Home Blog Page 25

उस संस्थान में ब्राह्मणों की अहमियत थी

इस नयी सीरीज में सवर्ण स्त्रियाँ लिखें, जिसमें जाति आधारित अपने अथवा अपने आस-पास के व्यवहारों की स्वीकारोक्ति हो और यह भी कि यह कब से और कितना असंगत प्रतीत होने लगा. आज आप क्या सोचती और व्यवहार करती हैं . पहली क़िस्त में पुणे से स्वरांगी साने लिख रही हैं. पुणे जहाँ जातिवाद सबसे क्रूर रूप में रहा है. पेशवाओं के जमाने से अबतक. हाल की एक घटना रही थी जिसमें एक डॉक्टर ने अपनी खाने बनाने वाली सहायिका पर मुकदमा इसलिए कर दिया था कि उसने नौकरी पाने के लिए खुद को ब्राहमण बताया था जिससे डॉक्टर का परिवेश अछूत हो गया था. वहां से ही ब्राह्मण लोकेशन की स्वरांगी बता रही हैं कि उनके परिवेश में स्पष्ट ब्राह्मणवाद तो नहीं है लेकिन उसका सूक्ष्म लेयर मौजूद है:

मुम्बई की डॉक्टर पायल तडावी की आत्महत्या के संदर्भ में हम एक सीरीज के तहत यह तथ्य स्त्रीकाल में सामने ला रहे हैं कि खुद जाति का बर्डन ढोती, अपने लिए ब्राह्मणवादी पितृसत्ता की व्यवस्था में उपेक्षित ऊंची जाति की महिलाएं अन्य जाति और धार्मिक पहचान वालों के साथ क्रूर और अमानवीय व्यवहार करती हैं. हम इस सीरीज में ऐसे अनुभवों को प्रकाशित कर रहे हैं. नाइश हसन और नीतिशा खलखो का अनुभव हम प्रकाशित कर चुके हैं. ये अनुभव सामने आकर एक खुले सत्य ‘ओपन ट्रुथ’ को एक आधार दे रहे हैं-दलित, ओबीसी, आदिवासी, पसमांदा स्त्री के रूप में ऐसे अनुभव के सीरीज जारी रहेंगे.


मैं दलित नहीं हूँ, इसलिए मेरे पास वह अनुभव न हो कि दलित होने की पीड़ा क्या होती है,मैं ब्राह्मण हूँ, लेकिन सच मानिए मेरे पास कभी वैसा अनुभव भी नहीं था कि ब्राह्मण होना क्या होता है?

मेरी परवरिश जिस वातावरण में हुई वहाँ ‘जात न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान’ को महत्व दिया जाता था…या हो सकता है मुझे ऐसा लगता रहा हो या मेरे सामने वैसा चित्र उभरकर आया था। जब समझ में आया कि मैं ब्राह्मण हूँ तब फ्लैशबैक में बचपन की, किशोरावस्था की और कॉलेज के दिनों की भी सारी छवियाँ उभरीं कि कब-कब मुझे लगा था कि मैं ब्राह्मण हूँ या नहीं हूँ। स्कूल से घर पैदल चलकर आते थे, घर दूर था और बीच में जिस सहेली का घर लगता था उसके यहाँ मटके का ठंडा पानी पीते थे, उसके घर में पंखे के नीचे बैठते थे और फिर आगे बढ़ते थे। मेरे साथ बर्वे उपनाम की दूसरी लड़की थी और जिसके घर रुकते थे वह खरे थी..बर्वे नारमदेव (नर्मदा किनारे रहने वाले) ब्राह्मण थी और खरे दलित थी। खरे ने खुद बताया था बड़े नाज़ से, क्योंकि उसकी वह काली हिरण जैसी चमकीली आँखें मुझे आज भी याद हैं, जब उसने कहा था कि वह ‘हरिजन’ है और यह श्रेणी महात्मा गाँधी ने उन्हें दी है। मैंने घर पर आकर बताया भी था कि वह हरिजन है लेकिन उसके हरिजन होने से न हमारी मित्रता में कोई फर्क आया न उसके घर जाने पर किसी तरह की रोक-टोक हुई। बर्वे और मैं उसके घर जाते रहे, पानी पीते रहे और स्कूल में भी साथ में पढ़ते-खाते-खेलते-गपियाते रहे।

कुछ बड़ी कक्षाओं में जब स्कूल के फॉर्म हम खुद भरने लगे तो जाति का सर्टिफिकेट लगाने की बात आई और मुझे वह सर्टिफिकेट नहीं लगाना था, तब पता चला कि अच्छा यह कुछ ‘खास जातियों’के लिए ही लगता है, लेकिन तब भी मन में किसी तरह का और कोई भाव नहीं था, वह एक दिन होता था जब फॉर्म भरे जाते और अपनी-अपनी जातियाँ लिखी जाती थीं, तमाम दूसरी औपचारिकताओं की तरह। लेकिन तब ये जरूर लगता कि फॉर्म में ये कॉलम नहीं होना चाहिए…न ये कॉलम होता न हमें हमारी जातियाँ पता चलतीं। बड़े स्कूल में स्कूल की बस से आना-जाना शुरू हुआ तो पता चला कि मेरे साथ जो बैठती है वह बौद्ध है। पर मुझे वह और उसे मैं उतनी ही पसंद थी, जितनी स्कूली सहेलियों की दोस्ती होती है। फिर एक और ओबीसी सहेली, जो अब पुलिस इंस्पेक्टर बन गई है…उससे अभी तक उसी तरह की दोस्ती है। जिला स्तर पर साक्षरता कार्यक्रम में स्कूली दिनों में ही जत्था कलाकार की तरह जाती थी और वहाँ एक सहेली बन गई थी तिवड़े। उसने एक दिन मेरा हाथ छूकर कहा, तुम्हारा हाथ कितना मुलायम है। तब भी मुझे यह अहसास नहीं हुआ था कि हाथ के मुलायम होने का जाति से कोई संबंध है, मुझे लगा चूँकि उसे बर्तन अधिक माँजने पड़ते हैं इसलिए उसका हाथ सख्त हो गया है। मैं यह सब इसलिए नहीं कह रही कि मैं अपना भोलापन दिखाना चाहती हूँ, मैं इसलिए कह रही हूँ कि सामाजिक परिवेश का असर आप पर बहुत अधिक होता है। जहाँ सामाजिक परिवेश में असमानता नहीं होती वहाँ उस तरह की वितृष्णा दोनों ओर से नहीं होती।

स्वरांगी साने की एक यादगार तस्वीर: उनके फेसबुक से

तुमी बामन्या न

तो, मुझे कब पता चला कि मैं ब्राह्मण हूँ। अर्थात् ही यह उस तरह से पता चलने वाली बात नहीं कह रही जो मुझे मेरे जन्म से मेरे गोत्र आदि के साथ पता थी, यह सामाजिक संदर्भ में पता चलने वाली बात कर रही हूँ। तो पुणे आने पर मेरे लिए यह अनुभव अलग किस्म की असहज अनुभूति लेकर आया। पहली बार ही जो कचरा उठाने आती थी, उसने बेल बजाई, मैंने कचरा बाहर रखा और ऐसे ही मुस्कराई…बेवजह..उससे नजर मिल गई तो मुस्करा दी, मेरे मन में सच में और कोई भाव नहीं था, लेकिन उसने मुझसे हँसकर कह दिया- ‘ताई तुमी बामन्या न (दीदी आप ब्राह्मण न?)’, मैं औचक रह गई। उसने जिस तरह से ‘बामन्या’ कहा उसमें एक तरह का वह भाव था जो मुझे कह रहा था कि उसमें और मुझमें भेद है। फिर यह भेद तो यहाँ लगातार मुझे महसूस होता रहा…। मेरी पिछली जिंदगी में हमने कभी किसी से उसकी जाति-धर्म के नाम पर बात नहीं की थी, मजाक नहीं उड़ाया था, टिप्पणी या उपहास नहीं किया था…दोनों ओर से नहीं। लेकिन यहाँ बहुत बहुत पक्के मित्र भी इसलिए पक्के थे कि वे जानते थे कि हम ब्राह्मण हैं और वे केवल ब्राह्मणों से दोस्ती रखते हैं। या दूसरी वजह भी यही थी कि हम ब्राह्मण हैं और ब्राह्मणों से दोस्ती रखना स्टेटस की बात होती है। यहाँ आकर जो पहली नौकरी मैंने की वहाँ मुझे एक अलग बात पता चली, जब एक ने कहा कि तुम्हें कोई नौकरी से नहीं निकालेगा, तुम खुद छोड़ना चाहो तो छोड़ देना, मैंने हैरत से पूछा क्यों? उसका जवाब था तुम ब्राह्मण हो न और ब्राह्मणों के स्टाफ में होने से संस्थान की अहमियत बढ़ती है इसलिए यहाँ ब्राह्मणों को नहीं हटाते। मैं हठात् थी, सच में हठात् थी, उसके पहले भी अपने पहले शहर में नौकरियाँ की थीं, लेकिन तब मेरी शैक्षणिक गुणवत्ता या कार्यानुभव मायने रखता था..पर मैं चकित थी कि ब्राह्मण होना भी क्या कोई पैमाना हो सकता है? अब यहाँ अन्य जातियों के मित्र-सहेलियाँ, परिचित, पड़ोसी, मिलने-जुलने वाले कोई भी ब्राह्मण होने के आधार पर ही कैटगराइज़ कर बात करते हैं। पहले असहज होती थी, कि केवल नाम बताने से काम नहीं चलता, उन्हें उपनाम भी बताना होता है और उपनाम बताते ही वे कह पड़ते हैं ब्राह्मण न? मैं हाँ में गर्दन हिलाती हूँ..पर उस प्रश्न का कोई संदर्भ, औचित्य नहीं समझ पाती। कुछ संबंध प्रगाढ़ होते हैं तो ब्राह्मणों के ढेरों किस्से उनके पास (गैर ब्राह्मण) होते हैं और वे समवेत हँसते हैं, फिर कहते हैं अरे नहीं तू वैसी नहीं, हम तो बस यूँ ही। मैं हैरत में पड़ जाती हूँ, और मैं कर भी क्या सकती हूँ।

खुद को गौण क्यों करवा रहे हो?

मराठी परिवारों में सुहागनों को किन्हीं विशेष अवसरों पर बुलाकर ‘हल्दी-कुमकुम’ लगाया जाता है, एक तरह का गेट-टूगेदर कह सकते हैं। उसमें भी मुझे अनुभव यह आया कि अरे ब्राह्मण हूँ इसलिए व्यर्थ भाव मत दो, यदि मेरी प्रतिभा, मेरी दोस्ती के कायल हो, तो बात है, लेकिन वे घूम-फिरकर मेरे ब्राह्मण होने पर आ जाते हैं और लगता है जैसे मेरी उनके प्रति की सारी सदाशयता, मित्रता वैसे कोई मायने नहीं रखती, मतलब मैं भली न भी होती तब भी वे उस दिन मुझे मान देते ही। तो अनुभव यह है कि जब मैं दूसरी नौकरी करने लगी तब मैं देर रात घर लौटती थी, हल्दी-कुमकुम जैसे कार्यक्रम शाम को होते हैं तो मैं कई बार नहीं जा पाती थी। दो-तीन बार अनुभव आया कि एक महिला मुझे उसके यहाँ हल्दी-कुमकुम में एक दिन पहले से कई बार याद दिलाती, दूसरे दिन में कहती कि मैं दोपहर को ऑफिस जाने से पहले उसके यहाँ चली जाऊँ। मुझे लगता कि चूँकि मैं नहीं जा पाती इसलिए वह ऐसा कहती होगी, लेकिन एक बार वह बोल पड़ी- ‘तुम ब्राह्मण हो न, तुमसे शुरुआत हो जाती है तो अच्छा रहता है। दोपहर में ही सही लेकिन पहला मान तुम्हारा।’ अरे मत करो न ऐसा, क्यों कर रहे हो, खुद ही अपने आप को कम आँक रहे हो। हम सभी समान हैं और समानता की लड़ाई है न ये, तो इसमें दूसरे को अपने से श्रेष्ठ कह खुद को गौण क्यों करवा रहे हो।  

इमेज गूगल

और गहरा दर्द

एक घटना तो मेरे जीवन में ऐसी हो गई कि उसकी टीस आज भी चुभती है। मेरी बहुत अच्छी सहेली बन गई थी। मेरी हमउम्र थी, हम आते-जाते थे, बच्चे साथ में खेला करते थे। सब सही चल रहा था। उसके यहाँ ‘हल्दी कुमकुम’ होता तो वह मुझे बुलाती और मेरे यहाँ होता तो मैं उसे। पर उसे न जाने कैसी और कौन-सी बीमारी लग गई। एक महीने के भीतर बुखार क्या आया और वह चल बसी। हम सभी के लिए वह बहुत त्रासद था, क्योंकि उसके छोटे बच्चे हमारी आँखों के सामने थे, जैसे ही खबर मिली, हम चार-पाँच सहेलियाँ उसके घर पहुँचीं…अस्पताल से वह आ गई थी, बर्फ की मानिंद ठंडी पड़ गई थी उसकी देह। हम सब रो रहे थे, उसकी माँ भी रो रही थी आखिर उसकी तो बेटी थी, उसका पति भी..क्यों न रोता उसकी जीवनसाथी थी, बच्चे तो माँ के बिना बिलख-बिलख रो रहे थे। घर के कोई बड़े-बुजुर्ग थे, वे कह रहे थे यह सुहागन गई है, इसे सुहागन की तरह सजाओ…इसकी शादी की साड़ी लाओ.. दुल्हन की तरह तैयार करो (इस पर अलग से बात होगी कि हमारे यहाँ अब भी सुहागन और विधवाओं के साथ कैसे भेदभाव होता है)..होना तो यह चाहिए था कि उसकी माँ-बहनें, सास-ननद या उनके परिवार में से कोई यह सब करता लेकिन सब मुझे कहने लगे कि मैं करूँ…तब तक भी मैं नहीं समझी, मुझे लगा कि मैं उसकी खास सहेली थी इसलिए मुझे कह रहे हैं। लेकिन उसकी माँ ने कहा- ‘तुम ब्राह्मण हो न, तुम्हारे हाथ से इसका सब होगा तो इसका अगला जन्म तर जाएगा’। उस गहन शोक की घड़ी में भी मेरा ब्राह्मण होना जैसे मुझे सबसे अलग कर गया, उसकी माँ-बहन उसकी ज्यादा सगी थी, लेकिन उसे तैयार करने का काम मुझ पर सौंपा गया क्योंकि मैं ब्राह्मण हूँ। अचानक मुझे लगा कि इतने साल जो मैं उसे अपनी दोस्ती का प्यार समझती थी कहीं उसकी ओर से भी वह प्यार, वह मान मेरे ब्राह्मण होने को लेकर तो नहीं था? अब उसकी मृत काया के पास केवल मैं थी, बाकी सब बहुत दूर से मुझे देख रहे थे, तौल रहे थे कि मैं ब्राह्मण हूँ, मैं जो भी करूँगी सही ही करूँगी इस श्रद्धा भाव के साथ। मैं उसकी सहेली थी, मतलब मैं तो खुद को यही मान रही थी…आज भी जब यह घटना याद करती हूँ तो मुझे लगता है, वह भी मुझे अपनी सहेली ही मानती होगी न या किसी और दुनिया से आया कोई अजूबा ब्राह्मण समझती होगी?

