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ब्राह्मणवादी पितृसत्ता पर बहुजन लेखिकाओं ने की बातचीत: बहुजन साहित्य संघ का आयोजन

डॉ. मिथिलेश, आरती यादव, कनकलता यादव और कविता पासवान

27 और 28 सितम्बर 2019 को ‘बहुजन साहित्य संघ’के तत्वाधान में आयोजित‘बहुजन महिला सम्मेलन’ का आयोजन जे.एन.यू. नई दिल्ली में सफलता पूर्वक सम्पन्न हुआ। महिला वक्ताओं ने बहुजन समाज की जटिलताओं और अंतर्विरोधों पर अपनी बात रखी और आज की परिस्थितियों को देखते हुए बहुजन एकता पर बल दिया ताकि देश की विभाजनकारी शक्तियों से लड़ा जा सके ।

पहले दिन‘आदिवासी महिला’ विषय पर परिचर्चा हुई । पैनल चर्चा में गोमती बोदरा, आईसां उरांव, स्नेहलता नेगी, आईवी हांसदा आदि ने भाग लिया और उन्होंने आदिवासी दर्शन, समाज के साथ नवपूँजीवादी संक्रमण के तहत आदिवासी स्त्रियों की समस्यायों पर बातचीत की । नेगी जी ने लद्दाख के किन्नौरी समुदाय की विशिष्टताओं, संस्कृति से हमें परिचित कराया । गोमती जी ने झारखण्ड के सन्दर्भ में नशाखोरी, जमीन के मुद्दे पर अपनी बात रखी। प्रीति मरांडी जी ने आदिवासी पत्रिका के हवाले से झारखण्ड के संथाल स्त्रियों की समस्यायों को रेखांकित किया । आदिवासी स्त्रियाँ सशक्त हैं। वह अपने निर्णय काफ़ी हद तक स्वयं ले सकती हैं, कभी कभी उनकी सशक्तता ही उनकी कमज़ोरी बन जाती है । उनके सरल, सहज स्वभाव का मतलब गैर आदिवासी गलत अर्थों में लगाते हैं और उनकी आज़ादी को भी गलत अर्थों में लेते हैं । अनीता मिंज जी ने यह बताया कि किस प्रकार आदिवासी स्त्रियों की स्वतंत्रता का अर्थ सिर्फ़ दैहिक सम्बन्ध तक सीमित समझ लिया जाता है जबकि वह अपनी स्वतंत्रता को जीती हैं । उनके रोजमर्रा के अभ्यास में यह शामिल होता है । वह मुख्यधारा की स्त्रियों से ज़्यादा स्वतंत्र और आत्मनिर्भर हैं, यहाँ उस प्रकार की समस्याएँ नहीं हैं जो दलित स्त्रियों की समस्याएँ हैं ।

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मेरी पूर्ति जी ने कामगार आदिवासी महिलाओं से संबंधित समस्यायों पर अपनी बात रखी तथा उनके दैहिक, आर्थिक शोषण को रेखांकित किया । दलालों के द्वारा घरेलू काम के लिए लाई गईं इन आदिवासी स्त्रियों को उनके काम के पैसे भी नहीं मिलते । जागृति पंडित ने डायन प्रथा के पहलू पर बात करते हुए यह स्पष्ट किया कि यह बाहर से आदिवासी समाज को कमज़ोर करने के लिए लाया गया एक टूल है जिसमें उसी स्त्री को शिकार बनाया जाता है जो सबसे सशक्त होती हैं । दलित आदिवासी के अंतर्संबंध पर प्रियंका सोनकर जी ने अपनी बात रखी और दलित समुदाय की स्त्रियों के शिक्षा के क्षेत्र में पिछड़ेपन का कारण ग़रीबी और पितृसत्ता को माना ।

आदिवासी समाज की मुख्य समस्या जीविका से जुड़ी हुई है। हर समुदाय की अलग-अलग परम्पराएँ और रीति रिवाज हैं लेकिन जो चीज़ सारे आदिवासी समुदायों में देखने को मिलती है, वह है उनका जीवन दर्शन । जो प्रकृति पर निर्भर है और उसी में वह रहना पसंद करते हैं । ज़ंगल, पशु, पक्षी उनकी जीवन-शैली का हिस्सा हैं और जब मुख्यधारा की विकास की अवधारणा वहाँ पहुँचती है तो वह अपने नियम उस समाज पर थोपने की कोशिश करते हैं ।

दूसरे दिन राउंड टेबल कार्यक्रम का संचालन सविता माली ने निराला की काव्य पक्ति ‘वह तोड़ती पत्थर’ से करते हुए किया कि जो स्त्री मौन होकर पत्थर तोड़ रही थी, उस स्त्री ने आज बोलने का साहस किया हैं। वक्ताओं में डा. मिथिलेश, डॉ. शीला, पूनम गुप्ता, सोनम मौर्या, रेणु चौधरी, रेणु चौहान, ललिता बघेल और आरती यादव इत्यादि ने बहुजन समाज की एकजुटता की आवश्यकता पर जोर  देते हुए बहुजन स्त्रीवाद की जरूरतों पर भी बल दिया।

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डॉ. मिथिलेश ने 20 वीं शताब्दी की लेखिका चन्द्रकिरण सौनरेक्सा की कहानियों के माध्यम से दलित-मुस्लिम समाज में व्याप्त गरीबी और संघर्ष को रेखांकित करते हुए उसे समकालीन समस्यायों से जोड़ा । 20 वीं शताब्दी में दलित वर्ग की महिलाएँ जिन समस्याओं से जूझ रही थीं, 21वीं शताब्दी में भी उन्हीं सब समस्याओं से जूझती हुई नजर आ रही हैं ।उन्होंनेजातिवादी ढाँचेको तोड़े जाने पर बल दियाऔर सामाजिक-राजनीतिक एकता की आवश्यकता बतलाई ।पूनम गुप्ता ने ब्राह्मणवादी ताकतों द्वारा अलग- अलग जाति और धर्मो में बाँट दिए गए बहुजन समाज की महिलाओं-पुरुषों को एक मंच पर आकर अपनी समस्याओं को एक दूसरे से साझा करना और उसका समाधान करना बहुजन साहित्य संघ का उदेश्य बताया ।बहुजन पुरुषों को अपने पितृसत्तात्मक संस्कारों को छोड़कर आगे आना चाहिए । आरती यादव ने 19 वीं शताब्दी के साहित्य में बहुजन स्त्रियों की अनुपस्थिति का सवाल उठाया और उस क्षेत्र में शोध कार्य किये जाने की महती आवश्यकता बताई । इसी क्रम में हिन्दू शब्द पर बात करते हुए ये कहा कि हिन्दू या हिंदुत्व के नाम पर ब्राह्मणवादी विचारों का ही प्रसार करने की चाल को गहराई से समझने की ज़रूरत है।सोनम मौर्या ने अपने अनुभवों को साझा करते हुए पिछड़े वर्गों में व्याप्त जातिवादी विकृतियों के बारे में अपनी बात रखी । पिछड़ी जातियों में जिस तरह से ब्राह्मणवादी व्यवस्था का दख़ल है, इस पर सोनम ने बहुत गम्भीरता से प्रकाश डाला ।रेणु चौहान ने दलित जीवन के संघर्षों को अपने अनुभव के आधार पर साझा करते हुए मुहावरा और लोकोक्तियों के माध्यम से हरियाणवी समाज की स्त्रियों की बेबाकी को रेखांकित किया । उन्होंने बहुजन समाज को एक अम्ब्रेला के नीचे आने की अपील की ताकि आज की परिस्तिथियों में एक साथ मिलकर लड़ा जा सके|

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कार्यक्रम के दूसरे सत्र पैनल डिस्कशन में अनीता भारती, रजनी अनुरागी, आफ़रीन, स्नेहाशीष, राबिया नाज़ और नीतिशा ख़लखो ने बहुजन स्त्रियों की समस्याओं पर प्रकाश डाला । अनीता भारती जी ने यह प्रश्न रखा कि जिस तरह से दलित साहित्य का अपना कुछ खास उद्देश्य है क्या बहुजन वैचारिकी भी किसी खास उदेश्य को लेकर है? क्या जिस तरह से दलित साहित्य ने ईश्वर की सत्ता को नकारा है, बहुजन समाज के अन्य लोगों में भी ईश्वर की सत्ता को न मानने का साहस है? उसका स्रोत क्या होना चाहिए? इन सवालों के माध्यम से बहुजन वैचारिकी के अंतर्विरोधों के साथ उसकी जरूरतों पर भी बल दिया । मुख्यधारा के इतिहासकारों ने दलित, मुस्लिम, पिछड़ी, आदिवासी  समाज की समस्याओं और इतिहास में उनकी उपस्थिति को नज़रअंदाज किया है अत: आज यह ज़रूरी हो गया है कि बहुजन समाज की नायिकाओं/ नायकों के संघर्षों को सामने लाया जाए और यह काम बहुजन के मंच से बखूबी किया जा सकता है।

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रजनी अनुरागी जीने स्त्रियों को संसाधनों से बेदख़ल करने की ब्राह्मणवादी पितृसत्ता की नीतियों पर सवाल उठाते हुए इस बात पर जोर दिया कि स्त्रियों को भी संसाधनों पर अधिकार दिया जाना चाहिए ।आफ़रीन जी ने सत्ता द्वारामुस्लिम समाज को राजनैतिक कुचक्रों का शिकार बनाये जाने और मौलिवियों द्वारा इस्लाम की आधी-अधूरी व्याख्या किए जाने पर रोष जताया।  राबिया नाज़ जी ने उर्दू साहित्य के माध्यम से मुस्लिम समाज की स्त्रियों की समस्याओं को उठाने का प्रयास किया । मीना कोटवाल जी ने पत्रकारिता के क्षेत्र में दलित स्त्रियों के साथ हुए भेदभाव पर अपनी बात रखी । उन्होंने कहा कि आज भी अपनी दलित पहचान की वजह से दलित समाज को तिरस्कार झेलना पड़ता है। स्नेहाशीष ने यह सवाल किया कि आख़िर वह कौन सी ताकत है जो हमें यह बताती है कि हम स्त्री या पुरुष हैं? उन्होंने कहा कि जाति की वैचारिकी पर ही जेंडर विभाजन हुआ है। इसलिए यह जरूरी है कि जाति व्यवस्था को ख़त्म किया जाए।

आजकल की ख़बरों में जो इस प्रकार की घट्नाओं को दिखाया जाता है कि आदिवासी की हत्या ओबीसी कर रहा है और इनको एक दूसरे के विरोध में खड़ा किया जा रहा है । इस पर भी प्रश्न-सत्र में परिचर्चा की गयी और ये निष्कर्ष निकाला गया कि सत्ता वर्ग किस प्रकार बहुजन एकता को नष्ट करने की कोशिश कर रहा है । हमें इन सत्ताधारी सर्पों से सचेत रहने की ज़रूरत है । यह वक़्त की ज़रूरत है कि तमाम मतभेदों के बावजूद आपसी संवाद और राजनीतिक एकता बेहद ज़रूरी है तथा सत्ता तंत्र के बिछाए जाल से बचने की ज़रूरत है ।

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अमेज़न क्यों जला?

विक्रम कुमार

आप आदिवासियों को लोकतांत्रिक मूल्य नहीं सिखा सकते. बल्कि आप लोगों को उनसे लोकतांत्रिक परंपराए सीखनी चाहिए. वे इस धरती पर सबसे ज्यादा लोकतांत्रिक लोग हैं.” मरांग गोमके जयपाल सिंह मुंडा द्वारा संविधान सभा में दिए भाषण का एक अंश है.

आज जब अमेज़न का जंगल जला दिया गया इसकी वजह क्या थी वहां कौन लोग रहते थे, किनके घर उजड़े उस आग से वहां रहने वाले विभिन्न प्रकार के जीवजंतु और आदिवासीयों के. वहां रहने वाले ना जाने कितने आदिवासी मारे गए, यह सिर्फ अमेज़न की बात नहीं है, भारत में भी जब दिकु (बाहरी) लोग आते हैं तब भी यही होता है उनको बल छल से उनको उनके स्थान से भगा दिया जाता है उनकी हत्याएं की जाती है. फिर मिथकीय कथाओं के द्वारा उनको समाज में घृणित स्थान दे कर उनको समाज का दुश्मन ठहरा दिया जाता है, जयपाल सिंह मुंडा संविधान सभा में कहते हैं “मैं भूला दिए गए उन हजारों योद्धाओं की ओर से बोल रहा हूँ जो आजादी की लड़ाई में आगे रहे. लेकिन उनकी कोई पहचान नहीं है. देश के इन्हीं मूल निवासियों को पिछड़ी जनजाति, आदिम जनजाति, जंगली, अपराधी कहा जाता है. श्रीमान मैं बताना चाहता हूँ कि मुझे जंगली होने पर गर्व है. इस देश के अपने हिस्से में हम इसी नाम से पुकारे जाते हैं”

फोटो: BBC

ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री पॉल कीटिंग ने अपने रेडफर्न पार्क भाषण में कहा कि ऑस्ट्रेलियाई आदिवासी समुदायों को लगातार झेलनी पड़ रही समस्याओं के लिए यूरोपीय आप्रवासी ज़िम्मेदार थे: ‘हमने हत्याएँ कीं, हमने बच्चों को उनकी माताओं से छीन लिया, हमने भेदभाव और बहिष्कार किया।

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आखिर क्यों सभी को आदिवासियों की ज़मीन चाहिए? क्योंकि इनके जमीन के नीचे खजाना है ये खजाना कोयला उरेनियम अब्रख धातुओं के अयस्क और ना जाने कितने खनिज संपदाओं के रूप में है इन सब के लिए आदिवासीयों को उनकी जमीनों से बेदखल कर दिए जा रहे हैं उनकी हत्या कर उनका जमीन लूटा जा रहा है ये हत्या कभी प्रायोजित भीड़ द्वारा तो कभी पत्थलगड़ी को असंवैधानिक बोल कर तो कभी ग्रीनहंट के नाम पर सत्ता द्वारा की जा रही है झारखण्ड में कई ऐसे मामले आये सामने आये हैं. आज झारखण्ड में सबसे ज्यादा आदिवासी देशद्रोह के केस में जेलों में बंद हैं. वैसे ही एक दिन अमेज़न के आदिवासीयों को बोल दिया जायेगा की तुमलोग गैर अधिकारिक रूप से जंगलों में कब्ज़ा किये हुए हो और सब पे फर्जी मुकदमा चला कर जेल में डाल दिए जायेंगे और जो विरोध करेगा उसे मार दिया जायेगा.

