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अम्बेडकर की प्रासंगिकता के समकालीन बयान

पुष्पा यादव.

पुस्तक समीक्षा

पुस्तक : व्हाट बाबासाहेब अम्बेडकर मीन्स टू मी

प्रकाशक : दी शेयर्ड मीरर पब्लिशिंग हाउस, हैदराबाद

प्रकाशन वर्ष : ई-बुक – 2017; पेपरबैक – फरवरी, 2019

मूल्य : 150/-

राउंडटेबल इंडिया और सावरी, अम्बेडकरवादी  चिंतन से प्रभावित दो वेब-पोर्टल हैं, जिन्होंने समकालीन भारत में जाति को विश्लेषित करने वाले प्रयासों को अभिव्यक्ति की जगह दी है, और जाति-विरोधी विमर्शों की लम्बी चली आ रही दलित-बहुजन परंपरा को बनाए रखने और पनपाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं. डॉ अम्बेडकर के जन्म के 125वीं वर्षगांठ के अवसर पर राउंडटेबल इंडिया और सावरी ने अपने पाठकों से ‘व्हाट बाबासाहेब अम्बेडकर मीन्स टू मी’ विषय पर लेख आमंत्रित किए. भारत के अलग-अलग भौगोलिक क्षेत्रों से अलग-अलग जातियों, आयु, पेशों और लैंगिक पहचान के लोगों ने इस विषय पर अपने लेख भेजे, जो बाबासाहेब अम्बेडकर की व्यापक लोकप्रियता व निरंतर बनी प्रासंगिकता का प्रतीक है. ऐसे 27 लेखों का प्रकाशन द शेयर्ड मीरर पब्लिशिंग हाउस के द्वारा ‘व्हाट बाबा साहेब अम्बेडकर मीन्स टू मी’ शीर्षक नामक पुस्तक के रूप में किया गया है. लगभग 160 पृष्ठों की यह पुस्तक वर्ष 2017 में प्रकाशित हुई. 2017 में इस पुस्तक का इलेक्ट्रोनिक संस्करण प्रकाशित हुआ और इसे ‘दी शेयर्ड मीरर’ व ‘अमेजन’ की वेबसाइट पर मुफ्त डाउनलोड के लिए उपलब्ध कराया गया. इस पुस्तक को डाउनलोड के लिए मुफ्त क्यों उपलब्ध कराया गया है, इस पर पुस्तक के प्रकाशक का कहना है कि इंटरनेट एक ऐसा प्लेटफार्म है जिसके जरिए बहुत बड़ी आबादी तक बिना अधिक मानवीय व भौतिक संसाधनों के पहुँचा जा सकता है. प्रिंट का काम लम्बा, अधिक उद्यम मांगने वाला और विशेषकर उन नव-प्रकाशकों के लिए बहुत मुश्किल भरा है जिनके पास परम्परागत पूंजी और वितरण के चैनल उपलब्ध नहीं है. प्रकाशकों को आशा है कि वे निकट भविष्य में इसे प्रिंट में लायेंगे, पर रोजमर्रा उभरते इन नई आवाजों को अधिक से अधिक दर्शकों के मध्य अभिव्यक्ति देने की आतुरता ने उन्हें इसे इलेक्ट्रोनिक रूप में शीघ्रता से मुफ्त उपलब्ध कराने को प्रेरित किया (दीक्षा,2017). फरवरी, 2019 में यह पुस्तक पेपरबैक संस्करण में भी आ चुकी है.

उत्तर-औपनिवेशिक भारत में जाति की मौजूदगी को नकारने; जाति अतीत का अवशेष है जो पूंजीवाद के विकास के साथ स्वतः लुप्त होने को बाध्य है जैसे तर्क गढ़कर; सामाजिक विश्लेषण की महत्वपूर्ण केटेगरी के रूप में जाति के प्रयोग से परहेज करके; व अन्य अनेक उपायों से जाति को अदृश्य बनाने, सामान्यीकृत करने और उच्च-जाति वर्चस्व के पुनरुत्पादन की राजनीति की जाती रही है. इस राजनीति का एक बेहद महत्वपूर्ण हिस्सा जाति-विरोधी विमर्श और उसके चिंतकों को अकादमिक जगहों से बहिष्कृत करना रहा है. पर नम्बे के दशक में आकर भारतीय अकादमिया में अम्बेडकर के चिंतन को जगह मिलनी शुरू हुई और आज सत्ता व ज्ञान-निर्माण के वर्चस्वशाली केन्द्रों में अम्बेडकर व राष्ट्र के सामाजिक पुनर्निर्माण में उनके चिंतन के महत्व पर विचार करने का ज़ोर बढ़ा है (कुमार,2008). जाति-विरोधी विमर्श को सत्ता-संरचनाओं (ज्ञान-निर्माण की संस्थाओं, स्कूली और विश्वविद्यालयी पाठ्यक्रम, मीडिया, नीति-निर्माण) में जगह नहीं दी जाती रही है, इसे इस उदाहरण से समझा जा सकता है कि कांचा इलैया 1994 से 1997 तक तीन मूर्ति लाइब्रेरी, दिल्ली में किए एक प्रोजेक्ट से जुड़ा अनुभव साझा करते हैं कि लाइब्रेरी में ‘गांधीवना’ और ‘नेहरुवना’ शीर्षक के अंतर्गत गाँधी और नेहरु पर कई रैक में किताबें उपलब्ध थी, पर अम्बेडकर की अपनी रचनाएँ जो तब तक महाराष्ट्र सरकार द्वारा कई भागों में प्रकाशित हो चुकी थीं, लाइब्रेरी में मौजूद नहीं थीं (इलैया,2010). अम्बेडकर या किसी भी अन्य दलित-बहुजन नायक व उनके समाज के संघर्षों को तीन-मूर्ति लाइब्रेरी जैसी ज्ञान-निर्माण की उच्च-वित्तपोषित संस्थाओं सहित स्कूली और विश्वविद्यालयी पाठ्यक्रमों में भी शामिल नहीं किया जाता रहा है. चार राज्यों बिहार, हरियाणा, राजस्थान और दिल्ली के कक्षा 6 से 8 तक पढ़ाई जाने वाली हिंदी की पाठ्यपुस्तकों का वंचित वर्गों की उपस्थिति एवं छवि की दृष्टि से ऋतुबाला(1997) ने अध्ययन किया. चार राज्यों की 16 पाठ्यपुस्तकों के 2268 पृष्ठों में से केवल 3 पर अम्बेडकर के चित्र मौजूद थे, और चित्र के नीचे अम्बेडकर का नाम मौजूद था, पर अम्बेडकर के चिंतन व सामाजिक योगदान पर कोई चर्चा सम्मिलित नहीं थी (बाला,1997).

‘व्हाट बाबासाहेब अम्बेडकर मीन्स टू मी’ पुस्तक में संकलित तमाम लेखों में शिक्षा व्यवस्था में जाति के मुद्दे पर मौजूद चुप्पी लगातार उभर कर सामने आती है और यह समझ विकसित होती है कि ये चुप्पी अनायास नहीं है बल्कि जाति पर आलोचनात्मक चर्चा की संभावनाओं को शिक्षा के दायरों में कुचलना उच्च-जाति वर्चस्व के पुनरुत्पादन की राजनीति का हिस्सा है. सनम रूही रेड्डी पुस्तक में शामिल अपने लेख में लिखती हैं कि ‘बाबासाहेब हमारे पाठ्यक्रमों में एक राजनीतिक विचारक या आधुनिक भारत के शिल्पकार के रूप में कभी नहीं आए, यह न केवल विश्वासघात की तरह महसूस होता है, बल्कि एक सुनियोजित बहिष्करण भी है.’

महितोश मंडल का कहना है कि विश्वविद्यालयों में दुनिया भर के तमाम चिन्तक पढ़ाए जाते हैं पर अम्बेडकर की सतत अनुपस्थिति और बहिष्करण की राजनीति के पीछे अम्बेडकर के प्रति ब्राह्मणवाद की घृणा है, और यह घृणा दुश्चिंता से उपजी है. दरअसल अम्बेडकर ने हिन्दू धर्म और ब्राह्मण सभ्यता के विरुद्ध कोई आधारहीन शोर-गुल नहीं किया है, बल्कि वे कानून के विद्यार्थी थे और बहुत ही तर्कपूर्ण व प्रासंगिक ढ़ंग से उन्होंने ब्राह्मणवाद की आलोचना प्रस्तुत की है. यदि युवा विद्यार्थी अम्बेडकर के आमूल परिवर्तनवादी विचारों को गंभीरता से पढ़ना शुरू करें, तो अकादमिक जगत से लेकर राजनीति, अर्थव्यवस्था, मीडिया, साहित्य, सिनेमा, और इत्यादि तक फैले राष्ट्र-व्यापी ब्राह्मणवादी साम्राज्य को भयंकर चुनौती मिलेगी. इसलिए अम्बेडकर का चिंतन ब्राह्मणवाद को दुश्चिंता में डालता है और यह बहिष्करण की राजनीति कार्य करती है.

अम्बेडकर के बहिष्करण की राजनीति का श्रुति हर्बर्ट को भी अहसास है जो लिखती हैं कि जिस बौद्धिक-सांस्कृतिक जगत में वे बड़ी हुई उसमें मार्क्स मौजूद थे, भागवत गीता, संस्कृत, कर्नाटक संगीत, ढ़ेरों भजन, रामायण और महाभारत, और क्रांतिकारी मानववादी कविताएँ मौजूद थी. बड़े होते हुए उनकी सवर्ण हिन्दू सांस्कृतिक दुनिया और वैचारिक मार्क्सवादी दुनिया दोनों के तत्वों से भेंट हुई, पर इस दुनिया में अम्बेडकर नहीं थे. अम्बेडकर के चिंतन से श्रुति का परिचय जब हुआ तो, जो बात महितोश कह रहे हैं कि अम्बेडकर के आमूल परिवर्तनवादी विचार युवा विद्यार्थी को बहुत प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं, वह श्रुति के साथ घटित हुआ. श्रुति लिखती हैं कि ‘मेरे जीवन में अम्बेडकर की खोज हुई और मेरी दुनिया बदलने लगी. मेरी शिक्षा के दौरान सवर्णों की जिस दुनिया के साथ मैं सहज बन गई थी, बाबासाहेब अम्बेडकर को पहली बार पढ़ने के बाद वह दुनिया मेरे लिए कोई मायने नहीं रखती थी. मुझे अचरज हुआ कि क्यों किसी ने पहले मुझे इस महान व्यक्ति के बारे में नहीं बताया.’

शिक्षण संस्थाएं अपने पाठ्यक्रम और विमर्श की जगहों से अम्बेडकर व जाति विरोधी चिंतन को प्रवेश से रोकती रही हैं, पर इन संस्थाओं में दलित-बहुजन विद्यार्थियों के प्रवेश ने इन संस्थाओं में अम्बेडकर व जाति विरोधी चिंतन को भी प्रवेश दिलाया है. स्वाति काम्बले, श्रुति हर्बर्ट, सुरवी नायक और मधुरा रावत के लेखों में यह उभरा है कि शिक्षण संस्थाओं में दलित-बहुजन विद्यार्थी समूहों व संगठनों की मौजूदगी ने इनकी जाति-विरोधी राजनीतिक चेतना के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. गौरी पटवर्धन का लेख इन अर्थों में रुचिकर है कि यह एक उच्च जाति महिला के जाति-व्यवस्था और अम्बेडकर के बारे में सीखने की प्रक्रिया का बयान है, और यह विस्तार से इसकी व्याख्या करता है जो गौरी कहती हैं कि ‘अम्बेडकर को अम्बेडकर के लोगों के बिना नहीं पढ़ा जा सकता है’.

हालाँकि सत्ता-संरचनाओं ने अम्बेडकर व उनके चिंतन के अदृश्यीकरण में सक्रिय भूमिका निभाई है, पर दलित व उत्पीड़ित आम जनता के लिए अम्बेडकर प्रेरणा और साहस के उत्कट स्रोत रहे हैं, इसलिए इस उत्पीड़ित जनता ने अपनी मौखिक परम्पराओं, लेखों, लोकगीतों, मूर्तियों, तस्वीरों, अम्बेडकर जयंती, महापरिनिर्वाण दिवस जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से अम्बेडकर को अपने रोजमर्रा के जीवन में शामिल रखा है. पुस्तक यह समझ उत्पन्न करती है कि यह दलित-बहुजन आम जनता द्वारा तमाम रूपों में की गई लम्बी और लगातार मेहनत है जिसने जाति-विरोधी चिंतन को जिन्दा बनाए रखा और प्रसारित किया है.

प्रद्न्या जाधव लिखती हैं कि बाबासाहेब के लोगों ने किसी पाठ्यपुस्तक में बाबासाहेब को जगह मिलने की उम्मीद के बिना बड़े सम्मान के साथ उनको अपने दिलों में सहेज के रखा. प्रद्न्या उनके समुदाय में नामकरण, मृत्यु और उत्सवों के अवसर पर गाए जाने वाले भीमगीतों की परम्परा से परिचय कराती हैं और बताती हैं कि किस तरह अम्बेडकर के संघर्षों और उनके चिंतन को सरलतम ढ़ंग से वचिंत समुदायों के मानस में पहुँचाने में भीमगीतों ने महती भूमिका निभाई है.

प्रद्न्या जाधव की तरह स्वाति काम्बले के समुदाय में भी वह समृद्ध मौखिक परम्परा मौजूद है जो बाबासाहेब को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचाती रहती है. स्वाति का कहना है कि ‘मेरे लिए, बड़े होने की प्रक्रिया बाबासाहेब के व्यक्तित्व के विभिन्न पक्षों को जानना और उसके माध्यम से स्वंय को जानना था’.

स्वाति काम्बले, राही गायकवाड़, प्रद्न्या जाधव, प्रद्न्या मंगला और प्रज्ञा चौहान के लेखों ने उन सामुदायिक परम्पराओं के आख्यान उपलब्ध कराए हैं जिसमें अम्बेडकर गुथें हुए हैं, जिन्होंने जाति विभेदकारी समाज के मुंह पर अम्बेडकर की मौजूदगी का हर रोज दावा किया है. अम्बेडकर की मौजूदगी का दावा जाति-विरोधी आन्दोलन के इतिहास में समृद्ध महाराष्ट्र और दक्षिण के राज्यों तक सीमित नहीं है बल्कि यह दूर-दूर तक फ़ैल चुका है. बंसीधर दीप का लेख उड़ीसा के कालाहांडी, जो भारत के आर्थिक रूप से सबसे पिछड़े इलाकों में से एक है, में अम्बेडकरवाद के पहुँच जाने और प्रसार के सफ़र की तस्वीर प्रस्तुत करता है. अम्बेडकर को जिन्दा रखने और उनके विचार के प्रसार के लिए संसाधनहीन अम्बेडकरवादियों व आम-लोगों ने जो लम्बी और लगातार मेहनत की है, उसका नतीजा यह है कि आज दलितों, पिछड़ी जातियों और अल्पसंख्यकों की बड़ी आबादी के जुड़ाव की धुरी अम्बेडकर हैं. इतिहास के इस पड़ाव पर आकर उच्च-जाति ताकतें यह समझ रही हैं कि अब उनके लिए अम्बेडकर को ख़ारिज करना फलदायक नहीं है और इसलिए वे अम्बेडकर की विरासत को हथियाने के आक्रामक एजेंडे पर चल पड़ी हैं. राहुल सोनपिम्पले का वैचारिक-तार्किक रूप से समृद्ध लेख अम्बेडकर में जगती उच्च-जातियों की हालिया रूचि के पीछे के इतिहास और अम्बेडकर को हथियाने की राजनीति की परतें खोलता है. 

दलित-बहुजन समुदायों के लिए अम्बेडकर की मौजूदगी का दावा करना बिलकुल आसान नहीं रहा है, बल्कि इसके लिए दलित समुदायों और व्यक्तियों ने उच्च जातियों की ओर से भयंकर हिंसा, अपमान और बहिष्कार झेला है. इन लेखों ने यह समझाया है कि अम्बेडकर जयंती मनाने की दलितों की कोशिशों को उच्च जातियों की ओर से दलित बस्तियों को जलाने, हिंसक झडपें, अम्बेडकर की मूर्तियों को तोड़ने, दलितों को गाँव से बाहर धकेलने, उनके विरुद्ध झूठे मुकदमें दायर करने, जल आदि सार्वजनिक सुविधाओं तक उनकी पहुँच को बाधित करने से लेकर उनकी हत्या तक जैसी प्रतिक्रियाएँ मिलती रहती हैं. इन तमाम खतरों के बावजूद आखिर क्यों दलित-बहुजन समुदाय अम्बेडकर का उत्सव मनाने में अपने पूरे साहस और उत्साह से लगा रहा है? इस समुदाय और उसके लोगों के लिए अम्बेडकर के होने के आखिर वे क्या मायने हैं कि अपने बहुत सीमित संसाधनों व ऊर्जा को पीढ़ी दर पीढ़ी वे अम्बेडकर की विरासत को बनाए रखने में निवेश किए जा रहे हैं?

एक ऐसा समाज जो अंतर्निहित रूप से असमान है, और जाति के निचले पायदानों पर रखे गए लोगों के लिए अनेक रूपों में अपमान, वंचना, बहिष्करण और उत्पीड़न की व्यवस्था करता है, उस समाज में बाबासाहेब अम्बेडकर की मौजूदगी इस समुदाय के लिए राहत है, हौसला है, आशा है, प्रेरणा है, मानवीय गरिमा और आत्मसम्मान का दावा है.

प्रज्ञा चौहान लिखती हैं, कि बाबासाहेब उनके अस्तित्व का प्रतीक हैं क्योंकि अम्बेडकर के दर्शन और राजनीतिक कृत्यों ने प्रज्ञा को यह समझने में मदद दी है कि एक गरिमापूर्ण जीवन कैसा होता है, और यह सुनिश्चित किया है कि एक नागरिक के संवैधानिक अधिकारों के साथ वे ऐसा जीवन जी सकती हैं. विनय शिंदे का कहना है कि बाबासाहेब ने उन्हें मजबूत और उद्देश्यपूर्ण बनाया है. लक्ष्मी पार्वती के लिए बाबासाहेब प्रेरणा के उत्कट स्रोत है जिन्होंने उनका अनुसरण करने वाले लोगों के लिए जीवन-लक्ष्य को बहुत ऊँचा स्थापित किया है.

अम्बेडकर ने इस पुस्तक के लेखकों को उनके सामाजिक सन्दर्भ की समझ विकसित करने में और विभिन्न स्तरों के उत्पीड़न को चुनौती देने में सहायता की है और सशक्त बनाया है.

