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पढ़ी-लिखी चुड़ैल: ‘स्त्री’!

साक्षी सिंह 

अमर कौशिक द्वारा निर्देशित और श्रद्धा कपूर, राजकुमार राव स्टारर हिंदी फिल्म ‘स्त्री’ देख कर आई. जाने की कोई ख़ास इच्छा नहीं थी क्योंकि फिल्म को ‘हॉरर-कॉमेडी’ की श्रेणी में रखा गया है. डरावनी फ़िल्में देख कर मुझे डर लगता है और आज कल कॉमेडी का मतलब सिर्फ़ ‘उपहास’ या कि कुछ ‘डबल मीनिंग जोक्स’ हो चुका है. इस सो कॉल्ड कॉमेडी के दोनों ही रूपों में मुख्य रूप से स्त्रियों को टार्गेट किया जाता है, जिससे कि मुझे शदीद परेशानी है. मगर अच्छे रिव्यूज़ और दोस्तों का साथ मिला सो चली गई. जाना अच्छा भी रहा और सबसे अच्छा तो इसी लिहाज़ में कि यहाँ कॉमेडी के नाम पर स्त्रियों की देह, चरित्र और मन को टार्गेट कर सिर्फ़ कुंठाओं को पोषित करनें का काम नहीं किया गया है.

फ़िल्म 31 अगस्त 2018 को ही रिलीज़ हो चुकी है सो अब तक उसकी कहानी, फिल्मांकन, अभिनय, आरम्भ, अंत आदि की खूबियों और ख़ामियों पर काफी बात-चीत हो चुकी है. इसलिए मैं यहाँ उन विषयों पर बात नहीं करूंगी. मगर एक ‘स्त्री’ होने के नाते इस फिल्म में मुझे क्या ख़ास लगा वो ज़रूर साझा करूंगी.
शुरू करते हैं फ़िल्म के नाम से, जहाँ अब-तक हिंदी भाषी क्षेत्रों में किसी मृत स्त्री की आत्मा को भूतनी, पिशाचिनी, चुड़ैल आदि-आदि कहनें का चलन रहा है, उसके उलट इस फ़िल्म में दिखाया गया है कि इस कहानी में लोग उस आत्मा को ‘स्त्री’ ही सम्बोधित करते हैं. लोगों को पता है कि वह पढ़-लिख सकती है, इसलिए वो अपने घरों के बाहर “ओ स्त्री कल आना” लिखते हैं. अगर इसके सांकेतिक अर्थ को देखें तो समझ आयेगा कि आज के वक़्त में जब कि लडकियाँ पढ़-लिख गई हैं, वे शब्दों के भाव और अर्थ समझनें लगी हैं. उन्हें अपनी क्षमताओं का पता है, तब आप भीतरी तौर पर भले ही उनसे नफरत क्यों ना करें उन्हें भला-बुरा कहें या उनके लिए भला-बुरा सोचें मगर ज़ाहिरी तौर पर तो आपको वे अपने साथ बदसुलूकी करनें की छूट कतई नहीं देंगी.
‘ओ स्त्री कल आना’ पढ़ कर स्त्री लौट जाती है, इसमें भी दो बातें नजर आती हैं. पहली कि, स्त्री को आप भले ही बुरी आत्मा मान रहे हैं मगर अपने साथ हुई नाइंसाफ़ी के बावजूद वह पुरुषों की भांति बलात् किसी के घर में नहीं घुसती बल्कि सामने वाले की इच्छा का सम्मान करते हुए वापस चली जाती है. दूसरी बात कि, जो ‘स्त्री’ बार-बार आ रही है, जिससे लोग डर और उसे कल आना पर टाल कर बेवकूफ़ बना रहे, वे ‘मत आना’ भी लिख सकते थे मगर नहीं लिखते क्योंकि वे जानते हैं कि वह स्त्री अपने साथ हुई नाइंसाफी का जवाब माँगने आती है, अपनें अधिकार के लिए आती है. अगर वे ‘मत आना’ लिखेंगे तो ‘स्त्री’ के विद्रोही हो जाने का भी डर रहेगा. हमारा आज का समाज भी कुछ ऐसा ही है वह ना तो स्त्रियों को उनके हक देता और ना ही देने से साफ़-साफ़ मना करता है. असल में स्त्री को लेकर लोगों के मन में बैठा डर किसी भूतनी या चुड़ैल का डर नही है बल्कि यह डर ‘हक़ माँगनें वाली पढ़ी-लिखी स्त्रियों का डर है’.

फ़िल्म में चंदेरी के ग़ायब हुए लोगों के उद्धारक के रूप में उस लड़के को दिखाया है ‘जिसकी आँखों में प्यार हो’ ना कि भुजाओं में बल. राजकुमार राव नें एक छोटे से कस्बे  के ‘लेडीज़ टेलर’ विक्की की भूमिका निभाई है. विक्की अच्छा दर्ज़ी है और एक दर्ज़ी की हैसियत से आस-पास उसका अच्छा नाम है. वो अपने काम को ही बेहतर तरीके से कर के खुश है. उसका ‘लेडीज़ टेलर’ होना कहीं भी उपहास की वजह नहीं बनता और ना ही अपना काम छोड़ वह  कुछ हिरोइक करने की फिराक में रहता है. एक सामान्य इंसान की तरह वह दोस्तों के साथ घूमता है, गालियाँ बकता है, प्रेम करता है और डरता भी है. कहीं भी हीरो बनने के चक्कर में बड़े-बड़े पौरुष भरे डायलॉग दर्शक के सर पर नहीं पटक देता. शुरू से अंत तक राव नें उसी सादगी से अपने किरदार को निभाया है.

वहीं स्त्री की उद्धारक स्वयं एक स्त्री यानि की श्रद्धा कपूर को बनाया है ना कि किसी पुरुष को, वह भी प्यार और मदद के रास्ते ही ना कि डर और दहशत के रास्ते. ‘स्त्री’ को जहाँ के लोगों नें बेईज्ज़त किया, उसे और उसके पति को मार दिया वहाँ वह इन्साफ के लिए सालों भटकती रही, पुरुषों को बंदी बना उनसे बदला लेती रही मगर उसे इंसाफ़ नहीं मिला बल्कि लोगों की धारणाएँ उसके लिए ग़लत ही बन गईं कि स्त्री पुरुषों को नंगा कर के सुहागरात मनाने के लिए ले जाती है. मगर श्रद्धा कपूर डर और दहशत की जगह राजकुमार राव को प्यार के माध्यम से ये समझाने में सफल हो जाती है कि ‘स्त्री को शरीर नहीं सिर्फ़ इज्ज़त और प्यार चाहिये’ जो कि बरसों पहले उससे छीन लिया गया था. फिल्मकार ने यहाँ परोक्ष रूप से ही सही मगर स्पष्ट कर दिया है कि ‘स्त्रियों’ को भी उनका हक और सम्मान, पुरुषों द्वारा बनाए हिंसा, भय और दहशत के रास्ते पर चल कर नहीं मिल सकता. स्त्री सशक्तिकरण के मायने ‘पुरुषों’ जैसा बन जाना कतई नहीं है और ना ही पितृसत्ता के समानांतर एक वैसी ही बर्बर सत्ता खड़ी करना है.

पितृसत्ता का वह भयानक जाल, जिसका शिकार हमेशा स्त्रियाँ रही हैं, उसे इस फ़िल्म में फिल्मकार नें पुरुषों पर डाल कर दिखाया है कि उसमें फंस कर पुरुष कैसे ख़ुद को बचाने के लिए घरों में बंद हो जाते हैं, टोटके करते हैं, परदा करते हैं, झुण्ड में बाहर निकलते हैं. किस प्रकार स्त्री का भय बढ़ने से धर्म की दुकानदारी बढ़ती है यह भी फिल्म में बीच-बीच में एक बोर्ड के माध्यम से साफ़ होता जाता है, बोर्ड एक पण्डे का होता है जिस पर ‘स्त्री’ से बचाने के नुस्खों का प्रचार और उसका दाम लिखा होता है और यह दाम देवी पूजन के उन चार दिनों में, जिनमें कि ‘स्त्री’ चंदेरी में अपना आतंक फैलाती, हर रोज़ बढ़ता दिखाई देता है.

इन मुद्दों के अतिरिक्त फिल्म में बीच-बीच में छोटे-छोटे डायलॉग्स के द्वारा कई कन्टेम्परेरी राजनीतिक मुद्दों को भी उठाया गया है. जैसे कि ‘भाई भक्त बनना अंधभक्त मत बनना’ ये आज कल बहुत ही प्रचलित राजनीतिक सटायर है जो कि समकालीन सत्ताधारी पार्टी के समर्थकों पर उनकी तर्कहीनता को चोटिल करनें के लिए किया जाता है. आधार कार्ड भी एक कंट्रोवर्सी बन चुका है जिसकी वजह से लोगों को अपनी प्राइवेसी और सुरक्षा दोनों पर ही ख़तरा मंडराता नजर आ रहा है, इस ओर भी इशारा करते हुए फिल्मकार नें पंकज त्रिपाठी से कहलवाया है कि स्त्री को सबके बारे में पता है क्योंकि ‘उसके पास सबका आधार लिंक है’. विजय राज ने एक अर्ध विक्षिप्त बूढ़े का किरदार निभाया है जो कि हर वक़्त ‘एमरजेंसी लगी है’ कि रट लगाए रहता है. यह भी एक एक खासा राजनीतिक तंज़ है. आज के भारत की राजनीतिक परिस्थितियों को देखते हुए देश भर के बुद्धिजीवी आए दिन इस और इशारा करते रहते हैं कि ‘यह दौर अघोषित एमरजेंसी का दौर है.

इस फ़िल्म की सबसे बड़ी खासियत जो मुझे लगी वह ये कि ऊपर लिखी बातों में बतौर दर्शक मैं जिन भी निष्कर्षों तक पहुँची हूँ, फ़िल्म में कहीं भी ऐसा नहीं लगता कि उसका कोई सीन या कोई संवाद दर्शक को वो बातें समझाने के लिए रखा गया है, बल्कि बहुत ही सहजता से हंसी-मज़ाक के लहज़े ये सभी बातें स्वाभाविक रूप से आई हुई जान पड़ती हैं. फ़िल्म कहीं भी बोझिल नहीं होती जिसके कारण हर तबके का दर्शक आसानी से शुरू से अंत तक जुड़ा रह सकता है और फ़िल्मकार बड़ी ही चतुरता से ‘हॉरर-कॉमेडी’ के ज़रिये अपनें सामाजिक सरोकार दर्शकों तक पहुँचा देता है.

साक्षी सिंह दिल्ली विश्वविद्यालय में शोधार्थी हैं. सम्पर्क: sakshipuspraj@gmail.com 

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पुलिस रिपोर्ट में हिन्दी विश्वविद्यालय की दलित छात्राएं निर्दोष, विश्वविद्यालय प्रशासन हुआ शर्मसार!

