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मी लार्ड, यहाँ महिलाओं को न्याय नहीं न्याय का स्वांग मिलता है

पिछले दिनों भारत के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई पर उनके मातहत काम कर चुकीं एक महिला का आरोप सामने आया कि मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने उनका यौन उत्पीड़न किया, विरोध करने पर नौकरी से निकलवा दिया, फिर इसकी सजा उसे उसके परिवार को प्रताड़ित करके दी गयी। पहली नज़र में ये मामला राजनितिक करार दिया गया बहुत से लोगों ने इसे इसी रूप में देखा भी। जाहिरन ये हैरान करने वाली बात नहीं थी आखिर मौजूदा निज़ाम में देश की सर्वोच्च संस्थाओं की निष्पक्षता और स्वायत्तता लगातार निशाने पर रही है। मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई के मामले में तो इसकी एक मजबूत पृष्टभूमि भी पहले से रही है। गौरतलब है कि 12 जनवरी 2018 को जस्टिस गोगोई सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन चीफ़ जस्टिस दीपक मिश्रा के ख़िलाफ़ प्रेस कॉन्फ्रेंस करने वाले चार न्यायाधीशों में शामिल थे। जस्टिस गोगोई समेत चारों न्यायाधीशों ने सार्वजनिक कहा था कि न्यायपालिका पर सरकार का दखल और बहुत दबाव है। चारों जजों ने उनके द्वारा तत्कालीन सीजेआई दीपक मिश्रा को लिखी चिट्ठी भी सौंपी, जिसमें अन्य बातों के साथ हर छोटे-बड़े मामले की न्यायिक प्रक्रिया में सत्ता के हस्तक्षेप के कारण देश और न्यायपालिका पर दूरगामी असर पड़ने के सन्दर्भ में चिंता जताई गयी थी। यौन शोषण के इस आरोप के सन्दर्भ में इस बात का जिक्र भी जरूरी है कि आने वाले दिनों में मुख्य न्यायधीश कई ऐसे मामलों पर सुनवाई करने वाले थे जिसे लेकर मौजूदा सरकार असहज़ हो सकती थी या है । सबसे महत्वपूर्ण राफेल विमानों की खरीद का मामला ही है जिसपर सुप्रीम कोर्ट से सरकार को क्लीन चिट मिल जाने के बाद अखबारों में छपे दस्तावेज़ों के आधार पर खुद मुख्य न्यायधीश रंजन गोगोई ने ही इसपर संज्ञान लिया।

सुप्रीम कोर्ट के सामने प्रदर्शन करती एनएफआईडव्ल्यू की महासचिव एनी राजा को गिरफ्तार कर ले जाती हुई पुलिस

दरअसल, मामला तब सामने आया जब सुप्रीम कोर्ट में जूनियर कोर्ट असिस्टेंट के पद पर काम करने वाली 35 वर्षीय महिला ने सुप्रीम कोर्ट के 22 जजों को पत्र लिखकर आरोप लगाया कि मुख्य न्यायाधीश जस्टिस रंजन गोगोई ने अक्टूबर 2018 में उसका यौन उत्पीड़न किया था। कथित उत्पीड़न की यह घटना 11 अक्टूबर 2018 की है,महिला का आरोप था कि उस दिन जब वे सीजेआई के घर पर बने उनके दफ्तर में थीं तब चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने उन्हें कमर के दोनों ओर से पकड़कर गले लगाया और जबरन उनके नज़दीक आने की कोशिश की। चीफ जस्टिस के इस “आपत्तिजनक व्यवहार’का विरोध करने के बाद से उनके और उनके परिवार के अन्य सदस्य लगातार प्रताड़ना के शिकार हो रहे हैं। देखा जाय तो यह बात निराधार नहीं है क्योंकि इस घटना के बाद महिला का विभिन्न विभागों में तीन बार तबादला हुआ और दो महीने बाद दिसंबर 2018 में उन्हें बर्खास्त कर दिया गया। जांच रिपोर्ट में जिन तीन वजहों का जिक्र है उनमें से एक उनका एक शनिवार को बिना अनुमति के कैज़ुअल लीव लेना भी है। फिर उनके पति और पति के भाई को भी जो दिल्ली पुलिस की नौकरी में थे झूठे केस में फंसाया गया और नौकरी से निलंबित कर दिया गया।

मामला शुरुआत में नाटकीय इसलिए भी लगा क्योंकि महिला के आरोप के तुरंत बाद सुप्रीम कोर्ट के एक वकील उत्सव बैंस ने सोशल मीडिया पोस्ट पर खुलासा किया कि मुख्य न्यायधीश को फंसाने की बड़ी साजिश हो रही है जिसमें अंडरवर्ल्ड डॉन दाऊद इब्राहिम और जेट एयरवेज के संस्थापक नरेश गोयल शामिल हैं। बाद में हलफ़नामा दाखिल कर उसने कहा कि चीफ जस्टिस को बदनाम करने के लिए उसे भी रिश्वत पेश की गयी थी यह मामला उक्त महिला और कुछ अन्य रजिस्ट्री कर्मचारियों के साथ तपन चक्रवर्ती और मानव शर्मा द्वारा चीफ जस्टिस के खिलाफ एक साजिश है। बैंस ने पीठ को सीलबंद लिफाफे में सबूत उपलब्ध कराए जिसके तहत माफ़ी मांगती महिला के सीसीटीवी फुटेज भी शामिल होने की बात कही गयी। इसके अलावा ये भी गौर करने वाली बात थी कि जिस मानव शर्मा और तपन कुमार चक्रवर्ती का जिक्र हो रहा था वो दोनों सुप्रीम कोर्ट में असिस्टेंट रजिस्ट्रार के पद पर तैनात थे जिनका काम जजों द्वारा डिक्टेट किए गए आदेश को नोट कर उसे कोर्ट की वेबसाइट पर अपलोड करने की थी। जनवरी 2019 की शुरुआत में सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस आरएफ नरीमन की बेंच की अवमानना के मामले में अनिल अंबानी को व्यक्तिगत रूप से पेश होने का आदेश दिया गया था लेकिन इन दोनों ने जो अपलोड किया उसके मुताबिक अनिल अंबानी को कोर्ट में व्यक्तिगत रूप से पेश होने की जरूरत नहीं थी, मामले के प्रकाश में आने पर चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने दोनों को सस्पेंड कर दिया था। साज़िश की बात घटनाओं के क्रम से भी साबित करने की कोशिश की गयी मसलन महिला के साथ यौन दुर्व्यवहार की घटना 11 अक्टूबर 2018 की है और तपन व मानव पर आरोप जनवरी 2019 के केस में लगा, यह मामला अनिल अंबानी से जुड़ता है जिनका सम्बन्ध राफेल विमानों की खरीद मामले से भी है।

खैर, इस पूरे मामले का केवल राजनीतिक पक्ष नहीं है , इसका दूसरा पक्ष ज्यादा महत्वपूर्ण है जो महिलाओं को न्याय, कार्यस्थल पर उनकी सुरक्षा,लैंगिक बराबरी जैसे मुद्दों से जुड़ा है लेकिन जिस तरह से इसे निपटाया गया है वह इंसाफ की बुनियादी अवधारणा को ही सिरे से ख़ारिज करता है मसलन, इंसाफ हो इसके लिए जरूरी है कि दूसरे पक्ष की बात सुनी जाय और कोई भी व्यक्ति अपने खिलाफ लगे आरोपों के लिए खुद जज होकर फैसला नहीं सुना सकता। जबकि इस मामले में इन दोनों ही बातों का उल्लंघन हुआ है, चीफ़ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता में जस्टिस अरुण मिश्रा और जस्टिस संजीव खन्ना की तीन जजों की बेंच ने छुट्टी के दिन मामले पर गौर किया और मामलें की जांच के लिए तीन सदस्यों की एक जांच समित बनाई। जस्टिस एसए बोबडे, जस्टिस इंदु मल्होत्रा और जस्टिस इंदिरा बनर्जी की इन हाउस कमेटी ने अपनी जाँच में महिला कर्मचारी की शिकायत में कोई सत्यता नहीं पाई और इस आधार पर मुख्य न्यायधीश को छः मई को आरोपों से मुक्त करते हुए क्लीन चिट दे दी। पूरी प्रक्रिया में न तो महिला की अपना एक सपोर्ट पर्सन या वकील साथ लाने की मांग मानी गयी और न ही प्रक्रिया की वीडियो रिकॉर्डिंग की गई। विशाखा गाइडलाइंस का पालन नहीं किया गया। यह अकारण नहीं है कि पहले ही 261 महिला वकीलों, स्कालरों के महिला समूह ने एक प्रेस विज्ञप्ति जारी करते हुए इस बात को नोटिस कराया था कि जस्टिस एएस बोबड़े द्वारा गठित समिति में भी कोई बाहरी सदस्य नहीं है जो कि अपने आप में महिलाओं का कार्यस्थल पर लैंगिक उत्पीड़न (निवारण, प्रतिषेध, प्रतितोष) अधिनियम, 2013 का उल्लंघन है। सबसे दुखद मुख्य न्यायाधीश की प्रतिक्रिया रही, उन्होंने न सिर्फ आरोपों से इनकार किया बल्कि महिला के साथ न्याय के सवाल को न्यायपालिका की आजादी के बरक्स खड़ा कर दिया। यही नहीं खुद अपने खिलाफ मुकदमे की सुनवाई शुरू कर दी , न्याय का उदाहरण पेश करने के बजाय महिला की यौन उत्पीड़न की शिकायत को ही गैरकानूनी करार दे दिया। इस मामले में भारत के मुख्य न्यायाधीश और विशेष बेंच का आचरण संस्थानों और सत्ता के उन्हीं लोगों की तरह रहा जो पदों पर रहते हैं और यौन उत्पीड़न के आरोपों का सामना करते हैं। जबकि यौन उत्पीड़न की शिकायत करने वाली महिला को प्रशासनिक उत्पीड़न का भी शिकार होना पड़ा है । उसे नौकरी से बर्खास्त किया जाना उसके परिजनों पर आपराधिक मामले दर्ज होना ये सब प्रशासनिक उत्पीड़न के दायरे में आते हैं।

न्याय की मांग करती महिलायें

खटकने वाली बात ये भी है कि शिकायतकर्ता महिला को इन हाउस कमेटी के सामने अपने वकील को रखने की अनुमति नहीं मिली इसलिए तीसरी बार महिला ने न्याय नहीं मिलने की उम्मीद के साथ पेश होने से ही इंकार कर दिया, कमेटी के सामने पेश नहीं होने की उसने तीन वजह बतायी, पहली सुनवाई के दौरान न तो वकील और न ही सहायक स्टाफ रखने की अनुमति मिलना जबकि उसे ठीक से सुनाई नहीं देता है, कमेटी की सुनवाई की ना वीडियो रिकॉर्डिंग हो रही है, ना ही ऑडियो रिकॉर्डिंग। 26 और 29 अप्रैल को दिए गए उसके बयान की कॉपी भी उसे नहीं सौंपी गई। लेकिन दूसरी ओर मुख्य न्यायाधीश, महिला के तीसरी बार अदालत में पेश इंकार करने के एक दिन बाद जजों की तीन सदस्यीय समिति के सामने पेश हुए। हालाँकि महिला को इस बात की जानकारी नहीं मिली कि समिति के समक्ष मुख्य न्यायाधीश के अपना बयान दर्ज कराते समय आरोपों से अवगत अन्य लोगों को समिति के समक्ष बुलाया गया था या नहीं। सबसे हैरान करने वाली बात तो ये है कि छः मई के फैसले की कॉपी न तो शिकायतकर्ता महिला को उपलब्ध कराई गयी है ना ही उसे सार्वजानिक किया गया है। इसलिए क्लीन चिट दिए जाने के इस फैसले को तुरंत ही 300 से अधिक महिला अधिकार कार्यकर्ताओं और सिविल सोसाइटी के सदस्यों ने खारिज कर दिया और इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट द्वारा सत्ता का दुरुपयोग करार दिया। क्योंकि इसे बगैर किसी नियम, निर्देश और निष्पक्ष जांच के आधार पर लिया गया है, फैसले में विशाखा गाइडलाइंस के उल्लंघन के साथ कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न एक्ट 2013 का भी उल्लंघन किया गया है। जबकि ‘कार्यस्थल पर महिला यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निवेष एवं निवारण) अधिनियम 2013 की धारा 13 के तहत दोनों पक्षों को रिपोर्ट की कॉपी पाने का अधिकार है। पूर्व केंद्रीय सूचना आयुक्त श्रीधर आचार्युलु ने भी आंतरिक समिति की रिपोर्ट को सार्वजनिक किये जाने की मांग की है और सुचना के अधिकार के तहत गोपनीयता के तर्क को कानून के खिलाफ बताया है। साथ ही सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ जजों द्वारा इस मामले में लगे आरोपों का निपटारा करने के तौर-तरीको को लेकर केंद्र सरकार और अटॉर्नी जनरल के के वेणुगोपाल के बीच भी गंभीर मतभेद पैदा हो गए हैं।
फिलहाल, मुख्य न्यायाधीश को क्लीन चिट दिए जाने के फैसले के खिलाफ, आरोप लगाने वाली सुप्रीम कोर्ट की पूर्व महिला कर्मचारी जल्द ही अदालत में अपील करेगी, मामला क्या रुख लेता है ये तो आनेवाला समय ही बताएगा लेकिन इतना तो स्पष्ट है कि इस मामले को जिस तरह से निपटाया गया है उससे कार्यस्थल पर यौन शोषण के खिलाफ महिलाओं की इंसाफ की लड़ाई कमजोर हुई है। इस मामले में इंसाफ की लड़ाई तभी आगे बढ़ सकती है जब सबसे पहले सबसे पहले विश्वसनीय व्यक्तियों की एक विशेष जांच समिति गठित हो, शिकायतकर्ता की मांग को लेकर पारदर्शिता बरती जाए उसे अपना पक्ष रखने दिया जाए, उसकी पसंद का वकील और कानूनी मदद उसे हासिल हो, जांच पूरी होने तक मुख्य न्यायाधीश को अपने आधिकारिक कर्तव्य और जिम्मेदारियों से मुक्त किया जाये। हो सके तो भारत के राष्ट्रपति को इस मामलें में संज्ञान लेना चाहिए। आरोप लगाने वाली महिला की शिकायत को यौन उत्पीड़न की रोकथाम के लिए बनाए गए क़ानून, ‘सेक्सुअल हैरेसमेंट ऑफ़ वुमेन ऐट वर्कप्लेस (प्रिवेन्शन, प्रोहिबिशन एंड रिड्रेसल)’ 2013 के तहत सुना जाए और विशाखा गाइडलाइंस का पालन हो, कानून के मुताबिक 90 दिन में जाँच पूरी हो और सभी रिपोर्ट सार्वजनिक हो।

ये इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि अभी पिछले ही साल #metoo अभियान के तहत हमने ऐसे मामलों पर एक हद तक गंभीर नजरिया हासिल किया है। इस अभियान के तहत देश भर की महिलाओं को अपने साथ हुए यौन दुर्व्यवहार और शोषण की दस्तानों को सार्वजनिक मंचों से साझा करने का हौसला मिला था फिर उसे अदालत ले जाकर इंसाफ पाने का रास्ता भी मिला था। उत्पीड़न की ये कहानियां हाल की भी थीं पांच-दस साल के अंतराल की भी और बीस साल से पहले की भी। इसके तहत उन महिलाओं ने भी हिम्मत करके अपना कटु अनुभव साझा किया जो उम्र के चालीसवें -पचासवें दशक में हैं और अपनी आधी से ज्यादा जिंदगी जी चुकी हैं ,समाज और कैरियर में अपना मुकाम हासिल कर चुकी हैं । बावजूद इसके उनका सामने आना और कहना बहुत हिम्मत की बात थी क्योंकि उन्हें ये मालूम था समाज का बड़ा तबका पहले उनकी ओर ही ऊँगली उठाएगा उन्हें लेकर जजमेंटल होगा। इसका सकारात्मक असर भी हुआ कई नामचीन नाम बेपर्दा हुए , बहुतों को इसकी कीमत अब चुकानी पड़ी और कई सत्ता और संस्थानों के प्यारे भी बने रहे। इस अभियान से कार्यस्थलों पर महिलाओं के साथ व्यवहार को लेकर एक किस्म की चेतना और संवेदनशीलता का माहौल बनने की शुरुआत हुई दूसरी ओर सुरक्षात्मक होने की भी। #MeToo केम्पेन के बाद दुनिया भर में कार्यस्थल पर महिलाओं की मौजूदगी को कम किये जाने के खतरे भी सामने आये। जाहिर है किसी महिला द्वारा कार्यस्थल पर यौन शोषण होने का आरोप बहुत गंभीर मसला है भले आरोपी सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा जज क्यों न हों , अतः इस मामले में फेयर न्यायिक प्रक्रिया की अनदेखी देश की तमाम पीड़ित महिलाओं के हौसले को ख़त्म करेगा और इंसाफ के लिए लड़ रही महिलाओं को निराश करेगा।

बेंगलुरू: धिक्कार है! लड़कियों की संख्या से आपत्ति है!!(लड़कियों के लिए हाई कट ऑफ़ मामला)


किस-किस तरह से लड़कियों को रोकेंगे? उन्हें गर्भ में आने से रोकेंगे, गर्भ में आ गई तो पैदा होने से रोकेंगे, पैदा हो गई तो जीने से रोकेंगे, जी ली तो पढ़ने से रोकेंगे, पढ़ ली तो आगे की पढ़ाई नहीं होने देंगे, आगे की पढ़ाई कर ली तो उच्च शिक्षा से रोकेंगे…और आधुनिकता का छद्म आवरण ओढ़कर रोकेंगे…तथाकथित सभ्य समाज का पैहरन ओढ़कर रोकेंगे, और तो और, बड़े भले और भोले बनकर रोकेंगे… इस तरह के हथकंडे अपनाना अब बस कीजिए… वर्ष 1848 में ही सावित्रीबाई फुले ने लड़कियों के लिए पहला स्कूल चलाकर पुरुषी सामंती व्यवस्था से लोहा लेने का बल दिलवा दिया था और आज वर्ष 2019 है…अच्छे बनने का स्वाँग छोड़ दीजिए और लड़कियों की रेखा काटने के बजाय अपनी रेखा बड़ी करने की जुगत कीजिए।