अम्बेडकर के प्रति दलित-बहुजन समुदाय के गहरे लगाव को समझना उच्च जातियाँ के लिए मुश्किल रहा है और वे इसे व्यक्ति-पूजा, अंधभक्ति कहकर उपहास करती रहती हैं|  अरविन्द बौद्ध ने ‘हम पूजा नहीं करते, हम शुक्रिया अदा करते हैं, हम बाबासाहेब को सलाम करते हैं’ शीर्षक से एक महत्वपूर्ण लेख लिखा है. अरविन्द के शब्दों में, ‘हममें से कईयों ने उन्हें नहीं पढ़ा है क्योंकि हममें से अधिकांश लोग अशिक्षित हैं. लेकिन क्या यह उनके आदर्शों को जानने से हमें रोकता है? जवाब है बिलकुल नहीं. हम अशिक्षित हो सकते हैं लेकिन हम जानते हैं कि वह किसके लिए खड़े हुए हैं. हम जानते हैं जो वह हमें बताना चाहते हैं. हम जानते हैं कि उन पर क्या गुजरी. हम जानते हैं कि वह हमें क्या पाता देखना चाहते थे. हम जानते हैं कि हमारे लिए उनका क्या सन्देश है. हम जानते हैं कि उनकी हमारे लिए क्या प्रासंगिकता है.’ अम्बेडकर के चिंतन को ‘जाति-चिंतन’ या ‘दलितों के लिए चिंतन’ के रूप में घटा के प्रचारित करने की साजिश होती रही है लेकिन अम्बेडकर का बौद्धिक जगत बहुत व्यापक रहा है. अरविन्द बौद्ध के शब्दों में, ‘बाबासाहेब ने कई विषयों पर लिखा: अर्थव्यवस्था, इतिहास, नृविज्ञान और राजनीति उनमें से कुछ हैं. उन्होंने लिखा कि कैसे ये विषय हमारी रोजमर्रा की ज़िन्दगी को प्रभावित करते हैं. उन्होंने लगातार लिखा कि एक समतामूलक समाज स्थापित करने के लिए क्या आवश्यक है? हमारे बाबासाहेब यह हैं. वह प्रेम की बात करते हैं, वह प्रेम का सपना देखते हैं, और वह प्रेम सिखाते हैं. यही कारण है कि हम उनसे प्रेम करते हैं.’

शिव शंकर दास का लेख पुस्तक में शामिल एक विचारोत्तेजक लेख हैं, जो मौजूदा जाति-विरोधी आन्दोलन के लिए आत्म-चिंतन का अवसर उपलब्ध कराता है. डॉ अम्बेडकर के राजनीतिक स्कूल के विकास के प्रयास को कामयाब नहीं बनाया जा सका, शिव शंकर दास इसके प्रति निराशा प्रकट करते हैं, और ऐसी संस्थाओं की मौजूदगी की जरुरत को समझाते हैं.

यह एक बेहद महत्वपूर्ण किताब है, जिसे दलित-बहुजनों के इतिहास को समझने, समकालीन अनुभवों व प्रतिरोधों को महसूस करने और भविष्य की उम्मीदों को सुनने के लिए पढ़ा जाना जरुरी है.

सन्दर्भ-सूची

Deeksha, J.  (2017, June 7). BR Ambedkar Diwas: Read this book about how Ambedkar continues to help GenX decipher caste. Retrieved from https://www.edexlive.com/news/2017/jun/07/heres-why-people-are-downloading-this-book-on-dalit-students-accounts-of-their-lives-582.html

Ilaiah, K. (2010). The weapon of the other: Dalitbahujan writings and the remaking of Indian nationalist thought. New Delhi: Pearson Longman.

Kumar, P. K. (2008). Indian Historiography and Ambedkar: Reading History from Dalit Perspective. Indian Journal for South Asian Studies. Vol.1.No.1. January -June 2008, Pondichery University, Pondicherry, Pp. 123-143.

बाला, ऋतु.(2003). स्कूली ज्ञान का सामाजिक पक्ष. शिक्षा विमर्श, वर्ष 5, अंक- 2, जून-जुलाई. दिगंतर: जयपुर.

पुष्पा यादव महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय में अनुवाद अध्ययन विभाग में एम.फिल. शोधार्थी के रूप में अध्यनरत हैं.

कानूनी भेदभाव: बेड़ियाँ तोड़ती स्त्री (सी.बी.मुथम्मा)

अरविंद जैन

(“स्त्री को अपने संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए, कानूनी हथियार उठाने ही होंगे।”)

सुश्री सी.बी. मुथम्मा (1924-2009) पहली महिला थी, जो भारतीय विदेश सेवा के लिए चुनी गई थी। पहली महिला राजनयिक (राजदूत) थी। नौ साल की थी, जब उनके पिता का देहांत हुआ। वो लैंगिक अधिकारों की रक्षा के लिए, जीवन भर लड़ती रही। उनकी एक बहुचर्चित पुस्तक है “स्ले बाई सिस्टम”।

मुथम्मा अक्सर बेहद आहत और अपमानित महसूस करती। आज़ादी के 32 साल और संविधान लागू होने के 29 साल बाद भी भारतीय विदेश सेवा तक में, विवाहित महिला पद के लिए अयोग्य मानी जाती है और महिला सदस्य को विवाह करने से पूर्व, सरकार से लिखित अनुमति लेना अनिवार्य है। क्यों? क्योंकि वह स्त्री है, आधी दुनिया की गुलाम नागरिक!

मुथम्मा ने जब इसके बारे में सोचना शुरू किया तो पता चला राधा चरण पटनायक बनाम ओडिशा राज्य*१ मामले में सत्र न्यायधीशों की नियुक्ति के लिए निकले-निकाले विज्ञापन में, विवाहित स्त्रियों की नियक्ति पर प्रतिबंध था। नियुक्ति के बाद विवाह पर अगर सरकार को लगे कि इससे कार्य क्षमता प्रभावित हो रही है, तो महिला को इस्तीफा देने के लिए कह सकती है। मतलब नौकरी से हटा सकती है। इस प्रावधान को महिला वकीलों द्वारा अदालत में चुनौती दी गई थी। ओडिशा उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति एस. बर्मन और बी.के.पात्रा ने उपरोक्त नियमों को भेदभाव पूर्ण मानते हुए, असंवैधानिक करार दिया था। यह निर्णय पढ़ने के बाद मुथम्मा को अँधेरी कोठरी में उम्मीद की किरण दिखाई देने लगी।

भारत की पहली महिला आईएफएस, जिसने जेंडर आधारित भेदभाव वाले क़ानून के खिलाफ लम्बी लड़ाई लड़ी

गहन चिंतन के बाद एक दिन उसने फैसला किया कि जो हुआ सो हुआ, वह अब चुप नहीं रहेगी। उसने ठान लिया कि कानून के समक्ष समानता के मौलिक अधिकार और धर्म, जाति, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव से रोक के बावजूद, स्त्री विरोधी शर्मनाक यौन पूर्वाग्रह (दुराग्रह) और वैधानिक भेदभाव को जड़ से नष्ट करवाने के लिए, अदालत का दरवाजा खटखटाना ही पड़ेगा। पहल करते हुए  मुथम्मा ने संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत सीधे सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर की।

उल्लेखनीय है कि अदालत में बहस के दौरान महाधिवक्ता सोली सोराबजी ने सरकार की तरफ से दलील दी थी कि महिलाओं द्वारा विवाह करने की स्थिति में, गोपनीय और महत्वपूर्ण सरकारी सूचनाओं और दस्तावेजों के लीक होने का खतरा या संभावना बढ़ सकती है। इस पर न्यायमूर्ति अय्यर ने पूछा था “क्या पुरुषों द्वारा शादी करने से यह खतरा या संभावना शून्य है?”

सी.बी. मुथम्मा बनाम भारत सरकार*२ मामले में सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति कृष्णा अय्यर ने खण्ड पीठ की तरफ से निर्णय में लिखा (लिखवाया) है कि “सुश्री मुथम्मा जो भारतीय विदेश सेवा की वरिष्ठ सदस्य हैं की यह याचिका एक ऐसी कथा कह रही है, जिसे सुन कर कोई भी आश्चर्य से कहेगा कि (भारतीय संविधान के) अनुच्छेद 14 और 16 मिथ है या यथार्थ! सरकार के किसी भी कार्य या निष्क्रियता से संवैधानिक अधिकारों की विश्वसनीयता पर कोई आँच नहीं आ सकती (आनी चाहिए) लेकिन आज़ादी की एक तिहाई सदी (32 साल) बाद भी सुश्री मुथम्मा की शिकायत का प्रभाव यह है कि भारतीय स्त्रीत्व के विरुद्ध यौन पूर्वाग्रह, सरकारी सेवा के नियमों में व्याप्त हैं। नियमों में दुराग्रह के आरोप निराधार नहीं (कुछ तो आधार है!) और यह सेवा नियमों की विरासत में भेदभाव को समाप्त करने के बारे में कार्यपालिका की अनिष्टकारी उदासीनता को दर्शाता है। यदि उच्च अधिकारी भी नियमों के तहत समान न्याय की उम्मीद खो दें, तो आम आदमी के बारे में जो पहले से ही महंगी न्यायिक मंडी से बाहर हैं, सिर्फ अनुमान ही लगाया जा सकता है। यह विचलित करने वाला विचार हमें उन दो नियमों के बारे में कुछ अवलोकन करने के लिए प्रेरित करता है, जो प्रथम दृष्टया सार्वजनिक सेवा में  महिला प्रजाति के साथ भेदभाव करते हैं और आश्चर्यजनक रूप से इतने लंबे समय तक लागू रहे हैं, संभवतः, क्योंकि सरकारी सेवक प्रशासन द्वारा बनाए असंवैधानिक नियमों को चुनौती देने से डरते हैं।

सुश्री मुथम्मा (याचिकाकर्ता) की शिकायत है कि उन्हें गैरकानूनी और असंवैधानिक रूप से भारतीय विदेश सेवा के ग्रेड I में पदोन्नति से वंचित किया गया है। उसे अपने ही शब्दों को उद्धृत करने के लिए; “… पदोन्नति में याचिकाकर्ता की उपेक्षा के कारणों में से एक महिलाओं के खिलाफ शत्रुतापूर्ण भेदभाव की लंबे समय से चली आ रही प्रथा है। यहां तक की आरम्भ में ही जब याचिकाकर्ता ने संघ लोक सेवा के लिए चुनी गई तो साक्षात्कार के समय संघ लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष ने याचिकाकर्ता को विदेश सेवा में शामिल ना होने के लिए प्रेरित (रोकने/मनाने) करने की कोशिश की। बाद में एक अवसर पर उन्होंने व्यक्तिगत रूप से याचिकाकर्ता को बताया कि उन्होंने अध्यक्ष के रूप में अपने प्रभाव का उपयोग, साक्षात्कार में उसे न्यूनतम अंक देने के लिए किया था। विदेश सेवा में प्रवेश के समय, याचिकाकर्ता को यह वचन भी देना था कि यदि वह विवाह करती है, तो विदेश सेवा से इस्तीफा दे देगी। कई अवसरों पर याचिकाकर्ता को एक स्त्री होने के परिणामों का सामना करना पड़ा और इस तरह (कानूनी!) भेदभाव का शिकार होना पड़ा, हालांकि संविधान विशेष रूप से अनुच्छेद 15 के तहत धर्म, जाति, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव को प्रतिबंधित करता है और संविधान का अनुच्छेद 14, कानून के समक्ष समता का अधिकार प्रदान करता है। केंद्रीय मंत्रिमंडल की नियुक्ति समिति के सदस्य और प्रतिवादी नंबर 2 मूल रूप से महिलाओं के विरुद्ध एक समूह के रूप में पूर्वाग्रह से ग्रसित हैं। प्रेस के अनुसार भारत के प्रधान मंत्री ने कहा है-“यह कहना अप्रासंगिक नहीं होगा कि अधिकांश महिलाएँ जो वरिष्ठ स्तर पर सेवा में हैं, उन्हें बहुत ही व्यवस्थित रूप से उन पदों के लिए चुना जा रहा है, जिन्हें परंपरागत रूप से मंत्रालय द्वारा कम प्राथमिकता दी गई थी। “

यदि इन दावों का एक अंश भी सच था, तो प्रशासनिक मानस और मर्दाना अहंकार में व्यापक असंवैधानिकता रची-बसी है, जो कि (संविधान के) भाग III के लिए अभिशाप है जो संबंधित मंत्रालय में निर्दोषों का शिकार करता है। अगर कहीं इस तरह का लैंगिक अन्याय सक्रिय है, तो  शिखर द्वारा गंभीरता से ध्यान देने योग्य है, ताकि इस तरह की (कु)प्रवृत्ति को समाप्त किया जा सके। विदेशी सेवा में स्त्री द्वेषी के रूप में और अधिक स्पष्ट दो हठी नियम हैं, जो याचिका में बताए गए हैं। भारतीय विदेश सेवा (आचरण और अनुशासन) नियम,1961 के शर्मनाक नियम 8 (2), पढ़ें जा सकते हैं:

नियम 8 (2): उन मामलों में जहां उप-नियम (1) लागू नहीं होता है, विदेश सेवा की महिला सदस्य शादी से पूर्व सरकार से लिखित में अनुमति लेगी। विवाह के बाद किसी भी समय, महिला सदस्य को सेवा से इस्तीफा देने की आवश्यकता पड़ सकती है, अगर सरकार संतुष्ट हो कि परिवार और घरेलू प्रतिबद्धताएं उसके कर्तव्यों के उचित और कुशल निर्वहन के रास्ते में आने की संभावना है।”

महिलाओं के विरुद्ध भेदभावपूर्ण  इस नियम में पारदर्शी पीड़ा मौजूद है। यदि कोई महिला सदस्य विवाह करने से पहले सरकार की अनुमति प्राप्त करेगी, तो सरकार को वही जोखिम तब भी होगा (होना चाहिए!) यदि पुरुष सदस्य विवाह करता है। यदि सेवा की महिला सदस्य के परिवार और घरेलू प्रतिबद्धतायें उसके कर्तव्यों के कुशल निर्वहन के रास्ते में आने की संभावना है, तो पुरुष सदस्य के मामले में भी तो ऐसी ही स्थिति उत्पन्न हो सकती है। एकल परिवारों, अंतर-महाद्वीपीय विवाह और अपरंपरागत व्यवहार के इन दिनों (समय) में, कोई भी व्यक्ति सभ्य स्त्री प्रजाति के खिलाफ इस नग्न पूर्वाग्रह को समझने में विफल है (होगा)। भारतीय विदेश सेवा (भर्ती संवर्ग, वरिष्ठता और पदोन्नति) नियम,1961 के नियम 18 (4) में भी वैसा ही  पूर्वाग्रह और तनाव कुंडली मारे बैठा हैं:

“(4) किसी भी विवाहित महिला को सेवा में नियुक्त होने का अधिकार नहीं होगा।”

प्रथम दृष्टि में ही यह नियम लज्जाजनक और अनुच्छेद 16 की अवहेलना है। यदि विवाहित पुरुष को अधिकार है, तो विवाहित महिला (अन्य चीजें समान होने पर), को क्यों नहीं!  वह किसी बदतर धरातल पर नहीं खड़ी।यह स्त्री विद्वेषी मुद्रा मर्दाना संस्कृति की खुमारी है, जो अबला स्त्री को बेड़ियों में जकड़ना है और यह भूलते हुए कि राष्ट्रीय स्वतंत्रता के लिए हमारा संघर्ष, महिला दासता के खिलाफ लड़ाई थी। स्वतंत्रता अविभाज्य है, इसलिए न्याय भी। अनुच्छेद 14 और 16  में हमारे मूल विश्वास को ‘आधी दुनिया’ और मानवता के संदर्भ में पूरी तरह  नजरअंदाज किया जाना, संविधान और व्यवहारिक कानून के बीच की दूरी का उदास प्रतिबिंब हैं। और अगर संसद के ‘सरोगेट’ के रूप में कार्यपालिका, (संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकार से सम्बंधित) भाग III के दांतों में ऐसे नियम बनाता है, खासकर जब उच्च राजनीतिक कार्यालय, यहां तक कि राजनयिक पद जो महिलाओं द्वारा भरा गया है, तो लिंग समानता के प्रति सख्त ‘एलर्जी’ का विरोध अपरिहार्य है।

हमारा अभिप्राय यह सामान्यीकरण करना नहीं है कि सभी व्यवसायों और सभी स्थितियों में पुरुष और महिलाएं समान हैं और यह दावा भी नहीं कि विशेष रोजगार की आवश्यकताएं, यौन संवेदनशीलता या सामाजिक क्षेत्रों की विशिष्टताओं या दोनों में से किसी भी बाधा को दूर करने के लिए, यौन आधार पर  चयन की विवशता या आवश्यकता ही नहीं है। लेकिन जहां भेदभाव प्रदर्शनीय है, वहाँ समानता का नियम ही चलना चाहिए। हमारे संविधान के इस पंथ ने आखिर हमारे सरकारी उल्लेख पर बताया, शायद आंशिक रूप से इस लंबित याचिका के दबाव में ही सही प्रतिवादी हलफनामे में यह कहा गया है कि नियम 18 (4) (पूर्व में संदर्भित) 12 नवंबर, 1973 को हटा दिया गया है। और इसी तरह, केंद्र सरकार का हलफनामा कहता है कि नियम 8 (2) भी विलुप्त होने के रास्ते में है, जिसे नियमावली से हटाने के बाद राजपत्रित किया जा रहा है। देर आए दुरुस्त आए। खैर! हमें इन नियमों की छानबीन करने या असंवैधानिक घोषित करने की आवश्यकता से राहत मिली।

युवा और वृद्ध मुथम्मा जिनके निजी संघर्षों ने स्त्री के बराबरी और हक की लड़ाई को मुकाम तक पहुँचाया

इस कानूनी कार्यवाही के बाद याचिकाकर्ता को पदोन्नत कर दिया गया है। कह सकते हैं कि इसके बाद, यह तो होना ही था।जहां न्याय हो चुका हो, तो आगे की जांच व्यर्थ है। केंद्र सरकार बताती है कि हालांकि याचिकाकर्ता को कुछ महीने पहले पदोन्नति के लिए पर्याप्त योग्य नहीं पाई गई थी, लेकिन वह अब उपयुक्त पाई गई है, उसे पदोन्नत किया गया है और ‘हेग’ में भारत के राजदूत के रूप में नियुक्त किया गया है। अब उसकी एक शिकायत शेष बची है। उसके पहले मूल्यांकन और दूसरे मूल्यांकन के बीच कुछ महीनों के अंतराल के दौरान, कुछ कनिष्ठ अधिकारी उससे वरिष्ठ हो गए हैं भारतीय आधिकारिक जीवन की चूहा दौड़ में, वरिष्ठता एक धार्मिक सम्मान प्राप्त करती दिखाई देती है। चूंकि याचिकाकर्ता के आगे का कैरियर बुरी तरह से  प्रभावित हो सकता है, क्योंकि यह तथ्य है कि उसका सेवा ग्रेड I में पहले जन्म हुआ था, इसलिए उसकी वरिष्ठता को बदलने वाली शिकायत को नज़र अंदाज़ नहीं किया जा सकता है। उनका मामला, वरिष्ठता पर विशेष ध्यान केंद्रित करते हुए, उन कनिष्ठों के संदर्भ में समीक्षा के योग्य है, जिन्हें कुछ महीनों के अंतराल में पदोन्नत किया गया है। अन्याय की भावना नासूर है, जिसे पूर्णतया नष्ट किया जाना चाहिए ताकि रणनीतिक स्थिति में हर नौकर देश के लिए अपना सर्वश्रेष्ठ दें। हमें भारत के संघ की तरफ से महाअधिवक्ता (सॉलिसिटर जनरल  सोली सोराबजी) की उपस्थिति का विशेष लाभ मिला है। चारित्रिक निष्पक्षता के साथ उन्होंने अपने मुवक्किल को इस बात के लिए राजी कर लिया है कि हम जिसे सिर्फ इशारे के रूप में मानते हैं, वह यह है कि प्रतिवादी सरकार (यूनियन ऑफ इंडिया) जल्द ही याचिकाकर्ता की वरिष्ठता की समीक्षा करेगा, उसकी योग्यता का पता लगाया जा चुका है और ग्रेड II में उसकी वरिष्ठता की पहचान की जा चुकी है। हम उसी के अनुसार निर्देशित करते हैं।

उपरोक्त कथन के अधीन रहते हुए, हमें याचिका में लगाए गए बदनीयती के आरोपों की जांच करना जरूरी नहीं लगता। याचिका या लैंगिक धर्माथ से किसी प्रेरणा का इंतजार किए बिना, हम सिर्फ इतना ही कहना चाहते हैं कि सरकार को यौन भेदभाव को समाप्त करने के लिए, सभी सेवा नियमों को खत्म करने की आवश्यकता है। हम याचिका निरस्त कर रहे हैं लेकिन समस्या नहीं।” *3.

