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बिहार बंद तस्वीरों में: राकेश रंजन की कविता के साथ

स्त्रीकाल डेस्क 

जनाक्रोश रंग ला रहा है. बिहार सरकार जनता की नजरों में कटघरे में है तो सुप्रीमकोर्ट इस मामले में स्वतः-संज्ञान लेते हुए केंद्र और राज्य सरकार को नोटिस भेज चुका है. आज वामदलों और विपक्ष के आह्वान पर बिहार बंद रहा. आइये बिहार बंद देखते हैं तस्वीरों में राकेश रंजन की एक मार्मिक कविता पढ़ते हुए.


पटना 







शीर्षकहीन
राकेश रंजन 


मुझे आपका खेत
नहीं जोतना मालिक
मेरा हल
खून से सन जाता है
उसमें बार-बार
फँसती हैं लाशें

फूल-सी बच्चियों की लाशें
आपके खेत में

दफ्न हैं मालिक

मार्च में शामिल महिलाऐं 



दफ्न हैं
दबाई गई चीखें
घोंटी गई साँसें
फटी हुई आँखें
कुचले हुए अंग

उनके सीने से चिपकी हुई जोंकें
मेरा खून सोखती हैं मालिक
उनकी देह की मिट्टी
मेरी रोटी में

किचकिचाती है

जहानाबाद में ट्रेन रोको 

उनकी जाँघों का रक्त
मेरी आँखों से बहता है मालिक

मुझे आपका खेत
नहीं जोतना

मुझे तुम्हारी कब्र
खोदनी है

हत्यारे!


दरभंगा में ट्रेन रोको 

नालंदा 

पुलिस से झड़प



आरा-पटना सड़क मार्ग 



राकेश रंजन चर्चित कवि हैं. ‘अभी-अभी जन्मा है कवि’ सहित कई काव्य-संग्रह प्रकाशित.



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पैसे की हवस विरासत में मिली थी हंटर वाले अंकल ‘ब्रजेश ठाकुर’ को !

वीरेन नंदा


मुजफ्फरपुरकाण्ड के मुख्य सरगना ब्रजेश ठाकुर के अन्तःपुर की कहानी बता रहे हैं वरिष्ठ साहित्कार वीरेन नंदा. वीरेन नंदा अयोध्या प्रसाद खत्री सम्मान के संस्थापक हैं. बता रहे हैं कैसे शुरू हुई थी इस परिवार से मुजफ्फरपुर में पीत-पत्रकारिता और बच्चियों के प्रति इसकी क्रूरता की कहानी:

रात में बाथरूम जाने उठती थी तो मेरी पैंट नीचे गिरी रहती थी — बालिका आश्रय गृह कांड की बच्चियाँ

न जाने कितनी ही स्त्रियों को दैहिक, मानसिक, शारीरिक यातना से मुक्ति दिलाने वाले, नारी मुक्ति के प्रथम विमर्शकार गौतम बुद्ध की इस धरती को कलंकित कर दिया मुजफ्फरपुर ने। बिहार की सांस्कृतिक राजधानी कही जाने वाली इस नगरी की आबरू तार-तार हो बेताब है। वृज्जिसंघ को टूटने से बचाने वाली नगरवधू अम्बपाली वेश्यावृत्ति छोड़ अपने भिक्षुणी बने जाने पर विह्वल है। और विह्वल है आज मुजफ्फरपुर की स्त्रियाँ, लड़कियाँ, बच्चियाँ और उनके परिजन !

पेशी के दौरान ब्रजेश ठाकुर

आज शर्मसार है पूरा बिहार,- स्त्रियों के नाम पर चलाए जाने वाली मुजफ्फरपुर की “सेवा संकल्प” संस्था के संचालक ब्रजेश ठाकुर की यौन कुत्सा कांड पर, जिसने “बालिका अल्पावास गृह” को “बालिका उत्पीड़न गृह” बना डाला ! कबीर ने स्त्रियों की दुर्दशा देख यूँ ही ऐसे नहीं कहा –
” नारी  की  झांई  पड़े  अन्धो  होत  भुजंग
कबीर तिनको कौन गति नित नारी के संग ”

बालिका अल्पावास गृह में स्त्रियों के साथ हुई यह अमानवीय और पीड़ादायक घटना नपुंसक पौरुषता की निशानी है, जिसके सूत्र इस देश में पौराणिक कथाओं में भी मिलते हैं कि किस तरह एक पुरुष अपनी बेटी को भी वेश्या बनाने से नहीं चूकता ! ययाति नामक एक चंद्रवंशी राजा के परम् गुरु ऋषि गालव थे। गालव अपने गुरु विश्वामित्र को गुरु-दक्षिणा में 800 अच्छी नस्ल का घोड़ा देने का वचन दिया था। ऋषि गालव के पास घोड़े तो थे नहीं ! तब उसने अपने शिष्य ययाति से इस समस्या के निदान के लिए कहा। ययाति के पास उतने घोड़े देने के साधन नहीं थे और गुरु को वह खाली हाथ लौटा नहीं सकता था। तब उसने ऋषि को अपनी रूपवती पुत्री माधवी के विरोध के बावजूद उन्हें भेंट कर दी। गुरू खुशी-खुशी उसे स्वीकार कर अपने साथ ले गये और दो-दो सौ घोड़ों के एवज में तीन राजाओं को बारी-बारी से एक-एक साल के लिए माधवी को बेचता रहा। तीन साल में तीन राजाओं से माधवी को तीन पुत्र उत्पन्न हुए और गुरु को 600 घोड़े। चौथा राजा जब न मिला तो ऋषि गालव ने 600 घोड़ा सहित माधवी को भी अपने गुरू विश्वामित्र को अर्पित कर दिया। विश्वामित्र भी माधवी का भोग कर एक पुत्र पैदा किये और फिर उसे अपने शिष्य गालव को लौटा दिया। ऋषि गालव ने भी जब उसका दैहिक शोषण कर लिया तो उसे लगा कि अब माधवी उसके काम की नहीं ! तब उसने माधवी को उसके पिता को वापस कर दिया। पौराणिक काल की यह कथा अपने आप में स्त्रियों की दशा को इंगित करने के लिए काफी है। आदि काल से चली आ रही स्त्रियों के उत्पीड़न की दशा सुधारने वाले गौतम की धरती के ये वारिस मुजफ्फरपुर को कलंकित कर दिया, जिसका दाग कभी नहीं छूटने वाला है ! मुजफ्फरपुर के इतिहास में यह काला पन्ना सदा के लिए टंक गया।

प्रातःकमल अखबार का मालिक है ब्रजेश ठाकुर

मुजफ्फरपुर में “सेवा-संकल्प विकास समिति” नामक एनजीओ के तहत चलने वाली संस्था “बालिका अल्पावास गृह” में 41 बच्चियों से मारपीट, नशा का इंजेक्शन और धमकी दे दे कर रेप करने-कराने वाले और रसूखदारों की हवस पूर्ति के आपूर्तिकर्ता आखिर इतनी अकूत संपत्ति कैसे अर्जित की ? उसकी कथा मुजफ्फरपुर में पीत-पत्रकारिता के जनक माने जाने जाने वाले उनके मरहूम पिता राधामोहन ठाकुर की कथा से शुरू होती है।

राधामोहन ठाकुर आरंभिक दौर में मुजफ्फरपुर के हरिसभा के निकट ‘कल्याणी स्कूल’ में शिक्षक थे। खड़खड़िया साइकिल से चलने वाला यह शिक्षक कभी स्कूल नहीं जाते थे, किंतु इनकी हाजिरी बनती रहती। कभी चेकिंग होती तो उसे मैनेज कर लेते। स्कूल के वेतन से उनका पेट कहाँ भरना था। उन्हें तो किसी भी तरह पैसा कमाना था और अकूत धन सीधी राह से आती नहीं ! तब उन्होंने यहाँ से एक अखबार निकालने की सोच ‘विमल वाणी’ का रजिस्ट्रेशन कराया और सरकारी विज्ञापन के लिए तब के उप-समाहर्ता और साहित्यकार डॉ. शिवदास पांडेय से संपर्क साधा। उन्होंने उनकी ऐसी मदद की, कि राधामोहन पैसे कमाने की मशीन बन गए ! यह बात स्वयं सेवा-संकल्प के संचालक व उनके कुत्सित पुत्र ब्रजेश ठाकुर ने इस शहर के साहित्यिकार डॉo शिवदास पाण्डेय के प्रणय-पर्व के अवसर पर छपी स्मारिका में अपने लेख में लिखता है — “….नियमित प्रकाशन के लिए विज्ञापन ही आर्थिक श्रोत थे। श्री ठाकुर ने अपनी गरीबी और मुफलिसी के बीच अपने बुलंद हौसलों का परिचय देते हुए डॉo शिवदास पाण्डेय से विज्ञापन के रूप में आर्थिक मदद की मांग की। डॉo शिवदास पांडेय उनके हौसलों से इतने प्रभावित हुए कि उनको यथासंभव विभागीय ही नहीं, आत्मीय सहायता भी दी, जिसका नतीजा ‘ प्रातः कमल ‘ जैसे दैनिक के बीजारोपण से शुरू हुआ….उन्होंने डॉo शिवदास पाण्डेय को अपना संरक्षक, सलाहकार और बड़ा भाई मान लिया।….. डॉo शिवदास पाण्डेय के प्रभाव से ही गरीबी से ऊपर उठकर पैसे की मशीन बने राधामोहन ठाकुर  सांस्कृति, साहित्य, शिक्षा और समाज सेवा की ओर बढ़ने को उत्प्रेरित हुए । डॉo शिवदास पाण्डेय का उप-समाहर्ता के बाद नगर निगम प्रशासक के रूप में भी मार्गदर्शन मिलता रहा। ” राधामोहन ठाकुर  ने शहर के सांस्कृतिक  क्षेत्र में क्या काम किया यह बात सभी जानते हैं !

प्रातः कमल में खुद को काम करने वाला बताते हुए एक पत्रकार ने कहा कि गोरखपुर से सरकारी विज्ञापन लाने में शबाब-कबाब और शराब की डाली लगाते थे राधामोहन ठाकुर। इस तरह खड़खड़िया साइकिल से चलने वाले राधामोहन ठाकुर ने करोड़ो की संपत्ति अर्जित की तो ऐश भी खूब किया। अखबारी कागज बेचने के आरोप में इनपर भी CBI इन्क्वारी हो चुकी है ! क्योंकि वे अखबार की उतनी ही प्रति छापते, जितना भर सरकारी विभाग को देना होता, बाकी कागज बेच लेते। स्थानीय व्यवसायियों से भी न्यूज छाप देने की धमकी दे कर पैसा ऐंठते !

दिल्ली स्थित बिहार भवन पर सामाजिक संगठनों ने बिहार सरकार के खिलाफ किया प्रदर्शन

करोड़ों का साम्राज्य खड़ा करने वाले इस राधामोहन ठाकुर के पुत्र ब्रजेश ठाकुर के भीतर भी पिता की तरह पैसे की भूख थी। उसी का परिणाम है “बालिका दुष्कर्म कांड” से रातों-रात देश भर में उसका कुख्यात हो जाना। उसकी  संस्था का नाम है, – “सेेवा-संकल्प एवं विकास समिति”। यह समिति बिहार सरकार द्वारा 8 अप्रैल 1987 को बीआर/2009/0003177 संख्या द्वारा रजिस्टर्ड हुई। नियमानुसार, ऐसी समिति में परिवार का एक ही व्यक्ति सदस्य हो सकता है, किन्तु इसमें उनके पुत्र राहुल आनंद सहित परिवार के अन्य रिश्तेदार भी सदस्य हो गये, जिनमें संजय कुमार अध्यक्ष, ब्रजेश ठाकुर मुख्य कार्यकारी अधिकारी, शिवशंकर ठाकुर कोषाध्यक्ष एवं प्रोमोटर में मधु कुमारी, राहुल आनंद, राजेश रंजन व अनिल श्रीवास्तव हैं। इसी एनजीओ के तहत उसने सरकार से अपनी पहुंच, रसूख और कल्याण विभाग के सहयोग से “बालिका अल्पावास गृह” खोला। इसमें अनाथ और बेसहारा लड़कियों को रख कर उसके रहने, खाने और देखभाल के नाम पर सरकार से लाखों रुपये ऐंठता रहा। इन बच्चियों की देखभाल वह क्या करता था उसका प्रमाण है इस कांड के बाद निरीक्षण करने वाली महिला आयोग की अध्यक्ष दिलमणि मिश्रा की टिप्पणी – ‘इस बालिका गृह की दशा तो जेलों से भी ज्यादा बदतर है’, से ही मिल जाती है।

 गलत ढंग से पिता द्वारा अर्जित धन, धन से बना रसूख और फिर सत्ता की चाह में उसने आनंद मोहन की पार्टी बिहार पीपल्स पार्टी को जॉइन कर लिया। 1995 के विधानसभा में ब्रजेश ठाकुर कुढ़नी (मुजफ्फरपुर) सीट से चुनाव में खड़ा हुआ। इस सीट से राजद के दिग्गज नेता बसावन प्रसाद भागवत भी खड़े थे किन्तु उत्तर बिहार का एक नामी गुंडा सम्राट अशोक भी मैदान में था। उसने ब्रजेश को थप्पड़ जड़ते हुए चुनाव न लड़ने की धमकी दी। ब्रजेश डर कर भाग गया। किन्तु सम्राट अशोक के मारे जाने के बाद वह 2000 में फिर चुनाव में उतरा, लेकिन अथाह खर्च करके भी जीत न सका। डी एम हत्याकांड में आनंद मोहन को उम्र कैद की सजा हुई लेकिन ब्रजेश की उससे नज़दीकी बनी रही। बाद में राजद और जदयू के नेताओं के साथ उसकी छनने लगी और उसके अखबार ‘प्रात: कमल’ को भारी-भरकम सरकारी विज्ञापन मिलने लगा, साथ ही बिहार सरकार में महत्वपूर्ण पत्रकार भी माना जाने लगा।

 सरकार और उनके विभागों में पैठ बनाने के बाद, उसने और धन कमाने के लिए एक अंग्रेजी अखबार ‘न्यूज़ नेक्स्ट’ शुरू  किया  और अपनी बेटी निकिता आनंद को उसका संपादक बना दिया। सुना जाता है कि उसने ‘हालात-ए-बिहार’ नामक एक उर्दू अखबार भी शुरू किया ! यानी इन तीनों अखबारों के सरकारी विज्ञापन और अपने एनजीओ से खूब धन कमाया फिर भी उसका पेट नहीं भरा तो अपने ‘बालिका अल्पावास गृह’ में बच्चियो का शोषण शुरू किया. यह सब   उसके घर से सटे बिल्डिंग में चल रहा था जिसमें तीनों अखबार के दफ्तर भी हैं।

30 जुलाई को देशव्यापी प्रदर्शन किया गया

इसी साल फरवरी में टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोसल साइंस (TISS) ने इस बालिका गृह की ऑडिट रिपोर्ट ‘समाज कल्याण विभाग’ को सौंपी। लेकिन ब्रजेश ठाकुर का रसूख तो देखिए ! उस रिपोर्ट को विभाग में ही उसके निदेशक तक पहुंचने में तीन माह लग गए ! यानी वह  26 मई 2018 को निदेशक के पास पहुँची। जबकि उस रिपोर्ट में इस बात का स्पष्ट उल्लेख किया गया था कि वहां बालिकाओं का यौन उत्पीड़न हो रहा है।

समाज कल्याण विभाग के निदेशक ने अपने रिटायर होने वाले दिन, यानी 31 मई को TISS के ऑडिट रिपोर्ट के आधार पर ‘बालिका गृह’ खाली करा कर उसमें रह रही 44 लड़कियों को मधुबनी, पटना और मोकामा शिफ्ट करवाया और अपने सहायक निदेशक को FIR करने को कहकर रिटायर हो गए। 1 जून को समाज कल्याण विभाग के सहायक निदेशक दिलीप वर्मा ने महिला थाने में FIR दर्ज की और तब से फरार हैं। उन्हें भी पुलिस खोज रही है। जिस दिन लड़कियों को बालिका गृह से मोकामा, मधुबनी और पटना शिफ्ट किया जा रहा था उस दिन भी रवि रौशन ने यौन उत्पीड़न किया !