वर्ष 2014-15 में, भारत में, उच्च शिक्षा में, सकल नामांकन अनुपात (जीईआर, सकल नामांकन का सामान्य अनुमान लगाने के लिए नामांकित किए गए छात्रों की कुल संख्या तथा संबंधित आयु-समूह के व्यक्तियों की कुल संख्या का अनुपात ज्ञात किया जाता है।) के अनुसार कम से कम 1.4 करोड़ लड़कों ने स्नातकपाठ्यक्रमों में दाखिला लिया था (लड़कियों की तुलना में करीब 17.5 फीसदी अधिक), स्नातकोत्तर डिप्लोमा पाठ्यक्रम में लड़कों की संख्या 0.16 करोड़ थी जो किलड़कियों की तुलना में 61 फीसदी अधिक थी लेकिन तब किसी के दिमाग में इस तरह का कोई ख्याल नहीं आया था कि लड़कों के लिए कट ऑफ़ अधिक कर दिया जाए ताकि लड़कियों की संख्या समान हो जाए लेकिन अब कहीं घुप्प अंधेरे में उजाले की कोई पतली किरण दिखी है, जहाँ उच्च शिक्षा में लड़कियों की संख्या अधिक हो रही है तो विकास के चक्र को फिर उल्टा घुमाने के लिए लड़कियों के लिए कट ऑफ अधिक किया जा रहा है ताकि लड़कों-लड़कियों का अनुपात सही बना रहे मतलब अधिक लड़कियाँ, अधिक पढ़ाई न करें, लड़कों के मुकाबले तो ज़रा नहीं और इस तरह का तथाकथित शानदार विचार किसी पिछड़े राज्य या कस्बे में नहीं आया है बल्कि विकसित कहे जाते कर्नाटक के हाई टैक बैंगलुरू में आया है। यहाँ के एमईएस पीयू कॉलेज में विज्ञान संकाय के लिए लड़कों के लिए कट ऑफ़ 92 प्रतिशत है, जबकि लड़कियों के लिए 95 प्रतिशत है। वाणिज्य लेने वाले लड़कों के लिए कट ऑफ़ 92 प्रतिशत है जबकि लडकियों के लिए कट ऑफ़ 94 प्रतिशत है। क्राइस्ट जूनियर कॉलेज में विज्ञान के लिए लड़कों के लिए कट ऑफ़ 94.1 प्रतिशत है जबकि लड़कियों के लिए यह 95.1 प्रतिशत है। यहाँ वाणिज्य लेने वाले लड़कों के लिए 95.5 प्रतिशत है जबकि लडकियों के लिए कट ऑफ़ 96 प्रतिशत है। कला संकाय के लड़कों के लिए कट ऑफ़ 84.5 प्रतिशत है तो लड़कियों के लिए 89.2 प्रतिशत है। क्राइस्ट यूनिवर्सिटी के कुलपति इसे इस तरह सही ठहराते हैं कि यह कट ऑफ़ उन्होंने लिंग संतुलन बनाए रखने के लिए किया है। उनके अनुसार यदि ज्यादा कट ऑफ़ नहीं होगा तो कॉलेज में सिर्फ़ लड़कियाँ होंगी। क्राइस्ट यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर फादर अब्राहम, लिंग संतुलन लाने के लिए उच्चतर कट ऑफ़ को सही मानते हैं।

गहन शोक और रोष का विषय है कि यह विषमता केवल तभी कैसे ध्यान आती है जब लड़के पिछड़ते नज़र आते हैं? जब-जब लड़कियाँ पिछड़ी हैं या उन्हें पीछे रखा गया है तब तब तो जेंडर के मुद्दे केवल महिलाओं के मुद्दे माने गए हैं, पूरे समाज के नहीं और इसे राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद, 2006 ने इसी तरह स्वीकारा भी है। वर्ष 2005 में जब राष्ट्रीय पाठ्यचर्चा की रूपरेखा बनी थी तब उसका उद्देश्य शिक्षा के माध्यम से जेंडर संवेदनशीलता को जगाना था पर क्या ऐसा हुआ? अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) द्वारा 2015 में किए गए अध्ययन के अनुसार, उच्च शिक्षा में लड़कियों का नामांकन 2014 में 46 फीसदी हुआ। करीब 1.2 करोड़ महिलाओं ने स्नातक पाठ्यक्रम में दाखिला लिया है लेकिन इनमें से कुछ हीव्यावसायिक पाठ्यक्रमों के लिए पढ़ाई करती हैं; 2013 में, नवीनतम वर्ष जिसके लिए आँकड़े उपलब्ध हैं, 600,000 महिलाओं ने डिप्लोमा पाठ्यक्रम में नामांकनलिया। यहाँ तक कि कुछ ही महिलाएँ पीएचडी में नामांकन कराती हैं; केवल 40 फीसदी पीएचडी छात्र महिलाएँ हैं।
2015 में मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा जारी की गई, उच्च शिक्षा पर अखिल भारतीय सर्वेक्षण के मुताबिक, 2014-15 में, उच्च शिक्षा में 3.33 करोड़नामांकन होने का अनुमान किया गया है, जिसमें से 1.79 करोड़ पुरुष थे और 1.54 करोड़ महिलाएँ। तब किसी के दिमाग में उच्च कट ऑफ़ वाला इस तरह का नायाब विचार लड़कों के संदर्भ में नहीं आया। वस्तुत: ऐसा होना भी नहीं चाहिए क्योंकि यह मनुष्य होने के नाते सभी के समान होने के अधिकार का हनन है। सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त शिक्षण संस्थानों में लड़कियों और लड़कों की समान संख्या बनाए रखने के लिए कर्नाटक राज्य सरकार के पूर्व-विश्वविद्यालय शिक्षा विभाग ने पीयू कॉलेजों को यह दिशा निर्देश जारी किए थे, जिसमें उन्हें सीट-मैट्रिक्स का पालन करने के लिए कहा गया था। यह मुख्यत: इसे सुनिश्चित करने के लिए था कि छात्राओं को निजी और सरकारी कॉलेजों में प्रवेश दिया जाए।
शिक्षा नीति में पिछले तीन-चार दशकों में जेंडर समानता लाने के लक्ष्य को कितनी ही बार रखा गया लेकिन शिक्षा की पहुँच में अभी भी जेंडर असमानता है और यदि कहीं इस असमानता में कुछ अलग और थोड़ा राहत देने जैसा होता है तो सरकारी नीति में लूप होल खोजकर उसे अपने हिसाब से कर लिया जाता है। पूरे देश में एम.फिल, स्नातकोत्तर और सर्टिफिकेट कोर्स को छोड़ कर, हाई स्कूल के बाद से लगभग हर स्तर पर महिलाओं कीतुलना में अधिक युवा पुरुषों की प्रवृत्ति स्पष्ट है। मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा 2014-15 में जारी किए गए आँकड़ों के अनुसार, स्नातकोत्तरपाठ्यक्रमों, 49 फीसदी पुरुष और 51 फीसदी महिलाएं हैं। महिलाओं का रुख ह्यूमैनिटीज़ की ओर केंद्रित रहता है, बैचलर ऑफ आर्ट्स (बीए) में 38 फीसदीमहिलाओं ने नामांकन लिया है, इसके बाद विज्ञान और वाणिज्य विषयों में महिलाओं के नामांकन लेने की संख्या अधिक रही है; बीए पाठ्यक्रम के लिए 28 फीसदीपुरुषों ने दाखिला लिया है। करीब 8 फीसदी युवा पुरुष इंजीनियरिंग के स्नातक पाठ्यक्रमों का चयन करते हैं। यह आँकड़ा महिलाओं की संख्या (4.1 फीसदी) सेदोगुना है। प्रौद्योगिकी के स्नातक पाठ्यक्रमों में पुरुष (9 फीसदी) और महिलाएँ (4.5 फीसदी) हैं।
मतलब यदि लड़कों की संख्या अधिक है तो आपको कोई आपत्ति नहीं है लेकिन यदि लड़कियों की संख्या अधिक होने लगी तो आप परेशान हो गए। जैसा कि पूर्व में कहा कि कुलपति जैसा व्यक्ति यह बयान देता है कि ‘ज्यादा कट ऑफ़ नहीं होगा तो कॉलेज में सिर्फ़ लड़कियाँ होंगी’। मतलब पुरुषों की दुनिया में महिलाओं ने कदम रखा तो कई क्षेत्रों में वे अकेली होती थीं, तब आपको समस्या नहीं थी, अब आपको दिक्कत है तो कठोर शब्दों में कहना होगा कि लड़कियों की संख्या नहीं, आपका बयान आपत्तिजनक है। अधिक कट ऑफ़ का हथकंडा लड़कियों के अधिक प्रवेश को रोकना है मतलब उनके शिक्षा के उसी अधिकार का हनन है जो उनका मनुष्य होने का मूलभूत अधिकार है, मतलब यह रवैया पूरी तरह गैर कानूनी है। लड़कियों ने अच्छा प्रदर्शन किया तो उनकी पीठ थपथपाने की बजाए आप उनकी पीठ में खंजर खोंप रहे हैं। हाईस्कूल-हायरसेंकडरी तक अखबारों की सुर्खियाँ होती हैं कि लड़कियों ने बाजी मारी, तो फिर बाजी मारने वाली वे सारी लड़कियाँ कहाँ खो जाती हैं? उन्हें आगे की पढ़ाई करने से रोकने के लिए इस तरह के तथाकथित ‘एलिट’ हथियार अपनाए जा रहे हैं, जिसके लिए कभी सावित्रीबाई फुले ने पत्थर खाए थे, आज पत्थर न फेंककर सभ्य होने का नाटक कर रहे हैं तो इस तरह की नौटंकी बंद कर दीजिए तुरंत…इसे चाहे तो चेतावनी समझ लीजिए लेकिन यह नौबत न आने दीजिए कि कहना पड़े कि लड़कियों की राह काटने की बजाए अपना रास्ता नापिए!

औरतें अपने दु:ख की विरासत किसको देंगी

राहुल

लड़कियां माँओं जैसे मुक़द्दर क्यूँ रखती हैं
तन सहरा और आँख समुंदर क्यूँ रखती हैं
औरतें अपने दु:ख की विरासत किसको देंगी
संदूकों में बंद ये ज़ेवर क्यूँ रखती हैं ।।
इशरत आफ़री

मां अपनी बेटी को अपनी उम्मीदों व आशाओं की एक कड़ी के रूप में देखती है। वह जानती है हर एक परेशानियों का सबब। जानती है बेटी की हर एक जरुरत। खुशियों, इच्छाओं, उदासियों, भावनाओं से वाकिफ जो होती है, और मौजूद रहती है जीवन के हर एक हर्फ़ में। और बेटी भी माँ की परछाई होती है। माँ का ख्याल रखती है बेटी, और देखती है मां, बेटी को अपनी उम्मीदों, आशाओं व संभावनाओं की नजर से। इसलिए लड़कियां रखती हैं मांओं जैसा मुक्कद्दर। मुक्कद्दर की यह संभावना साहित्य में भी खूब समाहित है। और यह संभावना निर्मित करती है एक विमर्श को जो अपने मनुष्य होने की चाह लिए एक अदद मुक्ति के लिए संघर्षरत है। 

हिंदी साहित्य में स्त्री-विमर्श की वैचारिकी और राजनीतिक निर्माण को देखा जाए तो यह कृष्णा सोबती के जिक्र के बग़ैर अधूरा है। मनुष्य की आजादी और मनुष्य के रूप में स्त्री का आजाद ख्याल (आजादी) होना इनके उपन्यासों का प्रस्थान विन्दु रहा है। ‘डार से बिछुड़ी’, मित्रो मरजानी, सूरजमुखी अंधेरे के, यारो के यार, तिन पहाड़, ऐ लड़की, जिंदगीनामा, समय सरगम आदि उपन्यासों के केंद्र में स्त्री ही है। उनके ये उपन्यास स्त्री पराधीनता और जटिल भारतीय सामाजिक,पारिवारिक ताने-बाने की पड़ताल करते हैं। आधुनिकता व पारम्परिकता का सामंजस्य बैठाती और साथ ही स्वाधीनता को पाने का रास्ता सुझाती उनकी आत्मकथात्मक लघु उपन्यास/ लम्बी कहानी ‘ऐ लड़की’ अनुभव और विचार की नई दुनिया रचती है। इनकी सृजनशीलता स्वाधीनता के लिए ‘स्व की चिंता’ और ‘खुशी की नई उपयोगिता’ गढ़ती है। स्त्री की सम्पूर्ण मुक्ति पर कृष्णा सोबती की विश्व दृष्टि व विचार से विरोध हो सकता है, लेकिन इनकी चिंताओं व सवालों को नाकारा नहीं जा सकता।

‘ऐ लड़की’ आत्मकथात्मक लघु उपन्यास/ लम्बी कहानी है, जिसमें माँ- बेटी (कृष्णा सोबती और उनकी माँ) का संवाद है। 1991 में राजकमल से प्रकाशित यह लघु उपन्यास/ लम्बी कहानी 88 पृष्ठों विस्तारित है और इसके केंद्र में माँ और बेटी का आपसी संवाद है। और यह संवाद अस्तित्व के अंत:संचरण का संवाद है। इस कथा में माँ और लड़की के अस्तित्व का परस्पर एक दूसरे में घुलना है। ऐ लड़की’ में माँ अपनी जीवन- स्मृति लड़की में खोलती है और अपने जीवन-अस्तित्व को व्यक्त करती है- “तुम्हें बार-बार बुलाती हूँ तो इसलिए कि तुमसे अपने लिए ताकत खींचती हूँ।” और इस तरह उस अनुभव को छू पाती है- “मैं तुमलोगों की माँ जरूर हूँ पर तुमसे अलग हूँ। मैं तुम नहीं और तुम मैं नहीं। मैं मैं हूँ।”

माँ-बेटी के आपसी संवाद एक दूसरे के पूरक नजर आते हैं। जिन्दगी के सारे रंग खासकर स्त्री जीवन के सारे रंग हर्ष, ख़ुशी, उत्साह, दुःख, शोक, वियोग, अकेलापन आदि एक दूसरे से गूंथे हैं। “ऐ लड़की अँधेरा क्यों कर रखा है! बिजली पर कटौती! क्या सचमुच ऐसी नौबत आ गई है”[1]। यह अँधेरा केवल कमरे का अँधेरा भर नहीं है बल्कि माँ और बेटी के जीवन का अँधेरा है। स्त्री जीवन का अँधेरा है। ‘रूढ़’ व ‘आधुनिक’ दोनों तरह के समाजों में किसी भी लड़की के लिए अविवाहित व अकेले रहना अमान्य है। सामाजिक नियम के विरुद्ध है। लेकिन इस कहानी में लड़की अविवाहित है और अपनी स्वेच्छा से अविवाहित भी रहना चाहती है। ‘यह बताओ, तुम क्यों नीली चिड़िया बनी बैठी हो!’[2]

वृद्ध और बीमारी से लड़ रही अम्मू मृत्यु से डरती नहीं हैं और न ही जीने की बहुत लालसा ही रखती है, बल्कि वह तो उससे जूझने व जितने की इच्छा रखती है। तभी तो वह कहती हैं “बीमारी को अपने अन्दर धसने नहीं दिया। अभी तक तो सब कुछ चाट जाती, मेरी देहरी की सांकल तो खुल चूँकि! दरवाजे पर खटपट हुई नहीं कि मैं बहार! मगर सुन लड़की मैं मजबूती से अड़ी हूँ”[3]। “जीना और जीवन छलना नहीं है। इस दुनिया से चले जाना छलना है। …यह दुनिया बड़ी सुहानी है। हवाएँ- धूप-छाँह-बारिश-उजाला–अँधेरा-चाँद-सितारे- इस लोक की तो लीला ही अनोखी है! अद्भुत है[4]। … देह तो एक वरण है। पहना तो इस लोक में चले आए। उतार दिया तो पर-लोक। दूसरों का लोक अपना नहीं[5]। यह विचार जीवन-मोह से मुक्ति का नहीं है बल्कि स्त्री-जीवन से मुक्ति का है। लेकिन स्त्री मुक्ति का सपना तब तक पूरा नहीं हो सकता जब तक रूढ़ सामाजिक-सांस्कृतिक मूल्यों से टकराहट न हो। स्त्री अपना पूरा जीवन परिवार की ख़ुशी के लिए खपा देती है, उसकी अपनी ख़ुशी कोई मायने नहीं रखती। “शादी के बाद औरत पूरे परिवार के लिए शिकारे की माँझी बन जाती है। …उन पर सवार परिवार मजे-मजे झूमते हैं और चप्पू चलती है औरत।”[6] अम्मू की यह बात पितृसत्ता के गहरे धसे स्त्री श्रम के शोषण को अभिव्यक्त करती है और कैसे       स्त्री-श्रम को नजरअंदाज किया जाता है, इसके सामाजिक-सांस्कृतिक संबंधों की ओर भी इशारा करती है।

अम्मू की जिंदगी एक रुढ़ सामाजिक ढांचे के चौखटे में ढलती व अनुकूलित होती हुई विकसित हुई है। उसके व्यक्तित्व का स्त्रीकरण समाज के धर्म परंपरा से हुआ और सामाजिक ताने-बाने में व्याप्त सांस्कृतिक निंरकुशता ने उसे अपने अनुरूप अनुकूलित भी किया। लेकिन मानव सुलभ इच्छाएं और जीवन-लय पुराने समय को तोड़ने के लिए कुलांचे भरती टकराती टूटती आगे बढ़ी, और सामाजिक ढांचे ने उसे अपने अनुरूप ढाला भी। एक स्त्री की इच्छाएं पितृसत्तात्मक समाज में कोई मायने नहीं रखती तभी तो अम्मू कहती है- “चाहती थी पहाड़ियों की चोटियों पर चढ़ूँ। शिखरों पर पहुंचूं। …तुम तो अपने में आजाद हो। तुम पर किसी की रोक-टोक नहीं। जो चाहो कर लो। लेकिन एक बात याद रहे कि अपने से भी आजादी चाहिए होती है।”[7] अम्मू अपने सहज स्मृतियों के द्वारा स्त्री-जीवन के दोनों छोरों (दुःख और सुख) को पकड़कर समय व समाज को नापती है और एक स्त्री के जिंदगी को परत दर परत खोलती हैं। तभी तो अपनी बेटी से कहती हैं कि– “अपने आप में आप होना परम है, श्रेष्ठ है! चलाई होती न परिवार की गाड़ी तुमने भी, तो अब तक समझ गई होती कि गृहस्थी में सारी शोभा नामों की है। यह इसकी पत्नी है, बहू है, माँ है, नानी है, दादी है! फिर वही खाना, पहनना और गहना! लड़की, वह नाम की ही महारानी है। सबकुछ पोंछ-पाँछ के उसे बिठा दिया जाता है अपनी जगह जगह पर।”[8] यानि उसे देवी का दर्जा दे दिया जाता है। ऐसी देवी जो अपनी इच्छा से कुछ भी नहीं कर सकती। यह वजूद अम्मू (माँ) की है लेकिन बेटी अपने अस्तित्व के प्रति सजग है। अपनी जिंदगी के हर पहल को स्वीकारती है, कुछ भी छुपाती नहीं। अविवाहित रहने का फैसला खुद उसका है और इसे लेकर वह जरा भी चिंतित नहीं है। इस संदर्भ में देखें तो यह कहानी पितृसत्ता के स्थापित भूमिका से एक तरह का विद्रोह भी है। यह विद्रोह  परिवार और निजी सम्पत्ति, राज्य की उत्पत्ति  के संदर्भ में देखा जा सकता है। निजी  सम्पति के उदय और उस पर अधिकार की वंशानुगत व्यवस्था के क्रम में स्त्री की यौनिकता पर नियंत्रण प्रारंभ हुआ ,जो कि उन पर पुरुष वर्चस्व को तय करने का कारण बना। यह नियंत्रण उनकी गत्यात्मकता पर रोक, उनकी यौनिकता पर नियंत्रण और इस क्रम में अपनी ही देह तथा समाज  के सभी  संसाधनों (आर्थिक तथा सांस्कृतिक ) से उनका वंचन करता है। लड़की और नर्स सूसन अपनी जिंदगी के लिए अपने रास्ते खुद चुनती हैं। “सुनो, बेटा- बेटियां,नाती- नातिन, पुत्र- पौत्र मेरा सब परिवार सजा हुआ है, फिर भी अकेली हूँ। और तुम! तुम उस प्राचीन गाथा से बाहर हो, जहाँ पति होता है, बच्चे होते हैं, परिवार होता है। न भी हो दुनियादारी वाली चौखट, तो भी तुम अपने आप में तो आप हो। लड़की अपने आप में आप होना परम है, श्रेष्ठ है।”

“गृहस्थ में पांव रखकर स्त्री का जो मंथन-मर्दन होता है, वह भूचाल के झटकों से कम नहीं होता है। और औरत इसे सहन कर लेती है, क्योंकि उसे सहन करना पड़ता है।”[9] यह कहानी समाज एवं परंपरा, निजत्व, दुख के साथ नैतिकता, राजनीति आदि को भी समेटती है। रिश्तों की जटिलता, स्वावलम्बन तथा माँ-बेटी की भूमिकाओं पर भी दृष्टि डालती है।

