पैसे की हवस विरासत में मिली थी हंटर वाले अंकल 'ब्रजेश ठाकुर' को !


  वीरेन नंदा

मुजफ्फरपुरकाण्ड के मुख्य सरगना ब्रजेश ठाकुर के अन्तःपुर की कहानी बता रहे हैं वरिष्ठ साहित्कार वीरेन नंदा. वीरेन नंदा अयोध्या प्रसाद खत्री सम्मान के संस्थापक हैं. बता रहे हैं कैसे शुरू हुई थी इस परिवार से मुजफ्फरपुर में पीत-पत्रकारिता और बच्चियों के प्रति इसकी क्रूरता की कहानी:

रात में बाथरूम जाने उठती थी तो मेरी पैंट नीचे गिरी रहती थी -- बालिका आश्रय गृह कांड की बच्चियाँ

न जाने कितनी ही स्त्रियों को दैहिक, मानसिक, शारीरिक यातना से मुक्ति दिलाने वाले, नारी मुक्ति के प्रथम विमर्शकार गौतम बुद्ध की इस धरती को कलंकित कर दिया मुजफ्फरपुर ने। बिहार की सांस्कृतिक राजधानी कही जाने वाली इस नगरी की आबरू तार-तार हो बेताब है। वृज्जिसंघ को टूटने से बचाने वाली नगरवधू अम्बपाली वेश्यावृत्ति छोड़ अपने भिक्षुणी बने जाने पर विह्वल है। और विह्वल है आज मुजफ्फरपुर की स्त्रियाँ, लड़कियाँ, बच्चियाँ और उनके परिजन !

पेशी के दौरान ब्रजेश ठाकुर 


आज शर्मसार है पूरा बिहार,- स्त्रियों के नाम पर चलाए जाने वाली मुजफ्फरपुर की "सेवा संकल्प" संस्था के संचालक ब्रजेश ठाकुर की यौन कुत्सा कांड पर, जिसने "बालिका अल्पावास गृह" को "बालिका उत्पीड़न गृह" बना डाला ! कबीर ने स्त्रियों की दुर्दशा देख यूँ ही ऐसे नहीं कहा -
                  " नारी  की  झांई  पड़े  अन्धो  होत  भुजंग
                    कबीर तिनको कौन गति नित नारी के संग "       

बालिका अल्पावास गृह में स्त्रियों के साथ हुई यह अमानवीय और पीड़ादायक घटना नपुंसक पौरुषता की निशानी है, जिसके सूत्र इस देश में पौराणिक कथाओं में भी मिलते हैं कि किस तरह एक पुरुष अपनी बेटी को भी वेश्या बनाने से नहीं चूकता ! ययाति नामक एक चंद्रवंशी राजा के परम् गुरु ऋषि गालव थे। गालव अपने गुरु विश्वामित्र को गुरु-दक्षिणा में 800 अच्छी नस्ल का घोड़ा देने का वचन दिया था। ऋषि गालव के पास घोड़े तो थे नहीं ! तब उसने अपने शिष्य ययाति से इस समस्या के निदान के लिए कहा। ययाति के पास उतने घोड़े देने के साधन नहीं थे और गुरु को वह खाली हाथ लौटा नहीं सकता था। तब उसने ऋषि को अपनी रूपवती पुत्री माधवी के विरोध के बावजूद उन्हें भेंट कर दी। गुरू खुशी-खुशी उसे स्वीकार कर अपने साथ ले गये और दो-दो सौ घोड़ों के एवज में तीन राजाओं को बारी-बारी से एक-एक साल के लिए माधवी को बेचता रहा। तीन साल में तीन राजाओं से माधवी को तीन पुत्र उत्पन्न हुए और गुरु को 600 घोड़े। चौथा राजा जब न मिला तो ऋषि गालव ने 600 घोड़ा सहित माधवी को भी अपने गुरू विश्वामित्र को अर्पित कर दिया। विश्वामित्र भी माधवी का भोग कर एक पुत्र पैदा किये और फिर उसे अपने शिष्य गालव को लौटा दिया। ऋषि गालव ने भी जब उसका दैहिक शोषण कर लिया तो उसे लगा कि अब माधवी उसके काम की नहीं ! तब उसने माधवी को उसके पिता को वापस कर दिया। पौराणिक काल की यह कथा अपने आप में स्त्रियों की दशा को इंगित करने के लिए काफी है। आदि काल से चली आ रही स्त्रियों के उत्पीड़न की दशा सुधारने वाले गौतम की धरती के ये वारिस मुजफ्फरपुर को कलंकित कर दिया, जिसका दाग कभी नहीं छूटने वाला है ! मुजफ्फरपुर के इतिहास में यह काला पन्ना सदा के लिए टंक गया।

