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प्रतिभा श्री की कविताएं: वर्णमाला व अन्य

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प्रतिभा श्री


शिक्षिका, परास्नातक, आजमगढ, सम्पर्क : मोबाईल raseeditikat8179@gmail.com

“वर्णमाला “
वे सिखाते हैं तुम्हें ‘क’ से कन्या
 ‘प’ से पूजा
जबकि,
उनकी वर्णमाला में है
‘क’से कुतिया
 ‘प’ से पगली
वे सिखाते हैं तुम्हें
‘द’ से देवी
‘म’ से ममता
‘त’ से त्याग
दरअसल उनकी वर्णमाला में है
‘द’ से दंड
‘म’ से मजूरन
और
‘त’ से तिरस्कृत
तुम्हारी वर्णमाला और उनकी वर्णमाला में
रह जाता है
सैकड़ों अदृश्य
तुमको पढ़ने ना दी गई
किताबों का फर्क,
जिन्हें पढ़ना होता है ..
तुम्हारी जायज मांगों में
 पिता की सख्त होती
भंगिमा से ,
कॉलेज जाते देख
भाई की तिलमिलाहट से,
उड़ते दुप्पटे संग
लिपटीं अफवाहों से,
देह पर कचोटती चीटियों से
उनकी वर्णमाला समझने में
तुम्हें तोड़ना होगा
तैंतीस लाख व्यंजन
 ग्यारह हजार स्वरों  से
 निर्मित
अभेद्य चक्रव्यूह
बांचना होगा हर रोज
अनगिनत अदृश्य इबारतें
जानना होगा
कि तुम औरत होने के अतिरिक्त
 मनुष्य हो
 सशरीर जीवित प्राणी
जिसे प्राप्त हैं
समस्त
प्रकृति एवं विधि सम्मत
 अधिकार
जो उन्हें
प्राप्त हैं।

मैं कौन
अवनि पर आगमन के तत्क्षण
गर्भनाल  की गांठ पर
लिखा गया
शिलापट्ट
तुम्हारे नाम का
शिशुकाल से
मेरी यात्रा के अनगिनत पड़ावों पर
तत्पर किया गया
तुम्हारी सहधर्मिणी बनने को
उम्र की आधी कड़ियाँ टूटने तक
मैं ढालती रही स्वयं को
तुम्हारे निर्धारित साँचे में
मैं बनी
स्वयं के मन की नहीं
तुम्हारे मनमुताबिक

जो तुमको हो पसन्द वही बात करेंगे
तुम दिन को अगर रात कहो रात कहेंगे

तुम रंच मात्र ना बदले
मैं बदलती रही
मृगनयनी,
चातकी
मोहिनी हुई
कुलटा
कलंकिनी
कलमुँही  कहाई
सौंदर्य ,
असौंदर्य के
 सारे उपमान,
समाहित हो मुझमें
मेरी तलाश  में
भटकते घटाटोप अंधेरों में
थाम तुम्हारे यग्योपवीत का एक धागा
जहाँ हाथ को हाथ सुझाई न दे
करते चक्रण
तुम्हारी नाभि के चतुर्दिक
तुम्हारे
विशाल जगमगाते प्रासादों से
गुप्त अंधेरे कोटरों तक
मैं सहचरी से
अतिरंजित कामनाओं की पूर्ति हेतु वेश्या तक
स्वर्ग की अभीप्सा से नरक के द्वार तक
सोखती रही
तुम्हारी देह का कसैलापन
स्वयं को खोजा
मय में डूबी तुम्हारी आंखों में
हथेलियों के प्रकंपन में
दो देहों के मध्य
घटित विद्युत विध्वंश में
कि ,
किंचित नमक हो
और ,
मुझे ,
मेरे ,
अस्तित्व के स्वाद का भान हो
तुम्हारी तिक्तता से नष्ट होता गया  माधुर्य
तुम्हारी रिक्तता में समाहित हो
मैं शून्य हुई
मुझे ……!
मुझ तक पहुंचाने वाला पथ
  कभी
मुझ तक ना आया ।
जल की खोज में भटकते
पथिक सी
मेरी दौड़ रेत के मैदानों से
मृगमरीचिका तक
मेरे मालिक !
क्या ,
मैं

अभिशापित हूँ ?
तुम्हारी लिप्साओं की पूर्ति हेतु
मेरे उत्सर्ग को
कई युगों से
आज भी
 खड़ी हूँ
तुम्हारी धर्मसभाओं में
वस्त्रहीन
और
तुम्हारा उत्तर है
मौन ।

“भेड़िये”


1
ठीक ठाक याद नहीं उम्र का हिसाब
ना याद है पढ़ाई की कक्षा

बेस्ट फ्रेंड का चेहरा भी याद नहीं
ना याद है सबसे तेज लड़के का नाम
लेकिन
याद है
तुम्हारा छूना
घर के भीतर ही,
देह पर रेंगती लिजलिजी छिपकलियाँ
तेज नुकीले नाखूनों से बोया गया जहर
बेबसी
,छटपटाहट,
आँसू
ठोंक दी गई सभ्यता की कीलों से  बन्द चीखें
मेरा ईश्वर मरा उस दिन
थोड़ी मैं भी मरी
चुप थी
कई दिनों तक
मेरी चुप्पी में ध्वनित रहे अकथनीय प्रश्न
महीनों खुरचती रही देह
 कि उतार सकूँ चमड़ी से लाल काई
जिससे
बची रह सकूँ मैं
मेरे भीतर
थोड़ी-सी
जीवित

2
बाद के दिनों में
एक आदत सी हो गई
जैसा बच्चा सीखता है
बोलना
लड़खड़ाते हुए
 चलना
मैं सीखती गई
बस में,
ऑटो में,
पैदल रास्ते पर,
सीने पर लगे तेज धक्के से
गिरते गिरते सम्हलना
कंधे से नीचे सरकते हाथों को झटकना
पैरों के बीच जगह बनाते पैरों को कुचलना
मेरे साथी
सेफ्टीपिन
नन्हा चाकू
और लंबे नाखून थे।
उम्र घटती गई
बढ़ती गई समझ
और

 

नफरत भी
पुरुष भेड़िया है
उसे पसंद है
लड़कियों का कच्चा मांस
लड़कियों को झुण्ड में रहना चाहिए
ताकि,
भेड़िये नोंच कर खा न सकें

3
तुमने छुआ जब प्रेम में थी
जैसे छूती है मां,
नवजात को
सहेजा ,
जैसा सहेजता हो वंचित अपना धन
निर्द्वन्द रही तुम्हारे संग
जैसे हरे पत्तों पर थिरकती हो
ओस की बूंदे
तुम मुझमें
मैं तुममें समाहित
जैसे गोधूलि में
सूर्य और धरती का आलिंगन
तब जाना
पुरुष
आदमी होता है।
बेहद कमजोर
उसे जीतने की भूख है
हारी हुई औरत उसकी पहली पसंद है।

4
अब छत्तीस की होने तक
 सीख चुकी हूँ
भेड़िये की पहचान
लड़कियों को बताती हूँ
लक्षण के आधार पर
पहचान के तरीके
परन्तु
जानती हूँ
आदमी के बीच
भेड़िये की पहचान
मुश्किल है ।
क्योंकि,
आदमी और भेड़िये के चेहरेअक्सर
गड्डमगड्ड होते हैं।।

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मुजफ्फरपुर यौन-शोषण मामले में जांच की धीमी गति: सुप्रीम कोर्ट करेगा निगरानी, हटाया मीडिया रिपोर्ट पर ब्लैंकेट बैन, मीडिया संस्थानों को गाइडलाइन बनाने के लिए भेजी नोटिस

सुशील मानव 

बिहार के मुजफ्फरपुर के शेल्टर होम में बच्चियों से बलात्कार के मामले में जांच की गति और दिशा असंतोषजनक है. सुप्रीम कोर्ट को भी जांच में हस्तक्षेप करते हुए हाई कोर्ट की निगरानी को रोकते हुए अपनी निगरानी में लाना पड़ा. जांच की गति और दिशा से सत्ता और बलात्कारियों के नेक्सस का पता चलता है. इस बीच पटना हाई कोर्ट द्वारा इसकी मीडिया रिपोर्टिंग पर पूर्ण प्रतिबन्ध (ब्लैंकेट बैन), जिसे कम-से-कम सरकार ने इसी रूप में लिया था, को हटाते हुए मीडिया के असंयमित व्यवहार पर भी नाराजगी व्यक्त करते हुए सुप्रीम कोर्ट उसके नियामक संस्थानों को गाइडलाइन बनाने को कहा है. मीडिया से संबंधित याचिका स्त्रीकाल की संपादकीय सदस्य निवेदिता ने दायर की थी.  उधर एडवोकेट अलका वर्मा के अनुसार उनकी लगातार की मांग के बावजूद ब्रजेश ठाकुर को अभी तक रिमांड में नहीं लिया गया है। लापता लड़की का पता नहीं लगाया गया है।  सुशील की रिपोर्ट:

20 सितम्बर को सुप्रीम कोर्ट में मुजफ्फरपुर शेल्टर-होम यौन-उत्पीड़न मामले में महत्वपूर्ण सुनवाई हुई. मीडिया रिपोर्टिंग के मामले में इस सुनवाई का विशेष महत्व है.  इस घटना को लेकर जमीन पर सक्रियता और लेखन के जरिये विरोध करने वाली वरिष्ठ पत्रकार, साउथ एशियन वीमेन इन मीडिया की बिहार-अध्यक्ष एवं स्त्रीकाल की संपादकों में से एक निवेदिता की याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने मुज़फ्फरपुर बालिकागृह यौन-उत्पीड़न केस में मीडिया रिपोर्टिंग पर पटना हाइकोर्ट द्वारा लगाई गई पूर्ण रोक हटा दी है। सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि मीडिया रिपोर्टिंग पर पूरी तरह प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता है, लेकिन कोई रेखा तो होनी चाहिए। कोर्ट ने बेहद तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि मीडिया को निर्णयात्मक रिपोर्ट से बचना चाहिए. कोर्ट ने कहा कि यौन उत्पीड़न की पीड़िता की किसी भी तरह से पहचान उजागर न हो। पीड़ित का कोई इंटरव्यू नहीं होगा। ऐसे मामलों को सनसनीखेज बनाने से बचना चाहिए.
बच्चियों के साथ यौन अपराधों के मामले में मीडिया रिपोर्टिंग पर सवाल उठाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया और एनबीए को नोटिस जारी कर ऐसे अपराधों में मीडिया रिपोर्टिंग के लिए गाइडलाइन बनाने में सहयोग मांगा। कोर्ट ने कहा कि हम उम्मीद करते हैं कि प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया आत्मचिंतन करें कि क्या हो रहा है? चार अक्टूबर तक इन नियामक संस्थानों को कोर्ट में अपना जवाब दाखिल करने को कहा गया है.

इसके साथ ही इस केस में चल रही  सीबीआई जांच को सुप्रीम कोर्ट ने अपनी निगरानी में ले लिया है। सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी ब्रजेश ठाकुर पर सख्ती दिखाते हुए कहा कि इनकम टैक्स उसकी संपत्ति की जांच करे। कोर्ट ने कहा कि ब्रजेश ठाकुर और चंद्रशेखर वर्मा का इतना आतंक है कि रिपोर्ट के मुताबिक कोई उनके खिलाफ बोलने को तैयार नहीं है. चंद्रशेखर वर्मा और पूर्व मंत्री मंजू वर्मा के पास अवैध हथियार के मामले को बिहार पुलिस गंभीरता से देखे। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 20 मार्च 2018 को जिन लड़कियों को समाज कल्याण विभाग से शेल्टर होम में भेजा गया, इस पर बिहार सरकार हलफ़नामा दायर करे कि क्या उन्हें वहां घट रही घटनाओं के मद्देनजर तो नहीं भेजा गया, यानी राज्य सरकार को इसकी जानकारी तो नहीं थी?

हीं सुप्रीम कोर्ट ने मुजफ्फरपुर बालिका गृह यौन उत्पीड़न कांड की जांच के लिये नयी एसआईटी( विशेष जांच दल) गठित करने के सीबीआई के विशेष निदेशक को दिए गए पटना हाईकोर्ट के आदेश पर मंगलवार 18 सितंबर को ही रोक लगा दी थी। न्यायमूर्ति मदन बी लोकूर और न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता की पीठ ने उच्च न्यायालय के आदेश पर रोक लगाते हुये कहा था कि सीबीआई के जांच दल को इस समय बदलना जांच के लिये नुकसानदेह होगा।

जांच प्रगति पर क़ानून के जानकारों की अस्तुष्टि 
जाँच में हुई अब तक कि प्रगति पर हमने दो जानकार और जिम्मेदार वकीलों से बात करके उनकी राय जानी कि मुजफ्फरपुर केस की जाँच किस दिशा में जा रही है तथा और क्या होता तो ये जांच बेहतर होता?
मुजफ्फरपुर केस की सीबीआई जाँच कराने के लिए पटना हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर करनेवाली अल्का वर्मा ने केस में लेटेस्ट अपडेट की जानकारी देते हुए बताया कि पहले की तारीख में पटना हाईकोर्ट ने सीबीआई को नई एसआईटी गठित करने और उच्च न्यायालय में रिपोर्ट जमा कराने के लिए कहा था। सीबीआई ने उच्च न्यायालय के इस अनावश्यक हस्तक्षेप के बारे में सुप्रीम कोर्ट में शिकायत की थी, इसीलिए सुपीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश पर स्टे लगा दिया। आज जब मामला उठाया गया तो आदेश पर रोक लगाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेते हुए मामले की सुनवाई सुप्रीमकोर्ट की निगरानी में कराने का निर्णयलिया।
अलका जांच की दिशा और गति से संतुष्टि के सवाल पर कहती हैं कि ‘जिस दिशा में जांच चल रही है उससे मैं संतुष्ट नहीं हूं। मेरी लगातार की मांग के बावजूद ब्रजेश ठाकुर को अभी तक रिमांड में नहीं लिया गया है। लापता लड़की का पता नहीं लगाया गया है। हम त्वरित कार्रवाई चाहते थे.’ क्या हाईकोर्ट की निगरानी ठीक दिशा में है के जवाब में अल्का वर्मा ने कहा कि, अगर सुप्रीम कोर्ट द्वारा जांच निगरानी की जाती है तो मुझे खुशी होगीl

स्त्रीवादी न्यायविद एवं सुप्रीम कोर्ट में अधिवक्ता अरविन्द जैन ने कहा कि जो मौजूदा ढांचा है, उसी में पॉक्सो अपराधों की जांच होना नियति है। इसमें सब वही लोग हैं। सीबीआई, एसआईटी में भी वही लोग हैं, जिनकी स्पेशल ट्रेनिंग नहीं है। हाँ, सीबीआई और एसआईटी की जाँच में थोड़ा फर्क हो सकता है। सबकुछ इस बात पर डिपेंड करता है कि मॉनिटरिंग कौन कर रहा है। ज़रूर कहीं न कहीं मॉनीटरिंग में गड़बड़ी रही होगी तभी सुप्रीम कोर्ट ने अपने हाथों में मॉनीटरिंग ले ली है- लोकल ऑथोरिटी का प्रोशर तो होता ही है।

इस सवाल के जवाब में कि, क्या शिनाख्त परेड ऐसे में ज़रूरी हो जाता है अरविंज जैन  कहते हैं कि जब सब कुछ ओपेन हो तो शिनाख्त परेड से बहुत फर्क नहीं पड़ता। जो साक्ष्य मिलते हैं और बच्चों के जो बयान होते हैं जाँच और सुनवाई उसी के बेसिस पे होती है। शिनाख्त परेड कराई भी जा सकती है पर इसकी बहुत ज़रूरत नहीं है। अरविन्द जैन कहते हैं कि घटना होने पर जांच के बाद सिस्टम को हम वैसा का वैसा छोड़ देते हैं। उसमें कोई ज़रूरी सुधार तक नहीं किया जाता। इस तरह के पहले भी केस हैं जिनसे कोई सबक नहीं लिया गया। आज हालात ये है कि हजारों बच्चे गायब हो रहे हैं, ह्युमन ट्रैफिकिंग के मामले बढ़े हैं। इनपर नजर रखने के लिए सरकार की ओर से कमीशन होते हैं, चाइल्ड प्रोटेक्शन बोर्ड होते हैं, जुवेनाइल बोर्ड होते हैं। पिछले 15-20 साल में सबकुछ एनजीओ के हाथों में सबकुछ सौंप देने का नतीजा है ये। जबकि एनजीओ का चरित्र ही पैसा इकट्ठा करना होता है। उन्हें राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय कई जगहों से फंडिंग होती है। आवारा पूँजी इकट्ठा हो जाने के बाद ये पुलिस और अपराधियों को मिलाकर एक नेक्सस बना लेते हैं।

क्या है मुजफ्फरपुर में बच्चियों से बलात्कार का यह मामला और कैसे इस मुद्दे पर पूरा देश न्याय का इन्तजार कर रहा है, जानने के लिए नीचे ख़बरों का लिंक देखें. 