पर मैं इतना तो समझ गई कि एक दुनिया में कई छोटी-छोटी अलग दुनिया बसती हैं और बहुत छोटी मानसिकताओं के साथ भी, ब्राह्‌मणों में भी और श्रेष्ठ होने की होड़ है। हम सब समान हैं, इसे सिद्ध करने की होड़ क्यों नहीं लगती कभी?

हां उनकी नजर में जाति-घृणा थी, वे मेरे दोस्त थे, सहेलियां थीं

नीतिशा खलखो

नीतिशा खलखो
 दिल्ली यूनिवर्सिटी के दौलत राम कॉलेज में हिंदी पढ़ाती हैं।

डा. पायल तडावी अपनी तीन सीनियर डॉक्टर्स की प्रताड़ना के कारण आत्महत्या कर चुकी हैं. उनकी सांस्थानिक हत्या हुई है. ऐसी स्थितियां और भी अन्य समूहों की महिलाएं झेलती रही हैं. खुद जाति का बर्डन ढोती, अपने लिए ब्राह्मणवादी पितृसत्ता की व्यवस्था में उपेक्षित ऊंची जाति की महिलाएं अन्य जाति और धार्मिक पहचान वालों के साथ क्रूर और अमानवीय व्यवहार करती हैं. हम इस सीरीज में ऐसे अनुभवों को प्रकाशित कर रहे हैं. पहली क़िस्त में नाइश हसन के अनुभव के बाद अब नीतिशा खलखो का अनुभव. आप भी एक दलित, ओबीसी, आदिवासी, पसमांदा स्त्री के रूप में यदि यह झेल चुकी हैं तो अपने अनुभव हमें भेजें.

झारखंड में पैदा होने वाले ज़्यादातर आदिवासी छात्रों को जाति-घृणा का सामना तब होता है जब वे स्कूल के प्रांगण में क़दम रखते हैं। जिस स्कूल में मैंने पढ़ाई की वहां काम कर रहे ज़्यादार सिस्टर्ज आदिवासी समुदाय से थीं। परंतु स्कूलों में जो बात मैंने महसूस किया वह बड़ी अफसोसनाक थी। हिंदू सवर्ण जाति से आने वाले छात्रों के अंदर आदिवासी शिक्षिकाओं व सिस्टर्स को लेकर बहुत तरह का पूर्वग्रह पाया जाता था। उनको लगता था ब्राह्मण जाति में पैदा लेने वाले शिक्षक ही ज्ञान के भंडार होते हैं। वही सब जानते हैं। बाकी को या तो कम आता है या कुछ नहीं आता है।

सवर्ण हिंदू जातियों के वैचारिक दबदबे का अंदाज़ा आप इस बात से लगा सकते हैं कि खुद आदिवासी शिक्षक भी इस बात को दोहराते फिरते थे कि हिंदू छात्र खूब मेहनती और तेज होते हैं, वहीं आदिवासी छात्र उनसे थोड़ा कम मेहनती होते हैं। रिजल्ट के दिन कक्षा 6 से 10 तक में पहला दूसरा और तीसरा स्थान पाने में सवर्ण छात्र ही आगे रहते थे। इनाम पाने में कुछ आदिवासी नाम भी पुकारे जाते थे। लेकिन जब खेल कूद, नित्य, संगीत और एक्स्ट्रा करिकुलर एक्टिविटी के क्षेत्र में इनाम बांटे जाते थे तो वहां सिर्फ आदिवासी बच्चे दिखाए देते थे। मगर ब्राह्मणवादी समाज में इज्जत तो मानसिक श्रम को ही मिलती है।लिहाज़ा खेल कूद में कामयाब आदिवासी समाज के बच्चों को ब्राह्मणवादी निज़ाम अहमियत नहीं देता है।

इस के अलावा कुछ समस्याएं और भी थी। हिन्दू धर्म बनाम ईसाई धर्म के ठेकेदारों के बीच चल रही रस्साकसी में पीड़ित वह हुए जो न तो अपने आप को हिन्दू मानते थे और न ही इसाई। मैंने एक तल्ख़ बात यह महसूस की कि जो बच्चे ईसाई न थे उनको ईसाई सिस्टरज प्यार और दुलार करने में कंजूसी करती थीं। किंतु यह भी सच है कि इस तरह का सौतेला सलूक सब नहीं करती थी। कुछ सिस्टर्ज़ जैसे सिस्टर फ्लोरा और सिस्टर मेरी ग्रेस टोप्पो ने सब को दुलार किया और उनका प्यार मुझे भी काफी मिला। आज जो भी में हूं उसमें उनका बड़ा योगदान है।

मुझे यह भी याद है स्कूल में आदिवासी छात्रों के लिए बच्चों के एक क्रिश्चयन संस्था मेरे स्कूल को दोपहर का खाना व कुछ सामान देती थी, जिनमें अंडा, चिकन, मटन, बीफ आदि शामिल था। जब खाना परोसा जाता था तो सवर्ण हिंदू छात्र इन मांसाहारी भोजन के प्रति घृणा की नज़र से देखते थे।

ब्राह्मण समाज की इसी पवित्र और अपवित्र के विचार ने स्कूल में बंधुत्व को कभी फलने-फूलने नहीं दिया। यही वजह है कि मेरे स्कूल में हिंदू और आदिवासी छात्रों के बीच एक साथ खाने पीने का प्रचलन न के बराबर था। खान-पान और रहन-सहन के मामले में वह अपने आप को दूसरों से अलग रखते थे। उनके अंदर श्रेष्ठता की भावना कुट कूट कर भरी थी।

वे सब ऊंची जाति की हिन्दू सहेलियां थीं: मेरे मुसलमान होने की पीड़ा

बाबासाहेब आंबेडकर ने भी तो इसी बात पर चिंता ज़ाहिर की है कि जाति- समाज में न तो अंतर जाति- शादी ब्याह ही होते हैं और न खान पान। यही वजह है कि आंबेडकर और भारत का बहुजन समाज की नज़र से जाति भारतीय समाज के पिछड़ेपन और जड़ता की के बड़ी वजह है।

जाति- भेदभाव का पीड़ादायक अनुभव मेरा पीछा करते हुए दिल्ली तक पहुंच गया। ग्रेजुएशन पूरा करने के लिए मैं देश के प्रतिष्ठत दिल्ली विश्वविद्यालय के हंसराज महाविद्यालय पहुंची। यहीं इतिहास की क्लास में एक शिक्षक ने कहा कि ‘विश्व में कई ऐसे मानव समुदाय अस्तित्व में थे जिन्होंने पृथ्वी के अस्तित्व को बचाने में बड़ी भूमिका अदा की है। उन्होंने प्रकृति से उतना ही लिया जिनसे उनका जीवन आसानी से चल सके। प्रकृति के संसाधन का इस्तेमाल वे अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए करते थे। प्रकृति का दोहन उन्होंने कभी नहीं किया जैसा कि आधुनिक और विकसित समाज में देखने को मिलता है। जंगल, नदियां, पहाड़, जानवर सभी कुछ उनके लिए पूजनीय थे। वे प्रकृति के सबसे बड़े संरक्षक थे।’

 इन बातों को सुनकर मैंने अपनी प्रतिक्रिया दी और कहा, ‘जिन मानव समुदाय के बारे में आप पढ़ा रहे हैं वह आज भी उसी तरह से ज़िन्दगी बसर कर रहा है। आज भी आदिवासी समाज कुदरत की गोद में जी रहा है और उसकी जीवन शैली पूरी तरह से प्रकृति के अनुरूप है।’

फिर मैंने अपना परिचय देते हुए कहा कि ‘मेरे नाम के साथ खलखो जुड़ा हुआ है जिसका अर्थ छोटी मछली होता है. छोटी मछली को मैं नहीं मार सकती ना कभी खा सकती. खलखो समाज जिसमें मैंने जनम लिया है उसकी यह जिम्मेवारी है कि इसके अस्तित्व को पृथ्वी पर सदा बनाए रखें. मेरी मां के नाम में लकड़ा जुड़ा है जिसका मतलब बाघ होता है. लिहाज़ा हम सब बाघ तक को हानि नहीं पहुंचा सकते. इस तरह हमारा आदिवासी समाज आज भी पृथ्वी की पारिस्थितिकी या ईको सिस्टम हमेशा बरकरार रखने के लिए प्रयत्नशील है.’

यह सब सुनकर मेरे शिक्षक बहुत खुश हुए और कहा कि ‘जिस समाज के बारे में हमसब पढ़ रहे हैं, उस समाज से कोई पढ़ने आया है.’ आखिर में उन्होंने मेरी खूब पीठ थपथपाई.
मुझे इस बात का थोड़ा भी अहसास नहीं था कि मेरी आईडेंटिटी जानकर मेरे साथ बुरा बरताव होने वाला था. मेरी अवहेलना शुरू हो गई. क्लास के बाद मुझे कुछ ने कहा कि ‘तुम आदिवासी हो मगर लगती तो नहीं हो.’इसका अर्थ मुझे शुरू में समझ में नहीं आया. जाति-समाज के दिमाग में यह पूर्वग्रह ग्रसित कर बैठा है कि ‘आदिवासी काले, बड़े-बड़े दांत वाले, असभ्य सी भाषा बोलने वाले, झिंगालाला करने और कच्चा मांस खाने वाले होते हैं.’

दर हकीकत इस पूर्वाग्रह के लिए वह खुद जिम्मेदार नहीं हैं. हिंदू ग्रंथों, टेलीविजन, सहित, समाज विज्ञान, सिनेमा ने अबतक आदिवासी को नकारात्मक तौर से पेश किया है. एंथ्रोपोलॉजी और सोशियोलॉजी के विद्वानों ने भी आदिवासियों का स्ट्रियोटाइप गढ़ने में बड़ा रोल अदा किया है.इसी स्टरियोटाइप से ग्रसित ही कर मेरे कॉलेज के दोस्तों ने मेरे साथ टिफिन खाना बंद कर दिया. उन्हें अब मैं उनके जैसा नहीं लगने लगी. उनके नजदीक मेरी एक ही पहचान थी. उन्होंने मेरे टिफिन में रखे हरे मूंग का स्प्राउट्स देखकर कहना शुरू कर दिया था कि ‘आदिवासी तो हर चीज को कच्चा ही खाते हैं ना.’

उनके इस भेदभावपूर्ण रवैए ने मुझे अन्दर से काफी दुखी किया. कॉलेज की बड़ी भीड़ में, मैं खुद को अकेला पाने लगी थी. मेरा आदिवासी आईडेंटिटी उनको इस लिए भी परेशान कर रहा था कि आदिवासी को आरक्षण मिलता है. आरक्षण से जुड़ी हुई बहुत सारी गलतफहमियों उनके दिमाग में भी बैठी हुई थी. कोई कहता, ‘तुम्हारा 58% में दाखिला हुआ और हमारे कई ब्राह्मण दोस्तों का 65% के बाद भी एडमिशन नहीं हो सका. तुमने उनका हक मारा है.’

जवाब देते हुए मैंने कहा कि ‘मेरा 58% में एडमिशन है और तुम्हारा 65% से. माना कि एंट्री गेट पर यह मुझे रियायत मिली. चलो अब साथ साथ पढ़ते हैं और देखते हैं कि जब समान शिक्षा हम दोनों को मिलने लगी है तो साल के आखिर में कौन ज़्यादा नंबर लता है.’पहले वर्ष में 60 प्लस की क्लास में मात्र 5 बच्चों को प्रथम श्रेणी प्राप्त हुई जिनमें से एक मैं भी एक थी. साल गुजरता गया और मेरे अंक बढ़ते गए. उनका भ्रम टूट लगा कि आदिवासी पढ़ नहीं सकते और अच्छे अंक नहीं ला सकते.

