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केंद्र सरकार के न चाहने पर भी सुप्रीम कोर्ट ने खत्म की व्यभिचार की धारा: महिला विरोधी थी यह धारा



स्त्रीकाल डेस्क 


केंद्र सरकार के न चाहने के बावजूद सुप्रीम कोर्ट में पांच जजों की संविधान पीठ ने गुरुवार को भारतीय आचार दंड संहिता (आईपीसी) की धारा (व्यभिचार) को हटा दिया है. 158 साल पुरानी इस धारा पर फैसला सुनाते हुए देश के प्रधान न्यायाधीश  दीपक मिश्रा ने कहा, “यह अपराध नहीं होना चाहिए.”  कोर्ट ने कहा कि इसमें कोई संदेह नहीं कि यह तलाक का आधार हो सकता है लेकिन यह कानून महिला के जीने के अधिकार पर असर डालता है. कोर्ट ने कहा कि पति महिला का मालिक नहीं है और जो भी व्यवस्था महिला की गरिमा से विपरीत व्यवहार या भेदभाव करती है, वह संविधान के अनुकूल नहीं है. जो प्रावधान महिला के साथ गैरसमानता का बर्ताव करता है, वह असंवैधानिक है. कोर्ट ने कहा कि यह कानून महिला की चाहत और सेक्सुअल च्वॉयस का असम्मान करता है. चीफ जस्टिस ने कहा कि यदि व्यभिचार की वजह से एक जीवनसाथी खुदकुशी कर लेता है और यह बात अदालत में साबित हो जाए, तो आत्महत्या के लिए उकसाने का मुकदमा चलेगा. कोर्ट ने कहा कि पुरुष हमेशा फुसलाने वाला, महिला हमेशा पीड़िता – ऐसा अब नहीं होता.

क्‍या थी धारा 497 
आईपीसी की धारा निरस्त धारा के अनुसार  497 के तहत अगर शादीशुदा पुरुष किसी अन्‍य शादीशुदा महिला के साथ संबंध बनाता है तो यह अपराध है. लेकिन इसमें शादीशुदा महिला के खिलाफ कोई अपराध नहीं बनता है.
धारा को इन शब्दों में पढ़ा जा सकता है: 

Whoever has sexual intercourse with a person who is and whom he knows or has reason to believe to be the wife of another man, without the consent or connivance of that man, such sexual intercourse not amounting to the offence of rape, is guilty of the offence of adultery, and shall be punished with imprisonment of either description for a term which may extend to five years, or with fine, or with both. In such case the wife shall not be punishable as an abettor.

कोई भी व्यक्ति किसी ऐसी स्त्री से, जो दूसरे की पत्नी हो, या वह व्यक्ति यह जानता हो या विश्वास करता हो कि वह दूसरे की पत्नी है, बिना उसके पति की अनुमति या सहयोग के, शारीरिक संबंध बनाता हो और ऐसा शारीरिक सम्बन्ध यदि बलात्कार न हो तो वह ऐडलटरी, व्यभिचार, जारकर्म का दोषी है. वह 5 सालों तक की सजा, या आर्थिक दंड, या दोनो का, भागी होगा. और वह पत्नी अपराध की सहभागी की तरह दंड की पात्र नहीं होगी.

व्याख्या से स्पष्ट है कि कथित व्यभिचार में शामिल महिला के पति के चाहने पर ही उसमें शामिल पुरुष पर मुकदमा हो सकता है. यानी सहमति से स्त्री संबंध रख सकती थी.  इस कानून के तहत अगर आरोपी पुरुष पर आरोप साबित होते है तो उसे अधिकत्‍तम पांच साल की सजा हो सकती है. इस मामले की शिकायत किसी पुलिस स्‍टेशन में नहीं की जाती है बल्कि इसकी शिकायत मजिस्‍ट्रेट से की जाती है और कोर्ट को सबूत पेश किए जाते हैं.

केन्‍द्र सरकार ने दी थी ये दलीलें 
केंद्र सरकार ने IPC की धारा 497 का समर्थन किया था. केंद्र सरकार ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट भी ये कह चुका कि जारता विवाह संस्थान के लिए खतरा है और परिवारों पर भी इसका असर पड़ता है.
केंद्र सरकार की तरफ असिस्टेंट सोलिसिटर जनरल पिंकी आंनद ने कहा था अपने समाज में हो रहे विकास और बदलाव को लेकर कानून को देखना चाहिए न कि पश्चिमी समाज के नजरिये से.

पढ़ें: असीमित व्यभिचार का कानूनी दरवाजा: बहन के नाम वकील भाई की पाती

फैसले की मुख्य बातें: 
सुप्रीम कोर्ट ने कहा- किसी पुरुष द्वारा विवाहित महिला से यौन संबंध बनाना अपराध नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने व्यभिचार कानून को बताया असंवैधानिक , कहा-चीन, जापान, ब्राजील में ये अपराध नहीं
चीफ जस्टिस ने कहा-व्यभिचार  कानून महिला के जीने के अधिकार पर असर डालता है.
चीफ जस्टिस ने कहा-इसमें कोई संदेह नहीं कि व्यभिचार तलाक का आधार हो सकता है, मगर यह अपराध नहीं हो सकता
चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने कहा – भारतीय संविधान की खूबसूरती ये है कि ये I, me and U को शामिल करता है
सुप्रीम कोर्ट ने कहा-जो भी सिस्टम महिला की गरिमा से विपरीत या भेदभाव करता है वो संविधान के गुस्से को आमंत्रित करता है. जो प्रावधान महिला के साथ गैरसमानता का बर्ताव करता है वो अंसवैंधानिक है
पांच में से दो जज  व्यभिचार कानून को रद्द करने को लेकर हुए एकमत. बहुमत से दिया फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने कहा-यह पूर्णता निजता का मामला है, महिला को समाज की चाहत के हिसाब से सोचने को नहीं कहा जा सकता.
इनपुट एनडीटीवी

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मन की बात और स्वच्छता की ढोंग वाली सरकार ज़रा हम सफाई कर्मियों का दर्द भी सुन लो!


सुशील मानव 


अंबेडकर महासभा द्वारा सफाईकर्मियों की सीवर में मौत के खिलाफ़ 25 सितंबर को देशव्यापी आंदोलन के आह्वान पर ‘सफाई कर्मचारी यूनियन दिल्ली’ की ओर से जंतर-मंतर पर 25 सितंबर को 11 बजे से एक धरना प्रदर्शन आयोजित किया गया, जिसमें सीवर में मरे मजदूरो के पीड़ित परिवारजनों समेत भारी संख्या में सफाईकर्मी और समाज के अन्य तबके के लोग शामिल रहे। इस प्रदर्शन को कई महिला संगठन, कर्मचारी संगठन और राजनीतिक दलों का समर्थन मिला। कई राजनेताओं और संगठनों के मुखिया ने सफाई कर्मचारी आंदोलन के मंच से वहां मौजूद लोगो को संबोधित किया।

 

एक सीवर की सफाई में अपना शौहर खो चुकी पूजा ने मंच से कहा कि अपने सरकार ने नौकरी तो दिलवाई लेकिन उसकी तनख्वाह महीने के 6 हजार ही मिलते हैं। उसमें मैं अपने घर को चलाऊँ कि बच्चों को पढ़ाऊँ। मैं चहती हूँ किसी भी बहन के साथ ऐसा न हो, न ही किसी के बच्चे अनपढ़ रहें।

लुधियाने से आई ममता ने बताया कि उनके पति की सीवर में डूबने सो मौत हो गई थी। उनके बच्चे अभी बहुत छोटे-छोटे हैं। हमें 6 हजार सैलरी मिलती है, उतने से गुजारा नहीं हो पाता। आखिर कब तक हम बहने सीवरों में अपना आदमी खोते रहेंगे, कब तक अपने बच्चों को लावारिश बनाते रहेंगे। कब तक ये आंदोलन चलता रहेगा? सीवर में जाने का मतलब है अपने घर के लोगों को बेघर करो। बच्चों को अनाथ और अनपढ़ करो।

सीवर में अपना एकलौता बेटा गँवा चुकी एक महिला ने मंच से अपना दुःख, अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुए बताया कि मेरा एकलौता बेटा था। पांच हजार रुपए की नौकरी करता था। एक रोज उन लोगों ने हमारे बच्चे को 500 रुपए का लालच देकर सीवर में उतार दिया था, बेटा सीवर में जैसा गया वैसा का वैसा रह गया, निकल भी नहीं पाया। सरकार ने उस वक्त सहायता के वादे तो कई किए थे पर दिया कुछ भी नहीं। हम तिरपाल तानकर रहते हैं। मेरे घर में कमाने वाला कोई नहीं है। दो बच्चियाँ हैं, एक तो अभी बहुत छोटी है और बीमार है। कमाने वाला चला गया अब न तो हमेरे पास रहने का ठिकाना है न खाने का। हम क्या करें कहाँ जाएँ क्या खाएँ?’
वहीं 9 सितंबर 2018 को पश्चिमी दिल्ली के डीएलएफ कालोनी में सीवर की सफाई में मरे सरफराज के पिता ने कहा कि भले ही सरकार ने हमारे बेटे की मौत के मुआवजे में कुछ भी न दिया गया हो फिर भी हम सरकार से विनती करते हैं कि हमारे बेटे की मौत के लिए जो लोग जिम्मेदार हैं उनके खिलाफ वह कड़ी सजा सुनिश्चित करे और उनकी कंपनी को बंद किया जाए। 

वहीं उसी घटना में मरे दूसरे मजदूर विशाल के बड़े भाई अंगद ने मंच से बताया कि उसका भाई पंप ऑपरेटर था उसपर दबाव बनाकर जबर्दस्ती वहाँ भेजा गया। तीन टैंको की सफाई के लिए 6 लोग थे। हर टैंक में दो-दो लोग उतरे। 20-25 फुट गहरा सीवर। जबकि दूसरा जना सीढ़ी पकड़ने के लिए था। सीवर में मेरा भाई घुस गया थोड़ी देर में जब ऑक्सीजन मिलना बंद हो गया तो मेरे भाई की साँस फूलने लगी। जो जना पानी लेने गया था वो लौटकर आया तो उसने विशाल को आवाज दी। वह जवाब नहीं दे सका। चार लोगों ने मिलकर उसे बाहर निकाला तो उस वक्त मेरा भाई विशाल जिंदा था, वो चलकर एंबुलेंस में गया। एंबुलेंस में ऑक्सीजन जैसी कोई सुविधा नहीं थी। उसे मोतीनगर के किसी अस्पताल में ले जाया गया, वहाँ वह लगभग पौना घंटा जिंदा था। वहाँ उसने नर्स को खून दिया है, तीन-चार उलटिंया की हैं, उसके बाद उसे आरएमएल रेफर कर दिया गया, वहाँ जाने तक मेरा भाई जिंदा था। वहाँ उसके साथ उस कंपनी या बिल्डिंग का भी व्यक्ति साथ नहीं गया था। एंबुलेंस उसे आरएमएल के स्ट्रेचर पर छोड़कर चली गई थी। हम लोग साथ में जाते हैं तब तो कोई सुनवाई सरकारी अस्पताल में होती नहीं है। वो तो फिर भी अकेला था। उसकी हर्टबीट बहुत धीमे धीमे आ रही थी। थोडी देर बाद उसकी मृत्यु हो गई। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में उसके पेट से डेढ़ सौ एमएल कीचड़ मिला है। मैं सरकार से यही कहना चाहूँगा कि इसकी निष्पक्ष जांच कराई जाए और जो दोषी हो उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई हो। 

सफाई कर्मचारी आंदोलन की कोर मेंबर विमल थोराट ने मंच से कहा कि ‘आज सफाई कर्मचारियों की इतनी बड़ी संख्या में मौत इसलिए हो रही है क्योंकि जो ढाँचा है उसे बदलने के लिए सरकार तनिक भी तैयार नहीं है। मनुस्मृति में जिस तरह लिखा गया है उसकी उसी तरह पालन किया जा रहा है। पिछले दस सालों में जो पौने दो हजार मौते हुई हैं उसकी जिम्मेदार सिर्फ और सिर्फ सरकार है। हम किसी से उम्मीद नहीं रखते हैं लेकिन हम उम्मीद रखते हैं हमारी सिविल सोसायटी, जो नागरिक समुदाय है, उसकी आज क्या जिम्मेदारी बनती है,वह अपनी जिम्मेदारी निभाए।