बिहार में बच्चियों के यौनशोषण के मामले का सच क्या बाहर आ पायेगा?

मंत्री के पति का उछला नाम तो हाई कोर्ट में सरेंडर बिहार सरकार: सीबीआई जांच का किया आदेश

बिहार के 14 संस्थानों में बच्चों का यौन शोषण: रिपोर्ट

बच्चों के यौन उत्पीड़न मामले को दबाने, साक्ष्यों को नष्ट करने की बहुत कोशिश हुई: एडवोकेट अलका वर्मा

‘सनातन’ कहाँ खड़ा है मुजफ्फरपुर में: हमेशा की तरह न्याय का उसका पक्ष मर्दवादी है, स्त्रियों के खिलाफ

पैसे की हवस विरासत में मिली थी हंटर वाले अंकल ‘ब्रजेश ठाकुर’ को !

ब्रजेश ठाकुर की बेटी के नाम एक पत्र: क्यों लचर हैं पिता के बचाव के तर्क

30 जुलाई को देशव्यापी प्रतिरोध की पूरी रपट: मुजफ्फरपुर में बच्चियों से बलात्कार के खिलाफ विरोध

बिहार बंद तस्वीरों में: राकेश रंजन की कविता के साथ

सुशील मानव फ्रीलांस जर्नलिस्ट हैं. संपर्क: 6393491351

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कुलपति हंगलू भेजे गये छुट्टी पर, होगी जुडीशियल जांच, अश्लील चैट मामला

सुशील मानव 


कुलपति के पद और प्रभाव के दुरुपयोग के आरोपी इलाहाबाद विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो रतनलाल हंगलू को छुट्टी पर भेजे जाने के साथ ही उनके अश्लील-चैट मामले की जुडिशियल जांच की सिफारिश कर दी गयी है. छात्रों ने उठाये जांच समिति गठन की संवैधानिकता पर सवाल. विद्यार्थियों  में  भ्रम है कि जांच आंतरिक रूप से गठित की गयी है या मंत्रालय के निदेश पर, जिसके बारे में विश्वविद्यालय के पीआरओ ने कहा कि न तो हम इसकी पुष्टि कर सकते हैं और न खंडन. मंत्रालय में छुट्टी होने के कारण इस पर किसी अधिकारी से बात नहीं हो सकी.  छात्रसंघ की पूर्व अध्यक्ष ऋचा सिंह के अनुसार जांच के लिए नियुक्त जस्टिस अरुण टंडन विश्वविद्यालय से सम्बद्ध के कॉलेज जे जुड़े हैं इसलिए इसमें कंफ्लिक्ट ऑफ़ इंटरेस्ट को देखते हुए हम इस जांच का विरोध करेंगे और नयी समिति गठित करने की मांग करेंगे जिसमें एक महिला सदस्य हो. ऋचा का आरोप है कि समिति के साथ नोडल ऑफिसर एक प्रोबेशन पर कार्यरत असिस्टेंट रजिस्ट्रार को बनाया गया है, यह भी संदेह पैदा करता है. इस बीच कानूनविदों की राय में जांच में सत्यता पाये जाने पर, यद्यपि बातचीत म्यूचुअल कंसेंट की लगती है, कुलपति होंगे पद के दुरूपयोग के दोषी, लगेगा प्रीवेंशन ऑफ़ करप्शन एक्ट भी.

विश्वविद्यालय के एक कार्यक्रम में कुलपति रतनलाल हंगलू और जस्टिस अरुण टंडन

स्त्रीकाल सहित मीडिया की रिपोर्टिंग, तमाम छात्रसंगठनों का साझा विरोध, संघर्ष और पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष ऋचा सिंह के प्रयासों के बाद आखिरकार इलाहाबद विश्वविद्यालय प्रशासन जाग ही गया। कुलपति के पद और प्रभाव के दुरुपयोग के आरोपी प्रो रतनलाल हंगलू को लंबी छुट्टी पर भेज दिया गया है। एमएचआरडी के निर्देश पर इस पूरे मामले की जांच के लिए हाईकोर्ट के रिटायर जज अरुण टंडन की अध्यक्षता में  एक जांच समिति गठित कर दी गई है। इलाहाबाद विश्विद्यालय के अतिथि गृह में इसकी जांच होगी। जस्टिस अरुण टंडन इलहाबाद विश्वविद्यालय से सम्बद्ध एक डिग्री कॉलेज, एस. एस.खन्ना, की संचलन समिति से जुड़े हैं.

जाँच पूरी होने तक रतनलाल हंगलू छुट्टी पर रहेंगे। इस दरमियान वे कैंपस में अपनी मर्जी से नहीं आ सकते। प्रभारी कुलपति प्रो केएस मिश्रा ने जांच कमेटी गठित की है। जबकि असिस्टेंट रजिस्ट्रार देवेश गोस्वामी को जांच कमेटी का नोडल अफसर बनाया गया है। उनके पास सारे दस्तावेजों को कलेक्ट करके न्यायमूर्ति तक ले जाने का जिम्मा होगा। 24-26 सितंबर तक इस प्रकरण से जुड़े साक्ष्य मांगे गए हैं। वहीं कार्यवाहक कुलपति ने इस मामले को लेकर छात्रों से कोई धरना प्रदर्शन न करने की अपील की है। पीआरओ चितरंजन कुमार सिंह ने बताया कि कार्यवाहक कुलपति की ओर से न्यायमूर्ति टंडन को इस बाबत पत्र भेज दिया गया है। जबकि इससे पहले तक रतन लाल हंगलू ऑडियो और वाट्सएप चैट से लगातार इनकार  करते हुए इसे गलत ठहरा रहे थे। इतना ही नहीं इस मामले को उजागर करनेवाले छात्रनेताओं के खिलाफ प्रशासन की ओर से एफआईआर तक दर्ज कराई गई थी। बता दें कि छात्रों के उग्र विरोध के चलते आरोपी वीसी रतन लाल हंगलू 17 व 18 सितंबर को कुलपति ऑफिस तक नहीं जा सके थे। 19 सितंबर को एचआरडी मंत्रालय ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय प्रशासन से रिपोर्ट माँगी थी।

छात्रों ने उठाये जांच पर सवाल 
छात्र-नेताओं ने हालांकि जांच समिति गठन की संवैधानिकता पर सवाल. छात्रों के सामने भ्रम है कि जांच आंतरिक रूप से गठित की गयी है या मंत्रालय के निदेश पर, जिसके बारे में विश्वविद्यालय के पीआरओ ने कहा कि न तो हम इसकी पुष्टि कर सकते हैं और न खंडन. मंत्रालय में छुट्टी होने के कारण इस पर किसी अधिकारी से बात नहीं हो सकी. छात्रसंघ की पूर्व अध्यक्ष ऋचा सिंह के अनुसार जांच के लिए नियुक्त जस्टिस अरुण टंडन विश्वविद्यालय से सम्बद्ध के कॉलेज जे जुड़े हैं इसलिए इसमें कंफ्लिक्ट ऑफ़ इंटरेस्ट को देखते हुए हम इस जांच का विरोध करेंगे और नयी समिति गठित करने की मांग करेंगे जिसमें एक महिला सदस्य हो. ऋचा के अनुसार जस्टिस टंडन कई कार्यक्रमों में कुलपति के अतिथि रहे हैं. पूर्व छात्र-संघ अध्यक्ष का आरोप है कि नोडल ऑफिसर एक प्रोबेशन पर कार्यरत असिस्टेंट रजिस्ट्रार को बनाया गया है, यह भी संदेह पैदा करता है.

इलाहाबाद विश्वविद्यालय

जारी है विरोध प्रदर्शन 
इससे पहले शुक्रवार 20 सितंबर को आरोपी वीसी के खिलाफ पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष दिनेश यादव, रोहित मिश्रा, ऋचा सिंह, वर्तमान अध्यक्ष अविनाश यादव की अगुवाई में छात्रों ने कैंपस में छात्रों के बीच एकजुटता प्रदर्शित करते हुए पैदल मार्च निकाला और वीसी के खिलाफ नारेबाजी करते हुए इस्तीफे की मांग की। छात्रों ने कहा कि जबतक एचआरडी मंत्रालाय आरोपी वीसी को बर्खास्त नहीं करता तब तक हमारा आंदोलन जारी रहेगा। छात्रों का कहना है कि नैतिकता और भरोसा खोने के बाद आरोपी रतन लाल हंगलू को वीसी पद पर बने रहने का कोई अधिकार नहीं है। वहीं छात्रों ने उन शिक्षकों पर भी निशाना साधा जोकि निजी स्वार्थ के लालच में वीसी पद और इलाहाबाद विश्वविद्यालय की प्रतिष्ठा व गरिमा का हनन करनेवाले रतन लाल हंगलू का बचाव कर रहे हैं।
इलाहाबाद विश्वविद्यालय के वर्तमान छात्रसंघ अध्यक्ष अविनाश यादव का कहना है छात्रों ने ठान लिया है के वे आरोपी वीसी को किसी भी कीमत पर अब वीसी की कुर्सी पर नहीं बैठने देंगे। जबकि पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष रोहित मिश्रा का कहना है कि इविवि में अगर किसी छात्रा के साथ छोड़खानी की कोई शिकायत आती है तो बिना जांच किए ही आरोपी छात्र को निलंबित कर दिया जाता है। हिंदी विभाग के अध्यक्ष प्रो कृपाशंकर पांडेय को एचआरडी को पत्र लिखने के आरोप में पद से हटा दिया गया जबकि वे आखिर तक कहते रहे कि उन्होंने कोई पत्र नहीं लिखा है। प्राणी शास्त्र विभाग के प्रो संदीप मल्होत्रा को भी बगैर आरोप सिद्ध हुए ही शिकायत मात्र के आधार पर विभागाध्यक्ष के पद से हटा दिया गया था। लेकिन खुद कुलपति पर बेहद गंभीर और घिनौने आरोप के बावजूद अपनी कुर्सी पर बने हुए हैं। जबकि पूरी निर्लज्जता से इविवि के शिक्षक उनका बचाव कर रहे हैं।
वहीं इलाहाबाद विश्वविद्यालय की महिला सलाहकार बोर्ड (वैब) की सदस्य रही प्रो लालसा यादव ने कहा कि वो 2016 में वैब की सदस्य थी जबकि वैब की बैठकों के दौरान उन्हें इस तरह के किस पत्र की जानकारी नहीं मिली। प्रो लालसा यादव ने पत्र को संदिग्ध व फर्जी बताया है।

क़ानूनविदों की राय 
इस बीच कानूनविदों की राय में जांच में सत्यता पाये जाने पर, यद्यपि बातचीत म्यूचुअल कंसेंट की लगती है, कुलपति होंगे पद के दुरूपयोग के दोषी, लगेगा प्रीवेंशन ऑफ़ करप्शन एक्ट भी. स्त्रीवादी अधिवक्ता अरविंद जैन के अनुसार ऐसे मामले न्यायपालिका में भी आये हैं, जिसके कारण आरोपी जजों को पद-त्यागना पड़ा था.



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सुप्रीम कोर्ट का दहेज़ संबंधी निर्णय यथार्थ की जमीन पर

अरविंद जैन


पिछले दिनों अपने ही एक निर्णय को पलटते हुए सुप्रीमकोर्ट ने दहेज़ के मामलों में जो नयी व्यवस्था दी है, वह स्वागत योग्य जरूर है, लेकिन न्याय का डगर इतना आसान नहीं है. अरविंद जैन का आलेख: 

“आमतौर पर सिर्फ कानून बनाने से ऐसी सामाजिक समस्याओं का समाधान नहीं हो सकता, जिन की जड़ें बहुत गहरी हैं. कानून बनाना जरूरी और अनिवार्य है, हालांकि इन्हें हर संभव दृष्टि से देखना चाहिए. देखना चाहिए ताकि कानून के साथ-साथ सामाजिक चेतना का प्रसार हो सके और समय को नया रूप-स्वरुप दिया जा सके.” (दहेज़ निषेध अधिनियम, 1961 पर संयुक्त संसदीय समिति की रिपोर्ट में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु की टिप्पणी)


भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने पिछले दो सप्ताह में अपने ही दो फैसलों को बदला। पहला भारतीय दंड संहिता,1860 की धारा 377 (समलैंगिकता) और दूसरा सोशल एक्शन फ़ॉर मानव अधिकार बनाम भारत सरकार मामले में भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 498ए (दहेज उत्पीड़न)। यथार्थवादी न्यायशास्त्र से लेकर आदर्श मॉडल स्कूल तक फैली विभिन्न शाखाओं पर लंबी बहस करने से क्या लाभ! सो, यहाँ मैं ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में सिर्फ दहेज संबंधी मामले पर संसद और न्यायपालिका की पक्षपाती भूमिका और न्यायिक विवेक और दृष्टिकोण के बारे में ही बात करूँगा।

उल्लेखनीय है कि अरनेश कुमार बनाम बिहार राज्य (2014) मामले में सुप्रीम कोर्ट ने दहेज उत्पीड़न के अपराधियों की गिरफ्तारी पर रोक लगाते हुए अपना निर्णय सुनाया था। इस पर भी विस्तार में चर्चा करेंगे।
27 जुलाई 2017 को राजेश शर्मा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य केस में सुप्रीम कोर्ट की एक और पीठ ने दहेज उत्पीड़न मामलों को कानून का दुरुपयोग बताते हुए, हर शहर में जाँच समिति बनाने के आदेश के साथ अन्य दिशा-निर्देश भी दिए थे। इससे बहू को दहेज के लिए उत्पीड़ित करने वाले पति एवम परिवार को असीमित छूट मिली और बहुओं को विकल्पहीन अंधेरे में धकेल दिया गया। इस निर्णय का राष्ट्रीय स्तर पर विरोध और आलोचना हुई।

एक साल बाद ही सितम्बर 2018 में सोशल एक्शन फ़ॉर मानव अधिकार बनाम भारत सरकार केस में पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई के बाद, सुप्रीम कोर्ट को  अपना (राजेश शर्मा वाला) फैसला बदलना पड़ा और जाँच समितियों के गठन को गैर कानूनी बताया गया है। 498ए पर इस निर्णय से भी, दहेज उत्पीड़न की शिकार बहूओं को कोई विशेष राहत मिलने की कोई संभावना नज़र नहीं आ रही। हाँ! इतना जरूर कह सकते हैं कि पुराने निर्णय के पैबन्दों को, नए रेशमी लबादे से ढक दिया गया है। क्या सिर्फ ‘कॉस्मेटिक सर्जरी’ से हालात बदल जाएंगे!

