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रजनी अनुरागी की कवितायें

रजनी अनुरागी


रजनी अनुरागी कविता में एक महत्वपूर्ण उपस्थिति हैं . रजनी कविताओं के लिए शीला सिद्धान्तकर सम्मान से भी सम्मानित हैं . संपर्क:rajanianuragi@gmail.com



1.मां का बक्सा

बहुत दिनों से मां कलेजे से लगाए हुए थी बक्सा
उसे अपनी टूटी खाट के नीचे रखती थी
बड़ा-सा ताला लगा था
जब भी मौका मिलता वह उसे खोलती
जी भर देखती और किसी की आहट पाकर उसे बंद कर देती
कई बार बेटों को शक हुआ
अम्मा ने जरूर इसके अंदर छिपा रखा है माल
कई बार चोरी-छिपे चाभी ढूंढ़ने के असफल हुए प्रयास
बेटे कितनी बार मां से लड़ चुके –
‘अपनी बेटी को ही देगी सारा माल’
कह चुके थे सगे भाई-
‘अब बुढ़िया मरे तो माल मिले’

काल के चक्र से एक दिन मर गयी बुढ़िया
बेटों ने मरने की खबर पहुंचने से पहले चाबी ढुंढ़वायी
बड़े उत्साह से बक्सा खोला और देखकर रह गए दंग

उसमें थी
बेटों को बालपन में पहनायी काले धागे की तगड़ी
रंग-बिरंगे झुनझुने,  लोहे की तार पर कूदता-फिसलता बंदर
छोटी-छोटी कुछ चूं-चूं चप्पलें, कुछ छोटे छोटे स्वेटर
मोजे, दस्ताने,छठी के कपड़े,काजल की सूखी डिब्बी
कुछ पीतल के घुंघरू, पुराने काले-सफेद फोटो
कुछ फटी पीली जर्जर किताबें, लकड़ी के टूटे खिलौने
बेसब्र भाई एक-एक कर जल्दी-जल्दी
कूड़ा निकालकर फेंकने लगे
और फिर उन्होंने पलट दिया बक्सा

छोटे बच्चे उन्हें उठा-उठाकर चहकने लगे
बेटे गुस्से से हाथ-पांव फटकते हुए छीनने लगे
बच्चों के हाथों से तार पर झूलता मुंह चिढ़ाता बंदर
रख देना इसे भी बुढ़िया के साथ
रोते हुए बोले
हाय ! हाय ! यही कबाड़ ताले के अंदर

2. मां
मां सब कुछ सहेजकर रखती है
हमेशा संभालती है उन चीजों को जो हैं बेकार
खाली डिब्बे, रैपर ,पॉलिथीन,फटे-पुराने कपड़े , ब्रश
उसने आज तक नहीं फेंके पुराने टूटे बर्तन
चाय की पत्ती को भी वह बना देती है खाद
आज तक नहीं फेंकी मेरी छोटी फ्रॉक
मेरा लिखा पहला अक्षर उसके संग्रहालय में
आज भी सुरक्षित है

अब वह मुझे ठीक से नहीं देख पाती
हाथों  से देखती है मेरा चेहरा चेहरा
महसूस करती है मेरा दर्द   पोंछती है अपने आंसू
अब वह ऊंचा सुनती है   लेकिन मेरे बोलने से पहले ही
न जाने कहां से उस तक पहुंच जाती है मेरी आवाज
मेरे लिए बनाती है आलू की सब्जी
पूरी अचार और घीए का रायता
वह निकालती है मलाई से घी और वर्ष भर जोड़ती है
फिर बांट देती है
असली घी देकर होती है खुश

मैं बरस दर बरस फैलती जा रही हूं
वह कहती है तू कितनी बोदी हो चली है
सिर पर हाथ फैरते हुए बना देती है अब भी मेरी चोटी
बटा हुआ चुटिला और उसमें लटकते फुंदने
मेरी कमर पर थिरकने लगते हैं

उसके दिल की गठरी में नजरबंद हैं कई पुराने दर्द
कभी कभी वह उन्हें धूप दिखाती है
वरना बक्से में बंद ही रखती है
कुशल हाथों से तहाये हुए जीवन के सत्तर साल
वहां करीने से रखे हुए हैं
उनकी तहों में जब कहीं से पुरानी टीस निकल आती है
तो झटके से दबा देती है
वह किसी को बक्से से हाथ नहीं लगाने  देती
वह संपत्ति है  उसकी

सोचती हूं   क्या मैं भी एक दिन मां जैसी हो जाऊंगी
लेकिन मुझमें इतना सब्र कहां
कि चीजों को संभाल कर रख पाऊं
मैं अभी से चीजों को भूलने लगी हूं
दिखता है कम   हड्डियां हैं बेदम
और दर्द
दर्द तो अब होता नहीं शायद

3.मां के विदा होते ही

मां के विदा होते ही
बेटों ने संभाले ज़मीन जायदाद के कागज़ात
बहुओं ने सभाले ऐंटिक जेवरात
बेटियों को मिली पुरानी साड़ियों की सौगात
पर उनकी छोड़ी किताबों का न रहा कोई नाम लेवा

अब उन्हें कौन सम्भाले…??
मां के साथ ही क्रिया कर्म कर देते तो अच्छा था
कितना मना करते थे पर मां मानती ही कहां थीं
मरते दम तक किताबों में जाने क्या ढूंढ़ती रहती थीं
(वैसे भी मां की सुध किसे थी)
घर भर घेर रक्खा है इन रद्दी किताबों ने
अब किताबों  की अंतिम यात्रा शुरु होनी तय थी
किताबें पहुंचा दी गईं किसी सिरफिरे के पास
उसने ज़रुरत भर की किताबें छाटीं
बाकी कर दीं आगे पास
अगले ने उड़ती नज़र से बांचा
एक आध का हो गया उद्धार

किताबें बाट जोहती रहीं
बहुत सी किताबों को नहीं मिला कद्रदान
किस रास्ते जाएंगी किताबें
कहा भटकेंगी कोई नहीं जानता
किताबों की आंखें हैं नम
वे पहुंचा दी गईण कबाड़ी के द्वार
किताबों मे जगी नई आस
रिसाइकिल होकर फिर बन जाएंगी
किसी किताब का आधार

4.


किताबें और बेटियां
किताबें और बेटियां एक सी होती हैं
कभी भी उठकर पुकारा जा सकता है
कभी वर्षों तक बेखबर भी रहा जा सकता है
मगर जब भी पुकारो दौड़ी चली आती हैं
पुरानी मधुर स्मृतियों सी सुख दुख सांझा करतीं

५. प्रेम कविता

जब भी पुरुष पढ़तें हैं प्रेम कविता
चारों ओर वसंत सा छा जाता है
आंखों के लश्कारे तरल हो जाते हैं
स्मित मुस्कान के दिए जल जातें हैं सभागार में

और स्त्री की प्रेम कविता पर
प्रश्न आंखों की पुतलियों में अड़ जाते
दृष्टि राडार सी घूमने लगती
करने लगती है सवाल
( जैसे अनाधिकार क्षेत्र में प्रवेश कर लिया हो
या अवांछित सा कुछ कह दिया हो )
ढूंढ़ते लगते हैं किसी बेनाम को
देने लगते हैं उसके प्रेम को नाम

और यह स्त्री -पक्षधर हिन्दी समाज है ( !)

(  हिन्दी के एक प्रोफेसर और हिन्दी के आलोचक , जिन्हें प्रतिष्ठित  देवी शंकर अवस्थी सम्मान हासिल है , के द्वारा अपनी पत्नी की पिटाई का वीडियो मीडिया में  वायरल होने पर स्वाभाविक    सी प्रतिक्रया हुई . फेसबुक पर भी इस प्रसंग में सक्रियता रही. हमेशा की तरह इस मसले पर भी आपसी          संबंध निर्णायक भूमिका में आने लगे . दृश्य  चर्चित ‘ छिनाल प्रकरण’ और ‘ खुर्शीद प्रकरण’ से बहुत अलग      नहीं थे. यहाँ भी तर्कों -कुतर्को की बाढ़ आई , अपने से भिन्न मत रखने वाले के खिलाफ गाली और                  अवमानना की हद तक बातचीत हुई.  स्त्रीकाल के पाठकों के लिए फेसबुक पर इस सन्दर्भ में सक्रियता के        कुछ प्रसंग. इस प्रस्तुति में . अशोक आजमी , अनिता मिश्रा , अरविंद शेष , गीता श्री , अभिषेक श्रीवास्तव  शायक आलोक और मजदूर झा के फेसबुक वाल पर चली बातचीत को शामिल किया गया है.    )

पत्नी की पिटाई करता बी एच यू प्रोफ़ेसर

अशोक आजमी ( अशोक पांडे ) की फेसबुक वाल पर हुई बहस , अशोक जी की टिपण्णी से शुरू हुई : 

अशोक आजमी : डा कृष्णमोहन प्रकरण पर युवा कथाकार चन्दन पांडे ने अपने ब्लॉग नई बात पर एक टिप्पणी लिखी है. मैं नहीं जानता कि उस वीडियो में दिख रहे पिटाई के दृश्य को कैसे जस्टिफाई किया जा सकता है? हाँ यह ज़रूर मानता हूँ कि प्रेम हो जाने, तलाक़ या अलगाव में ऐसा कुछ भी अस्वाभाविक नहीं है..पर पिटाई!  खैर चन्दन की बात पढ़िए और फिर ख़ुद ही फैसला लीजिये : ( चन्दन पांडे ने अपने ब्लॉग पर डा कृष्ण मोहन का बचाव किया है . जिसे इस सिसिलेवार बातचीत के ठीक नीचे पढ़ा जा सकता है.)

अमलेन्दु उपाध्याय : चंदन पांडे ने जो लिखा है, वह घटना के चित्र देखते ही पहली नज़र में मेरे दिमाग़ में गया था। अब चंदन ने घटना के पीछे की पूरी कहानी भी बता दी है।……

अशोक आजमी : फिर भी क्या कृष्णमोहन का व्यवहार आपको सही लग रहा है?  भाई मामला तो पब्लिक में है ही। मैंने कल भी और आज भी उचित क़ानूनी कार्यवाही की मांग की है। कृष्णमोहन जी की पत्नी का बयान भी है टी वी पर। चन्दन कृष्णमोहन के मित्र हैं। उनकी रायल्टी का मामला भी उठा चुके हैं जब फेसबुक पर थे तो उनके बयान को भी एक तरफ़ा क्यों न माना जाए?

गीता श्री : घरेलू कलह, अलगाव, झगड़े ये सब होते हैं, पर इस तरह रोड पर सबके सामने पत्नी की पिटाई करेंगे और उसके बाद मनुष्य होने का दर्जा भी चाहिए, संभव नहीं. मारपीट सामने दिखाई दे रही है, हमारा रिएक्शन उस मार पिटाई को देख कर उपजा है. लोग क्या चाहते हैं, हम चुप रहें. सरेआम पिटाई होते देख कर भी उसे सच न मानें? आप लड़ाई को घर के अंदर निपटाएं. पत्नी के साथ सड़क पर ऐसा व्यवहार करेंगे तो निंदा तो होगी , चाहे इसे मीडिया ट्रायल कहें या कुछ और. आप कानून तोड़े और उस पर बात हो तो ये मीडिया ट्रायल, वाह. अशोक, इसीलिए मैंने कहा था, खुद लोग टीवी देखें और रिएक्ट करें. मैं तो चुप रहूंगी.

गीता श्री : अशोक, इस मर्दवादी समाज से मुझे कोई उम्मीद नहीं. मैं इसीलिए अपने पोस्ट में नाम नहीं लेती किसी का पर जो सामने दिखेगा, उस पर बात होगी, कौन रोक लेगा. शशि थरुर का मीडिया ट्रायल बंद करिए पहले, या जितने अपराधी हैं, रेपिस्ट हैं, जब तक अपराधी साबित नहीं होते, उन पर बात करना यहां बंद करिए. वो मीडिया ट्रायल नहीं है क्या? अपने परिचितो के साथ हो तो मीडिया ट्रायल और गैरो के साथ हो तो बड़े शुभचिंतक बन कर उभरना चाहते हैं लोग. दोहरे मानदंड समझ में आ जाते हैं. अपना पक्ष हमेशा स्पष्ट रखना चाहिए, नहीं तो शामत किसी के घर का दरवाजा खटखटा सकती है.

रश्मि मुन्द्रा माहेश्वरी :अमलेंदु जी का कमेंट पढ़कर बेहद हैरानी हो रही है। घटना के पीछे की पूरी कहानी बता दी है, अमलेंदु जी, आप भी बहुत जल्दी निष्कर्ष पर पहुंच गए हैं। खैर किसी भी स्थिति में मारपीट तो बेहद निंदनीय है ही। इसका बचाव किसी भी तरह से नहीं किया जा सकता। हरगिज नहीं…
मनोरमा सिंह : नहीं उनका व्यवहार बिल्कुल सही नहीं था बल्कि अगर ये अलग रहने और अदालत में तलाक का केस फ़ाइल होने के बाद उनकी पत्नी के जबरदस्ती घर में घुसने का मामला था तो उन्हें भी तुरंत पुलिस की मदद लेनी चाहिए थी, विडिओ फुटेज उनके कपड़े फट जाने के बाद से है जाहिर है कुछ जबरदस्ती उनके साथ भी हुई होगी अब ये साफ़ नहीं है उनकी पत्नी ने खुद के डिफेन्स में उनके कपडे फाड़े या उकसाने के लिए , जहाँ तक प्रेम की बात है तो ये दो लोगों का निजी मामला है कोई किसी से जबरदस्ती प्रेम नहीं करवा सकता ये भी उतना ही बड़ा सच है !

अमलेन्दु उपाध्याय : व्यवहार को हम अभी कैसे तय कर सकते हैं जब तक कि वस्तु स्थिति सामने न आए ?

रमाकांत राय : जब किसी मोहन जी को मालूम था कि मीडिया इसी ताक में है तो उन्हें पुलिस की मदद लेनी चाहिए थी। सड़क पर जो वे घसीट रहे हैं धक्का दे रहे हैं तो उसे कैसे जस्टिफाई करेंगे।
यह भी पूछा जाना चाहिए कि शिल्पी जी वहां क्या कर रही थी और उनका बेटा किस हैसियत से धक्का देकर निकाल रहा था। मीडिया ट्रायल कहकर इसे हल्का न करें प्लीज।

अम्लेन्दु उपाध्याय  : संदेह इसलिए है कि मीडिया साथ में क्यों गया था ? मतलब व्यूह रचना पहले से तैयार की गई थी। बाकी किसके किससे संबंध हैं, इस पर कोई टिप्पणी नहीं।
रश्मी मुन्द्रा माहेश्वरी : व्यवहार को हम अभी कैसे तय कर सकते हैं जब तक कि वस्तु स्थिति सामने न आए ?……………..लेकिन आपके पूर्वाग्रह तो आपने अपने पहले कमेंट में बयां कर ही दिए हैं। अमलेंदु जी, आपके कमेंट से स्पष्ट है कि चंदन जी ने जो कुछ अपने दोस्त के बचाव में लिखा है, उससे आपके सामने पूरी कहानी सामने ही आ गई है..

गीता श्री : रमाकांत जी की बात से सहमत हूं. जो चीजें साफ साफ दिख रही हैं, उससे कैसे इनकार कर सकते हैं ? हम गलत हो सकते हैं, जो दिख रहा है, वह क्या है? दो लोग मिल कर क्रूर तरीके से एक औरत को सड़क पर घसीट रहे हैं, मार रहे हैं और धक्का दे रहे हैं. क्या है ये सब???

अमलेन्दु उपाध्याय : जी रश्मि जी, बिल्कुल, चंदन ने कृष्णमोहन जी का पक्ष सामने रखा है, उससे सहमत होना या न होना आपका या मेरा विवेक है। जहां तक पूर्वाग्रह की बात है तो मेरा नहीं, आपकी बातों में झलक रहा है। मेरी आदत है मैं किसी भी घटना को केवल आंखों या कानों से ग्रहण नहीं करता। इसलिए किसी भी इल्जाम को प्रथम दृष्टया कतई स्वीकार नहीं कर सकता…

रश्मि..: चंदन पांडे ने जो लिखा है, वह घटना के चित्र देखते ही पहली नज़र में मेरे दिमाग़ में गया था। अब चंदन ने घटना के पीछे की पूरी कहानी भी बता दी है।……आपके इस कमेंट के बाद यदि आप मुझे पूर्वाग्रह युक्त बताते हैं तो , है आपको..

अम्लेन्दु : महोदया, मेरा पूर्वाग्रह इसलिए नहीं है क्योंकि मैं कृष्णमोहन जी से उतना ही परिचित हूँ जितना आपसे। न मेरी उनसे किसी बिजनेस में साझेदारी है न किसी आंदोलन वगैरह में। लेकिन आप कृष्णमोहन जी को फांसी देने को तैयार लग रही हैं।

अशोक : जी, शिल्पी अगर उनके घर में हैं तो हैसियत पूछने का हक किसी को भी नहीं. न वह बच्ची हैं, न कृष्णमोहन. अगर वे साथ रहना चाहें तो इसमें ग़लत मेरी नज़र में कुछ नहीं. यह आप किस आधार पर कह रहे हैं कि वह लड़का शिल्पी जी का है? मेरी जानकारी में यह ग़लत सूचना है आपके पास.

रश्मि : अमलेंदु जी, आपको मुगालता है कि मेरा परिचय यकीनन किसी से कम और किसी से ज्यादा है। आखिरी लाइन में फिर आपका एक और पूर्वाग्रह सामने आ गया है। तैयार लग रही हैं, आप विवेक का इस्तेमाल करके महज इतना भर बता दीजिए कि मेरी किस बात से आपको लग गया कि उन्हें मैं फांसी देने के लिए तैयार बैठी हूं??…उल्टा आप उनके बचाव के लिए कमर कसे बैठे हैं….!!!

अशोक :  और अमलेन्दु जी, इसे व्यक्तिगत लड़ाई में क्या बदलना दोस्तों. जो है सब सामने दिख रहा है. अपनी अपनी नज़र…

रमाकंत : मैंने कृष्ण मोहन जी के बेटे की बात की है शिल्पी जी के नहीं।
दूसरे, अगर तलाक नहीं हुआ है तो उनका रहना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है। बाकी आप समझ रहे हैं कि शिल्पी वहां क्यों थीं?

अनिता मिश्रा : मुझे पता था जी कि कल तक कुछ तर्क खोज लिए जायेंगे जिससे प्रोफ़ेसर साहेब का आसन विचलित ना हो। मैंने माना वो स्त्री बेहद बुरी थी पर उसको इस तरह लात घूंसों से सड़क पर पीटना। और विरोध करने वाले से कहना दूसरा पक्ष देखो ।जब सब सड़क पर है मामला तब निजी कहाँ रहा।और माफ़ करिए वीडियो में उनकी क्रूरता देख के जिसे उन्हें महान मानना हो माने।मै नहीं मान सकती।दुनिया की सबसे दुश्चरित्र और दुष्ट औरत पर भी क्यों हाथ उठाना कानून किसलिए है।

अशोक : रमाकांत जी, मेरे लिए यह नैतिकता का मामला नहीं है. कौन किसके साथ रहे, कानून से परे भी मेरे लिए यह पर्सनल च्वायस और म्यूचुअल अंडरस्टैंडिंग का मामला है. मेरी सारी आपत्ति उस हिंसक घटना से है. जैसा कि मनोरमा जी ने कहा किसी भी हाल में हिंसा की जगह पुलिस का आप्शन चुनना चाहिए था. तमाशा तो बन ही गया है. बनियान फटना कोई बम फटना नहीं है और वह पूरी घटना देखते हुए कहीं नहीं लगता कि कृष्णमोहन आत्मरक्षा में यह सब कर रहे हैं…इसीलिए यह निंदनीय घटना है. इसकी सज़ा मिलनी चाहिए.

रमाकांत : मैं जबाब में बातें कह रहा था। मैं भी इसे मानता हूँ कि कृष्णमोहन और उनके बेटे का किया कृत्य किसी भी तरह से उचित नहीं ठहराया जा सकता।

उपाध्याय प्रतिभा : स्त्री होना ही निर्दोष होने की निशानी नहीं है. तलाक की अर्जी के रहते साथ रहने की जिद के पीछे की मंशा शातिराना ही हो सकती है.

रमाकांत :  और विवाह विच्छेद से पहले यह कानूनन जुर्म है जिसे कृष्णमोहन जी कर रहे थे।

अशोक : मैं सहमत हूँ. लेकिन फिर भी पिटाई को और उस व्यवहार को जस्टिफाई नहीं कर सकता.

गीताश्री : मुझे भी अंदेशा था अनिता, इसीलिए मैंने बिना नाम लिए पोस्ट लिखा था. बचाव पक्ष यहां बहुत कैलकुलेटिव ढंग से उतरे हैं. हमारा कोई स्वार्थ नहीं. हमने जो देखा, उस पर प्रतिक्रिया दी. उनकी लड़ाई पुरानी है, पर लड़ाई की नौबत के पीछे जो बेवफाई है, उस पर कोई बात नहीं करता. एक प्रेम कथा का यह दुखद अंत सड़क पर लात घूंसो के साथ…और हम कुछ कहें को प्रो. साब के शान के खिलाफ. उनके दोस्त तिलमिला रहे हैं. और चोट खाई औरत.. जिसने कभी नौकरी नहीं की और पूरा जीवन इनके पीछे लगा दिया, उसे उम्र के इस ढलान पर क्या मिला? हमें पीड़ा होगी और हम बोलेंगे चाहे आप इसे मीडिया ट्रायल कहें. तब तो बिगाड़ के डर से इमान की बात न कहें हम…

अशोक : रमाकांत जी, जार्ज फर्नांडीज जीवन भर पत्नी के साथ नहीं किसी और महिला के साथ रहे, ऐसे पचास उदाहरण है. प्रेम जबरदस्ती नहीं हो सकता. वह बयान भी सुनिए कृष्णमोहन जी की पत्नी का (उनका नाम नहीं याद मुझे) जिसमें वह कहती हैं, जीवन भर तलाक़ नहीं दूँगी. तो उचित वह बयान भी नहीं है.
खैर वह मेरे लिए अभी बहस का मुद्दा नहीं.

अशोक : मैं यह नहीं समझ पा रहा था कि प्रेम विवाह, कामरेडरी के इतने वर्षों बाद रिश्ता इतना कटु कैसे हो सकता है? क्या शान्ति से दो लोग रह नहीं सकते तो अलग भी नहीं हो सकते?

रमाकांत : और यह मारपीट नई नहीं है। उनको जानने वाले जानते हैं कि वे पहले भी घरेलू हिंसा में संलग्न रहे हैं। यह सबके सामने ऐसे आया है।

अशोक : दिक्कत यही है कि आप इसे नैतिकता के किसी शुद्धतावादी पैमाने पर देख रहे हैं, मैं नहीं. मैं इस आधार पर न जार्ज को ग़लत ठहराता हूँ न ही गुजरात की वर्तमान मुख्यमंत्री को. दिग्विजय सिंह का तो खैर केस ही अलग है. जीवन भर अविवाहित रहकर भी डा कॉल की पत्नी से रिश्ता निभाने वाले अटल बिहारी बाजपेयी से भी मुझे कोई दिक्कत नहीं.मेरी दिक्कत हिंसा और उत्पीडन से है. और प्लीज़ बहस को भटकाइए मत.

श्रुति कुमुद : आप सब पहले ही फैसला ले चुके हैं इसलिए देख कर भी नहीं देखते. मामला पिटाई का नहीं है. मामला घर में जबरिया घुसने का है और न घुसने देने का है. जब दो जने अलग अलग रहने का फैसला किया है तो वो जबरिया क्यों घुसना चाह रही हैं ?

रश्मि : मुझे नहीं लगता कि यहां कोई भी केवल और केवल उसी दृश्य को सच्चाई मान रहा है। हां, हम इतना जरूर कह रहे हैं कि पीछे भले ही दोनों ही पक्षों की सही गलत स्थितियां हों, , फिर भी जो सामने है, वो तो यकीनन बेहद निंदनीय है।

दुनिया भर में ७० % से अधिक महिलाओं ने अपने जीवन में वैवाहिक हिंसा को किसी न किसी रूप में झेला है

अशोक : एकदम रश्मि जी, यही कह रहा हूँ तबसे.

