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थियेटर ऑफ रेलेवेंस – स्वराजशाला

राजेश कासनियां 


थियेटर ऑफ रेलेवेंस के बारे में एक शोधार्थी, एक अभिनेता का अनुभव, जिसने इसकी एक कार्यशाला में भाग लिया :

मैंने 1 से 5 जुलाई , 2018 तक अम्बाला में  ‘थियेटर ऑफ रेलेवेंस’ स्वराजशाला की कार्यशाला में प्रतिभागिता की । इससे 2 वर्ष पूर्व भी मैं इस कार्यशाला में भाग ले चुका था । मैंने जब शैड्यूल देखा तो पहला सत्र हर सुबह 6:30 बजे चैतन्याभास से शुरु था । इस सत्र का संचालन  ‘थियेटर ऑफ रेलेवेंस’ के संस्थापक मंजुल भारद्वाज व उनकी टीम के सदस्य –अश्विनी , सायली , कोमल , योगिनी व तुषार कर रहे थे । मैं अपने पिछले अनुभव से वाकिफ़ था कि मंजुल सर समय के बड़े पाबंद हैं । इसलिए मैं समय का ख़ास ख़याल रखता था । क्योंकि सर हमेशा एक बात कहते हैं – यदि आपने काल (समय) पर विजय पा ली तो आप हर क्षेत्र में विजय प्राप्त कर सकते हैं ।

मंजूल भारद्वाज प्रशिक्षण देते हुए

सर का नारा है – हम…..हैं । जो हम में एकता व अपने वज़ूद का अहसास करवाता ,  वहीं हमें जोश से भर देता । सुबह की मुलाकात इसी नारे के साथ होती । वैसे बीच-बीच में ये नारा पूरे दिन सुनने को मिलता । चैतन्याभ्यास में आलाप(आवाज़ निकालाना)  करवाया जाता । इसका आशय है कि हमें अपनी अभिव्यक्ति की आज़ादी के प्रति जागरुक रहना वहीं शोषण व अन्याय के खिलाफ अपनी आवाज़ बुलंद करनी है । चैतन्याभ्यास में अनेक तरह की गतिविधियां करवाई जाती , जैसे – विभिन्न आकृतियां बनाना , क्षेत्रीय खेल व नृत्य करना , बचपन का खेल , प्रकृति से बात करना , चिंतन-मनन के माध्यम खुद को जानना आदि ।

इस कार्यशाला के माध्यम से मेरी दृष्टि दो आयामों के प्रति आकृष्ट हुई वों हैं – सांस्कृतिक व राजनैतिक चेतना ।सांस्कृतिक चेतना :-  ‘थियेटर ऑफ रेलेवेंस’ के जनक मंजुल भारद्वाज जी का कथन है कि इतिहास साक्षी है कि व्यवस्था को सांस्कृतिक चेतना के द्वारा बनाया और टिकाया गया है तो क्यों न आज सांस्कृतिक चेतना के द्वारा ही व्यवस्था को बनाया और टिकाया जाए ।  ‘थियेटर ऑफ रेलेवेंस’ इसी विचार के साथ काम करता है । आज जो संस्कृति है वो सामंती मूल्यों को पोषित करती है जो मनुवाद द्वारा संचालित है । यह शोषण पर आधारित है जो समाज को विघटन की ओर ले जाती है ।इस संस्कृति को समता , स्वतंत्रता और बंधुता के मूल्यों से संचालित किया जाए इसी उद्देश्य को समर्पित है –   ‘थियेटर ऑफ रेलेवेंस’ ।

थियेटर ऑफ रेलेवेंस

कार्यशाला में ‘मैं औरत हूं’ नाटक (जो मंजुल भारद्वाज द्वारा निर्देशित व अश्विनी , सायली , कोमल , योगिनी व तुषार द्वारा अभिनीत) की प्रस्तुति की गई । इसमें औरत के विविध आयामों को दिखाया गया । औरत कैसे पितृसत्ता के द्वारा गुलाम बनाई गई , किस-किस रूप में औरत का शोषण होता है । नाटक में दिखाया गया कि जिन औरतों ने अपने स्व को पहचान लिया वो सभी इस कुचक्र को भेदने में कामयाब भी हुई हैं । मंजुल भारद्वाज जी ने नारी विमर्श के चालू मुहावरों से हटकर एक अलग दृष्टि प्रदान की । उन्होंने बताया कि नारी शोषण की मूल जड़ – सम्पति , पितृसत्ता और पितृसत्ता द्वारा संचालित मूल्य और संस्कृति है । जब तक इन पर चोट नहीं की जायेगी तब नारी को शोषण से बचा पाना मुश्किल है।

राजनैतिक चेतना :- कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य प्रतिभागियों में राजनैतिक चेतना का विकास करना था। विभिन्न विचारधाराओं के सत्र का संचालन अजीत झा जी ने किया । उन्होंने मार्क्सवाद , अंबेडकरवाद , गांधीवाद ,लोहियावाद आदि विचारधाराओं से अवगत करवाया । ‘थियेटर ऑफ रेलेवेंस’ की टीम ने राजनीति पर केन्द्रित 2 नाटकों की प्रस्तुति की – राजनीति- भाग 1 और राजनीति-भाग 2 । नाटकों का निर्देशन किया मंजुल भारद्वाज ने व अभिनय किया – अश्विनी , सायली , कोमल , योगिनी व तुषार ने ।

कला जो काम कर सकती है वो व्याख्यान नहीं कर सकता । अजीत झा सर की बात को गहराई से समझाने का काम इन नाटकों ने किया । नाटक सामंतवाद से शुरु हो कर पूंजीवाद , समाजवादी व्यवस्था से लोकतंत्र की राह के माध्यम से स्वराज तक पहुंचा । प्रत्येक व्यवस्था के शोषण – दमन व खामियों को प्रतिभागियों के सामने जीवंत कर दिया । ये कला की ताकत – अश्विनी , सायली , कोमल , योगिनी व तुषार के कमाल के अभिनय व मंजुल भारद्वाज सर के सशक्त निर्देशन से ही संभव हो पाया ।

थियेटर ऑफ रेलेवेंस

नाटक की प्रस्तुति के बाद मंजुल भारद्वाज जी ने मंडल , कमंडल और भूमंडल(उनका कथन) व WTO की नीतियों का खेल स्पष्ट किया । सोवियत संघ के विघटन के बाद उदारीकरण , वैश्वीकरण और निजीकरण की नीतियों ने पूरे विश्व को प्रभावित किया । भारत में खेती-किसानी पर संकट , मंडल कमीशन के बाद बाबरी मस्जिद का विध्वंश इन सब नीतियों का ही दुष्परिणाम है । सामाजिक न्याय के प्रश्न पर राजीव गोदारा और सुरेन्द्र पाल सिंह ने व्यापक सन्दर्भों के साथ सहभागियों की भ्रांतियों को दूर किया ।

मंजुल भारद्वाज जी के अनुसार वर्तमान सत्ता आत्महीनता से ग्रस्त है जिसे हर पल अपने ढहने का खतरा रहता है । आत्महीनता से ग्रस्त व्यक्ति या सत्ता हिंसा का सहारा लेती है और वह देश व समाज के लिए विध्वंशक व विनाशकारी होती है । इस सत्ता को आत्मबल से ही उखाड़ा जा सकता है । क्योंकि आत्मबल से विचार पैदा होता है और विचार सृजनशील होता है । मंजुल सर इस सत्ता का विकल्प स्वराज के विचार में देखते हैं ।

स्त्रीकाल का प्रिंट और ऑनलाइन प्रकाशन एक नॉन प्रॉफिट प्रक्रम है. यह ‘द मार्जिनलाइज्ड’ नामक सामाजिक संस्था (सोशायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत रजिस्टर्ड) द्वारा संचालित है. ‘द मार्जिनलाइज्ड’ मूलतः समाज के हाशिये के लिए समर्पित शोध और ट्रेनिंग का कार्य करती है.
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‘द मार्जिनलाइज्ड’ के प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें :  फ्लिपकार्ट पर भी सारी किताबें उपलब्ध हैं. ई बुक : दलित स्त्रीवाद 

संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com

सैनिटरी नैपकिन जीएसटी मुक्त: महिलाओं की मुहीम ने लाया रंग

स्त्रीकाल डेस्क 


केंद्रीय वित्त मंत्री पीयूष गोयल की अध्यक्षता में जीएसटी काउंसिल की 28वीं बैठक में महत्वपूर्ण फैसले लिए गए हैं.  मनीष सिसोदिया सहित अलग-अलग राज्यों के वित्तमंत्री ने इस बैठक के बाद बताया कि  सैनिटरी नैपकिन को जीएसटी से बाहर रखने का फैसला लिया गया है.अभी इस पर 12 फीसदी टैक्स वसूल किया जा रहा था.

नैपकिन को टैक्स के दायरे में रखने के सरकार के निर्णय का व्यापक विरोध हो रहा था. संभवतः इन विरोधों को देखते हुए सैनिटरी नैपकीन को  जीएसटी के बाहर कर दिया गया है. सरकार की मंत्री मेनका गांधी, कांग्रेस की सांसद सुष्मिता देव आदि ने वित्तमंत्री से अनुरोध किया था कि सेनेटरी नैपकिन पर जीएसटी नहीं लगाया जाये, लेकिन सरकार ने इनकी तब नहीं सुनी थी. अब इस कदम का महिलाओं के बीच व्यापक स्वागत किया जा रहा है. स्त्रीकाल में हम सरकार द्वारा नैपकिन पर जीएसटी लगाने के फैसले के विरोध की खबरों को प्रमुखता से प्रकाशित करते रहे हैं.

पढ़ें और देखें वे रिपोर्ट. 


वित्तमंत्री को सेनेटरी पैड भेजने की मुहीम: एसएफआई और कई संगठनों ने देश भर में आयोजित किया कैम्पेन

जजिया कर से भी ज्यादा बड़ी तानाशाही है लहू पर लगान

गांधी के गाँव से छात्राओं ने भेजा प्रधानमंत्री और वित्तमंत्री को सेनेटरी पैड: जारी किया वीडियो

महावारी से क्यों होती है परेशानी 

उस पेड़ पर दर्जनो सैनिटरी पैड लटके होते थे

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आदिवासी स्त्री जिसे मीडिया प्रस्तुत नहीं करती है



अंजली


मीडिया से अलक्षित आदिवासी स्त्री-छवि और मीडिया द्वारा स्टीरिओटाइप का विश्लेषण कर रही हैं अंजली


स्त्री को वैश्विक स्तर पर एक इकाई माना गया है जिसका समाज व्यवस्थाएं सर्वाधिक शोषण करती है। स्त्री को तथाकथित सभ्य और कम विकसित समाज दोनों जगह पर एक अलग तरह का व्यवहार भुगतना पड़ता है। समाज के स्तर पर, खानपान में और आत्मसम्मानपूर्वक जीवन जीने के लिए प्रदत्त मूल अधिकारों में भी स्त्री से भेदभाव बरता जाता है। यद्यपि भारतीय संविधान देश के नागरिक को लिंग, जाति, धर्म आदि के भेदों से परे मूलभूत सुविधाएँ प्रदत्त कराने को सुनिश्चित करता है और मूल अधिकार प्रदान करता है। किन्तु इन प्रावधानों के होने के बावजूद भी स्त्री समुदाय पीड़ित अवस्था में है। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के उत्थान के लिए संविधान में किए गए प्रावधानों के बावजूद भी इन वर्गों से सम्बन्ध रखने वाली स्त्रियों को अपने दिन-प्रतिदिन के जीवन में तरह-तरह की यातनाओं का सामना करना पड़ता हैं। ऐसा माना जाता है कि मीडिया के उदय से लोकतंत्र को लागू करने में सहायता मिलती है और जनतंत्र मजबूत होता है। आदिवासी समुदाय भारतीय सन्दर्भ में जातीय आधार पर बटे समुदाय से अलग है। आदिवासी समुदाय का अपना जीवन दर्शन है, जिसमें प्रकृति को सबका मूल माना गया है। इसलिए आदिवासी समुदाय में लिंग आधारित भेद उतने जड़ रूप में विद्यमान नहीं है जितने अन्य समुदायों में व्याप्त है। किन्तु जब से आदिवासी क्षेत्रों में बाहरी समुदाय का हस्तक्षेप बढ़ा है, तब से आदिवासी जन-जीवन अस्त-व्यस्त हो रहा है। इसके परिणाम के रूप में हम देखते है कि आदिवासी स्त्री और पुरुष किस प्रकार उत्पीडित हो रहे है और इस उत्पीड़न के विरोध में लड़ रहे हैं। बात यदि आदिवासी स्त्री की करें तो हम पाते हैं कि आदिवासी स्त्री की छवि हमें आज विभिन्न रूपों में दिखाई दे रही है।
आदिवासी समुदाय में बाहरी संपर्कों के दबाव के कारण अलग-अलग तरह की समस्याएँ झेलती स्त्री, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खेल-कूद में भागीदारी करती आदिवासी युवती को मीडिया अपनी रिपोर्ट में कितना स्थान देती है। आदिवासी स्त्री को किस रूप में प्रस्तुत करती है, विभिन्न क्षेत्रों में उसके योगदान को किस प्रकार रेखांकित करती है। आदिवासी स्त्री की देह को किस प्रकार प्रस्तुत करती है और उसके प्रति क्या नजरिया रखती है। मीडिया के बारे में आदिवासी स्त्री की छवि या तो एक रोमांटिसिज्म की है या वस्तुतः निकृष्ट जबकि जरुरत यह है कि आदिवासी की वास्तविक मानवीय छवि को मीडिया में दिखाया जाए, उसकी समस्याओं और संघर्षों पर बात की जाए और उसका हल निकालने का रास्ता सुझाया जाए। मीडिया में आदिवासी स्त्री की प्रस्तुति- मांसल देह के रूप में, राज्यद्वारा या अन्य वर्चस्वशाली समुदायों द्वारा आदिवासी स्त्री का शोषण होने पर उसकी खबर को किस रूप में प्रस्तुत करती है। उससे भी आदिवासी स्त्री की मीडियाकरण की छवि निर्मित होती है। मानव तस्करी की शिकार स्त्री के रूप में, आदिवासी स्त्री की खेल में परफोर्मेंस के आधार पर उसकी छवि, अपने और राष्ट्र के हित में जो छवि आदिवासी स्त्री की है उसको मीडिया दिखाता है जैसे खेल प्रतिस्पर्धाओं में जीतने पर कितना ध्यान उन पर देता है।