पढ़ें: न्याय व्यवस्था में दहेज़ का नासूर

बुनियादी सवाल यह है कि क्या न्यायपालिका सिर्फ कानून व्याख्यायित कर सकती है या फैसलों की आड़ में कानून बना भी सकती है? न्यायपालिका और विधायिका के अधिकार क्षेत्र की सीमा रेखा कहाँ से शुरू होती है और कहाँ समाप्त? क्या विधायिका और न्यायपालिका मिल कर अपने बेटे-बेटियों की ही वैधानिक सुरक्षा में नहीं लगे हैं? बहूओं की चिंता कौन करेगा! न्यायधीशों की नियुक्ति के मामले में संसद द्वारा बनाए कानून को सुप्रीम कोर्ट ने असंवैधानिक ठहराया और परिणाम स्वरूप 400 से अधिक पद खाली पड़े हैं। अनुसूचित जाति और जनजाति अत्याचार निरोधक कानून, 1989 पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर देशव्यापी आंदोलन और उसके बाद संसद द्वारा किए संशोधन पर सवर्णों द्वारा भारत बंद की हिंसक घटनाएँ हमारे सामने हैं। तीन तलाक़ पर सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद, तीन तलाक़ विधेयक लोकसभा में पारित होने के बावजूद, राज्यसभा में अटका-लटका दिया गया। देश अच्छी तरह जानता-समझता है कि इस टकराव में कितना कुछ टूटा-फूटा और बिखरा है। खैर…!

वर्तमान भारतीय समाज का राजनीतिक नारा है ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ और सामाजिक-सांस्कृतिक आकांक्षा है ‘आदर्श बहू’। वैसे भारतीय शहरी मध्यम वर्ग को ‘बेटी नहीं चाहिए’, मगर बेटियाँ हैं तो वो किसी भी तरह की बाहरी (यौन) हिंसा से एकदम ‘सुरक्षित’ रहनी चाहिए।हालाँकि रिश्तों की किसी भी छत के नीचे, स्त्रियाँ पूर्ण रूप से सुरक्षित नहीं हैं। यौन हिंसा, हत्या, आत्महत्या, दहेज प्रताड़ना और तेज़ाबी हमले लगातार बढ़ते जा रहे हैं।

2013 के कानूनी संशोधन करते समय संसद ने (बेटियों को सुरक्षित रखने के  लिए) सहमति से  यौन संबंध बनाने की उम्र सोलह साल से बढ़ा कर अठारह साल की, मगर पन्द्रह साल से बड़ी उम्र की बहूओं के साथ बेटों द्वारा बलात्कार तक करने की खुली छूट को बरकरार रखा। संशोधन से पहले पति को सहवास की छूट थी मगर संशोधन के बाद अन्य यौन क्रियाओं (अप्राकृतिक) का भी कानूनी अधिकार मिल गया।  यह दूसरी बात है कि बाद में (2017) सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पन्द्रह से अठारह साल के बीच की उम्र की पत्नी से यौन संबंध अपराध माना जाएगा। अठारह साल से बड़ी उम्र की पत्नी अभी भी पति के लिए घरेलू ‘यौन दासी’ बनी हुई है। इस पर ना जाने कब विचार विमर्श शुरू होगा!

पढ़ें : सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ आगे आये महिला संगठन

दहेज उत्पीड़न विरोधी कानून की मूल विडंबना यह है कि आज तक इसका लाभ, वास्तविक पीड़िताओं को कम ही मिल पाया है. ईमानदारी से कहूँ तो साफ़ तौर पर कारण यह है कि कानून की भाषा में दहेज़ माँगना, लेना या देना किसी भी तरह ‘अपराध’ नहीं है, दहेज़ हत्या ‘दुर्लभतम में दुर्लभ’ मामला नहीं, दहेज़ उत्पीड़न ‘मृत्यु से ठीक पहले’ होना सिद्ध करो और अब दहेज़ अपराधियों की गिरफ्तारी पर भी रोक या अंकुश. नैशनल क्राइम रेकॉर्ड ब्यूरो की रिपोर्ट के मुताबिक, देश में हर घंटे एक महिला दहेज हत्या का शिकार हो रही है लेकिन दहेज प्रताड़ना के अधिकाँश मामले तो दर्ज ही नहीं होते. कानूनी जाल-जंजाल या समाज में बदनामी के भय से, उत्पीड़ित महिलाएं सामने नहीं आतीं और घुट-घुटकर जीती-मरती रहती हैं. इस सब के बावजूद देश की सब से बड़ी अदालत का कहना है कि महिलाएं कानून का ‘नाजायज इस्तेमाल’ ढाल की बजाय, हथियार के तरह कर रही हैं. सच यह है कि इस देश में बहुत से कानून हैं, मगर महिलाओं के लिए कोई कानून नहीं है और जो हैं वो अंततः स्त्री विरोधी हैं.

दहेज कानून का ‘दुरुपयोग’: गिरफ़्तारी पर अंकुश
2 जुलाई 2014 को सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति चंद्रमौली कुमार प्रसाद और पिनाकी चन्द्र घोष की खंड पीठ ने, अरनेश कुमार बनाम बिहार राज्य के मामले में दहेज कानून का ‘दुरुपयोग’ रोकने के लिए महत्वपूर्ण व्यवस्था दी थी. सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट कहा था कि जिन मामलों में 7 साल तक की सजा हो सकती है, उनमें गिरफ्तारी सिर्फ इस आधार पर नहीं की जा सकती कि आरोपी ने वह अपराध किया ही होगा. गिरफ्तारी तभी की जाए, जब पर्याप्त सबूत हों, आरोपी की गिरफ्तारी ना करने से जांच प्रभावित हो, और अपराध करने या फरार होने की आशंका हो. अदालत के निर्देश यह भी हैं कि दहेज मामले में गिरफ्तारी से  पहले केस डायरी में कारण दर्ज करना अनिवार्य होगा, जिस पर मजिस्ट्रेट जरूरी समझे तो गिरफ्तारी का आदेश दे सकता है. इस आदेश की अनदेखी करने पर अधिकारी के विरुद्ध विभागीय कार्रवाई की जानी चाहिए. सर्वोच्च न्यायालय ने आदेश जारी किया है कि दहेज उत्पीड़न के मामलों में भी आरोपी को बहुत जरूरी होने पर ही  गिरफ्तार किया जाना चाहिए. सर्वोच्च न्यायालय का यह निर्णय भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 498 ए या दहेज़ प्रतिषेध अधिनियम की धारा 4 तक ही सीमित नहीं है, बल्कि ऐसे सभी मामलों के लिए है जिनमे अपराध की सजा सात वर्ष से कम हो या अधिकतम सात साल तक हो. उल्लेखनीय है कि इस निर्णय द्वारा पति के सम्बन्धियों को भी ‘रक्त-विवाह और गोद संबंधों’ तक ही सीमित कर दिया गया है. शेष किसी सम्बन्धी के खिलाफ मामला नहीं चल सकता.

सर्वोच्च न्यायालय ने एक बार फिर से महिलाओं द्वारा दहेज़ कानून के ‘दुरूपयोग’  पर ‘गहरी चिंता’ जताते हुए कहा कि यह कानून बनाया तो इसलिए गया था कि महिलाओं को दहेज़ प्रताड़ना से बचाया जा सके, परन्तु कुछ औरतों ने इसका ‘नाजायज इस्तेमाल’ किया और दहेज उत्पीड़न की झूठी शिकायतें दर्ज कराईं हैं. उल्लेखनीय है कि यह सर्वोच्च न्यायालय का ऐसा पहला या आखिरी निर्णय नहीं है, जिसे किसी न्यायमूर्ति विशेष का पूर्वग्रह या दुराग्रह मान-समझ कर नज़र अंदाज़ किया जा सके. हिंसा, यौन-हिंसा, घरेलू हिंसा से लेकर सहजीवन में सहमति के संबंधों तक पर, उच्च न्यायालयों समेत और भी न्यायालय विवादस्पद सवाल उठा चुके हैं. दहेज़ कानूनों से परेशान ‘पति बचाओ’ या ‘परिवार बचाओ’ आन्दोलन भी सक्रिय है.

पढ़ें: महिला अधिकारः वैधानिक प्रावधान

कानून अधिकार या हथियार?

सर्वोच्च न्यायालय द्वारा भारतीय दंड संहिता की धारा 498ए के ‘दुरुपयोग’ पर दिशा-निर्देश महिला संघठनों को बेहद चौंकाने वाले हैं. विचारणीय प्रश्न यह है कि क्या वास्तव में ही स्त्रियों द्वारा दहेज़ कानूनों का ‘दुरूपयोग’ किया जा रहा है या अभियोग पक्ष की कमजोरियों के कारण सजा नहीं हो पाती ? मुद्दा यह नही है कि क्या अपराधियों को गिरफ्तारी में असीमित छूट से पुलिस की निरंकुशता और भ्रष्टाचार को बढ़ावा नहीं मिलेगा?
हम क्यों और कैसे भूल जाते हैं कि दहेज अपराध में सजा की दर इसलिए भी बेहद कम है कि अपराध घर की चारदीवारी के भीतर होते हैं, जिनके पर्याप्त सबूत नहीं होते या हो नहीं सकते. कौन देगा ‘बहू’ के पक्ष में गवाही? ऊपर से कानून में इतने गहरे गढ्ढे हैं, कानून के रखवाले भ्रष्टाचार से मुक्त नहीं, साधन-संपन्न वर्ग में दहेज का चलन  पहले से अधिक बढ़ा है, कानून ऊपरी तौर पर बेहद प्रगतिशील दिखते हैं, पर दरअसल बेजान और नख-दन्त विहीन हैं. कहा यह जा रहा है कि महिलाएं कानून का ‘नाजायज इस्तेमाल’ हथियार की तरह कर रही हैं, ना कि ढाल के रूप में. कानून अगर हथियार ही है तो क्या सिर्फ महिलाएं ही इसका ‘नाजायज इस्तेमाल’ कर रही हैं? बाकी कानूनों के ‘दुरूपयोग’ और बढ़ते अपराधों के बारे में, आपका क्या विचार है?

दहेज़ माँगना, लेना या देना ‘अपराध’ नहीं
निसंदेह दहेज़ विरोधी कानून तो 1961 में ही बन गया, लेकिन इस पर लगाम लगने की बजाय, समस्या निरंतर जटिल और भयंकर होती गई. इसलिए 1983 में संशोधन करके भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 498ए जोड़ा गया, साक्ष्य अधिनियम में बदलाव किये. कारण कानून की भाषा में दहेज़ माँगना, लेना या देना किसी भी तरह ‘अपराध’ नहीं माना-समझा गया. परिणाम स्वरुप दहेज़ उत्पीड़न और दहेज़ हत्याओं के आंकड़े, साल-दर-साल बढ़ते ही चले गए और आज तक दहेज़ हत्या के किसी भी मामले में फाँसी की सज़ा नहीं हुई. जिन मामलों में हुई भी तो वो उच्च अदालतों ने, आजीवन कारावास में बदल दी. सर्वोच्च न्यायालय से उम्रकैद की सजा पाए हत्यारे, फाइलें गायब करवा के तब तक बाहर घुमते रहे जब तक इस लेखक- वकील ने अखबारों में ‘भंडाफौड़’ नहीं किया. सुधा गोयल (दिल्ली राज्य बनाम लक्ष्मण कुमार,1986) और शशिबाला केस में ‘चौथी दुनिया’ और ‘टाइम्स ऑफ़ इंडिया’ में सनसनीखेज रिपोर्ट-सम्पादकीय छपने के बाद ही, हत्यारों को जेल भेजा जा सका. इस बारे में मैंने विस्तार से ‘वधुओं को जलाने की संस्कृति’ (‘औरत होने की सज़ा’) में लिखा है.

दहेज़ हत्या : फाँसी नहीं उम्रकै
आश्चर्यजनक तो यह भी है कि जब दहेज़-हत्या के मामलों में फाँसी की सजा के मामले सर्वोच्च न्यायालय तक पहुँचने लगे, तो भारतीय संसद को 1986 में कानून बदलना पड़ा. सैंकड़ों मामले हैं, किस-किस के नाम गिनवाएं. भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 304B में, दहेज़ हत्याओं के लिए चालाकी पूर्ण ढंग से विशेष प्रावधान पारित किया. इस कानून में यह कहा गया कि शादी के 7 साल बाद तक अगर वधु की मृत्यु अस्वाभाविक स्थितियों में हुई है और ‘मृत्यु से ठीक पहले’ (‘soon before death’) दहेज़ के लिए प्रताड़ित किया गया है, तो अपराध सिद्ध होने पर उम्रकैद तक की सजा हो सकती है. इससे पहले दहेज़ हत्या के केस भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 302 के तहत दर्ज़ होते थे और अधिकतम सजा फाँसी हो सकती थी. मगर संशोधन द्वारा पितृसत्ता ने यह पुख्ता इंतजाम कर दिया गया कि दहेज़ हत्या के जघन्य, बर्बर और अमानवीय अपराधों में भी, फाँसी का फंदा ‘पिता-पुत्र-पति’ के गले तक ना पहुँच सके और अगर सजा हो भी तो, सात साल से लेकर अधिकतम सजा ‘उम्रकैद’ ही हो.
मीडिया में प्रचारित-प्रसारित यह किया गया कि महिलाओं की रक्षा-सुरक्षा के लिया सख्त कानून बनाए गए हैं. ऐसे अनेक मामले हैं, जिनमे सर्वोच्च न्यायालय सहित विभिन्न अदालतों ने अपराधियों को, इसी आधार पर बाइज्ज़त रिहा किया कि पीडिता को ‘मृत्यु से ठीक पहले’ (‘soon before death’) दहेज़ के लिए प्रताड़ित नहीं किया गया था. विधि आयोग की 202 वी रिपोर्ट इस संदर्भ में पढने लायक है. विधि आयोग ने भी कोई विशेष संशोधन की सिफारिश नहीं की.