पढ़ें: सीवर में मौत: सर्वोच्च न्यायालय की अवहेलना

वरिष्ठ पत्रकार पी साईनाथ ने मंच से संबोधित करते हुए कहा कि ‘सफाई कर्मचारी आंदोलन का सबसे पहला उद्देश्य उस सिस्टम से लड़ना है जो उसके खिलाफ खड़ा है। सम्मान और मानवाधिकार के लिए दुनिया का सबसे बड़ा संघर्ष है ये। और आज मैं इसकी सॉलीडारिटी पर यहाँ इसके साथ खड़ा हूँ। जब हम ये मांग करते हैं कि सीवर की सफाई के लिए विदेशों से मशीने मँगवाइए और इसको खत्म करिए तो सत्ता कहती है कि पैसा नहीं है। नीरव मोदी विजय माल्या और राफेल डील को तीन गुना करने के लिए पैसा है पर इसके लिए पैसा नहीं है। ये आंदोलन जबसे शुरू हुआ तब से मैं इसके साथ हूँ आज भी मैं यहाँ इसके सॉलिडैरिटी के लिए खड़ा हूँ। ‘

स्वराज पार्टी के नेता योगेंद्र यादव ने कहा कि ‘आज की सभा में मैं सत्या को ढूँढ़ता हूँ। आज से आठ साल पहले सफाइ कर्मचारी आंदोलन ने देश के पाँच शहरों से एक यात्रा की थी, नवंबर 2010 में मावलंकर हॉल दिल्ली में सामाजिक परिवर्तन यात्रा समाप्त हुई थी। उस हॉल के मंच पर एक चार साल की बच्ची भी थी उसका नाम था सत्या। वह मंच पर इसलिए थी क्योंकि उसकी माँ ने संकल्प लिया था कि वो टोकरी उठाना छोड़ देगी।तमिलनाड़ू के आज तक टोकरी और मैला उठाने की व्यवस्था खत्म नहीं हुई। सत्या आज बारह साल की हो गई होगी। मैं सोचता हूँ कि आज क्या करती होगी सत्या? वो स्कूल जाती होगी, मेरे बच्चों कि तरह कंप्यूटर सीखती होगी या कि उसका नंबर भी वहीं लगा होगा, जहाँ उसकी माँ का लगता था। ये सवाल आज देश के सामने है। क्योंकि सीवर में जिसका दम घुटता है वो सिर्फ आपके भाई और पिता, पति दोस्त भर नहीं हैं। ये इस देश का संविधान है जिसका दम घुट रहा है सीवर के अंदर। ये हिंदुस्तान की आत्मा है जिसका दम घुट रहा है सीवर के अंदर। और इसका ईलाज सरकार नहीं अब हम सबको ही मिलकर करना होगा। हमें माँगना नहीं अब मुट्ठी बंद करके आवाज उठानी होगी।’

सीपीआई सासंद डी राजा कहा कि ‘मैं एक सांसद के तौर पर पूरी पार्लियामेंट के सामने ये सवाल उठाता हूँ कि मैनुअल स्कैवेंजिंग का काम अभी तक क्यों जारी है जबकि मैनुअल स्कैवेंजिंग राष्ट्र का शर्म है। सरकार इस काम के लिए टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल क्यों नहीं करती? मैं प्रधानमंत्री मोदी से पूछता हूँ कि क्या सबका साथ आपके लिए सिर्फ एक स्लोगन है और यदि स्लोगन नहीं हो तो आपके राज्य में ये शर्मनाक कार्य करने के लिए दलित क्यों बाध्य हैं? आपको सबके साथ होने की जरूरत नहीं सिर्फ इनके साथ होने की ज़रूरत है। मैं प्रधानमंत्री मोदी से पूछता हूँ कि क्या वे मैनुअल स्कैवेंजर के साथ हैं। कानून में ये मना है लेकिन कानून ही लागू नहीं है। ऐसे कामों को जाति विशेष के लोगों पर दबाव बनाकर उनसे करवाया जाता है। ये मानवाधिकार और जनवाद का सवाल है। इससे मुक्ति का युद्ध जारी रहेगा।’ 

वहीं ऐपवा की महासचिव कविता कृष्णन ने संबोंधित करते हुए कहा कि ‘मोदी जब भी बनारस के घाटों पर झाड़ू लेकर दिखें उनके पार्टी के समर्थकों को उनसे पूछना चाहिए कि आप झाड़ू लगाने वाले सफाईकर्मियों की मौत पर एक भी शब्द क्यों नहीं बोलते? मैन स्केवेंजिंग को आप आध्यात्मिक अनुभव बताते हैं। जब तक आप इस शर्मनाक काम को खत्म नहीं करते, मैला ढोने की प्रथा खत्म नहीं करते तब तक तो कम से कम स्वच्छता की बात तो मत कीजिए।’

सफाई कर्मचारी आंदोलन के संस्थापक बेजवाड़ा विल्सन ने मंच से ललकारते हुए कहा, ‘मैं देश के सभी नागरिकों की ओर से पूछता हूँ कि पिछले दस साल में 1790 लोग जो मरे हैं उनकी जिम्मेदारी कौन लेगा! गटर में मरे हजारों लोगों का पीड़ित परिवार आज अपनी पीड़ा लेकर यहाँ आया है। देश के प्रधानमंत्री आप चुपचाप बैठ सकते हो पर इस देश का नागरिक चुप नहीं बैठेगा। वो सवाल पूछेगा कि मेरे भाई को किसने मारा? मेरे पिता को किसने मारा? मेरे बेटे को किसने मारा? मेरे पति को किसने मारा?  इतने लोगों की मौत पर कहाँ है आपने मन की बात? आगे आओ और बताओ इस जनता को कहाँ है तुम्हारे मन की बात इन मौतों पर। इस आजाद देश में कोई गुलाम नहीं है हम सब नागरिक हैं। जीने का हक़ हम सबका है आप हमें कैसे मैत दे सकते हो। बंद करो ये सब बंद करो। प्रधानमंत्री ये सब बंद करो। चार साल में हुई तमाम सफाइकर्मियों की मौत पर आपने एक बार बी बयान नहीं दिया। आप की चुप्पी कहती है कि आपमें प्रधानमंत्री की सीट पर बैठने की योग्यता नहीं है। स्वच्छ भारत के लिए 36000 करोड़ रुपया गाँव में और 60,000 करोड़ रुपया शहरों में आप ट्वायलेट बनाने के लिए खर्च करते हैं। हमारे  लिए आपके बजट में सिर्फ पांच करोड़ रुपया होता है। ये क्या नीति है, हम यहाँ यही पूछने के लिए हैं। यू कैन नॉट किल अस लाइक दिस। हम यहाँ पैसे की बात करने के लिए नहीं गरिमा की बात करने, सम्मान की बात करने, बराबरी की बात करने, संविधान की बात करने के लिए आये हैं। पांच हजार साल से हम लोगों ने देश का मैला साफ किया। सबके लिए संविधान एक है। हम अपना जीने का अधिकार लेने यहां आए हैं और ये हक लड़कर लेकर जाएगें।’

सभा को स्वामी अग्निवेश, अरुंधती राय, प्रो तनिका सरकार, प्रो मनोज झा, सीपीआईएमएल के जनरल सचिव दीपांकर भट्टाचार्य, उषा रामानाथन, वृंदा ग्रोवर, न्यूजक्लिक के प्रवीण आदि ने भी संबोंधित किया और सेप्टिक टैंकों में होने वाली मौतों को खत्म करने की माँग की।

सुशील मानव फ्रीलांस जर्नलिस्ट हैं. संपर्क: 6393491351

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काश ! ऐसी पत्नियाँ, बहनें समाज का अधिकतम सच हो जायें!

ज्योति प्रसाद


क्या आपको मदर इण्डिया फिल्म का अंतिम दृश्य याद है? क्या आपको राधा, जिसका किरदार हिंदी सिनेमा की अदाकारा नरगिस ने निभाया था, याद है? महबूब खान द्वारा निर्देशित यह फिल्म सन् 1957 में प्रदर्शित हुई थी. इसी फिल्म से अंग्रेज़ी टर्म ‘मदर इण्डिया’ इतना लोकप्रिय हुआ कि सबकी ज़ुबान पर आज तक मौजूद है. लेकिन अगर कोई ‘मदर इण्डिया’ का अनुवाद ‘भारत माता’ टर्म से करे तो खटका होगा. पर इस फिल्म को अमरीकन लेखिका कैथरीन मायो द्वारा लिखित किताब ”मदर इण्डिया”(1927) के जवाब में यह नाम मिला था. मायो ने भारतीय समाज को निशाना बनाया था. खैर यह शोध का क्षेत्र भी है. इस पर बात आगे कभी होगी.
कोई शक़ नहीं कि इस फिल्म की सफलता का आलम यह है कि मैं इस फिल्म का ज़िक्र आज कर रही हूँ. इस फिल्म को इस समय याद करने के पीछे का कारण एक अमानवीय दुर्घटना है. फिल्म के अंत में मुख्य किरदार राधा की बंदूक से एक गोली निकलती है और एक युवती को उठाकर भाग रहे बेटे के सीने में जाकर अपना ठिकाना पाती है. वास्तव में यह दृश्य उस इंसानियत से जुड़े मूल्य के बारे में भी बताता है, जिसे आजकल के दौर में लोग ठीक से जानते तक नहीं. यहाँ यह स्पष्ट हो कि किसी की जान लेने को इंसानियत नहीं कहा जा रहा.

हालाँकि इस फिल्म में इसी दृश्य की आलोचना भी बहुत हुई है. कुछ आलोचकों का कहना है कि राधा का अपने बेटे को ‘इज्जत’ की बात कहते हुए गोली से मारना यह बताता है कि औरत के शील या सती होने की जो परम्परा है वह बरक़रार रहेगी. इज्जत से ही औरत को चिपका कर रखा जाएगा. और मौजूदा पम्परा यही चाहती भी है. लेकिन इस दृश्य को ऐसे देखे जाने की एक छोटी मांग तो की ही जा सकती है जिसमें गलत को गलत देखा जा रहा है. रेवाड़ी में अमानवीय बलात्कार में पकड़े गए आरोपियों में से एक आरोपी की पत्नी ने कुछ ऐसा ही काम किया है. वह पति का घर छोड़ कर जा चुकी है. उसने अपना सम्बन्ध भी ख़त्म कर लिया है.

गलत और सही की अगर अपनों के बीच ही निशानदेही करनी पड़ जाए तो किसे चुना जाए? आधुनिक समय में लोगों को इसमें कोई ख़ासी मशक्कत करते हुए नहीं देख पा रहे हैं. रिश्तों के पलड़े भारी पड़ ही जाते हैं. दिल्ली में हुई निर्भया घटना पर जब इंडिया’ज़ डॉटर (निर्देशित-लेज़ली उडविन 2015) नामक फिल्म बनाई गई तब अपराधियों के परिवार वालों से फैसले पर बात की गई. तब एक परिवार की युवा (युवती) रिश्तेदार ने कहा कि गलती तो उस लड़की की ही थी. रात में ऐसे कपड़े पहनकर नहीं निकलना चाहिए था. इसके बाद उन्होंने तमाम तर्क दिए अपनी बात को रखने के बाद.

इस युवा युवती या इस तरह की तमाम महिलाओं को अपने बेटे, पति या पिता पर आरोप/अपराध साबित हो जाने के बाद भी बचावकर्ता की भूमिका में देखना बहुत हैरान करने वाला व्यवहार नहीं लगता. यह सोच सिर्फ एक दिन में नहीं बनी है. इस सोच को महिलाओं के दिमागों में बाकायदा गढ़ा गया है. ऐसे बहुत से उदाहरण हैं/होंगे जहां वे विरोध में रही हैं/होंगी. लेकिन इस तरह के उदाहरणों की संख्या कम ही दिखती है जब बात बलात्कार जैसे जघन्य अपराध की आती है.

