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प्रोफ़ेसर रतनलाल की रिहाई!

यह आंबेडकरवाद और एकजुट लड़ाई की जीत है

एच. एल. दुसाध 

सत्ता का रवैया देखते हुए जिस बात की आशंका थी , वह सामने आ ही गयी. फेसबुक पर ज्ञानवापी मस्जिद में मिले शिवलिंग, जिसे एक तबका फव्वारा बता रहा है , पर खास नजरिये से टिपण्णी करने के कारण आंबेडकरनामा के एडिटर, , इतिहास के प्रोफ़ेसर तथा भारत के अन्यतम श्रेष्ठ इतिहासकार काशीप्रसाद जायसवाल के लेखन के शोधकर्ता प्रो. रतनलाल को कल 20 मई की रात साढ़े दस बजे गिरफ्तार कर लिया. इस गिरफ्तारी के खिलाफ प्रतिवाद जताने के लिए आधी रात को  दिल्ली पुलिस के साइबर थाना, मौरिस नगर पर सैकड़ों दलित व वाम एक्टिविस्ट, शिक्षक और छात्र जमा हो गए. सुबह होते-होते सोशल मीडिया प्रो. रतनलाल की रिहाई की मांग से पट गयी. यही नहीं उनकी रिहाई की मांग को लेकर देश के विभिन्न अंचलों में लोग सडकों पर भी उतर आये हैं.उनकी गिरफ्तारी की खबर वायरल होते ही देश के  छोटे-बड़े असंख्य बहुजन बुद्धिजीवियों के साथ वाम बुद्धिजीवी व संगठन इस घटना की भर्त्सना करने में जुट गए, लेकिन इन पंक्तियों के लिखे जाने तक बसपा- सपा, राजद- लोजपा इत्यादि बहुजनवादी दलों की ओर से कोई प्रतिवाद नहीं जताया गया है. बहरहाल इस घटना से सिर्फ बहुजन बुद्धिजीवी और एक्टिविस्ट ही नहीं मुख्यधारा के बुद्धिजीवी भी स्तब्ध हैं.

सुप्रसिद्ध शिक्षाविद प्रो. अजय तिवारी ने लिखा है,’ डॉ. रतनलाल की शिवलिंग विषयक टिपण्णी से असहमत हूँ, लेकिन उनकी गिरफ्तारी का विरोध करता हूँ. यह जनतांत्रिक आज़ादी का हनन है. उन्होंने पुराण- लेखकों से ज्यादा बुरी बात नहीं लिखी है.’ उनका समर्थन करते हुए कर्मेंदु शिशिर ने लिखा है,’ आपकी बात से शतप्रतिशत सहमत हूँ.’ वरिष्ठ चिन्तन कनक तिवारी ने लिखा,’ प्रोफेसर रतन लाल को केवल दलित लेखक कहकर हम उनका कद छोटा नहीं करते हुए कहेंगे. वे अभिव्यक्ति की आजा़दी के पहरेदार हैं. लेखक हैं. विचारक हैं. इस नाते अभिव्यक्ति की आजा़दी पर हमला उनकी गिरफ्तारी के जरिए हुआ है. यह केवल एक वर्ग विशेष पर नहीं पूरे भारतीय समाज पर है . हम सब इसका पुरजोर विरोध करेंगे . यह अंग्रेजों की मानसिकता की सरकार चल रही है आजकल’.

बहुजन बुद्दिजीवियों में प्रेमकुमार मणि ने लिखा,’ सोशल मीडिया से मिल रही खबरों के अनुसार दिल्ली विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग के एसोसिएट प्रोफ़ेसर रतनलाल को पुलिस ने कल गिरफ्तार कर लिया है . प्रोफेसर रतनलाल मेरे पुराने मित्र हैं . उनकी बौद्धिक सूझबूझ और विद्वता की मैं कद्र करता हूँ . उनकी तरह विनम्र और सभ्य मैंने बहुत कम लोगों को देखा है . उनकी गिरफ्तारी संभवतः उनके लिखे एक पोस्ट को लेकर हुई है . मेरी मान्यता है कि यह अभिव्यक्ति के संवैधानिक अधिकार पर हमला है . इसे मैं बिलकुल गलत मानता हूँ . मैं प्रोफ़ेसर रतनलाल के प्रति अपना समर्थन व्यक्त करता हूँ . हुकूमत उन्हें अविलम्ब मुक्त करे और पूरे प्रकरण केलिए उनसे मुआफी मांगे’. प्रो. लाल के गिरफ्तारी की खबर मिलते ही प्रख्यात पत्रकार उर्मिलेश ने लिखा,’ दिल्ली विश्वविद्यालय(हिन्दू महाविद्यालय) के एसो. प्रोफ़ेसर रतनलाल जैसे मुखर और प्रगतिशील बुद्धिजीवी की गिरफ़्तारी अत्यंत निंदनीय है. सत्ता और व्यवस्था के लगातार और तेजी से निरंकुश होते जाने का यह ठोस उदाहरण है. जिस तरह निहायत सतही और निराधार आरोपो मे उन्हें रात के अंधेरे मे हिरासत मे लिया गया, वह किसी लोकतांत्रिक समाज में संभव नहीं.अल्पसंख्यक समुदाय के सामाजिक कार्यकर्ताओं, छात्रों-युवाओं और प्रगतिशील विचारकों के बाद अब निशाने पर दलित, ओबीसी और अन्य समुदायों के असहमत बुद्धिजीवी! प्रोफ़ेसर रतनलाल को अविलम्ब रिहा करो!.’

सत्येन्द्र पीएस ने बहुत ही तल्ख अंदाज़ में रोष व्यक्त किया,’ दिल्ली यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर रतन लाल को गिरफ्तार कर लिया गया. लाल से पहली मुलाकात समाजवादी पार्टी द्वारा आयोजित एक मंच पर बहुत पहले हुई थी, जहां मुझे भी भाषणबाजी के लिए बुलाया गया था. उसके बाद दिलीप मंडल के साथ कई मुलाकातें और थोड़ी बहुत बात हुई. सोशल मीडिया पर उनको बहुत ज्यादा फॉलो नहीं कर पाता, लेकिन इतना पता है कि वह अम्बेडकरवादी हैं, अत्यंत मृदुभाषी हैं, सहृदय हैं.लिंग, योनि, यौन संबंध आदि आदि के बारे में जो हिन्दू धर्मग्रन्थों में लिखा गया है, वह अगर बताने पर लग जाया जाए तो धार्मिक लोगों को ऐसा फील होने लगेगा कि उनके कान में पिघला सीसा डाला जा रहा है. आश्चर्य की बात है कि एक ऐसे बयान पर गिरफ्तारी हुई है, जिसके बारे में तमाम महान विचारकों कबीर से लेकर ज्योतिबा फुले, भीमराव अंबेडकर, पेरियार आदि ने रतनलाल से 100 गुना उग्र होकर लिखा है.जब अम्बेडकर लिखा करते थे और गांधी से उस पर राय मांगी जाती थी तो गांधी कहा करते थे कि दलितों के साथ जो अन्याय हुआ है और उनके साथ जैसा व्यवहार किया जाता है, उसकी तुलना में अम्बेडकर की प्रतिकिया बहुत शालीन है.आप दलितों को सड़क पर पीट पीटकर मार डालते हैं, तरह तरह से जातीय मजाक बनाते हैं. आप या आपकी भावनाओं का कद्र वह क्यों करें? इसलिए कि आप गुंडे हैं, आप सत्ता में हैं? सरकार को न सिर्फ रतन लाल को तत्काल रिहा करने की जरूरत है, बल्कि एक सख्त संदेश देने की जरूरत है कि अगर ऐसे मामलों में आन्दोलन  होते हैं या पुलिस कोई गिरफ्तारी होती है या दलित चिंतकों को पीटा जाता है तो इतनी सख्त कार्रवाई होगी कि गुंडों की रूह कांप जाए. सरकार ऐसे नहीं चलती  नरेंद्र मोदीजी जी! कुछ तो लिहाज करिये गांधी और बुद्ध की धरती का, जहां आप पैदा हुए हैं! न्याय कीजिए, कुछ अच्छा कीजिए, जिससे आपको भी इतिहास याद रखे. यह नहीं चलेगा कि आपके शासन में आपके गुजरात में आपके देश में दलित पीटे  जाएं और यह कहकर आप अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर लें कि दलित भाइयों की जगह हमें पीटें, या इस घटना के लिए खुद को माफ नहीं कर पाऊंगा. आपके सख्त बयान आने चाहिए कि इस तरह के दलितों के उत्पीड़न, दलित चिंतकों के मुंह बंद करने और उन्हें डराने की कवायद पर सरकार की नो टॉलरेंस नीति है। सरकार के कारकुनों, न्यायपालिका और जनता को आप उसी तरह संदेश दे सकते हैं जैसा गांधी ने दिया था. उस समय अंग्रेजों का शासन था, अभी तो आपका शासन है.आस्था पर चोट के नाम पर हम प्रतिरोध की आवाज को दबाने की प्रवृत्ति  को क्या कहें क्योकि दिल्ली यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर और अम्बेडकरवादी विद्वान रतन लाल जी को प्राप्त सूचना के मुताबिक दिल्ली पुलिस के साइबर सेल ने गिरफ्तार कर लिया हैहम पुलिस की इस कार्यवाही पर प्रतिरोध जताते हैं’.

बहुजन विरोधी हर घटना पर आवाज उठाने वाले चंद्रभूषण सिंह यादव ने लिखा,’ प्रो रतन लाल जी अम्बेडकरिज्म को मानने वाले हैं. वे तार्किक बातें रखते हैं.यदि किसी को लगता है प्रो रतन लाल जी ने गलत बोला है तो उनसे उनके व्यक्तव्य पर स्पष्टीकरण मांगना चाहिए था,यदि सच में उनके कहने का आशय किसी के धार्मिक भावना को ठेस पंहुचाने वाली होती तो कोई बात नहीं लेकिन यदि इस तरह से एकपक्षीय कार्यवाही की जाएगी तो यह न्यायपूर्ण प्रक्रिया नही कही जाएगी क्योकि मेरी समझ से उनकी टिप्पड़ी ऐसे चीज पर थी जो शिवलिंग के शेप की नहीं है न कि शिवलिंग पर उंन्होने टिप्पड़ी की थी. हजारों लोगों द्वारा प्रो रतन लाल जी को गालियाँ और धमकियां दी जा रही हैं, क्या साइबर सेल उन गाली-धमकी देने वालों को गिरफ्तार कर सकेगा?क्या उन गालीबाजों या धमकीबाजो को चिन्हित कर साइबर सेल उनके गिरफ्तारी का प्रयास कर रहा है?क्या एससी-एसटी ऐक्ट के तहत जातिगत टिप्पड़ी करने वालों पर कार्यवाही की जा रही है?प्रो रतन लाल जी की मुखर आवाज को मुकदमा लिख दबाने की प्रबृत्ति अफसोसनाक व निंदनीय है. देश का सम्पूर्ण बुद्धिजीवी व बहुजन समाज प्रो रतनलाल जी के साथ है और उनके रिहाई के साथ सुरक्षा प्रदान करते हुये गालीबाजों और जातिवादी टिप्पड़ियां करने वालो पर मुकदमा लिखने की मांग करता है.’ सुप्रसिद्ध आलोचक वीरेंद्र यादव ने लिखा,’ आंबेडकरवादी बुद्धिजीवी, सबाल्टर्न चिंतक , इतिहास के अध्येता व दिल्ली विश्वविद्यालय के शिक्षक रतनलाल जी  की गिरफ्तारी एक बुलंद स्वर को चुप कराने की सत्ता की धौंसपट्टी है. जनतांत्रिक अभिव्यक्ति पर सत्ता की यह नकेलबंदी संवैधानिक अधिकारों पर हमला और संवाद की संस्कृति का हनन है. हम इसकी निंदा करते हैं और रतनलाल जी के साथ एकजुट हैं. रतनलाल जी को तुरंत रिहा कर जनतांत्रिक अभिव्यक्ति को सुनिश्चित किया जाना चाहिए.’

पटना के बुद्धिजीवी श्रवण कुमार पासवान ने कहा ,’ रतन लाल के गिरफ्तारी के खिलाफ़ एकजुट दलित एक्टिविस्ट दिल्ली विश्व विद्यालय के प्रोफेसर रतन लाल की गिरफ्तारी की घोर निन्दा करते हैं .रतन लाल ने कोई गलती बात नहीं की थी .धर्मों के नाम पर राजनीति गुंडागर्दी बंद हो.प्रोफेसर रतन लाल की देर रात गिरफ्तारी मुखर दलित आवाज को दबाने की दिशा में ब्राह्मणवादी सरकार की बड़ी भूमिका है.’. बुद्ध शरण हंस ने लिखा ,’प्रो रतनलाल विद्वान और मर्यादित व्यक्ति हैं. इनकी लेखनी और वक्तव्य सब मर्यादित होता है. कोई जरूरी नहीं कि रतनलाल अपनी हिफाजत के लिए भाजपा को खुश करनेवाली बात बोलें. रतनलाल तो बाबा साहब अम्बेडकर के विचारों पर चलनेवाले साहसी व्यक्ति हैं. उन्हें गिरफ्तार कर सरकार ने कायरों का काम किया है. उन्हें शीघ्र रिहा करो.’इस घटना जितना रोष चंद्रभान प्रसाद ने दिखाया, वह चौकाने वाला रहा. उन्होंने एनडी टीवी पर घोषणा किया,’ यह गिरफ्तारी प्रो. रतनलाल के विचारों के वजह से हुई है. मेरा यह सोचना है कि दलितों और आरएसएस के बीच वैचारिक युद्ध की घोषणा हो चुकी है. पिछला दो लोकसभा चुनाव जीतकर  भाजपा को ऐसा वहम  हो गया कि उसने भारत पर कब्ज़ा कर लिया है. लेकिन दलित बुद्धिजीवी उनको चुनौती दे रहे हैं . इसीलिए प्रो रतनलाल को रात साढ़े  दस बजे इस अंदाज में गिरफ्तार किया गया मानों वह भारी आतंकवादी हैं. यह एक युद्द की शुरुआत है.’      

बहुजन- वाम  बुद्धिजीवियों और एक्टिविस्टों ने जिस  एकजुटता और संघर्ष का प्रदर्शन  2018 के ऐतिहासिक 2 अप्रैल और 2019 में 13 पॉइंट रोस्टर के खिलाफ किया था, उसकी आज छोटे पैमाने पर  एक बार फिर पुनरावृत्ति हो गयी. शून्यकाल.कॉम के संपादक भंवर मेघवंशी ने प्रो.लाल की गिरफ्तारी पर प्रधानमंत्री को जो तल्ख़ पत्र लिखा वह बहुजन आन्दोलन में एक ऐतिहासिक दस्तावेज की  जगह पायेगा. दलित लेखक संघ के संरक्षक के तौर पर हीरालाल राजस्थानी जो सन्देश दिया है, उसे भी नहीं भुलाया जा सकता. पटना से दीपंकर भट्टाचार्य ट्विट पर करके तथा हरिकेश्वर राम पोस्ट पर पोस्ट लिखकर सरकार पर लगातार दबाव बनाते रहे. संजीव चंदन, अनीता भारती, रमेश भंगी, डॉ. अनिल जयहिंद, पत्रकार महेद्र यादव, प्रो. हेमलता महिश्वर , मयंक यादव, मनोज अभिज्ञान, डॉ. सिद्धार्थ रामू, पीडीआर. मनीषा बांगर, रवेश कुमार, प्रियदर्शन, नवल  कुमार, पवन कुमार खरवार, जयंत जिज्ञासु इत्यादि भी अतीत की भांति फिर एक बार अपने-अपने तरीके से प्रो. रतनलाल की रिहाई में जुटे रहे. महान पत्रकार दिलीप मंडल और प्रो. लक्ष्मण यादव ने फिर एक बार साबित किया कि बहुजन हितों की लड़ाई में वे बराबर अग्रिम पंक्ति में खड़ा मिलेंगे. बहरहाल प्रो.रतन लाल की रिहाई एक बड़ी लड़ाई थी, जिसमे कोई भूमिका अदा करने में बहुजन समाज के नेता बुरी तरह विफल रहे:  इतना विफल रहे कि कल लोग उनके खिलाफ झंडा लेकर भी खड़े हो जाएँ तो विस्मय नहीं होगा . किन्तु बहुजन लेखक- पत्रकार- एक्टिविस्ट, छात्र और शिक्षकों ने उनकी कमी खलने नहीं दी जिसका परिणाम यह हुआ कि प्रो. रतन लाल को बेल मिल गया. लेकिन यह आसान नहीं था, यह संजीव चंदन के तीन बजे के पोस्ट से साबित होता है.’रतनलाल जी को जमानत मिलने की सूचना है. इन धाराओं में इतना आसान नहीं होता है, मजिस्ट्रेट के स्तर पर. यह आंबेडकरवाद, एकजुट लड़ाई की जीत है. न्याय, लोकतंत्र, संविधान की जीत है!’ लेकिन यह लड़ाई ख़त्म नहीं हुई है ! पत्रकार दया शंकर राय के शब्दों में,’ मौजूदा सत्ता का जो फासीवादी चरित्र है ,उसे देखते हुए ये लड़ाई अनवरत और अभी लम्बी चलनी है.’ बहरहाल फासीवादी सत्ता के खिलाफ हमारी लड़ाई लम्बी चलेगी और हमें ख़ुशी है कि इस लड़ाई में साथ देने के लिए प्रोफ़ेसर रतन लाल के साथ कंधे से कन्धा मिलाकर संघर्ष करने वाली उनकी की फायर ब्रांड जीवन संगिंनी शालिनी आर्य के शब्दों में,’ सिंघम इज  बैक’!

