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छाया कोरेगाँवकर की कविताएं

कविता- छाया कोरेगाँवकर
अनुवाद- हेमलता महिश्वर

 

‘वह’ मुक्त ‘वह’ मुख़्तार –
‘वह’ सावित्री सत्यवान की,
साक्षात यम का आह्वान करनेवाली;

‘वह’ सावित्री ज्योतिबा की,
स्त्रियों के अस्तित्व को
अस्मिता की धुरी देनेवाली;

‘वह’ अभिमन्यु
गर्भ में ही युद्ध की
नाल समेट लेनेवाली;

उसके स्वातंत्र्य की बकवास
करनेवाले लड़वैयों को ही
स्वतंत्र होना होगा
‘पुरुष’ नामक
अनाम नशे से।

2.

कितना अच्छा हुआ
तू ज्योतिबा हुआ
इस सावित्री का
रटा-घोटा दिए धूलाक्षर
अंगुलियों के आदी हो जाने तक;
चुस्त कर दी पीठ पर धुरी
उसके पारंपरिक कुबड़ पर
स्नेहिल हाथ फिराकर;
साक्षरता का प्रमाणपत्र देते हुए
कितनी स्वाभाविकता से कहा,
“कुमकुम का कोई सत नहीं होता
गोदना ही मात्र तेरा है
चिता तक तो मैं साथ हूँ तेरे
मरना तुझ अकेले को ही होता है।”

3.

बचकाने दॉंव अधूरे ही रह गए
सो रानी अब रोती नहीं।
लगाती है पुनः नया दॉंव।
भगा देती है शिकारी कुत्ते
सिंदूर की आड़ से।
सिंदूर के सुरक्षित परकोटे में
रानी घुमती रहती है
नाच री घूमां!

अब रानी का दम घुटता है
रानी पोंछती है पुरानी पट्टी
उकेरती है नए सिरे से
स सावित्री का
स समता का
स स्वतंत्रता का
स सम्मान का
स संविधान का

राजा सावधान!
उसका प्रेम सघनतर होने लगा
और ताज के बदले
रानी पुनः शरणागत!

घूमां’ एक लोक नृत्य है जिसमें स्त्रियाँ घूम-घूमकर नाचती हैं।

4.

उसने कहा,
मैं तुम्हें हाथ दूँ
उसके पहले निकाल दो अपनी
कलाई से टचकी चूड़ियाँ;
हरी चूड़ियों की सनातन छनछन
मिटाए बग़ैर
मैं तुम्हें सुना न सकूँगा
शुद्ध मानवता के गीत.
मुक्त होने दो
सती-सावित्री के चमकदार रेशमी मिथकों में लिपटा
तुम्हारा आदिम स्त्रीत्व…
होने दो जाज्वल्यमान अपने भीतर
संस्कृति की कालिख से ढँका दीया …
और प्रकाशित होने दो उस उज्ज्वल प्रकाश में
तुम्हारे मेरे रिश्ते से परे जानेवाली
मानवता की पगडंडी

5.

शरीर के किस बिंदु से
आरंभ होता है स्त्री का स्त्रीत्व?
ठीक कौन-से ग्रंथ में समाया है
विशुद्ध वात्सल्य के विराट प्रवाह में …

कैसे कलंकित की जाती है उसकी समूची मानवता
यौन शुचिता के कागछुअन से

इतना घटिया फिर भी चीवट
स्त्रीत्व का मान बिंदु
किसने चिपकाया उसके मासूम मस्तक पर?

तब फिर रोपना तो पड़ेगा ही
स्त्रीत्व निरोधक रसायन
जन्मते ही आकार लेनेवाली
गर्भाशय में उसकी नन्हीं को!

6.

क्यों बढ़ा रही हूँ गुंथन मैं
तेरे- मेरे अंतस का?
और पूर रही हूँ अंगांग में
युगोंयुग की थकन
तुझमें बिला गई ‘मैं’ की करते तलाश

संभोग के अटल विराम के पश्चात्
पोछी जाती है त्वचा से
गहरे स्पर्श की महक पूर्णता के साथ

मेरी स्पर्शोत्सुक देह अब
देखती है होकर मुक्त
सीमित पारम्परिक बंधनों से-
उकेरकर देखती है स्वनिर्मित
ज़मीन के फलक पर
लिंगभेद के बरक्स नई बारहखड़ी

 

7.

एकांत की दीवार में चिनकर स्वयं को
मैं देखती हूँ रहस्य
मेरे भीतर की आदिम स्त्री का

छुड़ाती हूँ
‘उस’की जटिल गुँथन सनातन;

वृक्ष की जड़ पसरती है जैसे
शिलाखंड फोड़ती नमी की दिशा में
वैसी ही ‘उस’ की यात्रा
रिश्तों से रिश्तों की ओर

बढ़ती उम्र के साथ संपृक्त जीवन की
कोठरियाँ अनजाने खुलती चली जाती हैं
मॉं-बहन-प्रेमिका-सखी नामक
‘उस’ की सर्जक अंगुलियों की अथक यात्रा
तृषार्त,
एक सघन संवेद्य स्पर्श के लिए।

8.

पिंजरे के भीतर लगाया है वृक्ष
इसलिए दिया नहीं जा सकता
वचन, कली की सुरक्षा का
नोंच ली जाती हैं कलियाँ
गर्भ के गर्भ में ही अंकुरित होने के पूर्व
यहॉं तो खैरलांजी हत्याकांड से
निर्मित की जाती है दहशत
स्त्री के अवध्य गर्भागार में ही
विज्ञान-युग में कली खिलने हेतु
सुरक्षा-कवच का
होगा ही आविष्कार, ऐसा भी नहीं;
कदाचित तथागत को भी
आँखें खोलकर तलाश करना होगा
नगर-नगर में
बची-खुची ईसा गौतमी का …
अब सावित्री की बेटियों को
समयपूर्व ही होना होगा होशियार
धुलाक्षर उकेरने के पहले ही
हाथों में शस्त्र होने चाहिए
स्त्री के सतत् अस्तित्व के लिए

9.

बदलते नहीं उल्लेख वर्ष वर्षों तक
डायरी के हों या
जीवन के पन्ने

शिशु की स्मृति मात्र से उमड़ उठते
मॉं के वात्सल्य कुंभ
वैसी ही बेचैनी लगती है शब्दों को
डायरी के पन्नों में बह जाने की

तेरी चुप्पी के
काले कठोर पहाड़ को भेदते
क्षीण होती है
संपूर्ण स्त्रीत्व की मात्रा

तेरा बर्फीला अस्तित्व
हिमखंडी आत्म पर
लेता है ओढ़
शब्दों की आश्वस्त रजाई

एक ही छत के नीचे रहकर
आँच तक न लगी तुम्हें
घर में अखंड जलते
अग्निकुण्ड की;

मैं सहजता के साथ
घर के दरवाज़े की तरह
ओंठ भी बंद कर लेती हूँ
देहरी तेरे घर की जो आई हूँ
लांघकर

10

एक-दूसरे के कदमों से
क़दम मिलाकर
संग-साथ चलते हुए भी
राह विभाजित हो गई
एक अटल मोड़ में

श्वासोच्छ्वास मिलाकर
जीने के अद्वैत का
कोहरा विलीन हुआ
समांतर हुए हम एकमेक से

वैसे अब
रह भी नहीं गए छोटे
संसार नामक
बचकाने खेल में रमने लायक

सिंदूर पुँछ जाने पर भी
हरा ही रहता है गोदना
ऐसे ही, सारे रिश्तों के
विलीन हो जाने पर भी
तेरे मेरे में बची हुई
‘मैत्री’ बहुत है मेरे लिए
मंज़िल तक
पहुँचने को

भारतीय स्त्री अधिकार : एक ऐतिहासिक यात्रा

 

सुमुत्तिका, सुमुत्तिका, साधुमुत्तिकाम्हि मुसलस्स|

अहिरिको में छ्त्तकं वा पि, उक्खलिका मे देड्डुभं वा ति|| थेरी सुमंगलमाता

अहो! मैं मुक्त नारी हूँ! मेरी मुक्ति कितनी धन्य है!पहले मैं मूसल लेकर धान कूटा करती थी, आज मैं उनसे मुक्त हो गई हूँ| मेरी दरिद्रवस्था के वे छोटे-छोटे भांडे-बरतन, जिनके बीच में मैं मैली-कुचैली बैठती थी और मेरा निर्ल्लज पति मुझे उन छातों से भी तुच्छ समझता था, जिन्हें वह अपनी जीविका के लिए बनाता था. पृष्ठ 63

को नु ते इदमक्खासि, अजानन्तस्स अजानको|

दकाभिसेचना नाम, पापकम्मा पमुच्चति|| थेरी पुण्णा  पृष्ठ 204

गंगा-स्नान-शुद्धि से पाप-मुक्ति होती है, यह तुझसे किसने कहा? यह तो अज्ञानी, मूर्ख व्यक्ति का अज्ञानी मूर्ख के प्रति उपदेश है|

यह बारम्बार रेखांकित किये जाने योग्य है कि इसी देश की बौद्ध भिक्खुनियों ने इस पितृसत्ता और ब्राह्मणवाद के विरुद्ध न केवल कदम उठाया अपितु अपनी गाथा लिखकर स्त्री स्वातंत्र्य का पहला लिखित दस्तावेज़ हमें उपलब्ध कराया.

समूचा वैश्विक परिदृश्य ही स्त्री विरोधी था वरना इस पर चिंतन न हो रहा होता और जॉन स्टुअर्ट मिल को यह न लिखना पड़ता –“सामाजिक और प्राकृतिक – सभी कारण मिलकर यह असंभव कर देते हैं कि महिलाएं संगठित तौर पर पुरुषों की सत्ता का विरोध कर सकें. वे इस अर्थ में पराधीन वर्ग से भिन्न स्थिति में हैं कि उनके मालिक उनसे वास्तविक सेवा के अतिरिक्त कुछ और भी चाहते हैं. पुरुष केवल महिलाओं की पूरी-पूरी आज्ञाकारिता ही नहीं चाहते, वे उनकी भावनाएं भी चाहते हैं. सबसे क्रूर और निर्दयी पुरुष को छोड़कर सभी पुरुष अपनी निकटतम सम्बन्धी महिला में जबरन बनाये गये दास की नहीं बल्कि स्वेच्छा से बने दास की इच्छा रखते हैं. अत: उन्होंने महिलाओं के मस्तिष्क को दास बनाने के लिए हर चीज का इस्तेमाल किया है. अन्य दासों के मालिक आज्ञाकारिता को बनाये रखने के लिए भय का प्रयोग करते हैं—उनका खुद का भय या फिर धार्मिक भय. स्त्रियों के मालिक साधारण आज्ञाकारिता से कुछ अधिक चाहते थे. और उन्होंने शिक्षा के पूरे बल का इस उद्देश्य के लिए इस्तेमाल किया. बचपन से स्त्रियों को यह सिखाया जाता कि उनका आदर्श चरित्र पुरुष के चरित्र से बिलकुल विपरीत होना चाहिए. इच्छा शक्ति और आत्म-नियंत्रण नहीं, बल्कि नियंत्रण और दूसरों के नियंत्रण के समक्ष झुक जाना उनका गुण होना चाहिए. सारी नैतिकता उन्हें यह बताती है कि यह महिलाओं का कर्तव्य है और सभी मौजूदा भावनाओं के अनुसार यह उनका स्वभाव है कि वे दूसरों के लिए जियें, पूर्ण आत्म त्याग करें और अपने स्नेह संबंधों के अतिरिक्त उनका अपना कोई जीवन न हो. स्नेह सम्बन्धों से तात्पर्य सिर्फ उन सम्बन्धों से है, जिनकी उन्हें इज़ाजत है—वे पुरुष जिनसे स्त्री सम्बन्धित हो या वे बच्चे जो पुरुष व उनमें एक अटूट व अतिरिक्त बंधन होते हैं.” विद्रोही स्त्री- जर्मेन ग्रीयर पृष्ठ 65

एक सुदीर्घ परम्परा के माध्यम से जड़ता की निर्मिती करते हुए स्त्री को अधिक से अधिक ग़ुलाम बनाकर रखने की साज़िश ब्राह्मणवादी पितृसत्ता ने क़ायम कर रखी थी. यह पुरुष अपने स्त्री नाते को मनुष्य की तरह नहीं बल्कि एक ऐसे रोबोट के तौर पर देखता है जो उसके संकेतों पर बगैर किसी देरी के, बगैर कोई दर्द महसूस किये ‘हुकुम मेरे आक़ा’ की तर्ज़ पर संचालित होता रहे. जर्मन ग्रीयर का उक्त कथन नि:संदेह स्त्री के पक्ष में है. तब भी यह चिंतन की माँग करता है. उन्होंने जिसे ‘सामाजिक और प्राकृतिक कारण’ कहा है, यहीं वह पेंच है जिसमें सुधार की आवश्यकता है. जिस कारण को सामाजिक के साथ प्राकृतिक बताया गया है, वह क्या है? प्राकृतिक बताते ही आपने दबाव को, डिस्क्रिमिनेशन को न्याय संगत बता दिया. चलिए मान लिया कि माहवारी और गर्भावस्था और आगे बढ़ें तो क्या इसमें धात्री को भी शामिल करेंगे(?) को प्राकृतिक कारण कहा जा रहा है तो बीमारी भी प्राकृतिक कारण है ही. कितने पुरुष बीमार नहीं पड़ते होंगे? क्या यह बीमारी अतिरिक्त देख-भाल की माँग नहीं करती? पर तब तो ‘स्त्री सत्ता’ जैसा कोई पद पुरुष के विरुद्ध सांगठनिक तौर पर कोई दमनात्मक व्यवहार नहीं करता. तो माहवारी या गर्भावस्था को कारण बताकर किसी भी तरह की छूट नहीं ली जा सकती.

स्त्री को सहज मानवोचित अधिकारों से लैस करने की लडाई लम्बी है. कानूनन हक़ सुरक्षित करने का सिलसिला आरम्भिक तौर पर देखा जाये तो एक सौ दस-पन्द्रह वर्ष दिखाई देते हैं. 28 नवम्बर 1890 जोतिबा फुले की मृत्यु और 14 अप्रेल 1891 डॉ आंबेडकर का जन्म लगभग 116 दिनों का अन्तराल है. स्त्री को मनुष्य के तौर पर स्वीकार्यता दिलाने के आन्दोलन का आरम्भ यानि सोचा जाये तो सन 1842 से सन 1955-56 तक अंजाम में ले आना एक महत्वपूर्ण यात्रा है. नि:संदेह इसके लिए भारत के प्रथम प्रधानमंत्री के तौर पर पण्डित जवाहरलाल नेहरु की भूमिका भी असंदिग्ध है. किन्तु यह तय है कि महाराष्ट्र से स्त्री हक़ के लिए पुरजोर न केवल आवाज़ उठी अपितु वैधानिक काम भी किये गए. चित्तपावन ब्राह्मणों की सांस्कृतिक नगरी, पेशवाओं के  कार्यस्थल में अपने दम पर समस्त खतरों को उठाते हुए स्त्री को शिक्षा देने का कार्य फुले दंपत्ति ने किया था. यही कारण था कि फुले दंपत्ति को सार्वजनिक तौर पर 16 नवम्बर 1852 को मि. कैंडी ने सम्मानित किया. शिक्षित स्त्री कैसे समाज की मार्गदर्शक हो सकती है, यह सावित्री बाई फुले ने दिखा दिया.

नि:संदेह मनुस्मृति के माध्यम से भारतीय स्त्री ही नहीं, पुरुष को भी स्त्री विरोधी शिक्षा दी गई है जिसके संस्कार अब तक नहीं छूते हैं. आज तो हिन्दू राष्ट्र की संकल्पना के साथ और भी सांसे भरते दिखाई दे रहे हैं. डॉ आंबेडकर ने ‘नारी और प्रतिक्रांति’ में स्त्री के समग्र विकास में अवरोध उत्पन्न करने वाले उन श्लोकों का संदर्भ दिया है जो मनुस्मृति में भी दर्ज़ हैं. इसके खिलाफ़ डॉ आंबेडकर ने हुंकार भरी थी. 19-20 मार्च 1927 को महाड चवदार तालाब के जल सत्याग्रह करने के बाद जो हालत निर्मित हुए थे, उसी का परिणाम था कि दिनांक 25 दिसम्बर 1927 को मनुस्मृति का दहन किया गया था.

27 दिसम्बर सन 1927 को दलित महिलाओं को सम्बोधित करते हुए बाबा साहेब ने उनसे मनुष्य की तरह बने रहने की अपील की. उन्होंने कहा-अस्पृश्यता निवारण की समस्या पुरुषों की न होकर स्त्रियों की ही है. आपने हम पुरुषों को जन्म दिया है. दुसरे लोग हमें जानवरों से भी गया-गुजरा समझते हैं. … आपको सोचना चाहिए कि ब्राह्मणों की स्त्रियों में जितना शील है, उतना ही आपमें भी है. ब्राह्मणों की स्त्रियों में जितना पातिव्रत्य है, उतना ही आपमें भी है और तुम्हारे भीतर जितना धैर्य, संकल्प और उत्साह है, वह ब्राह्मण स्त्रियों में नहीं है. ऐसे में तुम्हारे पेट से जन्म लेनेवाले बच्चे की अवमानना होती है. … यदि आपने सोचा होता तो पुरुषों के पहले आपने सत्याग्रह किया होता. … आप संकल्प लें कि ऐसी कलंकित स्थिति में हम जीवन नहीं गुजारेंगे. … दूसरे यह कि सारी पुरानी और गलीज़ परम्पराएँ छोड़ देंगे. ढ़ंग से साडी बांधे, गले भर और हाथ भर गिलट या चांदी के गहने न पहनें, एक ही काफ़ी है. और पहनना ही है तो सोने के आभूषण पहनें. गहनों के बदले कपड़े अच्छे पहनें. अपने पहनावे से ही आप अलग दिखाई देती हैं, सुरुचिपूर्ण रहें. पिछले मार्च से लोगों ने मरे हुए जानवर का मांस खाना बंद कर दिया है. पर यदि पुरुष ऐसा करता है तो स्त्री को चाहिए कि वह पुरुष को ऐसा न करने को ताकीद करे. डॉ बाबा साहेब आम्बेडकर लेखन और भाषण भाग 1, पृष्ठ 142-145

इस एक संबोधन ने दलित स्त्रियों में सम्मानपूर्वक जीने की ललक पैदा कर दी. अगले दिन जब वे अपने गाँवों को वापस जाने लगीं तो फाटे हुए ही सही पर उनके पहनावे में परिवर्तन दिखाई दिया. बाबा साहेब ने अपने सार्वजनिक जीवन में ही नहीं, अपने प्रशासनिक-राजनितिक जीवन में स्त्री अधिकारों की सुरक्षा के लिए मजबूत कदम उठाये.

28 जुलाई सन 1928 को बम्बई विधान मंडल में डॉ आंबेडकर ने प्रसूति लाभ विधेयक के संदर्भ में अपने मजबूत तर्क में कहा था- “किसी महिला का कोई नियोक्ता प्रसूति की अवस्था में महिला के हितों की रक्षा के लिए अपनी ज़िम्मेदारी से पूरी तरह मुक्त होता है. इसमें कोई संदेह नहीं कि नियोक्ता महिला को किसी उद्योग विशेष में इसलिए काम पर लगता है, क्योंकि उसको पुरुष की अपेक्षा महिला को काम पर लगाने से अधिक लाभ मिलता है… मेरा कहना है कि यद्यपि प्रसूति लाभ के मामले में निश्चित रूप से कुछ ज़िम्मेदारी सरकार को सौंपी गई है, तथापि मेरे विचार से यदि इन हालात में विधेयक में नियोक्ता को भी कुछ दायित्व सौंपा गया है, तो उससे विधेयक पूरी तरह गलत नहीं हो जाता. … इस विधेयक के माध्यम से सुझाये गए लाभ विधान-मंडल द्वारा उन गरीब महिलाओं को दिए जाने चाहिए, जो इस प्रेसिडेंसी में हमारी फैक्टरियों में कठिन परिश्रम करती हैं.” बाबा साहेब डॉ आंबेडकर सम्पूर्ण वांग्मय, खंड 3, पृष्ठ 185-187

जब भी भारतीय स्त्री के संवैधानिक अधिकारों की व्यवस्था की चर्चा होती है, हिन्दू कोड बिल का संदर्भ अवश्य आता है. नि:सन्देह हिन्दू कोड बिल भारतीय संविधान शिल्पकार बाबा साहेब डॉ भीमराव आम्बेडकर का महत्वाकांक्षी बिल था. स्त्री मात्र  के सम्मान की कानूनन व्यवस्था डॉ आंबेडकर का सपना था. सोहनलाल शास्त्री विद्यावाचस्पति लिखते हैं – “जब बाबा साहेब वायसराय की कौन्सिल के सदस्य थे, उस समय से ही उनके मन में हिन्दू कोड बिल को बनाने का कई बार विचार उठा था. सर अकबर हैदरी और सर बी.एन. राय आदि महानुभावों ने इसकी रुपरेखा तैयार करने का संकल्प लिया.” पृष्ठ 6-7 हिन्दू कोड बिल और डॉ आंबेडकर

हिन्दू कोड बिल तैयार करने इतना आसान कार्य भी न था जबकि “ भारत के स्वतंत्र होने से कुछ समय पहले से ही हिन्दुओं का सुधारवादी वर्ग मुस्लिम और ईसाईयों की भांति हिन्दुओं के लिए भी कोई वैद्य और प्रमाणिक कोड या कानून बनाने के लिए इच्क्षुक अवश्य था, किन्तु ऐसे जटिल और सामाजिक, आर्थिक और धार्मिक क्रान्तिकारी कानून को कौन बनाये और संसद में उसे पारित कराये. ऐसा कोई भी शूरवीर एवं विधि विधानकों का अकाण्ड पंडित भी इस हिन्दू कोड को जो उस्तरों की माला था, अपने गले में पहनने के लिए तैयार नहीं था. हिन्दुओं में उच्च वर्णों में भी सुधारवादी व्यक्ति जन्म लेते रहे हैं. किन्तु वे जानते थे की राजनैतिक काम करने, जेलों में स्वराज्य प्राप्ति के लिए बरसों बंद रहने की अपेक्षा हिन्दुओं में धार्मिक और सामाजिक क्रांति लाना अति कठिन है. हिन्दू धर्मी राजनितिक तौर पर भले ही चुस्त रहे हों और स्वराज्य प्राप्ति के लिए अति भयानक पीड़ाएँ भी सही हों, किन्तु वे राजनितिक हिन्दुओं में धार्मिक और सामाजिक सधार या क्रान्ति लाने में अत्यंत धर्मभीरू और डरपोक रहे हैं. उनमें इतनी जुर्रत ही नहीं थी कि वे हिन्दुओं के धार्मिक और सामाजिक ढ़ाँचे में किसी प्रकार की क़ानूनी तब्दीली या परिवर्तन ला सकें.” पृष्ठ48 हिन्दू कोड बिल और डॉ आंबेडकर

डॉ आम्बेडकर ने विरोधियों से संवाद बनाकर बिल सम्बन्धी समस्त भ्रान्तियों को दूर करने का प्रयास भी करना चाहा पर असफल रहे. फिर भी उन्होंने हार नहीं मानी. उन्होंने सोहनलाल शास्त्री विद्यावाचस्पति से एक ऐसा संस्कृत विद्वान ढूंढ़कर लाने को कहा जो बिल के पक्ष में संस्कृत शास्त्रों से संदर्भ तलाशकर दे. सोहनलाल शास्त्री विद्यावाचस्पति की तलाश वेदों के सुप्रसिद्ध विद्वान पंडित धर्मदेव विद्यावाचस्पति पर ठहरी. पंडित धर्मदेव विद्यावाचस्पति ने तत्कालीन दैनिक ‘वीर अर्जुन’ में कुल 13 लेख माला प्रकाशित करवाई जिसमें हिन्दू कोड बिल को शास्त्र सम्मत ठहराने का प्रयास किया था.  यह लेख निम्नानुसार थे –

  1. हिन्दू कोड बिल हिंदुत्व का रक्षक है.
  2. विवाह सम्बन्धी धाराएँ
  3. विवाह-विच्छेद की परिस्थितियाँ
  4. विवाह-विच्छेद और स्मृति आदि ग्रन्थ
  5. दत्तक-विधान और संरक्षकता
  6. संपत्ति में स्त्रियों के अधिकार
  7. संपत्ति में स्त्रियों के अधिकार
  8. स्त्रियों के दायभागाधिकार
  9. स्त्रियों के दायभाग और स्मृतियाँ
  10. पुत्रियों के दायभागाधिकार पर विमर्श (पूर्वार्द्ध)
  11. पुत्रियों के दायभागाधिकार पर विमर्श (उत्तरार्द्ध)
  12. संयुक्त परिवार प्रथा
  13. हिन्दू कोड बिल की आवश्यकता

उक्त सारे प्रावधान का एक अत्यंत रेखांकित किये जाने योग्य कारण और भी है. महाड़ जल सत्याग्रह के बाद विविध स्थानों में दलित वर्ग की सभाएँ होने लगीं. इन सभाओं में स्त्री-पुरुष दोनों ही भाग लेते. दलित स्त्रियों की भी अलग-अलग स्थानों पर सभाएँ होने लगीं. साथ ही आंबेडकर दलित तरुण संघ (विदर्भ के दलित आन्दोलन का इतिहास –एच.एल.कोसारे पृष्ठ 279 भी स्थापित होने लगे. स्त्रियों द्वारा ली जा रही सभाओं में तत्कालीन ब्रिटिश सरकार से माँग के तौर पर जो प्रस्ताव पारित किये जा रहे थे, वे पूरी तरह से दलित स्त्री की राजनितिक भूमिका निर्मित कर रहे थे. दो-चार उदाहरण यहाँ दृष्टव्य हैं-

बुलढाणा ज़िला अस्पृश्य महिला परिषद

मतकापुर में दिनांक 28 मार्च 1934 को अस्पृश्य महिला परिषद का अधिवेशन मिसेस कमलाबाई रेगे की अध्यक्षता में हुआ।

परिषद में पारित प्रस्ताव-

(1) अस्पृश्य बालक बालिकाओं की शिक्षा के लिए सरकारी रिपोर्ट मतलब किलरो रिपोर्ट के अनुसार व्यवस्था करना

(2) शारदा बिल का अमलीकरण

(3) बालकों के नॉर्मल तथा बालिकाओं के फ़ीमेल नॉर्मल स्कूल में अस्पृश्य बालक-बालिकाओं को अधिक सुविधाओं की माँग। (4) मंदिर प्रवेश बिल आदि प्रस्ताव पर सौ. कांताबाई इंगले, राईबाई, केसरबाई वाकोडे, अहिल्यबाई, काशीबाई भगत, भारजाबाई, सौभद्राबाई, राधाबाई तायडे, सखुबाई तायडे, भीकाबाई वाघ, चिंधाबाई वाघ आदि के भाषण हुए। (जनता दिनांक 21-4-1934)

विदर्भ के दलित आन्दोलन का इतिहास – एच.एल.कोसारे, पृष्ठ 280

अस्पृश्य महिलाओं की सभा

जनता साप्ताहिक में 5 मई 1934 को प्रकाशित समाचार के अनुसार अप्रेल 1934 में तुमसर में सौ.सुभद्राबाई रामटेके (श्री नारायण दलाल रामटेके की पत्नी) की अध्यक्षता में अस्पृश्य महिलाओं की सभा हुई।

सभा में अग्रलिखित प्रस्ताव पारित हुए-

(1) सारी स्त्रियाँ अपने-अपने बच्चों में शिक्षा के प्रति रूचि जागृत करने का प्रयास करते हुए स्वयं भी थोड़ी-बहुत शिक्षा प्राप्त करने का प्रयत्न करे।

(2) कांग्रेस के नाम पर जो अस्पृश्यता निवारण का ढोंग और दिखावटी कार्य चला रहे हैं, उन कार्यकर्ताओं का निषेध

(3) अपने समाज के कुलनाशक गवई आदि अस्पृश्य मंडल और उन्हें गुमराह करनेवाले डॉ मूंजे आदि हिंदू सभावालों का तीव्र विरोध

(4) डॉ आंबेडकर के कार्यों को समर्थन

विदर्भ के दलित आन्दोलन का इतिहास – एच.एल.कोसारे,पृष्ठ 281

अस्पृश्य महिला सुधारक मंडल

नागपुर इमामवाडा में दिनांक 26 अप्रैल 1937 को डॉ आंबेडकर के जन्मदिवस के अवसर पर सौ.जानकीबाई फूले (रावसाहेब फूले की पत्नी) की अध्यक्षता में नागपुर महिला वर्ग की ओर से सार्वजनिक सभा का आरंभ हुआ। इसमें कु.सत्याभामा पाटील, सौ.अंजनीबाई देशभ्रतार, सौ.सकुबाई मेश्राम, सौ.राधाबाई कांबले, कु.दालंबीबाई तोतडे, सौ.कौसल्याबाई आदि वक्ताओं के भाषण हुए और निम्नलिखित प्रस्ताव पारित हुए –

  1. अस्पृश्य महिलाओं के सुधार के लिए सामाजिक,धार्मिक और आर्थिक अधिकार दिलाने के लिए अस्पृश्य महिला सुधारक मंडल स्थापित करते हुए स्वयं के पैरों पर खडे रहने के लिए अपनी उन्नति करना।
  2. डॉ बाबासाहेब आंबेडकर ही हमारे अस्पृश्य समाज के नेता हैं,उनके कदम से कदम मिलाकर हम अस्पृश्य महिलाओं का सुधार करेंगे, यही हमारा उद्देश्य होगा।

विदर्भ के दलित आन्दोलन का इतिहास – एच.एल.कोसारे, पृष्ठ 344

अस्पृश्य महिलाओं की सभा

धरमपेठ नागपुर में दिनांक 1 जनवरी 1938 को श्रीमती सखुबाई मेश्राम की अध्यक्षता में अस्पृश्य महिलाओं की सभा का आयोजन किया गया। सौ.अंजनीबाई देशभ्रतार और श्रीमती सखुबाई मेश्राम ने नागपुर में बड़े दिन के अवसर पर आयोजित अखिल भारतीय महिला परिषद में स्पृश्य बहनों के अस्पृश्य बहनों के प्रति पराएपन, विखंडित भाव, ओछापन और नीच वृत्ति के आचरण पर सोदाहरण बात की। इसके आगे उन्होंने बताया कि अस्पृश्य समाज की स्त्रियाँ अपना सुधार और उन्नति करें और अपने स्वाभिमान और स्वावलंबन का आंदोलन चलाकर समाज के लिए नि:स्वार्थ कार्य करें। दूसरे लोग हमारा सुधार करेंगे, यह भ्रामक धारण छोड़कर अपने ही पैरों पर खड़े होकर स्वयं का, अपने कुटुंब का और समाज का सुधार करे। इसी तरह शिक्षा, शुद्धता, स्वच्छता, सादा जीवन और भाषा और संगठन के संदर्भ में बहुत सारी बातें कहीं।

सभा में ऑल इंडिया महिला परिषद का अधिवेशन जो नागपुर में हुआ था, में स्पृश्य बहनों ने अस्पृश्य समाज की सौ.नाईबाई चौधरी वगैरह को भोजन के समय अलग दूर बैठालकर भोजन कराया और अस्पृश्य समाज से छूत मानते हुए अपमानित किया । इसलिए इस अखिल भारतीय महिला परिषद का तीव्र निषेध प्रस्ताव पारित किया गया।

इसके बाद ‘श्रीमती रमाबाई आंबेडकर महिला संघ’ की स्थापना हुई अध्यक्ष सौ. शारदाबाई तागडी चव्हाण, उपाध्यक्ष सौ.नगुबाई सूर्यवंशी, कोषाध्यक्ष सौ.यशोदाबाई सूर्यवंशी, सचिव श्रीमती सखुबाई मेश्राम, सह सचिव कु.चांगोनाबाई लांबधरे और अन्य सदस्य नियुक्त किए गए।

उपरोक्त मंडल के तत्वावधान में यहाँ एक ‘अस्पृश्य महिला नाइट स्कूल’ आरंभ करनेकी घोषणा की गई। (जनता दिनांक 22-1-1938)

विदर्भ के दलित आन्दोलन का इतिहास – एच.एल.कोसारे, पृष्ठ 354

उमरेड तालुक़ा महिला परिषद

दिनांक 20-4-1940 को उमरेड तालुक़ा महिला परिषद सौ.सुलोचनाबाई डोंगरे की अध्यक्षता में सम्पन्न हुई। इसमें डॉ आंबेडकर की दीर्घायु की कामना की गई। इसी तरह

  1. प्रदेश में विभिन्न स्थानों में महिला समता सैनिक दल की स्थापना की जाए।
  2. भावी संविधान में विधान-मंडल में अस्पृश्य महिलाओं के लिए स्थान आरक्षित रखें जाएँ,जैसे प्रस्ताव पारित हुए। (जनता दिनांक 29-6-1940)

विदर्भ के दलित आन्दोलन का इतिहास – एच.एल.कोसारे, पृष्ठ 390

उक्त सभाओं का आयोजन स्त्रियाँ ही कर रही थीं और सचेत राजनितिक निर्णय ले रही थीं. शिक्षा के प्रति जो चेतना फुले और डॉ आंबेडकर ने जगी थी, उसे प्राप्त करने और बच्चों को शिक्षित करने की चाह में रात्रि पाठशाला की भी फल करती है. अपने साथ होनेवाले अस्पृश्य व्यव्हार को उजागर करने के लिए स्पृश्य स्त्रियों द्वारा किये गये छद्म व्यवहार का निषेध भी करती हैं. न केवल इतना अपितु विधान माडलों में अस्पृश्य स्त्रियों के लिए स्थान आरक्षित करने की संवैधानिक व्यवस्था की भी मांग करती हैं. डॉ अम्बेडकर के नेतृत्व में जो भूमिका लेती हुई ये स्त्रियाँ आज से लगभग अस्सी–नब्बे वर्ष पहले दिखाई देती हैं, उसी का परिणाम है कि हम आज संविधान के माध्यम से नागरिक होने का दर्जा प्राप्त कर रहे हैं.

