बिहार में हर महिला के साथ अपराधिक
घटना एक रहस्यमय आवरण ले ले रहा है और ऐसा लगता है कि पूरा तन्त्र ऐसी घटनाओं में
अपनी मिलीभगत की निशानदेही दे रहा हो. मुजफ्फरपुर शेल्टर होम में अनाथ बच्चियों से
बलात्कार और हत्या में पूरे तन्त्र की मिलीभगत पर सुप्रीम कोर्ट तक की टिप्पणियाँ
आयी हैं. ताजा मामला बिहार के सीवान में महिला कांस्टेबल की कथित (आत्म) हत्या का सामने आया है. जितने संदेह इस वारदात के
इर्द-गिर्द हैं उतनी ही बेशर्मी मीडिया में देखने को मिल रही है. महिला
कांस्टेबल्स के लिए थानों और ड्यूटी में व्यवस्था का अभाव पूरे देश में है, जेंडर
सेंसिटिविटी तो खैर इस विभाग के लिए दूर की कौड़ी है. लेकिन बिहार में हालात और भी
खराब हैं. नवम्बर 2018 में एक महिला कांस्टेबल की मौत के बाद पटना में पुलिस ने
विद्रोह कर दिया था, उन्होंने जमकर तोड़-फोड़ की थी, अफसरों को पीटा था, जिसके बाद
सराकर ने 700 कांस्टेबल्स को बर्खास्त कर दिया था, जिसमें अधिकाँश महिलाएं थीं.
फिलहाल सीवान की घटना और उसके इर्द-गिर्द
के षड्यंत्र को समझते हैं:
पटना लाइव से साभार
बेशर्म
रिपोर्टिंग
चौथी दुनिया ने खबर का शीर्षक दिया
है, ‘क्या खूबसूरती ने ली बिहार पुलिस की कांस्टेबल स्नेहा की जान, क्या है उनकी मौत की वजह?’
आजतक की खबर का शीर्षक है, ‘क्या कांस्टेबल स्नेहा की खूबसूरती ही बनी
उनकी मौत की वजह?’
न्यूज24 के बिहार से पत्रकार अमिताभ ओझा इस खबर की तह तक जाने में लगे
हैं. लेकिन उनका चैनल शीर्षक दे रहा है,’ बला की खूबसूरत महिला कांस्टेबल की मौत’ या
वो बला की खूबसूरत थी लेकिन पुलिस कांस्टेबल थी.
अबतक मीडिया की खोजी रिपोर्ट की कुल उपलब्धि यही है कि उसे यही तथ्य
हाथ लगा है कि मृतक कांस्टेबल स्नेहा की ख़ूबसूरती ही उसकी मौत का कारण है, यानी
(आत्म) हत्या की सारी जिम्मेवारी खुद मृतक की हो, जबकि संदिग्ध मौत के इर्द-गिर्द
की सारी घटनाएं और पुलिस की गतिविधियाँ किसी बड़ी साजिश का संकेत दे रही हैं.
स्थानीय लोगों में इसे लेकर आत्महत्या और हत्या की तरह-तरह की कहानियाँ घूम रही
हैं.
क्या है पूरा मामला:
सीवान में कार्यरत मुंगेर जिले की निवासी
पुलिस कांस्टेबल स्नेहा कुमारी की लाश 1 जून को उसके सरकारी क्वार्टर में मिली.
पोस्टमार्टम रिपोर्ट से पता चलता है कि उसकी मौत 48 घंटे पहले 30 मई को ही हो गयी
थी. लाश की हालत ऐसी थी कि डॉक्टरों ने पोस्टमार्टम करने से इनकार कर दिया था तो
पुलिस के लोगों ने अस्पताल में हंगामा किया. 2013 में पुलिस में भर्ती हुई और सीवान के मुफ़स्सिल थाने में कार्यरत स्नेहा की संदिग्ध
मौत को पहले तो आत्महत्या माना गया लेकिन जल्द ही ह्त्या की आशंकाएं भी गहराने
लगीं हैं.
इन दिनों स्नेहा की तैनाती जिला
समाहरणालय में परिवार न्यायालय के कोर्ट में थी, जहाँ से उसने दो दिनों की छुट्टी
ली थी 30
और 31 मई के लिए. सीवान के पुलिस लाइन स्थित
महिला क्वार्टर में तीसरे मंजिल पर उसका का फ्लैट था जिसमें वो अकेले ही रहती थी. 1
जून को जब वह ड्यूटी पर नही आई तो उसके साथ काम करने वाली महिला
कांस्टेबल चांदनी कुमारी ने उसे मोबाइल पर फोन किया .लेकिन स्नेहा ने कॉल रिसीव
नही किया. पड़ोसी कांस्टेबल से बात करने पर उसने देखा तो बताया कि कमरे का दरवाजा
बंद है और दरवाजे पर खून है. जिसके बाद पुलिस को खबर दी गई.
स्थानीय अखबारों के अनुसार पुलिस
अपनी इंट्री के साथ ही संदिग्ध भूमिका में दिख रही है. दैनिक हिन्दुस्तान ने 5 जून
को लिखा, ‘सीवान पुलिस स्नेहा के शव के साथ
लगातार साजिश रच रही है। सोमवार की देर रात को सीवान पुलिस ने स्नेहा के शव को
नौवागढ़ी स्थित उसके घर पहुंचाया। इसके बाद सीवान पुलिस के द्वारा रात में ही शव को
जलाने का दबाव बनाया जा रहा था। लेकिन परिजनों ने कहा कि अधिक रात होने के कारण शव
मंगलवार को जलाया जाएगा। इसके बाद मंगलवार की सुबह ताबूत को खोला गया, तो शव देखने के बाद परिजन और ग्रामीण स्तब्ध रह
गए। उन्होंने कहा कि यह स्नेहा का शव नहीं है। वह शव किसी बूढ़ी औरत की थी. इससे आक्रोशित परिजनों और ग्रामीणों ने
पटना-भागलपुर मुख्य मार्ग एनएच-80 को नौवागढ़ी के समीप जाम कर
दिया। जाम की जानकारी मिलने ही स्थानीय पुलिस घटनास्थल पर पहुंची। लेकिन ग्रामीण
समझने को तैयार नहीं थे। इसके बाद वहां मुंगेर के एसपी गौरव मंगला पहुंचे। एसपी के
पहुंचने के बाद आक्रोशित ग्रामीणों और परिजनों को बलपूर्वक जाम स्थल से हटाया गया।’
मृतिका के पिता विवेकानंद मंडल भी कहते हैं कि साजिश के तहत
उसकी हत्या कर दिया गयी। मंडल का कहना है कि शनिवार की दोपहर को उन्हें नया रामनगर
थाना से जानकारी मिली की बेटी की तबीयत खराब है, सीवान बुलाया गया है। घर में किसी को जानकारी दिए बिना वे सीवान के लिए
रवाना हो गए। इसके बाद वहां स्थानीय पुलिस के द्वारा स्पष्ट तौर पर कोई जानकारी
नहीं दी गयी और ना ही बेटी से मुलाकात कराई गई।
स्नेहा ने 29 मई तक डियूटी की थी
रात में दस बजे तक घरवालो से बात हुई थी. उसकी बहन के अनुसार 30 मई की सुबह तक
उसकी बहन स्नेहा ने वाट्सप देखा था.हालांकि उसके बाद उसने काल रिसीव नही किया.
स्नेहा के साथ काम करने वाली चांदनी ने भी बताया कि स्नेहा ने दो दिनों का अवकाश
लिया था.लेकिन कही से भी वह घबराई हुई या तनाव में नहीं थी.
हत्या का संदेह
स्नेहा के पिता और उसकी बहन के
अनुसार ‘जब उसकी लाश घर पर मुंगेर भेजी गयी तो वह लाश उसकी नहीं थी. लाश किसी बुढ़िया
की दिख रही थी. किसी की लाश 48 घंटे में कैसे सड़-गल सकती है. हमने जब लाश लेने से
मना किया तो मुंगेर के एसपी ने दवाब बनाया कि हम लाश लें और उसे जल्द जला दें. मना
करने पर हमसब को बहुत मारा-पीटा गया.’ एक्सपर्ट्स भी कहते हैं कि 48 घंटे में एक
तो कोई लाश उतनी सड़-गल नहीं सकती है. और यदि सडती है तो उसकी दुर्गन्ध आस-पास के
लोग बर्दाश्त नहीं कर पायेंगे. जबकि दो दिन तक एकदम पास के कमरों में रहने वाली
महिला कांस्टेबल को इसकी भनक तक नहीं लगी.
पुलिस और सीवान एसपी की हाइपर
एक्टिविटी और संदेह
अपनी कांस्टेबल की मौत की सूचना
पाकर सीवान के एसपी नवीन झा हाइपर एक्टिव बताये जाते हैं. इस मौत को सबसे पहले
उन्होंने आत्महत्या कहा और पूरी बिल्डिंग खाली करवा ली. पूरी बिल्डिंग खाली करवाने
का कोई औचित्य नहीं दिखता. पुलिस महकमे में इतनी बड़ी घटना घट गयी है लेकिन जल्द ही
वे छुट्टी पर चले गये, जिसके बाद स्थानीय लोगों में उनपर अविश्वास और गहरा हो चुका
है. डीएसपी इस प्रसंग में कुछ भी पूछे जाने पर कुछ भी कहने से मना कर रहे हैं.
एक स्थानीय व्यक्ति ने अपने फेसबुक
पोस्ट में लिखा है, ‘ एसपी मौके पर सबसे पहले पहुंचते है और पूरे बिल्डिंग को खाली
करवा दिया जाता है. एसपी –बताते है कि स्नेहा ने पंखे से लटककर सुसाइड कर लिया.
लेकिन उनके पास इस बात का जवाब नही होता
है कि सुसाइड केस कमरे में खून कैसे आया?’ 1 को लाश की दुर्गंध
नही मिली थी? क्या 24 से 30
घंटे में लाश इतना डिकम्पोज हो जाएगा?जून को जब कमरे में लाश मिली
वह सड़ चुकी थी.
पटना: अक्टूबर 2018 में ट्रेनी कांस्टेबल्स ने की थी छेडछाड की शिकायत
स्नेहा को जानने वाले जो लोग भी सीवान
में है सभी ने चुप्पी साध ली है.सीवान की पुलिस इस मामले को जितना सुलझाने की कोशिश कर
रही है इस मामले में खुद ही उलझते जा रही है. सीवान के एसपी लंबी छुट्टी पर चले गए है.मुख्यालय में
मौजूद डीएसपी सहित कोई अधिकारी कुछ बोलने को तैयार नही है.
स्नेहा के पिता के अनुसार उसके साथ
दुष्कर्म करने के बाद हत्या कर दी गयी और शव को कहीं गायब कर दिया गया . इस मामले
में स्नेहा के परिजनों ने सरकार से उच्च स्तरीय जांच करने की मांग की है पिता का कहना
है कॉन्स्टेबल स्नेहा काफी हंसमुख लड़की थी. वो सभी से मिलती थी. जब भी उसकी छुट्टी
होती वो मुंगेर के नौवगढ़ी अपने घर परिवार के पास रहती थी. लेकिन इस बार जब सीवान पुलिस ने उन्हें बताया कि स्नेहा की तबियत खराब
ही तो हमलोग उससे मिलने सीवान पहुंचे . सीवान
पहुंचने पर वहां के एसपी ने बताया कि
स्नेहा की तबियत खराब है वो बार बार बेहोश हो रही थी . इस कारण इलाज के लिए उसे
पटना भेजा गया है . विवेकानंद ने कहा कि जब स्नेहा से मिलने की बात की तो मुझे दो
चौकीदार के साथ पटना भेजा गया . लेकिन पटना पहुंचने से पहले ही मुझे जानकारी दी
गयी कि स्नेहा को मुंगेर घर भेज दिया गया . इस दौरान भी पुलिस ने यह जानकारी नही
दी कि स्नेहा की मौत हो गयी है . लेकिन जब मुंगेर पहुंचे तो tv पर ख़बर देख कर जानकारी मिली कि स्नेहा ने आत्महत्या कर ली . इस पूरे
प्रकरण में पुलिस की भूमिका काफी शक पैदा कर रही है . शव के पहुंचने पर भी वो 50-60 साल की बूढ़ी की थी . जिसके दांत टूटे और सिर के
बाल सफेद थे पिता के अनुसार स्नेहा की मौत होने के बाद
भी उसके शव की न तो विभागीय फोटो ग्राफी की गई न ही सीवान की मीडिया को ही कवर करने दिया गया .
सवाल उठता है कि आखिर दस दिनों के
बाद स्नेहा के परिजनों को सुसाइड नोट क्यो नही दिखाया गया और कोई उन्हें घटना की
तस्वीर या वीडियो क्यो नही दिखाया गया? आखिर सीवान की पुलिस परिजनों से बार बार झूठ क्यो
बोल रही है?’ यदि
जांच और कार्रवाई नहीं होती है तो संदेह और गहराता जाएगा. खासकर तब जब सूबे के मुख्यमंत्री
खुद गृहमंत्री भी हों.
2018 में जम्मू-कश्मीर के कठुआ में नोमैड समुदाय की आठ साल की एक लड़की (आसिफा) से एक मंदिर परिसर में बलात्कार और फिर उसकी हत्या कर दिए जाने के मामले में एक पाटियाला की विशेष अदालत ने सोमवार को तीन मुख्य आरोपी सांजीराम और उसके भतीजे प्रवेश कुमार तथा दीपक खजुरिया को आजीवन कारावास की सजा सुनायी है। हालांकि सांजीराम के बेटे (सातवें आरोपी) विशाल को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया गया।साक्ष्य मिटाने के आरोपी पुलिस वालों को एसआई आनंद दत्ता, हेड कांस्टेबल तिलक राज और स्पेशल पुलिस अफसर सुरेन्द्र वर्मा को 5 सालों की सजा सुनायी गयी है।
मामले में बंद कमरे में हुई सुनवाई तीन जून को पूरी हुई थी और सोमवार की सुभ छः आरोपियों को दोषी सिद्ध कर दिया गया था। इस घटना ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया था। आरोपपत्र के अनुसार, पिछले साल 10 जनवरी को अगवा की गई आठ साल की बच्ची को कठुआ जिले में एक गांव के मंदिर में बंधक बनाकर रखा गया और उससे दुष्कर्म किया गया। उसे जान से मारने से पहले चार दिन तक बेहोश कर रखा गया।
मुख्य अभियुक्त सांजीराम को ले जाती पुलिस
इस घटना के सामने आने के बाद जहाँ देश भर में आक्रोश फूट पड़ा था वहीं राज्य में तत्कालीन सरकार में शामिल भारतीय जनता पार्टी के दो मंत्रियों ने बलात्कारियों के पक्ष में प्रदर्शन किये. जम्मू के बार असोसिएशन ने मामले में चार्जशीट दाखिल होने नहीं दी थी तो मामले की सुनवाई के लिए जम्मू से करीब 100 किलोमीटर और कठुआ से 30 किलोमीटर दूर पड़ोसी राज्य पंजाब के पठानकोट में जिला एवं सत्र अदालत में केस ट्रांसफर कर दिया गया था। उच्चतम न्यायालय ने इस मामले की सुनवाई जम्मू कश्मीर से बाहर किए जाने का आदेश दिया था। पटियाला में मामले की सुनवाई जिला और सत्र न्यायाधीश तेजविंदर सिंह ने किया।
हिन्दू एकता मंच के लोग बलात्कारियों के पक्ष में रैली करते हुए जिसका नेतृत्व भाजपा के मंत्री ने किया था, तस्वीर द वायर से साभार
जम्मू में आसिफा की वकील दीपिका सिंह राजावत को काफी परेशान किया गया था, उन्हें बलात्कार की धमकियां दी गयी थीं। पिछले साल पीड़िता के परिवार ने उनसे केस वापस लिया था। एडवोकेट मुबीन फ़ारूकी ने आगे इस मामले में पैरवी की। मामले के अभियोजन पक्ष में जेजे चोपड़ा, एसएस बसरा और हरमिंदर सिंह शामिल थे । उनके अनुसार वे अभियुक्तों की फांसी के लिए और निर्दोष करार दिए गये सातवें अभियुक्त को सजा दिलाने के लिए आगे अपील करेंगे. फिलहाल वे जजमेंट का अध्ययन कर आगे बढ़ेंगे। अभियुक्तों में एक नाबालिग के खिलाफ मामले की सुनवाई अभी बाकी है, क्योंकि उसकी उम्र का निर्णय जम्मू उच्च न्यायालय को करना है ।
इस सीरीज में सवर्ण स्त्रियाँ लिखें, जिसमें जाति आधारित अपने अथवा अपने आस-पास के व्यवहारों की स्वीकारोक्ति हो और यह भी कि यह कब से और कितना असंगत प्रतीत होने लगा. आज आप क्या सोचती और व्यवहार करती हैं . राजस्थान के ब्राह्मण परिवार की अनुपमा तिवाड़ी बता रही हैं कि उनके ब्राह्मण परिवेश में जातिवाद और छुआछूत किस कदर हावी था, और इसमें महिलायें आगे थीं:
अनुपमा तिवाड़ी कवयित्री, कहानीकार व सामाजिक कार्यकर्ता जयपुर राज. सम्पर्क: anupamatiwari91@gmail.com
मेरा जन्म राजस्थानी ब्राह्मण परिवार में हुआ. जिसमें भी मेरा परिवार अन्य ब्राह्मणों में भी अपने को सबसे ऊँ चे बताने वाले गौड़ ब्राह्मण और उसमें भी आदि गौड़ यानी वे ब्राह्मण जो कि शुरू से ब्राह्मण रहे हैं का वंशज मानता रहा है. मेरे परिवार ( माँ के परिवार) में अंतरजातीय विवाह को कोई जगह नहीं थी और न है क्योंकि परिवार में रक्त की शुद्धता को बचाए रखना है. खासतौर से मेरी माँ सबसे ज्यादा जाति-गुरुर से भरी रहती हैं. परिवार में पिछली चार पीढ़ियों में भी सब काफी पढ़े लिखे थे. किसी – किसी गाँव में तो हमारे रिश्तेदार गाँव के गुरु या सबसे ज्यादा पढ़े – लिखे लोगों में गिने जाते थे. पीढ़ियों से सबके नाम भी ऐसे थे जो परिवार को गौरान्वित करते थे. मेरे घर में आने वाले धोबी, माली, गुर्जर आदि जाति के लोग नीचे बैठते थे और हम बच्चे भी उनका नाम ही लेते थे चाहे वे उम्र में हमसे बड़े थे. ट्रेन, बस में या आसपास कहीं जब मेरी माँ के पास कोई दलित समाज की महिला आ कर खड़ी हो जाती या बैठ जाती तो मेरी माँ या तो वहाँ से दूर सरक जातीं या उसे घृणा भरी निगाहों से देखतीं. मैं उस समय कुछ समझ नहीं पाती थी कि जाति व्यवस्था को ले कर ये भेदभाव क्यों है ? पर मुझे मेरी माँ का उन्हें यूँ देखना अच्छा नहीं लगता था. मेरे घर में मेरी माँ कुछ इस प्रकार की कई सारी कहावतें भी बोलती थीं जैसे कि – “चिमारी को काकी खई, तो चौका में आ बैठी” मतलब कथित नीची जाति वाली औरत को चाची कह दिया तो रसोई में आ कर बैठ जाएगी. रसोई ब्राह्मण परिवारों में घर का सबसे पवित्र स्थान माना जाता है. जातसूचक ‘चमार, चूड़ा’ जैसे विशेषण भी घर में बहुत प्रचलित थे.