दहेज़ उत्पीड़न, ‘मृत्यु से ठीक पहले’ अनिवार्य
5 अगस्त 2010 को सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति आर. एम. लोढ़ा (2014 में बने मुख्य न्यायाधीश) और पटनायक की खंड पीठ  ने अमर सिंह बनाम राजस्थान केस के फैसले में कहा कि दहेज़ हत्या के मामले में आरोप ठोस और पक्के होने चाहिए, महज अनुमान और अंदाजों के आधार पर ये आरोप नहीं ठहराए जा सकते . पति के परिजनों पर ये आरोप महज अनुमान के आधार पर सिर्फ इसलिए नहीं गढ़े-मढ़े जा सकते कि वे एक ही परिवार के है, सो उन्होंने ज़रूर  पत्नी को प्रताड़ित किया होगा. जस्टिस आर. एम. लोढ़ा (2014 में बने मुख्य न्यायाधीश) और पटनायक की  खंडपीठ ने यह कहते हुए पति की माँ और छोटे भाई के खिलाफ लगाये गए दहेज़ प्रताड़ना और दहेज़ हत्या के आरोपों को रद्द कर दिया. आरोपियों को बरी करते हुए खंडपीठ ने कहा “दहेज़ माँगना अपराध नहीं है और दहेज़ के लिए उत्पीड़न मृत्यु से ठीक पहले होना चाहिए, वरना सजा नहीं हो सकती. वधुपक्ष के लोग पति समेत उसके सभी परिजनों को अभियुक्त बना देते हैं, चाहे उनका दूर-दूर तक इससे कोई वास्ता ना हो .ऐसे में अनावश्यक रूप से परिजनों को अभियुक्त बनाने से असली अभियुक्त के छूट  जाने का खतरा बना रहता है.

दहेज़ हत्या- ‘दुर्लभतम में दुर्लभ’ या नहीं?
दूसरी ओर 2010 में सुप्रीम कोर्ट जस्टिस मार्कंडेय काटजू और जस्टिस ज्ञान सुधा मिश्रा ने एक मामले में कहा कि दहेज हत्या के मामले में फांसी की सजा होनी चाहिए। ये केस ‘दुर्लभतम में दुर्लभ’ की श्रेणी में आते हैं। स्वस्थ समाज की पहचान है कि वह महिलाओं को कितना सम्मान देता है, लेकिन भारतीय समाज ‘बीमार समाज’ हो गया है। समय आ गया है कि वधु हत्या की कुरीति पर जोरदार वार कर इसे खत्म कर दिया जाए, इस तरह कि कोई ऐसा अपराध करने की सोच न पाए.
सर्वोच्च न्यायालय की खंड पीठ  ने कहा कि इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले और आदेश से असहमत होने का कोई कारण नहीं है. वास्तव में  में यह धारा 302 (नृशंस और बर्बरतापूर्ण हत्या) का केस है, जिसमें मौत की सजा होनी चाहिए. लेकिन आरोप  धारा 302 के तहत नहीं लगाया गया, सो हम ऐसा नहीं कर सकते। वरना मामला तो यह दुर्लभतम में दुर्लभ की श्रेणी में आता है और अपराधियों को मौत की सजा होनी चाहिए. होनी चाहिए मगर…….!
पढ़ें: दहेज विरोधी कानून में सुधार की शुरुआत

हकीक़त यह भी है कि विधायिका ने जानबूझ कर ‘आधे-अधूरे’ कानून बनाए और कभी समीक्षा करने की चिंता ही नहीं की. जिनके लिए कानून बनाया गये, उनसे न्याय व्यवस्था का कोई सरोकार बन ही नहीं पाया. दहेज कानून के मौजूदा रूप-स्वरूप पर पुनर्विचार कब-कौन करेगा? लाखों पीड़ित-उत्पीड़ित स्त्रियां ना जाने कब से, सम्मानपूर्वक जीने-मरने का अधिकार पाने के लिए रोज़ कचहरी के चक्कर काटती घूम रही हैं.

अरविंद जैन स्त्रीवादी अधिवक्ता हैं. सम्पर्क: 9810201120

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इस काण्ड में महिला है, साहित्य है, साहित्य का सम्मान है, उत्पीड़न है, स्कैंडल है, पावर है, पावर का दुरूपयोग है और हाँ राजनीति भी

सुशील मानव 

इलाहाबाद विश्वविद्यालय के कुलपति रतनलाल हंगलू के व्हाट्सऐप चैट और बातचीत का ऑडियो वायरल होने के बाद इलाहाबाद में हंगामा बरपा है. मामला हिन्दी साहित्य और एक विश्वविद्यालय से जुड़ा हाई प्रोफाइल है, लेकिन साहित्य जगत न इसे लेकर संवेदित है और न ही मुखर. विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग सहित अन्य विभागों में हलचल जरूर है, लेकिन वह कुलपति के पक्ष में माहौल बनाने के लिए-न्याय के लिए नहीं. मारपीट हो रही है, छात्राओं में दहशत है, महिला साहित्यकार के घर पर भी हमला हुआ है लेकिन साहित्य जगत असम्पृक्त है. सब की अपनी ढपली है अपना राग-हर कोई दूसरे को राजनीति करने का आरोपी बता रहा है, इस बीच असंवेदनशील मीडिया की हरकतें हैं और प्रभावित महिला साहित्यकार की परस्पर विरोधाभाषी बातें. प्रशासन कुलपति के खिलाफ जांच की जगह मामले को किसी तरह भटकाने में लगा है और विद्यार्थियों का दावा है कि कुलपति की डेढ़ दर्जन महिलाओं से बातचीत का ऑडियो उनके पास है. इस दावे के साथ नुकसान वहां के माहौल को है-जो स्वतः महिला विरोधी दिखने लगता है. लेकिन सबसे अधिक आश्चर्यजनक है कुलपति के नियोक्ता मानव संसाधन विकास मंत्रालय और राष्ट्रपति कार्यालय की चुप्पी. सुशील मानव की रिपोर्ट:

मीरा स्मृति सम्मान/पुरस्कार में कुलपति रतनलाल हंगलू इस सम्मान की भी जिक्र है बातचीत में



यथार्थ और दार्शनिक बयानों में उलझा हमला

महिला साहित्यकार का कहना है कि 18 की रात के तीन बजे महिला साहित्यकार के घर दो हमलावर गए और उनका नाम लेकर उनकी अम्मा से पूछा कि वह कहाँ है हम उसे छोडेंगे नहीं। उनके घर के सामने महिला साहित्यकार के विरुद्ध नारेबाजी की और उन्हें जान से मारने की धमकी भी दी। बता दें कि महिला साहित्यकार उस समय किसी कार्यक्रम के सिलसिले में बाहर गई हुई थी। हमारी उनसे फोन पर बात हुई जिसमें उन्होंने बताया कि ‘हाँ हमारे घर कुछ लोग आये थे और मेरी अम्मा को मुझे जान से मारने की धमकी देकर गए हैं।  हमलावर कौन थे या उनको आपके घर किसने भेजा था, आपको किसी पर शक़ है, आदि सवालों के जवाब में वो कहती हैं कि ‘ये वही लोग हैं जो शांति और व्यवस्था को भंग करना चाहते हैं। जो मनुष्य के खून के प्यासे हैं।‘ यह दार्शनिक जवाब अखबारों में छपे उनके बयान से मेल नहीं खाता, जिसमें वे कुलपति हंगलू के लोगों को हमलावर बताती हुई प्रकाशित हुई हैं.

 इस हमले के बाद अखबारों ने उनका और उनके दिवंगत पति का नाम तक लिखना शुरू कर दिया है, तस्वीरें छापी हैं, जो महिलाओं के हित में गैरकानूनी हरकत है. अमर उजाला  द्वारा उनका नाम और फोटो छापने की बात पर वे नाराजगी और गुस्सा दर्ज कराते हुए पत्रकार समुदाय से अपील करती हैं कि अमर उजाला के इस गैर कानूनी और गैरजिम्मेदाराना रिपोर्टिंग के लिए घोर निंदा और बहिष्कार और भर्त्सना कीजिए। महिला साहित्यकार ने कहा कि गर अमर उजाला कल लिखित माफी नहीं माँगता तो मैं उसके खिलाफ कानूनी कारर्वाई के लिए बाध्य होऊँगी।

हीं महिला साहित्यकार ने इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के कुलपति रतन लाल हांगलू से अपनी दोस्ती को स्वीकार करते हुए कहा है कि ‘हमारी उनसे अच्छी दोस्ती है वो हमारे घर भी कई बार आ चुके हैं। काश्मीर पर उनकी जानकारी जबर्दस्त है। मैं आजकल काश्मीर पर एक किताब लिख रही हूँ जिसमें मैं उनकी मदद लेती रहती हूँ। साथ ही उन्होंने ये भी कहा कि गर कुलपति दोषी हैं तो उनके खिलाफ़ कार्रवाई हो।‘”इन दो विरोधाभाषी बयानों के साथ वे विक्टिम होने से खुद को मुक्त कर लेती हैं. लेकिन यह इतना आसान भी नहीं है, क्योंकि इसी के साथ कुलपति पद के दुरूपयोग के दोषी सिद्ध होने की कतार में खड़े हो जाते हैं.

हुआ था ऑडियो भी वायरल:

कुलपति द्वारा महिला साहित्यकार को भेजे गये व्हाट्स ऐप मेसेज के वायरल होने के बाद उन दोनों के बीच इंटेंस बातचीत का एक ऑडियो भी वायरल हुआ है. इलाहाबाद विश्वविद्यालय के पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष और एबीवीपी के सचिव रोहित मिश्रा ने कुलपति रतन लाल हंगलू और महिला साहित्यकार के बीच अंतरंग बातों की ऑडियो-क्लिप जारी की है। 33 मिनट 20 सेकंड का ये ऑडियो-क्लिप दरअसल मोबाइल पर हुई बातचीत की ऑडियो रिकॉर्डिंग है। ऑडियो संभवतः दोनों के बीच शुरुआती बातचीत की कॉल-रिकार्डिंग है। क्योंकि महिला साहित्यकार द्वारा सबसे पहले यही प्रश्न पूछा गया है कि ‘आपको मेरा नंबर कहाँ से मिला।क्योंकि मैंने तो आपको कभी कॉल नहीं किया। इवेन जब आपका मेसेज आया और आपने कार्यक्रम की ढेर सारी रिपोर्ट वगैरह भेजी तो उसमें आपकी पिक्चर लगी हुई थी। तो भी मैंने पूछा था कि इज दिस हांगलूज नंबर। तो मुझे लगा कि जो किताब मैंने आपको दिया था आपने उसमें से मेरा नंबर लिया होगा।‘ वहीं हंगलू साहेब शिकायत करते हुए कहते हैं कि ‘उसके बाद से तो तुमने मुझसे कांटैक्ट ही नहीं किया। महिला बताती है कि आपका नंबर और कार्ड सब वहीं होटल में ही छूट गया था।‘

जैसा कि ऑडियो में दोनो की बातचीत से स्पष्ट है कि महिला साहित्यकार से संवाद की शुरुआत कुलपति की ओर से ही हुई थी, वॉट्सएप पर भी और वायसकॉल में भी।ऑडियों में कुलपति रतन लाल हांगलू दिल्ली स्थित महिला साहित्यकार से बातचीत में अपने प्रभाव का उपयोग करके नौकरी और बेहतर करियर देने का वादा कर रहे हैं। ऑडियो में, कुलपति के दिल्ली आने और उस महिला से मिलने की योजना के बाबत बात हो रही है जिसमें महिला अपनी अम्मा को बहाने से दो दिन के लिए गाँव भेजने की सफल योजना के बारे में बता रही है। इसके बाद वो विभिन्न मामलों के संस्थानों में शीर्ष पदों पर आसीन अपने दोस्तों के बारे में बताते हुए उक्त महिला साहित्यकार को व्याख्यान देने और संगोष्ठियों में भाग लेने के लिए आमंत्रित करवाने की बात करते हैं।

पूरी बातचीत के दौरान महिला साहित्यकार द्वारा कई बार अपने दिवंगत साहित्यकार पति को याद किया गया है, उसे सबसे खूबसूरत मर्द बताया गया है। और उसके बाद रतन लाल हंगलू को भी वे बेहद खूबसूरत बताती है। ऑडियों में साफ सुना जा सकता है कि बातचीत के दौरान दो बार रतन लाल हांगलू द्वारा शक़ जाहिर किया जाता है कि उधर कोई है, मुझे किसी की आवाज सुनाई पड़ी है जिसे महिला साहित्यकार ने पहले तो मुझे तो कोई आवाज नहीं सुनाई दे रही और फिर नेटवर्क की समस्या के चलते दूसरी लाइन जुड़ने की बात कहती है। और बाद में अपने दिवंगत जीवन साथी के भूत की आवाज़ बताकर खिलखिलाकर हँसती हैं। महिला कहती है कि हो सकता है मेरे पति का भूत तुमसे गुस्सा हो कि तुम उसकी बीवी के साथ क्या बात कर रहे है या फिर वो तुम्हें शुक्रिया कह रहा हो अपनी बीवी का ख्याल रखने के लिए उसका अकेलापन बाँटने के लिए।

बीच-बीच में कहीं-कहीं दुनिया जहान की बाते हैं और कहीं-कहीं बेहद निजी बातें। ऑडियों में कई बार अपने लिए कुलपति शब्द का इस्तेमाल करता हुए कहता है कि इलाहाबाद यूनिवर्सिटी गुंडों और ठगों का अड्डा है। तिस पर महिलासहानुभूति जताते हुए कहती है गलत यूनिवर्सिटी पाकर आप फँस गये कुलपति साहेब। ऑडियों में कल्याणी देवी यूनिवर्सिटी और हैदराबाद यूनिवर्सिटी का भी जिक्र आता है। बातचीत में अक्टूबर 2017 के मीरा स्मृति पुरस्कार का भी जिक्र है। जहाँ ऑडियो में रतनलाल हांगलू कहते हैं कि मैं तुम्हें मीरा स्मृति पुरस्कार देते समय तुम्हें देखकर बिल्कुल अवाक था क्या कमाल की चीज है। इस पर महिला साहित्यकार खिलखिलाकर हँस पड़ती है। इसके आगे ऑडियो में दिल्ली का मौसम और ठंड के बाबत उक्त महिला साहित्यकार से वे पूछते हैं। और बताते हैं कि उन्हें कई कार्यक्रम में शिरकत करने के लिए दो दिन बाद दिल्ली आना है तो कैसे कपड़े लेकर आएं। महिला साहित्यकार अपने ड्राइवर का नंबर देने और उसे स्टेशन पर लेने, भेजने या खुद लेने जाने की बात करती है। बातचीत के दौरान महिला पूछती है ‘हू आई एम ऑफ योर्स’  और कुलपति महोदय रोमांटिक अंदाज में बताते हैं कि ‘यू आर माई जान, यू आर माई सोल।’ महिला का प्रत्युत्तर है, ‘हाय राम इतना ज्यादा।‘ कुलपति अपने आपको हीरो बताते हुए कहते हैं कि मुझे कोट पैंट पहनना पड़ता है कई कार्यक्रमों में जाना होता है ऐसे वैसे कपड़े पहनकर चला जाऊं तो ऐसे वैसे लोग जो वहाँ होते हैं कि कहते हैं कि, अरे अरे देखो लौंडा आ गया कैसा वीसी बना है। महिला आगे कहती है नहीं आप हीरो हैं। फिल्मों वाले नहीं सचमुच के हीरो। और शेखी बघारते हुए फिर रतनलाल महोदय कहते हैं कि एक कार्यक्रम में मैंने कहा कि पूरा हिंदुस्तान एक तरफ और मैं एक तरफ।

