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स्त्री एवं भाषा : तीसरी परम्परा की खोज एवं वैकल्पिक भाषावैज्ञानिक अध्ययन

प्रो.शैलेन्द्र सिंह

प्रो.शैलेन्द्र सिंह पूर्वोत्तर में नार्थ इस्टर्न यूनिवर्सिटी ( नेहू ) में पढ़ाते हैं संपर्क : tosksinghnehu@gmail.com

( प्रोफ. शैलेन्द्र सिंह ने स्त्रीकाल और गुलबर्गा वि वि के द्वारा आयोजित सेमिनार     में  ‘ स्त्री एवं भाषा’  विषय पर एक आलेख प्रस्तुत किया था , जो शीघ्र ही        स्त्रीकाल   के प्रिंट एडिशन में प्राकाश्य है . उस आलेख का एक हिस्सा स्त्रीकाल के  पाठकों के लिए . शैलेन्द्र सिंह की प्रस्तुति के बाद वहाँ मौजूद स्त्रीवादियों ने उनसे जम  कर बहस की थी. असहमति की स्थिति में आलेख आमंत्रित हैं. )

वैज्ञानिक सोच,भाषा को ईश्वरीय देन एवं वरदान नहीं मानती है। अर्थात मनुष्य ने भाषा को रचा और संवारा, तो भाषा ने मनुष्य को। भाषायी निर्माण की उक्त प्रक्रिया में स्त्री एवं पुरुष एक दूसरे काप्रतिभागी नहीं रहा है, बल्कि एक ही मानवीय सिक्के के दो पहलूकी तरह दिखाई देते हैं। नतीजतन, भाषा न तो स्त्री की अनुपस्थिति में साकार हो सकती है, और न तो पुरुष की अनुपस्थिति में। अगर समाज निर्माण में स्त्री एवं पुरुष की उपस्थिति बुनियादी शर्त है, तो भाषा निर्माण की प्रक्रिया में भी स्त्री एवं पुरुष की उपस्थिति अनिवार्य शर्त है। अर्थात एक दूसरे की अनुपस्थिति में भाषा एवं समाज दोनों की उपस्थिति असंभव है। नितान्तः जिस कदर समाज निर्माण की प्रक्रिया में दोनों की समान सहभागिता है, वैसे ही दोनों की समान सहभागिता है भाषा निर्माण की प्रक्रिया में। जिस तरह स्त्री एवं पुरुष की अनुपस्थिति में समाज की उपस्थिति असंभव है, वैसे ही स्त्री एवं पुरुष की अनुपस्थिति में भाषा की उपस्थिति असंभव है। यह भी लाजिमी है, कि किसी विशिष्टभाषा की रचना न तो स्त्री की है और न तो पुरुषकी।पुरुष एवं स्त्री दोनों एक ही भाषा का प्रयोग करते आए हैं और करेंगे भी। कुछ भिन्नताएं सहज हैं, जिसको लेकर भाषाविदों ने अवश्य माथापच्ची की है।  भाषा एवं स्त्री के अंतरसंबंधों को भिन्न धाराओं के तहत परिभाषित एवं विश्लेशित करने की कोशिश की गयी है।

स्त्री, भाषा एवं सैद्धांतिकीः
भाषा एवं स्त्री के अंतरसंबंधों को निम्नलिखित सैद्धांतिक परिपाटियों के तहत समझना समीचीन होगाः

मूल सिद्धांतः


प्रथमतः भाषा, लिंग एवं स्त्री के अंतरसंबंधों के वैज्ञानिक सत्यापन, शोध एवं निष्कर्ष के लिए मूल सिद्धांत के तहत अध्ययन करना समुचित होगा। भाषाविज्ञान वैज्ञानिक विद्या है, इसलिए इसे सिर्फ सौन्दर्य शास्त्रीय मानकों की जरूरत नहीं है। वहीं दूसरी ओर इसे सिर्फ किसी विशिष्ट विचारधारा के तहत भी परिभाषित करना अनुचित होगा। विशुद्ध ज्ञान का हिस्सा बनकर इसे कद्र मुक्त होना होगा ताकी निष्पक्ष अध्ययन किया जा सके। मूल सिद्धांत, वैज्ञानिक अन्वेषण के तहत इसका अध्ययन करता है। सिद्धांत प्रतिपादन का आधार वस्तुनिष्ठ होता है। वैज्ञानिक सोच यह मानती है कि भाषा एवं लिंग के अन्तरसंबंधों को प्राथमिक डेटा संग्रह के द्वारा सत्यापित किया जा सकता है। अतः सिद्धांतो को वैज्ञानिक स्वीकृति की आवश्यकता होती है। मूल सिद्धांत विशुद्ध ज्ञान से प्रेरित एवं आश्रित भी होता है। लाजिमी है कि यह कद्र मुक्त एवं निष्पक्ष होता है।

सेमिनार में श्रोता

किसी भी भाषा की संरचना का समग्र विश्लेषण, लिंग विश्लेषण के बिना संभवनहीं है, क्योंकि भाषा संरचना में लिंग एक महत्वपूर्ण संरचनात्मक इकाई होती है। एक ओर अगर भाषा के बिना सम्प्रेषण संभव नहीं है, तो वहीं दूसरी ओर भाषा के बिना ‘‘स्व’’ की तलाश भी संभव नहीं है। भाषा प्रत्येक मनुष्य के ‘‘स्व’’ को पहचानने में हमारी मदद करती है। मनुष्य का ‘‘स्व’’ नारी एवं पुरुष में सदैव से विभाजित रहा है, जिसका सत्यापन भाषा के माध्यम से भी होता है। भाषामनुष्य को पहचानती है और साथ ही संरचनात्मक स्तर पर स्त्री एवं पुरुष की भिन्नता को सहज स्थान देती है। यही कारण है कि विश्व कीअधिकांशभाषाओं में लिंग भेद किसी न किसी रूप में भाषा संरचना का हिस्सा है। भाषा अगर मनुष्य द्वारा निर्मित धरोहर है, तो मनुष्य ने ही स्त्री एवं पुरुष को पहचानने के तरीकों का प्रावधान भाषा के माध्यम से भाषा के अन्दर भी किया है। सृष्टि में तीन मुख्य जातियां हैंः स्त्री,पुरुष एवं जड़। विश्व की अधिकांशभाषाओं में इन्हीं जातियों के आधार पर तीन भेद किए गए हैंः पुल्लिंग, स्त्री लिंग एवं नपुसंक लिंग। कुछ भाषाओं में लिंग की अभिव्यक्ति वाक्यों मेंभी होती है, तभी संज्ञा पदों का लिंग भेद स्पष्ट होता है। स्पष्ट है, कि संज्ञा के जिस रूप से व्यक्ति या वस्तु के लिंग भेद का बोध होता है, उसे भाषाविज्ञान में ‘लिंग’ कहते हैं। संज्ञा के रूप, लिंग, वचन एवं कारक के कारण बदलते है। उदाहरण के लिए, हिन्दी में ‘लड़का जाता है’ एवं ‘लड़की जाती है’, होता है तो वहीं ‘लड़कियां जाती हैं’ एवं ‘लड़के जाते हैं’ होता है। अंग्रेजी मेंभी लिंग का निर्णय इसी व्यवस्था के आधार पर है। कुछ आधुनिक भारतीय आर्य भाषाओं में भी लिंग भेद इसी आधार पर होता है। मराठी, गुजराती आदि भाषाओं में ऐसी व्यवस्था है, परन्तु, हिन्दी में नपुंसक लिंग नहीं है। हिन्दी में लिंग, विशेषण, सर्वनाम, क्रिया, विभक्ति में विकार उत्पन करता है। लिंग भिन्नता के प्रति हिन्दी भाषा इतनी संवेदनशील है, कि विभक्तियों में भी लिंग भेद पाए जाते है – जैसे कि, उसका मुख एवं उसकी नाक। आधुनिक भारतीय भाषा की जननी संस्कृत में लिंग का अर्थ ‘चिन्ह’ या ‘निशान’ होता है। भाषा में संज्ञा चिन्ह एवं निशानी समेटी होती है। सरल शब्दों में किसी वस्तु, भाव और जीव के नाम को संज्ञा की संज्ञा दी जाती है। वस्तु मुख्यतः चार वर्गों में विभक्त हैः- जाति, व्यक्ति, समूह एवं द्रव्य। स्पष्ट है, कि वस्तु या तो पुरुष जाति की होगी या स्त्री जाति की। संज्ञा के भी दो रूप हैं: प्राणीवाचक एवं अप्राणीवाचक। कुछ भाषाओं में अप्राणीवाचक संज्ञा में भी लिंग भेद के प्रावधान हैं। लिंग भेद के उपरोक्त तथ्यों को भाषाविज्ञान के मानदंडों के आधार पर सत्यापित किया जा सकता है। भाषाओं के लिंग भेद को विश्लेषित करना भाषावैज्ञानिकशोध का हिस्सा हो सकता है। इण्डो-यूरोपियन भाषा में लिंग भेद पाए जाते हैं। स्वाहिलीभाषा में सोलह प्रकार के लिंग भेद पाए जाते हैं, परन्तु कुछ भाषाओं में लिंगभेदकर्ता में निहित होता है। जैसे कि, अंग्रेजीमें- he left, she left औरit left। कुछ भाषाओं में लिंग वर्गीकरण का औचित्य सर्वथा वैज्ञानिक, भाषा वैज्ञानिक एवं संज्ञानिक नहीं होता है,बल्कि तार्किक, यादृच्छिक एवं स्थानीय होता है। उदाहरण के लिए जर्मन में ‘पेड़’पुल्लिंग है, तो ‘कलियां’ स्त्री लिंग एवं ‘पत्ते’ नपुसंग लिंग। हिन्दी में ‘पेड़’पुल्लिंग है, तो ‘कलियां’ स्त्रीलिंग परन्तु ‘पत्ते’ के लिए पुल्लिंग एवं स्त्रीलिंग दोनों भेदविद्यमान हैं। यही स्थिति हिन्दी की भी है क्योंकि ‘बस’ स्त्रीलिंग तो ‘ट्रक’पुल्लिंग। वहीं दूसरी ओर ‘घोड़ा’ जर्मन में लिंगविहीन है, तो हिन्दी में पुल्लिंग। वहीं दूसरी ओर कुछ भाषाओं में लिंग विशेष तौर परभाषिक प्रतीक से चिन्हित किया जाता है, जैसे किः खासी, ग्रीक, जर्मन एवं फ्रेंच। जर्मन एवं खासी का उदाहरण प्रस्तुत हैः