लेखक बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं.
संपर्क : 9654816191
             

मेरी साड़ी वो आशियाना है

भारती वत्स

चार्ली चैपलिन ने कहा था कि कविता पूरी दुनिया के नाम लिखा प्रेम पत्र है, आज के कुछ कवियों की कविताएं पढ़ते हुए मुझे लगा कि ये नौजवान कवि  भी अपनी आत्मा के द्वार पूरी दुनिया के लिए खोले खड़े हैं। इनकी कविताओं में एक ताव है जो पढ़ने वाले को ऊर्जा  देता है एक ज़िद है जो बोलने की निर्भीकता पैदा करती है एक रागात्मकता है जो मनुष्य की तरफ खड़ा करती है।

 अपने समय की छल छद्म से भरी राजनीति,गंदी व्यवस्था के बीच हम बार बार कबीर,रैदास,रहीम,से लेकर प्रेमचंद,निराला,मुक्तिबोध और दोस्तोवस्की की तरफ अपने आप को खड़ा पाते है आज के ये कवि भी अपने पुरखों की उस सोच की तरफ खड़े दिखाई दे रहे हैं जो मनुष्य को न्याय की तरफ खड़ा होना सिखाती है।

आधुनिक दौर में उत्पीड़न ,दमन और शोषण के खिलाफ हमारी चेतना में संवेदनाओं को जाग्रत करने में कविता की अग्रणी भूमिका रही है जो अन्याय के विरुद्ध संघर्ष के दायरे में ही रहकर  अंततः राजनीतिक सीमा मे बंद हो जाती थी परंतु बाद की कविता ने उस द्वंद्वात्मकता को नये प्रतिमानों से बहुत गहराई और संवेदनशीलता के साथ सिरजा, जो प्रकृति,स्त्री ,प्रेम से लेकर ब्रम्हांड तक के रूपक बहुत सहजता से तो रच ही रही है राजनीतिक काइयाँपन, धूर्तता, दोगलेपन,विस्थापन,विकास की त्रासदियों और पर्यावरण के प्रश्नों को भी आक्रामक तरीके से उकेर रही है। दुनिया के प्रति इन कवियों की समझ गहन अध्ययन से या किसी खास धारासे नहीं बल्कि जिंदगियों की जद्दोजद और इस समय के बेगानेपन के बीच ये तीव्र ,आक्रामक भावभूमियां निर्मित हो रही हैं।

आज की कविता का जो वितान है,वह आक्रामक तेवर,गहरे असंतोष की पथरीली जमीन पर निर्द्वंद्व फैला हुआ है खास तौर पर कुछ कवि तो, एक ताव के साथ कविता में प्रवेश करते हैं, यही ताव कविता का मर्म बन जाता है इसे गुस्सा या भड़ास कह कर टाला नहीं जा सकता है यह आक्रोश की रचनात्मक रिदम है जिसे युवा कवि अराजक दुनिया के बीच साधे हुए हैं।

       कुछ रचनाकारों का न तो छपना लक्ष्य होता है न पुरस्कार पाना, पर वे समाज से सीधे संवाद कर रहे होते हैं आज के दौर में कुछ कवि ऐसे ही खड़े होने की कोशिश करते दिखाई दे रहे हैं अपने मजबूत पैरों पर बिना किसी वैसाखी के। उनकी चर्चा इसलिए इस आलेख में शामिल कर रही हूं क्योंकि उनकी लगभग हर कविता अपील करती है, बोलती है आपके अंदर जगह बनाती महसूस है।

       आज की कविता राजनीतिक विचार से आगे जीवन के गहनतम गलियारों में दखल दे रही है यह कविता राजनीतिक संघर्ष की द्वेत्ता से परे वैकल्पिक चेतना की ओर जीवन की कविता है इस धारा को बहुत गहरे और सार्थक तरीके से आगे ले जाने वाले कविता को संवेदना के इस धरातल पर खड़ा करने वाले कवियों में विहाग वैभव ,अदनान कफिल, सबिकाअब्बास, वीरू सोनकर ,जसिंता केरकेट्टा की कविता को शामिल किया जाना चाहिए। इन्हें मैंने आभासी दुनिया से ही जाना है इनकी कोई भी किताब मैंने नहीं पढ़ी।

    वीरू सोनकर की कविता पढ़ते हुए मुझे एक शब्द ध्यान में आया गुरिल्ला कवि….। जो  जिंदगी के उन हिंसक अनुभवों को पूरी सृजनात्मकता के साथ लिखते हैं जिनका जिंदगी में होना ही जिंदगीयों को उदासियों में डूबो देता है वीरू भी उस उदासी से गुजरे होंगे तभी उनकी उदासी के रंग इतने तीखे और चटक हैं —-_—

        मैं बहुत दिन अपनी जाति के अहंकार में

        बोराया रहा

    बहुत दिन किशोरावस्था मैं किये सूअ रवध की  

        अपनी वीरता पर

        बहुत दिन ढांकता रहा

        इन से अपनी कायरता के बीज को

        जो कायरों को देख पता नहीं कब पनप गए थे

        मेरे भीतर…।

ये अपने आप से लड़ने के बीच बनी कविता है जो समाज से मिले संतापों से उपजी है उन संतापों से उबरने की लगातार कोशिश के बीच की आत्म स्वीकृति है यह कविता। उस अनुभव की कविता है, जब हम जो है उसे स्वीकार पाने की हिम्मत अपने अंदर पैदा कर रहे होते हैं और स्वीकार कर लेने के बाद अपने अंदर पैदा हुई ताकत को महसूस करते हैं। वीरू जीवन के उस साक्षात से भी गुजरते हैं जब हम कहीं अपने होने और ना होने की दुविधा में होते हैं । उस वक्त जब लोग हमें सब के बीच खड़ा देख रहे होते हैं ठीक उसी समय हम जीवन के उन खामोश स्पंदित नाजुक से कोनों में अपने आप के पास खड़े होते हैं जहां होना सिर्फ हम समझ पाते हैं । इस तरह लगातार दो दुनियाओं में जीते हैं जो होने और दिखने के अंतर के बीच मौजूद होती है —

           मैं तुम्हारे संगीत में नहीं अपने रुदन में था

          रुदन की हिचकियों में

          और कहीं अबोली शिकायतों में था

          मैं वहां-वहां था

         जहां हो सकने की स्वीकार्यताएं थी

         पर मैं अस्वीकार्यता में था…

मन के वे एकांत कोने, जहां हम अपने खालिस भरेपन के साथ होते हैं, जहां से हम दुनिया को उसके नग्न रूप में समझ रहे होते हैं तब अस्वीकार्यतायें हमारी ताकत बन जाती हैं दुनियादारी से भरी स्वीकार्यताओं के खिलाफ।

         वीरू सोनकर की कविता किसी राजनीतिक वाद से नहीं जन्मी है बल्कि उनकी कविता वैसी है जैसे रास्ते में हम चल रहे होते हैं और साथ वह सब कुछ अपने आप जुड़ता चलता है जो हमारी संवेदनशील अवलोकन की खिड़की से हमारे अवचेतन में बीज की तरह पहुंचता है और फिर बेचैनी के साथ आकार लेता है।

ये कवि उन धरातलों को दरका रहे हैं जो ऊपर से हमें समतल दिखाई देने लगे थे पर नीचे गजबजाती धरती थी।भरोसा किया जा सकता है साहित्यिक गुटबंदी को ये कवि तोड़ेंगे और एक नई जमीन तैयार करेंगे।

हर कवि की अपनी संरचना होती है जो उसकी गहन आंतरिकता से निकलती है तब कवि कविता करता नहीं है कविता होती है जो उसकी सहज अनुभूति से गहरे आब्ध्ध होती है इस तरह कविता का संबंध हमारे गहन अंतस्थल से है जो गहरी मानवी आकांक्षाओं से जन्म लेती है और हमारा रूपांतरण करती है तब कहीं जाकर बाहरी सरोकारों तक पहुंचती है।

कविता करना और कविता होने का अंतर इन कवियों की कविताओं में मिट सा जाता है अतः प्रज्ञ, स्वतः स्फूर्त, सतत प्रवाह नदी सा…। वैयतिक्ता से उद्भूत परंतु  एक हद तक वेयतिक्ता से मुक्ति की संभावनाएं इनमें दिखाई दे रही हैं.. समय की लहर लहर को आत्मसात करती कविता। शास्त्रीय शब्दावली में कहा जाए तो भाव और विभाव का संवेदनात्मक चित्रण ।

यह जो सृजन प्रक्रिया है इसके क्षण निराले होते हैं गहरे भावबोध से भरे हुए आनंद के क्षण… जहां पीड़ा और अवसाद भी सृजनात्मकआनंद की अनुभूति कराते हैं यह एकात्म भाव कवि से बेहद ईमानदारी और आग्रह पूर्ण एकाग्रता की मांग करता है वरना एक बार यदि सांस उखड़ी तो कविता की सांस भी उखड़ जाती है।

   विहाग वैभव की कविताएं पढ़ने के बाद लगा यह युवा जो कह रहा है वह वैसा नहीं है जो अमूमन अभी तक हम सुनते पढ़ते आए हैं बल्कि कुछ अलग है कुछ जुदा सा है पर यह जुदा होना किसी अवतरण चिन्ह में लिखी विशिष्ट उक्ति के समान नहीं है बल्कि ये अलग होना जीवन को भिन्न नजरिए से देखना है और महसूस करने की तरह था। जो अपनी ओर आकर्षित भर नहीं करता बल्कि अपने आप में बांधे रखता है क्रम से इनकी कविताएं पढ़ते गये और ये धीरे-धीरे हमारे  अंदर जगह बनाते  गए। विहाग की कविता, मां का सिंगारदान, मैं पढ़ रही थी पर पाठक की तरह नहीं बल्कि उसे पढ़ते हुए अपने आप कभी मां की तरह हो गई तो कभी मां के साथ हो गई और पढ़ते हुए पता नहीं कब मेरी आंखें नम हो गई —

               हमने मां को थकते हुए देखा

               थक कर बीमार पड़ते हुए देखा है

               पर मां को हमने

               कभी रोते नहीं देखा

               हमने मां को कभी जवान नहीं देखा

               बूढ़ी तो बिल्कुल नहीं

               ……………..

               मेरी दवाइयों के डिब्बे में

               सिमट कर रह गया

              मां का सिंगारदान

कविता पराएपन को खत्म करती है जहां से परायापन खत्म होता है वहां से संवेदना के गहरे तार जुड़ जाते हैं पाठक और कवि के बीच। विहाग अपने में सिमटे हुए से कवि होने का आभास देते हैं पर उनकी कविता जीवन के बहुत बड़े हिस्से को समेटे हुए है । विहाग अपने शोक को भी, अपने गुस्से को भी ऐसा रचते हैं कि वह आपका अपना हो जाता है, फिर चाहे वह, आझोती जारी है, हो, तलवारों का शोक गीत हो या आखिर कुछ नहीं कविता हो।

तलवारों का शोक गीत कविता,युद्धों की छद्म बाध्यता को पीठ पर ढोते हुए राष्ट्रों की कविता है जहां युद्ध, मानवीय समाज का एक निर्मम विकल्प बना दिया जाता है, जब युद्ध को सुरक्षा के एकमात्र  हल की तरह सत्ताएं प्रस्तुत करती हैं–

       तलवारों ने याद किया

       कैसे उस वीर योद्धा के सीने से खून

       धुले हुए सिंदूर की तरह बह निकला था 

       छलक-छलक

       और योद्धा की आंखों में दौड़ गई थी

       कोई सात -आठ साल की खुश

       बाहें फैलाए,दौड़ती,

        पास आती हुई लड़की

       दोनों तलवारों ने

       विनाश की यंत्रणा लिए

       याद किया सिसकते हुए…।

यह युद्ध की यंत्रणा के बीच संभावना से भरी कविता है ये, हिंसक रक्त रंजित भूमि से जीवन की ओर लौटाने वाली कविता है एक अलग कलेवर की कविता, जो सीधे-सीधे बात करती है कहीं कोई अबूझता नहीं कि जिसे बार-बार कई बार पढ़ने की जरूरत पड़े, बल्कि एक बार पढ़ते ही कविता मनोजगत का हिस्सा बन जाती है। युद्ध किस कदर अमानवीय दुनिया को रचते हैं सत्ताओं की महत्वाकांक्षाओं को ढोते सैनिक…। परंतु खास बात ये है कि कविता मे सैनिक नहीं सैनिक की बात  हथियार कर रहे हैं आपात मृत्यु के क्षणों में जीवन के जरिए युद्धों की व्यर्थता को उनकी निर्ममता को कविता कहती है जो आज का सबसे प्रासंगिक सवाल है।

          औरतों के साथ बरती जा रही हिंसायें यह बताती हैं कि हम कितने अशिक्षित और पिछड़े समय में रह रहे हैं।स्त्री कैसी दुनिया चाहती है?  कैसा साथ चाहती है? यह अभी भी समाज के सामने अनुत्तरित  है। आजादी कैसी? कितनी और किस से? यह प्रश्न बहुत बड़े और संजीदा है जिसके इर्द-गिर्द स्त्रियां घूम रही हैं। स्त्रियों के हस्तक्षेप और उनकी मौजूदगी हर स्तर पर दर्ज हो रही है, यह अलग बात है कि हम अभी भी पुराने औजारों को रंग रोगन कर,धो-पोंछ कर  आजमा रहे हैं। भविष्य के टूल्स क्या होंगे? और क्या होना चाहिए? अभी भी धुंधलके में है। इन कवियों की कविताएं इन बेचैनियों को रेखांकित करती हैं ।यह कविताएं शोर नहीं मचाती परंतु मन के अंदर बेचैनी भर देती हैं विहाग की एक और कविता का कुछ अंश पढ़िए —

         लोना आवाब को था कहना कुसुमकुमार से  

         यह सब

         जैसे गौरैया फुदक -फुदक कहती है माटी से

         जैसे बादल टपक- टपक कहता है धरतीसे

         जैसे पराग निचुड़-निचुड़ कहता है तितली से

         हां ठीक मुझे भी प्रेम है तुमसे

         बिलकुल वैसा ही उतना ही

        अकूत ,अनंत ,अथाह, अपरिमित…।

यह स्त्री मन की कविता है जो प्यार और परवाह की एक छोटी स्नेह से भरी दुनिया को अपने अंदर बुनती है उतनी ही पवित्र दुनिया जितनी गौरैया और मिट्टी की, जितनी बादल और धरती की । मैं कविता पढ़ती गई.. अपने आप के और और निकट पहुंचती गई ।थोड़ा समय लगा उससे उबरने में…..। अकस्मात यह ख्याल आया की एक पुरुष मेरी बात इतनी साफ और गहराई से कैसे कह सकता है? मेरा राजनीतिक विमर्श जागा क्या कविता की संवेदनात्मकता में कवि की निजी प्रतिबद्धताये  शामिल होती हैं? मन ने कहीं चाहा कि काश ये द्वैतता इन कवियों में न हो, जैसी की तथाकथित प्रगतिशील कवियों में अक्सर दिखाई देती है कहिनी और करनी में ।

       अदनान कफील की कविता भी प्रेम के एकांत  में जीवन का विस्तार होते देखने वाली कविता है —

          जब मैंने तुमसे प्रेम किया

          तब मैंने जाना

         की मेरे आस – पास  की दुनिया

         कितनी विस्तृत है

         मैंने हवा को खिलखिलाते देखा

         मैंने फूलों को मुस्कुराते देखा

         मैंने पहाड़ों को बतियाते दिखा

         ……………

         मैंने जाना कि आस-पास कितना कुछ है..।

प्यार हमेशा से कविता की मूल अनुभूति रहा है परंतु आज के युवा कवि  प्यार को जिस  ज़िद के साथ व्यक्त करते हैं वह रूहानी प्यार नहीं है बल्कि साक्षात दुनिया की तमाम ऊंच-नीच, सीमाओं, आचार संहिता के बीच गसा हुआ प्यार है जहां समर्पण नहीं है मित्रता है, एक बराबरी का भाव है, दो समकक्षों के बीच स्नेह सूत्र हैं जो विरह की विरुदावली से नहीं एक साथ होने की गहरी आकांक्षा से भरा हुआ है वैसे ही जैसे धरती पानी को सोख लेती है एक लय में अपने अंदर …..