इसी कड़ी में सन 1942 को नागपुर में संपन्न हुई एक और महिला परिषद का उल्लेख यहाँ विस्तार से करना समीचीन होगा. दिनांक 20 जुलाई 2022 को इस सभा को पूरे 80 वर्ष हो जायेंगे. दिनांक 19 जुलाई 1942 को अखिल भारतीय दलित वर्ग परिषद, नागपुर में आयोजित की गई. यहाँ दूसरे दिन यानि 20 जुलाई को स्त्रियों की सभा भी हुई जिसे डॉ आंबेडकर ने सम्बोधित किया. इसका पूर्ण विवरण निम्नानुसार है-

“अखिल भारतीय दलित वर्ग महिला परिषद, नागपुर

दूसरा अधिवेशन 20 जुलाई 1942

कार्यकारी मंडल 

स्वागताध्यक्ष – सौ. कीर्तिबाई पाटील

उपाध्यक्ष – कु. लतिकाबाई गजभिये

श्रीमती राधाबाई कांबले

महा सचिव – सौ. इंदिराबाई पाटील

संयुक्त सचिव – कु. कौशल्या नंदेश्वर

संयुक्त सचिव –कु. मंजुला कानफाडे 

सदस्य – कु. राधाबाई बोश्वर

कु. प्रभावती रामटेके

श्रीमती जाईबाई चौधरी

कोषाध्यक्ष – श्रीमती दालंबाबाई हाडके

अखिल भारतीय दलित वर्ग महिला परिषद का दूसरा अधिवेशन दिनांक 20 जुलाई 1942 को नागपुर के मोहन बाग में स्थापित अखिल भारतीय दलित वर्ग परिषद के भव्य मंडप में आयोजित हुआ। अधिवेशन में 75 हज़ार से अधिक लोग उपस्थित थे। और इनमें से 25 हज़ार दलित महिलाएँ थीं। मंच पर डॉ आंबेडकर और अन्य नेतागण थे। 

दलित वर्ग महिला परिषद की अध्यक्ष के रूप में मिसेज शिवराज का चयन हुआ था। मद्रास की मिसेज शिवराज अपरिहार्य कारणवश न आ सकीं इसलिए नासिक की कु. शांताबाई दाणी से निवेदन किया गया। उन्होंने अध्यक्ष पद सहर्ष स्वीकार किया पर ऐन वक्त पर बीमार पड़ गईं। इस कारण अलीगढ़ की कु नंदादेवी गौड़ को निमंत्रण दिया गया। पर उनका नागपुर आना संभव नहीं हो सका। अंतत: समय की कमी को देखते हुए अमरावती की सौ. सुलोचनाबाई डोंगरे का चुनाव दलित वर्ग महिला परिषद के अध्यक्ष के रूप में किया गया। और सौ. सुलोचनाबाई डोंगरे की अध्यक्षता में परिषद का कार्य आरंभ हुआ। 

सौ. कीर्तिबाई पाटील ने स्वागत भाषण प्रस्तुत किया। इसके बाद सौ. इंदिराबाई पाटील महासचिव ने अपना प्रतिवेदन परिषद के समक्ष प्रस्तुत किया। दलित महिला अधिवेशन में बहुत सारे प्रस्ताव पारित किए गए। इन प्रस्तावों पर सौ. जाईबाई चौधरी, सौ. राधाबाई कांबले, कु. प्रभावती रामटेके, कु. भीमाबाई बडगे, कु. मंजूला कानफाडे, कु. लतिका गजभिये, कु. सुलोचना नाईक अमरावती, कु. वीरेंद्राबाई तीर्थंकर, कु. चंद्रभागा पाटील गोंदिया, कु. कौशल्या नंदेश्वर के भी भाषण हुए। 

डॉ आंबेडकर का भाषण

अखिल भारतीय दलित वर्ग महिला परिषद, के अधिवेशन में डॉ आंबेडकर ने अपना बहुत छोटा पर महत्वपूर्ण भाषण दिया। परिषद में 20-25 हज़ार से ऊपर प्रचंड महिला समुदाय को देखकर उन्हें अपरिमित आनंद प्राप्ति बताते हुए डॉ आंबेडकर ने अपने भाषण में कहा कि, “स्त्री वर्ग में जागृति हुई तो वे अस्पृश्य समाज में बहुत बडी प्रगति निर्मित कर सकती हैं, मुझे इसका विश्वास है। महिलाओं की संगठित संस्थाएँ होना चाहिए, मेरा इस पर विश्वास है। उनकी सबसे बड़ी सेवा यह है कि उनमें सामाजिक दुर्गुण नहीं है। मैं अपने अनुभव से कहता हूँ। दलित समाज का कार्य जब मैंने अपने हाथों में लिया तभी यह निर्धारित किया था कि पुरुषों के साथ स्त्रियों को भी आगे ले जाना चाहिए। इसी कारण हमारी परिषद के साथ ही महिला परिषद भी आयोजित हो रही है। स्त्री समाज ने कितनी प्रगति की है, इससे मैं दलित समाज की प्रगति को नापता हूँ। इस परिषद में महिलाओं की प्रचंड संख्या देखकर मुझे विश्वास हुआ और आनंद हो रहा है कि हमारी प्रगति हुई है।”

डॉ आंबेडकर ने दलित महिलाओं को जो संदेश दिया वह बहुत महत्वपूर्ण। उन्होंने आगे कहा,”स्वच्छता के साथ रहना सीखें। सारे दुर्गुणों से दूर रहें। अपने बच्चों को शिक्षा प्रदान करें। उनमें महत्वाकांक्षा निर्मित करें। वे बड़े महान बन सकते हैं, ऐसा उनके मन मे रोपें, उनके मन से सारी प्रकार की हीन भावना निकाल दें। उनकी शादी करने की जल्दी न करें क्योंकि शादी एक ज़िम्मेदारी है। शादी की ज़िम्मेदारी संभालने की उनकी कूव्वत जब तक नहीं होती तब तक शादी न करवाएँ। शादी के बाद ज्यादा बच्चे पैदा करना अपराध है, यह शादी करनेवालों को ध्यान रखना चाहिए। तुम्हें यदि सुख सुविधा उपलब्ध नहीं थी तब भी अपने बच्चों को अच्छी स्थिति में रखना माता-पिता की ज़िम्मेदारी है। शादी करनेवाली हर लड़की को चाहिए कि वह अपने पति के उद्देश्य के पक्ष में खड़ी हो, उनकी दासी बनकर नहीं बल्कि बराबरी के नाते से, मित्र कहलाते हुए। इस संदेशानुसार यदि आपने अपने कर्तव्य किए तो आप अपने साथ-साथ दलित वर्ग का भी अभ्युदय करेंगे और सम्मान बढ़ाएँगे।

परिषद में पारित प्रस्ताव

अखिल भारतीय दलित वर्ग महिला परिषद में अग्रानुसार महत्वपूर्ण प्रस्ताव स्वीकृत किए गए-

  1. अखिल भारतीय दलित वर्ग परिषद में दिनांक19 जुलाई 1942 को स्वीकृत हुए प्रस्तावों को यह परिषद अपने अंत:करण से समर्थन देती है।
  2. हमारे समाज में पति-पत्नी में अनबन होने पर समझौते के आधार संबंध समाप्त करने के अधिकार को क़ानूनी मान्यता दी जाए। इस संबंध में सरकार और समाज के नेता उचित सुधार करते हुए तत्संबंधी क़ानून बनाए,परिषद यह माँग करती है। 
  3. हमारे समाज में एक ही समय पर पुरुषों द्वारा एक से अधिक विवाह करने की जो रूढ़ प्रथा है,बहुत अन्यायी और ज़ुल्मी प्रथा होने के कारण अधिक शादियाँ करने की प्रथा क़ानूनन बंद की जाए, ऐसा निवेदन परिषद सरकार से करती है।
  4. भारत के कारख़ानों की मजदूर स्त्रियों,बीड़ी मजदूर स्त्रियों, म्यूनिसिपल और रेलवे की मजदूर स्त्रियों को अपने कारख़ाने में काम करते हुए अन्य नौकरियों की तरह वर्ष में 21 दिन का आकस्मिक अवकाश और एक माह का अर्जित अवकाश, काम करते हुए किए दुखद घटना घट जाए तो वाजिब नुक़सान की भरपाई मिलना चाहिए। इसी तरह से 20 वर्ष की नौकरी होने पर कम से कम 15 रुपये प्रतिमाह की पेंशन संस्था की ओर से मिलने की कानूनन व्यवस्था की जानी चाहिए। यह परिषद नागपुर वाइसराय के कार्यकारी मंडल के नेक नामी मजदूर मंत्री से आग्रहपूर्वक निवेदन करती है। 
  5. (अ) महिला वर्ग शिक्षा के क्षेत्र में पिछड़ा हुआ है। उनमें शिक्षा का प्रचार करने के लिए प्रत्येक प्रांतीय सरकार प्रत्येक इलाक़े में50लड़कियों के लिए छात्रावास सरकारी खर्च से बनाए, यह परिषद सरकार से यह निवेदन करती है। 

(ब) अस्पृश्य घोषित किया गया समाज अत्यंत दरिद्र है. इस कारण अपने बच्चों को माध्यमिक और उच्च दर्जे की शिक्षा प्राप्त करनेवाली प्रत्येक छात्रा को सारी सरकारी और अर्द्ध सरकारी शालाओं में मुफ़्त और स्कॉलरशिप देने की व्यवस्था प्रत्येक प्रांतीय सरकार अविलंब करे, यह परिषद ऐसा गर्मजोशी और आग्रह की विनती करती है।

(स) प्रांतीय सरकार से निवेदन है कि अस्पृश्य मानी गई महिला वर्ग की अशिक्षा और पिछड़ेपन को ध्यान में रखकर उनके लिए अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा योजना बनाते हुए उसे शीध्रातिशीघ्र अमल में लाना आवश्यक है।

  1. मध्यवर्ती सरकार से निवेदन है कि मिलों में काम करनेवाली स्त्रियों के काम का निरीक्षण करने के लिए बहुत सारी जगहों पर पुरुषों की नियुक्ति की जाने के कारण कामगार महिलाओं पर अत्याचार और ज़ुल्म होते हैं,इसलिए मिलों या अन्य जगहों जहाँ स्त्रियाँ सामूहिक तौर पर काम करती हैं, उनके निरीक्षण के लिए स्त्री कामगार ही रखी जाएँ, सरकार कानूनन ऐसी व्यवस्था करे। 
  2. सरकार से निवेदन है कि जिस तरह से मध्यवर्ती और प्रांतीय विधान मंडल में,इसी तरह स्थानीय स्वराज संस्थाओं में स्त्री प्रतिनिधि ली जाती हैं, उसी तरह से अस्पृश्य मानी गई महिलाओं की सर्वांगीण उन्नति के लिए उनके प्रतिनिधि उक्त उल्लेखित सारे स्थानों पर आरक्षित स्थान के माध्यम से रखे जाने की व्यवस्था सरकार क़ानून के द्वारा करे। 
  3. यह परिषद यह तय करती है कि “अखिल भारतीय दलित महिला फेडरेशन” की स्थापना करते हुए उसके खर्च के लिए आवश्यक फंड जमा किया जाए।“विदर्भ के दलित आन्दोलन का इतिहास – एच.एल.कोसारे, पृष्ठ 444 -446

            उक्त सन्दर्भ में गौर करने लायक तथ्य यह है कि डॉ आंबेडकर दलित स्त्रियों में सामाजिक राजनितिक चेतना तो जगा रहे हैं पर महत्वपूर्ण यह भी है कि दलित स्त्रियाँ कैसे अपने अधिकारों के प्रति सचेत हो रही हैं. प्रस्ताव क्रमांक दो पर विशेष चर्चा की जानी चाहिए जब वे आपसी समझौते के आधार पर अलग हुए दंपत्ति को कानूनन अलग होने की व्यवस्था की माँग कर रही हैं. क्या ऐसी मांग और कहीं से उठी थी? सम्बन्ध-विच्छेद को क़ानूनी ज़ामा पहनने की माँग स्त्री के किस अधिकार की रक्षा करता है, क्या यह अब भी खोलने की ज़रूरत है जबकि तरह-तरह के केस न्यायालयों में स्त्री-उत्पीडन से सम्बन्धित हों?

आज सरकारी या गैर सरकारी नौकरी में जिस तरह से पेंशन, आकस्मिक अवकाश, प्रसूति लाभ आदि समस्त कर्मचारी अधिकार दिलाने के लिए डॉ आम्बेडकर के नेतृत्व में स्त्रयां अतत आवाज़ उठती रहीं. दलित समाज अंग्रेजों की प्रशंसा इसलिए करता है कि इस समय ही उनके मनुष्य होने को स्वीकार्यता मिली. अँगरेज़ सरकार ने ही सती प्रथा उन्मूलन 1829, विधवा पुनर्विवाह 1856, बालिका हत्या पर पाबन्दी 1870 पर कानून बनाये. “सन 1917 में स्त्रियों ने सरोजिनी नायडू के नेतृत्व में विमेंस इंडियन एसोसिएशन के तत्वाधान में सर्वप्रथम पुरुषों के बराबर मताधिकार की मांग की थी.” भारत में स्त्री समानता – गोपा जोशी पृष्ठ100 डॉ आंबेडकर के नेतृत्व में दलित स्त्रियाँ विधान-मंडल और संसद में अपने लिए आरक्षित स्थान मांग रही थीं. पूना पैक्ट के सरे विवाद से परिचित ये स्त्रियाँ हिन्दुओं की चालाकी से परिचित थीं. 20 मार्च 1927 को महाड़ के चवदार तालाब के जल सत्याग्रह के बाद जिस तरह से गोबर और गोमूत्र से तालाब को शुद्ध किया गया था, यह घटना हिन्दुओं की दलितों के प्रति मानसिकता को प्रदर्शित करने के लिए काफ़ी थी. चवदार तालाब में दलितों को पानी पीने का क़ानूनी अधिकार सन 1936 को मिल पाया. और वह भी तब जबकि अंग्रेज सरकार थी. आज जबकि पूरा देश स्वतंत्रता का ‘अमृत महोत्सव’ मना रहा है, दलितों, दलित स्त्रियों के उत्पीडन की जिस तरह से खबरें आ रही हैं, शर्मनाक है. शर्मनाक यह भी है कि सरकारी नौकरियों में आज भी बैकलाग बाकी है. जब सरकार का चेहरा धर्म-निरपेक्ष था, तब आरक्षित स्थानों में भारती नहीं हो सकी तो इस हिन्दू राष्ट्र की कल्पना के नक्कारखाने में अब क्या होगी? डॉ आम्बेडकर इसीलिए राजनितिक स्वतंत्रता के पहले सामाजिक समता को पर बल देते रहे.

अखिल भारतीय दलित वर्ग परिषद, नागपुर सन 1942 के अस्सीवें वर्ष में स्त्री सम्मान की यात्रा को देखना बिला शक़ रोमांचकारी है. जिनका कोई अस्तित्व नहीं था, उन्होंने समाज में सम्मान पाने के लिए जो संघर्ष किया, उस ज़ज्बे को नमन.

अभी मैं मुम्बई यात्रा पर थी. यहाँ एक खुबसुरत अनुभव हुआ. सभी मराठी स्त्री रचनाकार अपने जीवनसाथी का नामोल्लेख करते हुए ‘माझा जोतिबा’ कह रही थीं. सहजीवन का सबसे बेहतर आदर्श हमारे समक्ष जोतिबा-सावित्री फुले हैं. पहली बार जब मैंने श्यामल गरुड़ जी से ‘माझा जोतिबा’ यानि ‘मेरा जोतिबा’ सुना तो बहुत रोमांच हुआ. जब मैंने छाया कोरेगाँवकर जी से ‘माझा जोतिबा’ सुना, तो भी उतना ही रोमांच हुआ. पर अब सोच रही हूँ तो आनन्दाश्रु ढ़लक पड़े हैं. स्त्री जीवन को सम्मानित करने का श्रेय इसी फुले दंपत्ति को जाता है. कितना ही अच्छा हो कि ऐसे दम्पत्तियों को “फुले दंपत्ति सम्मान” दिया जाये जो मानव मात्र के जीवन स्तर को सामाजिक, धार्मिक बेड़ियाँ काटकर सतत प्रगति पथ पर ले जाने को किसी भी तरह से सन्नद्ध हों और उसे अंजाम तक पहुँचाएँ।

लेखिका का परिचय –
हेमलता महिश्वर
जसोला विहार, नई दिल्ली

हिन्दी नवजागरण और स्त्री प्रश्न

सुरेश कुमार

वास्तव में देखा जाए तो बीसवीं सदी का दूसरा और तीसरा दशक अस्मितावादी सरगर्मी से भरा रहा है। इस दशक में जहां हिन्दी लेखकों के भीतर पुराने मूल्यों के प्रति मोह भी दिखा, वहीं नवीन विचार अपनाने की ललक भी दिखायी दी। इसी दशक में साहित्यिक क्षेत्र में ‘चाँद’, ‘माधुरी’, ‘सुधा’, ‘विशाल भारत’, ‘मनोरमा’,‘त्यागभूमि’ आदि स्वाधीनतावादी चेतना से लैस पत्रिकाओं का उदय हुआ था। इन पत्रिकाओं के संपादक और लेखक    स्वराज की मांग के साथ स्त्री और अछूत समस्या का एजेंडा अपने लेखन में जोड़ लिया था। देखा जाए तो इस लेख के केंद्र में हिन्दी नवजागरण कालीन संपादकों और लेखकों के स्त्री संबंधी विचार है। इस लेख के पहले हिस्से में इस बात की पड़ताल करने का  प्रयास किया गया है कि बीसवीं सदी के दूसरे और तीसरे दशक में स्त्री लेखिकाएँ अपने अधिकारों की दावेदारी किस तरह पेश कर रही थी।  लेख के दूसरे हिस्से में इस बात की पड़ताल की जाएगी कि इस दशक के हिन्दी संपादकों और लेखकों का स्त्री संबंधी नज़रिया क्या था ? ऐसे में यह देखना महत्त्वपूर्ण होगा कि इस दौर की हिन्दी पत्रिकाओं में स्त्री प्रश्नों को कैसे देखा जा रहा था, और इन पत्रिकाओं के संपादक किस सामाजिक-धार्मिक भाषा में स्त्री प्रश्न को संबोधित कर रहे थे।

औपनिवेशिक भारत की बीसवीं सदी के दूसरे दशक में स्त्री समस्या का मुद्दा प्रमुख बनकर उभर था। हिंदी नवजागरणकालीन संपादक पत्र-पत्रिकाओं में बाल विवाह, विधवा विवाह और स्त्री शिक्षा सरीखे प्रश्नों को तरजीह देने लेगे थे। इस समय स्त्रियों को लेकर उच्च श्रेणी हिंदुओं के सामाजिक बंधन इतने कठोर थे कि विधवा स्त्रियाँ चाह कर भी पुनर्विवाह नहीं कर सकती थी। सन् 1911की जनगणना में विधवाओं के आकड़ों देखकर कर नवजागरण कालीन लेखक सकते में आ गए थे। सन् 1911की जनगणना में दो करोड़ चौसठ लाख इक्कीस हजार विधवाएँ थीं। इनमें से तीन लाख पैंतीस हज़ार 15 वर्ष से कम अवस्था की थी।1   विधवा स्त्रियों का पुनर्विवाह नहीं होने से उन्हें सामाजिक जीवन में तमाम तरह की कठिनाइयों का सामना करना पड़ा रहा था। चाँद पत्रिका 1923 केअप्रैल अंक में कुमारी सुखालता ने विधवा समस्या पर एक बड़ा ही मार्मिक लेख लिखा। इस लेख में कुमारी सुखालता ने बताया कि पुरोहितों और पोथधारियों की मूर्खता के चलते विधवा स्त्रियाँ बिना किसी अपराध के कैदियों सा जीवन व्यतीत कर रही हैं। कुमारी सुखालता का कहना था कि सती प्रथा की अग्नि से स्त्रियों को तो जरूर बचा लिया गया पर विधवा स्त्रियाँ जीवित रहते हुए भी रोज़ दुख की अग्नि में जल-भून रही है। विधवा जीवन स्त्रियों के लिए कितना दुष्कर और भयवाह था, इसका अंदाजा कुमारी सुखालता के इस कथन से लगाया जा सकता है : “मैं मानती हूँ कि विधवाओं कों  जिन्दा जलने से ज़रूर बचा लिया गया किन्तु अब तो जीवित अवस्था में हो वे धीरे धीरे दुःख की अग्नि में भस्म होती रहती है। चिता की अग्नि उन्हें एक दो घड़ी में ही समाप्त कर देती थी किन्तु सामाजिक बन्धनों की तथा असहायता और दरिद्रता की अग्नि अब उन्हें आजीवन सुलगाती रहती है। पहले तो इस जीवन का जो कुछ यातनाएं हुआ करती थीं, थोड़ी देर में चिता पर समाप्त हो जाती थी किन्तु अब संसार रूपी चिता की अग्नि उन्हें तमाम ज़िन्दगी बराबर जलाती रहती है। क्या समाज ने विधवाओं को सती-चिता से मुक्त इसलिये किया है कि उन्हें उस से अधिक यातना पूर्ण चिता पर उम्र भर जलाया करें।”2  नवजागरण कालीन स्त्रियाँ  इस बात का दावा  बार-बार कर रहीं थी कि उच्च श्रेणी के हिन्दू अपनी बहू-बेटियों के दुख दर्द को महसूस नहीं करते है। वे सड़ी-गली प्रथाओं के चलते अपनी बेटियों  को पशुओं की तरह इधर-से उधर हांक देते है। विधवा विवाह,बालविवाह और कन्या भ्रूण जैसी कुप्रथाओं की झाड़ियों और काँटों में  फसकर हिन्दू स्त्रियों का जीवन नष्ट हो जाता है। कुमारी सुखलता विधवा जीवन के खौलते हुए यथार्थ के संबंध में लिखती है कि, “विधवाओं की आज दशा क्या है ? उनका जीवन आज कैसे व्यतीत होता है। इनका जीवन नदी की उस धारा के समान हैं, जो कङ्कड़ पत्थर में पड़कर झाड़िया और काटों से अच्छादित होकर अपने तमाम सौन्दर्य को खो बैठा हो। यह कंकड़ पत्थर और यह झाड़ी और कांटे क्या है ? यह हिन्दू समाज के मृणासन्न मर्यादाएं हैं और कुप्रथाएं हैं जिनके कारण विधवा के जीवन का पुष्प अधखिला होते हुए भी बिखेर दिया जाता है। हिन्दूधर्म आज विधवाओं की यातनाओं को महसूम नहीं करता! उसमे नवीन जीवन का बहुत कम संचार हुआ है। वास्तविक जीवन का अभाव सा पाया जाता और इसलिये इस धर्म में आज वह अध्यात्म और वास्तविक नीतिमत्ता और पवित्रता नहीं पाई जाती कि जो धर्म की प्राण वायु है।”3

बीसवीं सदी के दूसरे दशक में विधवा समस्या ने विकराल रूप धारण कर लिया था। इस मर्दवादी समाज में उन्हें आठ घड़ी और चौसठ पहर दुख की कन्दराओं में जीवन काटना पड़ रहा था। इतना ही नहीं समाज और परिवार विधवाओं को बड़ी हिकारत भरी नज़रों से देखते थे। चाँद पत्रिका में तमाम अनाम विधवाओं के पत्र छ्पे जिनमें विधवाओं ने बड़ी शिद्दत से अपने दुखों का बयान किया। एक खत्री परिवार की स्त्री अपने विवाह के केवल इक्कीस दिन बाद विधवा हो गयी थी। यह अनाम विधवा अपने बारे में बताती  है कि, “जिस समय मेरा विवाह हुआ उस समय मेरे पति को पहिले से ही संग्रहणी की बीमारी थी। जो शायद शादी विवाह में कुपथ्य ( बदपरहेज़ी ) के कारण बढ़ गई और ठीक 21 वें दिन तार आया कि वे परलोक सिधार गए। उस समय मेरी उम्र 8 वर्ष की थी। मैंने सुना था कि वे (पति) पहले से ही बीमार रहते थे । उनकी आयु जब विवाह हुआ तो 35 साल की थी और उनकी पहिली दो स्त्रियां प्रसुत रोग से मर चुकी थीं।”4  इसके बाद यह अनाम हिन्दू विधवा वेद-पुराण की आलोचना तो करती ही है, वह ऐसे  पुरुष पर भी सवाल उठाती है जो खुद तो चार-पाँच विवाह कर लेते थे लेकिन विधवा स्त्रियों के पुनर्विवाह का विरोध करते थे। यह अनाम विधवा अपने पत्र में लिखती है कि, “मुझे समाज से कुछ नहीं कहना है। मैं केवल यह बात जानना चाहती हूं कि किस वेद, पुराण या कुरान में ऐसी आज्ञा दी गई है कि पुरुष जब चाहें पैर की जूतियों के समान हमें त्याग कर एक, दो, तीन, चार अथवा पांच पांच विवाह करलें पर स्त्रियां बेचारी ऐसी स्थिति में रहते हुए भी, जैसी आज मैं हूँ-दूसरा विवाह न कर सकें । यह समाज की भयङ्कर नीचता नहीं तो और क्या है ?”5

  विधवा स्त्रियों पर परिवार और समाज का बड़ा पहरा  रहता था। वे अपनी इच्छा  से न तो कहीं जा सकती थी और न तो कुछ वरण कर सकती थी। हर वक्त उन पर निगरानी रखी जाती थी। इस पहरेदारी से तंग आकर कुछ विधवाएँ आत्महत्या करने की बात तक सोचने लगती थी। एक उच्च श्रेणी की हिन्दू विधवा का जीवन कितना पीड़ा दायक था। इसका अंदाजा इस अनाम विधवा के पत्र से लगाया जा सकता है : “सेवा में निवेदन है कि में एक विधवा दुःखियारी आपकी सहायता के लिए प्रार्थना करती हूं। मेरी अवस्था इस समय 18 वर्ष की है। मुझे विधवा हुए तीन साल होगए। मैं वैश्य अग्रवाल जाति की हूँ । मेरे एक लड़की हुई थो जो इस समय 2 वर्ष की है और कोई सन्तान नहीं हुई । मेरे माता-पिता जाति का डर होने के कारण और निर्धन होने के कारण चुप हैं और मेरे शत्रु बन रहे हैं । मेरे सास ससुर भी, जैसा हिन्दु विधवा के साथ , इस जाति में घोर अत्याचार प्रचलित है कर रखा है, करते हैं । शोक है मेरे जेठ जिनकी उम्र 50 वर्ष से कम नहीं है, जिसके दो लड़के 17 औ 12 वर्ष के, और एक लड़की 11 वर्ष की है-पिछले साल 26 साल की एक विधवा से विवाह कर लाए लेकिन मुझ दुःखिया पर जिस का न पिता के घर जीवका का सहारा है और ना ससुराल में किसी को परमात्मा के भय का भी ख्याल नहीं होता दिन भर सारे कुटुंब की सेवा करते रहने पर भी रोटी का सहारा नहीं दीखता! हर समय सब की घुड़कियों और तानों से अति दु:खित हो रही हूँ । कई बार जी में आता है कि कुएं में छलांग मार कर इस मुसीबत से छुटकारा पा लूँ।”6

हिन्दी नवजागरण कालीन स्त्री लेखिकाएं विधवा जीवन की दुश्वारियों को अपने लेखन में उठा रहा थी। इसी के साथ वह पुरुषों के चाल-चलन पर सवालियाँ निशान भी लगा रही थी। श्रीमती भाग्यवती देवी ने मनोरमा पत्रिका में बिधवा शीर्षक से दो विधवा स्त्री का आपसी वार्तालाप लिखा। भाग्यवती देवी ने यह दावा किया कि उनका यह वार्तालाप सत्य घटना पर आधारित है। इस वार्तालाप से पहले लेखिका ने मर्दवादी नैतिकता पर बड़े गंभीर सवाल खड़े किए। भाग्यवती का दावा था कि अधिकांश युवा कालेजों और स्कूलों में  पढ़ते समय अपना जीवन ख़राब कर चुके होते है। जिसका परिणाम यह होता है कि वह शीघ्र ही काल का ग्रास बनकर अपनी पत्नी को विधवा बनाकर चले जाते हैं। श्रीमती भाग्यवती देवी ने पुरुष नैतिकता की कलाई खोलते हुए लिखा कि,“हमारी उच्च कही जाने वाली जातियों में वैधव्य जीवन के द्वारा समाज का कितना नैतिक पतन होता जा रहा है यह किसी से छिपा नहीं ! आज हजारों की संख्या में वह बहिनें जिनकी माँग का सिंदूर अभी तक धुला भी नहीं था वैधव्यता को प्राप्त हो जाती है। आये दिन हजारों विधवाओं के होते जाने पर भी हमारे रूढ़ि के गुलाम भाई इस ओर तनिक भी ध्यान नहीं देते कि क्यों इतनी शीघ्रता से हमारा ह्रास हो रहा है! क्या मैं आपको बताऊँ यह वैधव्य जीवन की बुलाने का पुण्य कार्य भी आप पुरुषों ही के द्वारा होता है! आप लोग अपनी अबोध कन्याओं को बूढ़े तथा दुर्बलेन्द्रिय नवयुवकों को जो अपना जीवन कालेजो और स्कूलों में ही प्रायः खराब कर चुके होते और इस आशा से कि लड़का पढ़ा हुआ है विवाह कर देते हैं। जिसका परिणाम यह होता है कि वह शीघ्र ही काल के ग्रास बन जाते हैं और अपनी उस साध्वी परिणीता भार्या को वैधव्य का दुःख दे जाते हैं ! उनके पश्चात् जो जो नाना भाँति अत्याचार सास श्वसुर ज्येष्ठ आदि करते हैं वह किसी से छिपे नहीं हैं । इन घरों के अत्याचार अलावा भी आज कल के फैशनेबुल शौक़ीन लोग नवयुवति विधवाओं को अपना शिकार बना लेते हैं।”7 यह लिखने के बाद भाग्यवती देवी ने लीला और मूर्ति नामक दो विधवाओं का वार्तालाप दिया है। लीला मात्र तेरह वर्ष की और मूर्ति  पंद्रह वर्ष  की अवस्था में विधवा हो गयी थी। मूर्ति अपने वार्तालाप में बताती है कि उसका पति बी.ए. करते समय चरित्र हीन हो गया था। नवजागरण कालीन उच्च श्रेणी की स्त्रियां किस  पीड़ा से गुजर रही थी। लीला और मूर्ति के इस वार्तालाप से महसूस किया जा सकता है :  

लीला– लीला अभी 13 वर्ष की बालिका थी कि यकायक उसके  सिर का सिंदूर पुछ गया। उसका विवाह हुए अभी  केवल दो मास ही हुए थे। हाय? वह कैसे पति का वियोग सहेगी। लीला के घर में पाँच प्राणी थे, माता, पिता, दो भाई, तथा लीला। लीला के पिता दो भाई थे। दोनों भाइयों में कन्या रत्न अकेली लीला ही थी इस कारण दोनों ही परिवारों में लीला को सब प्रकार से सुखी रखने का यत्न होता था और प्रेमाधिक्य के कारण वह सब की प्रेमपात्री बनी हुई थी। श्वसुरालय में केवल तीन जीव थे सास श्वसुर तथा पति। एकाएक पति वियोग हो जाने के कारण लीला को अनेक विपत्तियों का सामना करना पड़ा। एवंहि नाना भाँति के दुःखों का साम्राज्य छा गया। अहो ? यह 13 वर्षीया बालिका कैसे इतना दुःख उठा सकेगी । आइये हम उनकी बात चीत आपको सुनावे जो वह आपस में कर रहीं हैं ।

लीला-प्रिय बहिन मूर्ति मैं  क्या करूं ? कैसे अपने जीवन को व्यतीत करूं, अभी मैंने संसार का देखा ही क्या है ? ठीक तौर से आँख भी न खोलने पाई थी कि सदैव के लिए बन्द दो गई !