 शहर में नई-नई आयी सीनियर एस.पी. हरप्रीत कौर  2 जून को ब्रजेश से पूछताछ कर वहाँ के कागजात जब्त कर दूसरे दिन ब्रजेश सहित आठ लोग ( किरण कुमारी, चंदा कुमारी, मंजू देवी, इंदू कुमारी, हेमा मसीह, मीनू देवी, नेहा और रौशन कुमार) को हथकड़ी डाल ले गई। ब्रजेश दुहाई देता रहा कि मैं पत्रकार हूँ, बालिका गृह मेरा नहीं है। तब एक इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की पत्रकार ने पूछा – “जब आप का नहीं है तो आप के अखबार और बालिका अल्पावास गृह का मोबाइल नम्बर 9431240777 और फोन न. 0621-2242633 एक कैसे है ?” यह सुनकर ब्रजेश बगलें झांकने लगा। 4 जून को लड़कियों का मेडिकल टेस्ट हुआ जिसमें यौन उत्पीड़न की पुष्टि हुई। राष्ट्रीय महिला आयोग की सदस्य सुषमा साहू ने भी जांच कर कहा कि 15 लड़कियों के साथ दुष्कर्म हुआ है। 5 जून को बाल कल्याण समिति के अध्यक्ष विकास कुमार को पुलिस ने धर दबोचा। ‘बालिका अल्पावास गृह’ की 44 लड़कियों में से 34 के साथ रेप हुआ है। आठ की मेडिकल रिपोर्ट आनी बाकी है। इनमें तीन लड़कियां प्रेगनेंट हैं। 7 से 13 साल की बच्चियां भी इसकी शिकार हुई। पुलिस के समक्ष यौन उत्पीड़ित बच्चियों ने जो बयान दिया है उसे सुनकर कोई भी चीत्कार उठे। वे बताती हैं -“भूख से तड़प कर खाना मांगने पर पीटा जाता। जबरदस्ती का विरोध करने पर पीटा जाता ! खाने में नींद की गोली देकर यौन संबंध बनाया जाता, सुबह उठने पर वे खुद को निर्वस्त्र पाती और शरीर दर्द से ऐंठता रहता। खाना बनाने, बर्तन मंजवाने का काम करवाया जाता। किसी भी बात का विरोध करने पर ब्रजेश हंटर से पीटता। चंदा रॉड से मारती और खाना मांगने पर पीठ पर गर्म पानी उझल देती। सीडब्ल्यूसी रवि रौशन कुमार और काउंसलर विकास  भी गलत काम करता। ब्रजेश, नेहा, किरण, चंदा आदि ( बच्चियों के ) निचले हिस्से पर ही प्रहार करते। मार से एक लड़की का गर्भपात हो गया था। एक लड़की को फाँसी लगाकर मार दी गई।”- यह 41 लड़कियों का पुलिस को दिए गए बयान के अंश हैं। बालिका गृह को “बालिका यातना गृह” में तब्दील कर दिया था ब्रजेश ठाकुर ने। एक लड़की ने कहा कि इनकार करने पर एक लड़की की इतनी पिटाई की गई कि वह मर गई और शव उसी परिसर में दफनाए जाने की बात बताई। उसकी निशानदेही पर कोर्ट के आदेशानुसार खुदाई हुई। शव तो नहीं मिला किन्तु वहां की मिट्टी लेकर फोरेंसिक जांच के लिए भेज दिया गया है।

 2013 से अबतक 6 लड़कियां गायब है। बालिका गृह के रजिस्टर में उन्हें भगोड़ा लिख कर चुप्पी साध ली गई। पुलिस को खबर तक नहीं दी गई। यह बात वहां के रजिस्टर खंगालने पर पता चली, जिसकी भी छान बीन की जा रही है। सेवा संकल्प के अलमारियों को मजिस्ट्रेट के सम्मुख खोला गया तो उसमें कुछ सामान्य बीमारियों में दी जाने वाली दवा के अलावा नशे और मिर्गी में दिए जाने वाले इंजेक्शन भी मिले। मिर्गी के इंजेक्शन यदि सामान्य व्यक्ति को दिया जाए तो वह अचेत हो जाता है।

आश्चर्य तो इस बात की है कि बिहार सरकार के समाज कल्याण विभाग का इस तरह ब्रजेश ठाकुर पर मेहरबान होना तो समझ में आता है कि तू मुझे खुश कर मैं तुम्हें ! लेकिन मुजफ्फरपुर के अखबारों की दो दिनों तक चुप्पी साधना ब्रजेश की ऊपर तक पहुँच को भी दर्शाता है। पीटीआई और यूएनआई के मुजफ्फरपुर के रिपोर्टर ब्रजेश ठाकुर के खास करीबी रिश्तेदार भी हैं और उनमें से एक यहाँ के प्रेस क्लब का अध्यक्ष भी है ! तो मामला दबाने की कोशिश क्यों न होती, किन्तु यहाँ की सीनिअर एस.पी. हरप्रीत कौर की दिलेरी के आगे सब अखबारों को अपनी चुप्पी तोड़नी पड़ी। वह भी तब, जब एक इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने इसे शुरुआत से ही लीड लेना शुरू कर दिया था।

बिहार विधान परिषद में विरोध दर्ज कराती नेता प्रतिपक्ष राबड़ी देवी

ब्रजेश की शातिरता का एक नमूना यह भी है कि अपने कुकर्म को ढंकने के लिए वह समाज में अपनी नकली छवि बना अधिकारियों और अख़बारों से वाहवाही भी बटोरता रहा है। उसकी मिसाल 2007 में एक घटना से दी जा सकती है। हुआ यह कि एक दलित लड़की विमला की शादी एक पिछड़ी जाति की लड़के के साथ हुई । इस शादी के समारोह में उस वक़्त के डीएम सहित कई आला अधिकारियों को ब्रजेश ने आमंत्रित कर अपनी संस्था को आयोजक बताकर उस आयोजन का सेहरा ले लिया और दूसरे दिन इसकी खबर अखबारों में छपी कि ब्रजेश ठाकुर की संस्था ‘सेवा-संकल्प’ ने रेडलाइट एरिया की अंधेरी गली से निकाल उस लड़की का उद्धार किया और उसे नयी जिंदगी दी ! साथ ही यह भी खबर छपवाययी कि डी.एम.ने पांच हजार और अन्य लोगों ने इस सत्कर्म में दूल्हा-दुल्हन को उपहार दिए। यह खबर देख नव-जोड़े ने ब्रजेश ठाकुर और उनकी संस्था की मधु नामक महिला सहित कई अधिकारियों पर मिठनपुरा थाने में FIR की। लेकिन ब्रजेश का बाल भी बांका न हुआ। ब्रजेश की गिफ्तारी की खबर सुन विमला और उसके पति के कलेजे को अब ठंडक मिली। और कहती है – ‘ मेरे केस में तो उन लोगों का कुछ नहीं हुआ, लेकिन आज हमें खुशी मिली कि ब्रजेश ठाकुर और मधु के पाप का घड़ा फूट गया।’

यह और भी आश्चर्यजनक बात है कि इस “सेवा-संकल्प एवं विकास समिति” जैसे एनजीओ को केवल बिहार सरकार से ही फंडिंग नहीं हो रही थी बल्कि विदेशी संस्था भी ऐड दे रही थी। ऐसा सुना जाता है कि ‘ फॉरेन कॉन्ट्रिब्यूशन रेगुलेशन एक्ट ‘ (FCRA) के तहत भी ब्रजेश ठाकुर ने अपनी संस्था का रजिस्ट्रेशन करा रखा था, जहां से भारी मात्रा में विदेशी धन उसे मिलता रहा।  FCRA के तहत उसी एनजीओ को धन की प्राप्ति होती है जिसके सदस्य न तो राजनीतिज्ञ हो और न ही मीडिया से जुड़ा व्यक्ति हो, जबकि ब्रजेश राजनीतिज्ञ और मीडिया से जुड़ा था ! तब सवाल उठता है कि भारत सरकार के गृह-विभाग की देखरेख में चलने वाले FCRA से ब्रजेश की इस “परिवार-समिति” का निबंधन कैसे हुआ ? जबकि उक्त “सेवा-संकल्प” और उसके अखबार “प्रातः कमल” का जो रजिस्ट्रेशन है उसमें दोनों का पता, फैक्स और मोबाइल नम्बर एक ही है। यहाँ यह प्रश्न उठता है कि उक्त मोबाइल का खर्च किस खाते से होता था– प्रातः कमल के खाते से या सेवा-संकल्प से ? यह तो जांच से पता चलेगा या इस संस्था और अखबार का ऑडिट करने वाले चार्टर्ड अकाउंटेंट ही बता सकते हैं !

सरकार को  बाध्य होकर इस काण्ड को अब सी. बी.आई. के हवाले करना पड़ा है क्योंकि सामने चुनाव आने वाला है। इस कांड में कल्याण मंत्री मंजू वर्मा के पति का नाम आ रहा है। उनके पति का नाम रवि रौशन की पत्नी बार-बार ले रही है कि उनका यहाँ लगातार आना-जाना रहा है। मुजफ्फरपुर दौरे में तेजस्वी यादव ने नगर विकास मंत्री सुरेश शर्मा का भी नाम इस काण्ड से जोड़ दिया है। लेकिन इस ब्रजेश ठाकुर की सत्ता और सरकार में कैसी पहुंच थी उसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि जिस दिन उसपर FIR हो रहा था ठीक उसी समय अनाथ और गरीब पुरुषों के रहने-खाने-देखभाल का एक टेंडर ‘स्टेट सोसायटी फॉर अल्ट्रा पुअर एंड सोशल वेलफेयर’ के मुख्य अधिकारी राज कुमार द्वारा पास किया जा रहा था, जिसे तीन दिनों बाद उसी विभाग के वरिष्ठ अधिकारी कृष्ण कुमार सिन्हा ने ‘अपरिहार्य परिस्थितियों’ के हवाले से रद्द कर दिया। ज्ञात हो कि पाँच बालिका गृह चलाने वाले ब्रजेश ठाकुर को प्रति वर्ष 1 करोड़ का फण्ड सरकार मुहैय्या कराती रही है।

 इस सेवा-संकल्प का चयन, निरीक्षण और रिन्यूअल सब शक के घेरे में है। इसके निरीक्षण का काम जिला निरीक्षण समिति करती है। यह निरीक्षण प्रत्येक तीन माह पर करना आवश्यक है, जिसकी भी घोर अवहेलना की गई है। जबकि इस निरीक्षण समिति के अध्यक्ष होते हैं जिला अधिकारी, बाल संरक्षण इकाई के सहायक निदेशक सचिव, बोर्ड या समिति के सदस्य, मुख्य चिकित्सा पदाधिकारी, शिक्षा विभाग के जिला कार्यक्रम पदाधिकारी, विशेष किशोर पुलिस इकाई का सदस्य, अध्यक्ष द्वारा नामित सदस्य और मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ। तब यह सवाल उठता है कि सरकार के इतने विशेषज्ञों की समिति के होते हुए भी यह घृणित कांड कैसे घटा,  जिसपर देशभर की जनता थू-थू कर रही है ?

स्त्रीकाल का प्रिंट और ऑनलाइन प्रकाशन एक नॉन प्रॉफिट प्रक्रम है. यह ‘द मार्जिनलाइज्ड’ नामक सामाजिक संस्था (सोशायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत रजिस्टर्ड) द्वारा संचालित है. ‘द मार्जिनलाइज्ड’ मूलतः समाज के हाशिये के लिए समर्पित शोध और ट्रेनिंग का कार्य करती है.
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ब्रजेश ठाकुर की बेटी के नाम एक पत्र: क्यों लचर हैं पिता के बचाव के तर्क

संजीव चंदन

निकिता आनंद

कैसी हैं?

जाहिर है आप परेशान होंगी अपने पिता के लिए. आप कम से कम उतनी प्रसन्न तो नहीं होंगी जितना आपके पिता जघन्य यौन-उत्पीड़न मामले के आरोपी होकर भी पुलिस वाले के साथ पेशी के लिए जाते हुए दिख रहे हैं-उस प्रसन्नता की तस्वीर तो आपने देख ली ही होगी न.

पारिवारिक पूजा में हवन करता ब्रजेश ठाकुर

मैं आपकी परेशानी समझ सकता हूँ. इस समाज की परवरिश में रहे हम सबकी यह परेशानी हो सकती है, अपने परिवार के अपराधियों, कुंठितों, बलात्कारियों के बचाव की. ऐसा पहली बार नहीं हुआ है. मैंने आपके जवाबों का वीडियो देखा है, एक रिपोर्ट में भी आपका विस्तृत पक्ष पढ़ा है. बचाव में परिवार की महिलाओं को बहुत बार लाया जाता है-निर्भया काण्ड के आरोपियों के बचाव में भी उसके परिवार की महिलाएं आगे आयी थीं, इंदौर में भाजपा के विधायक की भी और कठुआ काण्ड में भी. आपका मामला पहला नहीं है और आख़िरी भी नहीं.

