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रंगमंच में हाशिये की सशक्त आवाज़ है ईश्वर शून्य का रंगकर्म

राजेश चन्द्र

दिल्ली का रंगमंच संख्यात्मक दृष्टि से बहुत उल्लेखनीय रहता आया है, क्योंकि यहां महीने में औसतन तीस से पचास नाटक मंचित होते हैं और उनमें भी स्वाभाविक तौर पर युवा निर्देशकों के नाटक ही अधिक संख्या में होते हैं। यदि बौद्धिक-वैचारिक स्तर पर दिल्ली के रंगमंच का आकलन करें तो आम तौर पर एक गहरी निराशा से दो-चार होना पड़ता है और कई बार ऐसा भी महसूस होता ही है कि यहां अधिसंख्य निर्देशकों की अपने समय-समाज के सवालों एवं संघर्षों में, उसके साहित्य में कोई रुचि नहीं है और न ही उनमें हस्तक्षेप करने की कोई इच्छा ही है। वे रंगकर्म को एक स्वान्तःसुखाय कर्म मानते हैं और एक प्रकार की आत्मरति में संतुष्टि की खोज करते हैं। अपने इष्ट-मित्र, स्वजन-सम्बंधी, प्रशंसक और अकादमियों-परिषदों की उत्सव-समितियों के सदस्य प्रस्तुति देख लें, उनकी सराहना और वाहवाही मिल जाये- जिसे आम तौर पर ‘‘स्टैडिंग आॅवेशन‘‘ की अतिरंजित शब्दावली में व्यक्त किया जाता है, कहीं किसी अखबार या अन्य किसी माध्यम में एक या दो काॅलम की कोई रपट छप जाये बस। इस चरण तक पहुंच जाने को प्रस्तुति का सफल रहना मानने का जैसे रिवाज़ है।

ईश्वर शून्य अपने साथी कलाकरों के साथ पहली पंक्ति में दायें से तीसरा

प्रस्तुति की सार्थकता-प्रासंगिकता, उसकी भाषा और सम्प्रेषणीयता, कथ्य के सापेक्ष उसके शिल्प-शैली की नवीनता और प्रभावोत्पादकता को लेकर किसी चर्चा या विमर्श की न इच्छा है, न समीक्षा या आलोचना के प्रति स्वीकार्यता। इस अनुत्साही परिवेश में दिल्ली में रंग-समीक्षा या तो मौज़ूद ही नहीं है, या उदासीन है, या फिर उसने स्वयं को येन-केन-प्रकारेण जीवित भर रखने के लिये परिवेश के साथ एक अनुकूलन कर लिया है। रंगमंच के लिहाज़ से यह एक स्वस्थ स्थिति नहीं मानी जा सकती, और ऐसा रंगमंच एक कलात्मक सामाजिक-सांस्कृतिक गतिविधि का दर्ज़ा पाने की पात्रता भी नहीं रखता। एक निर्देशक के तौर पर निजी प्रोफ़ाइल में दस-बीस कथित ‘सफल‘ या ‘सर्वश्रेष्ठ‘ प्रस्तुतियां, पांच-सात ‘मेगा‘ महोत्सवों में हिस्सेदारी, दो-चार ‘जुगाड़ के‘ पुरस्कार और जीवन में कुछ ‘ईर्ष्याजनक‘ सुख-सुविधाएं इस तरह भले ही जुड़ जायें, पर एक सर्जक कलाकार और रंगकर्मी के तौर पर ऐसा योगदान समय-समाज की कसौटी पर खरा उतर कर समाज की सामूहिक चेतना और स्मृति का हिस्सा भी बन पायेगा, ऐसा मानना अनुभव से सही नहीं लगता। दिल्ली के रंगमंच में व्याप्त इन स्थितियों का समरूप हिन्दी के अन्य रंग-केन्द्रों में भी दिखायी देता है या नहीं, इस बारे में बहुत दावे के साथ कुछ कहने की स्थिति में मैं स्वयं को नहीं पाता।

निश्चित रूप से इस स्थिति के अपवाद भी हैं और वरिष्ठ से लेकर युवा पीढ़ी में मौज़ूद ये अपवाद रंगमंच को तो एक सोद्देश्य, प्रतिबद्ध एवं गम्भीर सृजनात्मक और बौद्धिक-वैचारिक गतिविधि के तौर पर उल्लेखनीय सक्रियता देते ही हैं, साथ ही इनकी सक्रियताओं का प्रभावी विस्तार रंगमंच से आगे बढ़ कर समकालीन साहित्य, राजनीति, जनान्दोलनों एवं समकालीन विमर्शों तक भी दिखायी पड़ता है। यह कितनी त्रासद स्थिति है कि सार्थक एवं समाजोपयोगी रंगमंच की ऐतिहासिक विकास-यात्रा में कुछ नया, कलात्मक, मूल्यवान और विचारोत्तेजक जोड़ने की बेचैनी और छटपटाहट से अनुप्राणित जिस रंग-धारा को रंगमंच की मूलधारा होना था, आज वही उपेक्षा, अभाव और तिरस्कार के कारण सिमट कर हाशिया बनती गयी है और इसका विलोम बेशर्मी के ऊंचे आसन पर प्रतिष्ठित दिखायी देता है। उसी का जयघोष है, सारे विशेषण, सारी जगह, सारा संरक्षण उसे ही प्राप्त हो रहा है। यह रंगमंच का पूंजीवादी विकास (वास्तव में ‘अविकास‘) है, जिसमें मनुष्य, समाज और उसके मूल्यों-संघर्षों के लिये उतनी जगह नहीं है, जितनी व्यक्तिगत मुनाफ़ों, सुख-सुविधाओं के अतिरिक्त संचय की अमानुषिक होड़ है। इस कथित ‘विकास‘ के मुहावरे के बाहर जो कुछ भी है, वह इसके प्रस्तावकों और साझीदारों की दृष्टि में महत्वहीन, कलाविहीन, स्तरहीन और इसलिये त्याज्य है, न उसे देखने की आवश्यकता है और न उसे विमर्श में आने देना है। उससे एक व्यापक दूरी बना कर रखनी है और लगे हाथ उसे लांछित भी करते रहना है। इस मानसिक रुग्णता के संगठित प्रदर्शन हम आये दिन देखते ही हैं।

नाटक के बाद

ईश्वर शून्य दिल्ली के सर्वाधिक सक्रिय युवा निर्देशकों में से एक हैं, और वे रंगमंच की उसी बहुउपेक्षित धारा का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो रंगकर्म को एक सोद्देश्य, प्रतिबद्ध एवं गम्भीर सृजनात्मक तथा बौद्धिक गतिविधि मानती है और उसके माध्यम से अपने समय में एक प्रभावी वैचारिक हस्तक्षेप करने का निरन्तर प्रयास करती है। साहित्य, समाज और राजनीति के समकालीन विमर्शों से गहरा जुड़ाव ईश्वर शून्य के रंगकर्म को साधनहीनता में भी एक अलग और विशिष्ट वैचारिक धार और कलात्मक प्रासंगिकता देता है, और समाज की उपेक्षित-दमित मनुष्यता की पक्षधरता और उसकी जीवन-स्थितियों में बदलाव लाने की बेचैनी ही उनकी रंगदृष्टि और रंगभाषा को आधार देती है। रंग-समीक्षक के तौर पर लगभग एक दशक से दिल्ली के अधिकांश और देश के दर्जनों युवा निर्देशकों के रंगकर्म को देखते हुए मैंने यह अनुभव किया है कि अधिकांश युवा प्रारम्भिक एक-दो नाट्य-प्रस्तुतियों में अपनी ऊर्जा, कल्पनाशीलता तथा नवाचार से दर्शकों को चमत्कृत भी करते हैं और अक्सर ऐसा प्रतीत होने लगता है कि वे अपनी एक नयी रंगभाषा की खोज करते हुए उसे प्राप्त कर चुके हैं, परन्तु दुर्भाग्यपूर्ण रूप से आगे चल कर उनकी प्रस्तुतियां हमें निराश करने लगती हैं और निर्देशकीय यात्रा के प्रथम चरण में ही वे एक पराजित योद्धा की तरह अपने शस्त्रों से डूबती हुई नौका के अन्तिम पतवार का काम लेने लगते हैं। यह स्थिति उनकी सृजनात्मकता और कल्पनाशीलता के असमय ही चुक जाने का परिचायक लगती है और एक समीक्षक के तौर पर हमें उनके प्रारम्भिक कार्यों के आधार पर किया गया अपना ही आकलन अदूरदर्शी और जल्दबाज़ी से भरा महसूस होने लगता है। कम से कम मेरे लिये यह एक तक़लीफ़देह स्थिति होती रही है, जिसे ईमानदारी से स्वीकार करने में मुझे कोई हिचक नहीं है। अक्सर युवा निर्देशकों के काम में यह गतिरोध और जड़ता इसलिये आती है कि थोड़ी सराहना मिलने के बाद वे अहंकारी होने लगते हैं, अध्ययन में, समकालीन सवालों में उनकी रुचि नहीं रहती और वे कोई सृजनात्मक जोखिम लेने को तैयार नहीं हो पाते, इसलिये उनका काम दुहराव और सजावट से भर जाता है। उन्हें लगता है कि जिस कारण वे रंगकर्म में आये थे, उसकी पूर्ति इतने भर से ही हो जायेगी, इसलिये कुछ नया करने के बारे में सोचना मूर्खता है।

यही कारण रहे हैं कि ईश्वर शून्य के रंगकार्य को लगभग छह-सात वर्षों से निरन्तर देखते रहने के बावज़ूद मैंने कभी भी उसकी समीक्षा या आलोचना में एक शब्द भी ख़र्च नहीं किया और यह सच्चाई है कि उसकी निरन्तरता और सृजनात्मकता को लेकर इन वर्षों में एक सन्देह सदा ही प्रभावी रहा है। इससे भी अधिक सन्देह अपने आकलन को लेकर रहता आया, जिसके मूल में उसके बार-बार ग़लत सिद्ध होने की स्थितियां ज़िम्मेदार रही हैं। इसी मनःस्थिति के कारण ईश्वर शून्य के प्रारम्भिक चरण के पगला घोड़ा, माटी गाड़ी, मुद्राराक्षस, प्रेम परसाई और क़िस्सा जानी चोर आदि लगभग पांच-छह नाटकों को देखने के बावज़ूद मैंने जान-बूझ कर कोई औपचारिक प्रतिक्रिया नहीं दी, और समय का इन्तज़ार करता रहा। पिछले वर्ष ओमप्रकाश वाल्मीकि के ‘जूठन‘ की समर्थ प्रस्तुति को देखने के बाद ही मुझे विश्वास हो गया था कि ईश्वर शून्य अपनी सृजनशीलता के अगले और महत्वपूर्ण चरण में प्रवेश कर चुके हैं, उन्होंने रंगमंच में अपना पक्ष एवं दृष्टिकोण चुन लिया है और आने वाले दशक में हमें उनकी प्रतिबद्धता और रचनात्मकता के कितने ही उर्वर आयामों से परिचित और समृद्ध होने का मौक़ा मिलेगा, जिसके लिये हमें तैयार रहना चाहिये। शिवाजी सावन्त की प्रसिद्ध कृति ‘मृत्युंजय‘ के रूपान्तरण और प्रस्तुतिकरण में ईश्वर ने महाभारत के सबसे जटिल पात्र कर्ण के हिन्दू धर्म की बर्बर वर्ण-व्यवस्था और ब्राह्मणवाद से अथक संघर्ष को वर्तमान भारतीय सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्था के एक प्रभावी रूपक में ढालने में असाधारण कल्पनाशीलता का परिचय दिया है, और यह प्रस्तुति दर्शकों की चेतना पर अमिट प्रभाव छोड़ती हुई सम्पूर्ण कलात्मकता के साथ अपने समय के विमर्श को आगे बढ़ाती है।