न्यायमूर्ति कृष्णा अय्यर की संवेदनात्मक न्यायिक भाषा और प्रगतिशील दृष्टिकोण को ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में जानना-समझना जरूरी है। हालांकि याचिका अंततः निरस्त कर दी गई। खैर…इस कड़ी में आगे महिलाओं के उन तमाम न्यायिक संघर्षों पर संवाद होना चाहिए, जिन्होंने आधी दुनिया को रोशन करने की पहल और अभूतपूर्व भूमिका का सफलता पूर्वक निर्वाह किया है।

कहने की आवश्यकता नहीं कि सुश्री मुथम्मा ने यह कदम अपने व्यक्तिगत हितों का बचाव करने के लिए ही किया था। लेकिन निश्चित रूप से संघर्ष की इस राह ने बहुत सी स्त्रियों को प्रेरित किया। जब और कोई रास्ता नहीं बचा तो स्त्री विरोधी नियमों, कानूनों, कुप्रथाओं, विसंगतियों की संवैधानिक वैधता को ही चुनौती देनी पड़ी। एक बार नहीं, अनेक बार। ऐसे अनेक ऐतिहासिक मुकदमों की लंबी सूची है।

एयर इंडिया में भी एयर होस्टेस के संदर्भ में ऐसे ही भेदभाव पूर्ण नियम थे, जिन्हें बाद में  एयर इंडिया बनाम नरगेश  मिर्ज़ा *4. मामले में चुनौती दी गई थी।

विचित्र विडंबना है कि आज भी घोषित-अघोषित रूप से भारतीय समाज और गैर-सरकारी क्षेत्र में अविवाहित लड़कियों को ही प्राथमिकता दी जाती है और विवाहित स्त्रियों को नौकरी के लिए ‘अयोग्य’ समझा जाता है। ‘प्रसवाकाश’ माँगते ही नौकरी से हटा दिया जाता है। साधन-संपन्न वर्ग में शादी के बाद नौकरी छोड़ने का पारिवारिक दबाव-तनाव बढ़ने लगता है। यौन हिंसा और कार्यस्थल पर यौनिक उत्पीड़न के आतंक से भयभीत स्त्रियों के एक बड़े समूह को,घर-परिवार और बच्चे पालना ही अधिक सुरक्षित जान पड़ता है। क्या यह स्त्रियों की ‘व्यवस्था द्वारा हत्या’ नहीं!

*1. एआईआर 1969 ओडिशा 237

*2.   याचिका नंबर: 743/1979, निर्णय दिनांक 17 सिंतबर,1979

*3.  एआईआर 1979 सुप्रीम कोर्ट 1868

*4. एआईआर 1981 सुप्रीम कोर्ट 1829                                                                                  


वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद जैन स्त्रीवादी क़ानून-विश्लेषण के लिए जाने जाते हैं. संपर्क:bakeelsab@gmail.com                  

हिंदू कोड बिल और डॉ. अंबेडकर


डॉ. अंबेडकर राजनीति के आकाशगंगा के ऐसे देदीप्यमान नक्षत्र हैं जिनकी छवि कालांतर में भी धूमिल नहीं हो सकती। सामाजिक न्याय के पुरोधा माने जाने वाले डॉ. अंबेडकर ने देश के सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, शैक्षिक धार्मिक एवं संवैधानिक आदि क्षेत्रों में महत्वपूर्ण कार्य करते हुए राष्ट्र के निर्माण में अहम योगदान दिया।

आजादी के समय देश में संविधान निर्माण की अहम जिम्मेदारी मिलने के बाद डॉ. अंबेडकर ने पूरे राष्ट्र में जातिगत भेदभाव, छुआछूत का उन्मूलन कर सामाजिक क्रांति का बीजारोपण किया वहीं संविधान में स्त्री-पुरुष समानता, स्त्री अधिकार, सामाजिक न्याय, विश्व-बंधुता जैसे लोकतांत्रिक तत्वों की स्थापना पर बल दिया और संविधान के विभिन्न अनुच्छेद में उल्लेखित किया।

तात्कालिक समय में पूरे राष्ट्र में स्त्रियों की दशा में सुधार हेतु हिंदू कोड बिल का मसौदा तैयार करने का क्रांतिकारी कार्य किया क्योंकि भारतीय समाज में स्त्रियां अपने संवैधानिक अधिकार से वंचित थी। भारत में स्त्रियों की दयनीय स्थिति केलिए मनुस्मृति जैसे साहित्य तथा अधिकांश रूढ़ीवादी सोच के लोगों का विद्यमान होना था।

मनुस्मृति के द्वारा भारतीय समाज में अछूत और स्त्री को शिक्षा, संपत्ति और समानता के अधिकारों से वंचित करने के लिए कुचक्र रचा गया।मनुस्मृति के द्वारा ही वैदिक काल में स्त्री को हासिल स्वतंत्रता, सम्मान, ज्ञानप्राप्ति का अधिकार, संपत्ति में अधिकार, पुनर्विवाह का अधिकार, स्वयंवर का अधिकार आदि पर रोक लगाया गया। स्त्रियों को समानता, स्वाधीनता और आत्मबोध जैसे प्राकृतिक हक से वंचित कर दिया गया।फलस्वरुप स्त्रियां भोग विलास का साधन बनकर रह गई।स्त्रियों की दयनीय स्थिति के प्रति भारतीय हिंदू समाज कभी चिंतित नहीं दिखा।

डॉ. अंबेडकर ने अपने दूरदृष्टि एवं सकारात्मक सोच के द्वारा भारतीय नारी की दयनीय स्थिति के कारणों का अवलोकन किया तथा उनके सामाजिक पतन के सभी प्रमुख कारकों का पता लगाया और व्यापक शोध एवं अध्ययन के बाद हिंदू नारी का उत्थान और पतन नामक किताब में वर्णित वैदिक युग में नारी की स्थिति का हवाला देते हुए जनमानस को तात्कालिक समाज की नारी की स्थिति से अवगत कराया। डॉ. अंबेडकर ने इस बात पर जोर दिया कि वर्तमान समय की नारी की सामाजिक अवनति से ही समाज भी पतन की स्थिति में पहुंच गया। डॉ. अंबेडकर ने मनुस्मृति के नारी विरोधी कारणों का हवाला देते हुए कहा कि बौद्ध धर्म के समता, स्वतंत्रता और न्याय दर्शन से प्रभावित होकर समाज के शूद्र, अति शूद्र और नारीको द्वारा बौद्ध धर्म अपनाया जाना प्रमुख है।

मनु ने इस हिंदू धर्म के प्रचार प्रसार केलिए शूद्र-अतिशूद्र एवं नारी को शिक्षा से वंचित किया तथा धर्म आदेश तोड़ने पर प्राण दंड, जीव्हा काटना, कान और मुख में पिघला सीसा भरने तथा पागल कुत्तों से स्त्री के अंग अंग नोचवाने जैसे घ्रणित दंड का विधान रखा। इन अभिशापो के निराकरण केलिए डॉ. अंबेडकर ने संविधान के प्रारूप समिति के अध्यक्ष के रूप में संविधान में स्त्रियों को समानता का अधिकार प्रदान कर सामाजिक कलंक को मिटाने का प्रयास किया।

वस्तुतः हिंदी कोड बिल यथार्थ रूप से भारतीय स्त्री को मुक्ति दिलानेवाला संवैधानिक कानून था।तात्कालिक समाज में स्त्रियों की दयनीय स्थिति, शोषण एवं पीड़ा को महसूस करते हुए महात्मा फुले की धर्मसंगिनी सावित्री फुले ने कहा था “राख ही जलने का दर्द जानती है” और नारी उत्थान के अनेक सराहनीय प्रयास किए। बाद में डॉ. अंबेडकर ने अपनी प्रगतिशील सोच एवं विचारधारा को अमल में लाते हुए नारी उत्थान के प्रयास हेतु भारतीय संविधान में स्त्रियों के हक के लिए कानूनी मसौदा तैयार किया। डॉ. अंबेडकर का मुख्य लक्ष्य समाज के दलित वंचित एवं हाशिए पर जीवन यापन करनेवाले गरीब, स्त्री-समुदाय तथा अन्य शोषित वर्गों को संवैधानिक अधिकार दिलाना एवं उनके हितों की रक्षा करना था।

संविधान के अनुच्छेद 15 (1) के तहत कोई भी राज्य अपने नागरिकों के बीच मूलवंश, धर्म, जाति, लिंग, जन्म, स्थान के आधार पर किसी प्रकार का विभेदन ही करेगा। 15 (2) सभी नागरिक चाहे वह स्त्री अथवा पुरुष हो सार्वजनिक स्थान पर आवागमन कर सकते हैं और उस क्षेत्र का इस्तेमाल कर सकते हैं। 16 (2) के अनुसार सरकारी क्षेत्र के सभी उपक्रमों में नौकरी के लिए पुरुष और महिला को समान अधिकार प्राप्त है। 19 (1) के अनुसार नारी को विविध स्वतंत्रता का अधिकार प्राप्त है।

हिंदू कोड बिल का प्रारूप तैयार करना डॉ. अंबेडकर द्वारा उठाए गए सर्वश्रेष्ठ क्रांतिकारी कदमों में से एक था जो कानूनी रूप से स्त्रियों के मान सम्मान की रक्षा करने वाला तथा सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक अधिकार दिलाने वाला था। इस बिल के द्वारा बाल विवाह जैसे सामाजिक कलंक पर प्रतिबंध, अपनी स्वेच्छा से जीवन साथी चुनने का अधिकार, अन्तर्जातीय विवाह का अधिकार, संपत्ति पर बराबर का हक, तलाक का अधिकार, गोद लेने और संरक्षकता के अधिकार का प्रावधान किया गया था।

डॉ.  अंबेडकर ने अपने दूर दृष्टि एवं सकारात्मक सोच से स्त्रियों के मान सम्मान की रक्षा हेतु यह क्रांतिकारी बिल सदन में प्रस्तुत कर एवं संसद में सर्वानुमति से पास कराने में कोई कसर नहीं छोड़ी, लेकिन देश आजादी पसंद कुछ रूढ़ीवादी तथा दक्षिणपंथी विचारधारा के लोगों ने इसका भरपूर विरोध किया। विरोध का सर्व प्रमुख एवं तात्कालिक कारण हिंदू परिवार के टूटने का अंदेशा समझा गया। सांसद नजरूद्दीन अहमद और श्यामाप्रसाद मुखर्जी जैसे दक्षिण पंथी विचारधारा के लोगों के लिए यह बिल्कुल भी मंजूर नहीं था कुछ और प्रमुख गणमान्य सांसदों में जो हिंदू कोड बिल के मुखर विरोधी थे उन में श्यामनंदन सहाय तथा बाबू रामनारायण सिंह आदि प्रमुख थे।

इन विरोधों के फलस्वरुप तथा सांसदों के निराशापूर्ण रवैये से आहत होकर 10 अक्टूबर 1951 को डॉ. भीमराव अंबेडकर नेअपने पद से त्याग पत्र दे दिया।

बाद में 1955-56 ई. में हिंदू कोड बिल को चार भागों में विभक्त कर टुकड़ों टुकड़ों में पारित किया गया, जो इस प्रकार है–

  1. हिंदू विवाह विषयक विधि-1955
  2. हिंदू उत्तराधिकार कानून- 1956
  3. हिंदू दत्तक ग्रहण तथा भरण-पोषण कानून- 1956 एवं
  4. हिंदू अप्राप्तवयता औरसंरक्षकता का कानून-1956

इन कानूनों के लागू होने से हिंदू धर्म के अंदर व्याप्त सामाजिक कुरीतियों का अंत हुआ। नारी को  पैत्रक तथा पति की संपत्ति में, अन्तर्जातीय विवाह का, दत्तक संतान एवं भरण पोषण का अधिकार मिला। हिंदू कोड बिल जैसे प्रगतिशील एवं अर्वाचीन कानून का प्रारूप तैयार कर प्रखर विरोध के बावजूद संसद में प्रस्तुत करने के दृढ़ संकल्प एवं क्रांतिकारी दृष्टिकोण के कारण ही डॉ. अंबेडकर को स्त्री मुक्ति का योद्धा कहा जाता है।

वास्तव में डॉ. अंबेडकर स्त्री अस्मिता की रक्षा एवं उसकी गरिमा को स्थापित करने वाले सच्चे नायक थे।

                 

संदर्भ सूची

डॉ. अंबेडकर व्यक्तित्व एवं कृतित्व -डॉ. डी. आर. जाटव-समता साहित्य सदन, जयपुर।

डॉ. अंबेडकर संपूर्ण वांग्मय- डॉ. बाबा साहेब, प्रकाशनविभाग, नईदिल्ली।

अंबेडकर की राजनीतिक सोच एवं विचार- आशुतोष मुखर्जी-रावत प्रकाशन, दरियागंज, नईदिल्ली।

दलित साहित्य और चिंतन धारा- इग्नू मानविकी विद्यापीठ।

गूगल,विकीपीडिया डॉ.भीमरावअंबेडकर

लेखक कौशल कुमार पटेल जैन विश्वविद्यालय में हिंदी के शोधार्थी हैं.

फासीवाद की ओट में जातिवाद में गर्क होता लेनिनग्राद


अरुण आनंद    

अरुण आनंद इस आलेख में बिहार-सीपीआई के जातिवाद, जिसकी कार्यकारिणी में 75% सवर्ण , लगभग 37 प्रतिशत अकेले भूमिहार हैं, सहित बेगूसराय के कथित लेनिनग्राद में जातिवाद के खेल का जायजा ले रहे हैं. आंकड़ों और तथ्यों तथा साहित्यिक उद्धरणों के जरिये बिहार-सीपीआई की जातिवादी भूमिका समझने के लिए यह आलेख जरूर पढ़ें.

‘यहां का क्या हाल-चाल है?
क्या रहेगा? यहां बस मीठा कम्युनिस्ट है, खाली मीठा-मीठा बोलेगा आ भोट मांगेगा। बटाईदारी की बात करने जाओ त बोलेगा-कामरेड, अभी वर्ग संघर्ष का समय नहीं है।त हम पूछते हैं, कौन चीज का समय है-सिरिफ मार खाने का? हम ही कौन क्रांति कर रहे हैं। सरकारी कानून के मुताबिक हक मांगने से भी गये?’’ कामरेड धीरे-धीरे तैश  में आ गये थे।
कामरेड, ई बुढ़वा कामरेड लोग जो न कराबे। मुसहर टोली के लोगों ने कहा, मजूरी बढ़ाओ, पूरा टोला आग में फूंक दिया! पार्टी ऑफिस में कहने गये तो सिकरेटरी साहेब बोले-अखबार में खबर छपना जरूरी है, एस.डी.ओ के पास चलते हैं….पीड़ितों को सरकारी सहायता मिलनी जरूरी है। हमने पूछा-उ टुन्नू बाबू वगैरह का क्या होगा? तब बोले-पहले डी.एस.पी. के पास चलिये, उ बाद में देखेंगे। आज तक देख ही रहे हैं, इधर केस रफा-दफा!’
“कोंपल-कथा: (उपन्यास: अरुण प्रकाश पेज 25-26)

पार्टी के वरिष्ठ सवर्ण नेताओं के साथ प्रेस करते कन्हैया कुमार जातिवाद को नकारते हुए


हिन्दी लेखक अरुण प्रकाश ने 90 के दशक में यह विवरण अपने उपन्यास ‘कोंपल-कथा में दर्ज किया था। लेनिनग्राद का पर्याय बतलाये जाने वाले बेगूसराय के लोकेल पर रचित इस उपन्यास में उन्होंने कम्युनिस्ट पार्टी के बारे में जो कुछ भी लिखा है वह इस बात की गहरी तस्दीक से उपजा है कि जातिवाद और सामंतवाद किस तरह वाम संगठनों की आंतरिक संरचना में गहरे पैबस्त रही है। कभी इसी बेगूसराय के बारे में कहा जा था कि यहां भाकपा भूमिहार आधारवाली पार्टी है। जब सामंतों, भूमिपतियों के विरुद्ध मजदूर किसानों ने आंदोलन का आगाज किया तो जमीन जायदाद बचाने के लिए यहां के भूमिहार सामंतों ने भाकपा का झंडा थाम लिया। अपनी इन्हीं संकीर्णताओं के कारण अपने आधार क्षेत्रों में भी वामपंथ लगातार सिकुड़त जा रहा है और दक्षिणपंथी शक्तियां उस स्पेस को अपने प्रभाव क्षेत्र में समाहित करती जा रही हैं। एक दौर था जब मजदूर किसानों का सबसे बड़ा संगठन वाम के पास था, लेकिन वह भी आज उनसे छिटक चुका है। कारण कई हैं लेकिन सबसे प्रमुख है पार्टी की संरचना के अंदर व्याप्त सवर्ण बहुलता जिनके कारण यह लगातार हाशिये की ओर कदमताल करती रही है।


सी.पी.आईः वर्ग की ओट, पर जाति पर जोर
वामपंथ को सर्वहारा समाज की जमीनी पार्टी कहा गया है। एक ऐसी पार्टी जो कैडर बेस काम करती है और एक निश्चित वैचारिकी के साथ अपने कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षित करती रही है। बिहार में भी दलित-दमित जमात की आवाज को उसने एक दौर में प्रमुखता से ऐड्रेस किया है, लेकिन बदलते समय समाज के अनुकूल उसने अपने को परिवर्तित नहीं किया जिसके परिणामस्वरूप उनका आधार क्षेत्र लगातार सिमटता गया। देश ,दुनिया की राजनीति कहां से कहां चली गई, लेकिन सी.पी.आई 70 के दशक में जहां थी, आज भी वहीं खड़ी है। ठीक सोहनलाल द्विवेदी की कविता ‘खड़ा हिमालय बता रहा है’ की तर्ज पर कि-‘खड़ा हिमालय बता रहा है/डरो न आंधी पानी में/खड़े रहो तुम अविचल होकर/हर संकट तूफानी में।’ देश , समाज में चाहे मंडल आये चाहे कमंडल, हम अपने सवर्ण प्रभुत्व से लीक भर भी इधर से उधर नहीं होंगे। पार्टी में शीर्ष नेतृत्व का सवाल हो या स्थानीय नेतृत्व का- जब तक आप भूमिहार नहीं होंगे, पार्टी में आपकी कोई बकत नहीं। पार्टी की 32 सदस्यीय राज्य कार्यकारिणी में आज भी अकेले 24 ऊंची जाति के सदस्य हैं। मुस्लिम, दलित और ओबीसी के महज 8 सदस्य हैं। यह स्थिति तब है जब मंडल के बाद राजनीति दलों में नेतृत्व के सवाल पर बहुजन समाज की हिस्सेदारी को लेकर लगभग सभी पार्टियों में आमूल बदलाव आये हैं। आरक्षण और हिस्सेदारी के सवाल को लेकर भाजपा जैसी प्रतिगामी पार्टियां भी सोशल इंजीनियरिंग के रास्ते आ गई हैं। लेकिन वामपंथ में खासकर सी.पी.आई के अंदर रत्ती भर भी बदलाव नहीं आया है। 32 सदस्यीय इस पार्टी की राज्य कार्यकारिणी में अकेले 12 भूमिहार, 5 राजपूत, 5 ब्राहण और 2 कायस्थ हैं। शेष बचे पदों पर यादव समाज से 4 कोईरी से 1 मल्लाह से 1 और मुस्लिम, दलित समुदाय से भी 1-1 सदस्य हैं। यानी निर्णायक शीर्षस्थ पदों पर अकेले भूमिहार 37.5 प्रतिशत, 15.6% प्रतिशत राजपूत,और ब्राहण, 6.2 प्रतिशत कायस्थ। यानी 12 प्रतिशत सवर्ण आबादी समूह की पार्टी में हिस्सेदारी 74.9 प्रतिशत और 88 प्रतिशत की आबादी की हिस्सेदारी महज 26.1 प्रतिशत। पार्टी का जनाधार ओबीसी और दलितों का और प्रभुत्व सवर्णों का। लड़े-भिड़ें कटे-मरें बहुजन और उसे दिशा-निर्देश  करें अल्पजन। और यह भी चस्पां करें कि वे तो अभी इस लायक हुए ही नहीं कि पार्टी का निर्णयकारी हिस्सेदारी का पद उन्हें सौंपा जाए। है न मिराकल! पार्टी का आधार जिस जाति समुदाय में है वह महज 26.1 प्रतिशत हैं और जिनका आधार नहीं है वे सवर्ण पार्टी की कार्यकारिणी में 74.9 प्रतिशत पर काबिज हैं। और हम दंभ पिट रहे हैं कि दुनिया में सर्वहारा क्रांति अब होने ही वाली है।
अब आयें सीपीआई की राज्य कार्यकारिणी की 9 सेक्रेटारियेट का ढांचा देखेंः इसमें 3 भूमिहार,1-1 ब्राहण,राजपूत, 2 यादव, और 1-1 दलित और मुस्लिम सदस्य हैं। प्रतिशत के आंकड़ों में जाएं तो भूमिहार 30 प्रतिशत, ब्राहाण-राजपूत 10 प्रतिशत, यादव 20 प्रतिशत, 10-10 प्रतिशत दलित मुस्लिम हैं।

