकी कविताओं का प्रमुख स्वर आशावादी है। चाहे वह दलित स्त्री की स्थिति की बात हो या दलित समाज की या फिर सर्वहारा समाज की , वह उनकी स्थिति में बदलाव के लिए हमेशा आशावान रहती हैं. रजनी तिलक स्थितियां  पलटने और बदलने में विश्वास रखती है.उनकी कविताओं  का दूसरा मुख्य स्वर विपरित दमनकारी स्थिति से हारकर बैठने की बजाय उनके खिलाफ संघर्ष करना है। कवयित्री को हमेशा लगता है कि रात सुबह का आगाज है। इसलिए संघर्ष ही मुक्ति का एक मात्र रास्ता है।  उनकी कविताओं का तीसरा स्वर समानता में विश्वास होना है। वह लगातार अपने अंदर इस विश्वास को जगाएं रखती है कि एक दिन समाज में समानता का  बिगुल जरुर बजेगा। मुक्ति की कामना और मुक्ति का स्वप्न उनकी कविताओं का चौथा मुख्य स्वर है। जिसमें वह कामना करती है कि एक दिन मनुष्य को भेदभाव पूर्ण अन्याय से,शोषण से,भूख से, दुःख  से, उत्पीड़न से, गुलामी से, युद्ध से, जरुर मुक्ति मिलेगी और वह मानव होने की पूर्ण गरिमा को जरुर प्राप्त करेगा।

पदचाप में संकलित पहली कविता सावित्रीबाई फुले पर है.। कवयित्री लोगों से आहवान करती हैं कि आज सावित्रीबाई को पूजने की जगह अनुकरण करने की जरुरत है. क्योंकि सावित्रीबाई फुले ने ही दलित शोषित स्त्रियों को उनकी मुक्ति की राह दिखाई है:
दलित और पद-दलित स्त्रियों को
तुमने ककहरा ही नही सिखाया
भर दिया उनमें विद्रोह
धैठा था  एक द्वंद्व, एक जेहाद
पोंगा-पुरोहित व वेद शास्त्रों के खिलाफ

स्तंभ कविता में वह सावित्रीबाई फुले को अपने आदर्श के रुप में स्थापित करते हुए उन्हें नारीवादी दार्शनिक कहते हुए  कहती हैं:
तुम्हीं हो हमारी आदर्श
हमारे बंदी संस्कारों की,
वर्गीय-दर्प और उत्पीड़न की
पथ प्रदर्शक सावित्री
तुम्ही हो दर्शन हमारे नारीवाद की

अपनी एक अन्य कविता में युद्ध के स्थान पर बुद्ध की स्थापना जो कि शान्ति ,समता, बंधुत्व और विश्व शान्ति के प्रतीक हैं  को अपनाने की बात करती है। वह युद्ध की राजनीति पर प्रहार करती हैं. युद्ध में मारे गए व घायल हुए हिरोशिमा के बच्चों की माँ के दुख को महसूस करती है। हिरोशिमा की माओं के दुखों का वर्णन करते हुए वह कहती हैं-
हिरोशिमा की माँओं की सिसक
अभी बाकी है
ये जंग की तलवार
हमारे सिर से हटा दो
बारुद के ढेर पर
क्यों खड़ी है हमारी दुनिया ?

कवयित्री काफीहाउस में बैठकर देश दुनिया के मजदूरो किसानों दलितों के प्रति चिंता जताने वाले, उन पर साहित्य रचने वालों पर व्यंग्य करती हैं। उन्हें हैरानी है कि वे यह काम कैसे कर पाते हैं। 
कौन है वो ?
कॉफी होम में बैठ, खूब बतियाते है,
खेत- खलिहान, पर्यावरण पर
खूब लिखते हैं
खेतों में पैदा नही हुए
परंतु उनकी गंध सूँघते है,
दलित उत्पीड़न सहा नही
महसूस करते है
हो भाव विभोर
मार्मिक कविता लिखते है
मैं हैरान हूँ –
उन्होने हमारे दर्द
गीतों में पिरोए कैसे ?

इसी कड़ी में अपने संघर्ष के साथी कामरेड, जिन्हें  वह दादा यानि बड़ा  भाई कहती थी, मानती थी, जो एक बहुत बडे मानवअधिकारवादी कहलाते थे, उनके द्रारा किए गए विश्वास घात की पोल खोलते हुए कहती है कि क्या परिवार में पति के अलावा पत्नी और बच्चों के कोई  मानव अधिकार नही होते?  समाज बदलाव की लड़ाई में हम उस पक्ष को ही क्यों चुनते है जो सक्षम होता है, जिससे हमें फायदा होता है। पति और पत्नी यदि दोनों कामरेड हो तो क्या पति पुरुष का कामरेड साथी इसलिए उसके साथ खडे हो जायेंगे कि वह भी पुरुष है? यह कविता नितांत उनके व्यक्तिगत दुःख की है: 
दादा
तुमने मुझे स्नेह दिया
अपनी छोटी बहन समझ
सिखाया
तुम थे जिसने
उसे वकील का रास्ता दिखाया
विश्वास नही होता

जन-संघर्ष के अभियान में
मैं कब पीछे रही
पुलिस अत्याचार
राजनैतिक बंदियों के मुठभेड़
अत्याचारों की जाँच- पड़ताल
और रिपोर्ट,
इन सबकी अंतिम कड़ी में
तुम्हारे साथ सदा जुडी थी।

जानना चाहती हूँ आज मैं
बच्चों और स्त्रियों के सवाल
क्या मानव अधिकार नही ?
बच्चों की मुस्कान
औरत का स्वाभिमान
क्या उनका मानव अधिकार नही?

अपने कविता संग्रह पदचाप  में कवयित्री रजनी तिलक दलित आंदोलन में व्याप्त पितृसत्ता के खिलाफ, अपने पथ के साथ आंदोलन कारी दलित सामाजिक कार्यकर्ता को सचेत करती हैं कि मानव मुक्ति की लड़ाई सिर्फ पुरुषों की लड़ाई नही है उस लड़ाई में स्त्रियाँ भी बराबर की भागीदार है। सिर्फ पुरुषों के चाहने से ही क्रांति संभव नही है उसमें आधी आबादी के मुक्ति के सपने को भी जोड़ना पडेगा। 
मेरे दोस्त
मानव मात्र की मुक्ति के पक्षधर
अपने लिए मुक्ति चाहते हो
मेरा भी हक है

कवयित्री पुरुष से नही पितृसत्तात्मक मूल्यों से छुटकारा पाना चाहती है:
तुम्हारे साथ थी
कैदी थी तुम्हारी
अब अपने साथ हूँ
कैदी हूँ संस्कारों की

कवयित्री इन्ही संस्कारो का, इन्ही ब्राहमणवादी मूल्यों का पिंजरा तोड़कर मुक्ति की कामना करती है। इस मुक्ति की राह को राह को पार करने के लिए वह बडे से बड़ा जोखिम उठाने को तैयार है. वह किसी लोभ लालच और उपलब्धी की मोहताज नही है. वह हर तरह के कंटक हटाकर आगे अपने आगे बढ़ने की जुगत निकालती है:
परिंदा हूँ
मुझे खुला आसमान चाहिए
न बरगला
मैं पिंजरा तोड़ के आई हूँ
मुझे मेरी मंजिल है प्यारी
न डिगा
मैं काँटे रौद के आई हूँ।

सवाल यह है कि कवयित्री रजनी तिलक की राह के वह कौन से काँटे हैं जिन्हे वह रौंद के आईं है। क्या यह काँटे समाज में दलित स्त्री की दयनीय स्थिति के है या उसको दोयम समझे जाने की पीड़ा के हैं। क्या इन काँटोें में सवर्ण स्त्रीवाद और दलित पुरुषवाद का हाथ है अथवा समाज की क्रूर जातीय व्यवस्था इसकी जिम्मेदार है। कुल मिलाकर यही दर्द उनकी कविताओं का मुख्य स्वर है। जहाँ वह व्यवस्था से लेकर अपने संगी साथियों से भी चुनौती झेलती है। कवयित्री बेहद चिंतित है कि दलित स्त्री किस तरह पशुवत जीवन जीती है:
ये
कंजरो की बस्ती
झुंड औरतें
निरीह बकरियों सी.
नीले पीले काले घाघरे,
बेमेल ढेर कंठियाँ,
कानों पर ढोती
आठ आने वाली झुमकियाँ.

स्कूलों से वंचित बच्चियाँ
ये भी है अपनी
माँ की आँखों की पुतलियाँ
सीलन भरी
सूअर बाड़े सी आवास पट्टियाँ
जिन्हे विकास और योजनाओं ने
चिन्हित नही किया

भेड़िए कविता के माध्यम से कवयित्री रजनी तिलक ने दलित औरतों के प्रति समाज की विकृत मानसिकता को उजागर किया है। यह समाज उस भेडिए की तरह है जो मासूम भेडो को अपना शिकार बनाता रहता है.
एक अकेली औरत
जिसे परिवार ने निकाल दिया
वह सड़क पर नितांत अकेली है,
भेड़ियों से दर्जने आँखे
लपलपाती जुबानें
उसे सूँघने का काम करती है

सवर्ण स्त्रीवाद जो कि यह कहता है कि सभी स्त्री एक है। सभी स्त्रियों की पहचान एक ही और वह एक मात्र पहचान है उसका स्त्री होना. पर रजनी तिलक उनकी सवर्ण मानसिकता पर सवाल खडे करती हैं, वे कहती हैं:
औरत औरत होने में
जुदा-जुदा फर्क नही क्या
एक भंगी तो दूसरी बामणी
एक डोम तो दूसरी ठकुरानी
दोनों सुबह से शाम खटती है
बेशक, एक दिन भर खेत में
दूसरी घर की चारदिवारी में
शाम को एक सोती है बिस्तर पर
तो दूसरी काँटो पर।

एक सताई जाती है स्त्री होने के कारण
दूसरी सताई जाती है स्त्री और दलित होने पर
एक तड़पती है सम्मान के लिए
दूसरी तिरस्कृत है भूख और अपमान से।

एक सत्तासीन है तो दूसरी निर्वस्त्र घुमाई जाती है
औरत नही मात्र एक जज्बात
हर समाज का हिस्सा,
बँटी वह भी जातियों में
धर्म की अनुयायी है
औरत औरत में भी अंतर है।

रजनी तिलक चूंकि गहरे तक दलित आंदोलन में जुडी रही इसलिए दलित आंदोलन के सामने जो खतरे है जिनके कारण उसके टूटने बिखरने का जो खतरा है , जो उसकी कमियां है, जो उसकी खासियत है या फिर जो उसकी ताकत है वह इस इन सबसे अच्छी तरह से वाकिफ थी. दलित आंदोलन के सामने आज जो सबसे बड़ी चुनौती है वह उसका उपजातीय समूह में बँटा होना और आपस में रोटी बेटी का संबंध न होना। दलित समााज का इस तरह उपजातीय में बँटने का कारण हिन्दू धर्म की जातीय व्यवस्था है। जो इंसान से इंसान को जाति के आघार पर अलग करती है। उनको रोटी बेटी के संबंध करने और एक साथ मिलकर रहने खाने पर पाबंदी लगाती है। ऐसा नही कि पूरे दलित समुदायों में आपस में रोटी बेटी का संबंध नही है। रोटी बेटी का संबंध अम्बेडकरवादी विचारधारा के साथी तो कर रहे है परंतु जो अभी अम्बेडकरवाद के प्रभाव से दूर है उन्ही के लिए कवयित्री कहती है:
हम दलित
अनेक उपजातियों में बँटे
अनेक भिन्नताओं में पले
भूख प्यास , घृणा, हीनता को भोगते
जिंदा है आज भी,
लिए लडाई अस्तित्व और समानता की

उनकी बात में न आना
मकसद है उनका हमें लडाना
असमानता ना फले फूले चारो ओर
लड़ना है हमें असमानता से
गढ़नी है भाषा, बढाना है विज्ञान,
तभी बनेगा जातिविहीन समाज

कवयित्री रजनी तिलक जानती है बल्कि यूं कहे यह उनके अनुभव का विशाल दायरा है कि वे जिसे हमारे प्रगतिशील साथी सर्वहारा जमात कहते है दरअसल वह हमारे दलित मजदूरों का पूरा एक वर्ग है जो फैक्ट्री, खेत खलिहान, असंगठित में रात दिन खटता और पिसता है। मजदूर है इस देश का दलित कविता में रजनी तिलक यही बता रही है कि:
हर कष्ट में मुस्कुराता तेरा चेहरा,
जैसे भट्ठी में तपता सूर्ख लोहा
दलित ! तुम हो इस देश के मजदूर

गर्मियों में लहू टपकता, बन पसीना तुम्हारा
सर्दियों में अर्ध वस्त्र , ठंड से बेहाल बेचारा
दलित !तुम हो इस देश के सर्वहारा.