वर्ण-व्यवस्था द्वारा दलितों के हज़ारों वर्ष पुराने अपमान और अमानवीय उत्पीड़न को अपना कथ्य बनाने के बाद ईश्वर ने किन्नरों के जीवन और उनके बाह्यान्तरिक संघर्षों पर केन्द्रित नाटक ‘जानेमन‘ प्रस्तुत किया। मछिन्द्र मोरे द्वारा लिखित मराठी का यह नाटक मुम्बई की एक बस्ती के किन्नरों के जीवन के चित्रण के माध्यम से इस समुदाय की पीड़ा, आकांक्षाओं एवं संघर्षों को सामने लाने के लिये जाना जाता है। ईश्वर शून्य अब पितृसत्ता की हिंसा और स्त्रियों के सवालों को लेकर एक और नयी प्रस्तुति ‘औरत होने की सज़ा‘ तैयार करने जा रहे हैं। यह प्रस्तुति देश के जाने-माने कानूनविद, लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता अरविंद जैन की इसी शीर्षक से प्रकाशित बहुचर्चित पुस्तक पर आधारित होगी। देश में साम्प्रदायिक फ़ासीवाद के इस मौज़ूदा दौर में पितृसत्ता के ढांचे को एक नयी शक्ति मिली है और स्त्रियों के अधिकारों पर, उनकी यौनिकता पर जिस तरह संगठित हमले बढ़े हैं, उसमें यह प्रस्तुति प्रतिरोध के लिहाज़ से अहम भूमिका निभायेगी, ऐसी अपेक्षा रखनी चाहिये।

ईश्वर द्वारा निर्देशित एक नाटक पिंजर  का एक दृश्य

ईश्वर शून्य अपने समय के प्रमुख सामाजिक-सांस्कृतिक एवं राजनीतिक आन्दोलनों में भी शामिल होते रहते हैं और एक एक्टिविस्ट के तौर पर उनकी यह सक्रियता उनके नाट्य-प्रदर्शनों को भी एक सामयिक चेतना से लैस करती है। हबीब तनवीर और नया थियेटर के साथ काम करने के दौरान उन्होंने जिस वैचारिकता का दामन थामा, उसे मांजते-सहेजते और विकसित करते हुए वे निरन्तर आगे बढ़ते आये हैं और अपनी एक नयी राह भी उन्होंने बनायी है। हाल के दिनों में ईश्वर शून्य ने नाट्यालोचना और समीक्षा के क्षेत्र में भी ज़ोरदार दस्तक दी है और इस वीराने में भी उम्मीद का नया बिरवा रोपा है।

इस तरह देखें तो हिन्दी रंगमंच में ईश्वर शून्य एक ऐसी नयी रंगभाषा लेकर सामने आये हैं, जिसमें हमारे समाज के अब तक हाशिये पर पड़े वर्गों एवं समुदायों की अनदेखी-अनजानी ज़िन्दगी और उसके जलते सवालों को अभिव्यक्ति मिल पा रही है। ये सवाल इतनी प्रमुखता, केन्द्रीयता और निरंतरता के साथ कम से कम पिछले तीस-चालीस वर्षों में हिन्दी के रंग-दर्शकों के सामने नहीं आये थे। हाशिये के समाजों एवं उनके मुद्दों के प्रति यही वैचारिक प्रतिबद्धता ईश्वर शून्य के रंगकार्य को एक अलग विशिष्टता और सार्थकता प्रदान करती है।

14 सितम्बर को ईश्वर शून्य का जन्मदिन था। उनको स्त्रीकाल और इस लेखक की तरफ़ से अशेष शुभकामनाएं!

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महिला साहित्यकार पर यौनसंबंध बनाने का दबाव देने के आरोप में फंसे कुलपति द्वारा पीड़िता के साथ खड़े लोगों पर बदले की कार्रवाई

सुशील मानव 


महिला साहित्यकार के साथ अश्लील बातचीत करने और यौनसंबंध का दवाब बनाने के आरोप में घिरे इलाहाबाद विश्वविद्यालय के कुलपति रतनलाल हंगलू द्वारा पीड़िता के पक्ष में खड़े लोगों पर बदले की कार्रवाईयां करवायी जा रही हैं, मानहानि का मुकदमा दर्ज करने की धमकी दी जा रही है, वहीं विश्वविद्यालय के शिक्षक भी कथित शान्ति मार्च के नाम पर उनके समर्थन में प्रदर्शन कर रहे हैं. इस बीच मामले की सीबीआई जांच की मांग की गयी है. पुलिस के अपुष्ट सूत्रों के अनुसार पुलिस भी अश्लील बातचीत को कुलपति द्वारा की गयी बातचीत मान रही है. सुशील मानव की रिपोर्ट: 


महिला साहित्यकार से वाट्सएप पर अश्लील बात-चीत करने और अपने पद और पवर का दुरुपयोग करते हुए उसका प्रभाव भय और नौकरी का लालच देकर उस पर यौनसंबंध के लिए दबाव बनाने के आरोपित इलाहबाद विश्वविद्यालय के कुलपति रतन लाल हंगलू अपने कच्चे-चिट्ठे का भंडाफोड़ हो जाने के बाद से लगातार पीड़िता और पीड़िता के साथ खड़े लोगों के खिलाफ हमले करवा रहे हैं। इसके लिए वे अपनी सारी मशीनरी का इस्तेमाल भी कर-करवा रहे हैं। विश्वविद्यालय इलाहाबाद के पब्लिक रिलेशन ऑफिसर (पीआरओ) चितरंजन कुमार द्वारा ऋचा सिंह पर छात्रसंघ का अध्यक्ष रहने के दौरान रुपए गबन करने का आरोप लगाया गया है। वहीं सपा के छात्रसंगठन से निवर्तमान छात्रसंघ अध्यक्ष अवनीश यादव के खिलाफ़ दूसरों से अपनी कांपियाँ लिखवाने का आरोप पीआरओ इलाहाबाद विश्वविद्यालय के द्वारा लगाया गया है। अविनाश यादव और ऋचा सिंह पर यदि ऐसा कोई आरोप था तो यूनिवर्सिटी मैनेजमेंट द्वारा पहले क्यों कोई कार्रवाई नहीं की गई? जाहिर है ये सब कुलपति पर लगे गंभीर आरोपों के बाद बदले की भावना से की जा रही कार्रवाईयां हैं, ताकि सबसे अलग-थलग करके पीड़िता को अकेला और कमजोर किया जा सके। साथ ही यूनिवर्सिटी के पीआरओ चितरंजन कुमार द्वारा स्त्रीकाल वेबपोर्टल के संपादक और रिपोर्टर पर भी दबाव बनाने की कोशिश की जा रही है। उन्हें मानहानि की धमकी भिजवायी जा रही है। वहीं महिला साहित्यकार और कुलपति के वाट्सएप चैट और फोन पर बातचीत का ऑडियो सार्वजनिक करनेवाले छात्रनेता अविनाश दूबे के खिलाफ रजिस्ट्रार, इलाहबाद विश्वविद्यालय की ओर से एफआईआर दर्ज करवाया गया है।

बता दें कि ऋचा सिंह को पीड़ित महिला ने पत्र लिखकर बताया कि वाट्सएप चैट वायरल होने के बाद से रतन लाल हांगलू की ओर से पीड़िता को जान से मारने की धमकी मिल रही है। साथ ही पीड़िता ने पत्र में ऋचा सिंह पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष से अपने जीवन की सुरक्षा व्यवस्था के लिए भी गुहार लगाई है। अब इलाहाबाद विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से ऋचा सिंह पर मानहानि का मुकदमा दर्ज करवाने की भी धमकी अख़बारों में खबरों के जरिए दी जा रही है। ऋचा सिंह द्वारा पीड़िता की ओर से कुलपति पर आरोप लगाने और राष्ट्रपति प्रधानमंत्री को पत्र लिखने की बात को पीआरओ चितरंजन सिंह द्वारा विश्वविद्यालय की गरिमा से जोड़ दिया गया है। पीआरओ द्वारा लगातार बड़ी शातिरतापूर्ण ढंग से कुलपति के खिलाफ लगाए आरोप को विश्वविद्यालय की गरिमा से जोड़ दिया गया है। और इस तरह से प्रचारित प्रसारित किया जा रहा है कि जैसे कुलपति ही विश्वविद्यालय हैं। याद कीजिए पैटर्न देश में भी बलात्कार की कोई बड़ी घटना की कवरेज विदेशी मीडिया में होती है या प्रधानमंत्री के खिलाफ कोई नेता कुछ आरोप लगाता है तो कैसे भाजपा-और संघ के लोग इसे देश की छवि खराब करनेवाला बता देते हैं।

हिंदुस्तान से मिली खबर के मुताबिक शुक्रवार 14 सितंबर को इलाहाबाद विश्वविद्यालय प्रॉक्टोरियल बोर्ड की मीटिंग हुई। मीटिंग में ऋचा सिंह की ओर से कैंपस की लड़कियों की सुरक्षा को लेकर दिए गए बयान को गैरजिम्मेदाराना कहा गया है और इस पर क्षोभ व्यक्त किया गया है। मीटिंग में बताया गया है कि एक राष्ट्रीय स्तर की संस्था के बारे में ऋचा सिंह द्वारा किया जा रहा दुष्प्रचार निंदनीय है। उपरोक्त बातें बैठक में शामिल चीफ प्रॉक्टर प्रो राम सेवक दूबे की ओर से जारी प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया है।

उपरोक्त प्रेस विज्ञप्ति पर अगर ठहरकर एक नज़र डाली जाए तो बहुत सी चीजें स्पष्ट हो जाती हैं। कैंपस में लड़कियों की सुरक्षा के प्रति एक महिला व पूर्वछात्रसंघ अध्यक्ष की चिंता जताने वाले बयान को किस आधार पर इलाहाबाद विश्वविद्यालय प्रॉक्टोरियल बोर्ड ने गैर जिम्मेदाराना कहा? क्या प्रॉक्टोरियल बोर्ड ने इस पूरे मामले में कुलपति के विरुद्ध कोई जाँच करवाई। गर नहीं करवाई तो उस स्थिति में प्रोक्टोरियल बोर्ड का ये बयान बेहद ही शर्मनाक और निंदनीय है साथ ही इस बात की बानगी भी कि केंद्रीय विश्वविद्यालय जैसे उच्च शिक्षा संस्थान में किस तरह अलोकतांत्रिक और सामंतवादी आचरण किया जाता है, तथा किसी भी तरह का आरोप लगाने वाले के खिलाफ प्रबंधन एकजुट होकर किस तरह उसका शिकार करता है। जाहिर है प्रोक्टोरियल बोर्ड में शामिल लोग पूरी निर्लज्जता के साथ आरोपी कुलपति के साथ खड़े हैं। दूसरी बात ये कि प्रोक्टोरियल मीटिंग में ऋचा सिंह द्वारा एक राष्ट्रीय स्तर की संस्था के बारे में दुष्प्रचार का आरोप लगाकर निंदा भी कर दी गई है। ऋचा सिंह ने संस्था के बारे में क्या दुष्प्रचार किया है ये बात भी इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्रोक्टोरियल बोर्ड को स्पष्ट करनी चाहिए। उन्होंने तो सिर्फ कुलपति हांगलू पर आरोप लगाया है। तो क्या इलाहाबाद विश्वविद्यालय का प्रोक्टोरियल बोर्ड कुलपति हांगलू को संस्था (इलाहाबाद विश्वविद्यालय) मानता है?ये तो वही मिसाल हुई जो भाजपा वाले दुहराते रहते हैं कि जो मोदी सरकार के खिलाफ है वो राष्ट्रद्रोही है।
वहीं शुक्रवार को आरोपित कुलपति रतन लाल हांगलू के समर्थन में कुलपति दफ्तर से गांधी भवन तक शांति मार्च निकाला गया। शांति मार्च के बाद पीआरओ ने कुलपति के सारे आरोप धुल जाने का दावा करते हुए कहा कि ये शांति मार्च आरोप लगानेवालों के मुँह पर तमाचा है। माने गाँधी-भवन तक शांति मार्च निकालने के बाद भी मन की कुंठा और हिंसाभाव खत्म नहीं हुई और आरोप लगानेवालों को उन्होंने इसके जरिए तमाचा तक जड़ दिया। विश्वविद्यालय के पीआरओ चितरंजन कुमार इस समय आरोपित कुलपति के प्रवक्ता जैसा आचरण कर रहे हैं। जिसमें आरोप लगाने वालों के खिलाफ मुकदमा करने से लेकर रिपोर्ट लिखनेवाले पत्रकार को धमकाने तक सब शामिल है। वहीं तमाचा मार्च निकालनेवाले पीआरओ ने बिना किसी जाँच के ही सभी साक्ष्यों और गवाहों को फर्जी और झूठा भी कह दिया है।