गीता श्री : जबरिया घुसेंगी तो मारपीट करेंगे? पुलिस को बुलाएं, घर के अंदर बात करें, सड़क पर लाकर मारेंगे और धक्का देंगे, घसीटेंगे, छड़ी लेकर खदेड़ेंगे?

श्रुति : यह तर्क आपका बेहद सही है गीता जी. जबरिया घुसने वालों की पहले आरती उतारिये, लेकिन उसे कोई दोष मत दीजिए.

रश्मि : पुलिस को बुलाएं, घर के अंदर बात करें vs आरती उतारें, वाह क्या तुलना है…!!!

श्रुति : वाह क्या समझ है कि घर से बाहर निकालने को मारपीट कहा जाए !!

अशोक : खुदा करें कि आपको कभी यह आरती न झेलनी पड़े श्रुति जी. अगर वह वीडियो आपको हिंसक नहीं लगता तो आपकी आँखों पर ज़रूर को मोटा पर्दा है.धन्यवाद रश्मि जी.

उपाध्याय प्रतिभा : बेशक कृष्णमोहन की हरकत निंदनीय है, इसके लिए प्रोफ़ेसर महोदय पर कार्यवाही होनी चाहिए. लेकिन यह स्थिति आई क्यों? तलाक का केस होते हुए घर में स्वयम घुसने की ज़रूरत क्यों आ पड़ी?
जैसे खुर्शीद अनवर के मामले में एक प्रश्न ही समस्या का मूल है कि वह लड़की किसी अनजान के घर पर अकेले क्यों रुकी , ठीक वैसे ही यहाँ प्रश्न है कि तलाक का केस चल रहा है , तो प्रोफ़ेसर साहब के घर क्यों जाया गया? चन्दन पांडे द्वारा दी गई इस जानकारी से पहिले क्या मिडिया ने यह बताया कि उनका तलाक का मामला चल रहा है? क्या किसी मामले में पुलिस तुरंत आ जाती है?

अरविन्द शेष : किसी भी दलील पर कोई अगर उस महिला को उस तरह पीटे-घसीटे जाने का समर्थन या बचाव कर रहा है, तो उसके दिमागी विकास पर तरस खाना चाहिए। उस खास आपराधिक घटना (पीटते-घसीटते हुए घर से बाहर फेंकने) के प्रत्यक्ष होने के बावजूद अगर कोई इस घटना की “पृष्ठभूमि” की व्याख्या परोस रहा है तो जाने-अनजाने वह एक अपराध और आपराधिक प्रवृत्ति की हिमायत और उसका बचाव कर रहा है।अपने ऊपर ऐसा कोई भी हमला किसी भी महिला को किसी भी हाल में बर्दाश्त नहीं करनी चाहिए। वरना पहले एक ऐसी संस्कृति और सामाजिक व्यवस्था बनाइए जिसमें एक स्त्री भी ऐसे मामलों में “बराबर” का व्यवहार करे! अपने पति से दिक्कत होने पर उसे ऐसे ही पीटे, घसीटे और लतियाते हुए घर से बाहर फेंके। और ऐसा करते हुए वह उतनी ही सहज रहे, जितना वह कथित बुद्धिजीवी और उसके झंडाबरदार दिख रहे हैं…!

अशोक : क्या आप कहेंगे कि मारपीट नहीं हुई? वह हुई है और मेरे लिए निंदनीय है दो पुरुषों का लाठी डंडा लिए एक महिला को पीटना।

अरविन्द शेष : ज्यादा अफसोसनाक यह है कि इस बहाने फिर महिलाओं और दलितों-वंचितों के हक की रक्षा के लिए बने कानूनों के दुरुपयोग का राग अलापा जा रहा है…!

श्रुति : अरविन्द जी, दिमागी विकास जैसे मुहावरों से बचना चाहिए. आपको नहीं लगता कि बिना पढ़े बात करना भी दिमागी विकास वाले मुहावरे की श्रेणी में आता है. या क्या यह मूर्खता की श्रेणी में नहीं आता कि जब लेखक दो बार इस बात की दुहाई दे कि वह न्याय का पक्षधर है फिर भी हम इसलिए तड़प रहे हैं क्योंकि उसने किसी का पक्ष लिखा. तो क्या यह मान लिया जाए कि आज के बाद जितने भी अपराध होन्गे, उसमें “तथा कथित” अपराधी का पक्ष लिखना गलत होगा !! वाह ! यह सिर्फ कोई मूर्ख ही कहेगा कि वो प्रस्तुत वीडियो की निन्दा नहीं कर रहा. यह तो मानी हुई बात है. पर आपका और अन्य साथियों का यह तर्क गजब है कि किसी भी कार्रवाई के लिए वह वीडियो अंतिम सत्य मान लिया जाए.

श्रुति : आलेख में साफ तौर पर लिखा है कि अधिकारियों ने यह बात अप्रतक्ष्य तौर पर स्वीकारी है.
अरविन्द शेष : मैंने उस महिला को उस तरह पीटे-घसीटे जाने का समर्थन या ऐसा करने वालों का बचाव करने वालों पर सवाल उठाया है। अगर कोई उस महिला को इस तरह पीटे-घसीटे जाने और घर से बाहर फेंके जाने को गलत मानता है तो उसे मेरी बात से कोई परेशानी नहीं होगी। हमारे सामने पीटने-घसीटने और घर से बाहर फेंके जाने का संदर्भ है और मैं हर हाल में उसकी निंदा करता हूं, उसकी पृष्ठभूमि चाहे जो हो..

गीता श्री : कुमुद जी, पहली बार यहां इतनी सक्रिय दिखाई दे रही हैं, साथियो, कोई बड़ी वजह है कि वे इस तेवर और भाषा में बात कर रही है. मुझे अफसोस है कि वे लगातार बचाव के लिए गलत दलील देती जा रही हैं. अच्छा ये है कि वे मेरी लिस्ट में नहीं हैं, न कभी होंगी. उनका हर तर्क लचर और उनके बनारस कनेक्शन की ओर संकेत करता है. दुखद.

( यह वाद -प्रतिवाद और भी लंबा है , इसमें वे लोग भी शामिल हैं , जो खुर्शीद प्रकरण में उनके बचाव में गाली गलौच कर रहे थे .  यहाँ संक्षिप्त प्रस्तुति है )

कथाकार चन्दन पांडे के द्वारा उनके ब्लॉग पर कृष्ण मोहन का बचाव : 


मीडिया के शिकार होते जा रहे डॉ. कृष्णमोहन के मामले का सच 

डॉ. कृष्णमोहन और किरण का मुद्दा स्त्री-पुरुष के साथ दो इंसानों का भी है. सीमित समझ की पतित मीडिया ने इसे पीड़ित स्त्री बनाम प्रताड़क पुरुष बना दिया है. यहाँ तक कि प्रशासन भी मक्कार मीडिया के दबाव में कार्र्वाई करने की बात, अप्रत्यक्ष तौर पर, स्वीकार रहा है. इससे शायद ही किसी को गुरेज होगा कि सबको न्याय मिले पर ऐसा भी क्या भय खाना कि आप दूसरे की गर्दन देकर अपनी गर्दन बचाएँ.
ऐसे में यह बेहद जरूरी है कि सच सामने हो.
यह बात दुहरा देना चाहता हूँ ( ताकि लोग “कौआ कान ले के भागा” वाले अन्दाज में हमला न करें ) कि किसी भी मामले में न्याय ही अंतिम पैमाना होना चाहिए और हम सब उसकी तरफ हैं जो निर्दोष है पर इसका क्या अर्थ कि हम मामले को जाने भी नहीं ? तो आखिर यह फैसला कैसे होगा कि कौन निर्दोष है और कौन दोषी ?
मामला यह है कि इनके बीच अलगाव/ तलाक से सम्बन्धित मुकद्मा न्यायालय में है. किरण घोषित तौर Krishna Mohan से अलग रहती है. इस बाबत उनके बीच समझौता भी हुआ था कि तलाक होने तक वो दोनों अलग रहेंगे. एक निश्चित माहवार भत्ता भी तय हुआ था. कोई भी यह समझने की कोशिश नहीं कर रहा है कि जब अलग रहना तय हुआ है तो क्यों किरण बार बार घर में प्रवेश करने की जुगत लगाती रहती हैं ?
यह कई मर्तबा हो चुका है जब किरण ने मीडिया के सह-प्रायोजन में कृष्णमोहन के घर के सामने धरना प्रदर्शन या घर में भीतर जाने की कोशिश की हैं. ध्यान रहे कि मामला जब अदालत में है तो मेरी समझ के बाहर यह है कि जबरिया घर में घुसने की कोशिश को क्या कहा जाए ? अगर कोई ‘हिडेन अजेंडा’ न होता तो किरण को मीडिया और पुलिस के लाव-लश्कर के साथ घर में घुसने की कोशिश का कोई मतलब नहीं था. कायदे से उन्हें न्यायालय के निर्णय का इंतजार करना चाहिए. सस्ते सिनेमा के अलावा यह कहीं भी सम्भव नहीं दिखता कि तलाक की अर्जी भी पड़ी रहे और साथ साथ रहा भी जाए. यह भी ध्यातव्य हो कि किरण अपना सारा सामान घर से लेकर बहुत समय पहले ही जा चुकी हैं. अगर उन्हें कोई सुबहा है तो उन्हें पुलिस में शिकायत दर्ज करानी चाहिए. लोमड़ी मीडिया को थानेदार बनाने का शगल गलत है.मानवाधिकार व्यक्ति के, भी, होते हैं, सिर्फ समूह के ही नहीं.
घर से अलग रहने का निर्णय लेने के बाद, अदालत की कार्र्वाई के दरमियान, घर में घुसने की कोशिश क्या इस कदर निर्दोष है ? वो भी तब जब आप पहले से ही अलग रह रहें हों. या क्या भारतीय व्यव्स्था ने ठान लिया है कि दो ही छोर पर रहना नसीब है, एक छोर जिसमें आप स्त्री को इंसान भी न समझे और दूसरा छोर यह कि स्त्री होना ही निर्दोष होने की निशानी हो.
जिस वीडियो का हवाला मन्द-बुद्धिजीवी, मीडिया और साथी, दे रहे हैं उन्हें यह भी देखना चाहिए कि आखिर उस विडियो में कृष्णमोहन के कपड़े फटे हुए हैं. और कोई भी समझ सकता है कि वह वीडियो घर में घुसने की जिद और न घुसने देने की जद्दोजहद की है. यह सारा मामला उन्हें उकसाने के लिए प्रायोजित किया गया था. आखिर वही मीडिया इस बात का जबाव क्यों नहीं देता कि जब अलग रहना तय हुआ था तो किरण वहाँ क्या कर रही थीं ? अगर उन्हें शक था तो क्या उन्हें कानूनी मदद नहीं लेनी चाहिए थी ? घर में घुसकर तमाशा करना भी एक नीयत हो सकती है. वरना जहाँ प्रेम विवाह रहा हो, वहाँ ब्याह के इतने वर्षों बाद दहेज उत्पीड़न के तहत मामला दर्ज करना साफ नीयत का मामला नहीं है.
उस वीडियो को बनाने वालों से यह क्यों न पूछा जाए कि जिस स्त्री के पक्ष में तुम वीडियो उतार रहे हो, अगर – तुम्हारे अनुसार – उस पर जुल्म हो रहा था तो तुम कैमरा पकड़ने की बजाय उस स्त्री को बचा भी तो सकते थे.
अभी जो आतंकवादी मीडिया को समझने की कोशिश नहीं कर रहे हैं उन्हें ध्यान देना चाहिए कि पिछले दिनों इस मीडिया ने खुर्शीद अनवर का क्या किया. बाजार की पतलून के पिछले हिस्से से गिरा यह मीडिया स्त्री-पुरुष मामलों में इतना एकतरफा होता है कि इसके सामने आप अपनी बात भी नहीं रख सकते.
मैं इन्हें व्यक्तिगत तौर पर जानता हूँ. अपनी इस उम्र तक मैं जितने भी लोगों से मिला हूँ उसमें शायद ही कोई मिला हो जो कृष्णमोहन के स्तर का हो. गज़ब के इंसान हैं. मैने देखा है कि इंसान तो इंसान अपने कुत्ते की मामूली बीमारी तक में वे अन्दर से परेशान हो उठते हैं. घर के सभी सदस्यों का ख्याल रखना कोई उनसे सीखे. ऐसे में टुकड़े टुकड़े खबरों से किसी को परेशान किया जाता हुआ देखना दु:खद है.और इतनी तो इल्तिजा कर सकता हूँ कि पुलिस अपनी किसी भी कार्र्वाई में मीडिया के दबाव को कारण न बनाए.

महिलाओं को संबोधित कर गाली देने वाले हिन्दी वि वि के पूर्व कुलपति विभूति राय के खिलाफ प्रदर्शन

अनिता मिश्रा  अपनी वाल पर : बेरहमी से अपनी पत्नी की पिटाई करके घर से निकालते ये जनाब कोई साघारण व्यक्ति नहीं हैं। ये जाने कितनी डिग्रियां ले चुके नामचीन प्रोफेसर और लेखक हैं। ये प्रतीक भर हैं उस समाज के जो बौद्धिक होकर भी सिर्फ ” मर्द ” ही बना रहता है। इनके अंदर के सामंती मर्द की ताकत सिर्फ स्त्री पर निकलती है। कितने सेमीनारों में, किताबों में स्त्री समानता पर ना जाने क्या -बोला होगा पर मेरी नज़र में इनका सारा ज्ञान ”गोबर” है और किताबें ”कूड़ा” अगर ये इतनी तमीज नहीं सीख पाये कि एक स्त्री के साथ कैसे पेश आया जाता है। वैसे कई किस्से सुन कर मैं इस गलतफहमी से बाहर आ चुकी हूँ कि लेखक या आर्टिस्ट संवेदनशील व्यक्ति होता हैं।
( अगर ये फोटो बाहर ना आते और ये महिला डोमेस्टिक वायलेंस का केस करती तब तमाम इनके जैसे इनके पक्ष में कहते कि कानून का दुरूपयोग कर रहीं है स्त्रियां )

गीता श्री की वाल पर कथाकारों की अपील :
हम हिंसा का प्रतिरोध करते हैं।

हम इक्कीसवीं सदी के तकनीकि युक्त अत्याधुनिक समय में जी रहे हैं लेकिन लगता है जैसे सदियों पूर्व की तरह आज भी, स्त्री को सामाजिक रूप से इंसान समझने या इंसानी बराबरी में देखना तक गवारा नहीं है । स्त्री के लिए समानाधिकार और न्याय आज भी किसी अनसुलझी पहेली की तरह है तब आधुनिकीकरण की बातें सुनना या कहना ठीक “दिल बहलाने को ग़ालिब ख़याल अच्छा है” की तरह ही लगता है। स्त्रियों के मानसिक, शारीरिक, और दैहिक उत्पीड़न की ख़बरें सुनने या पढ़ने से शायद ही कोई व्यक्ति या वक्त अछूता रहता हो।
तभी आलोचक कृष्ण मोहन द्वारा अपनी पत्नी के रूप में एक स्त्री के साथ किये गए अमानवीय और हिंसा की घटना को भी इससे इतर नहीं देखा जा सकता। पति-पत्नी या स्त्री-पुरुष के बीच वैचारिक मतभेद, आंशिक विवाद या बहस एक सहज स्वाभाविक इंसानी प्रक्रिया है लेकिन उसकी परिणति का स्त्री हिंसा तक पहुंचना बेहद निंदनीय और शर्मनाक है। यहाँ हमारा काम किरण जी और कृष्ण मोहन के बीच हुए विवाद पर चर्चा करके किसी भी व्यक्ति के निजी और व्यक्तिगत जीवन में दखल देने का नहीं है और न ही यह जांचने और फैसला करने का कि किसकी कितनी और क्या ग़लती थी । यह जानने, जांचने और फैसला सुनाने का काम क़ानून का है, हमारा नहीं।
यहाँ हमारा मकसद उस क्रूरतम अमानवीय प्रवृति की भर्तसना करना है जो पुरुष द्वारा की जाने वाली स्त्री हिंसा के रूप में समाज में देखने को मिलती रही है। देखने के लिए भले ही यह महज़ शारीरिक हिंसा हो किन्तु गहरे और बड़े संदर्भों में ऐसे सभी कृत्य, डरा धमका कर, स्त्री को सामाजिक समानाधिकार और न्याय से वंचित रखने की परोक्ष कोशिश हैं। इसलिए भी न केवल हमें बल्कि दुनिया के हर जिम्मेदार व संवेदनशील व्यक्ति को ऐसी प्रवृतियों और अमानवीय कृत्यों की न केवल निंदा करनी चाहिए बल्कि इनके खिलाफ आवाज़ उठाकर खुद के जिन्दा होने का सुबूत भी देना चाहिए।
किरण जी के साथ हुई यह समाज की पहली घटना नहीं है। ऐसी घटनाएं लगभग हर रोज ही असंख्य शिक्षित-अशिक्षित स्त्रियों के साथ घरों में या सार्वजनिक जगहों पर घटित होती हैं किन्तु कतिपय कारणों से प्रकाश में नहीं आ पातीं। हालिया घटना के वस्तुगत यह वक्तव्य उन तमाम पीड़ित महिलाओं के पक्ष में हमारी आवाज़ है। तब ज़ाहिर है यहाँ हमारा उद्देश्य कृष्ण मोहन को सार्वजनिक रूप से अपमानित करना या व्यक्तिगत रूप से विरोध करना नहीं है । यह विरोध उस प्रवृति से है जो कृष्ण मोहन जी ने पत्नी किरण जी के लिए अपनाई जो सामाजिक रूप से अशोभनीय है।
जबकि हर विवाद और समस्या का समाधान आपसी संवाद और न्यायायिक रूप से भारतीय संविधान में अंतर्निहित है। बावजूद इसके महिलाओं के प्रति होने वाले ऐसे घिनौने और अमानवीय कृत्यों का हम सामूहिक रूप से एक स्वर में विरोध करते हैं तथा किरण जी और अनेक ऐसी पीड़ित स्त्रियों के लिए न्यायायिक इन्साफ़ और सामाजिक सम्मान की मांग करते हैं।

अभिवादन के साथ
कथाकार समूह

सत्यनारायण पटेल, अमिताभ राय, एम.हनीफ. मदार, सूरज प्रकाश, गीता श्री, तेजेन्दर शर्मा, कविता, सुभाष चन्द कुशवाह, आकांक्षा पारे काशिव, जयश्री राय, विभा रानी, मनोज कुलकर्णी, बहादुर पटेल, चरण सिंह पथिक, भागचन्द गुर्जर, संदीप मील, कैलाश वानखेड़े, आशीष मेहता, संजय वर्मा, प्रेरणा पांडे, विपिन चौधरी, योगेन्द्र आहुजा, कात्यायनी, सत्यम, जीवेश चौबे, तरुण भटनागर, यामिनि सोनवने, अनिता चौधरी, ममता सिंह, युनूस ख़ान, हिमांशु पंड्या, रोहिणी जी, राकेश बिहारी, प्रज्ञा पांडेय

हिन्दी जगत की एक प्रतिक्रया : संयोग अच्छा है कि अभियुक्त कृष्ण मोहन न तो कहीं किसी संस्थान के हेड हैं और न नियुक्तियां करने -करवाने , पैनल में जाने वाले प्रोफ़ेसर . नहीं तो  हिन्दी विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति द्वारा महिलाओं को गाली देने के बाद विरोध और हस्ताक्षर करने वालों का हस्र यह समाज देख चुका है !

अरविन्द शेष  अपनी वाल पर : एक पत्नी-पति के बीच तलाक की प्रक्रिया पूरी नहीं हुई, संपत्ति संबंधी विवाद (पति की संपत्ति में महिला का अधिकार) का कानूनी तौर पर निपटारा नहीं हुआ… और हम यह मूर्खाना सवाल उठाने में लगे हैं कि वह महिला पति के घर में गई क्यों..! यह सवाल जितना सामाजिक-संवैधानिक अधिकारों के सामंती दमन के “पुरुषार्थ” का है, उससे ज्यादा इसके मूल का है, जहां पितृसत्तात्मक मर्दाना कुंठा के बूते स्त्री पर शासन, उसे गुलाम बनाए रखने की सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्था रची जाती है। फिर अगर उस लाचार “मर्द” ने पत्नी के हंगामे से “मजबूर” होकर उसे पीटा-घसीटा और घर से बाहर फेंका तो वह महिला किस बात से कथित हंगामा करने पर मजबूर हुई? पीटने-घसीटने और घर से बाहर फेंकने के लिए “वजह है” महिला का हंगामा, और महिला ने अगर हंगामा किया, तो उसकी वजह? उसे नहीं खोजेंगे? प्रगतिशीलता का पाखंड ओढ़ा जाता है तो हम इसी तरह के दोहरे पैमानों की सौदागरी करते हैं। और किसी भी स्त्री के पास इस व्यवस्था से लड़ने के लिए अगर पुरुष-सत्ता के बरक्स बराबर के तौर-तरीके होते तो वह किसी कथित “सुनियोजित” तरीके का इस्तेमाल नहीं करती। पहले हम बराबरी की वह व्यवस्था तैयार करें, फिर स्त्री के खिलाफ चिचियाएं कि तुमने “युद्ध” में फलां तरीके क्यों अपनाए, चिलां का सहारा क्यों लिया…! इसके अलावा, जब उसके पति के घर में जाने को ही उसके उस तरह पीटते-घसीटते हुए बाहर फेंक दिए जाने की वजह के तौर पर पेश किया जाएगा तो फिर स्त्री के भी कानूनी-सामाजिक-राजनीतिक अधिकारों का सवाल उठेगा। एक सवाल यह है कि अगर कोई महिला दूसरी शादी कर लेती है और गुजारा भत्ता का दावा भी करती है, तब हम वीर-बहादुरों का स्टैंड क्या होगा? इसी लोकेशन से यह भी पूछा जाएगा कि अगर तलाक की प्रक्रिया अधूरी है तब किसी पुरुष को अपनी पत्नी को अपने घर से बाहर फेंकने के लिए पीटने-घसीटने का अधिकार किसने दिया? कथित सहजीवन से किसी को दिक्कत नहीं है। लेकिन अगर यह किसी के अधिकारों का दमन करके चलता है तो दमित व्यक्ति को विरोध करने का अधिकार है। उस विरोध का स्वरूप क्या होगा, यह हम नहीं तय करेंगे।
और हमारे जैसे लोग जो क्रांति और प्रगतिशीलता का परदा अपने थोबड़े पर टांगे फिरते हैं, अगर शासक और शासित, दमनकर्ता और दमित की पहचान नहीं कर पाते, उस व्यवस्था की परतों को जानबूझ कर ढके रहते हैं, तो ऐसा हमें घोषित तौर पर करना चाहिए कि हम असल में कूढ़मगज दक्षिणपंथी सामाजिक सत्ताधारी मर्द हैं जो अपने हर पाखंड से एक सामंती मर्दाना व्यवस्था को खाद-पानी पहुंचाते हैं, मजबूत करते हैं।

अभिषेक श्रीवास्तव अपनी वाल पर  कौन कहता है कि हिंदी साहित्यं के आलोचकों को मीडिया नहीं पूछता? शर्त ये है कि आलोचना दमदार होनी चाहिए… बौद्धिकता और विवेक से मुक्तन एकदम फिजि़कल… डायरेक्ट .

शायक आलोक : ” देखिये विभूति जी .. आपने जो छिनाल कहा तो उसके लिए हम आपका सार्वजनिक अपमान या व्यक्तिगत विरोध नहीं करना चाहते .. वो क्या है कि हम काहे आप से सींग टकरायें .. हे हे हे .. है कि नहीं .. हम तो बस इस प्रवृति का विरोध करते हैं ” ..

…………………एक सच यह भी…….
हिंदी वालों महानुभावों .. अपने शब्दजाल से दुनिया को बेवकूफ बनाना बंद करो.. रीढ़ की हड्डी चाहिए होती है सही को सही और गलत को साफ़ साफ़ गलत कहने के लिए .. वहां स्पष्टीकरण नहीं होता .. लानतें भेजता हूँ तुम्हें .. शर्मसार किया तुम लोगों ने मुझे ..

