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जांच और एसपी के ट्रांसफर से असंतुष्ट कोर्ट ने सीबीआई को लताड़ा: मुजफ्फरपुर शेल्टर होम केस

स्त्रीकाल डेस्क

मुजफ्फरपुर के शेल्टर होम में बच्चियों से बलात्कार मामले में सीबीआई जांच की प्रगति से असंतुष्ट हाई कोर्ट ने आज सीबीआई को जमकर फटकार लगायी. बिहार सरकार ने आज इस मामले की सुनवाई को टालने की भरपूर कोशिश की. हालांकि याचिकर्ताओं की ओर से एडवोकेट अलका वर्मा ने सीबीआई जांच पर सवाल उठाये तो कोर्ट ने आज सुनवाई की. मामले की सुनवाई कर रहे जस्टिस एमआर शाह और जस्टिस राजीव रंजन प्रसाद ने सीबीआई को फटकार लगाते हुए कहा कि जब जांच चल रही है तो आपने एसपी का तबादला कैसे कर दिया?

एडवोकेट अलका वर्मा ने कोर्ट को जब यह बताया कि न सिर्फ तबादला किया गया है बल्कि एसपी लखनऊ को एडिशनल चार्ज दिया गया है, जबकि मामले की गंभीरता को देखते हुए एक फुल टाइम एसपी को जांच करनी चाहिए थी, तो कोर्ट ने इस पर आश्चर्य व्यक्त करते हुए पूछा कि यह कैसे हो रहा है? सीबीआई के वकील ने जब जानकारी लेने के लिए सीबीआई से सम्पर्क करने की मोहलत माँगी तो बिफरे कोर्ट ने कहा कि ‘अगले डेट से आप अपने साथ सीबीआई के अधिकारियों को भी लेकर आइये. यदि हर बात आपको पूछना ही है तो.’

इसके पहले सीबीआई से कोर्ट ने अबतक जी जांच रिपोर्ट माँगी तो उसके लिए भी वकील ने अगली तारीख तक की मोहलत माँगी. गुस्साए कोर्ट ने कहा कि ‘आपको हर बार रिपोर्ट हाईकोर्ट में पेश करनी होगी. हम केस को मोनिटर कर रहे हैं. हमसे पूछे बिना एसपी का भी तबादला कैसे हुआ? नाराज कोर्ट ने मीडिया में जांच की प्रगति लीक होने पर भी सवाल किये.’

कोर्ट में सरकार और सीबीआई के वकीलों के रुख आश्चर्य में डालने वाले रहे. इससे यह साफ़ सन्देश गया कि सरकार जांच को नष्ट करने की दिशा में काम कर रही है. बिहार सरकार के वकील एडवोकेट जेनरल, ललित किशोर की ओर से पहले से ही इस केस की सुनवाई 27 अगस्त को करने का आग्रह किया गया था.
अगले 27 अगस्त को हाई कोर्ट फिर से इस मामले की सुनवाई करेगा.

पढ़ें:  बिहार में बच्चियों के यौनशोषण के मामले का सच क्या बाहर आ पायेगा?
 बच्चों के यौन उत्पीड़न मामले को दबाने, साक्ष्यों को नष्ट करने की बहुत कोशिश हुई: एडवोकेट अलका           वर्मा
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भीड़ का वहशीपन : धर्मोन्माद या इंसानी बर्बरता ?

नूर ज़हीर 


डायन के नाम पर, विच हंटिंग के नाम पर, सती के नाम पर, सम्मान के नाम पर महिलाएं पूरे ग्लोब पर मॉब लिंचिंग की शिकार होती रही हैं. कहीं कबीलाई कानूनों का संरक्षण है, तो कहीं धार्मिक उन्माद का या कथित सामाजिक नैतिकता का. महिलायें मॉब लिंचिंग की आदि शिकार हैं और शिकार में शामिल भी रही हैं अपने डोमेन में.  बता रही हैं नूर ज़हीर.

बात सन 1980 की है जब यह फिल्म भारत में दिखाई गई। फिल्म पर बैन था और चोरी छुपे देखी थी। “डेथ ऑफ़ अ प्रिंसेस” का दिमाग़ पर इतना असर हुआ था कि हफ़्तों ख्वाब में वही मंज़र दिखा था : एक नकाब पोश लड़की, भीड़ के गोलधारे में, इधर उधर भागने, बचने की कोशिश कर रही है और नंगी तलवार लिए एक आदमी उसपर वार पर वार कर रहा है।  लड़की एक अरब शहज़ादी, जिसने बाप के तये किये हुए रिश्ते को ठुकराकर अपने प्रेमी के साथ सऊदी अरेबिया से भागने की कोशिश की थी।दोनों एअरपोर्ट पर पकडे गए और दोनों को सजा-ए-मौत सुनाई गई। पुरुष को तो एक अकेली जगह लेजाकर गोली मार दी गई लेकिन महिला को तो मिसाल बनाना था।  उसे भीड़ से घेर कर, धकिया धकिया कर, दौड़ा-दौड़ा कर तलवार से लहू लुहान करके मारा गया।  लेकिन जिसने सबसे ज्यादा असर किया वह थी वह बर्बर भीड़, चंडाल/बधिक को उकसाती, वार सही पड़ने पर उधम मचाती, आँखों में मौत देखने की लालसा, होठोंपर उत्साह की ख़ुशी। .

इस बंगाली महिला को भीड़ ने पीट-पीट कर मार डाला



अगर हम ज़रा रुक कर सोचे तो ‘मॉब लिंचिंग’ ऐसी कोई अनहोनी, अचंभित करने वाला या समझ में न आने वाला कार्य नहीं है।  इस देश में जो दो बड़े धार्मिक समुदाय रहते हैं, यानि हिन्दू और मुसलमान उनमे मॉब लिंचिंग को धार्मिक अनुमति है। अगर नहीं होती तो न यहाँ कभी ‘सती प्रथा’ का न चलन होता और न ही पत्थर ‘संगसार’ की मिसाले मिलती।

मॉबलिंचिंग में एक सुरक्षा है, न पहचाने जाने की।  पुलिस भी अक्सर इस मामले में हाथ झाड कर अलग हो जाती है कि जब भीड़ ने मारा तो भला हम कैसे एक किसी को मुजरिम करार दे सकते हैं। चाहे चश्मदीद गवाह मौजूद हों इसके कि  किसने उकसाया, किसने खदेड़ा, किसने बर्बरता की राह दिखाई, किसने मर्दपन याद दिलाया, किसने अपने भाषण में ऐसे शब्द कहे जिससे छुपी हुई बर्बरता जागे और खुद को बेहतर हिन्दू या सबसे अच्छा मुसलमान साबित करने की इच्छा उग्र रूप लेकर हत्या करने पर आमादा हो गई।  इसलिए समूह में मारना एक सुरक्षा कवच है।  “जो सब कर रहे हैं, वो ठीक ही होगा’ या ‘सब कर रहे हैं तो हम क्यों अलग थलग रहे?’ ये अपने आप को चिन्हित करने का शौक़ है; अपने गुट, गिरोह या अपने समाज में।  जब पहचान अपनी न बन सके तो फिर भीड़ की पहचान को ओढने में क्या बुराई है?


इसके साथ साथ यह बात भी है की मॉब लिंचिंग के लिए शिकार का असहाय होना ज़रूरी है।  वो अल्प संख्यक हो, अकेला हो, मारने वालों का समूह बड़ा हो और सबसे बढ़ कर यह बात तय हो कि कामयाबी का उसे पूरा भरोसा है ।  इस उम्मीद से ही भीड़ का उन्माद बढ़ता है. भारतीय प्रायद्वीप में इस तरह की हत्या को धार्मिक रूप देकर स्वीकृति दे दी गई है। कुरान अपने आप में पथराव  और संगसारी से हत्या के खिलाफ है। लेकिन ज़्यादातर आलिम यह मानते हैं कि हदीस में इसके काफी उदहारण मिलते हैं और इसलिए इसे सजा का एक तरीका मानना ग़लत नहीं है।  इन्ही उदाहरणों के चलते अफ़ग़ानिस्तान में तालिबानी दौर में इस तरीके की सजा-ए-मौत अपने चरम पे थी।  इस बात को भी नहीं नकारा जा सकता कि ऐसी सजा-ए-मौत सबसे निरीह और सबसे असहाय को सबसे आसानी से दी जाती है।  महिलाए सबसे ज्यादा इसकी शिकार होती हैं।  अक्सर कोई बचाने के लिए दो कारणों से आगे नहीं आता, ‘महिलायें ‘फ़ालतू हैं’ और ‘महिलाए जुर्म की जड़ हैं इसलिए जन्मजात मुजरिम हैं. यानी महिलाएं आजतक ‘हव्वा’ का किया जिसके सर पर इलज़ाम है कि उसने आदम को शैतान का दिया हुआ फल खाने के लिए उकसाया था और उसे अपने जुर्म में भागीदार बनाकर, अल्लाह के गुस्से और सजा का हक़दार बनाया था।  अगर हव्वा न होती तो आजतक आदम और उनके बच्चे जन्नत में मज़े से रह रहे होते। यह पहला जुर्म आजतक महिलाओं से चिपका हुआ है, और ज़रा से शक को सुबूत की ज़रूरत नहीं होती; जो जन्मजात गुनाहगार हो उसने तो गुनाह किया ही होगा, लिहाज़ा ऐसे इंसान को पत्थर तो पड़ने ही चाहिए।

बात सिर्फ अफ़ग़ानिस्तान की नहीं है; पाकिस्तान के भी कबायली इलाकों में पत्थर मार कर हत्या काफी सुनने में आती है, खासकर के बलोचिस्तान और ख्वार पखुतुन्ख्वः  से। ये ज़्यादातर हत्याएं महिलाओं की हैं, उनपर हमेशा ही व्यभिचार के आरोप होते हैं।  इनमें पथराव  के साथ जिंदा दफ़न कर देने की इजाज़त भी है।  जनरल ज़िया के दौर में कोड़े लगाना भी आम बात हो गई थी।  यह कुरान में सजा के तौर पर दर्ज भी है, यानी इसको धार्मिक अनुमति भी है. संगसारी अकेले एक आदमी द्वारा संभव नहीं है; इसके लिए गड्ढा खोदना होता है, मुजरिम को आधा उसमे दफ़न करना होता है और फिर पत्थराव होता है जो अक्सर तीन दिन तक चलता है।  ज़ाहिर है की इतना कुछ एक भीड़ को जमा किये बिना कर पाना असंभव है।  और भीड़ वो होती है जो मानती है की मुजरिम गुनाहगार है और उसके लिए ये सजा उपयुक्त भी है और उसमे हाथ बटाने में उन्हें सवाब या पुण्य मिलेगा। इस तरह के किसी भी घटना के चित्र देखिये और दो बातों पर गौर कीजिये।  संगसारी करती हुई भीड़ में या तो औरतें होंगी ही नहीं या न के बराबर होंगी।  दुसरे इस भीड़ के हर फर्द के चेहरे पर उत्साह और ख़ुशी के भाव पर ध्यान दीजिये। देखिये कितना मज़ा आ रहा है एक ऐसे असहाय,  निरिही को मारकर, हर पत्थर पर उसकी चीखे सुनने में इन्हें कितना आनंद आ रहा है।

महिलाओं के प्रति बर्बरता का प्रतीक एक पेंटिंग

जिंदा दफ़न करना भी कोई अकेले के बस की बात नहीं।  ज़ाहिर है कि कोई भी जीता जागता इंसान आसानी से खुद को मृत्यु के हवाले नहीं करेगा।  उसे ज़बरदस्ती, हाथ पैर बाँध कर, किसी जगह बड़ा सा गड्ढा खोदकर दफनाना होगा और ऐसा करने में मोहल्ले वालों, गाँव वालों की मदद भी चाहिए होगी।

इसी तरह से सती पर ज़रा ध्यान दीजिये. एक अकेली औरत, जिसका ससुराल में अकेला रक्षक कुछ देर पहले ही मृत्यु को प्राप्त हुआ है, जो इतने दुःख में डूबी है की उसके समझ में भी नहीं आ रहा कि करे क्या? उसे घेर घार कर, चिता पर ज़बरदस्ती बिठा दिया जाता है; चीखती चिल्लाती है तो ढोल ताशे बजने लगते हैं, भागने का अवसर नहीं! बहुत बड़ी भीड़ के बिना क्या यह सब संभव है? ऊपर से इस हत्या को महाबलिदान का नाम दिया जाता है और मरने वाली को देवी मान लिया जाता है।  औरत को मारना समाज को इतनी ख़ुशी देता है कि राजस्थान के क्षत्रियों में होने वाली प्रथा जब बंगाल पहुंची तो इसे ब्राह्मणों ने गले लगा लिया।

सती पर कानूनी रोक है।  महिलाओं पर यह उपकार हमारी अपनी सरकार ने नहीं, रजवाड़ों नवाबों ने नहीं अंग्रेजों ने किया है। फिर भी 4 सितम्बर 1987 को रूप कुंवर की हत्या की गई और इसे सती का नाम देने की कोशिश हुई ।  रूप कुंवर की मौत को हत्या स्वीकारने के बावजूद न तो किसी को सजा हुई और न ही वहां बड़ा सा मंदिर बनने से कोई रोक पाया।लेकिन ऐसा मालूम पड़ता है जैसे मौजूदा समाज इस कानून से विचलित है।  इसीलिए एक  दिन पहले आरा, बिहार में एक महिला को नंगा करके दौड़ा दौड़ा कर मारा गया।  भीड़ पीछा कर रही थी और पत्थराव करने वाले, मारने वालों में एक भी महिला नहीं थी.