इन सब मुद्दों पर मीडिया का क्या स्टैंड है इसके माध्यम से हम देखने की कोशिश करेंगे कि आदिवासी स्त्री का मीडियाकरण कैसे किया गया है। आदिवासी समुदाय वस्तुतः जल, जंगल और जमीन पर पोषण करने वाले समुदाय है। जिनका अपना प्रकृति धर्म और अखड़ा समुदाय है। किन्तु वर्णव्यवस्था आधारित ग्रंथों में आदिवासी स्त्री और पुरुष दोनों को गैर-मानवीय और आर्य सौन्दर्य प्रतिमानों से इतर दिखाया जाता है। आज मीडिया जो मनोरंजन का दायित्व भी फिल्मों और नाटकों के माध्यम से वहन किए हुए है, वह इन धर्मशास्त्रों आधारित जड़ताओं को तोड़ने की बजाय मजबूत कर रहा है। मात्र भव्यता दिखाने के लोभ में आदिवासी स्त्री को अधिक मिथकीय और अपनी कल्पनाके रूप में प्रचारित कर रहा है। जिसके नख-केश-त्वचा इत्यादि मानवीय न होकर बेड़ोल रूप में दिखाए जाते है। ये सब बाहरी रूप-रंग के पैमाने आदिवासी स्त्री को गैर-आदिवासी समाज की नजरों में आभासी और गैर-यथार्थमयी बनाता है। मीडिया और आदिवासी विषय पर चर्चा करते समय हरिराम मीणा अपनी किताब आदिवासी दुनिया में कुछ सवाल मीडिया की भूमिका पर उठाते है जैसे उनके सवाल हैं “मुख्यधारा के जन संचार माध्यम अर्थात मास मीडिया में आदिवासियों को कितना स्पेस दिया जाता रहा है? इस सवाल का जवाब तलाश करते वक्त यह मुद्दा भी सामने आता है कि उस दिए गए स्पेस में आदिवासियों के प्रति कहाँ तक यथार्थ के निकट है? दूसरा सवाल यह उठा है कि आदिवासियों का अपना मीडिया कहाँ तक विकसित हुआ है चाहे उस मीडिया में योगदान देने वाले व्यक्ति आदिवासी समुदाय के सदस्य हों या आदिवासी जीवन में रूचि रखने वाले गैर-आदिवासी लोग?”  मीडिया के सन्दर्भ में बात करते समय हमें यह भी ख्याल रखना होगा कि यहाँ जन संचार के सभी माध्यमों को सम्मिलित किया जा रहा है जैसे प्रिंट मीडिया, अखबार और पत्रिकाएं, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया जिसमें दूरदर्शन और सिनेमा और साथ ही साथ खबरी चैनल भी सम्मिलित है। इन्टरनेट जैसी सुविधा होने के कारण बहुत सारे अन्य सोशल नेटवर्किंग संचार माध्यमों को भी शामिल किया जाता है जैसे ऑनलाइन पत्रिका, न्यूज़ पोर्टल, ब्लॉग, फेसबुक-ट्विटर और अन्य डिजिटल सामग्री भी शामिल है।

इन सब संचार माध्यमों में आदिवासी स्त्री की छवि देखने के लिए यह आधारभूत जानकारी होना भी जरुरी है कि इन संचार माध्यमों में कितने बुद्धिजीवी शामिल है, उनकी मान्यताएं और विश्वास क्या है यानी वे किस समुदाय से आ रहे है। जिन समुदायों से वे आ रहे है क्या मीडिया में आकर वे अपनी पूर्व प्रदत्त विचार शैली से इतर मीडिया सिद्धांत और नैतिकता के अनुसार पत्रकारिता करते है या नहीं। भारत में खासकर हिन्दी मीडिया में एथिक्स और मोरलिटी का बहुत अभाव है। जिसके कारण आदिवासी स्त्री की मीडिया में गलत छवि पेश की जाती है। अख़बार और पत्रिकाओं में निरंतर ऐसी खबरे छपती रहती है जिसमें मानव तस्करी के मामलें होते हैं किन्तु इन मामलों की पृष्ठभूमि क्या है इसको मीडिया नहीं खंगालता। लड़की और स्त्री इन मानव तस्करी की शिकार होती है जिन्हें आदिवासी क्षेत्रों जीविकोपार्जन का लोभ देकर ऐसे क्षेत्रों में लाया जाता है जहाँ स्त्री का लिंगानुपात कम होता है। ऐसी जगहों पर लड़कियों को गलत तरीके से पुरुषों को बेच दिया जाता है। ऐसे मामलों में मीडिया अपनी सिर्फ इतनी ही भूमिका का निर्वहन करके छोड़ देता है कि अमुक जगह इतनी आदिवासी जगहों की स्त्रियों को तस्करों से छुड़ाया गया आदि। इस तस्करी के पीछे की जमीन क्या है इस पर बात नहीं की जाती कि किस प्रकार आदिवासी क्षेत्रों की जमीन को विभिन्न भारी उद्योग-धंधों के लिए आदिवासियों से बलपूर्वक राज्य या माफिया सरगना ले लेते हैं। जिसका परिणाम होता है विस्थापन और जीविकोपार्जन के लिए एवं बसने के लिए नई जमीन की तलाश करना। इससे आदिवासी परिवार के विभिन्न लोग एक-दूसरी जगह पर जाने के लिए बाधित होते है। जिसमें से कई बार आदिवासी स्त्रियों को काम दिलाने के बहाने से गैर-आदिवासी क्षेत्रों से गए पुरुष ही आदिवासी स्त्रियों का घरेलू शोषण और तस्करी करते है। इन मुद्दों पर तथाकथित मीडिया में चुप्पी साध ली जाती है। गैर-सरकारी संगठनों के प्रयासों को भी अधिकतर दरकिनार कर दिया जाता है। जिससे यह होता है कि गैर-आदिवासी समाज में आदिवासी स्त्री की छवि इस प्रकार पीड़ित और शोषित के रूप में बनती तो है लेकिन स्त्री के प्रति मानवीय छवि मीडिया बनाने में असफल रहता है। यदि हालिया समय में आदिवासी स्त्री से जुड़े कुछ मुद्दों की मीडिया में प्रस्तुति पर बात की जाए तो देखा जा सकता है कि मीडिया जनतंत्र की ओर है या राज्य की ओर। आदिवासी क्षेत्रों में जब भी सैन्य बल या अर्ध सैन्य बल जाते है, तब वे वहाँ के गाँव तहस-नहस करते है, किसी आदिवासी स्त्री-पुरुष को नक्सली के नाम पर नृशंस हत्या करके उसे नक्सली कहकर प्रचारित करते है और आदिवासी लड़कियों और स्त्रियों के साथ जबरदस्ती यौन अपराध करते है। आदिवासी समुदाय द्वारा प्रतिकार करने पर उन्हें फंसाकर क़ानूनी शिकंजों में बाँध देते है। आदिवासी क्षेत्रों में हिंसा के बहुत सारे मुद्दे इसी तरह घटते है। यहाँ मीडिया इस तरह की रिपोर्टिंग करता है जिसमें राज्य और उसकी छवि को साफ तौर पर बचाने की कोशिश की जाती है और उल्ट आदिवासी स्त्री को ही नक्सली स्त्री बनाकर उसके साथ हुए हर वीभत्स तरीके से किए गए यौनाचार को देश हित एवं सुरक्षा के नाम पर ढँकने की कोशिश की जाती है। आदिवासी क्षेत्र में अध्यापन का कार्य करने वाली सोनी सोरी और सन् 2016 में सुकमा जिले के गोमपाड़ गाँव की आदिवासी युवती मडकम हिडमे के साथ सैन्यबलों द्वारा किया गया व्यवहार और उसकी मीडिया द्वारा की गई पक्षपातपूर्ण रिपोर्टिंग आदिवासी स्त्री के मीडियाकरण का स्पष्ट उदाहरण है।

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में प्रोफेसर सोना झरिया मिंज

समयांतर के फरवरी, 2017 के अंक में रामू द्वारा लिखे गए लेख ‘मानवाधिकारों का हनन और आदिवासी’ में हम स्पष्टतया देख सकते हैं कि किस प्रकार राज्य और मीडिया आदिवासी स्त्री के लिए निष्पक्ष न्याय के पथ में बाधा पहुँचाते है। जो पत्रकार एवं कानूनी सहायता प्रदत्त कराने वाले समूह है और इन अपराधों पर से पर्दा उठाने का प्रयास करते हैं तो उन्हें देश के हित के खिलाफ काम करने वाले लोगों के रूप में राज्य संरक्षण प्राप्त मीडिया चित्रित करती है। उन्हें देशद्रोही, माओवादी-नक्सली ठहराने की कोशिश की जाती है और जेलों में अपराधियों की तरह रखा जाता है। रामू अपने इस लेख में लिखते हैं “भारतीय सुरक्षा बलों द्वारा अंजाम दिएगये ऐसे ही जघन्य अपराधों के एक छोटे से अंश की पुष्टि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने की है, शायद यह स्वीकृति गिनी-चुनी महिलाओं को ही सही न्याय दिलाने की दिशा में एक छोटा कदम साबित हो।”  एन. एच. आर. सी. ने 7 जनवरी 2017 की अपनी रिपोर्ट में माना कि “प्रथम दृष्टया यह पाया गया कि 16 महिलाओं के साथ बलात्कार, यौन हिंसा और शारीरिक प्रताड़ना हुई है और इसे छतीसगढ़ राज्य पुलिस बल के जवानों ने अंजाम दिया है।”  छत्तीसगढ़ में 11 जनवरी से 14 जनवरी 2016 के बीच बीजापुर जिले के बेल्लाम लेंद्रा (नेंद्रा) गाँव की 13, सुकुमा जिले के कुन्ना गाँव की छह और दांतेवाडा जिले के छोटेगडम गाँव की महिलाओं के साथ सुरक्षा बलों ने सामूहिक बलात्कार किया था।”  “11 और16 मार्च 2011 की घटना, जिसमें दंतेवाड़ा जिले के 250 आदिवासी घरों को केंद्रीय और राज्य सुरक्षा बलों द्वारा फूँक दिया गया था, इस घटना की जांच सीबी आई द्वारा कराने का आदेश सुप्रीम कोर्ट ने दिया था। इस जांच में यह पाया गया कि घरों को जलाने का काम सुरक्षा बलों ने ही किया था, वहीं जांच के दौरान इस बात की भी पुष्टि हुई थी कि तीन महिलाओं के साथ सुरक्षा बलों ने बलात्कार किया था।”  “8 जनवरी 2016 को दांतेवाडा थाने के पदम गाँव की 14 वर्ष की लड़की, जब अपनी किराने की दुकान बंद कर रही थी, उसी समय एक के रिपुब का एक जवान आया और  उसके साथ पूरी रात बलात्कार किया।”  “बलात्कार की शिकार एक पीड़िता ने इंडियन एक्सप्रेस संवाददाता को बताया कि ‘वह अदालत गई। अदालत के दरवाजे पर खड़े पुलिस वालों ने उसे अंदर ही नहीं जाने दिया, लोग आते-जाते रहे हम वापस आ गए।’”  पत्रिका में जाहिर इन सब घटनाओं को पढ़कर हम यह सवाल उठा सकते हैं कि मुख्यधारा का मीडिया क्यों इन आदिवासी स्त्रियों के शोषण पर मौन है और यही मुख्यधारा का मीडिया बेंगलुरु और दिल्ली में घटित स्त्री शोषण की घटनाओं पर सचेत रहता है लेकिन आदिवासी स्त्री पर लम्बे समय से हो रहे निरंतर शोषण पर कोई आवाज़ नहीं उठाता। यह मीडिया की यह चयनित रिपोर्टिंग बताती है कि शोषित के लिए न्याय उठाने के रास्ते कितने कठिन और संकीर्ण है। रामू अपनी रिपोर्ट में जिस एक ओर बात की तरह ध्यान दिलाते हैं वह है कि आदिवासी स्त्री के सवालों को नक्सलवादी, माओवादी बताकर किनारे कर दिया जाता है लेकिन कोई मीडिया आदिवासी स्त्री के हक में बात उठाते वक्त यह नहीं बताता कि आदिवासी इलाकों में जहाँ नक्सलवाद या माओवाद नहीं है वहाँ के आदिवासी भी अपने जल, जंगल और जमीन की लड़ाई लड़ रहे हैं। और ऐसा वे अपनी संविधान प्रदत्त पांचवीं अनुसूची और वन अधिकार अधिनियम के तहत कर रहे हैं। आदिवासी स्त्री की लड़ाई मुख्यत: अपने जीविको पार्जन के साधनों के संरक्षण की है, जल-जंगल-जमीन को बचाने की है लेकिन बाहरी लोगों के प्रवेश ने और सैन्यबलों ने उनके आत्मसम्मानपूर्वक जीने के अधिकार को बाधित किया है। जिसकी छवि मीडिया में कुछ इस तरह से प्रस्तुत की जाती है जिससे आदिवासी स्त्री को अपनी न्याय की लड़ाई में कोई मदद नहीं मिलती। रामू की मानवाधिकारों के हनन पर लिखी गई इस रिपोर्ट में यह सवाल भी उठाया गया है कि आदिवासी महिलाओं के साथ हुए यौनशोषण पर देश की मुख्यधारा की मीडिया चुप्पी की रणनीति (थ्योरी ऑसायलेंस) अपनाते हुए चुप्पी साधे रहती है क्योंकि कोर्पोरेट द्वारा संचालित और पोषित मुख्यधारा का मीडिया राज्य के साथ खड़ा हुआ है न कि अपने नागरिकों के साथ। इसलिए इन सब मीडिया के नजरियों से देश का आदिवासी और देश की आदिवासी महिलाओं की ऐसी छवि तैयार की जा रही है जिसमें उन्हें देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरा बताया जा रहा है और उन्हें इस आधार पर नेस्तानाबूद किया जा रहा है। इस छवि के रूप में आदिवासी स्त्री का मीडियाकरण देश की नागरिकता के लिए खतरा है जिसमें नागरिकता का अधिकार भी चयनित और सुविधाभोगी तबकों को ही उपलब्ध है।