1989 में मैं,जयपुर की कच्ची बस्तियों में वैकल्पिक शिक्षा के लिए कार्यरत
एक संस्था से जुड़ी.वहाँ शिक्षा का काम हमें वंचित समुदाय के बच्चों के साथ करना
था. उस दौरान हमारे शिक्षक प्रशिक्षण में शिक्षा को शैक्षिक दृष्टि से समझने के
लिए उसके सामाजिक घटकों पर भी काफी चर्चाएँ, प्रशिक्षण का हिस्सा थीं.तीन महीने के
शिक्षक प्रशिक्षण के दूसरे महीने हम आधे दिन बस्तियों में जाते और फिर ऑफिस में तय
समय पर आ कर अपने अनुभवों को साझा करते.
एक दिन मैं वाल्मीकि समुदाय की बस्ती से जा कर आई. इस समुदाय की बस्तियाँ
अमूमन शहर से दूर प्राय: गंदे नाले या कचरे के पास होती हैं. जयपुर शहर अब काफी फ़ैल
गया है ऐसे में यह बस्ती बीच में आ गई है इसलिए इस जगह की स्थान के हिसाब से अब काफी
कीमत है लेकिन इस विशेष जाति समुदाय की वजह से तथाकथित कोई भी सवर्ण जाति का
व्यक्ति वहाँ अपना घर बनाने के बारे में सोच भी नहीं सकता. खैर… मैं वापस मुद्दे
पर आती हूँ. तो मैंने अपने अनुभव में बताया कि “आज तो मैंने एक राजपूत घर में पानी
पीया” इस बात पर हमारे समन्वयक बोले आपको क्या पता कि वो राजपूत हैं ? मैंने कहा“उनके
घर के बाहर उनके नाम के आगे राजपूत लिखा था”. उन्होंने कहा आपकी क्या जाति है?
मैंने बड़े ही ठसके से कहा – हम तो ब्राह्मण हैं. उन्होंने कहा “ब्राह्मण तो नीचे
होते हैं”. मैंने कहा“नहीं ब्राह्मण सबसे ऊँचे होते हैं”. इस पर हमारे और साथी
मित्र भी कुछ – कुछ बोले. यह चर्चा किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँची लेकिन इसने जैसे
दिमाग पर एक हथौड़ा– सा मारा कि कौन ऊँचा है और कौन नीचा ? और क्यों ? और कैसे ?
( आज सोचती हूँ कि उस समय मैं कितनी मासूम थी कि यह भी नहीं समझ पाई
थी कि कोई वाल्मीकि समाज का व्यक्ति नाम के आगे राजपूत लिख कर अपनी जाति छुपाने की
कोशिश नहीं कर सकता क्या? बादमें समझ आया कि दलित समाज के कई लोग अपनी जाति इसलिए
छुपाते हैं क्योंकि उन्हें आम समाज में हेय दृष्टि से देखा
जाता है). ऐसे अनेक सामाजिक मुद्दों पर जब चर्चाएँ होतीं तो मैं सोचती कि इतनी
अच्छी बात तो मैंने कभी नहीं सुनी. कभी मेरी मम्मी को ट्रेनिंग में लाऊँगी. वो
चर्चाएँ, वैज्ञानिक दृष्टिकोण से शिक्षा को समझने, बराबरी के मूल्य से दुनिया को
देखने, प्रथाओं, परम्पराओं और संस्कृतियों पर सवाल उठाने वाली होतीथीं. कभी – कभी
मुझे लगता कि अरे ! मैंने तो सोलह साल यूँ ही पढ़ाई की. मेरी असली पढ़ाई तो अब शुरू
हो रही है. मेरी मम्मी को जब कभी मैं घर जा कर बताती कि आज मैंने बस्ती में हरिजनों
(हालांकि यह शब्द कानूनी रूप से अवैध है, लेकिन हमारी जाति-चेतना के कारण आम प्रचलन
में है.’ के घर पानी पीया तो वे तंज कसते
हुए कहतीं “तुम्हारा क्या, तुम तो महान हो”.जबकि मैं तो कभी – कभी बच्चों के आग्रह
पर उनके घर खाना भी खा लेती थी लेकिन घर पर सिर्फ पानी पीने तक ही बताती थी.
चार वर्ष के बाद मेरे अपने घर में इस समुदाय के बच्चे भी आने लगे. वे
गद्दे पर बैठते तो कहते दीदी, आपके गद्दे कितने मोटे–मोटे हैं. इन्हीं बच्चों में से
एक बच्ची दौलत ने मेरी पाँच माह की बेटी के मुँह में अंगुली डालकर बताया था कि
दीदी, इसके चावल जैसा दांत उग रहा है. उस समय हम कितना खुश हुए थे.बच्चे खुश होते
थे हमारे घर आ कर. मैं जब बच्चों के साथ काम करती थी तो स्कूल के सामने ही इसी
समुदाय की एक महिला अपने घर में मेरी छोटी सी बच्ची को रखती थीं.
इसके दस साल बाद मुझे एक्शन एडजयपुर में काम करने का मौका मिला तो वहाँ मैं विभिन्न प्रकार से वंचित समुदाय के बच्चों के साथ काम करती थी. हमारी स्टेटहेड के. अनुराधा का अपने काम और वंचितों के साथ रिश्ता मुझे बहुत ही प्रेरित करने वाला था. जब मैं राजस्थान के सीकर जिले के शहर में जाती तो कालूराम हठवाल के घर पर रुकती. शुरुआत में वो मेरे लिए बाहर से कोल्ड ड्रिंक लाते फिर मैं मना करते हुए कहती कि नहीं, मैं चाय पी लूंगी.कभी – कभी कालूराम जी के यहाँ खाना भी खाती. उनका परिवार कोशिश करता कि वेमेरे लिए अच्छा खाना बनाएँ. मैं धन्यवाद् देती और जितने पैसे का खाना मैं बाजार में खाती उतना पैसादेने लगती तो वे बिलकुल मना कर देते और कहते दीदी, हम भी तो खाते हैं क्या फर्क पड़ता है, जबकि उनकी आर्थिक स्थिति बहुत ठीक भी नहीं थी.
एक बार इसी बस्ती में मैंने देखा कि एक व्यक्ति जहाज पर शौचालय की
सफाई का काम करते थे और रिटायर होने के बाद जब वे अपने घर आए तो उन्होंने अपने घर
के बाहर एक सुन्दर सा मंदिर बनवाया. एक दिन एक पड़ौसी से उनकी लड़ाई हो गई तो उस नेपता
है क्या बोला ? “अरे ! बड़ा बनता है, जहाज पर काम कर के आया है, वहाँ भी तो टट्टी
ही साफ़ करता था”. एक ही समाज में यदि कोई बेहतर काम करके, कुछ अच्छा बनने की कोशिश
करे तो भी उस समाज के लोग उसे उसकी औकात बताते रहते हैं कि तू हमसे ज्यादा मत बन.
हमारी संस्था ने इसी समाज की बालिकाओं के छह – छह महीने के दो आवासीय
शिविर किए. शिविर के समापन समारोह में प्रोफेसर श्यामलाल जैदिया को भी आमंत्रित
किया. उन्होंने अपने उद्बोधन में बताया कि मैं भी आपके ही समाज से हूँ लेकिन मेहनत
करके आज जोधपुर यूनिवर्सिटी में वाइस चांसलर पद से रिटायर हुआ हूँ. बचपन में मैं
इसी यूनिवर्सिटी में मेरी माँ के साथ मैला ढोने (शौचालय साफ़ करने) जाता था. श्यामलाल
जी की खूबसूरती, संयमित आवाज़ बहुत आकर्षक लग रही थी. मैंने ‘जूठन’ कहानी के लेखक ओमप्रकाश
वाल्मीकि को सुना. सुशीला टांकभौरे का स्त्री, विकलांगता और जाति का तिहरा दंश
पढ़ा. जब ‘सत्यमेव जयते’ का अस्पृश्यता वाला एपिसोड देखा तो उसेदे खते – सुनते हुए मेरे
आँसूं जार – जारबहने लगे. मैंने एक छोटा सा निर्णय लेने का सोचा कि मैं अपने नाम
के आगे ये ‘तिवाड़ी’उपनाम हठा देती हूँ. बहुत सारी घटनाओं को देखते – सुनते मुझे
जातिवाद से नफरत हो गई थी. लेकिन फिर बहुत सारे विचार मन में आए कि अब काफी साराइसी
नाम से लिख छप चुका है, नौकरी और अन्य सभी दस्तावेज इसी उपनाम से हैं, अब नौकरी भी
कुछ ही साल की बची है और जीवन भी. तो अब उपनाम चाहे यही रहे लेकिन छोटी–छोटी
कोशिशें करती रहूँ.
मैं कभी–कभी अपने घर के बाहर सफाई करने वाली महिला को चाय पर घर में बुला
लेती, नौकरी के चलते किराये के घर में सड़क पर सफाई करनेवाली महिला को घर में बुलाकर
चाय- शरबत पिलाती. मेरी मकान मालकिन उसकी मुझे जाति के बारे में समझाती तो मैं
उन्हें चुपके से घर बुलाने लगी.मुझे लगता कि एसा करने से उनमें तो अपनी जाति को
नीचे देखने का भाव कुछ कम होगा. बातचीत में वे कहतीं सब आदमी एक जैसे ही होते हैं
लेकिन समझ – समझ की बात है. मैं डरती भी कि मेरी मकान मालकिन मुझसे घर खाली न करवा
ले क्योंकि घ रकिरायेपर देते समय उन्होंने मुझसे मेरी भी जाति पूछी थी और फिर बहुत
खुश हो कर घर दे दिया था.
मैं नौकरी के चलते कई बार जब सरकारी स्कूलों में जाती और जब बच्चे
मुझसे घुल मिल जाते और जब मैं काफी सारी बात करने के बाद कहती कि किसी को कुछ
पूछना है, इस विषय के बारे या मेरे बारे में या किसी भी बात के बारे में तो पूछ
सकते हैं. तो कई मर्तबा बच्चे सकुचाते हुए मुझसे पूछते, दीदी आप कौन के हो ? मैं
समझ तो जाती फिर भी,नासमझ बनते हुए उनसेपूछती कौन के मतलब ? तो बच्चे कहते दीदी, मतलब
आपकी जात / जाति क्या है ? तो मैं कहती कि इससे क्या फर्क पड़ता है कि मैं बैरवा
हूँ या कोली हूँ या जैन हूँ या शर्मा हूँ. मेरी बात पर इसका फर्क पड़ेगा क्या ?
इतनाबहुत है न कि मैं औरत हूँ, मेरी औरत जात है जो तुमको दिख रही है अब बैरवा, जैन
जात तो तुमको कैसे दिखेगी बताओ ? जब दिखे नहीं तो काय की जात ? बच्चे चुप हो जाते.
हो सकता एक – दोबच्चोंको ये बात समझ भी आती हो.
जब मैं स्कूटर से अलग–अलग स्कूलों में जाती तो किसी बूढ़े आदमी से रास्ता
पूछती तो पहले तो वो रास्ता बताते फिर उनका अगला शाश्वत सवाल होता “बाई कुण केछे”
? एक बार मैंने एक बुजुर्ग व्यक्ति को कहा कि “मेरी कोई जात नहीं है” तो वो नाराज़
हो गए और बोले“ या तो होवे ही कोण कि जात कोण, जात तो होए सबकी”. सच में कई बार
मुझे इस जात का ठप्पा धर्म से भी गहरा लगता है और है भी. आप जाति जैसी अमूर्त चीज
से कभी मुक्त नहीं हो सकते, कैसी चीज है न ये!
विवाह से पहले मैं भी धार्मिक कर्मकांडी थी. उसके कुछ वर्ष बाद तक मेरे
जीवन में ये कर्मकांड भी चलते रहे और अंगारे से जलते सवाल भी धधकते रहे. एक समय
आया जिसमें मेरे जीवन में इन कर्मकांडों की रोशनी मंद पड़ती गई और धधकते अंगारे
ज्वाला बन, मेरे जीवन को रौशन करने लगे. मेरे जीवन में इन सवालों और इन पर लिए
निर्णयों ने मुझे मजबूत शख्सियत बनाया, मुझमें साहस भरा, मुझे बेबाक और बिंदास
बनाया.मंदिर, मस्जिदों कर्मकांडों, जाति – धर्म की व्यवस्थाओं और महिलाओं के लिए बनेवैवाहिक
चिह्नों, व्रत उपवासों पर आधारित बनी कुरीतियों पर मैं प्रहार करने लगी, इन
ढकोसलों की धज्जियाँ उड़ाने लगी. ये सवाल मेरी कहानियों और कविताओं की विषयवस्तु
बने. जब मैं चेतना गीत गाती तो समानता का एक – एक शब्द मेरे अन्दर उतरता जाता. मुझे
कबीर भाने लगे.मैं गाँधी, नेल्सन मंडेला, सावित्रीबाई फुले, शीतल साठे, हिमांशु
कुमार, मेधा पाटेकर, सरीखे अनेक सामाजिक कार्यकर्ताओंकी मुरीद होती गई. आज मैं
सोचती हूँ कि मेरे बच्चे किसी भी जाति धर्मके व्यक्ति से दोस्ती कर सकते हैं, शादी
कर सकते हैं.अब तीस साल पीछे मुड़कर देखती हूँ तो अपने को आज एक नई अनुपमा पाती
हूँ.
मुम्बई की डॉक्टर पायल तडावी की आत्महत्या के संदर्भ में हम एक सीरीज के तहत यह तथ्य स्त्रीकाल में सामने ला रहे हैं कि खुद जाति का बर्डन ढोती, अपने लिए ब्राह्मणवादी पितृसत्ता की व्यवस्था में उपेक्षित ऊंची जाति की महिलाएं अन्य जाति और धार्मिक पहचान वालों के साथ क्रूर और अमानवीय व्यवहार करती हैं. हम इस सीरीज में ऐसे अनुभवों को प्रकाशित कर रहे हैं. नाइश हसन और नीतिशा खलखो का अनुभव हम प्रकाशित कर चुके हैं. ये अनुभव सामने आकर एक खुले सत्य ‘ओपन ट्रुथ’ को एक आधार दे रहे हैं-दलित, ओबीसी, आदिवासी, पसमांदा स्त्री के रूप में ऐसे अनुभव के सीरीज जारी रहेंगे.