       एक दिन मैं उतर आऊंगा

       अपनी ऊंचाइयों से

       पानी की तरह

       तुम्हारे समतल में

       फैल जाऊंगा एकदिन….।

यह कविता एक आश्वस्ति है की धरती पर प्रेम है अभी.. इससे खूबसूरत बात क्या हो सकती है।

साझी विरासत को आगे बढ़ाने वाला युवा कवियों का ये हिरावल दस्ता तमाम धार्मिक जड़ताओं  के बीच सेतु की तरह उपस्थित है।

बच्चों पर मंगलेश डबराल,चंद्रकांत देवताले,इब्बार रब्बी ने भी मार्मिक कविताएं लिखीं जो दमित समाज के साथ चल रहे बच्चों,भूख के साथ जीते बच्चों की बात कहती हैं परंतु अदनान हिंसा के खिलाफ बचपन को खड़ा करते हैं अबोध मन की पवित्रताओ को क्रूरताओं के सामने खड़ा करते हैं, जो मुझे लगता है यथास्थिति से आगे की कविता है।मेरी दुनिया के तमाम बच्चे —

                देखना वो तुम्हारी टैंकों में बालू भर देंगे

                और तुम्हारी बंदूकों को

                मिट्टी में गहरा दबा देंगे

              वो सड़क पर गड्ढे खोदेंगे

              और पानी भर देंगे

              और पानियों में छपा छप लोटेंगे…

              वो प्यार करेंगे उन सब से

          जिससे तुमने उन्हें नफरत करना सिखाया..।

     ये लिखते हुए अदनान दुनिया की उस हिंसक सोच के सामने खड़े होते हैं जिसने मनुष्य -मनुष्य के बीच भेद खड़ा किया, उन जहरीले इरादों को प्रश्नकित करते हैं जिनके चलते खुबसूरत धरती का गीत नफरतों में बदल गया है। पूंजीवादी सोच की मौका परस्ती और नफे नुकसान की संकीर्ण दुनिया को भी ये अपनी कविता की विषयवस्तु बनाते हैं और भूमंडलीकरण से बनी साम्राज्यवादी फासीवादी सोच तक भी पहुंचते हैं।

इन नौजवानों की कविता मनुष्य की तरफ खड़ा होना सिखाती है। इनकी कविताएं उदासी की कविताएं हैं परंतु निराशा में नहीं डुबोती, यह घुटन और नाराजगी की कविताएं हैं परंतु संभावना को खत्म करने वाली नहीं है ।

     कविता  बाह्यजगत से तब जुड़ती है जब वह कवि के अंतरजगत से गहरे गुजरती है कविता का संबंध अंतःस्थल से है पर यह अंतःस्थल वह आध्यात्मिक अंतःस्थल नहीं है जो भौतिक जीवन के खिलाफ खड़ा हो जाता है बल्कि इसका संबंध हमारी गहनतम मानवीय आकांक्षाओं से है जिसमें  हमारा बाह्य जगत भी शामिल होता है इस तरह कविता मानवीय सरोकारों का विस्तार करती है जो अंतःजगत की यात्रा से गुजर कर ही संभव होता है आध्यात्मिकता और जगत का यह द्वंद कविता की संवेदनशीलता को और गहरा कर देता है कवि के अंदर आभ्यंतरीकरण के बाह्यकरण की प्रक्रिया सतत जारी रहती है जो कभी सामंजस्य के रूप में व्यक्त होता है तो कभी द्वंद में, आज का कवि इस द्वंद को  अनुभव कर रहा है। कभी तल्खी, कुछ शिकायत ,कुछ नाराजगी के साथ उन पारंपरिक मूल्यों पर चोट कर रहा है जिनके चलते आजादी कटघरे में खड़ी दिखाई देती है। अब जिस कवि की चर्चा हम करना चाहते हैं उसकी तल्खी और तेवर कविता को किताब से निकाल कर सड़क पर खड़ा कर रहे हैं एक संवाद की तरह, एक मुलाकात की तरह, सड़क पर चल रहे हर एक आदमी से..

      इनकी कविता पद्यभासी है जो गद्य में लिखी गई है जिसकी अपनी लयात्मकता होती है परंतु गणितीय छंद विधान से मुक्त;पितृसत्ता को, फासीवादी सोच को, बेखौफ चुनौती देती सबिका अब्बास नकवी की कविताएं है..। वह अपनी कविता को विशिष्ट वर्ग के बीच ना तो सीमित करना चाहती हैं और ना अपना एक विशिष्ट वर्ग बनाना चाहती हैं सबीका की कविता रोमांटिक कविता नहीं है परंतु उन कविताओं में जीवन के प्रति भरी रागात्मकता उन्हें नए संदर्भों में रोमांटिक बना देती है जिन्हें सुनते हुए हम अपने अंदर एक खिंचाव महसूस करते हैं कविता को पूरा सुनने का…।

     सबिका की ‘साड़ी’ कविता,उल्लेखनीय है; साड़ी जिसे औरत के सांस्कृतिक पहनावे की तरह सामंती समाज ने तय किया,नारीवाद साड़ी को असुविधाजनक ,असुरक्षित,देह आकर्षण के प्रतीक के रूप में देखता है जिसे पहन कर औरते नौ गज के गोल घेरे में बंध जाती हैं जो किसी भी मेहनत करने वाली ,काम करने वाली औरत के लिए किसी भी तरह सुरक्षित और सुविधाजनक नही कही जा सकती परंतु सबिका साड़ी के पल्लू को परचम की तरह लहराना चाहती हैं  उसे धरती का बिछावन और सिर पर साए की तरह ओढ़ना चाहती हैं —

     मेरी साड़ी वो आशियाना है जिसे

     तुम आसमान कहते हो

     मेरी साड़ी ही तो वो जमीन है

     जिस फर्श पर तुम रहते हो..

     ये साड़ी वो नदी है की लहर है

     जिस पर हम इश्क की नाव चलाते हैं

     इसी साड़ी से हम फासीवाद को फांसी लगाते हैं

     ….

     इस साड़ी पर तुमने बहुत छेद बनाए हैं

     …

     लेकिन हम भी बेहतरीन रफूगर है

     ….

     तुमने जहां से जातिवाद की कैंची लगाई थी

     उस पर मैंने सावित्री फुले की साड़ी का

     बेहतरीन टुकड़ा सिल दिया है…।

कविता मैं वास्तविक जीवन का जितना व्यापक फलक होगा जीवन अनुभव जितनी सघनता और तीव्रता से व्यक्त होंगे, उत्पीड़ित की तरफ खड़ा रचनाकार मनुष्यता से जितने गहराई से एकात्म होगा कविता या किसी भी कला की सृष्टि भी वैसी ही होगी। आज का कवि इस सेधान्तिकी को अपनी शर्तों पर,अपनी लय के साथ सिर्फ स्पर्श करके गुजर नहीं रहा बल्कि अनहद नाद की तरह कविता में उतार रहा है —

        हमारी हिम्मतें हमें विरासत में मिली हैं

        है जमाने ने देखो मोहब्बत हमी से की है

        हैं पलकों पर अपनी फलक को उठाए

        हथेली पर हम जहां को सजाएं

        कि सूरज को मिलती है शिद्दत हमीं से

        ………

        है चौड़ी छातियों को मुसीबत हमीं से

        पल्लू से मेरे यह परचम बने हैं

        बैनर लगे हैं यह झंडे गड़े हैं…..

खासबात ये है कि सबिका की कविता राजनीतिक कविता है पर वो नारा नहीं है उसमे गुस्सा है पर वो गुस्सा संवेदना के रास्ते पाठक या श्रोता के अंदर घर कर जाता है जो सवाल उठाता है जो उसकी आत्मा का सहचर बन जाता है। सबिका कविता सुनाते हुए इतनी ज्यादा सहज होती हैं की वो सहजता असहज लगने लगती है कभी कभी ओढ़ी हुई सी,पर ये उनका अपना कलेवर है इस से उनकी कविता के मर्म पर असर नहीं पड़ता उसकी आंतरिक बुनावट उतनी ही महीन बनी रहती है।

सबिका वास्तव में जनमंच पर ,सैकड़ों की भीड़ में हर एक से बात करने वाली कवि हैं उनकी कविताओं को एकांत कोने में बैठ कर पढ़ा नही जा सकता और अगर पढ़ा भी जाए तो एकांत कोने में ज्यादा देर ये कविताएं ठहरने नहीं देंगी।

क्योंकि ये हमारे अंदर सवाल उठाती हैं जो हमे बेचैन करते हैं जिन्हें व्यक्तिगत स्तर पर हल नहीं किया जा सकता जाहिर है ये आंदोलित करने वाली कविताएं हैं जो समय से मुखातिब होने का  ज़िद भरा आग्रह करती हैं।एक लड़की का ये , गुस्से से भरा रचनात्मक और निर्भीक संसार है।

          कविता संवेदना से बनती है, कविता मन को आघात देने वाले अनुभवों से बनती है आप कह सकते हैं कि राजनीतिक सोच की उथलाहट कविता के मर्म को खंडित करती है परंतु जब पूरा कालखंड, पूरा समय उस गलीज राजनीति के नाम ही लिख दिया गया हो तब कविता उससे अछूती कैसे रह सकती है? हम राजनीति से मुक्त अपने आप को यदि मानते हैं तो यह एक कोरा झूठ होगा। इस अर्थ में ये कविता राजनीतिक है कि हम राजनीति को बनाते हैं राजनीति हमे नही। ना तो कविता कोमलकांत पदावली है सिर्फ, ना ही तुकांत की गठजोड़ है। कविता मन के महीन तारों की गहरी संवेदनात्मक अभिव्यक्ति है। इस पृष्ठभूमि में जसिंता केरकेट्टा की कविता को पढ़ा जाना चाहिए,उनकी कविता पढ़ते हुए  मुझे लगा जैसे वह कह रही हो औरत हैं तो सिर्फ औरत की यंत्रणाओं को ही नहीं लिखेंगे बल्कि हर उस निष्ठुरता, हर उस बदमिजाजी पर लिखेंगे जिससे न सिर्फ औरत  बल्कि हाशिए का हर आदमी गुजरता है ।परिवारों बल्कि यह कहना ज्यादा ठीक होगा कि पूरी सामाजिक संरचना, वैधानिक संरचना और राजनीतिक संरचना पर जिस तरह पितृसत्ता पसरी पड़ी है उनसे जसिंता कभी सीधे तो कभी परोक्ष रूप से मोर्चा लेते दिखाई देती है ।इस विद्रूप समय में जब स्त्रियां आजादी के छद्म को बाजार में जी रही  हैं और ढूंढ रही हैं उस चमकीली दुनिया में अपने लिए एक आर्द्र कोना उस औरत के समानांतर एक घरेलू औरत है जो देहरी के अंदर है परंतु दोनों के सच थोड़े किंतु परंतु के साथ लगभग एक से हैं।  जसिंता केरकेट्टा इससे इतर स्त्री के माध्यम से पर्यावरण के सवाल उठाती हैं बाजारवाद के सवाल उठाती हैं सत्ताओं की कुरूपता के सवाल उठाती हैं और हमारे अवचेतन में जमे बैठे जाति और राष्ट्रवाद को प्रश्नांकित करती हैं —

          नन्ही दौड़ पड़ी हम आ गए बाजार!

          क्या-क्या लेना है ?पूछने लगा-दुकानदार

          भैया, थोड़ी बारिश, थोड़ी गीली मिट्टी

         एक बोतल नदी, वह डिब्बाबंद पहाड़

         उधर दीवार पर टंगी एक प्रकृति भी दे दो

         और यह बारिश इतनी महंगी क्यों

 दुकानदार बोला- यह नमी यहां कि नहीं!!

प्रकृति की तरफ पीठ किए पूंजीवादी समाज के सामने प्रश्न करती संवेदनात्मक कविता है ये, ये कविता तंज है विकसित दुनिया पर।

  सीधी सरलता से कही गई संजीदा बात कोई बिंब विधान नहीं, कोई छंद का गान नहीं परंतु कविता की ये तीक्ष्ण अंतर्वस्तु, आज के सबसे जीवंत प्रश्न उठा रही हैं, बाजार के चमकीलेपन में छुपी मानवीय संभावनाएं..।

 जसिंता जिन प्रश्नों को उठा रही हैं वह नए नहीं है न ही पहली बार उठे हैं उनकी खासियत उनकी साधारण अभिव्यक्ति है जो उनके गहन कथ्य को असाधारण बनाती है काव्य विषय जब कविता की अन्तरवस्तु बनते हैं तो वह रचनाकार के मनोंमय  अभ्यांतरीकरण को व्यक्त करते हैं।

        जब मेरा पड़ोसी

        मेरे खून का प्यासा हो गया

        मैं समझ गया

        राष्ट्रवाद आ गया..

  जसिंता की कविता कोमल कविता नहीं है उनकी कविता विकल करने वाली कविता है जो बिना किसी सजधज के हमारे अंतर्मन तक सीधे पहुंचती है उसका अपना कलेवर है जो पाठक को आसक्त करता और शर्मनाक हालातों के प्रति अंदर कुढ़न पैदा करती है और सीधे अपने आप के सम्मुख खड़ा कर देती है।

 कवि के समानांतर चलती दुनिया या दुनिया के समानांतर चलता कवि, जिससे उसका चेतन अचेतन लगातार टकराता है यह टकराना ही कवि का आत्म संघर्ष है जो उसका मीठा और कभी बेहद बेचैन करने वाला एकांत होता है। दुनियावी प्रपंच से दूर सृजन के क्षणों में जसिंता आज के सबसे निर्मम सत्यों से साक्षात करती है।

  कोई सैद्धांतिकी नहीं, विचारों का कोई घना संजाल नहीं जो किसी विशिष्ट विचारधारा से बना हो परंतु इन कविताओं में तनाव के बौखलाए हुए संवेदनात्मक स्फुरण दिखाई देते हैं विचारों का आरोपण कहीं नहीं। अनुभूति भरी ईमानदार कविता:-

            ओ शहर

छोड़ कर अपना घर,पुआल मिट्टी और खपरे

पूछते हैं  अक्सर

 ओ शहर!

 क्या तुम कभी उजड़ेते हो

 किसी विकास के नाम पर?

  इन कवियों की कविताओं के साथ कभी- कभी ऐसा अनुभव हुआ जैसे आप किसी यात्रा में हो और आपके साथ बैठा कोई मुसाफिर आप से लगातार बात कर रहा हो और आप अनसुनी करते-करते कब उसकी बातें सुनने लगे हैं और उसमें डूब जाए पता ही ना चले।

 मानवीय संभावनाओं के अंतःस्फोट आज की कविता में सुनाई दे रहे हैं तभी कविता इतिहास बनती है अन्यथा पानी के बुलबुले की तरह लुप्त हो जाती है। यह सब कवि साबिका की तर्ज पर सड़क तक पहुंच लोगों से सीधा संवाद करने खड़े हो जाएं तो इस से बड़ी क्रांति क्या होगी?

 लेखक का परिचय –   भारती वत्स                              
bhartivts@mail.com    

मनोसांकृतिक संरचना एवं हिंसा का अंतरसंबंध : हेजेमोनी और दलित स्त्री

किसी भी हिंसक घटना की पृष्टभूमि में उसके मनोसांस्कृतिक आधार का महत्वपूर्ण स्थान होता है ।बिना मानसिक तैयारी के कोई भी हिंसक विचार आकार नहीं ले सकता।हिंसक प्रवृत्ति के लिए लंबे समय तक सामाजिक स्वीकृति का होना अनिवार्य होता है ।यह स्वीकृति ही वर्तमान समय में भीड़ द्वारा हिंसा किए जाने की मनोसांस्कृतिक संरचना का निर्माण कर रही है ।

वर्चस्व के लिए की गयी हिंसा कोई एकाएक घटने वाली परिघटना नहीं है ऐसी घटनाएं पहले भी घटती रहीं हैं लेकिन उसका स्वरूप छोटा था और उसका मीडिया में खबर बनना और निंदा करने का चलन नहीं था क्योंकि यह मान्य कर ली गई हिंसा के श्रेणी में आती थी । विशेष समुदाय पर सुनियोजित हिंसा और खासकर अपराध के सामाजशास्त्र में महिलाएं आसानी से मान्य कर ली गई कोई व्यक्तिनुमा वस्तु ही थी । महिलाएं, विशेष रूप से दमित वर्ग की महिलाएं परंपरागत हिंसा के लिए चुनी गई गुलाम रहीं हैं जिसे न तो दमित वर्ग के पुरुषों से कोई मनोबल मिलता है और ना ही उसके शोषक वर्ग की महिला से । उसके विरुद्ध हिंसा की लड़ाई में कई बार वह अकेली ही दिखाई देती है तब भी जब वह शोषित हो रही होती है और तब भी जब वह न्याय मांग रही होती है । इस पृष्टभूमि को हम निम्न प्रश्नों द्वारा स्पष्ट करने का प्रयत्न करेंगे-

  • दलित महिलाओं के विरुद्ध हिंसा और मनोसंस्कृतिक संरचना का क्या संबंध है ?
  • वर्तमान समय में वर्चस्व वादी जातियों द्वारा किन माध्यमों से हिंसा का मनोशस्त्र गढ़ा जा रहा है ?