Der-man
पुल्लिंग-पुरुष
Die-frau
स्त्रीलिंग- महिला
das –kind
नपुंसकलिंग- बच्चा

भारत के चारों भाषा परिवार में लिंग निर्धारण की प्रक्रिया में भिन्नता है। कहा जा सकता है कि भाषा भी स्त्री एवं पुरुष के बीच के नैसर्गिक विभाजन को भाषिक इकाईयों एवं संरचना के माध्यम से प्रदर्शित करती है। इसके लिए उस भाषा एवं समाज में गुजर-बसर करने बाले व्यक्ति को गलत नहीं ठहराया जा सकता है क्योंकि अगर मानव जाति की संरचना की बुनियाद मानव जाति के दो प्राणियों के अन्तरण में निहित है तो भाषा में ऐसे अन्तरण को पहचानने की शक्ति भला गलत कैसे हो सकती है। भले ही आज यह समाज भाषाविज्ञान का नया अंग है, परन्तु भाषा एवं लिंग संबंधी अध्ययन की परम्परा बौद्धिक लेखन की शुरूआत से होती है। अरस्तु के अनुसार-“ग्रीक दार्शनिक पाइथोगोरस ने व्याकरणिक लिंग की अवधारणा की पुष्टि के लिए संज्ञा के साथ प्रयुक्त होने वाले पुल्लिंग, स्त्री एवं नपुसंक भाषिक कोटियों की चर्चा की।” ऐसा माना जाता है कि- सुमेरियन महिला Emesal नाम की विशिष्टभाषा का प्रयोग करती थीं, जो कि मुख्य भाषा से भिन्न थी। वहीं दूसरी ओरEmegir स्त्री एवं पुरुषदोनों के द्वारा बोली जाती थी। महिलाओं की भाषा में विशिष्ट प्रकार के शब्दों का प्रयोग होता था।  पौराणिक ग्रंथों में देवियों की भाषाशैली में भिन्नता के प्रमाण मिलते हैं एवं स्त्रियों द्वारा किए जाने वाले धार्मिक अनुष्ठानों में भाषिक भिन्नता की चर्चा है। ऐसे प्रमाण भारत में भी मिलते हैं। कुछ संस्कृत नाटकों में महिलाओं की बातें प्राकृत भाषा में हैं। इस तरह के भरपूर उदाहरण निम्नवर्गीय एवं अशिक्षित लोगों के लिए भी मिलते है। गारिफुना में स्त्री एवं पुरुष द्वारा प्रयुक्त भाषा में भिन्न शब्दों के प्रयोग के प्रमाण मिलते हैं। हांलाकि इससे भाषा प्रभावित नहीं होती है। सच यह है कि पुरुष द्वारा प्रयुक्त शब्द अधिकाशतः Carib के होते हैं, वहीं दूसरी ओर स्त्रियों द्वारा प्रयुक्त शब्दArawak के। ग्रीक भाषा में भी स्त्री एवं पुरुष द्वारा प्रयुक्त भाषा में अन्तर के कुछ नमूने मिलते है। यह भी प्रमाणित है,कि नृजातीय आस्ट्रेलियन भाषा‘ऐनयुवा’ में भी स्त्री एवं पुरुष की बोलियों में अन्तर है।

शैलेन्द्र सिंह का स्वागत

अतिवादी सिद्धांतः


अतिवादी सिंद्धात जीवन की विविध धाराओं से जुड़ी होती है। अतः इसे दैनिक जीवन का सिद्धांत भी कहा जा सकता है, जिसे वैज्ञानिकता की कसौटियों पर बांधा नहीं जा सकता है। शायद यही कारण है, कि स्त्री अध्ययन  में आज नव विमर्शों की भरमार है। कुछ विचार धाराएं तो फैशनयुक्त हैं। अतिवादी सिंद्धात स्त्री एवं भाषा के अन्तर्संबंधों को सुविधानुकूल नजरिया एवं दृष्टिकोण से देखने का प्रयास करता है। इसमें खास वैचारिक मंथन का गुंजाइश बनी रहती है। स्त्री एवं भाषा के अन्तर्संबंधों को परिभाषित करने के नए हथकण्डे़ अपनाए जाते हैं। कुछ हद तक तो यह छिद्रान्वेषण है, जिसमें सबकुछ विचाराधीन नजर आता है। अतिवादियों को ऐसा हक प्राप्त है। इन्हीं कारणों से उक्त श्रेणी के सिद्धान्त को प्रायोगिक नहीं माना जा सकता है। इन्हें तो खेमायी प्रश्नों को उछालने में विश्वास है न कि सार्थक उत्तर खोजने में। किसी भी प्रश्न का ठोस उत्तर तो संभव ही नहीं है। अर्थात इसकी गति प्रश्नों एवं विचारधाराओं में है। यह खेमायी रूझानों से लबालब होता है। खुशी इस बात कीहै कि स्त्री से संबंधित भाषायी प्रयोग का मामला आज गहन विमर्श का हिस्सा बन चुका है। साथ में आम सहमति बनाने में भी सफलता प्राप्त की है। किसी भी सिद्धांत के लिए अस्वीकृति  विफलता नहीं है बल्कि नयी सोच का हिस्सा। डोना हारवे बायम की विचार धारा plurist है जो वर्तमान स्त्री आलोचना में प्रतिबिंबित Shouldएवंmusts के मानदण्ड़ों का रोना रोती है। कोलोडनी ने यहां तक कह दिया कि- “Seminar in the feminist theory has become soley a means to profession advancement”। अर्थात व्यक्तिगत, स्थानीय, एवं बौद्धिक दृष्टियों की गुंजाइश सदैव बनी होती है। कभी कभार अतिवादि सोच को मुख्यधारा का हिस्सा बनाना खतरनाक भी साबित होता है।

कैमरॉन (1992) का मानना है कि स्त्री अध्यन साहित्यिक अध्ययन का चहेता है और भाषावैज्ञानिकदृष्टि से अभी इसमें अभी बहुत कुछ करना बाकी है। उनका यह भी कहना है कि ध्वनि विज्ञान, वाक्य विज्ञान एवं भाषाविज्ञान की कोरशाखाओं में इसके अध्यन के गुंजाइश अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान की तुलना में बहुत कम है, क्योंकि भाषिक परिवर्तनस्त्री-पुरुष के वजूद के कारण आम-तौर पर बहुत नहीं दिखायी पड़ता है,परन्तु भाषाविज्ञान की अन्य उप-शाखाओं में, जैसे कि समाजभाषाविज्ञान, मनोभाषाविज्ञान, प्रोक्ति, अनुवाद एवं कई अन्य में इसकी तमाम संभावनाएं बरकार हैं। इन विद्याओं के जरिए नयी सोच, प्रविधि एवं विचारधाराओं को शामिल किया जा सकता है। कैमरॉन ने यह भी साबित करने की कोशिश की है, कि किस तरह से ‘स्व’निम विज्ञान एवं वाक्य विज्ञान भाषा एवं स्त्री अध्ययन को प्रभावित नहीं कर पाया है। अतः मुख्य धारा से इतर नयी सोच की आवश्यकता है, जिसमें अतिवादियों को समझना समीचीन होगा।

वैकल्पिक सिद्धांतः


अपनी किताब ‘ओरिएण्टलिज्म’ में एडवर्ड सईद  (1978:1995) ने ठीक ही कहा है, कि पूरब के बारे में पश्चिमी दृष्टिकोण अविवेकी, अकारण, अयुक्तिक, विकृत और बचपना पूर्ण रहा है। भिन्न सांस्कृतिक अस्मिताओं के प्रति संवेदनशीलता और सजगता ही ‘‘स्व’’ के पुनर्प्रतिस्थापन के प्रति सबसे बड़ी श्रद्धांजलि हो सकती है, जिसके लिए स्त्री के प्रति आभार प्रकट करना आवश्यक है। आज गैर-पश्चिमी छवि को बिगाड़ने वाले के विरूद्ध  वैकल्पिक पश्चिम का अभ्युदय हो चुका है। लेकिन आक्रामकता में अभी भी कमी है। वास्तविक स्थिति,रूख,दृष्टिकोण और कथन के स्थापन को देशीय अलंकारों के साथ आक्रामक तरीके से दर्ज करने की आवश्यकता है। नृजातीय एवं स्थानीय आवाजों को  लयात्मक होना आवश्यक है। वैकल्पिक पश्चिम में बौद्धिक गरिमा पुनर्जीवित हो रही है। वैकल्पिक पश्चिम निष्प्राणीयता के चंगुल से छुटकारा पाने की भरपूर कोशिश कर रहा है। हालांकि और अधिक आक्रामक होने की जरूरत है। इसलिए गायत्री तीसरी दुनिया की नारीवादी लेखन,“not fully at one with the rhetoricity of language” (1993:2000) मानती है । भारतीय नारीवादी पाठ को गायत्री प्रभावशाली तो मानती हैं, लेकिन साथ में यह भी कहती हैं, कि इसमें नृजातीय चारित्रिक जीवनता की बड़ी कमी है, जिसके कारण वे अपनी विशिष्ट छाप बनाने में असफल हैं। गायत्री अपने लेखन में ब्रिटिश अंग्रेजी का प्रयोग न कर अमेरिकी अंग्रेजी का प्रयोग करती हैं, ताकि भारतीय पाठक औपनिवेशिक बू से एक हद तक दूर रह सकें। आज ऐसे प्रयोगों की जरूरत भी है।

यदि स्त्री अध्ययन का उद्देश्य संसाधन निर्माण है, तो मूल्य मानवीय है एवं सीमा सार्वभौम। आज उचित संदेश देने की जरूरत है। 21वीं सदी में नयी पीढ़ी को सही संदश देने का समय आ गया है। आज स्त्री विमर्श महज अकादमिक उतरदायित्व नहीं है, बल्कि वैकल्पिक सामाजिक यथार्थ। निरन्तरता बनाए रखने की जरूरत तमाम वर्गों में है। आमहित के लिए नयी आकांक्षाओं को गढ़ना होगा ताकि हाशिए पर रह रहे वर्गों को केन्द्र की नयी भूमिका में अवस्थित किया जा सके। स्त्री विमर्शकों की नयी पीढ़ी में सृजनात्मकता की नयी शक्ति सृजित हो रही है। कौन? क्या? कहां ? किससे? क्यों ? कैसे? किसलिए? जैसे प्रश्नों का सार्थक हल नये पैमानों पर होगा,अर्थात 21वी सदी में स्त्री विमर्श का विमर्श बदलेगा, स्त्री विमर्श की भाषा बदलेगी एवं स्त्रियों की भाषा बदेलगी ।

धारा 304 IPC के बहाने एक चर्चा : एक विचार यह भी

प्रो.परिमळा अंबेकर

प्रो.परिमळा अंबेकर हिन्दी विभाग , गुलबर्गा वि वि, कर्नाटक में प्राध्यापिका और विभागाध्यक्ष हैं . परिमला अम्बेकर मूलतः आलोचक हैं तथा कन्नड़ में हो रहे लेखन का हिन्दी अनुवाद भी करती हैं . संपर्क:09480226677

( दहेज़ कानून को कमजोर करने की कोशिशों के विरोध में देश भर से आवाज है . स्त्रीकाल भी इस मुहीम  में शामिल है. यहाँ हम इस संबंध में आलेख और रपटें प्रकाशित करते रहे हैं . संयोग से दो महिलाओं ने ही ऐसे आलेख लिखे , जो यह राय रखते हैं  कि इस कानून पर पुनर्विचार की जरूरत है . हमने इस आवाज को भी यहाँ जगह दी है . गुलबर्गा वि वि की हिन्दी प्राध्यापिका प्रो. परिमला अम्बेकर भी दहेज़ कानूनों को जंग लगा हथियार बता रही हैं , इन्हें बदलने की जरूरत पर जोड़ दे रही हैं . असहमति हो सकती है , लेकिन सहमति का बिन्दू यहाँ स्त्रियों को पैतृक सम्पत्ति में अधिकार की सुनिश्चितता की मांग है.  )