बिहार के सारे प्रमुख अख़बारों में कन्हैया कुमार का विज्ञापन


मंडल उभार के दौर में कभी कांशीराम ने भारत की राजनीतिक पार्टियों को लक्षित करते हुए कहा था कि चूंकि सारे दल मनुवादी हैं इसीलिए सभी दलों के शीर्ष पदों पर ब्राहण भरे हुए हैं। उनके इस आरोप को मंडल बुद्धिजीवियों ने लगातार क्लेम किया और समाज के अन्य क्षेत्रों में भी बहुजन हिस्सेदारी का सवाल मुखर करते रहे परिणामस्वरूप अपवाद रूप में ही, कूटनीति के ही तहत गैर-ब्राहण भी विभिन्न दलों में महत्वपूर्ण पदों पर आसीन होते गए। किंतु वामपंथ और खासकर सीपीआई इस प्रभाव से पूरी तरह निर्लिप्त ही रही। जो पार्टियां ब्राहणवाद और वर्णवाद की झंडावरदार थीं उनके अंदर भी नेतृत्व में बहुजन समाज के लिए बड़े बदलाव परिलक्षित हुए लेकिन जिस वामपंथ पर सामाजिक-राजनीतिक परिवर्तन को वैज्ञानिक ढंग से लागू करने का कार्यभार था वह यथास्थितिवाद और सवर्ण वर्चस्व में लीन रही। उसने हमेशा जाति के सवाल को नेतृत्व के सवाल पर अनदेखी की। बहुजन की जगह सवर्ण को तवज्जो देती रही। जहां प्रतिगामी दलों ने ब्राहणवाद को नियंत्रक पदों से नीचे उतारकर शूद्रो को शासन का हिस्सेदार बनाया वहीं वामपंथ इस मामले में टस से मस नहीं हुआ। बंगाल, केरल, त्रिपुरा आदि जिन राज्यों में उनका आधार था वहां से भी इसी कारण वे लगातार सिमटते चले गए। अपने प्रभाववाले इलाके में इन दलों ने ओबीसी, आदिवासी और दलित जातियों से विरले ही कोई स्तरीय नेता को उभरने का मौका दिया हो।

समर्थन और विरोध की हकीकत
बेगूसराय के बारे में आरंभिक दिनों में जो खबरें आयीं उसमें कन्हैया को .स्वयंभू विजेता और गिरिराज सिंह को दूसरे नम्बर पर बतलाया जाता रहा। इस कड़ी में राजद के जो सबसे मजबूत उम्मीदवार तनवीर हसन थे उनको खबरों से पूरी तरह बाहर कर दिया गया। इसके लिए मीडिया और उनके समर्थकों ने जो नैरेटिव गढ़े, उसमें तथ्य कम और भावनात्मक के सहारे भावुक बनाकर आम मतदाताओं को अपनी जद में ले लेने की धुर्तता ज्यादा काम कर रही थी। एक विशेष रणनीति के तहत पिछले लोकसभा और गत बिहार विधान सभा के नतीजों पर चुप्पी रखकर यह प्रोपेगेंडा परवान चढ़ाया जाता रहा, लेकिन जैसे ही सोशल मीडिया पर इसके प्रतिवाद के रूप में तथ्य रखे जाने लगे तो जाकर यह बात मीडिया से भी उभरनी आरंभ हुई है कि वहां असली मुकाबला तो तनवीर हसन और गिरिराज सिंह में है। कन्हैया तो तीसरे स्थान पर पिछली बार से ज्यादा मार्जिन के अंतर से पीछे होंगे।

पिछले लोकसभा चुनाव 2014 में जब भाजपा जदयू गठबंधन टूटा था तो सी.पी.आई और जदयू गठबंधन ने साथ मिलकर बेगूसराय से लोकसभा का चुनाव लड़ा था। इसमें सीपीआई को 1 लाख, 92 हजार वोट आये थे। राजद को 3.70 लाख वोट पड़े थे और भाजपा के भोला सिंह को 4 लाख 18 हजार वोट आये थे। यहां गौर करनेवाली बात यह है कि सीपीआई ने जदयू के साथ मिलकर तीसरा  स्थान हासिल किया था और भाजपा के साथ तब रामविलास पासवान के साथ ही उपेंद्र कुशवाहा और जीतनराम मांझी का गठबंधन भी साथ था। राजद ने अकेले चुनाव में भाजपा से महज 48 हजार मतों के अंतर से इस पराजय का सामना किया था। आज की बदली हुई स्थिति में सीपीआई अकेले है और भाजपा को रामविलास के साथ जदयू का समर्थन हासिल है, लेकिन राजद के साथ इस बार उपेंद्र कुशवाहा, जीतनराम मांझी, जदयू का विद्रोही शरद समूह और एक बड़ा मल्लाह ब्लॉक जो भाजपा का आधार ब्लाक था मुकेश सहनी के कारण जुड़ गया है इसलिए जीत की पूरी संभावना इसबार तनवीर हसन के पक्ष में जाती हुई नजर आ रही है। जो लोग कन्हैया को बेगूसराय से विजेता के रूप में जीतने की घोषणाएं कर रहे हैं वे यह नहीं पता पा रहे कि आखिर कन्हैया अपने वोट बैंक में पिछली बार की अपेक्षा तिगुना मतों का ध्रुवीकरण किस आधार पर कर पाएंगे? अगर वे अपनी  भूमिहार आइडेंटिटी को आगे करते हैं तो उन्हें अपनी जेएनयू वाली भाजपा की एग्रेसिव विरोध की छवि ओझल करनी होगी, क्योंकि यहां के भूमिहारों का बड़ा हिस्सा भाजपा में दीक्षित है। और उन्हें राष्ट्रद्रोही मानता है । ऐसा वे कर नहीं सकते, क्योंकि यही उनकी पूंजी है जिसकी बदौलत राष्ट्रीय मीडिया में उनकी वकत है। लेकिन अपनी इस भूमिहार छवि को वे ओझल भी नहीं होने देना चाहते। दिवंगत भाजपा नेता भोला सिंह और दिग्गभ्रमित कवि दिनकर को वे गले लगा रहे हैं, लेकिन जय भीम, लाल सलाम का उनका स्लोगन फिलहाल स्थगित कर दिया गया है। ऐसे में उनका एक ही जोर है कि मोदी विरोधी अपनी इस आक्रामक छवि को मुसलमानों में कैश किया जाये। इसके लिए बाजाब्ते सही गलत, जायज-नाजायज हर तरह के प्रोपेगेंडे की आजमाइश की जा रहे हैं। कभी गुजरात से तिस्ता सितलवार आ रही हैं तो कभी शबाना आजमी और जावेद अख्तर। कभी नजीब की मां, तो कभी शेहला राशीद। कभी दारूल उलूम नदवातुल उल्लमा लखनउ के उस्ताद नरुल्लाह नदवी का खुला पत्र जारी हो रहा है। ये सभी मुस्लिम परवरदिगार तनवीर हसन साहब को कन्हैया के समर्थन में बैठने की सलाह दे रहे हैं, उनकी ऐसी की तैसी कर रहे हैं और मुस्लिम मतदाताओं को संबोधित  कर रहे हैं कि अगर उन्हें तनवीर को ही वोट करना है तो उससे अच्छा है गिरिराज को वोट करें कम से कम वह इसकी अहसान तो मानेंगे। क्या ये वामपंथ या किसी लोकतांत्रिक बौद्धिक की आवाज हो सकती है जहां इस तरह की घृणा एक ऐसे उम्मीदवार के बारे में उसके ही कौम के लोगों द्वारा दी जा रही है जिसका एकेडमिक और राजनीतिक कैरियर स्वयं बहुत साफ सुथरा रहा हो। यह भाजपा के मुस्लिम कार्ड से किस तरह भिन्न है?
उद्देश्य अगर चुनाव जीतना ही था, और वह भी नैतिक-अनैतिक किसी तरह से-तो जिस तरह के अपकर्म कैडरबेस भाजपा या कैडररहित क्षेत्रीय पार्टियां सत्ता प्राप्ति के लिए करती रही हैं उससे कन्हैया और उनकी सीपीआई अलग कैसे है? यहां तो पार्टी में भी एक जर्बदस्त विभाजन है सिर्फ कन्हैया ही कन्हैया हैं शेष की कोई चर्चा तक नहीं। राज्य के दूसरे हिस्से में खड़े उनके उम्मीदवारों का क्या होगा, वे सीट निकाल पाएंगे भी या नहीं इसकी कोई चिंता नहीं है। अजीत सरकार के हत्यारे पप्पू यादव से हाथ मिलाने का प्रसंग हो या दिवगंत भाजपा सांसद भोला सिंह का माल्यार्पण-या फिर पार्टी द्वारा दबंग रणवीर यादव की पत्नी कृष्णा यादव से पार्टी से लड़वाने के लिए मिलना, जिसे बाद में कृष्णा यादव ने ही नकार दिया। या फिर पार्टी से उपर उठकर ज्ञात-अज्ञात स्रोतों से क्राउड फंडिंग ये सारे सवाल ऐसे हैं जिसपर बात की जानी चाहिए।
बेगूसराय में जो कुछ हो रहा है उसमें बहुत ज्यादा आशंका इस बात की है कि वहां से गिरिराज सिंह चुनाव में बाजी मार ले जाएंगे, क्योंकि ‘कन्हैया पक्ष की पूरी कोशिश मुस्लिम वोट बैंक में सेंध लगाने की है। और इसके लिए उनके अनेक गिरोह अफवाह की बरसात कर रहे हैं। अब तो यह स्पष्ट दिखने लगा है कि उनकी पूरी लड़ाई किस तरह तनवीर हसन और राजद के खिलाफ आक्रामक तरीके से सोशल मीडिया और अखबारों के जरिये जारी है। कन्हैया और उनके फालोअर्स एवं उनके नाम से चलनेवाले सोश लमीडिया पेज फेक न्यूज अक्सर आते रहे हैं जिसकी तथ्यपरक पड़ताल सरोज कुमार ने अपने फेसबुक पर की है। सबलोग ब्लॉग्स में अनीश अंकुर ने तो बाजाब्ता कन्हैया के बहाने पिछड़ा नेतृत्व, त्रिवेणी संघ, समाजवादी आंदोलन और लालू प्रसाद के शासन तक को विक्टिमाइज किया है, लेकिन इतने शातिराना और फूहड़ सतही भूमिहारी सनक में कि उनकी पूरी मूर्खता सामने आ गई है। न तो वे त्रिवेणी संघ को जानते हैं, न समाजवादी आंदोलन को, बरना बीपी मंडल को ही उस आंदोलन का मुख्य सूत्रधार मान हास्यास्पद निष्कर्ष पर नहीं आता। उन्हें बतलाना चाहिए कि जब लालू जी भूमिहारों के छंटे हुए छाड़नों को आगे कर रहे थे तो उनकी ही गोद में बैठी सीपीआई क्या कर रही थी? क्यों एक-एक कर जहानाबाद और उनके दूसरे आधार क्षेत्र छूटते चले गए और एक जिले और जाति में ही सिमट कर रह गई सीपीआई?  उन्हें इसका का भी स्पष्टीकरण देना चाहिए कि स्वयं भूमिहारों लेखकों की केदारदास श्रम समाज अध्ययन संस्थान में बैठक कर ‘कन्हैया के पक्ष में सभी साहित्यकार एकजुट’ की फर्जी खबर छापते रहे हैं। इसके माध्यम से आखिर आप किस तरह का आदर्श स्थापित कर रहे हैं। कभी चिंताहरण ट्रस्ट से सुशील मोदी को माल्यार्पण करेंगे और एनडीए समर्थित सरकार की सभी आर्थिक अर्हताएं हासिल करेंगे और कहेंगे कि हम प्रगतिशील हैं। आश्चर्य तो इस बात का है कि किशन कालजयी जैसे सो कॉल्ड प्रगतिशील भी कन्हैया के बहाने पिछडों के नीचा दिखाने के एक अभियान में शामिल हैं। आनेवाला समय उनक्व्व भी नोटिस लेगा।

शोहरत सीपीआई मॉडल की ही क्यों
बेगूसराय और कन्हैया प्रकरण ने बहुत सारी चीजों को साफ किया है। इसने यह भी स्पष्ट किया है कि इस देश का एकेडमिक और बौद्धिक वर्ग कितना पानी में है। यह भी कि उन्हें वामपंथ का बेगूसराय वाला सीपीआई मॉडल ही क्यों पसंद है? आरा वाला सीपीआई एमएल मॉडल क्यों पसंद नहीं है? इसका भी अपना एक क्लास इंटरेस्ट है जिसके आईने में उनकी मंशा को पढ़ा जाना चाहिए। बेगूसराय में दिल्ली, मुम्बई, गुजरात और देश के अलग-अलग हिस्सों की बौद्धिक बिरादरी ने शिरकत की लेकिन  आरा में नहीं जबकि वहां भी सीपीआई एमएल से राजू यादव जैसे संघर्षशील नौजवान खड़े हैं। बेगूसराय से कही ज्यादा जनसंघर्ष भोजपुर में माले का रहा है जिसे गठबंधन का समर्थन भी प्राप्त है।
दिलीप मंडल ने बहुत सही लक्षित किया है कि वामपंथ के अगर दो आधार मानें तो वह आरा और बेगूसराय होगा। बेगूसराय को सीपीआई का गढ़ माना जाता है। बिहार का लेनिनग्राद और मिनी मास्को कहा जाता है। लेकिन यह कैसा लेनिनग्राद है जहां अब तक के 14 सांसदों में मात्र दो को अपवाद मानें तो अभी तक वहां से एक ही जाति के सांसद होते रहे। और सीपीआई के भी जो दो सांसद हुए वह भी उसी कुल गोत्र के। यह इस लेनिनग्राद में ही संभव था कि सीपीआई से प्रशिक्षित होने वाले भोला सिंह अंतिम दौर में भाजपा के सांसद बन जाते हैं। लेकिन घबराइए नहीं वामपंथ का एक दूसरा मॉडल भी है जो आरा में अवस्थित है। और यह वाकई सर्वहारा क्रांति का प्रतीक रही है। यह सीपीआई एमएल का आधार क्षेत्र है। यहां पार्टी की राज्यकार्यकारिणी हो या जिला कार्यकारिणी इसमें बेगूसराय वाली बात नहीं है। इसमें विभिन्न जातियों की हिस्सेदारी है। इस मॉडल ने जगदीश  मास्टर, चंद्रमा प्रसाद, जीउत पासवान और राजू यादव जैसे प्रतिनिधि दिए हैं जो विभिन्न जातियों से आते हैं। 70 के दश क में पनपी नक्सलवादी चेतना का सबसे मजबूत गढ भोजपुर ही रहा, जहां से जगदीश  मास्टर, रामेश्वर अहीर जैसे श हीदी क्रांतिकारी पैदा हुए और मधुकर सिंह जैसे राजनैतिक चेतना से संपन्न कथाकार। इस भूमि ने आरा स्कूल के कथाकारों की एक स्वतःस्वफूर्त पीढ़ी पैदा हुई जिसने हिन्दी कथा साहित्य को एक नई माने दिए। लेकिन बेगूसराय में ऐसा कुछ हुआ क्या? जिस दिग्गभ्रमित राष्ट्रकवि दिनकर को लेकर इतना प्रोपेगेंडा रचा जाता रहा, खुद उनका लेखन क्या है ,उनका कर्म कैसा रहा। जब 42 का आंदोलन चल रहा था तो अंग्रेज सरकार की चाकरी कर रहे थे। विभिन्न प्रकार की नौकरियां करते रहे, राज्यसभा का सुख भोगते रहे। उनके लेखन में पौराणिकता और यथास्थितिवाद के सिवा है क्या? उर्वशी,परशुराम की प्रतीक्षा और ‘हारे को हरिनाम’जैसे प्रतीकों और बिम्बों की तह में जाएं तो हकीकत समझते देर नहीं लगती कि भाजपा में उन्हें क्यों पसंद करती रही है। यह अकारण नहीं कि बड़े मोदी दिनकर की जयंती मनाते हैं और भाजपा पालित सांस्कृतिक संस्थाएं दिनकर पर सरकारी आयोजन करती रही हैं। क्या मधुरक सिंह और आरा स्कूल के वामपंथ में ऐसी सूराख है जिससे सहारे कोई दक्षिणपंथी समूह अपना हित साध सके? बावजूद इसके अगर हमारी मीडिया, अकादमिया की दिलचस्पी उसमें नहीं है तो यह समझना कठिन नहीं है कि उनकी दिलचस्पी उसमें क्यों नहीं है? निश्चय ही इसके पीछ कहीं न कहीं वो विचार सूत्र ही हैं जो दर्षाते हैं कि वामपंथ का बेगूसराय मॉडल ही उन्हें क्यों प्रिय हैं?