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आज दुनिया भर में आदिवासियों पर खतरा मंडरा रहा है पूंजीवादी सत्ता का. भारत में ब्राह्मणवादी व्यवस्था पहले से ही आदिवासीयों को हिन्दू बता कर उनकी संस्कृति उनकी पहचान को ख़त्म कर रही है और आरएसएस बीजेपी जैसे ब्राह्मणवादी फासीवादी हिन्दूवादी संगठन आक्रामक रूप से उनको शारीरिक और मानसिक रूप से ख़त्म करने की प्रक्रिया में है. जिसे हम जंगल, नदी, पहाड़ों के रखवाले के तौर पर जानते हैं क्या वो थे में बदल जायेंगे? हम जानते हैं की अमेज़न के जंगल का 60% हिस्सा ब्राजील में आता है बांकी का अन्य देशों में. BBC अपने एक रिपोर्ट में बताती है की अमेज़न के जंगलों में इस साल आग लगने की रिकॉर्ड 75000 घटनाएं दर्ज की गई है और यह ब्राजील का सरकारी आंकड़ा भी है, नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर स्पेस रिसर्च (इनपे) ने अपने सैटेलाइट आंकड़ों में दिखाया है कि 2018 के मुकाबले इसी दरम्यान आग की घटनाओं में 85 प्रतिशत की वृद्धि हुई है. रिपोर्ट बताती है की अमेज़न के जंगल में वनस्पति और जीव जंतुओं की 30 लाख प्रजातियां और 10 लाख मूलनिवासी निवास करते हैं.

यहाँ की आदिवासी महिलायें एक स्तन से अपने बच्चे को दूध पिलाती है तो अपने दुसरे स्तन से गिलहरी के बच्चों दूध पिलाती वो तब तक स्तनपान कराती है जब तक वह बच्चा बड़ा ना हो जाए, ये आदिवासी महिलाएं उन बच्चों को अपने बच्चों की तरह देखभाल करती है, ये लोग हमारे धरती के पहले लोग हैं जिनका पूरी धरती पे अधिकार होना था आज उनका अस्तित्व खतरे में पड़ गया है. जयपाल सिंह मुंडा कहते हैं “पिछले छः हजार सालों से अगर इस देश में किसी का शोषण हुआ है, तो वे आदिवासीयों का हुआ है। उन्हें मैदानों से खदेड़कर जंगलों में धकेल दिया गया और हर तरह से प्रताड़ित किया गया,”

अमेज़न के जंगल में लगी आग एक सोची समझी साजिश है वहां के ज़मीन पर कब्ज़ा करने की और वहां के आदिवासियों को ख़त्म करने की प्रकृति को ख़त्म करने की. आज प्रकृति और उनके रखवाले दोनों को बचने की बहुत जरुरत है.

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कुछ अल्पविराम

रंजना बिष्ट

जाने माने कथाकार व कवि सच्चिदानंद जोशी की पुस्तक  ‘कुछ अल्पविराम’ यात्रा संस्मरणों और रोजमर्रा की जिन्दगी से जुडी छोटी-छोटी घटनाओं का एक संकलन है। जिस प्रकार भाषा में अल्पविराम का बड़ा महत्व है वैसे ही मनुष्य का जीवन भी है जिसकी दिशा और दशा तय करने में छोटी-छोटी घटनाओं का भी बड़ा योगदान होता है। एक संवेदनशील मनुष्य अपने आस-पास के वातावरण से ही प्रेरणा प्राप्त करता है। किसी बड़े टर्निंगप्वाइंट का इन्तजार नहीं करता।

आज मनुष्य कई प्रकार की समस्याओं से जूझ रहा है। यह समस्याएं व्यक्तिगत भी हैं और सामाजिक भी। मनुष्य के विकासक्रम में उसके घर-परिवार और शिक्षा का बड़ा योगदान होता है। मगर यह सामाज की विडंबना ही है कि संयुक्त परिवार की जगह एकलपरिवार ने ले ली है और शिक्षा व्यवसाय बन कर रह गई है। किराए के सूपरमैन-इस कहानी के माध्यम से लेखक ने शिक्षा व्यवस्था पर कड़ा प्रहार किया है, जो बच्चों का न तो सही मार्गदर्शन कर पा रही है और ना ही मानवीय मूल्यों का विकास। अंग्रेजी शिक्षा के वर्चस्व ने हमारी संस्कृति और सभ्यता की जडों को इस कदर खोखला कर दिया है कि अपनी मातृभाषा भी हम भूल गए हैं। ‘विदेश में हिन्दी के अनुभव‘ इसबात की ओर संकेत करती है। लेखक का अपनी मातृभाषा हिन्दी के प्रति समर्पण साफ झलकता है जब वह कोपेहेगन में संतअल्बन के एंग्लिक चर्च में प्रवेश करते वक्त अंग्रेजी की जगह हिन्दी के पत्रक की मांग करते हैं।

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‘हवाई यात्रा’ के जरिए जहां एक ओर उन्होंने मनुष्य से उसकी स्वाभाविकता छीन लेने वाली आडंबरपूर्ण आधुनिक जीवन शैली पर तंज कसा है वहीं दूसरी ओर ‘स्वतंत्रता दिवस’ लालबत्ती पर झंडे बेचती लड़की के जरिए आजादी के इतने दसक बाद देश के चिंताजनक हालातों की ओर संकेत किया है जहां आज भी नन्हें हाथों में कलम की जगह मजदूरी है।

धर्मनिरपेक्षता-मंदिर और मजार में भिखारियों का जिक्र करते हुए उन्होंने यह जाहिर किया है कि आमजन मान सस्वभाव से धर्मनिरपेक्ष होती है। वह अल्लाह और ईश्वर दोनों पर समान रूपसे आस्था रखती है।

लेडी श्रवण कुमार-भारतीय समाज की इस विडंबना की ओर संकेत किया है जहां पुरूष कोई कार्य करता है तो उसे समाज उसकी सराहना करता है। श्रवण कुमार की सेवा भक्ति का जिक्र हर एक की जुबान पर मिलता है। मगर हमारे देश में महिलाएं सेवाकर्म बरसों से करती आ रहीं हैं। मगर घर-परिवार हो या समाज सबने उसके योगदान को नजरअंदाज किया है।

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कथाकार डॉ. सच्चिदानंद जोशी के संस्मरणों के केन्द्र में जो पात्र हैं वह गरीब और आमजन हैं। जैसे भिखारी, कुली, वृद्ध महिला, ड्राइवर, गार्ड और बच्चें हैं हमारा तथाकथित सभ्य समाज जिनकी परवाह नहीं करता उनके प्रति चिंतन करना यह वास्तव में संवेदनशीलता है जो एक व्यक्ति को सामान्य मनुष्य से कवि, लेखक और रचनाकार बनाती है।

‘कुछ अल्पविराम’ में लेखक ने अपनी बात बहुत ही सरल और सहज ढंग से कही है। अनावश्यक रूप से अलंकृत शब्दों का प्रयोग नहीं किया है। हिन्दी भाषा जनसाधारण की भाषा बनी रहे इस बात का विशेष ध्यान रखा गया है। यह साहित्य और गैर-साहित्यिक दोनों तक रह के पाठक को पसंद आएगी।

पुस्तक- कुछ अल्पविराम
लेखक- सच्चिदानंद जोशी
प्रकाशक- प्रभात प्रकाशन, 4/19 आसफअली रोड, नईदिल्ली
मूल्य-150

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गिरह

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नवल किशोर कुमार
(लेखक फारवर्ड प्रेस, दिल्ली के हिंदी संपादक हैं)

यार विजय, यह बहुत अच्छा है कि तुम आज की पीढ़ी के साथ इतना अच्छा तालमेल बिठा लेते हो। नई पीढ़ी चाहे जैसे जिये, उन्हें आजादी मिलनी ही चाहिए। कहां एक हम थे कि न बचपन अपने हिसाब से जी सके, जवानी का तो पता ही नहीं चला कि कब आयी और कब जिम्मेवारियों का बोझ देकर बिना बताये रूखसत हो गयी। मान गए बॉस, तुम क्या शानदार जीवन जी रहे हो।
ऐसा नहीं है साथी। बीयर का एक लंबा घूंट हलक में उतारने के बाद विजय ने शंकर से कहा। जिम्मेदारी तो मेरे पास भी है। सुगंधा की जिम्मेदारी तो है ही। अभी तो वह कॉलेज गयी है। कुछ पढ़-लिख जाय तो उम्मीद बने। लेकिन मैं इतना जरूर मानता हूं कि सुगंधा जैसी आज की लड़कियों को आजादी मिलनी चाहिए। सबसे पहले पहल परिवार के लोगों को करनी चाहिए।

विजय का स्वभाव ही ऐसा है। हरदम अपने विचारों को जीने वाला। जैसा सोचता है वही करता भी है। शंकर उसके स्वभाव को जनता है। अभी दो दिन पहले ही तो विजय ने उसे अपनी नयी प्रेमिका से मिलवाया था। सचमुच ऐसा कहां होता है कि किसी पुरूष की प्रेमिका को उसकी पत्नी भी मान-सम्मान दे। शंकर मन ही मन विजय से ईर्ष्या भी करता है।
अच्छा यार विजय, यह सब कैसे कर लेते हो। उस दिन तुम जब अपनी महबूबा के साथ थे कितने अच्छा लग रहे थे। क्या भाभी को कोई ऐतराज नहीं होता? शंकर ने कबाब के बड़े टुकड़े को जिम्मेदारियों से मुक्त करते हुए कहा। यार शंकर छोड़ो यह सब। परिवार में सबको आजादी मिलनी चाहिए। मैं तो इसी में विश्वास करता हूं। जिसको जैसे जीना है जिये। हां, विश्वास जरूरी है। विश्वास है तो प्रेम का आधार हमेशा मजबूत रहता है।

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अच्छा तुम यह बताओ कि जम्मू-कश्मीर में जो इन दिनों चल रहा है, उसको लेकर तुमने कुछ लिखा या नहीं? क्या लिखना है? पार्टी ने तय किया है कि वह 370 के हटाए जाने का विरोध करेगी। सो मैं भी कर रहा हूं। इंडियन एक्सप्रेस में कल ही तो मेरा बयान छपा है। शंकर ने जवाब दिया, बधाई दोस्त। इंडियन एक्सप्रेस में बयान छपना इम्पोर्टेंट है। अब तुम पक्का लीडर बन गए। एक बीयर और पीते हैं इसी बात पर। बीयर पीना है तो पी लो। लेकिन यह वैसी बात नहीं है। तुम भी तो रहे हो पार्टी में पन्द्रह साल। जानते ही हो कि पार्टी का व्यवहार कैसा होता है। इस बार तो हमको आश्चर्य हुआ जब कहा गया कि सतीश पांडे के बजाय मैं पार्टी की ओर से बयान जारी करूं। जानते हो इसका मतलब क्या है? शंकर ने आधी सिगरेट को जबरदस्ती ऐश-ट्रे में डालते हुए कहा।

स्साला सतीश पांडे को अब भी भाव मिलता है पार्टी में! मैंने तो उसी के कारण ही पार्टी को छोड़ा। धारा 370 का विरोध पांडे नहीं कोई दलित करे तो इसका मतलब बनता है। राजनीति भी बड़ी कमीनी हो गयी है। हम लाल झंडा ढोते रहते हैं और यह जानते हुए कि आजकल लाल और भगवा में बहुत अधिक फर्क नहीं रह गया है। कम से कम जाति के सवाल पर।

विजय का घर दिल्ली के पॉश इलाके में है। किराया अधिक है लेकिन विजय को अच्छा लगता है इस मुहल्ले में रहना। यहां से न संसद दूर है और न दिल्ली विश्वविद्यालय। दूसरे मुहल्लों में कई समस्याएं होती हैं। या तो वे अल्ट्रा पॉश हैं या फिर लक्ष्मीनगर जैसा स्लम। कुल मिलाकर साकेत ठीक है रहने के ख्याल से। खाना खाओगे या खाकर आए हो? शांति ने विजय से पूछा। खाऊंगा लेकिन जरा देर से। सुगंधा का फोन आया था क्या? आज उससे बात न हो सकी। फोन नहीं लग रहा था। विजय ने जवाब देते हुए सवाल किया। हां, दोपहर में उसने फोन किया था। जयपुर से उदयपुर जा रही थी। उसका फोन चार्जर होटल के कमरे में छूट गया है। शांति ने खाने की प्लेटें साफ करते हुए कहा। उसके पास पैसा है न? मैंने पहले ही उसको कहा था कि दस हजार रुपए और ले जाये। गिलास में व्हिस्की डालते हुए विजय ने कहा। अच्छा लगता है सुगंधा को वह सब करते देखते जो हम और तुम कभी नहीं कर सके। धत्त। माथा पर चढ़ा रहे हो सुगंधा को। एक दिन पछताओगे जब वह उलटकर तुमसे सवाल करेगी। मुझसे तो वह कई बार मुंह लगा चुकी है। मैं तुमसे कहना चाहती थी। लेकिन क्या फायदा। तुम्हारा प्रोग्रेसिव वाला हैश टैग मुझे हर बार रोक देता है। मेरी मानो तो प्रगतिशील होना अच्छी बात है। लेकिन बहुत तेज छलांग लगाना अच्छी बात नहीं है। शांति ने कहा। तुम कहना क्या चाहती हो? क्या सुगंधा को उन्हीं बेड़ियों में कैद कर दूं जिन बेड़ियों में तुम्हारे मां-बाप ने तुम्हें कैद कर रखा था? जरा फ्रीज से ठंढा पानी तो दे देना।

