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“केदारनाथ सिंह की कविताओं में स्त्री”

चैताली सिन्हा

‘तीसरा सप्तक’ के कवि केदारनाथ सिंह हिन्दी साहित्य जगत में अपनी काव्य प्रतिभा के लिए जाने जाते रहेंगे . उनकी रचनात्मक प्रक्रिया ही उनके व्यक्तित्व की विशेषता है . केदारनाथ सिंह हिन्दी साहित्य के ऐसे चितेरे हैं जिनकी कविताएं अपने समय के विरुद्ध खड़ी दिखाई देती है . केदारनाथ जी की कविताओं में गाँव की गरीबी और चकाचौंध दिखने वाली शहरों का तनाव साफ़ झलकता है . यह तनाव अब नहीं है या आगे नहीं रहेगा, ऐसा कहना बेमानी होगा . यह तनाव आगे भी रहेगा . गाँव और कस्बों से रोज़ी–रोटी की तलाश में शहर आए लोगों की सिसकती ज़िन्दगियां किस क़दर शहरों के छोटे से कमरों में सिमटकर रह जाती हैं इसे कवि स्वयं भी अनुभव करते दिखाई देते हैं . केदारनाथ जी अपनी कविताओं में एक ओर जहाँ प्रकृति की सौम्यता और सरलता की बात करते हुए इस पृथ्वी के रहने की बात करते हैं, वहीं दूसरी ओर अपनी कविताओं के माध्यम से यह भी दिखाने की चेष्टा करते हैं कि शहर आपकी संवेदनाओं को किस क़दर मार देती है . प्रकृति की सरल और सहज प्रवृत्ति को शहर कठोर और क्रूर बना देती है . इसीलिए केदारनाथ की कविताओं के भीतर एक छटपटाहट और एक बेचैनी दिखाई देती है . यह छटपटाहट अकारण नहीं है बल्कि इसके पीछे कवि के भीतर का वह द्वंद्व है जो निरंतर कवि के अपने आपसे बहस करता है . करता है बहस उन तमाम उलझे हुए प्रश्नों से, उन तमाम समस्याओं और चुनौतियों से लड़ने के लिए .

पेंटिंग: हरि थापा

केदारनाथ सिंह जी ज़मीन से जुड़े हुए कवि हैं . निश्चित तौर पर नागार्जुन के बाद आधुनिक हिन्दी के सर्वाधिक लोकप्रिय, जनप्रिय कवि केदारनाथ सिंह जी ही ठहरते हैं .  ‘तीसरा सप्तक’ में सम्मिलित कवि केदारनाथ अपनी ज़मीनी स्तर पर लिखी गई कविताओं के लिए ही लोक जीवन के ज़्यादा निकट दिखाई पड़ते हैं . इनकी कविताओं के तार गाँव से लेकर शहर और हिन्दी से लेकर भोजपुरी तक जुड़ते हैं . भले ही तार सप्तक का यह तार आज टूट गया परंतु केदार जी की कविताओं में जिस संघर्ष और असीम इच्छाओं का खाका मिलता है वह आज भी वैसा ही है, जैसा पहले था . ज़िंदगी की जद्दोजहद आज भी उतनी ही उलझी हुई सी मालूम होती है, इनमें कोई बदलाव नहीं दिखता . हिन्दी साहित्य के संसार में केदारनाथ सिंह की कविता अपनी विनम्र उपस्थिति के साथ पाठक वर्ग के समीप जाकर खड़ी हो जाती है . वे अपनी कविताओं में किसी क्रांति या आंदोलन के पक्ष में बिना शोर किए मनुष्य, चींटी, घास, पत्ते, फूल, कठफोड़वा या जुलाहे के समर्थन में दिखते हैं . लोकबिम्ब से लेकर आधुनिक जीवन के तीखे स्वर उनकी कविताओं में निरंतर व्याप्त है .

प्रेम के नितांत व्यक्तिगत क्षणों को केदारनाथ जी जितनी सरलता से अपनी कविताओं में कह जाते हैं, वह किसी उस्ताद के बस की ही बात है . प्रेम की पीड़ा को भी उन्होंने अपने शब्दों में बखूबी अभिव्यक्त किया है –
“मैं जा रही हूँ – उसने कहा
जाओ – मैंने उत्तर दिया
यह जानते हुए कि
जाना हिन्दी का सबसे खौफनाक क्रिया है .”

विदा की तरह कविता का यह बिम्ब उतना ही मार्मिक, विस्तीर्ण और सहज स्वभाव वाला है . उनके लिए कविता कोई व्यक्तिगत किस्म की उपलब्धि नहीं थी, बल्कि वह दुनिया को बनाने का एक उष्मीय इरादा रखती है . केदारनाथ सिंह जी जानते हैं कि मनुष्य अपने कल्पना लोक में कितना उर्वर, राजनीतिक और फ़ितनागर हो सकता है . उनकी कविता ‘बनारस’ को ध्यान से पढ़ने पर बनारस एक बिम्ब के रूप में हमारे समक्ष प्रस्तुत होता है . जिन तत्त्वों से मिलकर यह शहर बनता है . वह उनकी कविता की बुनावट में चला आता है .  चाहे वह कबीर पर लिखी कविताएँ हों अथवा सुई-धागों के विषय में लिखी कविताएँ हों .

केदारनाथ जी की काव्य यात्रा नवगीत से शुरू हुई  थी . उनके नवगीतों का संग्रह ‘अभी बिलकुल अभी’ हिन्दी में बहुत चर्चित रहा . आज जबकि हिन्दी में नवगीतों की परंपरा अमूमन ख़त्म सा हो गया है, उनके नवगीत आज भी पाठकों को आकर्षित करते हैं . जहाँ तक आधुनिक कविताओं की उनके पहले संग्रह की बात है तो यह केदारनाथ जी के प्रगतिशील होने की ओर संकेत करता है . ‘ज़मीन पक रही है’ एक अत्यंत महत्वपूर्ण संग्रह है . केदारनाथ सिंह जी हमेशा देहाती, गाँव के आदमी बने रहे . इसीलिए उनकी कविताओं का मिजाज़ गंवईपना लिए हुए है . गाँव से कस्बे में आने का, कस्बे से दिल्ली जैसे महानगर में आने का तनाव भी दिखता है . ऐसे तनाव का प्रयोग वे जिस प्रकार करते हैं वह भी अपने आप में अनोखा है . दिल्ली के विषय में उनकी यह पंक्तियाँ देखने योग्य है
“बारिश शुरू हो रही है
बिजली गिरने का डर है
वे क्यों भागे जाते हैं
जिनके घर हैं .”[1]

जहाँ तक केदारनाथ सिंह की कविताओं में स्त्री पक्ष की बात है तो वह हमें कई रूपों में दिखाई पड़ती है . स्त्री पर बात करते हुए केदारनाथ जी ने कई कविताएँ लिखीं हैं . इनमें – ‘हॉकर’, ‘जो एक स्त्री को जानता है’, ‘नमक’, ‘तुम आईं’, ‘टमाटर बेचनेवाली बुढ़िया’, ‘सुई और तागे के बीच’, ‘हाथ’, ‘जाना’, ‘आना’, ‘बाघ’, ‘घुलते हुए गलते हुए’, ‘एक पारिवारिक प्रश्न’ आदि . केदारनाथ सिंह की कविताओं में स्त्री का प्रेरणादायी रूप और ‘अजूबा’ रूप दोनों का चित्रण मिलता है . उनकी कविताओं में स्त्री एक सर्वस्व के रूप में स्वीकारी गई हैं तो कभी उसका परित्यक्ता रूप भी दिखाया गया है .

केदार नाथ सिंह की कविता पंक्ति

स्त्री की सुन्दर एवं प्रेरणादायी रूप का चित्रण करते हुए कवि लिखते हैं –
उसका हाथ
अपने हाथ में लेते हुए मैंने सोचा
दुनिया को
हाथ की तरह गर्म और सुंदर होना चाहिए .”

इसी संदर्भ में उनकी एक और कविता को यहाँ देखना चाहिए, जहाँ कवि स्त्री की कठोर परिश्रमी रूप का चित्रण करते हुए ‘सुई और तागे के बीच में’ शीर्षक कविता में लिखते हैं –
माँ मेरे अकेलेपन के बारे में सोच रही है
पानी गिर नहीं रहा
गिर सकता है किसी भी समय
मुझे बाहर जाना है
और माँ चुप है कि मुझे बाहर जाना है….”

यह एक लंबी कविता है, जिसमें कवि स्त्री के परिश्रमी और पारिवारिक ज़िम्मेदारियों के बोझ तले दबी हुई छवि को दिखाते हैं . परिवार का बोझा ढोते-ढोते एक स्त्री, एक माँ का शरीर किस प्रकार झुकता जाता है, ढलता जाता है, इसका बेहद मार्मिक और कारुणिक बिम्ब खड़ा करते हैं कवि केदारनाथ सिंह जी यहाँ . यह झुकना, स्त्री का सांसारिक बोझ से झुकना है, दिन-ब-दिन ढलते उम्र से झुकना है, कर्तव्यों के बढ़ते बोझ से, दायित्वों के बोझ से झुकना है . यानी परिश्रम करती स्त्रियों की पीड़ा, उनके कष्ट का मर्म कवि समझते हैं . इस थका देनेवाली दिनचर्या में स्त्री कभी खाली नहीं बैठती वरन सुई और तागा लेकर बैठ जाती हैं . कवि अपनी माँ के माध्यम से संपूर्ण स्त्री समुदाय का श्रम उजागर करते हैं .

यह सर्वविदित है कि गया वक्त पुनः लौटकर नहीं आता . फिर भी कवि का यह प्रयास है कि उस उधड़े हुए समय को फिर से सिलने का प्रयत्न किया जाए ! यहाँ हमें कवि के आशावादी होने का परिचय मिलता है . जीवंतता का परिचय मिलता है . सुई और तागे की बात करते हुए करघे की बात करना, इस बात का संकेत है कि केदारनाथ जी कहीं-न-कहीं महात्मा गांधी के लघु-कुटीर उद्योग से प्रभावित थे और हथकरघा पद्धति में भी विश्वास करते थे . साथ ही इस उद्योग के बहाने स्त्री-श्रम को जो बल मिला, रोज़गार मिली, आय के साधन बढ़े आदि बातों से भी कवि इत्तेफाक़ रखते थे . ‘खूब मोटे और गझिन और खुरदुरे’ ये पंक्तियाँ खादी वस्त्र की विशेषता और सूत कातने वाले चरखे की ओर संकेत करता है .

इसी प्रकार केदार जी की एक और कविता है, जिसमें उन्होंने ग्रामीण जीवन में व्याप्त गरीबी, अभाव और स्त्री का सर्वस्व बचाकर रखने का भाव व्यक्त किया है . कविता का शीर्षक है – ‘घुलते हुए गलते हुए’ –
“सहसा बौछारों की ओट में
दिख जाती है एक स्त्री
उपले बटोरती हुई….
अंतिम पंक्तियों में कविता का बिंब देखने योग्य है –
स्त्री को
बौछारों में
धीरे-धीरे घुलते हुए
गलते हुए देखता हूँ मैं .”

यहाँ भी कामकाजी स्त्री की बात करते हैं कवि . स्त्री के जीवन में व्याप्त अभाव और गरीबी का यथार्थ चित्रण करते हैं . कवि ने स्त्री का बिंब एक ऐसे रूप में खींचा है जो सहज ही गाँव की जीवन शैली को दर्शाता है . ग्रामीण परिवेश में रचे-बसे लोक जीवन को दर्शाता है . ऐसे में यदि केदारनाथ सिंह जी को गाँव का कवि, जन का कवि कहा जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होगी . कवि के काव्य जगत में स्त्री हर रूप में चित्रित की गई हैं . उपले बचाने की कोशिश के माध्यम से यहाँ स्त्री अपना सर्वस्व बचाने की चेष्टा करती दिखाई देती हैं . स्त्री का स्वभाव है सब कुछ समेटने, सहेजने और सुरक्षित रखने की . वह जीवन में कुछ भी खोना नहीं चाहती . अपने समर्पण का उदात्त भाव वह अपनी गृहस्थी में लगा देना जानती हैं . स्त्री का घुलना और गलना स्वयं के अस्तित्व को मिटा देने की उत्कट जिजीविषा को व्यक्त करता है . स्त्री कई बार इस प्रयास में स्वयं को, स्वयं के अस्तित्व को मिटा देती है . स्त्री का हृदय अधिक उदार और स्नेहिल भाव का होता है, इस बात को कवि भी कहीं-न-कहीं स्वीकार करते हैं . स्त्री का श्रमिक रूप हमें आगे चलकर मार्क्सवाद की ओर ले जाती है . इसके अतिरिक्त कवि की बेहद चर्चित कविता ‘बाघ’ की यदि बात की जाए तो हम देखेंगे कि इस कविता की शुरुआत ही एक स्त्री को जानने के संदर्भ में की गई है . जहाँ कवि लिखते हैं कि-
“मैं एक स्त्री को जानता हूँ
जो एक छोटे से शहर में रहती
तो हो …जाएगा प्रकट .”
कविता ज़्यादा लंबी तो नहीं परंतु जितनी भी है वह अपने आपमें बहुत कुछ कहती है .

कवि यहाँ किस स्त्री की बात करते हैं, इसे समझने की ज़रूरत है . क्या वह स्त्री कवि से इतना आत्मीय संबंध रखती थीं कि कवि को उस वृद्धा स्त्री की एक-एक शब्द याद हैं . अथवा गाँव की परंपरा में दादी–नानी कही जाने वाली कोई चिरपरिचित अपनी हैं . एक स्त्री के माध्यम से कवि जिस बाघ की कहानी कहलवा रहे हैं, समझने की बात यहाँ यह है कि बाघ अन्तत: किसका प्रतीक है? सत्ता का अथवा आज के लोकतंत्र का वह कुरूप सत्य है जिससे हम और हमारी पीढ़ी रू–ब–रू हो रहे हैं . यह भय सत्ता के भीतर मौजूद वह भय है जिससे सर्वाधिक आम आदमी खौफ़जदा और आतंकित हैं . 

कवि का सूक्ष्म दृष्टिकोण उस ओर भी इशारा करता है, जहाँ प्रेम पर पहरा है . ऐसे पहरुओं के कारण प्रेम का उदात्त भाव या स्वरुप यहाँ नहीं पनप पाती क्योंकि जिस बाघ रूपी समाज का भय यहाँ उपस्थित है, वह बाघ कभी भी साधारण मनुष्य को डरा सकती है . डरा सकती है उन हथियारों से जिससे हो सकता है प्रेम का अंत . ऐसे पंजों से डरती है वह स्त्री, वह प्रेमी युगल जिसके भीतर सदैव एक डर बैठा रहता है, स्वयं के मारे जाने का .

यह बाघ दरअसल कोई और नहीं बल्कि एक भय का नाम है . यह भय हमारे समाज में भी मौजूद है और हमारे भीतर भी मौजूद है . यह बाघ कवि के स्वप्न का आधार है . बाघ मनुष्य के इतना निकट है कि एक के विनाश के साथ ही दूसरे के ध्वस्त हो जाने का संकल्प बहुत सहज भाव से जुड़ गया है .

केदारनाथ सिंह

केदारनाथ सिंह जी की स्त्री केन्द्रित एक और कविता है जिसका शीर्षक है ‘नमक’ . इसके अतिरिक्त एक अन्य कविता है, जिसका शीर्षक है – ‘जो एक स्त्री को जानता है’ . उपर्युक्त दोनों ही कविताएँ एक विशेष प्रकार की मांग करती है और वह मांग है स्त्री विमर्श और स्त्री अस्मिता की .

‘नमक’ कविता का आरम्भ नमक के स्वगत संवाद और वह भी प्रश्नवाची मुद्रा से होता है . नमक शहर से गुज़रता हुआ चुपके से एक घर में प्रवेश करता है . फिर चूल्हे के पास जाकर दाल-सब्ज़ी में घुल जाता है और जब खाने की मेज सजती है तो परिवार में सबसे अधिक नमक ही खुश होता है . मानो ‘नमक’ नमक न होकर परिवार का कोई सदस्य ही हो . (यहाँ नमक का अद्भुत मानवीकरण किया गया है .) कवि के ही शब्दों में –
“जैसे उसकी जीभ अपनी ही बोटी के
स्वाद का इंतज़ार कर रही हो .”

परंतु इसके तुरंत बाद ही यथास्थिति बिलकुल बदल जाती है जब घर का पुरुष चीखते हुए कहता है कि दाल फीकी है . और कविता, कविता न होकर मानो एक कहानी के रूप में अचानक से नाटकीय मोड़ ले लेती है –
“मैं कहता हूँ दाल फीकी है
पुरुष ने लगभग चीखते हुए कहा
अब स्त्री चुप
कुत्ता हैरान
ताकते हुए ….! (उत्तर कबीर तथा अन्य कविताएँ : पृ. 20)

इस कविता का विश्लेषण जिस रूप में किया जाना चाहिए, उस रूप में नहीं की गई . इस कविता को सिर्फ़ नमक के स्वाद तक ही सीमित कर दिया गया . परंतु क्या बात सिर्फ़ उतनी ही है, जितनी कही गई या दिखाई गई ! सवालिया निशान खड़ा होता है .

इस पूरी प्रक्रिया में एक मात्र पुरुष ही चिल्ला रहा है, स्त्री चुप है, मानो उससे कोई बहुत बड़ी भूल हो गई हो . स्त्री की चुप्पी ही उसे स्वयं को अपराधबोध से भर देता है . क्या यहाँ पुरुष का संयमित होना भी आवश्यक नहीं था? सिर्फ़ ज़रा-सा नमक ही तो कम डला था खाने में ! इस पर पुरुष का चिल्लाना यह दर्शाता है कि स्त्री को किसी भी तरह की भूल करने की इजाज़त नहीं है . चाहे वह अज्ञानतावश ही क्यों न हो . पितृसत्ता के भीतर स्त्री की छोटी-से-छोटी भूल भी अक्षम्य है . पुरुष का स्त्री पर क्रोधित होना स्त्री पर उसके एकाधिकार भाव को दर्शाता है, जहाँ उसे उसकी इच्छा के विरुद्ध कुछ भी करने की स्वतंत्रता नहीं है . परिवार की हर छोटी-बड़ी घटना के लिए स्त्री को दोष देना, ज़िम्मेदार ठहराना पितृसत्तात्मक समाज की विशेषता है .

परंतु यह पितृसत्ता यह भूल जाती है कि स्त्री का अपना भी कोई अस्तित्व है, कोई पहचान है . उसकी अपनी भी कोई इच्छा हो सकती है . स्त्री की खुद की भी कोई जिजीविषा हो सकती है . स्त्री को मनुष्य समझने की शक्ति अब तक इस पितृसत्ता में नहीं आई . स्त्री आज भी अपने होने का प्रमाण देती फिर रही हैं . ‘अस्मिता’ जो कि मुख्यतः स्त्री के स्वाभिमान की लड़ाई है, स्वत्व का बोध है, वह आत्मनिर्णय और आत्माभिव्यक्ति का प्रश्न है, जो किसी को व्यक्ति बनाता है . ‘अस्मि’ अर्थात् मैं हूँ .’ इस होने का एहसास स्त्री को बार-बार इस समाज में कराना पड़ता है . दरअसल अस्मिता-विमर्श सत्ता के समीकरण और शक्ति के संतुलन में अपने हिस्से पर दावे की सैद्धांतिकी है . यह स्वत्व का बोध असल में स्त्री के स्वाभिमान के साथ जुड़ा हुआ प्रश्न है . परन्तु कविता में चित्रित स्त्री की दशा पर यदि ध्यान दिया जाए तो हमें सीमोन द बोउवार की कुछ पंक्तियाँ अनायास ही याद हो आती है, जहाँ वह कहती हैं कि – ‘मात्र वर्ग-संघर्ष के द्वारा ही स्त्री-मुक्ति के महान लक्ष्य को हासिल नहीं किया जा सकता … चाहे साम्यवादी हों, मार्क्सवादी हों, माओवादी हों या ट्राटस्कीवादी, औरत हर जगह, हर खेमे में अधीनस्थ की स्थिति में है, सबसे निचले पायदानों पर खड़ी है .’

 ‘नमक’ कविता में स्त्री की चुप्पी का भी यही अर्थ है कि पितृसत्ता दलन के उन वैश्विक और ऐतिहासिक तरीकों का प्रयोग करती रही है, जो स्त्री को उसकी जैविक, अधीनस्थ स्थिति से बार – बार परिचित कराती है . पितृसत्ताक समाज स्त्री के मुद्दे पर सोचना ही नहीं चाहती . पितृसता की आन्तरिक इच्छा यही है कि समर्पण एक तरफा हो .

इस कविता की दूसरी विशेषता है कुत्ते और बच्चे की प्रतिक्रियाएं, जो कि उनकी भंगिमाओं से पता चलता है . केदारनाथ जी की कविताओं में भंगिमाओं के माध्यम से एक बिम्ब खड़ा करने का अद्भुत कौशल दिखाई पड़ता है . केदारनाथ सिंह एक ऐसे कवि हैं, जिन्होंने अपनी अमूमन कविताओं में स्त्री की पीड़ा को उकेरा है . यानी स्त्री मन को समझने की उनमें अद्भुत क्षमता है . ध्यान देने की बात है कि इन पंक्तिओं में मौन सबसे ज्यादा मुखर है –  यह चुप्पी की दहाड़ और अनबोले की ताकत ! जिसका वहन भी वह स्त्री /पत्नी ही करती है, पुरुष अथवा पति नहीं .

केदारनाथ सिंह की कविताओं का एक स्वर और भी है, और वह है रूमानियत का . केदारनाथ जी की कविताएं देखने और पढ़ने में भले ही  सरल लग सकता है परन्तु इनके अर्थ का गाम्भीर्य कभी-कभी पाठक को बड़ी उलझन में डाल देती है . कई बार यह नितांत कठिन हो जाता है कि अन्ततः कविता कहना क्या चाहती है . इसका उदाहरण हम उनकी कविता ‘ जो एक स्त्री को जानता है’ में देख सकते हैं . परन्तु यह जानना किस प्रकार का जानना है, एक अबूझ पहेली सी प्रतीत होती है –  “हवा को बहने दो
और उस स्त्री को भूल जाओ
जिसे तुम प्यार करते हो
. . . . . . . . . . . . . . ..”