बुर्जुआ विवाह संस्था में जकड़ी स्त्री की यह सामाजिक समस्या अम्मू की ज़िंदगी को कुरेदती है। जीवन में प्रेम का आभाव, महज स्वछंदता नहीं परिपूर्ण जीवन की चाह, उद्दाम आवेगमय प्यार की चाहत जो मानवता के भौतिक आत्मिक मुक्ति से संभव है जो आज भी स्त्री के लिए स्वप्न है। यह सारी चीजें अम्मू को अपनी जिंदगी में कभी न मिल सकी। वह अपनी बेटियों में अपनी इन इच्छाओं की चाह पाती हैं। और अपना ही विस्तार देखती हैं। “तुम जब होने वाली थी मैं दिल और मन से अकेली हो गई थी। सर में जैसे एकांत छा गया हो। दिल में यही उठे कि मैं पगडंडियों पर अकेली घूमती रहूँ। लगे चिड का ऊँचा पेड़ ही मेरे अन्दर उग आया है।”[10] अपनी समरूपा उत्पन्न करना माँ के लिए बड़ा महत्त्वाकारी है। बेटी के पैदा होते ही माँ सदाजीवी हो जाती है। वह कभी नहीं मरती। वह हो उठती है वह निरंतरा। वह आज है, कल भी रहेगी। माँ से बेटी तक। बेटी से उसकी बेटी, उसकी बेटी से अगली बेटी। अगली से भी अगली।”[11] यह क्रम लगातार चलता रहता है हम ख्याल होने तक। स्त्री मुक्ति तक। स्त्री मुक्ति और स्वतंत्रता की कल्पना आधी आबादी की आर्थिक स्वतंत्रता से भी जुड़ी है। “उसका वक्त तब सुधरेगा जब वह अपनी जीविका अपने आप कमाने लगेगी।”[12]  पितृसत्ता के विरुद्ध संघर्ष पुरानी रूढ़ियों और जकड़नों को तोड़े बिना, घर की चहदीवारी की कैद को ध्वस्त किए वगैर संभव नहीं है। “जरा सोचों मैं अपने भाई की तरह पढ़ती तो क्या बनती! क्या होती मैं और क्या होते मेरे बच्चे। सच तो यह है कि लड़कियों को तैयार ही जानमारी के लिए किया जाता है- भाई पढ़ रहा है, जाओ दूध दे आओ। भाई सो रहा है जाओ कंबल ओढा दो। जल्दी से भाई का थाली परस दो। उसे भूख लगी है। भाई खा चूका है। लो, अब तुम भी खा लो।”[13]

इस सामंती पितृसत्तात्मक समाज में लड़की होना एक अभिशाप है। जहाँ लड़की के पैदा होते ही उदासी छा जाती है। यही वजह है कि लड़की के मन में समाज के दोहरी नीतियों के प्रति गहरा आक्रोश है। अम्मू इससे बेखबर नहीं है बल्कि इससे उसका साबका बचपन में ही हो गया है। यह कितना दयनीय है कि उसने अपने उपर उन पुराने मूल्यों को लादा जिन्होंने उसे अपने बारे में, स्वतंत्र अस्तित्व के बारे में सोचने से रोका।

            अम्मू ने एकाकी, स्वावलंबी जीवन की शुरुआत की जिसमें एक स्वकेंद्रण था, जिद थी। समाज के ढांचे द्वारा पैदा व्यक्तित्व की ओढ़ी नैतिकता का दर्प था। ‘दूसरों के लिए जीना’ के कर्तव्य बोध का स्वपीड़न व ज़िंदगी का निग्रह था। और इसी के द्वारा पैदा ‘खुशामद करने-करवाने की इच्छा’, बच्चियों के प्यार और निजी ज़िंदगी पर एकाधिपत्य की चाह, बेटियों की हर बात को जानने की व्यग्रता थी। दरअसल यह अपनापन और प्यार तथा केंद में बने रहने की चाह थी जो उनके समाज ने उनके जीवन से छीन लिया था, और उनका ऐसा चरित्र निर्माण किया था। “बरसों-सालों-साल इस घर में रही हूँ पर इन दिनों बार-बार यही मन में कि कितना इतना जीना था तो कुछ ढंग का काम किया होता। इतनी बड़ी दुनिया है उसे ही देख डालती। पर गृहस्थी के ताने-बाने में उम्र ही गुजर गई।”[14] अम्मू की यह व्याग्रता, बेचैनी उस स्त्री आबादी की है जो अधीनस्थ है और दर्द का अव्यक्त उदधि समेटे है। बचपन से ही जिस स्त्री को औरतपने के चौखटे में सिद्धांत और नैतिकता के पाठ द्वारा कैद किया गया। “माँ पैदा करती है। पाल-पोसकर बढ़ा करती है। फिर उसी की कुर्बानी! माँ को टुकड़ों में बाटकर परिवार उसे यहाँ- वहाँ फैला देता है। कारण तो यही कि समूची रहकर कहीं उठ खड़ी न हो! माँ को प्योसर गाय या धाय बनाकर रखते हैं। खटती रहे, सुख देती रहे। उसका काम इतना ही है। वह अपने तई कुछ भी समझती रहे, पर बच्चों के लिए मात्र घर की व्यवस्था करने वाली।”[15] इस संदर्भ में देखें तो एक स्त्री को माँ का दर्जा देकर उसका महिमा मंडन ही किया जाता है। ‘माँ एक सामाजिक प्रत्यय है’। अम्मू के जीवन परिधि का विस्तार भी हो रहा है, खुद के लिए उसका जीना, स्वार्थ के लिए नहीं वरन सबके साथ जीने की तरफ जाता है। उसकी चिंता का दायरा स्व तक ही नहीं सिमित है बल्कि सूसन (अपनी अटेंडेंट) तक की चिंता है। वह सूसन से पूछती हैं- “अपने लिए कोई लड़का नजर में है? ढूढ़ने का काम तुम्हें खुद ही करना होगा।”[16]

अपने अस्तित्व को पति के अस्तित्व से अलग देखने-समझने की परंपरा ‘भारतीय समाज’ में  नहीं रही है। स्त्री पिता, पति, पुत्र के अस्तित्व से ही पहचानी जाती रही है। लेकिन सामंती पितृसत्ता के कमजोर पड़ने पर स्त्रियाँ अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष करने लगी हैं। विवाह के बाद भी अपने स्वतंत्र अस्तित्व को बनाए रखना चाहती हैं। इसी संदर्भ में अम्मू सूसन को एक मंत्र देती हैं- “मेरी बात सुनो। न पूरा खर्च तुम किया करो और न उसे ही करने दिया करो। आधा-आधा, समझी। नहीं तो यूं ही हजम कर ली जाओगी। सूसन, शादी के बाद किसी के हाथों का झुनझुना नहीं बनना। अपनी ताकत बनने की कोशिश करना।”[17] यह एक स्त्री की सहज चिंता है जो जीवन उसने जिया, वही जीवन भविष्य की पीढियां न जिएं, वे ऐसे समाज का हिस्सा हों जहाँ उनकी भी इच्छाओं, विचारों को समझा जा सके और अपने फैसले वे खुद ले सकें। उनकी अपनी इच्छाओं का दमन पितृसत्तात्मक ढांचे व रूढ़ सामाजिक-सांस्कृतिक मूल्यों के सहारे न हो सके।    

‘ऐ लड़की’ उपन्यास/लम्बी कहानी मृत्यु की प्रतीक्षा में एक बुजुर्ग स्त्री की कहानी मात्र नहीं है, बल्कि अपनी स्मृतियों के माध्यम से स्त्री जीवन को टटोलती एक ऐसी स्त्री की कहानी है जो स्त्री को रूढ़ सामाजिक मूल्यों से मुक्ति व स्त्री स्वावलम्बन की चाहत रखती है। “सोचने की बात है- मर्द काम करता है, तो उसे इवज में अर्थ-धन प्राप्त होता है। औरत दिन-रात जो खटती है वह बेगार के खाते में ही न! भूली रहती है अपने को मोह-ममता में अंजान बेध्यान।”[18] यह वह सवाल है जिसे नारीवाद भी उठाने से कतराता है।

समाज द्वारा अम्म्मू के अधीनस्थ स्त्री व्यक्तित्व का निर्माण, बुर्जुआ विवाह परम्परा, पुरुष की भोग दृष्टि, आर्थिक स्वातंत्र्य व नारी मुक्ति, स्वावलंबन, ‘स्त्री सुलभ लज्जा व संकोच’ आदि की चर्चा करते हुए प्रश्न उपस्थित करता है। और समाधान के लिए संवेदन बहस पैदा करता है। विषय में आत्मकथात्मक और वृद्ध अवस्था व बीमारी से लड़ती जिजीविषा से भरी अम्मू के जद्दोजहद की सीमा में यह उपन्यास गहरी भावात्मकता, संवेदना व वैचारिकी को संप्रेषित करता है। साथ ही स्त्री मनोविज्ञान व स्त्री प्रश्न के कई सवालों को भी खड़ा करता है।

यह दीगर बात है कि यह लघु उपन्यास/ लम्बी कहानी स्त्री मुक्ति के प्रश्न को निजता की मुक्ति व व्यक्ति स्व के स्वावलंबन की सीमा तक ही सीमित रहती है। स्त्री मुक्ति के तमाम सवालों को नजरअंदाज करते हुए यह स्त्री जीवन के लिए परंपरा और आधुनिक बोध के बीच सामंजस्य स्थापित करती हुई प्रतीत होती है।     


[1]  सोबती, कृष्णा.(1991). ऐ लड़की. दिल्ली : राजकमल प्रकाशन. पृष्ठ सं. 7
[2] वही, पृष्ठ सं. 8
[3] वही 8
[4] वही, 41
[5] वही 12
[6] वही 56
[7] वही 56
[8] वही 57
[9] वही 73
[10] वही 69
[11] वही 43
[12] वही 56
[13] वही 68
[14] वही 73
[15] वही 74
[16] वही 53
[17] वही 53
[18] वही 56

स्त्री अध्ययन विभाग, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय में गेस्ट फैकल्टी. ईमेल- apnaemailpata@gmail.com , मोबाइल नं. 9689337805

पंखुरी सिन्हा की कविताएं (घास पटाने के मेरे बूट व अन्य)

पंखुरी सिन्हा
युवा लेखिका, दो हिंदी कथा संग्रह ज्ञानपीठ से, तीन हिंदी कविता संग्रह, दो अंग्रेजी कविता संग्रह।

चर्चा
वह उसे बहुत पसंद कर रही थी
लगभग चाहने की तरह
और चाहती थी सुकून पाना
चाहने में उसे
पसंद करने में उसे
लौटना ज़िन्दगी में
उसे पसंद करना पूरी तरह
और चाहती थी
सुकून पाना
उस चाहने की चर्चा में
पर हर बार जब वह करीब आती
उस सुकून के
एक नया ज्वालामुखी फुफकारता कहीं पास
जैसे खुरचता हो कोई धरती की रीढ़ को।

हर बात का तराज़ू
उसके साथ की सुबहें
या वो सुबहें जब वो साथ था
कुछ उसकी बातों में आकाश था
कुछ मेरी आँखों में
कुछ आकाश हमारे आगे था
कुछ पीछे
कुछ दायें, बायें, की राजनीति थी
कुछ पत्थर सी कूटनीति थी
कुछ प्रतिध्वनियाँ थीं
प्रतिबिम्ब थे
हर बात की नाप जोख थी
हर बात में तराज़ू।

अब की खिड़की से
बिखेर लेने के बाद
ढेरों ताज़ा लिखावट इर्द गिर्द
पूरी तरतीबी से
अधूरे किस्से
बहसें अधूरी
कागज़ का वह सफ़ेद जो कहीं नहीं मिलता
चमकता सुबह की नीलाभ रौशनी में
जैसे और कुछ नहीं चमकता
और पीताभ हो जब लालिमा
उगते सूर्य की, आज
बिखेर कर कैनवस अधूरे चित्रों के
सूखते रंगों की खुशबू के
सराबोर रंगों की खुशबू में
जब बाकी सब हो नितांत शून्य
देखना अब की खिड़की से
अब के लम्हे से
अतीत को
उसके साथ वाले घर को
प्यार भरी आँखों से
इंतजार भरी आँखों से
तरसती आँखों से
कि उसका जाना हो
सबकुछ का जाना
बेहतरीन हिस्से का गवाना
एक ऐसे अब में रहते हुए
एक हुकुमत के बनाये
ऐसे अब में
जहाँ पुरुष की एक नयी सत्ता हो
तानाशाही तंत्र की गिरफ्त की खिड़की से
देखते हुए उस गुज़रे कल को।

इकबाल मेहदी का स्केच

उसकी दराजें
टूटने पर नींद के
पाना हर सुबह
कि गायब अचानक
दराजें क्या, मेजें भी
तमाम कुर्सी
टेबल
आल्मारियां
कमरे में खड़े दो बड़े, बड़े, सूटकेस
या तीन भी
खोले तक नहीं गए
तमाम लगेज, बैगेज
लिविंग आउट ऑफ़ सूट केसेज़
अंग्रेज़ी की उस नफीस कहावत की तर्ज़ पर
जो उसकी वह सहपाठिन
कहा करती थी
जिसके सूटकेस सबसे उम्दा
सबसे नामी ब्रांड के हुआ करते थे
सबसे महंगे
लेकिन उनके वैसा न होने पर भी
उसकी बातों में माद्दा था
‘लिविंग आउट ऑफ़ सूटकेसेज़’ में
अगर खस्ता भी हों सूटकेस आपके
पुराने, घिसे हुए लॉक के
जो अटक जाता हो बार, बार
और कपडे की सूटकेस का ज़िप
जो बुरी तरह अटक जाता हो बार बार
पुराने, घिसे सामानों को खुला छोड़ देने की तरह
खुले सूटकेसेज़ वाले दिनों रातों की तरह
कुछ वैसी ही तर्ज़ पर
‘लिविंग आउट ऑफ़ लौंडरी बास्केट्स’
जो डिमोशन हो
वास्तव में
कि सारी हस्ती सिमट गयी हो
प्लास्टिक के उन डब्बों में
प्लास्टिक के खुले लौंड्री बास्केट्स
ढेरों लिखे हुए रजिस्टर उनमें
थाक रजिस्टरों की
कपड़ों की भी
जिस्ता कागज़ का
लांड्री बास्केट जो बिखरे हों
कमरे में
फर्श पर
तोशक की बगल में
सारा बिखराव फर्श पर
सारी गुजर बसर फर्श पर
एक आन्दोलन के बाद
जिसकी मुहिम हो
हु डज़ द हाउसहोल्ड लांड्री
और बन गया हो वह आन्दोलन
कि तंग कर रहे हों हम आपको
और दायर करें रिपोर्ट आप
मुक़दमा आप
जबकि मारे लड़ाई के
बदहाल हों आप
फटेहाल हों आप
सुस्ता रहे हों
‘किसी तरुवर की छांव में’
मुहावरे की धुन पर
कमरे में किसी
और उस सहपाठिन का ताज़ा बयां आया हो
कि ‘इफ दे लाइक इट’
और ये तय करना मुश्किल हो
कि किस बारे में कहा हो उसने
कहीं लिविंग आउट ऑफ़ सूट केसेज़ का अपना बयां रिवाइज़ न कर दिया हो
या कि लिविंग आउट ऑफ़ लौंड्री बास्केट्स’
पर कहा हो
या कि सुस्ताने पर उसके
जैसे गर्मी में हाँफता हो चीता
लेकिन इफ दे लाइक इट
का उसका जुमला
बहुत प्रसिद्ध हो गया था
ऊँचे ओहदों के सारे अधिकारियों के बीच
ये वो दिन थे
जब उसके तमाम दोस्तों का मूल्य
बहुत बढ़ गया था
वो बहुत लोकप्रिय हो गए थे
बहुत बड़े
और दराजों में चूमकर
रखे जाने वाले कागजों का कोई पता नहीं था।

घास पटाने के मेरे बूट
दूब, तृण, तिनका
निकलता जैसे अंकुर
जैसे धरती के बीज
अम्बर की छाँव
घास जैसे पावन हरित सामग्री
वेदी पर जैसे मंत्र सृजन के
हर रोज़ उगती परत
हर रोज़ बिछती परत
परत गहराती
गहराता रंग
सहज, सुन्दर
ज़िन्दगी का रंग
रंग विस्तार का
विकास का
फैलाव का
गति का
रंग सपनों का
रंग, रंग बदलते अपनों का
नहीं बनता रंग प्रेम का उनके
बनता जाता रंग अनावश्यक सवालों का
पानी, मिटटी, कीचड, कादो
आवश्यक घास उगाने को
कुछ थमाव पानी का, कुछ जमाव पानी का
परहेज़ किसी भी उछाल से
उबाल से
पानी में चलने के बूट उसके
टखनो से ऊपर तक के
दरकार ठहराव की
शांति की
सुखद शामों की
खरीददारी की
घुटने तक के बूट
चमड़े के
जो उसने अबतक नहीं खरीदे
और जब कुछ डोलने लगे
इंच इंच उगती घास
सारे दिन उगती घास
सुबह से शाम तक उगती घास
सारी रात उगती घास
जो बिल्कुल अलग नज़र आती हो
सूरज की बदलती दिशा में
और जज़्ब हो जाने के बाद
सारा पानी
नंगे पाँव खड़े होकर
हरी धरती पर
सूर्य नमस्कार
चन्द्र नमन
अभिवादन दिशाओं का
असीम अनंत का
पूजा प्रकृति की।

पंखुरी सिन्हा को कविता के लिए राजस्थान पत्रिका का 2017 का पहला पुरस्कार,  राजीव गाँधी एक्सीलेंस अवार्ड 2013, पहले कहानी संग्रह, ‘कोई भी दिन’ , को 2007 का चित्रा कुमार शैलेश मटियानी सम्मान, मिल चुका है. ‘एक नया मौन, एक नया उद्घोष’, कविता पर,1995 का गिरिजा कुमार माथुर स्मृति पुरस्कार. ‘कोबरा: गॉड ऐट मर्सी’, डाक्यूमेंट्री का स्क्रिप्ट लेखन, जिसे 1998-99 के यू जी सी, फिल्म महोत्सव में, सर्व श्रेष्ठ फिल्म का खिताब मिला. इनकी कविताओं का मराठी, पंजाबी,  बांग्ला, अंग्रेज़ी और नेपाली में अनुवाद हो चुका है.