दरिंदगी का यह भयावह नृत्य अरब राजकुमारी से होता हुआ, रूप कुंवर से गुज़रता आज एक महिला को जिंदा जलाने पर आ पहुंचा है। जितनी भी मॉबलिंचिंग पर नज़र डालिए तो उनमे महिलाओं की भूमिका नदारद मिलती है।  तो क्या महिलाए इस तरह की भीड़ द्वारा की गई हत्या से दूर होती हैं? क्या वे ज्यादा दयालु या भावुक होती हैं? शायद नहीं! क्योंकि घर में होने वाले अत्याचार या जोर ओ जबर में औरतें बराबर की शरीक होती हैं।  महिलाओं ने भी जब पितृसत्ता  का लबादा ओढ़ लिया है तो उसके हर अत्याचार को वे धर्म, समाज और परंपरा के ही नज़रिए से देखती हैं।  इसीलिए बलात्कार में वे भी महिला/लड़की को दोषी मानती हैं। रविवार को जिस महिला को भीड़ ने नंगा घुमाकर शर्मसार किया,  उसके बारे में बताते हैं वह वेश्या थी।  क्या इसीलिए महिलाए नहीं आई उसको बचाने? क्योंकि उनके घरों के मर्द उसके पास जाते थे? उन मर्दों को तो कुछ कहने की अनुमति इन महिलाओं को पितृसत्ता नहीं देती, एक असहाय महिला की ऐसी दुर्गति में क्या वे अपना सतीत्व, अपने घर का कुशल मंगल तलाश लेती हैं.

विच हंट की एक पेंटिंग

आज रुक कर कुछ सवाल अपने आप से पूछने की ज़रूरत है। क्या असहाय, कमज़ोर की इस तरह घेरकर भीड़ द्वारा हत्या हमारे शिकारी जानवर की कुछ बची रह गई प्रवृत्तियां है जिन्हें हम संतुष्ट किये बिना रह नहीं पा रहे या हम फिर पीछे लौट रहे हैं जहाँ ‘सर्वाइवल ऑफ़ द फिट्टेस्ट’ की थ्योरी के तहत अब वही बचेगा जो बलशाली होगा? जिसकी गिनती ज्यादा होगी? जो भीड़ जुटा सकेगा? अगर ऐसा है तो फिर काहे का जनतंत्र और काहे की डेमोक्रेसी? हमसे तो वो जानवर भले जो कम से कम अगर हत्या करते भी हैं तो अपनी पेट की भूख मिटाने के लिए, किसी धर्मोन्माद का नंगा नाच करने के लिए या पितृसत्ता के खिलाफ खड़े होने वाली किसी स्त्रीस्वर को दबा देने के लिए नहीं .

वरिष्ठ लेखिका नूर ज़हीर कथासाहित्य का चर्चित नाम है. परिवार की परम्परा से ही प्रगतिशील आन्दोलन से जुडी हुई हैं. 

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नीतीश कुमार को कौन दे रहा धीमा जहर (!)

संजीव चंदन

नीतीश जी


उम्मीद है मजे में होंगे, सत्ता मजे में ही रखती है! चाहे लाख बलाएँ आयें, राज्य में बेटियों से राज्य-संरक्षित बलात्कार हो रहा हो या महिलाएं नंगी की जा रही हों. हो तो बहुत कुछ रहा है, लेकिन सत्ता आपकी अंतर-आत्मा तक इसके असर को पहुँचने ही नहीं देती होगी.

लेकिन मैं, आपको लेकर चिंतित हूँ, सच में चिंतित हूँ, खासकर तब से जब से मुझे यकीन हो गया है कि आपको धीमा जहर दिया जा रहा है. पता है मैं आपका शुरू से ही आलोचक रहा हूँ, फिर भी लगाव के भी कई कारण थे. इसके बावजूद कि आप बिहार के पुष्यमित्र शुंगों से मिलकर राजकाज चलाते रहे, आप वृह्द्द्रथ सिद्ध होने वाले हैं, लेकिन वृहद्रथ के मौर्यवंशीय होने के जो फर्क होते हैं वह तो था ही न. आपको मैं हमेशा से ही गैरब्राह्मण सत्ता का एक्स्टेंशन ही देखता रहा हूँ, इसके बावजूद कि आप अपने पूर्ववर्ती गैरब्राह्मण सत्ता के प्रभावी लोगों से सत्ता हासिल करने के लिए बार-बार पुष्यमित्र शुंगों से हाथ मिलाते रहे हैं.

खैर, आलोचक होने के बाद भी जो सबसे प्रभावी लगता था आपमें मुझे वह था आपके शासन काल में महिलाओं को लेकर लिए गये निर्णय-समुच्चय. कितनी बार, कितने आलेखों में, भाषणों में इस बात का जिक्र करने में मुझे गर्व होता था कि आपने बिहार को पहला राज्य बनाया जहाँ पंचायतों में महिलाओं को 50% आरक्षण दिया गया. आपने महिलाओं को नौकरियों में आरक्षण दिया. सच में कितना फर्क पडा बिहार के समाज पर, महिलाएं समाज में विजिबल हुईं, सत्ता में उनकी शेयरिंग बढ़ी, घर-समाज में आर्थिक हैसियत बढ़ने से महिलाओं का सम्मान बढ़ा! यह सब आप जितना समझ पा रहे हों या नहीं, हम जैसे आपके आलोचक समझ रहे थे. लेकिन आज, आज आपकी इस ताकत को भी नष्ट किया जा रहा है. इतिहास के पन्नों से आपके नाम के हर अक्षर दागदार बनाये जा रहे हैं. आपकी जो सबसे बड़ी ताकत थी-महिला, उसे ही आपकी हत्या का हथियार बनाया जा रहा है और यह सब आप के किसी अनजानी मजबूरी के कारण आपकी सहमति से हो रहा है, या हो सकता है कि आपकी गर्दन पर तलवार रखकर पुष्यमित्र शुंगों ने आपको विषपान के लिए मजबूर कर दिया हो/ है! या हो सकता है कि जहर की आदत लग गयी हो आपको!!

धीमा जहर तो काफी पहले से ही दिया जाता रहा है, लेकिन जब से शुंगों का प्रिय दिल्ली की गद्दी पर बैठा तबसे जहर का डोज बढ़ा दिया गया है. अन्यथा तो आपके पहले कार्यकाल से ही जिसने भी बिहार को बारीकी से देखा होगा, यह जरूर देखा होगा कि समाज में साम्प्रदायिकता के विषबेल कैसे बोये जाते रहे, हाँ इधर दिल्ली में भी सत्तासीन होने के बाद यह सब आक्रामक हुआ-त्रिशूल तक बांटे जाने लगे. दंगों और तनावों की रफ़्तार बढ़ा.

लेकिन मेरे प्रिय नीतीश जी, आप उस जहर से इतना आसानी से इतिहास के पन्नों में दागदार कब्र के भीतर दफ़न होने वाले नहीं थे. इसलिए अब आपकी सबसे बड़ी ताकत को ही आपके विरुद्ध खड़ा किया जा रहा है और आप उसमें सहभागी हो रहे. बचाइये, बचाइये सत्ता बचाइये और इस बीच आपकी छवि बलात्कारियों के सरगना की बनती जा रही है/ बनायी जा रही है. आपको क्या लगता है यह विपक्षी कर रहे हैं, नहीं जनाब वे सांप कर रहे हैं, जिन्हें आपने अपने आस्तीन में अपनी राजनीति की शुरुआत से ही पाल रखा है-समता पार्टी के दिनों से ही.

मुजफफरपुर में बच्चियों से बलात्कार के मामले में चलिए मान लेते हैं कि आपकी सरकार के ऑडिट से सबकुछ खुला-लेकिन उसके बाद आपकी सरकार ने और धीमे जहर के प्रभाव में मदहोशी की हालत में आपने जो किया वह क्या है- एफआईआर में देरी, मुख्य सरगना ब्रजेश ठाकुर की जेल में मेहमाननवाजी, मुख्य गवाह एक बच्ची का गायब होना, एक से बढ़कर एक मामलों के उल्लेख के बावजूद उन मामलों में प्रभावी जांच नहीं होना, यह सब क्या है? सच में आप धीरे-धीरे मर रहे हैं नीतीश जी, वह नेता मर रहा है, जिसने अपनी छवि महिला-पक्षधर की बना रखी थी. और तो और आपके चाहने से और भाजपाइयों की मिलीभगत से जहर का एक और डोज मिल चुका है, कुछ चीजों की आदत हो जाती है, जो आपको हो गयी है. कल जब हाई कोर्ट में इस मामले की सुनवाई है तब इसकी जांच कर रहे सीबीआई के एसपी का ही तबादला हो गया-किसे बचाया जा रहा है प्रभु!

पिछले कई महीनों से आपके यहाँ बलात्कारी सरेआम बलात्कार करते घूम रहे हैं. घर जाते डॉक्टर की पत्नी का सामूहिक बलात्कार हो या जहानाबाद, गया में बच्चियों से गैंगरेप. महिलाएं नंगी की जा रही हैं-कल ही आरा में राज्य और देश शर्मसार हुआ-पता नहीं आपको क्यों फर्क नहीं पड़ता है. लगता है धीमे जहर का असर तेज हो रहा है, आप अब तेजी से अपने अंत की पटकथा लिख रहे हैं. हर बार आप कोशिश करते हैं कि ऐसे मामलों में विपक्ष से जुड़े लोगों के नाम जाहिर किये जाएँ, बिहिया में आपने वही किया, जहनाबाद में भी किया था-लेकिन प्रभु सरकार आपकी है, इकबाल आपका घट रहा है. आपके साथी शुंगों का, भाजपाइयों का नाम आते ही आपकी पार्टी में शामिल शुंग और शुंग-मित्र बचाव में सक्रिय हो जाते हैं. हुजूर महिलाओं के लिए अच्छे काम का श्रेय आपको मिलेगा तो बलात्कार का यह कलंक दूसरों पर क्यों लगेगा भला! प्रभु मृत्यु के पूर्व भी चेतना आते हुए सुना, संभव हो तो अब धीमे जहर पीने से इनकार कर दीजिये, शायद कुछ शेष रह जाये इतिहास के पन्नों में आपके लिए अन्यथा सौ पवन वर्मा, डेढ़ सौ शैबाल गुप्ता और दो सौ वैसे साथी पत्रकार जो संस्थानों में बैठाये गये हैं आपके द्वारा,  भी मिलकर इन जहरीले नागों के विष से आपको बचा नहीं पायेंगे-आपके बाद शुंगों की सत्ता आयी तो कहीं वे उनके खेमे से आपका नाम खुरचते न दिखाई दें!

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वह भविष्य का नेता था लेकिन राजनीति ने उसे तुष्टिकरण में फंसा दिया (!)

लाल बाबू ललित 

परिस्थितिजन्य मजबूरियों के कारण राजनीति में पदार्पण को विवश हुआ वह शख्स अपनी मस्ती में अपनी बीवी, अपने बच्चों  और अपने पेशे से संतुष्ट जिंदादिली से अपनी जिंदगी जिए जा रहा था।  इंदिरा गाँधी की हुई हत्या से उपजी परिस्थितियों ने राजीव गांधी को राजनीति की चौखट पर सक्रिय रूप से दस्तक देने और देश की बागडोर सँभालने के लिए लगभग  विकल्पहीनता की स्थिति में लाकर रख दिया। हालाँकि संजय गाँधी की विमान दुर्घटना में हुई असामयिक मृत्यु के बाद से ही इंदिरा गांधी राजनितिक विरासत को लेकर चिंतित रहने लगी थी और बड़ी शिद्दत से यह चाह  रही थी कि राजीव राजकाज और राजनीति  में दिलचस्पी लें।

लेकिन उनकी गैरराजनीतिक पत्नी सोनिया गाँधी उन्हें ऐसा करने से रोक रही थी। वे अपने पति और बच्चों के संग निजी जिंदगी में बहुत खुश और संतुष्ट थी। इंदिरा की मौत के बाद भी सोनिया ने राजीव को राजनीति में आने से रोकने का भरसक प्रयास किया लेकिन हमेशा वही कहाँ होता है जैसा हम चाहते हैं। राजीव गाँधी ने इन्हीं हालातों के बीच देश का बागडोर संभाला।

राजीव गाँधी के लिए उनका राजनीति  से बाहर का होना फायदेमंद साबित हुआ। उनका नाम किसी विवाद से जुड़ा हुआ नहीं था। न ही वे किसी विशेष खेमे से जुड़े हुए थे। उनके खुले व्यव्हार  की वजह से लोगों में उनकी अपील बहुत ज्यादा थी। यहाँ तक कि देशवासियों ने उनको मिस्टर क्लीन की संज्ञा दी। उनके सलाहकार भी राजनीति से बाहर  ही थे। इनमें वे लोग भी थे जो दून स्कूल में उनके सहपाठी रहे थे और मित्र भी थे।  अरुण सिंह और अरुण नेहरू को तो बाकायदा उन्होंने अपने मंत्रिमण्डल में भी शामिल किया। सैम पित्रोदा जैसे लोगों को अपनी टीम में शामिल किया और हिंदुस्तान को बैलगाड़ी के ज़माने से कंप्यूटर के ज़माने में ले जाने की बात की।  ऐसा लगा कि सच में भारत को एक नए और आधुनिक युग में ले जाने वाला नायक मिल गया हो। मीडिया के एक हिस्से ने वाहवाही की तो दूसरे हिस्से ने मजाक भी उड़ाया।  मीडिया के कुछ लोगों ने राजीव गाँधी द्वारा नियुक्त किये गए कुछ विशेषज्ञों को ” राजीव का कंप्यूटर बॉय ”  तक कहा।

राजीव गाँधी के कार्यकाल के शुरुआती वर्षों में उठाये गए कदम से ऐसा लगा भी कि वे देश की ज्वलंत समस्याओं को सुलझाने और देश को शांति और विकास की राह पर ले जाने के लिए गंभीर प्रयास कर रहे हैं। प्रधानमंत्री बनते ही उन्हें विरासत में पंजाब, आसाम, मिजोरम और बंगाल की समस्याएँ मिली, इन सभी राज्यों में या तो अलग देश की मांग को लेकर या अलग राज्य की माँग  को लेकर उग्र गतिविधियां चल रही थीं। पंजाब और आसाम बुरी तरह जल रहा था।