और बृहद समाज का ध्यान हिंसा के मनोशस्त्र के बनने के पीछे मनोसंस्कृतिक हिंसा कैसे कम करती है,  जो नेपथ्य में काम करती है उस हिंसा को उजागर करना इस लेख का उद्देश्य है ।

मनोसांस्कृतिक संरचना का पुनर्निर्माण :

पिछले कुछ सालों से भारत की प्रभुत्व वाली जातियों के लोगों द्वारा विभिन्न माध्यमों से उनके अपने वर्चस्व को यथास्थिति में बनाए रखने के लिए हिंसा को एक प्रमुख हथियार बनाए जाने के कई मामले सामने आए हैं । हिंसा के सूक्ष्म स्वरूपों की पड़ताल किए बिना भौतिक हिंसा की प्रकृति की आधी-अधूरी समझ ही विकसित हो पाती है । बलात्कार जैसी दृश्य हिंसाओं को ज़्यादा महत्व देने के कारण इसके नेपथ्य में काम कर रहीं हिंसाओं को कमतर देखा जाता है । यह 70 और 80 के दशक के महिला आंदोलन द्वारा कुछ खास हिंसक घटनाओं को आंदोलन के रूप में चुने जाने के कारण हुआ, जिससे परिवार में हो रही जातीय संरचनात्मक हिंसा की अनदेखी की गई । जेण्डर की हिंसा को बहस के केंद्र में रखे जाने के कारण प्रतिदिन की जाने वाली हिंसा जो कि संरचना में रची-बसी है वह हिंसा की परिभाषा की परिधि से दूर हो गई । भारत में वर्चस्व को बनाए रखने के लिए जाति एक ऐसा सशक्त साधन है जिससे स्वयं नारीवादियों, समाजवादियों तथा स्वायत्त महिला संगठनों से भी इसकी परतों में जाकर इसकी विवेचना करने से चूक हो गयी । जिससे हुआ यह कि [1]पूरे भारत में चल रहे महिला आंदोलन जाति के मुद्दों पर असंवेदनशील दिखायी दिए क्योंकि समकालीन दलित महिलाओं पर हो रही शारीरिक और मानसिक हिंसा पर वें सभी चुप रहे । 70 के दशक में चल रहे दलित संगठनों द्वारा जो मुख्यतः उग्र स्वरूप के थे उन्होंने भी दलित महिलाओं पर हो रही शारीरिक हिंसाओं पर तो आंदोलन किए जो जातिगत हिंसा की श्रेणी में भी आते थे लेकिन अपनी महिला के प्रति वें स्वतः निष्ठुर रहे और उन्होंने अपने परिवार में दलित महिलाओं पर दलित पुरुषों द्वारा की जा रही शारीरिक व मानसिक हिंसा की निंदा भी नहीं की । उनके मुद्दे केवल स्त्री शिक्षा, उन्हें जाति के बंधन और कर्मकांड से मुक्त करने तक ही सीमित रहे ।वर्तमान में भी दलित महिलाओं की मानसिक हिंसा जो सामाजिक संरचना में वर्चस्व के सिद्धांत माध्यम से  प्रभुत्व शाली जातियों द्वारा की जाति है उस पर कम ही बात होती है ।

21 जून 2018 UDHR (मानवाधिकार की सार्वभौमिक घोषणा 1948) की 76 वीं वर्षगांठ पर जिनेवा में आयोजित ‘संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद’ के 38 वें सत्र में [2]‘ऑल इंडिया दलित महिला अधिकार मंच’ ने भारत में दलित महिलाओं द्वारा झेली जा रही जाति आधारित हिंसा से जुड़ी रिपोर्ट व वीडियो जारी किया, जिसमें भारत में दलित महिलाओं के विरुद्ध हो रही हिंसा के मुद्दे को चर्चा का विषय बनाया । उनका कहना है कि इस रिपोर्ट को पेश करने का उनका उद्देश्य यह है कि जाति आधारित हिंसा की समस्या से लड़ने के लिये सही नीति और क्रियान्वयन से जुड़े सुझावों को संयुक्त राष्ट्र के भीतर और बाहर खोजना और इस दिशा में अंतराष्ट्रीय स्तर पर साझेदारी बनाना था |  इस परिषद के 38 वें सत्र में ‘जातिगत बर्बरता के विरुद्ध आवाजें : भारत में दलित महिलाओं की कहानियां’ शीर्षक से जारी इस रिपोर्ट में खुले तौर पर इस बात की चर्चा की गयी है कि किस तरह मोदी सरकार में दलित महिलाओं को अत्यंत क्रूर हिंसा और दोषियों की सुरक्षा के लिए अधिकारियों के बीच मिलीभगत की विशेष संस्कृति का सामना करना पड़ रहा है | इस  रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि भारत के विभिन्न राज्य जैसे बिहार, हरियाणा, उड़ीसा और महाराष्ट्र में दलित महिलाओं के साथ होने वाली घटनाओं के मामलों में पुलिस प्रशासन की कारवाई में ढिलाई तथा जातिगत भेदभाव के खिलाफ वें अपना प्रतिरोध भी दर्ज कराती है |

सामाजिक स्तरीकरण की व्यवस्था में प्रतीकात्मक हिंसा वर्चस्वशाली जातियों द्वारा इस व्यवस्था से आरोपित की जाती है जैसे कभी-कभी यह तानाशाही न होकर प्राकृतिक लगने लगती है । यह कई बार शोषितों द्वारा स्वतः अपने अधिकार को छोड़े जाने और अपने अस्तित्व को नकारे जाने से भी लक्षित होता है । इस प्रकार की हिंसा की पृष्ठभूमि में शारीरिक हिंसा होती है । लेकिन यह हिंसा दैनंदिन जीवन की छोटी-छोटी घटनाओं में न सिर्फ साधारणतः स्वीकार कर ली जाती है बल्कि बेदभाव और शोषण की भी पुनरावृत्ति होती है । शोषितों द्वारा इसे स्वतः मौन स्वीकृति दे दी जाती है ।

[3]इटली के प्रसिद्ध समाजवादी अंटोनिओ ग्रामसी ने सत्ता के वर्चस्व के पीछे सांकृतिक तथा विचारधारात्मक रणनीति का होना आवश्यक तत्व के रूप में मान्य किया है । शोषित की सहमति के बिना सांस्कृति और ज्ञान का वर्चस्व जिससे हिंसा की जड़े मजबूती से जमायी जाती हैं वह स्थापित नहीं हो सकता । वें बताते है कि “आर्थिक केंद्रीयता सांस्कृतिक, नैतिक, वैचारिक वर्चस्व का निर्माण करती है और इसे कमजोर तबकों पर आरोपित करती है । यह मात्र राजनीतिक वर्चस्व के कारण ही नहीं होता इसके लिए आर्थिक गैरबराबरी आवश्यक है । इसीलिए यह ‘जबरदस्ती’ और ‘सहमति’ के बीच की बराबरी पर ध्यान देता है” । वर्चस्ववादी और दबंग वर्ग वैचारिक तथा सचेतन बुद्धि से शोषण करता है यह शोषण व्यावहारिक हिंसा को नहीं वरन वैचारिक हिंसा की ओर अग्रसर होता है ।

‘जिस काल में अमरीका जैसे देश में बलात्कार जैसी हिंसाओं के विरोध में प्रदर्शन किए जा रहे थे और अश्वेत नारीवादियों द्वारा अश्वेत महिलाओं के विरुद्ध व्यावहारिक और सांकेतिक हिंसा के रूपों को पहचान कर अपने अस्तित्व के लिए आंदोलन किए जा रहे थे ठीक उससे पहले यह काम भारत में किया जा चुका था’ ।[4] 1972 में महाराष्ट्र राज्य के नागपुर में बलात्कार पर पहली बार भव्य मुक विरोध प्रदर्शन किया गया यह अपने समय का पहला ऐसा मुक मोर्चा था जिसमें शोषित समुदाय की महिला की यौनिक स्वतंत्रता और उसे अपमानित किए जाने के बीच के फर्क को रेखांकित किया गया और लोगों के मानस में इस हिंसा की गंभीरता को मुखरता से स्पष्ट किया गया । ‘1975 में स्यूजन ब्राउनमिलर ने अपनी पुस्तक, ‘अगेन्स्ट अवर वील’ के माध्यम से पहली बार बलात्कार जैसी समस्या पर दुनिया का ध्यान खिंचा तथा इस हिंसा की गंभीरता पर प्रकाश डाला और समाज में स्त्री की शोषित अवस्था से सभी को अवगत कराया । ब्राउन मिलर के अनुसार “बलात्कार मूलतः राजनीतिक प्रक्रिया है और बलात्कार कामुक उत्तेजना से प्रेरित नहीं होता बल्कि राजनीतिक कारणों से प्रेरित होता है यानि वह पुरुष शक्ती की स्थापना और स्त्री-अधीनीकरण के विचार को संप्रेषित करता है’ ।[5] भारतीय संदर्भ में वर्चस्व की पुनरावृत्ति शारीरिक और मानसिक अधीनीकरण की प्रक्रिया के द्वारा दलित महिलाओं पर निरंतर हिंसक यौनिक हमलों के माध्यम से की जा रही है जो लंबी जातिगत घृणा का परिणाम होती है । यह हिंसक हमले किसी भी दमित समुदाय को निरंतर दासता की स्थिति में रखने के लिए उस समुदाय की महिला के विरुद्ध किए जाते रहे है जिससे उनके भीतर दमित मानसिकता की संरचना का पुनर्निर्माण होता रहे ।

बदलते समय के साथ हिंसा के रूप भी बदले हैं जैसे भीड़ द्वारा की गयी हिंसा और उस हिंसा का सामान्यीकरण करना, शिक्षा के क्षेत्रों में छात्र-छात्राओं पर हिंसक हमले, बलात्कारियों के पक्ष में निकाले गए मोर्चे, नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो द्वारा जारी आंकड़ों में महिलाओं की सुरक्षा पर चिंताजनक स्थिति, नेताओं द्वारा दिये गए बयान जिसमें महिलाओं को उनके विरुद्ध की गयी हिंसा के लिए जिम्मेदार बताना जैसे, [6]‘रेप इंडिया में होते हैं भारत में नहीं’, धारा 370 के हटने के बाद हिंसा की खुली छूट देना जिसमें पुरुष प्रभुत्व को स्वीकृति देते हुए हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर का बयान था कि अब हमारे लड़के वहाँ से लड़कियां ला सकते और हासिल कर सकते हैं । विक्रम सिंग जो मुजफ्फरपुर के एम. एल. ए. है उनके द्वारा कहा जाना कि बीजेपी. कार्यकर्ता वहाँ की गोरी चमड़ी वाली लड़कियों से विवाह करने के लिए उत्सुक है’ । इस तरह के हिंसक बयान के मात्र उच्चारण से ही बड़ी भीड़ को उस प्रतीकात्मक हिंसा का संकेत मिल जाता है । इन बयानों में जो कहा जा रहा है इसका सीधा हिंसक परिणाम गांव की उस दमित जातियों वाली युवतियों की यौनिक स्वतंत्रा पर होता है जो सामूहिक बलात्कार जैसी हिंसा के लिए आसान शिकार बना दी जाती है । जमीनी स्तर की हिंसा जो भौतिक आकार में नजर आती है उसका उपयोग विभिन्न माध्यमों से मानसिक हिंसा जो घृणा की संस्कृति का निर्माण करती उसके लिए जमीन तैयार कर रही होती है ।

आभासी प्रतीकात्मक हिंसा की पृष्टभूमि:

सोशल मीडिया जगत की बात करें तो  [7]‘हिंदु ट्रेड’ नामक एक समूह जो भारत में दलितों के विरुद्ध हिंसक भाषा का उपयोग कर उनके विरुद्ध की जाने वाली अन्य हिंसाओं के मनोशास्त्र को गढ़ता है और एक विशेष जाति समूह के लोगों पर आरोपित करता है तथा हिंसा को सामूहिक सहमति द्वारा अपने जाति समूह में सही घोषित करता है । इस समूह द्वारा जातिसूचक गालियाँ देना, दलितों कों ‘भीमट्या’ कह कर अपमानित करना, और दक्षिणपंथ की सत्ता कों बनाए रखने के लिए आपस में दलितों के विरुद्ध सामूहिक हिंसा के लिए सहमति देना यह सब किया जाता है । इसमें नाज़ियों द्वारा गैस चेंबर में डालकर कर किए गए नरसंहार जैसी हिंसा कों दलितों पर किए जाने की भी सहमति दी जाति है । यह हिंसा इंटरनेट पर  बातचीत का हिस्सा भले ही है लेकिन इस हिंसा की मनोसांस्कृतिक पृष्टभूमि जातिव्यवस्था की विभेदीकरण की राजनीति में तैयार की जाती है । मनोसांस्कृतिक संरचना की हिंसक पुनरावृत्ति इसी तरह के साधनों द्वारा की जा रही है ।

दलितों और उनकी महिलाओं के विरुद्ध हिंसा जैसे उनका अपमान करना, उनके द्वारा की गयी आर्थिक उन्नति और उनके आत्मविश्वास को नष्ट करना, दलित स्त्री की दैहिक स्वतंत्रता को, उनकी यौनिकता को अपनी मर्दानगी के नाम पर नियंत्रित करने के लिए सामूहिक बलात्कार करना और उनकी हर प्रतिरोधी क्षमता को मार-पीट कर दबाना । यह हिंसा के ऐसे रूप है जिन पर बात होती है और लिखा भी जाता है लेकिन इन हिंसाओं ने कैसे पूरी पीढ़ी को मानसिक रूप से तैयार किया जिसमें हिंसा को हिंसा के रूप में देखे जाने के साथ ही जातीय दंभ और इसको शांत करने के लिए अपनायी गयी हिंसा के उत्सव मनाये जाने की संकृति का भी ज्ञोतक बनाया है जिसके घातक परिणाम हम देख चूकें हैं, इस पर बात की जानी जरूरी है ।

[8]उत्तराखंड और रायपुर में हुई धर्म परिषद में मुस्लिम महिलाओं के विरुद्ध लगाए गए हिंसक नारे जिसका तत्काल कोई परिणाम न भी दिखे लेकिन इससे किसी भी हिंसा के लिए  एक तैयार भीड़ का निर्माण किया गया। जो कभी भी किसी ऐसे समुदाय के विरुद्ध मारने-काटने की मासिक तैयारी के साथ आएगी जिससे उनका कोई संबंध भी नहीं होगा । यदि भविष्य में इसी भीड़ द्वारा किसी धार्मिक उन्माद में विशेष जाति समूह और उनकी महिलाओं के विरुद्ध बलात्कार होते हैं, उनकी संपत्ति नष्ट कर दी जाती है, या उनकी पूरी बस्ती को ही आग लगा दी जाती है, तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं होगा कि यह हिंसक भीड़ कहा से आयी थी । इस हिंसा की तैयारी ऐसे ही कट्टरपंथियों द्वारा लंबे समय से कभी धार्मिक मंचों से तो कभी चुनावी मुद्दों में जातीय उन्माद को भड़काने का काम करती है जो नेपथ्य में रहकर बड़े नरसंहार का काम करती दिखायी देती है । राज्य की सत्ता समाज में धर्म की सत्ता के साथ मिलकर वर्चस्व को बनाए रखने का काम करती है इसके केंद्र में दलित महिलाओं के विरुद्ध की जाने वाली हिंसा होती है । यह करने के लिए आवश्यक है कि लोगों के मस्तिष्क में शोषित जातियों के विरुद्ध हिंसक भाषा का उपयोग कर उन्हें उकसाया जाए और उनके द्वारा हिंसा करने की जिम्मेदारी सौपी जाए जो पूर्ण रूप से जायज होगी । ऐसा ही हाथरस की सामूहिक बलात्कार की घटना में देखा गया कि कैसे पुलिस प्रशासन राजनीतिक हस्तक्षेप के कारण मृतक युवती के विरुद्ध काम कर रही थी और बाद के दिनों में सवर्ण समाज के लोगों द्वारा जातीय अस्मिता के नाम पर पंचायत बुलाकर बलात्कारियों को बचाने के लिए, जो उनकी अपनी जाति के थे, सामूहिक सहमति का निर्माण किया गया । ऐसा करना बहुत नया चलन है जो रास्तों पर और सार्वजनिक रूप से बलात्कारियों के पक्ष में जन सहमति बनायी जा रही है । यहां कैसे एक जाति के लोगों द्वारा नीची समझे जाने वाली जाति के लोगों के लिए हिंसा का मनोशास्त्र काम करता है जहां हिंसा में कानून, जातीय दंभ और राज्य के पक्षपाति विचार के आधार पर की गयी राजनीति का अंतरसंबंध देखने को मिलता है । किसी बड़ी हिंसा के किए जाने के पहले की मानसिक तैयारी ही उस हिंसा के घटने की मनोसांकृतिक संरचना का निर्माण करती है । छोटी हिंसाएँ भविष्य में बड़ी हिंसा के लिए कच्ची सामग्री का काम करती है । इस संदर्भ में बात को स्पष्ट करने के लिए कवंल भारती अपने लेख  [9]‘हिंदु हिंसा न भवति’ में कुछ इतिहास के उदाहरण और कुछ वर्तमान से संदर्भ लेकर यह बताते है कि कैसे दलितों के साथ “हिंदुओं की हिंसा उनके समाजशास्त्र का अनिवार्य हिस्सा है”

जो काम जाति व्यवस्था ने पहले से कर रखा है उसे अब धार्मिक आधार पर की गयी राजनीति के माध्यम से राज्य की वे सभी इकाइयां मिलकर कर रही है जिससे जाति के आधार पर एक बृहद तबके को सालों साल शोषित रखा जाए और ब्रम्हणवादी पितृसत्ता का काम जो कि दलित महिला के शोषण को कायम रखना  है, करती हैं । वर्चस्व को दबंग जाति के लोगों द्वारा बनाए रखने के क्रम में मनोसांस्कृतिक संस्कारों के प्रभाव का होना आवश्यक तत्व के रूप में उभरकर आया है । दृश्य हिंसा की परंपरा को लोकतांत्रिक समाज द्वारा नकारे जाने के बाद यह आवश्यक हो गया है कि दमितों की उनके दमन, शोषण के लिए उनसे सहमति ली जाए । और यह सहमति वर्चस्व के विभिन्न माध्यमों (स्कूल) द्वारा प्राप्त करने का कार्य करते है जिसमें मुख्यतः धार्मिक ग्रंथ, सामाजिक परंपराएँ, विश्वविद्यालय, स्थानीय मूल्य, राजनीतिक तथा धनी व्यापारी वर्ग के आर्थिक हित, ज्ञान और विज्ञापन जगत में, सांस्कृतिक जीवन में इन सभी का व्यवहार आदि । वर्चस्ववादी और दबंग वर्ग वैचारिक तथा सचेतन बुद्धि से शोषण करता है यह शोषण व्यावहारिक हिंसा को नहीं वरन् वैचारिक हिंसा की ओर अग्रसर होता है ।

संभावित निष्कर्ष –

सामाजिक स्तरीकरण जो सामाजिक विभेदीकरण की व्यवस्था पर स्थित है जिसमें हिंसक वर्चस्व एक मुख्य साधन है, यह लोगों के दैनंदिन व्यवहार का अंग है जो प्रतीकात्मक हिंसा का प्रस्थंबिंदु है । यह अभिजात्य लोगों द्वारा शोषित पर इस तरह आरोपित कर दिया जाता है कि वह हिंसक वर्चस्व व्यवस्था का एक हिस्सा लगाने लगता है जिसकी स्वीकृति दमित वर्गों में कभी हिंसा के माध्यम से तो कभी हिंसा के सहायक साधनों से भी प्राप्त की जाती है ।