हाँ, तो आपका मानना है कि आपके पिता को फंसाया जा रहा है. और इसके कई तर्क हैं आपके पास, जिसे मैंने भी देखा, पढ़ा, सूना. उन तर्कों पर सिलसिलेवार बात करते हैं. पहले एक सवाल आपसे कि तीन-तीन अख़बार के मालिक आप अपने पिता को कारोबार करते देख रही हैं. एक अख़बार की आप सम्पादक भी हैं तो आपसे न तो अख़बार का प्रबंधन छिपा होगा न, न उसका सर्कुलेशन, न उसका अर्थ-गणित. इसके अलावा पारिवारिक बिजनस के सक्रिय सदस्य के रूप में यह भी जानती होंगी कि रजिस्टर्ड संस्था में कौन-कौन से कार्यकारिणी में हैं? क्या आपको पता है कि आपके पिता की एक संस्था का सचिव, जो मुख्य पद होता है, कहीं एक्जिस्ट ही नहीं करता. जिस व्यक्ति को सचिव बताया गया है, उसका अता-पता आपके पिता भी नहीं बता पा रहे हैं. इंडियन एक्सप्रेस की एक खबर छपी है, उसमें एक अदृश्य व्यक्ति को सचिव बताया गया है. क्यों नहीं अब आप एक्सप्रेस को उस अदृश्य का पता बता देती हैं? कुछ तो मजबूरी होगी आपके ‘अच्छे पिता’ की एक अदृश्य को सचिव बनाने की. और हाँ, आप विज्ञापनों का गणित भी समझती होंगी न. शहर में न दिखने वाले अख़बार को अफसरों तक पहुंचा कर और बड़ी संख्या में सर्कुलेशन बताकर ही न सरकार से तीन अख़बारों का नियमित विज्ञापन लिया जा सकता है- जिले से लेकर देश की सरकार तक का विज्ञापन. इस तन्त्र पर कभी आपके मन में सवाल उठा था क्या, नहीं न-यही, यही है हमारे-आपके परवरिश से प्राप्त परिवार के प्रति मजबूरी.

पेशी के दौरान ब्रजेश ठाकुर

ज़रा आपके तर्कों पर बात करते हैं:

1. आपका कहना है “क्योंकि, मेरे बाप के पास‌ बहुत पैसा है. अगर उसे शारीरिक संबंध ही बनाना होता और लड़कियों की सप्लाई करनी होती तो यहां की लड़कियां क्यों करता? यहां तो वो लड़कियां थीं, जिन्हें समाज ने भी तज दिया था. कई मानसिक रूप से विक्षिप्त थीं. कुछ लड़कियों की उम्र आठ साल से भी कम थीं. सच बताऊं तो मेरे पिता को मैंने कभी ऊपर जाते देखा ही नहीं है. जहां आप अभी बैठे हैं यहीं बैठते थे. ऊपर जो ग्रिल दिख रहा है वो बालिका गृह के ओसारे का ग्रिल है जहां से बच्चियां नीचे की ओर झांकती रहती थीं. कभी हमसे भी बात कर लेतीं तो कभी पापा से.”

क्या आपका यह सवाल इस मामले से तनिक भी सम्बद्ध है ? आपके पिता से ज्यादा रसूख वाले लोगों पर बलात्कार सिद्ध नहीं हुए हैं! बहुत से बलात्कारी पैसे देकर सेक्स खरीदने की स्थिति में होते हैं, फिर भी बलात्कार करते हैं. लड़कियों की सप्लाई के लिए सहज उपलब्ध लड़कियों से अलग वे क्यों इन्वेस्ट करते भला? सीधा जवाब दे रहा हूँ, कोई भावुक सवाल नहीं कर रहा कि एक बेटी होकर पिता के लिए सेक्स क्रय का रूट आप क्यों देख रही हैं? इस सवाल का अर्थ ही नहीं है, क्योंकि आप यौन-शोषण के आरोपी अपने पिता का बचाव कर रही हैं.


2. “PMCH की मेडिकल जांच रिपोर्ट में क्या लिखा गया है किसी ने पढ़ा  है‌ क्या?  उसमें अंग्रेजी में साफ-साफ लिखा हुआ है, सेक्सुअल कॉन्टैक्ट कैनोट बी रूल्ड आउट. नो रेप फाउंड. नो स्पर्म‌ फाउंड. (Sexual Contact Cannot be ruled out. No rape found. No Sperm found). हिंदी में इसका मतलब क्या होगा कोई मुझे बता सकता है?”

जब आप यह सवाल करती हैं तो यह क्यों नहीं करतीं कि TISS की रिपोर्ट आने के कुछ महीने बाद एफआईआर हुआ. एफआईआर के बाद लड़कियों का तुरत मेडिकल होना था, जिसमें भी कई दिन लग गये. तब तक न डाक्टर स्पर्म ढूंढ सकता है, न देवता. आप क्या सच में इनोसेंटली यह तर्क दे रही हैं या पाठकों,श्रोताओं को उलझाने का एक तर्क है यह. हिन्दी में इसका मतलब भी लोग समझते हैं और अंग्रेजी में भी और उस भाषा में भी जिसका संकेत आपके तर्क में है.

3. आपको पता है, यहां आने वालीं मैक्सिमम लड़कियां कहां से आती हैं? या तो उनके ऊपर पहले से जुर्म हुआ रहता है या फिर वे मानसिक रूप से विक्षिप्त रहती है. उन‌ बच्चियों का रेप और उनपर जुल्म अगर यहां आने से पहले हुआ होगा तो क्या मेडिकल रिपोर्ट में ये बात नहीं आएगी. इस बात की गारंटी कौन देगा.

क्या यह सारी लड़कियों का सच है, क्या उन नाबालिगों का भी, जो काफी कम उम्र की हैं. 34 बच्चियों के साथ पुष्टि हुई शोषण की. और हाँ आपके ‘अच्छे पिता’ ने गायब छः बच्चियों के बारे कभी पुलिस को कोई सूचना क्यों नहीं दी? कभी यह सवाल उठा आपके मन में?

महिला आयोग की अध्यक्षा दिलमणि मिश्र विवादित शेल्टर होम में



4. हमारे घर पर सब रहते हैं. मम्मी, पापा, भाई, भौजाई, मैं और बच्चों के अलावा दूसरे स्टाफ भी. यदि यह सब इतने दिनों से चल रहा था तो क्या हम लोगों को जरा भी इसकी भनक नहीं लगती. हमें छोड़िए क्या हमारे स्टाफ्स को भी नहीं लगती!

मैं खुद भी एक बच्ची की मां हूं. मैं अपने पिता का साथ कभी नहीं देती. क्या आपको लगता है कि एक पत्नी जो यहीं अपने पति के साथ रह रही हो, उसको इन सब चीजों के बारे में मालूम नहीं चलता. और अगर चल जाता तो क्या एक पत्नी कभी यह बर्दाश्त कर सकती है कि उसका पति किसी दूसरे के साथ शारीरिक संबंध बनाए. क्या इसकी इजाजत वो दे सकती है?




मेरे भाई की हाल ही में शादी हुई है. बहु भी यहीं रहती है. वो तो नई लड़की थी हमलोगों के लिए. जिस घर में ये सब हो रहा हो, उस घर में रहना वह कैसे पसंद कर सकती है.

क्या आपको नहीं पता कि भरे -पूरे परिवार के बीच महिलाओं का यौन-शोषण होता है. कई ऐसे मामले आये हैं-करीबी रिश्तेदारों द्वारा शोषण के. पीडिता किसी को बता नहीं पाती है. और न ही पूरे परिवार को पता चल पाता है? आप यह जवाब देते हुए अपने पिता की तस्वीर पेश कर रही हैं, पूरे परिवार के साथ पूजा करते हुए-क्या आप कोई मनोवैज्ञानिक प्रभाव डालना चाहती हैं? क्या आशाराम से लेकर कई संतों की कथाएं काफी बाद सामने आयीं, उनकी ऐसी हजारो तस्वीरें नहीं पेश की जा सकती हैं?


5. “आप लड़कियों के मजिस्ट्रेट के सामने धारा 164 के अंतर्गत दिए गए बयान देखें. सारे बयानों में सिमिलारिटी ही नजर आएगी. पांच साल की बच्ची भी वही बयान दे रही है, जो अठारह साल की बच्ची दे रही है. ऐसा कैसे संभव है? क्या ऐसा नहीं लगता कि कोई उनका ट्यूटर रहा हो? उनसे बुलवाया गया हो. महिला आयोग की अध्यक्षा दिलमणि मिश्रा नवंबर 2017 में आईं थीं यहां. निरीक्षण के बाद यहां के स्टाफ की पीठ थपाथपा कर गई थीं. निरीक्षण के बाद के रिमार्क्स यहां की रजिस्टर में दर्ज किया था उन्होंने.


महिला आयोग की ही एक और सदस्या उषा विद्यार्थी जी भी आईं थीं दिसबंर 2017 में. उन्होंने भी जांच के बाद अपने रिमार्क्स दर्ज किए थे.  पुलिस ने उसको अब सीज कर लिया है.”


अब यहां सवाल ये है कि, क्या दिलमणि मिश्रा और आयोग के अन्य सदस्यों को यहां तब अनियमितताएं नहीं दिखी थीं. जब पिछले साल उन्होंने आकर निरीक्षण  किया था और बच्चियों से बात की थी. क्या तब बच्चियों ने उनको कुछ भी नहीं बताया था?


सवाल इसलिए भी लाजिमी है कि आज उन्हीं दिलमणि मिश्रा के हवाले से अखबारों में खबरें छपी हैं कि बच्चियों ने अपनी पीड़ा की कहानी सुनाई तो उनकी रूह कांप गईं.

आप एक कांस्पीरेसी थेयरी रख रही हैं. इस जवाब का सच है कि आपके पिता रसूख वाले थे और सरकारी अफसरों का आपके पिता के कुकर्म में भागीदारी के प्रसंग सामने आये हैं और कुछ अंदाज से भी समझा जा सकता है. पीडिताओं के पक्ष से यदि आप यह सब देखेंगी तो इसे नेक्सस की तरह देख सकेंगी और मामला सामने आने पर भागीदारों को खुद को बचाने की कवायद के तौर पर. रही बात लड़कियों का पहले किसी अधिकारी से आपबीती नहीं बताने की. तो ऐसा होता है. खौफ के कारण होता है. मेरा खुद का फील्ड रिपोर्टिंग के दौरान ऐसा अनुभव रहा है. दो साल पहले आपके ही राज्य के एक संस्थान में मैं गया था.वहां पढने वाली लड़कियों ने मुझे कुछ नहीं बताया. दो-तीन महीने पहले जब वहां एक यौन-शोषण का मामला आया. तो कई लड़कियों ने मुंह खोला.



मेरे पास कुछ तस्वीरें हैं. मैं आपको वो दिखाती हूं. बकौल निकिता ये तस्वीर उस दिन (31 मई) की है, जिस दिन सभी बच्चियों को यहां से शिफ्ट किया जा रहा था.यहां के जिन स्टाफ्स को अब जेल में डाल दिया गया है, बच्चियां उनसे लिपट कर रो रही हैं. केवल एक बच्ची नहीं. इन तस्वीरों में ढ़ेर सारी ऐसी बच्चियां दिख जाएंगी आपको. 164 के बयान के आधार पर मीडिया में आई खबरों में जिन जुल्मों और यातनाओं का जिक्र किया गया है, उतना सहने के बाद भी कोई बच्ची बिछड़ने के गम में ऐसे रोएगी?  आप देखिए और बताइए कि मीडिया में बच्चियों के 164 के बयानों के आधार पर जो खबरें छपी हैं, क्या उनपर यकीन करना संभव है?

एक खौफ और एक अनिश्चितता से दूसरी अनिश्चितता की ओर जाने में और अचानक से घट रही घटनाओं के खौफ में ऐसा क्यों नहीं हो सकता है? और हाँ, आपके ‘अच्छे पिता’ के साथ साजिश कौन कर रहा है? क्या स्टेट मशीनरी, जिसके लोग खुद ही इस मामले में शामिल बताये जा रहे हैं, आरोपी बनाये जा रहे हैं! 164 के बयान के लिए प्रशिक्षण किसने और क्यों दिया?

और आख़िरी बात कि एक आरोप आपके पिता पर यह भी है कि एक दलित और ओबीसी युगल की शादी को एक वेश्या के उद्धार की तरह पेश करवाते हुए उन्होंने श्रेय लिया, खबर छपी. पीड़ित पक्ष ने ऍफ़आईआर किया. आपके रसूखदार अच्छे पिता का कुछ नहीं बिगड़ा. आपने कभी सवाल किया कि इसमें आपके पिता की कौन सी समाजसेवी प्रवृत्ति काम कर रही थी!

निकिता जी, होता है यह. आप पहली बेटी नहीं हैं, जो पिता के बचाव में इस तरह आयी हैं-यह हमसब के परिवेश का ही हिस्सा है. ऐसा कई बार हुआ है-बचाव में परिवार की महिलाएं उतरी हैं. वैसे अपने पिता के हथकड़ी में जाते हुए आत्मविश्वास से भरे मुसकान वाली तस्वीर को भी डिकोड करियेगा, जैसे अप और तस्वीरों को डिकोड के लिए पेश कर रही हैं. सोचियेगा गलत ढंग से इतने जघन्य आरोप में फंसाया जा रहा व्यक्ति क्या इसी मनोभाव में होता है!

 तस्वीरें और बयान के हिस्से www.dpillar.com से साभार 

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बच्चों के यौन उत्पीड़न मामले को दबाने, साक्ष्यों को नष्ट करने की बहुत कोशिश हुई: एडवोकेट अलका वर्मा

मुजफ्फरपुर बिहार के शेल्टर होम में बच्चियों के साथ हुए अमानवीय, बर्बरतापूर्ण यौन-शोषण की घटना और केस से जुड़े सामाजिक, न्यायिक और राजनीतिक पहलुओं पर खुलकर अपनी बात रखी है पटना हाई कोर्ट की वकील व न्यायिक कार्यकर्ता (ज्यूडिशियल एक्टीविस्ट) अलका वर्मा ने. इसकी सीबीआई जांच और जांच का दायरा बढ़ाने की मांग के साथ उन्होंने पीआईएल भी की है. उनसे स्त्रीकाल के लिए  बातचीत की स्वतंत्र पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता सुशील मानव ने.