मेरे आदिवासी होने के नाते मेरे कुछ बिहार से आने वाले अगड़ी जातियों के दोस्तों ने मुझे ‘ माओवादी’ होने का लेबल लगा रखा था. मैंने पहली बार उनके मुंह से कानू सन्याल और चारू मजूमदार का नाम सुना था. उनके नाम से में पहली बार दिल्ली में ही परिचित हुई क्योंकि रांची में रहते हुए हमने सिर्फ एमसीसी ही सुना था. कभी इसका फुल फॉर्म की तरफ सोचा भी नहीं था.मेरे दोस्त ने मुझसे यह भी पूछा कि ‘तुमने विवेकानंद और रवीन्द्र नाथ टैगोर को पढ़ा है या नहीं?’ मैंने जवाब दिया, ‘हां नहीं पढ़ा है.’ इस पर उसका जवाब था कि, ‘हां तुम झारखंडी लोग कहां इनको पढ़ोगे. तुम तो कानू सन्याल और चारू मजूमदार को पढ़ने वाले लोग हो.’

उनके जवाब से परेशान हो कर उस शाम हॉस्टल की एक बड़ी दीदी के पास जाकर मैंने इन दोनों नामों के बारे में पूछा. मुझे बताया गया कि नक्सलबाड़ी आंदोलन के दौरान कानू सन्याल और चारू मजूमदार काफी सक्रिय थे.मैं ही नहीं लाखों करोड़ों आदिवासी छात्र किसी न किसी रूप में जाति-घृणा और हिंसा के शिकार हैं. उनको हर रोज़ जाति-समाज उनको “असभ्य” होने का ऐहसास दिलाता है. हर मोड़ हर मकाम पर उनके साथ भेद भाव बरता जाता. ज़रूरत इस बात की है कि इन समाजिक बुराई और गैर बराबरी पर खुल कर बातचीत हो और उसे जड़ से ख़त्म करने के लिए हर तरफ से प्रयास हो.

लिंक पर  जाकर सहयोग करें . डोनेशन/ सदस्यता
आपका आर्थिक सहयोग स्त्रीकाल (प्रिंट, ऑनलाइन और यू ट्यूब) के सुचारू रूप से संचालन में मददगार होगा.
‘द मार्जिनलाइज्ड’ के प्रकाशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  पढ़ें . लिंक पर जाकर ऑनलाइन ऑर्डर कर सकते हैं:‘द मार्जिनलाइज्ड’ अमेजन फ्लिपकार्ट
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016, themarginalisedpublication@gmail.com

केरल के सभी स्कूलों में सेनेटरी नैपकिन वेंडिंग मशीन लगाना अनिवार्य:देश में पहली बार


टाइम लाइन
वर्ष 2014 से 28 मई को विश्व मासिक धर्म स्वच्छता दिवस मनाया जाता है जिसका मुख्य उद्देश्य समाज में फैली कुरीतियों का निवारण करना है.

वर्ष 2017 की 30 अगस्त को तमिलनाडु के एक स्कूल से पीरियड से जुड़े रवैये को लेकर एक शर्मनाक ख़बर सामने आई. तमिलनाडु के तिरुनेलवेली ज़िले के पलायमकोट्टाई इलाके में एक छात्रा ने पीरियड के दाग को लेकर डाँट खाने के बाद आत्महत्या कर ली. सेंथिल नगर स्कूल की 7वीं कक्षा में पढ़ने वाली इस छात्रा को शिक्षिका ने यूनिफॉर्म पर पीरियड्स के दाग लग जाने को लेकर डाँटा था, जिसके बाद 12 साल की इस छात्रा ने सुबह 3 बजे अपने पड़ोस कीएक इमारत से कूदकर आत्महत्या कर ली.

वर्ष 2018 में 29 नवंबर को खबर मिली कि नेपाल सीमा से लगे पिथौरागढ़ जिले के सल्ला चिंगरी क्षेत्र के कई गाँवों की छात्राओं को मासिक धर्म के दौरान स्कूल नहीं भेजे जाने का मामला सामने आया. वे हर माह पाँचदिन घरों में ही बैठी रहती हैं. स्कूल और क्षेत्र के लोक देवता के मंदिर को जोड़ने वाला मार्ग एक ही है. किसी अनिष्ट की आशंका के चलते परिजन भी इस दौरान छात्राओं को स्कूल भेजने से बचते हैं. क्षेत्र के दो इंटर कॉलेज और दोजूनियर हाईस्कूल में इस तरह की समस्या सामने आई है.

वर्ष 2019 में 24 मई को नई दिल्ली में पहली बार मासिक धर्म आने से परेशान 12 साल की बच्ची ने फाँसी का फंदा लगाकर खुदकुशी कर ली. बच्ची की बड़ी बहन ने पुलिस को बताया कि ”दो दिन पहले उसे पहली बारमासिक धर्म आया था. इससे वह तनाव में आ गई थी. हालांकि, बड़ी बहन ने उसे बहुत समझाया, लेकिन उसकी परेशानी कम नहीं हुई.”इस मामले में लड़की के परिवार का कहना है कि ”इसी वजह से बच्ची ने खुदकुशी कर ली.”

माहवारी में हिमाचली महिलाएं नारकीय जीवन को मजबूर!

वर्ष 2019 की 20 मई की खबर देश में पहली बार केरल के सभी स्कूलों में सेनेटरी नैपकिन वेंडिंग मशीन लगाना अनिवार्य किया जा रहा है.

उपरोक्त तमाम बुरी खबरों के बीच किसी अच्छी खबर की तरह सामने आई यह बात है. वरना पीरियड्स कह लीजिए, मासिक धर्म या मासिक चक्र कह लीजिए…जिसे कालांतर में लगातार आना ही है उसे लेकर लोगों के मन में तथ्य कम और वहम ज्यादा होते हैं इसलिए कोई भी वर्ष हो और कोई भी प्रांत वहाँ की किशोरवयीन लड़कियों के जीवन में इसका आना सामान्य बात नहीं होती, बल्कि इसे आम बोलचाल की भाषा में ‘प्रॉब्लम’ ही कहा जाता है…कि अभी चार दिन ‘प्रॉब्लम’ है. वर्ष 2018 में देश की राजधानी दिल्ली में लड़कियों के लिए चलाए जाने वाले कुछ सरकारी स्कूलों का सर्वे किया गया तो सामने आने वाले आँकड़े शर्मनाक थे. सर्वेमें 12 से 18 साल की 600 लड़कियों से बातचीत की गई और उनमें से 40 फीसदी लड़कियों का कहना था कि मासिक धर्म के दौरान उन्हें मजबूरीवश एक से लेकर 7 दिनों तक छुट्टी लेनी पड़ती है. कारण कई थे- स्कूलों में लड़कियों के लिएअलग से टॉयलेट ना होना, नलों में पानी न आना और कपड़े या पैड फेंकने के लिए अलग से जगह ना होना वगैरह-वगैरह.

मासिक धर्म से जुड़े कुछ और कटु सत्य पर नजर डालें तो हालात और भी डरावने प्रतीत होते हैं. देश में 71 फीसदी किशोरियों को अपने पहले मासिक धर्म से पहले इसके बारे में कोई जानकारी नहीं होती. लगभग 20 फीसदी लड़कियाँ मासिकधर्म शुरू होते ही डर और सुविधाओं के अभाव के कारण स्कूल छोड़ देती हैं. 88 फीसदी किशोरियाँ नहीं जानतीं कि मासिक धर्म के दौरान सफाई ना रखने से क्या-क्या बीमारियाँ हो सकती हैं. सफाई ना अपनाने से इन्हें फंगल इंफेक्शन,यूरीनरी ट्रैक्ट इंफेक्शन और रिप्रोडक्टिव ट्रैक्ट इंफेक्शन होते हैं. जागरूकता के अभाव में ये इंफेक्शन फैल कर न केवल बहुत सी लड़कियों को माँ बनने के सुख से वंचित कर रहे हैं बल्कि उनमें से बहुतों को कम ही उम्र में सर्वाइकल कैंसर काभी शिकार बना रहे हैं. देश में हर साल सर्वाइकल कैंसर के एक लाख 32 हजार नए मामले सामने आते हैं. इनमें कम उम्र की लड़कियों की भी संख्या होती है. वहीं राष्ट्रीय किशोर स्वास्थ्य कार्यक्रम के तहत स्वास्थ्य विभाग की ओर से करवाए गए सर्वे में 95.5 फीसदी छात्राओं ने माना कि उन्हें मासिक धर्म के बारे में जानकारी है. 79 फीसदी छात्राओं ने माना कि वे मासिक धर्म के दौरान स्कूल जाना या घर से बाहर निकलना पंसद नहीं करतीं. 45 फीसदी छात्राएँ मासिकधर्म के दौरान योग और खेलकूद नहीं करती जबकि 41 फीसदी ऐसा करती हैं. 28 फीसदी कभी कर लेती हैं कभी नहीं करती. इसी तरह 63.5 फीसदी छात्राओं ने बताया कि उन्हें महिला प्रजनन प्रणाली के बारे में जानकारी है जबकि 86.5प्रतिशत छात्राओं को पुरुष प्रजनन प्रणाली की जानकारी नहीं थी.

सृजन की ताक़त रखने वाली महिलाओं से दुनिया की संस्कृतियाँ क्यों डरती हैं !

पहले 13 से 14 साल की उम्र में किशोरियों के शरीर में बदलाव देखने को मिलते थे ये बदलाव अब 11 से 12 साल में होने लगे हैं. मगर इस उम्र में बच्चियाँ इन बदलावों के लिए मानसिक रूप से तैयार नहीं होती हैं. इस बारे में बच्चियों को पहलेसे जानकारी देना जरूरी है, ताकि वे इसके लिए मानसिक रूप से तैयार हो सकें. लेकिन हमारे देश में होता कुछ उल्टा ही है. मासिक धर्म के दौरान बेटियों को अलग-थलग रखा जाता है. प्रचलित मान्यता के दौरान इस समय वे पूरी तरहसे अपवित्र हो जाती हैं. हालाँकि प्रगतिशील समाज में बहुत सारी चीजें बदल चुकी हैं. लेकिन पिछड़े क्षेत्रों में इन सब बातों को काफी तवज्जो दी जाती है. कई घरों में माँ को पीरियड आने पर बेटियों को खाना बनाना होता है, ऐसे में वे स्कूलनहीं जा पाती हैं. इतना ही नहीं माँ के बिल्कुल अलग-थलग पड़ जाने के कारण पूरी जिम्मेदारी बेटियों को उठानी पड़ती है.

बच्चियों का स्कूल जाना केवल इस एक वजह से रुक जाए, तो इससे शर्मनाक बात और क्या हो सकती है और वह भी इस सदी में! ऐसे में केरल के सभी स्कूलों में सेनेटरी नैपकिन वेंडिंग मशीन लगना कितना सुखद है. सभी उच्चतर माध्यमिक विद्यालयों में सेनेटरी नैपकिन वेंडिंग मशीनों को अनिवार्य करने वाला केरल भारत का पहला राज्य बन गया है. गर्मियों की छुट्टियों के बाद फिर से खुलने के लिए राज्य के स्कूलों के लिए सिर्फ कुछ हफ्तेबचे हैं, सरकार ने सभी स्कूलों को नए शैक्षणिक वर्ष की शुरुआत से ही वेंडिंग मशीन लगाना अनिवार्य कर दिया है. यह भी तय किया गया है कि मशीनों की संख्या स्कूल में छात्राओं की संख्या के अनुपात में होनी चाहिए. इसे राज्य सरकार की ‘शी पैड’ योजना के तहत लागू किया जाएगा, जिसका उद्देश्य सभी छात्राओं को सेनेटरी पैड उपलब्ध कराना है. शिक्षा विभाग ने राज्य के सभी सरकारी, निजी, सहायता प्राप्त और वित्तविहीन स्कूलों को भी पीने केपानी और लड़कों और लड़कियों के लिए अलग-अलग शौचालय सुनिश्चित करने के निर्देश दिए हैं. केरल के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन ने एक फेसबुक पोस्ट में कहा,“हर महिला को मासिक धर्म स्वच्छता का अधिकार है. सरकारकी ‘शी पैड ’योजना का उद्देश्य राज्य भर के सभी स्कूली छात्रों को स्वस्थ और स्वच्छ सैनिटरी पैड वितरित करना है. पर्यावरण के अनुकूल निपटान प्रणाली और इस्तेमाल किए गए पैड के लिए डिस्टिलरी को योजना के हिस्से के रूपमें वितरित किया जाएगा. अगले कुछ वर्षों में इस योजना पर अनुमानित 30 करोड़ रुपये खर्च किए जाएँगे. यह परियोजना राज्य महिला विकास निगम के नेतृत्व में स्थानीय स्व-सरकारी संस्थानों के सहयोग से कार्यान्वित की जारही है. सरकारी आँकड़ों के अनुसार, केरल में कुल 1845 उच्चतर माध्यमिक विद्यालय हैं, जिनमें निजी और सरकारी दोनों क्षेत्र शामिल हैं.

लिंक पर  जाकर सहयोग करें . डोनेशन/ सदस्यता
आपका आर्थिक सहयोग स्त्रीकाल (प्रिंट, ऑनलाइन और यू ट्यूब) के सुचारू रूप से संचालन में मददगार होगा.
‘द मार्जिनलाइज्ड’ के प्रकाशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  पढ़ें . लिंक पर जाकर ऑनलाइन ऑर्डर कर सकते हैं:‘द मार्जिनलाइज्ड’ अमेजन फ्लिपकार्ट
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016, themarginalisedpublication@gmail.com

बिहार की सावित्रीबाई फुले कुन्ती देवी की कहानी

नवल किशोर कुमार

कुन्ती देवी की कहानी 1930 के दशक के बाद बन रहे नए भारत की कहानी है. इस भारत को बनाने में जिन लाखों अनाम लोगों का योगदान रहा, उनमें से एक कुन्ती देवी भी हैं. 1924 में बिहार के एक छोटे से गांव में सामाजिक रूप से पिछड़े किसान परिवार में पैदा हुईं कुन्ती देवी ने बालिकाओं की शिक्षा के लिए आजीवन काम किया. 8 वर्ष की अवस्था में ही कुन्ती देवी का विवाह केशव दयाल मेहता से हुआ. विवाह के समय मेहता की उम्र 18 वर्ष की थी. इस दंपत्ति को अपनी शिक्षा के लिए बहुत कठिनाइयों का सामना करना पड़ा.