कविता की प्रकृति ही है समय से आगे चलना

                  

समय के साथ कवियों का वैयक्तिक स्‍वर सामाजिक होता जाता है। आरंभ में छोटे-मोटे दुख-दर्दों, सहज भावनात्‍मक प्रतिक्रियाओं तथा अतीत-स्‍मरण के रूप में लक्षित होने वाली अभिव्यक्ति धीरे-धीरे जटिल होती गई है।

अर्चना त्रिपाठी
माता सुंदरी कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय में हिंदी
की अस्थायी प्राध्यापिका

‘दिल्‍ली’ कविता में दिनकर लिखते हैं-
‘इस उजाड़, निर्जन खंडहर में
छिन्‍न-भिन्‍न उजड़े इस घर में
तुझे रूप सजने की सूझी
मेरे सत्‍यानाश-प्रहर में’[i]

शोषक और शोषित की एक लंबी परंपरा इन पंक्तियों में निहित है। कैसे एक तबका उजड़े घर में सुबक रहा है, भूख उसके लिए एक अहम सवाल है, वहीं दूसरी तरफ़ पूँजी से लैस वर्ग बनने-ठनने में विश्‍वास रखता है और भूख का अर्थ वह अन्‍य कई मायनों में लेता हुआ मुस्‍कराता है। राष्‍ट्रीयता से जुड़े हुए सवालों पर लिखने वाले कवियों के काव्‍य में गांधी के असहयोग आंदोलन, राष्‍ट्रीय भावनाओं से युक्‍त स्‍वतंत्रता संग्राम की घटनाओं, शहीदों के प्रति श्रद्धांजलि, मज़दूरों और किसानों के शोषण के प्रति विद्रोह की आवाज़ को बुलंदी मिली, यह वह समय था जब भारत अपनी अस्मिता की रक्षा के लिए संघर्ष कर रहा था। इस संग्राम में जुटे भारतीय दो वर्गों में बँटे थे। एक वर्ग गांधी द्वारा बताए सत्‍य–अहिंसा का मार्ग अपनाकर आज़ादी का स्‍वप्‍न देखता था, जिसमें कवि लिखता है-

“चल पड़े जिधर दो डग-मग में,
चल पड़े कोटि-पग उसी ओर।
पड़ गई जिधर भी एक दृष्टि,
गड़ गए कोटि-दृग उसी ओर।”[ii]

यहीं पर एक दूसरा वर्ग था, जो गांधी के सिद्धांतों से असहमत था और क्रांति में विश्‍वास रख रहा था। दिनकर लिखते हैं-
“ज़रा तू बोल तो, सारी धरा हम फूँक देंगे
पड़ा जो पंथ में गिरि, कर उसे दो टूक देंगे।”[iii]
दिनकर जी का झुकाव यद्यपि मार्क्‍सवाद की तरफ़ था लेकिन इन्‍होंने मार्क्‍सवाद और गांधीवाद के बीच से मार्ग तलाशा, यहाँ ध्‍वंस का नहीं, निर्माण का स्‍वप्‍न और स्‍वर साकार होता है। 1936 में प्रगतिशील लेखक संघ की स्‍थापना के समय से हिंदी में प्रगतिवादी आंदोलन की शुरुआत मानी जाती है, लेकिन प्रगतिशील कविताएँ इस संघ की स्‍थापना से पहले भी लिखी जा चुकी थीं। सोवियत आदर्शों और रूस की क्रांति से प्रेरित लेखकों ने अंतरराष्‍ट्रीय स्‍तर पर इस संगठन को बनाया था। प्रगतिवाद जीवन के प्रति एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण लेकर आगे बढ़ता है जहाँ ईश्‍वर, आत्‍मा आदि की सत्‍ता को अस्‍वीकार करके भौतिक विधान को स्‍वीकृति मिली है।

प्राचीन संस्‍कारों के मोहपाश को काटकर नवीन युग-यथार्थ की चेतना का स्‍वागत सर्वप्रथम स्‍वयं छायावादी कवि पंत ने किया था। ‘युगांत’ में इसकी आहट सुनाई देती है किंतु ‘युगवाणी’ और ‘ग्राम्‍या’ की कविताओं में यह स्‍वर ओजपूर्ण हो उठता है। पंत की कविता की यह नई ज़मीन थी। ध्‍यान देने वाली बात है कि छायावाद को रहस्‍यवाद के घेरे में डालकर उसके कई पहलुओं पर चर्चा नहीं हो सकती थी। एक तरफ़ तो छायावाद से शक्ति-काव्‍य निकलता है दूसरी तरफ़ शक्ति काव्‍य का ही पर्याय प्रगतिशील कविताएँ भी निकलती हैं जो कि नि:संदेह प्रगतिवादी कविताएँ हैं।

निराला अपनी कविताओं में सामाजिक-दृष्टि का परिचय उस समय दे रहे थे, जब हिंदी में प्रगतिवाद नाम की कोई बात नहीं थी। उनकी ‘भिक्षुक’, ‘दान’, ‘बादल-राग’, ‘विधवा’ जैसी कविताएँ बहुत पहले रची गईं। सन् 1936 में ‘वह तोड़ती पत्‍थर’, ‘कुकुरमुत्ता’ तथा अन्‍य रचनाओं के साथ ठोस यथार्थ से बने धरातल की बात करते हैं। 1936 में आईं प्रगतिशील रचनाएँ कहीं न कहीं प्र.ले.सं. से ज़रूर प्रभावित होकर लिखी जाने लगी थीं। बाद में ‘आराधना’ और ‘अर्चना’ के गीतों में निराला की प्रखर सामाजिक चेतना थोड़ा मंद पड़ी, जिसका कारण उनका और उनकी रचनाओं की लगातार उपेक्षा भी मानी जा सकती है। निराला नेहरू से हिंदी साहित्य की प्रगति को लेकर बातें करके भी सामाजिक कुरूपता को मिटाने का प्रयास किए, पर जब नेहरू जी जेल में थे और जनता की हालत ख़राब थी, उन्‍होंने लिखा-
“मँहगाई की बाढ़ आई, गाँठ की छूटी गाढ़ी कमाई
भूखे नंगे खड़े शरमाए, न आए वीर जवाहर लाल”[iv]

प्रगतिवादी कविता की क्रांति-चेतना राष्‍ट्रीय-सामाजिक दोनों पक्षों को लेकर चल रही थी। एक तरफ़ यह भावना पराधीनता से मुक्ति पाने के लिए ललकारती है तो दूसरी तरफ़ सामाजिक दृष्टि से वर्ग-व्‍यवस्‍था को ध्‍वस्त करने का आह्वान करती है।       

दूसरे महायुद्ध के दौरान भारत की जनता ने बहुत दुख सहे, साथ ही उसके सबसे सचेत अंश ने पूँजीपतियों और पूँजीवादी नेताओं की नीति भी पहचानी और साम्राज्‍यवादी दासता से मुक्ति पाने के लिए उसका मनोबल और दृढ़ हुआ। इस स्थिति को केदारनाथ अग्रवाल सटीक ढंग से प्रतिबिंबित करते हैं- ‘जो शिलाएँ तोड़ते हैं’ काव्‍य संग्रह में देखा जा सकता है। केदारनाथ अग्रवाल उन थोड़े से लेखकों में हैं जिन्‍होंने स्‍पष्‍ट देखा था कि किसान की सामंत विरोधी क्रांति को स्‍वाधीनता आंदोलन का प्रमुख अंग बनना है। अपने अंचल के किसानों से सीधे अवधी में बात करते हुए उन्‍होंने ओसौनी का गीत लिखा-
‘दौरी साधौ अन्‍न ओसावौ अडर उड़ावौ पैरा
ताल ठोंकि कै मारि भगावौ जेते ऐसा गैरा।’[v]

कांग्रेस और मुस्लिम लीग की सक्रियता से जनता में आशा की लहर थी कि देश को स्‍वाधीनता जल्‍दी मिल जाएगी। इस धारणा से बहुत दूर केदारनाथ अग्रवाल लिखते हैं- ‘मारि भगावौ जेते ऐरा गैरा’। किसान इनके पहले के कवियों में भी आता है पर अब वह पूरी धमक के साथ केदार की कविताओं में आता है।

मुक्तिबोध

केदारनाथ अग्रवाल से पहले नागार्जुन एक महत्‍वपूर्ण कड़ी के रूप में प्रगतिवादी साहित्‍य में अपनी धाक जमाते हैं। साधारण जन, निरक्षर लोग और कष्‍ट भोगती जनता की कविता बने नागार्जुन, नागार्जुन ऐसे ही नहीं कहते- प्रतिबद्ध हूँ…आबद्ध हूँ… इनकी प्रतिबद्धता जन के साथ है, जनता के स्‍वर से स्‍वर मिलाते हुए नागार्जुन कहते हैं-

‘जन-जन में विद्रोह भरेगी अन्नब्रह्म की माया
गुरबत का मैदान चरेगी अन्नब्रह्म की माया’[vi]

अन्‍याय का, अन्‍यायियों का प्रतिरोध करते नागार्जुन कबीर के समकक्ष खड़े जन की बात करते हैं। वे कबीर की ही भाँति बुद्धिजीवियों को खरी-खोटी सुनाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ते थे- ‘संग तुम्‍हारे साथ तुम्‍हारे’ शीर्षक कविता में उन्‍होंने सर्वहारा वर्ग के लोगों को संबोधित करते हुए लिखा है-
‘पतित बुद्धिजीवी जमात में आग लगा दो
यों तो इनकी लाशों को क्‍या गीध छुएँगे
गलित कुष्ठवाली काया को/कुत्ते भी तो सूँघ-सूँघकर
दूर रहेंगे/अपनी मौत इन्‍हें मरने दो…
तुम मत जाया करना….’[vii]

नागार्जुन यथार्थ की ज़मीन पर दृढ़तापूर्वक खड़े होकर समाज और राष्‍ट्र के सजग पहरुए की भूमिका निभाने वाले रचनाकार हैं। समाज की अराजक स्थिति उन्‍हें बेचैन कर देती है और व्‍यक्तिगत मौजीपन, फक्‍कड़पन कविताओं में भी बिना लाग-लपेट के सब कुछ कह जाता है- “धन्‍य वे जिनकी उपज के भाग
अन्‍न-पानी और भाजी-साग
विपुल उनका ऋण, सधा सकता न मैं दशमांश
ओह, यद्यपि पड़ गया हूँ दूर उनसे आज
हृदय से पर आ रही आवाज़
धन्‍य वे जन, वही धन्‍य समाज”[viii]

इसके अलावा नागार्जुन उन आस्‍थाओं, क्रांतिधर्मिता, समता, प्रगति और जनवाद से संबंधित आस्‍थाओं पर भी आलोचनात्‍मक टिप्‍पणी कर देते हैं- “सोचते रहे-सोचते रहे/क्रांति, समता, प्रगति, जनवाद/आजीवन हमने/ इन शब्‍दों से काम लिया है/वो हमें चेतावनी दे गए हैं…..”[ix]

त्रिलोचन के यथार्थवाद में जैसे शहर से लेकर देहात तक के दृश्‍यों की विविधता है। त्रिलोचन की अपनी पीड़ा जन की पीड़ा है उनका आत्‍मसंघर्ष जनसंघर्ष ही है। व्‍यवस्‍था बदलने की ललकार उनकी कविताओं में दिखाई देती है। ‘धरती’ कविता में लिखते हैं-
“ओ तू नियति बदलने वाला
तू स्‍वभाव का गढ़ने वाला
तूने जिन नयनों से देखा
उन मज़दूरों-किसानों का दल
शक्ति दिखाने आज चला है।”[x

त्रिलोचन हों या नागार्जुन इनकी ज़्यादातर विद्रोही और प्रगतिशील कविताएँ आज़ादी के बाद ही लिखी गईं मिलती हैं। त्रिलोचन की कविता पूरी दुनिया की सैरकर फिर दुनिया में आ जाती है। त्रिलोचन अपने पच्‍चीसवें सॉनेट में अत्‍यंत बेधक स्‍वर में लिखते हैं-

“लाशों की चर्चा थी, अथवा सन्‍नाटा था
राज्‍यपाल ने दावत दी थी, हा-हा, ही-ही
चहल-पहल थी, सागर और ज्‍वारभाटा था
जो सुनता था वही थूकता था, यह छी-छी
यह क्‍या रंग-ढंग है। मानवता थोड़ी सी
आज दिखा दी होती। वे साहित्‍यकार हैं।”[xi]

मानवीय संकट का तीखा एहसास कराती है यह कविता। खांटी किसान जीवन की सच्‍चाई और ग़रीबी से पार पाने के लिए किया गया श्रम साथ ही पति-पत्‍नी की संवेदना, तीनों तत्‍वों का मिश्रण करते हुए त्रिलोचन लिखते हैं-
“रस्सियाँ भी नगई बरा करता था
सुतली को कातकर बाध भी बनाता था।”[xii]

जीवन-स्थितियों का ऐसा सजीव चित्रण अपने आप में अनोखा है। कथ्‍य, शिल्‍प दोनों पक्षों में कविता का कोई सानी नहीं है। त्रिलोचन के यहाँ ‘एक भले आदमी का ईमानदारी से श्रम करते रहना’ ऐसी भलमनशाहत को महत्‍व दिया गया और एक भोले नगई के माध्‍यम से पूँजीवाद, साम्राज्‍यवाद, सामंतवाद जैसे बड़े सवाल बड़ी आसानी से खड़ा करते हैं।

निराला

त्रिलोचन कहते हैं ‘मैं जनपद का कवि हूँ’ सचमुच त्रिलोचन को क्षेत्रीय भाषा चौंकाती नहीं लुभाती है। उनकी भाषा भारत के किसान-जीवन की विविध क्रियाओं परिवेश और लोकोक्तियों से स्‍वरूप ग्रहण करती है-
‘साम्राज्य औ पूँजीवादी
लिए हुए अपनी बरबादी
ज़ोर आजमाई करते हैं
आज तोड़ने को उनका मन
उठकर दलित समाज चला है’[xiii]

 इन प्रमुख प्रगतिशील कवियों के पीछे प्रगतिशील लेखक संघ काम कर रहा था और साहित्‍य में प्रमुख रूप से जनवादी चेतना और फासिज़्म के विरोध के पीछे भी प्रगतिशील लेखक संघ काम कर रहा था। राजसत्‍ता, राजतंत्र के ख़िलाफ़ जनवादी आवाज़ का उठना ही तत्‍कालीन स्थिति के आधार पर बड़ी बात थी। 1942 की अगस्‍त क्रांति, भारतीय कम्‍युनिस्‍ट पार्टी का रूस समेत मिश्र राष्‍ट्रों का और एक तरह से ब्रिटिश सरकार का ही पक्ष समर्थन करना, इसी बीच बंगाल में भयंकर अकाल पड़ा, इस तरह देखा जाए तो 1939 से 1946 तक का दौर अनेक प्रकार के जटिल राजनीतिक और सामाजिक प्रश्‍नों का दौर बन गया। प्रगतिवादी लेखक संघ के मुख्‍य उद्देश्‍य में से भारतीय जननाट्य संघ (इप्‍टा) की स्‍थापना भी था, जिसके माध्‍यम से लेखक जनता तक पहुँचकर उनकी समस्‍याओं पर बात कर सकते थे और उसे अपनी रचनाओं में शामिल कर सकते थे।

रेखा अवस्‍थी ‘प्रगतिवाद और समानांतर साहित्‍य’ पुस्‍तक में लिखती हैं- “प्रगतिशील लेखक संघ की ओर से भारतीय जननाट्य शाला स्‍थापित करने के प्रयत्‍न शुरू हुए, 1943 में मुंबई (तत्‍कालीन बंबई) में ‘भारतीय जननाट्य संघ’ की स्‍थापना की गई। इसके तुरंद बाद कम्‍युनिस्‍ट पार्टी और प्रगतिशील लेखक संघ के परस्‍पर सहयोग से देश के कोने-कोने में जननाट्य शाला की शाखाएँ स्‍थापित करने की चेष्‍टा होने लगी। इस सदी के पाँचवे दशक में पीपुल्‍स थियेटर ने नाट्यकला को बल और शक्ति प्रदान की। इस धारा ने हर प्रांत और भाषा को अच्‍छे नाटककार, गीतकार, कवि और मंच कलाकार प्रदान किए।”[xiv]

यही कारण रहा कि साहित्‍य की सभी विधाओं में साम्राज्‍यवाद विरोधी स्‍वर उठने लगा। प्रगतिवादी कवियों की भरमार सी आ गई, परंतु इनमें से महत्‍वपूर्ण रूप से नागार्जुन, त्रिलोचन, केदारनाथ अग्रवाल, शमशेर, मुक्तिबोध का नाम और उनकी चुनिंदा प्रगतिशील कविताओं का ज़िक्र किया जा रहा है। बंगाल की अकाल की त्रासदी पर बाबा नागार्जुन कालजयी कविता लिखते हैं-

“कई दिनों तक चूल्‍हा रोया, चक्‍की रही उदास
कई दिनों तक कानी कुतिया, सोई उनके पास।”
फिर इसी अकाल का दूसरा दृश्‍य इस तरह से दिखाते हैं-
“दाने आए घर के अंदर कई दिनों के बाद
कौए ने खुजलाई पाँखें कई दिनों के बाद”[xv]

सांप्रदायिक उन्‍मादों पर लिखी गई शमशेर की कविताओं में गहरी तकलीफ़ और तीखे व्‍यंग्‍य का युग्‍म उसे अद्वितीय कविता बना देता है। शमशेर के व्‍यंग्‍य का मिज़ाज नागार्जुन से थोड़ा भिन्‍न है। यहाँ शब्‍दों की मार थोड़ी बाकी है-
“ये मुल्‍क इतना बड़ा है/यह कभी बाहर के/
हमले से/न सर होगा/जो सर होगा
तो बस/अंदर के फितने से”[xvi]

शमशेर तार सप्‍तक के कवि यानी प्रयोगवाद के अंतर्गत माने जाते हैं पर उनके काव्‍य के कई रंग हैं, उनकी कविताओं में प्रगतिशीलता भी निहित है, इससे इंकार नहीं किया जा सकता। शमशेर को ग़ैर-प्रगतिशील कहने वालों को उनकी यह कविता झुठला देती है-
“फिर वह हिलोर उठी-गाओ!
वह मज़दूर किसानों के स्‍वर कठिन हठी
कवि हे, उनमें अपना हृदय मिलाओ!
उनके मिट्टी के तन में है अधिक आग
है अधिक ताप! उसमें कवि हे
अपने विरह मिलन के पाप जलाओ!”[xvii]

मुक्तिबोध का नाम आते ही उन्‍हें नई कविता के खेमे में फिट कर दिया जाता है लेकिन उनकी प्रगतिवादी कविताओं के साथ अन्‍याय नहीं किया जा सकता। मुक्तिबोध अपने काव्‍य नायक को जीवन की यथार्थ स्थितियों विद्रूपताओं, विश्रृंखलताओं का अवबोधन कराकर क्रांति या विद्रोह का रास्‍ता सुझाते हैं, वे मार्क्‍सवाद से भी प्रभावित होते हैं और समाज की ख़ामियों को इसी सिद्धांत से दूर करना चाहते हैं पर पूर्णत: मार्क्‍स के सिद्धांत को अपने काव्‍य में उतारने से बचते भी हैं। मुक्तिबोध की रचनाएँ यद्यपि आज़ादी के बाद की हैं, पर कुछ एक कविताएँ जो कि प्रगतिशील स्‍वर के साथ-साथ आज़ादी के पहले के भावबोध को लिए हुए हैं-
“बारह का वक़्त है
भुसभुसे उजाले का फुसफुसाता षड्यंत्र
शहर में चारों ओर;
ज़माना भी सख्‍त़ है”[xviii]

राजनीतिक क्षेत्र में व्‍याप्‍त अवसरवाद, भ्रष्‍टाचार, पद लालसा, खोखली नारेबाजी आदि को महत्‍वपूर्ण ढंग से मुक्तिबोध ने अपनी कविताओं की विषय-वस्‍तु बनाया है।
युग के यथार्थ की बात करते हुए ‘अँधेरे में’ कविता में लिखते हैं-
“ओ मेरे आदर्शवादी मन/ओ मेरे सिद्धांतवादी मन
अब तक क्‍या किया?
जीवन क्‍या जिया!!”[xix]

रामधारी सिंह दिनकर

मुक्तिबोध की कविता अद्भुत संकेतों से भरी हर शब्‍द में चौंकाती है और एक शब्‍द के नए और कई अर्थ बना जाती है। युग के चेहरे का आइना हैं मुक्तिबोध। ऐसे यथार्थ की बात करते हैं जो आज के इतिहास के मलबे के नीचे दब गया है, मगर मर नहीं गया है-
“कोशिश करो/कोशिश करो/कोशिश करो
जीने की- ज़मीन में गड़कर भी…।

यही नहीं समय का कुचक्र और दहशत को मुक्तिबोध ‘लकड़ी का बना रावण’ शीर्षक कविता में व्यक्त करते हैं.-
हाय, हाय
उग्रतर हो रहा चेहरों का समुदाय
और कि भाग नहीं पाता मैं
हिल नहीं पाता हूँ
मैं मंत्र-कीलित-सा, भूमि में गड़ा-सा
जड़ खड़ा हूँ
अब गिरा तब गिरा 
इस पल कि उस पल…[xx]

मुक्तिबोध आदि कवियों के अतिरिक्‍त अज्ञेय, भारत भूषण अग्रवाल, भवानी प्रसाद मिश्र, नरेश मेहता, धर्मवीर भारती आदि भी प्रगतिवादी कवि के अंतर्गत आते हैं।