अलका वर्मा (बायें से पहली) अपने साथी वकीलों के साथ





सबसे पहले तो हमें अपना कुछ परिचय दीजिये कि आप करती क्या हैं और आपके संगठन का क्या नाम है और ये किस तरह का काम करता है।
मेरी कोई संस्था नहीं है। मैं एक एडवोकेट हूँ पटना हाईकोर्ट में प्रैक्टिस करती हूँ समाजिक सरोकार से जुड़े जो मुद्दे होते हैं उन्हें उठाती रहती हूँ। मैं किसी संस्था से ऐसे तो जुड़ी हुई नहीं हूँ लेकिन जो संस्थाएं सामाजिक सराकारों से जुड़ी हुई हैं उनके लिए मैं लीगल एडवाइजर के तौर पर सेवा देती रहती हूँ।

बतौर लीगल एडवाइजर आप कौन-कौन सी संस्थाओं से जुड़ी हुई हैं।
अनऑर्गेनाइज्ड बिहार डोमेस्टिक वर्कर्स वेलफेयर, एनसीबीएचआर, ऑल इंडिया दलित मुस्लिम युवा मोर्चा आदि । आई एम ओपेन फॉर ऑल, किसी को भी अपने ऑर्गेनाइजेशन के लिए मेरी कानूनी सलाह चाहिए तो मैं उन लोगो को देती हूँ।जैसे कि बिहार डोमेस्टिक वर्कर्स के लिए बिहार अनआर्गेनाज्ड वर्कर्स सोशल सिक्योरिटी एक्ट 2008 को राज्य में लागू करवाया,  जिसे सेंटर ने इंप्लीमेंट किया था, लेकिन स्टेट ने इंप्लीमेंट नहीं किया था. मैंने पीआईएल फाइल करके उसको इंप्लीमेंट करवाया, बिहार में उसके बोर्ड एंड रूल बनवाये। मैंने एनसीबीएचआर  आदि संस्था, बेसिकली मुद्दों के  समर्पित संस्थाओं   के साथ रह कर ‘प्रॉपर इंप्लीमेंटेशन ऑफ एक्ट’ के लिए काम किया। पीआईएल फाइल की। प्रिजनर्स फर्म में कंसल्टेंट थी तो प्रिजनर्स के लिए बहुत काम किया। कंडीशंस ऑफ प्रिजनर्स, चाइल्ड मैरिज के लिए काम किया। पटना हाईकोर्ट में दो रिटेनर लॉयर हैं, उनमें से एक मैं हूँ। उसमें भी हम लोग मुफ्त कानूनी सलाह देते हैं। मुफ्त में वकील देते हैं।

मुजफ्फरपुर पीआईएल जो डाली है आपने कुछ उसके बारे में बताइए। आपको ऐसा क्यों लगा कि इसमें पीआईएल डालनी चाहिए।या आपने पीआईएल दाखिल की तो इसका कुछ विरोध हुआ क्या?
कोई भी सेंसिटिव सिटीजन होगा तो उसकी अंतरात्मा छटपटाएगी कि 7-13  साल की मासूम बच्चियाँ हैं, उनके साथ में ऐसी घटना घट रही है. टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंस के कुछ लोग हैं यहाँ पर, वे मेरे टच में रहते हैं, तो उन्होंने मुझे फर्स्ट हैंड एकाउंट दिया वहाँ का। और फिर मुझे वहाँ का फर्स्ट हैंड एकाउंट बहुत जगह से मिला। फिर मैंने महसूस किया कि इसमें और कुछ हो जाए उससे पहले मैं पीआईएल फाइल करती हूँ। तो मेरे जूनियर हैं नवनीत उनको मैंने पिटीशनर बनाया और मैं वकील रही।और हम लोगो ने इसे सीबीआई इंक्वायरी के लिए फाइल किया। इस मामले की पहली सुनवाई हो चुकी थी,  6 अगस्त को दूसरी थी. लेकिन मैंने सोचा गर इसको इतना मेंशन करके नहीं करूँगी तो कहीं मेरे इवीडेंस हैं, जितने विटनेसेस हैं वो गायब हो जाएंगे। हालाँकि 6 अगस्त को तारीख मिली थी पर उससे पहले ही मैंने मेंशन किया और जब हेडलाइन हुआ कि आज हाईकोर्ट में सुनवाई है सीबीआई वाले मामले की तो, और बाकी जनता और एक्टीविस्ट लोग भी तो प्रेशर बनाए हुए थे, तो, दैट टाइम गवर्नमेंट बकल डाउन यू नो। और साढ़े दस बजे कोर्ट बैठती, हमारा केस पहली ही सुनवाई में था, उससे पाँच मिनट पहले ही कोर्ट में रहने वाले उनके पत्रकारों ने मुझे बताया कि मैडम सीबीआई इन्क्वायरी की अनुशंसा हो गई है। सो इट्स वेल एंड गुड यू नो। अब हमारी कोशिश है कि हाईकोर्ट की निगरानी में जाँच हो। अभी 6 तारीख को हमारा ये मामला फिर सुना जायेगा। सीबीआई इन्क्वायरी का आर्डर हुआ है पर हमारा प्रयत्न ये है कि तमाम शेल्टर होम जो हमारे यहाँ हैं, अक्रास द बिहार शेल्टर होम की जाँच हो। क्योंकि आपने देखा होगा कि अलग-अलग जगह से भी मोतीहारी,भागलपुर, मुंगेर, गया अररिया, अलग जगह से इश्यूज आ रहे हैं। 15 शेल्टर होम को चिन्हित किया हुआ है।एक मुजफ्फरपुर हो गया तो बाकी सब भी मुजफ्फरपुर न बन जाएँ। इट्स ऑलरेडी हैपनिंग। मुजफ्फरपुर में उजागर हो गया बाकी सब में अभी उजागर नहीं हो रहा है। और क्या-क्या घटनाएं घट गई होगीं, एक विजिलेंट सिटीजन के नाते ये हमारा कर्तव्य है कि जब भी हम ऐसा देखते हैं कुछ गलत हो रहा है, और आप सक्षम हैं तो किसी भी फोरम से आप उसको उठाइए और उन्हें न्याय दिलाइए।



बिहार मीडिया की क्या प्रतिक्रिया है, आपको कितना तवज्जो दे रही है इस केस को लेकर।
शुरु में तो बिहार मीडिया बहुत शांत रहा इस मामले में और जो प्रोटेस्ट सडकों पर हुआ मुजफ्फरपुर को लेकर बिहार मीडिया द्वारा उसे अनदेखा कर दिया गया। मैंने देखा कि बहुत सारे संगठनों ने मिलकर प्रोटेस्ट किया तो उसको भी कवरेज नहीं दिया गया। वह तो सोशल मीडिया से हम लोगो को मालूम हो जाता है। सोशल मीडिया हैज बीन रिवोल्यूशनरी थिंग, यू नो अदरवाइज प्रिंट मीडिया पर निर्भर रहते तो आज तक मुजफ्फकपुर के बारे में आम जनता को पता ही नहीं होता। क्योंकि इसको बहुत ही दबाने की कोशिश हुई है मुजफ्फरपुर इंसीडेंट को प्रिंट मीडिया द्वारा। लेकिन बाद में तो फिर इतना प्रेशर बन गया कि प्रिंट मीडिया भी कुछ दिनों बाद खबरें निकालने लग गई। जो भी पेपर्स हैं उन्होंने बहुत अच्छे से फॉलोअप किया है बाद में। किसी मुद्दे को लेकर पेपर सक्रिय रहते हैं कुछ पेपर निष्क्रिय रहते हैं। मीडिया का तो बहुत ही अफरमेटिव रोल है हमारी सोसायटी में। आज से तीस साल पहले जो मीडिया में नैतिकता थी, मीडिया हाउसेसे के बढ़ने से उसमें कमी आई है। पर कुछ हैं जो अपने इथिक्स और नार्म्स को फॉलो कर रहे हैं। कहते हैं यह चौथा स्तम्भ है तो समाज के प्रति इसकी अकाउंटिबिलिटी ज्यादा है। तो इन्हें ये समझना होगा। ऐसा न हो कि लोग टीवी देखना छोड़ दिया, तो पेपेर पढ़ना भी छोड़कर सोशल मीडिया पर ही निर्भर हो जाएं। सो इट्स रिस्पांसिबिलिटी ऑफ होल मीडिया। प्रिंट मीडिया की तो गाँव गाँव घर-घर में पहुँच होती है, तो ये जिम्मेदारी बनती है कि वह सारी ख़बरें ईमानदारी के साथ रखे।


बिहार से बहुत सारे साहित्यकार और बुद्धिजीवी, रंगकर्मी ताल्लुक रखते हैं। पर वे भी चुप्पी ओढ़े हुए हैं। फेसबुक या दूसरे सोशल साइट पर भी उनके द्वारा बहुत कुछ नहीं लिखा कहा गया है।
पता है क्या हुआ है वास्तव में, पहले घटनाएं घटती थीं पर सामने नहीं आती थीं, अब कहीं-कहीं सामने आ रही हैं। लोग बहुत इनसेंसिटिव होते जा रहे हैं प्रतिक्रिया देने में। सीबीआई जांचके लिए जब मैंने पीआईएल किया तो सबने यही सोचा कि मैं सरकार के विरुद्ध में जाकर काम कर रही हूँ। मैंने पीआईएल किया है मुझे इससे मतलब नहीं है कि ये सरकार के पक्ष में है या विपक्ष में । मैं न्याय के पक्ष में खड़ी हूँ ये किसी के पक्ष में जाये, या विपक्ष में इससे मुझे मतलब नहीं है। एडवोकेट जनरल जो हैं, वे भी नाराज होने लगे-सबने कहा कि अब तो तुम्हारा सरकारी पैनल में आना मुश्किल है। मैंने भी कहा (हँसते हुए) रहने दीजिए आए नहीं आएं क्या फर्क पड़ता है। मेरे जीवन का ध्येय है न्याय के लिए लड़ना, उस ध्येय के साथ मुझे कुछ मिलता है तो ठीक है अडरवाइज आई रियली डोंट केयर। इससे पहले भी मैंने जो पीआईएल फाइल की है और करती रहती हूं तो लोग कहते है कि सरकार के विरुद्ध  है। जो भी घटना घट रही है और गलत हो रही है तो सरकार तो कहीं न कहीं से उसमें इनवाल्व रहती ही है ना। यह जिम्मेवारी भी तो सरकार की ही है ना।

स केस में अब नितीश सरकार में भाजपा मंत्री मंजू वर्मा के पति चंद्रेश्वर वर्मा का नाम आया है इसमें और नेता मंत्री विधायक संलिप्त मिल सकते हैं। स्थानीय लोग आगे इस केस में और कई सफेदपोशों के नाम उजागर होने की संभावना जता रहे हैं। जाहिर है ये केस आगे खुलेगा तो कहीं न कहीं उन लोगो की भी गर्दन पकड़ी जायेगी । इस केस में और भी कई चौंकाने वाले लोगों के नाम का खुलासा हो सकता है, जो सत्ता या सत्ता के सहयोगी दल से ताल्लुक रखते हैं।  
देखिए कहते हैं न कि दे आर नाट गिल्टी अन टू प्रूवेन यही बात है। लेकिन जब बात आ  रही है तो तहकीकात तो होनी चाहिए। मैं आपको बात दूँ कि मैं कास्ट और क्लास की बात नहीं करती हमेशा ह्युमन बींग की तरह बात करती हूँ, लेकिन मुझे कुछ लोगो ने बोला कि मैडम हमें मालूम है कि मंजू देवी आप ही की कास्ट की हैं। तो मैंने बोला कि देखिए इससे मेरा सीबीआई जांच कभी हैंपर नहीं होने वाला है। कास्ट का क्या है इसमें मेरे अपने रिश्तेदारा होंगे तब भी नहीं। यह न्याय की बात है। मेरा ध्येय मेरा लक्ष्य सिर्फ जस्टिस है। यही निर्धारित करता है कि मुझे क्या करना है। छोटी छोटी बच्चियाँ, जिनका कोई नहीं है उनके लिए हममें से किसी न किसी को तो आना ही था। इसलिए मैं लड़ी। मैं हमेशा ऐसे लोगों की लड़ाई लडना चाहती हूँ और मैं सबसे कहती भी रहती हूँ कि ऐसे मुद्दे हो तो प्लीज लाइए, मुझे बताइए। जब महिलाएं बहुत सारे मुद्दे लेकर सड़क पर उतरती हैं तो भी मैं उनको कहती हूँ चाहे काट्रैंक्चुअल हों, चाहे आशा वर्कर्स हों, चाहे रसोइयाँ हो, मैं कहती हूँ आप अपना मेमोरेंडम ले आइए मैं आपको कोर्ट से दिलवाती हूँ। तो हम कोर्ट से बहुत सारी चीजे करवा सकते हैं। सड़क पर विद्रोह करना तो एक बहुत अच्छी चीज है कि लोगो को प्रेशराइज करना । लेकिन मैं चाहती हूं कि लोग आएं और मुझसे बोले कि मैं अपने स्तर पर भी भरसक प्रयास करती रहती हूँ।लेकिन मैं चाहती हूँ कि लोग मुझसे जुड़ें । कोर्ट एक पॉवर है, एक शस्त्र है इसका उपयोग होना चाहिए।

न्यायिक लड़ाई के जरिए आप समाज को लेकर आगे बढ़ती हैं जैसा कि ये आपका पेशा भी है। आप जुडिशियरी से ताल्लुक़ भी रखती हैं तो अच्छी तरह समझती हैं, लेकिन इधर विगत कई सालों में न्यायपालिका की छवि धूमिल हुई है, उसकी गरिमा का हनन हुआ है, लोगो का भरोसा कहीं न कहीं न्यायपालिका से कम हुआ है। फिर चाहे वह  सुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्ठतम जजों का प्रेस कान्फ्रेंस करना रहा हो या फिर जज लोया का केस या फिर हाशिमपुरा या फिर बिहार के तमाम जातीय जन संहारों के जो फैंसले आए हैं उनमें कोई दोषी नहीं पाया गया, किसी को सजा नहीं हुई तो न्याय पालिका की खुद की विश्वसनीयता भी कहीं न कहीं कठघरे में खड़ी होती है।