हॉकी के लिए ध्यानचंद खेल सम्मान से सम्मानित सुमारी टेटे

छोटे स्तर पर बहुत कम पत्रिकाएँ ऐसी है जो दलित-आदिवासी जीवन की वास्तविक सच्चाइयों से पाठक को रूबरू कराती है। ‘गोंडवाना सन्देश’ और ‘दलित आदिवासी दुनिया’ ऐसे ही प्रिंट मीडिया के लघु प्रयास हैं जिनके माध्यम से आदिवासी समाज की स्त्रियों के जन-जीवन से संघर्ष और लड़ाई की वास्तविक छवि जनसमुदाय तक पहुँच पा रही हैं। लेकिन मुख्यधारा के मीडिया में कोई भी प्रयास आदिवासी स्त्री की छवि को सकारात्मक रूप में नहीं जाहिर करता। कभी कभार कुछ घटनाओं में ही आदिवासी जीवन को सीमित कर दिया जाता है जिसका कोई नतीजा आदिवासियों के हक में नहीं निकलता। जैसे ओडिशा के कालाहांडी जिले के भवानीपटना में एक व्यक्ति अपनी पत्नी के शव को 12 किलोमीटर बांधकर और कंधे पर रखकर लाने की घटना को मुख्यधारा के मीडिया ने खूब भुनाया लेकिन उसके बावजूद कभी आदिवासी स्त्री के स्वास्थ्य की स्थिति का जायजा लेने का प्रयास नहीं किया। इसी तरह गेट्स फाउंडेशन ने सर्वाइकल कैंसर की दवाओं का आदिवासी स्त्रियों पर प्रयोग किया, जिस पर मीडिया महकमें में कोई खास हलचल नहीं हुई। इनसब घटनाओं के माध्यम से आदिवासी स्त्री की मीडिया में बन रही छवि का मोटा-मोटा अंदाजा हो जाता है कि उसकी राष्ट्र निर्माण में क्या स्थिति है।

इसी तरह की विस्तृत रिपोर्ट समयांतर के अगस्त  2016 के अंक में संजय पराते, विनीत तिवारी, अर्चना प्रसाद और नंदिनी सुंदर की भी प्रकाशित हुई है जिसका शीर्षक है ‘गैर जिम्मेदार युद्ध में पिसते छत्तीसगढ़ के आदिवासी’ इस रिपोर्ट में आदिवासी स्त्री के साथ सुरक्षा बलों द्वारा की गई यौन शोषण और हत्या का जिक्र है जिसके अनुसार चुचकुंटा गाँव की एक नवजवान औरत फुल्लो के साथ 17-18 जनवरी 2016 को, जब वह एक सिंचाई तालाब पर काम कर रही थी, सुरक्षा बलों ने बलात्कार किया। उस पर पुलिस ने नक्सली होने का इल्जाम लगाया हालाँकि ग्रामीण इस बात से इंकार कर रहे थे। इसी तरह अंतागढ़ के गाँव में बीएसएफ, एसपीओ द्वारा बलात्कार और यौन शोषण की घटना की भी रिपोर्टिंग इसमें की गई है, जिसके माध्यम से हम जान सकते है कि ऐसी घटनाएँ कितने बड़े स्तर पर घटती है और उनकी रिपोर्टिंग कहीं भी मुख्यधारा की प्रिंट और मास मीडिया में रिपोर्टिंग नहीं की जाती। और अधिक विस्तार से जानने के लिए समयांतर के इस अंक को देखा जा सकता है।
आदिवासी स्त्री की जो एक और छवि हम देखते है वह है खेलों में उनकी सक्रिय भागीदारी। आदिवासी समुदाय से राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खेल-कूद में भागीदारी करने वाली आदिवासी युवती को ही कितना स्थान देता है। मयूरभंज, उड़ीसा की 24 वर्षीय पूर्णिमा हेम्ब्रेम ने अभी तुर्कमेनिस्तान में आयोजित 5वें ‘एशियन इंडोर गेम’ में पेंटाथलॉन खेल प्रतियोगिता में स्वर्ण पदक प्राप्त किया। इसी तरह हॉकी खेल में भी आदिवासी युवतियों की प्रस्तुति सराहनीय है लेकिन हॉकी को राष्ट्रीय खेल होने के बावजूद मीडिया में क्रिकेट की तुलना में हॉकी को कम कवरेज दी जाती है। चूँकि हॉकी में व्यापारिकता और ग्लैमर का अभाव है, जो कि बाजार के नियंत्रक और नियंता भी काफी हद तक है इसलिए इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में सिर्फ एक हैडलाइन तक ही आदिवासी स्त्री खिलाडियों की बुलंदियां सिमट कर रह जाती है। प्रिंट मीडिया के सहारे इक्का द-
क्का राष्ट्रीय व स्थानीय अख़बारों और पत्रिकाओं में ही क्षेत्रीय अभिमान के द्वारा आदिवासी स्त्री की खिलाडी की छवि सामने आती है।

आदिवासी वीमेन एक्टिविस्ट

ऐसी ही कहानी है असुंता लकड़ा की, जो हॉकी खिलाडी है लेकिन बिरले ही हममें से उनका नाम जानते है। नीचे दी गई बातचीत जोहार झारखण्ड के फेसबुक पृष्ठ से ली गई है जिसे एक व्यक्ति ने अपने अनुभव के माध्यम से साझा किया है| किस तरह खेलों में भी आदिवासी स्त्री की उपेक्षा सिर्फ मीडिया ही नहीं बल्कि सरकार भी करती है| “क्या आप इन्हें पहचानते हैं? एक नजर में शायद आप भी इन्हें न पहचान पायें, लेकिन नाम और इनके काम का जिक्र आते ही आप इन्हें जरूर पहचान जायेंगे। ये हैं असुंता लकड़ा। ओलंपिक खेलों के लिए क्वालिफाइंग इंडियन टीम की कप्तान और झारखंड के सिमडेगा से आने वाली हॉकी सनसनी। दोपहर में रांची के हटिया स्थित डीआरएम ऑफिस के बाहर यूं ही पैदल चलते हुए मिल गयीं। शुरुआत में मैं भी उन्हें एक आम आदमी समझ आगे बढ़ चला था, लेकिन फिर गौर किया, तब समझा कि ये तो हमारी अपनी असुंता हैं। झिझकते हुए उनसे सवाल किया- आप असुंता हैं न? सरल तरीके से उन्होंने जवाब दिया- हां। फिर सवाल कौंधा और पूछ डाला, आप इतनी बड़ी हॉकी खिलाड़ी और आप ऐसे ही घूम रही हैं? कोई ताम-झाम नहीं, आस-पास कोई फैन भी नहीं? असुंता कहती हैं- मैं कोई क्रिकेट खिलाड़ी थोड़े ही हूं!! उनके इसी जवाब में छिपा दर्द भी सामने आ गया। फिर उन्होंने बताया कि कैसे आज भी उन्हें डिबडीह में एक किराये के मकान में रहना पड़ रहा है। आज तक सरकार की ओर से उन्हें न तो भूखंड मिला और न ही कोई क्वार्टर ही उपलब्ध कराया गया। असुंता इस देश में क्रिकेट के बाजारवाद के कारण तेजी से मरते जा रहे अन्य खेलों के भुक्तभोगी खिलाड़ियों की एक बानगी हैं। खैर, डीआरएम ऑफिस में उनका आना इसलिए होता है, क्योंकि वे रेलवे में कार्यरत हैं। वैसे उन्हें भोपाल में हॉकी कैंप में जाने के लिए टिकट कटाना था, इसलिए खुद इस दफ्तर में आना पड़ा। पहले तो रिजर्वेशन मिलना ही मुश्किल होता था, लेकिन जब से रेलवे ने उन्हें पहचान लिया है, तब से कम परेशानियां झेलनी पड़ती हैं। असुंता बताती हैं कि 2014 में दक्षिण कोरिया में होने वाले एशियाई खेल और ग्लासगो, स्कॉटलैंड में होने वाले कॉमनवेल्थ खेलों को लेकर टीम की तैयारी चल रही है। झारखंड की सरकार से उन्हें क्या अपेक्षा है? इस सवाल पर असुंता मुस्कराती हैं, फिर जवाब देती हैं- मैं आज भी किराये के मकान में रह रही हूं, और क्या कहूं। आप लोग खुद समझ सकते हैं।” वर्तमान में भारतीय हॉकी टीम में  खिलाडी नवजोत कौर दीप, ग्रेस एक्का, मोनिका मलिक, निक्की राधन, अनुराधा देवी, सविता पुनिया, पूनम रानी, वंदना कटारिया, दीपिका ठाकुर, नमिता टोप्पो, रेणुका यादव, सुनीता लाकरा, सुशीला चानू, रानी रामपाल, प्रीती दुबे और लिलिमा मिंज हैं। इनमें से कई आदिवासी समुदाय से आने वाली खिलाडी है| हाल ही में नई दिल्ली में आयोजित राष्ट्रीय नेहरू हॉकी प्रतियोगिता में 6 अक्टूबर 2017 को झारखण्ड की टीम ने पंजाब को 6-1 से पराजित किया लेकिन विस्तार से इन खबरों के बारे में हमें किसी मुख्यधारा की प्रिंट या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में देखने-पढ़ने को नहीं मिलता| यहाँ हम देख सकते हैं कि किस प्रकार आदिवासी स्त्री को खेल के क्षेत्र में भी सक्रिय होने पर मीडिया में उसकी प्रतिभा और खेल के प्रति जूनून को नजरअंदाज किया जाता है|

मॉडल रीनी कुजूर

मीडिया में आदिवासी स्त्री की प्रस्तुति – मांसल देह के रूप में–
इस तरह यदि मीडिया की भूमिका आदिवासी स्त्री की छवि को प्रस्तुत करने में देखी जाए तो हमें मीडिया की बहुत कम दिलचस्पी आदिवासी स्त्री के जन-जीवन को जानने-समझने और उसके सवाल उठाने में नहीं दिखाई देती| इसकी बजाय मीडिया बरगलाने की राजनीति अधिक करती है क्योंकि मीडिया सरकार को देश मान बैठी है और उसकी गलत नीतियों के विरोध में खड़े होने वाले आदिवासी समुदाय जिसमें आदिवासी स्त्री और पुरुष दोनों सम्मिलित है, उन्हें अपना विरोधी मान बैठी है| जो मीडिया का आचार और नैतिकता के विरोध में है| यही कारण है कि मीडिया आदिवासी स्त्री को या तो नक्सली के रूप में चित्रित करती है या उससे जुड़े मुद्दों के बारे में चुप्पी साधे रहती है लेकिन जब मीडिया को आदिवासी स्त्री का भुनाने लायक कुछ मुद्दा मिल जाता है तो उससे फायदा उठाना भी नहीं भूलती| यही कारण है कि हमारे देश की मीडिया की रैंकिंग विश्व में 136वें स्थान पर है, इसका मतलब हुआ कि मीडिया की विश्वसनीयता, नैतिकता और निष्पक्षता बहुत ही कम है| इस रैंकिंग का अर्थ है कि मीडिया अपने देश के लोगों के लिए, लोकतंत्र की एकता और अखंडता के लिए काम नहीं करता| आदिवासी इलाकों में स्त्रियों पर किए जाने वाले अलग-अलग तरह के अपराधों के बारेमें अधिसंख्य मीडिया फर्म रिपोर्टिंग करने में दिलचस्पी नहीं लेते| इसके साथ ही साथ खेल-कूद जगत में आदिवासी इलाकों से उभरती प्रतिभाओं को किन समस्याओं का सामना करना पड़ता है, देश के लिए खेलने में आगे किस-किस तरह की चुनौतियों का सामना आदिवासी स्त्री खिलाडियों को करना पड़ता है| इस लिए यह कहा जा सकता है कि मीडिया जिसमें आज अधिकतर प्राइवेट फर्म के रूप में बाजार में है और हमारे घर में सूचना प्रसारण की जिम्मेदारी इन मीडिया फर्मों ने अधिकतर अपने जिम्मे ही ले ली है| ऐसी मीडिया ने आदिवासी स्त्री की छवि को बहुत नुक्सान पहुँचाया है| इसलिए स्थानीय मीडिया, सोशल नेटवर्किंग साइट्स, वेब न्यूज़पोर्टल आदि जैसी वैकल्पिक मीडिया ने आदिवासी स्त्री की छवि को प्रस्तुत करने की एक ईमानदार कोशिश शुरू की है| जिसमें उनकी यथास्थिति को समझने की कोशिश की जा रही है, और उसके माध्यम से उनके लिए न्याय और लोकतान्त्रिक नागरिक अधिकारों के लिए सवाल उठाए जा रहे है|