कुलपति हंगलू

वहीं पीआरओ चितरंजन कुमार द्वारा गबन का आरोप लगाए जाने के बाद ऋचा सिंह ने अपने बयान में कहा है- “पीआरओ का बयान मेरी सामाजिक और व्यक्तिगत छवि को धूमिल करने का प्रयास है। गबन का मामला न होने की पुष्टि वित्त विभाग से की जा सकती है। आजादी के बाद विवि की प्रथम महिला छात्रसंघ अध्यक्ष होने के नाते मेरे द्वारा छात्रसंघ के बजट से एक रुपया भी नहीं लिया गया। बल्कि मैंने उल्टे विवि से पूछा कि उस सत्र में बजट का पैसा विवि ने कहाँ खर्च किया? लेकिन मुझे कोई जवाब नहीं मिला मैं पीआरओ पर मानहानि का मुकदमा दर्ज कराऊँगी।”

इस बीच पूर्व अध्यक्ष ऋचा सिंह ने गृहमंत्री राजनाथ सिंह को पत्र लिखकर कुलपति पर लगे आरोपों की सीबीआई जांच की मांग की है। वही अपुष्ट सूत्रों से यह भी पता चला है कि व्हाट्स ऐप चैट को पुलिस भी सही मान रही है।

सुशील मानव फ्रीलांस जर्नलिस्ट हैं. संपर्क: 6393491351

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नौकरी का प्रलोभन देकर महिला साहित्यकार से इलाहाबाद विश्वविद्यालय के कुलपति की अश्लील बातचीत: चैट हुआ वायरल


इलाहाबाद विश्वविद्यालय के कुलपति रतन लाल हंगलू और एक महिला साहित्यकार के बीच वाट्सएप चैट का स्क्रीनशॉट इन दिनों वायरल हो रहा है। चैट अश्लील भी है और नौकरी का प्रलोभन देते हुए एक किस्म की बारगेनिंग को भी सामने लाता है. कुलपति पर उनकी पूर्व नौकरियों में भी लगे हैं यौन-शोषण के आरोप. एक छात्रा की माँ ने नौकरी देने के प्रलोभन से छात्राओं के यौन-शोषण का आरोप लगाते हुए इलाहाबाद विश्वविद्यालय को सावधान भी किया था. छात्र-नेता ऋचा सिंह कहती हैं कि इस विश्वविद्यालय की लड़कियों की गरिमा खतरे में है और राष्ट्रपति से कुलपति की बर्खास्तगी की मांग भी उन्होंने की है. पढ़ें सुशील मानव की रिपोर्ट: 





ये चैट बेहजद निजी हैं और अश्लील भी– जिसे पढ़ने के बाद उस पैटर्न का खुलासा होता कि किस तरह किसी संस्था के उच्च पद पर बैठा कोई पुरुष अपने सत्ता पॉवर और पहुँच के बल पर तमाम तरह के लोभ लालच देकर महिलाओं और लड़कियों का यौनशोषण करता है। सबसे ज्यादा दुःख और गुस्सा तब आता है जब ये पुरुष किसी यूनिवर्सिटी के उच्च पद पर आसीन उच्च शिक्षित व्यक्ति हो।  कैसे वो प्यार, पैसे रुतबे और संस्थान के किसी वांछित पद पर नौकरी दिलवाने के वादे करते हुए किसी महिला का यौन-शोषण करता है। इस मामले में अभियुक्त कुलपति पहले से ही शादी-शुदा है, और ये बात उस महिला को भी भलीभाँति पता हो जिसका शिकार वो कर रहा हो। वाट्सएप चैट वायरल होने के बाद से वीसी इलाहाबाद प्रो रतन लाल हंगलू का मोबाइल नंबर स्विच ऑफ है। उनके एक दूसरे नंबर पर भी संपर्क करने की कोशिश की गई लेकिन उस नंबर पर पर भी उनसे संपर्क नहीं हो पा रहा है।

बता दें कि इलाहाबाद यूनिवर्सिटी की लड़कियाँ पहले भी कुलपति रतन लाल हंगलू और रजिस्ट्रार एन के शुक्ला के खिलाफ आंदोलनरत रही हैं। इससे पहले इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में आदित्यनाथ योगी को कैंपस में आने से रोकने का मामला हुआ था, 19 नवंबर 2016 की रात जब तत्कालीन छात्रसंघ अध्यक्ष ऋचा सिंह तमाम लड़कियों के साथ रात 12 बजे धरने पर यूनिवर्सिटी गेट पर बैठी हुई थी, उस वक़्त एबीवीपीके गुंडों के साथ एन के शुक्ला नशे की हालत में धुत वहाँ पहुचते हैं, और गुंडों के साथ मिलकर धरने पर बैठी लड़कियों को न सिर्फ अभद्र अश्लील गालियां दी बल्कि मार पीट भी की थी, जिसकी रिपोर्ट यूनिवर्सिटी से संबंधित कर्नलगंज थाने में दर्ज है।विश्वविद्यालय के महिला सलाहकार बोर्ड की चेयरपर्सन द्वारा विश्वविद्यालय को चिट्ठी लिखी गई थी जिसमें में यह स्वीकार किया गया कि लड़कियों की साथ देर रात अभद्रता हुई पर, विश्वविद्यालय उस चिट्ठी को दबा देता है, और उस पर कोई जांच नही होती।

गौरतलब है कि यूनिवर्सिटी में 12000 लड़कियाँ पढ़ती हैं। इसके पहले कुलपति रतन जिस कल्याणी विश्वविद्यालय में कार्यरत थे वहां पढने वाली एक लड़की की माँ सुभाषिनी डे ने इलाहाबद यूनिवर्सिटी के महिला सलाहकार बोर्ड के चेयरपर्सन को पत्र लिखकर उन्हें अपनी चिंता से अवगत करवाया था।महिला ने लिखा है कि ‘मैं कल्याणी विश्वविद्यालय में पढ़नेवाली एक छात्रा की माँ हूँ। मैं बहुत चिंतित होकर आपको पत्र लिख रही हूँ। आपके वीसी प्रो. रतन लाल हंगलू ने जॉब और दूसरे फायदे पहुँचाने का लालच देकर कल्याणी यूनिवर्सिटी के कई लड़कियों के साथ यौनसंबंध बनाया है। वो समाज के लिए बहुत बड़ा खतरा हैं। कृपया अपनी इलाहाबाद यूनिवर्सिटी की लड़कियों की सुरक्षा कीजिए। आप उनके चरित्र के बाबत हैदराबाद यूनिवर्सिटी में भी जांच पड़ताल कर सकती हैं। प्रो रतन लाल हंगलू अपने ऑफिस में केवल उन्हीं पुरुषों को नौकरी देता है जो उसके पास सेक्स के लिए लड़कियों की सप्लाई करता है। कृपया एहतियात के तौर पर उनपर आप कड़ी नज़र उनके पास किसी भी लड़की को अकेली मत जाने दीजिए। वो लड़कियों को फँसाने के लिए झूठी-मीठी बातें और तोहफों का इस्तेमाल करता है।रतन लाल हंगलू के बारे में ये सभी बातें कल्याणी यूनिवर्सिटी के हर एक व्यक्ति को भली भाँति पता है।’

कुलपति रतनलाल हंगलू

वहीं इलाहाबद यूनिवर्सिटी की पूर्व और प्रथम महिला छात्रसंघ अध्यक्ष ऋचासिंह ने आरोपित कुलपति रतन लाल हंगलू पर लगे यौनाचार के आरोप के संबंध में पत्र लिखकर उन्हें ये बताते हुए कि आपके कारनामे शहर के लगभग सभी सभी अखबारों में छप चुके हैं और उस कथित महिला ने भी इसकी पुष्टि की है, उनसे नैतिक आधार पर वीसी इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के पद से इस्तीफा देने की माँग की है। ऋचा सिंह ने पत्र में उन्हें ये भी याद दिलाया है कि ‘जब भी किसी छात्र-कर्मचारी-शिक्षक-विभागाध्यक्ष पर कोई आरोप लगा है आपने उन्हें जांचपूर्व ही पद से हटा दिया है उस समय आपकी दलील ये रही है कि वो व्यक्ति अपने पद के चलते जांच को प्रभावित न कर सके इसलिए ऐसा किया गया है। तो महोदय आज जब आप पर पर अपने पद का लाभ उठाते हुए एक कथित महिला को लाभ देने का आश्वासन संबंधी खबरें लगातार शहर के सभी प्रमुख समाचार पत्रों में प्रकाशित हो रही है और उक्त महिला ने भी जिसकी पुष्टि कर दी है। ऐसे में विश्वविद्यालय के कुलपति पद पर बने रहने का आपको नैतिक अधिकार नहीं रह जाता। जैसी की आपकी कार्यप्रणाली रही है उसी के अनुरूप आपसे अपेक्षा है कि आप उक्त आरोपों की जांच होने तक नैतिक आधार पर इस्तीफा देते हुए कैंपस के अंदर प्रवेश न करें। ताकि कुलपति पद की गरिमा बनी रहे। साथ ही विश्वविद्यालय में अध्ययन करनेवाली छात्रायें जो कुलपति के संरक्षण में यह आशा करती हैं कि परिसर छात्राओं को सुरक्षित माहौल उपलब्ध कराएगा। परंतु इस तरह के खबरों के बाद छात्राओं समेत उनके अभिभावक जो गांव-दूर दराज क्षेत्रों से अपनी बेटियों को विश्वविद्यालय में उच्च शिक्षा ग्रहण करने के लिए भेजते हैं वह सभी विश्वविद्यालय कैंपस को संदेह के घेरे में महसूस कर रही हैं और किसी भी घटना की शिकायत के लिए किस संस्था के पास जाएं जब कुलपति, रजिस्ट्रार सभी महिला उत्पीड़न के आरोप से घिरे हुए हैं।’