ऑडियो का वार्तालाप कुछ ऐसे उदाहरणों का भी समर्थन करता है जो वीसी और उस महिला के बीच व्हाट्सएप चैट में मौजूद थे, जो पहले दुबे द्वारा सार्वजनिक किया गया था।

रोहित मिश्रा द्वारा जारी किए गए ऑडियो पर, इलाहाबाद विश्वविद्यालय के पीआरओ चितरंजन कुमार सिंह का कहना है कि, “रोहित मिश्रा द्वारा सार्वजनिक किया गया ऑडियो की जाँच कराये जाने की ज़रूरत है जिससे ये पता चल सके कि ये ऑडियो विश्वसनीय है या किकिसी ने वीसी की आवाज़ की मिमिक्री करके तैयार की है।पूरे मुद्देकी अच्छी तरह से जाँच होनी चाहिए क्योंकि यह वीसी की छवि को खराब करने के षड्यंत्र के अलावा कुछ भी नहीं है।

महिला साहित्यकार से फोन पर जब मैंने पूछा कि वे  ऑडियो रिलीज करनेवाले रोहित मिश्रा या वॉट्सएप चैट रिलीज करनेवाले अविनाश दूबे को जानती हैं तो उन्होंने कहा नहीं मैं किसी रोहित मिश्रा या अविनाश दूबे को नहीं जानती। मैंने उनसे अगला प्रश्न किया कि क्या ऑडियो में वो अपनी आवाज़ होने की पुष्टि करती हैं तो उन्होंने कहा कि ‘नहीं’।

वहीं ऑडियो रिलीज करने वाले रोहित मिश्रा का कहना है ये तो अभी सिर्फ पहली ऑडियो रिकॉर्डिंग हैं। मेरे पास  17 अन्य रिकॉर्डिंग भी हैं, जिसमेंकुलपति द्वारा अन्य महिलाओं के साथ इसी तरह की आपत्तिजनक बातचीत करते सुना जा सकता है, इन महिलाओं में से कई तो इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के संकाय सदस्य हैं। रोहित मिश्रा के दावे से इस बात पर भी शक़ को बल मिलता है कि वाट्सएप चैट और बातचीत के ऑडियो कुलपति रतलाल हांगलू के मोबाइल से ही लीक किए गए हैं।

शिक्षक संघ की भूमिका

आरोपी कुलपति के समर्थन में शांतिमार्च निकालने की बात पूछने पर इलाहाबाद विश्वविद्यालय के शिक्षक एसोसिएशन के अध्यक्ष प्रो राम सेवक दूबे ने फोन पर बताया कि न तो मैं शामिल हुआ था इस शांति मार्च में और न ही शिक्षक एसोसिएशन। वह इंडिविजुअल छात्रों और शिक्षकों का मार्च था। इस शांतिमार्च में जो शिक्षक शामिल हुए थे वे व्यक्तिगत तौर पर शामिल हुए थे। उनके शामिल होने में शिक्षक एसोसिएशन का कोई लेना देना नहीं था। लेकिन यह पूछे जाने पर कि आप लोग आरोपी कुलपति के समर्थन में तो खड़े ही हैं जबकि अभी तक कोईं आंतरिक या वाह्य जाँच कुलपति रतन लाल हांगलू के खिलाफ नहीं हुई, शिक्षक संगठन के अध्यक्ष राम सेवक दूबे प्रतिप्रश्न करते हैं कि शिक्षक या कुलपति के पद पर बैठे कोई व्यक्ति ऐसे चरित्र का हो सकता है क्या? हम साथ काम करते हैं तो हमें इतना भरोसा तो होना ही चाहिए अपने साथी शिक्षकों और कुलपति पर। आगे उन्होंने बताया कि  पूरे मामले को लेकर इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के शिक्षक एसोसिएशन की बैठक प्रस्तावित है।‘ बैठक के बाद यह स्पष्ट हो गया कि शिक्षक संघ इस पर बंटा हुआ है. सम्बद्ध कॉलेजों के शिक्षक संघ ने छात्र-नेताओं पर बैठक के दौरान हंगामे और मारपीट का आरोप लगाया है. इस बीच विश्वविद्यालय के मिनिस्टीरियल एंड टेक्निकल स्टाफ यूनियन के अध्यक्ष डॉ. संतोष सहाय वीसी के प्रकरण की सीबीआई जांच कराने की मांग की है.

कुलपति के पक्ष में शान्ति मार्च में शिक्षकों के न सिर्फ शामिल होने की खबर है, बल्कि कुछ शिक्षक उनके पक्ष में जोर-शोर से सामने आ रहे हैं. विश्वविद्यालय के जानकारों का मानना है कि शिक्षक जो उनके समर्थन में आ रहे उनमें प्रायः प्रोबेशन अवधि वाले शिक्षक हैं, जिनकी नियुक्तियां विवादास्पद भी बतायी जा रही हैं.

छात्र मुखर आवाज  

इस पूरे प्रकरण में सबसे मुखर आवाज छात्र हैं, जिनका मानना है कि ऐसे कुलपति के होने से कैम्पस में महिलायें सुरक्षित नहीं होंगी. विद्यार्थी इस मुखरता का दंड भी पा रहे हैं, उनपर मुकदमे हुए हैं.

पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष ऋचा सिंह ने बताया कि कैंपस के छात्र आरोपी कुलपति के इस्तीफे और 12000 छात्राओं की सुरक्षा की माँग को लेकर कैंपस में ही धरने पर बैठे थे उस समय करीब एक बजे वह भी छात्रों के धरने को समर्थन देने कैंपस पहुँची जिसके बाद उनपर और धरना दे रहे छात्रों पर करीब 200-300 बाहरी गुंडों ने कैंपस में अंदर घुसकर हमला कर करके बमबाजी की। हमले में ऋचा सिंह वर्तमान अध्यक्ष अविनाश यादव और कई छात्रों को हल्की चोटें आई हैं। जिसके बाद कल शाम को कैंपस की छात्राओं ने महिला छात्रावास के बाहर गेट पर धरने प्रदर्शन करके अपना प्रतिरोध और रोष अभिव्यक्त किया। ऋचा सिंह का आरोप है कि राज्य प्रशासन और सरकार पूरे मामले में लगातार खामोशी ओढ़े हुए इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के बीएचयू में तब्दील होने का इंतजार कर रहा है। बता दें कि पिछले साल बीएचयू में लड़कियों की असुरक्षा और शिकायतों को लेकर ऐसे ही प्रशासनिक उदासीनता के चलते छात्राओं का आदोलन बड़ी हिंसा में तब्दील हो गया था।ऋचा सिंह बेहद गंभीर आरोप लगाते हुए कहती हैं कि इस तरह के हमले करवाकर विश्वविद्यालय प्रशासन पूरे मामले को दो छात्र संगठनों का आपसी संघर्ष साबित करके पूरे मामले से आरोपी कुलपति रतनलाल हांगलू को बचाने की फिराक़ में है।

वहीं पीआरओ चितरंजन कुमार सिंह से कुछ सवाल पूछे गए जैसे कि 1- पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष रोहित मिश्रा का कहना है कि उसके पास 17 अलग अलग स्त्रियों से बातचीत के ऑडियो हैं इस पर क्या कहना है आपका?2- आप बार बार आरोप लगा रहे हैं कि पूरे मामले में राजनीति की जा रही है तो राजनीति करनेवाले कौन लोग हैं और वे क्यों राजनीति कर रहे हैं? 3- बिना किसी जांच के यूनिवर्सिटी का टीचर एसोसिएशन ऐसे कैसे कुलपति के पक्ष में खड़ा हो सकता है। क्या टीचर एसोसिएशन के लोग राजनीति नहीं कर रहे पूरे मामले पर पक्षपाती होकर?जिसका उन्होंने जवाब नहीं दिया।

मंत्रालय का मौन

छात्र-नेताओं ने एसपी, एडीजी (यूपी), एचआरडी मंत्रालय, भारत सरकार और विजिटर के नाते राष्ट्रपति  को भी एक पत्र लिखा है जिसमें कुलपति के इस्तीफे और उनके खिलाफ जांच की मांग की जा रही है। “मैंने उच्च अधिकारियों को लिखा है और यह स्पष्ट कर दिया है कि वीसी के पास कोई अन्य विकल्प नहीं है अपने पद से इस्तीफा देने के सिवा ताकि पूरे मुद्दे में एक स्वतंत्र जांच की जा सके.  क्योंकि कुलपति अनैतिक चरित्र का है और यह कैंपस के 12000 से अधिक लड़कियों के छात्रों की सुरक्षा का सवाल है। लेकिन बेटी बचाओ, बेटी पढाओ सरकार के मंत्री इस मसले पर चुप हैं.

मानहानि का मुकदमा

उधर  48 घंटे का अल्टीमेटम पूरा होने के बाद आज पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष ऋचा सिंह द्वारा पीआरओ चितरंजन कुमार और रजिस्ट्रार एन के शुक्ला के विरुद्ध मानहानि का मुकदमा दर्ज करवाया गया। ऋचा सिंह का आरोप है कि मेरे लिखित नोटिस का जवाब लिखित में देने के बजाय पीआरओ चितरंजन द्वारा फोन करके तमाम हथकंडो द्वारा केस से पीछे हटने के लिए लगातार दबाव बनाया गया।

सुशील मानव फ्रीलांस जर्नलिस्ट हैं. संपर्क: 6393491351

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रंगमंच में हाशिये की सशक्त आवाज़ है ईश्वर शून्य का रंगकर्म

राजेश चन्द्र

दिल्ली का रंगमंच संख्यात्मक दृष्टि से बहुत उल्लेखनीय रहता आया है, क्योंकि यहां महीने में औसतन तीस से पचास नाटक मंचित होते हैं और उनमें भी स्वाभाविक तौर पर युवा निर्देशकों के नाटक ही अधिक संख्या में होते हैं। यदि बौद्धिक-वैचारिक स्तर पर दिल्ली के रंगमंच का आकलन करें तो आम तौर पर एक गहरी निराशा से दो-चार होना पड़ता है और कई बार ऐसा भी महसूस होता ही है कि यहां अधिसंख्य निर्देशकों की अपने समय-समाज के सवालों एवं संघर्षों में, उसके साहित्य में कोई रुचि नहीं है और न ही उनमें हस्तक्षेप करने की कोई इच्छा ही है। वे रंगकर्म को एक स्वान्तःसुखाय कर्म मानते हैं और एक प्रकार की आत्मरति में संतुष्टि की खोज करते हैं। अपने इष्ट-मित्र, स्वजन-सम्बंधी, प्रशंसक और अकादमियों-परिषदों की उत्सव-समितियों के सदस्य प्रस्तुति देख लें, उनकी सराहना और वाहवाही मिल जाये- जिसे आम तौर पर ‘‘स्टैडिंग आॅवेशन‘‘ की अतिरंजित शब्दावली में व्यक्त किया जाता है, कहीं किसी अखबार या अन्य किसी माध्यम में एक या दो काॅलम की कोई रपट छप जाये बस। इस चरण तक पहुंच जाने को प्रस्तुति का सफल रहना मानने का जैसे रिवाज़ है।

ईश्वर शून्य अपने साथी कलाकरों के साथ पहली पंक्ति में दायें से तीसरा

प्रस्तुति की सार्थकता-प्रासंगिकता, उसकी भाषा और सम्प्रेषणीयता, कथ्य के सापेक्ष उसके शिल्प-शैली की नवीनता और प्रभावोत्पादकता को लेकर किसी चर्चा या विमर्श की न इच्छा है, न समीक्षा या आलोचना के प्रति स्वीकार्यता। इस अनुत्साही परिवेश में दिल्ली में रंग-समीक्षा या तो मौज़ूद ही नहीं है, या उदासीन है, या फिर उसने स्वयं को येन-केन-प्रकारेण जीवित भर रखने के लिये परिवेश के साथ एक अनुकूलन कर लिया है। रंगमंच के लिहाज़ से यह एक स्वस्थ स्थिति नहीं मानी जा सकती, और ऐसा रंगमंच एक कलात्मक सामाजिक-सांस्कृतिक गतिविधि का दर्ज़ा पाने की पात्रता भी नहीं रखता। एक निर्देशक के तौर पर निजी प्रोफ़ाइल में दस-बीस कथित ‘सफल‘ या ‘सर्वश्रेष्ठ‘ प्रस्तुतियां, पांच-सात ‘मेगा‘ महोत्सवों में हिस्सेदारी, दो-चार ‘जुगाड़ के‘ पुरस्कार और जीवन में कुछ ‘ईर्ष्याजनक‘ सुख-सुविधाएं इस तरह भले ही जुड़ जायें, पर एक सर्जक कलाकार और रंगकर्मी के तौर पर ऐसा योगदान समय-समाज की कसौटी पर खरा उतर कर समाज की सामूहिक चेतना और स्मृति का हिस्सा भी बन पायेगा, ऐसा मानना अनुभव से सही नहीं लगता। दिल्ली के रंगमंच में व्याप्त इन स्थितियों का समरूप हिन्दी के अन्य रंग-केन्द्रों में भी दिखायी देता है या नहीं, इस बारे में बहुत दावे के साथ कुछ कहने की स्थिति में मैं स्वयं को नहीं पाता।

निश्चित रूप से इस स्थिति के अपवाद भी हैं और वरिष्ठ से लेकर युवा पीढ़ी में मौज़ूद ये अपवाद रंगमंच को तो एक सोद्देश्य, प्रतिबद्ध एवं गम्भीर सृजनात्मक और बौद्धिक-वैचारिक गतिविधि के तौर पर उल्लेखनीय सक्रियता देते ही हैं, साथ ही इनकी सक्रियताओं का प्रभावी विस्तार रंगमंच से आगे बढ़ कर समकालीन साहित्य, राजनीति, जनान्दोलनों एवं समकालीन विमर्शों तक भी दिखायी पड़ता है। यह कितनी त्रासद स्थिति है कि सार्थक एवं समाजोपयोगी रंगमंच की ऐतिहासिक विकास-यात्रा में कुछ नया, कलात्मक, मूल्यवान और विचारोत्तेजक जोड़ने की बेचैनी और छटपटाहट से अनुप्राणित जिस रंग-धारा को रंगमंच की मूलधारा होना था, आज वही उपेक्षा, अभाव और तिरस्कार के कारण सिमट कर हाशिया बनती गयी है और इसका विलोम बेशर्मी के ऊंचे आसन पर प्रतिष्ठित दिखायी देता है। उसी का जयघोष है, सारे विशेषण, सारी जगह, सारा संरक्षण उसे ही प्राप्त हो रहा है। यह रंगमंच का पूंजीवादी विकास (वास्तव में ‘अविकास‘) है, जिसमें मनुष्य, समाज और उसके मूल्यों-संघर्षों के लिये उतनी जगह नहीं है, जितनी व्यक्तिगत मुनाफ़ों, सुख-सुविधाओं के अतिरिक्त संचय की अमानुषिक होड़ है। इस कथित ‘विकास‘ के मुहावरे के बाहर जो कुछ भी है, वह इसके प्रस्तावकों और साझीदारों की दृष्टि में महत्वहीन, कलाविहीन, स्तरहीन और इसलिये त्याज्य है, न उसे देखने की आवश्यकता है और न उसे विमर्श में आने देना है। उससे एक व्यापक दूरी बना कर रखनी है और लगे हाथ उसे लांछित भी करते रहना है। इस मानसिक रुग्णता के संगठित प्रदर्शन हम आये दिन देखते ही हैं।