अंजली जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के  भारतीय भाषा केंद्र में शोधार्थी हैं  सम्पर्क : anjali1441992@gmail.com

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ग्यारहवीं ‘ए’ के लड़के देश का भविष्य हैं, असली खतरा ग्यारहवीं ‘बी’ की लड़कियां हैं

जया निगम 

सनी लियोनी  और सपना चौधरी हमारे समय के पुरुषों के लिये सपनीली परियां हैं, क्लास और कल्चर की ऊंची-ऊंची दीवारों को लांघते हुए इन दोनों ही औरतों ने अपनी लोकप्रियता की बड़ी शानदार मीनारें खड़ी की हैं. इसी तरह भाभी जी घर पर हैं की शिल्पा शिंदे की सेक्स अपील के चर्चे हर घर में हैं. सदियों से गणिकाओं और नगरवधुओं के नाम पर पुरुषों की यौन फंतासियों को पूरा करने वाली औरतें का जो अस्तित्व बाज़ार में रहा है, उन्ही लालसाओं के ऑन स्क्रीन अवतार के रूप में ये महिलायें दिख रही हैं. सविता भाभी की शोहरत के किस्से अभी पुराने नहीं हुए हैं.

भारत में इन महिलाओं की विराट सफलता के बरक्स कोई पुरुष अपनी सेक्स अपील के चलते बाजार में छाने में इतना कामयाब रहा हो ऐसा याद नहीं आता हालांकि इसके अपवाद स्वरूप केवल फवाद खान का नाम ही याद आता है जिनकी सेक्स अपील के फंदे में महिलायें मास लेवेल पर फंसीं लेकिन क्लास और कल्चर की सीमाओं को लांघना उनके लिये भी बहुत दूर की कौड़ी थी.

क्या इन दीवानावार आदमियों को अपने घर की महिलाओं के ‘टेस्ट’ के बारे में कुछ पता है? माना कि ज्यादातर ने ये जानने की जरूरत कभी महसूस ही नहीं की होगी लेकिन जिन्हे ‘जरूरतों का ख्याल’ आता है जो ये मानने के दावे करते हैं कि औरतें भी आदमियों की तरह इंसान होती हैं. उनकी भी इच्छायें-वासनायें, हार-जीत, संघर्ष-पराक्रम और अहम-कुंठायें होती हैं. उनके लिये भी सेक्स का चैप्टर खुलते ही केवल पुरुषों के फलसफे ही वास्तविक रह जाते हैं.

हिंदी के युवा लेखक गौरव सोलंकी की एक कहानी है, 11वीं A के लड़के. यूं तो ये कहानी बेहद विवादास्पद है और नयेपन की संभावनाओं से भरपूर भी, लेकिन मेरे लिये इस कहानी की खास बात है – एक ही क्लास में पढ़ने वाले भाई और बहन की सेक्सुअल फैंटेसीज़ का समानांतर चलना और उनका आपस में एक-दूसरे से ये सब साझा करना. कहानी में शायना, नायक की हमउम्र बहन है जिसका प्यार अमरजीत से है जो उसी की क्लास में पढ़ने वाला पढाकू किस्म का, चॉकलेटी संभावनाओं से भरपूर लड़का है जिसकी शक्ल के पीछे पूरे क्लास की लड़कियां एक साल फेल होने को तैयार हैं जबकि इस हल की दुकान चलाने वाले लड़के को केवल किताबों से मुहब्बत है. शायना और उसका भाई सर्विस क्लास मां-बाप की नौकरों के दम पर पलने वाली संतानें हैं. शायना का भाई अमरजीत की भाभी के साथ सविता भाभी की कल्पनाओं के सच होने से शुरुआत करते हुए उसकी सलवार तक धोने लगता है जबकि शायना अमरजीत की किताबों के पैसे चुकाते-चुकाते उसकी दाढ़ी बनाने लगती है.
इस किताब पर भारतीय ज्ञानपीठ की आपत्ति थी कि भाई-बहन के रिश्ते को इस तरह से कहानी में दिखाया जाना अश्लील है और हिंदी समाज भी इस तरह की कहानियों के लिये तैयार नहीं है, ये उद्गार उन्होने लेखक गौरव सोलंकी को लिखे गये अपने पत्र में व्यक्त किये जिसके लिये वो तायार नहीं हुए, उन्हे ये भी गवारा नहीं था कि वो अपनी कहानी में सगे भाई-बहन के रूप में दिखाये गये अपने पात्रों का रिश्ता बदल कर कुछ ममेरा या चचेरा कर दें. इस संग्रह का नाम पहले था – सूरज कितना कम जो बाद में एक अन्य प्रकाशन से ग्यारहवीं ए के लड़के के नाम से छप कर आया.

दरअसल ये पूरा किस्सा साल 2012 का है और हमारे समाज में यौन फंतासियों और सुखों पर लगे लैंगिक पहरों के अलग-अलग किस्सों की केवल एक नज़ीर भर है. देश के आकाओं को रानी जैसी गरीब घर की बहू-बेटियों का सविता भाभी में बदल जाना तो पुश्तैनी प्रहसन लगता है लेकिन दिक्कत उन्हे होती है शायना जैसी लड़कियों के अपने भाईयों के बरक्स अपनी प्रेम और वासनाओं के सिलसिले चलाने से, यौन सुखों और फंतासियों को अपनी तरह से जीने के उनके वादों और दावों से.

जो भाई अपनी बहनों को घर, परिवार, पड़ोस, देश और धर्म की चौहद्दी में बांध कर खुद अपने शिकारी अभियानों में व्यस्त रहते हैं, उनके हाथों इस देश का धर्म, संस्कृति और अर्थव्यवस्था बिल्कुल सुरक्षित रहती है लेकिन जो लड़के अपने साथ अपनी बहनों के इंसानी हकों को पहचान कर उन्हे नहीं दबाना नहीं सीखते, धमकाना और जरूरत पड़ने पर मारना नहीं सीखते वो ‘गुड़गांव’ जैसे शहरों के लिये किसी मतलब के नहीं बनते. क्या इत्तफाक है कि गौरव ने ये कहानी जिस शहर से भाग कर लिखी, उसी शहर के बनने की कहानी शंकर रमन ने लिखी.
देश में चलते सेक्सी बवंडर की एक से बढ़ कर एक डरावनी कहानियां सामने आ रही हैं – मगर देश को खतरा इन सच्ची कहानियों के वास्तविक अपराधियों से ज्यादा ऐसी काल्पनिक कहानियों के सच्चे किरदारों से हैं जो किस्सा, गुड़गांव, तितली, सिटीलाइट्स, अनफ्रीडम, एंग्री इंडियन गॉडसेज, एस दुर्गा और ग्यारहवीं ए के लड़के जैसी कहानियां कह रहे हैं.

इसे ऐसे भी कह सकते हैं कि ‘गुनाहों का देवता’ पढ़ कर मंत्रमुग्ध हो जाने वाली पीढ़ी उसी देवता की निजी जिंदगी पर आधारित ‘रेत की मछली’ को सुनने के लिये बिल्कुल तैयार नहीं है.
हमारी सोसायटी जिस किस्म के सेक्सी चक्रवात से गुजर रही है उसके बीचोबीच एक किस्म का ‘निर्वात’ है. निर्वात टूटेगा तो चक्रवात बिखर जायेगा. इस निर्वात को तोड़ने के औजार ‘रानी’ के पास नहीं हैं पर शायना के पास हैं, इसलिये उसका चुप रहना जरूरी है.

 आईआईएमसी की पूर्व छात्रा जया निगम फिलहाल फ्रीलांस करती  हैं. 
 

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स्त्रीकाल शोध पत्रिका अंक (28-29)

स्त्रीकाल शोध पत्रिका ऑनलाइन  का यह अंक  28-29 है. इस अंक में भारती शुक्ला, ज्योति कुमारी, अंजली, पूनम प्रसाद, डॉ. तूबा जमाल, डॉ. सुनीता कुमारी, डॉ. सुनीता शर्मा,डॉ. कुमारी उर्वशी, कृष्णचन्द, डॉ. सोनिया माला,संदीप तानाजी कदम,कविता रानी,सविता रानी,डॉ. शगुफ़्ता नियाज़,डा. नंदिनी सहाय,प्रियंका कुमारी नारायण,मनीष कुमार,सुनील कुमार यादव,सविता,डॉ लीना बी. एल ,शिल्पा शर्मा,डॉ. विमलेश शर्मा,सुबोध कान्त,दिवाकर एन और शिखा के शोध-आलेख प्रकाशित हैं. इस अंक को लिंक के जरिये नॉटनल पर पढ़ा जा सकता है. चित्र: सुनील लीनस डे



स्त्रीकाल शोध पत्रिका अंक 28-29 

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बहुजन भारत के शौर्य-मेधा का प्रतीक बनी हिमा दास

स्त्रीकाल डेस्क 


फ़िनलैंड के टैम्पेयर शहर में 18 साल की हिमा दास ने 12 जुलाई को इतिहास रचते हुए आईएएएफ़ विश्व अंडर-20 एथलेटिक्स चैंपियनशिप की 400 मीटर दौड़ स्पर्धा में पहला स्थान प्राप्त किया. हिमा विश्व एथलेटिक्स चैंपियनशिप की ट्रैक स्पर्धा में स्वर्ण पदक जीतने वाली पहली भारतीय हैं. किसान परिवार से आने वाली हिमा असम के नौगांव ज़िले की रहने वाली हैं. पिता-माता उनकी कोचिंग का खर्च उठाने की स्थिति में भी नहीं थे. कोच निपुण दास ने उन्हें ट्रेंड किया.

हिमा दास पीटी उषा के साथ

हिमा दास की इस शानदार उपलब्धि की दावेदारी को लेकर हालांकि सोशल मीडिया में बहस छिड़ गयी है. आरक्षण विरोधी और कथित मेरिट के दावेदार हिमा को अपना बता रहे हैं, ब्राह्मण परिवार से बता रहे हैं वहीं कथित मेरिट को अवसर की समानता से जोड़ने वाले आरक्षण समर्थक उसे बहुजन समाज की नायिका बताते हुए मेरिट के मिथ के खिलाफ लिख रहे हैं.

सोशल मीडिया में बहुजन विचारक के रूप में प्रतिष्ठा प्राप्त वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल लिखते हैं: 

क हायपोथिसिस पर विचार करें.
अमेरिका में जब रंगभेद चरम पर था, शासन-प्रशासन, शिक्षा, बिजनेस वगैरह क्षेत्रों में ब्लैक्स को आगे आने से रोका जा रहा था, तो अश्वेत लोगों ने दो क्षेत्रों में खुद को झोंक दिया.
कला-संगीत और खेल.
इन दो क्षेत्रों में अमेरिका में अश्वेत लोगों ने वह कर दिखाया, जिसकी कल्पना भी वहां के श्वेत नहीं कर सकते थे. वहां एक से एक प्रतिभाएं अश्वेतों के बीच से निकलकर आईं और सारी दुनिया पर छा गईं.
अब वहां का सिस्टम अश्वेतों के प्रति पहले से उदार है और एक ब्लैक बराक ओबामा को वहां के श्वेतों ने ह्वाइट हाउस भेजा.
दो सवाल है –
1. क्या भारत में भी यही दोहराया जा रहा है? हिमा दास, दीपा कर्मकार, उमेश यादव, कुलदीप यादव, पा. रंजीत, नागराज मंजुले….लिस्ट लंबी हो रही है.
2. क्या भारत में मुसलमान संगीत, फिल्म और खेल में बेहतर कर रहे हैं, तो इससे मेरी हायपोथिसिस की पुष्टि होती है?