इसके अलावा ऋचा सिंह ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी पत्र लिखकर मांग की है कि ‘प्रधानमंत्री जी बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ का नारा तो देते हो पर सड़क से लेकर विश्वविद्यालयों में चल रही परिस्थितियों के चलते छात्राओं की सुरक्षा खतरे में पड़ गयी है। समाचार पत्रों को पढ़ने के बाद अभिभावक अपनी बेटियों को विश्वविद्यलय में उनसे डरने लगे हैं। उपरोक्त तथ्यों और परिस्थितियों के प्रकाश में आपसे प्रार्थना है कि इलाहाबाद विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो रतन लाल हंगलू के खिलाफ लगे यौनाचार के आरोपों का उच्च स्तरीय समिति से अविलंब जांच कराने की कृपा करें। तथा निष्पक्ष जाँच के दौरान प्रो रतन लाल हंगलू का कैंपस में प्रवेश प्रतिबिंधित करने की कृपा करें।’ उल्लेखनीय है कि प्रो रतन लाल हंगलू के विरुद्ध पूर्व में भी उच्च स्तरीय जाँच समितियों ने अपनी रिपोर्ट मानव संसाधन मंत्रालय को सौंप रखी है।

ऋचा सिंह ने राष्ट्रपति को भी पत्र लिखकर विश्वविद्यालय की 12000 लड़कियों की सुरक्षा की चिंता जताते हुए उन्हें इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के बिगड़े हुए हालात से अवगत कराया है। साथ ही प्रो रतन लाल हंगलू और रजिस्ट्रार एन के शुक्ला पर यौनाचार के आरोपों के मद्देनजर उन्हें तत्काल प्रभाव से कैंपस में जाने से प्रतिबंधित करने की माँग की है।

अजीब विडंबना है कि देश में बेटी पढ़ाओ बेटी बचाओ का नारा दिया जाता है और उन्ही बेटियों का तन मन नोचने वाले उन्हें झूठे मीठे वायदे और लालच देकर उनका यौनउत्पीड़न करनेवालों पर आँच तक नहीं आती। सवाल तो उठता है कि कल्याणी यूनिवर्सिटी में रतन लाल हंगलू के खिलाफ मामला आने के बाद उन्हें किस आधार पर इलाहाबाद यूनिवर्सिटी का वीसी कुलपति बना दिया गया। उनके खिलाफ तमाम जाँच कमेटियों की रिपोर्ट को मानव संसाधन मंत्रालय क्यों दबाये बैठा रहा। जाहिर है केंद्र में मोदी सरकार आने के बाद से लड़कियों के लिए न देश के शेल्टर होम सुरक्षित हैं , न सड़के न विश्वविद्यालय न पुलिस थाना।

सुशील मानव फ्रीलांस जर्नलिस्ट हैं. संपर्क: 6393491351

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जान बचाने की महिला साहित्यकार की गुहार: छात्रसंघ की पूर्व अध्यक्ष को लिखा पत्र


इलाहाबाद विश्वविद्यालय के कुलपति रतन लाल हंगलू का महिला साहित्यकार के साथ अश्लील चैट सार्वजनिक होने के बाद साहित्यकार को मिल रही हैं धमकियां. इलाहबाद विश्वविद्यालय के छात्रसंघ की पूर्व अध्यक्ष ऋचा सिंह को पत्र लिखकर जीवन-रक्षा की उन्होंने अपील की है.  पत्र में उन्होंने लिखा है कि ‘ये प्रकरण न सिर्फ़ सम्मानित व्यक्ति, प्रतिष्ठित परिवार, संभ्रांत साहित्यिक जगत् को बुरी तरह से आहत कर रहा है बल्कि समस्त विश्वविद्यालयीय गरिमा और प्रशासनिक अधिकारियों के पद को भी मलिन कर रहा है…’  इस बीच विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों ने कुलपति को खुला पत्र लिखा है. 





पीड़ित साहित्यकार का पत्र: 

प्रिय ऋचा,
कैसी हो?

तुमने ‘चैट वायरल” जैसे ज़लील मुद्दे के सन्दर्भ में मुझे कॉल करके चिंता व्यक्त की, अच्छा लगा।
ये प्रकरण न सिर्फ़ सम्मानित व्यक्ति, प्रतिष्ठित परिवार, संभ्रांत साहित्यिक जगत् को बुरी तरह से आहत कर रहा है बल्कि समस्त विश्वविद्यालयीय गरिमा और प्रशासनिक अधिकारियों के पद को भी मलिन कर रहा है। हमारे अज़ीज़ इलाहाबाद विश्वविद्यालय की एकमात्र महिला छात्र संघ की अध्यक्ष होने के नाते आप मुझे इन निंदनीय, दु:खद और असम्मानजनक घटनाक्रम से दूर करो, साथ ही मेरे जीवन की भी सुरक्षा की व्यवस्था करने का प्रयास करो। बड़ी कृपा होगी, क्योंकि अब तो मुझे जान से मारने की धमकियां भी मिलने लगीं हैं।

पढ़ें:  नौकरी का प्रलोभन देकर महिला साहित्यकार से इलाहाबाद विश्वविद्यालय के कुलपति की अश्लील बातचीत: चैट हुआ वायरल

इस बीच विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों ने कुलपति को एक खुला पत्र लिखा है: 

खुला पत्र: 

कुलपति प्रो0 रतन लाल हांगलू पर लग रहे कथित व्याभिचार के आरोपों पर विश्वविद्यालय के छात्र-छात्राओं की ओर से कुलपति के नाम खुला पत्र ।

महोदय विश्वविद्यालय में जब से आपने कुलपति का कार्यभार ग्रहण किया है आप अपने फैसलों के लेकर हमेशा चर्चा में रहे हैं। जब-जब छा़त्र-कर्मचारी-शिक्षक-विभागाध्यक्ष पर कोई आरोप लगे हैं, आपने जॉच से पहले सम्बन्धित व्यक्ति को पद से हटाने का काम किया है, यह कहते हुए कि सम्बन्धित व्यक्ति जॉच को प्रभावित न कर सके।

महोदय आज जब स्वयं आप पर अपने पद का लाभ उठाते हुए एक  महिला को लाभ देने का आश्वासन सम्बन्धी खबरें एवं बेहद अशोभनीय-अभद्र वार्तालाप वायरल हो रहा है और लगातार शहर के सभी प्रमुख समाचार पत्रों मे प्रकाशित हो रहा है,  जिसकी पुष्टि स्वयं महिला द्वारा भी की जा रही है। ऐसे में विश्वविद्यालय के कुलपति पद पर बने रहने का आपको नैतिक अधिकार नहीं रह जाता है। विश्वविद्यालय की गरिमा एवं छात्राओं की सुरक्षा को ध्यान मे रखते हुये आपसे अपेक्षा की जाती है कि आप उक्त आरोपों की जॉच तक कैम्पस के अंदर प्रवेश न करें, साथ ही अगर आपके अन्दर जरा भी नैतिकता है, तो कुलपति पद की गरिमा को ध्यान मे रखते हुये आप नैतिकता के आधार पर इस्तीफा दें, तथा इस अतिसंवेदनशील विषय पर जॉच में सहयोग करें।

महोदय विश्वविद्यालय में अध्ययन करने वाली छात्रायें जो कुलपति के संरक्षण में यह आशा करती है कि परिसर छात्राओं को सुरक्षित माहौल उपलब्ध करायेगा, परन्तु पिछले दिनों आपके उपर लग रहे आरोपों के चलते समस्त विश्वविद्यालय परिवार बेहद आहत और शर्मिन्दगी महसूस कर रहा है।

आप पर यह पहला आरोप नहीं है इससे पहले कल्याणी विश्वविद्यालय जहॉ के आप भूतपूर्व कुलपति रहे हैं, वहॉं एक छात्रा की मॉ ने आपके चरित्र पर सवाल उठाते हुये इलाहाबाद विश्वविद्यालय के महिला सलाहकार बोर्ड को पत्र लिख कर छात्राओं की सुरक्षा के सम्बन्ध में विश्वविद्यालय को आगाह कराते हुये आपकी कार्यप्रणाली-अपने पद का दुरूपयोग करते हुये महिलाओं का शोषण करने के आरोप लगाये हैं और इलाहाबाद विश्वविद्यालय की छात्राओं की सुरक्षा को लेकर गम्भीर चिन्ता व्यक्त की थी।

महोदय पिछले कई दिनों से जिस तरह की खबरें शहर के सभी प्रमुख समाचार पत्रों में छप रही हैं इससे छात्राओं समेत तमाम अभिभावक जो गॉव तथा दूर- दराज के क्षेत्रों से अपनी बेटियों को विश्वविद्यालय में उच्च शिक्षा ग्रहण करने के लिये भेजते हैं, वह सभी विश्वविद्यालय कैम्पस को संदेह के घेरे में महसूस करते हुए छात्राओं की सुरक्षा के लिए संशंकित है। छात्रायें भी कैम्पस में अपने आप को सुरक्षित महसूस नही कर रही हैं। साथ ही एक बेहद अहम और चिन्ताजनक सवाल यह है कि अगर किसी छात्रा को अपनी सुरक्षा या यौन उत्पीड़न से सम्बन्धित किसी घटना की शिकायत करनी हो तो वह किस संस्था के पास करेगी? जबकि संस्था प्रमुख स्वयं आरोपो में घिरा हुआ है।

कुलपति प्रोफेसर रतनलाल हंगलू

महोदय यूजीसी गाइडलाइन के अनुसार कैम्पस के अन्दर जी0एस0कैश0 समिति को अनिवार्य किया गया है जहॉ पर महिला शोषण एवं उत्पीड़न सम्बन्धी किसी भी शिकायत को दर्ज कराया जा सके, परन्तु लम्बे समय से हम छात्र-छात्राओं द्वारा जी0एस0कैश0 कमेटी गठित करने की मॉग आपसे लगातार की गयी परन्तु कमेटी गठित ना करना आपकी कार्यप्रणाली पर इन आरोपों को देखते हुये प्रश्नचिन्ह लगाता है। एक ऐसा विश्वविद्यालय या संस्था जहॉ कुलपति, रजिस्ट्रार सभी महिला उत्पीडन के आरोपों में घिरे हुये हैं उस परिसर में छात्राओं की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित होगी यह बेहद गंभीर सवाल हैं।

अतः आपसे अनुरोध है कि विश्वविद्यालय की गरिमा एवं छात्राओं की सुरक्षा तथा यौन उत्पीड़न सम्बन्धी, विशाखा गाइडलाइन  के अनुसार ‘जिसमें यह कहा गया है कि ऐसा व्यक्ति जिस पर महिला शोषण सम्बन्धी आरोप लगे हों वह जॉच पूरी होने तक अपने पद पर नही रह सकता है’ इस गाइडलाइन तथा कुलपति पद की गरिमा को ध्यान में रखते हुये आपसे यह अपेक्षा की जाती है कि आप तत्काल नैतिक आधार पर इस्तीफा दें तथा सम्बन्धित विषय की जॉच पूरी होने तक कैम्पस में प्रवेश न करके जॉच में सहयोग करें।
समस्त छात्र’ छात्राएं

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माहवारी में थोपे गये पापों से मुक्ति हेतु कब तक करते रहेंगी ऋषि पंचमी जैसा व्रत!

विनिता परमार

हिन्दू व्रतों की स्त्रियों और गैर ब्राह्मण समुदायों के प्रति दुष्टताओं को लेकर आयी यह छोटी सी टिप्पणी जरूर पढ़ें. देखें कैसे अशुद्धि, पवित्रता-अपवित्रता का भाव स्त्रियों और ब्राह्मणेतर जातियों पर थोप दिया गया है.