प्रातःकमल अखबार का मालिक है ब्रजेश ठाकुर 


मुजफ्फरपुर में "सेवा-संकल्प विकास समिति" नामक एनजीओ के तहत चलने वाली संस्था "बालिका अल्पावास गृह" में 41 बच्चियों से मारपीट, नशा का इंजेक्शन और धमकी दे दे कर रेप करने-कराने वाले और रसूखदारों की हवस पूर्ति के आपूर्तिकर्ता आखिर इतनी अकूत संपत्ति कैसे अर्जित की ? उसकी कथा मुजफ्फरपुर में पीत-पत्रकारिता के जनक माने जाने जाने वाले उनके मरहूम पिता राधामोहन ठाकुर की कथा से शुरू होती है।

राधामोहन ठाकुर आरंभिक दौर में मुजफ्फरपुर के हरिसभा के निकट 'कल्याणी स्कूल' में शिक्षक थे। खड़खड़िया साइकिल से चलने वाला यह शिक्षक कभी स्कूल नहीं जाते थे, किंतु इनकी हाजिरी बनती रहती। कभी चेकिंग होती तो उसे मैनेज कर लेते। स्कूल के वेतन से उनका पेट कहाँ भरना था। उन्हें तो किसी भी तरह पैसा कमाना था और अकूत धन सीधी राह से आती नहीं ! तब उन्होंने यहाँ से एक अखबार निकालने की सोच 'विमल वाणी' का रजिस्ट्रेशन कराया और सरकारी विज्ञापन के लिए तब के उप-समाहर्ता और साहित्यकार डॉ. शिवदास पांडेय से संपर्क साधा। उन्होंने उनकी ऐसी मदद की, कि राधामोहन पैसे कमाने की मशीन बन गए ! यह बात स्वयं सेवा-संकल्प के संचालक व उनके कुत्सित पुत्र ब्रजेश ठाकुर ने इस शहर के साहित्यिकार डॉo शिवदास पाण्डेय के प्रणय-पर्व के अवसर पर छपी स्मारिका में अपने लेख में लिखता है -- "....नियमित प्रकाशन के लिए विज्ञापन ही आर्थिक श्रोत थे। श्री ठाकुर ने अपनी गरीबी और मुफलिसी के बीच अपने बुलंद हौसलों का परिचय देते हुए डॉo शिवदास पाण्डेय से विज्ञापन के रूप में आर्थिक मदद की मांग की। डॉo शिवदास पांडेय उनके हौसलों से इतने प्रभावित हुए कि उनको यथासंभव विभागीय ही नहीं, आत्मीय सहायता भी दी, जिसका नतीजा ' प्रातः कमल ' जैसे दैनिक के बीजारोपण से शुरू हुआ....उन्होंने डॉo शिवदास पाण्डेय को अपना संरक्षक, सलाहकार और बड़ा भाई मान लिया।..... डॉo शिवदास पाण्डेय के प्रभाव से ही गरीबी से ऊपर उठकर पैसे की मशीन बने राधामोहन ठाकुर  सांस्कृति, साहित्य, शिक्षा और समाज सेवा की ओर बढ़ने को उत्प्रेरित हुए । डॉo शिवदास पाण्डेय का उप-समाहर्ता के बाद नगर निगम प्रशासक के रूप में भी मार्गदर्शन मिलता रहा। " राधामोहन ठाकुर  ने शहर के सांस्कृतिक  क्षेत्र में क्या काम किया यह बात सभी जानते हैं !