नए बन रहे भारत को सबसे अधिक आवश्यकता शिक्षा और स्वास्थ्य की थी अधिसंख्य आबादी इन दोनों चीजों अन्योन्याश्रित चीजों से वंचित थी. निरक्षरता और बीमारियों का बोलबाला था. स्कूल और अस्पताल बहुत कम थे.

नए भारत के निर्माण के लिए आवश्यक था कि समाज में – विशेषकर पिछड़े-दलित समुदायों में जीवन के प्रति अनुराग उत्पन्न हो. यह तभी संभव है जब लोग स्वस्थ और शिक्षित हों, विशेषकर महिलाएं और बच्चे प्रसन्न हों. इस कमी को पूरा करने के लिए कुन्ती देवी ने नालंदा जिले के कतरीसराय और इसलामपुर कस्बे में 1930 के दशक में बालिकाओं के लिए स्कूल की स्थापना की, जबकि उनके पति केशव दयाल मेहता ने वहीं ‘भारतेंदू औषधालय’ बनाया. इन सबके पीछे उनका मकसद था – सामाजिक व लैंगिक भेदभाव की बीमारी का उन्मूलन तथा एक स्वस्थ भारत का निर्माण.

इस किताब में कुन्ती देवी-केशव दयाल मेहता की पुत्री पुष्पा कुमारी मेहता ने अपने माता-पिता की जीवनचर्या के बहाने भारत के निर्माण की जटिल प्रक्रिया को अनायास तरीके से दर्ज किया है. यह एक ऐसी कहानी है, जो अपनी ओर से कुछ भी आरोपित नहीं करती.

किताब मंगवाने के लिए लिंक पर क्लिक करें: इसलामपुर की शिक्षा ज्योति

प्रस्तुत है इस किताब के कुछ अंश :

स्त्री शिक्षा और जनस्वास्थ्य के लिए कुन्ती देवी और उनके पति केशव दयाल मेहता की पहल

केशव दयाल मेहता जी ने स्त्रियों को उत्तम शिक्षा देने के विचार से पत्नी कुन्ती देवी जी को शिक्षक-प्रशिक्षण दिलवाने का विचार किया. कुन्ती देवी भी इस विचार से सहमत हुईं. मेहता जी के आग्रह करने पर उनके माता-पिता एवं सासु मां-श्वसुर जी ने भी इस राय में अपनी सहमति दे दी. इस प्रकार कुन्ती देवी जी को साथ लेकर मेहता जी 1939 ई. में गया जिले के ‘पंचायती अखाड़ा’ शिक्षक-प्रशिक्षण महाविद्यालय गये. वहां औपचारिकता के सभी नियम पूरा करते हुए उसी शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालय में देवी जी का नामांकन करवा दिया. देवी जी ने उस प्रशिक्षण महाविद्यालय के छात्रावास में रहकर दो वर्षों का प्रशिक्षण की उपाधि प्राप्त की. मेहता जी हर कदम पर उनका साथ देते रहे.

इधर इस बीच मेहता जी की एक चाची (छोटी मां) ने 1939 में एक बच्ची को जन्म दिया, पर दुर्भाग्यवश बच्ची के जन्म के कुछ ही दिनों के बाद बच्ची की मां का आकस्मिक निधन हो गया, उस नवजात बच्ची का नाम ‘जानकी’ रखा गया. जानकी से 4-5 वर्ष बड़ी एक और बहन थी, जिसका नाम उर्मिला था. यहां पर यह भी ज्ञात करना आवश्यक है कि चन्देश्वर और जनार्दन जी, उर्मिला जी एवं जानकी के सगे बड़े भाई थे. अपनी मां के निधन के बाद ये चारों मासूम बच्चे अनाथ हो गए. सबसे अधिक समस्या नवजात जानकी के लालन-पालन की आयी. बड़ी बहन उर्मिला भी अभी छोटी ही थी, अतः इन दोनों की देख-भाल, पालन-पोषण का भार मेहता जी की पूज्या मां जी ने अपने कंधों पर लिया.
इधर मेहता जी वैद्यक औषधियों का निर्माण करते एवं असाध्य से असाध्य रोगों से पीड़ितों की चिकित्सा करते रहे. असाध्य रोगों से पीड़ित व्यक्ति भी मेहता जी के अमृततुल्य औषधियों से लाभ उठाते रहे. उधर इस बीच देवी जी का शिक्षक-प्रशिक्षण का कार्य 1939-1941 ई. में सम्पन्न हो गया, अतः मेहता जी उन्हें पुनः कतरी सराय ले आये.

मेहता जी के बड़े भाई ईश्वर दयाल मेहता जी को अपने छोटे भाई को हमेशा कतरी सराय में रहते रहना उचित नहीं लगा, इसलिए उन्होंने कतरी सराय जाकर मेहता जी को इसलामपुर जो कि मेहता जी के पैतृक गांव बेले से 6 मील दूर पश्चिम है- वहां जाकर रहने, पीड़ितों (रोगियों) की चिकित्सा करने, सेवा करने एवं देवी जी को ‘स्त्री शिक्षा’ देने की सलाह दी. मेहता-दम्पत्ति अपने बड़े भाई के विचारों से सहमत हुए और मेहता जी अपने सास-श्वसुर की अनुमति लेकर देवी जी को साथ लेकर इसलामपुर चले आये.

मेहता दम्पत्ति के इसलामपुर लौट आने के पूर्व ही मेहता जी के बड़े भाई ईश्वर दयाल जी ने मध्य (बीच) इसलामपुर के संगत नामक स्थान के पास एक मकान किराये पर ले रखा था, जो कि माधो राव नामक व्यक्ति का था, वे जाति से तेली थे. उसी मकान में मेहता दम्पत्ती ने अपनी एक नई जिन्दगी शुरू की. वह बहुत पुराना मकान था, कुछ ईंटों (पक्का) से बना था, कुछ मिट्टी (कच्चा) का बना हुआ था.

वहां पर मेहता जी ने उत्तम एवं शुद्ध औषधियों के निर्माण हेतु किराये का अन्य कमरा लेकर उसमें एक-दो गायें पालने का प्रबन्ध कर लिया, जिनके शुद्ध दूध, घी, मूत्र आदि से अनेक प्रकार के औषधियों के निर्माण करने में सहयोग-मिलने लगा. गायों की देखभाल तथा औषधियों के निर्माण कार्य बच्चे-बच्चियों के साथ ही देवी जी भी अथक परिश्रम करके पूर्ण सहयोग देती थीं. इस तरह मेहता जी बच्चों एवं पत्नी के सहयोग से जड़ी-बूटियों आदि से बड़े-बड़े लोहे एवं मिट्टी के बर्तनों में के असाध्य रोगों की चिकित्सा के लिए च्यवनप्राश, दशमूलारिष्ट, अशोकारिष्ट, त्रिफलाचूर्ण, शीतोपलादि चूर्ण, लाल दन्तमंजन, महानारायण तेल, महाविषगर्भ तेल, चन्दनादि तेल, चन्दामृत रस आदि अनेक प्रकार के औषधियों का निर्माण करते एवं पीड़ितों की पीड़ा की जांच करके उनकी चिकित्सा करते. सुदूर गांव-गांव जाते, पीड़ितों (रोगियों) को इसलामपुर तक आना सम्भव नहीं होता था, क्योंकि आधुनिक युग की तरह उस समय सवारियों की उपलब्धता संभव नहीं थी, अतः मेहता जी स्वयं चार व्यक्तियों के द्वारा ढोये जाने वाली सवारी से (पालकी या खटोली) या निकट के गांवों में स्वयं साइकिल चलाकर जाते थे. इस प्रकार गांवों में पहुंचकर रोगियों की चिकित्सा के लिए उनकी जांच एवं स्वनिर्मित आयुर्वेद की औषधियों से हर प्रकार के असाध्य रोगों की चिकित्सा करते, पीड़ित इनकी औषधियों से अवश्य लाभान्वित होते.

मेहता जी इसलामपुर से पैतृक गांव-बेले साइकिल से ही जाया करते थे. इस क्रम में बीच-बीच में कई गांव मिलते थे, उन गांवों के कुछ निवासियों से अच्छी जान-पहचान हो गई थी, साथ ही बेले गांव के पूर्व जमींदार घराने के प्रतिष्ठित परिवार के ‘रमन महतो’ के बड़े सुपुत्र होने के नाते भी इनकी पहले से ही प्रतिष्ठा बनी हुई थी. उसके बाद वैद्यगिरी (चिकित्सक) का गुण भी इनमें आ गया, अतः अधिकतर गांवों के निवासी अपने एवं अपने परिवार के रोगों के उपचार के बारे में इनसे सलाह लेते एवं चिकित्सा करवाते तथ लाभान्वित होते. बेले गांव से कुछ दूर पश्चिम ‘जैतीपुर’ नामक एक गांव है. वहां एक छोटा सा बाजार है जो कि आस-पास के क्षेत्रों का प्रसिद्ध बाजार है. कुछ वर्ष पूर्व जैतीपुर बाजार में गैर कानूनी तरीके से बंदूकें बनायी जाती थीं. अच्छी-अच्छी अवैध बन्दूकों का निर्माण कर दूर-दराज के क्षेत्रों में भेजी जाता था, जिनका उपयोग ग्रामीण क्षेत्रों के लोग स्वरक्षा के लिए तो करते ही थे, साथ ही ये बंदूकें डाकुओं एवं आपराधिक तत्वों तक भी पहुंचती थीं. इन कारणों से ‘जैतीपुर’ कुख्यात हो गया था. उस ग्राम में इस्लाम को मानने वालों की संख्या कुछ अधिक है. अतः वहां मेहता जी को एक मुस्लिम भाई से घनिष्ठ मित्रता हो गई. उनका नाम मोहम्मद इब्राहिम था, जिन्हें मेहता जी हमेशा ‘इब्राहिम मियां’ कहकर सम्बोधित करते थे. ‘इब्राहिम मियां’ जी अपने मुस्लिम धर्म की पहचान के मुताबिक अर्थात् परंपरा के अनुसार लंबी-लंबी दाढ़ी रखते थे. वे आयुर्वेद औषघि का ज्ञान रखते थे, साथ ही कुछ औषधियों का निर्माण कर अपने-अपने गांव तथा आसपास के लोगों की चिकित्सा करते थे. इस प्रकार दोनों मित्र एक दूसरे से औषधियों के बारे में राय-मशविरा (विचार-विमर्श) करते. मोहम्मद इब्राहिम मियां के घर के दलान (बैठका) में बैठकर बात करते. इब्राहिम जी भी कभी-कभी इसलामपुर आते और मेहता जी से मिलते थे.

इधर मेहता जी यानी मेरे पिता जी इसलामपुर के संगत के पास माधो साव के मकान में जब रह रहे थे, तब उसी स्थान के पास ‘मंगलचन्द जैन’ के मकान में कमरा किराये पर ले लिया, जिसमें उनकी पत्नी देवी जी अर्थात् मेरी मां स्वतन्त्र रूप से कन्या विद्यालय चलाने लगीं. कुछ समय तक अध्यापन कार्य अकेले चलाती रहीं. फिर बाद में उनकी मंझली (दूसरी) ननद की बड़ी बेटी बिन्देश्वरी इनके यहां आयी, अतः वह भी इनके अध्यापन कार्य में सहयोग करने लगी, भगिनी बिंदेश्वरी सप्तम वर्ग उत्तीर्ण थीं, वे देवी जी की सेवा-सहायता एवं इनके अनेक गुणों से काफी कुछ सीखा. फिर इसलामपुर पक्की तालाब से पूरब में रहने वाली ‘रामप्यारी देवी’ रहती थीं, जो जाति से कहार (रमानी) थीं, उन्हें शिक्षिका कार्य के लिए बुला लिया. उनके पति गोपाल जी बालक मध्य विद्यालय के चपरासी थे. इस प्रकार देवी जी के स्वतंत्र विद्यालय में तीन शिक्षिकायें मिलकर कार्य करने लगीं. देवी जी ने विद्यालय में सिर्फ कन्याओं को ही प्रवेश की अनुमति दे रखी थी. एक बच्ची थी- जिसका नाम सरस्वती था. वे जाति की धोबी थी. अपनी मां की सबसे बड़ी पुत्री थी. उनकी मां अपनी पुत्री सरस्वती को प्रतिदिन स्वयं देवी जी के पास विद्याध्ययन के लिए पहुंचा देतीं, तथा अवकाश के समय स्वयं आकर घर ले जातीं. कुछ दिन यूं ही चलता रहा, अन्त में सरस्वती देवी की मां ने देवी जी से कहा- ‘मेरी बेटी (पुत्री) अब आपकी बेटी है.’ इसे अपने पास रखिये, सिखाइये, आपकी सेवा में रहेगी. देवी जी को उस बच्ची पर ममता हुई, और उसे साथ रखकर शिक्षा देने लगीं.