लिंक पर जाकर सहयोग करें . डोनेशन/ सदस्यता आपका आर्थिक सहयोग स्त्रीकाल (प्रिंट, ऑनलाइन और यू ट्यूब) के सुचारू रूप से संचालन में मददगार होगा. ‘द मार्जिनलाइज्ड’ के प्रकाशन विभाग द्वारा प्रकाशित किताबें पढ़ें . लिंक पर जाकर ऑनलाइन ऑर्डर कर सकते हैं:‘द मार्जिनलाइज्ड’ अमेजन , फ्लिपकार्ट संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016, themarginalisedpublication@gmail.com
श्रीदेवी छत्तीसगढ़ रायपुर में रहती हैं. पिछले एक दशक से अजीम प्रेमजी फाऊंडेशन में शिक्षा के क्षेत्र में सक्रिय हैं.
इस सीरीज में सवर्ण स्त्रियाँ लिखें, जिसमें जाति आधारित अपने अथवा अपने आस-पास के व्यवहारों की स्वीकारोक्ति हो और यह भी कि यह कब से और कितना असंगत प्रतीत होने लगा. आज आप क्या सोचती और व्यवहार करती हैं . ब्राह्मण लोकेशन की श्रीदेवी बता रही हैं कि उनके ब्राह्मण परिवेश में जातिवाद और छुआछूत किस कदर हावी था:
मुम्बई की डॉक्टर पायल तडावी की आत्महत्या के संदर्भ में हम एक सीरीज के तहत यह तथ्य स्त्रीकाल में सामने ला रहे हैं कि खुद जाति का बर्डन ढोती, अपने लिए ब्राह्मणवादी पितृसत्ता की व्यवस्था में उपेक्षित ऊंची जाति की महिलाएं अन्य जाति और धार्मिक पहचान वालों के साथ क्रूर और अमानवीय व्यवहार करती हैं. हम इस सीरीज में ऐसे अनुभवों को प्रकाशित कर रहे हैं. नाइश हसन और नीतिशा खलखो का अनुभव हम प्रकाशित कर चुके हैं. ये अनुभव सामने आकर एक खुले सत्य ‘ओपन ट्रुथ’ को एक आधार दे रहे हैं-दलित, ओबीसी, आदिवासी, पसमांदा स्त्री के रूप में ऐसे अनुभव के सीरीज जारी रहेंगे.
बचपन मे मैं रेलवे स्कूल मे पढ़ती थी| वहाँ सभी जातियों के बच्चे पढ़ते थे कक्षा मे सब एक साथ बेंच मे अपने तरीके से बैठते| घर आने के बाद मुझे घर मे कोई चीज नही छूना था कपड़े घर के आँगन मे उतार कर नहाना होता फिर घर के कपड़े पहनने पड़ते, ऐसा खेलकर आने के बाद भी करना होता था| नहाने के आलस से मैं स्कूल के अलावा कहीं जाती नही थी| किशोर उम्र तक आते-आते मैंने स्कूल से आने के बाद नहाना छोड़ दिया इसके लिए माँ से रोज बहस भी होती| इसमे उनके दो तर्क निश्चित रूप से होते थे – जाने किस जाति की लड़की के साथ बेंच मे एक साथ बैठकर आई है| कौन लड़की पीरियड से है तुझे तो मालूम नही है न चलो जाओ नहाकर आओ|
कुछ दिन बाद से मैंने माँ से कहना शुरू किया, जो तुम किसी के बारे मे नही जानती कौन लड़की किस जाति की है और कौन लड़की पीरियड से है उसके लिए आप घर मे कानून क्यों बना रही हो कि मैं घर आकर नहाऊँ| रोज के नहाने के झंझट से बचने के लिए मैं एक सप्ताह तक स्कूल नही गई| माँ पिताजी की चिंता बढ़ गई नही पढ़ेगी तो क्या होगा? इसलिए फिर घर मे स्कूल से आने का बाद शुचिता के लिए नहाने की रीत बंद हुई, अच्छा तो यह हुआ कि मेरे भाई बहन के पढ़ने तक आते आते ये विचार शिथिल हो गया कि ‘बाहर जाने किस जाती के बच्चों के साथ बैठते और खेलते हो|’
मैं
कक्षा पाँच मे पढ़ती थी भाषा की पाठ्यपुस्तक मे एक पाठ था ‘बाबासाहेब डा भीराव अंबेडकर’
मैंने जब पहली बार उस पाठ को पढ़ा- उसमें वर्णित घटनाओं से मैं रो पड़ी थी,
तीन चार दिन तक उदास रही, माँ ने पूछा तो बता दिया मैंने|
उस दिन उन्होने कहा था इन सब पर दुखी होने से कुछ नही होता ये सब समाज मे होता है|
पापा अक्सर घर मे इन्दिरा गांधी और नेहरू और गांधी की बाते करते पर कभी भी अंबेडकर
की बात नही की| उस पाठ को पढ़ने के बाद मैंने उनसे पूछ लिया,
पापा अंबेडकर तो कितने अच्छे थे उन्होने भारत का संविधान बनाया और बहुत सारे
सामाजिक बुराईयों को कम करने के लिए काम किया| इस पर उनका सीधा जवाब था
उनके बारे मे बात मत करो उनके कारण ही हमारी आज यह हालत है आरक्षण नही होता मेरा
डिपार्टमेंटल प्रमोशन कब का हो गया होता|
हमारे घर मे मेरे बचपन से एक भैया आए थे काम खोजने के लिए वो किसी और जाति के थे पर साथ मे हम सब आराम से रहते थे| माँ ने कभी भोजन के लिए उनके साथ भेदभाव नही किया जो हम खाते वो भी वही खाते और वो साथ भी बैठते थे पर माँ ने कभी भी उनकी खाई हुई थाली को धोया नही हम सब के बर्तन माँ धोती थी पर भैया को अपनी थाली खुद धोनी होती थी| ये केवल मेरा अवलोकन है जब तक मैं इस पर सवाल करती तब तक भैया अपने काम मे लग गए उनकी शादी हो गई और उनका अलग घर बन गया| उनकी शादी के बाद भाभी अक्सर हमारे घर आती उन्होने सारा काम माँ से सीखा एक बार बातों बातों मे बताया की वे घर मे हमेशा ब्राह्मण जिस शैली मे भोजन बनाते है वैसा ही बनाती है क्योंकि भैया को वही पसंद है| दूसरा भाभी पूजा मे हमेशा ब्राह्मण महिलाओं को प्राथमिकता देता |भैया ने भी जितना मैंने उन्हे देखा है ब्राह्मण परिवारों से ही निकटता रखी है|
शिक्षकों के साथ एससीईआरटी मे विभिन्न प्रशिक्षणों के दौरान काम करते हुए कई बार जाती पूछी गई दक्षिण भारत मे (आंध्र प्रदेश) उस समुदाय या उस क्षेत्र विशेष के लोग ही आपको चिन्हित कर पाते हैं| मैं छत्तीसगढ़ मे रहती हूँ तो जब तक मैं स्वयम से होकर लोगो को अपनी जाति नहीं बताती तब तक पता नही होता| मेरे नाम में मैंने अपना उपनाम कभी नही लिखा संयोग से विद्यालय मे भी मेरा केवल नाम ही रह गया उपनाम किसी तरह से छूट गया| यह छूटना बचपन मे बुरा लगा था क्योंकि भाई और बहन के नाम मे उपनाम लगा हुआ था| पर आज यह अच्छा लगता है| किसी भी संस्था मे काम करते हुए मुझसे किसी ने भी जाति नही पूछी और न मुझे बताना पड़ा |कभी मेरे सामने ऐसे सवाल कोई पूछता तो मैं यही कहती ‘जाती न पूछो साधु की पूछ लीजिये ज्ञान’ इस पर भी एक दो बार लोगो ने यह कहा इतना तो समझ मे आता है जिस तरह से अपनी बात के लिए आप तर्क देती हैं आप तो ब्राह्मण ही होंगी|
मेरे बुआ की एक बेटी ने अपनी पसंद से प्रेम विवाह किया। मुझे याद है इसके लिए घर मे कितनी गरम बहसें हुई थी परिवार के कुछ सदस्यों ने उसे मृत मान लिया, उसका विवाह बहुत ही दुखी मन से उसके माता पिता ने कराया। उनके बहन की शादी मे वे गई तो उसने कहा मेरे शादी आपने ऐसे क्यों नही की यही जवाब था तुमने ब्राह्मण से शादी नही की इसलिए किस मुंह से तुम्हारी शादी इस तरह से करते। घर मे जब कोई विशेष देवी की पूजा होती तो उसे उस पूजा का हिस्सा आज भी नही बनाया जाता है |
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पेशे से प्राध्यापक नीलिमा समाकालीन बहुचर्चित लेखिकाओं में से एक हैं. प्रकाशित पुस्तकें: पतनशील पत्नियों के नोट्स, ऑफिशियली पतनशील, बेदाद ए इश्क (संपादित) संपर्क : neelimasayshi@gmail.com.
मेरी प्यारी बहनों । आओ चलें म्युउचुअल कंसेंट के बाद अब म्यूचुअल ओर्गेज़्म की ओर। ट्रिपल तलाक के बाद ट्रिपल ऑर्गेज़्म की ओर। फेकिंग ऑर्गेज़्मानुभूति से गारंटीड चरमानुभूति की ओर। ड्यूरेक्स कंडोम् के सा ।
हम ड्यूरेक्स वालों का नहीं तो कम से कम अपनी प्यारी सिने तारिकाओं के आह्वान का तो यकीन करो । वो क्या है न कि हुआ ये कि मुल्क की औरतों के शोचनीय कामानुभवों की बात हम क़ंडोम कर्ता लोग से लीक होकर आगे को गई। आगे को गई तो सिने तारिका लोग फीलिंग कंसर्ण्ड हुईं । होकर उनने हम ड्यूरेक्स वालों से कहा कि भई अब तुमी कुछ करो। और हम ड्यूरेक्स वालों की फीलिंग् फेमिनिस्ट चेतना ने हमसे सचमुच कुछ करवा भी दिया। और इस तरह कंडोमरेखा से ऊपर सेक्स बरतने वालों के जीवन में ऑर्गेज़्म- बराबरी भी बरतने का जज़्बा उगा ही दिया।
अब चूँकि अपन ड्यूरेक्स वाले कंडोम बनाते हैं समाज के दिमाग नहीं बना सकते थे। बाज़ार में अपना सामान चलाते हैं सामान के इस्तेमालकर्ता का दिमाग नहीं फिरा सकते थे। तो इसलिए हमने जुगत लगाई। न केवल जुगत लगाई बल्कि माननीय अदालत की सद्बुद्धि जगवा कर कैमिकलादि के इस्तेमाल पर रोक के खिलाफ लांग़ लास्टिंग स्टे भी लगवाई। तमाम दुश्वारियाँ उठाईं। और आखिरकार हुआ आत्मपरस्त लिंग को अपने मौलिक अधिकार से कुछ मिनट दूर रखकर लिंगाश्रित योनियों को उनका हक दिलवाने वाला कंडोमावतार ।
‘लस्ट स्टोरीज’का एक दृश्य
लिंग था कि मानता नहीं। योनि थी कि जानती नहीं। लिंग को जल्दी थी वो चला गया। योनी को अभी देर लगेगी वो छली गई। कंडॉम वाले जान गये लिंगों को रास्ते पर और योनियों को बराबरी की चोटी पर कैसे पहुंचाया जाये। दुनिया भर के लिंगों को हुक्म तो दिया जा सकता नहीं। खासकर बने बनाए ” इंडियन पेनिस कोड” के किसी भी पुराने तौर तरीके में दखलांदाज़ी -अरे न रे बाबा न । पर यूँ कि लपलपाते फन को कुछ वक्त सम्मोहित तो कर ही सकते हैं। ज़नाना के दर्रे के दरकने के लिए कुछ मियाँद तो दिलवा ही सकते हैं। जब साइंसी जुगत दिमागों को सुन्न कर सकती है तो लिंग क्या चीज़ हैं। हेल्प हिम स्टे लांगर। गिव सम मोर मोहलत टु अस्पायरिंग वेजाइनाज़। सत्तर फीसद रह गईं वालियों में सब नहीं तो कुछ तो सीमा पार कर ही लेंगी। बाकी बार्डर लाइन वाली अपना कुसूर या मुकद्दर मानकर नेक्स्ट टाइम ट्राइ करेंगी। तो हे कंडोम की खंदक में हाइबरनेट करते बेंजोकेन!! तुम लिंगों पर लिपट जाओ। उन्हें कुछ देर भुला दो लिंगों को कि वे योनियों में आखिर करने क्या आए थे। हे ओर्गेज़्मोद्द्यत बहनों !! तुम अपनी योनि को आश्वस्त करो। वो आएगा। वो आ रहा है। देखो वो आ गया। बिग वाला. जिसे कहते हैं असली वाला उर्फ बराबरी वाला वल्द म्यूचुअल वाला मज़ा। अब जो वो भीतर आ ही गया है तो जो आया वो जाएगा पर ज़रा ठहरकर। बेंजोकेन के समर्थन वाली हुकूमत ए लिंग गिरेगी पर ज़रा ठहरकर। क्योंकि कंडोम वाले हैं न । तुम्हारी योनी के दिन फिरने वाले हैं क्योंकि कंडोम वालों के पास तकनीक है न। (इतने में)चरानुभूति की लूट है लूट सके तो लूट।
वी लेट हिम टु लेट यू टेक युअर टाइम ।
मेरी प्यारी बहनो !! – तुम कहती थीं आज़ादी दो बराबरी दो , हक् दो , पैसा दो , इज़्ज़त दो। वो जब मिलेगा तब मिलेगा। काम सुख मिल रहा है वो तो लो। देखो हमें पता है तुमने मांगा भी नहीं पर हम कह रहे हैं कि तुम्हारा बनता है ले लो। आप बडी भोली हो। स्टेप बाय स्टॆप चलती हो। एक स्टेप आगे तो दूसरा पीछे को चलती हो। एक दूसरी के स्टॆप पे स्टेप रखती हो । एक ही दिशा में चलती हो तो सब कुछ भूल कर चलती जाती हो । कोई रोक दे तो रुक जाती हो । कोई रास्ता बदला दे तो बदल लेती हो। मॉर्डर्न सती टाइप लगती हो जब तुम कहती हो भैया एक ठो आर्थिक वाली आज़ादी देना । अरे दैहिक वाली नहीं । छी छी । किसी और को दिखाना ये ; हम कोई ऐसी वैसी औरत नहीं हैं। अब तुम मेच्योर हो जाओ। ई लजालूता साइड में रख दो और म्यूअल बेसिस पर यौन सुख मिल रहा आगे बढो और पा लो। अरे बोला न हम पीछे खड़े हैं तुम्हारे। तुम तो पैकेट मंगवाओ और लग जाओ। चंद घडियाँ वही हैं जो आज़ाद हैं। तुम आओ और पाओ। पाने की मंशा जगाओ। तुम पाओगी कि तुम पा सक रही हो। पा नहीं तो पाने की कामना जगा पा रही हो। अब लोग तो बोलेंगे कि ये बाज़ार भी न एकदम बाज़ारू है।
हे बहनों।
काम और काज की मारियों
शंका और शुचिता की मारियों ,
हाँ और नहीं की मारियों ,
अभी नहीं ऐसे नहीं की मारियों
पति और प्रेमी में फंसी
रसोई और बालकों में घिसी ,
घर और बाहर में पिसी ,
योनी और गर्भ में दुविधा वालियों
प्यार और सेक्स में दुविधा वालियों ,
यौन और मौन में दुविधा वालियों प्यारी बहनों !!
सोशल मीडिया पे कैम्पेन। कैम्पेन पे तारिका। तारिका पे बाज़ार और बाज़ार पे तुम्हारे बगल वाले पुरुष जैसी तमाम खोपड़ियों का कोई हाथ नहीं है । कौन किसके साथ है नहीं है । ये ओर्गेज़्म वाली बात कोई बात है भी या नहीं है। तुम बस हमारे कहने पर हमारे तरीके से ओर्गेज़्म हथियाना सीखो ओ बराबरी चाहने वालियों! सर्वे की शक्ति हमारे साथ है और हम तुम्हारे साथ हैं। तुम अपनी योनि का साथ दो। योनि को बाज़ार का साथ देने दो। मर्दाना मंज़िल वाला सेक्स ही सही वाला सेक्स है। वही वाला क्लामेक्स सही वाला क्लाइमेक्स है । तुम लाख महसूसो कि रास्ते में यहाँ मज़ा आया वहाँ करार आया । जाओ भी ! जानती होंगी तुम और दस तरीके ऑर्गेज़्मिक धरातल पर चहलकदमी के। होती होंगी तुम कई बार सेक्सुअलि खुद मुख्तार। होती होगी बिना लिंग द्वारा उद्धार के भी तुम्हारी गंगा पार। पर जब हम कंडोम वालों ने लिंग को नीम बेहोशी में लाकर पैदायशी बदलगाम को झुकाने का नुस्खा खोज ही लिया है तो तुमको भी लिंग की अधीनता में ही पानी चाहिए न और्गेज़्मिक स्वाधीनता ? बोलो चैये के नी चैये। हम तो कहते हैं ऑर्गेज़्म दान महा दान। बोलो चैये के नी चैये ?