पटना में अधिकतम सवर्ण और स्वजातीय साहित्यकारों की खबर बनी सभी साहित्यकारों की एकजुटता की

फासीवाद को शिकस्त वामपंथ नहीं, सामाजिक न्याय देगा

यह एक ठोस आजमाई हुई सच्चाई है कि लालू प्रसाद और उनकी पार्टी राजद ही फासीवाद विरोध के सबसे बड़ी प्रतीक रहे हैं। इसकी कीमत उनसे राजनीतिक तौर पर भाजपा, वामपंथ और अपर कास्ट मीडिया सब ने बसूली है। 90 के दशक में मुख्यमंत्री बनते ही सबसे पहले सर के बल खड़ी बिहार की दशकों अपर कास्ट वर्चस्व की राजनीति को उन्होंने पैरों के बल खड़ा किया। बिहारी समाज की विभिन्न संस्थाओं में पहली बार बहुजन समाज को हिस्सेदार बनाया और 90 के रामरथ यात्रा के समय से आज तक भाजपा के फासीवाद का सबसे करारा जबाव दिया। बिहार और हिन्दी पट्टी को गुजरात बनने से रोक लिया। भाजपा की राजनीति हिन्दुओं की वर्णों में विभक्त छवि को ढंककर उनकी एकीकृत छवि को कैश करना चाहती रही है ताकि वह ब्राहणवाद की अपनी वैचारिकी को अक्षुण रूप में सुरक्षित रख सके। यही काम यहां वामपंथ भी करती रही है, लेकिन भाजपा उनसे एक कदम आगे की सोचती है वह कई स्तरों पर काम करती रही है जाहिर है सामाजिक न्याय की काट के लिए 90 के दशक में अटल और आडवाणी के मोदी काल में उसने सोश ल इंजीनियरिंग भी खूब जमकर की। कर्पूरी ठाकुर को खलनायक बनाने वाली भाजपा नई सदी में उन्हें भारत रत्न देने की वकालत करती है, जुब्बा साहनी, बाबा चौहड़मल आदि दलित सबाल्टर्न नायकों को आगे करती है वामपंथ ने सोशल इंजीनिरिंग का बेस लिया लेकिन पार्टी में सवर्ण वर्चस्व में कटौती स्वीकार नहीं की। लालू प्रसाद जैसे नेता भाजपा को सबसे मजबूत मुकाबला इस लिए देते रहे हैं कि उन्होंने हिन्दुओं की इस एकीकृत पहचान को तोड़ा। आरक्षण और शासन का हिस्सेदारी बनाया।

यहां एक अंतर सीपीआई और भाजपा- दोनों पार्टियों के स्तर पर यह भी है कि 90 के दशक वाली भाजपा अटल आडवाणी सरीखे ब्राहणों को आगे करके लोकतंत्र की मार्फत जिस हिन्दुत्व की लड़ाई लड़ रही थी, वही भाजपा अब चायवाले अतिपिछड़े नरेंद्र मोदी को आगे करके सोशल इंजीनियरिंग की खाल में लोकतंत्र की मार्फत चुनाव मैदान में है। उसने हाशिये की बड़ी आबादी को अपने कोर ग्रुप का मुख्य एजेंडा बना लिया है। कर्पूरी ठाकुर का विरोध करने वाली भाजपा ही है, जो उन्हें भारत रत्न देने की आवाज मुखर करती रही है। यह भाजपा ही है जो बाबा चौहड़मल और जुब्बा साहनी जैसे दलित पिछड़े नायकों की जयंतियां मनाती रही है। लेकिन वर्गीय एप्रोच को मुख्य आधार मानने वाली सीपीआई 70 साल पहले जिस भूमिहारवाद की खोल में थी, आज भी उससे बाहर नहीं आई है। यह तो भाजपा की भोंडी नकल भी नहीं कर पा रहे उनका मुकाबला कहां से कर पाएंगे। भाजपा के अंदर वंचितों की पर्याप्त हिस्सेदारी है, तभी वह सोशल इंजीनियरिंग के खेल में सफल भी हो रही है लेकिन सीपीआई पार्टी में भूमिहार वर्चस्व बनाये रखकर अपेक्षा करती है कि मुस्लिम दलित उन्हें वोट करें। बिहार में इसी कारण लालू प्रसाद इन दोनों ही शक्तियों के निशाने पर रहे। यह एक अजीब स्थिति है कि वामपंथ और भाजपा दोनों के टारगेट में यहां की अल्पसंख्यक कौम और सामाजिक न्याय की वाहक यादव समुदाय ही हैं। यह अकारण नहीं कि भाजपा ने अपनी पूरी ताकत यादवों पर लगाई। यहां के प्रदेश अध्यक्ष भूपेंद्र यादव, भाजपा अध्यक्ष नित्यानंद राय और बिहार सरकार में मंत्री नंदकिशोर यादव। बावजूद इसके इनके वोट को वह ट्रांसफर नहीं कर पाई। वह इसलिए नहीं कर पाई क्योंकि उनकी इस मंशा को यह कौम बहुत अच्छी तरह समझती रही है।

वाम के निशाने पर तनवीर ही क्यों, गिरिराज क्यों नहीं

इस पूरे प्रकरण में यह तो स्पष्ट हो ही गया है कि कन्हैया और उनकी सीपीआई. की राजनीतिक जमीन खिसकी हुई है और वे पूरी तरह से गोयबल्स थेयरी के दुष्प्रचार अभियान में संघ की गिरोहवाद का पूरा पैकेज अपने साथ लेकर आये हैं। यहां वे पूरी तरह से नरेंद्र मोदी की कार्बन कॉपी रूप में हैं। उसी तरह के जैकेट विज्ञापनों से बेगूसराय के अखबार पटे हुए हैं। यहां साम्यवाद पूंजीवाद से गलबहियां कर रहा है, जिस तरह कभी अनुपम खेर मोदी की ब्रांडिंग करते थे और फिल्मकारों का एक समूह उनकी जयगान में लहालोट हुआ जाता था कुछ-कुछ वही स्टाइल में मुम्बई से जावेद अख्तर, शबाना आजमी, स्वरा भास्कर और प्रकाश  राज कन्हैया के जयगान में लगे हैं। यहां अंतर मात्र ब्रांडिंग भर का है। सीपीआई और इनके जितने बौद्धिक वीर हैं सभी के सभी तनवीर और राजद पर ही निशाना साध रहे हैं और उन्हें चुनाव से हट जाने का दवाब बना रहे हैं। इसमें उनके सहायक हैं-जे.एन.यू.के अकादमिक बौद्धिक,मुम्बई के सिनेमाई रंगरूट, सोशोलॉजिस्ट,पत्रकार,संपादक, कुछ दलित, मुस्लिम, ओबीसी रणबांकुरे और एनजीओ कल्चर में रंगे खटमिठिया क्रांतिकारी। इसमें वे सीधे तौर पर गिरिराज की मदद कर रहे हैं क्योंकि उन्हें मालूम है कि गिरिराज जितेंगे तभी उनसे विरोध का उनका स्पेस बचेगा। अन्यथा तनवीर जीत गए तो वे इस लायक ही नहीं रहेंगे कि बेगूसराय से कोई नई राजनीति खड़ी कर सकें। गिरिराज होंगे तभी मुसलमान असुरक्षित होंगे, राष्ट्र भक्ति और देश द्रोह की बात होगी, जहां राजद आयी हिस्सेदारी की बात होगी, आरक्षण बचाने का मसला होगा, पार्टी में हिस्सेदारी का सवाल आएगा और यह जैसे ही मुखर होगा उनकी पूरी जमीन खिसकेगी ही क्योंकि सामाजिक न्यायिक की मतदाता शक्तियां वर्ग की ओट में उनके जातिवाद को बहुत करीब से देखती महसूसती रही है। इसलिए कन्हैया और उनके समर्थक किसी मूर्खता में नहीं अपितु जानबूझकर यह कम्पेन चला रहे हैं ताकि तनवीर के खात्मे के बाद उनकी राजनीति की जमीन को कोई पुख्ता आधार मुहैया हो। वे अपनी पूरी ताकत से तनवीर की पराजय के लिए मुसलमान मतदाताओं की वोट में सेंधमारी की कोशिश में लगे हुए हैं ताकि भारत को मिनी पाकिस्तानी बतलाने वाले गिरिराज सिंह की जीत सुनिश्चित हो और नवादा के मुसमानों की तरह ही बेगूसराय के मुसलमानों में भी दहश तगर्दी का माहौल पैदा हो। ऐसा होगा तो प्यारा कन्हैया सामाजिक न्याय के बड़े कोर ग्रुप मुसलमान की वोट के सहारे ब्राहणवादी मीडिया पर सवार होकर बिहार में अपर कास्ट के खोए हुए राजनीतिक वर्चस्व को आगामी बिहार विधान सभा चुनावों में एक बड़े सिम्बल बनकर स्थापित करने में कामयाब हो सकेंगे।

जरूर पढ़ें: सीपीआई-विधायक दल के पूर्व नेता ने पार्टी को कहा था लालू प्रसाद का पिछलग्गू

इन प्रवृतियों के पीछे दरअसल एक जातिवादी अपर कास्ट उतेजना काम कर रही है, जो ‘जय भीम, साल सलाम, और सामंतवाद से आजादी’ के स्लोगन के रूप में इतेफाकन दिल्ली से शुरू हुई थी और जल्द ही वामपंथ के बेगूसराय मॉडल में फिट होती हुई संघी भोला सिंह के माल्यार्पण तक आकर खत्म हो गई। लेकिन हिन्दी की एकेडमिया,मीडिया इसे अभी भी जीवित रखना चाहती है ताकि सामाजिक न्याय को उसकी पटरी से उतारकर वहां एक नए किस्म का ब्राहणवाद को स्थापित किया जा सके। यहां अंतर बस इतना ही है कि इस बार वह भाजपा के उग्र राष्ट्रवाद के रूप में नहीं, अपितु उसके काउंटर पार्ट के रूप में खुद को स्थापित करने की अपनी अंतिम लड़ाई की आजमाईश कर रही है।

बेगूसराय के बहुजन मतदाताओं अभी भी वक्त है चेतो, इन गिरहकट्ट बहुरूपियों को पहचानों, उनकी मंशा की शिनाख्त करो। तुम्हारे सामने बिहार में नरसंहारों को अंजाम देनेवाले इनके ही कुलगोत्री रहे, क्या हुआ उनका, कोर्ट ने सारे अपराधियों को रिहा कर दिया इसकी लड़ाई लड़ने तो ये मुम्बईया और दिलीआईट नहीं आये? उनके अच्छे, लच्छेदार भाषणउन्हीं को सलामत होवे, तुम उनकी धुर्तता को तनवीर को मतदान करके बेनकाब करो मतदाताओं!

अरुण आनंद फ्रीलांस जर्नलिस्ट हैं.

अपने ही कानूनी जाल-जंजाल में फंसे पितृसत्ता के होनहार लाडले

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मद्रास उच्च न्यायालय के विद्वान् न्यायमूर्ति वी. पार्थीबान ने एक नाबालिग याचिकाकर्ता (जिसे तमिलनाडु के नमक्कल स्थित फास्ट ट्रैक महिला कोर्ट ने पोक्सो कानून के तहत दस साल की सजा सुनाई है) की सुनवाई के दौरान हुए कहा है कि 16 से 18 वर्ष की उम्र के युवाओं के आपसी सहमति से बनाए गए यौन संबंधों को पोक्सो एक्ट (बच्चों को यौन अपराध से बचाने वाले कानून) के तहत नहीं लाया जाना चाहिए. कोर्ट ने इस संबंध में ‘बच्चे’ की परिभाषा पर पुनर्विचार किए जाने की भी बात की. उन्होंने  कहा कि 18 साल से कम उम्र के युवाओं को ‘बच्चा’ मानने के बजाय 16 साल से कम उम्र के बच्चों को ‘बच्चा’ माना जाना चाहिए. न्यायमूर्ति ने यह भी कहा कि “16 साल की उम्र के बाद आपसी सहमति से बनाया गया यौन संबंध या शारीरिक संपर्क पोक्सो कानून के सख्त प्रावधानों से बाहर किया जा सकता है, और यौन हमले व किशोर संबंध को समझते हुए यौन अपराध के मामलों के लिए थोड़ा कम कड़े प्रावधान एक्ट में शामिल किए जा सकते हैं”. न्यायाधीश पार्थीबान के अनुसार “जिन केसों में लड़कियां 18 साल से कम उम्र की होने पर भी (संबंध बनाने के लिए) सहमति देने योग्य होती हैं, मानसिक रूप से परिपक्व होती हैं, दुर्भाग्य से उनमें भी पोक्सो कानून लग जाता है”.

सहमति से यौन सम्बन्ध की उम्र 16 साल से बढ़ा कर 18 साल करते ही, पितृसत्ता के लाडले संकट में हैं. विवाह पूर्व यौन संबंध हों या बाल विवाह या नाबालिग पत्नी से यौन संबंध सब पर कानूनी रोक लग गई. और यह पूरी बहस सिर्फ सहमती से सहवास कि उम्र ‘सौलह साल’ पर क्यों हो रही है? बाकी कानूनों के लिए भी समान रूप से कम या ज्यादा क्यों नहीं हो सकती?  वैसे सहमती से सहवास के लिए प्राचीन भारत (1860) में उम्र 10 साल भी रही है. उम्र सहमती आयोग कि सिफारिश पर 1891 में बढ़ा कर 12 साल की गई थी और बाद में बढ़ते-बढ़ते 15-16 साल की गई थी. सवाल यह है कि क्या सहमति के लिए शारीरिक या मानसिक रूप से परिपक्व होना ही काफी है? और इसका निर्णय कौन करेगा!

खैर..आज के दिन बालिग़ होने या किशोर न्याय अधिनियम में भी बालिग़ की उम्र 18 साल, लड़की के विवाह योग्य होने की उम्र 18 साल है या नहीं? निर्भया बलात्कार-हत्या कांड (16 दिसम्बर, 2012) के बाद देशभर में हुए विरोध, प्रदर्शन, आंदोलन के परिणाम स्वरूप बलात्कार कानून में बदलाव के लिए, रातों-रात जे. एस. वर्मा कमीशन बैठाया गया, अध्यादेश (फरवरी, 2013) जारी हुआ और फिर कानूनी संशोधन किये गए। पितृसत्ता द्वारा अपनी नाबालिग बेटियों को ‘सुरक्षित’ रखने के लिए सहमति से सहवास की उम्र सौलह साल से बढ़ा कर अठारह साल की गई। (भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 375) मगर बेटों (पति) को उनकी अपनी 15 साल से बड़ी उम्र की (बहू) पत्नी से सहवास ही नहीं, बल्कि संशोधन के बाद ‘अन्य यौन क्रीड़ाओं’ (अप्राकृतिक यौन क्रीड़ाओं/ मैथुन) तक का कानूनी अधिकार दिया, जिसे किसी भी स्थिति में (वैवाहिक) बलात्कार नहीं माना-समझा जाएगा।(भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 375 का अपवाद) कोई पुलिस-अदालत पत्नी की शिकायत का संज्ञान नहीं ले सकती।(आपराधिक दंड प्रक्रिया संहिता,1973 कि धारा 198 उप-धारा 6) कोई दलील-अपील नहीं। मगर सारा खेल तब बिगड़ गया जब चार साल बाद (अक्टूबर 2017) सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति मदन बी. लोकुर और दीपक गुप्ता ने अपने 127 पृष्ठों के निर्णय में कहा कि पन्द्रह से अठारह साल के बीच की उम्र की पत्नी से यौन संबंध को बलात्कार का अपराध माना जाएगा। मतलब अब 18 साल से कम उम्र कि पत्नी से भी सहवास संभव नहीं.

बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2006 की धारा 9 के अनुसार अगर अठारह साल से अधिक उम्र का लड़का, अठारह साल से कम उम्र लड़की से विवाह करे तो अपराध। सज़ा दो साल कैद या दो लाख ज़ुर्माना या दोनों हो सकते हैं. इसका सीधा-सीधा अर्थ है कि अगर लड़का भी अठारह साल से कम हो, तो कोई अपराध नहीं! चतुराई से जानबूझ कर बाल विवाह के लिए, जो सुरक्षित ‘चोर दरवाज़ा’ बना कर छोड़ा था, वो सुप्रीम कोर्ट ने बंद कर दिया. यह दूसरी बात है कि माननीय न्यायमूर्तियों ने अठारह साल से बड़ी उम्र की पत्नी के बारे में चुप्पी साध ली। सो बालिग़ विवाहिता अभी भी, पति के लिए घरेलू ‘यौन दासी’ बनी हुई है…बनी रहेगी। कोई नहीं कह सकता कि पति को वैवाहिक बलात्कार के कानूनी अधिकार पर विचार विमर्श कब शुरू होगा?

वर्तमान भारतीय समाज का राजनीतिक नारा है ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’, मगर सामाजिक-सांस्कृतिक आकांक्षा है ‘आदर्श बहू’। वैसे भारतीय शहरी मध्य वर्ग को ‘बेटी नहीं चाहिए’, मगर बेटियाँ हैं तो वो किसी भी तरह की बाहरी (यौन) हिंसा से एकदम ‘सुरक्षित’ रहनी चाहिए। हालाँकि रिश्तों की किसी भी छत के नीचे, स्त्रियाँ पूर्ण रूप से सुरक्षित नहीं हैं। यौन हिंसा, हत्या, आत्महत्या, दहेज प्रताड़ना और तेज़ाबी हमले लगातार बढ़ते जा रहे हैं। दरअसल पुरुषों को घर में घूंघट या बुर्केवाली औरत (सती, सीता, सावित्री, पार्वती, तुलसी या आनंदी,) चाहिए और अपने ‘आनंद बाज़ार’ चलाने और ब्रांड बेचने के लिए ‘बोल्ड एंड ब्यूटीफुल’ बिकनीवाली। सो, स्त्रियों को सहमती के लिए लाखों डॉलर, पाउंड, दीनार या सोने का लालच (विश्व सुन्दरी के ईनाम और प्रतिष्ठा) और जो सहमत नहीं उनके साथ जबरदस्ती यानी यौन-हिंसा, दमन, उत्पीड़न, शोषण के तमाम हथकंडे।

हर हाल में पुरुषों के लिए घर-बाहर पूर्ण यौन स्वतंत्रता होनी चाहिए। व्यभिचार और समलैंगिक सम्बन्ध से लेकर देह व्यापार तक कि खुली कानूनी छूट है, मगर सिर्फ बालिग स्त्री-पुरुषों के लिए. ऐसे में विद्वान् न्यायमूर्ति वी. पार्थीबान के इस बहुमूल्य विचार/सुझाव पर, विधायिका और सर्वोच्च न्यायपालिका को गंभीरता से पुनर्विचार करना चाहिए, वरना डर है पितृसत्ता के ‘होनहार युवा’, यौन कुंठाओं से विक्षिप्त होने लगेंगे या बनेंगे यौन अपराधी.  