रजनी तिलक एक प्रदर्शन में

कवयित्री सिर्फ दलित सर्वहारा वर्ग की पहचान ही नही करती अपितु उसको दलित दरिद्र में ढ़केलने वाले पूँजीपतियों पर भी प्रहार करती है और कहती है कि दलित मजदूरों की दूर्दशा का सामाजिक शोषण के साथ-साथ उनका आर्थिक रुप से शोषण भी है:
शोषण के अधिकारी, ये पूँजीवादी
इंसानियत के गद्दार, हैवान के साथी,
तुम्हें  न देते दो जून भरपेट रोटी
दलित ! तुम ही हो
इस देश के भूमिहीन कृषक सर्वहारा

यदि किसी को कवयित्री और सामाजिक नेत्री रजनी तिलक के स्त्रीवादी, समाजिक राजनैतिक आंदोलनधर्मी, सामाजिक राजनैतिक और वैयक्तिक जीवन को आंकना हो, उनके सामाजिक सरोकार जानने हो, उनकी इच्छाएं आकांक्षाएं समझनी हो, उनका समाज बदलाव का स्वप्न देखना हो तो उनकी पदचाप शीर्षक वाली कविता जरुर एक बार पढ़ लेनी चाहिए। पदचाप कविता एक बेहद सशक्त कविता है। ‘करोड़ो पदचाप हूँ’में वह बयान करती हैं:
मैं दलित अबला नहीं
नये युग की सूत्रपात हूँ
सृष्टि की जननी,
नये युग की आवाज हूँ
मेरा अतीत
बंधनों का
गुलामी के इतिहास का
युगों युगों के  दमन का वहन है।

अब-
मैं छोड़ दूंगी गुलामगिरी,
तोड़ दूंगी बेड़िया
सृजन में बाधक प्रेम की।

मेरा दुःख
दुःख नहीं
आशाओं का तूफान है
मेरे आँसू आँसू नहीं है
जंग का पैगाम है
इकाई नही मैं
करोड़ो पदचाप हूँ
मूक नही मैं
आधी दुनिया की आवाज हूँ
नए यूग की सूत्रधार हूँ.

अनिता भारती साहित्य की विविध विधाओं में जितना लिखती हैं , उतना ही या उससे अधिक सामाजिक मोर्चों पर डंटी रहती हैं  खासकर दलित और स्त्री मुद्दों पर. सम्पर्क : मोबाईल 09899700767.

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भाजपा का चार साल: प्रधानमंत्री से नाराज आधी आबादी

डेस्क 

भाजपा की अगुआई में एनडीए सरकार अपने चार साल पूरे होने का जश्न मना रही है. हालांकि विरोधी पार्टियां इस अवसर पर मंहगाई और अन्य मुद्दों पर सरकार को घेरने की तैयारी भी कर रही हैं. इस बीच सरकार पर सवाल आधी आबादी की ओर से भी उठने लगे हैं.

महिलाओं के संगठनों ने पिछले कुछ महीनों में दर्जनो पत्र प्रधानमंत्री नरेंद मोदी को भेजकर उनसे समय माँगा है, लेकिन प्रधानमंत्री उन्हें मिलने का समय नहीं दे रहे. कारण है भाजपा के घोषणा पत्र में महिला आरक्षण के लिए किया गये वादे पर मोदी सरकार की बेरुखी.

भाजपा ने 2014 में अपने घोषणापत्र में लिखा था कि ” भाजपा संविधान संशोधन के जरिये संसद एवं राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण प्रदान करने को प्रतिबद्ध है.’ हालांकि पार्टी ने पिछले चार सालों में इस मुद्दे पर कभी कोई पहल नहीं की.  महिलाओं के एक प्रतिनिधि मंडल से इस मसले पर बातचीत के लिए सरकार के ताकतवर मंत्री अरुण जेटली ने महज दो-तीन मिनट का समय दिया था. उनके व्यवहार से आहत महिला समाजकर्मी स्पष्ट हो चुके थे कि सरकार इस विषय को ठंढे बस्ते में डाल चुकी है. इस बीच पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी, कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी, उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने  आदि ने महिला आरक्षण पास करने को समय की जरूरत बताया. सोनिया गांधी ने सितंबर 2017 में ही इस मसले पर प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिखी थी. लेकिन प्रधान मंत्री मोदी की इस विषय पर चुप्पी और सरकार द्वारा चार सालों में कोई पहल न किया जाना सरकार की उदासीनता का संकेत है.

बीजेपी के घोषणापत्र का एक हिस्सा

महिला अधिकार कार्यकर्ता पद्मिनी कुमार कहती हैं कि ‘भाजपा ऐसी स्थिति में थी कि वह अपने बूते पर इस बिल को पास करा ले जाती. राज्यसभा से यह बिल पहले ही पारित हो चुका है. लोकसभा में भाजपा को पूर्ण बहुमत है और एनडीए तथा कांग्रेस को मिलाकर संविधान संशोधन के लिए इनके पास पर्याप्त संख्या बल है.’ गौरतलब है कि लोकसभा में भाजपा के अकेले 281 सदस्य थे, जबकिउपचुनावों में हार और कर्नाटक से येदुरप्पा और एक अन्य सांसद के इस्तीफे के बाद यह संख्या 271 (बहुमत से एक कम) हो गयी है.

भाजपा के महिला नेता और उसके महिला मोर्चे की अध्यक्ष विजया रहटकर पार्टी के स्तर पर महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित कराने के लिए अपने बड़े नेताओं को श्रेय देती हैं लेकिन पार्टी के महिला मोर्चे के पास महिला आरक्षण बिल पारित कराने के लिए कोई कार्यक्रम नहीं है. ऑफ़ द रिकार्ड बातचीत में भाजपा की कई महिला नेता संकेत देती हैं कि जबतक प्रधानमंत्री इस मसले पर अपनी चुप्पी नहीं तोड़ते हैं तबतक पार्टी का कोई नेता-महिला या पुरुष इसपर पहल नहीं ले सकता. महिला क़ानून के जानकार सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता अरविंद जैन कहते है ‘इरादे के अभाव में महिला आरक्षण अगले 100 साल तक पास नहीं होने वाला.

सोनिया गांधी द्वारा प्रधानमंत्री को लिखी गयी चिट्ठी

संसद के आगामी सत्र के पूर्व इस मुद्दे पर प्रधनामंत्री को घेरने का मन महिला संगठन बना रहे हैं, लेकिन एक कार्यकर्ता के अनुसार ‘दिल्ली में प्रदर्शन या चिट्ठी-पत्री से सरकार पर कोई असर नहीं होने वाला इसके लिए हर संसदीय क्षेत्र में घोषणापत्र से वादाखिलाफी के मुद्दे पर महिलाओं को आन्दोलन करना चाहिए.’ उन्होंने यह भी जोड़ा कि ‘जब तक इस मसाले पर ‘महिला आरक्षण के भीतर वंचित समाज की महिलाओं का आरक्षण की मांग करते हुए ग्रामीण स्तर से बड़ा आन्दोलन नहीं शुरू होता, डगर बहुत कठिन रहने वाली है. तय है कि 2019 के घोषणापत्र में भी भाजपा इस वादे को दुहरायेगी जरूर.

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ब्रा पहनने के नहीं पुरुषों के आचरण की संहिता बने

स्वरांगी साने

 साहित्यकार, पत्रकार और अनुवादक स्वरांगी की रचनाएं  विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित. संपर्क : swaraangisane@gmail.com

महिलाओं के मामले में दुनिया एक सी है. 10 मई को भारत के एक स्कूल ने छात्राओं को सकीं कलर का ब्रा पहनने का हुक्मनामा जारी किया तो 19 मई को टेक्सास के एक स्कूल में ब्रा न पहनने पर एक छात्रा को स्कूल से लौटा दिया गया. पहली सदी में प्राचीन ग्रीस में जब महिलाओं ने पहली बार कंचुकी पहनी थी..उससे पहले क्या लगातार बलात्कार होते थे? इस सवाल के साथ स्वरांगी साने का लेख: पुरुषों के आचरण की संहिता बने: यदि घर की बड़ी-बूढ़ी औरतें हो, युवतियाँ या बच्चियाँ हों तो उनमें घुस-घुसकर न बैठें..उनसे दो हाथ दूर रहकर बात करें सहित कई संहितायें…

पहली सदी में इतिहास मिलता है कि प्राचीन ग्रीस में जब महिलाओं ने पहली बार कंचुकी पहनी थी..उससे पहले क्या लगातार बलात्कार होते थे?
यह सवाल इसलिए ‘क्योंकि’ इतनी सदियाँ बीत जाने के बाद अब ऐसा लगता है,‘क्योंकि’ 19 मई 2018 की खबर है कि जब ब्रिटनी कोहेलो अपने टैक्सास के हार्कर हाइट्स हाई स्कूल पहुँची तो सहप्राचार्य ने उसकी ‘क्लास’ ले ली,‘क्योंकि’ वह ‘ब्रा’ पहनकर नहीं आई थी। ब्रिटनी कहती है कि उसके स्कूल के ड्रेस कोड में नहीं लिखा कि ब्रा पहनना ज़रूरी है। बिल्कुल आप किसी भी स्कूल के नियम देख लीजिए ऐसा कोई दुराग्रह ‘लिखित’ में नहीं होता पर लिखित में न होने का यह मतलब नहीं कि वैसा दुराग्रह होता ही नहीं है। उससे आठ दिन पहले 10 मई 2018 को दिल्ली के डीपीएस स्कूल में फरमान जारी हुआ कि लड़कियाँ ब्रा के साथ स्लिप भी पहनें। उन्हें यह भी हिदायत दी गई कि वे स्किन कलर की ब्रा पहनें। ताकि लड़कों का ध्यान भंग न हो! सही बात है…प्राचीन काल में भी पहुँचे हुए ऋषी-मुनियों का ध्यान टूटा है, उनकी ही तपस्या भंग हुई है। स्वयं पर नियंत्रण न रख पाने की उनकी ‘पौरूषीय कमज़ोरी’ की खबरदारी भी स्त्रियों / अप्सराओं को ही रखनी है।