रेवाड़ी में युवती से सामूहिक बलात्कार में शामिल एक अभियुक्त (सेना का जवान)  की पत्नी ने पति से अपने रिश्ते को खत्म करते हुए कहा कि उसे कोई भी सज़ा मिले उसे इससे कोई मतलब नहीं. इसी अभियुक्त की बहन ने गिरफ्तारी से पहले पुलिस के सामने समपर्ण करने की बात भी कही थी. यह कई मायनों में साहस का का परिचय है. इसी साहस से मूल्य तय होते हैं. जब कोई कहता है कि गलत तो गलत होता है तब इसका मतलब कठिन हालातों में भी गलत को पहचान कर गलत कहने का साहस है.

आज के समय में क्या इस तरह के बयान हमारे आसपास की अन्य महिलाओं के बर्ताव में दिखते हैं? किसी भी तरह के आरोप में पकड़े जाने पर वकील से पहले बचावकर्ता की भूमिका में परिवार के लोग पहले दिखाई देते हैं. अपने व्यक्ति या रिश्ते के साथ खड़े होना गलत नहीं है. पर यदि रिश्ते से जुड़ा व्यक्ति गलत कर रहा है, यह जानते हुए भी उसके साथ खड़े होना खटकता है.

आज भी टीवी पर जब तब ‘मेरा पति मेरा देवता है टायप की फिल्में रोज़ आती रहती हैं. एक तो गीत भी है. “भला है बुरा है, कैसा भी है मेरा पति मेरा देवता है..!” वास्तव में यह खतरनाक सोच है. यदि व्यक्ति भला है तो ज़िन्दगी की गाड़ी चल भी सकती है. बुरा होने पर कैसे? यह परम्परा में दिया गया है. माएं, बहनें, बेटियां और पत्नियों के ये सब रिश्ते सामाजिक तौर पर बनाये गए हैं और इनका एक ख़ास तरह का चरित्र गढ़ा गया है. निष्ठा का कोण जोड़ा गया है. किसी भी पत्नी को पति के ख़राब चरित्र को अपनाते हुए साथ रहने के निर्देश दिखाई पड़ते रहते हैं.

मुजफ्फरपुर शेल्टर होम रेप मामले में मुख्य आरोपी की पत्नी और बेटी बचाव की मुद्रा में टीवी पर सरेआम बयान देती दिखाई दे रही थीं. वे दोनों अपने पति और पिता के भरसक बचाव में आकर नाबालिग सरवाईवर लड़कियों को कोसने का मौका नहीं छोड़ रही थीं. यह हैरान कर देने वाला मामला भी था क्योंकि सरकार के नाक के नीचे कम उम्र की बच्चियों का बड़ी संख्या में बलात्कार और शोषण हुआ. इसकी पुष्टि भी हुई. कई बड़े नाम उजागर भी हुए. इस सब के बावजूद आरोपी की बेटी और पत्नी ने टीवी डिबेट में हिस्सा लेते हुए अपने रिश्ते का बचाव किया.

हर बात पर अमरीका का उदाहरण दिया जाता है. लेकिन उसी अमरीका के पूर्व राष्ट्रपति को उनके ही दफ्तर में काम करने वाली इंटर्न से यौन संबंधों के कारण महाभियोग भी झेलना पड़ा था. उनकी पत्नी और बेटी ने समय समय पर अनुकूल बातें रखीं पर कभी खुलकर स्टैंड नहीं लिया. वहीं दूसरी तरफ युवा इंटर्न युवती को एक ऐसी ज़िन्दगी मिली जहां वह ‘शेम’ को झेलती रहीं. बाद के बयानों में उन्हों ने कहा कि कई बार तो उन्हों ने आत्महत्या करने तक की बात भी सोची थी.

परिवारों में अच्छी बेटी, पत्नी, माँ, बहन बनने के गुर बचपन से सिखाये जाते रहे हैं. यह एक तरह का प्रशिक्षण होता है. लेकिन इस दिशा में बहुत से नैतिक मूल्य कमरे की चटाई में दबा भी दिए जाते हैं या दबाये जा रहे हैं. यह प्रक्रिया लम्बे समय से चल रही है. इसका अंजाम यह है कि कई बार हमारी नज़रों को गलत भी गलत नहीं लगता. पत्नी को कभी स्वतंत्र व्यक्ति जैसे नहीं सोचा जाता. ठीक इसी तरह बहनों, माँ और बेटी को भी. उनकी भूमिका आश्रिताओं की है. उदाहरण के लिए स्कूल, कॉलेजों या दोस्तों के बीच में जब माँ का ज़िक्र आता है तब उनके हाथ के खाने का ज़िक्र किया जाता है. कई बार मैंने दोस्तों के बीच अपनी माँ की जो छवि रखी वह यह- “माँ पढ़ी लिखी नहीं हैं पर घर के खर्चों का न जाने कैसे इतने शानदार तरीके से हिसाब रख लेती हैं!” लेकिन अब यह पंक्ति मुझे चुभती है. क्योंकि उन्हें इस छवि से बहुत समय तक मैंने बाहर देखने की कोई अच्छी कोशिश नहीं की थी. घर और रसोई में कैद कर माँ को पवित्र बना देना एक वैचारिक पाप लगता है.

रेवाड़ी गैंग रेप के अभियुक्त

कस्बों से जब तब उदाहरण लेकर बात को पुख्ता करने से बेहतर शहरों में भी एक नज़र डाल लेनी चाहिए. बहुत पहले किसी साहित्यिक प्रदर्शनी में जाना हुआ था. वहां किसी बड़े सरकारी ओहदे में कार्यरत महिला से मुलाक़ात हुई थी. उनके कपड़ों, विचारों, भाषा से वह बड़े घराने से मालूम लग रही थीं. वह किसी परिचित से मरी हुई ख़ामोशी से एक बात कह रही थीं. जो बात मुझे समझ आई उसे सुनकर दो मिनट मेरा मुंह खुला ही रह गया था. बात यह थी कि उनकी बेटी पढ़ाई के लिए किसी विदेश के विश्वविद्यालय जाना चाह रही थी. लेकिन उनके शौहर इस बात के लिए राज़ी नहीं थे. जबकि वह खुद चाहती थीं कि बेटी को अव्वल दर्जे की तालीम मिले. ऐसा नहीं था कि पिता पढ़े लिखे नहीं थे. उनकी बातों से पता चला कि वे काफी पढ़े लिखे थे और अच्छी पोस्ट पर कार्यरत थे. इस सब के बावजूद वह लड़की को स्वतंत्र व्यक्तित्व बनाने के बजाय बेटी बनाकर घर के आँगन की तुलसी बनाना चाह रहे थे. शहरों और कस्बों में इन फिक्स छवियों में रहने वाली पढ़ी लिखी और न पढ़ी लिखी कई महिलाएं साँस लेती नज़र आ जाएँगी.

इसलिए रेवाड़ी रेप की घटना में अभियुक्त की पत्नी और बहन का बयान वास्तव में इसी फिक्स छवि के खिलाफ़ खड़े मूल्य हैं. खुद को एक स्वतंत्र व्यक्ति के रूप में तो वे रख ही रही हैं साथ ही दमदार फैसले लेने से वे अन्यों के सामने उदाहरण भी रख रही हैं. यह हर व्यक्ति के अन्दर का गुण है. वह सही और गलत में फर्क कर सकती/सकता है. गौर कीजिये, हमारे अन्दर प्रकृति ने सही और गलत को अलग करने की एक क्षमता दी है. उदाहरण के लिए अपने शरीर का खयाला रखना या बचाव की मुद्रा में रहना हम खुद से जानते हैं. एक उदहारण यह भी है कि सामने से आते हुए पत्थर को देखकर हम तुरंत अपने को बचाते हैं. क्योंकि हमें यह सेन्स जन्मजात मिला है कि पत्थर लगने से हमें चोट लगेगी. दर्द होगा. खून बहेगा. हमने यहाँ अपने बचाव को सही माना है. इसके उलट अगर हम घायल हो जाते हैं तो हमें उस व्यक्ति या उस कारण पर गुस्सा आता है जिसके चलते यह दुःख मिल रहा है. ऐसा नहीं है कि महिलाएं अपने पुरुष साथी/बेटे/भाई की गलत बातों या हरक़तों को जानती नहीं. वे बखूबी जानती हैं समझती हैं. पर कुछ ही एक स्टैंड लेती हैं. यह गिनती लगातार बढ़ भी रही है.
समय की लम्बी अवधि में हमारे व्यक्तित्व पर व्यवहार से जुड़ी परतें जमाई गई हैं. हम लड़कियों के साथ यही हुआ है. लड़कों में शक्ति के आभास को पूरी तरह से पचाकर रखने और उसके इस्तेमाल की परत चढ़ाई गई है. आज से कुछ ही वर्ष पहले यदि किसी औरत के साथ रेप की जघन्य घटना घट जाती थी तब वह घटना अँधेरे में कहीं ऐसे दफ्ना दी जाती थी जिसका पता ही नहीं चलता था. कारण यह रहता था- “इज्जत का सवाल है. लड़कियां/औरतें इज्जत हुआ करती हैं.” यह पूरा खयाल ही ज़माने की पैदाइश और परवरिश है. आज भी कई केस दर्ज नहीं होते. उसके पीछे मौजूद कई वजहों में से यह एक है-इज्जत!

बहुत पहले मेरा सामना एक ऐसे परिवार से हुआ था जहाँ बेटा/भाई प्रेम विवाह कर के एक घूँघट वाली पत्नी लाया था. लेकिन वही भाई अपनी बहन के प्रेम प्रसंग का ख़याल तो दूर वह दहलीज़ पर खड़े होते हुए भी नहीं देख सकता था. जब माँ से बात हुई तब वह थोड़ा ख़ुशी से ही बोलीं- “अब लड़के की अपनी पसंद है. नया खून है. हम क्या ही लगाम लगाएं!” बहुत दिन बाद जब फिर से इसी माँ से मुलाक़ात हुई तब वह थोड़ा दुखी होती हुई बेटी के संदर्भ में बोलीं- “का बतावे कैसे हैं! लड़की के लिए लड़का ये(पति) खोज खोज कर थक गए. मिल ही नहीं रहा..!” जब मैंने उनकी बेटी पर नज़र डाली तो लगा कि वह बेजान है. जैसे किसी ने उसकी सांस पर कब्ज़ा जमाया हुआ है. माँ, बेटी और घूँघट वाली बहू में एक तार तो जुड़ा ही है. वह यह कि परम्परा में उनके चित्र पहले से ही तैयार हैं. पर इन तैयार चित्रों में विरोध की हलचल कई बार नहीं दिखती. लेकिन इस हलचल की उम्मीद बनी जरुर रहती है.

जब-जब बलात्कार जैसी अमानवीय घटनाएं हुई हैं तब तब अजीबों गरीब बयानों की बौछार हुई है. कई राजनीतिक दलों ने सत्ता भी इन्हीं दुर्घटनाओं को मुद्दा बनाकर हासिल की है. रात को लड़कियों को घर से बाहर नहीं निकलना चाहिए, लौंडे हैं, गलतियाँ हो ही जाती हैं, छोटे छोटे कपड़े पहनकर क्यों बाहर निकलती हैं…ये सब बयान उन लोगों की ओर से आये हैं जिन्हें जनता ने अपना प्रतिनिधि चुना है. पिछले साल ही हरियाणा में एक बड़े अधिकारी की बेटी को रात में चंडीगढ़ में जबरन उठाने की कोशिश की गई. जिन आरोपियों ने यह किया वे नेताओं के बेटे थे. लेकिन हैरानी इस बात की है कि इस सब को जानते हुए भी उनकी माएं या बहनें किसी तरह के विरोध में बयान देने सामने नहीं आईं. पत्नी का बयान एक बहादुरी जैसा ही काम है.