स्त्रीकाल में इस सबंध में प्रकाशित विचार / रपट पढ़ने के लिए क्लिक करें :

१. न्याय व्यवस्था में दहेज़ के नासूर 
२. हम चार दशक पीछे चले गए हैं 
३. सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ आगे आये महिला संगठन 
४. दहेज़ विरोधी क़ानून में सुधार की जरूरत 

जब जंग खाया हथियार, अपनी धार खोते जाता है, तब उस हथियार की उपयोगिता या तो परंपरा की एंटिक निशानी के रूप में रह जाती है या  उसकी उपयोगिता केवल झूठमूठ में डराने धमकाने के लिए की जाती है,बच्चों के खिलौनों की तरह ! संविधान और न्यायपालिका द्वारा  गढे गये कुछ कानून भी मेरे ख्याल से , समय और परिस्थिति के बदलाव के साथ साथ , इन्हीं जंग खाये हथियार के माफिक अपनी न्यायिक और सामाजिक असर को खोते जाते हैं । यूं तो, संवैधानिक कानूनी नियम ,कलम या धाराएॅं , अपनी संवैधानिक माॅडिफिकेशन के पर्याय के साथ तो प्रस्तुत रहते हैं लेकिन कभी कभी, अपनी परिसीमा के समाज में हो रहे आर्थिक शैक्षणिक और सांस्कृतिक बदलाव के चलते कुछ  विधिक नागरिक प्रवाधान , अपनी न्यायिक और सामाजिक धार  खो द्ते हैं । जैसे स्त्रियों की सुरक्षा एवं संरक्षण हेतू बनाये गये दहेज निग्रह के कानून !!  आज दहेज निग्रह कानून ( IPC )   धारा 498 अ )  की इंटेसिटी को कम करके उसमें शिथिलता ,  सुधार लाने की संसदीय एवं कानूनी कार्यवाही की पहल हो रही है। मेरी राय में, भारतीय स्त्रियों एवं परिवार की सुरक्षा और संरक्षण के लिए बने दहेज  संबंधी अपराध के रोकथाम के लिए बने दहेज विरोधी कानून की स्थिति भी आज जंग खाये हथियार के माफिक है। संक्रमण दौर की स्थिति में, आज भले ही  इस कथन की पुष्टि के लिए हमें , वास्तविक आधार हाथ न लग रहे हो।  लेकिन लगता जरूर है कि इक्कीसवी सदी के बनते समाजशास्त्र की यह आंतरिक चेतना है!

एन् सी आई बी  ( NCIB ) राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो द्वारा सन् 2012  में दिये गये दहेज हत्या संबंधी आॅंकडें जरूर चैकाने वाले हैं । सेक्शन 302/304   के तहत सन् 2008  में ( 8172 ) से लेकर 2011 में ( 8618)  तक के दहेज संबंधी स्त्रियों की मौत की बढती संख्या में सन् 2012 में ( 8233 )  में  हठात 4.5 प्रतिशत की  गिरावट  का आना, निस्संदेह विचारणीय है । क्या इसे हम, भारतीय महिला की शिक्षा, उसकी अस्मिता, उसके द्वारा प्राप्त की जा रही आर्थिक संबलता, जिये जा रही स्वछंदता की चेतना और तो और स्त्री के व्यक्तित्व और चरित्र को लेकर स्थापित रूढबद्ध सामाजिक सोच एवं दृष्टि में पड रही शिथिलता आदि के जरिये  हो रहे सामाजिक एवं आर्थिक बदलाव की चेतना का, शुभ संकेत मान सकते है ?

आज दहेज निग्रह कानून  IPC   धारा 498 A  में लायी जानेवाली शिथिलता याने सुधार की पहेल और उस संबंधी संसदीय कार्यवाही का समाचार और उच्च न्यायलय द्वारा इस संबधी व्यक्त चिंता की चर्चा प्रिंट एवं तकनिकी माध्यमों की सुर्खियों में हैं । ये खबरें ऊपर से स्त्री सुरक्षा विरोधी या घरेरू हिंसा को बढावा देने की पुरूष वर्चस्वता के दाॅंव पेंच भले ही लगे , लेकिन यह निस्संदहे एक शुभ संकेत भी है। क्यूॅंकि अब समय आ गया है कि हमें सामाजिक तौर पर इस वास्तविकता को स्वीकार कर लेने का कि दहेज विरोधी कानून और बहू बचाओ की विधिक धाराएॅं बस अब जंग खाये हथियार बन गयी हैं जिसे केवल अब व्यक्ति और परिवार के सदस्यों को डराने धमकाने के लिए प्रयोग में लाये जा रहे हैं। अर्थात स्त्री की शिक्षा, बढते उद्योगों के अवकाश, आर्थिक स्वतंत्रता, इक्कीसवी सदी के बाजारवाद की माॅंग और आपूर्ती के बदलते क्षेत्र,पुरूष की तुलना में स्त्री का संख्यागत आनुपातिक पतन के चलते  समाज के हर वर्ग और जाति में लडकियों की बढ़ती  माॅंग आदि ने आज दहेज और उससे जुडी पारिवारिक एवं सामाजिक चैखटे की परिभाषा ही बदल दी  है । स्त्री की सामाजिक चेतना और अपने बलबूते पर पाई गई उसकी सशक्तिकरण की ऊर्जा  के सम्मुख आज दहेज, शतरंज के खेल में मार खाये प्यादे की तरह, कोने में खिसका जा  रहा है । लेकिन सावधानी तो चाहिए कि कहीं यह मार खाया पुरूषसत्ता का प्यादा ,पैतरा बदलकर, रूप बदलकर पुनः अपनी व्यवस्था में आ तो न जाय !! अंग्रेजी फिल्मों के खलनायक टर्मिनेटर की तरह !

आज दहेज निग्रह कानून  ( IPC   धारा 498 A)  को लेकर सभी स्तरपर यह शंका झांक रही है कि अपने संरक्षण के लिए बने कानूनी प्रावधानों को स्त्रियाॅं अब ढाल की तरह नहीं तलवार की तरह इस्तेमाल कर रही है !! हो क्यूॅं नहीं !! यह तो निर्विवाद सच है कि कानून जब अपनी सामाजिक प्रखरता या धार , अपनी अस्मिता को खोने लगता है तब वह खिलवाड बन जाता है। कानून का जब सामाजिक दायरा खिसकते जाता है तब उसके मानवीय मूल्य कूच करने लगते हैं । परिवर्तित समाजिक व्यवस्था और वास्तविकता के आधार पर, स्त्री पुरूष के वैवाहिक संबंध के मूल में रही परंपरागत रूढी वरदक्षिणा के नये सरोकार और नयी परिभाषा को गढने की आवश्यकता की माॅंग आज प्रस्तुत है । भारतीय समाज में  दहेज नाम की प्रथा के या रूढी के, अनेक अर्थ और परिभाषाएॅं हैं । पिता की संपत्ति  पर अपना कानूनी अधिकार को जताने या  चलाने की मानसिकता के अभाव में दहेज भारतीय ब्याहता लडकी को स्त्रीधन के रूप में सहेजता है। लेकिन दुराग्रह में, सामाजिक प्रतिष्ठा का पर्याय बनकर यही स्त्रीधन , अपनी बाजारू मूल्य के चलते उसीके गले का फंदा भी बन सकता है ! और तो और दहेज जुटाने में असमर्थ लडकी के माता पिता, सामाजिक स्थानमान की झूठी प्रतिष्ठा में पडकर , बेटी के जीवन को असहनीय बना डालने के बहुत से किस्से भी हमे मिलते हैं । उपन्यासकार प्रेमचंद की निर्मला, दहेज संबंधी इन्हीं संगीन परिस्थितियों और बिखराव को झेलती है । अपने समय की सामाजिक विद्रूपता और स्त्री जीवन की अनकही वास्तविकता को प्रेमचंद कैनवास प्रदान करते हैं, निर्मला के जीवन संघर्ष और दारूण अंत का चित्रण करके । लेकिन गंभीर प्रश्न यह उभरता है कि क्या प्रेमचंद की निर्मला आज की वास्तविकता  है ? प्रेमचंद के उपन्यासकालीन समय और समाज , क्या इक्कीसवी सदी के स्त्री जीवन की वास्तविकता को और आज के समाज के बदले तेवर और रवय्ये को अपने में पचा पायेगा ?

भारतीय न्याय देवता के तराजू के पलडे में पडे दहेज उत्पीडन, दहेज हिंसा और हत्या रोक संबंधी कानून, दूसरे पलडे में हजारों लाखों भारतीय लडकियों औरतों की जलने के कटने के संगीन हत्याओं के भार से भी भारी पडने की कथा का, सहज बयान करते आ रहे हैं। लेकिन आज स्त्री शिक्षा, उसकी तरक्की पसंद मानसिकता, आर्थिक आत्मनिर्भरता, जाति व्यवस्था में विवाह संबंधी उभरती शिथिलता, पुरूष की तुलना में स्त्री का अनुपात का गिरना , वधू दक्षिणा का उभरता रूप इत्यादि इस भारी भरकम पलडे को अपना अंजाम दिखा रहे हैं । सन् 2013-2014 तक की अवधि में दहेज संबंधी वारदातों की घटती संख्या , अंधकार मे प्रखरता से जलते उस लौ की तरह जरूर है, जिसका होना मात्र, स्त्रियों में पनप रहा आत्मस्थैर्य , अंकुरित हो रही जागरूक चेतना और स्वतंत्र निर्णय शक्ति के धैर्य की आशा को बंधवाते जा रहा है । यूॅं तो वरदक्षिणा का कानूनी या सामाजिक पर्याय वधूदक्षिणा नहीं हो  सकता । वरदक्षिणा अर्थात दहेज कुछ हद तक स्त्रीधन के अर्थ में समीकृत होकर, स्त्री के भावी जीवन की सुरक्षा का आर्थिक आधार तो बन सकता है । जैसे इस्लाम धर्म में प्रचलित मेहर की राशि, पति के न होने या तलाक की स्थिति में , स्त्री के अस्थिर जिन्दगी में आर्थिक सहारा बनने ,उसमें आत्मस्थैर्य भरने के लिए होता है । लेकिन आज हमारे समाज में स्त्री और पुरूष के मध्य की बिगडती सानुपातिकता, लडकियों की गिरती संख्या ने वधूदक्षिणा के चोर दरवाजे खोल रही है । यूॅं तो भारतीय समाज के अनेक जाति एवं जनजातियों में, कस्बों में वधूदक्षिण, का रिवाज है, एक प्रथा के रूप में । मध्य प्रदेश के भील जनजाती में आचरण में रही भगोरिया पर्व हो या कर्नाटक और महाराष्ट्र के निचली जातियों में प्रचलन में रहे विवाह इसके उदाहरण है। लेकिन अधिक गंभीर आपत्तिजनक  ढंग से आज समाज के मध्यवर्ग एवं निम्नमध्यवर्ग में वधूदक्षिणा याने, लडकी के पिता को आपसी बातचीत से तय हुई राशि  को थमाकर लडकी को अपने बेटे से ब्याहने का व्यवहार, बडी तेजी से पनप रहा है ।