इस प्रकार समय चक्र चलता रहा. इसके बाद देवी जी के जीवन में चेचरी ननद (जो उनकी पुत्री समान है) जानकी आईं, वह उर्मिला की सगी छोटी बहन है, उस समय वह मात्र 4 वर्ष की रही होगी. देवी जी (अपनी भाभी जी से) शिक्षा ग्रहण करने आ गयीं. इसके बाद देवी जी की दूसरी अर्थात् मंझली ननद की पुत्री (बड़ी) बिन्देश्वरी जी मेरी मां-कुन्ती देवी की शरण में उनसे कुछ सीखने एवं उनकी सेवा करने आ गयीं. बाद में बिन्देश्वरी जी की सगी मंझली बहन बृंदा (बिन्दा) जी आयीं. इन दोनों बहनों की शादी इनके अभिभावकों ने बहुत छुटपन में ही कर दी थी. बिन्देश्वरी के पति शिक्षक थे. बिंदेश्वरी पढ़-लिखकर कुशल गृहिणी के साथ ही एक सफल शिक्षिका बनीं. परन्तु छोटी बहन बृंदा (बिंदा) कुछ माह तक इसलामपुर तथा बेले ग्राम में रहकर लौट गई- बराम सराय अर्थात् अपना मायके. कुछ समय बाद (माह) जब इनकी सगी मौसेरी बहन कुसुम कुमारी के विवाह में (1955 ई. में) सम्मिलित होने पुनः ननिहाल गांव-बेले आईं क्योंकि कुन्ती देवी जी की सगी भगिनी कुसुम का विवाह अपनी ससुराल बेले से ही सम्पन्न हुआ. हां तो, कुसुम कुमारी के विवाह में सम्मिलित होने के बाद से बिंदा अर्थात् 1955 ई. से अपने ननिहाल ग्राम बेले में रह गईं, तथा वहां घरेलू एवं कृषि कार्य में हाथ बंटाने लगीं. इन्हें बचपन से ही खांसी थी, जिसने बड़ी होने पर अर्थात् समय के साथ दमा रोग का रूप ले लिया.

इसलामपुर के इस नये मकान में आने पर उन्होंने आयुर्वेद की औषधियां निर्माण हेतु, हर प्रकार की जड़ी-बूटियों को इकट्ठा करना प्रारम्भ किया. उनको कूटने, पीसने एवं पकाने के लिए खल-मूसल एवं बड़े-बड़े लोहे के बर्तन आदि का प्रबन्ध किया, तथा इतने सब कार्यों को सम्पन्न करने के लिए कुछ सहयोगियों की आवश्यकता का अनुभव किया. अतः इन कार्यों को पूरा करने हेतु कई बच्चे एवं बच्चियों को अपने पास बुलाया, जिनमें कुछ बच्चे परिवार के थे, तथा कुछ बच्चे-बच्चियां दूसरी जाति एवं धर्म के भी थे. मेहता दम्पत्ति के स्वभाव, विचार को देखते हुए अपने बच्चों का भविष्य उज्जवल बनाने के लिए एवं मेहता दम्पत्ति की सेवा-सहायता हेतु कुछ बच्चों के माता-पिता या अभिभावकों ने स्वयं ही अपने बच्चों को इनके पास पहुंचा दिया. लड़के सब विद्या-अध्ययन करते तथा औषधियों के निर्माण में मेहता जी की सहायता करते एवं बच्चियां घरेलू कार्यों में देवी जी के साथ हाथ बंटाने के साथ विद्यालय जाकर अपना अध्यापन कार्य जारी रख देवी जी से अन्य ‘स्त्री शिक्षा’ प्राप्त करते हुए अपना जीवन उज्जवल बनाने में जुटी रहतीं.

किताब पढ़ें Amazon पर ऑर्डर करें: इसलामपुर की शिक्षा-ज्योति कुन्ती देवी

इस प्रकार मेरी मां (देवी जी) प्रतिपल बच्चियों की कठिनाइयों का ध्यान रखतीं एवं हर समस्या का समाधान बतातीं. इन सभी बच्चे-बच्चियों के कार्यों की कठिनाइयों, समस्याओं को दूर करने में देवी जी को काफी आनन्द मिलता. उदाहरण के तौर पर, वे अपने सभी बच्चों एवं सभी छात्राओं को हमेशा कहतीं कि हर छोटी-बड़ी वस्तुओं को यथास्थान रखनी चाहिए, अर्थात् किसी भी वस्तु या सामान को उसकी आवश्यकता के अनुसार वैसे स्थान पर रखो, जहां से आसानी से मिल सके (दीख सके). फिर उसको काम में लाने पर (उपयोग करने पर) पुनः उसी स्थान पर रखो, जहां से उठाया था, ताकि वह वस्तु हर किसी नये आगंतुक को भी दिशा बता देने पर (ढूढ़ने से) आसानी से मिल सके, और देवी जी स्वयं भी ऐसा ही करती थी, जिससे कम समय में आसानी से कोई भी वस्तु ढूंढी जा सके.

पुरुष शिक्षक का योगदान
कुंती देवी के ‘आर्य कन्या मध्य विद्यालय’में एक पुरुष शिक्षक का योगदान हुआ. वे बी.एससी. प्रशिक्षित विज्ञान शिक्षक के रूप में आये थे. वे गणित के अलावा विज्ञान विषय के भी अच्छे ज्ञाता थे. उनकी वाणी तथा व्यवहार (सबों के साथ) भी बड़ा मधुर था. वे किराये का कमरा लेकर इसलामपुर में रहने लगे. परन्तु विद्यालय चूंकि आरम्भ से ही सिर्फ कन्याओं का था, अध्यापन कार्य करने वाली भी सभी महिला ही थीं, और वे सभी गांवों की रहनेवाली थीं. अतः देवी जी की प्रबल इच्छा थी कि बी.एससी. के पद पर विज्ञान शिक्षिका अर्थात् महिला शिक्षिका का ही योगदान हो. परन्तु ऐसा नहीं हुआ, क्योंकि उस समय कार्यालय की सूची में बी.एससी. शिक्षिका पद के लिए किसी महिला शिक्षिका का नाम नहीं था. अतः पदाधिकारी को पुरुष शिक्षक को ही आर्य कन्या मध्य विद्यालय इसलामपुर में भेजना पड़ा. वैसे तो अरुण कुमार विद्यार्थी जी बी.एससी. प्रशिक्षित योग्य विज्ञान शिक्षक थे, इसलिए उन्हें छात्राओं को विज्ञान एवं गणित 7वां एवं 8वां वर्ग में अध्यापन कार्य हेतु कार्य-भार सौंपा गया. इसके साथ ही विद्यालय के कार्यालय संबंधी बाहरी कार्य भी बहुधा उनको ही करने के लिए कहा जाता. विद्यार्थी जी सभी कार्य पूर्णतः बखूबी निपटाते भी, फिर भी देवी जी उनके योगदान से भीतरी (हार्दिक रूप से) मन से प्रसन्न नहीं रहतीं. छात्राएं भी विद्यालय में अचानक पुरुष शिक्षक के आगमन से संकोच में रहतीं. उनके आगमन से पूर्व सभी वर्ग की छात्रायें, विशेषकर 7 व 8 वां वर्ग की छात्राएं निश्चिन्त होकर जलपान अवकाश में उछलकूद करतीं; विद्यालय प्रांगण में फुदकती-चहकती रहतीं. पर अब पुरुष शिक्षक पर दृष्टि पड़ते वे शरमा जातीं. वातावरण सामान्य होने में समय लगा. इसी तरह समय बीतता गया. इसके बाद एक और विज्ञान शिक्षक विनोद कुमार जी का योगदान हुआ. वे आई.एस.सी. प्रशिक्षित थे और हां, यहां पर एक बात ज्ञात करना आवश्यक है कि उस समय शिक्षक विभाग में नियम बनाया गया था कि हर कन्या विद्यालयों में एक या दो पुरुष शिक्षक का योगदान होना आवश्यक है, जो कि विद्यालय के बाहरी कार्यों को सुगमतापूर्वक निपटा सके, इन कारणों से भी आर्य कन्या मध्य विद्यालय की प्रधान अध्यापिका जी अर्थात् देवीजी को दो पुरुष शिक्षकों का योगदान स्वीकार करना पड़ा.

नवल कुमार फॉरवर्ड प्रेस के हिन्दी संपादक हैं.


लिंक पर  जाकर सहयोग करें . डोनेशन/ सदस्यता
आपका आर्थिक सहयोग स्त्रीकाल (प्रिंट, ऑनलाइन और यू ट्यूब) के सुचारू रूप से संचालन में मददगार होगा.
‘द मार्जिनलाइज्ड’ के प्रकाशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  पढ़ें . लिंक पर जाकर ऑनलाइन ऑर्डर कर सकते हैं: ‘द मार्जिनलाइज्ड’ अमेजन फ्लिपकार्ट
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016, themarginalisedpublication@gmail.com

स्त्रीकाल का नया अंक ऑनलाइन पढ़ें या घर मँगवायें

विशेष : #MeToo

इस अंक (#MeToo) में-
दीपांजना, सुधा अरोड़ा (Sudha Arora), जशवंत, अरविंद जैन (Arvind Jain Bakeelsab), विजय प्रसाद, शोएब दानियाल, नाइश हसन (Naish Hasan), , अमोल, सुशील मानव(Sushil Manav), मनोरमा, मेहरुन्निसा रेवा व सल्ला सरिओला, विजयलक्ष्मी सिंह ‘चंदेल’, मनोज, निवेदिता, प्रतिमा,नूर ज़हीर(Noor Zaheer), तोषी, रॉहिन कुमार, पल्लवी के थीम आलेख, पत्रकार विनोद दुआ के मामले में ‘दि वायर’ का पक्ष, आत्मकथांश, रमणिका गुप्ता, शरद जायसवाल(Sharad Jaiswal), पूजा तिवारी संदीप, मुक्ता साल्वे, अनुवाद सपकाले (संदीप मधुकर सपकाळे), अनिता भारती (Anita Bharti), के आलेख हेमलता महिश्वर(Hemlata Mahishwar), मेधा (Medha Medha), तहसीन मजहर(Tahsin Mazhar, प्रतिभा श्री, की कविताएं अफगानी कवयित्री नादिया अंजुमन की कविताओं का राजेश चन्द्र (Rajesh Chandra)द्वारा अनुवाद, और भूमिका द्विवेदी अश्क (Bhumika Dwivedi) तथा संजीव चंदन द्वारा स्मृतिलेख शामिल हैं.
कविताओं के साथ रेखाचित्र सोनी पांडे. कुछ आलेखों आ अनुवाद डा. अनुपमा गुप्ता ने किया है.

ऑनलाइन पढने के लिए लिंक क्लिक कर नॉटपर जायें :
स्त्रीकाल #MeToo

स्त्रीकाल घर मँगवायें लिंक क्लिक करें और द मार्जिनलाइज्ड पब्लिकेशन के वेबसाईट से ऑर्डर करें, सदस्य बनें : एक प्रति के लिए 25 रूपये शिपिंग चार्ज अलग से देना होगा
स्त्रीकाल घर मँगवायें ,
सदस्य बनें:

वे सब ऊंची जाति की हिन्दू सहेलियां थीं: मेरे मुसलमान होने की पीड़ा

नाइश हसन
सोशल एक्टविस्ट
संपर्क :naish_hasan@yahoo.com

डा. पायल तडावी अपनी तीन सीनियर डॉक्टर्स की प्रताड़ना के कारण आत्महत्या कर चुकी हैं. उनकी सांस्थानिक हत्या हुई है. ऐसी स्थितियां और भी अन्य समूहों की महिलाएं झेलती रही हैं. खुद जाति का बर्डन ढोती, अपने लिए ब्राह्मणवादी पितृसत्ता की व्यवस्था में उपेक्षित ऊंची जाति की महिलाएं अन्य जाति और धार्मिक पहचान वालों के साथ क्रूर और अमानवीय व्यवहार करती हैं. हम इस सीरीज में ऐसे अनुभवों को प्रकाशित कर रहे हैं. पहली क़िस्त में नाइश हसन के अनुभव. अप भी एक दलित, ओबीसी, आदिवासी, पसमांदा स्त्री के रूप में यदि यह झेल चुकी हैं तो अपने अनुभव हमें भेजें.

