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पटना में धर्मांतरण के नाम पर ईसाई परिवार की प्रताड़ना: जांच दल

निवेदिता 


बिहार से लगातार ऐसी खबरें आ रही हैं, जो बिहार में बढ़ते साम्प्रदायिक तापमान की सूचक हैं. कई जिलों में साम्प्रदायिक तनाव पैदा करने की खबरों के बीच इस बार राजधानी से हिंदूवादी जमातों के दवाब में पुलिस प्रशासन द्वारा एक ईसाई परिवार की प्रताड़ना की खबर है, परिवार का मुखिया बिहार मिलिट्री पुलिस में सब इन्स्पेक्टर हैं. ऐसा लगता है कि हिंदूवादी संगठनों के आगे नीतीश सरकार पूरी तरह बेवश है. इस मामले की जांच के लिए बने जांच दल की रिपोर्ट:

रुपसपुर घटना की जांच करने गयी टीम के सदस्यों के नाम
1. निवेदिता  ( बिहार महिला समाज की कार्यकारी अध्यक्ष)
2. रुपेश (सामाजिक कार्यकर्ता)
3. निशा पटना (उच्य न्यायालय की अधिवक्ता)
4. सुशील कुमार (छात्र संगठन)
5. इशतियाक (सामाजिक कार्यकर्ता)

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ नीतीश कुमार

बिहार की राजधानी अभी तक धार्मिक और साम्प्रदायिक आग से बची हुई है, पर इस आग को लहकाने की पूरी तैयारी की जा रही है। पिछले दिनों पटना में भी धर्म के नाम पर जहर घोलने की कोशिश हुई। इस कोशिश में एकबार फिर आर.एस.एस और विश्व हिन्दू परिषद का नाम आ रहा है। यह काम काफी बारीकी से किया जा रहा  है। इसबार उनके निशाने पर एक ईसाई परिवार है।

यह घटना 29 अप्रैल सुबह 10. 30 बजे की है। जिसमें एक ईसाई परिवार को पुलिस ने धर्म परिवर्तन के नाम पर  गिरफ्तार किया। पुलिस द्धारा दर्ज एफ.आई.आर को देखने से स्पष्ट होता है कि बिना किसी जांच-परख के पुलिस ने किसी दबाव में आकर आनन-फानन में ईसाई दंपत्ति को गिरफ्तार किया है। उनपर आईपीसी धारा 298, 504, 505, 120बी के तहत रुपसपुर थाना में एफआईआर लॉज किया गया है।  पुलिस के पास न तो गिरफ्तारी का वारंट था ना ही उच्चतम न्यायलय के दिये गए निर्देर्शो का पालन किया गया। उच्चतम न्यायालय के एक महत्वपूर्ण फैसले और सीआरपीसी में किए गये संशोधन के अनुसार अगर किसी केस के धारा के अंर्तरगत सात साल से कम की सजा का प्रावधान है तो पुलिस स्वयं गिरफ्तार नहीं कर सकती। गिरफ्तारी के लिए मजिस्ट्रेट से अनुमति सहित उसकी कुछ ‘शर्ते हैं। क्या उन ‘शर्तो का पालन किया गया?

इस पूरे मामले की जांच के लिए हमारी टीम के सदस्य रुपसपुर गए और वहां रहने वाले लोगों से मुलाकात की। टीम के लोग ईसाई परिवार से भी मिले जिनपर जबरन धर्म परिर्वतन कराने का आरोप है। रुपसपुर घनी आबादी वाला मुहल्ला है। जहां हिन्दुओं की मिली-जुली आबादी रहती है। आबादी का एक बड़ा हिस्सा दलितों का है। हिन्दू बहुल इस इलाके में मात्र एक परिवार ईसाई है। जो पिछले सात सालों से यहां रह रहा है।  सुभाष कुमार परियार ईसाई हैं। उनके पूर्वज नेपाल में रहते थे। बाद में वे बिहार आकर बस गए। सुभाष कुमार बीएमपी में सब इंस्पेक्टर की नौकरी करते हैं। उनकी पत्नी दुर्गा परियार प्रेरणा फाउन्डेशन के नाम से एक ट्रस्ट चलाती हैं। जिसके तहत महिलाओं को सिलाई-कढ़ाई की ट्रेनिंग दी जाती है।

पिछले 29 अप्रैल को करीब 10 बजकर 30 मिनट के आस-पास सुभाष कुमार परियार, उनकी पत्नी दुर्गा परियार और उनकी बहन रजनी प्रधान अपने घर में प्रार्थना कर रही थी । प्रार्थना में कई दूसरे लोग भी ‘शामिल थे उसी समय विश्व हिन्दू परिषद और आर.एस.एस से जुड़े हुए लोग उनके घर में धुस आये और हंगामा करने लगे। उन्होंने यह कहते हुए मार-पीट ‘शुरूकर दी कि ये लोग जबरन धर्म परिवर्तन करा रहे हैं।

जब प्राथना में मौजूद लोगों ने विरोध किया तो वे वापस गए और कुछ ही देर बाद अपने साथ पुलिस को लेकर आये। पुलिस ने बिना किसी वांरट के सुभाष कुमार परियार, दुर्गा परियार और उनकी बहन रजनी को गिरफ्तार कर लिया। दोनों महिलाओं की गिरफ्तारी के समय कोई महिला पुलिस साथ में नहीं थी।  रजनी प्रधान की गोद में पांच साल का बच्चा था जिसे बेरहमी मां से अलग कर दिया गया। विरोध करने पर रजनी की पुलिस द्धारा पीटाई की गयी। सुभाष कुमार बी.एम.पी में सब इन्सपेक्टर के पद पर कार्यरत हैं। जिनकी गिरफ्तारी के बाद उन्हें निलंबित कर दिया गया है.

जांच टीम ने रुपसपुर का दौरा किया और सुभाष परियार के परिवार से मुलाकात की। सुभाष परियार की 16 साल की बेटी इस घटना से काफी डरी हुई है। उसने बताया कि 29 अप्रैल को यह घटना घटी उस समय वह भी प्राथना में ‘शामिल थी। उसी समय कुछ नौजवान आये और मेरे माता-पिता को गंदी-गंदी गालिया देने लगे। विरोध करने पर उनकी पीटाई करने लगे। उसने बताया कि इस घटना के पीछे पारवारिक विवाद भी है जिसका फायदा आर.एस.एस ने उठाया है। उसके फूफा भीम सिहं ने आरएसएस से जुड़े नागेश राणा से उसके पिता के खिलाफ शिकायत की थी। उसके बाद ही धर्म परिर्वतन का आरोप लगाते हुए पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार किया। उसके फूफा उनकी बुआ के साथ अक्सर मार-पीट करते हैं जिसका विरोध उसके मां, पिता करते हैं।

उसी मुहल्ले के मिही लाल ने कहा कि उन्होंने पुलिसवालों से ही सुना कि ये लोग 10 हजार रुपये लेकर धर्म परिवर्तन कराते हैं। मिही लाल ने स्वीकार किया कि धर्म परिवर्तन की कोई घटना नहीं घटी है। आजतक इस मुहल्ले के किसी व्यक्ति नें ईसाई परिवार पर ये आरोप नहीं लगाया है।

मुन्ना देवी भी उसी मुहल्ले में रहती हैं। उन्होंने कहा कि कभी किसी के साथ किसी तरह की जबरदस्ती नहीं हुई है। वे लोग काफी अच्छे और ‘शांतिप्रिय लोग हैं। छोटे लाल और जितेन्द्र कुमार रुपसपुर के निवासी हैं। ने कहा कि कभी भी इस मुहल्ले में धर्म परिवर्तन को लेकर कोई बात-चीत नहीं हुई । वे लोग हमेशा मददगार रहते हैं। और काफी धार्मिक लोग हैं। उनका ट्रस्ट महिलाओं को रोजगार से जोड़ने का काम करता है।

जांच टीम के सदस्यों ने श्री आलोक राज ए.डी.जी (लॉ एण्ड आर्डर) से मुलाकात की और इस मामले से अवगत कराया। उन्होंने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए तत्काल आई.जी से बात की। आई .जी ने इस मामले की जांच तुरत डी.आई.जी से कराने का आदेश दिया है। हालांकि कल निचली अदालत से ईसाई परिवार की जमानत याचिका खारिज कर दी गयी है और खबर है कि पुलिस गवाह प्लांट कर रही है, क्योंकि एफआईआर में जो चार गवाह लिखे गये थे, वे उस मोहल्ले से बाहर के लोग थे अब पुलिस मोहल्ले से भी गवाहों को प्लांट कर रही है.



जांच टीम इस निष्कर्ष पर पहुंची है कि:
– रुपसपुर में रहने वाले ईसाई परिवार के खिलाफ एक साजिश के तहत यह कार्रवाई हुई है।
– इसके पीछे राजनीतिक पार्टियों का हाथ है
– आएएसएस और विश्व हिन्दू परिषद के कार्यकाओं का नाम आ रहा है
– धर्म के नाम पर उन्माद पैदा करने की कोशिश की जा रही है
– पुलिस द्धारा किए गये एफआईआर में भी यह कहीं दर्ज नहीं है की किन लोगों का जबरन धर्म परिवर्तन कराया गया।
– पुलिस द्धारा घटना की बगेर छान-बीन किए गिरफ्तारी से लगता है कि पुलिस के उपर कोई उपरी दबाव काम कर रहा है
– गिरफ्तारी का वारेंट भी पुलिस के पास नहीं था
– गिरफ्तारी के समय कोई महिला पुलिस अधिकारी भी मौजूद नहीं थी।
– जांच टीम यह मांग करती है कि इस मामले में पुलिस की भूमिका की जांच की जाय।
– बिना किसी सबूत के गिरफ्तारी के विरुद्ध पुलिस पर आपराधिक मुकदमा दर्ज हो।
– धर्म के नाम पर उन्माद पैदा करने और साम्प्रदायिक सौहार्द बिगाडने के लिए जिन लोगों ने यह साजिश रची उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई हो
– आरएसएस और विश्व हिन्दू  परिषद द्धारा रची गयी इस साजिश की जांच की जाय।
– ईसाई दम्पति  को बिना किसी ‘शर्त के रिहा किया जाय।
– सुभाष कुमार को उनकी नौकरी में फिर से बहाल किया जाय।

इस बीच एडीजी लॉ एंड आर्डर ने आलोक राज ने स्पष्ट किया कि उन्होंने डीजीपी से बात की तो उन्होंने सेंट्रल रेज के डीआईजी को इस मामले को सुपरवाईज करने का निर्देश दिया है. 


निवेदिता वरिष्ठ पत्रकार हैं और स्त्रीकाल के सम्पादन मंडल की सदस्य हैं. सम्पर्क: 9835029152

तस्वीरें गूगल से साभार 

स्त्रीकाल का संचालन ‘द मार्जिनलाइज्ड’ , ऐन इंस्टिट्यूट  फॉर  अल्टरनेटिव  रिसर्च  एंड  मीडिया  स्टडीज  के द्वारा होता  है .  इसके प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें : 
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अनुराधा अनन्या की कविताएं ( पति प्रेम और अन्य)

अनुराधा अनन्या

स्वतंत्र लेखिका, रंगमंच से जुड़ी हैं.:anuradha.annanya@gmail.com

पति प्रेम 

पतियों से दुखी औरतें
अपने सुकून टटोलती हैं
कभी  अपनों के दुलार में
कभी पुराने प्रेमियों की याद में
बेहद निजी समय में

निजी समय जो वे चुराती हैं
बुनती हैं अपने एकांत में

एकांत, किसी बंद कमरे में नहीं
जंगल में नही, छत पर भी नहीं
जहाँ मिल जाता है आसानी से एकांत किसी को भी
वहां  भी नही

औरतों का एकांत चलते-फिरते जीवन में
घर के काम करते हुए
बच्चे संभालते हुए.
बिस्तर पर ढेर औरतें
उतरती है अपने निजी समय में
नींद में होने के बावजूद

इस तरह खुद को बचाती हैं
संदिग्ध होने से
कई बार तो  एकांत को भी काटती हैं
इसी कोशिश में

मगर सुकून टटोलती रहती है पूरी शिद्दत से
ताकि बना रहे पति प्रेम
यहां तक  कि
उन्हें पति की मार में भी
प्रेम नजर आने लगता

एक पन्ना और बस मैं 

मैंने सारे क्षोभ को बटोरा
और कलम उठाई
फिर अपने दुखों को,निराशा को,थकान को
शब्दो मे पिरो कर
कागज़ पर रसीद कर दिया
जैसे पूरा मन खाली हो गया हो कोरे कागज़ पर

राहत बुनती चली गई एक- एक हर्फ़ के साथ
पूरा मन खाली हो गया
लबालब भरा हुआ था मन
प्यार से,धोखे से,निराशा से,थकान से, दुःख से,आस से
खाली हो गया एक काग़ज़ पर

दिमाग परत दर परत खुलता चला गया
केंचुली सी उतरती गई सारी परतें
परतों में छिपा एक गाना,एक कहानी,एक रहस्य,एक याद,एक धोखा,प्यार,कुछ योजनाएं,कुछ,दृश्य ,कुछ शब्द और एक क़लम
भाषा के रूप में उतरते गए
उधड़ता गया लबालब भरा हुआ मन और परत दर परत दिमाग एक ही पन्ने पर

एक नींद कमाऊंगी अब
अपने आलिंगन से ही
खुद को सुनाते हुए लोरी
बुनूँगी एक सपना,एक गाना,एक कहानी,एक याद,एक अहसास, प्यार,ढेरों इच्छाएं,योजनाएं,कुछ शब्द,एक क़लम, एक पन्ना और बस एक मैं

सहेलियों  सी कविता 


कविताएं मेरी सहेलियां  हैं
जिंदा रखती है मुझे
कागज़ पर
समेटे हुए अंदर के अवसाद मेरे
दुःख मेरे ,शिकायते भी
बचाकर रखती हैं आंच दिल मे आस की
फूट पड़ेगीं ठीक दुःख  की तरह ही
खुशी में भी
मन की पतझड़, वसन्त दोनो ही दिखेंगें
इन कविताओं में
ज़िंदा रहूंगी मैं,जिंदा कविताओं की  छिपी आस में

झांक लेंगी वे औरतें भी इनमें
जो छिपाकर रखती है जिंदा कविताएँ
कविताएँ, जीवन की यात्राओं की ,बादलों की,आसमानों की
असीम कल्पनाओं की और अधूरी इच्छाओं की भी

कविताएँ,छिपाकर रखी है उन औरतों ने
मन के किसी कोने में
दुप्पटे की गाँठ में
लटकते हुए छिके में
एक याद की तरह
महफूज है किसी खजाने सी

कविताएँ , जो जबान से ना कही गई
ना लिखी गई, किसी जबान में
दुनिया की चलताऊ भाषा से दूर
अपनी ही भाषा में

डूबी कविताएँ

पहचान जाएंगी औरतें देखते ही
सहेलियों की तरह
खोज लेंगी पीड़ अपनी, प्रीत अपनी
मेरी कविताओं में भी
उनकी कविताओं की तरह

ये कविताएँ जो कही गयीं
जो अनकही भी रही
भाषाओं में

4. 
कहना सुनना 

उसने कहा
तुम पागल हो
और निपट भी

मैं पागल हूँ…?
वह यह भी न कह पाई
पागल नहीं हूँ
न कह पाने की तरह

वह अभ्यस्त है
सिर्फ सुनने की
मगर कोशिश करती है
कहने की भी

मगर वह न कभी अभ्यस्त ही  रहा
सुनने का
न कोशिश ही की कभी

5. 
भाषा का अंतर 

मेरी भाषा को पता है
कब क्या कहना है

तुम्हारी भाषा को पता है
कब क्या कहलवाना है

इस कदर अभ्यस्त हैं
इस संवाद में हम
कि तुम सिर्फ इशारा भी करते हो
तो मैं मशीन सी चालू हो जाती हूँ

तस्वीरें गूगल से साभार 

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कम्युनिस्ट महिलाओं, कामगार महिलाओं के विचार सर्वहारा की क्रांति पर ही केंद्रित होना चाहिए: लेनिन

आज से लगभग 100 साल पहले 1920 में मार्क्सवादी स्त्रीवादी क्लारा जेटकिन ने रूसी क्रांति के विराट नेता लेनिन से यह बातचीत की थी. इस बातचीत का एक हिस्सा (बीच का हिस्सा), जो महिला श्रम के सन्दर्भ में है स्त्रीकाल के पाठक 1 मई (मजदूर दिवस) को पहले ही पढ़ चुके हैं, इस लिंक को क्लिक कर पढ़ सकते हैं. 