नाटक के बाद

ईश्वर शून्य दिल्ली के सर्वाधिक सक्रिय युवा निर्देशकों में से एक हैं, और वे रंगमंच की उसी बहुउपेक्षित धारा का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो रंगकर्म को एक सोद्देश्य, प्रतिबद्ध एवं गम्भीर सृजनात्मक तथा बौद्धिक गतिविधि मानती है और उसके माध्यम से अपने समय में एक प्रभावी वैचारिक हस्तक्षेप करने का निरन्तर प्रयास करती है। साहित्य, समाज और राजनीति के समकालीन विमर्शों से गहरा जुड़ाव ईश्वर शून्य के रंगकर्म को साधनहीनता में भी एक अलग और विशिष्ट वैचारिक धार और कलात्मक प्रासंगिकता देता है, और समाज की उपेक्षित-दमित मनुष्यता की पक्षधरता और उसकी जीवन-स्थितियों में बदलाव लाने की बेचैनी ही उनकी रंगदृष्टि और रंगभाषा को आधार देती है। रंग-समीक्षक के तौर पर लगभग एक दशक से दिल्ली के अधिकांश और देश के दर्जनों युवा निर्देशकों के रंगकर्म को देखते हुए मैंने यह अनुभव किया है कि अधिकांश युवा प्रारम्भिक एक-दो नाट्य-प्रस्तुतियों में अपनी ऊर्जा, कल्पनाशीलता तथा नवाचार से दर्शकों को चमत्कृत भी करते हैं और अक्सर ऐसा प्रतीत होने लगता है कि वे अपनी एक नयी रंगभाषा की खोज करते हुए उसे प्राप्त कर चुके हैं, परन्तु दुर्भाग्यपूर्ण रूप से आगे चल कर उनकी प्रस्तुतियां हमें निराश करने लगती हैं और निर्देशकीय यात्रा के प्रथम चरण में ही वे एक पराजित योद्धा की तरह अपने शस्त्रों से डूबती हुई नौका के अन्तिम पतवार का काम लेने लगते हैं। यह स्थिति उनकी सृजनात्मकता और कल्पनाशीलता के असमय ही चुक जाने का परिचायक लगती है और एक समीक्षक के तौर पर हमें उनके प्रारम्भिक कार्यों के आधार पर किया गया अपना ही आकलन अदूरदर्शी और जल्दबाज़ी से भरा महसूस होने लगता है। कम से कम मेरे लिये यह एक तक़लीफ़देह स्थिति होती रही है, जिसे ईमानदारी से स्वीकार करने में मुझे कोई हिचक नहीं है। अक्सर युवा निर्देशकों के काम में यह गतिरोध और जड़ता इसलिये आती है कि थोड़ी सराहना मिलने के बाद वे अहंकारी होने लगते हैं, अध्ययन में, समकालीन सवालों में उनकी रुचि नहीं रहती और वे कोई सृजनात्मक जोखिम लेने को तैयार नहीं हो पाते, इसलिये उनका काम दुहराव और सजावट से भर जाता है। उन्हें लगता है कि जिस कारण वे रंगकर्म में आये थे, उसकी पूर्ति इतने भर से ही हो जायेगी, इसलिये कुछ नया करने के बारे में सोचना मूर्खता है।

यही कारण रहे हैं कि ईश्वर शून्य के रंगकार्य को लगभग छह-सात वर्षों से निरन्तर देखते रहने के बावज़ूद मैंने कभी भी उसकी समीक्षा या आलोचना में एक शब्द भी ख़र्च नहीं किया और यह सच्चाई है कि उसकी निरन्तरता और सृजनात्मकता को लेकर इन वर्षों में एक सन्देह सदा ही प्रभावी रहा है। इससे भी अधिक सन्देह अपने आकलन को लेकर रहता आया, जिसके मूल में उसके बार-बार ग़लत सिद्ध होने की स्थितियां ज़िम्मेदार रही हैं। इसी मनःस्थिति के कारण ईश्वर शून्य के प्रारम्भिक चरण के पगला घोड़ा, माटी गाड़ी, मुद्राराक्षस, प्रेम परसाई और क़िस्सा जानी चोर आदि लगभग पांच-छह नाटकों को देखने के बावज़ूद मैंने जान-बूझ कर कोई औपचारिक प्रतिक्रिया नहीं दी, और समय का इन्तज़ार करता रहा। पिछले वर्ष ओमप्रकाश वाल्मीकि के ‘जूठन‘ की समर्थ प्रस्तुति को देखने के बाद ही मुझे विश्वास हो गया था कि ईश्वर शून्य अपनी सृजनशीलता के अगले और महत्वपूर्ण चरण में प्रवेश कर चुके हैं, उन्होंने रंगमंच में अपना पक्ष एवं दृष्टिकोण चुन लिया है और आने वाले दशक में हमें उनकी प्रतिबद्धता और रचनात्मकता के कितने ही उर्वर आयामों से परिचित और समृद्ध होने का मौक़ा मिलेगा, जिसके लिये हमें तैयार रहना चाहिये। शिवाजी सावन्त की प्रसिद्ध कृति ‘मृत्युंजय‘ के रूपान्तरण और प्रस्तुतिकरण में ईश्वर ने महाभारत के सबसे जटिल पात्र कर्ण के हिन्दू धर्म की बर्बर वर्ण-व्यवस्था और ब्राह्मणवाद से अथक संघर्ष को वर्तमान भारतीय सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्था के एक प्रभावी रूपक में ढालने में असाधारण कल्पनाशीलता का परिचय दिया है, और यह प्रस्तुति दर्शकों की चेतना पर अमिट प्रभाव छोड़ती हुई सम्पूर्ण कलात्मकता के साथ अपने समय के विमर्श को आगे बढ़ाती है।

वर्ण-व्यवस्था द्वारा दलितों के हज़ारों वर्ष पुराने अपमान और अमानवीय उत्पीड़न को अपना कथ्य बनाने के बाद ईश्वर ने किन्नरों के जीवन और उनके बाह्यान्तरिक संघर्षों पर केन्द्रित नाटक ‘जानेमन‘ प्रस्तुत किया। मछिन्द्र मोरे द्वारा लिखित मराठी का यह नाटक मुम्बई की एक बस्ती के किन्नरों के जीवन के चित्रण के माध्यम से इस समुदाय की पीड़ा, आकांक्षाओं एवं संघर्षों को सामने लाने के लिये जाना जाता है। ईश्वर शून्य अब पितृसत्ता की हिंसा और स्त्रियों के सवालों को लेकर एक और नयी प्रस्तुति ‘औरत होने की सज़ा‘ तैयार करने जा रहे हैं। यह प्रस्तुति देश के जाने-माने कानूनविद, लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता अरविंद जैन की इसी शीर्षक से प्रकाशित बहुचर्चित पुस्तक पर आधारित होगी। देश में साम्प्रदायिक फ़ासीवाद के इस मौज़ूदा दौर में पितृसत्ता के ढांचे को एक नयी शक्ति मिली है और स्त्रियों के अधिकारों पर, उनकी यौनिकता पर जिस तरह संगठित हमले बढ़े हैं, उसमें यह प्रस्तुति प्रतिरोध के लिहाज़ से अहम भूमिका निभायेगी, ऐसी अपेक्षा रखनी चाहिये।

ईश्वर द्वारा निर्देशित एक नाटक पिंजर  का एक दृश्य

ईश्वर शून्य अपने समय के प्रमुख सामाजिक-सांस्कृतिक एवं राजनीतिक आन्दोलनों में भी शामिल होते रहते हैं और एक एक्टिविस्ट के तौर पर उनकी यह सक्रियता उनके नाट्य-प्रदर्शनों को भी एक सामयिक चेतना से लैस करती है। हबीब तनवीर और नया थियेटर के साथ काम करने के दौरान उन्होंने जिस वैचारिकता का दामन थामा, उसे मांजते-सहेजते और विकसित करते हुए वे निरन्तर आगे बढ़ते आये हैं और अपनी एक नयी राह भी उन्होंने बनायी है। हाल के दिनों में ईश्वर शून्य ने नाट्यालोचना और समीक्षा के क्षेत्र में भी ज़ोरदार दस्तक दी है और इस वीराने में भी उम्मीद का नया बिरवा रोपा है।

इस तरह देखें तो हिन्दी रंगमंच में ईश्वर शून्य एक ऐसी नयी रंगभाषा लेकर सामने आये हैं, जिसमें हमारे समाज के अब तक हाशिये पर पड़े वर्गों एवं समुदायों की अनदेखी-अनजानी ज़िन्दगी और उसके जलते सवालों को अभिव्यक्ति मिल पा रही है। ये सवाल इतनी प्रमुखता, केन्द्रीयता और निरंतरता के साथ कम से कम पिछले तीस-चालीस वर्षों में हिन्दी के रंग-दर्शकों के सामने नहीं आये थे। हाशिये के समाजों एवं उनके मुद्दों के प्रति यही वैचारिक प्रतिबद्धता ईश्वर शून्य के रंगकार्य को एक अलग विशिष्टता और सार्थकता प्रदान करती है।

14 सितम्बर को ईश्वर शून्य का जन्मदिन था। उनको स्त्रीकाल और इस लेखक की तरफ़ से अशेष शुभकामनाएं!

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महिला साहित्यकार पर यौनसंबंध बनाने का दबाव देने के आरोप में फंसे कुलपति द्वारा पीड़िता के साथ खड़े लोगों पर बदले की कार्रवाई

सुशील मानव 


महिला साहित्यकार के साथ अश्लील बातचीत करने और यौनसंबंध का दवाब बनाने के आरोप में घिरे इलाहाबाद विश्वविद्यालय के कुलपति रतनलाल हंगलू द्वारा पीड़िता के पक्ष में खड़े लोगों पर बदले की कार्रवाईयां करवायी जा रही हैं, मानहानि का मुकदमा दर्ज करने की धमकी दी जा रही है, वहीं विश्वविद्यालय के शिक्षक भी कथित शान्ति मार्च के नाम पर उनके समर्थन में प्रदर्शन कर रहे हैं. इस बीच मामले की सीबीआई जांच की मांग की गयी है. पुलिस के अपुष्ट सूत्रों के अनुसार पुलिस भी अश्लील बातचीत को कुलपति द्वारा की गयी बातचीत मान रही है. सुशील मानव की रिपोर्ट: 


महिला साहित्यकार से वाट्सएप पर अश्लील बात-चीत करने और अपने पद और पवर का दुरुपयोग करते हुए उसका प्रभाव भय और नौकरी का लालच देकर उस पर यौनसंबंध के लिए दबाव बनाने के आरोपित इलाहबाद विश्वविद्यालय के कुलपति रतन लाल हंगलू अपने कच्चे-चिट्ठे का भंडाफोड़ हो जाने के बाद से लगातार पीड़िता और पीड़िता के साथ खड़े लोगों के खिलाफ हमले करवा रहे हैं। इसके लिए वे अपनी सारी मशीनरी का इस्तेमाल भी कर-करवा रहे हैं। विश्वविद्यालय इलाहाबाद के पब्लिक रिलेशन ऑफिसर (पीआरओ) चितरंजन कुमार द्वारा ऋचा सिंह पर छात्रसंघ का अध्यक्ष रहने के दौरान रुपए गबन करने का आरोप लगाया गया है। वहीं सपा के छात्रसंगठन से निवर्तमान छात्रसंघ अध्यक्ष अवनीश यादव के खिलाफ़ दूसरों से अपनी कांपियाँ लिखवाने का आरोप पीआरओ इलाहाबाद विश्वविद्यालय के द्वारा लगाया गया है। अविनाश यादव और ऋचा सिंह पर यदि ऐसा कोई आरोप था तो यूनिवर्सिटी मैनेजमेंट द्वारा पहले क्यों कोई कार्रवाई नहीं की गई? जाहिर है ये सब कुलपति पर लगे गंभीर आरोपों के बाद बदले की भावना से की जा रही कार्रवाईयां हैं, ताकि सबसे अलग-थलग करके पीड़िता को अकेला और कमजोर किया जा सके। साथ ही यूनिवर्सिटी के पीआरओ चितरंजन कुमार द्वारा स्त्रीकाल वेबपोर्टल के संपादक और रिपोर्टर पर भी दबाव बनाने की कोशिश की जा रही है। उन्हें मानहानि की धमकी भिजवायी जा रही है। वहीं महिला साहित्यकार और कुलपति के वाट्सएप चैट और फोन पर बातचीत का ऑडियो सार्वजनिक करनेवाले छात्रनेता अविनाश दूबे के खिलाफ रजिस्ट्रार, इलाहबाद विश्वविद्यालय की ओर से एफआईआर दर्ज करवाया गया है।

बता दें कि ऋचा सिंह को पीड़ित महिला ने पत्र लिखकर बताया कि वाट्सएप चैट वायरल होने के बाद से रतन लाल हांगलू की ओर से पीड़िता को जान से मारने की धमकी मिल रही है। साथ ही पीड़िता ने पत्र में ऋचा सिंह पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष से अपने जीवन की सुरक्षा व्यवस्था के लिए भी गुहार लगाई है। अब इलाहाबाद विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से ऋचा सिंह पर मानहानि का मुकदमा दर्ज करवाने की भी धमकी अख़बारों में खबरों के जरिए दी जा रही है। ऋचा सिंह द्वारा पीड़िता की ओर से कुलपति पर आरोप लगाने और राष्ट्रपति प्रधानमंत्री को पत्र लिखने की बात को पीआरओ चितरंजन सिंह द्वारा विश्वविद्यालय की गरिमा से जोड़ दिया गया है। पीआरओ द्वारा लगातार बड़ी शातिरतापूर्ण ढंग से कुलपति के खिलाफ लगाए आरोप को विश्वविद्यालय की गरिमा से जोड़ दिया गया है। और इस तरह से प्रचारित प्रसारित किया जा रहा है कि जैसे कुलपति ही विश्वविद्यालय हैं। याद कीजिए पैटर्न देश में भी बलात्कार की कोई बड़ी घटना की कवरेज विदेशी मीडिया में होती है या प्रधानमंत्री के खिलाफ कोई नेता कुछ आरोप लगाता है तो कैसे भाजपा-और संघ के लोग इसे देश की छवि खराब करनेवाला बता देते हैं।