बहुचर्चित केस नितीश कटारा हत्याकांड में परिवार के दबाव में आकर भारती यादव अपने परिवार के लिए ही एक ऐसा बयान दे गईं जो नितांत कमजोर रहा. वे अपने और नितीश के तमाम संबंधों को नकारते हुए सच का साथ नहीं दे पाई. यह भी है कि उन पर उनके परिवार का भावुक दबाव भी रहा होगा. आज नितीश कटारा की माँ अपने एक वक्तव्य में यह कहती भी दिखती हैं कि उन्हें यकीन नहीं होता कि उनके बेटे ने एक कमजोर लड़की को चुना था. भारती यादव ने अपने बयान में कहा था कि वह और नितीश सिर्फ दोस्त थे और उनके खुद के भाई किसी का खून नहीं कर सकते. उनके भाई उनका बहुत ख्याल रखते हैं. इन बयानों के बाद भी उनके भाई को पच्चीस साल की सजा हुई. हालाँकि तस्वीर का दूसरा पहलु यह भी है कि खुद भारती यादव अपने परिवार की शिकार थीं. उन्हें किसी को प्यार करने का या खुद का साथी चुनने का हक भी नहीं था. लेकिन दूसरी तरफ नीलम कटारा और सबरीना लाल जैसे मजबूत उदाहरण भी हैं जिन्होंने अपने लोगों के इंसाफ के लिए सच को थामे रखा और इंसाफ को पाया भी.

रेवाड़ी रेप में शामिल अभियुक्त की शादी पिछले साल ही हुई है. अपने को बलात्कारी पति से अलग कर लेने वाली उसकी पत्नी अब गर्भवती भी है. वह अपने पिता के घर पर है. उसने यह बयान अपने कठिन हालातों में दिया है. उसने यह साफ किया है कि वह कहाँ खड़ी रहना चाहेगी. उसने अपने पति के रिश्ते को ही ख़ारिज कर दिया है. यह बहुत आसान भी नहीं है. क्योंकि शुरू में वह पिता के घर में आश्रिता थी. शादी के बाद पति पर. और अब पति के जेल चले जाने पर वह फिर से पिता के घर में है. दूसरों पर निर्भरता दयनीय अवस्था होती है. इन सब हालातों के बाद भी उसका यह फैसला तारीफ के काबिल है. हालाँकि इसके बाद भी राह आसान नहीं है. अपने आर्थिक आधार की खोज उसे बच्चे के जन्म के बाद से ही शुरू करनी होगी. उसे उस माहौल में आगे गूंजने वाली आवाजों और तानों से भी दो चार होना होगा जो उसे और उसके परिवार को मिलेंगे.

शब्दों के तेजाब उगलता समाज और उसकी जुबान मरने मारने की तैयारी के साथ दिखती है. न्याय की डगर पहले से ही बहुत कठिन है. सरकारों का लचर रवैया ऐसा है कि वे गेस्ट अपिर्यंस देती है. आनन-फानन में जाँच के आदेश दिए जाते हैं. मामला मिडिया में उछला तो कारवाई की टॉफी थमा दी जाती है. सरकार के खुद के अभियान भी ऐसे नाम वाले हैं कि हज़ार साल पीछे चल रहे हैं. वास्तव में “बेटी बचाव बेटी पढ़ो अभियान” की बखिया उधेड़ती यह अमानवीय घटना सभी योजनाओं की पोल खोल देती है. हाल ऐसा नहीं कि संतोष कर के बैठ सकें. पर इस औरत ने सर्ववाइवर की तरफ  खड़ा होना बेहतर समझा बल्कि अपने लिए भी एक स्टैंड लिया. कुछ फैसले कठिन होते हैं. पर वे गलत और झूठ के साथ खड़े होने से लाख गुना बेहतर होते हैं. महिलाओं को ऐसे फैसले लेने ही होंगे. ये जरुरी हैं.

ज्योति प्रसाद जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में शोधार्थी हैं, समसामयिक मुद्दों पर लिखती हैं. 

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बीएचयू में लड़कियों की आवाज से क्यों परेशान होते हैं दक्षिणपंथी (?)

राजीव सुमन 

पिछले वर्ष 23 सितम्बर 2017 को काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (बी.एच.यू) में लैंगिग भेदभाव और हिंसा, छेड़खानी, उत्पीड़न व प्रशासन के पितृसत्तात्मक रवैया के खिलाफ समानता के व्यवहार के लिए वहाँ की
छात्राओं ने एक ऐतिहासिक आंदोलन किया था, जिसने पूरे भारत के लोगों का ध्यान अपनी तरफ आकर्षित किया था और तत्कालीन कुलपति जी.सी. त्रिपाठी को इसके परिणाम भुगतने पड़े थे, उसकी वर्षगांठ मनाने के
लिए 23 सितम्बर 2018 वहां की छात्राओं ने एक शान्ति सभा के साथ ही सांस्कृतिक कार्यक्रम और नुक्कड़ नाटक का आयोजन किया था जिसपर कथित रूप से एबीवीपी के छात्रों व बाहरी तत्वों ने मिलकर हमला
किया.

हमला करने वाले जय श्री राम, भारत माता की जय, वन्दे मातरम के नारे के साथ ही भद्दी गालियाँ दे रहे थे और इस बीच पुलिस और प्राक्टर के लोग तमाशबीन बने रहे. लेकिन जब मामला आगे बढ़ा तो छात्राओं पर कथित तौर पर लाठी चार्ज कर दिया गया जिसमे कई छात्राओं को चोटें आई हैं. इस घटना के विरोध में छात्राएं बीएचयू के महिला महाविद्यालय (एम्.एम्.वी.) की गेट के बाहर ही धरने पर बैठ गयीं, प्रशासन उन्हें लगातार अंदर ले जाने का प्रयास कर रहा .

ये लडकियां न तो जेएनयू दिल्ली की हैं न ही टीस, मुंबई की और न ही हैदराबाद या जाधवपुर विश्वविद्यालय की जहां मामले को वामपंथ का चोगा आसानी से पहनाया जा सकता है. बल्कि ये खुद प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी के बीएचयू की हैं जो अपने लिए लैंगिक हिंसा-भेदभाद से आजादी की मांग कर रही हैं. मुश्किल यह है कि ब्राह्मणवाद के गढ़ और सांस्कृतिक राजधानी से भाजपा और उसकी छात्र इकाई एबीवीपी का विरोध बीएचयू की छात्राएं अपने ऊपर लैंगिक भेदभाव के विरुद्ध कर रही हैं जो आगामी चुनाव के लिए विपक्ष को एक अवसर देता है. अभी कुछ दिन पहले ही यूजीसी ने सभी केन्द्रीय विश्वविद्यालयों के लिए एक सर्कुलर निकाला था कि सेना द्वारा पाकिस्तान के खिलाफ किये गए सर्जिकल स्ट्राइक के एक वर्ष पूरे होने के उपलक्ष में इसे शौर्य स्मृति के रूप में मनाया जाए तो इसका व्यापक पैमाने पर बुद्धिजीवियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा विरोध दर्ज किया गया और मानव संसाधन मंत्री प्रकाश जावडेकर को इसपर सफाई देनी पड़ी.
लेकिन जब छात्राओं ने लैंगिक हिंसा के खिलाफ एक वर्ष पूर्व किये गए अपने आन्दोलन की याद में शांति मार्च और नुक्कड़ नाटक का कार्यक्रम रखा तो तथाकथित एबीवीपी के लोगों ने उनपर फिर से लैंगिक हिंसा की और पुलिस ने लाठी चार्ज कर दिया. कई छात्राएं घायल हैं. संघ और बीजेपी की विचारधारा का यह हमला उनके अपने ही गढ़ में किया गया है जो यह साफ़ तौर पर दर्शाता है कि ‘बेटी बचाओ, बेटी पढाओ’, इस सरकार की मंशा नहीं, बस जुमला भर है.

नाम न बताए जाने की शर्त पर चश्मदीद एक छात्रा ने कहा कि “बीएचयू प्रशासन का महिला विरोधी, छात्र विरोधी रवैया फिर से सामने आया है। सवाल ये है कि जब एक घंटे से ए.बी.वी.पी. व अन्य गुंडो द्वारा कार्यक्रम को रोकने के लिए छात्राओं से हाथापाई की जा रही थी तब गार्ड मूकदर्शक क्यों बने बैठे थे? गुंडो को रोकने के बजाय छात्राओं पे बेरहमी से लाठीचार्ज कैसे किया गया? प्रशासन का ये रवैया दिखाता है कि छात्राओं पर हमला उनके द्वारा ही प्रायोजित था जिसमें उनके द्वारा पाले गए लम्पटों और गुंडो का सहारा लिया गया।”

इस बीच पुलिस ने छात्राओं की शिकायत पर एफ.आई.आर में दस छात्रों तथा एक दर्जन अज्ञात बाहरी लोगों पर आईपीसी की धारा 147, 354, 323, 504 और 506 के तहत नामजद किया है। पुलिस में की गई शिकायत के अनुसार अभियुक्त छात्र जो कथित रूप से एबीवीपी के सदस्य हैं, अन्य बाहरी तत्वों के साथ मिलकर रविवार की शाम को मालवीय गेट पर चल रहे इस कार्यक्रम को बाधित किया और जब छात्राओं ने इसका विरोध किया तो वे आक्रामक हो गए, गन्दी भाषा का प्रयोग किया और हमला करना शुरू कर दिया. वहां की छात्रा अवंतिका तिवारी ने कहा कि  “वे हमारे बढ़ने को बर्दाश्त नहीं कर सकते हैं, वे कल की तरह रणनीति के माध्यम से हमें डराना चाहते हैं, लेकिन चुप रहना अब हमारे लिए विकल्प नहीं है।”

लगता है बीएचयू विवाद थमने वाला नहीं है. शुरू से ही बीएचयू दक्षिणपंथ का गढ़ रहा है, वहाँ का प्रशासन और शैक्षणिक वातावरण पितृसत्ता के जड़ मूल्यों से निर्मित है. लैंगिक भेदभाव, हिंसा और जातिवादी सोच वहाँ के चपरासी से लेकर सर्वोच्च पद पर बैठे लोगों में विद्यमान है. यही कारण है कि शिक्षा के इस सबसे बड़े कैम्पस में लड़किया हमेशा उत्पीडित और लैंगिक हिंसा व भेदभाव का शिकार रही हैं. जातिवाद भी वहाँकी एक बड़ी समस्या है. पिछले वर्ष लड़कियों के लैंगिक हिंसा के विरुद्ध आन्दोलन ने कुछ ऐसा किया जो पिछले सौ सालों में नहीं हुआ था. इस परिघटना को एक परिवर्तन के रूप में उस समय देखा गया था.

पहली बार बीएचयू में कोई महिला प्राक्टर के पद पर चुनी गई थी. उस समय प्राक्टर रोयोना सिंह भले ही लड़कियों के शराब पीने और मनमुताबिक कपड़े (कथित तंग कपड़े) पहनने की स्वतंत्रता जैसी क्रांतिकारी बातें कर रही थीं लेकिन वहाँ पढने वाली लड़कियां अपनी इस सायंस फैकल्टी पर इसलिए विश्वास नहीं कर पा रहीं थीं कि उनके मुताबिक़ ब्राह्मणवादी पितृसत्ता से संचालित विश्वविद्यालय में कोई पदाधिकारी संकुचित दक्षिणपंथ से अलग हो ही नहीं सकता. चाहे वह महिला हो या पुरुष. उनका यह डर ठीक एक साल बाद सच साबित हो गया जब प्राक्टर पुलिस और स्थानीय पुलिस मूक बनी हुई थी.