प्रातः कमल में खुद को काम करने वाला बताते हुए एक पत्रकार ने कहा कि गोरखपुर से सरकारी विज्ञापन लाने में शबाब-कबाब और शराब की डाली लगाते थे राधामोहन ठाकुर। इस तरह खड़खड़िया साइकिल से चलने वाले राधामोहन ठाकुर ने करोड़ो की संपत्ति अर्जित की तो ऐश भी खूब किया। अखबारी कागज बेचने के आरोप में इनपर भी CBI इन्क्वारी हो चुकी है ! क्योंकि वे अखबार की उतनी ही प्रति छापते, जितना भर सरकारी विभाग को देना होता, बाकी कागज बेच लेते। स्थानीय व्यवसायियों से भी न्यूज छाप देने की धमकी दे कर पैसा ऐंठते !               
दिल्ली स्थित बिहार भवन पर सामाजिक संगठनों ने बिहार सरकार के खिलाफ किया प्रदर्शन 


करोड़ों का साम्राज्य खड़ा करने वाले इस राधामोहन ठाकुर के पुत्र ब्रजेश ठाकुर के भीतर भी पिता की तरह पैसे की भूख थी। उसी का परिणाम है "बालिका दुष्कर्म कांड" से रातों-रात देश भर में उसका कुख्यात हो जाना। उसकी  संस्था का नाम है, - "सेेवा-संकल्प एवं विकास समिति"। यह समिति बिहार सरकार द्वारा 8 अप्रैल 1987 को बीआर/2009/0003177 संख्या द्वारा रजिस्टर्ड हुई। नियमानुसार, ऐसी समिति में परिवार का एक ही व्यक्ति सदस्य हो सकता है, किन्तु इसमें उनके पुत्र राहुल आनंद सहित परिवार के अन्य रिश्तेदार भी सदस्य हो गये, जिनमें संजय कुमार अध्यक्ष, ब्रजेश ठाकुर मुख्य कार्यकारी अधिकारी, शिवशंकर ठाकुर कोषाध्यक्ष एवं प्रोमोटर में मधु कुमारी, राहुल आनंद, राजेश रंजन व अनिल श्रीवास्तव हैं। इसी एनजीओ के तहत उसने सरकार से अपनी पहुंच, रसूख और कल्याण विभाग के सहयोग से "बालिका अल्पावास गृह" खोला। इसमें अनाथ और बेसहारा लड़कियों को रख कर उसके रहने, खाने और देखभाल के नाम पर सरकार से लाखों रुपये ऐंठता रहा। इन बच्चियों की देखभाल वह क्या करता था उसका प्रमाण है इस कांड के बाद निरीक्षण करने वाली महिला आयोग की अध्यक्ष दिलमणि मिश्रा की टिप्पणी - 'इस बालिका गृह की दशा तो जेलों से भी ज्यादा बदतर है', से ही मिल जाती है।

 गलत ढंग से पिता द्वारा अर्जित धन, धन से बना रसूख और फिर सत्ता की चाह में उसने आनंद मोहन की पार्टी बिहार पीपल्स पार्टी को जॉइन कर लिया। 1995 के विधानसभा में ब्रजेश ठाकुर कुढ़नी (मुजफ्फरपुर) सीट से चुनाव में खड़ा हुआ। इस सीट से राजद के दिग्गज नेता बसावन प्रसाद भागवत भी खड़े थे किन्तु उत्तर बिहार का एक नामी गुंडा सम्राट अशोक भी मैदान में था। उसने ब्रजेश को थप्पड़ जड़ते हुए चुनाव न लड़ने की धमकी दी। ब्रजेश डर कर भाग गया। किन्तु सम्राट अशोक के मारे जाने के बाद वह 2000 में फिर चुनाव में उतरा, लेकिन अथाह खर्च करके भी जीत न सका। डी एम हत्याकांड में आनंद मोहन को उम्र कैद की सजा हुई लेकिन ब्रजेश की उससे नज़दीकी बनी रही। बाद में राजद और जदयू के नेताओं के साथ उसकी छनने लगी और उसके अखबार 'प्रात: कमल' को भारी-भरकम सरकारी विज्ञापन मिलने लगा, साथ ही बिहार सरकार में महत्वपूर्ण पत्रकार भी माना जाने लगा।

 सरकार और उनके विभागों में पैठ बनाने के बाद, उसने और धन कमाने के लिए एक अंग्रेजी अखबार 'न्यूज़ नेक्स्ट' शुरू  किया  और अपनी बेटी निकिता आनंद को उसका संपादक बना दिया। सुना जाता है कि उसने 'हालात-ए-बिहार' नामक एक उर्दू अखबार भी शुरू किया ! यानी इन तीनों अखबारों के सरकारी विज्ञापन और अपने एनजीओ से खूब धन कमाया फिर भी उसका पेट नहीं भरा तो अपने 'बालिका अल्पावास गृह' में बच्चियो का शोषण शुरू किया. यह सब   उसके घर से सटे बिल्डिंग में चल रहा था जिसमें तीनों अखबार के दफ्तर भी हैं।
30 जुलाई को देशव्यापी प्रदर्शन किया गया