चाहे विवाह में तय किया गया व्यवहार वरदक्षिणा का हो या वधूदक्षिणा का, कहर तो बरपेगा, लडकी पर ही । माता पिता की स्वार्थ घिनौनी मानसिकता के चलते, बडी आसानी से वधूदक्षिणा  के नाम पर बेटी बेचने  के बाजार को गर्माते जाने में देर नहीं लगेगी ।  वधूदक्षिणा का यह नया रूप, परिवार की बाजारी मानसिकता के चलते, अपने कोख जाये लडकियो को बेचने के फ्लश् मार्केट के अत्याधुनिक रूप में तब्दील होने में कोइ  कसर नहीं छोडेगा।  भले ही प्रेमचंद की निर्मला की समस्याएॅं आज की कडवी सच्चायी न हो लेकिन, आधुनिकीकरण की मानसिकता का यह नंगापन , हमारी बहू बेटियों को निर्मला के जीवन की संघर्षों के ऐवज में कही विजय तेंडूलकर की कमला की घिनौनी यातनाओं को न थमा दे !!कारण , महिला की सुरक्षा और विकास संबंधी संवैधानिक प्रवधानो  को, उसके आरक्षण और प्रगति हेतु बनाये गये कानून को,  बदलते परिवेश के अनुसार, उसके व्यक्तित्व और अस्मिता में आए परिवर्तन के आधार पर फिर से खंगालने की आवश्यकता है । दहेज के रोकथाम के लिए बनी  विधियाॅं, पारिवारिक हिंसा और दौर्जन्य पर अंकुश लगाने  के लिए  कानूनी धाराएॅं,  वैवाहिक जीवन के क्लेश और विवाह विच्छेद संबंधी कानूनी नीतियाॅं, जितनी व्यक्ति सापेक्ष है, उससे अधिक गुना वे समय और परिवेश सापेक्ष भी हैं  । ये कानून पुरूष विचार या स्त्री विचार के एकपक्षीय संकीर्ण नीतियों के दायरे में बांधे भी नहीं जा सकते । इसीलिए जागरूकता हमारी सोच की यह होनी चाहिए कि कही हम अपने बहू बेटियों की सुरक्षा और उनके संरक्षण के लिए नये सिरे से गढने जा रही नीतियाॅं, विधियाॅं , कहीं उसी के पैर की कुल्हाडी न बने !!

चर्चा को हम इन आम प्रश्नों पर केन्द्रित कर सकते हैं  – 


 क्या लडकियाॅं, पिता की संपत्ति  में  अपने अधिकार को अपनी भविष्य सुरक्षा निधि ( दहेज/स्त्रीधधन )  के रूप में पाने की  हकदार हैं  ?
 दहेज/स्त्रीधन का प्रमाण और स्वरूप निर्धारित करने का अधिकार देनेवाले के हाथों में सुरक्षित रक्खें  कि लेनेवालों के ?
 दहेज रोकथाम कानून को जंगखाये हथियार मानकर, उसे सिरे से ही मिटाकर, नये परिवेश के अनुकूल नये कानून को ऐसे गढे, जो दहेज के स्थान पर लडका और लडकी के समान संपत्ति  के अधिकार को सामाजिक बल प्रदान करता हो ।
 इक्कीसवी सदी की मुक्त व्यापार और आर्थिक नीतियों के चलते, समाज के ऊंचे  वर्ग से लेकर , निचले वर्ग तक की स्त्रियों द्वारा, अपने आसमान को छूने की जद्दोजहद  और संघर्ष की  मानसिकता के कारण , प्राप्त की हुई  आर्थिक संबलता के सम्मुख, दहेज और उसके रोकथाम संबंधी बने कानून क्या फिसड्डी हो रहे हैं ? और उसके सुधारित रूप की चर्चा करना, बेकार है?
 अपने गिरेबान में झांक कर देखें कि कही हमारे शास्त्रीय और जनजातीय जीवन की प्रथाएॅं, स्त्री पुरूष संबंधों को लेकर उनके द्वारा गढी गयी प्राचीन मानकताएॅं, विवाह , दहेज , विच्छेद संबंधी पारंपरिक नीतियाॅं और कानून ही न कहीं आज की मांगे हैं ? परंपरा एवं शास्त्र को, जनजातीय जीवन व्यवस्था को बौना, कूढा अवैज्ञानिक मानकर समाज एवं नृतत्वशास्त्र के साचे में ढलते आ रही नीति और कानून पर सनातनी और कस्बायी का हव्वा बिठाने की गलती कहीं  हम कर तो न  गये हैं ?
 NCB  की  रिपोर्ट के मुताबिक अंडमान निकोबार में दहेज संबंधी किसी भी स्त्री के मौत का न पाया जाना , कहीं अपने आधुनिक अत्याधुनिक जीवन शैली के सामने ,फिर से आत्मावलोकन के लिए उठा हुआ बृहत्त प्रश्न चिन्ह तो  नहीं है ?
 इन तमाम गुत्थियों का उत्तर श्रम श्रद्धा और सृजन में ढली भारतीय स्त्री के अपने जीवन विमर्श में है, जो ही इक्कीसवी सदी का नया   स्त्री विमर्श कहलायेगा । इस नये स्त्री विमर्श का पहला पडाव, स्त्री विचार ,पुरूष विचार, दलित स्त्री दलितेतर स्त्री जैसे विभाजनों से समाज को मुक्त करना है । तदनुरूप प्रगतिगामी विचार को प्रतिष्ठित करनेवाली लिंगविहीन , तात्पर्य जैविक पहचान को खोना नहीं , जातिविहीन विचारवाद को बढावा देनेवाली मानसिकता को व्यक्तियों में पनपाना है।  और अंतिम लक्ष्य समाज के आचार व्यवहार में बसी बसायी तमाम आचारण और विचार भेदों को मिटाकर , मानवीय विचार वाद को बढावा देकर हर व्यक्ति को चाहे स्त्री हो या पुरूष उसके अधिकार का स्पेस प्रदान करना ह। इसके लिए लडायी जिनती कानूनी होगी उतनी ही गहरायी में वह मानसिक भी होगी, आर्थिक भी होगी और राजनयिक   भी । तभी जाकर इस मंथन अर्थ निकलेगा , खंगालन की प्रक्रिया का सार्थक परिणाम निकलेगा !!

औरत : आजाद होने का अर्थ !

अरविंद जैन

स्त्री पर यौन हिंसा और न्यायालयों एवम समाज की पुरुषवादी दृष्टि पर ऐडवोकेट अरविंद जैन ने मह्त्वपूर्ण काम किये हैं. उनकी किताब ‘औरत होने की सजा’ हिन्दी में स्त्रीवादी न्याय सिद्धांत की पहली और महत्वपूर्ण किताब है. संपर्क : 9810201120
bakeelsab@gmail.com

( इस आजादी का औरत के लिए क्या मायने हैं , पत्र शैली में बता रहे हैं अरविंद जैन. )

प्रिय पुत्र प्रिंस / शुभ आशीर्वाद !

स्वतंत्रता दिवस के बहाने, जन्मदिन पर शुभकामनाओं के लिए आभारी हूं। मैं सचमुच नहीं जानती-समझती कि तुमने क्या सोच कर लिखा है- ‘माई डियर मदर इंडिया!’। मैं ‘अंगूठा छाप’ औरत- ‘मदर इंडिया’! नहीं..नहीं.., नहीं हो सकती मदर इंडिया! सच तो यह है कि मैं, सिर्फ तुम्हारी अभागी मां ही बनी रही। अगर निष्पक्ष होकर सोचूं- कहूं तो मैं केवल ‘गांधारी’ से बेहतर नहीं बन-बना सकी अपने आपको। काश! ‘मदर इंडिया’ होती और अपने तमाम हत्यारे, बलात्कारी, भ्रष्टाचारी, दुराचारी, निकम्मे और दुष्ट बेटों को गोली मार देती, काश!

स्वाधीनता और जन्म दिवस के ऐसे शुभ अवसरों पर, हम औरतों को भी राष्ट्र की आर्थिक समृद्धि, सामाजिक कल्याण, सुख-शांति और न्याय की भावी योजनाओं, कल्पनाओं और सरकारी घोषणाओं के बारे में ही विचार-विमर्श करना चाहिए। करना चाहिए, इसीलिए तो 67 साल करते रहे उम्मीद कि एक दिन, हम भी आजाद होंगे और हमें भी मिलेंगे बराबर कानूनी हक, सामाजिक मान-सम्मान, आर्थिक आत्म-निर्भरता और राजनीतिक सत्ता में समान भागेदारी। हम चुप रहे अब तक मगर अब देश के हालात और औरतों की दयनीय स्थिति-नाकाबिले बर्दाश्त हो चुकी है। चाहो तो इसे अग्रिम चेतावनी या चुनौती भी समझ सकते हो।


1947 की आधी रात, जब सारी दुनिया सो रही थी और देश जीवन और आजादी के लिए जाग रहा था, उसी समय तुम्हारी नानी मुझे जन्म देकर, कोख के भार से मुक्त हुई थी। लेकिन मुझे या मुझ जैसी करोड़ों ‘अबलाओं’ को कोख से कब्र तक, न जाने कब छुटकारा मिलेगा। मिलेगा भी या नहीं। 67 साल से दमित, शोषित और पीड़ित आत्माओं की चीत्कार, न संसद को सुनाई देती है और न ही सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच पाती है। इसे ‘आधी दुनिया’ का दुर्भाग्य कहूं या अपने ही पिता-पति और पुत्र का सुनियोजित षड्यंत्र?
क्या हुआ ‘हर आंख से आंसू’ पोंछने वाले, बापू और उनके सपने का? क्या आज भी हर औरत की आंखों में आंसू और आंचल में असहनीय कष्ट और पीड़ा मौजूद नहीं है? कहां गये सपनों को यथार्थ में बदलने के वायदे, पद ग्रहण के समय ली गई शपथ, संविधान द्वारा घोषित मौलिक और मानवीय अधिकार या हर पांचवें साल, आम चुनावों के समय किये गए वायदे और घोषणाएं? गरीबपुरा से लेकर देश की राजधानी तक, है कोई ऐसा गांव, शहर या महानगर, जहां स्त्रियां हिंसा और यौन हिंसा की शिकार न हो रही हों? हर दिन..हर घंटे..हर मिनट! राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो के आधे-अधूरे आंकड़े भी, क्या किसी ‘माई के लाल’ को दिखाई नहीं देते!