बीएचयू में लड़कियों का यह प्रदर्शन और विरोध केंद्र की शीर्ष सत्ता के लिए तब भी सिरदर्द बना था और अब भी. क्योंकि पिछली बार देश के प्रधानमन्त्री का दौरा बनारस में उसी वक़्त होने वाला था जिस वक़्त लडकियां आन्दोलनरत थीं. लड़कियों ने बीएचयू के मुख्य द्वार–सिंह द्वार पर ही एक बहुत बड़ा बैनर लगा रखा था जिसमे लिखा था जी.सी., वी.सी. गो बैक और साथ में बेटियों के प्रति नरेन्द्र मोदी और सरकार का बहु-प्रचारित, बहु-प्रसिद्द नारे को व्यंग्यात्मक अभिव्यक्ति देता नारा–“बचेगी बेटी तभी तो पढेगी बेटी”-टंगा था. इस बार भी लड़कियों का यह विरोध प्रदर्शन दक्षिण पंथी सामंती मूल्यों के राज्य और सांस्कृतिक नगरी बनारस से उठ रही है. वही बनारस जो प्र.मं. मोदी का संसदीय क्षेत्र रहा है, वही राज्य जिसके योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री हैं. फिर से ये “गन्दी लड़किया” (पिछले साल कई बार आंदोलनरत इन लड़कियों को इसी विशेषण से विश्वविद्यालय प्रशासन के लोग सुशोभित करते रहे थे.) महामना के इस विश्वविद्यालय से केंद्र और राज्य सरकार को उनपर हुए लैंगिक हिंसा और भेदभाव को लेकर मुह चिढा रही हैं.

राजीव सुमन स्त्रीकाल संपादक मंडल सदस्य हैं

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गांव की पाठशाला जिसने सबको बांध दिया:जूलिया वेबर गार्डन की डायरी

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शिरीष खरे

‘नन्हे बच्चे जिज्ञासु, खोजी इंसान होते हैं। वे अपनी समस्त इंद्रियों की मदद से दुनिया की अनूठी चीजें तलाशते हैं। वे समग्रता में जीकर सीखते हैं। पर केवल इतना ही नहीं है। उन्होंने जो कुछ सीखा होता है उसका उपयोग पहले या नई स्थितियों में करते रहते हैं।’
‘लोकतांत्रिक नियंत्रण तभी आ सकता है जिसमें बच्चों को अपनी समस्याओं के समाधान स्वयं खोजने की आजादी हो।’
‘हम एक सतत बदलती दुनिया में रहते हैं। ऐसी दुनिया में प्रभावी ढंग से बने रहना है तो हमें इसका सामना रचनात्मक तरीके से करना होगा। हम सब रचनात्मक शक्ति के ऐसे संसाधन हैं जिन्हें हमने टटोला तक नहीं है। इसके लिए हमें उन सभी बंधनों को तोड़ना होगा जो हमने आलोचना के डर से या हीन—भावना के कारण बना लिए हैं। पाठ्यचर्या को विकसित करने में कुछ चीजें चुननी पड़ती हैं।’
‘सिखाते समय हम शिक्षकों को कुछ सामाजिक लक्ष्य अपने समक्ष रखने चाहिए और ये लक्ष्य इस विचार से उपजने चाहिए कि हम किस प्रकार का समाज चाहते हैं।’


ये सारे कथन हैं जूलिया वेबर गार्डन के, जो 1946 में प्रकाशित उनकी पुस्तक ‘माई कंट्री स्कूल डायरी’ से हैं, जूलिया ने इसमें बतौर शिक्षिका अमेरिका में स्टोनीग्रोव नाम के गांव की दुर्गम पहाड़ी पर स्थित स्कूल के अनुभव साझा किए है। इस दौरान उनका चार वर्षों का अनुभव बताता है एक विपन्न ग्रामीण समुदाय अपने स्कूल को सीखने लायक सम्पन्न शैक्षणिक वातावरण में बदल सकता है। यह अनुभव बताता है कि विषम से विषम परिस्थितियों में भी यदि किसी शिक्षक को मौका मिले तो वह क्या कर सकता है! यह कहानी एक तरह से यह पुष्टि करती है कि एक तरफ यदि महंगे भवन, लैब और तमाम तरह की सुख—सुविधाओं हों और दूसरी तरफ कुशल—संवेदनशील शिक्षक हो तो आखिरी में शिक्षक ही भारी पड़ेगा। जूलिया तीस बच्चों की शाला की अकेली शिक्षिका हैं जो एक कमरे की शाला में पहली से आठवीं तक के सभी विषयों को पढ़ाने की जिम्मेदारी तो निभाती ही हैं, अपने बच्चों को कथित बड़े स्कूलों के बच्चों के मुकाबले बेहतर तरीके से जीवन जीने के लिए तैयार भी करती हैं।

एक अहम बात और! इसे पढ़ते हुए लगता है कि 1940 के दौरान स्कूल और शिक्षा की चुनौतियां आज की ही तरह थीं। दूर—दराज के स्कूल इसी प्रकार तरह—तरह के अभाव और गुणवत्ता की कमी से जुझ रहे थे।

कुछ स्कूल बच्चों में बदलाव लाते हैं। लेकिन, ‘माई कंट्री स्कूल डायरी’ जिसे एक तरह की कहानी है जिसमें स्कूल समुदाय में बदलाव लाता है। इस डायरी में स्कूल सबको आपस में बांध देता है। इसे पढ़ते हुए लगने लगता है कि स्कूल के नाम पर केंद्रीकृत विशालकाय कारखानों की बजाय छोटे स्कूल की जरुरत है जिसमें शिक्षक वह सब कर पाते हैं जो जूलिया वेबर कर सकीं। और यह भी, ‘रास्ता कितना भी असंभव क्यों न लगे, अगर हम उतना ही करें जितना हमें समझ में आ रहा हो तो अगला चरण साफ हो जाता है।’

यह डायरी चार भागों में विभाजित है जिसका हर भाग एक वर्ष की तरह है और इस प्रकार वर्ष—दर—वर्ष कुल चार वर्षों का लेखा—जोखा है जिसमें बतौर शिक्षिका जूलिया ने बच्चों को जानने के लिए सीखने की कोशिशों से लेकर एक नई शुरुआत, रचनात्मक हस्तक्षेप, वंचित समुदाय की शक्ति, नई तकनीक, अपना दर्शन और लोकतंत्र में जीने जैसी बातों को एक क्रम दिया है।

इसके बाद अभावग्रस्त व्यवस्था और गरीब—ग्रामीण जीवन के बीच यह शिक्षिका जूलिया एक विनम्र नायिका की तरह आती है जिसे कमजोर—लापरवाह कहे जाने वाले बच्चों से कोई शिकायत नहीं है। वे वेबर बच्चों की पृष्ठभूमि का पता लगाने के लिए उनके घर जाती हैं और परिजनों से बतियाती हैं। फिर हर बच्चे को ध्यान में रखते हुए उसे सिखाने की तैयारी करती हैं। फिर स्कूल की दुनिया को ग्रामीण परिवेश और समुदाय से जोड़ती हैं और यर्थाथ को समझने का माध्यम बनाती हैं। इस शिक्षिका का सामूहिक जीवन चौथे वर्ष में अपनी श्रेष्ठता पर पहुंचा जो बीते तीन वर्षों के अथक संघर्षों के बिना संभव नहीं हो पाता। किंतु, संघर्ष की इस कहानी के पीछे कहीं खीज या निराशा का दूर—दूर तक कोई संकेत नहीं। नतीजा, न्यूनतम साधन और संसाधनों से ही यह एक कमरे का छोटा स्कूल ‘सीखने की बड़ी लैब’ में बदल जाता है।

पहले दिन की तैयारी के दौरान जूलिया एकल—शिक्षक शाला को अपने लिए बड़े अवसर के तौर पर देखती हैं जिसमें रचनात्मक और लोकत्रांतिक जीवन के लिए बच्चों की तरह करने की संभावना कहीं अधिक होती है।

फिर एक शिक्षिका के तौर पर वे इस प्रकार से सामने आती हैं कि जूलिया योजनाओं को तो बहुत औपचारिक तरीके से तैयार करती हैं लेकिन उसे लागू कराने के मामले में वे बच्चों के साथ अनौपचारिक और दोस्ताना तरीका अपनाती हैं। यह उनके कौशल का ही प्रभाव होता है कि बच्चे लघु—पुस्तिकाएं और स्कूल के सामने फूलों वाले पौधों की छोटी क्यारियां बनाने जैसी पहल खुद करते हैं। इसी तरह, वह बच्चों की आपसी सहभागिता बढ़ाने के लिए ‘खजाने की खोज’ जैसे खेल तैयार करती हैं और उससे बच्चों में सहयोग की भावना बढ़ाती हैं। यह बताती है कि एक शिक्षक का अपने बच्चों से किस प्रकार का संबंध होना चाहिए।

जूलिया को जब लगता है कि उनके बच्चों के जीवन का अनुभव बेहद सीमित है तो वे उन्हें कई तरह की रुचियों से जोड़ती हैं। वे पैदल यात्रा, पिकनिक, सामूहिक गीत और नाटकों से बच्चों के जीवन को समृद्ध बनाती हैं। इसी कड़ी में बच्चे अखबार भी निकालते हैं। वर्तनी और भाषा की गलतियों को रिकार्ड करने के लिए वे बड़ों बच्चों को एक नई कॉपी बनाने के लिए कहती हैं। बड़े बच्चे इन कॉपियों में गलत के सामने सही वर्तनी दर्ज करते हैं। इसके अलावा नए और कठिन शब्दों को समझने के लिए आपसी चर्चा कराई जाती है और परिणाम यह होता है कि धीरे—धीरे बच्चों की शब्दावली बढ़ती जाती है।

जूलिया न केवल सभी विषयों को पढ़ाती हैं बल्कि बच्चों में भाषण, खेलकूद, कृषि और हस्त—कला जैसे कौशल विकसित करने में मदद करती हैं। विशेष बात यह है कि जूलिया के बच्चे अपने सवाल अपने मन में नहीं रखने की बजाय एक—दूसरे से पूछते हैं और उन्हें समझने के लिए आपस में चर्चा करते हैं। जूलिया को जब कभी लगता है कि बच्चों के लिए किसी विशेष चीज की जरुरत है तो वे उधार मांगने से भी नहीं झिझकतीं। समुदाय की मदद से ही उन्होंने एक बड़ा पुस्तकालय तैयार किया। इसी तरह, उन्होंने बड़े बच्चों को लकड़ी के खिलौने बनाना सिखाने के लिए बढ़ई को राजी किया। यहां यह बताना महत्त्वपूर्ण है कि जूलिया गांव वालों को स्कूल में लाती हैं और बच्चों से बातचीत कराती हैं। अंत में उन्होंने स्कूल को जीवंत समुदाय का अंग बना दिया। मैंने इस डायरी को इसे उम्मीद के साथ पूरा किया कि एक दिन सभी बच्चों को अच्छे शिक्षक मिलेंगे।

इस डायरी को पूरा पढ़ने के बाद यही उम्मीद है जिसके कारण शिक्षा—साहित्य में यह पुस्तक आज भी उतनी प्रांसगिक बनी हुई है जितनी सात दशक पहले जब यह लिखी जा रही थी। एक और जरुरी बात यह कि इस डायरी में शिक्षिका का अपने बच्चों के साथ भावनात्मक रिश्ता और उन बच्चों की अपनी—अपनी कहानियां जिस तरीके से खुलती जाती हैं उससे यह पूरा वर्णन एक आकर्षक कथानक में बदल जाता है।

‘माई कंट्री स्कूल डायरी’ को शिक्षा साहित्य की क्लासिकल पुस्तक माना गया है। पहला छपने के बाद कई साल तक इस पुस्तक का दूसरा संस्करण नहीं आया। फिर अमरीकी शिक्षाविद् जॉन होल्ट के प्रयासों से यह दुनिया भर में चर्चित हुई। यह पुस्तक विशेष तौर पर शिक्षकों के लिए प्रेरणादायी दस्तावेज है। एकलव्य प्रकाशन, भोपाल ने इसे हिंदी में ‘मेरी ग्रामीण शाला की डायरी’ नाम से प्रकाशित किया। पूर्वा याज्ञिक कुशवाहा ने इसे अंग्रेजी से हिंदी में अनूदित किया।