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विजय, मैं मानती हूं कि मेरे माता-पिता के ख्याल तुम्हारे जैसे नहीं थे। लेकिन पिछले बीस सालों से तो मैं तुम्हारे साथ ही हूं। तुमने जैसा चाहा, वैसी ही तो रही हूं। क्या अब भी कहोगे कि तुमने मुझे बेड़ियों में नहीं कैद किया? तो क्या मैंने तुम्हें गुलाम बना रखा है? किस बात की गुलामी है तुम्हें? क्या मैंने कभी जबरदस्ती कुछ किया? तुम जो करना चाहती थी, वह तुमने किया।  जरा मैं भी तो सुनूं कि मैंने तुम पर क्या-क्या थोपा है? विजय ने शांति से कहा। यह जो तुम रोज घर में आकर करते हो, क्या इसे थोपा जाना नहीं कहा जाना चाहिए। ड्रिंक लेने से मैंने तुम्हें कभी रोका नहीं, लेकिन घर में पीने से सुगंधा पर इसका असर पड़ रहा है। अब तो वह भी पीने लगी है। ट्रिप पर जाने से पहले वह अपने दोस्तों के साथ घर पर ही पी रही थी। उसके दोस्तों में वह लड़का भी था।
अरे वाह! मुझे नहीं पता था कि सुगंधा भी पीती है। कल उसके लिए स्पेशल वाइन ले आऊंगा। शांति सोचने और जीने की यही स्वतंत्रता तो मैं उसे देना चाहता हूं। भले ही मैं उसके लिए जमीन-जायदाद न दे सकूं, लेकिन एक बेहतर जीवन जरूर दूंगा। मुझे तुमने क्या दिया है अब तक जो तुम उसे दोगे? तुम पुरूष हमेशा दाता बने रहना चाहते हो।

गजब की जबरदस्ती है तुम लोगों की। मुझ जैसी महिला तुम्हारे इस दोहरे व्यवहार पर न इतराये तो तुम्हारी प्रगतिशीलता की पोल न खुल जाएगी। शांति ने कंघी से अपने बालों को सुलझाते हुए कहा। यह गलत है शांति। मैंने कभी इस तरह से सोचा ही नहीं। मुझे हमेशा लगा कि तुम्हें यह सब पसंद है जो मैं कर रहा हूं। अब जब तुम कह रही हो तो जरा यह भी बताओ कि मैंने तुम पर और क्या-क्या थोपा है?
छोड़ो यह सब। खाना खाते हैं। तुम्हारे लिए स्पेशल सब्जी है आज। तुम्हारा मटन भी गरम कर दिया है। शांति ने डायनिंग टेबल पर प्लेटें रखते हुए कहा।
नहीं, पहले बताओ। विजय ने दुबारा कहा।
क्या यह थोपा जाना नहीं है? अभी मेरी इच्छा खाने की है और तुम मुझे तुम्हारे द्वारा मुझ पर लादी गयी रस्सियों के गिरहों के बारे में बताने को बोल रहे हो। तुम्हें मेरी इच्छा का ख्याल रखना चाहिए। क्या तुम्हारी प्रगतिशीलता में यह शामिल नहीं है?

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खौफ और आशंकाओं में जी रहे कश्मीर के लोग, नाबालिगों और महिलाओं पर भी हो रहे अत्याचार: महिला संगठन

विक्रम कुमार

आज 50 दिनों से कश्मीर में दुकानें, होटलें, स्कूल, कॉलेज, विश्वविद्यालय बंद पड़ी है गलियां सड़कें सुनसान पुरे शहर में सन्नाटा भरा है, क्या ये वही कश्मीर है जिसका नाम सुनते ही हम गर्व से कहते थे की धरती का स्वर्ग कहीं और नहीं भारत में है मोदी सरकार ने जब से अनुच्छेद 370 को समाप्त कर दिया गया है तब से कश्मीर के हालात ऐसे हो गए हैं. देश भर से पत्रकार सामाजिक कार्यकर्ता जोखिम उठाकर भी कश्मीर के हालात देखने जा रहे हैं और वे ही आकर वहां की वास्तविक स्थितियां बयां कर रहे हैं अन्यथा मेनस्ट्रीम मीडिया कश्मीर का सच दिखाने की जगह राष्ट्रवाद का उन्माद पेश कर रही है.

कश्मीर की स्थिति को समझने के लिए 5 महिलाओं की एक टीम ने 17 से 21 सितम्बर तक कश्मीर का दौरा किया। टीम में एनी राजा, कवलजीत कौर, पंखुड़ी जहीर NFIW से, प्रगति महिला संगठन से पूनम कौशिक और मुस्लिम विमेंस फोरम से सैयदा हमीद शामिल थीं। उनलोगों ने बताया की “हम अपनी आँखों से देखना चाहते थे कि 50 दिनों के इस तालाबंदी में लोगों की हालत, विशेषकर महिलाओं और बच्चों को कैसे प्रभावित किया है। श्रीनगर में समय बिताने के अलावा, हमने शोपियां, पुलवामा और बांदीपोरा जिलों में कई गांवों का दौरा किया। हम अस्पतालों, स्कूलों, घरों, बाजारों में गए, ग्रामीण लोगों के साथ-साथ शहरी क्षेत्रों में पुरुषों, महिलाओं, युवाओं और बच्चों से बात की। यह रिपोर्ट आम लोगों की, हमारी चश्मदीद गवाही (चश्मदीद गवाह) है जो एक ना दिखने वाले पिंजड़े में 50 दिनों से कैद हैं।“

NFIW प्रगति महिला संगठन और मुस्लिम विमेंस फोरम
नई दिल्ली प्रेस क्लब में पत्रकारों से वार्ता करते हुए

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आगे बतातीं हैं की जुबेदा, शमीमा, खुर्शीदा अपने घरों के दरवाजे पर खड़ी होकर अपने 14, 15, 17, और 19 साल के बेटों के वापस आने का इंतजार कर रही हैं।  उन्होंने आशा नहीं छोड़ी, लेकिन वे जानते हैं कि यह एक लंबा इंतजार होगा, इससे पहले कि वे उनकी यातनाग्रस्त शरीर या उनकी लाशों को देखें… अगर वे (सेना के लोग) ऐसा करते हैं। डॉक्टरों, शिक्षकों, छात्रों, श्रमिकों ने हमसे पूछा, “अगर इंटरनेट सेवाएं 5 मिनट के लिए काट दी गईं तो आप दिल्ली में क्या करेंगे?” हमारे पास कोई जवाब नहीं था।

लगभग कश्मीर के हर जिले का यही हाल था. मगरिब की प्रार्थना के बाद लगभग 8 बजे लाइट काट दिया दिया जाता था. बांदीपोरा जिला मुख्यालय के पास एक गाँव में रहने वाली ज़रीना बताती हैं कि “पुरुषों को शाम 6 बजे के बाद घर के अंदर कैद हो जाना पड़ता है अगर कोई आदमी या लड़का शाम के बाद घर के बहार दिखाई पड़ता है तो उसके साथ क्या होगा पता नहीं। यदि ज्यादा कुछ आवश्यकता पड़ती है, तो हम महिलाएँ बाहर जाते हैं.” गुलाम अहमद की माँ की मौत हो गई वो दुखी आवाज में बताते है “मैं अपनी बहनों को उनकी माँ की मृत्यु के बारे में कैसे सूचित करूँगा? ”

फोटो EPA

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श्रीनगर के एक लल्ला डेड महिला अस्पताल में कई युवा महिला डॉक्टरों ने अनुच्छेद 370 के निरस्त होने के बाद से उन बाधाओं पर अपनी पूरी निराशा व्यक्त की वहां कई ऐसे मामले हैं महिलाएं प्रसव के लिए समय पर नहीं आ सकती हैं। बहुत कम एम्बुलेंस हैं; जो एम्बुलेंस चल रहा होता है उन्हें रास्ते में ही पिकेट पर रोक दिया जाता है। प्रसव के कई मामले ऐसे हैं अच्छे से इलाज नहीँ होने के कारण बच्चे विकृति के साथ जन्म जन्म ले रहे हैं. यह उनके माता-पिता को आजीवन कष्ट दिया जा रहा है। वर्तमान स्थिति में तनाव और खौफ (भय) के कारण कई महिलाएं समय से पहले बच्चों को जन्म दे रही हैं। एक युवा महिला चिकित्सक ने दुख के साथ हमें बताया ऐसा लगता है कि सरकार हमारा गला घोंट रही है.

बांदीपोरा अस्पताल के एक वरिष्ठ चिकित्सक ने हमें बताया कि कुलगाम, कुपवाड़ा और अन्य जिलों से लोग यहाँ इलाज केलिए आते हैं। मानसिक विकार, दिल के दौरे, के बहुत सरे मामले आते है हैं, इससे पहले कभी इतने मामले नहीं आये हैं। आपात स्थिति के लिए जूनियर डॉक्टर सीनियर्स की तलाश करते हैं; फोन से उन तक नहीं पहुंचा जा सकता है यदि वे परिसर से बाहर हैं, तो वे चिल्लाते हुए सड़कों पर दौड़ते हैं, पूछते हैं, हताशा हो कर ढूंढ़ते हैं। एसकेआईएमएस के एक आर्थोपेडिक डॉक्टर को सेना ने उस समय नाकाबंदी के दौरान रोका गया जब वह ड्यूटी के लिए जा रहा था। उन्हें सात दिनों के लिए रखा गया था। शोपियां में सफिया की कैंसर का सर्जरी हुई थी और उसे जाँच की जरूरत है मैं अपने डॉक्टर तक नहीं पहुँच सकती एक ही रास्ता है कि मैं शहर जाऊँ, लेकिन मैं वहाँ कैसे पहुँचूँ?

फोटो BBC

अनंतनाग की तहमीना ने अपने पति से आग्रह किया,  हमें एक और बच्चा चाहिए उनका बच्चा फैज़ को सेना ने मार डाला, अब्दुल हलीम चुप थे। वह इन शब्दों को सुनते हुए अपने छोटे लड़के के शव को अपने हाथों पर पड़ा देख सकता था।

एक महिला सुरक्षा गार्ड ने कहा कि भारतीय सरकार इसे फिलिस्तीन बनाना चाहती है। यह एक लड़ाई है जो हम और हमारे कश्मीर के लोग मिल कर लड़ेंगे और इस मुश्किल हालात का सामना करेंगे। एक युवा पेशेवर ने हमें बताया, हम स्वतंत्रता चाहते हैं, हम भारत नहीं चाहते, हम पाकिस्तान नहीं चाहते। हम इसके लिए कोई भी कीमत अदा करेंगे।

कश्मीर के हालात को देखने वहां के लोगों की आपबीती सुनने के बाद दौरे पर गई महिलाओं की टीम ने कहा कि हम अपने अनुभव और कश्मीर के लोगों की गवाही देते हुए हम दो निष्कर्षों पर पहुँचते हैं पहला जहाँ कश्मीरी लोगों ने पिछले 50 दिनों में भारत सरकार और सेना द्वारा बर्बरता और ब्लैकआउट के विरोध में अद्भुत संयम दिखाया है। जिन घटनाओं के बारे में हमें बताया गया था, उन्होंने हमारी रीढ़ को हिला दिया और यह रिपोर्ट केवल उनमें से कुछ को सारांशित करती है। हम कश्मीरी लोगों के साहस और संकल्पशीलता को सलाम करते हैं। दूसरा वहां के स्थिति के बारे में, कश्मीर में कुछ भी सामान्य नहीं है। उन सभी का दावा है कि स्थिति धीरे-धीरे सामान्य हो रही है, विकृत तथ्यों के आधार पर झूठे दावे किये जा रहे हैं.

NFIW  प्रगति महिला संगठन और मुस्लिम विमेंस फोरम ने सरकार से अपनी मांगे रखी है

1. हालात को सामान्य बनाने के लिए सेना और अर्धसैनिक बलों को वहां से हटा लें।
2. विश्वास पैदा के लिए सभी मामलों/एफआईआर को तुरंत रद्द करें और उन सभी को छोड़ दें, विशेष रूप से वे युवा जो हिरासत में और जेल में हैं, धारा 370 के निरस्त होने के बाद से।
3. व्यापक हिंसा और सेना और अन्य सुरक्षा कर्मियों द्वारा किये गए अत्याचारों पर न्यायिक जाँच हो।
4. परिवहन की अनुपलब्धता और संचार ठप होने के कारण उन सभी परिवारों को जिनके प्रियजनों को जान गंवानी पड़ी, उनको उचित मुआवजा मिले।

इसके अतिरिक्त:

• इंटरनेट और मोबाइल नेटवर्क सहित कश्मीर में सभी संचार लाइनों को तुरंत बहाल करें।
• अनुच्छेद 370 और 35 ए को पुनर्स्थापित करें।
• जम्मू और कश्मीर के राजनीतिक भविष्य के बारे में सभी निर्णय जम्मू और कश्मीर के लोगों के साथ बातचीत की प्रक्रिया के माध्यम से लिए जाएँ।
• सभी सेना कर्मियों को जम्मू और कश्मीर के नागरिक क्षेत्रों से हटाया जाय।
• सेना द्वारा की गई ज्यादतियों को देखने के लिए एक समयबद्ध जांच समिति का गठन किया जाय।

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सरोगेसी (विनियमन) विधेयक का बहिष्कारी चरित्र

– प्रमोद मीणा

फोटो: विकिपीडिया

मनुवादी पितृसत्‍ता स्‍त्री शोषण पर रोक लगाने के बहाने उल्‍टे पुंसवादी नैतिकता को ही जब तब स्‍त्री पर लादने की कोशिश करती देखी जाती है। एक ताजा मामले में किराये की कोख के चिकित्‍सकीय धंधे में दलालों के हाथों शोषित होने वाली सरोगेट माँ (अपनी गोद किराये पर देने वाली स्‍त्री) के उत्‍पीड़न पर लगाम लगाये जाने के नाम पर केंद्रीय मंत्रिमंडल से मंजूर सरोगेसी (विनियमन) विधेयक 2019 को लोकसभा ने भी पारित कर दिया है। यह विधेयक कोख के व्‍यापार को भारतीय संस्‍कृति और परिवार नामक संस्‍था के लिए खतरा मानकर जरूरतमंद गरीब स्‍त्री से सरोगेट माँ बनने का विकल्‍प छीन लेता है क्‍योंकि यह विधेयक वाणिज्यिक सरोगेसी से जुड़ी आपराधिक गतिविधियों पर रोक लगाने की जगह वाणिज्यिक सरोगेसी को ही प्रतिबंधित करने वाला है। यह विधेयक निकट कीस्‍त्री रिश्‍तेदार को ही नि:स्‍वार्थ सरोगेसी की अनुमति देता है।