पंजाब में जहाँ खालिस्तान की मांग फिर से जोर पकड़ रही थी। इंदिरा की हत्या के बाद देशभर में सिखों के खिलाफ हुई हिंसा और हत्या से उपजे जनाक्रोश के कारण नए सिख युवा खालिस्तान आंदोलन की तरफ फिर से आकर्षित हो रहे थे।  यहाँ तक कि  सिख धर्मगुरु और खुद अकाली दाल के नेताओं द्वारा खालिस्तान के समर्थन में नारे लगाए जा रहे थे।

राजीव गाँधी ने बड़े ही धैर्य से अपने सारे पूर्वग्रह और दुरग्रह को किनारे कर इस समस्या को सुलझाने का प्रयास किया और सुलझाया भी। जहाँ एक तरफ बदमाशों से सीधी भाषा में में बात करने वाले  जे ऍफ़ रिबेरो और के पी एस गिल जैसे पुलिस अधिकारियों को आतंवादियों के सफाये के लिए लगाया वहीँ दूसरी तरफ नरम रुख अपनाते हुए राजनैतिक स्तर पर भी इसे सुलझाने के प्रयास किये।  अकाली दल  को चुनाव में भाग लेने के लिए तैयार किया।  इंटेलिजेंस ब्यूरो की स्पष्ट रिपोर्ट थी कि यदि पंजाब में अभी चुनाव हुए तो कांग्रेस बुरी तरह हार जायगी।  बावजूद इसके राजीव ने राष्ट्रपति शासन हटकर पंजाब में चुनाव करवाए।  अकाली दल  भारी बहुमत से चुनाव जीत गया। कांग्रेस ने अपनी हार को सदाशयता से कबूला लेकिन खालिस्तानी मंसूबों को ध्वस्त करके रख दिया।

राजीव गांधी के साथ सैम पित्रोदा

ठीक यही स्थिति मिजोरम में थी। मिजो नेशनल फ्रंट के लाल डेंगा ने केंद्र सरकार का नाकोदम कर रखा था। वहीँ आसाम में अलग बोडोलैंड की माँग  को लेकर आल बोडो स्टूडेंट्स यूनियन उत्पात मचा रहे थे।  आसाम  जल रहा था। उधर बंगाल के दार्जीलिंग के नेपाली भाषा-भाषी लोग अपने लिए अलग राज्य गोरखालैंड की माँग  कर रहे थे। सुभाष घीसिंग के नेतृत्व में लोग चट्टान की तरह खड़े थे और उनकी एक आवाज पर मरने – मारने को उतारू थे।

इन सारी आंतरिक समस्याओं पर राजीव गाँधी बड़ी ही सूझबूझ और बारीकी से आगे बढे और धीरे-धीरे आगे बढ़ते हुए समस्याओं को सुलझा लिया।  जहाँ आसाम में छात्र नेता प्रफुल्ला कुमार महंत से समझौता कर उन्हें मुख्यधारा की राजनीति में आने के लिए राजी किया। राष्ट्रपति शासन हटाकर चुनाव करवाए।  कांग्रेस यहाँ भी बुरी तरह हार गयी। प्रफुल्ल महंत की पार्टी अगप भरी बहुमत से सत्ता में आयी।  कांग्रेस ने खुलकर स्वागत किया और कहा कि भले ही कांग्रेस चुनाव हार गयी हो लेकिन लोकतंत्र मजबूत हुआ है।  जून 1986 में मिजो नेशनल फ्रंट के नेता लाल ड़ेंगा से भी शांति समझौता हुआ।  समझौते की शर्तों  के मुताबिक मिजो नेशनल फ्रंट  नेताओं ने हथियार  डाल दिए और उनको आम माफ़ी दे दी गयी।  केंद्र सरकार ने मिजोरम को पूर्ण राज्य का दर्जा दे दिया और लाल ड़ेंगा ने मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाली।  यह कुर्सी उन्होंने कांग्रेस मंत्रिमण्डल से ग्रहण की थी।  मोर्चों पर राजीव गाँधी ने एक राजनेता की तरह नहीं, घर के अभिभावक की तरह और एक स्टेट्समैन की तरह खुद को  पेश किया और लगभग सफलतापूर्वक इन उबलते हुए मसलों पर पानी के छींटे मारकर शांत किया।

लेकिन कांग्रेस के अंदर मौजूद सामंती तत्वों और संघी मानसिकता के कांग्रेसियों ने धीरे-धीरे राजीव के मानस पटल को प्रदूषित करना शुरू कर दिया जिसका परिणाम हुआ कि  वोट बैंक के चक्कर में कई साहसिक फैसले लेने  से चुक गये।  और फिर उनमें मौजूद क्रन्तिकारी फैसले लेने वाला तत्व राजनीति की गंदगी और वोट बैंक के चक्कर में धीरे-धीरे ख़त्म होता चला गया वरना कई साहसिक बदलाव मुस्लिम महिलाओं और आम लोगों के जीवन में परिलक्षित होता जरूर दिखता।

इसका पहला उदहारण देखने को मिला शाहबानो के मामले में।  मोहम्मद अहमद खान नामक एक बुजुर्ग सुप्रीम कोर्ट में एक आवेदन लेकर आया।  उसने निचली अदालत के उस फैसले के खिलाफ सर्वोच्च न्यायलय में अपील की थी जिसमें उसे अपनी तलाकशुदा पत्नी को गुजारा-भत्ता देने का आदेश दिया था।
खान का कहना था क़ि उसने इस्लामिक कानून के मुताबिक अपनी तलाकशुदा पत्नी को 3 महीने का गुजारा भत्ता देकर अपना फर्ज अदा कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने दंड प्रक्रिया संहिता की धरा 125 के तहत खान की अपील को ख़ारिज कर दिया- एक तलाकशुदा पत्नी को अपने पूर्व पति से गुजारा भत्ता पाने का अधिकार है, अगर उनके पति ने दूसरी शादी कर ली हो और उस तलाकशुदा महिला ने पुनर्विवाह नहीं किया हो और कमाने लायक नहीं हो।

सुप्रीम कोर्ट ने साफ़ कहा कि CRPC और पर्सनल लॉ के बीच विवाद की स्थिति में CRPC 125 पर्सनल लॉ से ऊपर है।  और भी कई सुधारात्मक टिप्पणियां सुप्रीम कोर्ट ने की।  सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से मुस्लिम जगत में तीखी प्रतिक्रिया हुई और कई हलकों से टिप्पणी आयी कि सुप्रीम कोर्ट मुस्लिमों के निजी मामलों में अनावश्यक दखल दे रहा है।  धर्मगुरुओं और मुल्लाओं ने भी कोर्ट की तीखी आलोचना की।  इस फैसले के ठीक 3 महीने बाद जी एम बनातवाला नामक सांसद ने संसद में एक प्राइवेट मेंबर बिल पेश किया जिसमें मुसलामानों को CRPC 125 के दायरे से मुक्त करने की बात थी।

तत्कालीन गृह राजयमंत्री , प्रख्यात कानूनविद , राजीव गाँधी के भरोसेमंद और प्रगतिशील मुस्लिमों के प्रतिनिधि आरिफ मोहम्मद खान ने इस बिल का विरोध किया।  सदन में यह बिल धराशायी हुआ। लेकिन सदन के बाहर बहस चलती रही।  कट्टरपंथियों ने शाह बानो को धर्मच्युत कर दिया।  कट्टरपंथियों के दबाव में  शाह बानो झुक गयी।  मुसलमानों ने उसका बहिष्कार किया।  ठीक उसी समय उत्तर भारतीय राज्यों में उपचुनाव हुए।  कांग्रेस पार्टी उन उपचुनावों में हार गयी।

अपने परिवार के साथ राजीव गांधी

हार से राजीव गाँधी घबराये और चिंतित हो गए। राजीव गाँधी ने मोहम्मद आरिफ से  किनारा कर लिया  और उनकी जगह कट्टरपंथी मुसलमानों ने ले ली।  फरवरी 1986 में कांग्रेस मुस्लिम महिला बिल लेकर आयी। इस बिल के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट के शाह बानो वाले फैसले को निष्प्रभावी कर दिया गया।  मोहम्मद आरिफ खान कांग्रेस से इस्तीफ़ा देकर बाहर हो गए।  पहली बार राजीव गाँधी ने वोट बैंक की राजनीति में खुद को शामिल कर एक साहसिक और क्रन्तिकारी कदम से अपने आपको पीछे खिंच लिया और मुस्लिम समाज की महिलाओं के हक़ में बड़ा फैसला होकर भी नहीं हो सका।

इधर कट्टरपंथी हिन्दू तबका और संघियों ने राजीव गाँधी पर  तुष्टिकरण के आरोप लगाए और हिन्दू हितों की अनदेखी करने की  बात भी कही।  राजीव को फिर चिंता हुई और वे क्षतिपूर्ति में लग गए।  उन्हें लगा कि  हिन्दू वोट कहीं नाराज न हो जाय।  और इस क्रम में उन्होंने  और गलती की।  राम मंदिर – बाबरी मस्जिद जिसमें वर्षों से ताला जड़ा  हुआ था और विहीप  वाले लगभग तीन दशक बाद 80  के दशक में रामजन्म भूमि की मुक्ति के अभियान चला रहे थे।

उसी समय फैजाबाद की एक  स्थानीय अदालत ने एक वकील ने याचिका दायर कर आम लोगों को रामलला की पूजा अर्चना की अनुमति प्रदान करने की माँग की थी। शाह बानो प्रकरण के ठीक बाद जिला जज ने फैसला दिया कि  मस्जिद का ताला खोला जाय और पूजा अर्चना की इजाजत दी जाय। लोगों का मानना था कि  यह फैसला दिल्ली से दिलवाया गया है और शाह बानो प्रकरण के बाद नाराज हिन्दुओं को तुष्ट करने के लिए राजीव गाँधी के कहने पर अदालत ने यह फैसला दिया है। और इस तरह यह विवाद जो वर्षों से पिटारे में दबा पड़ा था , उसे फिर से बाहर कर दिया गया जिसका दंश देश ने 1992 में झेला  और आजतक झेल रहा है।

साफ़ है कि एक साफ़ सुथरा इंसान जिसने कई महत्वपूर्ण फैसलों से देश को एक नयी दिशा देने की पुरजोर कोशिश की थी और सफल भी हो रहा था, वोट बैंक की राजनीति  के चपेट से  बचा न सका और राजनीति  के एक पक्ष की सड़ांध ने उसे भी अपनी लपेट में ले लिया।

एडवोकेट लाल बाबू ललित सुप्रीमकोर्ट सहित दिल्ली के न्यायालयों में वकालत करते हैं. 

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गूगल का डूडल इस्मत चुगताई के नाम

स्त्रीकाल डेस्क 

उर्दू की मशहूर लेखिका इस्मत चुगताई की मंगलवार यानी 21 अगस्त को 107वीं जयंती है, इस मौके पर गूगल ने एक डूडल बनाकर उन्हें श्रद्धांजलि दी है। इस्मत चुगताई ने अपनी रचनाओं के जरिए महिलाओं के सवालों को नए सिरे से समाज के सामने उठाया। इन्हें इस्मत आपा के नाम से भी जाना जाता है। गूगल ने अपने डूडल में  इस्मत चुगताई को सफेद रंग की साड़ी पहने हुए दिखाया है, इस डूडल में वो लिखती हुई नजर आ रही हैं।इस्मत चुगताई के जन्म को लेकर कुछ भ्रम की स्थिति है। कुछ रिपोर्ट्स के मुताबिक इनका जन्म 15 अगस्त 1915 को बताया जाता है। वहीं अन्य जगह 1915 के 21 अगस्त को बताया जाता है। इस्मत का जन्म यूपी के बदायूंं में हुआ था। वह दस भाई बहन थीं। इस्मत अपने माता-पिता की नौवीं संतान थीं।

1942 उन्होंने अपनी सबसे विवादित कहानी ‘लिहाफ’ लिखी थी, जिसके कारण उनके ऊपर लाहौर हाई कोर्ट मे मुकदमा भी चला। आरोप था कि चुगताई ने अपने इस लेख में अश्लीलता दिखाई है। हालांकि ये मुकदमा बाद में खारिज हो गया। इस कहानी को भारतीय साहित्य में लेस्बियन प्यार की पहली कहानी भी माना जाता है। दरअसल अपने इस लेख में चुगताई ने एक गृहणी की कहानी दिखाई थी जो पति के समय के लिए तरसती है।

इस्मत चुगताई पूरी जिंदगी अपनी कलम को बंदूक बनाकर महिलाओं के हक के लिए लड़ती रहीं। उन्होंने अपनी रचनाओं के जरिए महिलाओं की दबी हुई आवाज को दुनिया के सामने उठया। चुगताई ने विशेष तौर पर अपनी रचनाओं में निम्न और मध्यम वर्ग से आनी वाली मुस्लिम तबके की लड़कियों की दबी-कुचली आवाज उठाई।इस्मत ने 1938 में लखनऊ के इसाबेला थोबर्न कॉलेज से बी.ए. किया। उन्‍होंने कहानी संग्रह- चोटें, छुई-मुई, एक बात, कलियां, एक रात, शैतान, उपन्यास- टेढ़ी लकीर, जिद्दी, दिल की दुनिया, मासूमा, जंगली कबूतर, अजीब आदमी भी लिखी। उन्‍होंने आत्‍‍‍‍मकथा भी ल‍िखी। 24 अक्टूबर 1991 में वह इस दुनिया से रुखसत हुईं। मुंबई में उनका इंतकाल हुआ और उनकी वसीयत के मुताबिक, उनका अंतिम संस्कार चिता जलाकर किया गया।

टाइम्स नाउ हिन्दी से साभार 

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केरल का आपदा संकट, तंगदील मोदी सरकार और पीड़ितों को ट्रोल करते उत्साही हिन्दू

राजीव सुमन 

देश का एक राज्य केरल इस वक़्त बहुत बड़ी प्राकृतिक विपदा से जूझ रहा है. र्प्राकृतिक सौन्दर्य से लैस केरल आज सदी की सबसे बड़ी बाढ़ की तबाही का सामना कर रहा है. 100 साल में कभी ऐसी तबाही केरल में नहीं देखी गई. 400 से ज़्यादा लोग अपनी जान गंवा चुके हैं. 6 लाख से ज़्यादा लोग राहत शिविरों में रह रहे हैं. राज्य के 14 में से 12 ज़िलों में रेड अलर्ट है और सबसे चिंताजनक बात है कि मौसम विभाग ने अभी भी भारी बारिश की आशंका जताई है जिससे आने वाले वक्त में हालात और बिगड़ सकते हैं. इडुक्की और एर्नाकुलम जिले राज्य के बाक़ी हिस्सों से पूरी तरह कट गए हैं. बदतर होते हालात के बीच सैंकड़ों रेस्कयू टीमें पूरी जी जान से लगी हुई हैं. सेना, नेवी, एयरफोर्स, NDRF, ITBP सभी राहत और बचाव के काम में लगे हैं. राज्य में बारिश और बाढ़ के चलते अब तक करीब 20 हज़ार करोड़ का नुकसान होने की बात मुख्यमंत्री विजयन कह रहे हैं. यातायात के साधन पूरी तरह ठप्प पड़े हैं.