लेनिन: कम्युनिस्ट नेतृत्व महिलाओं के आन्दोलन के सवाल पर निराशावादी, रुको और देखो वाला रुख अपना लेता है

प्रारम्भ इस लिंक से होता है: भारतीय संतों के हमेशा कुंडलिनी जागरण की तरह हमेशा सेक्स की समस्याओं में उलझे रहने वालों पर भी मैं अविश्वास करता हूं: लेनिन

“मैंने जहां जोड़ा कि जहां निजी सम्पत्ति और बुर्जुआ सामाजिक व्यवस्था है, वहां सेक्स और विवाह ने प्रत्येक सामाजिक वर्ग और स्तर की महिलाओं के लिए जटिल समस्याएं, द्वंद और दुःख ही दिए हैं। जहां तक सेक्स-संबंधों के मसले पर महिलाओं का सवाल है, युद्ध और उसके नतीजों ने पहले से मौजूद टकराहट और दुखों को बहुत बढ़ा दिया है। जो समस्याएं पहले महिलाएं छिपा जाती थी, अब खुलकर प्रगट हो गई है। क्रांति की शुरुआत के माहौल ने इसे बढ़ा दिया है। पुरानी भावना और खयालात टूट रहे हैं। पुराने सामाजिक संबंध ढीले होकर टूट रहे हैं। जनता के बीच नए रिश्ते पैदा होते नजर आ रहे हैं। ये बुर्जुआ  समाज की विरूपताओं और नकलीपन के विरूद्ध एक प्रतिक्रिया भी हैं। इतिहास में विवाह पद्धतियों और परिवारों की बनावट में हुए बदलावों, और इन बदलावों आर्थिक व्यवस्था पर निर्भरता आदि के बारे में जानने पर कामकाजी महिलाओं के मन में, बुर्जुआ  समाज की ‘सनातन’ रहने वाली धारणा भी टूटेगी। इनके प्रति एक ऐतिहासिक आलोचकीय रुख बुर्जुआ समाज के कठोर विश्लेषण की तरफ ले जाएगा और सेक्स के प्रति गलत नैतिकताओं के साथ-साथ इसके मर्म और प्रभावों को खोलकर रख देगा। सभी रास्ते रोम की तरफ जाते हैं। समाज के दार्शनिक ढांचे के एक महत्वपूर्ण अंग विशेष का हर सच्चा मार्क्सवादी विश्लेषण, बुर्जुआ समाज और उसके आधार, यानी निजी सम्पत्ति, के विश्लेषण की तरफ ले जाता है। ये एक ही नतीजे की ओर ले जाता है कि ‘कार्थेज को नष्ट करना ही होगा।’’

लेनिन ने मुस्कुराते हुए सिर हिलाया।

‘’बहुत खूब! तुमने अपनी पार्टी और उसके सदस्यों का एक वकील की तरह बचाव किया। जो कुछ तुमने कहा, बेशक सच है। तो भी जर्मनी में जो गलती की जा चुकी है, यह उसका बचाव नहीं कर सकती। वो गलती तो हो चुकी है। क्या तुम पूरी गम्भीरता के साथ मुझे आश्वस्त कर सकती हो कि उन पाठ और चर्चा गोष्ठियों में परिपक्व और मजबूत ऐतिहासिक भौतिकवादी नजरिए से सेक्स और विवाह के प्रश्नों पर विचार किया गया? इसके लिए भौतिकता की व्यापक, गहन और पूर्णतः मार्क्सवादी पकड़ की जरूरत होगी। इसके लिए अभी क्या तुम्हारे पास जरूरी ताकत है? वो पर्चा जिसके बारे में हमने पहले बात की थी, बांटा गया था तो शाम की पाठ और चर्चाओं में पढ़ाने के काम आया ही होगा। आलोचना के बावजूद। उसे प्रचारित किया गया। इस समस्या पर ऐसा अधूरा और गैर मार्क्सवादी रुख क्यों?  क्योंकि  सेक्स और विवाह को मुख्य सामाजिक समस्या के एक अंग के तौर पर नहीं देखा गया। इसके विपरीत मुख्य सामाजिक समस्या को सेक्स समस्या के एक हिस्से, एक उपांग के तौर पर बताया गया। मुख्य मुद्दा तो कहीं पीछे छूट गया। न सिर्फ यह प्रश्न अस्पष्ट हो गया, बल्कि साधारण तौर पर कामगार महिलाओं के विचार और वर्गीय चेतना भी धीमी पड़ गई।

‘’इसके अलावा, यह कम महत्वपूर्ण मुद्दा नहीं है, जैसा कि सोलोमन का कहना है कि, ‘प्रत्येक काम के लिए एक समय होता है।’ मैं पूछता हूं कि कामगार महिलाओं को ऐसे प्रश्नों- कि कैसे प्यार करें या करवाएं या कैसे प्रेम निवेदन करें या चाहें आदि पर महीनों व्यस्त रखने का क्या यह उचित समय है? और निश्चित ही ये सब ‘भूत, वर्तमान और भविष्य’ तथा विभिन्न नस्लों के परिप्रेक्ष्य में! इसे गर्वपूर्वक ऐतिहासिक भैतिकवाद का स्वरूप दे दिया गया है। अभी, इन दिनों तो कम्युनिस्ट महिलाओं, कामगार महिलाओं के विचार सर्वहारा की क्रांति पर ही केंद्रित होना चाहिए, जो अन्य मसलों के साथ भौतिक और सेक्स संबंधों के सुधार हेतु जरूरी आधार तैयार करेगी। अभी तो हमें इन मसलों पर कि- आस्ट्रेलिया की आदिम जातियों में विवाह कैसे होते थे या प्राचीन काल में भाई-बहनों के बीच विवाह होते थे या नहीं, आदि के बजाय दूसरी समस्याओं को प्राथमिकता देना चाहिए।

जर्मनी के सर्वहारा के लिए तो इस समय- सोवियतों की समस्या, वर्सेल्स का समझौता और उसका महिलाओं के जीवन पर असर, बेरोजगारी की समस्या, वेतन में कमी आना, कर और अन्य ऐसी समस्याएं हैं, जिन पर पहले सोचना होगा। थोड़े में कहूं, तो मेरा मानना है कामगार महिलाओं को सेक्स, विवाह आदि के मसलों की राजनीतिक और सामाजिक शिक्षा देना गलत है। बिल्कुल गलत, तुम इस बारे में चुप कैसे रह सकती हो? तुम्हें इसके खिलाफ अपने प्रभाव का उपयोग करना चाहिए।’’

मैंने अपने उत्साही दोस्त को बताया कि विभिन्न जगहों पर नेतृत्वकारी महिलाओं की आलोचना करने या अपना विरोध दर्ज कराने से मैं पीछे नहीं हटी हूं। पर जैसा कि वो भी जानता है कि किसी भी मसीहा का अपने देश या घर में सम्मान नहीं होता। आलोचना करने से मैं खुद इस शक के दायरे में आ गई कि मेरे दिमाग में सामाजिक-लोकतांत्रिक रुख और पुराने दोमुंहेपन के अंश आज भी मजबूत हैं। हालांकि अंत में मेरी आलोचना कारगर साबित हुई। अब शाम की सभाओं में सेक्स और विवाह चर्चा के मुख्य विषय नहीं है।

लेनिन ने अपनी दलीलों की कड़ी को फिर पकड़ लिया।

‘हाँ, हां, मुझे पता है।’ वो बोले। ‘इस मामले में कई लोग मुझ पर दोमुहा होने का शक करते हैं, हालांकि मेरे लिए ऐसा रुख घृणास्पद है। वे बहुत संकीर्ण सोच और नकलीपन से भरपूर हैं। यूं, मैं इससे उत्तेजित नहीं होता। बुर्जुआओं द्वारा दूषित उनके अण्डों में से जो पीली चोंच वाले पक्षी ताजा-ताजा बाहर आए हैं, बहुत-ही चालाक हैं। हमें अपनी राहों पर इनके बावजूद चलना होगा। सेक्स की समस्या के प्रति ‘आधुनिक’ नजरिए और उस पर जरूरत से ज्यादा रुचि दिखाई जाने से युवा आंदोलन भी प्रभावित हो रहा है।

एक उपहास और निंदापूर्ण हाव-भाव के साथ लेनिन ने ‘आधुनिक’ शब्द पर जोर दिया।

“मुझे यह भी बताया गया है कि तुम्हारे युवा संगठनों में भी सेक्स समस्याएं रुचि का विषय है, जबकि इस विषय पर बहुत व्याख्यान नहीं हुए हैं। ये बेतुकापन युवा आंदोलन के लिए बहुत खतरनाक और नुकसानकारी है। ये सेक्स की अधिकता, सेक्सजीवन के अधिक उपयोग और युवा लोगों की शक्ति और स्वास्थ्य की नष्टता की तरफ जा सकती है। तुम्हें इससे भी जूझना होगा। युवा आंदोलन और महिला आंदोलन के बीच दूरी न हो। हर कहीं हमारी कम्युनिस्ट महिलाओं को युवाओं के साथ सलीके से सहयोग करना चाहिए। यह व्यक्तिगत तौर से हटाकर उसे सामाजिक स्तर तक बढ़ाने वाली मातृत्व की निरन्तरता होगी। महिलाओं के शुरुआती सामाजिक जीवन और गतिविधियों को और भी बढ़ावा दिया जाना चाहिए। जिससे कि घर और परिवार पर केंद्रित उनकी संकीर्ण दोमुंहेपन और व्यक्तिवादी मानसिकता से वे बाहर निकल सकें।’’

‘हमारे देश में भी अच्छी संख्या में युवा हैं, जो सेक्स के प्रश्न पर ‘बुर्जुआ  विचारों और नैतिकताओं को संशोधित’ करने में व्यस्त हैं। मैं यह भी बताना चाहूंगा कि इसमें हमारे बेहतरीन लड़के-लड़कियों का, हमारे सचमुच संभावनाशील युवावर्ग का एक अच्छा-खासा हिस्सा शामिल है। ऐसा, जैसा कि तुमने अभी-अभी कहा। युद्ध की समाप्ति के बाद और क्रांति की शुरुआत में जो वातावरण बना है, उसमें पुराने वैचारिक मूल्य अपने आपको एक ऐसे समाज में पाते हैं, जिसका आर्थिक आधार आमूलचूल बदल रहा है। तो वे खत्म होने लगते हैं और अपने नियंत्रण की ताकत को खो देते हैं। संघर्ष में ही नए मूल्य ठोस होते जाते हैं। लोगों के बीच, महिला-पुरुषों के बीच के संबंधों के अनुसार भावनाओं और विचारों में क्रांतिकारी बदलाव आता है। व्यक्ति और समाज के अधिकारों की नई सीमाएं तय होने लगती हैं, जाहिर है कि व्यक्ति के कर्तव्यों की भी। मामला अब भी अधूरा, असमंजसपूर्ण और उत्तेजित है। विविध विरोधाभासी प्रवृत्तियों की दिशा और ताकत अभी भी साफ-साफ नहीं दिख रही है। नष्ट होकर पुनः जीवन में आने की प्रक्रिया बहुत ही धीमी और अक्सर ही तकलीफदेह होती है। ये सारी बाते सेक्स-संबंधों, विवाह और परिवार पर भी लागू होती है। बुर्जुआओ के विवाह के सड़न-गलन, और उसके विघटन, पति के लिए लायसेंस और पत्नी के लिए दासता, और उनकी गलत सेक्स नैतिकता और संबंधों ने बेहतरीन और आध्यात्मिक तौर पर सबसे ज्यादा सक्रिय लोगों को बेहद घृणा से भर दिया है।

बुर्जुआ विवाह में निहित दमन और बुर्जुआ कानून परिवार में बुराई और द्वंद को और भी बढ़ा देते हैं। ये जबरदस्ती और दमन ‘अतिपावन’ होते हैं, जो धनलोलुपता, नीचता और कीचड़ को ‘पवित्रता’ प्रदान करती है। ‘आदरणीय’ बुर्जुआ  समाज का रूढ़ीवादी दम्भ बाकी बातों की व्यवस्था करता है। चली आ रही घृणा और विकृतियों के विरुद्ध लोग विद्रोह कर देते हैं। एक समय में जब शक्तिशाली देश नष्ट किए जा रहे हों, पहले के सत्ता संबंध तोडे़ जा रहे हो, जब एक पूरा सामाजिक संसार गिरता जा रहा हो किसी भी व्यक्ति की भावनाएं तेजी से बदलने लगती हैं। आनंद के विविध रूपों को हासिल करने की इच्छा आसानी से विरोधहीन ताकत बन जाती है। सेक्स और विवाह के मामलों में बुर्जुआ भावनाओं में सुधार काम नहीं करेंगे। यौन संबंधों और विवाह आदि मसलों पर सर्वहारा की क्रांति के साथ एक और क्रांति हो रही है। परिणाम स्वरूप जो जटिल समस्याएं उठ खड़ी हुई हैं, निश्चित ही महिलाएं और युवा लोग उसमें गहरी दिलचस्पी ले रहे हैं। यौन-संबंधों की वर्तमान खराब स्थिति से दोनों ही तरह के लोगों पर खासा असर पड़ा है। युवा लोग पूरे जोर से विद्रोह करते हैं, यह स्वाभाविक ही है। युवाओं को मठवासियों की तरह आत्मा-तिरस्कार और मैली बुर्जुआ  नौतिकताओं के उपदेश देने से बड़ी गलती कोई दूसरी नहीं हो सकती। हालांकि यह कोई अच्छी बात नहीं है कि सेक्स, जो कि भौतिक तौर पर विकटता से महसूस किया जाता है, ऐसे समय में युवाओं की मानसिकता में गहरे पैठ गया है। इसके घातक परिणाम होंगे। साथी लीलिना से इस बाबत् पूछो, विभिन्न तरह की शिक्षण संस्थानों में बहुत काम करने के उनके पास अनेक अनुभव हैं। तुम जानती हो कि वे कम्युनिस्ट और सिर्फ कम्युनिस्ट है, उन्हें कोई पूर्वग्रह नहीं है।’’

‘सेक्स के प्रश्न पर युवाओं का बदला हुआ रुख बेशक आधारभूत और थ्योरी पर आधारित है। बहुत सारे लोग इसे ‘क्रांतिकारी’ और ‘कम्युनिस्ट’ कहते हैं। वे गंभीरता से मानते हैं कि ऐसा है भी। मैं एक बूढ़ा व्यक्ति हूं, इस बात को पसन्द नहीं करता। लोकप्रथा के अनुसार मैं एक योगी माना जा सकता हूं, लेकिन युवाओं का और बहुदा बुजुर्गों का भी, यह ‘नया सेक्स जीवन’ मुझे अक्सर पूरा बुर्जुआ महसूस होता है, और पुराने किस्म के बुर्जुआ  वेश्यालय का विस्तार ही लगता है। जैसा कि हम कम्युनिस्ट समझते हैं, इसका ‘मुक्त-प्रेम’ से कुछ लेना-देना नहीं है। बेशक तुमने उस प्रसिद्ध थ्योरी के बारे में सुन रखा होगा, जिसके अनुसार कम्युनिस्ट समाज में सेक्स की इच्छापूर्ति और प्रेम की याचना ‘एक ग्लास पानी पीने’ की तरह सरल और तुच्छ है। इस ‘पानी के ग्लास’ वाली थ्योरी पर हमारे युवाओं का एक वर्ग पागल हो चुका है, पूरा पागल। बहुत से युवा लड़के-लड़कियों के लिए यह घातक साबित हुआ है। इसके अनुयायी कहते हैं कि यह एक मार्क्सवादी थ्योरी है। मुझे इस किस्म के मार्क्सवाद की जरा-सी जरूरत नहीं है जो समाज की वैचारिक अधिरचना की हर प्रक्रिया, हर परिवर्तन में उसके आर्थिक आधार में बुरी तरह से हस्तक्षेप करे। क्योंकि मामला इतना आसान नहीं है। ऐतिहासिक भौतिकवाद के मामले में फ्रेडरिक एंगेल्स इस बात को बहुत पहले ही स्थापित कर चुके हैं।

भारत विज्ञान समिति द्वारा ‘महिलाओं के मुद्दे’ शीर्षक से प्रकाशित किताब से साभार. हिंदी में अनुवाद मनोज कुलकर्णी ने किया है 

क्रमशः
तस्वीरें गूगल से साभार 

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पुरुषों की तुलना में स्त्रियों का नैतिक विकास अधिक : अनामिका



हिन्दी साहित्य में स्त्रीलेखन के भीतर से बहुत कम रचनाकार हैं, जो खुद को स्त्रीवादी रचनाकार क्लेम करती हैं. अनामिका खुद को स्त्रीवादी रचनाकार मानने वाली लेखिकाओं में से एक हैं. उनसे बातचीत की है स्त्रीवाद की शोधार्थी अनुराधा ने 