वर्तमान में जातीय वर्चस्व को निरंतर बनाए रखने के क्रम में इंटरनेट जैसे सशक्त माध्यमों का उपयोग एक बलात्कारी, हिंसक भीड़ जिसमें महिलाएं भी शामिल कर ली गयी का निर्माण किया जा रहा है । जिसका उदाहरण हम महाराष्ट्र की खैरलांजी की सामूहिक बलात्कार और हत्या की हिंसा से लेकर हाल-फिलहाल चंद्रपुर में काले जादू का आरोप लगाकर एक ही परिवार के सात सदस्यों को चौराहे पर पीटकर हत्या की, हाथरस में बच्ची के साथ सामूहिक बलात्कार और इसके पक्ष में भौतिक और आभासी साधनों पर जैसे वाट्स ऐप ग्रुप में सहमति तथा हिंसक भाषा का उपयोग तक के हिंसक व्यवहार को देख रहे है । जो लगातार मनोसंस्कृतिक हिंसक संस्कृति की सहमति का निर्माण कर रहे है । जिसमें खासकर दलित समुदाय की महिला और उनके लिए जो आदर्श है डॉ. आंबेडकर को अपमानित करने वाले वाक्य बोले जा रहे है और ऐसा करने वालों की उम्र महज 18 वर्ष से शुरू हो रही है जो भविष्य के दंगाई के रूप में कम करेंगे । इनको ऑनलाइन से ऑफलाइन होने में जरा भी समय नहीं लगेगा । हिंसा में शामिल होकर उस हिंसा का आनंद उठाना एक क्रूर आपराधिक मानसिकता को उजागर करता है जो सामाजिक स्वास्थ को खराब करता है और यह सामाजिक बीमारी ही समाज का विकास अवरुद्ध करती है ।

अशिक्षित, धार्मिक उन्माद में व्यस्त भीड़ हिंसाओं के परिणामों को नहीं देख पाती और यह किस के पक्ष में की जा रही है, इससे किसका फायदा होगा यह सब उनके सोच के परे होता है । हिंसा के मनोशास्त्र में हिंसक प्रवृति का उन्माद आने वाली कई पीढ़ियों को अपना अनुयायी बनाकर रखता है और उस वैचारिक जमीन पर नरसंहारों के बड़े भयानक खेल में उन्हें शामिल किया जाता है । भारतीय संरचना में इसी हिंसक मनोशास्त्रों के पुनर्निर्माण के लिए अब तक की सभी व्यावहारिक और वैचारिक दासता को रोपित किया जाता है इसके बिना हिंसक भीड़ जुटाना संभव ही नहीं क्योंकि घृणा की मानसिकता समय के साथ फीकी भी पड़ जाती है ऐसे में धार्मिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक रणनीति ही उस मनोशास्त्र को पोषित करती है । फिर वह हिंसा हिंसा नहीं लगती जाति की सुरक्षा के लिए अनिवार्य हो जाती है ।

 

संदर्भ ग्रंथ सूची:

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[1] Rege, sharmila.(2018). A Dalit feminist stand point:   https://www.indiaseminar.com/2018/710/710

[2] http://www. twocircle.net/2018jun 23/423873 26/022022 कों देखा गया

[3] http://www.powercube.net/other-forms-of-power/gramsci-and-hegemony/date-29-8-2021

 

[4] Colins, patricia hill. (2002), ‘Black feminist thought’: Routledge publication

[5] बैनर्जी सारदा (2017), ‘बलात्कार-संस्कृति और स्त्रीवाद’, अनामिका पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीबूटर्स(प्रा.) लिमिटेड नई दिल्ली, पेज नं.80 प्यारा, 2

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[8] https://www. bbc./com/hindi/india -59774285

[9] भारती कवंल, संपादक राजकिशोर.(2000). ‘हिंदु हिंसा हिंसा न भवति’, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली p.no,56

शिल्पा भगत, पीएच् .डी. शोधार्थी, स्त्री अध्ययन विभाग, महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा 

प्रधानमंत्री को पत्र लिखना हुआ गुनाह: 6 बहुजन छात्र निष्कासित

जब देश में अख़लाक़, जुनैद, तबरेज और ना जाने कितने नाम हैं तथा झारखण्ड में आदिवासियों को, राजस्थान, असम, छतीसगढ़, उत्तरप्रदेश और देश के कई हिस्सों में गाय के नाम पर हिन्दू संगठनों द्वारा प्रायोजित भीड़ द्वारा हत्या की जा रही है और देश के प्रधानमंत्री अमेरिका में कहते हैं “वहां सब अच्छा है” अब प्रधानमंत्री न मिडिया से वाकिफ़ होते हैं और न ही जनता से तो ये सवाल देश के अमन पसंद लोग कैसे पूछेंगे की यहाँ क्या सब अच्छा है आर्थिक मंदी, बेरोजगारी, जम्मू कश्मीर में अनुच्छेद 370 का निरस्त होना या अल्पसंख्यकों पर प्रायोजित ढंग से मॉबलिंचिंग? जेएनयू का छात्र नजीब जो तक़रीबन तीन साल से गायब है उसको आरएसएस की एक छात्र शाखा जो अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् है इस संगठन के लोगों पर आरोप है की इनके द्वारा नजीब को पिटा जाता है और फिर गायब कर दिया जाता है, तो सवाल पूछना पड़ेगा, जब सवाल पूछा जाता है तो उनके ऊपर देशद्रोह का केस दर्ज कर दिया जाता है. रामचंद्र गुहा, मणिरत्नम और अपर्णा सेन अनुराग कश्यप श्याम बेनेगल समेत 49 अमन पसंद लोगों ने प्रधानमंत्री को खुला पत्र लिख कर उनको अवगत कराने का कोशिश किया गया की देश में मॉबलिंचिंग की घटनाएँ बहुत ज्यादा बढ़ गई है, लेकिन बिहार के मुजफ्फरपुर में इन 49 लोगों के खिलाफ गुरुवार को देशद्रोह का केस दर्ज कर दिया जाता है.

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ये सिलसिला आगे बढ़ता है जब महात्मा गाँधी अन्तर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा के प्रशासन ने छह विद्यार्थियों को निष्काशित कर दिया जाता है, चन्दन सरोज, नीरज कुमार, राजेश सारथी, रजनीश अम्बेडकर, पंकज वेला और वैभव पिंपलकर इन लोगों ने इस अलोकतांत्रिक कार्रवाई का विरोध करते हुए 9 अक्टूबर को विश्वविद्यालय में प्रधानमंत्री को पत्र लिखने का सामूहिक कार्यक्रम आयोजित किया जिसमें छात्र-छात्राओं ने अपने पत्र में पीएम मोदी प्रधानमंत्री से देश के मौजूदा हालात को देखते हुए कुछ सवालों का जवाब मांगा है. छात्र-छात्राओं ने देश में दलित-अल्पसंख्यकों के मॉबलिंचिंग से लेकर कश्मीर को पिछले दो माह से कैद किए जाने; रेलवे-बीपीसीएल-एयरपोर्ट आदि के निजीकरण; दलित-आदिवासी नेताओं, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं एवं बुद्विजीवी- लेखकों के बढ़ते दमन और उनपर देशद्रोह का मुकदमा दर्ज करने पर भी सवाल खड़े किए हैं. छात्र-छात्राओं ने महिलाओं पर बढ़ती यौन हिंसा व बलात्कार की घटनाओं के सवाल पर भी जवाब माँगा है. क्या ये सवाल जायज नहीं है? इन सवालों से देश की छवि खराब हो जाएगी?

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चन्दन सरोज कहते हैं की देश में आज दलितों-अल्पसंख्यकों की मॉबलिंचिंग की बढ़ती घटनाओं के लिए बीजेपी-आरएसएस जैसे संगठन जिम्मेवार है. बीजेपी-आरएसएस के नेता मॉबलिंचिंग करनेवालों को सम्मानित करते रहे हैं। एक सम्प्रदाय विशेष के खिलाफ नफरत फैलाने वालों को आज केन्द्र-राज्य की सरकारों में अहम ओहदे पर बिठाने का भी काम आरएसएस-बीजेपी ने ही किया है। ऐसी स्थिति में केन्द्र सरकार के मुखिया होने के नाते पीएम मोदी की ही यह जिम्मेदारी है कि वे इन घटनाओं पर रोक लगाएं.

शिल्पा भगत ने कहा कि आज देश में बलात्कार और यौन हिंसा के मामले थमने के बजाय बढ़ते ही जा रहे हैं. कुलदीप सेंगर से लेकर चिन्मयानंद जैसों को बचाने में सरकार ने कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी है. बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ का नारा देने वाली सरकार महिला सुरक्षा के मुद्दे पर पूरी तरह बेनकाब हो चुकी है. बलात्कारियों के पक्ष में जुलूस तक निकाले जा रहे हैं. इसलिए हम प्रधानमंत्री से उम्मीद करते हैं कि वे महिलाओं पर जारी यौन हिंसा-बलात्कार को रोकने हेतु सख्त कदम उठाएं.

रजनीश कुमार अम्बेडकर ने कहा कि संवैधानिक प्रक्रिया का उल्लंघन करते हुए कश्मीर से जिस प्रकार धारा-370 हटाया गया और यह कहा गया  कि इससे कश्मीर के लोगों को लोकतांत्रिक अधिकारों की गारंटी होगी. जबकि आज दो माह से अधिक समय गुजर जाने के बाद भी कश्मिरीयों को कैद कर रखा गया है. वहां आज भी कर्फ्यू जैसे हालात क्यों हैं? इसका पीएम मोदी को जवाब देना होगा.

वैभव पिम्पलकर ने कहा कि मोदी सरकार एक तरफ राष्ट्रीय गौरव और देशभक्ति की बात कर रही है, वहीं दूसरी तरफ रेलवे, बीपीसीएल, एयरपोर्ट से लेकर कई अन्य राष्ट्रीय महत्व के उद्दमों को पूंजीपतियों के हाथों बेच रही है. सरकार देश के विकास के बड़े-बड़े दावे कर रही है और स्थिति यह है कि रिजर्व बैंक से लेकर अन्य बैंक कंगाली की तरफ बढ़ रहे हैं. कंपनियों में नौकरी करनेवालों की बड़ी पैमाने पर छंटनी हो रही है. बेरोजगारी कम होने के बजाय बढ़ती जा रही है. छात्र-युवाओं के भविष्य के साथ किए जा रहे इस खिलवाड़ का प्रधानमंत्री मोदी को सामने आकर जवाब देना चाहिए. क्योंकि उन्होंने प्रतिवर्ष दो करोड़ युवाओं को रोजगार देने का देश की जनता से वादा किया था।

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नीरज कुमार ने कहा कि केन्द्र सरकार नागरिकता संशोधन कानून को सामने लाकर मुसलमानों में खौफ पैदा कर रही है. कई पीढ़ियों से किसी जगह पर रह रहे आम लोगों को लगातार भयभीत किया जा रहा है. देश के गृहमंत्री धर्म के आधार पर मुस्लिमों को नागरिकता के मामले में टारगेट कर देश-समाज में हिंसा, नफरत व अशांति फैला रहे हैं. प्रधानमंत्री को ऐसे गंभीर मामले में संज्ञान लेना चाहिए. यह देश सभी धर्म के लोगों का है. भारत का संविधान जाति, धर्म, वर्ण, लिंग, संप्रदाय के आधार पर किसी भी प्रकार के भेदभाव का निषेध करता है. पीएम को संविधान के इन मूल्यों की रक्षा करनी होगी.

इन विद्यार्थियों ने बहुजन नायक मान्यवर कांशीरामजी के पूण्यतिथि के कार्यक्रम करने के लिए प्रशासन को परमीशन के लिए पत्र दिया गया था लेकिन इनको कार्यक्रम करने का परमीशन यह बोल कर नहीं मिला की उसमें तारीख नहीं लिखा है. चंदन सरोज बताते हैं की यहाँ आरएसएस की शाखा बिना किसी परमीशन के रोज चलाई जा रही है और हमें कोई भी कार्यक्रम के लिए प्रशासन का परमीशन नहीं मिलता है. यहाँ के विद्यार्थियों के साथ सभी अमन पसंद लोगों, संगठनों को एक जुट होकर इनके पक्ष में खड़े होने की जरुरत है और इनका निष्कासन को तुरंत वापस लेना चाहिए.

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ब्राह्मणवादी पितृसत्ता पर बहुजन लेखिकाओं ने की बातचीत: बहुजन साहित्य संघ का आयोजन

डॉ. मिथिलेश, आरती यादव, कनकलता यादव और कविता पासवान

27 और 28 सितम्बर 2019 को ‘बहुजन साहित्य संघ’के तत्वाधान में आयोजित‘बहुजन महिला सम्मेलन’ का आयोजन जे.एन.यू. नई दिल्ली में सफलता पूर्वक सम्पन्न हुआ। महिला वक्ताओं ने बहुजन समाज की जटिलताओं और अंतर्विरोधों पर अपनी बात रखी और आज की परिस्थितियों को देखते हुए बहुजन एकता पर बल दिया ताकि देश की विभाजनकारी शक्तियों से लड़ा जा सके ।

पहले दिन‘आदिवासी महिला’ विषय पर परिचर्चा हुई । पैनल चर्चा में गोमती बोदरा, आईसां उरांव, स्नेहलता नेगी, आईवी हांसदा आदि ने भाग लिया और उन्होंने आदिवासी दर्शन, समाज के साथ नवपूँजीवादी संक्रमण के तहत आदिवासी स्त्रियों की समस्यायों पर बातचीत की । नेगी जी ने लद्दाख के किन्नौरी समुदाय की विशिष्टताओं, संस्कृति से हमें परिचित कराया । गोमती जी ने झारखण्ड के सन्दर्भ में नशाखोरी, जमीन के मुद्दे पर अपनी बात रखी। प्रीति मरांडी जी ने आदिवासी पत्रिका के हवाले से झारखण्ड के संथाल स्त्रियों की समस्यायों को रेखांकित किया । आदिवासी स्त्रियाँ सशक्त हैं। वह अपने निर्णय काफ़ी हद तक स्वयं ले सकती हैं, कभी कभी उनकी सशक्तता ही उनकी कमज़ोरी बन जाती है । उनके सरल, सहज स्वभाव का मतलब गैर आदिवासी गलत अर्थों में लगाते हैं और उनकी आज़ादी को भी गलत अर्थों में लेते हैं । अनीता मिंज जी ने यह बताया कि किस प्रकार आदिवासी स्त्रियों की स्वतंत्रता का अर्थ सिर्फ़ दैहिक सम्बन्ध तक सीमित समझ लिया जाता है जबकि वह अपनी स्वतंत्रता को जीती हैं । उनके रोजमर्रा के अभ्यास में यह शामिल होता है । वह मुख्यधारा की स्त्रियों से ज़्यादा स्वतंत्र और आत्मनिर्भर हैं, यहाँ उस प्रकार की समस्याएँ नहीं हैं जो दलित स्त्रियों की समस्याएँ हैं ।

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मेरी पूर्ति जी ने कामगार आदिवासी महिलाओं से संबंधित समस्यायों पर अपनी बात रखी तथा उनके दैहिक, आर्थिक शोषण को रेखांकित किया । दलालों के द्वारा घरेलू काम के लिए लाई गईं इन आदिवासी स्त्रियों को उनके काम के पैसे भी नहीं मिलते । जागृति पंडित ने डायन प्रथा के पहलू पर बात करते हुए यह स्पष्ट किया कि यह बाहर से आदिवासी समाज को कमज़ोर करने के लिए लाया गया एक टूल है जिसमें उसी स्त्री को शिकार बनाया जाता है जो सबसे सशक्त होती हैं । दलित आदिवासी के अंतर्संबंध पर प्रियंका सोनकर जी ने अपनी बात रखी और दलित समुदाय की स्त्रियों के शिक्षा के क्षेत्र में पिछड़ेपन का कारण ग़रीबी और पितृसत्ता को माना ।

आदिवासी समाज की मुख्य समस्या जीविका से जुड़ी हुई है। हर समुदाय की अलग-अलग परम्पराएँ और रीति रिवाज हैं लेकिन जो चीज़ सारे आदिवासी समुदायों में देखने को मिलती है, वह है उनका जीवन दर्शन । जो प्रकृति पर निर्भर है और उसी में वह रहना पसंद करते हैं । ज़ंगल, पशु, पक्षी उनकी जीवन-शैली का हिस्सा हैं और जब मुख्यधारा की विकास की अवधारणा वहाँ पहुँचती है तो वह अपने नियम उस समाज पर थोपने की कोशिश करते हैं ।

दूसरे दिन राउंड टेबल कार्यक्रम का संचालन सविता माली ने निराला की काव्य पक्ति ‘वह तोड़ती पत्थर’ से करते हुए किया कि जो स्त्री मौन होकर पत्थर तोड़ रही थी, उस स्त्री ने आज बोलने का साहस किया हैं। वक्ताओं में डा. मिथिलेश, डॉ. शीला, पूनम गुप्ता, सोनम मौर्या, रेणु चौधरी, रेणु चौहान, ललिता बघेल और आरती यादव इत्यादि ने बहुजन समाज की एकजुटता की आवश्यकता पर जोर  देते हुए बहुजन स्त्रीवाद की जरूरतों पर भी बल दिया।