अपनी भौगोलिक स्थिति और प्राकृतिक सौन्दर्य से समृद्ध केरल आज उसी का प्रकोप झेल रहा है. प्रकृति ने केरल को स्पष्ट रूप से तीन हिस्सों में बाँट रखा है–  पूर्वी मलनाड (पूर्वी उच्च क्षेत्र), अडिवारम (तराई क्षेत्र), ऊँचा पहाडी क्षेत्र  पालक्काड दर्रा, तृश्शूर-कांजगाड समतल, एरणाकुलम – तिरुवनन्तपुरम रोलिंग समतल और पश्चिमी तटीय समतल। यहाँ की भौगोलिक प्रकृति में पहाड़ और समतल दोनों का समावेश है। एक पौराणिक मान्यता के अनुसार परशुराम ने अपना परशु समुद्र में फेंका जिसकी वजह से उस आकार की भूमि समुद्र से बाहर निकली और केरल अस्तित्व में आया. इसलिए शायद केरल का एक अर्थ समुद्र से निकला भूभाग भी है.
छोटे से राज्य केरल में 40 नदियाँ हैं जो पश्चिमी दिशा में स्थित समुद्र अथवा झीलों में जा मिलती हैं. इनके अतिरिक्त पूर्वी दिशा की ओर बहने वाली तीन नदियाँ, अनेक झीलें और नहरें हैं. केरल को प्रकृति ने इतना समृद्ध किया है कि केरल को ‘ईश्वर का अपना घर’ भी कहा जाता है. ऐसा नहीं है कि केरल की समृद्धि सिर्फ प्रकृति प्रद्दत है. नवम्बर 1956  में एक राज्य के रूप में अस्तित्व में आने के बाद से ही यहाँ के लोगों ने अपनी मेहनत, लगन और भाईचारे की साझी संस्कृति विकसित करते हुए लोकतंत्र को और ज्यादा मजबूती प्रदान की. यही कारण है कि आज केरल सबसे साक्षर और स्त्री-पुरुष समानता में सबसे विकसित राज्य है. यहाँ की आबादी में हिन्दुओं तथा मुसलमानों के अलावा ईसाई भी बड़ी संख्या में रहते हैं. केरल में शिशुओं के प्रति वात्सल्य उत्कर्ष पर और मृत्यु दर सबसे कम है.यहाँ स्त्रियों की संख्या पुरुषों से भी अधिक है. यह राज्य विश्व का “प्रथम शिशु सौहार्द राज्य”  के रूप में ख्यातिप्राप्त है. किन्तु  आज खुद ईश्वर के इस घर पर प्रकृति का प्रकोप बाढ़ के रूप में कहर ढा रहा है.

आठ अगस्त से जारी बारिश के बाद से ही हालात बाद से बदतर होते जा रहे थे और 3-4 दिनों के भीतर ही लगभग 72 लोगों की जाने जा चुकी थी. बाढ़ से बुरी तरह प्रभावित पथनमथिट्टा ज़िला, उत्तरी पलक्कड़ के नेनमारा में भयंकर तबाही हो चकी थी. भूस्खलन आदि में दबे दर्जनों शवों को निकाला जा रहा है. मुख्यमंत्री विजयन ने राज्य में हालात की अत्यधिक गंभीरता की सूचना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री राजनाथ सिंह को बताते हुए राहत कार्य में केंद्र से सहायता देने का अनुरोध किया है. अब तक 387 लोग मारे जा चुके हैं. इडुक्की, एर्नाकुलम, पलक्कड, अलप्पुझा, कोझीकोड, वायनाड, त्रिशूर और पथनमथिट्टा के बाढ़ प्रभावित इलाकों में संघीय आपदा आपात बल की चार अन्य टीमों को बीते 15 अगस्त को केरल भेजा गया है और इसके साथ ही राज्य में एनडीआरएफ की कुल डेढ़ दर्जन टीमें काम कर रही हैं. एनडीआरएफ की एक टीम में करीब 45 सदस्य होते हैं. राज्य में करीब 80 बांधों में पानी का स्तर क्षमता से अधिक होने के बाद उनसे पानी छोड़ना पड़ा है.

प्रधानमंत्री मोदी ने की 500 करोड़ रुपये के राहत पैकेज की घोषणा

प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी ने केरल के बाढ़ के सम्बन्ध में पहला ट्वीट नौ अगस्त को किया जिसमे उन्होंने केरल के मुख्यमंत्री से बात की और हर संभव मदद देने का प्रस्ताव रखा. हाँ, साथ में,  यह भी लिखा कि इस विपदा में हमलोग कंधे से कन्धा मिलाकर खड़े हैं.. इसके बाद प्रधान मंत्री इतना व्यस्त हुए कि इस सन्दर्भ में दूसरा ट्वीट 15 अगस्त शाम लगभग 6 बजे किया. लेकिन इस बीच 15-20 ट्वीट 15 अगस्त के उनके भाषणों के रहे. जब अपनी तमाम व्यस्त कार्क्रमो से फुर्सत मिली–उन्होंने बताया कि केरल के मुख्यमंत्री से केरल के दुर्भाग्यपूर्ण आपदा पर विस्तार से बात हुई. केंद्र दृढ़ता से केरल वासियों के साथ खड़ा है और वह हर मदद के लिए तैयार है. 16 तारीख की सुबह में 9:15 पर फिर ट्वीटर के माध्ययम से बताया कि बाढ़ की स्थिति के बारे में मुख्यमंत्री विजयन से बात की. रक्षा मंत्री से आगे के बचाव और मदद कार्यों का विवरण लिया. और अंत में केरल के लोगों की सुरक्षा और बेहतरी के लिए प्रार्थना की. इसके बाद पुर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के एपिसोड में 10-15 ट्वीट.17 अगस्त को लगभाग 9.06 बजे सुबह फिर उन्होंने मुख्यमंत्री से चर्चा की और रहत कार्यों की जानकारी ली. साथ ही यह बताया कि शाम में वह केरल जाएंगे जायजा लेने. इसके बाद 7.30 बजे वे निकल गए केरल के बाढ़ पीडितो का जायजा लेने. इस दौरान राहुल गांधी ने प्रधान मंत्री को कई बार ट्वीट किया और इसे अविलंब राष्ट्रीय आपदा घोषित किये जाने की मांग की. कांग्रेस अध्यक्ष ने लिखा–‘प्रिय प्रधानमंत्री, कृपया बिना विलंब किए केरल की बाढ़ को राष्ट्रीय आपदा घोषित किया जाए. हमारे करोड़ों लोगों का जीवन, जीविका और भविष्य दाव पर है.’

अब सवाल कई उठ रहे हैं. प्रधान मंत्री को 9 अगस्त से पहले ही बाढ़ की विभीषिका का पता चल चुका था और मुख्य मंत्री को वे हर संभव मदद का भी आश्वासन दे रहे थे तब कोई ठोस घोषणा क्यों नहीं की गई? इसे राष्ट्रीय आपदा क्यों नहीं घोषित किया गया है अबतक ? केरल के मुख्यमंत्री ने तत्काल कम से कम 2000 करोड़ रूपए के मदद की जरुरत बतायी है. जबकि केंद्र ने 500 करोड़ ही दिए हैं. तो क्या यह माना जाए कि मोदी सिर्फ बोल बच्चन में माहिर हैं और जमीनी हकीक़त से इनका कोई वास्ता नहीं. सीपीएम नेता सीता राम येचुरी ने इसे अपर्याप्त बताया है और तत्काल राष्ट्रीय आपदा घोषित करने की बात कही.

सप्ताहांत तक केरल में भारी बारिश का अनुमान: समस्या और विकराल होने की संभावना

वर्षा से तबाह केरल के ऊपर मंडरा रहा ज़ोरदार दक्षिण पश्चिम मानसून इस सप्ताहांत को तमिलनाडु और कर्नाटक के साथ ही इस राज्य में भी खूब बरसेगा. चेन्नई स्थित क्षेत्रीय मौसम कार्यालय ने आज यह जानकारी दी है. मौसम कार्यालय ने अपनी रोज़ाना मौसम रिपोर्ट में बताया कि दक्षिण पश्चिम मानसून केरल में ‘जबरदस्त’ तथा तेलंगाना, लक्षद्वीप, तटीय कर्नाटक और दक्षिण अंदरूनी कर्नाटक में ‘सक्रिय’है. विभाग ने बताया कि केरल, लक्षद्वीप, कर्नाटक, तेलंगाना में ज़्यादातर स्थानों तथा तमिलनाडु एवं आंध्र प्रदेश में कुछ स्थानों सुबह साढ़े आठ बजे तक पिछले 24 घंटे में वर्षा हुई है.19 अगस्त के लिए भारी वर्षा संबंधी अपनी चेतावनी में क्षेत्रीय मौसम कार्यालय ने कहा कि तटीय कर्नाटक में छिटपुट स्थानों पर भारी से बहुत भारी वर्षा होने की संभावना है. विभाग ने कहा,‘तमिलनाडु में नीलगिरि, कोयंबटूर, थेनी, डिंडीगुल, तिरुनेलवेली ज़िलों में घाट इलाकों पर छिटपुट स्थानों तथा दक्षिणी अंदरूनी कर्नाटक में भारी वर्षा होने की संभावना है.’भारतीय मौसम विभाग के अधिकारी डॉ. एस. देवी ने बताया कि 16 अगस्त तक राज्य में 619.5 मिलीमीटर बारिश हुई है जोकि सामान्य तौर पर 244.1 मिलीमीटर होनी चाहिए. बारिश की तीव्रता में कमी आई है लेकिन अगले दो दिनों तक भारी बारिश जारी रहेगी.

नदियों में पानी के उफान को देखते हुए आंध्र प्रदेश के पूर्वी और पश्चिमी ज़िलों में आपदा राहत और बचाव टीमों को तैयार रखा गया है. तमिलनाडु के थेनी और मदुरै में भी बाढ़ का अलर्ट जारी कर दिया गया है. 8,410 लोग राहत शिविरों में पहुंचे गए हैं. चेन्नई तमिलनाडु के थेनी और मदुरै ज़िलों में  भी बाढ़ का अलर्ट जारी किया गया है. कावेरी और भवानी नदियों के तटों पर रहने वाले लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पंहुचाया गया है. मेट्टूर सहित तीन बांधों से दो लाख क्यूसेक से अधिक पानी छोड़ा गया है. अधिकारियों ने बताया कि करीब 8,410 लोगों ने कर्नाटक के जलाशयों से काफी मात्रा में जल प्रवाह होने के मद्देनजर राहत शिविरों में शरण ली है.

इसी बीच बाढ़ और बाँध का मामला सर्वोच्च न्यायालय पहुंचा

17 अगस्त को केरल में आई बाढ़ पर सुप्रीम कोर्ट दखल देने को तैयार होते हुए याचिका पर सुनवाई के लिए तैयार हो गई.  रसल जॉय ने केरल में बाढ़ से हुई मौतों व हालात का हवाला देते हुए सुप्रीम कोर्ट से दखल देने का आग्रह किया था. कोर्ट ने कहा कि पैनल पानी के स्तर को 142 फीट से 139 फीट पर करने पर विचार करे ताकि उस इलाके में रहने वाले लोग भय के साए में न रहें. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि केरल और तमिलनाडु दोनों समन्वय और सौहार्द के साथ केंद्र के साथ मिलकर काम करें. चीफ जस्टिस ने इस मौके पर केरल और तमिलनाडु के वकीलों से कहा सालों से आप दोनों पानी के लिए चिल्लाते रहे लेकिन अब दोनों की आंखों में आंसू हैं.

कई राज्य मदद को सामने आए

दिल्ली, बिहार, हरियाणा और पंजाब के मुख्यमंत्रियों ने 10-10  करोड़ रुपये मदद देने की घोषणा की है. , पंजाब सरकार ने  10 करोड़ के साथ ही तुरंत खाने योग्य 30 टन खाद्य सामग्री की सहायता भेजने की बात कही है. ओडिशा और झारखंड के मुख्यमंत्री ने केरल को पांच-पांच करोड़ रुपये की सहायता राशि जारी करने की घोषणा की है. इनके अलावा भी कई राज्य सहायता को आगे आ रहे हैं. लेकिन केंद्र सरकार का रवैया थोडा नकारात्मक कहा जा सकता है.  सोशल मीडिया पर घूम जाइए तो आपको भाजपा और संघ समर्थक लोगों के ऐसे-ऐसे पोस्ट दिखेंगे जिसका अनुमान कम-से-कम इस मानवता के संकट की घडी में आप नहीं लगा सकते थे. कुछ के कहने का निहितार्थ था कि कम्यूनिस्टों का राज्य है…वहाँ मुस्लिम और क्रिश्चियन ज्यादा हैं…लब्बोलुबाब यह कि ले देकर उनके दुश्मन कमजोर होंगें. क्या केंद्र सरकार के मात्र 500 करोड़ की मदद के पीछे भी कुछ इसी तरह की मंशा का आभास नहीं पाया जा सकता.