तुम सब आर्गेज़्म वंचिताओं की चिंताओं में तुम्हारा और सिर्फ तुम्हारा प्यारा बाज़ार !!
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आलोचक , सत्यवती महाविद्यालय ,दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाती है . संपर्क :medhaonline@gmail.com
आधुनिक
हिन्दी साहित्य के निर्माता और हिन्दी नवजागरण के पुरोधा भारतेन्दु हरिश्चंद्र ने
हिन्दी क्षे़त्र में एक नए युग का सूत्रपात किया था। उन्नीसवीं सदी के हिन्दी
क्षेत्र के केंद्रीय बौद्धिक और सामाजिक व्यक्तित्व के रूप में उनकी उपस्थिति से
किसी को इंकार नहीं हो सकता। भारतेन्दु ने उस युग के सामाजिक बहसों को दिशा देने
का काम तो किया ही, अपने समय के
विचारकों और लेखकों पर भी उनका अत्यधिक प्रभाव था। उनकी इस उपस्थिति के महत्त्व को
समझने के लिए उनका संक्षिप्त जीवन परिचय, साहित्य और समाज को
उनके योगदान पर प्रकाश डालना अनिवार्य है। इससे उनके स्त्री-विषयक विचारों के
विश्लेषण में मदद मिलेगी।
भारतेन्दु
की पारिवारिक और सामाजिक पृष्ठभूमि
भारतेन्दु
हरिश्चंद्र का जन्म बनारस के एक अग्रवाल-परिवार में हुआ था। उनके पिता गोपालचंद्र
एक चतुर व्यापारी थे। व्यापारिक बुद्धि के साथ ही उनमें यथेष्ट काव्यात्मक प्रतिभा
भी थी और उन्होंने ‘गिरधरदास’ के नाम से कोई चालीस रचनाएं लिखी थीं। अपनी
प्रतिभा और मोहक व्यक्तित्व के कारण गोपालचन्द्र ने भारत में काफ़ी प्रसिद्धि
प्राप्त कर ली थी। ब्रिटिश संरक्षण में आयोजित फूल- प्रदर्शनियों में उनके उद्यान
के पुष्पों को पुरस्कार मिलते रहे। गंगा के तट पर होने वाले ‘बुढ़वा मंगल’ के सालाना मेले में
उनके परिवार का बड़ा गहरा मेल-जोल था। गोपालचंद्र के परिवार ने लेखकों और कलाकारों
को भी बढ़ावा देने का काम किया। कभी बसंत, तो कभी होली – ऐसे
सांस्कृतिक अवसर अक़्सर ढूँढ़ लिए जाते थे, जब गोपालचंद्र के घर
लेखक-कलाकारों की मंडली जम बैठती थी।
भारतेंदु
अपने
पिता गोपालचंद्र पर पड़ रहे आधुनिकता के प्रभाव को लक्षित करते हुए भारतेन्दु ने
स्वयं एक जगह पर लिखा है-‘‘मेरे पिता के विचार
परिष्कृत थे। बिना अंग्रेज़ी की शिक्षा के भी उनको वर्तमान समय का स्वरूप भली-भाँति
ज्ञात था… टामसन साहब लेफ्टिनेंट गर्वनर के समय काशी में लड़कियों का पहला स्कूल
खुला तो हमारी बड़ी बहिन को उन्होंने उस स्कूल में पढ़ने बैठा दिया। यह कार्य उस समय
बड़ा कठिन था क्योंकि इसमें बड़ी ही लोक निन्दा थी। उन्होंने हम लोगों को अंग्रेज़ी
शिक्षा दी।’’1 ऐसी ही सांस्कृतिक समृद्धि और सामाजिक प्रतिष्ठा
वाले परिवार में भारतेन्दु का जन्म 1850 के आसपास बनारस में हुआ था। वह
गोपालचन्द्र के दो पुत्रों में बड़े थे। व्यापारिक और सर्जनात्मक व्यक्तित्व के
मालिक पिता के प्रथम पुत्र में सर्जनात्मक लक्षण अधिक उजागर हुए; जबकि द्वितीय पुत्र गोकुलचन्द्र अच्छे व्यापारी
सिद्ध हुए।
भारतेन्दु
के जन्मकाल का बनारस
जिस
युग के बनारस में हरिश्चंद्र ने आँखें खोली थीं,
उसके बारे में मदन
गोपाल का कहना है -‘‘1850 के आस-पास का
बनारस, जहाँ हरिश्चंद्र का जन्म हुआ था, निवास के लिए एक रोचक स्थान रहा होगा। … उन
दिनों के बनारस में लखनऊ के लोग उमड़ पड़े थे। बनारस शहर ने जहाँ एक ओर प्रतिभाशाली
कलाकारों को शरण दी, वहीं दूसरी ओर
विद्वता के लिए प्रख्यात पुरोहिती परम्परा के पंडितों को भी आश्रय दिया। हर प्रकार
की कला को संरक्षण देने वाले बनारस के महाराजा ने ही नहीं, बनारस के अन्य कुलीन, सम्पन्न परिवारों ने भी सभी तरह के कलाकारों को
पूरा-पूरा आश्रय दिया, चाहे वे कवि अथवा
संगीतकार हों, या नर्तक अथवा वेश्याएं।2 ’’
औपनिवेशिक
राजनैतिक परिदृश्य
भारतेन्दु
के जन्म के वक़्त के राजनैतिक परिदृश्य पर चर्चा करें तो 1848 में लार्ड डलहौजी के
भारत पदार्पण के साथ ही एक नए युग की शुरुआत हो चुकी थी। ईस्ट इंडिया कंपनी ने
पंजाब पर अपना कब्जा जमाकर भारत में पूरी तरह से अपने साम्राज्य की स्थापना की
प्रक्रिया समाप्त कर ली थी। पौर्वात्यवादी, उपयोगितावादी और
धर्मवादी विद्वानों ने मिल जुलकर अपने शासन के औचित्य को साबित करते हुए
सांस्कृतिक, सामाजिक और आर्थिक विविधता वाले भारत को अपने
प्रशासनिक और न्यायिक तंत्र की रचना की प्रक्रिया में भारत को पाठाधारित एकहरे
हिन्दू धर्म के समुदाय में परिवर्तित करने की प्रक्रिया भी लगभग पूरी कर ली थी। कोलकाता
से आगरा तक तार-संचार की व्यवस्था हो चुकी थी। भारत की पहली रेलवे लाइन बिझायी
जाने लगी थी और कोलकाता से दिल्ली तक की सड़क भी बना ली गई थी। जल मार्ग से यातायात
शुरू हो चुका था। बम्बई, मद्रास तथा कोलकाता में
विश्वविद्यालयों स्थापित होने लगे थे।
औपनिवेशिक
लैंगिक विचारधारा देसी समुदाय को भारतीय स्त्री की एक ख़ास तरह की छवि गढ़ने के लिए
प्रेरित कर रही थी। इसी क्रम में अंग्रेजों ने नारी-कल्याण के मक़सद से हिन्दू
विधवा पुनर्विवाह कानून पास कर दिया था। ऐसे ही सामाजिक सांस्कृतिक और राजनीतिक
परिदृश्य में भारतेन्दु का अवतरण भारत की धरती पर होता है। संभावनाओं से भरपूर
ऐतिहासिक परिस्थिति और अपनी प्रतिभा के बल पर भारतेन्दु बनारस और पूरे हिन्दी जगत
के केंद्रीय सांस्कृतिक और सामाजिक व्यक्तित्व के रूप में उभरे।
हिन्दी
लोकनायक और आधुनिक हिन्दी भाषा और साहित्य के पितामह
हिन्दी
के लोकनायक और आधुनिक हिन्दी भाषा और साहित्य के पितामह के रूप में प्रतिष्ठित
भारतेन्दु ने राष्ट्रवाद के आधुनिक सिद्धांत की एक स्थापना के आधार पर निज भाषा
उन्नति अहे, सब उन्नति को मूल को स्वीकार करते हुए न केवल
आधुनिक हिन्दी भाषा की रचना और उसके परिष्करण, परिमार्जन और
स्थिरीकरण का काम किया, वरन् हिन्दी साहित्य
मे कई नई विधाओं की शुरुआत की और पुरानी विधाओं को नया चोला पहनाने का भी काम
किया।
‘‘भारतेंदु हरिश्चंद्र का निधन 1885 ई. के जनवरी
महीने की 25 तारीख को हुआ। यह वर्ष भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना का वर्ष
भी था। 34 वर्ष और चार महीने की अल्पआयु में भारतेंदु बाबू ने अनुदित और मौलिक
सैकड़ों रचनाएँ लिखीं। गद्य को एक मानक भाषा देने के अलावा वे गद्य की प्रायः सारी
विधाओं के प्रवर्तक बने। कविता के क्षेत्र में पारंपरिक शैलियों के अलावा ठेठ लोक
जीवन में प्रचलित शैलियाँ तथा छंदों को उन्होंने अपनाया। शिष्ट कहे जाने वाले
काव्य के अलावा ग्रामगीतों तक की रचना की। न जाने कितने काव्य-रूपों तथा लयों से
उन्होंने हिंदी कविता को समृद्ध किया। कविता तथा गद्य, दोनों में उन्होंने समान अधिकार के साथ लिखा।
नाटक, मौलिक तथा अनुदित- दोनों प्रकार के उन्होंने सुलभ
किए तथा उनके मंचन में ही दिलचस्पी नहीं ली, स्वयं उनमें अभिनय
भी किया।’’3 जीवन के अंतिम समय तक भी भारतेन्दु हरिश्चंद्र
हिन्दी-लेखकों को उपन्यास-लेखन के लिए प्रेरित करते रहे। इसलिए यदि भारतीय भाषाओं
का सबसे पहला प्रख्यात विदेशी इतिहासकार जार्ज ग्रियर्सन हरिश्चंद्र को आज का
सर्वश्रेष्ठ भारतीय कवि कहे तो इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं। वैसे ग्रियर्सन का
मत तो यह भी है कि देशी बोली में रचित साहित्य को लोकप्रिय बनाने में भारतेन्दु
हरिश्चंद्र से अधिक महत्त्वपूर्ण कार्य किसी अन्य भारतीय ने नहीं किया।’’4
भारतेन्दु
ने तीन महत्त्वपूर्ण पत्रों का संपादन भी किया जो मात्र साहित्यिक पत्र बनकर ही
नहीं रह गए, समकालीन राजनीतिक तथा सामाजिक जीवन में भी जिनकी
महत्त्वपूर्ण शिरकत रही। कविवचन सुधा, हरिश्चंद्र मैगजीन
और स्त्री-शिक्षा की पत्रिका ‘बालाबोधिनी’ के प्रकाशन के जरिए
उन्होंने जन-जागरण का काम किया। कई आलोचक उन्हें हिंदी में राष्ट्रीय तथा
साहित्यिक पत्रकारिता का जनक मानते हैं। हिंदी भाषा तथा साहित्य की सेवा के लिए
हिंदी साहित्य के इतिहासकार रामचंद्र शुक्ल ने उन्हें महात्मा कहकर भी याद किया
है। भारतेंदु की सबसे बड़ी साहित्यिक देन उन्होंने यह मानी है कि उन्होंने साहित्य
को नए-नए विषयों की ओर उन्मुख किया और उसे नए और आधुनिक विचारों से लैस किया।
उन्नीसवीं
सदी का लोकवृत्त और भारतेन्दु हरिश्चन्द्र
यह
कहना कतई गलत न होगा कि उन्नीसवीं सदी के हिन्दी समाज का लोकवृत्त भारतेन्दु के
इर्द गिर्द ही गढ़ा जा रहा था। उस युग में सामाजिक,
साहित्यिक और
राजनीतिक बदलावों का वाहन बनने वाली कई महत्त्वपूर्ण संस्थाओं की स्थापना
भारतेन्दु ने की थी। उनके युग के सभी महत्त्वपूर्ण रचनाकार और पत्रकार हरिश्चंद्र
मंडल में शामिल थे। रामविलास शर्मा ने भारतेन्दु युग नामक अपनी पुस्तक में लिखा
है-‘‘……जिसका घर साहित्यकारों के सम्मेलन का सभाभवन हो, जिसने अपने चारों तरफ़ बालकृष्ण भट्ट, प्रताप नारायण मिश्र, राधाचरण गोस्वामी,
श्रीनिवासदास, काशिनाथ आदि लेखकों का व्यूह रचाया हो, जिसने ‘कवि-वचन-सुधा’ से लेकर ‘सारसुधा निधि’ तक पचीसों अख़बारों और पत्रों से हिन्दी में नयी
हलचल मचा दी हो और स्वयं नाटक, निबंध, कविताएं, व्याख्यान, मुकरियाँ आदि से अपने युग को चमत्कृत करके 36 साल
की अवस्था में ही अपनी जीवन-लीला समाप्त कर दी हो – दरअसल उसका जीवन कहानी न होगा
तो किसका होगा?’5’
मंजीत सिंह की पेंटिंग
हिन्दी
नवजागरण की महत्त्वपूर्ण विद्वान वसुधा डालमिया ने भारतेन्दु हरिश्चंद्र को ‘सांस्कृतिक और सामाजिक अथारिटी’ की संज्ञा देते हुए लिखा है-‘‘भारतेन्दु हरिश्चंद्र को आधुनिक हिन्दी साहित्य
में अग्रणी स्थान प्राप्त है। हिन्दी भाषा को हिन्दी गद्य के लिए उन्होंने बड़े
सर्जनात्मक ढंग से व्यवहार किया। मित्रों और ख़तो-किताबत करनेवालों के बीच
उन्होंने एक मंडली जुटाई और इसे हिन्दी में साहित्य लेखन के लिए प्रेरित किया।
बनारस में उनकी गणना ऊँची हैसियत के लोगों में की जाती थी। उनका संबंध बनारस के
वनिकों में श्रेष्ठ गिने जाने वालों नवपति महाजनों में से एक से था। नवपति महाजन
मूलतः क़र्ज़ देने का काम करते थे और 18वीं सदी में इन्हें अच्छी ख्याति प्राप्त हुई
थी। अपने पिता के ही समान उन्होंने बनारस के सांस्कृतिक जीवन में अग्रणी भूमिका
निभाई। वह कवि-गोष्ठी और संगीत समारोह का लगातार आयोजन करते थे। बनारस के महराजा
से उनकी अच्छी दोस्ती थी। रामनगर की रामलीला को बढ़ावा देने में भारतेन्दु का बड़ा
योगदान रहा। उन्होंने इस रामलीला के संवाद लिखे। वह शहर के मजिस्ट्रेट अवैतनिक के
पद पर भी रहे और स्वेच्छा से त्यागपत्र दिया। उनका संबंध स्थानीय अंग्रेज
अधिकारियों और प्राच्य विद्या विशारदों से रहा। कोलकाता स्थित एशियाटिक सोसायटी के
सचिव राजेन्द्र लाल मित्र से उनका पत्र-व्यवहार होता था। ‘एशियाटिक रिसर्चेज़’
में छपे
प्राच्य-विद्या संबंधी शोधपरक लेख तथ अन्य व्याख्यान भारतेन्दु ने अपने पास जुटा
कर रखे थे। उन्होंने कई समाजों की स्थापना की, स्कूल खोला या उनके
चलने में सहायता दी और तीन महत्त्वपूर्ण पत्रिकाओं का संपादन किया।’’6
‘नारि नर सम होहिं’
और भारतेन्दु की
लैंगिक विचारधारा
अपने
दौर के इतने केंद्रीय महत्व के व्यक्तित्व -‘भारतेन्दु’ ने स्त्रियों की स्थिति पर जो चिन्तन-लेखन किया
था, उसका उनके समय में अत्याधिक सामाजिक-सांस्कृतिक
प्रभाव पड़ा होगा और इसने समाज के चलन को निर्धारित करने में महती भूमिका निभाई
होगी। अतः भारतेन्दु के स्त्री-संबंधी विचार न केवल उस दौर की स्त्री की नियति को
जानने के लिए ज़रूरी है, बल्कि उस वक़्त नई
पितृसंरचना की जो बुनियाद डाली गई थी, उसकी मीनार आज के
समाज में बुलंद हो रही है। अतः इससे आज की स्त्रियों की दशा को भी समझने में मदद
मिलेगी। भारतेन्दु अपनी साहित्यक सेवा, सामाजिक परिवर्तन और
राजनीति में अपनी दखल के कारण अपने युग के निर्माता बन चुके थे। अतः भारतेन्दु के
स्त्री विषयक विचार का अध्ययन न केवल उस युग के अन्य हिन्दी बौद्धिकों के विचार से
अवगत होने के लिए आवश्यक है, वरन् उस युग की
प्रमुख सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक प्रवृत्तियों के अध्ययन के
लिए भी अनिवार्य है।
