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‘कागज पर लगाए गए पेड़’ सी जीवंत कविताएँ

पुनीता जैन

             सूर्यनारायण रणसुभे द्वारा अनूदित संध्या रंगारी की मराठी कविताओं का हिन्दी अनुवाद ‘बेटी को बोलना सिखाउंगी’ को पढ़ते हुए अकस्मात् कथादेश, जून 2019 में मीनाक्षी मुखर्जी के एक आलेख में उल्लेखित रवीन्द्रनाथ टैैगोर की एक कहानी ‘स्त्री-पत्र’ (1914) का  स्मरण हो आता है जिसमें रूढ़िवादी पारिवारिक व्यवस्था के भीतर एक स्त्री की दुरवस्था का चित्रण है. छोटी उम्र में विवाहित मृणाल आजीवन पारिवारिक, सामाजिक कर्तव्यों के निर्वहन में खपती है. जब वह एक रिश्तेदार वृद्धा के साथ तीर्थयात्रा पर समंदर किनारे पहुँचती है तब उसे अपने अस्तित्व के महत्त्व का बोध होता है. वह भी एक इंसान है तथा सृष्टि के साथ उसका स्वतंत्र संबंध है. एक विवेकशील, सजग स्त्री का यह अस्तित्व बोध उसे एक स्वतंत्र निर्णय की ओर ले जाता है जहाँ वह उस व्यवस्था में  वापिस न लौटने का निर्णय  लेती है . ‘सीमंतनी उपदेश’ की ‘एक अज्ञात हिन्दू स्त्री’, मृणाल या संध्या रंगारी, भारतीय पारिवारिक व्यवस्था में स्त्री का यह आत्मसंघर्ष आज भी निरंतर जारी है. महत्त्वपूर्ण यह है कि ये स्त्रियाँ उत्पीड़न को विविध कोण से देखते  हुए स्वयं अपनी मुक्ति  का रास्ता तलाशती है तथा हाशिए के उत्पीड़न के साथ अपने परिवेश और समय में शोषण के विविध चेहरों को भी चिह्नित करती हैं. संध्या रंगारी की कविताओं  में भी पारिवारिक दायित्वों  के बीच विलुप्त होती स्त्री,  पति के रूप में पितृसत्तात्मक व्यवस्था का शोषक  रूप सहज प्रश्नाकुलता के साथ अभिव्यक्त हुआ है. वस्तुतः स्त्री के प्रश्न उसकी मुक्ति का पहला कदम है और संध्या की कविताएँ मुखर प्रश्न ही हैं! ये प्रश्न स्त्री उत्पीड़न विषयक ही नहीं है वरन इसका विस्तार दलित समाज, राजनैतिक विडंबनाओं और दंगों  के कारण ध्वस्त होती मानवता तक जाता है. संध्या की विकलता और मुखरता के पीछे धैर्य के चुुक जाने की स्थिति दिखती है. संभवतया वे अपने काव्य संकलन का नाम ‘बेटी को बोलना सिखाउंगी’ इसलिए देती हैं ताकि  स्त्री की सहनशीलता  की कठोर परीक्षा बंद हो और उसे न्याय और स्वतंत्रता स्वाभाविक अधिकार के रूप में उपलब्ध हों.


साभार गूगल

             संध्या की कविताओं में व्यंजित वैयक्तिकता भी समूह मन के साथ सम्बद्ध है. उनकी व्यक्तिगत पीड़ा  में हाशिए के समुदायों का दुख समाहित है. मराठी के सुविख्यात हस्ताक्षर  सूर्यनारायण रणसुुभे  द्वारा चिह्नित और रेखांकित  संध्या रंगारी  के काव्य कर्म का यह वैशिष्ट्य है कि वे दलित और स्त्री पक्ष के साथ-साथ अपने समय व परिवेश  की तमाम विसंगतियों पर पैनी नजर रखती हैं. गजानन माधव मुक्तिबोध  का कथन है- ‘‘काव्य रागात्मक संदर्भों  की भावात्मक अभिव्यिक्त्ति है.’’  आगे वे कहते हैं ‘‘स्वानुभूति का सहअनुभूति  होना ही काव्य का श्रेष्ठ तत्व है.’’ (आलोचना – जुलाई-सितं. 2015, पृष्ठ 45-46)  यहीं इलियट के इस कथन का भी उल्लेख है- ‘दि ग्रेट पोएट, इन राइटिंग हिम सेल्फ, राइट्स हिज़ टाइम.’ उल्लेखनीय है कि संध्या की स्वानुभूति में परानुभूति को विस्तार मिला है. वे वैश्वीकरण, धार्मिक, जातिगत उन्माद, सत्ता व तंत्र के अन्तर्विरोध,  आंदोलनों के भीतरी दृश्यों  को भी काव्य-विषय बनाती हैं. संध्या की कविताओं में मुखरता और आक्रोश की विशेष जगह है. इस मुखरता में वे भाषिक  सौन्दर्य और कलात्मकता को नज़र अंदाज करती हैं. बल्कि यहाँ तक कि वे काव्यात्मकता के स्थान पर गद्यनुमा संबोधन, संवाद सीधे पितृसत्ता,  वर्चस्ववाद और तमाम शक्ति केन्द्रों  से स्थापित करने का प्रयास करती हैं. यह सूर्यनारायण  रणसुभे जी का अनुवाद कौशल है कि  वे कवयित्री के मूल स्वर को बनाए रखते हुए मराठीपन के सौन्दर्य की रक्षा कर ले गए हैं. ये कविताएँ हिन्दी  में अनूदित  होकर भी अपने मराठी लहज़े  को जीवंत रखती हैं.

          वस्तुत वैमर्शिक जगत के भीतर दलित कविता  ने एक सर्वथा भिन्न सौन्दर्य दृष्टि विकसित कर ली है, जिसमें प्रखर आक्रोश, विद्रोह और दृढ़ता  है. यहाँ निषेधों पर प्रश्नचिह्न लगाए गए हैं. कला सौन्दर्य, भाषा के आभिजात्य संसार, बिम्ब, प्रतीक  अर्थात स्थापित प्रतिमानों का यहाँ महत्व नहीं है.  यहाँ  अन्तर्वस्तु महत्वपूर्ण है तथा वह किस तरह अपनी अभिव्यक्ति के मार्ग गढ़ती है, इस पर ध्यान कम है. दलित कविता के उद्गारों में इतना ओज है कि उसके कथन अपना भाषिक कलेवर स्वाभाविक अभिव्यक्ति के प्रवाह द्वारा निर्मित  करते हैं. संध्या रंगारी का काव्य जगत लैंगिक और जातिगत विषमता व पहचान के भीतर तीव्र विकलता का आगार है. सौन्दर्य की स्थापित दृष्टि व अवधारणाओं के प्रति ठोस आग्रह संध्या की कविताओं में भी नहीं मिलता. हालांकि उनकी कविताओं का बड़ा हिस्सा स्त्री -उत्पीड़न से संबंधित  है. परिवार और विवाह जैसी सामाजिक संस्थाओं में स्थापित परंपराओं और संस्कारों के नाम पर स्त्री के अधिकारों को सदैव सीमित किया गया और उसे अपनी स्वतंत्र पहचान बनाने से दूर रखा गया है. घरेलू दायित्वों के नाम पर स्त्री के संपूर्ण जीवन का होम सांस्कृतिक दृष्टि से अपरिहार्य घोषित किया गया. इस संग्रह में यही स्त्री अपने स्वतंत्र अस्तित्व हेतु सौन्दर्य व कलात्मक आग्रहों को दरकिनार करते हुए अपने प्रखर बयानो को धारा प्रवाह रूप से प्रकट करती  है. यहाँ जाति और लैंगिक पहचान दोनों रूप में वंचित अस्मिता का बेबाक विस्फोट हुआ है. संध्या की कविता में स्वाभाविक आक्रोश और विषाद है. ये गुस्सा उन्हें तल्ख और उनकी मुद्रा को निरंतर प्रश्नवाचक बनाता है. भाषा को सीमा में बाँधकर रखना उन्हें उपयुक्त नहीं लगता, फलतः अंग्रेजी शब्द यहाँ धाराप्रवाह रूप से प्रयुक्त हैं. वे चीजों को स्थापित रूढ़ दृष्टि  से नहीं देखती बल्कि बोलने की पूरी आजादी  लेते हुए प्रत्येक विसंगति, विडंबना पर प्रहार करती हैं.


साभार गूगल

             स्त्री की पीड़ा  के मूल में उसकी लैंगिक पहचान को लेकर नियत निषेध, वर्जनाएँ और सीमाएँ  है . संध्या की विकल चेतना स्त्री के लिए निर्धारित उपमानों, अलंकारों से बाहर जाने की इच्छुक हैं, वह चाहती है उसे नख-शिख वर्णन से इतर मनुष्य रूप में देखा-समझा जाए. स्त्री  के मौन में उसके उत्पीड़न का इतिहास छिपा है . शारीरिक अत्याचार, शोषण, हिंसा, क्रूरता की कथाएँ स्त्री उत्पीड़न की स्थिति बयान करती हैं. स्त्री  की सहनशीलता ने उत्पीड़कों को सर्वदा बल दिया है. इसलिए संध्या कहती हैं- ‘‘ अतीत ठीक नहीं था औरत का /परंतु भविष्य / मैंने ठान लिया है कि मैं अपनी बेटी को बोलना सिखाउंगी.’  (पृष्ठ 22)  ये पंक्तियाँ प्रतिरोध के जीवंत हस्तांतरण का उदाहरण बनती हैं. संध्या की कविताएँ स्त्री प्रताड़ना के विरूद्ध मौन का समर्थन नहीं करती, वे आने वाली पीढ़ी  से मुखर प्रतिरोध का आह्वान करती है. बेटियों पर प्रतिबंध, निषेध व उनकी स्वतंत्र उड़ान व इच्छाओं  की काट-छाँट  को सुंदर बिम्ब में संध्या इस तरह प्रस्तुत करती हैं- ‘‘घर घर में / बोन्साई बेटियाँ / सजाई हुई.’’ (पृृष्ठ28) बेटी को बोलना सिखाने के निश्चय के पीछे  पितृसत्तात्मक  समाज में स्त्री उत्पीड़न की लंबी परंपरा के विरूद्ध प्रत्यक्ष संघर्ष चेतना की आवश्यकता को रेखांकित करना है.  इन कविताओं  में बेटी के दुख को सांझा करती, ढाँढस बंधाती माँ अपने पीठ के ताजे जख्म बेटी  को दिखाती है. यह बेटी अपनी माँ को जीती जागती लाश की तरह ठंडा पाती है. किन्तु इस स्थिति  को लेकर वह मूक नहीं है. अपनी बेटी व संपूर्ण  भावी पीढ़ी  को लेकर उसमें गहरी चिंता है  तथा वे समताप्रेमी बुद्धिजीवी पुरूष वर्ग के दोहरे चरित्र  पर भी गंभीर प्रश्न उठाती हैं, जिसके कारण स्त्री का जीवन तमाम आदर्श कथनों के बावजूद  यथावत हैं- ‘‘मेरी पाँच-छह वर्ष की बेटी / भारी स्कूली बस्ते का बोझ / संभालते हुए घर आती है / उतार लेती हूँ, मैं उसका बोझ / पर डर लगता है मुझे / कल ससुराल में गृहस्थी संभालते हुए / गर वह आ गयी चार दिनों के लिए / मायके / तब उसकी पीठ पर लदे दुख के /बोझ को क्या उतार ले सकूंगी  मैं?’’ (पृष्ठ 28) स्त्री के जीवन व समय पर परिवार, बच्चों व पति का आधिपत्य है, अपने लिए उसके पास समय नहीं है . स्त्री स्वतंत्रता  को भ्रम कहते हुए वे पूछती हैं- ‘‘यह भी तो सच है कि / औरत कहाँ होती है मनुष्य?’’ (पृष्ठ 29)  अन्यत्र उनका प्रश्न है- ‘‘लड़कियों का / खुद का बिम्ब कहाँ होता है ?’’(पृ. 32) स्त्री चेतना व विकलता के ऐसे स्वर संध्या के काव्य जगत को आकार देते हैं . स्त्री जीवन के कई पक्षों तथा पितृसत्ता में उसके स्थान को लेकर कई प्रश्न उनकी कविताओं में प्रखरता से उठाए गए हैं.

             बौद्धिक समाज में स्त्री विमर्श व स्त्री-स्वतंत्रता की चर्चा या महिला दिवस जैसे कार्यक्रमों  की वास्तविकता को संध्या अपनी कविताओं में चिह्नित करते हुए स्पष्ट करती हैं कि महत्वाकांक्षी स्त्रियाँ पितृसत्तात्मक मानसिकता को घर के बाहर तो अच्छी लगती है किन्तु घर में वे अस्वीकार्य है. घर-गृहस्थी के भीतर दबी -कुचली, अस्तित्वहीन स्त्री के कई बिंब व स्त्री के अस्तित्व संघर्ष की कुलबुलाहट उनकी अधिकांश कविता का विषय बनती है. वे इनके माध्यम से अपने अस्तित्व को खोजती है, प्रश्न करती हैं, व्यंग्य करती है और समाज और परिवार के अन्तर्विरोधों को सम्मुख लाती हैं. समस्त जिम्मेदारियों का निर्वहन करती यह बेचैन स्त्री अपने अस्तित्व बोध को लेकर विद्रोही स्वर भी अपनाती है- ‘‘कभी-कभी /वह प्यार में आकर पूछता है / प्रिय, तू किसकी ? / वह अब दृढ़ता से कह देती है / मैं अब खुद की .’’ (पृष्ठ 37)  पितृसत्ता मौन समर्पण चाहती है और परंपराओं का निष्ठापूर्ण अंधानुकरण . किन्तु संध्या की कविताओं की स्वतंत्रचेता स्त्री करवाचैथ के पाखंड से मुँह मोड़ लेने का चुनाव करती है. इस स्त्री में संघर्ष का माद्दा है और दृढ़ आत्म विश्वास व स्वाभिमान भी. किन्तु इसी के साथ यथास्थितिवाद  की छाया भी इन कविताओं  में बिखरी है- ‘‘ आदत सी हो गयी है अब अन्याय की / न्याय, समता जैसी बातें /सजाकर रख दी है मैंने कविता में / मेरी बेटी के लिए .’’ हताशा और  आशा का गहरा द्वन्द्व इनकी कविताओं में मिलेगा. गहरी थकान और निराशा के बावजूद इन कविताओं की स्त्री बेटी को आश्वस्त करती है कि उसके जीवन में जब किसी पुरूष के भीतर का शैतान जाग जाए तो वह निःसंकोच  मायके लौट आए. यहाँ झुकी कमर की हालत में भी एक माँ उसको आश्रय  देगी.  यह  निडरता,  साहस  व दृढ़ता ही स्त्री चेतना की रीढ़  है, जिसे ये कविताएँ शब्द बद्ध करती हैं. दुख, हताशा व विकल प्रश्नानुकूलता के बावजूद पारिवारिक दायित्वों से बंधी यह स्त्री अपनी मुक्ति, स्वतंत्रता को लेकर बारंबार आशंकित है- ‘‘मन में अपार करूणा सागर  होते हुए भी / औरत हो नहीं सकती बुद्ध.’’ (पृष्ठ 45)

साभार गूगल

             संध्या रंगारी की कविताएँ यथार्थ का प्रतिबिंब उकेरती हैं. दलित  कविता में इस यथार्थ का रूपांतरण काव्यात्मक लय, सौन्दर्य से आबद्ध न होकर प्रायः सपाट रूप से होता आया है. संध्या की कविता में भी अभिधार्थ  का प्राधान्य  है, व्यंजना यहाँ क्षीण है. विमर्श मूलक काव्य स्वर  होने के कारण यहाँ विषयवस्तु रूप पक्ष की अपेक्षा सशक्त है. एक रचनाकार, जिसके चार काव्य  संग्रह  प्रकाशित हो चुके हैं.  उससे वस्तु और रूप दोनों पक्षों में सशक्त संतुलन की अपेक्षा गलत नहीं कही जा सकती . संध्या ने अपनी कविताओं  के शीर्षक नहीं दिए हैं. इसलिए उनकी कई कविताओं को रेखांकित करने में अवरोध उपस्थित होता है. जैसे क्रमांक  सत्ताइस  कविता अपनी कमजोर शुरूआत  के बावजूद  आगे अपनी मार्मिकता व सघन संवेदनशीलता के कारण प्रभावित करती है. यह कविता स्मृति पक्ष का सुंदर उदाहरण  हैं. स्त्री दुख की कातर ध्वनि, ससुराल और मायके नामक दोनों स्थान में अनचीन्ही, अनचाही होने  की पीड़ा, माँ के दुलार व स्वयं मातृत्व बोध की गहन अनुभूति आदि कई दृष्टि से इस कविता की अन्तर्वस्तु तीव्र संवेदनशीलता  के साथ हृदय को स्पर्श करती है. किन्तु  शीर्षक रहित रह जाने से इसे रेखांकित या उद्धत करना कठिन हो जाता है. विवाह, परिवार, ससुराल, मायका, गृहस्थ जीवन में स्त्री-पुरूष की भूमिकाओं के द्वन्द्व के साथ-साथ  संस्कार, रूढियाँ, मान्यताओं के नाम पर अनेकानेक बंधनों के भीतर कसमसाती स्त्री की मुक्ति चेतना इन कविताओं में बारंबार अनेकविध अभिव्यक्त होती है- ‘‘कैसे कहूँ हे तथागत !  कितनी छटपटाहट  है मेरे भीतर / मनुष्य होने के लिए .’’  (पृष्ठ 56) संध्या  की कविताएँ  ‘स्त्री’ होने के इस सामाजिक नाम से छुटकारा चाहकर ‘मनुष्य’ रूप में  जीने की इच्छा रखती है. पुरूष या पति के साथ गुलामी का जीवन जीने वाली स्त्री, जातिगत हाशिए के भीतर हाशिए को वहन करती है. पति जातिगत गुलामी से मुक्ति चाहता है किन्तु स्वयं वह गृहस्थी में पितृसत्ता और वर्चस्ववाद का पोशक है. संध्या इस अन्तर्विरोध व विडंबना को प्रश्नांकित करती हैं.  मराठी लेखन में स्त्रियाँ अधिक बेबाक व स्पष्टवादी है. वस्तु या भोग्य होने के तीक्ष्ण बोध के परिणाम स्वरूप मुखर प्रतिरोध उनकी पहचान है.