 मूर्ति – बहिन मेरी दशा भी तुमसे  कोई  बड़ी नहीं- मैं भी इसी नाव में सवार हूँ ।  मैं 15 वर्ष की ही थी कि मेरे आराध्य देव मुझे बिलखता छोड़ कर स्वर्ग चले गये । मेरे पिता ने एक बड़े अच्छे कुलीन घराने में जो आगरा कालिज में बी.ए. में पढ़ता था विवाह किया था। माता की उमंग और पिता का अनन्य बात्सल्य भाव, देखने वाले कहते हैं अपूर्व था। वह इस बात की बड़ी तारीफ़ करते थे कि मेरा जामाता बी. ए. है परन्तु प्यारी बहिन मेरे वैधव्य का कारण तो यही कालेज की पढ़ाई का हुआ! मेरे पति देव कालेज में पढ़ते समय चरित्रहीन हो गये और उसी से शरीर में घुन लग गया जो उनका जीवन ही लेकर हटा ! मेरे वैधव्य को सुन माता पिता ने भी छट पटाकर प्राण दे दिये। मेरे अब भाई भावज के सिवाय कोई भी नहीं रहा जो मुझे धीरज बँधावे।

लीला- बहिन। तुम्हारी ही तरह मेरी स्नेह मयी माता भी मेरे अपार दुःख को न देख सकी और वह भी मुझे रोता छोड़ चल बसी। पिता जी मुझे  किसी प्रकार का भी दुःख नहीं होने देते पर मेरे अन्दर जो आग धधक रही है उसका क्या हो। जिस समय पिता जी ने मेरा विवाह  किया था उसी समय मुझे अपने भावी पति को जो घोड़ी पर चढ़कर द्वार पर आया था देख कर आशंका हो गई थी कि पिता जी मेरा बलिदान कर रहे हैं । बहिन कहने के लिये तो वह नव युवक था परन्तु उसका पीला रक्त हीन चेहरा बता रहा था कि यह विवाह के अयोग्य है। परन्तु हम बालिकाएँ इस विषय में मुंह खोल कर कुछ कह नहीं सकटी जिसका परिणाम आज मुझे मिल रहा है ।8

बीसवीं सदी के दूसरे-तीसरे दशक में व्यभिचार एक बड़ी समस्या बन कर उभरा था। विधवा स्त्रियों को उनके सगे संबन्धी नरम चारा समझ कर उन्हें पतित कर डालते थे। बड़ी दिलचस्प बात यह है कि इसका सारा दोष विधवा स्त्री के सिर ही मढ़ दिया जाता था। विधवा स्त्रियों का शरीरिक शोषण कितनी गंभीर समस्या बन गया था। इसका अंदाज़ा एक उच्च श्रेणी की विधवा के इस पत्र से लगाया जा सकता है :  “मेरा जन्म आज से 29 वर्ष पूर्व हुआ था। मैं सारस्वत ब्राह्मणी हूँ । जब मैं पाँच वर्ष की थी, मेरे पिता की मृत्यु हो गई। अब माता और मैं चचा के पास रहने लगीं। मैं अपने फूफा के यहाँ भी दो-तीन वर्ष रही । वहाँ पर ही मैं मामूली हिन्दी पढ़ गई। जब मैं 18 वर्ष की हुई तो मेरी शादी जिला बुलन्दशहर में हुई। विवाह के एक वर्ष बाद एक पुत्र उत्पन्न हुआ । मेरे पति रेलवे में बुकिंग  कलर्क थे। दो वर्ष  बाद मैं पति के साथ रहने लगी। एक वर्ष बाद एक पुत्री हुई और फिर दो वर्ष बाद एक पुत्र हुआ। अभाग्यवश पार साल मेरा सिन्दूर पुछ गया- मैं अनाथ हो गई। मेरे श्वसुर बहुत दिनों से पागल हैं। पति के मरते समय रुपए -पैसे की हालत अच्छी न थी। जो कुछ थोड़ा -बहुत था, वह चिकित्सा में समाप्त हो गया । उनको क्षय रोग था। अब मैं अपने श्वसुर के पास आ गई और उनकी सेवा करने लग गई । थोड़े ही दिनों बाद मेरे बड़े पुत्र और कन्या की मृत्यु हो गई । मैं श्वसुर जी के पास दो महीने ही रहने पाई थी। इस समय मेरे जेठ, जोकि मेरे पति के चचा के लड़के हैं और एक जजी कचहरी में नायव नाजिर हैं, आ गए और मेरी ननद से तरह-तरह की बातें बना कर मुझको अपने साथ ले गए । हाय ! यदि मुझे यह मालूम होता कि मैं एक गहरे गढ़े में गिर जाऊँगी तो कभी न जाती। मैं उनके पास चार महीने रही। एक महीने तक तो उन्होंने कुछ न कहा । दूसरे महीने छेड़ना शुरू किया। उनकी  स्त्री भी मौजूद हैं, लेकिन उनकी स्त्री को ऐसी बातें देख कर आनन्द होता है और वे हँसती हैं। मुझे तरह-तरह के प्रलोभन दिए गए । हाय ! मूर्खा इतना न जान सकी कि ये प्रलोभन वह नारकीय कुत्ता किस लिए दे रहा था। एक रात को वह मेरी कोठरी में आ घुसा और प्यार की बातें करने लगा। मैं चिल्ला उठी- “जा, चला जा अपना काला मुंह लेकर चला जा। तिस पर बोला- “प्यारी- तुझे मालामाल कर दूंगा। सब घर तेरा ही है ।” और तरह-तरह की बाते की और कहने लगा- “अगर तू चिल्लाएगी तो  बदनामी तेरी ही होगी; मेरा क्या बिगड़ेगा ? कल निकाल कर बाहर खड़ा कर दूंगा ।” उस समय इन बातों का हृदय पर बड़ा प्रभाव पड़ा । किन्तु मैं यह नहीं जानती थी कि पुरुष इतने स्वार्थी होते हैं कि मतलब निकल जाने पर मुँह से बात तक नहीं करते। हाय! मेरा सर्वस्व लूटा।  जिठानी जी देखती रहीं । यही नहीं, किन्तु हँसती रहीं । स्त्रियाँ भी ऐसी होती हैं , यह मुझे स्वप्न में भी आशा न थी। अब क्या था, काला मुँह हो गया। जिठानी के यहाँ जो कोई आता, उसी से वह ये सब बातें कहती । मुझे लज्जित होना पड़ता।”9

नवजागरण कालीन स्त्रियाँ एक तरफ पुरुष के नैतिक पतन की कहानी लिख रही थी तो वहीं दूसरी तरफ मर्दवादी अत्याचारों का प्रतिकार भी कर रही थी। श्रीमती मनोरमा देवी नवजागरण कालीन लेखिका थी। इनके अनेक लेख चाँद,माधुरी, सरस्वती, मनोरमा पत्रिका में बिखरे पड़ें हैं। मनोरमा पत्रिका सन 1929 के सितंबर अंक में श्रीमती मनोरमा देवी ने ‘अबलाओं पर अत्याचार’ शीर्षक से एक दिल को हिला देना वाला लेख लिखा। मनोरमा देवी ने इस लेख में स्त्री विमर्श की जमीन पर खड़ी होकर कहा कि स्त्रियाँ  दुखों की परवाह किए बगैर  पुरुषों पर अपना सर्वस्व निछावर कर देती हैं पर पुरुष इतने निर्दयी और अत्याचारी होते है कि उन्होंने स्त्रियों को कठपुतली और गुड़ियों का खेल समझ कर उन पर मनमाने अत्याचार करते हैं। इस लेखिका का कहना था कि स्त्रियाँ रक्त और मांस की बनी हुई हैं; इसके बावजूद यह मर्दवादी तंत्र स्त्रियों पर घोर सामाजिक अत्याचार करता है। श्रीमती मनोरमा का अभिमत था कि यह मर्दवादी समाज स्त्रियों की इच्छा-आंकक्षा का तनिक भी ख्याल नहीं रखता है।  यहाँ तक स्त्री को इस मर्दवादी तंत्र में कुछ भी कहने का अधिकार नहीं है। यदि स्त्री किसी बात पर अपना मुँह खोलती है तो उसे बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है। श्रीमती मनोरमा देवी इस मर्दवादी तंत्र के मुखौटा को उजागर करते हुए लिखती हैं कि, “अनेक स्थलों पर देखने में आता है कि बात-बात में  स्वामी स्त्री का त्यागकर देता है। वह  उससे हर तरह के छोटे बड़े काम लेता है दासी वृत्ति कराता है यहाँ तक कि वेश्यावृत्ति जैसा घृणित कार्य भी कराता है स्त्री ने किसी भी बात के विरुद्ध अपना मुँह खोला कि फिर वह घर से बाहर कर दी जाती है । कारण घर स्वामी है, दोष चाहे जिसका हो, स्वामी की जब तक इच्छा है स्त्री घर में रह सकती है, इच्छा नहीं रहने पर वह किसी तरह  घर नहीं रह सकती इस पर किसी को कुछ कहने का अधिकार नहीं । स्वामी प्रभु है, मालिक है, जो चाहे कर सकता है । इस प्रकार कितनी स्त्रियों का जीवन व्यर्थ नष्ट हो रहा है।”10 मनोरमा देवी आगे सवाल उठाती हैं कि इस समाज में स्वामी कितना ही अत्याचारी और दुष्ट हो पर स्त्री को उसके लात-जूते हस्ते हुए ही सहना पड़ता है। यहाँ तक स्त्री को अपने दुख को प्रकट करने का अधिकार नहीं कारण स्वामी देवता है।

नवजागरण कालीन स्त्रियाँ अपने लेखन में स्त्री अधिकारों की पहलकदमी करती दिखायी देती हैं। स्त्री अधिकारों के अंतर्गत स्त्री शिक्षा, विधवा विवाह, बाल विवाह जैसे मुद्दे अपने लेखन में उठा रही थी। नवजागरण कालीन लेखिका श्रीमती कौशल्या देवी श्रीवास्तव ने अपने एक लेख में स्त्री शिक्षा का सवाल उठाकर मर्दवादियों को सकते में डाल दिया था। इस लेखिका का कहना था कि स्त्रियों को गहने से लादने से अच्छा है कि उन्हें शिक्षा रूपी आभूषण से सुसज्जित किया जाए। इस लेखिका ने दावा किया कि मर्दवादी समाज स्त्रियों को इस लिए अनपढ़ बनाए रखता है कि कहीं स्त्रियाँ उनकी बराबरी न करने लगे। श्रीमती कौशल्या देवी, श्रीवास्तव अपने लेख में लैंगिक भेदभाव का मुद्दा भी उठाती हैं। इस लेखिका का साफतौर कहना था कि यह मर्दवादी समाज अपनी पुत्रियों की अपेक्षा पुत्रों की शिक्षा पर अधिक बल देते हैं।  इस नवजागरण कालीन लेखिका ने सुधारकों को चेतवानी देते हुये कहा कि जब तक स्त्री शिक्षा का उचित प्रबंध नहीं किया जाएगा, तब तक यह देश और समाज उन्नति नहीं कर सकता है। श्रीमती कौशल्या देवी, श्रीवास्तव अपने लेख में सुधारकों से स्त्री शिक्षा को लेकर अपनी अपील में लिखा कि, “हा ! विधाता तूने कैसा ज्ञान दिया है आजकल प्रायः ग्राम में भी स्कूल खुले हुए दृष्टि आते हैं उसमें पुत्र तथा कन्या दोनों ही पढ़ाई जा रही हैं किन्तु , कन्याओं को लोग दो ही एक दर्जे तक पढ़ा कर बन्द कर देते हैं परन्तु इस पढ़ाने से क्या पढ़ना न पढ़ना दोनों बराबर है-जब तक पूर्ण रूप से शिक्षा न दी जायगी तब तक सफलता प्राप्त होने की आशा नहीं है। अतः इसके लिये पूर्ण रूप से प्रबन्ध करने की आवश्यकता है। सुधारकों से मेरी प्रार्थना है कि वे इस ओर विशेष ध्यान दें । जब तक स्त्रियों के शिक्षा का पूरा प्रबन्ध न हो जायगा, तब तक इस प्यारे देश की उन्नति होने की आशा नहीं।”11 श्रीमती कौशल्या देवी अपने लेख में एक बड़ा ही अहम सवाल उठाती हैं कि लड़की का विवाह उसके मर्जी से किया जाए। इस लेखिका का अभिमत था कि अधिकांश माता-पिता अपनी कन्या पर दया नहीं करते हैं। वह आँख पर पट्टी बाँधकर कर अपनी कन्याओं के गले में विवाह नाम की कंठी लटका देते हैं। लेखिका उन माता-पिता से गुजारिश करती है कि लड़कियों का विवाह उनकी इच्छा से ही करें ताकि उन्हें जीवन में कष्ट नहीं उठाना पड़े। श्रीमती कौशल्या देवी लिखती हैं कि, “हमारा उन माता पिताओं से यही अनुरोध है कि वे अपनी कन्या की शादी जहाँ तक हो सके आँख बन्द करके न किया करें। ऐसा करने से उन्हें महान कष्ट भोगना पड़ता है । इस ब्याह से तो आजन्म कुमारी रहना अच्छा है किन्तु परतन्त्रता के कारण जो न हो वह थोड़ा है। ऐसे शादी करने से कितने ही पति ऐसे मिलते हैं जो उसे  प्यार की दृष्टि से देखते ही नहीं। उन्हें उनकी सूरत देखते भी घृणा उत्पन्न होती है। ऐसी शादी करने वाले पूज्य पिता ही सोचें भला यह जीवन भी सुखमय हो सकता है? कदापि नहीं। जो वस्तु अपने पसन्द की ख़रीदी जाती है उस पर अपना अगाध प्रेम रहता है और जो वस्तु पराए पसन्द की होती है उस पर अपना वैसा प्रेम कदापि नहीं रहता। एक न एक दोष निकल ही आते हैं। चाहे वह कैसी ही वस्तु क्यों न हो। अतएव माता पिता को चाहिये कि अपने पुत्र तथा पुत्रियों के इच्छानुसार ही शादी किया करें। ताकि स्त्री पुरुष दोनों का जीवन सुखमय हो।”12   नवजागरणकालीन स्त्रियों  इस बात को भली-भाँति समझ चुकी थी कि उनकी दुर्दशा की जिम्मेदार पितृसत्तावादी मानसिकता  है। वह मर्दवादवादियों को अपने लेखन के हवाले से आईना भी दिखा रही थी। वह इस मर्दवादी समाज से पूंछ रही थी कि स्त्रियों ने बड़ी यतनाओं में रहकर पुरुषों के लिए वृतादि सब कुछ किया है पर पुरुष स्त्रियों के बेहतरी के लिए क्या कभी व्रतादि  रखा है ?  नवजागरणकालीन लेखिका सौभाग्यवती विमला देवी ने ‘मानव जाति में स्त्री’ शीर्षक से एक लेख लिखा। इस लेख में मुख्यतौर पर स्त्रियों के पतन का जिम्मेदार मर्दवादी मानसिकता  को ठहराया गया। इस लेखिका ने कहा मर्दों की ओर से यहाँ तक कहा गया स्त्रियाँ जहां अपनी ज़ुबान खोलें वही ढ़ोल की तरह पीट कर  उनकी बोलती बंद करवा दी जाए। विमला देवी का कहना था कि इस मर्दवादी समाज को स्त्रियों का पढ़ना-लिखना सुहाता नहीं है। इन मर्दवादियों के चलते स्त्रियों को चहार दिवारी के भीतर सड़ना पड़ रहा है। सौभाग्यवती विमला देवी  स्त्री समाज का खौलता हुआ यथार्थ सामने रखते हुए लिखती हैं कि, “अफ़सोस! पुरुषों ने अपनी अज्ञानता के वश में आकर नारी-जाति को बिलकुल ही पतन के गहरे गर्त में ढकेल दिया, उन्होंने सदा के लिए पशु-जीवन में परिणत कर दिया। ओफ़! ऐसा भीषण प्रहार! ‘‘ढोल गवॉर शूद्र पशु नारी, ये सब ताड़न के अधिकारी ’’ का ढोल पीटा जाय। जहाँ पर बोली बन्द कर दी गई । “ चुप रहो, तुम्हारा कुछ हक नहीं, पढ़ना लिखना कुलटाओं का चिन्ह है। पर्दे की चहार दिवारी के अन्दर सड़ती रहो ।” आदि – कर्ण- कटु शब्दों के द्वारा घोंसे बजाया जाय। अत्याचार ? जुर्म ? पैचाशिक काण्ड मचाये जाय किसके साथ? मानव जाति की बुनियाद, बन्दनीया नारी जाति के साथ! पेड़ काट कर पल्लव सींचने की योजना! कुपथ रखते हुए ऊरुज विमुक्त होने की आशा रखना! कैसा अनर्थ है ? जो नरों की खान हैं, मानव जाति के, विकाश-केन्द्र हैं ; उन्हीं के साथ ऐसा निष्ठुर व्यवहार ? पशुओं से भी हीनतर ! छिः! ”13  श्रीमती विमला देवी के इन सवालों का जवाब शायद ही मर्दवादियों के पास था।

उमा नेहरू हिन्दी नवजागरणकाल की प्रसिद्ध लेखिका थी। इस लेखिका ने स्त्री समस्या को केंद्र में रखकर अनेक लेख और कहानियां लिखी है। सन 1927 में  उमा नेहरू की स्त्री समस्या पर केन्द्रित एक बड़ी मार्मिक कहानी ‘स्नेहलता’ शीर्षक से मनोरमा पत्रिका में छपी। उमा नेहरू की इस कहानी के केंद्र में स्त्री शिक्षा से लेकर स्त्रियों को गुलाम बनाने वाली प्रथाओं को बड़ी शिद्दत के उठाया गया है। इस कहानी की नायिका स्नेहलता है। जो वैवाहिक कुरुतियों का शिकार हो गयी है। वह अपने कथन में एक जगह कहती है कि, ‘शादी हमारी बरबादी हुई।’ क्योंकि ‘जो जो असहनीय और अत्याचारी साधन हमारी शारीरिक और हार्दिक आज़ादी को मिटाने के लिए रचे गये वह एक न एक रूप में आज तक उपस्थित है।’ उमा नेहरू की यह कहानी  स्त्रियों को बेड़ियों में जकड़ने वाले रिवाज़ों और प्रथाओं को सामने रखती है।  इस कहानी की पात्र स्नेहलता एक जगह कहती है कि, “रिवाज़ क़ानून और लाठी ने मिला कर दुनियां में किसी को ऐसा नहीं दबाया, ऐसा नहीं मिटाया, जैसा हम स्त्रियों को। मज़हब आए, पहले, परन्तु हमारे लिए उन्होंने केवल इतना ही किया हमारी गुलामी की जंजीरों पर धार्मिक सोना चढ़ा दिया। अगर आत्मिक उन्नति के द्वारा कोई सूरत हमारी स्वतंत्रता प्राप्ति की हो सकती थी तो उसको भी सम्पूर्ण रीति से मिटा दिया। हमें निश्चय करा दिया कि ईश्वर ही ने हमको गुलाम पैदा किया है और वह यह चाहता है कि हम सदा गुलामी में अपना जीवन व्यतीत करें। मज़हब में यदि हमारे मुआफिक कोई बात मिली तो उसे क़ानून ने ठीक कर दिया। और अगर कानून भी पूरी सख़्ती न कर सका तो रिवाज़ ने हाथ बटाया।” उमा नेहरू की यह कहानी में स्त्री शिक्षा के  सवाल कों भी उठाती हैं। नवजागरणकालीन पुरुष स्त्री शिक्षा को बड़ी शंका से देखते थे। कुछ लोगो को कहना था कि स्त्रियाँ शिक्षा पाकर उद्दंड और विधर्मी  हो जाएगी। शिक्षा पाकर उनका रिपुबल तीव्र हो जाएगा जिससे पतिवृता धर्म स्थिर नहीं रह सकेगा। उमा नेहरू अपनी कहानी में इस विमर्श को दिशा देती दिखी कि मर्दवादियों ने स्त्रियों पर अपना नियंत्रण क़ायम रखने के लिए  स्त्रियों को शिक्षा से वंचित कर दिया। कहानी की पात्र स्नेहलता अपने कथन में कहती है- “हम शिक्षा न देकर, हमको सांसारिक अनुभवों से बिलग रखकर, हम पर यह इलज़ाम लगाया जाता है कि हम नासमझ हैं, हम निकम्मे हैं और दुनियां के महत्वपूर्ण बातों में भाग लेने के अयोग्य हैं। इतनी नहीं बल्कि हमारे मुनसिफ़ मिज़ाज मालिकों का यह कहना है कि यदि वह हमें स्वतंत्रता दे दें तो इसमें हमारी ही हानि होगी। इसलिए हमारी सारी बातों का इख़्तेयार वह स्वयं अपने हाथों में रखते हैं। समस्त स्त्री जाति गोया उन बच्चों और पागलों वा मुजरिमों की श्रेणी में शामिल कर दी गई है जिनकी देख भाल क़ानून दूसरों के सुपुर्द कर देता है। अन्तर केवल इतना है कि बच्चे बड़े होकर, पागल सेहत पाकर; और मुजरिम अपनी सज़ा भुगतकर स्वतंत्र होने का अधिकारी बन सकता है । परन्तु हमारा बचपन वह बचपन है कि उम्र जिसको रफ़ा नहीं कर सकती।”14 इस कहानी में यह घोषणा की गई है किआज भले ही मर्दवादियों का बोलबाला है पर वह समय दूर नहीं है कि जब मर्दवादी अपने इन अत्याचारों का अन्त देखेंगे।

बीसवीं सदी के शुरुआती दशकों से ही स्त्रियाँ  शिक्षा की पहलकदमी पर ज़ोर देने लगी थी। वह कविता और कहानियों के हवाले से स्त्री शिक्षा की मांग सामने रख रही थी। स्त्रियाँ अपनी कविताओं में यह बता रही थी कि उनकी शिक्षा पर ध्यान नहीं दिया जाता है। इसका नतीजा यह हुआ कि स्त्रियाँ जीवन भर अज्ञान बनी रहती है। कुमारी अम्बा देवी विदुषी अपनी कविता में स्त्री पीड़ा का बयान इस तरह किया करती हैं –

हमको न पढ़ावत हो इससे नित मूढ़ बनी मुख जोवति हैं।

घर भीतर कैद पड़ीं दुखिया अनजान बनी अब रोवति है।।

बहु, बाल विवाह न रोक सके बन के विधवातन झोकति है।

न प्रसार सुरीति सके तुम तो  “अबला अबलौ अवलोकति हैं” ।।15

नवजागरणकालीन लेखिकाएं स्त्रियों कों शिक्षा का महत्व बड़ी शिद्दत के साथ समझा रही थी। वह यह भी कह रही थी कि स्त्री शिक्षा से मुक्ति संभव है। स्त्री शिक्षा के महत्व कों रेखांकित करती श्रीमती कृष्ण कला देवी की यह कविता देखिए :

विद्या पढ़ो हे बहिनों, यदि मान चाहती हो। क्यों मूरखा कहाकर, अपमान चाहती हो ॥

विद्या से धर्म उपजे, सुख धर्म ही से होवे । विदुषी बनो जो अपना, कल्याण चाहती हो॥

हर नारि-धर्म -पुस्तक, को ध्यान से पढ़ो तुम । धर्म की जो अपने, तुम आन चाहती हो॥

विद्या में स्वयं तुमको, होना निपुण उचित है । विद्वान तुम जो अपनी सन्तान चाहती हो ॥

विद्या पढ़ो पढ़ाओं, जग में हो यश तुम्हारा । दो विद्या- दान, देना यदि दान चाहती हो ॥

उठि प्रात विद्या सागर में तुम लगाओ गोते । यदि ज्ञान जल में करना, स्नान चाहती हो ॥

विद्या के भूषणों से हो जाओ तुम अलंकृत। यदि रूप का कुछ अपने अभिमान चाहती हो॥16

 

2.

अब इस पड़ताल की ओर बड़ा जाए कि नवजागरणकालीन पुरुष लेखकों का स्त्री प्रश्न पर दृष्टि कोण क्या था ? बीसवीं सदी के दूसरे और तीसरे दशक के  हिंदी संपादक और लेखक विधवा समस्या को आपदधर्म के तौर पर देख रहे थे।  हिंदी लेखक सन 1911 की जनगणना के आकड़ों से इस निष्कर्ष पर पहुंचे थे कि ईसाई और मुसलमान उच्च श्रेणी हिन्दू विधवाओं को नरम चारा समझ कर चरे जा रहे है। इस प्रकार की शोच रखने वाले पंडित मन्नन द्विवेदी,गजपुरी बी.ए.(1885-1921) नवजागरण काल प्रसिद्ध लेखक थे। इनके कद का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि प्रेमचंद ने इनसे अपने कहानी संग्रह ‘सप्तसरोज’ की भूमिका लिखवायी थी। सन 1921 में जब पंडित मन्नन द्विवेदी का इंतकाल हुआ तो प्रेमचंद ने इन्हें याद करते हुए ‘जमाना’ में एक श्रद्धांजली लेख भी लिखा था। इस नवजागरण कालीन लेखक ने स्त्रियों और अछूतों को ईसाई और मुसलमानों के चुंगल से बचाने के लिए बकायदा ‘हमारा भीषण हृास अर्थात हिन्दुओं! सावधान!!’ शीर्षक से एक किताब लिखी। उनकी यह किताब अक्तूबर 1917 में प्रताप कार्यलय, कानपुर से प्रकाशित हुई थी। इस किताब की पहले संस्करण में दो हज़ार प्रतियां छपी थी। एक साल बाद अर्थात नवंबर 1918 में इस किताब का दूसरा संस्करण प्रकाशित हुआ। पंडित मन्नन द्विवेदी का दावा था कि हिन्दू स्त्रियों को ईसाई और मुसलमान लेकर उड़े जा रहे हैं। इस नवजागरण कालीन लेखक ने विधवा समस्या को एक अलग ही रंग देते हुए लिखा कि, “आज जहाँ देखिए, मुसलमान गुण्डे हमारी विधवाओं के घरों के पास चक्कर लगाया करते हैं, ज़नाने मिशन की औरतें अपने जाल अलग बिछाये रहती हैं, पलक झपा नहीं कि वे इन देवियों को ले उड़ती हैं। ये लोग उनको धमच्युत कर के हमारे छाती पर कोदो दलते हैं। ऐसे नज़रे एक दो बार नहीं हज़ारों बार हो चुके है। अगर हमारे में आत्माभिमान और लज्जा होती तो हम अब तक या तो कोई उपाय किये होते या कर्मनाशा नदी में जाकर डूब मरते। आज कल हम अपनी विधवाओं को खाने पहरने की जितनी अधिक सुविधा करें अच्छा है। यह कहते हुए भी विधर्मियों की नजरों से जितना अधिक उनको बचायें उतना भी और अच्छा।”17 पंडित मन्नन द्विवेदी जैसे लेखक को स्त्री समस्या से  अधिक चिंता हिन्दू गौरव को बचाने की थी।

रामरख सिंह सहगल हिन्दी नवजागरण काल सबसे चर्चित संपादकों में से एक रहे हैं। रामरख सिंह सहगल नवजागरण काल की चर्चित पत्रिका चाँद के  उद्भावक और संपादक थे। चाँद पत्रिका का पहला अंक नवंबर 1922 को चाँद कार्यलय, इलाहाबाद से निकला था। चाँद पूर्णतया महिला केन्द्रित सचित्र मासिक पत्रिका थी। इस पत्रिका की संचालिका खुद रामरख सिंह सहगल की पत्नी श्रीमती विद्यावती सहगल थी। श्रीमती विद्यावती सहगल जानेमाने वकील लाला गंगाराम शास्त्री की बेटी थी और इन्होंने कन्या महाविद्यालय,जालंधर से शिक्षा प्राप्त की थी। संपादक रामरख सिंह सहगल ने चाँद, अप्रैल 1922 का अंक विधवा समस्या पर केन्द्रित किया। संपादक रामरख सिंह सहगल ने इस अंक में जो संपादकीय लिखा; वह पहली नज़र में बड़ा प्रगतिशील लगता है। उन्होंने संपादकीय लेख में विधवा विवाह के पक्ष में दलीले जरूर दी लेकिन रामरख सिंह सहगल ने विधवा समस्या को आपदधर्म बताकर  विधवा समस्या की गंभीरता से मुँह मोड़ लिया। इस संपादक का कहना था कि हम जानते हैं कि पतिव्रत धर्म का पालन करने और पुनर्विवाह के सिद्धान्त में कोड़ी और मोहर का अन्तर है पर अपदधम्म भी कोई चीज़ है अंग्रेजी में कहावत Imergency has no law आपदधम्म की ओर इशारा कर रहे हैं जिसे स्वय योगी राज महात्मा श्रीकृष्ण जयद्रथ वध के समय काम में लाए थे। …मान लीजिए विधवाओं के पुनर्विवाह का कार्य “मुंह काला करना” पर एक ही बार तो।18  इसके बाद रामरख सहगल ने अपने संपादकीय लेख में अपने मन की बात कहते हुए लिखा कि, “आज हज़ारो स्त्रियां भगाई और बेची जा रही हैं। बढ़ते हुए व्यभिचार की और दृष्टि करने से रोमांच आता है वेश्याओं की दिनों दिन वृद्धि देखकर शरीर एक बार थर्रा उठता है। दूध पीती बच्चियों का क्रंदन सुनकर जो अपनी माताओं की गोदियों में मुँह डालकर सिसक सिसक कर रो रही हैं। भला कौन ऐसा मानव हृदय  होगा जो करुणा से परिपूर्ण न हो जायेगा और कौन  ऐसा नेत्र होगा, जिससे आंसू न निकल पड़गे?”19

नवजागरण कालीन लेखक और संपादक विधवा समस्या के समाधान की बजाए उसे संप्रादायिक रंग देने की कयावद करते नज़र आए। नवजागरण कालीन हिन्दी संपादकों ने उच्च श्रेणी हिंदुओं के भीतर इस बात का भय पैदा करने का प्रयास किया कि हिन्दू विधवाएँ विधर्मियों के घर की देहरी रोशन करने में लगी हुई है। चाँद पत्रिका सन 1926 के अक्तूबर अंक में रामरख सिंह सहगल ने ‘वैधव्य और समाज’ शीर्षक एक लंबा संपादकीय लेख  स्त्री समस्या पर लिखा। इस संपादकीय में विशेष तौर पर इस बात पर ज़ोर दिया गया कि  हिन्दू विधवा स्त्रियाँ विधर्मियों के घर का दीपक बन उजाला करने पर तुली है। रामरख सहगल ने पहले तो इस बात पर रोष प्रकट किया कि उच्च श्रेणी के हिन्दू अपनी ललनाओं की रक्षा के लिए आगे क्यों नहीं आते है? इसके पीछे इनकी दलील थी कि युवक अपनी विलासिता की चिर निद्रा में सत्यासत्य का विश्लेषण नहीं कर सकते ! उनके हृदय में अपनी माताओं और बहिनों के कल्याण तथा उनकी शारीरिक एव नैतिक रक्षा की ममता नहीं रहती! उनकी भुजायें अपनी सहोदरा एवं कुल-ललना की मर्यादा नष्ट होती देख कर भी आततायियों का समूल नष्ट कर देने अथवा इस महामङ्गल-पथ में अपने जीवन की आहुति दे देने के लिये नहीं उठतीं ! उनकी आँखें मानवी सभ्यता के इन हत्याकारी भावों का पत्नीव चित्र देख कर तिलमिला नहीं जातीं! उनके रक्त अपने पापी समाज द्वारा उपेक्षित बहुओं को विधर्मियों की काम-पिपासा तथा विलासिता का शिकार एव उनके अँधेरे गृहों को प्रकाशमान करते हुए देख कर खौल नहीं उठते !20   रामरख सिंह सहगल आगे दावा करते हैं कि विधवा स्त्रियाँ प्रलोभन में आकर विधर्मियों के घर बैठकर अपने पूर्वजों की इज्जत को धूल में मिला देती है। रामरख सिंह सहगल अपने संपादकीय लेख में लिखते हैं कि, “हमारी बहुसंख्यक युवती विधवाओं को आजीवन संयम पथ पर आरूढ़ रहने का आदेश दिया जाता है। इसके अति रिक्त उनके संयम के मार्ग में भिन्न-भिन्न प्रकार के और भी प्रलोभन रख दिये जाते हैं, जो कि उनके हृदयों में अपने स्वजन और कुटुम्बियों के प्रति घृणा, तिरस्कार और क्रान्ति के भाव भर देते हैं और जिनके कारण वे अपने गृह के कैदखाने से निकल कर या तो वेश्या-जीवन धारण करती हैं अथवा किसी विधर्मी के घर में बैठ कर अपने पूर्वजों की उज्ज्वल कीर्ति को कालिमा से पूर्ण कर देती हैं।”21  

आप  से गयी जहान  से गई !!  