प्रयोगवादी कविता वस्‍तुत: मध्‍यवर्गीय समाज का चित्र है। यह 1943 में ‘तारसप्‍तक’ के प्रकाशन के साथ शुरू हुआ, इसमें सामाजिक सत्‍य के बजाय व्‍यक्तिगत सत्‍य को स्‍वीकार किया गया।

डॉ. नगेंद्र ‘हिंदी साहित्‍य का इतिहास’ में लिखते हैं- “ ‘तारसप्‍तक’ और ‘प्रतीक’ पत्रिका को देखने से यह स्‍पष्‍ट ज्ञात होता है कि इनमें संगृहीत या प्रकाशित कवियों के अनुभव के क्षेत्र, दृष्टिकोण और कथ्‍य एक ही प्रकार के नहीं है, कुछ ऐसे हैं जो विचारों से समाजवादी हैं और संस्‍कारों से व्‍यक्तिवादी- जैसे शमशेर, नरेश मेहता आदि। कुछ ऐसे हैं जो विचारों और क्रियाओं दोनों से समाजवादी हैं जैसे- रामविलास शर्मा, मुक्तिबोध।”[xxi]

प्रयोगवाद के अंतर्गत महत्‍वपूर्ण कवि के रूप में अज्ञेय को ही जाना जाता है। ‘प्रयोगवाद’ नामकरण को अनुपयुक्‍त मानते हुए ‘दूसरा सप्‍तक’ की भूमिका में अज्ञेय को स्‍पष्‍ट करना पड़ा कि ‘प्रयोग का कोई वाद नहीं है… प्रयोग अपने आप में इष्‍ट नहीं है, वह साधन है और दोहरा साधन है….’ देखा जाए तो प्रगतिवाद, प्रयोगवाद, नई कविता एक-दूसरे से इस तरह बँधे हुए हैं कि इन काव्‍यधाराओं में एक-दूसरे की काव्‍य प्रवृत्तियाँ मिली हुई दिखाई दे जाती है। हिरोशिमा कविता लिखते समय अज्ञेय प्रयोगवादी परंपरा से एकदम बाहर दिखते हैं-
“छायाएँ मानव-जन की
नहीं मिटीं लंबी हो-होकर
मानव ही सब भाप हो गए।
छायाएँ तो अभी लिखी हैं
झुलसे हुए पत्थरों पर
उजड़ी सड़कों की गच पर।”[xxii]

यही कवि आगे नए उपमानों की बात करता है और नदी के द्वीप की बात करता है यही नहीं चैत की हवाओं से भी रू-ब-रू होता है, ऐसे में अज्ञेय को सिर्फ़ प्रयोगवादी कवि कहकर ख़ारिज कर देना साहित्‍य–जगत की बहुत बड़ी ख़ामी को दर्शाता है। ज़ाहिर है प्रगतिवादी आंदोलन के माध्यम से साहित्यिक दृष्टिकोण बदला है।

प्रगतिवादी आंदोलन के विषय में कर्णसिंह चौहान लिखते है “तीसरे दशक में उभरा प्रगतिवादी आंदोलन और सातवें दशक में उभरा जनवादी आंदोलन आज़ादी के आर-पार के समय के हिंदी साहित्य के महत्वपूर्ण आंदोलन हैं। एक यदि 19 वीं शताब्दी में शुरू हुए आधुनिक साहित्य की परिणिति है तो दूसरा आज़ादी के बाद साहित्य में उदित प्रवृत्तियों की। ये दोनों आज़ादी से पूर्व और बाद के साहित्य को तार्किक परिणति और व्यवस्था प्रदान करते हैं। इस व्यवस्था से पूर्व के साहित्य को समझने-समझाने में मदद मिलती है। लेकिन इसके साथ ही यह भी उतना ही सच है कि कोई भी कड़ी व्यवस्था और जकड़बंदी स्थिरता और गतिहीनता को जन्म देती है- फिर वह चाहे भाषा का मामला हो या साहित्य का। इसलिए उस व्यवस्था के विरुद्ध प्रतिक्रिया होना स्वाभाविक है।”[xxiii]

इस प्रकार आज़ादी के पहले के शुरूआती दौर की कविताएँ सिर्फ़ रस, नायक-नायिका भेद, राजा की स्‍तुति, भक्ति काव्‍य इत्‍यादि तक सीमित रहे, लेकिन इसी दौर के दूसरे खंड में यानी आधुनिक काल की कुछ द्विवेदी युगीन, छायावादी, प्रगतिवादी और प्रयोगवादी कविताएँ पहले की विषय-वस्‍तु से हटकर यथार्थवादी घटनाओं का चित्रण करने लगीं और कविता विधा के लिए या कह लीजिए संपूर्ण साहित्‍य के लिए कुछ लेखकों द्वारा एक मुहिम चलाई गई थी कि साहित्‍य को वाद, सिद्धांत इत्‍यादि से दूर रखा जाना ही उचित होगा, ऐसे विचार को त्‍यागा गया। साहित्‍य में प्रगतिशील लेखक संघ के आने से प्रगतिवादी आंदोलन होने से कविताओं में पहली बार राजनीति, पूँजीवाद, मार्क्‍सवाद, साम्राज्‍यवाद जैसे शब्‍द को जगह मिली, जिससे नए तरह का आधुनिक साहित्‍य हमारे समक्ष आ सका। आज़ादी के बाद की कविताओं में जनवादी स्‍वर को बख़ूबी देखा जा सकता है।
संदर्भ:
[i]  संचयिता: रामधारी सिंह ‘दिनकर’, पृ. 50 
[ii]  सोहनलाल द्विवेदी, साहित्य आकादमी, पृ. 25
[iii]  हुंकार, रामधारी सिंह दिनकर, पृ. 42
[iv]  निराला रचनावली, खंड 2, संपादक- नंद किशोर नवल, पृ. 132
[v]  रूपतरंग और प्रगतिशील कविता की वैचारिक पृष्‍ठभूमि, रामविलास शर्मा, पृ. 215
[vi]  नागार्जुन: चयनित कविताएँ, संपादक- मैनेजर पांडेय, पृ. 50
[vii]  आजकल, संपादक- सीमा ओझा, जून 2011
[viii]  प्रतिनिधि कविताएँ, नागार्जुन, संपादक- नामवर सिंह, पृ. 29
[ix]  आजकल, संपादक- सीमा ओझा, जून, 2011, पृ. 14
[x]  रूपतरंग और प्रगतिशील कविता की वैचारिक पृष्‍ठभूमि, पृ. 282
[xi]  कविता की लोक प्रकृति, डॉ. जीवन सिंह,  पृ. 120
[xii]  ताप के ताए हुए दिन, त्रिलोचन, पृ. 67
[xiii]  धरती, त्रिलोचन, पृ. 29
[xiv]  प्रगतिवाद और समानांतर साहित्‍य, रेखा अवस्‍थी,  पृ. 41
[xv]  नागार्जुन प्रतिनिधि कविताएँ, संपादक- नामवर सिंह, पृ. 98
[xvi]  शमशेर बहादुर सिंह विशेषांक, उद्भावना, संपादक-विष्णु खरे, पृ. 116
[xvii]  वही, पृ. 122
[xviii]  चांद का मुँह टेढ़ा है, मुक्तिबोध, पृ. 53
[xix]  वही, पृ. 268
[xx]  वही, पृ. 51
[xxi]  हिंदी साहित्‍य का इतिहास, डॉ. नगेंद्र, पृ. 627
[xxii]  चुनी हुई कविताएँ, अज्ञेय, पृ. 87
[xxiii]  प्रगतिवादी आंदोलन का इतिहास, भूमिका से

आबिदा (परिमला अम्बेकर की कहानी)

‘‘अम्मा आजकल मय्यत उठने के लिए भी बीस पच्चीस हजार लगते हैं !!‘‘

जब से खबर मिली है आबिदा के मौत की, बार बार उसका कहा यह वाक्य कानों में बज रहा है। हमेशा बोलती हॅंसती खिलखिलाती आबिदा, दिल में कोई मलाल नहीं, जो भी कहना है सामने, न भीतर न बाहर !! चलुबुली भी इतनी कि हर किसी से बात करती, कोई लिहाज नहीं। क्या आदमी क्या जनाना, सब उसके मित्र मंडली के फेहरिस्त के। बडी से बडी बात को भी उतनी ही सरल और सहज अंदाज में कहती जैसे ठंडे पानी का घूँट पी रही हो।

क्या कुछ नहीं किया उसने! रहते समय तक अपना पेट खुद पाला और मरने के बाद अपनी मय्यत को खुद सजाया …!!

बहुत लंबे अरसे से मैं जानती थी आबिदा को। लगभग पच्चीस तीस साल से होगा। हमारे घर आती थी बच्चों को दिखाने। मेरे डॉक्टर पति की इलाज पर उसे पूरा भरोसा था। महीने दो महीने में कम-से-कम चार पांच बार , दूर शेखरोजे से दो तीन किलो मिटर चलते आती थी ब्रह्मपूर के हमारे घर। एक दो को  बगल में खोसे, और दो तीन को आगे पीछे डोलाते चलते ले आती थी बच्चों को अपने साथ। सुबह दवाखाने के कमरे का दरवाजा खोलने से पहले ही कट्टे पर आबिदा की सवारी बैठी रहती। हल्के बादामी रंग के बुर्के में लिपटी वह , हमें देखते ही मुंह पर का रकाब उठाकर सलाम करती । मेरे ससुराल के सारे सदस्य उसे जानते थे वह सबसे सलाम दुआ करती, हालचाल पूछती, बातें करती। चुलबुल-चुलबुल करते बच्चों को लिये दवाखाने की बेंच पर बैठे-बैठे भीतर घर के अहाते में झांककर देखती…मेरी सास से बातें करती । खीर पुलावो की बातें, अचार मुरब्बे की बातें, ईद त्यौहार की बातें , पीर पूजा की बातें … !! उसकी ये सारी बातें सुनकर मुझे आश्चर्य होता । पूछने पर हॅंसते कहती ‘‘ नहीं अम्मा … मेरी अम्मा की एक बम्मना की सहेली थी तुम जैसी शहाबाद में। रेलवे के मोहल्ले में हम सब रहते थे। भौत उठना बैठना था उनके साथ। इसीलिए मुझे तुम्हारे सब तौर तरीके मालूम है’’।

आबिदा सब से बोलती, बोलने से पहले उनका चेहरा देखकर हॅंस पडती। जबरदस्ती अपने चेहरे पर हॅंसी के कोलाज के चौखटा को चढाती। चाहे वह जान-मान का हो या ना हो, बातें काम-धाम की हो या ना हो। वह सबसे ऐसा बोलती जैसे वह सबका उधारी चुका रही हो। उसके बोलने के ढंग में एक नमूने की बेफिक्री रहती।  ‘‘ अरे, बातें करने में क्या जाने वाला है अम्मा, न लेने का ना देने का-मुंह में जुबान है तो बोलने के लिए…उल्लू की तरह घूरते बैठने से क्या मिलता ? ‘‘ उसका यह बेढंगी फलसफा किसी की जबान चढे या ना चढे लेकिन आबिदा अपना उल्लू जरूर सीधा कर लेती. अपनी जुबान की खुजली मिटा कर के !!

एक दिन वह हमारे यहॉं आयी थी…लेकिन उस दिन साथ में बच्चे नहीं थे। सफेद पाजामा कुर्ता और चाकलेटी ऊनी टोपी पहना एक बूढा बुजुर्ग और चिकन का दुपट्टा ओढी बूढी औरत उसके साथ थे। जब भी आबिदा के आने का आहट पाती मैं अपना काम-धाम छोडकर दवाखाने के कमरे के पास आकर, भीतर झांकती। आबिदा की मसखरी भरी बातें मुझे अच्छी लगतीं। किसी बहाने उसे भीतर बुलाकर, उससे बातें करती। बातुनी आबिदा के लिए तो यह ‘‘शेख भी कहे आम की बातें, आम को भी भाये आम की बातें ‘‘ वाली बात थी। मुझे लगता ‘शायद मेरी अम्मा की भी कोई मुसलमान सहेली रही होगी जिसके ही मुहल्ले में मैं भी पली बढी हुई होगी !!

मेरे भीतर आने की आहट पाकर साथ आये दोनो से बुर्के में से ही इशारा करते हुए कहा ‘‘ सलाम करो दागदर साब की जोरू हैं और ये हमारी अम्मा है।’ मैंने भी हाथ जोडकर नमस्कार किया। मेरे नजदीक आकर लगभग कान में सुनाने जैसी आवाज निकालते कहने लगी ‘‘ अम्मा तुम्हारे भय्या बाबू के अम्मी अब्बा है… महीने से पीछे पडे थे…दागदर को दिखाओ दागदर को दिखाओ, नै सो सौ ढंगा है अम्मा इनके। कुछ नै रैता चुपीच जान खाते, ऊपर से इनका मुझे डॉंटना अलग। इसीलिए बुलाको लाई… साब का चाय नाश्ता हुआ नै ‘‘। अपने सास  ससुर को हाथों से सहारा देकर बेंच पर बिठाते हुए उन्हें मेरे सामने ऐसा पेश कर रही थी जैसे मॉं अपने बच्चों को डॉंटते हुए स्कूल में टीचर के सामने उनकी शिकायत पर पेश करती है। अपने पति बाबू से बहन का रिश्ता जोडकर, बडी सहजता से सामने बैठे बुजुर्गों को मेरा माँ-बाप बना दिया था आबिदा ने। आबिदा की चालाक बातों की जाल में हरबार सब फॅंसते ही जाते… और वह है कि बादामी रंग की बुर्के की जाली में से अपने सॉंवले गोल चेहरे में हॅंसती बडी-बडी ऑंखों को और भी खिलाते जाती !! बैठे-बैठे मै सोचती ‘अंतर्राष्ट्रीय मसलों को हल करने के लिए बुलाई जानेवाली सभाओं में अगर आबिदा को बिठा देंगे तो क्या होगा ‘और उसके व्यवहार की कल्पना करके मै खुद ही खुद हॅंसते जाती।

उस दिन मैंने देखा …आबिदा आयी थी लेकिन हमेशा की तरह सुबह तडके नहीं… दस साढे दस के करीब वह आयी थी। साथ में बगल का एक ही बच्चा था, दुबला-पतला सा दूसरे बच्चों की फौज नदारद थी। किसी इमेरजन्सी के चलते डाक्टर भी घर पर नहीं थे। मुझे पास बुलाकर एक बडी सी थैली मेरे हाथ पकडाते कहने लगी ‘‘शहाबाद के अम्मी के खेत के मूंगफल्ली है अम्मा ‘‘ थैली हाथ में पकडे-पकडे वहीं बेंच पर बैठते मैने कहा ‘‘ बाल बच्चों का घर है तेरा उन्हें खिला देती, नाहक तूने…’’ बीच में ही मुझे टोकते उसने कहा ‘‘ अम्मा घर का बरकत बॉंटकर खाने में है., और बच्चे भी..’’ बच्चे कहते ही मुझे भी कुछ याद हो आया मैने पूछा ‘‘ हॉं आबिदा क्यूं आज इस अकेले को लायी हो, दूसरे कहॉं है। उलटे हुए बुर्के में से पूरा चेहरा खिलाते कहने लगी, ‘‘नहीं अम्मा ओ सब मेरे नहीं. मेरी दोनों देवरानियों के हैं तीन तीन बच्चे। मेरा यही अकेला है। एक दो आज इस्कूल गये हैं और दूसरे अपनी अम्मी के साथ थे।’ इसीलिए नै आये मेरे पिच्छे पिच्छे। ‘‘ बच्चे की ओर मेरे देखने के अंदाजे से ही वह समझ गयी , तपाक से बोल पडी ‘‘बहुत बारीक पैदा हुआ था अम्मा यह… कितने ही तो पीरों के यहाँ चरागां जला जलाकर बचा ली हूं इसे और दागदर साब की दवा और आपकी दुआ से बचा है अम्मा यह ‘‘इत्मीनान से मुझे बैठा हुआ देखकर उसे मैदान साफ नजर आया । बातुनी आबिदा फिर छूट पडी,’’ जब इसके पेट से थी तो तुमारे भय्या की मिल की नौकरी छूट गयी। ढंग से खाना नै दवा नै दारू नै। मेरी कमजोरी इसको लग गयी अम्मा। अभी भी वइच  हाल है। महीना गया नै बुखार जुकाम खांसी, दस्त लगेच रैता है ‘‘

घर के भीतर से मेरे नाम से किसी की आवाज सुनकर आबिदा बच्चे को बगल में लिये सलाम करके निकल गई। और मैं वहीं थैली से मुंगफल्ली निकालकर कुतरते बैठ गई। सोचने लगी ‘आबिदा जैसी कितनी ही तो औरतों के परिवार है हमारे समाज में, जो बच्चे की पैदाइश को पारिवारिक जिम्मेदारी नहीं समझते और बच्चे के परवरिश को मिल जुलकर सफलता से नहीं निभाते। अपनी औरतें हैं कि अंत तक इसके लिए पति और ससुराल वालों को जिम्मेदार ठहराकर उन्हें कोसते ही रह जाती हैं। कुपोषण से लडना हर-एक की जिम्मेदारी है। ससुराल हो या मायका इससे अपना पल्ला नहीं झाड सकता।’

शायद टीवी पर परिवार नियोजन की सरकारी विज्ञापनों को देखने का नतीजा होगा, सोचकर अपने आप पर ही हॅंसते हुए थैली लेकर भीतर चली गयी। खैर इसके बाद आबिदा का हमारे यहाँ आना ही लगभग बंद हो गया। मेरे खयालों में भी उसकी याद आती… जाती…आती… चली ही गयी।

लेकिन बहुत सालों बाद आबिदा अचानक प्रकट हो गयी। साथ में बहु को लाई थी दिखाने वह भी शाम के समय। वही बादामी रंग का बुर्का। लेकिन कुछ नया सा लग रहा था। बेटे के ब्याह में खरीदा होगा । ‘‘ अरे…आबिदा तेरे उस लिजलिजा सा खांसी बलगम का पुलिंदा बेटे ने शादी बना ली….? मेरी हॅंसी रूक न सकी। आबिदा की चुलबुले हॅंसी मजाकिया स्वभाव से तो मैं वाकिफ थी। लेकिन बगल में खडी गोल- मटोल गिड्डी काली बुर्के वाली बहु को मेरी हॅंसी कैसे लगी पता न चला। बुर्के से कोई हरकत होता न देख मैं एकदम चुप हो गयी। आबिदा ने ही आगे बढकर हॅसते हुए मेरे हाथ मिठाई का डब्बा देते बहू से सलाम करने कहा। वहीं बेंच पर इत्मीनान से बैठते हुए बुर्के के बंद खोलू जालीदार रेशमी परदे को ऊपर  उठाकर कहने लगी ‘‘क्यूं न होगा अम्मा… दागदर साब की दवा का और आपकी दुआ का असर है देखो …इस काबिल हो गया। लेकिन क्या करें अम्मा, तुम्हारे भय्या के नसीब में नै था, अल्ला का रहम देखना’’ उसके चेहरे पर गम और खुशी के भाव आ जा रहे थे। आबिदा के चेहरे पर खुशी नूर की तरह टपक रही थी वहीं बगल का गोल-मटोल संवेदनाहीन चेहरा बिना ऑंखें झपकाये एकटक मुझे ही घूरे जा रही थी। बुरखे में अब भी कोई हलचल होता न देख मैं चुपा गयी। लेकिन मुझे जरूर लगा… ‘अपनी आबिदा हॅंसता चांद है लेकिन इसकी यह बहू? इसमें तो आबिदा के खिलखिले स्वभाव का पौ भर का हिस्सा भी नहीं। न मजाक का अहसास और न ही खुशी का इजहार। चेहरा है या भुतनी का लबादा…!!’’ भीतर से पता नहीं क्यूं मेरा मन अस्वस्थ हो गया। खुशी से बोलती दिपदिपाती आबिदा से मैं कुछ कह नहीं सकी ।

