विमर्श से परे: स्त्री और पुरुष-आख़िरी क़िस्त

सुधा अरोड़ा
सुधा अरोडा
सुधा अरोडा सुप्रसिद्ध कथाकार और विचारक हैं. सम्पर्क : 1702 , सॉलिटेअर , डेल्फी के सामने , हीरानंदानी गार्डेन्स , पवई , मुंबई - 400 076 फोन - 022 4005 7872 / 097574 94505 / 090043 87272.

( अक्सर देखता हूं कि अपने फेसबुक स्टेट्स में या फिर स्त्रीकाल के पोस्ट में या किसी सभा में मैं स्त्रीवाद की बात करता हूं , तो पुरुष स्रोता या पठक पुरुष -विमर्श या पुरुषवाद के आग्रह के साथ उपस्थित होते हैं . सुधा जी का यह आलेख वैसे आग्रह रखने वाले पुरुष मित्रों को जरूर पढना चाहिए . पढना उन्हें भी चाहिए , जो दहेज कानून के द्वारा पुरुष -प्रताडना की बात करते हैं , भारत के न्यायालयों में बैठे मर्द  को भी. साथ ही उन्हें भी जो स्त्रीवाद को अनिवार्यतः पुरुष -विरोध के रूप में देखते हैं.  इसे हम तीन किश्तों में प्रकाशित कर रहे हैं . यह आख़िरी  किश्त है .  पहली किश्त के लिए यहाँ क्लिक करें. और दूसरी किश्त के लिए यहाँ  )

दरअसल विवाह संस्था आज भी निष्ठा , समर्पण और साहचर्य की प्रतीक है । अमेरिका जैसे खुले समाज में जहां देह की वर्जना नहीं है , वहां भी दाम्पत्य के मूल में निष्ठा ही है । वहां भी विवाहेतर सम्बन्ध तलाक का बायस बनते हैं । वहां भी बच्चों के भविष्य  और मानसिक स्वास्थ्य और विकास के मद्देनज़र कई - कई शादियाँ - टूटने की कगार पर पहुंचकर भी समझौते पर पहुंचती हैं और निस्सन्देह विवाह संस्था का बचा रहना यह बच्चों के पक्ष में जाता है और उनके भविश्य को सुरक्षित होने का अहसास दिलाता है । पर पुरुष के भीतर धंसे बैठे संस्कार , उसका अहंकार , उसका वर्चस्व और एकाधिकार (वनअपमैनशिप ) , इस गृहस्थी की गाड़ी को ठीक से चलने नहीं देता । जहां संतुलन को साधकर चला जाये , ऐसे परिवार की खुशहाली की खुशबू आप दूर से ही सूंघ सकते हैं ।

1993 के बाद एक पत्रिका ‘पुरुष उवाच‘ नाम से शुरु की गई थी जो वार्षिक  पत्रिका ‘स्त्री उवाच’ की तर्ज़ पर थी । बाद में इसका नाम ‘पुरुष स्पंदन’ कर दिया गया । पुरुष विमर्श  या पुरुष अध्ययन को विकसित करने की ज़रूरत है पर पूरी तरह जाति , वर्ग , वर्ण विभेद के अर्न्तसंबंधों की जानकारी रखने वाले उदार और प्रगतिवादी नज़रिये से । जैसे स्त्रियां एक समूह में बैठ कर ‘स्पीक आउट’ या ‘स्पीक अलाउड’ सेशन्स में अपने पर होती हिंसा, प्रताड़ना, शा सन और विभेद की बातें करती हैं, उसी तरह पुरुष अपने शासन, दमन, बलात्कार और हिंसा के पीछे छिपे मनोविज्ञान की पड़ताल करें - परिवार में हिंसा से लेकर समाज और देश में हो रही हिंसा के कारण तलाशने की कोशिश  करें । सवर्ण और दलित , उच्च और निम्न वर्ग की स्त्रियों के शासित और प्रताड़ित के अनुभवों में भी अंतर है । अगर हम अपने इर्दगिर्द फैले इस तरह के उदाहरणों को सामने रखकर , शोध के तहत कुछ निष्कर्षो  तक पहुंच पायें तो वे समाधान निश्चित  ही समाज को एक सकारात्मक दिशा  की ओर ले जायेंगे ।