‘नारि नर सम होंहि का नारा देने वाले भारतेन्दु के
स्त्री-विषयक विचार को गहराई से समझने के लिए हमें उन्हें तीन संदर्भो में देखना
होगा।
1 उनके द्वारा निकाली गई स्त्री पत्रिका ‘बालाबोधिनी’ के विश्लेषण के जरिए, 2 उनके नाटकों के विश्लेषण के जरिए और 3 अन्य जगहों पर अभिव्यक्त हुए उनके विचारों के विश्लेषण के माध्यम से।
‘बालाबोधिनी’ को आर्यकुल ललनाओं
को सद्गृहिणी और पतिव्रता बनाने की परियोजना कहा जा सकता है। 1870 का दशक
भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के प्रकाशन संबंधी गतिविधियों के उत्कर्ष का समय था और वह उत्तर-पश्चिम
प्रान्त के केंद्रीय लोकनायक के रूप में स्थापित हो चुके थे। उनके द्वारा प्रकाशित
की जा रही दो पत्रिकाएं – कविवचन सुधा और हरिश्चंद्र मैगज़ीन अपने वक़्त में अत्यधिक
प्रतिष्ठा प्राप्त कर चुकी थीं। इन पत्रिकाओं में वह समाज-सुधार के मसलों पर
समय-समय पर बहसें आयोजित किया करते थे। लेकिन इन सबसे अलग उन्होंने एक
महिला-पत्रिका ‘बालाबोधिनी’ का प्रकाशन 1874 में
शुरू किया। यह दस पृष्ठों की पत्रिका थी। इसका प्रवेशांक जनवरी 1974 में प्रकाशित
हुआ था। यह कुल मिलाकर तीन साल और कुछ महीने तक प्रकाशित हो सकी। इसके बारे में यह
तो ज्ञात नहीं कि इसकी कितनी प्रतियाँ प्रकाशित होती थीं, लेकिन इसकी सौ प्रतियाँ सरकार की तरफ़ से ख़रीदी
जाती थीं। सरकार का संरक्षण समाप्त होने के साथ ही फ़रवरी 1878 के बाद इसे ‘कविवचन सुधा’ में समाहित कर दिया
गया। इसमें भारतेन्दु के अलावा अन्य लेखकों की भी रचनाएँ प्रकाशित होती थीं।
भारतेन्दु
की अन्य पत्रिकाओं की ही तरह ‘बालाबोधिनी’ भी उन्नीसवीं सदी की हिन्दी पट्टी के लिए रहबर की
भूमिका निभा रही थी। यह हिन्दू स्त्रियों के मनोरंजन या विशुद्ध ज्ञानवर्धन के लिए
नहीं निकाली जा रही थी, वरन् इसके प्रकाशन
के पीछे भारतेन्दु का मक़सद राष्ट्रीय परियोजना के तहत घर-बाहर और स्त्री-पुरुष के
संबंध को पुनर्परिभाषित कर उसके विभाजन को सशक्त बनाने हेतु घरेलू वृत्त के पुनर्गठन
और हिन्दू पितृसत्ता के पुनर्संधान की थी; जिसे वसुधा ने अपनी
प्रकृति में विक्टोरियाई नैतिकता और विक्टोरियाई स्त्री दृष्टि से प्रभावित बताया
है। ‘बालाबोधिनी’ के प्रकाशन के
उद्देश्य के बारे में वसुधा डालमिया ने लिखा है,
‘‘स्त्री की भूमिका को
गृहणी और माँ के रूप में पुनर्परिभाषित करते हुए यह अपने रुझान में पूरी तरह
विक्टोरियाई थी।’’7 हिन्दी जगत के
आलोचकगण जो कि ‘नारि नर सम होंहि’
का नारा देने मात्र
से भारतेन्दु को स्त्री-मुक्तिकामी मान लेते हैं;
उन्हें वसुधा का यह
विचार हतप्रभ कर सकता है; लेकिन स्वयं ‘बालाबोधिनी’ की अन्तर्वस्तु, भाषा और तेवर वसुधा की इस स्थापना को सिद्ध करते
हैं।
पहले
हम ‘बालाबोधिनी’ के तेवर की बात
करें। कविवचन सुधा और हरिश्चंद्र चंद्रिका (जो कि पुरुषों के लिए निकाली जाती थीं)
से बालाबोधिनी के तेवर की तुलना की जाए तो ज़मीन-आसमान का फ़र्क़ सामने आता है। ये
दोनों पत्रिकाएं वाक्-पटुता और हास्य-व्यंग्यपरक रचनाओं और अपनी ज़िंदादिल प्रकृति
के लिए पूरे हिन्दी क्षेत्र में प्रसिद्ध थी; जबकि बालाबोधिनी ये
गुण सर्वथा अनुपस्थित थे। इसमें वाकपटुता और हास्य-व्यंग्य का पुट नहीं होता था।
इसमें प्रकाशित होनेवाली रचनाएं आमतौर पर अपनी अंतर्वस्तु और शैली में गंभीर और
उपदेशपरक हुआ करती थीं। भारतेन्दु के शेष सभी पत्रों में ब्रजभाषा में कृष्ण और
राधा के प्रेम की कविताएं निरन्तर प्रकाशित होती थीं, जबकि बालाबोधिनी में ब्रजभाषा और उसमें लिखी जा
रही प्रेमपरक कविताओं के प्रकाशन पर प्रतिबंध था।
भारतेन्दु
ने ‘बालाबोधिनी’ के प्रवेशांक में
भारतेन्दु लोकनायक, समाज संशोधक, और राष्ट्रवादी के रूप में संभावित पाठिकाओं से
पत्रिका का परिचय छोटी बहन के रूप में कराते हैं। उसके द्वारा दी गई सलाहों से
सहमत न होने पर भी इस नवान्तुक की बात को ध्यानपूर्वक सुनने का आग्रह करते हैं।
भारतेन्दु लिखते हैं -‘‘यदि आप मेरी बचकानी
हकलाहट पर ध्यान देंगी तब मैं सवशक्तिमान से प्रार्थना करूँगा कि मेरे हिन्दुस्तान
की महिलाएं साक्षर हो जाएं और अपने पुरुष की किस्मत के बराबर की साझीदार बनें।’’8 पत्रिका के प्रवेशांक में महिलाओं के पुरुष के
किस्मत की बराबर की साझीदार बनने की भारतेन्दु की प्रार्थना से सचमुच यह आभास होता
है कि यह पत्रिका स्त्री मुक्ति की सच्ची पत्रिका होगी; लेकिन इसमें छपनेवाली रचनाएं इसका खंडन करती हैं। इस संदर्भ
में एक रचना का उदाहरण प्रस्तुत है। पटना काॅलेज में संस्कृत के प्राध्यापक बिहारी
चैबे की ने ‘बालाबोधिनी’ में 1876 के मार्च
से लेकर जून तक ‘आरलेनस की कुमारी की
कहानी’ धारावाहिक छापी। यह कहानी फ्रांस की मशहूर ज़ांबाज
और मिथक बन चुकी साहसी नायिका जोन ऑफ आर्क के जीवन पर लिखी गई थी। 1412 ई. में एक
किसान के घर पैदा हुई जोन की माँ के साथ अंग्रेज सैनिकों ने बलात्कार किया था और
फ्रांस देश को रौंदा था। जोन आफ आर्क ने अपने को दैवी शक्तियों से युक्त बताकर
फ्रांसीसी फ़ौज का नेतृत्व करते हुए अंग्रेजों को हराया था। बाद में वह अंग्रेजों द्वारा पकड़ी
गई और उसके असाधारण गुणों से भयाक्रांत अंग्रेजों ने उसे जिंदा जलाकर मार डाला था।
कहानी पढ़ने से ऐसा एहसास होता है कि लेखक ने स्त्रियों को अपने अबलेपन का त्याग कर
नूतन शक्ति से ओतप्रोत करने के मक़सद से यह कहानी लिखी गई होगी। लेकिन कहानी के अंत
में लेखक द्वारा दिए गए उपेदश से ‘बालाबोधिनी’ के प्रवेशांक में भारतेन्दु द्वारा स्त्री की
मर्दों की किस्मत की बराबरी करने की प्रार्थना का खंडन हो जाता है। सिर्फ 19 साल की उम्र में शहीद हो गई जोन के
जीवन वृतांत का निष्कर्ष चौबे जी निकालते हैं -‘‘जो स्त्रियाँ अपना
स्त्रीधर्म छोड़कर देवियों जैसी वीरता दिखाने की कोशिश करेंगी, उनकी दुर्गति ऐसी ही होगी, जैसी जोन की हुई। कहने का तात्पर्य यह है कि अति
साहस और माया से बुरा ही फल देती है। स्त्रियाँ जो बहुत सा झूठ-झूठ अभुजाती और
माता भवानी की नक़ल करती हैं, सो सबका सत्य होना
असंभव ही है और लड़कियों को जो उनमें विश्वास हो जाता है, सो न होना चाहिए। स्त्रियों के घर जो पतिदेव रहते
हैं, उन्हीं की भक्तिपूर्वक सेवा करना परमोत्तम है।
इति।’’9
प्रवेशांक
में ही एक आलेख ‘शीलवती’ शीर्षक से छपता है। इसमें एक गुणवती पत्नी का
चरित्र चित्रण है। इसमें छपी रचनाएं सीधे-सीधे महिलाओं को उपेदश देती थीं, कि उन्हें फूहड़,
गँवार, अशिक्षित नहीं होना चाहिए। पत्रिका की कोशिश नए
उभरते मध्यवर्गीय एकल परिवार की सामाजिक बेहतरी के लिए हिन्दी पट्टी की स्त्री को
शहरी, आधुनिक और सुगृहिणी और आदर्श माँ बनाने की थी।
इसी उद्देश्य को ध्यान में रखकर उसमें निरन्तर ‘शिशुपालन’ का एक कालम छपता था, जिसमें शिशुओं के लालन-पालन संबंधी बातों पर
चर्चा होती थी। औरतों को आदर्श माँ और सुगृहिणी का प्रशिक्षण देने के मक़सद से
बिजनौर-पीलीभीत के पास सिकंदराबाद के निवासी हीरालाल द्वारा कन्या पाठशालाओं में
पाठ्यक्रम में शामिल किए जाने के मक़सद से तैयार की गई ‘बालाप्रबोध’ 1875 की जनवरी से
शुरू होकर अगले तीन-चार अंकों तक प्रकाशित की गई। इसमें भद्रवर्गीय हिन्दू परिवार
के मूल्यों के अनुरूप स्त्रियों को परंपरागत घरेलू कामों को और भी निपुणता और सफ़ाई
के साथ पूरा करने की शिक्षा दी गई थी। बच्चों का पालन कैसे करना चाहिए, पति की सेवा कैसे करनी चाहिए, सास-ससुर, ननद-जेठानी और
देवर-जेठ के साथ कैसे नम्रता का बर्ताव करना चाहिए,
इन सबकी शिक्षा बड़े
ब्यौरे के साथ दी गई थी। स्त्रियों की सुविधा और आराम को हिन्दू भद्रवर्गीय परिवार
के लिए नुकसानदायक मानते हुए लेखक लिखता है -‘‘स्त्रियों को खाली
बैठना विशेषकर के अयोग्य कहा है। क्योंकि जब वह खाली बैठती है तो अवश्य अपनी और
पर-स्त्रियों के दोषगुण गिनाती रहती है जिसका परिणाम ये होता है कि अनेक क्लेश
उत्पन्न हो जाते हैं।’’10
नौकरी
और कॅरियर के अवसरों के महत्तम लाभ उठाने के मक़सद से अपने मूल शहर-गाँव से
विस्थापित मध्यवर्ग के लिए नई जगह पर अकेली रह रही स्त्री के पातिव्रत्य को
सुनिश्चित कर पाना भी बड़ी चिन्ता थी। इस मक़सद को ध्यान में रखकर ‘बालोबोधिनी’ में अक्सर भारतवर्ष
की सीता, सावित्री, सती -जैसे आदर्श
महिलाओं की चरित्र महिमा प्रकाशित की जाती थी।
‘बालाबोधिनी’ के विश्लेषण से इस
बात की पुष्टि हो जाती है कि भारतेन्दु के स्त्री- विषयक विचार औपनिवेशिक शासन की
लैंगिक विचारधारा की उपस्थिति में स्त्री विषयक विक्टोरियाई धारणा और अपने
राष्ट्रीय ‘स्वत्व’ की निर्मिति के लिए
प्राचीन हिन्दू धर्म में स्त्रियों के लिए निर्धारित किए गए मूल्य शील, सती और पतिव्रता से बनते हैं। भारतेन्दु के स्त्री-विषयक विचारों पर
उनके वक़्त में उभरते नव मध्यवर्ग के
आधुनिक जीवन की परिस्थितियों की महती भूमिका रही थी। ‘‘विक्टोरियाई इंगलैंड में एक नये क़िस्म का अलगाव
महिलाओं पर लादा गया। उसकी पहचान को आर्थिक दृष्टि से निम्न वर्ग की महिलाओं के
विपरीत परिभाषित किया जा रहा था। वर्गीय प्रतिष्ठा और श्रेष्ठता के प्रतीक के तौर
पर मध्यवर्गीय महिलाओं को निजी वृत्त में सीमित प्रक्रिया इतर नहीं थी। ठीक इसी
वक़्त घर की नई निर्मिति भी की जा रही थी, जिसमें घर को निजी वृत्त
के रूप में इस तरह विच्छेदित कर दिया था, जो पुरुष सत्ता की
तात्कालिक चुनैतियों से मुक्त था।’’11
भारतेन्दु
के स्त्री विषयक इन विचारों की पुष्टि उनके नाटकों और अन्य प्रकार के लेखन से भी
होती है। उदाहरण के लिए यहाँ पर उनके अधूरे नाटक ‘सती प्रताप’ का ज़िक्र उचित होगा। इस नाटक में भारतेन्दु
सावित्री के मुख से स्त्री धर्म का उल्लेख करवाते हुए कहते हैं- ‘‘स्त्री धर्म बड़ा कठिन है। जिसको एक बेर मन से पति
कहकर वरण किया उसको छोड़कर स्त्री शरीर की अब इस जगत में कौन गति है। पिता माता बड़े
धार्मिक हैं, सखियों के मुख से यह संवाद सुनकर वह अवश्य उचित
ही करेंगे। वा न करेंगे तो भी यह जन्म में अन्य पुरुष अब मेरे हेतु कोई है नहीं।
(अपना वेष देखकर) अहा! यह वेष मुझको कैसा प्रिय बोध होता है। जो वेष हमारे जीवितेश्वर
धारण करें वह क्यों न प्रिय हो। इसके आगे बहुमूल्य हीरों के हार और चमत्कार दर्शक
वस्त्र सब तुच्छ हैं। वही वस्तु प्यारी है जो प्यारे को प्यारी हो। नहीं तो
सर्वसंपत्ति की मूल कारण स्वरूपा देवी पार्वती भगवान भूतनाथ की परिचर्या इस वेष से
क्यों करतीं? सतीकुलतिलका देवी जनकनंदिनी को अयोध्या के
बड़े-बड़े स्वर्ग विनिंदक प्रासाद और शचीदुर्लभ गृह-सामग्री से भी वन की कर्णकुटी और
पर्वतशिला अति प्रिय थी, क्योंकि सुख तो केवल
प्राणनाथ की चरण-परिचर्या में है। जब तक अपना स्वतंत्र सुख है तब तक प्रेम नहीं।
पत्नी का सुख एकमात्र पति की सेवा है। जिस बात में प्रियतम की रुचि उसी में
सहधर्मिणी की रुचि। अहा! वह भी कोई धन्य दिन आवेगा जब हम भी अपने प्राणाराध्य
देवता प्रियतम पति की चरणसेवा में नियुक्त होंगी। वृद्ध श्वसुर और सास के हेतु पाक
में नियुक्त होंगी। वृद्ध श्वसुर और सास के हेतु पाक और निर्माण करके उनका परितोष
करेंगी। कुसुम, दुर्वा, तुलसी, समिधा इत्यादि बीनने को पति के साथ वन में
घूमेंगी। परिश्रम से थकित प्राणनायक के स्वेद-सीकर अपने अंचल से पोंछकर मंद मंद
वनपत्र के व्यजनवायु से उनका श्रीअंग शीतल और चरणसंवाहनादि से श्रम करेंगी।’’12 भारतेन्दु द्वारा सावित्री से स्त्री धर्म के
बारे में कहलावाए गए इस उद्धरण में उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध के औपनिवेशिक भारत
के मध्यवर्गीय समाज के लिए आवश्यक स्त्री की छवि को पढ़ा जा सकता है; जो कि कहीं न कहीं योरोपीय मध्यवर्गीय स्त्री की
ही प्रतिछवि मालूम पड़ती है।
उन्नीसवीं
सदी के उभरते मध्यवर्ग के सामने आर्थिक चुनौतियाँ बहुत गंभीर थी। शिक्षा अर्जन पर
आधारित उनके जीवन पर अपनी संतति के लिए मँहगी शिक्षा का तो प्रबंध करना ही था, अपनी आधुनिक जीवनशैली और सामाजिक प्रतिष्ठा के नए