             स्त्री-पुरूष संबंध में गैरबराबरी व स्वामी-दास का भाव सर्वथा अन्यायपूर्ण कहा जाएगा. पति-पत्नी के बीच मालिक-गुलाम के से रिश्ते पर कवयित्री कहती है- ‘‘दुनिया का कोई भी गुलाम अपने/ मालिक पर प्रेम नहीं करता और/मालिक कभी भी गुलाम को बराबरी / का हक नहीं देता.’’  (पृष्ठ -65) स्त्री पुरूष संबंध की इस स्थिति  को वे ‘विवाह संस्था की निरर्थकता’  कहती है. संध्या के भीतर की शोषित स्त्री जीवंत रूप से उनके शब्दों में उपस्थित है, स्पष्ट नकार व विद्रोह भावना के साथ.  परिवार और मातृत्व के सम्मुख सर्वस्व समर्पित करती स्त्री की स्थिति यह है कि -‘‘सीमाएँ जानकर भी नहीं छूटता हाषिया.’’  (पृष्ठ 69)  स्त्रीमन की प्रत्यक्ष, यथार्थ अभिव्यक्ति के बीच उनकी कई प्रस्तुतियां सौंदर्यपूर्ण और कलात्मक भी है- ‘‘मेरे ही भीतर था सरसराता हुआ / एक हरा-भरा पेड़/ वह दिखलाई नहीं दिया उसे कभी/ और / मैं भी नहीं कर पाई प्रदर्षन उसका / सूखती गयी  मैं /’’ (पृष्ठ 71) गृहस्थ जीवन में स्त्री की उपस्थिति  को हरे-भरे पेड़ के सूख जाने के बिम्ब  में प्रस्तुत करती यह कविता स्त्री की स्वतंत्र पहचान के विलुप्त होते जाने की पीड़ा  का बयान करती है. यह पीड़ा इसलिए भी है  क्योंकि वे मानती हैं कि – ‘‘ घर-गृहस्थी होते हुए  भी मैं/ विस्थापित .’’  (पृष्ठ 72)  पितृसत्तात्मक समाज  में स्त्री हेतु निर्धारित  कर्तव्यों को विस्तृत अभिव्यक्ति संध्या की कविताओं में मिलती है. जिसमें अंतर्द्वंद्व, विडंबना, अन्तर्विरोध, स्मृति, स्वप्न और प्रतिरोध के स्वर गुंफित हैं. उत्पीड़न, यातना, त्रासद स्थितियों के भीतर भी आत्मविश्वास, आत्मसम्मान और दृढ़  निश्चय के स्वर उनकी कविताओं को संभावनापूर्व बनाते है. स्त्री का विकट आत्मसंघर्ष, पराजय बोध और विसंगत स्थितियों से अनुकूलन की प्रवृत्ति को वे इस तरह व्यक्त करती है- ‘‘ गर्भ में ही हार जाती हूँ मैं/ अपने खुद के जीने की लड़ाई / तुझे  जैसी चाहिए वैसी उसी साँचे की / बनती जाती हूँ मैं.’’ (पृष्ठ 77)  पितृसत्ता के अनुरूप ढलना और निरंतर उसका विरोध भी करना, यह आत्मसंघर्ष कविता में स्त्री जीवन के यथार्थ का सटीक चित्रण  प्रस्तुत करता है. यह भी सही है कि स्त्री के गुलाम, दासी होने से सदैव इंकार करती, जूझती संध्या  प्रतिशोध  भाव को उचित नहीं मानती.  किन्तु निश्चित ही वे अपनी जगह और स्वतंत्रता हेतु संघर्ष  करना चाहती हैं. विवाह, परिवार संस्था में स्त्री हेतु तमाम प्रतिकूलताओं को चिह्नित  करते हुए भी इसे तोड़ने के पक्ष में वे नहीं दिखती. उनकी कसमसाहट स्पष्ट  रूप से न्याय, समानता, आत्म सम्मान और स्वतंत्रता की आवाज को बल देती है.

             चूंकि संध्या लैंगिक पहचान की अपेक्षा ‘मनुष्य’ के रूप में  पहचाने जाने की पक्षधर हैं अतः मनुष्य के रूप में  वे अपने समय की सूक्ष्म पड़ताल भी करती हैं. आत्मविश्लेषण, आत्मावलोकन किसी भी कलम की बड़ी ताकत है. दलित आंदोलन के भीतरी चरित्र पर प्रश्नचिह्न  खड़ा करते हुए वे अपनी कलम की ताकत को दर्शाती हैं- ‘‘कर क्या रहे हैं हम/ धरना, मोर्चा, निर्देशन, निवेदन / अथवा / सबकी नजर बचाकर भीतर ही भीतर / किया गया सेटलमेंट.’’   (पृष्ठ 83)  दलित आंदोलन के दोहरेपन, झूठ ओर पाखंड  पर वे तीखे प्रहार करती हैं- ‘‘ बाबा ने हमारे हाथों में कलम दी/ और हम लोगों  ने कलम बेचकर /दलाली की .’’ (पृष्ठ 103)  ये कविताएँ  अभिधात्मक है, साफगोईयुक्त, बेबाक और स्पष्ट . काव्यात्मक लय की जगह इनमें गद्य का प्रभाव अधिक परिलक्षित होता है, हालांकि कई बार अंग्रेजी शब्दों का अधिक प्रयोग खटकता है.

             यह सही है कि संध्या की कविताएँ मुख्यतः स्त्री को लेकर प्रश्न व चिंता व्यक्त करती हैं.  वैश्विक विकास के दौर में स्त्री के दायित्व बढ़े हैं किन्तु उसकी घरेलू भूमिकाएँ अपरिवर्तित रही हैं. वह एक देह, एक भोग्य वस्तु की तरह ही देखी जाती है. संध्या स्त्री  के इस निर्धारित बिम्ब को तोड़ने की इच्छुक  हैं. किन्तु स्त्री पक्ष के अतिरिक्त जाति, धर्म, पंथ, सामाजिक वैमनस्य को लेकर भी वे चिंता व्यक्त करती हैं. राष्ट्रवाद, धर्मान्धता, भीड़ तंत्र वर्तमान परिदृष्य की बेहद गंभीर चुनौतियाँ  है. सामाजिक सद्भावना, सहिष्णुता व मानवता के ठोस आग्रह शिथिल हुए हैं. मानवीय संबंधों  में गहरी शंकाओं, दुर्भावनाओं ने जगह बना ली है. इस परिदृश्य के परिप्रेक्ष्य में एक शिक्षक के रूप में  संध्या अत्यंत सरलता पूर्वक एक ज्वलंत प्रश्न को उठाती हैं- ‘‘ क्या पढाऊँ मैं उन्हें/ पुस्तक  में लिखा  समृद्ध भारत/ कि/सड़क पर देखा हुआ सच्चा भारत ?’’ (पृष्ठ 114) यहाँ वास्तविकता अत्यंत  सहजता से प्रस्तुत हुई है. इस यथार्थ  तक पहुँच बनाते हुए ये कविताएँ किसान, सरकार, नेता, कुर्सी, आरक्षण, मीडिया, भाषा, रिश्ते-नाते,  विस्फोटक होते शहर, दंगों  आदि विविध विषयों तक पहुंँच बनाती हैं. आतंक, दहशत, घृणा और हिंसा के परिवेश में उनके भीतर की माँ अपने बच्चों के बहाने भावी पीढ़ी  के लिए चिंतित है- ‘‘ किस गुफा में / इंसानियत का षिल्प कुरेद दूँ / शापित भविष्य / तेरे हाथों में कैसे दूँ.’’ (पृष्ठ 121)  हताषा, अवसाद और प्रतिकूल स्थिति में भी वे कविताओं द्वारा सुरक्षित मानव जीवन की संभावनाएँ तलाशती हैं- ‘‘मेरे घोंसले में स्थित नन्हों के लिए तो/अपने ही घर में /  तैयार करना चाहती हूँ/ एक छोटी सी दुनिया / भय मुक्त / दषहत की छाया में जीते हुए भी.’’  (पृष्ठ 122)  व्यवस्थागत विसंगतियों, संवेदनहीनता को उनकी कविताएँ  रेखांकित करती हैं.  दंगों के दहशत भरे माहौल में दम तोड़ती मानवता केदृश्य भी यहाँ जीवंत रूप से प्रस्तुत हुए है. दंगों की तबाही के बाद की राख से पुनः रास्ते तलाशने की दृढ़ इच्छाशषक्ति मानवता पर विश्वास का उदाहरण  है. अमानवीय स्थितियों को ये कविताएँ दृढ़ स्वर में अभिव्यक्ति देती हैं. हताशा की चरम स्थितियाँ भी उन्हें चुप रहने नहीं देती – ‘‘मेरी कविता/घायल सैनिक की तरह/लड़ भी नहीं सकती/और चुप बैठ भी नहीं सकती.’’  (पृृष्ठ 137)  इसलिए वे अपनी कविताओं को ‘मन के भीतर का तूफान’   कहती हैं. संध्या मानती है कि ऐसी मुखरताएँ प्रायः व्यवस्था द्वारा प्रदत्त सम्मान, पुरस्कार के कारण चुप हो जाती हैं, किन्तु  ये कविताएँ इस तरह की समझौता परस्त प्रवृत्ति के विरूद्ध मुखर हैं.

             बहरहाल, संध्या की कविताएँ अपनी उपस्थिति द्वारा ‘नया आकाश’   खोजने का प्रयास करती हैं. ये संध्या का अत्यंत सकारात्मक व आशावादी स्वर है कि वे अपनी कविताओं को ‘कागज पर लगाए गए पेड़’  के रूप में फलता-फूलता देखती हैं. उनकी संघर्ष चेतना में भावी स्वप्नों  और संभावनाओं के लिए पर्याप्त उर्वरता है. यही वैशिष्ट्य उनकी कविताओं को महत्वपूर्ण बनाता है.

लेखिका पुनीता जैन भेल, भोपाल में स्नातकोत्तर महाविद्यालय में हिंदी की प्राध्यापिका हैं. इनसे इनके ईमेल आईडी rajendraj823@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.

एपवा ने योगी सरकार के खिलाफ राज्यपाल को सौंपा ज्ञापन

अंकित तिवारी

20 अगस्त 2019 को आल इण्डिया प्रोग्रेसिव विमेन अशोसिएशन (एपवा) ने उत्तर प्रदेश के राज्यपाल को प्रदेश में महिलाओं , बच्चियों , दलितों , आदिवासियों व अल्पसंख्यकों पर हिंसा और भीड़ द्वारा बढती हिंसात्मक घटनाओं को लेकर जिलाधिकारी के माध्यम से ज्ञापन सौंपा.
एपवा ने आरोप लगाया कि इन घटनाओं को रोकने में योगी सरकार नाकाम ही नहीं हो रही है बल्कि जो भी लोग इन घटनाओं के खिलाफ बोल रहे है उनके साथ तानाशाही भरा रवैया अपनाते हुए उन्हें गिरफ्तार किया जा रहा है. एपवा ने मांग किया कि बढ़ते दमन और हिंसा की  घटनाओं पर तत्काल रोक लगाई जाय. ऐपवा ने पूरे उत्तर प्रदेश में 20 अगस्त को इन मुद्दों पर एक साथ विरोध प्रदर्शन किया.

ऐपवा की राष्ट्रीय सचिव कविता कृष्णन पर मेघालय के राज्यपाल तथागत राय द्वारा की गई तथाकथित अभद्र टिप्पणी को लेकर भी एपवा ने कड़े शब्दों में निंदा करते हुए मांग किया कि वे इसके लिए सार्वजनिक रूप से माफी मांगे.

विगत 17 जुलाई को सोनभद्र नरसंहार जिसमें 3 महिलाओं समेत 10 आदिवासियों की हत्या कर दी गई, की घटना को मुख्यमंत्री योगी राज की विफलता का पर्याय बताया और इस घटना की कड़ी निंदा करते हुए दोषियों को कड़ी से कड़ी सजा और घटना की उच्चस्तरीय जांच की भी मांग की. साथ ही, सोनभद्र, मिर्जापुर , चंदौली समेत पूरे देश मे जहां भी आदिवासी , दलित रहते है वो जमीन उनके नाम करने की मांग की और आदिवासियों को उजाड़ने की कड़ी निंदा की.

एपवा ने उन्नाव की बलात्कार पीड़िता जो आज भी जिंदगी के लिए संघर्ष कर रही है उसके अतिशीघ्र स्वस्थ होने की कामना के साथ बलात्कार के आरोपी विधायक कुलदीप सिंह सेंगर पर  मुकदमा चलाकर कड़ी से कड़ी सजा की मांग की.

मुज्जफरपुर और सहारनपुर दंगो में दोषी भाजपा विधायक संगीत सोम पर से सभी आपराधिक मुकदमें वापस लेने और उसे संरक्षण देने पर योगी सरकार की कड़ी निंदा की और मांग किया कि विधायक संगीत सोम पर फास्टट्रैक कोर्ट में केस चलाकर कड़ी सजा दी जाए.

हाल ही में लखनऊ में कश्मीर की जनता के सवालों पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे नेताओं को उनके घर में नजरबंद कर दिया गया. ऐपवा ने योगी सरकार के इस रवैये पर कड़ी निंदा जतलाई और मांग किया कि शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन हमारा लोकतांत्रिक अधिकार है और कोई भी सरकार अपने नागरिकों की अभिव्यक्ति की आज़ादी पर हमला नहीं कर सकती यह गैर संवैधानिक है.

हाल ही में मोदीं सरकार ने रेलव के 7 कारखानों के निजीकरण का फैसले जिसमें बनारस का डीएलडब्लू कारख़ाना भी शामिल है. ऐपवा ने मोदी सरकार के इस फैसले की भर्त्सना करते हुए निजीकरण को बन्द करने की मांग की.

अंकित तिवारी प्रयागराज से फ्रीलांस रिपोर्टर हैं.

अपराधी हूँ मैं और अन्य कविताएँ

हेमंत कुमार(शोध छात्र) हिंदी विभाग, केरल केन्द्रीय विश्वविद्यालय.
  1. “अपराधी हूँ मैं”

जिंदगी और मौत के बीच,
हम साये बन गए,
कसूर बस इतना सा,
मेरा जन्म लेना,
जो अधिकार क्षेत्र नहीं हैं मेरा,
स्त्री- पुरुष से भिन्न, किन्नर हूँ मैं,
अपराध बस इतना सा,
शायद किस्मत का दस्तूर है,
या फ़रिश्ता,
अपराधी हूँ मैं.

साभार गूगल

2.क्या तुम जानते हो?

क्या तुम जानते हो?
उसे ….
जो मानवता की सच्ची पूजारन हैं,
जो तुम्हारे लिए खुशियाँ माँगती हैं,
जो तुम्हारे लिए नुमाइश है,
अरे, नहीं समझें ?
जो बच्चा पैदा होने पर,
शादी होने पर,
तुम्हारें लिए दुआएँ माँगती हैं,
आखिर क्यों ?
क्या संबंध हैं तुम्हारा,
न भाई, न बहन
न माता, न पिता….
कभी सोचा हैं तुमने ?
क्या तुम जानते हो,
ये लोग,
मोटर, बस, ट्रेन में..
यात्रा करना मुनासिब,
नहीं समझती
आखिर क्यों?
दस की जगह पचास देकर,
अकेले यात्रा करना,
वाजिब समझती हैं,
आखिर क्यों ?
ताकि तुम्हारी,
सभ्यता और संस्कार ,
मैले न हो जाये,
क्या तुम जानते हो?
उसका घर और ठिकाना,
क्या तुम जानते हो?
उसका नाम और पहचान,
आखिर क्यों ?

3. मैं कौन सा खिलौना हूँ?

मैं कौन सा खिलौना हूँ?
जिससे हर कोई खेलना चाहता हैं,
जिन्हें प्यारी हैं मेरी देह,
जिन्हें अच्छा लगता हैं,
मेरे द्वारा ताली बजाना,
हाव – भाव,
मगर मेरे साथ,
उठना-बैठना, हँसना- बोलना,
कोई नहीं चाहता,
जिन्हें नहीं पता,
मेरे हसमुख चेहरे का दर्द,
जिन्हें नहीं पता,
मेरे दिन-रात की घुटन
और सड़ाध,
जिन्हें नहीं पता,
किन्नर शरीर में,
कैद स्त्री का मर्म.

साभार गूगल

4. “मैं कौन हूँ”

मैं कौन हूँ,
सोनू,मोनू ,गोलू !
या फिर ,
सोनी, मोनी, डाली !
 नहीं !
मैं हिजड़ा हूँ !
हिजड़ा नहीं मै, गाली हूँ
सभ्य समाज के थाली में,
वह खाना हूँ,
जिसे कोई मन से खाता है,
कोई तन से खाता है,
बचा हुआ अवशेष,
मैं खुद खाती हूँ,
पेट के अंतड़ियोमें,
पच रही है,
रोजमर्रा की कमाई,
गाली और ताली,
जिससे सिंचित हो रहा है,
तन और मन.

बीबीसी में जातिगत भेदभाव (आरोप)

[सम्पादकीय नोट : आत्मसम्मान और जातिगत भेदभाव को लेकर अपनी पीड़ा, संघर्ष और अपने कटु अनुभव को व्यक्त कर रहीं हैं, भारत में बीबीसी कार्यालय में कार्यरत कर्मी जिन्हें कुछ दिनों पहले नौकरी से हटा दिया गया है. बीबीसी जैसी अंतर्राष्ट्रीय ख्याति की निरपेक्ष मीडिया सत्ता प्रतिष्ठान, जो यह मानती है कि वह अपने सहकर्मियों के प्रति लिंग, जाति, नस्ल , भाषा, प्रांत आदि के आधार पर किसी तरह के भेदभाद नहीं करती और उन्हें एक बेहतर माहौल में काम करने की आजादी के साथ- ही- साथ जन सरोकारी, सत्ता विरोधी समाचार लिखने, दिखाने की प्रतिष्ठा हासिल है, वहाँ यह “अनुभव” निश्चय ही उसकी शाख पर एक गहरा काला धब्बा साबित हो सकता है. बीबीसी ने यह प्रतिष्ठा वर्षों में, कठिन और सतत परिश्रम से हासिल की है, लेकिन भुक्तभोगी का अनुभव कुछ और ही बयां कह रहा है. वह भी तब जब भारत में बीबीसी की उनकी प्रमुख एक महिला हैं. भुक्तभोगी का दावा है कि वह सिर्फ अपना अनुभव लिख रही हैं. “…….जिसमें मैं अपना अनुभव लिख रही हूं. इसमें मैंने अभी कहीं भी ये नहीं कहा है कि मैं दलित हूं इसलिए मुझे बीबीसी से निकाला गया, ना मैंने ये कहा है कि मेरे साथ कोई भेदभाव हुआ है. मैं सिर्फ़ वो लिख रही हूं जो मैंने महसूस किया. क्यों किया या मेरे साथ ऐसा क्यों किया गया, ये आप ही पढकर बताइयेगा….” (मैं और बीबीसी सीरिज से इतर)

यह अनुभव मीना “मैं और बीबीसी ” सीरिज के तहत लिख रही हैं जिसमें अबतक उन्होंने दस सीरिज लिखा है. पाठको के लिये यह सीरिज चार से ( चूँकि जातिगत भेदभाव का जिक्र सीरिज चार से शुरू है) आप सब के सामने प्रस्तुत है. ]

मैं और बीबीसी-4

“आप ही मीना हो?”
“हां, क्यों क्या हुआ?”
“नहीं कुछ नहीं, बस ऐसे ही.”
“आपने इस तरह अचानक पूछा..? आप बताइए न किसी ने कुछ कहा क्या?”
“नहीं, नहीं कुछ ख़ास नहीं.”
(थोड़ी देर बात कर उन्हें विश्वास में लेने के बाद)
“बताइए न मैं किसी को नहीं बताऊंगी.”
“मुझसे किसी ने कहा था कि अब तो आपके लोग भी हमारे साथ बैठ कर काम करेंगे.”
———————–
यह सुन मैं थोड़ी देर शांत बैठ गई. मैंने उनसे जब पूछा कि आपको ये किसने कहा तो उन्होंने बताने से मना कर दिया. 
बीबीसी में मेरी नौकरी करने के ऊपर की गई यह टिप्पणी किसने बताई, मैं उनका नाम जगजाहिर नहीं करना चाहती क्योंकि मैं नहीं चाहती मेरी वज़ह से किसी की नौकरी ख़तरे में पड़ जाए. लेकिन बताना चाहूंगी वो व्यक्ति दलित समुदाय से आते हैं और वे पत्रकार नहीं हैं. वो बीबीसी के दफ़्तर में एक साधारण कर्मी हैं.

