भारतीय संतों के हमेशा कुंडलिनी जागरण की तरह हमेशा सेक्स की समस्याओं में उलझे रहने वालों पर भी मैं अविश्वास करता हूं: लेनिन


महिलाओं के मुद्दों पर लेनिन 
क्लारा जे़टकिन

आज से लगभग 100 साल पहले 1920 में मार्क्सवादी स्त्रीवादी क्लारा जेटकिन ने रूसी क्रांति के विराट नेता लेनिन से यह बातचीत की थी. इस बातचीत का एक हिस्सा (बीच का हिस्सा), जो महिला श्रम के सन्दर्भ में है स्त्रीकाल के पाठक 1 मई (मजदूर दिवस) को पहले ही पढ़ चुके हैं, इस लिंक को क्लिक कर पढ़ सकते हैं. 

लेनिन: कम्युनिस्ट नेतृत्व महिलाओं के आन्दोलन के सवाल पर निराशावादी, रुको और देखो वाला रुख अपना लेता है

आज से हम इस बातचीत को प्रारम्भिक हिस्से से क्रमवार प्रकाशित करेंगे. 

महिलाओं के अधिकारों की समस्या पर कॉमरेड लेनिन मुझसे लगातार चर्चा करते थे। महिलाओं के आंदोलन को वे बहुत महत्व देते थे। उनके अनुसार महिलाओं के आंदोलन, जन-आंदोलनों का एक जरूरी हिस्सा है, जो कुछ परिस्थितियों में निर्णायक होता है। वे महिलाओं को सामाजिक बराबरी देने को एक सिद्धांत की तरह देखते थे। निश्चित ही कोई भी कम्युनिस्ट इस बात से असहमत नहीं होगा।  इस विषय पर हम दोनों की सबसे पहली लंबी बातचीत 1920 की शरद ऋतु में हुई थी। यह बातचीत क्रेमलिन में लेनिन के बड़े से अध्ययन-कक्ष में हुई थी। लेनिन अपनी मेज पर बैठे थे, जो किताबों और कागजों से ढंकी हुई थी। वो किसी बेहद विद्वान व्यक्ति के अध्ययन और काम करने की ओर इशारा करती थीं, वो भी बिना किसी अव्यवस्था के।



मेरा स्वागत करने के बाद वे बोले, “हमें साफ सैद्धांतिक आधार पर महिलाओं का एक शक्तिशाली अंतरराष्ट्रीय आंदोलन खड़ा करना चाहिए। इसके लिए हमें हर साधन का उपयोग करना चाहिए। ये तो तय है कि मार्क्सवादी सिद्धांत के बिना हम उचित व्यवहार नहीं कर सकते। इस मामले में भी हम कम्युनिस्ट लोगों की सैद्धांतिक समझ बिलकुल साफ होनी चाहिए। हमें हमारी और दूसरी पार्टियों के बीच स्पष्ट रेखा खींचनी होगी। यह दुखद है कि महिलाओं के मुद्दे पर हमारे ‘दूसरे अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन’  (सेकंड इंटर्नेशनल) में अपेक्षानुरूप चर्चा नहीं हो पाई। वहां प्रश्न तो उठाए गए लेकिन किसी निश्चित मत तक नहीं पहुंचा जा सका। इस मामले पर अभी भी एक समिति है। उसे एक प्रस्ताव, पर्चा और निर्देश लिखने हैं। लेकिन अब तक बहुत कम प्रगति हो पाई है। तुम इसमें जरूर मदद करो।’’