भादो महीने के शुक्ल पक्ष की पंचमी को ऋषी पंचमी का व्रत  किया जाता है । आज भी बिहार, मध्य प्रदेश उत्तरप्रदेश,राजस्थान के कुछ भागों में इस दिन महिलाये व्रत रखती हैं । महिलाएं जब माहवारी से होती हैं तब गलती से कभी मंदिर में चली जाती हैं या कभी पूजा हो वहाँ चली जाती हैं या रसोई में चली जाती हैं, तो उसका दोष लगता है। ऋषिपंचमी व्रत इस बात का काट बताया जाता  है,  अगर किसी स्त्री ने गलती से भी माहवारी के दौरान अपने घर के किसी पुरुष का भोजन पानी छू दिया है तो उन्हें मुक्ति मिलेगी। धर्म-ग्रंथों की मूर्खतापूर्ण, दुष्टतापूर्ण मान्यता है कि रजस्वला स्त्री पहले दिन चाण्डालिनी, दूसरे दिन ब्रह्मघातिनी तथा तीसरे दिन धोबिन के समान अपवित्र होती हैं। वह चौथे दिन स्नान करके शुद्ध होती है। यदि यह शुद्ध मन से कभी भी ऋषि पंचमी का व्रत करें तो इसके सारे दुख दूर हो जाएंगे और अगले जन्म में अटल सौभाग्य प्राप्त करेगी।

इस अटल सौभाग्य की कामना में भादों शुक्ल पक्ष की तृतीया को महिलाओं ने हरीतालिका तीज का निर्जला व्रत किया तो फिर चतुर्थी की पूजा और पंचमी को राजस्वला होने के बाद पापों से मुक्त होने के लिये ऋषि पंचमी व्रत करेंगी।  108 बार चीरचीड़ी के दातुन से मुँह धोयेंगी, 108 लोटे पानी से नहायेंगी और पसही धान का चावल खायेंगी ।

एक बार व्रत पर नज़र दौडाया तो फिर प्रकृति का संरक्षण नज़र आया। चीरचीड़ी का पौधा औषधीय गुण से भरा हुआ है मासिक धर्म की अनियमितातों को दूर करता है। साथ -ही -साथ इस व्रत में हल से जोतकर ऊगनेवाले अनाज को खाना मना है।पसही धान अपने आप उग जाता है जो अब भारत के खत्म होनेवाले अनाज की किस्म है। इस व्रत में सप्तऋषियों की पूजा होती है। यानि पूर्ण प्रकृति पूजा, व्रत के तरीके से कोई ऐतराज नहीं लेकिन इसकी नियत यानी जो सोच रख यह व्रत बनाया गया उसपे गहरी आपत्ति है ।

मासिक धर्म के दौरान कोई भी स्त्री खाना नहीं बना सकती, ना ही वो किसी अन्य व्यक्ति के खाने व पानी को छू सकती है। क्योकि ऐसा माना जाता है कि मासिक धर्म के दौरान महिलायें अशुद्ध हो जाती है। इसलिए अगर वे खाने पानी को हाथ लगाती है तो इससे खाने का अपमान होता है। इस प्रक्रिया के दौरान महिलाओं को ना तो पूजा पाठ तक करने की अनुमति नहीं है, यहाँ तक उन्हें मंदिर के पास तक नहीं जाने दिया जाता। प्रगतिशील महिलायें भी अपने लालन -पालन और जडों की वजह से पूजा नहीं कर पाती। जानबुझ कर बनाये गये इस तरह के नियमों में महिलाये पिसती रहेंगी ।

मासिक धर्म या माहवारी एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमे महिलाओं को हर महीने 3 से 7 तक रक्त स्त्राव होता है। वैसे तो ये एक शारीरिक क्रिया है जो महिलाओं को गर्भधारण और प्रसव के लिए बहुत जरूरी है किन्तु ये किसी भी महिला के लिए एक सजा से कम नही होती क्योकि माहवारी के समय हर महिला पर ना जाने कितनी सारी रोक लगा दी जाती है । इन पाबंदियों को देखने पर ऐसा महसूस होता है जैसे कि माहवारी महिलाओं को अछूत बना दिया है । किन्तु वैज्ञानिक दृष्टि और आधार में इसका कोई जवाब नही है बस ये एक ऐसी परम्परा है जो सदियों से लगातार चली आ रही है। महिलाएँ भी इस तरह की सोच के साथ आने वाली पीढ़ी को इस तरह की सीख देती हैं जिससे शिक्षा , अशिक्षा का कोई मायने नहीं रह जाता है। महवारी के दौरान होनेवाली तकलीफ़ों को ध्यान में रखकर बनाये ये नियम पता नहीं कब हमारी अंधभक्ति बन गई ।

विनिता परमार
केन्द्रीय विद्यालय रामगढ़ कैंट 
ईमेल – parmar_vineeta@yahoo.co.in

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पढ़ी-लिखी चुड़ैल: ‘स्त्री’!

साक्षी सिंह 

अमर कौशिक द्वारा निर्देशित और श्रद्धा कपूर, राजकुमार राव स्टारर हिंदी फिल्म ‘स्त्री’ देख कर आई. जाने की कोई ख़ास इच्छा नहीं थी क्योंकि फिल्म को ‘हॉरर-कॉमेडी’ की श्रेणी में रखा गया है. डरावनी फ़िल्में देख कर मुझे डर लगता है और आज कल कॉमेडी का मतलब सिर्फ़ ‘उपहास’ या कि कुछ ‘डबल मीनिंग जोक्स’ हो चुका है. इस सो कॉल्ड कॉमेडी के दोनों ही रूपों में मुख्य रूप से स्त्रियों को टार्गेट किया जाता है, जिससे कि मुझे शदीद परेशानी है. मगर अच्छे रिव्यूज़ और दोस्तों का साथ मिला सो चली गई. जाना अच्छा भी रहा और सबसे अच्छा तो इसी लिहाज़ में कि यहाँ कॉमेडी के नाम पर स्त्रियों की देह, चरित्र और मन को टार्गेट कर सिर्फ़ कुंठाओं को पोषित करनें का काम नहीं किया गया है.

फ़िल्म 31 अगस्त 2018 को ही रिलीज़ हो चुकी है सो अब तक उसकी कहानी, फिल्मांकन, अभिनय, आरम्भ, अंत आदि की खूबियों और ख़ामियों पर काफी बात-चीत हो चुकी है. इसलिए मैं यहाँ उन विषयों पर बात नहीं करूंगी. मगर एक ‘स्त्री’ होने के नाते इस फिल्म में मुझे क्या ख़ास लगा वो ज़रूर साझा करूंगी.
शुरू करते हैं फ़िल्म के नाम से, जहाँ अब-तक हिंदी भाषी क्षेत्रों में किसी मृत स्त्री की आत्मा को भूतनी, पिशाचिनी, चुड़ैल आदि-आदि कहनें का चलन रहा है, उसके उलट इस फ़िल्म में दिखाया गया है कि इस कहानी में लोग उस आत्मा को ‘स्त्री’ ही सम्बोधित करते हैं. लोगों को पता है कि वह पढ़-लिख सकती है, इसलिए वो अपने घरों के बाहर “ओ स्त्री कल आना” लिखते हैं. अगर इसके सांकेतिक अर्थ को देखें तो समझ आयेगा कि आज के वक़्त में जब कि लडकियाँ पढ़-लिख गई हैं, वे शब्दों के भाव और अर्थ समझनें लगी हैं. उन्हें अपनी क्षमताओं का पता है, तब आप भीतरी तौर पर भले ही उनसे नफरत क्यों ना करें उन्हें भला-बुरा कहें या उनके लिए भला-बुरा सोचें मगर ज़ाहिरी तौर पर तो आपको वे अपने साथ बदसुलूकी करनें की छूट कतई नहीं देंगी.
‘ओ स्त्री कल आना’ पढ़ कर स्त्री लौट जाती है, इसमें भी दो बातें नजर आती हैं. पहली कि, स्त्री को आप भले ही बुरी आत्मा मान रहे हैं मगर अपने साथ हुई नाइंसाफ़ी के बावजूद वह पुरुषों की भांति बलात् किसी के घर में नहीं घुसती बल्कि सामने वाले की इच्छा का सम्मान करते हुए वापस चली जाती है. दूसरी बात कि, जो ‘स्त्री’ बार-बार आ रही है, जिससे लोग डर और उसे कल आना पर टाल कर बेवकूफ़ बना रहे, वे ‘मत आना’ भी लिख सकते थे मगर नहीं लिखते क्योंकि वे जानते हैं कि वह स्त्री अपने साथ हुई नाइंसाफी का जवाब माँगने आती है, अपनें अधिकार के लिए आती है. अगर वे ‘मत आना’ लिखेंगे तो ‘स्त्री’ के विद्रोही हो जाने का भी डर रहेगा. हमारा आज का समाज भी कुछ ऐसा ही है वह ना तो स्त्रियों को उनके हक देता और ना ही देने से साफ़-साफ़ मना करता है. असल में स्त्री को लेकर लोगों के मन में बैठा डर किसी भूतनी या चुड़ैल का डर नही है बल्कि यह डर ‘हक़ माँगनें वाली पढ़ी-लिखी स्त्रियों का डर है’.

फ़िल्म में चंदेरी के ग़ायब हुए लोगों के उद्धारक के रूप में उस लड़के को दिखाया है ‘जिसकी आँखों में प्यार हो’ ना कि भुजाओं में बल. राजकुमार राव नें एक छोटे से कस्बे  के ‘लेडीज़ टेलर’ विक्की की भूमिका निभाई है. विक्की अच्छा दर्ज़ी है और एक दर्ज़ी की हैसियत से आस-पास उसका अच्छा नाम है. वो अपने काम को ही बेहतर तरीके से कर के खुश है. उसका ‘लेडीज़ टेलर’ होना कहीं भी उपहास की वजह नहीं बनता और ना ही अपना काम छोड़ वह  कुछ हिरोइक करने की फिराक में रहता है. एक सामान्य इंसान की तरह वह दोस्तों के साथ घूमता है, गालियाँ बकता है, प्रेम करता है और डरता भी है. कहीं भी हीरो बनने के चक्कर में बड़े-बड़े पौरुष भरे डायलॉग दर्शक के सर पर नहीं पटक देता. शुरू से अंत तक राव नें उसी सादगी से अपने किरदार को निभाया है.

वहीं स्त्री की उद्धारक स्वयं एक स्त्री यानि की श्रद्धा कपूर को बनाया है ना कि किसी पुरुष को, वह भी प्यार और मदद के रास्ते ही ना कि डर और दहशत के रास्ते. ‘स्त्री’ को जहाँ के लोगों नें बेईज्ज़त किया, उसे और उसके पति को मार दिया वहाँ वह इन्साफ के लिए सालों भटकती रही, पुरुषों को बंदी बना उनसे बदला लेती रही मगर उसे इंसाफ़ नहीं मिला बल्कि लोगों की धारणाएँ उसके लिए ग़लत ही बन गईं कि स्त्री पुरुषों को नंगा कर के सुहागरात मनाने के लिए ले जाती है. मगर श्रद्धा कपूर डर और दहशत की जगह राजकुमार राव को प्यार के माध्यम से ये समझाने में सफल हो जाती है कि ‘स्त्री को शरीर नहीं सिर्फ़ इज्ज़त और प्यार चाहिये’ जो कि बरसों पहले उससे छीन लिया गया था. फिल्मकार ने यहाँ परोक्ष रूप से ही सही मगर स्पष्ट कर दिया है कि ‘स्त्रियों’ को भी उनका हक और सम्मान, पुरुषों द्वारा बनाए हिंसा, भय और दहशत के रास्ते पर चल कर नहीं मिल सकता. स्त्री सशक्तिकरण के मायने ‘पुरुषों’ जैसा बन जाना कतई नहीं है और ना ही पितृसत्ता के समानांतर एक वैसी ही बर्बर सत्ता खड़ी करना है.