ये बिल्कुल शुरूआती दिनों की बात है जब मेरी शिफ्ट डेस्क पर लगनी शुरू ही हुई थी. ये बात मेरे दिमाग में खटक रही थी कि आख़िर ऐसा कोई क्यों बोलेगा और ऐसा कौन बोल सकता है?

मैंने घर जाकर ये बात सबसे पहले राजा (जो अब मेरे पति हैं) को बताई. राजा ने सुनते ही मुझे डांट दिया कि “तुम पागल हो किसी की भी बातों में आ जाती हो. कोई कुछ भी बोले तुम बस अपने काम पर ध्यान लगाओ. इतनी अच्छी जगह गई हो बस अच्छे से काम करो. कुछ नहीं रखा इन सब बातों में. बीबीसी तो कम से कम ऐसा नहीं है, जहां इस तरह के लोग हों, हां और जगह तुम्हें मिल जाएंगे लेकिन बीबीसी में नहीं. वहां लोग खुद दलित-मुस्लिम पर स्टोरी करते हैं, लिखते हैं. वहां सब अच्छे लोग हैं और इन सब बातों को परे करो यार…”

मैं ये सब सुनकर चुप हो गई और वो सब भूल गई कि किसने क्या कहा है. अब जब भी उस व्यक्ति से मिलती तो थोड़ा इग्नोर करती और वो बात तो बिल्कुल नहीं छेड़ती जिसके लिए राजा ने गुस्सा किया था. मुझे भी लगा कि शायद मैं ही ज्यादा सोचने लगी थी.

शुरू में सब ठीक चल रहा था. मैं अपनी शिफ़्ट करती, सबके साथ व्यवहार भी सही था. हां, मैं बहुत बातूनी नहीं हूं इसलिए औरों की तरह मुझे फालतू बात करनी नहीं आती. मुझे पसंद है अपना काम करना और काम से काम रखना. मैं जब तक किसी पर पूरी तरह विश्वास नहीं करती तब तक आसानी से बात करने में सहज महसूस नहीं करती. लेकिन इस वज़ह से कुछ लोग मुझ से कटने लगेगें, ये नहीं पता था. मुझे एक बार को यही कारण लगा लेकिन धीरे-धीरे समझ बात समझ में आने लगी कि इसकी वज़ह कुछ और है. और वो वज़ह वही वज़ह थी जो उस दफ़्तर के उस साधारण दलित कर्मी ने बताई थी.


मैं और बीबीसी 5

डेस्क पर काम करते हुए मुझे नौ महीने हो गए थे. कुछ लोगों का रवैया मेरे प्रति बदलने लगा था. मेरे पीछे से मेरा मज़ाक बनाया जाने लगा, मुझे उल्टा-सीधा कहा जाने लगा. मेरे प्रति कुछ लोगों की बेरुखी साफ़ दिखाई देने लगी थी. मुझे इसका एक कारण ये भी लगा कि डेस्क के लोगों को मेरी ट्रांसलेशन से दिक्कत हो रही थी, इसलिए मेरी बनाई गई कॉपी कई बार चेक तक नहीं की जाती थी, लगाना तो दूर की बात.

औरों के मुक़ाबले मेरी इंग्लिश कमजोर थी, इसलिए मुझ से कुछ ग़लती भी हो जाती थी और समय भी थोड़ा ज्यादा लगता था.

लेकिन एक दिन एक कॉपी मैंने खुद ना करके ऑफिस की ही एक सहयोगी से ट्रांसलेट करवाई. वो अच्छा ट्रांसलेट करती है. उसने बेहतरीन ट्रांसलेट किया भी था. मैं देखना चाहती थी कि क्या उस कॉपी को शिफ्ट एडिटर लगाएंगे या पहले की तरह से डंप कर दिया जाएगा! इस कॉपी को भी शिफ्ट एडिटर ने नहीं देखा. वो कॉपी एक हैंडओवर से दूसरे हैंडओवर घूमती रही. उस स्टोरी के आगे मेरा नाम लिखा था, शायद यही वज़ह थी कि लोग उसे चेक करना तक मुनासिब नहीं समझते थे.

मैं अक्सर देखती थी कि जिस स्टोरी के आगे मेरा नाम लिखा होता था उसे सीरियसली नहीं लिया जाता था. क्या ये मेरा वहम था! इसकी पुष्टि के लिए मैंने एक बार फिर अपनी एक सहकर्मी से ट्रांसलेट की हुई कॉपी चेक करवाई तभी उसे आगे बढ़ाया, लेकिन उस बार भी मुझे निराशा ही हाथ लगी.

कुछ लोग मुझे नापसंद करने लगे, जिस तरह मुझे और मेरी स्टोरी को इग्नोर किया जा रहा था, मैं तनाव में रहने लगी और मेरा वज़न दिन प्रति दिन गिरने लगा, जिस वजह से मुझे बहुत कमजोरी भी हो गई थी. फिर भी मैं जब भी सब से मिलती तो एक मुस्कुराहट के साथ मिलती. मैं उस सम्मान का इंतज़ार कर रही थी, जो शायद मुझे मिलना ही नहीं था. जिन आंखों में मैं अपने लिए घृणा देख रही थी, उनसे सम्मान और अपनत्व की आशा निराशा में बदलने लगी थी.

काम से ज्यादा कुछ लोगों की रूचि किसी के पहनावे, खाने, बच्चे आदि जैसे विषयों में थी. मैं इस बीच कहीं फिट नहीं हो पा रही थी. शायद मेरा काम से काम रखना भी कुछ लोगों को खटक रहा था.

मेरे साथ आए सभी सहयोगियों की शिफ्ट इधर-उधर बदल-बदल कर लगने लगी. एक बार को मैंने सोचा कि शायद मुझे कॉन्ट्रैक्ट पर रखा गया है, इसलिए काम करने की सीमा और शिफ्ट तय किए गए होंगे. लेकिन मेरे कॉन्ट्रैक्ट में ऐसा कुछ नहीं लिखा था, ना इंटरव्यू या हायरिंग के समय बताया गया था. इसलिए एक बार मैं बीबीसी हिंदी के संपादक मुकेश शर्मा से भी मिली. मैंने उन्हें सब बताया, “सर… मुझे यहां कुछ अच्छा नहीं लगता. यहां का माहौल थोड़ा अजीब है. मुझे यहां बहुत ही नकारात्मकता महसूस होती है. मुझे लगता है कुछ तो ग़लत हो रहा है मेरे साथ.”

मैंने उनसे शिफ्ट बदलने के लिए भी कहा, जबकि मैंने अक्सर देखा था कि कुछ लोग बड़ी आसानी से अपनी शिफ्ट अपनी सहुलियत के अनुसार बदलवा लेते थे. मैं परेशान होकर जब भी रोटा बनाने वाले सर को शिफ्ट बदलने के लिए कहती, तो वो हमेशा संपादक से बात करने के लिए कहते.

संपादक जी ने भी माना था कि अगर तुम्हें यहां माहौल सही नहीं लग रहा, तो ये बीबीसी की कमी है कि तुम यहां सहज महसूस नहीं कर पा रही हो. साथ ही उन्होंने आश्वस्त किया कि वे सबसे बात करेंगे. शिफ्ट ना बदलने पर उनका कहना था कि तुम्हारी ट्रांसलेशन कमजोर है इसलिए दूसरी शिफ्ट नहीं लगाई जाती. लेकिन रिपोर्टिंग और सोशल तो लगाई जा सकती थी, ये क्यों नहीं लगी इसके लिए मैं बात करूंगा.

कुछ दिन तक सब ठीक रहा, मेरी शिफ्ट भी बदली गई लेकिन वापस वही सब होने लगा.

मुझे महसूस करवाया जाने लगा कि तुम्हें कुछ नहीं आता है.

मुझे लगने लगा जैसे एक इंग्लिश ही आपकी काबिलियत का पैमाना तय करने के लिए बनी है. रिपोर्टिंग की शिफ्ट तो लगाई गई लेकिन स्टोरी पास करवाना भी मेरे लिए किसी जंग से कम नहीं थी. मैं जो भी स्टोरी देती वो या तो रिजेक्ट कर दी जाती, या ये कह दिया जाता कि कुछ और सोचो. ये “कुछ और” मेरी समझ से परे था. जितना मैं कर पाती थी, करती थी. धीरे-धीरे मेरी सारी स्टोरी रिजेक्ट होने लगी. जब-जब स्टोरी रिजेक्ट की जाती, मेरा आत्मविश्वास भी उसके साथ गिरता चला जाता. ऑफिस के लोगों की नज़र में मुझे नाकारा महसूस करवाया जाने लगा था.


मैं और बीबीसी 6

मॉर्निंग मीटिंग में ज़्यादातर चर्चा स्टोरी आइडिया को लेकर होती है. अधिकतर स्टोरी राजेश प्रियदर्शी सर ही अप्रूव करते थे, जो बीबीसी हिंदी के डिजिटल संपादक हैं और मीटिंग में अधिकतर समय मौजूद होते थे.

मैं भी उस मीटिंग में स्टोरी आइडिया लेकर पहुंचती, लेकिन अधिकतर आइडिया रिजेक्ट कर दिए जाते. शुरू में जब मेरी स्टोरी रिजेक्ट होती तो मुझे लगता शायद मैं ही उस लेवल का नहीं सोच रही हूं, जो यहां का है. धीरे-धीरे स्टोरी कैसे पेश करनी है और कैसी स्टोरी होनी चाहिए, यह समझने की कोशिश कर रही थी.

मैंने खुद के अंदर कई बदलाव भी लाए, हर दिन कुछ नया सोच कर जाती पर बात न बनती. रिजेक्शन अब तक एक सिलसिला बन चुका था.मुझे याद नहीं कि कोई एक भी स्टोरी राजेश सर ने बिना किसी किंतु-परन्तु के पास की हो. वो भी तब पास होती थी जब मीटिंग में मौजूद अन्य लोग उसके लिए सहमत होते थे. नहीं तो अधिकतर गिरा दी जाती.

खैर, ये उनका संपादकीय अधिकार भी था. लेकिन सारे अधिकार मेरी स्टोरी पर ही आकर क्यों थम जाते थे!, पता नहीं.

मैंने उसी मीटिंग में कुछ लोगों की अपना स्टोरी आइडिया पूरा बताने से पहले ही बिना किसी कमी के पास होते भी देखा है. वे उनकी स्टोरी ना सिर्फ़ पास करते थे बल्कि ये तक कह देते थे कि आप बता रही हैं तो स्टोरी अच्छी ही होगी और हमें जरूर करनी चाहिए.

मुझे नहीं पता वो मुझे पसंद क्यों नहीं करते थे. मैंने दलितों और वंचितों पर उनके कई आर्टिकल देखे हैं. सोशल मीडिया पर भी वे वंचितों की आवाज़ बन कर कई मुद्दों पर लिखते रहते हैं. लेकिन जो सब वो लिखते थे और जैसा मैं उन्हें जान पा रही थी, वो उससे बिल्कुल मेल नहीं खा रहे थे.

मेरे लिए उनकी आखों में एक नफ़रत या घृणा जैसा कुछ था. वे जब भी मुझे देखते अपनी नज़रे घुमा लेते थे. मैं अगर उन्हें हैलो या गुड मॉर्निंग जैसा कुछ कहूं तो वे नज़रअंदाज़ कर देते थे और जवाब हीं नहीं देते थे. एक बार जब मैं सुबह की शिफ्ट में अपने डेस्क पर बैठकर काम कर रही थी तो मैंने उन्हें सुबह 9 बजे के करीब आते देखा और गुड मार्निंग कहा, लेकिन वे मुझे जवाब ना देकर आगे बढ़ गये और मेरे पीछे बैठी एक महिला कर्मी का नाम लेकर जोर से और खुशी के साथ कहते हैं, ‘गुड मॉर्निंग…’

हो सकता है कुछ लोगों के लिए ये बहुत ही मामूली बात हो लेकिन ये मेरा मनोबल गिराने के लिए एक घुन की तरह काम कर रही थीं, जो मुझे अंदर ही अंदर खोखला कर रही थी.

मुझे समझ ही नहीं आ रहा था कि कोई मुझसे इतनी नफ़रत क्यों कर रहा है, जबकि मैंने तो ऐसा कुछ नहीं किया था. मैं ऑफिस में एकदम अकेला सा महसूस करने लगी थी. सबसे कटने लगी थी. किसी से बात करने का मन नहीं करता था. समझ नहीं आ रहा था कि ये सब मैं किसे बताऊं और अगर किसी को बता भी दिया तो क्या मेरा कोई विश्वास करेगा! वे काफ़ी पुराने हैं यहां पर और मैं कुछ समय पहले ही आई थी.

ये सब कोई पहली बार नहीं हुआ था, कई बार हो चुका था. लेकिन मुझे हर बार कई गुना बुरा लगता और फिर भी मैं उन्हें एक नई सुबह एक नए अभिवादन के साथ मिलती. लेकिन जब उनका जवाब मुझे उनकी फेर ली गई नज़रों में दिख जाता तो मैं हर बार की तरह खामोश हो जाती और निराशा से भर जाती.

मैं और बीबीसी-7

मैं इतने तनाव में आ गई थी कि मेरा ऑफिस जाने का मन ही नहीं करता था. मन में हमेशा यही चलता रहता था कि मेरा एक्सीडेंट हो जाए, मुझे कुछ हो जाए… बस ऑफिस ना जाना पड़े.

जब मुझसे बर्दाश्त नहीं हुआ तो इन सब के बारे में मैंने अपने संपादक मुकेश शर्मा, भारतीय भाषाओं की एडिटर रूपा झा और यहां तक कि रेडियो एडिटर राजेश जोशी को भी बताया. सबको लगा कि मुझे ही गलतफ़हमी हुई है, मैं ही जरूरत से ज्यादा सोच रही हूं. लेकिन वो दौर सिर्फ मैं जानती हूं कि मैं कैसे-कैसे उस भयावह स्थिति में थी. मेरे मन में इतना डर बैठ गया था कि कोई कुछ भी कहता तो मैं डर से सहम जाती. लगता कि कोई भी आएगा और मुझे डांट देगा.

मैं धीरे-धीरे डिप्रेशन में जाने लगी. एक बार जब मैं सुबह की शिफ्ट में थी तो आधे घंटे में ही मेरी तबियत इतनी खराब हो गई थी कि मेरे हाथ-पैर ठंडे पड़ गए. मुझे चक्कर आने लगे थे. ना बैठा जा रहा था, ना ही कोई काम किया जा रहा था. लेकिन मेरी इतनी हिम्मत नहीं हो पा रही थी कि मैं डेस्क पर जाकर बता दूं कि मेरी तबियत बिगड़ गयी है, क्योंकि मन में डर जो बैठा था कि कब कौन डांट दे या कुछ सुना दे. आख़िर में बहुत हिम्मत जुटा कर घर जाने की परमिशन ली. शायद थोड़ी देर और ना जाती तो मैं बेहोश होकर वहीं गिर जाती.

जुलाई, 2018 में मैंने एक सामान्य पोस्ट लिखी थी. लेकिन उसके बाद मुझे आईआईएमसी बकचोदी पेज ने ट्रोल किया और मेरे बारे में काफ़ी कुछ लिखा, जिसे पढ़कर साफ समझ आ रहा था कि बीबीसी के ही किसी व्यक्ति ने लिखा या लिखवाया होगा. कई लोग मुझे उल्टा-सीधा कहने लगे. मेरे ऊपर अब सोशल मीडिया पर भी सवाल उठाए जाने लगे थे, मुझे नाकारा साबित किया जाने लगा था. मेरी जाति को लेकर भी मुझे काफी कुछ कहा गया. (नीचे उस पोस्ट का स्किनशॉट है जिसके बाद मुझे आईआईएमसी बकचोदी पेज पर ट्रोल किया गया था)

हां, मैं उन वज़हों से परेशान हो गई थी, शायद बहुत ज्यादा परेशान. कोई किसी के बारे में ऐसे कैसे लिख सकता है. ये बातें मेरे दिमाग मे लगातार चल रही थी. मन बेचैन होने लगा था. रात को ये सब सोच ही रही थी कि इतने में राजेश प्रियदर्शी सर का मैसेज आया, जिसमें लिखा था, “इंटरनेट के जमाने में कोई दलित नहीं होता.” मुझे कुछ समझ ही नहीं आया. इतने में उनका दूसरा मैसेज भी आया, जिसमें उन्होंने बीबीसी के एक पूर्व पत्रकार का नंबर दिया और कहा कि “इनसे बात करो ये भी दलित हैं. बीबीसी में पहले काम करते थे और अब डॉयचे वेले, जर्मनी में हैं.”

मुझे समझ नहीं आ रहा था कि वे मुझे ये सब क्यों कह रहे हैं. फिर समझ आया कि शायद सर ये कहना चाहते थे कि वो भी दलित हैं. लेकिन उन्होंने (शायद) यहां कभी वो सब महसूस नहीं किया जो मैंने किया है. लेकिन ये तो जरूरी नहीं कि सबका अनुभव एक जैसा हो. मैंने उन्हें फोन ना करने का फैसला किया, यहां तक कि मैंने उनका नंबर भी सेव नहीं किया और ना कभी बात करने के बारे में सोचा.

रह-रहकर बस दिमाग में यही बात आ रही थी कि सर ने ऐसा क्यों कहा कि इंटरनेट के जमाने में कोई दलित नहीं होता… अगर ये सच है तो इंटरनेट के जमाने में ही हम दलितों पर हो रहे अत्याचार, उत्पीड़न की खबरें क्यों करते हैं? क्यों उनके बारे में खुद वे अक्सर लिखते रहते हैं? क्यों दलितों को आज भी सम्मान नहीं मिल पा रहा? क्यों उन्हें हर चीज़ के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है? क्यों उनके नाम पर राजनीति हो रही है… आख़िर क्यों…?