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डॉ. मिथिलेश ने 20 वीं शताब्दी की लेखिका चन्द्रकिरण सौनरेक्सा की कहानियों के माध्यम से दलित-मुस्लिम समाज में व्याप्त गरीबी और संघर्ष को रेखांकित करते हुए उसे समकालीन समस्यायों से जोड़ा । 20 वीं शताब्दी में दलित वर्ग की महिलाएँ जिन समस्याओं से जूझ रही थीं, 21वीं शताब्दी में भी उन्हीं सब समस्याओं से जूझती हुई नजर आ रही हैं ।उन्होंनेजातिवादी ढाँचेको तोड़े जाने पर बल दियाऔर सामाजिक-राजनीतिक एकता की आवश्यकता बतलाई ।पूनम गुप्ता ने ब्राह्मणवादी ताकतों द्वारा अलग- अलग जाति और धर्मो में बाँट दिए गए बहुजन समाज की महिलाओं-पुरुषों को एक मंच पर आकर अपनी समस्याओं को एक दूसरे से साझा करना और उसका समाधान करना बहुजन साहित्य संघ का उदेश्य बताया ।बहुजन पुरुषों को अपने पितृसत्तात्मक संस्कारों को छोड़कर आगे आना चाहिए । आरती यादव ने 19 वीं शताब्दी के साहित्य में बहुजन स्त्रियों की अनुपस्थिति का सवाल उठाया और उस क्षेत्र में शोध कार्य किये जाने की महती आवश्यकता बताई । इसी क्रम में हिन्दू शब्द पर बात करते हुए ये कहा कि हिन्दू या हिंदुत्व के नाम पर ब्राह्मणवादी विचारों का ही प्रसार करने की चाल को गहराई से समझने की ज़रूरत है।सोनम मौर्या ने अपने अनुभवों को साझा करते हुए पिछड़े वर्गों में व्याप्त जातिवादी विकृतियों के बारे में अपनी बात रखी । पिछड़ी जातियों में जिस तरह से ब्राह्मणवादी व्यवस्था का दख़ल है, इस पर सोनम ने बहुत गम्भीरता से प्रकाश डाला ।रेणु चौहान ने दलित जीवन के संघर्षों को अपने अनुभव के आधार पर साझा करते हुए मुहावरा और लोकोक्तियों के माध्यम से हरियाणवी समाज की स्त्रियों की बेबाकी को रेखांकित किया । उन्होंने बहुजन समाज को एक अम्ब्रेला के नीचे आने की अपील की ताकि आज की परिस्तिथियों में एक साथ मिलकर लड़ा जा सके|

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कार्यक्रम के दूसरे सत्र पैनल डिस्कशन में अनीता भारती, रजनी अनुरागी, आफ़रीन, स्नेहाशीष, राबिया नाज़ और नीतिशा ख़लखो ने बहुजन स्त्रियों की समस्याओं पर प्रकाश डाला । अनीता भारती जी ने यह प्रश्न रखा कि जिस तरह से दलित साहित्य का अपना कुछ खास उद्देश्य है क्या बहुजन वैचारिकी भी किसी खास उदेश्य को लेकर है? क्या जिस तरह से दलित साहित्य ने ईश्वर की सत्ता को नकारा है, बहुजन समाज के अन्य लोगों में भी ईश्वर की सत्ता को न मानने का साहस है? उसका स्रोत क्या होना चाहिए? इन सवालों के माध्यम से बहुजन वैचारिकी के अंतर्विरोधों के साथ उसकी जरूरतों पर भी बल दिया । मुख्यधारा के इतिहासकारों ने दलित, मुस्लिम, पिछड़ी, आदिवासी  समाज की समस्याओं और इतिहास में उनकी उपस्थिति को नज़रअंदाज किया है अत: आज यह ज़रूरी हो गया है कि बहुजन समाज की नायिकाओं/ नायकों के संघर्षों को सामने लाया जाए और यह काम बहुजन के मंच से बखूबी किया जा सकता है।

यह भी पढ़ें: अम्बेडकर की प्रासंगिकता के समकालीन बयान

रजनी अनुरागी जीने स्त्रियों को संसाधनों से बेदख़ल करने की ब्राह्मणवादी पितृसत्ता की नीतियों पर सवाल उठाते हुए इस बात पर जोर दिया कि स्त्रियों को भी संसाधनों पर अधिकार दिया जाना चाहिए ।आफ़रीन जी ने सत्ता द्वारामुस्लिम समाज को राजनैतिक कुचक्रों का शिकार बनाये जाने और मौलिवियों द्वारा इस्लाम की आधी-अधूरी व्याख्या किए जाने पर रोष जताया।  राबिया नाज़ जी ने उर्दू साहित्य के माध्यम से मुस्लिम समाज की स्त्रियों की समस्याओं को उठाने का प्रयास किया । मीना कोटवाल जी ने पत्रकारिता के क्षेत्र में दलित स्त्रियों के साथ हुए भेदभाव पर अपनी बात रखी । उन्होंने कहा कि आज भी अपनी दलित पहचान की वजह से दलित समाज को तिरस्कार झेलना पड़ता है। स्नेहाशीष ने यह सवाल किया कि आख़िर वह कौन सी ताकत है जो हमें यह बताती है कि हम स्त्री या पुरुष हैं? उन्होंने कहा कि जाति की वैचारिकी पर ही जेंडर विभाजन हुआ है। इसलिए यह जरूरी है कि जाति व्यवस्था को ख़त्म किया जाए।

आजकल की ख़बरों में जो इस प्रकार की घट्नाओं को दिखाया जाता है कि आदिवासी की हत्या ओबीसी कर रहा है और इनको एक दूसरे के विरोध में खड़ा किया जा रहा है । इस पर भी प्रश्न-सत्र में परिचर्चा की गयी और ये निष्कर्ष निकाला गया कि सत्ता वर्ग किस प्रकार बहुजन एकता को नष्ट करने की कोशिश कर रहा है । हमें इन सत्ताधारी सर्पों से सचेत रहने की ज़रूरत है । यह वक़्त की ज़रूरत है कि तमाम मतभेदों के बावजूद आपसी संवाद और राजनीतिक एकता बेहद ज़रूरी है तथा सत्ता तंत्र के बिछाए जाल से बचने की ज़रूरत है ।

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अमेज़न क्यों जला?

विक्रम कुमार

आप आदिवासियों को लोकतांत्रिक मूल्य नहीं सिखा सकते. बल्कि आप लोगों को उनसे लोकतांत्रिक परंपराए सीखनी चाहिए. वे इस धरती पर सबसे ज्यादा लोकतांत्रिक लोग हैं.” मरांग गोमके जयपाल सिंह मुंडा द्वारा संविधान सभा में दिए भाषण का एक अंश है.

आज जब अमेज़न का जंगल जला दिया गया इसकी वजह क्या थी वहां कौन लोग रहते थे, किनके घर उजड़े उस आग से वहां रहने वाले विभिन्न प्रकार के जीवजंतु और आदिवासीयों के. वहां रहने वाले ना जाने कितने आदिवासी मारे गए, यह सिर्फ अमेज़न की बात नहीं है, भारत में भी जब दिकु (बाहरी) लोग आते हैं तब भी यही होता है उनको बल छल से उनको उनके स्थान से भगा दिया जाता है उनकी हत्याएं की जाती है. फिर मिथकीय कथाओं के द्वारा उनको समाज में घृणित स्थान दे कर उनको समाज का दुश्मन ठहरा दिया जाता है, जयपाल सिंह मुंडा संविधान सभा में कहते हैं “मैं भूला दिए गए उन हजारों योद्धाओं की ओर से बोल रहा हूँ जो आजादी की लड़ाई में आगे रहे. लेकिन उनकी कोई पहचान नहीं है. देश के इन्हीं मूल निवासियों को पिछड़ी जनजाति, आदिम जनजाति, जंगली, अपराधी कहा जाता है. श्रीमान मैं बताना चाहता हूँ कि मुझे जंगली होने पर गर्व है. इस देश के अपने हिस्से में हम इसी नाम से पुकारे जाते हैं”

फोटो: BBC

ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री पॉल कीटिंग ने अपने रेडफर्न पार्क भाषण में कहा कि ऑस्ट्रेलियाई आदिवासी समुदायों को लगातार झेलनी पड़ रही समस्याओं के लिए यूरोपीय आप्रवासी ज़िम्मेदार थे: ‘हमने हत्याएँ कीं, हमने बच्चों को उनकी माताओं से छीन लिया, हमने भेदभाव और बहिष्कार किया।

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आखिर क्यों सभी को आदिवासियों की ज़मीन चाहिए? क्योंकि इनके जमीन के नीचे खजाना है ये खजाना कोयला उरेनियम अब्रख धातुओं के अयस्क और ना जाने कितने खनिज संपदाओं के रूप में है इन सब के लिए आदिवासीयों को उनकी जमीनों से बेदखल कर दिए जा रहे हैं उनकी हत्या कर उनका जमीन लूटा जा रहा है ये हत्या कभी प्रायोजित भीड़ द्वारा तो कभी पत्थलगड़ी को असंवैधानिक बोल कर तो कभी ग्रीनहंट के नाम पर सत्ता द्वारा की जा रही है झारखण्ड में कई ऐसे मामले आये सामने आये हैं. आज झारखण्ड में सबसे ज्यादा आदिवासी देशद्रोह के केस में जेलों में बंद हैं. वैसे ही एक दिन अमेज़न के आदिवासीयों को बोल दिया जायेगा की तुमलोग गैर अधिकारिक रूप से जंगलों में कब्ज़ा किये हुए हो और सब पे फर्जी मुकदमा चला कर जेल में डाल दिए जायेंगे और जो विरोध करेगा उसे मार दिया जायेगा.

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आज दुनिया भर में आदिवासियों पर खतरा मंडरा रहा है पूंजीवादी सत्ता का. भारत में ब्राह्मणवादी व्यवस्था पहले से ही आदिवासीयों को हिन्दू बता कर उनकी संस्कृति उनकी पहचान को ख़त्म कर रही है और आरएसएस बीजेपी जैसे ब्राह्मणवादी फासीवादी हिन्दूवादी संगठन आक्रामक रूप से उनको शारीरिक और मानसिक रूप से ख़त्म करने की प्रक्रिया में है. जिसे हम जंगल, नदी, पहाड़ों के रखवाले के तौर पर जानते हैं क्या वो थे में बदल जायेंगे? हम जानते हैं की अमेज़न के जंगल का 60% हिस्सा ब्राजील में आता है बांकी का अन्य देशों में. BBC अपने एक रिपोर्ट में बताती है की अमेज़न के जंगलों में इस साल आग लगने की रिकॉर्ड 75000 घटनाएं दर्ज की गई है और यह ब्राजील का सरकारी आंकड़ा भी है, नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर स्पेस रिसर्च (इनपे) ने अपने सैटेलाइट आंकड़ों में दिखाया है कि 2018 के मुकाबले इसी दरम्यान आग की घटनाओं में 85 प्रतिशत की वृद्धि हुई है. रिपोर्ट बताती है की अमेज़न के जंगल में वनस्पति और जीव जंतुओं की 30 लाख प्रजातियां और 10 लाख मूलनिवासी निवास करते हैं.

यहाँ की आदिवासी महिलायें एक स्तन से अपने बच्चे को दूध पिलाती है तो अपने दुसरे स्तन से गिलहरी के बच्चों दूध पिलाती वो तब तक स्तनपान कराती है जब तक वह बच्चा बड़ा ना हो जाए, ये आदिवासी महिलाएं उन बच्चों को अपने बच्चों की तरह देखभाल करती है, ये लोग हमारे धरती के पहले लोग हैं जिनका पूरी धरती पे अधिकार होना था आज उनका अस्तित्व खतरे में पड़ गया है. जयपाल सिंह मुंडा कहते हैं “पिछले छः हजार सालों से अगर इस देश में किसी का शोषण हुआ है, तो वे आदिवासीयों का हुआ है। उन्हें मैदानों से खदेड़कर जंगलों में धकेल दिया गया और हर तरह से प्रताड़ित किया गया,”

अमेज़न के जंगल में लगी आग एक सोची समझी साजिश है वहां के ज़मीन पर कब्ज़ा करने की और वहां के आदिवासियों को ख़त्म करने की प्रकृति को ख़त्म करने की. आज प्रकृति और उनके रखवाले दोनों को बचने की बहुत जरुरत है.

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कुछ अल्पविराम

रंजना बिष्ट

जाने माने कथाकार व कवि सच्चिदानंद जोशी की पुस्तक  ‘कुछ अल्पविराम’ यात्रा संस्मरणों और रोजमर्रा की जिन्दगी से जुडी छोटी-छोटी घटनाओं का एक संकलन है। जिस प्रकार भाषा में अल्पविराम का बड़ा महत्व है वैसे ही मनुष्य का जीवन भी है जिसकी दिशा और दशा तय करने में छोटी-छोटी घटनाओं का भी बड़ा योगदान होता है। एक संवेदनशील मनुष्य अपने आस-पास के वातावरण से ही प्रेरणा प्राप्त करता है। किसी बड़े टर्निंगप्वाइंट का इन्तजार नहीं करता।

आज मनुष्य कई प्रकार की समस्याओं से जूझ रहा है। यह समस्याएं व्यक्तिगत भी हैं और सामाजिक भी। मनुष्य के विकासक्रम में उसके घर-परिवार और शिक्षा का बड़ा योगदान होता है। मगर यह सामाज की विडंबना ही है कि संयुक्त परिवार की जगह एकलपरिवार ने ले ली है और शिक्षा व्यवसाय बन कर रह गई है। किराए के सूपरमैन-इस कहानी के माध्यम से लेखक ने शिक्षा व्यवस्था पर कड़ा प्रहार किया है, जो बच्चों का न तो सही मार्गदर्शन कर पा रही है और ना ही मानवीय मूल्यों का विकास। अंग्रेजी शिक्षा के वर्चस्व ने हमारी संस्कृति और सभ्यता की जडों को इस कदर खोखला कर दिया है कि अपनी मातृभाषा भी हम भूल गए हैं। ‘विदेश में हिन्दी के अनुभव‘ इसबात की ओर संकेत करती है। लेखक का अपनी मातृभाषा हिन्दी के प्रति समर्पण साफ झलकता है जब वह कोपेहेगन में संतअल्बन के एंग्लिक चर्च में प्रवेश करते वक्त अंग्रेजी की जगह हिन्दी के पत्रक की मांग करते हैं।

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‘हवाई यात्रा’ के जरिए जहां एक ओर उन्होंने मनुष्य से उसकी स्वाभाविकता छीन लेने वाली आडंबरपूर्ण आधुनिक जीवन शैली पर तंज कसा है वहीं दूसरी ओर ‘स्वतंत्रता दिवस’ लालबत्ती पर झंडे बेचती लड़की के जरिए आजादी के इतने दसक बाद देश के चिंताजनक हालातों की ओर संकेत किया है जहां आज भी नन्हें हाथों में कलम की जगह मजदूरी है।

धर्मनिरपेक्षता-मंदिर और मजार में भिखारियों का जिक्र करते हुए उन्होंने यह जाहिर किया है कि आमजन मान सस्वभाव से धर्मनिरपेक्ष होती है। वह अल्लाह और ईश्वर दोनों पर समान रूपसे आस्था रखती है।

लेडी श्रवण कुमार-भारतीय समाज की इस विडंबना की ओर संकेत किया है जहां पुरूष कोई कार्य करता है तो उसे समाज उसकी सराहना करता है। श्रवण कुमार की सेवा भक्ति का जिक्र हर एक की जुबान पर मिलता है। मगर हमारे देश में महिलाएं सेवाकर्म बरसों से करती आ रहीं हैं। मगर घर-परिवार हो या समाज सबने उसके योगदान को नजरअंदाज किया है।

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कथाकार डॉ. सच्चिदानंद जोशी के संस्मरणों के केन्द्र में जो पात्र हैं वह गरीब और आमजन हैं। जैसे भिखारी, कुली, वृद्ध महिला, ड्राइवर, गार्ड और बच्चें हैं हमारा तथाकथित सभ्य समाज जिनकी परवाह नहीं करता उनके प्रति चिंतन करना यह वास्तव में संवेदनशीलता है जो एक व्यक्ति को सामान्य मनुष्य से कवि, लेखक और रचनाकार बनाती है।

‘कुछ अल्पविराम’ में लेखक ने अपनी बात बहुत ही सरल और सहज ढंग से कही है। अनावश्यक रूप से अलंकृत शब्दों का प्रयोग नहीं किया है। हिन्दी भाषा जनसाधारण की भाषा बनी रहे इस बात का विशेष ध्यान रखा गया है। यह साहित्य और गैर-साहित्यिक दोनों तक रह के पाठक को पसंद आएगी।

पुस्तक- कुछ अल्पविराम
लेखक- सच्चिदानंद जोशी
प्रकाशक- प्रभात प्रकाशन, 4/19 आसफअली रोड, नईदिल्ली
मूल्य-150

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गिरह

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नवल किशोर कुमार
(लेखक फारवर्ड प्रेस, दिल्ली के हिंदी संपादक हैं)

यार विजय, यह बहुत अच्छा है कि तुम आज की पीढ़ी के साथ इतना अच्छा तालमेल बिठा लेते हो। नई पीढ़ी चाहे जैसे जिये, उन्हें आजादी मिलनी ही चाहिए। कहां एक हम थे कि न बचपन अपने हिसाब से जी सके, जवानी का तो पता ही नहीं चला कि कब आयी और कब जिम्मेवारियों का बोझ देकर बिना बताये रूखसत हो गयी। मान गए बॉस, तुम क्या शानदार जीवन जी रहे हो।
ऐसा नहीं है साथी। बीयर का एक लंबा घूंट हलक में उतारने के बाद विजय ने शंकर से कहा। जिम्मेदारी तो मेरे पास भी है। सुगंधा की जिम्मेदारी तो है ही। अभी तो वह कॉलेज गयी है। कुछ पढ़-लिख जाय तो उम्मीद बने। लेकिन मैं इतना जरूर मानता हूं कि सुगंधा जैसी आज की लड़कियों को आजादी मिलनी चाहिए। सबसे पहले पहल परिवार के लोगों को करनी चाहिए।

विजय का स्वभाव ही ऐसा है। हरदम अपने विचारों को जीने वाला। जैसा सोचता है वही करता भी है। शंकर उसके स्वभाव को जनता है। अभी दो दिन पहले ही तो विजय ने उसे अपनी नयी प्रेमिका से मिलवाया था। सचमुच ऐसा कहां होता है कि किसी पुरूष की प्रेमिका को उसकी पत्नी भी मान-सम्मान दे। शंकर मन ही मन विजय से ईर्ष्या भी करता है।
अच्छा यार विजय, यह सब कैसे कर लेते हो। उस दिन तुम जब अपनी महबूबा के साथ थे कितने अच्छा लग रहे थे। क्या भाभी को कोई ऐतराज नहीं होता? शंकर ने कबाब के बड़े टुकड़े को जिम्मेदारियों से मुक्त करते हुए कहा। यार शंकर छोड़ो यह सब। परिवार में सबको आजादी मिलनी चाहिए। मैं तो इसी में विश्वास करता हूं। जिसको जैसे जीना है जिये। हां, विश्वास जरूरी है। विश्वास है तो प्रेम का आधार हमेशा मजबूत रहता है।