यहाँ स्वतः एक प्रश्न मन में उठने लगता है, क्या स्त्री से प्रेम करना इतना निकृष्ट कार्य है कि उसे भूलने के एवज में जंगली पत्तों और जंगली पशुओं से तुलना की जाए? हम जानते हैं कि ‘जंगली’ शब्द का अर्थ क्या होता है ! यानी एक ऐसा प्राणी जिसमें विवेक का अभाव होता है . क्या स्त्री या प्रेमिका की तुलना जंगली, विवेकहीन प्राणी या पेड़-पौधों और पत्ते से की गई है? क्या स्त्री को वाकई में इन उपमाओं से नवाजी जानी चाहिए ! क्या कवि का दृष्टिकोण भी स्त्री विरोधी नहीं है? यदि ऐसा है, तब तो निश्चित ही संत अगस्ताइन का यह कथन उचित है कि – “औरत वह जीव है, जो न स्थिर है और न कृत संकल्प .” और सीमोन का भी यह कहना उचित ही है कि – “स्त्री, पुरुष प्रधान समाज की एक कृति है . वह अपनी सत्ता को बनाए रखने के लिए स्त्री को जन्म से ही उनके नियमों के ढाँचे में ढालता चलता गया है .”[2]

तमाम ऐसे प्रश्न हैं इस कविता में जो स्त्री की छवि को धूमिल करती है . इसी कविता में कवि स्त्री को एक और नया नाम देते हैं – ‘अजूबा’ .

‘अजूबा’ कौन कहलाता है यह हम, आप सभी जानते हैं . अर्थात् हास्यास्पद दिखनेवाले, दुनिया में जो अनोखा हो, अद्वितीय हो . यदि अद्वितीय और अमूल्य के संदर्भ में बात हो तब तो निश्चित ही कवि का मंतव्य यहाँ एक स्त्री के प्रति अगाध प्रेम, स्नेह, सम्मान और आदरणीय भावनाओं के पक्ष में है . परंतु भाव यहाँ वह नहीं है . यदि ‘अजूबा’ से कवि का तात्पर्य व्यंग्यात्मक है तो यहाँ वही बात चरितार्थ होती है जो रोमन क़ानून में स्त्री को लक्ष्य करके कहा गया है कि – “स्त्री बेवकुफ और असंतुलित होती है .”[3]
कवि का मंतव्य यहाँ जो भी रहा हो परंतु यहाँ स्त्री की नकारात्मक छवि ही उभर कर आती है .

दूसरी ओर कवि नदी की बात करते हैं . नदी, जो प्रतीक है निरंतरता की, हर परिस्थिति में बहते जाने की, नदी प्रतीक है जीवंतता की  . कवि का स्त्री की बात करते -करते अचानक नदी की बात करना दोनों में समानता की ओर संकेत करता है . जिस प्रकार नदी और घास तमाम मौसमी झंझावातों को झेलते हुए पुनः अपनी यथास्थिति में बनी रहती है, ठीक उसी प्रकार स्त्री अपने जीवन के सभी कष्टों, अन्यायों, अपमान, उपेक्षा और प्रताड़नाओं को सहती हुई फिर से अपने उदार रूप में, स्नेहिल रूप में लौट आने की शक्ति रखती है .

जिस हरे घास पर क्षण भर बिताने की बात अज्ञेय करते हैं, उसी घास को केदारनाथ सिंह जी किसी की आत्मा में उगाकर उसे फिर से हरा करने का प्रयत्न करते हैं . यह विरले ही होंगे कि घास को भी किसी की आत्मा से जोड़ सकते हैं और उसमें पुनः जिजीविषा के लिए ऊर्जा भर सकते हैं . यह एक बड़े रचनाकार की विशेषता है, दरअसल घास का हरापन जीवंतता का प्रतीक है, आशा का प्रतीक है, सृजनशीलता का प्रतीक है, इसलिए कवि घास को बार–बार अपनी कविता में लाते हैं . जीवन-संघर्ष की थपेड़ों से हारा हुआ मनुष्य गिर के पुनः संभल सके, यह प्रेरणा भी हमें घास से मिलती है . यहाँ घास प्रतीक है दबे कुचलों का, शोषितों का, दमितों का . परन्तु घास में अदम्य क्षमता है, फिर से उठ खड़े होने का .

स्त्री मन को केदारनाथ सिंह जी कितना समझते हैं, इसका प्रमाण हमें उनकी कविता ‘तुम आईं’ में देखने को मिलता है –

“तुम आईं                                                                                                          
जैसे छीमियों में धीरे-धीरे
आता है रस  – – –  – – – – .
– – –  – – – – – – – – – – – –
जैसे दाने अलगाए जाते हैं भूसे से
तुमने मुझे खुद से अलगाया .”                                               

(1967),(‘केदारनाथ सिंह , प्रतिनिधि कविताएँ’, पृ.93-94 )

यानी मिलन के साथ ही बिछुड़ने  का दंश . ये एक गंभीर एवं परिपक्व कवि की ही रचना हो सकती है . जिन्होंने बहुत ही कम शब्दों में और बिना किसी लाग-लपेट के प्रेम का आदि, मध्य और अंत, तीनों ही अवस्थाओं को दिखा दिया और किसी को पता भी नहीं चला . प्रेम का प्रारंभिक रूप अर्थात प्रथम परिचय फिर मिलन का बढ़ता उपक्रम और अंत में अलगाव . पाठक को यहाँ बहुत कम समय मिला यह समझने में कि कवि कब एक दूसरे से अलग भी हो गए दाने से भूसे की तरह . कविता में प्रयुक्त प्रत्येक शब्द एक बिम्ब खड़ा करता है . मानो  वह पूरी प्रक्रिया साक्षात् हमारे समक्ष घटित हो रही हो .

ध्यातव्य है कि वह स्त्री कोई भी हो सकती है . एक पत्नी, एक प्रेमिका, एक पुत्री एक मित्र और एक माँ . जिनसे मिलना बहुत कम समय के लिए हुआ . जीवन में जिनके साथ रह पाने का सुख बहुत क्षणिक रहा . कवि केदार जी ने अपनी माँ और पत्नी से अपने स्नेहील अनुराग का भी उल्लेख किया है अपनी कुछ कविताओं में . कविता में प्रयुक्त शब्द ‘पकाना’ का अर्थ बड़े फ़लक पर है . पकाया अर्थात् जीवनानुभवों से पकाया . जीवन संघर्षों एवं चुनौतियों से लड़ना सिखाया . अच्छे-बुरे का भेद बताया . हर परिस्थिति में डटे रहना सिखाया .

इस कविता में एक गहरा दुःख है . एक गहरी वेदना है . संवेदना है उस स्त्री के प्रति, जो बहुत कम समय के लिए कवि के जीवन में आईं और बहुत जल्दी ही बिछड़ भी गईं . कवि छोटी-छोटी क्रियाओं के माध्यम से एक स्त्री के सभी चारित्रिक गुणों को उजागर कर देते हैं . उसका आना, हंसना, दिखना, हिलना तथा चलना आदि शब्दों से स्त्री के स्वरूप का स्वतः अनुभव हो जाता है कि वह जब आती है तो कैसे, जैसे छीमियों में धीरे-धीरे आता है रस यानी प्रेम का आगमन हुआ . स्त्री का कोमल स्वभाव, उसका हँसना जैसे तट पर पानी का बजना . कवि की अद्भुत कल्पना ! पानी बजता भी है . प्रायः पानी के कलकल ध्वनि के विषय में पढ़ते हैं परंतु केदारनाथ जी के यहाँ पानी बजता है .

इसी संदर्भ एक और कविता देखनी चाहिए, जहाँ वे लिखते हैं कि –
“उसका हाथ
अपने हाथ में लेते हुए मैंने सोचा
दुनिया को
हाथ की तरह गरम और सुंदर होना चाहिए .” (वही, पृ. 94)

हम जानते हैं कि हाथ कर्मों का प्रतीक है . इन पंक्तियों में कवि ने विश्व मानव की, विश्वबंधुत्व की बात की है . वैश्विक स्तर पर भाईचारे को स्थापित करने की बात की है . भूमंडलीकरण के इस दौर में और उपभोक्तावादी संस्कृति के दौर में आज मनुष्य के आपसी संबंधो में जो दूरी आई है कवि उसे लेकर कहीं-न-कहीं चिंतित दिखाई देते हैं . हाथ को माध्यम बनाकर वैश्विक परिप्रेक्ष्य में समभाव और सौहार्द की बात कह जाना एक दूरदर्शी रचनाकार की पहचान है .

केदारनाथ सिंह की कविताओं में स्त्री कई रूपों में दिखाई देती हैं . कभी वह प्रेयसी के रूप में आती है तो कभी पत्नी के रूप में, कभी पुत्री के रूप में तो कभी माँ के रूप में . कभी नदी के रूप में तो कभी विश्व के रूप में . कभी प्रकृति के रूप में आती है तो कभी एक श्रमिक स्त्री के रूप में . इतना ही नहीं केदारनाथ जी के यहाँ स्त्री एक ‘अजूबे’ के रूप में भी आती है .           ‘अजूबा’ कहने और जंगली पत्तों एवं जानवरों के गर्म रोओं के साथ स्त्री के संसर्ग में रहने वाले व्यक्ति को भूल जाने की सलाह दे डालते हैं .

ये बात सच है कि स्त्री को अभी भी मनुष्य नहीं समझा गया . स्त्री का दायरा अभी भी एक सीमित घेरे में ही है . यदि स्त्री को मनुष्य समझा जाता तो केदारनाथ सिंह जी भी अपनी कविता में स्त्री को एक ‘अजूबा’ की संज्ञा देने से अवश्य कतराते . उनका स्त्री को जानना अर्थात् जंगली पत्तों और जानवर तथा अजूबे को जानने के बराबर यदि समझा गया तो निश्चित ही इसके पीछे यही कारण है . प्रभा खेतान की आत्मकथा ‘अन्या से अनन्या’ में आइलिन प्रभा खेतान से यही प्रश्न करती है कि स्त्री को अभी भी मनुष्य समझा ही कहाँ गया है . स्त्री की अस्मिता आज भी खतरे में है और तब तक रहेगा, जब तक स्त्री को मनुष्य नहीं समझा जाएगा .

यद्यपि केदारनाथ सिंह जी की कविताओं में वर्णित उन स्त्रियों की विशेषताओं को भी नकारा नहीं जा सकता जहाँ उन्होंने स्त्री के संघर्षपूर्ण, श्रमिक और कामकाजी रूप को उजागर किया है .

स्त्री केंद्रित प्रायः प्रत्येक कविता में एक ऐसी स्त्री का चित्रण है जो किसी-न-किसी  रूप में संघर्षपूर्ण जीवन जी रही हैं . फिर चाहे वह स्त्री कोई टमाटर बेचनेवाली हो या फिर बारिश में भीगते हुए उपले बचाती कोई स्त्री . दिनभर की थकान के बाद रात को जगकर सुई तागे का काम करती कोई आत्मीय हों अथवा कोई कहानी सुनाने वाली गाँव की दादी–नानी .  सुई और तागे के काम में कवि ने वृद्धा की जो तल्लीनता दिखाई है वह प्रशंसनीय है . इस कविता को पढ़ते हुए ऐसा प्रतीत होता है कि केदारनाथ जी गाँधी जी के लघु-कुटीर उद्योग से प्रभावित थे . चरखे और खादी वस्त्र के महत्त्व को समझते थे . हथकरघा पद्धति को अपनाने में कवि का विश्वास था .

ऐसा कौन-सा पक्ष और ऐसा कौन-सा विषय है, जिसपर कवि ने अपनी कलम नहीं चलाई . ऐसा कौन-सा मुद्दा नहीं है जिसपर वे बात नहीं करते . विषयों की वैविध्यता केदारनाथ जी की रचनाओं में देखने को मिलता है . चींटी से लेकर हाथी तक और राई से लेकर पहाड़ तक, अमूमन हर विषय पर उनकी लेखनी मिलती है . देश के प्रति उनकी चिंता कविताओं में साफ़ मुखर होती है . एकांगी होता मनुष्य का जीवन एक दिन सिर्फ़ अपना सिर ढोएगा, बोझा ढोने के बजाय, इस बात की चिंता कवि को सालती रहती है . और अंततः रह जाएगी मनुष्य की चिंताओं की गठरियाँ जिन्हें वह वीराने में ढोते फिरेंगे .

परन्तु यहाँ हमें एक और महत्वपूर्ण बात भी याद रखनी होगी कि कवि जीवन को और इस पृथ्वी को लेकर बहुत ही आशावादी हैं . उन्हें यकीन है कि यह पृथ्वी रहेगी उनके रहते हुए और उनके बाद भी . इससे कवि के सकारात्मक सोच का पता चलता है . कवि ने अपनी कविताओं में चुप्पी और शब्दों की ध्वनि पर बहुत ज़ोर दिया है . उनकी प्रायः हर कविता में ‘चुप्पी’ का अर्थ बहुत गंभीर और कई बार खतरनाक सन्नाटा पैदा करती है . इस चुप्पी के भीतर ही हमें स्त्री के लगभग प्रत्येक पक्ष को देखने का अवसर मिलता है . स्त्री कई बार उपेक्षित और कई बार सर्वोपरि स्थान में बिठा दिए जाने के रूप में दृष्टिगत होती है .

केदारनाथ सिंह गाँव से शहर और शहर से गाँव की ओर रुख करते हैं . उनके स्वयं के भीतर एक गाँव बसता है . इस गाँव के भीतर का हर एक रेशा, हर एक तंतु कवि की स्मृति में सजीव है, जीवंत है . इस जीवंतता में मौजूद हैं वे सारी स्मृतियाँ, वे सारे रिश्ते नाते, वे सारे पल-कण जिसे कवि एक-एक कर चुनते हैं और अपनी कविताओं की बगिया में बिछा देते हैं . बिछा देते हैं अपनी माँ के स्मृतियों को, अपनी पत्नी से जुड़ी यादों को, गाँव की उन तमाम उम्रदराज़ औरतों को, जिन्हें कभी उपले बचाते तो कभी टमाटर बेचते हुए देखा गया था . कवि की स्मृतियों में सिर्फ खुरदुरा और झुर्रियों से भरी चेहरे वाली स्त्रियाँ ही शामिल नहीं हैं बल्कि स्त्री का सौम्य, करुणामयी और प्रेयसी वाला रूप भी शामिल है .

          अतः यह कहना समीचीन होगा कि केदारनाथ सिंह की कविताएँ न सिर्फ़ गली-मुहल्लों, कस्बों, गाँवों और नगरों की बात करते हैं वरन देश-विदेश की बात भी करते हैं . परंतु इनके अतिरिक्त वे स्त्री अस्मिता यानी स्त्री के अस्तित्व की बात भी पुरज़ोर तरीके से अपनी कविताओं में उठाते हैं . यहाँ बात करने का अंदाज़ भी कभी सकारात्मकता के संदर्भ में है और कभी नकारात्मकता के संदर्भ में .

जहाँ तक केदारनाथ जी की भाषा शैली की बात है तो वह लोक से निर्मित भाषा है . जो बोलती कम है और प्रभाव अधिक छोड़ती है . उनकी भाषा कहीं-न-कहीं परंपरा से जुड़ती है . लेकिन परंपरा से बहुत आगे निकलते हुए वे समकालीन जीवन से जुड़ते नज़र आते हैं . भाषा शैली की सबसे बड़ी विशेषता जो है, वह है बिम्बों और प्रतीकों का अद्भुत मिश्रण, उनका प्रयोग और उनका मानवीकरण . इसका कई उदाहरण हमें उनकी कविताओं में मिलती है –    
“छोटे-से आँगन में
माँ ने लगाए हैं
तुलसी के बिरवे दो
पिता ने उगाया है
बरगद छतनार है
मैं अपना नन्हा गुलाब
कहाँ रोप दूँ .
मुट्ठी में प्रश्न लिए
दौड़ रहा हूँ वन-वन
पर्वत-पर्वत
रेती-रेती…
बेकार .” (‘केदारनाथ सिंह, ‘प्रतिनिधि कविताएँ’, 1957; पृ.140 )

केदारनाथ सिंह जी की कविताओं को यदि कोई सरल कहते हैं तो यह उनकी भूल होगी . उनकी कविताएँ सरल दिखते हैं ज़रूर हैं परंतु वह सरल कतई नहीं है . हर छोटी-से-छोटी और बड़ी-से-बड़ी कविता अपने में कई गहरे अर्थ समेटे हुए हैं, जिसे प्रथम दृष्टया समझना कठिन है . इन्हें समझने के लिए दिमागी कसरत करनी पड़ती है, मशक्कत करनी पड़ती है . केदारनाथ जी की कविताओं ने अपने समय और बाद के रचनाकारों को काफी प्रभावित और प्रेरित किया है और आगे भी करते रहेंगे .

इन कविताओं में सिर्फ़ शब्द का ही सच नहीं है बल्कि समय का भी सच है . इसी कारण केदारनाथ जी की कविताएँ प्रासांगिक हैं . यह प्रासंगिकता आगे भी बनी रहेगी, ठीक उसी तरह जिस तरह कवि को यह विश्वास है कि-
“यह पृथ्वी रहेगी”

यह जानते हुए भी कि एक दिन सबको जाना है, यह जानते हुए कि जाना हिन्दी की सबसे खौफ़नाक क्रिया है .

संदर्भ-सूची

  1. केदारनाथ सिंह, ‘प्रतिनिधि कविताएँ’, राजकमल प्रकाशन प्रा.लि., बी-1, नेताजी सुभाष मार्ग, दरियागंज, नई दिल्ली – 110002, प्रथम संस्करण : 1985, ग्यारहवां संस्करण : 2018
  2. www.thewirehindi.com
  3. प्रभा खेतान (अनु.), ‘स्त्री उपेक्षिता : सीमोन द बोउवार’, हिन्द पॉकेट बुक्स, नई दिल्ली, संस्करण : 1998
  4. प्रभा खेतान (अनु.), ‘स्त्री उपेक्षिता : सीमोन द बोउवार’, हिन्द पॉकेट बुक्स, नई दिल्ली, संस्करण : 1998 ; पृ. 28

चैताली सिन्हा:शोधार्थी – जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय, भारतीय भाषा केंद्र
(हिंदी विभाग) . सम्पर्क:  .chaitalisinha4u@gmail.com

                                                        

पैतृक सम्पत्ति, कृषि भूमि और स्त्रियाँ


(“In rural South Asia, few women own land and even fewer control it.”[1])

हिन्दू विधवाओं को पति की चिता पर जिंदा जलाने की बर्बर प्रथा के खिलाफ लार्ड विलियम बेंटिक ने सती रेगुलेशन (1829) पारित किया। कुछ वर्ष बाद विधवा पुनर्विवाह अधिनियम,1856 का प्रारूप लार्ड डलहौजी ने तैयार किया था, मगर पारित किया लार्ड कैनिंग ने। विधवाओं को सती करने पर रोक लगाने और पुनर्विवाह का अधिकार देने पर, चीख-पुकार मची ‘धर्म (हिंदुत्व) खतरे में’। राजनेताओं ने घृणा संदेश फैलाने शुरू कर दिये “अंग्रेज हमारे धर्म और परंपराओं में हस्तक्षेप करके, हमें ईसाई बनाना चाहते हैं। यह हिन्दू संस्कृति पर हमला है।” बाद में ‘फूलमनी’ केस के सहमति की उम्र पर आयोग बनाने (1891) और  बाल विवाह पर प्रतिबंध (1929) लगाने के समय भी, राष्ट्रवादी नेतृत्व इसी भाषा में उन्माद फैलाता रहा। इन सभी अवसरों पर भारतीय सभ्यता- संस्कृति के रक्षकों के सीधे निशाने पर थे- समाज सुधारक राजा राम मोहन रॉय, ईश्वरचंद्र विद्यासागर, हरविलास शारदा व अन्य और अंग्रेज़ी सरकार। राष्ट्रीय गौरव के रक्षकों और समाज सुधारकों के बीच संघर्ष अब तक जारी है। दरअसल सत्ता परिवर्तन के साथ-साथ, सांस्कृतिक सुधार के समीकरण भी बदलना तय है। धार्मिक नफरत और विरोध की हत्या के संस्कार, अंततः राजनीति की भाषा-परिभाषा और लिंग भेदी मानसिकता में भी प्रतिबिंबित होते रहे हैं!

ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखें तो इसे कानून और न्याय व्यवस्था की विडम्बना ही कहा जायेगा कि विधवा पुनर्विवाह अधिनियम,1856 पारित होने के करीब सौ साल बाद भी भारतीय समाज में एक विधवा स्त्री को उत्तराधिकार[2] में संपत्ति पाने के लिए, चवालीस साल (1954-1998) लंबी कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ी! और आज भी यह तय नहीं है कि हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम,1956 में संशोधन (2005) के बाद बेटियों को पैतृक संपत्ति में अधिकार कब मिलेगा? जन्म से मिलेगा या सिर्फ उन बेटियों को जिनके पिता का देहांत संशोधन (9.9.2005) के बाद हुआ? फिलहाल  यह विवाद सुप्रीम कोर्ट की पूर्णपीठ (तीन जज) के समक्ष विचाराधीन है। देखते हैं कब-क्या फैसला होता है।

कृषि भूमि में विधवा का हिस्सा

गुरुअम्मा[3] के पति की  मृत्यु 1954 में हो गई थी। अदालती फैसले के अनुसार हुए बंटवारे में उसके हिस्से आई संपत्ति में कुछ ‘कृषि भूमि’ भी शामिल थी, जो उसके देवर (और उसके बेटे-बेटी) देना नहीं चाहते थे। हिस्सा ना देने का तर्क-कुतर्क यह कि संपत्ति में ‘कृषि भूमि’ शामिल नहीं होती। अंतिम चरण में विवाद जब सर्वोच्च न्यायालय  पहुँचा, तो न्यायमूर्ति सुश्री सुजाता मनोहर और जी.बी.पटनायक ने अपने फैसले[4] में कहा कि हिन्दू महिला संपत्ति अधिकार अधिनियम,1937 के अंतर्गत विधवा को  उत्तराधिकार में मिलने वाली संपत्ति में ‘कृषि भूमि’ भी शामिल है। ‘संपत्ति’ को अगर स्प्ष्ट रूप से अधिनियम में परिभाषित नहीं किया गया है, तो संपत्ति की परिभाषा में ‘कृषि भूमि’ भी शामिल मानी जायेगी अगर विधायिका चाहती तो ‘कृषि भूमि’ को इस कानून से बाहर रख सकती थी। उच्च न्यायालय के निर्णय को सही मानते हुए ,सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय में कहा कि  संपति की परिभाषा में ‘कृषि भूमि’ भी शामिल मानी जायेगी।

सर्वोच्च न्यायालय के उपरोक्त निर्णय के बाद भी विभन्न अदालतों में  हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम,1956 के अंतर्गत ‘संपत्ति’ में ‘कृषि भूमि’ के शामिल होने/ ना होने के बारे में विवाद बना रहा। पहला तर्क यह कि उपरोक्त निर्णय हिन्दू महिला संपत्ति अधिकार अधिनियम,1937 से संबंधित है और दूसरा यह कि हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम,1956 इससे बाद बना-बनाया गया कानून है।

‘सम्पत्ति’ में ‘कृषि भूमि’ शामिल है या नहीं?

सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति यू यू ललित और एम आर शाह के समक्ष[5] विचारणीय ‘यक्ष प्रश्न’ यह था कि क्या ‘कृषि भूमि’ भी उत्तराधिकार कानून[6] की धारा 22 के प्रावधानों के दायरे में आती है? इस सवाल पर अभी तक विभिन्न उच्च न्यायालयों के विरोधाभाषी फैसले आते रहे। उत्तराधिकार के अधिकांश अदालती मुकदमों में ‘कृषि भूमि’ भी शामिल रहती ही है। इसलिए सर्वोच्च न्यायालय के सामने यह एक सार्वजनिक महत्व का गंभीर मुद्दा था।

‘कृषि भूमि’ विवाद की पृष्ठभूमि यह है कि एक था लाजपत जिसकी मृत्यु के बाद, उसकी कृषि भूमि उसके दो पुत्रों नाथू और संतोख को मिली नाथू ने अपना हिस्सा एक बाहरी व्यक्ति को बेच दिया। संतोख ने मामला हमीरपुर अदालत में दायर कर कहा कि (उत्तराधिकार कानून[7] की धारा 22 के अनुसार) उसे इस मामले में प्राथमिकता पर संपत्ति लेने का अधिकार है। ज़िला अदालत ने मद्रास[8] और ओड़िशा[9] उच्च न्यायालय के फैसलों के आधार पर डिक्री संतोख के पक्ष में दी (जिसे बाद में उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय ने भी बरकरार रखा)। यहाँ यह बताना जरूरी है कि इस बीच नाथूराम की मृत्यु होने के बाद, उसकी जगह उसके उत्तराधिकारी बाबूराम ने ले ली थी।

हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति के सामने जब बाबुराम की अपील आई, तो उसके सामने पहले से हुए दो विरोधाभासी फैसले थे। वो भी उसी उच्च न्यायालय के। पहला एकलपीठ का फैसला (2008) यह था कि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम,1956 के प्रावधान कृषि भूमि की बिक्री पर लागू नहीं होते, जबकि इसके विपरीत दूसरी एकलपीठ का निर्णय (2012) था कि उत्तराधिकार कानून के प्रावधान कृषि भूमि की बिक्री पर लागू होते हैं। ऐसे में एकल पीठ के न्यायमूर्ति क्या करते! उन्होंने समुचित फैसले के लिए अपील खंडपीठ (दो जज) को  भेज दिया। ऐसी स्थिति में नियमानुसार यही प्रक्रिया निर्धारित भी है।

खंडपीठ (कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश संजय करोल व न्यायामूर्ति धर्मचंद चौधरी) ने दो विरोधाभासी एकल पीठों के निर्णयों पर बहस सुनने और विवेचना के बाद फैसला सुनाते हुए कहा कि एकल पीठ[10] के फैसले को ही सही माना जाना चाहिए। इसका परिणाम यह था कि उत्तराधिकार कानून के प्रावधान, कृषि भूमि से जुड़े विवादों पर भी लागू होंगे। खंडपीठ के स्पष्टीकरण के बाद, न्यायामूर्ति सी.बी बारोवलिया ने (सात मई, 2018) अपील खारिज कर दी, जिसके विरुद्ध बाबूराम द्वारा सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका दायर की गई।

‘संपत्ति’ में ‘कृषि भूमि’ शामिल-सुप्रीमकोर्ट

उत्तराधिकार कानून ‘कृषि भूमि’ पर लागू हैं या नहीं के सवाल पर, विस्तृत विवेचन के बाद  सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्तियों (ललित और शाह) ने निर्णय[11] में उच्च न्यायालय के फैसले को ही सही ठहराया। भविष्य के लिए यह भी स्पष्ट किया  कि धारा 22 में प्रावधान है कि जब बिना वसीयत के किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है, तो उसकी संपत्ति उत्तराधिकारियों पर आ जाती है। उत्तराधिकार कानून की धारा 22 ‘कृषि भूमि’ पर भी लागू होगी। इसलिए संयुक्त हिंदू परिवार की संपत्ति का बंटवारा होने पर या उससे पहले, यदि उत्तराधिकार में मिली संपत्ति को कोई एक सदस्य बेचना चाहे, तो अन्य वारिस प्राथमिकता के आधार पर उस संपत्ति को खरीदने का दावा कर सकते हैं। यानी संपत्ति किसी तीसरे व्यक्ति को बेचने से पहले, अन्य वारिसों की सहमति अनिवार्य होगी। उत्तराधिकार कानून की धारा 4 (2) के समाप्त होने का इस पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा, क्योंकि वह प्रावधान ‘कृषि भूमि’ पर काश्तकारी के अधिकारों’ से ही संबंधित था।  उत्तराधिकार कानून (1956) बनने से पहले, शास्त्रिक हिन्दू कानूनों में भी, ऐसे ही नियम और परंपरा मौजूद थी। भारतीय विधायिका द्वारा ऐसा प्रावधान बनाये-बचाये रखने का मुख्य/असली उद्देश्य भी यही (रहा) है कि परिवार (या संपत्ति) में बाहरी व्यक्ति ना घुस सके।

सर्वोच्च न्यायालय के उपरोक्त दोनों फैसलों से यह स्पष्ट हो गया कि पैतृक संपत्ति में ‘कृषि भूमि’ भी शामिल है और इस पर बेटियों और विधवा स्त्री का अधिकार है। उन्हें ‘कृषि भूमि’ में हिस्सा पाने (लेने) से वंचित नहीं किया जा सकता।

उत्तराधिकार कानून संशोधन (2005) कब से लागू होगा?

उपरोक्त दोनों निर्णयों के बीच उत्तराधिकार कानून की भाषा-परिभाषा में एक और नया पेच आ फँसा। हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियंम,1956 में हुए संशोधन[12] के अनुसार यह प्रावधान पारित किया गया है कि किसी व्यक्ति की मृत्यु बिना कोई वसीयत किये हो गई है और संपत्ति में पैतृक संपत्ति भी शामिल है, तो मृतक की संपत्ति में बेटे और बेटियों को बराबर हिस्सा मिलेगा। बेटी को भी पुत्र की तरह ‘कोपार्शनर’ माना-समझा जाएगा। यानी अब पैतृक संपत्ति में बेटियों को भी, बेटों के समान अधिकार दे  दिया गया है। हालांकि कानून में ही यह व्यवस्था कर दी गई कि अगर पैतृक संपत्ति का बँटवारा 20 दिसंबर, 2004 से पहले हो चुका है, तो उस पर यह संशोधन लागू नहीं होगा। पर समस्या यह है कि सुप्रीम कोर्ट के एक निर्णय के अनुसार अगर पिता की मृत्यु 9.9.2005 से पहले हो चुकी है, तो बेटी को पैतृक संपत्ति में अधिकार नहीं मिलेगा। जबकि दूसरे फैसले के अनुसार अधिकार मिलेगा। सो संशोधन के बावजूद, पैतृक संपत्ति में बेटियों के अधिकार का मामला, अंतर्विरोधी और पेचीदा कानूनी व्याख्याओं में अभी भी उलझा हुआ है। फिलहाल मामला[13]  तीन जजों की पूर्णपीठ (न्यायमूर्ति अर्जन सीकरी, अशोक भूषण और  एम.आर. शाह) को भेजा गया, जो अभी विचाराधीन है। इस बीच मार्च 2019 में न्यायमूर्ति अर्जन सीकरी रिटायर हो गए।

खैर…जिन बेटियों के पिता जीवित हैं या देहांत 9.9.2005 के बाद हुआ है, उनके केस में कोई कानूनी अड़चन दिखाई नहीं देती। मगर जिनके पिता का स्वर्गवास 9.9.2005 से पहले हो गया था, उन्हें सर्वोच्च न्यायालय की पूर्ण पीठ के फैसले की प्रतीक्षा करनी होगी।

तीन खण्ड पीठ: तीन फैसले

सुप्रीमकोर्ट के न्यायमूर्ति आदर्श कुमार गोयल और अनिल आर दवे के निर्णय[14] के अनुसार जिन बेटियों के पिता का 9.9.2005 से पहले ही स्वर्गवास हो चुका है/था, उन्हें संशोधित उत्तराधिकार कानून से पैतृक संपत्ति में कोई अधिकार नहीं मिलेगा! लेकिन सुप्रीम कोर्ट की ही दूसरी खंडपीठ (न्यायमूर्ति अशोक भूषण और अर्जन सीकरी) ने अपने निर्णय[15]  में कहा कि बेटियों को संपत्ति में अधिकार उनके जन्म से मिलेगा, भले ही पिता की मृत्यु 9.9.2005 से पहले हो गई हो पर इस मामले में बंटवारे का केस पहले से (2003) चल रहा था। सुप्रीमकोर्ट के न्यायमूर्ति आर.के. अग्रवाल और अभय मनोहर सप्रे ने अपने निर्णय[16] में फूलवती निर्णय को ही सही माना और स्पष्ट किया कि बँटवारा माँगने के समय, पिता और पुत्री का जीवित होने जरूरी है।

लगभग एक माह बाद ही दिल्ली उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति सुश्री प्रतिभा एम सिंह ने   सुप्रीमकोर्ट के उपरोक्त निर्णयों के उल्लेख करते हुए, अंतर्विरोधी और विसंगतिपूर्ण स्थिति का नया आख्यान सामने रखा।[17] फूलवती केस को सही मानते हुए अपील रद्द कर दी मगर सुप्रीमकोर्ट में अपील दायर करने की विशेष अनुमति/प्रमाण पत्र भी दिया ताकि कानूनी स्थिति तय हो सके। इन निर्णयों से अनावश्यक रूप से कानूनी स्थिति पूर्णरूप से अंतर्विरोधी और असंगतिपूर्ण हो गई। सुप्रीमकोर्ट की ही तीन खंडपीठों के अलग-अलग फैसले होने की वजह से, मामला तीन जजों की पूर्णपीठ  को भेजा गया। देखते हैं सुप्रीमकोर्ट कब-क्या फैसला सुनाती है!

सम्पत्ति का बँटवारा पहले और अब

उल्लेखनीय है कि संशोधन से पहले पैतृक संपत्ति का सांकेतिक बंटवारा, पहले पिता और पुत्रों के बीच होता था। पिता के हिस्से आई संपत्ति का फिर से बराबर बँटवारा पुत्र-पुत्रियों (भाई-बहनों) के बीच होता था। इसे सरल ढंग से कहूँ तो मान लो पिता के तीन पुत्र और दो पुत्रियां हैं और पिता के हिस्से आई पैतृक संपत्ति 100 रुपये की है, तो यह यह माना जाता था कि अगर बंटवारा होता तो पिता और तीन पुत्रों को 25-25 रुपये मिलते। फिर पिता के हिस्से में आये 25 रुपयों का बंटवारा तीनों पुत्रों और दोनों पुत्रियों के बीच पाँच-पाँच रुपये बराबर बाँट दिया जाता था। मतलब तीन बेटों को 25+5=30×3=90 रुपये और बेटियों को 5×2=10 रुपये मिलते। संशोधन के बाद पाँचों भाई-बहनों को 100÷5=20 रुपये मिलेंगे या मिलने चाहिए। हालाँकि भारतीय समाज में अधिकाँश ‘उदार बहनें’ स्वेच्छा से, अपना हिस्सा अभी भी भाइयों के पक्ष में ही छोड़ देती हैं।

स्वयं अर्जित संपत्ति : वसीयत का असीमित अधिकार

कहना ना होगा कि कोई भी व्यक्ति (स्त्री-पुरुष) स्वयं अर्जित संपत्ति, वसीयत द्वारा किसी को भी दे सकता है। जरूरी नहीं कि परिवार में ही दे, किसी को भी दे (दान कर) सकता है। कोई भी अपने पिता या पति के जीवन काल में, उनकी स्वयं अर्जित संपत्ति बँटवाने का अधिकारी नहीं है। मुस्लिम कानूनानुसार अपनी एक तिहाई  से अधिक संपत्ति की वसीयत नहीं की जा सकती। हिन्दू कानून में पैतृक संपत्ति का बँटवारा, संशोधन से पहले सिर्फ मर्द उत्तराधिकारियों के बीच ही होता था। वैसे वसीयत का असीमित अधिकार रहते, उत्तराधिकार कानून ‘अर्थहीन’ हैं।[18]

पाठक कृपया ध्यान दें कि वसीयत ना होने की स्थिति में बेटियों को पिता की स्वयं अर्जित संपत्ति में ही नहीं, बल्कि पिता की पैतृक संपत्ति (उनका हिस्सा) में से भाइयों के बराबर अधिकार मिलेगा। निःसंदेह संतान को अपने पिता-माता की संपत्ति में अधिकार है, बशर्ते मां-बाप बिना वसीयत किये मरें हों। बेटे-बेटी को सौतेले माता-पिता की संपत्ति में भी कोई अधिकार नहीं है। मतलब जो लेना हो, अपने माँ-बाप से लो! सौतेले मां-बाप से कुछ नहीं मिलेगा। यह दूसरी बात है कि जिनके पास संपत्ति/पूँजी है, वो बिना वसीयत के कहाँ मरते हैं! वसीयत में बेटी को कुछ दिया, तो उसे वसीयत के हिसाब से मिलेगा अगर वसीयत पर विवाद हुआ (होगा) तो सम्भव है बेटियाँ सालों कोर्ट-कचहरी करती रहें लगता है कि बेटियों को संपत्ति में समान अधिकार मिल पाना इतना आसान नहीं कोर्ट-कचहरी के लिए, एक उम्र कम समझें!

सौतेली संतान : सौतेले कानून

संक्षेप में निष्कर्ष यह है कि दुनिया भर की ‘पूँजी’ (स्त्री देह और धरती) पर पुरुषों का वर्चस्व है। विवाह कानूनों के माध्यम से (स्त्री)देह और उत्तराधिकार कानूनों के माध्यम से धरती पर सदियों से पुरुषों का क़ब्ज़ा बना हुआ है। क्योंकि ‘पूँजी’ पर उत्तराधिकार के लिए ‘वैध’ संतान और ‘वैध’ संतान के लिए, ‘वैध’ विवाह अनिवार्य है। ‘वैध’ संतान अपने पिता के (माता भी) उत्तराधिकारी माने-समझे जाते हैं और अवैध सिर्फ अपनी माँ की। सौतेले माता-पिता से संतान को गुजारा भत्ता तक पाने का अधिकार नहीं, उत्तराधिकार में क्या मिलेगा? जो लेना हो अपने माँ-बाप से लो, सौतेले माँ-बाप से कुछ भी लेने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है। विधवा पुनर्विवाह या तलाक के बाद दूसरा विवाह करने के कानूनी अधिकार के बावजूद,  सौतेली संतान के बारे में तो आज तक हमने सोचना भी शुरू नहीं किया। कहना कठिन है कि इस दिशा में ‘सोचना’ कब शुरू करेंगे!

सन्दर्भ

[1] A Field of One’s Own’- Bina Agarwal
[2] हिन्दू महिला संपत्ति अधिकार अधिनियम,1937
[3] विजयनाथ बनाम गुरुअम्मा और अन्य (1999) 1 एससीसी 292
[4] 1999 (1) एससीसी 292, दिनांक 18 नवंबर,1998
[5] बाबू राम बनाम संतोख सिंह (सिविल अपील नंबर 2553/2019)
[6] हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम,1956
[7] हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम,1956
[8] एआइआर 2000 मद्रास 516
[9] एआइआर 1988 ओड़िशा 285
[10] रोशन लाल बनाम प्रीतम सिंह (अपील नंबर 258/2012)
[11] दिनांक 17 जनवरी, 2019
[12] 9.9.2005 से प्रभावी
[13] 5 दिसंबर, 2018 को
[14] प्रकाश बनाम फूलवती (2016 (2) SCC 36, दिनांक 19 अक्टूबर 2015
[15] दनम्मा उर्फ सुमन सुरपुर बनाम अमर केस (2018 (1) स्केल 657, दिनांक 1फरवरी, 2018
[16] मंगामल बनाम टी बी राजू, दिनांक 19 अप्रैल, 2018
[17] विनीता शर्मा बनाम राकेश शर्मा दिनांक 15 मई, 2018
[18] विस्तार के लिए देखें “उत्तराधिकार बनाम पुत्राधिकार- अरविंद जैन”

महिला राजनेताओं की सेक्सुअल ट्रोलिंग को रोक सकती है राजनीतिक जागरूकता

कनुप्रिया

कनुप्रिया
पेशे से इंजीनियर कनुप्रिया इंजीनियरिंग पढ़ाने और कुछ सालों तक यूनाइटेड नेशन के लिए काम करने के बाद आजकल सोशल सेक्टर से जुड़ी हैं. संपर्क: joinkanu@gmail.com

राजनीतिक अनपढ़ सबसे ख़राब अनपढ़ होता है,  क्योकि वह न कुछ सुनता है, न कुछ देखता है, वह राजनीतिक गतिविधियों में कोई हिस्सा नही लेता. उसे नही पता कि उसके जीवनयापन की क़ीमत, आटे दाल का भाव, उसके किराए से लेकर उसकी दवाइयों तक सबकुछ राजनीतिक निर्णयों पर निर्भर करता है. यहाँ तक कि वो अपनी political ignorance पर गर्व करता है, सीना ठोंककर कहता है आई हेट पॉलिटिक्स. उसे नही पता कि उसके राजनीतिक अज्ञान से और भागीदारी न करने से ही समाज मे वेश्यायें हैं, अनाथ और छोड़े गए बच्चे है, लुटेरे हैं और सबसे ख़राब भ्रष्ट अधिकारी और शोषणकारी संस्थाओं के अनुचर हैं: कथन बर्तोल्त ब्रेख़्त.

अब आते हैं एक सर्वे पर जो 2013 में गार्डियन में छपा था, इसमें विश्व के 10 विकसित और विकासशील देशों अमेरिका, कनाडा, इटली, ब्रिटेन, जापान, कोलंबिया, उत्तरी कोरिया, ग्रीस, ऑस्ट्रेलिया और नॉर्वे के दस हज़ार लोगो पर राजनीतिक जागरूकता को लेकर सर्वे किया गया और सर्वे में पाया गया था कि बावजूद इन देशो में राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक भिन्नता के और विकसित देशों में बेहतर जेंडर इक्वलिटी के इनमें एक समानता है कि स्त्रियों में पुरुषों के बनिस्पत राजनीतिक जागरूकता 20 से 30 प्रतिशत तक कम है. यानि दुनिया की आधी आबादी की हिस्सेदारी राजनीतिक प्रक्रिया में कम है या न के बराबर है और इसका कितना बड़ा ख़ामियाजा हम एक समाज के तौर पर उठाते हैं इसकी कल्पना ही की जा सकती है. 

यदि हम स्त्रियों में राजनीतिक अज्ञानता के कारणों को समझने की कोशिश करें तो कई बातें सामने आती हैं मसलन एक उम्र तक वो घर-परिवार संभालने और उसके मसलो में उलझी रहती हैं, वो खुलकर सामाजिक-राजनीतिक मामलों में विचार प्रकट करने से डरती हैं, वो ग़लत होने से डरती हैं, उनके पास माकूल मंच या विमर्श के समूह नही होते जहाँ वो अपने विचारों की अभिव्यक्ति कर सकें, और जाहिर है जब जिस अभिव्यक्ति के लिये मंच नही होता तो उसकी विचार की क्षमता भी उसी अनुसार घट जाती है.

इसके अलावा अगर हम अपने ही देश की बात करें तो पितृसत्ता भी एक बहुत बड़ी बाधा है स्त्रियों के जागरूक न होने के पीछे. हमारा समाज आज भी स्त्री को निर्णयकर्ता के रूप में देखने को तैयार नही, घर परिवार छोड़िये वो ख़ुद अपने लिये निर्णय नही ले सकती. भारत मे स्त्री मतदाताओ पर किये सर्वे बताते है कि दक्षिण भारत मे स्त्रियाँ स्वैच्छिक मतदान का प्रयोग ज़्यादा करती हैं उत्तर भारत की तुलना मे जहाँ आज भी स्त्रियाँ अपने मत का निर्णय करने के लिये स्वतंत्र नही. आपको जिन मामलों में निर्णय का अधिकार अथवा स्वतंत्रता न हो तो निर्णय करने की क्षमता पर भी इसका सीधा असर पड़ता ही है.

राजनीति जनता के प्रतिनिधत्व का मंच है, जहाँ जनता अपने मुद्दों के लिये निर्णयकर्ता चुन कर भेजती है, हमारा समाज स्त्रियों को आज भी निर्णयकर्ता की भूमिका में देखने के लिए तैयार नही.

 इसके अतिरिक्त एक और प्रमुख कारण ये भी है कि जिस क्षेत्र में समाज के किसी वर्ग का प्रतिनिधित्व न हो तो ये बात उस वर्ग के अन्य लोगो के लिए एक तरह की मानसिक बाधा का काम करती है मसलन कुछ क्षेत्र जो पुरुष क्षेत्र माने जाते हैं उनमे स्त्रियाँ अपने आप ही रुचि कम दिखाती हैं उसे बतौर करियर भी नही चुनती और राजनीति भी पुरुष वर्चस्व का क्षेत्र ही माना जाता है.

इन बाधाओं के दूर होने का एक उपाय ये है कि  स्त्रियों को राजनीति में अधिक से अधिक प्रतिनिधित्व के अवसर मिले. पंचायत स्तर पर स्त्रियों के आरक्षण ने राजनीतिक प्रतिनिधित्व में स्त्री विकल्प को देखने के सामाजिक नजरिये को बदलने की एक हद तक कोशिश की है  मगर इसके बावजूद भी स्त्रियों के लिये चुनौतियाँ कम नज़र नही आतीं, सरपंच पति आज भी निर्णयकर्ता की भूमिका में काबिज़ हैं, पितृ सत्ता अपना दावा छोड़ने को तैयार नही.  वहीं देश मे जो स्त्रियाँ राजनीति में मज़बूत स्थिति में नज़र भी आती हैं उनमे से ज़्यादातर के पास राजनीतिक सिस्टम सपोर्ट मौजूद है, वो राजनीतिक परिवारों से आई हैं या उनके पिता, माँ, भाई, पति पहले से ही राजनीति में लंबे समय से मौजूद रहे हैं, उनके इतर ऐसी बहुत कम स्त्रियाँ हैं जो राजनीति में अपना स्थान बना पाई हों.  