…और हर दिन नए फ़रमान! भारत से लेकर दूर-सुदूर…तथाकथित उन्नत विकसित समाज में भी यही शोर…इतनी ही हिदायतें, इतनी ही पाबंदियाँ.. लड़की ब्रा पहनें ताकि लड़के ताकें न…लड़के न हुए लालच की टोकरी हो गए..जहाँ जगह मिली, लगे लार टपकाने..और उनकी लार न टपके…उन पर कोई तोहमत न आए..कोई आँच न आए…इसलिए टोकरी को ढाककर रखो, सात दीवारों के भीतर छिपाकर रखो।

हमें तो शुक्रगुज़ार होना चाहिए उन लोगों का जो नवजात कन्या से यह नहीं कह रहे कि अरे माँ के गर्भ से ही पूरे तन को ढककर इस दुनिया में आना था…पूरे कपड़े, बदनभर कपड़े…ऐसे कपड़े, वैसे कपड़े…और लंबा घूँघट-बुरका…उसके बाद भी वह डरी-सहमी कि अब कुछ हुआ, तब कुछ हुआ…

राकेश कुमार की शॉर्ट फ़िल्म है-‘नेकेड’, कल्कि कोचीन और रीताबरी की..जिसमें बलात्कार के कारणों पर कल्कि का संवाद है कि ‘सेक्चुयलिटी और न्यूडिटी की बात नहीं है, कंट्रोल, पावर की बात है… पुरुष इनसेक्योर होते हैं रिजेक्ट हो जाने से डरते हैं…बचपन से लड़कियों को सिखाया जाता है ये मत करो, वो मत करो, यहाँ मत जाओ वहाँ मत जाओ और मर्दों को नहीं। तो वे बड़े ही होते है कि ये उनका बर्थ राइट है और हम (लड़कियाँ) बड़ीहोती हैं कि हमारा कोई राइट नहीं’।
आगे उसका रीताबरी से संवाद है- ‘तुमने बहुत सेक्सी ब्रा पहनी है, लेकिन जब तुम आई तो यू कवर योरसेल्फ क्यों?’
रीताबरी का जवाब-‘मैं ऑटोरिक्शा में आई थी, लोग घूरते हैं’।

14 वीं सदी में खिलाड़ियों की पेंटिंग

लौटते हैं अपनी बात पर..यही, बिल्कुल यही बात है। कोई आधा बदन उघाड़े पुरुष खड़ा हो तो हम अपनी बेटियों-लड़कियों से क्या कहते हैं..उधर मत देखो..पर यदि किसी महिला की ब्रेसियर झलके तो क्या हम अपने बेटों-लड़कों से कहते हैं कि मत देखो!

क्या हमने लड़कों को इस बात के लिए तैयार किया है जिसमें वे ‘न’ का अर्थ समझ सकें…कभी लड़के से कहा है ढंग से बैठें, ढंग के ढके कपड़े पहने, बनियान में न घूमे…जो गर्मी उसे सता रही है, हाँड़-माँस की उसकी माँ, बहन, बेटी, बीवी को भी सता रही होगी पर तब भी वह पूरे बदन कपड़े ओढ़े है।

दिल्ली के रोहिणी इलाके का डीपीएस स्कूल हो या टैक्सास का हाईस्कूल..क्या फर्क पड़ता है कि उसका नाम ब्रिटनी है या कुछ और…नियम तो नियम है..और उसके लड़की होने के साथ ही वह तैयार है कि आइए मुझ पर नियम लादिए..कल एक नियम था…आज चार लादिए…अब सौ और फिर दो सौ…

इतना बवाल, इतना हो-हल्ला, शब्दकोष में ब्रा का अर्थ ढूँढते हैं तो ब्रा, मतलब ब्रेसियर का अर्थ है छाती को ढकने और सपोर्ट देने वाला महिला का अंतर्वस्त्र।उसमें ऐसा कहीं नहीं लिखा कि इसे पहनने से उनका शील भंग होने से बच जाएगा या यदि वे इसे पहनती हैं तो पुरुष कामुक नहीं होंगे। हम इसे अधो अंतर्वस्त्र कह सकते हैं, तो जब इस आधी दुनिया के आधे बंदों को यह छूट है कि वे अपने अधोवस्त्र मतलब बनियान,चाहे तो पहनें, चाहे तो न पहनें तो महिलाओं को यह छूट क्यों नहीं? नहीं, नहीं मैं सवाल ही बदल देती हूँ जब आधी दुनिया के आधे लोग बिना हमसे पूछे आधे बदन उघाड़े घूमते हैं तो उनका क्या हक बनता है वे सलाह दें कि हम क्या पहनें क्या नहीं…और हम उनकी नसीहत को मानें ही क्यों? एक नसीहत मान लेने पर चार नसीहतें और दी जाएँगी…यदि उनसे अपना चरित्र नहीं सँभलता तो उसकी तोहमत महिलाओं, लड़कियों, बच्चियों पर क्यों?नहीं छोड़ रहे न वे किसी को…छह महीने की बालिका का भी बलात्कार कर डालते हैं…नराधम, नारकीय कौन है? ऐसा लगता है पुरुष एक शिकारी जमात है जो शिकार पर निकलता है और कहीं भी, कहीं भी, किसी भी अकेली स्त्री को देखेगा तो अपने शिकार पर टूट पड़ेगा। क्या उस छह महीने की बच्ची को भी ब्रा पहननी चाहिए? या कि माँ के पेट में ही क्यों न यदि वो कन्या शिशु है तो कपड़े पहन ले…ऐसी तकनीक ईज़ाद कर लीजिए न और फिर मजे लीजिए कि देखा हमने कैसे बाँध कर रखा है स्त्री जात को!

ब्रा बर्निंग आंदोलन

ब्रिटनी को दोपहर घर जाना पड़ा और ब्रा पहनकर स्कूल आना पड़ा, उसने ट्वीट किया कि ‘मुझे शर्मिंदगी महसूस हुई…’

हाँ यही नब्ज़ है जो दुष्ट प्रवृत्तियों ने पकड़ ली है, वे शर्म महसूस कराते हैं और उन्हें खुद किसी बात की शर्म, लिहाज़ नहीं होता…उससे कहा जाता है कि लड़के उसे उन नज़रों से न देखें इसलिए उसे ब्रा पहननी चाहिए। वह ट्वीट करती है ‘लड़कियों के कपड़े पहनने पर दोष देना बंद कीजिए क्योंकि हमने लड़कों को इस तरह बड़ा ही नहीं किया कि महिलाओं की इज़्ज़त करना उनका अधिकार है’।

दिल्ली के रोहिणी इलाके के डीपीएस स्कूल में जो हुआ वहाँ भी असेम्बली (प्रार्थना सभा) के बाद लड़कों से जाने के लिए कहा गया और कक्षा 9 से कक्षा 12वीं तक की छात्राओं को रुकने की हिदायत दी गई। उसके बाद उन्हें समझाइश दी गई कि अपनी ब्रा को छिपाएँ, केवल स्किन कलर की ब्रा पहनें ताकि वो दिखे न, शर्ट के बटनों के अलावा अतिरिक्त बटन सील लें ताकि दो बटनों के बीच से उनका शरीर न दिखे।

अमा छोड़िए ये सब..मैं तो कहती हूँ ऑनली बॉयज़ स्कूल बना दिए जाए, जहाँ केवल लड़कों को पढ़ने भेजा जाए ताकि लड़कियाँ अपने स्कूलों में सुरक्षित रहें, ख़ुश रहें और खुलकर साँस ले पाएँ..खुलकर जी पाएँ।

नियम पुरुषों के लिए, कुछ आप भी जोड़ें …


1- सड़क पर कहीं भी हल्के होने की जल्दबाजी को नियंत्रित करें।


2- निश्चित करें कि पेंट की जिप लगी है।


3- घर-बाहर, पोर्च में, गलियारे में खुले बदन, बनियान पहनकर न घूमें।


4- शॉर्ट्स पहनना वर्जित है, हमेशा बचपन से फ़ुल पैंट पहनें।


5- यदि घर की बड़ी-बूढ़ी औरतें हो, युवतियाँ या बच्चियाँ हों तो उनमें घुस-घुसकर न बैठें..उनसे दो हाथ दूर रहकर बात करें।


6- किसी भी सार्वजनिक स्थान पर या कहीं भी लड़कियों को बेवजह छूने से बाज आएँ।


7. देर रात तक सड़कों, बाज़ारों में न घूमें, बहुत घूम लिए..अब वह समय और क्षेत्र महिलाओं के लिए छोड़ दें।


8- जिम करें अच्छी बात है, लेकिन शरीर सौष्ठव का प्रदर्शन करना ज़रूरी नहीं।

9. माचो बनने की कोशिश न करें।


10-  याद रखें…महिलाएँ जितना सहन करती हैं, समय आने पर वे उतना ही पलटकर जवाब भी दे सकती है। उनके धैर्य की परीक्षा न लें।


11- ईव टीजिंग का जवाब यदि ईंट का जवाब पत्थर से की तरह मिलने लगा तो मुश्किल हो जाएगी..बेहतर है कि आइंदा ऐसा न करें।


12- सड़क-छाप रोमियो से लड़कियों को नफ़रत है, ऐसा व्यवहार न करें।


यहाँ से आप भी जोड़ें …


13- 

(नियम जोड़ते चलिए…खाना बनाने के नियम, घर में रहने के नियम, ऑफ़िस के नियम…)  चलिए पुरुषों के लिए संहिता बनाएँ और उनसे उसका पालन करवाएँ।

तस्वीरें गूगल से साभार 

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जहानाबाद (बिहार) में बलात्कारियों को बचाने में लगी पुलिस:सामाजिक कार्यकर्ताओं पर दर्ज किया मुकदमा

निवेदिता 

बिहार के जहनाबाद जिले में नाबालिगों से लगातार हुए सामूहिक बलात्कार के मामले में पुलिस आरोपियों को बचा रही है और न्याय की मांग कर रहे पद्मश्री सुधा वर्गीज सहित महिला सामाजिक कार्यकर्ताओं पर उसने उल्टा मुकदमा भी दर्ज कर डाला. निवेदिता की रिपोर्ट: 

बिहार के जहानाबाद में नाबालिग लड़की के साथ हुए बलात्कार के मामले में सत्ता और पुलिस की भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं. सामूहिक बलात्कार को छेड़खानी में बदल दिया गया है .पुलिस ने अपने  एफआईआर (342/18) में छेड़खानी का मामला दर्ज किया है. जबकि महिला संगठनों की तरफ से गये  जाँच दल के सामने नाबालिग लड़की ने कहा कि उसके साथ सामूहिक बलात्कार हुआ.