हिंदुस्तान से मिली खबर के मुताबिक शुक्रवार 14 सितंबर को इलाहाबाद विश्वविद्यालय प्रॉक्टोरियल बोर्ड की मीटिंग हुई। मीटिंग में ऋचा सिंह की ओर से कैंपस की लड़कियों की सुरक्षा को लेकर दिए गए बयान को गैरजिम्मेदाराना कहा गया है और इस पर क्षोभ व्यक्त किया गया है। मीटिंग में बताया गया है कि एक राष्ट्रीय स्तर की संस्था के बारे में ऋचा सिंह द्वारा किया जा रहा दुष्प्रचार निंदनीय है। उपरोक्त बातें बैठक में शामिल चीफ प्रॉक्टर प्रो राम सेवक दूबे की ओर से जारी प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया है।

उपरोक्त प्रेस विज्ञप्ति पर अगर ठहरकर एक नज़र डाली जाए तो बहुत सी चीजें स्पष्ट हो जाती हैं। कैंपस में लड़कियों की सुरक्षा के प्रति एक महिला व पूर्वछात्रसंघ अध्यक्ष की चिंता जताने वाले बयान को किस आधार पर इलाहाबाद विश्वविद्यालय प्रॉक्टोरियल बोर्ड ने गैर जिम्मेदाराना कहा? क्या प्रॉक्टोरियल बोर्ड ने इस पूरे मामले में कुलपति के विरुद्ध कोई जाँच करवाई। गर नहीं करवाई तो उस स्थिति में प्रोक्टोरियल बोर्ड का ये बयान बेहद ही शर्मनाक और निंदनीय है साथ ही इस बात की बानगी भी कि केंद्रीय विश्वविद्यालय जैसे उच्च शिक्षा संस्थान में किस तरह अलोकतांत्रिक और सामंतवादी आचरण किया जाता है, तथा किसी भी तरह का आरोप लगाने वाले के खिलाफ प्रबंधन एकजुट होकर किस तरह उसका शिकार करता है। जाहिर है प्रोक्टोरियल बोर्ड में शामिल लोग पूरी निर्लज्जता के साथ आरोपी कुलपति के साथ खड़े हैं। दूसरी बात ये कि प्रोक्टोरियल मीटिंग में ऋचा सिंह द्वारा एक राष्ट्रीय स्तर की संस्था के बारे में दुष्प्रचार का आरोप लगाकर निंदा भी कर दी गई है। ऋचा सिंह ने संस्था के बारे में क्या दुष्प्रचार किया है ये बात भी इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्रोक्टोरियल बोर्ड को स्पष्ट करनी चाहिए। उन्होंने तो सिर्फ कुलपति हांगलू पर आरोप लगाया है। तो क्या इलाहाबाद विश्वविद्यालय का प्रोक्टोरियल बोर्ड कुलपति हांगलू को संस्था (इलाहाबाद विश्वविद्यालय) मानता है?ये तो वही मिसाल हुई जो भाजपा वाले दुहराते रहते हैं कि जो मोदी सरकार के खिलाफ है वो राष्ट्रद्रोही है।
वहीं शुक्रवार को आरोपित कुलपति रतन लाल हांगलू के समर्थन में कुलपति दफ्तर से गांधी भवन तक शांति मार्च निकाला गया। शांति मार्च के बाद पीआरओ ने कुलपति के सारे आरोप धुल जाने का दावा करते हुए कहा कि ये शांति मार्च आरोप लगानेवालों के मुँह पर तमाचा है। माने गाँधी-भवन तक शांति मार्च निकालने के बाद भी मन की कुंठा और हिंसाभाव खत्म नहीं हुई और आरोप लगानेवालों को उन्होंने इसके जरिए तमाचा तक जड़ दिया। विश्वविद्यालय के पीआरओ चितरंजन कुमार इस समय आरोपित कुलपति के प्रवक्ता जैसा आचरण कर रहे हैं। जिसमें आरोप लगाने वालों के खिलाफ मुकदमा करने से लेकर रिपोर्ट लिखनेवाले पत्रकार को धमकाने तक सब शामिल है। वहीं तमाचा मार्च निकालनेवाले पीआरओ ने बिना किसी जाँच के ही सभी साक्ष्यों और गवाहों को फर्जी और झूठा भी कह दिया है।

कुलपति हंगलू

वहीं पीआरओ चितरंजन कुमार द्वारा गबन का आरोप लगाए जाने के बाद ऋचा सिंह ने अपने बयान में कहा है- “पीआरओ का बयान मेरी सामाजिक और व्यक्तिगत छवि को धूमिल करने का प्रयास है। गबन का मामला न होने की पुष्टि वित्त विभाग से की जा सकती है। आजादी के बाद विवि की प्रथम महिला छात्रसंघ अध्यक्ष होने के नाते मेरे द्वारा छात्रसंघ के बजट से एक रुपया भी नहीं लिया गया। बल्कि मैंने उल्टे विवि से पूछा कि उस सत्र में बजट का पैसा विवि ने कहाँ खर्च किया? लेकिन मुझे कोई जवाब नहीं मिला मैं पीआरओ पर मानहानि का मुकदमा दर्ज कराऊँगी।”

इस बीच पूर्व अध्यक्ष ऋचा सिंह ने गृहमंत्री राजनाथ सिंह को पत्र लिखकर कुलपति पर लगे आरोपों की सीबीआई जांच की मांग की है। वही अपुष्ट सूत्रों से यह भी पता चला है कि व्हाट्स ऐप चैट को पुलिस भी सही मान रही है।

सुशील मानव फ्रीलांस जर्नलिस्ट हैं. संपर्क: 6393491351

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नौकरी का प्रलोभन देकर महिला साहित्यकार से इलाहाबाद विश्वविद्यालय के कुलपति की अश्लील बातचीत: चैट हुआ वायरल


इलाहाबाद विश्वविद्यालय के कुलपति रतन लाल हंगलू और एक महिला साहित्यकार के बीच वाट्सएप चैट का स्क्रीनशॉट इन दिनों वायरल हो रहा है। चैट अश्लील भी है और नौकरी का प्रलोभन देते हुए एक किस्म की बारगेनिंग को भी सामने लाता है. कुलपति पर उनकी पूर्व नौकरियों में भी लगे हैं यौन-शोषण के आरोप. एक छात्रा की माँ ने नौकरी देने के प्रलोभन से छात्राओं के यौन-शोषण का आरोप लगाते हुए इलाहाबाद विश्वविद्यालय को सावधान भी किया था. छात्र-नेता ऋचा सिंह कहती हैं कि इस विश्वविद्यालय की लड़कियों की गरिमा खतरे में है और राष्ट्रपति से कुलपति की बर्खास्तगी की मांग भी उन्होंने की है. पढ़ें सुशील मानव की रिपोर्ट: 





ये चैट बेहजद निजी हैं और अश्लील भी– जिसे पढ़ने के बाद उस पैटर्न का खुलासा होता कि किस तरह किसी संस्था के उच्च पद पर बैठा कोई पुरुष अपने सत्ता पॉवर और पहुँच के बल पर तमाम तरह के लोभ लालच देकर महिलाओं और लड़कियों का यौनशोषण करता है। सबसे ज्यादा दुःख और गुस्सा तब आता है जब ये पुरुष किसी यूनिवर्सिटी के उच्च पद पर आसीन उच्च शिक्षित व्यक्ति हो।  कैसे वो प्यार, पैसे रुतबे और संस्थान के किसी वांछित पद पर नौकरी दिलवाने के वादे करते हुए किसी महिला का यौन-शोषण करता है। इस मामले में अभियुक्त कुलपति पहले से ही शादी-शुदा है, और ये बात उस महिला को भी भलीभाँति पता हो जिसका शिकार वो कर रहा हो। वाट्सएप चैट वायरल होने के बाद से वीसी इलाहाबाद प्रो रतन लाल हंगलू का मोबाइल नंबर स्विच ऑफ है। उनके एक दूसरे नंबर पर भी संपर्क करने की कोशिश की गई लेकिन उस नंबर पर पर भी उनसे संपर्क नहीं हो पा रहा है।

बता दें कि इलाहाबाद यूनिवर्सिटी की लड़कियाँ पहले भी कुलपति रतन लाल हंगलू और रजिस्ट्रार एन के शुक्ला के खिलाफ आंदोलनरत रही हैं। इससे पहले इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में आदित्यनाथ योगी को कैंपस में आने से रोकने का मामला हुआ था, 19 नवंबर 2016 की रात जब तत्कालीन छात्रसंघ अध्यक्ष ऋचा सिंह तमाम लड़कियों के साथ रात 12 बजे धरने पर यूनिवर्सिटी गेट पर बैठी हुई थी, उस वक़्त एबीवीपीके गुंडों के साथ एन के शुक्ला नशे की हालत में धुत वहाँ पहुचते हैं, और गुंडों के साथ मिलकर धरने पर बैठी लड़कियों को न सिर्फ अभद्र अश्लील गालियां दी बल्कि मार पीट भी की थी, जिसकी रिपोर्ट यूनिवर्सिटी से संबंधित कर्नलगंज थाने में दर्ज है।विश्वविद्यालय के महिला सलाहकार बोर्ड की चेयरपर्सन द्वारा विश्वविद्यालय को चिट्ठी लिखी गई थी जिसमें में यह स्वीकार किया गया कि लड़कियों की साथ देर रात अभद्रता हुई पर, विश्वविद्यालय उस चिट्ठी को दबा देता है, और उस पर कोई जांच नही होती।

गौरतलब है कि यूनिवर्सिटी में 12000 लड़कियाँ पढ़ती हैं। इसके पहले कुलपति रतन जिस कल्याणी विश्वविद्यालय में कार्यरत थे वहां पढने वाली एक लड़की की माँ सुभाषिनी डे ने इलाहाबद यूनिवर्सिटी के महिला सलाहकार बोर्ड के चेयरपर्सन को पत्र लिखकर उन्हें अपनी चिंता से अवगत करवाया था।महिला ने लिखा है कि ‘मैं कल्याणी विश्वविद्यालय में पढ़नेवाली एक छात्रा की माँ हूँ। मैं बहुत चिंतित होकर आपको पत्र लिख रही हूँ। आपके वीसी प्रो. रतन लाल हंगलू ने जॉब और दूसरे फायदे पहुँचाने का लालच देकर कल्याणी यूनिवर्सिटी के कई लड़कियों के साथ यौनसंबंध बनाया है। वो समाज के लिए बहुत बड़ा खतरा हैं। कृपया अपनी इलाहाबाद यूनिवर्सिटी की लड़कियों की सुरक्षा कीजिए। आप उनके चरित्र के बाबत हैदराबाद यूनिवर्सिटी में भी जांच पड़ताल कर सकती हैं। प्रो रतन लाल हंगलू अपने ऑफिस में केवल उन्हीं पुरुषों को नौकरी देता है जो उसके पास सेक्स के लिए लड़कियों की सप्लाई करता है। कृपया एहतियात के तौर पर उनपर आप कड़ी नज़र उनके पास किसी भी लड़की को अकेली मत जाने दीजिए। वो लड़कियों को फँसाने के लिए झूठी-मीठी बातें और तोहफों का इस्तेमाल करता है।रतन लाल हंगलू के बारे में ये सभी बातें कल्याणी यूनिवर्सिटी के हर एक व्यक्ति को भली भाँति पता है।’

कुलपति रतनलाल हंगलू

वहीं इलाहाबद यूनिवर्सिटी की पूर्व और प्रथम महिला छात्रसंघ अध्यक्ष ऋचासिंह ने आरोपित कुलपति रतन लाल हंगलू पर लगे यौनाचार के आरोप के संबंध में पत्र लिखकर उन्हें ये बताते हुए कि आपके कारनामे शहर के लगभग सभी सभी अखबारों में छप चुके हैं और उस कथित महिला ने भी इसकी पुष्टि की है, उनसे नैतिक आधार पर वीसी इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के पद से इस्तीफा देने की माँग की है। ऋचा सिंह ने पत्र में उन्हें ये भी याद दिलाया है कि ‘जब भी किसी छात्र-कर्मचारी-शिक्षक-विभागाध्यक्ष पर कोई आरोप लगा है आपने उन्हें जांचपूर्व ही पद से हटा दिया है उस समय आपकी दलील ये रही है कि वो व्यक्ति अपने पद के चलते जांच को प्रभावित न कर सके इसलिए ऐसा किया गया है। तो महोदय आज जब आप पर पर अपने पद का लाभ उठाते हुए एक कथित महिला को लाभ देने का आश्वासन संबंधी खबरें लगातार शहर के सभी प्रमुख समाचार पत्रों में प्रकाशित हो रही है और उक्त महिला ने भी जिसकी पुष्टि कर दी है। ऐसे में विश्वविद्यालय के कुलपति पद पर बने रहने का आपको नैतिक अधिकार नहीं रह जाता। जैसी की आपकी कार्यप्रणाली रही है उसी के अनुरूप आपसे अपेक्षा है कि आप उक्त आरोपों की जांच होने तक नैतिक आधार पर इस्तीफा देते हुए कैंपस के अंदर प्रवेश न करें। ताकि कुलपति पद की गरिमा बनी रहे। साथ ही विश्वविद्यालय में अध्ययन करनेवाली छात्रायें जो कुलपति के संरक्षण में यह आशा करती हैं कि परिसर छात्राओं को सुरक्षित माहौल उपलब्ध कराएगा। परंतु इस तरह के खबरों के बाद छात्राओं समेत उनके अभिभावक जो गांव-दूर दराज क्षेत्रों से अपनी बेटियों को विश्वविद्यालय में उच्च शिक्षा ग्रहण करने के लिए भेजते हैं वह सभी विश्वविद्यालय कैंपस को संदेह के घेरे में महसूस कर रही हैं और किसी भी घटना की शिकायत के लिए किस संस्था के पास जाएं जब कुलपति, रजिस्ट्रार सभी महिला उत्पीड़न के आरोप से घिरे हुए हैं।’

इसके अलावा ऋचा सिंह ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी पत्र लिखकर मांग की है कि ‘प्रधानमंत्री जी बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ का नारा तो देते हो पर सड़क से लेकर विश्वविद्यालयों में चल रही परिस्थितियों के चलते छात्राओं की सुरक्षा खतरे में पड़ गयी है। समाचार पत्रों को पढ़ने के बाद अभिभावक अपनी बेटियों को विश्वविद्यलय में उनसे डरने लगे हैं। उपरोक्त तथ्यों और परिस्थितियों के प्रकाश में आपसे प्रार्थना है कि इलाहाबाद विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो रतन लाल हंगलू के खिलाफ लगे यौनाचार के आरोपों का उच्च स्तरीय समिति से अविलंब जांच कराने की कृपा करें। तथा निष्पक्ष जाँच के दौरान प्रो रतन लाल हंगलू का कैंपस में प्रवेश प्रतिबिंधित करने की कृपा करें।’ उल्लेखनीय है कि प्रो रतन लाल हंगलू के विरुद्ध पूर्व में भी उच्च स्तरीय जाँच समितियों ने अपनी रिपोर्ट मानव संसाधन मंत्रालय को सौंप रखी है।

