इस अंक (#MeToo) में- दीपांजना, सुधा अरोड़ा (Sudha Arora), जशवंत, अरविंद जैन (Arvind Jain Bakeelsab), विजय प्रसाद, शोएब दानियाल, नाइश हसन (Naish Hasan), , अमोल, सुशील मानव(Sushil Manav), मनोरमा, मेहरुन्निसा रेवा व सल्ला सरिओला, विजयलक्ष्मी सिंह ‘चंदेल’, मनोज, निवेदिता, प्रतिमा,नूर ज़हीर(Noor Zaheer), तोषी, रॉहिन कुमार, पल्लवी के थीम आलेख, पत्रकार विनोद दुआ के मामले में ‘दि वायर’ का पक्ष, आत्मकथांश, रमणिका गुप्ता, शरद जायसवाल(Sharad Jaiswal), पूजा तिवारी संदीप, मुक्ता साल्वे, अनुवाद सपकाले (संदीप मधुकर सपकाळे), अनिता भारती (Anita Bharti), के आलेख हेमलता महिश्वर(Hemlata Mahishwar), मेधा (Medha Medha), तहसीन मजहर(Tahsin Mazhar, प्रतिभा श्री, की कविताएं अफगानी कवयित्री नादिया अंजुमन की कविताओं का राजेश चन्द्र (Rajesh Chandra)द्वारा अनुवाद, और भूमिका द्विवेदी अश्क (Bhumika Dwivedi) तथा संजीव चंदन द्वारा स्मृतिलेख शामिल हैं. कविताओं के साथ रेखाचित्र सोनी पांडे. कुछ आलेखों आ अनुवाद डा. अनुपमा गुप्ता ने किया है.
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डा. पायल तडावी अपनी तीन सीनियर डॉक्टर्स की प्रताड़ना के कारण आत्महत्या कर चुकी हैं. उनकी सांस्थानिक हत्या हुई है. ऐसी स्थितियां और भी अन्य समूहों की महिलाएं झेलती रही हैं. खुद जाति का बर्डन ढोती, अपने लिए ब्राह्मणवादी पितृसत्ता की व्यवस्था में उपेक्षित ऊंची जाति की महिलाएं अन्य जाति और धार्मिक पहचान वालों के साथ क्रूर और अमानवीय व्यवहार करती हैं. हम इस सीरीज में ऐसे अनुभवों को प्रकाशित कर रहे हैं. पहली क़िस्त में नाइश हसन के अनुभव. अप भी एक दलित, ओबीसी, आदिवासी, पसमांदा स्त्री के रूप में यदि यह झेल चुकी हैं तो अपने अनुभव हमें भेजें.
मेरा गाँव उत्तर प्रदेश के सुलतानपुर जिले में है, तियरी नाम है गाँव का। कर्मठ स्वतन्त्रता सेनानी मेरे बाबा नाज़िम अली का गाँव। आज से 30 बरस पहले पढाई का सफर उसी गाँव से प्रारम्भ किया था। शेख-सय्यदों का गाँव। ऊॅंची ज़ात का गुमान ब्राहमणों की तरह सय्यदों में भी खूब है। पढाई-लिखाई का सिलसिला चलता रहा, वो दौर जब बाबरी मस्जिद ढहा दी गई, मेरे रिश्तेदारों की लाशें बिछा दी गई , माहौल बहुत खराब होता चला गया। उसी सिलसिले में बात करने एक दिन मेरे विद्यालय में एक स्थानीय पत्रकार जगन्नाथ वर्मा आए। मेरा तर्क ये था कि अयोध्या को एक ऐसा स्थल बना दिया जाना चाहिए जहाँ हिन्दू और मुसलमान सभी आएं, उनके इबादतगाह भी हो , पर्यटन का केन्द्र भी हो, इससे हमारे आपसी झगडे ख़त्म हो जाऐगे। इस बयान का अखबार में छपना कि मुसलमानों की ओर से मुझ पर गालियों की बौछार होने लगी , हम भाई बहन डर सहम गए। एक तो लड़की होने के नाते दूसरा ऐसी प्रतिक्रिया। हमारा घर स्कूल से 14-15 किलोमीटर दूर था। साइकिल से आना जाना। हमेशा डर लगा रहता था किसी अनहोनी का। इस बयान पर हमारे माता-पिता को भी परेशान किया जाने लगा। तैश खाए मुसलमानों ने अखबार में माफी मांगने का दबाव बनाया कि हम कहें ये मस्जिद मुसलमानों की थी, है,और रहेगी-बस्स!! और कुछ भी नही!! हमें काफिर करार दिया गया। उम्र इतनी नहीं थी कि इस सियासत को समझ पाती। भला यही लगा कि झगड़ा समाप्त हो जाए, तो कह दिया। बहुत अपमानित हुई। मजहब बचाने वालों ने निशाने पर ले लिया। छोटी उम्र में एक विचार बना कि ये गाँव वाले बहुत दकियानूस होते है, शहरों में ऐसा नही होता, वहाँ लोग शिक्षित व खुले विचारों के होते हैं।
कुछ समय बाद शिक्षा के सिलसिले में लखनऊ आना हो गया। लखनऊ विश्वविद्यालय से एम0फिल0 किया फिर कुछ दिनों बाद एक महिला अधिकार संगठन में नौकरी कर ली। यहाँ आकर यह भरम धराशाई हो गया कि हम भी ऊॅंची ज़ात वाले हैं । यूं कहूँ तो एक एहसास-ए-कमतरी ने घेर लिया। यहाँ सिर्फ मुसलमान नाम होना काफी था एक विशेष प्रकार से देखे जाने के लिए। एक दिन मेरी एक हमउम्र सहकर्मी ने यूं ही हॅंसते-हॅंसते किसी की बात बताई और उसे मुसल्टा (मुसलमान) कह कर सम्बोधित किया । इसके फौरन बाद उसने मेरी ओर पलट कर देखा, दोबारा उपहास मिश्रित हॅंसी के साथ बोली , वैसे तुम लोग भी हिन्दुओं को किसी न किसी नाम से पुकारते ही होगे! उसमें जरा भी अपराधबोध नही था, वो एक के ऊपर एक पैर रखे उसे धीरे-धीरे हिला रही थी, और ऐसे हॅंस रही थी जैसे किसी कला फिल्म की नायिका अपना दोहरा किरदार निभा रही हो। उसे ये एहसास भी नही हुआ कि उसके कलेजा चीर देने वाले शब्दों से मेरे अन्दर कितना कुछ टूट बिखर गया है। मुझे हिन्दू मित्रों को किस उपनाम से पुकारना है ये मेरे परिवार ने कभी नहीं सिखाया था। मैं उसे क्या जवाब देती, स्वतन्त्रता सेनानी की पोती थी, क्रान्ति की बातें बचपन से सुनकर मन क्रान्किारी ही था। अपमानित सा मुहं लिए वहां से उठ गई। ये मेरे साथ शहर आने के बाद पहला वाकया था जिसने खुले विचारों की पूर्वधारणा को तोड़ना आरम्भ किया था।
ऐसा मौका कई बार आया जब मेरी एक अन्य सहकर्मी (ब्राहमण) साथ खाना खाने से कतराती रहती थी, कभी खा भी लेती तो मेरे डब्बे से एक निवाला भी न चखती। ये सिलसिला लम्बा चलता रहा। कष्ट किसी को नही था इस बात से, सिवाय मेरे। वक्त गुज़रता गया। दिल की बात जुबान तक आने में ज्यादा वक्त नही लगा। एक दिन उसने कहा गुरूदेव कहते हैं, जैसा खाओगे अन्न वैसा होगा मन….। गायत्री परिवार के श्रीराम शर्मा की भक्ति के शब्द थे ये। यानि मेरे बिना कुछ बताए पूछे ही वह निष्कर्ष पर पहुचं गई थी कि मुसलमान का अन्न और मन कैसा होता है। मैं निरूत्तर हो गई कि ये अन्तर्यामी लोग अपने आप सबकी कुण्डलियाँ देख चुके हैं.मेरे अन्दर पता नही क्या क्या होने लगा था। क्या करती रहना तो यहीं था। अपने मन को समझाती रही जितना समझा सकती थी ।
मेरे मित्रों ने कई बार बड़ी बेबाकी से मुझसे ये बात कही है ”तुम मुसलमान हो, पर लगती बिल्कुल नहीं हो।’ इस बात पर कई बार मै मुस्कुरा दी , पर कई बार मेरी भी ज़बान में कडवाहट घुल गई । रोज-रोज इन बेहूदा सवालों से दो चार होती रही, कई बार ह्दय को चीरती उनकी व्यंज्ञात्मक मुस्कान भी बहुत सी अनकही बातों का भी उत्तर दे देती थी। मेरी जिज्ञासा अब ये जानने में हो गई थी कि मुसलमान कैसे लगते हैं । हमारा स्कूल एक, कॉलेज एक फिर मेरे साथ पढी लड़कियों में और मुझमें क्या फर्क है, ये मुझे कभी पता ही नही चला। पर न जाने कौन सा फर्क उनकी जांचती निगाहें ढूँढती रही । यह एक बहुत कॉमन सवाल रहा जिसे अनेको बार अनेको जगहों पर मुझसे पूछा गया। बात ये है कि मै तो लगना चाहती हूँ वही मुसलमान, जिसकी मेरे अज़ीज़ साथियों के मन में तस्वीर है, उनसे जानने की इच्छा भी है कि हमें कैसा लगना चाहिए। अगर वो हमें समझा सकें।
जल्दी ही मैने देखा कि उच्च जाति की इन लडकियों का एक गुट बन गया दफ्तर में। उनके बीच मुसलमानों को लेकर खराब चर्चाएँ आम हो गई। गाँव से शहर आने के बाद मैंने पहली बार मुसलमानों के लिए कटुआ शब्द यहीं सुना था। एक लड़की जिसके पिता आरएसएस का सरस्वती शिशुमन्दिर स्कूल चलाते थे, आर्थिक रूप से काफी सम्पन्न परिवार से थी। संगठन की मुखिया को कई बार विचारधारा के बारे में आगाह किया परन्तु उसका अमीर होना उसकी योग्यता में शामिल था, जो गाहे-बेगाहे असर भी छोडता था। मुसलमानों के खिलाफ घोर कट्टरवादी माहौल में पली लड़की की रग-रग में नफरत भरी हुई थी। बैलेन्स बनाना अब बिल्कुल असम्भव लगने लगा था। एक दिन मैने उससे कहा तुम्हारी शक्ल मेरी एक रिश्तेदार से मिलती-जुलती है, इस बात से ही वह धृणा से भर गई , बोली, भक और नफरत भरी हॅंसी हॅंसने लगी मानो कह रही हो किसी मुसलमान से उसकी शक्ल की तुलना करने की मेरी जुर्रत कैसे हुई। सास बहू धारावाहिकों में नागिन जैसी भूमिकाओं में दिखाई जाने वाली औरतें घरों के भीतर ही नही, दफ्तरों में भी होती है जो बॉस को खुश रखना खूब जानती है। कोई मुसलमान औरत दफ्तर में सर से दुपटटा ओढ़ कर आ जाए तो उसे कहा जाता था ये इनके यानी मेरे लोग है। हाँ ऊपर-ऊपर सब लोग सेक्युलर, मुसलमान प्रेमी होने का अच्छा खासा ढोंग रचते थे, जिसे बाहर से देखने वाला भांप भी नही सकता था।
नौकरी एक मजबूरी थी, घुटन बढती जा रही थी, खुदकशी करने का सवाल हावी होता जा रहा था, घर वाले भी मेरी पीड़ा को समझ नही पा रहे थे, हर रोज ये विचार हावी होता चला जा रहा था, एक दिन सोचा आज दफ्तर में ही जान दे दुगी । इतना अपमानित महसूस करती थी कि सुबह उठकर दफ्तर जाने का इरादा भी मुझे डराने लगा था। एक स्वतन्त्रता सेनानी की पोती थी , क्रान्ति की बातें बचपन से ही सुनती रहती थी, मन भी क्रन्तिकारी ही था, लेकिन जिस माहौल में जवानी में कदम रखा उसके साथ मेरा तालमेल ही नहीं बैठ पा रहा था। मेरी सेहत भी गिरती जा रही थी। सवालों को छोटा बताकर कई बार चुप कराने की चेष्टा हुई । ये छोटे सवाल नहीं है। ये गम्भीर कलेजा कुतरने वाले सवाल हैं। किसी परिस्थिति को देखकर कुछ कहना और उसे जी कर कुछ कहना दोनों में बड़ा फर्क होता है। इन सवालों को जीने की पीड़ा बड़ी गहरी होती है। इन सवालों को तथाकथित महिला अधिकार के पैरोकारों के सामने उठाने पर ज्यादातर को यही लगा कि मै सवाल ज्यादा ही करने लगी हूँ ये मेरी गुस्ताख़ी है, पर सवाल तो वही ज्यादा करता है जिसके हिस्से में संघर्ष ज़्यादा होता है। जिसे छोटी छोटी चीजों के लिए बेजा परेशानियों से दो चार होना पड़ता है। मुझे अपने राष्ट्र प्रेम को भी बहुत बार साबित करना पड़ा था।
मेरी गुरू बहनों ने महिला मानवाधिकार के जो मूल्य हमें सिखा दिए थे वो मेरे भीतर बडे़ गहरे बैठ गए उससे इतर जाने का कभी सोचा ही नहीं, लेकिन मुस्लिम की पहचान उनके चश्मे से क्या दिखती है, खुले आम गिनाते मेरी सहकर्मी बहनों को भी कभी गुरेज नही हुआ। न आंखों की शर्म न जुबान पर लगाम। हम तो बहनापे का दर्द बांटने आए थे, उसे मजबूत बनाने, हमे पता ही नहीं था की हमारे बहनापे के दरमियान भी गहरी मोटी लकीरें है। जो हमें हिन्दू मुस्लिम के अलग-अलग खानो में ही रखती हैं. इसके पीछे वजह जो मुझे नजर आती है वो ये कि भारत में महिला आन्दोलन के झण्डाबरदारों में ज्यादातर उच्च वर्ग व उच्च कही जाने वाली हिन्दू जातियों से आई महिलाएं थीं और हैं। जो ऐतिहासिक तौर पर अप्रत्यक्ष रूप से शोषणकारियों का ही वर्ग रहा है। जिन्होंने कठिनाइयों पर चर्चा तो की है पर उसे जिया नही है। तो अन्जाम ये हुआ कि वो यहां भी उसी जमात में शामिल रहीं । इस लिए अन्तः कलह व द्वन्द काफी नज़र आया जिसे सामान्य होने में अभी नस्लें खत्म होंगी। जब तक कि पीड़ित वर्ग मज़बूती से लामबन्द नहीं हो जाता। जब तक आप कोई घाव न दिखा पाएं तब तक आप की पीड़ा को बहुत कम आंकता है ये समाज , लेकिन कुछ तकलीफों में हम आप कोई घाव नहीं दिखा सकते फिर भी भीतर की दुनिया के हजार टुकड़े हो चुके होते है। बदलते तो गाँव शहर है हम, विचार तो हमारे साथ-साथ ही सफर करते है। वो तो ऐसे ही चिपके रहते हैं जब तक कि हम उन्हें झटक कर फेंक न दें। हमें तय करना होगा किसी की उच्छृंखलताकी हद तक आज़ादी किसी के लिए घुटन न बन जाए।
कहते हैं कभी-कभी तो बुरे हादसे भी इंसान को बिगाड़ने के बजाए सम्हाल देते है। मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। जेहनी जद्दोजेहेद जारी रही , मन में घोर उथल-पुथल चल रहा था। बस एक दिन झटके में बिना किसी पूर्व योजना के इस्तीफा देने का इरादा पक्का हो गया। उसके बाद मुसलमान औरतों के साथ बहुत जमीनी स्तर पर काम करना प्रारम्भ किया, उनकी रोजी रोटी तालीम के सवाल उठाना प्रारम्भ किए, मुझे ऐसा लगा जैसे मै जी उठी, बहुत आत्मबल और ऊर्जा मिली उस इस्तीफे से, उस घुटन भरे महिला अधिकार संगठन से बाहर आकर। जिन्दगी जीने का नजरिया बदल गया। खूब पढाई की, खुद को समय दिया, उसके बाद मुस्लिम समाज के कट्टरवाद और शरीया कानून पे जो वार किया तो कोई आलिम, फाजिल, मौलवी, मौलाना हमें हरा नही सका। मज़हबी तंजीमों को झकझोर कर रख दिया।