आपने लिखना कैसे शुरू किया? 
मेरे पिताजी भी कवि थे। मैं उनसे अन्त्याक्षरी खेलती थी। जब वे हारने लगते तो कुछ बना के बोल देते। उन्हीं को देखकर मैं भी जब हारने लगती तो कुछ बना के बोलने लगी, जीतने के लिए, तो कई बार पिताजी हंसने लगते, बोलते ये तो ठीक है। फिर उन्होंने मुझे एक रजिस्टर लाकर दिया, बोले लिखा करो, जो मन में आया करे। उस रजिस्टर में मैंने जो पहली पंक्ति लिखी वह अंगीठी को देखकर लिखी। अंगीठी में आग जलाने के लिए कोयला ऊपर तक भर देते हैं और उसमें से बड़ी देर तक धुंआ निकलता है जबतक आग नहीं जलती। उसे देखकर मैंने लिखा- ‘धुंआ उठा ऐसे जैसे कूबड़ी माई’। हमारे घर के सामने ही एक कूबड़ी माई रहती थी, उन्हीं को देखकर मैंने ये लिखा। मुझे ऐसी समांतर चीज़ें मिलाना अच्छा लगता था, तब मैं 7 साल की थी। वो तो मुझे बाद में पता चला इसे उत्प्रेक्षा अलंकार कहते हैं। फिर पिताजी मुझसे पूछने लगे, तुम्हे ये कैसा लगता है, वो कैसा लगता है, जैसे ‘जाड़े के दिन तुम्हे कैसे लगते हैं?’ तो मैंने कहा ‘जाड़े का दिन जैसे आपस की बात हो अधूरी’। पिताजी ने कहा ये लिख लो, अच्छी लाइन है ये। ऐसे लिखना सीखा।

मतलब, आपको आपके परिवेश और खेल की रोचकता ने लिखने के लिए प्रेरित किया?
हाँ…. कविता बहुत सहज रूप से बातचीत का हिस्सा बनकर उभरी हमारे बीच।  बाद में अंग्रेजी की प्रोफेसर बनने के बाद अंग्रेजी में कविताएं लिखने का मन नहीं हुआ? मैंने शुरू में ही अंग्रेजी में भी कविताएं लिखी। मैं जिस स्कूल में पढ़ती थी वह एक एंग्लो- इंडियन समुदाय का स्कूल था। अंग्रेज जब यहाँ से गए तो उनके जो बच्चे भारतीय लोगों से पैदा हुए थे वे यहाँ छूट गए। उनको एंग्लो-इंडियन समुदाय कहते थे। हमारे मुजफ्फरपुर में रेलवे कॉलोनी है वहां ये लोग रहते थे, क्योंकि अंग्रेज अपने लोगों को रेलवे में आसानी से नौकरी दे देते थे, इसलिए देशभर में ऐसी बहुत सी कॉलोनियां थी, और वहां उनके बच्चों के लिए ऐसे स्कूल भी थे। मेरे घर के पीछे भी एक स्कूल था उसी की एक टीचर मिसेज होलिंक्सवर्ड ने वहां के बच्चों के लिए एक स्कूल खोला था- ‘सेंट फ्रांसिस सीनियर सेकेंडरी स्कूल’, उसी में मुझे प्रवेश दिलाया गया। वह स्कूल इतना भयंकर था कि वहां खेल-खेल में भी हिंदी बोलने पर रूल से मार पड़ती। वहां पर स्कूल की एक पत्रिका निकलती थी, मुझे उसका चाइल्ड एडिटर बना दिया गया, तब मैं शायद सातवीं या आठवीं में थी। उसके लिए मैंने अंग्रेजी में भी कविताएं लिखी। जिनका एक संकलन भी आया। लेकिन बाद में मेरे भीतर ये चेतना जगी कि मुझे अंग्रेजी में नहीं लिखना चाहिए, पर अंग्रेजी में प्रवेश इसलिए लिया क्योंकि उस समय जो विश्व साहित्य था वह ज्यादातर अंग्रेजी में ही था, जिनका परिचय मुझे पिताजी की लाइब्रेरी और एक चलंत लाइब्रेरी उस समय हुआ करती थी, जिसमें ‘पीपल्स पब्लीकेशन हाउस’ द्वारा मुद्रित रूसी साहित्य की किताबें आती थी, से हुआ। ये सब अंग्रेजी में  था, अब तो हिंदी में भी है, पर उस समय नहीं थी इसलिए मुझे लगा अगर विश्व साहित्य की सैर करनी है तो अंग्रेजी पढ़ने से आसानी होगी इसलिए मैंने अपनी पूरी पढ़ाई अंग्रेजी में की और उसके बाद क्योंकि ये मेरा विषय बन गया तो अकादमिक लेखन तो मैंने अंग्रेजी में किया लेकिन सृजनात्मक लेखन के लिए संकल्पपूर्वक मैंने हिंदी को ही चुना। ये मेरा एक सचेतन निर्णय था।

हिंदी में लेखिकाओं  की संख्या तो बढ़ रही है लेकिन महिला आलोचक न के बराबर हैं, इसका क्या कारण हो सकता है?
इसका कारण ये हो सकता है कि बौद्धिकता से स्त्रियों का नाता कम-कम जोड़ा जाता है इसलिए शायद स्त्री भी यही समझती है कि शायद वह बौद्धिक निकष पर उतनी खरी नहीं उतरेगी। अभिव्यक्ति के लिए तो वो रचनाएं लिख लेती हैं, रचनाएं खुद को लिखवा लेती हैं लेकिन अपने को एक बौद्धिक के रूप में सामने लाने का आत्मविश्वास अभी स्त्रियों में आया नहीं है और दूसरी बात कि कविता, कहानी भावों की चीज़ है वो बिना पढ़े भी लिखी जा सकती हैं पर उच्च शिक्षा से भी स्त्रियों का नाता बहुत समय तक नहीं रहा जिसको पाकर सिद्धांत गढ़ने का आत्मविश्वास आता है, जबकि विदेश में स्त्रियों ने भी बड़े-बड़े सिद्धांत दिए हैं पर अपने यहाँ स्त्रियों के लिए शिक्षा की अव्यवस्था और अनेक पूर्वग्रहों के कारण स्त्री के विदुषी रूप का विकास कम हो पाया।

बाएँ से दाएं अनुराधा, अनामिका और प्रज्ञा



स्त्री विमर्श की सैद्धांतिकी और उसके वर्तमान व्यवहारिक रूप में क्या कोई अंतर है? यदि हाँ तो क्या और उसका समाधान क्या हो सकता है?
कोई भी सैद्धांतिकी आंदोलन की पृष्ठभूमि में गढी जाती है। भारतीय स्त्री विमर्श की सैद्धांतिकी में सूप का ‘सार सार को  गहि रखे, थोथा दे उड़ाए’ का गुण रहा है। विदेश से हमने बहुत कुछ लिया जैसे मार्क्सवाद ने लिया वैसे ही स्त्री विमर्श ने भी  लेकिन उसमें से रखी काम की ही चीज़, जो थोथा था उसे छोड़ दिया। जैसे हमारे काम की एक बहुत महत्वपूर्ण धारणा थी, बहनापे की। स्त्रियों में यह बहनापा, हर वर्ण, वर्ग जाति उम्र में भी पाया जाता है, तुममे और मुझमें भी। तुम मेरी बेटी की उम्र की हो लेकिन मुझमें और तुममें बहनापे के दो सूत्र हैं। पहला मेरी और तुम्हारी भाषा, हमारी भाषा अंतरंग भाषा है। एक-दूसरे के कंधे पर हाथ रखकर बात करने वाले ह्रदय की भाषा है और दूसरा जो बहनापे का सूत्र है वह हमारी देह है, जो हमारे शोषण का आधार है। देह से जुड़े जो सुख या जो दुःख मेरे होंगे वही तुम्हारे भी होंगे इसलिए एकदम से जुड़ाव हो जाता है। गर्भधारण, बच्चे को दूध पिलाना, उसे बड़ा करना, ये इतना बड़ा सुख है जिससे पुरुष कभी परिचित नहीं हो सकता लेकिन इसके अलावा भ्रूण-हत्या, मारपीट, गाली गलौज, यौन-शोषण, वेश्यावृत्ति, पोर्नोग्राफी आदि बहुत से बड़े-बड़े दुःख भी हैं जो इसी शरीर से जुड़े हैं और सभी के हैं,ये किसी भी जाति, वर्ग, धर्म, वर्ण, गाँव की, शहर की, बच्ची हो बुजुर्ग हो तो एकदम से जुड़ाव हो जाता है।


आपके जो काव्य-संग्रह है, मैंने तीन शोधकार्य के लिए लिये  हैं- ‘कविता में औरत’, ‘दूब-धान’ और ‘खुरदुरी हथेलियाँ’, में मुख्य रूप से स्त्रियों के प्रतिरोध के स्वर हैं। जैसे ‘दूब-धान’ में गाँव की स्त्रियों के प्रतिरोध का चित्रण है लेकिन ‘दूब-धान’ शीर्षक से ऐसा कुछ ध्वनित नहीं होता, इस शीर्षक का आशय क्या है?
हमारे यहाँ स्त्रियों को खोइंचा दिया जाता है। जिसमें दूब, चावल, चावल न हो तो धान, हल्दी और कुछ पैसे आँचल में डालकर दिया जाता है और गाँठ बांधकर कहा जाता है, हम आते रहेंगे। कविता भी अपने आँचल में दूब-धान बांधकर चलती है क्योंकि वह हमेशा स्मृतियों में लौटती रहती है, वे स्मृतियाँ चाहे वैयक्तिक हों चाहे जातीय, तो मेरा वो मतलब था और मिटटी की याद….स्त्री को विदा होते हुए भी मायका हमेशा याद रहता है। अब तो विस्थापन दोहरा है। पहले स्त्री आसपास के गाँव में ही विदा होती थी। अब तो वो दूर पढने भी जाती है, नौकरी करने भी जाती है, पर उसका परिवेश उसके आँचल में बंधा रहता है, यही एक जुड़ाव है यहाँ।

स्त्री विमर्श पर कुछ लोग आरोप लगाते हैं कि भारतीय सांस्कृतिक सन्दर्भों में यह स्त्री-पुरुष संबंधों को प्रभावित कर रहा है?आपके क्या विचार हैं? 
इसका एक ही लाइन में उत्तर हो सकता है कि पहले की स्त्रियाँ तन-मन से सेवा करती थी और आज की स्त्रियाँ तन-मन-धन से सेवा कर रही हैं। स्त्री विमर्श से उसकी सेवा का भाव कम नहीं हुआ है, मातृत्व भाव मरा नहीं है बल्कि ममता का विस्तार हुआ है। पहले ममता और स्नेह केवल अपने परिवार के लिए ही थी लेकिन अब जैसे-जैसे वो बाहर निकली है उसकी ममता का दायरा भी बढ़ा है। दुनिया की कोई भी ताक़त मुझे ये मानने से मना नहीं कर सकती कि तुमलोग मेरा परिवार नहीं हो। रक्त सम्बन्ध से स्त्री विमर्श के परिवार का कोई लेना-देना नहीं है। पहले यौन सम्बन्ध और रक्त सम्बन्ध परिवार के ही निर्णायक थे अब नयी स्त्री के यहाँ पारिवारिकता का दायरा बढ़ा है और आत्मा का रिश्ता ही पारिवारिकता का निर्धारक है, तो मुझे नहीं लगता इस विमर्श में कोई दम है। लोग सोचते हैं स्त्रियाँ अगर आज़ाद हो जाएंगी तो दिल तोड़ेंगी और घर फोड़ेंगी पर ऐसा नहीं है ये दिल तोड़ने और घर फोड़ने वाली स्त्रियों का वाग्विलास नहीं है। ये अपने संबंधों के क्षितिज को लगातार बढ़ाने का उपक्रम है। इसे उनकी युद्धों, सेनाबलों में सेनानी, पर्यावरण संरक्षिकाओं की भूमिका
बहनापे के सूत्र से देखें तो ग्रामीण महिला भी एक बहन है। हम (स्त्रियाँ) जितनी आसानी से ग्रामीण महिला से बात कर लेते हैं, एक पुरुष से वे इतनी आसानी से नहीं खुलेंगी। दो स्त्रियाँ वे किसी भी संस्कृति या परिवेश की हों आसानी से गप्प कर सकती हैं। यह गप्प ही वह सूत्र है जिसके सहारे वे अपने भीतर के गाँव या शहर को उद्घाटित कर सकती हैं। यदि आप सहज रूप से किसी से बात ही नहीं कर सकते हैं तो उसकी स्मृतियाँ आपके लिए हमेशा अंजान ही रहेंगी और जबतक किसी की स्मृतियाँ और सपने साझा नहीं होते तबतक कोई मनुष्य अपना नहीं बन सकता।


आपकी कविताओं की स्त्रियाँ संवाद करती हैं और उनकी भाषा में एक प्रतिरोध है? यह स्थितियां आपकी आँखों देखी हैं या कल्पना की उपज?
ये दोनों ही स्थितियां मेरी देखी हुई हैं। मेरी एक मामी ने मुझसे कहा था, शादी के समय कि ससुराल में पापड़ जब खाना तो दाल में भिगो के खाना, कुट-कुट नहीं होनी चाहिए। मैंने ये भी देखा है कि स्त्रियों के लिए कहा जाता है कि चुप्पी ही सौंदर्यशास्त्र है लेकिन मैंने ये भी देखा है कि घूंघट के नीचे से भी स्त्रियाँ जीभ दिखा देती हैं, तो ऐसा है कि स्त्रियाँ जब खुलती हैं तो दोम्ब्काचार में कितना अच्छा केरीकेचर करती हैं। वो एक अच्छे बच्चे की तरह चुपचाप बैठी रहती हैं, उनका नटखटपन छुप के रहता है लेकिन जहाँ मौका मिलता है वो खुलकर सामने आ जाता है। उसके बाद बातचीत की लय जब शुरू हो जाती है तो ख़त्म नहीं होती आसानी से। मेरी एक कविता है ‘चिट्ठी लिखती हुई औरत’ उसमें यही सब है, तो ये सब देखा हुआ है मेरा, हवा में मैंने बात नहीं की है और ये स्त्रियों की बड़ी शक्ति है। इसे निखारने का मुझे लगता है हम सबको प्रयास करना चाहिए।

स्त्री विमर्श पर पुरुषों और स्त्रियों का नजरिया अलग-अलग है। आपका इस बारे में क्या मत है?
उत्तर- मैंने कहा न, पुरुष तो समझते हैं कि ये दिल तोड़ने और घर फोड़ने वाली स्त्रियों का वाग्विलास है। इनके जीवन में कोई संकट नहीं है तो घूम-घूम के बात बना रही हैं लेकिन ऐसी बात नहीं है। स्त्रियाँ तो ये चाहती हैं कि पुरुष सदैव प्रेम करने के लायक बनें। स्त्रियाँ अभी तक बच्चों की तरह पुरुषों को देखती आ रही हैं। माफ़ करते हुए, उनके बड़े होने का इंतज़ार करते हुए। आज की स्त्री मन से बहुत अकेली हो गयी है क्योंकि जितना उनका नैतिक विकास हुआ है तुलनात्मक रूप से पुरुषों का कम हुआ है और मेरी एक कविता में तो मैंने ये भी कहा है कि स्त्रीधन कहके जो गहने गिनाए जाते हैं जैसे लज्जा, सहिष्णुता वो गहने स्त्री-पुरुष में बराबर-बराबर क्यों नहीं बंट सकते? ये तो पुरुषों के ही हक की ही बात है कि ये गहने उन्हें अधिक मानवीय, अधिक सहृदय, अधिक दोस्त, अधिक प्रिय ही तो बनाते हैं। इसमें पुरुषों का ही भला होगा न और पुरुषों को वे विकास से बाहर नहीं मानती। वो जानती हैं कि दोष पितृसत्ता का है, पुरुष का नहीं है। उस पितृसत्ता को भेद कर ज्यादा मानवीय रूप में वो अगर सामने आए तो इसमें सबका ही भला है।


अनुराधा, स्त्री-अध्ययन विभाग, म.गा.आ.हिं. वि, वर्धा की शोधार्थी हैं.  संपर्क anuradha.loving91@gmail.com
स्त्रीकाल का संचालन ‘द मार्जिनलाइज्ड’ , ऐन इंस्टिट्यूट  फॉर  अल्टरनेटिव  रिसर्च  एंड  मीडिया  स्टडीज  के द्वारा होता  है .  इसके प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें : 
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कार्ल मार्क्स का प्रेम पत्र (जेनी के नाम)

दुनिया के इतिहास, अर्थव्यवस्था, समाज, राजनीति को समझने के, दुनिया को समझने के भौतिकवादी चिंतन में से एक महान चिंतन कार्ल मार्क्स का है. अपने जीवन का अधिकांश पुस्तकालयों में बिताने वाले, लेखन, चिंतन और सक्रिय राजनीति को समर्पित इस महान बुद्धिजीवी के सीने में एक दिल भी धड़कता था.मार्क्‍स की 200वीं जयन्ती (5 मई) पर पढ़ते हैं उनका एक प्रेम पत्र, जो उन्होंने 21 जून 1865 को अपनी प्रेमिका और बाद  में पत्नी हुईं जेनी को लिखा था. 