चिंता-निराशा और बढ़ गई और ये सब मैंने फिर से अपने संपादकों को बताया. बार-बार बताने से भी कुछ नहीं हो रहा था. ना ऑफिस के हालात सुधर रहे थे और ना मुझे सम्मान मिल रहा था. मैं ऑफिस में दोहरी जंग लड़ रही थी. एक सम्मान की तो दूसरी मीडिया में अपनी जगह बनाने की, कुछ अच्छा काम करने की.

काफ़ी जद्दोजहद के बाद कुछ स्टोरी करने को मिली और मैंने पूरी ईमानदारी के साथ उनपर काम भी किया. कुछ स्टोरी ने बहुत अच्छा परफॉर्म किया, कई बार तो वो उस दिन और हफ्ते की सबसे ज्यादा चलने वाली स्टोरी में भी शामिल हुई. मुझे लगा कि अब तो कोई मेरे लिए दो शब्द जरूर कहेगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ. दूसरों की स्टोरी अगर थोड़ा भी अच्छा परफॉर्म करती तो उनके लिए व्हाट्सएप ग्रुप पर भी तारीफ़ होती, ऑफिस में भी और मीटिंग में तो भर-भर के तारीफ़ों के साथ तालियां भी बजाई जाती. लेकिन मेरे लिए कभी किसी मीटिंग में या कहीं कोई तारीफ़ नहीं हुई.

इसी बीच मैं एक स्टोरी करना चाहती थी. ऑफिस में मेरी बारह बजे से शिफ्ट थी लेकिन स्टोरी सुबह की मीटिंग में पहुंचानी होती है और मैंने अपनी सहयोगी को वो बता दी थी, जिसे मीटिंग में मेरी तरफ से आइडिया बताना था. उस स्टोरी आइडिया को सुनते ही राजेश प्रियदर्शी सर कहते हैं कि “with due respect she is not well equipped to do these kind of stories.”

हो सकता था वो स्टोरी नहीं की जा सकती हो या उसे करने का कोई अलग तरीका हो. वो बात आसानी से कही जा सकती थी कि हमें इस तरह की स्टोरी करनी चाहिए या नहीं करनी चाहिए या इसे ऐसे-वैसे करनी चाहिए. लेकिन सभी लोगों के बीच, मेरी गैर-मौजूदगी में मुझे नाकारा और अयोग्य ठहरा दिया गया जैसे मैं कुछ करने लायक ही नहीं हूँ.


मैं और बीबीसी 8

समय के साथ-साथ मेरे मन में गुस्सा उत्पन्न होना शुरू हो गया. मुझे हमेशा से अपने आत्मसम्मान से बहुत प्यार रहा है. न्यूज़रूम में तीन बार जिस तरह राजेश प्रियदर्शी सर ने मुझे सबके सामने डांटा था, उससे मेरे आत्मसम्मान को गहरा धक्का लगा था.

दूसरी बार जब उन्होंने मुझे डांटा था तो वो दो दिन बाद मुझे अकेले में ले जाकर सॉरी भी बोले थे. अगर वे सही थे तो सॉरी किस बात का और वो सही नहीं थे तो जिस तरह उन्होंने पूरे न्यूज़रूम में चिल्लाकर मुझे डांटा था वैसे ही सॉरी सबके सामने बोलना चाहिए था. खैर, ये बात तो मैं उनसे उस समय नहीं बोल पाई थी लेकिन ये सवाल तो हमेशा से मेरे मन में बना हुआ था.

आखिर में उनके इस व्यवहार से परेशान होकर मैंने अपने संपादक मुकेश शर्मा सर को कह दिया था कि मैं अपनी किसी भी स्टोरी के लिए राजेश प्रियदर्शी सर के पास नहीं जाऊंगी. मुकेश सर ने भी कहा ठीक है, तुम अपनी स्टोरी मेरे पास या प्लानिंग के पास लेकर जाना. लेकिन सिर्फ इतना भर बोलने से ये बात कैसे संभव हो सकती थी. किसी भी स्टोरी के लिए उनसे सामना करना ही पड़ता था. और मैं सबको नहीं बोल सकती थी कि मुझे अपनी स्टोरी के लिए राजेश सर के पास नहीं जाना है.

वे मेरी स्टोरी पर जरूर रूकावट डालते, कई बार मेरी स्टोरी उनके लिए महत्व नहीं रखती तो कई बार वो इंटरनेशनल लेवल की नहीं होती. लेकिन मुझे याद है प्रगति मैदान पर बने स्काई वॉल्क फ्लाईओवर की स्टोरी उनके लिए इंटरनेशनल स्टोरी थी क्योंकि वो मैंने नहीं किसी और ने प्रपोज़ की थी, जिसे वे शायद मना नहीं कर पाए होंगे. लेकिन मेरी जामिया की स्टोरी हो या ग़ाजीपुर में मुर्गा काटने पर लगे बैन जैसी कई स्टोरी थी, जिनसे पूरे देश में नहीं तो कई राज्यों में फ़र्क पड़ता है. खैर, वे स्टोरी मैंने की तो जरूर लेकिन बहुत कुछ सुनने के बाद.

मेरी तबियत लगातार बिगड़ रही थी. और ऐसे में मुझे ऑफिस के माहौल को भी झेलना पड़ रहा था. चिंता और तनाव के बढ़ने के कारण मेरी छाती में दर्द भी होने लगा था. कई डॉक्टर को दिखाया लेकिन कहीं कुछ पता नहीं चल रहा था. कमजोरी के साथ सांस लेने पर परेशानी होने लगी थी. पास के क्लिनिक से लेकर, मैक्स, और गंगाराम में इलाज करवाया. लेकिन आराम नहीं हो रहा था. सभी का कहना था कि चिंता और तनाव के कारण ये बीमारी बढ़ रही है. अगर चिंता करना खत्म नहीं किया तो कुछ भी हो सकता है.

लेकिन ऑफिस में अगर मैं बीमारी का ज़िक्र करती या बीमारी के चलते छुट्टी मांगती तो कुछ लोग मज़ाक करते कि ये आए दिन बीमार होती है. मुझे तो मेरी बीमारी के कागज़ दिखाने के लिए भी कह दिया गया था, जैसे मैं अपनी खुशी से बीमार पड़ रही हूं.

कई लोग ऑफिस में ही पूछते थे कि मैं इतनी चुप क्यों रहती हूं. मैं खुद को ही जवाब देती कि जिसके अंदर एक बवंडर चल रहा हो वो बाहर से शांत ही रहते हैं. लेकिन सामने वाले को एक स्माइल देकर ही चुप होना पड़ता. कई बार ऑफिस के कुछ लोगों ने बोला भी कि मीना तुम सबसे बात किया करो, अगर तुम्हारे पास बात करने के लिए कुछ नहीं होता तो खाने-पीने की बात करो. मैंने उन्हें कहा कि सर मुझसे ये सब बात नहीं होती, मैं जो हूं सामने हूं.

पहले सब को मेरी ट्रांसलेशन से परेशानी थी लेकिन अब तो मेरी कॉपी हू-ब-हू पेज पर लगती थी. अगर अब कोई परेशानी थी तो मुझे लगता है जो मेरी कॉपी देखते थे उन्हीं में कमी होती थी, जो हू-ब-हू छाप देते थे. लेकिन फिर भी ना मेरी शिफ्ट में ज्यादा बदलाव हुए ना लोगों के व्यवहार में. मेरे आखिरी दिनों तक हैंडओवर में कुछ लोग स्पेशल मेंशन करते थे कि ये कॉपी मीना ने बनाई है ध्यान से देखें. यहां तक कि मुझे बीबीसी रेडियो की न्यूज़ पढ़ने के लिए भी नहीं कहा जाता, जिसे रेडिया की शिफ्ट वाला बनाकर देता था और उसे केवल लाइव पढ़ना होता था. शायद मेरी आवाज़ भी इतनी अच्छी नहीं थी या मुझे हिंदी भी पढ़नी नहीं आती थी!

किसी को कितना गिराया जा सकता है, कितना नकारा-आयोग्य बनाया जा सकता है, ये सब मैं यहां सीख रही थी. कई बार काम करने का सच में मन नहीं होता था क्योंकि मेरे काम करने पर भी लोगों की नज़र में मेरी एक छवि बनी हुई थी. जिसे मैं कुछ भी कर लूं तो भी नहीं बदल पा रही थी. अंदर गुस्से से भर गई थी, पता नहीं वो किस पर था खुद पर या हालातों पर!


मैं और बीबीसी 9

‘‘कहां से हो?’’
‘‘दिल्ली से ही, जन्म-पढ़ाई सब दिल्ली से ही हुआ है, लेकिन राजस्थान से भी संबंध रखते हैं.’’
‘‘राजस्थान..? राजस्थान में कहा से हो?’’
‘‘बूंदी ज़िले से’’
‘‘अच्छा… राजस्थान में क्या हो?’’
‘‘दलित हैं मैम’’
(गर्दन हिलाते हुए शांति-सी छा जाती है)
…………………………………………………….
ये सब मुझ से शुरूआत के दिनों में ही पूछा गया था. वे भी ऑफिस में नई थीं और मैं तो थी ही. हां, उनको कई सालों का अनुभव जरूर था. एक जाने-माने हिंदी चैनल की रिपोर्टर रही हैं और बीबीसी में सीनियर ब्रॉडकास्ट जर्नलिस्ट के लिए चुनी गई थी.

शिफ्ट बदलवाने की काफ़ी जद्दोजहद के बाद मुझे उनके साथ काम करने का मौका मिला. और उन्हें भी मेरे ज्यादातर काम में कमी निकालने का. अब मेरी स्टोरी वुमन एंड यूथ डेस्क हेड और डिजिटल एडिटर राजेश प्रियदर्शी सर से होकर गुजरनी थी. मेरी स्टोरी कई बार इन दोनों के बीच में ही उलझ कर रह जाती थी. कई बार अगर वुमन एंड यूथ डेस्क हेड किसी स्टोरी के लिए मना नहीं कर पाती थीं तो राजेश सर के पास मेरी स्टोरी जाती थी. अगर वे मना नहीं कर पाते थे तो वो वुमन एंड यूथ डेस्क हेड के पास भेजते. और इस तरह मेरी स्टोरी इन दोनों के बीच में ही झूलती रहती, जैसे सरकारी ऑफिस में एक फाइल को जबरदस्ती जगह-जगह घुमाया जाता है.

कुछ ऐसी स्टोरी थी, जिन पर मैंने बहुत मेहनत की थी. लेकिन जब भी वो राजेश प्रियदर्शी सर और महिला डेस्क के पास जाती तो हर बार एक नई कमी निकल जाती.

ऐसा ही एक बार तब हुआ जब मैं दिल्ली विश्वविद्यालय में आरक्षित सीटों पर हेर-फेर की एक स्टोरी कर रही थी, जिसके बारे में शुरू से ही पता था कि मामला क्या है और कितना बड़ा है. लेकिन बार-बार दोनों लोग बारी-बारी से पढ़ते और हर बार एक नई कमी निकाल देते. जब भी उस कमी को पूरा करके पहुंचती हूं तो एक और नई कमी. इस तरह स्टोरी को लगभग 21 दिन हो गए थे. जब आखिर में सबकी कमियों को पूरा करके स्टोरी आगे बढ़ाई तो वो स्टोरी गिरा दी गई. महिला डेस्क की मैम का कहना था कि राजेश प्रियदर्शी सर ने कहा है कि मामला ज्यादा बड़ा नहीं है. अगर मामला ज्यादा बड़ा नहीं था तो शुरू से ही क्लियर था. अगर नहीं भी पता था तो एक संपादक को एक ही स्टोरी कितनी बार पढ़कर सही करवाने की जरूरत पड़ती है! एक अच्छा संपादक एक बार में ही पढ़कर सारी कमी एक बार में ही बता देता है. एक नहीं तो ज्यादा से ज्यादा दो बार. लेकिन मेरी स्टोरी को गिराने का हर बार एक नया बहाना तैयार होता.

बीच में मैंने सीवर साफ करने से हो रही मौतों पर स्टोरी की थी. महिला डेस्क की मैम कुछ दिन की छुट्टी पर थीं और मेरी स्टोरी बिना किसी रीराइट किए पब्लिश भी हो रही थी और अच्छा परफॉर्म भी कर रही थी. महिला डेस्क की मैम मेरी हर स्टोरी में रीराइट करती थीं क्योंकि इनकी नज़र में मुझे कुछ नहीं आता था.

इनका तो यहां तक कहना था कि “देखो मैंने तुम्हें इतना अच्छा लिखना सीखा दिया कि तुम्हें आईआईएमसी से अवार्ड भी मिल गया”, जबकि उस स्टोरी में इनका रत्तीभर भी हाथ नहीं था. जिसका हाथ था, उसने सीपीएस पेज जरूर बनाया था पर सारे इनपुट मैं ही लिखकर दे रही थी. वो भी इसलिए क्योंकि ब्रेकिंग न्यूज़ चल रही थी तो थोड़ा-थोड़ा लिख कर बार-बार अपडेट करना था, जो डेस्क पर बैठा व्यक्ति कर रहा था.

खैर, इनकी गैर-मौजूदगी में भी काम बहुत अच्छे से चल रहा था. महिला डेस्क की मैम जब छुट्टियों से वापस आती हैं तो मुझसे ये नहीं पूछा कि काम कैसे मैनेज हुआ या डेस्क पर कोई दिक्कत तो नहीं आई. वे मिलकर सीधा कहती हैं, ‘‘तुम क्या इसी तरह (यानि दलितों से जुड़ी स्टोरी) की स्टोरी कर के अपनी पहचान बनाना चाहती हो. एक कर ली ठीक है, लेकिन अब क्या बार-बार ऐसी स्टोरी करोगी?’’ उनके इस सवाल पर मैंने जवाब देना भी सही नहीं समझा लेकिन सवालों से भरी एक स्माइल जरूर दे दी.

मैं समझ गई थी कि मैं यहां कितना भी अच्छा काम कर लूं, लेकिन लोगों को वही सोचना है जो वो सोचना चाहते हैं. इनका व्यवहार भी मेरे लिए बहुत अच्छा नहीं रहा है. हां, ये हाय-हेलो, हाल-चाल सब पूछती जरूर थी, लेकिन उसमें फॉर्मेलिटी दिखाई देता था, अपनत्व नहीं. वे शायद मुझे पसंद नहीं करती थी. जिनके अगर मैं उदाहरण दूं तो वो बहुत छोटे किस्से हो सकते हैं, लेकिन समझदार के लिए इशारा काफ़ी होता है.

हालांकि इन्होंने एक-दो बार बोला भी कि मीना तुम्हें जो परेशानी हो मुझ से साझा कर सकती हो. लेकिन जिनसे शिकायत हो उसी के पास शिकायत लेकर नहीं जाया जाता, तो आपसे क्या ही बताऊं मैम (ये मैं खुद ही मन में बात करती).

मेरी कई स्टोरी करवाने के बाद गिरा दी गई. ऐसा करके वे साबित भी कर देते कि मुझे कुछ नहीं आता और मेरा आत्मविश्वास भी गिरा दिया जाता. मैं समझ ही नहीं पा रही थी कि आखिर इन्हें चाहिए क्या! जो कहते थे वो कर देती थी फिर भी हर बार एक नई कमी, नया सवाल तैयार रखते थे ताकि कहीं तो मैं हार मान लूं. अगर तब भी ऐसा नहीं होता तो स्टोरी गिराने का हथियार इनके पास होता ही था.


मैं और बीबीसी 10

आज मैं पिछला नहीं बल्कि कल की ही एक ताज़ा सूचना से शुरू करना चाहूंगी. कल मुझे पता चला कि मिस्टर झा ने बीबीसी से इस्तीफ़ा दे दिया है. जैसे ही मुझे पता चला चंद लोगों के लिए रही सही इज्जत भी मेरे दिल से खत्म हो गई. कुछ लोगों पर बहुत विश्वास किया था, जिन्हें मैंने अपनी परेशानी का हर मामला सबसे पहले बताया था और वो मुझे सिवाये आश्वासन के कुछ नहीं देते. हालांकि विश्वास और इज्जत की परत धीरे-धीरे उतरती गई और आज रही सही भी, सब पूरा साफ़ हो गया.

इस सूचना का ज़िक्र इसलिए करना जरूरी है क्योंकि बीबीसी की तरफ़ से आधिकारिक बयान यही दिया जा रहा है कि मेरा कॉन्ट्रैक्ट इसलिए खत्म किया गया क्योंकि मिस्टर झा वापस आ रहे हैं, जिनकी जगह मुझे रखा गया था. वे दो साल की एजुकेशन लीव पर थे.

लेकिन कल अचानक पता चला कि वे तो इस्तीफ़ा दे चुके हैं और ये इस्तीफ़ा उन्होंने कल नहीं बल्कि तीन महीने पहले ही दे दिया था (जिसका दावा मैं नहीं कर रही). मान लिया अगर तीन महीने पहले नहीं भी दिया होगा तो संपादक पदों पर बैठे अधिकारियों को इसके बारे में पूरी जानकारी होगी, क्योंकि अचानक कोई इस्तीफ़ा नहीं देता. एक छोटे से संस्थान में भी महीनाभर पहले बताना अनिवार्य होता है और फिर ये तो अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थान है. इसलिए मैं तो बिल्कुल नहीं मान सकती कि इस्तीफ़े की बात अचानक मेरे जाने के बाद पता चली.

जबकि मुझे कल ही वो बात भी याद आई जब मुझे किसी ने कहा था कि मिस्टर झा वापस नहीं आएंगे क्योंकि वो बीबीसी छोड़ रहे हैं. उस समय मैंने उनकी बात हल्के में ले ली क्योंकि मुझे लगा अगर ऐसा होगा तो सबसे पहले संपादक को ही पता चलेगा. वे हमेशा कहते थे, ‘‘मिस्टर झा आ रहे हैं इसलिए कॉन्ट्रैक्ट खत्म कर रहे हैं और अभी हमारे पास कोई नई वैकेंसी भी नहीं हैं, जिसकी जगह रखा जाए.’’ मुझे भी नोटिस तीन महीने पहले ही पकड़ाया गया था यानि अगर मैं सही समझ रही हूं तो पहले मिस्टर झा से कंफर्म किया होगा और उन्हें इस इस्तीफ़े वाली बात को बाहर ना बताने के लिए कहा होगा ताकि मुझे उनके आने का हवाला दे कर निकालने में आसानी हो. तब जाकर पूरी सोची समझी साजिश की तहत इस मामले को पूरे ऑफिशियली ढंग से अंजाम दिया गया है.

लेकिन मेरे बाद भी वहां जॉइनिंग हुई है. मुझे तो ये भी नहीं बताया गया था कि मैं कॉन्टैक्ट पर रहने के बाद अप्लाई कर सकती हूं या नहीं. लेकिन मैंने उसी ऑफिस में अपने संपादक को कई लोगों के पास जाकर ये कहते हुए जरूर देखा है कि ‘‘अरे नई पॉस्ट आई है तुम भर रहे हो ना, अरे नया अटैचमेंट आया है अप्लाई किया या नहीं.’’ हां, ये बात भी सही है कि मैंने खुद जाकर उनसे क्यों नहीं पूछा, वो इसलिए क्योंकि बीबीसी में रहकर इतना तो पता चल ही गया कि यहां पहले लोगों को पसंद किया जाता है, उन्हें सिलेक्ट किया जाता है और फिर उनके लिए वैकेंसी निकाली जाती है और ऐसा सिर्फ मैं ही नहीं बल्कि बीबीसी का एक गार्ड भी जानता है.