सीबीआई वाले जाँच का जो जिरह करना था उसमें कोर्ट का कहना था कि आप सीबीआई को क्यों केस सौंपना चाहती हैं, क्यों नहीं चाहती कि सरकार करे, बिहार का जो प्रशासन है वह करे। तो मेरा कहना है कि इनवेस्टीगेशन ही मुख्य है। इनवेस्टीगेशन अगर गड़बड़ हो गयी तो न्यायपालिका चाहकर भी आपको न्याय नहीं दे पाएगी। कोर्ट में मेरा प्वाइंट ही यही था कि बाथे-बथानी में इतने लोगो का जनसंहार हुआ लेकिन किसी का कनविक्शन नहीं हुआ। तो हम सब तो न्यायपालिका पर ही उँगली उठाते हैं कि आपने न्याय नहीं किया। पर इन्वेस्टीगेशन गलत होगा तो तथ्यों को कमजोर करेगा। और जब जिरह होगी तो सब चीज कमजोर होते-होते न्याय जिसको मिलना चाहिए उसे न मिलकर दूसरे को मिल जाएगा।  कोर्ट में मेरा प्वाइंट ही यही था कि बाथे-बथाने में गर किसी की कन्विक्शन नहीं हुआ तो मतलब कि इन्वेस्टीगेशन प्रॉपर नहीं हुआ था। और यही बात यहाँ पर हो रहा है इस केस में। अगर इन्वेस्टीगेशन सीबीआई को नहीं सौंपा तो एक दिन बृजेश ठाकुर खुले में घूमता चलेगा। और कहेगा कि देखा हमारा कुछ नहीं हुआ। क्योंकि एक महीना हो गया रिपोर्ट सबमिट हुए लेकिन एक महीने के बाद हम एफआईआर दर्ज करते हैं। मतलब एक महीने में उनको साक्ष्य गायब करने का मौका मिल गया। तो देर हुई। सोशल जस्टिस डिपार्टमेंट के सेक्रेटरी से जब देर का कारण जब पूछा गया तो वे कहतें है कि हम मंत्रणा कर रहे थे अपने न्यायिक सलाहकारों से कि क्या होना चाहिए।दिस इज वेरी शेमफुल एंड डिसग्रेसफुल ऑन्सर। क्योंकि यदि आपको लीगल इशूज पर मंत्रणा करनी है तो लीगल ल्युमिनरी हैं हाइकोर्ट में। आपके एडवोकेट जनरल हैं, उनसे बात करते। एक महीना देर कर देना एफआईआर करने में और फिर एफआईआर होने के बाद दो महीने तक आप बृजेश ठाकुर को रिमांड पर नहीं ले रहे हैं। ये सब चीजें हैं। किसी लड़की के साथ में जब पॉक्सों एक्ट लगा हुआ है तो आपको 72 घंटे के अंदर में मेडिकल जाँच करनी हैं। आपने इसमें भी एक महीने एफआईआर करने में,  औरचार सप्ताह यहाँ पर देर कर दी । हरप्रीत कौर, जो एसएसपी है, वह अपने हाथ खड़े कर रही थी, उनसे नहीं हो पा रहा था, वह कह रही थी कि अब मुझे सीआईडी की मदद लेनी पड़ेगी।तो  जब वह कह रही हैं कि मुझे मदद चाहिए, जब वह इंगित कर रही हैं कि मेडिकल इक्जामिनेशन लडकियों का गलत तरीके से हुआ है डॉक्टर के बजाय नर्सों ने किया है। वह मदद माँग रही हैं सीआईडी से और सेंटर मदद दे भी रहा है लेकिन स्टेट मना कर रहा है, समझ जाइए कि दाल में कुछ काला है। वह तो एक्टीविस्ट हैं, जिन्होंने सड़क पर निकलकर हंगामा किया, अलग-अलग पार्टी ने सदन में हंगामा किया सीबीआई की मांग की, हाईकोर्ट सुनवाई पर राजी हुई तो वह इस प्रेशर से बकलडाउन हो करके मान गए वर्ना तो हम हंड्रेड परसेंट स्योर थे कि हाईकोर्ट से सीबीआई जाँच का ऑर्डर लेके रहेंगें। और हाईकोर्ट से सीबीआई जाँच का ऑर्डर हो भी जाता। लेकिन फिर सरकार के पास जनता को दिखानेवाला मुँह नहीँ रहता जल लोग कहते कि हाईकोर्ट ने सीबीआई जाँच का ऑर्डर दिया है सरकार को इन्होंने अपने मन से तो नहीं किया। सब कुछ सोच विचारकर फिर उन्होंने खुद ही अनुशंसा कर दी।



पर खुद सीबीआई की साख भी सवालों के गहरे में है। कठुआ मामले में आम लोगो का भरोसा स्टेट इनवेस्टीगेशन टीम की जाँच के साथ था, जबकि आरोपियों को बचाने के लिए केंद्र की सत्ताधारी दल के लोग सीबीआई इनक्वायरी थोप रहे थे।
जस्टिस लोया वाले मामले में कितना मैशअप हुआ है जानते ही हैं। लेकिन हम गर सीबीआई इनक्वायरी के लिए कह रहे हैं तो हमारे पास कोई और चारा ही नहीं है। सीबीआई इवन्क्वायरी का इधर के वर्षों में ट्रेंड देखें तो वे बहुत सारे मैटर पर किसी नतीजे पर पहुँच ही नहीं पाए हैं। सारे ही आधे-अधूरे करके छोड़ दिए हैं। वो इधर किसी मुकाम पर नहीं पहुँच रहे हैं। तो सीबीआई की साख भी अब वो नहीं रही है लेकिन फिर हमारे पास और कोई विकल्प भी नहीं हैं। लेकिन फिर भी हमें सीबीआई से कुछ निष्पक्षता की उम्मीद है, जबकि सीआईडी भी स्टेटफंक्शनरी या उसके अधीन है तो वो भी स्टेट का हथकंडा बनेगी ही। पर हाँ सीबीआई को गर सेंट्रल गाइड करेगी तो वो अपने पक्ष के लोगो को बचाएगी। तो यही समय है जब सिविल सोसायटी की रिस्पांसबिलिटी बढ़ जाती है उन्हें ऑनेस्ट होना पड़ेगा। तो मेरे पीआईएल में ये भी दर्ख्वास्त है कि शेल्टर होम को मॉनीटर करने के लिए एक एक मॉनीटरिंग समिति होनी चाहिए जिसमें सिविल सोसायटी के सदस्य, जैसे कि डॉक्टर पत्रकार, सायकोट्रिस्ट, लॉयर, एडमिनिस्ट्रेशन, एकैडमेशन और जूडिशियल एकेडमी के लोग को शामिल करके इनकी एक टीम होनी चाहिए। जो कभी भी जाकर औचक निरीक्षण करे। सबकुछ फ्री एंड फेयर होना चाहिए। आप इतना बंद बंद करके रखते हैं और हर महीने जूडिशियल एकेड़मी के लोग जाकर मुआयना करते हैं और सब लीपापोती करके आ जाते हैं। किसी को पता भी नहीं चलता।

स्त्रीकाल का प्रिंट और ऑनलाइन प्रकाशन एक नॉन प्रॉफिट प्रक्रम है. यह ‘द मार्जिनलाइज्ड’ नामक सामाजिक संस्था (सोशायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत रजिस्टर्ड) द्वारा संचालित है. ‘द मार्जिनलाइज्ड’ मूलतः समाज के हाशिये के लिए समर्पित शोध और ट्रेनिंग का कार्य करती है.
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‘सनातन’ कहाँ खड़ा है मुजफ्फरपुर में: हमेशा की तरह न्याय का उसका पक्ष मर्दवादी है, स्त्रियों के खिलाफ



प्रेमप्रकाश 

कर्ण रहे होंगे अप्रतिम, लेकिन हमारा सनातन तो अर्जुन के साथ ही खड़ा है-– पिछले दिनों अपनी ही किसी पोस्ट पर अपने ही एक अनन्य मित्र की यह टिप्पणी पढकर हम सोच मे पड़ गये। तत्काल उनकी बात का उत्तर तो वहीं दे दिया लेकिन अभी भी लगता है कि समाधान नही हुआ। न उनका, न मेरा और न सनातन का। आज की इस पोस्ट के लिए अपने उसी उत्तर का एक सिरा पकड़ रहा हूँ।
सनातन के साथ होने का दावा करता संगठन बजरंग दल वैलेंटाइन डे के विरोध में

मै सोचता रहा कि हमारा सनातन बात तो करता है न्याय के साथ खड़े होने की, धर्म के साथ खड़े होने की, सत्य के साथ खड़े होने की और वंचित के साथ खड़े होने कि फिर वह खड़ा अर्जुन के साथ क्यो होता है? अर्जुन पीड़ा का नाम तो नही है और कम से कम कर्ण के सामने तो न्याय का नाम भी नही है अर्जुन। सनातन कर्ण को पैदा तो करता है पर कर्ण की कीमत पर भी खड़ा अर्जुन के साथ ही होता है। सही तो कह रहे थे मेरे मित्र।

सनातन माने आधुनिक संदर्भों मे कोई धर्म विशेष नही, सनातन माने देश की मूल चिन्तन धारा। सनातन माने भारत का राष्ट्रीय आचरण। सनातन माने वृहत्तर समाज का सहज स्वभाव। सनातन माने गुणधर्म के आधार पर सही गलत, उचित अनुचित का निर्णय। सनातन माने नैतिकता का तराजू और सनातन माने अपने मानदंडों पर मूल्यों की तौल। अब इन सूचकांकों पर अपना इतिहास तौलकर देखिये तो सनातन कब कहाँ किसके पक्ष मे खड़ा रहा है।सनातन कर्ण के साथ ही नही, एकलव्य के साथ भी खड़ा नही होता। सनातन द्रोण के साथ खड़ा होता है, जबकि वह अपराधी है लेकिन सत्ता के हाथ उसके सिर पर है। सनातन अर्जुन के साथ खड़ा होता है, जबकि उसका पराक्रम सत्तापोषित है। सनातन सुग्रीव और विभीषण के साथ खड़ा होता है, जबकि वे राज्य के भगौड़े और देशद्रोही है लेकिन प्रभुवर्ग के साथ है।

सनातन आज मुजफ्फरपुर मे कहाँ किसके साथ खड़ा है, निरीक्षण भाव से देखने की चीज है। सनातन जहाँ भी खड़ा है, या तो सेलेक्टिव सोच के साथ खड़ा है या फिर तटस्थ है। अनाथ को शरण देना सनातन का मूल्य रहा है। शरणार्थी के प्रति अतिथि और सेवाभाव सनातन के आग्रही नियम रहे है। सनातन संस्कार बच्चों की सूरत मे ईश्वर की मूरत के दर्शन करते है। ये बातें सनातन पुस्तकों मे लिखी हुई है। सनातन चिन्तकों का दर्शन ही इन्ही मूल्यों, परंपराओं और नियमों पर खड़ा बताया जाता है। लेकिन लिखे जाने और किये जाने के बीच जो अंतर है, मुजफ्फरपुर उसकी नायाब तस्वीर है। नाम मालूम है न आपको उस एनजीओ का ? सेवा, संकल्प और विकास समिति नाम है उसका। उसके अपने बाईलाज भी होंगे, जिसमे लिखित रूप से शपथ ली गयी होगी कि यह समिति समाज के अनाथ बच्चों की सेवा, शिक्षा और स्थायित्व के लिए संकल्पित है।उन कागजों पर इस संकल्प को प्रमाणित करती सरकारी मुहरे भी लगी होंगी।ये मुहरे हमारी चुनी हुई सरकारों की तरफ से लगायी जाती है। यानी ये कि हमने ही, यानी समाज ने ही उस समिति को उन बच्चों की जिम्मेदारी दे रखी थी, जिसके संचालन के लिए उन कागजों के पीछे एक सनातनी खड़ा था।

मुजफ्फरपुर की घटना का विरोध करती महिलायें

हमारा सनातन मुजफ्फरपुर मे कहाँ खड़ा है ? बड़े शांत भाव से, पूरी तटस्थता से सनातन अपने सनातनी के पीछे खड़ा है।सनातन यह बात समझता है कि उन बच्चों की सूरत मे ईश्वर जरूर है लेकिन स्त्री की देह में है। और अगर स्त्री की देह मे ईश्वर भी है तो सनातनी पुरुष की जाँघो मे दबोचने के लिए ही है। सनातन का स्टैंड एकदम क्लियर है। सनातन की प्रज्ञा पर कोई सवाल खड़ा नही होता। अगर वह मुजफ्फरपुर मे है तो सात से पंद्रह साल की अनाथ लड़कियों को नोचते, खसोटते, मारते, पीटते, घसीटते, भोगते अपने श्रेष्ठि सनातनियो की सुरक्षा मे खड़ा है और अगर वह हरियाणा मे है तो अपने उन्ही श्रेष्ठि सनातनियो के लिए एक सगर्भा बकरी की योनि मे रास्ता बनाता खड़ा है। सचमुच याद रखने लायक वाक्य है कि हमारा सनातन धोखे और छल से नौ वर्ष की बालिका कुन्ती को गर्भवती करने के समर्थन मे खड़ा होता है। एक निर्दोष और निष्काम बच्ची के गर्भ से पैदा होने वाले कर्ण को पालने के समर्थन मे खड़ा नही होता। हमारा सनातन उस विप्लवी पुरुष के पराक्रम के साथ भी खड़ा नही होता है। सनातन वहाँ खड़ा होता है, जहाँ अर्जुन है, जहाँ राज्य की संभावना है, जहाँ सत्ता का सुख है।

चिरन्तन से अधुनातन तक सनातन की यही भूमिका ही है। उसके नियमो की किताबें मोटी होती जाती है।उपदेशों के अध्याय बढते ही जाते है। उसकी कलम की स्याही कभी नही सूखती। सूखता जा रहा है लेकिन सनातन की  आँखो का पानी, सूखता जा रहा है करुणा का सोता, तृष्णा नही मरती, मर रहा है स्वयं सनातन।