इसी साल फरवरी में टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोसल साइंस (TISS) ने इस बालिका गृह की ऑडिट रिपोर्ट 'समाज कल्याण विभाग' को सौंपी। लेकिन ब्रजेश ठाकुर का रसूख तो देखिए ! उस रिपोर्ट को विभाग में ही उसके निदेशक तक पहुंचने में तीन माह लग गए ! यानी वह  26 मई 2018 को निदेशक के पास पहुँची। जबकि उस रिपोर्ट में इस बात का स्पष्ट उल्लेख किया गया था कि वहां बालिकाओं का यौन उत्पीड़न हो रहा है।

समाज कल्याण विभाग के निदेशक ने अपने रिटायर होने वाले दिन, यानी 31 मई को TISS के ऑडिट रिपोर्ट के आधार पर 'बालिका गृह' खाली करा कर उसमें रह रही 44 लड़कियों को मधुबनी, पटना और मोकामा शिफ्ट करवाया और अपने सहायक निदेशक को FIR करने को कहकर रिटायर हो गए। 1 जून को समाज कल्याण विभाग के सहायक निदेशक दिलीप वर्मा ने महिला थाने में FIR दर्ज की और तब से फरार हैं। उन्हें भी पुलिस खोज रही है। जिस दिन लड़कियों को बालिका गृह से मोकामा, मधुबनी और पटना शिफ्ट किया जा रहा था उस दिन भी रवि रौशन ने यौन उत्पीड़न किया !

 शहर में नई-नई आयी सीनियर एस.पी. हरप्रीत कौर  2 जून को ब्रजेश से पूछताछ कर वहाँ के कागजात जब्त कर दूसरे दिन ब्रजेश सहित आठ लोग ( किरण कुमारी, चंदा कुमारी, मंजू देवी, इंदू कुमारी, हेमा मसीह, मीनू देवी, नेहा और रौशन कुमार) को हथकड़ी डाल ले गई। ब्रजेश दुहाई देता रहा कि मैं पत्रकार हूँ, बालिका गृह मेरा नहीं है। तब एक इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की पत्रकार ने पूछा - "जब आप का नहीं है तो आप के अखबार और बालिका अल्पावास गृह का मोबाइल नम्बर 9431240777 और फोन न. 0621-2242633 एक कैसे है ?" यह सुनकर ब्रजेश बगलें झांकने लगा। 4 जून को लड़कियों का मेडिकल टेस्ट हुआ जिसमें यौन उत्पीड़न की पुष्टि हुई। राष्ट्रीय महिला आयोग की सदस्य सुषमा साहू ने भी जांच कर कहा कि 15 लड़कियों के साथ दुष्कर्म हुआ है। 5 जून को बाल कल्याण समिति के अध्यक्ष विकास कुमार को पुलिस ने धर दबोचा। 'बालिका अल्पावास गृह' की 44 लड़कियों में से 34 के साथ रेप हुआ है। आठ की मेडिकल रिपोर्ट आनी बाकी है। इनमें तीन लड़कियां प्रेगनेंट हैं। 7 से 13 साल की बच्चियां भी इसकी शिकार हुई। पुलिस के समक्ष यौन उत्पीड़ित बच्चियों ने जो बयान दिया है उसे सुनकर कोई भी चीत्कार उठे। वे बताती हैं -"भूख से तड़प कर खाना मांगने पर पीटा जाता। जबरदस्ती का विरोध करने पर पीटा जाता ! खाने में नींद की गोली देकर यौन संबंध बनाया जाता, सुबह उठने पर वे खुद को निर्वस्त्र पाती और शरीर दर्द से ऐंठता रहता। खाना बनाने, बर्तन मंजवाने का काम करवाया जाता। किसी भी बात का विरोध करने पर ब्रजेश हंटर से पीटता। चंदा रॉड से मारती और खाना मांगने पर पीठ पर गर्म पानी उझल देती। सीडब्ल्यूसी रवि रौशन कुमार और काउंसलर विकास  भी गलत काम करता। ब्रजेश, नेहा, किरण, चंदा आदि ( बच्चियों के ) निचले हिस्से पर ही प्रहार करते। मार से एक लड़की का गर्भपात हो गया था। एक लड़की को फाँसी लगाकर मार दी गई।"- यह 41 लड़कियों का पुलिस को दिए गए बयान के अंश हैं। बालिका गृह को "बालिका यातना गृह" में तब्दील कर दिया था ब्रजेश ठाकुर ने। एक लड़की ने कहा कि इनकार करने पर एक लड़की की इतनी पिटाई की गई कि वह मर गई और शव उसी परिसर में दफनाए जाने की बात बताई। उसकी निशानदेही पर कोर्ट के आदेशानुसार खुदाई हुई। शव तो नहीं मिला किन्तु वहां की मिट्टी लेकर फोरेंसिक जांच के लिए भेज दिया गया है।