सोशल मीडिया में मानवता का संदेश और सवालों का सिलसिला 
खैर, इन सब के बीच भारतीयता और उससे भी बढ़कर मानवता के दर्शन वाले कुछ मर्मस्पर्शी पोस्ट आपको आश्वस्त जरूर कर देंगे कि मानवता ज़िंदा ही नहीं फल-फूल भी रही है..

फेसबुक पर श्वेता यादव टेढ़ी उंगली नाम से एक ब्लॉग चलाती हैं. वे फेसबुक यूजर प्रद्युम्न यादव के पोस्ट को अपने फेसबुक वाल पर शेयर करते हुए केरल की बीएससी 3rd ईयर की एक मुस्लिम छात्रा हनाना हामिद के बारे में बताती हैं कि कैसे उसने मछली बेचकर अपने परिवार का भरण-पोषण किया और अपनी पढ़ाई जारी रखी. अपनी गाढ़ी कमाई से बचे कुल डेढ़ लाख रूपए उसने निजी तौर पर बाढ़ पीड़ितों की मदद के लिए मुख्यमंत्री राहत कोष में डाल दिए. हनाना उस समय सुर्ख़ियों में आई थी जब उसे स्कूल ड्रेस में मछलियाँ  बेचने पर खूब ट्रोल किया गया था और झूठी, बनावटी और दिखावटी कहा गया था. बाद में केरल सरकार के केन्द्रीय मंत्री अलफोंस कन्नाथनम उसके बचाव में आए और उसे सच्चा बताया. हनान हामिद ने राहत कोष में पैसे देते वक़्त कहा– ‘मुझे लोगों से जो मिला वही वापस कर रही हूँ. क्योंकि जिन लोगों ने मेरी मदद की वो आज बाढ़ की समस्या से जूझ रहे हैं, इसलिए उनकी मदद के लिए मई इतना तो कर ही सकी हूँ.”

एक अन्य पोस्ट में फेसबुक पर सक्रिय जया निगम ने कॉरपोरेट घरानों द्वारा केरल के लोगों के लिये की जा रही आर्थिक मदद की खबरें ढ़ूंढ़ीं, फेसबुक पर शेयर करते हुए लिखा-
“टीवीएस मोटर्स ने 1 करोड़ रुपये, ICICI बैंक ने 10 करोड़ रुपये और वॉक्सवौगन कंपनी द्वारा 30 लाख रुपये की आर्थिक मदद सुनिश्चित किये जाने की चुनिंदा खबरें. पतंजलि की मदद की खबर भी मिली पर केवल टीवी पर. उनकी रकम की पुष्टि करने वाली कोई डीटेल खबर नहीं मिली.” लगे हाथ पूंजीपतियों को कटघरे में भी खड़ा करती हैं जो वर्षों से मुनाफे के चक्कर में केरल की प्रकृति से खिलवाड़ कर रहे थे. वे मोदी पर तंज कसते हुए लिखती हैं-
“प्राइवेट प्लेयर्स यानी पूंजीपति जो भारत के विकास और समाज की वो दुखती रग हैं, जिसके बारे में बात करते हुए हमारे मोदी जी कुछ यूं भावुक हो उठते हैं मानो आम भारतीय अगर जिंदा भी है तो उनकी वजह से और उनके ही लिये.” जाया अपने पोस्ट में आगे सवाल करती हैं कि
“ऐसे में उन्ही कॉरपोरेट घरानों की ओर से केरल में इतनी कम आर्थिक मदद दिया जाना एक नज़ीर है उन लोगों के लिये जिन्हे विकास के विनाशकारी प्रोज्क्ट्स पर अंधश्रद्धा है. क्या हमारे कॉरपोरेट घरानों के मालिकों के दिलों में जरा भी आम भारतीय का ख्याल बचा है या उन्होने केवल भारतीय को पैसा बनाने का उपकरण समझ लिया है. थोड़ा उन बेलआउट पैकेजों का ही ख्याल कर लें जिन्हे आम भारतीय के टैक्स के पैसे से आपको दिया जाता है कि ताकि उनके रोजगार बने रहें और आपके अरबों रुपये के व्यापारिक घराने बचे रहें. मोदी जी कॉरपोरेट घरानों से एक बार कह कर तो देखिये केरल की जनता समेत समस्त भारतीयों की निगाहें आखिर आप पर ही टिकी हैं!”

स्त्रीकाल के लिए फ्रीलांस रिपोर्टिंग करनेवाले सुशील मानव एक अलग ही खबर फेसबुक पर देते हैं. वे वाल पर लिखते हैं–
“बाढ़ की भीषण तबाही से जूझ रहे केरल की मदद के लिए यूएई (यूनाइटेड अरब अमीरात ) ने आगे आकर हाथ बढ़ाया है. यूएई ने केरल में बाढ़ पीड़ितों की मदद के लिए एक कमेटी का गठन किया है. यूएई के प्रेसिडेंट शेख खलीफा ने एक नेशनल इमरजेंसी कमेटी का गठन करने का निर्देश दिया है, ताकि केरल बाढ़ पीड़ितों को सहायता मुहैया कराई जा सके. वहीं यूएई के वाइस प्रेसिडेंट शेख मोहम्मद बिन राशिद अल मकतूम ने ट्वीट कर कहा है कि केरल के लोग हमारी सफलता में सहभागी रहे हैं और हैं. ऐसे में उनके प्रति हमारी विशेष जिम्मेदारी बनती है. इस समय बाढ़ प्रभावित लोगों कि मदद करना हमारा फर्ज है.
वाइस प्रेसिडेंट शेख मोहम्मद बिन राशिद अल मकतूम ने कहा है कि हमें भारत में अपने भाईयों की मदद से पीछे नहीं हटना चाहिए. हमने एक कमेटी का गठन कर दिया है. उन्होंने लोगों से अपील की है कि इस समय बढ़-चढ़कर केरल के लोगों की मदद करें.
जबकि हमारी अपनी सरकार दो दिन जश्न और तीन दिन मातम मनाने के बाद आज हवाई यात्रा से लोगो के हाल चाल जान रही है. जबकि बाढ़ के चलते अब तक 324 लोगों की मौत हो चुकी है है. कागज की जियो यूनिवर्सिटी को 1000 करोड़ और 36 राफेल डील के बदले 58000 करोड़ विदेशी कंपनियों को दे आने वाले प्रधानमंत्री मोदी ने बाढ़ से तबाह केरल के लिए 500 करोड़ रुपये की आर्थिक मदद की घोषणा की है.

जाहिर है आफत में फँसे केरल के लोगो से चुनावी खुन्नस भी पूरी कर ली जा रही है..”.तो इन प्रतिक्रियाओं को देखते हुए लगता है कि प्रधानमंत्री द्वारा 15 अगस्त का आयोजन, फिर पूर्व प्रधानमन्त्री अटल विहारी वाजपेयी के देहावसान का इवेंट जनमानस को ठेस पहुंचा गया. खैर, केंद्र सरकार की मदद के अलावे जिताने हाथ मदद को सामने आए हैं और आ रहे हैं उससे आशा और भरोसा दोनों मज़बूत हुआ है कि आपदा कितनी ही बड़ी क्यों न हो, मानवता और भाईचारे से हर जंग जीती जा सकती है.

राजीव सुमन स्त्रीकाल के संपादन मंडल के सदस्य हैं. 

स्त्रीकाल का प्रिंट और ऑनलाइन प्रकाशन एक नॉन प्रॉफिट प्रक्रम है. यह ‘द मार्जिनलाइज्ड’ नामक सामाजिक संस्था (सोशायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत रजिस्टर्ड) द्वारा संचालित है. ‘द मार्जिनलाइज्ड’ मूलतः समाज के हाशिये के लिए समर्पित शोध और ट्रेनिंग का कार्य करती है.

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स्वराजशाला: राजनीति की रंगशाला

अश्विनी नांदेडकर और सायली पावसकर 

“मैं बदलाव हूँ..मैं मेरे देश का बदलाव हूँ, मैं मेरे देश की मालिक हूँ, मैं युवा हूँ.. इसी संकल्पना से शुरू हुई यूथ फार स्वराज आयोजित  “थिएटर ऑफ रेलेवंस – स्वराजशाला”!

बदलाव हर किसी को चाहिए, हर कोई चाहता है की, समाज बदले,व्यवस्था बदले, देश के हालात बदलें पर कोई बदलाव का माध्यम बनता है क्या? बदलाव की परिभाषा स्वराजशाला में निर्माण हुई कि हर बदलाव की बुनियाद ‘व्यक्ति’ है इसलिए बदलाव हमेशा खुद से आता है… और एक एक रचनात्मक पहल से बदलाव की लहर आती है। इसी आयाम से राजनीति और राजनैतिक प्रक्रियाओं को नई दृष्टि से समझने की शुरुआत हुई ।

राजनीति से मेरा क्या लेना देना, अरे हम सभ्य और अच्छे लोग हैं, हमें राजनैतिक मामलों से दूर ही रहना चाहिए…ऐसे अनेक संवादों से हम हर पल रूबरू होते हैं। आज के राजनैतिक परिप्रेक्ष्य में राजनीति व्यक्तिगत तथा दलगत लाभों के लिए राज-सत्ता को प्राप्त करने तक की प्रक्रिया है, यही नज़रिया है राजनीति को देखने का। इस नज़रिए को उत्प्रेरक मंजुल भारद्वाज ने अंबाला, हरियाणा में 1 से 10 जुलाई 2018 तक चली “थिएटर ऑफ रेलेवंस -स्वराजशाला” में  बदला और राजनीति पवित्र, शुद्ध, सात्विक,आध्यात्मिक और कलात्मकता की समग्र प्रक्रिया है यह दृष्टिकोण युवा सहभागियों को दिया। यूथ फार स्वराज आयोजित “थिएटर ऑफ रेलेवंस – स्वराजशाला” में  हरियाणा और पंजाब के युवाओं ने सहभागिता की ।

देश का वर्तमान और भविष्य युवा है और जिन युवाओं को राजनीति की डोर संभालनी है, वो 4G डेटा में भ्रमित हैं या Globalized and liberalized world में लिप्त है। इसी कारण राजीनीति एक नीतिगत प्रक्रिया होते हुए भी नाकाम है। इस अवस्था मे जहाँ राजनैतिक क्रांति असम्भव है वहां संभावनाओं की जमीन तराशने के लिए हम युवा प्रतिबद्ध हैं। हरियाणा और पंजाब के युवा स्वराजियों ने राजनीति के दृष्टिगत बदलाव को साकार करने के लिए सांस्कृतिक चेतना से उभरे “थिएटर ऑफ रेलेवंस” रंग चिन्तन के सैद्धान्तिक प्रयोग और प्रक्रियाओं से निर्माण का इतिहास “थिएटर ऑफ रेलेवंस – स्वराजशाला” में रचा ।

“थिएटर ऑफ रेलेवंस” नाट्यदर्शन ने विगत 26 वर्षों से समाज और व्यक्तियों के मानस में ‘सांस्कृतिक चेतना’ जागृत कर नयी दृष्टि प्रदान करके जनमानस को सांस्कृतिक क्रांति के लिए प्रतिबद्ध किया है। “थिएटर ऑफ रेलेवन्स” अपनी रंगदृष्टि से, आत्महीनता से उपजे विकारों का उन्मूलन कर, आत्मबल से वैचारिक रूप का निर्माण करता है।

स्वराजशाला में युवा स्वराजियों ने स्वयं को देखना, स्वयं को जानना, स्व अध्ययन प्रक्रिया में अपने आपको ढाला। TOR की प्रक्रिया ने व्यक्तिगत स्वभाव के बाहरी आवरण को भेदकर अपने अन्तरंग को खंगोलने एवं विचार विमर्श के लिए प्रेरित किया।

(1)

नींद बहुत आती है

राम नाम के नारों

राम नाम के जुमलों

राम के नाम बजने वाले

मंजीरों के शोर में

नींद बहुत आती है

घनी नींद में सो जाता है

देश राम राज्य के लिए

तड़ीपार,जुमलेबाज़,भक्तों का झुण्ड

गाय और भक्ति भाव का

करते है दोहन, चुनाव में

परचम लहराते हैं

हिन्दू ,हिन्दूतत्व और हिन्दुस्तान का

अपने ही देशवासियों की लाश पर

संविधान की अर्थी निकालते हुए

सुलाते हैं सांस्कृतिक चिंतन को

चिरकाल निद्रा में,

हर पल मर्यादा पुरुषोत्तम की

मर्यादाओं को तार तार करते हुए

चीर निद्रा में सोयी आत्मा

नहीं जागती अग्नि परीक्षा के लिए

बस शरीर स्वाहा हो जाते हैं

और सन्नाटे से आवाज़ आती रहती है

राम नाम सत है

चिरनिद्रा में सोने वालों की गत है !