           पुरुष केंद्रित परंपरागत द्विलिंगी परिवार संस्‍था से इतर संबंधों को अनैतिक मानने वाली कथित ‘भारतीय’ सरकार इस विधेयक के द्वारा समलैंगिक स्‍त्री-पुरुषों, अविवाहित एकल स्‍त्री-पुरुषों और विधवा या परित्‍यक्‍त स्त्रियों से बच्‍चे को जन्‍म देने का अधिकार छीन लेना चाहती है। यह विधेयक सहजीवी जीवन जी रहे स्‍त्री-पुरुषों को भी चिकित्‍सा विज्ञान की इस देन का इस्‍तेमाल बच्‍चे की प्राप्ति के लिए करने से वंचित करता है। स्‍पष्‍ट है कि केंद्र सरकार का सरोगेसी (विनियमन) विधेयक जहाँ परंपरागत द्विलिंगी अस्मिताओं से इतर लैंगिक अस्मिता रखने वाले लोगों को पुनरुत्‍पादन के प्राकृतिक अधिकार से महरूम करता है, वहीं स्‍त्री के गर्भ धारण करने के अधिकार पर भी परिवार संस्‍था की पहरेदारी बैठाता है।

            सरोगेसी जैसे महत्‍वपूर्ण विधेयक को बिना किसी व्‍यापक और गंभीर परिचर्चा के लोकसभा से पारित करवाया गया है। पहले भी दिसंबर, 2018 में जब इसे लोकसभा से पारित करवाया गया था, तो मात्र 9 सांसदों ने इस पर बहस की थी और वह भी मात्र दो घंटों की रस्‍मी चर्चा-परिचर्चा के बाद इसे पारित करवा दिया गया था। किंतु उस समय इसे राज्‍यसभा में प्रस्‍तुत नहीं किया जा सका था। सरकार की तरफ से तत्‍कालीन स्‍वास्‍थ्‍य मंत्री ने वाणिज्यिक सरोगेसी पर प्रतिबंध लगाने के पीछे भारतीय परिवार नामक संस्‍था को बचाने का उद्देश्‍य रेखांकित किया था और कहा था कि अगर परिवार चिकित्‍सकीय कारणों से शिशु को जन्‍म देने में अक्षम हो तो आधुनिक चिकित्‍सा विज्ञान द्वारा प्रदत्‍त सरोगेसी की तकनीक से बच्‍चे को जन्‍म देने का अवसर उस परिवार को दिया जाना चाहिए। स्‍पष्‍टत: आजीविका के लिए अपनी कोख किराये पर देने वाली गरीब स्‍त्री के हितों का संरक्षण करना इस विधेयक का उद्देश्‍य कभी रहा ही नहीं था। यह विधेयक तो भारतीय परिवार व्‍यवस्‍था किवां हिंदू परिवार व्‍यवस्‍था पर होने वाले वैकल्पिक लैंगिकताओं के हमलों का जबाव देने के लिए लाया गया था। इसके माध्‍यम से सरोगेसी के इस्‍तेमाल को वैवाहिक युग्‍मों तक सीमित करके विवाह संस्‍था से बाहर के संबंधों की वैधता को नकारा गया है। परित्‍यक्‍त और विधवा या अविवाहित स्‍त्री से सरोगेसी के माध्‍यम से बच्‍चे को जन्‍म देने का विकल्‍प छीनना नारीवादी आंदोलन के गाल पर भी तमाचा है।

            यद्यपि अपनी 228 वीं रपट में विधि आयोग ने वाणिज्यिक सरोगेसी में निहित आपराधिक लूट-खसोट और सरोगेट माँओं के साथ होने वाले अन्‍यायों का जिक्र किया था और उस रपट में वाणिज्यिक सरोगेसी पर प्रतिबंध की भी मांग की गई थी किंतु सरोगेसी के सामाजिक आयामों और लक्ष्‍यों पर बिना किसी अध्‍ययन के मात्र पुंसवादी नैतिकता के चश्‍मे से सरोगेसी पर प्रतिबंध लगाने के पक्ष में भारतीय विधि आयोग भी नहीं रहा है।

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            वास्‍तविकता तो यह है कि हमारी सरकारों के पास वाणिज्यिक सरोगेसी पर निगरानी रखने वाला कोई तंत्र ही नहीं रहा है। न कभी वाणिज्यिक सरोगेसी को मूर्त रूप देने वाले चिकित्‍सालयों को सूचिबद्ध किया गया और न कभी वाणिज्यिक सरोगेसी के लिए कोई आचार संहिता बनाई गई। जब वाणिज्यिक सरोगेसी के सकारात्‍मक-नकारात्‍मक पक्षों को लेकर केंद्र सरकार के पास कोई विश्‍वसनीय सर्वेक्षण और अध्‍ययन रिपोर्ट है ही नहीं, तो एक सिरे से वाणिज्यिक सरोगेसी को खारिज़ करने का कोई तुक नहीं बैठता। वैश्‍वीकरण के जिस दौर में भारत स्‍वास्‍थ्‍य पर्यटन के क्षेत्र में अपनी अपेक्षाकृत सस्‍ती और गुणवत्‍तापूर्ण स्‍वास्‍थ्‍य सेवाओं के कारण जिस तेजी से उभर रहा है, उस दौर में सरोगेसी के वाणिज्यिक रूप पर पूरी तरह से रोक लगाने से बेहतर है – निर्धन जरूरतमंद सरोगेट माँओं के पक्ष में वाणिज्यिक सरोगसी से पैदा अवसरों को कानून के दायरे में भुनाना।

            सरोगेसी के क्षेत्र में जारी आपराधिक लूट-खसोट और सरोगेट माँ बनने वाली स्त्रियों के शोषण पर रोक लगाने के लिए सरोगेसी की प्रक्रिया पर सख्‍़त निरीक्षण रखना और उसको विनियमित करने का ढांचा खड़ा करने की जो कोशिश यह विधेयक करता है, उसकी आवश्‍यकता से कोई इंकार नहीं कर सकता। इस विधेयक में सरोगेट माँ के उत्‍पीड़न का हेतु बनने वाले लोगों के लिए सज़ा के तौर पर 10 साल तक के कारावास और 10 लाख तक के आर्थिक जुर्माने का प्रावधान है। मानव भ्रूण आदि की खरीद-फरोख्‍़त और सरोगेसी के विज्ञापनों के लिए भी यही सज़ा मुकर्रर की गई है। सरोगेसी से जुड़े क्लिनिकों का पंजीयन भी अनिवार्य कर दिया गया है।

           किंतु इस विधेयक में निहित इन तमाम कठोर प्रावधानों के बावजूद भी शायद यह विधेयक वाणिज्यिक सरोगेसी पर व्‍यवहार में रोक नहीं लगा पाएगा क्‍योंकि चिकित्‍सा बाज़ार में वाणिज्यिक सरोगेसी के खरीददार ग्राहकों की मांग चोर रास्‍तों का बढ़ावा देगी। इस विधेयक में वैसे भी इस चोर रास्‍तों के लिए संभावनाएँ संकेतित कर दी गई हैं। उदाहरण हेतु सरोगेसी (विनियमन) विधेयक में परिवार के अंतर्गत पंजीकृत पति-पत्‍नी ही शामिल हैं किंतु जिस निकट संबंध अंतर्गत सरोगेसी को स्‍वीकृति दी गई है, उस निकट संबंध को अपरिभाषित ही छोड़ दिया गया है। हाँ, सरोगेट माँ बनने के लिए स्‍वयं को प्रस्‍तुत करने वाली इस निकट संबंधिनी पर युवा विवाहिता होने और पहले से ही एक बच्‍चे की माँ होने की शर्तें और लाद दी गई हैं। सरोगेट माँ बनने की इन अनिवार्य अर्हताओं के कारण सरोगेसी के माध्‍यम से शिशु की आस लगाये बैठे ‘वैध’ विवाहित युग्‍मों के लिए बच्‍चे को जन्‍म देने के अवसर कहीं ज्‍यादा कम हो जाने वाले हैं। वास्‍तव में जिस भारतीय (हिंदू) परिवार को बचाने के लिए सरकार वाणिज्यिक सरोगेसी पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की कवायद कर रही है, उसी परिवार में निहित पुंसवादी नैतिकता के चलते निकट संबंध में सरोगेसी के लिए अपनी कोख नि:स्‍वार्थ भाव से प्रस्‍तुत करने वाली युवा विवाहिता माँ मिलना लगभग असंभवप्राय: होता है।

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            इस विधेयक के अनुसार सिर्फ विवाहित भारतीय युग्‍म ही सरोगेसी तकनीक से बच्‍चे को जन्‍म देने के अधिकारी होंगे। इसका मतलब हुआ कि अनिवासी भारतीय भी अगर भारत आकर अपने निकट पारिवारि‍क संबंध में आने वाली किसी युवा विवाहिता और एक बच्‍चे की माँ की कोख का इस्‍तेमाल करके सरोगेट शिशु को जन्‍म देना चाहें, तो उन्‍हें इसकी अनुमति नहीं होगी।

            यहाँ यह भी ध्‍यातव्‍य है कि सरोगेसी की प्रक्रिया का सबसे अहम् चरण होता है – भ्रूण को आईवीएफ (इन विट्रो फर्टिलाइजेशन) प्रयोगशाला में संवर्धित करना। सरोगेट स्‍त्री के गर्भ में इस संवर्धित भ्रूण को स्‍थापित करना तो इस पूरी प्रक्रिया का सबसे अंतिम चरण होता है। अत: सरोगेसी के विनियमन से पहले तो सरकार को प्रजनन सहायक प्रौद्योगिकी विधेयक (असिस्‍टेड रिप्रोडक्टिव टेक्‍नोलॉजी विधेयक) को पारित करवाना चाहिए था जो लंबे समय से ठंडे बस्‍ते में पड़ा हुआ है। इस विधेयक को कानून का रूप देना बहुत जरूरी है ताकि प्रजनन सहायक प्रौद्योगिकी से जुड़े अपराधों पर रोक लग सके। आज हालात ये हैं कि सौ फीसदी सफलता का दावा करने वाले आईवीएफ क्लिनिक कुकुरमुत्‍तों की तरह जहाँ-तहाँ देखे जा सकते हैं। ये क्लिनिक शिशु के इच्‍छुक बांझ दम्‍पतियों को लूटने में लगे हैं। किसी भी प्रकार की चिकित्‍सकीय नैतिकता का ये पालन नहीं करते हैं। स्थिति की गंभीरता का आलम यह है कि किसी और के भ्रूण को भी ये आपका बताकर गर्भाशय में स्‍थापित कर देते हैं। 

            जो विदेशी पहले ही भारत की किसी आईवीएफ प्रयोगशाला में अपना भ्रूण सुरक्षित करवा चुके हैं, उनको भी यह सरोगेसी (विनियमन) विधेयक सरोगेसी की अनुमति नहीं देता है। लेकिन उनके ऐसे भ्रूणों की स्थिति पर विधेयक में विचार तक नहीं किया गया है। विधेयक सरलीकृत ढंग से विदेशी लोगों के भ्रूणों के भारत में आयात-निर्यात पर रोक लगाता है। इस विधेयक को कानून का दर्ज़ा देने से पहले उससे जुड़ी जटिलताओं पर अगर व्‍यापक राय-मशविरा किया जाता, तो इस तरह के महत्‍वपूर्ण मुद्दे नहीं छूटते।  