सुशील मानव

पिछले दिनों हिन्दी विश्वविद्यालय की पांच दलित शोधार्थियों/ विद्यार्थियों पर कार्रवाई करते हुए विश्वविद्यालय प्रशासन ने  उन्हें निलंबित कर दिया था, जब उनपर एक फर्जी मुकदमा वर्धा के एक थाने में दर्ज हुआ. अब उसी मुकदमे में कोई तथ्य नहीं पाते हुए पुलिस ने अपनी रिपोर्ट फ़ाइल कर दी है. इस रिपोर्ट के बाद विश्वविद्यालय प्रशासन को शर्मसार होना चाहिए लेकिन उसके अधिकारियों की कार्यप्रणाली से ऐसा दिखता नहीं है. प्रशासन पर सवाल उठ रहे हैं कि निलंबन तत्काल तो निलंबन वापसी में ‘प्रक्रिया’ क्यों? इसके पूर्व भी विश्वविद्यालय के प्रभारी रजिस्ट्रार के के सिंह द्वारा पीड़िताओं पर समझौते का दवाब बनाते बातचीत का एक ऑडियो वायरल हुआ था. सुशील मानव की रिपोर्ट: 

विश्वविद्यालय परिसर का एक भाग

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा की पाँच दलित लड़कियों के खिलाफ नजदीकी रामनगर पुलिस थाने में धारा 143, 147,149,312, और 323 में लिखाई गई एफआईआर की बुनियाद पर वर्धा यूनिवर्सिटी प्रशासन द्वारा उक्त पाँच लड़कियों को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया गया था। तीन महीने की आईजी स्तर से जाँच में निर्दोष पाए जाने के बाद आरोपित पाँचों लड़कियों को पुलिस प्रशासन द्वारा क्लीनचिट दे दिया गया। और उसकी एक कॉपी कल ही वर्धा विश्वविद्यालय को रिसीव करवा दी गई। आईजी जाँच में निर्दोष करार दिए जाने के बाद पाँचों छात्राएं जब यूनिवर्सिटी के रजिस्ट्रार से अपने निलंबन वापसी के बाबत जानकारी लेने गई तो रजिस्ट्रार ने बताया कि पुलिस जाँच की रिपोर्ट वीसी तक पहुँचा दी गई है और निलंबन वापसी की प्रक्रिया में है। इस बाबत जब इस रिपोर्ट के लिए मैंने कुलपति से फोन पर पूछा कि ‘आईजी जाँच में पाँचों लड़कियों को क्लीनचिट दिए जाने के बाद अब कितने समय में उन लड़कियों का निलंबन वापिस लिया जाएगा?’ तो इसके जवाब में वीसी ने कहा कि ‘अभी वह कागज यूनिवर्सिटी प्रशासन तक नहीं पहुँचा है। जब पहुँचेगा तो देख विचारकर फैसला लिया जाएगा।‘ मैंने जोर देकर कहा कि सर हमें पक्की जानकारी है कि पुलिस जाँच रिपोर्ट यूनिवर्सिटी प्रशासन तक कल ही पहुँच गई है।

इस सवाल पर बहुत हत्थे से उखड़ गये कुलपति गिरीश्वर मिश्र ने कहा कि ‘आप लोगों को क्या है क्यों पड़े हो इस मामले में। उन लड़कियों के खिलाफ़ एफआईआर हुई है।’ मैंने प्रतिप्रश्न किया, ‘एफआईआर तो आप पर भी हुई है यूनिवर्सिटी के और भी कई लोगों के खिलाफ़ हुई है। मेरी इस बात से तिलमिलाए वीसी महोदय ने मेरी कॉललाइन काट दी। मैंने कई बार फिर से प्रयास किया पर उन्होंने मेरा नंबर ब्लैकलिस्ट में डाल दिया। मेरा दूसरा प्रश्न अनुत्तरित रह गया। मैं वीसी महोदय से अगला प्रश्न यह पूछना चाहता था कि ‘उक्त पाँचों लड़कियों को क्लीचनिट मिलने के बाद क्या वर्धा यूनिवर्सिटी प्रशासन अपने गलत फैसले के लिए उन लड़कियों से माफी माँगेगा?’

इसके ठीक बाद मेरी बात रजिस्ट्रार केके सिंह से हुई। के के सिंह ने पाँचों लड़कियों के निलंबन वापसी पर पूछने के बाबत बताया कि निलंबन वापसी प्रक्रिया में है। वीसी इसे देख रहे हैं और जल्द ही इस पर फैंसला होगा। मैंने पूछा, ‘कुछ अनुमान ही बता दीजिए कितने दिन में होगी?’ तो उन्होंने कहा कि ये हम आपको नहीं बता सकते। बस इतना जान लीजिए की ये प्रक्रिया में है। इसके जवाब में कि ‘लड़कियों को क्लीनचिट मिलने के डॉक्युमेंट आपको कब मिले थे, उन्होंने बेहिचक कहा कि, ‘कल (11 सितम्बर) शाम को।’

वहीं पाँचों पीड़िताओं में से एक लड़की आरती से भी बात हुई। उसने फोन पर बातचीत में बताया कि ‘निर्दोष होते हुए भी हमें निलंबित कर दिया गया। निलंबन के बाद से हम पाँच लड़कियों ने पिछले तीन महीने से मानसिक और शारीरिक यातनाएँ झेली है।‘ वे बताती हैं कि ‘हमने बार-बार कुलपति और रजिस्ट्रार को बताया था कि हमलोग निर्दोष हैं और उसके सबूत विश्वविद्यालय में ही उपलब्ध हैं. अंततः पुलिस के आई जी से हमें मिलना पड़ा. उनके हस्तक्षेप से पुलिस ने जल्द जांच पूरी कर हमें क्लीनचिट दिया है.’  पुलिस जाँच में क्लीनचिट मिलने के बाद वे पिछले दो दिन से लगातार यूनिवर्सिटी कैंपस में रजिस्ट्रार और वीसी दफ्तर के चक्कर लगा रही हैं। रजिस्ट्रर द्वारा उन्हें बार-बार प्रक्रिया में होने को कहकर टाला जा रहा है । बता दें कि के के सिंह वही रजिस्ट्रार हैं जिनका कुछ दिन पहले फोनकाल ऑडियो वायरल हुआ था जिसमें वो पीड़ित लड़कियों को ही समझौते के लिए दबाव बनाते और धमकाते हुए साफ सुनाई पड़ते हैं। पीड़ित लड़कियों का कहना है कि जब यूनिवर्सिटी प्रशासन द्वारा निलंबन तत्काल कर दिया गया था, उसमें किसी तरह की आंतरिक जांच की प्रक्रिया नहीं अपनाई गई तो अब पुलिस से क्लीनचिट मिलने के बाद उनका निलंबन तत्काल वापिस क्यों नहीं लिया जा रहा। प्रक्रिया के नाम पर निलंबन वापसी में टाल-मटोल क्यों किया जा रहा है?

पूरा मामला क्या है-
बी. एड.–एम. एड. एकीकृत की छात्रा ललिता ने आरोप लगाया था कि शादी का झांसा देकर शोध छात्र चेतन सिंह लगातार उसका यौन शोषण करता रहा। और फिर 29 दिसंबर 2017 को उसने चेतन सिंह पर आईपीसी की धारा 376, 323, 506, 417 के तहत स्थानीय राम नगर पुलिस स्टेशन, वर्धा में केस दर्ज कराया। इस केस में विश्वविद्यालय की चार लड़कियां आरती कुमारी, विजयालक्ष्मी सिंह, कीर्ति शर्मा, शिल्पा भगत पीड़िता की गवाह थीं।विश्वविद्यालय की महिला सेल की सिफारिश पर हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा प्रशासन ने चेतन सिंह को यौन शोषण के आरोप में निष्कासित कर दिया। कुछ दिन बाद आरोपी चेतन सिंह को कोर्ट से इस शर्त पर जमानत मिली कि जमानत के बाद वो पीड़िता या गवाहों को किसी प्रकार से प्रताड़ित नहीं करेगा। इसके बाद आरोपी चेतन सिंह विश्वविद्यालय के महिला छात्रावास के निकट ही पंजाब राव कॉलोनी में अपनी पत्नी सोनिया के साथ किराए पर आकर रहने लगा।

कुलपति गिरीश्वर मिश्र और विश्वविद्यालय के शिक्षक एवं छात्र

इसी दौरान दिनांक 03 मई 2018 की शाम अपनी ज़रूरत के सामान लेने गई पीड़ित छात्रा ललिता और चेतन सिंह व सोनिया सिंह का आमाना-सामना हो गया, जिसके बाद गाली गलौज करते हुए चेतन सिंह कथित रूप से पीड़िता को थप्पड़ मारता है। और फिर उसी रात 8:00 बजे अपनी पत्नी सोनिया सिंह के साथ रामनगर पुलिस थाना में जाकर चेतन सिंह ललिता के खिलाफ धारा 504, 506 के तहत एनसीआर दर्ज कराता है । ललिता भी विश्वविद्यालय के महिला छात्रावास के कर्मचारी, गार्ड, केयरटेकर तथा 3 महिला मित्र के साथ रामनगर थाने में चेतन सिंह के खिलाफ धारा 324 के तहत केस दर्ज कराती है। फिर दिनांक 08 मई 2018 को चेतन सिंह की पत्नी सोनिया सिंह द्वारा हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा को लिखित शिकायत पत्र दिया जाता है जिसमें पीड़िता पक्ष की 4 मुख्य गवाहों पर आरोप लगाए गए कि उन सबने चेतन सिंह व उसकी पत्नी के साथ मारपीट की जिसके दौरान उसका गर्भपात हो गया। इस मामले में सेवाग्राम से बनी एक मेडिकल रिपोर्ट के आधार पर 07 जून 2018 को उक्त पाँचों लड़कियों के खिलाफ़ एफआईआर दर्ज कर ली गई। एन.सी.आर. में जहाँ पीड़िता के अलावा किसी का भी नाम नहीं था वहीं बाद में एफआईआर में चार अन्य नाम लड़कियों के नाम जोड़ दिया गया।इसी केस के सिलसिले में रामनगर थाने के पी.एस.आई.सचिन यादव पीड़िता और उसके साथ के गवाह लड़कियों व उनके अभिभावकों को धमकी देता है कि “5 लड़कियों की पीएच-डी. खत्म करवा दूँगा और सब को जेल कराऊँगा”। पी.एस.आई. का यह रवैया देखकर पीड़िता लड़कियों ने इसकी शिकायत आईजी नागपुर से की। आईजी ने मामले पर तुरंत संज्ञान लेते हुए वर्धा एसपी से जांच प्रक्रिया शुरू करवाई। इस बीच पीएसआई का ट्रांसफर हो गया. 6 जुलाई 2018 को आरोपियों के बयान दर्ज़ कराए गए। उसी दिन 6 जुलाई 2018 को एफआईआर को आधार बनाते हुए विश्वविद्यालय द्वारा 5 लड़कियों को बिना किसी प्राथमिक जांच किए निलंबित कर दिया गया। जोकि पूर्णतयः असंवैधानिक था। इन लड़कियों का निलंबन मुंबई न्यायालय के आदेश क्रमांक 9889/2017 का खुला उल्लंघन है जिसमें साफ-साफ कहा गया है कि केवल एफआईआर दर्ज होने के आधार पर विद्यार्थियों के शिक्षा लेने के संवैधानिक अधिकार का हनन करने का अधिकार किसी संस्था के पास नहीं है। तो क्या अब यूनिवर्सिटी के वीसी अपनी इस गंभीर और असंवैधानिक गलती के लिए उन लड़कियों से माफी माँगेंगे जिन्हें उनके असंवैधानिक कार्रवाई के चलते मानसिक, शारीरिक, सामाजिक, विश्वविद्यालय प्रशासन व पुलिसिया यंत्रणाओं से गुजरना पड़ा।

सुशील मानव फ्रीलांस जर्नलिस्ट हैं. संपर्क: 6393491351

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भीमा-कोरेगांव हिंसा पर एनडीए के डिप्टी मेयर की फैक्ट फायन्डिंग रिपोर्ट से उड़ सकती है सरकार की नींद

एक ओर पुणे, महाराष्ट्र की पुलिस सामाजिक कार्यकर्ताओं, बुद्धिजीवियों, वकीलों को भीमा-कोरेगाँव में 1 जनवरी को हुई हिंसा का दोषी मानते हुए गिरफ्तार कर रही है, जिसे सरकार का समर्थन और तर्क मजूबती से समर्थन दे रहा है, वहीं एनडीए के सहयोगी दल आरपीआई (ए) के कोटे से पुणे के डिप्टी मेयर डा. सिद्धार्थ धेंडे की अध्यक्षता वाली 9 सदस्यीय फैक्ट फायन्डिंग टीम की रिपोर्ट हिन्दूवादी नेता और सरकार को इस मामले में कटघरे में खड़ा कर रही है. यह रिपोर्ट कोल्हापुर रेंज के आईजी को सौपी गयी है. 