मेनचेस्टर, 21 जून  1865


मेरी दिल अज़ीज़,

देखो, मैं तुम्हें फिर से खत लिख रहा हूँ. जानती हो क्यों? क्योंकि मैं तुमसे दूर हूँ और जब भी मैं तुमसे दूर होता हूँ तुम्हें अपने और भी करीब महसूस करता हूँ. तुम हर वक़्त मेरे जेहन में होती हो और मैं बिना तुम्हारे किसी भी प्रतिउत्तर के तुमसे कुछ न कुछ बातें करता रहता हूँ,

जेनी और कार्ल मार्क्स

ये जो क्षणिक दूरियां होती हैं न प्रिय, ये बहुत सुन्दर होती हैं. लगातार साथ रहते-रहते हम एक-दूसरे में, एक-दूसरे की बातों में, आदतों में इस कदर इकसार होने लगते हैं कि उसमें से कुछ भी अलग से देखा जा सकना संभव नहीं रहता. फिर छोटी छोटी सी बातें, आदतें बड़ा रूप लेने लगती हैं, चिडचिड़ाहट भरने लगती हैं. लेकिन दूर जाते ही वो सब एक पल में कहीं दूर हो जाता है, किसी करिश्मे की तरह दूरियां प्यार की परवरिश करती हैं ठीक वैसे ही जैसे सूरज और बारिश करती है नन्हे पौधों की. ओ मेरी प्रिय, इन दिनों मेरे साथ प्यार का यही करिश्मा घट रहा है. तुम्हारी परछाईयां मेरे आसपास रहती हैं, मेरे ख्वाब तुम्हारी खुशबू से सजे होते हैं. मैं जानता हूँ कि इन दूरियों ने मेरे प्यार को किस तरह संजोया है, संवारा है.

जिस पल मैं तुमसे दूर होता हूँ मेरी प्रिय, मैं अपने भीतर प्रेम की शिद्दत को फिर से महसूस करता हूँ, मुझे महसूस होता है कि मैं कुछ हूँ. ये जो पढ़ना-लिखना है, जानना है, आधुनिक होना है ये सब हमारे भीतर के संशयों को उजागर करता है, तार्किक बनाता है लेकिन इन सबका प्यार से कोई लेना-देना नहीं. तुम्हारा प्यार मुझे मेरा होना बताता है, मैं अपना होना महसूस कर पाता हूँ तुम्हारे प्यार में.

जेनी

इस दुनिया में बहुत सारी स्त्रियाँ हैं, बहुत खूबसूरत स्त्रियाँ हैं लेकिन वो स्त्री सिर्फ तुम ही हो जिसके चेहरे में मैं खुद को देख पाता हूँ. जिसकी एक एक सांस, त्वचा की एक एक झुर्री तुम्हारे प्यार की तस्दीक करती है, जो मेरे जीवन की सबसे खूबसूरत याद है. यहाँ तक कि मेरी तमाम तकलीफों और जीवन में होने वाले तमाम अपूरणीय नुकसान भी उन मीठी यादों के साये में कम लगने लगते हैं.

मैं तुम्हारी उन प्रेमिल अभिव्यक्तियों को याद करता हूँ, तुम्हारे चेहरे को चूमते हुए अपने जीवन की तमाम तकलीफों को, दर्द को भूल जाता हूँ…

विदा, मेरी प्रिय. तुम्हें और बच्चों को बहुत सारा प्यार और चुम्बन…


तुम्हारा
मार्क्स

अनुवादक: प्रतिभा कटियार, प्रतिभा की दुनिया ब्‍लाग से साभार

तस्वीरें गूगल से साभार
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भारतीय संतों के हमेशा कुंडलिनी जागरण की तरह हमेशा सेक्स की समस्याओं में उलझे रहने वालों पर भी मैं अविश्वास करता हूं: लेनिन

महिलाओं के मुद्दों पर लेनिन 
क्लारा जे़टकिन

आज से लगभग 100 साल पहले 1920 में मार्क्सवादी स्त्रीवादी क्लारा जेटकिन ने रूसी क्रांति के विराट नेता लेनिन से यह बातचीत की थी. इस बातचीत का एक हिस्सा (बीच का हिस्सा), जो महिला श्रम के सन्दर्भ में है स्त्रीकाल के पाठक 1 मई (मजदूर दिवस) को पहले ही पढ़ चुके हैं, इस लिंक को क्लिक कर पढ़ सकते हैं. 

लेनिन: कम्युनिस्ट नेतृत्व महिलाओं के आन्दोलन के सवाल पर निराशावादी, रुको और देखो वाला रुख अपना लेता है


आज से हम इस बातचीत को प्रारम्भिक हिस्से से क्रमवार प्रकाशित करेंगे. 

महिलाओं के अधिकारों की समस्या पर कॉमरेड लेनिन मुझसे लगातार चर्चा करते थे। महिलाओं के आंदोलन को वे बहुत महत्व देते थे। उनके अनुसार महिलाओं के आंदोलन, जन-आंदोलनों का एक जरूरी हिस्सा है, जो कुछ परिस्थितियों में निर्णायक होता है। वे महिलाओं को सामाजिक बराबरी देने को एक सिद्धांत की तरह देखते थे। निश्चित ही कोई भी कम्युनिस्ट इस बात से असहमत नहीं होगा।  इस विषय पर हम दोनों की सबसे पहली लंबी बातचीत 1920 की शरद ऋतु में हुई थी। यह बातचीत क्रेमलिन में लेनिन के बड़े से अध्ययन-कक्ष में हुई थी। लेनिन अपनी मेज पर बैठे थे, जो किताबों और कागजों से ढंकी हुई थी। वो किसी बेहद विद्वान व्यक्ति के अध्ययन और काम करने की ओर इशारा करती थीं, वो भी बिना किसी अव्यवस्था के।

मेरा स्वागत करने के बाद वे बोले, “हमें साफ सैद्धांतिक आधार पर महिलाओं का एक शक्तिशाली अंतरराष्ट्रीय आंदोलन खड़ा करना चाहिए। इसके लिए हमें हर साधन का उपयोग करना चाहिए। ये तो तय है कि मार्क्सवादी सिद्धांत के बिना हम उचित व्यवहार नहीं कर सकते। इस मामले में भी हम कम्युनिस्ट लोगों की सैद्धांतिक समझ बिलकुल साफ होनी चाहिए। हमें हमारी और दूसरी पार्टियों के बीच स्पष्ट रेखा खींचनी होगी। यह दुखद है कि महिलाओं के मुद्दे पर हमारे ‘दूसरे अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन’  (सेकंड इंटर्नेशनल) में अपेक्षानुरूप चर्चा नहीं हो पाई। वहां प्रश्न तो उठाए गए लेकिन किसी निश्चित मत तक नहीं पहुंचा जा सका। इस मामले पर अभी भी एक समिति है। उसे एक प्रस्ताव, पर्चा और निर्देश लिखने हैं। लेकिन अब तक बहुत कम प्रगति हो पाई है। तुम इसमें जरूर मदद करो।’’

जो लेनिन अब मुझे बता रहे थे, मैं दूसरों से पहले ही सुन चुकी थी। मैंने अपनी खुशी जाहिर की। क्रांति के दौरान जो कुछ रूसी महिलाओं ने किया था, और जो वे अब उसकी रक्षा और विकास के लिए कर रही थीं, मैं उससे उत्साहित थी। जहां तक बोल्शेविक पार्टी में महिलाओं की स्थिति और गतिविधियों का सवाल है, मेरा मानना है- ये आदर्श पार्टी है। इसने अकेले ही अंतररार्ष्ट्रीय कम्युनिस्ट महिला आंदोलन तैयार किया, वो भी मूल्यवान, प्रशिक्षित और अनुभवी दल-बल के साथ। इसने इतिहास के लिए एक महान उदाहरण पेश किया।
फीकी मुस्कान के साथ लेनिन बोले, “सही है, यह बेहतरीन है। पेत्रेगार्द में, यहां मास्को में और दूसरे शहरों और औद्योगिक केंद्रों पर क्रांति के दौरान सर्वहारा महिलाओं ने बहुत अच्छा काम किया। मेरा विचार हैं कि उनके बगैर हमारी जीत मुश्किल होती। उन्होंने बहुत साहस दिखाया। उनमें अब भी बहुत दम है। उनकी तकलीफों और पाबंदियों की कल्पना करो। लेकिन फिर भी उन्होंने ये सब किया, क्योंकि वे सोवियत लोगों की रक्षा चाहती थीं। क्योंकि उन्हें आजादी और साम्यवाद चाहिए था। हां, हमारी कामकाजी महिलाएं बेहतरीन वर्ग-लड़ाकू हैं। वे प्रशंसा और प्रेम के काबिल हैं। ये भी स्वीकारना चाहिए कि पेत्रेगार्द में हमारे खिलाफ लड़ने में, संवैधानिक जनवादियों के फौजियों के मुकाबले, उनकी महिलाओं ने हमें अच्छी टक्कर दी। फ्ये सच है कि हमारी पार्टी में भरोसे लायक, बुद्धिमान और न थकने वाली महिलाएं हैं। वे सोवियतों, कार्यकारी समितियों, जन समितियों और हर तरह के कार्यालयों में महत्वपूर्ण पदों पर हैं। उनमें से कई तो पार्टी में या मजदूरों, किसानों के बीच या लाल सेना में दिन-रात काम करती हैं। ये हमारे लिए बहुत अच्छी बात है। ये सारी दुनिया की महिलाओं के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि ये महिलाओं की योग्यता, समाज के लिए उनके द्वारा किए गए बहुत अच्छे काम का सबूत है। सर्वहारा के अधिनायकवाद के इस पहले प्रयोग ने महिलाओं के लिए सामाजिक बराबरी का रास्ता साफ किया है। अधिकतर महिलावादी साहित्य की अपेक्षा इसने ज्यादा पूर्वाग्रहों को खत्म किया है। बावजूद इस सबके अभी भी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर महिलाओं का कम्युनिस्ट आंदोलन नहीं है। जल्द ही हमें ऐसा आंदोलन खड़ा करना चाहिए। ऐसे आंदोलन के बगैर हमारे इंटरनेशनल और उसकी पार्टियों का काम अधूरा रहेगा, वह कभी भी पूरा नहीं हो सकेगा। हमारा क्रांतिकारी काम संपूर्णता में होना चाहिए। मुझे बताओ कि विदेशों में हमारा कम्युनिस्ट आंदोलन कैसा चल रहा है?”

उस समय जितना मैं बता सकती थी-जबकि कॉमिटर्न की पार्टियों के आपस में संबंध ढीले और छिटपुट थे- मैंने बताया। कुछ आगे झुककर बैठे लेनिन ने ध्यान से हर बात सुनी। उनके चेहरे पर ऊब, जल्दबाजी या थकावट का कोई निशान नहीं था। यहां तक कि कम महत्व के विवरण पर भी उन्होंने ध्यान दिया। मैंने उनसे बेहतर श्रोता कभी नहीं देखा। साथ ही ऐसा व्यक्ति भी जिसने जो कुछ सुना और उतनी ही तेजी से उसका सैद्धान्तीकरण कर लिया। यह इस बात से पता चलता है कि जो कुछ मैंने उन्हें बताया, उस पर उन्होंने समय-समय पर छोटे और सटीक प्रश्न किए। जो कुछ मैंने बयान किया था, उसके एक या दूसरे मुद्दे पर वे बाद में आए। लेनिन ने कुछ छोटे-मोटे विवरण भी दर्ज किए।

जाहिर है कि मैंने जर्मनी के काम-काज के बारे में सविस्तार बताया। रोजा लक्जमबर्ग द्वारा क्रांतिकारी संघर्ष में अधिक से अधिक महिलाओं को लाने की बात के व्यापक महत्व के बारे में मैंने लेनिन को बताया। जब कम्युनिस्ट पार्टी गठित की गई, रोजा ने महिलाओं का एक अखबार निकालने पर जोर दिया। आखिरी बार जब मैं लियो जोगिशे से उनकी हत्या के 36 घंटे पहले मिली थी, तो उन्होंने मेरे साथ पार्टी के काम करने के इरादों के बारे में चर्चा की थी। उन्होंने मुझे कई काम सौंपे। इसमें से एक था- कामकाजी महिलाओं के बीच संगठन बनाने का। अपने पहले अवैधानिक अधिवेशन में पार्टी ने इस मुद्दे को लिया था। युद्ध के पहले या उस दौरान प्रसिद्ध हुई प्रशिक्षित और अनुभवी महिला आंदोलनकर्मी और नेत्रियां, बिना किसी अपवाद के किसी न किसी तरह की सामाजिक जनवादी थी। उन्होंने सर्वहारा महिलाओं को आंदोलनरत और व्यस्त बनाए रखा था। हालांकि इनमें ऊर्जावान, समर्पित महिलाओं का एक छोटा-सा समूह था। वे पार्टी के प्रत्येक काम और संघर्ष में हिस्सा लेती थीं। इसके अलावा पार्टी ने कामकाजी महिलाओं के बीच व्यवस्थित संगठन की गतिविधियां संचालित की। हालांकि ये तो अभी शुरुआत ही है, एक अच्छी शुरुआत।

लेनिन बोले, “अच्छे, बहुत अच्छे। अवैधानिक या अर्ध वैधानिक दौर में कम्युनिस्ट महिलाओं की ऊर्जा, समर्पण, उत्साह, हिम्मत और बुद्धि हमारे भविष्य के काम की उन्नति का आश्वासन है। यह पार्टी के फैलाव में उपयोगी है। यह लोगों के दिल जीतने और काम करने की पार्टी की ताकत को बढ़ाने वाला है। लेकिन इस मुद्दे के मूल सिद्धांतों की स्पष्ट समझ प्रत्येक सदस्य को कैसे दी जा सकती है? जनता के बीच काम करने के लिए यह सबसे महत्वपूर्ण है। जनता को जो विचार हम देते हैं, और चाहते हैं कि जनता जिन चीजों को समझे या जिनसे प्रेरणा ले, उस बारे में यह बात बहुत महत्वपूर्ण है। मैं याद नहीं कर पा रहा हूं कि किसने कहा था कि, ‘महान काम करने के लिए प्रेरणा जरूरी होती है।’

“हमें और दुनिया के कामगारों को सचमुच अभी महान काम करने हैं। आपके साथियों की प्रेरणा क्या है? जर्मनी की सर्वहारा महिलाएं? वहां के सर्वहारा की क्या स्थिति है? क्या उनकी रुचियां और कार्रवाईयां इस समय की राजनीतिक मांगों पर केंद्रित हैं? उनके विचारों का केंद्र क्या है?

“मैंने रूस और जर्मनी के साथियों से इस बारे में अनेक अनोखी बातें सुनी हैं। मेरा मतलब क्या है, मैं बताता हूं। मैं जानता हूं कि हेम्बर्ग में कोई कम्युनिस्ट महिला वेश्याओं के लिए अखबार निकालती है। वो उन्हें क्रांतिकारी संघर्ष के लिए संगठित कर रही है। अपने दुखद धंधे के कारण किसी पुलिस धारा का उल्लंघन करने पर जेल भेज दी गई वेश्याओं की रक्षा में रोजा जैसी सच्ची कम्युनिस्ट ने मानवीय सोच से एक लेख लिखने का अच्छा काम किया था। वेश्याएं बुर्जुआ समाज के दोहरे शोषण की शिकार हैं। एक तो इसकी संपत्ति की व्यवस्था की, दूसरी नैतिक दम्भ की। बेशक कोई कठोर स्वभाव और तंग नजरिए वाला ही इसे भूल सकता है। यह सब समझ पाना एक बात है, लेकिन वेश्याओं को एक विशेष क्रांतिकारी संघ के हिस्से की तरह संगठित करना और उनके लिए ट्रेड यूनियन अखबार निकालना! क्या जर्मनी में कामगार महिलाएं बची ही नहीं हैं जिन्हें कि संगठित किए जाने की जरूरत है? जिन्हें एक अखबार की जरूरत है? जिन्हें आपके संघर्ष में शामिल किया जाना है?
यह एक भटकाव है। यह मुझे उस साहित्यिक फैशन की जोरदार याद दिलाता है, जो हर वेश्या को एक हसीन मैडोना बना देता है। इसका उद्गम भी मजबूत हैः सामाजिक सहानुभूति और आदरणीय बुर्जुआओं  के नैतिक ढकोसलों के विरूद्ध क्रोध। लेकिन यह अच्छा विचार तो बुर्जुआ के पतन और विकृति के पीछे दब गया। हमारे देश में भी वेश्यावृत्ति का प्रश्न, अनेक समस्याओं के साथ हमारे सामने होगा। वेश्याओं को उत्पादक कामों की तरफ लाना, सामाजिक अर्थ व्यवस्था में उनके लिए जगह बनाना, ये काम करने होंगे। लेकिन हमारी वर्तमान अर्थव्यस्था और दूसरे हालात इसे मुश्किल और जटिल बना देते हैं। सर्वहारा के सत्ता में आने के बाद से, महिला समस्याओं का यह पहलू हमें हर तरह से चुनौती दे रहा है, और हल ढूंढे जाने की मांग करता है। यहां सोवियत रूस में भी इसके लिए बहुत ज्यादा प्रयासों की जरूरत है।

लेकिन जर्मनी में तुम्हारी विशेष समस्या पर लौटा जाए। अपने किसी सदस्य के ऐसे अव्यवस्थित काम पर किन्हीं भी परिस्थितियों में पार्टी को शांत नहीं रहना चाहिए, ये भ्रम पैदा करता है और हमारी ताकत को बांटता है। अभी इसे रोकने के लिए तुमने क्या किया है?”