लाखों महिलाओं को मौत के घाट उतारा जा चुका है और न्याय या कानून-व्यवस्था से आम औरतों ही नहीं, आदमियों का भी भरोसा उठता जा रहा है। लगता है किसी दिन, कागजी कानून की विशाल इमारतें अपने ही भार तले दब जायेंगी, बशर्ते कि समय रहते इन जर्जर संस्थाओं की ठीक से ‘मरम्मत’ नहीं की गई। मैं तो अब भी आशा और उम्मीद करती हूं कि हमारी मंगल कामनाओं के साथ, ‘राष्ट्र के प्रहरी’ विश्वासघात न करें। जो हुआ सो हुआ.. अब और नहीं। अब तुम्हें क्या-क्या और कैसे बताऊं- समझाऊं कि हम (दलित) महिलाओं को आए दिन, कहीं न कहीं निर्वस्त्र घुमाया जाता है, जिंदा जलाया जाता है, रिपोर्ट करो तो धमकाया जाता है, जबरन वेश्या बनाया जाता है, धर्म के नाम पर बहलाया- फुसलाया जाता है, बेटियों को गर्भ में ही मरवाया जाता है, भेड़-बकरियों की तरह खरीदा-बेचा जाता है, खाप पंचायतों के आदेश-अध्यादेश पर प्रेमी युगलों को पेड़ों पर लटकाया जाता है…..फांसी चढ़ाया जाता है।

‘भ्रूणहत्या’ से लेकर ‘सती’ तक बने-बनाये गये कानून, स्त्री हितों की रक्षा-सुरक्षा कम, आतंकित अधिक करते हैं, ‘रमीजा बी’ अब भी बलात्कार (सामूहिक) का शिकार हो रही है, तो ‘मथुरा’ और ‘सुमन रानी’ खाकी वर्दी वालों की हवस को शांत कर रही हैं। देवराला सतीकांड के तमाम हत्यारे बाइज्जत बरी कर दिये गये हैं। ‘निर्भया’ के हत्यारों की फाँसी पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा राखी है, इंसाफ की आस में औरतों की चीखती-चिल्लाती-भटकती आत्माएं, सालों से कोर्ट-कचहरी के चक्कर काट रही हैं। जिन्दा औरतें अपने ही घरों में असुरक्षित हैं, ‘अपना घर’ बेटियों के यौन शोषण-उत्पीड़न का अड्डा बना है और ‘आशा किरण’ में अंधेरे पसरे पड़े हैं।

‘फिजा’ अपने ही घर में मरी हुई पाई गई और ‘गीतिका’ ने आत्महत्या करना बेहतर समझा। बहुएं दहेज की बलिवेदी पर और बेटियां तेजाब काण्ड या गैंगरेप के दुष्चक्र में मर-खप रही हैं। अपराधी (अग्रिम) जमानत पर, छुट्टे घूम रहे हैं। ऐसे हत्यारे और दहशतजदा माहौल में, आजाद देश की औरतों को गुलामों से बेहतर नहीं कहा जा सकता। हां! शिक्षित-समृद्ध-साधन-सम्पन्न और कुछ अति-आधुनिक शहरी औरतें, इससे थोड़ा अलग मानी-समझी जा सकती हैं, जिनकी पहुंच ‘ऊपर तक’ है। मैं तो सिर्फ देश की उन आम औरतों की बात कर रही हूं, जिनकी व्यथा-कथा सुनने वाला कोई नहीं। राष्ट्रीय महिला आयोग और महिला संगठनों से लेकर राष्ट्रीय मीडिया तक।

अयोध्या-गोधरा से कुरुक्षेत्र तक, हर खुदाई में मिलेंगे स्त्री कंकाल ही। इन सब पर सोचने-समझने पर घोर घृणा भी हो रही है और पश्चात्ताप भी। पैदा होते ही ऐसे विषधरों का गला, क्यों न घोंट दिया माताओं ने। अब तो प्रायश्चित भी, असंभव-सा लगने लगा है। 67 साल की यह बूढ़ी मां क्या करेगी? अफसोस कि तमाम प्रतिभाशाली और क्रांतिकारी बेटे-बेटियां, जो सचमुच स्वाधीनता संघर्ष के दौरान बुने सपनों को साकार कर सकते थे या जिनमें देश की नियति बदलने की सारी संभावनाएं मौजूद थीं, सत्ता संस्थानों ने खरीद लिए, राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय पूंजी की गुलामी करने लगे या पेशेवर दलाल हो गये। कुछ ने सपनों के स्वर्ग अमेरिका, फ्रांस, इंग्लैंड या कहीं और जाकर ‘आत्महत्या’ कर ली।
जिनके बस का यह सब करना नहीं था, वो ‘फर्जी मुठभेड़’ में मारे गये या फिर अराजक जीवन की शराब पीते-पीते एक दिन, खून की उल्टियां करते हुए मिले। ऐसी विश्वासघाती और आत्मघाती होनहार पीढ़ियों को या राष्ट्र कर्णधारों को, यह बूढ़ी मां क्या कहे, कैसे कहे- ‘आजादी मुबारक’ हो। मुझे माफ करना पुत्र! यह सब लिखने के लिए।


तुमको मैं कुछ कहना ही नहीं चाहती थी, कभी कहा भी नहीं। सारी उम्र तुम्हारे नाम की, कभी सौंगध तक नहीं उठाई। पता नहीं क्यों, अब चुप रहना-सहना मुमकिन नहीं। ‘स्वाधीनता दिवस की पूर्व-संध्या पर, राष्ट्रपति का राष्ट्र के नाम संदेश’ सुनते-सुनते और लालकिले की प्राचीर से प्रधानमंत्री के भाषण में दिखाये सब्ज बागों से कान पक गये हैं। दुख तो यह भी है कि महिला प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, मुख्यमंत्री, गवर्नर, सुप्रीम और हाईकोर्ट की न्यायमूर्तियां और अन्य सांसद, मंत्री, अफसर वगैरह के होने के बावजूद, हम आम औरतों के हालात बद से बदतर होते गये हैं।कुर्सी मिलते ही औरत, औरत नहीं रहती, सत्ता के इशारे पर नाचने वाली ‘गुड़िया’ बन जाती है, गुड़िया। राजपथ पहुंचते ही सब भूल जाते हैं कि ‘दुर्गा पूजा’ पर घर भी जाना है, जहां यह बूढ़ी मांसालभर इंतजार करती रहती है। तुमने जाने-अनजाने मालूम नहीं कितने पुराने घाव, हरे-भरे कर दिये बेटा! किसी की लिखी दो लाइनें, रह-रहकर याद आ रही हैं-

“मां-बाप बहुत रोए, घर आ के अकेले में, मिट्टी के खिलौने भी, सस्ते न थे मेले में”

खैर..छोड़ो देश-दुनिया की बातें। सबसे पहले तो यह बताओ कि तुम और तुम्हारा घर-परिवार कैसा है? बहू रानी मस्त होंगी। बेटे, पोते कैसे हैं? बड़े वाले की बहू की, तो शक्ल तक न देखी। पोतों को भी, फोटो में ही देखा था सालों पहले। सुना था कि तुमने शानदार कोठी खरीद ली है। चलो, अच्छा है, बढ़िया है, खुश रहो, खुशहाल रहो। अब तो हम सब, ‘ग्लोबल विलेज’ में ही रहते हैं ना! सुना है कि देशों की सीमा-रेखाएं समाप्त हो गई, पर क्या सच में कभी होंगी? याद रखना कि तुम ‘हिन्दुस्तानी’ हो। जरूरत पड़ने पर सबसे पहले, तुम्हें ही देखा-परखा-पहचाना और खदेड़ा जाएगा।

हां! मैंने अपनी वसीयत ‘रजिस्ट्रेड’ करवा दी है। मृत देह अस्पताल को और चल-अचल सम्पत्ति, ‘राष्ट्रीय शिक्षा संस्थान’ के नाम कर दी है।

बहुत-बहुत स्नेह सहित
तुम्हारी मां उर्फ ‘मदर इंडिया’

कविता विकास की कवितायेँ

कविता विकास


कविता विकास   पेशे से अध्यापिका हैं , धनवाद में रहती हैं। एक काव्य संग्रह ‘लक्ष्य’ प्रकाशित।  संपर्क : 09431320288 ,kavitavikas28@gmail.com

१. धूरि 

अब  कोई तुम्हे  अबला कहे
तो बतला देना कि कैसे
उस दिन ज्वर में तपते हुए
तुम्हारी आँख क्या लग गई कि
गृहस्थी की गाड़ी रुक गयी
अस्त – व्यस्त हो गया माहौल
पता नहीं तुम्हे अबला समझने वाले
कद्देवार मर्द यह
समझ भी पाये या नहीं कि
तुम परिवार की धूरि  हो।
तुम्हारी पसंद – नापसंद को दरकिनार कर
कोई कौड़ियों की मोल तुम्हे बेच दे
तो प्रतिकार करना
कुलटा कहने वाले लोग
चंद दिनों में तुम्हारी अहमियत
समझ जायेंगे।
और हाँ ,पैसों की थैली फेंक कर
एक रात की दुल्हन तुम्हे बनाने वाले
वेश्या कहते थे न ,
अब उनकी पैसों की थैली
उनपर ही फेंककर जतला देना कि
उन्होंने अपनी आत्मा गिरवी रखी है
तुमने नहीं ,तुम तो प्राणवायु हो
जिसके बिना जीवन की कल्पना भी नहीं। 

२. बोंसाई

मैं कोई बोंसाई का पौध नहीं
जिसकी जड़ों को काट कर
शाखाओं – प्रशाखाओं को छाँट कर
एक गमले में रोप दिया ।
मैं तो मैं हूँ ।
बेटी ,बहन और पत्नी  के रिश्तों का
निर्वहन करती हुई भी
एक स्वतंत्र व्यक्तित्व  हूँ ।
अपना एक वजूद है
एक ठोस ज़मीनी सतह हूँ
जिस पर काल के झंझावातों ने
कम विनाश नहीं रचा।

फिर भी सुनहरी किरणों वाला सूर्य
हर दिन उगता है ।
हवाएँ सुरमयी संगीत बिखेरती हैं
नव पल्लवन को मैं उल्लसित रहती हूँ ।
मेरे अंतर को चीर कर देखो
गर्म लावा प्रवहित है   ।
जब भी मेरे वजूद को ललकारा
मैं ज्वालामुखी बन जाती हूँ ।
नहीं बनती मैं बेवज़ह बर्बादी का सबब
लेकिन मेरी कोमलता कायरता नहीं है ।
बंधी है इसमें एक कूल की मर्यादा
और आँगन की किलकारियों का अविरल प्रवाह ।
कुम्हार के चाक सा सुगढ़ निर्माण
लिखा है मेरी हथेलियों में
फिर भला क्यूँकर इनसे हो  विनाश ?
अपने सर्ग का उपहार
बस यही माँगू  मैं
कि बढ़ने दो मुझे वट सा विस्तृत ।
मेरी छांव से ना कर गुरेज
प्रकृति ,प्राणी ,प्रयास
मैं ही तो हूँ ।