इस काम में मेरी सबसे ज्यादा मदद की थी डा0 असगर अली इंजीनियर ने। मुस्लिम महिलाओं की आवाज को मजबूती देने में तथाकथित सधे हुए एनजीओ से कही बहुत ज्यादा बडी भूमिका निभाई। राह में बहुत सी दुश्वारियां आई जब औरत के सामने औरत खडी कर दी गई उसे नेस्तोनाबूद करने के वास्ते, आतिश पर कदम रखने पड़े , लेकिन मेरी भूमिका को कभी नकारा नही जा सकता। जिसका असर आज दिखाई भी दे रहा है। डा0 पायल तुम तो मेरी ही तरह थी, मेरे ही जैसा अपमान सहती थी। तुम घबराकर खुद में क्यों सिमट गई। तुम्हें अपमान सहकर अपने पंख और फैला लेने चाहिए थे। एक बड़ी लाइन भी तो खींचना था। तुम्हें हारना नही था इसका इलाज हम तुम जैसे लोग ही कर सकते है। सावित्री बाई फुले भी अगर यूं ही अपमान सह कर मर गई होती, ताराबाई शिन्दे ने भी अगर खुदकुशी कर ली होती तो क्या हम तुम यहां तक पहुचते जहांतक पहूंच पाए ! नही! शायद कभी नही! ये सफर लम्बा है , ऐसे ब्राह्मणवादी , मनुवादी चेहरे हमारे सामने आते रहेंगे हमें डराते रहेंगे, हमारा उपहास करते रहेंगे, लेकिन मजहबी हदबन्दियांको तोड़़ते हुए इन्ही कांटों भरी राह में ही हमें अपना रास्ता निकालना होगा। तभी एक नई दुनिया मुमकिन हो पाएगी।
हेमलता महिश्वर जामिया मीलिया इस्लामिया में हिंदी की प्रोफेसर , कविता, कहानी और आलोचना में समान और सशक्त गति. संपर्क:hemlatamahishr @gmail.com
मुम्बई के नायर हॉस्पिटल में डॉ पायल तडावी की आत्महत्या को सांस्थानिक हत्या बताते हुए उच्च शिक्षा में जाति-घृणा को ऐतिहासिक संदर्भों में देख रही हैं प्रोफेसर हेमलता महिश्वर:
मैंने कहीं पढ़ा कि “व्हाटसऐप ग्रुप में उसकी जाति को लेकर मजाक उड़ाया जाने लगा, उसकी लैब में उसे काम करने से रोका जाने लगा, उसकी योग्यता पर सवाल किया जाने लगा, उसके इलाज से मरीजो के अशुद्ध हो जाने की बात की जाने लगी, उसके आदिवासी होने ने उसे जंगली की श्रेणी में रख दिया, खाने की टेबल पर उसे इस तीनो सवर्ण इलीट महिलाओं ने गॉशिप पॉइंट बना दिया।”
डॉ पायल तडावी, वी वाई एल नायर हॉस्पिटल से संबद्ध टोपीवाला नेशनल मेडिकल कॉलेज, मुंबई में स्नातकोत्तर की पढ़ाई कर रही थीं। गॉयनेकोलॉजी विभाग में काम करना मतलब 48-72 घंटे लगातार काम करना। इन मेडिकोज़ को कंघी-चोटी की फ़ुरसत नहीं मिलती तो किसी और बात की तो सोचना ही क्या? मेरे घर से एक बच्ची गॉयनी में पीजी कर रही है। एक बार एक ही रात में बीस सीज़र और अट्ठारह नॉर्मल डिलवरी करवाई। ऐसा इन लोगों के साथ अक्सर होता है। इन मेडिकोज़ के लिए कोई मानवाधिकार की आवाज़ तो उठाए। ऐसी सघन व्यस्तता में सीनियर्स जाति का ध्यान रखे हुए हैं तो सोचिए कि कितनी बजबजाती हुई मानसिकता है जबकि वे मेडिकल कॉलेज के विद्यार्थी हैं, गॉयनी विभाग के विद्यार्थी हैं। बच्चे के पैदा होने के कारण की समूल जानकारी रखते हैं और फिर भी जाति व्यवस्था पर यक़ीन करते हैं। कैसा विरोधाभास है यह? यह इलीट वर्ग धर्म की जकडबंदी से ख़ुद को मुक्त नहीं कर पाया। अस्पृश्यता तो अब तक अंत्यजों के साथ होती रही, आदिवासी को भी लपेट लिया गया, यह नया है। यह इलीट वर्ग की बौद्धिक चेतना का चमत्कार है कि वे आदिवासियों के साथ भी छुआछूत बरत सकते हैं। अस्पृश्यता का विस्तार करते जा रहे हैं। मरीज़ को तो ईलाज़ से मतलब होता है, उसे चिकित्सक की जाति से क्या लेना-देना? पर ये असुरक्षित भावना से घिरे दयनीय इलीट वर्ग के लोग अपने व्यवसाय की अनिवार्य मानवता से जैसे अंजान हैं।
बायें पल्लवी तडावी, दायें सीनियर डॉक्टर्स जिनपर पल्लवी की प्रताड़ना का आरोप है
जब कभी भी आरक्षण को लेकर विरोध उठा है, एम्स के डॉक्टर्स ने सड़कों पर झाडू लगाई है। क्या संदेश देना चाहते हैं वे? वंचित समुदाय के लोग शिक्षा प्राप्त करेंगे तो इनके हाथों में झाड़ू ही क्यों आएगी? सड़कों में झाड़ू लगाने का एकमात्र ठेका क्या सिर्फ वंचित समुदाय का है? काम को लेकर इतना अपमान-बोध इनके भीतर क्यों है? ये तो भाग्यवादी हैं, इनके भाग्य से भला कौन क्या छीन लेगा? ये लोग डरते हैं कि कहीं अध्ययन के पश्चात् यह वंचित वर्ग हमें ही प्रतियोगिता में न ले आए। इसलिए धूर्ततापूर्वक इन लोगों ने वंचितों से शिक्षा का अधिकार ही छीन लिया। क्या राम कथा के शंबूक वध की याद नहीं दिलाते हैं? जैसे ही कोई शूद्र तपस्या करेगा, वैसे ही ब्राह्मण का बेटा मरेगा। क्या है इस दृष्टांत में? ब्राह्मण स्वंय को सदा-सदा के लिए प्रतियोगिता से परे रखना चाहता है। अध्ययन-अध्यापन को सिर्फ़ अपने साथ ही सुरक्षित रखने का मतलब है, किसी और को इलीट क़िस्म का धोखा देते रहना। शबरी पूरी श्रद्धा के साथ, अंध-श्रद्धा के साथ जूठे बेर भी खिलाए तो मंज़ूर है क्योंकि अंध-श्रद्धा सत्ता के लिए चुनौती कभी नहीं बनती। पर शंबूक का तपस्या करना मतलब ज्ञान प्राप्त करते हुए योग्यता अर्जित करना तो सत्ता के लिए चुनौती होगा ही न! एक सेवक यदि ज्ञान प्राप्त कर लेगा तो वह सदियों से थोपे जा रहे शास्त्रों को सवाल के घेरे में ले आएगा। इसलिए इनकी भाषा में शंबूक का वध होता है, हत्या नहीं, गांधी-वध होता है, हत्या नहीं। शंबूक केवल सेवा के लिए है, ज्ञान प्राप्तकर सवाल करने के लिए नहीं। इसलिए क्षत्रीय राम ब्राहमण नामक नीति निदेशक की रक्षा के लिए शंबूक वध करते हैं। ब्राह्मण सत्ता को नियंत्रित करता है और क्षत्रीय उसके निर्देशन में सत्ता को संभालता है। यह सदियों से चला आ रहा है। और आज औद्योगिक समाज भी इसे तोड़ नहीं पा रहा है।
भारत में जिस तरह का विरोध अंग्रेज़ों का हुआ, मुग़ल या अन्य बाहर से आए हुए शासक का नहीं हुआ, क्यों? मुग़लों ने हिंदू व्यवस्था पर चोट नहीं की थी। अंग्रेज़ों ने हिंदू व्यवस्था को चरमरा दिया था। स्त्री शिक्षा, दलित वर्ग की शिक्षा ने हिंदू धर्म शास्त्रों की धज्जियाँ उड़ा दी। सती-प्रथा पर क़ानूनी रोक लग गई, लड़कियों के लिए पाठशालाएँ आरंभ हुईं, ज्योतिबा फुले का सामाजिक संघर्ष अंग्रेज़ी शिक्षा की बदौलत परवान चढ़ा। डॉ अम्बेडकर ने हिंदू धर्म की पहेलियों को समझने का प्रयास करते हुए उसका त्याग किया। यहीं से शक्ति प्राप्त करते हुए स्वतंत्र भारत के वंचित समुदाय ने नागरिक होने की हैसियत प्राप्त करते हुए अपने सतत हो रहे अपमान के बदले सम्मान प्राप्त करने के लिए संघर्ष करना आरंभ किया। अभी तो प्रथम वर्ग में पहली – दूसरी पीढ़ी ने कदम रखा ही है कि ये सदियों से सम्मान पर कुंडली मारे बैठे लोग इस संघर्ष को धूल धूसरित करने में लग गए हैं।
डॉ पायल रोहित वेमुला की तरह ही सांस्थानिक हत्या का शिकार हुई हैं। हम सब यह जानते हैं कि मेडिकल कॉलेज की पढ़ाई कितनी कठिन है? फिर मेडिकल पीजी की प्रवेश परीक्षा कठिनतम है। ऐसे में मुंबई जैसे महानगर के मेडिकल कॉलेज में पढने का मतलब है विद्यार्थी बहुत मेहनती रहा है। डॉ पायल तडावी तो आदिवासी बताई जाती हैं। वहॉं से तो तथाकथित सभ्य समाज तक की यात्रा और भी कठिन, दुरुह रही होगी। मेडिकल कॉलेज में सामान्य कॉलेज की तरह आपके पास अपनी जाति को छुपाने का कोई रास्ता नहीं होता। यहाँ जातियां जग – ज़ाहिर होती हैं। और इलीट वर्ग के हाथों में जैसे हथियार आ जाता है। इनकी ज़ुबान फ़ोरसिप (एक तरह का चाकू जिससे मांसपेशी की पतली से पतली परत काटी जा सकती है) की तरह हो जाती हैं। मन को बहुत महीनता के साथ परत-दर-परत छीलने लगती हैं। लहू-लुहान होता हुआ मन पीड़ित के चेहरे पर जैसे-जैसे दिखाई देता है, वैसे-वैसे इनका प्रहार बढ़ता चला जाता है। अंत में इनकी फ़ोरसिपी ज़बान पीड़ित की हत्या कर देती है और ये पीड़क उसे आत्म हत्या का नाम देते हैं। डॉ पायल तडावी भविष्य में क्या कुछ नहीं कर सकती थी, सारी संभावनाएँ समाप्त हो गईं।
रोहित वेमुला तो आम्बेडकरी चेतना से लैस था फिर भी सांस्थािनक हत्या का शिकार हुआ। यह जानने के बावजूद मैं समस्त समाज से अपील करना चाहती हूँ कि वे अपने बच्चों को डॉ आम्बेडकर, ज्योतिबा फुले की जीवनी और विचार से अनिवार्यत: परिचित करवाएँ। यही अपील मैं वंचित वर्ग के अध्यापकों से भी करती हूँ कि वे अपने प्रत्येक विद्यार्थी, चाहे वे दलित हों या गैर दलित, आदिवासी, स्त्री, पुरुष सबको इनके कामों से परिचित करवाएँ और सभ्य समाज बनाने की दिशा में अपना अमूल्य योगदान दें ताकि हेमा आहूजा, भक्ति महर और अंकिता खंडेलवाल जैसी सिनिक सीनियर्स पैदा ही न हों।
सरकार की ज़िम्मेदारी बनती है कि समाज में ऐसी नफ़रतों को रोकने के लिए ऐसे जातिवादियों को कड़ी से कड़ी सज़ा दे ताकि कोई और रोहित वेमुला, डॉ पायल तड़वी सांस्थानिक हत्या का शिकार न हो।
30 मई को संसद में शपथ लेने वाले 542 सांसदों में से 78 महिला सांसद शपथ लेंगी. यह संख्या 1952 के बाद अबतक महिला प्रतिनिधित्व की सबसे बड़ी संख्या है , चुनी गयी 78 महिला सांसदों में उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल की संख्या ग्यारह-ग्यारह है, यानी इन दो राज्यों से चुनी गयी कुल महिला सांसदों में लगभग 30%का प्रतिनिधित्व है.
देश भर से कुल 724 महिला उम्मीदवारों ने चुनाव लड़ा, जिसमें कांग्रेस ने सबसे अधिक 54 महिलाओं को मैदान में उतारा, जबकि दूसरे नम्बर पर रही भाजपा जिसने 53 महिलाओं को टिकट दिये। 14 फीसदी से अधिक महिला सांसदों के साथ, 17 वीं लोकसभा में सबसे ज्यादा महिलाएं होंगी।
16 वीं लोकसभा में 64 महिलाएं जीती थीं, जबकि 52 महिलाएं 15 वीं लोकसभा के लिए चुनी गईं। 16वीं लोकसभा में सोनिया गांधी, हेमा मालिनी और किरन खेर सहित 41 महिला सांसदों में से 27 ने इन लोकसभा चुनावों में अपनी सीटों को बरकरार रखा, हालांकि स्मृति ईरानी और प्रज्ञा ठाकुर ने अपेक्षाकृत अपने अधिक प्रसिद्ध प्रतिद्वंद्वियों पर जीत के साथ ज्यादा ध्यान खींचा है। प्रज्ञा ठाकुर अपने उग्र हिन्दुत्ववादी विचारों और गतिवधियों के कारण भी सुर्खियों में रही हैं.
ईरानी एक जायंट किलर के तौर पर सामने आयी हैं उन्होंने अमेठी में राहुल गांधी को हराकर एक ऐतिहासिक जीत दर्ज की। संसद में प्रवेश करने वाले अन्य प्रमुख नाम तमिलनाडू से कनिमोझी करुणानिधि और भाजपा की रीता बहुगुणा हैं, जो उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद निर्वाचन क्षेत्र से जीती हैं।
अन्य दलों में, बहुजन समाज पार्टी (BSP) ने 24 महिला उम्मीदवार, अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस (AITC) 23, CPI (M) 10, CPI चार, जबकि राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) ने एक उम्मीदवार मैदान में उतारा।
222 महिलाओं ने स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ा। संसदीय चुनावों में कुल 8,049 उम्मीदवार मैदान में थे। चार ट्रांसजेंडर उम्मीदवारों ने स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ा, जबकि AAP एकमात्र पार्टी थी जिसने एक ट्रांसजेंडर उम्मीदवार को मैदान में उतारा। लेकिन सभी ट्रांसजेंडर उम्मीदवार चुनाव में हार गए। सबसे अधिक महिला उम्मीदवार उत्तर प्रदेश से 104 सीटों पर मैदान में उतरीं, उसके बाद महाराष्ट्र में उनकी संख्या बड़ी रही। तमिलनाडु में 60, बिहार में 55 और पश्चिम बंगाल में 54 महिला उम्मीदवार मैदान में थीं।
14 वीं लोकसभा में 52 महिला उम्मीदवार जीतीं, 13 वीं लोकसभा में 52 महिला उम्मीदवार जीतीं, 12 वीं लोकसभा में 44 महिला उम्मीदवार जीतीं, 11 वीं लोकसभा में 41 महिला उम्मीदवार जीतीं। 10 वीं लोकसभा में 42 महिला उम्मीदवार जीतीं। 9 वीं लोकसभा में 28 महिलाएं थीं जबकि 8 वीं लोकसभा में 45 महिला सांसद थीं। इससे पहले तीसरी लोकसभा में अधिकतम 37 महिलाएं जीती थीं। पहली और दूसरी लोकसभा में 24 महिला सांसद थीं.