मुंबई में और कोलकाता में महिलाओं के अधिकारों और उनपर होने वाली प्रताड़ना से निबटने के लिये मीडिया से जुड़े कुछ प्रगतिशील सोच वाले पुरुषों ने काउंसिलिंग सेंटर बनाये - तथापि , सहज , सहयोग वगैरह । ‘सहयोग’ ने युवाओं को साथ लेकर ‘गाली बंद‘ अभियान - स्त्री के यौनांगों को लेकर गांव खेड़े ही नहीं , महानगरों तक में जो गालियां पुरुषों की ज़बान पर हर दूसरे वाक्य के साथ आती हैं - उन्हें रोकने का कार्यक्रम ‘स्टॉप अब्यूज़’ शुरु किया , जिसमें उन्हें सफलता भी मिली । 1995 में मीडिया के कुछ लोगों ने मिलकर मुंबई में एक संगठन ‘मावा’ बनाया गया था। मावा  (MAVA – Men against violence and abuse) यानी मेन अगेंस्ट वायलेंस एंड अब्यूज़ । कई बार महिला संगठनों में हम प्रताड़ित महिला के पति को बुलाकर समझौता करवाना चाहते हैं , पर महिला संगठनों में जाना पुरुष  अपनी हेठी समझते हैं । ऐसे में पुरुषों  द्वारा बनाया संगठन बहुत मददगार सिद्ध होता है । ऐसे कुछ एक संगठन कुछ बड़े शहरों में हैं और नब्बे के दशक  में ही इनकी शुरुआत हुई । नारीवादी आंदोलन को सही दिशा  देने में और काम को आगे बढ़ाने में ये बहुत मददगार सिद्ध हुए हैं। इन्होंने महिलाओं के हक में मासिक पत्रिकायें और न्यूज़ लेटर भी निकाले जिसमें महिला सामाजिक कार्यकर्ताओं के आलेखों को प्रमुखता से प्रकाशित किया । आठ मार्च को महिला दिवस के आयोजनों में इन्होंने भागीदारी निभाई और खुद भी आठ मार्च के लिये विशेष  कार्यक्रम आयोजित किये । कॉलेज के छात्रों के बीच जागरुकता फैलाने में इन पुरुष संगठनों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई ।
तकलीफ़ तब होती है , जब हम सुनते हैं कि सामाजिक कार्यकर्ता पुरुष , जिन्होंने प्रताड़ित महिलाओं के लिये एक सपोर्ट सिस्टम तैयार किया, में से कुछ स्वयंसेवी बाहर तो इस तरह के सामाजिक काम करते रहे , पर अपने दूसरे संबंध बन जाने पर, घर में अपनी पत्नी को गलत दवाइयां देकर, मानसिक अस्पताल की दहलीज़ पर पहुंचाकर, उनसे निज़ात पानी चाही । यह एक आपराधिक स्थिति है और वह ऐसे ही रूढ़िग्रस्त समाजों में पनपती है जहां तलाक पाना मुश्किल  है , लेकिन मनोचिकित्सक को रिश्वत  देकर मानसिक अस्वस्थता का प्रमाणपत्र पाना आसान है । इसका भरपूर फायदा पुरुष अपने अनैतिक संबंधों को नैतिकता का जामा पहनाने के लिये उठाते हैं । ऐसी स्थितियां पुरुष  वर्ग पर भरोसा नहीं करने देतीं । तब यह कहना ही पड़ता है कि औरत की हैसियत , उसकी मानमर्यादा , उसके रुतबे , उसके चरित्र ,रोज़मर्रा के उसके अनथक श्रम पर लगातार आघात करता पुरुष  समाज क्या कभी थमेगा या बदलेगा ? समाजशास्त्र  के विचारक क्या इसका विश्लेष्ण  कर किसी नतीजे पर पहुंचेंगे कि क्यों पुरुष  घर के बाहर दबे-कुचलों के समर्थन में झंडा उठाने के बावजूद घर में घुसते ही उसी झंडे के डंडे से अपनी बीवी को पीटता है और इस कर्म में कभी थकता - हारता भी नहीं ? इसके मूल में वह प्रताड़ना ही है जिससे हम पिछले तीस सालों से लड़ रहे हैं पर अफसोस कि इसमें कहीं कोई कमी आती दिखाई नहीं दे रही , सिर्फ हिंसा के रूप बदल बदल कर हमारे सामने आ रहे हैं।