मैं सोचने लगी, आबिदा हजारी प्रसाद द्विवेदी के लिखे उस शिरीष की तरह है जो भर भरे धूपकाल में फूलों से लदाफदा रहता है, शिरीष के उस फलों की तरह है जो हर मौसम में जीवन रूपी वृक्ष से लगे लगे रहते हैं, अपनापन जताते रहते हैं।

यूं तो आबिदा कोई विशेष हिस्सा नहीं थी मेरे जीवन की। उसे तो मैं भूल ही गयी। लेकिन पता नहीं क्यूं फिर आबिदा के साथ का मेरा संपर्क शायद खत्म नहीं हुआ था। वह फिर आ गयी मेरे घर। लगभग आठ दस साल बाद। इस बार साथ में कोई नहीं था। अकेली थी आबिदा। मुझे आश्चर्य हुआ। वह कभी अकेली नहीं होती किसी न किसी को लेकर आती है साथ डॉक्टरी इलाज के लिए। कभी वह अकेली अपने इलाज के लिए आता मैने नहीं देखा था। इस बार वह अकेली थी। बेरंगी बादामी बुरखे के परदे को आहिस्ता से ऊपर करते हुए निढाल सी बेंच पर बैठ गयी। मैं खडी-खड़ी उसके चेहरे को ही देखती रह गयी। चेहरे से जैसे सारा रस निचुड गया था,ऑंखों से नूर जैसे गुल हो गयी थी। मेरी चढी त्यौरियों को देख आाबिदा  के चेहरे पर हंसी बेबसी सी पसर गयी। उसके आने का आहट पाकर मेरी सास भी भीतर कमरे में आ गयी। उन्हें देख उसके चेहरे की हॅंसी बेबसी की सारी बाधाएं तोडकर ऑंखों से बरसने लग गयी। हम दोनों को उसे समझाने के सिवा कुछ सूझ नहीं रहा था।

‘ पत्थर तक से बात करती है वह ‘यह मुहावरा जुमला हुआ था उसपर। हर कोई उसे देखकर कहता। ‘बोलना हॅसना उसके जेवर हैं मॉं के पेट से ही पैनकर आयी है उने।‘ लेकिन आज वही हॅंसोडी आबिदा फफक-फफकर रो रही थी। धीरे-धीरे सारी बातें खुलती गयी।

बहु घर के चादर के नाप की नहीं थी। उसके पैर दिन-ब-दिन पसरते ही जा रहे थे। दिन की ऑटो की कमाई में माँ-पत्नी और दो बच्चों का पेट भरना बेटे को भारी पडने लगा। सास ससुर देवर जेठानियों के बीच जीवन गुजारी आबिदा को बहू के नखरे अजीब लगते। बेटा बुरा न माने, बेटा दुःखी ना हो, बेटा ये न समझे बेटा ओ न समझे सोच सोचकर आबिदा गलने लग गयी थी। ससुराल के हल में बैल की तरह जुती आबिदा फिर से बेटे के लिए घर का सारा भार अपने कंधे पर उठा लिया था। हॅंसते-हंसते सारे काम निपटाते जाती। लेकिन समय का सूरज जैसे जैसे ढलान पर उतरने लगा… आबिदा थकने लगी। बहू का बरताव उसे बेगाना जतवाने लगा। उसने सोचा, ‘यह तो बेगानेपन की जुतायी है। न किसी को उसके मेहनत से मतलब और न उसकी परेशानी से चिंता। वह अकेली पडने लगी। उसकी हॅंसी, उसका मसखरा घर के चारों कोनों में चित्त से पडे रहने लगे। लेकिन बहू है कि हथेली में बाल उगाये बैठी थी।

आखिर चारा न पाकर बेटा अधिक कमाई के लिए विदेश निकल गया। महीना-महीना पैसा भेजने लगा। बहू बच्चे खुश, नये कपडे लत्तों से लदे-फदे। सिनेमा, बाजार सैर सपाटे में मस्त। लेकिन आबिदा को वह पैसा छूना तक हराम लगता। उधर बेटा मेहतन करता है, भूखा पेट रहता है, आसमान के नीचे सोता है। बेटे के खून पसीने की कमाई पर बहू पोतों की मटरगश्ती उसके चेहरे की सीन को छीनती गयी। ऊपर से बहू के ताने। पेट भरना भारी पडने लगा। आबिदा भूखी पेट भले ही रह सकती थी लेकिन हॅंसने-हंसाने  के बिना रहना जैसे उसे असंभव सा था। कोने में बिखरे पडे अपनी हॅंसी के टूटे किरचों को बटोरा, हड्डियों में बची रही सही ऐंठपन को कसकर, खूंटी पर टंगे अपनी बादामी रंग के बुर्के को ओढकर घर से निकल पडी आबिदा । बेटे की खून की कमायी का बेरहम कौर तोडना उसपर काफिर गुजरा। चेहरे पर लदी बेबसी की हॅंसी को उतारकर आबिदा घरों के काम पर लग गयी। फिर से हॅंसने लगी, खिलखिलाने लगी।

आबिदा से मेरी मुलाकात उसके मौत की खबर आने के कुछ ही महीने पहले हुई थी। शायद उस दिन वह ईद का पैगाम देने आयी थी। वही उसकी आखरी मुलाकात थी। उस दिन वह बहुत खुश नजर आ रही थी। मुझे लगा उसके चेहरे से निसर गई हॅंसी फिर से सूखी झुर्रियों में धीरे-धीरे भरती जा रही है। आबिदा  मेरे थमाये गिलास से चाय का घूंट भरते कहते जा रही थी और साथ में हॅंसते भी जा रही थी। सामने बैठे मै उसकी बातों को सुनते जा रही थी। जैसे मेरी कहानी का कोई जीवंत किरदार मेरे सामने अपने आप को खोलते जा रहा हो।’ अम्मा अब मै मर गई तो भी कोई परवा नै। अपना कमाती हूं खाती हूं। मैने यूं ही पूछा, ‘‘कितना पैसा जमा कर लिया है आबिदा।’ फटाक से बोल पडी ‘‘होंगे बीस पच्चीस हजार !’ मेरा एकटक सुनता देख फिर कहने लगी ‘‘मैं बुड्डी हो गई हूं….मर गई तो मुझपर किसी का भी पैसा नै लगना, बेटे का भी नै। अम्मा आजकल मय्यत उठने के लिए भी बीस-पच्चीस हजार से कम नहीं लगते”

आबिदा का वह आखिरी वाक्य मेरे कानों में गूंजने लगा था। होठ बुदबुदाने लगे मैं सोचने लगी, ‘‘मौत के बाद भी शायद हॅंसी उसके चेहरे पर खिली रही होगी।’’  खबर सुनकर जर्र हुआ मेरा चेहरा यह सोचकर खिल गया ‘‘चुलबुली मसखरी हंसोड़ आबिदा बादामी रंग के बुर्के के जालीदार परदे से झांककर, बीस पच्चीस हजार के हिसाब-किताब के बहाने काजी से बोलने-बतियाने के लिए उठ कर बैठ तो न गयी हो’’                              

अपनी मौत को भी वह हॅंसी की पोटली में बांध कर ले जा रही थी ।  

लेखक परिचय: विभागाध्यक्ष , हिन्दी विभाग , गुलबर्गा वि वि, कर्नाटक में प्राध्यापिका परिमला अम्बेकर मूलतः आलोचक हैं.  इन्होंने कहानियाँ भी लिखी है. संपर्क:09480226677

आम्रपाली ( रेनू यादव की कविताएं)

रेनू यादव, फैकल्टी असोसिएट,गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय, नोएडा. ‘ मैं मुक्त हूँ’ काव्य-संग्रह प्रकाशित

आम्रपाली – 1
नहीं चुनतीं अपनी
जिन्दगी की डोर
बना दी जाती हैं पतंग
जिन्हें उड़ाया जाता है
अलग-अलग छतों पर
आँधियों में झंझोड़कर
तीलियों में फंसा कर
चीर दी जाती हैं
बिहरा दी जाती हैं
करके तार तार
और खींच लीं जाती हैं
झटके से
गोल रोल बनाकर
रख दिया जाता उन्हें
अंधेरे घुप्प कमरें में
बार बार उधेड़ने के लिए

आम्रपाली – 2
मस्तक गिरवी पैर पंगू
छटपटाता धड़ हवा में
त्रिशंकू भी क्या
लटके होंगें इसी तरह शून्य में ?
रक्तीले बेबस आँखों से
क्या देखते होंगे इसी तरह
दो कदम रखने खातिर
जमीन को ?
और जमीन मिलते मिलते
फिसल जाती होगी तलवों से
हो जाती होगी उतनी ही दूर
जितनी करीब होगी कभी
ख्वाबों में तमाम कोशिश के बाद भी

चित्रांकन: सोनी पांडेय

उसे तो रोने की आदत है
रोना क्या इतना बुरा है अम्मा !
जो रोज खड़ी कर दी जाऊँ चौराहे पर ?
राधा और सीता के रोने
पर लिखे गए कितने ग्रंथ
अहल्या, सबरी, यशोधरा
शकुन्तला को क्यों किया
जाता है याद
द्रौपदी भी तो रोयी थी
भरी सभा में अम्मा
कुन्ती रोती रही आजीवन
इतना ही बुरा था उनका रोना
फिर वे ही आदर्श क्यों हैं अम्मा !
नानी को देखा रोते हुए
तुम कभी हँसी नहीं
क्या जिन्दगी का जंग लड़ने से
पहले रोना जरूरी होता है अम्मा !
मैं भी रो रही हूँ
झाडियों में चीखती आवाजों से
तेजाब से झुलस रहा है बदन
अपनों से खार खायी
अधूरे प्रेम की दास्तान से
और सबसे अधिक
नानी और तुम्हें रोता देखकर !
फिर मेरा मजाक क्यों उड़ाया
जाता है अम्मा !
कोई सामने से
कोई खींसे निपोरकर
कोई मुँह छुपाकर
कोई तमाचा मारकर
सब कहते हैं इनसे उनसे
“उसे तो रोने की आदत है” !

एक युवा फिल्मकार की दस्तक: मंजिलें अभी शेष है!

चन्द्रकांता

‘ओवर-दी-टॉप’ प्लेटफॉर्म एक ऐसा मंच है जिसने मुख्यधारा के ‘स्टारडम’ का वर्चस्व तोड़ा है और नई पीढ़ी को अपना हुनर दिखाने के लिए एक बड़ा स्पेस दिया है। इसके तहत टी.वी संचार और ब्रॉडकास्टिंग के प्रचलित साधनों की जगह सीधे इंटरनेट या यूटयूब जैसे मंचों पर अपना फ़िल्म कंटेंट जारी कर दिया जाता है। इसके अपने खतरे भी हैं लेकिन इनका लाभ यह हुआ है कि दर्शकों को कंटेंट की विविधता और अभिनय की एक बड़ी रेंज देखने को मिल रही है।

‘तस्वीरें’ युवा निर्देशक पावेल सिंह की पहली शार्ट फ़िल्म है। यह फ़िल्म 4 मई 2019 को यूट्यूब पर रिलीज़ हुई है। व्हाइट फायर प्रोडक्शन और दी रेड रेनबो स्टूडियोज़ की इस फ़िल्म की पटकथा भी पावेल ने लिखी है। फ़िल्म का प्लॉट प्रकाशक और लेखक के संबंधों के इर्द गिर्द बुना गया है। यह विषय अपने आप में अनूठा और साहसिक है। इससे पहले वर्ष 1973 में आई राजेंद्र सिंह बेदी की फ़िल्म फ़ागुन में एक बहुत संक्षिप्त सा खाका प्रकाशक और लेखक के संबंधों को लेकर खींचा गया था।

‘तस्वीरें’ आपको बताती है कि बाज़ार की मुनाफ़ा व्यवस्था किस तरह एक संवेदनशील लेखक को प्रकाशक के हाथों की कठपुतली बना देती है। यदि वह लेखक स्त्री है तब उसे और भी कई तरह के समझौते करने पड़ सकते हैं। किसी किताब का लिखा जाना, छपना और उसका पाठकों तक पहुंचना इसके पीछे व्यवस्था का एक पूरा गणित काम करता है।

फिल्म की शुरुआत होती है दिल्ली के सिविल लाइंस से जहां अरविंद ( सिद्धिविनायक सिंह ) नाम का लेखक दफ़्तर के बाहर प्रकाशक ( गुरिंदर आज़ाद ) का इंतजार कर रहा है। प्रकाशक दिल्ली के कभी न खत्म होने वाले जाम में फंसा है। वह गाड़ी में बैठा है और फोन पर वैदेही नाम की किसी महिला लेखक से बातचीत में व्यस्त है। दोनों की बातचीत से मालूम पड़ता है की महिला लेखक को अपनी कहानी छपवानी है । लेकिन क्योंकि बाज़ार में कुछ भी मुफ़्त नहीं मिलता इसलिए केवल लेखन से बात नहीं बनेगी महिला को ‘कुछ और’ भी देना होगा। प्रकाशक का एक संवाद देखिये –

“अरे मोहतरमा ! आप तो पहुंची हुई लेखिका हैं .. आपको तो सब पता है, क्या देना है, और वो भी कितना.. और वो भी कब… हरिओSम …. ” !!!

देखें फिल्म

अपने ऐतिहासिक स्वरूप में पूंजीवाद ने हमें स्त्री की मुक्ति का स्वप्न दिखाया । पूंजीवाद की परिणीति बाज़ारवाद में हुई और पूंजी व बाज़ार ने मिलकर एक ऐसी व्यवस्था को जन्म दिया जहां स्त्री एक वस्तु से अधिक कोई महत्व नहीं रखती।

बहरहाल, कहानी इस सौदेबाजी से आगे बढ़ती है एक युवा लेखक अरविंद अपनी नई कहानी ‘तस्वीरें’ लेकर प्रकाशक के दफ़्तर पहुंचता है । प्रकाशक उसकी कहानी को सुनने में कोई खास रुचि नहीं दिखाता लेकिन अपने अहम को तुष्ट करने के लिए वह बार बार कहानी में हस्तक्षेप करता है और बाज़ार के अनुरूप कहानी में बदलाव की मांग करता है । बाज़ारवाद ने लेखक के सामने ऐसी स्थिति पैदा कर दी है जहाँ या तो वह भूखा मरे या फिर तड़का मारकर बाज़ार के स्स्वादानुसार लिखे। परजीवी प्रकाशक को इसी बाज़ार का दंभ है । एक जगह प्रकाशक कहता भी है –

‘हम ही तो बनाते हैं अरविंद को अरविंद’ … वरना तो सड़कों पर सैकड़ों अरविंद घूम रहे हैं … सभी अरविंद हैं .. साSSला सब बराबर हैं ।

प्रकाशक के लिए अरविंद का महत्व केवल इतना है कि वह फेमस है । खैर, अरविंद अपनी कहानी के मुख्य किरदार नयन के नज़रिए से कहानी सुनाना शुरू करता है।

नयन (सागर शर्मा) एक आत्मकेंद्रित किस्म का व्यक्ति है वह किसी की परवाह नहीं करता उसका अधिकांश समय फोन पर व्यतीत होता है । वामिका (अनुष्का शर्मा ) नयन की प्रेमिका है । दोनों एक कैफ़े में मिलते हैं जहाँ नयन लगातार अपने फोन में व्यस्त  है और वामिका की बातों की तरफ उसका कोई ध्यान नहीं होता । यह फ़िल्म का एक महत्वपूर्ण दृश्य है जो वर्तमान पीढ़ी के रिश्तों में आए तनाव की परतें उधेड़ता है। आज हमारी संवेदनाओं पर तकनीक हावी हो गई है। गैजेट्स, फोन और सोशल मीडिया ने हमारी जिंदगी और आपसी संबंधों में एक बड़ा अंतराल पैदा कर दिया है। नयन के रूखे रवैये को देखकर वामिका कहती है –

‘तुम किसी के भी नहीं हो नयन .. तुम खुद के भी नहीं हो।’

इतना कहकर वामिका कैफ़े से चली जाती है। नयन को यह अहसास होता है कि उसने वामिका की कही यह बात पहले भी कहीं सुनी है। यहां से कहानी में जैनाब का आगमन होता है। जैनाब नयन के बचपन की मित्र थी। दोनों एक ही स्कूल में थे और अच्छे दोस्त थे। एक दिन नयन के पिता का ट्रांसफर हो जाता है और जैनाब और नयन अलग हो जाते हैं। जैनाब को इस बात से ठेस पहुंचती है कि नयन को उन दोनों के बिछड़ जाने की बात से कोई फर्क नहीं पड़ा। इस बात के लिए जैनाब उसे कहती है –

‘तुम किसी के नहीं हो सकते’।

हालांकि सातवीं कक्षा में इस तरह की बात किसी बच्चे के मुंह से सुनना थोड़ा अजीब सा लगता है । फ़िल्म का लेखक जैनाब के किरदार को लेकर बहुत स्पष्ट नहीं दिखाई पड़ता।

इधर एक तरफ नयन जैनाब को लेकर परेशान है और दूसरी तरफ उसे वामिका के मैसेज आ रहे हैं। बहुत खोजबीन के बाद नयन को मालूम पड़ता है की जैनाब वैभव शर्मा को पसंद करने लगी थी । स्कूल के दिनों में वैभव और नयन के बीच अक्सर लड़ाई झगड़े होते थे। अचानक वैभव जैनाब से बातचीत बंद कर देता है और एक दूसरी लड़की के साथ मित्रता कर लेता है। वह जैनाब को अपनी नई प्रेमिका के सामने अपमानित करता है। परिवार में रोज़ाना के झगड़े और वैभव के इस धोखे को जैनाब सहन नहीं कर पाती और आत्महत्या कर लेती है। नयन वैभव को मिलने बुलाता है और शराब की बोतल उसके सिर पर दे मारता है। तो यह थीं फ़िल्म की अलग अलग तस्वीरें जो निर्देशक ने खींची हैं।

फ़िल्म में संकेतों का बहुत अच्छा प्रयोग किया गया है। फ़िल्म में महिला किरदारों के नाम का चुनाव सोच समझकर किया गया है। वैदेही (सीता), वामिका (चंडिका, दुर्गा या शक्ति का स्वरुप ), जैनाब (सुंदर/कीमती/महकता हुआ) आदि नाम दिलचस्प हैं और कहानी से जुड़े हुए भी हैं। इसके अलावा प्रकाशक का अपनी बात खत्म करते वक़्त ‘हरिओssम’ कहना और एक संवाद बोलते हुए अरविंद का टेबल पर हाथ रखकर पैंसिल के दो किनारों को हिलाना ऐसे ही संकेत है। संकेतों और प्रतीकों के माध्यम से अपनी बात रखना आपके विचारों की मजबूती को दर्शाता है ।

‘तस्वीरें’ कहानी का प्लॉट तो मजबूत है लेकिन पटकथा थोड़ी कमजोर है। कहानी के अलग-अलग हिस्से जब आपस में जुड़ते हैं तो उनमें तारतम्य की कमी नजर आती है। कहानी में कुछ त्रुटियां हैं जो नहीं होनी चाहिए थीं जैसे कैफ़े छोड़कर वामिका जाती है। लेकिन बाद में एक जगह बताया गया है की नयन कैफ़े छोड़कर गया। पार्क में शराब वाले दृश्य पर आकर फ़िल्म स्लो हो जाती है ।इसके अलावा संवादों पर और काम किया जाना चाहिए था।

अनुष्का शर्मा (वामिका) इस फ़िल्म की उपलब्धि हैं उनका काम बेहतरीन है । कैमरे को लेकर वह सहज दिखीं। सागर शर्मा (नयन) का काम भी अच्छा है। मुख्य पात्रों में सिद्धिविनायक और गुरिंदर आज़ाद का काम औसत है। फ़िल्म का बैकग्राउंड स्कोर और DOP काफी बेहतरीन है और प्रभावित करता है। यह फ़िल्म का यू.एस. पी. है।

अंत में, क्रिटिक लिखना एक बात है लेकिन ‘तस्वीरें’ की पूरी टीम ने जो मेहनत की है वह स्क्रीन पर आपको दिखती है। कुल मिलाकर यह एक अच्छा प्रयास है खासकर फ़िल्म का कैमरा वर्क। काम जारी रहे, आप लोगों की मेहनत रंग जरूर लाएगी। इस फ़िल्म से जुड़े सभी लोगों को भविष्य के लिए खूब शुभकामनाएं ️️।

चंद्रकांता

इंसाफ करने के नाटक-नौटंकी की क्या जरूरत: अरविंद जैन

सुप्रीम कोर्ट ने अपने मुख्य न्यायधीश पर लगे आरोप को खारिज कर दिया और इसपर अपनी रिपोर्ट जारी करने से इनकार भी कर दिया है. जाहिर है कि अपने इस निर्णय के लिए वह स्त्रीवादियों के निशाने पर है. वरिष्ठ स्त्रीवादी अधिवक्ता अरविंद जैन से स्त्रीकाल ने इस निर्णय पर बातचीत की.