छात्राओं के साथ सुधा वर्गीज़

गौरतलब है कि पिछले दिनों जहनाबाद के रामदानी गाँव (भरथुआ) में एक नाबालिग लड़की के साथ छेड़-छाड़, उसके कपडे उतारने की कोशिश करते हुए 13लड़कों के एक समूह ने वीडियो बनाया था, जो पिछले 29 अप्रैल को वायरल हो गया था. इसके बाद पुलिस हरकत में आयी और कुछ गिरफ्तारियाँ हुईं थीं, हालांकि 4 मई तक सारे आरोपी गिरफ्तार हो गये थे. अप्रैल  के आख़िरी सप्ताह में यह  मामला प्रकाश में आया. इसके दो सप्ताह बाद जहनाबाद में ही एक और नाबालिग के साथ गैंग रेप का वीडियो बनाया गया और वायरल किया गया.

ताजा घटनाक्रम में नाबालिग लड़की के साथ बलात्कार के मामले में न्याय की मांग करने गयी महिला सामाजिक कार्यकर्ताओं पर प्रशासन ने प्राथमिकी दर्ज कर दी है. सामाजिक कार्यकर्ता सुधा वर्गीज , कंचन बाला और मीरा यादव पर सरकारी कामकाज में बाधा और नाजायज मजमा लगाने के आरोप में प्राथमिकी दर्ज की गयी है . उनपर धारा 147,149, 353, 504 के तहत जहानाबाद नगर थाना में प्राथमिकी दर्ज की गयी है. इस मामले को लेकर एक प्रतिनिधि मंडल  बिहार विधान सभा के अध्यक्ष से भी मिला और जांच दल पर पर किये गए झूठे मुकदमे वापस लेने की मांग भी की.

जहानाबाद में प्रदर्शन

सुधा वर्गीज ने कहा कि ‘जिस देश में महिलाओं के लिए न्याय की मांग करने के लिए आवाज उठाने वाली महिलाओं पर सत्ता का प्रहार हो तो समझ लीजिये की अब कोई सुरक्षित नहीं है . हम सभी महिला संगठनों की और से जहानाबाद में बलात्कार की शिकार नाबालिग लड़की के साथ हुई घटना की जाँच फिर से कराये जाने की मांग को लेकर प्रदर्शन कर रहे थे. जहानाबाद के मामले में पुलिस की भूमिका संदेहास्पद है. जो प्राथमिकी दर्ज की गयी है उसमें बलात्कार का उल्लेख नहीं किया गया है. इतनी जघन्य और हिंसक मामले को पुलिस प्रसासन ने कमजोर कर दिया है.’

वायरल वीडियो से



वर्गीज ने बताया कि ‘ हमलोग 6 मई को पीडिता से मिले उसने बताया कि उसे  चार घंटे तक बंधक रखा गया था. और उसका सामूहिक बलात्कार किया गया. नाबालिग पीडिता की हालत ख़राब है. उसे उसके ही घर में नजर बंद कर दिया गया है . 24 घंटे वह पुलिस की निगरानी में रहती है . एक छोटे से अंधरे कमरे में एक चौकी पर पूरी रात और दिन उसे महिला पुलिस के साथ रहना पड़ता है . उसे किसी से बात करने या बाहर जाने की इजाज़त नहीं है.’  जांच दल के सदस्य पूछती हैं, ‘क्या यह आप कल्पना कर सकते हैं की जिस बच्ची के साथ सामूहिक बलात्कार हुआ हो वह किस मानसिक स्थिति में होगी ? उसे उस जगह से निकलना तो दूर उसे कड़े निगरानी में रखा जा रहा रहा है जैसे वो कोई अपराधी हो. शर्मनाक है ये . हम एक ऐसे राज में हैं जहाँ की पुलिस और सत्ता बलात्कारियों को संगरक्षण देती है.’  हालांकि पटना रेंज के आई जी नैय्यर हसनैन खान ने पीड़िता के साथ सामूहिक बलात्कार से इनकार किया. जांच दल के एक सदस्य ने सवाल किया  कि क्या बलात्कार के नये क़ानून के अनुसार सिर्फ इंटरकोर्स को ही बालात्कार माना जाता है?’

15 मई को कई  महिला संगठन जहानाबाद में प्रदर्शन कर रहे थे और महिलाओं का एक प्रतिनिधि मंडल डीएम से मिलना चाह रहा था कि उलटा उनपर ही मुकदमा दर्ज कर दिया गया. प्रदर्शन ख़त्म होने के बाद पुलिस ने प्रदर्शनकारियों की जबरदस्ती तस्वीरें निकालीं. मुंह पर कला कपडा बांधे कुछ पुलिसकर्मी प्रदर्शन ख़त्म होने के बाद जबरदस्ती महिला साथियों की तस्वीर लेने लगे तो उसका विरोध हुआ.

निवेदिता वरिष्ठ पत्रकार हैं और स्त्रीकाल के सम्पादन मंडल की सदस्य हैं. सम्पर्क: 9835029152

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श्रम साध्य था किन्नरों से बातचीत कर उपन्यास लिखना: नीरजा माधव

थर्ड जेंडर  पर केन्द्रित प्रथम हिंदी उपन्यास यमदीप की लेखिका नीरजा माधव से एम. फ़ीरोज़ खान की बातचीत

क्या कारण है कि आज के लेखक हाशिये के लोगों पर लिखना नहीं चाहते?
देखिये, लेखन एक तपस्या है। आप ए.सी. में बैठकर उमड़ते बादलों को नहीं देख सकते। इसके लिए तो शहर निकलना पड़ेगा। सार्थक लेखन भी वैसी ही मांग करता है। जिस भी विषय पर लिखना हो तो आपका ज्ञान, आपका यथार्थ अनुभव उसमें से झलकना चाहिए। बन्द कमरे में आराम से लेटकर कोई भी एक थीम किसी से उधार लेकर एक कहानी का ताना-बाना बुन लेना मुश्किल नहीं है। इस प्रकार के लेखन से आप रेखाचित्रा तो बना सकते हैं, पर उसमें रंग नहीं भर सकते। रंग तो तभी भर पायेंगे जब उन रंगों को नजदीक से देखें, महसूस करें। हाशिये के इस समाज के बारे में लिखना श्रम-साध्य था। जैसे ‘यमदीप’ में किन्नरों  का एक सांकेतिक शब्द ‘गिरिया’ मैंने लिया। जरूरी नहीं कि दिल्ली के किन्नर भी ‘गिरिया’ ही बोलें, क्योंकि उनका कोई भाषायी व्याकरण शास्त्र नहीं है। क्षेत्र विशेष में उसका अध्ययन करने से ही पता चलेगा।

किन्नरों पर लिखने की प्रेरणा कहाँ से मिली? 
किन्नरों पर लिखने की प्रेरणा मेरे मन में सन् 1991 में ही आ गई थी जब मेरी बेटी कुहू का जन्म हुआ और उस अवसर पर तृतीय प्रकृति (थर्ड जेण्डर) के लोग मेरे घर मंगलगान करने और नेग लेने आये थे। उस समय आकाशवाणी में नौकरी कर रही थी मैं। मैंने सर्वप्रथम उन पर रेडियो के लिए फीचर बनाने का संकल्प लिया और अपनी रिकार्डिंग मशीन लेकर उनकी बस्तियों के कई चक्कर लगाए। कभी वे इण्टरव्यू देते और कभी फिर किसी दिन आने का वादा करके टाल देते। उस समय तक तथाकथित सभ्य समाज के लोग उनकी बस्तियों में जाना अपमान और व्यंग्य का विषय मानते थे। मेरे भी कार्यालय में मेरा संकल्प सुन सहकर्मी मज़ाक में मुस्कुराये थे पर मैंने अपना मिशन जारी रखा। बहुत मुश्किल से उन लोगों के गुरु से मिल सकी और तभी जाकर कुछ तृतीय प्रकृति के लोग अपना इण्टरव्यू देने के लिए तैयार हुए थे। पर पूरी बातें बताने को तैयार तब भी नहीं। बार-बार मेरे माइक को हटाकर कहते तुम बेटी सरकारी आदमी हो। हम लोगों को फंसा दोगी। अन्त में माइक, रिकार्डिंग मशीन के बिना ही कई-कई चक्कर इनकी बस्तियों के मैंने लगाए। आत्मीयता के साथ उनकी कोठरी में बैठकर उनकी आन्तरिक भावनाओं को कुरेदा तो बहुत ही मर्मान्तिक बातें मेरे सामने आईं। बहुत से रहस्यों से परदा उठा। अनेक सांकेतिक शब्द, जो वे लोग किसी अपने यजमान या ग्राहक के सामने प्रयोग करते थे, का अर्थ मैंने जाना। तो, प्रेरणा तो मेरी बेटी का जन्म ही था।

उपन्यास का शीर्षक ‘यमदीप’ ही क्यों रखा?
‘यमदीप’ शीर्षक रखने के पीछे भी उनके जीवन की विडम्बना ही थी। अच्छे घरों में पैदा हुए ये थर्ड जेण्डर के लोग उस दीपक की ही तरह तो हैं जो दीपावली से एक दिन पूर्व यमराज के नाम निकालकर कूड़े-करकट या घूरे पर रख देते हैं लोग और पीछे पलटकर देखना मना होता है उस दीप को। इनका भी जीवन लगभग यम के उसी दीप की तरह होता है जिसे समाज में जगह नहीं मिलती और बदहाल बस्ती में भागकर जाना और वहीं समाप्त हो जाना इनकी नियति बन जाती है। एक सनातन परम्परा यम का दीया से इस प्रतीक को लिया है मैंने। भारत का हर व्यक्ति दीपावली पर्व और उससे पूर्व मनाई जाने वाली छोटी दीपावली आदि से अच्छी तरह परिचित है।


‘यमदीप’ लिखते समय किन कठिनाइयों का सामना करना पड़ा?
‘यमदीप’ लिखने में कठिनाइयाँ आईं तो बस इसी बात में कि वे जल्दी कुछ बताने को तैयार नहीं होते थे। अपना परिचय भी नहीं देना चाहते थे। मेरे सामने ही अपने सांकेतिक शब्दों में कुछ बोलकर निकल जाते थे। कई बार उनसे मिलने पहुँची तो काम का बहाना बना निकल लिये। कई बार उनके गुरुजी ने भी भीतर से कहलवा दिया कि बाहर गये हैं। दरअसल वे किसी सामान्य मनुष्य को अपने बहुत नजदीक नहीं आने देना चाहते। उनसे कोई भी रहस्य जानने के लिए मुझे कई-कई बार उनकी बस्ती में जाना पड़ता था। यह एक कठिन काम था। इस कठिन काम में मेरी मदद करते थे मेरे पति डाॅ. बेनी माधव। उनकी बस्तियों में ले जाना और उनके घर के बाहर खड़े रहना, उफ् बहुत कठिन कार्य था। वे पुरुषों को अपने घर में प्रवेश नहीं करने देते थे। मेरे पति के लिए साफ शब्दों में कहते थे- बेटी तुम आ जाओ अन्दर। हमें इन्सानों से क्या काम? तो पुरुषों को वे इन्सान मानते थे। आप तो धीरे-धीरे बहुत परिवर्तन आ रहा है उन लोगों के भीतर।