सन्दर्भ : कृष्ण मोहन को हिंदी वालों की फेसबुक चिट्टी ..
**विभूति प्रकरण को याद किया मैंने हायपोथेतिकल संवाद के साथ

मजदूर झा अपनी वाल पर : डॉ. कृष्णमोहन का सच चाहे जो भी हो, जिस तरह से उन्होने अपनी पत्नी को सरे-आम पीटा है, इसकी वकालत करना वहशी समाज का समर्थक होना है। चन्दन पांडे ने जिस चालाकी के साथ उनकी वकालत की है, आश्चर्य से कम नहीं है। मैं उनसे कहना चाहूँगा कि आप निर्दोष और दोषी की तलाश जिस लोकतान्त्रिक ढांचे में रहकर करना चाहते हैं, उनका पीटना क्या इसी लोकतान्त्रिक अधिकार के दायरे में आता है? आपने कहा कि दोनों के बीच तलाक का फैसला होना है, भत्ता बंद इसलिए किया गया क्योंकि वो ज्यादा पैसे मांगने लगी… समूची घटना को आपने घटिया पुरुष मानसिकता के नज़रिए से देखा है। ये तलाक देने कि कोई उम्र-सीमा होनी चाहिए कि नहीं? एक परिवार में पढ़ने-लिखने का मौका या अन्य सुविधाएं पुरुष को पहले दी जाती है, वह उन सुविधाओं के दम पर व्यवस्थित होता है, तब जाकर उसे अपने लेबल के लोग ज्यादा पसंद आते हैं, तलाक कि प्रक्रिया डॉ. कृष्णमोहन जी के उम्र में ऐसे ही शुरू होता है, फिर जब आपकी पत्नी या घर वाले आपको बनाने में लगे होने के कारण किसी लायक नहीं बचते हैं, तब आप उनको तलाक देते हैं या किनारा कर लेते हैं। ये कौन सा न्याय है चन्दन बाबू? जब गुजारा भत्ता आप दे रहे थे, तो अचानक बंद क्यों कर दिया. ‘और ज्यादा मांगने लगी’ तो आपने बंद ही कर दिया। यह तर्क बेवकूफ़ों को भी बेवकूफ बनाने में कारगर साबित नहीं होगा। मामला जब कोर्ट में था, जब तलाक की पूरी प्रक्रिया समाप्त नहीं हुई थी तब आपने किस अधिकार से अपनी प्रेमिका को अपने घर में रहने दिया या रख लिया। और यहीं मैं आपको यह भी बताना चाहूँगा कि जब तक यह प्रक्रिया पूरी नहीं होती कानूनन आपकी पत्नी उस घर में आ जा सकती है। चलिये यहाँ तक भी ठीक है अब आप ये बताइये कि—आपने मारा क्यों, घसीटा क्यों?? आ गए न अपने फूहड़ मर्दानगी की औक़ात पे। और चन्दन बाबू, जितनी संभावना इस बात की है कि महिला ने धक्का-मूक्की में उनका बनियान फाड़ा तो क्या इस बात की संभावना नहीं है कि–बचाव या मार खाती एक महिला की स्वाभाविक प्रतिक्रिया में ऐसा हुआ हो? खैर, छोड़िए मैं तो आप जैसे लोगों से इस बात के लिए भी तैयार रहता हूँ कि दामिनी प्रकरण में, ईंट, छड़ इस्तेमाल करने वाला बलात्कारी सज्जन आपका कोई संबंधी नहीं निकला नहीं तो माशाअल्लाह आपके तर्क देखने लायक होते और उन गरिमामयी तर्कों को शेयर करते हमारे दूसरे कहानीकार मनोज पांडे क्या खूब जँचते…. ख़ैर, खेमेबाज़ कहानीकारों की अंतिम परिणति यही होती है।

क्या पुरुष अपने समदुखी ‘मीत’ की व्यथा -कथा समानुभूति से लिखेंगे ?

सुधा अरोड़ा

सुधा अरोड़ा सुप्रसिद्ध कथाकार और विचारक हैं. सम्पर्क : 1702 , सॉलिटेअर , डेल्फी के सामने , हीरानंदानी गार्डेन्स , पवई , मुंबई – 400 076
फोन – 022 4005 7872 / 097574 94505 / 090043 87272.

( मन्नू भंडारी की ‘ एक कहानी यह भी’ की समीक्षा करते हुए प्रसिद्ध आलोचक मैनेजर पांडे का एक आलोचनात्मक लेख मार्च २०१० में हंस में छापा था . उसी आलेख के सन्दर्भ में आलोचना की पुरुष दृष्टि की पड़ताल कर रही हैं , सुधा अरोड़ा . यह आलेख में हंस में २०१० में ही प्रकाशित हुआ था .)

‘‘ साहित्य समाज का दर्पण है ’’ उक्ति घिस घिस कर पुरानी हो गई , पर साहित्य का समाजशास्त्रीय विश्लेषण  आज भी साहित्य का एक अनिवार्य हिस्सा नहीं बन पाया । साहित्य और समाजविज्ञान के बीच की इस खाई ने साहित्य और साहित्यिक समीक्षाओं को शद्ध कलावादी बना दिया और समाजविज्ञान के मुद्दों को एक अलग शोध  का विषय  , जिसका साहित्य से कोई वास्ता नहीं ।

हिन्दी साहित्य में महिला रचनाकारों की आत्मकथाएं उंगलियों पर गिनी जा सकती हैं । पुरुषवर्ग अक्सर यह सवाल पूछता है कि लेखिकाएं अपनी आत्मकथाएं क्यों नहीं लिखतीं ? पर लिखी गयी आत्मकथाओं को इस या उस कारण से कठघरे में खड़ा करता रहता है।  हमारा भारतीय लेखक समाज काफी क्रूर और निर्मम है ।  बाहर बाहर से सहानुभूति जताता हुआ , यह एक लेखिका के पर कतरने को और उसके औरत होने के कारण जन्मे दुख , उसकी तकलीफ और उसकी व्यथा पर ठहाका लगाने की मंशा  रखता हुआ , शातिर अंदाज में मंद- मंद मुस्कुराता और व्यंग्यात्मक टिप्पणियां करता है ।

हंस के मार्च 2010 अंक में ‘‘ आत्मा का आईना ’’ आलेख में वरिष्ठ समीक्षक मैनेजर पांडे ने बेहद उदारमना होकर मन्नू जी की किताब ‘ एक कहानी यह भी ’ की एक बेहतरीन विश्लेषणात्मक समीक्षा की है , लेकिन अंत तक आते -आते उनकी आलोचकीय दृष्टि  पर पुरुषवादी सोच ने धावा बोल दिया है। उनका एक लंबा पैराग्राफ है जिसमें मीता के प्रति गहरी समानुभूति से उन्होंने एक टिप्पणी दी है । वे लिखते हैं –
‘‘ इस कहानी में एक पात्र और उससे जुड़ा प्रसंग ऐसा है जिस पर अगर मन्नू परानुभूति या समानुभूति के साथ सोचतीं और लिखतीं तो उनकी आत्मकथा असाधारण होती . वह पात्र है मीता, जो एक ओर राजेन्द्र यादव के बौद्धिक छल का शिकार हुई है तो दूसरी ओर मन्नू तथा राजेन्द्र के बीच तनाव और अलगाव का कारण भी है. मेरे सामने सवाल यह है कि क्या मीता के कुछ दुख-दर्द नहीं होंगे. अगर वे हैं तो उनकी चिंता किसी को नहीं है, न राजेन्द्र को और न मन्नू को. मन्नू तो एक स्त्री हैं और संवेदनशील  लेखिका भी . यही नहीं , वे स्वयं राजेंद्र  के छल से पीड़ित स्त्री हैं इसलिए उनसे यह उम्मीद की जा सकती है कि वे मीता की पीड़ा को एक समदुखिनी के दर्द को समझने और व्यक्त करने की कोशिश करतीं ,लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया . मीता तो लेखिका नहीं है फिर उसके दुख दर्द की कहानी कौन कहेगा ? लगता है कि दूसरी असंख्य स्त्रियों की तरह मीता की पीड़ा भी अनकही रह जाएगी . ’’ (हंस: मार्च 2010 – पृष्ठ -54 )

इस पैराग्राफ में प्रश्नकर्ता का भी बौद्धिक छल उजागर होता है । वह लेखिका से उस विश्लेष्ण  की मांग कर रहा है जो कृति का अभीष्ट है ही नहीं । हाल ही में मन्नू जी से एक पत्रकार ने साक्षात्कार लिया और हंसःमार्च में प्रकाशित इस आलेख ‘ आत्मा का आईना ‘ के अंतिम पैराग्राफ पर उनकी राय पूछी । मन्नू जी ने कहा – ‘‘ जब मीता ने राजेंद्र जी से सारे सम्बन्ध तोड़ लिए थे , उनके सारे पत्र भी लौटा दिए थे , तो जैसे ही उसे पता चला कि वह मुझसे शादी कर चुके हैं , दोबारा वह उनकी जिन्दगी में दाखिल हो गई । अगर उसकी जगह मैं होती और राजेंद्र किसी और से शादी कर रहे होते या कर चुके होते , तो मैं तो अपने को पूरी तरह उनसे काट लेती , उनकी जिंदगी में कोई दखल न देती और एक पत्नी का अधिकार छीन कर कभी अपना घर बसाने का सपना तो नहीं ही देखती । ’’ मन्नू जी की इस उक्ति से आप स्त्रियों की किस्मों के बीच एक स्पष्ट  विभाजक रेखा खींच सकते हैं । इस विभाजक रेखा के दूसरी ओर पड़ी स्त्रियों का दुख उनके अस्तित्व का नहीं , उनकी आकांक्षाओं ( आज  के संदर्भ में महत्वाकांक्षाओं ) का है, जिसमें प्रेम या भावना से पैदा होने वाली पीड़ा-व्यथा का कहीं नामो निशान नहीं है। अगर कुछ है तो वह तहस- नहस करने का एक त्रासजनित सुख है ।

सुप्रसिद्ध रचनाकार मन्नू भंडारी

समीक्षक ने बड़ी तकलीफ से लिखा है – ‘‘ मीता तो लेखिका नहीं है ,फिर उसके दुख दर्द की कहानी कौन कहेगा ? लगता है कि दूसरी असंख्य स्त्रियों की तरह मीता की पीड़ा भी अनकही रह जाएगी !’’ समीक्षक महोदय भूल गये कि ‘ अन्या से अनन्या ‘ की लेखिका प्रभा खेतान मीता ही हैं ! क्या उस ‘मीता’ की भरी पूरी आत्मकथा से मीताओं की तथाकथित अनकही पीड़ा की भरपाई नहीं हो गई ? मैनेजर पांडे जी को चाहिए कि जब -जब मीताओं की व्यथा कथा पढ़ना चाहें , इस आत्मकथा का आद्योपांत पाठन कर लें । मन्नू जी ने तो फिर भी मीता के कोण से कई कहानियां लिखीं – जिनमें ‘स्त्री सुबोधिनी’ , ‘एक बार और’ चर्चित भी हुईं क्योंकि उसकी स्थिति में कल्पना का पुट देकर कहानियां लिखना ही उनके लिए संभव था । मीता के वास्तविक जीवन की न तो मन्नू जी को जानकारी थी , न वे उसके निजी जीवन से वाकिफ होना चाहती थीं तो वे आत्मकथा जैसी विधा में उसका क्या बयान करतीं – जो पूरी तरह सच और वास्तविकता पर आधारित होती है ।  जिस ‘व्यथा’ को हाईलाइट करने की बात हमारे वरिष्ठ  समीक्षक करते हैं , शायद वे यह नहीं जानते  कि यह मीता ‘तनाव’ का कारण जरूर थी ,पर ‘अलगाव’ का नहीं । मीता – चाहे वह जैसी भी हो – का एकवचन तो पत्नी स्वीकार करके जीवन के तीसेक साल गुजार देती है पर बहुवचन में ‘ मीताओं ’ को स्वीकार करना मुश्किल होता है ।

विडम्बना तो यह है कि इनमें से कुछ मीताओें के भी एक नहीं , कई मीत होते हैं । आज के समय में बहुवचन में ‘मीत’ पालने वाली इन ‘मीताओं’ का दुख दर्द कैसा ? अनकही पीड़ा का अर्थ क्या है ? यह अनकही पीड़ा-व्यथा किस किस्म के समीक्षकों को आलोड़ित करती है ? ऐसी मीताएं पुरुषों  के ‘‘बौद्धिक छल का शिकार ’’ नहीं होतीं , वे तो सबकुछ जानते -समझते एक पिता और पति के दायित्व से पुरुष  को डिगा कर उसका प्रेमी के रूप में खुद शिकार  करती हैं । इस शिकार  में उसे न सिर्फ विवाहित पुरुष  से प्रेम (!) करने का , बल्कि सिर्फ अपनी देह के तांडव के बूते पर एक समर्पित-समझदार-विदुषी  औरत को उसके अधिकार से अपदस्थ और उसकी ‘स्पेस’ से बेदखल करने का दोहरा सुख शामिल हो जाता है, जो उसे एक त्रासदी निर्मित करने का और संगति में विध्वंस करने का भी क्रूर त्रासजनित आनंद देता है । हमारे समीक्षकों के पास इन देहवादी ‘मीताओं’ को पहचानने की निगाह क्यों नहीं है ? समीक्षकीय दृष्टि  की सारी स्पष्टता  इस ‘मीता’ के संबंध पर आकर धुंधलके में क्यों बदल जाती है ?

 संभवतः इसका कारण यह है कि हिन्दी साहित्य मीताओं से अंटा पड़ा है । आज के अधिकांश  लेखकों- कवियों-समीक्षकों के जीवन में एक -एक मीता है । ये सब मीताओं वाले पुरुष  हैं – गांव में जिनकी बेपढ़ी बीवियां या शहर में जिनकी पढ़ी लिखी बीवियां उनके बच्चों को बगैर किसी गिले-शिकवे के पाल रही हैं, इसलिए अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़कर इन मीताओं के प्रति उनकी सहानुभूति का पलड़ा भारी है । हिन्दी साहित्य में पुरुष  रचनाकारों ने भी आत्मकथाएं लिखी हैं । क्या हमारे वरिष्ठ  समालोचक पुरुष – आत्मकथा लेखक से आग्रह करेंगे कि उनकी पत्नी का अगर कोई ‘मीत’ रहा है तो उस समदुखी ‘मीत’ की व्यथा कथा का वे संवेदनशीलता  से बयान करें ? आखिर संवेदनशीलता सिर्फ महिलाओं की बपौती तो नहीं है न !

मन्नू भंडारी , राजेन्द्र यादव और बेटी रचना

 प्रभा खेतान की ‘‘अन्या से अनन्या’’ की काफी चर्चा हुई क्योंकि खुलकर उन्होंने विवाहित पुरुष  से अपने प्रेम संबंध का खुलासा किया । राजेंद्र जी ने भी प्रभा खेतान से अपनी मित्रता को सात्र  और सिमोन के संबंधों के बरक्स रखा और एक साक्षात्कार में यह भी कहा – ‘‘ प्रभा खेतान मेरी बहुत इंटीमेट फ्रेंड रही  हैं ।’’ ( 23 लेखिकाएं और राजेंद्र यादव – पृष्ठ  85) । मुझे हैरानी तब होती है जब मैं देखती हूं कि प्रभा खेतान की आत्मकथा   ‘‘अन्या से अनन्या ’’ के बारे में प्रकाशित  तमाम समीक्षाओं में , एक भी आलोचक ने यह सवाल नहीं उठाया कि सहजीवन निभाने वाले जिन अपने प्रेमी डा  गोपालकृष्ण  सराफ के बारे में उन्होंने इतने विस्तार से लिखा है , वह संवेदनशील  लेखिका जरा अपनी समदुखिनी – पांच बच्चों की मां , डा सराफ की पत्नी की पीड़ा , यातना के बारे में भी कुछ लिखतीं कि पति को अन्या के पास जाते देखकर उन महिला पर क्या बीतती होगी ? कलकत्ता के तमाम साहित्यकार ‘जन्नत की हकीकत’ जानते हैं पर जाहिर है , हमें सिर्फ उतना ही दिखाई देगा और उतना ही समझ में आएगा , जो शब्दों में कह दिया गया है । उस आत्मकथा में बस इतना ही जिक्र है कि डा सराफ कहते हैं कि वह हर समय रोती रहती है , उसे तो रोने की आदत पड गयी है । ‘अन्याओं ’ से संबंध रखने वाले अधिकांश  लेखक-कवि- कलाकारों की बीवियों को रोने की आदत पड़ जाती है, जिससे बचने के लिए वे साइकिएट्रिस्ट के चक्कर लगाती हैं या एंटी डिप्रेसेंट दवाइयां खाती हैं । इनसे हमारे समीक्षक वर्ग का कोई सरोकार नहीं है क्योंकि एक रोने-कलपने वाली , चिड़चिडी , बुझी हुई पत्नी कमोबेश  सबके घरों में मौजूद है जो खुद तनाव और बीमारियों से ग्रस्त होते हुए भी , गैर जिम्मेदार पति को बख्शते  हुए बच्चों समेत परिवार के दोनों पहियों को अपने मजबूत (!) कंधों पर यथासंभव भरसक खींचती चली जाती हैं । इसी श्रेणी में आती हैं मन्नू जी । मन्नू जी की किताब एक कहानी यह भी – जिसके बारे में भूमिका में ही उन्होंने स्पष्ट  कर दिया है कि यह किताब चैदह साल में टुकड़ों टुकड़ों में लिखी गयी ।  यह उनके जीवन की लेखकीय यात्रा है , आत्मकथा नहीं है और उन्होंने अपने निजी जीवन के प्रसंग खोलकर नहीं लिखे , एक पूरक प्रसंग भी उन्होंने एक संपादक के दबाव के तहत ही लिखा वरना वह उतना भी नहीं लिख पातीं , फिर भी समीक्षक ढिठाई से कहे चले जा रहे हैं कि मीता के बारे में वे परानुभूति या समानुभूति के साथ सोचतीं और लिखतीं तो उनकी आत्मकथा असाधारण होती ।…….

आज भारतीय समाज और जीवन में ही नहीं , साहित्य में भी मूल्य बदल रहे हैं । अनैतिकता हमें चैंकाती नहीं , आकर्षित  करती है । उसका बयान हमें रोमांचकारी लगता है । दूसरे तमाम मुद्दों को दरकिनार कर , हम ललक कर उस किताब को पढ़ना चाहते हैं । साहित्य का प्रकाशक  इस तथ्य से अच्छी तरह वाकिफ है । मैत्रेयी की आत्मकथा का फलैप मैटर देखें -‘‘ मैत्रेयी ने डा . सिद्धार्थ   और राजेंद्र यादव के साथ अपने संबंधों को लगभग आत्महंता बेबाकी के साथ स्वीकार किया है।’’ अंदर पूरी किताब का एक एक पन्ना पढ़ जाइए , आप उस ‘आत्महंता बेबाकी’ (!) को ढूंढते रह जाएंगे । इसके उत्तर में फरवरी 2009 के आउटलुक में राजेंद्र यादव की अपनी एक टिप्पणी पर्याप्त है -‘‘ मैत्रेयी ने मुझे कुछ जरुर जाना होगा पर लिखने में शायद वह भी चूक गई है । चूकने से ज्यादा कहना चाहिए कि वह छिपा गई है। वह जो इबारत में नहीं झांकता , पर पीछे से झांकता जरूर दिखता है। जाने उसने ऐसा क्यों किया ? ’’ ( आउटलुक: फरवरी 2009 – पृष्ठ – 75 )

आत्मकथा लेखन की सबसे बड़ी चुनौती है – अपने जीवन , बल्कि कहना चाहिए , अपनी व्यथा से , अपने झेले हुए से , एक दूरी बनाने की । आत्मकथा लेखन में सेल्फ सेंसरशिप  – स्व प्रतिबंध – अपना अंकुश सबसे पहले सबसे आड़े आता है । भारतीय समाज में परिवार एक बहुत महत्वपूर्ण इकाई है । अगर हम सच बोल रहे हैं तो हमारे अपने परिवार के या करीबी लोग नाराज हो सकते हैं। तो मेरा मानना यह है कि इस तरह के प्रतिबंधों के बीच आत्मकथा नहीं लिखी जानी चाहिए । एक ईमानदार आत्मकथा तभी लिखी जा सकती है, जब आप यह मानकर चलें कि आपके पास खोने के लिए कुछ नहीं बचा , सिवाय उन जंजीरों के जो समाज ने हमारे इर्द -गिर्द जकड़ रखी हैं ।   वास्तविकता यह है कि एक औरत का अपनी आत्मकथा लिखना स्त्री सशक्तीकरण की ओर बढ़ता पहला चरण है । ईमानदारी इसकी पहली शर्त है । अपने जीवन को और अपनी कलम को महिमामंडित करने या अपने गुनाहों पर परदा डालने के लिए लेखकीय बुनावट के साथ शब्दों से खेलना , भाषा  की कशीदाकारी करना और कला के कीमखाबी लिहाफ में अपनी करतूतों को सजा- धजाकर प्रस्तुत करना आत्मकथा की विधा के मकसद को ही डिफ्यूज करना है ।

डा लाल रत्नाकर की पेंटिंग

हिन्दी में जिन महिला रचनाकारों की आत्मकथाएं आई हैं – उनमें से सच पूछें तो आत्मकथा के मूलभूत सरोकार और ईमानदारी ही गायब है । अपने जीवन और लेखन को महिमामंडित करना या अपने किए को अपने नजरिए से जायज ठहराना आत्मकथा लिखना नहीं होता । मन्नू भंडारी में ईमानदारी कूट कूट कर भरी है पर उनकी   आत्मकथा तो आत्मकथा है ही नहीं । वह सचमुच उनके लेखकीय संस्मरण हैं जिसे प्रकाशक आत्मकथा नाम से बेच रहे हैं  क्योंकि आत्मकथा एक सेलेबल विधा है ।

अंत में कुछ जरूरी बातें — 

सबसे पहले मन्नू जी की इस पुस्तक ‘एक कहानी यह भी ’ को पढ़ते हुए यह स्पष्ट कर लिया जाना चाहिए कि यह पुस्तक दाम्पत्य के दैनंदिन के छलावों में मरती खपती एक ईर्ष्यालू  स्त्री का सियापा नहीं , बल्कि इसमें  एक स्त्री रचनाकार की बौद्धिक दृष्टि  और उस दृष्टि  का आलोक भी है ,जो एक ‘सामान्य‘ स्त्री का ‘रचनाकार’ स्त्री में कायांतरण करता है। दाम्पत्य के अलावा भी साहित्यिक और सामाजिक अंतर्विरोधों  के कई मुद्दों को रचनात्मकता के पार्श्व  में रखकर देखने की इस पुस्तक में वस्तुगत और निरपेक्ष कोशिश  है । यहां स्त्री के किसी गोपन जगत को खोलकर लोलुप पाठकीय उपभोग के लिए किया गया मुआयना नहीं है, बल्कि आत्मसजग भाषा  में एक स्त्री रचनाकार के परिवेश  की मार्मिक मीमांसा है । लेकिन इसका क्या किया जाए कि हिन्दी साहित्य में आलोचना क्षेत्र के अधिपतियों की आस्वाद ग्रंथि में जादुई यथार्थ ( मैजिकल रिएलिज़्म ) के बदले आभासी यथार्थ ( वर्चुअल  रिएलिज़्म ) का चस्का लग गया है। यह एक दुखद स्थिति है कि वे महिला रचनाकारों की आत्मकथाओं में प्रेम के पुराने त्रिकोण के रोमांच का अतिरेक में आख्यान सुनने की अपेक्षा रखते हैं और ऐसी तमाम मीताओं की मर्मकथा सुनना चाहते हैं ,ताकि बौद्धिक लंपटई का साहित्यीकरण कर सकें । पुरुष  रचनाकारों की आत्मकथा में क्या उन्होंने किसी छूटे हुए प्रसंग या छूटे हुए पात्र को लाने की मांग कभी की जो लेखक की पत्नी का लंपट प्रेमी रहा हो ?