एस.एस.पंवार आजकल, कथेसर एवं दस्तक, कथा समय सहित विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कविताएं और लेख प्रकाशित। संपर्क- 9017738638
मुझे तमाम लड़कियों की आंखें तुम्हारी बेटी जैसी लगती हैं
जिनमें उदासियां दर्ज हैं
डरी हुई लम्बी यात्राओं की,
नक़्शे की तरह खौफ़ की सख़्त जमीनें अंकित है
जिनकी आँखों के पथरीले सुर्ख़ धरातल पर
नई उड़ानों में परों के नोच दिए जाने बिखरने, टूटने का सहमापन गिर जाने हतोत्साहन और समंदर के मटमैले से बेरंग हो जाने का मनहूस ख़ौफ़ बार-बार डरा रहा हो जिसे,
वो खौफ़ जिसकी वजह से बगीचे सीख जाते हैं हिटलरशाही, गुलाबों का खिलना जहां कोई रिवाज नहीं हुक्म होगा महज सत्ताओं का, पेड़ों का स्वभाव जहां इनकार कर सकता है लताओं को प्रश्रय देने से
मुझे लगता है कभी-कभी मुल्क की तमाम किशोर लड़कियों की आंखें उस खौफ़ से भर गई हैं जो खौफ़ सड़क के दो किनारों पर खड़े होकर प्रेम में डूबे दो वृक्षों में होता है किसी ऊंचे वाहन की चोट से क्षतिग्रस्त हो जाने का खौफ़
ये सहमी हुई लड़कियां मुझे
उन वृक्षों पर पलती अमरबेल जैसी लगती है
एक के कट जाने पर
जिसका वजूद खतरे में हो,
ये अमरबेल के लिए गाली नहीं
बल्कि दरख़्तों का सौभाग्य होगा
मैं ख़ाब में देखता हूँ कई दफे कि सड़क के तमाम एकतरफा दरख़्त काटे जा रहे हैं
छली गई औरतें
परकीय में छली गयी हूं मैं
मैं घोषणा करती हूं कि मुझे अब एक मुक्कमल वेश्या करार दी जाए
हर बार नए सिरे से ये कहती हुई मैं कि
‘मैं और नहीं टूटना चाहती’
‘रोक लो मुझे’
‘तुम्हीं के साथ’
‘ बस तुम्हारे साथ’
‘कि यहीं रुक सकूँ मैं’
कितने अर्जुनों के तीरों से बिधी हूं मैं
इस भ्रम में
कि भीष्म की प्यास बस अर्जुन का तीर बुझा सकता है
कितने भावातिरेकों में कहा मैंने
कि मुझे छोड़ तो नहीं दोगे ना ?
मैं अकेली तो नहीं पड़ जाऊंगी ना?
तुम्हारे जैसा प्रेम
शायद कहीं न मिले मुझे ?
वो जो बन्दरगाह आते हैं छोटे-छोटे
जहां
एक ही गन्तव्य को निकली दोओं में एक नाव ठहर जाती है
और एक ही बढ़ती है आगे
कहीं वो यात्रा तो नहीं है हमारी?
कितनी बार बाज दृष्टियों से महज बेधी जाऊंगी मैं
आखिर कितनी बार,
यौनिक प्रयोगशाला में तब्दील मेरी देह
अब मुक्त होना चाहती है
इस सत्ता से मुक्त
कि मैं अपना घर बना सकूँ
एक उदास चिट्ठी ( एक गुमनाम दोस्त के नाम )
उसके अनुमान संदिग्धता भरे रहे
एक अनजान सी उम्र में उसने जो कमाया उस पर कभी छाप अंकित नहीं करनी चाही
वो बनती रही अमावस की काली रातें
जहां-जहां
वो शाया हुईं
दहाई पृष्ठांको वाले उन अखबारों में नहीं थे
कोई भी लिपीय शब्द
उसने सदैव देखा
सदी के सातवें दशक की खूंटी पर टँगा
तमाम भोली अदाकाराओं में अपना अजीब-सा करेक्टर
उसने पाया
बीते वक्त की तमाम सूनी काली अमावसें
उसकी आंखों पर चुभ गयी हैं,
जब जब उसने नदी बन सागर होना चाहा
तमाम रेगिस्तान
उसकी छातियों पर चिमट गए,
उसने अपने स्तनों के उभार में जो अंतर देखा
कई बरसों के लटकते कैलेंडर उसके आगे से कौंध गए,
समझौतापसन्द नहीं थीं वो,
वो चाहती रही बिल्ली बनकर जिंदा मछलियां खाना,
पैरों का भीग जाना मगर
कभी नहीं रहा उसके स्वभाव में,
कई युवा; जिनके चमकते गाल अब सलवटें लेने लगे थे और
बालों के अवरोही गणित के साथ
जिनकी सफेद दाढ़ियाँ बताने लगी थीं कि वे अब सधे हुए कॉमरेड हैं;
सब उसके साँचें से बाहर होने लगे थे
कितनी ही बार वो मर्लिन मुनरो होते-होते बची और उसने
अपनी दीवार पर नए कैलेंडर टांगे,
एक अस्तित्वहीन मुल्क का समाजशास्त्र
उसे काटता रहा बार-बार
ठुकराई गई औरत
नींद में कुछ नहीं खोया उसने बीते बसन्त के पत्ते गिने और सकुचाकर दुहरी हो गई अतृप्त आत्माओं की तरह
भटकती छायाएं डराती है उसे आजकल
सूने एकांत स्थानों पर
देर तक टकटकी जमीनें चीरती हैं
अपनी छातियों के दूध से देव-प्रतिमाएं सींचना अब
कोई सिद्धांत नहीं बुनता…
अपलक आंखें ख़ाब को ख़ाब कहते डरती हैं,
मिटा हुआ द्वंद्व
सूनी छतों पर घूमती काली बिल्लियों से खौफ़ खाता है
तमाम साये किसी धुन की प्रतीक्षा में
हो जाते हैं अचेत…
दर्द की खाईयों से बने डरावने शब्द
गूंजते हैं
बार-बार
सुनसान पत्थरों के बीच…
उसकी कई रचनाएँ जब्त होने से डर रही हैं…
‘तीसरा सप्तक’ के कवि केदारनाथ सिंह हिन्दी साहित्य जगत में अपनी काव्य
प्रतिभा के लिए जाने जाते रहेंगे . उनकी रचनात्मक प्रक्रिया ही उनके व्यक्तित्व की
विशेषता है . केदारनाथ सिंह हिन्दी साहित्य के ऐसे चितेरे हैं जिनकी कविताएं अपने
समय के विरुद्ध खड़ी दिखाई देती है . केदारनाथ जी की कविताओं में गाँव की गरीबी और
चकाचौंध दिखने वाली शहरों का तनाव साफ़ झलकता है . यह तनाव अब नहीं है या आगे नहीं
रहेगा, ऐसा कहना बेमानी होगा . यह तनाव आगे भी रहेगा . गाँव और कस्बों से रोज़ी–रोटी
की तलाश में शहर आए लोगों की सिसकती ज़िन्दगियां किस क़दर शहरों के छोटे से कमरों में
सिमटकर रह जाती हैं इसे कवि स्वयं भी अनुभव करते दिखाई देते हैं . केदारनाथ जी
अपनी कविताओं में एक ओर जहाँ प्रकृति की सौम्यता और सरलता की बात करते हुए इस
पृथ्वी के रहने की बात करते हैं, वहीं दूसरी ओर अपनी कविताओं के माध्यम से यह भी
दिखाने की चेष्टा करते हैं कि शहर आपकी संवेदनाओं को किस क़दर मार देती है . प्रकृति
की सरल और सहज प्रवृत्ति को शहर कठोर और क्रूर बना देती है . इसीलिए केदारनाथ की
कविताओं के भीतर एक छटपटाहट और एक बेचैनी दिखाई देती है . यह छटपटाहट अकारण नहीं
है बल्कि इसके पीछे कवि के भीतर का वह द्वंद्व है जो निरंतर कवि के अपने आपसे बहस
करता है . करता है बहस उन तमाम उलझे हुए प्रश्नों से, उन तमाम समस्याओं और
चुनौतियों से लड़ने के लिए .
पेंटिंग: हरि थापा
केदारनाथ सिंह जी ज़मीन से जुड़े हुए कवि हैं . निश्चित तौर पर नागार्जुन के बाद आधुनिक हिन्दी के सर्वाधिक लोकप्रिय, जनप्रिय कवि केदारनाथ सिंह जी ही ठहरते हैं . ‘तीसरा सप्तक’ में सम्मिलित कवि केदारनाथ अपनी ज़मीनी स्तर पर लिखी गई कविताओं के लिए ही लोक जीवन के ज़्यादा निकट दिखाई पड़ते हैं . इनकी कविताओं के तार गाँव से लेकर शहर और हिन्दी से लेकर भोजपुरी तक जुड़ते हैं . भले ही तार सप्तक का यह तार आज टूट गया परंतु केदार जी की कविताओं में जिस संघर्ष और असीम इच्छाओं का खाका मिलता है वह आज भी वैसा ही है, जैसा पहले था . ज़िंदगी की जद्दोजहद आज भी उतनी ही उलझी हुई सी मालूम होती है, इनमें कोई बदलाव नहीं दिखता . हिन्दी साहित्य के संसार में केदारनाथ सिंह की कविता अपनी विनम्र उपस्थिति के साथ पाठक वर्ग के समीप जाकर खड़ी हो जाती है . वे अपनी कविताओं में किसी क्रांति या आंदोलन के पक्ष में बिना शोर किए मनुष्य, चींटी, घास, पत्ते, फूल, कठफोड़वा या जुलाहे के समर्थन में दिखते हैं . लोकबिम्ब से लेकर आधुनिक जीवन के तीखे स्वर उनकी कविताओं में निरंतर व्याप्त है .
प्रेम के नितांत व्यक्तिगत क्षणों को केदारनाथ जी जितनी सरलता से अपनी कविताओं में कह जाते हैं, वह किसी उस्ताद के बस की ही बात है . प्रेम की पीड़ा को भी उन्होंने अपने शब्दों में बखूबी अभिव्यक्त किया है – “मैं जा रही हूँ – उसने कहा जाओ – मैंने उत्तर दिया यह जानते हुए कि जाना हिन्दी का सबसे खौफनाक क्रिया है .”
विदा की तरह कविता का यह बिम्ब उतना ही मार्मिक, विस्तीर्ण और सहज स्वभाव वाला
है . उनके लिए कविता कोई व्यक्तिगत किस्म की उपलब्धि नहीं थी, बल्कि वह दुनिया को
बनाने का एक उष्मीय इरादा रखती है . केदारनाथ सिंह जी जानते हैं कि मनुष्य अपने
कल्पना लोक में कितना उर्वर, राजनीतिक और फ़ितनागर हो सकता है . उनकी कविता ‘बनारस’
को ध्यान से पढ़ने पर बनारस एक बिम्ब के रूप में हमारे समक्ष प्रस्तुत होता है .
जिन तत्त्वों से मिलकर यह शहर बनता है . वह उनकी कविता की बुनावट में चला आता है . चाहे वह कबीर पर लिखी कविताएँ हों अथवा
सुई-धागों के विषय में लिखी कविताएँ हों .
केदारनाथ जी की काव्य यात्रा नवगीत से शुरू हुई थी . उनके नवगीतों का संग्रह ‘अभी बिलकुल अभी’ हिन्दी में बहुत चर्चित रहा . आज जबकि हिन्दी में नवगीतों की परंपरा अमूमन ख़त्म सा हो गया है, उनके नवगीत आज भी पाठकों को आकर्षित करते हैं . जहाँ तक आधुनिक कविताओं की उनके पहले संग्रह की बात है तो यह केदारनाथ जी के प्रगतिशील होने की ओर संकेत करता है . ‘ज़मीन पक रही है’ एक अत्यंत महत्वपूर्ण संग्रह है . केदारनाथ सिंह जी हमेशा देहाती, गाँव के आदमी बने रहे . इसीलिए उनकी कविताओं का मिजाज़ गंवईपना लिए हुए है . गाँव से कस्बे में आने का, कस्बे से दिल्ली जैसे महानगर में आने का तनाव भी दिखता है . ऐसे तनाव का प्रयोग वे जिस प्रकार करते हैं वह भी अपने आप में अनोखा है . दिल्ली के विषय में उनकी यह पंक्तियाँ देखने योग्य है “बारिश शुरू हो रही है बिजली गिरने का डर है वे क्यों भागे जाते हैं जिनके घर हैं .”[1]
जहाँ तक केदारनाथ सिंह की कविताओं में स्त्री पक्ष की बात है तो वह हमें कई
रूपों में दिखाई पड़ती है . स्त्री पर बात करते हुए केदारनाथ जी ने कई कविताएँ
लिखीं हैं . इनमें – ‘हॉकर’, ‘जो एक स्त्री को जानता है’, ‘नमक’, ‘तुम आईं’, ‘टमाटर
बेचनेवाली बुढ़िया’, ‘सुई और तागे के बीच’, ‘हाथ’, ‘जाना’, ‘आना’, ‘बाघ’, ‘घुलते
हुए गलते हुए’, ‘एक पारिवारिक प्रश्न’ आदि . केदारनाथ सिंह की कविताओं में स्त्री
का प्रेरणादायी रूप और ‘अजूबा’ रूप दोनों का चित्रण मिलता है . उनकी कविताओं में
स्त्री एक सर्वस्व के रूप में स्वीकारी गई हैं तो कभी उसका परित्यक्ता रूप भी
दिखाया गया है .
केदार नाथ सिंह की कविता पंक्ति
स्त्री की सुन्दर एवं प्रेरणादायी रूप का चित्रण करते हुए कवि लिखते हैं – उसका हाथ अपने हाथ में लेते हुए मैंने सोचा दुनिया को हाथ की तरह गर्म और सुंदर होना चाहिए .”
इसी संदर्भ में उनकी एक और कविता को यहाँ देखना चाहिए, जहाँ कवि स्त्री की कठोर परिश्रमी रूप का चित्रण करते हुए ‘सुई और तागे के बीच में’ शीर्षक कविता में लिखते हैं – माँ मेरे अकेलेपन के बारे में सोच रही है पानी गिर नहीं रहा गिर सकता है किसी भी समय मुझे बाहर जाना है और माँ चुप है कि मुझे बाहर जाना है….”
यह एक लंबी कविता है, जिसमें कवि स्त्री के परिश्रमी और पारिवारिक
ज़िम्मेदारियों के बोझ तले दबी हुई छवि को दिखाते हैं . परिवार का बोझा ढोते-ढोते
एक स्त्री, एक माँ का शरीर किस प्रकार झुकता जाता है, ढलता जाता है, इसका बेहद
मार्मिक और कारुणिक बिम्ब खड़ा करते हैं कवि केदारनाथ सिंह जी यहाँ . यह झुकना,
स्त्री का सांसारिक बोझ से झुकना है, दिन-ब-दिन ढलते उम्र से झुकना है, कर्तव्यों
के बढ़ते बोझ से, दायित्वों के बोझ से झुकना है . यानी परिश्रम करती स्त्रियों की
पीड़ा, उनके कष्ट का मर्म कवि समझते हैं . इस थका देनेवाली दिनचर्या में स्त्री कभी
खाली नहीं बैठती वरन सुई और तागा लेकर बैठ जाती हैं . कवि अपनी माँ के माध्यम से
संपूर्ण स्त्री समुदाय का श्रम उजागर करते हैं .