फिल्म पद्मावत का विरोध

इस मरने को आप रोक नही सकते लेकिन इस मरने के खिलाफ खड़े हो सकते है। इस मरण के खिलाफ जीवन की पुकार जरूरी है। इस मरण के खिलाफ जीवन का उद्गार जरूरी है। अगर इस मरण की परंपरा के खिलाफ खड़े नही हुए तो कल को कही खड़ा होने लायक नही रहेगा सनातन। ध्यान से देखिये। देखिये कि मुजफ्फरपुर का विस्तार हो रहा है। मुजफ्फरपुर केवल झांकी है। सनातन मूल्यों के नाम पर कहीं कुछ नही बाकी है। मुजफ्फरपुर न जाने कब से भारत मे तब्दील होने लगा है। देश के हर शहर मे एक मुजफ्फरपुर है। ये विस्तार बहुत सघन है। फर्क सिर्फ इतना है कि मुजफ्फरपुर की कलई उतर गयी। बाकियों की अभी बाकी हृ। सच कह रहा हूँ, मुजफ्फरपुर तो बस झांकी है। आइये ! नागरिक समाज का आवाहन है। कल उतर आइये सड़कों पर इस पतन, इस मरण के खिलाफ। उतरिये आप भी अपने शहर मे इस मरण के खिलाफ। ध्यान रहे, पूरी शर्मिन्दगी के साथ उतरेगे हम। अपनी लड़कियों, अपनी बच्चियों, अपनी बहन बेटियों और अपनी औरतों से आँखे चुराते हुए निकलियेगा ताकि अदब बनी रहे,  लिहाज बचा रहे, आँखो के पानी की लाज रह जाय और शेष रह जाय सनातन मे उम्मीदों का ध्वंसावशेष भी।

वरिष्ठ पत्रकार प्रेमप्रकाश जी की फेसबुक वाल से 

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बिहार के 14 संस्थानों में बच्चों का यौन शोषण: रिपोर्ट

रोहिण कुमार 



कुछ महीने पहले बिहार सरकार की पहल पर टाटा इंस्टिट्युट ऑफ सोशल साइंसेस (टीआईएसएस या टिस) ने बिहार के बालगृहों का एक सोशल ऑडिट किया था. टिस की ‘कोशिश’ यूनिट ने बिहार के 38 जिलों में घूमकर करीब 110 बालगृहों की ऑडिट रिपोर्ट 27 अप्रैल, 2018 को समाज कल्याण विभाग को सौंपी थी. ‘कोशिश’ मुख्यत: शहरी गरीबी के ऊपर काम करती है. टीम में कुल आठ सदस्य थे, पांच पुरुष और तीन महिलाएं.

बिहार समाज कल्याण विभाग के मुख्य सचिव अतुल प्रसाद के मुताबिक टीआईएसएस की रिपोर्ट को तीन श्रेणियों में बांटा गया- ‘बेहतर’, ‘प्रशासनिक लापरवाही’ और ‘आपराधिक लापरवाही’. मुजफ्फरपुर का ‘सेवा संकल्प एवं विकास समिति’ आपराधिक लापरवाही की श्रेणी में पाया गया था.

‘कोशिश’ की यह रिपोर्ट 26 मई को समाज कल्याण विभाग ने अपने सभी क्षेत्रीय पदाधिकारियों को बुलाकर उनसे साझा की. विभाग ने अधिकारियों को तत्काल कार्रवाई का आदेश दिया. इसके आधार पर पुलिस ने पहली प्राथमिकी 31 मई को मुजफ्फरपुर के ‘सेवा संकल्प एवं विकास समिति’ पर किशोर न्याय अधिनियम और पॉक्सो ऐक्ट के तहत दर्ज किया.

पुलिस ने 3 जून को इस संस्था से जुड़े ब्रजेश ठाकुर, किरण कुमारी, मीनू देवी, मंजू देवी, इंदु कुमारी, चंदा देवी, नेहा कुमारी और हेमा मसीह को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया. पुलिस ने इस बालगृह में रखी गई 44 में से 42 लड़कियों को पटना, मधुबनी और मोकामा के विभिन्न बालिका गृहों में स्थानांतरित कर दिया. कोशिश यूनिट के सदस्यों के अनुसार, जून में ही पटना पीएमसीएच ने मेडिकल परीक्षण में पाया था कि 42 में से 29 लड़कियों के साथ बलात्कार हुआ था.

पढ़ें: नीतीश सरकार के खिलाफ देशव्यापी प्रदर्शन 30 जुलाई को

सेवा संकल्प एवं विकास समिति में रहने वाली कुछ लड़कियों ने पुलिस को दिए गए अपने बयान में बताया कि एक लड़की को वहां के कर्मचारियों ने बात न मानने पर पीट-पीटकर मार डाला था. बाद में उसे बालिका गृह परिसर में ही दफना दिया गया. सोमवार 23 जुलाई को मुजफ्फरपुर पुलिस बालिका गृह की खुदाई करने पहुंची. तब मामले ने तूल पकड़ लिया. विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने यह मामला सदन में उठाया. इसके बाद  देश भर के मीडिया की नज़रें मुजफ्फरपुर की ओर मुड़ गईं. हालांकि फिलहाल मुख्यमंत्री या उपमुख्यमंत्री ने कोई बयान नहीं दिया है. लेकिन कुछ मीडिया रिपोर्टों के अनुसार बिहार सरकार ने गुरुवार को इस मामले की सीबीआई जांच के आदेश जारी किए हैं.

लेकिन यह मामला सिर्फ मुजफ्फरपुर तक सीमित नहीं है. टाटा इंस्टिट्युट ऑफ सोशल साइंसेस की उसी रिपोर्ट में बिहार के 14 और शेल्टर होम्स में उत्पीड़न की बात उजागर हुई है. अफसोस इसपर न मीडिया की नज़र गई न ही प्रशासन ने तत्परता से अबतक कार्रवाई की है.

मुजफ्फरपुर के शेल्टर होम की खुदाई

नवभारत टाइम्स की ख़बर के मुताबिक, मुजफ्फरपुर बालिका संरक्षण गृह के अधिकारी रवि कुमार रोशन की पत्नी शीबा कुमारी सिंह ने समाज कल्याण मंत्री मंजू वर्मा के पति पर संदेह जताया है. शीबा का आरोप है कि मंजू वर्मा के पति चंद्रेश्वर वर्मा अक्सर बालिका गृह आते रहते थे. जब वे आते थे तो बालिका संरक्षण गृह के सभी अधिकारियों को ऊपर की मंजिल खाली करवा कर नीचे भेज दिया जाता था.

खैर मुजफ्फरपुर की घटना तो अब शासन प्रशासन की नज़र में है और इस पर कार्रवाई भी होती दिख रही है, लेकिन टिस की जिस रिपोर्ट पर यह सारी जानकारी सामने आई थी उसमें 14 अन्य बालगृहों के ऊपर भी उंगली उठाई गई थी. टिस के शोधकर्ताओं ने रिपोर्ट का यह हिस्सा न्यूज़लॉन्ड्री (यह खबर वहीं से साभार) के साथ साझा किया है. यहां हम उन सभी संस्थाओं का नाम और उस पर दी गई संस्तुतियां दे रहे हैं. बिहार समाज कल्याण विभाग के निदेशक राज कुमार से जब पूछा ने जानना चाहा कि बाकी 14 संस्थानों पर कार्रवाई का क्या स्टेटस है तो वो एक दूसरा ही दर्द बयान करने लगे. उनका गुस्सा मीडिया पर था. उनका कहना था, “बिहार सरकार की तारीफ की जानी चाहिए जिसने स्वत: ही टिस से सोशल ऑडिट करवाया. उसके बाद ही यह सारी जानकारी सामने आई. पर मीडिया यह बात किसी को नहीं बता रहा है.”



1. सेवा संकल्प एवं विकास समिति, मुजफ्फरपुर (बालिका गृह)

यह एकमात्र बालिका गृह है जहां ऑडिट रिपोर्ट के बाद प्रशासन हरकत में आया है. रिपोर्ट में बताया गया कि सेवा संकल्प एवं विकास समिति में बच्चियों के साथ गंभीर यौन उत्पीड़न और हिंसा की शिकायतें हैं. लड़कियों की किसी भी खुली जगह में आवाजाही पर मनाही थी और वे सिर्फ रात के खाने के लिए कमरे से बाहर निकाली जाती थीं.

2. निर्देश, मोतीहारी (बाल गृह)

‘निर्देश’ मोतीहारी स्थित बाल गृह है. रिपोर्ट के अनुसार, यहां सभी बच्चों के साथ मारपीट होती है. मारपीट का खास पैटर्न है, अगर एक भी बच्चा शरारत करता है तो सभी की पिटाई होती है. बच्चों के मुताबिक, बदमाशी करना, भागने की कोशिश करना, आपस में लड़ाई करने पर बाल गृह का कर्मचारी सभी बच्चों की पिटाई करता है.  अपनी रिपोर्ट में कोशिश कहता है कि बच्चों के साथ यौन शोषण और हिंसा हो रही है, जिस पर अविलंब कार्रवाई और विस्तृत जांच की ज़रूरत है.

3. रुपम प्रगति समाज समिति, भागलपुर (बाल गृह)

भागलपुर के इस बालगृह एनजीओ के सचिव पर रिपोर्ट में गंभीर सवाल उठाए गए. संस्थान का एक कर्मचारी जो बच्चों के समर्थन में था, उसे सचिव द्वारा परेशान किया जाता था. ऑडिट टीम ने संस्थान में लगी शिकायत पेटी की पड़ताल की और उसमें आरटीओ रेखा के खिलाफ कई शिकायत पायी. बच्चों ने हिंसा की कई वारदातों का जिक्र लिखित शिकायतों में किया था. बताया गया कि रेखा बच्चों के साथ शारीरिक हिंसा और गाली-गलौज करती है. संस्थान ऑडिट टीम को शिकायत पेटी की चाभी नहीं देना चाह रही थी. उन्होंने चाभी खो जाने का बहाना बनाया.

4. पनाह, मुंगेर (बाल गृह)

मुंगेर के पनाह बाल गृह की अपनी कोई बिल्डिंग नहीं है. यह एक बैरक जैसे ढांचे के भीतर चलता है. पनाह का निरीक्षक बालगृह के परिसर में ही रहता है. वह बच्चों से सफाई और खाना बनवाने का काम करवाता है. बच्चों के मना करने पर वह बच्चों को मारता-पीटता है. एक बच्चा जो निरीक्षक के लिए खाना बनाता है, उसने अपने गाल पर लगभग 3 इंच लंबा निशान दिखाया. यह निशान कथित तौर पर निरीक्षक की पिटाई का था. चोट के कारण उसे अब बोलने और सुनने में समस्या आती है.

पढ़ें: मंत्री के पति का उछला नाम तो हाई कोर्ट में सरेंडर बिहार सरकार: सीबीआई जांच का किया आदेश

एक दूसरा बच्चा, जिसकी उम्र करीब 7 साल है, वह भी सुनने की समस्या से ग्रस्त है. बच्चे ने ऑडिट टीम से निरीक्षक की शिकायत में बताया कि निरक्षक ने उसके सुनने की मशीन छीन ली है. ऑडिट टीम ने उसकी मशीन वापस करवाई.

5. दाउदनगर ऑर्गनाइजेशन फॉर रुरल डेवलपमेंट (डीओआरडी), गया (बालगृह)

यह संस्थान किसी कैदखाने की तरह और शोषणकारी माहौल में संचालित हो रहा है. लड़कों ने ऑडिट टीम को बताया कि महिला कर्मचारी लड़कों से पेपर पर बेहूदे संदेश लिखवाती हैं और दूसरी महिला कर्मचारियों को देने को विवश करती हैं. बच्चों ने पिटाई की बात स्वीकारी है. ऑडिट टीम ने शक जाहिर किया है, यहां कर्मचारी बच्चों का अन्य कामों में इस्तेमाल करते हैं.

6. नारी गुंजन- पटना, आरवीईएसके- मधुबनी, ज्ञान भारती- कैमूर (ए़डॉप्शन एजेंसी)

ये तीनों ही संस्थान दयनीय स्थिति में संचालित हो रहे हैं. नवजात शिशुओं और बच्चों के अनुपात में केयरटेकर्स की संख्या बेहद कम है. तीनों ही जगह अस्वच्छ थे. ऑडिट टीम ने बच्चों को भूखा और नाखुश पाया. कर्मचारियों ने शिकायत किया कि उन्हें लंबे वक्त से तनख्वाह नहीं मिली है.

7. ऑबजर्वेशन होम, अररिया 

यह सीधे तौर पर सरकार द्वारा संचालित बाल गृह है. लड़कों की शिकायत है कि यहां बिहार पुलिस का एक गार्ड लड़कों के साथ ‘गंभीर’ मारपीट करता है. एक बच्चे ने ऑडिट टीम को छाती पर चोट का निशान दिखाया. देखने से ऐसा प्रतीत हुआ कि उसकी छाती को जोर से दबाया गया था, जिसकी वजह से छाती में  सूजन भी थी.

गौरतलब हो कि अररिया स्थित इस ऑब्जर्वेशन होम में हिंसा की जानकारी निरीक्षक को थी. चूंकि गार्ड की नियुक्ति बिहार पुलिस ने की थी, निरीक्षक ने कार्रवाई की बात पर बेचारगी जाहिर किया. बच्चों के मन में गार्ड के प्रति गुस्सा था. एक बच्चे ने ऑडिट टीम से कहा, “इस जगह का नाम सुधार गृह से बदलकर बिगाड़ गृह कर देना चाहिए.”

8. इंस्टिट्युट ऑफ खादी एग्रीकल्चर एंड रुरल डेवलपमेंट (आइकेआरडी), पटना (महिला अल्पावास गृह)

लड़कियों ने यहां हिंसा की शिकायत की है. कई खोई हुई लड़कियों को यहां रखा गया हैं. कुछ लड़कियों के पास अपने घरवालों के नंबर थे लेकिन संस्था के कर्मचारी उन्हें मां-बाप से संपर्क करने नहीं दे रहे. पिछले साल एक लड़की ने रोजमर्रा की हिंसा से परेशान होकर आत्महत्या कर ली थी. एक अन्य उत्पीड़न की शिकार लड़की अपना मानसिक संतुलन खो चुकी है. लड़कियों के पास कपड़ों और दवाइयों की कमी है. समूचे तौर पर उनके रहने की स्थिति दयनीय है.

9. सखी, मोतीहारी, महिला अल्पावास गृह

यहां मानसिक बीमारी से पीड़ित लड़कियों व महिलाओं के साथ शारीरिक हिंसा की बात सामने आई है. हिंसा के सभी आरोप काउन्सलर पर हैं. लड़कियों ने सेनेटरी पैड न मिलने की शिकायत की है. यहां भी रहने का माहौल ठीक नहीं है और तुरंत कार्रवाई की जरूरत है.