मुझे अपने मामले में ऐसी कोई सकारात्मक रवैया नहीं दिख रहा था. जिस संस्थान में मैं अपने सम्मान की लड़ाई लड़ रही थी, जहां मैं अपनी पहचान बनाने के लिए गई थी, जहां मैं चाह रही थी कि लोग मुझे भी एक्सेप्ट तो कर लें. ये सब हो पाता तो ही ना मैं कुछ और सोच पाती! इन्हें मुझे रखना होता तो कुछ कर के रख लेते फिर किसी मिस्टर झा के आने का बहाना ना बनाना पड़ता लेकिन सवाल तो यही है कि इन्हें मुझे रखना ही नहीं था.

नोट: इस पोस्ट से यह निष्कर्ष बिल्कुल न निकाला जाए कि मैं बीबीसी की नौकरी वापस पाना चाहती हूं या फिर मैं बीबीसी से निकाले जाने से खफ़ा हूं. मैं स्पष्ट करना चाहती हूं कि मेरी लड़ाई न्यूज़ रूम में भेदभाव के ख़िलाफ़ है. बीबीसी में शुरुआत से ही मेरी लड़ाई एक्सेप्टेंंस की रही है. मेरा ये अनुभव उसी लड़ाई का हिस्सा है. यहां मैं ‘निकालने’ जैसे शब्द का इस्तेमाल इसलिए कर रही हूं क्योंकि अब तो मुझे भी यही लग रहा है, जबकि इससे पहले मैंने कहीं नहीं कहा था. जारी……

भवसागर के उस पार मिलना पियारे हरिचंद ज्यू

साधना अग्रवाल, आलोचक, प्राध्यापिका: कमला नेहरू कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय: agrawalsadhna2000@gmail.com

साधना अग्रवाल

20वीं शताब्दी के अंतिम दशक से मनीषा कुलश्रेष्ठ ने कहानियों से अपने लेखन की शुरूआत की। उनकी आरंभिक कहानियां— कठपुतलियां, स्वांग और बिगड़ैल बच्चे थीं। बहुत जल्द मनीषा कुलश्रेष्ठ को इन कहानियों से एक खास पहचान मिली। कहना चाहिए अपनी पीढ़ी की लेखिकाओं में सृजनात्मक दृष्टि से वे सबसे ज्यादा संभावनाशील हैं। बाद में वह उपन्यास की ओर प्रवृत्त हुईं। उनके उपन्यास— शिगाफ, पंचकन्या, स्वप्नपाश और किरदार छपकर चर्चित हुए।

एक बातचीत के क्रम में मुझे किसी ने बताया था कि हंस संपादक राजेन्द्र यादव की अतिरिक्त रुचि लेखकों के प्रेम—प्रसंग में थी। चूंकि प्रतिभा अग्रवाल का संबंध भारतेंदु हरिश्चंद्र के परिवार से था इसलिए राजेन्द्र जी ने प्रतिभा जी को उकसाया कि तुम भारतेंदु हरिश्चंद्र पर लिखो ही नहीं बल्कि उनके प्रेम—प्रसंग को भी उजागर करो। स्पष्टत: उनका संकेत भारतेंदु की प्रेमिका मल्लिका की ओर था। लेकिन राजेन्द्र जी निराश हुए जब प्रतिभा अग्रवाल की पुस्तक —’ प्यारे हरिश्चंद्र की कहानी रह जाएगी’ छपकर आई तो उसमें मल्लिका का उल्लेख तो था, लेकिन जैसा राजेन्द्र जी चाहते थे, उस रूप में नहीं था।

मनीषा कुलश्रेष्ठ प्राक्कथन में इस उपन्यास के लिखने की समस्या और स्रोत के संबंध में कुछ स्रोत सामग्री का उल्लेख करते हुए लिखती हैं— जब उपन्यास लिखा जाता है, उपन्यासकार के भीतर कृतिकार ईश्वर चुपके से आ बैठता है।’ उदाहरण के लिए महान लेखक टॉल्स्टॉय के उपन्यास ‘अन्ना करेनिना’ का उल्लेख करते हुए वह कहती हैं—’अन्ना करेनिना को गढ़ते हुए कि जब वे आन्ना को समाज की स्त्रियों के समक्ष ‘चरित्रहीनता’ का प्रतिफलन बनाने बैठे तो वह उनके हाथ से निकल ‘मास्टरपीस’ ही बन गई।’  

मनीषा अच्छी तरह जानती हैं कि मल्लिका पर जितनी स्रोत सामग्री उपलब्ध है, बहुत कम है। इसलिए उन्होंने गल्प का सहारा लिया। पुस्तक के अंतिम आवरण पृष्ठ पर बिल्कुल ठीक लिखा गया है—’इतिहास के धुंधलके से गल्प के सहारे मनीषा कुलश्रेष्ठ ने उसी विस्मृत और उपेक्षित नायिका को खोज निकाला है और उसके जीवन पर एक काल्पनिक जीवनीपरक उपन्यास रचा है।’

उपन्यास का आरंभ भोर में मल्लिका की नींद उचटने से होता है और यहीं से भारतेंदु हरिश्चंद्र से परिचय और उनकी स्मृति का इतिहास शुरू होता है। हम जानते हैं कि भारतेंदु हरिश्चंद्र इतिहास प्रसिद्ध सेठ अमीचंद के कुल में उत्पन्न कवि गोपालचंद गिरधरचंद के ज्येष्ठ पुत्र थे और उनका जन्म 9 सितम्बर 1850 ई. में हुआ था। उन्हें लंबी उम्र नहीं मिली। मात्र 34 वर्ष 4 महीने की आयु में 6 जवरी 1885 ई. की रात 9 बजकर 45 मिनट पर हिंदी का भारतेंदु अस्त हो गया।

इस उपन्यास को लिखते हुए मनीषा को बार—बार यह डर सताता रहा कि कभी मैं मल्लिका के बहाने हरिचंद ज्यू का जीवन ही न दोहरा दूं। निश्चित रूप से इस उपन्यास का लेखन मनीषा कुलश्रेष्ठ के लिए बहुत चुनौतीपूर्ण था लेकिन उन्होंने जिस तरह इस उपन्यास में संतुलन कायम किया है, वह पाठकों के लिए हैरानी की बात है। मल्लिका बालविधवा थी और काशी अपनी मुक्ति की खोज में आई थी। उसे क्या मालूम था कि बनारस में न केवल भारतेंदु से उसका परिचय होगा बल्कि उनके प्रेम में वह डूब जाएगी। मल्लिका पढ़ी—लिखी थी और बांग्ला के प्रसिद्ध लेखक बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय की संबंधी थी। शुरू से ही मल्लिका भारतेंदु की आत्मीय बन गई। यही कारण है कि भारतेंदु ने अपना दिल उसके सामने खोल दिया। मल्लिका विधवा थी लेकिन वह प्रगतिशील विचारों की थी। शुरू में ही भारतेंदु द्वारा संपादित पत्रिका ‘बाला —बोधिनी’ का उल्लेख हुआ है। मल्लिका को अपने पूर्वजों और संबंधियों से साहित्यिक संस्कार मिले थे। यही कारण है कि बंकिमचंद्र की कृतियों के किए हुए उसके अनुवादों पर उसे सराहना मिलती है। बेशक यह उपन्यास गल्प के सहारे लिखा गया है लेकिन उपन्यास की संरचना में भारतेंदु के जीवन और रचनाओं को छोड़ नहीं दिया गया है- जैसे भारतेंदु की पत्नी का नाम सचमुच मन्नो देवी था और मल्लिका की बहन का नाम शेफालिका था, जिसे वह शिउली कहा करती थी। प्राक्कथन में ही मनीषा ने उल्लेख किया है—’कथादेश जुलाई 2007 में भारतेंदु की प्रेमिका मल्लिका पर लेख और उनके उपन्यास कुमुदिनी के अंश छपे थे।

यह पूरा उपन्यास मल्लिका और भारतेंदु के बीच प्रेम की दिलचस्प कहानी की तरह है और अंत बेहद मार्मिक। गल्प के सहारे भी ऐसा उपन्यास लिखा जा सकता है, सहसा विश्वास नहीं होता। हम जानते हैं कि भारतेंदु का जन्म एक अमीर घराने में हुआ था। वह उन्हीं अमीचंद के वंशज हैं जिन्होंने ईस्ट इंडिया कंपनी के व्यापार में से अपने लिए लाखों बना लिए थे। लेकिन भारतेंदु ने इन पैसों को अपनी शाहखर्ची के चलते लुटा दिया था। मल्लिका के जीवन के संबंध में उपन्यास में जहां—तहां संकेत किए गए हैं। मल्लिका के पिता मिताई बाबू ने अपनी दोनों पुत्रियों के नामकरण फूलों के उपर किए थे— शेफालिका और मल्लिका। अपने बचपन में ही मां की मृत्यु के कारण मल्लिका अपने पिता से ही लिपटी रहती। पिता के अध्यापक होने के कारण वह भी उनके साथ स्कूल जाती। उसकी रुचि को देखकर गणित और अन्य विषयों के साथ उसे साहित्य भी पढ़ाया गया। मल्लिका का एक बहुत होनहार भाई भी था—अनिर्बान चटर्जी, जो क्रांतिकारी हो गया था। मल्लिका की शादी अपनी मौसी के देवर के बेटे सुब्रत से बचपन में ही हो गई थी। उपन्यास में मल्लिका हरिचंद ज्यू को हंसकर बताती है—’न हमने उसे देखा, न उसने हमें। आठ साल के हम थे, दस साल के वो, जब हमारी शादी हुई। चेहरा किसे याद रहा ? शिउली और जीजा तो शादी की रस्मों को टुकुर—टुकुर देखते थे। हम दोनों तो उंघ रहे थ. बाल विधवा मल्लिका की साहित्यिक रुचि थी जिसका संकेत उपर किया जा चुका है। मल्लिका सांवली थी लेकिन उसके नैन—नक्श बेहद आकर्षक थे। यह अकारण नहीं है कि बनारस आने के पूर्व उसके पास विवाह के प्रस्ताव आये जिसे उसने झटक दिया। बनारस में मल्लिका का संबंध बहुत मधुर था। उसने एक तोता पाल रखा था—भुवनमोहिनी, जो मनुष्यों की तरह बोलता था। मल्लिका ने भारतेंदु को बांग्ला सिखाई और भारतेंदु ने उसे हिंदी साहित्य की ओर मोड़ा। भारतेंदु ने उसे कवि—वचन सुधा पत्रिका में लिखने के लिए कहा, अनुवाद तो वह कर ही रही थी। हरिचंद ज्यू और मल्लिका का लगाव ऐसे ही बढ़ता रहा और वह कवि गोष्ठी और साहित्यिक गोष्ठियों में भी जाने लगी। कजरी, जो मल्लिका की दासी थी,एक अद्भुत चरित्र है। उसमें मनुष्यता के भाव ही नहीं, मल्लिका के लिए चिंता भी है। वह बराबर मल्लिका को संभालती रहती थी।

भारतेंदु हरिश्चंद्र

एक प्रसंग है भारतेंदु द्वारा चाय की पत्ती की पुड़िया लाने का और मल्लिका द्वारा उसे गलत समझ लिए जाने का। दोनों ओर से मजाक होने लगता है—’तभी अजाने ही हरिश्चंद्र ने मल्लिका की हथेली थाम कर कहा,” कल तुम्हारी काव्य—पंक्तियों ने मुझे रुला दिया, उसे पूरी करो ना और हिंदी में लिखो। उसे कवि—वचन सुधा में छापेंगे।” इस तरह मल्लिका की रुचि साहित्य में होने लगी और वह भारतेंदु द्वारा संपादित पत्रिका को देखने ही नहीं लगी बल्कि उसके लिए लिखने भी लगी। भारतेंदु की स्थिति परिवार की दृष्टि में ऐय्याश और लापरवाह व्यक्ति की थी लेकिन मल्लिका से प्रेम के बीच भी अपनी पत्नी मन्नो देवी के लिए उनके मन में करुणा और सहानुभति थी। कभी—कभी भारतेंदु मल्लिका से रूठ जाते थे और मल्लिका उनसे। लेकिन यह क्षणिक होता था। भारतेंदु और मल्लिका के बीच यह प्रणय संबंध लगातार गहराता जा रहा था। कभी—कभी भारतेंदु जब मौज में आते थे तो मल्लिका को चंद्रिका कहते थे। खुद हरिश्चंद्र थे इसलिए अपनी प्रेमिका को चंद्रिका कहते थे। यहां तक कि उन्होंने अपनी पत्रिका का नाम हरिश्चंद्रिका कर दिया। सब जानते थे कि चंद्रिका के नाम से मल्लिका की कविताएं, कवि—वचन सुधा में प्रकाशित हुई हैं।

जिस तरह इन दोनों के बीच तेजी से प्रेम पनपा,उसी तेजी के साथ इसका अंत भी हो गया। भारतेंदु के प्रेम का यह एक आत्मीय प्रसंग है—’आप, तुम, हरिश्चंद्र जी। ये शब्द बहुत रूखे हैं। हम तुम्हें चंद्रिका कहेंगे, तुम हमें ज्यू! ठीक है ?” मल्लिका ने उल्लास से गर्दन हिला दी।’ ऐसा नहीं है कि भारतेंदु में विरोधाभास नहीं था। जिन अंग्रेजों के चलते अनिर्बान दा छिपते भटक रहे हैं उनके लिए भारतेंदु हरिश्चंद्र का भक्तिभाव उसे असमंजस में डालता था। मल्लिका निरावरण, निर्वसन भरे—भरे वक्ष लिए,मसनद पर लेटे हरिचंद ज्यू के सम्मुख थी। टोपी का स्वांग न जाने कहां जा गिरा था। भाल पर रचित ढंग का टीका भी मिट गया था। लंबं केश सर्प सरीखे ज्यू के वक्ष पर लहरा रहे थे। एक जगह भारतेंदु कहते हैं—’ज्यादा न सही मैंने तुम्हारे नाम भी अपनी किताबों की आय सुरक्षित कर दी है न जाने कब ‘। भारतेंदु के अंतिम दिनों का चित्र बहुत मार्मिक है। भारतेंदु बिस्तर पर पड़े थे मगर किसी को पहचान नहीं पा रहे थे। वे मतिभ्रम में थे। अंतिम समय मल्लिका पास थी, ‘ सूखे होंठों पर एक स्मित आया और चंद्र अस्त हो गया। चंद्रिका चंद्र के साथ अंधियारे की गैल उतर गई। समस्त—ज्ञान श्वासों की कड़ी के साथ टूटकर बिखर गया और विज्ञान का प्रदीप बुझकर वाष्प हो गया। वाह रे समय ! आह रे काल! मन्नो दहाड़ कर रो पड़ी। मल्लिका को सिसकियां भी भारी पड़ती थीं। उसने आहिस्ता से चरण छू लिए मृत—देह के। उसका अंतस सुन्न था।’ मल्लिका का यह वाक्य सचमुच किसी पाठक को झकझोरने के लिए काफी है—’ज्यू ! आपने तो मुझसे प्रतीक्षा तक छीन ली । आगे कजरी कहती है—’मलिकिनी, अर्थी की तैयारी है,दर्सन कर लेव।’ काशी के उस घाट पर चंदन की लकड़ियों में जलती चिता के ओज से चहुंदिस प्रकाशमान थी।    

भारतेंदु के निधन के बाद मल्लिका सोचती है—’ अभी जाने कितने बिछोह शेष हैं मेरे भाग्य में। सबका हिसाब चुका आउं। तब भवसागर के उस पार मिलना पियारे हरिचंद ज्यू ! अपनी डोंगी लिए।’ मल्लिका के लिए भारतेंदु ने अपनी वसीयत में लिखा था— ‘कंपनी,पांडुलिपियां, पुस्तकों का अधिकार और हर माह पचास रुपए की रकम मल्लिका के पास जाए।’

भारतेंदु के निधन के बाद मल्लिका के लिए काशी में कुछ नहीं बच गया था। उसने अपनी स्वरचित उपन्यासों की  पांडुलिपियां भारतेंदु के भाई गोकुलचंद्र को दे दीं। पुस्तकें पुस्तकालय को दे दीं। ज्यू की पुस्तकों की एक—एक प्रति रख ली और कहा — ‘इन्हें किसी छापेखाने से छपवा दीजिएगा। अब काशी से मुझे विदा दें। मैं वृंदावन जाना चाहती हूं गोकुल।’

मनीषा कुलश्रेष्ठ का यह उपन्यास गल्प के सहारे लिखे जाने के बावजूद संरचना की दृष्टि से खूब कसा हुआ और भाषा की दृष्टि से उल्लेखनीय है। एक उदाहरण देखिए—’रात्रि का अवसानकाल निकट था। पूनो का आकाश शंख—सा चमकता था। प्रभात की धूमिल रेखाएं क्षितिज पर खिंची थीं। एक महाराज प्रभाती गा रहा था कि नींद खुल गई, स्वप्न खंडित होकर विस्मृत हो गया।’यहां शमशेर की काव्य—पंक्ति — ‘प्रात: नभ था शंख जैसा’ की सहसा याद आ जाती है। मनीषा कुलश्रेष्ठ ने इस उपन्यास को लिखने के लिए पर्याप्त शोध किया है और मल्लिका और भारतेंदु के जीवन के व्यक्तिगत निजी प्रसंगों को भी विश्वसनीयता के साथ उठाया है। लेकिन इस उपन्यास में एक बात अखरती है और वह है भारतेंदु द्वारा अपनी पुस्तकों का कॉपी राइट मल्लिका को देना जबकि हकीकत यह है कि भारतेंदु ने बाबू रामदीन सिंह (खड्गविलास प्रेस बांकीपुर पटना के मालिक) द्वारा बार—बार आर्थिक मदद देने की कृतज्ञता से उऋण होने के लिए अपनी तमाम पुस्तकों के कॉपी राइट उन्हें सौंप दिए थे। भारतेंदु उनसे मिलने खड्गविलास प्रेस भी गए थे और वहां रात में रुके भी थे। ‘तब बाबू रामदीन सिंह ने उन्हें एक पगड़ी, एक थान कपड़ा और 501 रु. नकद से उनकी विदाई की। खड्गविलास प्रेस के मैनेजर बाबू साहबप्रसाद सिंह ने अपनी ओर से 75 रु. विदाई में दिए।’ (आधुनिक हिंदी के विकास में खड्गविलास प्रेस की भूमिका पृ. 194)

अंत में, बस यही कहना बचा रह जाता है कि यह उपन्यास भारतेंदु और मल्लिका  की मात्र प्रेम कहानी नहीं है बल्कि उनके भीतर उठने वाले अंतर्द्वंद्वों की प्रतिध्वनि भी है। पठनीय और उल्लेखनीय तो यह उपन्यास है ही।

उपन्यास: “मल्लिका”
लेखिका : मनीषा कुलश्रेष्ठ
प्रकाशन: राजपाल एण्ड सन्ज़ 1590, मदरसा रोड, कश्मीरी गेट दिल्ली 110006
मूल्य: 235रु.
प्रथम संस्करण 2019   

माहवारी का ब्योरा नौकरी के लिए क्यों जरूरी (?) : बेड़ियां तोडती स्त्री: नीरा माथुर

“जब हम भारतीय महिलाओं के लिए समान अधिकारों की संवैधानिक गारंटी प्राप्त करने के लिए आगे बढ़ रहे हैं, तो भारतीय जीवन बीमा निगम यथास्थिति से आगे नहीं बढ़ रहा है. यह मामला  निगम के इस विशिष्ट रवैये को दर्शाता है.” (एआइआर 1992 सुप्रीमकोर्ट 392)


श्रीमती नीरा माथुर ने भारतीय जीवन बीमा निगम (“निगम”) में सहायक के पद के लिए आवेदन किया. लिखित परीक्षा और साक्षात्कार में सफल रही तो उसे एक घोषणा पत्र भरने के लिए कहा गया, जो उसने 25 मई,1989 को निगम को भर कर दे दिया। उसी दिन निगम के अनुमोदित पैनल की महिला चिकित्सक द्वारा भी जांच की गई और उसे नौकरी के लिए चिकित्सकीय रूप से फिट पाया गया. फिर उसे एक अल्पकालिक प्रशिक्षण कार्यक्रम से गुजरने का निर्देश दिया गया. सफलतापूर्वक प्रशिक्षण पूरा होने के बाद उसे नियुक्ति पत्र दिनांक 25, सितम्बर,1989 दिया गया. अब वह छह महीने की अवधि के लिए परिवीक्षा पर थी और अगर उसका काम संतोषजनक हुआ तो नौकरी पक्की हो जाएगी.