यमदीप लिखने का अनुभव कैसा रहा?
बहुत अच्छा। 1999 में मैंने इसे लिख लिया था और 2002 में सामयिक प्रकाशन, नई दिल्ली से थर्ड जेण्डर पर प्रथम उपन्यास के रूप में यह प्रकाशित हुआ। लगभग तीन सौ पृष्ठों का उपन्यास। अनुभव तब और अच्छा लगा जब बिना किसी धरना, प्रदर्शन या जुलूस और नारेबाजी के सुप्रीम कोर्ट ने थर्ड जेण्डर को आरक्षण दे दिया। इस उपन्यास में मैंने थर्ड जेण्डर समुदाय के लिए शिक्षा, सुरक्षा और नौकरियों में आरक्षण दिये जाने और मुख्यधारा में समाविष्ट किये जाने की सर्वप्रथम मांग की थी। सुप्रीम कोर्ट के उस निर्णय को मैं साहित्य की विजय मानती हूँ। अन्यथा न जाने कब तक यह तृतीया प्रकृति समुदाय गरीबी, बदहाली के अंधेरे में पड़ा रहता। अब कम से कम लोग उन्हें मनुष्य की तरह समझने तो लगे हैं। ‘यमदीप’ प्रकाशित होने के दस-बारह वर्षों बाद ही सही, कुछ लेखकों ने भी प्रयास किया कि वे इनके बारे में लिखें। स्वयं थर्ड जेण्डर के लोग भी अब आगे आने लगे हैं। यह मेरे लिए अत्यन्त सुखद है कि एक कार्य मैंने शुरू किया, उस पर लोगों का ध्यान गया।


नाजबीबी और मानवी का किरदार आपके मन में कैसे आया?
उनकी बस्तियों में भटकते हुए मैंने स्वयं में मानवी को तलाश किया। यह बात अलग है कि मानवी हमारे तथाकथित सभ्य समाज की स्त्राी के संघर्षों का प्रतीक भी है। उसी प्रकार बस्तियों में आते-जाते कई पात्रों के जीवन से साक्षात्कार के बहाने नाजबीबी भी मेरी कल्पना में यथार्थ रूप धारण करने लगी। मेरी कल्पना और समाज के यथार्थ का प्रतिबिम्ब हैं नाजबीबी और मानवी।

‘यमदीप’ लिखने से पहले और लिखने के बाद आप अपनी सोच में क्या अन्तर पाती हैं?
लिखने से पूर्व कहीं-न-कहीं एक दुविधा थी मन में कि पता नहीं इस नये और उपेक्षित विषय को साहित्य समाज किस रूप में लेगा? पर जब इसका कई भाषाओं में अनुवाद और थर्ड संस्थाओं द्वारा नाट्य मंचन हुआ तो मुझे सन्तोष हुआ कि चलो, लिखना व्यर्थ नहीं गया। जे.एन.यू. सहित अनेक विश्वविद्यालयों में इस पर शोध-कार्य हो चुके हैं। कई विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों हेतु भी प्रस्तावित है यह उपन्यास। (हँसते हुए) कई पुरस्कारों से वंचित भी किया गया इस उपन्यास को। कथा यू.के. सम्मान के लिए तो लन्दन के हिन्दी लेखक श्री तेजेन्द्र शर्मा ने ही फेसबुक पर लिखा था जब ‘यमदीप’ को लेकर ‘पहले हम पहले हम’ का वाक् युद्ध छिड़ा था। तो ‘यमदीप’ के साथ यह सब बहुत हो चुका है। लेकिन सत्य तो सत्य ही रहेगा। मेरी आदत कभी नहीं रही कि एक उपन्यास लिखने के बाद साल दो साल उसकी समीक्षा या प्रमोशन के लिए कोई प्रयास करूँ। एक कृति लिख लेने के बाद प्रायः उसे भूलकर मैं अगले में खो जाती हूँ पाठकों का दुलार उसे चाहे जहाँ तक पहुँचा दे।

‘यमदीप’ पढ़ने के बाद आपके परिवार और मित्रों की क्या प्रतिक्रिया थी?
सभी को चैंकाने वाला कथानक लगा था। एक अछूत विषय। इसके पूर्व भी कुछ लिखा गया होगा पर इतना विश्वास से कहा जा सकता है कि उनके इतना करीब जाकर आन्तरिक जीवन की मार्मिक कहानी शायद पहली बार जो सभी के हृदय को द्रवित कर गई थी। परिवार और मित्रों में मेरे सभी पाठक भी आ जाते हैं। उनके प्रति दृष्टिकोण में परिवर्तन आया सभी के। कुछ ने यह भी कहा कि ये थर्ड जेण्डर के लोग इतने भी निश्छल और ईमानदार नहीं होते जैसा यमदीप में चित्रित किया गया है। पर मैं जानती हूँ ये सब सतही जानकारियाँ हैं। कुछ लोग कहते हैं कि ‘ किन्नर बनाए भी जाते हैं इनके द्वारा।’ मैंने उनके गुरु से पूछा भी था यह सवाल। दुखी स्वर में बोले थे- ‘‘देख लो बेटी मेरी कोठरिया। किसको पकड़ कर, कहाँ लेटाकर, किस औजार से आपरेशन कर देंगे हम? अस्पताल में एक फोड़ा का आपरेशन करने में भी डाॅक्टर लोग इतनी दवाइयाँ, सुइयाँ लगाते हैं तब ठीक होता है। हम कितना पढ़े-लिखे हैं कि अपने से दवा देकर सब ठीक कर लेंगे।’’ उनके गुरु का यह उत्तर मुझे भी बिल्कुल सत्य लगा था। अंग-भंग कर देने मात्रा से भीतर जो हारमोन्स का प्राकृतिक स्राव होता है, वह भी स्त्री-पुरुष में अलग-अलग, उसे तो किसी आपरेशन से बन्द नहीं किया जा सकता।
तो ‘यमदीप’ लिखने में लोगों की तरह-तरह की प्रतिक्रियाएँ भी खूब मिली और अनुभव भी कई तरह के हुए। आज लिखने के बाद असीम सन्तोष है कि एक वंचित और उपेक्षित समाज के बारे में मैंने लिखा जो ईमानदार है, शारीरिक रूप से बलवान है पर भीतर से भावनात्मक रूप से टूटा हुआ है, प्रकृति के एक क्रूर मज़ाक से उसका धरती पर जीना दूभर बना हुआ है। उसे हमारे स्नेह और संवेदना की आवश्यकता है। उसके बारे में अफवाहें फैलाने की जरूरत नहीं।

किन्नरों के लिए समाज का नज़रिया कैसा होना चाहिए?
मेरी पूर्व की इतनी बातों का अर्थ साफ है कि सहानुभूतिपूर्ण और संवेदनापूर्ण होना चाहिए। वे भी हमारे, आपकी तरह मनुष्य हैं। हमारे घरों में ही वे पैदा हुए हैं। उनकी अलग से कोई जाति या धर्म नहीं है। प्रकृति के एक क्रूर मजाक को पूरे समाज को उसी प्रकार स्वीकार करना चाहिए जैसे परिवार में किसी दिव्यांग बच्चे को हम संभालकर रखते हैं।

‘यमदीप’ लिखने के अलावा आप किन्नरों के लिए और क्या करना चाहती हैं?
साहित्य का काम ‘टार्च बियरर’ का होता है। वह समाज को दिशा देता है। अंधेरे कोनों को सामने लाता है। साहित्य को कहा जाता है कि समाज का दर्पण होता है, तो दर्पण कई प्रकार का होता है। कुछ दर्पण ऐसे होते हैं जिनमें आपना ही चेहरा इतना विदू्रप दिखाई देता है तो किसी में हास्यास्पद। किसी-किसी दर्पण पर गन्दगी जमी हो तो भी चेहरा साफ नहीं दिखाई देता। अब तय तो पाठक को करना है कि वह किस प्रकार के साहित्य में समाज का चेहरा देखना चाहता है। आज साहित्य के नाम पर बहुत कुछ विद्रूप और हास्यास्पद भी लिखा जा रहा है। तो साहित्य के लिए यह संकट का भी समय है। इन्हीं संकटों में भी नई राह बनाने का भी समय है। जो मूल्यवान साहित्य होगा, वही बचा रह जायेगा।
रही मेरे और भी कुछ करने की तो बता दूँ कि मैं कोई समाज सेविका या राजनीतिज्ञ तो नहीं हूँ कि उनके लिए अलग से कुछ और कर सकूँ। हाँ, कलम हमारा हथियार है, उसके माध्यम से एक बहस हमने छेड़ दी है। आगे समाज और राष्ट्र की जिम्मेदारी है

आप अपने जन्म, स्थान, शिक्षा, घर-परिवार और साहित्यिक पृष्ठभूमि के बारे में विस्तार से बताइये?
मेरा जन्म 15 मार्च 1962 को जौनपुर जिले के एक गाँव में हुआ था। पिता शिक्षक थे और माँ धर्मनिष्ठ एवं सम्पूर्ण एक आदर्श भारतीय स्त्राी। प्रारम्भिक शिक्षा गाँव की प्राथमिक पाठशाला से लेकर उच्च शिक्षा काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी से। अंग्रेजी विषय में एम.ए. और पी-एच.डी. बी.एच.यू. से ही सम्पन्न। लोक सेवा आयेग, उ.प्र. द्वारा शैक्षिक सेवा से चयनित हुई परन्तु उसी समय कुछ महीनों के अंतराल पर संघ लेख सेवा आयेग द्वारा आकाशवाणी/दूरदर्शन के लिए राजपत्रित अधिकारी के रूप में चयनित और उसी सेवा में रहने का निर्णय लिया। भारत के विभिन्न केन्द्रों पर सेवाएँ दीं। साहित्य लेखन साथ-साथ चलता रहा।
परिवार में मेरे पति डा. बेनी माधव (प्राचार्य) और दो बच्चे कुहू और केतन हैं। भारत सरकार ने सन् 2016 में राष्ट्रीय पुस्तक ‘न्यास’ भारत का ट्रस्टी सदस्य नामित किया।
साहित्य के साथ-साथ शास्त्रीय और उप-शास्त्रीय संगीत में विशेष रुचि। इस समय सारनाथ वाराणसी में स्थायी निवास है। पिताजी से प्रेरणा मिली लिखने की। छात्रा जीवन से लेखन शुरू कर दिया था। पत्र-पत्रिकाओं में लेख और कविताएँ प्रकाशित होती रहती थीं।

आपकी प्रिय विधा कौन सी है और क्यों?
मेरी प्रिय विधा तो कथा ही है पर कविताएँ और ललित-निबंध भी लिखती हूँ। क्यों लिखती हूँ, इसका जवाब स्थूल रूप में नहीं दिया जा सकता। बस कोई अदृश्य शक्ति ये सब लिखने को प्रेरित करती है।

एम. फ़ीरोज़ खान वांग्मय पत्रिका के सम्पादक हैं. सम्पर्क: vangmaya@gmail.com
तस्वीरें गूगल से साभार 
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मानवाधिकार-प्रहरी सोनी सोरी को मिला अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार सम्मान