10. नोवेल्टी वेल्फेयर सोसायटी, महिला अल्पावास गृह, मुंगेर

संस्था ने बिल्डिंग का एक हिस्सा किसी परिवार को रेंट पर दे दिया है और उससे 10,000 रुपये प्रति माह का किराया वसूल रहे हैं. लड़कियों ने कुछ ज्यादा नहीं  बताया, सिर्फ इतना कि बाथरूम में अंदर की कुंडी नहीं है. ऑडिट टीम ने संस्थान का एक बंद कमरा खुलवाया और उसमें से एक मानसिक रूप से बीमार महिला को बाहर निकाला. वह महिला ऑडिट टीम की सदस्य को पकड़कर रोने लगी.

11. महिला चेतना विकास मंडल, महिला अल्पावास गृह, मधेपुरा

ऑडिट टीम ने महिला चेतना विकास मंडल को निर्दयी पाया. एक लड़की ने शिकायत में कहा, उसे सड़क से जबरदस्ती उठाकर लाया गया है और उसे परिवार से संपर्क करने नहीं दिया जा रहा है. ऑडिट टीम लड़की के केस के बारे में ज्यादा जानकारी इकट्ठा करना चाह रही थी लेकिन उस वक्त संस्थान में रसोइया के अलावा और कोई नहीं था. रसोइया बहुत डरा हुआ था. लड़कियों के पास सोने की चटाई और दरी नहीं थी. वे जमीन पर सोती हैं.

12. ग्राम स्वराज सेवा संस्थान, महिला अल्पावास गृह, कैमूर

लड़कियों ने यौन उत्पीड़न की शिकायत की है.  सुरक्षा गार्ड यौन उत्पीड़न शामिल रहा है. लड़कियों और महिलाओं ने कहा, गार्ड भद्दी टिप्पणियां करता है और उसका लड़कियों के प्रति व्यवहार भी अनुचित है. चूंकि गार्ड ही संस्था के सारे कामकाज की देखरेख करता है, वह लड़कियों पर शासन करता है.

13. सेवा कुटीर, मुजफ्फरपुर 

मुजफ्फरपुर का यह सेवा कुटीर ओम साईं  फाउंडेशन द्वारा संचालित होता है. लड़कियों ने गाली-गलौज और हिंसा की शिकायतें की है. इन लड़कियों को काम का हवाला देकर यहां लाया गया था. ऑडिट टीम को संस्था से जुड़े दस्तावेज नहीं मिले क्योंकि संस्था के कर्मचारी ने अलमारी की चाभी नहीं होने की बात कही. अलमारी की चाभी दूसरे कर्मचारी के पास थी जो ऑडिट के दिन छुट्टी पर था.

लोकसभा में इस मसले पर बयान देते गृहमंत्री राजनाथ सिंह

14. सेवा कुटीर, गया

मेटा बुद्धा ट्रस्ट, गया स्थित सेवा कुटीर को संचालित करती है. यह वृद्धाश्रम है. ऑडिट टीम ने सेवा कुटीर के लोगों को बहुत दुबला पतला पाया.  लोगों से बातचीत करते समय ऑडिट टीम ने संस्थान सदस्यों को इशारे करते देखा. बहुत ही शासकीय तरीके से संस्थान चलाया जा रहा था. यहां मानसिक रूप से बीमार लोगों की संख्या काफी ज्यादा थी.

स्थानीय अख़बार प्रभात खबर के मुताबिक दिसंबर 2015 में सुजाता बाईपास के निवासियों ने सेवा कुटीर के संचालकों के खिलाफ शिकायत की थी. गांववालों का कहना था कि सेवा कुटीर के सदस्य जबरन भिखारियों को पकड़ लाते हैं और जबरदस्ती उनका इलाज करवाया जाता है.

15. कौशल कुटीर, पटना

यह संस्था डॉन बॉस्को टेक सोसायटी द्वारा संचालित की जाती है. यहां महिलाओं और पुरुषों दोनों के साथ गाली-गलौज की जाती है. बहुत सख्ती के साथ महिलाओं और पुरुषों को अलग रखा जाता है. वे क्लास एक साथ अटेंड करते हैं लेकिन आपस में बातचीत करने की मनाही होती है. उन्हें खुले जगह में भी जाने नहीं दिया जाता.

पढ़ें : बिहार में बच्चियों के यौनशोषण के मामले का सच क्या बाहर आ पायेगा?

बेसुध है प्रशासन

26 मई, 2018 को ही समाज कल्याण विभाग ने अपने अधिकारियों को रिपोर्ट में  दोषी पाए गए सभी बालगृहों पर तत्परता से कार्रवाई का निर्देश दिया था. मुजफ्फरपुर के सेवा संकल्प एवं विकास समिति पर कार्रवाई की खबरें सुर्खियों में है लेकिन बाकी जगहों पर क्या हो रहा है, इसका जायजा लेने की कोशिश न्यूज़लॉन्ड्री ने की.

टीआईएसएस की रिपोर्ट में पटना के नारी गुंजन और इंस्टिट्युट ऑफ खादी एग्रीकल्चर एंड रूरल डेवलपमेंट गंभीर गड़बड़ी के आरोपी पाए गए हैं. जब न्यूज़लॉन्ड्री ने पटना के जिलाधिकारी से कार्रवाई के संबंध में पूछा, जिलाधिकारी ने मामले पर अनभिज्ञता जाहिर की. उन्हें पता ही नहीं था टीआईएसएस की रिपोर्ट में पटना के दो एनजीओ का भी नाम है. उन्होंने टालमटोल वाले अंदाज में कहा, “अबतक यह मामला हमारे संज्ञान में नहीं आया है. हमें आपसे इसकी जानकारी मिल रही है. इस संबंध में अधिकारियों को जानकारी दी जाएगी.”

मुंगेर के एसपी गौरव मंगला ने बताया कि नॉवेल्टी वेलफेयर सोसायटी पर एफआईआर दर्ज हुई है. यह एफआईआर तीन दिन पहले यानी सोमवार को दर्ज की गई है. एसपी कहते हैं, “अभी जांच चल रही है. किसी की भी गिरफ्तारी नहीं हुई है.”

गया, अररिया और मोतीहारी के जिलाधिकारियों से संपर्क नहीं हो सका है. उनसे  हमने केसों के संबंध में कुछ सवाल भेजे हैं, उनके जबाव आने पर इस स्टोरी को अपडेट करेंगे.

बाकी जिलों में कार्रवाई की क्या गति है? इसके जबाव में बिहार समाज कल्याण विभाग के निदेशक राज कुमार कहते हैं, “जहां से भी गंभीर शिकायतें मिलीं थी, वहां समाज कल्याण विभाग की ओर से कार्रवाई की गई है.” टीआईएसएस की रिपोर्ट में 15 संस्थानों में गंभीर गड़बड़ियों की बात है लेकिन निदेशक इन्हें गंभीर शिकायतें नहीं मानते.

टिस की रिपोर्ट के बाद सरकार को कार्रवाई में देरी क्यों लगी? इस पर राज कुमार पूरे घटनाक्रम का अलग खाका पेश करते हैं. वह कहते हैं, “27 अप्रैल को टीआईएसएस ने रिपोर्ट का ड्राफ्ट विभाग को सुपुर्द किया. कोशिश टीम के सदस्यों ने विभाग से रिपोर्ट के सिलसिले में बैठक करने की गुजारिश की. 5 मई और 7 मई को विभाग के साथ बैठक हुई. 9 मई को अंतिम रिपोर्ट टीआईआईएस ने सौंपी. इसके बाद 26 मई को क्षेत्रीय पदाधिकारियों के साथ विभागीय बैठक हुई.”

राज कुमार मीडिया से खफा दिखे. उनके अनुसार बिहार सरकार की तारीफ की जानी चाहिए जिसने स्वत: सोशल ऑडिट टीआईएसएस से करवाया. जब न्यूज़लॉन्ड्री ने उनसे जानना चाहा कि विभाग ने इसके पहले अंतिम बार कब ऑडिट करवाया था? क्या सरकार बालगृहों को अनुदान राशि बिना जांच के देती है? राज कुमार इस सवाल का जवाब टाल गए. उन्होंने फोन रखते हुए उन्होंने सिर्फ इतना बताया कि विभाग सोशल ऑडिट को नियमित करने पर विचार कर रहा है.

बालगृहों की देखरेख की जिम्मेवारी ट्रांसजेंडर्स के हाथ

बालिका गृहों और महिला अल्पावास गृहों के संबंध में टिस की रिपोर्ट के बाद बिहार समाज कल्याण विभाग ने ट्रांसजेंडर्स  को सुरक्षा की जिम्मेदारी सौंपने का फैसला किया है. समाज कल्याण विभाग के प्रमुख सचिव को इंडियन एक्सप्रेस को दिए बयान के अनुसार ट्रांसजेंडर्स को सुरक्षा की जिम्मेदारी देने से उत्पीड़न के मामलों में कमी आएगी. ट्रांसजेंडर्स को रोजगार मिलेगा और यह क़दम सामाजिक समरसता कायम करने में भी मददगार साबित होगा.

टिस और कोशिश टीम के सदस्य विभाग के इस कदम से सहमति नहीं रखते. न्यूज़लॉन्ड्री से बातचीत में टीम के एक सदस्य, जो अपना नाम उजागर नहीं करना चाहते, कहते हैं, “सरकार को हमने यह सलाह कभी नहीं दी. जो लोग मानव तस्करी के बारे में समझ रखते हैं, उन्हें मालूम हैं ट्रांसजेंडर्स के ऊपर किस तरह के खतरे होते हैं.”

कोशिश यूनिट के सदस्य मुजफ्फरपुर की कार्रवाई पर संतुष्टि जताते हैं. वे चाहते हैं कि सरकारें सोशल ऑडिट को नियमित बनाए. बच्चों, वृद्ध व्यक्तियों को महिलाओं बताने दें कि बालगृहों के भीतर क्या स्थितियां हैं. स्थानीय मीडिया की रिपोर्टिंग पर कोशिश यूनिट मीडिया के रुख से नाखुश है. उनका मानना है कि यह मामला और पहले प्रमुखता से उठाना जाना चाहिए था.

कई बालगृहों पर कार्रवाई न होने का एक संभावित कारण है कि इन बालगृहों में लड़कों के यौन उत्पीड़न की सूचना है. वर्तमान कानून के तहत लड़कों के साथ रेप पर कार्रवाई का पर्याप्त कानून नहीं है.

बहरहाल यह कैसी स्थिति है जहां ऑडिट में पंद्रह दागी संस्थाओं के नाम उजागर होने के बाद पदाधिकारियों की बैठक होती है, त्वरित कार्रवाई की बात कही जाती है और अब दो महीने बाद भी बाकी 14 संस्थानों में उचित कार्रवाई नहीं हो सकी है. प्रशासन, मीडिया और राजनीति लोगों की उम्मीदें ध्वस्त करने की औज़ार बन गई हैं? या बलात्कार और उत्पीड़न की घटनाएं हमारे लिए सामान्य हो चुकी हैं.

खबर न्यूज लौंड्री से साभार

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अश्लील बातचीत के आरोपी प्रोफेसर के खिलाफ शिकायत लेने से पुलिस ने की थी आनाकनी

स्त्रीकाल डेस्क
गया कॉलेज गया, मगध विश्वविद्यालय, बिहार के अंग्रेजी विभाग के एक प्रोफेसर, वकार अहमद ने पीजी में पढ़ने वाली एक छात्रा को प्रोजेक्ट में मदद करने के बहाने फोन किया और उससे अश्लील बातें कीं. और उसे अच्छे नंबर से पास कराने के नाम पर यौन संबंध बनाने के लिए कहा.

परेशान छात्रा ने  प्रोफेसर की शिकायत पुलिस से की और उससे बातचीत का एक ऑडियो पुलिस तक पहुंचा दिया. इस ऑडियो क्लिप में प्रोफेसर ने कबूल किया है कि वे पहले भी लड़कियों की ऐसी मदद कर चुके हैं. जैसे ही यह मामला सामने आया छात्रों ने कॉलेज परिसर में जमकर हंगामा किया. प्रोफेसर ने छात्रा को फर्स्ट क्लास मार्क्स के लिए घर पर आकर उनकी तमन्ना पूरी करने के लिए कहा.

छात्रा और प्रोफेसर की बातचीत का ऑडियो अब वायरल हो चुका है, जिसमें प्रोफेसर को उससे अच्छा नंबर देने की एवज में लिए अश्लील बातें करते हुए सुना जा सकता है. छात्रा ने पुलिस को बताया कि अंग्रेजी विभाग के प्रोफेसर वकार अहमद ने प्रोजेक्ट में मदद करने के नाम पर उससे उसका मोबाइल नंबर लिया था. वीडियो में छात्रा का बयान:

छात्रा की  धमकी भी की अनसुनी 

जब प्रोफेसर वकार छात्रा से अश्लील बातें कर रहे थे तो उसने प्रोफेसर को फोन पर ही बताया कि आपकी बातचीत फोन में रिकॉर्ड कर रही हूं. इसकी शिकायत थाने में करूंगी. छात्रा ने बताया कि प्रोफेसर ने उसकी लाइफ बर्बाद करने की भी धमकी दी. हालांकि इस धमकी के बाद भी प्रोफेसर को फर्क नहीं पड़ा. छात्रा के अनुसार उसने ने एक बार नहीं कई दफे फोन किया.24 जुलाई को पहला फोन 1.53 दोपहर में किया था. फिर 24 जुलाई की ही शाम को 6.05 बजे फिर फोन किया. 25 जुलाई को दोपहर 1.39 बजे फिर फोन कर प्रोफेसर ने फर्स्ट क्लास मार्क्स के लिए छात्रा से घर आने की बात कही. तब छात्रा ने पूछा कि घर आकर वह क्या करेगी, तो प्रोफेसर ने कहा, ‘हमारी इच्छा पूरी करोगी, तो पैरवी कर नंबर बढ़वा देंगे’.