जो लेनिन अब मुझे बता रहे थे, मैं दूसरों से पहले ही सुन चुकी थी। मैंने अपनी खुशी जाहिर की। क्रांति के दौरान जो कुछ रूसी महिलाओं ने किया था, और जो वे अब उसकी रक्षा और विकास के लिए कर रही थीं, मैं उससे उत्साहित थी। जहां तक बोल्शेविक पार्टी में महिलाओं की स्थिति और गतिविधियों का सवाल है, मेरा मानना है- ये आदर्श पार्टी है। इसने अकेले ही अंतररार्ष्ट्रीय कम्युनिस्ट महिला आंदोलन तैयार किया, वो भी मूल्यवान, प्रशिक्षित और अनुभवी दल-बल के साथ। इसने इतिहास के लिए एक महान उदाहरण पेश किया।
फीकी मुस्कान के साथ लेनिन बोले, “सही है, यह बेहतरीन है। पेत्रेगार्द में, यहां मास्को में और दूसरे शहरों और औद्योगिक केंद्रों पर क्रांति के दौरान सर्वहारा महिलाओं ने बहुत अच्छा काम किया। मेरा विचार हैं कि उनके बगैर हमारी जीत मुश्किल होती। उन्होंने बहुत साहस दिखाया। उनमें अब भी बहुत दम है। उनकी तकलीफों और पाबंदियों की कल्पना करो। लेकिन फिर भी उन्होंने ये सब किया, क्योंकि वे सोवियत लोगों की रक्षा चाहती थीं। क्योंकि उन्हें आजादी और साम्यवाद चाहिए था। हां, हमारी कामकाजी महिलाएं बेहतरीन वर्ग-लड़ाकू हैं। वे प्रशंसा और प्रेम के काबिल हैं। ये भी स्वीकारना चाहिए कि पेत्रेगार्द में हमारे खिलाफ लड़ने में, संवैधानिक जनवादियों के फौजियों के मुकाबले, उनकी महिलाओं ने हमें अच्छी टक्कर दी। फ्ये सच है कि हमारी पार्टी में भरोसे लायक, बुद्धिमान और न थकने वाली महिलाएं हैं। वे सोवियतों, कार्यकारी समितियों, जन समितियों और हर तरह के कार्यालयों में महत्वपूर्ण पदों पर हैं। उनमें से कई तो पार्टी में या मजदूरों, किसानों के बीच या लाल सेना में दिन-रात काम करती हैं। ये हमारे लिए बहुत अच्छी बात है। ये सारी दुनिया की महिलाओं के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि ये महिलाओं की योग्यता, समाज के लिए उनके द्वारा किए गए बहुत अच्छे काम का सबूत है। सर्वहारा के अधिनायकवाद के इस पहले प्रयोग ने महिलाओं के लिए सामाजिक बराबरी का रास्ता साफ किया है। अधिकतर महिलावादी साहित्य की अपेक्षा इसने ज्यादा पूर्वाग्रहों को खत्म किया है। बावजूद इस सबके अभी भी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर महिलाओं का कम्युनिस्ट आंदोलन नहीं है। जल्द ही हमें ऐसा आंदोलन खड़ा करना चाहिए। ऐसे आंदोलन के बगैर हमारे इंटरनेशनल और उसकी पार्टियों का काम अधूरा रहेगा, वह कभी भी पूरा नहीं हो सकेगा। हमारा क्रांतिकारी काम संपूर्णता में होना चाहिए। मुझे बताओ कि विदेशों में हमारा कम्युनिस्ट आंदोलन कैसा चल रहा है?”

उस समय जितना मैं बता सकती थी-जबकि कॉमिटर्न की पार्टियों के आपस में संबंध ढीले और छिटपुट थे- मैंने बताया। कुछ आगे झुककर बैठे लेनिन ने ध्यान से हर बात सुनी। उनके चेहरे पर ऊब, जल्दबाजी या थकावट का कोई निशान नहीं था। यहां तक कि कम महत्व के विवरण पर भी उन्होंने ध्यान दिया। मैंने उनसे बेहतर श्रोता कभी नहीं देखा। साथ ही ऐसा व्यक्ति भी जिसने जो कुछ सुना और उतनी ही तेजी से उसका सैद्धान्तीकरण कर लिया। यह इस बात से पता चलता है कि जो कुछ मैंने उन्हें बताया, उस पर उन्होंने समय-समय पर छोटे और सटीक प्रश्न किए। जो कुछ मैंने बयान किया था, उसके एक या दूसरे मुद्दे पर वे बाद में आए। लेनिन ने कुछ छोटे-मोटे विवरण भी दर्ज किए।

जाहिर है कि मैंने जर्मनी के काम-काज के बारे में सविस्तार बताया। रोजा लक्जमबर्ग द्वारा क्रांतिकारी संघर्ष में अधिक से अधिक महिलाओं को लाने की बात के व्यापक महत्व के बारे में मैंने लेनिन को बताया। जब कम्युनिस्ट पार्टी गठित की गई, रोजा ने महिलाओं का एक अखबार निकालने पर जोर दिया। आखिरी बार जब मैं लियो जोगिशे से उनकी हत्या के 36 घंटे पहले मिली थी, तो उन्होंने मेरे साथ पार्टी के काम करने के इरादों के बारे में चर्चा की थी। उन्होंने मुझे कई काम सौंपे। इसमें से एक था- कामकाजी महिलाओं के बीच संगठन बनाने का। अपने पहले अवैधानिक अधिवेशन में पार्टी ने इस मुद्दे को लिया था। युद्ध के पहले या उस दौरान प्रसिद्ध हुई प्रशिक्षित और अनुभवी महिला आंदोलनकर्मी और नेत्रियां, बिना किसी अपवाद के किसी न किसी तरह की सामाजिक जनवादी थी। उन्होंने सर्वहारा महिलाओं को आंदोलनरत और व्यस्त बनाए रखा था। हालांकि इनमें ऊर्जावान, समर्पित महिलाओं का एक छोटा-सा समूह था। वे पार्टी के प्रत्येक काम और संघर्ष में हिस्सा लेती थीं। इसके अलावा पार्टी ने कामकाजी महिलाओं के बीच व्यवस्थित संगठन की गतिविधियां संचालित की। हालांकि ये तो अभी शुरुआत ही है, एक अच्छी शुरुआत।