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           किसी भी तकनीक के अच्‍छे-बुरे, दोनों पहलू होते हैं। इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि सरोगेसी की प्रक्रिया से जन्‍मे बच्‍चों को विकलांगता आदि की स्थिति में उनके वास्‍तविक जैविक माँ-बाप द्वारा छोड़ने के मामले भी सामने आये हैं। वाणिज्यिक सरोगेसी के विरोधी तो यहाँ तक आरोप लगाते हैं कि मानव देह व्‍यापार के लिए भी सरोगेसी की तकनीक का दुरुपयोग किया जा रहा है। लेकिन दूसरी तरफ जैविक और चिकित्‍सकीय कारणों से बच्‍चे को जन्‍म देने में अक्षम लोगों के लिए सरोगेसी चिकित्‍सा विज्ञान के वरदान से कम नहीं है। सरोगेसी ने निर्धन स्त्रियों के लिए अपनी कोख किराये पर देकर आजीविका अर्जन का रास्‍ता भी वाणिज्यिक स्‍तर पर खोला है। दूसरे के बच्‍चे के लिए अपनी कोख उपलब्‍ध करवाना एक बहुत ही मानवीय और प्रशंसनीय कार्य है। और इसकी एवज़ में अगर कोई गरीब स्‍त्री अपनी आर्थिक बदहाली से उबरने के लिए अपेक्षित पारिश्रमिक की माँग करती है, तो इसमें गलत क्‍या हैॽ अस्‍तु, वाणिज्यिक सरोगेसी के कुछ नकारात्‍मक पक्षों के कारण उस पर पूर्ण रोक लगाना न्‍यायोचित नहीं कहा जा सकता। जरूरत थी वाणिज्यिक सरोगेसी के समुचित नियमन की ताकि बीच के लुटेरा दलालों पर अंकुश लगाया जा सकता, किंतु उल्‍टा वाणिज्यिक सरोगेसी पर ही पूर्णत: रोक लगा देने की कवायद की गई है। यह कवायद सीधे-सीधे स्‍त्री के गर्भाशय को नियंत्रित करने की पुंसवादी चाल है क्‍योंकि एक स्‍त्री को अपनी इच्‍छानुसार गर्भवती होने और दूसरे के गर्भ के लिए अपनी कोख का इस्‍तेमाल करने की अनुमति तो होनी ही चाहिए। अस्‍तु, वाणिज्यिक सरोगेसी को सुपरिभाषित आर्थिक अनुबंध की सीमा में लाया जाना चाहिए। सरोगेट माँ के स्‍वास्‍थ्‍य और खान-पान का समुचित प्रबंध और बीमा सुरक्षा की व्‍यापक व्‍यवस्‍था जरूरी है। वाणिज्यिक सरोगेसी को कानूनी अनुबंध के दायरे में लाकर ही सरोगेट माँ और सरोगेट शिशु को जन्‍म देने के इच्‍छुक माँ-बाप का एक-दूसरे के प्रति दायित्‍व सुनिश्चित किया जा सकता है। कानून बनाकर वाणिज्यिक सरोगेसी पर एकमुश्‍त रोक लगा देने से यह प्रक्रिया रुकेगी नहीं अपितु चोरी-छिपे ढंग से बदस्‍तूर जारी रहेगी, बल्कि इससे जुड़ा भ्रष्‍टाचार तथा शोषण और भी ज्‍यादा जोर पकड़ेगा। बाँझ स्‍त्री-पुरुष और अपनी कोख किराये पर उपलब्‍ध कराने वाली गरीब स्‍त्री, दोनों के हितों की रक्षा इसी में है कि वाणिज्यिक सरोगेसी का नियमन किया जाए, न कि उस पर प्रतिबंध लगाया जाए। इसे एक पेशे के रूप में कानूनी मान्‍यता दी जानी चाहिए। अपनी कोख किराये पर देने का महान मानवीय कार्य करने वाली स्‍त्री के लिए इसकी एवज में समुचित भुगतान सुनिश्चित किया जाना चाहिए। गर्भावस्‍था के दौरान और प्रसूति उपरांत भी सरोगेट माँ की नियमित चिकित्‍सकीय देखरेख का प्रावधान होना चाहिए। इसी के साथ-साथ परंपरागत परिवार के दायरे से बाहर भी लोगों को इसके इस्‍तेमाल की छूट मिलनी चाहिए क्‍योंकि अपने वर्तमान प्रारूप में सरोगेसी (विनियमन) विधेयक, 2019 बहुत ही ज्‍यादा बहिष्‍कारी प्रकृति का है। अत: इसे समावेशी बनाना जरूरी है। इसके साथ-साथ वाणिज्यिक सरोगेसी से जन्‍म लेने वाले शिशु के प्रति उसके जैविक माँ-बाप की जिम्‍मेदारी सुनिश्चित करने के लिए कानूनी बाध्‍यता भी जरूरी है। इसी प्रकार अपनी देह विकृत होने के डर से वाणिज्यिक सरोगेसी को शौक की तरह अपनाने की प्रवृत्ति पर पूर्ण विराम भी जरूरी है। स्‍पष्‍ट है कि सरोगेसी की पूरी प्रक्रिया के कानूनी ढंग से क्रियान्‍वयन को सुनिश्चित कर देने पर सरकार के लिए ऐसे किसी भी विधेयक की जरूरत ही नहीं रह जाएगी।

(संपर्क :– डॉ. प्रमोद मीणा, सहआचार्य, हिंदी विभाग, मानविकी और भाषा संकाय, महात्‍मा गाँधी केंद्रीय विश्‍वविद्यालय, जिला स्‍कूल परिसर, मोतिहारी, जिला–पूर्वी चंपारण, बिहार–845401, ईमेल – pramod.pu.raj@gmail.com, pramodmeena@mgcub.ac.in; दूरभाष – 7320920958 )

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डीयू (DU) प्रशासन का महिला विरोधी और अमानवीय व्यवहार

आरती रानी प्रजापति

हमारी एक साथी 3 दिन से बुरी तरह बीमार है लेकिन नियुक्ति में हुए इस भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ रही है। कल उसकी हालत ज्यादा खराब होने पर यह बैठे सुरक्षा कर्मियों से कहा गया कि आप डॉक्टर की व्यवस्था कर दीजिए। उस लड़की को लिवर इंफेक्शन है। बेहद अमानवीय तरीके से उनका जवाब था कि बीमार है तो घर जाए, यहां क्यों बैठी है? उस लड़की की है दृढ़ संकल्प की शक्ति ही थी जो वह बीमार होने के बाद भी यहां जमी रही। खैर तबियत खराब होने पर हमने जिद कर के उसको बाहर भेज दिया। अपनी दवा लेकर वह आई और उसको सुरक्षाकर्मियों ने नीचे ही रोके रखा। बुखार में होने के बाबजूद वह बारिश में बाहर खड़े होने को मजबूर थी। कई मिन्नते की। बातचीत करने के लिए लोग तो, जो कि इन सुरक्षाकर्मियों के जानकार थे तो ऊपर आये लेकिन वह लड़की नहीं आई। बता दूं वह लड़की इस दिल्ली में अकेली है। पीजी में रहती है। रात 11 बजे हमारे जिद करने पर लगभग शाम 5 बजे से बाहर बैठी वो लड़की अपने पीजी में अकेले जाने को मजबूर हुई। 

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सवाल यहां है कि एक महिला जो कि बीमार है, जिस पर वह पीरियड में भी है क्या उसकी मूलभूत सुविधाओं को ध्यान नहीं रखना चाहिए?
क्या उस अकेली लड़की से इस व्यवस्था को इतना डर था कि उसको बाहर ही रखा गया। जबकि उसकी स्थिति खराब थी?
यदि कोई आ जा नहीं सकता तो इनके जानने वाले लोग हम तक कैसे पहुँच गए।
यदि यहाँ से यानी इस फ्लोर से बाहर जाना ही आंदोलन को खत्म करना माना जा रहा है तो रात में मीडियाकर्मियों के आने पर हमपर नीचे आने का दवाब क्यों बनाया गया।
वह लड़की रात 11 बजे यहां से अकेले गई, यदि उसको कुछ हो जाता तो उसका जिम्मेदार कौन होता।

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अतिथि शिक्षकों की नियुक्ति में हुई पहले आओ पहले पाओ की नीति का विरोध प्रशासन पर इतना भारी क्यों पड़ रहा है।
क्योंकि इन्होंने मान लिया है कि यह बेरोजगार हैं इसलिए इन्हें तंग किया जा सकता है, लेकिन 4 दिन में यदि कोई बीमार है और किसी जरूरी काम से जा रहा है तो सिर्फ उसी व्यक्ति के आने से इतनी परेशानी क्यों?
आंदोलन का चौथा दिन है।
डटे हुए हैं, लड़ते रहेंगे.

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इसलामपुर की शिक्षा-ज्योति कुन्ती देवी

हरेराम सिंह
युवा आलोचक, संपर्क: 9905421280

‘इसलामपुर की शिक्षा-ज्योति कुन्ती देवी’ बिहार की उस स्त्री की कथा है, जिसके भीतर समाज को बदलने की ख्वाब पलते थे. जो कभी स्त्रियों को अनपढ़ नहीं देखना चाहती थीं. जिनके भीतर आजादी के पूर्व ही आजादख्याली बसती थी. जिन्होंने अपने कर्म से पूरे इसलामपुर को न सिर्फ प्रभावित किया, बल्कि पूरे बिहार व स्त्रियों के लिए सावित्रीबाई फुले की तरह प्रेरणा की स्रोत बन गईं! उस महान व दूरदर्शी सोच को जीवंतता प्रदान करने का काम उनकी बेटी पुष्पा कुमारी मेहता द्वारा होता है, जो अपनी माँ कुंती देवी से इसलिए प्रभावित हैं कि उनकी माँ सिर्फ उनकी माँ नहीं थी बल्कि उस युग में किसानों व पूरे पिछड़ों की माँ थीं.आज पूरा बिहार उन पर गर्व कर सकता है,वह पिछड़ों के लिए गोर्की की माँ की तरह थी, आलो आँधारी थीं!

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भारत में ऐसी स्त्रियों की कथा बहुत कम लिखी गई है जिन्होंने हमें या अपने परिवार व समाज को बदलने का काम किया. हर स्त्री प्रेरणा व गरिमा की स्रोत हैं, बस मर्दवादी नजरिया से जरा अलग हटकर सोचा जाए. “इसलामपुर की शिक्षा-ज्योति कुंती देवी” एक ऐसी ही स्त्री की सच्ची दास्तां है जिसके सहारे परिवार व समाज के विकास में स्त्रीयों की कितनी अहम भूमिका है, समझा जा सकता है. हिंदी के जीवनी साहित्य को नयी तकनीक से लिखने व परखने का नया आयाम भी यह पुस्तक प्रस्तुत कर रही है. इसके लिए पुष्पा कुमारी मेहता को धन्यवाद और प्रकाशक द मार्जिनलाइज्ड को हृदय से आभार; इस आशा के साथ कि आप और ऐसी स्त्रियों की सच्ची कथा लेकर आएं जो सबकुछ छोड़कर के भी परिवार, समाज व देश का मुस्कुराना देखना चाहती थीं.

माँ सपनों की तरह है, जो हमेशा जीवन में नवरंग लाती हैं। पुष्पा जी की माँ जीवन की नवरंग हैं, जो अंधकार-युग नें भी पिछड़ों की रोशनी बनकर आती हैं। ग्रमीण स्त्रियों की आशा बनकर आती हैं। इसलिए पुष्पा कुमारी मेहता उनके बहाने उनके संपर्क की सारी स्त्रियों का इतिहास लिख डालती हैं। एक तरह से यह जीवनी साहित्य स्त्रियों का सम्यक इतिहास, सम्यक् संघर्ष व सामूहिक जिम्मेदारी का आख्यान प्रस्तुत करता है।

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ट्रोजन की औरतें’ एवं ‘स्त्री विलाप पर्व


शशांक शुक्ला
उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय में हिंदी के सहायक प्रोफेसर सह विभागाध्यक्ष हैं.

परिपार्श्व – एथेंस और ट्रॉय का युद्द पश्चिमी सभ्यता का आदि विमर्श बिंदु है। अधिकांश पश्चिमी साहित्य , कला, दर्शन, राजनीति सिद्धांत इस युद्ध की छाया तले विकसित हुए हैं। आप चाहें तो होमर के ‘इलियड’, ‘ओडिसी’ की बात करें या अरस्तु के राजनीतिक-दर्शन या काव्य-सिद्धांत की। यह बड़ा विचित्र है कि किसी सभ्यता का आदि-विमर्श युद्ध बन रहा हो, किन्तु यह केवल पश्चिमी सभ्यता का सच नहीं है; अपितु भारतीय परंपरा का भी सच है। वाल्मीकि कृत ‘रामायण’ केवल राम-रावण युद्ध मात्र न था, अपितु दो संस्कृतियों का आंतरिक संघर्ष भी था। किन्तु यह संघर्ष सांस्कृतिक संघर्ष था, कहीं बहुत भीतरी संघर्ष , या मनुष्य की आंतरिक वृत्तियों का संघर्ष… । प्रश्न है कि क्या यह सांस्कृतिक संघर्ष था या साभ्यतिक संघर्ष? क्या ‘महाभारत’ का युद्ध सभ्यता का संघर्ष था? हालांकि ‘महाभारत’ का युद्ध पारिवारिक युद्ध था- एक ही कुल-गोत्र के बीच का युद्ध। फिर वह सांस्कृतिक संघर्ष क्यों न बना? बात थोड़ी और स्पष्ट करने की आवश्यकता है। ‘रामायण’ पर जिस आर्य-अनार्य संघर्ष की छाया देखी गयी है, वैसा संघर्ष किसी रूप में ‘महाभारत’ के सन्दर्भ में नहीं देखा गया। ‘रामायण’ के पात्रों का जिस प्रकार प्रतीकीकरण किया गया…जिस प्रकार ‘रामायण’ पर आधारित रामलीलाओं का मंचन हुआ…जिस प्रकार आदर्श गढ़ने की सम्भावना ‘रामायण’ में छिपी हुई थी…या कहें कि आंतरिक वृत्तियों को उद्घाटित करने की सामर्थ्य ‘रामायण’ में जिस प्रकार थी, वैसा ‘महाभारत’ में नहीं। देव-असुर के द्वैत के लिए जिस प्रकार का स्पेस ‘रामायण’ में था, उस प्रकार का स्पेस ‘महाभारत’ में नहीं था। ‘महाभारत’ आंतरिक संघर्ष नहीं है, बावजूद पारिवारिक संघर्ष है और ‘रामायण’ आंतरिक संघर्ष है, बावजूद सांस्कृतिक संघर्ष है। यही कारण है कि ‘रामायण’ सांस्कृतिक संघर्ष का महाकाव्य है और ‘महाभारत’ साभ्यतिक संघर्ष का महाकाव्य। हालांकि ‘महाभारत’ के मूल में , केंद्र में धर्म रहा है, सत्य रहा है; किन्तु अपनी व्यंजना में वह सभ्य-असभ्य या कहें कि ‘सभ्यता का विमर्श’ रहा है। युधिष्ठिर और दुर्योधन सभ्य और असभ्य के रूपान्तर हैं, जिन्हें क्रमशः सत्य [ कृष्ण ] और असत्य [ शकुनि ] का संबल है। हालांकि ‘महाभारत’ की संरचना जटिल है। वह विभिन्न प्रकार के अंतर्विरोधों को समेटे हुए है। धर्म की ढेरों कथाएं, विभिन्न प्रसंग, घटनाएँ , आख्यान, चरित्र….ये सब मिलकर ‘महाभारत’ को ‘सम्पूर्ण मानस का प्रतिनिधि’ बनाते हैं। दरअसल ‘रामायणकार’ की तरह ‘महाभारतकार’ के सामने ग्रन्थ को दो भिन्न संस्कृतियों के संघर्ष के रूप में चित्रित करने की साहित्यिक/सांस्कृतिक बाध्यता न थी। इसलिए भी  उसे सम्पूर्ण भारतीय मानस के बिम्ब के रूप में चित्रित करने के लिए अतिरिक्त स्पेस मिला। ]