भेदभाव की कानूनी बेड़ियाँ तोड़ती स्त्री: रख्माबाई

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“क्या मैं ही पहला आदमी हूँ जो इस पुकार को सुनकर ऐसा व्याकुल हो उठा हूँ या औरों ने भी इस आवाज़ को सुना है और सुनकर अनसुना कर दिया है? और क्या सचमुच जवान लड़की की आवाज़ को सुनकर अनसुना किया जा सकता है?”
(‘जहाँ लक्ष्मी क़ैद है’ 1957, राजेन्द्र यादव, पृष्ठ 228)

सुप्रीम कोर्ट के मुख्यन्यायाधीश रंजन गोगोई की पीठ ने 5 मार्च, 2019 को वैवाहिक अधिकारों की पुनर्स्थापना (रेस्टीट्यूशन ऑफ कंजुगल राइट्स) की संवैधानिक वैधता को चुनौती देती एक जनहित याचिका (ओजस्व पाठक बनाम भारत सरकार) सुनवाई के लिए तीन न्यायमूर्तियों की खंडपीठ को सौंपी है। इस संदर्भ में ऐतिहासिक पृष्ठभूमि जानना जरूरी है और दादाजी बनाम रख्माबाई केस (1884-88) की चर्चा के बिना बात अधूरी रहेगी।

रख्माबाई उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में जन्मी एक ऐसी भारतीय स्त्री थी, जिसे अपने विरोध में तैनात परिवार, समय और समाज की कुप्रथाओं, परम्पराओं और मनमाने कानूनों का उम्रभर सामना करना पड़ा। तब सहमति से सहवास या वैवाहिक सहवास की उम्र सिर्फ दस साल तय थी। (भारतीय दंड संहिता,1860) परिणाम स्वरूप ‘बाल विवाह’ कानून सम्मत माने जाते थे। दहेज और अन्य सामाजिक-आर्थिक कारणों की वजह से उन दिनों, उत्तर भारत में तो लड़कियों का पैदा होते ही गला घोंट कर मार दिया जाता था या कुपोषण के कारण मर जाती थी। तभी तो ‘द फीमेल इंफेंटसाइड प्रिवेंशन एक्ट,1870’ पारित हुआ था। 

रख्माबाई ढाई साल की थी कि पिता जनार्दन पांडुरंग का देहांत हो गया। वसीयत के हिसाब से मिली लगभग पच्चीस हजार की संपत्ति, उसकी माँ ने रख्माबाई के नाम कर दी थी। छह साल बाद ही विधवा माँ जयंतीबाई ने, डॉ सखाराम अर्जुन से  दूसरा विवाह कर लिया। सौतेले पिता ने ग्यारह साल की उम्र में ही रख्मा का (बाल) विवाह, अपने ही गरीब रिश्तेदार दादाजी भीकाजी (उम्र बीस साल) से करवा दिया। पढ़ना-लिखना बंद। दादाजी (पति) लगातार यह दबाव बनाते रहे कि रख्माबाई (पत्नी) को उसके साथ रहने दिया जाए, लेकिन रख्माबाई उसके साथ रहने या ससुराल जाने को राजी नहीं। ग्यारह साल बाद (1884) अंततः मामला वकीलों, कानून और अदालत की तारीखों और अपील दर अपील में उलझता चला गया।

बम्बई उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति पिनी ने मुकदमा रद्द करते हुए, अपने ऐतिहासिक निर्णय (दादाजी बनाम रख्माबाई,1885 आईएलआर 9 बम्बई 529, दिनांक 21 सिंतबर,1885) में लिखा “वर्तमान मुकदमे के पक्षकार ग्यारह साल पहले विवाह के धार्मिक समारोह से गुजरे थे। जब प्रतिवादी ग्यारह वर्ष की बालिका थी। उन्होंने कभी सहवास नहीं किया। और अब जब प्रतिवादी बीस-बाईस की महिला है, तो वादी अदालत से उसे घर ले जाने के लिए विवश करने को कह रहा है। प्रतिवादी बचपन में हुए विवाह को मानने के लिए राजी नहीं। उसकी सहमति कहाँ है! मुझे ऐसा लगता है कि  इन परिस्थितियों में युवा महिला को इस व्यक्ति के पास जाने के लिए विवश करना, जिसे वह बेहद नापसंद करती है ताकि वह उसकी इच्छा के विरुद्ध उसके साथ सहवास कर सके। नहीं! यह एक बर्बर, क्रूर और घृणित कार्य होगा। मैं इस युवा स्त्री को वादी के साथ रहने और सहवास करने के लिए बाध्य नहीं कर सकता।”

न्यायमूर्ति पिनी के फैसले से देश भर में (बाल) विवाह की वैधता, परिवार की पवित्रता, हिन्दू संस्कृति की रक्षा और स्त्री स्वतंत्रता, अस्मिता और अधिकारों पर बहस आमने-सामने आ खड़ी हुई। विस्तार के लिए देखें ‘एनस्लेवड डॉटरस, सुधीर चंद्र, ऑक्सफ़ोर्ड प्रेस, 1997)

न्यायमूर्ति पिनी के फैसले के विरुद्ध दायर अपील की सुनवाई बम्बई उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति सर चार्ल्स सार्जेंट (मुख्य-न्यायाधीश) और सर लिटिलटन होल्योक बेली की पीठ ने की। विद्वान वकीलों (लैथम और मैक्फर्सन) की बहस सुनने के बाद न्यायमूर्तियों ने (2 अप्रैल,1886) न्यायमूर्ति पिनी का फैसला उलट दिया और मुकदमा वापिस एकल जज के पास भेज दिया गया ताकि दोनों पक्षों की गवाही और वकीलों  की बहस के बाद योग्यता के आधार पर निर्णय हो सके।

इस बीच न्यायमूर्ति पिनी इंग्लैंड लौट गए। उनकी जगह न्यायमूर्ति फैरन ने ली। बहस समाप्त होने के बाद न्यायमूर्ति फैरन ने रख्माबाई को निर्देश दिया कि वो एक महीने के भीतर अपने पति दादाजी के घर लौट जाए, अन्यथा छह महीने जेल जाने के के लिए तैयार रहे। उन दिनों वैवाहिक पुनर्स्थापना (रेस्टीट्यूशन ऑव कंजुगल राइट्स) मामले में अदालत की डिक्री के उल्लंघन की सज़ा छह महीने सज़ा होती थी।

रख्माबाई

रख्माबाई ने भी सार्वजनिक रूप से अपना संकल्प दोहराया “ऐसे निक्कमे और बीमार पति के साथ कभी नहीं रहूँगी, भले ही छह महीने जेल जाना पड़े।” रख्माबाई के इस फैसले से ब्रिटिश शासन-प्रशासन और न्याय व्यवस्था के पहिये डगमगाने लगे थे। सम्बंधित कानून-नियम बदलने की प्रक्रिया तेज हो गई। देश-दुनिया के अखबारों में बहस गर्म होने लगी। पक्ष-विपक्ष में लेख, रिपोर्ट, पत्र, साक्षात्कार छपने लगे। रख्माबाई को जेल भेजने का सम्भावित परिणाम, देश भर में विरोध प्रदर्शन और ‘स्त्री विद्रोह’ हो सकता था। रख्माबाई के बचाव में गठित समिति ने प्रिवी कौंसिल में अपील दायर करने के लिए फण्ड जमा करना शुरू कर दिया। 

नैतिकता, धर्म, संस्कृति, राष्ट्र, कानून और स्त्री अधिकारों पर बहस के साथ-साथ, कट्टरपंथी और सुधारवादी नेता बीच का रास्ता भी तलाशते रहे। प्रिवी कौंसिल में अपील दायर होने से सज़ा का खतरा टल गया। दोनों तरफ के बिचौलियों ने समझौते के बात भी जारी रखी। भारी दबाव-तनाव में सभी पक्ष टकराव से बचना चाहते थे। लंबी कानूनी लड़ाई और अनिश्चित भविष्य की भावना से रख्माबाई भी थक गई थी। फिर एक दिन रख्माबाई इस बात पर राजी हो गई कि वह दादाजी को दो हज़ार रुपये देगी और दादाजी ‘डिक्री’ को लेकर कोई कानूनी कार्यवाही नहीं करेगा। समझौते के बाद रख्माबाई आगे की पढ़ाई के लिए इंग्लैंड चली गई। बाद में वह भारत की पहली महिला डॉक्टर बनी। दादाजी की 1904 में मृत्यु होने के बाद रख्माबाई ने शेष जीवन विधवा के वेश में बिताया। 

दरअसल अदालत तक आई (लाई) अधिकांश स्त्रियाँ कानून नहीं जानती और न्याय व्यवस्था (अधिकांश पुरुष) उनकी पीड़ा को महसूस ही नहीं करते (कर सकते)। स्त्री व्यथा-कथा को उसकी नज़र से कैसे देखें, समझें, महसूस करें? समय-समाज ने कभी परिचित ही नहीं होने दिया। हम तो उसे माँ, बहन, पत्नी, बेटी, प्रिया और (खल) नायिका के रिश्तों-रूपों में ही (थोड़ा-बहुत) जानते हैं, व्यक्ति के रूप में जानना कभी सीखा-सिखाया ही नहीं गया। सो करना भी चाहें, तो महसूस कर नहीं (सकते) पाते । बात क्षणिक भावुकता या संवेदनशीलता की नहीं… उसकी पीड़ा को स्वयं की पीड़ा की तरह, आत्मसात करने की है। यह बिना प्रशिक्षित गहन संवेदना के संभव नहीं। स्त्री-पुरुष समानता पर, उपदेशात्मक आदेश सुनाना अलग बात है। न्याय के ऐसे हज़ारों निर्णय बताए-गिनाए जा सकते हैं। न्यायशास्त्र की अवधारणाएँ पुरुषों द्वारा, पुरुषों के संदर्भ में ही रची-रचाई गई हैं, ना कि स्त्रियों के संदर्भ में। मगर बदलाव की ऐतिहासिक प्रक्रिया में अनिवार्य न्यायशास्त्र के नए शस्त्र (तर्क-वितर्क, विचार और अवधारणाएं) भी, एक न एक दिन अवश्य विकसित होंगे। ‘आधी दुनिया’ अन्याय, दमन या विकल्पहीनता का बोझ, अधिक दिन तक ढो नहीं सकती। हर व्यक्ति या समाज का अपना एक सपना और संकल्प होता है, सो वो भविष्यहीन नहीं हो सकते।

कहना ना होगा कि न्यायमूर्ति पिनी का फैसला ना बदलता, तो शायद भारत की करोड़ों बेटियों को विवाह संस्था की गुलामी से राहत मिलती। यह कहना गलत नहीं कि अगर रख्माबाई के पास इतनी ‘संपत्ति’ ना होती, तो शायद मुकदमा ही नहीं होता।1884 के बाद भारत में वैवाहिक अधिकारों की पुनर्स्थापना का  कानून कुछ फेर-बदल के साथ आज भी बना हुआ है, जबकि इंग्लैंड में 1970 में ही खत्म हो गया। यहाँ महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि आज़ादी के बाद बने विशेष विवाह अधिनियम, 1954 और हिन्दू विवाह अधिनियम,1955 में वैवाहिक अधिकारों की पुनर्स्थापना का कानून शामिल ही क्यों किया गया। जवाब स्पष्ट और सीधा है कि यह विवाहित स्त्रियों पर नियंत्रण रखने में, पुरुष हितों को पोषित करता था। विधायिका की भाषा को, न्यायपालिका की परिभाषा लगातार मजबूत करती रही। धर्म, विवाह और परिवार जैसी व्यक्तिगत आस्था में धर्म-निरपेक्ष संविधान और मौलिक अधिकारों का क्या काम! 

रख्माबाई केस के लगभग सौ साल बाद आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति पी.ए.चौधरी ने टी. सरिता बनाम वेंकट सुब्बयया (एआईआर 1983 आंध्र प्रदेश 356, दिनांक 1जुलाई, 1983) केस में हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 9 (वैवाहिक अधिकारों की पुनर्स्थापना) को भेदभाव पूर्ण, बर्बर और मानवीय गरिमा का उल्लंघन मानते हुए असंवैधानिक करार दिया। लेकिन साढ़े चार महीनें बाद ही  को दिल्ली उच्चन्यायालय के न्यायमूर्ति अवध बिहारी रोहतगी ने हरविंदर कौर बनाम हरमंदर सिंह (ए आईआर 1984 दिल्ली 66, दिनांक 15 नवंबर,1983) मामले में इसे संविधान सम्मत माना। न्यायमूर्ति रोहतगी ने न्यायमूर्ति चौधरी के तर्कों की खुले शब्दों में आलोचना की और कहा कि विवाह संस्था में संवैधानिक अधिकारों का हस्ताक्षेप, चीनी मिट्टी के बर्तनों की दुकान में साँड़ घुसने (घुसाने) जैसा होगा। यह प्रावधान बनाने का उद्देश्य विवाह और परिवार बचाना है। यौन संबंध विवाह का मात्र एक हिस्सा है, सब कुछ नहीं। संवैधानिक वैधता पर बहस के लिए, अटॉर्नी जनरल (के. पारासरन) अदालत में स्वयं मौजूद रहे। 

सरोज रानी बनाम सुदर्शन कुमार (एआईआर 1984 सुप्रीम कोर्ट 1562, दिनांक 8 अगस्त,1984) में सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति एस. मुर्तजा फ़ज़ल अली और सव्यसाची मुखर्जी ने दिल्ली उच्च न्यायालय के निर्णय को सही मानते हुए, वैधता के सवाल पर पूर्ण विराम लगा दिया। न्यायमूर्तियों ने कहा कि यह अधिकार तो विवाह संस्था में ही अंतर्निहित है और हिन्दू कानून पर विषय के विद्वान् मुल्ला की किताब पढ़वाई। मतलब इस कानून को असंवैधानिक भी मान लें, तो धर्मशास्त्रों से कैसे बचेंगे! “स्त्री का धर्म है कि हमेशा अपने पति की छत्रछाया (घर) में आज्ञाकारी पत्नी बन कर रहेगी।” आश्चर्यजनक है कि तीनों अदालतों के फैसलों में, दादाजी बनाम रख्माबाई केस का कहीं कोई उल्लेख तक नहीं है। (विस्तार के लिए देखें ‘पिता पुत्री संवाद, औरत होने की सज़ा, अरविंद जैन)

इस बीच देश की अनेक अदालतों ने  बाल विवाह के मामलों भी, इसे बचाव का उचित कारण नहीं माना। रख्माबाई से लेकर सरोज रानी और अभी तक, भारतीय पितृसत्तात्मक समाज में पत्नी पति की संपत्ति और ‘यौन-दासी’ बनी हुई है। बाल विवाह और वैवाहिक बलात्कार कानून की संवैधानिक वैधता के  मुद्दे पर दिल्ली उच्च न्यायालय के तीन न्यायमूर्तियों की पूर्णपीठ के समक्ष (2008-12) बहस के दौरान, इस लेख के लेखक ने न्याय के रखवालों की हिन्दू धर्म, विवाह, परिवार और धर्मशास्त्रों में अटूट आस्था, निष्ठा और पूर्ण समर्पण को विशुद्ध रूप में उबलते-उफनते देखा (महसूस) किया है। चारों तरफ से ज़हर बुझे तर्क-बाणों के घाव, अभी तक सालते हैं। अक्सर लगता था कि शायद मैं तांबे की ठोस दीवार में कील ठोंकने का प्रयास (दुःसाहस) कर रहा हूँ। 

परिणाम स्वरूप 2013 में हुए संशोधन के बाद भी, पति को अपनी पत्नी से वैवाहिक बलात्कार का कानूनी अधिकार बना-बचा हुआ है। बाल विवाह पूर्ण रूप से अवैध नही। विचित्र स्थिति यह है कि भूतपूर्व मुख्य न्यायधीश दीपक मिश्रा ने 8 अप्रैल, 2019 को बंगलुरू में कहा कि पुरुषों के लिए वैवाहिक बलात्कार की छूट का प्रावधान हटाने से ग्रामीण परिवारों में अराजकता फैल जाएगी। परिवार संस्था बिखर जाएगी… नैतिक मूल्य नष्ट हो जाएंगे। 

खैर.. अब देखना यह है कि वैवाहिक अधिकारों की पुनर्स्थापना कानून की संवैधानिक वैधता को चुनौती देती विचाराधीन जनहित याचिका पर, सर्वोच्च न्यायालय के तीन न्यायमूर्तियों की पूर्ण पीठ कब और क्या फैसला सुनाती है। विवाह और (संयुक्त) परिवार के किले में कैद स्त्री की बेड़ियाँ टूटेंगी या नहीं।  न्यायिक विवेक फिर कोई नया समाजशास्त्र-न्यायशास्त्र रचेगा या कोई उत्तर आधुनिक सांस्कृतिक राग अलापने लगेगा। “क्या सचमुच स्त्री की आवाज़ को सुनकर अनसुना किया जा सकता है?” 

भाजपा सीएम की पत्नी उनके खिलाफ उत्पीड़न और घरेलू हिंसा की शिकायत लेकर पहुँची कोर्ट

खबर है कि त्रिपुरा के मुख्यमंत्री बिप्लब देब पर उनकी पत्नी ने घरेलू हिंसा का आरोप लगाया है।

सीएम की पत्नी नीति ने नई दिल्ली के तीस हजारी कोर्ट में पति से तलाक के लिए उत्पीड़न और घरेलू हिंसा का आरोप लगाया है।

नीति देब अपने पति बिप्लब

देब ने 2018 में त्रिपुरा के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली थी. वे वहां के लोकप्रिय मुख्यमंत्री मानिक सरकार को सत्ता से हटाकर मुख्यमंत्री बने थे और इस तरह वामपंथी सरकार के बदले वहां आज भाजपा की सरकार है।

देब अपने विवादास्पद टिप्पणियों के लिए सुर्खियाँ बटोरते रहे हैं. 2018 में उन्होंनेराष्ट्रव्यापी विवाद का दावा किया कि महाभारत युग के बाद से इंटरनेट और उपग्रह मौजूद थे। उन्होंने सिविल सेवा परीक्षा पर भी विवादास्पद टिप्पणी की, जिसमें कहा गया कि केवल सिविल इंजीनियरों को सिविल सेवा परीक्षा में बैठना चाहिए।

बेगूसराय की बिसात पर किसकी होगी शह और किसकी होगी मात?

लालबाबू ललित 

9 फरवरी 2016 से ही कन्हैया कुमार का बेगूसराय में एकतरफा महागठबंधन उम्मीदवार होने की खबरे राष्ट्रीय मीडिया में चलाई जाने लगी थीं. साम-दाम-दंड-भेद में लगे कन्हैया समर्थक जहाँ अपनी असंभव सी जीत को हासिल करने के पासे फेंक रहे हैं वहीं बेगूसराय की जमीनी हकीकत कहती है कि मुकाबला और तनवीर हसन और गिरिराज सिंह के बीच है: लाल बाबू ललित का विश्लेषण और ग्राउंड जीरो से रिपोर्ट.

तनवीर हसन और गिरिराज सिंह

बेगूसराय सीट एकबारगी राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियाँ बटोरने लगा जब राजनितिक गलियारों में इस चर्चा ने जोर पकड़ना शुरू किया कि जेएनयूएसयू के पूर्व अध्यक्ष और 9 फरवरी 2016 की इसी कैंपस में हुई एक घटना से अचानक लाइमलाइट में आये कन्हैया कुमार के वहाँ से चुनाव लड़ने की सम्भावना जताई जाने लगी। एकाएक एक दिन विभिन्न चैनलों और वेबपोर्टल पर यह खबर चलाया जाने लगा कि लालू यादव ने इस सीट से महागठबंधन से कन्हैया कुमार को लड़ाने की सहमति दे दी है। इस खबर को चलाने में एंडीटीवी से लेकर कई राष्ट्रीय चैनल थे।  ऐसे जोर- शोर से इस खबर को वायरल किया गया जैसे लगा कि सबकुछ तय हो चुका है, अब बस निर्वाचन आयोग कन्हैया को निर्वाचित होने का प्रमाण पत्र सौंपेगा और कन्हैया संसद में घुसकर मोदी की ऐसी -तैसी कर देंगे।  इस खबर ने कहाँ से अपना वजूद पाया , इस पर अलग- अलग किस्म के कयास लगाए जाने लगे लेकिन बाद में राजद के मनोज कुमार झा ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर इसे स्पष्ट किया कि इस संबंध में पार्टी या सहयोगी दलों के साथ किसी भी फोरम पर औपचारिक या अनौपचारिक किसी तरह की कोई बातचीत नहीं हुई है तो यह सवाल कहाँ पैदा होता है कि 40 सीटों में से 39 को छोड़कर सिर्फ बेगुसराय सीट के विषय में लालू जी यह घोषणा कर देंगे।  किस सीट से कौन लड़ेगा , किसके खाते में कौन सी सीट जायगी , इसके निर्धारण की एक प्रक्रिया होती है , ऐसे – कैसे किसी के नाम की कोई घोषणा कर देगा।

यह करीब साल भर पहले की बात रही होगी। कुछ दिन यह शोर थमा लेकिन पता नहीं कौन इस खबर को लगातार हवा दे रहा था कि वह सीट तो कन्हैया  कुमार की पक्की है। कयासों का दौर रुक- रुक कर चलता रहा और जब सीटों के बँटवारे का मसौदा शक्ल लेने लगा तब यह देखा गया कि महागठबंधन की बैठकों में राजद , कुशवाहा , मुकेश सहनी , जीतन राम माँझी , शरद यादव आदि तो थे लेकिन वाम दलों की उपस्थिति इन बैठकों में नहीं थी।  जग -जगह से और अलग- अलग वेब चैनल और पोर्टल यह खबर जरूर चला रहे थे कि वाम दलों से भी बातचीत जारी है और महागठबंधन में उनको भी एकमडेट करने की बात चल रही है। लेकिन जमीन पर ऐसा कुछ दीख नहीं रहा था।  ख़बरें यह भी थी कि वाम दलों के घटक सीपीआई ने 4 से 6 सीट की माँग अपने लिए रखी हुई है और बेगूसराय पर तो किसी तरह का कोई समझौता हो ही नहीं सकता।  वह सीट तो सीपीआई लड़ेगी ही लड़ेगी और कन्हैया कुमार वहां से पार्टी के उम्मीदवार होंगे। उधर सीपीआई माले ने भी अपने लिए 6 सीटों का चयन कर रखा था और 3 से नीचे जिसमें आरा , सिवान और जहानाबाद आदि सीटों पर तो समझौते की कोई बात नहीं होनी थी , इन तीन सीटों पर तो उनको लड़ना ही लड़ना था।  कुछ ऐसा ही हाल सी.पी.एम. का था जो अपने लिए 3 सीट चाह रहे थे। यानी कुल मिलाकर लेफ्ट यूनिटी अपने लिए 12 सीट से कम पर झुकने के लिए तैयार नहीं थे और उसमें भी पूर्व शर्त यह थी कि बेगूसराय पर कोई बातचीत नहीं , वह सीट कन्हैया कुमार के लिए चाहिए ही चाहिए। यह एक फंतासी में जीने वाली स्थिति थी और व्यावहारिक धरातल पर इन शर्तों का माना  जाना लगभग असंभव था।  हकीकत यह है कि सीपीआई माले को छोड़कर किसी भी अन्य वाम दल के लिए किसी सीट पर क्लेम करना सिर्फ हठधर्मिता ही है आज की तारीख में।  कायदे से 2 -3 सीट पर उन लोगों को मान जाना चाहिए था और किसी भी सीट की कोई भी पूर्व शर्त नहीं रखी जानी चाहिए थी।

खैर , यह अव्यावहारिक  समझौता नहीं होना था, नहीं हुआ। सीपीआई  अलग ही चुनाव में गयी और उसने बेगूसराय से कन्हैया कुमार को अपना उम्मीदवार घोषित किया। महागठबंधन ने अपने पुराने साथी राजद के डॉ तनवीर हसन को अपना उम्मीदवार घोषित किया। एनडीए  से यहाँ गिरिराज सिंह लड़ रहे हैं।

इस तस्वीर के बाहर आने के बाद कयास को दिया गया हवा

बेगूसराय में बाजी किसके हाथ लगेगी ? 