प्रतिमानों पर खड़े उतरने के भी आर्थिक दवाबों का सामना करना था। ऐसे में उसे बतौर
गृहणी एक किफ़ायतसार स्त्री की आवश्यकता थी, जो अंग्रेज़ स्त्री
की घर और देश की सभी ज़िम्मेदारियों को तो पूरा करे,
लेकिन उनकी तरह अपने
रहन-सहन पर फ़िजूलखर्ची न करे। सावित्री के मुख से हीरे जवाराहत को त्याग कर सत्यवान
के साथ सादा जीवन जीने का यही मध्यवर्गीय संदर्भ है। साथ ही उन्नीसवीं सदी के
मध्यवर्ग को नई जगह पर अकेली रह रही स्त्री के पातिव्रत्य की रक्षा को सुनिश्चित
करने की दुश्चिंता सता रही थी, इसलिए न केवल
भारतेन्दु वरन् उस वक़्त के हर हिन्दी लेखक में पातिव्रत्य का महिमामंडन मिलता है।
सावित्री का यह कहना कि ‘पत्नी का सुख
एकमात्र पति की सेवा है’; मध्यवर्ग की इसी
आशंका का संकेत है। सास, श्वसुर के लिए
खाना-पकाना, उनकी सेवा यह सब घर को निपुणता से संचालित करने
के संकेत है। यहाँ पर भारतेन्दु ने आधुनिक मध्यवर्ग की स्त्री की छवि को वैधता
प्रदान करने के लिए धर्म के प्राचीन मुहावरों का प्रयोग किया है।
मध्यवर्ग
की स्त्री की जिस छवि को अखिल भारतीय स्त्री के बतौर प्रचारित प्रसारित किया जा
रहा था; वह हिन्दू धर्म की उच्च जाति की स्त्री थी। उस पर
थोपे गए आधुनिक मान-मूल्य ने अब तक की पंरपराओं से प्राप्त स्त्री के ‘स्पेस’ और ‘क्षणों की स्वाधीनता’ को भी छीनने का काम किया और उसे मान मर्यादा के
अट्टालिका पर बैठाकर उससे स्वाभाविक जीवन के रास-रंग को छीन लिया गया। उसके दुःख
और खुशी मनाने के तरीक़ों को भी नियंत्रित किया जाने लगा। और यह सब किया गया यह
कहते हुए कि निम्न वर्ग की स्त्री से वह अलग हैं,
उनसे बहुत श्रेष्ठ
हैं। जातीय संगीत में एक ओर तो भारतेन्दु स्त्री द्वारा गीत गाए जाने की चर्चा
करते हैं और समाज सुधार में उसके इस्तेमाल की बात करते हैं, साथ ही वह शादी में स्त्रियों द्वारा हास-परिहास
और गाली से भरे गीत गाने के सर्वथा विरुद्ध हैं। उनके जीवनीकार शिवनन्दन सहाय ने
लिखा है-‘‘ यह विवाह आदि में बुरे गीत गाना पसंद नहीं करते
थे, वरन् मई 1880 में जब इनकी कन्या का विवाह हुआ तो
उस समय इन्होंने अपने घर गाली का गाना बंद कर दिया।’’13 इस बात की सूचना ‘कविवचन’ सुधा में प्रकाशित
होती है और भारतेन्दु के मित्र ठाकुर जाहर सिंह उन्हें पत्र लिखकर इस बात के लिए
साुधवाद देते हैं और कहते हैं कि -‘‘हमारी जाति की
स्त्रियां अच्छा गीत नहीं जानतीं अतः आपसे मेरी प्रार्थना है कि कोई पुस्तक ऐसी
बने जिसमें हर समय के अच्छे-अच्छे सरल भाषा में हांेय जो स्त्रियाँ उनको पढ़ कर
बुरी चाल के गीत आदि छोड़ दें।’’ 14 अपनी परंपरा से प्रेरणा लेने वाले भारतेन्दु
आखि़र स्त्रियों द्वारा शादी में गाए जाने वाले गीत को बुरा मानकर त्यागने की बात
क्यों करते हैं, दरअसल इसकी व्याख्या वसुधा की इसी टिप्पणी के
सहारे की जा सकती है कि उनकी स्त्री-विषयक दृष्टिकोण में विक्टोरियाई नैतिकता का
प्रभाव है। विक्टोरियाई इंगलैंड जिस तरह मध्यवर्गीय स्त्री की परिभाषा निम्नवर्गीय
स्त्री के विपरीत गढ़ी जा रही थी, उसी भाँति ‘हन्दी जाति’ का गठन करने वाले
भारतेन्दु हिन्दू मध्यवर्गीय स्त्री को अंधेर नगरी की मछली बेचनेवाली निम्नवर्गीय
महिला के विपरीत गढ़ रहे थे; इसलिए जो
आचार-व्यवहार उन्हें निम्न वर्गीय महिला के समकक्ष करती हो, उसका परित्याग करना अनिवार्य था। इसी मान्यता के
अंतर्गत भारतेन्दु शादी में गाली भरे गीत गाने के विरुद्ध थे।
19वीं सदी में एक सिक्ख महिला
भारतेन्दु
के स्त्री-विषय विचार की व्याख्या उनके समय और व्यक्तित्व के अंतर्विरोधों को
समाने रखकर ही की जा सकती है। दरअसल भारतेन्दु का अंतर्विरोध न केवल उनका बल्कि
उनके युग का अंतर्विरोध था। दरअसल उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध के हिन्दी पट्टी के
तमाम बौद्धिकवर्ग स्वयं और अपने समुदाय को अंग्रेज़ों के रचे हुए इतिहास के आइने
में देख रहे थे। सभ्यतागत श्रेष्ठता और आधुनिकता के अग्रदूत होने का दावा करनेवाले
अंग्रेज़ देसी समुदाय के समक्ष सटीक, तर्कयुक्त, वैज्ञानिक जीवन पद्धति का उदाहरण पेश कर रहे थे।
ऐसे वक़्त में देसी समुदाय के सामने दो कठिन चुनौतियाँ थीं। पहली चुनौती अतीत की
ऐसी व्याख्या प्रस्तुत करने की थी; जिससे भारत की
सभ्यतागत श्रेष्ठता साबित की जा सके। दूसरी चुनौती स्वयं और समुदाय को आधुनिक
बनाने की थी, लेकिन अपने ‘स्वत्व’ की रक्षा करते हुए।
भारतेन्दु
के भीतर अपने युग का यह अंतर्विरोध मौजूद है और उनके जेहन में परंपरा और आधुनिकता
का वितंडा हमेशा चलता रहता था। ‘पंरपरा और आधुनिकता’ के इस संघर्ष में भारतेन्दु ने परंपरा के
सीधे-सरल ढंग से स्वीकार नहीं किया; बल्कि उसे आधुनिक
तर्क से संपन्न बनाकर प्रस्तुत किया। इसका उदाहरण उनके लेखन में बहुत जगह दृष्टिगत
होता है। अपने बलिया वाले भाषण में वह पारंपरिक धार्मिक रीति-नीति को भी
वैज्ञानिकता से सिद्ध करते हुए लिखते हैं-‘‘…. तुम्हारे बलिया मेला
और यहाँ स्नान क्यों बनाया गया? जिससे जो लोग कभी
आपस में नहीं मिलते, दस-दस पाँच-पाँच कोस
से वे लोग साल में एक जगह एकत्र होकर आपस में मिलें…एकादशी का व्रत क्यों रखा है? जिससे महीने में दो-एक उपवास से शरीर शुद्ध हो
जाए। गंगा जी नहाने जाते हो तो पहले पानी सिर पर चढ़ाकर तब पैर डालने का विधान
क्यों है? जिससे तलुए से गरमी सिर में चढ़कर विकार न उत्पन्न
करे। दीवाली इसी हेतु है कि इसी बहाने साल-भर में एक बेर तो सफ़ाई हो जाय। यही
तिहवार तुम्हारी म्युनिसपालिटी है।’’15
भारतेन्दु
आधुनिकता को अपनाने के सबल आकांक्षी होने के बावजूद परंपरा के पूर्ण त्याग के पक्ष
में क़तई नहीं थे। वह आधुनिक विचारों को भी परंपरा का वस्त्र पहनाकर अपना रहे थे
ठीक यही अंतर्विरोध उनके स्त्री-विषयक विचार में भी दृष्टिगोचर होते हैं। वह
भारतीय स्त्री के बारे में इच्छा करते हैं-‘‘जिस भाँति अंग्रेज
स्त्रियाँ सावधान होती हैं, पढ़ी लिखी होती हैं, घर का काम-काज सम्हालती हैं, अपने संतानगण को शिक्षा देती हैं, अपना स्वत्व पहचानती हैं, अपनी जाति और अपने देश की संपत्ति-विपत्ति को
समझती हैं, उसमें सहायता देती हैं,…’’16 उसी भाँति आर्यकुल ललनागण भी करें। ऐसी इच्छा
करते हए वह मध्यवर्गीय आधुनिक घर और आधुनिक राष्ट्र के लिए ज़रूरी स्त्री की बात कर
रहें हैं और भौतिक जगत में उपनिवेशकों की श्रेष्ठता को स्वीकार कर आत्मसात कर रहे
हैं; लेकिन जब वह कहते हैं-‘‘इससे यह शंका किसी को न हो कि मैं स्वप्न में भी
यह इच्छा करता हूं कि इन गौरांगी युवती समूह की भाँति हमारी कुललक्ष्मी गणा की
लज्जा को तिलांजलि देकर अपने पति के साथ घूमें’’17 तब वह भारतीय स्त्री
के उच्चतर मूल्यों के आधार पर आध्यात्मिक धरातल पर अपनी सभ्यता को उपनिवेशकों की
सभ्यता से श्रेष्ठ साबित कर रहे हैं।
भारतेन्दु समग्र, 2002, पृ.
1028
वही,
पृ.
9
भारतेन्दु
और भारतीय नवजागरण, (संपा.) शंभुनाथ, आने वाला कल
प्रकाशन, कलकत्ता, 1986, पृ. 63
मदन गोपाल, पृ. 6
शर्मा,
रामविलास,
भारतेन्दु-युग,
विनोद
पुस्तक मंदिर, आगरा, 1951, पृ. 169
पेशे से इंजीनियर कनुप्रिया इंजीनियरिंग पढ़ाने और कुछ सालों तक यूनाइटेड नेशन के लिए काम करने के बाद आजकल सोशल सेक्टर से जुड़ी हैं. संपर्क: joinkanu@gmail.com
कनुप्रिया
दिल्ली में DTC बस और मेट्रो की सुविधा स्त्रियों के लिये नि: शुल्क कर देने के बाबत एक स्कीम दिल्ली सरकार लाने की सोच रही है, ऐसा दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा. इस प्रपोजल पर काम करने के लिये सरकारी अफसरों को एक हफ्ते का समय दिया गया है, दिल्ली सरकार का कहना है कि हालाँकि दिल्ली ट्रांसपोर्ट में केंद्र सरकार और दिल्ली सरकार की बराबर की भागीदारी है, मगर यदि ये प्रपोज़ल लागू होता है तो इस स्कीम के कारण होने वाले अतिरिक्त आर्थिक भार को दिल्ली सरकार वहन करेगी.
भाजपा समर्थक धड़ा इस मामले को अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव के मद्देनज़र सीधे-सीधे वोट की राजनीति कहकर ख़ारिज कर रहा है, वहीं अन्य पार्टी समर्थक जो केजरीवाल की राजनीति के समर्थक नहीं है इस पर चुप हैं या हास्य व्यंग्य में मामले को रफ़ा-दफ़ा कर रहे हैं. चूँकि ये क़दम एक राजनीतिक पार्टी द्वारा उठाया गया है इसलिये इसपर राजनीतिक प्रतिक्रियाएँ आनी स्वाभाविक हैं, मगर राजनीतिक नज़रिए से अलग इस मुद्दे को सामाजिक नज़रिए से देखने की भी ज़रूरत है.
महानगरों की बात की जाए तो दिल्ली राजधानी होने के बावजूद स्त्रियों के लिये विशेष रूप से असुरक्षित शहर माना जाता है, निर्भया बलात्कार के बाद इसे रेप कैपिटल कहा जाने लगा, पूर्व सरकारें भी लॉ एंड आर्डर दिल्ली सरकार के अधीन न होने के कारण स्त्रियों की असुरक्षा पर अपनी असमर्थता बयान कर चुकी हैं वहीं ख़ुद दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल पुलिस नियंत्रण को लेकर समय-समय पर अपनी आपत्तियाँ दर्ज़ कर चुके हैं, ख़ुद उनकी सुरक्षा में चुनाव के दौरान चूक देखी गई.
सुरक्षा के लिये पुलिस और निजी
सुरक्षा एजेंसियों पर निर्भरता से भी पहले और उनके अतिरिक्त भी एक किस्म की
सुरक्षा होती है जो ख़ुद समाज प्रदान करता है. मुहल्लों में दोपहर को धूप खाते
बुज़ुर्ग, स्वेटर बुनती या बातें करती स्त्रियाँ जिस तरह की सुरक्षा मुहल्ले
के बच्चों को दे दिया करते थे वो सोसायटी के अच्छी सैलरी वाले सिक्योरिटी गार्ड भी
नही दे सकते. जो सुविधा और सुरक्षा समाज की पारस्परिकता से आती है वो पैसे देकर
ख़रीदे हुए बंदोबस्त से नहीं. कमोबेश यही बात ट्रांसपोर्ट के मामले में भी लागू
होती है. पुलिस की गश्त लगाती वैन्स की अपनी सीमाएँ हैं मगर स्त्रियों की
उपस्थिति यदि पब्लिक यातायात में बढ़ती है किसी भी समय तो वो ख़ुद एक सुरक्षा का
अप्रत्यक्ष वातावरण रचती हैं.
स्त्रियों के लिये असुरक्षा कोई छोटी-मोटी समस्या नहीं, अपितु उनके पूरे जीवन को बुरी तरह नष्ट करने की क्षमता रखने वाली समस्या है. छोटी- छोटी लड़कियों का दिल मचलता है बाहर मैदानों में हैंड बॉल खेलने का मगर वो खेल नही सकतीं, असमय बाज़ार नही निकल नही सकतीं, यहाँ तक कि ग़रीब मुहल्लों में अड्डा जमाए लड़के ये नौबत तक ला सकते हैं कि काम पर जाने वाले माँ -बाप बेटियों का स्कूल जाना बंद कर दें. स्कूल के मास्टर, कर्मचारी भी भरोसे लायक़ नहीं. ऐसे में लड़कियों की सुरक्षा से परेशान अभिभावक किसी दुर्घटना की आशंका में बेटी का कैसे भी ब्याह करने का सोचते हैं, ब्याह होगा तो एक ही होगा वो चाहे जैसे भी व्यवहार करे, बलात्कार भी हो तो उसे सामाजिक मान्यता प्राप्त है. यूँ एक लड़की के सुरक्षा कारणों से सपने छोड़िये छोटी-छोटी इच्छाएँ तक नष्ट हो जाती हैं, कभी वो जीवन और प्रेम की कामना में भागी हुई लड़कियों तक मे शामिल हो जाती हैं फिर भी राहत नही मिलती और पीछे छूटी परिवार की लड़की पर सुरक्षा नज़र कड़ी हो जाती है. रक्षा बंधन भी ऐसी सुरक्षा के मद्देनज़र किया गया समाज का उपाय ही है जिसमें भक्षक प्रजाति से ही रक्षा की कामना है, ये स्त्री को समाज मे अपने तईं सुरक्षित होने का बोध नही कराता, एक बहन के लिये एक भाई सदा चाहिए.
इस तरह स्त्री सुरक्षा समाज के कई
स्तरों और जीवन की कई परतों में फैला एक जटिल मामला है, एक सुरक्षित समाज
बनाने के लिये समाज मे न जाने कितने बदलावों और उपायों की ज़रूरत है. स्त्रियों की
दुकानों, दफ्तरों, स्कूल, कॉलेजों, सड़को, सिनेमाघरों, रेस्टोरेंट में बढ़ी हुई उपस्थिति एक ऐसा ही उपाय है जो असुरक्षा की
भावना को कम कर सकता है.
हाल के वर्षों में निजी ट्रांसपोर्ट
कंपनियों जैसे ओला और ऊबर द्वारा स्त्रियों के लिये सुरक्षित सफ़र के बंदोबस्त ने
स्त्रियों को बड़ी राहत दी है,
मगर ये व्यवस्थाएँ एक वर्ग तक सीमित
हैं, हर कोई इन व्यवस्थाओं का शुल्क नही चुका सकता. तब ग़रीब महिलाओं के
लिये क्या रास्ता बचता है सिवा इसके कि वो पब्लिक ट्रांसपोर्ट का ही इस्तेमाल
करें.