मुझे यही लगता है कि विमर्श के नाम पर कोई पुरुष प्रताड़ना पर एक चालू किस्म का संकलन संपादित कर ले या कोई पत्रिका अति उत्साह में पुरुष विमर्श पर एक विशेषांक निकाल डाले , अन्ततः उसकी परिणति स्त्री स्वभाव और स्त्री के बदलते स्वरूप को विश्लेषित करने में ही होगी (दशकों तक पुरुष  स्त्री जमात पर नियंत्रण करता रहा , अब उसे अपनी ज़ेरॉक्स जमात जब मुटिठयां भांजती दिख रही है तो बजाय इस असंतुलन की तह तक जाने के, वह इसी जमात को अपना ख़ैरख्वाह मान रहा है ) और इसी की आज जरूरत भी है जिसके लिये मैं पहले ही यह लिख कर अपना अफसोस जाहिर कर चुकी हूं -अफसोस इस बात का है कि स्त्रियों का भी पूरा फोकस इस पुरुषव्यवस्था का हिस्सा बनने में है । साहित्य हमेशा शोषित  के पक्ष में खड़ा होता है पर ऐसा अवसरवादी साहित्य कितना स्त्री सशक्तीकरण में योगदान दे पाएगा , मालूम नहीं । आखिर बदलाव ज़मीनी तौर पर स्त्रियों के लिए काम करनेवाली गैर महत्वाकांक्षी कार्यकर्ताओं से ही आएगा । साहित्य के जरिए हम कितना कर पाएंगे, कभी कभी यह सोच ही निराशा  के गर्त में धकेल देती है । आज समाज में बदलाव लाने की इच्छा रखने वाली सामाजिक कार्यकर्ताओं के सामने दोहरी लड़ाई है । इनकी पहली लड़ाई स्त्री देह में पुरुष सोच को पुष्पित  पल्लवित करने वाली इन स्त्रियों से ही है , पुरुषों का नम्बर तो दूसरा है। पुरुष चाहें तो इस वाक्य को पढ़कर खुश  हो सकते हैं कि ‘डिवाइड एंड रूल’ के तहत चित भी उनकी रही और अब पट भी ।

आज ऐसी स्त्रियों की एक ब्रीड पनप रही है जिसके लिये निजी संबंधों में नैतिकता और एकनिष्ठता  कोई मूल्य नहीं रही। इन मूल्यों के छूटते ही, संकोच और संवेदना दोनों तिरोहित हो जाते हैं। इस जमात के सामने कोई अवरोध और रुकावटें (inhibitions) नहीं हैं , इसलिये ये कोई हर्ट अपने साथ ले कर नहीं चलती । जैसे पुरुष अपनी एकनिष्ठ पत्नी की बेक़द्री कर, उसे छोड़ने में और दूसरा सम्बन्ध बनाने में कोताही नहीं बरतते थे, ये स्त्रियां भी न अपने पतियों की परवाह करती हैं, न छूट गये प्रेमियों की । संकोच और आचार संहिता को ताक पर रख कर इनके लिये जीना ज्यादा आसान हो गया। देह युक्त और भावना मुक्त होने के , आज के प्रैक्टिकल या बाजार-प्रमुख समय में बड़े शुभ  लाभ हैं । प्रेम अब अपने साथ आहत भावनाओं का पैकेज लेकर नहीं आता क्योंकि वह ‘प्रेम’ की पुरानी परिभाषा से बाहर आ चुका है । अब वह प्रेम कम और अर्थशास्त्र का नफ़ा-नुकसान वाला बहीखाता ज्यादा बन गया है ।