राजनीति में जेंडर इक्वलिटी की समस्या के समाधान के लिये संविधान में 108 वे संशोधन के साथ संसद और विधानसभाओं में महिलाओं के 33 % आरक्षण का बिल 2008 में प्रस्तावित किया गया था, जिसे 2010 में राज्यसभा में पास कर दिया, मगर लोकसभा में ये वोटिंग कभी नही हुई. इस बिल पर वोटिंग की माँग तबसे लगातार सामाजिक राजनीतिक हलकों में उठती रही है और हाल ही में कॉंग्रेस ने इसे अपने घोषणापत्र में फिर जगह दी है. 

इसके अतिरिक्त एक बड़ी चुनौती जो राजनीति में स्त्रियों के लिये है वह है उनकी sexual trolling. लगभग हर छोटी बड़ी स्त्री राजनीतिज्ञ को ज़रूर कभी न कभी इससे गुज़रना पड़ा है, उनके ऊपर चरित्र हनन के हमले पुरुषों के मुक़ाबले कहीं ज़्यादा होते हैं. न सिर्फ़ नेताओ द्वारा बल्कि मीडिया और सोशल मीडिया पर भी. ध्यान देने वाली बात ये है कि ऐसे हमले सिर्फ़ पुरुष ही नही करते महिलाएँ भी करती हैं, मगर इससे ऐसे हमलों को किसी भी हालत में जायज़ नही ठहराया जा सकता. इस तरह के हमले न सिर्फ़ मनोरंजन के लिये, खीज निकालने, निंदा आलोचना के लिये किये जाते हैं बल्कि ये एक किस्म के haarrasment tool की तरह काम मे लिए जाते हैं जो अधिक से अधिक स्त्रियों को राजनीति में आने के लिये हतोत्साहित करते हैं. राजनीति में जैसे-जैसे जागरूकता, भागीदारी और प्रतिनिधित्व बढ़ेगा उम्मीद है कि सेक्सुअल ट्रोलिंग में भी कमी आयेगी.

फिर भी तकनीक ने न सिर्फ़ स्त्रियो में राजनीतिक जागरूकता को बढ़ाया है बल्कि उनकी अभिव्यक्ति और विमर्शों को भी मंच प्रदान किये हैं. फ़ेसबुक पर बावजूद चरित्र हनन के हमलों के राजनीतिक विमर्शों में स्त्रियों की उपस्थिति बढ़ी है, वो बिना इस बात से डरे और हिचके कि तुम स्त्री हो तुम्हे राजनीति का क्या पता, अपने विचार खुलकर अभिव्यक्त कर रही हैं. बीजेपी के IT cell की सफ़लता को हम हाल ही में हुए गुजरात विधानसभा चुनाव में बीजेपी के पक्ष में महिला वोटर्स के पुरुषों की तुलना में अधिक संख्या प्रतिशत के रूप में देख सकते हैं. 

स्त्रियों में राजनीतिक जागरूकता और निर्णयकर्ता के तौर पर उनका प्रतिनिधित्व न सिर्फ़ स्त्रियों के मुद्दों के लिये महत्वपूर्ण है बल्कि समाज की आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक नीतियों के निर्धारण के लिये भी बहुत ज़रूरी है. दुनिया के निर्णयों में स्त्रियों की भागीदारी एक बेहतर विश्वसमाज के बनने के लिये बहुत महत्वपूर्ण है, इसमें कोई संदेह नही.



मी लार्ड, यहाँ महिलाओं को न्याय नहीं न्याय का स्वांग मिलता है

पिछले दिनों भारत के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई पर उनके मातहत काम कर चुकीं एक महिला का आरोप सामने आया कि मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने उनका यौन उत्पीड़न किया, विरोध करने पर नौकरी से निकलवा दिया, फिर इसकी सजा उसे उसके परिवार को प्रताड़ित करके दी गयी। पहली नज़र में ये मामला राजनितिक करार दिया गया बहुत से लोगों ने इसे इसी रूप में देखा भी। जाहिरन ये हैरान करने वाली बात नहीं थी आखिर मौजूदा निज़ाम में देश की सर्वोच्च संस्थाओं की निष्पक्षता और स्वायत्तता लगातार निशाने पर रही है। मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई के मामले में तो इसकी एक मजबूत पृष्टभूमि भी पहले से रही है। गौरतलब है कि 12 जनवरी 2018 को जस्टिस गोगोई सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन चीफ़ जस्टिस दीपक मिश्रा के ख़िलाफ़ प्रेस कॉन्फ्रेंस करने वाले चार न्यायाधीशों में शामिल थे। जस्टिस गोगोई समेत चारों न्यायाधीशों ने सार्वजनिक कहा था कि न्यायपालिका पर सरकार का दखल और बहुत दबाव है। चारों जजों ने उनके द्वारा तत्कालीन सीजेआई दीपक मिश्रा को लिखी चिट्ठी भी सौंपी, जिसमें अन्य बातों के साथ हर छोटे-बड़े मामले की न्यायिक प्रक्रिया में सत्ता के हस्तक्षेप के कारण देश और न्यायपालिका पर दूरगामी असर पड़ने के सन्दर्भ में चिंता जताई गयी थी। यौन शोषण के इस आरोप के सन्दर्भ में इस बात का जिक्र भी जरूरी है कि आने वाले दिनों में मुख्य न्यायधीश कई ऐसे मामलों पर सुनवाई करने वाले थे जिसे लेकर मौजूदा सरकार असहज़ हो सकती थी या है । सबसे महत्वपूर्ण राफेल विमानों की खरीद का मामला ही है जिसपर सुप्रीम कोर्ट से सरकार को क्लीन चिट मिल जाने के बाद अखबारों में छपे दस्तावेज़ों के आधार पर खुद मुख्य न्यायधीश रंजन गोगोई ने ही इसपर संज्ञान लिया।

सुप्रीम कोर्ट के सामने प्रदर्शन करती एनएफआईडव्ल्यू की महासचिव एनी राजा को गिरफ्तार कर ले जाती हुई पुलिस

दरअसल, मामला तब सामने आया जब सुप्रीम कोर्ट में जूनियर कोर्ट असिस्टेंट के पद पर काम करने वाली 35 वर्षीय महिला ने सुप्रीम कोर्ट के 22 जजों को पत्र लिखकर आरोप लगाया कि मुख्य न्यायाधीश जस्टिस रंजन गोगोई ने अक्टूबर 2018 में उसका यौन उत्पीड़न किया था। कथित उत्पीड़न की यह घटना 11 अक्टूबर 2018 की है,महिला का आरोप था कि उस दिन जब वे सीजेआई के घर पर बने उनके दफ्तर में थीं तब चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने उन्हें कमर के दोनों ओर से पकड़कर गले लगाया और जबरन उनके नज़दीक आने की कोशिश की। चीफ जस्टिस के इस “आपत्तिजनक व्यवहार’का विरोध करने के बाद से उनके और उनके परिवार के अन्य सदस्य लगातार प्रताड़ना के शिकार हो रहे हैं। देखा जाय तो यह बात निराधार नहीं है क्योंकि इस घटना के बाद महिला का विभिन्न विभागों में तीन बार तबादला हुआ और दो महीने बाद दिसंबर 2018 में उन्हें बर्खास्त कर दिया गया। जांच रिपोर्ट में जिन तीन वजहों का जिक्र है उनमें से एक उनका एक शनिवार को बिना अनुमति के कैज़ुअल लीव लेना भी है। फिर उनके पति और पति के भाई को भी जो दिल्ली पुलिस की नौकरी में थे झूठे केस में फंसाया गया और नौकरी से निलंबित कर दिया गया।

मामला शुरुआत में नाटकीय इसलिए भी लगा क्योंकि महिला के आरोप के तुरंत बाद सुप्रीम कोर्ट के एक वकील उत्सव बैंस ने सोशल मीडिया पोस्ट पर खुलासा किया कि मुख्य न्यायधीश को फंसाने की बड़ी साजिश हो रही है जिसमें अंडरवर्ल्ड डॉन दाऊद इब्राहिम और जेट एयरवेज के संस्थापक नरेश गोयल शामिल हैं। बाद में हलफ़नामा दाखिल कर उसने कहा कि चीफ जस्टिस को बदनाम करने के लिए उसे भी रिश्वत पेश की गयी थी यह मामला उक्त महिला और कुछ अन्य रजिस्ट्री कर्मचारियों के साथ तपन चक्रवर्ती और मानव शर्मा द्वारा चीफ जस्टिस के खिलाफ एक साजिश है। बैंस ने पीठ को सीलबंद लिफाफे में सबूत उपलब्ध कराए जिसके तहत माफ़ी मांगती महिला के सीसीटीवी फुटेज भी शामिल होने की बात कही गयी। इसके अलावा ये भी गौर करने वाली बात थी कि जिस मानव शर्मा और तपन कुमार चक्रवर्ती का जिक्र हो रहा था वो दोनों सुप्रीम कोर्ट में असिस्टेंट रजिस्ट्रार के पद पर तैनात थे जिनका काम जजों द्वारा डिक्टेट किए गए आदेश को नोट कर उसे कोर्ट की वेबसाइट पर अपलोड करने की थी। जनवरी 2019 की शुरुआत में सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस आरएफ नरीमन की बेंच की अवमानना के मामले में अनिल अंबानी को व्यक्तिगत रूप से पेश होने का आदेश दिया गया था लेकिन इन दोनों ने जो अपलोड किया उसके मुताबिक अनिल अंबानी को कोर्ट में व्यक्तिगत रूप से पेश होने की जरूरत नहीं थी, मामले के प्रकाश में आने पर चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने दोनों को सस्पेंड कर दिया था। साज़िश की बात घटनाओं के क्रम से भी साबित करने की कोशिश की गयी मसलन महिला के साथ यौन दुर्व्यवहार की घटना 11 अक्टूबर 2018 की है और तपन व मानव पर आरोप जनवरी 2019 के केस में लगा, यह मामला अनिल अंबानी से जुड़ता है जिनका सम्बन्ध राफेल विमानों की खरीद मामले से भी है।

खैर, इस पूरे मामले का केवल राजनीतिक पक्ष नहीं है , इसका दूसरा पक्ष ज्यादा महत्वपूर्ण है जो महिलाओं को न्याय, कार्यस्थल पर उनकी सुरक्षा,लैंगिक बराबरी जैसे मुद्दों से जुड़ा है लेकिन जिस तरह से इसे निपटाया गया है वह इंसाफ की बुनियादी अवधारणा को ही सिरे से ख़ारिज करता है मसलन, इंसाफ हो इसके लिए जरूरी है कि दूसरे पक्ष की बात सुनी जाय और कोई भी व्यक्ति अपने खिलाफ लगे आरोपों के लिए खुद जज होकर फैसला नहीं सुना सकता। जबकि इस मामले में इन दोनों ही बातों का उल्लंघन हुआ है, चीफ़ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता में जस्टिस अरुण मिश्रा और जस्टिस संजीव खन्ना की तीन जजों की बेंच ने छुट्टी के दिन मामले पर गौर किया और मामलें की जांच के लिए तीन सदस्यों की एक जांच समित बनाई। जस्टिस एसए बोबडे, जस्टिस इंदु मल्होत्रा और जस्टिस इंदिरा बनर्जी की इन हाउस कमेटी ने अपनी जाँच में महिला कर्मचारी की शिकायत में कोई सत्यता नहीं पाई और इस आधार पर मुख्य न्यायधीश को छः मई को आरोपों से मुक्त करते हुए क्लीन चिट दे दी। पूरी प्रक्रिया में न तो महिला की अपना एक सपोर्ट पर्सन या वकील साथ लाने की मांग मानी गयी और न ही प्रक्रिया की वीडियो रिकॉर्डिंग की गई। विशाखा गाइडलाइंस का पालन नहीं किया गया। यह अकारण नहीं है कि पहले ही 261 महिला वकीलों, स्कालरों के महिला समूह ने एक प्रेस विज्ञप्ति जारी करते हुए इस बात को नोटिस कराया था कि जस्टिस एएस बोबड़े द्वारा गठित समिति में भी कोई बाहरी सदस्य नहीं है जो कि अपने आप में महिलाओं का कार्यस्थल पर लैंगिक उत्पीड़न (निवारण, प्रतिषेध, प्रतितोष) अधिनियम, 2013 का उल्लंघन है। सबसे दुखद मुख्य न्यायाधीश की प्रतिक्रिया रही, उन्होंने न सिर्फ आरोपों से इनकार किया बल्कि महिला के साथ न्याय के सवाल को न्यायपालिका की आजादी के बरक्स खड़ा कर दिया। यही नहीं खुद अपने खिलाफ मुकदमे की सुनवाई शुरू कर दी , न्याय का उदाहरण पेश करने के बजाय महिला की यौन उत्पीड़न की शिकायत को ही गैरकानूनी करार दे दिया। इस मामले में भारत के मुख्य न्यायाधीश और विशेष बेंच का आचरण संस्थानों और सत्ता के उन्हीं लोगों की तरह रहा जो पदों पर रहते हैं और यौन उत्पीड़न के आरोपों का सामना करते हैं। जबकि यौन उत्पीड़न की शिकायत करने वाली महिला को प्रशासनिक उत्पीड़न का भी शिकार होना पड़ा है । उसे नौकरी से बर्खास्त किया जाना उसके परिजनों पर आपराधिक मामले दर्ज होना ये सब प्रशासनिक उत्पीड़न के दायरे में आते हैं।

न्याय की मांग करती महिलायें

खटकने वाली बात ये भी है कि शिकायतकर्ता महिला को इन हाउस कमेटी के सामने अपने वकील को रखने की अनुमति नहीं मिली इसलिए तीसरी बार महिला ने न्याय नहीं मिलने की उम्मीद के साथ पेश होने से ही इंकार कर दिया, कमेटी के सामने पेश नहीं होने की उसने तीन वजह बतायी, पहली सुनवाई के दौरान न तो वकील और न ही सहायक स्टाफ रखने की अनुमति मिलना जबकि उसे ठीक से सुनाई नहीं देता है, कमेटी की सुनवाई की ना वीडियो रिकॉर्डिंग हो रही है, ना ही ऑडियो रिकॉर्डिंग। 26 और 29 अप्रैल को दिए गए उसके बयान की कॉपी भी उसे नहीं सौंपी गई। लेकिन दूसरी ओर मुख्य न्यायाधीश, महिला के तीसरी बार अदालत में पेश इंकार करने के एक दिन बाद जजों की तीन सदस्यीय समिति के सामने पेश हुए। हालाँकि महिला को इस बात की जानकारी नहीं मिली कि समिति के समक्ष मुख्य न्यायाधीश के अपना बयान दर्ज कराते समय आरोपों से अवगत अन्य लोगों को समिति के समक्ष बुलाया गया था या नहीं। सबसे हैरान करने वाली बात तो ये है कि छः मई के फैसले की कॉपी न तो शिकायतकर्ता महिला को उपलब्ध कराई गयी है ना ही उसे सार्वजानिक किया गया है। इसलिए क्लीन चिट दिए जाने के इस फैसले को तुरंत ही 300 से अधिक महिला अधिकार कार्यकर्ताओं और सिविल सोसाइटी के सदस्यों ने खारिज कर दिया और इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट द्वारा सत्ता का दुरुपयोग करार दिया। क्योंकि इसे बगैर किसी नियम, निर्देश और निष्पक्ष जांच के आधार पर लिया गया है, फैसले में विशाखा गाइडलाइंस के उल्लंघन के साथ कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न एक्ट 2013 का भी उल्लंघन किया गया है। जबकि ‘कार्यस्थल पर महिला यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निवेष एवं निवारण) अधिनियम 2013 की धारा 13 के तहत दोनों पक्षों को रिपोर्ट की कॉपी पाने का अधिकार है। पूर्व केंद्रीय सूचना आयुक्त श्रीधर आचार्युलु ने भी आंतरिक समिति की रिपोर्ट को सार्वजनिक किये जाने की मांग की है और सुचना के अधिकार के तहत गोपनीयता के तर्क को कानून के खिलाफ बताया है। साथ ही सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ जजों द्वारा इस मामले में लगे आरोपों का निपटारा करने के तौर-तरीको को लेकर केंद्र सरकार और अटॉर्नी जनरल के के वेणुगोपाल के बीच भी गंभीर मतभेद पैदा हो गए हैं।
फिलहाल, मुख्य न्यायाधीश को क्लीन चिट दिए जाने के फैसले के खिलाफ, आरोप लगाने वाली सुप्रीम कोर्ट की पूर्व महिला कर्मचारी जल्द ही अदालत में अपील करेगी, मामला क्या रुख लेता है ये तो आनेवाला समय ही बताएगा लेकिन इतना तो स्पष्ट है कि इस मामले को जिस तरह से निपटाया गया है उससे कार्यस्थल पर यौन शोषण के खिलाफ महिलाओं की इंसाफ की लड़ाई कमजोर हुई है। इस मामले में इंसाफ की लड़ाई तभी आगे बढ़ सकती है जब सबसे पहले सबसे पहले विश्वसनीय व्यक्तियों की एक विशेष जांच समिति गठित हो, शिकायतकर्ता की मांग को लेकर पारदर्शिता बरती जाए उसे अपना पक्ष रखने दिया जाए, उसकी पसंद का वकील और कानूनी मदद उसे हासिल हो, जांच पूरी होने तक मुख्य न्यायाधीश को अपने आधिकारिक कर्तव्य और जिम्मेदारियों से मुक्त किया जाये। हो सके तो भारत के राष्ट्रपति को इस मामलें में संज्ञान लेना चाहिए। आरोप लगाने वाली महिला की शिकायत को यौन उत्पीड़न की रोकथाम के लिए बनाए गए क़ानून, ‘सेक्सुअल हैरेसमेंट ऑफ़ वुमेन ऐट वर्कप्लेस (प्रिवेन्शन, प्रोहिबिशन एंड रिड्रेसल)’ 2013 के तहत सुना जाए और विशाखा गाइडलाइंस का पालन हो, कानून के मुताबिक 90 दिन में जाँच पूरी हो और सभी रिपोर्ट सार्वजनिक हो।

ये इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि अभी पिछले ही साल #metoo अभियान के तहत हमने ऐसे मामलों पर एक हद तक गंभीर नजरिया हासिल किया है। इस अभियान के तहत देश भर की महिलाओं को अपने साथ हुए यौन दुर्व्यवहार और शोषण की दस्तानों को सार्वजनिक मंचों से साझा करने का हौसला मिला था फिर उसे अदालत ले जाकर इंसाफ पाने का रास्ता भी मिला था। उत्पीड़न की ये कहानियां हाल की भी थीं पांच-दस साल के अंतराल की भी और बीस साल से पहले की भी। इसके तहत उन महिलाओं ने भी हिम्मत करके अपना कटु अनुभव साझा किया जो उम्र के चालीसवें -पचासवें दशक में हैं और अपनी आधी से ज्यादा जिंदगी जी चुकी हैं ,समाज और कैरियर में अपना मुकाम हासिल कर चुकी हैं । बावजूद इसके उनका सामने आना और कहना बहुत हिम्मत की बात थी क्योंकि उन्हें ये मालूम था समाज का बड़ा तबका पहले उनकी ओर ही ऊँगली उठाएगा उन्हें लेकर जजमेंटल होगा। इसका सकारात्मक असर भी हुआ कई नामचीन नाम बेपर्दा हुए , बहुतों को इसकी कीमत अब चुकानी पड़ी और कई सत्ता और संस्थानों के प्यारे भी बने रहे। इस अभियान से कार्यस्थलों पर महिलाओं के साथ व्यवहार को लेकर एक किस्म की चेतना और संवेदनशीलता का माहौल बनने की शुरुआत हुई दूसरी ओर सुरक्षात्मक होने की भी। #MeToo केम्पेन के बाद दुनिया भर में कार्यस्थल पर महिलाओं की मौजूदगी को कम किये जाने के खतरे भी सामने आये। जाहिर है किसी महिला द्वारा कार्यस्थल पर यौन शोषण होने का आरोप बहुत गंभीर मसला है भले आरोपी सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा जज क्यों न हों , अतः इस मामले में फेयर न्यायिक प्रक्रिया की अनदेखी देश की तमाम पीड़ित महिलाओं के हौसले को ख़त्म करेगा और इंसाफ के लिए लड़ रही महिलाओं को निराश करेगा।

बेंगलुरू: धिक्कार है! लड़कियों की संख्या से आपत्ति है!!(लड़कियों के लिए हाई कट ऑफ़ मामला)


किस-किस तरह से लड़कियों को रोकेंगे? उन्हें गर्भ में आने से रोकेंगे, गर्भ में आ गई तो पैदा होने से रोकेंगे, पैदा हो गई तो जीने से रोकेंगे, जी ली तो पढ़ने से रोकेंगे, पढ़ ली तो आगे की पढ़ाई नहीं होने देंगे, आगे की पढ़ाई कर ली तो उच्च शिक्षा से रोकेंगे…और आधुनिकता का छद्म आवरण ओढ़कर रोकेंगे…तथाकथित सभ्य समाज का पैहरन ओढ़कर रोकेंगे, और तो और, बड़े भले और भोले बनकर रोकेंगे… इस तरह के हथकंडे अपनाना अब बस कीजिए… वर्ष 1848 में ही सावित्रीबाई फुले ने लड़कियों के लिए पहला स्कूल चलाकर पुरुषी सामंती व्यवस्था से लोहा लेने का बल दिलवा दिया था और आज वर्ष 2019 है…अच्छे बनने का स्वाँग छोड़ दीजिए और लड़कियों की रेखा काटने के बजाय अपनी रेखा बड़ी करने की जुगत कीजिए।