श्रीमती माथुर 9 दिसंबर, 1989 से 8 मार्च, 1990 तक लम्बी छुट्टी पर चली गई. वास्तव में, उसने 27 दिसंबर, 1989 को मातृत्व अवकाश के लिए आवेदन किया और उसके बाद 6 जनवरी, 1990 को चिकित्सा प्रमाण पत्र दिया. डॉ हीरा लाल के नर्सिंग होम में 10 जनवरी, 1990 को भर्ती कराया गया और अगले ही दिन उसने एक पूर्ण अवधि के बच्चे को जन्म दिया. 19 जनवरी, 1990 को उन्हें नर्सिंग होम से छुट्टी दे दी गई. 13 फरवरी, 1990 को दफ्तर पहुँची तो उसकी सेवा समाप्त कर नौकरी से (भी) छुट्टी दे दी गई. यह उसकी परिवीक्षा की अवधि के दौरान था. नौकरी से छुट्टी का कोई कारण (आधार) नहीं बताया-लिखा गया.

श्रीमती माथुर ने सेवा समाप्ति आदेश को उच्च न्यायालय (संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत) में इस आधार पर चुनौती दी कि नौकरी से हटाने का आदेश साधारण नहीं, बल्कि सेवा में शामिल होने से पहले उसके द्वारा की गई घोषणा में कुछ ‘विसंगति’ पर आधारित है. जवाबी शपथ-पत्र में निगम ने यह कहते हुए मामले का विरोध किया कि याचिकाकर्ता का काम ‘संतोषजनक’ नहीं था और इस तरह नियुक्ति की शर्तों के तहत उसे बिना सूचना और ‘बिना कोई कारण’ बताए छुट्टी की गई है. उच्च न्यायालय के न्यायमूर्तियों ने सेवा समाप्ति के मुद्दे पर, किसी भी तरह से हस्तक्षेप करने से मना कर दिया. श्रीमती माथुर ने सुप्रीमकोर्ट में अपील दायर और उच्चतम न्यायालय ने अंतिम निपटान के लिए नोटिस जारी करते हुए अंतरिम आदेश दिया कि “इस आदेश की प्राप्ति की तारीख से 15 दिनों के भीतर याचिकाकर्ता (श्रीमती नीरा माथुर) को बहाल किया जाये.”भारतीय जीवन बीमा निगम ने याचिकाकर्ता की सेवाओं को समाप्त करने का औचित्य साबित करने का हर संभव प्रयास किया. निगम के वकीलों ने जोर देकर कहा कि वह अभी भी परिवीक्षाधीन (प्रोबेशन पर) थी, इसीलिए सेवाओं को समाप्त करने के समय, कोई कारण नहीं दिए गए थे, यह एक सरल आदेश है, याचिकाकर्ता पर कोई ‘कलंक’ नहीं लगाया गया, वह 9 दिसंबर, 1989 से 8 मार्च 1990 तक छुट्टी पर थी, उसने जानबूझकर फिटनेस के लिए चिकित्सीय परीक्षण से पहले घोषणा पत्र भरने के समय गर्भवती होने के तथ्य का उल्लेख नहीं किया, तथ्यों को छुपाया और निगम को तो बाद में तब पता चला, जब उसने निगम को सूचित किया कि उसने एक बेटी को जन्म दिया है.

25 मई, 1989 को याचिकाकर्ता द्वारा भरी गई घोषणा की शर्तों के संदर्भ में निगम ने भी कहा: “6. केवल मेडिकल परीक्षार्थी की उपस्थिति में महिला उम्मीदवारों द्वारा भरा जाना है:  ए) क्या आप शादीशुदा हैं- हां. बी) यदि ऐसा है, तो कृपया बताएं: i) आपके पति का पूर्ण नाम और व्यवसाय श्री प्रदीप माथुर, विधि अधिकारी, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, नेहरू प्लेस, नई दिल्ली. ii) बच्चों की संख्या, यदि कोई हो, और उनकी वर्तमान आयु: एक बेटी: 1 वर्ष और 6 महीने. iii) क्या मासिक धर्म हमेशा नियमित और दर्द रहित रहा है, और क्या अब ऐसा है? …. हाँ. iv) कितनी अवधारणाएँ हुई हैं? कितने पूर्ण-अवधि में चले गए हैं? एक. v) अंतिम माहवारी की तारीख बताएं: … 29 अप्रैल, 1989. vi) क्या अब आप गर्भवती हैं? … नहीं. vii) अंतिम बच्चा जनने की तिथि: 14 नवंबर, 1987. viii) क्या आपका कोई गर्भपात या गर्भपात हुआ है? … नहीं. निगम ने आरोप लगाया कि याचिकाकर्ता द्वारा दी गई घोषणा ‘असत्य’ ‘गलत’ है. डॉ एस.के. गुप्ता, एमडी, डॉ हीरा लाल बाल एवं प्रसूति गृह, के अनुसार जानबूझकर निगम को मासिक धर्म की गलत तारीख (29 अप्रैल,1989) देने की घोषणा की गई थी, जबकि डॉ एसके गुप्ता को 3 अप्रैल,1989 को एलएमपी की सही तारीख दी थी. तर्क दिया गया कि यदि उसने अपनी घोषणा में मासिक धर्म की सही तारीख का उल्लेख किया होता, तो उसकी नियुक्ति को टाल दिया जाता. यह भी तर्क दिया गया कि याचिकाकर्ता को निगम की सेवा से मुक्त करने का निर्णय 2 आधारों पर था: (1) क्योंकि उसकी सेवा के प्रारंभिक चरण में उसके द्वारा दी गई झूठी घोषणा के कारण; और (2) परिवीक्षा की अवधि के दौरान उसका काम संतोषजनक नहीं था. निगम द्वारा जारी किए गए निर्देश 16 को भी संदर्भित किया गया जिसके अनुसार “……यदि चिकित्सा परीक्षण के समय, कोई भी महिला आवेदक गर्भवती पाई जाती है, तो निगम में उसकी नियुक्ति को प्रसव के तीन महीने बाद माना जाएगा।…..”

माननीय न्यायमूर्तियों (श्री के.जे. शेट्टी और योगेश्वर दयाल) ने अपने निर्णय में लिखा है “हमने मामले की सावधानी से जांच की है. हमारे पास यह बताने के लिए रिकॉर्ड पर कुछ भी नहीं है कि परिवीक्षा (प्रोबेशन) की अवधि के दौरान याचिकाकर्ता का काम संतोषजनक नहीं था. दरअसल, समाप्ति का कारण अलग-अलग प्रतीत होता है. यह सेवा में प्रवेश करने के चरण में उसके द्वारा दी गई घोषणा थी. यह कहा जाता है कि उसने अपनी गर्भावस्था को दबाने के लिए, पिछले मासिक धर्म की अवधि के बारे में झूठी घोषणा की थी. ऐसा लगता है कि याचिकाकर्ता को इस मामले में दोषी नहीं ठहराया जा सकता है. निगम द्वारा अनुमोदित पैनल में शामिल डॉक्टर द्वारा उसकी चिकित्सकीय जांच की गई थी. वह पद से जुड़ने के लिए चिकित्सकीय रूप से फिट पाई गईं.

हालांकि, वास्तविक ‘शरारत’ एक महिला उम्मीदवार से घोषित घोषणा की प्रकृति के बारे में है. घोषणा में कॉलम (iii) से (viii) के तहत प्रस्तुत किए जाने वाले विवरण वास्तव में अगर ‘शर्मनाक’ नहीं तो ‘लज्जाजनक’ अवश्य हैं. विनम्रता और आत्मसम्मान शायद ऐसी व्यक्तिगत समस्याओं के प्रकटीकरण को रोक सकता है जैसे कि उसकी मासिक धर्म नियमित या दर्द रहित है, अवधारणाओं की संख्या; कितने पूर्ण अवधि के लिए गए हैं आदि निगम घोषणा में इस तरह के स्तंभों को हटाना बेहतर होगा. यदि घोषणा का उद्देश्य ‘मातृत्व अवकाश’ से मना करना है और सेवा में प्रवेश करने के समय गर्भवती महिला को कोई और लाभ ना देना है (जिस नियम कि संवैधानिक वैधता को चुनौती नहीं दिए जाने के कारण हम कोई राय नहीं व्यक्त करत रहे हैं), तो निगम उसे चिकित्सा परीक्षण के अधीन गर्भावस्था परीक्षण सहित कर सकता है. जिन परिस्थितियों में पहले से ही अंतरिम आदेश जारी किया गया है, हम निरपेक्ष हैं. हालांकि, हम यह मानते (कहते) हैं कि अपीलार्थी नौकरी से सेवा समाप्त करने (हटाने) की तारीख से वेतन की हकदार नहीं होगी. इस दिशा-निर्देश के साथ अपील का निर्णय हुआ, लेकिन मुकदमें की लागत (खर्च) के बारे में कोई आदेश नहीं दिया जा रहा.”कहते हैं कि अंत भला सो सब भला. जैसे दिन श्रीमती नीरा माथुर के बहुरे, वैसे सबके बहुरें! समता, समानता और सम्मान से जीने के तमाम मौलिक अधिकार प्रदान करने वाले संविधान (1950) बनने-बनाने के बाद, केंद्र सरकार को सरकारी, गैर-सरकारी संस्थानों में कार्यरत महिलाओं के लिए मातृत्व लाभ अधिनियम,1961(12 दिसंबर,1961) पारित करने में ग्यारह साल का समय लग गया.

संविधान बनने के चालीस साल बाद तक, भारतीय जीवन बीमा निगम (लगभग सरकारी संस्थान) महिलाओं की नियुक्ति के समय मासिक-धर्म की तारीख तक पूछ रहा है, ताकि महिलाओं को मातृत्व अवकाश (लाभ) ना देना पड़े. गर्भवती है तो नौकरी अभी नहीं (कभी नहीं) मिलेगी. माना कि ऐसे नियम की संवैधानिक वैधता को भी चुनौती दी जानी चाहिए थी, मगर क्या माननीय न्यायमूर्ति स्वयं इस पर संज्ञान नहीं ले सकते थे! जब नौकरी में बहाल किया तो वेतन भी दिलवा देते, बड़ी मेहरबानी होती हुज़ूर!

आरएसएस की विचारधारा विभाजनकारी और फासीवादी: डी. राजा

अनुवाद : डॉ. प्रमोद मीणा

भाकपा के नये महासचिव संविधान और लोकतांत्रिक व्‍यवस्‍था के लिए खतरा देखते हैं वेल्‍लूर जिले के चिपचूर गाँव में एक अनुसूचित जाति परिवार में जन्‍मे भारतीय कम्‍यूनिस्‍ट पार्टी के नये महासचिव डी. राजा को गरीबी और भूख के साथ संघर्ष करना पड़ा था। उनकी महाविद्यालयी शिक्षा एक छोटे से कस्‍बे गुडियाथम में हुई जो साम्‍यवादी आंदोलन, द्रविड़ आंदोलन और अंबेडकरवादी आंदोलन जैसे राजनीतिक आंदोलनों का गढ़ था। गरीबी और अन्‍याय के खिलाफ उनके गुस्‍से ने उन्‍हें साम्‍यवादी आंदोलन के प्रति आकर्षित किया। ऑल इंडिया स्‍टूडेंट फेडरेशन के साथ काम करते हुए वे छात्र नेता के रूप में उभरे और बाद में ऑल इंडिया यूथ फेडरेशन के महा सचिव बने और 1975 में पार्टी के पूर्णकालिक कार्यकर्ता बन गये। ‘दि हिंदू’ के लिए बी. कोलाप्‍पन द्वारा लिये गये साक्षात्‍कार में डी. राजा ने याद किया कि ‘‘मेरे माता-पिता भूमिहीन किसान थे। मैं एक हरिजन कल्‍याण विद्यालय में पढ़ाई करता था और (मुख्‍यमंत्री) कामराज द्वारा शुरु किये गये मध्‍यावधि भोजन खाता था। मैं आज भी वह दिन याद करता हूँ जब मुझे उनसे मिलने का अवसर मिला था। मेरे पास पहनने के लिए कमीज न थी। मैंने सिर्फ उन्‍हें छुआ भर था।’’ इस साक्षात्‍कार का हिंदी अनुवाद :

आप भाकपा के महासचिव एक ऐसे समय बने हैं जब समस्‍त घटनाक्रम भाजपा से संचालित होता है। आपकी चुनौतियाँ क्‍या हैं ॽ

फोटो क्रेडिट सी.वी. सुब्रमण्यम

यह सिर्फ वाम के लिए चुनौतीपूर्ण समय नहीं है, अपितु यह लोगों के लिए और संपूर्ण देश के लिए ही चुनौतीपूर्ण है क्‍योंकि दक्षिणपंथी ताकतों ने राजनीतिक सत्‍ता हथिया ली है। भाजपा उस आरएसएस की राजनीतिक भुजा है जिसकी विचारधारा विभाजनकारी, सांप्रदायिक, कट्टरतावादी और फासीवादी है। वे अपने कार्यक्रम को आक्रमणकारी ढंग से लादने की कोशिश करते हैं। यह संविधान और देश की लोकतांत्रिक व्‍यवस्‍था के लिए एक खतरा पेश करता है। सरकार निगमों और व्‍यवसायिक घरानों के हितों की रक्षा के लिए पूरी तरह से प्रतिबद्ध है। इसका लक्ष्‍य है – दलितों, आदिवासियों और अल्‍पसंख्‍यकों पर होने वाली भीड़ की हिंसा और हमलों को बढ़ावा देना। अगर कोई सरकार पर सवाल उठाता है या इसकी नीतियों की आलोचना करता है तो उस पर राष्‍ट्र विरोधी और अर्बन नक्‍सली होने का ठप्‍पा लगा दिया जाता है।

दूसरी महत्‍वपूर्ण चुनौती है सेकूलर और लोकतांत्रिक ताकतों की एकता। तमिलनाडु को छोड़कर 2019 के आम चुनावों में ऐसा घटित नहीं हो सका। यह न सिर्फ कांग्रेस के लिए अपितु बसपा, सपा, राजप और वाम जैसे दलों के लिए झटका था। दूसरी बड़ी चुनौती है – सेकूलर लोकतांत्रिक ताकतों में एका कैसे स्‍थापित किया जाए। वामदल बेजुबानों की ज़बान हैं और भारतीय राजनीति के ये नैतिक घटक हैं। लोग जानते हैं कि अगर वाम कमजोर होता है तो इससे भारतीय राजनीति में एक नैतिक शून्‍य पैदा हो जाता है। वाम लोगों की उम्‍मीद लगातार बना हुआ है।

एक मत है कि भाजपा ने वाम और दूसरे दलों के ‘मुसलिम तुष्टिकरण’ को भुनाया .

भाजपा झूठी कहानी गढ़ने और नकली तर्क प्रसारित करने में सफल रही। यह पार्टी एक तरह से इस चीज में सफल रही जिसे वास्‍तविक मुद्दों से परे लोगों की सोच और उनके दिमागों में सेंधमारी करना कहा जा सकता है। भाजपा ने मास मीडिया और सोशल मीडिया एवं धन शक्ति का इस्‍तेमाल किया। कॉरपोरेट वित्‍त और चुनावी बांड का भाजपा ने जमकर प्रयोग किया। एक तरफ भाजपा दूसरे दलों पर अल्‍पसंख्‍यकों का तुष्टिकरण करने का आरोप लगाती है, और दूसरी तरफ यह अतिश्‍योक्ति के स्‍तर पर जाकर बहुसंख्‍यकों की पीड़‍ितता को प्रदर्शित करती है।

यहाँ तक कि वे संकीर्ण, सांप्रदायिक और विभाजनकारी तरीके से राष्‍ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे का इस्‍तेमाल करते हैं और एक स्‍तर पर वे डर की मानसिकता पैदा करते हैं और दूसरे स्‍तर पर धमकाते-डाँटते हैं। जिस तरीके से आरटीआई अधिनियम संशोधन विधेयक पारित किया गया और जिस तरीके से वे छानबीन की समुचित प्रक्रिया के बिना ही सभी विधेयकों को पारित करवाने के लिए हर चीज को मटियामेट कर रहे हैं, उन बातों को लोग अब जान रहे हैं। यह दिखाता है कि कैसे संसद और दूसरे संस्‍थानों को क्षति पहुँचाई जा रही है।

अपने परंपरागत मैदान तक पर वाम की पराजय का क्‍या कारण है ॽ

केरल में अपने तमाम प्रयासों के बावजूद भाजपा एक सीट जीतने में भी नाकामयाब रही। पश्चिम बंगाल चिंता का विषय बन गया है। तृणमूल कांग्रेस ने वाम से सत्‍ता ऐंठ ली किंतु वाम के खिलाफ अपनी लड़ाई में उसने भाजपा के उभार की स्थितियाँ पैदा कर दीं। अब तृणमूल भी समस्‍या झेल रही है क्‍योंकि भाजपा सत्‍ता के लिए संघर्षशील ताकत के रूप में उभरने की कोशिश कर रही है। यह एक गंभीर स्थिति है और वाम भी अपनी रणनीति पर मंथन कर रहा है और लोगों के मुद्दों को उठाने में लगा है और यह इन्‍हें लेकर सड़कों पर उतरेगा। टैगोर, रामकृष्‍ण परमहंस और विवेकानंद की जमीन पर लोगों को विभाजित करने के लिए जय श्री राम का नारा इस्‍तेमाल किया जा रहा है और अमर्त्‍य सेन जैसे नोबेल विजेता खुलकर इसके विरोध में आये हैं।

साम्‍यवादी हमेशा वर्ग संघर्ष पर बल देते हैं किंतु जाति पर हिसाब-किताब साफ करना रह जाता है .