‘ट्रोजन की औरतें’ नाटक युद्ध के निष्कर्ष [ ? ] पर आधारित नाटक है। ‘युद्ध से निष्कर्ष’ और ‘युद्ध के निष्कर्ष’ की व्यंजना में फ़र्क है। ‘युद्ध से निष्कर्ष’ एक पक्ष की विजय और शान्ति स्थापना से जुड़ा हुआ है तो ‘युद्ध के निष्कर्ष’ भयावहता, संत्रास, पीड़ा, रुदन…में। ‘युद्ध से निष्कर्ष’ थोड़ा दार्शनिक है, सामजिक है , राष्ट्रीय है..मानवतावादी है तो ‘युद्ध के निष्कर्ष’ थोड़ा पारिवारिक है, व्यक्तिगत है, आत्मिक है, मनोसंघर्ष के स्तर पर है। ‘युद्ध से निष्कर्ष’ के पश्चात ‘युद्ध के निष्कर्ष’ की विभीषिका प्रारंभ होती है। बड़े फलक के संघर्ष वस्तुतः आंतरिक संघर्षों को जन्म देते हैं। एक बड़ा युद्ध सांस्कृतिक विजय-पराजय का दंभ-अभिशाप तो देता ही है, साथ ही अपने पीछे विलाप करती मानव-आत्माओं के चित्र भी हमें पकड़ा देता है।  ‘ट्रोजन की औरतें’ ग्रीक ट्रेजडी [ युद्ध ] को हम इसी रूप में देख सकते हैं। उसी प्रकार जैसे ‘महाभारत’ में युद्ध के पश्चात गांधारी तथा अन्य स्त्रियों के विलाप दृश्य। यह बड़ा आश्चर्य है कि ‘वाल्मीकि’ ने युद्ध की समाप्ति पर मंदोदरी-सुलोचना या अन्य स्त्रियों के ‘विलाप दृश्य’ उस प्रकार सघनित रूप में चित्रित नहीं किये। इसके पीछे कहीं यह वजह तो नहीं रही कि वहां सांस्कृतिक संघर्ष में विजय का प्राप्य इतना बड़ा था कि व्यक्तिगत संताप तक हमारी दृष्टि आसानी से नहीं पहुंचती? सुलोचना जैसी स्त्रियों के करुण दृश्य यदा-कदा संकेतात्मक रूप में आये हैं, किन्तु वे कथा की संरचना में अपना विशेष अर्थ नहीं रख पाते।

फोटो- विकिपीडिया

‘द ट्रोजन विमेन’/ ‘ट्रोजन की औरतें’ नाटक यूरिपिडीज द्वारा 416 ईसापूर्व में लिखा गया था। यह नाटक यूनान की विजय तथा ट्रॉय की पराजय के कथ्य पर केन्द्रित है। किन्तु इसका मूल कथ्य विजय के पश्चात की घटनाओं से जुड़ा हुआ है। ‘ट्रोजन की औरतें’ युद्ध के पश्चात के उन्माद, पाशविकता, व्यभिचार, हिंसा पर आधारित है। यह नाटक मुख्य रूप से हैक्युबा के विलाप और उस बहाने महान यूनान की सभ्यता पर प्रश्न चिह्न लगाता है। ‘महाभारत’ के ‘स्त्री पर्व’ में विभिन्न प्रकार के ‘विलाप दृश्य’ रखे गए हैं। जैसे धृतराष्ट्र का विलाप, कौरववंश की युवतियों के सामूहिक विलाप। इसके अतिरिक्त विभिन्न अध्याय केवल विलाप की  विभिन्न भंगिमाओं के निमित्त रचे गए हैं। दुर्योधन तथा उसके पास रोती हुई पुत्रवधू को देखकर गांधारी का श्रीकृष्ण के सम्मुख विलाप, अपने अन्य पुत्रों तथा दुशासन को देखकर गांधारी के श्रीकृष्ण के सम्मुख विलाप [ अध्याय 18 ] । विकर्ण, दुर्मुख, चित्रसेन, विविंशति तथा दु:सह को देखकर गांधारी का श्रीकृष्ण के सम्मुख विलाप [ अध्याय 19 ]  । गांधारी तथा श्रीकृष्ण के प्रति उत्तरा और विराट कुल की स्त्रियों के शोक एवं विलाप का वर्णन [ अध्याय 20 ] । गांधारी के द्वारा कर्ण को देखकर उसके शौर्य तथा उसकी स्तुति के विलाप का श्रीकृष्ण के सम्मुख वर्णन [ अध्याय 21 ]  । अपनी-अपनी स्त्रियों से घिरे हुए अवन्ती नरेश और जयद्रथ को देखकर तथा दु:शला पर दृष्टिपात करके गांधारी का श्रीकृष्ण के सम्मुख विलाप [ अध्याय 22 ]  । शल्य, भगदत्त, भीष्म और द्रोण को देखकर श्रीकृष्ण के सम्मुख गांधारी का विलाप [ अध्याय 23 ] । भूरिश्रवा के पास उसकी पत्नियों का विलाप , उन सबको तथा शकुनि को देखकर गांधारी का श्रीकृष्ण के सम्मुख शोकोदगार [ अध्याय 24 ] । तथा अन्यान्य वीरों को मरा देखकर गांधारी का शोकातुर होकर विलाप करना और क्रोधपूर्वक श्रीकृष्ण को यदुवंशविनाश विषयक श्राप देना [ अध्याय 25 ] । यह बड़ा विचित्र संयोग यह कि हैक्युबा और गांधारी के वर्णन/ विलाप में अद्भुत रूप से साम्य है । ‘ट्रोजन की औरतें’ नाटक के केंद्र में हैक्युबा है, ठीक उसी प्रकार जैसे ‘स्त्री पर्व’ तथा ‘स्त्री विलाप पर्व’ के केंद्र में गांधारी। जिस प्रकार गांधारी समस्त कुरुवंश के लिए विलाप कर रही है, उसी प्रकार  हैक्युबा ट्रोजन के लिए। 

क्या ‘महाभारत’ के ‘स्त्री पर्व’ एवं ‘स्त्री विलाप पर्व’ से ग्रीक त्रासदी ‘ट्रोजन की औरतें’ के बीच किसी प्रकार की तुलना की जा सकती है? ‘ट्रोजन को औरतें’ पश्चिमी सभ्यता/आख्यान का एक हिस्सा भर है। जबकि ‘महाभारत’ एक रचयिता की स्वतंत्र अनुकृति। फिर ‘महाभारत’ की अपनी जटिल-विस्तृत संरचना है, जहाँ ‘कथ्य’ को व्यापक रूप दिया गया है; वहीँ ‘ट्रोजन की औरतें’ एक या कुछ-एक दृश्यों में रचित नाटक है। ‘महाभारत’ में ‘स्त्री विलाप पर्व’ के अतिरिक्त भी विलाप के ढेरों दृश्य हैं, जिसमें केवल स्त्रियाँ ही विलाप नहीं करतीं , अपितु पुरुष भी विलाप करते हैं। ‘ऐषीक पर्व’ के दसवें अध्याय में पुत्रों तथा पांचालों के वध पर युधिष्ठिर का विलाप, धृतराष्ट्र के अग्नि प्रवेश पर युधिष्ठिर का विलाप, अर्जुन की मृत्यु पर चित्रागंदा का विलाप, वभ्रुवाहन का शोकोदगार, ‘शल्य पर्व’ के 63 वें अध्याय में दुर्योधन का विलाप, ‘सौप्तिक पर्व’ के आठवें अध्याय में दुर्योधन की दशा देखकर कृपाचार्य और अश्वत्थामा का विलाप… ।  ‘स्त्री पर्व’ में पुत्र की मृत्यु पर द्रौपदी का विलाप, धृतराष्ट्र का विलाप आदि । इसके अतिरिक्त भी महाभारत युद्ध में विभिन्न प्रकार के विलाप दृश्य चित्रित किये गए हैं। जैसे एकलव्य की मृत्यु पर सुभद्रा, अर्जुन तथा उत्तरा का विलाप , घटोत्कच की मृत्यु पर भीम का विलाप…आदि । कहने का अर्थ यह कि इसी प्रकार महाभारत में अन्य दृश्य भी चित्रित किये गए हैं।  महाभारत में विलाप के विभिन्न दृश्य उसे व्यापक कारुणिक आधार देते हैं , किन्तु बावजूद उसके विलाप दृश्य महाकाव्य की धार्मिक-सैद्धांतिक ऊँचाइयों के नीचे दब जाते हैं। धृतराष्ट्र के विलाप पर विदुर के धर्म-मोक्ष एवं सैद्धांतिक स्थापनाओं का स्मरण करें। इस प्रकार के धर्मयुक्त कथन ‘ट्रोजन की औरतें’ में नहीं है। ‘ट्रोजन की औरतें’ इस प्रकार ज्यादा कारुणिक एवं मार्मिक बन गया है, क्योंकि इसमें विशुद्ध मानवीय पीड़ा-करुणा की सृष्टि की गयी है। यहाँ ‘पुरुषों के विलाप’ दृश्य नहीं हैं। अत: पुरुष और स्त्री के मध्य के द्वंद्व की सृष्टि के लिए नाटककार को पर्याप्त स्पेस मिला है। ‘ट्रोजन की औरतें’ इसीलिए एक ‘विमर्शात्मक कृति’ बन उठा है, क्योंकि यह एक स्त्री की पीड़ा के आर्त्त स्वर में पुरुष की सामंती मानसिकता, हिंस व्यवहार , व्यभिचार ….को व्यंग्यात्मक लहजे में हमारे सामने रखता है। नाटक के मध्य इस प्रकार के संवाद रखे गए हैं, जो स्त्री पीड़ा को और गहन करते हैं। नाटक में आये कोरस का कथन देखिये-“ मैं दुखियारी किसकी दाश्ता बनूँगी। मुझे कौन यहाँ से ले जाएगा? क्या मुझे ट्रॉय की सरज़मीन से दूर, किसी यूनानी के घर जाना होगा ?”  हम स्पष्ट रूप से देख सकते हैं कि कथन में स्त्री पराधीनता की पीड़ा भी है और राष्ट्र के ध्वंश का दुःख भी । हैक्युबा प्रति-प्रश्न करते हुए कहती है- “क्या ट्रॉय की मल्लिका को किसी ग़ैर के बच्चों की आया बनना पडेगा?”। हैक्युबा के टेलथीबीयस से यह पूछने पर कि- “ मेरी दुखियारी बेटी [ एन्द्रोमके ] को लैकेडेमोनियन औरत की गुलामी करनी होगी” ।  टेलथिबीयस उत्तर देता है- “ नहीं । वो बीबी की तरह , बादशाह के बिस्तर की जीनत बनेगी …हर औरत को किसी एक मर्द की गुलामी करनी होगी”।  ‘ट्रोजन की औरतें’ इस प्रकार ‘रुदन के बीच विमर्श’ पैदा करता है। संभवतः स्त्री विमर्श का आदि आख्यान। ‘स्त्री विलाप पर्व’ में विलाप है, करुणा है…पूर्व की सुखद स्मृति के बीच वर्तमान की भयावहता है …अतीत की स्मृति और वर्तमान के विनाश से रचनाकार ने करुणा को घनीभूत करने का प्रयास किया है , जो अंततः एक विसंगति को जन्म देता है ; जिसमें युधिष्ठिर का राज्य प्राप्ति छोटा लगने लगता है। इस नाटक में पीड़ा, घुटन, छटपटाहट, विडंबना की सृष्टि की गयी है। ‘महाभारत’ का विलाप दृश्य युद्ध की निरर्थकता को घनीभूत करते हैं। [ जिस संकेत पर घर्मवीर भारती ने ‘अँधा युग’ लिखा …] , किन्तु ‘ट्रोजन की औरतें’ में युद्ध की विभीषिका…. युद्ध विजय के बाद का दर्द तो है ही , साथ ही युद्ध विजय के उन्माद के बीच लूट, हिंसा, बलात्कार, जबरदस्ती, दुश्चिंता….इत्यादि भी है। ‘स्त्री पर्व’ में घटनाएँ पूर्व में घट चुकी हैं …अब उनका प्रभाव है, उससे उत्पन्न करुणा है। यहाँ युद्ध की समाप्ति पर भी हिंस घटनाओं का घटना ज़ारी है। वहां अतीत और वर्तमान है, यहाँ वर्तमान और भविष्य। वहां अतीत की भयावहता का संक्रमण वर्तमान में हो रहा है तो यहाँ अतीत की भयावहता वर्तमान से होते हुई भविष्य तक जा रही है। वहां युद्ध के बाद का पश्चाताप है, यहाँ युद्ध के बाद का उन्माद है; जो परिस्थिति को भय, जुगुप्सा और हैवानियत से भर दे रहा है। ‘महाभारत’ की मूल संरचना में सत्य-असत्य, धर्म-अधर्म का द्वंद्व है, किन्तु ‘ट्रोजन की औरतें’ नाटक में सैन्य विभीषिका-आतंकवाद है…और है अंध राष्ट्रवाद । नाटक में सभ्यता-उपनिवेश का संघर्ष भी है। यह नाटक क्रूरता, पाशविकता, अश्लीलता के मध्य युद्ध की निस्सारता भी रेखांकित करता है, किन्तु उसका मुख्य फ़ोकस/ बल युद्ध की विभीषिका से संत्रस्त स्त्रियों की पीड़ा को उकेरना है। हैक्युबा, एन्द्रोमके , कसान्द्रा और ढेरों स्त्रियों की पीड़ा को समवेत रूप में नाटककार यूरिपिडीज ने गहनतापूर्वक उकेरा है। यूनान के सैनिकों ने जिस तरह ट्रोजन को तबाह किया, स्त्रियों और बच्चों को मारा, बंधक बनाया, शोषण किया, बलात्कार किया ….यही घटनाक्रम इस नाटक के केंद्र में है। ज़ाहिर है कि सत्ता की विध्वंशकारी नीतियों के प्रतिकार में ही यह महान नाटक रचा गया है। एथेंस और  ट्रॉय के महान [ ? ] युद्ध पर प्रश्न चिह्न लगाता यह नाटक हमारे सामने …हमारी मानवता पर एक प्रश्न चिह्न अंकित करता है । ट्रोजन शहर को ध्वंश करना …या उसे आग के हवाले कर देना एक सभ्यता को नष्ट करना भी है। युद्ध तो मनुष्य के उन्माद का प्रतिरूप है ही , किन्तु शहर को ध्वस्त करना सभ्यता और मानव जाति के सृजनात्मक तत्वों को ध्वस्त करना है । स्त्री पीड़ा को केंद्र में रख नाटककार ने सम्पूर्ण मानव सभ्यता को कटघरे में खड़ा किया है। ऐसी स्थिति में महान यूनान की शौर्य/विजय गाथाएं घूमिल पड़ने लगती हैं…झूठी जान पड़ती हैं।