मुख्यन्यायधीश को यौन शोषण के आरोपों से ‘क्लीन चिट’ मिलने पर आपका क्या कहना है?”

मुखिया के साथ ‘पूर्ण इंसाफ’ करके, क्या न्यायपालिका पर मंडराता ‘खतरा’ टल  गया? कहा गया है कि इंदिरा जय सिंह बनाम सुप्रीमकोर्ट (2003) 5 एससीसी 494 निर्णय के अनुसार, ऐसे मामलों में आंतरिक प्रक्रिया के तहत गठित समिति की ‘जाँच रिपोर्ट’ सार्वजनिक करना अनिवार्य नहीं है। अगर यह सही है, तो इंसाफ करने के नाटक-नौटंकी की क्या जरूरत!  विश्वास से कह सकते हैं कि भविष्य में कोई भी स्त्री,किसी न्यायमूर्ति पर आरोप लगाने का ‘दुःसाहस’ नहीं करेगी।

इंदिरा जयसिंह ने ट्वीट कर विरोध जताया है कि निर्णय बहुत पुराना है और उसमें ऐसा कुछ नहीं है।

मैं नहीं जानता कि उन्होंने क्या लिखा है। वो सुप्रीमकोर्ट की वरिष्ठ वकील हैं। तमाम विरोध और विवादों के वो शायद पहली (महिला) अतिरिक्त महाअधिवक्ता रही हैं, सो हम सबसे बेहतर ही समझती होंगी।

समाचार है कि आज कुछ महिला संगठनों और राजनीतिक दलों ने भी विरोध प्रदर्शन किया।

विरोध-प्रदर्शन करना उनका (हमारा) मौलिक अधिकार है. आप लगाते रहें धारा 144… गिरफ्तार करके शाम तक बैठाए रखें या जेल भेज दें। देश भर में आंदोलन होते रहे हैं..होते रहेंगे। हालांकि जितना विरोध बढ़ता है, उससे अधिक दमन बढ़ जाता है। सत्ता में सब ‘चरित्रवान’ दिखने का प्रयास करते रहते हैं। 

यौन शोषण की शिकायत करने वाली  महिला ने, आंतरिक जाँच समिति के न्यायमूर्तियों से जाँच रिपोर्ट की कॉपी माँगी है। उसे कॉपी मिलनी चाहिए या नहीं?

इसका फैसला भी जाँच समिति के सदस्य ही करेंगे। हो गया इंसाफ! ‘अर्थहीन’ राय देने से क्या लाभ!

क्या पहले की तरह इस बार भी, घर की बात को घर के आँगन में ही दफ़न कर दिया जाएगा?

संभावनाओं से कहीं अधिक आशंकाएं हैं। संस्थाओं के अपने अंतर्विरोध और विसंगतियाँ इतने गहरे और महीन हैं कि कहना कठिन है- अंततः क्या और कैसा होगा। अब कहने को क्या बचा है!

आपके विचार से क्या कोई समाधान संभव है?

असाधारण स्थितियों में सामान्य दवा से इलाज कैसे हो सकता है। कानून को रक्त कैंसर या न्यायिक विवेक को मानसिक पक्षाघात हुआ हो, तो समाधान साधारण व्यक्ति की क्षमता से बाहर है। प्रतिभाहीन नेतृत्व से संकट और विकट हो सकता है।

वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद जैन स्त्रीवादी क़ानून-विश्लेषण के लिए जाने जाते हैं. संपर्क:bakeelsab@gmail.com

सत्ता में भारतीय महिलाओं की उपस्थिति: सामर्थ्य, सीमाएँ एवं संभावनाएँ

कुसुम त्रिपाठी


राजीनति एक सार्वजनिक क्षेत्र है और परम्परागत रूप से भारतीय महिलाओं को सार्वजनिक क्षेत्र में आने की मनाही रही है। फिर भी 20वीं सदी में गांधीजी के प्रभाव से महिलाएँ भारी संख्या में राजनीतिक आन्दोलनों में भाग लेने लगी थी। राजनीति में महिलाओं की भागीदारी कम होने का सबसे महत्वपूर्ण कारण ’’बंदिश’’ है। धार्मिक संहिताएँ (मनुस्मृति) सदियों से स्त्री को नियंत्रण और पाबन्दियों में रहने का आदेष देती है। बंदिशों की साजिश है पितृसत्तात्मक समाज महिलाओं को अपनी मिल्कियत समझाता है और लाख हजार कोशिशों के बावजूद वह महिला को अपनी जरूरत की सामग्री समझता रहेगा। जिस समाज में बेटियों को देर रात बाहर रहने के अंजाम से डराया जाता है, हमारे घरों में बेटियों को सहेली के घर जाने तक के लिए झूठ बोलना पड़ता है, फोन पर बात करने, घर पर आने-जाने को हर पल का हिसाब देना होता है। लड़कियों द्वारा खुल के बोली गई बातों पर घर के ही तिलमिलाए लोगों के फ्रस्ट्रेशन से जूझना पड़ता है। इन सब कारणों से हमारी शक्तियाँ, हमारी स्वभावगत संवेदनशीलता की वजह से इन छोटी-छोटी व्यर्थ की लड़ाइयों में इतनी खर्च हो जाती है कि हमारे उड़ानों की ऊँचाई, उनकी परिधि निःसंदेह घटती जाती है। लम्बी, ऊँची उड़ान भरने की हमारी महत्वकांक्षा को हमारे चरित्र को यूं गूंथ दिया जाता है कि अपनी महत्वकांक्षाओं को हम खुद किसी संगीन गुनाह की तरह देखने लगते हैं। समाज में महिलाओं को दोयम दर्जे का समझा जाता है, इसलिए महिला अधिकारों को मानवाधिकारों से काटकर देखा जाता हैं, महिलाओं को लोकतांत्रिक स्थान और मानवाधिकारों की गारंटी देने में विफल रहता है। महिलाओं की समस्याओं के बारे में चिन्ताओं को अक्सर पीछे धकेल दिया जाता है क्योंकि प्रतिनिधि संस्थाओं में अल्पमत में होने के कारण महिलाएँ निर्णय प्रक्रिया में कोई प्रभावी भूमिका नहीं निभा पाती इसलिए उनके हस्तक्षेप को प्रभावी बनाने के लिए उनका राजनीतिक सबलीकरण बेहद जरूरी है।


1947 अगस्त आजादी के बाद डॉ. बाबा साहब अम्बेडकर ने संविधान में स्त्रियों को पुरूषों के समान राजनीतिक अधिकार प्रदान किए और साथ ही जाति, धर्म, वर्ग, जन्मस्थान और शैक्षणिक या संपत्ति के आधार पर भेद भाव बिना भारत के सभी नागरिकों को मताधिकार प्रदान किया। इस प्रकार डॉ. अम्बेडकर भारतीय संविधान में महिलाओं को भी नागरिकों का मताधिकार प्रदान किया। इस प्रकार भारतीय सवंधिन में महिलाओं की स्वतंत्र तथा सक्रिय और समान राजनीतिक हिस्सेदारी को स्वीकार किया गया और राष्ट्र निर्माण में उनकी भूमिका के लिए उनके राजनीतिक सबलीकरण की जरूरत को रेखांकित किया।


स्वतंत्र भारत की पहली लोकसभा में चुनाव के लिए 43 महिला प्रत्याशी खड़ी हुई जिसमें कुल 14 चुनाव जीती। जवाहरलाल नेहरू का ध्यान इस ओर गया और उन्होंने कहा- “मुझे अफसोस है कि इतनी कम महिलाएँ चुनाव जीती है। इसकी जिम्मेदारी हम सब पर है………हमारे कानून, हमारे समाज में सब जगह पुरूषों का वर्चस्व है और हम सबका इसको लेकर एकतरफा रवैया है……….लेकिन अंत में महिलाएँ ही भारत में भविष्य की निर्मात्री होंगी। (राय, शीरिन 1997, जेण्डर एण्ड रिप्रजेटेंशन : विमेन एमपीज इन इंडिया इन ऐनी-मारी मोटे (एडि.) गेटिंग इन्स्टीटूशन राइट फॉर विमेन, लंदन जेड बुक 1997)।” दूसरी ओर राजनीति में महिलाओं की भागीदारी के लिए कोई उपाय नहीं सोचे गए। राजनीतिक पार्टियाँ स्वाधीनता के सुख बोध और विभाजन से जुड़ी भयावह हिंसा की भावनाओं में ही डूबी रही और उनका पूरा ध्यान वही लगा रहा। महिला समूहों के लिए विभाजन के समय महिलाओं पर हिंसा, (बलात्कार, अपहरण, कत्ल) का मुद्दा सर्वोपरि हो गया। उस समय सामाजिक समस्याएँ ज्यादा महत्वपूर्ण हो गई और राजनीतिक भागीदारी का मुद्दा पीछे छूट गया। आश्चर्य कि स्वतंत्रता आन्दोलन में महिलाओं की जबरजस्त भागीदारी देखी गई थी, किन्तु स्वतंत्रता के बाद कई महिला नेत्रियाँ ने राजनीति से सन्यास ले लिया तो कई कल्याणकारी योजनाओं के अर्न्तगत समाज सेवा जैसा कार्यों में जुट गईं। डॉ. उषा मेहता (मुम्बई) जिन्होंने 1942 में मुम्बई में भारत छोड़ो आन्दोलन के दौरान समानान्तर रेडियो स्टेशन चलाया था, जिसके कारण उन्हें ब्रिटिश सरकार ने आजीवन कारावास की सजा दी थी, आजादी के बाद जेल से छूटने के बाद अपनी पढ़ाई पूरी करने में लग गईं।
उनसे मैंने जनसत्ता में साक्षात्कार के दौरान पूछा था कि आप कभी चुनाव क्यों नहीं लड़ीं। उन्होंने जवाब दिया था-“जहाँ चुनाव में खड़े रहने के लिए पैसा भरना पड़ता हो और वे पैसे हम टाटा बिरड़ा जैसे उद्योगपतियों से लेकर भरेगें तो जरूर जिन उद्योगपतियों ने हम पर पैसे खर्च किये, बदले में वे चाहेगें कि हम उनका विकास करें न कि जनता का। सत्ता में महिलाओं की भागीदारी का प्रश्न सीधे-तौर पर नीति-निर्णायक निकायों में महिलाओं की भूमिका से जुड़ा है। इससे महिलाओं की चिन्ताजनक स्थिति नीतियों को तय करने में उनकी भागीदारी की अनुपस्थिति का संकेत देती है। यह सत्ता में महिलाओं की भागीदारी से जुड़ा पहलू है।”

संयुक्त राष्ट्र की आर्थिक, सामाजिक और मानवीय गतिविधियों में भारत की भागीदारी सक्रिय और जीवंत है। भारत में महिलाओं की मुक्ति के क्षेत्र में अग्रणी बेगम हामिद अली संयुक्त राष्ट्र आयोग में महिलाओं की स्थिति पर अपने देश का प्रतिनिधित्व करती हैं। फोटो तिथि: 12 फरवरी, 1947 फोटो साभार: यूएन फोटो


अन्तरराष्ट्रीय मंचो पर महिला प्रश्न पर चली आ रही बहस और आन्दोलन का अपना एक लम्बा इतिहास रहा है। पूरे विश्व में विधायिकाओं में सिर्फ 10.5 प्रतिशत महिलाएँ हैं और मंत्री पद पर सिर्फ 6 प्रतिशत महिलाएँ है। हमारे देश की स्थिति हमारे पड़ोसी देशों से भी बदतर है। हमारे देश में भी महिलाओं के राजनीतिक सशक्तिकरण का प्रश्न अचानक ही उत्पन्न नहीं हुआ। 1947 में महिलाओं की स्थिति के संबंध में तैयार हुई रिपोर्ट में एक पूरा अध्याय ही महिलाओं की राजनीतिक स्थिति के बारे में था और इसमें विशेष रूप से इस बात का उल्लेख किया गया था कि महिलाओं की खराब स्थिति के लिए उनकी आर्थिक और सामाजिक स्थिति के साथ ही उनकी राजनीतिक स्थिति भी जिम्मेदार है और इससे उबरने के लिए विधायक निकायों में आरक्षण के बारे में कहा गया था. रिपोर्ट में इस बात की ओर ध्यान दिलाया गया था कि- “संविधान में महिलाओं को जिस बराबरी और सशक्तता की बात की गई है वह केवल एक भ्रमजाल है। 70’ के दशक में अनेक महिला समूह कोटा सिस्टम की बात उठाते रहे हैं। समिति ने ग्राम पंचायतों में कानून बनाने का सुझाव रखा ताकि ग्राम विकास कार्यक्रमों में महिलाएँ उपेक्षित न रहें।” राजनीतिक पार्टियों को भी कहा गया कि वे चुनाव प्रक्रिया का कुछ ऐसा तरीका निकालें कि सभी राजनीतिक इकाईयों में महिलाओं का उचित प्रतिनिधित्व हो सके। समिति की रिपोर्ट में महिलाओं के प्रतिनिधित्व को परिवर्तन का मुख्य जरिया माना।


1947 की स्टेट्स रिपोर्ट, 1988 की राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य योजना की संस्तुतियों के कारण ग्राम पंचायतों और नगर निगमों में 33 प्रतिशत आरक्षण मिला। 1980’ के दशक में राजनीति में कांग्रेस पार्टी का वर्चस्व कम होने के कारण भारतीय राजनीति में कई स्थानीय पार्टियाँ उभरी, जिन्हें नये निर्वाचन क्षेत्रों तक पहुँचने की जरूरत थी और इसी जरूरत के तहत कई राजनीतिक पार्टियों ने महिला संगठनों के पंचायती राज और नगर निगमों में 33 प्रतिशत आरक्षण के सुझाव का समर्थन किया। 1993 के संविधान के 73वें और 74 वें संशोधन विधेयक के पारित होने से महिलाओं को ग्राम पंचायतों और नगर निगमों में 33 प्रतिशत आरक्षण का कानूनी अधिकार मिल गया। इस संशोधन से तमाम महिलाएँ पंचायतों और जिला परिषदों में आई। उनकी सकारात्मक प्रतिक्रिया के कारण 1996 में केन्द्रीय चुनाव के पहले महिला संगठनां ने संसद और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण की मांग सभी राजनीतिक पार्टियों के सामने रखी। सभी राजनीतिक पार्टियों ने अपनी चुनावी घोषणापत्रों में संसद और विधानसभाओं में एक तिहाई मांग का समर्थन किया लेकिन जैसा कि अधिकतर महिला संबंधी नीतियों के साथ होता है राजनीतिक भागीदारी की बात केवल कागज तक ही सीमित रही। 1996 के चुनावों में महिलाओं को 15 प्रतिशत से भी कम वोट मिले। पिछले 50 सालों में किसी भी संसद में महिलाओं का प्रतिशत 7 से ज्यादा नहीं बढ़ा।
राष्ट्रीय स्तर पर सत्तारूढ़ संयुक्त सरकार ने महिला आरक्षण विधेयक को अपने ’’सामान्य न्यूनतम कार्यक्रम’’ में शामिल किया। 12 सितम्बर 1996 को तत्कालिन प्रधानमंत्री देवगौड़ा ने लोकसभा के प्रथम सत्र में युनाइटेड फ्रन्ट सरकार ने 81वॉ संविधान संशोधन बिल पेश किया किन्तु यह पारित नहीं हुआ। इस समिति में संसद के दोनों सदनों के सदस्य थे। 13 जुलाई 1998 में यह बिल दूबारा पेष किया गया था। काफी हंगामें, शोर-शराबे और कड़े विरोध के कारण बिल फिर भी पारित नहीं हो पाया। पुरूष वर्चस्व वाली संसद बिल को पारित करने की शायद हिम्मत ही नहीं जुटा पाई। महिला आन्दोलन की बढ़ती मजबूती के कारण जेण्डर प्रतिनिधित्व के मुद्दे का काफी राजनीतिकरण हुआ है मगर मुख्यधारा राजनीतिक दलों ने जेण्डर-न्याय के मुद्दे को अभी तक मन से नहीं अपनाया। क्या संसद में महिलाओं का अधिक प्रतिनिधित्व बढ़ने से राजनीतिक क्षेत्र में पुरूष वर्चस्व को ज्यादा चुनौतिपूर्ण स्थिति का सामना करना पड़ेगी ? 81वें संशोधन बिल पर पक्ष व विपक्षी दोनों दलों के बीच काफी बहस चली।



1947 में संयुक्त राष्ट्र की महिलाओं की स्थिति पर रिपोर्ट, न्यूयोर्क.