रिपोर्ट में आया भिड़े का नाम, प्रधानमंत्री के साथ भिड़े


रिपोर्ट के मुताबिक यह हिंसा सुनियोजित थी, जिन्हें रोकने के लिए पुलिस ने कुछ नहीं किया और मूकदर्शक बनी रही। यही नहीं, रिपोर्ट ने हिंसा को साजिश बताया है और कहा है कि हिंदूवादी नेता मिलिंद एकबोटे और संभाजी भिड़े ने करीब 15 साल से ऐसा माहौल बना रखा है, जिनसे हिंसा की स्थिति पैदा हुई।

भीमा कोरेगांव कमिशन मुम्बई में इसकी सुनवाई चल रही है। फैक्ट-फाइंडिंग टीम के एक सदस्य को कमीशन सुनेगा।  टीम की रिपोर्ट में कहा गया है कि एकबोटे ने धर्मवीर संभाजी महाराज स्मृति समति की स्थापना वधु बुद्रक और गोविंद गायकवाड़ से जुड़े इतिहास को तोड़ने-मरोड़ने के लिए की थी। महार जाति के गायकवाड़ ने शिवाजी महाराज के बेटे संभाजी महाराज का अंतिम संस्कार किया था।

जातियों के बीच खाई खोदने की कोशिश 
रिपोर्ट में कहा गया है- ‘संभाजी महाराज की समाधि के पास गोविंद गायकवाड़ के बारे में बताने वाले बोर्ड को हटाकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक केबी हेडगेवार का फोटो लगाया गया था, जिसकी कोई जरूरत नहीं थी। यह अगड़ी और निचली जातियों के बीच खाई बनाने के लिए उठाया गया कदम था। अगर पुलिस ने कोई कदम उठाया होता तो किसी अनहोनी को रोका जा सकता था।’ रिपोर्ट में आरोप लगाया गया है कि भीमा-कोरेगांव के पास सनासवाड़ी के लोगों को हिंसा के बारे में पहले से पता था। इलाके की दुकानें और होटेल बंद रखे गए थे।

दंगाई कहते रहे, ‘पुलिस हमारे साथ’ 
रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया है कि गांव में केरोसिन से भरे टैंकर लाए गए थे और लाठी-तलवारें पहले से रखी गई थीं। रिपोर्ट में पुलिस के मूकदर्शक बने रहने का दावा करते हुए एक डेप्युटी एसपी, एक पुलिस इंस्पेक्टर और एक अन्य पुलिस अधिकारी का नाम लिया गया  है। दावा किया गया है कि की बार हिंसा के बारे में जानकारी दिए जाने के बाद भी पुलिस ने गंभीरता से नहीं लिया। यहां तक कि रिपोर्ट के मुताबिक दंगाई यह तक कहते रहे- ‘चिंता मत करो, पुलिस हमारे साथ है।’

भिड़े-एकबोटे ने बदली इतिहास की पटकथा 
रिपोर्ट में कहा गया है कि सादी वर्दी में मौजूद पुलिस भगवा झंडों के साथ भीमा-कोरेगांव जाती भीड़ को रोकने की जगह उनके साथ चल रही थी। धेंडे ने दावा किया है कि इस बात का सबूत दे दिया गया है कि दंगे सुनियोजित थे और उनका एल्गार परिषद से कोई लेना-देना नहीं है, जैसा कि पहले आरोप लगाया गया है।

सिद्धार्थ धेंडे

उन्होंने बताया कि इतिहास से पता चलता है कि भीमा कोरेगांव और आसपास के इलाकों में दलितों और मराठाओं के बीच दुश्मनी नहीं थी लेकिन भिड़े और एकबोटे ने इतिहास की पटकथा को बदलकर सांप्रदायिक तनाव पैदा किया। समय के हिसाब से हिंदुत्ववादी ताकतों के संबंध को दिखाया है।  हालांकि सरकार भिड़े और एकबोटे की गिरफ्तारी से बचती रही है.

खबर का इनपुट नवभारत टाइम्स और आरपीआई (ए) के अंदरुनी सूत्र)

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सुप्रीम कोर्ट ने मीडिया पर प्रतिबंध मामले में बिहार सरकार से मांगा जवाब, मीडिया-गाइडलाइन बनाने की बतायी जरूरत

स्त्रीकाल डेस्क 


मुजफ्फरपुर शेल्टर होम में बच्चियों से बलात्कार मामले की जांच पर मीडिया रिपोर्टिंग पर प्रतिबंध लगाने के मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार और सीबीआइ को नोटिस जारी कर उसका जवाब मांगा है। सुप्रीम कोर्ट ने पटना उच्च न्यायालय के आदेश के खिलाफ दायर की गई याचिका पर मंगलवार को सुनवाई की। हालांकि सुनवाई के दौरान कोर्ट ने मीडिया की भूमिका पर भी सवाल खड़े किये। 18 तारीख तक नोटिस का जवाब मांगते हुए कोर्ट ने दो सदस्यों को नामित किया कि वे बिहार सरकार को मीडिया गाइडलाइन बनाने में मदद करें- सदस्य हैं, शेखर नफाड़े और अपर्णा भट्ट। इस बीच सुप्रीम कोर्ट ने पटना हाई कोर्ट द्वारा बच्चियों से बातचीत करने के लिए नियुक्त कोर्ट के प्रतिनिधि प्रकृति शर्मा की नियुक्ति पर भी रोक लगा दी है।

मुजफ्फरपुर के बालिका गृह में नाबालिग बच्चियों के साथ कथित रूप से बलात्कार और यौन शोषण किया गया था। मामले के खुलासे के बाद इसकी जांच की जिम्मा सीबीआइ को सौंपा गया था, जिसकी पटना हाइकोर्ट जांच की मॉनिटरिंग कर रहा है। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने भी स्वतः संज्ञान भी लिया था। पढ़ें स्त्रीकाल में सम्बन्धित रिपोर्ट:

1. बिहार में बच्चियों के यौनशोषण के मामले का सच क्या बाहर आ पायेगा?
2. बच्चों के यौन उत्पीड़न मामले को दबाने, साक्ष्यों को नष्ट करने की बहुत कोशिश हुई: एडवोकेट अलका           वर्मा
  3. उस बलात्कारी की क्रूर हँसी को, क्षणिक ही सही, मैंने रोक दिया: प्रिया राज

याचिकाकर्ता निवेदिता ( वरिष्ठ पत्रकार और स्त्रीकाल के सम्पादन मंडल की सदस्य) की याचिका की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति मदन बी लोकूर और न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता की पीठ ने राज्य सरकार और केंद्रीय जांच ब्यूरो से 18 सितंबर से पहले जवाब मांगा है । याचिकाकर्ता की ओर से ऐडवोकेट  फौज़िया शकील मामले की पैरवी कर रही हैं.

इस मामले में कुछ गिरफ्तारियाँ हुई हैं और राज्य सरकार के मंत्रियों की भूमिका भी इस मामले में संदिग्ध रही है.

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देशवासियों के नाम पूर्वोत्तर की बहन का एक खत

तेजी ईशा

प्रिय देशवासियों, 
यह खत  इस उम्मीद के साथ कि आप इसे पढ़ पाएंगे.
मुझे नहीं पता कि मेरे साथ यह सब क्यों हो रहा हैं? मैंने जिस धरती पर अपना सबकुछ, इसी धरती पर प्रेम करते हुए निकाल दिया, वही धरती अब मुझे बेदखल करने के लिए राजनीतिक स्तर पर तैयार है. मुझे नहीं पता यह सब किसलिए और क्यों हो रहा है. मेरे बेटे का कुछ माह पहले ही गोवाहटी के एक कॉलेज में दाखिला हुआ है. और कुछ छिट-पुट काम भी यही इसी शहर में कर रहा है. हम इस शहर, इस मुल्क, इस जमीन से निकाल दिए जायेंगे तो कौन-सी जगह पर रहेंगे. कौन-सा देश, कहाँ के शरणार्थी और कहाँ की नई अकल्पनीय भौगोलिक स्थिति और पराई भाषा! कैसे जाएंगे हम अपना जीवन समेट कर और कहाँ जाएँगे?



मेरी दुर्गा माता की मूर्ति क्या मेरे साथ जा पायेगी? कुछ दिन बाद ही दुर्गा माँ आने वाली हैं, क्या मैं उसे छोड़ के चली जाउंगी? बिहू के गीत “ऊई.. जान.. ऊई.. जान.. जानमोनी होपुनोटे आहिबा..” जैसे कई गीत कान में सुनते-सुनते याद होंगे. मुझे वास्तव में नहीं पता कि कांग्रेस और भाजपा क्या है? मुझे यह, केवल इतना पता है कि मैं गोवाहटी की सुपारी खाती हूँ और मेरे गाल के कोने में पान समेटा रहता है. यही रहते हुए मैंने अपने बाबा-अब्बू से जाना कि दूर-दराज के रिश्ते और अदब-व्यवहार कैसे निभाए जाते हैं. देश-प्रदेश-राज्य क्या है! क्या होता है ! नहीं पता है. बस यह पता है कि हम जहाँ हंसी-ख़ुशी पुश्तों से रह रहे हैं वही मेरा देश है. मेरे फेफड़े में जहाँ की हवा पिछले पचपन सालों से भड़ती हुई साँस से जीवन सेंक रही है वही मेरा देश है.

पड़ोस की नसरीन ने मुझे अगले ईद में हाथ से बनी मेजपोश की मांग की है. नारंगी, हरे और उजले मोटे धागें ले आई हूँ. क्रोशिय पर धागे से कई घर बीन चुकीं हूँ. क्या इस धागे के घर को भी ठीक इसी घर की तरह छोड़ के जाना है. नसरीन के हाथों की जादुई मालिश हर दर्द की दवा है. क्या उसकी इस दवा को मैं ले जा पाऊँगी? नसरीन यूँ ही हमेशा की तरह पड़ोस के अग्रवाल जी, पाएंग़जी और जैन की बीबियों को उसके हाथ-पैर दर्द करने पर प्यार से मालिश करेगी. पर मैं अपने ऐसे दर्द के साथ कहीं किसी अनिश्चित जगहों पर रहूंगी बिना नसरीन की, उसकी मालिश की, उसके बक-बक की.

बारिश आने से पहले ही बरांडा के लिए कुछ फूल-पात्र लिए थे. जोरहाट से कुछ रेशमी फूल के उद्भिद (पौधा) मंगवाए थे. उसकी दो-चार पत्तियां इस नए जगह को अपना घर मान कर आ गईं हैं. यह गमला इस नए पौधें का नया घर है जिसमें यह अपना सर्वस्व जमा चूका है. क्या मैं इसे अपने पूर्णता के साथ ले जा पाऊँगी. मुझे तो यह भी उम्मीद नहीं है कि मैं इस बैगनी फूलों को देख पाऊँगी. अमित ने इसे अपने ननिहाल से ला कर दिया था. यह गमला यहाँ रह जायेगा तो इसे रोज पानी कौन देगा? कौन इसे रोज सिर्फ दस मिनट धूप में रखेगा? पता नहीं शायद इसकी मिट्टी में मरने से पहले वाली झुर्री होगी और यह भी पौधे सहित मेरी तरह अलविदा ना कह दे.

बोरा की बेटी हुई है. बिलकुल अपने माँ पर गई है. गुझिया बना कर मैंने सबका मुंह मीठा किया. बोरा के ससुरालवालों ने कहा है कि इन्हें अगले दफे सिक्किम ले जाने के लिए गुझिया चाहिए. वो लोग अपनी होली अपने पोती के ननिहाल में ही मनाएंगे. आनेवाली होली के रंगों में मेरे हाथों के छाप किसी पाचिल (दिवाल), वस्त्र (कपड़े) और परदे होंगे कि नहीं – पता नहीं. गलियों में “ऐखने असो” (इधर आओ) की मेरी आवाज किसी को नहीं सुनाई देगी. “छेड़े येबेना ना.. ” (छोड़ना नहीं किसी को) की हंसीली आवाज भी मेरी कानों में नहीं आएगी.