                                                       स्रोत : चाँद : नवंबर 1929, वर्ष : 8, खंड : 1, संख्या  : 1  

रामरख सिंह सहगल लगातार संपादकीय लेखों के हवाले से इस बात को हवा देते रहे कि हिन्दू स्त्रियों को विधर्मी लेकर उड़े जा रहे हैं। इस संपादक की दलील थी कि विधर्मी हिन्दू स्त्रियों को अपने जाल में फंसाकर अपनी संख्या में दिन दूनी वृद्धि करने में लगे हुए है। रामरख सहगल ने चाँद अक्तूबर 1927  के संपादकीय में फिर से एक बार विधर्मियों से स्त्रियों के संरक्षण पर बल दिया। इस संपादक का दावा था कि विधर्मी हिंदुओं की दुर्बलता का लाभ उठाकर हिंदुओं का भयंकर ह्रास करने पर तुले हुए हैं। रामरख सहगल ने अपनी मंशा प्रकट करते हुए लिखा कि, “हमारी इस दुर्बलता का लाभ विधर्मी उठा रहे हैं। वे हमारे बच्चों तथा हमारी स्त्रियों का-जिन्हें हम समाज के अत्याचारों के कारण अपनी छाती पर हाथ रख बड़ी निर्दयता के साथ बहिष्कृत कर निकाल देते हैं-अत्यन्त प्रसन्नता के साथ स्वागत करते हैं । इस कारण एक ओर हमारा नित्य भयंकर ह्रास हो रहा है ; और दूसरी ओर हमारे ह्रास के कारण विधर्मियों की संख्या दिन दूनी और रात चौगुनी गति से बढ़ रही है!”22   हिंदी नवजागरण कालीन लेखक और संपादक  स्त्रियों की दुर्दशा से ज़्यादा इस बात से चिंतित दिखे कि स्त्रियों को विधर्मियों के चुंगल से कैसे बचाए जाए। रामरख सिंह सहगल का दावा था कि यदि विधवा स्त्रियों के पुनर्विवाह का इंतजाम नहीं किया गया तो वह दिन दूर नहीं हिन्दू घरों की बहू-बेटियाँ उनके मुँह पर कालिख पोत कर बपतिस्मा लेती पाईं जाएंगी।  रामरख सिंह सहगल ने अपनी चिंता प्रकट करते हुए लिखा कि, “हम इतना अवश्य कहेंगे कि अधिकांश विधवाएँ हिन्दू समाज के मस्तक को नीचा करने के लिए पर्याप्त साधन हैं; और यदि हिन्दू समाज शीघ्र ही अपनी स्थिति में परिवर्त्तन नहीं करता, तो वह दिन दूर नहीं है, जबकि हमारे घरों की अधिकांश बहू-बेटियाँ हमारे मुँह में कालिख पोत कर लाखों की संख्या में कलमा पढ़ते अथवा बपतिस्मा लेते पाई जाएँगी ! हम आराम से खाते पीते औौर मौज उड़ाते हैं, और हमारी आँखों के सामने हमारी बहू-बेटियाँ गुण्डों के द्वारा भगाई जा रही हैं ।”23  

हिंदी नवजागरण कालीन संपादक स्त्री उद्धार के नाम पर हिन्दू रक्षा की लड़ाई लड़ रहे थे। वह अपनी संपादकीय लेख के हवाले से यह बात बार-बार कह रहे थे कि विधर्मी उनकी स्त्रियों को लेकर उड़े जा रहे हैं। वह धार्मिक वर्चस्व को कायम करने के लिए मुसलमानों और इसाइयों का गुंडा की संज्ञा दे रहे थे। माधुरी हिंदी नवजागरणकाल की प्रतिनिधि पत्रिका मानी जाती है। माधुरी पत्रिका का पहला अंक अंक 30 जुलाई 1922 में लखनऊ के मुंशी नवल किशोर से प्रकाशित हुआ था। माधुरी पत्रिका हिन्दू विचारों की वाहक थी। वह खुले आम हिन्दू संगठन का समर्थन भी करती थी। अगस्त 1927 में माधुरी पत्रिका के पाँच साल पूरे हुए थे। इस अवसर पर संपादक द्वय (कृष्ण बिहारी मिश्रऔर प्रेमचंद) ने संपादकीय लिखकर माधुरी की नीतियों और उद्देश्य को स्पष्ट किया। इस अंक के संपादकीय में लिखा गया कि,“’हिंदू-धर्म और हिंदू-जाति की सेवा करन अपना अहोभाग्य समझेगी। उन सभी प्रकार के आंदोलनों से ‘माधुरी’ की सहानुभूति होगी, जिनका उद्देश्य हिंदू-धर्म और हिंदू-जाति की रक्षा करना है। स्पष्ट शब्दों में ‘माधुरी’ हिंदू-संगठन और शुद्धि के विशुद्ध और उचित रूप का निस्संकोच समर्थन करेगी। यह बात इतनी सख्त इसलिये लिख दी गई है कि कुछ लोगों में यह भ्रम फैला या फैलाया गया है कि ‘माधुरी’ हिंदू-हितरक्षा के मामले में या तो विरोधी-भाव रखती है, या उदासीन। यह बात बिलकुल मिथ्या है। माधुरी हिंदू-हित-रक्षा के उचित रूप का पूर्ण बल के साथ समर्थन करेगी।”24  माधुरी पत्रिका के सन 1925 के मई अंक में ‘हिंदुओं के प्रति मुसलमानों का व्यवहार’ शीर्षक से एक संपादकीय लेख लिखा गया। इस संपादकीय लेख में बातया गया कि मुसलमान हिंदुओं पर बड़ा अत्याचार कर हिन्दू युवतियों को जबरन मुसलमान बनाने पर तुले हुए हैं। माधुरी के संपादक ने मुसलमानों  टिप्पणी करते हुए लिखा कि, “इधर कुछ दिनों से हिंदुओं के प्रति मुसलमानों का व्यवहार साधारणतः बड़ा ही कटु हो रहा है। कोई दिन ऐसा नहीं बीतता, जिस दिन के दैनिक पत्रों में हिंदुओं के प्रति मुसलमानों के दुर्व्यवहार और अत्याचार की ख़बर पढ़ने को न मिलती हो। कम-से-कम सौ पचास स्थानों में अब तक हिंदू लुट-पिट चुके हैं, उनकी स्त्रियाँ बेइज्जत हुई हैं, उनके बच्चे जबरन् या धोका देकर मुसलमान बनाए गए हैं। सहारनपुर, हाबड़े आदि के दंगे अभी कल की घटना है। बंगाल के देहातों में अधिकतर मुसलमान गुंडे हिंदू-युवतियों को उठा ले जाकर उन पर अत्याचार करते हैं, और उनका यह क्रम लगातार जारी है। दिल्ली और पंजाब आदि में हिंदुओं पर मुसलमानों का अत्याचार सुसंगठित रूप से चल रहा है। हशन  निज़ामी की स्कीम के अनुसार मौल्वी लोगों ने काम जारी कर दिया है।”25  

माधुरी पत्रिका के संपादक लगातार संपादकीय लेख लिखकर हिन्दुओं को यह बता रहे थे कि उनकी स्त्रियाँ छीनी जा रही हैं। माधुरी के कई संपादकीय लेखों  में इसाइयों और मुसलमानों के प्रति ज़हर उगला गया। माधुरी पत्रिका 1925 के सितंबर अंक में ‘हिन्दू- संगठन क्यों आवश्यक है ?’ शीर्षक एक संपादकीय लिखा गया। इस संपादकीय लेख में इस बात का विशेष तौर पर जिक्र किया गया कि तीन उच्च श्रेणी कि हिन्दू स्त्रियाँ मिशनरियों के चुंगल में जा फंसी थी। जिन्हें हिन्दू महासभा ने बड़े परिश्रम से मिशनरियों के चुंगल से मुक्त कराया है। माधुरी पत्रिका के संपादक ने लिखा कि, “इस युग में निर्बल की खैर नहीं। उसके आदमी छिन जाते हैं, उसकी स्त्रियाँ ईसाई मिशनरियों के आश्रय में भेज दी जाती हैं, कहीं भी उसकी फ़र्याद नहीं सुनी जाती। लुटेरे धार्मिक उत्तेजना फैलाकर जब बलबा मचाते हैं, तब निर्बल ही पिटते, लुटते और मरते हैं । हमारे इस कथन के लिये प्रमाण ढूँढ़ने की ज़रूरत नहीं है। गत 10-12 महीनों के इतिहास में इन सब आपत्तियों की कई बार कई जगह पुनरावृत्ति हो चुकी है। अभी हाल में, कलकत्ते में, तीन ब्राह्मणियाँ पुलीस की खैरवाही से मिशनरियों के फंदे में जा फँसी थीं। अंत को हिंदू-सभा के उद्योग से उनका छुटकारा हुआ।”26  माधुरी पत्रिका के संपादक यहीं तक नहीं रुके वह आगे भी विधर्मियों से हिन्दू अबलाओं को बचाने पर ज़ोर देते रहे।  

हिंदी नवजागरणकालीन बड़े-बड़े लेखकों ने इस बात का दावा किया कि उनकी स्त्रियाँ उनके हाथ से निकाल कर विधर्मी बनती जा रही हैं। पंडित अयोध्या सिंह जी उपाध्याय हिंदी नवजागरण काल के बड़ी कवि माने जाते हैं। इन्होंने विधवा समस्या को लेकर एक ‘अपने दुखड़े’ शीर्षक से एक  कविता लिखी थी। उनकी यह कविता चाँद पत्रिका अप्रैल 1923 के अंक में प्रकाशित हुयी थी। इस कविता में कवि अयोध्या सिंह उपाध्याय ने विधवाओं की दुर्दशा पर चिंता प्रकट करने के बजाए इस बात पर चिंता प्रकट की कि स्त्रियाँ इसाइयों की गोद में बैठकर उच्च श्रेणी के मर्दों  की मूछों को नीचा दिखाकर उनकी संख्या में वृद्धि कर रही हैं। पंडित अयोध्या सिंह जी उपाध्याय अपनी बहू-बेटियों को लेकर कैसी राय रखते थे। इस कविता  में  महसूस कीजिए :

दिन ब दिन बेवा हमारी हीन बन। दूसरों के हाथ में हैं पड़ रहीं ||

जन रही है आँख का तारा वहीं । जो हमारी आँख में हैं गड़ रहीं ॥

लाज जब रख सके न बेवो की । तब भला किस तरह लजायें वे ॥

घर बसे किस तरह हमारा तब । जब कि घर और का बासायें वे ॥

गोद में ईसाइयत इसलाम की । बेटियां बहुये लिटा कर हम लटे ॥

आह ! घाटा पर हमें घाटा हुआ । मान बेवों जा घटा कर हम घटे ॥

है अगर बेवा निकलने लग गई । पड़ गया तो बढ़तियों का काल भी ॥

आबरू जैसा रतन जाता रहा । खो गये कितने निराले लाल भी ॥27 

                                                                                 

औपनिवेशिक दौर के बीसवीं सदी के दूसरे और तीसरे दशक में हिन्दी नवजागरण कालीन संपादकों ने स्त्रियों से संबंधित एक नया सगुफ़ा छोड़ दिया। हिन्दी लेखकों और संपादकों का कहना था कि उच्च श्रेणी की स्त्रियाँ तैतीस करोड़ देवी देताओं को छोड़कर पीर-मज़ारों और कब्रों की पूजा करने में लगी हैं। चाँद,माधरी, सरस्वती आदि पत्रिकाओं में व्यंग चित्र और कविताओं में यह दर्शाया गया कि उच्च श्रेणी की हिन्दू स्त्रियाँ हिन्दू देवी देवताओं को छोडकर पीर-मज़ारों की पूजा करने पर तुली हुई हैं। चाँद दिसंबर 1925 के अंक में श्री शोभाराम धनुसेवक की एक पीर-पूजा शीर्षक से लंबी कविता छ्पी। इस कविता में इस बात का भय व्यक्त किया गया कि उच्च श्रेणी कि हिन्दू स्त्रियाँ  पीर-पूजा कर हिन्दू गौरव को मिट्टी में मिला रही हैं। बड़ी मेजे की बात यह है कि यह कविता स्त्रियों की प्रतिनिधि चाँद पत्रिका में छ्पी थी। श्री शोभाराम धनुसेवक की यह कविता हिन्दी नवजागरण कालीन लेखकों और संपादकों की मानसिकता को सामने रखती है :

देवियो ! तुम जड़ता वश , पीरों की पूजा करती !  पीरों फूल चढ़ातीं, दरगाहों पर, जा करके मस्तक धरती !!

दीजै मुझको पुत्र चाँझपन- से करिये मेरा उद्धार ! तुम्हें चढ़ाऊँगी मैं सिरनी, पूजो आशा पार मदार !!

कभी भटकती जा कब्रों पर, कभी ताज़ियों से मिन्नत ! कहती पूर्ण मुरादें करिये, बखशो जीवन में जिन्नत !!

कभी खोजती हो ख्वाजा को, कभी औलिया आला को ! शा साहब ! मंजूर कराओ, अरज़ी अल्ला ताला को !!

कभी अपरिचित दरवेशों से , बनवाती गंडे ताबीज़! बात लम्बी चौड़ी सुन कर , जाती उन पर शीघ्र पसीज !!

चकमों में या रंगे- सियारों के सहसा उन पर विश्वास ! कर लेती हो , फिर रोती हो , जब हो जाता सर्वस नाश !!

कभी फक़ीरों के फेरों में, कानों को फुंकवाती हो ! हाफिज मुल्लाओं से बच्चों के मुख पर थुकवाती हो !!

हितू समझती जिन्हें, वही हित हरने को तैय्यार खड़े ! अवसर पाकर सर्वनाश तक करने को तैय्यार खड़े !!

होता है संताप तुम्हारी, नासमझी पर बहिनों आज ! चरण- दलित होकर रोता है, तुम से हिन्दू-धर्म-समाज !!

वारि नहीं, वह मृग- तृष्णा है, जिसे देख कर भूली हो ! मणी गँवा कर तुच्छ काँच पर, बेसमझी से फूली हो !!

सन्तति सीता सावित्री की- हो, निज गौरव याद करो ! तज निज धर्म विधर्म ग्रहण कर, मत जीवन बरबाद करो !!

पति सेवा से सावित्री ने, यम पर भी जय पाई थी ! नत -मस्तक हो अखिल विश्व ने, जिस की महिमा गाई थी !!

सती शिरोमणि सीता को पा भारत जग में धन्य हुआ ! तुम्हीं बताओ आर्य धर्म सा, पूर्ण धर्म क्या अन्य हुआ ?

पति की सेवा से ना पालो , ऐसी कौन, असंभव चोज़ ?  स्वर्ग, मोक्ष तक तुम्हें सुलभ है, फिर क्या हैं गंडे ताबीज़ !!

बहिनों ! आज तुम्हारे कारण,शीश हमारा नीचा है ! क्यों जड़ता वश कल्प- वेल पर, विषम हलाहल सींचा है ?

नारी का सर्वस्व पतिव्रत, उससे होकर रीती तुम ! प्राप्त भवन का सुधा त्याग क्यों, गरल पराया पीती तुम ?

सोचा भी है बहिनों तुमने, क्या इसका परिणाम हुआ ! आर्य -धर्म पीरों को पूजा से कितना बदनाम हुआ ?

जगत्पूज्य थीं वही आज अब पीर पूजने जाती है ! मरुस्थल में कल-कंठ स्वर्ग की, हाय कूजने जाती है !

हुई !! राहु चन्द्रवत लक्ष्यों बहिनें, बेधर्मिन के ग्रास हुई । पतन वहाँ अनिवार्य जहाँ पर , धर्म भावना-ह्रास हुयी!!

चेतो अब भी आर्य देविया, पतित प्रथा से मुँह मोड़ो ! पूजा करो पती- देवाँ की, पीरों की पूजा छोड़ो !!

कहते हैं सत शास्त्र नारि के, लिये दूसरा देव नहीं !पतिव्रता के लिये पति  बिनु जग में कोई सेव नहीं !!

सतियो ! उसो सत्य आभूषण, से उर को सन्जित करिये !तज जीवन  सर्वस्व पूजकर- असत न कुल लज्जित करिये !!

आर्य देवियो जिस दिन तुम में, यही सत्य संचित होगा ! ऐसा कौन सुफल फिर जिससे, शुद्धि जीवन वंचित होगा ?

देखेंगा संसार चकित हो, अभिलाषाएँ पल भर में ! तुम पूजोगी, फिरना होगा- नहीं तुम्हें फिर दर दर में !!

देकर द्रव्य चरण में जिनके, पावन शीश झुकाती हो ! वक काकों को हंस समझ कर , जड़तावश पतयाती हो !!

तुम देखोगो वही तुम्हारे, पद में शीश झुकावेंगे !  जननी कह पद – धूलि शीश घर, जीवन सफल बनावेंगे !!

भारत ही क्यों धन्य धन्य फिर- तुम से जगतीतल होगा ! सतियो सत उत्कर्ष तुम्हारा, पुरुष वर्ग का बल होगा !!

आशा है इस सत्य- निवेदन, पर बहिनों तुम दोगी ध्यान ! भ्रान्त धारणाएँ छोड़ोगी, दिखला कर आदर्श महान !!

यदि श्रद्धा है सुर-पूजन में, तो निज देवों की अर्चा ! करिये पर हिन्दू रमणी में, उचित न पीरों की चर्चा !!

तैतिस कोटि तुम्हारे सुर है, उन्हें छोड़ कर पर की आश !  करना भारी भूल न होगी, मृग-तृष्णा से शान्त पिपास !!28

हिन्दी नवजागरण कालीन पत्रिकाओं  में व्यंग्य चित्र खूब छपते थे। यह व्यंग्य चित्र सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था पर कटाक्ष करते थे। बड़ी दिलचस्प  बात यह  चाँद, माधुरी, मनोरमा, सरस्वती आदि  पत्रिकाओं ने ईसाई और मुसलमानों के खिलाफ खूब व्यंग्य चित्र छापे । चाँद पत्रिका में कई ऐसे कार्टून छपे जिसमें में  दखाया गया कि हिन्दू स्त्रियाँ तैतीस करोड़  देवी-देवताओं  को छोड़कर पीर-पूजा करने जाती है।  बड़े मज़े की बात यह कि एक  व्यंग्य  चित्र में यह दिखाया गया कि मौलवी हिन्दू स्त्रियों पर कुदृष्टि रखते हैं। चाँद पत्रिका में छापा यह व्यंग्य चित्र देखिए :

                                                                                

                                                             पीर-पूजन  

 

                                                स्रोत : चाँद : नवंबर 1929, वर्ष : 8, खंड : 1, संख्या  : 1  

 

दूसरी तरफ हिन्दी नवजागरन कालीन पत्रिकाओं ऐसे भी व्यंग्य चित्र देखने को मिले जिनमें यह दिखाया गयाकि मुसलमान मनिहार उच्च श्रेणी की स्त्रियों को चूड़ी पहनने के बहाने उनके घरों में सुरंग लगाने पर आमादा है। माधुरी पत्रिका में एक ऐसा व्यंग्य चित्र छपा जिसमें दीखया गया कि मुसलमान चूड़ीहार हिन्दू स्त्रियों को अपने जाल में फंसा कर उनको विधर्मी बना डालते है। यह व्यंग्य चित्र देखिए :

 

                                            हिन्दू घरों में तबलीग का प्रोपोगैंडा

 

 

                           स्रोत : माधुरी अक्तूबर 1927, वर्ष :6  खंड :1  संख्या : 3 पृ.697  

चाँद पत्रिका ने भी  हिन्दू समाज के भीतर यह हवा खूब उड़ाई कि मियाँ चूड़िहारों से  हिंदुओं को सावधान रहने की जरूरत है। यह मियां चूड़िहार हिन्दू  स्त्रियों  को बहला कर अपने कब्जे में कर लेते हैं।  चाँद पत्रिका  में मियाँ चूड़िहार पर छपा यह व्यंग्य चित्र देखिए  :

 

 

स्रोत : चाँद : नवंबर 1929, वर्ष : 8, खंड : 1, संख्या  : 1  

बीसवीं सदी के तीसरे दशक में हिन्दी संपादक स्त्री-रक्षा  पर जोर देते दिखायी दिए। ऐसे संपादकों का कहना था कि विधर्मियों से स्त्रियों की रक्षा करना जरूरी है। माधुरी पत्रिका अगस्त 1927 के अंक में ‘स्त्री- रक्षा’ शीर्षक से एक लंबा संपादकीय लिखा गया। इस संपादकीय लेख में पहले तो स्त्रियाँ  के प्रति दया दृष्टि दिखाते हुये इस बात का स्मरण कराया गया कि स्त्रियाँ भी आदर की पात्र है। इसके बाद संपादकीय में कहा गया कि  स्त्रियों की रक्षा का  भार पुरुषों ने अपने ऊपर ले रखा क्योंकि ईश्वर ने पुरुषों को शक्तिशाली बनाया है। माधुरी के संपादक का अभिमत था कि हिन्दू समाज न तो अपनी स्त्रियों का आदर करता है न तो उनकी रक्षा का कोई उचित प्रबंध करता है। यह बड़े ही परिताप की बात है। माधुरी के संपादक ने दावा किया हिन्दू जाति के लोग  इतने कायर हो चुके हैं कि वह स्त्रियों की रक्षा विधर्मियों से नहीं कर प रहे है। माधुरी के संपकीय लेख में कहा गया कि, “वर्तमान हिंदू -समाज में न तो स्त्रियों का आदर है। और न उनकी रक्षा का प्रबंध है। यह बढ़े ही परिताप की बात है। पर यह परिताप सहस्र-गुना अधिक हो जाता है, जब हम देखते हैं कि मुसलमान गुंडे हिंदू स्त्रियों को नाना प्रकार से चरित्र भ्रष्ट करते हैं ; परंतु फिर भी हिंदू -समाज पर्याप्त परिमाण में संक्षुब्ध नहीं होता। जो जाति मरने पर होती है, जिसमें कायरता का प्राधान्य हो जाता है, वही जाति ऐसे अपमान सहन करने में समर्थ होती है । एक जीत-जागती जाति तो ऐसे दुराचरण को एक क्षण के लिये भी सहन नहीं कर सकती। समाचार पत्रों में नित्य ही यह समाचार पढ़ने को मिलता कि मुसलमान गुंडों ने हिंदू स्त्रियों का अपमान किया पर हिंदू लोग सिवाय इसके कि अपनी त्रियों से और भी अधिक परदा करा-उनको घर के बाहर और भी पैर न रखने में इसके सिवाय और कोई दूसरा प्रतीकार नहीं ढुड़ते हैं।”29  माधुरी के संपादक ने अपने संपादकीय लेख में  स्त्रियों के मसले पर कहा कि धार्मिक गुंडों को सबक सीखने के लिए  कठोरतम दंड का प्रावधान सरकार की ओर से निश्चय किया जाए। माधुरी के संपादक ने अपनी मांग रखते हुए लिखा कि, “यदि मुसलमान गुंडों का एक संगठित दल हो, जिनका काम केवल हिंदू स्त्रियों को ही छेड़ने का हो, जो प्रत्येक दशा में हिंदू स्त्रियों की इज्जत उतारने पर तुले हुये है, जिनमें यह भाव भरे गये हो कि हिंदू स्त्रियों का सतीत्व भंग करने से सवाब होता है तो ऐसे गुंडों की सजा हमारी राय में प्रचलित दंढ-विधान से नहीं हो सकती । ऐसे गुंडों को तो इतना कठोर दंड मिलना चाहिये कि एक बार सज़ा पा चुकने के बाद फिर उन्हें दोबारा गुंडई करने का साहस ही न हो । हमारा हिंदू समाज से यह नत्र निवेदन है कि ऐसे संगठित और ‘धार्मिक’ गुंडों को उचित पाठ पढ़ाने के लिये उन्हें सरकारी कानून को कठोरतम कराना होगा। यदि हिन्दू लोगअपनी स्त्रियों का सम्मान करना चाहते हैं, उनकी उचित रक्षा करना चाहते हैं, तो उन्हें अविलंब ऐसा कानून बन वाना चाहिये कि यदि ‘धार्मिक’ कारणों से प्रवृत्त होकर कोई गुंडई करता हो, तो उसको साधारण गुंडे से तीन चार गुना अधिक दंड दियाजाय।”30  

अब हम इस लेख की समाप्ति की ओर बढ़ रहे हैं। निष्कर्ष में पाते है कि  बीसवीं सदी के दूसरे और तीसरे दशक की स्त्रियाँ अपने अधिकारों के प्रति सचेत दिखायी देती हैं। वह अपने लेखन में विधवा पुनर्विवाह, बाल विवाह और व्यभिचार जैसे ज्लंत मुद्दे को सामने रख रही थी। बीसवीं सदी के दूसरे दौर की स्त्रियाँ अपने सार्वजनिक और व्यक्तिगत जीवन में बदलाव के लिए मर्दवादी मानसिकता  के खिलाफ संघर्ष कर रही थी। इस पितृसत्तावादी समाज में स्त्रियाँ अपनी शिक्षा की दावेदारी का भी सवाल उठा रही थी। स्त्रियों की ओर से यह दावेदारी उस दौर में होती जब स्त्री बौद्धिकता पर मर्दवादियों का पहरा लगा हुआ था। आज के सौ साल पहले पितृसत्तावादी निर्मितियों के खिलाफ ज़मीन तैयार करना कोई छोटी बात नहीं थी। देखा जाए तो बीसवीं सदी के दूसरे और तीसर दशक के हिंदी संपादक स्त्री समस्या को आपदधर्म के तौर पर देख रहे थे। नवजागरण कालीन संपादकों और लेखकों की स्त्री-उद्धार की परियोजना हिन्दू धर्म की रक्षा करने पर टिकी थी। इसका नतीजा यह हुआ कि स्त्रियों की दावेदारी का मसला अलग-थलग पड़ गया। हिंदी संपादक और लेखक स्त्री परियोजना के बहाने धार्मिक वर्चस्व की लड़ाई लड़ रहे थे। नवजागरण कालीन स्त्री-उद्धार आंदोलन में यह भी देखा गया कि हिंदी लेखक और संपादकों द्वारा बीसवीं सदी के दूसरे-तीसरे दशक में स्त्रियों को ढाल बनाकर इसाईयों और मुसलमानों के खिलाफ जबर्दस्त मोर्चेबंदी की पहलकदमी को अंजाम दिया। यहाँ तक हिन्दी नवजागरण कालीन संपादकों ने चूड़ी बेचने वाले मुसलमान मनिहारों को निशाना बनाकर उन्हें हिन्दू घरों में तबलीग फैलाने वाला बता दिया। यह सवाल लाज़मी है कि हिंदी नवजागरण कालीन संपादकों के लिए स्त्री मुक्ति से ज्यादा उनके लिए हिन्दू रक्षा का विषय प्रमुख मुद्दा बन गया था।

 

 

संदर्भ

 

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  • एक प्रतिष्ठित महिला का पत्र,चाँद अप्रैल 1923,  वर्ष : 1 खंड  : 1 संख्या : 6, पृ. 496
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  • एक शिक्षाप्रद कहानी,चाँद, अप्रैल 1930, पृ.102
  • अबलाओं पर अत्याचार,श्रीमती मनोरमा देवी,काशी,मनोरमा, सितंबर 1929, वर्ष : 6, संख्या : 6, भाग : 1, पृ. 607
  • भारतीय महिलाएं और आभूषण,श्रीमती कौशल्या देवी, श्रीवास्तवव्य  ‘शांति’, मनोरमा जनवरी 1929, वर्ष : 5, भाग: 2 संख्या : 4 , पृ.368
  • वही,पृ. 370
  • मानव जाति में स्त्री समाज,श्रीमती भाग्यवती विमला देवीजी, मनोरमा जनवरी 1929, वर्ष : 5, भाग: 2 संख्या : 4 , पृ.372
  • स्नेहलता,श्रीमती उमा नेहरू, मनोरमा  अगस्त 1927,वर्ष : 4, भाग: 1, संख्या : 5, पृ. 495-96
  • समस्या पूर्ति,कुमारी अम्बा देवी विदुषी विशारद,महिला जनवरी 1925, भाग: 2 , संख्या : 1, पृ. 1
  • विद्या, श्रीमती कृष्णा कला देवी, प्रयाग, महिला जनवरी 1927, भाग:  4, अंक : 2, पृ.16
  • हमारा भीषण हृास अर्थात हिन्दुओं! सावधान!!, पंडित मन्नन द्विवेदी,गजपुरी बी.ए  प्रताप कार्यलय, कानपुर, 1918, पृ. 32
  • विधवा विवाह,संपादकीय, चाँद, अप्रैल 1923, वर्ष : 1 खंड  : 1 संख्या : 6, पृ. 558
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  • वैधव्य और समाज,संपादकीय, चाँद, अक्तूबर 1926, वर्ष : 4  खंड  : 2  संख्या : 6, पृ. 546-47
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  • संरक्षण की आवश्यकता,संपादकीय विचार, चाँद,अगस्त 1927, वर्ष : 5,  खंड  : 2,  संख्या : 5, पृ. 419
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  • नवीन वर्ष,संपादकीय विचार, माधुरी, अगस्त 1927, वर्ष : 6, खंड : 1 , संख्या  : 1, पृ. 193
  • हिंदुओं के प्रति मुसलमानों का व्यवहार,विविध विषय,संपादकीय, माधुरी,मई 1924, वर्ष : 2,  खंड  : 2,  संख्या : 4
  • हिन्दू-संगठन क्यों आवश्यक ? विविध विषय,संपादकीय,माधुरी, सितंबर 1924, वर्ष : 2,  खंड  : 1 ,  संख्या : 6 , पृ. 815
  • अपने दुखड़ें,ले. कविवर पं. अयोध्या सिंह जी उपाध्याय, चाँद अप्रैल 1923,  वर्ष : 1 खंड  : 1 संख्या : 6, पृ. 493
  • पीर-पूजा,श्रीशोभरामजी धनुसेवक , चाँद,दिसंबर 1925, वर्ष : 4  खंड  : 1 संख्या : 2 , पृ. 195-96
  • स्त्री- रक्षा,संपादकीय, माधुर, अगस्त 1927, वर्ष : 6,  खंड  : 1 ,  संख्या :2  , पृ. 345
  • स्त्री- रक्षा, संपादकीय, माधुर, अगस्त 1927, वर्ष : 6,  खंड  : 1 ,  संख्या :2  , पृ. 346

लेखक का परिचय – नवजागरणकालीन  साहित्य के अध्येता और शोधार्थी

 

नागरिकता, समता और अधिकार के संघर्ष अभी जारी हैं

आधुनिक भारत के  निर्माण में  आज़ादी से पहले  और आजादी के बाद के तमाम जनांदोलनों की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका रही है और इन आंदोलनों में  महिलाओं  की  भागीदारी  और ज्यादा  महत्वपूर्ण  है। साथ ही आजादी की लड़ाई जितना पुरुषों ने लड़ी उतनी ही महिलाओं ने भी 1857 में ये सिलसिला अगर  रानी   लक्ष्मीबाई , बेग़म हज़रत महल, झलकारी बाई, ऊदा देवी, अज़ीज़न बाई, अवंतिबाई लोधी और धार की रानी द्रौपदी से शुरू होता है तो ऐसे अनेकों गुमनाम नामों से भी जिन्हें इतिहास में दर्ज़ नहीं किया गया। दर्जनों स्त्रियों ने आज़ादी के जंग में अपनी कुर्बानी दी अंग्रेजों के द्वारा उन्हें फांसी चढ़ाया गया और जिन्दा जलाया गया।  एक गुमनाम इतिहास उस दौर की तवायफों का भी है जिन्होंने अपनी दौलत और अपनी जान सब इस देश और यहाँ के लोगों के लिए कुर्बान कर दिया, रुडयार्ड किपलिंग ने अपनी पुस्तक  “ऑन द सिटी वॉल ” में  1857 के विद्रोह में वेश्यालयों की सक्रिय भागीदारी और तवायफों के निजी योगदान पर विस्तार से लिखा है।  इसके अलावा “1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की पत्रकारिता” किताब में शोभना देवी, इंद्र कौर, आशा देवी, भगवती देवी त्यागी, रहीमी, जमीला ख़ान, मन कौर, बख्तावरी देवी और उम्दा जैसी आम ग्रामीण विद्रोहिणियों के नाम हैं जिन्होंने केवल अपने पतियों और बेटों को ही विद्रोह की जंग में जाने प्रेरित नहीं किया बल्कि खुद भी आगे बढ़कर सक्रिय योगदान दिया।

जबकि आजादी के आंदोलन में भी महिलाओं की बहुत अहम् भागीदारी रही, इससे पहले सावित्री बाई फुले और फातिमा शेख, पंडिता रमाबाई  जैसी महिलाओं का भी है जिन्होंने मध्ययुगीन प्रथाओं और परम्पराओं को चुनौती देते हुए जाती और लिंग से इतर इस देश में महिलाओं के लिए आधुनिक  शिक्षा की शुरुआत  की, विधवाओं के पुनर्वास पर काम किया। 1947 आजादी के आंदोलन में भी हजारों आम भारतीय स्त्री समेत कस्तूरबा,प्रभावती, मैडम बीकाजी कामा,अरुणा   आसफ अली, विजयलक्ष्मी पंडित, इंदिरा गांधी, सरोजिनी नायडू,सुचेता कृपलानी  जैसी तमाम महिला नेताओं ने सक्रिय योगदान दिया।

इस साल 15 अगस्त को  भारत को आजाद हुए 75 साल हो जाएंगे, इन पचहत्तर सालों में इस देश ने दुनिया को दूसरी महिला प्रधानमंत्री दिया, महिलाओं ने संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकारों के साथ अपने अथक संघर्ष से राजनीतिक, सामाजिक स्तर पर और भी बहुत से अधिकार हासिल किया। हर क्षेत्र में महिलाओं ने अपनी उपस्थिति दर्ज़ कराई। राजनीति में  सुचेता कृपलानी,  विजयलक्ष्मी  पंडित ,  इंदिरा  गांधी, नंदिनी   सत्पथी ,  मोहसिना   किदवई , सोनिया गांधी,  सुषमा   स्वराज ,  मायावती ,  शीला   दीक्षित ,  ममता   बनर्जी  जैसे नामों का सिलसिला है तो जनपक्षधर समाजिक सरोकारों के लिए लगातार संघर्ष करने वाली मेधा पाटेकर, सोनी सोरी, इरोम शर्मीला, अरुणा रॉय, सुधा भारद्वाज और तीस्ता सीतलवाड़ जैसे नाम हैं, जो तमाम जनपक्षधर मसलों के लिए अभी भी संघर्षरत हैं, इनमें से कुछ पहले से जेल में बंद हैं तो तीस्ता सीतलवाड़ जैसी सामाजिक कार्यकर्त्ता पिछले हफ्ते ही गिरफ्तार कर ली गई हैं।

75 साल के भारत में संविधान के आर्टिकल 243डी के क्लॉज़ (3) के तहत पंचायती राज संस्थाओं में महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित की गई है। इसके मुताबिक प्रत्येक पंचायत में प्रत्यक्ष निर्वाचन द्वारा भरे जाने वाले स्थानों की कुल संख्या के कम से कम एक-तिहाई स्थान (जिनके अंतर्गत अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों की स्त्रियों के लिए आरक्षित स्थानों की संख्या भी है) स्त्रियों के लिए आरक्षित रहेंगे और ऐसे  स्थान किसी पंचायत में भिन्न-भिन्न निर्वाचन-क्षेत्रों को चक्रानुक्रम  से आबंटित किए  जा सकेंगे । इस प्रावधान के कारण ग्रामीण स्तर पर भी  राजनीति  में  महिला  भागीदारी   का   संख्यात्मक   प्रतिनिधित्व   बढ़ा  है।महिलाओं  को  नया   आत्मविश्वास  मिला है, उनमें राजनीतिक चेतना का विस्तार हुआ है और समाजिक जारूकता बढ़ी है।  हालाँकि ये और बात है कि संसद और विधानसभाओं  में   महिला  आरक्षण का मामला 1998  से   लंबित   है।  एक और बात का जिक्र महत्वपूर्ण है और वो ये कि नब्बे के दौर के भूमंडलीकरण ने महिलाओं को साठ -सत्तर के दशक के मुकाबले में ज्यादा पब्लिक स्पेस मुहैया कराया, शिक्षा और जागरूकता के साथ उनकी मौजूदगी तमाम सार्वजानिक स्पेस में  बढ़ी इसलिए  उन्हें  अपने मसलों के लिए एकजुट होना,लड़ना और खड़ा होना भी पहले से बेहतर आया है।