पुलिस ने शिकायत लेने में की आनाकानी 

अपने दोस्त की सलाह पर छात्रा ने पूरी बातचीत रिकार्ड कर ली थी,  जिसके बाद मामला दर्ज कराने जब वह रामपुर थाना पहुँची तो पुलिस ने थाने में मामला दर्ज कराने को लेकर आनाकानी की. थाने में छात्रा को डराने की कोशिश की गई. थाने में पुलिसकर्मी ने उसे कहा कि केस करोगी तो गवाही के लिए बार बार आना पड़ेगा, बोलो तो प्रोफेसर को बुलवाकर मांफी मंगवा देते हैं. इसके पहले भी एक छात्रा की शिकायत पर प्रोफेसर के खिलाफ कॉलेज कार्रवाई कर चुका है, वह निलम्बित हो चुका है.  इस मामले की जांच पुलिस क्र रही है. प्रोफेसर से बात सम्भव नहीं हो पायी.

प्रिंसिपल ने कहा इन्टरनल जांच में प्रोफेसर पाया गया दोषी
स्त्रीकाल ने जब कॉलेज के प्रिंसिपल दीनेश सिन्हा से बात की तो उन्होंने पहले तो यह कहा कि यह मामला हमारे यहाँ कैंपस का नहीं है इसलिए कॉलेज की भूमिका नहीं बनती. हालांकि विशाखा जजमेंट का हवाला देने, और प्रोफेसर एवं छात्रा का वर्तमान में कॉलेज से सम्बद्ध होने की ओर उनका ध्यान खीचा गया तो उन्होंने कहा कि ‘जब हमें शिकायत मिली तो हमने जांच समिति गठित की. 24 घंटे में समिति ने अपनी रिपोर्ट देते हुए प्रोफेसर को दोषी माना है. आगे की कार्रवाई के लिए मैंने फ़ाइल कुलसचिव, मगध विश्वविद्यालय को भेज दी है.’ 

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नीतीश सरकार के खिलाफ देशव्यापी प्रदर्शन 30 जुलाई को

स्त्रीकाल डेस्क 

मुजफ्फरपुर बालिका-संरक्षण गृह में बच्चियों से बलात्कार के मामले में यद्यपि राज्यसरकार ने सीबीआई जांच का आदेश दे दिया है, लेकिन सरकार के खिलाफ जनाक्रोश और व्यापक हुआ है.  कहा जाता है कि 25 जुलाई को न्यायालय में जनहित याचिका की सुनवाई और विपक्ष के व्यापक दवाब में राज्यसरकार ने सुनवाई के पहले ही सीबीआई जांच की घोषणा कर दी थी. लेकिन स्त्रीकाल में याचिकाकर्ता की रिपोर्ट के अनुसार कोर्ट में सरकार का रुख याचिकाकर्ताओं के खिलाफ घृणा वाला था और घटना पर वह पर्देदारी के पक्ष में दिख रही थी.

राज्यसरकार को कारगर कार्रवाई में भी दो महीने लग गये, जबकि मुख्य आरोपी के बड़े कनेक्शन की कहानियाँ मीडिया और सोशल मीडिया में खूब उछलीं. यहाँ तक कि मुख्य आरोपी ब्रजेश ठाकुर को पुलिस रिमांड पर लेने में भी पुलिस सफल नहीं हुई. इस बीच इस मामले में मंत्री-कनेक्शन भी सामने आया. यह सब देखते हुए मामले की व्यापक जांच, जांच का दायरा राज्यभर में फैलाने की मांग और राज्य के मुखिया का स्टेट संरक्षित इस शोषण की जिम्मेवारी लेते हुए इस्तीफे की मांग तेज हो रही है.

राइड फ़ॉर जेण्डर फ्रीडम’ की कॉल पर राइड फ़ॉर जेण्डर फ्रीडम, एनएफआईडवल्यू और स्त्रीकाल द्वारा बिहार भवन, दिल्ली पर 30 जुलाई को 2 बजे से प्रदर्शन की घोषणा के बाद देश भर में विरोध प्रदर्शन की तैयारी की खबर है. इस मुहीम से पहले वेब पोर्टल टेढ़ी उंगली जुड़ा और देखते देखते देश भर से लोग जुड़ने लगे. अभी तक कई शहरों में प्रदर्शन की खबर है.

पढ़ें : बिहार में बच्चियों के यौनशोषण के मामले का सच क्या बाहर आ पायेगा?

‘राइड फॉर जेंडर फ्रीडम’ के तहत देश भर  में चार साल से सायकलिंग कर रहे राकेश ने कहा कि ‘मुजफ्फरपुर के बालिका आश्रय गृह में बच्चियों से बर्बरता स्टेट संरक्षित यौन हिंसा का एक पैटर्न है, जिसके पूरे राज्य में फैले होने की संभावना है. इस मामले में पूरे राज्य की बालिका-आश्रय गृहों की जांच और इसकी जिम्मेवारी लेते हुए राज्य के मुखिया नीतीश कुमार के इस्तीफे की हमारी मांग है.’ उन्होंने बताया कि ‘अब प्रदर्शन का स्वरूप व्यापक हो गया है. 30 जुलाई को10 बजे से 5 बजे तक देश भर में एक साथ कई शहरों में होंगे प्रदर्शन।’

पढ़ें   मंत्री के पति का उछला नाम तो हाई कोर्ट में सरेंडर बिहार सरकार: सीबीआई जांच का किया आदेश

प्रदर्शन को समूह को-आर्डीनेट कर रही श्वेता यादव ने सोशल मीडिया में पोस्ट लिखकर सूचित किया है कि तमाम शहरों के उन साथियों का नंबर शेयर कर रही हूँ जो इन शहरों में प्रोटेस्ट को कोआर्डिनेट करेंगे.. इन साथियों के अलावा भी आप अपने-अपने शहरों से अपने हिसाब से जुड़ने के लिए स्वतंत्र हैं.. बैनर आपका पोस्टर आपका बस दुःख और लड़ाई साझी … एक बात साफ़ कर दूँ इसे किसी एक का प्रयास नहीं बल्कि साझा प्रयास समझा जाए.. क्योंकि जब दुःख साझें हो तो उससे लड़ाई भी साझी ही लड़नी होगी …

समूह को-आर्डीनेटर-
श्वेता यादव, सुशील मानव

8587928590, 6393491351

दिल्ली-
एनी राजा- 9868181992, राकेश- 9811972872
संजीव चन्दन- 8130284314,

बनारस-
स्वाति सिंह – 8423571891, 8808365427
बिहार-
मकेश्वर रावत – 9932534537
आजमगढ़
पूनम तिवारी, कमला सिंह -9455356786
गोरखपुर –
धीरेन्द्र प्रताप -8960043920
गोधरा
नरेंद्र परमार -9978368373
चेन्नई –
भारती कन्नान -9940220091
वर्धा-
नरेश गौतम-8007840158,
नूतन मालवी -9325222427
देहरादून-
स्वागता -7409426643
इलाहबाद-
सुनील मानव -6393491351
जौनपुर-
श्वेता यादव -8587928590
हिमांचल प्रदेश-
मिनहास -7018520132
जयपुर-
संदीप मील-9116038790
छत्तीसगढ़-
संदीप यादव -9560554552

श्वेता के अनुसार और भी लोग इस मुहीम से जुड़ते जायेंगे. 

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मंत्री के पति का उछला नाम तो हाई कोर्ट में सरेंडर बिहार सरकार: सीबीआई जांच का किया आदेश

संतोष कुमार

मुजफ्फरपुर बालिका-गृह में बच्चियों से बलात्कार मामले में बिहार सरकार में सामाजिक कल्याण मंत्री मंजू वर्मा के पति का नाम सामने आ जाने के बाद इस मामले में तह तक पहुँचने का एक रास्ता जहाँ खुलता है, वहीं एक भ्रम भी पैदा होता है कि मसला सुलझ गया. लेकिन राज्य के राजनीतिक संगठन और सामाजिक संगठन इस नये खुलासे को आख़िरी अंजाम नहीं मानते. इस भेद का असर आज पटना हाई कोर्ट में देखने को मिला.

पति चंद्रेश्वर वर्मा के साथ मंत्री मंजू वर्मा

एक ओर हमारी जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान हमारी कोशिश थी कि इस पूरे मामले की जांच सीबीआई से हो वहीं राज्य सरकार कोर्ट को यह कन्विंस करती रही कि चूकी इस मामले में चार्जशीट तैयार है इसलिए अब आगे की जांच का कोई औचित्य नहीं है. सरकार ने यहाँ तक कह डाला कि याचिका करता बिहार के ‘कुरूप चेहरे’ (अगली फेस) हैं. पलटकर कोर्ट ने पूछा कि यदि आपने तहकीकात पूरी कर ली है और चार्जशीट भी तैयार कर लिया है तो यह बताइये कि वहां से गायब चार लडकियां कहाँ हैं. सरकार के जवाब न दे पाने पर कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता नहीं यह मामला राज्य का ‘कुरूप चेहरा’ है. कोर्ट का रूख सख्त है. उधर  इस मसले पर सरकार ने सीबीआई जांच की स्वीकृति जरूर दे दी है, लेकिन हमारी कोशिश होगी कि जांच का दायरा पूरे बिहार के बालिका-संरक्षण गृहों तक विस्तारित हो. पटना उच्च न्यायालय में इसकी अगली सुनवाई 6 अगस्त को होने वाली है.

संस्था संचालक ब्रजेश ठाकुर, अबतक मुख्य आरोपी

मंत्री मंजू वर्मा के पति का नाम आने के बाद और इस मामले से सामाजिक कल्याण मंत्री मंजू वर्मा का नाम जुड़ जाने के बाद दो असर होते हैं- एक अभी तक इस मामले में मुख्य किरदार और मुजफ्फरपुर बालिका संरक्ष्ण गृह के डायरेक्टर ब्रजेश ठाकुर और उसने जुड़े नेताओं से ध्यान हट कर सारा ध्यान मंजू वर्मा तक केन्द्रित हो जाता है, दूसरा ऐसे मामले में काम कर रही पितृसत्तात्मक प्रवृत्ति को एक और तर्क मिल जाता है-महिलाओं का दुश्मन महिलायें. जबकि सच्चाई यह है कि इस मामले की और राज्य भर के सारे बालिका-गृहों की जांच हो तो इसमें और बड़े नाम सामने आ सकते हैं, कई नाम आ सकते हैं-हमें कोशिश करनी होगी कि सरकार इसकी आंच अपने तक आने से रोकने के प्रयास में बच्चियों को मिलने वाले न्याय को ही कुंद न कर दे.

मंत्री का इनकार

हालांकि मंत्री मंजू वर्मा ने कहा कि वे एक बार पति के साथ वहां गईं थीं. लेकिन, उसके बाद पति वहां कभी नहीं गए. मेरे पति का इस मामले से कोई लेना देना नहीं है. मंत्री ने कहा कि यह उनकी और पति की छवि को खराब करने तथा परिवार को बदनाम करने की सोची-समझी राजनीतिक साजिश है. प्रतिपक्ष के नेता तेजस्वी यादव पर गंदी राजनीति करने का आरोप लगाते हुए कहा कि उनके मुजफ्फरपुर जाने के बाद आरोपित रवि रौशन की पत्‍नी से बयान दिलवाया गया है. पहले तेजस्वी यादव अपने गिरबान में झांकें.

इस मामले में देश भर में आक्रोश है. संसद में सांसद पप्पू यादव और रंजीता रंजन ने मसला उठाया और गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने जांच का आश्वासन दिया तो भी आजतक बिहार सरकार का रवैया इससे बचने का ही रहा, जब तक कोर्ट सख्त नहीं हुआ.

दिल्ली में बिहार भवन पर प्रदर्शन

इस बीच 30 जुलाई को राइड फॉर जेंडर फ्रीडम, नेशनल फेडरेशन ऑफ़ इन्डियन वीमेन (एनएफआईडवल्यू) और स्त्रीकाल सहित कई संगठनों ने इस मामले में समग्र जांच और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के इस्तीफे की मांग करते हुए बिहार भवन पर एक प्रदर्शन का आह्वान किया है. मुजफ्फरपुर के ही रहने वाले राकेश पिछले चार सालों से देश भर में ‘जेंडर-फ्रीडम’ के लिए सायकिल यात्रा कर रहे हैं. उनकी पहल पर इस प्रदर्शन का आह्वान किया गया है.

क्या है पूरा मामला: जानने के लिए लिंक पर क्लिक करें : बिहार में बच्चियों के यौनशोषण के मामले का सच क्या बाहर आ पायेगा? 


संतोष कुमार सामाजिक कार्यकर्ता हैं और उन्होंने इस मामले में जनहित याचिका दायर की है 

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कैथलिक पादरी के खिलाफ आगे आये महिला संगठन: पादरी पर है नन के यौन शोषण का आरोप

स्त्रीकाल डेस्क 


पिछले दिनों केरल के कई पादरियों पर ननों से यौन शोषण के आरोपों के बीच कई महिला संगठनों ने जालन्धर के बिशॉप फ्रांको मुलाक्कल को हटाये जाने की मांग दिल्ली में आर्क बिशॉप से किया है. महिला संगठनों ने लिखा है कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि आरोपकर्ता नन के चरित्र पर ही सवाल उठाये जा रहे हैं. इस तरह के प्रयास को उन्होंने पीडिता के ऊपर अनावश्यक दवाब लाने का प्रयास बताया है.

सामाजिक कार्यकर्ताओं ने आर्क बिशॉप को लिखे पत्र में इस बात पर भी चिंता जताई कि आरोपी बिशॉप को अभी तक उनके पद से हटाया नहीं गया है, जो उनके अनुसार  प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत के खिलाफ है और न्याय मिलने को हर संभव बाधित करेगा. अपने पावर का इस्तेमाल करते हुए आरोपी बिशॉप जांच को प्रभावित कर सकता है, पीडिता को धमका सकता है या गवाहों को प्रभावित कर सकता है.

आर्क बिशॉप को पत्र लिखने वाली सामाजिक कार्यकर्ताओं और ऐसे संगठनों में सईदा हमीद, मोहिनी गिरी (पूर्व सदस्य एनसीडवल्यू), गार्गी चक्रवर्ती, , एनी राजा (एनएफआईडवल्यू), शबनम हाशमी, पद्मिनी कुमार मरियम डवले (आयडवा) सहित कई संगठन और सामाजिक कार्यकर्ता शामिल हैं.

गौरतलब है कि ऐसे आरोपों का एक वीडियो भी केरल में वायरल हुआ था, जिसमें कई पादरियों पर आरोप लगे हैं. इन दिनों धार्मिक गुरुओं के ऐसे मामले बड़ी संख्या में रिपोर्ट हो रहे हैं. यह सडांध सभी धर्मों में फैला है.

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