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ज्यादा अश्लील हैं मर्दों के पहनावे : बुल टीशर्ट यानी अश्लील टीशर्ट!

स्वतंत्र मिश्र


स्वतंत्र मिश्र पेशे से पत्रकार हैं ,स्त्रीकाल के प्रिंट एडिशन के सम्पादन मंडल के सदस्य भी हैं . इनसे उनके मोबाइल न 9953404777 पर सम्पर्क किया जा सकता है.

( विचित्र बात है कि संसद से लेकर सड़क तक स्त्रियों के कपड़ों को कोसने का नैतिक कर्म हमारे  दैनंदिन में शामिल है. कल भी संसद इसका गवाह बनी. इस नैतिकता के  प्रवचन  -कर्ताओं को शायद ६ माह  की बच्ची से लेकर ८० साल की बूढ़ी  स्त्रियों पर बलात्कार नहीं दिखते -जिनमें कपड़ों का कोई रोल नहीं है.  हम  स्त्रियों के पहनावे पर बोलते हुए शायद पुरुषों की भाषा , उनके गानों की पसंद , उनके पहनावे को भूल जाते हैं।  मानो यह दुनिया पुरुषों की है , जिसमें सबको कायदे से रहना सीखना होगा , ख़ास कर स्त्रियों को।  स्वतंत्र मिश्र की यह रपट पुरुषों   की टी शर्ट पर पसरी अश्लीलता की पड़ताल कर रही है। )

‘युवा होने का मतलब उत्साह से भरा होना हो सकता है पर उत्साहित होने का मतलब यह तो कतई नहीं हो सकता है कि आप सड़क पर अश्लील स्लोगन लिए घूमते फिरेंगे। यह सब महिलाओं को अपमानित करने के लक्ष्य से गढ़े जा रहे हैं और इसका कारोबार भी फल- फूल  रहा है। औरतों के प्रति बढ़ रही हिंसा को देखते हुए इन प्रवृत्तियों पर लगाम लगाया जाना जरूरी है।’ – स्वाति नौडियाल, ड्रेस डिजाइनर
युवाओं के बीच हनी सिंह जैसे दर्जनों ऐसे गायकों या ऐसी फिल्मों को प्रामाणिकता तब और तेजी से मिलने लगती है जब उस अश्लीलता को टीशर्ट बनाने वाली कंपनियां बुल और पैंकी  टीशर्ट के नाम पर बाजार में धड़ल्ले से बेचने में यह कहकर जुट जाती हैं कि हम सबके चेहरों पर मुस्कान बिखेरना चाहते हैं

नोएडा के ग्रेट इंडिया पैलेसे के वाटर पार्क में  कुछ लड़के समूह में मौज करने पहुंचे थे। इसी में से एक ने दूसरे मित्र से बातचीत के क्रम में ताली पीटते हुए कहा -‘ओ तेरी के… प्रदीप तू यार भैंस की आंख…।’ मैं भी उसके पीछे-पीछे ही अपने परिवार के सदस्यों के साथ चल रहा था। वे सबके सब बिंदास थे। उनका बिंदासपन आकर्षित तो कर रहा था पर हंसी-ठिठोली के बीच वे बेलौस अंदाज में एक-दूसरे से कभी ‘अबे चू…’, ‘तेरी तो मां की…’  तो कभी अंग्रेजी का एक अल्फाज ‘फ…’ बार-बार कह रहे थे। उनमें से एक की टीशर्ट पर रोमन और देवनागरी में लिखा था ‘दिल्ली से हूं बेहन…’ तो एक की टीशर्ट पर लिखा था -‘मेरे पास माल है।’ उनमें से एक से पूछा कि ये ‘मां की आंख’ और ‘भैंस की आंख’ का मतलब क्या होता है, इसके जवाब में उसने कहा- ‘गाली का रिप्लेसमेंट है सरजी।’ ये सारे लड़के दिल्ली के रोहिणी और प्रीतमपुरा के निवासी थे और सभी के सभी खाते-पीते घरों से थे।

भाषा की दरकती इस दीवार के बारे में जब पड़ताल करनी शुरू की तो पता चला कि यह फिल्म, टेलीविजन और एफएम रेडियो चैनल के जरिए जरिए  बरसाती नदी की तरह अबाध बढ़ती चली जा रही है। इस बेलगाम भाषा को महानगरों में ‘बुल -पैंकी ’ या ‘सुपर बुल’ होने के लिए कम से कम युवा वर्गों में जरूरी माना जाने लगा है। एक पब्लीकेशन हाउस में काम करने वाले हिमांशु भट्ट ने इस मुद्दे पर बातचीत में कहा- ‘हम लड़के तो कुछ भी नहीं करते हैं। आपने एफएम पर रेडियो जॉकी को बोलते सुना है? कभी टेलीविजन पर चलने वाले विज्ञापन की द्विअर्थी भाषा सुनी हैै? कभी आपने रियल्टी शो मसलन बिग बॉस या कॉमेडी नाइट की भाषा सुनी हैै? अगर नहीं सुनी हो तो आप एक बार उनकी गली होकर आइए फिर आपको हम उनकी औलाद से भी                                                 कमजोर लगेंगे।’

‘ बुल टीशर्ट’ का कलैक्शन लेकर बाजार में उतरी दिल्ली की टीशर्ट कंपनी  ‘तपस्या’ ने दो दर्जन से भी ज्यादा स्लोग्न (नारों) वाले राउंडनैक (गोल गले) टीशर्ट बाजार में उतारे हैं। इस टीशर्ट की कीमत ४९९ रुपये है लेकिन देश के अलग-अलग हिस्सों और स्टोर पर यह ३९९ रुपये में उपलब्ध है। तपस्या कंपनी  के मालिक राजीव गुप्ता और इस  कंपनी की वेबसाइट का कहना है, ‘हम टीशर्ट का व्यापार करने नहीं विचारों का व्यापार करने

आए हैं। आप हमारी वंâपनी की टीशर्ट पर धार्मिक मसलन ‘ओम, भगवान गणेश या किसी धार्मिक संदेश को पाएंगे या फिर कुछ ऐसा जिसकी वजह से हर किसी के चेहरे पर मुस्कराहट तैर जाए।’ यह सच है कि तपस्या कंपनी की टीशर्ट पर्यावरण बचाने से लेकर शांति-सुकून  की बात तो करती है लेकिन दूसरी ओर वह सीधे-सीधे तो किसी टीशर्ट पर भाषा और चित्र, रोमन और देवनागरी के कॉकटेल के साथ अश्लील नारों से भरे टीशर्ट बाजार में बेच रही है। दिल्ली विश्वविद्यालय के एक प्रसिद्ध कॉलेज कैम्पस  में नामकरण के लिए पहुंचे नितिन की टीशर्ट पर प्रसिद्ध अंतरराष्ट्रीय रैगे गायक बॉब मारले का नाम तीन अलग-अलग रंगों के बॉक्स में अंग्रेजी में ‘बॉब मार …’ लिखा हुआ था। इस कंपनी  के वेबसाइट पर बुल  टीशर्ट के उदाहरण यहां उद्धृत किए जा रहे हैं – ‘बापू कमावे कैश ते पुत्तर करे एैश’, ‘यौन संबंध’, ‘अ मग अ डे कीप्स द डॉक्टर अवे (बीअर की बोतल का चित्र)’, ‘विच वे यू लाइक? ९६,६९’…आदि-इत्यादि।  ’, इस बारे में पूछा तो नितिन ने बताया, ‘आपको दो अर्थों या इस तरह के बुल -पैंकी  टीशर्ट देखनी हो तो बेवकूफ  डॉटकॉम पर थोड़ी देर के लिए जाओ।’ वेबकूफ डॉटकॉम को खंगाला तो पता चला कि अश्लील स्लोग्न वाले टीशर्ट की बाढ़ है। यहां तो दो अर्थ वाले नहीं, यहां तो सीधे-सीधे अर्थों वाले स्लोग्न टीशर्ट की भरमार है।

दिल्ली स्थित एक एक्सपोर्ट हाउस ‘अनंत इंटरनेशनल’ में डिजाइनर का काम करने वाली स्वाति नौडियाल के अनुसार ‘इन दिनों फिल्म, गाने और रेडियो पर युवा होने का मतलब बिंदास बताया जा रहा है। यह ठीक है कि युवा होने का मतलब उत्साह से भरा होना हो सकता है पर उत्साहित होने का मतलब यह तो कतई नहीं हो सकता है कि आप सड़क पर अश्लील स्लोगन लिए घूमते फिरेंगे। बेशर्मी की हद को पार कर जाने वाली युवाओं की भाषा और संवाद होंगे। यह सब महिलाओं को अपमानित करने के लक्ष्य से गढ़े जा रहे हैं और इसका कारोबार भी फल-पूâल रहा है। औरतों के प्रति बढ़ रही हिंसा को देखते हुए इन प्रवृत्तियों पर लगाम लगाया जाना जरूरी है।’

शैफ़ाली फ्रॉस्ट की कवितायें

शैफ़ाली फ्रॉस्ट

शैफ़ाली फ्रॉस्ट, पिछले कई सालों से टेलीविज़न में  एडिटर और फिल्म मेकर रही हैं।  कहानियाँ  और कवितायें लिखती हैं . लखनऊ में पली बढ़ी शैफ़ाली भारत और यू. के. में रहती हैं।  संपर्क  : shephali1@hotmail.com



( नए मुहावरों और बिम्बों के साथ  शैफ़ाली हिन्दी कविता में दस्तक दे रही हैं।   स्त्रीकाल के द्वारा इस प्रवेश का स्वागत ! )


1. बढ़ती लड़की 


भरे हुए पानी को
फिर-फिर पीती गीली मिट्टी,
अपनी कौंध में फुंकी
अपनी ही रौशनी में बुझी,
खुली ज़ुबान, बंद शब्द
कटकटाते दांत लिए,
फूलती, फटती, फिर बनती
बड़ी होती बच्ची

नुक्कड़ पर मरे जिनावर की गंध जैसी
मंदिर की हर घंटी में बजती है
उसकी आस,
चाह चलती है घुटने तले,
रुके तलुवे से चाटती है आसमान,
सबकी आँखों में चुभती है
इठला के चलती है सड़क पर
वो बढ़ती लड़की

अँधेरे का रास्ता रोकती कीचड़,
कुछ बची-खुची बदनाम रौशनी,
धुंए की फांक सी
आँखों को चबाती है
बंजर माँ की छाती की मूंग,
थके बाप की डरी पसलियां
पूरी तरह बिखेर चुकी अपनी लोच,
धौंकते चौराहों की नज़र बचा
सड़कों पर सर धुनती हैं,
छज्जे ही छज्जे हैं
इस शहर में
हर उबलती खिड़की के नीचे

निर्जल बाढ़ में फूले हुए जिन्न
एक हाथ में आसमान
एक हाथ में परछाई पकड़े
बहते हैं,
जमते हैं बहते हैं
जम जम के बहते हैं,
मरने वाली हर मांसपेशी के
अधकच्चे खोखलों पर
रुक रुक के चढ़ती है परवान,
उस घर की अकेली ज़िंदा आवाज़

अपनी भागती हथेली को
पत्ती भर डन्डियों के पेड़ तले,
देह भर के सूंघती है
अनायास कभी कभी,
वो बड़ी लड़की,
जैसे भौंचक्की सी किसी चाह को
अनजाने में
कोई सपना मिले,
दस उँगलियाँ और एक छोटी सी नाक लिए,
अधपक्का सा
अकेला

2. झरिया  में है नोकिया  का टावर

तुम आयी हो
लपटती ज़मीन की गुफाओं से निकल,
तुम आयी हो
दो दिन तीन रात के सफर के बाद,
तुम उतर के इधर देखती हो
फिर उधर

बिछा देती हो नए शहर की नालियों में
अपना बिस्तर,
सुखा देती हो
नए मकानों के वॉल पर अपना स्वैटर,
बिखर जाती है गेट पर उनके
तुम्हारी हैरत से खुली आँख,
बाँध लेती हो संथाली कन्धों में अपनी
बाज़ुओं का फैलाव

उतर रहे हैं चौबिस मंज़िली लिफ़्ट से
मालिक के सजनित कुत्ते,
बंधे बाजू, सधे पाँव,
चमकदार पट्टों में,
पुरानी कंपनियों का नया नाम,
नए नक्शों का कथानक,
साढ़े तैंतीस आरपीएम का रिकॉर्ड,
मिला देती हो फटी हुई बिवाई
बूटों से इनकी,
खोंस लेती हो स्वैटर में अपने
नयी मंज़िलों का आतंक

खेल रही हैं चौहद्दी में
किरकेट, बास्केट बॉल
मालिक की संवर्धित औलाद,
भरे हैं विरासती पेट उनके
पेट के सहारे तुम्हारे,
तुम चढ़ाती हो
थोड़ी सी भूख
दबी छाती के नाराज़ कोने में,
झरिया में खनकता है टावर !

बजती है गले में तुम्हारे
नोकिआ की धुन,
खींच लेता है ज़ुबान से लोरी
तुम्हारे अपने का तोतला प्रतिरोध,
दबा देती हो स्वेटर तले सर अपना,
बुझने लगती है
आँखों में तुम्हारे
दबे कोयले की आग

चार कुत्तों वाली मालकिन
दरवाज़ों के अंदर
खा रही है
तुम्हें, तुम्हारे ही हाथ,
तुम करती हो दरकार
थोड़ी सी सांस,
मुंडारी बोलता है न सुनता है
चबाते मुंह का दांत वाला कोना,
बाँध कर कपड़ा नाक पर
खाती जा रही है वो

बजती है एक बार फिर
नोकिया  की धुन
खाए हुए कानों में तुम्हारे,
तुम कलपती हो उलगुलान
झरिया की पहाड़ी में जलता है टावर,
दबाती हो बटन क्रांति का,
दौड़ के बुलाती हो उतरती हुई लिफ़्ट,
भौंकता है साढ़े तैंतीस आरपीएम में
लिफ़्ट वाला कुत्ता,
पकड़ लेता है स्वैटर तुम्हारा
चमकीले पट्टों का कथानक,
अधचबे नक्शों का आतंक

गिरती हो गुज़री हुई
शहर की नालियों में तुम,
फाड़ देती हो
कालका मेल का टिकिट
पट्टे वाले हाथ से,
बिछ जाती हो
चुके साये में,
उठ कर गुज़रने को
कल सुबह,
एक बार फिर

3. इन्तजार 

रात
थके पैरों का मनहूस रुकना,
कितनी चुप्पी है
मेरी सरहद में

इस बंद कमरे में
जो भूल चुकी हूँ
वो भी है,
भाप की तरह

सुबह के बँटते ही,
चुके साये में
रोकूंगी नहीं शरीर

सुनती, थरथराती, सांस लेती,
मेरे मरने में
मृत्यु दुखती है मेरी

पलकों पर भारी है
सन्नाटा
आभास का

आज भी नहीं आये
तुम शोर बन कर

४. प्रलय  से पहले


छोड़ न दे उसे पीछे कहीं
निकल जाए नावों में नयी,
दो हथेलियाँ पकड़ रही हैं
उस भागते पाँव को
हो रहा है उनसे अलग ,
जो ढूंढ रहा है घर
उन तमाम गड्ढों में
जहां शायद पानी हो

हथेली की लकीरों में
सो रही है वो चिड़िया,
जिसका रिश्ता
दोनों के इतिहास से टूट चुका है,
जिसका संगीत
बै-मौसम पानी से रूंध चुका है

वो पाँव जो ऊपर से
लात मार रहा है,
वो हथेली जो पिट रही है
उस पाँव से,
दोनो की संधि में
अटक गयी है
वो चिड़िया

अमन का दूत
पुरानी टहनी, दांतों में पहन,
जली जा रही है, ठंडे गुस्से से ,
डूब रही है
आग और पानी के भंवर में,
पर गाए जा रही है
शांति का गीत
अब भी

५. . शाम 

आज नीचे से देख रहे हैं
ऊपर हम,
उस पुराने दिन को
जब तन्हा गुंथे हुए हाथ लिए
हवा से हिलती पहाड़ी पर
मैने पहला नाख़ून रखा था

लहरों की कुर्सियां
नदी के हर छोटे पत्थर पर
पैर रख कर कूद रही थीं ,
उस दिन
तुमने कहा था ,
पास आ कर बैठो
मेरे …

गुज़रते रहे
कितने नदी, नाले, चश्मे, समंदर
माथे की शिकन पर अपनी,
मैने बादल में मुहँ डाल लिया
तुमने बिजलियाँ कानों पर चढ़ा ली थीं

‘देखो ,
सवेरा बरस रहा है !’
तुमने कहा,
और नाख़ून के पोरों से
मेरी पलकें बंद कर दीं

बंद आँखें ढूंढने लगीं
हमारी गुंथी उँगलियों का हुसूल,
ताकते रहे
बरसाती नदी का उफ़ान
तैरती कुर्सियों से हम

ऊतर गयी शाम आखिर
उस पहाड़ की छाँव में,
न तुम मिल सके
न मैं,
चुभता रहा
कुर्सियों की पीठ पर
इस नज़्म का नाख़ून

6. आख़िरी मादा 

ज़िंदा नालों की सांस बसी है
रौशनी में गुलाबों की,
गजब खिड़कियां हैं देखो
इस बदनाम ईमारत की,
सजा हैं हड्डियों पर मांस
चमकते शीशों के पीछे ,
टंगे हैं बदन कई
धुले बालों के नीचे,
लिपटी है हर होंठ से
बिगड़े साम्राज्यों की औलाद,
हर स्राव से उठती है रह रह
न मरने की वास

नाम की तख्ती से
तारीख़ दी गयी हैं मिटा,
तारीख़ की किताबों से
नाम हो गए हैं फना,
लुटो और लूटो, खूब
कहते हैं अशआर,
हर हवस बिकाऊ है यहाँ
हर भूख ख़रीदार

रंग लगी आखें
ओढ़ के रिसती है करुणा,
कलफ लगी पलकें
तोड़ के घिरता है अँधेरा,
गुलकार बस्तों  में खोंस टूटा सर्वांग,
छिपी जेबों से निकलती है
कतरी हुई ज़ुबान,
कांख कांख कर
स्याह रातों को,
चखाती है
सय्यादों का गोश्त,
तुम्हीं खा लो इन्हे, तो टूटे
इन मरे सायों का तिलिस्म

फाड़ डाले
अपनी ही गन्दगी
बदबूदार हवा का नासूर,
बहते मवाद की राह
तैर कर निकल जाये
यह आख़री मादा,
तख्ती पटक
कांच तोड़,
मरे नालों की सांस से परे
आदम-औ- हव्वा की
बची खुची औलाद,
टूटी टाँग
टूटे दांत
टूटे हाथ लिए,
एक नयी नाव की आस में
इस डूबती हैवानियत से दूर

7. मोटी औरत 

जिसकी गर्दन बँट रही है
टैलकम पाउडर की लकीरों से,
कलफ़ लगी हरी साड़ी में लिपटी, दिन चढ़े
पोंछती है पसीना चेहरे का, फाउंडेशन लगा,
खरीदती है सड़क से सूती रुमाल
दस रूपये में चार,
वो मोटी औरत
जिसे नहीं पता
कब लड़की से आंटी, आंटी से माताजी हो गयी,
रिक्शे वाला भी पूछता है आँख भर कर जिससे
‘भार होगा, तो दाम बड़ा लगेगा न माई’

जिसके टखनों में कालिख है
घिसी हुई पाजेब की,
छिपाती है बिवाई, छितरी हुई
चप्पल में डॉक्टर शोल की,
वो मोटी औरत
जिसने पान मसाला खाना शुरू नहीं किया अब तक,
गुडगाँव शहर में मॉल के बाहर
कर रही है इंतज़ार
जवान बेटी का,
जिसे ले जा कर अंदर
देखेगी सजता हुआ,
अपने आप से बिलकुल अलग

जिसे थोड़े ही समय के लिए
घर में रुक जाना था,
जिसके बढ़ते बच्चों को
अंग्रेज़ी मीडियम किताबों में डूब जाना था
और उसे वापस दफ़्तर निकल जाना था,
वो मोटी औरत
जिसके काम बंद कर चुके अंग
उगल रहे हैं आग,
हर महीने, तेईस तारीख से सत्ताईस तक
उसे निचोड़ने के बाद,
लोटती है, टाइल लगे ठंडे फर्श पर,
ग्रुप हाउसिंग के बंद मकानों में
हर दोपहर, अकेली
अट्ठारह साल बाद

जिसके सर की मांग के दो पार
उभर रही हैं लकीरें सफ़ेद रंग की सपाट,
मारती है रंग वो हर उगते नयेपन पर अपने
काला और खुशबूदार,
वो मोटी औरत
जो चिपचिपी कंघी से काढ़ती है बाल,
सजती है चाय की प्याली में
गरम पोहे के साथ,
जिसे देख कर खुश होता है तैंतीस साल पुराना
दफ़्तर से लौटा
अफ़सरनुमा अजनबी हर शाम

जिसकी हिलती खाल पर खिंच गए हैं
लिसड़ती उम्र के नाखून,
जो कपडे उतारती है, दरवाज़े के पीछे
अपनी ही नज़र बचा कर हर रात,
वो मोटी औरत
देती है अपनापन
उस चुने हुए अजनबी को,
बत्ती बुझा कर
चादर में छुप कर,
मांगे जाने पर, कभी कभार

8. प्रतिरोध 

तुम्हारे जूते चल रहे हैं
हाथ पर मेरे,
मैं चिल्लाना चाहती हूँ,
चिल्लाती हूँ ,
डर जाती हूँ
आतंकित तो नहीं हो गए तुम ?