ब्लैक कम्युनिस्ट

मैं जवाब दे पाती कि इससे पहले ही लेनिन फिर कहने लगे, ‘क्लारा, तुम्हारे ‘पापों का रिकार्ड’ तो और भी बुरा है! मुझे बताया गया है कि कामगार महिलाओं के लिए शाम को आयोजित किए जाने वाले पाठों और चर्चाओं में सेक्स और विवाह की समस्या सबसे पहले उठाई जाती है। तुम्हारे राजनीतिक पाठों और शैक्षणिक कार्य में ये सबसे ज्यादा रुचि के विषय बताए जाते हैं। जब मैंने यह सुना, मुझे अपने कानों पर भरोसा नहीं हुआ। सर्वहारा के सबसे पहले तंत्र को दुनिया-भर की प्रतिक्रांतियों से जूझना पड़ रहा है। जर्मनी के हालात में भी सर्वहारा की तमाम क्रांतिकारी शक्तियों की एकता की जरूरत है, जिससे कि दबाव बना रही प्रतिक्रांति से मुकाबला किया जा सके। लेकिन सक्रिय कम्युनिस्ट महिलाएं सेक्स की समस्याओं और ‘अतीत, वर्तमान और भविष्य’ की विवाह स्थितियों पर चर्चा करने में व्यस्त हैं। इन प्रश्नों पर कामगार महिलाओं को सचेत करना, वे अपना सबसे महत्वपूर्ण काम मानती हैं। ये दुखद है कि वियेना की एक कम्युनिस्ट लेखिका द्वारा सेक्स के प्रश्नों पर लिखा गया एक पर्चा बहुत लोकप्रियता पा रहा है। पुस्तिका एकदम बकवास है! इस विषय में कामगारों ने सही बातें बेबेल के लेखन में पहले ही पढ़ लिया है। न सिर्फ उस थकाऊ और सूखे पर्चे के रूप में बल्कि बुर्जुआ समाज में उठने वाले आंदोलन के द्वारा भी। पर्चे को वैज्ञानिक मुलम्मा चढ़ाने की गरज से फ्रायड के सिद्धांत को शामिल किया गया है, लेकिन यह एक नवसिखुए  द्वारा की गई गड़बड़ी-भर है। फ्रायड की थ्योरी तो अब एक ‘झक’ बन चुकी है। मैं लेखों, शोधपत्रें, पर्चों आदि में वर्णित सेक्स थ्योरियों पर विश्वास नहीं करता। थोड़े में कहूं तो बुर्जुआ  समाज की गंदगी के ढेर पर तेजी से पनपने वाले उस खास किस्म के साहित्य में दी गई थ्योरियों पर। भारतीय संत जो सदा अपनी कुंडलिनी ही जागृत करने में लगे रहते हैं, उसी तरह हमेशा सेक्स की समस्याओं में उलझे रहने वालों पर भी मैं अविश्वास करता हूं- मेरे ख्याल में सेक्स पर इस तरह की थ्योरियों की भरमार, जो कि अधिकांश के लिए महज एक ख्याल है और अधिकतर तो इकतरफा ही है, किसी व्यक्तिगत जरूरत से पैदा होती है। ये बुर्जुआ नैतिकता के सामने अपने असामान्य और अत्यधिक सेक्स वाले जीवन को सही सिद्ध करने और खुद के प्रति समर्थन पैदा करने की नीयत से फलती-फूलती है। बुर्जुआ नैतिकता के प्रति यह छिपा हुआ सम्मान मेरे लिए उतना की घृणास्पद है जितना कि सेक्स पर आधारित हर बात की जड़ में उतरना। चाहे इन्हें जितना भी विद्रोही और क्रांतिकारी दिखाने की कोशिश की जाए, अंतिम विश्लेषण में ये तमाम अपने चरित्र में बुर्जुआ ही हैं। बुद्धिजीवी और उन जैसे लोग इनके बारे में बहुत रुचि रखते हैं। इनके लिए पार्टी में, वर्ग-सचेत, लड़ाकू सर्वहारा में कोई जगह नहीं है।
क्रमशः 

भारत विज्ञान समिति द्वारा ‘महिलाओं के मुद्दे’ शीर्षक से प्रकाशित किताब से साभार. हिंदी में अनुवाद मनोज कुलकर्णी ने किया है 

तस्वीरें गूगल से साभार
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सांप्रदायिक हिंसा भड़काने का बजरंगी पैटर्न: नालंदा से लौटकर निवेदिता

निवेदिता
एक शहर को हमसब दरकते और टूटते हुए देख रहे हैं। मुहब्बत और भाईचारा को हिन्दू और मुसलमान में बदलते हुए देख रहे हैं। जहर को नसों में फैलते हुए देख रहे हैं। मैंने उनके तमामदुःख,डर और गुस्से को अपनी डायरी में दर्ज कर लिया है, जिनके बीच से वे गुजरे हैं। जो कुछ घटा उसकी आंशका उन्हें पहले से थी। ये घटनाएं उन गंभीर और दुःखदायी घटनाओं की पूर्व सूचनाएं थी, जिसका विवरण हम यहां पेश कर रहे हैं:

नालंदा में साम्प्रदायिक तनाव को हुए अब लगभग एक माह होने को है। जब हमलोग नालंदा जिला के सिलाव प्रखंड पहुंचे तो दोपहर हो चुकी है। गर्मी काफी है। सूरज तप रहा है। दीवारों पर सलेटी रंग के धूल जमे हुए हैं। सड़क के दोनों किनारे कतार से दुकानें हैं। छोटी-छोटी दुकानें जहां रोजमर्रे का सारा सामान मिलता है।
कड़़ा बाजार में चहल-पहल है। वर्षो से हिन्दू और मुसलमान साथ-साथ रोजगार करते हैं। ये ऐसा प्रखंड है जहां कभी साम्प्रदायिक तनाव नहीं हुए। धनी आबादी वाला ये शहर अपने आप में अनोखा है। जहां मुसलमानों की बड़ी आबादी है। लगभग दो हजार मुसलमान परिवार के बीच 200 परिवार हिंन्दुओं का है। यहां के लोग खूब मेहनती हैं। उनकी मुख्य दिलचस्पी व्यापार में है। गरीबों की संख्या काफी है। बीड़ी इनके रोजगार का मुख्य साघन है। यहां घर-घर में बीड़ी बनाने का काम होता है। पूरा का पूरा परिवार बीड़ी बनने से होने वाली आमदनी पर जिंदा है। 1 हजार बड़ी बनाने पर सिर्फ 125 रुपए मिलते हैं।

ऊपर से देखने में शांत शहर के भीतर-भीतर बहुत कुछ उबल रहा है।  मुहब्बत से रहने वाले लोगों के बीच नफरत के बीच बोये जा चुके हैं। नफरत की प्रयोगशाला नयी नहीं है पर ईलाका नया है। तुच्छता और नग्नता के सभी प्रयोग बिहार में सफल रहे। साम्प्रदायिकता का किटाणु न मरता है, ना हमेशा  के लिए लुप्त होता है। वह सालों तक लोगों के दिलों में छिपकर सोया रहता है। और उपयुक्त अवसर की ताक में रहता है। यह अवसर बजरंग दल के लिए सही अवसर था। जिसकी तैयारी वे पिछले एक साल से कर रहे थे। वे जानते हैं धर्म एक ऐसा हथियार है जिसके जरिये वे समाज को विभाजित कर सकते हैं।

बजरंग दल से जुड़े कुछ लोगों ने तय किया कि इस बार की रामनवी का जुलूस वे नुरानी मुहल्ला से निकालेंगे। उन्होंने इसके लिए प्रशासन पर दवाब बनाना शुरु किया। कड़ा बाजार से नुरानी मुहल्ला का रास्ता काफी संकरा है। इस मुहल्ले की खास बात रही है कि आजतक यहां कभी कोई साम्प्रदायिक तनाव नही हुए। लेकिन पिछले रमजान के महीने से लगातार तनाव करने की कोशिश  जारी थी। रमजान के महीने में बजरंग दलों के लोगों ने जुलूस निकाले थे और भडकाउ नारे लगाए गये थे। ’मुल्ला जाओ पाकिस्तान’ और ’हिन्दुस्तान में रहना है तो बंदे मातरम कहना होगा’ जैसे नारे लगे।

26 मार्च को नालंदा के डी.एम ने शान्ति समिति की बैठक बुलाई जिसमें दोनों समुदाय के लोग शामिल हुए थे। प्रशासन ने कहा कि किसी कीमत पर वे उन इलाकों से जुलूस निकालने नहीं देंगे। पर बजरंग दल के लोग अड़े रहे। काफी मशक्कत के बाद तय हुआ कि पांच-हिन्दू और पांच मुसलमान मिलकर राम के रथ को गली से बाहर ले जायेंगे-दस लोगों में बीजेपी के वार्ड पार्षद सुधीर सिंह,विजय सिंह, बबलू महतो , लखपति साव, संदीप पासवान और मुसलमानों की तरफ से मोहम्द इस्राफिल, गजनी, निसार अहमद,अरमान, सफदर इमाम शामिल हुए। 28 मार्च को राम के रथ को कड़ा डीह से सिलाव ब्लॉक तक सभी दस लोगों ने शान्तिपूर्ण तरीके से गली के बाहर पहुंचा दिया।

दरअसल बजरंग दल की मंशा राम के रथ को शन्तिपूर्ण निकालना नहीं था । इसलिए बिना प्रशासन की सूचना के अचानक रेलवे होल्ड के पास चार से पांच हजार लोग जमा हो गये जिसमें महिलाओं की काफी संख्या थी। इनलोगों ने प्रशासन पर उसी रास्ते से निकलने का दवाब बनाना शुरु किया। दवाब में आकर प्रशासन ने महिलाओं को उस रास्ते से जाने की अनुमति दी पर जब मर्दो का हुजूम भी उसी रास्ते से जाने का दवाब बनाने लगा तो मुसलमानों ने विरोध किया। प्रशासन का कहना है जो लोग जमा हुए थे वे उस इलाके के नहीं थे उनके पास बड़ी संख्या में तलवार और दूसरे हथियार थे। वे भडकाउ नारे लगाने लगे। फिर पत्थरबाजी शुरू हुई । प्रशा सन को भीड़ को नियंत्रित करने के लिए कठोर कदम उठाने पड़े। जमकर लाठीचार्ज किया। जिसमें बच्चे और महिलाएं भी धायल हुए।

ये हिंसा स्थानीय स्तर पर की गयी । यहां के लोगों ने बताया कि जुलूस में शामिल होने के लिए बाहर से लोगों को बुलाया गया था। इस बात की पुष्टि प्रशासन ने भी की। हिंसा के लिए रामनवमी का दिन चुना गया । कुछ जगह रामनवमी गुजर जाने के बाद जुलूस निकाला गया। ज्यातर नौजवानों को शामिल किया गया। सिलाव के दंगे में दिलीप पासवान और संदीप पासवान का नाम आ रहा है। संदीप बजरंग दल का नेता है और दिलीप पासवान का छोटा भाई है। दिलीप वार्ड 13 के पार्षद रहे हैं। पहले राजद से जुड़े हुए थे। इन दिनों भाजपा के नजदीक हैं। इसबार चुनाव हार गए। मोहम्मद इस्राफिल ने उन्हें हराया है। इस मामले में अबतक 38 लोग गिरफ्तार हैं। 72 लोग नामजद अभियुक्त हैं। नालंदा के डीएम ने स्वीकार किया कि यहां हुए साम्प्रदायिक तनाव के लिए बजरंग दल जिम्मेदार है।  सिलाव में अभी भी दहशत है। साम्प्रदायिक तनाव के दौरान 8 दिन दुकानें बंद रही। जिसका गहरा असर रोजगार पर पड़ा। इस तरह के तनाव से दोनों समुदाय के लोग प्रभावित हुए हैं। पत्थरबाजी में कई लोगों के घर को नुकसान पहुंचा है।

नकाद खानम वार्ड पार्षद हैं। उनके पति दिल्ली में काम करते हैं। उनका घर कड़ा बाजार में है। जब हम उनके घर पहुंचे वे बेहद परेशान थी। उनके चेहरे पर गहरी थकान थी।  उन्हें मालूम है एक लड़ाई जीत ली गयी है, दंगाई पीछे हट गए हैं। लेकिन इसे जीत नहीं कहा जा सकता। दंगाई अपना काम पूरा कर गए। उन्होंने लोगों के दिलों में दरार पैदा कर दिया।  उन्होंने कहा कि पिछले 20 सालों से रह रही हूं । कभी कोई तनाव हिन्दू -मुसलमानों के बीच नहीं हुआ। पहली बार ये दहश त महसूस हुआ। ये मुस्लिम बहुल इलाका है फिर भी हम डरे हुए हैं। बगेर हिंदूओं के हम जी नहीं सकते और हमारे बिना वे रह नहीं सकते। हम एक -दूसरे के जीवन में रचे-बसे हैं। हम शादी,विवाह में शामिल होते हैं। रोजमर्रे की जिन्दगी के सुख-दुख में शामिल होते हैं,पर अब मन में गांठ पड़ गयी है।

दहशत इतनी  है कि नुरानी मुहल्ले में छोटी सी परचून की दुकान चलाने वाली 75 साल की उम्रदराज महिला ने अपना नाम नहीं बताया। उनके पति रामधनी महतो अब बीमार रहते हैं इसलिए पत्नी ही दुकान देखती हैं। पहले कुछ भी बताने को तैयार नहीं थीं। काफी देर बात-चीत के बाद उनकी आँखें भर आयी। उन्होंने कहा की इससे बुरा क्या होगा कि उम्र के इस पड़ाव पर एक-दूसरे के लिए नफरत देख रही हूं। हमारे बीच ऐसा कभी नहीं था। यहां मुसलमानों की तादाद ज्यादा है फिर भी कभी ये बात जेहन में नहीं आयी। हम एक दूसरे की जिन्दगी में शा मिल हैं। उन्होंने कहा कि कुछ पार्टी वाले नेता ये सब करा रहे हैं।

सरीफन खातून और सईदा खतून की उम्र 70 से 75 के आस पास होगी। हम जब नुरानी मुहल्ले में पहुंचे मकानों के दरवाजे बंद थे। घरों में मातम छाया हुआ है। हर आदमी कहने से बच रहा है। उनकी आंखें भावशून्य हो गयी थीं। बूढ़ी आवाज में कपंकंपी है। अपने को जप्त करते हुए कहा ’मैं रुखसत होकर आयी तो ममता चाची ने मुझे सबकुछ सिखाया था। मैं बच्ची थी। घर का काम- काज नहीं जानती थी। मेरे लिए मेरी मां की तरह थी। हमलोग किस तरह एक दूसरे के बिना रह सकते हैं। दूधवाली, सब्जी वाली, धोबिन ये सब हमारे जीवन का हिस्सा हैं ये हिन्दू हैं। इस तनाव के बाद भी हमारे घरों में आना-जाना नहीं बंद किया।

सिलाव में अब जिन्दगी फिर से पटरी पर लौटी है। पर बहुत कुछ है जिसे सबने खो दिया है। जो सबकी सांझी चीजें थीं -प्यार, भरोसा, साझेदारी। उन्हें उम्मीद है कि वे मुहब्ब्त से जीत लेंगे अपने लोगों का दिल। हमलोग अब निकल आएं हैं। क्षितिज दूर तक फैला नजर आ रहा है। धूल से सनी सड़कों पर हम अब दूसरे श हर को देखने जा रहे हैं। गर्मी के सुखद मौसम का सुनहरा जादू नहीं रहा। आम के मंजर की खूश बू भरी हुई है पर दंगों ने सारे रंग और खश बू तबाह कर दिए हैं।  मैली सड़कें और मैली सफेद दीवारें जिस पर कहीं किसी पेड़ की परछाई नहीं है। हम सुन रहे हैं धीमी पदचापों और असंख्य दिल की आवाजें जो कह रही हैं कि हमें चैन से जीने दो।