लेनिन बोले, “अच्छे, बहुत अच्छे। अवैधानिक या अर्ध वैधानिक दौर में कम्युनिस्ट महिलाओं की ऊर्जा, समर्पण, उत्साह, हिम्मत और बुद्धि हमारे भविष्य के काम की उन्नति का आश्वासन है। यह पार्टी के फैलाव में उपयोगी है। यह लोगों के दिल जीतने और काम करने की पार्टी की ताकत को बढ़ाने वाला है। लेकिन इस मुद्दे के मूल सिद्धांतों की स्पष्ट समझ प्रत्येक सदस्य को कैसे दी जा सकती है? जनता के बीच काम करने के लिए यह सबसे महत्वपूर्ण है। जनता को जो विचार हम देते हैं, और चाहते हैं कि जनता जिन चीजों को समझे या जिनसे प्रेरणा ले, उस बारे में यह बात बहुत महत्वपूर्ण है। मैं याद नहीं कर पा रहा हूं कि किसने कहा था कि, ‘महान काम करने के लिए प्रेरणा जरूरी होती है।’

“हमें और दुनिया के कामगारों को सचमुच अभी महान काम करने हैं। आपके साथियों की प्रेरणा क्या है? जर्मनी की सर्वहारा महिलाएं? वहां के सर्वहारा की क्या स्थिति है? क्या उनकी रुचियां और कार्रवाईयां इस समय की राजनीतिक मांगों पर केंद्रित हैं? उनके विचारों का केंद्र क्या है?

“मैंने रूस और जर्मनी के साथियों से इस बारे में अनेक अनोखी बातें सुनी हैं। मेरा मतलब क्या है, मैं बताता हूं। मैं जानता हूं कि हेम्बर्ग में कोई कम्युनिस्ट महिला वेश्याओं के लिए अखबार निकालती है। वो उन्हें क्रांतिकारी संघर्ष के लिए संगठित कर रही है। अपने दुखद धंधे के कारण किसी पुलिस धारा का उल्लंघन करने पर जेल भेज दी गई वेश्याओं की रक्षा में रोजा जैसी सच्ची कम्युनिस्ट ने मानवीय सोच से एक लेख लिखने का अच्छा काम किया था। वेश्याएं बुर्जुआ समाज के दोहरे शोषण की शिकार हैं। एक तो इसकी संपत्ति की व्यवस्था की, दूसरी नैतिक दम्भ की। बेशक कोई कठोर स्वभाव और तंग नजरिए वाला ही इसे भूल सकता है। यह सब समझ पाना एक बात है, लेकिन वेश्याओं को एक विशेष क्रांतिकारी संघ के हिस्से की तरह संगठित करना और उनके लिए ट्रेड यूनियन अखबार निकालना! क्या जर्मनी में कामगार महिलाएं बची ही नहीं हैं जिन्हें कि संगठित किए जाने की जरूरत है? जिन्हें एक अखबार की जरूरत है? जिन्हें आपके संघर्ष में शामिल किया जाना है?
यह एक भटकाव है। यह मुझे उस साहित्यिक फैशन की जोरदार याद दिलाता है, जो हर वेश्या को एक हसीन मैडोना बना देता है। इसका उद्गम भी मजबूत हैः सामाजिक सहानुभूति और आदरणीय बुर्जुआओं  के नैतिक ढकोसलों के विरूद्ध क्रोध। लेकिन यह अच्छा विचार तो बुर्जुआ के पतन और विकृति के पीछे दब गया। हमारे देश में भी वेश्यावृत्ति का प्रश्न, अनेक समस्याओं के साथ हमारे सामने होगा। वेश्याओं को उत्पादक कामों की तरफ लाना, सामाजिक अर्थ व्यवस्था में उनके लिए जगह बनाना, ये काम करने होंगे। लेकिन हमारी वर्तमान अर्थव्यस्था और दूसरे हालात इसे मुश्किल और जटिल बना देते हैं। सर्वहारा के सत्ता में आने के बाद से, महिला समस्याओं का यह पहलू हमें हर तरह से चुनौती दे रहा है, और हल ढूंढे जाने की मांग करता है। यहां सोवियत रूस में भी इसके लिए बहुत ज्यादा प्रयासों की जरूरत है।

लेकिन जर्मनी में तुम्हारी विशेष समस्या पर लौटा जाए। अपने किसी सदस्य के ऐसे अव्यवस्थित काम पर किन्हीं भी परिस्थितियों में पार्टी को शांत नहीं रहना चाहिए, ये भ्रम पैदा करता है और हमारी ताकत को बांटता है। अभी इसे रोकने के लिए तुमने क्या किया है?”