स्त्री विमर्श का हश्र हम देख ही रहे हैं। बोल्डनेस के नाम पर पत्रिकाओं के पन्नों पर देह विमर्श  परोसा जा रहा है। जब स्त्री विमर्श  शब्दकोश में सो रहा था , तब बग़ैर नारों और नगाड़ों के स्त्रियों के हक में ज्यादा महत्वपूर्ण रचनाएं लिखी गयीं । आज विमर्श  का जिन बोतल से बाहर आ गया है और हड़कंप मचा रहा है । महिला रचनाकारों की एक बड़ी जमात बिना किसी सरोकार और प्रतिबद्धता के स्त्री विमर्श  कर रही है और साहित्य के पन्नों पर कहानी और कविता के नाम पर रसरंजक साहित्य परोस रही है । यह एक अलग किस्म का एंटी क्लाइमेक्स है । एक ओर सदियों से चली आ रही दासता झेलने को अभिशप्त स्त्री , दूसरी ओर अपनी देह को दांव पर लगाते हुए पुरुषकी ही शतरंजी बिसात पर उसके ही मोहरों और उसकी ही चालों से उसे नेस्तनाबूद करती जमात । एक गुलामी को तोड़ने के लिये सिर्फ जगह बदल लेना और गुलाम का शोषक  की भूमिका में उतर आना कोई समाधान नहीं हो सकता । यह भूमिका जहां कुछ जगह घेरती दिखती है , वहीं से पुरुष विमर्श  का डंका बजाने वे ही महिलायें नौटंकी करती उठ खड़ी होती हैं जो इस भूमिका में शरीक  हैं । स्त्री विमर्श  को तो पुरुषोंने ही अपनी मनमर्ज़ी से संचालित किया और यह तो खालिस पुरुषों का तमाशा  ही है , जिसे कंधा देने के लिये ऐसी औरतें मौजूद हैं ।  

भावना संवेदना विहीन, हिसाबी किताबी , इस्पात में ढली लड़कियों-महिलाओं की एक बदली हुई जमात हमारे सामने है ,पर इस जमात को खड़ा किसने किया है ? सत्ता  में बैठे प्रभुता संपन्न पुरुषों ने ही न ! यह स्त्री जाति की प्रताड़ना का विलोम है, एक औसत तस्वीर नहीं । आज भी इसका प्रतिशत प्रताड़ित होती स्त्रियों के मुकाबले बहुत कम है । बेशक प्रतिशत कम हो, पर इस पर गौर करना पुरुषों के लिये ज़्यादा बड़ी ज़रूरत है क्यों कि इस से पुरुष वर्ग ही मूर्ख बन रहा है ।  पुरुष की स्वभावगत कमज़ोरी इसने भांप ली है । वैसे तो नारीवाद , पुरुष और स्त्री की स्वभावगत - जन्मना या अर्जित - दोनों तरह की प्राकृतिक विशिष्टताओं  को सिरे से खारिज करता है और उनपर सवाल खड़े करता रहा है , यह जानते हुए भी इसे कहने का खतरा मैं उठा रही हूं । एक खास किस्म की स्त्रियों की जमात पर लिखी अपनी एक कविता – शतरंज के मोहरे - का एक अंश  दे रही हूं -
पनप रही है अब/ नयी सदी में नयी जमात / जो सन्नाटे का संगीत नहीं सुनती /सलाइयों में यादों के फंदे नहीं बुनती /जो करेले और भिंडी में कभी नहीं उलझती /अपने को बंद दराज़ में नहीं छोड़ती /अपने सारे चेहरे साथ लिए चलती है /कौन जाने , कब किसकी ज़रूरत पड़ जाए 
अपनी शतरंज पर / वह पिटे हुए मोहरों से खेलती है /एक एक का  शिकार  करती /उठापटक करती /उन्हें ध्वस्त होते देखती है /उसकी शतरंज का खेल है न्यारा / राजा धुना जाता है /और जीतता है प्यादा / उसकी उंगलियों पर धागे बंधे हैं /हर उंगली पर है एक चेहरा /एक से एक नायाब /एक से एक शानदार /उसके इंगित पर मोहित है /वह पूरी की पूरी जमात / जिसने /अपने अपने घर की औरत की / छीनी थी कायनात 
उन सारे महापुरुषों को /अपने ठेंगे पर रखती/एक विजेता की मुस्कान के साथ /सड़क के दोनों किनारों पर/फेंकती चलती है वह औरत /यह अहसास करवाए बिना /कि वे फेंके जा रहे हैं /और वे ही उसे सिर माथे बिठाते हैं /जिन्हें वह कुचलती चलती है !
इक्कीसवीं सदी की यह औरत /हाड़ मांस की नहीं रह जाती /इस्पात में ढल जाती है /और समाज का /सदियों पुराना /शोषण का इतिहास बदल डालती है /रौंदती है उन्हें /जिनकी बपौती थी इस खेल पर/उन्हें लट्टू सा हथेली पर घुमाती है /और ज़मीन पर चक्कर खाता छोड़/ बंद होंठों से तिरछा मुस्काती है /बाज़ार के साथ /बाज़ार बनती /यह सबसे सफल औरत है !