कल ही अरुणाचल के गाँव मायोंग से कासिफ और उसकी बेगम आस्फा आईं थी. उसने बताया कि सरकार ने लुकानो नाम (बचा नाम) को फिर से माँगा है. ईद पर मैंने उन्हें सेवैयाँ और मेजपोस्त भिजवाकर हामिद के जन्मदिन पर आने को कहा था. पर सरकार के इस गणना वाले फरमान के बाद दूर-दराज से कोई नहीं आया.
यह दूरियां अब बढ़ती ही जाएगी. और छुटती जाएगी सभी बातें-हंसी-दुलार. मेरे बरांडे पर दिन भर मस्ती करती ये नई-नह्न्कू चूजों को देख कर ऐसा लगता है कि किसी दिन ठीक उसी कुत्ते की तरह, दीवार फांद कर कोई हमें झपट्टा न मार दे.

मुझे कई दिनों से यह लग रहा है कि दीवार पर टंगे वो प्लास्टिक के फूलों की तरह हमारा वजूद है जो कुछ सालों तक तो धोकर अपने साथ टांग कर रखा जाता है और फिर उसे अपने से हटा दिया जाता है जिसका पता किसी को नहीं होता है.

बारिश लगातार हो रही है. ज्योति ने परसों ही कहा था कि आंटी गोभी आने में देर है, प्याज के पकोड़े ही खिला दो. इस बारिश उसकी फरमाइश पूरा करते हुए सोच रही हूँ कि अगली बारिश में कहाँ आलू के चिप्स सुखाउंगी! बना भी पाऊँगी कि नहीं! यदि बना भी लिया तो चित्रा, हामिद, नजीब, जोसेफ तो नहीं होंगे न छत पर चिड़ियों को भगाने के लिए. उस डर में भी नहीं रह पाऊँगी कि कहीं इन शरारती बच्चों के पैर से चिप्स न टूट जाए. इन गर्मियों में तो दो छोटे-बड़े मर्तबान अचार के इनसे टूट गये थे. क्या मैं अगली गर्मी किसी पर ये प्यार वाला गुस्सा निकाल पाऊँगी? हो सकता है मेरा मर्तबान शायद आचार से न भरे, मर्तबान भी हो कि नहीं  पता नहीं.
घर के पीछे अदरक और धनिए को बोया है. इसे कैसे बड़े होता देखूंगी? इसके नन्हें कोमल नये पत्तों पर से क्या फिर मक्खी उड़ा पाऊँगी?

छत के कोने में बने ईटों के कुर्सी को कहाँ-कैसे लेकर जाउंगी जिसपर अकेलेपन में बैठने पर हिम्मत मिलती है. जहाँ हम फेंके जाने वाले हैं वहां क्या छत होगा? वो चौड़ी ईंट की भूरी खुरदरी कुर्सी होगी? जिससे उठने पर हम हमेशा अपने दुप्पटे को छुड़ा कर सारे गुस्से को निकालते थे. क्या वो अकेलापन होगा जो कई सालों से इस घर के मिट्टी में रचने बसने के बाद बना है. इस अकेलेपन और उस होने वाले अकेलेपन में वो पिया (तोता) पीछे से टांय बोलकर टोकेगा कि नहीं?

चार गली आगे जो मोदीखाना (किराने की दुकान) के बगल में बैठा ब्योसको भिक्खु (बुड्डा-भिखाड़ी) को रोज कौन रोटी देगा? अच्छा है यह यही रहे. कम-से-कम इसी जगह. उसकी मुस्कराहट, यहाँ तक की गालियाँ भी सुनते सुनते अपना-सी लग गईं होंगी. नई जगह पर शायद सब नया सा लगे. मुस्कराहट तो मिलते मिलते रह जाएगी. शायद  बची साँस भी उस मुस्कुराहट की उम्मीद से चली जाए. दो दिनों से जब भी इसे देख रही हूँ तो एक डर जैसा लगता है कि मुझे भी कोई रोटी देने वाला बचेगा क्या ?

इस एक नये शब्द ने एन.आर.सी. ने मेरे जीवन को पूरी तरह से बदल दिया है. यह मेरे जीवन का एक नया ककहरा बन गया है, जिसमें क, ख, ग की जगह एन, आर, सी को पढ़ने और सीखने की कोशिश कर रही हूँ. इसे पढ़ते और सीखते हुए मैं कभी-कभी अपने भविष्य की तरफ भी यूँ ही ऑंखें ऊँची करके देखने लगती हूँ. वहां पहुंचकर थोड़ा ठिठक कर मेरे कानों में मुझे यह सुनाई देता है – जन गण मन अधिनायक जय हे! क्या मैं इससे बाहर हो गई हूँ? मैंने इस धरती का सूरज देखा है, मैं यहाँ की बारिश में नहाई हूँ, मुझे यहाँ की धूप से बहुत अलग किस्म का लगाव है. मेरी सारी मुस्कुराहटें, मेरा सारा प्रेम, मैंने इसी जगह पर सीखा है, मेरी कभी कभी की तकलीफें, कभी कभी का थोड़ा दुःख, थोड़ा रोना, थोड़ा अकेलापन मैंने इसी धरती पर महसूस किया है. लेकिन अब जो अकेलापन मिलने वाला है, क्या वो सच में अकेलापन है या इस भरे-पूरे जीवन को जीने के बाद किसी भयावह बीहड़ जंगल में फेंक दिए जाने के दुस्वप्न को लगातार जीना मेरी इन सांसों में समा गया है. मुझे किसी से कोई शिकायत नहीं है. खुद अपने से भी नहीं. जीवन में यह पहली बार महसूस होता है कि शिकायत का कोई अर्थ नहीं. मेरा खुद का होना ही अपने में एक शिकायत है. इसे ना मैं देख पा रही हूँ. और ना ही कोई दूसरा. इस पूरे ब्रह्माण्ड में मेरे होने की शिकायत को इस उपग्रह को कोई वितान देख पा रहा है नहीं कोई पत्रकारिता की सनसनी भरी खबर.

मैं जहाँ भी जाउंगी, अपने इस मुल्क को अपने साथ ही जीऊँगी. मेरा यह सब लिखना मेरी गूंगी आवाज को शब्द देने का प्रयास ही है, पता नहीं आप इस आवाज को सुन पाएंगे कि नहीं.
आपकी
इसी मुल्क की अभी तक की एक नागरिक

तेजी ईशा पूर्वोत्तर पर शोध कर रही है

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Periyar’s Self-Respect as a Radical Ethical Framework: Reimagining Social Justice through an Intersectional Lens

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Abstract

E.V. Ramasamy, known by most as Periyar, was a trailblazing social reformer in South India whose Self-Respect Movement questioned caste injustice, gender inequality, and Brahmanical control. This paper explores an undervalued component of his philosophy: the idea of self-respect as a radical ethical framework for social justice. Through thoroughly reading Periyar’s writings and speeches—especially those in his Collected Works—this study argues that self-respect exceeds personal dignity to reflect a shared ethic anticipated by modern intersectional feminism. Combining rationalism, anti-caste philosophy, and gender equality in Periyar’s perspective offers a proto-intersectional approach to challenge caste, gender, and religious oppression. This essay highlights Periyar’s importance to movements for equality and his capacity to direct intersectional action now, therefore tying his self-respect with contemporary feminist theory. Using primary sources and comparative research, it shows how Periyar’s ethical challenge to accepted society structures offers a road map for eliminating systematic inequality.

Keywords: Periyar, Self-Respect Movement, intersectional feminism, social justice, rationalism, anti-caste, gender equality, and the Dravidian movement.

Erode Venkatappa Ramasamy (1879–1973) transformed Indian societal development by founding the Self-Respect Movement (1925) and Dravidar Kazhagam (1944); he aimed to oppose Brahminical rule and advocate for non-Brahmin Dravidians’ rights. Built on reason, dignity, and egalitarianism, his method sought to eradicate caste, gender, and religious hierarchy. Though Periyar has made well-documented contributions to Dravidian identity and anti-caste politics, his ideas of self-respect as a radical ethical framework have gotten scant attention in North India, especially in light of modern intersectional feminism. This paper argues that Periyar’s self-respect is a communal ethic expecting intersectional methods by addressing the connected oppressions of caste, gender, and religion, rather than only a call for human dignity. Examining Periyar’s writings, words, and actions helps one to understand his role as a predecessor of current feminist views and offers guidance for movements aiming at world social justice.

Periyar was born in Erode, Tamil Nadu, in 1879. Periyar came from a wealthy but non-Brahmin family with a Kannada-speaking Balija caste background. Early experiences with caste and gender inequality, especially on a 1904 trip to Kashi, shaped his criticism of Hindu rigidity. After seeing Brahminical exploitation and caste-based exclusion in Varanasi, Periyar shifted from religion to rationality and formed his next activities. Alleged Brahmin-centric bias drove his brief membership in the Indian National Congress (1919–1925) to be terminated; he then joined the Justice Party and started the Self-Respect Movement (Ramasamy 527). Experiences with systematic injustice inspired Periyar to seek his ideal society free of caste, gender, and religious prejudice. He became known as a defender of social equality and human dignity by organizing anti-Hindi demonstrations in 1938 and the Vaikom Satyagraha in 1924. His self-respect ideology drove these activities; he offered it as a universal moral for helping underprivileged areas.

Kimberly Crenshaw developed intersectionality theory, which states that there is no single basis of an individual identity, but it is made of the intersection and intersectionalities like gender, class, religion, nationality, and sexuality. A woman is not suppressed because of being a woman, but her caste, religion, and race play vital roles in making her predicament more complex. In Dalit women’s literature, the pain of being a woman, the pain of the discrimination on the basis of caste, and the pain of poverty intersect each other.

The self-respect movement was a social movement that empowered the lives of the marginalized. This moment began to ensure justice for the marginalized and the downtrodden. It ensured dignity and equality for everyone, opposing the caste system, Brahmin hegemony, and superstition. It propagated rationalism and scientific temper in the society. The movement advocated for women’s rights, widow remarriage, and other related issues. He was against the dowry system and child marriage, and self-respect marriages were promoted to eradicate hierarchy and division from the society. He opposed the Hindi opposition; this moment was about Tamil identity and culture.

E. V. Ramasamy Periyar successfully led the Vaikom Satyagraha for 20 months. In Travancore state (present-day Kerala) in the Kottayam district, the untouchable Dalits were not allowed to pass through the temple street. Vaikom Satyagraha began on 30th March 1924 for opening the entry for Dalits; Gandhi also joined this movement. In 1925 the Travancore state opened the street for the entry of the Dalits; this was the first Dalit rights movement of South India. Dalits got entry inside the temple in 1936 through the temple entry proclamation.

The Self-Respect Movement Founded in 1925, aimed to advance women’s, non-brahmin, and other persecuted groups’ equality and dignity. Periyar’s self-respect went beyond simple pride to a radical ethical point of view, challenging hierarchical social institutions. “Self-respect is the foundation of a society in which everyone has equal rights and chances,” he said in his weekly magazine Kudi Arasu (Ramasamy 54). This ethic challenged Brahminical authority, which Periyar saw as preserving caste and gender inequity through religious texts and practices. Periyar’s self-respect was communal, motivating groups to reject internalised inferiority and demand structural change. Promoting women’s equality and rationalism, he supported self-respecting weddings free of Brahminical ceremonies. These partnerships reflected his greater objective of social reform—a rejection of caste-based patriarchal customs. Emphasising reason as a vehicle for self-respect, Periyar urged people to challenge religious beliefs and superstitions endorsing injustice (Kalidass, 2020). Periyar uses intersectionality. Though Kimberlé Crenshaw’s idea of intersectionality did not emerge until the late twentieth century, Periyar’s approach foretells it by addressing caste-, gender-, and religious-related inequalities. His anti-caste campaigning reflected his support of women’s rights, which included opposition to child marriage and remarriage of widows. “The liberation of women is impossible without the dismantling of caste,” Periyar said, “since both are founded in Brahmanical patriarchy” (Ramasamy 102). This all-encompassing strategy includes a knowledge of various interlocking injustices and intersectional feminism claims. Periyar’s criticism of Hinduism as a weapon for Brahminical control covered gender as well. Famously, he said, “If God is the root cause of our degradation, destroy God.” Periyar imagined a society rejecting religious literature, especially the Manusmriti and Bhagavad Gita, which he regarded as supporting caste and gender hierarchies; reason and self-respect took center stage above dogmatic traditions (Kalidass, 2020). As seen by the Vaikom Satyagraha, his struggle for Dalit rights reveals his will to oppose caste-based injustice, together with religious and gender persecution. Intersectional feminists and Periyar. The self-respect ethic of Periyar reflects the effort of current intersectional feminism to solve the interactions of race, gender, class, and other identities. His idea of group empowerment aligns with feminist calls for solidarity among impoverished populations. Parallel with his scientific criticism of superstition, feminist challenges of patriarchal rules endorsing gender-based violence and discrimination follow. Periyar’s focus on Dravidian identity often resulted in exclusionary speech, therefore excluding non-Tamil people. He was less appealing to religious non-Brahmins because of his fervent atheism, which occasionally overshadowed his broader social justice goals. Notwithstanding these challenges, Periyar’s point of view stresses the need to eradicate linked repressive institutions and offers a strong basis for intersectional movement.