आरक्षण के विरोधी पक्ष संसद और विधानसभाओं में महिला आरक्षण के पूरे तर्क को पिछड़ा कदम मानते है. उनके अनुसार यह बराबरी के सिद्धांत का उल्लघंन करता है। वे आरक्षण के नीति के पूरी तरह खिलाफ है। उनके अनुसार- “इससे भारत टुकड़ों में बंटेगा। इन संविधानिक संषोधनों को इतिहास में भारतीय समाज को विभाजित करने की प्रक्रिया की तरह देखा जाएगा।’’ (हिन्दुस्तान टाइम्स, 30 नवम्बर, 1994 बुच) कुछ ऐसे लोग भी हैं जो पहले इस बिल का समर्थन कर रहे थे बाद में अल्पसंख्यकों के हितों की दुहाई देकर इस बिल के एकदम विरोधी हो गये। इस तरह जुलाई 1998 में समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय जनता दल यह कहकर कि महिला आरक्षण बिल में देष की मौजूदा जाति भेद को ध्यान में नहीं रखा गया है। उन्होंने कहा-’’जेण्डर न्याय को और दूसरे सामाजिक न्याय से अलग करके देखना एक शहरी मध्यवर्गीय संकल्पना है और यह देष की सभी महिलाओं के लिए उपयोगी नहीं हो सकती है।” (दि स्टेसमैन 13 जुलाई, 1998 संपादकीय)। इन पार्टियों का कहना है कि अन्य पिछड़ी जाति और अलप्संख्यक समूहों के लिए भी इसी में अलग से कोटा तय किया जाए। अंत में सवाल यह भी उठता है कि हमारी प्राथमिकताएँ क्या है? क्या भारतीय राजनीतिक तंत्र जिसमें अन्य चुनौतियाँ हैं, क्या इस एक चुनौती का सामना कर पाएगा? समता पार्टी के प्रभुनाथ सिंह ने बिल पर बहस के समय कहा- “आज देश के सामने कई और गंभीर समस्याएँ है…………..यह महिला आरक्षण बिल पेश करने का उपयुक्त समय नहीं है।” (स्टैटमेन, 15 जुलाई, 1998 पृ.।). बिल का विरोध करने वालों ने नारीवादियों और महिला समूहों को “बालकटी मेम साहब” और “बीबी ब्रिगेड” जैसे अपमानित करने वाले शब्दों का प्रयोग किया। महिला मुद्दे को “देश का विभाजन करने वाला” बताया।


महिला आरक्षण के पक्ष के लोगों का कहना है पुरूष-वर्चस्व वाले राजनीतिक तंत्र में महिलाओं को कोई जगह नहीं मिलती है। सीटों का आरक्षण होगा तो महिलाओं को स्थानीय स्तर पर राजनीतिक जगह मिलेगी तथा महिलाओं की सामाजिक एकजुटता बढ़ेगी। महिलाओें का तर्क है कि उन्हें बराबरी का हक चाहिए, कोई दया या भीख नहीं। वे आरक्षण को सामाजिक न्याय का हिस्सा मानती हैं। महिलाएँ दावे के साथ कहती हैं कि “विकास नीतियों के पीछे कई निजी स्वार्थ हित हैं जिसके अन्तर्गत काफी मोलभाव होता है। ये नीतियों अधिकतर प्रशासनिक अधिकारियों या फिर किसी ताकतवर छोटे समूह द्वारा बंद दरवाजों के पीछे तय की जाती है जहाँ किसी प्रकार की पारदर्शिता का प्रश्न ही नहीं उठता।’’ (स्टॉट 1991, पृ.65)। सवाल यह है कि जहाँ सब नीतियों को बनाने में पुरूषों का वर्चस्व है, महिलाएँ वहाँ कैसे पहुँचे? महिला संगठनों/समूहों का मानना है कि कोटा व्यवस्था से महिलाएँ उन सभी सामाजिक बाधाओं को पार कर सकेंगी, जिनके कारण वे अभी तक राजनीति से दूर रखी गई हैं और उनकी आवाज को अनसुना किया गया है।


भारत में कई राजनीतिक पार्टियों का महिला संगठनों से काफी घनिष्ठ संबंध रहा है। पार्टी राजनीति से जुड़ाव की एक नई समस्या हाल में और जुड़ गई। दक्षिण पंथीय पार्टियाँ भारतीय संस्कृति और परम्पराओं के पुर्नस्थापना की दुहाई देकर महिलाओं को नए सिरे से लामबंद कर रहे हैं जिसमें वे औरतों का, परम्पराओं के रक्षक के रूप में आव्हान कर रही है।
महिला समूहों का मानान है कि यदि राजनीतिक संस्थाओं में नाममात्र मौजूदगी के बजाय 33 प्रतिशत महिलाएँ होगी तो पार्टियाँ उनको अनदेखा नहीं कर पाएंगे। इस कारण महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण मिलना चाहिए। उनका तर्क है कि महिलाओं को राजनीति में आने की मौजूदा व्यक्तिगत जिम्मेदारी के बजाय यह जिम्मेदारी राजनीतिक पार्टियों की होनी चाहिए कि वे महिलाओं को टिकट देकर राजनीति में आने का मौका दें। महिलाओं को राजनीति से बाहर रखने का पूरा सामाजिक इतिहास है। वे भी दबे-कूचले समूह का हिस्सा हैं इस बात को मानकर इसकी क्षति-पूर्ति कानूनन आरक्षण देकर की जानी चाहिए।
भारत में महिला आन्दोलन इस वक्त संसद और राज्य विधान सभाओं में महिला के सवालों पर सकारात्मक कार्यवाही को लेकर बंटा हुआ है। यह मूलतः दो बातों पर केन्द्रित है-महिला आरक्षण का कोटा बढ़ाने को लेकर और उसमें पिछली जातियों की महिलाओं को लेकर और दूसरों अभिजात्यवाद के मुद्दों पर।

अपने व्यक्तिगत पहचान पत्रों के साथ, ब्यूनस आयर्स की महिलाएं 1947 में राष्ट्रपति चुनाव के लिए चुनावों में जाती हुई दिखाई दे रही हैं।


पंचायतों में 33 प्रतिशत आरक्षण के कारण महिलाएँ सरपंच तो बनी पर वे सरपंच स्त्रियाँ प्रोक्सी (नाम मात्र) नेता है। ग्राम पंचायतों में देखा गया कि यदि महिला सीट है तो प्रधान महिला जनरल मीटिग्स में नहीं जाती या नहीं जाने दिया जाता। उसका पति या ससुर ही प्रधान कहा जाता है। प्रधान-पति पैदा हो गए हैं. उत्साही महिला अभ्युदय (यू.एस.ए.) द्वारा किये गए सर्वे जो 19 महिला उम्मीदवारों पर किया गया था, उसमें से सिर्फ दो उम्मीदवारों ने स्वीकार किया कि वे अपनी मर्जी से आई है, अन्य सभी अपनी पार्टियों या परिवार की इच्छा से आई थी। इनके सर्वेक्षण से यह भी पता चला कि आरक्षण से प्रभुत्वशाली जातियों की ताकत में भी बढ़ोत्तरी हुई है। क्योंकि इस प्रक्रिया में भूस्वामियों को अपनी सत्ता को विस्तार देने का मौका मिला है। इस सर्वे में यह भी साफ किया गया कि महिलाओं पर दोहरी जिम्मेदारी है- “घरेलू कामों की और राजनीतिक दायित्वों की भी। महिला पंचायती राज सदस्यों के परिवारों में घरेलू कामों का कोई नया बंटवारा नहीं हुआ है जिससे राजीनीतिक दायित्वों पर भी बुरा असर पड़ा है”।
राजनीतिक जिम्मेदारियाँ निभाने में महिलाओं के सामने एक और भी दिक्कत आती है, वे राजनीतिक कार्यों में प्रशिक्षित नहीं होती, जहाँ प्रशिक्षण दिया जाता है वहाँ उनके पति या ससुर चले जाते हैं। कई गांवों में “सर्व महिला” पंचायतें भी बनी हैं क्योंकि कोई भी पुरूष महिला सरपंच के अर्न्तगत काम नहीं करना चाहता। पिढ़गारा (मध्यप्रदेश), ब्रहम नगर व श्रीरामपुर (महाराष्ट्र) पंचायतें इसका उदाहरण हैं। दलित, वंचित समाज की महिलाएँ आर्थिक और राजनीतिक दोनों दृष्टि से कमजोर है। उन्हें समाज में ऊँची जातियों से तथा दलित पितृसत्तात्मक संरचना से भी जुझना पड़ता है।
यह भी देखा गया कि जहाँ कहीं भी महिला प्रधान थोड़ी भी दबंग थी उस क्षेत्र का विकास अनुपात से कहीं अधिक हुआ है। औरतों ने स्कूल खोले, पम्पीसेट लगाएँ, कहीं कुएँ खोदे, टूबेल बनवाए, शौचालय बनवाए तो पुरूष सरपंचों ने दारू की भट्टी खोली।
हाल ही में यूनाइटेड नेशन यूनिवर्सिटी के वर्ल्ड इंस्टीच्यूट फॉर डेवलमेंट ईकोनॉमिक्स रिसर्च की एक रिपोर्ट सामने आई। उन्होंने इस शोध में 1992 से 2012 के बीच 4,265 राज्य विधानसभा क्षेत्रों को शामिल किया। 2018 में किये इस शोध में यह बात खुलकर आई कि भारत में महिला विधायकों के निर्वाचन क्षेत्र में पुरूष विधायकों के निर्वाचन क्षेत्रों की तुलना में ज्यादा विकास हुआ है। यह शोध महिला विधायकों को चुनने के आर्थिक प्रभाव का विश्लेषण करने के लिए किया गया था ताकि अधिक विकास पर एक नेता के लिंग के कारण पड़ने वाले प्रभावों की जांच की जा सकें। उन्होंने पाया कि महिलाओं और पुरूषों के निर्वाचन क्षेत्रों के बीच विकास में एक चौथाई का अंतर है। नासा द्वारा ली गई तस्वीरों से पता चला कि महिला विधान क्षेत्रों में बिजली का प्रसार पुरूष विधान क्षेत्रों से ज्यादा हुआ है। सड़क निर्माण भी काफी हुआ है। नासा की तस्वीरों में यह भी सामने आया कि महिला निर्वाचन क्षेत्रों में पुरूष निर्वाचन क्षेत्रों की अपेक्षा अधूरी सड़क परियोजनाओं की संख्या 22 प्रतिशत कम है। (स्त्रीकाल 26 मार्च,2019 गायत्री आर्य).


अस्सी के उत्तरार्थ में राजनीति का अपराधीकरण होने लगा। आज तक सफेदफोश नेताओं की जो डॉन लोग, भाई लोग, माफिया लोग, मटका किंग तथा कई अफराधी प्रवृत्तियों में फंसे लोग पैसा देकर नेताओं को जिताते थे, उन्हें लगा क्यों न हम खुद राजनीति में उतरें, परिणामस्वरूप भारी संख्या में अपराधी प्रवृत्ति के लोग विधानसभाओं और संसदों में चुनकर आने लगें। ताकत और पैसों के बल पर चुनाव लड़ा जाने लगा। श्रीमती मृणाल गोरे जिन्हें महाराष्ट्र में पानी वाली बाई, बेलन वाली बाई के नाम से पुकारा जाता था जो आपातकाल के दौरान जेल में बन्द थी, आपातकाल के बाद जनता दल के टिकट पर लड़ी थी। भारी बहुमत से जीती थी, उन्होंने खुद चुनावी राजनीति में भाग लेना छोड़ दिया। मैंने जनसत्ता मुम्बई के लिए उनका इन्टरव्यू लिया था और ये सवाल पूछा था कि जिस मृणाल ताई को मुम्बई का बच्चा-बच्चा जानता है वे चुनावी राजनीति से क्यों सन्यास ले रही हैं। उनका जवाब था-“राजनीति में अब केवल गुण्डे रह गए है। हमारे नेता दलाली करते है। भ्रष्ट हैं और मैं इस भ्रष्ट और अपराधिक प्रवृत्ति के नेताओं के साथ काम नहीं कर सकती। अरे, मैं क्या कोई भी महिला इनके साथ चुनावी राजनीति में नहीं उतर सकती। इससे अच्छा है समाज-सेवा करना।” इस तरह राजनीति अनीति की शरणस्थली बन गयी। जहाँ अपराध और कपट को संरक्षण और प्रश्रय मिलने लगा। राजनीति का अपराधीकरण लगभग विश्व के अन्य देशों में भी हुआ। इन्टर पार्लियामेंटरी यूनियन की भारत की को-आर्डिनेटर नीलू मिश्रा ने बताया कि 178 देश इसके सदस्य है। अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर महिला सांसदों पर सर्वेक्षण किया गया तब पता चला दुनियाँ भर की महिला सांसदां के साथ पुरूषसत्तात्मक सामाजिक व्यवस्था अभद्र व्यवहार करता है। नीलू जी ने बताया 81.1 प्रतिशत महिलाओं के साथ अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर संसदीय संघ में हिंसा की जाती है। 44.4 प्रतिशत महिलाओं को मनोवैज्ञानिक समस्या झेलनी पड़ती है। 70 प्रतिशत औरतों को धमकी दी जाती है। महिला सांसदों ने बताया कि 21 प्रतिशत अफवाहें उनके साथ उड़ाई जाती हैं। 32.7 प्रतिशत महिला सांसदों ने बताया कि उनके अभद्र अश्लील कार्टून और तस्वीरें बनाई जाती है जो हमारे यौन से संबंधित होते हैं। आर्थिक उत्पीड़न 32.7 प्रतिशत महिला सांसदों का किया जाता है। अधिकतर महिलाएँ संसद के समक्ष बोल नहीं पाती। इस तरह इस सर्वेक्षण से साफ जाहिर है कि सांसद महिलाओं को भद्दी भाषा, अपशब्द, गालियों, अपहरण, बलात्कार, गन्दे कार्टून, जान से मार डालने तक की धमकी दी जाती है।
इस सबके बावजूद जो महिलाएँ पार्टी के अंदरूची ढाँचे में उपस्थिति दर्ज करवाने में कामयाब हो रही है उन्हें भी नेतृत्व के दूसरे दर्जे पर धकेल दिया जाता हैं, वे राजनीतिक दलों में नीति और रणनीति के स्तर पर बमुश्किल ही कोई महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। अक्सर उन्हें “महिला मुद्दों पर निगाह रखने का काम दे दिया जाता है जिससे कि चुनावों में पार्टी को फायदा मिल सकें।
साथ ही साथ राजनीति में महिलाओं की सक्रिय भागीदारी न होने की वजह इस क्षेत्र में बढ़ता प्रदूषण भी है। यदि कोई दबंग लड़की या महिला यहाँ आना भी चाहती है तो परिवार वाले असुरक्षा और पीठ पीछे होती आलोचना और भद्दी बातों को देखते हुए जाने की अनुमति नहीं देते। किसी तरह महिलाएँ राजनीति में आ भी जाय तो अपराधी प्रवृत्ति के राजनीति के खुर्राट भेड़िये साबुत खा जाने को तैयार बैठे रहते हैं। पुरूष वर्चस्व समाज में स्त्रियों को चरित्रहीन साबित करने की होड़ लग जाती है ताकि उन लांछनों से शर्मसार होकर अपने बढ़ते हुए कदम वापस खीचं लें। हॉलांकि कई महिलाओं ने पुरूषों द्वारा खींची गयी लक्ष्मण रेखा को पार कर समाज में अपनी उपस्थिति मजबूती से दर्ज करवाई है, पर इनकी गिनती कम है।


आज सभी पार्टियों के नेता भ्रष्ट हैं। सभी साम्राज्यवादी देशों से जब डील करते है तो तगड़ा दलाली लेते हैं, इतना ही नहीं देश के भीतर भी व्यापारियों से किसी भी योजना को पास कराने के लिए दलाली लेते हैं। दलाल नेताओं के बीच देखा गया कि महिलाएँ भ्रष्ट नहीं होती (कुछ अपवाद हो सकते हैं)। दलाल सरकार, सांठ-गांठ, जोड़-तोड़, मंत्री पद के लिए खरीद-फरोख्त। उसके लिए गुण्डों का सहारा कभी-कभी माफिया तक का सहारा लिया जाता है। दारू-पीना -पिलाना। इन सबके बीच महिला नेता अपने-आप को असुरक्षित महसूस करती हैं। महिला विधायक पुरूष विधायकों से कम भ्रष्ट व अधिक कुशल होती हैं। हाल ही में जनरल ऑफ इकोनॉमिक विहेवियर एण्ड ऑर्गेनाइजेशन में प्रकाशित एक शोध में यह सामने आया कि सरकार में ज्यादा महिलाओं का होना भ्रष्टाचार को सीमित करता है। 125 देशों में हुए इस शोध से पता चलता है कि जिन देशों की संसद में महिलाओं की संख्या ज्यादा है, वहाँ भ्रष्टाचार काफी कम पाया गया है। इस बात की पुष्टि भारत में होने वाले बड़े-बडे़ घोटालों में लिप्त महिलाओं की न्यूनतम संख्या देखकर भी होती है। भ्रष्टाचार में कम लिप्त होना भी महिलाओं को अपने क्षेत्र के लोगों के प्रति ज्यादा जिम्मेदार साबित करता है। इस कारण उनका पूरा ध्यान अपने निजी आर्थिक हित साधने के बजाय अपने क्षेत्र के लोगों के विकास में अधिक लगता है।


आज भी राजनीतिक पार्टियाँ आधी आबादी को “चुनाव जिताऊ फैक्टर नहीं मानती।” आज भी हमारे देश की औरतों को यह कहते हुए सुना गया है कि पति जहाँ कहते है, हम वहीं वोट डाल देते है। स्त्रियों में राजनीतिक चेतना का अभाव देखा जा रहा है। राजनीति हमारे जीवन को प्रभावित करती है। यह मुख्य वजह है कि हम समाज में निर्णायक भूमिका में नहीं उतर पा रहे है। “अम्माजी”, “बहनजी” या “दीदीजी” ये सब सत्ता में आती है तब महिलाओं को उनके प्रश्नों को भूल जाती है। आज भी हमारे देश की मात्र 65.46 प्रतिशत महिलाएँ साक्षर हैं। स्वतंत्रता के इतने वर्ष बाद भी सरकारी कागज-पत्रों में अँगूठे की निशानी लगाने का प्रावधान रहता है। यह देश के लिए शर्म का विषय है।


महिलाओं की राजनीतिक प्रक्रिया में भागीदारी इस भारतीय पितृसत्तात्मक सामंतवादी सोच के रहते मुश्किल ही है। जब डॉ. बाबा साहब अम्बेडकर के “हिन्दू कोड बिल” को इस देश के पितृसत्तात्मक सामाजिक मूल्यों ने पास होने नहीं दिया जिसमें उत्तराधिकार की बात कही गई थी, जो भारतीय सामंती पुरूष अपनी पुत्रियों को घर की संपत्ति में उत्तराधिकार नहीं दे सकता भला हम उस समाज के पुरूषों से ये आशा ही कैसे कर सकते है कि वे सत्ता में महिलाओं को आने देगें।


इसलिए मुझे तो लगता है महिलाओं को खुद अपने लिए रास्ते बनाने होगें। जिस तरह सावित्रीबाई फूले ने जब लड़कियों के लिए स्कूल खोला तो रास्ते में ऊँच्य जाति/वर्ग के पुरूष उन पर गोबर फेंकते, उनको गालियाँ देते, अभद्र व्यवहार करते, जब सावित्रीबाई ने ये बात ज्योतिबा फुले से कही तो उन्होंने कहा, एक और साड़ी रख लिया करें। ताकि गन्दी साड़ी को बदला जा सके। सावित्री बाई ने वैसा ही किया पर एक दिन उन्होंने बड़े साहस के साथ उन पुरूषों का सामना किया, वे रूकी और एक आदमी को जोर का तमाचा जड़ दिया। वे नहीं जानती थी इसका परिणाम क्या होगा? पर परिणाम अच्छा निकला, दुसरे दिन से सारे पुरूषों ने उस रास्ते पर पर बैठना बन्द कर दिया और सावित्रीबाई की “स्त्री-षिक्षा” अभियान आगे बढ़ा। इसलिए आज हम सभी स्त्रियाँ पढ़ी-लिखी बन पाई, यहाँ तक पहुँच पाई वरन् मनु स्मृति ने साढ़े तीन हजार के इतिहास में स्त्रियों/दलितों की शिक्षा पर पाबन्दी लगा रखी थी। यदि सावित्रीबाई ने डरकर स्त्री-शिक्षा से पांव पीछे ले लिया होता तो आज भी हम साढ़े-तीन हजार पहले के भारत में जी रही होती। इसलिए राजनीति में सत्ता में आने के लिए भी हमें सावित्रीबाई के तरीकों को अपनाना पड़ेगा। एकजूटता दिखानी पड़ेगी।


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  9. कमिटी ऑन दी स्टेट्स ऑफ वीमेन इन इंडिया, 1974, टूवार्ड इक्वालिटी, रिपोर्ट ऑफ द सी.एस.डब्ल्यू. आई. न्यू दिल्ली सोशल वेलफेयर
  10. सेन्टर फॉर वीमेन्स डेवलोपमेंट स्टडीज (सी.एस.डब्ल्यू.एस.), 1988, प्रसपेक्टिव फार्म द वीमेन्स मुवमेन्ट, न्यू दिल्ली, सी.डल्ब्यू.डी.एस.
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  12. www.streekaal.com/2019/03/- गायत्री आर्य, 26 मार्च, 2019
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  14. http/www.bbc.com/hindi/india प्रवीन राय 31 मई, 2014
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  17. दि स्टेटमैन, 15 जुलाई, 1998 पृ. 1
  18. स्टॉट, 1991 पृ. 65

लेखिका कुसुम त्रिपाठी ( A/301,क्वीन्स, हीरानन्दानी इस्टेट, जी.बी.रोड,थाना-400607) लम्बे समय से स्त्रीवादी आन्दोलनों की मुखर आवाज रही हैं और मुंबई में पढ़ाती हैं.