कई बार मैंने यह साफ किया है कि साम्‍यवादियों का वर्ग संघर्ष आर्थिक मुद्दों तक सीमित नहीं किया जा सकता था। भारतीय संदर्भ में वर्ग संघर्ष सामाजिक न्‍याय के लिए है और यह जातीय विभेदन के खिलाफ है। यहाँ तक कि अंबेडकर ने भी बुर्जुआ वर्ग को और ब्राह्मणवाद को दो शत्रुओं के रूप में चिह्नित किया था। हमें सामाजिक वास्‍तविकता को संबोधित करना है, अधिरचना और आधार के बीच के द्वंद्वात्‍मक संबंधों को समझना है। अगर हम सामाजिक न्‍याय के लिए और जातीय भेदभाव के खिलाफ लड़ाई नहीं लड़ते हैं तो हम क्रांति को पूरा नहीं कर सकते। सिर्फ आर्थिक मांगों को संबोधित करके हम क्रांति की प्रक्रिया को आगे नहीं बढ़ा सकते।    

(अनुवादक :– डॉ. प्रमोद मीणा, सहआचार्य, हिंदी विभाग, मानविकी और भाषा संकाय, महात्‍मा गाँधी केंद्रीय विश्‍वविद्यालय, जिला स्‍कूल परिसर, मोतिहारी, जिला–पूर्वी चंपारण, बिहार–845401, ईमेल – pramod.pu.raj@gmail.com, pramodmeena@mgcub.ac.in; दूरभाष – 7320920958 )    


[1] बी. कोलाप्‍पन द्वारा लिया गया डी.राजा का यह साक्षात्‍कार 29 जुलाई, 2019 के दि हिंदू में छपा है।

नोबेल पुरस्कार जीतने वाली पहली अफ्रीकी-अमेरिकी महिला–टोनी मॉरिसन

राजीव सुमन

टोनी मॉरिसन को सामजिक मुद्दों पर अपनी सूक्ष्म और स्पष्ट दृष्टिकोण रखने के साथ-साथ उनके तीक्ष्ण शब्द प्रयोगों के लिए भी याद किया जाएगा. उनकी राजनीतिक दृष्टि जिसमे वह श्वेत वर्चस्व, लिंगवाद और सभी अमानवीय विचारधाराओं के खतरनाक प्रभावों का मुकाबला करने के लिए एक ख़ास तरह की भाषा का प्रयोग करती हैं वह उनकी पहचान और प्रभाव का विश्लेषण करने के लिए एक पर्याप्त क्षेत्र मुहैया कराता है. टौनी की सौंदर्य प्रतिभा और उसकी सूक्ष्म राजनीतिक संवेदनशीलता सामयिक नहीं है. 1984 के अपने एक निबंध “रूटेडनेस: द एनसेस्टर इन द फाउंडेशन” में कहा था कि काम को “राजनीतिक और सुंदर दोनों” होना चाहिए. हमें उन्हें एक क्रांतिकारी राजनीतिक विचारक के रूप में भी याद रखना चाहिए, जिन्होंने दुनिया को बदलने के लिए अपनी लेखनी का इस्तेमाल किया.उनकी लेखनी का फलक किसी भी स्थिति की निरपेक्ष और विनाशकारी गैरबराबरी को चिन्हित करता है जो दूसरों को कमतर या न्यून समझते हैं. उनकी व्यापक कलात्मकता और बौद्धिकता का यह तत्व उनके व्यापक राजनीतिक निहितार्थ को दर्शाते हैं.

साभार गूगल


टोनी मॉरिसन महिला आंदोलनो और उससे जुड़े कुछ महत्वपूर्ण कार्यों को भी अंजाम दिया, मसलन जिल जॉनसन द्वारा “लेस्बियन नेशन” और रोज़लिन फ्रैड बैक्संडाल, लिंडा गॉर्डन और सुसान रेवरबी द्वारा संपादित “अमेरिकाज वर्किंग वीमेन: ए डॉक्युमेंट्री हिस्ट्री”. उन्होंने मुहम्मद अली, ह्युई न्यूटन, जॉर्ज जैक्सन सहित ब्लैक पवार मूवमेंट की आवाज़ों का संपादन किया. उन्होंने कार्यकर्ताओं, रैलियों और प्रदर्शनकारियों आदि के घटनाओं को एक स्थायी आंकड़ों के रूप में सुरक्षित बनाने में मदद की जो बाद में उनके कामों का गवाह बन सके. वह उन लंबे संघर्षों की गवाह थीं पर पारंपरिक अर्थों में एक कार्यकर्ता नहीं थी.

स्त्रीवाद से उनका सम्बन्ध : हालाँकि टोनी मॉरिसन के उपन्यास आम तौर पर अश्वेत महिलाओं पर केंद्रित होते हैं, लेकिन स्वयं को वह स्त्रीवादी के रूप में नहीं समझतीं. 1998 में एक साक्षात्कार में जब उनसे यह पूछा गया कि “स्त्रीवाद से आप इतनी  दूरी क्यों रखती हैं ? तो इसके जवाब में उन्होंने कहा : “संभवतः मैं अपनी कल्पना में जितना संभव हो उतना खुद को मुक्त रख सकूँ,  मैं अपना पक्ष कैसे रख सकूंगी, जब स्वयं को बाँध लूँ. वह सब कुछ जो मैंने लेखन की दुनिया में अब तक किया है, वह अभिव्यक्ति के विस्तार के लिए ही तो किया गया है, न कि  इसे बंद करने के लिए, कभी-कभी विचारों के नए दरवाजे खोलने के लिए, यहाँ तक कि कभी-कभी किताब की रचनाओं का अंत भी शेष छोड़ देती हूँ, पुनर्व्याख्या, पुनर्विचार थोड़ी अस्पष्टता, दुविधा के लिए अंत को खुला छोड़ना जरुरी है”. टोनी मॉरिसन कहती हैं कि उनके कुछ पाठक इसे “मेरी मजबूती” समझते हैं, जो यह महसूस कर सकते हैं कि मैं  स्त्रीवाद के लिए कोई अलग द्वार बनाने की दिशा में हूँ. मैं पितृसत्ता का समर्थन नहीं करती, और न ही मैं समझती हूँ कि इसकी जगह मातृसत्ता कायम हो जाए. मुझे लगता है कि यहाँ प्रश्न सभी के लिए न्यायसंगत पहुंच और सभी के लिए दरवाजे खोलने का है.” 2012 में उन्होंने 1970 के दशक में काले और गोरे स्त्रीवादियों के बीच अंतर के बारे में एक सवाल का जवाब देते हुए कहा– “वूमनिस्ट वह है जो काले स्त्रीवादी खुद को कहते थे, दोनों एक ही चीज़ नहीं थे, काले स्त्रीवाद में पुरुषों के साथ संबंध बेहद मायने रखते थे. ऐतिहासिक रूप से, काली महिलाओं ने हमेशा अपने पुरुषों को आश्रय दिया है क्योंकि वे वहाँ से बाहर थे और वे ही ऐसे थे जिनकी हत्या होने की सबसे अधिक संभावना थी।” डब्ल्यू. एस. कोट्टिसवारी(W. S. Kottiswari), पोस्टमॉडर्न फेमिनिस्ट राइटर्स (2008) में लिखती हैं कि मॉरिसन मुख्यधारा के इतिहासकारों द्वारा लिखे गए इतिहास को दुबारा लिखकर और बिलवड एवं पैराडाइज में मिथक और लोक कथाओं के मूल पाठ को उलटकर “यूरो-अमेरिकन डाइकोटोमी” को बदलते हुए “उत्तर-आधुनिक नारीवाद” की विशेषताओं का उदाहरण प्रस्तुत करती हैं. कोटिस्वरी बताती हैं, “पश्चिमी चिन्हों, अमूर्तताओं के बजाय, मॉरिसन ने स्त्री रंग की शक्तिशाली ज्वलंत भाषा को महत्व दिया है … वह अनिवार्य रूप से उत्तर आधुनिक हैं क्योंकि मिथक और लोककथाओं के लिए उनका दृष्टिकोण पुनर्पाठ का है.”

टोनी मॉरिसन का मानना ​​था कि लेखक का कर्तव्य है कि वह जनता की आवाज बने. उपन्यास ऐसा करने का एक साधन मात्र था उनके लिए. दशकों पहले उन्होंने अपने तीक्ष्ण व्याख्यानो और निबंधों की एक श्रृंखला के माध्यम से अधिनायकवाद के बढ़ते खतरे के बारे में सचेत किया था. उन्होंने सभी महान विचारकों की तरह, एक दर्पण रखा जो हमें बुराई और अच्छाई की हमारी दोनों क्षमताओं को दिखाता है. अपने उपन्यास, “ए मर्सी” में, नस्लीय दासता से पहले के एक ऐसे दौर में वे हमें ले जाती हैं जब एक नए राष्ट्र को अलग-अलग विकल्प चुनना था, जहां सब कुछ जीवंत और संभव था। वह हमें उस विनाशकारी विकल्प के रास्ते से नीचे नहीं ले जाती, जो वास्तविकता में बनाया गया था, जिसे हम जी रहे हैं. वह बस  अपनी कल्पना की शक्ति का उपयोग करके हमें याद दिलाती हैं कि समय के किसी भी स्तर पर  हमने वह अलग तरीका चुना होगा.

शेक्सपियर की तुलना में अब वे अमेरिका में भले ही अधिक पढ़ी जाती हों पर उनके आलोचकों की भी कमी नहीं है, भले ही वे आज जोर से नहीं बोल रहे हों. पर, उनकी आलोचना इस रूप में करते हैं कि उनकी विषयवस्तु बहुत संकीर्ण है, उन्होंने गुलामी प्रथा के बारे में लिखा कि गुलामी ने काले लोगों के साथ क्या किया था. समय के इस दौर में यह बेहद पुरानी बात हो चुकी है.., हालांकि उनका गद्य उत्तम है, मगर कठिनाई है तो कथ्य में. उनका सारा लेखन आत्म-घृणा, शरीर-त्याग, विश्वासघात, भूतों की यात्रा, बलात्कार, अनाचार, हत्या, यहां तक ​​कि भ्रूणहत्या को समेटे है जो, सभी क्रूर नस्लीय पूर्वाग्रह से बंधे हुए हैं. स्टेनली क्राउच ने उनके सबसे प्रसिद्ध कृतियों में से एक “बिलोवेड” को  ब्लैकफेस होलोकॉस्ट उपन्यास कहा जो केवल यह सुनिश्चित करने के लिए लिखा गया है कि सबसे अधिक पीड़ित अश्वेत महिलाओं की दृष्टि भी कमजोर नहीं होती है. दूसरों ने उनकी लेखनी की तुलना गोथिक फंतासी आदि से  भी की है…

एक लेखिका के रूप में अपने पांच दशक से भी ज्यादा लंबे करियर के माध्यम से बार-बार उन्होंने अपने लेखन की विषय वस्तु के अपने चयन के बारे में समझाया है. उन्होंने मारियो कैसर और सारा लाडीपो मानिका के साथ एक बातचीत में कहा था, यह सब उसके देश के बारे में है कि कैसे वह अफ्रीकियों के श्रम के गर्भ में पैदा हुआ था, जो “मुफ्त में काम करते हैं और खुद को और अधिक मुफ्त के श्रमिकों के रूप में पुनारोत्पादित करते हैं” और यही पाप आज भी बहुत ही ठोस तरीके से जारी है.

अपने पहले उपन्यास, “द ब्लूएस्ट आई” जो उन्होंने 39 वर्ष की उम्र में लिखा था और जो अभी भी उनका सबसे अधिक चर्चित उपन्यास है में बड़े मार्के की बात लिखती हैं.  “देखिये, नस्लवाद वास्तव में और सच में दर्द देता है. यदि आप सचमुच गोरा होना चाहते हैं जो आप नहीं हैं और आप युवा और कमजोर हैं, तो यह आपको मार सकता है.”

इस अवसाद युगवाले समय में उपन्यास, एक गोरे बुर्जुआ सामाजिक मॉडल से एक साथ निकटता और दूरी काले घरेलू कामगारों केलिए विनाशकारी दुष्परिणामों वाला है। पॉलीन ब्रीडलोव की अपने श्वेत नियोक्ता के प्रति आस्था और सौन्दर्य का भाव उसे उसके अपने बच्चे के प्रति घृणा और दुत्कार पैदा करती है और अपने आकाओं के प्रति भाव पोषित करती है.

ग्यारह साल की पेकोला ब्रीडलोव में अगर नीली आँखों के लिए इतनी आसक्ति आ जाती है कि अंततः वह उसके पीछे  बुरी तरह से पागल हो जाए : “यह कुछ समय पहले पेकोला में हुआ था कि अगर उसकी आँखें, वो आँखें जो तस्वीरें खींचती थीं, और जगहें जानती थीं – अगर उसकी आंखें अलग होतीं, सुंदर होती, तो वह खुद भी अलग होती.” वह जिस शर्ली  देवी की  मूर्ति को पूजती है उसकी आँखें भी तो नीली हैं और बाल ब्लोंड हैं.

यदि मेरा रंग / वर्ग / जाति / देश / ऊँचाई / वजन / जातीयता.. अलग होती तो मैं सुंदर होती, मेरा जीवन सुंदर होता. यह बिल्कुल भी असामान्य विचार नहीं है. और यह सिर्फ एक तरीका है जिसमें मॉरिसन बहुत विशिष्ट तरीके से विषय वस्तु को अपने  बहुविध पाठकों तक ले जाती हैं. उनके अंतिम उपन्यास ‘गॉड हेल्प द चाइल्ड’ की शुरुआती पंक्तियाँ हैं: “यह मेरी गलती नहीं है, इसलिए आप मुझे दोष नहीं दे सकते. “यह उसकी माँ है जिसने अभी-अभी एक ऐसी काली बेटी को जन्म दिया है जिससे वह बहुत डर गई है. “आधी रात की तरह काली, सूडानी कालापन” या जैसा कि कई भारतीय माँ “काली कलूठी” कहती हैं.

लौरेन ओहियो टोनी मॉरिसन के बारे में कहते हैं कि जैसे टॉल्सटॉय ने रूसियों के लिए लिखा था वैसे ही उन्होंने काले पाठकों के लिए लिखा. उन्होंने लोरेन में एक छोटी रंगीन लड़की के लिए नहीं लिखा, लेकिन उसने उसे पढ़ा. जैसे वह दुनिया भर के पुस्तक प्रेमियों द्वारा पढ़ा जाता है, जो अफ्रीकी-अमेरिकी नहीं हैं. क्योंकि वह वह अच्छा था या अच्छी थी. यह सार्वभौमिक अनुभव लिखने की कोशिश करने के बारे में नहीं है. लेकिन यह भी उतना ही बड़ा सच है कि वह काले अमेरिकी अनुभव को नग्न रूप से इसे एक अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उठाया है.

1993 में, सुश्री मॉरिसन 11 उपन्यासों के साथ-साथ बच्चों की पुस्तकों और निबंध संग्रह की लेखिका थीं. उनकी प्रसिद्द पुस्तकों में “सोलोमन के गीत” जैसी कृतियां थी  जिसे 1977 में नेशनल बुक क्रिटिक्स सर्कल अवार्ड और “बिलोवेड” थीं जिसे 1988 में पुलित्जर पुरस्कार जीता. टोनी मॉरिसन का 88 वर्ष की आयु में 5 अगस्त 2019 को निधन हो गया. वह साहित्य में नोबेल पुरस्कार जीतने वाली पहली अफ्रीकी-अमेरिकी महिला थीं और अमेरिका में नस्ली भेदभाव पर अपनी तीखे और गहरी समझ के लिए जानी जाती थीं. उनकी सबसे अधिक बिकने वाली किताब  ने अमेरिका में काले लोगों की अस्मिता के सवाल को पुरजोर तरीके से उठाया विशेष रूप से अक्सर काले महिलाओं के कुचलने वाले अनुभवों को अपनी चमकदार, भड़काऊ गद्य के माध्यम से जो उनकी विशिष्टता थी और शायद अंग्रेजी में किसी अन्य लेखक के पास वह ताक़त नहीं थी.
अमेरिका को फिर से महान बनाने के स्लोगन में, मॉरिसन अमेरिका को फिर से श्वेत बनाने की मुहीम की एक छिपी हुई परियोजना को देखती हैं – क्योंकि हर जगह “रंग के लोग” हैं, देश की एक लंबी समझ वाली परिभाषा को मिटाने की धमकी देते हुए इसकी श्वेतता पर जोर देते हैं. “और फिर क्या? एक और राष्ट्रपति काला? सीनेट में काले? सुप्रीम कोर्ट के तीन काले न्यायधीश? धमकी भयभीत करनेवाली है.” लेकिन इन सबके बावजूद टोनी मॉरिसन का फलक व्यापक और सुकुनदायक भी है. उनके उपन्यासों में गंभीर परिस्थितियों के बावजूद, मानवता और आनंद का उत्सव है.

टोनी मॉरिसन उन दुर्लभ अमेरिकी रचनाकारों में से एक थीं जिनकी पुस्तकें आलोचनात्मक और व्यावसायिक दोनों स्तरों पर सफल थीं. उनके उपन्यास नियमित रूप से न्यूयॉर्क टाइम्स के बेस्ट-सेलर सूची में दिखाई देते थे. उसके आख्यान पुरुषों, महिलाओं, बच्चों और यहां तक कि भूतों की आवाज़ों को बहुस्तरीय पॉलीफोनी में पिरोते हैं, जिनमें मिथक, जादू और अंधविश्वासों को रोजमर्रा की क्रियाओं से जोड़कर देखा जाता है, एक ऐसी तकनीक जिसके कारण उनके उपन्यासों की तुलना अक्सर लैटिन अमेरिकी जादुई यथार्थवादी लेखकों जैसे गेब्रियल गार्सिया मार्खेज से की जाती थी. “बिलोवेड” में वे लिखती हैं जो 19 वीं शताब्दी में सेट किया गया है लेकिन 20 वीं शताब्दी के रूपक के रूप में खड़ा है, “यह एक दुनिया है जिसमें कोई भी श्वेत आपके दिमाग में आने वाली किसी भी चीज़ के लिए आपकी पूरी आत्म ले सकता है.”