ब्लैक कम्युनिस्ट 


मैं जवाब दे पाती कि इससे पहले ही लेनिन फिर कहने लगे, ‘क्लारा, तुम्हारे ‘पापों का रिकार्ड’ तो और भी बुरा है! मुझे बताया गया है कि कामगार महिलाओं के लिए शाम को आयोजित किए जाने वाले पाठों और चर्चाओं में सेक्स और विवाह की समस्या सबसे पहले उठाई जाती है। तुम्हारे राजनीतिक पाठों और शैक्षणिक कार्य में ये सबसे ज्यादा रुचि के विषय बताए जाते हैं। जब मैंने यह सुना, मुझे अपने कानों पर भरोसा नहीं हुआ। सर्वहारा के सबसे पहले तंत्र को दुनिया-भर की प्रतिक्रांतियों से जूझना पड़ रहा है। जर्मनी के हालात में भी सर्वहारा की तमाम क्रांतिकारी शक्तियों की एकता की जरूरत है, जिससे कि दबाव बना रही प्रतिक्रांति से मुकाबला किया जा सके। लेकिन सक्रिय कम्युनिस्ट महिलाएं सेक्स की समस्याओं और ‘अतीत, वर्तमान और भविष्य’ की विवाह स्थितियों पर चर्चा करने में व्यस्त हैं। इन प्रश्नों पर कामगार महिलाओं को सचेत करना, वे अपना सबसे महत्वपूर्ण काम मानती हैं। ये दुखद है कि वियेना की एक कम्युनिस्ट लेखिका द्वारा सेक्स के प्रश्नों पर लिखा गया एक पर्चा बहुत लोकप्रियता पा रहा है। पुस्तिका एकदम बकवास है! इस विषय में कामगारों ने सही बातें बेबेल के लेखन में पहले ही पढ़ लिया है। न सिर्फ उस थकाऊ और सूखे पर्चे के रूप में बल्कि बुर्जुआ समाज में उठने वाले आंदोलन के द्वारा भी। पर्चे को वैज्ञानिक मुलम्मा चढ़ाने की गरज से फ्रायड के सिद्धांत को शामिल किया गया है, लेकिन यह एक नवसिखुए  द्वारा की गई गड़बड़ी-भर है। फ्रायड की थ्योरी तो अब एक ‘झक’ बन चुकी है। मैं लेखों, शोधपत्रें, पर्चों आदि में वर्णित सेक्स थ्योरियों पर विश्वास नहीं करता। थोड़े में कहूं तो बुर्जुआ  समाज की गंदगी के ढेर पर तेजी से पनपने वाले उस खास किस्म के साहित्य में दी गई थ्योरियों पर। भारतीय संत जो सदा अपनी कुंडलिनी ही जागृत करने में लगे रहते हैं, उसी तरह हमेशा सेक्स की समस्याओं में उलझे रहने वालों पर भी मैं अविश्वास करता हूं- मेरे ख्याल में सेक्स पर इस तरह की थ्योरियों की भरमार, जो कि अधिकांश के लिए महज एक ख्याल है और अधिकतर तो इकतरफा ही है, किसी व्यक्तिगत जरूरत से पैदा होती है। ये बुर्जुआ नैतिकता के सामने अपने असामान्य और अत्यधिक सेक्स वाले जीवन को सही सिद्ध करने और खुद के प्रति समर्थन पैदा करने की नीयत से फलती-फूलती है। बुर्जुआ नैतिकता के प्रति यह छिपा हुआ सम्मान मेरे लिए उतना की घृणास्पद है जितना कि सेक्स पर आधारित हर बात की जड़ में उतरना। चाहे इन्हें जितना भी विद्रोही और क्रांतिकारी दिखाने की कोशिश की जाए, अंतिम विश्लेषण में ये तमाम अपने चरित्र में बुर्जुआ ही हैं। बुद्धिजीवी और उन जैसे लोग इनके बारे में बहुत रुचि रखते हैं। इनके लिए पार्टी में, वर्ग-सचेत, लड़ाकू सर्वहारा में कोई जगह नहीं है।
क्रमशः 

भारत विज्ञान समिति द्वारा 'महिलाओं के मुद्दे' शीर्षक से प्रकाशित किताब से साभार. हिंदी में अनुवाद मनोज कुलकर्णी ने किया है 

तस्वीरें गूगल से साभार
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