शिरीष खरे के बारे में: 

डेढ़ दशक की पत्रकारिता में पांच राजधानियों (नई-दिल्ली, भोपाल, जयपुर, रायपुर और मुंबई) में काम का अनुभव। इस दौरान प्रिंट मीडिया की मुख्यधारा के भीतर-बाहर रहते हुए ग्रामीण पत्रकारिता की एक हजार स्टोरी-रिपोर्ट प्रकाशित। ग्रामीण पत्रकारिता में उत्कृष्ट रिर्पोटिंग के लिए प्रेस कौंसिल ऑफ इंडिया की ओर से तत्कालीन उप-राष्ट्रपति मोहम्मद हामिद अंसारी द्वारा पुरस्कृत। लैंगिक-संवेदनशीलता पर सर्वश्रेष्ठ फीचर लेखन के लिए दो बार लाडली मीडिया अवार्ड। प्रतिष्ठित माधवराव सप्रे (भोपाल) और मिनीमाता (रायपुर) पत्रकारिता सम्मान। ‘सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज, नई-दिल्ली’, और ‘रीच-लिली, चेन्नई’ द्वारा फेलोशिप। अन्वेषण (इंवेस्टीगेट) रिपोर्टिंग पर ‘तहकीकात’ नाम से एक पुस्तक। मो. : 9421775247/ 8827190959 ईमेल : shirish2410@gmail.com

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शिक्षकों का समूह बंटा कुलपति हंगलू के पक्ष और विपक्ष में: राष्ट्रपति को लिखी चिट्ठी

सुशील मानव 


इलाहाबाद विश्वविद्यालय शिक्षक संघ (ऑटा) के पूर्व पदाधिकारियों ने कुलपति रतन लाल हंगलू के खिलाफ माननीय राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को खुला पत्र लिखकर कुलपति के कार्यकाल में अनियमितताओं की लंबी फेहरिस्त भेजी है.उधर संघ के वर्तमान पदाधिकारी कुलपति के पक्ष में खड़े हैं, इस बीच महिला साहित्यकार ने एबीवीपी नेता अविनाश दुबे पर ब्लैकमेल का आरोप लगाया है. महिला सलाहकार बोर्ड (वैब) की पूर्व अध्यक्ष ने कुलपति के खिलाफ उनके पहले की यूनिवर्सिटी से एक छात्रा की मां की शिकायत प्राप्त होने की बात स्वीकार की है, वहीं वर्तमान अध्यक्ष लालसा यादव ऐसे किसी पत्र से इनकार करती रही हैं. पढ़ें पूरी  रिपोर्ट: 


इलाहबाद विश्वविद्यालय शिक्षक संघ (ऑटा) के पूर्व पदाधिकारियों ने कुलपति रतन लालहंगलू के खिलाफ माननीय राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को खुला पत्र लिखकर कुलपति के कार्यकाल में अनियमितताओं की लंबी फेहरिस्त भेजी है. मानव संसाधन विकास मंत्रालय को लगातार कुलपति के खिलाफ शिकायतें भेजी जाने के बावजूद कुलपति पर अब तक कोई कार्रवाई न होने और उच्च शिक्षा नियामकों पर चुप्पी साधे रहनेवाले पदाधिकारियों के खिलाफ भी आवाज उठायी गयी है. पूर्व पदाधिकारियों  के पत्र में  गौतम राजू की अध्यक्षता में गठित यूजीसी की कमिटी की ओर से कुलपति की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाये गये हैं.

आरोप जो लगाए गए हैं :
1. इविवि की प्रवेश परीक्षाओं एवं अन्य परीक्षाओं में व्यापक अनियमितता
2. इविवि की आधिकारिक बैठकों में अध्यापकों व अधिकारियों के प्रति अपमानजनक टिप्पणियां करना
3. इविवि एवं संघटक कॉलेजों में शिक्षकों की भर्ती में स्क्रीनिंग, शॉर्ट लिस्टिंग, विशेषज्ञों के चयन, अकादमिक 4. क्षमता, और शोध संबंधी आकलन में की गयी व्यापक अनियमितता एवं पक्षपातपूर्ण चयन.
5. अधिनियम, परिनियम एवं यूजीसी के रेगुलेशन में वर्णित प्रावधानों का व्यापक उल्लंघन, जिनके कारण उच्च न्यायालय में कई याचिकाएं दाखिल हुईं. कुलपति को कई  बार न्यायालय की अवमानना का आरोप झेलना पड़ा और एक बार तो न्यायालय के आदेश पर कुलपति एवं कुलसचिव के वेतन पर भी रोक लगा दी गई. 6. प्रशासनिक निर्णयों में मनमानी एवं नियमानुसार चुने गये अथवा नामित पदाधिकारियों को भ्रामक तथ्यों के आधार पर पद मुक्त करना. वरिष्ठता सूची में मनचाहा परिवर्तन कर देना और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत की सतत अवहेलना.वहीं

इविवि प्रशासन की ओर से एचआरडी मंत्रालय को भेजी गई जांच रिपोर्ट पर छात्रसंघ के वर्तमान व पूर्व अध्यक्षों ने सवाल उठाते हुए कहा है कि बिना कोई जांच हुए ही इविवि प्रशासन कैसे कोई जांच रिपोर्ट भेज सकता है .

लालसा यादव का झूठ  
वहीं इविवि की महिला सलाहकार बोर्ड (वैब) की पूर्व अध्यक्ष  प्रो रंजना कक्कड़ ने दावा किया है कि कुलपति रत्न लालहंगलू के खिलाफ कल्याणी यूनिवर्सिटी की छात्रा की मां की ओर से दो पत्र इविवि वैब को भेजा गया था उसकी मूलप्रति मेरे पास है. जबकि कुछ दिन पहले वैब की वर्तमान अध्यक्ष लालसा यादव ने ऐसे किसी पत्र से इनकार किया था.  प्रो रंजना कक्कड़ ने बताया कि वहपत्र 16 मई 2016 को मिला था. हालांकि कि वो दिसंबर 2015 में रिटायर होने गई थी लेकिन उन्हें जून 2016 तक का सत्र लाभ मिला था. उन्होंने मूल प्रति अपने पास जबकि एक प्रति कॉलेज के रिकार्ड में रख दिया था. उनके रिटायर होने के बाद मामले को दबा दिया गया.
वहीं छात्रों के तीव्र विरोध के बाद आरोपी कुलपति  रतन लालहंगलू  आज होनेवाले इविवि के स्थापना दिवस समारोह में शामिल नहीं होंगे ऐसी सूचना मिली है. इस बीच 24 सितंबर को जिले की तमाम महिला संगठनों द्वारा आरोपी कुलपति के खिलाफ सिविल लाइंस के सुभाष चौराहे पर विरोध प्रदर्शन की कॉल की गई है.

महिला साहित्यकार को धमकी मामले में नया मोड़ 
पिछले दिनों जिस महिला साहित्यकार के साथ कुलपति की अश्लील बातचीत का स्क्रीन शॉट वायरल हुआ था उसे दिल्ली स्थित आवास पर धमकी की खबर आई थी. धमकी वाले दिन और समय पर एबीवीपी के नेता अविनाश दुबे के उस इलाके में होने की पुष्टि हुई है. गौरतलब है कि महिला साहित्यकार ने कहा था कि उसे धमकी देने आये लोग कुलपति के लोग थे. छात्रनेता अविनाश दूबे ने उस वक्त गाजियाबाद जाने की बात कबूल कर ली है लेकिन उसका कहना है कि वह धमकाने नहीं बल्कि महिला के बुलाने पर गया था.

वहीं इस बाबत जब महिला साहित्यकार से पूछा गया तो उन्होंने कहा कि ‘न तो मैंने इसे बुलाया था न ही इसे कोई चैट का स्क्रीनशॉट दिया था. उलटे ये बंदा खुद मुझे पिछले चार महीने से गंदे मेसेजेज भेजकर और कॉल करके पूछता था कि रतन लालहंगलू तुम्हारे यहां क्यों आता है, क्या करता है. इस वाल के जवाब में कि जब वो आपको चार महीने से परेशान कर रहा था तो आपने उसके खिलाफ महिला हेल्पलाइन में कोई शिकायत क्यों नहीं दर्ज करवाई, महिला साहित्यकार ने कहा कि प्रो रतन लालहंगलू को भी वो मेसेजेज भेजकर धमकाता था इस बारे में खुद हंगलू ने मुझसे कहा था कि वो जल्द ही अविनाश दूबे के खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज करवाने जा रहे हैं. तो अविनाश दूबे ने जो मेसेजेज मुझे भेजे थे वो भी मैंने कुलपति रतनलाल हंगलू को फॉरवर्ड कर दिये थे कि दोनों मामले की एक ही शिकायत में निपटारा हो जायेगा.’

वहीं छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष ऋचा सिंह  द्वारा इविवि के छात्रों की तरफ से कल एक प्रेस विज्ञप्ति जारी की गई है. जिसमें बताया गया है कि विश्वविद्यालय लगातार ग़लत सूचना के माध्यम से छात्रों समेत मंत्रालय को गुमराह करने का प्रयास कर रहा है. एक तरफ़ विश्वविद्यालय द्वारा जांच कमेटी गठित होती है और जिनकी अध्यक्षता में गठित होती वो किसी भी सूचना से इंकार करते हैं।  दूसरी तरफ़ बिना जाँच हुए, कौन से रिपोर्ट मानव संसाधन विकास मंत्रालय को अवकाश के दिन, जब विश्वविद्यालय और मंत्रालय दोनों जगह अवकाश था, भेजी गयी है ?? यह अपने आप मे संदेहस्पद है और विश्वविद्यालय की मंशा पर सवाल खड़े करती है।
जब छात्र लगातार परिसर में आंदोलनरत है, ऐसे समय मे विश्वविद्यालय द्वारा इतने असंवेदनशील व्यवहार से छात्र- छात्राओं में लगातार गुस्सा बढ़ रहा है। आज छात्रों द्वारा “ट्विटर ट्रेंड”के माध्यम से मानव संसाधन विकास मंत्रालय और प्रधानमंत्री कार्यालय से कुलपति की बर्खास्तगी की माँग की गयी।

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दिग्गज स्त्रीवादी समानांतर सिनेमा की एक बड़ी सख्सियत कल्पना लाजमी का निधन !

राजीव कु. सुमन

प्रसिद्ध फिल्मकार 64 वर्षीय कल्पना लाजमी (1954 – 2018) का मुंबई के कोकिलाबेन धीरूभाई अंबानी अस्पताल में २३ सितम्बर २०१८ रविवार की सुबह सुबह साढ़े चार बजे निधन हो गया। उनके भाई देव लाजमी ने यह जानकारी देते हुए बताया कि ‘वे किडनी के कैंसर से पीड़ित थीं. उनकी किडनी और लीवर ने काम करना बंद कर दिया था।’ उनका अंतिम संस्कार आज दोपहर साढ़े बारह बजे ओशिवारा श्मशान भूमि में किया जाएगा।

कल्पना लाजमी की  विरासत कला और फिल्म जगत थी. वे प्रख्यात चित्रकार ललिता लाजमी की बेटी थीं और फिल्म निर्माता गुरु दत्त की भतीजी थीं, लेकिन कल्पना लाजमी ने वहाँ अपना अलग रास्ता अख्तियार किया. वह स्त्रियोंमुख और समानांतर-यथार्थवादी फिल्मों की तरफ मुड़ी. कल्पना लाजमी  ने अपने करियर की शुरुआत अनुभवी फिल्म निर्देशक श्याम बेनेगल के साथ सहायक निर्देशक के रूप में शुरू किया जो पादुकोण परिवार के उनके रिश्तेदार भी थे। उनकी फिल्में अक्सर महिलाओं पर केंद्रित रहती थीं। उनकी कुछ लोकप्रिय फिल्मों में रूदाली, दमन, दरमियान शामिल हैं।


बाद में वह श्याम बेनेगल की ‘भूमिका: द रोल’ में सहायक पोशाक डिजाइनर के रूप में काम करने लगीं। उन्होंने वृत्तचित्र फिल्म डी.जी. के साथ अपना निर्देशन शुरू किया. बाद में 1978 में मूवी पायोनियर और ‘ए वर्क स्टडी इन चाय प्लकिंग’ (1979)  और ‘अलोंग द ब्रह्मपुत्र’ (1981) नाम के वृत्तचित्रों का भी निर्देशन किया. उन्होंने 1986 में ‘एक पल’ फिल्म निर्देशक के रूप में शुरुआत की जो शबाना आज़मी और नसीरुद्दीन शाह अभिनीत थे। उन्होंने फिल्म का निर्माण किया, फिल्म लेखन में  हिस्सा लिया और गुलजार के साथ फिल्म के लिए पटकथा भी लिखी थी।

उसके बाद कुछ समय के लिए उन्होंने फिल्म निर्देशन से अवकाश लिया और तन्वी आज़मी अभिनीत अपने पहले टेलीविजन धारावाहिक लोहित किनारे (19 88) को निर्देशित करने में जुट गईं. उन्होंने 1993 में डिंपल कपाडिया अभिनीत और समीक्षकों द्वारा प्रशंसित ‘रुदाली’ के साथ सिनेमा में वापसी की। इस फिल्म के लिए डिम्पल कपाडिया को सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला.