बोंसाई के बगल में
अपनी पौध लहरा कर
सामंजस्य कैसे कर पाओगे तुम ?
दो एक विशाल आयाम मुझे
और अगर नहीं  दे पाए
तो मेरे आकाश को ना बाँधो
उड़ने दो मुझे स्वतः
जैसे नील गगन में उड़ता जाता है
पक्षी क्षितिज के पार ।

अतीत और वर्तमान को समझने की दिशा में एक प्रयास : रोमिला थापर के साथ कुलदीप कुमार की बातचीत

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” 1961 में ‘अशोका एंड द डिक्लाइन ऑफ द मौर्यास’ (अशोक और मौर्यों का पतन) के प्रकाशन के साथ ही, रोमिला थापर प्राचीन भारत के सर्वश्रेष्ठ इतिहासकारों के रूप में उभरकर सामने आयीं । 43 साल बाद भी, यह किताब उस महान सम्राट और उसके समय के बारे में सबसे ज्यादा प्रमाणिक व्याख्या बनी हुई है । 1966 में जब पेंग्विन ने उनकी किताब हिस्ट्री ऑफ इंडिया वोल्यूम 1 प्रकाशित की, तब लोगों ने महसूस किया कि इतिहास को इतनी स्पष्टता के साथ भी लिखा जा सकता है । जल्दी ही यह किताब हर उस व्यक्ति के लिए जो भारत के इतिहास को गहराई से समझना चाहता हो, एक मानक पाठ्यपुस्तक बन गयी । उसके बाद अनेकों और किताबें प्रकाशित हुर्इं और जैसा कि क्लुज पुरस्कार द्वारा उनके लिए सम्मान लेख में कहा गया, “प्राचीन भारत के विशिष्ट इतिहासकार” के तौर पर उन्हें व्यापक रूप से स्वीकार कर लिया गया । इतिहास के लिए उनकी अपनी तार्किक और वैज्ञानिक पद्धति के साथ–साथ धर्मनिरपेक्ष ध्येय के प्रति अपने निर्भीक समर्थन के कारण, उन्हें भारत और विदेश दोनों जगह हिंदुत्ववादी समर्थकों के हमलों और घृणित प्रचारों का निशाना बनना पड़ा । 
दिल्ली विश्वविद्यालय और कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में अध्यापन के बाद,1972 में उन्होंने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में प्राचीन भारत के इतिहास के प्रोफेसर का पदभार ग्रहण किया । अब वहाँ मानद प्रोफेसर हैं । रोमिला थापर विश्वविद्यालय के लेडी मार्गरेट हाल, ऑक्सफोर्ड की मानद सदस्य हैं तथा कार्नेल विश्वविद्यालय और युनिवर्सिटी ऑफ पेंसिल्वेनिया के साथ–साथ कॉलेज डी फ्रांस, पेरिस में अतिथि प्रोफेसर हैं । 1983 में उन्हें भारतीय इतिहास कांग्रेस का अध्यक्ष और 1999 में ब्रिटिश एकेडमी का सदस्य चुना गया था ।
रोमिला थापर दो बार, 1992 और 2005 में, पद्म भूषण ठुकरा चुकी हैं । तब राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम को लिखे अपने पत्र में उन्होंने स्पष्ट किया– “मैंने कुछ साल पहले ही यह निश्चय कर लिया था कि मैं सिर्फ अकादमिक संस्थानों या अपने पेशे से जुड़े संस्थानों के द्वारा दिये जाने वाले सम्मान ही स्वीकार करूँगी । मैं सरकारी सम्मान स्वीकार नहीं करूँगी ।” 2008 में, उन्हें इतिहासकार पीटर ब्राउन के साथ “स्टडी ऑफ ह्यूमैनिटी विषय” पर लाइफटाइम एचीवमेंट के लिए प्रतिष्ठित क्लुज पुरस्कार दिया गया । यूस लाइब्रेरी ऑफ कांग्रेस ने उन विषयों को सम्मिलित करने के लिए यह पुरस्कार शुरू किया था जिन्हें नोबेल पुरस्कार में शामिल नहीं किया जाता । कुलदीप कुमार ने उनसे  इस बारे में बातचीत की कि कैसे भारतीय इतिहास लेखन सदियों के दौरान विकसित हुआ । उन्होंने भारत में असहमति की परम्परा और वर्तमान समय में बौद्धिक अभिव्यक्ति का गला घोंटने के प्रयासों के बारे में भी बात की । ” 

प्रसिद्द इतिहासकार रोमिला थापर

आपकी हाल ही में प्रकाशित किताब “द पास्ट बिफोर अस” प्राचीन उत्तर भारत में ऐतिहासिक परम्परा के बारे में विस्तार से चर्चा करती है । फिर भी इस बात पर हैरानी होती है कि क्यों और कैसे यह दृष्टिकोण स्वीकार कर लिया गया कि भारतियों में ऐतिहासिक चेतना का अभाव है ?


मेरी यह किताब जो छह महीने पहले प्रकाशित हुई यह उस समय की ऐतिहासिक परम्परा के बारे में है जिसे मैं प्राचीन उत्तर भारत कहती हूँ – वह काल जो लगभग 1000 ईसापूर्व से 1300 ईसवी तक का है । यह किताब मूलरूप से इतिहास–लेखन का अध्ययन है और यह ऐतिहासिक लेखन का वह क्षेत्र है जिस पर भारत में हमने बहुत ज्यादा ध्यान नहीं दिया है, विशेष तौर पर प्राक–आधुनिक भारत के सन्दर्भ में । यह आधुनिक भारतीय इतिहास के लिए बेहद महत्त्वपूर्ण बनता जा रहा है लेकिन प्राक–आधुनिक भारतीय इतिहास के लिए इसका महत्त्व थोड़ा कम है । यह महत्त्वपूर्ण है क्योंकि यह उस समय के इतिहासकारों और विचारधारा का अध्ययन है जो हमारे इतिहास लेखन को प्रभावित करते हैं । इसलिए यह इतिहास लेखन पर इतिहास द्वारा की गयी टिप्पणी है ।
इसकी शुरूआत मेरे इस प्रश्न पर विचार करने से हुई  कि हर कोई यह क्यों कहता है कि भारतीय सभ्यता में इतिहासबोध का अभाव है । मैं यह नहीं समझ सकी कि क्यों एक जटिल सभ्यता का अतीत के बारे में कोई बोध विकसित नहीं हुआ और क्यों वह विशिष्ट तरीकों से अतीत से अपना सम्बन्ध कायम नहीं कर सकी । प्रत्येक समाज की अपने अतीत के बारे में एक समझ होती है और वह अपने अतीत को लेखन के भिन्न–भिन्न रूपों में अभिव्यक्त करता है ।

ऐसा क्यों कहा जाता है कि भारतीय सभ्यता में इतिहासबोध का अभाव है ? मेरा यह मानना है कि इसका सम्बन्ध भारतीय इतिहास के औपनिवेशिक लेखन से है । आपका अभिप्राय प्राच्यवादियों से है ?


कुछ हद तक प्राच्यवादियों  से, और कुछ हद तक प्रशासक–इतिहासकारों से, जैसा कि उन्हें अक्सर कहा जाता है । ये ब्रिटिश प्रशासक थे जिन्होंने इतिहास लेखन भी किया था और निश्चय ही इसका सबसे प्रमुख उदाहरण विंसेंट स्मिथ है । लेकिन उससे पहले भी 19वीं सदी में, प्राचीन भारतीय इतिहास को एक ऐसे इतिहास के तौर पर देखा जाता था जो एक ठहरे हुए समाज से आता था । जिसमें कोई बदलाव नहीं होता था । यह तर्क दिया जाता था कि अगर समाज में कोई परिवर्तन नहीं होता है तो यह स्पष्ट है कि उसके लिए इतिहास का कोई महत्त्व नहीं है, क्योंकि इतिहास परिवर्तन का दस्तावेज है, परिवर्तन की व्याख्या है । इसलिए अगर आप कहते हैं कि समाज ठहरा हुआ है तो एक हद तक आपका यह कहना उचित है कि उस समाज में इतिहास बोध का अभाव है ।

कुलदीप कुमार चर्चित स्तंभकार हैं , जनसत्ता के नियमित स्तम्भ -लेखक

ठहरा हुआ किस अर्थ में ?
इस अर्थ में कि बिलकुल ही कोई सामाजिक परिवर्तन नहीं हुआ और समाज का ढाँचा निरंतर एक जैसा ही बना रहा । इसके बाद उन्होंने इसे काल के सिद्धान्त के साथ जोड़ दिया और कहा कि काल का प्राचीन भारतीय सिद्धान्त पूरी तरह चक्रीय है । यह एक ही चक्र का निरंतर बार–बार दोहराया जाना है, जो निश्चय ही तकनीकी रूप से सही नहीं है, क्योंकि अगर आप चक्रीय समय की भी व्याख्या को पढ़ते हैं तो यह एकदम स्पष्ट हो जाता है कि चक्र का आकार परिवर्तित होता है और हर चक्र में मौजूद धर्म की मात्रा में भी परिवर्तन होता है ।

वास्तव में, यह कम होता जाता है ।
हाँ, कम होता जाता है । इसलिए यह आवश्यक है कि ऐसा होने के पीछे कोई न कोई सामाजिक परिवर्तन जरूर होना चाहिए । लेकिन इसे स्वीकार नहीं किया गया । हालाँकि इससे भी बढ़कर सबसे महत्त्वपूर्ण कारक यह था कि एक औपनिवेशिक ढाँचा, एक उपनिवेशी शासन, उस समाज के लोगों पर उपनिवेश या औपनिवेशिक समाज की अपनी खुद की समझ थोपना चाहता है । और ऐसा करने का सबसे बेहतर तरीका यह कहना है कि “हम तुम्हारे लिए तुम्हारे इतिहास की खोज करेंगे और फिर तुम्हें बताएँगे कि वह क्या था ।” ब्रिटिश उपनिवेशवाद ने इस काम को मुख्य रूप से प्राक–आधुनिक भारतीय इतिहास के बारे में इस समझ के साथ सम्पन्न किया कि इसका सारतत्व दो धार्मिक समुदायों के मेल से निर्मित हुआ है ।

हिंदू और मुसलमान ?
हाँ । यह जेम्स मिल्स के काल विभाजन तक (हिंदू, मुसलमान और ब्रिटिश काल) और भारतीय समाज को इन दो धार्मिक समुदायों के सन्दर्भ में देखने की सनक तक जाता है ।