वर्ष 2014-15 में, भारत में, उच्च शिक्षा में, सकल नामांकन अनुपात (जीईआर, सकल नामांकन का सामान्य अनुमान लगाने के लिए नामांकित किए गए छात्रों की कुल संख्या तथा संबंधित आयु-समूह के व्यक्तियों की कुल संख्या का अनुपात ज्ञात किया जाता है।) के अनुसार कम से कम 1.4 करोड़ लड़कों ने स्नातकपाठ्यक्रमों में दाखिला लिया था (लड़कियों की तुलना में करीब 17.5 फीसदी अधिक), स्नातकोत्तर डिप्लोमा पाठ्यक्रम में लड़कों की संख्या 0.16 करोड़ थी जो किलड़कियों की तुलना में 61 फीसदी अधिक थी लेकिन तब किसी के दिमाग में इस तरह का कोई ख्याल नहीं आया था कि लड़कों के लिए कट ऑफ़ अधिक कर दिया जाए ताकि लड़कियों की संख्या समान हो जाए लेकिन अब कहीं घुप्प अंधेरे में उजाले की कोई पतली किरण दिखी है, जहाँ उच्च शिक्षा में लड़कियों की संख्या अधिक हो रही है तो विकास के चक्र को फिर उल्टा घुमाने के लिए लड़कियों के लिए कट ऑफ अधिक किया जा रहा है ताकि लड़कों-लड़कियों का अनुपात सही बना रहे मतलब अधिक लड़कियाँ, अधिक पढ़ाई न करें, लड़कों के मुकाबले तो ज़रा नहीं और इस तरह का तथाकथित शानदार विचार किसी पिछड़े राज्य या कस्बे में नहीं आया है बल्कि विकसित कहे जाते कर्नाटक के हाई टैक बैंगलुरू में आया है। यहाँ के एमईएस पीयू कॉलेज में विज्ञान संकाय के लिए लड़कों के लिए कट ऑफ़ 92 प्रतिशत है, जबकि लड़कियों के लिए 95 प्रतिशत है। वाणिज्य लेने वाले लड़कों के लिए कट ऑफ़ 92 प्रतिशत है जबकि लडकियों के लिए कट ऑफ़ 94 प्रतिशत है। क्राइस्ट जूनियर कॉलेज में विज्ञान के लिए लड़कों के लिए कट ऑफ़ 94.1 प्रतिशत है जबकि लड़कियों के लिए यह 95.1 प्रतिशत है। यहाँ वाणिज्य लेने वाले लड़कों के लिए 95.5 प्रतिशत है जबकि लडकियों के लिए कट ऑफ़ 96 प्रतिशत है। कला संकाय के लड़कों के लिए कट ऑफ़ 84.5 प्रतिशत है तो लड़कियों के लिए 89.2 प्रतिशत है। क्राइस्ट यूनिवर्सिटी के कुलपति इसे इस तरह सही ठहराते हैं कि यह कट ऑफ़ उन्होंने लिंग संतुलन बनाए रखने के लिए किया है। उनके अनुसार यदि ज्यादा कट ऑफ़ नहीं होगा तो कॉलेज में सिर्फ़ लड़कियाँ होंगी। क्राइस्ट यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर फादर अब्राहम, लिंग संतुलन लाने के लिए उच्चतर कट ऑफ़ को सही मानते हैं।

गहन शोक और रोष का विषय है कि यह विषमता केवल तभी कैसे ध्यान आती है जब लड़के पिछड़ते नज़र आते हैं? जब-जब लड़कियाँ पिछड़ी हैं या उन्हें पीछे रखा गया है तब तब तो जेंडर के मुद्दे केवल महिलाओं के मुद्दे माने गए हैं, पूरे समाज के नहीं और इसे राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद, 2006 ने इसी तरह स्वीकारा भी है। वर्ष 2005 में जब राष्ट्रीय पाठ्यचर्चा की रूपरेखा बनी थी तब उसका उद्देश्य शिक्षा के माध्यम से जेंडर संवेदनशीलता को जगाना था पर क्या ऐसा हुआ? अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) द्वारा 2015 में किए गए अध्ययन के अनुसार, उच्च शिक्षा में लड़कियों का नामांकन 2014 में 46 फीसदी हुआ। करीब 1.2 करोड़ महिलाओं ने स्नातक पाठ्यक्रम में दाखिला लिया है लेकिन इनमें से कुछ हीव्यावसायिक पाठ्यक्रमों के लिए पढ़ाई करती हैं; 2013 में, नवीनतम वर्ष जिसके लिए आँकड़े उपलब्ध हैं, 600,000 महिलाओं ने डिप्लोमा पाठ्यक्रम में नामांकनलिया। यहाँ तक कि कुछ ही महिलाएँ पीएचडी में नामांकन कराती हैं; केवल 40 फीसदी पीएचडी छात्र महिलाएँ हैं।
2015 में मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा जारी की गई, उच्च शिक्षा पर अखिल भारतीय सर्वेक्षण के मुताबिक, 2014-15 में, उच्च शिक्षा में 3.33 करोड़नामांकन होने का अनुमान किया गया है, जिसमें से 1.79 करोड़ पुरुष थे और 1.54 करोड़ महिलाएँ। तब किसी के दिमाग में उच्च कट ऑफ़ वाला इस तरह का नायाब विचार लड़कों के संदर्भ में नहीं आया। वस्तुत: ऐसा होना भी नहीं चाहिए क्योंकि यह मनुष्य होने के नाते सभी के समान होने के अधिकार का हनन है। सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त शिक्षण संस्थानों में लड़कियों और लड़कों की समान संख्या बनाए रखने के लिए कर्नाटक राज्य सरकार के पूर्व-विश्वविद्यालय शिक्षा विभाग ने पीयू कॉलेजों को यह दिशा निर्देश जारी किए थे, जिसमें उन्हें सीट-मैट्रिक्स का पालन करने के लिए कहा गया था। यह मुख्यत: इसे सुनिश्चित करने के लिए था कि छात्राओं को निजी और सरकारी कॉलेजों में प्रवेश दिया जाए।
शिक्षा नीति में पिछले तीन-चार दशकों में जेंडर समानता लाने के लक्ष्य को कितनी ही बार रखा गया लेकिन शिक्षा की पहुँच में अभी भी जेंडर असमानता है और यदि कहीं इस असमानता में कुछ अलग और थोड़ा राहत देने जैसा होता है तो सरकारी नीति में लूप होल खोजकर उसे अपने हिसाब से कर लिया जाता है। पूरे देश में एम.फिल, स्नातकोत्तर और सर्टिफिकेट कोर्स को छोड़ कर, हाई स्कूल के बाद से लगभग हर स्तर पर महिलाओं कीतुलना में अधिक युवा पुरुषों की प्रवृत्ति स्पष्ट है। मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा 2014-15 में जारी किए गए आँकड़ों के अनुसार, स्नातकोत्तरपाठ्यक्रमों, 49 फीसदी पुरुष और 51 फीसदी महिलाएं हैं। महिलाओं का रुख ह्यूमैनिटीज़ की ओर केंद्रित रहता है, बैचलर ऑफ आर्ट्स (बीए) में 38 फीसदीमहिलाओं ने नामांकन लिया है, इसके बाद विज्ञान और वाणिज्य विषयों में महिलाओं के नामांकन लेने की संख्या अधिक रही है; बीए पाठ्यक्रम के लिए 28 फीसदीपुरुषों ने दाखिला लिया है। करीब 8 फीसदी युवा पुरुष इंजीनियरिंग के स्नातक पाठ्यक्रमों का चयन करते हैं। यह आँकड़ा महिलाओं की संख्या (4.1 फीसदी) सेदोगुना है। प्रौद्योगिकी के स्नातक पाठ्यक्रमों में पुरुष (9 फीसदी) और महिलाएँ (4.5 फीसदी) हैं।
मतलब यदि लड़कों की संख्या अधिक है तो आपको कोई आपत्ति नहीं है लेकिन यदि लड़कियों की संख्या अधिक होने लगी तो आप परेशान हो गए। जैसा कि पूर्व में कहा कि कुलपति जैसा व्यक्ति यह बयान देता है कि ‘ज्यादा कट ऑफ़ नहीं होगा तो कॉलेज में सिर्फ़ लड़कियाँ होंगी’। मतलब पुरुषों की दुनिया में महिलाओं ने कदम रखा तो कई क्षेत्रों में वे अकेली होती थीं, तब आपको समस्या नहीं थी, अब आपको दिक्कत है तो कठोर शब्दों में कहना होगा कि लड़कियों की संख्या नहीं, आपका बयान आपत्तिजनक है। अधिक कट ऑफ़ का हथकंडा लड़कियों के अधिक प्रवेश को रोकना है मतलब उनके शिक्षा के उसी अधिकार का हनन है जो उनका मनुष्य होने का मूलभूत अधिकार है, मतलब यह रवैया पूरी तरह गैर कानूनी है। लड़कियों ने अच्छा प्रदर्शन किया तो उनकी पीठ थपथपाने की बजाए आप उनकी पीठ में खंजर खोंप रहे हैं। हाईस्कूल-हायरसेंकडरी तक अखबारों की सुर्खियाँ होती हैं कि लड़कियों ने बाजी मारी, तो फिर बाजी मारने वाली वे सारी लड़कियाँ कहाँ खो जाती हैं? उन्हें आगे की पढ़ाई करने से रोकने के लिए इस तरह के तथाकथित ‘एलिट’ हथियार अपनाए जा रहे हैं, जिसके लिए कभी सावित्रीबाई फुले ने पत्थर खाए थे, आज पत्थर न फेंककर सभ्य होने का नाटक कर रहे हैं तो इस तरह की नौटंकी बंद कर दीजिए तुरंत…इसे चाहे तो चेतावनी समझ लीजिए लेकिन यह नौबत न आने दीजिए कि कहना पड़े कि लड़कियों की राह काटने की बजाए अपना रास्ता नापिए!

औरतें अपने दु:ख की विरासत किसको देंगी

राहुल

लड़कियां माँओं जैसे मुक़द्दर क्यूँ रखती हैं
तन सहरा और आँख समुंदर क्यूँ रखती हैं
औरतें अपने दु:ख की विरासत किसको देंगी
संदूकों में बंद ये ज़ेवर क्यूँ रखती हैं ।।
इशरत आफ़री

मां अपनी बेटी को अपनी उम्मीदों व आशाओं की एक कड़ी के रूप में देखती है। वह जानती है हर एक परेशानियों का सबब। जानती है बेटी की हर एक जरुरत। खुशियों, इच्छाओं, उदासियों, भावनाओं से वाकिफ जो होती है, और मौजूद रहती है जीवन के हर एक हर्फ़ में। और बेटी भी माँ की परछाई होती है। माँ का ख्याल रखती है बेटी, और देखती है मां, बेटी को अपनी उम्मीदों, आशाओं व संभावनाओं की नजर से। इसलिए लड़कियां रखती हैं मांओं जैसा मुक्कद्दर। मुक्कद्दर की यह संभावना साहित्य में भी खूब समाहित है। और यह संभावना निर्मित करती है एक विमर्श को जो अपने मनुष्य होने की चाह लिए एक अदद मुक्ति के लिए संघर्षरत है। 

हिंदी साहित्य में स्त्री-विमर्श की वैचारिकी और राजनीतिक निर्माण को देखा जाए तो यह कृष्णा सोबती के जिक्र के बग़ैर अधूरा है। मनुष्य की आजादी और मनुष्य के रूप में स्त्री का आजाद ख्याल (आजादी) होना इनके उपन्यासों का प्रस्थान विन्दु रहा है। ‘डार से बिछुड़ी’, मित्रो मरजानी, सूरजमुखी अंधेरे के, यारो के यार, तिन पहाड़, ऐ लड़की, जिंदगीनामा, समय सरगम आदि उपन्यासों के केंद्र में स्त्री ही है। उनके ये उपन्यास स्त्री पराधीनता और जटिल भारतीय सामाजिक,पारिवारिक ताने-बाने की पड़ताल करते हैं। आधुनिकता व पारम्परिकता का सामंजस्य बैठाती और साथ ही स्वाधीनता को पाने का रास्ता सुझाती उनकी आत्मकथात्मक लघु उपन्यास/ लम्बी कहानी ‘ऐ लड़की’ अनुभव और विचार की नई दुनिया रचती है। इनकी सृजनशीलता स्वाधीनता के लिए ‘स्व की चिंता’ और ‘खुशी की नई उपयोगिता’ गढ़ती है। स्त्री की सम्पूर्ण मुक्ति पर कृष्णा सोबती की विश्व दृष्टि व विचार से विरोध हो सकता है, लेकिन इनकी चिंताओं व सवालों को नाकारा नहीं जा सकता।

‘ऐ लड़की’ आत्मकथात्मक लघु उपन्यास/ लम्बी कहानी है, जिसमें माँ- बेटी (कृष्णा सोबती और उनकी माँ) का संवाद है। 1991 में राजकमल से प्रकाशित यह लघु उपन्यास/ लम्बी कहानी 88 पृष्ठों विस्तारित है और इसके केंद्र में माँ और बेटी का आपसी संवाद है। और यह संवाद अस्तित्व के अंत:संचरण का संवाद है। इस कथा में माँ और लड़की के अस्तित्व का परस्पर एक दूसरे में घुलना है। ऐ लड़की’ में माँ अपनी जीवन- स्मृति लड़की में खोलती है और अपने जीवन-अस्तित्व को व्यक्त करती है- “तुम्हें बार-बार बुलाती हूँ तो इसलिए कि तुमसे अपने लिए ताकत खींचती हूँ।” और इस तरह उस अनुभव को छू पाती है- “मैं तुमलोगों की माँ जरूर हूँ पर तुमसे अलग हूँ। मैं तुम नहीं और तुम मैं नहीं। मैं मैं हूँ।”

माँ-बेटी के आपसी संवाद एक दूसरे के पूरक नजर आते हैं। जिन्दगी के सारे रंग खासकर स्त्री जीवन के सारे रंग हर्ष, ख़ुशी, उत्साह, दुःख, शोक, वियोग, अकेलापन आदि एक दूसरे से गूंथे हैं। “ऐ लड़की अँधेरा क्यों कर रखा है! बिजली पर कटौती! क्या सचमुच ऐसी नौबत आ गई है”[1]। यह अँधेरा केवल कमरे का अँधेरा भर नहीं है बल्कि माँ और बेटी के जीवन का अँधेरा है। स्त्री जीवन का अँधेरा है। ‘रूढ़’ व ‘आधुनिक’ दोनों तरह के समाजों में किसी भी लड़की के लिए अविवाहित व अकेले रहना अमान्य है। सामाजिक नियम के विरुद्ध है। लेकिन इस कहानी में लड़की अविवाहित है और अपनी स्वेच्छा से अविवाहित भी रहना चाहती है। ‘यह बताओ, तुम क्यों नीली चिड़िया बनी बैठी हो!’[2]

वृद्ध और बीमारी से लड़ रही अम्मू मृत्यु से डरती नहीं हैं और न ही जीने की बहुत लालसा ही रखती है, बल्कि वह तो उससे जूझने व जितने की इच्छा रखती है। तभी तो वह कहती हैं “बीमारी को अपने अन्दर धसने नहीं दिया। अभी तक तो सब कुछ चाट जाती, मेरी देहरी की सांकल तो खुल चूँकि! दरवाजे पर खटपट हुई नहीं कि मैं बहार! मगर सुन लड़की मैं मजबूती से अड़ी हूँ”[3]। “जीना और जीवन छलना नहीं है। इस दुनिया से चले जाना छलना है। …यह दुनिया बड़ी सुहानी है। हवाएँ- धूप-छाँह-बारिश-उजाला–अँधेरा-चाँद-सितारे- इस लोक की तो लीला ही अनोखी है! अद्भुत है[4]। … देह तो एक वरण है। पहना तो इस लोक में चले आए। उतार दिया तो पर-लोक। दूसरों का लोक अपना नहीं[5]। यह विचार जीवन-मोह से मुक्ति का नहीं है बल्कि स्त्री-जीवन से मुक्ति का है। लेकिन स्त्री मुक्ति का सपना तब तक पूरा नहीं हो सकता जब तक रूढ़ सामाजिक-सांस्कृतिक मूल्यों से टकराहट न हो। स्त्री अपना पूरा जीवन परिवार की ख़ुशी के लिए खपा देती है, उसकी अपनी ख़ुशी कोई मायने नहीं रखती। “शादी के बाद औरत पूरे परिवार के लिए शिकारे की माँझी बन जाती है। …उन पर सवार परिवार मजे-मजे झूमते हैं और चप्पू चलती है औरत।”[6] अम्मू की यह बात पितृसत्ता के गहरे धसे स्त्री श्रम के शोषण को अभिव्यक्त करती है और कैसे       स्त्री-श्रम को नजरअंदाज किया जाता है, इसके सामाजिक-सांस्कृतिक संबंधों की ओर भी इशारा करती है।

अम्मू की जिंदगी एक रुढ़ सामाजिक ढांचे के चौखटे में ढलती व अनुकूलित होती हुई विकसित हुई है। उसके व्यक्तित्व का स्त्रीकरण समाज के धर्म परंपरा से हुआ और सामाजिक ताने-बाने में व्याप्त सांस्कृतिक निंरकुशता ने उसे अपने अनुरूप अनुकूलित भी किया। लेकिन मानव सुलभ इच्छाएं और जीवन-लय पुराने समय को तोड़ने के लिए कुलांचे भरती टकराती टूटती आगे बढ़ी, और सामाजिक ढांचे ने उसे अपने अनुरूप ढाला भी। एक स्त्री की इच्छाएं पितृसत्तात्मक समाज में कोई मायने नहीं रखती तभी तो अम्मू कहती है- “चाहती थी पहाड़ियों की चोटियों पर चढ़ूँ। शिखरों पर पहुंचूं। …तुम तो अपने में आजाद हो। तुम पर किसी की रोक-टोक नहीं। जो चाहो कर लो। लेकिन एक बात याद रहे कि अपने से भी आजादी चाहिए होती है।”[7] अम्मू अपने सहज स्मृतियों के द्वारा स्त्री-जीवन के दोनों छोरों (दुःख और सुख) को पकड़कर समय व समाज को नापती है और एक स्त्री के जिंदगी को परत दर परत खोलती हैं। तभी तो अपनी बेटी से कहती हैं कि– “अपने आप में आप होना परम है, श्रेष्ठ है! चलाई होती न परिवार की गाड़ी तुमने भी, तो अब तक समझ गई होती कि गृहस्थी में सारी शोभा नामों की है। यह इसकी पत्नी है, बहू है, माँ है, नानी है, दादी है! फिर वही खाना, पहनना और गहना! लड़की, वह नाम की ही महारानी है। सबकुछ पोंछ-पाँछ के उसे बिठा दिया जाता है अपनी जगह जगह पर।”[8] यानि उसे देवी का दर्जा दे दिया जाता है। ऐसी देवी जो अपनी इच्छा से कुछ भी नहीं कर सकती। यह वजूद अम्मू (माँ) की है लेकिन बेटी अपने अस्तित्व के प्रति सजग है। अपनी जिंदगी के हर पहल को स्वीकारती है, कुछ भी छुपाती नहीं। अविवाहित रहने का फैसला खुद उसका है और इसे लेकर वह जरा भी चिंतित नहीं है। इस संदर्भ में देखें तो यह कहानी पितृसत्ता के स्थापित भूमिका से एक तरह का विद्रोह भी है। यह विद्रोह  परिवार और निजी सम्पत्ति, राज्य की उत्पत्ति  के संदर्भ में देखा जा सकता है। निजी  सम्पति के उदय और उस पर अधिकार की वंशानुगत व्यवस्था के क्रम में स्त्री की यौनिकता पर नियंत्रण प्रारंभ हुआ ,जो कि उन पर पुरुष वर्चस्व को तय करने का कारण बना। यह नियंत्रण उनकी गत्यात्मकता पर रोक, उनकी यौनिकता पर नियंत्रण और इस क्रम में अपनी ही देह तथा समाज  के सभी  संसाधनों (आर्थिक तथा सांस्कृतिक ) से उनका वंचन करता है। लड़की और नर्स सूसन अपनी जिंदगी के लिए अपने रास्ते खुद चुनती हैं। “सुनो, बेटा- बेटियां,नाती- नातिन, पुत्र- पौत्र मेरा सब परिवार सजा हुआ है, फिर भी अकेली हूँ। और तुम! तुम उस प्राचीन गाथा से बाहर हो, जहाँ पति होता है, बच्चे होते हैं, परिवार होता है। न भी हो दुनियादारी वाली चौखट, तो भी तुम अपने आप में तो आप हो। लड़की अपने आप में आप होना परम है, श्रेष्ठ है।”

“गृहस्थ में पांव रखकर स्त्री का जो मंथन-मर्दन होता है, वह भूचाल के झटकों से कम नहीं होता है। और औरत इसे सहन कर लेती है, क्योंकि उसे सहन करना पड़ता है।”[9] यह कहानी समाज एवं परंपरा, निजत्व, दुख के साथ नैतिकता, राजनीति आदि को भी समेटती है। रिश्तों की जटिलता, स्वावलम्बन तथा माँ-बेटी की भूमिकाओं पर भी दृष्टि डालती है।

बुर्जुआ विवाह संस्था में जकड़ी स्त्री की यह सामाजिक समस्या अम्मू की ज़िंदगी को कुरेदती है। जीवन में प्रेम का आभाव, महज स्वछंदता नहीं परिपूर्ण जीवन की चाह, उद्दाम आवेगमय प्यार की चाहत जो मानवता के भौतिक आत्मिक मुक्ति से संभव है जो आज भी स्त्री के लिए स्वप्न है। यह सारी चीजें अम्मू को अपनी जिंदगी में कभी न मिल सकी। वह अपनी बेटियों में अपनी इन इच्छाओं की चाह पाती हैं। और अपना ही विस्तार देखती हैं। “तुम जब होने वाली थी मैं दिल और मन से अकेली हो गई थी। सर में जैसे एकांत छा गया हो। दिल में यही उठे कि मैं पगडंडियों पर अकेली घूमती रहूँ। लगे चिड का ऊँचा पेड़ ही मेरे अन्दर उग आया है।”[10] अपनी समरूपा उत्पन्न करना माँ के लिए बड़ा महत्त्वाकारी है। बेटी के पैदा होते ही माँ सदाजीवी हो जाती है। वह कभी नहीं मरती। वह हो उठती है वह निरंतरा। वह आज है, कल भी रहेगी। माँ से बेटी तक। बेटी से उसकी बेटी, उसकी बेटी से अगली बेटी। अगली से भी अगली।”[11] यह क्रम लगातार चलता रहता है हम ख्याल होने तक। स्त्री मुक्ति तक। स्त्री मुक्ति और स्वतंत्रता की कल्पना आधी आबादी की आर्थिक स्वतंत्रता से भी जुड़ी है। “उसका वक्त तब सुधरेगा जब वह अपनी जीविका अपने आप कमाने लगेगी।”[12]  पितृसत्ता के विरुद्ध संघर्ष पुरानी रूढ़ियों और जकड़नों को तोड़े बिना, घर की चहदीवारी की कैद को ध्वस्त किए वगैर संभव नहीं है। “जरा सोचों मैं अपने भाई की तरह पढ़ती तो क्या बनती! क्या होती मैं और क्या होते मेरे बच्चे। सच तो यह है कि लड़कियों को तैयार ही जानमारी के लिए किया जाता है- भाई पढ़ रहा है, जाओ दूध दे आओ। भाई सो रहा है जाओ कंबल ओढा दो। जल्दी से भाई का थाली परस दो। उसे भूख लगी है। भाई खा चूका है। लो, अब तुम भी खा लो।”[13]