हालांकि इस बीच विकी बायोग्राफी नामक साईट में हिमा दास की जाति बंगाली ब्राह्मण बतायी जा रही है. इसपर तीखी प्रतिक्रया देते हुए आलोक रंजन अपने फेसबुक पेज पर लिखते हैं ‘ब्राह्मणो से नीच और घटिया मानसिकता का इंसान पूरी दुनिया में कोई नही हो सकता, ये देखिये कैसे ब्राह्मण चाल चलते हैं.’

इस बीच एथलेटिक्स फेडरेशन ऑफ़ इंडिया ने हिमा दास के ठीक से अंग्रेजी न बोल पाने पर एक ट्वीट कर दिया , जिसकी चौतरफा निंदा शुरू हुई. बहुजन विचारक और नेता मनीषा बांगर ने इसके खिलाफ एक के बाद एक तंज कसते हुए पोस्ट लिखे. एक पोस्ट में उन्होंने लिखा ‘Mallya और Nirav इतनी रफ्तार से English बोले की 100 करोड़/ मिनिट की स्पीड से भारत को लूट के फ़रार हो गये.’ 

फेडरेशन की चौतरफा निंदा के बाद उसने अपने बयान पर क्षमा मांग ली: 13 जुलाई को ट्वीट कर फेडरेशन ने लिखा : ‘सभी भारतवासियों से क्षमा अगर हमारी एक TWEET से आप आहत हुए है!असल उद्देश्य यह दर्शाना था कि हमारी धाविका किसी भी कठनाई से नहीं घबराती, मैदान के अंदर या बाहर! छोटे से गाँव से आने के बावजूद, विदेश में अंग्रेजी पत्रकार से बेझिझक बात की! एक बार फिर उनसे क्षमा जो नाराज हैं,  जय हिन्द!’

संजय बौद्ध ने लिखा, ‘ये तस्वीर देख के महापुरुषों का एक कथन ध्यान आ गया की – “अछूतो को अगर फटे हुए बांस उठाने का भी अधिकार होता तो शायद ये देश कभी गुलाम नहीं होता…!”


Reservation Is Our Right For Equality नामक फेसबुक पेज से लेकर कई और पेज पर यह लिखा गया: 
दलित समाज की धानुक  जाति में पैदा हुई हिमा दास ने जीता 400 मीटर दौड़ में जीता गोल्ड मैडल। किया भारत का नाम किया रौशन 
हिमा दास, असम के छोटे से गांव की 18 साल की मासूम सी लड़की जिसने आईएएएफ विश्व अंडर-20 एथलेटिक्स चैम्पियनशिप की 400 मीटर दौड़ स्पर्धा में गोल्ड मेडल जीतकर देश का गौरव बढाया है ।
इस इवेंट में देश को पहली बार गोल्ड मेडल हासिल हुआ है। हिमा ने महिला, पुरुष, जूनियर, सीनियर सभी वर्गों में पहली बार वर्ल्ड ट्रैक इवेन्ट में गोल्ड जीता है वो भी 51.46 सेकेण्ड के रिकॉर्ड समय में। 
जो काम अब तक कोई भारतीय नहीं कर पाया वो हिमा ने किया है। 
बहुजन समाज की शेरनी हिमा असम के नगाँव जिले के धींग के पास कंधूलिमरी गाँव से हैं। उसके पिता रोंजीत दास और मां जोमालि चावल की खेती करते हैं। बेहद गरीब परिवार से आने वाली हिमा 6 बहन-भाइयों में सबसे बड़ी है। तमाम मुश्किलों को हराते हुए हिमा ने ये क़ामयाबी हासिल की है।


शाबाश हिमा! तुमने हर आम लड़की के सपने को हिम्मत दी है ।
अब कुछ और लडकियां जिनके सपने आखों में ही मार दिये जाते हैं ऐसे सपने साकार करने के लिए आगे आयेंगी।
?बधाई हिमा ढेरो बधाई?
आरक्षण विरोधियों, ये है बहुजनों की मेरिट।तुम हमारी मेरिट से डरते हो 
जय भीम जय संविधान

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महिला आरक्षण के समर्थन में राहुल गांधी: पीएम को छोड़ सभी जिम्मेवार नेताओं ने अबतक किया समर्थन

स्त्रीकाल डेस्क 

राहुल गांधी ने अपने ट्वीट के जरिये पीएम मोदी से कहा है कि वह संसद में महिला आरक्षण बिल लाएं, कांग्रेस उनका पूरा समर्थन करेगी. कांग्रेस इस संबंध में प्रेस कांफ्रेंस कर चिट्ठी जारी करने वाली है.

भाजपा ने स्वयं महिला आरक्षण बिल को अपने घोषणापत्र का हिस्सा बनाया था, लेकिन बहुमत के बावजूद इसे पास कराने का कोई कदम अबतक नहीं उठाया है, कारण है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इस पर चुप्पी. हालांकि इस बिल के समर्थन में अबतक पूर्व राष्ट्रपति, प्रणव मुखर्जी, सोनिया गांधी, वेंकैया नायडू और अब राहुल गांधी ने आवाज उठायी है. 20 सितंबर 2017 को पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने भी प्रधानमंत्री मोदी को पत्र लिखकर लोकसभा में महिला आरक्षण बिल को पास करने का निवेदन किया था. पिछले साल कांग्रेस ने शीतकालीन सत्र के दौरान देश के अलग-अलग राज्यों से संसद और विधानसभा में महिलाओं के लिए 33 फीसदी आरक्षण के समर्थन में 33 लाख हस्ताक्षर जमा किए थे. बड़ी- बड़ी कागज की पेटियां लेकर देश के अलग-अलग प्रदेशों से महिला कांग्रेस की कार्यकर्ताओं और नेता दिल्ली पहुंचीं थीं. महिला कांग्रेस के पदाधिकारियों और सदस्यों ने 33 लाख हस्ताक्षर जमा करने का दावा किया था.

यह भी पढ़ें : सोनिया गांधी का मास्टर स्ट्रोक: महिला आरक्षण के लिए लिखा पीएम मोदी को खत

राहुल ने कहा है कि संसद और विधानसभाओं में महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण मिलना चाहिए।  बता दें कि महिला आरक्षण विधेयक पिछले काफी समय से लटका है। 1996 में तत्कालीन पीएम एच. डी. देवगौड़ा के कार्यकाल में इस बिल को संसद में पेश किया गया था। 2010 में राज्यसभा में पास होने के बाद यह बिल लोकसभा में पास नहीं हो सका। वर्ष 1993 में संविधान में 73वें और 74वें संशोधन के जरिए पंचायत और नगर निकाय में एक तिहाई सीटों को महिलाओं के लिए आरक्षित किया गया था। स्त्रीकाल में पढी जा सकती है इस बिल पर अब तक हुई पूरी बहस. हमने प्रिंट में इस पर एक अंक भी प्रकाशित किया है. लेकिन सवाल राहुल गांधी से भी है कि वे आरक्षण के भीतर आरक्षण यानी दलित-आदिवासी और पिछड़ी जाति की महिलाओं के लिए आरक्षण के साथ इस बिल पर मानस क्यों नहीं बनाते?

इन्हें पढ़ें: सारे दल साथ -साथ फिर भी महिला आरक्षण बिल औंधे मुंह : क़िस्त सात
  महिलाओं द्वारा हासिल प्रगति ही समुदाय की प्रगति: डा. आंबेडकर
           आरक्षण के भीतर आरक्षण के पक्ष में बसपा का वाक् आउट : नौवीं क़िस्त

स्त्रीकाल के महिला आरक्षण अंक को  पढ़ने के लिए क्लिक करें : महिला आरक्षण 

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दलित छात्राओं को ब्लैकमेल करते रजिस्ट्रार का ऑडियो आया सामने : हिन्दी विश्वविद्यालय मामला

बलवंत ढगे

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार (इन चार्ज) कृष्ण कुमार सिंह मुसीबत में फंस सकते हैं. दरअसल स्त्रीकाल के पास उपलब्ध उनकी बातचीत का एक ऑडियो उनके द्वारा, विश्वविद्यालय प्रशासन और जिले की पुलिस द्वारा दलित छात्राओं के साजिशन उत्पीडन और निलम्बन को पुष्ट करता है. वे बातचीत में छात्रा पर दवाब डालते हुए शादी का झांसा देकर यौन उत्पीडन करने के आरोपी को बचाने की कोशिश कर रहे हैं. रजिस्ट्रार अपने इस कृत्य से न सिर्फ एक अपराधिक साजिश कर कई छात्राओं के करिअर के साथ खिलवाड़ की अपनी और कुलपति की कोशिश का खुलासा कर रहे हैं बल्कि अपने विरुद्ध महिला उत्पीडन और एट्रोसिटी एक्ट की धाराओं के तहत कार्रवाई भी आमंत्रित कर रहे हैं. वे बातचीत में छात्रा पर दवाब डालते हुए शादी का झांसा देकर यौन उत्पीडन करने के आरोपी को बचाने की कोशिश कर रहे हैं. वे छात्रा को कह रहे हैं कि ‘तुम लिख कर दे दो कि चेतन का निलम्बन वापस लिया जाये तो तुम्हारा भी वापस हो जाएगा.’इस मामले में जिले की पुलिस अधीक्षक निर्मला देवी ने कोई भी बात करने से मना कर दिया. ( बातचीत सुनने के लिए रिपोर्ट के बीच में दिया गया वीडियो लिंक क्लिक करें ) 

हिन्दी विश्वविद्यालय का महिला छात्रावास

क्या है पूरा मामला (राजेश सारथी द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति पर आधारित और मीडिया विजिल द्वारा संपादित) 

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा (महाराष्ट्र) प्रशासन ने एक मारपीट की कथित घटना और सम्बंधित एफ.आई.आर. के आधार पर (विभिन्न धाराओं का हवाला देते हुए, जो क्रमश: 143, 147, 149, 312 और 323 हैं ) 5 महिला विद्यार्थियों/शोधार्थियों (04 पीएच-डी., 01 बी.एड.–एम.एड. एकीकृत) को विश्वविद्यालय से निष्कासित कर दिया है। इसके लिए विश्वविद्यालय ने अपने स्तर से कोई जांच कमिटी बनाने कि ज़रूरत भी नहीं समझी। छात्राओं के अनुसार, ’’बिना किसी कमेटी के, न ही प्रोक्टर, न ही छात्र कल्याण अधिष्ठाता और न ही संबन्धित विभाग से कोई पूछताछ की ज़हमत उठायी गयी। घटना वाले दिन दो छात्राओं में से कोई भी परिसर से बाहर ही नहीं गया जिसका पुख्ता सबूत विश्वविद्यालय के सीसीटीवी और हास्टल का आवक-जावक रिकॉर्ड है।”

विश्वविद्यालय प्रशासन से छात्राएं बार-बार अपने गुनाह का सबूत मांगती रही, परन्तु प्रभारी रजिस्ट्रार ने दस दिन घुमाया और बाद में कहा कि कुलपति महोदय ने कोई भी जानकारी देने से मना किया है। जब छात्राओं ने अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करने की बात कही तो वे बोले- ये मामला विश्वविद्यालय के बाहर का है। जब छात्राओं के अभिभावकों ने कुलपति एवं कुलसचिव से बात करनी चाही कि बिना किसी कमेटी गठन के निष्कासन कैसे किया, तो कुलपति ने कोई बात सुनने से इंकार कर दिया और पीड़ित छात्राओं को अपना पक्ष रखने का मौका तक नहीं दिया। दिलचस्प है कि न तो घटनास्थल विश्वविद्यालय की परिधि में आता है और न ही शिकायतकर्ता का संबंध इस विश्वविद्यालय से है।

मामला चेतन सिंह बनाम ललिता का है। दोनों दिल्ली के निवासी हैं और हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के छात्र हैं। ललिता बी. एड.–एम. एड. एकीकृत की छात्रा है जबकि चेतन सिंह हिंदी एवं तुलनात्मक साहित्य विभाग का पीएच-डी. शोधार्थी है। दिनांक 29/12/2017 को ललिता, पिता हेतराम ने चेतन सिंह पर यौन शोषण का आरोप लगाते हुए आईपीसी की धारा 376, 323, 506, 417 के तहत स्थानीय राम नगर पुलिस स्टेशन, वर्धा में मामला दर्ज कराया। इस केस में विश्वविद्यालय की चार लड़कियां आरती कुमारी, विजयालक्ष्मी सिंह, कीर्ति शर्मा, शिल्पा भगत पीड़िता के गवाह थीं। हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा ने चेतन सिंह को यौन शोषण के आरोप में विश्वविद्यालय के महिला सेल के सिफारिश पर निष्कासित कर दिया। कुछ दिन बाद आरोपी चेतन सिंह को कोर्ट से इस शर्त पर जमानत मिल जाती है कि जमानत के बाद पीड़िता व गवाहों को किसी प्रकार से परेशान नहीं करेंगे। इसके बाद आरोपी चेतन सिंह विश्वविद्यालय के महिला छात्रावास के निकट ही पंजाब राव कॉलोनी में अपनी पत्नी सोनिया के साथ किराए पर रहने लगा और पीड़िता के साथ-साथ गवाहों को अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करने का प्रयास करने लगा।