A perfect illustration of Periyar’s transversal ethic is his self-respecting marriages. These couples questioned caste and gender roles by excluding Brahmin priests and Vedic rites. Apart from feminist ideas of autonomy and agency, they promoted mutual consent and equality (Jeyaraman 80). Reflecting the ongoing relevance of Periyar’s views, self-respect marriages remain a kind of protest against caste-based and patriarchal norms in contemporary Tamil Nadu. The Dravidar Kazhagam and its successors struggle for social justice. Hence, Periyar’s concept still shapes Tamil Nadu’s socio-political environment (Natarajan, 1989). Emphasizing his continuing influence, Tamil Nadu honors his birth anniversary as “Social Justice Day.” Globally, Periyar’s self-respect ethic offers direction for intersectional movements tackling linked injustices, including Black feminism and indigenous rights campaigning. His focus on social dignity and reason builds a worldwide platform to address structural inequalities. Historically, Periyar’s idea of self-respect is a fundamental ethical basis for social justice. Combining anti-caste, anti-religious, and feminist ideas, Periyar’s point of view foresaw modern intersectional feminism, addressing the linked injustices of caste, gender, and religion. Although his method had flaws, modern movements benefit greatly from his emphasis on rationalism and communal empowerment. This paper exhorts academics and activists to fight world injustice and inequality by applying Periyar’s self-respect as a proto-intersectional ethic.

Works Cited

Jeyaraman, Bala. Periyar: The Political Biography of E.V. Ramasamy. Rupa Publications, 2013.
Kalidass, R. “E.V. Ramasamy Is a Social Rebuilder.” International Journal of Scientific & Technology Research, vol. 9, no. 1, Jan. 2020, pp. 123–130, www.researchgate.net/publication/339216784_EV_Ramasamy_Is_A_Social_Rebuilder.
Natarajan, P. “Periyar E. V. Ramasamy and the Justice Party.” Social Science Digest, vol. 3, July 1985, pp. 89–95.
Ramasamy, E.V. Collected Works of Periyar. E.V.R. The Periyar Self-Respect Propaganda Institution, 7th ed., 2016. 

सखी का सखी को प्रेम पत्र: खुल गई बेडियां!

यशस्विनी पाण्डेय

प्यारी सखी ,
वैसे तो आमतौर पर मै पत्र लिखते हुए कोई संबोधन नहीं देती, क्योंकि ये मेरा पत्र लिखने का अपना आइकॉन है. तुम जानती हो, बल्कि जिन-जिनको पत्र लिखे हैं मैंने वो सब जानते हैं. पर आज तुम्हे संबोधन देकर लिख रही क्योंकि आज ये पत्र सभी पढने वाले हैं तो मै चाहती हूँ कि पढने वाले जाने कि ये पत्र कौन किसके लिए लिख रहा. आज तुम होती मेरी ज़िन्दगी में तो भी हम कर तो कुछ नहीं पाते. पर हाँ, खुश होते उन आगे की पीढ़ियों के लिए जो हमारी तरह जात-मजहब उम्र लिंग से ऊपर उठकर इश्क करते. हम खुश होते उन लोगों के लिए जो हमारी तरह एक दोगली जिंदगी जीने को विवश नहीं. जीना तो हमे भी नहीं चाहिए था ये दोहरा जीवन, पर हममें न हिम्मत थी, न आत्मविश्वास, न कोई आधार.  किस बेस पर क्या करते कहाँ रहते? क्या मै तुम्हे वो सुरक्षा दे पाती तुम्हे जो एक पुरुष देता है ? नहीं ! न मै खुद को ही सुरक्षित रख पाती इस पुरुष सत्तात्मक समाज में जहाँ कानून भी हमारे पक्ष में नहीं था. हमारे जैसे लोगों को तो पुलिस भी ढूंढ-ढूंढ कर परेशां करती है. हमारा कभी पाला तो नहीं पड़ा ऐसी परिस्थितियों से पर हाँ ऐसा होता तो है ही.

मुझे याद है छोटी सी स्कर्ट पहने तुम स्कूल आती थी और मै कुरता-जीन्स. ऐसा नहीं है कि मै खुद को लड़का मानती थी, मुझे अपने स्त्रीत्व से ही प्रेम है. तुम्हारे घर में भी प्यार मोहब्बत तो दूर दोस्ती को लेकर भी काफी रुल रेगुलेशन थे और मेरे घर में भी घोर जातिवाद. सिर्फ निम्न जाति का होने की कीमत नही चुकाई जाती, बल्कि उच्च जाति, कुल खानदान की भी उतनी ही बड़ी कीमत चुकवाई जाती है, वो भी केवल बहु-बेटियों से. घर पर जब भी कोई आता था तो दादी का यही सवाल होता था उस लड़की से कि जात क्या है? अगर उच्च कुल की नही हुई वो तो पूरा ध्यान दादी का इसी मे रहता था की किस बर्तन में मैंने चाय दी? कहाँ बिठाया क्या खिलाया? और फिर उसके जाने के बाद मुझसे बर्तन को विशेष तौर पर साफ़ करने को कहा जाता था और चादर को बदल देने को. मेरी उम्र कोई कम नहीं थी पर तब भी ये समझ में नहीं आता था कि इसका क्या मतलब? इसका दोस्ती से और किसी के आने जाने से क्या सह-संबंध ? तुम्हारे आने के साथ भी इस तरह की घटनाएँ होने लगी थीं पर तब बहुत ज्यादा मुझे बुरा लगता था. तुम्हारे आने की फ्रीक्वेंसी ज्यादा थी जाहिर है हम सिर्फ अच्छी सखियाँ नहीं थीं हम बहुत-बहुत अच्छी सखियाँ थीं. दीन-दुनिया, परिवार, समाज, आयु-लिंग से कहीं ऊपर. ये सब न दादी के लिए मैटर करता था न मेरे माँ-बाप के लिए. पर मेरे लिए मैटर करता था, वह था, दादी जो अप्रत्यक्षतः अपमान करती थीं तुम्हारा, उनके अंदर जो खुन्दस थी तुम्हारे निम्न-जाति को लेकर. उनकी ये निगेटिविटी कब मेरे अंदर भी घर कर गयी पता नहीं चला. तुम्हारे जाने के बाद पिताजी से वो चुगली करती थीं कि मैंने तुम्हारे लिए बाज़ार से मिठाई मंगवाई फिर चाय के साथ समोसे मंगवाए और तुम्हे भगवान माफिक इज्जत दे रही हूँ मै. वैसे तो ये उनकी व्यंग्यात्मक शिकायत रहती थी कि ‘भगवान जइसन इज्जत दियाता’ पर प्रेम अगर परमात्मा और खुदा है तो हाँ तुम ही तो थी ‘मेरा प्यार’‘मेरी खुदा’. ईश्वर ने तो साथ नहीं ही दिया मेरा. कब कैसे साथ नहीं दिया इसकी तो लम्बी कहानी है. जीवन में जो पहली सरसराहट आई थी वो तुम्हारी ही वजह से तो आई थी. मन-मानस, देह-दिमाग पर जो गुदगुदाहट थी, एक इंटेंसिटी और नशा-सा जो तारी रहता था वो तुम से ही रहता था. क्या-क्या तारी रहता था? तुम्हे भी पता है उसे सिर्फ तुम समझ सकती हो और हमारे जैसे लोग समझ सकते हैं. बहरहाल, दादी हमारे प्रेम कहानी की खलनायक/खलनायिका का रोल अदा कर रही थीं. उनकी नकारात्मकता माँ-पिताजी के सर चढ़कर भी बोलने लगा. मुझे याद है ज़िन्दगी में अगर निगेटिविटी के असर में आकर अगर कोई गलत रिएक्शन मैंने किया है तो वो दादी के साथ किया. उनकी कॉटन की साडी में ब्लेड लगा के और उनकी आलमारी की चाभी छुपा के. अपनी साड़ी को लेकर पजेसिव रहती थीं वो. आयरन की हाई स्टार्च वाली साड़ी पहन के घर के मुख्य द्वार पर बैठा उनका दमकता चेहरा आज भी मुझे याद आता है तो हंसी आती है कि हमारे उनके बीच एक चूहे-बिल्ली का खेल चलता था. उनकी नकारात्मकता के प्रभाव स्वरूप माँ पिताजी ने फतवा जारी कर दिया कि जब दादी को नहीं पसंद तो तुम अपनी दोस्ती-यारी स्कूल कॉलेज तक ही सीमित रखो. पाबन्दी की हद ये भी थी कि मै तुम्हारे घर भी नहीं जा सकती थी. क्योंकि, दो वजह थे एक तो मेरे घर से भी कहीं आने-जाने की इजाजत नहीं के बराबर थी, दूसरा, तुम्हारे घर में भी मित्रता को लेकर नकारात्मक दृष्टिकोण ही था. बेसिकली ये सब इसीलिए था कि हम अपनी जिंदगी न जीने लगे, अपने सुख-दुःख न पहचानने लगे, हमे क्या अच्छा लगता है? क्या करना चाहिए? ये सब सोच न आने लगे. पर, मै तो पैदा ही गर्भ से विद्रोह कर के हुई होउंगी. माँ कहती भी है कि मै तीसरी संतान थी घर में वो भी बेटी. तो उन्होंने नहीं चाहा कि मै आऊं बिना ये इंश्योर हुए कि मेरा लिंग क्या है? अब सिर्फ सोच से कहाँ काम चलता है? तकनीक भी तो चाहिए, एफर्ट भी तो मैटर करता है और वैसे भी बच्चे तो ईश्वर का तोहफा होते हैं पाप -पुण्य का ये सब मामला हो जाता है. ये अलग बात है कि उस बच्चे को लाकर बेसिक जरूरत शिक्षा-अच्छा भोजन जैसी सुविधाओं से उसे ताउम्र वंचित किया जाए. ये पाप की श्रेणी में नहीं आता? कितना हास्यास्पद है न अपने हिसाब से पाप-पुन्य का खांचा खींच लो. छोड़ो मामला दूसरी तरफ जा रहा, आओ हम अपनी बातें करते हैं. दादी से लिया गया नादानी से भरा प्रतिशोध मुझे शांत तो नहीं कर पाया. पर, एक अपराधबोध-सा जरुर पैदा कर गया जब परेशान हो-हो कर वो अपनी चाभी ढूंढ रही थीं और अपनीकटी-फटी साड़ी देख हाय-तौबा मचा रही थीं. शुरुआत के कुछ क्षण तो बड़ा आनंद आया पर जल्दी ही अपनी औकात पर आ गयी मै कि ये मै नहीं कि अपने फ्रस्टेशन में किसी को तंग करके मुझे सुकून मिले.