 2013 से अबतक 6 लड़कियां गायब है। बालिका गृह के रजिस्टर में उन्हें भगोड़ा लिख कर चुप्पी साध ली गई। पुलिस को खबर तक नहीं दी गई। यह बात वहां के रजिस्टर खंगालने पर पता चली, जिसकी भी छान बीन की जा रही है। सेवा संकल्प के अलमारियों को मजिस्ट्रेट के सम्मुख खोला गया तो उसमें कुछ सामान्य बीमारियों में दी जाने वाली दवा के अलावा नशे और मिर्गी में दिए जाने वाले इंजेक्शन भी मिले। मिर्गी के इंजेक्शन यदि सामान्य व्यक्ति को दिया जाए तो वह अचेत हो जाता है।

आश्चर्य तो इस बात की है कि बिहार सरकार के समाज कल्याण विभाग का इस तरह ब्रजेश ठाकुर पर मेहरबान होना तो समझ में आता है कि तू मुझे खुश कर मैं तुम्हें ! लेकिन मुजफ्फरपुर के अखबारों की दो दिनों तक चुप्पी साधना ब्रजेश की ऊपर तक पहुँच को भी दर्शाता है। पीटीआई और यूएनआई के मुजफ्फरपुर के रिपोर्टर ब्रजेश ठाकुर के खास करीबी रिश्तेदार भी हैं और उनमें से एक यहाँ के प्रेस क्लब का अध्यक्ष भी है ! तो मामला दबाने की कोशिश क्यों न होती, किन्तु यहाँ की सीनिअर एस.पी. हरप्रीत कौर की दिलेरी के आगे सब अखबारों को अपनी चुप्पी तोड़नी पड़ी। वह भी तब, जब एक इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने इसे शुरुआत से ही लीड लेना शुरू कर दिया था।           
बिहार विधान परिषद में विरोध दर्ज कराती नेता प्रतिपक्ष राबड़ी देवी 
  

ब्रजेश की शातिरता का एक नमूना यह भी है कि अपने कुकर्म को ढंकने के लिए वह समाज में अपनी नकली छवि बना अधिकारियों और अख़बारों से वाहवाही भी बटोरता रहा है। उसकी मिसाल 2007 में एक घटना से दी जा सकती है। हुआ यह कि एक दलित लड़की विमला की शादी एक पिछड़ी जाति की लड़के के साथ हुई । इस शादी के समारोह में उस वक़्त के डीएम सहित कई आला अधिकारियों को ब्रजेश ने आमंत्रित कर अपनी संस्था को आयोजक बताकर उस आयोजन का सेहरा ले लिया और दूसरे दिन इसकी खबर अखबारों में छपी कि ब्रजेश ठाकुर की संस्था 'सेवा-संकल्प' ने रेडलाइट एरिया की अंधेरी गली से निकाल उस लड़की का उद्धार किया और उसे नयी जिंदगी दी ! साथ ही यह भी खबर छपवाययी कि डी.एम.ने पांच हजार और अन्य लोगों ने इस सत्कर्म में दूल्हा-दुल्हन को उपहार दिए। यह खबर देख नव-जोड़े ने ब्रजेश ठाकुर और उनकी संस्था की मधु नामक महिला सहित कई अधिकारियों पर मिठनपुरा थाने में FIR की। लेकिन ब्रजेश का बाल भी बांका न हुआ। ब्रजेश की गिफ्तारी की खबर सुन विमला और उसके पति के कलेजे को अब ठंडक मिली। और कहती है - ' मेरे केस में तो उन लोगों का कुछ नहीं हुआ, लेकिन आज हमें खुशी मिली कि ब्रजेश ठाकुर और मधु के पाप का घड़ा फूट गया।'