यह सर्वविदित है कि गया वक्त पुनः लौटकर नहीं आता . फिर भी कवि का यह प्रयास है कि उस उधड़े हुए समय को फिर से सिलने का प्रयत्न किया जाए ! यहाँ हमें कवि के आशावादी होने का परिचय मिलता है . जीवंतता का परिचय मिलता है . सुई और तागे की बात करते हुए करघे की बात करना, इस बात का संकेत है कि केदारनाथ जी कहीं-न-कहीं महात्मा गांधी के लघु-कुटीर उद्योग से प्रभावित थे और हथकरघा पद्धति में भी विश्वास करते थे . साथ ही इस उद्योग के बहाने स्त्री-श्रम को जो बल मिला, रोज़गार मिली, आय के साधन बढ़े आदि बातों से भी कवि इत्तेफाक़ रखते थे . ‘खूब मोटे और गझिन और खुरदुरे’ ये पंक्तियाँ खादी वस्त्र की विशेषता और सूत कातने वाले चरखे की ओर संकेत करता है .
इसी प्रकार केदार जी की एक और कविता है, जिसमें उन्होंने ग्रामीण जीवन में व्याप्त गरीबी, अभाव और स्त्री का सर्वस्व बचाकर रखने का भाव व्यक्त किया है . कविता का शीर्षक है – ‘घुलते हुए गलते हुए’ – “सहसा बौछारों की ओट में दिख जाती है एक स्त्री उपले बटोरती हुई…. अंतिम पंक्तियों में कविता का बिंब देखने योग्य है – स्त्री को बौछारों में धीरे-धीरे घुलते हुए गलते हुए देखता हूँ मैं .”
यहाँ भी कामकाजी स्त्री की बात करते हैं कवि . स्त्री के जीवन में व्याप्त अभाव और गरीबी का यथार्थ चित्रण करते हैं . कवि ने स्त्री का बिंब एक ऐसे रूप में खींचा है जो सहज ही गाँव की जीवन शैली को दर्शाता है . ग्रामीण परिवेश में रचे-बसे लोक जीवन को दर्शाता है . ऐसे में यदि केदारनाथ सिंह जी को गाँव का कवि, जन का कवि कहा जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होगी . कवि के काव्य जगत में स्त्री हर रूप में चित्रित की गई हैं . उपले बचाने की कोशिश के माध्यम से यहाँ स्त्री अपना सर्वस्व बचाने की चेष्टा करती दिखाई देती हैं . स्त्री का स्वभाव है सब कुछ समेटने, सहेजने और सुरक्षित रखने की . वह जीवन में कुछ भी खोना नहीं चाहती . अपने समर्पण का उदात्त भाव वह अपनी गृहस्थी में लगा देना जानती हैं . स्त्री का घुलना और गलना स्वयं के अस्तित्व को मिटा देने की उत्कट जिजीविषा को व्यक्त करता है . स्त्री कई बार इस प्रयास में स्वयं को, स्वयं के अस्तित्व को मिटा देती है . स्त्री का हृदय अधिक उदार और स्नेहिल भाव का होता है, इस बात को कवि भी कहीं-न-कहीं स्वीकार करते हैं . स्त्री का श्रमिक रूप हमें आगे चलकर मार्क्सवाद की ओर ले जाती है . इसके अतिरिक्त कवि की बेहद चर्चित कविता ‘बाघ’ की यदि बात की जाए तो हम देखेंगे कि इस कविता की शुरुआत ही एक स्त्री को जानने के संदर्भ में की गई है . जहाँ कवि लिखते हैं कि- “मैं एक स्त्री को जानता हूँ जो एक छोटे से शहर में रहती तो हो …जाएगा प्रकट .” कविता ज़्यादा लंबी तो नहीं परंतु जितनी भी है वह अपने आपमें बहुत कुछ कहती है .
कवि यहाँ किस स्त्री की बात करते हैं, इसे समझने की ज़रूरत है . क्या वह स्त्री कवि से इतना आत्मीय संबंध रखती थीं कि कवि को उस वृद्धा स्त्री की एक-एक शब्द याद हैं . अथवा गाँव की परंपरा में दादी–नानी कही जाने वाली कोई चिरपरिचित अपनी हैं . एक स्त्री के माध्यम से कवि जिस बाघ की कहानी कहलवा रहे हैं, समझने की बात यहाँ यह है कि बाघ अन्तत: किसका प्रतीक है? सत्ता का अथवा आज के लोकतंत्र का वह कुरूप सत्य है जिससे हम और हमारी पीढ़ी रू–ब–रू हो रहे हैं . यह भय सत्ता के भीतर मौजूद वह भय है जिससे सर्वाधिक आम आदमी खौफ़जदा और आतंकित हैं .
कवि का सूक्ष्म दृष्टिकोण उस ओर भी इशारा करता है, जहाँ प्रेम पर पहरा है .
ऐसे पहरुओं के कारण प्रेम का उदात्त भाव या स्वरुप यहाँ नहीं पनप पाती क्योंकि जिस
बाघ रूपी समाज का भय यहाँ उपस्थित है, वह बाघ कभी भी साधारण मनुष्य को डरा सकती है
. डरा सकती है उन हथियारों से जिससे हो सकता है प्रेम का अंत . ऐसे पंजों से डरती
है वह स्त्री, वह प्रेमी युगल जिसके भीतर सदैव एक डर बैठा रहता है, स्वयं के मारे
जाने का .
यह बाघ दरअसल कोई और नहीं बल्कि एक भय का नाम है . यह भय हमारे समाज में भी
मौजूद है और हमारे भीतर भी मौजूद है . यह बाघ कवि के स्वप्न का आधार है . बाघ
मनुष्य के इतना निकट है कि एक के विनाश के साथ ही दूसरे के ध्वस्त हो जाने का
संकल्प बहुत सहज भाव से जुड़ गया है .
केदारनाथ सिंह
केदारनाथ सिंह जी की स्त्री केन्द्रित एक और कविता है जिसका शीर्षक है ‘नमक’ . इसके अतिरिक्त एक अन्य कविता है, जिसका शीर्षक है – ‘जो एक स्त्री को जानता है’ . उपर्युक्त दोनों ही कविताएँ एक विशेष प्रकार की मांग करती है और वह मांग है स्त्री विमर्श और स्त्री अस्मिता की .
‘नमक’ कविता का आरम्भ नमक के स्वगत संवाद और वह भी प्रश्नवाची मुद्रा से होता है . नमक शहर से गुज़रता हुआ चुपके से एक घर में प्रवेश करता है . फिर चूल्हे के पास जाकर दाल-सब्ज़ी में घुल जाता है और जब खाने की मेज सजती है तो परिवार में सबसे अधिक नमक ही खुश होता है . मानो ‘नमक’ नमक न होकर परिवार का कोई सदस्य ही हो . (यहाँ नमक का अद्भुत मानवीकरण किया गया है .) कवि के ही शब्दों में – “जैसे उसकी जीभ अपनी ही बोटी के स्वाद का इंतज़ार कर रही हो .”
परंतु इसके तुरंत बाद ही यथास्थिति बिलकुल बदल जाती है जब घर का पुरुष चीखते हुए कहता है कि दाल फीकी है . और कविता, कविता न होकर मानो एक कहानी के रूप में अचानक से नाटकीय मोड़ ले लेती है – “मैं कहता हूँ दाल फीकी है पुरुष ने लगभग चीखते हुए कहा अब स्त्री चुप कुत्ता हैरान ताकते हुए ….! (उत्तर कबीर तथा अन्य कविताएँ : पृ. 20)
इस कविता का विश्लेषण जिस रूप में किया जाना चाहिए, उस रूप में नहीं की गई .
इस कविता को सिर्फ़ नमक के स्वाद तक ही सीमित कर दिया गया . परंतु क्या बात सिर्फ़
उतनी ही है, जितनी कही गई या दिखाई गई ! सवालिया निशान खड़ा होता है .
इस पूरी प्रक्रिया में एक मात्र पुरुष ही चिल्ला रहा है, स्त्री चुप है, मानो
उससे कोई बहुत बड़ी भूल हो गई हो . स्त्री की चुप्पी ही उसे स्वयं को अपराधबोध से
भर देता है . क्या यहाँ पुरुष का संयमित होना भी आवश्यक नहीं था? सिर्फ़ ज़रा-सा नमक
ही तो कम डला था खाने में ! इस पर पुरुष का चिल्लाना यह दर्शाता है कि स्त्री को
किसी भी तरह की भूल करने की इजाज़त नहीं है . चाहे वह अज्ञानतावश ही क्यों न हो .
पितृसत्ता के भीतर स्त्री की छोटी-से-छोटी भूल भी अक्षम्य है . पुरुष का स्त्री पर
क्रोधित होना स्त्री पर उसके एकाधिकार भाव को दर्शाता है, जहाँ उसे उसकी इच्छा के
विरुद्ध कुछ भी करने की स्वतंत्रता नहीं है . परिवार की हर छोटी-बड़ी घटना के लिए
स्त्री को दोष देना, ज़िम्मेदार ठहराना पितृसत्तात्मक समाज की विशेषता है .
परंतु यह पितृसत्ता यह भूल जाती है कि स्त्री का अपना भी कोई अस्तित्व है, कोई
पहचान है . उसकी अपनी भी कोई इच्छा हो सकती है . स्त्री की खुद की भी कोई जिजीविषा
हो सकती है . स्त्री को मनुष्य समझने की शक्ति अब तक इस पितृसत्ता में नहीं आई .
स्त्री आज भी अपने होने का प्रमाण देती फिर रही हैं . ‘अस्मिता’ जो कि मुख्यतः
स्त्री के स्वाभिमान की लड़ाई है, स्वत्व का बोध है, वह आत्मनिर्णय और
आत्माभिव्यक्ति का प्रश्न है, जो किसी को व्यक्ति बनाता है . ‘अस्मि’ अर्थात् मैं
हूँ .’ इस होने का एहसास स्त्री को बार-बार इस समाज में कराना पड़ता है . दरअसल
अस्मिता-विमर्श सत्ता के समीकरण और शक्ति के संतुलन में अपने हिस्से पर दावे की
सैद्धांतिकी है . यह स्वत्व का बोध असल में स्त्री के स्वाभिमान के साथ जुड़ा हुआ
प्रश्न है . परन्तु कविता में चित्रित स्त्री की दशा पर यदि ध्यान दिया जाए तो
हमें सीमोन द बोउवार की कुछ पंक्तियाँ अनायास ही याद हो आती है, जहाँ वह कहती हैं
कि – ‘मात्र वर्ग-संघर्ष के द्वारा ही स्त्री-मुक्ति के महान लक्ष्य को हासिल नहीं
किया जा सकता … चाहे साम्यवादी हों, मार्क्सवादी हों, माओवादी हों या
ट्राटस्कीवादी, औरत हर जगह, हर खेमे में अधीनस्थ की स्थिति में है, सबसे निचले
पायदानों पर खड़ी है .’
‘नमक’ कविता में स्त्री की चुप्पी का भी यही अर्थ है कि पितृसत्ता दलन के उन वैश्विक और ऐतिहासिक तरीकों का प्रयोग करती रही है, जो स्त्री को उसकी जैविक, अधीनस्थ स्थिति से बार – बार परिचित कराती है . पितृसत्ताक समाज स्त्री के मुद्दे पर सोचना ही नहीं चाहती . पितृसता की आन्तरिक इच्छा यही है कि समर्पण एक तरफा हो .
इस कविता की दूसरी विशेषता है कुत्ते और बच्चे की प्रतिक्रियाएं, जो कि उनकी
भंगिमाओं से पता चलता है . केदारनाथ जी की कविताओं में भंगिमाओं के माध्यम से एक
बिम्ब खड़ा करने का अद्भुत कौशल दिखाई पड़ता है . केदारनाथ सिंह एक ऐसे कवि हैं, जिन्होंने
अपनी अमूमन कविताओं में स्त्री की पीड़ा को उकेरा है . यानी स्त्री मन को समझने की
उनमें अद्भुत क्षमता है . ध्यान देने की बात है कि इन पंक्तिओं में मौन सबसे
ज्यादा मुखर है – यह चुप्पी की दहाड़ और
अनबोले की ताकत ! जिसका वहन भी वह स्त्री /पत्नी ही करती है, पुरुष अथवा पति नहीं .
केदारनाथ सिंह की कविताओं का एक स्वर और भी है, और वह है रूमानियत का . केदारनाथ जी की कविताएं देखने और पढ़ने में भले ही सरल लग सकता है परन्तु इनके अर्थ का गाम्भीर्य कभी-कभी पाठक को बड़ी उलझन में डाल देती है . कई बार यह नितांत कठिन हो जाता है कि अन्ततः कविता कहना क्या चाहती है . इसका उदाहरण हम उनकी कविता ‘ जो एक स्त्री को जानता है’ में देख सकते हैं . परन्तु यह जानना किस प्रकार का जानना है, एक अबूझ पहेली सी प्रतीत होती है – “हवा को बहने दो और उस स्त्री को भूल जाओ जिसे तुम प्यार करते हो . . . . . . . . . . . . . . ..”
यहाँ स्वतः एक प्रश्न मन में उठने लगता है, क्या स्त्री से प्रेम करना इतना
निकृष्ट कार्य है कि उसे भूलने के एवज में जंगली पत्तों और जंगली पशुओं से तुलना
की जाए? हम जानते हैं कि ‘जंगली’ शब्द का अर्थ क्या होता है ! यानी एक ऐसा प्राणी जिसमें
विवेक का अभाव होता है . क्या स्त्री या प्रेमिका की तुलना जंगली, विवेकहीन प्राणी
या पेड़-पौधों और पत्ते से की गई है? क्या स्त्री को वाकई में इन उपमाओं से नवाजी
जानी चाहिए ! क्या कवि का दृष्टिकोण भी स्त्री विरोधी नहीं है? यदि ऐसा है, तब तो
निश्चित ही संत अगस्ताइन का यह कथन उचित है कि – “औरत वह जीव है, जो न स्थिर है और
न कृत संकल्प .” और सीमोन का भी यह कहना उचित ही है कि – “स्त्री, पुरुष प्रधान
समाज की एक कृति है . वह अपनी सत्ता को बनाए रखने के लिए स्त्री को जन्म से ही
उनके नियमों के ढाँचे में ढालता चलता गया है .”[2]
तमाम ऐसे प्रश्न हैं इस कविता में जो स्त्री की छवि को धूमिल करती है . इसी कविता में कवि स्त्री को एक और नया नाम देते हैं – ‘अजूबा’ .
‘अजूबा’ कौन कहलाता है यह हम, आप सभी जानते हैं . अर्थात् हास्यास्पद दिखनेवाले, दुनिया में जो अनोखा हो, अद्वितीय हो . यदि अद्वितीय और अमूल्य के संदर्भ में बात हो तब तो निश्चित ही कवि का मंतव्य यहाँ एक स्त्री के प्रति अगाध प्रेम, स्नेह, सम्मान और आदरणीय भावनाओं के पक्ष में है . परंतु भाव यहाँ वह नहीं है . यदि ‘अजूबा’ से कवि का तात्पर्य व्यंग्यात्मक है तो यहाँ वही बात चरितार्थ होती है जो रोमन क़ानून में स्त्री को लक्ष्य करके कहा गया है कि – “स्त्री बेवकुफ और असंतुलित होती है .”[3] कवि का मंतव्य यहाँ जो भी रहा हो परंतु यहाँ स्त्री की नकारात्मक छवि ही उभर कर आती है .