‘ट्रोजन की औरतें’ नाटक में सीमित दृश्य हैं। इन सीमित दृश्यों में नाटककार ने संवेदना को घनीभूत किया है। अल्प दृश्य और सीमित पात्र रखने के पीछे नाटककार की मंशा संवेदना का घनीभूतिकरण करना ही हो सकता है। हैक्युबा-एन्द्रोमके संवाद हों या हैक्युबा-हेलेन संवाद सभी परिस्थिति की गहनता उकेरने में सफ़ल रहे हैं। हेलेन का चरित्र नाटक में एक नए प्रकार का विमर्श खड़ा करता है, किन्तु नाटककार ने उसे सीमित रूप में रखा है। हेलेन की सुन्दरता और उस सुन्दरता के प्रभाव की भयावहता इस युद्ध-विनाश के मूल में है… । यही कारण है कि इस नाटक की प्रतिनिधि पात्र हैक्युबा है , न कि हेलेन। हालांकि हेलेन के वचन संकेत रूप में पुरुषों के व्यभिचारी रूप का पर्दाफाश कर देते हैं। हेलेन और हैक्युबा परस्पर विरोधी ध्रुव पर खड़ी हैं, किन्तु स्त्री पराधीनता के बिंदु पर एक हैं और यही नाटककार की सफलता है ।

‘ट्रोजन की औरतें’ स्त्रियों के चीत्कार के बीच सभ्यता का विमर्श है। हैक्युबा इस चीत्कार का प्रतिनिधि है, प्रतीक है। उसके सामने बर्बर साम्राज्यवाद और राजतन्त्र बौने लगने लगते हैं। यह बौना लगने लगना  नाटककार की सफलता हो सकती है। हैक्युबा के प्रश्नों का उत्तर बर्बर साम्राज्यवाद के पास नहीं है…और क्या हमारे पास भी है?

‘महाभारत’ सम्पूर्ण भारतीय चिंतन परंपरा का निचोड़ है, ऐसी स्थिति में उसका ‘स्त्री विलाप पर्व’ मार्मिक, कारुणिक होते हुए भी उसकी मूल व्यंजन से भिन्न [ सत्य/ धर्म की विजय …] नहीं हो पाता । ‘स्त्रियों के विलाप’ यहाँ युद्ध के विनाश को तो सूचित करते हैं, किन्तु वे महान लक्ष्य [ शान्ति स्थापना ] की पूर्ति में सहायक भी होते हैं। बावजूद महाकवि व्यास ने ‘स्त्री विलाप पर्व’ की रचना कर पुरुषों के मिथ्या दंभ को प्रश्नांकित कर दिया है। महाकवि अपनी रचना में ऐसे संकेत स्थल छोड़ जाता है, जो व्यापक विमर्श की आधार भूमि बनते हैं। क्लासिक कृतियाँ यही कार्य किया करती हैं।

आचार्य श्रीराम शर्मा और स्त्री शिक्षा

योगेश कुमार/ डॉ सुशील उपाध्याय

भारतीय संस्कृति विश्व की श्रेष्ठ एवं समृद्ध संस्कृतियों में से एक है। यदि हम यह कहें कि यह विश्व की श्रेष्ठतम् संस्कृति है तो भी कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी क्योंकि जीवन के जिन उच्च आदर्शों एवं लक्ष्यों का निर्धारण यहाँ हुआ वह अन्यत्र कहीं भी दुर्लभ है। संस्कृति के ऊषाकाल में ही सामाजिक, धार्मिक व राजनैतिक सहित हर एक क्षेत्र में तथा व्यक्तिगत एवं पारिवारिक स्तर पर श्रेष्ठतम् मूल्यों एवं नियमों का प्रणयन हुआ। सभी सामाजिक संस्थाओं यथा विवाह, परिवार, आश्रम आदि ने इस संस्कृति के उद्भव एवं विकास में इन नैतिक मूल्यों ने प्रेरक भूमिका निभायी। प्रारम्भ से समाज में स्त्री-पुरुष का भेदभाव न करते हुए दोनों को समान महत्व व अधिकार प्रदान किए गये। स्त्रियों को भी पुरुषों के समान ही स्वतन्त्रता व अधिकार प्राप्त थे। भारतीय स्त्री के इतिहास पर यदि दृष्टिपात किया जाये तो यह पता चलता है कि वेदकालीन समाज की स्त्रियाँ भले ही समाज में समान स्थान की अधिकारिणी रहीं हो, लेकिन उसके बाद तो स्त्री जाति का सूर्य ही ढलता गया है। पुराण व शास्त्रीय ग्रन्थ आदि पुरुषों की धरोहर थे और उन्होंने आदर्श स्त्री की रूढ़िबद्ध धारणा को उसी रूप में व्यक्त किया, जिस रूप में वे उसे देखते थे। अपने परम्परागत रूप में भारतीय स्त्री त्याग और पवित्र प्रेम के लिए सदैव प्रेरणा-स्रोत रही। भारतीय संस्कृति में स्त्री जिस पुरूष से विवाह करती है उसी पर सर्वस्व न्यौछावर करना उसका धर्म है। बदले में भले ही उसे वैसा न मिले। पत्नी का यही धर्म परिवार की नैतिकता और शान्ति का मेरूदण्ड है। इसी के परिप्रेक्ष्य में महादेवी वर्मा ने शृंखला की कड़ियाँ में कहा है कि- ‘‘यूरोप में स्त्रियां चाहे हमारी तरह देवत्व का भार लेकर न घूम रही हों, मानवी अवश्य समझी जाने लगी हैं।’’  जबकि भारत में आज भी स्त्रियों को भोग्या माना जाता है।

श्रीराम शर्मा आचार्य ने स्त्री शिक्षा की जमकर वकालत की। उन्होंने अपनी लेखनी के माध्यम से स्त्री शिक्षा के लिए अभियान चलाया। उनका अभियान कारगर भी हुआ और समाज में स्त्री शिक्षा के प्रति जागृति आई- ‘‘समाज का एक और विशाल वर्ग है स्त्री का। देश की कुल जंनसख्या में लगभग आधी स्त्री हैं। दुर्भाग्यवश इतनी बड़ी जनशक्ति को आज प्रायः अशिक्षित स्थिति में ही रहना पड़ रहा है। तद्नुरूप उनका पतन भी काफी हुआ। 1989 की जनगणना रिपोर्ट के अनुसार पुरूष तथा स्त्रियों में साक्षरता क्रमशः 46.7 प्रतिशत तथा 24.9 प्रतिशत है। ग्रामीण क्षेत्र में स्त्रियों की साक्षरता तो और भी कम है। 1979 में किए पर्यवेक्षण के अनुसार ग्रामीण क्षेत्रों में पुरुषों की साक्षरता 33.8 प्रतिशत तथा स्त्रियों की 13.2 प्रतिशत थी। नगरीय क्षेत्र में 61.3 प्रतिशत पुरूष तथा 42.3 प्रतिशत स्त्रियाँ साक्षर थीं। शिक्षा की यह विभिन्नता स्त्री जाति की प्रगति में अवरोध बनकर खड़ी है।’’ 

आचार्य जी का मानना था कि अगर स्त्री को शिक्षित करना है तो उसके लिए सामान्य प्रयास भर करने से काम नहीं चलेगा। उसके लिए अधिक प्रयत्न करने होंगे- ‘‘आज की कन्या कल की माँ है, जिसे एक बहुत बड़ा उत्तरदायित्व सँभालना है। देश को सुयोग्य नागरिक देकर अपना कर्तव्य निभाना है। शादी के तुरन्त बाद ही उसको घर का सभी कार्य संभालना पड़ता है तथा एक महान जिम्मेदारी निभाने को नये गृह में प्रवेश करती है। वहाँ हर एक कार्य को सोच-समझ कर करना पड़ता है। घर को स्वर्ग बनाने की महान जिम्मदारी भी उसी की बुद्धि पर निर्भर करती है।

अक्षर ज्ञान के अभाव में वह कुछ पढ़-लिख नहीं सकती। यदि उसने बचपन में कुछ नहीं सीखा है और शिक्षित है तो स्वाध्याय द्वारा वह अन्य गुण प्राप्त कर लेगी। पति, पुत्र, सास, ससुर से कैसे व्यवहार किया जाय, घर को किस तरीके से सजाना चाहिए आदि? कई बातें न जानने पर भी स्वाध्याय द्वारा वह इतने गुण प्राप्त कर सकती है जिनका अब तक अभाव रहा। यदि वह अशिक्षित है तो पुस्तकें पढ़ना लिखना तो दूर रहा, वह यह भी ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकेगी कि उसके (ऊपर) क्या-क्या महान जिम्मेदारियाँ हैं और कैसे उन्हें निभाए। ऐसी स्थिति में महिलाओं का शिक्षित होना तो इतना आवश्यक है जैसे दीपक को तेल।’’  महिला शिक्षा के विरोधियों को आचार्य जी ने अपने लेखों के माध्यम से समझाया कि समय बदल रहा है। बदलते समय की बयार को स्वीकार करो और अच्छी चीजों को अंगीकार कर आगे बढ़ो- ‘‘विकास क्रम में ऐसे बदलाव अनायास ही प्रस्तुत कर दिए गए हैं। इस परिवर्तन क्रम को रोका नहीं जा सकता। जो पुरानी प्रथाओं पर अड़ा रहेगा, उसे न केवल घाटा ही घाटा उठाना पड़ेगा, वरन् उपहासास्पद भी बनना पड़ेगा।’’

उस समय कुछ लोगों का मानना था कि जब महिलाओं को नौकरी नहीं करनी है और घर का कामधाम संभालना है तो फिर उन्हें पढ़ाने पर इतना जोर क्यों दिया जा रहा है। इस पर आचार्य जी ने स्पष्ट किया कि स्त्री को गृहलक्ष्मी का दर्जा दिया गया है और गृहलक्ष्मी पढ़ी-लिखी होगी तो घर का सारा बजट नियंत्रित कर सकती है। उन्होंने स्त्री की शिक्षा के स्वरूप और महत्व के बारे में बताया कि- ‘‘स्त्री शिक्षा का स्वरूप और महत्त्व असाधारण है। इसलिए उसकी समग्रता के लिए परिवार की समझदार महिलाओं को वह उत्तरदायित्व सँभालना चाहिए। लड़के रोटी कमाने लगे तो उनका काम चल जाता है और सामान्यजनों को सामान्य काम मिल जाता है। लड़कियाँ सीधे पैसा तो नहीं कमातीं, पर कम खर्च में घर की शोभा-सज्जा बनाए रह सकती हैं। स्वयं काम में व्यस्त रहने के साथ-साथ परिवार के बड़ों या छोटों को साथ लगाए रह सकती हैं। स्वच्छता भी शोभा हैं। सादा जीवन उच्च विचार की नीति अपनाने पर हर किसी को बड़प्पन का श्रेय मिलता है। स्त्री को विशेष रूप से, क्योंकि उनमें से एक भी प्रगतिशील, परिश्रमी एवं मधुर स्वभाव की हो तो बच्चों या बड़ों को, मर्दों या महिलाओं को अपने ढाँचे में ढाल सकती हैं।’’ 

आचार्यश्री का मानना था कि लड़कियों को केवल किताबी शिक्षा देने भर से काम नहीं चलेगा। बल्कि लड़कियों को स्वालम्बन की शिक्षा देनी होगी ताकि आधी आबादी अपने पैरों पर खड़ी हो सके। उनका सोचना था कि-  ‘‘लड़कियों की शिक्षा के सम्बन्ध में कुछ नये सिरे से विचार करना पड़ेगा क्योंकि बच्चों की, घर गृहस्थी की जिम्मेदारी सँभालते हुए घर छोड़कर अन्यत्र कठिनाई में ही जा सकती हैं। उन्हें ऐसे ही उद्योग सीखने चाहिए, जिन्हें घर रहते हुए सहायक धन्धे के रूप में आसानी से सम्पन्न किया जा सके’’  

स्त्री शिक्षा के साथ ही उन्होंने अपने समय में अनपढ़ रह गए बुजुर्गों की शिक्षा की ओर ध्यान दिए जाने की जरूरत बताई। उनका कहना था कि बच्चों और महिलाओं की शिक्षा की तरह ही प्रौढ़ शिक्षा का प्रचार-प्रसार किया जाना चाहिए- ‘‘लोकतन्त्रात्मक समाजवाद की दिशा में जो कदम उठाए जा रहे है, उनकी भी सफलता साक्षरता और प्रौढ़-शिक्षा के कार्यक्रम की सफलता के बगैर संदिग्ध है। ग्राम पंचायत और सहकारी भण्डारों की ही बात लीजिए। ग्राम पंचायतों की स्थापना के पीछे जो उद्देश्य थे, क्या उनकी सम्यक् सिद्धि हो पाई है? क्या ग्राम पंचायतों में चुनाव निष्पक्ष और योग्यता के आधार पर होता है? क्या वहाँ आज भी साम्प्रदायिकता, जाति भेद आदि का प्राधान्य नहीं है? और क्या, ग्राम पंचायतों से जिन कार्यों को सम्पन्न करने की उम्मीद बाँधी गई थी, वे कार्य हो रहे हैं? सहकारिता का आन्दोलन जो वर्तमान महँगाई, मुनाफाखोरी और जमाखोरी की विश्राम स्थिति में उपभोक्ताओं के लिए तथा अन्य अनेक स्तरों पर कृषकों, मजदूरों आदि के लिए अत्यन्त लाभप्रद हो सकता है- क्या सम्यक् रूप से चल रहा है? मैं समझता हूँ कि अधिकांश जनता में सामाजिक जागृति का अभाव ही इसके लिए प्रमुख रूप से जिम्मेदार है। प्रौढ़-शिक्षा के प्रभावी कार्यक्रम द्वारा ही हमारी निश्चेष्टा दूर की जा सकती है।’’