आज दिखावटी धर्मनिष्ठा और फ़ासीवादी विचारों की सत्ता है, वह आत्महीनता से ग्रस्त है, इसीलिए आज युवाओं को अपनी ऊर्जा सही दिशा में संचालित एवं कार्यान्वित करनी है..इसलिए स्वराजशाला में सहभागियों ने “आत्मबल और आत्महीनता” इन विषयों का चिंतन किया और हम “आत्मबल” यानी सकारात्मक-रचनात्मक विचारों से सम्पूर्ण रहेंगे यह निश्चय किया ।

युवा स्वराजियों ने थिएटर ऑफ रेलेवंस की कलात्मक प्रक्रियाओं से राजनीति को देखने और समझने की नयी दृष्टि का मनन किया । कला से जीवन नीति और राजनीति बदलने की पद्धतियों का अनुभव किया और समझा। जहां बदलाव की प्रयोगशाला व्यवहार की दुनियादारी से दूर है, स्वराजशाला एक प्रयोगशाला है जहाँ सीखने और सिखाने की प्रक्रिया एकतरफा नही है, समग्र है । इसीलिए सभी ने हर दिन अपने आत्मनुभव को चिट्ठी के रूप में लिखा। आत्मसंवाद के साथ समूह संवाद को मजबूत किया।

परिचय की परिभाषा को व्यापक रूप तब मिला जब स्वराजशाला के उत्प्रेरक एवं राजनैतिक चिंतक मंजुल भारद्वाज ने दीवारों पर लगे राजनैतिक चिंतकों के quotations का अध्ययन करने की प्रक्रिया में, युवा स्वराजियों की चेतना को Evolve किया, सभी साथी एक समूह में अपना परिचय देते हुए अपने विचार को प्रस्तुत कर रहे थे। वैचारिक रूप से समूह प्रक्रिया में हर सहभागी अपना वैचारिक परिचय दे रहा था । इससे हमारे विचार और हमारा कार्य ही हमारा परिचय है, यह युवा सहभागियों ने जाना ।

संगठन हमारा मूल्य है, भारतीय विरासत है, इससे साम्राज्यवादी ताकतें  डरती हैं और हमारी भारतीय संस्कृति और एकता को ध्वस्त करती हैं। इस भारतीय विरासत को आगे ले जाने की जिम्मेदारी अब हम युवाओं की है, इस बात को स्वीकार कर स्वराजशाला में संगठन को मजबूत करने के लिए बहुत उम्दा प्रक्रियाएं TOR सिद्धान्त के माध्यम से आगे बढ़ी , जैसे असहमतियों को खुलकर व्यक्त करने की आजादी, जहाँ असहमति किसी को ख़ारिज करने के लिए नही बल्कि संवाद कर, समझ निर्माण करने के लिए है ।

कला ही है जो जीवन और राजनीति का शुद्धिकरण करती है। इसका अनुभव हर सहभागी ने किया और  लिया, जब उन्होंने थिएटर ऑफ रेलेबंस नाट्य सिद्धांत द्वारा अपनी अभिव्यक्ति की प्रक्रिया को रचनात्मक एवं कलात्मक आयाम से जोड़ा। नाट्य प्रस्तुतियों में अपनी “स्वराज यात्रा” को दर्शाया। खोजा अपने अंदर के व्यक्तित्व के रचनात्मक गुणों को और सृजन ऊर्जा से समूह का निर्माण हुआ। जब व्यक्ति एवं समूह एक दूसरे से जुड़ते हैं, तब मजबूत संगठन का निर्माण होता है।

स्वराजशाला में हर दिन सुबह चैतन्य अभ्यास प्रक्रिया नए आयामों को लेकर उजागर हो रही थी। जैसे मौसम और राजनीति का गहरा संबंध और उसका प्रभाव भी गहरा है। चैतन्य अभ्यास हर सहभागी को उसके, क्षेत्र, ज़मीन, काल, मौसम, स्वयं और प्रकृति से जोड़ता है। यह आयाम प्रस्थापित राजनीति को समझने के लिए आवश्यक है।

चैतन्य अभ्यास में अपने वैचारिक, भावनिक, शारीरिक और अध्यात्मिक आयामों को युवा स्वराजियों ने राजनैतिक दृष्टि से जोडा और अनुभव किया अपने होने की नई ऊर्जा, कलात्मक दृष्टि, नई उमंग, अपने भीतर के व्यक्तित्व को खोजने की प्राकृतिक चैतन्य प्रक्रिया।

आज देश को विश्वासात्मक नेतृत्व की खोज है, जो समतामूलक समाज निर्माण करे और देश की उम्मीद बने, वक्त को अपने हाथ में लेकर जीवन जीये। स्व-अध्ययन, निर्णायक भूमिका और सर्वसमावेशी व्यक्तित्व जैसे मूल्यों से सहभागियों ने नेतृत्व निर्माण की ओर पहल की ।

“राजनीति एक शुद्ध, पवित्र, सात्विकता की बहती अविरल धारा है” । “थिएटर ऑफ रेलेवंस – स्वराजशाला” में TOR TEAM (अश्विनी, सायली, कोमल, योगिनी व तुषार) ने राजनीति के चार मुख्य स्तम्भ “सत्ता, व्यवस्था, राजनैतिक चरित्र और राजनीति” को नाटक ‘राजगति’ की प्रस्तुति से स्वराजियों को रूबरू किया । राजनीति और राजनैतिक चरित्र की परिभाषा को गढ़ा। राजनीति की प्रक्रियाओं को समझने के लिए सहभागियों ने विचारधाराओं का अध्ययन किया।

विचारधारा का क्या अर्थ है? राजनैतिक चिंतकों ने अपने जीवन अनुभव और जीवन मूल्यों को अपने विचारों से विश्व के पटल पर रखा। इन विचारधाराओं का स्वराजशाला में राजनैतिक व्यक्तित्व “अजित झा” के मार्गदर्शन में सहभागियों ने विस्तार से मनन किया।

(2)

सत,सूत और सूत्र

अचंभित करने वाला

भ्रमित दौर है

‘लोकतंत्र’ संख्या बल का शिकार हो गया

पैसा और जुमला हावी हो गया

‘विवेक’ और विनय पर अंहकार छा गया

संविधान, तिरंगा खिलौना हो गये

अपने अपने रंग में सब नंगे हो गए

भगवा,हरा,लाल और नीला

चुनकर सब निहाल हो गए

इन्सान और इंसानियत लहूलुहान हो गए

भारत की विविधता के विरोधाभास

स्वीकारने का साहस,

गांधी का उपहास हो गया

बनिया है,बनिया है के शोर में

हर भारतीय से संवाद एक सौदा हो गया

सत्य के प्रयोग भ्रम हो गए

खुलापन और सबकी स्वीकार्यता

गाँधी के पाखंड हो गए

जिनको चाहिए था बस अपना

तुष्ट हिस्सा

वो तुष्टीकरण का शिकार हो गए

आज़ादी का जश्न मातम हो गया

गांधी के चिंतन की चिता पर

अपने अपने रंगों की ताल ठोक

पूरी युवा पीढ़ी को भ्रमित कर

कई राम,कई अम्बेडकर और

कई मार्क्स की सन्तान हो गए

अस्मिता,स्वाभिमान और पहचान

के नाम पर जपते हैं अपने अपने

भगवान की माला

और आग लगाते हैं उसी धागे को

जो जोड़ता है,पिरोता है

एक सूत्र में विविध भारत को

अपने सत और सूत से

जिसका नाम है ‘गांधी’!

‘राजगति’ नाटक के माध्यम से गांधी – भगत सिंह – अम्बेडकर – कार्ल मार्क्स इन राजनैतिक चरित्रों और उनके चिंतन (विचारधारा), चेतना को अधिक स्पष्टता से सहभागियों ने अनुभव किया,चिंतन की एक मजबूत बुनियाद का निर्माण हुआ और राजनैतिक दृष्टिगत मंथन प्रक्रिया को व्यापक गति मिली ।

1991 का वर्ष भारत में एक अनोखा दौर लेकर आया मंडल, कमंडल और भूमंडल! मंडल, कमंडल और भूमंडल ने भारत के सामजिक, आर्थिक, राजनैतिक और सांस्कृतिक ताने बाने को नष्ट कर उसके सामने नये भयावह संकटों का जाल फैलाया है । भूमंडलीकरण के बाद भारत के साथ पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था बदल गयी। संस्कृति, संवाद, साहित्य और कला के बजाय व्यापार बड़ा हुआ ‘खरीदों और बेचो के मन्त्र ने मनुष्यता का ह्रास कर तकनीक के युग का सूत्रपात किया । व्यक्ति का वस्तुकरण हो गया ,विज्ञान के सिद्धांतों को तकनीक तक सीमित कर अंधविश्वास का बोलबाला हो गया यानी आधुनिकता के नाम पर विकास की मोहर लग गई ।आज की व्यवस्था में सभी विकास का गीत गा रहे हैं। विकास का  मुखौटा विनाशकारी है। WTO की  साजिश यानी 1. कैसे साम्राज्यवादी और पूंजीवादी ताकतें मानवीय मूल्यों को ध्वस्त कर रही हैं और 2. भारतीय जीवन जो विविध, कृषिप्रधान, संगठन और सौहार्दपूर्ण था उसको ख़त्म कर रहीं हैं 3.संवैधानिक मूल्य और प्राकृतिक सम्पन्नता का विध्वंस कर रहीं हैं, इन आयामों को थिएटर ऑफ रेलेवंस की प्रक्रियाओं ने युवा स्वराजियों के साथ उजाकर किया और उन्हें एक राजनैतिक दृष्टिकोण प्रदान किया। राजनीति का मतलब है, जड़ तक पहुचना । एक शब्द से राजनीति की आबो हवा बदलती है और एक शब्द से विचारधारा की जमीन पता चलती है।

सामाजिक न्याय के प्रश्न पर राजीव गोदारा और सुरेन्द्र पाल सिंह ने व्यापक सन्दर्भों के साथ सहभागियों की भ्रांतियों को दूर किया । नाटक ‘मैं औरत हूँ’ के माध्यम से सहभागियों ने जेंडर के विषय पर विमर्श किया । हरियाणा के साथियों का राजेन्द्र चौधरी ने ‘जैविक खेती’ की प्रक्रिया और प्रारूप पर मार्गदर्शन किया । पंजाब के साथियों को हरमीत कौर बरार ने जेंडर समानता, नरेंद्र संधू ने सरकारी योजनाओं और कुलदीप पूरी ने शिक्षा की अवधारणा और अवस्था पर मार्गदर्शन किया ।

आजादी के आज 71 साल बाद, हम भगत सिंह, गांधी,शिवाजी,गौतम बुद्ध, अम्बेडकर इन चरित्रों को देखते है, उन्हें अपना अभिमान समझते हैं, आदर्श मानते हैं । पर क्या हम उनके जीवन मूल्यों को अपने अंदर उतारते हैं? आज हर राजनैतिक चरित्र, या तो किसी पक्ष का है, या किसी राज्य का,पर यह राजनैतिक चरित्र हमारे जीवन हिस्सा नहीं है। वह सम्पूर्ण भारत देश का नहीं है।इसीलिए आजादी के इतने सालों बाद भी हमारे देश में एक राजनैतिक चरित्र निर्माण नहीं हुआ। इस विरोधाभास को उत्प्रेरक मंजुल भारद्वाज ने रेखांकित किया और युवाओं को इन राजनैतिक चरित्रों के आत्मसंघर्ष को गहराई से समझने का दृष्टिकोण प्रदान किया । हम युवाओं को आज के इस राजनैतिक परिपेक्ष्य में यह समझना महत्वपूर्ण रहा जिससे हर युवा स्वराजी ने राष्ट्रनिर्माण के लिए अपनी भूमिका को समझा और “खुद का राज के साथ खुद पर राज” की “स्वराज” नीति का स्वीकार किया।

यूथ फार स्वराज के राष्ट्रीय अध्यक्ष मनीष ने राजीव गोदारा और सुरेन्द्र पाल सिंह के मार्गदर्शन में अपने साथियों रिषव,अमित,अंकित, लवप्रीत और सभी सहभागियों के साथ मिलकर भविष्य की रुपरेखा तैयार की ।

थिएटर ऑफ रेलेवंस नाट्य सिद्धांत के कलात्मक कैनवास पर, बदलाव की जमीन पर, सिद्धांतों को मथ कर स्वभाव के आईने में सभी सहभागियों ने ‘अपने राजनैतिक’ अस्तित्व को समता,न्याय,मानवता और संवैधानिक रंगों से सजाया!

(3)

मेरा रंग

मेरा रंग कौन सा है

मेरा रंग श्वेत है

सफ़ेद है मेरा रंग

मैं कलाकार हूँ

संवाद मेरा प्राण है

मेरी कला का मक़सद है

विश्व शांति, विश्व कल्याण

हम अपनी मुक्ति के लिए

मुक्तिधाम में भी सफ़ेद रंग में

लिपट कर जाते हैं

मेरे सफ़ेद ‘रंग’ में

सारे रंग समाहित हैं

बिल्कुल ‘सूर्य’ किरण की तरह

आपको वही रंग दिखेगा

जो रंग आपकी दृष्टि पर चढ़ा है

या जो रंग ‘आप’ देखना चाहते हैं

जैसे ‘सूर्य’ की किरण को प्रिज्म से

देखने पर हर रंग नज़र आता है

यहाँ ‘सूर्य’ मेरी ‘कलात्मक चेतना’ है

‘प्रिज्म’ है आपका ‘दृष्टिकोण”

वैसे मुझे ‘हरा’ रंग प्रिय है

क्योंकि ‘प्रकृति’ हरी है

मुझे सांस देने वाली ‘वनस्पति’ हरी है

हरी भरी है मेरी ‘वसुंधरा’

‘केसरी’ और बसंती रंग मुझे प्रेरित करते हैं

कुर्बानी के लिए, मानव कल्याण के लिए

हर पल ‘कुर्बानी’ को तत्पर हूँ मैं !

लाल रंग मेरी रगों में दौड़ता है

मेरे लहू का रंग ‘लाल’ है

लाल ‘रंग’ प्रेम है

प्रेम से प्रेम है मुझे

बिना ‘प्रेम’ के

दुनिया नहीं जी सकती

नहीं चल सकती

प्रेम दुनिया की आत्मा है

मेरा ‘रंग’ सफ़ेद है

जिसमें समाए हैं सारे ‘रंग’

मैं कलाकार हूँ

मैं जीवन का शिल्पकार हूँ

मेरा रंग सफ़ेद है !