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अच्छा तुम यह बताओ कि जम्मू-कश्मीर में जो इन दिनों चल रहा है, उसको लेकर तुमने कुछ लिखा या नहीं? क्या लिखना है? पार्टी ने तय किया है कि वह 370 के हटाए जाने का विरोध करेगी। सो मैं भी कर रहा हूं। इंडियन एक्सप्रेस में कल ही तो मेरा बयान छपा है। शंकर ने जवाब दिया, बधाई दोस्त। इंडियन एक्सप्रेस में बयान छपना इम्पोर्टेंट है। अब तुम पक्का लीडर बन गए। एक बीयर और पीते हैं इसी बात पर। बीयर पीना है तो पी लो। लेकिन यह वैसी बात नहीं है। तुम भी तो रहे हो पार्टी में पन्द्रह साल। जानते ही हो कि पार्टी का व्यवहार कैसा होता है। इस बार तो हमको आश्चर्य हुआ जब कहा गया कि सतीश पांडे के बजाय मैं पार्टी की ओर से बयान जारी करूं। जानते हो इसका मतलब क्या है? शंकर ने आधी सिगरेट को जबरदस्ती ऐश-ट्रे में डालते हुए कहा।

स्साला सतीश पांडे को अब भी भाव मिलता है पार्टी में! मैंने तो उसी के कारण ही पार्टी को छोड़ा। धारा 370 का विरोध पांडे नहीं कोई दलित करे तो इसका मतलब बनता है। राजनीति भी बड़ी कमीनी हो गयी है। हम लाल झंडा ढोते रहते हैं और यह जानते हुए कि आजकल लाल और भगवा में बहुत अधिक फर्क नहीं रह गया है। कम से कम जाति के सवाल पर।

विजय का घर दिल्ली के पॉश इलाके में है। किराया अधिक है लेकिन विजय को अच्छा लगता है इस मुहल्ले में रहना। यहां से न संसद दूर है और न दिल्ली विश्वविद्यालय। दूसरे मुहल्लों में कई समस्याएं होती हैं। या तो वे अल्ट्रा पॉश हैं या फिर लक्ष्मीनगर जैसा स्लम। कुल मिलाकर साकेत ठीक है रहने के ख्याल से। खाना खाओगे या खाकर आए हो? शांति ने विजय से पूछा। खाऊंगा लेकिन जरा देर से। सुगंधा का फोन आया था क्या? आज उससे बात न हो सकी। फोन नहीं लग रहा था। विजय ने जवाब देते हुए सवाल किया। हां, दोपहर में उसने फोन किया था। जयपुर से उदयपुर जा रही थी। उसका फोन चार्जर होटल के कमरे में छूट गया है। शांति ने खाने की प्लेटें साफ करते हुए कहा। उसके पास पैसा है न? मैंने पहले ही उसको कहा था कि दस हजार रुपए और ले जाये। गिलास में व्हिस्की डालते हुए विजय ने कहा। अच्छा लगता है सुगंधा को वह सब करते देखते जो हम और तुम कभी नहीं कर सके। धत्त। माथा पर चढ़ा रहे हो सुगंधा को। एक दिन पछताओगे जब वह उलटकर तुमसे सवाल करेगी। मुझसे तो वह कई बार मुंह लगा चुकी है। मैं तुमसे कहना चाहती थी। लेकिन क्या फायदा। तुम्हारा प्रोग्रेसिव वाला हैश टैग मुझे हर बार रोक देता है। मेरी मानो तो प्रगतिशील होना अच्छी बात है। लेकिन बहुत तेज छलांग लगाना अच्छी बात नहीं है। शांति ने कहा। तुम कहना क्या चाहती हो? क्या सुगंधा को उन्हीं बेड़ियों में कैद कर दूं जिन बेड़ियों में तुम्हारे मां-बाप ने तुम्हें कैद कर रखा था? जरा फ्रीज से ठंढा पानी तो दे देना।

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विजय, मैं मानती हूं कि मेरे माता-पिता के ख्याल तुम्हारे जैसे नहीं थे। लेकिन पिछले बीस सालों से तो मैं तुम्हारे साथ ही हूं। तुमने जैसा चाहा, वैसी ही तो रही हूं। क्या अब भी कहोगे कि तुमने मुझे बेड़ियों में नहीं कैद किया? तो क्या मैंने तुम्हें गुलाम बना रखा है? किस बात की गुलामी है तुम्हें? क्या मैंने कभी जबरदस्ती कुछ किया? तुम जो करना चाहती थी, वह तुमने किया।  जरा मैं भी तो सुनूं कि मैंने तुम पर क्या-क्या थोपा है? विजय ने शांति से कहा। यह जो तुम रोज घर में आकर करते हो, क्या इसे थोपा जाना नहीं कहा जाना चाहिए। ड्रिंक लेने से मैंने तुम्हें कभी रोका नहीं, लेकिन घर में पीने से सुगंधा पर इसका असर पड़ रहा है। अब तो वह भी पीने लगी है। ट्रिप पर जाने से पहले वह अपने दोस्तों के साथ घर पर ही पी रही थी। उसके दोस्तों में वह लड़का भी था।
अरे वाह! मुझे नहीं पता था कि सुगंधा भी पीती है। कल उसके लिए स्पेशल वाइन ले आऊंगा। शांति सोचने और जीने की यही स्वतंत्रता तो मैं उसे देना चाहता हूं। भले ही मैं उसके लिए जमीन-जायदाद न दे सकूं, लेकिन एक बेहतर जीवन जरूर दूंगा। मुझे तुमने क्या दिया है अब तक जो तुम उसे दोगे? तुम पुरूष हमेशा दाता बने रहना चाहते हो।

गजब की जबरदस्ती है तुम लोगों की। मुझ जैसी महिला तुम्हारे इस दोहरे व्यवहार पर न इतराये तो तुम्हारी प्रगतिशीलता की पोल न खुल जाएगी। शांति ने कंघी से अपने बालों को सुलझाते हुए कहा। यह गलत है शांति। मैंने कभी इस तरह से सोचा ही नहीं। मुझे हमेशा लगा कि तुम्हें यह सब पसंद है जो मैं कर रहा हूं। अब जब तुम कह रही हो तो जरा यह भी बताओ कि मैंने तुम पर और क्या-क्या थोपा है?
छोड़ो यह सब। खाना खाते हैं। तुम्हारे लिए स्पेशल सब्जी है आज। तुम्हारा मटन भी गरम कर दिया है। शांति ने डायनिंग टेबल पर प्लेटें रखते हुए कहा।
नहीं, पहले बताओ। विजय ने दुबारा कहा।
क्या यह थोपा जाना नहीं है? अभी मेरी इच्छा खाने की है और तुम मुझे तुम्हारे द्वारा मुझ पर लादी गयी रस्सियों के गिरहों के बारे में बताने को बोल रहे हो। तुम्हें मेरी इच्छा का ख्याल रखना चाहिए। क्या तुम्हारी प्रगतिशीलता में यह शामिल नहीं है?

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खौफ और आशंकाओं में जी रहे कश्मीर के लोग, नाबालिगों और महिलाओं पर भी हो रहे अत्याचार: महिला संगठन

विक्रम कुमार

आज 50 दिनों से कश्मीर में दुकानें, होटलें, स्कूल, कॉलेज, विश्वविद्यालय बंद पड़ी है गलियां सड़कें सुनसान पुरे शहर में सन्नाटा भरा है, क्या ये वही कश्मीर है जिसका नाम सुनते ही हम गर्व से कहते थे की धरती का स्वर्ग कहीं और नहीं भारत में है मोदी सरकार ने जब से अनुच्छेद 370 को समाप्त कर दिया गया है तब से कश्मीर के हालात ऐसे हो गए हैं. देश भर से पत्रकार सामाजिक कार्यकर्ता जोखिम उठाकर भी कश्मीर के हालात देखने जा रहे हैं और वे ही आकर वहां की वास्तविक स्थितियां बयां कर रहे हैं अन्यथा मेनस्ट्रीम मीडिया कश्मीर का सच दिखाने की जगह राष्ट्रवाद का उन्माद पेश कर रही है.

कश्मीर की स्थिति को समझने के लिए 5 महिलाओं की एक टीम ने 17 से 21 सितम्बर तक कश्मीर का दौरा किया। टीम में एनी राजा, कवलजीत कौर, पंखुड़ी जहीर NFIW से, प्रगति महिला संगठन से पूनम कौशिक और मुस्लिम विमेंस फोरम से सैयदा हमीद शामिल थीं। उनलोगों ने बताया की “हम अपनी आँखों से देखना चाहते थे कि 50 दिनों के इस तालाबंदी में लोगों की हालत, विशेषकर महिलाओं और बच्चों को कैसे प्रभावित किया है। श्रीनगर में समय बिताने के अलावा, हमने शोपियां, पुलवामा और बांदीपोरा जिलों में कई गांवों का दौरा किया। हम अस्पतालों, स्कूलों, घरों, बाजारों में गए, ग्रामीण लोगों के साथ-साथ शहरी क्षेत्रों में पुरुषों, महिलाओं, युवाओं और बच्चों से बात की। यह रिपोर्ट आम लोगों की, हमारी चश्मदीद गवाही (चश्मदीद गवाह) है जो एक ना दिखने वाले पिंजड़े में 50 दिनों से कैद हैं।“

NFIW प्रगति महिला संगठन और मुस्लिम विमेंस फोरम
नई दिल्ली प्रेस क्लब में पत्रकारों से वार्ता करते हुए

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आगे बतातीं हैं की जुबेदा, शमीमा, खुर्शीदा अपने घरों के दरवाजे पर खड़ी होकर अपने 14, 15, 17, और 19 साल के बेटों के वापस आने का इंतजार कर रही हैं।  उन्होंने आशा नहीं छोड़ी, लेकिन वे जानते हैं कि यह एक लंबा इंतजार होगा, इससे पहले कि वे उनकी यातनाग्रस्त शरीर या उनकी लाशों को देखें… अगर वे (सेना के लोग) ऐसा करते हैं। डॉक्टरों, शिक्षकों, छात्रों, श्रमिकों ने हमसे पूछा, “अगर इंटरनेट सेवाएं 5 मिनट के लिए काट दी गईं तो आप दिल्ली में क्या करेंगे?” हमारे पास कोई जवाब नहीं था।

लगभग कश्मीर के हर जिले का यही हाल था. मगरिब की प्रार्थना के बाद लगभग 8 बजे लाइट काट दिया दिया जाता था. बांदीपोरा जिला मुख्यालय के पास एक गाँव में रहने वाली ज़रीना बताती हैं कि “पुरुषों को शाम 6 बजे के बाद घर के अंदर कैद हो जाना पड़ता है अगर कोई आदमी या लड़का शाम के बाद घर के बहार दिखाई पड़ता है तो उसके साथ क्या होगा पता नहीं। यदि ज्यादा कुछ आवश्यकता पड़ती है, तो हम महिलाएँ बाहर जाते हैं.” गुलाम अहमद की माँ की मौत हो गई वो दुखी आवाज में बताते है “मैं अपनी बहनों को उनकी माँ की मृत्यु के बारे में कैसे सूचित करूँगा? ”

फोटो EPA

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श्रीनगर के एक लल्ला डेड महिला अस्पताल में कई युवा महिला डॉक्टरों ने अनुच्छेद 370 के निरस्त होने के बाद से उन बाधाओं पर अपनी पूरी निराशा व्यक्त की वहां कई ऐसे मामले हैं महिलाएं प्रसव के लिए समय पर नहीं आ सकती हैं। बहुत कम एम्बुलेंस हैं; जो एम्बुलेंस चल रहा होता है उन्हें रास्ते में ही पिकेट पर रोक दिया जाता है। प्रसव के कई मामले ऐसे हैं अच्छे से इलाज नहीँ होने के कारण बच्चे विकृति के साथ जन्म जन्म ले रहे हैं. यह उनके माता-पिता को आजीवन कष्ट दिया जा रहा है। वर्तमान स्थिति में तनाव और खौफ (भय) के कारण कई महिलाएं समय से पहले बच्चों को जन्म दे रही हैं। एक युवा महिला चिकित्सक ने दुख के साथ हमें बताया ऐसा लगता है कि सरकार हमारा गला घोंट रही है.

बांदीपोरा अस्पताल के एक वरिष्ठ चिकित्सक ने हमें बताया कि कुलगाम, कुपवाड़ा और अन्य जिलों से लोग यहाँ इलाज केलिए आते हैं। मानसिक विकार, दिल के दौरे, के बहुत सरे मामले आते है हैं, इससे पहले कभी इतने मामले नहीं आये हैं। आपात स्थिति के लिए जूनियर डॉक्टर सीनियर्स की तलाश करते हैं; फोन से उन तक नहीं पहुंचा जा सकता है यदि वे परिसर से बाहर हैं, तो वे चिल्लाते हुए सड़कों पर दौड़ते हैं, पूछते हैं, हताशा हो कर ढूंढ़ते हैं। एसकेआईएमएस के एक आर्थोपेडिक डॉक्टर को सेना ने उस समय नाकाबंदी के दौरान रोका गया जब वह ड्यूटी के लिए जा रहा था। उन्हें सात दिनों के लिए रखा गया था। शोपियां में सफिया की कैंसर का सर्जरी हुई थी और उसे जाँच की जरूरत है मैं अपने डॉक्टर तक नहीं पहुँच सकती एक ही रास्ता है कि मैं शहर जाऊँ, लेकिन मैं वहाँ कैसे पहुँचूँ?

फोटो BBC

अनंतनाग की तहमीना ने अपने पति से आग्रह किया,  हमें एक और बच्चा चाहिए उनका बच्चा फैज़ को सेना ने मार डाला, अब्दुल हलीम चुप थे। वह इन शब्दों को सुनते हुए अपने छोटे लड़के के शव को अपने हाथों पर पड़ा देख सकता था।

एक महिला सुरक्षा गार्ड ने कहा कि भारतीय सरकार इसे फिलिस्तीन बनाना चाहती है। यह एक लड़ाई है जो हम और हमारे कश्मीर के लोग मिल कर लड़ेंगे और इस मुश्किल हालात का सामना करेंगे। एक युवा पेशेवर ने हमें बताया, हम स्वतंत्रता चाहते हैं, हम भारत नहीं चाहते, हम पाकिस्तान नहीं चाहते। हम इसके लिए कोई भी कीमत अदा करेंगे।

कश्मीर के हालात को देखने वहां के लोगों की आपबीती सुनने के बाद दौरे पर गई महिलाओं की टीम ने कहा कि हम अपने अनुभव और कश्मीर के लोगों की गवाही देते हुए हम दो निष्कर्षों पर पहुँचते हैं पहला जहाँ कश्मीरी लोगों ने पिछले 50 दिनों में भारत सरकार और सेना द्वारा बर्बरता और ब्लैकआउट के विरोध में अद्भुत संयम दिखाया है। जिन घटनाओं के बारे में हमें बताया गया था, उन्होंने हमारी रीढ़ को हिला दिया और यह रिपोर्ट केवल उनमें से कुछ को सारांशित करती है। हम कश्मीरी लोगों के साहस और संकल्पशीलता को सलाम करते हैं। दूसरा वहां के स्थिति के बारे में, कश्मीर में कुछ भी सामान्य नहीं है। उन सभी का दावा है कि स्थिति धीरे-धीरे सामान्य हो रही है, विकृत तथ्यों के आधार पर झूठे दावे किये जा रहे हैं.