साहित्यकार और सोशल एक्टिविस्ट निवेदिता स्त्रीकाल के संपादन मंडल से जुड़ी हैं. सम्पर्क: niveditashakeel@gmail.com 

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पहली ट्रांसजेंडर स्टूडेंट (पंजाब विश्वविद्यालय) के संघर्ष की कहानी

डिसेन्ट कुमार साहू

“किन्नर समाज में अछूत बने हुए है। आमतौर पर उन्हें स्कूलों और शिक्षण संस्थानों में दाखिला नहीं मिलता। उनके लिए बहुत कुछ किया जाना बाकी है।”
सुप्रीम कोर्ट,  22 अक्टूबर 2013

पिछले कुछ समय में विभिन्न क्षेत्रों में ट्रान्सजेंडर ने संघर्ष करते हुए अपनी काबिलियत का लोहा मनवाया है। यह बात चाहे भारत की पहली ट्रान्सजेंडर न्यूज़ एंकर पद्मिनी प्रकाश की हो, राजस्थान की पहली ट्रान्सजेंडर हवलदार बनी गंगा की हो या अन्य क्षेत्रों में उपस्थिती दर्ज कराने वाली ट्रान्सजेंडर की हो, सभी ने यह मुकाम अपने संघर्षों से हासिल की है। ये उपलब्धियां सिर्फ इसलिए महत्वपूर्ण नहीं है कि इन्होंने कुछ करके दिखाया है और अन्य लोगों के लिए उदाहरण पेश की है। यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि इन्होंने अपने लिए बनाई गई पारंपरिक ढांचे को तोड़ा है जो उन्हें समाज से बहिष्कृत होकर भीख मांगने के लिए मजबूर करती है। निश्चित ही इन एक-एक ईटों के सहारे पहचान और स्वीकार्यता की एक बड़ी भवन तैयार की जा रही है जहां मानवीय गरिमा के साथ जीवन का अधिकार हो। ऐसे ही बेहतर समाज की ओर कदम बढ़ाते हुए पंजाब विश्वविद्यालय ने ट्रान्सजेंडर विद्यार्थियों को निःशुल्क शिक्षा प्रदान करने की घोषणा की है। इससे पहले यह विश्वविद्यालय, ट्रान्सजेंडर टॉयलेट बनवाने वाला पहला विश्वविद्यालय बनने के कारण देशभर में अपनी पहचान बना चुका था, साथ ही विश्वविद्यालय परिसर को भेदभाव मुक्त बनाने के लिए एंटी डिस्क्रिमिनेशन सेल भी बनाया गया है। हाल ही में चंडीगढ़ में ट्रान्सजेंडर कल्याण बोर्ड का भी निर्माण किया गया। इन उपलब्धियों के पीछे धनंजय की संघर्ष और साहस की कहानी है, जिन्होंने एक बेहतर समाज बनाना ही अपने जीवन का उद्देश्य बना लिया और इसमें उन्होने काफी हद तक सफलता भी प्राप्त की है। उनकी सफलता को पंजाब विश्वविद्यालय के परिसर में महसूस कर सकते है जहां ट्रान्सजेंडर की उतनी ही स्वीकार्यता है जितनी अन्य लोगों की। उन्हें लोगों की भेदती या असहज करने वाली नजरों का सामना नहीं करना पड़ता, यही कारण है कि धनंजय मानती है कि पंजाब विश्वविद्यालय ट्रान्सजेंडर विद्यार्थियों के लिए बेहतर जगह बन रही है।

ऐसे हजारों ट्रान्सजेंडर बच्चे है जिन्हें अपनी पढ़ाई सहपाठियों तथा शिक्षकों के दुर्व्यवहार के कारण छोड़ देना पड़ा। जिनमें हंसी-मज़ाक से लेकर यौन हिंसा तक की घटनाएँ शामिल होती है। ऐसी परिस्थितियों में जब धनंजय ने पंजाब विश्वविद्यालय में पहली ट्रान्सजेंडर विद्यार्थी के रूप में प्रवेश ली तो यह खबर काफी दिनों तक चंडीगढ़ के अखबारों तथा सोशल मीडिया पर छायी रही। इस समय धनंजय मानवाधिकार विषय लेकर स्नातकोत्तर की पढ़ाई कर रही हैं। वैसे तो इससे पहले भी उन्होने दो बार स्नातकोत्तर करने हेतु प्रवेश लिया था लेकिन दोनों बार ही अपनी पढ़ाई पूरा नहीं कर पाए, इसके साथ ही तब उनकी पहचान एक पुरुष की ही थी। अपनी पहचान को स्वीकार करना तथा इस पहचान के साथ आगे की पढ़ाई करने का निर्णय धनंजय के लिए आसान नहीं था। वैसे तो समाज द्वारा बनाये गये इस द्विलैंगिक खांचे से उसका संघर्ष 4-5 वर्ष की उम्र में ही शुरू हो गया था जब उसने यह एहसास कर लिया था कि वह पुरुष शरीर में कैद कोई और है जो इस शरीर के साथ सामंजस्य नहीं बैठा पा रहा है। उम्र की शुरुआती अवस्था में स्त्रैण हाव-भाव को लेकर किसी भी तरह की समस्या का सामना तो नहीं करना पड़ा जो आमतौर पर दूसरे ट्रान्सजेंडर को करना पड़ता है। धनंजय को घर के कामों में माँ का हाथ बटाना तो पसंद था ही, फ़्राक व माँ की साड़ी पहनना भी पसंद था। परिवार तथा रिश्तेदारी के सारे लोग उसे बहुत प्यार करते थे, हो भी क्यों न आखिर वह प्यारी-प्यारी बातें जो करता था। उस समय धनंजय को सभी लोग कहते ‘कुडियां वर्गा द मुंडा'(लड़कियों की तरह लड़का)।

धनंजय पढ़ाई में होनहार थे, उन्होने चंडीगढ़ के सेक्टर 46 के सरकारी कालेज से स्नातक की पढ़ाई पूरी की। वे स्नातक स्तर पर कालेज भर में प्रथम आये इसके साथ ही उन्हें तीन साल तक कालेज कलर (college colour) भी चुना गया जो कालेज का मान-सम्मान बढ़ाने वाले विद्यार्थी को दिया जाता है। इसी दौरान 1989 से 1993 तक उन्होंने शास्त्रीय संगीत और नृत्य की भी दीक्षा ली। ज़िंदगी बिलकुल सामान्य सी पटरी पर चल रही थी लेकिन अपने बेटे के हाव-भाव देखकर शायद घर वालों को कोई चिंता सताए जा रही थी तभी तो घर वालों ने लाख मना करने के बाद भी बेटे को 21 वर्ष की आयु में शादी के बंधनों में बांध दिया। तब वे स्नातक की पढ़ाई कर ही रहे थे। आज भी धनंजय शादी की बात याद करती हुई अपराधबोध से भर जाती है और सिर्फ इतना कहती है कि ‘काश यह नहीं हुआ होता’ यह अपराधबोध उस स्त्री के प्रति है जिसे वह एक पुरुष के रूप में मुकम्मल प्यार न दे सकें। धनंजय भी उन ट्रान्सजेंडर में से एक हैं जिन्हें जबर्दस्ती शादी के बंधनों में बांध दिया जाता है। वे उस सोच के शिकार हुए जो शादी के बाद सब कुछ ‘ठीक’ हो जाएगा समझते हैं। 21 वर्ष की उम्र में भी धनंजय असमंजस की स्थिति से निकल नहीं पाये थे, शादी के लिए मना सिर्फ इसलिए कर रहे थे क्योंकि लड़कियों के प्रति कोई आकर्षण नहीं था।

धनंजय के लिए आगे की ज़िंदगी और भी कठिन होने वाली थी, उसे दुखों का दरिया पार करना था। स्नातकोत्तर करने के लिए सन 1993 में इतिहास विभाग में प्रवेश लिया लेकिन स्त्रैण हाव-भाव के कारण छेड़-छाड़ तथा सीनियरों के द्वारा यौन उत्पीड़न का शिकार हुए। आखिरकार तंग आकार विभाग छोड़ देना पड़ा लेकिन पढ़ाई से लगाव होने के कारण अपनी पढ़ाई जारी रखने के लिए फ्रेंच तथा रशियन भाषा में डिप्लोमा किया। वर्ष 1993 में ही वे लिपिक पद हेतु विश्वविद्यालय में चुने गए, इसके साथ ही आगे की पढ़ाई भी करना चाहते थे अत: 1994 में एलएलबी करने के लिए पुनः विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया लेकिन इस बार फिर से वह हैवानों से बच नहीं पाये और हास्टल में सीनियरों द्वारा उनके साथ बलात्कार किया गया (उसके साथ जबर्दस्ती गुदा मैथुन किया गया)। इस घटना ने शायद उसे अंदर तक तोड़ कर रख दिया था, वह नहीं चाहती थी कि यह सब उसे और सहना पड़े अतः उसने पढ़ाई छोडने का निर्णय लिया। इसके बाद भी वह कलर्क के रूप में विश्वविद्यालय में काम कर ही रहे थे, लेकिन एक षड्यंत्र यहाँ भी इंतजार कर रहा था। आगे धनंजय बताती है “1998 में पेपर लीक हुआ, इस मामले में मुझे झूठे तरीके से फंसा दिया गया। पुलिस कस्टडी में मुझे कई तरह की प्रताड़नाओं से गुजरना पड़ा, पुलिस वालों के द्वारा भी मेरा यौन उत्पीड़न हुआ।” एक तरफ अदालती मामला तो दूसरी तरफ “मैं कौन हूँ” इस सवाल का अब तक जवाब ना मिलना, ने धनंजय को गहरी निराशा और तनाव में डाल दिया था। यह सन 1998 का साल था, कहीं से भी इस निराशा और तनाव की स्थिति से निकलने की उम्मीद न दिखाई देने पर मन में आत्महत्या कर लेने का ख्याल आने लगा। इस निराशा के कारण ज़्यादातर समय घर से बाहर भटकते हुए बीतने लगा। ऐसे ही एक दिन जब वह पार्क में सोये थे तो एक व्यक्ति पास आकार उससे समय पूछने लगा, समय बताने पर आग्रह करता है कि वह उससे बात करना चाहता है। शायद उसे कुछ अनुभव हो गया था। एक-दूसरे के साथ अनुभव साझा करते हुए वह व्यक्ति धनंजय से कहता है कि “तुम गे (समलैंगिक पुरुष) हो।” अपने समान अनुभवों के कारण धनंजय को भी लगा कि शायद वह सही कह रहा हो। उस दिन से पहले तक उसने ‘गे’ शब्द कभी नहीं सुना था, अर्थ से तो अब भी अनजान ही था। मतलब पूछे जाने पर उस व्यक्ति ने बस इतना कहा था कि “जो आदमी, आदमी की ओर आकर्षित होता है।” यह धनंजय के लिए जादुई शब्द था, जिसने उसके भावनाओं को एक पहचान दे दी थी। उसने यह भी बताया कि ऐसा महसूस करने वाला वह दुनिया में अकेला व्यक्ति नहीं है, उसने चंडीगढ़ में ही समूह के अन्य सदस्यों से धनंजय को मिलवाया भी। उस दिन को याद करते हुई धनंजय कहती है “उस दिन मैं बहुत खुश थी, पहली बार लगा कि मैं अकेली नहीं हूँ, मेरे जैसे और भी लोग है।” अब ज़्यादातर समय नए दोस्तों के साथ ही गुजरने लगा था, उनसे मिलना, बात करना, एक-दूसरे से मज़ाक करना अच्छा लगने लगा था। आखिर खुद को ‘मैं कौन हूँ’ इसका जवाब जो मिल गया था। ज़्यादातर मामलों में एलजीबीटीक्यू पहचान वाले लोगों के  लिंग अभिव्यक्ति (जेंडर एक्स्प्रेशन), यौन रुझान (सेक्सुयल ओरिएंटेशन) को बहुसंख्यक समाज द्वारा कलंकित तथा हेय दृष्टि से देखें जाने के कारण एलजीबीटीक्यू पहचान वाले लोग अपनी अभिव्यक्ति या रुझान को पाप या गलत मानने लगते है। जब उन्हें यह एहसास होता है कि यह गलत या असामान्य नहीं है तथा उनके जैसे और भी लोग है तो यह उनके लिए दुनिया की सबसे खुशी देने वाली चीज होती है।

अब भी पेपर लीक वाला मामला चल रहा था। धनंजय बताती है “मैं पुलिस कस्टडी में थी, पुलिस ने जमानत के कागजात बताकर अन्य कागजातों पर मेरा हस्ताक्षर ले लिया और अदालत द्वारा जून 2000 में मुख्य अपराधकर्ता ठहराएँ जाने के कारण मुझे जेल भेज दिया गया। फरवरी 2001 में जमानत पर रिहा हुई। यह पूरा मामला 2014 में जाकर समाप्त हुआ। यह मेरे जीवन का सबसे बदतर समय था, शायद इन्हीं मुश्किलों ने मुझे लड़ना सीखा दिया।” 2001 से ही उसने एक गैर सरकारी संस्था के साथ मिलकर एलजीबीटीक्यू मुद्दों पर काम करना शुरू कर दिया। उस समय उनका ज्यादा ज़ोर एमएसएम (समलैंगिक पुरुष) पर ही था इसलिए अब भी वह ट्रान्सजेंडर समूह से ज्यादा मिल नहीं पायी थी। 2009 में दोस्तों के साथ मिलकर एनजीओ(गैर-सरकारी संगठन) रजिस्टर्ड कराने के बाद किन्नर समुदाय के साथ मिली और उनके साथ काम करने लगी। “2013-14 तक मैं खुद को गे ही मानती थी लेकिन डेरे (किन्नर समुदाय) के लोगों से मिलते रहने और अपने अनुभवों से लगा कि मैं गे नहीं ट्रान्सजेंडर हूँ।” इस तरह 43-44 साल गुजर गए खुद की पहचान करते हुए, आधे से ज्यादा जीवन दो जेंडरों के बीच झूलते हुए निकल गया था।

अपनी पहचान के बारे में निश्चित होने के बाद एलजीबीटीक्यू समूह के लोगों के लिए उस पहचान के साथ लोगों के सामने आना महत्वपूर्ण कदम होता है। ज़्यादातर ट्रान्सजेंडर के साथ यह आसान नहीं होता, क्योंकि परिवार व समाज का दबाव ऐसा न करने का होता है, या फिर समाज में ऐसे व्यक्तियों के पहचान को कलंकित किए जाने के कारण खुद ऐसे पहचान वाले लोग खुद की पहचान को गलत समझने लगते है। लेकिन धनंजय ने कभी भी अपनी पहचान को गलत नहीं माना। वह कहती है कि ‘अगर हमें खुद अपनी पहचान को लेकर शर्म या झिझक हो तो लोग भी उसी नजरिए से देखेंगे। आज लोग मुझसे बात करते है, मुझे उनका साथ और सहयोग मिलता है क्योंकि मैंने अपनी पहचान को कभी गलत नहीं माना।’ पंजाब विश्वविद्यालय से धनंजय का बचपन से नाता रहा कारण मामा और पापा यहाँ काम करते थे। यहाँ के लगभग लोग उसे बचपन से ही जानते थे। वह कई इमारतों की तरफ इशारा करके बताने लगती है कि कहाँ पर क्या था और कहाँ पर वह अपने दोस्तों के साथ खेला करती थी। इस तरह उसकी लड़कपन की खुशनुमा यादें इस विश्वविद्यालय से जुड़ी थी तो दूसरी तरफ अपना आत्म-सम्मान भी उसने यही खोया था, इसलिए उसने मन ही मन यह निश्चय कर लिया था कि वह अपना खोया हुआ आत्म-सम्मान और अधिकार यही से लेगी। यही कारण है कि उसने विश्वविद्यालय में फिर से आना चुना।

पढ़ाई करने का निर्णय तो ले ही लिया था अब बारी थी अगले कदम की यानि लोगों के बीच जाकर जेंडर तथा यौनिकता के मुद्दे पर बात करने की। विश्वविद्यालय में ट्रान्सजेंडर के रूप में प्रवेश लेना और लोगों के द्वारा स्वीकार्यता प्राप्त कर लेना, यह सब कुछ अचानक नहीं हुआ था यह उसके मेहनत का ही फल था। वह कहती है ‘इसके लिए मैंने 4-5 साल तक तैयारी की, इस विश्वविद्यालय में मैंने इन मुद्दों को लेकर 2012 से ही काम शुरू कर दिया था। मैंने अलग-अलग विभागों के छात्रों तथा शिक्षकों से बात-चीत शुरू की। मैंने बात करते हुए एक चेन बनाया ताकि ज्यादा से ज्यादा लोगों तक अपनी बात पहुंचा सकूँ। इसी बीच हमने 2013 में पहली बार यहां (चंडीगढ़) प्राइड मार्च का आयोजन किया। उस समय विश्वविद्यालय प्रशासन ने भी कह दिया था कि यहाँ से चले जाओ, यहाँ कार्यक्रम मत करो। हमें हटाने के लिए सुरक्षा गार्ड भी आ गये, लेकिन हमारे समर्थन में छात्र-छात्राएँ तथा शिक्षक सामने आये। उन्होने प्रशासन से बात की और हमें कार्यक्रम की शुरुवात विश्वविद्यालय से ही करने के लिए कहा।’ आज भी समाज की मुख्यधारा ट्रान्सजेंडर के बारे में ज्यादा कुछ नहीं जानता, धनंजय ने इसी खाली जगह (gap/space) को भरने का प्रयास किया।