अश्विनी नांदेडकर और सायली पावसकर थिएटर ऑफ रेलेवंस से जुड़े हैं. 

….

नोट : तीनों कविताओं और स्वराजशाला में प्रस्तुत नाटक ‘राजगति’ और ‘मैं औरत हूँ’ के सृजक हैं मंजुल भारद्वाज


स्त्रीकाल का प्रिंट और ऑनलाइन प्रकाशन एक नॉन प्रॉफिट प्रक्रम है. यह ‘द मार्जिनलाइज्ड’ नामक सामाजिक संस्था (सोशायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत रजिस्टर्ड) द्वारा संचालित है. ‘द मार्जिनलाइज्ड’ मूलतः समाज के हाशिये के लिए समर्पित शोध और ट्रेनिंग का कार्य करती है.

आपका आर्थिक सहयोग स्त्रीकाल (प्रिंट, ऑनलाइन और यू ट्यूब) के सुचारू रूप से संचालन में मददगार होगा.
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‘द मार्जिनलाइज्ड’ के प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें :  फ्लिपकार्ट पर भी सारी किताबें उपलब्ध हैं. ई बुक : दलित स्त्रीवाद 
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साम्प्रदायिक हिंसा से अलग तासीर है मॉब लींचिंग की

इरफान इंजीनियऱ


पिछले कुछ वर्षों में मॉब लिंचिंग (भीड़ द्वारा व्यक्ति या व्यक्तियों को पीट-पीटकर मार डालना) की घटनाओं में तेजी से वृद्धि हुई है, विशेषकर भाजपा के दिल्ली में सत्ता में आने के बाद से गाय से जुड़े मुद्दों पर साम्प्रदायिक हिंसा की घटनाएं चार गुना बढ़ गई हैं। सन् 2010 में जहां गाय से जुड़े मुद्दे, 5 प्रतिशत से कम साम्प्रदायिक दंगों के लिए जिम्मेदार थे, वहीं सन् 2017 मे इनका प्रतिशत बढ़कर  20 हो गया। ‘इंडिया स्पेन्ड‘ वेब पोर्टल के अनुसार, 2010 से लेकर 25 जून 2017 तक, गाय से जुड़े मुद्दों पर मॉब लिंचिंग की 60 घटनाओं में 25 व्यक्ति मारे गए। इनमें से 97 प्रतिशत घटनाएं भाजपा के सत्ता में आने के बाद हुईं। मरने वालों में से 84 प्रतिशत मुसलमान व शेष 16 प्रतिशत दलित या अन्य हाशिए पर पड़े वर्गों से थे। गौरक्षा से संबंधित हिंसा, लिंचिंग का सबसे प्रमुख कारण रही है। इसके अलावा, बच्चा चोरी और डायन होने के आरोप में भी  भीड़ द्वारा हत्याएं होती रही हैं। दूसरे मामले की अधिकांश शिकार महिलाएं होती हैं।

सेंटर फारॅ स्टडी ऑफ़ सोसायटी एंड सेक्युलरिज्म (सीएसएसएस) ने देश में साम्प्रदायिक हिंसा की घटनाओं के अपने अध्ययन में पाया कि सन् 2014 में भाजपा के केन्द्र में सत्ता में आने के बाद से, देश में कोई बड़ा साम्प्रदायिक दंगा नहीं हुआ। बल्कि, सन् 2014 में साम्प्रदायिक हिंसा की घटनाओं में, उसके पिछले वर्ष की तुलना में, कमी आई। परंतु समाज में साम्प्रदायिक सोच का बोलबाला बढ़ा और इसका मुख्य कारण था सत्ताधारी दल के नेताओं के नफरत फैलाने वाले भाषण। सन् 2015 में साम्प्रदायिक हिंसा की घटनाओं में किंचित वृद्धि हुई परंतु इस हिंसा में मरने वालों की संख्या 90 (2014) के मुकाबले 84 थी। वर्तमान सरकार के सत्ता में आने के बाद से, साम्प्रदायिक हिंसा के स्वरूप में एक बड़ा परिवर्तन आया है। अब बड़े साम्प्रदायिक दंगे नहीं होते। इसके विपरीत, छोटे पैमाने पर हिंसा होती है, जिसमें या तो मौतें होती ही नहीं हैं या बहुत कम संख्या में होती हैं।

पॉल ब्रास (‘द प्रोडक्शन ऑफ़ हिन्दू-मुस्लिम रायट्स इन कंटेम्पोरेरी इंडिया‘, 2004) लिखते हैं कि साम्प्रदायिक दंगे, ‘संस्थागत दंगा प्रणाली‘ (आईआरएस) द्वारा माकूल राजनैतिक परिस्थितियों में भड़काए जाते हैं। इसके लिए रोजाना के मामूली झगड़ों को साम्प्रदायिक रंग देकर, बड़ा स्वरूप दे दिया जाता है। साम्प्रदायिक हिंसा से हमेशा उस दल को फायदा होता है, जो समाज के बहुसंख्यक तबके का प्रतिनिधित्व करने का दावा करता है, अर्थात पहले जनसंघ और अब, भाजपा।

हिन्दू श्रेष्ठतावादी अब सत्ता में हैं। अतः उन्हें अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए बड़े और भीषण दंगे करवाने की जरूरत नहीं रह गई है। वे अपना लक्ष्य, नफरत फैलाने वाले भाषणों और दुष्प्रचार से हासिल कर सकते हैं। अल्पसंख्यकों को धर्मपरिवर्तन करवाने वाले, आतंकी, पाकिस्तान के प्रति वफादार, अलगाववादी और राष्ट्रविरोधी बताया जाता है और यह भी कहा जाता है कि वे देश के टुकड़े-टुकड़े करवाने पर आमादा हैं। इसके अलावा, उन्हें लव जेहाद के जरिए हिन्दू महिलाओं को अपने प्रेम जाल में फंसाने व गौवध का भी दोषी ठहराया जाता है। यह भी कहा जाता है कि अतीत में उन्होंने हिन्दुओं का दमन किया और हिन्दू मंदिरों को जमींदोज किया। इस दुष्प्रचार से साम्प्रदायिकता की आग धीमे-धीमे सुलगती रहती है परंतु न तो मीडिया का और ना ही अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों का ध्यान उसकी ओर जाता है। इसके विपरीत, बड़े दंगे और कत्लेआम, मीडिया और मानवाधिकार संगठनों की नजर में आ जाते हैं और इससे सरकारों की बदनामी होती है।
आईआरएस को साम्प्रदायिक दंगे करवाने के लिए बहुत मेहनत नहीं करना पड़ती। सबसे पहले एक जबरदस्त प्रचार अभियान चलाया जाता है, जिसका उदेश्य होता है अल्पसंख्यकों का दानवीकरण। डॉ. असगर अली इंजीनियर इसे समष्टि स्तर के कारक (‘आन डेव्लपिंग थ्योरी ऑफ़ कम्युनल रायट्स‘, 1984) कहते हैं। कोई भी साम्प्रदायिक दंगा तभी करवाया जा सकता है जब समष्टि कारक मौजूद हों, अर्थात, जिस समुदाय को निशाना बनाया जाना है, उसके प्रति समाज में पूर्वाग्रह व्याप्त हों। उसके बाद सूक्ष्म स्तर के कारकों की ज़रूरत पड़ती है। यह किसी मस्जिद के सामने से निकलता हिन्दू धार्मिक जुलूस हो सकता है, कोई अंतःर्धार्मिक विवाह हो सकता है, किसी मुसलमान पर गुलाल फेंकना हो सकता है, किसी मुस्लिम दुकानदार द्वारा गाय को भगाने के लिए उसे मारना हो सकता है या साबरमती एक्सप्रेस के डिब्बे में आग लगना हो सकता है। समष्टि स्तर के कारक पहले से ही दंगों के लिए वातावरण तैयार कर देते हैं। बस, एक तीली की ज़रूरत होती है, जो सूक्ष्म स्तर के कारक उपलब्ध करवाते हैं।

मॉब लिंचिग भी इसी प्रक्रिया से होती है। ऐसा लग सकता है कि ये घटनाएं स्वस्फूर्त हैं परंतु यह सही नहीं है। इनके पीछे वर्षों का दुष्प्रचार और समाज में रोपे गए पूर्वाग्रह होते हैं।


मॉब लिंचिग और साम्प्रदायिक दंगे   


मॉब लिंचिंग और साम्प्रदायिक दंगों, दोनों में भीड़ को हिंसा करने के लिए सड़क पर लाने के लक्ष्य से अफवाहें फैलाई जाती हैं। ये अफवाहें इस तरह की होती हैं जो लोगों को संशयग्रस्त, चिंतित और क्रोधित कर दें। वे साधारण लोगों को खून की प्यासी भीड़ों में बदल देती हैं।

कभी यह अफवाह फैलाई जाती है कि शहर की दूध या पानी की सप्लाई में जहर मिला दिया गया है। माताएं अपने बच्चों को दूध पिलाना बंद कर देती हैं और कुछ सहज-विश्वासी लोग पानी पीना भी बंद कर देते हैं। परंतु आखिर कोई कितनी देर प्यासा रह सकता है? ऐसी अफवाहें भी आम तौर पर फैलाई जाती हैं कि दूसरे समुदाय के लोगों की अस्त्रों से लैस भीड़, किसी इलाके पर हमला करने के लिए कूच कर गई है, फलां मस्जिद में हथियार जमा हो रहे हैं या एक समुदाय विशेष की महिलाओं को बलात्कार का शिकार बनाया जा रहा है।  इनमें से कोई भी या एक से अधिक अफवाह, लोगों को सड़क पर उतरकर दूसरे समुदाय के व्यक्तियों या उनकी संपत्ति को निशाना बनाना शुरू कर देने के लिए पर्याप्त होती हैं।

शहर या गांव में बच्चा चोरी करने वाले गिरोह घूम रहे हैं या गायों को काटने के लिए ले जाया जा रहा है, इस तरह की अफवाहों का प्रयोग भी लोगों को खून-खराबे के लिए प्रेरित करने के लिए किया जाता है। यही साम्प्रदायिक दंगों के मामले में भी होता है।

साम्प्रदायिक दंगों और मॉब लिंचिंग के बीच दूसरी समानता है, अपराध के पीड़ितों को न्याय दिलवाने में राज्य तंत्र की क्षमता पर अविश्वास। दंगाई और लिचिंग करने वाले तुरंत न्याय करना चाहते हैं। उन्हें अपने शिकार के अपराधी होने के किसी सुबूत की जरूरत नहीं होती। वे उसे वहीं और उसी समय सजा देना चाहते हैं और वह भी अधिक से अधिक बर्बर और अमानवीय ढंग से। न्याय के नाम पर वे बदला लेते हैं।  दंगों और मॉब लिंचिग, दोनों में एक दमित समुदाय को दूसरे दमित समुदाय से भिड़ा दिया जाता है। साम्प्रदायिक दंगों में दलितों को मुसलमानों के खिलाफ भड़काया जाता है, और मुसलमानों को दलितों के खिलाफ। कंधमाल में आदिवासियों ने दलित ईसाईयों पर हमले किए। लिंचिंग और दंगों दोनों के शिकार ‘बाहरी लोग‘ होते हैं। वे दूसरे धर्म के हो सकते हैं या दूसरे गांव या शहर के।

परंतु साम्प्रदायिक दंगों और मॉब लिंचिग में कुछ अंतर भी हैं। साम्प्रदायिक दंगे एक पूरे समुदाय के विरूद्ध युद्ध की घोषणा होते हैं। ‘शत्रु‘ समुदाय के हर व्यक्ति और उसकी संपत्ति को निशाना बनाया जाता है। साम्प्रदायिक दंगों का उद्देश्य  होता है किसी समुदाय को सामूहिक सजा देना। कोई भी व्यक्ति मात्र इसलिए शत्रु बन जाता है क्योंकि वह किसी विशिष्ट समुदाय का सदस्य है। वह कितना ही सीधा-सादा और अपने काम से काम रखने वाला क्यों न हो, उसे सिर्फ इसलिए निशना बनाया जाता है क्योंकि वह उस समुदाय का है। इसके विपरीत, मॉब लिंचिंग के निशाने पर विशिष्ट व्यक्ति होते हैं, जिन्हें भीड़ किसी अपराध या गलती का दोषी मानती है। इसके अलावा, जहां साम्प्रदायिक दंगे भड़काने के लिए पहले से तैयारी करनी पड़ती है और योजना बनानी पड़ती है वहीं मॉब लिंचिंग के लिए बहुत योजनाबद्ध और विस्तृत तैयारी नहीं करनी पड़ती।

गौवध के मुद्दे पर जो हिंसा हो रही है, उसके निशाने पर मुख्यतः मुसलमान हैं। मोहम्मद अखलाक, पहलू खान, जुन्नैद, अलीमउद्दीन अंसारी इत्यादि इसके उदाहरण हैं। इंडिया स्पेन्ड की रिपोर्ट के अनुसार, गाय से जुड़े मुद्दों पर हुई मॉब  लिंचिंग के मामलों के 84 प्रतिशत शिकार मुसलमान थे। परंतु समस्या यह है कि इस मुद्दे को लेकर केवल कुछ ही मुसलमानों को निशाना बनाया जा सकता है, अर्थात वे जो या तो मवेशियो का व्यापार करते हैं, उन्हें पालते हैं या उनका परिवहन करते हैं। अन्य मुसलमानों को शिकार बनाने के लिए पानी या दूध में जहर या बच्चा चोरी जैसी अफवाहों का प्रयोग किया जाता है। यह अफवाह भी उड़ाई जाती है कि बच्चा चोर अपह्त बच्चों के शरीर से अंग निकालकर बेचते हैं। बच्चा चोरी से संबंधित अफवाहों में जिन वीडियो का प्रयोग किया जाता रहा है, उनमें से कई में संदेही को बुर्कानशी महिला के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। जाहिर है कि इस तरह की अफवाहें फैलाने वालों को यह आशा रही होगी की इससे गाय के मुद्दे की तरह, मुख्यतः मुसलमान भीड़ों के निशाने पर आ जाएंगे। परंतु उनका यह गणित गड़बड़ा गया और अब हालत यह है कि हाशिए पर पड़े वर्गों के गैर मुस्लिम अजनबियों की भी बच्चा चोर होने के आरोप में जान ली जा रही है।