जहां तक संवेदनशीलता के साथ पीड़ा और दुख दर्द को व्यक्त करने का सवाल है तो वे तो क्रिमिनल्स – जघन्य अपराधियों – के भी हो सकते हैं तो इन मीताओं के क्यों नहीं ? मीताएं बहुत हैं और उनकी आबादी में उत्तरोत्तर इजाफ़ा हो रहा है क्योंकि साहित्य के बाजार का विचार उनकी रचनात्मकता का राजमार्ग बन रहा है । यह मुद्दा अलग है और इस पर विस्तार से फिर कभी लिखा जाएगा । अभी सिर्फ इतना ही कि आत्मकथात्मक रचना से उस ब्यौरे की अनावष्यक मांग बार बार क्यों की जाती है जो उस रचना का अभीश्ट है ही नहीं ?
( हंस से साभार )

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सोनिया गांधी का नागरिकता प्रसंग : पितृसत्ता का राग-विराग

संजीव चंदन

( २०१४ में टेनिस खिलाड़ी सानिया मिर्जा को तेलंगाना का ब्रांड अम्बेसडर बनाए जाने पर सांस्कृतिक राष्ट्रवादियों के द्वारा किये जा रहे हंगामे का सीन और उसके तर्क १० साल पहले २००४ में सोनिया गांधी की नागरिकता के सवाल पर हुए हंगामे की याद दिलाते हैं . यह आलेख २००५ में गोवा में आल इंडिया असोसिएशन फॉर वीमेन स्टडीज़ के कांफ्रेंस में प्रस्तुत किया गया था, यह एक बार फिर से प्रासंगिक हो गया है.  सोनिया गांधी इटली की बेटी थी , बहु भारत  की थी , तो उनकी नागरिकता और निष्ठा पर संदेह किया गया  . अब सानिया मिर्जा इस  देश की बेटी है और पड़ोसी देश की बहु ,तब भी उनकी  नागरिकता और निष्ठा पर संदेह है . पितृसत्तात्मक व्यवस्था में स्त्रियों का  न तो कोइ घर होता है , न देश !)

सोनिया गांधी के प्रधानमंत्री बनने की योग्यता-अयोग्यता के विवाद से जो निहितार्थ बनते हैं, उनका मूल संदर्भ भारतीय समाज की पितृसत्तात्मक सोच और समझ से है। सोनिया के सवाल पर कट्टर रुढि़वादियों से लेकर मध्यममार्गियों के पक्ष-विपक्ष की भाषा, तर्क, तर्कों की समझ पितृसत्तात्मक समाज की विचार-परम्परा से ही संचालित है। इस आलेख में सोनिया गांधी से जुड़े गहरे शास्त्रीय  राजनीतिक निष्कर्षों से विशेष सरोकार न रखकर इसके सामाजिक संदर्भों की ही पड़ताल की गयी है, जबकि भविष्य की राजनीतिक दशा-दिशा के सूत्र इन संदर्भों में सूत्रबद्ध भी हैं, क्योंकि पिछले कुछ दशक से जिस राजनीतिक विचारधारा ने भारतीय राजनीति में अपनी पकड़ मजबूत की है, वह परिवार और राष्ट्र की पितृसत्तापेक्षी भाषा में ही बात करती है तथा इसका पूर्वज संस्कार भारतीय नवजागरण के राष्ट्रवादी स्वरों से भी जा जुड़ता है।

सोनिया गांधी भारत के  पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के साथ : आत्मीय क्षण

सोनिया गांधी, जो कि इटली में पली-बढ़ी, भारत में एक राजनीतिक परिवार की बहू बनकर आयी, जिसके दो-दो सदस्य (पंडित जवाहरलाल नेहरू तथा श्रीमती इंदिरा गांधी) इस देश के प्रधानमंत्री बन चुके थे, तीसरे का  बनना तब शेष था। यह परिवार राजनीति की धूरि में था। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारतीय राजनीति का चक्का इसी धूरि के इर्द-गिर्द नाचता रहा। देश को इस विवाह पर कोई विशेष एतराज नहीं था बल्कि एक गर्व-भाव ही रहा होगा, जो अक्सर पितृसत्तात्मक समाज के वर-पक्ष को होता है, विजेता भाव एक भारतीय की गैर भारतीय नस्ल, वह भी गोरे  नस्ल ,की कन्या पर विजय। विदेशी कन्या, गोरे नस्ल की अंग्रेज कन्या पर विजय, आहत भारतीय मन को आत्मतुष्ट करता है, जिसके स्वाभिमान को उपनिवेशवादी गुलामी ने चोट पहुंचाई थी।

परिवार, समाज या राष्ट्र का भाव अथवा राष्ट्रवाद  मूलतः पुरुषवादी स्मृति, आहत पौरुष और पुरुषवादी आशा से उत्पन्न हुआ है। राष्ट्र अपना गौरव ‘स्त्री-छवि’ को निर्मित कर गढ़ता है और अपने अपमान का बदला शत्रु  राष्ट्र की स्त्रियों के अपमान से लेता है। पितृसत्तात्मक समाज में स्त्रियां परिवार, समाज और राष्ट्र की इज्जत का प्रतीक होती हैं, इसीलिए इतिहास गवाह है कि विजेता जातियां/ राष्ट्र विजितों की स्त्रियों पर बलात्कार कर उनका अपमान कर उनके मान-सम्मान का दलन करते हैं। भारतीय संदर्भ में ‘ब्रिटिश  -राष्ट्र’ पर किसी विजय की गुंजाइश नहीं होने के कारण हर वह अवसर जब भारतीय पुरुष विदेशी कन्या को विवाह लाता है, भारतीय मानस की आत्मतुष्टि का कारण बनता है।

ब्रिटिश उपनिवेश ने अपने आर्थिक प्रभावों के अतिरिक्त और ज्यादा समय तक असरकारी प्रभाव सांस्कृतिक स्तर पर डाले थे। गुलाम भारतीयों के लिए अंग्रेज स्त्रियां  आदर्श थीं, उनके रहन-सहन बोल-चाल के मद्देनजर सुधारवादी भारतीयों ने अपनी पत्नियों को भी सुशिक्षित गृहिणी बनाने के भरपूर प्रयास किए थे, परंतु आकर्षण की हदें गोरे चमड़े में बसी थीं, गोरी नस्ल में समाहित थीं। गोरों का यह आतंक आज भी है, इसलिए सोनिया गांधी का श्वेत नस्ल से होना भी एक विशेष स्थिति पैदा करता है। कैम्ब्रिज से एक व्यक्ति ने इंटरनेट पर एक सवाल छोड़ रखा है कि क्या सोनिया गांधी Mary Antonitee नाम से इटली मूल की होने के बजाय ‘अबेबी गांधी’ नाम से अफ्रीकन मूल की काली महिला होती तब भी क्या उसके प्रधानमंत्री  होने के प्रति आग्रह-दुरग्रह ऐसे ही होते। स्पष्ट है कि रंगीन भारतीयों के लिए काले नस्ल की विविधता श्रेष्ठता पूर्ण चुनौती नहीं देती है या आकर्षण पैदा नहीं करती है, स्पष्ट ही है कि सोनिया के प्रसंग में आहत राष्ट्रीयता और नस्ल-श्रेष्ठता के आधार पर भेद-भाव की दुहरी प्रवृत्ति है। यहां अफ्रीकी नामांकन में एक सचेत संदर्भ भी है। नाइजीरिया में अबेबी का अर्थ होता है ‘चाहा और पा लिया’ अर्थात् आसानी से प्राप्य। आसानी से प्राप्यता की गुंजाइश गोरे नस्ल की सोनिया गांधी के साथ नहीं बनती है,अर्थात् विजेता भाव की संभावना और भी प्रबल हो जाती है तथा आगे चलकर अतिरिक्त आग्रह को प्रेरित भी करती है।

सोनिया और राजीव का विवाह  साथ में राजीव गांधी की माँ और भारत की पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी

भारतीय विवाह-संस्था यद्यपि अंतरजातीय विवाहों को हतोत्साहित करती है, परंतु विवाह कोई समर्थ उच्च वर्गीय पुरुष कर रहा है, तो उसकी व्यवस्था भी करती है;
शुद्रैव भार्या शुद्रस्य सा चस्वा च विशः स्मृते
ते चस्वा चैव राजश्च ताश्व स्वा चाग्रजन्मनः।
यद्यपि स्वतंत्र भारत का आधुनिक संविधान कानून के समक्ष सबकी समानता की घोषणा करता है, परन्तु उच्चवर्गीय श्रेष्ठता का ऐतिहासिक श्रोत आज भी मनुस्मृति जैसे प्राचीन कानून-ग्रंथ हैं, जो आम भारतीय मानस को गहरे स्तर पर प्रभावित करते हैं, और खासकर जब सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का प्रयास राष्ट्रीयता को एक होमोजेनाइज्ड हिन्दू राष्ट्रीयता में समेटकर पेश करने का है तब इस प्रकार की मानसिक उर्वरता और भी उपयोगी सिद्ध होती है।

सोनिया के प्रसंग में भारतीय मानस का आह्लाद इसलिए भी चरम पर था कि गांधी-नेहरू परिवार, जिसे असंवैधानिक तौर पर परम्परा से भारत के प्रथम परिवार या राज-परिवार का दर्जा प्राप्त था, उसका उत्तराधिकारी उसे ब्याह कर लाया था, अर्थात् एक जातीय गौरव का सर्वोत्तम प्रसंग बनता था। समस्या तब उठ खड़ी हुई जब सोनिया का राजनीति में आना उसकी और कांग्रेस  की मजबूरी बनी तथा वह प्रधानमंत्री पद की प्रबल दावेदार बनती चली गयी। समस्या की हास्यास्पद गंभीरता तब तक बनी रही जब तक स्वयं उसने यह घोषणा नहीं कर दी कि प्रधानमंत्री का पद उसके लक्ष्यों में नहीं है। इस पूरे प्रकरण में पक्ष-विपक्ष की भाषा और समझ को समझा जाना चाहिए, जो अधिकांशतः राजनीति-प्रेरित हाते हुए भी एक पितृसत्तात्मक सामाजिक सच का प्रतिनिधित्व कर रही थी।

राष्ट्रवाद की अपनी मूल प्रवृत्ति के अनुरूप ही भारतीय राष्ट्रवाद ने स्वयं को परिवार की भाषा में ही अभिव्यक्त किया है और केन्द्र में रही स्त्री । भारत-देश की तस्वीर उभरते राष्ट्रवाद के दौरान शृंखलिता देश माता के रूप में बनायी गयी थी, जिसे विदेशियों के शृंखलाबंध से आजाद होना था। बंकिम चंद्र की शस्य-श्यामला भारत-भूमि अंग्रेजों के द्वारा बलात्कृत थी। इसी भाषा में भारत के प्रथम प्रधानमंत्री भी समस्या को संबोधित करते थे। भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन और उसके पूर्व सुधारवादी आंदोलनों में स्त्री  की मातृ छवि ही अधिक समादृत थी। जननी और जन्मभूमि, जिन्हें वाल्मीकि रामायण ‘स्वर्गादपि गरियसी’ बनाता एक दूसरे का प्रतिनिधित्व कर रहे थे। सुधार आंदोलनों में स्त्री शिक्षा का जो मूल उद्देश्य था वह रक्त-शुद्ध आर्य नस्ल के लिए सुशिक्षित माता और सुगृहिणी के निर्माण को ही लक्ष्य कर निर्मित था। एकमात्र फुले और उनके साथ दलित चिंतक स्त्री -शिक्षा को स्त्री -पुरुष समानता के लिए उपयोगी बता रहे थे अथवा 1848 में प्रथम महिला विद्यालय खोलकर एक क्रांतिकारी पहल ले रहे थे। पत्नी सावित्री बाई फुले समाज की लांछना सहकर भी अथवा अपने ऊपर पत्थर, गोबर के आक्रमण को झेलते हुए भी लड़कियों को पढ़ना अपनी प्राथमिकताओं में शामिल कर चुकी थीं। वैसे भी पुरुष सुधार आंदोलनों से अलग स्त्री -चिंतक, लेखिकाओं की चिंताओं में विवाह और मातृत्व प्राथमिक तौर पर शामिल नहीं थे। पंडित रमाबाई, ताराबाई शिंदे, एक अज्ञात हिन्दू महिला, स्त्री -मुक्ति के अन्य जरूरी मुद्दों पर ज्यादा जोर दे रही थी। परंतु बाद में भी राष्ट्रीय आंदोलन की सबसे बड़ी पार्टी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से ऐतिहासिक तौर पर विरादराना सिद्ध करने वाली कांग्रेस में सोनिया के प्रसंग में एक बार फिर स्त्री  का मातृ-रूप, पालक-रूप ही मुखर हो उठा।

जब सोनिया गांधी ने भारत का प्रधानमंत्री होने से इनकार कर दिया

मरती हुई कांग्रेस को जिलाने की  गुहार परिवार की विरासत बचाने में मां की भूमिका को निभाने के नाम पर कांग्रेस जन सोनिया से करते रहे। सोनिया के छवि-निर्माण की योजना बनाने वालों ने भी सुहागिन मां और फिर विधवा का ही आदर्श गढ़ा, जिसमें वह भारतीय परिवार में ब्याह कर आती है और फिर मां बनती है फिर विधवा, राष्ट्र के लिए शहीद पति का पत्नी के रूप में। शहादत और बलिदान देने वाली स्त्री -छवि को आसानी से आम भारतीय जन के बीच भुनाया जा सकता है। भारतीय सांस्कृतिक राष्ट्रबोध में जाति की शहादत के बाद जौहर करनेवाली स्त्री  (मुंडमाल, शिवपूजन सहाय) को विशेष आदर प्राप्त है। यहां जौहर य सती होना महिमामंडित तो नहीं हो सकता (सती प्रथा का महिमामंडल रूपकंवर कांड से ही कानूनन अवैध है) लेकिन पति और बच्चों का शहादत देने के लिए तैयार मामतामयी मां का महिमामंडन तो संभव ही है, भारतीय हिन्दू समाज से वोट प्राप्ति के लिए आवश्यक भी। अब 21वीं शताब्दी में राष्ट्रवाद का सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के रूप में मस्जिद भंजन नुमा विकास की स्थिति में भी भाषा वही रही, भय भी वही विदेशी पद दलन का। सोनिया गांधी के सवाल को भारतीय राष्ट्र के लिए खतरा निर्धारित किए जाने में राष्ट्रवाद की चिंताएं उपनिवेशकालीन चिंताओं से ही जा जुड़ती है, तभी जार्ज फर्नाडिज को दो घटनाएं एक जैसी ही दिखती हैं, ईस्ट इंडिया कंपनी के बहाने गोरों का राज्य या सोनिया के प्रधानमंत्रीत्व  के रास्ते विदेशी साम्राज्य।

भयदोहन के इस खेल में एक-से-बढ़कर एक ऐतिहासिक संदर्भों का इस्तेमाल किया गया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के साप्ताहिक ऑर्गनाइजर ने 6 जून 1999 के अंक में इसे इवेन्जलाइजेशन की संज्ञा दी तो उर्दू साप्ताहिक ‘हमारा कदम’ के मुख्य संपादक सोहैल ने सोनिया गांधी को ‘सोनिया डी गामा’ नाम से संज्ञेय किया। एस. गुरुमूर्ति ने ‘स्वदेशी जागरण मंच’ के 15 मई 99 के अंक में  लिखा , ‘ All that  nation has told Sonia in silent mode is : Madam, it is India now, not East India any more… The conviction that Sonia as Prime Minister of India will be a national shame cut across all parties including the Congress.’
यहां यह भी गौर किए जाने लायक है कि भारत की पुनः गुलामी का यह आतंक भारतीय राजनीति की तमाम वर्चस्वशाली विचारधारा तब बना रही है, जब उनके ही नेतृत्व में भूमंडलीकरण के रास्ते आर्थिक उपनिवेश की हकीकत सामने है, अथवा राष्ट्र राज्यों की सीमा को सैन्य-अतिक्रमण के द्वारा या सैन्य ताकत के बल पर उपनिवेश बनाना आवश्यक नहीं है, जब इंटरनेशनल कंपनियां या अन्तरराष्ट्रीय संस्थाएं सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक स्तर पर नये-नये उपनिवेशों को रौंदने में लगी हैं।

केन्द्र में स्त्री  है, विदेशी स्त्री ,जो भारतीय परिवार की बहू बनी है परंतु विदेशी होने के नाते वह मूल देश से ही जा जुड़ती है, उसके हित वहीं से जुड़ते हैं। इसीलिए वह ‘भारत-माता’ की पार्थिव प्रतिनिधि या मातृ-भाव की भौतिक छवि नहीं हो सकती। यहां मानदंड दोहरा अपनाया जा रहा है। भारतीय समाज में ‘बेटी’ ब्याह के बाद ससुराल के परिवार में जा मिलती है तथा उसके हित नए परिवार के हितों से जुड़ते हैं, उसकी अर्थी  ही बाहर निकलती है, वह नहीं। स्त्री  का अपना अस्तित्व पति और परिवार से ही निर्धारित होता है, उसमें ही निहित होता है। अनिच्छुक सोनिया को कांग्रेसी-जनों ने इसी तर्क से कांग्रेस की जिम्मेदारी संभालने के लिए मनाया तथा इसी तर्क से वे उसके प्रधानमंतरी  होने को भी गलत  नहीं मानते। किसी विदेशी पुरुष के भारतीय परिवार में विवाह के बाद क्या तर्क ऐसे ही बनते, यह भी विचारणीय है।

सुषमा स्वराज ने सोनिया गांधी के प्रधानमंत्री होने का यह कह कर विरोध किया था कि वे उनके प्रधानमंत्री बनने पर अपना सिर मुड़वा लेंगी

सोनिया गांधी भी पति-गृह की जिम्मेदारियों को संभालती हुई उत्तराधिकारी (राहुल गांधी) के संरक्षण और उसके इसी दिशा में विकास का बखूबी काम करती रहीं। ध्यात्व है कि पितृसत्तात्मक परिवार की परंपरा के अनुरूप राहुल गांधी को ही कांगे्रस का भावी नेता बनाया जा रहा है, जबकि उससे कम कुशल और अनुभवी प्रियंका गांधी सिद्ध नहीं हुई। पितृसत्ता पुरुष-रेखा (Male –lienage ) में ही पुनर्जीवित होती है।यहां जो और भी उल्लेखनीय है, वह सोनिया की संतान के प्रधानमंत्री बनने पर  किसी सवाल का स्वतः नहीं उठना। स्पष्ट है सोनिया भले ही विदेशी हो परंतु पितृसत्ता की व्याख्या में संतान विदेशी नहीं होगी, क्योंकि शास्त्रों की व्याख्या में स्त्रियां खेत (क्षेत्र)  मानी जाती हैं और फसल (संतान) ,उसकी जिसका बीज (वीर्य) हो। इस प्रकार सोनिया की संतान स्वतः ही खेत (सोनिया) के ख्यातनाम मालिकों नेहरू-गांधी परिवार की वंश-परंपरा का वाहक हो जाती है, भले ही प्राथमिकता पुरुष-सतान को दी जा रही हो।

पति-गृह या उसकी पार्टी की जिम्मेदारी का निर्वहन  पति की मृत्यु के बाद, भारतीय पितृसत्तात्मक परिवार के अनुरूप ही बनता है, जहां स्त्री  का जीवन पति के जीवन की ही प्रतिच्छाया बन जाती है तथा जिसकी पराकाष्ठा स्त्री  के ‘सतीत्व’ में अभिव्यक्त होती है। भारतीय पुरुष का मोक्ष ऊर्ध्वमूलीय  है, जगत से परे ब्रह्मचिंतन के माध्यम से और स्त्री  को मोक्ष मिलता है, देह के माध्यम से पति-सेवा के द्वारा। रूपकंवर  को लेकर परंपरा और अस्मिता के नाम पर उत्साहित होने वाली जमात को सानिया का भी राजीव गांधी के साथ सती होना शायद मर्यादित लगता, उसके स्वागत में पलक-पावड़े बिछाए जाते और सोनिया भारतीय परंपरा की एक आदर्श बहू के रूप में अमर बनायी जातीं। जो विदेश में जन्म लेकर भी, पल-बढ़कर भी ‘भारतीय-संस्कृति’ में संस्कारित हुईं। विदेशी स्त्री  का भारतीयकरण सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के लिए एक अलग और विशिष्ट रोमांच पैदा करता। यहां पति के जीवन-उद्देश्यों को ही अपना जीवन-उद्देश्य मानकर स्वयं को लगभग समाप्त कर जीने और सती हो जाने में कोई विशेष फर्क भी नहीं है। अर्थात् परिवार की जिस भाषा में पक्ष के प्रयास और तर्क बने, उसकी खतरनाक संगति परंपरावादी पितृसत्तात्मक समझ से ही बनती है, जो सोनिया के प्रधानमंत्री होने का विरोध कर रही है।

सोनिया के द्वारा प्रधानमंत्री का पद ठुकराए जाने पर विभिन्न टी.वी. चैनलों ने विमर्श आमंत्रित किए। एन.डी़ टी.वी. ने ‘क्या सोनिया के समक्ष सभी भारतीय नेता बौने हो गए’ सवाल पर बातचीत आयोजित की। समस्या तो इस विषय में ही है जो सोनिया (विदेशी) और अन्य नेताओं (भारतीय) का द्वैध बना रही है। बातचीत के दौरान जिस त्याग और तपस्या को लेकर राजनीतिज्ञ और चिंतक सोनिया के पक्ष में अपनी बात कर रहे थे, उसी त्याग और तपस्या की भूरि-भूरि प्रशंसा भारतीय जनता पार्टी के प्रतिनिधि-विचारक भी कर रहे थे, जिन्हें सोनिया गांधी का प्रधानमंत्री बनना सर्वाधिक संक्रामक प्रतीत हो रहा था। त्याग-तपस्या की जिस अवधारणा से सोनिया बड़ी बनायी जा रही थी वही त्याग-तपस्या और मातृत्व और मातृत्व की तथाकथित महानता, आदि स्त्रिायों को छद्म आदर पहले भी दिलवाते रहे हैं
कुपुत्रो जायेत क्वचिद्पिकुमाता न भवति (दुर्गा सप्तशती)
अहल्या और अनुसूइया की प्रशंसा की परंपरा इस देश में प्राचीनतम है। परंतु स्त्री  के स्वयं के कर्तापन का क्या? सोनिया की तमाम सक्रियता, सशक्तता के बावजूद यदि स्त्री  के रूप में सोनिया से कुछ छिना है तो उसका कर्तापन, क्योंकि  उसके कार्य पति गृह से नियंत्रित हैं और मानकर चला जा रहा है कि वह जो भी करेगी, शुभ ही करेगी।

सोनिया राय बरेली में , उन्होंने अपने नेतृत्व का लोहा मनवाया , विरोध करने वाले शरद पवार जैसे नेता भी बाद में उनका नेतृत्व स्वीकार करने को बाध्य हुए

यदि प्रधानमंत्री के सवाल पर सोनिया का पक्ष बनाना ही था तो उसे वैश्विक संदर्भ में बनाना चाहिए था, जिसको लेकर विश्व-ग्राम के पक्षधर आशान्वित दिखते हैं, तर्क गढ़ते हैं। ऐसा कहते हुए मैं स्पष्ट करना चाहता हूं कि वैश्वीकरण पूंजी  के जिस आतंक से संचालित है, यहां बात उसकी नहीं की जा रही है। पूंजी राष्ट्र राज्य की सीमाएं तोड़ती है, तो यह टूटन अपने साथ वैश्विक समता-समानता का कोई आदर्श लेकर नहीं आता बल्कि पूंजी  के क्षुद्र स्वार्थों के लिए एक छद्म ही गढ़ता है। यही कारण है कि पूंजी के स्वतंत्र आवागमन के साथ ही विभिन्न देशों में राष्ट्रवाद का कट्टर चरित्र भी उभरा है। इससे ही जोड़कर समझा जा सकता है कि जिस राजनीतिक जमात की सरकार विदेशी-निवेश के लिए बेचैन-प्रयासरत है ,वही जमात सोनिया के सवाल पर इतना अधिक संवेदनशील क्यों हो गया?