ऋचा सिंह ने राष्ट्रपति को भी पत्र लिखकर विश्वविद्यालय की 12000 लड़कियों की सुरक्षा की चिंता जताते हुए उन्हें इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के बिगड़े हुए हालात से अवगत कराया है। साथ ही प्रो रतन लाल हंगलू और रजिस्ट्रार एन के शुक्ला पर यौनाचार के आरोपों के मद्देनजर उन्हें तत्काल प्रभाव से कैंपस में जाने से प्रतिबंधित करने की माँग की है।

अजीब विडंबना है कि देश में बेटी पढ़ाओ बेटी बचाओ का नारा दिया जाता है और उन्ही बेटियों का तन मन नोचने वाले उन्हें झूठे मीठे वायदे और लालच देकर उनका यौनउत्पीड़न करनेवालों पर आँच तक नहीं आती। सवाल तो उठता है कि कल्याणी यूनिवर्सिटी में रतन लाल हंगलू के खिलाफ मामला आने के बाद उन्हें किस आधार पर इलाहाबाद यूनिवर्सिटी का वीसी कुलपति बना दिया गया। उनके खिलाफ तमाम जाँच कमेटियों की रिपोर्ट को मानव संसाधन मंत्रालय क्यों दबाये बैठा रहा। जाहिर है केंद्र में मोदी सरकार आने के बाद से लड़कियों के लिए न देश के शेल्टर होम सुरक्षित हैं , न सड़के न विश्वविद्यालय न पुलिस थाना।

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जान बचाने की महिला साहित्यकार की गुहार: छात्रसंघ की पूर्व अध्यक्ष को लिखा पत्र


इलाहाबाद विश्वविद्यालय के कुलपति रतन लाल हंगलू का महिला साहित्यकार के साथ अश्लील चैट सार्वजनिक होने के बाद साहित्यकार को मिल रही हैं धमकियां. इलाहबाद विश्वविद्यालय के छात्रसंघ की पूर्व अध्यक्ष ऋचा सिंह को पत्र लिखकर जीवन-रक्षा की उन्होंने अपील की है.  पत्र में उन्होंने लिखा है कि ‘ये प्रकरण न सिर्फ़ सम्मानित व्यक्ति, प्रतिष्ठित परिवार, संभ्रांत साहित्यिक जगत् को बुरी तरह से आहत कर रहा है बल्कि समस्त विश्वविद्यालयीय गरिमा और प्रशासनिक अधिकारियों के पद को भी मलिन कर रहा है…’  इस बीच विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों ने कुलपति को खुला पत्र लिखा है. 





पीड़ित साहित्यकार का पत्र: 

प्रिय ऋचा,
कैसी हो?

तुमने ‘चैट वायरल” जैसे ज़लील मुद्दे के सन्दर्भ में मुझे कॉल करके चिंता व्यक्त की, अच्छा लगा।
ये प्रकरण न सिर्फ़ सम्मानित व्यक्ति, प्रतिष्ठित परिवार, संभ्रांत साहित्यिक जगत् को बुरी तरह से आहत कर रहा है बल्कि समस्त विश्वविद्यालयीय गरिमा और प्रशासनिक अधिकारियों के पद को भी मलिन कर रहा है। हमारे अज़ीज़ इलाहाबाद विश्वविद्यालय की एकमात्र महिला छात्र संघ की अध्यक्ष होने के नाते आप मुझे इन निंदनीय, दु:खद और असम्मानजनक घटनाक्रम से दूर करो, साथ ही मेरे जीवन की भी सुरक्षा की व्यवस्था करने का प्रयास करो। बड़ी कृपा होगी, क्योंकि अब तो मुझे जान से मारने की धमकियां भी मिलने लगीं हैं।

पढ़ें:  नौकरी का प्रलोभन देकर महिला साहित्यकार से इलाहाबाद विश्वविद्यालय के कुलपति की अश्लील बातचीत: चैट हुआ वायरल

इस बीच विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों ने कुलपति को एक खुला पत्र लिखा है: 

खुला पत्र: 

कुलपति प्रो0 रतन लाल हांगलू पर लग रहे कथित व्याभिचार के आरोपों पर विश्वविद्यालय के छात्र-छात्राओं की ओर से कुलपति के नाम खुला पत्र ।

महोदय विश्वविद्यालय में जब से आपने कुलपति का कार्यभार ग्रहण किया है आप अपने फैसलों के लेकर हमेशा चर्चा में रहे हैं। जब-जब छा़त्र-कर्मचारी-शिक्षक-विभागाध्यक्ष पर कोई आरोप लगे हैं, आपने जॉच से पहले सम्बन्धित व्यक्ति को पद से हटाने का काम किया है, यह कहते हुए कि सम्बन्धित व्यक्ति जॉच को प्रभावित न कर सके।

महोदय आज जब स्वयं आप पर अपने पद का लाभ उठाते हुए एक  महिला को लाभ देने का आश्वासन सम्बन्धी खबरें एवं बेहद अशोभनीय-अभद्र वार्तालाप वायरल हो रहा है और लगातार शहर के सभी प्रमुख समाचार पत्रों मे प्रकाशित हो रहा है,  जिसकी पुष्टि स्वयं महिला द्वारा भी की जा रही है। ऐसे में विश्वविद्यालय के कुलपति पद पर बने रहने का आपको नैतिक अधिकार नहीं रह जाता है। विश्वविद्यालय की गरिमा एवं छात्राओं की सुरक्षा को ध्यान मे रखते हुये आपसे अपेक्षा की जाती है कि आप उक्त आरोपों की जॉच तक कैम्पस के अंदर प्रवेश न करें, साथ ही अगर आपके अन्दर जरा भी नैतिकता है, तो कुलपति पद की गरिमा को ध्यान मे रखते हुये आप नैतिकता के आधार पर इस्तीफा दें, तथा इस अतिसंवेदनशील विषय पर जॉच में सहयोग करें।

महोदय विश्वविद्यालय में अध्ययन करने वाली छात्रायें जो कुलपति के संरक्षण में यह आशा करती है कि परिसर छात्राओं को सुरक्षित माहौल उपलब्ध करायेगा, परन्तु पिछले दिनों आपके उपर लग रहे आरोपों के चलते समस्त विश्वविद्यालय परिवार बेहद आहत और शर्मिन्दगी महसूस कर रहा है।

आप पर यह पहला आरोप नहीं है इससे पहले कल्याणी विश्वविद्यालय जहॉ के आप भूतपूर्व कुलपति रहे हैं, वहॉं एक छात्रा की मॉ ने आपके चरित्र पर सवाल उठाते हुये इलाहाबाद विश्वविद्यालय के महिला सलाहकार बोर्ड को पत्र लिख कर छात्राओं की सुरक्षा के सम्बन्ध में विश्वविद्यालय को आगाह कराते हुये आपकी कार्यप्रणाली-अपने पद का दुरूपयोग करते हुये महिलाओं का शोषण करने के आरोप लगाये हैं और इलाहाबाद विश्वविद्यालय की छात्राओं की सुरक्षा को लेकर गम्भीर चिन्ता व्यक्त की थी।

महोदय पिछले कई दिनों से जिस तरह की खबरें शहर के सभी प्रमुख समाचार पत्रों में छप रही हैं इससे छात्राओं समेत तमाम अभिभावक जो गॉव तथा दूर- दराज के क्षेत्रों से अपनी बेटियों को विश्वविद्यालय में उच्च शिक्षा ग्रहण करने के लिये भेजते हैं, वह सभी विश्वविद्यालय कैम्पस को संदेह के घेरे में महसूस करते हुए छात्राओं की सुरक्षा के लिए संशंकित है। छात्रायें भी कैम्पस में अपने आप को सुरक्षित महसूस नही कर रही हैं। साथ ही एक बेहद अहम और चिन्ताजनक सवाल यह है कि अगर किसी छात्रा को अपनी सुरक्षा या यौन उत्पीड़न से सम्बन्धित किसी घटना की शिकायत करनी हो तो वह किस संस्था के पास करेगी? जबकि संस्था प्रमुख स्वयं आरोपो में घिरा हुआ है।

कुलपति प्रोफेसर रतनलाल हंगलू

महोदय यूजीसी गाइडलाइन के अनुसार कैम्पस के अन्दर जी0एस0कैश0 समिति को अनिवार्य किया गया है जहॉ पर महिला शोषण एवं उत्पीड़न सम्बन्धी किसी भी शिकायत को दर्ज कराया जा सके, परन्तु लम्बे समय से हम छात्र-छात्राओं द्वारा जी0एस0कैश0 कमेटी गठित करने की मॉग आपसे लगातार की गयी परन्तु कमेटी गठित ना करना आपकी कार्यप्रणाली पर इन आरोपों को देखते हुये प्रश्नचिन्ह लगाता है। एक ऐसा विश्वविद्यालय या संस्था जहॉ कुलपति, रजिस्ट्रार सभी महिला उत्पीडन के आरोपों में घिरे हुये हैं उस परिसर में छात्राओं की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित होगी यह बेहद गंभीर सवाल हैं।

अतः आपसे अनुरोध है कि विश्वविद्यालय की गरिमा एवं छात्राओं की सुरक्षा तथा यौन उत्पीड़न सम्बन्धी, विशाखा गाइडलाइन  के अनुसार ‘जिसमें यह कहा गया है कि ऐसा व्यक्ति जिस पर महिला शोषण सम्बन्धी आरोप लगे हों वह जॉच पूरी होने तक अपने पद पर नही रह सकता है’ इस गाइडलाइन तथा कुलपति पद की गरिमा को ध्यान में रखते हुये आपसे यह अपेक्षा की जाती है कि आप तत्काल नैतिक आधार पर इस्तीफा दें तथा सम्बन्धित विषय की जॉच पूरी होने तक कैम्पस में प्रवेश न करके जॉच में सहयोग करें।
समस्त छात्र’ छात्राएं

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माहवारी में थोपे गये पापों से मुक्ति हेतु कब तक करते रहेंगी ऋषि पंचमी जैसा व्रत!

विनिता परमार

हिन्दू व्रतों की स्त्रियों और गैर ब्राह्मण समुदायों के प्रति दुष्टताओं को लेकर आयी यह छोटी सी टिप्पणी जरूर पढ़ें. देखें कैसे अशुद्धि, पवित्रता-अपवित्रता का भाव स्त्रियों और ब्राह्मणेतर जातियों पर थोप दिया गया है.

भादो महीने के शुक्ल पक्ष की पंचमी को ऋषी पंचमी का व्रत  किया जाता है । आज भी बिहार, मध्य प्रदेश उत्तरप्रदेश,राजस्थान के कुछ भागों में इस दिन महिलाये व्रत रखती हैं । महिलाएं जब माहवारी से होती हैं तब गलती से कभी मंदिर में चली जाती हैं या कभी पूजा हो वहाँ चली जाती हैं या रसोई में चली जाती हैं, तो उसका दोष लगता है। ऋषिपंचमी व्रत इस बात का काट बताया जाता  है,  अगर किसी स्त्री ने गलती से भी माहवारी के दौरान अपने घर के किसी पुरुष का भोजन पानी छू दिया है तो उन्हें मुक्ति मिलेगी। धर्म-ग्रंथों की मूर्खतापूर्ण, दुष्टतापूर्ण मान्यता है कि रजस्वला स्त्री पहले दिन चाण्डालिनी, दूसरे दिन ब्रह्मघातिनी तथा तीसरे दिन धोबिन के समान अपवित्र होती हैं। वह चौथे दिन स्नान करके शुद्ध होती है। यदि यह शुद्ध मन से कभी भी ऋषि पंचमी का व्रत करें तो इसके सारे दुख दूर हो जाएंगे और अगले जन्म में अटल सौभाग्य प्राप्त करेगी।

इस अटल सौभाग्य की कामना में भादों शुक्ल पक्ष की तृतीया को महिलाओं ने हरीतालिका तीज का निर्जला व्रत किया तो फिर चतुर्थी की पूजा और पंचमी को राजस्वला होने के बाद पापों से मुक्त होने के लिये ऋषि पंचमी व्रत करेंगी।  108 बार चीरचीड़ी के दातुन से मुँह धोयेंगी, 108 लोटे पानी से नहायेंगी और पसही धान का चावल खायेंगी ।

एक बार व्रत पर नज़र दौडाया तो फिर प्रकृति का संरक्षण नज़र आया। चीरचीड़ी का पौधा औषधीय गुण से भरा हुआ है मासिक धर्म की अनियमितातों को दूर करता है। साथ -ही -साथ इस व्रत में हल से जोतकर ऊगनेवाले अनाज को खाना मना है।पसही धान अपने आप उग जाता है जो अब भारत के खत्म होनेवाले अनाज की किस्म है। इस व्रत में सप्तऋषियों की पूजा होती है। यानि पूर्ण प्रकृति पूजा, व्रत के तरीके से कोई ऐतराज नहीं लेकिन इसकी नियत यानी जो सोच रख यह व्रत बनाया गया उसपे गहरी आपत्ति है ।

मासिक धर्म के दौरान कोई भी स्त्री खाना नहीं बना सकती, ना ही वो किसी अन्य व्यक्ति के खाने व पानी को छू सकती है। क्योकि ऐसा माना जाता है कि मासिक धर्म के दौरान महिलायें अशुद्ध हो जाती है। इसलिए अगर वे खाने पानी को हाथ लगाती है तो इससे खाने का अपमान होता है। इस प्रक्रिया के दौरान महिलाओं को ना तो पूजा पाठ तक करने की अनुमति नहीं है, यहाँ तक उन्हें मंदिर के पास तक नहीं जाने दिया जाता। प्रगतिशील महिलायें भी अपने लालन -पालन और जडों की वजह से पूजा नहीं कर पाती। जानबुझ कर बनाये गये इस तरह के नियमों में महिलाये पिसती रहेंगी ।

मासिक धर्म या माहवारी एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमे महिलाओं को हर महीने 3 से 7 तक रक्त स्त्राव होता है। वैसे तो ये एक शारीरिक क्रिया है जो महिलाओं को गर्भधारण और प्रसव के लिए बहुत जरूरी है किन्तु ये किसी भी महिला के लिए एक सजा से कम नही होती क्योकि माहवारी के समय हर महिला पर ना जाने कितनी सारी रोक लगा दी जाती है । इन पाबंदियों को देखने पर ऐसा महसूस होता है जैसे कि माहवारी महिलाओं को अछूत बना दिया है । किन्तु वैज्ञानिक दृष्टि और आधार में इसका कोई जवाब नही है बस ये एक ऐसी परम्परा है जो सदियों से लगातार चली आ रही है। महिलाएँ भी इस तरह की सोच के साथ आने वाली पीढ़ी को इस तरह की सीख देती हैं जिससे शिक्षा , अशिक्षा का कोई मायने नहीं रह जाता है। महवारी के दौरान होनेवाली तकलीफ़ों को ध्यान में रखकर बनाये ये नियम पता नहीं कब हमारी अंधभक्ति बन गई ।

विनिता परमार
केन्द्रीय विद्यालय रामगढ़ कैंट 
ईमेल – parmar_vineeta@yahoo.co.in

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