मेरा गाँव उत्तर प्रदेश के सुलतानपुर जिले में है, तियरी नाम है गाँव का। कर्मठ स्वतन्त्रता सेनानी मेरे बाबा नाज़िम अली का गाँव। आज से 30 बरस पहले पढाई का सफर उसी गाँव से प्रारम्भ किया था। शेख-सय्यदों का गाँव। ऊॅंची ज़ात का गुमान ब्राहमणों की तरह सय्यदों में भी खूब है। पढाई-लिखाई का सिलसिला चलता रहा, वो दौर जब बाबरी मस्जिद ढहा दी गई, मेरे रिश्तेदारों की लाशें बिछा दी गई , माहौल बहुत खराब होता चला गया। उसी सिलसिले में बात करने एक दिन मेरे विद्यालय में एक स्थानीय पत्रकार जगन्नाथ वर्मा आए। मेरा तर्क ये था कि अयोध्या को एक ऐसा स्थल बना दिया जाना चाहिए जहाँ हिन्दू और मुसलमान सभी आएं, उनके इबादतगाह भी हो , पर्यटन का केन्द्र भी हो, इससे हमारे आपसी झगडे ख़त्म हो जाऐगे। इस बयान का अखबार में छपना कि मुसलमानों की ओर से मुझ पर गालियों की बौछार होने लगी , हम भाई बहन डर सहम गए। एक तो लड़की होने के नाते दूसरा ऐसी प्रतिक्रिया। हमारा घर स्कूल से 14-15 किलोमीटर दूर था। साइकिल से आना जाना। हमेशा डर लगा रहता था किसी अनहोनी का। इस बयान पर हमारे माता-पिता को भी परेशान किया जाने लगा। तैश खाए मुसलमानों ने अखबार में माफी मांगने का दबाव बनाया कि हम कहें ये मस्जिद मुसलमानों की थी, है,और रहेगी-बस्स!! और कुछ भी नही!! हमें काफिर करार दिया गया। उम्र इतनी नहीं थी कि इस सियासत को समझ पाती। भला यही लगा कि झगड़ा समाप्त हो जाए, तो कह दिया। बहुत अपमानित हुई। मजहब बचाने वालों ने निशाने पर ले लिया। छोटी उम्र में एक विचार बना कि ये गाँव वाले बहुत दकियानूस होते है, शहरों में ऐसा नही होता, वहाँ लोग शिक्षित व खुले विचारों के होते हैं।

कुछ समय बाद शिक्षा के सिलसिले में लखनऊ आना हो गया। लखनऊ विश्वविद्यालय से एम0फिल0 किया फिर कुछ दिनों बाद एक महिला अधिकार संगठन में नौकरी कर ली। यहाँ आकर यह भरम धराशाई हो गया कि हम भी ऊॅंची ज़ात वाले हैं । यूं कहूँ तो एक एहसास-ए-कमतरी ने घेर लिया। यहाँ सिर्फ मुसलमान नाम होना काफी था एक विशेष प्रकार से देखे जाने के लिए। एक दिन मेरी एक हमउम्र सहकर्मी ने यूं ही हॅंसते-हॅंसते किसी की बात बताई और उसे मुसल्टा (मुसलमान) कह कर सम्बोधित किया । इसके फौरन बाद उसने मेरी ओर पलट कर देखा, दोबारा उपहास मिश्रित हॅंसी के साथ बोली , वैसे तुम लोग भी हिन्दुओं को किसी न किसी नाम से पुकारते ही होगे! उसमें जरा भी अपराधबोध नही था, वो एक के ऊपर एक पैर रखे उसे धीरे-धीरे हिला रही थी, और ऐसे हॅंस रही थी जैसे किसी कला फिल्म की नायिका अपना दोहरा किरदार निभा रही हो। उसे ये एहसास भी नही हुआ कि उसके कलेजा चीर देने वाले शब्दों से मेरे अन्दर कितना कुछ टूट बिखर गया है। मुझे हिन्दू मित्रों को किस उपनाम से पुकारना है ये मेरे परिवार ने कभी नहीं सिखाया था। मैं उसे क्या जवाब देती, स्वतन्त्रता सेनानी की पोती थी, क्रान्ति की बातें बचपन से सुनकर मन क्रान्किारी ही था। अपमानित सा मुहं लिए वहां से उठ गई। ये मेरे साथ शहर आने के बाद पहला वाकया था जिसने खुले विचारों की पूर्वधारणा को तोड़ना आरम्भ किया था।

ऐसा मौका कई बार आया जब मेरी एक अन्य सहकर्मी (ब्राहमण) साथ खाना खाने से कतराती रहती थी, कभी खा भी लेती तो मेरे डब्बे से एक निवाला भी न चखती। ये सिलसिला लम्बा चलता रहा। कष्ट किसी को नही था इस बात से, सिवाय मेरे। वक्त गुज़रता गया। दिल की बात जुबान तक आने में ज्यादा वक्त नही लगा। एक दिन उसने कहा गुरूदेव कहते हैं, जैसा खाओगे अन्न वैसा होगा मन….। गायत्री परिवार के श्रीराम शर्मा की भक्ति के शब्द थे ये। यानि मेरे बिना कुछ बताए पूछे ही वह निष्कर्ष पर पहुचं गई थी कि मुसलमान का अन्न और मन कैसा होता है। मैं निरूत्तर हो गई कि ये अन्तर्यामी लोग अपने आप सबकी कुण्डलियाँ देख चुके हैं.मेरे अन्दर पता नही क्या क्या होने लगा था। क्या करती रहना तो यहीं था। अपने मन को समझाती रही जितना समझा सकती थी ।

पढ़ें:सांस्थानिक हत्या की सनातन परम्परा: शंबूक से लेकर डा.पायल तक

मेरे मित्रों ने कई बार बड़ी बेबाकी से मुझसे ये बात कही है ”तुम मुसलमान हो, पर लगती बिल्कुल नहीं हो।’ इस बात पर कई बार मै मुस्कुरा दी , पर कई बार मेरी भी ज़बान में कडवाहट घुल गई । रोज-रोज इन बेहूदा सवालों से दो चार होती रही, कई बार ह्दय को चीरती उनकी व्यंज्ञात्मक मुस्कान भी बहुत सी अनकही बातों का भी उत्तर दे देती थी। मेरी जिज्ञासा अब ये जानने में हो गई थी कि मुसलमान कैसे लगते हैं । हमारा स्कूल एक, कॉलेज एक फिर मेरे साथ पढी लड़कियों में और मुझमें क्या फर्क है, ये मुझे कभी पता ही नही चला। पर न जाने कौन सा फर्क उनकी जांचती निगाहें ढूँढती रही । यह एक बहुत कॉमन सवाल रहा जिसे अनेको बार अनेको जगहों पर मुझसे पूछा गया। बात ये है कि मै तो लगना चाहती हूँ वही मुसलमान, जिसकी मेरे अज़ीज़ साथियों के मन में तस्वीर है, उनसे जानने की इच्छा भी है कि हमें कैसा लगना चाहिए। अगर वो हमें समझा सकें।

जल्दी ही मैने देखा कि उच्च जाति की इन लडकियों का एक गुट बन गया दफ्तर में। उनके बीच मुसलमानों को लेकर खराब चर्चाएँ आम हो गई। गाँव से शहर आने के बाद मैंने पहली बार मुसलमानों के लिए कटुआ शब्द यहीं सुना था। एक लड़की जिसके पिता आरएसएस का सरस्वती शिशुमन्दिर स्कूल चलाते थे, आर्थिक रूप से काफी सम्पन्न परिवार से थी। संगठन की मुखिया को कई बार विचारधारा के बारे में आगाह किया परन्तु उसका अमीर होना उसकी योग्यता में शामिल था, जो गाहे-बेगाहे असर भी छोडता था। मुसलमानों के खिलाफ घोर कट्टरवादी माहौल में पली लड़की की रग-रग में नफरत भरी हुई थी। बैलेन्स बनाना अब बिल्कुल असम्भव लगने लगा था। एक दिन मैने उससे कहा तुम्हारी शक्ल मेरी एक रिश्तेदार से मिलती-जुलती है, इस बात से ही वह धृणा से भर गई , बोली, भक और नफरत भरी हॅंसी हॅंसने लगी मानो कह रही हो किसी मुसलमान से उसकी शक्ल की तुलना करने की मेरी जुर्रत कैसे हुई। सास बहू धारावाहिकों में नागिन जैसी भूमिकाओं में दिखाई जाने वाली औरतें घरों के भीतर ही नही, दफ्तरों में भी होती है जो बॉस को खुश रखना खूब जानती है। कोई मुसलमान औरत दफ्तर में सर से दुपटटा ओढ़ कर आ जाए तो उसे कहा जाता था ये इनके यानी मेरे लोग है। हाँ ऊपर-ऊपर सब लोग सेक्युलर, मुसलमान प्रेमी होने का अच्छा खासा ढोंग रचते थे, जिसे बाहर से देखने वाला भांप भी नही सकता था।

नौकरी एक मजबूरी थी, घुटन बढती जा रही थी, खुदकशी करने का सवाल हावी होता जा रहा था, घर वाले भी मेरी पीड़ा को समझ नही पा रहे थे, हर रोज ये विचार हावी होता चला जा रहा था, एक दिन सोचा आज दफ्तर में ही जान दे दुगी । इतना अपमानित महसूस करती थी कि सुबह उठकर दफ्तर जाने का इरादा भी मुझे डराने लगा था। एक स्वतन्त्रता सेनानी की पोती थी , क्रान्ति की बातें बचपन से ही सुनती रहती थी, मन भी क्रन्तिकारी ही था, लेकिन जिस माहौल में जवानी में कदम रखा उसके साथ मेरा तालमेल ही नहीं बैठ पा रहा था। मेरी सेहत भी गिरती जा रही थी।
सवालों को छोटा बताकर कई बार चुप कराने की चेष्टा हुई । ये छोटे सवाल नहीं है। ये गम्भीर कलेजा कुतरने वाले सवाल हैं। किसी परिस्थिति को देखकर कुछ कहना और उसे जी कर कुछ कहना दोनों में बड़ा फर्क होता है। इन सवालों को जीने की पीड़ा बड़ी गहरी होती है। इन सवालों को तथाकथित महिला अधिकार के पैरोकारों के सामने उठाने पर ज्यादातर को यही लगा कि मै सवाल ज्यादा ही करने लगी हूँ ये मेरी गुस्ताख़ी है, पर सवाल तो वही ज्यादा करता है जिसके हिस्से में संघर्ष ज़्यादा होता है। जिसे छोटी छोटी चीजों के लिए बेजा परेशानियों से दो चार होना पड़ता है। मुझे अपने राष्ट्र प्रेम को भी बहुत बार साबित करना पड़ा था।


मेरी गुरू बहनों ने महिला मानवाधिकार के जो मूल्य हमें सिखा दिए थे वो मेरे भीतर बडे़ गहरे बैठ गए उससे इतर जाने का कभी सोचा ही नहीं, लेकिन मुस्लिम की पहचान उनके चश्मे से क्या दिखती है, खुले आम गिनाते मेरी सहकर्मी बहनों को भी कभी गुरेज नही हुआ। न आंखों की शर्म न जुबान पर लगाम। हम तो बहनापे का दर्द बांटने आए थे, उसे मजबूत बनाने, हमे पता ही नहीं था की हमारे बहनापे के दरमियान भी गहरी मोटी लकीरें है। जो हमें हिन्दू मुस्लिम के अलग-अलग खानो में ही रखती हैं. इसके पीछे वजह जो मुझे नजर आती है वो ये कि भारत में महिला आन्दोलन के झण्डाबरदारों में ज्यादातर उच्च वर्ग व उच्च कही जाने वाली हिन्दू जातियों से आई महिलाएं थीं और हैं। जो ऐतिहासिक तौर पर अप्रत्यक्ष रूप से शोषणकारियों का ही वर्ग रहा है। जिन्होंने कठिनाइयों पर चर्चा तो की है पर उसे जिया नही है। तो अन्जाम ये हुआ कि वो यहां भी उसी जमात में शामिल रहीं । इस लिए अन्तः कलह व द्वन्द काफी नज़र आया जिसे सामान्य होने में अभी नस्लें खत्म होंगी। जब तक कि पीड़ित वर्ग मज़बूती से लामबन्द नहीं हो जाता। जब तक आप कोई घाव न दिखा पाएं तब तक आप की पीड़ा को बहुत कम आंकता है ये समाज , लेकिन कुछ तकलीफों में हम आप कोई घाव नहीं दिखा सकते फिर भी भीतर की दुनिया के हजार टुकड़े हो चुके होते है। बदलते तो गाँव शहर है हम, विचार तो हमारे साथ-साथ ही सफर करते है। वो तो ऐसे ही चिपके रहते हैं जब तक कि हम उन्हें झटक कर फेंक न दें। हमें तय करना होगा किसी की उच्छृंखलताकी हद तक आज़ादी किसी के लिए घुटन न बन जाए।

कहते हैं कभी-कभी तो बुरे हादसे भी इंसान को बिगाड़ने के बजाए सम्हाल देते है। मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। जेहनी जद्दोजेहेद जारी रही , मन में घोर उथल-पुथल चल रहा था। बस एक दिन झटके में बिना किसी पूर्व योजना के इस्तीफा देने का इरादा पक्का हो गया। उसके बाद मुसलमान औरतों के साथ बहुत जमीनी स्तर पर काम करना प्रारम्भ किया, उनकी रोजी रोटी तालीम के सवाल उठाना प्रारम्भ किए, मुझे ऐसा लगा जैसे मै जी उठी, बहुत आत्मबल और ऊर्जा मिली उस इस्तीफे से, उस घुटन भरे महिला अधिकार संगठन से बाहर आकर। जिन्दगी जीने का नजरिया बदल गया। खूब पढाई की, खुद को समय दिया, उसके बाद मुस्लिम समाज के कट्टरवाद और शरीया कानून पे जो वार किया तो कोई आलिम, फाजिल, मौलवी, मौलाना हमें हरा नही सका। मज़हबी तंजीमों को झकझोर कर रख दिया।

इस काम में मेरी सबसे ज्यादा मदद की थी डा0 असगर अली इंजीनियर ने। मुस्लिम महिलाओं की आवाज को मजबूती देने में तथाकथित सधे हुए एनजीओ से कही बहुत ज्यादा बडी भूमिका निभाई। राह में बहुत सी दुश्वारियां आई जब औरत के सामने औरत खडी कर दी गई उसे नेस्तोनाबूद करने के वास्ते, आतिश पर कदम रखने पड़े , लेकिन मेरी भूमिका को कभी नकारा नही जा सकता। जिसका असर आज दिखाई भी दे रहा है। डा0 पायल तुम तो मेरी ही तरह थी, मेरे ही जैसा अपमान सहती थी। तुम घबराकर खुद में क्यों सिमट गई। तुम्हें अपमान सहकर अपने पंख और फैला लेने चाहिए थे। एक बड़ी लाइन भी तो खींचना था। तुम्हें हारना नही था इसका इलाज हम तुम जैसे लोग ही कर सकते है। सावित्री बाई फुले भी अगर यूं ही अपमान सह कर मर गई होती, ताराबाई शिन्दे ने भी अगर खुदकुशी कर ली होती तो क्या हम तुम यहां तक पहुचते जहांतक पहूंच पाए ! नही! शायद कभी नही! ये सफर लम्बा है , ऐसे ब्राह्मणवादी , मनुवादी चेहरे हमारे सामने आते रहेंगे हमें डराते रहेंगे, हमारा उपहास करते रहेंगे, लेकिन मजहबी हदबन्दियांको तोड़़ते हुए इन्ही कांटों भरी राह में ही हमें अपना रास्ता निकालना होगा। तभी एक नई दुनिया मुमकिन हो पाएगी।