उनकी अगली फिल्म ‘दर्मियान: इन बिटविन’ (1997) थी जिसकी वे खुद  निर्माता-निर्देशक थीं. फिल्म में  किरण खेर और तब्बू को उनके प्रभावशाली  अभिनय के लिए खूब सराहा गया.

उनकी अगली फिल्म ‘दमन’ 2001 में आई जो वैवाहिक हिंसा पर बनी फिल्म थी. फिल्म को भारत सरकार द्वारा वितरित किया गया था और जिसे  आलोचकों द्वारा अत्यधिक प्रशंसित किया गया। यह दूसरी बार था जब एक अभिनेत्री ने स्त्री निर्देशन में बनी फिल्म के तहत रवीना टंडन को सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के लिए राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीता था।

उसकी अगली फिल्म थी ‘क्यों’ (2003) जो बहुत अधिक ध्यान नहीं खिंच पायी आलोचकों का. उनकी आखिरी रिलीज फिल्म ‘चिंगारी’ थी जिसमे सुष्मिता सेन ने एक गांव की वेश्या के रूप में अभिनय किया था, वह भी 2006 में रिलीज होने के बाद व्यावसायिक रूप से असफल रही. यह फिल्म भूपेन हजारिका के उपन्यास ‘द प्रॉस्टीट्यूट एंड द पोस्टमैन’ पर आधारित थी। हजारिका उनके पार्टनर भी थे।उनकी मौत पर सिने जगत के कई जानी-मानी हस्तियों ने ट्विटर और अन्य सोशल मिडिया पर शोक सन्देश व्यक्त किया है.

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शालिनी मोहन की कवितायेँ : ‘परिभाषित’ व अन्य

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शालिनी मोहन


विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कविताएँ प्रकाशित। ‘अहसास की दहलीज़ पर’ साझा काव्य संग्रह प्रकाशित .
सम्पर्क:  shalini.mohan9@gmail.com

1.
परिभाषित

विधवा शब्द का अर्थ क्या है

माँग में सिंदूर और माथे
पर एक लाल बिंदिया
श्रृंगार को पूर्ण रूप से दर्शाती है
इनका होना ही
एक स्री होने का परिचायक है
यहाँ देह और आत्मा दोनों
एक जैसे दिखते हैं
वह देह जिसे उसने जिया
और आत्मा जिसे उसे पूजना है

एक विधवा नहीं समझना चाहती
कविता को
ऐसा करना तोड़ देगा
उसका भ्रम
यह एक छोटी सी स्वतंत्रता होगी
जिसे वह पूरी तरह
जी नहीं पायेगी

जब अंधेरी गुफा में
उसकी उबड़-खाबड़ दीवार पर
लड़खड़ाने लगते हैं क, ख, ग
और घ भी ऊँघता नज़र आता है
तो अचानक चमगादड़ और उल्लु
घूरने लगते हैं तीव्रता से उनको
तब वे स्वतः टूट टूट कर
गिरने लगते हैं
अब कोई पैशाचिक शक्ति
जागृत करती है उन्हें
अचानक एक झोंके में लेके
जा बैठती है बूढ़े बरगद पर
वहीं उनका एकांत निवास है

नीचे ठूंठ पर बैठता है
एक ओझा,  बनाता
एक कालजयी रचना

2.
साड़ी में लिपटी नारी

क्या सादगी
चेहरे पर उसके छाई है
जैसे पूस के महीने में
धूप मन को भायी है
सीमाओं में बँधी
असीमितताओं को समेटे
लो साड़ी में आ गई
नारी एक लिपटी

आई तो सबको बाँध लिया
बेटी को इसने नाम दिया
जा कर भी सबको बाँध दिया
बहू से घर को आबाद किया
बँध गई जिसने भी बाँध दिया
सूनी कलाई को है नाम दिया
अपने घने केसू से
सारे घर में है छाँव किया

स से सबल, प्र से प्रबल
म से ममता को निस्सार किया
अपने नयन के बूँदों से
प्यार से है सबको थाम लिया
कर्म को ही धर्म समझा
लोभ से हमेंशा रही दूर
मेहनत की पराकाष्ठा कर दी
कभी न इसका हुआ ग़ुरुर

बारिश की निरंतर बूँदें भी
इस चट्टान को ना पिघला सकी
बनी, मिटी, मिट के बनी
तब जा कर यह नारी
देखो एक साड़ी में है लिपटी

3.
एक आदिवासी लड़की

बस्ती, जंगल, नदी, उड़ते पंछी
बहुत याद करती है मुनिया
पिछली बार जब लौटी थी
अपनी बस्ती
उसकी माँ ने कहा था
एक-दो साल में ब्याह दी जायेगी
धीरे-धीरे मुनिया समझने लगी है
नारी सशक्तीकरण, शहरीकरण और स्पर्धा

मुनिया अपने थोड़े से बदले चेहरे को
हर दिन आईने में निहारती है
उसका काला रंग
अब थोड़ा फीका हो गया है
लाल, पीले रंग फबकर
अपनी चमक छोड़ने लगे हैं

रूखे, बेज़ान बाल
मुलायम और चमकदार हो गये हैं
उसकी फटी एड़ी
चप्पल में सुन्दर दिखने लगी है
तन पर अच्छे, आधुनिक कपड़े हैं

बालकनी में आती बारिश के
हल्के छींटों में कैसे भीगना है
सीख लिया है उसने
अपने मन के तालाब में खिले कमल को
कैसे संभालना है
जानती है अब मुनिया

अपनी मालकिन की दुलारी
अक्सर यही सोचती है
कि एक दिन राजकुमार आयेगा
गोरा, सुदंर और शहरी
मालकिन ढूँढ लायेगी
जैसे अपनी बेटी के लिये लायी थी

लौटना फिर उसी मिट्टी पर
भय और उदासी देता है
अपने सपने में उसी बस्ती के
अंतिम छोर पर
एक शहर बसा चुकी है मुनिया
मुनिया जब हँसती है
उसकी सारी सादगी
झलकती है, सफ़ेद दाँतों से

4.
वेश्या 

वेश्या शब्द का विलोम क्या होगा
वेश्या शब्द को लोगों ने
बहुत नंगा किया है, घोर घृणा दी है
इसके उच्चारण मात्र से लोगों ने
अपनी जिह्वा काटी है हर बार
इस शब्द ने इतनी घृणा झेली है
कि लज्जित हुआ, शर्मिंदा हुआ खुद से बार-बार
कहाँ जाये, क्या करे

हमारे दिमाग़ में इसने
सिर्फ़ एक देह और दृश्य पैदा किये हैं
बची हुई देह, दृश्य और परिस्थितियों के बारे में
ना तो हम सोचते ना समझते हैं
सोचने और समझने से पूरी तरह इन्क़ार कर देते हैं
एक ऐसा दिन रहा होगा
जिसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते
जब जीवन काटने के लिए
बेचने को उस स्त्री के पास कुछ भी नहीं बचा होगा
अंत में उसने अपना शरीर बेच दिया
सत्य, असत्य, सही, ग़लत को पोटली में बाँध
बन गई वह वेश्या

वेश्या सिर्फ़ एक देह नहीं
उसके पास एक आत्मा भी है

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अश्लील चैट की जांच के लिए बनी जांच-समिति पर उठे सवाल, जज ने कहा मुझे नहीं है समिति-गठन की सूचना

सुशील मानव 

इलाहाबाद विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा जांच कमेटी गठित करके मामले की जांच कराए जाने की सूचना के बाद इलाहाबाद विश्वविद्यालय कैंपस में एक बार फिर छात्रों का गुस्सा अपने उफान पर है। छात्रों ने इविवि प्रशासन द्वार गठित जांच कमेटी की विश्वसनीयता और संवैधानिकता पर आपत्ति जताते हुए जांच कमेटी के बहाने मामलेको डायवर्ट करके उसकी लीपापोती करने का गंभीर आरोप लगाया है। वहीं महिला साहित्यकार ने भी कहा कि जिस जज की बेटी को पहले किया नियुक्त उसे ही सौपा है जांच का जिम्मा-जांच निष्पक्ष नहीं हो सकती. इस बीच लेखकों और वामपंथी संगठनों पर भी सवाल उठ रहे हैं. सोशल मीडिया में कहा जा रहा है कि कई वामपन्थी शिक्षकों की नियुक्ति के कारण वामपंथी लेखक संगठन महिला साहित्यकार पर हमले के मामले में चुप हैं.

धरने पर बैठीं छात्राएं 

अपनी आपत्ति और माँगों को लेकर इविवि के आंदोलनरत छात्रों ने कल एक प्रेसविज्ञप्ति भी रिलीज की।