कमल शुक्ल 
वर्ष 2018 का विश्व प्रतिष्ठित मानव अधिकार सम्मान ‘फ्रंट लाइन डिफेंडर्स अवार्ड फॉर ह्यूमन राइट्स डिफेंडर्स ऐट रिस्क’ पाने वालों में भारत की ओर से सोनी सोरी शामिल हैं। वहीं सोनी सोरी, जिनके गुप्तांग में पत्थर भरे गए, जिन्हें निर्ममता से यातनाएं दी गयी। दो साल के लिए जेल में ठूंस दिया गया। उन्हें बदसूरत बनाने की नीयत से चेहरे पर खतरनाक रसायन पोत दी गई। निस्संदेह जिनके क्रुर हाथों ने यह सब किया, अब यह सुनकर उनके हाथ  जरूर कापेंगे कि उन्होंने ऐसा करके उस महिला को दुनिया की सबसे सुंदर स्त्री बना दिया है। खनिज के लिए जल-जंगल और जमीन हथियाने की नीयत से बस्तर में लंबे समय से अपनी ही जनता के खिलाफ युद्ध लड़ रहे कॉर्पोरेट परस्त छत्तीसगढ़ सरकार पर पीड़ित-शोषित सोनी सोरी भारी पड़ी है।

सोनी सोरी

इस वर्ष ‘फ्रंट लाइन डिफेंडर्स अवार्ड फॉर ह्यूमन राइट्स डिफेंडर्स ऐट रिस्क’ का पुरस्कार प्राप्त करने वाले पाँच अंतरराष्ट्रीय प्राप्तकर्ताओं  की सूची में भारतीय सामाजिक कार्यकर्ता सोनी सोरी का नाम शामिल किया गया है। छत्तीसगढ़ में आदिवासी समुदाय को न्याय दिलाने के लिए जोखिम भरे संघर्ष के लिए उन्हें यह सम्मान दिया जा रहा है। उनके अलावा इस वर्ष यह पुरस्कार पाने वालों में नुर्केंन बेसल (टर्की), लूचा आन्दोलन (कोंगो का लोकत‌ंत्रात्मक गणराज्य), ला रेसिस्तेंचिया पसिफिचा दे ला मिक्रोरेगिओं दे इक्ष्क़ुइसिस (ग्वाटेमाला), और हस्सन बौरास (अल्जीरिया) शामिल हैं।

विजेताओं के नामों की घोषणा करते हुए, फ्रंट लाइन डिफेंडर्स के कार्यकारी निर्देशक एंड्रू एंडरसन ने कहा, “आज जिन मानवाधिकार रक्षकों का सम्मान हम कर रहे है, ये वे लोग हैं जो विश्व के सबसे खतरनाक जगहों पर कार्य करते हैं। अपने-अपने समुदायों के लिए शांतिपूर्ण ढंग से न्याय और मानवाधिकार की मांग करने हेतु स्वयं की परवाह किये बिना इन्होंने कई बलिदान दिये हैं।”

सन 2005 से ‘फ्रंट लाइन डिफेंडर्स अवार्ड फॉर ह्यूमन राइट्स डिफेंडर्स ऐट रिस्क’ पुरस्कार हर साल उन मानवाधिकार रक्षकों को दिया जाता रहा है, जिन्होंने खुद को जोखिम में डाल कर भी अपने समुदाय के लोगों के अधिकारों की सुरक्षा और बढ़ावा देने में अदम्य साहस का प्रदर्शन करते हुए योगदान दिया है। पहले यह सिर्फ एक रक्षक या किसी एक आन्दोलन को दिया जाता था। लेकिन इस वर्ष यह पहली बार पांच अलग-अलग देशो के पांच मानवाधिकार रक्षकों को दिया जा रहा है। 2018 के इन पांच पुरस्कार विजेताओं व उनके परिवारों को विभिन्न तरीके के हमलों का, मानहानि, कानूनन उत्पीड़न, मृत्यु की धमकी, कारावास और अभित्रास आदि का सामना करना पड़ा है।

सोनी सोरी आदिवासियों के बीच

कौन है सोनी सोरी?


सोनी सोरी एक आदिवासी कार्यकर्ता हैं। साथ ही वह नारी अधिकारों की रक्षक हैं, जो छत्तीसगढ़ राज्य के बस्तर इलाके में काम करती हैं। वह और उनके सहकर्मी, अर्द्धसैनिक बल और पुलिस द्वारा हिंसा को बढ़ावा देने वाली गतिविधियों के खिलाफ वकालत करते हैं। उन्होंने भारत के सुदूर और दुर्गम क्षेत्रो में राज्य-प्रायोजित दुर्व्यवहार जैसे- घर जलाना, बलात्कार और बिना वजह आदिवासियों को यातनाएं देना व उनका यौन-शोषण करना आदि के विरोध में संलेख पत्र तैयार किये और इन गतिविधियों के खिलाफ संघर्ष किया है। उन्होंने कई शैक्षणिक संस्थाओं को माओवादी संगठनों से होने वाली हानि से भी बचाया है।  सुरक्षा बलों ने उनके इन कार्यों के प्रतिशोध में, उन्हें हिरासत में बंद कर कई तरह की अमानवीय यातनायें दी और उनके शरीर में पत्थर डाल कर घंटों यातनाएं दी। सोनी सोरी ने दो वर्षों से अधिक कारावास सहा है। कुछ वर्षों बाद कुछ लोगो ने उनके चेहरे पर रसायन डाला जिससे उनके चेहरे की चमड़ी जल गई। इतना ही नहीं, उन्हें धमकी दी गई कि अगर उन्होंने सुरक्षा बलों द्वारा किये गए बलात्कारों के खिलाफ वकालत करनी नहीं छोडी, तो उनकी बेटियों का भी ऐसा ही हश्र होगा। किन्तु बिना डरे उन्होंने अपने कार्य के प्रति अडिगता दिखाते हुए काम बंद करने से इंकार किया और आज भी वह धमकी, अभित्रास और बदनामी के बावजूद उन खतरनाक संघर्ष क्षेत्र में सक्रिय हैं।

हालांकि सोनी, अन्य सामाजिक कार्यकर्ताओं और पत्रकारों को बदनाम करने के उद्देश्य से राज्य सरकार व पुलिस द्वारा बनाये गए ‘अग्नि’ व ‘सामाजिक एकता मंच’ आदि संगठनों के माध्यम से सोनी सोरी को राष्ट्रद्रोही और माओवादी होने का तक आरोप लगा दिया गया।

फ्रंट लाइन डिफेंडर्स के कार्यकारी निर्देशक एंड्रू एंडरसन कहते हैं, “विभिन्न देशों की सरकारें और शोषकवर्ग मानवाधिकार रक्षकों को बदनाम कर उनके हौसले को कुंद करने का प्रयास करते हैं और उनके मानव कल्याण की दिशा में किये गये कार्यों को गैरकानूनी घोषित करते हैं। इसके खिलाफ विश्व भर से सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा एकमत से स्वीकार किया गया कि अंतर्राष्ट्रीय पहचान और सम्मान मानवाधिकारों को लेकर सर्वस्व दांव पर लगा देने वाले बहादुरों के साथ खड़ा होना जरूरी है। यह पुरस्कार इसी भावना पर आधारित है।” वे आगे कहते हैं, “यह पुरस्कार इस बात का साक्षी है कि इन रक्षकों को अन्तराष्ट्रीय समुदायों का पूर्ण समर्थन है और उनका बलिदान नज़रंदाज़ नहीं हुआ है। हम उनके अदम्य साहस की सराहना करते हुए उनके साथ अटल विश्वास के साथ खड़े है।”

सोनी सोरी जेएनयू में

साथियों के संघर्ष को समर्पित यह पुरस्कार – सोनी


सोनी सोरी ने फॉरवर्ड प्रेस से बातचीत में स्वयं को मिले इस विश्व स्तरीय पुरस्कार को बस्तर के आदिवासियों के हक और अधिकार के लिए संघर्ष कर रहे तमाम जमीनी सामाजिक कार्यकर्ताओं को समर्पित किया। उन्होंने बताया कि इस सम्मान से उनके साथ काम कर रहे साथियों का मनोबल बढ़ेगा। सोनी ने बताया कि  मेरे साथ जो भी हुआ, वह बस्तर में रोज घटने वाली घटनाओं में से एक है। वह बस्तर के उन सभी गाँवो में नही पहुँच सकती हैं जहां रोज किसी न किसी आदिवासी की हत्या या बलात्कार हो रही है। सैकड़ों गाँव अपनी ही जनता से युद्ध के नाम जला दिए गए हैं। हजारों आदिवासी मुठभेड़ के नाम पर मार डाले गए। हजारों निर्दोषों को जेल में ठूंसा गया है। सोनी ने बताया कि उसने माओवादियों का भी कहर झेला है, जिन्होंने उनके पिता को मारा। मगर अब अपने जीते जी वह यह लड़ाई बन्द नहीं करेंगी।

‘फ्रंट लाइन डिफेंडर्स अवार्ड फॉर ह्यूमन राइट्स डिफेंडर्स ऐट रिस्क’ का प्रतीक चिन्ह

पीड़िता बने रहना सोनी सोरी को मंजूर नहीं

हिमांशु कुमार, सामाजिक कार्यकर्ता

जाने-माने सामाजिक कार्यकर्ता हिमांशु कुमार कहते हैं कि सोनी सोरी को छत्तीसगढ़ सरकार ने थाने में ऐसी प्रताड़ना दी जो आजादी के बाद किसी भी महिला के साथ हिरासत में किया जाने वाला सबसे भयानक दुर्व्यवहार था। नागरिक अधिकारों के लिए आवाज उठाने वाली एक आदिवासी सामाजिक कार्यकर्ता के ऊपर यह जुल्म सरकार के द्वारा किया गया था। लेकिन सोनी सोरी ने एक पीड़िता बने रहना स्वीकार नहीं किया। जेल से बाहर आते ही उसने अपने जैसी हजारों आदिवासी महिलाओं और लाखों आदिवासी लोगों के लिए नागरिक अधिकार, समानता और मानवाधिकारों की लड़ाई शुरू की और वह सारी दुनिया में एक महत्वपूर्ण आवाज बन कर उभरीं। आज सारी दुनिया में वह एक महत्वपूर्ण मानवाधिकार कार्यकर्ता के रूप में जानी जाती हैं। फ्रंटलाइन डिफेंडर्स ने उन्हें जो सम्मान दिया है, वह सोनी सोरी के काम के अनुरूप ही है। मैं उसका स्वागत करता हूं और सोनी सोरी को बधाई देता हूं।

(कॉपी एडिटिंग – नवल)


छत्तीसगढ से प्रकाशित साप्ताहिक ‘भूमकाल समाचार’ के संपादक कमल शुक्ल फर्जी पुलिस-मुठभेडों के खिलाफ आवाज उठाने के लिए जाने जाते हैं। वे बस्तर में पत्रकारों की सुरक्षा के कानून की मांग कर रही संस्था ‘पत्रकार सुरक्षा कानून संयुक्त संघर्ष समिति’ के मुखिया भी हैं ​

फॉरवर्ड प्रेस से साभार

तस्वीरें गूगल से साभार 
स्त्रीकाल का संचालन ‘द मार्जिनलाइज्ड’ , ऐन इंस्टिट्यूट  फॉर  अल्टरनेटिव  रिसर्च  एंड  मीडिया  स्टडीज  के द्वारा होता  है .  इसके प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें : 
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स्त्री देह में कैद एक पुरुष हूँ मैं…