दूसरी ओर कवि नदी की बात करते हैं . नदी, जो प्रतीक है निरंतरता की, हर परिस्थिति में बहते जाने की, नदी प्रतीक है जीवंतता की . कवि का स्त्री की बात करते -करते अचानक नदी की बात करना दोनों में समानता की ओर संकेत करता है . जिस प्रकार नदी और घास तमाम मौसमी झंझावातों को झेलते हुए पुनः अपनी यथास्थिति में बनी रहती है, ठीक उसी प्रकार स्त्री अपने जीवन के सभी कष्टों, अन्यायों, अपमान, उपेक्षा और प्रताड़नाओं को सहती हुई फिर से अपने उदार रूप में, स्नेहिल रूप में लौट आने की शक्ति रखती है .
जिस हरे घास पर क्षण भर बिताने की बात अज्ञेय करते हैं, उसी घास को केदारनाथ सिंह जी किसी की आत्मा में उगाकर उसे फिर से हरा करने का प्रयत्न करते हैं . यह विरले ही होंगे कि घास को भी किसी की आत्मा से जोड़ सकते हैं और उसमें पुनः जिजीविषा के लिए ऊर्जा भर सकते हैं . यह एक बड़े रचनाकार की विशेषता है, दरअसल घास का हरापन जीवंतता का प्रतीक है, आशा का प्रतीक है, सृजनशीलता का प्रतीक है, इसलिए कवि घास को बार–बार अपनी कविता में लाते हैं . जीवन-संघर्ष की थपेड़ों से हारा हुआ मनुष्य गिर के पुनः संभल सके, यह प्रेरणा भी हमें घास से मिलती है . यहाँ घास प्रतीक है दबे कुचलों का, शोषितों का, दमितों का . परन्तु घास में अदम्य क्षमता है, फिर से उठ खड़े होने का .
स्त्री मन को केदारनाथ सिंह जी कितना समझते हैं, इसका प्रमाण हमें उनकी कविता ‘तुम आईं’ में देखने को मिलता है –
“तुम आईं जैसे छीमियों में धीरे-धीरे आता है रस – – – – – – – . – – – – – – – – – – – – – – – जैसे दाने अलगाए जाते हैं भूसे से तुमने मुझे खुद से अलगाया .”
(1967),(‘केदारनाथ सिंह , प्रतिनिधि कविताएँ’, पृ.93-94 )
यानी मिलन के साथ ही बिछुड़ने का दंश .
ये एक गंभीर एवं परिपक्व कवि की ही रचना हो सकती है . जिन्होंने बहुत ही कम शब्दों
में और बिना किसी लाग-लपेट के प्रेम का आदि, मध्य और अंत, तीनों ही अवस्थाओं को
दिखा दिया और किसी को पता भी नहीं चला . प्रेम का प्रारंभिक रूप अर्थात प्रथम परिचय
फिर मिलन का बढ़ता उपक्रम और अंत में अलगाव . पाठक को यहाँ बहुत कम समय मिला यह
समझने में कि कवि कब एक दूसरे से अलग भी हो गए दाने से भूसे की तरह . कविता में
प्रयुक्त प्रत्येक शब्द एक बिम्ब खड़ा करता है . मानो वह पूरी प्रक्रिया साक्षात् हमारे समक्ष घटित
हो रही हो .
ध्यातव्य है कि वह स्त्री कोई भी हो सकती है . एक पत्नी, एक
प्रेमिका, एक पुत्री एक मित्र और एक माँ . जिनसे मिलना बहुत कम समय के लिए हुआ .
जीवन में जिनके साथ रह पाने का सुख बहुत क्षणिक रहा . कवि केदार जी ने अपनी माँ और
पत्नी से अपने स्नेहील अनुराग का भी उल्लेख किया है अपनी कुछ कविताओं में . कविता
में प्रयुक्त शब्द ‘पकाना’ का अर्थ बड़े फ़लक पर है . पकाया अर्थात् जीवनानुभवों से
पकाया . जीवन संघर्षों एवं चुनौतियों से लड़ना सिखाया . अच्छे-बुरे का भेद बताया .
हर परिस्थिति में डटे रहना सिखाया .
इस कविता में एक गहरा दुःख है . एक गहरी वेदना है . संवेदना है उस स्त्री के
प्रति, जो बहुत कम समय के लिए कवि के जीवन में आईं और बहुत जल्दी ही बिछड़ भी गईं .
कवि छोटी-छोटी क्रियाओं के माध्यम से एक स्त्री के सभी चारित्रिक गुणों को उजागर
कर देते हैं . उसका आना, हंसना, दिखना, हिलना तथा चलना आदि शब्दों से स्त्री के
स्वरूप का स्वतः अनुभव हो जाता है कि वह जब आती है तो कैसे, जैसे छीमियों में
धीरे-धीरे आता है रस यानी प्रेम का आगमन हुआ . स्त्री का कोमल स्वभाव, उसका हँसना
जैसे तट पर पानी का बजना . कवि की अद्भुत कल्पना ! पानी बजता भी है . प्रायः पानी
के कलकल ध्वनि के विषय में पढ़ते हैं परंतु केदारनाथ जी के यहाँ पानी बजता है .
इसी संदर्भ एक और कविता देखनी चाहिए, जहाँ वे लिखते हैं कि – “उसका हाथ अपने हाथ में लेते हुए मैंने सोचा दुनिया को हाथ की तरह गरम और सुंदर होना चाहिए .” (वही, पृ. 94)
हम जानते हैं कि हाथ कर्मों का प्रतीक है . इन पंक्तियों में कवि ने विश्व
मानव की, विश्वबंधुत्व की बात की है . वैश्विक स्तर पर भाईचारे को स्थापित करने की
बात की है . भूमंडलीकरण के इस दौर में और उपभोक्तावादी संस्कृति के दौर में आज
मनुष्य के आपसी संबंधो में जो दूरी आई है कवि उसे लेकर कहीं-न-कहीं चिंतित दिखाई
देते हैं . हाथ को माध्यम बनाकर वैश्विक परिप्रेक्ष्य में समभाव और सौहार्द की बात
कह जाना एक दूरदर्शी रचनाकार की पहचान है .
केदारनाथ सिंह की कविताओं में स्त्री कई रूपों में दिखाई देती हैं . कभी वह
प्रेयसी के रूप में आती है तो कभी पत्नी के रूप में, कभी पुत्री के रूप में तो कभी
माँ के रूप में . कभी नदी के रूप में तो कभी विश्व के रूप में . कभी प्रकृति के
रूप में आती है तो कभी एक श्रमिक स्त्री के रूप में . इतना ही नहीं केदारनाथ जी के
यहाँ स्त्री एक ‘अजूबे’ के रूप में भी आती है . ‘अजूबा’ कहने और जंगली पत्तों एवं जानवरों
के गर्म रोओं के साथ स्त्री के संसर्ग में रहने वाले व्यक्ति को भूल जाने की सलाह
दे डालते हैं .
ये बात सच है कि स्त्री को अभी भी मनुष्य नहीं समझा गया . स्त्री का दायरा अभी भी एक सीमित घेरे में ही है . यदि स्त्री को मनुष्य समझा जाता तो केदारनाथ सिंह जी भी अपनी कविता में स्त्री को एक ‘अजूबा’ की संज्ञा देने से अवश्य कतराते . उनका स्त्री को जानना अर्थात् जंगली पत्तों और जानवर तथा अजूबे को जानने के बराबर यदि समझा गया तो निश्चित ही इसके पीछे यही कारण है . प्रभा खेतान की आत्मकथा ‘अन्या से अनन्या’ में आइलिन प्रभा खेतान से यही प्रश्न करती है कि स्त्री को अभी भी मनुष्य समझा ही कहाँ गया है . स्त्री की अस्मिता आज भी खतरे में है और तब तक रहेगा, जब तक स्त्री को मनुष्य नहीं समझा जाएगा .
यद्यपि केदारनाथ सिंह जी की कविताओं में वर्णित उन स्त्रियों की विशेषताओं को
भी नकारा नहीं जा सकता जहाँ उन्होंने स्त्री के संघर्षपूर्ण, श्रमिक और कामकाजी
रूप को उजागर किया है .
स्त्री केंद्रित प्रायः प्रत्येक कविता में एक ऐसी स्त्री का चित्रण है जो किसी-न-किसी रूप में संघर्षपूर्ण जीवन जी रही हैं . फिर चाहे वह स्त्री कोई टमाटर बेचनेवाली हो या फिर बारिश में भीगते हुए उपले बचाती कोई स्त्री . दिनभर की थकान के बाद रात को जगकर सुई तागे का काम करती कोई आत्मीय हों अथवा कोई कहानी सुनाने वाली गाँव की दादी–नानी . सुई और तागे के काम में कवि ने वृद्धा की जो तल्लीनता दिखाई है वह प्रशंसनीय है . इस कविता को पढ़ते हुए ऐसा प्रतीत होता है कि केदारनाथ जी गाँधी जी के लघु-कुटीर उद्योग से प्रभावित थे . चरखे और खादी वस्त्र के महत्त्व को समझते थे . हथकरघा पद्धति को अपनाने में कवि का विश्वास था .
ऐसा कौन-सा पक्ष और ऐसा कौन-सा विषय है, जिसपर कवि ने अपनी कलम नहीं चलाई .
ऐसा कौन-सा मुद्दा नहीं है जिसपर वे बात नहीं करते . विषयों की वैविध्यता केदारनाथ
जी की रचनाओं में देखने को मिलता है . चींटी से लेकर हाथी तक और राई से लेकर पहाड़
तक, अमूमन हर विषय पर उनकी लेखनी मिलती है . देश के प्रति उनकी चिंता कविताओं में
साफ़ मुखर होती है . एकांगी होता मनुष्य का जीवन एक दिन सिर्फ़ अपना सिर ढोएगा, बोझा
ढोने के बजाय, इस बात की चिंता कवि को सालती रहती है . और अंततः रह जाएगी मनुष्य
की चिंताओं की गठरियाँ जिन्हें वह वीराने में ढोते फिरेंगे .
परन्तु यहाँ हमें एक और महत्वपूर्ण बात भी याद रखनी होगी कि कवि जीवन को और इस पृथ्वी को लेकर बहुत ही आशावादी हैं . उन्हें यकीन है कि यह पृथ्वी रहेगी उनके रहते हुए और उनके बाद भी . इससे कवि के सकारात्मक सोच का पता चलता है . कवि ने अपनी कविताओं में चुप्पी और शब्दों की ध्वनि पर बहुत ज़ोर दिया है . उनकी प्रायः हर कविता में ‘चुप्पी’ का अर्थ बहुत गंभीर और कई बार खतरनाक सन्नाटा पैदा करती है . इस चुप्पी के भीतर ही हमें स्त्री के लगभग प्रत्येक पक्ष को देखने का अवसर मिलता है . स्त्री कई बार उपेक्षित और कई बार सर्वोपरि स्थान में बिठा दिए जाने के रूप में दृष्टिगत होती है .
केदारनाथ सिंह गाँव से शहर और शहर से गाँव की ओर रुख करते हैं . उनके स्वयं के भीतर एक गाँव बसता है . इस गाँव के भीतर का हर एक रेशा, हर एक तंतु कवि की स्मृति में सजीव है, जीवंत है . इस जीवंतता में मौजूद हैं वे सारी स्मृतियाँ, वे सारे रिश्ते नाते, वे सारे पल-कण जिसे कवि एक-एक कर चुनते हैं और अपनी कविताओं की बगिया में बिछा देते हैं . बिछा देते हैं अपनी माँ के स्मृतियों को, अपनी पत्नी से जुड़ी यादों को, गाँव की उन तमाम उम्रदराज़ औरतों को, जिन्हें कभी उपले बचाते तो कभी टमाटर बेचते हुए देखा गया था . कवि की स्मृतियों में सिर्फ खुरदुरा और झुर्रियों से भरी चेहरे वाली स्त्रियाँ ही शामिल नहीं हैं बल्कि स्त्री का सौम्य, करुणामयी और प्रेयसी वाला रूप भी शामिल है .
अतः यह कहना समीचीन होगा कि
केदारनाथ सिंह की कविताएँ न सिर्फ़ गली-मुहल्लों, कस्बों, गाँवों और नगरों की बात
करते हैं वरन देश-विदेश की बात भी करते हैं . परंतु इनके अतिरिक्त वे स्त्री
अस्मिता यानी स्त्री के अस्तित्व की बात भी पुरज़ोर तरीके से अपनी कविताओं में
उठाते हैं . यहाँ बात करने का अंदाज़ भी कभी सकारात्मकता के संदर्भ में है और कभी
नकारात्मकता के संदर्भ में .
जहाँ तक केदारनाथ जी की भाषा शैली की बात है तो वह लोक से निर्मित भाषा है . जो बोलती कम है और प्रभाव अधिक छोड़ती है . उनकी भाषा कहीं-न-कहीं परंपरा से जुड़ती है . लेकिन परंपरा से बहुत आगे निकलते हुए वे समकालीन जीवन से जुड़ते नज़र आते हैं . भाषा शैली की सबसे बड़ी विशेषता जो है, वह है बिम्बों और प्रतीकों का अद्भुत मिश्रण, उनका प्रयोग और उनका मानवीकरण . इसका कई उदाहरण हमें उनकी कविताओं में मिलती है – “छोटे-से आँगन में माँ ने लगाए हैं तुलसी के बिरवे दो पिता ने उगाया है बरगद छतनार है मैं अपना नन्हा गुलाब कहाँ रोप दूँ . मुट्ठी में प्रश्न लिए दौड़ रहा हूँ वन-वन पर्वत-पर्वत रेती-रेती… बेकार .” (‘केदारनाथ सिंह, ‘प्रतिनिधि कविताएँ’, 1957; पृ.140 )
केदारनाथ सिंह जी की कविताओं को यदि कोई सरल कहते हैं तो यह उनकी भूल होगी . उनकी
कविताएँ सरल दिखते हैं ज़रूर हैं परंतु वह सरल कतई नहीं है . हर छोटी-से-छोटी और
बड़ी-से-बड़ी कविता अपने में कई गहरे अर्थ समेटे हुए हैं, जिसे प्रथम दृष्टया समझना
कठिन है . इन्हें समझने के लिए दिमागी कसरत करनी पड़ती है, मशक्कत करनी पड़ती है .
केदारनाथ जी की कविताओं ने अपने समय और बाद के रचनाकारों को काफी प्रभावित और
प्रेरित किया है और आगे भी करते रहेंगे .
इन कविताओं में सिर्फ़ शब्द का ही सच नहीं है बल्कि समय का भी सच है . इसी कारण केदारनाथ जी की कविताएँ प्रासांगिक हैं . यह प्रासंगिकता आगे भी बनी रहेगी, ठीक उसी तरह जिस तरह कवि को यह विश्वास है कि- “यह पृथ्वी रहेगी”
यह जानते हुए भी कि एक दिन सबको जाना है, यह जानते हुए कि जाना हिन्दी की सबसे
खौफ़नाक क्रिया है .