बहरहाल, इस भूमिका का उद्देश्य आगे लेख की उस मूल बात के सन्दर्भ में बतौर पृष्ठभूमि है, पिछले कुछ दशकों में हमने लगातार महिलाओं को जनांदोलनों में ना सिर्फ सक्रिय भागदारी करते देखा बल्कि कई आंदोलनों को उन्होंने ही खड़ा किया, उनका नेतृत्व किया और अधिकार हासिल किया। पिछली सदी में आजादी के आंदोलन से अलग महिलाओं  के ये आंदोलन अगर सती प्रथा, बाल-विवाह रोकने, विधवा पुनर्विवाह, दलित महिलाओं के बराबरी के अधिकार आदि मसलों से संबधित थे तो  सत्तर के दशक में पेड़ों को बचाने के लिए मौजूदा उत्तराखंड तत्कालीन उत्तर प्रदेश में महिलाओं ने ही “चिपको आंदोलन ” खड़ा किया था। ताड़ी और शराब के खिलाफ भी महिलाओं ने आंदोलन किये। बांध विरोधी आंदोलन, विस्थापन के खिलाफ आंदोलन के साथ जल -जंगल -जमीन के सवालों से जुड़े तमाम आन्दोलनों के पीछे महिलाओं की ही अहम् भूमिका रही है। नर्मदा बचाओ आंदोलन महिलाओं के द्वारा संचालित आंदोलन रहा है। आंध्रप्रदेश में शराब के विरोध में महिलाओं ने बहुत प्रभावी अर्क -विरोधी आंदोलन किया और उत्तर पूर्व में एएफएसपीए -विरोध का आंदोलन कैसे  भुला जा सकता है जिसे इरोम शर्मिला और मणिपुर की माताओं बहनों ने लड़ा। हाल ही में कृषि बिल को वापस लेने के लिए एक साल से भी ज्यादा चले किसान आंदोलन की ही बात करें तो उसमें महिलाओं की समानांतर भूमिका रही लेकिन बड़े स्तर पर किसान आंदोलन पुरुष किसानों का आंदोलन था, वही उस आंदोलन का चेहरा थे, महिलाएं पूरक अवश्य थीं।

दरअसल, महिलाओं पर घरेलू हिंसा से लेकर, वर्कप्लेस पर सेक्सुअल हैरेसमेंट और बलात्कार के विरोध में प्रभावी कानून को लेकर महिलाओं ने पिछले दो दशक में ही कई महत्वपूर्ण आंदोलन किये हैं और बदलाव को प्रेरित किया है बलात्कार और यौन हिंसा के सन्दर्भ में “निर्भया कानून ” ऐसे ही आंदोलन का हासिल है। बहरहाल,  हम इस लेख में खासतौर पर नागरिकता कानून के खिलाफ महिलाओं के द्वारा हाल ही में किये गए आंदोलन और  केरल में सबरीमला मंदिर में रजस्वला आयु की महिलाओं के प्रवेश के सन्दर्भ में महिलाओं की भागीदारी और भूमिका के बारे में बात करेंगे।

शुरुआत  नागरिकता (संशोधन) कानून के विरोध में शाहीन बाग में हुए आंदोलन से , जिसे लोकतंत्र की एक नई करवट के रूप में भी देखा गया। एक अनजान ,गुमनाम से इलाके में 101 दिन तक चला यह विरोध प्रदर्शन हालांकि कोरोना वायरस और उसके बाद लागू राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन के कारण मुकम्मल परिणति से पहले ख़त्म हो गया लेकिन ख़त्म होने से पहले भारतीय लोकतंत्र के सन्दर्भ में महिलाओं और खासतौर पर मुस्लिम महिलाओं की राजनीतिक समझ, उनके साहस और संकल्प की ताकत का अनुभव पुरे देश को करा दिया, शाहीन बाग़ एक राष्ट्रीय परिघटना के तौर पर दर्ज़ हुआ।  इसका असर इतना व्यापक हुआ कि 15 दिसंबर 2019 से 24 मार्च 2020 तक 101 दिन चले  इस विरोध प्रदर्शन के दौरान देश के कई राज्यों में 80 से ज्यादा जगहों पर नागरिकता (संशोधन) कानून का विरोध शाहीन बाग़ की तर्ज़ पर शुरू हुआ, हर शहर में नागरिकता (संशोधन) कानून के विरोध प्रदर्शन की जगह को उस शहर का “शाहीन बाग़ ” कहा गया।  यह अपनेआप में इतिहास दर्ज़ होने वाली बात है जब विरोध का कोई स्थान ही पुरे देश में उस ख़ास मसले पर विरोध का प्रतीक बन जाता हो। हमने देश के तमाम शहरों में “शाहीन बाग़” देखा जो दक्षिण -पूर्वी दिल्ली के जामिया नगर में बसे शाहीन बाग़ का विस्तार बनता  चला गया। दिल्ली के जीडी बिड़ला रोड, शाहीन बाग़ ,कालिंदी कुंज इलाके का 40 फुट का रोड दिल्ली के जंतर -मंतर और रामलीला ग्राउंड से अलग सत्ता के विरोध में खड़े होने का पर्याय बन गया, इसी दिल्ली में नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में तुर्कमान गेट, खुरेजी और हौजरानी समेत कुल 66 विरोध प्रदर्शन हुए और ये सब दिल्ली के अलग अलग शाहीन बाग़ थे। गौरतलब है कि इसी दौरान गृह मंत्रालय (एमएचए) के द्वारा लोकसभा में एक लिखित जवाब में बताया गया था  कि नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) के खिलाफ दिल्ली में 66 विरोध प्रदर्शन हुए। इस दौरान कुल 11 मामले दर्ज किए गए हैं और 99 लोगों को गिरफ्तार किया गया।

बहरहाल, शाहीन बाग़ पर जारी विरोध -प्रदर्शन को ख़त्म हुए 2 साल से ज्यादा का समय हो गया है लेकिन अब भी इसकी ताब बाकी है इस आंदोलन पर देश दुनिया में तमाम लेख लिए गए।  कुछ किताबें तक आ गई , आखिर क्यों नागरिकता कानून के विरोध का  शाहीन बाग की महिलाओं का आंदोलन अब तक के बाकी आंदोलनों से अलग है, या  क्यों इसे बहुत गंभीरता से देखे, समझे और विश्लेषित किये जाने की जरूरत है? सबसे पहली बात तो ये कि जब बहुसंख्य समाज इस कानून से सहमति नहीं होने के बावजूद इसे लेकर अपनी प्रतिक्रिया के सन्दर्भ में बहुत गंभीर और जिम्मेदार नहीं दिख रहा था तब शाहीन बाग़ की आम घरेलु महिलाओं ने जो प्रायः पर्दे में, घरों में अपने घर-गृहस्थी के कार्यों में व्यस्त रहती थीं, बगैर डरे हुए इस कानून के खिलाफ बोलना और प्रतिरोध करना अपनी जिम्मेदारी और कर्तव्य समझा। जबकि  ये औरतें ना तो कोई एक्टिविस्ट थीं  ना ही किसी पार्टी की नेता कार्यकर्त्ता ना ही कॉलेज विश्वविद्यालय में पढ़ाने वाली प्रोफेसर। और हाँ ये औरतें अपने घर का काम करके इस प्रदर्शन में शामिल होने आ रही थीं।

वो भी तब जबकि दिसंबर के आखिर के दिन दिल्ली के सबसे सर्द दिनों में से होते है ,उस कड़ाके की ठंड में भी शाहीनबाग में पूरे जोश के साथ आंदोलन जारी रहा। आंदोलन में युवा  लड़कियां और छात्राएं भी थीं तो उनकी माएं भी,गोद में  बच्चे को लेकर आने वाली महिलायें भी थीं सबसे अनोखी बात बड़ी -बुजुर्ग महिलाओं का इसमें शामिल होना उनकी भूमिका रही, 90-100  साल से ऊपर की उम्र ही वृद्धाएं भी यहाँ 101 दिन बैठनेवालों में से थीं।  सभी का लक्ष्य एक था कि सरकार को इस बिल को वापस लेने पर मजबूर करना। ये अपने आप में बहुत खूबसूरत बात थी कि यहाँ हर उम्र की महिलाएं एक साथ नागरिकता कानून के विरोध में मज़बूत तेवर के साथ खड़ी थीं। दूसरी सबसे ज्यादा गौर करने वाली बात इस आंदोलन  में किसी राजनीतिक पार्टी का सहयोग या संलिप्तता का नहीं होना कह सकते हैं,  यह एक स्वतः स्फूर्त आंदोलन रहा जिसकी नेता व आयोजनकर्ता सब महिलाएं थीं,इसके बावजूद यह आंदोलन भारत के कुछ ऐसे आन्दोलनों में शामिल हो चुका है जिसके दौरान किसी भी किस्म की हिंसा या अराजकता का प्रदर्शन नहीं किया गया।  हाल ही में हमने  केंद्र सरकार की अग्निवीर योजना के खिलाफ छात्रों के विरोध प्रदर्शन देखा, जिसमें दर्जनों ट्रेन को आग लगा दिया गया। हालांकि उनका विरोध करना कहीं से गलत नहीं था लेकिन अराजकता , तोड़-फोड़ का समर्थन नहीं किया जा सकता।  यहाँ इस उदाहरण का जिक्र उस फ़र्क़ को दर्ज़ करने के लिए भी जरूरी है कि कोई भी विरोध प्रदर्शन या आंदोलन का नेतृत्व जब महिलायें करती हैं तो उनका अप्रोच कितना अलग होता है।

इस आंदोलन का महत्त्व लोगों में संविधान की समझ और उसमें भरोसा बढ़ाने का भी आंदोलन रहा और इस लिहाज से इसे लोकतंत्र की समझ व्यापक और मजबूत करनेवाला भी कहा जा सकता है।  जो कि भारतीय लोकतंत्र के लिए एक अच्छा संकेत है।  इसे थोड़ा और विस्तार से ऐसे समझ सकते हैं कि ऐसे दौर में जब  लोग किसी भी विरोध -प्रदर्शन में शामिल होने से इसलिए बच और डर रहे हों कि पता नहीं उनपर कौन सी धारा लगाकर उन्हें जेल में डाल दिया जाएगा तब  भी इन औरतों ने   डटे रह कर लोगों की कुंद राजनीतिक -सामाजिक सोच को झकझोरा, उन्हें हस्तक्षेप की जरूरत और महत्त्व का एहसास कराया। घरेलु कही जाने वाली इन सभी महिलाओं की परिपक्व राजनीतिक समझ कई और तरह से भी दिखी जैशाहीन बाग़ के तमाम पोस्टर, बैनर इसकी तस्दीक करने वाले कहे जा सकते हैं मसलन, गाँधी, अम्बेडकर, भगत सिंह, मौलाना आज़ाद, फुले, पेरियार के नारे, कोट्स। सर्व धर्म समभाव के पोस्टर बैनर, ईश्वर, अल्लाह, जीजस, गुरुनानक सभी से जुड़े प्रतीकों का प्रतिनिधित्व।  इसके अलावा बहुत मजबूती से इस पुरे आंदोलन को किसी भी राजनीतिक दल या संघठन से अलग रखना, इसे किसी भी राजनीतिक दल या संगठन के पाले में नहीं जाने देना। साथ ही आंदोलन को पूरी तरह से जनता के सहयोग से संचालित करना किसी पार्टी या संगठन से कोई आर्थिक सहयोग नहीं लेना। ये सभी बातें इस आंदोलन में शामिल महिलाओं की परिपक्व राजनीतिक समझ का परिचय देती हैं।  और साथ ही उनकी दूरदृष्टि का भी क्योंकि इस आंदोलन के बहाने ही वो आनेवाली पीढ़ी को भी  लोकतंत्र, न्याय, प्रतिरोध के पाठ सीखा रही हैं और संविधान के मूल्यों को सुनिश्चित करते हुए लोकतांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष, बराबरी के भारत की स्थापना के लिए प्रेरित कर रही हैं।

इस आंदोलन का एक सबसे महत्वूर्ण पक्ष महिलाओं के द्वारा पितृसत्तात्मक समाज के द्वारा उनके लिए तय किए गए परदा समेत लैंगिक असमानता के तमाम  नियमों,आचार संहिताओं व वर्जनाओं को तोड़कर इस आंदोलन में शामिल होना भी कहा जा सकता है। जबकि नागरिकता कानून से प्रभावित केवल महिलायें ही नहीं होने वाली थी बावजूद इसके आंदोलन की कमान पूरी तरह से महिलाओं के हाथ में रही।  जबकि अधिकतर राजनीतिक मसलें  अगर वो सिर्फ महिलाओं से जुड़े मसले ना हों तो उनका नेतृत्व पुरुषों के द्वारा ही किया जाता रहा है। साथ ही शाहीनबाग ने मुसलमान औरतों की एक दूसरी ही तस्वीर पेश की, यहाँ ये उल्लेख जरूरी है कि शाहीनबाग प्रदर्शन में समाज के सभी जाति धर्म के लोगों की भागीदारी रही लेकिन मुसलमान औरतों की संख्या बढ़चढ़ कर रही। इस मौके पर उन्होंने अपनी भागीदारी व प्रबंधन से इस देश की अपनी नागरिकता का शानदार क्लेम पेश किया उसे साबित किया। उन्होंने स्टेट के द्वारा किये जा रहे राजनीतिक फैसलों में अपने स्पेस और अपने अस्तित्व दोनों की दावेदारी पेश की और ऐसा करने के लिए वो खुद मैदान में उतरी, जनांदोलन के मार्फ़त जिसका संचालन, प्रबंधन और नेतृत्व सब उनके ही हाथ में था। इस तरह उन्होंने पितृसत्ता के बरक्स भी अपनी लड़ाइयों को खुद लड़ने की लकीर खींची। हालाँकि इससे पितृसत्ता के उनपर नियंत्रण की कहानी इतनी जल्दी नहीं बदलती लेकिन इसे एक शुरुआत तो कह ही सकते हैं।

आंदोलन में शामिल महिलाओं की प्रगतिशील सोच का इससे भी पता चलता है कि वो किसी भी धार्मिक मसले पर इस तरह से गोलबंद नहीं हुई थी हमने ढाई साल बाद नूपुर शर्मा और पैगम्बर साहब पर अपमानजनक टिप्पणी के मामले में भी मुसलमान महिलाओं का यही स्टैंड देखा जब वो इस तरह के धार्मिक मसले पर गोलबंद नहीं हुई जैसे वो सीएए और एनआरसी पर हुई थीं। हालाँकि ये आन्दोलन ख़त्म हो गया लेकिन बेशक इस विरोध प्रदर्शन ने भारतीय लोकतंत्र में एक नई इबारत तो लिख ही दिया है, आंदोलन ने अपनी शुरुआत में ही सत्ता को इस कदर दवाब में डाल दिया कि इस निजाम के द्वारा इस आंदोलन को बदनाम करने, ख़त्म करने की साजिशें और षड्यंत्रों की लगातार कोशिशें होती रहीं। लेकिन इस मामले में सरकार की मदद कोरोना वायरस और लॉक डाउन की घोषणा ने की। इसका असर इस तरह भी देख सकते हैं कि नागरिकता संशोधन कानून, 2019 के तहत सरकार ने अभी तक किसी भी अल्पसंख्यक शरणार्थी को भारत की नागरिकता प्रदान नहीं की है क्योंकि इस कानून पर अमल के लिये जरूरी नियमों को अभी तक अंतिम रूप नहीं दिया गया है, इसके लिये जरूरी नियमों को अभी तक अधिसूचित नहीं किया जा सका है। दूसरी ओर इस कानून के तहत नियम बनाने के मामले में सरकार की ढिलाई भी काफी कुछ बयां करती है.नागरिकता संशोधन विधेयक संसद से पारित होने और उसे राष्ट्रपति की संस्तुति मिलने के साथ ही इसकी संवैधानिक वैधता को चुनौती देते हुए उच्चतम न्यायालय में एक एक करके करीब 140 याचिकाएं दायर हुई हैं, तो मामला इतना आसान भी नहीं रहा है सरकार के लिए।

महिलाओं के द्वारा हाल ही में किये गए आन्दोलनों में दूसरा महत्वपूर्ण आंदोलन  केरल में पथनमथिट्टा जिले के पश्चिमी घाटी में संरक्षित वन क्षेत्र में स्थित सबरीमला मंदिर में रजस्वला आयु की महिलाओं के प्रवेश के सन्दर्भ में है, महत्त्व की दृष्टि से केरल का सबरीमाला मंदिर को दक्षिण भारत का काशी विश्वनाथ नंदिर या अयोध्या  मंदिर कह सकते हैं, इस मंदिर में हर साल आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या दुनिया में कहीं भी किसी धार्मिक स्थल पर जाने वाली सांख्य से ज्यादा है। अनुमानतः प्रति वर्ष यहाँ 4 -5 करोड़ लोग आते हैं। एक और जरूरी बात इस मंदिर का शैव और वैष्णव दोनों मतों का मेल होना भी है।अयप्पा स्वामी जिनकी यहाँ पूजा की जाती है वो शिव और विष्णु के स्त्री रूप मोहिनी की संतान हैं इसलिए अयप्पा स्वामी की आराधना शैव और वैष्णव दोनों के द्वारा होता आया है।  एक और ख़ास बात इस मंदिर परिसर के कुछ मंदिरों का दुनिया में किसी भी धर्म के लोगों के लिए खुला होना है।  लेकिन दूसरी ओर ये वही मंदिर है जहाँ रजस्वला स्त्री यानि 10 -50 साल की स्त्री का प्रवेश प्रतिबंधित रहा था और इस  प्रतिबन्ध को  धार्मिक परंपरा के तौर पर सामजिक स्वीकृति प्राप्त थी।धार्मिक मान्यताओं के अनुसार  सबरीमाला मंदिर में पूज्य ईश्वर का स्वरूप नैश्तिका ब्रह्मचारी का है। परंपराओं और पुराणों के अनुसार इसी को आधार बनाकर मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर रोक लगाई गई थी।

दरअसल, पिछली आधी सदी में सबरीमला मंदिर में लैंगिक भेदभाव के मसले से ज्यादा लैंगिक ध्रुवीकरण वाला मसला शायद ही कोई और रहा हो। लेकिन ये भी सच है कि महिलाओं का एक हिस्सा लगातार मंदिर में प्रवेश से जुड़ें इस लैंगिक भेदभाव को लेकर सक्रिय रहा। इस पूरी मुहिम में महिलाओं की भागीदारी और भूमिका की बात है तो इसके मूल में 10 से 50 वर्ष की महिलाओं का मंदिर में प्रवेश वर्जित होना और तमाम महिलाओं का इस प्रतिबन्ध के खिलाफ खड़े होना और कानूनन इस लिंग आधारित  भेदभाव पर रोक लगवाना रही है। दरअसल, मंदिर में महिलाओं के  प्रवेश को लेकर विवाद दशकों पुराना रहा है। लेकिन विवाद की शुरुआत तब हुई जब मंदिर के मुख्य ज्योतिषि परप्पनगडी उन्नीकृष्णन के द्वारा कहा गया कि भगवान अयप्‍पा की ताकत मंदिर में किसी महिला के प्रवेश करने की वजह से कम हो रही है। उनके  इस बयान के बाद कन्नड़ अभिनेत्री जयमाला ने कहा कि 1986 में 27 साल की उम्र में वो सबरीमाला अय्यप्पा मंदिर गई थीं और उन्होंने अय्यप्पा भगवान की मूर्ति का चरणस्पर्श किया था। उनके इस बयान के बाद  मंदिर का शुद्धिकरण करवाया गया और उनके  इस दावे के बाद ही सबको ये मालूम चला कि मंदिर में रजस्वला महिलाओं का प्रवेश वर्जित है।  ये भी हैरान करने वाली बात है कि जयमाला जैसी अभिनेत्री जो इसी पत्रकार को 2016 के इंटरव्यू में कहती हैं कि भारत में सती प्रथा, देवदासी प्रथाएं भी हुआ करती थीं, दलितों को अब भी सामाजिक, धार्मिक भेदभावों का शिकार होना पढ़ता है, लेकिन हमने समय के साथ ऐसी परंपराओं और प्रथाओं की अमानवीयता को समझा और उन्हें हटाया। सबरीमाला मंदिर में भी 10 से 50 साल के बीच की महिलाओं के प्रवेश पर रोक को जितनी जल्दी हटाया जाए एक प्रगतिशील समाज और देश बनाने  के लिए ये बहुत जरूरी है। 2019 में इस मसले पर कोई टिप्पणी करने से इंकार कर देती हैं।  इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि मंदिर में महिलाओं के प्रवेश का यह मामला कितना संवेदनशील रहा है।

बहरहाल, इसी प्रकरण के बाद मंदिर में हर उम्र की महिलाओं के प्रवेश दिए जाने को लेकर 1990 में प्रतिबन्ध के  खिलाफ केरल हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की गई। 1991 में केरल हाईकोर्ट ने अपने फैसले में महिलाओं के प्रवेश को पूरी तरह से प्रतिबंधित कर मंदिर के फैसले को सही ठहराया था। और कहा कि  मासिक धर्म की उम्र वाली महिलाओं का मंदिर में प्रवेश निषेध न तो संविधान का और न ही केरल के कानून का उल्लंघन है। 2006 में हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ पांच महिला वकीलों का समूह केरल के यंग लॉयर्स असोसिएशन जिसमें भक्ति पसरीजा, प्रेरणा कुमारी, लक्ष्मी शास्त्री, सुधा पाल, अलका शर्मा शामिल थीं, सुप्रीम कोर्ट में गए। इसके बाद जुलाई 2016 में  सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को मौलिक अधिकारों का हनन कहा और मामले को  2017 में पांच सदस्‍यीय संवैधानिक पीठ को सौंप दिया गया।

सितंबर 2018 में सबीरमाला मामले पर  तत्कालीन मुख्य न्यायधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच जजों की बेंच ने महिलाओं के मंदिर में प्रवेश के पक्ष में  ऐतिहासिक फैसला सुनाया जबकि एक सदस्य महिला न्‍यायधीश इंदु मल्होत्रा की प्रवेश के फैसले से असहमति थी इस फैसले ने जैसे पुरे दक्षिण भारत खासतौर पर केरल, कर्नाटक और तमिलनाडु  में महीनों तक तनाव का माहौल पैदा कर दिया, सड़क पर दोनों समूह के लोग थे एक वो जो सुप्रीम कोर्ट के फैसले के विरोध में थे और वो भी जो इस फैसले का स्वागत कर  रहे थे बात इस फैसले के वास्तविकता में भी उतरने की थी।  एक ओर प्रवेश के विरोध में 600 किलोमीटर से ज्यादा लम्बी ज्योति श्रृंखला बनायीं जा रही थी  दूसरी ओर मंदिर में प्रवेश के समर्थन में पचास लाख औरतों के द्वारा निर्मित 620 किमी लम्बी लैंगिक समानता की मानव श्रृंखला भी थी, इस मानव श्रृंखला में सभी धर्मों की महिलायें साथ आयी थीं, एक और अंतर इस समूह पर प्रतिबन्ध के समर्थक समूह के लोगों का आक्रामक होना था।  लैंगिक समानता की मानव श्रृंखला के दौरान  एक फोटो जर्नलिस्ट शाजिला अली फातिमा की एक तस्वीर वायरल हुई थी काम के दौरान उनपर हमला होने की और आँखों में आंसू के बावजूद शाजिला अली फातिमा का अपने कैमरे पर मजबूत पकड़ बनाये रखने और अपना काम करते रहने की। ये भी उल्लेखनीय है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद उन पत्रकारों और एक्टिविस्टों पर भी हमले हुए जिन्होंने मंदिर में प्रवेश करने की कोशिश की मसलन  फैसले के बाद नारीवादी कार्यकर्ता रेहाना फातिमा, पत्रकार कविता जक्कल और एक महिला भक्त मैरी स्वीटी ने जब सबरीमाला में प्रवेश करने की कोशिश की तो उन्हें फैसले के खिलाफ भक्तों द्वारा मंदिर के प्रवेश के बजाय पुलिस सुरक्षा में लौटने  के लिए मजबूर किया गया। सच ये है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद भी यथस्थितिवाद हावी है, धार्मिक परंपरा का पालन करने वालों की मर्जी अघोषित रूप से प्रैक्टिस में है इसकी तस्दीक इस बात से होती है कि 2018 में प्रतिबन्ध हटने का सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद सिर्फ 2 महिलाओं ने मंदिर में प्रवेश किया जिनमें पहली महिला हैं बिंदु अम्मिणी जो एक वकील, व्याख्याता और दलित सामाजिक कार्यकर्त्ता हैं, और दूसरी उनकी दोस्त कनकदुर्गा।  लेकिन मंदिर में इन दोनों का प्रवेश इतना सहज नहीं रहा सबसे पहले तो इनके प्रवेश और निकलने के बाद मंदिर कर शुद्धिकरण किया गया, इन दोनों के प्रवेश से मंदिर अपवित्र माना गया। बाद में बिंदु के घर पर हमला हुआ, तोड़ -फोड़ के गई और उन्हें लगातार जान से मार डालने की धमकी मिलती रही।कनकदुर्गा को मंदिर में प्रवेश करने के कारण उनके पति के द्वारा तलाक दे दिया गया। 2018 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद अब  2022  है लेकिन अभी तक सिर्फ इन्हीं दो महिलाओं के मंदिर में प्रवेश करने की आधिकारिक जानकारी है हालाँकि जनवरी 2019 में केरल सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को कुल 51 औरतों के मंदिर में प्रवेश की जानकारी दी लेकिन बाद में इससे मुकरते हुए केवल दो महिलाओं के मंदिर में प्रवेश की पुष्टि की।

जाहिर है सबरीमाला मंदिर में प्रवेश के मामले में सालों के संघर्ष के बावजूद सफलता अभी कागज पर मिली है जमीन पर नहीं, जमीनी हक़ीक़त ये है कि कांग्रेस जैसी पार्टी का इस मसले पर स्टैंड मौजूदा मुख्यमंत्री पिनरई विजयन से उलट सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ धार्मिक मान्यताओं के अनुरूप का है।  यानि अभी संघर्ष बाकी है, लैंगिक बराबरी के संवैधानिक मूल्य और स्त्रियों को लेकर प्रगतिशील फैसलों का व्यावहारिक धरातल पर उतरना अभी भी चुनावी राजनीति और वोट बैंक के नफा नुक्सान के हवाले हैं।  केरल जैसे अधिकतम साक्षरता वाले राज्य में ये हाल है जब सुप्रीम कोर्ट के फैसले के 4 साल होने के बावजूद केवल 2 महिलाएं मंदिर में प्रवेश करती हैं और वापस आने के बाद उसकी सजा या दुष्परिणाम झेलती हैं।

पुनश्च:

यहाँ ये जान लेना भी जरूरी है आखिर नागरिकता संशोधन कानून 2019 है क्या?

दरअसल, देश में घुसपैठियों का मामला काफी समय से चर्चा में रहा था और घुसपैठियों को देश से बाहर करने की दिशा में सबसे पहले असम में एनआरसी (NRC) यानी नैशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजंस पर काम हुआ। लेकिन एनआरसी ने बड़ी संख्या में ऐसे लोगों को भी नागरिकता की लिस्ट से बाहर रख दिया जो देश के ही मूल निवासी थे। इसी के जवाब में या समाधान में  सरकार ने नागरिकता संशोधन कानून, 2019  पेश किया गया।

नागरिकता संशोधन कानून 2019 में अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान से आए हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और क्रिस्चन धर्मों के प्रवासियों के लिए नागरिकता के नियम को आसान बनाया गया है। पहले किसी व्यक्ति को भारत की नागरिकता हासिल करने के लिए कम से कम पिछले 11 साल से यहां रहना अनिवार्य था। इस नियम को आसान बनाकर नागरिकता हासिल करने की अवधि को एक साल से लेकर 6 साल किया गया है यानी इन तीनों देशों के ऊपर उल्लिखित छह धर्मों के बीते एक से छह सालों में भारत आकर बसे लोगों को नागरिकता मिल सकेगी। आसान शब्दों में कहा जाए तो भारत के तीन मुस्लिम बहुसंख्यक पड़ोसी देशों से आए गैर मुस्लिम प्रवासियों को नागरिकता देने के नियम को आसान बनाया गया है।इस कानून को लेकर विवाद की वजह इसके प्रावधानों के द्वारा खासतौर पर मुस्लिम समुदाय को निशाना बनाया जाना है जो सीधे -सीधे संविधान के अनुच्छेद 14  जो समानता के अधिकार की बात करता है का उल्लंघन है। एक धर्मनिरपेक्ष देश किसी के साथ धर्म के आधार पर भेदभाव कैसे कर सकता है?

यह आलेख स्त्रीकाल प्रिंट के ताजा अंक में प्रकाशित है

फ्रेंच लेखिका एनी अर्नो (साहित्य की नॉबेल विजेता ) के 15 कथन

एनी का तमाम लेखन आत्मकथात्मक और ‘सत्य की चीर-फाड़’ करने वाला है। माना जाता है कि अपने जीवन को ही वे छद्म-पात्र-रचना (Impersonating) के ज़रिए प्रस्तुत करती रही हैं। उनके लेखन में उनकी माँ का अल्ज़ाइमर और उनका अपना कैन्सर भी है। वे एक साहसी महिला रही हैं। उन्होंने एक शादीशुदा विदेशी राजनयिक से प्रेम-संबंध रखा और उस समय गर्भपात कराया जब फ़्रांस में यह क़ानूनन अवैध था। प्रस्तुत हैं अंग्रेज़ी से अनूदित उनके कुछ महत्त्वपूर्ण उद्धरण-

 

  • “मैं समय और मृत्यु से जूझने के लिए लिखती हूँ। समय मेरे लेखन में हमेशा एक अहम किरदार रहा है।”
  • “सामाजिक उन्नति निर्वासन का ही एक रूप है। आप एक पूरा-का-पूरा संसार पीछे छोड़ते हुए, एक तरह से अपने आप को अलविदा कहते हैं। यह कठिन है।”
  • “स्वनिर्णय और सामाजिक उन्नति बहुत कठिन है- किन्तु यह आज भी संभव है।”
  • “जब आप अपने मूल सामाजिक-वर्ग से भागने की कोशिश करते हैं। जैसी मैंने कोशिश की, वापसी की, अपनी पढ़ाई के साथ, आप अक्सर ख़ुद से पूछते हैं: मुझे क्या परेशान करने वाला है? आख़िर में मुझे क्या रोकेगा ?  जब मैंने देखा कि मैं गर्भ से हूँ तो यह अचानक मुझ पर तारी हो गया : यह मेरी देह होगी, यही मुझे रोकेगी। उस समय अविवाहित गर्भवती ग़रीबी का प्रतीक थी। यह गारण्टी थी कि कभी तुम्हें मुक्त नहीं किया जाएगा। यह सब ख़त्म हो गया था।”
  • “मैं बस आगे बढ़ती रही। और इस सरकार के प्रतिबन्ध से ख़ुद को (गर्भपात करवाने से) रुकने नहीं दिया।”
  • “सच कहूँ, तो जो कुछ मैंने देखा और सुना है, उसे खोने के बज़ाय मैं मर जाना पसन्द करूँगी।”
  • “मैं ऐसी लेखक नहीं जो केवल जज़्बात को ध्यान में रखती है और यह ‘द इयर्स’ की विषय-वस्तु भी नहीं है। प्रमुख बिन्दु है निजता के बारे में न बोलना। निजी को तस्वीरों के विवरणों से भी एकत्र किया जा सकता है। मैं एक तस्वीर पर (हरेक दशक के लिए) वस्त्रों, प्रकाश और स्थानों को विवरणों के साथ उस क्षण रख सकती हूँ। तस्वीरों के माध्यम से मैं अपने पिता और बच्चों की मृत्यु का स्पर्श कर सकती हूँ, बहुत मुख़्तसर, लेकिन प्रायः मैं जज़्बात के बारे में नहीं बोलती।”
  • “ये दुर्लभ था, लेकिन मैं एक अकेली बच्ची थी- मेरी बहन मेरे जन्म से पूर्व ही मर चुकी थी। और क्योंकि मेरी माँ एक मज़बूत शख़्सियत थीं और पढ़ने से उन्हें प्यार था, मैं आगे बढ़ी थी। हाँ, इसने मेरे और मेरे परिवार के मध्य एक दूरी पैदा कर दी। चालीस साल पहले यही दूरी मेरी पहली क़िताब का विषय थी।”
  • “’मी टू’ पर मेरी पूर्ण सहमति है। निश्चित रूप से उसमें कुछ अति(याँ) हैं, किन्तु ख़ास बात यह है कि स्त्रियाँ इस तरह के व्यवहार को और अधिक स्वीकार नहीं करेंगी। फ़्रांस में हम सिडक्शन के बारे में बहुत सुनते हैं, परन्तु यह सिडक्शन नहीं है, पुरुष-प्रभुता है। दुराचार केवल यौन मामलों में ही नहीं है, साहित्य समेत यह प्रत्येक जगह है। महिला लेखकों को टेलीविज़न- कार्यक्रमों में बहुत कम आगे किया जाता है, वहाँ प्रत्येक स्त्री पर तीन मर्द होते हैं। वहाँ पर एक यह भी ख़याल है कि महिला केवल उपन्यासकार है और मर्द लेखक।”
  • “चुनाव करना कठिन है। मैंने जर्मेन ग्रीअर की ‘दि फ़ीमेल यूनक्’  उस समय पढ़ी, जब पढ़ना महत्त्वपूर्ण होता है और उसने मेरे लिखने के ढंग को प्रभावित किया। सार्त्र की ‘ला नौज़ी’ सिमोन की ‘दि सेकेंड सेक्स’ और वर्जीनिया वुल्फ़, एक अद्भुत लेखक, को मैंने अपने बीसवें साल में खोजा, और जॉर्ज पेरेक्। तमाम क़िताबें हैं जिन्हें मैं पढ़ना चाहती थी फिर उनके जैसा ही लिखना भी। मेरे लिए, केवल कहानी और विषय-वस्तु ही नहीं, शिल्प भी मायने रखता है।
  • “मैंने लिखा है, लाखों लड़कियों और औरतों पर की गई बर्बरताओं की स्मृति को सुरक्षित करने के लिए।”
  • मेरे बचपन की आँखें कहाँ हैं? वे डरे-डरे नयन जो उसके पास तीस साल पहले थे। आँखें, जिन्होंने मुझे बनाया?”
  • दुःख को बरकरार नहीं रखा जा सकता है। उसे परिमार्जित कर हास्य में परिवर्तित कर देना चाहिए।
  • “अस्तित्त्व में होना बिना प्यास के ख़ुद को पीना है।”
  • “बूढ़ा होना फ़ीका हो जाना है, पारदर्शी बन जाना।”