पढ़ें: कुलपति पर जांच 

प्रेस विज्ञप्ति:
आज जैसा कि सभी प्रमुख समाचार पत्रों से हम सबको यह ज्ञात हुआ है कि इलाहाबाद विश्वविद्यालय के कुलपति का प्रभार संभाल रहे प्रोफेसर के.एस. मिश्रा जी ने कल इलाहाबाद हाईकोर्ट से अवकाश प्राप्त न्यायमूर्ति माननीय अरुण टंडन जी की अध्यक्षता में एक उच्च स्तरीय जाँच कमेटी का गठन कर दिया गया है, कुलपति रतन लाल हांगलू पर पद के दुरुपयोग एवं महिला उत्पीड़न के आरोपों की जांच की मांग को लेकर।
1- हम इस जांच कमेटी को पूरी तरह से अस्वीकार्य करते हैं, यह जाँच कमेटी किसी भी तरह से स्वीकार्य नहीं है।
2- हमारी आपत्ति के प्रमुख कारण निम्न है-
• जब विश्वविद्यालय के कुलपति रतन लाल हांगलू छुट्टी पर चले गये तो उनके मातहत या एक्टिंग विस चांसलर स्थायी कुलपति के ऊपर जांच के लिए कैसे किसी कमेटी का गठन कर सकते हैं, कमेटी गठन करना एक्टिंग वीसी के अधिकार क्षेत्र के बाहर है।
• कुलपति रतन लाल हांगलू पर लग रहे आरोपों की जांच मानव संसाधन विकास मंत्रालय से कमतर किसी संस्था के द्वारा गठित नहीं की जा सकती जिसकी माँग पूर्व अध्यक्ष ऋचा सिंह मानव संसाधन विकास मंत्रालय, माननीय राष्ट्रपति महोदय, माननीय प्रधानमंत्री जी,एवं महिला आयोग द्वारा की जा चुकी है।
• जांच कमेटी में महिला का न होना पुनः विश्वविद्यालय का महिला के प्रति असंवेदनशीलता का प्रमाण है। महिला उत्पीड़न पर बन रही किसी भी कमेटी में महिला सदस्य का होना अनिवार्य है, यह कानून कहता है और यूजीसी के नियम कहते हैं।
• कनफ्लिक्ट ऑफ इनटेरेस्ट: माननीय न्यायमूर्ति श्री अरुण टंडन जी जो खत्री पाठशाला के सम्बन्धित है और श्री एस.एस. खन्ना, खत्री पाठशाला द्वारा संचालित है। अतः ऐसे व्यक्ति द्वारा जांच न्यायसंगत कैसे हो सकती जो विश्वविद्यालय के अधीन एवं सम्बद्ध हो।
• कमेटी के नोडल अधिकारीजो कि विश्वविद्यालय में असिस्टेंट रजिस्ट्रार हैं, जिनकी नियुक्ति लगभग एक महीने पहले हुयी है और वर्तमान में प्रोबेशन पीरियड पर हैं और कुलपति के मातहत हैं जिनसे जांच कमेटी प्रभावित हो सकती है।
• जांट कमेटी में टाइम बाउंड का नहीं होना अर्थात समय सीमा का निर्धारण न करना, विश्वविद्यालय द्वारा जाँच के नाम पर की जा रही लीपापोती की कलई खोलता है।
• विश्वस्त सूत्रों से पता चला है कि विश्वविद्यालय द्वारा कथित महिला पर दबाव बनाकर उसको प्रभावित करने का प्रयास किया जा रहा है, जो बेहद निंदनीय है और यह विश्वविद्यालय द्वारा जांच को प्रभावित करने का घृणित प्रयास है जो बेहद निंदनीय है।
3- यह स्पष्ट है विश्वविद्यालय की कार्यप्रणाली और बयानों से कि विश्वविद्यालय प्रशासन, छात्रों एवं इलाहाबाद प्रशासन में भ्रम की स्थिति को पैदा करके परिसर में विपरीत स्थितियों को पैदा करने पर अमादा है।  एक तरफ कुलपति जी का बयान आता है कि जब तक जाँच नहीं हो जाती वह परिसर में प्रवेश नहीं करेंगे दूसरी तरफ रजिस्ट्रार द्वारा स्थापना दिवस दिनांक 23.09.2018 में कुलपति के उपस्थिति को निश्चित किया जाता है और पत्र जारी करके। जो कि कैंम्पस में टकराव की स्थिति बनाने का विश्वविद्यालय द्वारा प्रयास है जिस संबंध में आज वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक को पत्र लिखकर भी सूचित कर दिया गया है, कि कैंपस में कुलपति का प्रवेश किसी भी स्थिति में स्वीकार्य नहीं है।
4- आज ऋचा सिंह द्वारा पुनः मानव संसाधन को पत्र लिखकर इस तथ्य से अवगत कराया गया कि किस तरह से विश्वविद्यालय प्रशासन जांच कमेटी के नाम पर एक गंभीर मामले की लीपापोती करने का प्रयास कर रहा है। विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा जांच कमेटी का गठन करना जब उसके अधिकार क्षेत्र में है ही नहीं तो वह जांच कमेटी का गठन कैसे कर सकता है। अतः मंत्रालय तत्काल अपने स्तर पर जांच कमेटी का गठन करे और इस कमेटी को भंग करने का आदेश विश्वविद्यालय के दे।

पढ़ें: महिला साहित्यकार से इलाहाबाद विश्वविद्यालय के कुलपति की अश्लील बातचीत

महिला साहित्यकार की आपत्ति 
वहीं दूसरी ओर पिछले दो दिन से लगातार इलाहाबाद से दिल्ली तक उक्त महिला साहित्यकार द्वारा पैसे लेकर अपना स्टैंड बदलने की बातें होती रही। इस मामले में जब हमने महिला साहित्यकार से संपर्क किया तो उन्होंने इसका पुरजोर खंडन करते हुए कहा-“असंभव। सवाल ही नहीं उठता। मैं इलाहाबाद के सबसे धनी व्यक्तियों में से एक की पत्नी हूँ। अगर कोई आपको पैसे जैसी बात कहता है तो वो दुनिया का सबसे मूर्ख और नीच भी है। मेरा संबंध सबसे ज्यादा पढ़े लिखे और साहित्यिक परिवार से है। मैं अपना स्टैंड क्यूं बदलूँगी। जब जज मुझे बुलाएंगे, मैं अपना पक्ष सौ प्रतिशत रखूँगी। मैं मरते दम तक सच का साथ दूँगी”

कुलपति-निवास के सामने प्रदर्शनकारी छात्र 

वहीं महिला साहित्यकार का ये भी कहना है कि-“मैंने रतन लाल हांगलू को अपनी किताब नहीं दी थी। किताब उन्हें मीरा सम्मान देने वाली संस्था की ओर से ही दी गयी थी। और मेरे दिल्ली निवास पर हमला 8 सितंबर को हुआ था।”महिला साहित्यकार ने एबीवीपी छात्र नेता अविनाश दूबे पर फोन पर धमकी देने और अश्लील मेसेज भेजने का आरोप लगाया। महिला साहित्यकार का कहना है कि ‘कभी ये आदमी खुद रतनलाल हांगलू का आदमी बताता है, कभी कहता है कि रजिस्ट्रर ने, तो कभी कहता है कि पीआरओ चितरंजन कुमार सिंह ने भेजा है। ये आदमी मुझसे पैसे उगाहने के चक्कर में लगा हुआ है।’  महिला साहित्यकार ने इविवि प्रशासन द्वारा जांच कमेटी की निष्पक्षता और विश्वसनीयता पर भी गंभीर सवाल उठाए हैं। महिला साहित्यकार का कहना है कि ‘इविवि के कुलपति हाँगलू ने 26 जनवरी को रिटायर्ड जज अरुण टंडन को अपने यहाँ बुलाकर विशेष पुरस्कार दिया गया था और फिर बदले में जज अरुण टंडन द्वारा एसएस खन्ना गर्ल्स डिग्री कॉलेज में कुलपति रतल लाल हांगलू पति-पत्नीको विशिष्ट अतिथि के तौर पर बुलाया जाता है।दोनों एक दूसरे के घर अक्सर लंच-डिनर पर आते-जाते रहे हैं। महिला साहित्यकार काकहना है कि जज टंडन और कुलपति हांगलू के इसी म्युचुअल संबंधों के चलते ही इविवि के कुलपति रतन लाल हांगलू ने जज अरुण टंडन की बेटी को बतौर टीचर इविवि में नियुक्ति दी है।‘

सुशील मानव फ्रीलांस जर्नलिस्ट हैं. संपर्क: 6393491351

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संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016, themarginalisedpublication@gmail.com

डॉक्टर मनीषा बांगर ‘वायस ऑफ पीपल’ सम्मान से हुईं सम्मानित !



 राजीव कुमार सुमन   

14 सिंतबर 2018 को दिल्ली के माता सुंदरी रोड पर स्थित एवान-ए-गालिब ऑडिटोरियम में पल-पल न्यूज वेब पोर्टल की तरफ से आयोजित कार्यक्रम और सम्मान समारोह में मुद्दों और सरोकारों से जुड़े सोशल मीडिया के कई जाने-माने पत्रकारों और व्यक्तियों को ‘वायस ऑफ पीपल’ सम्मान से सम्मानित किया गया। सम्मान पानेवालों में तीन महिलाएं — पत्रकार भाषा सिंह, सम्पादक प्रेमा नेगी और बामसेफ की बहुजन नेत्री डॉ मनीषा बांगर शामिल हैं.

पेशे से गैस्ट्रोएन्टरोलोजिस्ट चिकित्सक डॉ. मनीषा बांगर बामसेफ की पूर्व उपाध्यक्ष रही हैं और बहुजन समाज की प्रगति केलिए लगातार सक्रिय रहने के लिए उन्हें यह सम्मान दिया गया. सोशल मीडिया खासकर फेसबुक, ट्विटर और यु-ट्यूब वीडियो के माध्यम से वामसेफ की राजनीति और बहुजन मुद्दों पर अपनी बेबाक बात रखने केलिए वे मशहूर हैं.

पूर्व राज्य सभा सांसद अली अनवर और पूर्व आईपीएस एसआर दारापुरी के हाथों सम्मानित किए जाने के बाद डॉ मनीषा बांगर ने कहा कि ‘यह पुरस्कार मेरे लिए बहुत मायने रखता है क्योंकि मीडिया वर्ल्ड में मेरी यह धमक बामसेफ की बैठकों में मेरे विचार से लेकर एक विशेषज्ञ चिकित्सक  होने के नाते मेरी राय जानने तक ही सिमित रही थी, किन्तु मुंबई और दिल्ली में नेशनल इंडिया न्यूज नाम के न्यूज नेटवर्क मीडिया की शुरुआत करने के बाद, जिसमें मेरे कार्यक्रमों को चार लाख से ज्यादा की सदस्यता के साथ और केवल चार महीने में ही दो करोड़ से ज्यादा लोगों द्वारा देखा गया है, मैं उन सभी लोगों को धन्यबाद करती हूं जिन्होंने मुझ पर विश्वास किया और मुझे समर्थन दिया और उनको भी जिन लोगों ने मेरा विरोध किया। यह पुरस्कार इन दोनों कारणों से एक बड़ी भूमिका निभाता है, जिसे मैंने अपने देश के लोकत्रांत्रिक मूल्यों और लोकतांत्रिक फेवरिक को बनाए रखने के लिए जिम्मेदार नागरिक के साथ-साथ चुनौती के रुप में लिया है।’

वहीँ कार्यक्रम को कई जाने-माने मीडिया कार्यकर्ताओं ने संबोधित किया. कार्यक्रम को संबोधित करते हुए वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश ने कहा कि यह भारतीय मीडिया का सबसे बुरा दौर है। उन्होंने कहा कि मीडिया बजाय सत्ता से सवाल पूछने के उल्टे सत्ता पक्ष की तरफ से सवाल पूछ रहा है। पल पल न्यूज़ की संपादक खुश्बू अख्तर के यूट्यूब चैनल की सराहना करते हुए कहा कि ऐसे लोग लोग बधाई के पात्र हैं, जिन्होंने सच बोलने के लिये नये विकल्प ईजाद किये हैं।

प्रोफेसर रतन लाल ने कहा कि वाटसप यूनीवर्सिटी से मिलने वाली‘शिक्षाओं’के दौर में फेक न्यूज़ का चलन बहुत अधिक बढ़ गया है। उन्होंने कहा कि समय है कि अब न सिर्फ फेक न्यूज़ बल्कि फेक जर्नलिस्टों के खिलाफ भी अभियान चलाया जाए।

आम आदमी पार्टी से आए संजय सिंह ने बीजेपी के इशारे पर चल रहे पत्रकारों को जमकर लताड़ा और कहा कि बड़े-बड़े चैनल के पत्रकार आजकल बीजेपी के प्रवक्ता बनकर विपक्ष से सवाल कर रहे हैं और देख कर अच्छा लगता है की जब इन पत्रकारों से सवाल करने के लिए एक अल्टरनेटिव मीडिया का तबका  सरकार और गोदी मीडिया के इस रवयै पर खुलकर सवाल उठा रहा है जिसमें दी वायर,पलपल न्यूज और बोलता हिंदूस्तान अपनी भूमिका को ईमानदारी के साथ उठा रहा है.

कार्यक्रम में अनेक बुद्धिजीवी, पत्रकार, लेखक और समाजिक कार्यकर्ताओं ने शिरकत की थी। इस मौके पर समाजिक कार्यकर्ताओं, एंव अलग अलग क्षेत्रों के युवाओं को सम्मानित किया गया। इस कार्यक्रम को जेएनयू के लापता नजीब अहमद की मां फातिमा नफीस, राज्य सभा के पूर्व सांसद अली अनवर, पूर्व आईपीएस एसआर दारापुरी, वरिष्ठ पत्रकार प्रशांत टंडन, अभिषेक श्रीवास्तव, आम आदमी पार्टी के प्रवक्ता एंव राज्यसभा सांसद संजय सिंह, जिग्नेश मेवानी आदि ने संबोधित किया।

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