सांस्थानिक हत्या की सनातन परम्परा: शंबूक से लेकर डा.पायल तक

हेमलता महिश्वर
जामिया मीलिया इस्लामिया में हिंदी की प्रोफेसर , कविता,
कहानी और आलोचना में समान और सशक्त गति. संपर्क:hemlatamahishr
@gmail.com

मुम्बई के नायर हॉस्पिटल में डॉ पायल तडावी की आत्महत्या को सांस्थानिक हत्या बताते हुए उच्च शिक्षा में जाति-घृणा को ऐतिहासिक संदर्भों में देख रही हैं प्रोफेसर हेमलता महिश्वर:

मैंने कहीं पढ़ा कि “व्हाटसऐप ग्रुप में उसकी जाति को लेकर मजाक उड़ाया जाने लगा, उसकी लैब में उसे काम करने से रोका जाने लगा, उसकी योग्यता पर सवाल किया जाने लगा, उसके इलाज से मरीजो के अशुद्ध हो जाने की बात की जाने लगी, उसके आदिवासी होने ने उसे जंगली की श्रेणी में रख दिया, खाने की टेबल पर उसे इस तीनो सवर्ण इलीट महिलाओं ने गॉशिप पॉइंट बना दिया।”

डॉ पायल तडावी, वी वाई एल नायर हॉस्पिटल से संबद्ध टोपीवाला नेशनल मेडिकल कॉलेज, मुंबई में स्नातकोत्तर की पढ़ाई कर रही थीं। गॉयनेकोलॉजी विभाग में काम करना मतलब 48-72 घंटे लगातार काम करना। इन मेडिकोज़ को कंघी-चोटी की फ़ुरसत नहीं मिलती तो किसी और बात की तो सोचना ही क्या? मेरे घर से एक बच्ची गॉयनी में पीजी कर रही है। एक बार एक ही रात में बीस सीज़र और अट्ठारह नॉर्मल डिलवरी करवाई। ऐसा इन लोगों के साथ अक्सर होता है। इन मेडिकोज़ के लिए कोई मानवाधिकार की आवाज़ तो उठाए। ऐसी सघन व्यस्तता में सीनियर्स जाति का ध्यान रखे हुए हैं तो सोचिए कि कितनी बजबजाती हुई मानसिकता है जबकि वे मेडिकल कॉलेज के विद्यार्थी हैं, गॉयनी विभाग के विद्यार्थी हैं। बच्चे के पैदा होने के कारण की समूल जानकारी रखते हैं और फिर भी जाति व्यवस्था पर यक़ीन करते हैं। कैसा विरोधाभास है यह? यह इलीट वर्ग धर्म की जकडबंदी से ख़ुद को मुक्त नहीं कर पाया। अस्पृश्यता तो अब तक अंत्यजों के साथ होती रही, आदिवासी को भी लपेट लिया गया, यह नया है। यह इलीट वर्ग की बौद्धिक चेतना का चमत्कार है कि वे आदिवासियों के साथ भी छुआछूत बरत सकते हैं। अस्पृश्यता का विस्तार करते जा रहे हैं। मरीज़ को तो ईलाज़ से मतलब होता है, उसे चिकित्सक की जाति से क्या लेना-देना? पर ये असुरक्षित भावना से घिरे दयनीय इलीट वर्ग के लोग अपने व्यवसाय की अनिवार्य मानवता से जैसे अंजान हैं।

बायें पल्लवी तडावी, दायें सीनियर डॉक्टर्स जिनपर पल्लवी की प्रताड़ना का आरोप है

जब कभी भी आरक्षण को लेकर विरोध उठा है, एम्स के डॉक्टर्स ने सड़कों पर झाडू लगाई है। क्या संदेश देना चाहते हैं वे? वंचित समुदाय के लोग शिक्षा प्राप्त करेंगे तो इनके हाथों में झाड़ू ही क्यों आएगी? सड़कों में झाड़ू लगाने का एकमात्र ठेका क्या सिर्फ वंचित समुदाय का है? काम को लेकर इतना अपमान-बोध इनके भीतर क्यों है? ये तो भाग्यवादी हैं, इनके भाग्य से भला कौन क्या छीन लेगा? ये लोग डरते हैं कि कहीं अध्ययन के पश्चात् यह वंचित वर्ग हमें ही प्रतियोगिता में न ले आए। इसलिए धूर्ततापूर्वक इन लोगों ने वंचितों से शिक्षा का अधिकार ही छीन लिया।
क्या राम कथा के शंबूक वध की याद नहीं दिलाते हैं? जैसे ही कोई शूद्र तपस्या करेगा, वैसे ही ब्राह्मण का बेटा मरेगा। क्या है इस दृष्टांत में? ब्राह्मण स्वंय को सदा-सदा के लिए प्रतियोगिता से परे रखना चाहता है। अध्ययन-अध्यापन को सिर्फ़ अपने साथ ही सुरक्षित रखने का मतलब है, किसी और को इलीट क़िस्म का धोखा देते रहना। शबरी पूरी श्रद्धा के साथ, अंध-श्रद्धा के साथ जूठे बेर भी खिलाए तो मंज़ूर है क्योंकि अंध-श्रद्धा सत्ता के लिए चुनौती कभी नहीं बनती। पर शंबूक का तपस्या करना मतलब ज्ञान प्राप्त करते हुए योग्यता अर्जित करना तो सत्ता के लिए चुनौती होगा ही न! एक सेवक यदि ज्ञान प्राप्त कर लेगा तो वह सदियों से थोपे जा रहे शास्त्रों को सवाल के घेरे में ले आएगा। इसलिए इनकी भाषा में शंबूक का वध होता है, हत्या नहीं, गांधी-वध होता है, हत्या नहीं। शंबूक केवल सेवा के लिए है, ज्ञान प्राप्तकर सवाल करने के लिए नहीं। इसलिए क्षत्रीय राम ब्राहमण नामक नीति निदेशक की रक्षा के लिए शंबूक वध करते हैं। ब्राह्मण सत्ता को नियंत्रित करता है और क्षत्रीय उसके निर्देशन में सत्ता को संभालता है। यह सदियों से चला आ रहा है। और आज औद्योगिक समाज भी इसे तोड़ नहीं पा रहा है।

पढ़ें:कभी सूख नहीं पायेंगे रोहित वेमुला की माँ के आंसू

भारत में जिस तरह का विरोध अंग्रेज़ों का हुआ, मुग़ल या अन्य बाहर से आए हुए शासक का नहीं हुआ, क्यों? मुग़लों ने हिंदू व्यवस्था पर चोट नहीं की थी। अंग्रेज़ों ने हिंदू व्यवस्था को चरमरा दिया था। स्त्री शिक्षा, दलित वर्ग की शिक्षा ने हिंदू धर्म शास्त्रों की धज्जियाँ उड़ा दी। सती-प्रथा पर क़ानूनी रोक लग गई, लड़कियों के लिए पाठशालाएँ आरंभ हुईं, ज्योतिबा फुले का सामाजिक संघर्ष अंग्रेज़ी शिक्षा की बदौलत परवान चढ़ा। डॉ अम्बेडकर ने हिंदू धर्म की पहेलियों को समझने का प्रयास करते हुए उसका त्याग किया। यहीं से शक्ति प्राप्त करते हुए स्वतंत्र भारत के वंचित समुदाय ने नागरिक होने की हैसियत प्राप्त करते हुए अपने सतत हो रहे अपमान के बदले सम्मान प्राप्त करने के लिए संघर्ष करना आरंभ किया। अभी तो प्रथम वर्ग में पहली – दूसरी पीढ़ी ने कदम रखा ही है कि ये सदियों से सम्मान पर कुंडली मारे बैठे लोग इस संघर्ष को धूल धूसरित करने में लग गए हैं।

डॉ पायल रोहित वेमुला की तरह ही सांस्थानिक हत्या का शिकार हुई हैं। हम सब यह जानते हैं कि मेडिकल कॉलेज की पढ़ाई कितनी कठिन है? फिर मेडिकल पीजी की प्रवेश परीक्षा कठिनतम है। ऐसे में मुंबई जैसे महानगर के मेडिकल कॉलेज में पढने का मतलब है विद्यार्थी बहुत मेहनती रहा है। डॉ पायल तडावी तो आदिवासी बताई जाती हैं। वहॉं से तो तथाकथित सभ्य समाज तक की यात्रा और भी कठिन, दुरुह रही होगी। मेडिकल कॉलेज में सामान्य कॉलेज की तरह आपके पास अपनी जाति को छुपाने का कोई रास्ता नहीं होता। यहाँ जातियां जग – ज़ाहिर होती हैं। और इलीट वर्ग के हाथों में जैसे हथियार आ जाता है। इनकी ज़ुबान फ़ोरसिप (एक तरह का चाकू जिससे मांसपेशी की पतली से पतली परत काटी जा सकती है) की तरह हो जाती हैं। मन को बहुत महीनता के साथ परत-दर-परत छीलने लगती हैं। लहू-लुहान होता हुआ मन पीड़ित के चेहरे पर जैसे-जैसे दिखाई देता है, वैसे-वैसे इनका प्रहार बढ़ता चला जाता है। अंत में इनकी फ़ोरसिपी ज़बान पीड़ित की हत्या कर देती है और ये पीड़क उसे आत्म हत्या का नाम देते हैं। डॉ पायल तडावी भविष्य में क्या कुछ नहीं कर सकती थी, सारी संभावनाएँ समाप्त हो गईं।

रोहित वेमुला तो आम्बेडकरी चेतना से लैस था फिर भी सांस्थािनक हत्या का शिकार हुआ। यह जानने के बावजूद मैं समस्त समाज से अपील करना चाहती हूँ कि वे अपने बच्चों को डॉ आम्बेडकर, ज्योतिबा फुले की जीवनी और विचार से अनिवार्यत: परिचित करवाएँ। यही अपील मैं वंचित वर्ग के अध्यापकों से भी करती हूँ कि वे अपने प्रत्येक विद्यार्थी, चाहे वे दलित हों या गैर दलित, आदिवासी, स्त्री, पुरुष सबको इनके कामों से परिचित करवाएँ और सभ्य समाज बनाने की दिशा में अपना अमूल्य योगदान दें ताकि हेमा आहूजा, भक्ति महर और अंकिता खंडेलवाल जैसी सिनिक सीनियर्स पैदा ही न हों।

सरकार की ज़िम्मेदारी बनती है कि समाज में ऐसी नफ़रतों को रोकने के लिए ऐसे जातिवादियों को कड़ी से कड़ी सज़ा दे ताकि कोई और रोहित वेमुला, डॉ पायल तड़वी सांस्थानिक हत्या का शिकार न हो।

सोनिया गांधी, स्मृति ईरानी, प्रज्ञा ठाकुर सहित नई लोकसभा में रिकॉर्ड 78 महिला सांसद

30 मई को संसद में शपथ लेने वाले 542 सांसदों में से 78 महिला सांसद शपथ लेंगी. यह संख्या 1952 के बाद अबतक महिला प्रतिनिधित्व की सबसे बड़ी  संख्या है ,  चुनी गयी 78 महिला सांसदों में उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल की संख्या ग्यारह-ग्यारह है, यानी इन दो राज्यों से चुनी गयी कुल महिला सांसदों में लगभग 30%का प्रतिनिधित्व है.

देश भर से कुल 724 महिला उम्मीदवारों ने चुनाव लड़ा, जिसमें कांग्रेस ने सबसे अधिक 54 महिलाओं को मैदान में उतारा, जबकि दूसरे नम्बर पर रही भाजपा जिसने 53 महिलाओं को टिकट दिये। 14 फीसदी से अधिक महिला सांसदों के साथ, 17 वीं लोकसभा में सबसे ज्यादा महिलाएं होंगी।

16 वीं लोकसभा में 64 महिलाएं जीती थीं, जबकि 52 महिलाएं 15 वीं लोकसभा के लिए चुनी गईं। 16वीं लोकसभा में सोनिया गांधी, हेमा मालिनी और किरन खेर सहित 41 महिला सांसदों में से 27 ने इन लोकसभा चुनावों में अपनी सीटों को बरकरार रखा, हालांकि स्मृति ईरानी और प्रज्ञा ठाकुर ने अपेक्षाकृत अपने अधिक प्रसिद्ध प्रतिद्वंद्वियों पर जीत के साथ ज्यादा ध्यान खींचा है। प्रज्ञा ठाकुर अपने उग्र हिन्दुत्ववादी विचारों और गतिवधियों के कारण भी सुर्खियों में रही हैं.