राज्य की भूमिका   
गौहत्या के आरोप में हुई मॉब लिंचिंग की घटनाओं के मामले में राज्य की भूमिका एकतरफा रही है। जो लोग अपनी जान बचाने में कामयाब हो जाते हैं उन पर गौहत्या निषेध कानूनों के तहत मुकदमे चलाए जाते हैं। ये कानून बहुत कठोर हैं। इसके विपरीत, मॉब लिंचिंग – जो गौहत्या से कहीं अधिक गंभीर अपराध है – के आरोपियों के विरूद्ध या तो कोई कार्यवाही की ही नहीं जाती या बहुत ढीले-ढाले ढंग से की जाती है। राजस्थान में पहलू खान की लिंचिंग के मामले में राज्य ने आरोपियों के खिलाफ अभियोगपत्र दाखिल नहीं किया परंतु जो लोग भीड़ के हमले से अपनी जान बचाने में कामयाब हो गए थे, उन्हें आरोपी बना दिया गया।

पुलिस सामान्यतः घटनास्थल पर तब पहुंचती है जब भीड़ अपना काम कर चुकी होती है। भाजपा नेता और मंत्री, लिंचिंग के आरोपियों का बचाव करते हैं। अलीमउद्दीन अंसारी की लिंचिंग के मामले में जिन 11 लोगों को विचारण न्यायालय ने हत्या का दोषी करार दिया था, उन्हें उच्च न्यायालय से जमानत दिलवाने का श्रेय लेने के लिए भाजपा की झारखंड राज्य इकाई के अध्यक्ष और केन्द्रीय मंत्री जयंत सिन्हा के बीच होड़ मच गई। जयंत सिन्हा ने उन अभियुक्तों का स्वागत किया जिन्हें उनकी अपील पर विचारण के दौरान जमानत पर रिहा कर दिया गया था। कुल मिलाकर, राज्य ऐसी घटनाओं के मामले में अपना मुंह फेर लेता है। शायद वह यह संदेश देना चाहता है कि मुसलमानों को भीड़ द्वारा पीट-पीटकर मार डालने में कुछ भी गलत नहीं है।

अब, जबकि मॉब लिंचिंग ने गंभीर रूप अख्तियार कर लिया है और गैर-मुसलमानों को भी इसका शिकार बनाया जा रहा है, तब सरकार ने इस मामले में कुछ कड़े कदम उठाने की पेशकश की है। धुले में एक घुमन्तु जनजाति के 5 व्यक्तियों की पीट-पीटकर हत्या की घटना के दो महीने पहले, गोसावी समुदाय ने पुलिस से यह अनुरोध किया था कि समुदाय के सदस्यों को पहचानपत्र जारी कर दिए जाएं। बच्चा चोरी की अफवाहें वहां पिछले दो माह से फैल रही थीं परंतु प्रशासन ने उन्हें रोकने के लिए कोई कदम नहीं उठाया। अगर पुलिस यह संदेश स्पष्ट रूप से प्रसारित कर देती कि कानून तोड़ने वालों से कड़ाई से निपटा जाएगा तो शायद ये पांच निरपराध लोग अब भी जीवित होते। परंतु तब किसे यह मालूम था कि इन अफवाहों का शिकार गैर-मुस्लिम बनेंगे।

निष्कर्ष  
मॉब लिंचिंग किसी भी सभ्य समाज में पूरी तरह अस्वीकार्य है। यह जंगल राज के समान है। सन् 1877 से लेकर 1950 तक अमरीका में अश्वेत की मॉब लिंचिंग की अनेक घटनाएं हुईं। इनका उद्धेष्य गोरों के वर्चस्व को स्थापित करना और अश्वेत को समर्पण करने के लिए मजबूर करना था। ये सभी घटनाएं बहुत मामूली या झूठे आरोप लगाकर अंजाम दी गईं। गोरों का मानना था कि इस तरह के मामलों में किसी प्रकार के मुकदमे की जरूरत ही नहीं है और सजा भीड़ द्वारा दी जाना पूरी तरह उचित है। अमरीका के दक्षिणी राज्यों में लिंचिंग की 4,084 घटनाएं हुईं और अन्य राज्यों में 300। इनमें से शायद ही किसी घटना के दोषियों को सजा मिल सकी हो। अमरीका में नागरिक अधिकार आंदोलन के उदय के साथ लिंचिंग की घटनाएं बंद हो गईं।

हिन्दुत्व की राजनैतिक विचारधारा के प्रमुख चिंतक – सावरकर और गोलवलकर – यह मानते थे कि मुसलमान और ईसाई, हिन्दू राष्ट्र के लिए बाहरी हैं और हिन्दू राष्ट्र इन बाहरी लोगों के साथ अनवरत युद्धरत है। गोलवलकर ने अपनी पुस्तक ‘व्ही आर अवर नेशनहुड डिफाइंड‘ में इस बात की वकालत की थी कि भारत में मुसलमानों और ईसाईयों के साथ वही सुलूक किया जाए जो हिटलर की जर्मनी में यहूदियों के साथ किया गया था।

मॉब लिंचिंग केवल कुछ लोगों की जिंदगी खत्म हो जाना या कुछ का घायल हो जाना नहीं है। मुद्दा प्रजातंत्र, कानून के शासन और न्याय का है। इस मामले में प्रधानमंत्री की चुप्पी उनकी सरकार की सोच की दिशा बताती है। मंत्रियों और अन्य भाजपा नेताओं द्वारा जो कहा और किया जा रहा है, उससे हम एक ऐसे समाज की ओर बढ़ रहे हैं जिसमें जो शक्तिशाली है, वही सही है।

यह जरूरी है कि राज्य तुरंत मॉब लिंचिंग की घटनाओं को रोकने के लिए जरूरी कदम उठाए और हमें उसे ऐसा करने पर मजबूर करना होगा। लिंचिंग न केवल उस समुदाय का अमानवीकरण करती है जो निषाने पर होता है, वरन् वह पूरे समाज को अमानवीय और बर्बर बनाती है। इसके पहले कि बहुत देर हो जाए, हमें आगे बढ़कर मानवाधिकारों, कानून के शासन और प्रजातंत्र की रक्षा के लिए कदम उठाने चाहिए।

इरफान इंजीनियर सोशल एक्टिविस्ट हैं/ अंग्रेजी से अमरीश
हरदेनिया द्वारा अनुदित

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एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक जीतने वाली पहली महिला: विनेश फोगाट



स्त्रीकाल डेस्क

जकार्ता: विनेश फोगाट ने सोमवार को 18वें एशियाई खेलों में भारत को कुश्ती में दूसरा स्वर्ण पदक दिलाया। उन्होंने 50 किग्रा फ्रीस्टाइल फाइनल में जापान की इरी युकी को 6-2 से हराया। एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक जीतने वालीं वे पहली भारतीय महिला हैं। इसके पहले भारत की ओर से गीतिका जाखड़ ने सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया था। गीतिका ने 2006 दोहा एशियाड में रजत पदक जीता था। विनेश एशियाई खेलों में 2 पदक जीतने वाली दूसरी महिला पहलवान हैं। उनसे पहले गीतिका जाखड़ एशियाई खेलों में 2 पदक जीत चुकी हैं।

विनेश ने फाइनल में जापान की पहलवान के खिलाफ आक्रमण और रक्षण का बेहतरीन नमूना पेश किया। उन्होंने पहले राउंड में 4-0 की बढ़त बनाई। उन्होंने इरी युकी को अपने पैरों से पूरी तरह दूर रखा ताकि वह कोई दांव न लगा सके। हालांकि, दूसरे राउंड में विनेश को चेतावनी के बाद एक अंक गंवाना पड़ा, लेकिन उन्होंने दबदबा बनाए रखा और आखिरी सेकंड्स में दो अंक लेकर 6-2 पर मुकाबला खत्म किया। विनेश के फाइनल में पहुंचने के बाद उनके ताऊ और पहलवान महावीर सिंह फोगाट ने उन्हें ट्वीट कर बधाई दी थी और स्वर्ण पदक के साथ देश लौटने का संदेश दिया था।

विनेश इसके पहले 2014 के राष्ट्रमंडल खेल में महिला कुश्ती में स्वर्ण पदक हासिल कर चुकी हैं। उनकी चचेरी बहनों, गीता फोगाट और बबीता फोगाट ने भी महिला कुश्ती में नाम हासिल किया है।


इनपुट दैनिक भास्कर 


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वर्मा जी,शर्मा जी, रावत जी, सबके हैं संबंध बच्चियों के बलात्कार काण्ड से

स्त्रीकाल डेस्क 
इधर देश का ध्यान मीडिया ने पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की लम्बी बीमारी के बाद मृत्यु पर केन्द्रित कर रखा है उधर जैसे-जैसे सीबीआई की जांच आगे बढ़ रही है बिहार की बेटियों के जीवन को आपदाग्रस्त बनाने वालों में सत्तापक्ष के एक से बढ़कर एक नेताओं की संलिप्तता सामने आ रही है. जदयू सहित भारतीय जनता पार्टी के नेताओं की संलिप्तता की बातें कही जा रही हैं, सामने आ रही हैं. वर्मा जी के नाम के साथ शर्मा जी का नाम बहुत पहले से लोगों, और विपक्ष की जुबान पर है अब पूर्व मंत्री रावत जी का भी नाम सुर्खियों में है. 

पूर्व मंत्री दामोदर रावत और उनका बेटा राजीव रावत


रावत कनेक्शन: 

मामले में अपने पति चंद्रेश्वर वर्मा का नाम आने के बाद सूबे की पूर्व मंत्री मंजू वर्मा ने पहले ही इस्तीफा दे दिया था अब सीबीआई के रेड में अपने आवास पर 50 से ज्यादा ज़िंदा कारतूस मिलने के बाद वे और उनके पति आर्म्स एक्ट के तहत एक ऍफ़आईआर भी अपने ऊपर ले चुके हैं. इस बीच पूर्व समाज कल्याण मंत्री दामोदर रावत और उनके बेटे राजीव रावत  के तार इस कांड से जुड़ते नजर आ रहे हैं जिसको लेकर जेडीयू ने कड़ी कार्रवाई की है.

सीबीआई को इस बात के सबूत मिले हैं कि इस कांड के मुख्य आरोपी बृजेश ठाकुर के राजीव रावत के साथ संबंध थे. इस बात का खुलासा होने के बाद जेडीयू ने राजीव रावत को पार्टी से निकाल दिया है. राजीव रावत युवा जेडीयू का प्रदेश महासचिव था. युवा जेडीयू के अध्यक्ष अभय कुशवाहा ने कहा कि राजीव रावत को पार्टी ने अनुशासनहीनता की वजह से  बाहर का रास्ता दिखाया है. मुजफ्फरपुर कांड को लेकर CBI जल्द पूर्व समाज कल्याण विभाग के मंत्री दामोदर रावत और उसके बेटे से पूछताछ कर सकती है.

सूत्रों के अनुसार सीबीआई को इस बात के  सबूत मिले हैं कि बृजेश ठाकुर के मुजफ्फरपुर स्थित आरएम होटल में  पूर्व समाज कल्याण मंत्री दामोदर रावत का बेटा राजीव रावत अपने दोस्तों के साथ अक्सर जाया करता था और अय्याशी किया करता था. बृजेश ठाकुर ने राजीव रावत का सहारा लेकर ही उस वक्त के समाज कल्याण मंत्री दामोदर रावत से संपर्क साधा और उनके मंत्री रहते समाज कल्याण विभाग से उन्हें अपने एनजीओ के लिए पैसा मिला. तत्कालीन समाज कल्याण विभाग के मंत्री दामोदर रावत पर आरोप लग रहे हैं कि उन्होंने बृजेश ठाकुर को अवैध तरीके से फायदा पहुंचाया.

मुजफ्फरपुर के विधायक और मंत्री  सुरेश शर्मा

शर्मा कनेक्शन
मुजफ्फरपुर में शेल्टर होम का मामला सामने आने के बाद से ही वहां के भाजपा विधायक और सरकार में मंत्री सुरेश शर्मा के ब्रजेश ठाकुर से रिश्तों की बात कही जाती रही है. विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव ने उनसे इस्तीफा भी माँगा था, जिसके बाद मंत्री ने उन्हें मानहानि की नोटिस भेज दी थी. शनिवार को राष्ट्रीय जनता दल (राजद) और कांग्रेस ने शनिवार को मुजफ्फरपुर आश्रय गृह (शेल्टर होम) दुष्कर्म मामले में संलिप्तता का आरोप लगाते हुए उनका  लिए बगैर विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव ने शनिवार को मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से मंत्री और मुजफ्फरपुर से विधायक को बर्खास्त करने की मांग की. यादव ने चेतावनी देते हुए कहा कि वह मामले में मंत्री की संलिप्तता उजागर करेंगे. हालांकि भाजपा के इस मंत्री को लेकर भाजपा के नेता उतने तत्पर नहीं हैं, जितना वे मंत्री मंजू वर्मा के मामले में थे. मंजू वर्मा के इस्तीफे के लिए सक्रिय बयान देने वाले भाजपा के वरिष्ठ नेता सीपी ठाकुर ने शर्मा के इस्तीफे के सवाल पर टालने वाले बयान दिये.
पढ़ें:  बिहार में बच्चियों के यौनशोषण के मामले का सच क्या बाहर आ पायेगा?
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   उस बलात्कारी की क्रूर हँसी को, क्षणिक ही सही, मैंने रोक दिया: प्रिया राज

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