उस पेड़ पर दर्जनो सैनिटरी पैड लटके होते थे

संजीव चंदन 

स्त्रियों के लिए माहवारी को टैबू बनाया जाना सामाजिक-सांस्कृतिक प्रक्रिया है. इसे गोपनीय,  टैबू और लज्जा का विषय बनाने में यह प्रक्रिया न सिर्फ स्त्रियों के मानस को नियंत्रित और संचालित करती है, बल्कि पुरुषों का भी ख़ास मानसिक अनुकूलन करती है. माहवारी को लेकर पुरुषों के बीच की धारणा को समझने के लिए यह एक सीरीज है, जिसमें पुरुष अपने अनुभव इस विषय पर लिख सकते हैं.

वह मुझसे साढ़े चार-पांच  चाल साल बड़ी थी, रिश्ते में एक पीढ़ी ऊपर. अभी भी दृश्य सा याद है, 7-8 साल का रहा होउंगा मैं. आँगन में बैठकर मैं खाना खा रहा था और वे आँगन से लगे कुएं के पास रो रही थीं. बगल के घर से एक नानी आयीं, उन्होंने पूछा 'क्यों रो रही है वो'  कोई जवाब देता उसके पहले मैं बोल उठा, ' महीना हुआ है.' मेरा बोलना था कि घर की महिलायें समवेत रूप से हंस पड़ी. हालांकि मुझे क्या पता था कि महीना क्या होता है, शायद नानी के पूछने के पहले किसी से मैंने सुना होगा कि उन्हें क्या हुआ था, इसलिए मैं बोल पड़ा और सबको हँसते देखकर रुआंसा सा हो गया था.


लेकिन ठीक-ठीक मुझे याद नहीं  कब जान पाया कि यह महिलाओं की योनि से होने वाला मासिक रक्तस्राव है, संभवतः किशोर अवस्था के दोस्तों ने रहस्य भाव में बताया होगा या पहली बार विज्ञान के क्लास में लड़कियों के अंगों के बारे में बताया गया होगा तब. हालांकि वह कोई एक-आध शब्द की जानकारी ही होती थी-'रजस्वला.', जिसका सम्पूर्ण ज्ञान निश्चित तौर पर मुझसे ज्यादा ज्ञानी लड़कों ने दिया होगा. मैं टी मॉडल का विद्यार्थी था, जहां लडकियां नहीं पढ़ती थीं.

जब मैंने स्त्रियों की माहवारी को पहली बार जाना

घर में यह जरूर होता था, कि छोटी बहू होने के बावजूद महीने के कुछ दिनों में मां खाना नहीं बनाती थीं, और अधिक पूजा-पाठी होने के बावजूद पूजा नहीं करती थीं, उन दिनों कभी-कभी फिर वही शब्द टकरा जाता 'महीना.' घर में कभी न पैड दिखा और न सूखता हुआ कपड़ा.

लडकियां लड़कों के लिए रहस्यलोक की प्राणी तो होती ही थीं,  गाँव के स्कूल में पढ़ते वक्त छेड़-छाड़ की पात्र भी. हालांकि मैं बहुत दिन तक गाँव के स्कूल में नहीं पढ़ा, लेकिन सीनियर लड़कों का लड़कियों को छेड़ना आज भी याद है, उनके चक्कर में एक दो बार शिकायत मेरे घर भी आ चुकी थी. शिकायत का कारण बने थे खेल,  जिसमें लड़के किसी लडकी को समवेत चिढ़ाते. उसके नाम का द्विअर्थ बना कर. कॉलेज तक आते-आते लडकियां जब दोस्त बनीं, बेतकल्लुफ बातें करने लगीं, तो माहवारी क्या होता है वह भी जान गया और यह भी कि यह दर्द , शर्म और अछूतपन का कोई मासिक रूटीन है, जिसे हर लडकी को नियमित जीना पड़ता है-भोगना पड़ता है और हो सके तो इस नियमित मासिक चक्र को गुप्त रखना पड़ता है, ख़ासकर पुरुषों से.


मैं  एमए करने महाराष्ट्र के वर्धा पहुंचा स्त्री-अध्ययन का विद्यार्थी होकर. यद्यपि क्लास में हम यौन अंगों का नाम लेते हुए उनपर आरोपित भावों से मुक्ति की फिल्म देख चुके थे, जेंडर का सैद्धांतिक अधययन कर चुके थे, कर रहे थे, लेकिन ऐसा नहीं था वहाँ कि जेंडर का असर पूरी तरह समाप्त हो गया हो. लडकियां काली पन्नी में ही खरीदती थी सैनिटरी पैड. वहां होस्टल के पास एक पेड़ था, काँटों वाला. उसपर दर्जनो इस्तेमाल किये हुए सैनिटरी पैड लटके हुए होते थे . उसके काटे जाने के पहले तक हम उस ओर से गुजरते तो पेड़ पर अतिरिक्त भाव में नजर जाती ही जाती.

माहवारी पर बात की झिझक हुई खत्म 

आप पर आरोपित भाव और विचार से मुक्त होने में समय लगता है. यह हमारे परवरिश और माहौल का ही असर है कि अभी कुछ सालों पहले तक कंडोम और पैड दोनो ही खरीदने में एक अतिरिक्त बोध तो हुआ ही करता रहा है. उस बोध से, झिझक से आज मुक्त तो जरूर हूँ, लेकिन मध्यवर्गीय परिवेश के लिए मुक्ति  एक अभियान का हिस्सा होना चाहिए.  यह सांस्कृतिक अनुकूलन से मुक्ति का प्रसंग है, जिससे पुरुष और स्त्री, दोनो को जरूर मुक्त होना चाहिए.

क्या महिलायें भेजेंगी प्रधानमंत्री और वित्तमंत्री को सैनिटरी पैड

संजीव चंदन स्त्रीकाल के संपादक हैं .
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