ईरानी एक  जायंट किलर के तौर पर सामने आयी हैं उन्होंने अमेठी में राहुल गांधी को हराकर एक ऐतिहासिक जीत दर्ज की। संसद में प्रवेश करने वाले अन्य प्रमुख नाम तमिलनाडू से कनिमोझी करुणानिधि और भाजपा की रीता बहुगुणा हैं, जो उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद निर्वाचन क्षेत्र से जीती हैं।

यह भी पढ़ें: महिला राजनेताओं की सेक्सुअल ट्रोलिंग को रोक सकती है राजनीतिक जागरूकता

अन्य दलों में, बहुजन समाज पार्टी (BSP) ने 24 महिला उम्मीदवार, अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस (AITC) 23, CPI (M) 10, CPI चार, जबकि राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) ने एक  उम्मीदवार मैदान में उतारा।

222 महिलाओं ने स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ा। संसदीय चुनावों में कुल 8,049 उम्मीदवार मैदान में थे। चार ट्रांसजेंडर उम्मीदवारों ने स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ा, जबकि AAP एकमात्र पार्टी थी जिसने एक ट्रांसजेंडर उम्मीदवार को मैदान में उतारा। लेकिन सभी ट्रांसजेंडर उम्मीदवार चुनाव में हार गए। सबसे अधिक महिला उम्मीदवार उत्तर प्रदेश से 104 सीटों  पर मैदान में उतरीं, उसके बाद महाराष्ट्र में उनकी संख्या बड़ी रही। तमिलनाडु में 60, बिहार में 55 और पश्चिम बंगाल में 54 महिला उम्मीदवार मैदान में थीं।

14 वीं लोकसभा में 52 महिला उम्मीदवार जीतीं, 13 वीं लोकसभा में 52 महिला उम्मीदवार जीतीं, 12 वीं लोकसभा में 44 महिला उम्मीदवार जीतीं, 11 वीं लोकसभा में 41 महिला उम्मीदवार जीतीं। 10 वीं लोकसभा में 42 महिला उम्मीदवार जीतीं। 9 वीं लोकसभा में 28 महिलाएं थीं जबकि 8 वीं लोकसभा में 45 महिला सांसद थीं। इससे पहले तीसरी लोकसभा में अधिकतम 37 महिलाएं जीती थीं। पहली और दूसरी लोकसभा में 24 महिला सांसद थीं.

यह भी पढ़ें: महिलाओं को संसद में होना ही चाहिए : वेंकैया नायडू

ये हैं 78 महिला सांसद:

पश्चिम बंगाल
मिमी चक्रवर्ती, जादवपुर – एआईटीसी
अपरूप पोद्दार, आरामबाग – AITC
लॉकेट चटर्जी, हुगली – AITC
प्रतिमा मोंडल, जयनगर – एआईटीसी
सजदा अहमद, उलुबेरिया – एआईटीसी
सौगत रॉय , दम दम – एआईटीसी
काकोली घोष दस्तीदार, बारासात – AITC
माला रॉय, कोलकाता दैनिक – एआईटीसी
महुआ मोइत्रा, कृष्णानगर – एआईटीसी
देबोश्री चौधरी, रायगंज – भाजपा
नुसरत जहाँ रूही, बशीरहाट – एआईटीसी
शताब्दी रॉय (बनर्जी), बीरभूम – एआईटीसी

उत्तर प्रदेश
अनुप्रिया पटेल, मिर्जापुर – अपना दल
सोनिया गांधी, रायबरेली – आईएनसी
संघमित्रा मौर्य, बदायूं – भाजपा
केशरी पटेल, फूलपुर – भाजपा
स्मृति ईरानी, अमेठी – भाजपा
हेमा मालिनी, मथुरा – भाजपा
मेनका गांधी, सुल्तानपुर – भाजपा
रीता बहुगुणा जोशी, प्रयागराज – भाजपा
निरंजन ज्योति, फतेहपुर – भाजपा
रेखा वर्मा, धौरहरा – भाजपा
संगीता आजाद, लालगंज – बसपा

महाराष्ट्र
पूनम महाजन, मुंबई उत्तर मध्य – भाजपा
हीना विजयकुमार गावित, नंदुरबार – भाजपा
भावना गवली, यवतमाल-वाशिम – शिवसेना
भारती प्रवीण पवार, डिंडोरी – भाजपा
सुप्रिया सुले, बारामती – एनसीपी
प्रीतम मुंडे, बीड – बीजेपी
रक्षा खडसे, रावेर – भाजपा
नवनीत राणा, अमरावती – स्वतंत्र (राकांपा समर्थन)

ओडिशा
अपराजिता सारंगी, भुवनेश्वर – भाजपा
संगीता कुमारी सिंह देव, बोलनगीर -बीजेपी
प्रतिमा बिसोई, अस्का – भाजपा
राजश्री मल्लिक, जगतसिंहपुर – बीजेडी
मंजुलता मंडल, भद्रक – बीजद
चंद्रानी मुर्मू, क्योंझर – बीजेडी

गुजरात
भारती बेन शियाल, भावनगर – भाजपा
गीताबेन राठवा, छोटा उदयपुर – भाजपा
पूनमबेन मादम, जामनगर – भाजपा
दर्शन जरदोष, सूरत – भाजपा
रंजनबेन भट्ट, वडोदरा – भाजपा
शारदाबेन अनिलभाई पटेल, महेसाणा – भाजपा

आंध्र प्रदेश
चिन्ता अनुराधा, अमलापुरम – YSCRP
गोडेटी माधवी, अरुकु – वाईएससीआरपी
वंगा गीथविस्वनाथ, काकीनाडा – YSCRP
बीसेती वेंकट सत्यवती, अनकपल्ली – वाईएससीआरपी

मध्य प्रदेश
प्रज्ञा सिंह ठाकुर, भोपाल – भाजपा
संध्या रे, भिंड – भाजपा
रीति पाठक, सीधी – भाजपा
हिमाद्री सिंह, शहडोल – भाजपा

छत्तीसगढ़
ज्योत्सना महंत, कोरबा – आईएनसी
गोमती साई, रायगढ़ – भाजपा
रेणुका सिंह, सरगुजा – भाजपा

बिहार
रमा देवी, शेहर – भाजपा
वीणा देवी, वैशाली – एलजेपी
कविता सिंह, सीवान – JD (U)

राजस्थान
रंजीता कोहली, भरतपुर – भाजपा
जस कौर मीणा, दौसा – भाजपा
दीया कुमारी, राजसमंद – भाजपा

तमिलनाडु
कनिमोड़ी करुणानिधि, थूथुकुडी – डीएमके
तमिळची तंगपांड्यन (सुमति), चेन्नई साउथ – डीएमके
ज्योतिमणि सेनिमलाई, करूर – आईएनसी

कर्नाटक
सुमलता अम्बरीश, मांड्या – निर्दलीय (भाजपा समर्थन)
शोभा करंदलाजे, उडुपी चिकमगलूर – भाजपा

झारखंड
अन्नपूर्णा देवी, कोडरमा – भाजपा
गीता कोरा, सिंहभूम- आईएनसी

त्रिपुरा
प्रतिमा भौमिक, त्रिपुरा पश्चिम – भाजपा

हरियाणा
सुनीता दुग्गल, सिरसा – भाजपा

मेघालय
अगाथा के संगमा, तुरा – एनपीपी

असम
रानी ओझा, गौहाटी – भाजपा

केरल
राम्या हरिदास, अलठुर – आईएनसी

पंजाब
प्रनीत कौर, पटियाला – आईएनसी

तेलंगाना
मलोथ कविथा, महबूबबाद – टीआरएस

उत्तराखंड
माला राज्य लक्ष्मी शाह, टिहरी गढ़वा – भाजपा

साभार: द इकोनोमिक टाइम्स और अन्य ऑनलाइन स्रोत

स्वागत है ‘सरकार’: ‘न्यू इंडिया’ की औरतें

हम नये भारत ‘न्यू इंडिया’ की गौरवशाली, परंपरा-निष्ठ, संस्कृति के प्रति समर्पित औरतें आपका स्वागत करती हैं मेरे ‘सरकार’:

मैं अमर बेल को गाली नहीं देता और अन्य कविताएं (कवि:एस एस पंवार)

मैं अमरबेल को गाली नहीं देता

एस.एस.पंवार
आजकल, कथेसर एवं दस्तक, कथा समय सहित विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कविताएं और लेख प्रकाशित।
संपर्क- 9017738638

मुझे तमाम लड़कियों की आंखें तुम्हारी बेटी जैसी लगती हैं
जिनमें उदासियां दर्ज हैं
डरी हुई लम्बी यात्राओं की,
नक़्शे की तरह खौफ़ की सख़्त जमीनें अंकित है
जिनकी आँखों के पथरीले सुर्ख़ धरातल पर

नई उड़ानों में परों के नोच दिए जाने
बिखरने, टूटने का सहमापन
गिर जाने हतोत्साहन
और समंदर के मटमैले से
बेरंग हो जाने का मनहूस ख़ौफ़
बार-बार डरा रहा हो जिसे,

वो खौफ़ जिसकी वजह से
बगीचे सीख जाते हैं हिटलरशाही,
गुलाबों का खिलना जहां कोई रिवाज नहीं
हुक्म होगा महज सत्ताओं का,
पेड़ों का स्वभाव जहां इनकार कर सकता है
लताओं को प्रश्रय देने से

मुझे लगता है कभी-कभी
मुल्क की तमाम किशोर लड़कियों की आंखें उस खौफ़ से भर गई हैं
जो खौफ़ सड़क के दो किनारों पर खड़े होकर
प्रेम में डूबे दो वृक्षों में होता है
किसी ऊंचे वाहन की चोट से क्षतिग्रस्त हो जाने का खौफ़

ये सहमी हुई लड़कियां मुझे
उन वृक्षों पर पलती अमरबेल जैसी लगती है
एक के कट जाने पर
जिसका वजूद खतरे में हो,
ये अमरबेल के लिए गाली नहीं
बल्कि दरख़्तों का सौभाग्य होगा

मैं ख़ाब में देखता हूँ कई दफे
कि सड़क के तमाम एकतरफा दरख़्त काटे जा रहे हैं

छली गई औरतें

परकीय में छली गयी हूं मैं
मैं घोषणा करती हूं कि मुझे अब एक मुक्कमल वेश्या करार दी जाए
हर बार नए सिरे से ये कहती हुई मैं कि
‘मैं और नहीं टूटना चाहती’
‘रोक लो मुझे’
‘तुम्हीं के साथ’
‘ बस तुम्हारे साथ’
‘कि यहीं रुक सकूँ मैं’

कितने अर्जुनों के तीरों से बिधी हूं मैं
इस भ्रम में
कि भीष्म की प्यास बस अर्जुन का तीर बुझा सकता है
कितने भावातिरेकों में कहा मैंने
कि मुझे छोड़ तो नहीं दोगे ना ?
मैं अकेली तो नहीं पड़ जाऊंगी ना?
तुम्हारे जैसा प्रेम
शायद कहीं न मिले मुझे ?

वो जो बन्दरगाह आते हैं छोटे-छोटे
जहां
एक ही गन्तव्य को निकली दोओं में एक नाव ठहर जाती है
और एक ही बढ़ती है आगे
कहीं वो यात्रा तो नहीं है हमारी?

कितनी बार बाज दृष्टियों से महज बेधी जाऊंगी मैं
आखिर कितनी बार,
यौनिक प्रयोगशाला में तब्दील मेरी देह
अब मुक्त होना चाहती है
इस सत्ता से मुक्त
कि मैं अपना घर बना सकूँ

एक उदास चिट्ठी ( एक गुमनाम दोस्त के नाम )

उसके अनुमान संदिग्धता भरे रहे
एक अनजान सी उम्र में उसने जो कमाया उस पर कभी छाप अंकित नहीं करनी चाही

वो बनती रही अमावस की काली रातें
जहां-जहां
वो शाया हुईं
दहाई पृष्ठांको वाले उन अखबारों में नहीं थे
कोई भी लिपीय शब्द

उसने सदैव देखा
सदी के सातवें दशक की खूंटी पर टँगा
तमाम भोली अदाकाराओं में अपना अजीब-सा करेक्टर
उसने पाया
बीते वक्त की तमाम सूनी काली अमावसें
उसकी आंखों पर चुभ गयी हैं,

जब जब उसने नदी बन सागर होना चाहा
तमाम रेगिस्तान
उसकी छातियों पर चिमट गए,
उसने अपने स्तनों के उभार में जो अंतर देखा
कई बरसों के लटकते कैलेंडर उसके आगे से कौंध गए,

समझौतापसन्द नहीं थीं वो,
वो चाहती रही बिल्ली बनकर जिंदा मछलियां खाना,
पैरों का भीग जाना मगर
कभी नहीं रहा उसके स्वभाव में,

कई युवा; जिनके चमकते गाल अब सलवटें लेने लगे थे और
बालों के अवरोही गणित के साथ
जिनकी सफेद दाढ़ियाँ बताने लगी थीं कि वे अब सधे हुए कॉमरेड हैं;
सब उसके साँचें से बाहर होने लगे थे

कितनी ही बार वो मर्लिन मुनरो होते-होते बची और उसने
अपनी दीवार पर नए कैलेंडर टांगे,
एक अस्तित्वहीन मुल्क का समाजशास्त्र
उसे काटता रहा बार-बार

ठुकराई गई औरत

नींद में कुछ नहीं खोया उसने
बीते बसन्त के पत्ते गिने और सकुचाकर दुहरी हो गई
अतृप्त आत्माओं की तरह

भटकती छायाएं डराती है उसे आजकल
सूने एकांत स्थानों पर
देर तक टकटकी जमीनें चीरती हैं
अपनी छातियों के दूध से देव-प्रतिमाएं सींचना अब
कोई सिद्धांत नहीं बुनता…
अपलक आंखें ख़ाब को ख़ाब कहते डरती हैं,
मिटा हुआ द्वंद्व
सूनी छतों पर घूमती काली बिल्लियों से खौफ़ खाता है

तमाम साये किसी धुन की प्रतीक्षा में
हो जाते हैं अचेत…
दर्द की खाईयों से बने डरावने शब्द
गूंजते हैं
बार-बार
सुनसान पत्थरों के बीच…
उसकी कई रचनाएँ जब्त होने से डर रही हैं…