पहला फ़तवा जारी होने के बाद हम घर से बाहर बागीचे में और दालान में मिलने लगे. तुम जब आती थी तो मेरे घर किसी से खबर भिजवाती थी कि तुम बाहर हो और फिर मै तुमसे बाहर मिलने लगी. तुम्हारा जब घर जाने का समय होता था तो मै तुम्हे तुम्हारे घर तक छोड़ने जाती थी. फिर तुम्हारे घरवाले जब आश्वस्त हो जाते थे कि खानदान की इज्जत आसपास है तो फिर तुम मुझे मेरे घर छोड़ने आती थी. कितना मजेदार था न ये सिलसिला ! जी चाहता था कभी थमे ही न. पर, थमता तो सब कुछ हैं ! ये सी-ऑफ करने का नायाब और शानदार तरीका भी थ्रिल्ल था जिंदगी का. अगर हम किसी और को बताएं कि हमारा घर महज 500 मीटर की दूरी पर था और हम मिलने देखने को तरसते रहते थे. मेरी छत से तुम्हारा छत थोडा धुंधला, पर दीखता था और हम दोनों के घरवालों में एक तरह से दुश्मनी ही थी तो सबको फ़िल्मी मामला ही लगेगा. पर, फ़िल्में भी तो समाज का ही आइना होती हैं न. दुनिया में कुछ असम्भव भी है क्या ?
2 सालों के हमारे सम्बन्ध में इतनी असंख्य घटनाएँ हुईं कि अब तो याद करने से भी बातें याद नहीं आएँगी पर जिन घटनाओं ने दिमाग पर ज्यादा होंट किया था उसमे एक ये भी रहा कि मेरे घर से पहले फतवे के बाद जब हम बाहर मिलने लगे उसी दौरान एक दिन तुम जब मुझसे मिलने आई और मै अपने घरवालों के साथ शहर गयी थी तब फोन भी नही होता था कि मै तुम्हे बता सकूं. पत्रवाहक की उपलब्धता की अपनी सीमाएं हैं. मेरे घर के एक नौकर ने हमारे संबंधो का फायदा उठाकर तुम्हारे साथ यौन शोषण करने की कोशिश की. खैर, तुम बच निकली. नहीं, भी बचती तो क्या ही लुट जाने वाला था ! बस ये है कि दिमाग में बुरी स्मृतियाँ जगह ना ही लें तो बेहतर होता है. उसके बाद कितना मुश्किल रहा होगा तुम्हारे लिए मुझसे मिलने आना और बाहर उस नौकर के रहते हुए मेरा इंतजार करना. और ये सब हम क्यों झेल रहे थे? जातिवाद, सामंतवाद, लिंगवाद? कितनी दुखद विडंबना थी कि हम इस मामले में भी न किसी से कुछ कह सके न कर सके.
स्कूल में हम तय करते थे कि आज शाम को कितने बजे छत पर चढ़ना है. पर सिर्फ हमारे तय करने से चीजें मन-मुताबिक कहाँ होती हैं? बाकि सारे टर्म्स और कंडीशन भी तो होते हैं. मेरे साथ मेरी बहने होती थी. तुम्हारे साथ तुम्हारे भाई-बहन. सो, हम एकटक वो धुंधली छवि निहार भी नहीं पाते थे. दिल को सुकून-सा जरुर मिलता था तुम्हारी छत पर तुम्हारी आकृति देख. बहनें अक्सर शाम होने पर छत से वापिस चलने को कहती थी पर मै यही कहती थी कि थोड़ी देर बाद आती हूँ. जब तक शाम की हलकी रौशनी भी तुम्हारी आकृति को स्पष्ट करती मै खड़ी होकर नजरों में भरते रहती थी. हालाँकि प्रेम में कहाँ कुछ भरता है ? जितना भरता है कहीं उससे ज्यादा खाली होता है. जितनी प्यास बुझती नही उतनी और बढ़ जाती है.
धीरे-धीरे हमारे बीच में प्यार, इश्क, गहराई, समर्पण, भूख, लालच, इंटेंसिटी, दीवानगी, तड़प, साथ जीने-मरने की चाह, केयर, पजेसनेस आदि तत्व कब कैसे शामिल होने लगे कुछ पता ही नहीं चला. कब हम लम्बे-लम्बे पत्र लिखने लगे– एक स्कूल, एक क्लास में पढने के बावजूद, कुछ पता नहीं चला. मुझे तो याद भी नहीं कि हम लिखते क्या थे ? या बातें क्या करते थे? बातें करने को कुछ था नहीं ज्यादा हमारे बीच या फिर हम दुनियावी बातों में कभी पड़े नहीं. बहरहाल, हमारे बीच कोई गॉसिप नहीं होता था. केवल देखा-देखी आहें भरना, दिल धडकना और ये ऐसे आवेग जिन्हें समझने में हम भी सक्षम नहीं थे.

खुमारी इतनी शांति से देर तक नहीं चलती रहती. हमारी खुमारी को भी जबरदस्त धक्का लगा था जब तुम्हारी माँ ने मेरे पत्र को पढ़ लिया था और उनकी तरफ से दूसरा फतवा जारी हुआ कि अब दोस्ती खत्म. वो तुम्हे बहका रही है. उसका खानदान ही ऐसा है. वगैरह-वगैरह. तुम बेहद डरी हुई परेशान और तनाव में थी. मैंने तुम्हारी मम्मी से जाकर डायरेक्ट बात करने की हिम्मत की और समझाया कि जैसे आपकी नजर में ये नासमझी है हम दोनों की, तो इसी नासमझी में हम कोई गलत कदम भी उठा लेंगे. सो, मिलने-जुलने से ना रोकिये. कुछ शर्त-नियमों के साथ उन्होंने मेरी बात मान ली. वो टर्म्स-कंडीशन कुछ ऐसे थे कि हम अब केवल उनके घर पर उनकी नजरों के सामने, उनके कमरे में मिलेंगे और बातें करेंगे. तुम्हारा मेरे घर आना उन्होंने बंद कर दिया. खैर, चोर तो हमेशा ताक में ही रहता है, हमने उसमे भी गुंजाईश ढूंढ ली. वो गाना है न “दीवाने हैं दीवानों को न घर चाहिए… मोहब्बत भरी एक नजर चाहिए”. आप जब मर रहे हों प्यास से तो जो भी बूंद जहाँ से मिले बस गले को तर करना होता है प्यास बुझाना गौण हो जाता है. तुम्हारी माँ ने मेरा पत्र सुरक्षित रख लिया था कि अगर नियम तोड़ा गया तो वो उसे मेरी माँ से दिखा देंगी. मैंने तुम्हे इस काम के लिए लगाया कि जैसे भी कर के वो खत ढूंढो. इसमें हमारा भविष्य छिपा है. तुम्हे नहीं मिला और हम इसी डर में सालों जीते रहे.

तुम्हारी माँ ने कहा कि ये विकृति है इस पर नियन्त्रण बहुत जरुरी है. कल को तुमलोगों को अपनी इस भूल पर पछतावा होगा और मेरी बातें याद आएँगी और मुझे सही ठहराओगे तुमलोग. आज मै बुरी हूँ, दोषी हूँ, दुश्मन हूँ. खैर, इस तरह की असंख्य घटनाओं से भरा था हमारा सम्बन्ध, हमारा प्यार, हमारी इंटेंसिटी …. तुम्हारी माँ तुम सबको लेकर कहीं और शिफ्ट हो गयीं और मेरी झोली में तुम्हारी अंतहीन यादें, गांव, बागीचा, दादी, स्कूल, बाथरूम, होली, खत के राख़, तुम्हारे दिए गिफ्ट कार्ड, कपड़े और भी बहुत कुछ रह गया और है..
आज तुम एक जिन्दा लाश हो अपने घर पर बात नहीं करती तुम. तुम्हे लगता है तुमसे बिना पूछे तुम्हारी गलत शादी कर के तुम्हारी ज़िन्दगी बर्बाद कर दी गयी है. तुम्हारे अंदर का मनुष्य मर चुका है. प्यार ,मोहब्बत तो जैसे कभी किया ही नहीं था तुमने. तुमसे जब-जब बात करने की कोशिश की और ज्यादा दुखी हुई. तुम कमजोर पड़ गयी, तुमने खत्म कर दिया खुद को. तुम मुझसे प्यार न करती, किसी से तो करती, जिसके साथ रहती हो उसी से करती. पर अब सब तुम्हारे लिए अस्तित्वहीन है. तुम्हारी माँ से कहना चाहती हूँ कि मै उन्हें कोई भी धन्यवाद नहीं देना चाहती न फील करती हूँ ना हम विकृत थे ना हमारा सम्बन्ध.

काश कि एक इन्सान का दूसरे इन्सान से प्यार  की तरह हमारे प्यार को समझा होता, बजाय इसके कि इसे समलैंगिकता, अप्राकृतिक, अवैध, गैरकानूनी जैसे विभागों की श्रेणी में रखा गया. आज उनकी बेटी जिंदा होती और हमारे सम्बन्ध और प्यार के क़ानूनी सहमति पर हम जश्न मना रहे होते, अपने-अपने घर में अपनी-अपनी जिंदगी जीते हुए ही सही ……..पाना और साथ रहना ही तो प्यार नहीं, एक एहसास कि कोई मीलों दूर आपके इंतजार में है आपसे बात करने के, आपसे मिलने के आपके साथ छुट्टियाँ बिताने के आपसे अपने सुख-दुःख संघर्ष शेयर करने के इंतजार में कोई जी रहा है. मुझे तुम्हारी माँ जैसी उन असंख्य औरतों से शिकायत है जो अपनी बेटी-बेटे की सेक्सुअलिटी को ढंक छुपा कर उन्हें दोहरा जीवन जीने को विवश करते हैं. अपनी गरिमा इज्जत और बड़े बनने की चाह में. आप तो तभी गिर जाते हैं जब आप प्रेम का असम्मान करते हैं. धन्यवाद माननीय न्यायधीश का कि उनके इस फैसले से शायद ऐसी असंख्य आयरनी और दुर्घटनाएं और कुछ मौत थम सके !!

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मुजफ्फरपुर बलात्कार मामले में मीडिया रिपोर्टिंग बैन के खिलाफ स्त्रीकाल संपादकीय सदस्य निवेदिता पहुँची सुप्रीम कोर्ट

राजीव सुमन 


 5 सितम्बर 2018 को सर्वोच्च न्यायालय में पटना उच्च न्यायलय द्वारा मुजफ्फरपुर शेल्टर होम-बलात्कार मामले की जांच से सम्बंधित मीडिया रिपोर्ट पर प्रतिबन्ध-आदेश  को चुनौती दी गयी है. साउथ एशिया वीमेन इन मीडिया  के बिहार चैप्टर की अध्यक्ष और सामाजिक कार्यकर्ता एवं स्त्रीकाल की संपादकीय सदस्य निवेदिता ने उच्च न्यायालय के इस आदेश को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में अनुच्छेद 136 के तहत विशेष याचिका दायर की.

अप्रैल 2018 में टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज, मुंबई ने बिहार सरकार के अंतर्गत चलने वाले बालिका गृह का सोशल ऑडिट किया जिसके बाद कई चौंकाने वाले तथ्य बाहर आए. बिहार के मुजफ्फरपुर बालिका गृह में अनाथ बच्चों के यौन और शारीरिक शोषण होने की बात इस रिपोर्ट में आई जिसके बाद मीडिया की सक्रिय भूमिका के कारण यह राष्ट्रीय समाचार बन गया। पटना उच्च न्यायालय में इस मामले में जनहित याचिकायें दायर हैं. संतोष कुमार  द्वारा दायर एक जनहित याचिका है 12845/2018। इसी जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान पटना उच्च-न्यायालय ने अपने एक व्यापक आदेश के तहत आश्रय गृह से सम्बंधित किसी भी मामले की मीडिया रिपोर्टिंग से मनाही कर दी. पटना उच्च न्यायालय ने अपने 23-08-2018 के आदेश में कहा कि “इन परिस्थितियों में, जब तक जांच पूरी नहीं हो जाती है, तब तक सभी प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को इस मामले के संबंध में विशेष रूप से, पहले से किए गए जांच के संबंध में और / या जो जांच होनी है, कुछ भी रिपोर्ट करने से रोका जाता है, क्योंकि इससे जांच में बड़ी बाधा होने की संभावना हो सकती है.”