इस सामंती पितृसत्तात्मक समाज में लड़की होना एक अभिशाप है। जहाँ लड़की के पैदा होते ही उदासी छा जाती है। यही वजह है कि लड़की के मन में समाज के दोहरी नीतियों के प्रति गहरा आक्रोश है। अम्मू इससे बेखबर नहीं है बल्कि इससे उसका साबका बचपन में ही हो गया है। यह कितना दयनीय है कि उसने अपने उपर उन पुराने मूल्यों को लादा जिन्होंने उसे अपने बारे में, स्वतंत्र अस्तित्व के बारे में सोचने से रोका।

            अम्मू ने एकाकी, स्वावलंबी जीवन की शुरुआत की जिसमें एक स्वकेंद्रण था, जिद थी। समाज के ढांचे द्वारा पैदा व्यक्तित्व की ओढ़ी नैतिकता का दर्प था। ‘दूसरों के लिए जीना’ के कर्तव्य बोध का स्वपीड़न व ज़िंदगी का निग्रह था। और इसी के द्वारा पैदा ‘खुशामद करने-करवाने की इच्छा’, बच्चियों के प्यार और निजी ज़िंदगी पर एकाधिपत्य की चाह, बेटियों की हर बात को जानने की व्यग्रता थी। दरअसल यह अपनापन और प्यार तथा केंद में बने रहने की चाह थी जो उनके समाज ने उनके जीवन से छीन लिया था, और उनका ऐसा चरित्र निर्माण किया था। “बरसों-सालों-साल इस घर में रही हूँ पर इन दिनों बार-बार यही मन में कि कितना इतना जीना था तो कुछ ढंग का काम किया होता। इतनी बड़ी दुनिया है उसे ही देख डालती। पर गृहस्थी के ताने-बाने में उम्र ही गुजर गई।”[14] अम्मू की यह व्याग्रता, बेचैनी उस स्त्री आबादी की है जो अधीनस्थ है और दर्द का अव्यक्त उदधि समेटे है। बचपन से ही जिस स्त्री को औरतपने के चौखटे में सिद्धांत और नैतिकता के पाठ द्वारा कैद किया गया। “माँ पैदा करती है। पाल-पोसकर बढ़ा करती है। फिर उसी की कुर्बानी! माँ को टुकड़ों में बाटकर परिवार उसे यहाँ- वहाँ फैला देता है। कारण तो यही कि समूची रहकर कहीं उठ खड़ी न हो! माँ को प्योसर गाय या धाय बनाकर रखते हैं। खटती रहे, सुख देती रहे। उसका काम इतना ही है। वह अपने तई कुछ भी समझती रहे, पर बच्चों के लिए मात्र घर की व्यवस्था करने वाली।”[15] इस संदर्भ में देखें तो एक स्त्री को माँ का दर्जा देकर उसका महिमा मंडन ही किया जाता है। ‘माँ एक सामाजिक प्रत्यय है’। अम्मू के जीवन परिधि का विस्तार भी हो रहा है, खुद के लिए उसका जीना, स्वार्थ के लिए नहीं वरन सबके साथ जीने की तरफ जाता है। उसकी चिंता का दायरा स्व तक ही नहीं सिमित है बल्कि सूसन (अपनी अटेंडेंट) तक की चिंता है। वह सूसन से पूछती हैं- “अपने लिए कोई लड़का नजर में है? ढूढ़ने का काम तुम्हें खुद ही करना होगा।”[16]

अपने अस्तित्व को पति के अस्तित्व से अलग देखने-समझने की परंपरा ‘भारतीय समाज’ में  नहीं रही है। स्त्री पिता, पति, पुत्र के अस्तित्व से ही पहचानी जाती रही है। लेकिन सामंती पितृसत्ता के कमजोर पड़ने पर स्त्रियाँ अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष करने लगी हैं। विवाह के बाद भी अपने स्वतंत्र अस्तित्व को बनाए रखना चाहती हैं। इसी संदर्भ में अम्मू सूसन को एक मंत्र देती हैं- “मेरी बात सुनो। न पूरा खर्च तुम किया करो और न उसे ही करने दिया करो। आधा-आधा, समझी। नहीं तो यूं ही हजम कर ली जाओगी। सूसन, शादी के बाद किसी के हाथों का झुनझुना नहीं बनना। अपनी ताकत बनने की कोशिश करना।”[17] यह एक स्त्री की सहज चिंता है जो जीवन उसने जिया, वही जीवन भविष्य की पीढियां न जिएं, वे ऐसे समाज का हिस्सा हों जहाँ उनकी भी इच्छाओं, विचारों को समझा जा सके और अपने फैसले वे खुद ले सकें। उनकी अपनी इच्छाओं का दमन पितृसत्तात्मक ढांचे व रूढ़ सामाजिक-सांस्कृतिक मूल्यों के सहारे न हो सके।    

‘ऐ लड़की’ उपन्यास/लम्बी कहानी मृत्यु की प्रतीक्षा में एक बुजुर्ग स्त्री की कहानी मात्र नहीं है, बल्कि अपनी स्मृतियों के माध्यम से स्त्री जीवन को टटोलती एक ऐसी स्त्री की कहानी है जो स्त्री को रूढ़ सामाजिक मूल्यों से मुक्ति व स्त्री स्वावलम्बन की चाहत रखती है। “सोचने की बात है- मर्द काम करता है, तो उसे इवज में अर्थ-धन प्राप्त होता है। औरत दिन-रात जो खटती है वह बेगार के खाते में ही न! भूली रहती है अपने को मोह-ममता में अंजान बेध्यान।”[18] यह वह सवाल है जिसे नारीवाद भी उठाने से कतराता है।

समाज द्वारा अम्म्मू के अधीनस्थ स्त्री व्यक्तित्व का निर्माण, बुर्जुआ विवाह परम्परा, पुरुष की भोग दृष्टि, आर्थिक स्वातंत्र्य व नारी मुक्ति, स्वावलंबन, ‘स्त्री सुलभ लज्जा व संकोच’ आदि की चर्चा करते हुए प्रश्न उपस्थित करता है। और समाधान के लिए संवेदन बहस पैदा करता है। विषय में आत्मकथात्मक और वृद्ध अवस्था व बीमारी से लड़ती जिजीविषा से भरी अम्मू के जद्दोजहद की सीमा में यह उपन्यास गहरी भावात्मकता, संवेदना व वैचारिकी को संप्रेषित करता है। साथ ही स्त्री मनोविज्ञान व स्त्री प्रश्न के कई सवालों को भी खड़ा करता है।

यह दीगर बात है कि यह लघु उपन्यास/ लम्बी कहानी स्त्री मुक्ति के प्रश्न को निजता की मुक्ति व व्यक्ति स्व के स्वावलंबन की सीमा तक ही सीमित रहती है। स्त्री मुक्ति के तमाम सवालों को नजरअंदाज करते हुए यह स्त्री जीवन के लिए परंपरा और आधुनिक बोध के बीच सामंजस्य स्थापित करती हुई प्रतीत होती है।     


[1]  सोबती, कृष्णा.(1991). ऐ लड़की. दिल्ली : राजकमल प्रकाशन. पृष्ठ सं. 7
[2] वही, पृष्ठ सं. 8
[3] वही 8
[4] वही, 41
[5] वही 12
[6] वही 56
[7] वही 56
[8] वही 57
[9] वही 73
[10] वही 69
[11] वही 43
[12] वही 56
[13] वही 68
[14] वही 73
[15] वही 74
[16] वही 53
[17] वही 53
[18] वही 56

स्त्री अध्ययन विभाग, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय में गेस्ट फैकल्टी. ईमेल- apnaemailpata@gmail.com , मोबाइल नं. 9689337805

पंखुरी सिन्हा की कविताएं (घास पटाने के मेरे बूट व अन्य)

पंखुरी सिन्हा
युवा लेखिका, दो हिंदी कथा संग्रह ज्ञानपीठ से, तीन हिंदी कविता संग्रह, दो अंग्रेजी कविता संग्रह।

चर्चा
वह उसे बहुत पसंद कर रही थी
लगभग चाहने की तरह
और चाहती थी सुकून पाना
चाहने में उसे
पसंद करने में उसे
लौटना ज़िन्दगी में
उसे पसंद करना पूरी तरह
और चाहती थी
सुकून पाना
उस चाहने की चर्चा में
पर हर बार जब वह करीब आती
उस सुकून के
एक नया ज्वालामुखी फुफकारता कहीं पास
जैसे खुरचता हो कोई धरती की रीढ़ को।

हर बात का तराज़ू
उसके साथ की सुबहें
या वो सुबहें जब वो साथ था
कुछ उसकी बातों में आकाश था
कुछ मेरी आँखों में
कुछ आकाश हमारे आगे था
कुछ पीछे
कुछ दायें, बायें, की राजनीति थी
कुछ पत्थर सी कूटनीति थी
कुछ प्रतिध्वनियाँ थीं
प्रतिबिम्ब थे
हर बात की नाप जोख थी
हर बात में तराज़ू।

अब की खिड़की से
बिखेर लेने के बाद
ढेरों ताज़ा लिखावट इर्द गिर्द
पूरी तरतीबी से
अधूरे किस्से
बहसें अधूरी
कागज़ का वह सफ़ेद जो कहीं नहीं मिलता
चमकता सुबह की नीलाभ रौशनी में
जैसे और कुछ नहीं चमकता
और पीताभ हो जब लालिमा
उगते सूर्य की, आज
बिखेर कर कैनवस अधूरे चित्रों के
सूखते रंगों की खुशबू के
सराबोर रंगों की खुशबू में
जब बाकी सब हो नितांत शून्य
देखना अब की खिड़की से
अब के लम्हे से
अतीत को
उसके साथ वाले घर को
प्यार भरी आँखों से
इंतजार भरी आँखों से
तरसती आँखों से
कि उसका जाना हो
सबकुछ का जाना
बेहतरीन हिस्से का गवाना
एक ऐसे अब में रहते हुए
एक हुकुमत के बनाये
ऐसे अब में
जहाँ पुरुष की एक नयी सत्ता हो
तानाशाही तंत्र की गिरफ्त की खिड़की से
देखते हुए उस गुज़रे कल को।

इकबाल मेहदी का स्केच

उसकी दराजें
टूटने पर नींद के
पाना हर सुबह
कि गायब अचानक
दराजें क्या, मेजें भी
तमाम कुर्सी
टेबल
आल्मारियां
कमरे में खड़े दो बड़े, बड़े, सूटकेस
या तीन भी
खोले तक नहीं गए
तमाम लगेज, बैगेज
लिविंग आउट ऑफ़ सूट केसेज़
अंग्रेज़ी की उस नफीस कहावत की तर्ज़ पर
जो उसकी वह सहपाठिन
कहा करती थी
जिसके सूटकेस सबसे उम्दा
सबसे नामी ब्रांड के हुआ करते थे
सबसे महंगे
लेकिन उनके वैसा न होने पर भी
उसकी बातों में माद्दा था
‘लिविंग आउट ऑफ़ सूटकेसेज़’ में
अगर खस्ता भी हों सूटकेस आपके
पुराने, घिसे हुए लॉक के
जो अटक जाता हो बार, बार
और कपडे की सूटकेस का ज़िप
जो बुरी तरह अटक जाता हो बार बार
पुराने, घिसे सामानों को खुला छोड़ देने की तरह
खुले सूटकेसेज़ वाले दिनों रातों की तरह
कुछ वैसी ही तर्ज़ पर
‘लिविंग आउट ऑफ़ लौंडरी बास्केट्स’
जो डिमोशन हो
वास्तव में
कि सारी हस्ती सिमट गयी हो
प्लास्टिक के उन डब्बों में
प्लास्टिक के खुले लौंड्री बास्केट्स
ढेरों लिखे हुए रजिस्टर उनमें
थाक रजिस्टरों की
कपड़ों की भी
जिस्ता कागज़ का
लांड्री बास्केट जो बिखरे हों
कमरे में
फर्श पर
तोशक की बगल में
सारा बिखराव फर्श पर
सारी गुजर बसर फर्श पर
एक आन्दोलन के बाद
जिसकी मुहिम हो
हु डज़ द हाउसहोल्ड लांड्री
और बन गया हो वह आन्दोलन
कि तंग कर रहे हों हम आपको
और दायर करें रिपोर्ट आप
मुक़दमा आप
जबकि मारे लड़ाई के
बदहाल हों आप
फटेहाल हों आप
सुस्ता रहे हों
‘किसी तरुवर की छांव में’
मुहावरे की धुन पर
कमरे में किसी
और उस सहपाठिन का ताज़ा बयां आया हो
कि ‘इफ दे लाइक इट’
और ये तय करना मुश्किल हो
कि किस बारे में कहा हो उसने
कहीं लिविंग आउट ऑफ़ सूट केसेज़ का अपना बयां रिवाइज़ न कर दिया हो
या कि लिविंग आउट ऑफ़ लौंड्री बास्केट्स’
पर कहा हो
या कि सुस्ताने पर उसके
जैसे गर्मी में हाँफता हो चीता
लेकिन इफ दे लाइक इट
का उसका जुमला
बहुत प्रसिद्ध हो गया था
ऊँचे ओहदों के सारे अधिकारियों के बीच
ये वो दिन थे
जब उसके तमाम दोस्तों का मूल्य
बहुत बढ़ गया था
वो बहुत लोकप्रिय हो गए थे
बहुत बड़े
और दराजों में चूमकर
रखे जाने वाले कागजों का कोई पता नहीं था।

घास पटाने के मेरे बूट
दूब, तृण, तिनका
निकलता जैसे अंकुर
जैसे धरती के बीज
अम्बर की छाँव
घास जैसे पावन हरित सामग्री
वेदी पर जैसे मंत्र सृजन के
हर रोज़ उगती परत
हर रोज़ बिछती परत
परत गहराती
गहराता रंग
सहज, सुन्दर
ज़िन्दगी का रंग
रंग विस्तार का
विकास का
फैलाव का
गति का
रंग सपनों का
रंग, रंग बदलते अपनों का
नहीं बनता रंग प्रेम का उनके
बनता जाता रंग अनावश्यक सवालों का
पानी, मिटटी, कीचड, कादो
आवश्यक घास उगाने को
कुछ थमाव पानी का, कुछ जमाव पानी का
परहेज़ किसी भी उछाल से
उबाल से
पानी में चलने के बूट उसके
टखनो से ऊपर तक के
दरकार ठहराव की
शांति की
सुखद शामों की
खरीददारी की
घुटने तक के बूट
चमड़े के
जो उसने अबतक नहीं खरीदे
और जब कुछ डोलने लगे
इंच इंच उगती घास
सारे दिन उगती घास
सुबह से शाम तक उगती घास
सारी रात उगती घास
जो बिल्कुल अलग नज़र आती हो
सूरज की बदलती दिशा में
और जज़्ब हो जाने के बाद
सारा पानी
नंगे पाँव खड़े होकर
हरी धरती पर
सूर्य नमस्कार
चन्द्र नमन
अभिवादन दिशाओं का
असीम अनंत का
पूजा प्रकृति की।

पंखुरी सिन्हा को कविता के लिए राजस्थान पत्रिका का 2017 का पहला पुरस्कार,  राजीव गाँधी एक्सीलेंस अवार्ड 2013, पहले कहानी संग्रह, ‘कोई भी दिन’ , को 2007 का चित्रा कुमार शैलेश मटियानी सम्मान, मिल चुका है. ‘एक नया मौन, एक नया उद्घोष’, कविता पर,1995 का गिरिजा कुमार माथुर स्मृति पुरस्कार. ‘कोबरा: गॉड ऐट मर्सी’, डाक्यूमेंट्री का स्क्रिप्ट लेखन, जिसे 1998-99 के यू जी सी, फिल्म महोत्सव में, सर्व श्रेष्ठ फिल्म का खिताब मिला. इनकी कविताओं का मराठी, पंजाबी,  बांग्ला, अंग्रेज़ी और नेपाली में अनुवाद हो चुका है.

कविता की प्रकृति ही है समय से आगे चलना

                  

समय के साथ कवियों का वैयक्तिक स्‍वर सामाजिक होता जाता है। आरंभ में छोटे-मोटे दुख-दर्दों, सहज भावनात्‍मक प्रतिक्रियाओं तथा अतीत-स्‍मरण के रूप में लक्षित होने वाली अभिव्यक्ति धीरे-धीरे जटिल होती गई है।

अर्चना त्रिपाठी
माता सुंदरी कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय में हिंदी
की अस्थायी प्राध्यापिका

‘दिल्‍ली’ कविता में दिनकर लिखते हैं-
‘इस उजाड़, निर्जन खंडहर में
छिन्‍न-भिन्‍न उजड़े इस घर में
तुझे रूप सजने की सूझी
मेरे सत्‍यानाश-प्रहर में’[i]

शोषक और शोषित की एक लंबी परंपरा इन पंक्तियों में निहित है। कैसे एक तबका उजड़े घर में सुबक रहा है, भूख उसके लिए एक अहम सवाल है, वहीं दूसरी तरफ़ पूँजी से लैस वर्ग बनने-ठनने में विश्‍वास रखता है और भूख का अर्थ वह अन्‍य कई मायनों में लेता हुआ मुस्‍कराता है। राष्‍ट्रीयता से जुड़े हुए सवालों पर लिखने वाले कवियों के काव्‍य में गांधी के असहयोग आंदोलन, राष्‍ट्रीय भावनाओं से युक्‍त स्‍वतंत्रता संग्राम की घटनाओं, शहीदों के प्रति श्रद्धांजलि, मज़दूरों और किसानों के शोषण के प्रति विद्रोह की आवाज़ को बुलंदी मिली, यह वह समय था जब भारत अपनी अस्मिता की रक्षा के लिए संघर्ष कर रहा था। इस संग्राम में जुटे भारतीय दो वर्गों में बँटे थे। एक वर्ग गांधी द्वारा बताए सत्‍य–अहिंसा का मार्ग अपनाकर आज़ादी का स्‍वप्‍न देखता था, जिसमें कवि लिखता है-

“चल पड़े जिधर दो डग-मग में,
चल पड़े कोटि-पग उसी ओर।
पड़ गई जिधर भी एक दृष्टि,
गड़ गए कोटि-दृग उसी ओर।”[ii]

यहीं पर एक दूसरा वर्ग था, जो गांधी के सिद्धांतों से असहमत था और क्रांति में विश्‍वास रख रहा था। दिनकर लिखते हैं-
“ज़रा तू बोल तो, सारी धरा हम फूँक देंगे
पड़ा जो पंथ में गिरि, कर उसे दो टूक देंगे।”[iii]
दिनकर जी का झुकाव यद्यपि मार्क्‍सवाद की तरफ़ था लेकिन इन्‍होंने मार्क्‍सवाद और गांधीवाद के बीच से मार्ग तलाशा, यहाँ ध्‍वंस का नहीं, निर्माण का स्‍वप्‍न और स्‍वर साकार होता है। 1936 में प्रगतिशील लेखक संघ की स्‍थापना के समय से हिंदी में प्रगतिवादी आंदोलन की शुरुआत मानी जाती है, लेकिन प्रगतिशील कविताएँ इस संघ की स्‍थापना से पहले भी लिखी जा चुकी थीं। सोवियत आदर्शों और रूस की क्रांति से प्रेरित लेखकों ने अंतरराष्‍ट्रीय स्‍तर पर इस संगठन को बनाया था। प्रगतिवाद जीवन के प्रति एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण लेकर आगे बढ़ता है जहाँ ईश्‍वर, आत्‍मा आदि की सत्‍ता को अस्‍वीकार करके भौतिक विधान को स्‍वीकृति मिली है।

प्राचीन संस्‍कारों के मोहपाश को काटकर नवीन युग-यथार्थ की चेतना का स्‍वागत सर्वप्रथम स्‍वयं छायावादी कवि पंत ने किया था। ‘युगांत’ में इसकी आहट सुनाई देती है किंतु ‘युगवाणी’ और ‘ग्राम्‍या’ की कविताओं में यह स्‍वर ओजपूर्ण हो उठता है। पंत की कविता की यह नई ज़मीन थी। ध्‍यान देने वाली बात है कि छायावाद को रहस्‍यवाद के घेरे में डालकर उसके कई पहलुओं पर चर्चा नहीं हो सकती थी। एक तरफ़ तो छायावाद से शक्ति-काव्‍य निकलता है दूसरी तरफ़ शक्ति काव्‍य का ही पर्याय प्रगतिशील कविताएँ भी निकलती हैं जो कि नि:संदेह प्रगतिवादी कविताएँ हैं।

निराला अपनी कविताओं में सामाजिक-दृष्टि का परिचय उस समय दे रहे थे, जब हिंदी में प्रगतिवाद नाम की कोई बात नहीं थी। उनकी ‘भिक्षुक’, ‘दान’, ‘बादल-राग’, ‘विधवा’ जैसी कविताएँ बहुत पहले रची गईं। सन् 1936 में ‘वह तोड़ती पत्‍थर’, ‘कुकुरमुत्ता’ तथा अन्‍य रचनाओं के साथ ठोस यथार्थ से बने धरातल की बात करते हैं। 1936 में आईं प्रगतिशील रचनाएँ कहीं न कहीं प्र.ले.सं. से ज़रूर प्रभावित होकर लिखी जाने लगी थीं। बाद में ‘आराधना’ और ‘अर्चना’ के गीतों में निराला की प्रखर सामाजिक चेतना थोड़ा मंद पड़ी, जिसका कारण उनका और उनकी रचनाओं की लगातार उपेक्षा भी मानी जा सकती है। निराला नेहरू से हिंदी साहित्य की प्रगति को लेकर बातें करके भी सामाजिक कुरूपता को मिटाने का प्रयास किए, पर जब नेहरू जी जेल में थे और जनता की हालत ख़राब थी, उन्‍होंने लिखा-
“मँहगाई की बाढ़ आई, गाँठ की छूटी गाढ़ी कमाई
भूखे नंगे खड़े शरमाए, न आए वीर जवाहर लाल”[iv]

प्रगतिवादी कविता की क्रांति-चेतना राष्‍ट्रीय-सामाजिक दोनों पक्षों को लेकर चल रही थी। एक तरफ़ यह भावना पराधीनता से मुक्ति पाने के लिए ललकारती है तो दूसरी तरफ़ सामाजिक दृष्टि से वर्ग-व्‍यवस्‍था को ध्‍वस्त करने का आह्वान करती है।       