सोनिया के प्रसंग में स्त्रियो की नागरिकता के सवाल पर भी गौर किया जाना चाहिए। यद्यपि सोनिया गांधी ने 1983 में विधिवत भारतीय नागरिकता ग्रहण कर ली थी परंतु 1980 से ही उसका नाम वोटर लिस्ट में था, उन्हें  मतदाता का अधिकार प्राप्त था, अर्थात् उनकी नागरिकता पति की नागरिकता से पुष्ट हो रही थी। मनुस्मृतीय व्यवस्था में पति का घर ही स्त्री  का घर होता है। अन्यथा स्त्रियों का अपना कोई घर नहीं। भारत पाकिस्तान बंटवारे में किसी देश की संपत्ति, जमीन, मकान पर स्त्रियों का अधिकार नहीं था। उनकी नागरिकता धर्म से निर्धारित हो रही थी। विभाजन के बाद दोनों देशों की अपहृत महिलाओं की पुनर्वापसी अभियान में स्त्रियों की नागरिकता के संदर्भ में अपनी राय का कोई अधिकार नहीं था, जबकि दोनों राष्ट्र बनना इसी आधार पर तय हुआ था कि किसी भी राष्ट्र में रहने का चुनाव नागरिक की स्वेच्छा पर निर्भर करेगा। परंतु पुनर्वापसी में हिन्दू और सिख महिलाओं के लिए उनका घर भारत ही था और मुस्लिम महिलाओं का स्वाभाविक घर पाकिस्तान। धर्म किस प्रकार नागरिकता तय करती है अथवा किसी दूसरे राष्ट्र में, जहां किसी अन्य धर्म को नागरिकता की बहुलता है, एक धर्म दुर्राभसंधि की संभावनाएं पैदा करता है, इसका उदाहरण अशोक सिंघल के 12 जून 1999 में नागपुर में दिए गए भाषण में मिलता है, ‘सोनिया गांधी के छद्म वंश में पोप भारत पर शासन करना चाहता है।’

सांस्कृतिक राष्ट्रवाद तो धर्म के आधार पर नागरिकता को अपना व्यापक सरोकार भी घोषित करता है। भारतीय मुसलमानों के लिए हिन्दुवादी विचारधारा की स्पष्ट घोषणा है कि भारत में रहना होगा तो वंदेमातरम् कहना होगा, रामकृष्ण को अपना पुरखा मानना होगा और मुहम्मदी हिन्दू बनकर रहना होगा।
सोनिया स्वयं भी पोपुलर  राजनीति के मानस से संचालित अपने संबोधनों में भारत में अपनी नागरिकता के आधार पर स्वयं को प्रस्तुत नहीं करती हैं बल्कि भावनात्मक दोहन का प्रयास करती हैं, ‘मैं यही सुहागिन बनी फिर मां बनी और विधवा भी हुई।’ यानी पत्नी और मां के रूप में स्त्री  को प्रतिष्ठा देने वाली भारतीय पितृसत्तात्मक समाज को वे सुविधा ही मुहैया करा रही होती हैं।

इस पूरे प्रकरण में विवाद के तौर-तरीके भी पितृसत्ता की लम्पट भाषा के साथ ही शालीन तर्क के भीतर थे। स्त्री  के खिलाफ स्त्रियां खड़ी हुईं। सोनिया को सुषमा स्वराज और उमा भारती ललकार रही थी। एक विदेशी (सोनिया) के खिलाफ पिछड़ी जाति (उमा भारती) अखाड़े में उतरी,सब कुछ सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और पितृसत्ता के सपनों के अनुरूप ही था, मलेच्छ के खिलाफ पिछड़े – दलित भी सवर्ण हितों के साथ जा खड़ा होता है, हिन्दू हित के नाम पर और स्त्री  के खिलाफ स्त्रियां ही जाती हैं। इसी दौरान किसी तमिल पत्रिका ने सोनिया गांधी की एक विवादास्पद तस्वीर छापी-प्रयास ‘इज्जत-हरण’ का था, इज्जत सोनिया की, स्त्री की, और चूंकि वह परिवार की इज्जत है इसलिए कांग्रेस की। पक्ष के बौखलाए लोगों की चिंता भी इसी इज्जत की धारणा से संचालित थी क्योंकि सोनिया का अपमान संपूर्ण राष्ट्र का अपमान था, क्योंकि  वह इस राष्ट्र की बहू हो चुकी थी। है न पितृसत्ता की लम्पट भाषा और उसके शालीन तर्क!

फोटो प्रकरण का एक और खतरनाक निहितार्थ है। पुरुष-दर्शन के लिए निर्मित तस्वीर या स्त्रिायों के भीतर की पुरुष-दृष्टि (Male Gaze) की तुष्टि के लिए बनायी गयी तस्वीर दर्शकों/ पाठकों की एक मनोग्रंथि को संतुष्ट करती है, जिसे Voeurism कहते हैं, कामुक नग्नता/अश्लीलता को देखकर प्राप्त आनंद। सोनिया विदेशी है, उच्च वर्ग की लोकप्रिय महिला है, इसीलिए मनोग्रंथि के तमाम फण्टैसियों के लिए उपयुक्त पात्रा भी है, बाजार पाठकों/दशकों/क्रेताओं की हर कमजोरी और ताकत से रुपए बनाता है, फिर राजनीतिक कृपालुओं की कृपा भी पाना चाहता है।

१० सालों बाद वही नागरिकता विवाद , भावुक सानिया मिर्ज़ा

इस प्रकार के संवेदनशील मुद्दों पर बेवाक राय बनाने में सावधानी बरतने की आवश्यकता इसलिए है कि रुढि़वादी भी यदि आपके निष्कर्षों तक ही पहुंचते हैं या इन निष्कर्षों में उन्हें आंशिक समर्थन भी प्राप्त होता है, तो उनका गलत इस्तेमाल आसानी से किया जा सकता है। सोनिया गांधी को सिर्फ राजीव की विधवा होने के कारण प्रधानमंत्री नहीं होना चाहिए का निष्कर्ष इस स्थापना के साथ दिया जाए कि परिवारवाद का लोकतंत्र में कोई स्थान नहीं होना चाहिए  तथा बहू होने के नाम पर प्रधानमंत्री पद की दावेदारी का तर्क बनाना लोकतांत्रिक  समाज के लिए बाधा है, तो परंपरावादियों को ही बल मिल रहा होगा। इसके पूर्व भी शाहबानों प्रकरण में नारीवादियों की चिंताओं को हिन्दूवादी राजनीति के नेताओ ने भुनाया था तथा प्रकरण की आड़ में ही समान नागरिक संहिता की राय को अधिक मजबूती देने की कोशिश की थी। गड्डमड होने के इस खतरे के बावजूद स्त्रीवादी  दृष्टि तो इस प्रकरण पर बनायी ही जानी चाहिए।

आरती रानी प्रजापति और पूजा प्रजापति की कवितायेँ

( स्त्रीकल में आज दो  नवांकुर कवयित्रियों की कवितायें . आरती रानी जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय में शोधरत हैं  और पूजा प्रजापति आंबेडकर विश्वविद्यालय दिल्ली में शोधरत हैं )

आरती रानी की कवितायेँ

कैसे?

10-12 ईटें
एक साथ उठाते
तुम
क्या थकते नहीं हो?
क्या तुम्हें नहीं लगती
धूप
बारिश
तपती धरती
पराई ?
क्या नहीं आता गुस्सा तुम्हें
इन सब पर
क्या तुम्हारा पसीना

सुख गया है
या तुम आदी हो गये
क्या तुम्हारे फटे पैर
दर्द नहीं करते ?
नहीं निकलती उनसे चीख?
फिर तुम कैसे
मुस्कुरा लेते हो
हर परिस्थिति में?

रेड-लाईट

चिथड़े ख्वाब
और
मैली देह के साथ
सूखे स्तनों से
दूध पिलाती तुम
खींच लेती हो
अपनी ओर निगाहें
दौड पड़ती है
उनमें चिंगारी
कौधने लगता है दिमाग
सुर्ख तन के साथ
और
तभी
ओवर हो जाती है
रेड-लाईट
सुरक्षित बच जाती हो तुम
अनगिनत
बलात्कार के बावजूद

पूजा प्रजापति की कविता 

वो नीचजात

बहुत जरुरी था उसका टूट जाना
बरसों से बंधी झूठी आस का खत्म हो जाना
जीवन पर से उसका विश्वास उठ जाना
वो जात ही बहुत बुरी है
उसके साथ यही सलूक होना चाहिए
एक बार नहीं दो बार नहीं
जीवनभर गलती जो करती रही वो नीचजात
इतनी बड़ी गलती की सजा इससे कम भला क्यों हो
ऐसी सजा दुनिया का कोई भी कानून नहीं दे पाता
ऐसी जात को जन्मते ही मार दिया जाना चाहिए
ताकि फिर वह अंधविश्वास न कर सकें
किसी जल्लाद को भगवान मान फिर न पूज सकें
फिर कभी समर्पित न कर सकें वो अपना अस्तित्व
कभी न बंध सकें वो नीच मेरे साथ रिश्ते में
आखिर उसकी औकात ही क्या जो बराबरी करती है
अबतक उसकी जिंदगी सही सेवा में बीतती रही है
उसकी अस्मिता को यूँ ही रौंदा जाना चाहिए
यूँ ही तार तार कर दिया जाना चाहिए उसका आँचल
क्योंकि वह स्त्री है और मैं पुरुष
कैसे सह सकता हूँ उसका ऊंचा अस्तित्व
कैसे देख सकता हूँ उसे इठलाते
उस समाज में जहाँ सिर्फ मेरी सत्ता है…..

महिलाएं असुरक्षित, यहां भी और वहां भी

आशीष कुमार ‘‘अंशु’


आशीष कुमार ‘‘अंशु’ देश भर में खूब घूमते हैं और खूब रपटें लिखते हैं . आशीष फिलहाल विकास पत्रिका ‘सोपान’ से सम्बद्ध हैं और विभिन पत्र -पत्रिकाओं में लिखते हैं . संपर्क : 9868419453 .

( पूर्वोत्तर से भारतीय सेना के द्वारा स्त्रियों पर अत्याचार की खबरें आती रहती  हैं , महिलाओं ने उनके खिलाफ व्यापक प्रदर्शन भी किये हैं.  पूर्वोत्तर के राज्य महिलाओं की स्वतंत्रता की लिहाज से अपेक्षाकृत बेहतर समाज माना जाता है. वहाँ महिलाओं पर स्थानीय पुरुषों द्वारा यौन हिंसा की यह रपट परेशान करती है.)

इम्फाल न्यायालय के बाहर एक सुबह की यह घटना है। टीजी हायर सेकेन्डरी स्कूल की लड़कियां न्यायालय के बाहर आकर इकट्ठी थीं। इन लड़कियों को उन दो लोगों कां इंतजार था, जिन्हें पुलिस अपनी हिरासत में लेकर न्यायालय में आई थी। उन लड़को को देखते ही  लड़कियों के एक झुण्ड   ने हमला कर दिया। लड़कियां उन दोनों लड़कों को छोड़ने के इरादे  में नहीं थी। बाद में लड़कियों के चंगुल से इन दोनों लड़कों को महिला पुलिस ने आकर बचाया। इन दो युवको पर बलात्कार का आरोप था। इनमें एक 27 वर्षिय पुलिस का सिपाही थोंगम तरूण था, थोंगम ने कुछ मणिपुरी फिल्मों में काम भी किया है। दूसरा मणिपुर पुलिस की गाड़ी का ड्राइवर 30 वर्षीय  युवनाम विलियम था। इन दोनों के ऊपर सोलह साल की एक स्कूल जाने वाली लड़की को खाने में नशा मिलाकर खिलाने और बलात्कार का आरोप था। आरोप है कि पहले थोंगम ने उस लड़की को अपने प्रेम के जाल में फंसाया और उसके बाद एक दिन मौका देखकर खाने में नशा मिलाकर पहले उसे बेहोश किया और उसके बाद अपने मित्र के साथ मिलकर उसके साथ बलात्कार किया।

इन युवको के लिए फांसी की मांग कर रही लड़कियां अपने स्कूल की पढ़ाई छोड़ कर आई थी और माहौल ऐसा बन गया था कि आज बिना उन दोनों  युवकों की फांसी तय हुए वे वापस नहीं जाएंगी। बाद में गृह मंत्रालय को इस मामले में हस्तक्षेप करना पड़ा। गृह मंत्रालय की तरफ से लड़कियों को विश्वास दिलाया गया कि पीड़ित लड़की के साथ न्याय होगा। लड़कियां दोषियों के लिए फांसी की मांग कर रहीं थीं। गृह मंत्रालय की तरफ से मिले आश्वासन के बाद लड़कियों ने स्पष्ट किया – यदि गृह मंत्रालय ने अपना वादा पूरा नहीं किया तो वे अपना विरोध प्रदर्शन फिर जारी करेंगी।

बलात्कारियों को कड़ी सजा दिलाने के लिए कोर्ट परिसर के बाहर खड़ी मणिपुरी महिलायें

पूर्वोत्तर भारत का जिक्र जब भी हमारे सामने आता है, हमारे सामने एक ऐसे प्रदेश की छवि उभरती है, जहां महिलाओं को आजादी है, अपने तरह से जीने की। जहां स्त्री और पुरूष में कोई भेद नहीं है। जहां स्त्री पर किसी भी तरह की हिंसा की बात कोई सोच भी नहीं सकता। पूर्वोत्तर में मणिपुर का दर्जा और भी ऊपर है, यहां विभिन्न आन्दोलनों और अभियानों को महिलाओं ने ही नेतृत्व दिया है। फर्स्ट वीमेंस  वार (1904) और सेकेन्ड वीमेंस  वार (1939-40) की जमीन है, मणिपुर। क्या अब मणिपुर बदल रहा है?

ह्यूमन राइट अलर्ट के बबलू लोइटोंगबम बताते हैं– ‘मणिपुर की स्थितियां पिछले दो-तीन दशकों में बदली हैं। इसमें टेलीविजन के सास-बहू वाले धारावाहिक और बॉलीवुड की फिल्मों ने बड़ी भूमिका निभाई है। मणिपुर में महिलाओं की स्थिति पूरे देश से बेहतर है, यह कहना ठीक नहीं होगा लेकिन यहां की महिलाओं को, जो दूसरे राज्यों की महिलाओं से थोड़ा अलग करता है, वह सिर्फ इतना की, यहां की आंतरिक अर्थव्यवस्था, ट्रेड और कॉमर्स महिलाओं के हाथ में हैं।’ बबलू बताते हैं- ‘इम्फाल का मुख्य इमा बाजार, जहां खाने-पीने से लेकर घर की जरूरत का दूसरा सारा सामान मिलता है। उसे मणिपुर के विभिन्न हिस्सों से आकर महिलाएं ही सम्भालती हैं। इमा बाजार मणिपुर में आर्थिक गतिविधियों के साथ-साथ राजनीतिक गतिविधियों का भी केन्द्र बना है। कारोबारी महिलाओं के इस ताकत का इस्तेमाल कई बार यहां के आन्दोलनों में भी हुआ।’

मणिपुर की यह घटना कई लोगों को चौंका सकती है, जिसमें ट्रक से अपने देवर के साथ तमेन्गलांग जिले से आ रही एक महिला का पीछा कार में सवार चार युवक करते हैं और एक सुनसान से रास्ते में ट्रक रूकवा कर महिला के साथ चारों युवक बलात्कार करते हैं। मणिपुर महिला आयोग की अध्यक्ष डॉ एल इबेटॉम्बी देवी पत्रकारों से बात करते हुए कहती हैं- मणिपुर में बढ़े बलात्कार के मामले चिन्ताजनक हैं, और जो मामले प्रकाश में आए हैं, उनमें नशीले पदार्थों का उपयोग किसी न किसी तरह अधिकांश मामले में हुआ है। इम्फाल पूर्वी जिले में अक्टूबर में हुआ एक बारहवीं कक्षा की लड़की के साथ बलात्कार एक ऐसा ही मामला था। इबेटॉम्बी देवी जब प्रेस कान्फ्रेन्स में बता रहीं थी कि “जो मामले प्रकाश में आए हैं”, उस वक्त उन्हें जानकारी थी कि बड़ी संख्या में मामले प्रकाश में आ नहीं पाते हैं।

भारतीय सेना के द्वारा लड़कियों के बलात्कार के खिलाफ प्रदर्शन करती मणिपुरी महिलाएं

महिलाओं पर हुए अत्याचार के मणिपुर में 01 जनवारी 2012 से 15 अक्टूबर 2012 तक दर्ज हुए मामलों की जानकारी एक गैर सरकारी संस्था ने उपलब्ध कराई। मिली जानकारी के अनुसार, बलात्कार के कुल 21 मामले दर्ज हुए, बलात्कार के बाद हत्या के 04, आत्महत्या के 18, हत्या के 16, बलात्कार के प्रयास के 07, बलात्कार के बाद हत्या के प्रयास के 01, जलाए जाने के 01, गंभीर चोट पहुंचाए जाने के 41, अपहरण के 04, धमकी के 02, लापता हुई 30 लड़कियां, और परिवार ने जिन लड़कियों को अपने हाल पर छोड़ दिया ऐसे मामले 03 हैं।  यह सारे वे मामले हैं जो प्रकाश में आए। बहुत सारे मामलों के संबंध में जानकारी ही नहीं मिलती, क्योंकि सारी खबरों तक न पुलिस की पहुंच है और न ही अखबार और टीवी चैनलों की।

वीमन्स  एक्शन फॉर डेवलपमेन्ट की सबीता मंगस्ताबम के अनुसार मणिपुर के कुल नौ में से पांच जिले पहाड़ी हैं। पहाड़ी जिलों में कानून व्यवस्था नाम की कोई चीज नहीं है। सबीता बताती हैं- ‘मणिपुर के पहाड़ी इलाकों में आज भी पारम्परिक  कानून चलता, जिसमें महिलाओं के खिलाफ हत्या, बलात्कार जैसे घिनौने अपराध का निपटारा गाय, भैंस या फिर मुर्गे की लेन-देन से आज भी हो जाता है। मणिपुर की पुलिस महिलाओं पर हुए अत्याचार को कभी गंभीरता से देखने की कोशिश नहीं करती है। क्या पहले बलात्कार और उसके बाद पैसो या बकरी-गाय के बदले समझौता, क्या एक सभ्य समाज की परंपरा है? इसे लेकर मणिपुर के अंदर एक स्वस्थ्य बहस होनी चाहिए, जिससे अपराधी को सही  सजा मिल सके।”

खोपुर क्षेत्र में चार स्कूल जाने वाली लड़कियों के साथ बलात्कार का मामला सरकार के लिए शर्म की बात बनी हुई है। इस तरह के मामलों को सरकार हर तरह से मीडिया में आने से रोकना चाहती है। मीडिया में खबरों को आने से रोकने की जगह सरकार यदि अपराध को रोकने में कसरत करती तो वह मणिपुर समाज के लिए भी अच्छी खबर होती। राज्य के स्वैच्छिक संगठन लगातार इस मामले में न्याय की मांग कर रहे हैं। मणिपुर की स्थितियों की चर्चा करते हुए बबलू एक बात जोड़ते हैं- राज्य में महिलाओं पर बढ़े अत्याचार की बात करते हुए, आर्म्स फोर्सेस (स्पेशल पावर्स) एक्ट की इसमें भूमिका को कम करके नहीं देखा जा सकता। पूरे मणिपुर को फौजी कैम्प में बदल दिया गया है। प्रत्येक 40 मणिपुरी पर एक फौजी मणिपुर में तैनात कर दिया गया है। 25 लाख की आबादी पर साठ हजार जवान हैं यहां। आप सोचिए यहां के आम लोगों पर इसका क्या प्रभाव पड़ रहा होगा?

सबीता का मानना कुछ बबलू जैसा ही था, ‘ मैदानी इलाकों की खबर मीडिया में आ भी जाती है। पहाड़ी क्षेत्रों में क्या हो रहा है, कौन जानता है? कौन लिख रहा है उनके बारे में और कौन दिखा रहा है उनकी कहानी? मणिपुर में जवानों को असीमित अधिकार दे दिया गया है और गांवों में तो वे किसी के साथ कुछ भी करने को स्वतंत्र हैं क्योंकि वहां से कोई खबर शहर तक नहीं आती।’  पूर्वोत्तर में महिलाओं की स्थिति को लेकर जो एक आदर्श सी छवि हमारे दिमाग में है, उस तस्वीर को मिटाने की जरूरत नहीं है लेकिन हमें समझना चाहिए वह तस्वीर पूरी कहानी बयान नहीं करती क्योंकि वह एक अधूरी तस्वीर है।

राजेंद्र यादव के अंतर्विरोध , हंस और दलित स्त्री अस्मिता के सवाल

 मनीषा कुमारी / संजीव चंदन

( ३१ जनवरी को हंस का सालाना आयोजन है हंस के  पुनर्प्रकाशन दिवस और  प्रेमचंद जयन्ती के अवसरपर. राजेन्द्र यादव के सम्पादन में हंस के लगभग २८ वर्षों के प्रकाशन के दौरान ३५० अंकों के एक अध्ययन के द्वारा राजेन्द्र जी के वैचारिक अंतर्विरोध की पड़ताल करता यह आलेख . विशेष सन्दर्भ हैं  दलित स्त्री अस्मिता के सवाल . यह आलेख अनिता भारती और बजरंग बिहारी तिवारी के संयुक्त सम्पादन में प्रकाशित होने वाली किताब ‘ यथास्थिति से टकराते हुए दलित स्त्री जीवन से जुडी आलोचना’ के लिए लिखा गया है . )

हिन्दी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर राजेन्द्र यादव, उदय शंकर के द्वारा ली गई तस्वीर

फरवरी 1994 के सम्पादकीय में राजेंद्र यादव जी हंस की नीति स्पष्ट करते हैं, जो  1986 के अगस्त से हंस के पुनर्प्रकाशन का मैनीफेस्टो भी है . प्रेमचंद के हंस का 34 सालों बाद पुनर्प्रकाशन हिंदी साहित्य जगत और हिंदी समाज के लिए एक मह्त्वपूर्ण परिघटना है , जिसकी बडी उपलब्धियों में से एक है दलित और स्त्री अस्मिता की आवाज को स्पेस देना और उसे हिंदी की चेतना मे अनिवार्य रूप से दाखिल  करा देना . 1994 के उस सम्पादकीय में राजेंद्र यादव राजेश जोशी के द्वारा अनूदित कैथरीन मन्सफ़ील्ड की कहानी को हंस में न प्रकाशित किये जाने के अपने निर्णय के संबंध में कहते हैं , ‘ मगर मेरी इच्छा है कि तीसरी दुनिया के संघर्षों को वाणी देने वाली कविताओं , कहानियों को ही रेखांकित करने की कोशिश की जाय तो बेहतर है .’
अब सवाल है कि 1986 के बाद , बल्कि उसके पहले से ही हकीकत बन चुके तीसरी दुनिया में अस्मिताबोधी आंदोलनों को लेकर हंस का क्या स्टैंड रहा है , यह समझना जरूरी है . हालांकि इस आलेख का उद्देश्य  दलित  स्त्री और स्त्रीवाद के प्रति हंस और राजेंद्र यादव के रिश्ते  और नीतियों  की पडताल तक ही सीमित है. आजतक लगभग 350 अंको के साथ अगस्त 1986 से निरंतर हंस के शुरुआती अंकों में ही एक स्पष्टता है , साम्प्रदायिकता के खिलाफ उसकी स्पष्ट मुहिम की शुरुआत प्रारम्भिक अंकों से ही है और देह केंद्रित स्त्री -यौनिकता की पक्षधरता की झलक भी प्रारंभिक अंकों में ही मिल जाती है. पहले ही अंक में अरविंद जैन के  आलेख ‘प्रजापति कटघरे में’ और वहीं अर्चना वर्मा के द्वारा प्रस्तुत इर्विंग वैलेस के ‘सेवन मिंनट्स’ के एक अंश के प्रकाशन के साथ साहित्य में अश्लीलता के विवादों पर हंस का अपना स्टैंड घोषित सा है. धीरे- धीरे हंस स्त्रीविमर्श और दलित विमर्श के लिए प्रतिबद्ध होता गया. उसकी यही खूबी बनी और उसके विरोधियों के लिए यह उसका दुर्गुण.