डिसेंट कुमार साहू 


आखिर वह भी तो इससे परेशान ही थी कि स्त्री देह में जन्म लेने के बाद अपने शरीर से एकाकार नहीं कर पा रही थी। बचपन से सब कुछ तो सही ही चल रहा था किन्तु उम्र के बढ़ने के साथ ही धीरे-धीरे वेदिका को अपना ही शरीर आखिर बंधक क्यों लगने लगा? वेदिका 9 वर्ष की उम्र में ऐसा क्या महसूस करने लगी थी जो अपने ही शरीर को बंधक मानने लगी थी? इस बारे में वेदांश (अब वेदिका को वेदांश कहलाना पसंद है) कहते हैं-“8-9 साल की उम्र तक मैं बिलकुल लड़कियों की तरह रहा। मुझे लंबे बाल रखना, चूड़ी पहनना, लड़कियों वाले कपड़े पहनना अच्छा लगता था, पर दसवें साल तक आते-आते अचानक इन सब चीजों से जैसे कोई लगाव ही नहीं रह गया। अब यह सब करना काफ़ी तकलीफदेह लगने लगा। तब मैंने 13 साल की उम्र में लड़कों जैसे कपड़े पहनना व रहना शुरू कर दिया। हालांकि यह सब करने के लिए खुद पर कभी दबाव नहीं डालना पड़ा, यह सब कुछ सहज व स्वाभाविक प्रक्रिया के तहत ही होते जा रहा था। हाँ, बाल जरूर लंबे ही थे जिसे घर वालों के कारण काटने की हिम्मत नहीं हुई।”

आगे वह बताते चले गये कि मैंने कई बार अपने घर वालों को बताने की कोशिश की लेकिन वे सुनने को तैयार ही नहीं थे कि उनकी बेटी या कहूँ उनका ‘बेटा’ क्या महसूस करता है। यह उस दिन की बात है जब मैंने पहली बार माँ के सामने ही कहा था कि “अब मैं ऐसे नहीं रह सकता, मुझे यह शरीर किसी कारागाह की तरह लगता है जिसने मुझे कैद कर रखा है। मैं लड़कों की तरह महसूस करती हूँ।” लेकिन माँ को मेरी बात कुछ भी समझ नहीं आई थी, माँ ने उस वक्त बस इतना भर ही कहा कि “21-22 साल तक ठीक हो जाओगी, बहुत सारी लड़कियां ऐसी होती है जिन्हें लड़कों की तरह रहना अच्छा लगता है।” “माँ के सामने मैंने जो बात कही थी वह न तो कोई मज़ाक था और न ही कोई मामूली बात ही थी, जो मैंने यूं ही कह दी हो, यह बात समझने में मुझे 19 साल लग गए कि मैं स्त्री देह में कैद एक पुरुष हूँ। हाँ, कोई दो साल पूर्व की ही तो बात है जब एक ट्रान्सजेंडर (FTM) से मेरी मुलाक़ात हुई थी और उससे मैंने अपने अनुभव साझा किया था, तो उसने मुझे अपने आप से मिलवाया था, लेकिन यह मुलाक़ात भी तो खुद को ढूंढते हुए ही हुई थी। उसके कहने पर ही तो ढेर सारी किताबें तथा वीडियो देखा था जिससे अपनी पहचान को लेकर दृढ़ हुआ, शायद इसी से तो हिम्मत मिली थी कि अपनी बात घर वालों से कह सकूँ।”

जिस उम्र में हम विपरीत लिंगी लोगों के प्रति आकर्षित होने लगते हैं, वेदिका ने पाया कि वह तो लड़कियों के प्रति ही आकर्षित हो रही है। इस एहसास ने उसे सबसे ज्यादा खुद को समझने के लिए बाध्य कर दिया। एक दसवीं की लड़की को ग्यारहवीं कक्षा की मानवी पसंद आने लगी, वह दिल ही दिल मानवी को पसंद करने लगी। मानवी न उसके स्कूल की थी और न ही उसके मोहल्ले की, लेकिन एक जगह थी जहां दोनों की मुलाक़ात हो जाती, वह जगह थी ट्यूशन क्लास। मानवी महसूस कर रही थी कि वेदिका उसके आस-पास वैसे ही चक्कर लगाने लगी थी जैसे कोई प्रेमी अपनी प्रेमिका के। चूंकि वेदिका, मानवी के लिए लड़की ही थी इसलिए वेदिका का उसका ख्याल रखना, उसके लिए दूसरों से लड़ जाना, ज़्यादातर समय साथ रहना सब सामान्य बात ही थी। वेदिका खुद शारीरिक रूप से लड़की होने के कारण एक तरफ तो अपने दिल की बात कहने से डरती, तो दूसरी तरफ मानवी के प्रति अपने आकर्षण के बावजूद वह इस आकर्षण को तब तक गलत ही मान रही थी क्योंकि उसने अब तक लड़का-लड़की को ही प्रेमी-प्रेमिका के रूप में अपने आस पास देखा था। इन तमाम सवालों और उलझनों के बावजूद उसके साथ रहने व प्यार जताने का वह कोई भी मौका नहीं छोड़ती थी, इससे मानवी को भी एहसास होने लगा था कि वेदिका उसकी बेहद परवाह करती है। उन दिनों को याद करते हुए मानवी कहती है “मैं यह महसूस करती कि वो मेरा ख्याल रखता है, मेरा सपोर्ट करता है, मेरे लिए उसका झुकाव था, इन सबके बावजूद वह मेरे लिए थी तो लड़की ही। मैं सोचती थी कि हमारे बीच इससे ज्यादा रिश्ता तो नहीं हो सकता था। इस कारण मैं वेदिका से भागने लगी थी।” वेदिका पहले तो खुद को लेस्बियन समझने लगी थी, किंतु गहन अध्ययन और खुद के अनुभवों से उसने जाना कि उसका सिर्फ यौन आकर्षण ही लड़कियों की तरफ नहीं थी बल्कि वह खुद को पुरुष के रूप में देखना ज्यादा पसंद करती है। अब वह निश्चित होती जा रही थी कि वह लेस्बियन नहीं है।

उसने कई बार घर वालों को प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से बताने की कोशिश की लेकिन वह नाकाम रही। इस बीच उसकी समस्या और बढ़ गई जब 19 साल की उम्र में उसके शरीर में किशोरावस्था के कारण बदलाव आने लगे थे, शरीर में आया अनचाहा बदलाव उसके लिए असहनीय था। बढ़ती उम्र के साथ शरीर में आ रहा बदलाव उसे तनाव में डालने लगा। अचानक बढ़ता हुआ स्तन उसके लिए अभिशाप बन चुका था, मासिक धर्म अब भी ऐसी अनचाही पीड़ा है जो शारीरिक से ज्यादा मानसिक रूप से तोड़ देती है, हालांकि इसकी शुरुआत 12-13 वर्ष की उम्र में हो चुकी थी जो अन्य लड़कियों के साथ भी होता है। यह जैसे एक अलार्म हो जो बीच-बीच में उसे उसकी स्त्री शरीर में कैद होने का अहसास कराती हो। ऐसे में यह स्वाभाविक ही था कि उसे अपने ही शरीर से घृणा हो जाए। इस बारे में वेदांश कहते हैं कि, “अगर मासिक धर्म को छोड़ दें तो 18 वर्ष की उम्र तक मेरा शरीर लड़कों जैसा ही था, आप समझ सकते हैं जब 18 के बाद शरीर में अचानक बदलाव आया होगा तो उसका क्या असर हुआ होगा मेरे ऊपर। मैंने सभी जगहों पर जाना बंद कर दिया, लोगों से मिलना-जुलना छोड़ दिया। ऐसा नहीं है कि यह सब मैंने जानबूझकर किया हो, पर जब आप ऐसी जटिल स्थिति में हों तो कुछ सोच-समझ पाना और निर्णय लेना मुश्किल हो जाता है।” अब वह घर की चाहरदीवारी के भीतर खुद में सिमट कर रह गया था। शायद वह दुनिया के सामने बोझ बन चुके अपने उस दैहिक पहचान के साथ आना नहीं चाहता था, वह ऐसी लिंग भूमिका (जेंडर रोल) अदा नहीं करना चाहता था जिस भूमिका के लिए वह मानसिक रूप से तैयार न हो।
मन और शरीर के बीच चल रहे अंतर्द्वंद्व का असर यह हो रहा था कि वह अपने पढ़ाई में भी ध्यान नहीं दे पा रहा था। उसने कई बार प्रयास किया कि वह अपने पढ़ाई पर ध्यान दे लेकिन ऐसा संभव नहीं हो पा रहा था, परिस्थितियाँ वेदांश के लिए जटिल होती जा रही थी। एक तरफ ज़िंदगी दो पहचानों के बीच झूल रही थी तो दूसरी तरफ अपने कैरियर को भी नष्ट होते हुए वह देख रहा था। ऐसे में उसने फिर एक बार निश्चय करके घर वालों को सब कुछ बता देने की ठानी। उसे अपनों से उम्मीद थी कि वे उसे समझेंगे तथा इस कठिन घड़ी में उसका साथ देंगे लेकिन उसने जब घर वालों को हिम्मत जुटाकर यह बात बताई तो घर वाले उसे डाक्टर के पास ले गए। वहां उसके शरीर की जांच हुई। जांच के बाद डाक्टर ने कहा- “सब कुछ ठीक है बस तुम्हें एक छोटा सा काम करना होगा। तुम्हें अपना दिमाग बदलना होगा। क्योंकि सेक्स बदलना न आसान है और न ही बहुत ज्यादा सफल।” “उस दिन मैं बहुत रोया, मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मेरे साथ क्या हो रहा है!” क्या सही और क्या गलत! खुद की पहचान को अपनों द्वारा स्वीकार न किए जाने की त्रासदपूर्ण स्थिति थी। इन तमाम परेशानियों के कारण अपनी पढ़ाई पर ध्यान ना दे पाना वेदांश को अंदर ही अंदर तोड़ता जा रहा था, वह निराशा के गर्त में धंसता जा रहा था। इस परिस्थिति से हमेशा-हमेशा के लिए छुटकारा पाने के लिए उसने आत्महत्या करने की कोशिश भी की। वेदांश कहते हैं “आप परिवार से लड़ सकते हैं, दूसरे लोगों से भी लड़ सकते हैं लेकिन जिंदगी के हर एक पल खुद से नहीं लड़ सकते। हमारी लड़ाई हर एक पल अपने आप से होती है। यही कारण है कि ट्रान्सजेंडर में आत्महत्या की दर सबसे ज्यादा है।”

बहरहाल सुखद पहलू तो यह है कि जिस लड़की को वह चाहने लगा था अब वह भी उसे चाहने लगी है, दोनों ने हर कदम साथ चलने का वादा किया है। आज जब परिवार, समाज उसके खिलाफ खड़ा है तो वह लड़की ही एक मात्र है जो उसे उसकी पहचान के साथ स्वीकार कर रही है। मानवी, वेदांश को लड़के के रूप में स्वीकार करने के सवाल पर कहती है “मैंने यह देखकर प्यार नहीं किया कि वो क्या है, मैं बस उसे एक अच्छे इंसान के रूप में देखती हूँ। वह जैसा रहना चाहता है, उससे मुझे कभी कोई समस्या नहीं हुई।” मानवी बातचीत के बीच में ही मजाकिया लहजे में कहती है “हमारे बीच सबसे ज्यादा समस्या आपसी संबोधन को लेकर हुई, जो अब तक मेरे लिए लड़की थी उसके लिए अब मुझे लड़कों वाला सम्बोधन करना था।” इस रिश्ते में एक समय ऐसा भी आया था जब वेदांश ने मानवी को बता दिया था कि वो शायद उसका साथ न निभा पाए, अतः दोनों इस रिश्ते को तोड़ दे। जब खुद की पहचान ही अनिश्चित हो और परिवार, समाज उसे समझने के लिए तैयार न हो तो ऐसे में वह नहीं चाहता था कि उसकी वजह से किसी और की ज़िंदगी तबाह हो। इसके बावजूद मानवी ने वेदांश का साथ नहीं छोड़ा, उसने वेदांश को विश्वास दिलाया कि वह उसके साथ हमेशा रहने वाली है। मानवी कहती है “आज भी ऐसा नहीं है कि उसने मुझे प्रपोज किया हो या मैंने प्रपोज किया हो, लेकिन कुछ ऐसा था जिसे हम दोनों ने ही महसूस किया और आज हम एक दूजे के साथ हैं। यह मानवी का ही प्यार है कि वेदांश परिवार और समाज से दो-दो हाथ करने को तैयार है। वेदांश इस बारे में कहते हैं “मैंने उससे कहा कि मैं यह रिलेशनशिप कायम नहीं रख सकता, उस समय तो वह मान गई लेकिन यह उसी की कोशिश थी कि आज हम साथ-साथ हैं। उसके प्यार ने ही मुझे अहसास दिलाया है कि अगर मैं इस रिश्ते के लिए नहीं लड़ा तो मेरे जीवन में रह ही क्या जाएगा?”