दूसरे महायुद्ध के दौरान भारत की जनता ने बहुत दुख सहे, साथ ही उसके सबसे सचेत अंश ने पूँजीपतियों और पूँजीवादी नेताओं की नीति भी पहचानी और साम्राज्‍यवादी दासता से मुक्ति पाने के लिए उसका मनोबल और दृढ़ हुआ। इस स्थिति को केदारनाथ अग्रवाल सटीक ढंग से प्रतिबिंबित करते हैं- ‘जो शिलाएँ तोड़ते हैं’ काव्‍य संग्रह में देखा जा सकता है। केदारनाथ अग्रवाल उन थोड़े से लेखकों में हैं जिन्‍होंने स्‍पष्‍ट देखा था कि किसान की सामंत विरोधी क्रांति को स्‍वाधीनता आंदोलन का प्रमुख अंग बनना है। अपने अंचल के किसानों से सीधे अवधी में बात करते हुए उन्‍होंने ओसौनी का गीत लिखा-
‘दौरी साधौ अन्‍न ओसावौ अडर उड़ावौ पैरा
ताल ठोंकि कै मारि भगावौ जेते ऐसा गैरा।’[v]

कांग्रेस और मुस्लिम लीग की सक्रियता से जनता में आशा की लहर थी कि देश को स्‍वाधीनता जल्‍दी मिल जाएगी। इस धारणा से बहुत दूर केदारनाथ अग्रवाल लिखते हैं- ‘मारि भगावौ जेते ऐरा गैरा’। किसान इनके पहले के कवियों में भी आता है पर अब वह पूरी धमक के साथ केदार की कविताओं में आता है।

मुक्तिबोध

केदारनाथ अग्रवाल से पहले नागार्जुन एक महत्‍वपूर्ण कड़ी के रूप में प्रगतिवादी साहित्‍य में अपनी धाक जमाते हैं। साधारण जन, निरक्षर लोग और कष्‍ट भोगती जनता की कविता बने नागार्जुन, नागार्जुन ऐसे ही नहीं कहते- प्रतिबद्ध हूँ…आबद्ध हूँ… इनकी प्रतिबद्धता जन के साथ है, जनता के स्‍वर से स्‍वर मिलाते हुए नागार्जुन कहते हैं-

‘जन-जन में विद्रोह भरेगी अन्नब्रह्म की माया
गुरबत का मैदान चरेगी अन्नब्रह्म की माया’[vi]

अन्‍याय का, अन्‍यायियों का प्रतिरोध करते नागार्जुन कबीर के समकक्ष खड़े जन की बात करते हैं। वे कबीर की ही भाँति बुद्धिजीवियों को खरी-खोटी सुनाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ते थे- ‘संग तुम्‍हारे साथ तुम्‍हारे’ शीर्षक कविता में उन्‍होंने सर्वहारा वर्ग के लोगों को संबोधित करते हुए लिखा है-
‘पतित बुद्धिजीवी जमात में आग लगा दो
यों तो इनकी लाशों को क्‍या गीध छुएँगे
गलित कुष्ठवाली काया को/कुत्ते भी तो सूँघ-सूँघकर
दूर रहेंगे/अपनी मौत इन्‍हें मरने दो…
तुम मत जाया करना….’[vii]

नागार्जुन यथार्थ की ज़मीन पर दृढ़तापूर्वक खड़े होकर समाज और राष्‍ट्र के सजग पहरुए की भूमिका निभाने वाले रचनाकार हैं। समाज की अराजक स्थिति उन्‍हें बेचैन कर देती है और व्‍यक्तिगत मौजीपन, फक्‍कड़पन कविताओं में भी बिना लाग-लपेट के सब कुछ कह जाता है- “धन्‍य वे जिनकी उपज के भाग
अन्‍न-पानी और भाजी-साग
विपुल उनका ऋण, सधा सकता न मैं दशमांश
ओह, यद्यपि पड़ गया हूँ दूर उनसे आज
हृदय से पर आ रही आवाज़
धन्‍य वे जन, वही धन्‍य समाज”[viii]

इसके अलावा नागार्जुन उन आस्‍थाओं, क्रांतिधर्मिता, समता, प्रगति और जनवाद से संबंधित आस्‍थाओं पर भी आलोचनात्‍मक टिप्‍पणी कर देते हैं- “सोचते रहे-सोचते रहे/क्रांति, समता, प्रगति, जनवाद/आजीवन हमने/ इन शब्‍दों से काम लिया है/वो हमें चेतावनी दे गए हैं…..”[ix]

त्रिलोचन के यथार्थवाद में जैसे शहर से लेकर देहात तक के दृश्‍यों की विविधता है। त्रिलोचन की अपनी पीड़ा जन की पीड़ा है उनका आत्‍मसंघर्ष जनसंघर्ष ही है। व्‍यवस्‍था बदलने की ललकार उनकी कविताओं में दिखाई देती है। ‘धरती’ कविता में लिखते हैं-
“ओ तू नियति बदलने वाला
तू स्‍वभाव का गढ़ने वाला
तूने जिन नयनों से देखा
उन मज़दूरों-किसानों का दल
शक्ति दिखाने आज चला है।”[x

त्रिलोचन हों या नागार्जुन इनकी ज़्यादातर विद्रोही और प्रगतिशील कविताएँ आज़ादी के बाद ही लिखी गईं मिलती हैं। त्रिलोचन की कविता पूरी दुनिया की सैरकर फिर दुनिया में आ जाती है। त्रिलोचन अपने पच्‍चीसवें सॉनेट में अत्‍यंत बेधक स्‍वर में लिखते हैं-

“लाशों की चर्चा थी, अथवा सन्‍नाटा था
राज्‍यपाल ने दावत दी थी, हा-हा, ही-ही
चहल-पहल थी, सागर और ज्‍वारभाटा था
जो सुनता था वही थूकता था, यह छी-छी
यह क्‍या रंग-ढंग है। मानवता थोड़ी सी
आज दिखा दी होती। वे साहित्‍यकार हैं।”[xi]

मानवीय संकट का तीखा एहसास कराती है यह कविता। खांटी किसान जीवन की सच्‍चाई और ग़रीबी से पार पाने के लिए किया गया श्रम साथ ही पति-पत्‍नी की संवेदना, तीनों तत्‍वों का मिश्रण करते हुए त्रिलोचन लिखते हैं-
“रस्सियाँ भी नगई बरा करता था
सुतली को कातकर बाध भी बनाता था।”[xii]

जीवन-स्थितियों का ऐसा सजीव चित्रण अपने आप में अनोखा है। कथ्‍य, शिल्‍प दोनों पक्षों में कविता का कोई सानी नहीं है। त्रिलोचन के यहाँ ‘एक भले आदमी का ईमानदारी से श्रम करते रहना’ ऐसी भलमनशाहत को महत्‍व दिया गया और एक भोले नगई के माध्‍यम से पूँजीवाद, साम्राज्‍यवाद, सामंतवाद जैसे बड़े सवाल बड़ी आसानी से खड़ा करते हैं।

निराला

त्रिलोचन कहते हैं ‘मैं जनपद का कवि हूँ’ सचमुच त्रिलोचन को क्षेत्रीय भाषा चौंकाती नहीं लुभाती है। उनकी भाषा भारत के किसान-जीवन की विविध क्रियाओं परिवेश और लोकोक्तियों से स्‍वरूप ग्रहण करती है-
‘साम्राज्य औ पूँजीवादी
लिए हुए अपनी बरबादी
ज़ोर आजमाई करते हैं
आज तोड़ने को उनका मन
उठकर दलित समाज चला है’[xiii]

 इन प्रमुख प्रगतिशील कवियों के पीछे प्रगतिशील लेखक संघ काम कर रहा था और साहित्‍य में प्रमुख रूप से जनवादी चेतना और फासिज़्म के विरोध के पीछे भी प्रगतिशील लेखक संघ काम कर रहा था। राजसत्‍ता, राजतंत्र के ख़िलाफ़ जनवादी आवाज़ का उठना ही तत्‍कालीन स्थिति के आधार पर बड़ी बात थी। 1942 की अगस्‍त क्रांति, भारतीय कम्‍युनिस्‍ट पार्टी का रूस समेत मिश्र राष्‍ट्रों का और एक तरह से ब्रिटिश सरकार का ही पक्ष समर्थन करना, इसी बीच बंगाल में भयंकर अकाल पड़ा, इस तरह देखा जाए तो 1939 से 1946 तक का दौर अनेक प्रकार के जटिल राजनीतिक और सामाजिक प्रश्‍नों का दौर बन गया। प्रगतिवादी लेखक संघ के मुख्‍य उद्देश्‍य में से भारतीय जननाट्य संघ (इप्‍टा) की स्‍थापना भी था, जिसके माध्‍यम से लेखक जनता तक पहुँचकर उनकी समस्‍याओं पर बात कर सकते थे और उसे अपनी रचनाओं में शामिल कर सकते थे।

रेखा अवस्‍थी ‘प्रगतिवाद और समानांतर साहित्‍य’ पुस्‍तक में लिखती हैं- “प्रगतिशील लेखक संघ की ओर से भारतीय जननाट्य शाला स्‍थापित करने के प्रयत्‍न शुरू हुए, 1943 में मुंबई (तत्‍कालीन बंबई) में ‘भारतीय जननाट्य संघ’ की स्‍थापना की गई। इसके तुरंद बाद कम्‍युनिस्‍ट पार्टी और प्रगतिशील लेखक संघ के परस्‍पर सहयोग से देश के कोने-कोने में जननाट्य शाला की शाखाएँ स्‍थापित करने की चेष्‍टा होने लगी। इस सदी के पाँचवे दशक में पीपुल्‍स थियेटर ने नाट्यकला को बल और शक्ति प्रदान की। इस धारा ने हर प्रांत और भाषा को अच्‍छे नाटककार, गीतकार, कवि और मंच कलाकार प्रदान किए।”[xiv]

यही कारण रहा कि साहित्‍य की सभी विधाओं में साम्राज्‍यवाद विरोधी स्‍वर उठने लगा। प्रगतिवादी कवियों की भरमार सी आ गई, परंतु इनमें से महत्‍वपूर्ण रूप से नागार्जुन, त्रिलोचन, केदारनाथ अग्रवाल, शमशेर, मुक्तिबोध का नाम और उनकी चुनिंदा प्रगतिशील कविताओं का ज़िक्र किया जा रहा है। बंगाल की अकाल की त्रासदी पर बाबा नागार्जुन कालजयी कविता लिखते हैं-

“कई दिनों तक चूल्‍हा रोया, चक्‍की रही उदास
कई दिनों तक कानी कुतिया, सोई उनके पास।”
फिर इसी अकाल का दूसरा दृश्‍य इस तरह से दिखाते हैं-
“दाने आए घर के अंदर कई दिनों के बाद
कौए ने खुजलाई पाँखें कई दिनों के बाद”[xv]

सांप्रदायिक उन्‍मादों पर लिखी गई शमशेर की कविताओं में गहरी तकलीफ़ और तीखे व्‍यंग्‍य का युग्‍म उसे अद्वितीय कविता बना देता है। शमशेर के व्‍यंग्‍य का मिज़ाज नागार्जुन से थोड़ा भिन्‍न है। यहाँ शब्‍दों की मार थोड़ी बाकी है-
“ये मुल्‍क इतना बड़ा है/यह कभी बाहर के/
हमले से/न सर होगा/जो सर होगा
तो बस/अंदर के फितने से”[xvi]

शमशेर तार सप्‍तक के कवि यानी प्रयोगवाद के अंतर्गत माने जाते हैं पर उनके काव्‍य के कई रंग हैं, उनकी कविताओं में प्रगतिशीलता भी निहित है, इससे इंकार नहीं किया जा सकता। शमशेर को ग़ैर-प्रगतिशील कहने वालों को उनकी यह कविता झुठला देती है-
“फिर वह हिलोर उठी-गाओ!
वह मज़दूर किसानों के स्‍वर कठिन हठी
कवि हे, उनमें अपना हृदय मिलाओ!
उनके मिट्टी के तन में है अधिक आग
है अधिक ताप! उसमें कवि हे
अपने विरह मिलन के पाप जलाओ!”[xvii]

मुक्तिबोध का नाम आते ही उन्‍हें नई कविता के खेमे में फिट कर दिया जाता है लेकिन उनकी प्रगतिवादी कविताओं के साथ अन्‍याय नहीं किया जा सकता। मुक्तिबोध अपने काव्‍य नायक को जीवन की यथार्थ स्थितियों विद्रूपताओं, विश्रृंखलताओं का अवबोधन कराकर क्रांति या विद्रोह का रास्‍ता सुझाते हैं, वे मार्क्‍सवाद से भी प्रभावित होते हैं और समाज की ख़ामियों को इसी सिद्धांत से दूर करना चाहते हैं पर पूर्णत: मार्क्‍स के सिद्धांत को अपने काव्‍य में उतारने से बचते भी हैं। मुक्तिबोध की रचनाएँ यद्यपि आज़ादी के बाद की हैं, पर कुछ एक कविताएँ जो कि प्रगतिशील स्‍वर के साथ-साथ आज़ादी के पहले के भावबोध को लिए हुए हैं-
“बारह का वक़्त है
भुसभुसे उजाले का फुसफुसाता षड्यंत्र
शहर में चारों ओर;
ज़माना भी सख्‍त़ है”[xviii]

राजनीतिक क्षेत्र में व्‍याप्‍त अवसरवाद, भ्रष्‍टाचार, पद लालसा, खोखली नारेबाजी आदि को महत्‍वपूर्ण ढंग से मुक्तिबोध ने अपनी कविताओं की विषय-वस्‍तु बनाया है।
युग के यथार्थ की बात करते हुए ‘अँधेरे में’ कविता में लिखते हैं-
“ओ मेरे आदर्शवादी मन/ओ मेरे सिद्धांतवादी मन
अब तक क्‍या किया?
जीवन क्‍या जिया!!”[xix]

रामधारी सिंह दिनकर

मुक्तिबोध की कविता अद्भुत संकेतों से भरी हर शब्‍द में चौंकाती है और एक शब्‍द के नए और कई अर्थ बना जाती है। युग के चेहरे का आइना हैं मुक्तिबोध। ऐसे यथार्थ की बात करते हैं जो आज के इतिहास के मलबे के नीचे दब गया है, मगर मर नहीं गया है-
“कोशिश करो/कोशिश करो/कोशिश करो
जीने की- ज़मीन में गड़कर भी…।

यही नहीं समय का कुचक्र और दहशत को मुक्तिबोध ‘लकड़ी का बना रावण’ शीर्षक कविता में व्यक्त करते हैं.-
हाय, हाय
उग्रतर हो रहा चेहरों का समुदाय
और कि भाग नहीं पाता मैं
हिल नहीं पाता हूँ
मैं मंत्र-कीलित-सा, भूमि में गड़ा-सा
जड़ खड़ा हूँ
अब गिरा तब गिरा 
इस पल कि उस पल…[xx]

मुक्तिबोध आदि कवियों के अतिरिक्‍त अज्ञेय, भारत भूषण अग्रवाल, भवानी प्रसाद मिश्र, नरेश मेहता, धर्मवीर भारती आदि भी प्रगतिवादी कवि के अंतर्गत आते हैं।

प्रयोगवादी कविता वस्‍तुत: मध्‍यवर्गीय समाज का चित्र है। यह 1943 में ‘तारसप्‍तक’ के प्रकाशन के साथ शुरू हुआ, इसमें सामाजिक सत्‍य के बजाय व्‍यक्तिगत सत्‍य को स्‍वीकार किया गया।

डॉ. नगेंद्र ‘हिंदी साहित्‍य का इतिहास’ में लिखते हैं- “ ‘तारसप्‍तक’ और ‘प्रतीक’ पत्रिका को देखने से यह स्‍पष्‍ट ज्ञात होता है कि इनमें संगृहीत या प्रकाशित कवियों के अनुभव के क्षेत्र, दृष्टिकोण और कथ्‍य एक ही प्रकार के नहीं है, कुछ ऐसे हैं जो विचारों से समाजवादी हैं और संस्‍कारों से व्‍यक्तिवादी- जैसे शमशेर, नरेश मेहता आदि। कुछ ऐसे हैं जो विचारों और क्रियाओं दोनों से समाजवादी हैं जैसे- रामविलास शर्मा, मुक्तिबोध।”[xxi]

प्रयोगवाद के अंतर्गत महत्‍वपूर्ण कवि के रूप में अज्ञेय को ही जाना जाता है। ‘प्रयोगवाद’ नामकरण को अनुपयुक्‍त मानते हुए ‘दूसरा सप्‍तक’ की भूमिका में अज्ञेय को स्‍पष्‍ट करना पड़ा कि ‘प्रयोग का कोई वाद नहीं है… प्रयोग अपने आप में इष्‍ट नहीं है, वह साधन है और दोहरा साधन है….’ देखा जाए तो प्रगतिवाद, प्रयोगवाद, नई कविता एक-दूसरे से इस तरह बँधे हुए हैं कि इन काव्‍यधाराओं में एक-दूसरे की काव्‍य प्रवृत्तियाँ मिली हुई दिखाई दे जाती है। हिरोशिमा कविता लिखते समय अज्ञेय प्रयोगवादी परंपरा से एकदम बाहर दिखते हैं-
“छायाएँ मानव-जन की
नहीं मिटीं लंबी हो-होकर
मानव ही सब भाप हो गए।
छायाएँ तो अभी लिखी हैं
झुलसे हुए पत्थरों पर
उजड़ी सड़कों की गच पर।”[xxii]

यही कवि आगे नए उपमानों की बात करता है और नदी के द्वीप की बात करता है यही नहीं चैत की हवाओं से भी रू-ब-रू होता है, ऐसे में अज्ञेय को सिर्फ़ प्रयोगवादी कवि कहकर ख़ारिज कर देना साहित्‍य–जगत की बहुत बड़ी ख़ामी को दर्शाता है। ज़ाहिर है प्रगतिवादी आंदोलन के माध्यम से साहित्यिक दृष्टिकोण बदला है।

प्रगतिवादी आंदोलन के विषय में कर्णसिंह चौहान लिखते है “तीसरे दशक में उभरा प्रगतिवादी आंदोलन और सातवें दशक में उभरा जनवादी आंदोलन आज़ादी के आर-पार के समय के हिंदी साहित्य के महत्वपूर्ण आंदोलन हैं। एक यदि 19 वीं शताब्दी में शुरू हुए आधुनिक साहित्य की परिणिति है तो दूसरा आज़ादी के बाद साहित्य में उदित प्रवृत्तियों की। ये दोनों आज़ादी से पूर्व और बाद के साहित्य को तार्किक परिणति और व्यवस्था प्रदान करते हैं। इस व्यवस्था से पूर्व के साहित्य को समझने-समझाने में मदद मिलती है। लेकिन इसके साथ ही यह भी उतना ही सच है कि कोई भी कड़ी व्यवस्था और जकड़बंदी स्थिरता और गतिहीनता को जन्म देती है- फिर वह चाहे भाषा का मामला हो या साहित्य का। इसलिए उस व्यवस्था के विरुद्ध प्रतिक्रिया होना स्वाभाविक है।”[xxiii]

इस प्रकार आज़ादी के पहले के शुरूआती दौर की कविताएँ सिर्फ़ रस, नायक-नायिका भेद, राजा की स्‍तुति, भक्ति काव्‍य इत्‍यादि तक सीमित रहे, लेकिन इसी दौर के दूसरे खंड में यानी आधुनिक काल की कुछ द्विवेदी युगीन, छायावादी, प्रगतिवादी और प्रयोगवादी कविताएँ पहले की विषय-वस्‍तु से हटकर यथार्थवादी घटनाओं का चित्रण करने लगीं और कविता विधा के लिए या कह लीजिए संपूर्ण साहित्‍य के लिए कुछ लेखकों द्वारा एक मुहिम चलाई गई थी कि साहित्‍य को वाद, सिद्धांत इत्‍यादि से दूर रखा जाना ही उचित होगा, ऐसे विचार को त्‍यागा गया। साहित्‍य में प्रगतिशील लेखक संघ के आने से प्रगतिवादी आंदोलन होने से कविताओं में पहली बार राजनीति, पूँजीवाद, मार्क्‍सवाद, साम्राज्‍यवाद जैसे शब्‍द को जगह मिली, जिससे नए तरह का आधुनिक साहित्‍य हमारे समक्ष आ सका। आज़ादी के बाद की कविताओं में जनवादी स्‍वर को बख़ूबी देखा जा सकता है।
संदर्भ:
[i]  संचयिता: रामधारी सिंह ‘दिनकर’, पृ. 50 
[ii]  सोहनलाल द्विवेदी, साहित्य आकादमी, पृ. 25
[iii]  हुंकार, रामधारी सिंह दिनकर, पृ. 42
[iv]  निराला रचनावली, खंड 2, संपादक- नंद किशोर नवल, पृ. 132
[v]  रूपतरंग और प्रगतिशील कविता की वैचारिक पृष्‍ठभूमि, रामविलास शर्मा, पृ. 215
[vi]  नागार्जुन: चयनित कविताएँ, संपादक- मैनेजर पांडेय, पृ. 50
[vii]  आजकल, संपादक- सीमा ओझा, जून 2011
[viii]  प्रतिनिधि कविताएँ, नागार्जुन, संपादक- नामवर सिंह, पृ. 29
[ix]  आजकल, संपादक- सीमा ओझा, जून, 2011, पृ. 14
[x]  रूपतरंग और प्रगतिशील कविता की वैचारिक पृष्‍ठभूमि, पृ. 282
[xi]  कविता की लोक प्रकृति, डॉ. जीवन सिंह,  पृ. 120
[xii]  ताप के ताए हुए दिन, त्रिलोचन, पृ. 67
[xiii]  धरती, त्रिलोचन, पृ. 29
[xiv]  प्रगतिवाद और समानांतर साहित्‍य, रेखा अवस्‍थी,  पृ. 41
[xv]  नागार्जुन प्रतिनिधि कविताएँ, संपादक- नामवर सिंह, पृ. 98
[xvi]  शमशेर बहादुर सिंह विशेषांक, उद्भावना, संपादक-विष्णु खरे, पृ. 116
[xvii]  वही, पृ. 122
[xviii]  चांद का मुँह टेढ़ा है, मुक्तिबोध, पृ. 53
[xix]  वही, पृ. 268
[xx]  वही, पृ. 51
[xxi]  हिंदी साहित्‍य का इतिहास, डॉ. नगेंद्र, पृ. 627
[xxii]  चुनी हुई कविताएँ, अज्ञेय, पृ. 87
[xxiii]  प्रगतिवादी आंदोलन का इतिहास, भूमिका से

आबिदा (परिमला अम्बेकर की कहानी)

‘‘अम्मा आजकल मय्यत उठने के लिए भी बीस पच्चीस हजार लगते हैं !!‘‘

जब से खबर मिली है आबिदा के मौत की, बार बार उसका कहा यह वाक्य कानों में बज रहा है। हमेशा बोलती हॅंसती खिलखिलाती आबिदा, दिल में कोई मलाल नहीं, जो भी कहना है सामने, न भीतर न बाहर !! चलुबुली भी इतनी कि हर किसी से बात करती, कोई लिहाज नहीं। क्या आदमी क्या जनाना, सब उसके मित्र मंडली के फेहरिस्त के। बडी से बडी बात को भी उतनी ही सरल और सहज अंदाज में कहती जैसे ठंडे पानी का घूँट पी रही हो।

क्या कुछ नहीं किया उसने! रहते समय तक अपना पेट खुद पाला और मरने के बाद अपनी मय्यत को खुद सजाया …!!