संदर्भ-सूची
केदारनाथ सिंह, ‘प्रतिनिधि कविताएँ’, राजकमल प्रकाशन प्रा.लि., बी-1, नेताजी सुभाष मार्ग, दरियागंज, नई दिल्ली – 110002, प्रथम संस्करण : 1985, ग्यारहवां संस्करण : 2018
(“In rural South Asia, few women own land and even fewer control it.”[1])
हिन्दू विधवाओं को पति की चिता पर जिंदा
जलाने की बर्बर प्रथा के खिलाफ लार्ड विलियम बेंटिक ने सती रेगुलेशन (1829) पारित
किया। कुछ वर्ष बाद विधवा पुनर्विवाह अधिनियम,1856 का प्रारूप लार्ड डलहौजी
ने तैयार किया था, मगर पारित किया लार्ड कैनिंग ने। विधवाओं
को सती करने पर रोक लगाने और पुनर्विवाह का अधिकार देने पर, चीख-पुकार
मची ‘धर्म (हिंदुत्व) खतरे में’।
राजनेताओं ने घृणा संदेश फैलाने शुरू कर दिये “अंग्रेज हमारे धर्म और
परंपराओं में हस्तक्षेप करके, हमें ईसाई बनाना चाहते हैं। यह
हिन्दू संस्कृति पर हमला है।” बाद में ‘फूलमनी’ केस के सहमति की उम्र पर आयोग बनाने (1891) और बाल विवाह पर प्रतिबंध (1929) लगाने के समय भी, राष्ट्रवादी
नेतृत्व इसी भाषा में उन्माद फैलाता रहा। इन सभी अवसरों पर भारतीय सभ्यता-
संस्कृति के रक्षकों के सीधे निशाने पर थे- समाज सुधारक राजा राम मोहन रॉय,
ईश्वरचंद्र विद्यासागर, हरविलास शारदा व अन्य
और अंग्रेज़ी सरकार। राष्ट्रीय गौरव के रक्षकों और समाज सुधारकों के बीच संघर्ष अब
तक जारी है। दरअसल सत्ता परिवर्तन के साथ-साथ, सांस्कृतिक
सुधार के समीकरण भी बदलना तय है। धार्मिक नफरत और विरोध की हत्या के संस्कार,
अंततः राजनीति की भाषा-परिभाषा और लिंग भेदी मानसिकता में भी
प्रतिबिंबित होते रहे हैं!
ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखें तो इसे कानून और न्याय व्यवस्था की विडम्बना ही कहा जायेगा कि विधवा पुनर्विवाह अधिनियम,1856 पारित होने के करीब सौ साल बाद भी भारतीय समाज में एक विधवा स्त्री को उत्तराधिकार[2] में संपत्ति पाने के लिए, चवालीस साल (1954-1998) लंबी कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ी! और आज भी यह तय नहीं है कि हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम,1956 में संशोधन (2005) के बाद बेटियों को पैतृक संपत्ति में अधिकार कब मिलेगा? जन्म से मिलेगा या सिर्फ उन बेटियों को जिनके पिता का देहांत संशोधन (9.9.2005) के बाद हुआ? फिलहाल यह विवाद सुप्रीम कोर्ट की पूर्णपीठ (तीन जज) के समक्ष विचाराधीन है। देखते हैं कब-क्या फैसला होता है।
कृषि भूमि में विधवा का हिस्सा
गुरुअम्मा[3] के
पति की मृत्यु 1954 में हो गई थी। अदालती फैसले के
अनुसार हुए बंटवारे में उसके हिस्से आई संपत्ति में कुछ ‘कृषि
भूमि’ भी शामिल थी, जो उसके देवर (और
उसके बेटे-बेटी) देना नहीं चाहते थे। हिस्सा ना देने का तर्क-कुतर्क यह कि संपत्ति
में ‘कृषि भूमि’ शामिल नहीं होती।
अंतिम चरण में विवाद जब सर्वोच्च न्यायालय पहुँचा,
तो न्यायमूर्ति सुश्री सुजाता मनोहर और जी.बी.पटनायक ने अपने फैसले[4] में
कहा कि हिन्दू महिला संपत्ति अधिकार अधिनियम,1937 के अंतर्गत
विधवा को उत्तराधिकार में मिलने वाली संपत्ति में ‘कृषि भूमि’ भी शामिल है। ‘संपत्ति’
को अगर स्प्ष्ट रूप से अधिनियम में परिभाषित नहीं किया गया है,
तो संपत्ति की परिभाषा में ‘कृषि भूमि’
भी शामिल मानी जायेगी अगर विधायिका चाहती तो ‘कृषि
भूमि’ को इस कानून से बाहर रख सकती थी। उच्च न्यायालय के
निर्णय को सही मानते हुए ,सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय में
कहा कि संपति की परिभाषा में ‘कृषि
भूमि’ भी शामिल मानी जायेगी।
सर्वोच्च न्यायालय के उपरोक्त निर्णय के बाद भी
विभन्न अदालतों में
हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम,1956 के अंतर्गत ‘संपत्ति’ में ‘कृषि भूमि’
के शामिल होने/ ना होने के बारे में विवाद बना रहा। पहला तर्क यह कि
उपरोक्त निर्णय हिन्दू महिला संपत्ति अधिकार अधिनियम,1937 से
संबंधित है और दूसरा यह कि हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम,1956
इससे बाद बना-बनाया गया कानून है।
‘सम्पत्ति’ में ‘कृषि भूमि’ शामिल है या
नहीं?
सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति यू यू ललित
और एम आर शाह के समक्ष[5] विचारणीय
‘यक्ष प्रश्न’ यह था कि क्या ‘कृषि भूमि’ भी उत्तराधिकार कानून[6] की
धारा 22 के प्रावधानों के दायरे में आती है? इस सवाल पर अभी
तक विभिन्न उच्च न्यायालयों के विरोधाभाषी फैसले आते रहे। उत्तराधिकार के अधिकांश
अदालती मुकदमों में ‘कृषि भूमि’ भी
शामिल रहती ही है। इसलिए सर्वोच्च न्यायालय के सामने यह एक सार्वजनिक महत्व का
गंभीर मुद्दा था।
‘कृषि भूमि’ विवाद की पृष्ठभूमि यह है कि एक था लाजपत जिसकी मृत्यु के बाद, उसकी कृषि भूमि उसके दो पुत्रों नाथू और संतोख को मिली नाथू ने अपना हिस्सा एक बाहरी व्यक्ति को बेच दिया। संतोख ने मामला हमीरपुर अदालत में दायर कर कहा कि (उत्तराधिकार कानून[7] की धारा 22 के अनुसार) उसे इस मामले में प्राथमिकता पर संपत्ति लेने का अधिकार है। ज़िला अदालत ने मद्रास[8] और ओड़िशा[9] उच्च न्यायालय के फैसलों के आधार पर डिक्री संतोख के पक्ष में दी (जिसे बाद में उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय ने भी बरकरार रखा)। यहाँ यह बताना जरूरी है कि इस बीच नाथूराम की मृत्यु होने के बाद, उसकी जगह उसके उत्तराधिकारी बाबूराम ने ले ली थी।
हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति के सामने जब बाबुराम की अपील आई, तो उसके सामने पहले से हुए दो विरोधाभासी फैसले थे। वो भी उसी उच्च न्यायालय के। पहला एकलपीठ का फैसला (2008) यह था कि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम,1956 के प्रावधान कृषि भूमि की बिक्री पर लागू नहीं होते, जबकि इसके विपरीत दूसरी एकलपीठ का निर्णय (2012) था कि उत्तराधिकार कानून के प्रावधान कृषि भूमि की बिक्री पर लागू होते हैं। ऐसे में एकल पीठ के न्यायमूर्ति क्या करते! उन्होंने समुचित फैसले के लिए अपील खंडपीठ (दो जज) को भेज दिया। ऐसी स्थिति में नियमानुसार यही प्रक्रिया निर्धारित भी है।
खंडपीठ (कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश संजय करोल
व न्यायामूर्ति धर्मचंद चौधरी) ने दो विरोधाभासी एकल पीठों के निर्णयों पर बहस
सुनने और विवेचना के बाद फैसला सुनाते हुए कहा कि एकल पीठ[10] के
फैसले को ही सही माना जाना चाहिए। इसका परिणाम यह था कि उत्तराधिकार कानून के
प्रावधान, कृषि भूमि से जुड़े विवादों पर भी लागू होंगे। खंडपीठ के स्पष्टीकरण के बाद, न्यायामूर्ति सी.बी
बारोवलिया ने (सात मई, 2018) अपील खारिज कर दी, जिसके विरुद्ध बाबूराम द्वारा सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका दायर
की गई।
‘संपत्ति’ में ‘कृषि भूमि’ शामिल-सुप्रीमकोर्ट
उत्तराधिकार कानून ‘कृषि भूमि’
पर लागू हैं या नहीं के सवाल पर, विस्तृत
विवेचन के बाद सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्तियों
(ललित और शाह) ने निर्णय[11] में उच्च न्यायालय के फैसले को ही सही ठहराया। भविष्य के लिए यह भी स्पष्ट
किया कि धारा 22 में प्रावधान है कि जब बिना वसीयत के
किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है, तो उसकी संपत्ति
उत्तराधिकारियों पर आ जाती है। उत्तराधिकार कानून की धारा 22 ‘कृषि भूमि’ पर भी लागू होगी। इसलिए संयुक्त हिंदू
परिवार की संपत्ति का बंटवारा होने पर या उससे पहले, यदि उत्तराधिकार
में मिली संपत्ति को कोई एक सदस्य बेचना चाहे, तो अन्य वारिस
प्राथमिकता के आधार पर उस संपत्ति को खरीदने का दावा कर सकते हैं। यानी संपत्ति
किसी तीसरे व्यक्ति को बेचने से पहले, अन्य वारिसों की सहमति
अनिवार्य होगी। उत्तराधिकार कानून की धारा 4 (2) के समाप्त होने का इस पर कोई फर्क
नहीं पड़ेगा, क्योंकि वह प्रावधान ‘कृषि
भूमि’ पर काश्तकारी के अधिकारों’ से ही
संबंधित था। उत्तराधिकार कानून (1956) बनने से पहले,
शास्त्रिक हिन्दू कानूनों में भी, ऐसे ही नियम
और परंपरा मौजूद थी। भारतीय विधायिका द्वारा ऐसा प्रावधान बनाये-बचाये रखने का
मुख्य/असली उद्देश्य भी यही (रहा) है कि परिवार (या संपत्ति) में बाहरी व्यक्ति ना
घुस सके।
सर्वोच्च न्यायालय के उपरोक्त दोनों फैसलों
से यह स्पष्ट हो गया कि पैतृक संपत्ति में ‘कृषि भूमि’ भी शामिल है और इस पर बेटियों और विधवा स्त्री का अधिकार है। उन्हें ‘कृषि भूमि’ में हिस्सा पाने (लेने) से वंचित नहीं
किया जा सकता।
उत्तराधिकार कानून संशोधन (2005) कब से लागू
होगा?
उपरोक्त दोनों निर्णयों के बीच उत्तराधिकार
कानून की भाषा-परिभाषा में एक और नया पेच आ फँसा। हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियंम,1956 में हुए
संशोधन[12] के अनुसार यह प्रावधान पारित किया गया है कि किसी व्यक्ति की मृत्यु बिना
कोई वसीयत किये हो गई है और संपत्ति में पैतृक संपत्ति भी शामिल है, तो मृतक की संपत्ति में बेटे और बेटियों को बराबर हिस्सा मिलेगा। बेटी को
भी पुत्र की तरह ‘कोपार्शनर’ माना-समझा
जाएगा। यानी अब पैतृक संपत्ति में बेटियों को भी,
बेटों के समान अधिकार दे दिया गया है।
हालांकि कानून में ही यह व्यवस्था कर दी गई कि अगर पैतृक संपत्ति का बँटवारा 20
दिसंबर, 2004 से पहले हो चुका है, तो
उस पर यह संशोधन लागू नहीं होगा। पर समस्या यह है कि सुप्रीम कोर्ट के एक निर्णय
के अनुसार अगर पिता की मृत्यु 9.9.2005 से पहले हो चुकी है, तो
बेटी को पैतृक संपत्ति में अधिकार नहीं मिलेगा। जबकि दूसरे फैसले के अनुसार अधिकार
मिलेगा। सो संशोधन के बावजूद, पैतृक संपत्ति में बेटियों के
अधिकार का मामला, अंतर्विरोधी और पेचीदा कानूनी व्याख्याओं
में अभी भी उलझा हुआ है। फिलहाल मामला[13] तीन जजों की पूर्णपीठ (न्यायमूर्ति अर्जन सीकरी, अशोक
भूषण और एम.आर. शाह) को भेजा गया, जो अभी विचाराधीन है। इस बीच मार्च 2019 में न्यायमूर्ति अर्जन सीकरी
रिटायर हो गए।
खैर…जिन बेटियों के पिता जीवित हैं या
देहांत 9.9.2005 के बाद हुआ है, उनके केस में कोई कानूनी अड़चन
दिखाई नहीं देती। मगर जिनके पिता का स्वर्गवास 9.9.2005 से पहले हो गया था,
उन्हें सर्वोच्च न्यायालय की पूर्ण पीठ के फैसले की प्रतीक्षा करनी
होगी।
तीन खण्ड पीठ: तीन फैसले
सुप्रीमकोर्ट के न्यायमूर्ति आदर्श कुमार
गोयल और अनिल आर दवे के निर्णय[14] के
अनुसार जिन बेटियों के पिता का 9.9.2005 से पहले ही स्वर्गवास हो चुका है/था,
उन्हें संशोधित उत्तराधिकार कानून से पैतृक संपत्ति में कोई अधिकार
नहीं मिलेगा! लेकिन सुप्रीम कोर्ट की ही दूसरी खंडपीठ (न्यायमूर्ति अशोक भूषण और
अर्जन सीकरी) ने अपने निर्णय[15] में कहा कि बेटियों को संपत्ति में अधिकार उनके जन्म से मिलेगा, भले ही पिता की मृत्यु
9.9.2005 से पहले हो गई हो पर इस मामले में बंटवारे का केस पहले से (2003) चल रहा
था। सुप्रीमकोर्ट के न्यायमूर्ति आर.के. अग्रवाल और अभय
मनोहर सप्रे ने अपने निर्णय[16] में फूलवती निर्णय को ही सही माना और स्पष्ट किया कि बँटवारा माँगने के
समय, पिता और पुत्री का जीवित होने जरूरी है।
लगभग एक माह बाद ही दिल्ली उच्च न्यायालय की
न्यायमूर्ति सुश्री प्रतिभा एम सिंह ने सुप्रीमकोर्ट के
उपरोक्त निर्णयों के उल्लेख करते हुए, अंतर्विरोधी और विसंगतिपूर्ण
स्थिति का नया आख्यान सामने रखा।[17] फूलवती केस को सही मानते हुए अपील रद्द कर दी मगर सुप्रीमकोर्ट में अपील
दायर करने की विशेष अनुमति/प्रमाण पत्र भी दिया ताकि कानूनी स्थिति तय हो सके। इन निर्णयों से अनावश्यक रूप से कानूनी स्थिति पूर्णरूप से अंतर्विरोधी और
असंगतिपूर्ण हो गई। सुप्रीमकोर्ट की ही तीन खंडपीठों के अलग-अलग फैसले होने की वजह
से, मामला तीन जजों की पूर्णपीठ को
भेजा गया। देखते हैं सुप्रीमकोर्ट कब-क्या फैसला सुनाती है!