पितृसत्ता का वह भयानक जाल, जिसका शिकार हमेशा स्त्रियाँ रही हैं, उसे इस फ़िल्म में फिल्मकार नें पुरुषों पर डाल कर दिखाया है कि उसमें फंस कर पुरुष कैसे ख़ुद को बचाने के लिए घरों में बंद हो जाते हैं, टोटके करते हैं, परदा करते हैं, झुण्ड में बाहर निकलते हैं. किस प्रकार स्त्री का भय बढ़ने से धर्म की दुकानदारी बढ़ती है यह भी फिल्म में बीच-बीच में एक बोर्ड के माध्यम से साफ़ होता जाता है, बोर्ड एक पण्डे का होता है जिस पर ‘स्त्री’ से बचाने के नुस्खों का प्रचार और उसका दाम लिखा होता है और यह दाम देवी पूजन के उन चार दिनों में, जिनमें कि ‘स्त्री’ चंदेरी में अपना आतंक फैलाती, हर रोज़ बढ़ता दिखाई देता है.

इन मुद्दों के अतिरिक्त फिल्म में बीच-बीच में छोटे-छोटे डायलॉग्स के द्वारा कई कन्टेम्परेरी राजनीतिक मुद्दों को भी उठाया गया है. जैसे कि ‘भाई भक्त बनना अंधभक्त मत बनना’ ये आज कल बहुत ही प्रचलित राजनीतिक सटायर है जो कि समकालीन सत्ताधारी पार्टी के समर्थकों पर उनकी तर्कहीनता को चोटिल करनें के लिए किया जाता है. आधार कार्ड भी एक कंट्रोवर्सी बन चुका है जिसकी वजह से लोगों को अपनी प्राइवेसी और सुरक्षा दोनों पर ही ख़तरा मंडराता नजर आ रहा है, इस ओर भी इशारा करते हुए फिल्मकार नें पंकज त्रिपाठी से कहलवाया है कि स्त्री को सबके बारे में पता है क्योंकि ‘उसके पास सबका आधार लिंक है’. विजय राज ने एक अर्ध विक्षिप्त बूढ़े का किरदार निभाया है जो कि हर वक़्त ‘एमरजेंसी लगी है’ कि रट लगाए रहता है. यह भी एक एक खासा राजनीतिक तंज़ है. आज के भारत की राजनीतिक परिस्थितियों को देखते हुए देश भर के बुद्धिजीवी आए दिन इस और इशारा करते रहते हैं कि ‘यह दौर अघोषित एमरजेंसी का दौर है.

इस फ़िल्म की सबसे बड़ी खासियत जो मुझे लगी वह ये कि ऊपर लिखी बातों में बतौर दर्शक मैं जिन भी निष्कर्षों तक पहुँची हूँ, फ़िल्म में कहीं भी ऐसा नहीं लगता कि उसका कोई सीन या कोई संवाद दर्शक को वो बातें समझाने के लिए रखा गया है, बल्कि बहुत ही सहजता से हंसी-मज़ाक के लहज़े ये सभी बातें स्वाभाविक रूप से आई हुई जान पड़ती हैं. फ़िल्म कहीं भी बोझिल नहीं होती जिसके कारण हर तबके का दर्शक आसानी से शुरू से अंत तक जुड़ा रह सकता है और फ़िल्मकार बड़ी ही चतुरता से ‘हॉरर-कॉमेडी’ के ज़रिये अपनें सामाजिक सरोकार दर्शकों तक पहुँचा देता है.

साक्षी सिंह दिल्ली विश्वविद्यालय में शोधार्थी हैं. सम्पर्क: sakshipuspraj@gmail.com 

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पुलिस रिपोर्ट में हिन्दी विश्वविद्यालय की दलित छात्राएं निर्दोष, विश्वविद्यालय प्रशासन हुआ शर्मसार!

सुशील मानव

पिछले दिनों हिन्दी विश्वविद्यालय की पांच दलित शोधार्थियों/ विद्यार्थियों पर कार्रवाई करते हुए विश्वविद्यालय प्रशासन ने  उन्हें निलंबित कर दिया था, जब उनपर एक फर्जी मुकदमा वर्धा के एक थाने में दर्ज हुआ. अब उसी मुकदमे में कोई तथ्य नहीं पाते हुए पुलिस ने अपनी रिपोर्ट फ़ाइल कर दी है. इस रिपोर्ट के बाद विश्वविद्यालय प्रशासन को शर्मसार होना चाहिए लेकिन उसके अधिकारियों की कार्यप्रणाली से ऐसा दिखता नहीं है. प्रशासन पर सवाल उठ रहे हैं कि निलंबन तत्काल तो निलंबन वापसी में ‘प्रक्रिया’ क्यों? इसके पूर्व भी विश्वविद्यालय के प्रभारी रजिस्ट्रार के के सिंह द्वारा पीड़िताओं पर समझौते का दवाब बनाते बातचीत का एक ऑडियो वायरल हुआ था. सुशील मानव की रिपोर्ट: 

विश्वविद्यालय परिसर का एक भाग

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा की पाँच दलित लड़कियों के खिलाफ नजदीकी रामनगर पुलिस थाने में धारा 143, 147,149,312, और 323 में लिखाई गई एफआईआर की बुनियाद पर वर्धा यूनिवर्सिटी प्रशासन द्वारा उक्त पाँच लड़कियों को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया गया था। तीन महीने की आईजी स्तर से जाँच में निर्दोष पाए जाने के बाद आरोपित पाँचों लड़कियों को पुलिस प्रशासन द्वारा क्लीनचिट दे दिया गया। और उसकी एक कॉपी कल ही वर्धा विश्वविद्यालय को रिसीव करवा दी गई। आईजी जाँच में निर्दोष करार दिए जाने के बाद पाँचों छात्राएं जब यूनिवर्सिटी के रजिस्ट्रार से अपने निलंबन वापसी के बाबत जानकारी लेने गई तो रजिस्ट्रार ने बताया कि पुलिस जाँच की रिपोर्ट वीसी तक पहुँचा दी गई है और निलंबन वापसी की प्रक्रिया में है। इस बाबत जब इस रिपोर्ट के लिए मैंने कुलपति से फोन पर पूछा कि ‘आईजी जाँच में पाँचों लड़कियों को क्लीनचिट दिए जाने के बाद अब कितने समय में उन लड़कियों का निलंबन वापिस लिया जाएगा?’ तो इसके जवाब में वीसी ने कहा कि ‘अभी वह कागज यूनिवर्सिटी प्रशासन तक नहीं पहुँचा है। जब पहुँचेगा तो देख विचारकर फैसला लिया जाएगा।‘ मैंने जोर देकर कहा कि सर हमें पक्की जानकारी है कि पुलिस जाँच रिपोर्ट यूनिवर्सिटी प्रशासन तक कल ही पहुँच गई है।

इस सवाल पर बहुत हत्थे से उखड़ गये कुलपति गिरीश्वर मिश्र ने कहा कि ‘आप लोगों को क्या है क्यों पड़े हो इस मामले में। उन लड़कियों के खिलाफ़ एफआईआर हुई है।’ मैंने प्रतिप्रश्न किया, ‘एफआईआर तो आप पर भी हुई है यूनिवर्सिटी के और भी कई लोगों के खिलाफ़ हुई है। मेरी इस बात से तिलमिलाए वीसी महोदय ने मेरी कॉललाइन काट दी। मैंने कई बार फिर से प्रयास किया पर उन्होंने मेरा नंबर ब्लैकलिस्ट में डाल दिया। मेरा दूसरा प्रश्न अनुत्तरित रह गया। मैं वीसी महोदय से अगला प्रश्न यह पूछना चाहता था कि ‘उक्त पाँचों लड़कियों को क्लीचनिट मिलने के बाद क्या वर्धा यूनिवर्सिटी प्रशासन अपने गलत फैसले के लिए उन लड़कियों से माफी माँगेगा?’

इसके ठीक बाद मेरी बात रजिस्ट्रार केके सिंह से हुई। के के सिंह ने पाँचों लड़कियों के निलंबन वापसी पर पूछने के बाबत बताया कि निलंबन वापसी प्रक्रिया में है। वीसी इसे देख रहे हैं और जल्द ही इस पर फैंसला होगा। मैंने पूछा, ‘कुछ अनुमान ही बता दीजिए कितने दिन में होगी?’ तो उन्होंने कहा कि ये हम आपको नहीं बता सकते। बस इतना जान लीजिए की ये प्रक्रिया में है। इसके जवाब में कि ‘लड़कियों को क्लीनचिट मिलने के डॉक्युमेंट आपको कब मिले थे, उन्होंने बेहिचक कहा कि, ‘कल (11 सितम्बर) शाम को।’

वहीं पाँचों पीड़िताओं में से एक लड़की आरती से भी बात हुई। उसने फोन पर बातचीत में बताया कि ‘निर्दोष होते हुए भी हमें निलंबित कर दिया गया। निलंबन के बाद से हम पाँच लड़कियों ने पिछले तीन महीने से मानसिक और शारीरिक यातनाएँ झेली है।‘ वे बताती हैं कि ‘हमने बार-बार कुलपति और रजिस्ट्रार को बताया था कि हमलोग निर्दोष हैं और उसके सबूत विश्वविद्यालय में ही उपलब्ध हैं. अंततः पुलिस के आई जी से हमें मिलना पड़ा. उनके हस्तक्षेप से पुलिस ने जल्द जांच पूरी कर हमें क्लीनचिट दिया है.’  पुलिस जाँच में क्लीनचिट मिलने के बाद वे पिछले दो दिन से लगातार यूनिवर्सिटी कैंपस में रजिस्ट्रार और वीसी दफ्तर के चक्कर लगा रही हैं। रजिस्ट्रर द्वारा उन्हें बार-बार प्रक्रिया में होने को कहकर टाला जा रहा है । बता दें कि के के सिंह वही रजिस्ट्रार हैं जिनका कुछ दिन पहले फोनकाल ऑडियो वायरल हुआ था जिसमें वो पीड़ित लड़कियों को ही समझौते के लिए दबाव बनाते और धमकाते हुए साफ सुनाई पड़ते हैं। पीड़ित लड़कियों का कहना है कि जब यूनिवर्सिटी प्रशासन द्वारा निलंबन तत्काल कर दिया गया था, उसमें किसी तरह की आंतरिक जांच की प्रक्रिया नहीं अपनाई गई तो अब पुलिस से क्लीनचिट मिलने के बाद उनका निलंबन तत्काल वापिस क्यों नहीं लिया जा रहा। प्रक्रिया के नाम पर निलंबन वापसी में टाल-मटोल क्यों किया जा रहा है?