हंस का एक महत्वपूर्ण विशेषांक

लेकिन हंस की इस घोषित प्रतिबद्धता के अंतर्विरोध  भी खूब हैं. सबसे बडा  अंतर्विरोध  राजेंद्र जी की प्रतिबद्धता और उनके ट्रेनिंग के बीच है . बाद के दिनों में समाजशास्त्री लीला दूबे को जवाब में लिखे अपने एक सम्पाद्कीय में  राजेंद्र जी यह स्वीकार भी करते हैं कि उनकी ट्रेनिंग शास्त्रीय नहीं है , अकादमिक नहीं है, इसलिए वे कामनसेंस के साथ मौलिक ढंग से सोचते हैं.  अभाव सिर्फ अकादमिक ट्रेनिंग भर का ही नहीं है; अभाव है तत्कालीन समविचारी आंदोलनों  से किसी जुडाव का भी या फिर प्रसंग है अपनी सामाजिक वर्गीय स्थिति में खुद के मानस निर्मिति का भी . यही कारण है कि जातिउत्पीडन के खिलाफ बाद में मुखर दिखते राजेंद्र जी जब हंस के पुनर्प्रकाशन के पांचवे  अंक में  ही युवाओं को संबोधित करते हैं, ‘ एक संदेश नई पीढी के नाम’ में, तो वह संबोधन मध्यवर्गीय युवाओं को संबोधित करने तक सीमित रह जाता है ,और पूरे संदेश में जाति उत्पीडन कोई विषय नहीं होता है.  उसके ठीक दो महीने बाद फरवरी 1987 की संपादकीय में वे लिखते हैं, ‘ हमारे यहां सिर्फ गुंडागर्दी, बलात्कार, गावों में हरिजनों और स्त्रियों के ‘वध’ की कला  का विकास हुआ है .’ 1987 में राजेंद्र जी जिस ‘हरिजन’ शब्द का प्रयोग कर रहे हैं , उसके प्रति दलितचेतना नफरत से भरी थी और राजेंद्र जी उसका बेधडक प्रयोग कर रहे हैं. इसके पहले वे अक्टूबर 1986 में शैलेश मटियानी का आलेख ‘ हरिजन होने का मतलब’  छाप चुके थे .  यह वह समय है, जब हिंदी पट्टी में भी कांशीराम जी के सायकल के पहिये घूमने लगे थे . महाराष्ट्र तो उग्र पैथर आंदोलन की वैचारिकी से पहले ही रु-ब-रु हो चुका था.

इस शास्त्रीय ट्रेनिंग या आदोलनों से दूरी या अपनी वर्गीय -जातीय निर्मितियों के कारण अपनी सीमाओं के बावजूद राजेंद्र जी ने अपने हंस के पन्नों पर अपना और हंस  का वैचारिक आगाज दे दिया था , वे हिंदू धर्म , हिंदू -हिंदी समाज की जडताओं पर प्रहार के लिए प्रतिबद्ध थे. इस प्रक्रिया में ही वे 1988 के जनवरी में डा. आम्बेडकर के द रिडल औफ राम ऐंड कृष्ण का अनुवाद प्रकाशित करते हैं. यहां भी यद्यपि वे कृष्ण की अपनी व्याख्या करते हुए इस मह्त्वपूर्ण आलेख के राम वाले हिस्से हो ही प्रकाशित करते हैं. धीरे-धीरे हंस में अनिवार्यतः स्त्री और दलित मुद्दे स्थान लेने लगते हैं, हंस ‘देहमुक्ति’ के अपने सिद्धांत की वकालत की राह पर भी चल निकलता है . जहां तक स्त्री और दलित रचनाधर्मिता के लिए प्लेटफार्म का सवाल है तो इस मामले में स्त्री रचनाधर्मिता भारी पडती है . दलित रचनाधर्मिता के लिए स्पेस के संदर्भ में पत्रिका पुनर्प्रकाशन  के 18 साल बाद पहला दलित विमर्श अंक ‘ सत्ता और दलित’ के संपादक श्योराज सिंह बेचैन कहते हैं कि इतने सालों में हंस में ‘दलित रचनाकारों की उपस्थिति 5% तक ही है’ . दलित स्त्री रचनाकार तो नगण्य हैं ही .  हंस की अब तक की यात्रा में प्रकाशित स्त्री विमर्श और लेखन के विशेष अंकों में भी दलित स्त्री की भागीदारी और उसके संघर्ष के मुद्दों की प्रायः अनुपस्थिति सी है . दुःस्थिति तो यह भी है कि खुद श्यैराज सिंह के सम्पादन में प्रकाशित ‘ सत्ता और दलित अंक’ में दलित लेखिकाओं की भागीदारी भी नगण्य है. अतिथि संपादक इसके लिए संपादकीय में अपनीए मजबूरी इन शब्दों में बताते हैं, ‘ हमारे पास ख्याति प्राप्त लेखिकायें वास्तव में नहीं है.’ इस सफाई पर दलित स्त्रीवादी रचनाकार अनिता भारती की माकूल टिप्प्णी है , ‘ यह टिप्पणी दलित महिलाओं पर बिल्कुल उसी तरह की है ,जिस प्रकार सवर्ण मानसिकता से ग्रसित सवर्ण लेखक दलित लेखकों पर करते हैं.’ पृ . 215, समकालीन नारीवाद , अनिता भारती ).

राजेन्द्र जी की यह तस्वीर उनके विरोधियों और चाहने वालों के सामान रूप से प्रिय है .

राजेंद्र जी दलितों और स्त्रियों की साझी लडाई की बात करते हैं , दोनों की पीडा वे एक सी बताते हैं. 2002 के संपादकीय में वे लिखते हैं, ‘ साहित्य में स्त्रियों और दलितों का साथ आना एक साझी क्रांति का प्रारंभ है, क्योंकि दोनों ही सही अर्थों में सर्वहारा हैं, इनकी वास्तविक मुक्ति भी सर्वहारा क्रांति के दर्शन से उदित होगी .’ नवम्बर 2002 में वे फिर लिखते हैं, ‘ स्त्री और दलित दोनो ही अन्य हैं, वह समानांतर दुनिया में रहती है . चूकि हमारे और उनके बीच की अंतर्क्रिया निरंतर बनी रहती है इसलिए उसकी चेतना और अभिरूचियों का विकास हमारी ही बोली बानी  में होता है .’ इसके पहले भी 1994 के नवंबर -दिसंबर अंक  ‘औरत उत्तर कथा 1’ के संपादकीय में वे जहां धर्म और जाति दोनो को ही स्त्री के उत्पीडन में समान रूप से सक्रिय बताते हैं , वहीं दलित स्त्री को भी ‘स्त्री अस्मिता’ के वृहद आकार में शामिल मानते हैं, ‘ धर्म और जातिगत बलात्कारों के बीच अपने को साधे रखना शायद औरत के लिए सबसे बडी अग्निपरीक्षा है. देह के बलात्कार द्वारा कुचल जाने या पूरी तरह ध्वस्त हो जाने से इन्कार करने वाली तो न जाने कितनी भंवरी बाइयां समाज और साहित्य में उठ खडी हुई हैं.’ राजेंद्र जी की दलित और स्त्री की एक लडाई की वकालत यूं ही निर्विवाद भी नहीं थी . 1993 के अप्रैल में हंस में ही मृदुला गर्ग उनकी इस धारणा को दुरुस्त करने की कोशिश करती हैं, ‘ पर आप निराश न हों आपकी हमदर्द -हमख्याल बीसियों औरतों को मैं जानती हूं, जो हर तरह से स्वतंत्र -सम्पन्न होने के बावजूद खुद को दलित बतलाती है. बकायदा रोती -कलपती -झीकती हैं , पर दलित वर्ग की स्त्री के लिए तनिक सोच-विचार करने को तैयार नहीं हैं. स्त्री जाति में भी दो वर्ग हैं , ‘ दलित और गैर दलित , उसी तरह पुरुषों में भी दो वर्ग हैं : दलित और गैरदलित.’ यहां मृदुला जी राजेंद्र जी को ठीक -ठीक सामजिक हकीकत बता रही हैं, जिस हकीकत की भूमि पर ही दलित स्त्रियों ने अपनी आवाज गैरदलित स्त्रियों और दलितों से अलग बनाई. जब यह आवाज बनने लगी तो राजेंद्र जी अपने ही अंतरविरोध के साथ फिर उपस्थित हुए. उस वक्त मृदुला गर्ग की उन्होंने खूब खबर ली , उन्हें अपने टार्गेट के कुछ लोगों में शामिल कर लिया . मृदुला जी उन गैर दलित स्त्रियों से एकदम अलग और सही स्टैंड पर हैं, जो उनके समर्थन में इसलिए आईं कि उन्हें दलितों से अपनी तुलना में अपना अपमान दिख रहा था, जबकि मृदुला जी राजेंद्र यादव के साथ -साथ गैरदलित स्त्रियों को भी समाज की वास्तविकता पर आधारित समाजशास्त्रीय विश्लेषण बता रही थीं , वे गैर दलित स्त्रियों की आत्मग्रस्तता की खूब खबर ले रही थीं अपनी इस स्थपना में .

 इसके विपरीत राजेंद्र जी उन्हें उन स्त्रियों का प्रतिनिधि बताकर अपना प्रतिपक्ष बना लेते हैं, जो दलितों की तुलना से नाक -भौं सिकोड रही थीं. और जब दलित स्त्रियों का अपना पक्ष उनसे अपना हिस्सा मांगता है, दलित स्त्रीवाद उन्हें अपनी लडाई की मशाल थमाना चाहता है, तो वे अपने ही कंफ्युजन के साथ प्रतिक्रिया देते हैं. दलित स्त्रीवाद और दलित स्त्री अभिव्यक्ति पर आधिकारिक काम करने वाले बजरंग बिहारी तिवारी के अनुसार उनका लेख वे यह कहते हुए लौटा देते हैं कि ‘ दलित स्त्रीवाद दलितों और स्त्रियों की लडाई को कमजोर करेगा.’ अपने इस तर्क के समर्थन में वे अपने सहयोगी संजीव को भी शामिल बताते हैं. ऐसा करते हुए राजेंद्र जी यही भूल जाते हैं कि  कभी हंस को उन्होंने तीसरी दुनिया के संघर्षों को वाणी देने का प्लेटफार्म बताया था. ब्लैक और दलित स्त्रीवाद इस दुनिया की एक बडी हकीकत के रूप में था, जिसे वे अपने ही बनाये कारणो से नकार रहे  थे. नकार का यह तर्क जबकि अस्मिताबोधी सारी आवाजों के खिलाफ जाता है, हां, स्त्री और दलित आवाजों के खिलाफ भी. कम्युनिष्ट पार्टियों में सक्रिय स्त्रियों ने जब अपनी आवाज बनाई तो उनके खिलाफ ऐसे ही तर्क दिये गये थे और दलितों की लडाई और आवाज को भी ऐसे ही तर्कों के साथ वर्ग संघर्ष के मार्ग में रोडा बताया गया था. राजेंद्र जी की तुलना में मृदुला गर्ग राजनीतिक रूप से ज्यादा करेक्ट पोजीशन पर दिखती हैं.
राजेंद्र जी और हंस स्त्री विमर्श के मामले में भी अपना ही संसार रचते हैं. इनके लिए स्त्री की मुक्ति का मार्ग ‘देहमुक्ति’ से तय होता है और ‘ देहमुक्ति’ को वे यौनप्रसंगों तक सीमित कर देते हैं. हंस के शुरुआती पन्नों में ही साहित्य  में यौन प्रसंगो के डीटेल पर खूब सारी बहसें और सम्पादकीय पसरे पडे हैं. राजेंद्र जी अपनी इस जिद्दी समझ को खाद पानी अपनी जिस समझ से देते हैं , उसकी अभिव्यक्ति वे जुलाई 1993 के अपने संपादकीय में करते हैं , ‘ स्त्री अपनी बौद्धिक  या अन्य उप्लब्धियों के लिए चाहे जितनी हाय तौबा मचाती रहे, पुरुष की जिद्द् है कि साम दाम दंड भेद से वह उसे कमर , कूल्हे , नितंब , छातियों से ऊपर नहीं उठने देंगे.’ इस जिद्दी समझ का ही आलम था कि बाद के दिनों में रचनाओं में यौन प्रसंगों के डीटेल हंस में छपने की गारंटी बनने लगे.  राजेंद्र जी को खुद ही पता नहीं चला कि उन्होंने खुद को और हंस को कब पुरुषों के उसी अभियान में शामिल कर लिया जिसमें उसकी जिद्द है कि साम दाम दंड भेद से वह उसे कमर , कूल्हे , नितंब , छातियों से ऊपर नहीं उठने देगा.’ हंस के पुनर्प्रकाशन की योजना में शामिल और पहले ही अंक से नियमित लेखक अरविंद जैन इस जिद्द को चिह्नित करते हुए कहते हैं कि ‘ मैंने खुद को उसी दिन हंस से अलग कर लिया जब उसके एक अंक में छपी बलात्कार की आधा दर्जन से अधिक कहानियों में पीडिता को बलात्कार की घटना के बाद अनिवार्यतः आइने के सामने निर्वस्त्र होते पाया. यह सारी कहानियों में महज संयोग नहीं हो सकता , यह विकृति थी, यह एक योजना बद्ध प्रकाशन था.’फिर सवाल है कि दलित स्त्रीवाद आलोचना के आइने में हिंदी की एक मह्त्वपूर्ण उपस्थिति को कैसे देखा जायेगा.

फिर सवाल यह भी है कि इस उपस्थिति को देखने की जरूरत भी क्या है और क्यों है? निस्संदेह भागीदारी की कसौटी पर हंस दलितों और दलित स्त्रियों ,दोनो की दृष्टि से कमजोर है. सैद्धांतिक स्तर पर भी राजेंद्र जी बहुत से  वैसे दलित और स्त्री रचनाकारों के साथ खडे दिखते हैं , जो दलित स्त्री की आवाज को दलित और स्त्री आंदोलनों के उद्धेश्य में बाधा पाते हैं. इनमें से कुछ तो दलित स्त्रियों की सक्रियता को डा धर्मवीर की शैली में हिकारत से देखते हैं . ‘ सत्ता विमर्श और दलित’ अंक में खुद डा धर्मवीर अपनी इस शैली का नमूना ‘ दोहरा अभिशाप कितना दोहरा : एक डायनासोर  औरत ‘ में पेश करते हैं, प्रसिद्ध लेखिका कौश्ल्या वैसंत्री की लानत -मलानत करते हैं, और इसके समर्थन में प्रभा खेतान जैसे स्त्री संघर्ष के पैरोकार को उद्धृत करते हैं, ‘ दलित आंदोलन इसलिए ज्यादा सशक्त है कि वहां कांशीराम हैं, डा धर्मवीर हैं, इसलिए नहीं कि वहां मायावती और कौश्ल्या वैसंत्री हैं.’इस सीमा के बावजूद देखना यह होगा कि लगभग 350 अंकों  और लगभग 10 विशेषांकों में फैले हंस के पुनर्प्रकाशन में राजेंद्र जी और हंस ने क्या जाति -धर्म और साम्प्रदायिकता के खिलाफ मुहिम इमानदारी से चला रखी है , क्या समाज में जेंडर विभेद के खिलाफ इमानदारी से  मुहिम छेड रखी है ! इन कसौटियों पर हंस खरे उतरता है और इस लिहाज से इसकी उपस्थिति  हिंदी में दलित स्त्रीवाद के लिए पृष्ठभूमि सी भी है. जरूरत पडने पर दलित स्त्री की आवाज और मुद्दों को दलित और स्त्री आंदोलन के खिलाफ मानने वाले राजेंद्र यादव डा धर्मवीर की नैतिकता और  उनके दलित स्त्रीविरोधी मंतव्यों को अपने संपादकीय में आडे हाथ लेते  भी हैं.  हालांकि यह भी सही है कि इस संपादकीय के लिए अनिता भारती , बजरंग बिहारी तिवारी और श्रीधरम ने राजेंद्र जी को तैयार किया था , उनका मन बनाया था .राजेंद्र यादव  अपने अंतरविरोधों से भरे हैं, उससे संचालित होते हैं, और उसका ही प्राकट्य उनके संपादन और संपादकीय नीतियों में हुआ है, जिससे अनिवार्य मुठभेड और सम्वाद  दलित स्त्रीवादी अस्मिता के लिए जरूरी है.

सलाखें भीतर और बाहर

प्रो.परिमळा अंबेकर

प्रो.परिमळा अंबेकर हिन्दी विभाग , गुलबर्गा वि वि, कर्नाटक में प्राध्यापिका और विभागाध्यक्ष हैं . परिमला अम्बेकर मूलतः आलोचक हैं तथा कन्नड़ में हो रहे लेखन का हिन्दी अनुवाद भी करती हैं . संपर्क:

gughindi22@gmail.com

( यह आलेख केन्द्रीय कारागृह , गुलबर्गा , कर्नाटक , में सजायाफ्ता कैदियों की सजा माफी के लिए विचार की जाने वाली फाइलों के आधार पर लिखा गया है. केन्द्रीय कारागृह की सलाहकार समिति की सदस्य के नाते प्रोफ़ेसर परिमळा अंबेकर ने इन फाइलों का अध्ययन किया . हर फ़ाइल में अपराध की शिकार , कारण स्त्री है , एक अपवाद को छोड़कर, जहां वह प्रत्यक्ष अपराधी तो है लेकिन वही सारा सच नहीं है. यह आलेख केस डायरी के माध्यम से पितृसत्ता का अध्ययन है.)

अपराध, यानी मानसिकता की वह तीखी लकीर ,जो चाहत और चीज के मध्य उभर आती है । चाहत और चीज को, अगर व्यक्ति वैयक्तिकता के घेरे में बांधने की मानिसकता पालता है तो वह बडे ही बेतकल्लुफ हो  उस चीज के सामाजिक घेरे को मिटाता है । अपराधी की मानसिकता निस्संदेह संकुचित और अंधी होने के कारण  चीेजो के अस्तित्व के विशाल और प्रकाशमान घेरे को पहचानता नहीं है और तो और इस सच्चाई को स्वीकारता भी नहीं  है , स्वीकारना भी नहीं चाहता । अपराधी अपनी चाहत की चीज को पाने के लिए ,मानव समाज निर्बंधित बाडे को तोडता है, परिणाम में हाथ उसके रंग जाते हैं खून से !! बदले में नसीब होती है दुनिया सलाखों के पीछे की !!

इतिहास गवाह है, दुनिया के हर जंग, हर झगडे हर जिल्लती अपराध के पीछे इन तीन चीजो को पाने की चाहत छिपी है – जमीन को पाने की, जर को पाने की और जोरू को पाने की । जोरू, यानी  स्त्री । तो चलिये हमने अपनी चाहत की चीजों की फेहरिस्त में जोरू को यानी  स्त्री को भी निर्जीव ,जड संपत्ति  की कोटी में डाल दिया। ताकि अपराध की अपराधी मानसिकता की एकरूपता बनी रहे !! ताकि न्यायिक गतिविधियों के लिए कोई  व्यवधान न रहे ! भले ही अपनी न्यायिक व्यवस्था दफा 304 (ठ ), 354(ए ),366, 367, 376 और न जाने कितने ही स्त्री के प्रति के अपराध के लिए दंड विधान मुकर्रर किया क्यूॅं न हो , लेकिन अपराधी कहा मान बैठेगा कि अपनी सरकार स्त्री को वस्तु नहीं व्यक्ति मानती है। अपराधी तो उसे वस्तु ही मानेगा , तभी तो ऐसे हत्याओं को अंजाम मिलता है।  क्यूॅंकि बाप दादाओं से यह रीत चली है ,कि स्त्री ठहरी भोग की वस्तु , पुरूष की संपत्ति. स्त्री के प्रति वस्तुगत चाहत न रखें तो भला खाक मजा आयगा !! और तो और यह तो रीत रूढी ठहरी । खानदानी  मर्यादा और पुरूषत्वता के दर्प का प्रश्न ठहरा। आसानी से मिटाये तो नहीं मिट जाती ?

केन्द्रीय  कारागृह  की स्थायी सलाह मंडली  बैठक की कार्यवाहियॉं चल रही थी। दीर्घावधी शिक्षाबंदियों की शिक्षा संबंधी परिशीलन के लिए फाइलें खोली जा रही थी । अपराधी ,अपराध और शिक्षा के समीकरण का गहन अभ्यास चल रहा था । अपराधी की फाइलों की प्रतियॉं खुली पडी थी । मैं झांक- झांक कर हर फाइल की तल की गहरायी को देख रही थी । लगभग हर अपराध की केस हिस्ट्री इसी गणित को दुहरा रहे थे । अपराधी पुरूष, जिसपर अपराध हुआ है वह स्त्री, जिसके लिए अपराध हुआ है वह स्त्री, जिस कारण से अपराध हुआ है वह स्त्री । अर्थात हर अपराधिक फाइलें, भीगे हुयी थी स्त्री की ऑंसू से, रंगे हुये थे स्त्री के खून से, खार खाये हुये थे स्त्री की आह से, उसांसों से । अपराधी चाहे कोई  हो, अपराध चाहे कैसा भी हो, दंड विधान चाहे कोई  भी क्यूॅं न हो, परिणाम का ठीकरा फूटते जा रहा था स्त्री पर । मॉं, बेटी, बहन, पत्नी, माशुका…. बनकर वह पुरुषसत्तात्मक  मानसिकता के समाज के सलाखों के पीछे बंधी दिखायी पड रही थी । जैसे सलाखों के पीछे बंद पुरूष से कह रही हो,

तू बंधा है भीतर सलाखों में,
जिसकी अपनी सीमा है, रूप है,
मैं बंधी हूॅं बाहर सलाखों में,
जिसकी अपनी न सीमा है न रूप है,
वह तो बस असीम हैं, अरूप हैं.
जैसे ब्रह्म !

आम निर्णय लेने के लिए सलाह समीति में उपस्थित हर सदस्य से पूछा जा रहा था, क्या आप चौदह वर्ष की शिक्षा काटे इन अपराधियों की बाकी शिक्षा को माफ करने के पक्ष में है या नहीं ? सलाह दीजिये । एक एक करके सजाबंदी की संख्या, नाम, जाति-धर्म, शिक्षा का कलम, शिक्षा अवधी का विवरण, पेरोल की अवधी ,जेल में उस कैदी का व्यवहार चरित्र और अपराध प्रकरण का ब्यौरा , विस्तृत केस हिस्ट्री बतायी जा रही थी । हर सजा बंदी कैदी के केस से संबंधित अपराध का स्वरूप और अपराधी की मानसिकता पर रह रहकर मेरी दृष्टि अड जाती। केस हिस्ट्री पढते पढते ,ऑंख के परदे पर घटना का चलचित्र ही घूमने लगता । उन कुछ एक  चलचित्रों के शब्दचित्र यहॉं प्रस्तुत है , जो इन्हीं सलाखों के पीछे की सच्चाई बताते है । अविश्वसनीय सच्चे झूठ की कहानी बयॉं करते हैं।

केस नं: 1  सजाबंदी संख्या, नाम, स्थान ,जाति धर्म (गोपनीय )
विधित दंड   : भारतीय दंड संहिता की धारा 302  

घटना व अपराधः

लगभग बीस वर्ष का युवक, व्यवसाय से अपना जीवन यापन कर रहा था । पडोसी सुंदर,सुघढ, सुशील ब्याहता औरत पर इसकी नजर पडती है । आते- जाते उसे छेडता है । इसे देखकर, उस सुंदर सुघढ औरत का पति अपराधी युवक के परिवार से भिड पडता  है । युवक यही घाघ लगाकर बैठा हुआ है कि कब वह औरत अकेली हाथ लगे।खेत में काम करते पति को , खाना देने के लिए निकली अकेली औरत , मौके के ताक में बैठा लडका !! अपने साथियों के सहारे, उसे नजदीक के खेत में खींच ले जाता है और बलात्कार  की कोशिश करता है। लेकिन इसका घोर विरोध करती जालसाजों के पंजे में फॅंसी स्त्री। विरोध करती छटपटाती औरत के सर पर वे पत्थर दे मारते हैं । हाथ न आने के आवेश में, क्रोध से , विवाहित स्त्री की मर्यादा और मंगल सूचक उसके गले में बंधे मंगलसूत्र के धागे से ही उसका गला फांसकर उसे मौत की नींद सुला देता है युवक । अपनी इच्छित चीज का हाथ न लगने के क्रोध से भुनभुनाया कामुक युवक !

यह रहा, ढंग से मूॅंछे तक न फूटनेवालेे युवक की, पडोसी स्त्री को अपनी संपत्ति  मानने की मानसिकता । आस पास रहने वाले स्त्रियों को जिसे वे चाहते हैं, जिसे वे भोगना चाहते हैं, उसपर अधिकार जमाने की, उसे किसी भी प्रकार से हथिया लेने की पुरूष की वर्चस्वी बर्बर मानसिकता । साली मेरे सामने तू नखरे दिखाती है – हिन्दी सिनेमायी विलेन का अंदाज !







केस नंः  2  सजाबंदी संख्या, नाम, स्थान ,जाति धर्म  (गोपनीय )
विधित दंड   : भारतीय दंड संहिता का धारा 302  
घटना व अपराध .