 

एनी अर्नो का काम प्रशंसनीय और उसका स्थायी महत्व

रमण कुमार सिंह

फ्रेंच लेखिका एनी एरनॉक्स को इस वर्ष का साहित्य का नोबेल पुरस्कार दिया गया है, जिनके बारे में कहा जा रहा है कि समझौते नहीं करने वाला उनका चालीस वर्षों का लेखन एक ऐसे जीवन की खोज है, जिस पर लिंग, भाषा और वर्ग से संबंधित महान असमानताओं के निशान हैं। एनी एरनॉक्स 17वीं महिला लेखिका हैं, जिन्हें यह पुरस्कार मिला है। नोबेल समिति के अक्ष्यक्ष प्रोफेसर हेनरिक हेल्डिन ने कहा कि इस 82 वर्षीय लेखिका का काम ‘प्रशंसनीय और स्थायी’ महत्व का है। उन्होंने अर्ध आत्मकथात्मक कहानियों को सुनाने के लिए साहस और तटस्थ कुशलता का उपयोग किया, जो सामाजिक अनुभव के विरोधाभासों को उजागर करते हैं और शर्म, अपमान, ईर्ष्या और आपकी पहचान को देखने मे असमर्थता का वर्णन करते हैं।
एनी एरनॉक्स जन्म 1940 में नार्मंडी में हुआ, जहां उनका प्रारंभिक जीवन गरीब, मगर महत्वाकांक्षी था। उनके माता-पिता कैफे और किराने की दुकान चलाते थे। जब उनका मध्यवर्गीय पृष्ठभूमि की लड़कियों के साथ सामना हुआ, तो उन्हें अपने कामकाजी वर्ग के माता-पिता और अपने माहौल की शर्म का एहसास हुआ। बाद में इन सब अनुभवों को उन्होंने अपने उपन्यासों में स्थान दिया। उनकी आधिकारिक जीवनी के अनुसार उनके रचनात्मक कार्य का मुख्य विषय देह और यौनिकता, अंतरंग संबंध, सामाजिक असामनता और शिक्षा के माध्यम से वर्ग परिवर्तन का अनुभव, समय और स्मृति, और इन जीवन अनुभवों को कैसे लिखना है का व्यापक प्रश्न था।
उनकी पहली पुस्तक क्लीन्ड आउट1974 में प्रकाशित हुई, जो 1964 में कराए गए उनके गर्भपात के अनुभवों पर आधारित थी, जब फ्रांस में गर्भपात अवैध था। एक विवाहित विदेशी राजनयिक के साथ उनके प्रेम पर आधारित पुस्तक ए सिंपल पैशन फ्रांस में बेस्टसेलर रही है। लेकिन फ्रांस से बाहर उन्हें द ईयर्स के लिए जाना जाता है, यह एक प्रयोगात्मक आत्मकथा है, जो फ्रांसीसी इतिहास की घटनाओं के साथ एरनॉक्स के जीवन के 70 से अधिक वर्षों की घटनाओं को एक साथ पिरोती है।
लंबे समय से आलोचक उनके साहित्य की प्रशंसा करते रहे हैं। उनके लेखन में कथा और आत्मकथा के बीच की रेखा धुंधली पड़ जाती है। उनके आत्मकथात्मक उपन्यास विधा की मांग (मेलोड्रैमेटिक अंतरंग रहस्योद्घाटन एवं कथात्मक आख्यान की सहजता) की अवहेलना करते हैं, लेकिन गंभीर प्रामाणिक जानकारी प्रदान करते हैं। उन्होंने अपने एक साक्षात्कार में बताया था कि उन्होंने लिखने की कोशिश कॉलेज के समय में ही शुरू की थी, लेकिन प्रकाशक ने बहुत ज्यादा महत्वाकांक्षी बताकर उसे प्रकाशित करने से इन्कार कर दिया। फिर जब तक वह तीस की नहीं हो गईं, तब तक कलम नहीं पकड़ी, जब वह दो बच्चों की मां नहीं बन गईं। अपना पहला उपन्यास क्लीन्ड आउट उन्होंने सबसे छिपाकर लिखा। उन्होंने लिखा, ‘मेरी पहली पांडुलिपि को लेकर मेरे पति मजाक उड़ाते थे। मैंने पीएच. डी, थीसिस लिखने का बहाना बनाया। किताब प्रकाशित होने के बाद मेरे पति ने बहुत बुरी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि यदि तुम गुप्त रूप से किताब प्रकाशित करवा सकती हो, तो मुझे धोखा भी दे सकती हो।’ जल्द ही उन्हें अपने उदास वैवाहिक जीवन के बारे में लिखना पड़ा। बाद के उपन्यासों में उन्होंने अपनी मां की एल्जाइमर की बीमारी, अपने कैंसर और प्यार के बारे में भी लिखा।

साभार फेसबुक पेज

राजेन्द्र सजल: एक कहानी सजग कहानीकार

सबसे पहली बात जो राजेन्द्र सजल जी के बारे में कही जानी चाहिए कि वे एक कहानी सजग कहानीकार हैं। हमारे यहाँ लेखक की सजगता का आकलन समाज के संदर्भ में ही किया जाता है। कोई लेखकअथवा कहानीकार समाज के मुद्दों को और उसकी समस्याओं को अपनी कहानियों में कितना उठाता है, कितना रचता है उतना ही हमारे लिए वह कहानीकार एक सजग कहानीकार होता है। किंतु कोई कहानीकार कितना कहानी सजग कहानीकार है यह बात प्राय: और कम से कम दलित आलोचकों और रचनाकारों के बीच तो चर्चा या आलोचना का विषय नहीं बनती। ऐसा करते ही हमें लगता है कि हम रूपवादी हो रहे हैं। हम साहित्य के सौन्दर्यशास्त्र के प्रति झुकाव या लगाव प्रदर्शित कर रहे हैं और जैसे यह एक साहित्यिक अपराध है जो हम कर रहे हैं। असल में यह सब हमने शुरू भी नहीं किया। जैसे जैसे साहित्य में तथाकथित प्रगतिशील चेतना का वर्चस्व स्थापित हुआ वैसे वैसे संस्कृति, सौन्दर्य-शास्त्र, परंपरा नाम की प्रत्येक चीज से हमने दूरी बरतनी शुरू कर दी। उसे त्याज्य और घृणित मान लिया गया। यद्यपि नामवर सिंह इसके अपवाद रहे और नई कहानी के नएपन को उन्होंने कहानी के शिल्प के आधार पर ही चिह्नित किया। यहाँ यह बात बराबर ज़ोर देकर कहने की जरूरत है कि क्योंकि हिन्दी के दलित साहित्यकारों का पालन-पोषण इसी तथाकथित प्रगतिशील आंदोलन की निगरानी में हुआ इसलिए दलित आलोचकों और साहित्यकारों ने भी रचना में रचनात्मकता पर बात करने से परहेज किया। न केवल परहेज किया बल्कि बाद में तो एक हद तक कठहुज्जती भी की। यह सब बहुत ही सहज था। क्रिया की प्रतिक्रिया की तरह। ‘सौंदर्यशास्त्र’ के नाम तक से हमने नफ़रत होने लगीथी। जबकि कमाल की बात यह है कि हमारी रचनाओं में, कहानियों में, कविताओं में कमाल की रचनात्मकता मौजूद रही है। कहानी की कला, कविता की बुनावट के मामले में हमारे रचनाकार विशेष रूप से आश्वस्त करते रहे हैं। उनके भीतर अनुभूति की आँच इतनी प्रखर है कि वह आंच अपनी अभिव्यक्ति के लिए अपने आप एक ताल, एक धुन, एक रचनात्मक शिल्प तैयार करती है। कोई भी रचना अच्छी हुए बिना पाठकों के बीच जगह बना ही नहीं सकती। हांलाकि यह एक अलग और गंभीर मुद्दा है कि खानदानी प्रकाशकों, पार्टी चालित आलोचकों और अकादमिक ठेकेदारों के रहते अच्छी रचनाएँ पाठकों तक पहुँच भी नहीं पाती।

राजेन्द्र सजल एक कहानी सजग कहानीकार हैं, इसकी दो वजहें हैं एक, अपने कहानी संग्रह की भूमिका में उन्होंने अपनी इस सजगता का परिचय दिया है। और दूसरा संग्रह में शामिल उनकी कहानियों की शिल्पगत विविधता इसका परिचायक है। पहले बात करें भूमिका की, जहाँ वे लिखते हैं—“असल बात यह है कि कहानी, कहानी रहनी चाहिए और उसमें कहानीपन होना चाहिए।” अब ये कहानीपन किसी कहानी में आता कैसे है या उसे कैसे समझा जा सकता है? इसे समझाते हुए वे आगे लिखते हैं कि “जिसका (कहानी का) इस विशाल दुनिया में एक छोटा-सा संसार होता है। जिसमें पात्र और घटनाएँ इस दुनिया के प्रेम, पीर और प्रतिरोध को उमड़-घुमड़कर अभिव्यक्त करती रहें। जिसको पढ़कर लगे कि ‘हाँ, ये मेरा भोगा हुआ यथार्थ है, या फिर मुझसे जुड़े किसी शख्स, परिवेश अथवा समय की कहानी है। कहानी की दुनिया पाठक की अपनी दुनिया से जुड़ती चली जाए।” मतलब कहानी के पाठक को यह पता रहता है कि वह कोई कहानी पढ़ रहा है पर उसके बाद भी वह वहाँ घटित हो रही घटनाओं से, वहाँ विचरते चरित्रों से आत्मीय संबंध बना पाता है।  कहानी के भीतर के देशकाल और वातावरण को वह महसूस करता है। यह महसूस करना, उसे जीना है। जैसा कि स्वयं राजेन्द्र सजल जी ने लिखा है कि  “उस जमीन पर ( कहानी में) होने वाले हर मौसम को पाठक महसूस कर सके। कभी भीगता रहे तो कभी ठिठुरता- तपता रहे और आखिर बासन्ती रंग में रंगा हुआ महसूस करे।”  यह ठिठुरना, तपना, बासंती रंग में रंगा जाना भावना के धरातल पर कहानी को महसूस करना ही है। अपने वास्तविक जीवन के साथ कहानी के जीवन को भी जीना है। यहाँ विभिन्न तरह के भाव, जिन्हें काव्यशास्त्र में स्थायी भाव कहा गया है जो रस के रूप में पाठक के भीतर संचरित होते हैं; उन्हीं के बारे में राजेन्द्र सजल जी बात कर रहे हैं। असल में कहानी का कहानीपन यही हैकि कहानी पाठक के भीतर विभिन्न  भावों (रसों) का संचार कर सके।

साथ ही यह भी सत्य है कि आज के पाठक या कहें आधुनिक पाठक की बुद्धि भी उतनी ही सजग है जितनी उसकी भावनाएँ।  वह स्थितियों और घटनाओं को जीवन में ही नहीं कहानी के भीतर भी तर्क और अपने विवेक के धरातल पर जाँचता और परखता है। यह उसके आधुनिक होने का प्रमाण है। अब उसकी प्रवृति ही ऐसी बन चुकी है। ऐसे में कहानीकार को कहानी में दिमाग भी लगाना पड़ता है। पाठक इतना भी भावुक नहीं है कि बिना किसी ठोस आधार के उसकी भावनाएँ संचरित होना शुरू कर दें। अगर ऐसा है तो भी यह हमारे साहित्यकारों और आलोचकों का दायित्व है कि वे पाठकों को सावधान, और जिम्मेदार पाठक बनने की ओर अग्रसरित करें।  दलित साहित्य या कहें विशेष रूप से अस्मिता धर्मी साहित्य में पाठकों के ही नहीं रचनाकारों में भी अपनी अस्मिता को लेकर भावुक हो जाने की पूरी संभावना रहती है। राजेन्द्र सजल जी के यहाँ आधुनिक पाठक होने की यह सजगता पूरी तरह से विद्यमान है। उनकी कहानियाँ कोरी भावुक बनाकर रुलाने वाली, क्रोध में और आवेश में मुट्ठियाँ भींचने वाली कहानियाँ नहीं हैं। वे सबसे पहले पाठक के भीतर विश्वास पैदा करती हैं कि वे सच्चाई को दिखाने वाली कहानियाँ है। जैसे किसी कोर्ट में अपनी कोई भी बात रखने से पूर्व कटघरे में खड़ा व्यक्ति यह कसम खाता है कि “मैं जो कुछ कहूँगा सच कहूँगाँ, सच के सिवा कुछ नहीं कहूँगा।” ऐसी ही कोई कसम लेकर राजेन्द्र सजल कहानी लिखना आरंभ करते हैं।  यह तो हम जानते ही हैं कि बाहरी दुनिया का सच कहानी में ज्यों का त्यों नहीं आता, उसे तराशना, काटना-छाँटना पड़ता है। और इस काम में राजेन्द्र जी माहिर शिल्पकार हैं। वे पूरी तरह जानते हैं कि “कहानी आनंद के साथ-साथ हृदय की उर्वरता को न बढाए और झकझोर कर चेतना को जगाए नहीं तो फिर क्या कहानी हुई।” (भूमिका से) इस प्रकार हम कह सकते हैं कि राजेन्द्र सजल जी की कहानियाँ एक ओर पाठक के भीतर विभिन्न रसों का संचार तो करती ही हैं। उसके भीतर सोए स्थायी भावों को रस के रूप में परिणत करती ही हैं, साथ ही वे ऐसा समाज और जीवन की विविध स्थितियों का यथार्थ चित्रण करके करती हैं। ये स्थितियाँ परिवेश और इतिहास जन्य हैं कोरी भावुकता या कल्पना इनके पीछे नहीं है।

अब इन बातों को उनकी कहानियों के जरिये जाने। इस संग्रह में कुल जमा उनकी दस कहानियाँ संग्रहित हैं।  कहानियों की विषयवस्तु अपने समय के तमाम बड़े और गंभीर मुद्दों को समेटे हुए हैं। जातिवाद, संप्रदायवाद, ब्राह्मणवाद, पितृसत्ता और इन सबसे परिचालित अपने समय की राजनीति, सभी जरूरी मुद्दे इनकी कहानी में गुँथे हुए हैं। साथ ही साथ मनुष्य मात्र की विभिन्न प्रवृतियाँ, जिसमें प्रेम, ईर्ष्या, डर और लालच, चालाकी, समझदारी, हताशा और निराशा , संघर्ष और टकराव, जीत और हार सभी स्थितियाँ कहानियों को सहज बनाए रखती हैं। जैसे पहली ही कहानी ‘मास्टर माई’ को लें। कहानीकार इस कहानी में प्रेमचंद टाईप का कहानीकार है। प्रेमचंद टाईप से मेरा मतलब है ऐसा कहानीकार जो अपने पाठक का बहुत ध्यान रखता है। वह चाहता है कि वह जो कहानी कह रहा है उसे समझने में उसके पाठक को कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए। इसलिए वह कहानी में पात्रों की मन:स्थितियों की व्याख्या बहुत मन लगाकर करते हैं। मास्टर माई का अपने बेटे पर वैसे ही प्रेम और भरोसा है जैसे प्राय: माँओं का होता है। पर संतान के रंग-ढंग कैसे बदल जाते हैं, यही इस कहानी में बताया गया है। निश्चित रूप से यह कोई नया विषय नहीं है। संतानों का मतलबी निकलना, धोखेबाज होना सर्वविदित है। इस कहानी को विशेष बनाता है। माँ (मास्टर माई) को इस बात का एहसास क्रमश: किस तरह होता है और उसकी वह अजीब मुस्कान जो इस एहसास के बाद उसके चेहरे पर चिपक जाती है।  अपने बेटे को जवाब देती मास्टर माई की वह मुस्कान और गहरी हो जाती है। “हाँ, बेटा ढोर ही चर रहे हैं और मैं सो रही हूँ।” यहाँ व्यंजनार्थ में सामने खेत को चरते रोजडों का जिक्र नहीं है बल्कि मास्टर माई और उसके पति की कमाई आज कैसे उन्हीं का नकारा और निकम्मा सपूत चर रहा है और वह माँ अपने अंधे प्रेम में अब तक देख ही नहीं पा रही थी, इस बात का जिक्र है। ठीक वैसे ही जैसे “ बड़े घर की बेटियाँ ऐसी ही होती हैं।” कह कर प्रेमचंद कहानी का सारा मर्म एक वाक्य में निचोड़ देते हैं। कहानी में खेत, और खेतों पर रहने और काम करने वालों की जिंदगियों का चित्रण कर कहानी को विश्सनीय बनाया गया है। असल में राजेन्द्र सजल जी जानते हैं कि किसी कहानी को विश्वसनीय उसका कथानक नहीं बनाता बल्कि कथानक को अपने ऊपर खड़ा करने वाला परिवेश और देशकाल बनाता है। राजेन्द्र सजल की कहानियों में राजस्थान के एक क्षेत्र विशेष का जीवन इस कदर पिरोया गया है कि कहानी अपने आप जी उठती है।

राजेन्द्र जी की कहानियों में अधिकाँश कहानियाँ स्त्री चेतना की कहानियाँ हैं। इन कहानियों को यहाँ स्त्री विमर्श की कहानियाँ न कहकर स्त्री चेतना की कहानियाँ इसलिए कहा जा रहा हैक्योंकि कहानियों में जो केन्द्रीय स्त्री किरदार हैं वे पूरी तरह से अपने ऊपर हो रहे अनाचार और दुर्व्यवहार के प्रति सजग हैं। वे न केवल जानती हैं कि जो हो रहा है वह गलत हो रहा है बल्कि अपनी जितनी सामर्थ्य उनमें है उसके बल पर वे उन स्थितियों, परिस्थितियों से जूझती हैं, लड़ती हैं। वे चुपचाप आँसू नहीं बहाती। अब सारी करामात इसी बात में है कि उनकी यह लड़ाई कहानी के कहानीपन और पाठक के आधुनिक पाठक होने को कितना साथ लेकर चल पाती है। जैसे उनकी ‘मास्टर माई’, ‘इत्ती सी बात’, ‘बावली’ और ‘झमकू’  ये चार कहानियाँ सीधे-सीधे स्त्री चेतना की कहानियाँ हैं। ‘बावली’ श्यामवर्णी लड़की जिसे ब्याह के बाद उसका पति इसीलिए त्याग देता है कि वह सुन्दर नहीं। भारतीय समाज में सुंदरता का पैमाना गौरा होना ही है। गुण कोइ नहीं देखता। कृष्ण श्यामल हैं तो भी पूज्य हैं पर राधा तो गौरी ही होनी है। सांवली जिसे गाँव-मौहल्ले वाले ‘बावली’ कहने लगते हैं क्योंकि वह रोज-रोज ससुराल में अपना अपमान सह नहीं पाती और एक टूटी खंडहरनुमा हवेली में जाकर विक्षिप्त की तरह वहाँ रहने लगती है। यही बावली जब बिल्कुल विपरित हालातों में भी जी जाती है और एक बेटे को जन्म देती है तब उसका पति, उसके सास-ससुर उसे वापस ले जाना चाहते हैं। अब तो वह एक बेटे की माँ है। बेटे की माँ होते ही उसका मोल बढ़ जाता है। पर बावली अपने आत्मसम्मान से समझौता नहीं करती। वह जानती है कि यह उसका स्वीकार नहीं बल्कि उसके बेटे का ( घर के वंश चलाने वाले) का स्वीकार है। जो पति उसे सबके सामने पत्नी मानने को तैयार नहीं है, जिसे उसकी शक्ल से घिन आती है, वह रात के अँधेरे में अपनी हवस मिटाने उसी के पास आता था। उस पर जबरदस्ती करता था, उसी का परिणाम वह बेटा है।वह कैसे उस पति के घर वापस लौट सकती थी। “…ना माई ना! आज लल्ले की माँ हूँ, लल्ला खिलाने का सुख दुनियाँ का सब से बड़ा सुख है माई। इस सुख की खातिर वो राजी है, पण माई यो सुख मिलणो….तरसन दे माई, उनको तरसन दे। पतो तो चाले, बिछोह की पीड़ा काँई व्हे/ फेर माई, यो तो लल्लो हुयो परमात्मा भली करी, जे लल्ली होति तो म्हारो कांई होतो,…. दादा-दादी नै पोतो चाहे, बाप नै बेटो, अर मैं?” इस मैं का कोई जवाब नहीं है दुनिया के पास। इस ‘मैं’का जवाब न मिलने  का सारा भार वह बावली अपने जीवन को कुछ बेहतर बना पाने के रास्ते को ठुकराकर चुकाती है। वह भीख माँगकर खाती है, कोई यह भी कह सकता है कि बदले की भावना से भरी वह अपने बेटे की जिंदगी भी कष्टदायक बना देती है, पर जो है सो है। उसका यही तरीका है समाज से बदला लेने का।  आज भी स्त्री इस बात का जवाब माँग रही है दुनिया से, क्या संतान पैदा करने ( बेटा पैदा करने) के अलावा भी स्त्री की कोई जरूरत है पुरुष की जिंदगी में? और न भी हो तो क्या स्त्री को किसी पुरुष के बिना जीने की आज़ादी है?

राजेन्द्र जी की कहानियाँ स्त्री चेतना के चलताऊ मुद्दों की बजाए बहुत गहरे पैठे और बहुत हद तक सहज स्वीकृत मान लिये गए व्यवहारों पर  सवाल उठाती हैं। उनकी नायिकाएँ ग्रामीण समाज की तथाकथित अनपढ़ औरतें हैं जिनके बारे में पढ़ा-लिखा समाज प्राय: यह सोच रखता है कि उनमें किस बात की स्त्री चेतना हो सकती है। इन औरतों के अवसर कितने भी सीमित क्यों न हों पर वे भरपूर जवाब देती हैं। इस जवाब में उसकी सारी जिन्दगी निकल जाती है। पर यही उनकी जीत है कि वे लड़ती हैं और अंत तक समझौता नहीं करती।  “इत्ती सी बात” बहुत ही भावुक कर देने वाली और भीतर तक भेद जाने वाली कहानी है। मुझे यहाँ रजनी तिलक की वह कविता याद आ रही है जिसमें वे सहज स्वीकार करती हैं कि ‘हाँ मैं लड़ाका हूँ।’ पर इसका मतलब यह नहीं है कि ये स्त्रियाँ प्रेम, अपनेपन और जिम्मेदारी के एहसास से रहित है। दलित स्त्री के व्यक्तित्व की एक जो खास पहचान है वह है उसका कर्मठ होना। वह बहुत मेहनती और बड़े जिगरे वाली होती है।  प्रसिद्ध साहित्यकार रांगेय राघव की बहुत प्रसिद्ध कहानी ‘गदल’ भी इसी तरह की कहानी है। ‘गदल’ और इत्ती सी बात की ‘दादी’ स्त्री मुक्ति की आदर्श कही जा सकती हैं। वास्तव में मुक्ति दिमाग से चाहिए। कोई दूसरा, सामने का पुरुष और समाज आपको मुक्त नहीं करता, आप स्वयं इस मुक्ति की एहसास को अपने भीतर धारण करते हैं। निश्चित रूप से समाज में गैर बराबरी है पर आप आपकी जो भी स्थितियाँ हैं उनके बीच ही अपनी लड़ाई भरपूर लड़ते हैं, लड़ सकते हैं, आपको लड़नी चाहिए। ‘इत्ती सी बात’ की दादी बहुत कर्कश है, उसे कभी किसी ने हँसते नहीं देखा। पर इसका अर्थ यह भी नहीं है कि वह अपनी जिम्मेदारी और जवाबदेही से पीछे हटती है। बल्कि अपने कर्मठ व्यक्तित्व के बल पर ही उसने वह औरा हासिल किया है कि अपनी शर्तों पर जी सके।  खुश होना और अपनी खुशी को हँस कर अभिव्यक्त करना यह नेमत प्रकृति ने अपने किसी जीव को नहीं दी। केवल मनुष्य है जो खुश होकर हँसता है और अपनी खुशी का इज़हार करता है। पर दादी के वैवाहिक जीवन की शुरुआत होती है उस झन्नाटेदार थप्पड़ से जो उसे इसलिए रसीद कर दिया जाता है कि नई नवेली आई बहु जो मात्र तेरह साल की है, ननदों के साथ मिल कर हँस बोल रही है। उसकी उन्मुक्त हँसी बाहर उससे लगभग दूनी उम्र के पति को सुनाई देती है और बस झन्नाटेदार थप्पड़ के साथ “शर्म-हया है कि नहीं, बाबले ( मायके) ने कुछ नहीं सिखाया। बाहर मेहमान बैठे हैं और ही-ही कर रही है।”  औरत को सासरे में कोई और इज्जत दे न दे। कोई और समझे चाहे न समझे। पर पति नाम के प्राणी के साथ जिसके पीछे वह अपना सबकुछ छोड़ कर चली आती है, उससे प्यार और अपनेपन की वह उम्मीद करती है। और पति भी जब दूनी उम्र का हो, उससे समझदारी की उम्मीद ज्यादा रहती है।  वह चाहती तो थी कि  गौना कराकर वापस न आए। पर पिता ने अपनी इज्जत की पग़ड़ी उसके पैरों में रख दी। मजबूरन वह ससुराल आई पर अपने भीतर इस कसम के साथ कि वहाँ कभी नहीं हँसूगी। उसकी इस कसम से उसका पूरा जीवन रसहीन हो जाता है। अपनी इस कसम को पालने की खातिर वह अपना सारा जीवन प्यार और अपनत्व के इज़हार से रहित हो कर जीती है। यह एक ऐसा दंड है जो वह स्वयं के माध्यम से समाज को देती है। यह एक ऐसी कसम बन जाती है जिसका तावान उसे अपने आप को निचोड़ कर भरना पड़ता है। सबसे बड़ी बात सारी उम्र बीत जाती है और मरते समय तक किसी को उसके दुख का पता नहीं चलता। पति को तो अपनी उस गलती की गंभीरता का एहसास उस समय भी नहीं होता जब मरने से पहले वह उसे बताती है। “बस, इत्ती-सी बात! और तू उम्र भर…!” उसकी समझ में ही नहीं आता कि औरत की भी इज्जत है, उसका स्वाभिमान है। उसके स्वाभिमान को केवल उस पर हिंसा या यौन हिंसा करके ही नहीं कुचला जाता बल्कि उसके उठने, बैठने, हँसने और बोलने पर सरेआम प्रतिबंध लगाकर भी कुचला जाता है। जब एक नवयौवना को इस आधार पर, उसके घर वाले घुड़कते हैं तो उसका कोमल हृदय, उसका व्यक्तित्व जो अभी आकार ग्रहण करने ही लगे हैं कुंठित और विकृत हो जाता है।  यह समाज के लिए इत्ती सी बात हो सकती है पर दादी मुँह फेर कर यह कहते हुए मर जाती है “इत्ती सी बात ?”  कहानी में अंत मे आकर इन शब्दों की व्यंजना स्पष्ट होती है।  यहाँ कोई भी यह कह सकता है कि आखिर इस कसम से उसने क्या पाया।  पर कहने वाला इसकी व्याख्या किसी तरह से करता रहे पर कहानी अपना मकसद पूरा कर देती है। वह अपने पति से यह कह कर मरती है कि “अगले जन्म में मैं आदमी बनूँगी और तुम लुगाई बनना। मैं तुझे खूब हँसाऊँगी। तू हँसना, मैं नहीं मारूँगा…” ऐसा नहीं है उसे अपने पति से प्रेम नहीं है। वह उसकी इज्जत के लिए दोहरी मेहनत करती है। मरते-मरते यह कह कर जाती है कि “अगले जन्म की तैयारी है। तू बेगा आना। मैं बाट देखूँगी…” सारी उम्र उसका बेचारा पति यह समझ ही नहीं पाता कि उसकी हर सुविधा का ध्यान रखने वाली, उसकी सारी जिम्मेदारियों को अपने कंधों पर ढोने वाली उसकी औरत को आखिर दो बोल हँसकर बोलने से क्यों परहेज है। झमकू भी एक ऐसी ही कहानी है जो समाज के इस सत्य को बयां करती है कि संतान न होने की जिम्मेवारी सिर्फ़ औरत को उठानी पड़ती है। गाँव में ब्याहली आई झमकू को उसका पति सास-ससुर इसलिए त्याग देते हैं कि सात साल में वह एक बार भी पेट से नहीं हुई। पर झमकू इस बात को नहीं मानती उसके भीतर कहीं विश्वास है कि बिना किसी सबूत के ऐसे कैसे उसे बाँझ करार किया जा सकता है। वह वहीं रहती है अनाथ हरिया का घर बसाती है। उसका विश्वास जीतता है जब वह पहले ही साल में गर्भ धारण करती है।

असल में राजेन्द्र जी की कहानियाँ अपने विषय- मुद्दों को लेकर इतना ध्यान नहीं खीँचती जितना उस विषय या मुद्दे के ट्रीटमेंट को लेकर। राजस्थानी आबो-हवा, भाषा, बोली बानी और मन:स्थतियों विशेष का चित्रण इन कहानियों को विशेष बनाता है। अलग अलग कहानियाँ अलग- अलग तरह से आगे बढ़ती हैं। कहानी काअपने भीतर के देशकाल में आगे-पीछे होना, कहानी में रोचकता पैदा करता है। झमकू कहानी की शुरूआत झमकू के इस एहसास के साथ होती है कि आज शायद तबियत कुछ गड़बड़ है। “झाड़ू उठाया ही था कि धरती घूमती सी जान पड़ी। वह आँख मूँदकर आँगन में बैठ गई। कुछ देर बाद उठी तो जी मतलाने लगा।….”  एक समझदार पाठक को बताने की जरूरत नहीं कि यह सब किस बात का संकेत है। वह अनुमान लगा लेता है कि यह उसके गर्भवती होने का संकेत है। और उस पर “झूँठ हुआ तो? लोग हँसेगे! हँसे तो हँसे। बाकी रहा ही क्या है।” से पाठक को समझ आता है कि ऐसा बहुत कुछ है जो घटित हो चुका है उसे जानकर ही कहानी को पूरा जाना जा सकता है। फिर, धीरे धीरे पीछे की कहानी खुलती है, और वापस वर्तमान में आकर खत्म होती है। वहाँ पहुँचकर झमकू को ही नहीं बल्कि उसके साथ पाठक को भी असीम शांति मिलती है। “चौधरी का झुका सिर मुश्किल से उठा। आसमान में उमड़ती बादली चाँद को ढक रही थी। वह जल्दी-जल्दी हवेली की तरफ़ बढ़ा। उसके कानों में शूल-सी हँसी टकराई। उसने पलट कर देखा, झमकू पागल-सी खिलखिला कर हँस रही थी।” ‘बादली’ झमकू थी जिसने चाँद के दाग को ढ़क लिया थाऔर साथ में चाँद को भी। अपने इस पुरुषार्थ पर वह खिलखिला के हँस रही थी।

राजेन्द्र जी के यहाँ कहानियों के मामले में काफ़ी विविधता है। यह विविधता कहानी लिखने और कहने के ढंग में भी है और जो कहा जाना है उसे लेकर भी है। एक तरफ़ जैसाकि पहले भी कहा गया कि वे प्रेमचंद टाइप के कहानीकार हैं। जो, जो कहना चाहते हैं उस पर केन्द्रित रहते हैं। आलतू-फालतू के वर्णन और विवरण वहाँ नहीं होते। अब तक हमने जिन कहानियों पर बात की वे ऐसी ही कहानियाँ हैं। बेशक कहानी के देशकाल और पात्रों के भीतर के जज्बातों का चित्रण करने में वे काफ़ी समय लेते हैं। इससे पाठकों को कहानियाँ बहुत बेहतर ढंग से समझ आती हैं। पर सभी कहानियाँ इस तरह की कहानियाँ नहीं हैं। ‘अंतिम रामलीला’ अपने भीतर औपन्यासिक कलेवर लिये हुए हैं तो ‘दिल्ली के बादशाह के दुख’ बाणभट्ट की ‘कादंबरी’ का सा असर पैदा करती है।