पूरा मामला क्या है-
बी. एड.–एम. एड. एकीकृत की छात्रा ललिता ने आरोप लगाया था कि शादी का झांसा देकर शोध छात्र चेतन सिंह लगातार उसका यौन शोषण करता रहा। और फिर 29 दिसंबर 2017 को उसने चेतन सिंह पर आईपीसी की धारा 376, 323, 506, 417 के तहत स्थानीय राम नगर पुलिस स्टेशन, वर्धा में केस दर्ज कराया। इस केस में विश्वविद्यालय की चार लड़कियां आरती कुमारी, विजयालक्ष्मी सिंह, कीर्ति शर्मा, शिल्पा भगत पीड़िता की गवाह थीं।विश्वविद्यालय की महिला सेल की सिफारिश पर हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा प्रशासन ने चेतन सिंह को यौन शोषण के आरोप में निष्कासित कर दिया। कुछ दिन बाद आरोपी चेतन सिंह को कोर्ट से इस शर्त पर जमानत मिली कि जमानत के बाद वो पीड़िता या गवाहों को किसी प्रकार से प्रताड़ित नहीं करेगा। इसके बाद आरोपी चेतन सिंह विश्वविद्यालय के महिला छात्रावास के निकट ही पंजाब राव कॉलोनी में अपनी पत्नी सोनिया के साथ किराए पर आकर रहने लगा।

कुलपति गिरीश्वर मिश्र और विश्वविद्यालय के शिक्षक एवं छात्र

इसी दौरान दिनांक 03 मई 2018 की शाम अपनी ज़रूरत के सामान लेने गई पीड़ित छात्रा ललिता और चेतन सिंह व सोनिया सिंह का आमाना-सामना हो गया, जिसके बाद गाली गलौज करते हुए चेतन सिंह कथित रूप से पीड़िता को थप्पड़ मारता है। और फिर उसी रात 8:00 बजे अपनी पत्नी सोनिया सिंह के साथ रामनगर पुलिस थाना में जाकर चेतन सिंह ललिता के खिलाफ धारा 504, 506 के तहत एनसीआर दर्ज कराता है । ललिता भी विश्वविद्यालय के महिला छात्रावास के कर्मचारी, गार्ड, केयरटेकर तथा 3 महिला मित्र के साथ रामनगर थाने में चेतन सिंह के खिलाफ धारा 324 के तहत केस दर्ज कराती है। फिर दिनांक 08 मई 2018 को चेतन सिंह की पत्नी सोनिया सिंह द्वारा हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा को लिखित शिकायत पत्र दिया जाता है जिसमें पीड़िता पक्ष की 4 मुख्य गवाहों पर आरोप लगाए गए कि उन सबने चेतन सिंह व उसकी पत्नी के साथ मारपीट की जिसके दौरान उसका गर्भपात हो गया। इस मामले में सेवाग्राम से बनी एक मेडिकल रिपोर्ट के आधार पर 07 जून 2018 को उक्त पाँचों लड़कियों के खिलाफ़ एफआईआर दर्ज कर ली गई। एन.सी.आर. में जहाँ पीड़िता के अलावा किसी का भी नाम नहीं था वहीं बाद में एफआईआर में चार अन्य नाम लड़कियों के नाम जोड़ दिया गया।इसी केस के सिलसिले में रामनगर थाने के पी.एस.आई.सचिन यादव पीड़िता और उसके साथ के गवाह लड़कियों व उनके अभिभावकों को धमकी देता है कि “5 लड़कियों की पीएच-डी. खत्म करवा दूँगा और सब को जेल कराऊँगा”। पी.एस.आई. का यह रवैया देखकर पीड़िता लड़कियों ने इसकी शिकायत आईजी नागपुर से की। आईजी ने मामले पर तुरंत संज्ञान लेते हुए वर्धा एसपी से जांच प्रक्रिया शुरू करवाई। इस बीच पीएसआई का ट्रांसफर हो गया. 6 जुलाई 2018 को आरोपियों के बयान दर्ज़ कराए गए। उसी दिन 6 जुलाई 2018 को एफआईआर को आधार बनाते हुए विश्वविद्यालय द्वारा 5 लड़कियों को बिना किसी प्राथमिक जांच किए निलंबित कर दिया गया। जोकि पूर्णतयः असंवैधानिक था। इन लड़कियों का निलंबन मुंबई न्यायालय के आदेश क्रमांक 9889/2017 का खुला उल्लंघन है जिसमें साफ-साफ कहा गया है कि केवल एफआईआर दर्ज होने के आधार पर विद्यार्थियों के शिक्षा लेने के संवैधानिक अधिकार का हनन करने का अधिकार किसी संस्था के पास नहीं है। तो क्या अब यूनिवर्सिटी के वीसी अपनी इस गंभीर और असंवैधानिक गलती के लिए उन लड़कियों से माफी माँगेंगे जिन्हें उनके असंवैधानिक कार्रवाई के चलते मानसिक, शारीरिक, सामाजिक, विश्वविद्यालय प्रशासन व पुलिसिया यंत्रणाओं से गुजरना पड़ा।

सुशील मानव फ्रीलांस जर्नलिस्ट हैं. संपर्क: 6393491351

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भीमा-कोरेगांव हिंसा पर एनडीए के डिप्टी मेयर की फैक्ट फायन्डिंग रिपोर्ट से उड़ सकती है सरकार की नींद

एक ओर पुणे, महाराष्ट्र की पुलिस सामाजिक कार्यकर्ताओं, बुद्धिजीवियों, वकीलों को भीमा-कोरेगाँव में 1 जनवरी को हुई हिंसा का दोषी मानते हुए गिरफ्तार कर रही है, जिसे सरकार का समर्थन और तर्क मजूबती से समर्थन दे रहा है, वहीं एनडीए के सहयोगी दल आरपीआई (ए) के कोटे से पुणे के डिप्टी मेयर डा. सिद्धार्थ धेंडे की अध्यक्षता वाली 9 सदस्यीय फैक्ट फायन्डिंग टीम की रिपोर्ट हिन्दूवादी नेता और सरकार को इस मामले में कटघरे में खड़ा कर रही है. यह रिपोर्ट कोल्हापुर रेंज के आईजी को सौपी गयी है. 

रिपोर्ट में आया भिड़े का नाम, प्रधानमंत्री के साथ भिड़े


रिपोर्ट के मुताबिक यह हिंसा सुनियोजित थी, जिन्हें रोकने के लिए पुलिस ने कुछ नहीं किया और मूकदर्शक बनी रही। यही नहीं, रिपोर्ट ने हिंसा को साजिश बताया है और कहा है कि हिंदूवादी नेता मिलिंद एकबोटे और संभाजी भिड़े ने करीब 15 साल से ऐसा माहौल बना रखा है, जिनसे हिंसा की स्थिति पैदा हुई।

भीमा कोरेगांव कमिशन मुम्बई में इसकी सुनवाई चल रही है। फैक्ट-फाइंडिंग टीम के एक सदस्य को कमीशन सुनेगा।  टीम की रिपोर्ट में कहा गया है कि एकबोटे ने धर्मवीर संभाजी महाराज स्मृति समति की स्थापना वधु बुद्रक और गोविंद गायकवाड़ से जुड़े इतिहास को तोड़ने-मरोड़ने के लिए की थी। महार जाति के गायकवाड़ ने शिवाजी महाराज के बेटे संभाजी महाराज का अंतिम संस्कार किया था।

जातियों के बीच खाई खोदने की कोशिश 
रिपोर्ट में कहा गया है- ‘संभाजी महाराज की समाधि के पास गोविंद गायकवाड़ के बारे में बताने वाले बोर्ड को हटाकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक केबी हेडगेवार का फोटो लगाया गया था, जिसकी कोई जरूरत नहीं थी। यह अगड़ी और निचली जातियों के बीच खाई बनाने के लिए उठाया गया कदम था। अगर पुलिस ने कोई कदम उठाया होता तो किसी अनहोनी को रोका जा सकता था।’ रिपोर्ट में आरोप लगाया गया है कि भीमा-कोरेगांव के पास सनासवाड़ी के लोगों को हिंसा के बारे में पहले से पता था। इलाके की दुकानें और होटेल बंद रखे गए थे।

दंगाई कहते रहे, ‘पुलिस हमारे साथ’ 
रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया है कि गांव में केरोसिन से भरे टैंकर लाए गए थे और लाठी-तलवारें पहले से रखी गई थीं। रिपोर्ट में पुलिस के मूकदर्शक बने रहने का दावा करते हुए एक डेप्युटी एसपी, एक पुलिस इंस्पेक्टर और एक अन्य पुलिस अधिकारी का नाम लिया गया  है। दावा किया गया है कि की बार हिंसा के बारे में जानकारी दिए जाने के बाद भी पुलिस ने गंभीरता से नहीं लिया। यहां तक कि रिपोर्ट के मुताबिक दंगाई यह तक कहते रहे- ‘चिंता मत करो, पुलिस हमारे साथ है।’

भिड़े-एकबोटे ने बदली इतिहास की पटकथा 
रिपोर्ट में कहा गया है कि सादी वर्दी में मौजूद पुलिस भगवा झंडों के साथ भीमा-कोरेगांव जाती भीड़ को रोकने की जगह उनके साथ चल रही थी। धेंडे ने दावा किया है कि इस बात का सबूत दे दिया गया है कि दंगे सुनियोजित थे और उनका एल्गार परिषद से कोई लेना-देना नहीं है, जैसा कि पहले आरोप लगाया गया है।

सिद्धार्थ धेंडे

उन्होंने बताया कि इतिहास से पता चलता है कि भीमा कोरेगांव और आसपास के इलाकों में दलितों और मराठाओं के बीच दुश्मनी नहीं थी लेकिन भिड़े और एकबोटे ने इतिहास की पटकथा को बदलकर सांप्रदायिक तनाव पैदा किया। समय के हिसाब से हिंदुत्ववादी ताकतों के संबंध को दिखाया है।  हालांकि सरकार भिड़े और एकबोटे की गिरफ्तारी से बचती रही है.

खबर का इनपुट नवभारत टाइम्स और आरपीआई (ए) के अंदरुनी सूत्र)

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सुप्रीम कोर्ट ने मीडिया पर प्रतिबंध मामले में बिहार सरकार से मांगा जवाब, मीडिया-गाइडलाइन बनाने की बतायी जरूरत

स्त्रीकाल डेस्क 


मुजफ्फरपुर शेल्टर होम में बच्चियों से बलात्कार मामले की जांच पर मीडिया रिपोर्टिंग पर प्रतिबंध लगाने के मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार और सीबीआइ को नोटिस जारी कर उसका जवाब मांगा है। सुप्रीम कोर्ट ने पटना उच्च न्यायालय के आदेश के खिलाफ दायर की गई याचिका पर मंगलवार को सुनवाई की। हालांकि सुनवाई के दौरान कोर्ट ने मीडिया की भूमिका पर भी सवाल खड़े किये। 18 तारीख तक नोटिस का जवाब मांगते हुए कोर्ट ने दो सदस्यों को नामित किया कि वे बिहार सरकार को मीडिया गाइडलाइन बनाने में मदद करें- सदस्य हैं, शेखर नफाड़े और अपर्णा भट्ट। इस बीच सुप्रीम कोर्ट ने पटना हाई कोर्ट द्वारा बच्चियों से बातचीत करने के लिए नियुक्त कोर्ट के प्रतिनिधि प्रकृति शर्मा की नियुक्ति पर भी रोक लगा दी है।

मुजफ्फरपुर के बालिका गृह में नाबालिग बच्चियों के साथ कथित रूप से बलात्कार और यौन शोषण किया गया था। मामले के खुलासे के बाद इसकी जांच की जिम्मा सीबीआइ को सौंपा गया था, जिसकी पटना हाइकोर्ट जांच की मॉनिटरिंग कर रहा है। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने भी स्वतः संज्ञान भी लिया था। पढ़ें स्त्रीकाल में सम्बन्धित रिपोर्ट:

1. बिहार में बच्चियों के यौनशोषण के मामले का सच क्या बाहर आ पायेगा?
2. बच्चों के यौन उत्पीड़न मामले को दबाने, साक्ष्यों को नष्ट करने की बहुत कोशिश हुई: एडवोकेट अलका           वर्मा
  3. उस बलात्कारी की क्रूर हँसी को, क्षणिक ही सही, मैंने रोक दिया: प्रिया राज

याचिकाकर्ता निवेदिता ( वरिष्ठ पत्रकार और स्त्रीकाल के सम्पादन मंडल की सदस्य) की याचिका की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति मदन बी लोकूर और न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता की पीठ ने राज्य सरकार और केंद्रीय जांच ब्यूरो से 18 सितंबर से पहले जवाब मांगा है । याचिकाकर्ता की ओर से ऐडवोकेट  फौज़िया शकील मामले की पैरवी कर रही हैं.