यह व्यवस्था नि: शुल्क होने से ग़रीब
महिलाओं और लड़कियों द्वारा अधिक संख्या में इन साधनों के उपयोग की सम्भावना बढ़ती
है. ट्रांसपोर्ट शुल्क से महीने के बजट पर बढ़ने वाले स्थाई भार के कारण स्त्रियों
द्वारा जहाँ नौकरी और शिक्षा के कई विकल्पों पर विचार तक ख़ारिज हो जाया करता है
वहाँ उन विकल्पों के चुने जाने के अवसर बढ़ेंगे. न सिर्फ़ ज़रूरी कामों के लिये बल्कि
सैर सपाटे, मनोरंजन, शॉपिंग आदि के लिये भी ऐसी व्यवस्था से प्रोत्साहन ही होगा.
स्त्रियों के आत्मविश्वास, आत्मनिर्भरता और सुरक्षा के मद्देनजर ये व्यवस्था किस तरह बदलाव को
अंजाम दे सकती है फ़िलहाल उसकी कल्पना ही की जा सकती है.
सोशल मीडिया में इस क़दम पर बहस चल रही
है, वहाँ ज़ाहिर कुछ आपत्तियों में एक आपत्ति ये भी है कि जो महिलाएँ
टिकट का पैसा दे सकती हैं उन्हें ये सब्सिडी क्यो? इस बारे में दिल्ली सरकार का कहना है
कि ये सब्सिडी आरोपित नही है,
मतलब जो महिलाएँ शुल्क चुका सकती हैं वो
ये सब्सिडी छोड़ सकती हैं.
जहाँ तक इस व्यवस्था में सरकार को
होने वाली दिक्कतों की बात है दिल्ली ट्रांसपोर्ट डिपार्टमेंट का कहना है कि DTC में ऐसी व्यवस्था
होने में तो कोई दिक़्क़त नही होगी मगर मेट्रो के मामले में ये निर्णय निश्चयी
चुनौतीपूर्ण होगा.
जो भी है, जब हम पिछले सालों
में सरकारों द्वारा नोटबन्दी जैसे अर्थव्यवस्था के लिए आत्मघाती क़दम उठाते हुए देख
चुके हैं तो जनहित में किये जाने वाले ऐसे प्रयोगों के लिये स्पेस भी होना चाहिये.
आख़िर हम सरकारें चुनते किसलिये हैं, मन्दिर मस्ज़िद, श्मशान क़ब्रिस्तान
बनाने के लिये?
अंग्रेज़ी की प्रसिद्ध लेखिका अरुंधति रॉय के नाम से कौन परिचित नहीं! वही अरुंधति रॉय, जिसे ‘गॉड ऑफ स्मॉल थिंग्स’ के लिए ‘बुकर प्राइज’ (1997) मिला था।
हाँ! पर एक और मिस रॉय
हैं, जिसका नाम है मेरी रॉय! मेरी रॉय को जब पिता की
मृत्यु (1960) के बाद संपत्ति में समान अधिकार नहीं मिला, तो
वह स्त्री विरोधी और भेदभावपूर्ण कानूनों के विरुद्ध लड़ने के लिए निकलती हैं और
ज़िला अदालत से सर्वोच्च न्यायालय तक की 26 साल
लंबी संघर्ष यात्रा करके ही घर लौटती हैं। सदियों पुराने कानून की संवैधानिक वैधता
को चुनौती देकर, अपने अधिकार पाने का दुःसाध्य काम करने वाली
मेरी रॉय, स्त्री अधिकारों की प्रमुख कार्यकर्ता भी हैं और
सम्मानीय शिक्षक भी।
शायद अधिकाँश पाठकों को यह जानकर आश्चर्य हो कि अरुंधति रॉय की माँ का नाम है मेरी रॉय। अरुंधति जब दो साल की थी तो माँ मेरी रॉय और पिता राजीव रॉय के बीच विवाह विच्छेद हो गया था। माँ मेरी रॉय केरल की सीरियन ईसाई और पिता बंगाली हिन्दू हैं। कहते हैं मां और बेटी दोनों ‘विद्रोही’ हैं।
बेटी अरुंधती रॉय के साथ मेरी रॉय
खैर…मेरी रॉय ने 1983 में त्रावनकोर ईसाई उत्तराधिकार अधिनियम, 1916 की संवैधानिक वैधता को चुनौती देते हुए, अनुच्छेद 32 के तहत याचिका (नंबर 8260/1983) दायर की थी। सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश पी.एन. भगवती और आर.एस. पाठक ने विद्वान् वकीलों की बहस और कानूनी प्रावधानों की गहन समीक्षा करने के बाद 24 फरवरी, 1986 को अपना ऐतिहासिक फैसला सुनाया[1] जिससे केरल की हजारों नहीं, लाखों औरतों को संपत्ति में समान अधिकार मिलने का रास्ता खुला।
मुकदमें की पृष्ठभूमि यह है कि केरल में ईसाई समुदाय में संपत्ति पर अलग-अलग उत्तराधिकार कानून थे, जो प्राचीन काल से धर्मशास्त्रों के आधार पर बने-बनाये गए थे। लम्बे समय तक यह सिलसिला चलता रहा। विभिन्न क्षेत्रों में विभिन्न प्रथा और कानून होने के कारण, अनिश्चितता और संपत्ति विवाद बढ़ते जा रहे थे। 1916 में त्रावनकोर में राजशाही थी और महाराजा ने सभी नियमों को मिला कर भारतीय ईसाईयों के लिए उत्तराधिकार सम्बन्धी पहला कानून त्रावणकोर ईसाई उत्तराधिकार अधिनियम, 1916 (अधिनियम, 1916) बनाया था। 1949 में त्रावनकोर को कोचीन में मिला दिया गया, जहाँ पहले से कोचीन ईसाई उत्तराधिकार अधिनियम,1921 (अधिनियम, 1921) लागू था।1949 में मलबार का भी कुछ हिस्सा केरल से मिलाया गया, जहाँ भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 (अधिनियम, 1925) लागू था।
उल्लेखनीय है कि अधिनियम,
1925 में स्त्री-पुरुष को
मिलने वाले हिस्से में किसी भी प्रकार का कोई भेदभाव नहीं किया गया था। परिणाम
स्वरूप एक ही राज्य के तीन भागों (त्रावनकोर, कोचीन और मलबार व अन्य) में, तीन
अलग-अलग अधिनियम (1916, 1921 और 1925) अपना-अपना काम कर रहे थे। अधिनियम,1916 में विधवाओं को संपत्ति पर जीवन काल तक सीमित अधिकार था (अगर
पुनर्विवाह ना करें) और स्त्रियों को सम्पत्ति में पाँच हज़ार से अधिक नहीं मिल
सकता था और वो भी तब जब उसे विवाह के समय स्त्रीधन के रूप में कुछ ना मिला हो. 1951 में संसद ने (पार्ट बी स्टेट (लॉज़) एक्ट, 1951) कानून पारित किया, जिसके अनुसार 1 अप्रैल,
1951 से उत्तराधिकार संबंधी
सभी पुराने प्रदेशीय कानूनों को रद्द करते हुए, केन्द्रीय कानून अधिनियम, 1925 लागू करने कि घोषणा की थी। लेकिन केरल के ईसाइयों ही नहीं, विद्वान
वकीलों और न्यायाधीशों को भी उत्तराधिकार कानून के बारे में बहुत से संशय बने रहे।
संविधान में कानून के समक्ष समानता के मौलिक अधिकार के बावजूद, धर्म के आधार पर बने-बनाये भेदभावपूर्ण उत्तराधिकार कानूनों के कारण स्त्रियों के साथ अकल्पनीय अन्याय होता (रहा) है। साधन-सम्पन्न वर्ग में कानूनी विवाद सालों अदालत और अपील दर अपील की प्रक्रिया में ही सालों लटके रहते हैं। मैरी रॉय केस इसका सिर्फ एक नमूना भर है। स्वयंम अर्जित संपत्ति के वसीयत करने के असीमित अधिकार के होते हुए, उत्तराधिकार कानून (जहाँ मृतक की कोई वसीयत नहीं) एक स्तर पर अर्थहीन ही सिद्ध होते रहे हैं। समृद्ध व्यक्ति बिना वसीयत किये, कहाँ मरते हैं!
न्यायमूर्तियों के समक्ष सार्वजनिक महत्व का रोचक कानूनी प्रश्न यह था कि 1 अप्रैल, 1951 के बाद केन्द्रीय कानून भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 का त्रावणकोर और कोचीन में लागू अधिनियम, 1916 और अधिनियम, 1921 पर क्या प्रभाव पड़ेगा? इस वैधानिक सवाल पर मद्रास उच्च न्यायालय के एकल और खंडपीठ का अलग-अलग मत था, सो न्यायमूर्तियों को देखना था कि कौन सा निर्णय सही है। मद्रास उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति इस्माइल[2] का मत था कि 1951 के बाद त्रावणकोर ईसाई उत्तराधिकार अधिनियम, 1916 रद्द हो चुका है। मद्रास उच्च न्यायालय की खंडपीठ[3] ने भी परोक्ष रूप से यह माना है कि अधिनियम,1916 दरअसल में अधिनियम, 1925 से भी पहले का है।
अरुंधती और मेरी रॉय
अधिनियम, 1925 के प्रावधानों से स्पष्ट था कि यह पूरे देश में (पारसी धर्म के अनुयाइयों के अलावा) सब पर लागू होगा। न्यायमूर्तियों ने केरल राज्य के वकीलों का यह तर्क मानने से इंकार कर दिया कि 1951 के बाद भी, त्रावनकोर के ईसाईयों पर अधिनियम, 1916 ही लागू रहेगा। 1925 का अधिनियम बाद में बना है और अधिक स्पष्ट भी है, सो किसी भी तर्क से 1916 का कानून नहीं बच सकता। वह तो बहुत पहले रद्द किया जा चुका है, सो उसका कोई अस्तित्व ही नहीं है। राज्य सरकार के वकीलों का यह तर्क भी बहुत ही धुंधला है कि अधिनियम, 1925 की धारा 29 में कहा गया है कि त्रावनकोर में 1916 का कानून ही लागू रहेगा, क्योंकि 1951 के अधिनियम में साफ़ तौर पर 1916 (और1921 भी) का कानून रद्द किया जाता है। इस संदर्भ में त्रावनकोर और कोचीन उच्च न्यायालय का मत सही नहीं ठहराया जा सकता।[4] अपवाद और विलय के प्रावधान विधायिका द्वारा अपनायी प्रक्रिया है। दोनों कि भाषा का उदेश्य ही भिन्न है। हमें यह कहने में कोई हिचक नहीं है कि 1 अप्रैल 1951 के बाद पूरे राज्य में भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 के ही प्रावधान लागू हैं/होंगे, ना कि पुराने कानून अधिनियम,1916 (या अधिनियम, 1921)
न्यायमूर्तियों ने विचार-विमर्श के बाद अंतिम निर्णय सुनाते हुए कहा “इस विचार के उपरांत अब इस बात पर बहस करना जरूरी नहीं है कि त्रावणकोर ईसाई उत्तराधिकार अधिनियम, 1916 के धारा 24, 28 और 29 असंवैधानिक हैं या नहीं। हम याचिका स्वीकार करते हुए यह घोषित करते हैं कि पूर्व राज्य त्रावनकोर के भारतीय ईसाईयों की संपत्ति में उत्तराधिकार के मामलों में (जहाँ कोई वसीयत नहीं है) भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम,1925 के अध्याय 2 भाग 5 ही लागू होगा।”
सुप्रीम कोर्ट के मेरी रॉय फैसले के आधार पर केरल उच्च न्यायालय ने
अधिनियम, 1921 को भी रद्द करार दे दिया।[5] सुप्रीम कोर्ट का यह (1986)
निर्णय एक प्रकार से पिछली तारीख (1अप्रैल,1951) से लागू नया
कानून बन गया। परिणाम स्वरूप 1 अप्रैल,1951 से लेकर 24 फरवरी, 1986 तक के बीच की अधिकांश ईसाई सम्पत्ति की खरीद-बेच और अदालती
फैसले/डिक्री नये विवाद का कारण बन गए। उत्तराधिकार कानूनों की स्थिति पहले ही
बेहद पेचीदा थी, सुप्रीम
कोर्ट निर्णय (1986) के बाद और ‘विचित्र’ हो गई।
सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद भी मेरी रॉय की कोर्ट-कचहरी का अंत
नहीं हुआ। संपत्ति में एक तिहाई हिस्सा मेरी रॉय की माँ का था, जो
उनके जीवन काल तक ही रह सकता था। 1988 में जिला अदालत से लेकर केरल उच्च न्यायालय (1994) तक के चक्कर
लगाती रही। जिस भाई के खिलाफ़ मुक़दमेबाज़ी करनी पड़ी, उसने (उसकी कम्पनी) 1984 में ही संपत्ति बैंक को गिरवी रख कर कर्ज़ उठा
लिया था। ज़मीन का बँटवारा होने लगा, तो स्टेट बैंक ऑफ त्रावनकोर ज़मीन का कब्ज़ा लेने के
नोटिस और धमकियाँ देने लगा। 2000 में अपनी मां की मृत्यु के बाद, उन्होंने
अंतिम निर्णय के लिए कोट्टायम उप-अदालत का दरवाजा खटखटाया। यह मामला 8 साल तक जारी
रहा, जिसके
बाद 2009 में डिक्री अनुपालन की याचिका दायर करने के बाद ही संपत्ति मेरी रॉय को
मिल पाई। दरअसल संविधान में कानून के समक्ष समानता
के मौलिक अधिकार के बावजूद, धर्म के आधार पर बने-बनाये भेदभावपूर्ण
उत्तराधिकार कानूनों के कारण स्त्रियों के साथ अकल्पनीय अन्याय होता (रहा) है।
साधन-सम्पन्न वर्ग में कानूनी विवाद सालों अदालत और अपील दर अपील की प्रक्रिया में
ही सालों लटके रहते हैं। मेंरी रॉय केस इसका सिर्फ एक नमूना भर है।
संदर्भ :- [1] मेरी रॉय बनाम केरल राज्य, एआईआर 1986 सुप्रीम कोर्ट 1011 [2] सोलोमा बनाम मुथिया, 1974 भाग 1 मद्रास लॉ जर्नल 5 [3] डी. चेल्लिया बनाम जी. ललिताबाई, एआईआर 1978 मद्रास 66 [4] एआइआर 1957 त्रावनकोर और कोचीन उच्च न्यायालय1 [5] वी.एम. मैथयू बनाम एलिसवा (1988 (1) केएलटी 310(खंडपीठ) और जोसफ बनाम मेरी (1988 (2) केएलटी 27 (खंडपीठ)
एक एड हॉक दलित प्राध्यापिका (दिल्ली विश्वविद्यालय)
डा. पायल तडावी अपनी तीन सीनियर डॉक्टर्स की प्रताड़ना के कारण आत्महत्या कर चुकी हैं. उनकी सांस्थानिक हत्या हुई है. ऐसी स्थितियां और भी अन्य समूहों की महिलाएं झेलती रही हैं. खुद जाति का बर्डन ढोती, अपने लिए ब्राह्मणवादी पितृसत्ता की व्यवस्था में उपेक्षित ऊंची जाति की महिलाएं अन्य जाति और धार्मिक पहचान वालों के साथ क्रूर और अमानवीय व्यवहार करती हैं. हम इस सीरीज में ऐसे अनुभवों को प्रकाशित कर रहे हैं. यह पत्र/ अनुभव दिल्ली विश्वविद्यालय की एक एड हॉक दलित प्राध्यापिका ने इस शर्त के साथ भेजा है कि उनका नाम जाहिर न किया जाये. आप एक दलित, ओबीसी, आदिवासी, पसमांदा स्त्री के रूप में यदि जातिवाद झेल चुकी हैं तो अपने अनुभव हमें भेजें.