इनका चौथा उपन्यास, “टार बेबी” (1981), काले लोगों के साथ नस्लीय और वर्गीय पूर्वाग्रह के मुद्दों से स्पष्ट रूप से संबंधित है. एक कैरिबियाई द्वीप पर स्थित, यह एक महानगरीय, यूरोपीय-शिक्षित अश्वेत महिला के प्रेम संबंध को किसी न किसी और स्थानीय व्यक्ति के साथ प्यार करता है. उनके अन्य उपन्यासों में “जैज” (1992), में 1920 का न्यूयॉर्क शामिल है, “ए मर्सी” (2008), जो 17 वीं शताब्दी में कथा सेट करके जाति के विचारों से गुलामी की संस्था को तलाक देता है, जहां सेवा, काले या श्वेत वर्ग द्वारा निर्धारित किए जाने के लिए उपयुक्त नहीं था; और “होम” (2012) की कथा वस्तु जिम क्रो साउथ में लौटने पर एक काले कोरियाई युद्ध के दिग्गजों के संघर्ष के बारे में है. इनके नॉनफिक्शन के संस्करणों में “प्लेइंग इन द डार्क: वाइटनेस एंड द लिटरेरी इमेजिनेशन” (1992) और “व्हाट मूव्स एट द मार्जिन: सिलेक्टेड नॉनफिक्शन” (2008, कैरोलिन सी. डेनार्ड द्वारा संपादित) शामिल हैं.

उनकी अन्य उपलब्धियों में 2000 में राष्ट्रीय मानविकी पदक और राष्ट्रपति बराक ओबामा द्वारा 2012 में राष्ट्रपति पदक शामिल हैं. अपने जीवन और कार्य के अध्ययन के लिए समर्पित टोनी मॉरिसन सोसाइटी की स्थापना 1993 में हुई थी. टोनी मॉरिसन का जन्म संयुक्त राज्य अमेरिका के ओहियो के लॉरेन में एक श्रमिक वर्ग के परिवार में हुआ था. वह एक बच्चे के रूप में अपने पिता से कहानियों के रूप में बहुत कुछ पढ़ती आई हैं जो अफ्रीकी-अमेरिकी परंपरा में बिखरी हुई थीं जो बाद में उनके स्वयं के लेखन में एक तत्व बन गया. उन्होंने वाशिंगटन विश्वविद्यालय में हॉवर्ड यूनिवर्सिटी सहित कई विश्वविद्यालयों में अंग्रेजी पढ़ाई और पढ़ाई की है. 1964 से उन्होंने पब्लिशिंग हाउस एडिटर के रूप में काम किया, और 1970 में एक रचनाकार के रूप में अपनी शुरुआत के बाद से, उन्होंने प्रिंसटन सहित कई विश्वविद्यालयों में भी पद संभाला है. टोनी मॉरिसन की शादी से उनके दो बच्चे हेरोल्ड मॉरिसन हैं. उनके बेटे हेरोल्ड फोर्ड मॉरिसन और तीन पोते-पोतियां हैं. एक और बेटा, स्लेड, जिसके साथ उन्होंने बच्चों के लिए कई पुस्तकों के ग्रंथों पर सहयोग किया, 2010 में मृत्यु हो गई. 1989 में, सुश्री मॉरिसन प्रिंसटन के संकाय सदस्य भी रहीं, जहां उन्होंने मानविकी और अफ्रीकी अमेरिकी अध्ययन में पाठ्यक्रम पढ़ाया, और रचनात्मक लेखन कार्यक्रम की सदस्य थीं.

टोनी मॉरिसन की रचनाएं अफ्रीकी-अमेरिकियों के चारों ओर घूमती हैं; हमारे अपने समय में उनका इतिहास और उनकी स्थिति दोनों पर उनकी नज़र है. उनके पात्र अक्सर कठिन परिस्थितियों और मानवता के अंधेरे पक्ष को दर्शाते हैं, लेकिन फिर भी आशा और प्रकाश को व्यक्त करते हैं. जिस तरह से वह व्यक्तिगत जीवन की कहानियों को प्रकट करती है, उसके पात्रों के लिए अंतर्दृष्टि, समझ और सहानुभूति प्रकट करती है. टोनी मॉरिसन की अनूठी कथा तकनीक प्रत्येक नए काम के साथ विकसित होती गई है.

ग्राम्य जीवन का दस्तावेज़ :चिरकुट दास चिन्गारी


शफक महजबीन

किताब – चिरकुट दास चिन्गारी (उपन्यास) 
लेखक – वसीम अकरम 
प्रकाशक – हिंद युग्म प्रकाशन, दिल्ली 
मूल्य – 125 रुपये (पेपरबैक) 
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हम जितनी तेज़ी से आधुनिक होते जा रहे हैं, उतनी ही तेज़ी से गांव हमारे भीतर से ख़त्म होता जा रहा है. परिस्थितिजन्य, समय और समाज के बदलावों के बाद भी हमारे भीतर हमारी जड़ें जस की तस बनी रहें, यह साहित्य रचना के मूल कर्तव्यों में एक है कि ज़िम्मेदारी के साथ यथार्थ का चित्रण करे. आधुनिक होते दौर में ग्राम्य जीवन की कहानियों का अभाव स्वाभाविक है, लेकिन हमारे भीतर संवेदनाएं गहरी दबी पड़ी हैं, तो रचना फूटेगी ही. पेशे से पत्रकार और मिज़ाज से लेखक वसीम अकरम का पहला उपन्यास ‘चिरकुट दास चिन्गारी’ इन्हीं संवेदनाओं से निकली ग्राम्य जीवन के हास-परिहास की एक बेहतरीन रचना है. इस उपन्यास को पढ़ते हुए वसीम अकरम इसके पन्नों पर साफ नजर आते हैं, मानो वे दिल्ली में नहीं, मारकपुर गांव की गलियों में घूम रहे हों और इसके किरदारों से बात कर रहे हों. एक उपन्यासकार की यही सफलता है. 

हिंदी साहित्य के शलाका पुरुष राजेंद्र यादव ने एक दफा कहा था, ‘घर में जो स्थान नाली का है, साहित्य में वही स्थान गाली का है.’ इस बयान का यह अर्थ नहीं कि राजेंद्र जी गाली का समर्थन करते थे, बल्कि यह कि अगर कहानी के पात्र गाली दे रहे हैं, तो लेखक की यह ज़िम्मेदारी है कि वह अपने पात्रों की ज़बान न काटे. उपन्यास ‘चिरकुट दास चिन्गारी’ के किरदार भी कहीं-कहीं गालियां देते हैं, लेकिन वे ऐसा सायास बिल्कुल नहीं करते और हास-परिहास के बीच उनकी गालियां गैर-ज़रूरी भी नहीं लगतीं. अपने किरदारों की ज़ुबान काटे बगैर ही वसीम अमरम ने उत्तर भारत के ग्राम्य जीवन का रेखाचित्र खींचा है, जो कि बेहद सराहनीय है.  हमारे समाज में गालियां हमेशा ही महिलाओं को केंद्र में रची गई हैं, जो न सिर्फ सामाजिक विडंबना है, बल्कि मानसिक विडंबना भी है. इस आलोक में देखा जाए तो किसी भी उपन्यास में किसी के भी द्वारा किसी को दी गई गाली का समर्थन नहीं किया जा सकता. लेकिन, इसी समाज में हास-परिहास की एक समृद्ध परंपरा भी है, जिसमें कहीं-कहीं हल्की-फुल्की गालियों का इस्तेमाल भी होता रहा है और किसी को असहज भी नहीं करता. वसीम इस कोशिश में कामयाब रहे हैं.


उपन्यास ‘चिरकुट दास चिन्गारी’ की भाषा बहुत ही सरल-सहज और गंवई शब्दावलियों से भरी हुई है. यही नहीं, वसीम अकरम ने कुछ ऐसे नये शब्द-शब्दावलियों के साथ कई मुहावरों की रचना भी की है, जो अन्यत्र पढ़ने को नहीं मिलते. साहित्य सृजन में बिल्कुल ही नया शब्द गढ़ना उत्कृष्ट रचनकर्म माना जाता है, और इस पर वसीम अकरम एकदम खरे उतरते हैं. ‘सालियाना मुस्कान’, ‘यदि मान ल कि जदि’, ‘नवलंठ’, ‘पहेंटा-चहेटी’, ‘चिरिक दें कि पलपल दें’, ‘चुतरचहेंट’, ‘रामरस’, ‘परदाफसाद’, ‘बलिस्टर’, ‘लतुम्मा एक्सप्रेस’, ‘फिगरायमान’, ‘इक्स’, ‘लौंडियास्टिक’, ‘गलती पर सिंघिया मांगुर हो जाना’, ‘कान्फीओवरडेंस’, इन शब्दावलियों को पढ़कर मन गांव की उस ठेठ भरी ठांव पर ठहर जाता है.  


पिछले कुछ सालों से यह शिकायत भी आ ही रही है कि साहित्यिक हलकों में अब गांव की गलियां बची नहीं रह गयी हैं. यह शिकायत सही भी है, क्योंकि शहरीकरण की प्रक्रिया में गांव महज नॉस्टेल्जिया का विषय बनकर रह गया है. और इस संदर्भ में ले-देकर प्रेमचंद ज्यादा याद आते रहे हैं. इसलिए साहित्य की नयी पीढ़ी पर यह ज़िम्मेदारी बढ़ती जा रही है कि वे गांवों के देश भारत की ग्रामीण विभीषिका, उसकी संवेदनाएं, उसकी जीवंतता और उसके हास-परिहास को अपनी रचनाओं में लेकर आएं. शायद इसीलिए वसीम अकरम ने इस शिकायत को दूर करने की कोशिश की और ‘चिरकुट दास चिन्गारी’ के रूप में ग्राम्य जीवन का एक शानदार वितान रच डाला. इस वितान में अब भी पूरा गांव नहीं समा पाया है, लेकिन जितना कुछ है, वह एक गंवई सौंदर्य को समझने के लिए काफी है. 


ग्रामीण परिवेश के एक जीवंत दस्तावेज़ को पाठकों के हाथों में सौंपने में हिंद युग्म प्रकाशन की भी एक बड़ी भूमिका है, जो न सिर्फ ऐसी रचनाओं को छाप रहा है, बल्कि बरास्ते अपनी टैगलाइन ‘नई वाली हिंदी’ के साथ वह पठनीयता को एक नया आयाम भी रच रहा है. यही वजह है कि बेस्ट सेलर की सूची में हिंद युग्म प्रकाशन की ज्यादातर किताबें अपना स्थान बना रही हैं. ग्राम्य जीवन की शानदार जीवंतता को समझने के लिए पाठकों को यह उपन्यास ज़रूर पढ़ना चाहिए. 

समीक्षक पेशे से शिक्षिका हैं: संपर्क:mahjabeenshafaq@gmail.com

प्रलेस की एक सदस्या की खुली चिट्ठी :पितृसत्ता के खिलाफ हर लड़ाई में हम आपके साथ हैं

आरती

संजीव जी,
इस मुद्दे को आप मुझे व्यक्तिगत भी भेजते रहे हैं, काफी दिनों से पढ़ रही रही हूं.

नूर जहीर संगठन के प्रथम पंक्ति की लेखिका, कार्यकर्ता और संगठन कर्मी भी हैं  उस स्तर पर क्या हो रहा है यह हम जैसे सबसे निचले पायदान पर काम करने वाले कम प्रचलित लेखक, संपादक को पता नहीं होता.

खैर इस पूरे मुद्दे पर पहली बात तो यह कह दूं कि विभूति नारायण से मेरी कोई सहानुभूति नहीं है. और मैं खुद भी उन्हें किसी कार्यक्रम में मंच पर बरदाश्त नहीं कर सकती . भरसक विरोध करूंगी लेकिन संगठन के भीतर. ऐसा करके मैं देखूंगी कि क्या कोई असर होता है, नहीं होगा तो किसी और तरीके के बारे में भी  सोचूंगी.  

हालांकि ऐसा कहते हुए मैं सोच रही हूं कि नूर जहीर, जिनका कद मुझे हमेशा प्रगतिशील लेखक संघ और इप्टा में बहुत ही महत्वपूर्ण दिखाई दिया,( वह है भी). वह इस तरह कि- वे जब भी किसी कार्यक्रम में दिखी हमेशा पहली पंक्ति में दिखी, उनकी बातों का वजन भी हमने महसूस किया फिर यदि वे उपेक्षित महसूस कर रही हैं और सोशल मीडिया पर गुहार लगा रही हैं तब हम अपने बारे में अंदाज लगा ही सकते हैं. अभी कुछ दिनों पहले  जब नूर जी भोपाल आई थी तब संगठन के सभी लोग ने, मध्य प्रदेश में प्रथम पंक्ति के लोग ने,( वही जो आपके शब्दों में भूमिहार और सामंती कहे जा रहे हैं इन दिनों) नूर जी स्वागत में लगे हुए थे. हम भी थे. खैर ऊपर से ऐसा ही दिखाई देता है भीतर कुछ और होता है.

आप ने बार-बार कहा कि संगठन के भीतर की महिलाएं क्यों नहीं बोल रही है? चुप्पी तो किसी भी विषय में खतरनाक होती है और मैं भी अधिक दिनों तक चुप नहीं रह सकी जब मैंने देखा  कि यह  मसला सामूहिकता की ओर जा रहा है. हालांकि मुझे किसी ने बोलने या चुप रहने कि न तो समझाइश दी थी और न ही मुझ पर किसी तरह का कोई दबाव था. वैसे भी कोई भी किसी पर कोई दबाव नहीं डाल सकता हर व्यक्ति आने और जाने के लिए स्वतंत्र होता है मैं भी हूं . 

मेरी बात कही जाए तो प्रलेसमैंने खुद चुना है, तो मेरी पहली प्राथमिकता होगी कि जिन वजहों से मैंने उसे चुना है उसमें सहयोग करूं. जैसा कि मैंने कहा कि मैं भी जिन चीजों पर मुझे  असहमति होगी, संगठन के भीतर आवाज उठाकर देखूंगी. हालांकि यह खरा सच है कि हमारे देश के सामाजिक ताने-बाने की तरह ही लगभग सभी संस्थाएं ,संगठन और पार्टियां पितृसत्तात्मक सांचे में जकड़ी हुई है. वहां स्त्रियों के लिए बमुश्किल जगह बन पाती है और वह जगह भी पिछली पंक्ति में बैठने के लिए बनती है. जो बोलती हैं वे ऐसे परंपरावादी  ढांचे के लिए मुफीद नहीं होती. उन्हें तभी स्वीकारा जाता है जब वे उनकी तरह हो जाएं . उसी तरह लिखने लगे ,उसी तरह बोलने लगे. कोई जगह पाने के लिए उन्हें भी पुरुष की आवाज को अपनी आवाज बनाना पड़ता है. यह बात इसके पहले भी मार्क्सवादी विचारधारा और पार्टी के गठन के साथ ही प्रतिबद्ध महिलाओं ने महसूस की थी और कहा भी था. जिसकी जरूरत को महसूस करके लेनिन ने अपने समय में पार्टी में कई सुधारात्मक काम किए थे. इस आशय का एक लेख मैंने बहुत पहले लिखा था जो आपके स्त्रीकाल में भी प्रकाशित हुआ था.इसलिए नूर जहीर जिस आवाज को उठा रही हैं उसे मैं महसूस कर सकती हूं और उनकी आवाज को मेरा समर्थन है.

 एक बात आपके लिए – आप मेरे मैं अच्छे दोस्त हैं( ऐसा मैं मानती हूं आशा है आप भी ऐसा ही मानते होंगे). आप के द्वारा समय-समय पर उठाए गए मसलों का मैंने समर्थन किया है. एक बार मैंने कहा भी था, याद कीजिए, कि आप सच का साथ दीजिए और किसी के नाराज होने की परवाह मत  कीजिए . अभी भी यही कहूंगी. हालांकि आपके द्वारा उठाए गए कई मसलों पर मेरी राय अलग थी. कई बार मैं इसलिए चुप रही क्योंकि वह आपकी राजनीतिक धारा के लिए जरूरी था, जैसे कन्हैया कुमार का मामला. आपने क्या क्या लिखा, कब कब लिखा ,हमने आपको कभी नहीं टोका ना अपनी असहमति लिखी. क्योंकि  वह चुनावी रणनीति का  एक भाग था. वह आप की दलगत नैतिकता ही थी. और बोलना हर समय हर बिंदु पर जरूरी भी नहीं होता. 

लेकिन यह मुद्दा अलग है. हमारी वरिष्ठ साथी नूर जहीर से जुड़ा हुआ है और हमारे प्रिय संगठन प्रलेस से भी. इसलिए बोलना जरूरी है.

याद आता है कभी राजेंद्र यादव महिलाओं के खेवनहार  बने हुए थे, वहीं महिलाओं के सारे मुद्दे उठाते थे और महिलाएं पर्दे के पीछे खड़ी तालियां बजाती थी. यह सूरतेहाल आठवें-नौवें दशक और उसके बाद भी चलता रहा. इन दिनों वह भूमिका हमारे अजीज दोस्त संजीव चंदन ने संभाल रखी है. अभी भी स्त्रियों को अपने मुद्दे उठाने के लिए एक स्त्रीवादी मर्द की जरूरत है जो बारी-बारी सबसे पूछता है कि तुम क्यों चुप हो ? तुम क्यों चुप हो? अभी भी सूरतेहाल तीन दशक पहले वाले ही हैं.

 हमें बहुत अच्छा लगता यदि नूर जहीर अपनी लड़ाई में सीधे हमें शामिल करती, बजाय आपके मार्फत? नूर जहीर संगठन की वरिष्ठ साथी हैं हमारी प्रिय लेखिका भी .उनके मान-सम्मान के लिए (मैं यहां हम नहीं कहूंगी मैं कहूंगी)  मैं उनके साथ हूं, बशर्ते कि वे हमें अपनी लड़ाई का साथ ही तो समझे. 

मध्यप्रदेश के एक कार्यक्रम में नूर ज़हीर

यहां यह भी कहा जा सकता है कि क्या हर एक से पूछ-पूछ कर मसले उठाए जाएं ? और फिर जरूरी नहीं कि वे मुझ या मुझ जैसी महिलाओं को जानती भी हो( संगठन के भीतर की).

 तो नूर आपा !! एक बड़ी लड़ाई के लिए लोगों को आवाज तो देनी ही होगी . हो सकता है आप मुझे न जानती पहचानती हो, लेकिन कुछ महिलाएं तो है संगठन के भीतर हैं,जिन्हें आप जानती और पहचानती हैं . 

फिर भी मैं आपकी लगभग बातों का समर्थन करती हूं और पितृसत्तात्मक ढांचे के खिलाफ वह चाहे घर के भीतर हो या संगठन के भीतर या कहीं बाहर उस लड़ाई में आपके साथ हूं.

…………. आरती

लेखिका आरती प्रलेस के मध्यप्रदेश इकाई में हैं. वे समय की साखी नामक साहित्यिक-सांस्कृतिक पत्रिका की सम्पादक हैं.