आचार्य श्रीराम शर्मा ने अपने लेखों के माध्यम से शिक्षा का महत्व बताते हुए लिखा- ‘‘शिक्षा की गुण गरिमा जितनी भी गाई जाए, उतनी ही कम है। विद्या को ज्ञानचक्षु की उपमा दी गई है। उसके अभाव में मनुष्य अंधों के समतुल्य माना जाता है। विद्या को सर्वोपरि धन माना गया है। उससे अमृत की प्राप्ति होती है, ऐसा कहा जाता रहा है। पर उसमें यह सभी विशेषताएं तब उत्पन्न होती हैं, जब उसके द्वारा मनुष्य के गुण, कर्म, स्वभाव का, व्यक्तित्व का विकास हो, प्रतिभा को समुन्नत-सुसंस्कृत बनाने में सहायता मिले। अन्यथा भ्रष्ट चिन्तन और दुष्ट आचरण से मनुष्य और भी अधिक खतरनाक होता जाता है। उसे ब्रह्म-राक्षस की संज्ञा दी जाती है।’’  आचार्यश्री कहना था कि समाज को उन्नत व विकसित बनाने के लिए शिक्षा ही सबसे बड़ा हथियार होता है। विद्या सर्वोत्तम धन है जिसकी सहायता से आर्थिक रूप से कमजोर व्यक्ति भी महान कार्य कर सकता है।

श्रीराम शर्मा आचार्य बच्चों को नैतिक शिक्षा दिए जाने के पक्षधर थे। उनका मानना था कि जो बच्चे आगे चलकर देश का भविष्य बनने वाले हैं उन्हें नैतिक तौर पर मजबूत होना चाहिए- ‘‘देश का भविष्य उन लोगों के हाथ है जो आज शिक्षा प्राप्त करने के उपरान्त भावी उत्तरदायित्वों को सँभालने वाले हैं। प्रगति और सुव्यवस्था के लिए आवश्यक है कि भावी जिम्मेदारियाँ सँभालने वालों को नैतिक दृष्टि से उत्कृष्ट बनाया जाय। अन्यथा योजनाएँ कितनी ही उत्तम क्यों न हों, उन्हें चलाने वाले यदि उपयुक्त स्तर के न हुए तो सफलता संदिग्ध रहेगी। इसलिए अभिभावकों का, विज्ञानों का और शिक्षा संचालकों का यह सोचना ठीक है कि सच्चरित्रता को भी शिक्षा के साथ-साथ ही सुदृढ़ करने के लिए प्रयत्नरत हुआ जाय। गीली मिट्टी से इच्छित आकार के बर्तन बन सकते हैं। सूखने पर वह ढलती नहीं बिखर जाती है। गीली लकड़ी को मोड़ा जा सकता है पर सूख जाने पर वैसा सम्भव नहीं। बालकपन और किशोरावस्था ऐसी है, जिसमें पूर्वाग्रह नहीं होते और संस्कार भी परिपक्व नहीं होते। ऐसी दशा में यदि शिक्षा के साथ नीति-निष्ठा का समावेश रहे तो उसका अच्छा प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है। प्राचीनकाल में गुरुकुलों के ढले विद्यार्थी नर-रत्न बनकर निकलते थे। इसमें जहाँ पाठ्यक्रम का महत्त्व था वहाँ अध्यापन शैली की विशेषता भी अपना काम करती थी।’’  आचार्य जी का कहना था कि शिक्षा ऐसी होनी चाहिए, जिससे विद्यार्थियों में शिष्टता आये। शिष्टता के बिना सभ्यता की कल्पना नहीं की जा सकती- ‘‘शिष्टता सभ्यता की आधारशिला है और अशिष्टता अनगढ़पन की सबसे बुरी प्रतिक्रिया है।’’ 

आचार्य जी का कहना था कि बच्चों को स्कूल भेजते समय उनका मनोवैज्ञानिक विश्लेषण भी किया जाना चाहिए- ‘‘मनोवैज्ञानिक बातों का ध्यान रखते हुए भी बच्चों के मन से यद्यपि समूची हिचकिचाहट तो दूर नहीं की जा सकती। पर उनके मन में वह क्षमता अवश्य उत्पन्न की जा सकती है, जो नये वातावरण के अनुकूल बनने का आत्मविश्वास दिला सके। बच्चा स्कूल में प्रारम्भिक दिनों में उस प्रकार प्रवेश करता है, जैसे-बत्तख का बच्चा तालाब में उतर रहा हो, जाना पड़ रहा है-यह विवशता है और जाने का मन नहीं है। क्योंकि आस-पास सब कुछ नया ही नया और अनदेखा-सा है।’’ 

आचार्य जी ने स्त्री शिक्षा के साथ ही समाज के सभी वर्गों के लिए अनिवार्य शिक्षा की मांग की। भविष्य के लिए देखा गया उनका स्वप्न भी इसी से जुड़ा हुआ था। आचार्य जी ने संकल्पना की थी कि- ‘‘समाज का कर्तव्य होगा कि हर व्यक्ति को कामचलाऊ शिक्षा अनिवार्य रूप से मिले। अशिक्षित रहना कानूनन जुर्म बना दिया जाएगा। जो स्वेच्छा से न पढ़ेंगे, वे कैदखाने में रखकर पढ़ने के लिए बाधित होंगे।’’

शिक्षा को लेकर आचार्य जी की गंभीरता का अनुमान इससे लगाया जा सकता है कि उन्होंने समाज और देश के अन्य कार्यों को शिक्षा के बिना अधूरा बताया। उनका कहना था कि जब तक देश में साक्षरता की दर नहीं बढ़ेगी तब तक देश की उन्नति संभव नहीं है- ‘‘हमारे देश में शिक्षा प्रसार की बड़ी आवश्यकता हैं। मुश्किल से पच्चीस प्रतिशत लोग साक्षर हैं। ऐसी स्थिति में जनतन्त्रा की सफलता व राष्ट्र की प्रगति के स्वप्न देखना कितना बेमानी होता है। शिक्षा, समाज कल्याण, समाज-सेवा आदि के कार्य सेवा-भावना से जितनी अच्छी तरह सम्पादित हो सकते हैं। उतनी अच्छी तरह नौकरपेशा लोगों द्वारा नहीं जिन्हें सरकार रखती है। आज के वर्ग को यदि समुचित मार्गदर्शन मिले और उन पर समाज की जिम्मेदारी डाली जाय तो वे निश्चित रूप से अपनी शक्ति का सदुपयोग करते हुए समाज-सेवा में ऐसे ही कीर्तिमान स्थापित करें, जैसे भोजाडांगा में हुए उच्छृंखलतापूर्ण कार्यों में लगी हुई है वहीं, यदि सृजन और सेवा की रचात्मक प्रवृतियों में लग सके, तो निश्चित रूप से यह देश और समाज के लिए समस्या न बनकर प्रगति का सेतु बन जाय।’’

आधुनिक शताब्दी में स्त्री के अनेक रूप हमारे सामने प्रस्तुत हुए। जिनमें शिशु के डगमगाते कदमों के साथ गृहस्थी की डगमगाती नौका को सम्भालने वाली स्त्री या पहाड़ों की अलंघ्य उंचाईयों तथा सागर की अथाह गहराईयों को अपने कदमों से नाप लेने वाली स्त्री, खेल के मैदान में अपनी ताकत या शिक्षा के क्षेत्र में विलक्षण प्रतिभा का परिचय देने वाली स्त्री या फिर सामाजिक संत्रास, घुटन, विखण्डन व भौतिकता तथा आर्थिक विषमता से जन्मी मानसिक संत्रास को झेलती चलती आ रही स्त्री के रूप प्रमुख रहे।

इक्कीसवीं सदी की स्त्री राजनीतिक दृष्टि से अधिकार सम्पन्न है। भारत की शिक्षित स्त्री ही नहीं अशिक्षित स्त्री ने भी भारतीय गणराज्य की स्थापना के साथ मताधिकार पा लिया था। समाज में मध्यम वर्ग की स्त्रियों को घर के भीतर व घर के बाहर, नवीन और पुरातन आदि की अनेक समस्याओं में संघर्षरत रहना पड़ता है। भारत के भावी स्त्री समाज की रूपरेखा इन्हीं समस्याओं के स्वस्थ निराकरण पर निर्भर करती है। अर्थाभाव व स्वावलम्बन की इच्छा ने मध्यम वर्ग की शिक्षित स्त्री को घर से बाहर आने में सहायता दी है, लेकिन दोनों ही क्षेत्रों में उसकी उपस्थिति संदेह के घेरे में है। सम्बन्धों में संघर्ष एवं कटुता, जीवन के लिए आवश्यक वस्तुओं का अभाव तथा पारिवारिक अव्यवस्था आदि के कारण शिक्षित स्त्री बाहर कार्य खोजती है।

आधुनिक काल में स्त्रीयों ने जितनी भी उन्नति और विकास किया है, इतिहास को देखें तो उतना पहले कभी नहीं हुआ। स्त्रीयों का कार्य क्षेत्र अब तक घर, परिवार, पति और बच्चे ही रहे थे, परन्तु अब वह उन सीमा रेखाओं को लांघकर नये युग में पदार्पण कर चुकी है और नये युग का सृजन भी कर रही है। उसने बहुत सी धार्मिक, रूढ़िगत और सभ्यता सम्बन्धी लक्ष्मण रेखाओं को लांघ लिया है। जमीन को अपने कर्मों से चूमती स्त्री आकाश में उड़ान भरने लगी है। पिछले वर्षों में स्त्री की जीवन शैली में अप्रत्याशित परिवर्तन हुआ है। पर्दे में रहने वाली स्त्री आज पुरुषों की तरह केश सज्जा रखकर उनके जैसे ही वस्त्र धारण कर कन्धे से कन्धा मिलाकर काम करती नजर आ रही है। यह प्रसन्नता का विषय है कि समाज की आधी आबादी आज अपनी पहचान बनाने में समर्थ है।

श्रीराम शर्मा आचार्य का भी मानना था कि शिक्षा आदमी को मानव बनाती है और उसे एक सभ्य समाज में रहने लायक बनाती है। इसलिए उन्होंने शिक्षा की महत्ता और अनिवार्यता पर विशेष जोर दिया। शिक्षा में जिन सुधारों की बात आज हम कह रहे हैं। बड़े-बड़े आयोग बनाकर शिक्षा में सुधार के जो उपाय सुझाए जा रहे हैं। आचार्यश्री काफी पहले उन्हें बता गए थे। आज हर बोर्ड की तरफ से प्रयास किया जा रहा है कि केवल किताबी ज्ञान बच्चों को न परोसा जाए, उसके स्थान पर व्यवहारिक शिक्षा दी जाए। यह बात आचार्यश्री ने कापफी समय पहले कह दी थी। उन्होंने लिखा था कि पाठ्यक्रम में व्यावहारिक जीवन सम्बन्धी जानकारियों को स्थान अवश्य दिया जाय, जिससे विद्यार्थी को स्वास्थय, यात्रा, शिष्टाचार, रेल, डाक तार, व्यापार तथा राजकीय नियमों की आवश्यक जानकारी हो जाय।

आज सीबीएसई और उत्तराखंड सहित कई बोर्ड विद्यार्थियों के समग्र मूल्यांकन पर जोर दे रहे हैं। देश का मानव संसाध्न विकास मंत्रालय कह रहा है कि केवल तीन घंटे की परीक्षा के आधर पर छात्र का मूल्यांकन न किया जाए। यही बात आचार्यश्री दशकों पहले कह गए। उनका मानना था कि परीक्षा में उत्तीर्ण-अनुत्तीर्ण होना वार्षिक परीक्षाओं पर निर्भर न रहे वरन् विद्यार्थी के कार्य की मासिक प्रगति के विवरण के आधार पर उसे उत्तीर्ण या अनुत्तीर्ण किया जाय। शिक्षा के क्षेत्र में उनके योगदान को कम करके नहीं आंका जा सकता। शिक्षा को लेकर उनकी भविष्य दृष्टि की भी सराहना की जानी चाहिए। आज पूरे देश में बारहवीं कक्षा तक एक बोर्ड और एक पाठयक्रम की आवाज उठ रही है। आचार्यश्री ने इसे दशकों पहले महसूस करते हुए कहा था कि सब प्रान्तों में एक ही प्रकार का पाठ्यक्रम हो, जिससे एक प्रान्त के विद्यार्थियों को दूसरे प्रान्त में जाने पर दाखिला सम्बन्धी कोई अड़चन न हो। आचार्य श्रीराम शर्मा भी स्त्री शिक्षा के पक्षधर थे उनका कहना था कि आधी आबादी को शिक्षित के बगैर समाज का भला नहीं हो सकता। आचार्य जी लड़कियों को लेकर किताबी ज्ञान देने तक सीमित नहीं रखना चाहते थे बल्कि वह लड़कियों को स्वालम्बन की शिक्षा देने की बात करते थे।

सन्दर्भ ग्रन्थ सूची-

  हिन्दू स्त्री का पत्नीत्व, शृंखला की कड़ियां, महादेवी वर्मा, राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली, 1942

2 शिक्षा एवं विद्या, श्रीराम शर्मा आचार्य, अखण्ड ज्योति संस्थान मथुरा, 1998

3 मनःस्थिति बदले तो परिस्थिति बदले, श्रीराम शर्मा आचार्य, युग निर्माण योजना विस्तार, गायत्री तपोभूमि, मथुरा, 2010

4 समस्याएँ आज की समाधान कल के, श्रीराम शर्मा आचार्य, युग निर्माण योजना विस्तार, गायत्री तपोभूमि, मथुरा, 2009

5 जीवन साधना के स्वर्णिम सूत्र, श्रीराम शर्मा आचार्य, युग निर्माण योजना विस्तार, गायत्री तपोभूमि, मथुरा, 2008

6 मूल्यनिष्ठ पत्रकारिता और युग पत्रकार पं0 श्रीराम शर्मा आचार्य, डॉ0 विजय कुमार मिश्र, शिशिर प्रकाशन, मेरठ, 2007