‘अंतिम रामलीला’ आजादी के दौर का बहुत नया और देसी विश्लेषण प्रस्तुत करती कहानी है। अपने बीते इतिहास को देखने समझने की एक दम नई समझ देने वाली। यह हनुतपुरा गाँव की कहानी है। गाँव जो आजादी से पहले मुस्लिम तेलियों का गाँव होता था। यहाँ की जमीन में तिलहन, सरसों, मूँगफली की जबरदस्त खेती होती थी। उस इलाके की रानी साहिबा ने यह सब देख समझकर गाँव बसाया था। गाँव में खेती करने वाली जातियों के साथ-साथ तेलियों और विभिन्न शिल्पी जातियों को भी बसाया गया। सबसे ज्यादा काम फलाफूला तेलियों और रैगरों का था। खेती के लिए रेगिस्तान में चड़स की जरूरत थी। चड़स बनाने के लिए रैगरों की। जो बूढ़े और मरे बैलों का इस्तेमाल करके प्रकृति का इको सिस्टम बनाये रखते थे।  जल्द ही इन दोनों जातियों का वर्चस्व छा गया। उनकी हवेलियाँ बन गईं। गाँव बहुत खुशहाल था। गाँव में नहीं थे तो राजपूत, ब्राह्मण और महाजन। लेखक लिखता है कि बेशक देश गुलाम था पर गुलामी का दंश इस गाँव ने सीधे नहीं झेला थाऔर न ही किसी को ऊँच-नीच के कारण हटकार-फटकार की वेदना से गुजरना पड़ाथा। आपस में झड़पे हो जाती थीं पर उनपर जाति और धर्म का रंग नहीं था। पर यह सब बदल गया जब देश आजाद हुआ। भारत-पाकिस्तान का विभाजन हुआ, धीरे-धीरे बाहर की खबरें ( मुसलमानों पर अत्याचार और उनके द्वारा देश छोड़ कर जाने की ) तेलियों को बेचैन करने लगीं। अंतत: उन्होंने भी गाँव छोड़ कर जाने का निर्णय लिया। इसके बाद उनकी हवेलियों, मकानों और दुकानों को सरकार ने बाहर से आए ब्राह्मणों और बनियों को सौंप दिया गया। ये ब्राह्मण और बनिये अकेले नहीं आए इनके साथ आई हिन्दू धर्म की विभाजनकारी नीति। पहली बार गाँव वालों को पता चला कि कौन जात ऊँची है और कौन नीची।  इस तरह से राजेन्द्र सजल जी यह कहना चाहते हैं कि बेशक विभिन्न पेशों पर आधारित जातियाँ भारतीय गाँवों की सच्चाई है पर उनके बीच मनुस्मृति के विभाजन कारी सिद्धान्त बाद में थोपे गए। यह सब भारतीय गाँवों पर अंग्रेजों के समय, आजादी के दौरान विकसित हुआ। वे कहना चाहते हैं कि भारतीय गाँवों का जातीय वैर-भाव बनियों और ब्राह्मणों का पैदा किया हुआ है। क्योंकि अंग्रेजी शासन और छापेखाने के विकास ने न केवल लिखे शब्द की कीमत बढ़ा दी बल्कि उन जातियों की सामाजिक आर्थिक हैसियत भी बहुत बढ़ गई जो परपंरा से लिपि पढ़ना और लिखना जानती थीं।  उन्होंने रातोरात नए नए शास्त्र रच कर ऐसे प्रचारित कर दिये कि जैसे वे हमेशा हमेशा से जन सामान्य में मान्य थे।  खैर कहानी में केवल इतना ही नहीं है। वह रैगरों के अपने हक और  संघर्ष की कहानी भी है। कहानी का वितान बहुत विस्तृत और व्यापक है।  बनियों और ब्राह्मणों के बीच की राजनीति भी है। ब्राह्मणों की मक्कारी और बनियों की चतुराई भी है। गाँव की छोटी बड़ी करार कर दी गई जातियों के बीच फूट की राजनीति भी है।  सबसे बड़ी बात है गाँव के सरपंच ( जो जात से रैगर है।)  द्वारा ब्राह्मणों और बनियों की इस राजनीति और चतुराई को समझ कर उसका ऐसा तोड़ निकालना की वह शातिरपना बेअसर हो जाए। गाँव में चुनाव होते हैं और ब्राह्मण और बनियों की सारे षड़यंत्र के बाद भी चूहे रैगर का बेटा सरपंच बन जाता है। अब ब्राह्मणों और बनियों ने यह देख लिया है कि लोकतंत्र के चलते उन्हें राजनैतिक सत्ता सभी जातियों के साथ बाँटनी पड़ेगी। कहानी में ब्राह्मणों के नेता आचार्य जी और बनियों के नेता सेठ धनपत जी की बातचीत का नमूना देखिये।बनियों का नेता सेठ धनपत आचार्य जी से कहता है कि… “यह तो निश्चित है कि अब सत्ता मंदिर से निकलकर खेत-खलिहानों और कांकड़ पर बसी बस्तियों में चली जाएगी और हम देख रहे हैं, आज़ादी के बाद से ही कई संगंठन बन गए हैं। आए दिन उनके नेता राजनैतिक जागरुकता के लिए सभाओं का आयोजन करते रहते हैं। ऐसे में अब न तो उनको धर्म और शास्त्र का हवाला देख आप नियंत्रित कर सकते हैं और न ही अछूत कहकर किसी को बहिष्कृत कर सकते हैं।” आचार्य जी जवाब देते हैं “नहीं, ऐसा नहीं है। धर्मस्थलों का सत्ता शून्य होने का अर्थ है, निष्प्राण होना और यह कभी संभव नहीं है। हाँ, कभी कभी सत्ता अपने मार्ग से भटक जाती है। यह एक जंगली हथिनी की तरह होती है, जो न तो अनाड़ियों के काबू में आती है और न ही अपना पुराना आवास भूलती है, देखना एक दिन फिर लोट आएगी।” इसके लिए वे पूरी योजना बनाकर काम करते हैं। सबसे पहले गाँव के पिछड़ी जातियों (किसानों) और दलित जातियों के बीच एक दूसरे के खिलाफ़ एक नए संघर्ष को जन्म दे देते हैं। और दूसरी और धर्म को खाने कमाने का धंधा  बनाते हैं और गाँव वालों का आर्थिक शोषण करते रहते हैं। गाँव में होने वाली रामलीला केवल भगवान राम की लीला नहीं बल्कि बनियों और ब्राह्मणों की लीला है। गाँव की किसान जातियों और दलित जातियों के बीच रामलीला में ज्यादा से ज्यादा दान देने का कंपीटिशन करवा के दोनों से न केवल रुपये ऐंठते हैं बल्कि दोनों के बीच कभी न मिटने वाली विभाजक रेखा भी खींचते हैं। वर्तमान भारत में हम यह देखते ही हैं कि दलितों को जाति के नाम पर प्रताडित करने वाले ज्यादातर पिछड़ी किसान जातियों के ही लोग हैं। इस कहानी में  गाँव का सरपंच जो एक पढ़ा लिखा दलित युवक है इस चाल को समझ जाता है और वह रातोंरात उस रामलीला मंडली का तंबू वहाँ से उखड़वाकरफेंक देता है।और फिर कभी उस गाँव में रामलीला न करवाने का निर्णय लेता है। यहाँ आकर कहानी खत्म होती है।  वास्तव में मैंने जैसा कहा कि कहानी का कथानक इतना विस्तृत और व्यापक है कि उस पर उपन्यास लिखने की जरूरत थी। यूँ  भी कहानी पचास पेज तक फैली है। कहानी को पढ़ते हुए बार-बार पिछले पन्नों पर लौटने की जरूरत होती है। इतने सारे पक्ष और झरोखें हैं कि बहुत कुछ एक साथ मौजूद है। पाठक ‘जय भीम’ भी सुनता है। रैगरों के लिए ‘गंगापुत्र’ होने की व्याख्या भी सुनता है। हिन्दू-मुसलमान भी है तो गाँव के वे मुहावरे जो इस कहानी को उस गाँव विशेष हनुतपुरा की कहानी बनाते हैं।

“हो ग्यो म्याऊँ को सो मूँडों

थारी शान बिगड़गी जी

आंटी मूँछयाळी बालम

थारी ढीली पड़गी जी”

‘दिल्ली के बादशाह के दुख’ कहानी मृणाल पाण्डे के उपन्यास ‘हिमुली हीरामन की कथा’ की याद दिलाती है। दोनों कहानियों का कथानक वर्तमान की राजनीति और राजनैतिक हस्तियों पर केन्द्रित है। यह वास्तव में अपने समय के राजनैतिक इतिहास को लिखने का परंपरागत भारतीय अंदाज है।  स्वयं पत्रिका के संपादक संजीव चंदन की कुछ कहानियों में कथा कहने का यह अंदाज मिलता है। इसमें लेखक सूत्रधार य़ा नट और नटी की तरह कहानी सुनाना आरंभ करते हैं। “एक राजा था। लोगों का मानना था कि वह राजा कम बादशाह ज्यादा था। अत: वह बिना किसी बहस में पड़े यह घोषित कर चुका था कि जिसको जैसा लगे, मान सकता है उसको कोई आपत्ति नहीं हैं। ‘राजा साहब कहो या फिर बादशाह सलामत। फिर भी जब किसी के मुख से वह ‘जहाँपनाह ! संबोधन सुनता तो छाती दूनी हो जाती थी।” यह सबकुछ बहुत व्यंजना परक है।कथा लोककथा की तरह कही गई है। पर लेखक बराबर यह आग्रह करता रहता है कि यह कहानी सच्ची कहानी है।वास्तव में यह लोककथ कहने का ढंग ही है। “कहानी को आगे बढ़ाने से पहले मैं यह बताना उचित समझता हूँ कि यह कहानी मुझे मेरे दादाजी ने सुनाई थी। उस वक्त मेरे और दादाजी के बीच जो संवाद हुआ वह उतना ही रोचक और जरूरी है जितनी कहानी है।” किसी लोककथावाचक की तरह लेखक भी यह दावा करता है कि यह कहानी पीढ़ी दर पीढ़ी इसी तरह सुनाई जाती रही है। कहानी की सच्चाई के बारे में दादाजी कहते हैं कि “हाँ, मैं तुम्हें यह जरूर बता दूँ कि यह कहानी एक सच्ची कहानी है। भले ही इतिहास के पन्नों में इस कहानी के पात्रों और घटनाओं का कहीं जिक्र नहीं मिलेगा, किंतु एक सच्ची कहानी की यह विशेषता होती है कि जो भी उसको पढ़ता है या सुनता है वह उसकी अपनी हो जाती है। उसको लगता है कि यह मेरी या फिर मेरे समय की कहानी है।…” और सच में जब पाठक इस कहानी को पढ़ता है। तो अपने समय के राजनैतिक गलियारों में पहुँच जाता है।  इस तरह की कहानियाँ जो अपने समय के शासन और शासक की सच्चाईयों को अपने कथानक के दायरे में लेकर आती हैं वहाँ लेखक को यही शैली अपनानी पड़ती है। इस तरह की कहानियाँ इसी तरह लोककथा शैली में जादुई यथार्थ की तकनीक से कही जाती हैं। इस तरह की कहानियों में लेखक का ध्यान देशकाल और वातावरण को उसके यथार्थ में पकड़ने पर नहीं रहता। वह विवरण नहीं देता। वहाँ एक के बाद एक घटनाएँ कहानी को आगे बढ़ाती हैं। और पाठक बिना कोई सवाल किये कुतुहलवश आगे बढ़ता रहता है। यहाँ कहानी के भीतर एक नई कहानी है। बिल्कुल अलिफ़ लैला की तरह। हाँलाकि यहाँ आधुनिक कहानी का पक्ष कमजोर पड़ता है।

एक और कहानी है ‘कोख कोठरी और अनसुलझा रहस्य’।रहस्य और रोमांच से भरी यह कहानी राजेन्द्र सजल की कहानी कला का एक और नमूना है। जहाँ ‘मास्टर माई’ जैसी कहानियों में लेखक प्रेमचंद सरीखा कहानी को बहुत खोल कर एक एक बात समझाकर कहने वाला कहानीकार दिखता है वहीं इस कहानी में लेखक पूरी कहानी संकेतों में कहता है। उन संकेतों को पकड़कर और खोल पाने में सफ़ल होकर पाठक को एक अलग ही तरह का आनंद मिलता है। कहानी में एक नवाब साहब हैं जिनकी दो बीबियाँ हैं और है एक उनका घरेलू नौकर। बढ़ती उम्र के नवाब साहब की बीबियों से नौकर से बढ़ती नजदीकियाँ जहाँ नवाब साहब को बाप बनने का सुख देती हैं वहीं नवाब साहब का खानदानी खून उस नौकर की मौजूदगी से बार बार पछाड़ खा खाकर गिरता और उठता रहता है। उसी के कारण नवाब साहब भारत छोड़ कर पाकिस्तान जाने का निर्णय करते हैं। पर छोटी बीबी हैं कि वह उस नौकर को भी साथ लेकर चलना चाहती है।इसकी क्या वजह है इसे भी संकेतों में कहा गया है। अंत तक यह रहस्य सुलझ ही नहीं पाता कि असल में पाकिस्तान कौन दो लोग गए और किन दो लोगों को वहीं मारकर हवेली में ही बंद कर दिया गया। पाठक यहाँ अपनी सुविधा से कहानी को जिस तरह पढ़ना चाहें पढ़ सकते हैं। हो सकता है कि हवेली में मिलीं लाश छोटी बीवी और उस नौकर ही हो क्योंकि नवाब साहब उस नौकर को अपने साथ पाकिस्तान नहीं लेकर चलना चाहते थे, क्योंकि उसके सामने रहने से उन्हें हमेशा अपने नामर्द होने की याद आती रहेगी। हो सकता है वह लाश बड़ी बीबी और उस नौकर की हो क्योंकि उसबड़ी बहु का ही तो अवैध संबंध उस नौकर से था। यह भी तो हो सकता है कि वह लाश स्वयं बड़ी बीबी और नवाब साहब की ही हो, कहीं छोटी बीवी ने नौकर के साथ मिलकर उन दोनों की हत्या कर दी हो।  पाठक जिस दिशा में चाहे सोच सकता है, उसी के अनुसार उसे तर्क कहानी में मिल जाएँगे। इस तरह यह कहानी लगातार उसके जेहन में बनी रहेगी। यह इस कहानी की बहुत खास विशेषता है। इसके अलावा भारत पाकिस्तान के बँटवारे की पृष्ठभूमि में इस कहानी को जो खड़ा किया गया है उससे कहानी सच्ची होने का पूरा आभास देती है। बल्कि उसी के कारण कहानी जिंदा हो जाती है।  प्रसिद्ध शिक्षाविद् कृष्णकुमार ने अपने एक व्याख्यान में बच्चों को कहानी से कैसे जोड़ें इस मुद्दे पर विचार करते हुए कहा कि कहानी इस तरह कही चाहे कि बच्चों को कहानी, सच्ची लगे।  इसके उदाहरण के लिए उन्होंने अपने एक प्रयोग के बारे में बताया कि कैसे एक स्कूल के छोटे बच्चों को उन्होंने एक बार ‘बुढ़िया की रोटी’ कहानी सुनाई जिस दिन कहानी समाप्त हुई उस दिन वे अपने साथ रात की बासी रोटी ले गए और ले जाकर उस रोटी को उन्होंने यह कहकर अपनी मेज पर रख दिया कि यह उसी बुढ़िया की वही रोटी है जिसे कव्वा ले गया था।  बस फिर क्या था वह कहानी जैसे बच्चों के लिए जिन्दा अनुभव हो गई। वे उस रोटी को उसी विश्वास के साथ देख रहे थे हो न हो यही वह रोटी है। क्योंकि वह रोटी साक्षात सामने थी इसलिए उन्हें बुढ़िया और कव्वे की लड़ाई पर पूरा भरोसा हो गया। ठीक यही काम राजेन्द्र सजल जी ने अपनी इस कहानी के साथ किया कोख कोठरी और अनसुलझे रहस्य को भारत-पाकिस्तान के विभाजन की सच्ची घटना के बीच पिरो दिया।

रघुवीर सहाय की कविताओं में अभिव्यंजित कथा संसार

सुमित कुमार चौधरी

रघुवीर सहाय ‘दूसरा सप्तक’ में शामिल ऐसे विरले कवि हैं जिनकी कविताएँ स्वतंत्र भारत का दस्तावेजीकरण करती हैं । इनकी कविताएँ यथार्थ का देखा हुआ कटु सत्य का रूप लेकर भारतीय जन मानस की व्यथा का चलचित्र प्रस्तुत करती हैं । यूँ तो रघुवीर सहाय की कविताओं में अक्सर कथा का चित्र उभरता नज़र आता है, पर यह चित्र या चरित्र किसी खास नायक का प्रतिनिधि नहीं होता है । वह आम जनसाधारण के रूप में आया हुआ चरित्र होता है । उनके ईद-गिर्द से लिया गया । यही उनकी कविता का केन्द्रीय तत्व है । नायक है । यह नायक नयी कविता या उसे पूर्व की कविता से बिल्कुल भिन्न है । वह इसलिए कि इनकी कविताएँ अधिकतर घटना प्रधान होकर कथ्य की बुनावट में प्रस्तुत होती हैं । वे लोकतांत्रिक मूल्यों के विध्वंसकारी नीतियों और बिडम्बनाग्रस्त विसंगतियों का वास्तविक चित्र खींचते   हैं । ‘आत्महत्या के विरुद्ध’ कविता कथा की शक्ल में उसी की बानगी है । सुरेश शर्मा ने ‘रघुवीर सहाय रचनावली’ के पहले भाग की भूमिका में लिखा है, “ ‘आत्महत्या के विरुद्ध’ की कविताएँ रघुवीर सहाय के सिर्फ अपने अतीत से मुक्ति की कविताएँ नहीं हैं बल्कि पूरी काव्य परम्परा के यथास्थितिवादी माहौल से मुक्ति की कविताएँ हैं । उनमें नयी कविता के बाद ‘अकविता के ध्वंसवादी मूल्य और आत्महत्य की घोषणाओं के विरुद्ध एक जिम्मेदार हस्तक्षेप है ।”1 ‘आत्महत्या के विरुद्ध’ कविता अपने पूरे परिदृश्य में इसी विसंगति और विडम्बना को व्यक्त करते हुए जनसाधारण के जीवन को खबर की भाषा में पूरे नाटकीय अंदाज में प्रस्तुत करती है । इसमें चरित्रों का संगठन तात्कालीन राजनैतिक परिवेश को उद्घाटित करते हुए गहरे अर्थों में कथा की निर्मिति में सहायक होकर लोकतांत्रिक मूल्यों की ख़बर लेती है । एकदम खबर की शैली में होते हुए । सामाजिक और राजनीतिक यथार्थ की पेंच को उखाड़‌कर रख देती है-

“समय आ गया है जब तब कहता है सम्पादकीय

हर बार दस बरस पहले मैं कह चुका होता हूँ कि समय आ गया है ।

 

एक ग़रीबी, ऊबी, पीली, रोशनी, बीबी

रोशनी, धुन्ध, जाला, यमन, हरमुनियम अदृश्य

डब्बाबन्द शोर

गाती गला भींच आकाशवाणी

अन्त में टड़ंग ।”2

गौर करने वाली बात है कि ‘आत्महत्या के विरुद्ध’ कविता की शुरुआत पहली पंक्ति से ही अख़बारी बयान से शुरू होती है जबकि कविता की दूसरी पंक्ति में कवि वह सारी बातें पहले कह चुका होता है, जो दूसरी पंक्ति के बाद कविता में आयी है । गरीब, गरीबी से ऊबी जनता, जनता का मटमैला शरीर, घर की स्त्रियाँ या यह कह लें कि परिवार नामक संस्था में महत्वपूर्ण स्थान रखने वाली-बीबी । धुन्ध में सना हुआ परिवेश, जाला लगा हुआ या जाले में फँसा हुआ समाज और अदृश्य ध्वनि शोर में बदल चुके हैं, जिसमें आकाशवाणी भी गला भींचकर जनता से संपर्क करती है । रघुवीर सहाय की यह दृष्टि उनकी कविता का कथ्य होकर कथा के रूप में ढलती है । यह शोख़ी उनकी कविता की कथात्मक में शामिल होकर भारतीय जीवन के रंग-रूप की सूरत बयान करती है । कवि भारतीय राजनीति में व्याप्त धूर्त, भ्रष्ट और काइयाँ लोगों का परिचय करवाता हुआ ‘मुसद्दीलाल’ जैसे पात्र से अवगत कराता है-

“नगर निगम ने त्यौहार जो मनाया तो जनसभा की

मन्थर मटकता मन्त्री मुसद्दीलाल महन्त मंच पर चढ़ा

छाती पर जनता की”3

यानी जनता की छाती पर चढ़ा यह मुसद्दीलाल जैसा व्यक्तित्व हमारे राजनितिक दलाल का भ्रष्ट चरित्र है । वस्तुत: यह भ्रष्ट चरित्र हमारे समाज का प्रतीक मात्र है । इस तरह के चरित्र अपनी हरकतों से कभी बाज नहीं आते । इन्हीं लोगों की पैरवी से अस्पताल से लेकर, कोटा, सुविधाएँ, शिफ़ारिश तक उसी के मातहत होता है । यह स्थिति भारतीय जन‌मानस बहुत बारीकी से जानता और समझता है-

“दोनों, बाप मिस्तरी, और बीस बरस का नरेन

दोनों पहले से जानते हैं पेंच की मरी हुई चूड़ियाँ

नेहरू-युग के औज़ारों को मुसद्दीलाल की सबसे बड़ी देन”4  

मुसद्दीलाल जैसे चरित्र भारतीय राजनीति या नेहरूयुग की राजनीति के लोकतंत्रीय प्रणाली को दीमक की तरह चाट जा रहे हैं । यह अराजक व्यवस्था केवल नेहरूयुग की भयावहता को ही नहीं दर्शाता बल्कि कवि की दूरगामी दृष्टि वर्तमान और भविष्य को भी रेखांकित करती है । इस तरह का अनैतिक चारित्रिक पतन भारतीय परिवेश में इस तरह पसर गया है कि अस्पताल में भी कोई व्यक्ति सुरक्षित महसूस नहीं कर पाता  है । एक उदाहरण देखिए-

“अस्पताल में मरीज़ छोड़कर आ नहीं सकता तीमारदार

दूसरे दिन कौन बतायेगा कि वह कहाँ गया ।”5

ध्यान देने वाली बात यह है कि नयी कविता में इस तरह की संवेदनात्मक कविता नहीं मिलती । इस नयी पद्धति या संवेदन शैली की कविता ‘गायब होता देश’ की ओर संकेत करती है । अपने पूरे कथ्य-रूप में यह पूर्व की कविताओं से इकदम भिन्न और नये मिज़ाज की कविता है । ‘आत्महत्या के विरुद्ध’ की इसी अख़बारी विशिष्टता को रेखांकित करते हुए रामस्वरूप चतुर्वेदी ने लिखा है, “अख़बार, राजनीति, दैनंदिन जीवन-ये सामान्यत: कविता के प्रतिरोधी रूप माने जाते रहे हैं । उनके लिए गद्य और कथा-साहित्य ही उपयुक्त माध्यम समझे गये हैं । रघुवीर सहाय एक साथ इस व्यापक अनुभव परिवेश को बिना किसी ऊपर से दिखते उद्यम या कि प्रदर्शन के कविता बना देते हैं ।

यही चेतना ‘आत्महत्या के विरुद्ध’ में एक नयी अटपटी शैली में फैली है । टूटे फूटे, अलग थलग बिंबों में सामान्य जीवन की व्यवस्था नहीं बल्कि क्रूर अव्यवस्था का चित्र यहां प्रस्तुत किया गया   है । रोशनी, धुंध, जाला, यमन, हरमुनियम अदृश्य, ‘अकादमी की महापरिषद की अनंत बैठक’, ‘मंथर मटकता मंत्री मुस‌द्दीलाल’, ‘एक फटा कोट एक हिलती चौकी एक लालटेन’, ‘अंग्रेजी की अवध्य गाय’, ‘मुन्न से बोले बिनोवा से जैनेन्द्र’, ‘भौचक भीड़ धांय धांय’, ‘समय आ गया है’- ऐसे टुकड़े  समकालीन परिदृश्य को उतना उकेरते नहीं जितना सुझा देते हैं । इन टुकड़ों में अर्थ निश्चित नहीं, हां सहानुभूति निश्चित है । पूरी कविता के केन्द्र में जनता या कि लोग हैं जो हर अर्थ में कवि के लिए एक ‘मुश्किल’ हैं ।”6  

‘आत्महत्या के विरुद्ध’ कविता में कथा वाचक के रूप में कवि स्वयं उपस्थित है । भारतीय राजनीति के शिकार होते हुए जन की व्यथा को बहुत सजग होकर उद्‌घाटित करता है । वह अपने चारों ओर घट रही घटनाओं की विद्रूपता को भलीभाँति देख लिया है । तभी उसे बेचैनी छायी हुई है । वह ‘चिकनी पीठ’ वाले उदास व्यक्ति के पीठ पर हाथ नहीं रख पाता । यह बदतर हालत देखकर वह हृदय विदारक हो जाता है । फिर भी वह विद्रोही स्वर में बोल उठता है-

“कुछ होगा कुछ होगा अगर मैं बोलूँगा

न टूटे न टूटे तिलिस्म सत्ता का मेरे अन्दर एक कायर टूटेगा टूट

 

मेरे मन टूट एक बार सही तरह

अच्छी तरह टूट मत झूठमूठ ऊब मत रूठ

मत डूब सिर्फ टूट…”7  

कवि की यह निडर भावना कथा की वैचारिक नींव साबित होती है, क्योंकि कवि की यह धारदार ललकार ‘अंदर का कायर टूटने’ से ही ‘सत्ता के तिलिस्म’ को दरारे दे सकता है । कविता में इस तरह का वैचारिक आयाम कथा को समझने में महती भूमिका निभाता है । इस कविता के कथा को समझने के लिए ‘आत्महत्या के विरुद्ध’ कविता संग्रह के उस वक्तव्य को देखा जा सकता है जिसमें कवि लिखता है कि, “मैं कहानी, कविता या नाटक में बांटकर इस सवाल को आसान नहीं बनाना चाहता लेकिन इतना जरूर कहना चाहता हूँ कि तीनों में शब्द के तीन तरह के इस्तेमाल की वजह से रचना की मुश्किलें हमें तीन तरफ ले जाती          हैं ।……सबसे मुश्किल और एक ही सही रास्ता है कि मैं सब सेनाओं में लड़ूँ-किसी में ढाल सहित, किसी में निष्कवच होकर- मगर अपने को अंत में मरने सिर्फ अपने मोर्चे पर दूँ- अपनी भाषा के, शिल्प के और उस दोतरफा जिम्मेदारी के मोर्चे पर जिसे साहित्य कहते हैं ।”8 गौरतलब है कि रघुवीर सहाय के इस वक्तव्य से यह  स्पष्ट होता है कि वे ‘आत्महत्या के विरुद्ध’ के लिए तीन मुश्किलों में से शिल्प का एक अलग रास्ता चुनते हैं । यानी अपनी आँखों-देखी चल-चित्र को व्यक्त करने के लिए ख़बर का रास्ता चुनता है । इस शैली या शिल्प में उपरोक्त वक्तव्य में वे तीनों विधाएँ शामिल हैं जिनको कवि विभेद कर देखने से बचता है, और होता यह है कि ख़बर की शिल्प अपने आवरण में कथा के रूप को धारण करती चलती जाती है । चूँकि कवि की संवेदना लोकतांत्रिक समाज व्यवस्था के प्रति सचेत है । वह भाषा और शिल्प में यथार्थ को फेटकर जस का तस पेश कर देता है । शोषण, दमन और अत्याचार के गहराते रूप-चित्र को समग्रता में प्रस्तुत कर देता है । डॉ. माहेश्वर ने लिखा है कि, “रघुवीर सहाय कविता के मुख्य आशय के साथ आसपास के परिवेश में से संदर्भित तमाम छोटे-छोटे दृश्यखण्ड एकत्रित करते हैं और उन्हें कविता की केन्द्रीय संवेदना के आसपास फैला देते हैं । कविता का केन्द्रीय आशय उन छोटे-छोटे दृश्यखण्डों के बीच में से कहीं-कहीं चकाचौंध पैदा करता हुआ सा उभर आता है और उसके आलोक में वे तमाम धूमिल दृश्यखण्ड सार्थक तथा संदर्भगत दिखाई देने लगते हैं ।”9 यानी रघुवीर सहाय ‘आत्महत्या के विरुद्ध’ कविता में या यूँ कह लें कि उनकी कविताओं मे विराट भीड़ से उन चरित्रों और खण्ड-खण्ड दृश्यों का चुनाव करके उसे कथा की सूरत में ढ़ाल देते हैं । वस्तुतः यह स्थिति उनकी कविताओं में समय के मार से उपजी त्रस्त जनता की है, जिसमें लोकतांत्रिक मूल्यों के क्षरण से उपजी हुई है । तभी वे कविता के अंत में कहते हैं-

“समय जो गया

मेरे तलुवे से छनकर पाताल में

वह जानता हूँ मैं ।”10

रघुवीर सहाय की कविताओं में चरित्र और चित्र का एक कोलाज देखा जा सकता है । उनके यहाँ घटना प्रधान कविताओं का बाहुल्य है । ऐसा नहीं है कि जिन कविताओं में घटनाएँ प्रमुख रूप से आयीं हैं वह कथा के मानिंद खरी नहीं उतरती । बल्कि इस तरह की कविताएँ कथा का रूप लेकर नये कवियों से भिन्न रूप ली हुई हैं । इसलिए रघुवीर सहाय के यहाँ कथा-नायक की जगह ‘चरित्र’ को केन्द्र में रखकर उसकी सार्वभौमिक महत्ता को पूरी संवेदना के साथ दर्ज़ करते हैं, जबकि अधिनायकवादी चरित्र  की महत्ता को अपने पैरो तले रौंदते हुए चलते चले जा रहे है । रघुवीर सहाय की एक कविता है ‘अधिनायक’ जिसमें ‘हरचरना’ भारत-भाग्य-विधाता का गुणगान करता है-

“राष्ट्रगीत में भला कौन वह

भारत-  भाग्य-  विधाता है

फटा सुथन्ना पहने जिसका

गुन  हरचरना  गाता  है ।”11

यह अधिनायकवादी चरित्र भारतीय राजनीति का है जिसमें एक व्यक्ति प्रतीक के रूप में ‘फटा सुथन्ना’ पहनकर पूरे जनसाधारण की व्यथा को व्यक्त करता है । यह साधारण जन अधिनायकवादी शासन व्यवस्था से इतना डरा हुआ है कि उसका ‘बाजा रोज बजाता है’ यानी वह हर क्षण व्यवस्था का  शिकार होता है । अर्थात् वह गुलामी प्रथा की बोझ से दबा है । यह छोटी सी कविता, जो सोलह पंक्तियों में सिमटी हुई है, वह हरचरना के माध्यम से आजाद भारत के बेहाली (साधारण जन) की कथा-व्यथा पूरी संवेदन रूप में प्रस्तुत करती है । इतना ही नहीं हत्या, अपराध की असल कथा कविता में रघुवीर सहाय बड़े निडर होकर लिखते हैं । वे ‘रामदास’ कविता में ‘रामदास’ की हत्या का ज़िक्र करते हैं कि हत्यारा ‘उसे बता दिया गया था कि उसकी हत्या होगी’ और यह हत्या, हत्या की शक्ल में बदल गई । यह हत्या किसी धनाढ्य व्यक्ति की नहीं बल्कि साधारण जन की हत्या है । एक की हत्या नहीं बल्कि बहुसंख्यकों को हत्या है । कवि यहाँ ख़ुद वाचक के रूप में होकर इस हत्या-अपराध को हूबहू दर्ज़ करता है । इस सिलसिलेवार कथा की कड़ी में अगर देखा जाय तो रघुवीर सहाय की तमाम ऐसी कविताएँ हैं जो कथा का रूप ली हुई हैं, जिसमें ‘रामदास’, ‘दयाशंकर’, जैसी कविताएँ शामिल हैं । इन कविताओं को  सही मायने में हम कथांश के रूप में देख सकते हैं । चूँकि रघुवीर सहाय के यहाँ ऐसे तमाम छोटे-छोटे चित्र, चलचित्र, दृश्य खण्ड, घटना उनकी कविता में कथात्मकता एवं कथांश का आवरण लिए हुए हैं । लीलाधर जगूड़ी ने अपने कविता संग्रह ‘महाकाव्य के बिना’ की भूमिका में लिखा है कि, “पहले और आज की कविता में यह लगभग एक ध्रुवीय अंतर है । अब कविता में नायक नहीं होते, व्यक्ति होते हैं । कोई स्थापित और लोक प्रचलित कथा नहीं होती । अनुभव और अनुभूति का आवेग ही अपने कथानक को रचता चलता है । घटनाएँ और स्थितियां ही बिम्ब बन जाती हैं । मनुष्य का व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन कई स्तरों पर विघटित व विकसित होता है । उनकी सघन और गहरी प्रस्तुति लंबे फॉर्म में ही संभव है ।”12 लीलाधर जगूड़ी के इस कथन को रघुवीर सहाय की कथा प्रधान कविताओं के सन्दर्भ में रखकर देखना सार्थक प्रतीत होता है । रघुवीर सहाय ही नहीं बल्कि सारे नए कवियों के यहाँ उक्त कथन की सार्थकता देखी जा सकती है । बहरहाल, रघुवीर सहाय नायक के मिथ को तोड़ते हुए ‘चरित्र’ की केन्द्रीयता को महत्व देते हैं । यह उन‌की कवि दृष्टि का संवेदन सूत्र है । चूँकि आजादी के बाद हमारे समाज में ऐसे तमाम चरित्र चारों ओर बिखरे पड़े हुए थे जिस पर गहरी दृष्टि रघुवीर सहाय ने डाली और हुआ यूँ कि साधारण जन कविता की केन्द्रीयता में उचित स्थान पाने लगें । जैनेन्द्र, रामदास, लोहिया, मुसद्‌दीलाल, बिनोवा, नरेन, प्रधानमंत्री, मंत्री, जैसे तमाम चरित्र कविता में आकर कथा तत्व की बुनावट में सहयोगी सिद्ध हुए ।

संदर्भ सूची-

  1. संपादक- सुरेश शर्मा, रघुवीर सहाय, रचनावली भाग-1, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2000, पृ. सं. 19.
  2. 2. रघुवीर सहाय, आत्महत्या के विरुद्ध, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 1967, पृ. सं. 19.
  3. 3. वही, पृ. सं. 19-20.
  4. 4. वही, पृ. सं. 22.
  5. 5. वही, पृ. सं. 22.
  6. 6. रामस्वरूप चतुर्वेदी, नयी कविताएँ : एक साक्ष्य, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, 2015, पृ. सं. 42-43.
  7. 7. रघुवीर सहाय, आत्महत्या के विरुद्ध, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 1967, पृ. सं. 20-21.
  8. 8. संपादक- सुरेश शर्मा, रघुवीर सहाय, रचनावली भाग-1, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2000, पृ.  सं. 103.
  9. 9. संपादक- नरेन्द्र मोहन, लंबी कविताओं का रचनाविधान, दि मैकमिलन कंपनी आफ इंडिया लिमिटेड, नई दिल्ली, 1977, पृ. सं. 144.
  10. 10. रघुवीर सहाय, आत्महत्या के विरुद्ध, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 1967, पृ. सं. 25.
  11. 11. वही, पृ. सं. 49.
  12. 12. लीलाधर जगूड़ी, महाकाव्य के बिना, किताबघर प्रकाशन, नई दिल्ली, 1996, पृ. सं. 8.