हमारा साहित्य इतने संतुष्ट, तृप्त, खाये पिये अघाये वर्ग से आता है कि उसे स्त्री यौनिकता के मुद्दे और देह की आज़ादी से बाहर निकल कर सामान्य वर्ग की तकलीफ़ पर बात करने की न फुर्सत है, न चाहत । ये एक विशिष्ट  तबके से आये विशिष्ट  ग्रह के वाशिन्न्दे  हैं , जिनकी कलम सिर्फ़ देह के सरोकारों के इर्द गिर्द अपने शब्दों की पच्चीकारी दिखाती है। रंगीन बाज़ार में सिर्फ़ रंगीनियां ही बिकाऊ हैं । वहां समाज के बड़े तबके के स्याह दुख त्याज्य हैं। उनके लिये यहां कोई जगह नहीं। उनकी बेहतरी की चिंता करने के लिये सामाजिक कार्यकर्ताएं और संस्थाएं हैं न ! साहित्य एक कला है और कला से समाज बहिष्कृत  हो रहा है। व्यावसायिक फिल्मों की तरह ही हिंदी साहित्य का प्रकाशक  भी यौनिकता का बाकायदा टैग लगाकर किस्से कहानियां बेच रहा है।

दरअसल पुरुषों के समानांतर, आज के उपभोक्तावादी समय में महत्वाकांक्षाओं और लिप्सा की मारी पुरुषनुमा स्त्रियों की एक व्यावहारिक जमात पनप रही है । इस व्यावहारिक जमात से पुरुषों को परहेज़ होना चाहिये था । ऐसा नहीं हुआ । इसके विपरीत आततायी और निरंकुश  पुरुषों से इन पुरुषनुमा स्त्रियों का गठबंधन बहुत मजबूत होता जा रहा है । नैतिक मूल्यों को थाती की तरह बचाकर रखने वाली कुछेक ‘सिरफिरी’ स्त्रियों को शुद्धतावादी ठहराकर , उनपर ‘मॉरल पोलिसिंग’ का लेबल लगाकर , उनके जनाज़े को कंधा देने के लिये , ये पुरुष और स्त्रियां एक साथ ताल से ताल मिलाकर चल रहे हैं । साहित्य के संसार में धकमपेल से अपनी जगह बनाती यह नियो रिच क्लास , जिनका कोई सामाजिक सरोकार नहीं हैं, जो ‘‘खाओ पियो , मौज करो‘‘ वाले फलसफे में यकीन करती है और जिसका देश  में व्याप्त भ्रश्टाचार और समाज की विसंगतियों से कोई वास्ता नहीं है, जो आज की नयी लड़की के हाथ में गला फाड़ चिल्लाने वाला भोंपू थमाकर बगावत का बेसुरा बिगुल बजाना चाहती है, जिसका एकमात्र सरोकार स्त्री में नयी किस्म की पनपती यौनिक आज़ादी है, अगर एक-दूसरे का हाथ थामे, आज आपके सामने बढ़ती चली जा रही है तो इन्हें आप कैसे ध्वस्त करेंगे  ! इनके पास तो खोने के लिये भी कुछ नहीं है !
समाप्त 
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