इसी ब्लैंकेट आदेश को चुनौती देते हुए बुद्धवार 5 सितम्बर 2018 को सर्वोच्च न्यायालय में एक याचिका दायर की गई है.  निवेदिता ने बताया  कि इस व्यापक आदेश का प्रभाव बड़ा ही नकारात्मक है इस मसले से जुडी हर प्रकार की रिपोर्टिंग पर रोक उचित नहीं है, खासकर वैसी रिपोर्टिंग से जो जांच में कोई बाधा उत्पन्न नहीं करती हो. मसलन जैसे अदालत की कार्यवाही पर रिपोर्टिंग, वकीलों और कार्यकर्ताओं की राय की रिपोर्ट करना मामले को उजागर करते हुए, इस मुद्दे पर टीवी चर्चाएं आयोजित करना आदि.

याचिका में यह कहा गया है कि न्यायालय के सामने यह निष्कर्ष निकालने के लिए कोई सामग्री नहीं थी कि मीडिया रिपोर्टिंग चल रही जांच में बाधा डाल सकती है। विशेष रूप से, मीडिया रिपोर्टिंग पर प्रतिबंध के लिए सीबीआई ने भी मांग नहीं की थी, जो अब मामले की जांच कर रही है, न ही राज्य पुलिस द्वारा, जिसने जांच की थी। इस आशंका का समर्थन करने के लिए रिकॉर्ड पर कुछ भी नहीं था कि रिपोर्टिंग किसी भी तरह से जांच को प्रभावित करेगी.

शेल्टर होम में यौन हिंसा के खिलाफ प्रतिरोध में निवेदिता

याचिका में मौलिक अधिकारों के हनन के साथ ये कानूनी प्रश्न उठाए गए हैं. उच्च न्यायालय का उक्त आदेश अवैध है जो जनता के जानने के अधिकार के खिलाफ है. साथ ही, भारत के संविधान में वर्णित मौलिक अधिकार 19 (1) (ए) का उल्लंघन करता है? उक्त आदेश मीडिया अधिकारों का भी अतिक्रमण करता है. याचिकाकर्ता की वकील फौज़िया शकील ने इस संबंध में बताया कि ‘इस मामले की सुनवाई अगले हफ्ते होने की संभावना है. हालांकि आज ही इस मामले की अर्जेंट सुनवाई की अपील करने वाली हूँ.’

निवेदिता बिहार में महिला हिंसा के खिलाफ सक्रिय प्रतिरोधों की अगुआई भी करती रही हैं. 

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समलैंगिकता को मिली सुप्रीम मान्यता: अंतरंगता निजी मामला

राजीव सुमन 
नई दिल्ली, 6 सितम्बर : समलैंगिकता की धारा 377 को लेकर चल रहे घमासान पर सुप्रीम कोर्ट ने आज अपना अहम फैसला सुना दिया है. पांच न्यायाधीशों की संवैधानिक पीठ ने आज आम सहमति से  IPC की धारा 377 को मनमाना और अतार्किक बताते हुए निरस्त कर दिया है. सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने कहा कि समलैंगिक संबंध अपराध नहीं है. धारा 377 अतार्किक और मनमानी धारा है और LGBTQ समुदाय को भी समान अधिकार है.

संविधान पीठ ने कहा, “यौन प्राथमिकता बायोलॉजिकल तथा प्राकृतिक है... इसमें किसी भी तरह का भेदभाव मौलिक अधिकारों का हनन होगा. कोर्ट ने कहा, अंतरंगता और निजता किसी की भी व्यक्तिगत पसंद होती है. दो वयस्कों के बीच आपसी सहमति से बने यौन संबंध पर IPC की धारा 377 संविधान के समानता के अधिकार, यानी अनुच्छेद 14 का हनन करती है..

संविधान पीठ के न्यायाधीश– दीपक मिश्रा, जस्टिस रोहिंटन नरीमन, जस्टिस एएम खानविलकर, जस्टिस डी.वाई.चंद्रचूड़ और जस्टिस इंदु मल्होत्रा ने इस केस में शुरूआती सुनवाई के दौरान यह तय करना सुनिश्चित किया था कि वो जांच करेंगे कि क्या जीने के मौलिक अधिकार में ‘यौन आजादी का अधिकार’ शामिल है, ख़ास कर तब जब 9 न्यायाधीशो के संविधानिक पीठ ने एक अन्य मामले में ‘निजता का अधिकार’ को एक मौलिक अधिकार है, तय किया. इसके बाद यह फैसला सुनाया गया. जस्टिस इंदु मल्होत्रा ने इस आशय की बात कही कि इतिहास को उनसे की गई इस नाइंसाफी केलिए माफ़ी मांगनी चाहिए.

इससे पहले अपने 17 जुलाई को दिए आदेश में संविधान पीठ ने धारा-377 की वैधता को चुनौती वाली याचिकाओं पर अपना फैसला सुरक्षित रखते हुए यह साफ किया था कि इस कानून को पूरी तरह से निरस्त नहीं किया जाएगा. संविधान पीठ का कहना था कि यह दो समलैंगिक वयस्कों द्वारा सहमति से बनाए गए यौन संबंध तक ही सीमित रहेगा. पीठ ने कहा था कि अगर धारा-377 को पूरी तरह निरस्त कर दिया जाएगा तो आरजकता की स्थिति उत्पन्न हो सकती है. हम सिर्फ दो समलैंगिक वयस्कों द्वारा सहमति से बनाए गए यौन संबंध पर विचार कर रहे हैं. यहां सहमति ही अहम बिन्दु है. पहले याचिकाओं पर अपना जवाब देने के लिए कुछ और समय का अनुरोध करने वाली केन्द्र सरकार ने बाद में इस दंडात्मक प्रावधान की वैधता का मुद्दा अदालत के विवेक पर छोड़ दिया था.
न्यायधीश रोहिंगटन ने धारा 377 से सम्बंधित सवाल उठाया कि क्या प्रजनन के लिए किए जाने पर ही सेक्स प्राकृतिक होता है?केंद्र सरकार ने अपना पक्ष रखते हुए कहा था  कि नाबालिगों और जानवरों के संबंध में दंडात्मक प्रावधान के अन्य पहलुओं को कानून में रहने दिया जाना चाहिए. धारा 377 ‘अप्राकृतिक अपराधों’ से संबंधित है जिसमें किसी महिला, पुरुष या जानवरों के साथ अप्राकृतिक रूप से यौन संबंध बनाने वाले को आजीवन कारावास या दस साल तक के कारावास की सजा और जुर्माने का प्रावधान है. समलैंगिकता अपराध है या नहीं, इस  पर केंद्र ने कहा था- धारा 377 का मसला हम सुप्रीम कोर्ट के विवेक पर छोड़ते हैं.

भारतीय दंड विधान की धारा-377 क्या कहती है?
इस एक्ट की शुरुआत लॉर्ड मेकाले ने 1861 में इंडियन पीनल कोड (आईपीसी) ड्राफ्ट करते वक्त की थी. इसी ड्राफ्ट में धारा-377 के तहत समलैंगिक रिश्तों को अपराध की श्रेणी में रखा गया था. जैसे आपसी सहमति के बावजूद दो पुरुषों या दो महिलाओं के बीच सेक्स, पुरुष या महिला का आपसी सहमति से अप्राकृतिक यौन संबंध (unnatural Sex), पुरुष या महिला का जानवरों के साथ सेक्स या फिर किसी भी प्रकार की अप्राकृतिक हरकतों को इस श्रेणी में रखा गया है. इसमें गैर जमानती 10 साल या फिर आजीवन जेल की सजा का प्रावधान है.

भारत में धारा 377 पर पहला विवाद? लगभग १५० साल पुरानी इस धारा को पहली कानूनी चुनौती नाज़ फाउंडेशन की तरफ से 2009 में मिली जब पहली बार सेक्स वर्करों ने दिल्ली हाई कोर्ट में इस धारा 377 के खिलाफ याचिका दायर की. इस याचिका में उनका कहना था कि यह सिर्फ सेक्स की बात नहीं बल्कि यह हमारी आजादी, भावना, समानता और सम्मान का हनन है.

तब क्या था दिल्‍ली उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय का फैसला
2 जुलाई 2009 को दिल्ली हाईकोर्ट ने धारा 377 को अंसवैधानिक करार दिया था. लेकिन बाद में सर्वोच्च न्यायालय ने 11 दिसंबर 2013 को सुरेश कुमार कौशल बनाम नाज फाउंडेशन मामले में दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को पलटते हुए समलैंगिकता को फिर से अपराध की श्रेणी में ला खडा कर दिया था और इस मामले में पुनर्विचार याचिका भी खारिज कर दी थी. लेकिन यह मामला फिर से पांच जजों के सामने क्यूरेटिव याचिका के तौर पर लंबित थी.

कुछ अजब-गजब और अच्छी टिप्पणियां–

इस ऐतिहासिक फैसले को लेकर कुछ मजेदार टिप्पणियाँ भी देखने को मिली. जाने-माने फिल्म निर्माता- निर्देशक और LGBTQ के समर्थक करण जौहर ने ट्वीट किया है और कहा है कि ऐतिहासिक फ़ैसला!!! आज फक्र हो रहा है! समलैंगिकता को अपराध के दायरे से बाहर करना और धारा 377 को ख़त्म करना इंसानियत और बराबरी के हक़ की बड़ी जीत है. देश को उसका ऑक्सीजन वापस मिला है!

एक बीजेपी सांसद ने कहा कि अब हमें राहुल गांधी के गले लगा लेने से डर लगता है, क्योंकि उसके बाद हमारी पत्नियां तलाक दे सकती हैं..!

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स्त्रीवादी भी.मार्क्सवादी भी करते हैं लिंचिंग: पाखी पत्रिका का बलात्कार प्रकरण

सुशील मानव 


पाखी की अनैतिक साहित्यिक पत्रकारिता के असर से वयोवृद्ध आलोचक विश्वनाथ त्रिपाठी की सोशल मीडिया में आलोचना हुई-एक हद तक वे ट्रोल हुए. सुशील मानव इसे एक खतरनाक प्रवृत्ति बता रहे हैं:

मॉब लिंचिंग सिर्फ भक्त और कम पढ़े लिखे लोग ही नहीं करते इस मॉबोक्रेसी में लिंचिंग नवोत्साही साहित्यकार और पाठक, आलोचक भी करते हैं बस मौका मिलने की देर है। मॉब लिंचिंग देश की नई और सर्वग्राह्य संस्कृति बन चुकी है। आदमी औरत, छद्म वामी और राइटिस्ट सबके सब इस संस्कृति के उपासक हो चुके हैं।

3 सितम्बर की रात  जिस तरह से बुजुर्ग मार्क्सवादी आलोचक विश्वनाथ त्रिपाठी के इंटरव्यू की कुछ पंक्तियों को, जिसे जानबूझकर पत्रिका के संपादक और मालिक द्वारा विवादित करके छापा गया था, कोट करते हुए एक एक युवा आलोचक आशीष मिश्र  द्वारा विश्वनाथ त्रपाठी को‘बलात्कार का सौंदर्यशास्त्री’ बताते हुए अपनी फेसबुक वॉल पर एक पोस्ट लिखा गया वह   बेहद शर्मनाक है। इसके बाद तो विश्वनाथ त्रिपाठी को लिंचिंग करनेवालों का पूरा हुजूम ही उमड़ पड़ा। फेमिनिस्ट रचनाकारों, संपादकों (स्त्रीकाल के सम्पादक सहित) से लेकर कुछ कथित युवा मार्क्सवादी लेखकों, संपादकों आलोचकों और आम पाठकों तक ने उन पर लानत बरसाये। प्रशासन से साहित्य में आए ध्रुव गुप्त ने तो बाकायदा बलात्कार के बदले बलात्कार की तर्ज पर बुजुर्ग आलोचक को चौराहे पर खड़ा करके उनके संग सामूहिक बलात्कार करने तक का फैसला सुना दिया। लिंचिंग करने वालों में हिंदी अकादमी की पूर्व अध्यक्ष मैत्रेयी पुष्पा और सुमन केसरी जैसी वरिष्ठ लेखिकाएं भी शामिल रहीं।