एक्टिंग रजिस्ट्रार के के सिंह

इसी दौरान दिनांक 03/05/2018 की संध्या को पीड़ित छात्रा ललिता के साथ हाथापाई होती है जिसमें दोनों पक्षों को चोट आती है। घटना के तुरंत बाद चेतन सिंह रात 8:00 बजे अपनी पत्नी सोनिया सिंह के साथ रामनगर पुलिस थाना में जाकर ललिता के खिलाफ एनसीआर दर्ज कराता है जिसमें धारा 504, 506 के तहत आरोप लगाए जाते हैं। ललिता भी विश्वविद्यालय के महिला छात्रावास के कर्मचारी, गार्ड, केयरटेकर तथा 3 महिला मित्र के साथ रामनगर थाने जाकर चेतन सिंह के खिलाफ धारा 324 के तहत केस दर्ज कराती है। दिनांक 08/05/2018 को चेतन सिंह की पत्नी सोनिया सिंह द्वारा हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा को लिखित शिकायत पत्र दिया जाता है जिसमें केस की पीड़िता पक्ष की 4 मुख्य गवाहों के नाम शामिल कर आरोप लगाए गए कि 4 गवाह और पीड़िता (ललिता) ने चेतन सिंह व उसकी पत्नी के साथ मारपीट की जिससे उसका गर्भपात हो गया। इस मामले में सेवाग्राम से बनी एक मेडिकल रिपोर्ट के आधार पर 07/06/2018 को एफआईआर दर्ज की गई। एन.सी.आर. में पीड़िता के अलावा किसी का भी नाम नहीं था लेकिन बाद में एफआईआर में चार अन्य नाम जोड़ दिया गया।

इसी बीच रामनगर थाने के पी.एस.आई. सचिन यादव द्वारा पीड़िता को धमकाया भी जाता है। रामनगर थाने का  पी.एस.आई. सचिन यादव पीड़िता और उसके साथ के गवाह के अभिभावक को धमकी देता है कि “5 लड़कियों की पीएच-डी. खत्म करवा दूँगा और सब को जेल कराऊँगा”। पी.एस.आई. का यह रवैया देखकर पीड़िता (ललिता) ने इसकी शिकायत नागपुर आईजी से की। आई. जी. ने मामले को तुरंत संज्ञान में लेते हुए वर्धा एस.पी. से जांच प्रक्रिया शुरू करवाई। 6 जुलाई 2018 को आरोपियों के बयान दर्ज़ कराए गए। उसी दिन 6 जुलाई 2018 को एफआईआर को आधार बनाते हुए विश्वविद्यालय द्वारा 5 लड़कियों को बिना किसी प्राथमिक जांच किए निलंबित कर दिया गया।

इस मामले की जांच सिटी एस.पी. वर्धा की देखरेख में आई.जी. नागपुर के अधीन चल रही है। आई.जी. की जांच प्रक्रिया पूरी हुए बगैर इन पाँच छात्राओं को विश्वविद्यालय द्वारा निष्कासित किया गया है जो कि असंवैधानिक है। यह मुंबई न्यायालय के आदेश क्रमांक 9889/2017 का खुला उल्लंघन है जिसमें साफ-साफ लिखा है कि किसी पर भी एफआईआर दर्ज होने के कारण विद्यार्थियों के शिक्षा लेने के संवैधानिक अधिकार का हनन करने का अधिकार किसी संस्था के पास नहीं है।

साजिश का खुलासा 

सामाजिक कार्यकर्ता और आरपीआई के विदर्भ महासचिव अशोक मेश्राम कहते हैं, ‘इस पूरी बातचीत से यह स्पष्ट होता है कि विश्वविद्यालय प्रशासन यौन उत्पीड़न के आरोपी छात्र के पक्ष में मिलकर पांच छात्राओं को प्रताड़ित कर रहा है. यही नहीं पुलिस भी इस प्रसंग में मिली हुई है. क्या कारण है कि मामले की जांच करने वाला पुलिस अधिकारी और रजिस्ट्रार दोनो ही छात्रा को डरा रहे हैं, ब्लैकमेल कर रहे हैं. आम तौर पर ऐसे मामले में दलित आरोपी के साथ प्रशासन कभी खड़ा नहीं होगा लेकिन व्यवहार में महिला विरोधी प्रशासन दलित पीडिता के खिलाफ काम कर रहा है. शिकायतकर्ता और गवाहों पर दवाब बनाने की कोशिश कर रहा है.’ मेश्राम आगे कहते हैं कि ‘ इस पूरे मामले में 5 छात्राओं का निलम्बन और उनपर मुकदमा एक सामूहिक साजिश की ओर इशारा करते हैं.’ दिल्ली विश्वविद्यालय में इतिहास के प्राध्यापक और जनता दल लोकतांत्रिक के राष्ट्रीय सचिव रतन लाल कहते हैं कि छात्रा और गवाहों पर दवाब बनाना अपराधिक कृत्य है, कार्रवाई होनी चाहिए. सूत्रों के अनुसार विश्वविद्यालय के कुछ विद्यार्थी इस मामले में कानूनी कार्रवाई के लिए कुलपति और मानव संसाधन विकास मंत्रालय को लिख सकते हैं और हर संभव कानूनी कदम उठा सकते हैं. हालांकि के के सिंह से जब इस प्रसंग में सम्पर्क किया गया तो उन्होंने बिना ऑडियो सुने  कहा कि मैंने कोई बात नहीं की है, मेरी आवाज नहीं है ऑडियो में.

बलवंत ढगे टाइम्स ऑफ़ इंडिया के वर्धा संवाददाता हैं. संपर्क: 9890513257

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काली मॉडल रिनी कुजूर का प्रसिद्धि-पूर्व संघर्ष : रंगभेद का भारतीय प्रसंग

ज्योति प्रसाद

 शोधरत , जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय. सम्पर्क: jyotijprasad@gmail.com  


छत्तीसगढ़ के एक गाँव की लड़की रातोरात इन्टरनेट पर छा गई है. इसकी वजह बहुत बड़ी और खास है. रिनी नी कुजूर नामक इस खालिस भारतीय मॉडल को देखकर लोग दंग हैं. लोग उनकी तुलना बारबेडियन अंग्रेज़ी पॉप गायिका रिहाना से कर रहे हैं. उनकी शक्ल काफी हद तक एक  दूसरे से मिलती भी है. रिनी कुजूर ने अपनी इन्स्टाग्राम प्रोफाइल पर अपना नाम रिहाना से मिलता जुलता रखा है. दोनों में नैन नक्श की समानता के अलावा एक और समानता भी है. दोनों के रंग एक जैसे हैं. अंग्रेज़ी गायिका रिहाना की लोकप्रियता का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि उनको इन्स्टाग्राम पर 64 मिलियन लोग फॉलो करते हैं. यह संख्या हैरान कर देती है. उनका एक गीत जो ‘अम्ब्रेला’ नाम से मशहूर है, को यूट्यूब पर 40 करोड़ से भी अधिक लोग देख चुके हैं. यह आंकड़ा जादुई नहीं बल्कि हकीक़त है. ठीक इसी तरह एक अन्य गायिका बियोंस नोवेल्स को इन्स्टाग्राम पर ही 116 मिलियन लोग फॉलो करते हैं. बात माइकेल जैक्सन की हो, रिहाना की हो, बियोंस की हो या फिर बॉब मार्ले की सभी का एक ही रंग है- काला! रिनी कुजूर का भी यही रंग है. और यह भी एक अच्छी वजह है कि वे आज भारतीय मिडिया में चर्चा का विषय बन चुकी हैं.

अपने नैन नक्श के रिहाना से मिलने जुलने के कारण इन्टरनेट पर छा जाने वाली रेनी कुजूर का रंग अचानक से कई अख़बारों और ऑनलाइन मीडिया वेबसाइट पर प्रमुखता से चमक रहा है. उनका इस तरह से रातों रात चर्चा में आ जाना खास भी है. भारत जैसे देश में जहाँ बात-बात में रंग को लेकर भेदभाव होता है वहीं उसी देश में रेनी अपने इसी रंग के साथ धूम मचा रही हैं. अख़बारों में उनके ऊपर खास रिपोर्ट लिखी जा रही हैं. उनकी तरह-तरह की तस्वीरें छप रही हैं. लोग उनको गूगल पर सर्च कर रहे हैं. लोग उनके बारे में हर तरह की जानकारी जानना चाह रहे हैं. एक ओर उनकी तस्वीर है तो बगल में रिहाना की. ऊपर मोटे मोटे अक्षरों में लिखा गया है- (Meet Indian Rihanna!) मिलिए भारतीय रिहाना से!

रिनी कुजूर



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हालाँकि अभी यह शुरुआत है. रिनी के लिए मॉडल बनने का यह सफ़र आसान नहीं रहा. यह देश इंग्लैंड नहीं है जहाँ नओमी कैम्पबेल जैसी मॉडल का अपना एक रूतबा है. जब वह रैंप वॉक करती हैं तो लोगों की तालियाँ उनका स्वागत करती हैं. पर भारत में ऐसा नहीं होता. नओमी आज 48 साल की हो चुकी हैं पर अभी भी उनका जलवा कायम है. रिनी कुजूर में नओमी का भी अक्स देखा जा सकता है. हमारे देश में जाति, धर्म, अमीरी-गरीबी का भेदभाव तो है ही साथ ही रंग से जुड़ा भेदभाव भी जड़ों तक फैला हुआ है. ऊपर से रिनी का छतीसगढ़ जैसे प्रदेश से होना जो अधिकतर मामलों में पिछड़ा हुआ प्रदेश बताया जाता है, साथ ही उनका आदिवासी होना भी. अख़बारों में उनके दिए गए इंटरव्यूज़ में उन्होंने बताया भी है कि बचपन से लेकर आज तक के संघर्ष में लोगों ने उनके काले रंग को लेकर मजाक बनाया है. अंग्रेज़ी भाषा पर बेहतर पकड़ न होने के चलते और गहरे रंग को देखकर उनको काम का मौका ही नहीं मिलता था. कई जगह काम देने से मना कर दिया जाता था. कई बार मेकअप करने वाले लोग उनके रंग को लेकर तंज कस दिया करते थे. उनके पास ऐसे ढेरों उदाहरण हैं जहाँ वह बतलाती हैं कि रंग को भारत में किस तरह से देखा जाता है.

पर उनके अनुभवों से यह साफ़ हो जाता है कि हमारे यहाँ के लोग गोरे रंग को लेकर किस हदतक पागल हैं. हमारी नस्ल काकेसियन नहीं है. हम काले वर्ण की कतार में आते हैं. भारत एक गरम देश है. हमारे यहाँ के लोगों में यूरोपियन लोगों की तरह सफ़ेद रंग में तब्दील हो जाने की गज़ब की चाहत है. यहाँ के फ़िल्मी सितारे खुद गोरा बनाने वाली क्रीम का जोरशोर से प्रचार करते हैं. यहाँ तक कि शाहरुख़ खान खुद मर्दों वाली क्रीम बेचते हैं. उनके विज्ञापन के मुताबिक यह क्रीम लड़कों ‘मर्दों’ को इस्तेमाल करनी चाहिए क्योंकि यह लड़कियों पर इम्प्रेसन डालने के लिए अच्छा उत्पाद है. लेकिन उन्हें यह भी सोचना चाहिए कि जब वे अपनी रा-वन फिल्म बना रहे थे तब ‘छमक-छल्लो’ गीत एक काले विदेशी गीतकार एकॉन से क्यों गवाया? ये फ़िल्मी सितारे तो ज्यादा नहीं सोच पाते. यह लोगों को सोचना चाहिए कि वे क्यों अन्धे होकर इन्हें फॉलो करते हैं. हाल-फिलहाल में आलिया भट्ट, यमी गौतम, हृतिक रोशन, शाहरुख़ खान, दीपिका पादुकोण, जॉन अब्राहम आदि फ़िल्मी कलाकार गोरापन बेच रहे हैं. इस हद तक रंग से जुदा भेदभाव खुलेआम दिखता है. भारत में गोरा बनाने वाली क्रीम का कारोबार करोड़ों में है. टीवी पर हर दूसरा तीसरा विज्ञापन इन्हीं कंपनियों का है.

टीवी पर हर दस मिनट में फेयर एंड लवली क्रीम का प्रचार करने वाली अभिनेत्री यमी गौतम बार-बार भारतीय दर्शकों और आम लोगों को रंग साफ़ करने का लगभग आदेश देती हैं, पर खुद अपने सोशल साईट इन्स्टाग्राम पर बियोंस नोवेल्स, जेनिफ़र लोपेज़ और प्रियंका चोपड़ा जैसी शख्सियतों को फॉलो करती हैं. यह उनके व्यक्तित्व का दोहरापन है. एक तरफ उनको भारतीय काले रंग के लोगों मरीज लगते हैं दूसरी तरफ वे बियोंस जैसी गायिका को फॉलो करती हैं. युवा होती लड़कियों को यमी गौतम की बजाय रिनी कुजूर को फॉलो करना चाहिए जिसने अपने इस रंग और तमाम रुकावटों के बाद भी अपना हौंसला नहीं छोड़ा. आज दुनिया उन पर चर्चा कर रही है. उनकी खूबसूरती पर कसीदे कहे जा रहे हैं.