इस मामले में कुछ गिरफ्तारियाँ हुई हैं और राज्य सरकार के मंत्रियों की भूमिका भी इस मामले में संदिग्ध रही है.

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देशवासियों के नाम पूर्वोत्तर की बहन का एक खत

तेजी ईशा

प्रिय देशवासियों, 
यह खत  इस उम्मीद के साथ कि आप इसे पढ़ पाएंगे.
मुझे नहीं पता कि मेरे साथ यह सब क्यों हो रहा हैं? मैंने जिस धरती पर अपना सबकुछ, इसी धरती पर प्रेम करते हुए निकाल दिया, वही धरती अब मुझे बेदखल करने के लिए राजनीतिक स्तर पर तैयार है. मुझे नहीं पता यह सब किसलिए और क्यों हो रहा है. मेरे बेटे का कुछ माह पहले ही गोवाहटी के एक कॉलेज में दाखिला हुआ है. और कुछ छिट-पुट काम भी यही इसी शहर में कर रहा है. हम इस शहर, इस मुल्क, इस जमीन से निकाल दिए जायेंगे तो कौन-सी जगह पर रहेंगे. कौन-सा देश, कहाँ के शरणार्थी और कहाँ की नई अकल्पनीय भौगोलिक स्थिति और पराई भाषा! कैसे जाएंगे हम अपना जीवन समेट कर और कहाँ जाएँगे?



मेरी दुर्गा माता की मूर्ति क्या मेरे साथ जा पायेगी? कुछ दिन बाद ही दुर्गा माँ आने वाली हैं, क्या मैं उसे छोड़ के चली जाउंगी? बिहू के गीत “ऊई.. जान.. ऊई.. जान.. जानमोनी होपुनोटे आहिबा..” जैसे कई गीत कान में सुनते-सुनते याद होंगे. मुझे वास्तव में नहीं पता कि कांग्रेस और भाजपा क्या है? मुझे यह, केवल इतना पता है कि मैं गोवाहटी की सुपारी खाती हूँ और मेरे गाल के कोने में पान समेटा रहता है. यही रहते हुए मैंने अपने बाबा-अब्बू से जाना कि दूर-दराज के रिश्ते और अदब-व्यवहार कैसे निभाए जाते हैं. देश-प्रदेश-राज्य क्या है! क्या होता है ! नहीं पता है. बस यह पता है कि हम जहाँ हंसी-ख़ुशी पुश्तों से रह रहे हैं वही मेरा देश है. मेरे फेफड़े में जहाँ की हवा पिछले पचपन सालों से भड़ती हुई साँस से जीवन सेंक रही है वही मेरा देश है.

पड़ोस की नसरीन ने मुझे अगले ईद में हाथ से बनी मेजपोश की मांग की है. नारंगी, हरे और उजले मोटे धागें ले आई हूँ. क्रोशिय पर धागे से कई घर बीन चुकीं हूँ. क्या इस धागे के घर को भी ठीक इसी घर की तरह छोड़ के जाना है. नसरीन के हाथों की जादुई मालिश हर दर्द की दवा है. क्या उसकी इस दवा को मैं ले जा पाऊँगी? नसरीन यूँ ही हमेशा की तरह पड़ोस के अग्रवाल जी, पाएंग़जी और जैन की बीबियों को उसके हाथ-पैर दर्द करने पर प्यार से मालिश करेगी. पर मैं अपने ऐसे दर्द के साथ कहीं किसी अनिश्चित जगहों पर रहूंगी बिना नसरीन की, उसकी मालिश की, उसके बक-बक की.

बारिश आने से पहले ही बरांडा के लिए कुछ फूल-पात्र लिए थे. जोरहाट से कुछ रेशमी फूल के उद्भिद (पौधा) मंगवाए थे. उसकी दो-चार पत्तियां इस नए जगह को अपना घर मान कर आ गईं हैं. यह गमला इस नए पौधें का नया घर है जिसमें यह अपना सर्वस्व जमा चूका है. क्या मैं इसे अपने पूर्णता के साथ ले जा पाऊँगी. मुझे तो यह भी उम्मीद नहीं है कि मैं इस बैगनी फूलों को देख पाऊँगी. अमित ने इसे अपने ननिहाल से ला कर दिया था. यह गमला यहाँ रह जायेगा तो इसे रोज पानी कौन देगा? कौन इसे रोज सिर्फ दस मिनट धूप में रखेगा? पता नहीं शायद इसकी मिट्टी में मरने से पहले वाली झुर्री होगी और यह भी पौधे सहित मेरी तरह अलविदा ना कह दे.

बोरा की बेटी हुई है. बिलकुल अपने माँ पर गई है. गुझिया बना कर मैंने सबका मुंह मीठा किया. बोरा के ससुरालवालों ने कहा है कि इन्हें अगले दफे सिक्किम ले जाने के लिए गुझिया चाहिए. वो लोग अपनी होली अपने पोती के ननिहाल में ही मनाएंगे. आनेवाली होली के रंगों में मेरे हाथों के छाप किसी पाचिल (दिवाल), वस्त्र (कपड़े) और परदे होंगे कि नहीं – पता नहीं. गलियों में “ऐखने असो” (इधर आओ) की मेरी आवाज किसी को नहीं सुनाई देगी. “छेड़े येबेना ना.. ” (छोड़ना नहीं किसी को) की हंसीली आवाज भी मेरी कानों में नहीं आएगी.

कल ही अरुणाचल के गाँव मायोंग से कासिफ और उसकी बेगम आस्फा आईं थी. उसने बताया कि सरकार ने लुकानो नाम (बचा नाम) को फिर से माँगा है. ईद पर मैंने उन्हें सेवैयाँ और मेजपोस्त भिजवाकर हामिद के जन्मदिन पर आने को कहा था. पर सरकार के इस गणना वाले फरमान के बाद दूर-दराज से कोई नहीं आया.
यह दूरियां अब बढ़ती ही जाएगी. और छुटती जाएगी सभी बातें-हंसी-दुलार. मेरे बरांडे पर दिन भर मस्ती करती ये नई-नह्न्कू चूजों को देख कर ऐसा लगता है कि किसी दिन ठीक उसी कुत्ते की तरह, दीवार फांद कर कोई हमें झपट्टा न मार दे.

मुझे कई दिनों से यह लग रहा है कि दीवार पर टंगे वो प्लास्टिक के फूलों की तरह हमारा वजूद है जो कुछ सालों तक तो धोकर अपने साथ टांग कर रखा जाता है और फिर उसे अपने से हटा दिया जाता है जिसका पता किसी को नहीं होता है.

बारिश लगातार हो रही है. ज्योति ने परसों ही कहा था कि आंटी गोभी आने में देर है, प्याज के पकोड़े ही खिला दो. इस बारिश उसकी फरमाइश पूरा करते हुए सोच रही हूँ कि अगली बारिश में कहाँ आलू के चिप्स सुखाउंगी! बना भी पाऊँगी कि नहीं! यदि बना भी लिया तो चित्रा, हामिद, नजीब, जोसेफ तो नहीं होंगे न छत पर चिड़ियों को भगाने के लिए. उस डर में भी नहीं रह पाऊँगी कि कहीं इन शरारती बच्चों के पैर से चिप्स न टूट जाए. इन गर्मियों में तो दो छोटे-बड़े मर्तबान अचार के इनसे टूट गये थे. क्या मैं अगली गर्मी किसी पर ये प्यार वाला गुस्सा निकाल पाऊँगी? हो सकता है मेरा मर्तबान शायद आचार से न भरे, मर्तबान भी हो कि नहीं  पता नहीं.
घर के पीछे अदरक और धनिए को बोया है. इसे कैसे बड़े होता देखूंगी? इसके नन्हें कोमल नये पत्तों पर से क्या फिर मक्खी उड़ा पाऊँगी?

छत के कोने में बने ईटों के कुर्सी को कहाँ-कैसे लेकर जाउंगी जिसपर अकेलेपन में बैठने पर हिम्मत मिलती है. जहाँ हम फेंके जाने वाले हैं वहां क्या छत होगा? वो चौड़ी ईंट की भूरी खुरदरी कुर्सी होगी? जिससे उठने पर हम हमेशा अपने दुप्पटे को छुड़ा कर सारे गुस्से को निकालते थे. क्या वो अकेलापन होगा जो कई सालों से इस घर के मिट्टी में रचने बसने के बाद बना है. इस अकेलेपन और उस होने वाले अकेलेपन में वो पिया (तोता) पीछे से टांय बोलकर टोकेगा कि नहीं?

चार गली आगे जो मोदीखाना (किराने की दुकान) के बगल में बैठा ब्योसको भिक्खु (बुड्डा-भिखाड़ी) को रोज कौन रोटी देगा? अच्छा है यह यही रहे. कम-से-कम इसी जगह. उसकी मुस्कराहट, यहाँ तक की गालियाँ भी सुनते सुनते अपना-सी लग गईं होंगी. नई जगह पर शायद सब नया सा लगे. मुस्कराहट तो मिलते मिलते रह जाएगी. शायद  बची साँस भी उस मुस्कुराहट की उम्मीद से चली जाए. दो दिनों से जब भी इसे देख रही हूँ तो एक डर जैसा लगता है कि मुझे भी कोई रोटी देने वाला बचेगा क्या ?

इस एक नये शब्द ने एन.आर.सी. ने मेरे जीवन को पूरी तरह से बदल दिया है. यह मेरे जीवन का एक नया ककहरा बन गया है, जिसमें क, ख, ग की जगह एन, आर, सी को पढ़ने और सीखने की कोशिश कर रही हूँ. इसे पढ़ते और सीखते हुए मैं कभी-कभी अपने भविष्य की तरफ भी यूँ ही ऑंखें ऊँची करके देखने लगती हूँ. वहां पहुंचकर थोड़ा ठिठक कर मेरे कानों में मुझे यह सुनाई देता है – जन गण मन अधिनायक जय हे! क्या मैं इससे बाहर हो गई हूँ? मैंने इस धरती का सूरज देखा है, मैं यहाँ की बारिश में नहाई हूँ, मुझे यहाँ की धूप से बहुत अलग किस्म का लगाव है. मेरी सारी मुस्कुराहटें, मेरा सारा प्रेम, मैंने इसी जगह पर सीखा है, मेरी कभी कभी की तकलीफें, कभी कभी का थोड़ा दुःख, थोड़ा रोना, थोड़ा अकेलापन मैंने इसी धरती पर महसूस किया है. लेकिन अब जो अकेलापन मिलने वाला है, क्या वो सच में अकेलापन है या इस भरे-पूरे जीवन को जीने के बाद किसी भयावह बीहड़ जंगल में फेंक दिए जाने के दुस्वप्न को लगातार जीना मेरी इन सांसों में समा गया है. मुझे किसी से कोई शिकायत नहीं है. खुद अपने से भी नहीं. जीवन में यह पहली बार महसूस होता है कि शिकायत का कोई अर्थ नहीं. मेरा खुद का होना ही अपने में एक शिकायत है. इसे ना मैं देख पा रही हूँ. और ना ही कोई दूसरा. इस पूरे ब्रह्माण्ड में मेरे होने की शिकायत को इस उपग्रह को कोई वितान देख पा रहा है नहीं कोई पत्रकारिता की सनसनी भरी खबर.

मैं जहाँ भी जाउंगी, अपने इस मुल्क को अपने साथ ही जीऊँगी. मेरा यह सब लिखना मेरी गूंगी आवाज को शब्द देने का प्रयास ही है, पता नहीं आप इस आवाज को सुन पाएंगे कि नहीं.
आपकी
इसी मुल्क की अभी तक की एक नागरिक

तेजी ईशा पूर्वोत्तर पर शोध कर रही है

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