मेज़ पर मेरे सामने
बैठा है, एक बच्चा
पैर झुलाता
खुजली मचाता उँगलियों पर
निडर,
“लकड़ी के पटरे पर खड़े होने के लिए
जलती हुई पेन्सिल पर घिसने के लिए
आ गया हूँ मैं !”

मिला रहा है शकल
उसका मुहं, मेरे हाथ से,
आज नहीं तो कल
उसका गुस्सा लिखेगा मुझे,
सूरज सा जलता,
पानी सा बुझता

उलट कर गिरता है
कुर्सी से,
पहुंचता है लगा कर कलाबाजी,
डालता है जूते में तुम्हारे, पाँव अपना
छोटा सा,
रुक जाती है एक क्षण को
तुम्हारी धार,
चिल्ला देते हो तुम भी
मेरे साथ,
खिलखिला के हँस देता है
मेरा हाथ

सुधा उपाध्याय की कवितायें

सुधा उपाध्याय

सुधा उपाध्याय महत्वपूर्ण साहित्यकार हैं। इनके दो कविता संग्रह -‘इसलिए कहूँगी मैं’और
‘बोलती चुप्पी’- प्रकाशित हो चुके हैं। एक आलोचना पुस्तक भी प्रकाशित है। संपर्क : sudhaupadhyaya@gmail.com

1. युद्धरत औरत

सुबह सवेरे
एक बनावटी मुस्कान पहने निकलती है घर से
बार-बार मुखौटे बदलते थक जाती है
कृत्रिम हंसी, खुश्क आंखें और खोखले मन
आतंकित करते हैं
तब भी विशिष्टों में नहीं रच पच पाती
थकी हुई वापस लौटती है अपनी दुनिया में
जहां राह देख रहे हैं
जाने कब से भूखे बच्चे,
बिखरा घर, उलझी आलमारी
दूध राशन सब्जी की खरीदारी
करती युद्धरत औरत
डांट डपटकर सुला देती है बच्चों को
पड़ जाती है निढाल बिस्तर पर
ताकि कल फिर जिरहबख्तर के साथ
निकल सके घर से।

     2.  नहीं फेंक सकती

तुम अकसर कहते हो मुझे
अव्यवस्थित
कर चुके हो शिकायत
संग्रह भावना की
पर क्या करूं
मैं नहीं फेंक सकती जिए हुए
किसी पल को कुड़ेदान में
चाहे वो बच्चों के बनाए सुंदर कार्ड हों
उनके तुतलाते हस्ताक्षर,

रंगीन ड्राइंग
क्लासरूम नोट्स
यूं ही कागज के ठोंगे पर लिखी कोई कविता
डायरी का कोई पन्ना
कहीं से मिल गई कोई अच्छी शायरी
या फिर चिंदियों में
तुम्हारे तमाम प्यारे संबोधनों का इतिहास
हर ब्यौरा सुरक्षित रखा है मन के कोने में
फिर भी उसे दुलराने के लिए
उसका बाहर होना भी
उतना ही जरूरी है

4.   क्यों करती हो वाद-विवाद

क्यों करती हो वाद-विवाद
बैठती हो स्त्री विमर्श लेकर
जबकि लुभाते हैं तुम्हें
पुरुषतंत्र के सारे सौंदर्य उपमान
सौंदर्य प्रसाधन, सौंदर्य सूचक संबोधन
जबकि वे क्षीण करते हैं
तुम्हारे स्त्रीत्व को
हत्यारे हैं भीतरी सुंदरता के
घातक हैं प्रतिशोध के लिए।
फिर क्यों करती हो वाद-विवाद।

5.    बोनजई

तुमने आँगन से खोदकर
मुझे लगा दिया सुंदर गमले में
फिर सजा लिया घर के ड्राइंग रूम में
हर आने जाने वाला बड़ी हसरत से देखता है
और धीरे-धीरे मैं बोनज़ई में तब्दील हो गई
मौसम ने करवट ली
मुझमें लगे फल फूल ने तुम्हें फिर डराया
अबकी तुमने उखाड़ फेंका घूरे पर
आओ देखकर जाओ
यहां मेरी जड़ें और फैल गईं हैं

6.       कूबत

चट्टानों को तोड़ देने का हौंसला
तूफानों को चीरकर निकलने का साहस
शहर भर की भेदती निगाहों से बचती
अंधेरों से लड़ने की कूबत
औरत तूने कहां से जुटाई
ये आईना जो दरक गया था कभी का
इसे फिर कहां से उठा लाई

7.    खानाबदोश औरतें

सावधान ….
इक्कीसवीं सदी की खानाबदोश औरतें
तलाश रहीं हैं घर
सुना है वो अब किसी की नहीं सुनतीं
चीख चीख कर दर्ज करा रही हैं सारे प्रतिरोध
जिनका पहला प्रेम ही बना आखिरी दुःख
उन्नींदी अलमस्ती और
बहुत सारी नींद की गोलियों के बीच
तलाश विहीन वे साथी जो दोस्त बन सकें
आज नहीं करतीं वे घर के स्वामी का इंतज़ार
सहना चुपचाप रहना कल की बात होगी
जाग गयी हैं खानाबदोश औरतें
अब वे किस्मत को दोष नहीं देतीं
बेटियां जनमते जनमते कठुवा गयी हैं

8.       अक्षत

सुनो मैंने आज भी सहेज कर रखा है
वह सबकुछ जो अम्मा ने थमाई थी
घर छोर कर आते हुए
तुम्हारे लिए अगाध विश्वास
सच्ची चाहत ,धुले पूछे विचार
संवेदनशील गीत ,कोयल की कुहुक
बुलबुलों की उड़ान ,ताज़े फूलों की महक
तितली के रंग ,इतर की शीशी
कुछ कढाई वाले रुमाल
सोचती हूँ हवाई उड़ान भरते भरते
जब तुम थक जाओगे
मैं इसी खुरदुरी ज़मीन पर तुम्हे फिर मिल जाउंगी
जहाँ हम घंटों पसरे रहते थे मन गीला किये हुए
वे सब धरोहर दे दूँगी ख़ुशी से वे तुम्हारे ही थे
अक्षत तुम्हारे ही रहेंगे ….

9. मौसम

मुझपर फब्ती है
जेठ की दुपहरी
पूस की रात
बरसात की उमस
सबकुछ जीती हूं एक साथ
क्यों कि मौसम ऐसे ही करवट लेता है।

नीला आसमान : दूसरी किश्त

शोभा मिश्रा


साहित्यिक -सामाजिक संगठन फर्गुदिया की संस्थापक ‘संचालक शोभा मिश्रा कवितायेँ और कहानियां लिखती हैं. ये सक्रिय ब्लॉगर के रूप में सम्मानित हैं और दिल्ली में रहती हैं. संपर्क : shobhamishra789@gmail.com

( शोभा मिश्रा की यह लम्बी कहानी भारतीय समाज के उस बडे
हिस्से की कहानी है, जहां औरत तय भूमिकाओं के लिए गढ़ी जाती है. छोटे -छोटे
वे हर प्रसंग यहाँ बारीकी से और सहज भाषा में शामिल किये गए हैं , जो उन
भूमिकाओं को तय करते हैं . उसी  परिवेश की लडकी सुनैना अपने मायके में अपने
वजूद और निर्णयों के लिए लड़ते हुए अपने ससुराल में हार जाती है. हालांकि
इस हार के लिए मायका भी उतना ही जिम्मेवार है, जितना ससुराल, फिर भी मायके
और माँ के स्नेह को वह अपना अंतिम राजदार बनाती है , आख़िरी पत्र के द्वारा .
)

केनवास पर सीनरी और चद्दरों, रूमालों पर रंग भरकर अपने मास्टरजी से सुनैना खूब स्नेह पाती थी…उसकी बनाईं सीनरी रिश्तेदार और पड़ोसी कभी -कभी खूब सराहकर माँग लेते …वह और उसके घर के सदस्य संकोचवश मना नहीं कर पाते थे लेकिन रंग, केनवास और कपड़ों का खर्च निकालने के लिए सुनैना कभी-कभी अपनी सीनरी बेच भी देती थी! मास्टर जी चाचाजी के दोस्त थे…रंगों की दुनिया की विभिन्न कलाओं, विधाओं में वे माहिर थे…कभी-कभी जब घर आते तो सुनैना को पेंटिंग की बारीकियों के बारे में सिखाते थे! एक दिन सुनैना मास्टरजी के घर गई…मास्टरजी ग्लास पेंटिंग्स से भरा आर्टरूम देखकर हैरान रह गई…ग्लास पेंटिंग देखते-देखते बिल्लियों के जोड़ेवाली एक पेंटिंग पर उसकी निगाह ठहर गई …मास्टरजी से पेंटिंग की इस नई विधा की जानकारी लेने के बाद बिल्लियों जैसी पेंटिंग बनाने की इच्छा जाहिर की…मास्टरजी ने छोटे-छोटे पारदर्शी शीशे के टुकड़े देते हुए उससे कहा कि जैसे समझाया है अभी तुम इस पर फूलों और सब्जियों की आकृति बनाकर प्रेक्टिस करना सीखो! बिल्लियों की आँखों और बालों में रंग भरना ये ग्लास पेंटिंग्स के मँझे हुए पेंटर भी ढंग से नहीं कर पाते हैं! लेकिन सुनैना तो बिल्लियों की आँखों में मन ही मन रंग भर चुकी थी!

उस दिन मास्टरजी के घर से लौटकर सुनैना भूरी ...सफेद और काली बिल्लियों के पेयर के बारे में ही सोचती रही …मास्टरजी ने ग्लास पेंटिंग कैसे बनाई जाती है,…कैसे पारदर्शी शीशे पर पहले आकृति की सूक्ष्म लाइनों और शेड्स में रंग भरने होते हैं और बाद में बेस में रंग भरना होता है…जो समझाया था उसी के बारे में सोचती रही!दूसरे दिन ट्यूशन से लौटते समय फोटोफ्रेम करनेवाले की दुकान के आगे उसके पाँव थम गए, आगे बढ़कर फ्रेम में लगाये जानेवाले शीशे का दाम पूछ ही लिया…छः बाई चार इंच के पारदर्शी शीशे की कीमत पाँच रुपये थी!

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घर आकर अम्मा से सुनैना ने अपने मन की बात कही, पहले भी पेंटिंग के लिए रंग और कपड़ों का खर्च तो देना ही पड़ता था, अम्मा शीशे का पैसा देने के लिए भी राजी हो गई! दूसरे दिन ही सुनैना ने शीशा खरीदा और मन में उतरी बिल्लियों की आँखों की लाल-नीली नसों को शीशे पर सबसे पहले प्रत्यक्ष रूप दिया उसके बाद उनके शरीर के भूरे…पीले…सफेद … काले रोयें में रंग भरती गई! एक धुन में पूरी रात शीशे पर बिल्लियों में रंग भरने में डूबी रही! सुबह होने वाली थी …खिड़की से बाहर हल्का नीला उजाला बिखरा हुआ था इधर सुनैना के सामने शीशे पर बनी बिल्लियों का जोड़ा मुस्करा रहा था!शाम को जब उसने मास्टरजी को अपनी ग्लास पेंटिंग दिखाई…खुशी से स्तब्ध मास्टरजी पेंटब्रश मुँह में दबाये बस पेंटिंग निहारते रह गए …बोले कुछ भी नहीं! थोड़ी देर बाद सुनैना के सर पर हाथ रखकर बस इतना ही कहा कि ‘‘ऐसे ही आगे बढ़ती जाओ…मेरा आशीर्वाद तुम्हारे साथ है!’’

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अब तो ग्लास पेंटिंग बनाने में सुनैना का मन खूब रमने लगा…शीशे के लिए अम्मा कभी-कभी पैसे दे देती थीं लेकिन कभी-कभी पेंटिंग्स के लिए रंग और शीशे…कपड़े के लिए पैसे माँगने पर घर में माहौल बहुत बिगड़ जाता था! चाचाजी सुनैना को हमेशा यही नसीहत देते की तुम अपनी पढ़ाई पर ध्यान दो …बहुत मुश्किल से पास भर हो जाती हो, ये सब चित्रकारी-वारी में कुछ नहीं रखा है! चाचाजी की बातों का कभी वह विरोध नहीं करती थी लेकिन अकेले में यही सोचा करती कि पढ़ाई में होशियार होना और कक्षा में अव्वल आना ही सबकुछ होता है क्या? आज हमारी बनाई कितनी सीनरी बिक जाती हैं। कुछ ग्लास पेंटिंग्स और सीनरी मास्टरजी की पेंटिंग्स के साथ प्रदर्शनी में भी शामिल की गई! दिल्ली के एक बड़े चित्रकार मास्टरजी की पेंटिंग्स के साथ हमारी भी पेंटिंग्स खरीदकर ले गए थे! ये सब छोटी-छोटी मन को संतोष देनेवाली उपलब्धि कम हैं क्या?

एक दिन जब सुनैना को शीशे के लिए पैसे नहीं मिले तो वो बहुत रोई …अम्मा उसे समझाती रहीं, ‘‘रो मत … जब हमरे पास होगा तब हम तुम का पेंटिंग के सामान के लिए पैसा जरूर देंगे!’’ सुनैना के पास आयल कलर और ब्रश था लेकिन उसे पेंटिंग बनाने के लिए शीशे की जरूरत थी! एक दिन दोपहर में अम्मा के पास लेटी- लेटी सुनैना ने अम्मा का हाथ अपने हाथ में लेकर बड़े प्यार से उनसे बक्से में रखी उनकी कढ़ाई की हुई फोटो के बारे में बात करने लगी! ‘‘अम्मा! उस फोटो का क्या करोगी? इत्ते साल से उसको बक्से में काहे रखी हो? उसको कमरे में सजा क्यों नहीं देती दीवार पर?’’ अम्मा स्नेह से उसके सर पर हाथ फिराती हुई बोली, ‘‘वो फोटो हमारे मायके की याद है…गर्मियों की दुपहरिया में ओसारा में तुम्हारी नानी के साथ बैठकर…साँझ को छत पर सखियों के संग हँसी -ठिठोली करते हुए … दूर खेतांे में डूबते सूरज को निहारते हुए वो सब फोटो हम काढ़े हैं…दीवार पर सजाकर रंग खराब होई … गिरके टूट भी सकत है…एक बार मायके की यादन के सँजोई धरोहर खत्म हुई जाई तब कहाँ मिली?’’

अम्मा का मायके की यादों से जुड़ी अपनी कला के प्रति इतना मोह देखकर सुनैना से कुछ कहते नहीं बना…चुपचाप अम्मा का हाथ पकड़कर सो गई! लेकिन एक दिन दोपहर में जब अम्मा और चाची बुलउवा में गईं थी तब सुनैना ने अम्मा का बक्सा खोलकर उनकी काढ़ी हुई कुछ फोटो से शीशा अलग कर लिया … बहुत दिन से वो अम्मा और चाचा से पेंटिंग के सामान के लिए पैसा माँग रही थी…अम्मा तो मजबूर थी लेकिन चाचा ने गुस्से में पैसा नहीं दिया! रुई और रंग-बिरंगे सिल्क के कपड़े पर काढ़े हुए राधा- कृष्णा, तोता, मछली और खरगोश को उसने शीशे से अलग कर दिया…कुछ सितारे…मोती और टिकुलियाँ काढ़े हुए कपड़े से निकलकर नीचे फर्श पर गिर गए! अम्मा बुलउवा से लौटी तो ये सब देखकर थोड़ा दुखी तो हुईं लेकिन सहमी हुई सुनैना को देखकर मुस्करा दीं!

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आज सुनैना स्कूल से लौटी तो अम्मा, चाची, दादी खुश होकर आपस में कुछ बातें कर रही थी …अम्मा के हाथ में अंतर्देशीय-पत्र था! वो अपना बस्ता रखकर सीधा अम्मा के पास गई और उतावली होकर अम्मा से पूछने लगी ‘‘किसकी चिट्ठी है अम्मा?’’ उसे लगा मामाजी के गाँव से चिट्ठी आई होगी तो उसमें नानीजी का भी हाल-चाल होगा! अम्मा प्यार से उसकी तरफ देखकर मुस्कराने लगी…दादी बोल पड़ी, ‘‘तुम्हरी मौसी की चिट्ठी है हफ्तेभर बाद तुमका लड़केवाले देखने आयेंगे!’’सुनैना चुपचाप उठकर वहाँ से चली गई…पिछले दो साल से अपने लिए विद्रोह करके वो थक गई थी …अब सबकुछ स्वीकार कर चुकी थी! हाथ-मुँह धोकर अम्मा के कमरे में नीचे चटाई बिछाकर लेट गई! थोड़ी देर में अम्मा खाना लेकर आ गईं …सुनैना अपनी आँखों और माथे पर बाँह रखकर सोने का प्रयास कर रही थी …अम्मा ने धीरे से उसकी बाँह हटाते हुए उसे प्यार से खाना खाने के लिए कहा! वह उठकर बैठ गई और खाना खाकर फिर लेट गई…आज अम्मा उससे बहुत बात करना चाह रही थी…अम्मा का मन भारी हो रहा था लेकिन बिटिया की मनःस्थिति का ध्यान रखते हुए वह उसके पास से हट गई! अम्मा के जाते ही सुनैना ने अपनी आँखें खोल ली और कुछ सोचते हुए छत पर धीरे-धीरे घूमते पंखे को निहारने लगी!

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आज अम्मा सुनैना को अपनी शादी में मिली सितारे जड़ी गुलाबी साड़ी पहनाकर तैयार कर रही थीं, सुनैना के लम्बे बालों को समेटकर अम्मा ने एक सुन्दर लम्बी छोटी गूंथ दी थी, माथे पर छोटी सी लाल बिंदी सजा दी और कानों में अपने सोने के छोटे झुमके पहना दिए! चाची ने उसके दाहिने हाथ में अपने आर्टिफिशियल सुन्दर कड़ों का सेट पहना दिया, एक हाथ में सुनैना को शादी में देने के लिए घड़ी जो पहले ही खरीद ली गई थी वो अम्मा ने पहना दी! सावन के महीने में अगर दिनभर बरसा हुआ आसमान साफ हो तो वो शाम कुछ गुलाबी आभा लिये हुए मासूम सी सुन्दर सी नवयौवना लगती है, सुनैना वैसी ही शाम की तरह सुन्दर राजकुमारी जैसी लग रही थी!

एक अजीब उदासी सुनैना के चेहरे पर छाई हुई थी, वो बस लगातार शून्य में कुछ निहारे जा रही थी, अम्मा ने उसकी ठोढ़ी को अपने अंगूठे और अनामिका उँगली से ऊपर उठाकर उसका चेहरा अपनी तरफ किया…अम्मा और सुनैना की आँखंे मिली…अम्मा ने सुनैना की और सुनैना ने अम्मा की आँखों में उदासी के घिरे बादलों को देख लिया…इससे पहले कि सुनैना की आँखों के बादल बरसते …अम्मा ने खटिया पर बैठी सुनैना का सर अपनी गोद में समेट लिया…अंकवार में भरकर धीरे से बस इतना ही बोल पाई, ‘‘देवी जइसन … बिटिया हमार!’’
भीतर मन में तो दोनों के हृदय के धरातल पर बिछोह के बादल लगातार बरस रहे थे लेकिन दोनों ने ही आँखों में घिर आये बादलों को अभी फटने नहीं दिया था! अम्मा सुनैना का सर अपनी छाती से लगाए उसके माथे पर स्नेह से हाथ फिरा रहीं थी और सुनैना ने अम्मा की छाती में अपना चेहरा छिपाकर आँखें बंद कर ली थी!
‘‘ए ताईजी! वो लोग आ गए।’’

अम्मा ने हड़बड़ाकर सुनैना को अपने से अलग किया और गुडुआ से बोली, ‘‘ए बाबू! तुम्हरे पापा तो दरवज्जे पर हैं ना उनके स्वागत के लिए?’’ गुडुआ बहुत उत्साहित था अपनी ताईजी की बात सुनकर ये कहता हुआ घर के द्वार की तरफ भागा। ‘‘हाँ ताईजी … पापा वहीं हैं!’’चाची भी भागकर घर की खिड़की से बाहर झाँकने लगी…अम्मा रसोई की तरफ दौड़ी…घर में सभी उत्साहित होकर लड़केवालों की आवभगत के लिए इधर-उधर दौड़- भाग करने लगे! दादी बड़बड़ाती हुई अम्मा को धीमी आवाज में नसीहत देने लगी – ‘‘ई रोना-धोना बाद में करिहो बहुरिया… अब ही तो मेहमान न के खातिरदारी करो जल्दी जायके।’’

चाचीजी और एक अनजान पुरुष की हँसी के साथ कुछ आवाजें सुनैना और उसकी अम्मा के करीब आती गईं!‘‘रस्ते में कोई परेशानी तो नहीं हुई?’’ ये चाचाजी की आवाज थी!‘‘नाही … सुबह बहुत जल्दी -जल्दी करने के बाद भी घर से निकलने में दस बज गए … रस्ते में दो जगह रुके … लम्बे सफर में रिंकू की माँ की तबियत थोड़ी बिगड़ जाती है।’’अम्मा और चाची रसोई में मेहमानों के चाय-पानी के इंतजाम में व्यस्त थी…उदासी और घबराहट के मिलेजुले भाव के साथ बैठी सुनैना की आँखें जिज्ञासावश खिड़की की तरफ उठ ही गईं …मार्च के महीने की हलकी गर्मी में सीलिंग फैन चल रहा था …खिड़की पर लगा पर्दा पंखे की हवा से कभी-कभी ऊपर उठ जाता! करीब पैंतालिस साल की उस महिला की छवि गरिमामय थी लेकिन चेहरे पर मुस्कराहट के बाद भी एक हल्के अहंकार का भाव था…अधेड़ उम्र के हिसाब से उन्होंने खूब चटख बैंगनी रंग की साड़ी पहनी थी… सुनैना ने अंदाजा लगा लिया कि ये उसकी होनेवाली सासू माँ हैं! मौसी ने अम्मा…दादी … चाची और नानी के सामने इनकी तारीफों के पुल बाँध दिए थे, पढ़ी- लिखी हैं … घर सलीके से रखती हैं और बहुत शांत भाव की हैं! साथ में जो पुरुष थे उन्होंने सलेटी रंग की सफारी पहनी हुई थी, पैंतालिस के आस-पास उनकी भी उम्र होगी…चाचाजी से बात करते हुए उनके व्यवहार में सरलता झलक रही थी… चेहरे पर गंभीर भाव थे!

दो कमरों के बीच की दीवार की खिड़की से उठते-गिरते परदे से कभी-कभी सुनैना घरवालों द्वारा चुने हुए अपने ससुराल वालों को निहार लेती कभी अपने छोटे से कमरे की बाहरी दीवार की खिड़की से बाहर खड़ी फिएट को देख लेती …क्रीम रंग की फिएट की तारीफों के पुल बाँध दिए थे मौसी ने, वो लोग बहुत अमीर हैं … अपना बड़ा घर है… जमीन है … कार है … सुख और धन की कमी नहीं है घर में … अपनी बिटिया राज करेगी उस घर में। गुडुआ अपने हम उम्र दोस्तों के साथ कार के आस-पास ही मंडरा रहा था …सुनैना का मन हो रहा था कि जाकर उसको दो थप्पड़ लगा आये लेकिन दादी पास बैठी थी और अम्मा ने सख्त हिदायत दी थी कि जब तक लड़के वाले घर में रहे तुम बाहर मत निकलना!

तभी उसे चाचाजी की आवाज सुना ई दी, ‘‘जाइये ... आप भीतर जाकर बिटिया से मिल लीजिये।’’ कहकर चाची को आवाज लगाने लगे …चाची और अम्मा उन लोगों को चाय नाश्ता कराने के बाद इसी इंतजार में बैठी थी कि शुक्लाईन (सुनैना की होनवाली सासू माँ) कब सुनैना बिटिया को देखने अन्दर आएँ!कमरे के दरवाजे का पर्दा हटाकर शुक्लाईन कमरे में दाखिल हुई…उन्हें देखते ही सुनैना खटिया पर से उठ गई और एक किनारे सर झुकाकर खड़ी हो गई…दादी ने पहले से ही सिखाया था कि उनके पैर छूले ना लेकिन सुनैना ने आज तक अपने घरवालों के अलावा किसी के पैर नहीं छुए थे …उसे हिचकिचाहट हो रही थी लेकिन जब उसकी नजर दादी से मिली तो वो सहम गई …दादी आँखें बड़ी करके उसे घूर रही थी और शुक्लाईन का पैर छूने का इशारा कर रहीं थी! सुनैना ने आगे बढ़कर पैर छू लिये …सुनैना के दोनों कंधे को हाथ लगाकर शुक्लाईन ने उसे उठाया और कहने लगी, ‘‘अरे! जीती रहो … आओ इहाँ हमरे पास बयिठो।’’

सुनैना खटिया पर उनके पास बैठ गई ...दादी नीचे पाटा लेकर बैठ गई …चाची और अम्मा दरवाजे पर अपने आँचल को पकड़कर खड़ी थी! शुक्लाईन चाची और अम्मा की तरफ इशारा करती हुई बोली कि, ‘‘आपो लोग बईठ जाओ।’’ अम्मा और चाची भी नीचे चटाई बिछाकर बैठ गई! इधर-उधर घर- परिवार की बातें होती रही…बीच-बीच में शुक्लाईन सुनैना से बात करके उसकी पढ़ाई-लिखाई और दूसरे हुनर के बारे में उससे पूछतीं रहीं…दादी ने जैसे-जैसे समझाया था वैसे ही सुनैना उन्हें जवाब देती गई! दादी तो जैसे उतावली हुई जा रही थी कुछ ऐसा सुनने के लिए जिससे वो आश्वस्त हो जाएँ कि शुक्लाईन को सुनैना पसंद है! एक बार तो वो बोल ही पड़ीं कि बिटिया आपके घर की हुई…अब ईका अपने घर लई जाओ!

सुनैना चुपचाप दादी की बात सुनकर मन ही मन कुढ़ती रही! तभी दूसरे कमरे से शुकुलजी ने शुक्लाईन को आवाज लगाई, ‘‘अरे अब चला जाए … घर पहुँचते-पहुँचते देर रात होई जाई।’’ शुक्लाईन उठते हुए अपने बड़े पर्स में से अंगूठी निकालकर सुनैना को पहनाती हुई बोली, ‘‘अब हमरे रिंकू ने तो बहुरिया को पसंद ही कर लिया है तो हम कैसे मनाकर सकते हैं … आपकी बिट्टो (मौसी) ने हमरे बेटे पर न जाने कौन सा मंत्र मारा है कि उ ब्याह के लिए इत्ती छोटी उम्र मा तैयार हो गया…। नाही तो अब ही हमरे बिटवा की उम्र ही कित्ती है … खेले-खाए … पढ़े-लिखे की उम्र माँ हमरे बिटवा को प्रेम का रोग लग गया।’’ शुक्लाईन मखौल वाली हँसी हँस पड़ीं!सुनैना को उनकी बात नागवार गुजरी लेकिन करती भी क्या…चुप रह गई! वो तो अपनों से हारी थी! अँगूठी पहनाने के बाद शुक्लाईन फिर बैठक में चली गईं। बैठक में बैठे चाचाजी और शुक्लाजी कुछ संकल्प की बात कर रहे थे…सुनैना को ये बातें कुछ कम समझ आ रही थी वह ध्यान से उनकी बातें सुनने लगी …चाचाजी याचना करते हुए कह रहे थे, ‘‘बीस हजार हम आपको कैश देंगे उसके बाद शादी का खर्च भी तो है…आप जिद पर न अड़े रहिये!’’

इस बार सुनैना शुक्लाईन की बात सुनकर क्रोध और घृणा के भाव से भर गई! हँसकर शुक्लाईन चाचाजी से कह रही थी कि तब आप रहे दियो पाड़ेजी हमर बिटवा कौनो मछली नाही है ,जो सड़ जाई!इस बार के व्यंग्य से सुनैना ने दादी और अम्मा को घूरकर देखा…अम्मा आश्वासन में एक हाथ उठाकर दूसरे हाथ की उँगली चुप कराने के संकेत में अपने होठों पर रखती हुई सुनैना को चुप रहने का इशारा किया! उसके बाद सुनैना वहाँ से उठकर रसोई में कपड़े बदलने चली गई! चाचाजी उन लोगों के साथ कुछ देर बात करते रहे उसके बाद बैठक में सभी लोग लड़केवालों को विदा करने के लिए इकट्ठे हो गए! विवाह की तारीख की कुछ बातें करते-करते सभी घर से बाहर निकल गए! सुनैना खिड़की से बाहर उन्हें वापस जाता हुआ देखती रही!

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अम्मा-बाबा के साथ साथ गुड्डे-गुड़िया का, सखियाँ, बचपन सब पीछे छूट गया! दादी की इस सीख, ‘‘बिटियाँ! ससुराल में सबके खूब इज्जत करिहो … मायके जइसन गुस्सा ससुराल माना करिहो…बिटिया! नई बहुरिया कुछ साल धीरज धरके बड़न के सेवा-सत्कार करीले और छोटन के स्नेह दे तो बाद मा ससुरालवाले ओका सर-आँख पर बईठा के रखत हैं…सोवे से पहिले सास के गोड़ जरूर दबायो … सर मा तेल रखि के दबा दिहा करियो … एक बार रसोई ढंग से सँभाल लिहो तो ससुराल माँ राज करिहो!’’ के साथ सुनैना मायके से विदा हो गई …मायके की यादों के साथ उसी की बनाईं सीनरी, चद्दरें, रूमाल, मेजपोश और गिलास पेंटिंग अम्मा और दादी ने एक अलग बक्से में रख दिया … रंगों से सजे अपने भविष्य के सपनों को वो अपने साथ दूसरी दुनिया में ले जा रही थी इस उम्मीद के साथ कि उसके सपनों की बेल जिसकी नर्म, नन्ही टहनियाँ आतुर हैं एक मजबूत सहारे को…वो उसे एक ना एक दिन जरूर मिलेगी और उसके सपनों की बेल ऊँचे आसमान की ओर बढ़कर अपने रंगों की छटा बिखेरेगी!

सुनैना को विदा करते समय अम्मा तो एक बार फिर जैसे मानसिक प्रसव पीड़ा से गुजरी…!पारंपरिक रीति-रिवाजों के अनुसार ससुराल में द्वार से ही खूब मान-सम्मान के साथ के साथ सुनैना को घर के भीतर लाया गया …सफर की थकान … अपनों से दूर होने के दुःख के साथ पियरी साड़ी में लिपटी बुत बनी सुनैना को उसकी नन्द और दूसरी औरतें स्नेह से सँभालकर हँसी-ठिठोली करती हुई घर के भीतर ले गईं … बाँस की और मूँज की हाथ से बनी रंग-बिरंगी डलिया में पैर रखकर घर के भीतर जाती हुई सुनैना अपने पाँव के नीचे से अपने ही वजूद की जमीन से छीनी जानेवाली मिटटी से अनजान जो जिस दिशा ले गया … उसी ओर बढ़ती गई!
कोहबर पूजन की रस्म के बाद मुँह दिखाई की रस्म हुई … टोले-मोहल्ले और परिवार की औरतों सुन्दर बहुरिया को देखकर खुश थीं …‘‘शुक्लाइन! अब तो तुम आराम करो…बाजार-हाट और बुलउवा घूमो … तुम्हार घर और रसोई सँभालेवाली आ गई!’’

शादीशुदा नन्द और उनकी जेठानियाँ उसे अकेली देखकर पास में बैठकर अम्मा-चाची के जैसे सासु को खुश रहने के तरीके समझाती…अपनी नन्द की एक बात उसकी समझ नहीं आई, ‘‘देखो बहुरिया! रात का कमरे में आये के देरी मत करिहो … दिनभर घर के बहुत काम होत है… रसोई के काम निपटावे लगो तो पूरी रात बीत जाए…रात के बर्तन एक किनारे रख दिहा करिहो…मरद-मनई राती के अपनी मेहरारू समय से पास देखा चाहत हैं!’’ वो बस चुपचाप कभी अपनी नन्द का कभी उनकी जेठानी का चेहरा देखती रही! थकी-हारी, उँघती सुनैना ये सब बातें सुनती रही … जमीन पर बिछे गद्दे पर बैठी ना जाने कब उसे नींद आ गई…!

अम्मा, नानी और चाची की नसीहत के अनुसार सुनैना ने ससुराल की गृहस्थी सँभाल ली…दस-बारह सदस्यों के संयुक्त परिवार का भार उसने अपने नन्हे कन्धों पर उठा लिया…सुबह पाँच बजे उठकर पूरे घर का झाड़ई-बुहारू करने के बाद नहा -धोकर दादी सास की पूजा की तैयारी और फिर उसके बाद रसोई में का काम खत्म करके सफाई- करते दोपहर हो जाती … थकी – हारी कुछ देर आराम करती फिर से शाम की रसोई…देर रात तक दादी-सास और सासू-माँ के पैर दबाकर बिस्तर पर निढाल ऐसे गिरती जैसे मीलों पैदल ऊँचे पहाड़ की चढ़ाई चढ़कर आई हो! उस रात नींद आँखों से कोसों दूर थी लेकिन ब्रह्ममुहूर्त में एक चिड़िया की आवाज सुनकर देह और उससे भी ज्यादा मन के घाव भूलकर सुनैना ने आँखें खोल लीं … ये एक नया अनुभव था, जिसके बारे में चाची, दादी और अम्मा किसी ने भी नहीं समझाया था। अम्मा के कहे अनुसार रिंकूजी बहुत ही सभ्य और शालीन थे। सुनैना के हर सुख-दुःख में उसका खयाल रखते थे लेकिन बीती रात क्या हुआ था उन्हें … रिंकूजी जानते थे कि वो तीन दिन से बुखार से तप रही थी…अन्न का एक दाना भी उसके मुँह में नहीं गया था…अपनी तरफ से बस हलका विरोध भरकर सकी थी लेकिन रिंकूजी की जिद के आगे उसे झुकना पड़ा…कमजोर शरीर ये अप्रत्याशित नोच-खसोट सह गया लेकिन आत्मा कहीं भीतर तक छिल गई! उसे बचपन में सुनी नानीजी की कहानियाँ याद आ गई… राजकुमारी और राजकुमार की कहानी में एक राक्षस भी होता था जो राजकुमारी पर हमेशा बुरी नजर रखता था और उनसे दुर्व्यवहार करता था…राजकुमार उस राक्षस से राजकुमारी की रक्षा करता था…वह कहानी सुनते-सुनते नानीजी को बीच में ही रोककर पूछती बैठती कि बुरी नजर क्या होती है नानी …दुर्व्यवहार क्या होता है। नानी राक्षस को बुरा बताते हुए कहती कि बाबू! राक्षस ने राजकुमारी के साथ बुरा किया…उस पर बुरी नजर डाली।

आज रिंकू में सुनैना को नानी जी की कहानियों वाला राक्षस नजर आया … देर तक अपनेे बिस्तर पर बैठी रोती रही … समझ ही नहीं पा रही थी कि किससे क्या कहे।बगल में ही बिस्तर पर रिंकू बेसुध सो रहे थे …आज पहली बार रिंकूजी के साथ वह भयभीत थी। खुद में ही सवाल-जवाब और वेदना में डूबी उसकी तंद्रा तब टूटी जब रिंकू के हाथों का स्पर्श उसने अपने पैरों में महसूस किया। रिंकू उसके पैरों के पास बैठे फूट-फूट कर रो रहे थे … रिंकू का यह रूप देखकर वो हैरानी और असमंजस में पड़ गई ,‘‘पति परमेश्वर होता है,’’ दादी, चाची और नानी ने अभी तक यही पाठ पढ़ाया था … झट से रिंकू जी को कंधों से पकड़कर उठाती हुई सुनैना बोली…‘‘ये आप क्या कर रहे हैं? हम पर पाप चढ़ाएँगे क्या?’’ रिंकूजी को अपनी रातवाली गलती का अहसास था!
अम्मा और नानी से चिट्ठी में ससुराल की हर बात का जिक्र करने वाली सुनैना आज रात का जिक्र कैसे करती? आज उसे शादी के पहले दिन अपनी नन्द और उनकी जेठानी की कही बात याद आ गई कि- ‘‘मरद-मनई अपनी मेहरारू के राती में समय से अपने पास देखा चाहत हैं!’’कुछ ही दिनों में रिंकू जी की सरकारी नौकरी लग गई दूसरे शहर में…कुछ महीने बाद घर देखकर वे उसे अपने साथ ले जायेंगे…जाते समय सुनैना को ये दिलासा दे गए थे।

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आज सुनैना की अम्मा की खुशी का ठिकाना नहीं था...मास्टर जी जो खुशखबरी लेकर आये थे उससे वह खुशी से फूली नहीं समा रही थी…मास्टर जी ने अपनी पेंटिंग की प्रदर्शनी में सुनैना की जिन पेंटिंग्स को भी शामिल किया था उसमें से बिल्लियों के जोड़े वाली ग्लास पेंटिंग्स को एक प्रतिष्ठित अकादमी द्वारा सम्मानित करने के लिए चुना गया था! अम्मा ने चिट्ठी में ये शुभ संदेश लिखकर सुनैना को भेज दिया! अम्मा अब सुनैना के भविष्य को लेकर आश्वस्त थी…उनकी बिटिया के सपनों को सतरंगी आसमान मिल गया था…उसके हुनर को एक दिशा मिल गई थी…अम्मा के मन में एक उम्मीद की किरण दिखाई दी कि शायद इस उपलब्धि से सुनैना के परिवार वालों का मन भी बदल जाए…चिट्ठी पढ़कर उनकी फूल-सी बिटिया कितनी खुश होगी … इसका अंदाजा वह लगा सकती थी… आखिरकार उसकी माँ जो थी…

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ससुराल में सुनैना के हाथ से रंग और ब्रश तो जैसे छूट ही गया था…कभी-कभी दोपहर में रंग-ब्रश लेकर बैठती भी तो जान बूझकर सासू-माँ कोई न कोई काम उसे बता देतीं… मायके की बनाई पेंटिंग सुनैना ने ससुराल की घर के सभी कमरों की दीवार पर सजा दिया…सासू-माँ के कहने पर चद्दरें और मेजपोश भी बिस्तर और मेज पर बिछा दिए…घर और रसोई के कामों से कभी भी सासू माँ संतुष्ट नहीं होती थी … कुछ न कुछ कमी निकलकर सुनैना और उसके मायके वालों की उसी के सामने खूब इज्जत उतारती थी! लेकिन सुनैना को विश्वास था कि एक दिन सब ठीक हो जायेगा…चिट्ठी में अम्मा से अपनी सासू माँ के बुरे व्यवहार का जिक्र तो करती थी लेकिन मानसिक और शारीरिक रूप के प्रताड़ना की असह्य पीड़ा को छिपा ले जाती थी … अम्मा पत्रों के जवाब में यही दिलासा देतीं कि एक दिन जब रिंकू जी की नौकरी लग जायेगी तब सब ठीक हो जायेगा!

एक शाम सासू-माँ कहीं पड़ोस में गई थी...घर में कम ही लोग थे…सुनैना आज बहुत दिन के बाद ऑयल कलर लेकर बैठी थी…शीशे पर ऊँचे बर्फ से ढँके पहाड़, चिनार-देवदार के वृक्ष और गहरी नील झीलवाली सीनरी अभी पूरी ही होने वाली थी कि उसे सासू-माँ की तेज चीख सुनाई दी…सब कुछ छोड़कर वो रसोई की तरफ भागी…चूल्हे पर दूध उफन कर नीचे बह गया था… जल भी गया था… वह रंगों में इतनी ज्यादा खोई थी कि उसे दूध जलने कि महक भी नहीं आई!सासू-माँ क्रोध से काँप रही थी… लगातार चीख रही थी… ‘‘कौन बुरे कर्म किये थे कि ई दिन देखे पड़त है… जब से ई घर माँ आई है … एक्को दिन हमार चैन से ना बीता…रोज कौनो न कौनो बर्बादी … अरे हमहूँ तो इत्ता बड़ा परिवार सँभाले रहे…कब्बो केहू हमरे काम पर उँगली नाही उठाया।’’ बड़बड़ाती हुई सासू माँ उसके कमरे के बाहर आकर रुक गई … फर्श पर रंग की शीशियाँ और ब्रश देखकर उनका गुस्सा सातवें आसमान पर चढ़ गया…कमरे के भीतर जाकर अपने पाँव से सारे रंग बिखेर दिए … पूरे कमरे में पानी और रंग बिखर गया… उससे भी उनका गुस्सा शांत नहीं हुआ बिस्तर और मेज पर चढ़कर दीवार से सारी पेंटिंग्स उतारकर फेंकने लगी…उसके कमरे के बाद बाकी दूसरे कमरों से भी उन्होंने पेंटिंग्स उतार कर नीचे फर्श पर पटक दी…इससे पहले कि सुनैना कुछ समझ पाती … सासू-माँ सबकुछ चकनाचूर कर चुकी थी…घर के सभी लोग उसे ही बुरा-भला कह रहे थे … सासू-माँ को दिलासा दे रहे थे…वह खुलकर रो भी नहीं सकी…कुछ देर बाद झाड़ू लेकर पूरे घर को साफ करने लगी … काँच के टुकड़े समेटते हुए उसे अम्मा बहुत याद आई…उसे बिखरे कांच के टुकड़ों के पीछे से झाँकती अम्मा की बनाईं रोती-बिलखती फोटो नजर आ रह थी…मानो कह रही हों कि तुमने अपनी अम्मा के मायके की यादों को मिटा दिया…आँसुओं से भरी आँख से भी स्मृतियों के साफ आसमान पर उसे अम्मा की शादी से पहले बनाई हुई फोटो साफ दिख रही थी!
रात का काम खत्म करके वो रसोई में ही बैठ गई…देर रात घर में सभी लोग सो चुके थे…पेंटिंग के साथ-साथ उसके भीतर बहुत कुछ टूट गया था…घुटनों में मुँह छिपाकर वो खूब रोई … विक्षिप्त, बदहवास …कोई उसे सँभालने वाला नहीं था… ना जाने कब तक अकेली रोती रही… अचानक उठकर अनाज के ड्रम में कुछ ढूँढ़ने लगी… अनाज के ड्रम से छोटी-छोटी पुड़िया निकालकर जल्दी से हाथ में उसकी गोलियाँ ले ली… कुछ देर गोलियों को देखकर कुछ सोचती रही उसके बाद सारी गोलियाँ झटके से मुँह में रख ली … आधा गिलास पानी पीकर सर दीवार से टिकाकार आँखें बंद करके बैठ गई…अचानक उसे अपनी अम्मा और नानी का ध्यान आया … अपने प्रति भी मोह जागा लेकिन शायद अब देर हो चुकी थी…एक कागज और कलम लेकर बैठ गई और अपनी अम्मा को चिट्ठी लिखने लगी…

अम्मा!

हम बहुत बुरे हैं अम्मा, हमने तुम्हारी सीसे मढ़ी हुई रुई की मछरी …खरगोश… सुग्गावाली कलाकृतियाँ अपने लिए उधेड़कर- बिखेर दीं थी, आज बहुत दुःख हो रहा है। अम्मा, लाल टिकुली से तुमने सुग्गे की आँख बनाईं थी, लाल रिबन से बना उसके गले का घेर कितना सुन्दर था, छोटी-छोटी रंग-बिरंगी मोतियों से उसके हरे पंखों को तुमने सजाया था! अम्मा! तुम्हारी मायके की यादों को नोच-नोचकर हमने नष्ट कर दिया, सिर्फ अपना स्वार्थ सोचती रही, रुई से बनी कलाकृतियों में तुम्हारी आत्मा बसती थी, अपनी कला को निखारने के लिए तुम्हारी बुनी हुई कला को मिटाती रही! तुमने उफ तक नहीं किया अम्मा! आधा तुम्हारा… आधा हमारा मिलकर भी कुछ पूरा नहीं बन सका अम्मा! जानती हो? जिस पेंटिंग के लिए हमने तुम्हारी सुन्दर फ्रेम में शीशे मढ़ी रुई से बनी पक्षियों, जल-जीवों को खंड-खंड बाँट दिया था और उस शीशे पर सुन्दर आयल पेंटिंग बनाई थी आज वो सारी पेंटिंग सासू माँ ने गुस्से में तोड़ दी! मेरा तो कुछ नहीं बचा अम्मा, सख्त संगमरमर की फर्श पर गिरते ही शीशे की पेंटिंग चूर-चूर हो गई। लेकिन हमको ध्यान है अम्मा, जब हम तुम्हारी बनाई फोटो में से शीशा अलग कर रहे थे तब सूत पर रुई से बनाईं कलाकृतियों को हमने फर्श पर लापरवाही से फेंका था और शीशे को अपने लिए सहेज लिया था, जो हमने फेंक दिया था वह टूटा-बिखरा नहीं था, जो सहेजा था आज वो सब चकनाचूर हो गया!
तुम तो हर चीज सँभालकर रखती थी न अम्मा? हमको उम्मीद है जो हमने फेंक दिया था वो तुमने सँभालकर रखा होगा! हम तो तुम्हारी बिगड़ी संतान पहले से ही थे, ब्याह के सात साल बाद भी कुछ नहीं सीख पाए, तभी तो आज हमको ये सजा मिली है, अम्मा! तुम नहीं जानती, उस पेंटिंग के साथ हम भी आज चूर-चूर हो गए, आज हम हार गए अम्मा…किसी भी इंसान की रुचियाँ, उसका हुनर शायद उसकी आत्मा होता है…हम अपनी काया के भीतर अपनी आत्मा को बचाये रखने के लिए संघर्ष करते रहे…लेकिन अंततः उसको बचा नहीं सके … अब काया को कब तक ढोएँ? तुम होती तो उदासी और हताशा में हमारा सर सँभाल लेतीं लेकिन बिखरे-बिखरे आज हम को होश नहीं कि हमने कितनी बार दीवार में अपना सर पटका है, बहुत दर्द हो रहा है अम्मा! तुम तो हमको समझाई थी कि जब भी दुखी होना … हमको चिट्ठी लिख देना, वही चिट्ठी लिख रहे हैं अम्मा! तुमसे और नानी से बहुत कुछ बतियाने का म…न्न्न् ,इसके बाद सुनैना की आँखों के सामने से अपने ही लिखे अक्षर धुँधलाने लगे…
अवचेतन में भी उसे नानीजी का स्नेहिल स्पर्श महसूस हो रहा था…रुँधे स्वर में अम्मा की पुकार मानो उसे रोक लेना चाहती थी ! नीला आसमान …हरे-भरे वृक्षों वाली सीनरी … तन्मयता से रंग भरी बिल्ली के जोड़ों वाली पेंटिंग्स…मास्टर जी की हौसला-आफजाई…चद्दरें … मेजपोश के रंग! उसे उम्मीदों के नए आसमान में ले जाना चाहते थे लेकिन चाहकर भी वो उन रंगों को ज्यादा देर तक देख नहीं सकी। धीरे-धीरे उसकी आँखों के आगे स्याह अँधेरा छाता जा रहा था। शून्य विराम की… एक अनंत यात्रा की शुरूआत थी ये…शायद…।

यौन शोषण के आरोपों से घिरी न्यायपालिका

अरविंद जैन

स्त्री पर यौन हिंसा और न्यायालयों एवम समाज की पुरुषवादी दृष्टि पर ऐडवोकेट अरविंद जैन ने मह्त्वपूर्ण काम किये हैं. उनकी किताब ‘औरत होने की सजा’ हिन्दी में स्त्रीवादी न्याय सिद्धांत की पहली और महत्वपूर्ण किताब है. संपर्क : 9810201120
bakeelsab@gmail.com

( पिछले दिनों मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश के ऊपर उसके अधीनस्थ न्यायालय की अतिरिक्त सेशन जज ने यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया . न्यायिक प्रक्रिया की इससे बड़ी विडम्बना और क्या हो सकती है ! इससे भी बड़ी विडम्बना यह थी कि जिस उच्चतम न्यायालय ने 10 से अधिक कर्मियों वाले कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न के खिलाफ ‘विशाखा समिति’ गठित करने के आदेश दिए थे वह खुद ही अपने यहाँ ऐसी समिति के प्रति अनिच्छुक रहा . ताजा घटना क्रम के बहाने एडवोकेट अरविन्द जैन न्यायपालिका के स्त्री विरोधी चरित्र की पड़ताल कर रहे हैं . )

इससे बड़ी न्यायिक विडम्बना और क्या होगी कि देश की सर्वोच्च अदालत ने (‘विशाखा’ बनाम राजस्थान राज्य, ए.आई.आर. 1997 सुप्रीम कोर्ट 3012 मामले में) ‘कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न’ रोकने के लिए, 13 अगस्त 1997 को जो एतिहासिक ‘दिशा-निर्देश’ जारी किये थे, उन्हें खुद अपनी अदालत में लागू करने में लगभग 17 साल लग गए. सरकार और कानून मंत्रालय भी विधेयक बनाने के बारे में 17 साल तक सोचते-विचारते रहे. आख़िरकार, 22 अप्रैल 2013 को कानून बन पाया. कारण एक नहीं, अनेक हो सकते हैं, पर इससे लिंग समानता और स्त्री रक्षा-सुरक्षा के सवाल पर, विधायिका और न्यायपालिका की गंभीरता का अनुमान तो लगाया ही जा सकता है.

पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायधीशों पर यौन शोषण के आरोप, वरिष्ठ अधिवक्ताओं पर यौन शोषण के आरोप , तहलका के संपादक तरुण तेजपाल पर अपनी एक सहकर्मी के साथ यौन शोषण, यौन उत्पीड़न के कारण इण्डिया टी.वी. की पत्रकार द्वारा आत्महत्या का प्रयास और आए दिन महिलाओं के साथ होने वाले यौन उत्पीडन,अत्याचार के दुखद हाद्सो के बावजूद  समाज, मीडिया और न्यायपालिका की रहस्यमय ख़ामोशी का मतलब क्या है? क्या यह सब होने-देखने के लिए ही औरतें अभिशप्त हैं?

न्यायपालिका में पारदर्शिता पर चल रही बहस के बीच में ही, एक और ‘दुर्घटना’ हमारा सामने है. मध्य प्रदेश उच्च-न्यायालय (ग्वालियर) के न्यायमूर्ती एस.के.गंगेले द्वारा यौन उत्पीड़न से परेशान महिला सत्र-न्यायाधीश का त्यागपत्र. राष्ट्रपति, कानूनमंत्री, सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और मध्य प्रदेश उच्च-न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को भेजी शियाकत पर, सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश आर.एम. लोढ़ा ने कहा है कि ”यह एकमात्र ऐसा पेशा है, जिसमें हम अपने सहयोगियों को भाई और बहन के रूप में देखते हैं। यह बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण घटना है. मेरे पास शिकायत आई है और मैं इस पर उचित कार्रवाई करूंगा.” कब और क्या कार्यवाही होगी, अभी कहना कठिन है.

न्यायमूर्ती एस.के.गंगेले ने सभी आरोपों का खंडन करते हुए कहा है कि “आरोप सिद्ध हों तो फाँसी पर लटका दें….किसी भी एजेंसी से जांच करवा लो….मैं निर्दोष हूँ.” हम सब जानते हैं कि आरोपों की जाच और सुनवाई के बिना तो कुछ होना नहीं है. भूतपूर्व अतिरिक्त महाधिवक्ता ने न्यायमूर्ति पर ‘महाभियोग’ चलाने की मांग की है. एक वकील और स्वयंसेवी का कहना है कि जज साहिबा चाहे तो पुलिस को शिकायत करे या मध्य प्रदेश उच्च-न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को. मतलब मामला मध्य प्रदेश का है. अन्य उत्साही वकील ने तो जनहित याचिका भी दायर कर दी.

मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के ग्वालियर बेंच के  एक न्यायाधीश पर अधीनस्थ कोर्ट की एक अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया

स्त्रीकाल पर अरविन्द जैन के दूसरे आलेख पढ़ने के लिए क्लिक करें :
( मर्दों के लिए घर आशियाना और औरतों के लिए जेलखाना है )
( दाम्पत्य में बलात्कार का लाइसेंस असंवैधानिक है )
( मनुवादी न्याय का शीर्षतंत्र )
( न्याय व्यवस्था में दहेज़ का नासूर )

आश्चर्यजनक है कि समाज के सर्वश्रेष्ठ और संदेह से परे तक सम्मानित माने-समझे जाने वाले क्षेत्रों (शिक्षा, चिकित्सा, न्यायपालिका, मीडिया आदि) से भी, महिलाओं के देह-दमन के अशोभनीय समाचार निरंतर बढ़ते जा रहे हैं. न्याय के प्रांगन से बचाओ…बचाओ की चीख-चिल्लाहट, अस्मत के बदले इंसाफ़ की दास्ताँ या किसी न्यायमूर्ति द्वारा नौकरी पाने-बचाने की ऐसी शर्मनाक शर्तें, सचमुच गंभीर चेतावनी है. न्याय और कानूनविदों के चाक-चौबंद किले में, ‘कुलद्रोहियों ’ का क्या काम? पुनर्विचार करना पड़ेगा कि न्यायधीशों की चुनाव प्रक्रिया में किस-किस खामी के कारण, अनैतिकता और बीमार मानसिकता भी चोरी छुपे प्रवेश कर रही है. चारों ओर से सवालों का घेरा, गहराता जा रहा है. न्याय की अंधी देवी के हाथों में, अवमानना के लिए सज़ा देने वाली तलवार को जंग लग चुका है या पीड़ित दंड के भय से मुक्त हो गया है?

दरअसल शिक्षित और स्वावलंबी स्त्रियों को दोहरी .  भूमिका निभानी पड़ रही है. आज़ादी के बाद शिक्षा-दीक्षा के कारण स्त्रियाँ बदली हैं..बदल रही हैं, परन्तु भारतीय पुरुष अपनी मानसिक बनावट-बुनावट बदलाने को तैयार नहीं है. एक तरफ पुरुषों के लिए यह सत्ता से भी अधिक, लिंग वर्चस्व की लड़ाई है. दूसरी ओर स्त्रियाँ अपने सम्मान और गरिमा पर हुए या होने वाले हमले का हर संभव विरोध करने लगी है. दमन और विरोध के इस दुश्चक्र में यौन शोषण, उत्पीड़न और हिंसा लगातार बढ़ रही है. समानता के संघर्ष में स्त्रियों का विरोध-प्रतिरोध या दबाव-तनाव बढ़ता है, तो कुछ उदारवादी-सुधारवादी ‘मेक-अप’ या ‘कॉस्मेटिक सर्जरी’ की तरह, नए विधि-विधान बना दिए जाते हैं और कुछ और सुधारों के सपने दिखा दिए जाते हैं. सच है कि सिर्फ कानूनी विधान-प्रावधान बना देने भर से, समस्या का समाधान नहीं होगा. विशाखा दिशा-निर्देशों की छाँव में ढले-पले अधिनियम में, अभी भी ढेरों अन्तर्विरोध और विसंगतियां मौजूद हैं. अधिनियम में ‘कानूनी गड्ढों’ और चोर रास्तों के रहते, स्त्री-विरोधी अपराधों पर लगाम लगा पाना मुश्किल होगा.

हमें नहीं भूलना चाहिए कि हक़ मांगने वाली आवाजों को चुप कराना या रख पाना अब  नामुमकिन है. शायद मीडिया को डरा-धमका कर झुकाया जा सकता हो, मगर सोशल मीडिया का गला घोंटना असंभव है. 1860 के न्याय-शास्त्रों और सिद्धांतों  से, इक्कीसवीं सदी के वर्तमान भारतीय समाज, विशेषकर स्त्री-समाज को नहीं चलाया जा सकता. बदलते समय-समाज में संविधान के मौलिक अधिकारों का अर्थ, स्त्री-पुरुष के लिए बराबर होना ही चाहिए.  ‘सार्वजानिक आस्था और विश्वास’ की, उच्च न्यायालय के हर न्यायमूर्ति से यह अपेक्षा रहती है कि वह  निष्ठा और नैतिक मानदंडों पर खरा उतरेगा. आम व्यक्ति की आखिरी उम्मीद हैं न्यायधीश. यह बहाना नहीं चलेगा कि समाज का नैतिक पतन हो रहा है और वो भी उसी समाज से आते हैं, सो आदर्श व्यवहार की आशा नहीं करनी चाहिए. न्यायधीश की निष्पक्षता और नैतिकता संदेह से परे होना लाज़िमी है. भारतीय समाज “न्यायधीश की बौद्धिक ईमानदारी और नैतिक चरित्र” को, “स्त्री के कौमार्य और पवित्रता” की तरह ही देखता-समझता है. स्वतंत्र और निष्पक्ष न्यायधीशों के बिना, प्रजातंत्र और कानून के राज्य की रक्षा कैसे होगी?

अगर संविधान के रक्षकों पर ही, स्त्री अस्मिता के भक्षक बनने के गंभीर आरोप (सही या गलत) लग रहे हैं, तो यह अपने आप में बेहद संगीन है. न्याय मंदिरों के ‘स्वर्ण कलश’ ही कलुषित होने लगे, तो फिर ‘लज्जा’ कहाँ फरियाद करेगी? समय रहते इस महामारी का समुचित समाधान ढूँढने और उसे कारगर रूप से लागू करने की मुख्य जिम्मेवारी, निस्संदेह न्यायिक परिवार के मुखिया की है. देश की “आधी आबादी” बड़ी उत्सुकता और बेचैनी से, निर्णायक फैसले और सम्पूर्ण न्याय की इंतज़ार में बाट जोह रही है. विश्वास करना होगा कि इस बार, इंसाफ़ होने में देर या अंधेर नहीं होगा.
( नवभारत टाइम्स  से साभार  )

प्रेमचंद का साहित्य और दलित स्त्री

( रानी कुमारी के द्वारा ‘प्रेमचंद का साहित्य और दलित स्त्री’ विषय पर आयोजित संगोष्ठी की रपट।  रानी दिल्ली वि वि में शोधरत  हैं.  )

“ प्रेमचंद पर बात करना मुश्किल हैं। कहाँ से शुरू करें! इस विषय पर एक खुली बहस होनी चाहिए। यह पहली बहस है जो इस मंच पर हो रही है। पिछले कुछ वर्षों से दलित  साहित्यकारों में कथाकार प्रेमचंद को लेकर विवाद है। यह विवाद सच में कोई मायने रखता है या केवल विवाद के लिए विवाद है। यह गौर करने वाली बात है प्रेमचंद और उनके साहित्य पर आज दलित साहित्य व साहित्यकारों द्वारा तीन प्रकार से चर्चा हो रही है, प्रेमचंद पर चर्चा करने वाली सबसे पहली धारा उन साहित्यकारों की हैं, जो दलित साहित्य में प्रेमचंद के योगदान को अमूल्य मानते हैं। दूसरी धारा में वे दलित साहित्यकार आते हैं, जो प्रेमचंद की वैचारिकी पर प्रश्न-चिन्ह लगाते हुए उन्हें एक तरफ पक्के ‘गांधीवादी’ और दूसरी तरफ कट्टर ‘अंबेडकर विरोधी’ घोषित करते हैं। इस धारा के साहित्यकार प्रेमचंद की कहानियों के कथ्य, भाषा और विचार पर  सवाल खड़े कर उन्हें दलित चेतना की दृष्टि से खारिज करते हुए ‘ब्राह्मणवादी’, हिंदुवादी और न जाने किस-किस पदवी से विभूषित करते हैं।  तीसरी तरह की विचारधारा दलित साहित्य में उन संकीर्ण जातिवादी दलित लेखकों की है, जो साहित्यकार प्रेमचंद के योगदान को पूर्वाग्रही नजरिये से अपने ही कुतर्कों, मनगढ़ंत, कुपाठ और गलत पाठ करते हुए उनकी जाति कायस्थ होने की कसौटी पर कसकर उनकी व उनके साहित्य की घोर जातिवादी आलोचना कर रहे है।‘

उक्त बातें अपेक्षा के सम्पादक डॉ. तेज़ सिंह की स्मृति में ‘प्रेमचंद का साहित्य और दलित स्त्री’ विषय पर ‘साहित्य सवांद’ के द्वारा आयोजित संगोष्ठी में ‘साहित्य संवाद’ की संस्थापिका और लेखिका तथा सामाजिक कार्यकर्ता अनिता भारती ने कही.

फोटो : संघपाली अरुणा लोकशक्ति

घर के ड्राईंग रूम से शुरु होकर डॉ. तेज सिंह की स्मृति में आयोजित ‘साहित्य संवाद’ की तृतीय संगोष्ठी गत शाम 28 जुलाई को गांधी शांति प्रतिष्ठान में सुगठित रूप से सम्पन्न हुई। हाल ही में स्थापित ‘साहित्य संवाद’ की यात्रा का विकास दिनोंदिन बढ़ रहा है। यह इसके लिए बहुत ही उत्साह की बात है। विकास यात्रा की कड़ी में “प्रेमचंद का साहित्य और दलित स्त्री” विषय पर आयोजित इस संगोष्ठी की अध्यक्षता रमणिका गुप्ता ने की तथा मुख्य वक्ता के रुप में सुमित्रा मेहरोल, वैभव सिंह, रजनी दिसोदिया, कवितेंद्र इंदु, गंगासहाय मीणा, प्रियंका सोनकर उपस्थित रहें। टिप्पणीकार के रूप में बहुत ही संक्षेप में विषय पर अपनी बात बजरंग बिहारी तिवारी और टेकचंद ने प्रस्तुत की। इस सारगर्भित संगोष्ठी के महत्वपूर्ण विषय से परिचय अनिता भारती ने करवाया। उसका सुनियोजित और सफल संचालन धर्मवीर सिंह ने. वहीं सभी अतिथियों का धन्यवाद ज्ञापन जे.एन.यू शोधछात्रा आरती रानी प्रजापति ने कर इस संगोष्ठी का समापन किया।

दलित साहित्यकार अनिता भारती ने इस विषय की गंभीरता, उस पर विमर्श की आवश्यकता और उस पर विवाद आदि इन बिंदुओं पर बात करते हुए प्रेमचंद को बिना किसी पूर्वाग्रह से ग्रसित एक सजग लेखक के रूप में समझने की बात कही। उन्होंने सवाल उठाया कि हमें उन पर आरोप लगाने से पहले यह सोचना चाहिए कि क्या प्रेमचंद स्त्री को स्त्रीत्व के सभी गुणों के साथ चित्रित करना चाहते थे और क्या वह ऐसा कर पाये हैं? उन्होंने कहा कि दलित साहित्य का अर्थ केवल प्रतिकार करना भर नहीं है। सुमित्रा मेहरोल कहा कि प्राय: दलित स्त्रियाँ जाति और पितृसत्ता से पीड़ित दिखाई देती है। उन्होंने कहा कि प्रेमचंद के यहाँ दलित स्त्रियों केवल डर, हीनता ही नहीं मिलती बल्कि उनमें निर्भीकता भी देखी जा सकती है। वैभव सिंह ने कहा कि प्रेमचंद के विश्लेषण का अर्थ है कि उनके समय का विश्लेषण। सेवासदन में उनकी जो संवेदना सवर्ण स्त्रियों के प्रति दिखाई देती है वह आगे चलकर दलित स्त्रियों के प्रति भी देखी जा सकती है। रजनी दिसोदिया ने कहा कि प्रेमचंद और हिंदी दलित आलोचना एक चलता सिक्का है जिसे हर कोई चलाता आ रहा है। हिंदी आलोचना की एक बनी बनाई पद्धति से किसी भी निष्कर्ष पर तुरंत पहुँचकर उसे सिद्ध सत्य मान लेना गलत है। उन्होंने ‘कफन’ कहानी में बुधिया के प्रसव के दौरान बेखबर और अनुपस्थित स्त्री समाज की मानवीयता पर सवाल उठाया। कवितेंद्र इंदु ने कहा क्या दलित स्त्रियों का सवाल स्त्रियों के सवाल से हटकर हैं? दलित स्त्रीवाद और प्रेमचंद में जरुर कुछ सामान है तभी दलित स्त्री पर यहां बात की जा रही है। जे.एन.यू से डॉ. गंगा सहाय मीणा ने प्रेमचंद साहित्य में एक दो स्थान पर मामूली रूप से चित्रित आदिवासी समाज के मुख्य या कहें तो गंभीर समस्या के रूप में चित्रण से नादारद पर गहरी चिंता जताई। उन्होंने बताया कि प्रेमचंद के समय में भी व्यापक स्तर पर कई आदिवासी आंदोलन चल रहे थे, जिनका कहीं कोई चित्रण प्रेमचंद की लेखनी नहीं कर पायी। जे.एन.यू. शोधछात्रा प्रियंका सोनकर ने कहा कि प्रेमचन्द को केवल दलित विरोधी मानना ठीक नहीं है। उन्होंने कहा प्रेमचंद के पूरे साहित्य में शोषितों वंचितों के प्रति संवेदनाएं ही चित्रित की हैं, जो उन्हें दलितों के पक्ष में भी खड़ा करती हैं।

फोटो : संघपाली अरुणा लोकशक्ति

वरिष्ठ आलोचक तथा संगोष्ठी की अध्यक्षा रमणिका गुप्ता प्रेमचंद को इस मामले में गलत नहीं ठहराती हैं उनके अनुसार कोई भी सजग से सजग लेखक समाज के सभी मुद्दों पर बात करें यह कोई जरुरी नहीं। ऐसे नियम लेकर आप किसी भी साहित्यकार का मूल्यांकन नहीं कर सकते। कहानीकार टेकचंद ने प्रेमचंद को अपने समय के आईने में ना देखने के बजाय उनके समय के आईने में देखने पर जोर दिया। वरिष्ठ दलित आलोचक बजरंग बिहारी तिवारी ने कहा कि इस संगोष्ठी में उठे गंभीर मुद्दे और निकले परिणामों को देखते हुए इस विषय पर किसी पत्रिका का विशेषांक जरुर आना चाहिए ताकि इससे जुड़े सभी बिंदु एक जगह देखे जा सके। उनके हिसाब से यह विषय एक केवल संगोष्ठी में संपूर्णता नहीं पा सकता यह इसकी शुरुआत हो सकती है अंत नहीं। इस तरह गंभीर और व्यापक विमर्श की मांग करती हुई यह संगोष्ठी सावन की हल्की-फुल्की रिमझिम की सौंधी महक के साथ समाप्त हुई।

नीला आसमान: पहली किश्त

शोभा मिश्रा


साहित्यिक -सामाजिक संगठन फर्गुदिया की संस्थापक ‘संचालक शोभा मिश्रा कवितायेँ और कहानियां लिखती हैं. ये सक्रिय ब्लॉगर के रूप में सम्मानित हैं और दिल्ली में रहती हैं. संपर्क : shobhamishra789@gmail.com

( शोभा मिश्रा की लम्बी कहानी दो किश्तों में )

अपने होने की अनुभूति से अनभिज्ञ जब उसने अपनी कोमल गुलाबी पंखुड़ियों सी पलकें हलके से ऊपर उठाईं तो नारंगी क्षितिज को मंत्रमुग्ध-सी निहारती रही, स्वर्ण सी दमकती बादलों की मुलायम रुई की मंडलियाँ एक दूसरे से गुँथी हुई बहुत नजदीक उसके गालों को अपने स्पर्श से गुदगुदा रही थीं।नन्हे पाँव के नीचे गीली रेत की गुदगुदी उसके हृदय और रोम रोम को उमंगों से भर रही थी, ठंडी नदी की धीमी लहरें बार-बार पाँवों में पायलों का आकार दे रही थी, ठंडी बूँदों की रुन-झुन कानों से होती हुई मस्तिष्क की शिराओं को विषाद से मुक्त कर ब्रह्मांण विचरण का आभास दे रही थी। देवदार के वृक्षों से ढँकी विशाल पर्वत श्रृंखला को वो अपनी नन्ही बाहों में समेट लेना चाहती थी। इन्द्रधनुष के सभी रंगों से सजी क्यारियाँ, फूलों की पंखुड़ियों पर इतराती तितलियाँ उसकी आँखों में सभी रंग भर दे रहीं थी।तभी अचानक पाँवों के नीचे की गीली नरम रेत पथरीली होती गई, पाँव में पायलें बनती ठंडी लहरें सख्त बेड़ियाँ बनती गईं।अपने रंगों, ख्यालों, उमंगों के आसमान में विचरती उन्मुक्त चिरैया सी वो लगातार उड़ती रहती… मोर के सतरंगी, इन्द्रधनुषी पंखों के रंगों से कभी नदी, झरने, पहाड़वाली सीनरी बना देती तो कभी फूलों पर रंग-बिरंगी तितलियाँ…लेकिन रूढ़िवादी परम्पराओं की सुनहरी कैद से वो अक्सर सहम जाती… समय से पहले पंखों के आने से पहले उसके लिए एक अलग पिंजरा तैयार करने की बातें की जाने लगी।

कुछ ही दिनों बाद उसकी बुआ की शादी थी। पूरा घर मेहमानों और रिश्तेदारों से भरा हुआ था। कुछ रिश्तेदार छोटी छोटी मंडली बनाकर बैठे थे, हँसी-मजाक कर रहे थे, कुछ नीचे बिछे गद्दे पर आराम फरमा रहे थे। हँसी मजाक और काम की बातों के साथ पूरे घर में हलके शोर के साथ मेले जैसा माहौल था।सुनैना स्कूल से लौटी। बैठक के बाद चाची के कमरे से गुजरते हुए रसोई की तरफ बढ़ गई। रसोई में अम्मा और चाची सबको खाना परोसने में लगीं थी, दादी…बुआ…अम्मा…चाची…दीदी मिलकर एक और ब्याह रचाने के लिए पंचायत बैठाये हुए थीं। दादी खाना खा रही थीं। सुन्दर सी बुआ के सर पर खूब तेल चुपड़ा हुआ था। शरीर और कपड़ों पर हल्दी का पीलापन साफ दिख रहा था, बुआ भी कोने में बैठी खाना खा रही थीं, मौसी खाना खाने के लिए अपनी बारी के इंतजार में थीं।

वह स्कूल का बस्ता पीठ पर लादे रसोई के दरवाजे पर खड़ी हो गई, उसे देखकर अम्मा और चाचीजी एक दूसरे की तरफ देखते हुए सहमकर चुप हो गईं। चाची और अम्मा जानती थी कि वह अपने ब्याह की बात सुनकर नाराज होती है, उसकी आँखें किसी को ढूँढ़ रही थीं, जैसे ही उसे गुडुआ नजर आया उसने उससे पूछ ही लिया…
‘‘ए गुड्डू … नानीजी कहाँ हैं रे? वो खाना खाईं की नहीं?’’
गुडुआ अपने में मस्त था। ‘‘हमको का पता… होंगी यहीं कहीं’’, कहकर बाहर भाग गया।
‘‘होंगी कहाँ…बैठी होंगी कहीं कोने में छिपकर… सुहागिनों के साथ बैठेंगी तो उनके सुहाग न उजड़ जाएंगे …वो तो हमारी अम्मा का मन था इसलिए नानीजी को शादी पर बुलवा लीं…नहीं तो बिटिया के घर बैठकर खाने में पुरानी सोच की हमारी दादी कम हंगामा नहीं करतीं…नानी और अम्मा को जीने नहीं देती दादी’’ वो भुनभुनाती हुई स्टोररूम की तरफ बढ़ गई …

नानी स्टोररूम में ही थीं, अम्मा का बक्सा ठीक कर रही थीं, वह नानी को देखकर चहककर बोली… नानी!!
नानी ने आँख उठाकर एक बार उसे देखा और मुस्कुराते हुए सर का आँचल ठीक करते हुए बोली ‘‘जा बाबू… पहले हाथ-मुँह धोलो… कुछ खा लो… फिर आराम से बैठकर बतियाएँ।’’

वह मुस्कुराती हुई रसोईघर की ओर बढ़ गई, हाथ-मुँह धोकर पाटे पर बैठ गई। अम्मा और चाची से दुलराते हुए खाना माँगने लगी, चाची उसको पुचकारते हुए बड़े प्यार से बोलीं, ‘‘बिटिया… बस अम्मा (दादी) को खिलाकर तुमको और तुम्हारी मौसी को एक साथ खाना परोस देंगे।’’ वह चाची की बात पर मुस्करा भर दी, अम्मा को तिरछी निगाह से देखती रही…उसे बार-बार अपने ब्याह की बात पसंद नहीं थी…नानीजी अम्मा को कितनी बार समझा चुकी हैं कि इसके ब्याह के लिए अभी लड़का देखना बंद करो…इसको पढ़ने दो…अभी तो ग्यारहवीं ही कर रही है लेकिन अम्मा तो मान जाएँ…दादी को कौन समझाएगा।चाचीजी दादी को पंखा झलते हुए अपना राग अलापे हुए थीं, ‘‘बस्ती वाला लड़का कम पढ़ा-लिखा जरूर है लेकिन उन सबके पास गाँव में खेती और बाग-बगीचा बहुत है…लड़के का बैंकाक में बढ़िया बिजनेस है…हर छः महीने में जब गाँव आता है तो मोटी-मोटी नोटों की गड्डी अपनी महतारी को पकड़ता है…ब्याह के बाद सबकुछ हमारी बिटिया का ही तो होगा।’’
दादी लोटे से पानी पीकर बोली, ‘‘उ तो सब ठीक है लेकिन बिटिया को परदेस भेजना ठीक नहीं…अपने देश में कहीं भी रहें…कम से कम दुःख-सुख…तीज-त्यौहार में हम सब मिल तो लेंगे।’’

मौसी की निगाह में उसके लायक एक लड़का था, वो उसका बखान करने में लगीं थीं, ‘‘लड़का पढ़ने में बहुत होशियार है…कहीं न कहीं उसकी सरकारी नौकरी जरूर लग जाएगी…परिवार बहुत आधुनिक विचारधारा का है…सास बहुत मॉडर्न है… बिटिया खुश रहेगी…और सबसे बड़ी बात ये है कि बिटिया हमारे पड़ोस में रहेगी… हमारी आँखांें के सामने…और इसके पास रहने पर हमको भी आराम हो जाएगा… बीमारी-हजारी में कितनी तकलीफ होती है…अकेले घर का सारा काम करना पड़ता है…ये बिना टिफिन के ड्यूटी चले जाते हैं…कई बार बच्चों को भूखा सोना पड़ता है।’’ कहते-कहते मौसी का गला भर्रा गया…आँख से आँसू टपकने लगे…वैसे बात-बात पर रोना मौसीजी की बचपन की आदत है …नानी ने उसे एक बार बताया था।उसको बहुत भूख लगी थी ऊपर से अपने ब्याह की बात सुनकर और खाक हुई जा रही थी…लगातार चुभती हुई नजर से अपनी अम्मा को देख रही थी …अम्मा किसी को बोलने से रोक नहीं पा रही थीं और कहीं उसके सब्र का बाँध टूट न जाये … वह कोई हंगामा खड़ा न कर दे इस बात से भी डर रही थीं।

उसे मौसी की नौटंकी पर बहुत गुस्सा आ रहा था …अपने गुस्से पर भरसक काबू करते हुए मुस्कराती हुई मौसी से बोली, ‘‘काहे मौसी…जब बड़का पैदा हुआ था तब तो बुलाने पर हम आये नहीं थे का? पूरे सवा महीने तुम्हरे पास रहकर हम घर का काम सँभाले थे और एक बार तुम्हारे पैर में फ्रैक्चर हुआ था तब रिंकी (उसके मामा की लड़की) ने पूरे एक महीने तुम्हरी देखभाल की थी…जरूरत पड़ने पर कोई न कोई जाता ही है तुम्हरे पास…अपनी परेशानी का बहाना लेकर क्यों हमारी बलि चढ़ाने पर लगी हो?’’

मौसी ने फिर रोना शुरू किया और बिलखते हुए कहने लगी, ‘‘अरे हमारी किस्मत में बिटिया का सुख नहीं है… तुमको गोदी में खिलाये हैं … हमने तुमको अपनी बिटिया से कम नहीं समझा है कभी…पड़ोस में रहोगी तो वोे कमी भी पूरी हो जाएगी।’’

अब तक खाने की थाली उसके सामने आ चुकी थी, गुडुआ भी बाहर से मटरगस्ती करके आ गया था…दादी के बगल में बैठकर सारी बातें सुन रहा था…मौसी की खिल्ली उड़ाते हुए बोला, ‘‘काहे मौसी! पूरी दुनिया के लड़के तुम अपने अंचरा में बाँधे फिरती हो का …? दूसरे शहर में रहते हुए हमरे मोहल्ले की खबर थी तुमका, एक साल पहिले भी तुम दीदी के लिए हमरे मोहल्ले का लड़का देखी थी…बाद में ताऊ को उ लड़का पसंद नहीं आया…ब्याह के लिए लड़के वालन का मना कर दिया गया …ओ के बाद भी उ लड़का दीदी जब स्कूल जाती थी तो ओका पीछा करत रहे…उ तो पापा एक बार ओका कनपटीयाये तब जाके कहीं उ दीदी का पीछा करना छोड़ा, ओ के नाते दीदी स्कूल जाये से डरत रही।’’

बारह साल का गुडुआ चाची का इकलौता बेटा होने से उसको सभी का बहुत प्यार मिलता था …इसलिए थोड़ा बिगड़ा हुआ भी था…घरेलू परपंच में उसे बहुत मजा आता था… वैसे तो उसकी और गुडुआ की खूब बनती थी लेकिन जब उसे कोई डांटता था तब गुडुआ के कलेजे को बहुत ठंडक मिलती थी।बुआ ने उसकी बात सुनकर एक बार जोर से उसे डांट लगाई, ‘‘चुप हो जा गुडुआ…बड़न के बीच में तेरे बोलने का क्या मतलब?’’ गुडुआ बुआ की बात सुनकर चुप हो गया।

सुनैना सबकी बकवास और ज्यादा देर तक नहीं सुन सकती थी …थाली जल्दी से अपने आगे खींचकर कटोरी की पूरी दाल चावल के ऊपर उड़ेलते हुए अम्मा से मिर्चे का अचार माँगने लगी…वो  जल्दी से खाना खत्म करके नानी के पास जाकर आराम करना चाहती थी…अम्मा अचार के साथ देसी घी का डब्बा भी लिए आईं …झट उसने अम्मा के हाथ से अचार ले लिया और घी के लिए मना कर दिया…अम्मा ने एक बार थोड़ा सा घी चावल दाल में डालने की जिरह की लेकिन उसने फिर मना कर दिया।कोने में बैठी बुआ को नाऊन उबटन लगा रही थी, उसके कान चाची और मौसी की बात सुनने में लगे थे।

दादी को सुनाई कम पड़ता था…वे लगातार बोले जा रही थीं ‘‘बढ़उ (दादाजी) के दिमाग का कौनो ठिकाना नहीं है…सुनरी बहुत पढ़ाकू बनत रहीं…बी. ए करे का चक्कर में उम्र हो गई और बढ़उ जल्दीबाजी में ठेठ देहाती से ओकर बियाह कर दिए…अब दिन-रात चूल्हा फूँकती हैं और कंडा पाथतीं हैं…अबहीं बियाहे के साल भर नाही हुआ… पेट फुलाये घूम रही हैं…पढ़ाई-लिखाई सब धरा रही गया…घर बैठे पड़ोस में बढ़िया परिवार मिल रहा है…जल्दी देख सुनकर बियाह कर दो सब।’’लगभग पैंसठ साल की दादी अपनी उम्र से दस साल ज्यादा बड़ी दिखतीं थीं, पापा और चाचा दादी के जने हैं…सुनरी और बुआ दादा के दूसरी पत्नी की बेटियाँ हैं…दूसरी दादी बहुत खूबसूरत थीं …उनके पिता पंडिताई करके घर का खर्च चलाते थे…बहुत गरीब थे …दादा बिना दहेज लिए अपने से आधी उम्र की दूसरी दादी को ब्याह लाये थे…दूसरी दादी गाँव में एक बार हैण्डपंप से पानी भर रहीं थीं…पाँव फिसल गया …सर में गहरी चोट आने की वजह से छोटी उम्र में ही चल बसी थी…बाद में बड़ी दादी ने ही दोनों बेटियों सुनरी और बुआ का पालन-पोषण किया।दादी मौसी से सहमत थी…दादी की जहर उगलती बातें सुनकर उसकी भूख वैसे ही मर गई थी …उसने अभी दो चार निवाले ही मुँह में डाले थे…वो अपने गुस्से को रोक नहीं पा रही थी…एक बार दादी की तरफ देखकर गुस्से से बोली, ‘‘लड़का इतना अच्छा है तो तुम ही काहे नहीं बियाह कर ले रही हो दादी?’’

दादी को सुनाई कम पड़ता था लेकिन उसके बोलने के ढंग और हाव-भाव से तुरंत समझ गई कि वो उन्हें ही कुछ व्यंग्य कर रही है…गुडुआ समझ गया कि दादी को कुछ सुनाई नहीं दिया …उसे तो मौका चाहिए था कि किसी तरह उसे डांट पड़े…गुडुआ दादी के कान के पास जाकर बोला, ‘‘दादी … दीदी कह रही है कि लड़का इतना अच्छा है तो तुम ही काहे नहीं बियाह कर लेती?’’कहकर गुडुआ गलहत्थी लगाकर मासूम बनकर उकडू बैठ गया और दादी गुस्से में जोर-जोर से चिल्लाने लगी, ‘‘अरे दुल्हिन… बिगाड़ो…खूब बिगाड़ो बिटिया का…जहाँ जहियें खूब नाम रोशन करिहें खानदान का…ई सब तुम्हरी अम्मा (नानीजी) का किया धरा है…रात-दिन उ स्टोर में अंचरा में छुपाये केई का जाने कौन पाठ पढ़ावा करती हैं…कुछ उँच-नीच होई ता उनका कछु न जाई…नाम डूबी हमरे बिटवा का… हमरे खानदान का…तुम और तुम्हरी महतारी मिलके सब इज्जत डुबाये दो…न जाने कौन संस्कार दे रही हो…जब नाक कटी तब पता लागी …तुम गोरी चमड़ी लेके घूँघट में रहत हो… अपने से ज्यादा गोरी चमड़ी वाली जनम के खुल्ला छोड़ दिए हो।’’

दादी एक सुर में जहर उगले जा रहीं थीं...अम्मा चुप थी…नाऊन बुआ को उबटन लगाना छोड़कर धीमी आवाज में दादी का पक्ष लेते हुए उसे ही उपदेश दे रही थी…‘‘ना बिटिया… दादी का कोई अईस कहत है… बिटियन के शादी-बियाह समय रहिते हो जाए तो तसल्ली होए जात है… बढ़िया परिवार मिली रहा है… पढ़ा-लिखा लरिका है… कौनो बुराई नाही है बियाह करे में।’’ इस बार वह अपने गुस्से को रोक नहीं पाई…उसका खाना अभी पूरा खत्म नहीं हुआ था …वह जोर से चीखकर बोली, ‘‘अम्मा और नानी को काहे कोस रही हो दादी… अंश तो तुम्हारे दुलारे बेटवा की ही हूँ…जब वो अम्मा को पीटते हैं…गन्दी-गन्दी गाली देते हैं…तब तुम्हरी जुबान को लकवा मार जाता है का …? तब तो खूब मजे लेकर सुनती हो…हमने ऐसा क्या कह दिया … काहे तुम सब अभी से हमरे बियाह के पीछे पड़ी हो…? अपने काम से काम काहे नहीं रखती?’’
गुडुआ सुनैना का गुस्सा और घर झगड़ा होते देखकर कुछ डर जरूर गया लेकिन उसको डाँट सुनवाने के उसके मनसूबे कम नहीं हुए थे…वह दादी की तरफ एक बार फिर बढ़ा…उसका कहा उनके कान में दोहराने के लिए…इस बार बुआ जल्दी से आगे बढ़ी और दो चाँटे लगाकर गुडुआ को बाहर का रास्ता दिखा दिया…बाहर जाकर गुडुआ रो रहा था।

इस बार दादी उसकी सारी बातें सुन चुकी थीं क्योंकि  उसने गुस्से में लगभग चीखते हुए ये बातें कही थी …अब दादी तेज आवाज में उसे गन्दी गालियाँ दे रही थी…अभी उसकी थाली में आधा खाना वैसे ही बचा हुआ था…वो झटके से थाली अम्मा की ओर सरकाकर खड़ी हो गई…दादी की जली कटी सुनते हुए उन्हें लगातार घूर रही थी…उसने अपनी मुट्ठियाँ कसकर भींच रखी थी और गहरी-गहरी साँसें ले रही थी…उसका चेहरा गुस्से से लाल हो गया था…वह भरसक प्रयास कर रही थी कि सबके सामने न रोये। वहाँ सभी उसके अपने थे लेकिन किसी के भी सामने रोना वह अपना अपमान समझती थी।अम्मा दादी को कुछ नहीं कह सकती थीं…वो सुनैना को समझाने आगे बढ़ीं लेकिन अम्मा को अपनी तरफ बढ़ता देख वो पाटे को जोर से लात मारकर भागती हुई स्टोररूम की तरफ बढ़ गई…

2
अप्रैल की दोपहर में कुछ रिश्तेदार फर्श पर चटाई और चद्दर बिछाकर सो रहे थे कुछ रसोईघर का शोर सुनकर उसी तरफ उत्सुकता से देख रहे थे…वह सोये हुए रिश्तेदारों को बचाकर उन्हें फांदती हुई आगे बढ़ी जा रही थी…गाँव से आये कुछ रिश्तेदार शिकायती लहजे में उसे ही घूर रहे थे… उसका मन हो रहा था कि उन्हें कुछ बढ़िया सुना दे…कोई तमाशा तो हो नहीं रहा था जो कान लगाकर सुन रहे थे और अब टकटकी लगाये देख रहे हैं।स्टोररूम के पास पहुची तो देखा नानी जी कुछ बदहवास सी उसकी तरफ ही भागी आ रही हैं…उन्होंने पाटा दीवार से टकराने की आवाज सुन ली थी…शायद दादी और उसका शोर भी…नानी को देखकर वो कुछ देर के लिए ठिठक गई…वो उनसे लिपटकर खूब रो लेना चाहती थी…मन का सारा गुबार निकाल लेना चाहती थी लेकिन आँखों में आँसू भरकर क्षण भर को उन्हें ऐसे निहारती रही…मन और आँखों में भारी बादलों का गुबार छिपाए शिकायत करती रही…मजबूर नानी अपनी दुलारी नतनी के मन का दुःख खूब समझ रही थी…अपने भविष्य को केनवास पर उतारनेवाली लाडली को आज वो असहाय देख रही थी…उसके भविष्य के सारे रंग जैसे उसी के आँसुओं में धुले जा रहे थे!

वह याचक निगाहों से नानी को देखती आगे बढ़ गई और स्टोररूम में एक कोने में धम्म से बैठ गई…नानी उसके पास आकर उसके सर पर हाथ फेरने लगी…नानी का स्पर्श पाकर उनकी गोद में लुढ़क गई…उनकी सूती साड़ी मुँह में ठूसकर फूट-फूट कर रो पड़ी…सब्र का बाँध टूट गया था…आँसू सैलाब बनकर बह निकले थे…सर नानी की गोद में छुपाकर वो नन्ही बच्ची की तरह दोनों घुटने मोड़कर सीने और पेट से सटाकर अपने आप में दुबक गई।

‘‘ना रो हमार बाबू…ना रो हमार बाबू,’’ कहकर नानी उसका चेहरा ऊपर करके उसके आँसू पोछने का प्रयास करती रही…नानी की आँखें भी भर आईं थी…सुनैना की हिचकियों में उलझे आधे-अधूरे शब्द नानी समझ रही थी, ‘‘ये सब जब इकट्ठी होतीं हैं मेरे ब्याह की बात क्यों करती रहतीं हैं…बुआ की शादी है सब खुश हैं लेकिन हमारे सर पर फिर वही बोझ ब्याह का…अब तो मौसी और चाची को एकसाथ देखकर डर लगता है…दादी कितना बेइज्जती की तुम्हारी और अम्मा की … तुम रसोईघर में सबके साथ बैठकर खाना क्यों नहीं खाती?’’नानी खुद भी रोती रहीं और उसके आँसू पोछती रहीं …सर पर हाथ फेरते हुए बोली, ‘‘उनको बियाह की बात करे दो… आज ई कोई नई बात तो ना है…पिछले दो साल से तुम्हरे लिए सब लड़का देख रहे हैं…अबहीं तक कहाँ कोई तय हुआ? तुम बिलकुल चिंता ना करो।’’ उसका मन कुछ शांत हुआ…नानी ने उसे प्यार से अपनी गोद से उठाया और खुद खड़ी होने लगीं…नन्ही बच्ची की तरह वो नानी का हाथ पकड़कर बोली, ‘‘कहाँ जा रही हो नानी?’’

‘‘बैठो आराम से…अभी आ रही हूँ,’’ कहकर सर का पल्लू ठीक करती हुई नानी दबे कदमों से रसोई की ओर बढ़ गई…घर में अब बिलकुल शांति थी…बस कूलर और पंखों के चलने की आवाज सुनाई देर ही थी।
कुछ देर में नानी प्लेट में खाना और लोटे में पानी लेकर आईं…कंधे पर सीधे पल्ले का आँचल ठीक करती हुई बैठ गई…अपनी हथेली में थोड़ा पानी लेकर उसका चेहरा और आँख भिगो दिया और अपने आँचल से पोंछकर बोली, ‘‘उठो बाबू अब कुछ खा लो।’’थकान और उदासी से अब उसे नींद आ रही थी…वो उँ$घती हुई बोली, ‘‘नहीं नानी… हम खा लिए हैं … अब नहीं।’’

नानी उसको दुलारती हुई बोली, ‘‘नहीं…हमको मालूम है हमारे बाबू को बहुत भूख लगी है… बाबू हमारे हाथ से खाना खाएगी।’’ कहकर नानी प्लेट में दाल-चावल और मिर्चे का अचार अपने हाथ से मिलाने लगी और फिर एक कौर बनाकर अपने हाथों से उसे खाना खिलाने लगी…पहला कौर खाते ही वो कुछ शिकायत करती हुई बोली, ‘‘घी क्यों डाल दी?’’नानी दूसरा कौर उसके मुँह में डालकर मुस्कराती हुई बोली ‘‘हमार बाबू घी नहीं खाई ता दूसरे घरे जाके आपन काम कैसे करी?’’ वो थोड़ा नाराज होकर नानी से बोली ‘‘नानी…तुम भी?’’
नानी वैसे ही मुस्कराती हुई बोली ‘‘अरे नहीं बाबू हम तो मजाक कर रहे हैं…अभी तो तुमको बहुत पढ़ना है… सयानी, होशियार बिटिया बनना है…और तुम्हरी पेंटिंग और सीनरी एक एक करके खूब बिक रही है…उसकी एक दिन प्रदर्शनी भी लगेगी…हमरी बिटिया का खूब नाम होगा।’’

नानीकी बातें सुनकर वह खुश हो रही थी...उसका पेट भी अब भर चुका था…उसने नानी को अब और खिलने से मना करते हुए सोने के लिए कहा…प्लेट में अब दो चार कौर खाना ही बचा था…नानी उसको पुचकारते हुए बोली, ‘‘बस ई चार कौर अब खतम कर लो’’ कहते हुए नानी ने प्लेट में चार अलग अलग कौर बना दिए…उसने फिर भी मना किया की अब उसे नहीं खाना है, नानी प्लेट के चार कौर उसे दिखाते हुए बोली ‘‘देखो तो ये किसका किसका कौर है… एक तुम्हरी अम्मा का…एक चाचा का … एक अतवरिया का और एक’’। इससे पहले कि नानी आगे एक और नाम लेतीं वो मुस्कराती हुई बोली पड़ी ‘‘एक तुम्हारा।’’ नानी उसकी ओर कौर बढ़ाती हुई बोली … ‘‘नहीं …ये एक तुम्हरी प्यारी दादी का।’’ उसने थोड़ा नाराज होती हुई कौर खा लिया। नानी उसे समझाती रहीं, ‘‘देखो बाबू…दादी तुम्हरे हित के लिए ही कह रही हैं…वो तुमसे बहुत प्यार करती हैं…शादी की बात कर रही हैं तो करने दो … इतनी जल्दी कहाँ लड़का मिलनेवाला है!’’नानी उसे समझाती रही और उसे माथे पर स्नेह से हाथ फिराती रही…माथा सहलाते- सहलाते नानी ने उसकी दोनों गुथी हुई चोटियाँ खोल दीं और बालों में उगलियाँ फिराती रही… टेबल फैन की हवा और नानी की गोद की ठंडक पाकर वो गहरी नींद में सो गई…नानी भी बैठे-बैठे उसका सर गोद में लिये हुए एकतरफ बिस्तरों के ढेर पर लुढ़क गईं!

3.
आज उसकी बुआ की शादी थी…रात के आठ बजे दुल्हन बनी बुआ स्टोररूम में बैठी थी…बुआ की सखी-सहेलियाँ और मोहल्ले की कुछ औरतें उन्हें घेरे खड़ी थीं! इधर सुनैना की मौसी न जाने क्यों उसके आस-पास ही मंडरा रही थीं…आज मौसी ने उसे अपनी पीली साड़ी पहनाकर उसका हल्का शृंगार भी किया था…इकहरे बदन की छरहरी …गोरी सुनैना पीली सितारोंवाली साड़ी में लिपटी जब आईने के सामने खड़ी हुई तो कुछ देर के लिए अपने ही रूप पर मुग्ध हो गई…फ्रॉक और स्कूल की युनिफॉर्म में वो खुद को नन्ही बच्ची या विद्यार्थी ही समझती थी लेकिन आज वो खुद में आश्चर्यजनक बदलाव महसूस कर रही थी…कहीं न कहीं अपने आप में एक सम्पूर्ण स्त्री के कुछ लक्षण देख रही थी!आईने में खुद को निहारती हुई उसे नानी जी की कहानी ‘बेलवति-कन्या’ की सुन्दर नायिका की छवि याद आ गई…कहानी में उसकी नानी ने बेलवति-कन्या का जैसे रूप-वर्णन किया था वो अपने रूप में उसे देख रही थी! मौसी उसे देखकर बहुत खुश हो रही थी…बार-बार कभी उसकी साड़ी का आँचल ठीक करतीं कभी उसके चेहरे पर गिरते बालों को सँभालती…गर्मी की वजह से आये पसीने को पोंछती हुई उसे पंखे के सामने रहने की ही सलाह देतीं…तब किसी की आवाज सुनाई दी, ‘‘बारात आ गई!’’

घर के लगभग सभी पुरुष बाहर ही थे। कुछ महिलाएँ जल्दी से घर के दरवाजे के बाहर खड़ी हो गई कुछ बारात और दूल्हा देखने के लिए छत पर खड़ी हो गईं! सुनैना अपनी बुआ के पास ही बैठी रही। बारात आने के बहुत पहले से मौसी सुनैना को किसी न किसी बहाने बाहर ले जा रही थी और बाहर खड़ी होकर बेचैनी से उनकी आँखें किसी को ढूँढने लगती…एक बार फिर मौसी सुनैना को बाहर चलने के लिए कहने लगी तो उसने कहा, ‘‘मौसी! हमने दूल्हा पहले ही देखा हुआ है … अभी थोड़ी देर में फिर जयमाला में देखना ही है।’’ उसकी बात सुनकर मौसी सहमति में सर तो हिला दी लेकिन परेशान होकर कभी अन्दर तो कभी बाहर फिरती रहीं।
सुनैना कुछ देर के लिए रसोई में नानी के पास गई…ये जानते हुए भी कि नानी उसकी बात नहीं मानेंगी फिर भी उनसे एक बार बोली, ‘‘चलो न नानी … द्वार चार हो रहा है … एक बार से हरे में सजे-धजे दूल्हा को देख लो।’’ नानी उसकी बिंदी और हलके से हार को ठीक करते हुए बोली, ‘‘अभी नहीं बाबू … बाद में देख लूँगी।’’ उसे मालूम था …नानी यही जवाब देंगी लेकिन वो मजबूर थी …कुछ भी बदल नहीं सकती थी…रूढ़िवादी विचारधारा के शिकार लोगों के बीच उसे अपनी नानी दयनीय सी लग रही थी लेकिन आज हलके सुनहरे किनारी वाली आसमानी साड़ी में नानी उसे बहुत प्यारी लग रही थीं। हलकी झिझक में भी चेहरे पर गरिमा साफ झलक रही थी! एक असफल कोशिश नानी जी को बाहर ले जाने की करती हुई उनका हाथ थामे बैठी थी तभी मौसी भागी-भागी उत्साहित सी रसोई में दाखिल हुई और उसका हाथ पकड़कर ये कहती हुई बाहर ले गई कि ‘‘चलो … अब जयमाला होने वाली है।’’

बुआ को उनकी सखियाँ और मुहबोली बहन जयमाला के लिए लेकर जा रहीं थी। मौसी सबको धकियाती हुई सुनैना का हाथ पकड़े जयमाला के लिए जाती बुआ के पास ले गई और बुआ के बगल वाली एक लड़की को हटाकर सुनैना को उनके बगल में खड़ी कर…जिस लड़की को मौसी ने बुआ के बगल से हटाया वो आश्चर्यचकित सी उनसे पूछ ही बैठी, ‘‘क्या हुआ मौसी ऐसी क्या आफत आ गई जो भागदौड़ मचाये हो…तुम का इहो खयाल नाही की सामने बाराती खड़े हैं।’’ मौसी उस लड़की को लगभग फटकारती हुई बोली, ‘‘ओकी बुआ है…बगल माँ ओके साथ चले देयो!’’लड़की थोड़ा गुस्से से ठुनकती हुई पीछे दूसरी लड़कियों के साथ होली…सुनैना को ये सब बड़ा अजीब लग रहा था…एकांतप्रिय सुनैना शादी-ब्याह या किसी भी फंक्शन में खुद को असहज महसूस करती थी! जयमाला के लिए बने स्टेज तक पहुँचकर सुनैना ने एक नजर बाँके दूल्हे पर डाली उसके बाद पीछे हटने को हुई तभी मौसी ने पीछे से उसकी पीठ पर हाथ रखकर हलके से धकियाते हुए स्टेज पर जाने का इशारा किया…उसने आँखों ही आँखों में मौसी को लगभग घूरते हुए स्टेज पर जाने से मना किया लेकिन मौसी ने इस बार लगभग पूरे गुस्से उसे घूरते हुए आदेशात्मक संकेत में उसे स्टेज पर जाने के लिए कहा…इस बार सुनैना थोड़ा सहम गई और बुआ के साथ स्टेज की तरफ बढ़ गई…मौसी के चेहरे पर अब तसल्ली भरी एक मुस्कान थी!
जयमाला की रस्म में सुनैना ने महसूस किया कि कोई है जो लगातार उसे चोर नजरों से देख रहा है…दूल्हे के दोस्तों में मैरून रंग के पैजामे-कुर्ते में उसे अपना ही हमउम्र लगातार उसके आस-पास नजर आ रहा था। उसकी नजर मौसी की तरफ गई तो मौसी भी उसी मैरून रंग के वस्त्र वाले लड़के को देख रही थी और उसे सुनैना की तरफ दिखाकर कुछ इशारा कर रही थी…इस बार सुनैना ने भरपूर नजर से उस मैरून वस्त्रवाले लड़के को देखा!

लगभग पाँच फिट ग्यारह इंच का शालीन सा दिखनेवाला लड़का उसी की तरफ देख रहा था…दोनों की नजरें मिलीं…वह औचक सी उसे देख रही थी…कुछ-कुछ उसे बुआ की चाल का अंदाजा लग गया था…नजरें मिलते ही लड़का थोड़ा झिझका और जयमाला देखने की खुशी में शामिल हो गया। सुनैना को वहाँ खड़ा होना अब भारी लग रहा था…उसे ये बात समझ आ गई कि मौसी ने से यहाँ एक कठपुतली की तरह किसी के सामने पेश किया है!जैसे ही जयमाला की रस्म खत्म हुई सुनैना अपनी साड़ी सँभालती हुई लगभग भागती हुई घर की तरफ बढ़ गई…घर में घुसते ही नानी को ढूँढ़ती हुई रसोई की तरफ बढ़ गई…नानी वहीं थी …उसे देखते ही मुस्कराती हुई पूछने लगी कि ‘‘दूल्हा कैसा लग रहा था? जयमाला ठीक से हो गई।’’

सने हाँ में सर हिलाया और पास ही पड़ी मचिया पर धम्म से बैठ गई …अपनी चूड़ियाँ और दूसरे जेवर उतारकर अपनी गोद में रखती हुई बड़बड़ाने लगी, ‘‘मौसी का वही पुराना नाटक…हमको जयमाला दिखाने नहीं ले गई थी…किसी के सामने प्रदर्शनी बनाकर दिखाने ले गई थीं!’’नानी उसकी साड़ी में से पिन खोलने में उसकी मदद करती हुई उसे पुचकारती हुई पूछ बैठी ‘‘हुआ का … कछु कहो तो!’’

 इतने में मौसी भी रसोई में दाखिल हुई और उतावली हुई सुनैना के बाल ठीक करती हुई उससे पूछने लगी ‘‘ काहे सुनैना! मैरून शेरवानी वाले लड़के को देखी? हम इसी लड़के की बात कर रहे थे … तुम्हरे होए वाले फूफा के रिश्तेदारी मा है और हमरे पड़ोस मरहत है…दिखे में तो ठीक-ठाक है न बिटिया?’’वो कुछ भी नहीं बोली शादी में ही पहनने के लिए जो गुलाबी सलवार-कुर्ता सिलवाया गया था वो उठाकर गुसलखाने की तरफ बढ़ गई…पीछे से उसके कानों में मौसी और नानी की आवाजें आती रहीं…मौसी लड़के का बखान करने में लगी थी और नानी कह रही थी, ‘‘वैसे अब ही उसकी पढ़ाई पूरी नहीं हुई है…और जो भी हो … बिटिया के मन का जरूर ध्यान रखिहो!’’

मुँह-हाथ धोकर कपड़े बदलकर सुनैना छत पर चली गई...रंग-बिरंगी इलेक्ट्रॉनिक लड़ियों वाली झिलमिलाती झालरें उसके मन में आते अच्छे-बुरे और असमंजस भरे ख्यालों की तरह कभी ठहर जातीं थी कभी तरंगित लहरों की तरह दौड़ने लगती थी…सरकारी दोमंजिला मकान के बगल के नीम के पेड़ की डालियाँ उसके छत की रेलिंग पर झुकी हुई थी…हलके हवा के झोंके से उसे राहत मिल रही थी…नीचे शादी-ब्याह के भगदड़ जैसे माहौल से और शोर-शराबे से भी कुछ देर के लिए उसने निजात पा ली थी…घर के पीछे की तरफ छोटे से आँगन में बने मंडप में शादी की तैयारी में लगे लोग भाग-दौड़ कर रहे। वह किनारे खड़ी रेलिंग का सहारा लिए चुपचाप तैयारी देखती रही फिर टहलती हुई छत पर बिछी चारपाई पर निढाल सी लेट गई…आँखें बंद करते ही न जाने क्यों उसे जयमाला के स्टेजवाली आँखें अपनी ओर बहुत प्यार से देखती नजर आईं। वह हड़बड़ाकर उठ बैठी। उसे न जाने क्या हुआ उठकर घर की छत के आगे वाली रेलिंग का सहारा लेकर खड़ी हो गई और नीचे खाना खा रहे बारातियों में किसी को ढूँढने लगी। आखिर वह उसे नजर आ ही गया…नीम की एक बड़ी टहनी के घने गुच्छे के पीछे से छिपकर सुनैना उसी मैरून शेरवानी वाले लड़के को ध्यान से देखती रही …दोस्तों के साथ बैठा वह भी खाना खा रहा था …हँसी-मजाक के माहौल में जहाँ सभी लड़कों के हाव-भाव बहुत ही उन्मुक्त और आजाद थे वहीं वह उसे कुछ शर्मीला और शालीन लगा…दूसरे हम-उम्र लड़कों के हुड़दंगई वाले व्यवहार के आगे वो शांत… स्थिर सा कभी- कभी मुस्कराकर सभी की खुशी में शामिल हो जा रहा था! गेंहुआ रंग … हलकी मूँछंे और सलीके से कुछ-कुछ मिलिट्री स्टाईल में कटे बालों में वो  गँवई लड़कों से कुछ अलग लग रहा था!
नीम के झुरमुट में छिपी न जाने कितनी देर तक वह उसे निहारती रही…उसकी मुस्कराहट में वो अपने लिए आजादी का छोटा सा खुला आसमान देख रही थी…उसका बचपन कहीं पीछे छूटा जा रहा था…अभी तक जिन हथेलियों के बीच में मेहँदी का गोल ठप्पा और उँगलियों के पोरों को ढंकनेवाले डिजाईन की आदत थी उन्हीं हथेलियों में उसने प्रीत की बेल-बूटियों को सजता हुआ महसूस किया! कोई अनजाना अहसास उसके बचपन की उँगली पकड़कर अपने साथ ले जा रहा था और उमंग भरे यौवन को कंधों से पकड़कर उसके समक्ष खड़ा करने की कोशिश कर रहा था!

सुनैना न जाने कब तक उसे निहारती हुई उसी में खोई रही,…उसकी तंद्रा टूटी सीढ़ियों से आती चिर-परिचित कदमों की आहट सुनकर …रेलिंग से हटकर वह सीढ़ियों की तरफ बढ़ गई …उसे जिसका अंदाजा था वही थीं…नानीजी एक हाथ में ढँकी हुई थाली और एक हाथ में लोटे में पानी लेकर चली आ रही थीं…उसने बढ़कर नानी के हाथ से थाली और लोटा पकड़ते हुए कहा ‘‘नानी! खाना ऊपर काहे ले आई … हम नीचे आने ही वाले थे!’’‘‘नहीं …हमको मालूम है तुम सो जाती …! चलो आओ बैठो यहाँ … हम तुमको अपने हाथ से खाना खिलाएँगे!’’ सुनैना को खाना खिलाने के बाद नानी उसे पंखा झलने लगी। पंखा झलते-झलते उसका मन टटोलने के लिए पूछ बैठी, ‘‘बिटिया! आज तुम उस लड़के को देखी?’’ सब कुछ समझते हुए भी सुनैना अनजान बन गई, ‘‘किस लड़के को नानी?’’ नानी अपने सर का आँचल सही करते हुए उसे समझाते हुए बोली-‘‘देखो बिटिया! जईसे अब तक तुम्हरे घरे की बिटियन का बियाह होता आया है वई से तुम्हरे दादाजी तुम्हरा बियाह भी करी दिहें…तुम्हरी मौसी ने जो लड़का देखा है उ लड़का और परिवार तुम्हरे लिए हर लिहाज से बढ़िया है…पढ़े-लिखे लोग हैं…तुमको भी आगे पढ़वाए देंगे…अपने घरे की दूसरी बहिन न को देखो…कहाँ गाँव-देहात में ब्याह दी गई हैं … ई लड़का और परिवार को कम से कम बिट्टो (मौसी) अच्छी तरह जानती तो हैं … कहीं गाँव माँ ब्याहे से अच्छा है शहर को ई परिवार…तुम अपने दादा-दादी को ब्याह के लिए हाँ करी दो … देखो बाबू … एक बार तुमको अच्छा घर-ससुराल मिल जाए तो हमहूँ चैन की साँस ले!’’

वह नानी की आँखों में झाँकती हुई बोली, ‘‘आपको मौसी हमें समझाने के लिए भेजी हैं न?’’ नानी उसका माथा सहलाती हुई स्नेह से बोली, ‘‘मौसी और तुम्हरी अम्मा को तुम्हरी बहुत चिंता है बाबू।’’ वह नानी की गोद में करवट बदलकर लेट गई और उनका हाथ अपने हाथ में लेकर गहरी साँस लेते हुए बोली, ‘‘जैसा आप ठीक समझो नानी।’’ और आँखें बंद कर लीं! आँखों से निकली कुछ बूँदों में अपने मन में उभर आये गुलाबी रंग का कुछ अंश मिलाकर उसने अपने मन को प्रेम रूपी रंग का एक हल्का सा शेड दे दिया…

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मौसी को और क्या चाहिए था…सुनैना को लेकर वो बहुत खुश थी...नानी को कंधों से पकड़कर बोली, ‘‘देखना अम्मा …इस बार गोरखपुर जाते ही शुकुल परिवार में सुनैना का रिश्ता तय करवाने की पूरी कोशिश करेंगे…लड़के से तो जिक्र कर ही दिया है…घरवाले भी मान ही जायेंगे!’’सुनैना के विवाह को लेकर घर में जो माहौल था उससे तो ये तय ही था कि उसके लिए पिंजरा ढूँढ़ने की पूरी तैयारी हो गई है…उसने भी अनमने मन से ही सही घरवालों की खुशी में खुश होते हुए पिंजरे में कैद होने का मन बना ही लिया…कम से कम इस बार पिंजरा उसे भा तो रहा था!

बुआ विदा हो रहीं थी…उनकी सिसकियाँ रुक नहीं रही थी …दादी का भी मन डूबा जा रहा था! अपने होश में सुनैना अपने घर की ये पहली शादी ढंग से देख-समझ रही थी…गुडुआ और सुनैना बुआ से लिपटकर खूब रोये …बुआ के विदा होते ही घर में गहरा सन्नाटा पसर गया!दूसरे दिन नानी भी मामा के साथ सुनैना को ब्याह के लिए समझा-बुझाकर गाँव चली गईं…मौसी भी विवाह के लिए सुनैना की सहमति पाकर संतुष्ट होकर वापस अपने घर चली गई!

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बुआ की शादी को लगभग एक महीना बीत गया था। अब सुनैना जब भी उजले…गुलाबी, हल्के रंगों की चद्दरों पर फेब्रिक कलर से रंग भरती या सीनरी और गिलास पेंटिंग बनाती तो अम्मा उसके पास बैठकर प्यार से उसकी कला की खूब तारीफ करतीं और जो गिलास पेंटिंग, सीनरी और चद्दरें ज्यादा सुन्दर बन जाती थी तो उन्हें अलग करके सँभालकर रख देतीं! पूछने पर कहती कि ‘‘ई सब अपने ससुराल ले जाना!’’
पेंटिंग्स में अपनी बिल्लियों के जोड़ेवाली गिलास पेंटिंग्स देखकर सुनैना को कुछ महीने पहले की बातें याद आ गई!

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उस दिन अम्मा और बुआ को स्टोररूम में देखकर सुनैना बहुत खुश हुई…अम्मा का स्टोररूम में व्यस्त होना मतलब अम्मा ने बड़का बक्सा खोला होगा! अम्मा ने बक्से का सारा सामान निकालकर स्टोररूम के बाहर रखा था और बक्सा में वापस सलीके से सब सामान लगाने में जुटी थीं!लकड़ी के फ्रेम में मढ़ी मछली, वृक्ष के नीचे बाँसुरी बजाते कृष्णा, मटकी से मक्खन गिराते कृष्णा, तोता, खरगोश जैसी सुन्दर फोटो देखकर सुनैना की आँखें चमक उठीं …उसका मन चिड़ियों जैसा चहक उठा …अम्मा अपनी ब्याह की पियरी के साथ एक सूती साड़ी में बाँधकर वो सब फोटो वापस बक्से में रखने जा रही थीं!‘‘अम्मा! ई का है? तनिक हमको दिखाओ ना,’’ सुनैना उत्साहित होती हुई अम्मा का हाथ पकड़कर दुलराती हुई बोली, अम्मा सर का आँचल ठीक करते हुए बोलीं, ‘‘बिटिया! हमको बहुत काम है … ई सब जल्दी रखे दो।’’

‘‘नाही अम्मा, एक बार हमको देखे दो...बहुत सुन्दर फोटो दिख रही है…’’अम्मा सूती साड़ी में सँभालकर पकड़ी हुई सारी फोटो आहिस्ते से खटिया पर रखते हुए बोली ‘‘अच्छा लो …जल्दी देख लो बिटिया … तब तक हम दूसरा सामान बक्से माँ रख देते हैं।’’सुनैना खुश होकर एक-एक फोटो उठाकर निहारने लगी …लकड़ी के फ्रेम में सीसे मढ़ी कृष्णा की फोटो सुनैना मुग्ध होकर देखती रह गई …पीले सिल्क के कपड़े पर रुई से अम्मा ने कैसे बाँसुरी धरे कृष्णा और बालरूप में मटकी गिराकर माखन खाते कृष्णा बनाया है, सुनैना … अम्मा का हुनर देखकर हैरान थी …पेड़ की एक टहनी पर बैठा तोता अम्मा ने लाल रंग के कपड़े पर कढ़ाई करके बनाया था…रंग-बिरंगी मोतियाँ … लाल रिबन … सुनहरे गोटे… इन्द्रधनुषी रंगों की रेशमी धागों की कढ़ाई से बनी फोटो देखकर सुनैना चकित थी!‘‘अम्मा! ई सब तुमने कैसे बनाया और कब बनाया,’’ सुनैना ने उत्सुकता से अम्मा से प्रश्न किया!
‘‘बिटिया ई सबकुछ तो कपड़े पर काढ़ा गया है कुछ रुई को कपड़े पर रखकर सिलाई करके उसे मोतियों और रिबन से सजाया गया है …ई सारी फोटो शादी के पहिले की हैं’’
सब फोटो तो बहुत सुन्दर थीं और बनाने में अम्मा ने मेहनत भी खूब की होगी…सुनैना यही सब सोचती रही और उन फोटो को मढ़ने में जिन पारदर्शी शीशों का इस्तेमाल किया गया था उन्हें फोटो से अलग करके अपने ऑइल कलर से उन्हें नया रंगरूप देने के ख्वाब बुनती रही!‘‘अब लाओ बिटिया … बहुत काम बिखरा पड़ा है … ई फोटो रखे दो … बाद मा फिर कभी देख लिहो।’’ कहकर अम्मा ने फोटो और पियरी साड़ी एक सूती साड़ी में बाँधकर सँभालकर बक्से में रख दिया!…

स्त्री के विरूद्ध स्त्री कठघरे में ( !)

अनीता मिश्रा


अनीता मिश्रा स्त्री मुद्दों पर काफी सक्रिय रहती हैं . स्त्री के पक्ष में बेबाक टिप्पणियों के साथ सोशल मीडिया में इनकी उपस्थिति अत्यंत महत्वपूर्ण है. संपर्क: anitamisr@gmail.com

( हाल के दिनों में कुछ घटनाएँ ऐसी रहीं , जो काफी चौकाने वाले थीं. स्त्री अधिकारों के लिए प्रतिबद्ध लोगों पर अलग -अलग आरोप लगे और उनके बचाव के तर्क वैसे ही थे जैसे किसी स्त्रीविरोधी मर्द के अपने बचाव के  होते रहे हैं. यह सब स्त्री अधिकारों की लड़ाई को कम से कम तीन दशक पीछे ले जाने वाले तर्क थे . हिन्दी के घोषित वाम रुझान ( !) वाले एक आलोचक और बी एच यू के प्रोफ़ेसर द्वारा अपनी पत्नी की प्रताड़ना के बाद के तर्क भी इसी परम्परा के थे . इस सन्दर्भ में अनीता  मिश्रा का यह आलेख .)

पिछले  दिनों एक मुद्दा सोशल मीडिया पर काफी चर्चित रहा। यह मुद्दा था ,हिंदी के लेखक-आलोचक प्रोफ़ेसर कृष्ण मोहन द्वारा अपनी पत्नी के साथ पीटते-घसीटते हुए करके घर से निकालने का। जैसे ही इस घटना का वीडियो सामने आया, बुद्धिजीवियों के बीच काफी हलचल मच गई। कुछ ही देर में मुद्दा कबड्डी के खेल में बदल गया। किस पाले में कितने लोग हैं। तमाम तरह के तर्क-वितर्क, कुतर्क शुरू हो गए। वीडियो में जो दृश्य था, उसे देख कर कोई भी संवेदनशील व्यक्ति नहीं कहेगा कि प्रोफ़ेसर साहब ठीक कर रहे हैं। बुरी तरह से लात-घूंसे खाती एक रोती-कलपती स्त्री को देखकर कौन कहेगा कि ऐसा करना उचित है। लेकिन हैरानी और चौंकाने वाली बात है कि कुछ लेखकों ने इस बात पर न सिर्फ प्रोफ़ेसर साहब का अश्लील बचाव किया, बल्कि उनके कदम को उचित ठहराया, यह कह कर कि मामले को पूरा जाने बिना प्रोफ़ेसर कृष्मोहन की आलोचना गलत है।

जो भी मामले पिछले कुछ दिनों में सामने आए हैं उन सब पर गौर करें तो हिंदी के कुछ बुद्धिजीवियों और लेखकों के बीच की एक खास तरह की प्रवृत्ति सामने आई है कि वे सही गलत का फैसला घटना देख कर नहीं, अपने संबंधों के आधार पर करते हैं। हम फलां को इतने दिनों से जानते हैं, वे ऐसे हैं, वैसे हैं आदि-आदि उनके व्यक्तित्व के तमाम उदहारण गिना डालते हैं। कुछ समय पहले जब एक युवती के साथ रेप की घटना हुई थी, तब यही हुआ था। सबने अपने संबधों का हवाला देकर एकतरफा फैसला सुना दिया था। तब ज्यादातर लोगों के तर्क थे कि ऊपरी तौर पर लग रहा है कि लड़की ही दोषी है। इस मामले में कहा गया कि ऊपरी तौर पर मार खाती स्त्री को मत देखिये, मामला अंदर तक समझिए। वाह! अपनी सुविधा से एक मामले को ऊपर से देखिए, एक मामले को अंदर तक समझिए। दोनों हाल में स्त्री को कटघरे में खड़ा कर दीजिये और एकतरफा फैसला सुना दीजिये।

फिलहाल बात इस मामले की है जो लोग प्रोफ़ेसर साहेब के बचाव में तमाम तर्क गढ़ रहें हैं। उनका कहना है कि वह जबरन घर में घुस रही थी; वह काफी झगड़ालू स्त्री है; उनके बीच तनाव था और कि यह उनका निजी मामला है, सबको अपनी राय नहीं देनी चाहिए। पहली बात जब बात घर से सड़क पर आ गई और नेशनल चैनल पर दिखाई जा चुकी तो मामला निजी कहां रहा। दूसरे कि अगर दो पक्षों में किसी एक को अपनी पीड़ा किसी और से कहने की जरूरत पड़ी तो यह सिर्फ दो पक्षों के बीच का मामला कैसे रहा। इसके अलावा, अगर वह स्त्री दुनिया की सबसे बुरी स्त्री भी थी, तो भी पति या किसी और को उसे इस तरह मारने-पीटने का अधिकार कैसे है। अगर वाकई वह कुछ ऐसा कर रही थीं जो कानून के विरुद्ध था तो प्रोफ़ेसर साहब पुलिस को बुला सकते थे। अब उनके समर्थक जो लोग बोल रहें है कि बिना मामला समझे ठीक नहीं है। कल्पना कीजिये कि ये मामला अगर टी वी चैनेल की वजह से सामने नहीं आया होता और ये सारी हिंसा घर के अंदर हुई होती तब तो प्रोफ़ेसर साहेब के सारे समर्थक भी इस मामले की आलोचना करने वालों के पीछे लाठी डंडा लेकर पड़ जाते और ऐसे लोग सोशल मीडिया पर भी गलियां खा रहे होते।

मीडिया में वायरल हुए वीडियो से एक तस्वीर : प्रोफ़ेसर के द्वारा पत्नी की पिटाई

यह बात सही है किसी के निजी जीवन को समझे बिना टिप्पणी करना ठीक नहीं है। लेकिन जो लोग भी प्रोफ़ेसर साहब की इस हरकत के खिलाफ बोल रहे थे, कोई उनके निजी जीवन पर  बात नहीं कह रहा था। सबका कहना यही था कि किसी भी सूरत में अपनी पत्नी के साथ इस तरह की हिंसा गलत है। मान लिया उनकी पत्नी ही मीडिया वालों को लेकर आई थी (ऐसा कहना है कुछ लोगों का) तो यह भी सोचने की बात है कि जबकि केस चल रहा था और गुजारा भत्ता वगैरह सब तय हो गया था फिर आखिर उनको क्यों इस तरह का कदम उठाना पड़ा। ज़ाहिर है, जो तय था उसमें कोई अड़चन डाली जा रही थी। इसके अलावा, तलाक की प्रक्रिया पूरी भी नहीं हुई थी कि उनके पति ने किसी अन्य के साथ रहना भी शुरू कर दिया था। मान लिया कि उनकी पत्नी तमाशा बना कर यही पक्ष सबको दिखाना चाहती थीं तो इसमें गलत क्या है। आखिर एक महिला के रूप में वह भुक्तभोगी हैं, सारी प्रताड़ना उनके हिस्से में आई है, एक प्रेम विवाह का दुखद अंत हुआ, घर छूटा है एक स्त्री का। जाहिर है वह रिएक्ट करेगी।

हालांकि यह एक अलग बहस का मुद्दा है कि जब प्रेम नहीं रहा, तब साथ रहने का क्या फायदा या फिर उस तीसरी औरत की बात भी करनी चाहिए। अगर इन सारे मुद्दों पर चर्चा होगी तब फिर बात दूर तक जाएगी। बात फिर प्रेम पर उलझ जाएगी जो किसी खास व्यक्ति के भीतर वाकई कोई शाश्वत भावना नहीं है या एक दफा हो गया तो दुबारा नहीं होगा। लेकिन यहाँ चर्चा का विषय है एक स्त्री के साथ सार्वजनिक रूप से की गई हिंसा जो किसी सूरत में उचित नहीं हैं। प्रेम चाहे कोई कितनी दफा करे, कोई किसे रोक सका है। लेकिन ध्यान रहे कि आप प्रेम किस कीमत पर पा रहे हैं। अगर प्रेम की कीमत एक स्त्री सार्वजनिक रूप से मार खाकर चुका रही है, तो इसका समर्थन किस हद तक किया जाएगा। दो शानदार इंसान भी एक दूसरे की ज़िंदगी साथ रहकर नर्क कर सकते हैं। वे अलग-अलग बेहतर होकर भी एक दूसरे के लिए बदतर हो सकते हैं। लेकिन हालात जो भी हों, किसी भी सूरत में इस तरह एक स्त्री को पिटते देख कर कोई तर्क देकर उसे जस्टीफाई करना या उसका बचाव करना निहायत हास्यास्पद है। मुझे वाकई ऐसे लेखकों और बुद्धिजीवियों पर तरस आती है जो घटना को सही गलत के परिप्रेक्ष्य में न देख कर अपने संबंधों के हिसाब से देखते हैं। यही नहीं, वे  एकतरफ़ा फैसला भी सुना डालते हैं। ऐसे में उन लेखकों की तारीफ करनी चाहिए जो सिर्फ साहित्य ही नहीं, जीवन में भी स्टैंड लेना जरूरी समझते हैं।

सोशल मीडिया में इस प्रकरण पर हुई बहस की एक झलक के लिए क्लिक करें : ( और यह स्त्री पक्षधर समाज है )

उन्हें लड़ना ही होगा अपने हिस्से के आसमान के लिए

निवेदिता


निवेदिता पेशे से पत्रकार हैं. सामाजिक सांस्कृतिक आंदोलनों में भी सक्रिय रहती हैं. हाल के दिनों में वाणी प्रकाशन से एक कविता संग्रह ‘ जख्म जितने थे’ के साथ इन्होंने अपनी साहित्यिक उपस्थिति भी दर्ज कराई है.निवेदिता से niveditashakeel@gamail.com पर सम्पर्क किया जा सकता है.



( काठमांडू में सात देशों की महिला पत्रकारों के एक सम्मलेन से लौट कर वरिष्ठ पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता निवेदिता इन  देशों की महिला पत्रकारों के  समान संघर्षों की कहानी  स्त्रीकाल के पाठकों से साझा कर रही हैं. )


पिछले पांच दिनों तक पूरी दुनिया हमारी थी । हमने सरहदों की सीमा पार की। मुल्क की दीवारों को पार किया । हमसब मिले काठमांडू में। अलग-अलग भाषा,संस्कृति  के बावजूद हम मुहब्बत के रंग में डूबे रहे। हमने जाना पूरी दुनिया की पत्रकारिता में क्या कुछ चल रहा है। पाकिस्तान,बंगलादेश ,अफगानिस्तान समेत कुल सात देशों  की महिला पत्रकारों ने पत्रकारिता और उससे जुडे मसलों पर बात की ।इन देशों  से आयी महिला पत्रकारों ने बताया कि दुनिया तक खबरें पहुंचाने की बड़ी कीमत चुकानी पड़ती हैं उन्हें। पिछले दस सालों में सिर्फ पाकिस्तान में 100 से ज्यादा पत्रकार मारे जा चुके हैं। भय और आतंक के बीच महिलाएं काम करती हैं। वे हिंसा का सामना करती हैं। उनकी कलम पर पहरे लगें हैं। जुबा पर मुहर लगी है। बमों और गोलियों के बीच पत्रकारिता करने वाली महिला पत्रकार कहती हैं कि ‘दुनिया में वह गोली कहीं नहीं बनी जो सच को लगे।’
पर वो वहां मात खा जाती हैं जहां महिला होने की वजह से एक खास तरह की मानसिक और शारीरिक हिंसा क्षेलती हैं।  दुनिया की पत्रकारों के लिए पत्रकारिता से बडी चुनौती है लैंगिक विभेद। ये पत्रकार जो खबरों से लड़ती हैं, जो दूर-दराज गांवों,शहरों कस्बों और महानगरों से खबरें ले आती हैं, उन सब को लैंगिक विभेद का समाना करना पड़ता है। पाकिस्तान की सना मिर्जा ने बताया कि कई अखबार महिलाओं को नहीं रखते । यह एक तरह की अघोषित नीति है। पेशावर की महिला पत्रकार आॅफिस से काम नहीं करती। उन्हें हर जगह तालिबान से खतरा रहता है। वे नहीं चाहते औरतें मीडिया में काम करें। इसलिए वे छुपकर अपने घरों से खबरें भेजती हैं। सरकार के पास महिलाओं की सुरक्षा को लेकर कोई नीति नहीं है। उन्होंने स्वीकार किया कि इस दौर में पत्रकारिता के मूल्य बदले हैं, तेवर बदले हैं।

वैश्वीकरण  मीडिया पहले से ज्यादा आक्रामक  बनाया है। मनोरंजन से लेकर खबर परोसने के तरीके बेहद आक्रमणकारी और विखंडनकारी है। पूंजी के इस खेल में मीडिया के लिए महिला पत्रकार भी बाजार का हिस्सा है। बाजार बनाए रखने के लिए उसे खूबसूरत एंकर व रिपोटर्र चाहिए। खबरों से ज्यादा मीडिया का ध्यान इस बात पर रहता है कि उनके चैनल की एंकर की शक्ल  इस बाजार को लुभा सकती है या नहीं। सना कहती हैं मेरे लिए एंकरिंग बड़ी चुनौती है। हम रोज वैसी खबरों से गुजरते हैं जो दिल दहलाने वाली होती है। उन स्थितियों में एक एंकर के लिए जरुरी होता है कि वह अपनी बात इस तरह से कहे कि किसी की भावना आहत नहीं हो। पाकिस्तान में महिला हिंसा की खबरें काफी बढ़ी है पर उन खबरों को जगह नहीं मिल पाती।  उन खबरों को जगह मिले,खबरे संवेदनशील  तरीके से लिखे जाएँ  और न्याय के पक्ष में आवाज उठाए इसके लिए भी पाकिस्तान की पत्रकारों को  मीडिया के भीतर दबाव बनाना पड़ता है।

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करें : ( जब जरा गरदन झुका ली देख ली तस्वीरें यार )
( यह चुप्पी खतरनाक है )

 अफगानिस्तान  के हालात और भी खराब हैं। मैकिया मुनीर ने बताया कि पत्रकारों पर हमले होते हैं। आतंकवादी संगठनों का दवाब रहता है। कई बार ऐसे संगठन पत्रकारों का इस्तेमाल अपने लिए करते हैं। महिला पत्रकारों को पुरुषों के मुकाबले कम पैसे मिलते हैं। महिला पत्रकारों ने कहा कि उनके सामने इस बात का दवाब रहता है कि न्यूज बुलेटिन को अधिक से अधिक आकर्षक व बिकाउ बनाएं। बाॅडी लैगवेज उत्तेजक हों और पोशाक  पारदर्शी  हों। दरअसल पूंजीवाद के लिए हर चीज कामोडिटी है। वह पुराने मिथकों को तोड़ता है और नए मिथकों को गढ़ता है। दुनिया के सभी देशों  में कमोवेश  महिलाएं लैंगिक विभेद की शिकार हैं। आज भी महिला पत्रकारों की संख्या कम है। सभी देशों में शीर्ष  पर पहुंचने वाली महिलाओं की संख्या कम है ।  महिलाओं को पुरुषों के मुकाबले कमतर आंका जाता है।

श्रीलंका की पत्रकार दिलरुकशी,आॅस्टेलिया की जेना,बंगालादेश  की नाडिया, हिन्दुस्तान की लक्ष्मी और नेपाल की निर्मला समेत सभी महिला पत्रकारों ने महसूस किया कि कार्यस्थल  पर यौन उत्पीड़न के अधिकांश  मामलों में महिलाओं को न्याय नहीं मिलता। ऐसे कई मामले सामने आए पर न्याय नहीं मिला।
खबरों को लेकर भी विभेद है। महिलाओं को राजनीतिक,अपराध,वाणिज्य,प्रशासन जैसे बीट नहीं दिये जाते हैं। एक पत्रकार ने बताया कि सालों तक उसे धर्मगुरुओं के प्रवचन पर रिपोर्ट बनाना पड़ा।यह माना गया कि मीडिया की कार्य संस्कृर्ति महिला पत्रकारों के विरोध में खड़ी है। उनके उठने, बैठने से लेकर उनकी निजी  जिन्दगी में भी ताक-झांक की कोशिशें  होती रहती हैं। महिला पत्रकारों की स्थायी नियुक्ति एक बड़ा मसला है। अधिकांश  महिलाएं अस्थायी नियुक्ति की वजह से असुरक्षित हैं। उन्होंने पाया कि अखबारों में शहरी,ग्रामीण,गरीब,दलित औरतों के जिन्दगी के संघर्षों  को कम जगह मिलती है पर मीडिया में मनोरंजन के नाम पर विघटन,अविश्वास ,परिवार विभाजन,विवाहेतर संबंध जैसी खबरों को ज्यादा तरजीह मिलती है। दरअसल मीडिया का मूल स्वर स्त्री विरोधी है। मीडिया इसी पितृसत्तात्मक समाज से निकला है। इसलिए मीडिया में महिला पत्रकारों के सामने कई तरह की चुनौतियां है। उन्हें लड़ना ही होगा अपने हिस्से के आसमान के लिए।

क्या सजा के खौफ से तेजाब हमलों को रोका जा सकता है ( ! )

संजय स्वदेश


संजय स्वदेश जन पक्षधर पत्रकार हैं. संप्रति हरिभूमि में कार्यरत हैं. संपर्क : 99691578252 .

( तेजाब हमले के एक मामले में एक साल के अन्दर  मध्यप्रदेश के एक न्यायालय के द्वारा फांसी की सजा के सन्दर्भ से संजय स्वदेश की यह रपट इन हमलों की समाजिकी की पड़ताल करता है और कठोर सजाओं में इस समस्या का एक हल देखता है. स्त्रीकाल फांसी की सजा के प्रावधान के प्रति असहमत होते हुए भी इस आलेख के इस निष्कर्ष से सहमत है कि कानूनी प्रावधानों में उपलब्ध कठोरतम सजा भी इस समस्या के समाधान की दिशा में एक पहल हो सकती है . इन घटनाओं में निहित क्रूरता को देखते हुए इनके लिए दी जाने वाली फांसी की सजा से सहमति का ही मन बनता है. )

1979-80 में भगलपुर जेल में कैदियों की आंख में तेजाब डाल कर अंधा करने का आंखफोड़वा प्रकरण हुआ। जेल की चाहरदिवारी की यह क्रूर  घटना मीडिया माध्यम से समाज तक पहुंची।  देश में किसी महिला पर तेजाब फेंकने का पहला मामला 1982 में आया। तकनीक के युग में मीडिया मजबूत हुआ तो दूर दराज की तेजाब हमले की घटनाएं भी सामने आने लगी हैं। खबरों से अपराधी अपराध के तरीके जानने लगे हैं। बदायूं कांड़ के बाद कई महिलाओं के शव हत्या के बाद पेड़ से लटकाए गये। शायद अपराधियों में सजा का  खौफ किसी पर तेजाब फेंकने के  क्रूर कर्म से रोक सके.

बीते 25 जुलाई को मध्य प्रदेश के मुरैना जिले की अंबाह तहसील की एक अदालत ने एक ऐतिहासिक फैसला दिया। एक साल पहले तेजाब डालकर अपनी शादीशुदा कथित प्रेमिका की हत्या करने के मामले में एक युवक को फांसी की सजा सुनाई। फांसी की सजा देते वक्त कोर्ट ने यह टिप्पणी भी की कि ‘इस अपराध के लिए आजीवन कारावास की सजा पर्याप्त नहीं है, इसलिए मृत्युदंड दिया जाता है। इससे मृतक के परिजनों के साथ-साथ समाज की आत्मा भी आहत हुई है।’ देश में संभवत: यह पहला मामला है, जब किसी व्यक्ति पर तेजाब फेंकने वाले अपराधी को फांसी की सजा कोर्ट ने सुनाई है। इसी दिन सुप्रीम कोर्ट ने तेजाब के हमलों, विशेषकर ठुकराये हुए  प्रेमियों द्वारा किये जा रहे ऐसे हमले की बढ़ती घटनाओं पर चिंता व्यक्त करते हुए  कहा कि स्थिति दयनीय है। सुप्रीम कोर्ट ने इस समस्या से निबटने के प्रति केंद्र सरकार की सुस्ती पर सवाल उठाया। यह पहला ऐसा मामला नहीं है, जिसमें कोर्ट ने सरकार की उदासीनता पर निशाना साधते हुए उसे कटघरें में खड़ा किया हो। चाहे फटकार जितनी भी पड़े, सरकार की सुस्ती उसी बेरहमी से बनी रही है, जिस बेरहमी से कोई अपराधी किसी मासूम के चेहरे पर तेजाब फेंक का उसकी जिदंगी नरक बना देता है। कोर्ट ने इसी दिन तेजाब हमलों की पीड़ितों के पुनर्वास की नीति तैयार करने का भी निर्देश दिया।

तेज़ाब हमले की पीडिता

यह भी कोई पहला निर्देश नहीं है। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने इसी साल 31 मार्च तक तेजाब की खरीद-बिक्री और दूसरे विषाक्त पदार्थों के दुरुपयोग की रोकथाम के लिए राज्य सरकारों को नियम बनाने का निर्देश दिया था। अक्सर कोर्ट के ऐसे आदेश-निर्देश और टिका-टिप्पणी संबंधित प्रकरणों के तारीख वाले दिन के अगले दिन अखबारों में होते हैं। फिर न इस पर कोई चर्चा करता है और न ही कोई पीड़िता की सुध लेता है। पीड़िता की हर दिन की जिंदगी असमान्य अवस्था में कटती है। जो निराश हो चुकी हैं, वे मौत का इंतजार कर रही हैं। जिन्हें अपराधियों को सजा दिलाने का हौसला है, वे आत्मविश्वास से लवरेज होकर बेरहम समाज में अपनी लड़ाई लड़ रही है। ऐसी पीड़िताओं में लक्ष्मी मिशाल है। उसे हर संवेदनशील सैल्यूट करता है।

देश के हर राज्य में तेजाबी हमले कई दर्दनाक कहानियों के उदाहरण हैं। विभिन्न रिपोर्ट के अनुसार ऐसा अनुमान लगाया जाता है कि हर साल देश में करीब एक हजार मासूम तेजाब हमले की शिकार हो रही हैं। लेकिन सरकारी आंकड़ों में यह महज सौ, सवा सौ की होता है। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो से ऐसे मामलों का स्पष्ट आंकड़ा नहीं मिल पाता क्योंकि तेजाब हमले का अधिकतर मामला आईपीसी की धारा 307 (हत्या का प्रयास), धारा 320 (गम्भीर चोट पहुंचाना) और धारा 326 (घातक हथियारों से जान-बूझकर प्रहार करके चोट पहुंचाने) के तहत दर्ज किए जाते हैं। लिहाजा, तेजाब हमले के सही आंकड़ें सामने नहीं आ पाते हैं। इसे घटनाओं के खिलाफ लड़ने वाले विभिन्न स्वयंसेवी संगठन उन्हीं घटनाओं का ब्यौरा जुटा पाते हैं, जो किसी तरह मीडिया में आ जाए। देश के दूर दराज में होने वाली ऐसी घटनाएं वहीं तक रह जाती है। हालांकि आजकल मीडिया की सक्रियता के चलते ऐसे मामले राष्ट्रीय  स्तर की मीडियों की सुर्खियों में आने लगे हैं। लेकिन इस क्रूरता  को अंजाम देने वाले अपराधियों के दिल  में खौफ नहीं बैठ पा रहा है।

तेज़ाब हमलों और स्त्री के खिलाफ अन्य हिंसा के खिलाफ जन जागृति के लिए राकेश कुमार सिंह देश भर में सायकल से यात्रा कर रहे हैं. समस्या के स्थाई समाधान के लिए सामाजिक चेतना ज्यादा जरूरी है .

आजाद भारत की आजादी की  वर्षगांठ की 66वीं सालगिरह सामने हैं। गौर  कीजिए, गुलाम भारत और आजादी भारत के अगले तीन दशक में तेजाब फेंकने की बेरहम प्रकरण सामने आने का उल्लेख नहीं मिलता है। गूगल में एशिड फैक्ट्री खोजो तो हिंदी फिल्म की कहानी मिलती है। बताया जाता है कि भारत में किसी महिला पर 1982 में भारत में तेजाब हमले का पहला मामला प्रकाश में आया था। 1979-80 में भगलपुर जेल में कैदियों की आंख में तेजाब डाल कर अंधा करने का आंखफोड़वा प्रकरण हुआ। जेल की चाहरदिवारी की यह क्रूर  घटना मीडिया माध्यम से समाज तक पहुंची। संभवत समाज के कुंठित  मन वाले अपराधियों ने जान लिया कि बदला लेने का यह भी एक तरीका हो सकता है। अस्सी का  दशक देश का वह दौर था, जब एक  नया भारत करवट ले रहा था, धीरे-धीरे विकास की ओर अग्रसर, देश-दुनिया से कदमताल करने की बेताबी के साथ। तब स्वर्णकार तेजाब का उपयोग करते थे। मतलब तेजाब के उपभोक्ताओं का वर्ग एक ही था। धीरे-धीरे देश में वाहन चले। उसमें लगने वाली बैट्री के लिए तेजाब की खपत बढ़ी। उत्पादन भी बढ़ा। लिहाजा, विकास की गति के साथ-साथ जैसे-जैसे तेजाब सर्व सुलभ होते गया, समाज में क्रूरतम सोच रखने वालो ने  इसे अपना हथियार बनाना शुरू किया। यह भी गौर की बात है कि जैसे-जैसे देश ने विकास किया, देश में तेजाब हमले की घटनाएं बढ़ी। तकनीक के युग में मीडिया मजबूत हुआ तो दूर- दराज की तेजाब हमले की घटनाएं भी सामने आने लगी हैं।

समाज का संवेदनशील तबका इन खबरों से चिंता जताने लगा है। इसके अपराधियों को कठोर सजा के लिए एकजूट  स्वर भी उठने लगे हैं। लेकिन कुंठित और क्रूर  मानसिकता वाला मन कहां बदल रहा है? वे खबरों से ऐसे अपराध के तरीके जानने लगे हैं। हाल ही में उत्तर प्रदेश के बदायूं कांड को देंखे। दुष्कर्म के बाद हत्या कर शव को पेड़ पर लटकाने की घटना जैसे सुर्खियों में आर्इं, देश के दूसरे हिस्सों में एक के बाद इसी तरह की कई घटनाएं हुर्इं, जिसमें हत्या के बाद शव को पेड़ से लटका दिया गया। एक स्थान के अपराधी के अपराध के तरीके पढ़ कर दूसरे क्षेत्र के अपराधी उससे प्रेरित  हो रहे हैं। मतलब यह बीमारी और क्रूर  मानसिकता  का समाजिक सक्रमण है। अपराधियों में कानून की लंबी प्रक्रिया और बच कर निकलने की पूरी संभावना के कारण सजा का खौफ नहीं पल रहा है। मुरैना जिले की अंबाह तहसील कोर्ट ने घटना के एक साल के अंदर फैसला सुना कर भले ही सराहनीय कार्य किया हो, लेकिन दूसरे की जिंदगी नरक बना कर अपनी जिंदगी बचाने के लिए ये अपराधी शीर्ष कोर्ट तक न जाने कितने साल खुली हवा में मौज की सांस लेते रहेंगे और पीड़िता हर दिन नरक भोगती रहेगी।  मध्यप्रदेश में 25 जुलाई को निचली अदालत ने तेजाब हमले के दोषी को फांसी की सजा सुनाई और इसके चौथे दिन 28 जुलाई को पश्चिम बंगाल के हुगली जिले के आरामबाग इलाके में चार लोगों ने एक कॉलेज छात्रा के उपर तेजाब का हमला कर भाग गए। शायद अपराधियों में सजा के खौफ का सामाजिक संक्रमण की किसी पर तेजाब फेंकने के कूृ्रर कर्म से रोक सकें।