रिहाना

भारतीय जनता पार्टी के एक नेता हैं तरुण विजय. पिछले साल अफ़्रीकी मूल के लोगों पर लगातार भारत में होते हमले पर उन्हें अल जजीरा चैनल ने चर्चा के लिए बुलाया था. तभी वे एक ऐसी बात बोल गए जिससे बखेड़ा खड़ा हो गया था. उन्हों ने कहा- “अगर हम नस्लीय होते तो दक्षिण भारत के लोगों के साथ क्यों रहते? आप जानते हैं न उनके बारे में…तमिल, केरल, कर्णाटक और आन्ध्र प्रदेश. हम उनके साथ क्यों रहते फिर. हमारे यहाँ चारों तरफ काले लोग हैं.” (बीबीसी की रिपोर्ट) इस बयान के बाद लोगों ने सोशल मिडिया पर जमकर आलोचना की और यहाँ तक कहा गया कि उन्हें दक्षिण भारत में घुसने न दिया जाये. यह बयान एक राजनितिक सत्तारूढ़ दल के प्रतिनिधि की तरफ से आया. लेकिन कहीं न कहीं इसमें व्यक्तिगत सड़ी हुई मानसिकता की बू भी आती है. इसलिए जब रिनी कुजूर जैसे संघर्ष करने वाले लोग इस माहौल और मानसिकता में अपनी एक जगह बनाते हैं तब उनकी उपलब्धियों  को कम कर के नहीं आंका जा सकता.

स्कूल की शिक्षा में बताया गया कि आर्य का एक मतलब गोरा रंग होता है. फिल्मों की नायिका को काला होने का हक नहीं. वह तो गुंडे अथवा खल पात्रों की संपत्ति है. काले रंग को कुछ इस तरह से साहित्य से लेकर घर तक के माहौल में परिभाषित कर दिया गया है कि हम इसके आदि बन चुके हैं. इस रंग के इर्द गिर्द सलीके से एक घटिया सोच विकसित कर दी गई है. जब 2016 में नवम्बर महीने में नोटबंदी हुई तब एक शब्दावली ‘काला धन या ब्लैक मनी’ का खूब इस्तेमाल किया गया. गौर से शब्दों की बिसात जो भाषा में बिछी है, उसे समझें तो एक पल को अपनी भाषा के ऊपर सोचने का मन हो आएगा. कैसी भाषा है!

जिसे हम काली कमाई पुकारकर गला खराब कर रहे थे वास्तव में वह कमाई तो है पर काली नहीं बल्कि अवैध या गैर कानूनी आय है। कई दफा एक शब्दावली सुनी होगी- ‘आय से अधिक संपत्ति.’ वास्तव में यही सही शब्दावली है. लेकिन हमने काले शब्द को जबरन इस्तेमाल करना शुरू कर दिया क्योंकि हमारे देश के पॉपुलर मंत्री इस शब्द का बिना सोचे समझे इस्तेमाल करते हैं. असल में इस गलत ढंग से कमाई गई आय को अवैधानिक आय कहकर पुकारा जाना चाहिए.

इस बात पर भी गौर करना जरूरी है कि हम कितनी अपनी भाषा बोलते हैं और कितनी दूसरों की नक़ल करते हैं. जो जुबान हमें दी गई है हम उसी में सोचते और बोलते हैं. हमारी खुद की कोई तर्कशील भाषा नहीं दिखती. उधार के शब्द लेकर हम अपनी रोज़मर्रा ढोते हैं. बच्चों की भाषा को गौर से सुने तो पाएंगे की स्कूल जाने के बाद वह अधिक भेदभाव वाली बन जाती है. यह एक ऐसी प्रक्रिया है जो दिखती नहीं पर असर साफ़ समझ आता है.
भाषा आज के दौर में परोसी जाती है. घर में दरवाजे के नीचे से सुबह सुबह 16 से 17 पन्नों वाला अखबार हो या फिर टीवी में चलते कार्यक्रम, दफ्तर की धूल खाती फाइले हों या फिर सब्जी तरकारी खरीदने तक की प्रक्रिया में एक ज़ुबान चुपके से बैठी होती है. कहीं फुर्सत नहीं है दिमाग को खुद की भाषा के वाक्य रचने की. जो ज़्यादा देखा-सुना वही बार बार जीभ से संचालित होने लगता है. बनाई जा रही व्यस्त दिनचर्या सोचने की प्रक्रिया को रोक रही है और हम दिन पर दिन नक़ली होते जा रहे हैं. हम कभी बैठ कर यह नहीं सोचते कि  त्वचा का रंग आखिर क्यों इतना मायने रखता है? रंग के ऐसा होने की क्या वजहें हैं? गोरे होने की जरुरत क्यों है? काले रंग को इतने बड़े पैमाने पर क्यों ख़राब बताया जा रहा है? ऐसे सवालों के बारे में हम कभी सोचते ही नहीं.
सभी रंग को सोखने के बाद ही काला रंग पनपता है.  काला रंग विपरीत या किसी रंग का विलोम नहीं है. यह सफ़ेद रंग का दुश्मन नहीं है. वास्तव में यह रंग बाकी रंगों की तरह ही एक रंग है। बाज़ार और महान संस्कृति के पोषकों ने इसे एक हद तक नकारात्मक चोला पहनाया हुआ है. इसे अंधेरे से जोड़ा जाता है. अपशगुन का तमगा पहनाया जाता है. सामाजिक धब्बा कहा जाता है. इतना ही नहीं काली शक्ति जैसे शब्द से उन नकारात्मक रूहानी ताक़तों से जोड़ा जाता है जो हमारी दुनिया से परे हैं. अमावस की रात का ज़िक्र भी लगभग कुछ ऐसा ही है. रहस्य का रंग भी यही है. कई लोगों को देखा जा सकता है कि वे पैरों में काला धागा बांधकर रखते हैं या फिर गले में काली माला पहनते हैं कि किसी की नज़र नहीं लगे. नज़र क्या है-काली और बचाव भी काले रंग के धागे से किया जा रहा है. मौजूदा दौर में हम अपनी पीढ़ी को भी ऐसे अन्धविश्वास विरासत के रूप में दे रहे हैं जबकि कोशिश यह होनी चाहिए कि उन्हें समानता और वैज्ञानिक नजर दी जाती.

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बहुत हद तक इस रंग के आसपास घूमती यह बिल्कुल नयी विचारधारा नहीं है. लंबे समय से इसकी बुनाई होती रही है। यही वजह कि अब हमारे दिमाग में काले रंग से जुड़ी छवियाँ अलग थलग हैं. अमूमन हम इन छवियों को काले रंग में रंग देते हैं या फिर हिकारत की नज़र से देखते हैं. धर्म से लिपे-पुते इस देश में हर रंग का अपना मजहब है. हिन्दू या मुस्लिम, सभी के अपने खास रंग हैं और उनका महत्व है. लेकिन ऊपरी नज़र डालने पर काला रंग फिर से बिना कुर्सी के रह जाता है. अब कुछ परिवर्तन देखने को मिल रहे हैं. इस रंग का अपना एक मुकाम विकसित हो चुका है. अपने पहनावे में लोग इस रंग को जगह तो ही रहे हैं साथ ही साथ इस रंग से जुड़े झूठी कहानियों से बाहर आ रहे हैं.

रिनी कुजूर

 नोटबंदी की घटना ने इस रंग के आगे एक गतिरोधक बना दिया था. हर ज़ुबान पर काला धन या काली कमाई जैसा शब्द फेविकोल से चिपका दिया गया था. इसने अंबुजा सीमेंट सी मजबूती दिखाई दे रही थी. वास्तव में यह रंग उतना अनलकी नहीं जितना सोचा जाता है. कम से कम रिनी कुजूर को देखकर जिस खूबसूरती की समझ बनती है उसे अपनी सोच में शामिल करने की हर किसी को जरुरत है. रिनी जैसे लोगों को कल्पनीय आदर्शों से जो कलेंडर में धुप बत्ती का धुआं सूंघते हैं कि जगह रिप्लेस करने का सोचा जा सकता है.

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जातिरूढ़ सास ‘अनारो’ की भूमिका में मैं अपनी सास को कॉपी कर रही हूँ





स्टार भारत का लोकप्रिय धारवाहिक ‘निमकी मुखिया’ अपनी ड्रैमेटिक सीमाओं के बावजूद ग्रामीण समाज की जाति व्यवस्था और महिला मुखिया के संघर्ष पर बना तुलनात्मक रूप से एक बेहतरीन धारवाहिक है. ‘निमकी मुखिया में ‘अनारो’, दलित नायिका की उच्च जाति की सास, की भूमिका कर रही गरिमा सिंह ने ‘स्त्रीकाल’ से बातचीत करते हुए अपनी इंडस्ट्री, समाज की जाति व्यवस्था, स्त्रियों की स्थिति, खुद सहित अन्य अंतरजातीय विवाहों की मुश्किलों, वर्तमान समय के संकीर्ण हालात तथा खुद के बारे में बेवाक राय रखी. धारवाहिक की अक्खड़, जातिग्रस्त, सामंती मूल्यों में जकड़ी और अनपढ़ ‘अनारो’ की भूमिका कर रही गरिमा की बौद्धिकता और आधुनिक चेतना काबिले तारीफ़ है: स्त्रीकाल के लिए बातचीत संजीव चन्दन ने की है. 

गरिमा सिंह

गरिमा आप एक लोकप्रिय धारवाहिक में महत्वपूर्ण भूमिका कर रही हैं, जिसकी पृष्ठभूमि बिहार के मधुबनी जिले की ग्रामीण व्यस्था है, वहां फैला जातिवाद और स्त्रीविरोधी चेतना, बधाई! इस इंडस्ट्री का अपना अनुभव शेयर करें और इस धारवाहिक से जुड़ने की कहानी भी…
मैं 2005 से इस इंडस्ट्री में हूँ. मैंने शुरुआती दौर में कुछ कॉमेडी किये, कुछ दूसरे किस्म के एपिसोडिक किरदार किये. मेरी बेटी हुई और जब मैं दुबारा काम में वापस लौटी तो मुझे माँ का किरदार ऑफर हुआ-2011 में. तब मैं 30 साल की थी. ‘छोटी बहू’ के दूसरा भाग से शुरुआत हुई, उसके बाद ‘फिर सुबह होगी’. ‘फिर सुबह होगी’ बेड़ियों पर आधारित कहानी थी, जिसमें मैंने एक ‘मामी’ का किरदार किया. लाइफ ओके पर एक और सीरियल में माँ का किरदार किया. अब तक मैं निगेटिव भूमिकाएं करती थी, यहाँ मेरी भूमिका पॉजिटिव थी. उस किरदार को लोगों ने काफी पसंद किया. और अब जमा हबीब साहब द्वारा लिखित ‘निमिकी मुखिया’ में निमकी की सास की भूमिका कर रही हूँ. जमा हबीब साहब से मैं सोशल मीडिया-फेसबुक पर जुडी थी, उनकी सोच से प्रभावित थी और वह मुझसे मिलती भी थी. हबीब साहब कमाल के लेखक हैं, उनके साथ काम करना काफी महत्वपूर्ण है. इमोशनल लेबल पर वे बहुत अच्छा काम करते हैं, हालांकि निमकी मुखिया में इमोशन से ज्यादा ड्रामा है. लेकिन इस धारवाहिक में न्यूआन्सेज को पकड़ने और पेश करने की लेखक की काबिलियत से आप जरूर प्रभावित होंगे. इस प्रोजेक्ट से जुड़ने के पहले मैं बनारस की विधवाओं पर केन्द्रित एक कहानी में माँ का किरदार कर रही थी.

अनारो

हाँ, इस सीरियल की कुछ सीमाओं के बावजूद मैं कहूंगा कि यह अन्य धारवाहिकों से एकदम अलग है, और इसीलिए मेरे जैसा दर्शक भी इसे देखता है. 
अधिकाँश टीवी सीरियल्स के साथ दिक्कत है कि वे बड़े ही फेक पृष्ठभूमि पर होते हैं. वे कहीं भी आपके जीवन से जुड़ते हुए नहीं दिखते हैं. अजीब तरह की कहानी होती है, जिनका निजी जीवन से कोई तालमेल नहीं होता है. मुख्य किरदारों की दो से तीन शादियाँ कर दी जाती हैं. मैं इंडस्ट्री से बाहरी व्यक्ति के तौर पर कहूं तो मैं ऐसे किसी भी सीरियल को देखना पसंद न करूं.


दिक्कत यही है, आप सीरियल्स देखें, काफी लाउड, अतार्किक और महिला-विरोधी होते हैं. हर महिला के कई चेहरे, कई चरित्र…
समस्या ही यह है कि चैनल बैठा हुआ है प्रोड्यूसर के ऊपर. पहले एक दूरदर्शन हुआ करता था. कमलेश्वर जैसे लोग निर्णय की भूमिका में थे. कमलेश्वर की सेंसिवलिटी अलग थी. तब साहित्य ही सोचा जाता था, कहानियाँ जीवन से जुडी होती थीं. गाँव-परिवेश से उनका जुडाव होता था. अब ऐसा नहीं है. लेकिन यहाँ मैं अपने किरदार से खुश हूँ. मेरे किरदार को लेकर बहुत से लोगों के मेसेज आते हैं. वे लोग रिलेट करते हैं खुद को. निमकी मुखिया स्टार भारत का नम्बर वन सीरियल है. हालांकि यह चैनल अपेक्षाकृत नया है. चैनलों की टीआरपी के हिसाब से कलर नम्बर वन पर है, स्टार भारत नम्बर 4 का चैनल है, लेकिन इस सीरियल को देखने वाले लोग अच्छा रिस्पांस दे रहे हैं. ‘निमकी मुखिया’ लोगों को बहुत फेक नहीं दिखता है. हालांकि शुरुआती दिनों में ऐसे कमेन्ट जरूर आते थे कि ‘निमकी मूर्ख क्यों है? वह चीजों को समझ नहीं क्यों सकती है, क्यों वह उसी घर में जाना चाहती है, जहाँ लोग उसे पसंद नहीं करते हैं. हालांकि चीजें अब स्पष्ट भी हो रही हैं, आगे जाकर और स्पष्ट होंगी.