यह पत्र
किसी की शिकायत नहीं है बल्कि मेरी मानसिक यातना की अभिव्यक्ति है, मैं कई सालों, महीनों और दिनों से सोचती थी कि कुछ लिखूंगी और यदि आज नहीं लिखती तो मैं शायद फांसी के फन्दे पर झूल रही होती। अपने मन से निकाल कर आज मैं यहां लिख रही हूं।
मैं यह पत्र
अभी रात को 2 बजकर 29
मिनट पर लिख रही हूं जब सारी दुनिया चैन की नींद सो रही है और मैं मानसिक यातना से ग्रस्त बेचैन यह पत्र लिख रही हूं । आज मई की आखिरी तारीख है । 1 मई को
विश्व मजदूर दिवस मनाया जाता है और आज 31 मई है
इस महीने की आखिरी तारीख। मान लीजिए मैं भी एक बंधुआ मजदूर हूं क्योंकि मैं एक कॉलेज में कहने को सहायक प्रवक्ता हूं किन्तु बंधुआ हूं। मेरी पास अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता तो है किन्तु जब उसे अभिव्यक्त करती हूं तो चुप करा दिया जाता है ।
आज मैंने विभागाध्यक्ष से बहुत निवेदन किया किन्तु अपनी असमर्थता को जाहिर करते हुए मुझे जून में एडमिशन ड्यूटी के लिए बार-बार बुलाया जा रहा है। इसके लिए मैं पहले से ही अनुरोध कर चुकी थी क्योंकि मुझे अपनी Ph.Dजमा करनी है मेरे पास बिल्कुल भी समय नहीं है। एडमिशन ड्यूटी को समाप्त करने के बाद मैं पूरे लगन से अपने Ph.D के चैप्टर लिखने में अतिव्यस्त हूं। किसी भी हालत में इसे 15 जुलाई तक समाप्त करना है ताकि कॉलेज के कामों में मैं अपना सहयोग दे सकूं। फिर भी नहीं माना गया और एडमिशन ड्यूटी में मुझे लगा दिया गया। आज मुझे 11AM पर कॉलेज बुलाया गया। मैंने उनसे विनम्र निवेदन किया किन्तु उन्होंने मुझसे लिखित में ले लिया कि तुम अपनी असमर्थता जाहिर कर रही हो। मैंने उन्हें समझाने की बहुत कोशिश की कि मैं पीएच.डी. को जमा करते ही 15 जुलाई से दिन-रात कॉलेज के एडमिशन में सहयोग दूंगी । फिर भी नहीं माना। बोला कि हमारे पास और कोई नहीं है हम तुम्हें कहीं और नहीं लगा सकते क्योंकि “तुम्हें कुछ काम नहीं आते हैं” । (हमारी योग्यता पर ऐसे ही आरोप लगाये जाते हैं)
कल उनका मैसेज आया था मुझे उन्होंने admission committee में के साथ रखा। मैंने उन्हें मदद देने का मैसेज किया, क्योंकि मुझे 4th list में बुलाया जा रहा है। मैंने सोचा कि कोशिश यही रहेगी कि पीएच.डी का काम पूरा हो जायेगा तो मदद कर दूंगी। फिर दूसरे दिन मुझे वहां से हटाकर हेल्प डेस्क में रखा गया क्योंकि जिसका नाम वहां दिया गया था, उसके पिता जी की तबियत खराब होने के कारण उसे घर के लिए निकलना पड़ा । मुझे हेल्प डेस्क के लिए फोन आया तो मैंने मना किया कि मैम अभी पीएच.डी. का काम कर रही हूं इसलिए मैं नहीं आ सकती । उन्होंने एडमिशन कंवेनर से बात करने के लिए कहा। मैंने ऐडमिशन कन्वेनर से अपनी समस्या बतायी वे तुरन्त तैयार हो गयी कि बेटा तुम अपना पीएच.डी. लिखो मैं किसी और को हेल्प डेस्क के लिए कह दूंगी । उसके बाद आज मुझे कॉलेज में मिलने के लिए बुलाया गया । घर से निकलने से पहले मैंने उन्हें फोन किया कि मैं बात कर लेती हूं किन्तु फोन नहीं उठाया और न ही कॉल बैक किया । सीनियर टीचर इन्चार्ज होने का अपना स्वाभिमान इसे कहा जा सकता है। मैं वहां पहुंची। मेरी उनसे बात हुई बार-बार निवेदन करने पर भी वो नहीं मानी जिससे मुझे रोना आ रहा था। मेरी आंखों से आंसू निकल रहे थे। मैं रोती जा रही थी किन्तु उन्होंने इस पर भी टिप्पणी की कि हम किसी को इस तरह आंसू गिराते नहीं देखे हैं जो काम नहीं करना चाहता है। मैं इसलिए आंसू नही निकाल रही थी कि मैं काम नहीं करना चाहती हूं बल्कि पीएचडी मेरी अभी अन्तिम दौर में है अगर इसे नहीं जमा कर पाई तो मेरे पूरे पांच साल बर्बाद हो जायेंगे। इसलिए मुझे यह बहुत दुःख के साथ कहना पड़ रहा है कि एक दलित लड़की जब शिक्षा के लिए अपना कदम बढ़ाती है तो उसे कितना कष्ट सहना पड़ता है। इस पर भी जब वो आर्थिक आजीविका के लिए आत्मनिर्भर होकर अपनी शिक्षा का खर्च स्वयं वहन करती हो और उसके लिए नौकरी करती हो।
शैक्षणिक संस्थाओं में कुछ सवर्ण महिलाओं द्वारा अत्याचार और उत्पीड़न की घटनाएं लोगों को अजीब लग सकती हैं यह भी तब जब स्त्रियों को भी शिक्षा प्राप्त करने में बहुत मशक्कत करनी पड़ी हो, किन्तु यह एक बड़ा सत्य है। आज सदियों बाद दलित स्त्रियों की पहली पीढ़ी उच्च शिक्षा ग्रहण कर रही हैं । घर और बाहर दोनों जगह काम उसे तो करना ही पड़ता है इसके साथ ही साथ उसके साथ जातिगत भेदभाव और उसकी अवमानना निरन्तर होती है। उसकी शिक्षा की प्रगति में बाधक कुछ सवर्ण महिलाएं विभिन्न और अतिरिक्त कार्यभार सौंप देती हैं ताकि वह वहां तक पहुंच ही न पाए। सबसे बड़ी हैरानी की बात यह है कि कई संघर्षों से जूझती हुई एक स्थायी दलित शिक्षिका भी जब दलित स्त्री की समस्या को समझ नहीं पाती है और उसका उत्पीड़न करने में सहायक होती है। हर चीज लिखित में लेकर अपना पूरा दबाव व वर्चस्व कायम करने की कोशिश जारी रहती है। दलित महिलाएं जो अभी-अभी निम्न स्थिति से उठकर आई है कैसे वो एक दलित महिला का दर्द नहीं समझ पाती और सवर्ण महिला के साथ मिलकर उसके उत्पीड़न में भागीदार होती है। यहां मैं स्पष्ट कर देना चाहती हूं कि सभी सवर्ण महिलाएं ऐसी नहीं होती, कुछ सवर्ण महिलाएं ऐसी भी हैं जो आपकी हर समस्याओं के साथ सहानुभूति और संवेदना जताकर वो आपके साथ खड़ी होती हैं। ये उत्पीड़न सामंती मानसिकता से ग्रस्त लोग करते हैं जिन्हें अपना वर्चस्व हर हाल में बनाये रखना है। इन सभी संदर्भों को समझना होगा। स्त्रियों के साथ यौन हिंसा और शारीरिक हिंसा ही बड़ी हिंसा नहीं है उसे मानसिक प्रताड़ना देना भी बड़ी हिंसा है। हम केवल पुरुषों पर यह आरोप नहीं लगा सकते कि कार्यस्थलों पर महिलाओं के शोषण में उनकी बड़ी भूमिका होती है।
कार्यस्थलों पर महिलाओं
के साथ दुर्व्यवहार की घटनाएं आम बात है किन्तु महिलाओं द्वारा महिलाओं का शोषण यह लोगों के लिए नई बात हो सकती है। आज जिस मानसिक पीड़ा से मैं गुजर रही हूं इसका खामियाजा मेरे अलावा कौन भुगतेगा? युवा लड़कियों के साथ
अधिक उम्र की महिलाएं क्यों गलत व्यवहार करती हैं? काम करने के लिए जिस शान्त और सौहार्द वातावरण की आवश्यकता है उसकी उपलब्धता कौन सुनिश्चित करायेगा ? जिस
तरह विभिन्न संस्थानों और विश्वविद्यालयों में रैगिंग के खिलाफ कानून बनाए गयें हैं –एंटी रैगिंग, वैसे ही कार्यस्थलों
पर काम करती हुई महिलाओं के साथ हिंसा, शारीरिक व मानसिक
उत्पीड़न पहुंचाने वालों के खिलाफ कानून बनने चाहिए। ऐसा कानून जिससे वे अपने ऊपर हो रहे मानसिक उत्पीड़न के लिए आवाज उठा सके। हर काम सुकून और शान्ति से सौहार्द वातावरण में किया जा सके।
आज पूंजीवादी
नीतियों द्वारा काम कम हुए हैं। लोग न चाहते हुए भी प्राइवेट और शार्ट टर्म पर काम करने के लिए मजबूर हैं। कहीं स्थायी नियुक्तियां न होने की वजह से वे वहीं पर टिके रहते हैं उन्हें निरन्तर यह कह कर भी डराया-धमकाया जाता है कि
उन्हें स्थायी नियुक्ति में नहीं रखा जायेगा। जिसकी वजह से वे कुछ भी बोलने में असमर्थ होते हैं। यदि इसका वे विरोध करते हैं तो उन्हें यह कहकर शिक्षण संस्थानों से बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है कि ‘हमारी
पहुंच बहुत ऊंची है हम कहीं भी तुम्हारा selection नहीं होने देंगे’। इसका
भी बड़ा कारण यह है कि लोगों के पास उच्च शिक्षा और अतिरिक्त योग्यताओं की डिग्रियां तो हैं किन्तु उनके लिए काम कम है जिसकी वजह से वे खाली और निराश बैठ जाते हैं तथा अपने उत्पीड़न के खिलाफ़ चुप रहते हैं।
अतः हमारे देश की सरकार से यह निवेदन है कि जितनी जल्द स्थायी नियुक्तियां होंगी उतना ही शोषण का पैमाना कम होगा। शिक्षण संस्थानों में सभी समान पदों पर होंगे, कोई किसी से कम नहीं होगा, सभी अपने साथ हुए शोषण के खिलाफ आवाज उठायेंगे और गलत का प्रतिकार करेंगे।
यदि मैंने भी आत्महत्या का रास्ता अपना लिया तो क्या मेरे साथ न्याय किया जायेगा ? क्योंकि लोग यही कहेंगे इसे कुछ बोलना चाहिए था, सबसे बात करनी चाहिए थी । जो व्यक्ति इस दुनिया से चला जायेगा उस पर कोई बात ही नहीं करना चाहेगा । सब मुझे ही कायर कहकर ठण्डे पड़ जायेंगे । फिर मामला शान्त हो जायेगा और शैक्षणिक संस्थानों में महिलाओं के साथ ऐसे ही दुर्व्यवहार और मानसिक प्रताड़नाएं जारी रहेंगे । कृप्या इसका संज्ञान लिया जाय । ऐसे मसलों पर कॉलेज की प्रधानाध्यापिका चुप है, हमारे संस्थान-विश्वविद्यालय चुप हैं, टीचर एसोशिएसन (डूटा) चुप है, वाइसचांसलर चुप है, शिक्षा का विभाग संभालने वाला मानवीय केन्द्रीय संसाधन मंत्रालय चुप है । देश का पहला व्यक्ति राष्ट्रपति चुप है, प्रधान मंत्री चुप है, हमारी भारत सरकार चुप है, यहां तक कि महिलाओं के साथ होने वाले उत्पीड़न की हर घटनाओं का संज्ञान लेने वाला संयुक्त राष्ट्र संघ तक चुप है। कौन करेगा मेरे साथ न्याय ? जबकि मैं अपने दलितपन को छोड़ भी दूं तो सबसे पहले मैं इंसान हूं। मनुष्य किसी भी तरह का अपमान सहन नहीं कर सकता जब उसे बार-बार जलील किया जाता हो ऐसे में उसके पास अपना कीमती जीवन खत्म कर लेने के अलावा और कोई चारा नहीं बचता।
मैं पूरे दावे के साथ
कह सकती हूं कि मुझ पर झूठा आरोप लगाकर कुछ लोगों को अपने पक्ष में खड़ाकर के मुझे गलत सिद्ध किया जायेगा। उनसे अपने पक्ष में लिखित में लेकर कि वो सही हैं और मैं बेबुनियादी बातें कर रहीं हूं, कर लिया
जायेगा। मेरे खिलाफ कुछ लोग पत्र लिखने में हिचकेंगे नहीं । क्योंकि मैं अस्थायी शिक्षिका हूं और लोगों को नौकरी चाहिए इसलिए वो मेरे पक्ष में कुछ नहीं बोलेंगे सारा न्याय फिर एक स्थायी व्यक्ति के हित में होगा। इसमें वो लोग भी शामिल होंगे जो बड़े-बड़े भाषणों में सोशल नैटवर्किंग साइट्स पर स्त्री-मुक्ति के विषय में बहुत कुछ लिखते और बोलते हैं किन्तु व्यवहार में वो उतने ही खोखले लोग हैं। जब आपके साथ अन्याय होता है तो वे चुप्पी साधे होते हैं।
मैं एक दलित
हूं इसलिए मुझे इंसाफ मिलेगा इसकी मुझे कोई उम्मीद नहीं है। एक स्त्री भी हूं इसलिए न्याय मिलने में देर लग सकती है। किन्तु मैंने अपने दलित और स्त्री होने के फायदे और नुकसान से यह पत्र नहीं लिखा है। मैंने एक मानसिक यातना से ग्रस्त लड़की और सबसे बड़ा इन्सान होने के नाते अपनी दुःखभरी और यातनादायी अभिव्यक्ति की है।
अपने इस पत्र
के हवाले से मैं उन सभी महिलाओं चाहे वे सवर्ण हों या दलित-आदिवासी, अल्पसंख्यक,
ट्रांसजेण्डर के साथ हो रहे कार्य स्थलों पर हर शोषण के विरोध की आवाज बनना चाहती हूं। हो सकता है यह पत्र पोस्ट होते ही मुझे नौकरी से निकाल दिया जाय, कई धमकियां
और दी जायं। मुझे कहीं नौकरी न मिले। फिर भी हर शोषण-उत्पीड़न और गलत
के खिलाफ आवाज उठनी चाहिए। क्योंकि शोषण सहने वाला सबसे बड़ा अपराधी होता है।
इस
पत्र को अभी मैं कहीं भी पोस्ट करने से बच रही हूं क्योंकि समय बहुत बड़ा होता है और सही समय का इंतजार है मुझे । वही मुझे न्याय दिलायेगा । इसका पूरा भरोसा है मुझे ।
भाषा कितना अच्छा होता कि तुम्हारा भी अस्तित्व होता
श्रीदेवी छत्तीसगढ़ रायपुर में रहती हैं. पिछले एक दशक से अजीम प्रेमजी फाऊंडेशन में शिक्षा के क्षेत्र में सक्रिय हैं.
मरे हुए लोग और जानवरों की हड्डियां धरती पर बहती हुई हवाएँ, बरसता हुआ पानी, सदियों से खड़ी पर्वत श्रृंखलाएं, चमकता हुआ सूरज, धूप की किरणें, फैलता हुआ कुहरा, रंग बदलते मौसम इन सबकी हम कार्बन डेटिंग कर पाते इनके पास भी तुम होती और बतलाती उन समाजों के सच जो आज सभ्य घोषित किए हुए है खुद को इसलिए की एक बड़े वर्ग को असभ्य और असंस्कृत कह सके | साहित्य और इतिहास तो केवल गुण गाता है उनका जो स्वामी है जो नायक है जो मुखिया है तुम भी छोड़ पाती अपने निशान समय के उन पन्नों पर जो अलिखित हैं, अनछूए हैं और चुनौती देती उस साहित्य और इतिहास को जिसे चुने हुए लोगो ने लिख दिया|
वह तोड़ती पत्थर …नहीं है केवल इलाहाबाद के पथ पर वह दिखती है दुनिया की हर गली में धमतरी से लेकर दिल्ली तक न्यूयार्क से लेकर सिडनी तक हाथ में काम का औज़ार लिये, करती है अपनी दिनचर्या की शुरुआत मांजती है बर्तन घरों में, धो रही है आंगन तो किसी जगह पर बीन रही है कचरा जो हमने ही फ़ैलाये हैं सर पर भारी धमेला लिये अमराती है पांच मंजिल ऊपर कभी ईंटे तो कभी गारा सम्मान और प्रेम तो शायद उन्हें वह धरती देती है, जिस पर वह नंगे पांव चला करती है।
वे पत्थर देते है, जिन्हें वह अपने हाथों से तोड़ती है। वे बर्तन और आंगन देते है, जिन्हें वह धोती है । पर अब न हो इंतजार किसी से पाने के लिए सम्मान और प्रेम सिर्फ विद्रोह हो अपने काम के सम्मान में और प्रेम अपने काम से
लिखो इसलिए, लिखो इसलिए कि दर्ज हो सके आज की एक सामान्य सी बात जो बुनियाद है भविष्य कि किसी एक बड़ी घटना की लिखो इसलिए, कि लोग पढ़ सके उन द्वंदो को जो एक व्यक्ति के जीवन मे हैं जाति लिंग और वर्ग के कारण लिखो इसलिए, कि कोई बात सामान्य नहीं है उसका महत्व बढ़ जाता है समाज के सांस्कृतिक निर्माण मे लिखो इसलिए, कि समझ सको सत्ता के खेल को, लिखो इसलिए, कि रच सको अपना साहित्य, सभ्यता के निर्माण मे तुम्हारे योगदान को |