सम्पत्ति का बँटवारा पहले और अब
उल्लेखनीय है कि संशोधन से पहले पैतृक
संपत्ति का सांकेतिक बंटवारा, पहले पिता और पुत्रों के बीच होता था। पिता
के हिस्से आई संपत्ति का फिर से बराबर बँटवारा पुत्र-पुत्रियों (भाई-बहनों) के बीच
होता था। इसे सरल ढंग से कहूँ तो मान लो पिता के तीन पुत्र और दो पुत्रियां हैं और
पिता के हिस्से आई पैतृक संपत्ति 100 रुपये की है, तो यह यह
माना जाता था कि अगर बंटवारा होता तो पिता और तीन पुत्रों को 25-25 रुपये मिलते।
फिर पिता के हिस्से में आये 25 रुपयों का बंटवारा तीनों पुत्रों और दोनों
पुत्रियों के बीच पाँच-पाँच रुपये बराबर बाँट दिया जाता था। मतलब तीन बेटों को
25+5=30×3=90 रुपये और बेटियों को 5×2=10
रुपये मिलते। संशोधन के बाद पाँचों भाई-बहनों को 100÷5=20
रुपये मिलेंगे या मिलने चाहिए। हालाँकि भारतीय समाज में अधिकाँश ‘उदार बहनें’ स्वेच्छा से, अपना
हिस्सा अभी भी भाइयों के पक्ष में ही छोड़ देती हैं।
स्वयं अर्जित संपत्ति : वसीयत का असीमित
अधिकार
कहना ना होगा कि कोई भी व्यक्ति
(स्त्री-पुरुष) स्वयं अर्जित संपत्ति, वसीयत द्वारा किसी को भी दे
सकता है। जरूरी नहीं कि परिवार में ही दे, किसी को भी दे
(दान कर) सकता है। कोई भी अपने पिता या पति के जीवन काल में, उनकी स्वयं अर्जित संपत्ति बँटवाने का अधिकारी नहीं है। मुस्लिम
कानूनानुसार अपनी एक तिहाई से अधिक संपत्ति की वसीयत
नहीं की जा सकती। हिन्दू कानून में पैतृक संपत्ति का बँटवारा, संशोधन से पहले सिर्फ
मर्द उत्तराधिकारियों के बीच ही होता था। वैसे वसीयत का असीमित अधिकार रहते,
उत्तराधिकार कानून ‘अर्थहीन’ हैं।[18]
पाठक कृपया ध्यान दें कि वसीयत ना होने की
स्थिति में बेटियों को पिता की स्वयं अर्जित संपत्ति में ही नहीं, बल्कि
पिता की पैतृक संपत्ति (उनका हिस्सा) में से भाइयों के बराबर अधिकार मिलेगा।
निःसंदेह संतान को अपने पिता-माता की संपत्ति में अधिकार है, बशर्ते मां-बाप बिना वसीयत किये मरें हों। बेटे-बेटी को सौतेले माता-पिता
की संपत्ति में भी कोई अधिकार नहीं है। मतलब जो लेना हो, अपने
माँ-बाप से लो! सौतेले मां-बाप से कुछ नहीं मिलेगा। यह दूसरी बात है कि जिनके पास
संपत्ति/पूँजी है, वो बिना वसीयत के कहाँ मरते हैं! वसीयत
में बेटी को कुछ दिया, तो उसे वसीयत के हिसाब से मिलेगा अगर
वसीयत पर विवाद हुआ (होगा) तो सम्भव है बेटियाँ सालों कोर्ट-कचहरी करती रहें लगता
है कि बेटियों को संपत्ति में समान अधिकार मिल पाना इतना आसान नहीं कोर्ट-कचहरी के
लिए, एक उम्र कम समझें!
सौतेली संतान : सौतेले कानून
संक्षेप में निष्कर्ष यह है कि दुनिया भर की ‘पूँजी’
(स्त्री देह और धरती) पर पुरुषों का वर्चस्व है। विवाह कानूनों के
माध्यम से (स्त्री)देह और उत्तराधिकार कानूनों के माध्यम से धरती पर सदियों से
पुरुषों का क़ब्ज़ा बना हुआ है। क्योंकि ‘पूँजी’ पर उत्तराधिकार के लिए ‘वैध’ संतान
और ‘वैध’ संतान के लिए, ‘वैध’ विवाह अनिवार्य है। ‘वैध’
संतान अपने पिता के (माता भी) उत्तराधिकारी माने-समझे जाते हैं और
अवैध सिर्फ अपनी माँ की। सौतेले माता-पिता से संतान को गुजारा भत्ता तक पाने का
अधिकार नहीं, उत्तराधिकार में क्या मिलेगा? जो लेना हो अपने माँ-बाप से लो, सौतेले माँ-बाप से
कुछ भी लेने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है। विधवा पुनर्विवाह या तलाक के बाद दूसरा विवाह करने के कानूनी अधिकार के बावजूद, सौतेली
संतान के बारे में तो आज तक हमने सोचना भी शुरू नहीं किया। कहना कठिन है कि इस
दिशा में ‘सोचना’ कब शुरू करेंगे!
सन्दर्भ
[1]A Field of One’s Own’- Bina Agarwal [2] हिन्दू महिला संपत्ति अधिकार अधिनियम,1937 [3] विजयनाथ बनाम गुरुअम्मा और अन्य (1999) 1 एससीसी 292 [4] 1999 (1) एससीसी 292, दिनांक 18 नवंबर,1998 [5] बाबू राम बनाम संतोख सिंह (सिविल अपील नंबर 2553/2019) [6] हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम,1956 [7] हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम,1956 [8] एआइआर 2000 मद्रास 516 [9] एआइआर 1988 ओड़िशा 285 [10] रोशन लाल बनाम प्रीतम सिंह (अपील नंबर 258/2012) [11] दिनांक 17 जनवरी, 2019 [12] 9.9.2005 से प्रभावी [13] 5 दिसंबर, 2018 को [14] प्रकाश बनाम फूलवती (2016 (2) SCC 36, दिनांक 19 अक्टूबर 2015 [15] दनम्मा उर्फ सुमन सुरपुर बनाम अमर केस (2018 (1) स्केल 657, दिनांक 1फरवरी, 2018 [16] मंगामल बनाम टी बी राजू, दिनांक 19 अप्रैल, 2018 [17] विनीता शर्मा बनाम राकेश शर्मा दिनांक 15 मई, 2018 [18] विस्तार के लिए देखें “उत्तराधिकार बनाम पुत्राधिकार- अरविंद जैन”
कनुप्रिया पेशे से इंजीनियर कनुप्रिया इंजीनियरिंग पढ़ाने और कुछ सालों तक यूनाइटेड नेशन के लिए काम करने के बाद आजकल सोशल सेक्टर से जुड़ी हैं. संपर्क: joinkanu@gmail.com
राजनीतिक अनपढ़ सबसे ख़राब अनपढ़ होता है, क्योकि वह न कुछ सुनता है, न कुछ देखता है, वह राजनीतिक गतिविधियों में कोई हिस्सा नही लेता. उसे नही पता कि उसके जीवनयापन की क़ीमत, आटे दाल का भाव, उसके किराए से लेकर उसकी दवाइयों तक सबकुछ राजनीतिक निर्णयों पर निर्भर करता है. यहाँ तक कि वो अपनी political ignorance पर गर्व करता है, सीना ठोंककर कहता है आई हेट पॉलिटिक्स. उसे नही पता कि उसके राजनीतिक अज्ञान से और भागीदारी न करने से ही समाज मे वेश्यायें हैं, अनाथ और छोड़े गए बच्चे है, लुटेरे हैं और सबसे ख़राब भ्रष्ट अधिकारी और शोषणकारी संस्थाओं के अनुचर हैं: कथन बर्तोल्त ब्रेख़्त.
अब आते हैं एक सर्वे पर जो 2013 में गार्डियन में छपा था, इसमें विश्व के 10 विकसित और विकासशील देशों अमेरिका, कनाडा, इटली, ब्रिटेन, जापान, कोलंबिया, उत्तरी कोरिया, ग्रीस, ऑस्ट्रेलिया और नॉर्वे के दस हज़ार लोगो पर राजनीतिक जागरूकता को लेकर सर्वे किया गया और सर्वे में पाया गया था कि बावजूद इन देशो में राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक भिन्नता के और विकसित देशों में बेहतर जेंडर इक्वलिटी के इनमें एक समानता है कि स्त्रियों में पुरुषों के बनिस्पत राजनीतिक जागरूकता 20 से 30 प्रतिशत तक कम है. यानि दुनिया की आधी आबादी की हिस्सेदारी राजनीतिक प्रक्रिया में कम है या न के बराबर है और इसका कितना बड़ा ख़ामियाजा हम एक समाज के तौर पर उठाते हैं इसकी कल्पना ही की जा सकती है.
यदि हम स्त्रियों में राजनीतिक अज्ञानता के कारणों को समझने की कोशिश करें तो कई बातें सामने आती हैं मसलन एक उम्र तक वो घर-परिवार संभालने और उसके मसलो में उलझी रहती हैं, वो खुलकर सामाजिक-राजनीतिक मामलों में विचार प्रकट करने से डरती हैं, वो ग़लत होने से डरती हैं, उनके पास माकूल मंच या विमर्श के समूह नही होते जहाँ वो अपने विचारों की अभिव्यक्ति कर सकें, और जाहिर है जब जिस अभिव्यक्ति के लिये मंच नही होता तो उसकी विचार की क्षमता भी उसी अनुसार घट जाती है.
इसके अलावा अगर हम अपने ही देश की बात करें तो पितृसत्ता भी एक बहुत बड़ी बाधा है स्त्रियों के जागरूक न होने के पीछे. हमारा समाज आज भी स्त्री को निर्णयकर्ता के रूप में देखने को तैयार नही, घर परिवार छोड़िये वो ख़ुद अपने लिये निर्णय नही ले सकती. भारत मे स्त्री मतदाताओ पर किये सर्वे बताते है कि दक्षिण भारत मे स्त्रियाँ स्वैच्छिक मतदान का प्रयोग ज़्यादा करती हैं उत्तर भारत की तुलना मे जहाँ आज भी स्त्रियाँ अपने मत का निर्णय करने के लिये स्वतंत्र नही. आपको जिन मामलों में निर्णय का अधिकार अथवा स्वतंत्रता न हो तो निर्णय करने की क्षमता पर भी इसका सीधा असर पड़ता ही है.
राजनीति जनता के प्रतिनिधत्व का मंच
है, जहाँ जनता अपने मुद्दों के लिये निर्णयकर्ता चुन कर भेजती है, हमारा समाज
स्त्रियों को आज भी निर्णयकर्ता की भूमिका में देखने के लिए तैयार नही.
इसके अतिरिक्त एक और प्रमुख कारण ये भी है कि जिस क्षेत्र में समाज
के किसी वर्ग का प्रतिनिधित्व न हो तो ये बात उस वर्ग के अन्य लोगो के लिए एक तरह
की मानसिक बाधा का काम करती है मसलन कुछ क्षेत्र जो पुरुष क्षेत्र माने जाते हैं
उनमे स्त्रियाँ अपने आप ही रुचि कम दिखाती हैं उसे बतौर करियर भी नही चुनती और
राजनीति भी पुरुष वर्चस्व का क्षेत्र ही माना जाता है.
इन बाधाओं के दूर होने का एक उपाय ये
है कि स्त्रियों को राजनीति में अधिक से अधिक प्रतिनिधित्व के अवसर मिले.
पंचायत स्तर पर स्त्रियों के आरक्षण ने राजनीतिक प्रतिनिधित्व में स्त्री विकल्प
को देखने के सामाजिक नजरिये को बदलने की एक हद तक कोशिश की है मगर इसके बावजूद भी स्त्रियों के लिये चुनौतियाँ कम नज़र नही आतीं, सरपंच पति आज भी
निर्णयकर्ता की भूमिका में काबिज़ हैं, पितृ सत्ता अपना दावा छोड़ने को तैयार
नही. वहीं देश मे जो स्त्रियाँ राजनीति में मज़बूत स्थिति में नज़र भी आती
हैं उनमे से ज़्यादातर के पास राजनीतिक सिस्टम सपोर्ट मौजूद है, वो राजनीतिक
परिवारों से आई हैं या उनके पिता,
माँ, भाई, पति पहले से ही राजनीति में लंबे समय
से मौजूद रहे हैं, उनके इतर ऐसी बहुत कम स्त्रियाँ हैं जो राजनीति में अपना स्थान बना
पाई हों.
राजनीति में जेंडर इक्वलिटी की समस्या
के समाधान के लिये संविधान में 108
वे संशोधन के साथ संसद और विधानसभाओं
में महिलाओं के 33 % आरक्षण का बिल 2008
में प्रस्तावित किया गया था, जिसे 2010 में राज्यसभा में
पास कर दिया, मगर लोकसभा में ये वोटिंग कभी नही हुई. इस बिल पर वोटिंग की माँग
तबसे लगातार सामाजिक राजनीतिक हलकों में उठती रही है और हाल ही में कॉंग्रेस ने
इसे अपने घोषणापत्र में फिर जगह दी है.
इसके अतिरिक्त एक बड़ी चुनौती जो राजनीति में स्त्रियों के लिये है वह है उनकी sexual trolling. लगभग हर छोटी बड़ी स्त्री राजनीतिज्ञ को ज़रूर कभी न कभी इससे गुज़रना पड़ा है, उनके ऊपर चरित्र हनन के हमले पुरुषों के मुक़ाबले कहीं ज़्यादा होते हैं. न सिर्फ़ नेताओ द्वारा बल्कि मीडिया और सोशल मीडिया पर भी. ध्यान देने वाली बात ये है कि ऐसे हमले सिर्फ़ पुरुष ही नही करते महिलाएँ भी करती हैं, मगर इससे ऐसे हमलों को किसी भी हालत में जायज़ नही ठहराया जा सकता. इस तरह के हमले न सिर्फ़ मनोरंजन के लिये, खीज निकालने, निंदा आलोचना के लिये किये जाते हैं बल्कि ये एक किस्म के haarrasment tool की तरह काम मे लिए जाते हैं जो अधिक से अधिक स्त्रियों को राजनीति में आने के लिये हतोत्साहित करते हैं. राजनीति में जैसे-जैसे जागरूकता, भागीदारी और प्रतिनिधित्व बढ़ेगा उम्मीद है कि सेक्सुअल ट्रोलिंग में भी कमी आयेगी.
फिर भी तकनीक ने न सिर्फ़ स्त्रियो में
राजनीतिक जागरूकता को बढ़ाया है बल्कि उनकी अभिव्यक्ति और विमर्शों को भी मंच प्रदान
किये हैं. फ़ेसबुक पर बावजूद चरित्र हनन के हमलों के राजनीतिक विमर्शों में
स्त्रियों की उपस्थिति बढ़ी है,
वो बिना इस बात से डरे और हिचके कि
तुम स्त्री हो तुम्हे राजनीति का क्या पता, अपने विचार खुलकर अभिव्यक्त कर रही
हैं. बीजेपी के IT cell की सफ़लता को हम हाल ही में हुए गुजरात विधानसभा चुनाव में बीजेपी के पक्ष में
महिला वोटर्स के पुरुषों की तुलना में अधिक संख्या प्रतिशत के रूप में देख सकते
हैं.
स्त्रियों में राजनीतिक जागरूकता और निर्णयकर्ता के तौर पर उनका प्रतिनिधित्व न सिर्फ़ स्त्रियों के मुद्दों के लिये महत्वपूर्ण है बल्कि समाज की आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक नीतियों के निर्धारण के लिये भी बहुत ज़रूरी है. दुनिया के निर्णयों में स्त्रियों की भागीदारी एक बेहतर विश्वसमाज के बनने के लिये बहुत महत्वपूर्ण है, इसमें कोई संदेह नही.