बहुत लंबे अरसे से मैं जानती थी आबिदा को। लगभग पच्चीस तीस साल से होगा। हमारे घर आती थी बच्चों को दिखाने। मेरे डॉक्टर पति की इलाज पर उसे पूरा भरोसा था। महीने दो महीने में कम-से-कम चार पांच बार , दूर शेखरोजे से दो तीन किलो मिटर चलते आती थी ब्रह्मपूर के हमारे घर। एक दो को  बगल में खोसे, और दो तीन को आगे पीछे डोलाते चलते ले आती थी बच्चों को अपने साथ। सुबह दवाखाने के कमरे का दरवाजा खोलने से पहले ही कट्टे पर आबिदा की सवारी बैठी रहती। हल्के बादामी रंग के बुर्के में लिपटी वह , हमें देखते ही मुंह पर का रकाब उठाकर सलाम करती । मेरे ससुराल के सारे सदस्य उसे जानते थे वह सबसे सलाम दुआ करती, हालचाल पूछती, बातें करती। चुलबुल-चुलबुल करते बच्चों को लिये दवाखाने की बेंच पर बैठे-बैठे भीतर घर के अहाते में झांककर देखती…मेरी सास से बातें करती । खीर पुलावो की बातें, अचार मुरब्बे की बातें, ईद त्यौहार की बातें , पीर पूजा की बातें … !! उसकी ये सारी बातें सुनकर मुझे आश्चर्य होता । पूछने पर हॅंसते कहती ‘‘ नहीं अम्मा … मेरी अम्मा की एक बम्मना की सहेली थी तुम जैसी शहाबाद में। रेलवे के मोहल्ले में हम सब रहते थे। भौत उठना बैठना था उनके साथ। इसीलिए मुझे तुम्हारे सब तौर तरीके मालूम है’’।

आबिदा सब से बोलती, बोलने से पहले उनका चेहरा देखकर हॅंस पडती। जबरदस्ती अपने चेहरे पर हॅंसी के कोलाज के चौखटा को चढाती। चाहे वह जान-मान का हो या ना हो, बातें काम-धाम की हो या ना हो। वह सबसे ऐसा बोलती जैसे वह सबका उधारी चुका रही हो। उसके बोलने के ढंग में एक नमूने की बेफिक्री रहती।  ‘‘ अरे, बातें करने में क्या जाने वाला है अम्मा, न लेने का ना देने का-मुंह में जुबान है तो बोलने के लिए…उल्लू की तरह घूरते बैठने से क्या मिलता ? ‘‘ उसका यह बेढंगी फलसफा किसी की जबान चढे या ना चढे लेकिन आबिदा अपना उल्लू जरूर सीधा कर लेती. अपनी जुबान की खुजली मिटा कर के !!

एक दिन वह हमारे यहॉं आयी थी…लेकिन उस दिन साथ में बच्चे नहीं थे। सफेद पाजामा कुर्ता और चाकलेटी ऊनी टोपी पहना एक बूढा बुजुर्ग और चिकन का दुपट्टा ओढी बूढी औरत उसके साथ थे। जब भी आबिदा के आने का आहट पाती मैं अपना काम-धाम छोडकर दवाखाने के कमरे के पास आकर, भीतर झांकती। आबिदा की मसखरी भरी बातें मुझे अच्छी लगतीं। किसी बहाने उसे भीतर बुलाकर, उससे बातें करती। बातुनी आबिदा के लिए तो यह ‘‘शेख भी कहे आम की बातें, आम को भी भाये आम की बातें ‘‘ वाली बात थी। मुझे लगता ‘शायद मेरी अम्मा की भी कोई मुसलमान सहेली रही होगी जिसके ही मुहल्ले में मैं भी पली बढी हुई होगी !!

मेरे भीतर आने की आहट पाकर साथ आये दोनो से बुर्के में से ही इशारा करते हुए कहा ‘‘ सलाम करो दागदर साब की जोरू हैं और ये हमारी अम्मा है।’ मैंने भी हाथ जोडकर नमस्कार किया। मेरे नजदीक आकर लगभग कान में सुनाने जैसी आवाज निकालते कहने लगी ‘‘ अम्मा तुम्हारे भय्या बाबू के अम्मी अब्बा है… महीने से पीछे पडे थे…दागदर को दिखाओ दागदर को दिखाओ, नै सो सौ ढंगा है अम्मा इनके। कुछ नै रैता चुपीच जान खाते, ऊपर से इनका मुझे डॉंटना अलग। इसीलिए बुलाको लाई… साब का चाय नाश्ता हुआ नै ‘‘। अपने सास  ससुर को हाथों से सहारा देकर बेंच पर बिठाते हुए उन्हें मेरे सामने ऐसा पेश कर रही थी जैसे मॉं अपने बच्चों को डॉंटते हुए स्कूल में टीचर के सामने उनकी शिकायत पर पेश करती है। अपने पति बाबू से बहन का रिश्ता जोडकर, बडी सहजता से सामने बैठे बुजुर्गों को मेरा माँ-बाप बना दिया था आबिदा ने। आबिदा की चालाक बातों की जाल में हरबार सब फॅंसते ही जाते… और वह है कि बादामी रंग की बुर्के की जाली में से अपने सॉंवले गोल चेहरे में हॅंसती बडी-बडी ऑंखों को और भी खिलाते जाती !! बैठे-बैठे मै सोचती ‘अंतर्राष्ट्रीय मसलों को हल करने के लिए बुलाई जानेवाली सभाओं में अगर आबिदा को बिठा देंगे तो क्या होगा ‘और उसके व्यवहार की कल्पना करके मै खुद ही खुद हॅंसते जाती।

उस दिन मैंने देखा …आबिदा आयी थी लेकिन हमेशा की तरह सुबह तडके नहीं… दस साढे दस के करीब वह आयी थी। साथ में बगल का एक ही बच्चा था, दुबला-पतला सा दूसरे बच्चों की फौज नदारद थी। किसी इमेरजन्सी के चलते डाक्टर भी घर पर नहीं थे। मुझे पास बुलाकर एक बडी सी थैली मेरे हाथ पकडाते कहने लगी ‘‘शहाबाद के अम्मी के खेत के मूंगफल्ली है अम्मा ‘‘ थैली हाथ में पकडे-पकडे वहीं बेंच पर बैठते मैने कहा ‘‘ बाल बच्चों का घर है तेरा उन्हें खिला देती, नाहक तूने…’’ बीच में ही मुझे टोकते उसने कहा ‘‘ अम्मा घर का बरकत बॉंटकर खाने में है., और बच्चे भी..’’ बच्चे कहते ही मुझे भी कुछ याद हो आया मैने पूछा ‘‘ हॉं आबिदा क्यूं आज इस अकेले को लायी हो, दूसरे कहॉं है। उलटे हुए बुर्के में से पूरा चेहरा खिलाते कहने लगी, ‘‘नहीं अम्मा ओ सब मेरे नहीं. मेरी दोनों देवरानियों के हैं तीन तीन बच्चे। मेरा यही अकेला है। एक दो आज इस्कूल गये हैं और दूसरे अपनी अम्मी के साथ थे।’ इसीलिए नै आये मेरे पिच्छे पिच्छे। ‘‘ बच्चे की ओर मेरे देखने के अंदाजे से ही वह समझ गयी , तपाक से बोल पडी ‘‘बहुत बारीक पैदा हुआ था अम्मा यह… कितने ही तो पीरों के यहाँ चरागां जला जलाकर बचा ली हूं इसे और दागदर साब की दवा और आपकी दुआ से बचा है अम्मा यह ‘‘इत्मीनान से मुझे बैठा हुआ देखकर उसे मैदान साफ नजर आया । बातुनी आबिदा फिर छूट पडी,’’ जब इसके पेट से थी तो तुमारे भय्या की मिल की नौकरी छूट गयी। ढंग से खाना नै दवा नै दारू नै। मेरी कमजोरी इसको लग गयी अम्मा। अभी भी वइच  हाल है। महीना गया नै बुखार जुकाम खांसी, दस्त लगेच रैता है ‘‘

घर के भीतर से मेरे नाम से किसी की आवाज सुनकर आबिदा बच्चे को बगल में लिये सलाम करके निकल गई। और मैं वहीं थैली से मुंगफल्ली निकालकर कुतरते बैठ गई। सोचने लगी ‘आबिदा जैसी कितनी ही तो औरतों के परिवार है हमारे समाज में, जो बच्चे की पैदाइश को पारिवारिक जिम्मेदारी नहीं समझते और बच्चे के परवरिश को मिल जुलकर सफलता से नहीं निभाते। अपनी औरतें हैं कि अंत तक इसके लिए पति और ससुराल वालों को जिम्मेदार ठहराकर उन्हें कोसते ही रह जाती हैं। कुपोषण से लडना हर-एक की जिम्मेदारी है। ससुराल हो या मायका इससे अपना पल्ला नहीं झाड सकता।’

शायद टीवी पर परिवार नियोजन की सरकारी विज्ञापनों को देखने का नतीजा होगा, सोचकर अपने आप पर ही हॅंसते हुए थैली लेकर भीतर चली गयी। खैर इसके बाद आबिदा का हमारे यहाँ आना ही लगभग बंद हो गया। मेरे खयालों में भी उसकी याद आती… जाती…आती… चली ही गयी।

लेकिन बहुत सालों बाद आबिदा अचानक प्रकट हो गयी। साथ में बहु को लाई थी दिखाने वह भी शाम के समय। वही बादामी रंग का बुर्का। लेकिन कुछ नया सा लग रहा था। बेटे के ब्याह में खरीदा होगा । ‘‘ अरे…आबिदा तेरे उस लिजलिजा सा खांसी बलगम का पुलिंदा बेटे ने शादी बना ली….? मेरी हॅंसी रूक न सकी। आबिदा की चुलबुले हॅंसी मजाकिया स्वभाव से तो मैं वाकिफ थी। लेकिन बगल में खडी गोल- मटोल गिड्डी काली बुर्के वाली बहु को मेरी हॅंसी कैसे लगी पता न चला। बुर्के से कोई हरकत होता न देख मैं एकदम चुप हो गयी। आबिदा ने ही आगे बढकर हॅसते हुए मेरे हाथ मिठाई का डब्बा देते बहू से सलाम करने कहा। वहीं बेंच पर इत्मीनान से बैठते हुए बुर्के के बंद खोलू जालीदार रेशमी परदे को ऊपर  उठाकर कहने लगी ‘‘क्यूं न होगा अम्मा… दागदर साब की दवा का और आपकी दुआ का असर है देखो …इस काबिल हो गया। लेकिन क्या करें अम्मा, तुम्हारे भय्या के नसीब में नै था, अल्ला का रहम देखना’’ उसके चेहरे पर गम और खुशी के भाव आ जा रहे थे। आबिदा के चेहरे पर खुशी नूर की तरह टपक रही थी वहीं बगल का गोल-मटोल संवेदनाहीन चेहरा बिना ऑंखें झपकाये एकटक मुझे ही घूरे जा रही थी। बुरखे में अब भी कोई हलचल होता न देख मैं चुपा गयी। लेकिन मुझे जरूर लगा… ‘अपनी आबिदा हॅंसता चांद है लेकिन इसकी यह बहू? इसमें तो आबिदा के खिलखिले स्वभाव का पौ भर का हिस्सा भी नहीं। न मजाक का अहसास और न ही खुशी का इजहार। चेहरा है या भुतनी का लबादा…!!’’ भीतर से पता नहीं क्यूं मेरा मन अस्वस्थ हो गया। खुशी से बोलती दिपदिपाती आबिदा से मैं कुछ कह नहीं सकी ।

मैं सोचने लगी, आबिदा हजारी प्रसाद द्विवेदी के लिखे उस शिरीष की तरह है जो भर भरे धूपकाल में फूलों से लदाफदा रहता है, शिरीष के उस फलों की तरह है जो हर मौसम में जीवन रूपी वृक्ष से लगे लगे रहते हैं, अपनापन जताते रहते हैं।

यूं तो आबिदा कोई विशेष हिस्सा नहीं थी मेरे जीवन की। उसे तो मैं भूल ही गयी। लेकिन पता नहीं क्यूं फिर आबिदा के साथ का मेरा संपर्क शायद खत्म नहीं हुआ था। वह फिर आ गयी मेरे घर। लगभग आठ दस साल बाद। इस बार साथ में कोई नहीं था। अकेली थी आबिदा। मुझे आश्चर्य हुआ। वह कभी अकेली नहीं होती किसी न किसी को लेकर आती है साथ डॉक्टरी इलाज के लिए। कभी वह अकेली अपने इलाज के लिए आता मैने नहीं देखा था। इस बार वह अकेली थी। बेरंगी बादामी बुरखे के परदे को आहिस्ता से ऊपर करते हुए निढाल सी बेंच पर बैठ गयी। मैं खडी-खड़ी उसके चेहरे को ही देखती रह गयी। चेहरे से जैसे सारा रस निचुड गया था,ऑंखों से नूर जैसे गुल हो गयी थी। मेरी चढी त्यौरियों को देख आाबिदा  के चेहरे पर हंसी बेबसी सी पसर गयी। उसके आने का आहट पाकर मेरी सास भी भीतर कमरे में आ गयी। उन्हें देख उसके चेहरे की हॅंसी बेबसी की सारी बाधाएं तोडकर ऑंखों से बरसने लग गयी। हम दोनों को उसे समझाने के सिवा कुछ सूझ नहीं रहा था।

‘ पत्थर तक से बात करती है वह ‘यह मुहावरा जुमला हुआ था उसपर। हर कोई उसे देखकर कहता। ‘बोलना हॅसना उसके जेवर हैं मॉं के पेट से ही पैनकर आयी है उने।‘ लेकिन आज वही हॅंसोडी आबिदा फफक-फफकर रो रही थी। धीरे-धीरे सारी बातें खुलती गयी।

बहु घर के चादर के नाप की नहीं थी। उसके पैर दिन-ब-दिन पसरते ही जा रहे थे। दिन की ऑटो की कमाई में माँ-पत्नी और दो बच्चों का पेट भरना बेटे को भारी पडने लगा। सास ससुर देवर जेठानियों के बीच जीवन गुजारी आबिदा को बहू के नखरे अजीब लगते। बेटा बुरा न माने, बेटा दुःखी ना हो, बेटा ये न समझे बेटा ओ न समझे सोच सोचकर आबिदा गलने लग गयी थी। ससुराल के हल में बैल की तरह जुती आबिदा फिर से बेटे के लिए घर का सारा भार अपने कंधे पर उठा लिया था। हॅंसते-हंसते सारे काम निपटाते जाती। लेकिन समय का सूरज जैसे जैसे ढलान पर उतरने लगा… आबिदा थकने लगी। बहू का बरताव उसे बेगाना जतवाने लगा। उसने सोचा, ‘यह तो बेगानेपन की जुतायी है। न किसी को उसके मेहनत से मतलब और न उसकी परेशानी से चिंता। वह अकेली पडने लगी। उसकी हॅंसी, उसका मसखरा घर के चारों कोनों में चित्त से पडे रहने लगे। लेकिन बहू है कि हथेली में बाल उगाये बैठी थी।

आखिर चारा न पाकर बेटा अधिक कमाई के लिए विदेश निकल गया। महीना-महीना पैसा भेजने लगा। बहू बच्चे खुश, नये कपडे लत्तों से लदे-फदे। सिनेमा, बाजार सैर सपाटे में मस्त। लेकिन आबिदा को वह पैसा छूना तक हराम लगता। उधर बेटा मेहतन करता है, भूखा पेट रहता है, आसमान के नीचे सोता है। बेटे के खून पसीने की कमाई पर बहू पोतों की मटरगश्ती उसके चेहरे की सीन को छीनती गयी। ऊपर से बहू के ताने। पेट भरना भारी पडने लगा। आबिदा भूखी पेट भले ही रह सकती थी लेकिन हॅंसने-हंसाने  के बिना रहना जैसे उसे असंभव सा था। कोने में बिखरे पडे अपनी हॅंसी के टूटे किरचों को बटोरा, हड्डियों में बची रही सही ऐंठपन को कसकर, खूंटी पर टंगे अपनी बादामी रंग के बुर्के को ओढकर घर से निकल पडी आबिदा । बेटे की खून की कमायी का बेरहम कौर तोडना उसपर काफिर गुजरा। चेहरे पर लदी बेबसी की हॅंसी को उतारकर आबिदा घरों के काम पर लग गयी। फिर से हॅंसने लगी, खिलखिलाने लगी।

आबिदा से मेरी मुलाकात उसके मौत की खबर आने के कुछ ही महीने पहले हुई थी। शायद उस दिन वह ईद का पैगाम देने आयी थी। वही उसकी आखरी मुलाकात थी। उस दिन वह बहुत खुश नजर आ रही थी। मुझे लगा उसके चेहरे से निसर गई हॅंसी फिर से सूखी झुर्रियों में धीरे-धीरे भरती जा रही है। आबिदा  मेरे थमाये गिलास से चाय का घूंट भरते कहते जा रही थी और साथ में हॅंसते भी जा रही थी। सामने बैठे मै उसकी बातों को सुनते जा रही थी। जैसे मेरी कहानी का कोई जीवंत किरदार मेरे सामने अपने आप को खोलते जा रहा हो।’ अम्मा अब मै मर गई तो भी कोई परवा नै। अपना कमाती हूं खाती हूं। मैने यूं ही पूछा, ‘‘कितना पैसा जमा कर लिया है आबिदा।’ फटाक से बोल पडी ‘‘होंगे बीस पच्चीस हजार !’ मेरा एकटक सुनता देख फिर कहने लगी ‘‘मैं बुड्डी हो गई हूं….मर गई तो मुझपर किसी का भी पैसा नै लगना, बेटे का भी नै। अम्मा आजकल मय्यत उठने के लिए भी बीस-पच्चीस हजार से कम नहीं लगते”

आबिदा का वह आखिरी वाक्य मेरे कानों में गूंजने लगा था। होठ बुदबुदाने लगे मैं सोचने लगी, ‘‘मौत के बाद भी शायद हॅंसी उसके चेहरे पर खिली रही होगी।’’  खबर सुनकर जर्र हुआ मेरा चेहरा यह सोचकर खिल गया ‘‘चुलबुली मसखरी हंसोड़ आबिदा बादामी रंग के बुर्के के जालीदार परदे से झांककर, बीस पच्चीस हजार के हिसाब-किताब के बहाने काजी से बोलने-बतियाने के लिए उठ कर बैठ तो न गयी हो’’                              

अपनी मौत को भी वह हॅंसी की पोटली में बांध कर ले जा रही थी ।  

लेखक परिचय: विभागाध्यक्ष , हिन्दी विभाग , गुलबर्गा वि वि, कर्नाटक में प्राध्यापिका परिमला अम्बेकर मूलतः आलोचक हैं.  इन्होंने कहानियाँ भी लिखी है. संपर्क:09480226677

आम्रपाली ( रेनू यादव की कविताएं)

रेनू यादव, फैकल्टी असोसिएट,गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय, नोएडा. ‘ मैं मुक्त हूँ’ काव्य-संग्रह प्रकाशित

आम्रपाली – 1
नहीं चुनतीं अपनी
जिन्दगी की डोर
बना दी जाती हैं पतंग
जिन्हें उड़ाया जाता है
अलग-अलग छतों पर
आँधियों में झंझोड़कर
तीलियों में फंसा कर
चीर दी जाती हैं
बिहरा दी जाती हैं
करके तार तार
और खींच लीं जाती हैं
झटके से
गोल रोल बनाकर
रख दिया जाता उन्हें
अंधेरे घुप्प कमरें में
बार बार उधेड़ने के लिए

आम्रपाली – 2
मस्तक गिरवी पैर पंगू
छटपटाता धड़ हवा में
त्रिशंकू भी क्या
लटके होंगें इसी तरह शून्य में ?
रक्तीले बेबस आँखों से
क्या देखते होंगे इसी तरह
दो कदम रखने खातिर
जमीन को ?
और जमीन मिलते मिलते
फिसल जाती होगी तलवों से
हो जाती होगी उतनी ही दूर
जितनी करीब होगी कभी
ख्वाबों में तमाम कोशिश के बाद भी

चित्रांकन: सोनी पांडेय

उसे तो रोने की आदत है
रोना क्या इतना बुरा है अम्मा !
जो रोज खड़ी कर दी जाऊँ चौराहे पर ?
राधा और सीता के रोने
पर लिखे गए कितने ग्रंथ
अहल्या, सबरी, यशोधरा
शकुन्तला को क्यों किया
जाता है याद
द्रौपदी भी तो रोयी थी
भरी सभा में अम्मा
कुन्ती रोती रही आजीवन
इतना ही बुरा था उनका रोना
फिर वे ही आदर्श क्यों हैं अम्मा !
नानी को देखा रोते हुए
तुम कभी हँसी नहीं
क्या जिन्दगी का जंग लड़ने से
पहले रोना जरूरी होता है अम्मा !
मैं भी रो रही हूँ
झाडियों में चीखती आवाजों से
तेजाब से झुलस रहा है बदन
अपनों से खार खायी
अधूरे प्रेम की दास्तान से
और सबसे अधिक
नानी और तुम्हें रोता देखकर !
फिर मेरा मजाक क्यों उड़ाया
जाता है अम्मा !
कोई सामने से
कोई खींसे निपोरकर
कोई मुँह छुपाकर
कोई तमाचा मारकर
सब कहते हैं इनसे उनसे
“उसे तो रोने की आदत है” !