सोलह सत्रह साल का  निम्न वर्ग का लडका । ढंग से अपनी रोजी कमाता भी न होगा ।  जिस लॉरी का यह क्लिनर था उस लॉरी का डा्रइवर इस युवक का बचपन का मित्र रहा था । मित्र ने खूबसूरत सी लडकी से ब्याह रचा लिया । लेकिन इस आशिक युवक का दिल दोस्त की ब्याहता पर आ गया। दोस्त से बार बार यह कहता भी था कि, अगर ब्याह करना है तो तेरी पत्नी जैसी खूबसूरत बला से ही मैं शादी करूॅंगा । बेचारे ड्राइवर  दोस्त को क्या पता, उसके बचपन के साथी के मन में कैसे शैतानी प्लान आकार ले रहे हैं ।
एक दिन पति- पत्नी दरगाह  जाते हैं । अपने प्लान के मुताबिक ,कातिल मित्र भी उनके साथ हो लेता है । उन दोनों को फोटो खिंचवाने के बहाने नदी की ओर ले जाता है । बस क्या था, देखते ही देखते, नदी के उफनते लहरों में मित्र को धकेलकर मार देता है ।

युवा मन की अस्थिर बुद्धि ही कह ले या , जो चाहा उसे पाने की शैतानी जिद्द ही कह ले ,या स्त्री को केवल भोग और काम की तृप्ति के लिए पाने की बर्बर चाह ही कह ले ।  युवक जो अभी कानूनी तौर पर नाबालिग है , आजीवन  शिक्षा का शिकार बनता है ।

केस नंः  3  सजाबंदी संख्या, नाम, स्थान ,जाति धर्म  (गोपनीय) 
विधित दंड   : भारतीय दंड संहिता का धारा 302
घटना व अपराध  

लगभग चौबीस की आयु  का शादीशुदा बेटा हर महीने मॉं के सामने हाथ फैलाता था । अपने जेब खेर्चे के लिये बार बार मॉं को तंग करता था । न काम न धाम । न ब्याहता पत्नी को पाल सकता है और न घर की आर्थिक जिम्मेदारी निभा सकता है । सोने पे सुहागा !! अपनी दूसरी शादी करवाने के लिए मॉं पर दबाव डालने लगा । घर की बेहाली जान मॉं, घर पर बहू के रहते भला बेटे के सर पर दूसरा सेहरा कैसे बांध सकती है । मॉं मना करती गयी , करती गयी । और क्या था अपनी हवशी इच्छा पूरा न होते देख, युवक ने कुल्हाडी उठायी और मॉं के सर पर दे मारा । अपने जिस बेटे की परवरिश , गरीबी में भी जी जान लगाकर करते आयी थी, जिस बेटे का परिवार बसाकर चैन का बुढापा काटना चाहती थी , वही मॉं उसी बेटे के स्वार्थ और बर्बरता का शिकार हो गयी ।
यह रही , भारतीय निम्न परिवार के अपढ, विलासी और स्त्री को ;चाहे वह मॉं हो, बेटी हो, बहन हो या पत्नी हो, अपनी जूती समझनेवाले युवक की पुरूषवर्चस्वी मानसिकता की कहानी। घर परिवार, दीन दुनिया भाड में जाय, मेरी  चलनी चाहिए । घर में चाहे फाके पडे या , छप्पर फटे, मैं पुरूष, घर का मालिक, मेरी मन मर्जी चलनी चाहिए । इसी पुरूष मानसिकता ने मॉं को ही मौत के घाट उतार दिया ।

केस नंः  4  सजाबंदी संख्या, नाम, स्थान ,जाति धर्म  (गोपनीय ) 
विधित दंड   : भारतीय दंड संहिता का धारा 302, 201.
घटना व अपराध 

बीस बाइस  वर्ष का निम्न मध्यवर्गीय परिवार का लडका, खेतीबाडी करता था। मॉं से घर चलाने के खर्चे के पैसे को लेकर लड पडा । बात से बात बढती गयी । बेटे का क्रोध का पारा चढता गया । पैसा बोलता है !! पैसा बोलने लगा, मॉं से पैसा न निकलता देख बेटे ने अपने ही हथेली से मॉं का गला दबादिया । मरी पडी मॉं को देखकर, क्या कोई  बेटा अपने बचाव में सोच सकता है। लेकिन इस बेटे की आगे की हैवानी हरकते देखिये । बोरी में मॉं के शरीर को बांधकर, पास के नहर में फेंक देता है।

यह घटना है भारतीय युवक की परावलंबी मानसिकता की । अपने विरूद्ध के हर आवाज को दबा देने की , अहंकारी, क्रोधी युवा मानसिकता की। अपने चाहतों के विरूद्ध उठी आवाज , भले ही अपनी जननी की ही क्यूॅं न हो, उसे गले में ही फांस देने की हैवानी स्वभाव की।

केस नंः  5  सजाबंदी संख्या, नाम, स्थान ,जाति धर्म  ( गोपनीय ) 
विधित दंड   : भारतीय दंड संहिता का धारा 302, 201.
घटना व अपराध 

भारतीय समाज में स्त्री पुरूष की संपत्ति भी है और उसकी मर्यादा भी। अपने बहू बेटियों पर हुये हुये अन्याय अत्याचार का बदला , तभी पूर्ण होगा जब अत्याचारी के बहू बेटियॉं दॉंव पर चढेंगी । लेकिन इस केस में स्त्री पर हुए अत्याचार, मानहानि के बदले , बलि चढा है अपराधी का बेटा ।

अपनी बहन का बलात्कार  करनेवाले अपराधी को भला भारतीय समाज का युवक जिंदा चलता फिरता कैसे देख सकता था । उस रेपिस्ट के साथ झगडा करता है , उसे मारना  युवक के बस की बात नहीं थी । बहन के साथ हुये अन्याय का बदला लेने के लिए एक दर्दनाक प्लान उसके दिमाग में आकार लेते जाती है । इसी ताक में बैठा युवक, आरोपी के बेटे की बलि चढा देता है । उसे मारकर, लाश को बोरी में बाँधकर, पास के नहर में उसने फेंक दिया ।

यहॉं स्त्री के प्रति  भारतीय समाज की उभय मानसिकता स्पष्ट उभरते हैं । पहली,  अपराधी पुरूष का, जो गॉंव गली की बेटियों को अपने हवश का शिकार बनाने की गंदी कामुक  मानसिकता । दूसरी, सजाबंदी युवक की,किसी भी कीमत पर, अपने परिवार की मर्यादा रहे बहन के चरित्र को भंग करनेवाले व्यक्ति को अपने ही हाथों सजा देकर बदले की आग को ठंडा करने की मानसिकता।

केस नंः  6  सजाबंदी संख्या, नाम, स्थान ,जाति धर्म  ( गोपनीय ) 
विधित दंड   : भारतीय दंड संहिता का धारा 302 . 
घटना व अपराध 

कन्नड में एक कहावत प्रचलित है ‘‘ पति-पत्नी के बीच का झगडा, भोजन करके सोने तलक मात्र ‘‘ लेकिन इस मुलजिम ने तो इस कहावत को सिरे से ही झुठला दिया है । पत्नी के साथ आपसी वैमनस्य, झगडा पति  को नागवार गुजरती है । झगडालू पत्नी को जान से मारने की साजिश रचता है । रात में गहरी नींद में सोयी  पत्नी के सर पर भारी भरकम पत्थर पटक देता है और आपसी झगडे को अंत कर देता है ।

अपनी बात को काटने वाली, विरोध  में उॅूंची आवाज में बोलने वाली औरत को भला भारतीय समाज का पति हजम कर पायेगा !  हॉं में हॉं मिलाना, नीची आवाज में बोलना ही तो औरत का गहना है !! इन संस्कारों में पला बढा युवक अपनी पुरूषत्वी वर्चस्व को बट्टा चढता कैसे देख पायेगा । आश्चर्य है, कि इस पुरूष अहंकारी मानसिकता के पति को , पत्नी की मौत ही, झगडे का पर्याय दिखायी पडा , तलाक नहीं !!





विधित दंड   : भारतीय दंड संहिता का धारा 302 . 
घटना व अपराध 

लगभग सारे भारतीय विवाहित पुरूष की मानसिकता है, पत्नी को अपना अधिनस्थ गुलाम मानना।बांदी अगर अपना हुक्म बजाती है तो, उसे हार उपहारों से नवाजेंगे। नहीं  तो ? नहीं  का तो पर्याय निर्दिष्ट है । उस बांदी के नसीब में अपने आका के ही हाथों मिलने वाली प्रत्यक्ष मौत की सजा !!मारना पीटना तो पुरूषों का जन्म सिद्ध अधिकार ठहरा । पूछा जाय तो कहेंगे, जो कहता हूॅं नहीं करती , साली उल्टा जुबान लडाती है !! कहीं यह संभव है । अपने जीवन में मांस को हाथ से तक न छूने वाली औरत, पति के कहने पर मांस पकाये । शराब की बू से मितली खानेवाली औरत, पति के गिलास भरे । ऐसा करने से पत्नी ने मना किया।

दौडधूप कर , रॉशन की पाली में घंटोंभर ठहरकर, मिट्टी के तेल के डब्बे घर में सजाकर रखी  थी पत्नी ने । घर में मांस मछली पकाने, शराब के गिलास भरने को लेकर शुरू हुआ पति पत्नी  के बीच झगडा। तैश खाया पति  ! सारे जलावन तो घर में ही मौजूद   थे !! उलीच देता है सारा डब्बा घासलेट का पत्नी  पर और उसे कर देता है चिनगारी के हवाले !! घर का चूल्हा जलाने के लिए , परिश्रम से जिस मिट्टी के तेल को संजोकर रखा  था, उसी से दाह संस्कार हो जाता है औरत का !!

केस न 8,9,10,11,12. सजाबंदी संख्या, नाम, स्थान ,जाति धर्म  (गोपनीय) 
विधित दंड   : भारतीय दंड संहिता का धारा 302,147,148,341,
घटना व अपराध 

दिल दहला देनेवाला हत्याकांड । पॉंच मित्रों का मिलकर, तीन भाईयों की एक ही घटना स्थलपर हत्या । पॉंच मित्रों में किसी एक की पत्नी का, मृतक भाइयो में किसी एक के साथ के अनैतिक संबंध को लेकर संघर्ष । बात से बात बढती हुई , हाथापायी पर उतर आयी । अगले ही क्षण कुल्हाडी से तीनों भाइयों को मौत के घाट उतार देते हैं पांच मित्र

दूसरे की पत्नी मेरी बांह  में ! लेकिन मेरी पत्नी दूसरे की बांह  में ? असंभव !! भारतीय स्त्री के चरित्र की शुद्धता और पत्नी के देह की पावित्रता का प्रश्न भारतीय पतियों के सम्मुख रामराज्य के धोबी की मानसिकता का उत्तर लिया हुआ है । धोबी साधारण आम गरीब हो तो क्या हुआ , पुरूष तो है । भारतीय समाज में स्त्री के शील की शुद्धता के पीछे जाति धर्म और जनांगीय मर्यादा का तमगा भी लगा हुआ है । विवाहेतर संबंधों के लिए भारतीय संविधान में बने कानूनी प्रावधान अपने कदम उठाने से पहले ही समाज की, वर्जित अनैतिक मान्यताओं की, व्यवस्था की कुल्हाडी उन कदमों को काट डालती है ।

केस न 13.    सजाबंदी संख्या, नाम, स्थान ,जाति धर्म  ( गोपनीय ) 
विधित दंड   : भारतीय दंड संहिता का धारा 302, 201.
घटना व अपराध

अपराध के पीछे केवल और केवल पुरूष का ही हाथ होता है । ऐसी बात  नहीं । स्वार्थ और अपनी व्यक्तिगत इच्छाओ के लिए, पुरूष संबंधों को भुनाने के स्त्री के प्रयत्नो का कच्चा चिट्ठा भी अपराधिकों के फाइलों में बंद मिलता है। अनैतिक संबंध को अंजाम देने  के लिए, रास्ते का रोडा बने पति को खुरपी  से मारकर खत्म कर देने की साजिश में साथी प्रेमी  का साथ देनेवाली पत्नी की मानसिकता की कहानी बर्बर है। विवाहेतर संबंध को अनैतिक मानकर, अपनी मर्यादा को आंच आता देखकर, विरोध करनेवाले पति के हाथ लगती है उसकी ही मौत ।

केस न 1४ .     सजाबंदी संख्या, नाम, स्थान ,जाति धर्म  (गोपनीय ) 
विधित दंड   : भारतीय दंड संहिता का धारा 302, 203.
घटना व अपराध 

चिंता तो चिंतित को चिता की ओर ले जाती है लेकिन शंका और गुमान में यह बात उलटी पडती है । शंका और गुमान तो शंकालु को नहीं अपितु  जो शंकित है उसे चिता की ओर ले जाते हैं । यह पुरूष की आम शंकालु मानसिकता है, कि उसकी पत्नी अनैतिक संबंध को पाल रही है । इस केस में, लगभग पैंतीस वर्ष के पति को यह गुमान हो गया है कि उसकी पत्नी अपने ही संबंधी के साथ दैहिक संबंध रखी हुई  है । गुमान गहराते जाता है । पत्नी के हरेक व्यवहार पर नजर रखे शंकित पति का खून पिलिया रोगी की हर नजर पीली कथन की तरह पत्नी की हर बात, हर हरकत से खौलने लगता है । सोचना क्या था ? सुबह छः बजे किसी बहाने खेत की ओर पत्नी को लेजाता है, कुल्हाडी से टुकडे कर देता है।
जो अपनी नहीं हुई , भला वह किसी और की कैसी ? पुरूष, आजीवन सजा के तहत बंदीखाने का सजा भुगत रहा है ।

चलिए, सलाखों के पीछे की और बाहर की कहानी की सच्चाई तो हमने देख ली। इन सजाबंदियों की सजा के बाकी सालों को माफ करने या न करने का निर्णय तो खैर सरकारी कार्यवाही की रही है, इसलिए  गोपनीय है । लेकिन क्या इन सारे अपराधों के पीछे अपना पंजा कसे बैठी पुरूष की दंभी अहंकारी मानसिकता गोपनीय है । लगभग इन सारे अपराधों के मूल में, स्त्री को अपना इच्छित चीज माननेवाली, अपनी बांदी  या गुलाम की तरह स्त्री के व्यक्तित्व को वस्तु बनाकर सरे आम समाज के बाजार में व्यवहार में लायी जाने वाली पुरूष की वर्चस्वी उपभोक्तावादी स्वछंदता की भावना क्या जाहिर नहीं ? समाज की यह रूग्ण मनोभावना क्या              लाइलाज है ?

लाइलाज को क्या इलाज ? वाला अंदाज तो समस्या का परिहार नहीं ठहरा। हाथ कंगन को आरसी क्या ? इस सत्य से मुॅंह मोड नहीं सकते कि, समाज में जड जमायी पारंपरिक पुरूषवर्चस्वी मानसिकता के पलने बढने में स्त्री भी उतनी ही जिम्मेदार है जितना कि पुरूष। और तो और इन संस्कारों के अरूप अनाम असीम जडों को खाद पानी देते आया है हमारे देश की सामाजिक, शैक्षिक और आर्थिक व्यवस्था । अपने देसी जमीन में गहरे में उतरे इन जडों को काटने की आवश्यकता है । इसके लिए, स्त्री और पुरूष दोनों को ही कुल्हाडी उठानी है । उठी कुल्हाडी की धार को तरतीब देनी है । शिक्षा का प्रचार प्रसार, आर्थिक  विकास की योजनाएॅं, महिला उत्पीडन विरूद्धी कानून आदि सरकारी मुहिमों से भी बढकर समाज के उभय हिस्सों को अपनी अपनी भागीदारी एवं हिस्सेदारी  निभानी है । आरोप प्रत्यारोपों के कानूनी दांव पेंच से ऊपर  उठकर, स्त्री और पुरूष को सौहार्द , संयम, सहयोग ,सहजीवन के प्रगति के मंत्र को आत्मसात करनी है । आइए, सलाखों के पीछे के अपने ही समाज के दूसरे हिस्से से हम कहें ,
देख बढरही हैं तेरी ओर,
सहेज लेने के लिए
जमीन पर पडने से पहले
पश्चाताप के ऑंसू तेरे ,
हथेली पर अपने ।
सलाखों के पीछे की उष्मा  ,उसॉंसें तेरी,
उगा देंगी दाने विश्वास के,
हथेली पर मेरे लहलहायेगी,
हरीघास, बिछलती, डोलती, बंधनहीन,
सलाखें हीन ।
क्यूॅं कि शोभते हैं पीछे सलाखों के,
केवल और केवल,
अपने अपने भगवान !!

चाहे नरक में दीजो डार

नासिरूद्दीन हैदर खाँ


नासिरूद्दीन हैदर खाँ पेशे से पत्रकार हैं और जेंडर जिहाद के संपादक हैं .

( मुसलमानों के बीच स्त्री -पुरुष के गिरते अनुपात और भ्रूण ह्त्या के सन्दर्भ में यह शोधपूर्ण आलेख मुसलमान महिलाओं की दयनीय स्थिति का चित्र सामने रखता है. )


‘..और (इनका हाल यह है कि) जब इनमें से किसी को लड़की पैदा होने की खुशखबरी दी जाती है तो उसका चेहरा स्याह पड़ जाता है और वह तकलीफ में घुटने लगता है। जो खुशखबरी उसे दी गयी वह उसके लिए ऐसी बुराई की बात हुई कि लोगों से छिपा फिरता है। (सोचता है) अपमान सहन करते हुए उसे जिंदा रहने दे या उसे मिट्टी में दबा दे।’ (कुरान: सूरा अल-नहल आयत ५८-५९)


यह चौदह सौ साल पहले का अरब समाज का चेहरा था, जिसका जि़क्र क़ुरान की इस आयत में आता है। …मगर इन चौदह सौ सालों में कुछ नहीं बदला तो बेटियों के पैदा होने का दु:ख! क़ुरान की दुहाई देने वाले कितने मुसलमान हैं, जो बेटी की पैदाइश को ख़ुशख़बरी मानते हैं और लड्डू बाँटते हैं? आज भी ‘बेटी’ सुनते ही ज्‍यादातर लोगों का चेहरा स्याह पड़ जाता है। … यह आयत आज के भारतीय समाज पर पूरी तरह सटीक है।

आम तौर पर बार-बार बताया जाता है कि इस्लाम ने औरतों को काफी हुक़ूक़ दिए हैं। सचाई भी है। लेकिन क्या वाक़ई में ‘मर्दिया सोच के अलम्बरदार’ मुसलमान औरतों को वे हक़ दे रहे हैं? और कुछ नहीं तो सिर्फ जि़दगी का हक़! जी हाँ, पैदा होने और जिंदा रहने का हक़।

कल्पना करें कि एक सुबह जब हम उठें तो पता चले कि लखनऊ और मथुरा में रहने वाले सभी लोग गायब हो गये हैं। … उस सुबह कोहराम मचेगा या जिंदगी हर रोज़ की तरह इतमिनान से चलेगी? अफसोस, इतनी तादाद में मुसलमान औरतें गायब हैं, लेकिन किसी के कान पर जूँ तक नहीं रेंगती।सन् 2001 की जनगणना कई मायनों में अहम है। यह पहली जनगणना है, जिसके आँकड़े विभिन्न मज़हबों की सामाजिक-आर्थिक हालत का भी आँकड़ा पेश करती है। इसने कई मिथक तोड़े, तो कई नए तथ्य उजागर भी किए। एक मिथक था कि मुसलमानों में लिंग चयन और लिंग
च‍यनित गर्भपात नहीं होता!

सन् 2001 की मरदुमशुमारी के मुताबिक मुसलमान देश की कुल आबादी का 13.4 फीसदी हैं। यानी करीब तेरह करोड़ इक्यासी लाख अट्ठासी हजार। इसमें मर्दों की आबादी सात करोड़ तेरह लाख (7,13,74,134) है। क़ायदे से इतनी ही या इससे ज्यादा औरतें होनी चाहिए। लेकिन इस आबादी में मर्दों के मुकाबले पैंतालीस लाख साठ हजार (45,60,028) मुसलमान औरतें कम हैं या कहें गायब हैं। यानी कल्पना करें कि एक सुबह जब हम उठें तो पता चले कि लखनऊ और मथुरा में रहने वाले सभी लोग गायब हो गये हैं। … उस सुबह कोहराम मचेगा या जिंदगी हर रोज़ की तरह इतमिनान से चलेगी? अफसोस, इतनी तादाद में मुसलमान औरतें गायब हैं, लेकिन किसी के कान पर जूँ तक नहीं रेंगती।

तत्कालीन अरब समाज के कई कबीलों में लड़कियों की पैदाइश को अपशगुन माना जाता था और उन्हें मार डालने की रवायत थी और चौदह सौ साल पहले क़ुरान ने और इस्लाम ने इसे बड़ा जुर्म माना। कुरान के सूरा अत-तकवीर की आयत (एक से नौ) है-

जब सूरज बेनूर हो जायेगा/ और जब सितारे धूमिल पड़ जाएँगे/ जब पहाड़ चलाये जाएँगे/../ और जब दरिया भड़काए जाएँगे/../ और जब जिंदा गाड़ी हुई लड़कियों से पूछा जाएगा/ कि वह किस गुनाह पर मार डाली गई।

यानी मुसलमानों से कहा गया कि उस वक्त को याद करो जब उस लड़की से पूछा जाएगा जिसे जिंदा गाड़ दिया गया था कि किस जुर्म में उसे मारा गया। इस तम्बीह का आज के मुसलमान कितना पाबंद हैं, देखें। आज बेटियों को जिंदा गाड़ने की ज़रूरत नहीं है बल्कि रहम (गर्भ) की जाँच कराकर उसे खत्म कर दिया जा रहा है। इस लिहाज़ से क़ुरान की आयत की रोशनी में यह भी गलत है।

औरतें कहीं हवा में गायब नहीं हो गईं। बल्कि खुद मुसलमान, बेटों की ललक में उन्हें पैदा ही नहीं होने दे रहे। हिन्दुओं, सिखों और जैनियों की तरह मुसलमान भी ‘बिटिया संहार’ में शामिल हैं। उत्तर प्रदेश में बुंदेलखंड की सबसे ज्यादा मुसलमान आबादी वाले शहर बांदा, पूरी दुनिया में तहजीब का झंडा उठाने वाले शहर लखनऊ और इल्म के मरकज़ अलीगढ़ और दारुल उलूम, देवबंद की वजह से बार-बार चर्चा में रहने वाली धरती सहारनपुर में मुसलमान जोड़े अपनी आने वाली औलाद की सेक्स की जाँच करा रहे हैं और लड़की को पैदा नहीं होने दे रहे। (जाहिर है सब ऐसा नहीं करते।) ऐसी ही हालत गुजरात, महाराष्ट्र, बिहार, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, दिल्ली में भी है। कहीं काफी पहले से ही दूसरे मज़ाहिब के लोगों की ही तरह बेटी नहीं पैदा होने दी जा रही थी तो कहीं अब देखा-देखी यह चलन जोर पकड़ रहा है।

बेटियों को गायब करने का काम तहज़ीब याफ्ता मुसलमान ख़ानदान, पढ़े-लिखे, धनी, ज़मीन वाले, और शहरों में रहने वाले सबसे बढ़ कर कर रहे हैं। इस काम में मुसलमान डॉक्टर भी खुलकर मदद दे रहे हैं। क्यों, क्योंकि बेटियों को पैदा न होने देने का धँधा काफी मुनाफे वाला है।मुसलमानों की आबादी के लिहाज से उत्तर प्रदेश काफी अहम है। यहाँ की आबादी में साढ़े अट्ठारह (18.5) फीसदी यानी तीन करोड़ सात लाख चालीस हजार (30,740,158) मुसलमान हैं। यहाँ की मुसलमान आबादी में तेरह लाख 16 हजार बेटियाँ गायब हैं। यानी, मुसलमान लड़कियों को गायब करने में अकेले यूपी का हिस्सा करीब 29 फीसदी है बाकि में देश के पूरे राज्य ! यहाँ के चंद मुस्लिम बहुल जिलों का हाल जान लें। अलीगढ़ की आबादी से करीब 33 हजार लड़कियाँ लापता हैं। अलीगढ़ का लिंग अनुपात, मतलब एक हजार लड़कों पर लड़कियों की तादाद, 883 है। इसी तरह लखनऊ में करीब साढ़े सात लाख (748687) मुसलमान हैं। यहाँ मर्दों के मुकाबले करीब लगभग चौंतीस हजार (34169) मुसलमान औरतें कम हैं। मर्दों के मुकाबले सहारनपुर में सत्तहत्तर हजार तो मुजफरनगर में करीब चौहत्तर हजार, बिजनौर में 58 हजार और कानपुर शहर में करीब चालीस हजार मुसलमान औरतें कम हैं। इनमें हर उम्र की औरत शामिल हैं और वह भी शामिल है जिसे यह जानकर पैदा नहीं होने दिया गया कि वो लड़की है और जिनके साथ लड़की होने के नाते जिंदगी में हर कदम पर भेदभाव किया गया और मौत के मुँह में ढकेल दिया गया। इनमें से कइयों को सिर्फ इसलिए मार दिया गया कि वे अपने साथ मोटा दहेज लेकर नहीं आई थीं।