अप्रैल 2014 में सुप्रीम कोर्ट के थर्ड जेंडर पहचान संबंधी निर्णय आने के बाद विश्वविद्यालय प्रशासन से प्रवेश फॉर्म में थर्ड जेंडर का कॉलम देने लिए लिए कहा गया। 2016 में पंजाब विश्वविद्यालय की पहली ट्रान्सजेंडर विद्यार्थी के रूप में धनंजय ने प्रवेश लिया। अब भी कुछ लोगों के लिए धनंजय का ट्रान्सजेंडर पहचान स्वीकार करना मुश्किल था। उन्हें लगता था कि अब तक तो लड़का था फिर कैसे ट्रान्सजेंडर हो सकता है, तो वहीं कुछ लोगों के लिए अब भी हंसी-मज़ाक की पात्र मात्र थी। धनंजय अपने सहपाठियों के साथ हुए पहले परिचय के बारे में बताती है “जब मैंने बताया कि मैं शादी-शुदा हूँ तो लोगों को लगा कि मैं नकली हूँ और सिर्फ कुछ लाभ प्राप्त करने के लिए नाटक कर रही हूँ। इसका कारण उनके दिमाग में ट्रान्सजेंडर के प्रति बैठी कई भ्रांतियाँ थी, लेकिन जब धीरे-धीरे उन्हें मेरे बारे में पता चलता गया तो वे मेरे साथ खड़े होते गए।” पूर्व के अनुभवों (यौन उत्पीड़न, छेड़-छाड़) के कारण अब भी वह कहीं अकेले जाने से डरती थी, ऐसे में उन्होंने लड़कियों को एक बेहतर साथी पाया जो उनकी समस्याओं को समझ रही थी और सहायता के लिए भी तत्पर थी। विश्वविद्यालय में प्रवेश लेने के बाद एक बड़ी समस्या टॉयलेट की थी कि कौन सा टॉयलेट उपयोग में लिया जाए। कुलपति को जब इस समस्या से अवगत कराया गया तो उन्होने जल्द ही अलग टॉयलेट बनाने का आश्वासन के साथ अस्थायी तौर पर लड़कियों की टॉयलेट के उपयोग करने सहमति प्रदान की।

धनंजय जितना महत्वपूर्ण कक्षा में समय बिताने को मानती है उतना ही महत्वपूर्ण वह अन्य लोगों के साथ मिलना और बात करने को भी मानती है यह इस दृष्टि से कि ताकि सोशल स्पेस में ट्रान्सजेंडर की मौजूदगी सामान्य हो जाए। वह इस संदर्भ में कहती है ‘अगर मुझे सिर्फ पढ़ाई करनी होती तो चुपचाप अपनी कक्षाओं में शामिल होती और चली जाती लेकिन इससे क्या होता? लोगों का ट्रान्सजेंडर समुदाय के प्रति जो नजरियाँ है वह जस का तस बना रहता।’  ज़्यादातर ट्रान्सजेंडर किशोरावस्था में आते तक अपनी पहचान के बारे में निश्चित हो जाते है। यह स्कूली शिक्षा का अंतिम पड़ाव (10वीं या 10+2वीं) या स्नातक की पढ़ाई का शुरुआती समय होता है। ऐसे में जब उन्हें उसकी पहचान के कारण परिवार व समाज से बहिष्कृत किया जाता है तब उसके पास किसी प्रकार की सहायता के लिए व्यवस्था नहीं होती। रोटी और सुरक्षा के तलाश में या तो वे डेरा में शामिल हो जाते (यहाँ भी अपनी आजीविका के लिए बधाई, मंगनी ही करना होता है) है या सेक्स वर्कर के रूप में काम करने लगते है। इसका कारण यह भी है कि कोई छोटा सा काम भी उन्हें मयस्सर नहीं हो पाता है, इन दोनों ही अवस्था में उसका आगे का भविष्य खत्म सा हो जाता है। आखिरकार इन दोनों ही स्थितियों में उन्हें बहिष्कृत जीवन ही गुजारना पड़ता है। बहुत सारे ट्रान्सजेंडर पढ़ाई तो करना चाहती है लेकिन उन्हें सहपाठियों तथा शिक्षकों की उपेक्षा, मज़ाक का पात्र बन जाने के कारण पढ़ाई छोड़ देनी पड़ती है। धनंजय को भी इन्हीं परिस्थितियों से गुजरना पड़ा, अतः उन्होने प्रशासन के सामने शिक्षा, आवास तथा भोजन जैसे बुनियादी चीजों को निशुल्क उपलब्ध कराने की मांग रखी इसके साथ ही भेद-भाव मुक्त माहौल को सुनिश्चित करने के लिए कहा ताकि समाज में स्वीकार्यता के साथ एक बेहतर जीवन के लिए तैयार हो सकें। इन मांगों के प्रति प्रशासन का रवैय्या सकारात्मक रहा है।

धनंजय के प्रयासों से आज पंजाब विश्वविद्यालय ट्रान्सजेंडर विद्यार्थियों के लिए बेहतर जगह बनती जा रही है। इस सत्र में 5 ट्रान्सजेंडर विद्यार्थियों ने अलग-अलग विषयों में प्रवेश लिए है। भविष्य में इस संख्या के बढ़ने को लेकर धनंजय सकारात्मक है, वे बताती है कि अलग-अलग जगहों से लोग विश्वविद्यालय में प्रवेश संबंधी पूछताछ के लिए फोन करते रहते है। इस तरह के प्रयासों का लाभ असमंजस की स्थिति से निकलने, अपनी पहचान निर्धारित करने तथा एक बेहतर रोल मॉडल के लिए होगा। फैशन डिजायनिंग में स्नातक कर रही प्रीत कहती है ‘मैं बहुत दिनों से महसूस करती थी कि मैं लड़की हूँ लेकिन बदनामी, पारिवारिक-सामाजिक दबाव के कारण खुद को कभी व्यक्त नहीं कर पायी थी। लेकिन जब मैं दीदी(धनंजय) से मिली तो मुझे हिम्मत मिला कि मैं जैसा महसूस करती हूँ वैसा ही रहूँ।’ प्रीत के इस कदम के बाद परिवार वालों ने प्रीत को घर से निकाल दिया, इस समय प्रीत अपने बुआ के साथ रहती है। आज तक लोगों ने ट्रान्सजेंडर को पारंपरिक कामों से अपनी आजीविका चलाते हुए देखा है, खुद ट्रान्सजेंडर भी यहीं मानकर चलते थे कि यही हमारा काम है ऐसे में इस तरह के बदलाव लोगों का ट्रान्सजेंडर को देखने की दृष्टिकोण में बदलाव लाएगी। पिछले 13 साल से विश्वविद्यालय के कैंटीन में काम करने वाले रंजीत कहते है ‘आज तक मैंने उनके (धनंजय) बारे में किसी को बुरा कहते हुए नहीं सुना है, जब उनका व्यवहार सबके साथ अच्छा है तो कोई बुरा क्यों बोलेगा? उनको यहाँ पढ़ते देखने से पहले मैं यही सोचता था कि हिजड़ा सिर्फ ट्रेनों में पैसा मांगते है और नाच-गाने का काम करते है, अब मैं ऐसा नहीं सोचता हूँ।’

धनंजय विश्वविद्यालय परिसर में हुए परिवर्तनों के बारे में बताते हुए कहती है “पहले लोग बात करने, मिलने में शर्म महसूस करते थे। कहीं से गुजरता तो लोग मेरे हाव-भाव देखकर हँसते, मज़ाक बनाते। लेकिन आज लोगों ने हमें हमारी पहचान के साथ स्वीकार कर रहे है। शुरुआत में लोग एलजीबीटीक्यू पहचानों के बारे में नहीं जानते थे, विशेष रूप से ट्रान्सजेंडर के बारे में उनके दिमाग में बहुत सारी भ्रांतियाँ थी। वे सभी को ‘गे’ समझते थे। लोगों के बीच रहने से यह हुआ है कि आज इसी विश्वविद्यालय में 10 से भी ज्यादा शोध ट्रान्सजेंडर के ऊपर हो रहे हैं। वे संवेदनशील हुए है, उनकी सोच में बदलाव आया है। उन्हें पहली बार पता चल रहा है कि हमें किन समस्याओं से गुजरना पड़ता है। इन बदलाओं के बाद  भी मुझे इस विश्वविद्यालय से बहुत सारी उम्मीदें है।”

इन तमाम संघर्षों के पीछे एक ही आग्रह है कि हमें भी इंसानों की तरह स्वीकार्यता मिले। ताकि धनंजय जैसे लाखों ट्रान्सजेंडर को अपने परिवार, समाज, संस्कृति से विस्थापित ना होना पड़े। आपको उनकी जेंडर व यौनिक पहचान को स्वीकार करने से पहले उन्हें एक व्यक्ति के रूप में स्वीकार करना पड़ेगा। सफलताओं की कहानी सिर्फ इसलिए है ताकि उन्हें आप कमतर ना समझने लगे, ताकि उन्हें बंद खांचों के बाहर भी समझ सकें। क्या इससे पहले भी कोई ए. रेवती जैसी लेखिका नहीं हो सकती थी? हो सकती थी लेकिन कभी हमने उन्हें सुनने की जहमत नहीं उठाई। क्या इससे पहले किसी धनंजय को इन अमानवीय यातनाओं से नहीं गुजरना पड़ा होगा? आज भी उन्हें अमानवीय अत्याचारों को सहना पड़ रहा है सिर्फ इसलिए क्योंकि हमने उन्हें वे जैसे है और जैसा रहना चाह रहे है वैसे पसंद नहीं करते। वह तभी स्वीकार किए जाएंगे जब वे हमारी मानकों पे फिट हो।

(यह आलेख धनंजय के साथ की गई बातचीत  पर आधारित है)

लेखक म.गां.अ.हि.वि.वि. वर्धा के  समाजकार्य विभाग में शोधार्थी हैं. संपर्क: dksahu171@gmail.com, मोबाइल: 9604272869




तस्वीरें गूगल से साभार
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लेनिन: कम्युनिस्ट नेतृत्व महिलाओं के आन्दोलन के सवाल पर निराशावादी, रुको और देखो वाला रुख अपना लेता है



मजदूर दिवस पर विशेष 


आज से लगभग 100 साल पहले 1920 में मार्क्सवादी स्त्रीवादी क्लारा जेटकिन ने रूसी क्रांति के विराट नेता लेनिन से यह बातचीत की थी. लेनिन इस बातचीत के हिस्से में महिलाओं के सवाल पर नेतृत्व की बेरुखी और महिला श्रम के प्रति लोगों में अनादर और उपेक्षा की बात कर रहे हैं. हम पूरी बातचीत किस्तों में प्रकाशित करेंगे, यह हिस्सा बातचीत के मध्य से लिया गया है मजदूर दिवस को ख़ास संदर्भ करते हुए. 

लेनिन कहते रहे, “महिलाओं के लिए हमारी मांगों पर सोवियत रूस ने नई रोशनी डाली है। सर्वहारा की तानाशाही में वे सर्वहारा और बुर्जुआ के बीच संघर्ष की एक वस्तु नहीं रह गई है। एक बार उन्हें बाहर ले आया जाए, तो वे साम्यवादी समाज के निर्माण में ईंटों का काम करेंगी। ये महिलाओं को दूसरी तरह दिखाता है।  सर्वहारा की सत्ता हासिल करने में एक निर्णायक महत्व की तरह। यहां और वहां की उनकी स्थितियों को बडे़ पैमाने पर बताया जाना चाहिए, ताकि सर्वहारा के  क्रांतिकारी वर्ग संघर्ष के लिए बड़ी संख्या में महिलाओं की सहायता हासिल की जा सके। सिद्धांतों की स्पष्ट समझ और मजबूत संगठनात्मक आधार के साथ महिलाओं को लामबंद करना, कम्युनिस्ट पार्टियों और उनकी जीत के लिए एक महत्वपूर्ण मुद्दा होना चाहिए। खैर, हमें खुद को निर्णायक नहीं बनाना चाहिए। हमारे राष्ट्रीय धड़े में अभी भी इस मामले पर स्पष्ट समझ नहीं बन पाई है। जब भी कम्युनिस्ट नेतृत्व के तहत कामकाजी महिलाओं के जन आंदोलन की बात उठती है, वे निराशावादी और रुको और देखो वाला रुख अपना लेते हैं। वे यह नहीं मान पाते कि ऐसे जनआंदोलन को विकसित कर उसका नेतृत्व करना पार्टी गतिविधि का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, बल्कि पार्टी का आधा काम ही समझो। कम्युनिस्ट महिलाओं के उद्देश्यपूर्ण, मजबूत और व्यापक आंदोलन की जरूरत और महत्व के बारे में यदा-कदा उनकी सम्मति, पार्टी की निरन्तर चिंता और काम के बजाय एक आदर्शवादी बक-बक ही है।”

“महिलाओं के बीच आंदोलन प्रचार करने और उन्हें जागरूक और क्रांतिकारी बनाने के काम को ये लोग दोयम दर्जे का मानते हैं। उसे सिर्पफ कम्युनिस्ट महिलाओं का काम मानते हैं। चूंकि यह काम तेजी से और मजबूती से आगे नहीं बढ़ा, इसलिए कम्युनिस्ट महिलाओं की निंदा की जाती है। यह गलत है, बुनियादी तौर पर गलत है। सरासर भेदभावपूर्ण है। जैसी कि एक प्रेंफच कहावत हैμ ‘यह समानताकी पलटी है।’ हमारे राष्ट्रीय धड़े के  गलत रवैये के तल में क्या है? मैं सोवियत रूस की बात नहीं कर रहा हूं। अंतिम विश्लेषण से यह निकलता है कि यह महिलाओं को और उनकी उपलब्धियों को कम कर आंकने के  कारण है। बस यही बात है! यह विडम्बनापूर्ण है कि अभी भी हमारे कई साथियों के बारे में कहा जा सकता है कि उनके  कम्युनिस्ट आवरण को खुरचों तो एक दोमुंहा स्वरूप मिलेगा। इसके  लिए आप उनके  संवेदनशील बिंदु, मसलन महिलाओं के बारे में उनकी मानसिकता को खुरचिए। इसका सबसे प्रत्यक्ष उदाहरण इस सामान्य दृश्य, जिसमें एक महिला किसी काम, मसलन घरेलू काम में जो साधरण, नीरस, मेहनतवाला और समय खर्चने वाला हो, पिस रही हो, उसे एक पुरुष शांत-भाव से देख रहा हो. उसकी घटती हिम्मत, दिमाग के  पस्त होते जाने, हृदय गति के  धीमे होते जाने, इच्छा के  कमजोर होते जाने को ताक रहा है। मैं बुर्जुआ महिलाओं की बात नहीं कर रहा, जो घरेलू काम को और बच्चों की देखभाल नौकरानियों के  भरोसे छोड़ देती हैं। जो मैं कह रहा हूं, वो महिलाओं के  व्यापक वर्ग पर लागू होता है, मजदूरों की पत्नियों पर भी, चाहे वे दिन-भर कारखानों में काम कर पैसा कमाती हों।”

“बहुत ही कम पति, यहां तक कि सर्वहारा वर्ग के पति भी नहीं सोचते कि वे अपनी पत्नियों का कितना बोझ और चिंताएं हल्की कर सकते हैं या कि इन ‘महिलाओं वाले काम’ में हाथ डालकर उन्हें पूर्णतः मुक्त कर सकते हैं। लेकिन नहीं, ये तो पुरुषों के  ‘अधिकारों और सम्मान’ के विरुद्ध होगा। वे तो आराम और सुविध की मांग करते हैं। एक महिला का घरेलू जीवन, प्रतिदिन हजारों तुच्छ बातों के सामने स्वयं का त्याग करने का होता है। उसके पति के , ‘भगवान और स्वामी’ के  पुरातन अधिकार बिना परिर्वतन के  बने रहते हैं। वस्तुतः उनके  दासत्व का ही वे बदला लेती हैं, छिपे रूप में। महिलाओं का पिछड़ा रह जाना और अपने पति के  क्रांतिकारी आदर्शवादी कामों के  प्रति अज्ञानता से पतियों की संघर्ष क्षमता, लड़ने की इच्छा पिछड़ जाती है। वे उन सूक्ष्म किटाणुओं की तरह हैं, जो अन्दर पनपते हैं और कुतरते हैं. धीरे-धीरे लेकिन निश्चित तौर पर। मैं मजदूरों के जीवको जानता हूं, के वल किताबी तौर पर नहीं। महिलाओं के  बीच हमारे कम्युनिस्ट काम और साधरण तौर पर हमारे राजनीतिक कामों में पुरुषों के बीच समुचित शैक्षिक कामों का शुमार है। हमें पुराने स्वामी-दासी दृष्टिकोण को पार्टी और समाज, दोनों में से बाहर निकलना चाहिए। यह हमारा एक राजनीतिक काम है और जल्द से जल्द जरूरी है। उतना ही जरूरी जितना कि कामकाजी महिलाओं के बीच पार्टी का काम करने के लिए गहन सैद्धांतिक और व्यवहारिक प्रशिक्षण पाये पुरुष और महिला साथियों का एक समूह बनाने का।”