यह और भी आश्चर्यजनक बात है कि इस "सेवा-संकल्प एवं विकास समिति" जैसे एनजीओ को केवल बिहार सरकार से ही फंडिंग नहीं हो रही थी बल्कि विदेशी संस्था भी ऐड दे रही थी। ऐसा सुना जाता है कि ' फॉरेन कॉन्ट्रिब्यूशन रेगुलेशन एक्ट ' (FCRA) के तहत भी ब्रजेश ठाकुर ने अपनी संस्था का रजिस्ट्रेशन करा रखा था, जहां से भारी मात्रा में विदेशी धन उसे मिलता रहा।  FCRA के तहत उसी एनजीओ को धन की प्राप्ति होती है जिसके सदस्य न तो राजनीतिज्ञ हो और न ही मीडिया से जुड़ा व्यक्ति हो, जबकि ब्रजेश राजनीतिज्ञ और मीडिया से जुड़ा था ! तब सवाल उठता है कि भारत सरकार के गृह-विभाग की देखरेख में चलने वाले FCRA से ब्रजेश की इस "परिवार-समिति" का निबंधन कैसे हुआ ? जबकि उक्त "सेवा-संकल्प" और उसके अखबार "प्रातः कमल" का जो रजिस्ट्रेशन है उसमें दोनों का पता, फैक्स और मोबाइल नम्बर एक ही है। यहाँ यह प्रश्न उठता है कि उक्त मोबाइल का खर्च किस खाते से होता था-- प्रातः कमल के खाते से या सेवा-संकल्प से ? यह तो जांच से पता चलेगा या इस संस्था और अखबार का ऑडिट करने वाले चार्टर्ड अकाउंटेंट ही बता सकते हैं !

सरकार को  बाध्य होकर इस काण्ड को अब सी. बी.आई. के हवाले करना पड़ा है क्योंकि सामने चुनाव आने वाला है। इस कांड में कल्याण मंत्री मंजू वर्मा के पति का नाम आ रहा है। उनके पति का नाम रवि रौशन की पत्नी बार-बार ले रही है कि उनका यहाँ लगातार आना-जाना रहा है। मुजफ्फरपुर दौरे में तेजस्वी यादव ने नगर विकास मंत्री सुरेश शर्मा का भी नाम इस काण्ड से जोड़ दिया है। लेकिन इस ब्रजेश ठाकुर की सत्ता और सरकार में कैसी पहुंच थी उसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि जिस दिन उसपर FIR हो रहा था ठीक उसी समय अनाथ और गरीब पुरुषों के रहने-खाने-देखभाल का एक टेंडर 'स्टेट सोसायटी फॉर अल्ट्रा पुअर एंड सोशल वेलफेयर' के मुख्य अधिकारी राज कुमार द्वारा पास किया जा रहा था, जिसे तीन दिनों बाद उसी विभाग के वरिष्ठ अधिकारी कृष्ण कुमार सिन्हा ने 'अपरिहार्य परिस्थितियों' के हवाले से रद्द कर दिया। ज्ञात हो कि पाँच बालिका गृह चलाने वाले ब्रजेश ठाकुर को प्रति वर्ष 1 करोड़ का फण्ड सरकार मुहैय्या कराती रही है।

 इस सेवा-संकल्प का चयन, निरीक्षण और रिन्यूअल सब शक के घेरे में है। इसके निरीक्षण का काम जिला निरीक्षण समिति करती है। यह निरीक्षण प्रत्येक तीन माह पर करना आवश्यक है, जिसकी भी घोर अवहेलना की गई है। जबकि इस निरीक्षण समिति के अध्यक्ष होते हैं जिला अधिकारी, बाल संरक्षण इकाई के सहायक निदेशक सचिव, बोर्ड या समिति के सदस्य, मुख्य चिकित्सा पदाधिकारी, शिक्षा विभाग के जिला कार्यक्रम पदाधिकारी, विशेष किशोर पुलिस इकाई का सदस्य, अध्यक्ष द्वारा नामित सदस्य और मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ। तब यह सवाल उठता है कि सरकार के इतने विशेषज्ञों की समिति के होते हुए भी यह घृणित कांड कैसे घटा,  जिसपर देशभर की जनता थू-थू कर रही है ?

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