लेखक का परिचय – 
सुमित कुमार चौधरी
झेलम छात्रावास, 
शोधार्थी- जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली-110067

बहुरिया रामस्वरूप देवी

प्रियंका प्रियदर्शिनी
बिहार बलिदान की वह ऐतिहासिक धरती है जिसने जंग-ए-आज़ादी में ईंट का जबाब पत्थर से दिया है। आज़ादी के दीवानों ने गांधी के सत्याग्रह को तो अपनाया ही साथ में क्रांतिकारी तेवर को भी अपनाए रहे। यही कारण रहा की बिहार की धरती पर गांधी व भगतसिंह दोनों के कदम पड़े।
1857-1947 के बीच हुए स्वतंत्रता संग्राम के विभिन्न आंदोलनों में महिलाएं मजबूती से डटी रही हैं। हजारों-हजार महिलाओं ने शहादत दी तब जाकर देश ने आज़ादी पाई है। भारत की आज़ादी के लिए देश में दो प्रमुख रास्ते बन गए थे। एक रास्ता गांधी व कांग्रेस के साथ जाता था तो दूसरा भगतसिंह के हथियारबंद क्रांतिकारी मार्ग पर। बिहार की महिलाएं दोनों रास्तों पर चलीं। क्रांतिकारी मार्ग पर चलने का ही नतीजा था कि बिहार के छपरा जिले के मलखाचक गांव के क्रांतिकारी पुरुष राम विनोद सिंह का घर डायनामाइट से उड़ा दिया गया और छपरा की ही क्रांतिकारी तेवर की महिला ‘बहुरिया रामस्वरूप देवी’ के घर को भी अंग्रेजों ने आग के हवाले कर दिया था।
देश के इतिहास में केवल एक लक्ष्मीबाई की चर्चा की गयी और बाकियों को भुला दिया गया। बिहार की महिलाओं के इतिहास को उठाकर देखने पर पता चलता है यहां हजारों लक्ष्मीबाई का जन्म हुआ और हजारों बलिदान दिए गए। यहां शहादत देने वाली महिलाओं के समक्ष कोई राज-पाठ नहीं था, थी तो केवल देशभक्ति की भावना। अन्याय के विरुद्ध लड़ने का साहस और निःसंकोच आज़ादी की बलि बेदी पर प्राण न्योछावर करने का दृढ़ संकल्प। बिहार में ऐसी ही क्रांतिकारी तेवर की एक महिला हुईं ‘बहुरिया रामस्वरूप देवी’। बहुरिया रामस्वरूप देवी वह महिला थीं जिन्होंने बिहार में क्रांतिकारी तेवर की अगुआई की। उस निडर और बहादुर महिला ने न तो कभी स्वयं को अंग्रेज़ो के समक्ष झुकने दिया न ही उनसे डरकर अपने प्रण से पीछे हटी। अपने लक्ष्य में दृढ़ता से लगी रही और 18 अगस्त 1942 को छपरा के मढौरा थाने पर राष्ट्रीय ध्वज(तिरंगा) फहराया। गंगा जिस धरती को सिंचित करती हो वहाँ की फसलें और नस्लें दोनों कमाल करती हैं। शायद यही कारण रहा कि पर्दे में रहने वाली महिलाएं जब घरों से निकलीं तो गंगा का ओज और वेग साथ लिए निकलीं। रूढ़िग्रस्त और सामंतवादी ताकतें भी उनकी धारा नहीं मोड़ पायीं।
बहुरिया का जन्म भागलपुर जिले के कहलगांव थानांतर्गत बसे मुहान गांव में हुआ था। पिता श्री भूपनारायण सिंह भागलपुर जिले के ज़मीदार थे। बहुरिया का बचपन तो जमीदारी ठाट-बाट में बीता लेकिन बड़ी होने पर उन्होंने अपने लिए क्रांति का कठिन मार्ग चुना। अंग्रेजी, उर्दू और हिंदी भाषाओं की प्रारंभिक शिक्षा उन्हें दी गयी थी। पिता अपनी पुत्री को शिक्षित करना चाहते थे इसलिए उन्होंने बहुरिया को आगे भी पढ़ाया-लिखाया। उन्होंने मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण किया और व्यवहारिक विषयों की शिक्षा में भी निपुण हुईं। बाल विवाह के उस दौर में रामस्वरूप देवी का विवाह भी नौ वर्ष की आयु में छपरा स्थित अमनौर के श्री हरमाधव प्रसाद से करा दिया गया। पिता के घर की ही तरह पति का घर भी सम्पन्न माना जाता था। अमनौर के जमींदार परिवार में उनका विवाह हुआ था। पति हरमाधव बाबू देशभक्त निकले, वे आज़ादी के आंदोलनों में भाग लेते थे व आज़ाद ख़याल व्यक्ति थे। लेकिन ससुराल के बाक़ी सदस्य परंपरागत पर्दे को मानने वाले थे। ससुराल में पति के प्रगतिशील विचार व व्यक्तित्व ने बहुरिया जी को सहज बनाया। ऐसा माना जाता है कि वह बचपन से ही क्रांतिकारियों की टोली में रहती थीं और उनके कामों में हाथ बटाती थीं। उन्होंने क्रांतिकारी साहित्य भी पढ़ रखा था। शादी के पश्चात वह पति के साथ भी हर सामाजिक गतिविधियों में भाग लेने लगीं।
विभिन्न आंदोलनों में बहुरिया जी की भागीदारी
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ब्रिटिश गुलामी के ख़िलाफ़ भारत में महत्वपूर्ण आंदोलन हुए, उन आंदोलनों में महिलाएं सक्रिय रूप से अपना योगदान दे रही थीं। रामस्वरूप देवी ने हुकूमत के विरुद्ध हुए तीन महत्वपूर्ण आंदोलनों में भाग लिया। उन्होंने सन 1921 के सविनय अवज्ञा आंदोलन में, 1931 के नमक सत्याग्रह व 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लिया था।
1921 के सविनय अवज्ञा आंदोलन में रामस्वरूप देवी ने अपनी साहस और शिक्षा का परचम लहराया। ऐसा माना जाता है कि पूर्व बिहार से लेकर पश्चिम बिहार के कई क्रांतिकारी दलों के साथ उनका संबंध था, वे गुप्त रूप से क्रांतिकारियों की मदद करती थीं व उन्हें संरक्षण देती थीं। इस आंदोलन में वो खुलकर सामने आयीं और अंग्रेजी शासन को भारत से उखाड़ फेंकने के लिए सत्याग्रह में शामिल हो गयीं। उन्होंने गांव-गांव में जाकर युवकों व महिलाओं के बीच राष्ट्रीय चेतना की चिंगारी भड़काई। इस अवज्ञा आंदोलन में भाग लेने के दौरान उन्हें बंदी बनाकर भागलपुर जेल में डाला गया था। बाद में जब उन्हें रिहा किया गया तब वे और अधिक जोश के साथ आंदोलनों में सक्रिय हो गयीं। 1921 ई. में गया जिले में अखिल भारतीय नारी कांग्रेस अधिवेशन का आयोजन किया गया था। बहुरिया जी के मजबूत इरादों व कुशलता से लोग पहले ही प्रभावित थे, उन्हें इस सभा के संचालन की जिम्मेदारी दी गयी। उन्होंने अधिवेशन में उत्तेजक भाषण दिए और लोगों को अंग्रेज़ो के विरुद्ध एकजुट होने को कहा। भारत की औरतों के लिए बहुरिया का संदेश था, “मर्दों की गुलामी से मुक्त होने के लिए यह आवश्यक नहीं कि उद्दंडता से काम लें। अपने कर्तव्य को पहचान कर आगे बढ़ो। यह मत भूलो कि तुम नारी हो और ममतामयी मां हो। हां! नारी व मां की आड़ में सुरक्षा ओढ़कर बेकार मत बैठो। एक पहिये की गाड़ी कितना रास्ता तय करेगी? दूसरा पहिया उसमें जुड़ना ही चाहिए। वह इतने स्वस्थ रूप में जुड़े कि जरा सा भार पड़ने पर चरमरा न जाए।”
बहुरिया के ये शब्द महिलाओं में ऊर्जा भर रही थी और अंग्रेज सिपाहियों के दिलों में खौफ़। एक महिला से खौफ़ खाने का ही वह मंजर था कि अधिवेशन के बाद उन्हें तीक्ष्ण व भड़काऊ भाषण देने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया।  गिरफ्तारियां बहुरिया को कभी डरा नहीं सकी न ही उन्हें उनके लक्ष्य से डिगाने में सफल हुईं। वे छपरा जिले में लगातार सक्रिय रहीं। अंग्रेजों के विरुद्ध होने वाली लड़ाइयों में प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से शामिल रहीं। 1930 के नमक सत्याग्रह आंदोलन के वक्त वे अपने जिले में एक प्रभवशाली महिला के रूप में उभरीं। यह वह समय था जब सम्पूर्ण भारत में नमक आंदोलन ने क्रांति की लहर पैदा कर दी थी। महात्मा गांधी ने दांडी से सत्याग्रह की शुरुआत की थी और वह सत्याग्रह दक्षिण से शुरू होकर पूरे उत्तर भारत में फ़ैलने लगा था। अनेक सत्याग्रहियों पर लाठी बरसाए जा रहे थे, उन्हें जेलों में बंद किया जा रहा था। आंदोलनकारियों व नमक कानून भंग करने वालों को बंदी बनाया जा रहा था। इस क्रांति की लहर में क्रांतिकारी तेवर वाली बहुरिया जी का पीछे रहना मुश्किल था। वे पति के साथ नमक सत्याग्रह में शामिल हुईं। इस आंदोलन में उनके पति श्री हरिमाधव प्रसाद की गिरफ्तारी हुई। पति की गिरफ्तारी ने उन्हें आक्रोशित किया और उनके सब्र का बांध तोड़ दिया। अब बहुरिया गांवों में घूम-घूमकर लोगों को आज़ादी की लड़ाई में अंग्रेजों के खिलाफ एकजुट होने को कहने लगीं। उन्होंने महिलाओं को आह्वान किया और कहा “उठो, जागो मेरी बहनों। जब देश पर संकट आ पड़ा हो तो हमें घर के भीतर रहना शोभा नहीं देता।” बहुरिया के इन प्रयासों और ख़िलाफ़त से अंग्रेजी सरकार घबराने लगी थी, अतः उसने बहुरिया को भी 1 जनवरी 1931 को जेल में डाल दिया।
इस बार जब बहुरिया जी को गिरफ्तार करके भागलपुर सेंट्रल जेल ले जाया जा रहा था तब एक ऐसी घटना घटी जिसे इस बात का सबूत माना जाना चाहिए कि रामस्वरूप देवी के विराट व्यक्तित्व की गहरी छाप जनता के मन पर थी-
आशारानी व्होरा ने अपनी पुस्तक ‘महिलाएं और स्वराज्य’ में लिखा है कि रामस्वरूप देवी को गिरफ्तार कर के जिस गाड़ी से जेल ले जाया जा रहा था, जनता उसके आगे लेट गयी और गाड़ी को रोक लिया। अंग्रेजी सिपाहियों के बहुत कोशिश के बाद भी जब जनता हटने को तैयार न हुई तो उनके अफसर ने भीड़ को कुचलकर गाड़ी निकाल लेने का आदेश दिया। अब स्थिति इतनी गंभीर हो गयी थी कि बहुरिया जी से चुप न रहा गया। उन्होंने उस अंग्रेज अफसर से चीखकर पूछा, ‘क्या मेरी इच्छा के बिना आप मुझे एक कदम भी आगे ले जा सकते हो? जब अंग्रेजी अफसर ने कोई जबाब नहीं दिया और निरुत्तर खड़े रहे तब उस दृढ़ संकल्पित महिला ने जनता का आह्वान किया, “मेरे वीर भाइयों, यह कैसी वीरता दिखा रहे हैं आप? यह वीरता नहीं नादानी है। सोचो तो, स्वर्ग से बढ़कर हमारी मातृभूमि आज गैरों के क़ब्जे में है। उसे छुड़ाने के लिए हजारों-लाखों नश्वर शरीरों के बलिदान की जरूरत है। यह मेरी गिरफ्तारी तो बहुत मामूली सी बात है। जाइये आपलोग भी आज़ादी की बलिबेदी पर न्योछावर होने के लिए तैयार रहिए।”
बहुरिया जी के कहने पर लोग उठकर एक तरफ खड़े हो गए। श्रद्धा से लोगों का माथा झुक गया और अंग्रेजी गाड़ी आगे बढ़ गयी। उनकी गिरफ्तारी से लोगों में क्षोभ था लेकिन अच्छी बात यह हुई की इसबार उन्हें अधिक दिन तक जेल में नहीं रहना पड़ा। गांधी-इरविन समझौते के तहत अन्य कैदियों के साथ उन्हें भी रिहा कर दिया गया।
छपरा क्रांतिकारियों की धरती रही है। यहाँ के महिला-पुरुष भगत सिंह के क्रांतिकारी विरासत के उत्तराधिकारी रहे हैं। यही कारण रहा कि रामस्वरूप देवी बलिदान की बातें इतनी सहजता के साथ कहा करती थीं।। उन्होंने मानो अपनी जान हथेली पर लेकर चलना मंजूर कर लिया था।  1937 ई. में बहुरिया जी के पति श्री हरिमाधव प्रसाद की मृत्यु हृदयाघात से हो गयी। पति की मृत्यु उनके लिए सिर्फ़ सुहाग का जाना नहीं था बल्कि उन्होंने अपना सबसे क़रीबी साथी को खोया था। पति की मृत्यु का दुःख असहनीय तो था लेकिन इस दुःख को बहुरिया ने कभी स्वयं पर हावी नहीं होने दिया। क्योंकि वो जानती थीं की उन्होंने जो रास्ता चुना है वो बलिदानों की मांग करती है। उस विराटा स्त्री को अभी अपने जीवन के मुख्य लक्ष्य की प्राप्ति करनी थी जो अंग्रेजों को भारत से भागकर ही पूरी की जा सकती थी।
1942 का वह वर्ष भारतीय इतिहास में अगस्त क्रांति के नाम से भी मशहूर है। यह वह साल था जब भारत की सम्पूर्ण ताकत अंग्रेज़ो के विरुद्ध एकजुट हो गयी थी और विद्रोह अपने उच्चतम स्तर तक जा पंहुचा था। न सिर्फ पुरुष बल्कि देश की महिलाएं,बड़े-बूढ़े, बच्चे,छात्र-नौजवान आदि ने ठान लिया था कि अब स्वराज्य लेकर ही मानेंगे। 1942 ई. के भारत छोड़ो आंदोलन में ‘करो या मरो’ के नारे के साथ पूरे देश में एक ज्वाला भभक उठी थी। बिहार में इसकी लपटें बहुत ऊंची उठी।
9 अगस्त 1942 ई. को लोकनायक जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में पटना की सड़कों पर हजारों छात्र-नौजवान सर पर कफ़न बांधकर निकल पड़े। रामस्वरूप देवी छात्र-नौजवानों के उस जुलूस में शामिल हुईं और इंकलाब जिन्दाबाद, वन्दे मातरम, भारत माता की जय आदि नारे लगाते हुए आगे बढ़ीं। बिहार के घर-घर से निकले उन वीर सपूतों को डराना और उनका हौसला तोड़ना अंग्रेजों के लिए एक चुनौती हो गयी थी। सात नौजवानों की एक टोली हाथों में तिरंगा लिए पटना के सचिवालय से यूनियन जैक का झंडा उतारकर तिरंगा फहराने को जब आगे बढ़ी तो अंग्रेज अपने क्रूरतम रूप में सामने आए। बौखलायी अंग्रेज़ी सेना ने सीधे नौजवानों के  सीने पर गोलियां दागी। एक-एक कर सातों नौजवानों ने बलिबेदी पर चढ़कर शहादत दी। इस घटना ने पूरे बिहार की जनता को भाव विह्वल किया। चारो ओर असंतोष की लहर दौड़ गयी। लोगों ने आर-पार की लड़ाई के लिए कमर कस ली। बहुरिया उन सात शहीदों के मौत का बदला लेने का ठान चुकी थीं। इस घटना के बाद वे आरा, छपरा, बलिया आदि जिलों में लोगों के बीच जाकर क्रांति की चिंगारी सुलगाने लगीं। छपरा जिले में क्रांति का मशाल लेकर वो अगली पंक्ति में खड़ी हो गयीं।
18 अगस्त 1942 ई. का दिन था रामस्वरूप देवी ने अपने हाथों से छपरा जिले के मढौरा थाने पर तिरंगा फहरा दिया। तिरंगा फहराने के बाद निकट स्थित उधोग परिसर के बाहर हो रही जनसभा में शिरकत किया। वहां वो जनसभा को संबोधित करने लगीं कि अंग्रेजी पुलिस दल वहां आ पहुंची और बिना बात किये ही सभा में मौजूद स्त्री-पुरुष, बच्चे-बूढ़े सबपर गोलियां चलाने लगी। हथियारों से लैस विदेशी सिपाहियों ने अंधाधुंध गोलियों की वर्षा की। लोग भागकर आस-पास के खेतों में छिपने लगें, जो न भाग सके वे मारे गए। लेकिन बहुरिया मैदान में डटी रहीं तभी गोलियों की बौछार से पेड़ की एक डाल टूटकर गिरी। लोगों ने जाना बहुरिया को गोली लग गयी। इस भ्रम ने लोगों के खून में उबाल भर दिया। देखते ही देखते फसलों में छिपे हजारों लोग बाहर निकल आये। क्रोध में तिलमिलाए लोगों ने जो कुछ ईंट-पत्थर मिला उससे गोरे सिपाहियों पर टूट पड़े। क्रुद्ध भीड़ ने सात गोरे सिपाहियों को मौत के घाट उतार व शेष को मैदान से भगाकर पटना में हुए सात शहीदों की शहादत का बदला लिया।
मारे गए सिपाहियों की लाशों को तुरंत उठाकर पत्थरों से बांधकर लोगों ने नारायणी नदी में डूबा दिया। प्रकृति ने भी क्रूर अंग्रेजों के विरुद्ध भारतीयों का साथ दिया। उस दिन खूब वर्षा हुई जिससे खून के सभी धब्बे मिट गए। सारे सबूत नष्ट कर दिए गए थे जिस कारण मुकदमा नहीं चल सकता था। बदला लेने के लिए अंग्रेजों का दमन चक्र शुरू हुआ। 22 अगस्त 1942 को अंग्रेजों द्वारा बहुरिया जी के घर में आग लगा दी गयी। उनके सभी सामान जला दिए गए। पूरे गांव में अंग्रेजी सिपाहियों ने डेरा डाल दिया था। दिन भर वे घरों, खेतों और बागों में बहुरिया को ढूंढते रहते थे पर उन सिपाहियों को बहुरिया कहीं नहीं मिलीं क्योंकि जनता अपनी जान पर खेलकर भी उनकी रक्षा के प्रति कटिबद्ध थी।
अंत में अंग्रेजी सत्ता ने कांग्रेस पर दबाब बनाना शुरू किया। कांग्रेस का गुप्त संदेश पाकर बहुरिया समर्पण के लिए सामने आ गयीं। उनपर मुकदमे चलाकर उन्हें लम्बी सज़ा काटने के लिए भागलपुर जेल में भेज दिया गया। आख़िरकार 15 अगस्त 1947 ई. का वह दिन भी आया जिसके लिए जाने कितने देशप्रेमियों ने अपने लहू बहाए, शहादतें दी और जेलों की यातनाएं सही। आज़ादी की ख़बर सुन बहुरिया ने अपने स्वप्न को साकार पाया। जेल से बाहर आने के बाद वे फिर से राजनीतिक गतिविधियों में सक्रिय हो गयीं। आज़ाद भारत के 1952 में हुए प्रथम आम चुनाव में रामस्वरूप देवी विधानसभा के लिए खड़ी हुईं। इस चुनाव में उनके ख़िलाफ़ छः प्रतिद्वंदियों ने चुनाव लड़ा। स्थिति यह हुई की छहों प्रतिद्वंदियों की जमानतें जब्त हो गयीं। बहुरिया के व्यक्तित्व ने जो छाप जनता के दिलों में छोड़ी थी उसी का नतीजा था कि वे अपार बहुमत से जीतकर विधानसभा की सदस्य हुईं। उन्नत भारत का स्वप्न देखने वाली और उसके लिए काम करने वाली उस महान वीरांगना को दुर्भाग्यवश आगे देश सेवा का अवसर प्राप्त न हो सका। वो चुनाव तो जीत गयीं लेकिन प्रकृति के नियमों के अनुसार उन्हें जीवन से हार जाना पड़ा।
संघर्ष के रास्तों पर चलकर कभी उनका हौसला नहीं टूटा लेकिन नश्वर शरीर कमजोर पड़ता गया। चुनाव के बाद वो बीमार पड़ गयीं और 29 नवम्बर 1953 की सुबह बिहार की उस सिंहनी के प्राण टूट गए।
राजद समाचार से साभार 

कथाकार राजेन्द्र सजल के कथा संग्रह ‘अंतिम रामलीला’ पर परिचर्चा

रिपोर्ट
प्रस्तुति – अरुण कुमार  

आम्बेडकरवादी लेखक मंच के तत्वावधान में दिनांक 7 अगस्त 2022 को राजेंद्र सजल की कहानियों की पुस्तक ‘अंतिम रामलीला’ पर परिचर्चा का आयोजन नेहरू युवा केंद्र, आईटीओ, दिल्ली  के सभागार में किया गया |  इस अवसर पर प्रमुख वक्ताओं के रूप में प्रो.गोपाल प्रधान, अध्यक्ष जनसंस्कृति मंच,  अनीता भारती, अध्यक्ष दलित लेखक संघ, प्रो. रजनी दिसोदिया, संस्थापक समय संज्ञान पत्रिका, संजीव चन्दन, संस्थापक स्त्रीकाल , प्रो. प्रमोद मेहरा, अध्यक्ष यूथ फेडरेशन ऑफ़ वर्ल्ड पीस एवं स्वयं लेखक राजेंद्र सजल उपस्थित थे |  संजय सहाय, संपादक हंस अपनी अस्वस्थ्यता के चलते कार्यक्रम में उपस्थित नहीं हो पाए | कार्यक्रम का सञ्चालन युवा कवि और आलोचक अरुण कुमार ने किया तथा धन्यवाद ज्ञापन शोध छात्रा पूजा सूर्यवंशी ने किया |

संचालक अरुण कुमार ने कार्यक्रम की भूमिका प्रस्तुत करते हुए बताया कि आम्बेडकरवादी लेखक मंच अपनी स्थापना से दलित साहित्य को लेकर गंभीर कार्य कर रहा है | इसी कड़ी में राजेंद्र सजल की सशक्त कहानियो को हिंदी की दुनिया से परिचित करवाने हेतु इस परिचर्चा का आयोजन किया गया है | इन कहानियों पर परिचर्चा  इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि लेखक की पहली कहानी ‘झमकू’ लगभग 20 वर्ष पूर्व दैनिक भास्कर में तथा दूसरी कहानी मधुरिमा में प्रकाशित हुई थी, उसके बाद पत्र-पत्रिकाओं में दस्तक दिए बिना ही सीधे अपनी पुस्तक में संकलित कहानियों के माध्यम से हिंदी साहित्य में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज करवायी है | लेखक का कहानी कौशल इतना जबरदस्त है कि आज नहीं तो कल आपको इन कहानियों से रूबरू होना पड़ेगा |

वक्ताओं में अपनी बात रखते हुए प्रो. रजनी दिसोदिया ने कहा कि राजेंद्र सजल सजग कहानीकार है | ये कहानी की बुनावट पर ज्यादा सोचते है | उन्होंने पुस्तक की भूमिका में इसे स्पष्ट रूप से कहानी की बुनावट पर बात की है, यह सोचना ही उन्हें अन्य लेखकों से अलग बनाता है | हम लोग दलित साहित्य के सौंदर्यशास्त्र से परहेज करते है जबकि इस पर बात होनी चाहिए | इन कहानियों में जो स्थायी भाव है वह रस में परिणत हो जाता है | राजेंद्र सजल की कहानियों को भी दलित साहित्य के सौंदर्यशास्त्र की दृष्टि से परखा जाना चाहिए | सजल की कहानियों में यथार्थ की अभिव्यक्ति है, ऐसा लगता है कि ये कहानियां आपके आसपास घट रही है | ‘इत्ती सी बात’ कहानी आपको बेहद भावुक कर देती है तो ‘मास्टर माई’ कहानी हमें हमारे घर के बुजुर्गों की समस्या से आँखे चार करवाती है | ‘अंतिम रामलीला’ कहानी एक दृष्टि, एक विश्लेषण की कहानी है जो कि अलग से एक चर्चा की मांग करती है | कुछ अर्थों में राजेंद्र जी प्रेमचंद जैसे कहानीकार लगते है, वह प्रेमचंद की तरह ही पाठक फ्रेंडली है | संग्रह की सभी कहानियां बेहद महत्वपूर्ण और पठनीय है |

प्रो. प्रमोद मेहरा ने बताया कि इस समय रीडरशिप की समस्या प्रगाढ़ हो चुकी है, कॉन्टेक्स्ट बड़ा चैलेंजिंग हो चुका है, रंगहीन, स्वादहीन की तरफ पाठक नहीं जाता है | 1.4 बिलियन लोगों के देश में क्या कहानियां आ रही है ? यह सोचना पड़ेगा | हमारी कितनी कहानियां अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बना पाती है ? जबकि कहानी साहित्य की बेहद सशक्त विधा है | उन्होंने कहा कि जब द्वितीय विश्व युद्ध के समय  हिरोशिमा और नागासाकी पर एटम बम गिराया गया  तब शहरों की एक सूची बनी थी उसमें क्योटो शहर का भी नाम था, लेकिन बम गिराने वालों ने क्योटो शहर पर बम नहीं गिराया क्योंकि उसके किसी सदस्य ने क्योटो की खूबसूरती को किसी कहानी में पढ़ा था | गैटे ने भी अन्तरराष्ट्रीय साहित्य की बात की है | राजेंद्र सजल की ‘अंतिम रामलीला’ कहानी  प्रतिनिधि कहानी है, यह किसी गाँव की समस्या न होकर वर्तमान भारत की समस्याओं को केंद्र में रखती है | इसी प्रकार की कहानी ‘दिल्ली के बादशाह के दुःख’ है | ये कहानियां वैश्विक परिप्रेक्ष्य की कहानियां है और इनका अनुवाद अन्य भाषाओँ में होना चाहिए | स्वयं प्रमोद जी ने भी कहानी के अनुवाद करने की जिम्मेदारी भी ली |

स्त्रीकाल के संपादक, आलोचक संजीव चन्दन ने कहा कि संग्रह की कहानियां लेखक ने मुझे भूमिका लिखने हेतु प्रेषित की थी | भूमिका में ही मैंने बेहद जिम्मेदारी के साथ लिखा है कि ‘राजेंद्र सजल हिंदी कथा साहित्य की एक उपलब्धि होने वाले है’| इस बात की तस्दीक यहाँ मेरे पूर्व के वक्ताओं ने की है और बाद के वक्ता भी करेंगे | संजीव ने आगे कहा की हिंदी वाले बेहद अनुदार किस्म के लोग है | यहाँ अनुवाद की परंपरा को और अधिक मजबूत होना चाहिए खासकर भारत की अन्य भाषाओं से | राजेंद्र सजल वर्धा के साथी रहे है,वर्धा ब्राह्मणों के लिए ब्राह्मणों द्वारा संचालित विश्वविद्यालय है | बहुत से संघर्षों में के सजल साथी रहे, मित्रता का दबाव भी होता है मगर उनकी कहानियों को पढ़कर कोई भी दावा कर सकता है | ‘इत्ती सी बात’ कहानी में जो फेमिनिस्ट स्टेटमेंट है वही कहानी को महत्वपूर्ण बनाता है | सजल लोककथाओं से लोक परम्पराओं से उर्जा लेते है , उनकी शैली कहीं कहीं पर उन्हें विजयदान देथा के समकक्ष खड़ा कर देती है | इस संग्रह की सबसे अच्छी कहानी मुझे ‘कोख और कोठरी: अनसुलझा रहस्य’ लगी | ब्राह्मणवाद की सटीक पहचान उन्होंने संग्रह की प्रतिनिधि कहानी में की है | सजल वैचारिक रूप से संपन्न कहानीकार है, सभी कहानियां उम्दा है|

दलित लेखक संघ अध्यक्ष अनीता भारती ने अपना वक्तव्य देते हुए कहा कि सजल की कहानियां चकित करती है| लम्बी कहानियों की अपेक्षा छोटी कहानियां ज्यादा प्रभावित करती है | ‘अंतिम रामलीला’ कहानी में मुझे ‘जय भीम’ नारे को लेकर काल क्रम का दोष लगता है | इस कहानी का गाँव राजेंद्र जी का अपना गाँव लगता है | कहानियों में पात्रों का चयन बड़ी सजगता से किया गया है | इनकी कहानियों में स्त्री-पुरुष सम्बन्ध बहुत ही सहज रूप में आता है जो कि कहानियों की विशेषता है | इस संग्रह की सबसे सशक्त कहानी मुझे ‘रखवाला’ लगी | रखवाला की  ‘सुसली’ संग्रह की सबसे सशक्त स्त्री पात्र है |  ‘झमकू’ कहानी में बाँझपन की समस्या को चित्रित किया है | झमकू कहानी की स्त्री द्वारा यह निर्णय लिया जाना कि मैं अपने गाँव वापस नहीं जाऊँगी राजस्थान के जातिवादी, पितृसत्तात्मक समाज में बहुत बोल्ड डिसीजन है | ‘बावली’ कहानी स्त्री विमर्श की कहानी है, वही ‘काला भूत’ कहानी दलित विमर्श की कहानी है | भाषा की दृष्टि सभी अत्यंत मजबूत कहानियां है, ठेठ राजस्थानी भाषा का इस्तेमाल, कहानी की विश्वसनीयता को बढ़ाते है| प्रत्येक कहानी में राजस्थान की गंध है |

प्रो. गोपाल प्रधान ने अपनी बात रखते हुए कहा कि राजेंद्र सजल की कहानियां हिंदी कहानी की मुख्यधारा में बड़ा हस्तक्षेप है | इसके लिए हमें वर्तमान हिंदी की कहानी को देखना समझना पड़ेगा | कहानी में मुख्य उपस्थिति शहर की है और नवउदारवाद के दौर में हमारे पास यथार्थ मीडिया के जरिए आता है | इसने हमारे अनुभव जगत को बेहद सीमित कर दिया, समकालीन कहानी में यह एक ब्लाईंड स्पॉट की तरह है |  इसने पाठक की संवेदना का विस्तार नहीं होने दिया | राजेंद्र की कहानियों में यह यथार्थ अपनी पूरी भयावहता के साथ उपस्थित है | भाषा के मामले में  फणीश्वर नाथ ‘रेणु’ ने जो शुरू किया उसे राजेंद्र ने आगे बढाया है, भाषा में यथार्थ पूरी तरह उभरकर आया है | इन कहानियों में स्त्री समुदाय लड़ते हुए, जूझते हुए, बेहद सशक्त रूप से चित्रित हुआ है जैसे गोदान में होरी प्रमुख पात्र है मगर ‘धनिया’ की तेजस्विता अन्यतम है | ‘अंतिम रामलीला’ कहानी कलर्डस्कोपिक  बहुरंगी यथार्थ की कहानी है जो कि मुझे बहुत पसंद है | सभी कहानियों में एक प्रकार की औपन्यासिकता है |  

अपनी कहानियों की रचनात्मकता और शिल्प पर बात करते हुए कहानीकार राजेंद्र सजल ने अपने जीवन के संघर्षों के बारे में रूबरू करवाया | उन्होंने बताया कि मेरे पैदा होने पर जब मेरे पिता मेरी कुंडली के बारे में पूछने के लिए पंडित के पास गए तो पंडित  दोपहर तक पिता से खेत में बेगार करवाते रहे, पंडित के मनमुताबिक कार्य न होते देख कर उसने मूलो में पैदा होना बताया तथा माता-पिता के लिए कष्टकारी बताया| जिसके चलते बचपन से ही माता-पिता का स्नेह मुझसे छिन गया और मुझे मेरी बड़ी बहन ने पाला |  कक्षा नौ तक आते आते पंजाब ईंट भट्ठे पर काम करने पहुँच गया | इस प्रकार संघर्षों की आँच में तपकर बाहर निकला | उन्होंने कहा कि ये मेरी कहानियों का यथार्थ मेरे इर्द गिर्द बिखरा हुआ पड़ा है, जो अभी तक की कहानियों में व्यक्त हुआ है यह प्रारंभिक स्तर का है | अभी बहुत कुछ आना बाकी है |

इस परिचर्चा में भाग लेने राजस्थान से आए रामस्वरूप रावत ने कहा कि ग्रामीण परिवेश में व्यक्ति क्या भोगता है वह शहर में बैठा आदमी महसूस नहीं करता है, लेकिन इस गोष्ठी में आकर मेरी यह धारणा बदली है | यहाँ विचार और मानसिकता अद्भुत समावेश देखने को मिला है | कार्यक्रम में धन्यवाद ज्ञापन पूजा सूर्यवंशी ने किया | इस परिचर्चा में  प्रसिद्द इतिहासकार एवं आम्बेडकरनामा के संस्थापक डॉ. रतन लाल, कवयित्री रजनी अनुरागी, नाटककार राजेश कुमार, कवि जावेद आलम खान, कवि समय सिंह जौल, कवयित्री संतोष देवी,शोध छात्रा संगीता झा,अजय कुमार, मनीषा, लारैब अकरम, द मूकनायक की संस्थापक मीना कोटवाल, राजा चौधरी सहित कई गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे |