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आरती रानी प्रजापति और पूजा प्रजापति की कवितायेँ

( स्त्रीकल में आज दो  नवांकुर कवयित्रियों की कवितायें . आरती रानी जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय में शोधरत हैं  और पूजा प्रजापति आंबेडकर विश्वविद्यालय दिल्ली में शोधरत हैं )

आरती रानी की कवितायेँ

कैसे?

10-12 ईटें
एक साथ उठाते
तुम
क्या थकते नहीं हो?
क्या तुम्हें नहीं लगती
धूप
बारिश
तपती धरती
पराई ?
क्या नहीं आता गुस्सा तुम्हें
इन सब पर
क्या तुम्हारा पसीना

सुख गया है
या तुम आदी हो गये
क्या तुम्हारे फटे पैर
दर्द नहीं करते ?
नहीं निकलती उनसे चीख?
फिर तुम कैसे
मुस्कुरा लेते हो
हर परिस्थिति में?

रेड-लाईट

चिथड़े ख्वाब
और
मैली देह के साथ
सूखे स्तनों से
दूध पिलाती तुम
खींच लेती हो
अपनी ओर निगाहें
दौड पड़ती है
उनमें चिंगारी
कौधने लगता है दिमाग
सुर्ख तन के साथ
और
तभी
ओवर हो जाती है
रेड-लाईट
सुरक्षित बच जाती हो तुम
अनगिनत
बलात्कार के बावजूद

पूजा प्रजापति की कविता 

वो नीचजात

बहुत जरुरी था उसका टूट जाना
बरसों से बंधी झूठी आस का खत्म हो जाना
जीवन पर से उसका विश्वास उठ जाना
वो जात ही बहुत बुरी है
उसके साथ यही सलूक होना चाहिए
एक बार नहीं दो बार नहीं
जीवनभर गलती जो करती रही वो नीचजात
इतनी बड़ी गलती की सजा इससे कम भला क्यों हो
ऐसी सजा दुनिया का कोई भी कानून नहीं दे पाता
ऐसी जात को जन्मते ही मार दिया जाना चाहिए
ताकि फिर वह अंधविश्वास न कर सकें
किसी जल्लाद को भगवान मान फिर न पूज सकें
फिर कभी समर्पित न कर सकें वो अपना अस्तित्व
कभी न बंध सकें वो नीच मेरे साथ रिश्ते में
आखिर उसकी औकात ही क्या जो बराबरी करती है
अबतक उसकी जिंदगी सही सेवा में बीतती रही है
उसकी अस्मिता को यूँ ही रौंदा जाना चाहिए
यूँ ही तार तार कर दिया जाना चाहिए उसका आँचल
क्योंकि वह स्त्री है और मैं पुरुष
कैसे सह सकता हूँ उसका ऊंचा अस्तित्व
कैसे देख सकता हूँ उसे इठलाते
उस समाज में जहाँ सिर्फ मेरी सत्ता है…..

महिलाएं असुरक्षित, यहां भी और वहां भी

आशीष कुमार ‘‘अंशु’


आशीष कुमार ‘‘अंशु’ देश भर में खूब घूमते हैं और खूब रपटें लिखते हैं . आशीष फिलहाल विकास पत्रिका ‘सोपान’ से सम्बद्ध हैं और विभिन पत्र -पत्रिकाओं में लिखते हैं . संपर्क : 9868419453 .

( पूर्वोत्तर से भारतीय सेना के द्वारा स्त्रियों पर अत्याचार की खबरें आती रहती  हैं , महिलाओं ने उनके खिलाफ व्यापक प्रदर्शन भी किये हैं.  पूर्वोत्तर के राज्य महिलाओं की स्वतंत्रता की लिहाज से अपेक्षाकृत बेहतर समाज माना जाता है. वहाँ महिलाओं पर स्थानीय पुरुषों द्वारा यौन हिंसा की यह रपट परेशान करती है.)

इम्फाल न्यायालय के बाहर एक सुबह की यह घटना है। टीजी हायर सेकेन्डरी स्कूल की लड़कियां न्यायालय के बाहर आकर इकट्ठी थीं। इन लड़कियों को उन दो लोगों कां इंतजार था, जिन्हें पुलिस अपनी हिरासत में लेकर न्यायालय में आई थी। उन लड़को को देखते ही  लड़कियों के एक झुण्ड   ने हमला कर दिया। लड़कियां उन दोनों लड़कों को छोड़ने के इरादे  में नहीं थी। बाद में लड़कियों के चंगुल से इन दोनों लड़कों को महिला पुलिस ने आकर बचाया। इन दो युवको पर बलात्कार का आरोप था। इनमें एक 27 वर्षिय पुलिस का सिपाही थोंगम तरूण था, थोंगम ने कुछ मणिपुरी फिल्मों में काम भी किया है। दूसरा मणिपुर पुलिस की गाड़ी का ड्राइवर 30 वर्षीय  युवनाम विलियम था। इन दोनों के ऊपर सोलह साल की एक स्कूल जाने वाली लड़की को खाने में नशा मिलाकर खिलाने और बलात्कार का आरोप था। आरोप है कि पहले थोंगम ने उस लड़की को अपने प्रेम के जाल में फंसाया और उसके बाद एक दिन मौका देखकर खाने में नशा मिलाकर पहले उसे बेहोश किया और उसके बाद अपने मित्र के साथ मिलकर उसके साथ बलात्कार किया।

इन युवको के लिए फांसी की मांग कर रही लड़कियां अपने स्कूल की पढ़ाई छोड़ कर आई थी और माहौल ऐसा बन गया था कि आज बिना उन दोनों  युवकों की फांसी तय हुए वे वापस नहीं जाएंगी। बाद में गृह मंत्रालय को इस मामले में हस्तक्षेप करना पड़ा। गृह मंत्रालय की तरफ से लड़कियों को विश्वास दिलाया गया कि पीड़ित लड़की के साथ न्याय होगा। लड़कियां दोषियों के लिए फांसी की मांग कर रहीं थीं। गृह मंत्रालय की तरफ से मिले आश्वासन के बाद लड़कियों ने स्पष्ट किया – यदि गृह मंत्रालय ने अपना वादा पूरा नहीं किया तो वे अपना विरोध प्रदर्शन फिर जारी करेंगी।

बलात्कारियों को कड़ी सजा दिलाने के लिए कोर्ट परिसर के बाहर खड़ी मणिपुरी महिलायें

पूर्वोत्तर भारत का जिक्र जब भी हमारे सामने आता है, हमारे सामने एक ऐसे प्रदेश की छवि उभरती है, जहां महिलाओं को आजादी है, अपने तरह से जीने की। जहां स्त्री और पुरूष में कोई भेद नहीं है। जहां स्त्री पर किसी भी तरह की हिंसा की बात कोई सोच भी नहीं सकता। पूर्वोत्तर में मणिपुर का दर्जा और भी ऊपर है, यहां विभिन्न आन्दोलनों और अभियानों को महिलाओं ने ही नेतृत्व दिया है। फर्स्ट वीमेंस  वार (1904) और सेकेन्ड वीमेंस  वार (1939-40) की जमीन है, मणिपुर। क्या अब मणिपुर बदल रहा है?

ह्यूमन राइट अलर्ट के बबलू लोइटोंगबम बताते हैं– ‘मणिपुर की स्थितियां पिछले दो-तीन दशकों में बदली हैं। इसमें टेलीविजन के सास-बहू वाले धारावाहिक और बॉलीवुड की फिल्मों ने बड़ी भूमिका निभाई है। मणिपुर में महिलाओं की स्थिति पूरे देश से बेहतर है, यह कहना ठीक नहीं होगा लेकिन यहां की महिलाओं को, जो दूसरे राज्यों की महिलाओं से थोड़ा अलग करता है, वह सिर्फ इतना की, यहां की आंतरिक अर्थव्यवस्था, ट्रेड और कॉमर्स महिलाओं के हाथ में हैं।’ बबलू बताते हैं- ‘इम्फाल का मुख्य इमा बाजार, जहां खाने-पीने से लेकर घर की जरूरत का दूसरा सारा सामान मिलता है। उसे मणिपुर के विभिन्न हिस्सों से आकर महिलाएं ही सम्भालती हैं। इमा बाजार मणिपुर में आर्थिक गतिविधियों के साथ-साथ राजनीतिक गतिविधियों का भी केन्द्र बना है। कारोबारी महिलाओं के इस ताकत का इस्तेमाल कई बार यहां के आन्दोलनों में भी हुआ।’

मणिपुर की यह घटना कई लोगों को चौंका सकती है, जिसमें ट्रक से अपने देवर के साथ तमेन्गलांग जिले से आ रही एक महिला का पीछा कार में सवार चार युवक करते हैं और एक सुनसान से रास्ते में ट्रक रूकवा कर महिला के साथ चारों युवक बलात्कार करते हैं। मणिपुर महिला आयोग की अध्यक्ष डॉ एल इबेटॉम्बी देवी पत्रकारों से बात करते हुए कहती हैं- मणिपुर में बढ़े बलात्कार के मामले चिन्ताजनक हैं, और जो मामले प्रकाश में आए हैं, उनमें नशीले पदार्थों का उपयोग किसी न किसी तरह अधिकांश मामले में हुआ है। इम्फाल पूर्वी जिले में अक्टूबर में हुआ एक बारहवीं कक्षा की लड़की के साथ बलात्कार एक ऐसा ही मामला था। इबेटॉम्बी देवी जब प्रेस कान्फ्रेन्स में बता रहीं थी कि “जो मामले प्रकाश में आए हैं”, उस वक्त उन्हें जानकारी थी कि बड़ी संख्या में मामले प्रकाश में आ नहीं पाते हैं।

भारतीय सेना के द्वारा लड़कियों के बलात्कार के खिलाफ प्रदर्शन करती मणिपुरी महिलाएं

महिलाओं पर हुए अत्याचार के मणिपुर में 01 जनवारी 2012 से 15 अक्टूबर 2012 तक दर्ज हुए मामलों की जानकारी एक गैर सरकारी संस्था ने उपलब्ध कराई। मिली जानकारी के अनुसार, बलात्कार के कुल 21 मामले दर्ज हुए, बलात्कार के बाद हत्या के 04, आत्महत्या के 18, हत्या के 16, बलात्कार के प्रयास के 07, बलात्कार के बाद हत्या के प्रयास के 01, जलाए जाने के 01, गंभीर चोट पहुंचाए जाने के 41, अपहरण के 04, धमकी के 02, लापता हुई 30 लड़कियां, और परिवार ने जिन लड़कियों को अपने हाल पर छोड़ दिया ऐसे मामले 03 हैं।  यह सारे वे मामले हैं जो प्रकाश में आए। बहुत सारे मामलों के संबंध में जानकारी ही नहीं मिलती, क्योंकि सारी खबरों तक न पुलिस की पहुंच है और न ही अखबार और टीवी चैनलों की।

वीमन्स  एक्शन फॉर डेवलपमेन्ट की सबीता मंगस्ताबम के अनुसार मणिपुर के कुल नौ में से पांच जिले पहाड़ी हैं। पहाड़ी जिलों में कानून व्यवस्था नाम की कोई चीज नहीं है। सबीता बताती हैं- ‘मणिपुर के पहाड़ी इलाकों में आज भी पारम्परिक  कानून चलता, जिसमें महिलाओं के खिलाफ हत्या, बलात्कार जैसे घिनौने अपराध का निपटारा गाय, भैंस या फिर मुर्गे की लेन-देन से आज भी हो जाता है। मणिपुर की पुलिस महिलाओं पर हुए अत्याचार को कभी गंभीरता से देखने की कोशिश नहीं करती है। क्या पहले बलात्कार और उसके बाद पैसो या बकरी-गाय के बदले समझौता, क्या एक सभ्य समाज की परंपरा है? इसे लेकर मणिपुर के अंदर एक स्वस्थ्य बहस होनी चाहिए, जिससे अपराधी को सही  सजा मिल सके।”

खोपुर क्षेत्र में चार स्कूल जाने वाली लड़कियों के साथ बलात्कार का मामला सरकार के लिए शर्म की बात बनी हुई है। इस तरह के मामलों को सरकार हर तरह से मीडिया में आने से रोकना चाहती है। मीडिया में खबरों को आने से रोकने की जगह सरकार यदि अपराध को रोकने में कसरत करती तो वह मणिपुर समाज के लिए भी अच्छी खबर होती। राज्य के स्वैच्छिक संगठन लगातार इस मामले में न्याय की मांग कर रहे हैं। मणिपुर की स्थितियों की चर्चा करते हुए बबलू एक बात जोड़ते हैं- राज्य में महिलाओं पर बढ़े अत्याचार की बात करते हुए, आर्म्स फोर्सेस (स्पेशल पावर्स) एक्ट की इसमें भूमिका को कम करके नहीं देखा जा सकता। पूरे मणिपुर को फौजी कैम्प में बदल दिया गया है। प्रत्येक 40 मणिपुरी पर एक फौजी मणिपुर में तैनात कर दिया गया है। 25 लाख की आबादी पर साठ हजार जवान हैं यहां। आप सोचिए यहां के आम लोगों पर इसका क्या प्रभाव पड़ रहा होगा?

सबीता का मानना कुछ बबलू जैसा ही था, ‘ मैदानी इलाकों की खबर मीडिया में आ भी जाती है। पहाड़ी क्षेत्रों में क्या हो रहा है, कौन जानता है? कौन लिख रहा है उनके बारे में और कौन दिखा रहा है उनकी कहानी? मणिपुर में जवानों को असीमित अधिकार दे दिया गया है और गांवों में तो वे किसी के साथ कुछ भी करने को स्वतंत्र हैं क्योंकि वहां से कोई खबर शहर तक नहीं आती।’  पूर्वोत्तर में महिलाओं की स्थिति को लेकर जो एक आदर्श सी छवि हमारे दिमाग में है, उस तस्वीर को मिटाने की जरूरत नहीं है लेकिन हमें समझना चाहिए वह तस्वीर पूरी कहानी बयान नहीं करती क्योंकि वह एक अधूरी तस्वीर है।

राजेंद्र यादव के अंतर्विरोध , हंस और दलित स्त्री अस्मिता के सवाल

 मनीषा कुमारी / संजीव चंदन

( ३१ जनवरी को हंस का सालाना आयोजन है हंस के  पुनर्प्रकाशन दिवस और  प्रेमचंद जयन्ती के अवसरपर. राजेन्द्र यादव के सम्पादन में हंस के लगभग २८ वर्षों के प्रकाशन के दौरान ३५० अंकों के एक अध्ययन के द्वारा राजेन्द्र जी के वैचारिक अंतर्विरोध की पड़ताल करता यह आलेख . विशेष सन्दर्भ हैं  दलित स्त्री अस्मिता के सवाल . यह आलेख अनिता भारती और बजरंग बिहारी तिवारी के संयुक्त सम्पादन में प्रकाशित होने वाली किताब ‘ यथास्थिति से टकराते हुए दलित स्त्री जीवन से जुडी आलोचना’ के लिए लिखा गया है . )

हिन्दी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर राजेन्द्र यादव, उदय शंकर के द्वारा ली गई तस्वीर

फरवरी 1994 के सम्पादकीय में राजेंद्र यादव जी हंस की नीति स्पष्ट करते हैं, जो  1986 के अगस्त से हंस के पुनर्प्रकाशन का मैनीफेस्टो भी है . प्रेमचंद के हंस का 34 सालों बाद पुनर्प्रकाशन हिंदी साहित्य जगत और हिंदी समाज के लिए एक मह्त्वपूर्ण परिघटना है , जिसकी बडी उपलब्धियों में से एक है दलित और स्त्री अस्मिता की आवाज को स्पेस देना और उसे हिंदी की चेतना मे अनिवार्य रूप से दाखिल  करा देना . 1994 के उस सम्पादकीय में राजेंद्र यादव राजेश जोशी के द्वारा अनूदित कैथरीन मन्सफ़ील्ड की कहानी को हंस में न प्रकाशित किये जाने के अपने निर्णय के संबंध में कहते हैं , ‘ मगर मेरी इच्छा है कि तीसरी दुनिया के संघर्षों को वाणी देने वाली कविताओं , कहानियों को ही रेखांकित करने की कोशिश की जाय तो बेहतर है .’
अब सवाल है कि 1986 के बाद , बल्कि उसके पहले से ही हकीकत बन चुके तीसरी दुनिया में अस्मिताबोधी आंदोलनों को लेकर हंस का क्या स्टैंड रहा है , यह समझना जरूरी है . हालांकि इस आलेख का उद्देश्य  दलित  स्त्री और स्त्रीवाद के प्रति हंस और राजेंद्र यादव के रिश्ते  और नीतियों  की पडताल तक ही सीमित है. आजतक लगभग 350 अंको के साथ अगस्त 1986 से निरंतर हंस के शुरुआती अंकों में ही एक स्पष्टता है , साम्प्रदायिकता के खिलाफ उसकी स्पष्ट मुहिम की शुरुआत प्रारम्भिक अंकों से ही है और देह केंद्रित स्त्री -यौनिकता की पक्षधरता की झलक भी प्रारंभिक अंकों में ही मिल जाती है. पहले ही अंक में अरविंद जैन के  आलेख ‘प्रजापति कटघरे में’ और वहीं अर्चना वर्मा के द्वारा प्रस्तुत इर्विंग वैलेस के ‘सेवन मिंनट्स’ के एक अंश के प्रकाशन के साथ साहित्य में अश्लीलता के विवादों पर हंस का अपना स्टैंड घोषित सा है. धीरे- धीरे हंस स्त्रीविमर्श और दलित विमर्श के लिए प्रतिबद्ध होता गया. उसकी यही खूबी बनी और उसके विरोधियों के लिए यह उसका दुर्गुण.

हंस का एक महत्वपूर्ण विशेषांक

लेकिन हंस की इस घोषित प्रतिबद्धता के अंतर्विरोध  भी खूब हैं. सबसे बडा  अंतर्विरोध  राजेंद्र जी की प्रतिबद्धता और उनके ट्रेनिंग के बीच है . बाद के दिनों में समाजशास्त्री लीला दूबे को जवाब में लिखे अपने एक सम्पाद्कीय में  राजेंद्र जी यह स्वीकार भी करते हैं कि उनकी ट्रेनिंग शास्त्रीय नहीं है , अकादमिक नहीं है, इसलिए वे कामनसेंस के साथ मौलिक ढंग से सोचते हैं.  अभाव सिर्फ अकादमिक ट्रेनिंग भर का ही नहीं है; अभाव है तत्कालीन समविचारी आंदोलनों  से किसी जुडाव का भी या फिर प्रसंग है अपनी सामाजिक वर्गीय स्थिति में खुद के मानस निर्मिति का भी . यही कारण है कि जातिउत्पीडन के खिलाफ बाद में मुखर दिखते राजेंद्र जी जब हंस के पुनर्प्रकाशन के पांचवे  अंक में  ही युवाओं को संबोधित करते हैं, ‘ एक संदेश नई पीढी के नाम’ में, तो वह संबोधन मध्यवर्गीय युवाओं को संबोधित करने तक सीमित रह जाता है ,और पूरे संदेश में जाति उत्पीडन कोई विषय नहीं होता है.  उसके ठीक दो महीने बाद फरवरी 1987 की संपादकीय में वे लिखते हैं, ‘ हमारे यहां सिर्फ गुंडागर्दी, बलात्कार, गावों में हरिजनों और स्त्रियों के ‘वध’ की कला  का विकास हुआ है .’ 1987 में राजेंद्र जी जिस ‘हरिजन’ शब्द का प्रयोग कर रहे हैं , उसके प्रति दलितचेतना नफरत से भरी थी और राजेंद्र जी उसका बेधडक प्रयोग कर रहे हैं. इसके पहले वे अक्टूबर 1986 में शैलेश मटियानी का आलेख ‘ हरिजन होने का मतलब’  छाप चुके थे .  यह वह समय है, जब हिंदी पट्टी में भी कांशीराम जी के सायकल के पहिये घूमने लगे थे . महाराष्ट्र तो उग्र पैथर आंदोलन की वैचारिकी से पहले ही रु-ब-रु हो चुका था.

इस शास्त्रीय ट्रेनिंग या आदोलनों से दूरी या अपनी वर्गीय -जातीय निर्मितियों के कारण अपनी सीमाओं के बावजूद राजेंद्र जी ने अपने हंस के पन्नों पर अपना और हंस  का वैचारिक आगाज दे दिया था , वे हिंदू धर्म , हिंदू -हिंदी समाज की जडताओं पर प्रहार के लिए प्रतिबद्ध थे. इस प्रक्रिया में ही वे 1988 के जनवरी में डा. आम्बेडकर के द रिडल औफ राम ऐंड कृष्ण का अनुवाद प्रकाशित करते हैं. यहां भी यद्यपि वे कृष्ण की अपनी व्याख्या करते हुए इस मह्त्वपूर्ण आलेख के राम वाले हिस्से हो ही प्रकाशित करते हैं. धीरे-धीरे हंस में अनिवार्यतः स्त्री और दलित मुद्दे स्थान लेने लगते हैं, हंस ‘देहमुक्ति’ के अपने सिद्धांत की वकालत की राह पर भी चल निकलता है . जहां तक स्त्री और दलित रचनाधर्मिता के लिए प्लेटफार्म का सवाल है तो इस मामले में स्त्री रचनाधर्मिता भारी पडती है . दलित रचनाधर्मिता के लिए स्पेस के संदर्भ में पत्रिका पुनर्प्रकाशन  के 18 साल बाद पहला दलित विमर्श अंक ‘ सत्ता और दलित’ के संपादक श्योराज सिंह बेचैन कहते हैं कि इतने सालों में हंस में ‘दलित रचनाकारों की उपस्थिति 5% तक ही है’ . दलित स्त्री रचनाकार तो नगण्य हैं ही .  हंस की अब तक की यात्रा में प्रकाशित स्त्री विमर्श और लेखन के विशेष अंकों में भी दलित स्त्री की भागीदारी और उसके संघर्ष के मुद्दों की प्रायः अनुपस्थिति सी है . दुःस्थिति तो यह भी है कि खुद श्यैराज सिंह के सम्पादन में प्रकाशित ‘ सत्ता और दलित अंक’ में दलित लेखिकाओं की भागीदारी भी नगण्य है. अतिथि संपादक इसके लिए संपादकीय में अपनीए मजबूरी इन शब्दों में बताते हैं, ‘ हमारे पास ख्याति प्राप्त लेखिकायें वास्तव में नहीं है.’ इस सफाई पर दलित स्त्रीवादी रचनाकार अनिता भारती की माकूल टिप्प्णी है , ‘ यह टिप्पणी दलित महिलाओं पर बिल्कुल उसी तरह की है ,जिस प्रकार सवर्ण मानसिकता से ग्रसित सवर्ण लेखक दलित लेखकों पर करते हैं.’ पृ . 215, समकालीन नारीवाद , अनिता भारती ).

राजेन्द्र जी की यह तस्वीर उनके विरोधियों और चाहने वालों के सामान रूप से प्रिय है .

राजेंद्र जी दलितों और स्त्रियों की साझी लडाई की बात करते हैं , दोनों की पीडा वे एक सी बताते हैं. 2002 के संपादकीय में वे लिखते हैं, ‘ साहित्य में स्त्रियों और दलितों का साथ आना एक साझी क्रांति का प्रारंभ है, क्योंकि दोनों ही सही अर्थों में सर्वहारा हैं, इनकी वास्तविक मुक्ति भी सर्वहारा क्रांति के दर्शन से उदित होगी .’ नवम्बर 2002 में वे फिर लिखते हैं, ‘ स्त्री और दलित दोनो ही अन्य हैं, वह समानांतर दुनिया में रहती है . चूकि हमारे और उनके बीच की अंतर्क्रिया निरंतर बनी रहती है इसलिए उसकी चेतना और अभिरूचियों का विकास हमारी ही बोली बानी  में होता है .’ इसके पहले भी 1994 के नवंबर -दिसंबर अंक  ‘औरत उत्तर कथा 1’ के संपादकीय में वे जहां धर्म और जाति दोनो को ही स्त्री के उत्पीडन में समान रूप से सक्रिय बताते हैं , वहीं दलित स्त्री को भी ‘स्त्री अस्मिता’ के वृहद आकार में शामिल मानते हैं, ‘ धर्म और जातिगत बलात्कारों के बीच अपने को साधे रखना शायद औरत के लिए सबसे बडी अग्निपरीक्षा है. देह के बलात्कार द्वारा कुचल जाने या पूरी तरह ध्वस्त हो जाने से इन्कार करने वाली तो न जाने कितनी भंवरी बाइयां समाज और साहित्य में उठ खडी हुई हैं.’ राजेंद्र जी की दलित और स्त्री की एक लडाई की वकालत यूं ही निर्विवाद भी नहीं थी . 1993 के अप्रैल में हंस में ही मृदुला गर्ग उनकी इस धारणा को दुरुस्त करने की कोशिश करती हैं, ‘ पर आप निराश न हों आपकी हमदर्द -हमख्याल बीसियों औरतों को मैं जानती हूं, जो हर तरह से स्वतंत्र -सम्पन्न होने के बावजूद खुद को दलित बतलाती है. बकायदा रोती -कलपती -झीकती हैं , पर दलित वर्ग की स्त्री के लिए तनिक सोच-विचार करने को तैयार नहीं हैं. स्त्री जाति में भी दो वर्ग हैं , ‘ दलित और गैर दलित , उसी तरह पुरुषों में भी दो वर्ग हैं : दलित और गैरदलित.’ यहां मृदुला जी राजेंद्र जी को ठीक -ठीक सामजिक हकीकत बता रही हैं, जिस हकीकत की भूमि पर ही दलित स्त्रियों ने अपनी आवाज गैरदलित स्त्रियों और दलितों से अलग बनाई. जब यह आवाज बनने लगी तो राजेंद्र जी अपने ही अंतरविरोध के साथ फिर उपस्थित हुए. उस वक्त मृदुला गर्ग की उन्होंने खूब खबर ली , उन्हें अपने टार्गेट के कुछ लोगों में शामिल कर लिया . मृदुला जी उन गैर दलित स्त्रियों से एकदम अलग और सही स्टैंड पर हैं, जो उनके समर्थन में इसलिए आईं कि उन्हें दलितों से अपनी तुलना में अपना अपमान दिख रहा था, जबकि मृदुला जी राजेंद्र यादव के साथ -साथ गैरदलित स्त्रियों को भी समाज की वास्तविकता पर आधारित समाजशास्त्रीय विश्लेषण बता रही थीं , वे गैर दलित स्त्रियों की आत्मग्रस्तता की खूब खबर ले रही थीं अपनी इस स्थपना में .

 इसके विपरीत राजेंद्र जी उन्हें उन स्त्रियों का प्रतिनिधि बताकर अपना प्रतिपक्ष बना लेते हैं, जो दलितों की तुलना से नाक -भौं सिकोड रही थीं. और जब दलित स्त्रियों का अपना पक्ष उनसे अपना हिस्सा मांगता है, दलित स्त्रीवाद उन्हें अपनी लडाई की मशाल थमाना चाहता है, तो वे अपने ही कंफ्युजन के साथ प्रतिक्रिया देते हैं. दलित स्त्रीवाद और दलित स्त्री अभिव्यक्ति पर आधिकारिक काम करने वाले बजरंग बिहारी तिवारी के अनुसार उनका लेख वे यह कहते हुए लौटा देते हैं कि ‘ दलित स्त्रीवाद दलितों और स्त्रियों की लडाई को कमजोर करेगा.’ अपने इस तर्क के समर्थन में वे अपने सहयोगी संजीव को भी शामिल बताते हैं. ऐसा करते हुए राजेंद्र जी यही भूल जाते हैं कि  कभी हंस को उन्होंने तीसरी दुनिया के संघर्षों को वाणी देने का प्लेटफार्म बताया था. ब्लैक और दलित स्त्रीवाद इस दुनिया की एक बडी हकीकत के रूप में था, जिसे वे अपने ही बनाये कारणो से नकार रहे  थे. नकार का यह तर्क जबकि अस्मिताबोधी सारी आवाजों के खिलाफ जाता है, हां, स्त्री और दलित आवाजों के खिलाफ भी. कम्युनिष्ट पार्टियों में सक्रिय स्त्रियों ने जब अपनी आवाज बनाई तो उनके खिलाफ ऐसे ही तर्क दिये गये थे और दलितों की लडाई और आवाज को भी ऐसे ही तर्कों के साथ वर्ग संघर्ष के मार्ग में रोडा बताया गया था. राजेंद्र जी की तुलना में मृदुला गर्ग राजनीतिक रूप से ज्यादा करेक्ट पोजीशन पर दिखती हैं.
राजेंद्र जी और हंस स्त्री विमर्श के मामले में भी अपना ही संसार रचते हैं. इनके लिए स्त्री की मुक्ति का मार्ग ‘देहमुक्ति’ से तय होता है और ‘ देहमुक्ति’ को वे यौनप्रसंगों तक सीमित कर देते हैं. हंस के शुरुआती पन्नों में ही साहित्य  में यौन प्रसंगो के डीटेल पर खूब सारी बहसें और सम्पादकीय पसरे पडे हैं. राजेंद्र जी अपनी इस जिद्दी समझ को खाद पानी अपनी जिस समझ से देते हैं , उसकी अभिव्यक्ति वे जुलाई 1993 के अपने संपादकीय में करते हैं , ‘ स्त्री अपनी बौद्धिक  या अन्य उप्लब्धियों के लिए चाहे जितनी हाय तौबा मचाती रहे, पुरुष की जिद्द् है कि साम दाम दंड भेद से वह उसे कमर , कूल्हे , नितंब , छातियों से ऊपर नहीं उठने देंगे.’ इस जिद्दी समझ का ही आलम था कि बाद के दिनों में रचनाओं में यौन प्रसंगों के डीटेल हंस में छपने की गारंटी बनने लगे.  राजेंद्र जी को खुद ही पता नहीं चला कि उन्होंने खुद को और हंस को कब पुरुषों के उसी अभियान में शामिल कर लिया जिसमें उसकी जिद्द है कि साम दाम दंड भेद से वह उसे कमर , कूल्हे , नितंब , छातियों से ऊपर नहीं उठने देगा.’ हंस के पुनर्प्रकाशन की योजना में शामिल और पहले ही अंक से नियमित लेखक अरविंद जैन इस जिद्द को चिह्नित करते हुए कहते हैं कि ‘ मैंने खुद को उसी दिन हंस से अलग कर लिया जब उसके एक अंक में छपी बलात्कार की आधा दर्जन से अधिक कहानियों में पीडिता को बलात्कार की घटना के बाद अनिवार्यतः आइने के सामने निर्वस्त्र होते पाया. यह सारी कहानियों में महज संयोग नहीं हो सकता , यह विकृति थी, यह एक योजना बद्ध प्रकाशन था.’फिर सवाल है कि दलित स्त्रीवाद आलोचना के आइने में हिंदी की एक मह्त्वपूर्ण उपस्थिति को कैसे देखा जायेगा.

फिर सवाल यह भी है कि इस उपस्थिति को देखने की जरूरत भी क्या है और क्यों है? निस्संदेह भागीदारी की कसौटी पर हंस दलितों और दलित स्त्रियों ,दोनो की दृष्टि से कमजोर है. सैद्धांतिक स्तर पर भी राजेंद्र जी बहुत से  वैसे दलित और स्त्री रचनाकारों के साथ खडे दिखते हैं , जो दलित स्त्री की आवाज को दलित और स्त्री आंदोलनों के उद्धेश्य में बाधा पाते हैं. इनमें से कुछ तो दलित स्त्रियों की सक्रियता को डा धर्मवीर की शैली में हिकारत से देखते हैं . ‘ सत्ता विमर्श और दलित’ अंक में खुद डा धर्मवीर अपनी इस शैली का नमूना ‘ दोहरा अभिशाप कितना दोहरा : एक डायनासोर  औरत ‘ में पेश करते हैं, प्रसिद्ध लेखिका कौश्ल्या वैसंत्री की लानत -मलानत करते हैं, और इसके समर्थन में प्रभा खेतान जैसे स्त्री संघर्ष के पैरोकार को उद्धृत करते हैं, ‘ दलित आंदोलन इसलिए ज्यादा सशक्त है कि वहां कांशीराम हैं, डा धर्मवीर हैं, इसलिए नहीं कि वहां मायावती और कौश्ल्या वैसंत्री हैं.’इस सीमा के बावजूद देखना यह होगा कि लगभग 350 अंकों  और लगभग 10 विशेषांकों में फैले हंस के पुनर्प्रकाशन में राजेंद्र जी और हंस ने क्या जाति -धर्म और साम्प्रदायिकता के खिलाफ मुहिम इमानदारी से चला रखी है , क्या समाज में जेंडर विभेद के खिलाफ इमानदारी से  मुहिम छेड रखी है ! इन कसौटियों पर हंस खरे उतरता है और इस लिहाज से इसकी उपस्थिति  हिंदी में दलित स्त्रीवाद के लिए पृष्ठभूमि सी भी है. जरूरत पडने पर दलित स्त्री की आवाज और मुद्दों को दलित और स्त्री आंदोलन के खिलाफ मानने वाले राजेंद्र यादव डा धर्मवीर की नैतिकता और  उनके दलित स्त्रीविरोधी मंतव्यों को अपने संपादकीय में आडे हाथ लेते  भी हैं.  हालांकि यह भी सही है कि इस संपादकीय के लिए अनिता भारती , बजरंग बिहारी तिवारी और श्रीधरम ने राजेंद्र जी को तैयार किया था , उनका मन बनाया था .राजेंद्र यादव  अपने अंतरविरोधों से भरे हैं, उससे संचालित होते हैं, और उसका ही प्राकट्य उनके संपादन और संपादकीय नीतियों में हुआ है, जिससे अनिवार्य मुठभेड और सम्वाद  दलित स्त्रीवादी अस्मिता के लिए जरूरी है.

सलाखें भीतर और बाहर

प्रो.परिमळा अंबेकर

प्रो.परिमळा अंबेकर हिन्दी विभाग , गुलबर्गा वि वि, कर्नाटक में प्राध्यापिका और विभागाध्यक्ष हैं . परिमला अम्बेकर मूलतः आलोचक हैं तथा कन्नड़ में हो रहे लेखन का हिन्दी अनुवाद भी करती हैं . संपर्क:

gughindi22@gmail.com

( यह आलेख केन्द्रीय कारागृह , गुलबर्गा , कर्नाटक , में सजायाफ्ता कैदियों की सजा माफी के लिए विचार की जाने वाली फाइलों के आधार पर लिखा गया है. केन्द्रीय कारागृह की सलाहकार समिति की सदस्य के नाते प्रोफ़ेसर परिमळा अंबेकर ने इन फाइलों का अध्ययन किया . हर फ़ाइल में अपराध की शिकार , कारण स्त्री है , एक अपवाद को छोड़कर, जहां वह प्रत्यक्ष अपराधी तो है लेकिन वही सारा सच नहीं है. यह आलेख केस डायरी के माध्यम से पितृसत्ता का अध्ययन है.)

अपराध, यानी मानसिकता की वह तीखी लकीर ,जो चाहत और चीज के मध्य उभर आती है । चाहत और चीज को, अगर व्यक्ति वैयक्तिकता के घेरे में बांधने की मानिसकता पालता है तो वह बडे ही बेतकल्लुफ हो  उस चीज के सामाजिक घेरे को मिटाता है । अपराधी की मानसिकता निस्संदेह संकुचित और अंधी होने के कारण  चीेजो के अस्तित्व के विशाल और प्रकाशमान घेरे को पहचानता नहीं है और तो और इस सच्चाई को स्वीकारता भी नहीं  है , स्वीकारना भी नहीं चाहता । अपराधी अपनी चाहत की चीज को पाने के लिए ,मानव समाज निर्बंधित बाडे को तोडता है, परिणाम में हाथ उसके रंग जाते हैं खून से !! बदले में नसीब होती है दुनिया सलाखों के पीछे की !!

इतिहास गवाह है, दुनिया के हर जंग, हर झगडे हर जिल्लती अपराध के पीछे इन तीन चीजो को पाने की चाहत छिपी है – जमीन को पाने की, जर को पाने की और जोरू को पाने की । जोरू, यानी  स्त्री । तो चलिये हमने अपनी चाहत की चीजों की फेहरिस्त में जोरू को यानी  स्त्री को भी निर्जीव ,जड संपत्ति  की कोटी में डाल दिया। ताकि अपराध की अपराधी मानसिकता की एकरूपता बनी रहे !! ताकि न्यायिक गतिविधियों के लिए कोई  व्यवधान न रहे ! भले ही अपनी न्यायिक व्यवस्था दफा 304 (ठ ), 354(ए ),366, 367, 376 और न जाने कितने ही स्त्री के प्रति के अपराध के लिए दंड विधान मुकर्रर किया क्यूॅं न हो , लेकिन अपराधी कहा मान बैठेगा कि अपनी सरकार स्त्री को वस्तु नहीं व्यक्ति मानती है। अपराधी तो उसे वस्तु ही मानेगा , तभी तो ऐसे हत्याओं को अंजाम मिलता है।  क्यूॅंकि बाप दादाओं से यह रीत चली है ,कि स्त्री ठहरी भोग की वस्तु , पुरूष की संपत्ति. स्त्री के प्रति वस्तुगत चाहत न रखें तो भला खाक मजा आयगा !! और तो और यह तो रीत रूढी ठहरी । खानदानी  मर्यादा और पुरूषत्वता के दर्प का प्रश्न ठहरा। आसानी से मिटाये तो नहीं मिट जाती ?

केन्द्रीय  कारागृह  की स्थायी सलाह मंडली  बैठक की कार्यवाहियॉं चल रही थी। दीर्घावधी शिक्षाबंदियों की शिक्षा संबंधी परिशीलन के लिए फाइलें खोली जा रही थी । अपराधी ,अपराध और शिक्षा के समीकरण का गहन अभ्यास चल रहा था । अपराधी की फाइलों की प्रतियॉं खुली पडी थी । मैं झांक- झांक कर हर फाइल की तल की गहरायी को देख रही थी । लगभग हर अपराध की केस हिस्ट्री इसी गणित को दुहरा रहे थे । अपराधी पुरूष, जिसपर अपराध हुआ है वह स्त्री, जिसके लिए अपराध हुआ है वह स्त्री, जिस कारण से अपराध हुआ है वह स्त्री । अर्थात हर अपराधिक फाइलें, भीगे हुयी थी स्त्री की ऑंसू से, रंगे हुये थे स्त्री के खून से, खार खाये हुये थे स्त्री की आह से, उसांसों से । अपराधी चाहे कोई  हो, अपराध चाहे कैसा भी हो, दंड विधान चाहे कोई  भी क्यूॅं न हो, परिणाम का ठीकरा फूटते जा रहा था स्त्री पर । मॉं, बेटी, बहन, पत्नी, माशुका…. बनकर वह पुरुषसत्तात्मक  मानसिकता के समाज के सलाखों के पीछे बंधी दिखायी पड रही थी । जैसे सलाखों के पीछे बंद पुरूष से कह रही हो,

तू बंधा है भीतर सलाखों में,
जिसकी अपनी सीमा है, रूप है,
मैं बंधी हूॅं बाहर सलाखों में,
जिसकी अपनी न सीमा है न रूप है,
वह तो बस असीम हैं, अरूप हैं.
जैसे ब्रह्म !

आम निर्णय लेने के लिए सलाह समीति में उपस्थित हर सदस्य से पूछा जा रहा था, क्या आप चौदह वर्ष की शिक्षा काटे इन अपराधियों की बाकी शिक्षा को माफ करने के पक्ष में है या नहीं ? सलाह दीजिये । एक एक करके सजाबंदी की संख्या, नाम, जाति-धर्म, शिक्षा का कलम, शिक्षा अवधी का विवरण, पेरोल की अवधी ,जेल में उस कैदी का व्यवहार चरित्र और अपराध प्रकरण का ब्यौरा , विस्तृत केस हिस्ट्री बतायी जा रही थी । हर सजा बंदी कैदी के केस से संबंधित अपराध का स्वरूप और अपराधी की मानसिकता पर रह रहकर मेरी दृष्टि अड जाती। केस हिस्ट्री पढते पढते ,ऑंख के परदे पर घटना का चलचित्र ही घूमने लगता । उन कुछ एक  चलचित्रों के शब्दचित्र यहॉं प्रस्तुत है , जो इन्हीं सलाखों के पीछे की सच्चाई बताते है । अविश्वसनीय सच्चे झूठ की कहानी बयॉं करते हैं।

केस नं: 1  सजाबंदी संख्या, नाम, स्थान ,जाति धर्म (गोपनीय )
विधित दंड   : भारतीय दंड संहिता की धारा 302  

घटना व अपराधः

लगभग बीस वर्ष का युवक, व्यवसाय से अपना जीवन यापन कर रहा था । पडोसी सुंदर,सुघढ, सुशील ब्याहता औरत पर इसकी नजर पडती है । आते- जाते उसे छेडता है । इसे देखकर, उस सुंदर सुघढ औरत का पति अपराधी युवक के परिवार से भिड पडता  है । युवक यही घाघ लगाकर बैठा हुआ है कि कब वह औरत अकेली हाथ लगे।खेत में काम करते पति को , खाना देने के लिए निकली अकेली औरत , मौके के ताक में बैठा लडका !! अपने साथियों के सहारे, उसे नजदीक के खेत में खींच ले जाता है और बलात्कार  की कोशिश करता है। लेकिन इसका घोर विरोध करती जालसाजों के पंजे में फॅंसी स्त्री। विरोध करती छटपटाती औरत के सर पर वे पत्थर दे मारते हैं । हाथ न आने के आवेश में, क्रोध से , विवाहित स्त्री की मर्यादा और मंगल सूचक उसके गले में बंधे मंगलसूत्र के धागे से ही उसका गला फांसकर उसे मौत की नींद सुला देता है युवक । अपनी इच्छित चीज का हाथ न लगने के क्रोध से भुनभुनाया कामुक युवक !

यह रहा, ढंग से मूॅंछे तक न फूटनेवालेे युवक की, पडोसी स्त्री को अपनी संपत्ति  मानने की मानसिकता । आस पास रहने वाले स्त्रियों को जिसे वे चाहते हैं, जिसे वे भोगना चाहते हैं, उसपर अधिकार जमाने की, उसे किसी भी प्रकार से हथिया लेने की पुरूष की वर्चस्वी बर्बर मानसिकता । साली मेरे सामने तू नखरे दिखाती है – हिन्दी सिनेमायी विलेन का अंदाज !







केस नंः  2  सजाबंदी संख्या, नाम, स्थान ,जाति धर्म  (गोपनीय )
विधित दंड   : भारतीय दंड संहिता का धारा 302  
घटना व अपराध .

सोलह सत्रह साल का  निम्न वर्ग का लडका । ढंग से अपनी रोजी कमाता भी न होगा ।  जिस लॉरी का यह क्लिनर था उस लॉरी का डा्रइवर इस युवक का बचपन का मित्र रहा था । मित्र ने खूबसूरत सी लडकी से ब्याह रचा लिया । लेकिन इस आशिक युवक का दिल दोस्त की ब्याहता पर आ गया। दोस्त से बार बार यह कहता भी था कि, अगर ब्याह करना है तो तेरी पत्नी जैसी खूबसूरत बला से ही मैं शादी करूॅंगा । बेचारे ड्राइवर  दोस्त को क्या पता, उसके बचपन के साथी के मन में कैसे शैतानी प्लान आकार ले रहे हैं ।
एक दिन पति- पत्नी दरगाह  जाते हैं । अपने प्लान के मुताबिक ,कातिल मित्र भी उनके साथ हो लेता है । उन दोनों को फोटो खिंचवाने के बहाने नदी की ओर ले जाता है । बस क्या था, देखते ही देखते, नदी के उफनते लहरों में मित्र को धकेलकर मार देता है ।

युवा मन की अस्थिर बुद्धि ही कह ले या , जो चाहा उसे पाने की शैतानी जिद्द ही कह ले ,या स्त्री को केवल भोग और काम की तृप्ति के लिए पाने की बर्बर चाह ही कह ले ।  युवक जो अभी कानूनी तौर पर नाबालिग है , आजीवन  शिक्षा का शिकार बनता है ।

केस नंः  3  सजाबंदी संख्या, नाम, स्थान ,जाति धर्म  (गोपनीय) 
विधित दंड   : भारतीय दंड संहिता का धारा 302
घटना व अपराध  

लगभग चौबीस की आयु  का शादीशुदा बेटा हर महीने मॉं के सामने हाथ फैलाता था । अपने जेब खेर्चे के लिये बार बार मॉं को तंग करता था । न काम न धाम । न ब्याहता पत्नी को पाल सकता है और न घर की आर्थिक जिम्मेदारी निभा सकता है । सोने पे सुहागा !! अपनी दूसरी शादी करवाने के लिए मॉं पर दबाव डालने लगा । घर की बेहाली जान मॉं, घर पर बहू के रहते भला बेटे के सर पर दूसरा सेहरा कैसे बांध सकती है । मॉं मना करती गयी , करती गयी । और क्या था अपनी हवशी इच्छा पूरा न होते देख, युवक ने कुल्हाडी उठायी और मॉं के सर पर दे मारा । अपने जिस बेटे की परवरिश , गरीबी में भी जी जान लगाकर करते आयी थी, जिस बेटे का परिवार बसाकर चैन का बुढापा काटना चाहती थी , वही मॉं उसी बेटे के स्वार्थ और बर्बरता का शिकार हो गयी ।
यह रही , भारतीय निम्न परिवार के अपढ, विलासी और स्त्री को ;चाहे वह मॉं हो, बेटी हो, बहन हो या पत्नी हो, अपनी जूती समझनेवाले युवक की पुरूषवर्चस्वी मानसिकता की कहानी। घर परिवार, दीन दुनिया भाड में जाय, मेरी  चलनी चाहिए । घर में चाहे फाके पडे या , छप्पर फटे, मैं पुरूष, घर का मालिक, मेरी मन मर्जी चलनी चाहिए । इसी पुरूष मानसिकता ने मॉं को ही मौत के घाट उतार दिया ।

केस नंः  4  सजाबंदी संख्या, नाम, स्थान ,जाति धर्म  (गोपनीय ) 
विधित दंड   : भारतीय दंड संहिता का धारा 302, 201.
घटना व अपराध 

बीस बाइस  वर्ष का निम्न मध्यवर्गीय परिवार का लडका, खेतीबाडी करता था। मॉं से घर चलाने के खर्चे के पैसे को लेकर लड पडा । बात से बात बढती गयी । बेटे का क्रोध का पारा चढता गया । पैसा बोलता है !! पैसा बोलने लगा, मॉं से पैसा न निकलता देख बेटे ने अपने ही हथेली से मॉं का गला दबादिया । मरी पडी मॉं को देखकर, क्या कोई  बेटा अपने बचाव में सोच सकता है। लेकिन इस बेटे की आगे की हैवानी हरकते देखिये । बोरी में मॉं के शरीर को बांधकर, पास के नहर में फेंक देता है।

यह घटना है भारतीय युवक की परावलंबी मानसिकता की । अपने विरूद्ध के हर आवाज को दबा देने की , अहंकारी, क्रोधी युवा मानसिकता की। अपने चाहतों के विरूद्ध उठी आवाज , भले ही अपनी जननी की ही क्यूॅं न हो, उसे गले में ही फांस देने की हैवानी स्वभाव की।

केस नंः  5  सजाबंदी संख्या, नाम, स्थान ,जाति धर्म  ( गोपनीय ) 
विधित दंड   : भारतीय दंड संहिता का धारा 302, 201.
घटना व अपराध 

भारतीय समाज में स्त्री पुरूष की संपत्ति भी है और उसकी मर्यादा भी। अपने बहू बेटियों पर हुये हुये अन्याय अत्याचार का बदला , तभी पूर्ण होगा जब अत्याचारी के बहू बेटियॉं दॉंव पर चढेंगी । लेकिन इस केस में स्त्री पर हुए अत्याचार, मानहानि के बदले , बलि चढा है अपराधी का बेटा ।

अपनी बहन का बलात्कार  करनेवाले अपराधी को भला भारतीय समाज का युवक जिंदा चलता फिरता कैसे देख सकता था । उस रेपिस्ट के साथ झगडा करता है , उसे मारना  युवक के बस की बात नहीं थी । बहन के साथ हुये अन्याय का बदला लेने के लिए एक दर्दनाक प्लान उसके दिमाग में आकार लेते जाती है । इसी ताक में बैठा युवक, आरोपी के बेटे की बलि चढा देता है । उसे मारकर, लाश को बोरी में बाँधकर, पास के नहर में उसने फेंक दिया ।

यहॉं स्त्री के प्रति  भारतीय समाज की उभय मानसिकता स्पष्ट उभरते हैं । पहली,  अपराधी पुरूष का, जो गॉंव गली की बेटियों को अपने हवश का शिकार बनाने की गंदी कामुक  मानसिकता । दूसरी, सजाबंदी युवक की,किसी भी कीमत पर, अपने परिवार की मर्यादा रहे बहन के चरित्र को भंग करनेवाले व्यक्ति को अपने ही हाथों सजा देकर बदले की आग को ठंडा करने की मानसिकता।

केस नंः  6  सजाबंदी संख्या, नाम, स्थान ,जाति धर्म  ( गोपनीय ) 
विधित दंड   : भारतीय दंड संहिता का धारा 302 . 
घटना व अपराध 

कन्नड में एक कहावत प्रचलित है ‘‘ पति-पत्नी के बीच का झगडा, भोजन करके सोने तलक मात्र ‘‘ लेकिन इस मुलजिम ने तो इस कहावत को सिरे से ही झुठला दिया है । पत्नी के साथ आपसी वैमनस्य, झगडा पति  को नागवार गुजरती है । झगडालू पत्नी को जान से मारने की साजिश रचता है । रात में गहरी नींद में सोयी  पत्नी के सर पर भारी भरकम पत्थर पटक देता है और आपसी झगडे को अंत कर देता है ।

अपनी बात को काटने वाली, विरोध  में उॅूंची आवाज में बोलने वाली औरत को भला भारतीय समाज का पति हजम कर पायेगा !  हॉं में हॉं मिलाना, नीची आवाज में बोलना ही तो औरत का गहना है !! इन संस्कारों में पला बढा युवक अपनी पुरूषत्वी वर्चस्व को बट्टा चढता कैसे देख पायेगा । आश्चर्य है, कि इस पुरूष अहंकारी मानसिकता के पति को , पत्नी की मौत ही, झगडे का पर्याय दिखायी पडा , तलाक नहीं !!





विधित दंड   : भारतीय दंड संहिता का धारा 302 . 
घटना व अपराध 

लगभग सारे भारतीय विवाहित पुरूष की मानसिकता है, पत्नी को अपना अधिनस्थ गुलाम मानना।बांदी अगर अपना हुक्म बजाती है तो, उसे हार उपहारों से नवाजेंगे। नहीं  तो ? नहीं  का तो पर्याय निर्दिष्ट है । उस बांदी के नसीब में अपने आका के ही हाथों मिलने वाली प्रत्यक्ष मौत की सजा !!मारना पीटना तो पुरूषों का जन्म सिद्ध अधिकार ठहरा । पूछा जाय तो कहेंगे, जो कहता हूॅं नहीं करती , साली उल्टा जुबान लडाती है !! कहीं यह संभव है । अपने जीवन में मांस को हाथ से तक न छूने वाली औरत, पति के कहने पर मांस पकाये । शराब की बू से मितली खानेवाली औरत, पति के गिलास भरे । ऐसा करने से पत्नी ने मना किया।

दौडधूप कर , रॉशन की पाली में घंटोंभर ठहरकर, मिट्टी के तेल के डब्बे घर में सजाकर रखी  थी पत्नी ने । घर में मांस मछली पकाने, शराब के गिलास भरने को लेकर शुरू हुआ पति पत्नी  के बीच झगडा। तैश खाया पति  ! सारे जलावन तो घर में ही मौजूद   थे !! उलीच देता है सारा डब्बा घासलेट का पत्नी  पर और उसे कर देता है चिनगारी के हवाले !! घर का चूल्हा जलाने के लिए , परिश्रम से जिस मिट्टी के तेल को संजोकर रखा  था, उसी से दाह संस्कार हो जाता है औरत का !!

केस न 8,9,10,11,12. सजाबंदी संख्या, नाम, स्थान ,जाति धर्म  (गोपनीय) 
विधित दंड   : भारतीय दंड संहिता का धारा 302,147,148,341,
घटना व अपराध 

दिल दहला देनेवाला हत्याकांड । पॉंच मित्रों का मिलकर, तीन भाईयों की एक ही घटना स्थलपर हत्या । पॉंच मित्रों में किसी एक की पत्नी का, मृतक भाइयो में किसी एक के साथ के अनैतिक संबंध को लेकर संघर्ष । बात से बात बढती हुई , हाथापायी पर उतर आयी । अगले ही क्षण कुल्हाडी से तीनों भाइयों को मौत के घाट उतार देते हैं पांच मित्र

दूसरे की पत्नी मेरी बांह  में ! लेकिन मेरी पत्नी दूसरे की बांह  में ? असंभव !! भारतीय स्त्री के चरित्र की शुद्धता और पत्नी के देह की पावित्रता का प्रश्न भारतीय पतियों के सम्मुख रामराज्य के धोबी की मानसिकता का उत्तर लिया हुआ है । धोबी साधारण आम गरीब हो तो क्या हुआ , पुरूष तो है । भारतीय समाज में स्त्री के शील की शुद्धता के पीछे जाति धर्म और जनांगीय मर्यादा का तमगा भी लगा हुआ है । विवाहेतर संबंधों के लिए भारतीय संविधान में बने कानूनी प्रावधान अपने कदम उठाने से पहले ही समाज की, वर्जित अनैतिक मान्यताओं की, व्यवस्था की कुल्हाडी उन कदमों को काट डालती है ।

केस न 13.    सजाबंदी संख्या, नाम, स्थान ,जाति धर्म  ( गोपनीय ) 
विधित दंड   : भारतीय दंड संहिता का धारा 302, 201.
घटना व अपराध

अपराध के पीछे केवल और केवल पुरूष का ही हाथ होता है । ऐसी बात  नहीं । स्वार्थ और अपनी व्यक्तिगत इच्छाओ के लिए, पुरूष संबंधों को भुनाने के स्त्री के प्रयत्नो का कच्चा चिट्ठा भी अपराधिकों के फाइलों में बंद मिलता है। अनैतिक संबंध को अंजाम देने  के लिए, रास्ते का रोडा बने पति को खुरपी  से मारकर खत्म कर देने की साजिश में साथी प्रेमी  का साथ देनेवाली पत्नी की मानसिकता की कहानी बर्बर है। विवाहेतर संबंध को अनैतिक मानकर, अपनी मर्यादा को आंच आता देखकर, विरोध करनेवाले पति के हाथ लगती है उसकी ही मौत ।

केस न 1४ .     सजाबंदी संख्या, नाम, स्थान ,जाति धर्म  (गोपनीय ) 
विधित दंड   : भारतीय दंड संहिता का धारा 302, 203.
घटना व अपराध 

चिंता तो चिंतित को चिता की ओर ले जाती है लेकिन शंका और गुमान में यह बात उलटी पडती है । शंका और गुमान तो शंकालु को नहीं अपितु  जो शंकित है उसे चिता की ओर ले जाते हैं । यह पुरूष की आम शंकालु मानसिकता है, कि उसकी पत्नी अनैतिक संबंध को पाल रही है । इस केस में, लगभग पैंतीस वर्ष के पति को यह गुमान हो गया है कि उसकी पत्नी अपने ही संबंधी के साथ दैहिक संबंध रखी हुई  है । गुमान गहराते जाता है । पत्नी के हरेक व्यवहार पर नजर रखे शंकित पति का खून पिलिया रोगी की हर नजर पीली कथन की तरह पत्नी की हर बात, हर हरकत से खौलने लगता है । सोचना क्या था ? सुबह छः बजे किसी बहाने खेत की ओर पत्नी को लेजाता है, कुल्हाडी से टुकडे कर देता है।
जो अपनी नहीं हुई , भला वह किसी और की कैसी ? पुरूष, आजीवन सजा के तहत बंदीखाने का सजा भुगत रहा है ।

चलिए, सलाखों के पीछे की और बाहर की कहानी की सच्चाई तो हमने देख ली। इन सजाबंदियों की सजा के बाकी सालों को माफ करने या न करने का निर्णय तो खैर सरकारी कार्यवाही की रही है, इसलिए  गोपनीय है । लेकिन क्या इन सारे अपराधों के पीछे अपना पंजा कसे बैठी पुरूष की दंभी अहंकारी मानसिकता गोपनीय है । लगभग इन सारे अपराधों के मूल में, स्त्री को अपना इच्छित चीज माननेवाली, अपनी बांदी  या गुलाम की तरह स्त्री के व्यक्तित्व को वस्तु बनाकर सरे आम समाज के बाजार में व्यवहार में लायी जाने वाली पुरूष की वर्चस्वी उपभोक्तावादी स्वछंदता की भावना क्या जाहिर नहीं ? समाज की यह रूग्ण मनोभावना क्या              लाइलाज है ?

लाइलाज को क्या इलाज ? वाला अंदाज तो समस्या का परिहार नहीं ठहरा। हाथ कंगन को आरसी क्या ? इस सत्य से मुॅंह मोड नहीं सकते कि, समाज में जड जमायी पारंपरिक पुरूषवर्चस्वी मानसिकता के पलने बढने में स्त्री भी उतनी ही जिम्मेदार है जितना कि पुरूष। और तो और इन संस्कारों के अरूप अनाम असीम जडों को खाद पानी देते आया है हमारे देश की सामाजिक, शैक्षिक और आर्थिक व्यवस्था । अपने देसी जमीन में गहरे में उतरे इन जडों को काटने की आवश्यकता है । इसके लिए, स्त्री और पुरूष दोनों को ही कुल्हाडी उठानी है । उठी कुल्हाडी की धार को तरतीब देनी है । शिक्षा का प्रचार प्रसार, आर्थिक  विकास की योजनाएॅं, महिला उत्पीडन विरूद्धी कानून आदि सरकारी मुहिमों से भी बढकर समाज के उभय हिस्सों को अपनी अपनी भागीदारी एवं हिस्सेदारी  निभानी है । आरोप प्रत्यारोपों के कानूनी दांव पेंच से ऊपर  उठकर, स्त्री और पुरूष को सौहार्द , संयम, सहयोग ,सहजीवन के प्रगति के मंत्र को आत्मसात करनी है । आइए, सलाखों के पीछे के अपने ही समाज के दूसरे हिस्से से हम कहें ,
देख बढरही हैं तेरी ओर,
सहेज लेने के लिए
जमीन पर पडने से पहले
पश्चाताप के ऑंसू तेरे ,
हथेली पर अपने ।
सलाखों के पीछे की उष्मा  ,उसॉंसें तेरी,
उगा देंगी दाने विश्वास के,
हथेली पर मेरे लहलहायेगी,
हरीघास, बिछलती, डोलती, बंधनहीन,
सलाखें हीन ।
क्यूॅं कि शोभते हैं पीछे सलाखों के,
केवल और केवल,
अपने अपने भगवान !!

चाहे नरक में दीजो डार

नासिरूद्दीन हैदर खाँ


नासिरूद्दीन हैदर खाँ पेशे से पत्रकार हैं और जेंडर जिहाद के संपादक हैं .

( मुसलमानों के बीच स्त्री -पुरुष के गिरते अनुपात और भ्रूण ह्त्या के सन्दर्भ में यह शोधपूर्ण आलेख मुसलमान महिलाओं की दयनीय स्थिति का चित्र सामने रखता है. )


‘..और (इनका हाल यह है कि) जब इनमें से किसी को लड़की पैदा होने की खुशखबरी दी जाती है तो उसका चेहरा स्याह पड़ जाता है और वह तकलीफ में घुटने लगता है। जो खुशखबरी उसे दी गयी वह उसके लिए ऐसी बुराई की बात हुई कि लोगों से छिपा फिरता है। (सोचता है) अपमान सहन करते हुए उसे जिंदा रहने दे या उसे मिट्टी में दबा दे।’ (कुरान: सूरा अल-नहल आयत ५८-५९)


यह चौदह सौ साल पहले का अरब समाज का चेहरा था, जिसका जि़क्र क़ुरान की इस आयत में आता है। …मगर इन चौदह सौ सालों में कुछ नहीं बदला तो बेटियों के पैदा होने का दु:ख! क़ुरान की दुहाई देने वाले कितने मुसलमान हैं, जो बेटी की पैदाइश को ख़ुशख़बरी मानते हैं और लड्डू बाँटते हैं? आज भी ‘बेटी’ सुनते ही ज्‍यादातर लोगों का चेहरा स्याह पड़ जाता है। … यह आयत आज के भारतीय समाज पर पूरी तरह सटीक है।

आम तौर पर बार-बार बताया जाता है कि इस्लाम ने औरतों को काफी हुक़ूक़ दिए हैं। सचाई भी है। लेकिन क्या वाक़ई में ‘मर्दिया सोच के अलम्बरदार’ मुसलमान औरतों को वे हक़ दे रहे हैं? और कुछ नहीं तो सिर्फ जि़दगी का हक़! जी हाँ, पैदा होने और जिंदा रहने का हक़।

कल्पना करें कि एक सुबह जब हम उठें तो पता चले कि लखनऊ और मथुरा में रहने वाले सभी लोग गायब हो गये हैं। … उस सुबह कोहराम मचेगा या जिंदगी हर रोज़ की तरह इतमिनान से चलेगी? अफसोस, इतनी तादाद में मुसलमान औरतें गायब हैं, लेकिन किसी के कान पर जूँ तक नहीं रेंगती।सन् 2001 की जनगणना कई मायनों में अहम है। यह पहली जनगणना है, जिसके आँकड़े विभिन्न मज़हबों की सामाजिक-आर्थिक हालत का भी आँकड़ा पेश करती है। इसने कई मिथक तोड़े, तो कई नए तथ्य उजागर भी किए। एक मिथक था कि मुसलमानों में लिंग चयन और लिंग
च‍यनित गर्भपात नहीं होता!

सन् 2001 की मरदुमशुमारी के मुताबिक मुसलमान देश की कुल आबादी का 13.4 फीसदी हैं। यानी करीब तेरह करोड़ इक्यासी लाख अट्ठासी हजार। इसमें मर्दों की आबादी सात करोड़ तेरह लाख (7,13,74,134) है। क़ायदे से इतनी ही या इससे ज्यादा औरतें होनी चाहिए। लेकिन इस आबादी में मर्दों के मुकाबले पैंतालीस लाख साठ हजार (45,60,028) मुसलमान औरतें कम हैं या कहें गायब हैं। यानी कल्पना करें कि एक सुबह जब हम उठें तो पता चले कि लखनऊ और मथुरा में रहने वाले सभी लोग गायब हो गये हैं। … उस सुबह कोहराम मचेगा या जिंदगी हर रोज़ की तरह इतमिनान से चलेगी? अफसोस, इतनी तादाद में मुसलमान औरतें गायब हैं, लेकिन किसी के कान पर जूँ तक नहीं रेंगती।

तत्कालीन अरब समाज के कई कबीलों में लड़कियों की पैदाइश को अपशगुन माना जाता था और उन्हें मार डालने की रवायत थी और चौदह सौ साल पहले क़ुरान ने और इस्लाम ने इसे बड़ा जुर्म माना। कुरान के सूरा अत-तकवीर की आयत (एक से नौ) है-

जब सूरज बेनूर हो जायेगा/ और जब सितारे धूमिल पड़ जाएँगे/ जब पहाड़ चलाये जाएँगे/../ और जब दरिया भड़काए जाएँगे/../ और जब जिंदा गाड़ी हुई लड़कियों से पूछा जाएगा/ कि वह किस गुनाह पर मार डाली गई।

यानी मुसलमानों से कहा गया कि उस वक्त को याद करो जब उस लड़की से पूछा जाएगा जिसे जिंदा गाड़ दिया गया था कि किस जुर्म में उसे मारा गया। इस तम्बीह का आज के मुसलमान कितना पाबंद हैं, देखें। आज बेटियों को जिंदा गाड़ने की ज़रूरत नहीं है बल्कि रहम (गर्भ) की जाँच कराकर उसे खत्म कर दिया जा रहा है। इस लिहाज़ से क़ुरान की आयत की रोशनी में यह भी गलत है।

औरतें कहीं हवा में गायब नहीं हो गईं। बल्कि खुद मुसलमान, बेटों की ललक में उन्हें पैदा ही नहीं होने दे रहे। हिन्दुओं, सिखों और जैनियों की तरह मुसलमान भी ‘बिटिया संहार’ में शामिल हैं। उत्तर प्रदेश में बुंदेलखंड की सबसे ज्यादा मुसलमान आबादी वाले शहर बांदा, पूरी दुनिया में तहजीब का झंडा उठाने वाले शहर लखनऊ और इल्म के मरकज़ अलीगढ़ और दारुल उलूम, देवबंद की वजह से बार-बार चर्चा में रहने वाली धरती सहारनपुर में मुसलमान जोड़े अपनी आने वाली औलाद की सेक्स की जाँच करा रहे हैं और लड़की को पैदा नहीं होने दे रहे। (जाहिर है सब ऐसा नहीं करते।) ऐसी ही हालत गुजरात, महाराष्ट्र, बिहार, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, दिल्ली में भी है। कहीं काफी पहले से ही दूसरे मज़ाहिब के लोगों की ही तरह बेटी नहीं पैदा होने दी जा रही थी तो कहीं अब देखा-देखी यह चलन जोर पकड़ रहा है।

बेटियों को गायब करने का काम तहज़ीब याफ्ता मुसलमान ख़ानदान, पढ़े-लिखे, धनी, ज़मीन वाले, और शहरों में रहने वाले सबसे बढ़ कर कर रहे हैं। इस काम में मुसलमान डॉक्टर भी खुलकर मदद दे रहे हैं। क्यों, क्योंकि बेटियों को पैदा न होने देने का धँधा काफी मुनाफे वाला है।मुसलमानों की आबादी के लिहाज से उत्तर प्रदेश काफी अहम है। यहाँ की आबादी में साढ़े अट्ठारह (18.5) फीसदी यानी तीन करोड़ सात लाख चालीस हजार (30,740,158) मुसलमान हैं। यहाँ की मुसलमान आबादी में तेरह लाख 16 हजार बेटियाँ गायब हैं। यानी, मुसलमान लड़कियों को गायब करने में अकेले यूपी का हिस्सा करीब 29 फीसदी है बाकि में देश के पूरे राज्य ! यहाँ के चंद मुस्लिम बहुल जिलों का हाल जान लें। अलीगढ़ की आबादी से करीब 33 हजार लड़कियाँ लापता हैं। अलीगढ़ का लिंग अनुपात, मतलब एक हजार लड़कों पर लड़कियों की तादाद, 883 है। इसी तरह लखनऊ में करीब साढ़े सात लाख (748687) मुसलमान हैं। यहाँ मर्दों के मुकाबले करीब लगभग चौंतीस हजार (34169) मुसलमान औरतें कम हैं। मर्दों के मुकाबले सहारनपुर में सत्तहत्तर हजार तो मुजफरनगर में करीब चौहत्तर हजार, बिजनौर में 58 हजार और कानपुर शहर में करीब चालीस हजार मुसलमान औरतें कम हैं। इनमें हर उम्र की औरत शामिल हैं और वह भी शामिल है जिसे यह जानकर पैदा नहीं होने दिया गया कि वो लड़की है और जिनके साथ लड़की होने के नाते जिंदगी में हर कदम पर भेदभाव किया गया और मौत के मुँह में ढकेल दिया गया। इनमें से कइयों को सिर्फ इसलिए मार दिया गया कि वे अपने साथ मोटा दहेज लेकर नहीं आई थीं।

बेटियों को गायब करने का काम तहज़ीब याफ्ता मुसलमान ख़ानदान, पढ़े-लिखे, धनी, ज़मीन वाले, और शहरों में रहने वाले सबसे बढ़ कर कर रहे हैं। इस काम में मुसलमान डॉक्टर भी खुलकर मदद दे रहे हैं। क्यों, क्योंकि बेटियों को पैदा न होने देने का धँधा काफी मुनाफे वाला है। इस मसले के सामाजिक पहलू पर नजर डाली जाए तो अंदाजा होता है कि समाज में लड़कियों को कमतर समझने का रुझान तो था ही मगर जहेज के बढ़ते रिवाज ने अब इनकी जिंदगियों को ही खतरे में डाल दिया है। पंजाब और पश्चिमी उत्तर प्रदेश आर्थिक रूप से काफी खुशहाल हैं लेकिन वहाँ भी बेटियाँ अनचाही हैं।

सबसे बढ़कर तकनीक की तरक्की ने लड़कियों के खिलाफ पहले से ही मौजूद पितृसत्तात्म विभेद की खाई को और ज्यादा गहरा करने का काम किया है। तकनीक का इस्तेमाल डिजायनर फेमिली बनाने में किया जा रहा है। यानी एक बेटा या दो बेटे या एक बेटा और एक बेटी। बिटिया संहार का नतीजा, हमारे सामने आ रहा है। लड़कियाँ तो लड़कों की चाह में गायब की गईं लेकिन कभी किसी ने सोचा, लड़कों की दुल्हन कहाँ से आयेगी ! यही नहीं ये तो क़ुदरत के निज़ाम को बर्बाद करना है। कुरान की रोशनी में अगर आज के हालात में अगर यह कहा जाए कि और उस वक्त को याद करो जब बेटियों से यह पूछा जाएगा कि किस बिना पर तुम पेट में ही पहचान कर मार डाली गयी। आप ही बताएँ कि उस लड़की का क्या जवाब होगा? कहीं वह यह तो नहीं कहेगी-

ओरे विधाता, बिनती करुँ, परुँ पइयाँ बारम्बार

अगले जन्म मोहे बिटिया न कीजो, चाहे नरक में दीजो डार

(यह काम एचपीआईएफ फेलोशिप के तहत किया गया है।)

(जेंडर जिहाद से साभार )

स्त्री आत्मकथा : आत्माभिव्यक्ति और मुक्ति प्रश्न

(डा बाबा साहब भीम राव आम्बेडकर विश्वविद्यालय , दिल्ली, के हिन्दी विभाग में शोधरत कुमारी ज्योति गुप्ता के ‘ स्त्री आत्मकथा  :  आत्माभिव्यक्ति और मुक्ति प्रश्न, सन्दर्भ : – ” अन्या से अनन्या ” और एक कहानी यह भी ” विषयक  शोध का एक अंश हम प्रकाशित कर रहे हैं. ‘स्त्रीकाल’ , खासकर स्त्री विमर्श और स्त्री अध्ययन के विद्यार्थियों और शोधार्थियों का अपना मंच है . यहाँ आप न सिर्फ विभिन्न शोध और सामयिक लेखों के लिए जुड़ सकते हैं , बल्कि स्त्री रचनाधर्मिता और स्त्रीवादी रचनाओं का पाठ भी कर सकते हैं . स्त्रीकाल के पिछले अंकों से  शोध -रिफरेन्स के लिए शोधार्थी हमसे संपर्क करते रहते हैं , आप यहाँ पिछले महत्वपूर्ण अंक भी देख सकते हैं , जिन्हें हम धीरे -धीरे अपडेट कर रहे हैं . हम जल्द ही ‘स्त्रीकाल’ के प्रिंट एडिशन की तरह वेब एडिशन के लिए भी ISSN नंबर हासिल कर लेंगे .  स्त्रीविमर्श के  शोधार्थी अपने शोध -आलेख और  शोध -प्रबंध हमें क्रमशः मंगल फॉण्ट और पी डी ऍफ़ फ़ाइल में भेजा करें. )

आत्मकथा के सन्दर्भ में कृष्णानंद गुप्त जी ने लिखा है -“आत्मकथा हमारे लिए नई वस्तु है भारतीय सहित्यकारों ने अपने सम्बन्ध में कभी कुछ कहने की आवश्यकता नहीं समझी ,यहाँ तक कि दूसरों के संबंध में भी वे सदैव चुप रहें हैं । इसी से हमारे यहाँ इतिहास नहीं ,जीवन चारित नहीं और आत्मकथा नाम की चीज तो बिलकुल ही नहीं, हम कह सकते हैं कि यह अंतिम वस्तु हमारे यहाँ पश्चिम से आई है ।”1 अतः इस बात से सहमत होने में कोई आपत्ति नहीं कि आत्मकथा नामक विधा पश्चिम से भारत में आई है । सेंट आग्स्तैन पहले व्यक्ति थे जिन्होंने ‘confession ‘ लिखकर अपने को व्यक्त का नया तरीका अपनाया। इसके बाद रूसो और गेटे तथा तमाम साहित्यकारों और राजनीतिज्ञों ने आत्मकथा के माध्यम से ‘स्व ‘को व्यक्त किया । इससे प्रेरित होकर हिंदी में भी आत्मकथाएं लिखी गयीं ।

रेखांकन /गुलज़ार

सामान्यतः आत्मकथा विधा अन्य गद्य विधाओं की तरह हिंदी साहित्य के लिए आधुनिक काल  की उपज है. यह कई रूपों में लिखी जाती है ,यथा -डायरी ,संस्मरण, जर्नल,पत्र आदि । अज्ञेय ने लिखा है ”आत्मकथा,संस्मरण और जीवनी तीनों   जीवन वृत्त से जुडी होने के कारण साथ राखी जा सकती हैं लेकिन विशेष रूप से ‘ जीवनी ‘ और ‘आत्मजीवनी ‘में भी जो बुनियादी अंतर है उसका बहुत अधिक महत्व है । किसी दूसरे  के जीवन को तटस्थ असंपृक्त अथवा वस्तुपरक भाव से देखना आसन होता है ,स्वयं अपने जीवन और कर्म के प्रति ऐसी तटस्थता निश्चित ही बड़ी कठिन साधना मांगती है । “2 अतः कहा जा सकता है कि अपने को तटस्थ बेबाक प्रकट करने के कारण ही आत्म्काथा जीवनी से अलग हो जाती है क्योंकि जीवनी में व्यक्ति और उसके समय का सच लिखना आसन होता है जबकि आत्मकथा में निजी जीवन का सच लिखना मुश्किल. प्रायः यह देखा जाता है कि जीवन मूल्यों की विशिष्ट व्यवस्था रचनाकार प्रस्तुत तो करता है लेकिन अपनी कमजोरियां व्यक्त करते समय वह ज्यादा सजग हो जाता है जिससे आत्मकथा जटिल हो जाती है । रमणिका गुप्ता ने लिखा है ”आत्मकथा दूसरी विधाओ से भिन्न होती है चूँकि ये सत्य अनुभवों पर आधारित होती है इसमें परिस्थितियाँ बदली  नहीं जाती बल्कि परिस्थितियों का दस्तावेजीकरण होता है …आत्मकथा में जीवन के सत्य को दर्ज किया जाता है । पाठक या समाज उससे अपने निष्कर्ष खुद निकलता है । आत्मकथा सापेक्षित सत्य के इस दौर में बहुजन हिताय सत्य तक पहुँचने की राह दिखाती है ।”3

महिला आत्मकथा लेखन के साथ यही बात है, सम्पूर्ण सत्य यहाँ भी व्यक्त नहीं हो पता .इसका  कारण  ‘स्व’ के प्रति सजगता है लेकिन जब ये सजगता ख़त्म होती है तो स्त्री उन विषयों पर भी खुल के बात करती है जो नितांत निजी या यूँ कहें प्राइवेट है  , जब वह अपने जीवन और लेखन में पारदर्शिता बरतती है तब लोग उसे अश्लील मानने लगते हैं जबकि इस अश्लीलता को जिंदगी में हर व्यक्ति विशेषकर औरतें हर रोज भोगती हैं. आत्मकथा अभिव्यक्ति का माध्यम है जिसमे इच्छा का महत्व  होता है । Laura Marcus ने  आत्मकथा में ‘Intention ‘को महत्त्व देते हुए लिखा “Within critical discussion of autobiography ,’Intention’ has had a necessary and often unquestioned role in providing the critical link between author ,narrator and protagonist. Intention, however, is further defined as a particular kind of writing. Trust the author ,this rather circular argument goes ,if s/he seems to be trustworthy. Autobiography depends on seriousness of the author the seriousness of his personality and his intention of writting.”4 तात्पर्य यह है कि आत्मकथा में ‘इच्छा ‘ लेखक और मुख्य पात्र के बीच एक आवश्यक और अप्रत्याशित भूमिका निभाती है, जो भी हो ,इच्छा रचना  की सत्यता की अनिवार्य शर्त है । इसलिए इसे ईमानदारी से व्यक्त किया जाना चाहिए । लेखक जो सोचता है उसी की अभिव्यक्ति अपनी आत्मकथा में करता है इसलिए आत्मकथा लेखक की गंभीरता ,उसके व्यक्तित्व की गंभीरता और उसके लेखनी की इच्छा  पर निर्भर करता है ।

किसी भी लेखिका को समझने के लिए उसका सृजनात्मक लेखन ,जैसे कहानी,उपन्यास तथा संस्मरण काफी होता है ,फिर उसे आत्मकथा क्यों लिखनी चाहिए,उसके अनुभव का ऐसा कौन सा पक्ष है ,जो अन्य रचनाओं के जरिये पूरा नहीं हुआ। इसपर अपना विचार प्रकट करते हुए डा०जगदीश्वर प्रसाद चतुर्वेदी ने लिखा है -“स्त्रियाँ लम्बे समय से सार्वजनिक जीवन से बाहर  रही हैं ,पर्दे,में ,घर में कैद रही हैं।उनकी कोई पहचान नहीं रही है।आज भी औरतों का बड़ा तबका घरों में कैद है। चूँकि वह घर में कैद है यही कारण  है कि स्त्री का प्राइवेट संसार और शरीर ये दोनों ही साहित्य से ग़ायब रहा  है स्त्री का  ‘आत्म ‘ दमित,उत्पीडित रहा है। स्त्री का ‘आत्म’ या ‘स्व’ कभी भी आनंद भरा नहीं रहा है .स्त्री के जिस रूप और सौंदर्य का वर्णन हमारे साहित्य की उपलब्धि रहा है उसका स्त्री की यथार्थ जिंदगी से कोई सम्बन्ध नहीं है वहाँ स्त्री का कृत्रिम रूप चित्रित हुआ है।स्त्री आत्मकथा के आने से स्त्री का दमित शोषित ‘आत्म’ प्रकाशित होता है इसमें स्त्री के अदृश्य रूपों और अव्यक्त जिंदगी को पढ़ा जा सकता है ।स्त्री आत्मकथा में स्त्री के जीवन की चुप्पी या साइलेंस के इलाकों को देखा जाना  चाहिए।”5 अतः हम कह सकते हैं कि अतीत की दमित स्मृतियों से मुक्ति के लिए तथा अपनी चुप्पी तोड़ने के लिए आत्मकथा लिखी जाती है, इसमें कुछ जीवन की उप्लब्धियों को कलात्मक ढ़ंग से अभिव्यक्त करती हैं तो कुछ सिलसिलेवार तरीके से अपनी संवेदनाओं को शब्दों के माध्यम से मूर्त रूप प्रदान करती हैं ,जिसमे उनका संघर्ष विभिन्न रूपों में दीखता है। स्त्री आत्मकथा की गुत्थियों को खोलते हुए डा ०जगदीश्वर चतुर्वेदी ने लिखा है -”औरत इसलिए भी आत्मकथा  लिखती है क्योंकि वह अतीत से मुक्त होना चाहती है। मुक्त होने के लिए बोलना जरुरी है जो लोग सोचते हैं कि वे बिना  बताये मुक्त हो जाएँगे उन्हें ग़लतफहमी है। मुक्ति के लिए गोपन रखना जरुरी नहीं है स्त्री अपने को सुरक्षित करने ,दुबारा जोड़ने और पुनः सृजित करने के लिए आत्मकथा लिखती है।वह अपरिहार्य को बताती है, उद्घाटित करती है। ”6

 डा० प्रभा खेतान की आत्मकथा भी इसी रूप में हमारे सामने आती है ,जहाँ वे तयशुदा मानदंड के खिलाफ जाकर अपनी अनुभूति की सच्ची अभिव्यक्ति करती हैं।’अन्या  से अनन्या’ में वे मुक्ति की विभिन्न पहलुओं जैसे पित्रिसतात्मक समाज से मुक्ति,आर्थिक मुक्ति,अभिव्यक्ति की आजादी,स्त्री की बाध्यकारी स्थिति से मुक्ति को दर्ज करती हैं ।यह एक ऐसी आत्मकथा है जो अपने को अभिव्यक्त तो करती है साथ ही आत्म के ऊपर सवाल भी खड़े करती है।लेखिका खुद को प्रश्नों के कटघरे में खड़ा करती है और कहती हैं -” writing autobiography is also like a stripe-tease dance. you start taking of your clothes on the road. There is always a dark corner in the mind of the writer which wishes to express itself and to eulogize while wishing at the same time that people don’t take her words in the wrong manner. Whatever is written should be taken in the right perspective and meaning. It is up to the readers.”7  तात्पर्य यह है कि आत्मकथा लिखना स्ट्रिपटीज डांस की तरह है ,जिसमे आपको एक-एक कर अपने कपडे दर्शकों के सामने उतारने पड़ते हैं लेखक अपनी समस्त साहसिक उपलब्धियों के साथ वैयक्तिक कमजोरियों को पाठक समुदाय के सामने रखते हुए यह निर्णय करने का दायित्व उन्हीं को सौप देता है। अतः यह पाठक समुदाय पर निर्भर करता है कि वह प्रभा खेतान को बदचलन औरत मानना चाहता है या एकाग्र निष्ठा से उस आदमी को प्रेम करने वाली औरत जो इनका पूरी तरह से अपना कभी नहीं हुआ। यहाँ निर्भीक भाव से स्वयं को अभिव्यक्त  करने वाली महिला का रूप सामने आया है जो तमाम तरह के मुक्ति प्रश्नों से जुझते हुए सामाजिक चुनौतियों से स्वीकार करती है।

 आर्थिक मुक्ति या यूँ  कहें  अस्मिता की तलाश इस आत्मकथा का एक महत्वपूर्ण अंश है ।डा0 प्रभा खेतान ने कहा भी है ” औरत समाज में दोयम स्तर पर है , मैं  तो खुद दोयम दर्जे की जिन्दगी जी रही थी,जिससे निकलने को छटपटा रही थी और सिमोन के इस कथन को आत्मसात कर लिया – फ्रीडम स्टार्टस फ्रॉम पर्स ( freedom starts from purse ) मुक्ति की पहली शर्त है कि स्त्री आर्थिक रूप से स्वावलंबी हो। यदि इस एक शर्त को कोई औरत पूरा कर ले तो वह अपनी जिन्दगी कि आधी से अधिक ल जीत लेती है। ”8  ‘अन्या से अनन्या’ में इस लड़ाई से जद्दोजहद करती स्त्री दिखाती है। महिला उद्योगपति प्रभा खेतान का दुस्साहस इस रूप में सामने आता है कि वह मारवाड़ी पुरुषों की दुनियां में घुसपैठ करती है। कलकत्ता चेम्बर्स ऑफ़ कोमर्स की अध्यक्ष बनती है अपनी आत्मकथा में इस मुक्ति संघर्ष को व्यक्त करती हैं अतः यह आत्मकथा सिर्फ स्त्री- पुरुष सम्बन्ध तथा पति -पत्नी के बीच ‘वह ‘ की  भूमिका निभाने वाली स्त्री की नहीं बल्कि अस्मिता की तलाश में निकली ऐसी स्त्री की है जिसने तयशुदा और प्रचलित मानदंडों के खिलाफ स्वयं को खड़ा किया।

  आत्मकथा विशेषतः महिला आत्मकथा के सम्बन्ध में चन्द्र तलपडे मोहंती ने अपनी पुस्तक ‘ feminism ‘ में लिखा है -”autobiography is a  genre in which a person unties the  complex  knots of   society at the cost of his/her privacy . autobiography in any language  written by women have raised issued which are pertinent to their liberation from patriarchy and over all change in gender equations.”9  तात्पर्य यह है कि आत्मकथा अपने को अभिव्यक्त करने का वह माध्यम है, जिसके जरिये व्यक्ति समाज की जटिलताओं और अपने निजी संबंधों की गुत्थियों को खोलता है। आत्मकथा ,चाहे वह किसी भी भाषा में लिखी  गई  हो ,वह स्त्री मुक्ति का मार्ग है, जिसके जरिये लेखिकाऍ पितृसत्ता और लिंग दोनों ही स्तर पर अपने को मुक्त करना चाहती हैं। महिला लेखिकाऍ विशेषतः डा० प्रभा  खेतान तथा मन्नू भंडारी की आत्मकथा पर ये बातें लागू होती हैं क्योंकि इन्होने ‘स्व ‘ की अभिव्यक्ति के माध्यम से पितृसत्तात्मक समाज को चुनौती दी जिसमें आत्माभिव्यक्ति की आकांक्षा और मुक्ति संघर्ष साफ तौर पर दिखता .

प्रख्यात लेखिका प्रभा खेतान

 आत्मकथा में ‘ आत्मगोपन ‘ का महत्व होता है ‘ आत्मगोपन ‘ और ‘ गोपन ‘ से सारा समाज घिरा है इस गोपन को खोलने के लिए सदियों से दमित कुंठा से मुक्त होने के लिए आत्मकथा लिखी जाती है ।’ एक कहानी यह भी’ इसका प्रमाण है जहाँ मन्नू भंडारी नितांत निजी प्रसंग का खुलासा करते हुए कहती हैं -” इतना तो समझ में आ गया कि राजेंद्र के दिमाग में एकाएक सामानांतर जिन्दगी कि यह जो अवधारणा पैदा हुई है ,निश्चित ही उसके सूत्र कहीं और ही हैं .पर असलियत को ईमानदारी से स्वीकार करने का साहस तो राजेंद्र में कभी रहा ही नहीं( (कम से कम मेरे सन्दर्भ में )इसलिए अपने हर झूठ ,अपनी हर जिद ,बल्कि यूँ कहूँ कि अपनी हर नाजायज  हरकत को ढंकने के लिए आदत से मजबूर राजेंद्र हमेशा कोई न कोई ऐसा सूत्र भी ढूंढ़ ही लेते है -कभी आधुनिकता के नाम पर तो कभी लेखन के नाम पर तो कभी कोई फलसफा गढ़कर जो उन्हें सही सिद्ध कर दे .” 1 0

 स्त्री आत्मकथा की असली जंग अनखुली सार्वजनिक जिन्दगी के उद्घाटन में छिपी होती है। सामान्यतः स्त्री आत्मकथा में घरेलू जीवन और उसके आख्यान हावी रहते है , किन्तु ऐसी आत्मकथा भी आ रही है ,जहाँ स्त्री घरेलू जीवन अथवा पारिवारिक जीवन के बाहर के सत्य को बता रही हैं। मन्नू भंडारी ने लिखा है -”मुझे इनके खिलाफ शिकायतों का कोई खर्रा नहीं खोलना ,मुझे तो इनकी ‘ विशिष्ट ‘ जीवन-पद्धति का एक उदहारण भर पेश करना है। पर जब -जब इस तरह की कोई घटना घटती ,मै सोचती क्या सभी रचनाकार अपने परिवार के प्रति ऐसी ही गैर -जिम्मेदाराना ,क्रूर हरकतें करते हैं? जहाँ तक मै जानती हूँ ऐसा नहीं है। यह तो राजेंद्र के मन में मुझे लेकर जितनी कुंठाएं जमी हुई थी उसी का परिणाम था  ….मै तो भोगने के लिए अभिशप्त थी ही और अपने इसी तरह के कुकर्मों को राजेंद्र ‘ विशिष्ट ‘जीवन-पद्धति की आड़ ….में, रचनात्मकता की आड़ में तर्क सांगत ही नहीं जायज भी ठहराते थे।” 11.ऐसे कितने ही प्रसंग हैं जो लेखिका के अनकही को बयां करते हैं उन्होंने लिखा भी है ”सन ९२मे अपना आत्मकथ्य लिखने का जो अनुबंध किया था वह आज तक (सन2006)घिसटता रहता ?कभी दो पन्ने लिख दिए तो कभी चार …..”12

अतः हम कह सकते हैं कि यह विधा आत्माभिव्यक्ति का ऐसा माध्यम है, जिसमें  स्त्रियाँ तमाम तरह के मुक्ति प्रश्न और चुनौतियों से जूझते हुए अपनी अतृप्त आकांक्षा को व्यक्त करती हैं।

  सन्दर्भ -ग्रन्थ सूची
1 . गुप्त ,कृष्णानंद :हंस -वाणी ,आत्मकथा ,प्रेमचंद (संपादक ),आत्मकथा अंक ,प्रथम संस्करण -1932 ,प्रथम आवृति -2008 ,विश्वविद्यालय प्रकाशन ,वाराणसी -2211001 ,पृ ० सं ० -167
2 . अज्ञेय ,सच्चिदनंद हीरानंद वत्सयायन :आत्मकथा जीवनी और संस्मरण ,समकालीन भारतीय साहित्य ,सितम्बर-अक्टूबर ,2004साहित्य अकादमी ,नई दिल्ली -110001 पृ ० सं ० -26
3 . गुप्ता , रमणिका :शर्म की परतें खुलती हैं आत्मकथाओं में ,हंस ,सितम्बर 2005 ,अक्षर  प्रकाशन  प्रा ० लि ० ,पृ ० सं ०-50
4 .Anderson, Linda: Autobiography, First Indian Reprint-2007,First published by Routledge 2 Park Square ,Milton Park, Abindon OX on OX14 4RN ,pg no-3
5.  चतुर्वेदी ,जगदीश्वर :स्त्री आत्मकथा :आलोचना पद्धति के मानदंड ,प्रगतिशील वसुधा -73 ,अप्रैल -जून 2 0 0 7 ,भोपाल -462003 पृ ० सं ० 259
6 . चतुर्वेदी ,जगदीश्वर :स्त्री आत्मकथा :आलोचना पद्धति के मानदंड ,प्रगतिशील वसुधा -73 ,अप्रैल -जून 2 0 0 7 ,भोपाल -462003 पृ ० सं ० 26 2
7http;//www.google.co.in/search?/=en&q=relatedeconomictimes.indiatimes.com/articleshow/msid-3504762,flstny-1cm
8 . खेतान ,प्रभा :प्रभा खेतान से साधना अग्रवाल की बातचीत ,वागर्थ ,सितम्बर -2 0 0 3 ,भरतीय भाषा परिषद् ,कोलकाता -700017 ,पृ ० सं ० -37
9http;//www.google.co.in/search?/=en&q=relatedeconomictimes.indiatimes.com/articleshow/msid-3504762,flstny-1cm
10 . भंडारी ,मन्नू :एक कहानी यह भी ,पहला संस्करण -2008, (पेपरबैक्स ),राधाकृष्ण प्रकाशन प्रा ० ली ० ,नई दिल्ली -1100 02 ,पृ ० सं ० -205
11 . वही ,पृ ० सं ० – 57
12 . वही ,पृ ० सं ० – 99

दिल्ली में नाइजीरियन यौन- दासियाँ

OLUTOSIN OLADOSU ADEBOWALE


OLUTOSIN OLADOSU ADEBOWALE  स्त्री अधिकार कार्यकर्ता हैं, नागारिक पत्रकार हैं. वे बच्चों पर यौन हिंसा के खिलाफ काम करती हैं . वे अग्रेजी में एम ए हैं.

( आज हम स्त्रीकाल में एक नाइजीरियन शोधार्थी से नाइजीरियन पत्रकार की बातचीत प्रकाशित कर रहे हैं , जो दिल्ली में देह व्यापार में शामिल नाइजीरियन नागरिकों की मजबूरी को स्पष्ट करता है .  दिल्ली की सड़कों , गलियों में अफ्रीकन ‘काली’ लड़कियों को देखकर दिल्लीवासियों की आम धारणा उनके खिलाफ होती है. उन्हें वे ‘वेश्या’ या ‘स्मगलर’ समझते हैं . इस धारणा को और पुष्ट किया था दिल्ली में आई अरविंद केजरीवाल की ‘ मसीहाई अंदाज वाली सरकार ने.’ हम अक्सर अपनों से दूसरों के मामले में तय धारणाओं से प्रेरित होते हैं , जिसे अपने लिए तो कतई पसंद न करें. यह सच है कि दिल्ली में इनमें से कई लडकियां ‘देह व्यापार’ में हैं, लेकिन दिल्ली के इस बड़े बाजार में उनका क्रेता कौन है , वह तो दिल्ली में ही रहता है न और अधिकांश मामलों में भारतीय भी है.  इस बातचीत को वे न पढ़ें , जो इसमें अपनी धारणाओं का समर्थन तलाशने आयेंगे , बल्कि वे संवेदनशील पाठक पढ़ें , जिन्हें दुनिया भर में कहीं भी ऐसी मजबूरियों और स्वेच्छाओं की जड़ में नागरिक सरकारों की असफलता दिखती है, जो ‘देह व्यापार’ में शामिल लड़कियों को सम्मानजनक जीवन देने में असफल हैं. )

क्या तुम अपने बारे में बता सकते  हो ? 

मैं Olufunbi Falayi हूँ . मैं भारत में एक छोटे ट्रेनिंग प्रोग्राम के तहत सामजिक उद्यमी हूँ

अफ्रीकी महिलाओं के दिल्ली के अनुभव के बारे में कुछ कह सकते  हो ?

मैं एताशा सोसाइटी ( Etasha Society ) से सम्बद्ध था  , जहाँ प्रशिक्षण के दौरान मुझे कार्य अनुभव लेने थे, और मुझे भारत के नेशनल स्किल डेवलपमेंट कारपोरेशन के कार्यान्वयन के तरीकों को समझना था. मैं खानपुर के एक  इलाके में रहता था . केरल में  , जहाँ मेरा संस्थान स्थित है , मुझे  किसी नाइजीरियन नागरिक  से मिलने का मौक़ा नहीं मिला , लेकिन दिल्ली की सड़कों पर उनकी बड़ी संख्या देखकर मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहा. पहले दिन मैं दो ‘काली महिलाओं’ से मिलकर मैं बहुत खुश हुआ  , हमने एक दूसरे से मिलने की खुशी का इजहार किया और हम एक –दो दिन में फिर मिलने को तय हुए. मैंने एक नाईजीरियन लड़की को अपने घर पर बुलाया और नाइजीरिया की राजनीति पर हम बातें करने लगे, जिससे जल्द ही वह ऊब गई . उसने पूछ लिया , ‘ मैं यहाँ थोड़ी देर के लिए हूँ या पूरी रात के लिए ? ‘

नाइजीरियन लडकियां , जिनके प्रति नजरिया बदलने की जरूरत है

मैं तो एकदम से सदमे में आ गया  , वह मेरे अपार्टमेंट में किसी बहनापे या भाईचारे के भाव से नहीं आई थी , बल्कि सेक्स के लिए आई थी. मैं बहुत लज्जित था  और उससे पूछा , ‘ तुम यह सब क्यों करती हो ! मुझे लगा की हम नाइजेरियन हैं , एक हैं. सेक्स का मेरा कोइ इरादा नहीं था .’ उसने कहा , ‘ तुम क्या सोचते हो कि मैं यहाँ क्यों हूँ. मुझे अपने बॉस को कुछ मिलियन रुपये देने हैं , मुझे प्रतिदिन काम करने की जरूरत है. मेरा पासपोर्ट जब्त है और जब मैं भुगतान करूंगी तभी मुझे वह मिल पाएगा.’ मेरे लिए यह एक नाइजीरियन सिनेमा देखने का सा अनुभव था , मैंने उसे जाने के लिए कह दिया. दूसरे दिन ठीक यही घटना युगांडा की एक लडकी के साथ घटी. वह लडकी भारत में छः महीने के लिए थी. उसके अनुसार वह यूगांडा में एक हेयर ड्रेसर थी. मैंने उससे पूछा कि उसे यूगांडा में हेयर ड्रेसर का काम छोड़कर भारत में यौनकर्मी क्यों बनना पड़ा ! उसने बताया कि वह एक बेहतर जिन्दगी जीना चाहती है और भारत या यूगांडा में हेयर ड्रेसर का काम उसे बेहतर जिन्दगी नहीं दे सकता है.

जबरन वेश्यावृत्ति
तुम्हें क्या लगता है क्या यही कारण है अफ्रीकी महिलाओं का भारत में पलायन का ?
भारत में वेश्यावृत्ति का तैयार बाजार है . भारतीय पुरुष अफ्रीकी महिलाओं की मांग करते हैं . सबसे बड़ा इलाका मालवीय नगर है , जहां यौनकर्मी बड़ी संख्या में रहती हैं. एक कमजोर व्यक्ति के लिए तो वहाँ की स्थिति बेचैन कर देने के लिए पर्याप्त है . बहुत ही भयावह दृश्य है वहाँ. मैंने यौनकर्मियों से बात करनी शुरू की , उनमें से कई एड्स से पीड़ित हैं . सवाल है कि वे जियेंगी कैसे !

लोकतंत्र में मसीहाई असंवेदनशीलता का एक नमूना दुनिया ने देखा , जब अल्पावधि वाली सरकार के मंत्री रातों में शहंशाह के नायक की तरह दिल्ली में सब ठीक करने के अंदाज में निकलते थे , उनके रडार पर ये ‘काली’ लडकियां भी थीं.

इस स्थिति के बारे में तुम्हारी क्या राय है ?

इनमे से बहुत से “ कार्पोरेट गर्ल”  हैं , वे कॉर्पोरेट संस्थानों में काम करती हैं ,  बहुत सी ऐसी भी लड़कियां हैं , जो स्कूल्स में काम करती हैं , वे घर में ही रहती हैं , गलियों में नहीं निकलती हैं . मेरी एक नाइजीरियन दोस्त है, जो स्कूल में काम करती है , वह मेरे ६ सप्ताह के दिल्ली प्रवास में मुझसे नहीं मिली , क्योंकि उसके स्कूल में एकदम से कठोर प्रावधान है . ऐसा नहीं है कि सभी लडकियां इस जबरन गुलामी की शिकार हैं . बहुत सी डीसेंट अफ्रीकन लडकियां  नई दिल्ली में हैं. मेरा मुख्य कंसर्न वे लडकियां हैं , जो माल्स , क्लबस में होती हैं और वहीं से अपने ग्राहकों को रिझाती हैं. अपने बॉस को , जिसने पासपोर्ट जब्त कर रखा है , कई मिलियन नाईजेरियन करेंसी देने के लिए दिन रात काम करना एक प्रकार की परिष्कृत गुलामी है .

तुम्हें क्या लगता है , क्या ये लडकियां नाईजीरिया वापस जाना चाहेंगी ?

मूलतः जो मसला है वह यह कि नाइजेरिया में उन्हें काम नहीं था , या वैसा काम नहीं था , जिससे वे अपना जीवन –यापन कर सकें . तो जो रास्ता है , वह यही कि उन्हें सही काम मिले , उचित वेतन के साथ पुनर्वास का कोइ कार्यक्रम उन्हें वापस नहीं ला सकता है. जीवन यापन के साधन का अर्थ यह नहीं है कि उन्हें वैसे हुनर सिखाये जाएँ , जिसका वे इस्तेमाल ही नहीं कर सकें, बल्कि इसका मतलब वैसे हुनर सिखाने से है , जो उन्हें एक सम्मानजनक जीवन दे सके. क्या तुम मुझे एक अनुमान बता सकते हो कि कितनी इडो लडकियां यौनकर्मी के तौर पर काम कर रही हैं ? यह तो मेरे लिए कह पाना आसान नहीं है , लेकिन दिल्ली में यौनकर्मियों का  ८०%  इन्हीं लड़कियों का है. और ८०% नाइजीरियन लड़कियों में इडो हैं . मतलब है कि जिन इडो लड़कियों को इटली ने जगह नहीं दी , वे सब दूसरे देशों में चली गई. मेरे अपने शोध के अनुसार अफ्रीका और नाइजेरिया से दिल्ली गई लड़कियों की एक बड़ी संख्या यौनकर्मियों की है , लेकिन ऐसी दूसरी लडकियां भी हैं , जो वहाँ सम्मानजनक काम कर रही हैं . लेकिन यह सही भी है कि इस ग़लीज काम में लड़कियों की संख्या बढ़ती जा रही है.

नाइजेरियन लडकियां दिल्ली के स्कूलों में पढ़ाती हैं

नाइजीरियन युवा लड़के वहाँ क्या करते हैं ?

मैं वहाँ अक्सर अफ्रीकन रसोई में खाने जाता था , वहाँ जो लड़के मिलते थे , वे सिगरेट पीते हुए कंप्यूटर पर काम करते हैं , उन ग्राहकों से बात करते हुए , जिन्हें वे ऑनलाइन पटाते हैं . मैं वहाँ इनके साथ दिल्ली की सड़कों पर दिखते हुए शर्मिंदगी महसूस करता था , क्योंकि इन्हें वहाँ ड्रग का धंधा करने वाला ही समझा जाता है. यह सब निराशाजनक था और मैं अपनी सरकार से यही प्रार्थना करूंगा कि वह कोइ दीर्घगामी समाधान लेकर आये.
( सेफ वर्ल्ड फॉर वीमेन से साभार )

मनीषा जैन की कवितायें

मनीषा जैन


मनीषा जैन की कविताएं विभिन्न पत्र -पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं. एक कविता संग्रह ‘ रोज गूंथती हूँ पहाड़’ प्रकाशित है . मनीषा रेखा चित्रकार भी हैं . संपर्क:22manishajain@gmail.com

( मनीषा जैन की कवितायें . रेखाचित्र गुलज़ार हुसैन के . )

1.    मकड़ी का जाला

बिलकुल सटीक जगह पर
बांध दिया गया हमें
घर नाम के कोने से

मकड़ी के जाले की तरह
बार बार पूरते रहते हैं हम
अपना संसार जाले की मानिदं

और तोड़ते रहते हैं हम
अपने ही पैरो की जंजीरें
और इसी मकड़ी के जाले के बीचों बीच
मर जाते हैं हम मकड़ी की तरह

उन्हीं सात फेरों की जंजीरों में बंधे हुए हम
सुखाते रहते है
तुम्हारे दफतर जाने के बाद
तुम्हारे गीले तौलिए

और संगवाते रहते हैं तुम्हारे कमरे
ताकि शाम को जब तुम आओ
तुम्हारी सब चीजें अपने स्थान पर मिलें
बाॅस की डाट खा कर आए तुम
कुछ शांत रह सको
अपना गुस्सा मुझ पर ना निकालो

गर्मागरम बनाते रहे तुम्हारी रसोई
गर्म गर्म फुलके खिलाते रहे तुम्हें
जिससे तुम सो सको
सारी रात चैन की नींद


जिससे अगली सुबह तुम
तैयार हो सको तुम
अगले दिन दफतर के लिए

और अगले दिन मैं फिर
मकड़ी की तरह
नये जालों का ताना बाना बुन सकूं

और कदम बढ़ाती रहूं
अपनी बढ़ती उम्र के साथ
इसे ही अपनी नियति मानकर
बढ़ती रहूं मृत्यु की ओर
धीरे धीरे धीरे।

२.   क्या तुम भूल पाओगे

तुम थक कर आए हो घर
क्या तुम उस स्त्री को भूल पाओगे?
जो अपने हाथों से सजाती है
तुम्हारे सपनीले घर
क्या तुम्हारी आंखें
उसे ढ़ूंढती हैं
जो बिछाती थी पलकें
तुम्हारे इंतजार में
क्या तुमने कभी उन आंखों में झांका
जिनमें तुम्हारी ही तस्वीर बसती है
तुम यह देख कर हैरान हो जाओगे
वह स्त्री जब भी आईना देखती थी
तुम ही नज़र आते थे आईने में उसे
अब जब तुम थक कर घर आओगे
फिर उसे ना पाओगे
तब तुम क्या उसे कभी भूल पाओगें।

३.     वह स्त्री

वह स्त्री
बना रही है चूल्हा
जगा रही है
पेट की आग
छान रही है
अपनी मुश्किलें
मिला रही है
प्रेम के मसाले
छोंक रही है
जीवन में गरमाई
ऐसे ही मिश्रण से
बनायेगी गर्म घर
प्रेम की सौंधी खुशबू
वाले       घर।

४.   साल के अंत में

साल के नए दिन
वह स्त्री
धो रही है बर्तन
बुहार रही है फर्श

इस साल होली पर
वह स्त्री
रसोई में खेल रही है
मसालों से होली
बना रही है रंगबिरंगी सब्जियां
गूंथ रही है परात भर चून
थपक रही है सैंकड़ो पूरियां
पकायेगी उन्हें
पसीने के घी में
सूरज की कढ़ाही में

इस वर्ष तीज पर
वह स्त्री
ढ़ो रही है गारा, मिट्टी, ईंट
घिस रही है एडि़यां
सजा रही है जीवन की महावर
अपने पैरो पर
चमका रही है
जीवन के आईने में अपना चेहरा

इस वर्ष राखी पर
वह स्त्री
बांध रही है पेड़ को राखी
नाप रही है संघर्ष की लम्बाई

इस वर्ष दिवाली पर
उस स्त्री का घर
बह गया बाढ़ में
बैठी है सड़क मुहाने पर
कैसे जला पायेगी घर में दिया

साल के अंत में
वह स्त्री
पूछ रही है माचिस का पता।

एक साक्षात्कार लंबाणी जनजाति की स्त्रियों से

( कन्नड़ में किया गया यह अध्ययन अंग्रेजों के ज़माने से अपराधी करार
दी गई जनजातियों में से एक  लंबाणी जनजाति की स्त्रियों के जीवन व्यवहार
,दैनंदिन में रची बसी कला से हमें परिचित कराता है ,प्रोफ़ेसर पी के खंडोबा
द्वारा कर्नाटक और उससे सटे  महाराष्ट्र के  इलाकों  में बसे इस समुदाय की
जीवन -कला किये गए इस अध्ययन का अनुवाद गुलबर्गा वि वि के हिन्दी  विभाग
की  विभागाध्यक्ष डा परिमाला अम्बेकर के द्वारा  किया  गया है ,दक्षिण से  हिन्दी
की विदुषी की भाषा में क्षेत्र का प्रभाव स्पष्ट है. )

लंबाणी जनजाति की एक  स्त्री

 अनुवादक की टिप्पणी

किसी जनपद का या लोक जीवन का शास्त्रीय या तात्विक अध्ययन ऐसा ऐनक है, जिसमें प्रस्तुत लोक जीवन का शास्त्र और तत्व, मूल्य और मानवीयता के इंद्रधनुषी रंगों में तब्दील होने लगते हैं । भौतशास्त्र के थेयरी ऑफ़ रिफ्लेक्शन की तरह !! जैसे एक सफेद किरण,अपने में छिपे सतरंगी रेशों को फैला देता है!! प्रो पी.के.खंडोबा द्वारा प्रस्तुत लंबाणी जनजाती के दृश्य और प्रदर्शन कलाओं का शास्त्रीय और तात्विक अध्ययन ऐसा ही एैनक है, जो अध्ययन की शिष्टता के साथ साथ पाठकों को आगे बढकर लंबाणी जीवन शैली और संस्कृति की रंगीनियों को देखने और अनुभव करने की चेतना जगाती है। इस महत्वपूर्ण कन्नड कृति के हिन्दी अनुवाद के पीछे की चेतना भी यही रही है ।”

लंबाणी अथवा बंजारा जन भारतभर में बसे हुए हैं।  प्रादेशिकता की दृष्टि से भिन्न भिन्न व्यवसायों में जुटे हुये होने के कारण ,उन्हें उन उन प्रदेशों में अलग अलग नामों से पहेचाना जाता है । पहले  घुमंतू , आज दल या टोली में बसे हुये ये लंबाणी लोग समस्त भारत में गोरमाटी के नाम से अपने आप को पहचानते हैं । विशिष्ट संस्कृति एवं परंपरा को लिये हुय ये जन बंजार, लंबाणी, लंबाडी, सुकाली, लमाणि इत्यादि नामों से पुकारे जाते रहे हैं । अपनी वेशभूषा, आभूषण, आचार विचारों में पारम्परिकता  को बचाये रखने के लिए  नगरों से दूरस्थ प्रदेशों में ,अधिकतर पहाड ,गुफा, कंदराओं में ,अपना ही अलग से तांडाओं का निर्माण करके , वे रहते हैं और अपनी संस्कृति को बचाते आये  हैं । शतमानों के बीत जानेपर भी ये जन यथास्थिति में रह रहे हैं ।

स्वतंत्रता पूर्व, इस देश में जब वाहन आदि, का प्रचलन नहीं था, तब इन बंजारा लोगों ने, दूर –दूर से , से जंगल झंखाडों के रास्ते ,अपने मवेशियों पर खाद्य पदार्थो का रसद लादकर लाया  और भारतीय जन –जीवन का संरक्षण किया है। देश की स्वतंत्रता के लिए लडकर मरनेवालों में ये भी शामिल रहे हैं । ऐसे देशभक्त समाज पर कलंक लगाने हेतु अंग्रेज सरकार के द्वारा  इन्हें अपराधी जनजाति , ( क्रिमिनल ट्राइब्स )  के नाम से परिगणित करने के परिणाम स्वरुप  इनकी सामाजिक, शैक्षणिक और सांस्कृति अभिवृद्धि कुंठित हुयी । इस तरह से अलक्षित हुये इन लागों के आचार- विचार, परंपरा, संपद्राय , विवाह-उपनयन साथ में रीति-नीतियां बहुत ही विशिष्ठ बने हुये हैं । इनके द्वारा बोली जानेवाली भाषा की न कोइ लिपि है और न ही उनका लिखित साहित्य ही उपलब्ध है ।

लंबाणी जनजाति की स्त्री का  ड्रेस

लंबाणी जनजाति के विविध चेहरे से संबंधित अबतक के हुए अध्ययननों का अगर हम परिशीलन करेंगे तो , हम यह निश्चित तौर  पर कह सकते हैं कि इस जनजाति के दृश्य एवं प्रदर्शन कलाओं के दस्तावेजों का संग्रह और अध्ययन हुआ नहीं है । साहित्य, संस्कृति और भाषा से संबंधित कुछ  संभवित अध्ययन में प्रासंगिक तौर पर यहाँ  वहां  दृश्य और प्रदर्शन कला से संबंधित कुछा स्थूल विवरों का पाया जाना हम देखते हैं । संस्कृति के अध्ययन में सांस्कृति परिवर्तन , एक बहुत बडा अंश है । जनजातियों को नजर अंदाज करके , भारतीय संस्कृति की परिपूर्णता को मापा नहीं जा सकता । संस्कृतियों के निर्माण में इन जनजातियों के विशिष्ठ पात्र के होने को हम भुला नहीं सकते । भारत की ये जनजातियां , विश्वास, संप्रदाय, साहित्य, संगीत, कला, कुशलता आदि अनेक सांस्कृतिक घटकों  से भारत की संस्कृति को समृद्ध  किया है ।

निसर्गजीवी इन लंबाणी जनजातियों के दृश्य और प्रदर्शन कलाएं  अत्यधिक विशिष्ठ हैं । समग्र कला संसार में ही इन लंबाणी कलाओं के लिए विशिष्ठ स्थान, मान प्राप्त हैं । एैनक जडी कसूती कलाओं से सजी रंग रंगीन स्त्रियों के पहनावे , देहभर पहने जानेवाले वजनदार आभूषण , नागरिक समाज को अचरज में डाल ही नहीं देते, अपितु इस ढंग के आकर्षक और कलात्मक वेशभूषा को खुद भी धारण करने की इच्छा तक उनमें असूया का भाव जगाते हैं । हम इस बात को नहीं भुला सकते कि इन पोशाकों में कलात्मकता के साथ कठिनता और परिश्रम भी छिपा हुआ है । लंबाणियों के इन आकर्षक कला के लिए राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय बाजार मे अधिकाधिक मांग  बढने के कारण, इन  लंबाणी स्त्रियों  की  बडी मेहनत से, अपने हाथों से ,परिश्रम से बनाये हुये, इन पोशाकों को दुगने तिगने दामों में बेचने का दृश्य हर कहीं दिखायी दे रहा है ।

लंबाणी स्त्रियों के गीत , नर्तन आदि अत्यंत कलात्मक हैं और  अपनी एक अलग विशेषता रखते हैं । इन जनजाति के दृश्य कलाओं में कसूति, गुदायी, वाद्य वादन, रंगोली, घरों का विन्यास, केशालंकार और विवाहादि उत्सवों में विविध दृश्य बहुत ही अद्भुत हैं  , देखनेवालों की आंखों को तृप्त करते हैं । साथ ही इस जनजाति के प्रदर्शनकलाओं के विविध भंगिमाओं के नृत्य, आचरण और संस्कार आदि , जत्रा, पर्व, उत्सव आदि , क्रिडाए, और बयलाट ;ग्रामांतर प्रदेशों में खेले जाने वाले विशिष्ट जनपदी नाटकद,  हरेक को मंत्रमुग्ध कर देते हैं । ये सारे अत्यंत ही कुतुहलकारी और अध्ययनयोग्य विषय हैं ।

लंबाणी जनजाति के ये लोग जंगल का वास छोडकर गाँव ,शहर में आकर बसे जा रहे हैं । इसी कारण से आधुनिकता की हवा इन लोगों को भी प्रभावित करती है  और  ये लोग अपने आस -पास की संस्कृति के प्रभाव का शिकार हो रहे हैं । आज ये लोग अनिवार्यतया आधुनिकता के लिए अपने आप को खुला छोड रहे है । अन्य संस्कृति के अतिशय प्रभाव के शिकार इन लोगों के सामाजिक स्थान मान में भी काफी बदलाव आया है । इस आधुनिकता के परिणाम की तीव्रता एवं प्रभाव उनकी वेशभूशा पर, गीतवृन्दों पर, वाद्य वादकों के परिकरों पर, सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक जीवन पर भी स्पष्टतया गोचरित होता है । इस दिशा में लंबाणी जनजाति के दृश्य और प्रदर्शन कलाओं का दस्तावेज और अध्ययन की आवश्यकता को पहेचानते हुए, यह  अध्ययन तय हुआ है  । लंबाणी जनजाति के दृश्य-प्रदर्शन कलाओं की वैशिष्टताओं को पहचानना, और आधुनिक संदर्भ में उनपर हुये प्रभाव एवं परिणामों को निर्दिष्ट  करना इय अध्ययन का प्रमुख उद्धेश्य रहा है ।

लंबाणी जनजाति की स्त्रियों  का पारंपरिक नृत्य

कर्नाटक के कुछ प्रमुख तांडाओं को और महाराष्ट्र के सीमावर्ती प्रदेशों में  स्थित कुछ लंबाणी प्रदेशों को, प्रस्तुत अध्ययन के लिए क्षेत्रकार्य के रूप में चुनकर सामग्री को संग्रहित किया गया है । साथ ही ‘‘ कर्नाटक के लंबाणी जन- एक सांस्कृतिक अध्ययन ‘‘ नामक मेरी पी.एच .डी शोधग्रंथ को साथ ही, ‘‘ कर्नाटक के लंबाणी जनजातियां ‘‘ नामक पुस्तक की आंशिक सहायता यहाँ  ली गयी है । प्रस्तुत अध्ययन को लंबाणी जनजाति के दृश्य एवं प्रदर्शन कलाओं का समग्र अध्ययन मानने की कोइ  भूल न करें । इस दिशा में यह एक ढंग का स्थूल अध्ययन मात्र है और भावी अध्ययनकर्ताओं के लिए एक निर्दिष्ट दिक्सूची भी है ।

 लंबाणी जनजाति की दृश्य कलाएं  : रंगीन वेशभूषा:

संपूर्ण भारतभर में लंबाणी स्त्रियों की वेशभूषाओं के रंग और नमूने लगभग एक समान दीख पडते है । इन वस्त्रों में लाल रंग की प्रधानता होनेपर भी , नीले , हरे और सफेद कपडों के जोडन से चित्र विचित्र दिखने वाले उनके लहंगे  ,(फेटिया), ओढनी (छांटिया), चोली (कांचळि) आदि वस्त्रों को वे स्वयं तैयार  कर लेते हैं । इन वस्त्रों पर वे ढेर सारे सीसे के बने आभरणों का (रांग पारि), चांदी के आभरणों का, छोटे -छोटे कौडियों का, चांदी के सिक्कों का , छोटे- छोटे ऐनक के टुकडे (काचे)  इत्यादि के जोडन का काम करते हैं ।  रंग रंगीन धागों के सहारे जोडे ये चीजें वस्त्रों को और भी आकर्षक बनाते हैं।

हम बणजारी गेणा गांटारी
हम  बणजारी आचो कुलारी
हम बणजारी बामणिघरेरि
हम बणजारी राजा रामेरी
हम बणजारी गेणा गांटारी (1998-116)

इस गीत के बोल, अपने वस्त्र आभूषणों के प्रति  लंबाणी स्त्रियों के प्रेम और अभिमान को ही अभिव्यक्त नहीं करते साथ ही यह भी कहते हैं कि, वे अत्यंत ही ऊंचे  घराने के है, ब्राहम्ण जाति से संबंधित हैं, राजा महाराजाओं के क्षत्रियों के वंश के हैं, आदि भाव को भी सूचित करते हैं ।  ( वै.रूप्ला नायकः 1998: 116)

लंबाणी शब्द के उच्चार मात्र से हमारी आँख  के सम्मुख एक ऐसे स्त्री का चित्र उभरकर आता है, जो हाथों में विचित्र ढंग की चूडियां भरकर, माथेपर झूलते बालों के लटों में चांदी के आभूषण झुलाते हुए, देहभरकर एैनकों से जडा लहंगा पहनी हुई  है, अधखुले पीठ की वह अपने गोरे बदन भर में गोदने के फूलों को सजाये खडी  है।  रंगीन कपडे, एैनक, चूडियां आदि आभरणों का अलंकार इन जनजाति की  स्त्रियों की मात्र विशेषता ही नहीं, उनका सौन्दर्य भी है । वे जहाँ  कहीं भी हो ,आसानी से उन्हे पहचाना जा सकता है । इन सब में विशेषता इस बात की है कि, भारत भर में किसी और जनजाति के लोग इस ढंग के सांप्रदाय सम्बद्ध  वेशभूषा एवं पोशकों को बचाए नहीं रख पाये हैं ।

लंबाणी स्त्रियों द्वारा धारण किये जाने वाले लहंगे  (फेटिया), ओढनी (छांटिया), चोली (कांचळि) , पैर का खडा, पटिया, वांक्य, घुगरि, टोप्ली, चोट्ली इत्यादि, इस जनांग के सौन्दर्य के कलश रूपी आभूषण हैं । इतना ही नहीं, प्रकार प्रकार के ये आभूषण, प्रकार प्रकार के ये पोशाक उस लंबाणी स्त्री की  श्रद्धा के संकेत भी हैं ।  यूं  देखा जाय तो लंबाणी स्त्रियों के पहनावे में अधिकतया  लाल रंग की ही प्राधान्यता रहने के बावजूद  दूसरे रंगों की भी कोई  कमी नहीं पायी जाती । दर्जी की सिलायी का काम कम हानेपर भी , ये स्त्रियां स्वयं उन कपडों में छोटे छोटे ऐनकों को जोडकर कशिदाकारी करती हैं । लंबाणी स्त्रियों द्वारा अपने हर कपडों में एैनकों को जोड लेना एक दृष्टि से अलंकारिक लगने पर भी , एक और दृष्टि से यह उनकी होशियारी को भी जताते हैं । कारण प्राचीन काल में इनके पूर्वज घोरअरण्य में वास जब करते थे , तब जंगल के क्रूर प्राणि सिंहादियों से अपनी रक्षा के लिए अपने शरीर पर यहाँ – वहाँ एैनक के टुकडे लगा लेने की रीति शायद रही होगी, ताकि क्रूर प्राणि इन कांच के टुकडों में अपना बिंब खुद देखकर भागें । इस प्रकार परंपरा से कांच के टुकडों को देह में धारण करने का कार्य चले आने के कारण , ऐनक लगाने का कार्य आज भी दिखायी पडता है ।

लंबाणी जनजाति की स्त्री  कढाई करती हुई

लंबाणियों की वेशभूषाओं में पुरूषों की तुलना में स्त्रियों की वेशभूषाए ही अधिक विशिष्ठ हैं साथ ही ये उनकी परंपरा के भी द्योतक हैं । अपनी वेशभूषा से ही लंबाणी स्त्रियां पहचानी जाती है , इस हदतक उनके पेाशाक समाज में चिरपरिचित हैं । मुझे लगता है शायद इन वर्णरंजित लंबाणीयों के समान कोई  और जनजाति अपनी आकर्षक वेशभूषा से हमारा ध्यान आकर्षण कदाचित  ही करती होगी ।उन्हें पहचानना बहुत सुलभ है ।  इन लंबाणी स्त्रियों द्वारा धारण किए जाने वाले कपडों में कला के साथ साथ कठिनता का भी होना हम देख सकते हैं । उनके पहनेजानेवाले लहंगे, चोली और घुंघट इत्यादियों को तय्यार करना अधिक मेहनत का काम है । इन पोशाकों की तय्यारी में महीने के महीने लग जाते हैं , इसमें कोयी अतिशयोक्ति नहीं । इन्हें बनाने में अधिक पैसे भी लगते हैं और अधिक परेशानी भी उठानी पडती है ।
फेटिया:

लंबाणी स्त्रियों द्वारा धारण की जानेवाली लहंगा फेटिया कहलाता है । यह कमर से लेकर पैरों तक की लंबायी में आवृत्त रहता है , पैरों के आभूषण को ढंकता  नहीं । इन लोगों द्वारा पहने जाने वाला लहंगा, लाल रंग के जाडे कपडे से सिला जाता है । कमर की घेरायी  लंबायी में लगभग 9‘‘ की चैडे नीले रंग के कपडे को तरह तरह के  कशीदे के धागे से लहंगे को जोडकर सीते हैं । इसे ‘‘घेरों ‘‘ कहते हैं । इसपर चित्ताकर्षक ढंग से सफेद रंग के कपडे के गोट सीते हैं । इस फेटिया के किनारे पर भी और कमर के निचले भाग में भी रंगरंगीन धागों से, सीसा  के आभरणों से, कौडियों से , एैनक के टुकडे इत्यादियों से इस तरह सिला जाता है, जिससे देखने वालों की आँखें  चुधिया सी जाती हैं । लहंगे को कमर में कसकर बांधने के लिए धागों की दो लडियां होती हैं , जिसे वे ‘‘डोरी‘‘ कहते हैं । ब्याहता स्त्रियां इस डोरी के कोने को कौडियों और लच्छों से सिलकर उसे कमर में बांध लेती हैं, कौडियों और लच्छों से सजी डोरी को वे ‘‘सडकेवाळ डोरी‘‘ कहते हैं ।लहंगे को ऊपर  से नीचे की ओर क्रमशः पाच भागों में विभाजित करते हैं । हरेक भाग, विभिन्न नाम और गुणलक्षणों से और विशिष्टता से सजे रहते हैं ।
1    लेपो
2    काळेर् घेरो
3    रातडो घेरो
4    चीट् और
5    लावणी
इसे तय्यार करने के लिए 9‘‘ का चैडा और 9 मीटर लंबा नीले/काले रंग का कपडा  (काळो छांटियार् घेरो) , 12‘‘ चैडाई  का 6 मीटर लंबा किसी रंग का कपडा और 4‘‘ चैडाई  का 6 मीटर लंबी पट्टी (लावणी)  की जरूरत है और उूपर की ओर एक मोटी कमरपट्टी , साथ ही बीच बीच में छोटे छोटे कपडों के कतरन, छोटी छोटी ऐनकें लगती हैं जिन्हें ढालकर कशीदाकारी की जाती है ।

लेपो
सुंदर और वर्णरंजित ढंग से कशीदाकारी से भरा यह कपडा कमर में बांधी जाने वाली पट्टी (ठमसज) है , जिसे वे लेपो कहते हैं । ‘लेपो‘ लहंगे का उूपरी किनारे का भाग होकर अत्याकर्षक रहता है । इसकी सिलायी के लिए 3-4 परतों का फ्याब्रिक लाल कपडे का उपयोग करते हैं । गोलाकर के एैनक के टुकडे और अल्यूनियम् के बटनों को डालकर , वैविध्यमय धागों से इसपर कशीदे का काम किया जाता है । उनके पोशाकों में ही यह भाग अत्यंत कलात्मक और विशिष्ट बना रहता है । बिना एक इंच भी छोडे कसीदे के सारे प्रकारों को यहा प्रयोग करते हैं । यह लगभग 1 मीटर लंबी और 6.7 ‘‘ चैडी पट्टी है जिसे कमर पर कसकर बांध लिया जाता है । इस पट्टी के दायें और बायीं ओर नाडा डालकर बायीं ओर बांध लेते हैं । लहंगे का बायां भाग भी एक हत्था भर लंबा खुला रहता है ।
इस लेपो को तैयार  करने के लिए लगभग एक दो महीने के समय की जरूरत पडती है । अनेक विशिष्ट प्रकार के कसीदा कलाकृतियों का यहाँ ं प्रयोग करने के कारण और यह काम अधिक ही सूक्ष्म होने के कारण इसकी तैय्यारी  धीमी  गति से चलती है । इसीकारण इसके लिए अधिक समयावकाश की जरूरत पडती है । यहाँ  की कसीदाकारी के लिए विविध रंग के चमकीले धागों का प्रयोग किया जाता है । इसपर कढीजाने वाली कसीदे  के चित्र इतने होती हैं कि पीछे से लेपों का कपडा जरा सा भी दिखता ही नहीं। यहाँ  कढी कसीद का प्रयोग वे और किसी जगह उपयोग नहीं करते हैं । उनके संपूर्ण पोशाक में लेपो का काम अत्यंत ही क्लिष्ट और परिश्रम भरा काम होने के कारण, यह बहुत ही कीमती वस्तु है ।

कांचळी (चोली)
लंबाणी स्त्रियों द्वारा पहने जाने वाली चोली , पीठभाग में खुला रहकर , यह छाती और पेट के भाग को ढकता है और यह पीठ-पीछे नाडों से बांधे जाने वाली चोली है । इसके सामने वाले भाग में और भुजाओं पर, रंगीन धागों से अनेक प्रकार की कशीदे कढी जाते हैं । इसपर  ‘ रांग पारी‘ नाम के सीसे के आभरण, चांदी के सिक्के, ऐनक के टुकडों को सिला जाता है । इस कांचळी की छाती पर झूलने वाले लगभग 4‘‘ चैडे , 5‘‘ लंबे मोटे कपडे को सिलकर इसे पूरा ‘रांग पारी‘ सीसे के आभरणों को एैनक के टुकडों को रंगीन धागों से चित्र विचत्र ढंग से सीकर ढका जाता है । इस चोली के उभय भुजाओं से नीचे आस्तिनों पर झूलते हुये दो ‘ खविया‘ होते हैं । इनपर रांग पारी कौडिया आदियों से सिला जाता है । ये लगभग पिछले जमाने में युद्ध के सैनिक द्वारा धारण किये जाने वाले लोहे के कवच के नमूने जैसे लगते हैं । युद्धवीर लंबाणी जन, प्राचीन काल में समय आने पर अपने आत्मरक्षण के लिए , लंबाणी महिलाएं  भी आयुधधारी बनकर, अपनी छाती और आस्तिनों के रक्षण के लिए चोली पर धारण करने के के कारण  इन खविया को सीने का चलन यहा जाहिर होता है ।
यह वस्त्र ट आकार के गलापट्टा से युक्त होकर, भुजापट्टियां, कांख के उॅपर आस्तिनों को ढंकने के कारण दिखने में बडे ही अलंकारिक लगते हैं । दायें भाग की भुजापट्टी (खव्या) एैनक की कसीदे से और सिक्कों से अलंकृत रहता है , बायें भाग की भुजापट्टी ओढनी में छिपा रहनें के कारण इसपर खव्या नहीं होता। छाती और पेट के भाग को पूरी तौर पर ढंकने वाले इस वस्त्र पर , एैनक के सिक्कों से धातू के सिक्कों से और लच्छों को भरकर कशीदाकारी की जाती है । यह विविध आकार और रंगों की छातीपट्टा, भुजापट्टा, उदर पट्टा और आंतडियों की पट्टिों से जोडे रहकर ज् आकार का बना रहता है । यह वीरयोद्धा के युद्ध कवच की तरह होता है।  इस ढंग की चोली को विवाहित स्त्रियां मात्र धारण करती हैं। अविवाहित युवतियां इसे धारण नहीं करती। साथ में विधवायें भी बिना खव्या के निरालंकृत साधारण चोली पहनती हैं
इसे तय्यार करने के लिए छाती के माप की पट्टी (छातीर पेट), पेट के माप की पट्टी, आस्तिन पट्टी, पीठ के लिए दोनो भागों में 3‘‘ चैडी पट्टी (,खडपा)  की आवश्यकता है । साथ ही छाती पर दोनो ओर ‘ कांटली‘ , दायी भुजापर खव्या, चोली भर में कसीदा कढने के लिए छोटे छोटे ऐनक, टिन के बटन, उून के लच्छों ( फुंदा) की जरूरत पडती है । चोली पर इन सारे कसूती के काम के साथ साथ उसके किनारे पर छोटे छोटे घुंघरू की लडियों को पिरोया जाता है । यह लाल, नीला, हरा और काले रंग के कपडों के टुकडों को जोडकर सिला हुआ वस्त्र होने के कारण, इसपर, इन रंगीन वस्त्रों पर फबने वाले रंग रंगीन धागों से ही कसूती की सिलाई  भरी जाती है ।
छांटिया ( ओढनी)

पैर के नीचले हिस्से में यह आभूषण पहनती हैं लंबाणी जनजाति की स्त्रियाँ

सामान्यतया यह लाल रंग के कपडे की बनी रहती है और लगभग 6 फूट लंबा और 4 फूट चैडाई  को लिये रहती है ।  इसके एक छोर को कमर के दायें भाग में लहंगे में खोसे रहकर , कपडे के दूसरे छोर को याने अतिरिक्त भाग को दाये भाग से घेरते हुये सर पर ओढाकर बायीं भुजापर लाकर लटकते हुये छोडा जाता है । लगभग 6 फूट चैडे और 3 फूट लंबे लाल कपडे पर विशेष कसीदे की कढायी की जाती है , उसपर रांग पारी सीस के गहनों को, चांदी के सिक्कों को, ऐनक के टुकडों को, कौडी आदियों को रंग रंगीन धागों से चित्रविचित्र ढंग से सीकर सजाया जाता है और उसे उूपरी घूघट के लिये सिर के दोनों भागों में समान लंबायी के आकार से सिया जाता है । इसे घुंघटो कहा जाता है । छांटिया के बायें छोर में मोटे स्तन के आकार की छोटी सी कसूती कढी थैली सिली रहती है। इसे ‘अढोछेडा‘ कहा जाता है और थैली को ‘ छेवटिया‘ कहा जाता है । इस ‘अढोछेडा‘ छोर को बांयी भुजा के नीचे से होते हुये छाती पर ओढकर दायीं भुजा के उूपर आंचल की तरह ओढते हैं ।
इसकी तैयारी में तीन मीटर का लाल कपडा, 6 भीगा लंबा और 4‘‘ चौड़ा  हरा कपडा, उसपर ऐनक की कसूती कढी पांच  चैकाकार के एक ही प्रमाण के फूल ( पांचफूल)  , 2‘‘चैडायी के 2 पट्टिया (पाटा), और एक भारयुक्त मोटा घुंघटों का जोडा लगता है । घुंघटो पर अत्यंत कलात्मक ढंग से ऐनक ढालकर कसीदे का काम किया गया रहता है । साथ ही  वहा, गुंडिया, चांदी का चैन और पुराने सिक्के को कतार में जोडकर भारयुक्त बनाया जाता है । उूपरी ओढन यानी घूंघट के अस्तर भाग में अलंकार के हेतू, यहाँ  ववहाँ  रंगीन त्रिकोनाकार के छोटे टुकडों को (खापली ) जोडा जाता है । छांटिया के बाएँ  छोर पर एक छोटी सी कसूती कढी थैली को मोटे स्तनाकार में सिलाजाता है । इसे अडोछेडा कहते हैं और थैली को छेवाटिया कहा जाता है । इसपर अलंकारिक ढंग से कसीदा की जाती है ।  छेवटिया में एक सिक्का रहता है । जिसके वजन से छांटिया दायीं भुजा से सरकता नहीं है । लंबाणी स्त्रिया नमस्कार करते समय इस छेवटिया थैली को हाथ में धरकर नमस्कार करती हैं । यह छेवटिया रंग रंगीन धागे की कसूती के काम से अलंकृत रहता है ।

फुल्या- गण्णो: 
इनका प्रयोग विशेष संदर्भो में किया जाता है । सरपर धारण करने के लिए , कौडियों से और रंग रंगीन धागे की कसीदे से अलंकृत सिंबी (गाला) और उसके उूपर ओढने के लिए सिला गया ‘फुल्या‘ नामक चित्ताकृत चैकाकार का कपडा  नदी नालों से पानी लाते समय घूल नही पडे इसलिए उसपर ढाकने के लिए ‘गण्णों‘ (गरणौ) नामक कसीदा और कौडियों से तय्यार किया हुआ कपडा चित्ररंजित होता है ।

स्त्रियों के आभरण:     हाथों के आभरण
1    हाथीदांत की चूडिया, (चूडीद) एक एक हाथ में
2    भुजाओं में चूडो ( बलिया )
3    चूडियों के बीच में एक एक काली चूडी (बोद्लू)
4    कसोट्या ,( विविध मनको से कसीदा  कढी चूडी)
5    हाथ की उुंगली में तांबा/चांदी के सिक्को की अंगूठिया
6    विशेष संदर्भो में हथेली पर गजरा, भुजापर पचेला, हथेली पर माट्ली, भुजाओं में घुंघरू का चैन (बाजूबंद) ।

पैरों के आभरण
1    चांदी/लोहे की धातू से बना बिछुआ
2    पीतल का टेढामेढा वांकडी
3    चैकाकार का कस्सा
4    चांदी/लोहे की धातू का बना चैन
5    पैर की उुंगली में चांदी के मिंचुवा, तांबे की चटकी पित्तल का अंगुतळा और अंगुठे में शरभरी
6    विशेष संदर्भ में पैर में पहनेजाने वाला  चांदी का चैन
7    गरतणि ।

गले के आभरण
1    गले में पीले रंग के मणियों से गुंथी  गयी पटिया
2    पुराने सिक्कों का हार (रपियार हार )
3    चांदी की हांसली, मंदेळिया, वांक्या
4    विविध मणियों से गुंथा गया मणिमाला ।

मुख के आभरण
1    गालों के दोनों ओर बालों के साथ झूलते हुवे चांदी/लोहे के बने घुगरी, टोप्ली, कड्डी, आडिसांकळी, जिसे ‘चोट्ला‘   भी कहा जाता है ।
2    नाक में सोने का मुकुर (भुरिया)
3    कानों में लोहे के बने कनियाँ झूलते हैं ।
4    कानों में झुमकी पहनते हैं ।

  कमर के आभरण
1    कमर में बाँधधकर उसे पैर की लंबाई तक लटकता हुआ छोडा गया कौडियों से बना सडक्

इस तरह , बंजारा औरतों द्वारा पहनी जानेवाले गहने, अपार हैं । ‘पटिया‘, नामक गले का पट्टा, बडे बिछुवे के आकार का चांदी का हांसली नामक गले का पट्टा, रंग रंगीन मणियों के हार (मुंगा लाल्दी)  बालों को जोडकर पिरोया गया घुगरी, चोट्ला नामक चांदी के आभरण  स्त्रियों के दोनों गालों पर झूलते रहते हैं । ‘घुगरी‘ नामक गहने को केवल विवाहित स्त्रियाँ  ही मात्र पहनती हैं । पती के मौत पर उन्हें उतार दिया जाता है ।नाकपर भुरिया नामक सोने की नथनी पहनते हैं । कानों पर तरह तरह के चांदी के आभरण  पहनते हैं। अपने हाथों की उँगलियों  में भी, पैरों की उंगगलियों में भी चांदी और पीतल के गढे नमूने नमूने के अंगूठियों को धारण करते हैं , ये जन हाथों की चूडियां और पैरों की चूडियां भी पहनने की रूढी रखते हैं ।

कोल्डा, कस्सा, माट्ली, वांकडी, विंचुवा, अंगुतला, चटकी , शरभरी , फूला, मींटी नामक अनेक प्रकार के गहनों को हाथ एवं पैरों की ऊँगलियों में भर भर कर पहनी हुयी लंबाणी स्त्रियाँ  पायी जाती हैं । वांकडी नामक गहना, घुडसवार, घोडे की दौड लगाने के लिए धारण करने वाले कोंडे जैसा रहकर, इनसे नन्हे नन्हें घुंघरुओं  की आवाज भी निकलती है।
कलई में और भुजाओं में सींग की बनी बंगडियों पहनती हैं । भुजाओं में सिंग की बंगडियों के नीचे रंग रंग के कौडियों से सिले ‘पेचेला‘ नामक लच्छा बांध लेते हैं। कलई में ‘माट्ली‘ नामक चूडियां पहनती हैं ।
अनब्याही स्त्रियां , इन सिंग के बने बंगडियों को केवल कलई में ही भर लेती हैं । शादीशुदा लेकिन, पति को खोयी हुयी स्त्रियां केवल भुजाओं में ही इन सिंग की बनी बंगडिया (बळिया, बोद्लू)  पहनती हैं । अविवाहित स्त्रियां गले में चीडा नामक कालेपोते डालकर, पैरों में घुंघरू का चैन याने पाजेब और ‘गरतणि‘ नामक काले मनके की लडी को, कलई में चूडी नामक सिंग के बने चूडियों को और कौडिया पिरोकर गुंथी गयी ‘सडक्‘ नाक दो तीन मोटे लडियों को कमर से बांधकर नीचे की ओर लटकता छोड देती हैं । ब्याहिता स्त्रियाँ पैरों में पाजेब, ‘गरतणि‘ और ‘चीडा‘ नामक काले मनके नहीं पहनती हं ।

शरीर पर गोदाना की परम्परा

   कशीदाकारी कला का विन्यास  :

लंबाणी दृश्यकलाओं में कशीदे की कला अत्यंत प्रमुख है । अगर हम कहें कि लंबाणी औरतें बिना कशीदा कढे कपडे पहनते नहीं है तो कोई  आश्चर्य की बात नहीं । वे अपने पोशाकों की तय्यारी के समय , कपडों में विविध नमूने के कपडों के टुकडों को जोडकर वर्णमय ढंग से कशीदा काढते हैं।वर्णमय बनेरहे उनके पोशाक सचमुच में कलात्मक लगते हैं। महिलाओं द्वारा पहनेजानेवाला लहंगा, चोली, और ओढनी आदि को अनेक कपडों के टुकडों से जोडकर, बीच बीच में छोटे छोटे ऐनकों को जोडकर कशीदे से सजाते हैं । इतना ही नहीं साथ में गोंडई, गुंडिया, धातू के सिक्के , घुंगरू  इत्यादियों को जोडकर कशीदा काढते हैं । लंबाणी औरतें अपने फुरसत के समय में कभी बेकार बैठकर समय व्यर्थ नहीं करते। किसी भी प्रकार के कसूती के काम में अपने आप को व्यस्त रखते हैं । उन्हें अपना पोशाक खुद को तय्यार कर लेने की अनिवार्यता होने के कारण लंबाणी की हर महिला कशीदे की कला सीखी हुयी रहती है । लेकिन इसके लिए बहुत अधिक समय और व्यवधान की आवश्यकता पडती है । उनके द्वारा पहने जाने वाले तीन वस्त्र को तय्यार करने के लिए कम से कम महीने दो महीने के समय की आवश्यकता पडती है ।
लंबाणी औरतों से अगर हम कशीदा कहते हैं तो उसे वे समझ नहीं पायेंगी क्यूकि वे इस कला को खिलण्, तून्, कामकरेरो आदि नाम से जानती हैं । वर्णमय और अलंकारिक बने उनके पोशाकों पर कढी जानेवाली कशीदे को वे विभिन्न नामों से बुलाते हैं ।

कशीदाकारी के प्रकार:
1    काचे कशीदा (एैनक जडी कसूती)
2    लबानी कशीदा
3    चकचुनि कशीदा (गरि)
4    गाडरे कशीदा (कांड)
5    पोचे कशीदा
6    कलोणी कशीदा
7    रेलामाकी कशीदा (मीन की हड्डी)

     गोदना कला का विन्यास 

लंबाणी स्त्रियाँ  मुखपर, हाथों पर सुई से जो टीका गुदवाती हैं वे एक प्रकार के अलंकारिक चिन्ह की तरह होते हैं । सामान्यतया ये लोग नाक के दाये भाग में गोदना का टीका लगाते हैं , हाथों कों और पैरों को गोदना से सजाते हैं । जनजातीय समुदायों में औरतें और पुरूष, आँखों  की दृष्टि के परिहार्य के लिए डिढौने के रूप ही सही , सौन्दर्य के चिन्ह के रूप में ही क्यूं  नहो या शौर्य के चिन्ह की तरह ही क्यूं नहो, गोदना गुदवा लेते हैं । रंगीन पत्ते, फूल , बेलबूटों के चित्रों को , अपने नामों को अथवा कुछाध प्राणियों के चित्र या अनेक चित्ताकार चित्रों को हम उनके गोदन की कला में देख सकते हैं. लंबाणी महिलाओं में सामान्यतया, माथा, गाल, आस्तिन , जांघ , पैर, पाद , हथेली , ठोडी, भंवों के दोनों ओर, छाती, कमर, घुटना,पीठ और पैरों के मीनखंड, इस प्रकार  देह के विविध भागों पर अत्यंत कलात्मक ढंग से रेखाकृतियों  को गुदवाने की परिपाटी  पायी जाती है ।

लंबाणी महिलाए, इतर स्त्रियों की तरह अपने सौभाग्य के प्रतीक के रूप में माथे पर कुंकुंम का टीका लगाते नहीं है। बदले में माथे पर गोदना का टीका गुदवा लेते हैं । विवाहपूर्व में ही गोदन से गुदवालेने की प्रथा इनमें परंपरा से चली आई  है ।  पेड, बेल, सेहरा, राम का झूला, सांप, बिच्छू, मछली, रेंगता कीडा, गेहू के बीज, सिंह का नख, चूल्हा, मोगरा और कमल के फूल इत्यादी चित्र विन्यास के गोदने से वे अपने को अलंकृत करते हैं ।  केवल गोदने के बलपर ही लंबाणी स्त्रियों को पहचानने का विधान लंबाणी जनजातियों में प्रचलित है। गोदना उन्हें बहुत सरलता से अन्य स्त्रियों से भिन्न दिखाता है ।

गोदना पर आधारित कुछ रूढ़ियाँ  और विश्वास

1    हथेली के बगल में गेहू के  दाने के गोदने से उस औरत के हाथ का पका भोजन सडेगा नहीं ।
2    बिच्छू इत्यादी विषजंतुओं के चित्र को गुदवाने से उन्हें वे काटेंगे नहीं ,अगर काटें भी तो उन विषजंतुओं का विष चढेगा नहीं ।
3    मान्यता यह है कि मरने पर अपने साथ केवल गोदना ही रहता है ,अतिरिक्त कोई  भी संपत्ति  साथ नहीं आयेगी ।
4    लडकी का ऋतुमति होने से पहले ही गुदवाया गोदना धर्म की मुद्रा है, ऋतुमति होने के बाद गुदवाया गोदना पाप की मुद्रा के समान है ।
5    जो गोदना गुदवाते हैं , उन्हे पांच  दिनों तक स्नान नहीं करना है और इन पांच  दिनो तक उन्हें हल्दी डाला गया भोजन नहीं खाना है ।
6    गोदना गुदवाये पुरूषों को राश के कण में प्रवेश निषिद्ध  है । उनके प्रवेश से फसल की राशी में उभार नहीं आयेगी ।
7    रोग के कारण हाथ पैर अगर दर्द करते हैं , हड्डियों के जुडाव में अगर सूजन है  या दर्द है अथवा वात हुआ हो तो उन स्थानों पर गुदवाने से , रोग कम हो जाने का विश्वास बंधा हुआ है ।
8    बुरी नजर से बचने के लिए भी शरीर पर गोदना गुदवाते हैं ।

गुलज़ार हुसैन की कवितायें

गुलज़ार हुसैन


गुलज़ार हुसैन जितने संवेदनशील और बेहतरीन कवि हैं उतने ही अच्छे रेखा -चित्रकार. मुम्बई में पत्रकारिता करते हैं . संपर्क: मोबाईल न. 9321031379

( गुलज़ार की १० कवितायें उनके अपने ही रेखांकन के साथ. ये कवितायें एक संवेदनशील कवि  के द्वारा अपने इर्द -गिर्द के समाज के  रेखाचित्र सरीखें हैं . इनकी कविताओं में रेखांकन और रेखांकन में कविता ही वह खासियत है , जो इन्हें दोनो चौद्दियों पर ख़ास बनाते हैं .)

1. रोटी- अचार और लाल चटाई 

निस्संदेह, वह हमेशा उस खजूर की चटाई पर ही नहीं होती थी
जिस पर वह हमेशा मुझे दिखाई देती थी

वह कभी मिट्टी और कभी घास पर भी जाकर बैठती थी
वह पत्ता चुनने और बकरी चराने के समय जंगली कांटों के बीच से भी आगे बढ़ती थी
वह कई बार तालाब के किनारे की गिली मिट्टी पर सहेलियों संग खेलती भी थी

लेकिन जितनी बार मैं उसके घर गया
उतनी बार उसे चटाई पर बैठकर रोटी- अचार खाते देखा

जब शाम को लालटेन लेकर
किताब-कॉपियों के संग उसने बैठना छोड़ दिया
तब उसने चटाई पर बैठकर धूप की किरणों और चांद की रोशनी में छुपी जिंदगी को पढ़ना शुरू किया

खजूर की चटाई उसके जीवन से उतनी ही जुड़ी थी
जितनी रोटी और अचार
उसकी माँ जब जीवित थी, तब बनाई थी उसने तीन चटाइयां
मामी और फूफी के ले जाने के बाद उसके पास एक ही रह गई थी

उस चटाई पर वह उंगली फिराते हुए महसूसती थी माँ का स्पर्श
कि कैसे तन्मयता से माँ  ने बिना चश्मा लगाए हुए उसे बीना था
खजूर की छोटी -छोटी नुकीली पत्तियों को एक- एक करके पिरोया था
अंगुलियों में बार- बार आई चुभन को छुपाते हुए

उसने एक बार कहा था मुझसे
कि भरना चाहती है वह इस रंगहीन चटाई में चटख रंग
वह बनाना चाहती है चटाई पर हरे भरे खेत और पहाड़
लेकिन वह इस तरह तो नहीं रंगना चाहती थी चटाई

इस समाज ने उसे तब तक रंग की एक पुड़िया नहीं सौंपी
जब तक उसकी अखिरी सांस नहीं छीन ली गई

…और जब चाकुओं से गोदी गई उसकी बलत्कृत देह इस चटाई पर रखी गई
तब चटाई पर पसर गया गाढ़ा रंग
और तब बनी चटाई पर लाल रंग की नदी
जिसके आसपास कोई खेत और पहाड़ की हरियाली नहीं थी

उसकी लाल चटाई अब भी वैसे ही गोल मोड़ कर रखी है
जहां चूल्हे के निकट वह अपनी लालटेन रखती थी

2. तेज बारिश में

तेज बारिश में
छतरी होने के बावजूद भीग रही है रुकसाना
शीतल टाकीज का नाईट शो टूटा है अभी अभी
लोग तितर- बितर हो गए हैं
कुछ लोग छतरी खोले घर की ओर भाग रहे हैं
कुछ लोग बस स्टॉप के शेड में छुपे हुए हैं
और कुछ लोग रुकसाना के निकट सिगरेट फूंकते हुए मंडराने लगे हैं

तेज बारिश में
रुकसाना झांकती है बारी- बारी से सबकी आँखों में
जो उसे ही घूर रहीं होतीं हैं लगातार
वह ढूंढती है उन आँखों में
थोड़ी सी कम दरिंदगी वाली दो आँखें
जिनके नीचे न हो षड्यंत्रपूर्ण मुस्कुराहट
वह उनकी  हथेलियों को भी देखती है
कि कहीं किसी की उँगलियों में गिध्द जैसे रक्त पिपासु नाख़ून न हों
वह ताड़ती है उनकी जेबों को भी
ताकि बिना आनाकानी किए वह दे सके
कल के लिए पेट भरने का खर्च

तेज बारिश में
वह बार -बार सड़क की ओर भी देख लेती है
कि कहीं कोई खाकी वर्दी वाला न आ धमके
वह जानती है कि उसका हिस्सा देने के बाद
उसे एक बार भूखा ही रहना पड़ेगा
इसलिए वह जल्दी ही किसी के साथ निकल जाना चाहती है

तेज बारिश में
छतरी ताने कई लोग उसके निकट आते हैं
और मोल -भाव कर खिसक जाते हैं
तब बचे हुए दो -तीन लोगों की फुसफुसाहट
रात का गहराता सन्नाटा
और नाले में पानी की घरघराहट से वह घबरा जाती है
उसे लगता है मूसलाधार बरसात रात भर नहीं रुकेगी
और उसकी खोली में फिर से भर जाएगा पानी
अचानक  उसे खोली में चटाई पर लेटे अपने बेटे की याद हो आती है
वह झट से अपनी छतरी मोड़ती है
और लौट रहे एक आदमी को इशारे से रोक कर कहती है
” …चलो ! उतने में ही सही …”

3. लेकिन वह अभिनेत्री नहीं है

कुर्ला स्टेशन पर
लोकल ट्रेन के डिब्बे में अपनी बेटी का हाथ पकड़े
धड़धड़ाती घुस आई औरत
अचानक जोर- जोर से गाने लगती है

यह  किसी ने सोचा नहीं था क्षण भर पहले
कि सुनना पड़ेगा बेसुरा गाना
औरत गा रही है …परदेशी …परदेशी जाना नहीं …
और उसकी नाबालिग बेटी हथेली पसारे
भटक रही है एक सीट से दूसरी सीट

गाती हुई औरत बार -बार देख लेती है
अपनी बेटी की हथेली पर
जब कोई यात्री उसकी बेटी को दूर हटाते हुए
फेर लेता है उपेक्षा से नजरें
तब गाती हुई औरत की आवाज
ट्रेन की तेज रफ़्तार में कहीं खो जाती है
वह भूल जाती  है लय कई बार
लेकिन जब भी उसकी बेटी की हथेली पर
गिरता है कोई सिक्का
वह ऊँची आवाज़ में गाने लगती है

गाती हुई औरत बार बार भूल जाती  है गाने के बोल
लेकिन वह जोड़ देती है कई शब्द अपने मन से
वह किसी भी हालत में टूटने नहीं देती है
गीत की पंक्तियों की कड़ी
गीत में जुड़े नए अपरिचित शब्द
और टूटते सुर में पसरी पीड़ा
उसका अपना सृजन है

इस समय गीत को रचने और गाने वाली वह स्वयं है
लेकिन वह अभिनेत्री नहीं है

4.  झोपड़ी में गर्भवती औरत

किराए की उस छोटी सी  झोपड़ी में
तिलचट्टों ,चूहों और कनखजूरों के साथ रहती है गर्भवती औरत
देर रात तक पानी भरने
और सुबह जल्दी उठ कर खाना बनाने से थककर चूर हुई औरत
पति के काम पर जाते ही
फर्श पर चटाई बिछा कर पसर जाती है

पतरे की दीवारों से बतियाते
और आटा -चावल के डिब्बों ,झोलों पर
उछालते- कूदते चूहों को देखते हुए न जाने कब उसे नींद आ जाती है

शाम को जब घुटन से बेचैन होकर उसकी आँखें खुलती हैं
तब वह पेट पकड़े लड़खड़ाती हुई
खोलती है दरवाजा
और लेने लगती है लंबी -लंबी सांस
वह सोचती है कि काश इस झोपड़ी में कोई खिड़की होती

5. मैंने देखा है तुम्हे

निस्तब्ध रात में
जब घरों के दरवाजे बंद हो जाते हैं
बुझा दी जाती है बत्तियाँ
उस समय मैंने देखा है तुम्हें
शराब पीकर रोते हुए

दो पैग पीने के बाद तुम बिलखने लगती हो
टूटे खिलौने हाथ में लिए उदास बच्ची की तरह
दुःख से थरथराती है तुम्हारी देह सूखे पीले पत्तों सी
आँखें डूबती हुई सी लगती हैं
जैसे किसी शाम में दूर जाती नाव

रोती हुई तुम देती हो गालियाँ
उन सबको जिन्होंने तुम्हें ठगा है
और तुम्हें छोड़ दिया है
इमारतों के जंगल में
पंखहीन

तुम्हारी गालियाँ
उन तड़पती  चिड़ियों की चीख सी लगती है
जिनके पंख
कुतर डाले हैं लोमड़ियों ने

मैंने देखा है तुम्हें
नशे में खिलखिलाते हुए भी
जोर-जोर से ठहाके लगाते हुए भी

तुम सब पर हँसती हो
बारी बारी से
और तुम्हारा चेहरा अचानक तमतमा जाता है
लाल हो जाते हैं तुम्हारे कोमल गालों के उभार
इस लालिमा में
क्रोध और नफरत का उफान है
लेकिन यहाँ प्यार का स्पर्श भी है
हल्का और फीका
खोया -खोया सा

तुम इस प्यार पर भी हँसती हो
और ग्लास उठाते हुए
छलछला जाती हैं तुम्हारी आँखें
6.  सीढियां

इन सीढ़ियों पर कभी कोई दीपक नहीं जलाता
न ही कोई झाड़ू फेरता है
क्योंकि वहाँ पसरे अँधेरे में किसी के पैर घसीटने की आवाज़ आती है
कोई ऊपर से नीचे उतरते हुए बार -बार रोता है
वह चीखता भी है ,लेकिन उसकी आवाज़ बीच में ही टूट जाती है

वह इन सीढ़ियों से उतर कर भाग जाना चाहता है दूर …बहुत दूर
लेकिन कटे हुए उसके दूसरे पैर से रिसता खून उसे चिपका लेता है

लोग सुन सकते हैं उसके हांफने की आवाज़
और सुन सकते हैं उसके गले से लिपटी एक छोटी बच्ची का विलाप भी
वह धीरे -धीरे सिसकती है ,कराहती है ….
उसके गले से निकलती है आवाज़ -” …माँ -माँ ”

उसकी गर्भवती माँ ऊपर ही रह गई है
दो हिस्सों में अलग -थलग
खून से लथपथ ….निर्जीव ….

अब भी साफ़ सुनी जा सकती हैं
पिता और बेटी की तेज धडकनें
पीठ थपथपाने
और कहीं निकट ही ठहाकों की आवाज़

यहाँ सुनी जा सकती हैं
केरोसिन फेंकने और आग की लपटों में दो शरीरों के छटपटाने की आवाज़ भी
जिनके राख बन जाने तक
वहाँ आखिरी बार प्रकाश फैला था

सबने साफ साफ़ देखा था
सीढ़ियों पर पड़े राख के ढेर में
ऊपर से रिसते रक्त की धार

सुना है
अब इन सीढ़ियों की सफाई की जायेगी
इन्हें  चमका कर इस्तेमाल लायक बनाया जाएगा

7. अचानक एक खाली नाव ने उसे बुला लिया

जैसे कोई अभी-अभी 11 वर्ष की सजा काटने के बाद
बेगुनाह साबित हो कर निकला हो
और आकाश को निहारने का प्रयास कर रही उनकी आंखों में पड़ी हों
बारिश की ठंडी बूंदें

जैसे कोई कड़ी धूप से बचने के लिए
निराश बैठा हो सूखे पेड़ के नीचे
और अभी- अभी तेज हवा का झोंका
उसे थमा गया हो सुगंध
धान रोपने के लिए खेत में गुंथी जा रही मिट्टी की
और छोटे खेत के किनारे की पगडंडी पर बच्चों के पैर से रौंदे जा रहे घास की

जैसे कोई तालाब में डूबने जा रहा हो
और अचानक एक खाली नाव ने उसे बुला लिया हो

जीने के लिए कोई भी बहाना अप्रिय नहीं होता
हर मोड़ पर मुस्कुरा के मिलती है जिंदगी
कान में कहती है- लड़ो
जैसे लड़ रही है चिड़िया तिनके और दाने के लिए

8.  जिन्दगी का नया गीत

जिन पंछियों के घोंसले उजाड़ दिए जाते हैं
वे नहीं छोड़ देते हैं अपना वतन
वे दाना चुगते हैं अपने बच्चों का पेट भरने के लिए
आंधी से उजड़ गये खेतों से भी
वे उन तालाबों के निकट भी ठन्डे पानी की तलाश में भटकते हैं
जिनके पानी का रंग लाल हो गया होता है उनके अपनों के खून से
वे फिर से आशियाना बनाने के लिए उन्हीं पेड़ों पर मंडराते हैं, तिनके ले ले कर
जिन पेड़ों की शाखाओं पर उन्हें पकड़ने के लिए जाले लगा दिए गए हैं
वे सशंकित हैं, चिंतित हैं, लेकिन डरे हुए नहीं हैं
आप अब उन्हें हथेलियों पर मूंगफली रख कर नजदीक नहीं बुला सकते
वे फुर्र से उड़ जाएंगे जिन्दगी का नया गीत गाते हुए…..

9. जहाँ काली पड़ गई जमीन

अब शाम में अंधेरा घिरते ही
घोड़े की हिनहिनाहट नहीं सुनाई पड़ती
तो बेचैनी में खटिया से उठकर टहलने लगता है बूढा
फिर बीड़ी जलाने से पहले
खांसता रहता है देर तक

वह बार – बार उधर देखता है
जहां बंधा रहता था घोड़ा खूंटे से
अब उस जगह पर दीवार के किनारे पड़ा है तांगे का पुराना पहिया
और पहिए पर मटमैली बोरियां
जो रात में ठंड से बचाती थी घोड़े को

वह उस जगह से थोड़ी दूर पर देखता है
जहां काली पड़ गई है जमीन
वहीं पर अलाव लगाती थी बुढ़िया
और बुदबुदाते हुए काली चाय ले आती थी

खजूर के पेड़ के नीचे
अब भी उल्टी पड़ी है टोकरी
जिसमें घास रखकर वह हिनहिनाते घोड़े के पास जाती थी
और उसकी पीठ पर चपत लगाते हुए
देती थी गालियाँ

खटिया पर लेटते हुए सोचता है बूढा
कि पहले कभी इस तरह अंधेरे में
वह नहीं बैठा रहता था चुपचाप
शाम ढलते ही बुढ़िया जला देती थी लालटेन

10. इस गुलमोहर को खून से सींचा गया है

मुजफ्फरपुर की सड़कों पर गुजरते हुए
एक घर की चारदीवारी के अन्दर
गुलमोहर के लाल फूल देखकर मैं ठहर गया
पल भर

मेरे मित्र ने बताया
कि इस घर में रहता था एक सिख परिवार
लेकिन वह अचानक न जाने कहाँ चला गया
जब चौरासी के सिख विरोधी दंगों की आंच यहाँ तक पहुंची
तब जला दी गईं  थी कई दुकाने
और लाठी -बन्दूक के सहारे
खाली करा दिए गए थे कई घर

सिखों को मारने,लूटने और भगाने के बाद भी
घर सुनसान नहीं हुए
क्योंकि दूसरों के घरों के चिराग बुझाने के बाद
वहाँ अपने दीपक जलाने वाले पहुँच गए

यह गुलमोहर का पेड़ तब से खड़ा है चुपचाप
इसके तने पर अब भी हैं तलवार से बने घाव के चिन्ह
इसकी जड़ों को खून से सींचा गया है
इसलिए इसके लाल -लाल फूलों को देखकर
लोग ठहर जाते हैं कुछ देर

लोग कहते हैं
रात होते ही
इन लाल फूलों से टपकते हैं आंसू