यह कहानी वेदांश और मानवी के साथ बातचीत पर आधारित है। यहाँ दोनों के नाम बदले गये हैं। 

(लेखक महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा, महाराष्ट्र के समाजकार्य विभाग में पी-एच.डी. शोधार्थी हैं.  संपर्क: dksahu171@gmail.com, मोबाइल: 9604272869 )

तस्वीरें गूगल से साभार 
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छः दलित महिलाओं की पहल: सामुदायिक पत्रिका नावोदयम



नूतन यादव 


छः दलित महिलाओं द्वारा की जा रही सामुदायिक पत्रकारिता के बारे में बता रही हैं नूतन यादव: 

हाशिये के समाज से जुड़े गंभीर मुद्दे  अक्सर  मीडिया में स्थान नहीं बना पाते जिसमें महिलाएं और वे भी दलित महिलाओं की आवाज तो बिलकुल अनसुनी कर दी जाती है | ऐसे में छः दलित महिलाओं के एक स्वयं सहायता समूह ने एक सामुदायिक पत्रिका ‘नवोदयम’  के रूप में न केवल मुख्य धारा की मीडिया के समक्ष अपनी पत्रिका शुरू कर  उसमें दलित, गरीब और ग्रामीणों  की समस्याओं को उठाया बल्कि दलित और ग्रामीण महिलाओं को सशक्त करने के नए रास्तों को भी सामने लाने का नया माध्यम बनी |

काम करते रिपोर्टर

आंध्र प्रदेश के चित्तूर जिले में जमीनी पत्रकारिता एक नए और बेहतर रूप में दिखाई दे रही है | 15 अगस्त  2001 में चित्तूर जिले में  गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम के तहत विकास के मुदों पर जागरूकता पैदा करने के लिए  सरकारी पहल के रूप में नवोदयम शुरू हुआ जिसने  आगे चलकर एक प्रकाशन की शक्ल ली | चित्तूर जिले में कुछ महीनों के लिए  डीपीआईपी परियोजना DPIP को लागू करने के बाद इसकी समीक्षा के लिए की गई बैठकों में से एक में यह महसूस किया गया की इस  परियोजना से जुडी गतिविधियों के सार  को प्रेरणा स्त्रोत के रूप में समुदायों तक नियमित रूप से पहुंचाया जाना चाहिए| इसी समय  नवोदयम  पत्र ने जन्म लिया जिसका उद्देश्य सशक्तिकरण के लिए सूचना’ की प्राप्ति था|

इसकी सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि यह पूरी तरह से  ग्रामीण महिलाओं द्वारा चलाया जाता है | नवोदयम की स्थापना इन प्रमुख  चार उद्देश्यों की पूर्ति के लिए हुई : (1) ग्रामीण गरीबों की आवाज को आगे बढ़कर रखना (2) ग्रामीण महिलाओं को विशेष कवरेज देना  (3) सूचनाओं को ग्रामीणों की पहुँच में लाना  (4) पत्रकारिता को महिलाओं के सशक्तिकरण के साधन के रूप में अपनाना | यह प्रोजेक्ट पूरी तरह से सरकार द्वारा प्रायोजित था लेकिन इसे चलाने वाली महिलाओं ने अपनी स्वतंत्रता को बनाये रखा और सरकार के  सम्पादकीय हस्तक्षेप को नहीं माना | एक  बात जो नवोदयम को दूसरे पत्रों से  अलग बनाती है वह यही है कि इसका संचालन  पूरी तरह से कम पढ़ी लिखी गरीब महिलाएं कर रही हैं | शुरू में नवोदयम का प्रकाशन  त्रैमासिक के रूप में किया गया था जिसमें केवल आठ पृष्ठ थे  जो बाद में बढती लोकप्रियता के कारण 24 पृष्ठों के मासिक पत्र में बदल गया | ग्रामीण महिलाएं जिनमें अधिकतर दलित है पत्रिका से जुड़े सभी कार्य जैसे रिपोर्टिंग, लेखन, संपादन, ले-आउट, यहाँ तक कि सर्कुलेशन का काम भी संभालती हैं|  वित्तीय प्रबन्धन सहित नवोदयम प्रकाशित करने के तकनिकी पहलुओं को देखने के लिए संवाददाताओं में से एक कोर कमिटी का गठन किया गया जो पत्रिका के कुल बजट का प्रबन्धन करती है|

संस्थापक सदस्यों में से एक सदस्य मंजुला के अनुसार उनकी सबसे बड़ी समस्या भाषा की रही | प्रमुख व्यावसायिक  अखबार उनकी समस्याओं को स्थान नहीं देते थे इसकी वजह उन अखबारों के पत्रकारों की भाषा भी रही | वे अंग्रेजी और  मानक तेलुगू  बोलते समझते थे जिसके कारण वे ग्रामों के भीतर तक नहीं जाते थे और मंडल स्तर की  ख़बरों को ही महत्त्व दिया करते थे | संस्थापक सदस्य और सम्पादक मंजुला ‘नवोदयम’ के बारे में बताती हैं कि शुरू में हम छः महिलाएं ही गाँवों और मंडलों में घूमघूम कर खबरें एकत्र किया करती थी और फिर स्वयं उसका पेज आदि डिजाईन  करती थी और प्रिंट करती थी | अपनी शुरुआत के चार सालों तक इनके पास कोई कैमरा नहीं था तो ये आपस में ही खबर के अनुसार चित्रादि बना लिया करती थी | वे कहती हैं कि आरम्भ में उनसे गाँव वाले अक्सर पूछा करते थे कि पिता या पति होने के बावजूद वे काम क्यों करती हैं?  रात में देर से लौटना या कहीं ठहर जाना भी आपत्तिजनक माना जाता था | मंजुला बताती हैं कि चीजें तब  गंभीर हो गईं जब  कुछ विशेष  स्टोरीज लिखने पर उन्हें मौत की धमकियाँ तक मिली | इसका कारण अचानक आये बदलावों के कारण गाँव में पुरुषों को आ रही परेशानियां थीं|

आज  अन्य अंशदाताओं के अतिरिक्त नवोद्यम के 12 स्थायी सदस्य  हैं| प्रत्येक रिपोर्टर अपनी बीट की खबरें कवर करने के लिए लगभग 5 से  6 मंडल घूमती  हैं | इस पत्रिका में व्यापक रूप से उन्हीं मुद्दों पर लिखा जाता है जिनसे पाठक सीधे तौर पर जुड़े  होते हैं |इस पत्रिका के रिपोर्टर मुख्यतः अपने  गाँवों और उसके  आस पास के परिवेश मे घटने वाली घटनाओं पर ही  चाहे वे स्त्री सशक्तिकरण , घरेलू हिंसा और बाल विवाह जैसे बड़े मुद्दे हों | अथवा  ऐसे छोटे विषय जैसे किस तरह अपना बैंक लोन चुकाएँ इससे पहले कि उसका  ब्याज आपको ख़त्म कर दे |

पत्रिका में काम करने वाले  पत्रकारों के पहले  बैच ने  भी आरम्भ में कई बड़े जनसमूहों को संबोधित किया और अपनी यात्रा की  कहानी साझा की |आज जब इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ग्रामीण जनता के पास पहुँचने लगा है नवोदयम ने 7 महिलाओं को 10 महीने में वीडियो पत्रकारिता की ट्रेनिंग दी | अब वह 100 से अधिक डॉक्यूमेंटरी फिल्म बना चुकी हैं और अपनी वीडियो क्लिप्स प्रमुख टेलीविज़न नेटवर्कों को उपलब्ध करा रही हैं |
आज जब हम मेन स्ट्रीम मीडिया द्वारा महिलाओं के मुद्दों को कवरेज न दिए जाने का रोना रो रहे हैं ऐसे में नवोदयम महिला शक्ति का  एक प्रेरणादायी उदाहरण प्रस्तुत करता है |

लाड़ली सम्मान से सम्मानित नवोदयम टीम

चूँकि इलेक्ट्रोनिक मीडिया ग्रामीणों तक पहुँचने में समय लेता है इसलिए नवोदयम ने दस महीने की अवधि में सात महिलाओं को वीडियो पत्रकारिता में प्रशिक्षण दिया है|इन महिलाओं ने सौ से भी अधिक डॉक्यूमेन्ट्री फिल्में बनाई हैं| दहेज़ पर बनाई फिल्मों ने ग्रामीणों पर गहरा प्रभाव छोड़ा|  जिन ग्रामीणों के बच्चे स्कूल छोड़कर बाल-श्रम करने लगे थे उन्होंने भी इन नवोद्यम की कर्मियों के समझाने पर अपने बच्चों को वापस स्कूल भेजने पर आजी हो गए|इस पत्रिका प्रभाव वास्त्वविक है और सहज ही दिखता है|

आज  मुख्यतः महिलाओं के बीच पढ़ी जा रही इस  पत्रिका की हर पाठिका यह सुनिश्चित करती है कि उनके पति और परिवार के एनी सदस्य भी इसे अवश्य पढ़ें|नवोदयं के संवाददाताओं को जब भी किसी सामाजिक बुराई से जुडी खबर मिलती है  वे तुरंत हरकत में आते हैं और सचमुच में उस पर कोई कार्यवाही करते हैं|नवोदयम कम्युनिटी मैगज़ीन ( तेलुगू ) ने वर्ष 2009 यूएनएफपीए UNFPA लाडली मिडिया स्पेशल जूरी अवार्ड जीता | नवोदयम  जैसी सफल सामुदायिक पत्रिका से प्रेरणा लेते हुए  रेडिओ और फिल्मों का उपयोग कर कई  अन्य पहल भी की जा रही हैं जिससे वंचितों की आवाज समाज और सत्ता तक पहुंचाई जा सके|  यह पत्रिका अपने आप में संघर्ष की एक सफल और अनुपम गाथा है |

नूतन यादव सोशल एक्टिविस्ट और हिन्दी की प्राध्यापिका हैं. सम्पर्क: 9810962991

तस्वीरें गूगल से साभार 
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