बेटियों को गायब करने का काम तहज़ीब याफ्ता मुसलमान ख़ानदान, पढ़े-लिखे, धनी, ज़मीन वाले, और शहरों में रहने वाले सबसे बढ़ कर कर रहे हैं। इस काम में मुसलमान डॉक्टर भी खुलकर मदद दे रहे हैं। क्यों, क्योंकि बेटियों को पैदा न होने देने का धँधा काफी मुनाफे वाला है। इस मसले के सामाजिक पहलू पर नजर डाली जाए तो अंदाजा होता है कि समाज में लड़कियों को कमतर समझने का रुझान तो था ही मगर जहेज के बढ़ते रिवाज ने अब इनकी जिंदगियों को ही खतरे में डाल दिया है। पंजाब और पश्चिमी उत्तर प्रदेश आर्थिक रूप से काफी खुशहाल हैं लेकिन वहाँ भी बेटियाँ अनचाही हैं।

सबसे बढ़कर तकनीक की तरक्की ने लड़कियों के खिलाफ पहले से ही मौजूद पितृसत्तात्म विभेद की खाई को और ज्यादा गहरा करने का काम किया है। तकनीक का इस्तेमाल डिजायनर फेमिली बनाने में किया जा रहा है। यानी एक बेटा या दो बेटे या एक बेटा और एक बेटी। बिटिया संहार का नतीजा, हमारे सामने आ रहा है। लड़कियाँ तो लड़कों की चाह में गायब की गईं लेकिन कभी किसी ने सोचा, लड़कों की दुल्हन कहाँ से आयेगी ! यही नहीं ये तो क़ुदरत के निज़ाम को बर्बाद करना है। कुरान की रोशनी में अगर आज के हालात में अगर यह कहा जाए कि और उस वक्त को याद करो जब बेटियों से यह पूछा जाएगा कि किस बिना पर तुम पेट में ही पहचान कर मार डाली गयी। आप ही बताएँ कि उस लड़की का क्या जवाब होगा? कहीं वह यह तो नहीं कहेगी-

ओरे विधाता, बिनती करुँ, परुँ पइयाँ बारम्बार

अगले जन्म मोहे बिटिया न कीजो, चाहे नरक में दीजो डार

(यह काम एचपीआईएफ फेलोशिप के तहत किया गया है।)

(जेंडर जिहाद से साभार )

स्त्री आत्मकथा : आत्माभिव्यक्ति और मुक्ति प्रश्न

(डा बाबा साहब भीम राव आम्बेडकर विश्वविद्यालय , दिल्ली, के हिन्दी विभाग में शोधरत कुमारी ज्योति गुप्ता के ‘ स्त्री आत्मकथा  :  आत्माभिव्यक्ति और मुक्ति प्रश्न, सन्दर्भ : – ” अन्या से अनन्या ” और एक कहानी यह भी ” विषयक  शोध का एक अंश हम प्रकाशित कर रहे हैं. ‘स्त्रीकाल’ , खासकर स्त्री विमर्श और स्त्री अध्ययन के विद्यार्थियों और शोधार्थियों का अपना मंच है . यहाँ आप न सिर्फ विभिन्न शोध और सामयिक लेखों के लिए जुड़ सकते हैं , बल्कि स्त्री रचनाधर्मिता और स्त्रीवादी रचनाओं का पाठ भी कर सकते हैं . स्त्रीकाल के पिछले अंकों से  शोध -रिफरेन्स के लिए शोधार्थी हमसे संपर्क करते रहते हैं , आप यहाँ पिछले महत्वपूर्ण अंक भी देख सकते हैं , जिन्हें हम धीरे -धीरे अपडेट कर रहे हैं . हम जल्द ही ‘स्त्रीकाल’ के प्रिंट एडिशन की तरह वेब एडिशन के लिए भी ISSN नंबर हासिल कर लेंगे .  स्त्रीविमर्श के  शोधार्थी अपने शोध -आलेख और  शोध -प्रबंध हमें क्रमशः मंगल फॉण्ट और पी डी ऍफ़ फ़ाइल में भेजा करें. )

आत्मकथा के सन्दर्भ में कृष्णानंद गुप्त जी ने लिखा है -“आत्मकथा हमारे लिए नई वस्तु है भारतीय सहित्यकारों ने अपने सम्बन्ध में कभी कुछ कहने की आवश्यकता नहीं समझी ,यहाँ तक कि दूसरों के संबंध में भी वे सदैव चुप रहें हैं । इसी से हमारे यहाँ इतिहास नहीं ,जीवन चारित नहीं और आत्मकथा नाम की चीज तो बिलकुल ही नहीं, हम कह सकते हैं कि यह अंतिम वस्तु हमारे यहाँ पश्चिम से आई है ।”1 अतः इस बात से सहमत होने में कोई आपत्ति नहीं कि आत्मकथा नामक विधा पश्चिम से भारत में आई है । सेंट आग्स्तैन पहले व्यक्ति थे जिन्होंने ‘confession ‘ लिखकर अपने को व्यक्त का नया तरीका अपनाया। इसके बाद रूसो और गेटे तथा तमाम साहित्यकारों और राजनीतिज्ञों ने आत्मकथा के माध्यम से ‘स्व ‘को व्यक्त किया । इससे प्रेरित होकर हिंदी में भी आत्मकथाएं लिखी गयीं ।

रेखांकन /गुलज़ार

सामान्यतः आत्मकथा विधा अन्य गद्य विधाओं की तरह हिंदी साहित्य के लिए आधुनिक काल  की उपज है. यह कई रूपों में लिखी जाती है ,यथा -डायरी ,संस्मरण, जर्नल,पत्र आदि । अज्ञेय ने लिखा है ”आत्मकथा,संस्मरण और जीवनी तीनों   जीवन वृत्त से जुडी होने के कारण साथ राखी जा सकती हैं लेकिन विशेष रूप से ‘ जीवनी ‘ और ‘आत्मजीवनी ‘में भी जो बुनियादी अंतर है उसका बहुत अधिक महत्व है । किसी दूसरे  के जीवन को तटस्थ असंपृक्त अथवा वस्तुपरक भाव से देखना आसन होता है ,स्वयं अपने जीवन और कर्म के प्रति ऐसी तटस्थता निश्चित ही बड़ी कठिन साधना मांगती है । “2 अतः कहा जा सकता है कि अपने को तटस्थ बेबाक प्रकट करने के कारण ही आत्म्काथा जीवनी से अलग हो जाती है क्योंकि जीवनी में व्यक्ति और उसके समय का सच लिखना आसन होता है जबकि आत्मकथा में निजी जीवन का सच लिखना मुश्किल. प्रायः यह देखा जाता है कि जीवन मूल्यों की विशिष्ट व्यवस्था रचनाकार प्रस्तुत तो करता है लेकिन अपनी कमजोरियां व्यक्त करते समय वह ज्यादा सजग हो जाता है जिससे आत्मकथा जटिल हो जाती है । रमणिका गुप्ता ने लिखा है ”आत्मकथा दूसरी विधाओ से भिन्न होती है चूँकि ये सत्य अनुभवों पर आधारित होती है इसमें परिस्थितियाँ बदली  नहीं जाती बल्कि परिस्थितियों का दस्तावेजीकरण होता है …आत्मकथा में जीवन के सत्य को दर्ज किया जाता है । पाठक या समाज उससे अपने निष्कर्ष खुद निकलता है । आत्मकथा सापेक्षित सत्य के इस दौर में बहुजन हिताय सत्य तक पहुँचने की राह दिखाती है ।”3

महिला आत्मकथा लेखन के साथ यही बात है, सम्पूर्ण सत्य यहाँ भी व्यक्त नहीं हो पता .इसका  कारण  ‘स्व’ के प्रति सजगता है लेकिन जब ये सजगता ख़त्म होती है तो स्त्री उन विषयों पर भी खुल के बात करती है जो नितांत निजी या यूँ कहें प्राइवेट है  , जब वह अपने जीवन और लेखन में पारदर्शिता बरतती है तब लोग उसे अश्लील मानने लगते हैं जबकि इस अश्लीलता को जिंदगी में हर व्यक्ति विशेषकर औरतें हर रोज भोगती हैं. आत्मकथा अभिव्यक्ति का माध्यम है जिसमे इच्छा का महत्व  होता है । Laura Marcus ने  आत्मकथा में ‘Intention ‘को महत्त्व देते हुए लिखा “Within critical discussion of autobiography ,’Intention’ has had a necessary and often unquestioned role in providing the critical link between author ,narrator and protagonist. Intention, however, is further defined as a particular kind of writing. Trust the author ,this rather circular argument goes ,if s/he seems to be trustworthy. Autobiography depends on seriousness of the author the seriousness of his personality and his intention of writting.”4 तात्पर्य यह है कि आत्मकथा में ‘इच्छा ‘ लेखक और मुख्य पात्र के बीच एक आवश्यक और अप्रत्याशित भूमिका निभाती है, जो भी हो ,इच्छा रचना  की सत्यता की अनिवार्य शर्त है । इसलिए इसे ईमानदारी से व्यक्त किया जाना चाहिए । लेखक जो सोचता है उसी की अभिव्यक्ति अपनी आत्मकथा में करता है इसलिए आत्मकथा लेखक की गंभीरता ,उसके व्यक्तित्व की गंभीरता और उसके लेखनी की इच्छा  पर निर्भर करता है ।

किसी भी लेखिका को समझने के लिए उसका सृजनात्मक लेखन ,जैसे कहानी,उपन्यास तथा संस्मरण काफी होता है ,फिर उसे आत्मकथा क्यों लिखनी चाहिए,उसके अनुभव का ऐसा कौन सा पक्ष है ,जो अन्य रचनाओं के जरिये पूरा नहीं हुआ। इसपर अपना विचार प्रकट करते हुए डा०जगदीश्वर प्रसाद चतुर्वेदी ने लिखा है -“स्त्रियाँ लम्बे समय से सार्वजनिक जीवन से बाहर  रही हैं ,पर्दे,में ,घर में कैद रही हैं।उनकी कोई पहचान नहीं रही है।आज भी औरतों का बड़ा तबका घरों में कैद है। चूँकि वह घर में कैद है यही कारण  है कि स्त्री का प्राइवेट संसार और शरीर ये दोनों ही साहित्य से ग़ायब रहा  है स्त्री का  ‘आत्म ‘ दमित,उत्पीडित रहा है। स्त्री का ‘आत्म’ या ‘स्व’ कभी भी आनंद भरा नहीं रहा है .स्त्री के जिस रूप और सौंदर्य का वर्णन हमारे साहित्य की उपलब्धि रहा है उसका स्त्री की यथार्थ जिंदगी से कोई सम्बन्ध नहीं है वहाँ स्त्री का कृत्रिम रूप चित्रित हुआ है।स्त्री आत्मकथा के आने से स्त्री का दमित शोषित ‘आत्म’ प्रकाशित होता है इसमें स्त्री के अदृश्य रूपों और अव्यक्त जिंदगी को पढ़ा जा सकता है ।स्त्री आत्मकथा में स्त्री के जीवन की चुप्पी या साइलेंस के इलाकों को देखा जाना  चाहिए।”5 अतः हम कह सकते हैं कि अतीत की दमित स्मृतियों से मुक्ति के लिए तथा अपनी चुप्पी तोड़ने के लिए आत्मकथा लिखी जाती है, इसमें कुछ जीवन की उप्लब्धियों को कलात्मक ढ़ंग से अभिव्यक्त करती हैं तो कुछ सिलसिलेवार तरीके से अपनी संवेदनाओं को शब्दों के माध्यम से मूर्त रूप प्रदान करती हैं ,जिसमे उनका संघर्ष विभिन्न रूपों में दीखता है। स्त्री आत्मकथा की गुत्थियों को खोलते हुए डा ०जगदीश्वर चतुर्वेदी ने लिखा है -”औरत इसलिए भी आत्मकथा  लिखती है क्योंकि वह अतीत से मुक्त होना चाहती है। मुक्त होने के लिए बोलना जरुरी है जो लोग सोचते हैं कि वे बिना  बताये मुक्त हो जाएँगे उन्हें ग़लतफहमी है। मुक्ति के लिए गोपन रखना जरुरी नहीं है स्त्री अपने को सुरक्षित करने ,दुबारा जोड़ने और पुनः सृजित करने के लिए आत्मकथा लिखती है।वह अपरिहार्य को बताती है, उद्घाटित करती है। ”6

 डा० प्रभा खेतान की आत्मकथा भी इसी रूप में हमारे सामने आती है ,जहाँ वे तयशुदा मानदंड के खिलाफ जाकर अपनी अनुभूति की सच्ची अभिव्यक्ति करती हैं।’अन्या  से अनन्या’ में वे मुक्ति की विभिन्न पहलुओं जैसे पित्रिसतात्मक समाज से मुक्ति,आर्थिक मुक्ति,अभिव्यक्ति की आजादी,स्त्री की बाध्यकारी स्थिति से मुक्ति को दर्ज करती हैं ।यह एक ऐसी आत्मकथा है जो अपने को अभिव्यक्त तो करती है साथ ही आत्म के ऊपर सवाल भी खड़े करती है।लेखिका खुद को प्रश्नों के कटघरे में खड़ा करती है और कहती हैं -” writing autobiography is also like a stripe-tease dance. you start taking of your clothes on the road. There is always a dark corner in the mind of the writer which wishes to express itself and to eulogize while wishing at the same time that people don’t take her words in the wrong manner. Whatever is written should be taken in the right perspective and meaning. It is up to the readers.”7  तात्पर्य यह है कि आत्मकथा लिखना स्ट्रिपटीज डांस की तरह है ,जिसमे आपको एक-एक कर अपने कपडे दर्शकों के सामने उतारने पड़ते हैं लेखक अपनी समस्त साहसिक उपलब्धियों के साथ वैयक्तिक कमजोरियों को पाठक समुदाय के सामने रखते हुए यह निर्णय करने का दायित्व उन्हीं को सौप देता है। अतः यह पाठक समुदाय पर निर्भर करता है कि वह प्रभा खेतान को बदचलन औरत मानना चाहता है या एकाग्र निष्ठा से उस आदमी को प्रेम करने वाली औरत जो इनका पूरी तरह से अपना कभी नहीं हुआ। यहाँ निर्भीक भाव से स्वयं को अभिव्यक्त  करने वाली महिला का रूप सामने आया है जो तमाम तरह के मुक्ति प्रश्नों से जुझते हुए सामाजिक चुनौतियों से स्वीकार करती है।

 आर्थिक मुक्ति या यूँ  कहें  अस्मिता की तलाश इस आत्मकथा का एक महत्वपूर्ण अंश है ।डा0 प्रभा खेतान ने कहा भी है ” औरत समाज में दोयम स्तर पर है , मैं  तो खुद दोयम दर्जे की जिन्दगी जी रही थी,जिससे निकलने को छटपटा रही थी और सिमोन के इस कथन को आत्मसात कर लिया – फ्रीडम स्टार्टस फ्रॉम पर्स ( freedom starts from purse ) मुक्ति की पहली शर्त है कि स्त्री आर्थिक रूप से स्वावलंबी हो। यदि इस एक शर्त को कोई औरत पूरा कर ले तो वह अपनी जिन्दगी कि आधी से अधिक ल जीत लेती है। ”8  ‘अन्या से अनन्या’ में इस लड़ाई से जद्दोजहद करती स्त्री दिखाती है। महिला उद्योगपति प्रभा खेतान का दुस्साहस इस रूप में सामने आता है कि वह मारवाड़ी पुरुषों की दुनियां में घुसपैठ करती है। कलकत्ता चेम्बर्स ऑफ़ कोमर्स की अध्यक्ष बनती है अपनी आत्मकथा में इस मुक्ति संघर्ष को व्यक्त करती हैं अतः यह आत्मकथा सिर्फ स्त्री- पुरुष सम्बन्ध तथा पति -पत्नी के बीच ‘वह ‘ की  भूमिका निभाने वाली स्त्री की नहीं बल्कि अस्मिता की तलाश में निकली ऐसी स्त्री की है जिसने तयशुदा और प्रचलित मानदंडों के खिलाफ स्वयं को खड़ा किया।

  आत्मकथा विशेषतः महिला आत्मकथा के सम्बन्ध में चन्द्र तलपडे मोहंती ने अपनी पुस्तक ‘ feminism ‘ में लिखा है -”autobiography is a  genre in which a person unties the  complex  knots of   society at the cost of his/her privacy . autobiography in any language  written by women have raised issued which are pertinent to their liberation from patriarchy and over all change in gender equations.”9  तात्पर्य यह है कि आत्मकथा अपने को अभिव्यक्त करने का वह माध्यम है, जिसके जरिये व्यक्ति समाज की जटिलताओं और अपने निजी संबंधों की गुत्थियों को खोलता है। आत्मकथा ,चाहे वह किसी भी भाषा में लिखी  गई  हो ,वह स्त्री मुक्ति का मार्ग है, जिसके जरिये लेखिकाऍ पितृसत्ता और लिंग दोनों ही स्तर पर अपने को मुक्त करना चाहती हैं। महिला लेखिकाऍ विशेषतः डा० प्रभा  खेतान तथा मन्नू भंडारी की आत्मकथा पर ये बातें लागू होती हैं क्योंकि इन्होने ‘स्व ‘ की अभिव्यक्ति के माध्यम से पितृसत्तात्मक समाज को चुनौती दी जिसमें आत्माभिव्यक्ति की आकांक्षा और मुक्ति संघर्ष साफ तौर पर दिखता .

प्रख्यात लेखिका प्रभा खेतान

 आत्मकथा में ‘ आत्मगोपन ‘ का महत्व होता है ‘ आत्मगोपन ‘ और ‘ गोपन ‘ से सारा समाज घिरा है इस गोपन को खोलने के लिए सदियों से दमित कुंठा से मुक्त होने के लिए आत्मकथा लिखी जाती है ।’ एक कहानी यह भी’ इसका प्रमाण है जहाँ मन्नू भंडारी नितांत निजी प्रसंग का खुलासा करते हुए कहती हैं -” इतना तो समझ में आ गया कि राजेंद्र के दिमाग में एकाएक सामानांतर जिन्दगी कि यह जो अवधारणा पैदा हुई है ,निश्चित ही उसके सूत्र कहीं और ही हैं .पर असलियत को ईमानदारी से स्वीकार करने का साहस तो राजेंद्र में कभी रहा ही नहीं( (कम से कम मेरे सन्दर्भ में )इसलिए अपने हर झूठ ,अपनी हर जिद ,बल्कि यूँ कहूँ कि अपनी हर नाजायज  हरकत को ढंकने के लिए आदत से मजबूर राजेंद्र हमेशा कोई न कोई ऐसा सूत्र भी ढूंढ़ ही लेते है -कभी आधुनिकता के नाम पर तो कभी लेखन के नाम पर तो कभी कोई फलसफा गढ़कर जो उन्हें सही सिद्ध कर दे .” 1 0

 स्त्री आत्मकथा की असली जंग अनखुली सार्वजनिक जिन्दगी के उद्घाटन में छिपी होती है। सामान्यतः स्त्री आत्मकथा में घरेलू जीवन और उसके आख्यान हावी रहते है , किन्तु ऐसी आत्मकथा भी आ रही है ,जहाँ स्त्री घरेलू जीवन अथवा पारिवारिक जीवन के बाहर के सत्य को बता रही हैं। मन्नू भंडारी ने लिखा है -”मुझे इनके खिलाफ शिकायतों का कोई खर्रा नहीं खोलना ,मुझे तो इनकी ‘ विशिष्ट ‘ जीवन-पद्धति का एक उदहारण भर पेश करना है। पर जब -जब इस तरह की कोई घटना घटती ,मै सोचती क्या सभी रचनाकार अपने परिवार के प्रति ऐसी ही गैर -जिम्मेदाराना ,क्रूर हरकतें करते हैं? जहाँ तक मै जानती हूँ ऐसा नहीं है। यह तो राजेंद्र के मन में मुझे लेकर जितनी कुंठाएं जमी हुई थी उसी का परिणाम था  ….मै तो भोगने के लिए अभिशप्त थी ही और अपने इसी तरह के कुकर्मों को राजेंद्र ‘ विशिष्ट ‘जीवन-पद्धति की आड़ ….में, रचनात्मकता की आड़ में तर्क सांगत ही नहीं जायज भी ठहराते थे।” 11.ऐसे कितने ही प्रसंग हैं जो लेखिका के अनकही को बयां करते हैं उन्होंने लिखा भी है ”सन ९२मे अपना आत्मकथ्य लिखने का जो अनुबंध किया था वह आज तक (सन2006)घिसटता रहता ?कभी दो पन्ने लिख दिए तो कभी चार …..”12

अतः हम कह सकते हैं कि यह विधा आत्माभिव्यक्ति का ऐसा माध्यम है, जिसमें  स्त्रियाँ तमाम तरह के मुक्ति प्रश्न और चुनौतियों से जूझते हुए अपनी अतृप्त आकांक्षा को व्यक्त करती हैं।

  सन्दर्भ -ग्रन्थ सूची
1 . गुप्त ,कृष्णानंद :हंस -वाणी ,आत्मकथा ,प्रेमचंद (संपादक ),आत्मकथा अंक ,प्रथम संस्करण -1932 ,प्रथम आवृति -2008 ,विश्वविद्यालय प्रकाशन ,वाराणसी -2211001 ,पृ ० सं ० -167
2 . अज्ञेय ,सच्चिदनंद हीरानंद वत्सयायन :आत्मकथा जीवनी और संस्मरण ,समकालीन भारतीय साहित्य ,सितम्बर-अक्टूबर ,2004साहित्य अकादमी ,नई दिल्ली -110001 पृ ० सं ० -26
3 . गुप्ता , रमणिका :शर्म की परतें खुलती हैं आत्मकथाओं में ,हंस ,सितम्बर 2005 ,अक्षर  प्रकाशन  प्रा ० लि ० ,पृ ० सं ०-50
4 .Anderson, Linda: Autobiography, First Indian Reprint-2007,First published by Routledge 2 Park Square ,Milton Park, Abindon OX on OX14 4RN ,pg no-3
5.  चतुर्वेदी ,जगदीश्वर :स्त्री आत्मकथा :आलोचना पद्धति के मानदंड ,प्रगतिशील वसुधा -73 ,अप्रैल -जून 2 0 0 7 ,भोपाल -462003 पृ ० सं ० 259
6 . चतुर्वेदी ,जगदीश्वर :स्त्री आत्मकथा :आलोचना पद्धति के मानदंड ,प्रगतिशील वसुधा -73 ,अप्रैल -जून 2 0 0 7 ,भोपाल -462003 पृ ० सं ० 26 2
7http;//www.google.co.in/search?/=en&q=relatedeconomictimes.indiatimes.com/articleshow/msid-3504762,flstny-1cm
8 . खेतान ,प्रभा :प्रभा खेतान से साधना अग्रवाल की बातचीत ,वागर्थ ,सितम्बर -2 0 0 3 ,भरतीय भाषा परिषद् ,कोलकाता -700017 ,पृ ० सं ० -37
9http;//www.google.co.in/search?/=en&q=relatedeconomictimes.indiatimes.com/articleshow/msid-3504762,flstny-1cm
10 . भंडारी ,मन्नू :एक कहानी यह भी ,पहला संस्करण -2008, (पेपरबैक्स ),राधाकृष्ण प्रकाशन प्रा ० ली ० ,नई दिल्ली -1100 02 ,पृ ० सं ० -205
11 . वही ,पृ ० सं ० – 57
12 . वही ,पृ ० सं ० – 99