सोवियत रूस में आज के हालात के बारे में मेरे प्रश्न पर लेनिन ने जवाब दिया,  “सर्वहारा की तानाशाही वाली सरकार, कम्युनिस्ट पार्टी और मजदूर संघों के साथ मिलकर पुरुषों और महिलाओं के पिछड़े विचारों को बदलने की हर संभव कोशिश कर रही है, ताकि पुरानी और गैर साम्यवादी मानसिकता को जड़ से नष्ट किया जा सके। कहने की जरूरत नहीं कि कानून के समक्ष पुरुषों और महिलाओं की स्थिति बिल्कुल बराबरी की है। इस बराबरी को प्रभाव में लाने की गंभीर कोशिश हर क्षेत्र में देखी जा सकती है। हम आर्थिक क्षेत्र, प्रशासन, विधयिका और सरकार में काम करने के लिए महिलाओं की सूची बना रहे हैं। उनके लिए तमाम पाठ्यक्रम और शिक्षण संस्थाएं खुली है, ताकि वे अपना व्यावसायिक और सामाजिक प्रशिक्षण सुधार सकें। हम सामुदायिक रसोईघर, सार्वजनिक भोजनालय, लॉन्ड्रियां और मरम्मत की दुकानें, झूलाघर, बाल विद्यालय, शिशु आवास और तमाम तरह की शिक्षण संस्थाएं खोल रहे हैं। संक्षेप में यह कि हम व्यक्तिगत परिवारों के घरेलू कामों और शिक्षा को समाज में ले जाने के काम को पूरा करने के  लिए गंभीर और तत्पर हैं। इसीलिए महिलाओं को अपनी पुरानी घरेलू गुलामी और पति पर उसके पूर्ण आश्रय से मुक्त किया जा रहा है। उसे समाज में अपनी क्षमताओं और आकांक्षाओं के लिए जगह बनाने के लिए योग्य बनाया गया है। बच्चों को उनके विकास के लिए घर के बजाय बेहतर अवसर दिए जा रहे हैं। हमारे पास विश्व का सबसे प्रगतिशील महिला श्रम कानून है, जो संगठित श्रम के  मान्यता प्राप्त प्रतिनिधियों द्वारा लागू किया जाता है। हम प्रसव घर, मां एवं शिशु घर, मातृत्व केंद्र, नवजात एवं शिशु देखभाल हेतु पाठ्यक्रम, मां एवं बच्चे की देखभाल पर प्रदर्शनियां आदि स्थापित कर रहे हैं। जरूरतमंद और बेरोजगार महिलाओं की हर संभव मदद की कोशिश भी हम कर रहे हैं। हमें पता है कि कामकाजी महिलाओं की जरूरतों को देखते हुए, यह बहुत कम है। अभी भी यह उनकी वास्तविक मुक्ति के  लिए पर्याप्त नहीं है। लेकिन जारशाही और पूंजीवादी रूस में जो कुछ था, उससे आगे की ओर यह एक बड़ा कदम है। लेकिन यह उन स्थानों पर  अभी भी पूंजीवादी शासन है उसकी तुलना में कहीं अधिकहै। सही दिशा में यह एक अच्छी शुरुआत है। हम इसे लगातार, सारी उपलब्ध ऊर्जा के साथ आगे भी बढ़ाएंगे। विदेशों में आप निश्चिन्त रहें। क्योंकि बीतते जाते हर दिन के साथ यह स्पष्ट होता जा रहा है कि लाखों महिलाओं को साथ लिए बगैर हम उन्नति नहीं कर सकते। एक ऐसे देश में जहां की कुल आबादी में 80 प्रतिशत किसान हैं, सोचो, इस बात के क्या मायने है। छोटी किसानी का मतलब व्यक्तिगत घरबार और महिलाओं का बंधन। इस मामले में तुम हमसे कहीं बेहतर होगे, अगर यदि तुम्हारे देश ‘जर्मनी’ का सर्वहारा यह समझ ले कि सत्ता हासिल करने, क्रांति करने के लिए समय, ऐतिहासिक तौर पर तैयार है।इसी बीच, विकट समस्याओं के  बावजूद, हम निराश नहीं हैं। जैसे समस्याएं बढ़ती हैं हमारी शक्ति भी बढ़ती है। व्यावहारिक जरूरत भी हमें महिलाओं की मुक्ति के नए रास्ते तलाशने के लिए उकसाती है। सोवियत राज्य के साथ कॉमरेडों की एकजुटता अजूबा करदिखाएगी। मैं स्पष्ट कर दूं कि कॉमरेड की एकता का मेरा आशय कम्युनिस्ट एकता से है, न कि बुर्जुआ अर्थ में, जैसा कि सुधरवादियों द्वारा उपदेश दिया गया था। जिनका क्रांति का जज्बा किसी सस्ते सिरके  की गंध की तरह उड़ गया। व्यक्तिगत पहल जो सामूहिक गतिविधि में तब्दील हो, इस एकजुटता के लिए चाहिए। सर्वहारा की तानाशाही के  तहत साम्यवाद के सच होने से देहातों में भी महिलाओं की मुक्ति होगी। इस मसले पर हमारे उद्योगों और खेती के विद्युतीकरण से मुझे बहुत अपेक्षाएं हैं। वो एक महान योजना है! इसके रास्ते में ढे़र-सीभयंकर बड़ी बाधएं हैं। समुदाय में छिपी पड़ी शक्ति को जगाना पड़ेगा। जो इनसे पार पा सकें। लाखों महिलाओं को इसमें जरूर हिस्सेदारी करनी होगी।”

पिछले दस मिनटों में कोई दो बार दरवाजों पर दस्तक दे चुका था, लेकिन लेनिन बोलते रहे। अब उन्होंने दरवाजा खोला और चिल्लाए, “मैं आ रहा हूं।“ मेरी तरफ मुड़कर,  मुस्कुराते हुए वे बोले, “तुम जानती हो क्लारा, मैं इस बात का लाभ उठाने जा रहा हूं कि मैं एक महिला से बतिया रहा था। देर हो जाने के  लिए महिलाओं की बकवास की बदनाम आदत का बहाना बनाउंगा। यद्यपि इस बार महिला की बजाय पुरुष ने ही अधिक बातें की। तुम एक अच्छी श्रोता हो! शायद यही वजह थी, जिसने मुझे इतना बोलने के  लिए उकसाया।”  इस मजाकिया बात के साथ लेनिन ने कोट पहनने में मेरी मदद की।

“तुम्हें और गर्म कपड़े पहनना चाहिए।“ उन्होंने विनम्र सुझाव दिया। मास्को स्टुटगार्ट नहीं है। तुम्हारी देखभाल के लिए कोई होना चाहिए। ठंड से बचना। अलविदा!” उन्होंने मजबूती के  साथ मुझसे हाथ मिलाया।

भारत विज्ञान समिति द्वारा ‘महिलाओं के मुद्दे’ शीर्षक से प्रकाशित किताब से साभार. हिंदी में अनुवाद मनोज कुलकर्णी ने किया है 

तस्वीरें गूगल से साभार
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हूक….!!

प्रो.परिमळा अंबेकर

विभागाध्यक्ष , हिन्दी विभाग , गुलबर्गा वि वि, कर्नाटक में प्राध्यापिका और. परिमला आंबेकर मूलतः आलोचक हैं.  हिन्दी में कहानियाँ  अभी हाल से ही लिखना शुरू किया है. संपर्क:09480226677

बस स्टैंड के कंपाउंड के भीतरी घेरे की गोलाई में कोई आ या जा नहीं रहा था। सुनसान पसरा पडा वह अहाता, शमशानी मौन से धीरे धीरे भरता जा रहा था  बस स्टैंड की पिछली ऊंची दीवार से लगी खडी बसें जैसे इस नीरवता को साक्षी दे रहे हों। जलती लाईटों से छनती रोशनी का मटमैलापन वातावरण के पसारे को उदासी से लीप पोत कर थक हार कर बैठ चुका था। रह रहकर कोई कुत्ता अपनी जगे से उठता और दुम हिलाते एकाध अधखुले दुकान का चक्कर काटता फिर लौटकर अपनी जगे पर हल्के से रिरियाते हुए दुम और मुंडी को दुबकाकर, आँखें मिटकाते सो जाता। शायद रात के डेढ दो बज रहे होंगे। यादगिरी के इस छोटे से बस स्टैंड में इस वक्त किसी गाडी के आने या जाने का कोई अंदाजा नहीं लग रहा था ।

लेकिन यादगिरी के इस बस स्टैंड के भीतरी अहाते में पसरी इस बियाबानी की स्थिरता को कोई आवाज तोड़े जा रही थी । जैसे दिल के गर्त से उठती चीख को दबाने से फट पडनेवाली रूदनभरी सिसकी की आवाज हो- हाँ यह किसी औरत की ही आर्त ध्वनि थी, जो रह रहकर सन्नाटे को चीरती हुयी कहीं दूर अंधकार के गर्त में समा जा रही थी। खाली बोतल से निकली हवा का गले में फंसने से उठनेवाली सिटकरी सी ध्वनि से पास में सोया कुत्ता अपनी मूंदी आँखें क्षणभर खोलता फिर ऐसे बंद कर लेता, जैसे उस इन्सान के रूदन से अपनी अनुकंपा को बोध रहा हो या मातम के प्रति अपनी हिस्सेदारी जता रहा हो। कुछ क्षण के लिए रूदन की आवाज बंद सी हो गयी । शायद उस औरत ने फेंफडे के भीतर की हवा को बाहर आने से रोक ली हो, मुंह में आंचल को ठूंसकर या फेफडो का बर्तन ही खाली हो गया हो…!! यह आंचल का कपडा भी अजीब है, मुंह में ठूंसते ही रोते हुए को चुप करा देता है, चुप बैठे हुए को रूला भी देता है …!!

 उस खाली स्थिर अहाते में उसी समय कुछ हलचल सा हुआ । मायूसी के अंधकार से उठकर आता सा कोई आदमी बस स्टैंड के अहाते के एक कोने से दूसरे कोने की ओर चल पडा जहां से औरत के रोने की आवाज आ रही थी। वह आदमी लगभग अधेड उम्र का गंवई लग रहा था । धोती, बुशर्ट और कंधेपर अंगोछा डाले वह शख्स गठरी बनी बैठी उस औरत के बगल में जा निढाल सा पसर गया । जैसे जिंदगीभर चलते ही आ रहे उस आदमी को अब एक कदम भी उठाना असाध्य हो गया हो, उसे लग रहा था जैसे पैर में सीसा भरते जा रहा हैं। आदमी के आते ही औरत के रोने की ध्वनि और तेज हो गयी। कुछ क्षण बाद  सन्नाटा फिर मायूसी का चादर ओढकर कुत्ते की तरह आंख मूंद कर सो गया। लेकिन दूसरे ही पल एक विस्फोट सा हुआ। उस आदमी का लोहे के बेंचपर उस औरत के पास आकर बैठने के दूसरे ही पल उन दोनो के एक सुर में रोने की आवाज ने उस मायूसी लिपी अंधकार के परत को तार तार कर दिया । उस भयंकर दिल को टूक कर देने की रूलायी से पास का वह कुत्ता भी अपनी जगे से उठकर उनके पास जाकर चुपचाप खडा हो गया, जैसे उसकी समझ में रहा हो, कि आदमियो की मायूसी मे शरीक होना अपने जानवरपन का आदिम कर्तव्य है।

बात साफ थी। निश्चय ही बेटी की मौत की खबर थी और वह भी स्टोव के फटने से जलकर मरने की खबर,  जैसे ब्याहता बेटी के मरने या मारने का दमदार सामाजिक नुस्खा। सर्वस्वीकृत न्यायिक और संवैधानिक नुस्खा !! और बात उससे भी साफ और सरल थी, ससुराल वालों से खबर मिली इस दुर्घटना का रात के लगभग एक बजे, क्यूंकि हमारे निम्न और मध्यम समुदाय की बस्तियों के स्टोव तो रात में, अधिकतर रात के बारह के बाद ही तो फटते हैं …!! शिवम्मा और बसप्पा को उनकी बेटी भीमव्वा का स्टोव के फटने से जल जाने से कलबुर्गी सरकारी अस्पताल में भर्ती कराने तक की खबर, और…और उसके देह का नब्बे प्रतिशत से ज्यादा जलजाने से मरजाने की खबर देर रात को ही मिली थी। इस खबर को पाकर आधे घंटे से यादगिरी के बस स्टैंड में कलबुर्गी जाने वाली बस के इंतजार में बिलखते बैठे थे पति पत्नी शिवम्मा और बसप्पा। बसप्पा उठकर पूछताछ के बंद काउंटर में बार बार झांक आता या फिर निरीह सा लौटकर शिवम्मा के पास आकर बैठ जाता। शिवम्मा के रह-रह कर रोने की उस दिलटूक करने वाली आवाज को सुनने के लिए निर्जीव से खडे बसों की कतार और उन कुत्तों के सिवाय और कोई नहीं था, जिनमें से उनके पास बैठा एक कुत्ता , बार बार अपने फर्ज को निस्संदेह निभा भी रहा था ।

बसप्पा अपने बुशर्ट की जेब से माचिस और बीडी निकालकर सुलगाने लगा, उसकी ओर जलती आंखों से देखती शिवम्मा फूलकर मोटे हुए गले की नसों में और तनाव भरते हुए भर्रायी आवाज में कहने लगी, “वहां मेरी भीमा असप्ताल में मरी पडी है और यहां तुझे बीडी सुलगाने की पडी है।” रूलाई का भभका शिवम्मा को उसी बेंच पर निढाल सा कर दिया वह बेंच के लोहे के पाइप  से अपना सर पीट पीटकर दे मारने लगी । जलती बीड़ी को वहीं जमीन से मसलकर बसप्पा, शिवम्मा के पास आकर बैठ गया। हलकान होती अपनी आवाज मे जरा ताकत डालते पत्नी की ओर देखकर उसने कहा, ‘अरी, क्या मैं बीडी का कश खींच रहा हूं, नहीं री शिवी… शिवी मेरा दिल जल रहा है री …इसे कैसे ठंडा करूं …तू ही बोल … भीमव्वा … बेटी भीमा…!!,” फुक्का फाडकर रोने लगा ।

शिवम्मा ने अपने दोनो हाथों को आकाश की ओर उठाया। वहां भी धुप्प अंधकार आर पार पसरा पैठा था। निढाल से हाथों को उठा उठाकर अपनी छाती पर दे मारने लगी !! दूसरे ही पल सीना तानकर बैठ गयी। अपने दोनों  हाथों को पति की ओर सीधा तानकर भग्न मुद्रा में बैठी शिवम्मा के मुंह से जैसे आग के गोले बरसने लगे, अब कैसे मिलेगा रे छाती को ठंडक? कित्ती बार बोली थी रे भीमा कि अप्पा मुझे वहां शादी नई करने का, मुझे और पढना है, मैं कलबुर्गी जाउूंगी, वहां जाकर पढूंगी… नौकरी करूंगी।’’ शिवम्मा हठात अपनी जगह से उठी  बसप्पा के नजदीक जाकर आपने दोनो हथेलियों को तीर के नोक सी उसके मुंह पर तानती हुई भर्राये गले से कहा, ‘हां  हां तूने तो मेरी भीमा को कलबुर्गी भेजा, जरूर भेजा, लेकिन-लेकिन किस लिए, किस लिए,’ वह दहाड़ मारकर रोने लगी।

शिवम्मा सीधे तीर से तने उसके पतले से दोनो लंबे लम्बे हाथ हवा में उसी तरह ताने खड़ी रही, जैसे भीमा की मौत का उत्तर मांग रही हो। उत्तर में बसप्पा पत्नी की ओर सूखे प्रश्न भरी आंखों से बस देखता ही रह गया ।
उसी समय कहीं दूर से कुत्तों के झुंड से लंबी हॅूंक सी उठी । उस हूंक में घुले सदियों के रूदन की लरज से सारा वातावरण कांप सा गया …!!

तस्वीरें गूगल से साभार
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