इस सवाल का जवाब जानने के लिए बेगूसराय की डेमोग्राफिक स्थिति को जानना जरूरी  होगा। लगभग 19 लाख वोटर्स वाले इस क्षेत्र में भूमिहार वोटर्स की आबादी सबसे अधिक है। लगभग इतनी ही या इससे थोड़ा ही कम मुस्लिम मतदाता हैं। यादवों की तादाद तीसरे नंबर पर है। बाकी जातियों और वर्गों की तादाद इन तीनों के बाद ही है। मैंने यहाँ किसी की सम्भावना को टटोलने के लिए सबसे पहले इसी कारक को सामने रखा है , इस पर कइयों को आपत्ति हो सकती है कि जाति ही सबसे बड़ा फैक्टर कैसे हो सकता है ? लेकिन मैं किसी भी तरह की फंतासी में जीने का आदि नहीं हूँ। पूरे बिहार या बिहार ही क्यों , पूरे उत्तर भारत में मतदाता जाति के आधार पर बँटे हुए हैं और इलेक्शन में वोटिंग का सबसे अधिक निर्णायक आधार यह जाति ही है। तो बेगूसराय इससे अछूता नहीं है।  और बेगूसराय में अचानक कोई क्रांति का सूत्रपात हो गया हो , ऐसा भी बिलकुल नहीं है। तो बेगूसराय भी इसी मंथन से होकर गुजरेगा। वहाँ के भूमिहार मतदाता , मुस्लिम मतदाता इस क्षेत्र के उम्मीदवारों की किस्मत निर्धारण करने में सबसे ज्यादा निर्णायक भूमिका अदा करेंगे। 

क्या सोच रहे भूमिहार मतदाता ? 

इस बात को जानने और समझने के लिए जब मैं बेगूसराय पहुँचा तो स्थिति समझने में बहुत देर नहीं लगी।  बरौनी रेलवे स्टेशन से उतरकर मैंने सिमरिया में रात बिताने की सोची। सिमरिया 2 पंचायतों में बाँटा गया है। सिमरिया -1 और सिमरिया -2 . सिमरिया एक में लगभग 5000  वोटर्स हैं जिसमें भूमिहारों की आबादी सबसे अधिक है। मैं वहाँ एक पूर्व जिला पार्षद के घर रुका था, वह भी भूमिहार हैं , जिनकी पत्नी भी 2  बार जिला पार्षद रही थीं। उनका घर राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर के घर से 2 घर बाद ही है और ये भी उनके सगे- संबंधी ही हैं। उनसे बातचीत हुई और कहा कि आपलोगों ने तो इस सीट को बहुत हॉट बना दिया है जिस पर उनका जवाब था कि बिलकुल नहीं। हमलोगों ने नहीं आप दिल्ली वालों ने इसे बेवजह इसे हवा दी हुई है जबकि जमीन पर कुछ नहीं है।  हमने पूछा कि भूमिहार मतदाता क्या सोच रहा है ? उन्होंने कहा कि आपको क्यों लगता है कि कुछ इतर सोच रहा है ? भूमिहार 90 % वोट भाजपा को करेगा। 10 % में जो कुछ कांग्रेस वाले हैं वह तनवीर हसन को देगा और इसी 10 % सेगमेंट में कुछ वोट कन्हैया को भी मिल जायगा। उनका यह भी कहना था कि भाजपा के उम्मीदवार को सबसे अधिक लीड मटिहानी विधानसभा से मिलेगा जहाँ से जदयू के नरेंद्र सिंह उर्फ़ बोगो सिंह वर्तमान विधायक हैं। उन्होंने कहा कि यह मैं लिखकर दे सकता हूँ कि सिमरिया 1 में 5000 वोट यदि गिरेंगे तो 3000 -3100 भाजपा को मिलेगा बाकी में अन्य सभी होंगे। रात का खाना खाने का मौका मुझे मिला कन्हैया के गाँव बीहट में जहाँ पर एक भोज में शामिल होने का अवसर प्राप्त हुआ। हुआ यह था कि उक्त महिला जिला पार्षद का मायका बीहट ही था और मायके में भोज था , इसलिए परिवार के सभी लोग वहीँ खाने पर आमंत्रित थे। मैं भी खुश हुआ कि एक साथ सैकड़ों लोगों की बातचीत सुनने का मौका मिलेगा। वहाँ सभी उम्र वर्ग के लोग इकठ्ठा थे।  युवा भी और बुजुर्ग भी।  10 युवा एक साथ कुर्सी पर बैठकर चुनावी चर्चा कर रहे थे।  चर्चा के केंद्र में कन्हैया और गिरिराज ही थे।  कोई भी युवा कन्हैया कह कर नहीं बल्कि कनहैवा कह कर ही संबोधित कर रहा था यहाँ तक कि कन्हैया से बहुत छोटी उम्र का लड़का सब भी।  हालाँकि वे सभी मतदाता थे। वहाँ यह बात स्पष्ट हो गयी थी कि भूमिहार मतदाता ने अपना मत तय कर लिया है और उनका वोट थोक में भाजपा के उम्मीदवार गिरिराज सिंह को मिलेगा। मेरे इस आकलन को और भी मजबूत पुष्टि मिली जब अगली सुबह मैं गिरिराज सिंह के रोड शो को सिमरिया घाट से विभिन्न इलाकों में फॉलो कर रहा था। सिमरिया में हर 10 घर में से 8 घरों की मुंडेर पर भाजपा के बड़े – बड़े झंडे लहरा रहे थे। कैलकुलस में यदि इंटीग्रेशन की थ्योरी से आप अवगत होंगे तो यह समझना बहुत मुश्किल नहीं है क़ि सिमरिया को एक पतला स्ट्रिप मानकर और पूरे बेगूसराय को एक सर्कुलर डिस्क मान लें तो पूरे भूमिहार समुदाय का मूड आसानी से समझा जा सकता है कि उनका वोट कंसोलिडेट होकर भाजपा को जा रहा है। यह बात तब और पुष्ट हो गयी जब दिनकर पुस्तकालय में कई भूमिहार शिरोमणियों से बातचीत का मौका मिला। वहाँ कुछ लोगों ने तो यहाँ तक कहा कि कन्हैया को अपने परिवार में भी सारा वोट नहीं मिलेगा।

बेगूसराय के मुस्लिम कहाँ हैं ? 

यह बहुत ही ज्वलंत सवाल है। बेगूसराय भ्रमण के दौरान और विभिन्न लोगों से बातचीत के दौरान जो बात हवा में तैर रही थी कि यहाँ मुस्लिम वोटर्स बँटे हुए हैं।  इसमें कोई शक नहीं कि मुस्लिमों का बड़ा और निर्णायक तबका महागठबंधन के उम्मीदवार तनवीर हसन के साथ खड़ा है। लेकिन यहाँ मुस्लिम वोटर्स को 3 धड़ों में बाँट रहा हूँ। एक वह तबका जो सबसे बड़ा है और तनवीर हसन के साथ है।  एक दूसरा टुकड़ा या स्लाइस है जिसमें मुख्य रूप से युवा हैं, जिसमें कन्हैया का क्रेज है।  यह टुकड़ा कितना बड़ा है , इसको लेकर अलग -अलग तरह के कयास हैं लेकिन यह तय है कि यह बहुत बड़ा नहीं है।  हो सकता है यह 10% हो या 15 % हो 20 % लेकिन किसी भी सूरत में यह 25% नहीं है। यह संभव है कि चुनाव आते -आते यह घटे लेकिन किसी भी हाल में यह बढ़ने वाला नहीं है।  इन दोनों के इतर एक बहुत छोटा तबका मुस्लिमों का ऐसा है जो वेट एंड वाच वाली स्थिति में है। इसमें बौद्धिक तबका है जो यह सुनिश्चित करना चाह रहा है कि भूमिहार का वोट किसे मिलेगा ? कन्हैया को या गिरिराज को ?  यह तबका कन्हैया के साथ जाने की सोच रहा है यदि भूमिहार की बहुतायत आबादी कन्हैया को वोट करती है. लेकिन यदि भूमिहार गिरिराज के पक्ष में गए तो ये तनवीर हसन के लिए वोट करेंगे। हालाँकि अब तक ये निर्णय करने की स्थिति में आ गए होंगे और मुझे लगता है कि अंतिम रूप से इनका वोट राजद के उम्मीदवार को जाने की पूरी सम्भावना है। इनका सीधा मकसद भाजपा विरोधी  मजबूत खेमे की तरफ जाना है।  लेकिन यह तय है बेगूसराय में सबसे अधिक उहापोह में और विभाजित मैंडेट वाला  मुस्लिम वोटर्स ही है।

यादव, कुर्मी , कुशवाहा , मल्लाह  और दलित सहित अन्य OBC ब्लॉक कहाँ खड़ा है ? 

यह बिलकुल साफ़ है कि यादव वोटर्स की 90% आबादी राजद के उम्मीदवार के पक्ष में वोट करने जा रहा है। बाकी 10 % देशभक्त हिन्दू यादव  भाजपा को भी वोट करेंगे।  कुछ वोट कन्हैया को भी मिल सकते हैं। यादव वोट में बिखराव बहुत कम है ठीक उसी तरह जैसा  कि भूमिहार वोट में है। मल्लाहों की जहाँ तक बात है , यह तबका 2014 में पूरी तरह भाजपा के साथ गया था लेकिन इस बार इसमें भी विभाजन है। और आधा – आधा वाली स्थिति है।  मल्लाहों के वोट तनवीर हसन को बंट मिल रहे हैं और भाजपा को भी।  कुछ निश्चित तौर पर सीपीआई को भी मिल रहा है।  कुर्मी , कुशवाहा सहित OBC का दूसरा ब्लॉक भाजपा की तरफ झुका हुआ है।  दलितों के वोट भी बनते हुए हैं।  इसमें से भाजपा को भी मिलना है , राजद को भी और सीपीआई को भी।  दलितों में भी एक तबका तेजी से उभरा है जो अपने आपको हिन्दू स्वाभिमान से जोड़ रहा है और उनमें फिर एक बार मोदी सरकार का जबरदस्त क्रेज है।

संघर्ष में कौन कहाँ है ? 

जमीन पर देखेंगे तो यह समझते देर न लगेगी कि मुकाबले में गिरिराज सिंह और तनवीर हसन ही हैं। जीत इन दोनों में से ही किसी की होगी।  यह बात भाजपा के लोग भी और राजद के लोग भी मान रहे हैं।  सिर्फ ये दोनों ही नहीं , सामान्य मतदाता भी यह निश्चित तौर पर मान रहे हैं कि मुकाबला तनवीर हसन और गिरिराज सिंह के ही बीच है। दबी जुबान से सीपीआई के कार्यकर्त्ता भी यह मानकर चल रहे हैं।  यह बात मैं सीपीआई काडर के कुछ लोगों से बातचीत के आधार पर कह रहा हूँ।  जिस समय मैं दिनकर पुस्तकालय में खड़ा था , ठीक उसी समय बीबीसी के रजनीश कुमार अपनी टीम के साथ कुछ लोगों का इंटरव्यू ले रहे थे।  कुल 5 लोगों में से 2 सीपीआई के सक्रिय कार्यकर्त्ता थे।  एक का नाम भी मैं बता सकता हूँ।  वे थे लक्षणदेव सिंह जो सिमरिया निवासी ही हैं और उनका परिवार सीपीआई का काडर है।  उनके साथ एक और भी थे जिससे मैंने बातचीत की और कहा कि आप तो कहीं हैं ही नहीं मुकाबले में।  धीमी जुबान में उन्होंने यह स्वीकार किया कि लोग जाति के नाम पर पूरी तरह बँटे हुए हैं जबकि पूर्व सांसद भोला सिंह ने रत्ती भर भी काम नहीं किया है।  फिर भी वोट ये लोग भाजपा को ही देंगे। किसी को भी बेगूसराय के भले की फिक्र नहीं है। 

सीपीआई क्या सोच रही है ? 

तेजस्वी यादव और कन्हैया कुमार: महागठबंधन से नजदीकी की कोशिश

सीपीआई कुछ नहीं सोच रही है।  उसे यह बखूबी अहसास है कि हारजीत की दौड़ से वह बाहर हो चुकी है। शुरुआत से उसका डेस्पेरशन साफ़ देखा जा सकता है। हद तो तब हो गयी जब इनका यह डेस्पेरशन उलूल -जूलूल हरकतों में बदलता गया। ये पूरी तरह संघी स्टाइल में काम करने लगे।  आज से 15 दिन पहले  किसी शातिर न्यूज़ पोर्टल का हवाला देते हुए लिखा कि तेजस्वी ने अपने बयान में सीपीआई उम्मीदवार के समर्थन की बात कही है।  जबकि यह पूरी तरह फेक था।  इसका अनुमान कोई इसी से लगा सकता है कि तेजस्वी अभी तक वहाँ 2 सभाएँ कर चुके हैं अपने उम्मीदवार के समर्थन में। सर्व वही नहीं , उनके अलावा जीतन राम माँझी सहित उपेंद्र कुशवाहा , मुकेश साहनी ने वहां जगह – जगह सभाएँ कर रहे है।  क्या ये लोग सीपीआई के लिए कैंपेन कर रहे हैं ? कल – परसों एक और हास्यास्पद स्थिति देखने को मिली जब कुछ कन्हैया समर्थक सोशल मीडिया पर तनवीर हसन की कन्हैया के साथ की किसी पुरानी तस्वीर का हवाला देते हुए लिख रहे थे कि तनवीर साहब ने कन्हैया को समर्थन कर देने का फैसला किया है ? यह तो बेवकूफी और शातिरपना की हद थी।  तनवीर हसन मैदान में अभी भी डंटे हुए हैं जबकि सीपीआई के महासचिव तक उन्हें बैठाने की अपील कर रहे हैं ?  अब सीपीआई इस हद तक वहाँ काम कर रही है कि खुद तो नहीं जीत सकते लेकिन मुस्लिम वोटर्स पर फोकस कर तनवीर हसन को हरा दो।  भाजपा का काम मुफ्त में आसान हो रहा है और निश्चित रूप से राजद के उम्मीदवार के पेशानी पर बल पड़  रहे हैं।

अंतिम रूप से क्या होगा ? 

यदि मुस्लिम मतों का विभाजन नहीं रुका तो भाजपा उम्मीदवार का जीतना आसान और लगभग तय हो जायगा लेकिन अंतिम समय में मुस्लिम वोटर्स ने कंसोलिडेट होकर महागठबंधन के पक्ष में वोट करने का निर्णय ले लिया तो पासा महागठबंधन की तरफ भी पलट सकता है भले जीत का मार्जिन कम हो।  उस स्थिति में कन्हैया की हालत बहुत ही बुरी होगी।  लेकिन मुस्लिम मतों में वह विभाजन करने में सफल हो गये तब भी दूसरे स्थान पर आना उनके लिए मुश्किल ही होगी।  हाँ , इस स्थिति में वह राजद उम्मीदवार को हरवाकर भाजपा के गिरिराज सिंह की जीत सुनिश्चित जरूर करेगा।

लालबाबू ललित पेशे से अधिवक्ता हैं और शौकिया राजनीतिक रिपोर्ट के लिए फ्रीलांस जर्नलिज्म करते हैं. संपर्क:8700261438

न्यायपालिका में यौन शोषण का मामला पहला नहीं है और न्याय नहीं हुआ तो आख़िरी भी नहीं होगा

अरविंद जैन


देर आयद दुरुस्त आयद के तर्ज पर भारत के सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने अपने खिलाफ़ यौन उत्पीड़न की जाँच, न्यायमूर्ति बोबड़े को सौंप दी है। न्यायमूर्ति बोबड़े ने आंतरिक समिति में, न्यायमूर्ति एन. वी.रमन्ना और इंदिरा बनर्जी को रखने का फैसला लिया है। काश! यह फैसला शनिवार को ही ले लिया गया होता, तो कितना बेहतर होता। किसी को यह नहीं लगता कि मीडिया, सुप्रीम कोर्ट बार या किसी और दबाव-तनाव में लिया फैसला है। खैर… न्यायिक विवेक जागा तो सही, भले ही थोड़ी देर से।

शिकायत कर्ता महिला और उसका पति चीफ जस्टिस रंजन गोगोई के साथ

मुख्य न्यायधीश रंजन गोगोई पर यौन शोषण के गंभीर आरोप लगे हैं, जिसे ‘षड्यंत्र’ कह कर ‘न्यायपालिका पर खतरा’ बताया जा रहा है. कोई भी कैसे भूल सकता है कि यह न्यायिक परिवार के मुखिया पर आरोप हैं! मीडिया में खबर आते ही शनिवार को तीन जजों की विशेष पीठ का गठन हुआ और पीठ में खुद मुख्य न्यायधीश मौजूद रहे, हालांकि फैसले पर उन्होंने हस्ताक्षर नहीं किये. क्यों नहीं किये हस्ताक्षर? दोनों न्यायमूर्ति ने भी आदेश में लिखा है कि यह कोई ‘न्यायिक आदेश’ नहीं है. ‘न्यायिक आदेश’ नहीं है तो क्या है? मिडिया पर कोई रोक नहीं लगाई गई बल्कि कहा गया कि अपने विवेक से समाचार प्रकाशित करें. सर्वोच्च न्यायालय के इतिहास में इस तरह और ऐसी ‘संदेहास्पद’ और ‘रहस्यमयी’ कार्यवाही शायद कभी नहीं हुई. हम सब जानते हैं कि आरोपों की जाँच और सुनवाई के समान अवसर दिए बिना, न्याय संभव नहीं हो सकता.