पिछले दिनों भारत के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई पर उनके मातहत काम कर चुकीं एक महिला का आरोप सामने आया कि मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने उनका यौन उत्पीड़न किया, विरोध करने पर नौकरी से निकलवा दिया, फिर इसकी सजा उसे उसके परिवार को प्रताड़ित करके दी गयी। पहली नज़र में ये मामला राजनितिक करार दिया गया बहुत से लोगों ने इसे इसी रूप में देखा भी। जाहिरन ये हैरान करने वाली बात नहीं थी आखिर मौजूदा निज़ाम में देश की सर्वोच्च संस्थाओं की निष्पक्षता और स्वायत्तता लगातार निशाने पर रही है। मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई के मामले में तो इसकी एक मजबूत पृष्टभूमि भी पहले से रही है। गौरतलब है कि 12 जनवरी 2018 को जस्टिस गोगोई सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन चीफ़ जस्टिस दीपक मिश्रा के ख़िलाफ़ प्रेस कॉन्फ्रेंस करने वाले चार न्यायाधीशों में शामिल थे। जस्टिस गोगोई समेत चारों न्यायाधीशों ने सार्वजनिक कहा था कि न्यायपालिका पर सरकार का दखल और बहुत दबाव है। चारों जजों ने उनके द्वारा तत्कालीन सीजेआई दीपक मिश्रा को लिखी चिट्ठी भी सौंपी, जिसमें अन्य बातों के साथ हर छोटे-बड़े मामले की न्यायिक प्रक्रिया में सत्ता के हस्तक्षेप के कारण देश और न्यायपालिका पर दूरगामी असर पड़ने के सन्दर्भ में चिंता जताई गयी थी। यौन शोषण के इस आरोप के सन्दर्भ में इस बात का जिक्र भी जरूरी है कि आने वाले दिनों में मुख्य न्यायधीश कई ऐसे मामलों पर सुनवाई करने वाले थे जिसे लेकर मौजूदा सरकार असहज़ हो सकती थी या है । सबसे महत्वपूर्ण राफेल विमानों की खरीद का मामला ही है जिसपर सुप्रीम कोर्ट से सरकार को क्लीन चिट मिल जाने के बाद अखबारों में छपे दस्तावेज़ों के आधार पर खुद मुख्य न्यायधीश रंजन गोगोई ने ही इसपर संज्ञान लिया।
सुप्रीम कोर्ट के सामने प्रदर्शन करती एनएफआईडव्ल्यू की महासचिव एनी राजा को गिरफ्तार कर ले जाती हुई पुलिस
दरअसल, मामला तब सामने आया जब सुप्रीम कोर्ट में जूनियर कोर्ट असिस्टेंट के पद पर काम करने वाली 35 वर्षीय महिला ने सुप्रीम कोर्ट के 22 जजों को पत्र लिखकर आरोप लगाया कि मुख्य न्यायाधीश जस्टिस रंजन गोगोई ने अक्टूबर 2018 में उसका यौन उत्पीड़न किया था। कथित उत्पीड़न की यह घटना 11 अक्टूबर 2018 की है,महिला का आरोप था कि उस दिन जब वे सीजेआई के घर पर बने उनके दफ्तर में थीं तब चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने उन्हें कमर के दोनों ओर से पकड़कर गले लगाया और जबरन उनके नज़दीक आने की कोशिश की। चीफ जस्टिस के इस “आपत्तिजनक व्यवहार’का विरोध करने के बाद से उनके और उनके परिवार के अन्य सदस्य लगातार प्रताड़ना के शिकार हो रहे हैं। देखा जाय तो यह बात निराधार नहीं है क्योंकि इस घटना के बाद महिला का विभिन्न विभागों में तीन बार तबादला हुआ और दो महीने बाद दिसंबर 2018 में उन्हें बर्खास्त कर दिया गया। जांच रिपोर्ट में जिन तीन वजहों का जिक्र है उनमें से एक उनका एक शनिवार को बिना अनुमति के कैज़ुअल लीव लेना भी है। फिर उनके पति और पति के भाई को भी जो दिल्ली पुलिस की नौकरी में थे झूठे केस में फंसाया गया और नौकरी से निलंबित कर दिया गया।
मामला शुरुआत में नाटकीय इसलिए भी लगा क्योंकि महिला के आरोप के तुरंत बाद सुप्रीम कोर्ट के एक वकील उत्सव बैंस ने सोशल मीडिया पोस्ट पर खुलासा किया कि मुख्य न्यायधीश को फंसाने की बड़ी साजिश हो रही है जिसमें अंडरवर्ल्ड डॉन दाऊद इब्राहिम और जेट एयरवेज के संस्थापक नरेश गोयल शामिल हैं। बाद में हलफ़नामा दाखिल कर उसने कहा कि चीफ जस्टिस को बदनाम करने के लिए उसे भी रिश्वत पेश की गयी थी यह मामला उक्त महिला और कुछ अन्य रजिस्ट्री कर्मचारियों के साथ तपन चक्रवर्ती और मानव शर्मा द्वारा चीफ जस्टिस के खिलाफ एक साजिश है। बैंस ने पीठ को सीलबंद लिफाफे में सबूत उपलब्ध कराए जिसके तहत माफ़ी मांगती महिला के सीसीटीवी फुटेज भी शामिल होने की बात कही गयी। इसके अलावा ये भी गौर करने वाली बात थी कि जिस मानव शर्मा और तपन कुमार चक्रवर्ती का जिक्र हो रहा था वो दोनों सुप्रीम कोर्ट में असिस्टेंट रजिस्ट्रार के पद पर तैनात थे जिनका काम जजों द्वारा डिक्टेट किए गए आदेश को नोट कर उसे कोर्ट की वेबसाइट पर अपलोड करने की थी। जनवरी 2019 की शुरुआत में सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस आरएफ नरीमन की बेंच की अवमानना के मामले में अनिल अंबानी को व्यक्तिगत रूप से पेश होने का आदेश दिया गया था लेकिन इन दोनों ने जो अपलोड किया उसके मुताबिक अनिल अंबानी को कोर्ट में व्यक्तिगत रूप से पेश होने की जरूरत नहीं थी, मामले के प्रकाश में आने पर चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने दोनों को सस्पेंड कर दिया था। साज़िश की बात घटनाओं के क्रम से भी साबित करने की कोशिश की गयी मसलन महिला के साथ यौन दुर्व्यवहार की घटना 11 अक्टूबर 2018 की है और तपन व मानव पर आरोप जनवरी 2019 के केस में लगा, यह मामला अनिल अंबानी से जुड़ता है जिनका सम्बन्ध राफेल विमानों की खरीद मामले से भी है।
खैर, इस पूरे मामले का केवल राजनीतिक पक्ष नहीं है , इसका दूसरा पक्ष ज्यादा महत्वपूर्ण है जो महिलाओं को न्याय, कार्यस्थल पर उनकी सुरक्षा,लैंगिक बराबरी जैसे मुद्दों से जुड़ा है लेकिन जिस तरह से इसे निपटाया गया है वह इंसाफ की बुनियादी अवधारणा को ही सिरे से ख़ारिज करता है मसलन, इंसाफ हो इसके लिए जरूरी है कि दूसरे पक्ष की बात सुनी जाय और कोई भी व्यक्ति अपने खिलाफ लगे आरोपों के लिए खुद जज होकर फैसला नहीं सुना सकता। जबकि इस मामले में इन दोनों ही बातों का उल्लंघन हुआ है, चीफ़ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता में जस्टिस अरुण मिश्रा और जस्टिस संजीव खन्ना की तीन जजों की बेंच ने छुट्टी के दिन मामले पर गौर किया और मामलें की जांच के लिए तीन सदस्यों की एक जांच समित बनाई। जस्टिस एसए बोबडे, जस्टिस इंदु मल्होत्रा और जस्टिस इंदिरा बनर्जी की इन हाउस कमेटी ने अपनी जाँच में महिला कर्मचारी की शिकायत में कोई सत्यता नहीं पाई और इस आधार पर मुख्य न्यायधीश को छः मई को आरोपों से मुक्त करते हुए क्लीन चिट दे दी। पूरी प्रक्रिया में न तो महिला की अपना एक सपोर्ट पर्सन या वकील साथ लाने की मांग मानी गयी और न ही प्रक्रिया की वीडियो रिकॉर्डिंग की गई। विशाखा गाइडलाइंस का पालन नहीं किया गया। यह अकारण नहीं है कि पहले ही 261 महिला वकीलों, स्कालरों के महिला समूह ने एक प्रेस विज्ञप्ति जारी करते हुए इस बात को नोटिस कराया था कि जस्टिस एएस बोबड़े द्वारा गठित समिति में भी कोई बाहरी सदस्य नहीं है जो कि अपने आप में महिलाओं का कार्यस्थल पर लैंगिक उत्पीड़न (निवारण, प्रतिषेध, प्रतितोष) अधिनियम, 2013 का उल्लंघन है। सबसे दुखद मुख्य न्यायाधीश की प्रतिक्रिया रही, उन्होंने न सिर्फ आरोपों से इनकार किया बल्कि महिला के साथ न्याय के सवाल को न्यायपालिका की आजादी के बरक्स खड़ा कर दिया। यही नहीं खुद अपने खिलाफ मुकदमे की सुनवाई शुरू कर दी , न्याय का उदाहरण पेश करने के बजाय महिला की यौन उत्पीड़न की शिकायत को ही गैरकानूनी करार दे दिया। इस मामले में भारत के मुख्य न्यायाधीश और विशेष बेंच का आचरण संस्थानों और सत्ता के उन्हीं लोगों की तरह रहा जो पदों पर रहते हैं और यौन उत्पीड़न के आरोपों का सामना करते हैं। जबकि यौन उत्पीड़न की शिकायत करने वाली महिला को प्रशासनिक उत्पीड़न का भी शिकार होना पड़ा है । उसे नौकरी से बर्खास्त किया जाना उसके परिजनों पर आपराधिक मामले दर्ज होना ये सब प्रशासनिक उत्पीड़न के दायरे में आते हैं।
न्याय की मांग करती महिलायें
खटकने वाली बात ये भी है कि शिकायतकर्ता महिला को इन हाउस कमेटी के सामने अपने वकील को रखने की अनुमति नहीं मिली इसलिए तीसरी बार महिला ने न्याय नहीं मिलने की उम्मीद के साथ पेश होने से ही इंकार कर दिया, कमेटी के सामने पेश नहीं होने की उसने तीन वजह बतायी, पहली सुनवाई के दौरान न तो वकील और न ही सहायक स्टाफ रखने की अनुमति मिलना जबकि उसे ठीक से सुनाई नहीं देता है, कमेटी की सुनवाई की ना वीडियो रिकॉर्डिंग हो रही है, ना ही ऑडियो रिकॉर्डिंग। 26 और 29 अप्रैल को दिए गए उसके बयान की कॉपी भी उसे नहीं सौंपी गई। लेकिन दूसरी ओर मुख्य न्यायाधीश, महिला के तीसरी बार अदालत में पेश इंकार करने के एक दिन बाद जजों की तीन सदस्यीय समिति के सामने पेश हुए। हालाँकि महिला को इस बात की जानकारी नहीं मिली कि समिति के समक्ष मुख्य न्यायाधीश के अपना बयान दर्ज कराते समय आरोपों से अवगत अन्य लोगों को समिति के समक्ष बुलाया गया था या नहीं। सबसे हैरान करने वाली बात तो ये है कि छः मई के फैसले की कॉपी न तो शिकायतकर्ता महिला को उपलब्ध कराई गयी है ना ही उसे सार्वजानिक किया गया है। इसलिए क्लीन चिट दिए जाने के इस फैसले को तुरंत ही 300 से अधिक महिला अधिकार कार्यकर्ताओं और सिविल सोसाइटी के सदस्यों ने खारिज कर दिया और इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट द्वारा सत्ता का दुरुपयोग करार दिया। क्योंकि इसे बगैर किसी नियम, निर्देश और निष्पक्ष जांच के आधार पर लिया गया है, फैसले में विशाखा गाइडलाइंस के उल्लंघन के साथ कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न एक्ट 2013 का भी उल्लंघन किया गया है। जबकि ‘कार्यस्थल पर महिला यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निवेष एवं निवारण) अधिनियम 2013 की धारा 13 के तहत दोनों पक्षों को रिपोर्ट की कॉपी पाने का अधिकार है। पूर्व केंद्रीय सूचना आयुक्त श्रीधर आचार्युलु ने भी आंतरिक समिति की रिपोर्ट को सार्वजनिक किये जाने की मांग की है और सुचना के अधिकार के तहत गोपनीयता के तर्क को कानून के खिलाफ बताया है। साथ ही सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ जजों द्वारा इस मामले में लगे आरोपों का निपटारा करने के तौर-तरीको को लेकर केंद्र सरकार और अटॉर्नी जनरल के के वेणुगोपाल के बीच भी गंभीर मतभेद पैदा हो गए हैं। फिलहाल, मुख्य न्यायाधीश को क्लीन चिट दिए जाने के फैसले के खिलाफ, आरोप लगाने वाली सुप्रीम कोर्ट की पूर्व महिला कर्मचारी जल्द ही अदालत में अपील करेगी, मामला क्या रुख लेता है ये तो आनेवाला समय ही बताएगा लेकिन इतना तो स्पष्ट है कि इस मामले को जिस तरह से निपटाया गया है उससे कार्यस्थल पर यौन शोषण के खिलाफ महिलाओं की इंसाफ की लड़ाई कमजोर हुई है। इस मामले में इंसाफ की लड़ाई तभी आगे बढ़ सकती है जब सबसे पहले सबसे पहले विश्वसनीय व्यक्तियों की एक विशेष जांच समिति गठित हो, शिकायतकर्ता की मांग को लेकर पारदर्शिता बरती जाए उसे अपना पक्ष रखने दिया जाए, उसकी पसंद का वकील और कानूनी मदद उसे हासिल हो, जांच पूरी होने तक मुख्य न्यायाधीश को अपने आधिकारिक कर्तव्य और जिम्मेदारियों से मुक्त किया जाये। हो सके तो भारत के राष्ट्रपति को इस मामलें में संज्ञान लेना चाहिए। आरोप लगाने वाली महिला की शिकायत को यौन उत्पीड़न की रोकथाम के लिए बनाए गए क़ानून, ‘सेक्सुअल हैरेसमेंट ऑफ़ वुमेन ऐट वर्कप्लेस (प्रिवेन्शन, प्रोहिबिशन एंड रिड्रेसल)’ 2013 के तहत सुना जाए और विशाखा गाइडलाइंस का पालन हो, कानून के मुताबिक 90 दिन में जाँच पूरी हो और सभी रिपोर्ट सार्वजनिक हो।
ये इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि अभी पिछले ही साल #metoo अभियान के तहत हमने ऐसे मामलों पर एक हद तक गंभीर नजरिया हासिल किया है। इस अभियान के तहत देश भर की महिलाओं को अपने साथ हुए यौन दुर्व्यवहार और शोषण की दस्तानों को सार्वजनिक मंचों से साझा करने का हौसला मिला था फिर उसे अदालत ले जाकर इंसाफ पाने का रास्ता भी मिला था। उत्पीड़न की ये कहानियां हाल की भी थीं पांच-दस साल के अंतराल की भी और बीस साल से पहले की भी। इसके तहत उन महिलाओं ने भी हिम्मत करके अपना कटु अनुभव साझा किया जो उम्र के चालीसवें -पचासवें दशक में हैं और अपनी आधी से ज्यादा जिंदगी जी चुकी हैं ,समाज और कैरियर में अपना मुकाम हासिल कर चुकी हैं । बावजूद इसके उनका सामने आना और कहना बहुत हिम्मत की बात थी क्योंकि उन्हें ये मालूम था समाज का बड़ा तबका पहले उनकी ओर ही ऊँगली उठाएगा उन्हें लेकर जजमेंटल होगा। इसका सकारात्मक असर भी हुआ कई नामचीन नाम बेपर्दा हुए , बहुतों को इसकी कीमत अब चुकानी पड़ी और कई सत्ता और संस्थानों के प्यारे भी बने रहे। इस अभियान से कार्यस्थलों पर महिलाओं के साथ व्यवहार को लेकर एक किस्म की चेतना और संवेदनशीलता का माहौल बनने की शुरुआत हुई दूसरी ओर सुरक्षात्मक होने की भी। #MeToo केम्पेन के बाद दुनिया भर में कार्यस्थल पर महिलाओं की मौजूदगी को कम किये जाने के खतरे भी सामने आये। जाहिर है किसी महिला द्वारा कार्यस्थल पर यौन शोषण होने का आरोप बहुत गंभीर मसला है भले आरोपी सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा जज क्यों न हों , अतः इस मामले में फेयर न्यायिक प्रक्रिया की अनदेखी देश की तमाम पीड़ित महिलाओं के हौसले को ख़त्म करेगा और इंसाफ के लिए लड़ रही महिलाओं को निराश करेगा।