महाभारत को पारम्परिक रूप से इतिहास के तौर पर श्रेणीबद्ध किया गया था । क्या अतीत को देखने का भारतीय तरीका बहुत अलग था ?
जब कोई प्राचीन भारत के पाठ का अवलोकन करता है तो यह सम्भव है कि उसे कुछ ऐसे पाठ देखने को मिलें जिनमें उसे इतिहास के किसी पहलू की झलक दिखायी दे । ब्रिटिश उपनिवेशवाद ने तर्क दिया कि सिर्फ कश्मीर में 12वीं सदी के दौरान लिखी गयी कल्हण की रचना ‘राजतरंगिणी’ में ही कश्मीर में इतिहास की झलक दिखायी देती है । उनका कहना था कि यह एक अपवाद था । हालाँकि मूल पाठों को सतर्कतापूर्वक देखने पर कुछ दिलचस्प पहलुओं की जानकारी मिलती है । उदाहरण के लिए, मूल पाठों के कुछ हिस्से का वर्णन ‘इतिहास’ के तौर पर किया गया है । इस शब्द का अर्थ उस तरह से ‘इतिहास’ नहीं है जैसा हम आज समझते हैं । इसका अर्थ केवल इतना है कि ‘अतीत में ऐसा हुआ था’ । अगर हम ‘इतिहास–पुराण’ शब्द को लें, तो उसका अर्थ है कि यह वही है जैसा हम सोचते हैं कि अतीत में घटित हुआ था । लेकिन इसके बारे में जो महत्त्वपूर्ण बात है वह यह है कि यहाँ एक खास तरह के इतिहास के बारे में एक सचेतनता है, भले ही वह ऐतिहासिक रूप से सही न हो । यही वह चीज है जिसमें मेरी दिलचस्पी है ।  इसलिए मैंने किताब में तर्क दिया कि इस प्रश्न के तीन पहलू हैं जिनकी जाँच–पड़ताल की जानी चाहिए । पहला, वह कौन से पाठ हैं जो ऐतिहासिक चेतना को प्रदर्शित करते हैं और जिन्हें हमें ऐतिहासिक तौर पर सही मानने की आवश्यकता नहीं है लेकिन जो उन लोगों की तरफ संकेत करते हैं जो कुछ हद तक इस दिशा में सोच रहे हैं । उसके बाद दूसरा पहलू वह है जिसे मैं ऐतिहासिक परम्परा कहती हूँ, जहाँ जो भी आँकड़े, विवरण या अतीत के बारे में जो कुछ मिल जाये, उसे हासिल करने का जान–बूझकर  प्रयास किया जाता है और फिर उसे एक साँचे में ढालने के लिए चालाकी से उसमें फेरबदल किया जाता है । मेरा तर्क यह है कि विष्णु पुराण के बारे में एक किताब में ऐसा किया गया है जहाँ अतीत का एक कथा के रूप में वर्णन किया गया – प्रारम्भ मिथकीय मनु से और उसके बाद उत्तराधिकारी समूहों, वंश समूहों, मध्य युग में गोत्रों और अन्त में राजवंशों और उसके शासकों को सूचीबद्ध किया गया है । आधुनिक इतिहासकारों के लिए जरूरी नहीं कि ऐतिहासिकता का प्रश्न महत्त्वपूर्ण हो – यानि यह महत्त्वपूर्ण नहीं कि कौन से व्यक्ति और घटनाएँ वास्तविक हैं – कि उस आख्यान में समाज के दो विभिन्न रूपों और ऐतिहासिक परिवर्तन की झलक प्रतिबिम्बित होती है ।

अशोक चक्र

आपका अभिप्राय इक्ष्वाकु से है ?2
हाँ, इक्ष्वाकु से आने वाली कुछ वंशावलियाँ और इला से आने वाली दूसरी वंशावलियाँ । मूल रूप से यह गोत्र समाज का एक रूप है जो राजवंशों से भिन्न है । इसके बाद आने वाले उत्तर–गुप्त काल में, रूपों में परिवर्तन होता है और वहाँ आख्यान का स्पष्ट और सचेत लेखन है जिसके बारे में दावा किया जाता है कि घटनाएँ वैसी ही लिखी गयी हैं जैसी वे वास्तव में घटित हुर्इं थीं । और दिलचस्प यह कि इनमें सबसे पहले बौद्धों और जैनियों के आख्यान शामिल हैं । बौद्धों और जैनियों की परम्पराओं में एक तीव्र इतिहास बोध पाया जाता है, वह शायद इसलिए है क्योंकि उनकी शिक्षाएँ और चिंतन ऐसे ऐतिहासिक व्यक्तियों पर आधारित हैं जिनका वास्तव में अस्तित्व था । इतिहास में उनका स्थान कोई भी स्पष्ट रूप से देख सकता है । दूसरी ओर, उत्तर–पौराणिक ब्राह्मणीय परम्परा तीन प्रकार की रचनाओं को देखती है जो वर्तमान और अतीत के अभिलेख हैं और इसलिए वह इतिहास लेखन में सहायक है । पहला, राजाओं के जीवन–वृतांत– ‘चरित्र’ साहित्य । हर्षचरित्र, रामचरित्र और इस प्रकार का अन्य आख्यान उपलब्ध है । दूसरा शिलालेख हैं जो लगभग हर राजा ने जारी किये । कुछ शिलालेख बेहद लंबे हैं जो राजवंशों का थोड़ा संक्षिप्त इतिहास और अलग–अलग राजाओं की गतिविधियों की जानकारी देते हैं । अगर किसी एक राजवंश के सभी शिलालेखों को कालक्रम में शुरु से अन्त तक एकसाथ रखा जाय तो उसका परिणाम उस राजवंश का एक खास तरह का इतिहास होगा । हमारे आज के बहुत से अध्ययन कि उत्तर–गुप्त काल में क्या हुआ था– कम से कम कालक्रम और राजवंशों से सम्बन्धित अध्ययन– मुख्य रूप से इन शिलालेखों पर आधारित हैं । और अभी हाल ही में इन शिलालेखों ने भूमि सम्बन्धों, श्रम और सत्ता के पदानुक्रम से सम्बन्धित राजनीतिक आर्थिक परिवर्तनों के प्रमाण भी उपलब्ध कराये हैं ।

यहाँ तक कि अशोक के आदेशपत्रों में भी एक इतिहास बोध दिखायी देता है । उसने ये आदेशपत्र अपनी प्रजा को निर्देश देने के तात्कालिक उद्देश्य से जारी किये थे, लेकिन भावी पीढ़ी भी उसके दिमाग में अवश्य रही होगी

हाँ, ऐसा ही हुआ होगा । उनमें से कुछ में तो वह यहाँ तक कहता है कि उसे उम्मीद है कि उसके पुत्र और पौत्र हिंसा का त्याग कर देंगे और अगर वे ऐसा नहीं कर पाये, तब भी कम से कम वे दंड देने के मामले में दयालु होंगे । इसलिए वहाँ भावी पीढ़ी के लिए लिखित निर्देश जारी करने की भावना है और मैं यह सोचती हूँ कि यह विशेष तौर से शिलालेखन से सम्बन्धित साहित्य में एकदम स्पष्ट है । एक पत्थर या ताम्रपत्र पर या एक खास तरह से बनाये गये स्तंभ या शिला के अग्रभाग या मंदिर की दीवार पर खुदवा कर लिखने का कष्ट क्यों उठाया गया ? ऐसा इस इच्छा के चलते किया गया ताकि अगली कई पीढ़ियों तक इसे लगातार पढ़ा जाय ।
तीसरे प्रकार का इतिहास लेखन निश्चय ही कालक्रम से किया गया अभिलेखन है । राजतरंगिणी कश्मीर का वृतांत है और वह बेहद शानदार और उच्चस्तरीय है । लेकिन इसके अलावा कई इससे छोटे वृतान्त भी इतिहास लेखन के उदाहरण हैं जिन्हें संजो कर रखा गया, हालाँकि वे कल्हण के इतिहास लेखन जितने उत्कृष्ट नहीं हैं ।
मध्यकाल में राजदरबारों में महाकाव्य साहित्य के नये संस्करणों का कालक्रमानुसार लेखन जारी रहा, रामायण और महाभारत के नये संस्करण लिखे गये और बाद में जन्मी कई नयी भाषाओँ में भी इनके नये संस्करण लिखे गये ।

आप दो महाकाव्यों – रामायण और महाभारत– को कैसे समझती हैं ? आम तौर पर हिंदू यह सोचते हैं कि उनमें जो कुछ भी वर्णन दिया गया है, ठीक वैसा ही घटित हुआ था । इन महाकाव्यों की ऐतिहासिकता को सुनिश्चित करने के लिए हस्तिनापुर और अयोध्या में खुदाई का काम भी किया गया ।
भारतीय महाकाव्यों की व्याख्या करने में इतिहासकारों के सामने दो समस्यायें पेश आती हैं । एक तरीके से यह भारत की विशिष्ट समस्या है, क्योंकि अन्यत्र कहीं भी महाकाव्य अनिवार्य रूप से धार्मिक पाठ नहीं बन पाये हैं । वे प्राचीन समय के नायकों का वर्णन करने वाली कविता ही बने रहे । लेकिन यहाँ ये पवित्र या अर्द्ध–पवित्र ग्रन्थ बन गये हैं । इसकी वजह से हमारे सामने दो समस्याएँ आती हैं । पहली बहुत ही आधारभूत समस्या है जो आजकल हर वक्त हमारे सामने पहले हमेशा से ज्यादा ही सामने आती रही है । यह समस्या आस्था और इतिहास के बीच सीमारेखा खींचने से सम्बन्धित है । यहाँ यह प्रवृति मौजूद है कि अगर आप एक इतिहासकार के रूप में महाभारत का अध्ययन कर रहे हैं तो महज इसलिए कि आप उसे एक पवित्र साहित्य की तरह देखते हैं । लेकिन आप ऐसा नहीं करते । एक इतिहासकार होने के नाते आप लेखन को उस दौर के समाज के सन्दर्भ में देखते हैं और आप उसे एक धर्मनिरपेक्ष, तर्कसंगत ढंग से विश्लेषित करते हैं ।
इससे समस्या पैदा होती है क्योंकि, आस्थावान व्यक्ति के लिए ये घटनाएँ वास्तव में घटीं । उनके लिए ये वे लोग थे जिन्होंने जिंदगी जी और जिन्होंने शिक्षा प्राप्त की, इत्यादि । जबकि एक इतिहासकार के लिए यह प्रमुख ऐतिहासिक चिंता नहीं है कि ये व्यक्ति और घटनाएँ ऐतिहासिक हैं या नहीं । महत्त्वपूर्ण बात उस व्यापक ऐतिहासिक सन्दर्भ को सुनिश्चित करना है, जिसका मूलपाठ में वर्णन किया गया है और यह देखना है कि साहित्य के रूप में उस समाज का सार प्रस्तुत करने में उसकी क्या भूमिका है । हमारे पास कोई ऐसा वास्तविक प्रमाण नहीं है कि इन लोगों का वास्तव में अस्तित्व था । जब तक हमें इस बात का वास्तविक प्रमाण नहीं मिल जाता, हम इस बारे में कोई फैसला नहीं ले सकते । ये दो अलग–अलग क्षेत्र हैं, लेकिन दुर्भाग्यवश आज हो यह रहा है कि आस्था के आधार पर बोलने वाले कुछ लोगों में– सब में नहीं, बल्कि एक छोटे–से हिस्से में – यह माँग करने की प्रवृति रखते हंै कि इतिहासकार ऐतिहासिकता को महज उसी आधार पर स्वीकार कर लें कि आस्थावान लोग इसे इतिहास मानते हैं । इतिहासकार ऐसा नहीं कर सकते । आज इतिहास को आस्था पर नहीं, आलोचनात्मक जाँच–पड़ताल पर आधारित होना चाहिए ।