 ये सब उन लोगो ने किया जो आम लोगो को वाट्सएप अफवाहों पर प्रतिक्रिया करने से पहले उसकी सत्यता जाँचने की हिदायतें दिया करते थे। इन लोगो को इस विवादित पत्रिका और उसकी सवर्णवादी टीम पर इतना भरोसा था कि इन्होंने न तो दूसरे पक्ष को सफाई देने का मौका दिया और न ही वहाँ शामिल दूसरे लोगो, जैसे कि मदन कश्यप या कुमार अनुपम जैसे रचनाकारों से संपर्क करके सच को जानने की ज़रूरत नहीं  समझी। न ही इन लोगों में इतनी मनुष्यता बची थी कि प्रतिक्रिया देने से पहले इस बात पर विचार करते कि विश्वनाथ त्रिपाठी के दामाद की दो ही दिन पूर्व आसमायिक निधन हुआ है तो थोड़ा मौके की नज़ाकत और मनुष्यता का ही लिहाज़ कर लिया जाए। और ये सब तब हो रहा था जब घोर सांप्रदायिक और बाज़ारवादी एजेंडा लेकर हिंदी साहित्य में घुसपैठ करनेवाली पाखी पत्रिका की छवि बेहद विवादित और सवालों के घेरे में रही है। यह पत्रिका हिंदी साहित्य में घुसपैठ करने के बाद से ही लगातार खतरनाक और विध्वंसक भूमिका में रही है। नामवर सिंह, विश्वनाथ त्रिपाठी और राजेन्द्र यादव जैसे आलोचकों और संपादकों ने इस पत्रिका के मंच पर जाकर, इसके पुरस्कार स्वीकार करके हिंदी साहित्य क्षेत्र में इस पत्रिका को मान्यता प्रदान की।

सबसे ज्यादा सोचनीय और शर्मनाक रहा खुद को वामपंथी समझने और कहलाने वालो साहित्यकारों की नकरात्मक और लिंचिंग करती प्रतिक्रियाओं का आना। जबकि उन्हें ही सबसे ज्यादा सजग होकर इस साजिश की शिनाख्त करनी चाहिए थी। सबसे पहले मैनेजर पांडेय फिर नामवर सिंह और अब विश्वनाथ त्रिपाठी को निशाना बनाया जाना दरअससल एक ही साजिश का हिस्सा है। तीनों ही वरिष्ठ आलोचकों के खिलाफ़ साजिश में जो एक बात कॉमन थी- इन लोगो से से ईश्वरवाद के कांसेप्ट का कबूलनामा करवाना। पाखी के इस विवादित इंटरव्यू में भी पहले विश्वनाथ त्रिपाठी को इसी मुद्दे पर घेरने की कोशिश की गई थी। अपूर्व जोशी ने कुलदीप नैय्यर के हवाले से सुपरपॉवर के कांसेप्ट का जाल बिछाया भी था लेकिन वो तो भला हो मदन कश्यप जी का जिन्होंने अपने अकाट्य तर्कों से ईश्वरवाद की अवधारणा की हवा पहले ही निकाल दी। अल्पना मिश्रा जो कि हजारी प्रसाद द्विवेदी की पौत्री हैं, ने उन्हें उनकी 11 साल पहले आई किताब व्योमकेश दरवेश पर नामावली संबंधित कथित त्रुटियों समेत छोटी-छोटी बातों पर घेरने की कोशिश की। जिसे बड़ी शातिरता से अनंत विजय और दैनिक जागरण ने उठाकर दुष्प्रचारित करना शुरू कर दिया। तमाम कोशिशों के बावजूद ये मुद्दा भी उतना नहीं चल सका। और फिर विश्वनाथ त्रिपाठी को बलात्कार का सौंदर्यशास्त्री बताकर पेश कर दिया गया। जो कुछ वामपंथी साहित्यकारों की किंचिद असावधानी और फेमिनिस्ट लोगों की अतिप्रतिक्रियावादी पोस्टों व कमेंटों के चलते अपने विरूपित होकर जबर्दस्ती के विवाद में तब्दील हो गया। सांप्रदायिक दक्षिणपंथियों ने इस विरूपित वक्तव्य के बहाने मार्कस्वादी सिद्धातों पर ही हमला बोल दिया। साजिश में शामिल एकमात्र महिला आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी की पौत्री अल्पना मिश्रा ने आशीष मिश्रा की पोस्ट शेयर करते हुए बाकायदा मार्क्सवाद पर तीखा हमला बोला और इसे शेल्टर होम और कठुआ से जोड़कर लिखा- ‘कठुआ, मुज़फ्फरपुर, देवरिया, हरदोई… की जड़ें मार्क्सवादी आलोचक की सोच में……’

वो तो देर-सवेर जब इस पूरे प्रकरण में साजिश की बू सूँघते हुए तथा विश्वनाथ त्रिपाठी के अब तक के लिखे बोले से गुजरे लोगो ने इस पूरे प्रकरण पर अविश्वास जताते हुए पाखी के संपादक प्रेम भारद्वाज और मालिक अपूर्व जोशी पर बात-चीत का पूरा ऑडियो-वीडियो जारी करने का दबाव बनाया। उससे पहले पाखी टीम के लोग भी पूरे डंके की चोट पर अपनी वाल की पोस्ट और दूसरों की वॉल पर कमेंट में कहते फिर रहे थे कि हमने पूरे इंटरव्यू का लिप्यांतरण में शब्दशः लिखा है। और हमारे पास उसका ऑडियो-वीडियो बतौर सबूत मौजूद है। लेकिन जब उन्होंने दबाव के चलते ऑडियो और वीडियो जारी किए तो सारा खेल ही बदल गया। हालांकि ऑडियो और वीडियो की गुणवत्ता बेहद खराब है। बावजूद इसके इनके साजिश का भंडाफोड़ करने में वो सक्षम ऑडियो सक्षम साबित हुआ। रिकार्डिंग में स्पष्ट जाहिर है कि त्रिपाठी जी की कही बातों में से अति महत्वपूर्ण वाक्य को जानबूझकर छोड़ दिया गया है जबकि कई शब्दों को बदलकर अर्थ का अनर्थ कर दिया गया है।

विश्वनाथ जी ऑडियो में जो कह रहे हैं वह यूं है – ‘देखिये चाहे कविता हो या सौन्दर्य हो..मेरा सौन्दर्य का अनुभव है कि हमेशा एक अजीब किस्म की उदात्त और करुणा पैदा करता है सौन्दर्य। आप सौन्दर्य देखते ही लिक्विडेट होना शुरू करता है (इस बिंदु पर प्रेम भारद्वाज “सूरज को उगते देखना” पूछते हैं, विश्वनाथ जी कहते हैं “मरो गोली सूरज को” और एक अश्लील सी सामूहिक हँसी उभरती है)। उस अश्लील हँसी को चीरते हुए त्रिपाठी जी फिर कहते हैं- ‘मैं एकमएक होने की, मैं विगलित होने की बात कर रहा हूँ। मैं पत्थर के पानी होने की बात कर रहा हूँ। (अल्पना मिश्रा की आवाज़ आती है – उदात्त प्रेम) और अगर सौन्दर्य ये करता है। एक ख़ास तरह की करुणा पैदा करता है। सौन्दर्य देखकर आदमी को..आदमी कुत्ता भी हो सकता है। दो साल की बच्ची को देख कर रेप.. (अल्पना जी कहती हैं ऊ तो विकृति है।) त्रिपाठी जी कहते हैं- ‘ऊ विकृति को पढने (क्लियर नहीं हो रहा लेकिन पालने कतई नहीं है) के लिए सौन्दर्योपासक होने की ज़रुरत है।’

अल्पना मिश्रा फिर कहती हैं “नहीं नहीं सौन्दर्योपासक व्यक्ति नहीं कर सकता वह विकृति।

विश्वनाथ जी तुरंत कहते हैं कि “वही तो मैं कह रहा हूँ।”

जबकि पाखी पत्रिका के जुलाई-अगस्त अंक में इंटरव्यू कुछ यूँ छापा गया है-

विश्वनाथ त्रिपाठी : मारो सूरज को गोली- मैं विलीन होना-पत्थर को पानी होने की बात कर रहा हूं- सौंदर्य को देखकर अदमी क्रूर भी हो सकता है। आदमी दो साल की लड़की को देखकर रेप की भावना से भर सकता है।

अल्पना मिश्र : वह तो विकृति है?

अपूर्व जोशी : मानसिक रुग्ण्ता है।

विश्वनाथ त्रिपाठी : उस विकृति को पालने के लिए सौन्दर्य उपासक होने की जरूरत है।

अल्पना मिश्र : नहीं-नहीं सौंदर्य उपासक कभी भी बलात्कार नहीं कर सकता

देखिये कैसे हुई है एडिटिंग – उदात्त, करुणा जैसे सारे संदर्भ ग़ायब हो जाते हैं। कुत्ता “क्रूर” और पढ़ने “पालने” हो जाता है। अल्पना मिश्रा  के “”नहीं नहीं सौन्दर्योपासक व्यक्ति नहीं कर सकता वह विकृति” के जवाब में विश्वनाथ त्रिपाठी का स्पष्ट कहा “वही तो मैं कह रहा हूँ” ग़ायब कर दिया जाता है।

यहाँ एक बात और गौर करने की है कि एक बुजुर्ग आलोचक से प्रश्न करने के लिए 6 लोग उन्हें घेरकर बैठे-बैठाए गए थे! माने पूरी तैयारी थी उनकी हंटिंग करने की। ये बिल्कुल उसी तर्ज पर जैसा कि आजकल आपको गोदीवादी टीवी चैनलों पर देखने को मिलता है जहाँ एक विपक्षी प्रवक्ता को घेरकर सत्तापक्ष के प्रवक्ता समेत कई लोग उसे घेरकर उसकी हंटिंग करने के लिए बुलाए जाते हैं। सच सामने आने के बावजूद आपने कुकृत्य पर सार्वजनिक माफी माँगने के बजाय पाखी के संपादक पूरी बेशर्मी से अपना  बचाव कर रहे हैं।प्रेम भारद्वाज के स्वर में अल्पना मिश्रा भी अपना स्वर मिलाए हुए हैं। और ऑडियों में सबकुछ स्पष्ट होने के बावजूद वो कह रही हैं कि पाखी में वही छपा है जो मैंने विश्वनाथ त्रिपाठी के मुँह से उस इंटरव्यू में सुना था।

ऑडियो टेप में सच सामने और पाखी टीम की साजिशें उजागर हो जाने के बाद कल तक शब्दशः अक्षरशः इंटरव्यू लिखने की बात करने वाले उसके संपादक प्रेम भारद्वाज पूरी बेशर्मी से अब ये कह रहे हैं कि लिप्यांतरण में हूबहू या शब्दशः नहीं लिखा जा सकता। ये तो बदमाशों की सीनाजोरी है जो प्रेम भारद्वाज कह रहे हैं। आखिर प्रेम भारद्वाज ने वहीं शब्द या वाक्य क्यों काटे जो विश्वनाथ त्रिपाठी की सबसे अच्छी बात थी और ऑडियो में भी स्पष्ट थी। सबसे खराब बात उस बलात्कार वाली लाइन को क्यों नहीं काटा? जाहिर है इनका एजेंडा ही वाद पैदा करके मार्क्सवाद की हंटिंग करना था। पाखी के मेज पर उसके संपादक और मालिकान लोगों द्वारा अबनी जुबान विश्वनाथ त्रिपाठी के मुँह में डालने की पुरजोर साजिश की गई है। अब सही समय आ गया है जब इसी घोर सांप्रदायिक और बाज़रवादी एजेंडे पर काम करनेवाली पाखी पत्रिका और उसके मंचों, पुरस्कारों का साहित्यकारों द्वारा एकमत हो बहिष्कार कर दिया जाए।

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