दरअसल न्यायपालिका के संकट या खतरे बाहरी कम, भीतरी अधिक है.अगर संविधान के रक्षकों पर ही, स्त्री अस्मिता खंडित करने के गंभीर आरोप (सही या गलत) लग रहे हैं और न्यूयार्क टाइम्स तक में छप रहे हैं, तो यह अपने आप में बेहद संगीन मामला है. न्याय मंदिरों के ‘स्वर्ण कलश’ ही कलुषित होने-दिखने लगे, तो फिर ‘लज्जा’ कहाँ फरियाद करेगी? समय रहते इसका समुचित समाधान ढूँढने और उसे कारगर रूप से लागू करने की मुख्य जिम्मेवारी, निस्संदेह न्यायिक परिवार के मुखिया और अन्य सदस्यों की ही है.

इससे बड़ी न्यायिक विडम्बना और क्या होगी कि देश की सर्वोच्च अदालत ने (‘विशाखा’ बनाम राजस्थान राज्य, ए.आई.आर. 1997 सुप्रीम कोर्ट 3012) ‘कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न’ रोकने के लिए, 13 अगस्त 1997 को जो एतिहासिक ‘दिशा-निर्देश’ जारी किये थे, उन्हें खुद अपनी अदालत में लागू करने में लगभग 17 साल लग गए. सरकार और कानून मंत्रालय भी विधेयक बनाने के बारे में 17 साल तक सोचते-विचारते रहे. आख़िरकार, 22 अप्रैल 2013 को कानून बन पाया. कारण एक नहीं, अनेक हो सकते हैं, पर इससे लिंग समानता और स्त्री रक्षा-सुरक्षा के सवाल पर, विधायिका और न्यायपालिका की गंभीरता का अनुमान तो लगाया ही जा सकता है.

इससे पहले न्यायमूर्तियों और वरिष्ठ अधिवक्ताओं पर भी यौन शोषण के आरोप लगते रहे हैं. आए दिन महिलाओं के साथ होने वाले यौन उत्पीडन, अत्याचार के दुखद हाद्सो के बावजूद समाज, मीडिया और न्यायपालिका की ख़ामोशी का मतलब क्या है? क्या औरतें यह सब होने-देखने के लिए ही अभिशप्त हैं? न्यायपालिका में पारदर्शिता पर चल रही बहस के बीच में ही, एक और ‘दुर्घटना’ हमारा सामने आई थी. मध्य प्रदेश उच्च-न्यायालय (ग्वालियर) के न्यायमूर्ती एस.के.गंगेले द्वारा यौन उत्पीड़न से परेशान महिला सत्र-न्यायाधीश द्वारा त्यागपत्र देने की. महिला की शियाकत पर, सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश आर.एम. लोढ़ा ने कहा था कि ”यह एकमात्र ऐसा पेशा है, जिसमें हम अपने सहयोगियों को भाई और बहन के रूप में देखते हैं। यह बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण घटना है. मेरे पास शिकायत आई है और मैं इस पर उचित कार्रवाई करूंगा.” जांच कमेटी द्वारा न्यायमूर्ती एस.के.गंगेले को ‘क्लीन चिट’ के बाद, महिला सत्र-न्यायाधीश ने फिर से सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया लेकिन कोई ठोस परिणाम सामने नहीं आ पाए.

आश्चर्यजनक है कि समाज के सर्वश्रेष्ठ और संदेह से परे तक ‘सम्मानित’ माने-समझे जाने वाले क्षेत्रों (शिक्षा, चिकित्सा, न्यायपालिका, मीडिया आदि) से भी, महिलाओं के देह-दमन के शर्मनाक समाचार निरंतर बढ़ते जा रहे हैं. न्याय के प्रांगन से बचाओ…बचाओ की चीख-चिल्लाहट, अस्मत के बदले इंसाफ़ की दास्ताँ या किसी न्यायमूर्ति द्वारा नौकरी पाने-बचाने की ऐसी शर्मनाक शर्तें, सचमुच गंभीर चेतावनी और चिंता का विषय है. पुनर्विचार करना पड़ेगा कि न्यायधीशों की चुनाव प्रक्रिया में किस-किस खामी के कारण, अनैतिकता और बीमार मानसिकता भी चोरी छुपे प्रवेश कर रही है. चारों ओर से सवालों का घेराव बढ़ता जा रहा है. पीड़ित स्त्री रोज एक ही सवाल पूछ रही है कि क्या न्याय की अंधी देवी के हाथों में सज़ा देने वाली तलवार को जंग लग चुका है? न्याय और कानूनविदों के चाक-चौबंद किले में, ‘कुलद्रोहिओं’ का क्या काम?

दरअसल शिक्षित और स्वावलंबी स्त्रियों को दोहरी भूमिका निभानी पड़ रही है. आज़ादी के बाद शिक्षा-दीक्षा के कारण स्त्रियाँ बदली हैं….बदल रही हैं, परन्तु भारतीय शिखर पुरुष अपनी मानसिक बनावट-बुनावट बदलाने को तैयार नहीं है. एक तरफ पुरुषों के लिए यह सत्ता से भी अधिक, लिंग वर्चस्व की लड़ाई है और दूसरी ओर स्त्रियाँ अपने सम्मान और गरिमा पर हुए हमले का हर संभव विरोध करने लगी है. दमन और विरोध के इस दुश्चक्र में यौन शोषण, उत्पीड़न और हिंसा लगातार बढ़ रही है.

समानता के संघर्ष में स्त्रियों का विरोध-प्रतिरोध या दबाव-तनाव बढ़ता है, तो कुछ उदारवादी-सुधारवादी ‘मेक-अप’ या ‘कॉस्मेटिक सर्जरी’ की तरह, नए विधि-विधान बना दिए जाते हैं और कुछ और सुधारों के सपने दिखा दिए जाते हैं. सच है कि सिर्फ कानूनी विधान-प्रावधान बना देने भर से, समस्या का समाधान नहीं होगा. विशाखा दिशा-निर्देशों की छाँव में ढले-पले अधिनियम में, अभी भी ढेरों अन्तर्विरोध और विसंगतियां मौजूद हैं. अधिनियम में ‘कानूनी गड्ढों’ और चोर रास्तों के रहते, यौन उत्पीड़न और स्त्री-विरोधी अपराधों पर लगाम लगा पाना मुश्किल होगा.

कोई भी व्यक्ति कानून से उपर नहीं है और हमें नहीं भूलना चाहिए कि हक़ मांगने वाली आवाजों को चुप कराना या रख पाना अब नामुमकिन है. शायद मीडिया को परोक्ष रूप से डरा-धमका कर झुकाया जा सकता हो, मगर सोशल मीडिया का गला घोंटना असंभव है.1860 के न्याय-शास्त्रों और सिद्धान्तों से, इक्कीसवीं सदी के वर्तमान भारतीय समाज, विशेषकर स्त्री-समाज को नहीं चलाया जा सकता. बदलते समय-समाज में सोचना पड़ेगा कि स्त्री-पुरुष समानता के सिद्धांत व्यवहार में कैसे बदलें. आम व्यक्ति की आखिरी उम्मीद हैं न्यायपालिका और हर न्यायमूर्ति से यह अपेक्षा है कि वह निष्ठा और नैतिक मानदंडों पर खरा उतरे. यह कहने से काम नहीं चलेगा कि समाज का नैतिक पतन हो रहा है और न्यायाधीश भी उसी समाज से आते हैं, सो आदर्श व्यवहार की आशा नहीं करनी चाहिए. न्यायधीश की निष्पक्षता और नैतिकता संदेह से परे होना लाज़िमी है. भारतीय समाज “न्यायधीश की बौद्धिक ईमानदारी और नैतिक चरित्र” को, “स्त्री के कौमार्य और पवित्रता” की तरह ही देखता-समझता है. निष्पक्ष न्यायधीशों के बिना, प्रजातंत्र और कानून के राज्य की रक्षा कैसे होगी? ‘आधी आबादी’ बड़ी उत्सुकता और बेचैनी से सम्पूर्ण न्याय की बाट जोह रही है. उसे यह विश्वास दिलाना ही होगा कि इंसाफ़ होने में देर या अंधेर नहीं होगा

लेखक वरिष्ठ न्यायविद हैं. संपर्क: bakeelsab@gmail.com

किन्नर से अपने बेटे का विवाह कराने वाली एक दिलेर माँ की कहानी, उसी की जुबानी


किन्नरों का सामूहिक विवाह ‘गोल्डन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड’ में दर्ज हो चुका है। इससे पूर्व किन्नरों का इतने बड़े पैमाने पर सामूहिक विवाह दुनिया के किसी कोने में नहीं हुआ था। यह सामूहिक विवाह देश के छत्तीसगढ़ प्रांत की राजधानी रायपुर में 30 मार्च, 2019 को समारोह पूर्वक संपन्न हुआ। इस सामूहिक विवाह की खास बात यह थी कि इसमें शामिल सभी पंद्रह जोड़े में सभी वधु ‘किन्नर’ यानी ‘ट्रांसवुमेन’ थी। यह सामूहिक विवाह बैंड-बाजा और बाराती के साथ पूरे धूम-धाम से संपन्न हुआ। छत्तीसगढ़ में कार्यरत ट्रांसजेंडरों की संस्था ‘मितवा समिति’ की इस पूरे आयोजन में अग्रणी भूमिका रही। देश के कई राज्यों- छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात, बिहार, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल से पंद्रह जोड़े इस सामूहिक विवाह में शामिल हुए। यह सामूहिक विवाह कई मायनों में सम्पूर्ण विश्व में अपने-आपमें अनूठा था। किन्नरों को लेकर समाज में व्याप्त भ्रांतियों को बदलने की मुहिम के एक महत्वपूर्ण पड़ाव के बतौर ही इसे देखा जाना चाहिए। इस सामूहिक विवाह में जहां राज्य के मुख्यमंत्री भूपेश सिंह बघेल और गृहमंत्री ताम्रध्वज साहू भी वर-वधु को आशीर्वाद देने के लिए आए। वहीं ज़्यादातर वर पक्ष के परिजन भी इस मौके पर उपस्थित हुए, यह भी अपने आपमें अहम बदलाव की तरफ ही इशारा करता है। भारतीय समाज में आज भी जहां ज़्यादातर लोग या तो किन्नरों को‘देवी’ का रूप मानते हैं या फिर उसे हास्य-व्यंग्य और अपमान का पात्र ही समझते हैं। इस दो किस्म के अतिरेकों के बीच आज यह समझने की आवश्यकता है कि किन्नर भी हमारी-आपकी तरह इंसान ही हैं। पुरुष शरीर में पैदा हुआ कोई व्यक्ति जब अपने आपको स्त्रियों जैसा महसूस करता है और स्त्री के रूप में रहने लगता है, तो उसे ही किन्नर के तौर पर जाना जाता है। विज्ञान ने आज ऐसे लोगों के लिए अपने लिंग को परिवर्तित कर लेने की राह को भी सुगम बना दिया है। लिंग परिवर्तित करा लेने के बाद ये किन्नर पूरी तरह स्त्री ही बन जाती है। एक स्त्री और एक ट्रांसवुमन में बस केवल इतना ही फर्क रह जाता है कि ट्रांसवुमन में बच्चे पैदा करने की क्षमता नहीं पाई जाती। इस सामूहिक विवाह में रायपुर के एक जोड़े- पंकज और ईशिता ने भी शादी रचाई। इसी मौके पर पंकज की माँ से महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा, महाराष्ट्र के समाज कार्य विषय के प्राध्यापक डॉ. मुकेश कुमार ने इस पूरे मुद्दे पर बातचीत की। पंकज की माँ की ही जुबानी यह पूरी बातचीत नीचे प्रस्तुत की जा रही है…..  

पंकज नागवानी की माँ राधा नागवानी से बात करते हुए मुकेश कुमार

पंकज नागवानी मेरा बेटा है और ईशिता मेरी बहु है। ईशिता ट्रांसवुमन है। आज हम सास-बहु साथ में बहुत अच्छी तरह से रहते हैं।हमारी एक बेटी भी है, जिसकी शादी पहले ही हो चुकी है और वह ससुराल में रहती है। हमारे काफी रिश्तेदार हैं और हमारा परिवार बहुत बड़ा है। हम मूलतः छिंदवाड़ा (मध्यप्रदेश) के रहने वाले हैं, किन्तु अब रायपुर (छत्तीसगढ़ की राजधानी) में ही बस गए हैं। हमारे परिवार को किन्नर होने के बावजूद ईशिता को अपनाने में कोई दिक्कत नहीं हुई। क्योंकि हमारे परिवार में ऐसी कोई बात ही नहीं होती कि ईशिता किन्नर है अथवा क्या है। आज हमारे पूरे परिवार को इस बात को लेकर किसी प्रकार की कोई आपत्ति नहीं है। बात रही औलाद की, कि किन्नर बच्चे पैदा नहीं कर सकती, तो फिर वंश कैसे आगे बढ़ेगा! मगर यह तो साधारण सी बात है। कई बार यह देखने में आता है कि हममें से कई स्त्रियोंके भी बच्चे पैदा नहीं होते। तो ऐसी स्थिति में हम क्या करते हैं! किसी परिवार से अथवा अनाथालय से बच्चे गोद ले लेते हैं। तो मैं भी अपने बेटे और बहु को एक बच्चा गोद ले दूँगी, पूरा हो जाएगा हमारा परिवार! और क्या चाहिए! संसार में, जिंदगी में, हमारी कितनी पीढ़ियाँ आईं और चली गईं। जरूरी तो नहीं कि हमारी सारी पीढ़ीयों की ही औलादें हुई ही हों! तब फिर इस कारण रिश्ते में समाज को क्यों आपत्ति होनी चाहिए?

जब मेरे बेटे ने ट्रांसवुमन ईशिता से विवाह के अपने फैसले के बारे में मुझे बताया, तो मैंने अपने सभी रिश्तेदारों को बुलाया और उनसे इस बारे में बात की। उन सभी ने इसपर और तो कोई आपत्ति नहीं जताई, किन्तु औलाद को लेकर ही उनकी आपत्ति थी। फिर मैंने अपने रिश्तेदारों को समझाया कि तुमलोगों की यह बात तो सही है। किन्तु स्त्री-पुरुष में भी शादी होती है, तो किसी-किसी के बाल-बच्चे नहीं होते हैं, तो उस वक्त हम क्या करते हैं! उसे तो समाज भी कुछ नहीं कहता।

पंकज की माँ ईशिता से अपनी पहली मुलाक़ात के बारे में बताते हुए वह कहती हैं कि कुछ वर्ष पूर्व एक बार मैं काफी बीमार पड़ गई थी। धनतेरश का दिन था। बेटा उस वक्त कपड़े की दुकान में काम करता था, उसे अपने काम पर जाना होता था, त्योहार के कारण उसेछुट्टीभी नहीं मिल रही थी। सो बेटे ने कहा कि बहन को ससुराल से बुला लेते हैं। लेकिन बेटी की शादी के बाद वह पहली दीपावली थी और मैं चाहती थी कि वह अपनी पहली दीपावली ससुराल में ही मनाए। इसलिए मैंने बेटे से कहा कि उसे मेरी बीमारी के बारे में बताना भी मत। तब बेटे ने ईशिता को फोन करके घर बुला लिया। उसने दो दिनों तक मेरी खूब सेवा की। उस वक्त तक मुझे पता भी नहीं चला था कि वह किन्नर है या लड़की है। दो-तीन में मैं जब चंगी (स्वस्थ्य) हो गई और चलने-फिरने लायक हो गई तो बेटे ने मुझे ईशिता के किन्नर होने की बात बताई और उसे घर में साथ रखने की बात कहने लगा। उस वक्त मैंने बेटे को समझाया कि बिना शादी किए इसे साथ में रखने पर पास-पड़ोस और समाज के लोग तरह-तरह की बातें करेंगे। यह ठीक नहीं होगा। बाद में बेटे ने मुझे बताया कि दोनों ने डोंगरगढ़ में बगैर किसी को बताए शादी भी कर ली है। तब मैंने अपने रिश्तेदारों को बुलाया, उन्हें सबकुछ बताया। सबको तैयार कर भैया-दूज के दिन गुरुद्वारे में ले जाकर दोनों की शादी करा दी। आज रायपुर में इस बड़े आयोजन में एक बार फिर मेरे बेटे और बहु की शादी का समाजीकरण होते देख काफी अच्छा लग रहा है। परिवार-समाज दोनों जगह इन दोनों को वैवाहिक जोड़े का दर्जा मिल गया है। ताकि कोई उंगली न उठा सके कि पराई लड़की को हमने अपने घर में बिन ब्याहे रख लिया है। यह हमें बिलकुल भी अच्छा नहीं लगता।

वह आगे बताती हैं कि मैं यह सोचते हुए इस रिश्ते के लिए तैयार हुई कि यदि इस शादी से इंकार करती हूँ तो बेटे का प्यार छिन जाएगा। हो सकता है इससे बेटा भटक जाए, बिगड़ जाए। यदि ऐसा होता तो आखिर मेरी ही तो औलाद बिगड़ती! यही सोचकर हमने इस रिश्ते को कबूल कर लिया। इससे मेरे बेटे को उसका प्यार मिला। उसी की खुशी में तो मेरी खुशी है। मेरा बेटा खुश है तो मैं भी खुश हूँ। यही सोचते हुए मैंने अपने बेटे की खुशी का रास्ता चुना।

चेहरे पर प्रसन्नता का भाव लिए वह कहती है कि मुझे इस बात की खुशी है कि न तो मेरे रिश्तेदारों ने और न ही समाज के दूसरे लोगों ने हमारे इस निर्णय को लेकर हमें कभी परेशान किया। होना भी यही चाहिए कि जब हमने अपने बेटे के इस रिश्ते को कबूल कर लिया तो किसी को इसमें कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए। मेरा बेटा आज अच्छे से कमाता है। कमाई के पैसे पहले मुझे लाकर देता था। शादी के बाद मैंने उससे कहा कि अब अपनी बीबी को दे, उसे भी लगना चाहिए कि तूने उसे बीबी का दर्जा दिया है। आज दोनों मेरी अच्छी तरह से देखभाल करते हैं। और मुझे क्या चाहिए!

अंत में वह कहती है कि मैं ज्यादा पढ़ी-लिखी तो नहीं हूँ। अपना नाम लिख लेना और थोड़ा-बहुत पढ़ना जानती हूँ। किन्तु मैं यह जरूर कहूँगी कि सभी माँ-बाप को अगर उनका बच्चा ऐसे फैसले लेता है तो अपने बच्चों की खुशी के लिए ऐसे रिश्ते को खुशी-खुशी स्वीकार करना चाहिए। ट्रांसवुमन और स्त्री में कोई फर्क नहीं है, वह भी अपने पति को हर खुशी देती है। बस केवल वह बच्चे पैदा नहीं कर सकती। किन्तु देश में अनाथालयों तो बच्चे भरे पड़े हुए हैं, वे वहाँ से बच्चे गोद ले सकते हैं। इससे उस अनाथ बच्चे को भी परिवार मिल जाएगा। ऐसे रिश्ते में किसी को कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए। इसमें कोई बुराई नहीं है। किन्नरों का जन्म भी तो हम स्त्रियों के ही पेट से हुआ है। तो फिर उसे अपनाने में क्या दिक्कत है! समाज को यह समझना होगा कि किन्नर कोई आसमान से नहीं टपका है। इसलिए किन्नरों को न तो गलत निगाह से ही देखा जाना चाहिए और न तो उसे हीन ही मानना चाहिए।