दिक्कत यह है कि इन्डियन सोप ऑपेरा 70 के दशक की फिल्मों से आगे नहीं जा रहा है. फिल्मों में उम्र बरिअर टूट गया है. आज 40 साल की अभिनेत्रियाँ भी लीड भूमिका के साथ फ़िल्में कर रही हैं, जबकि सीरियल्स में 30 की उम्र तक अभिनेत्रियों को माँ की भूमिका के लिए मजबूर किया जाता है. 
दरअसल सीरियल आगे कैसे बढेगा, यहाँ चैनल में बैठे लोग पूछते हैं कि ‘प्रेमचन्द कौन हैं?’ ‘उनका सीवी लेकर आओ’. इससे बड़ा मजाक क्या हो सकता है. अच्छी कहानी करने का माद्दा नहीं है. मैं चैलेन्ज के साथ कह सकती हूँ कि हर सीरियल शुरुआती 10 एपीसोड के बाद एक जैसा मिलेगा-सेट पैटर्न पर. उससे बाहर रिस्क फैक्टर है. प्रोड्यूसर को लेकर चिंता शुरू हो जाती है, उसका दवाब शुरू हो जाता है.  उसके पैसे लगे हैं. हालांकि कम उम्र में माँ की भूमिका में होना काफी चैलेंजिंग भी है एक अभिनेता के तौर पर. मुझे तो दादी भी बना दो तो मुझे अच्छा लगेगा. हालांकि कुछ लड़कियां हैं इंडस्ट्री में जो उम्र के लिहाज से माँ बनना नहीं चाहती हैं.

हाँ लेकिन 30-35 तक लीड भूमिकाओं से हटा दिया जाता है, जबकि अब फिल्मों में 30-35 और उससे ऊपर की लडकियां लीड भूमिका में हैं. खैर, जाति को लेकर आपकी इंडस्ट्री को आप कैसे देखती हैं? 

इंडस्ट्री जाति और रिलीजन से ऊपर है. ये चीजें यहाँ मायने नहीं रखती हैं. रामायण हो, महाभारत हो या महाकाली जैसे सीरियल, उसके ज्यादा से ज्यादा किरदार मुसलमान हैं. कलाकारों की कोई जाति नहीं होती, उन्हें हर किरदार निभाना होता है. मुझे लगता है कि यह कौम ही ऐसा है. हो सकता है पहले ऐसा कभी रहा हो, लेकिन अब तो काफी बदलाव है. हालांकि अभी पिछले पांच साल से विचित्र स्थिति है, अलग माहौल है, फिर भी इसका असर हमारी इंडस्ट्री पर नहीं पड़ा.

शूटिंग के बाद



‘निमकी मुखिया’ की कहानी पर तो आपसब की राय बनती होगी?
शुरुआती दौर में इस पर बात होती थी. जैसे वैसे कलाकार जो बिलकुल शहरों में रहे हैं, मसलन निमकी की भूमिका कर रही भूमिका हो या बब्बू की भूमिका में अभिषेक आश्चर्य करते थे कि ‘ऐसा होता है क्या?’ जिन्होंने गाँव नहीं देखा है, शहरों में रहे हैं उनके लिए यह सब नया है, क्योंकि शहरों में जातिभेद तुलना में कम है. मैं चुकी गाँव से रही हूँ, मैं यह सब समझती हूँ. मैं कायस्थ परिवार की लडकी रही हूँ. मेरे नाना की हवेली थी. मैं देखती थी कि मेरे नाना, नानी वहां बैठे होते तो जो दलित परिवार के लोग उस ओर से गुजरते थे वे चप्पल उठाकर हवेली के एरिया में आते-जाते थे और नाना-नानी को नमस्कार करते. वे अंदर नहीं आ सकते थे. उन्हें बाहर बैठना होता था. इसलिए मैं जानती हूँ कि यह कितना विकट अनुभव हो सकता है. कितना पहाड़ सा अनुभव. यह शहरों के बच्चों को नहीं पता चल सकता है. ऐसी गंदगी उन्हें नहीं पता. मैं उन्हें बताती हूँ कि यह तो कुछ ही नहीं है जो इस सीरियल में दिखा रहे हैं. हो तो बहुत कुछ सकता है, यदि कपड़ा छू जाये, बर्तन छू जाये या शरीर छू जाये तो  कोड़े भी पड़ सकते थे. जमा साहब ने लोगों को बताया अपना अनुभव. हालांकि मैंने ये चीजें तब देखी जब ये ख़त्म हो रही थीं. जब मैंने ऐसा देखा है तो बताइये पहले चीजें कितनी भयावह होंगी. अब ये चीजें फिर से बढ़ रही हैं. हर दिन न्यूज में रहता है कि दलितों को मार दिया गया.

यह सवाल जमा साहब से ज्यादा बनता है कि एक राजनीतिक पृष्ठभूमि पर बनी फिल्म में दलित नायिका को एकदम से अभिज्ञ किरदार में ढाला गया है, हालांकि हो सकता है वह आगे जाकर ऐसी न रहे
दरअसल यह लिमिटेड एपिसोड्स का सीरियल नहीं है. कई एपिसोड्स में फैला है, इसलिए टीआरपी भी बहुत हद तक कहानी और करेक्टर की गति को प्रभावित करती है. यदि एपिसोड्स लिमिटेड होते तो कहानी और ज्यादा इंटेंस होती.

हालांकि यह भी दिख रहा है कि एक फ्यूडल घर खंड-खंड हो रहा है. 
हाँ, फ्यूडल वर्चस्व को खंड-खंड किया जा रहा है. जमा साहब अपने क्राफ्ट में भी बेहतरीन हैं. उनका हर किरदार दिखता है. इस सीरियल में भी यह है.

बेटी और पति के साथ गरिमा सिंह

अपने बारे में बतायें
मैंने मास्टर्स तक की पढाई इलहाबाद से की है. रिसर्च भी कर रही थी म्यूजिक से, जिसे पूरा नहीं कर पाई. मेरे माँ-पिताजी देवरिया से हैं. पिताजी इलहाबाद में पोस्टेड थे, माँ हाउस मेकर हैं. उन्होंने एमए-एमएड कर रखा है. मेरी माँ की बदौलत ही मैं आगे कुछ कर पायी. वे पढी-लिखी और सुलझे विचारों वाली हैं. पढाई के अलावा मैं जो कुछ भी कर पायी वह माँ की मदद से ही. मेरा समय इलाहबाद में ही गुजरा है, छुट्टियों में गाँव आया-जाया करती थी. हमलोग एक भाई और एक बहन हैं. बड़ा भाई आईएएस है, जम्मू में पोस्टेड है. मैंने पढाई के दौरान ही थिएटर करना शुरू किया. मेरी मुलाकात उन्हीं दिनों विक्रांत- से हुई, जिनकी पत्नी हूँ मैं. वे लोग थिएटर करते थे. वे और उनके भाई. एक म्यूजिकल नाटक के सिलसिले में उनसे मुलाक़ात हुई. मेरे गुरू जी ने उसके लिए म्यूजिक किया था. पहली बार वहीं से मैं थिएटर के बारे में जान सकी. मैं बीच-बीच में प्रोक्सी करने लगी, यानी कोई किरदार निभाने वाला नहीं हो तो मैंने उसकी जगह पर वह कर लिया. वहीं से हमारी दोस्ती डेवलेप हुई. विक्रांत के बड़े भाई शांतिभूषण जी ने मुझे लीड भूमिका में लेकर एक नाटक किया. विक्रांत का परिवार गाजीपुर का है. हालांकि मेरे पिताजी मेरे थिएटर करने के पक्ष में नहीं थे. लेकिन यह संभव हो पाया. दो-तीन साल थिएटर करते हुए विक्रांत के साथ हमारी अंडरस्टैंडिंग अच्छी बनी और फिर हमने शादी कर ली.

अंतरजातीय विवाह?
शादी में जाति एक मुद्दा बना. मैं कायस्थ थी और विक्रांत राजपूत. कायस्थों के लिए कमाई वाली पढाई मायने रखती है लेकिन विक्रांत पढ़े-लिखे तो बहुत थे लेकिन कमाई वाली पढाई नहीं मानी जाती थी वह. माँ चाहती थी कि मेरी शादी डाक्टर इंजीनियर से हो. लेकिन हम जिद्द पर थे, और आखिरकार यह संभव हो पाया. यह 17 साल पहले की बात थी. जाति इलहाबाद जैसे शहर में बहुत मायने रखती थी. लेकिन मेरे ससुर इस मामले में आगे आये. उन्होंने पिताजी को मनाया. हालांकि यह एक बड़ा संकट भी था कि हम दोनो कुछ नहीं कर रहे थे. उसी दौरान हमने आकाशवाणी का फॉर्म भरा और हम आकाशवाणी में चुन लिये गये.

जाति-भेद को तब खुद भी महसूस किया आपने, है न? 
शादी के बाद जाति का दंश हमने लम्बे अरसे तक झेला. विक्रांत के गाँव ने कहा कि हम जाति-बाहर करेंगे. गाजीपुर के उस गाँव में मैंने बहुत कुछ सहा. औरतें आती थीं और मेरा हाथ-पाँव छू-छू कर देखती थीं, मानो यह कोई दूसरे ग्रह से आयी हुई लडकी तो नहीं है न. ससुर मेरे बहुत प्रोग्रेसिव हैं, बहुत ओपन माइंडेड. उनकी वजह से चीजें आसान हो पायीं. घर की महिलाओं की भूमिका मैं कैसे बताऊँ. मेरी सास जो अब मुझे बहुत मानती हैं, तब बहुत स्ट्रिक्ट थीं.

वे पढी-लिखी हैं? 
नहीं बिलकुल नहीं. उनके लिए बड़ी समस्या थी कि वे अपनी जाति से एक लड़की लाना चाहती थीं और उनके घर में एक ऐसी लडकी आकर बैठ गयी थी जिससे वह बिलकुल सहमत नहीं थीं. वे मेरी तरफ देखती भी नहीं थीं.

माँ-पिता के साथ गरिमा सिंह

महिलाएं कास्ट की विक्टिम भी हैं और कास्ट से लोडेड भी. 
बिलकुल, बिलकुल. और मैं बताऊँ मैं कहीं न कहीं अपने सास की कॉपी करती हूँ. वह सब हमने देखा हुआ है, जो निमकी की सास कर रही है. हालांकि समय के साथ उनमें बड़ा बदलाव आया. आज वे मुझे बहुत प्यार करती हैं और यह अहसास भी करती हैं कि उनकी गलती थी. हालांकि मैं उनकी गलती नहीं मानती हूँ. औरतों का दायरा बहुत छोटा है. मेरी सास ने घूँघट से बाहर अपना चेहरा कभी नहीं निकाला. सडक पर चलते हुए कभी उन्होंने घूँघट नहीं उठायी थी. यानी कभी उन्होंने सूरज नहीं देखा होगा. वह रौशनी नहीं देखी होगी, जो दिन के उजाले में होती है. दरअसल महिलाओं की परवरिश ही ऐसी है.

यानी जाति का दंश आपने झेला जबकि आप दलित नहीं थीं. 
हाँ बिलकुल. हमारा समाज अजब है. कहता है कि लडकियों की कोई जाति नहीं होती फिर भी आप भेद भाव करते हैं. औरतों की कोई जाति नहीं होती, घर नहीं होता है.

जाति होती भी नहीं है और जाति उनसे ही सुरक्षित होती है. 
हाँ, कई लड़ाइयाँ लम्बी होती हैं. मैंने इसके लिए बहुत संघर्ष किया है घर के भीतर भी. यहाँ तक कि घूँघट हटाने के लिए. मैंने खूब सवाल किये. सास के पास कोई जवाब नहीं थे. हालांकि विक्रांत और मेरे ससुर ने मेरा बहुत साथ दिया-वह अकेली लडाई मेरे और मेरे सास के बीच थी. आज बदलाव हुआ है.

इंडस्ट्री में सेक्सुअल एक्सप्लॉयटेशन की क्या स्थिति होती है. 
एक्सप्लॉयटेशन होंगे, लेकिन वह दूसरों के अनुभव हो सकते हैं. हालांकि कई मामलों में पीड़ित की इच्छाएं भी काम कर रही होती हैं, अतिरिक्त हासिल की आकांक्षा से प्रेरित. एक्सप्लॉयटेशन जैसी यहाँ है वैसी ही कई संस्थानों में होती है .

संजीव चंदन स्त्रीकाल के सम्पादक हैं 

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