NFIW  प्रगति महिला संगठन और मुस्लिम विमेंस फोरम ने सरकार से अपनी मांगे रखी है

1. हालात को सामान्य बनाने के लिए सेना और अर्धसैनिक बलों को वहां से हटा लें।
2. विश्वास पैदा के लिए सभी मामलों/एफआईआर को तुरंत रद्द करें और उन सभी को छोड़ दें, विशेष रूप से वे युवा जो हिरासत में और जेल में हैं, धारा 370 के निरस्त होने के बाद से।
3. व्यापक हिंसा और सेना और अन्य सुरक्षा कर्मियों द्वारा किये गए अत्याचारों पर न्यायिक जाँच हो।
4. परिवहन की अनुपलब्धता और संचार ठप होने के कारण उन सभी परिवारों को जिनके प्रियजनों को जान गंवानी पड़ी, उनको उचित मुआवजा मिले।

इसके अतिरिक्त:

• इंटरनेट और मोबाइल नेटवर्क सहित कश्मीर में सभी संचार लाइनों को तुरंत बहाल करें।
• अनुच्छेद 370 और 35 ए को पुनर्स्थापित करें।
• जम्मू और कश्मीर के राजनीतिक भविष्य के बारे में सभी निर्णय जम्मू और कश्मीर के लोगों के साथ बातचीत की प्रक्रिया के माध्यम से लिए जाएँ।
• सभी सेना कर्मियों को जम्मू और कश्मीर के नागरिक क्षेत्रों से हटाया जाय।
• सेना द्वारा की गई ज्यादतियों को देखने के लिए एक समयबद्ध जांच समिति का गठन किया जाय।

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सरोगेसी (विनियमन) विधेयक का बहिष्कारी चरित्र

– प्रमोद मीणा

फोटो: विकिपीडिया

मनुवादी पितृसत्‍ता स्‍त्री शोषण पर रोक लगाने के बहाने उल्‍टे पुंसवादी नैतिकता को ही जब तब स्‍त्री पर लादने की कोशिश करती देखी जाती है। एक ताजा मामले में किराये की कोख के चिकित्‍सकीय धंधे में दलालों के हाथों शोषित होने वाली सरोगेट माँ (अपनी गोद किराये पर देने वाली स्‍त्री) के उत्‍पीड़न पर लगाम लगाये जाने के नाम पर केंद्रीय मंत्रिमंडल से मंजूर सरोगेसी (विनियमन) विधेयक 2019 को लोकसभा ने भी पारित कर दिया है। यह विधेयक कोख के व्‍यापार को भारतीय संस्‍कृति और परिवार नामक संस्‍था के लिए खतरा मानकर जरूरतमंद गरीब स्‍त्री से सरोगेट माँ बनने का विकल्‍प छीन लेता है क्‍योंकि यह विधेयक वाणिज्यिक सरोगेसी से जुड़ी आपराधिक गतिविधियों पर रोक लगाने की जगह वाणिज्यिक सरोगेसी को ही प्रतिबंधित करने वाला है। यह विधेयक निकट कीस्‍त्री रिश्‍तेदार को ही नि:स्‍वार्थ सरोगेसी की अनुमति देता है।

           पुरुष केंद्रित परंपरागत द्विलिंगी परिवार संस्‍था से इतर संबंधों को अनैतिक मानने वाली कथित ‘भारतीय’ सरकार इस विधेयक के द्वारा समलैंगिक स्‍त्री-पुरुषों, अविवाहित एकल स्‍त्री-पुरुषों और विधवा या परित्‍यक्‍त स्त्रियों से बच्‍चे को जन्‍म देने का अधिकार छीन लेना चाहती है। यह विधेयक सहजीवी जीवन जी रहे स्‍त्री-पुरुषों को भी चिकित्‍सा विज्ञान की इस देन का इस्‍तेमाल बच्‍चे की प्राप्ति के लिए करने से वंचित करता है। स्‍पष्‍ट है कि केंद्र सरकार का सरोगेसी (विनियमन) विधेयक जहाँ परंपरागत द्विलिंगी अस्मिताओं से इतर लैंगिक अस्मिता रखने वाले लोगों को पुनरुत्‍पादन के प्राकृतिक अधिकार से महरूम करता है, वहीं स्‍त्री के गर्भ धारण करने के अधिकार पर भी परिवार संस्‍था की पहरेदारी बैठाता है।

            सरोगेसी जैसे महत्‍वपूर्ण विधेयक को बिना किसी व्‍यापक और गंभीर परिचर्चा के लोकसभा से पारित करवाया गया है। पहले भी दिसंबर, 2018 में जब इसे लोकसभा से पारित करवाया गया था, तो मात्र 9 सांसदों ने इस पर बहस की थी और वह भी मात्र दो घंटों की रस्‍मी चर्चा-परिचर्चा के बाद इसे पारित करवा दिया गया था। किंतु उस समय इसे राज्‍यसभा में प्रस्‍तुत नहीं किया जा सका था। सरकार की तरफ से तत्‍कालीन स्‍वास्‍थ्‍य मंत्री ने वाणिज्यिक सरोगेसी पर प्रतिबंध लगाने के पीछे भारतीय परिवार नामक संस्‍था को बचाने का उद्देश्‍य रेखांकित किया था और कहा था कि अगर परिवार चिकित्‍सकीय कारणों से शिशु को जन्‍म देने में अक्षम हो तो आधुनिक चिकित्‍सा विज्ञान द्वारा प्रदत्‍त सरोगेसी की तकनीक से बच्‍चे को जन्‍म देने का अवसर उस परिवार को दिया जाना चाहिए। स्‍पष्‍टत: आजीविका के लिए अपनी कोख किराये पर देने वाली गरीब स्‍त्री के हितों का संरक्षण करना इस विधेयक का उद्देश्‍य कभी रहा ही नहीं था। यह विधेयक तो भारतीय परिवार व्‍यवस्‍था किवां हिंदू परिवार व्‍यवस्‍था पर होने वाले वैकल्पिक लैंगिकताओं के हमलों का जबाव देने के लिए लाया गया था। इसके माध्‍यम से सरोगेसी के इस्‍तेमाल को वैवाहिक युग्‍मों तक सीमित करके विवाह संस्‍था से बाहर के संबंधों की वैधता को नकारा गया है। परित्‍यक्‍त और विधवा या अविवाहित स्‍त्री से सरोगेसी के माध्‍यम से बच्‍चे को जन्‍म देने का विकल्‍प छीनना नारीवादी आंदोलन के गाल पर भी तमाचा है।

            यद्यपि अपनी 228 वीं रपट में विधि आयोग ने वाणिज्यिक सरोगेसी में निहित आपराधिक लूट-खसोट और सरोगेट माँओं के साथ होने वाले अन्‍यायों का जिक्र किया था और उस रपट में वाणिज्यिक सरोगेसी पर प्रतिबंध की भी मांग की गई थी किंतु सरोगेसी के सामाजिक आयामों और लक्ष्‍यों पर बिना किसी अध्‍ययन के मात्र पुंसवादी नैतिकता के चश्‍मे से सरोगेसी पर प्रतिबंध लगाने के पक्ष में भारतीय विधि आयोग भी नहीं रहा है।

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            वास्‍तविकता तो यह है कि हमारी सरकारों के पास वाणिज्यिक सरोगेसी पर निगरानी रखने वाला कोई तंत्र ही नहीं रहा है। न कभी वाणिज्यिक सरोगेसी को मूर्त रूप देने वाले चिकित्‍सालयों को सूचिबद्ध किया गया और न कभी वाणिज्यिक सरोगेसी के लिए कोई आचार संहिता बनाई गई। जब वाणिज्यिक सरोगेसी के सकारात्‍मक-नकारात्‍मक पक्षों को लेकर केंद्र सरकार के पास कोई विश्‍वसनीय सर्वेक्षण और अध्‍ययन रिपोर्ट है ही नहीं, तो एक सिरे से वाणिज्यिक सरोगेसी को खारिज़ करने का कोई तुक नहीं बैठता। वैश्‍वीकरण के जिस दौर में भारत स्‍वास्‍थ्‍य पर्यटन के क्षेत्र में अपनी अपेक्षाकृत सस्‍ती और गुणवत्‍तापूर्ण स्‍वास्‍थ्‍य सेवाओं के कारण जिस तेजी से उभर रहा है, उस दौर में सरोगेसी के वाणिज्यिक रूप पर पूरी तरह से रोक लगाने से बेहतर है – निर्धन जरूरतमंद सरोगेट माँओं के पक्ष में वाणिज्यिक सरोगसी से पैदा अवसरों को कानून के दायरे में भुनाना।

            सरोगेसी के क्षेत्र में जारी आपराधिक लूट-खसोट और सरोगेट माँ बनने वाली स्त्रियों के शोषण पर रोक लगाने के लिए सरोगेसी की प्रक्रिया पर सख्‍़त निरीक्षण रखना और उसको विनियमित करने का ढांचा खड़ा करने की जो कोशिश यह विधेयक करता है, उसकी आवश्‍यकता से कोई इंकार नहीं कर सकता। इस विधेयक में सरोगेट माँ के उत्‍पीड़न का हेतु बनने वाले लोगों के लिए सज़ा के तौर पर 10 साल तक के कारावास और 10 लाख तक के आर्थिक जुर्माने का प्रावधान है। मानव भ्रूण आदि की खरीद-फरोख्‍़त और सरोगेसी के विज्ञापनों के लिए भी यही सज़ा मुकर्रर की गई है। सरोगेसी से जुड़े क्लिनिकों का पंजीयन भी अनिवार्य कर दिया गया है।

           किंतु इस विधेयक में निहित इन तमाम कठोर प्रावधानों के बावजूद भी शायद यह विधेयक वाणिज्यिक सरोगेसी पर व्‍यवहार में रोक नहीं लगा पाएगा क्‍योंकि चिकित्‍सा बाज़ार में वाणिज्यिक सरोगेसी के खरीददार ग्राहकों की मांग चोर रास्‍तों का बढ़ावा देगी। इस विधेयक में वैसे भी इस चोर रास्‍तों के लिए संभावनाएँ संकेतित कर दी गई हैं। उदाहरण हेतु सरोगेसी (विनियमन) विधेयक में परिवार के अंतर्गत पंजीकृत पति-पत्‍नी ही शामिल हैं किंतु जिस निकट संबंध अंतर्गत सरोगेसी को स्‍वीकृति दी गई है, उस निकट संबंध को अपरिभाषित ही छोड़ दिया गया है। हाँ, सरोगेट माँ बनने के लिए स्‍वयं को प्रस्‍तुत करने वाली इस निकट संबंधिनी पर युवा विवाहिता होने और पहले से ही एक बच्‍चे की माँ होने की शर्तें और लाद दी गई हैं। सरोगेट माँ बनने की इन अनिवार्य अर्हताओं के कारण सरोगेसी के माध्‍यम से शिशु की आस लगाये बैठे ‘वैध’ विवाहित युग्‍मों के लिए बच्‍चे को जन्‍म देने के अवसर कहीं ज्‍यादा कम हो जाने वाले हैं। वास्‍तव में जिस भारतीय (हिंदू) परिवार को बचाने के लिए सरकार वाणिज्यिक सरोगेसी पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की कवायद कर रही है, उसी परिवार में निहित पुंसवादी नैतिकता के चलते निकट संबंध में सरोगेसी के लिए अपनी कोख नि:स्‍वार्थ भाव से प्रस्‍तुत करने वाली युवा विवाहिता माँ मिलना लगभग असंभवप्राय: होता है।

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            इस विधेयक के अनुसार सिर्फ विवाहित भारतीय युग्‍म ही सरोगेसी तकनीक से बच्‍चे को जन्‍म देने के अधिकारी होंगे। इसका मतलब हुआ कि अनिवासी भारतीय भी अगर भारत आकर अपने निकट पारिवारि‍क संबंध में आने वाली किसी युवा विवाहिता और एक बच्‍चे की माँ की कोख का इस्‍तेमाल करके सरोगेट शिशु को जन्‍म देना चाहें, तो उन्‍हें इसकी अनुमति नहीं होगी।

            यहाँ यह भी ध्‍यातव्‍य है कि सरोगेसी की प्रक्रिया का सबसे अहम् चरण होता है – भ्रूण को आईवीएफ (इन विट्रो फर्टिलाइजेशन) प्रयोगशाला में संवर्धित करना। सरोगेट स्‍त्री के गर्भ में इस संवर्धित भ्रूण को स्‍थापित करना तो इस पूरी प्रक्रिया का सबसे अंतिम चरण होता है। अत: सरोगेसी के विनियमन से पहले तो सरकार को प्रजनन सहायक प्रौद्योगिकी विधेयक (असिस्‍टेड रिप्रोडक्टिव टेक्‍नोलॉजी विधेयक) को पारित करवाना चाहिए था जो लंबे समय से ठंडे बस्‍ते में पड़ा हुआ है। इस विधेयक को कानून का रूप देना बहुत जरूरी है ताकि प्रजनन सहायक प्रौद्योगिकी से जुड़े अपराधों पर रोक लग सके। आज हालात ये हैं कि सौ फीसदी सफलता का दावा करने वाले आईवीएफ क्लिनिक कुकुरमुत्‍तों की तरह जहाँ-तहाँ देखे जा सकते हैं। ये क्लिनिक शिशु के इच्‍छुक बांझ दम्‍पतियों को लूटने में लगे हैं। किसी भी प्रकार की चिकित्‍सकीय नैतिकता का ये पालन नहीं करते हैं। स्थिति की गंभीरता का आलम यह है कि किसी और के भ्रूण को भी ये आपका बताकर गर्भाशय में स्‍थापित कर देते हैं। 

            जो विदेशी पहले ही भारत की किसी आईवीएफ प्रयोगशाला में अपना भ्रूण सुरक्षित करवा चुके हैं, उनको भी यह सरोगेसी (विनियमन) विधेयक सरोगेसी की अनुमति नहीं देता है। लेकिन उनके ऐसे भ्रूणों की स्थिति पर विधेयक में विचार तक नहीं किया गया है। विधेयक सरलीकृत ढंग से विदेशी लोगों के भ्रूणों के भारत में आयात-निर्यात पर रोक लगाता है। इस विधेयक को कानून का दर्ज़ा देने से पहले उससे जुड़ी जटिलताओं पर अगर व्‍यापक राय-मशविरा किया जाता, तो इस तरह के महत्‍वपूर्ण मुद्दे नहीं छूटते।  

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           किसी भी तकनीक के अच्‍छे-बुरे, दोनों पहलू होते हैं। इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि सरोगेसी की प्रक्रिया से जन्‍मे बच्‍चों को विकलांगता आदि की स्थिति में उनके वास्‍तविक जैविक माँ-बाप द्वारा छोड़ने के मामले भी सामने आये हैं। वाणिज्यिक सरोगेसी के विरोधी तो यहाँ तक आरोप लगाते हैं कि मानव देह व्‍यापार के लिए भी सरोगेसी की तकनीक का दुरुपयोग किया जा रहा है। लेकिन दूसरी तरफ जैविक और चिकित्‍सकीय कारणों से बच्‍चे को जन्‍म देने में अक्षम लोगों के लिए सरोगेसी चिकित्‍सा विज्ञान के वरदान से कम नहीं है। सरोगेसी ने निर्धन स्त्रियों के लिए अपनी कोख किराये पर देकर आजीविका अर्जन का रास्‍ता भी वाणिज्यिक स्‍तर पर खोला है। दूसरे के बच्‍चे के लिए अपनी कोख उपलब्‍ध करवाना एक बहुत ही मानवीय और प्रशंसनीय कार्य है। और इसकी एवज़ में अगर कोई गरीब स्‍त्री अपनी आर्थिक बदहाली से उबरने के लिए अपेक्षित पारिश्रमिक की माँग करती है, तो इसमें गलत क्‍या हैॽ अस्‍तु, वाणिज्यिक सरोगेसी के कुछ नकारात्‍मक पक्षों के कारण उस पर पूर्ण रोक लगाना न्‍यायोचित नहीं कहा जा सकता। जरूरत थी वाणिज्यिक सरोगेसी के समुचित नियमन की ताकि बीच के लुटेरा दलालों पर अंकुश लगाया जा सकता, किंतु उल्‍टा वाणिज्यिक सरोगेसी पर ही पूर्णत: रोक लगा देने की कवायद की गई है। यह कवायद सीधे-सीधे स्‍त्री के गर्भाशय को नियंत्रित करने की पुंसवादी चाल है क्‍योंकि एक स्‍त्री को अपनी इच्‍छानुसार गर्भवती होने और दूसरे के गर्भ के लिए अपनी कोख का इस्‍तेमाल करने की अनुमति तो होनी ही चाहिए। अस्‍तु, वाणिज्यिक सरोगेसी को सुपरिभाषित आर्थिक अनुबंध की सीमा में लाया जाना चाहिए। सरोगेट माँ के स्‍वास्‍थ्‍य और खान-पान का समुचित प्रबंध और बीमा सुरक्षा की व्‍यापक व्‍यवस्‍था जरूरी है। वाणिज्यिक सरोगेसी को कानूनी अनुबंध के दायरे में लाकर ही सरोगेट माँ और सरोगेट शिशु को जन्‍म देने के इच्‍छुक माँ-बाप का एक-दूसरे के प्रति दायित्‍व सुनिश्चित किया जा सकता है। कानून बनाकर वाणिज्यिक सरोगेसी पर एकमुश्‍त रोक लगा देने से यह प्रक्रिया रुकेगी नहीं अपितु चोरी-छिपे ढंग से बदस्‍तूर जारी रहेगी, बल्कि इससे जुड़ा भ्रष्‍टाचार तथा शोषण और भी ज्‍यादा जोर पकड़ेगा। बाँझ स्‍त्री-पुरुष और अपनी कोख किराये पर उपलब्‍ध कराने वाली गरीब स्‍त्री, दोनों के हितों की रक्षा इसी में है कि वाणिज्यिक सरोगेसी का नियमन किया जाए, न कि उस पर प्रतिबंध लगाया जाए। इसे एक पेशे के रूप में कानूनी मान्‍यता दी जानी चाहिए। अपनी कोख किराये पर देने का महान मानवीय कार्य करने वाली स्‍त्री के लिए इसकी एवज में समुचित भुगतान सुनिश्चित किया जाना चाहिए। गर्भावस्‍था के दौरान और प्रसूति उपरांत भी सरोगेट माँ की नियमित चिकित्‍सकीय देखरेख का प्रावधान होना चाहिए। इसी के साथ-साथ परंपरागत परिवार के दायरे से बाहर भी लोगों को इसके इस्‍तेमाल की छूट मिलनी चाहिए क्‍योंकि अपने वर्तमान प्रारूप में सरोगेसी (विनियमन) विधेयक, 2019 बहुत ही ज्‍यादा बहिष्‍कारी प्रकृति का है। अत: इसे समावेशी बनाना जरूरी है। इसके साथ-साथ वाणिज्यिक सरोगेसी से जन्‍म लेने वाले शिशु के प्रति उसके जैविक माँ-बाप की जिम्‍मेदारी सुनिश्चित करने के लिए कानूनी बाध्‍यता भी जरूरी है। इसी प्रकार अपनी देह विकृत होने के डर से वाणिज्यिक सरोगेसी को शौक की तरह अपनाने की प्रवृत्ति पर पूर्ण विराम भी जरूरी है। स्‍पष्‍ट है कि सरोगेसी की पूरी प्रक्रिया के कानूनी ढंग से क्रियान्‍वयन को सुनिश्चित कर देने पर सरकार के लिए ऐसे किसी भी विधेयक की जरूरत ही नहीं रह जाएगी।

(संपर्क :– डॉ. प्रमोद मीणा, सहआचार्य, हिंदी विभाग, मानविकी और भाषा संकाय, महात्‍मा गाँधी केंद्रीय विश्‍वविद्यालय, जिला स्‍कूल परिसर, मोतिहारी, जिला–पूर्वी चंपारण, बिहार–845401, ईमेल – pramod.pu.raj@gmail.com, pramodmeena@mgcub.ac.in; दूरभाष – 7320920958 )

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