प्रतिबंधित पुस्तक द  हिंदूज : ऐन  अल्टरनेटिव हिस्ट्री का कवर

यही वजह है कि इतिहास की पाठ्यपुस्तकों में परिवर्तन की माँग उठायी जाती है ?
हाँ, बिल्कुल । उदाहरण के लिए यह बहुत ही दिलचस्प है कि एनसीआरटी की उन पाठ्यपुस्तकों पर बहस की जा रही है, जिनमें हमने प्राचीन, मध्य काल और यहाँ तक कि आधुनिक समय तक का पूरा इतिहास लिखा । आज उन किताबों की आलोचना और उनमें बदलाव की माँग धार्मिक संगठनों और धार्मिक संस्थाओं की ओर से पेश की जाती है । ऐसी माँग दूसरे इतिहासकारों की ओर से नहीं की जाती । यह इस बात का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण लक्षण है कि कैसे आस्था, एक मायने में, इतिहासकारों के कार्यक्षेत्र में दखलंदाजी करती है ।
दूसरे, कोई भी यह प्रश्न पूछ सकता है कि क्या यह सिर्फ आस्था का मामला है, या जिसे आस्था की तरह पेश किया जाता है उसमें कोई राजनीतिक तत्व भी शामिल है ? क्योंकि जिन संगठनों द्वारा ये माँग पेश की जाती है, उनके राजनीतिक संगठनों से जुड़ाव हैं । हर हालत में, समाज में जिस संगठन का एक दबदबा होता है उसका कोई राजनीतिक रवैया भी होता है, जिसका ‘राजनीतिक’ शब्द के व्यापक अर्थ में इस्तेमाल किया जाता है । इसलिए, इतिहास के क्षेत्र में आस्था की दखलंदाजी सिर्फ धर्म और इतिहास का टकराव नहीं है । यह एक खास तरह की राजनीति के साथ टकराव भी है ।

आजकल हर किसी की धार्मिक भावनायें आहत होने के लिए उत्सुक रहती हैं । क्या हमारे यहाँ असहमति की परम्परा रही है ? प्राचीन भारत में किस हद तक असहमति को सहन या स्वीकार किया जाता था ?
निश्चय ही, हमारे यहाँ असहमति की परम्परा रही है । मैं इसे उदाहरण देकर समझाती हूँ । जब अतीत में लोग, खासकर बाहर से आने वाले लोग, भारत में धर्म के बारे में लिखते थे तब वे अक्सर दो मुख्य धार्मिक समूहों का सन्दर्भ लेते थे– ब्राहमण और श्रमण । वह चाहे ईसापूर्व चैथी सदी में मेगास्थनीज हो या 12वीं इसवीं में अल–बरूनी हो, वे सभी ब्राहमणों और श्रमणों की बात करते थे । वास्तव में, जैसे अशोक ने पंथों का जिक्र करते हुए अपने शिलालेखों में इनके बारे में बात की ।

क्या यह वैदिक और गैर–वैदिक का भेद है ?
इससे कहीं ज्यादा । क्योंकि जब हम अल–बरुनी के काल में आते हैं, तब ब्राहमण ही वेदों की और साथ ही पुराणों की भी शिक्षा दे रहे थे । पुराणों पर आधारित हिन्दुवाद ज्यादा लोकप्रिय था जैसे कि शिल्पकला, चित्रकला और कुछ साहित्यिक श्रेणियों में दिखायी देता है । श्रमणों में बुद्ध और जैन शामिल थे, जिन्हें ब्राह्मण नास्तिक कहते थे । सम्भव है कि इस शब्दावली में दूसरे सम्प्रदायों को भी शामिल किया गया हो जो वैदिक आस्था के अनुयायी नहीं थे, जैसे कि भक्तिमार्गी गुरू । इस दुचितेपन के बारे में दिलचस्प बात यह है कि पंतजलि ने संस्कृत के अपने व्याकरण–सम्बन्धी अध्ययन में इन दोनों का जिक्र विरोधियों की तरह किया है और इन्हें साँप और नेवले जैसा कहा है । इसका अर्थ यह है कि ब्राह्मणवादी परम्परा में गम्भीर असहमतियाँ मौजूद थीं ।

क्या यह संघर्ष में तब्दील हुआ ?


हाँ, कुछ मामलों में ऐसा हुआ । राजतरंगिणी में कल्हण वर्णन करते हैं कि उस काल के एक विशेष दौर में, पहली सदी के मध्य के आसपास बौद्ध सन्यासियों पर हमले हुए और बौद्ध मठों को तबाह किया गया । इसके बाद, तमिल स्रोत जैनियों को सूली पर चढ़ाये जाने का जिक्र करते हैं । शिलालेख शैवों और जैनियों के बीच, शैवों और बौद्धों के बीच और अन्य मतों के बीच असहमतियों का भी जिक्र करते हैं । लेकिन उनके बीच कभी भी जिहाद या धर्मयुद्ध नहीं हुए, हालाँकि असहिष्णुता की घटनाओं के प्रमाण जरूर मिले हैं ।
इसकी वजह यह हो सकती है कि प्राक–आधुनिक भारतीय सभ्यता में धार्मिक प्रवृति का उतना भेदभाव नहीं था । इसके बजाय उसका स्वरुप यह था कि जाति से सम्बन्धित लोग जाति के बाहर के लोगों को इंसानों से कमतर समझते थे । यह भारत में हर धर्म का चरित्र है भले ही वह धर्म यहीं का हो या कहीं बाहर से आया हो ।    असहमति इस अर्थ में दिलचस्प रूप ले लेती थी कि खुद दोनों परम्पराओं के भीतर भी असहमतियाँ थीं – ब्राह्मणवादी और श्रमणवादी दोनों में । यह बहस और विचारविमर्श की प्रचलित और स्थापित प्रक्रियाओं में भी स्पष्ट दिखायी देता है । पहले विरोधी पक्ष का दृष्टिकोण सम्पूर्णता में और निष्पक्ष रूप से पेश किया जाता और उसके बाद उस विचार के प्रस्तुतकर्ता की अन्तरविरोधी बातों को विस्तार से पेश किया जाता । उसके बाद ही सहमति या असहमति का निर्णय किया जाता । उल्लेखनीय यह है कि असहमति को मान्यता दी जाती और उस पर बहस की जाती । इस बात के अनेकों प्रसंग मौजूद हैं जब राजाओं के दरबार में लोग बहस के बाद विजयी हुए या पराजित हुए ।

और विरोधियों के दृष्टिकोण यानि पूर्वपक्ष के दृष्टिकोण को ईमानदारी से पेश किया जाता था ?
हाँ, क्योंकि वाद–विवाद सार्वजनिक रूप से आयोजित होता था ।

क्या लेखन के क्षेत्र में भी ऐसा होता था ?


हाँ, यहाँ लेखन के क्षेत्र में भी ऐसा होता था । जैसा कि किसी भी अच्छे विद्वता के क्षेत्र में किया जाता है कि अगर आपको किसी चीज का खण्डन करना है, तो पहले आपको उसे पूरी तरह समझना चाहिए । अन्यथा वह एक सतही आलोचना होगी । यह एक बेहतर पांडित्य का सार है और स्पष्ट रूप से यह उस वक्त अस्तित्व में था । असहमति का सामना करने का दूसरा तरीका जिसे काफी प्रभावी माना जाता था, वह यह था कि ब्राहमणवादी परम्परा उन लोगों को सहजता से नजरंदाज कर देती थी, जिनसे वे सहमत नहीं होते थे । विष्णुपुराण में ब्राहमणों, बौद्धों और जैनियों के बीच के तनाव की दिलचस्प झलक मिलती है जिसमें बौद्धों और जैनियों को महामोहा कहा गया है, जिसका अर्थ है – भ्रमित करने वाले । और इसके पीछे कहानी यह है कि उन्होंने ब्रह्माण्ड की व्याख्या करने वाले एक सिद्धान्त की कल्पना की, जो एक भ्रम था और जो लोगों को गलत दिशा में ले गया । इसलिए उन्हें भ्रमित करने वाला कहकर उनकी भर्त्सना की गयी । असहमति का मुकाबला करने का यह एक अलग ही तरीका था ।
आम तौर पर यह कहा जाता है कि वह शंकराचार्य ही थे जिन्होंने हिन्दुत्व की रक्षा की । लेकिन मुझे यह तर्क अस्वीकार्य लगता है क्योंकि उन्होंने बौद्ध धर्म के कुछ विचारों को हथिया लिया था । इसके अतिरिक्त बौद्ध धर्म के पतन के और भी कई कारण थे । यह दिलचस्प है कि मठों की स्थापना की व्यवस्था, जो पहले उस रूप में अस्तित्व में नहीं थी, वह कुछ हद तक बौद्ध और जैन विहारों के मठनुमा ढाँचे के समानान्तर खड़ी की गयी प्रतीत होती है । इसका प्रभाव यह था कि जब शिक्षा देने के काम को बड़े पैमाने पर संगठित और विस्तृत करना हो, तब उसका समर्थन करने के लिए एक संस्थान का होना आवश्यक था ।

कुछ भी हो, शंकराचार्य को ‘प्रच्छन्न बुद्ध” – एक गुप्त बुद्ध – की उपाधि दी गयी ।
हाँ, वह थे । लेकिन मैं सोचती हूँ कि ऐसा इसलिए था, क्योंकि उन्होंने आन्दोलन को संगठित करने के लिए श्रमणिक परम्परा की कुछ विशिष्टतायें अपनायी और यह एक ऐसा तथ्य है जिसे हम स्वीकार नहीं करते । विचारधारा की जाँच–पड़ताल करते समय यह देखना दिलचस्प है कि विरोधी परम्परा से क्या सीखा और हथिया लिया गया ।

रामायण की कई कथायें  प्रचलित हैं

रामकथा की बहुलता के बारे में आपकी क्या राय है ? बौद्ध और जैन परम्परा में इसके अनेकों रूपांतर पाये जाते हैं ।
लोगों के बीच इन कहानियों के अपने अलग–अलग संस्करण हैं । रामकथा एक बेहद लोकप्रिय कहानी थी और आज भी है । और बौद्ध जातक कथाओं में भी इसके कुछ हिस्से कई स्थानों पर पाये गये हैं । जिसे दशरथ कथा कहा जाता है वह कहानी का सिर्फ एक हिस्सा है । इसमें राम और सीता वनवास के लिए जाते हैं, वापस लौटते हैं और फिर एकसाथ 36,000 साल तक शासन करते हैं । मुख्य अन्तर यह है कि बौद्ध संस्करण में, राम और सीता भाई–बहन हैं । जैन संस्करण (पउमचरियम) पूरी तरह से जैन लोकाचार के अनुसार लिखा गया है । इसमें सभी (दशरथ, राम, सीता और दूसरे) जैन हैं । स्पष्ट रूप से यह एक मुख्य नायक की बड़ी कहानी पर अपना अधिकार जमा लेना है ।

इस संस्करण में, अन्त में दशरथ दुनिया का त्याग कर देते हैं–––
हाँ, दशरथ दुनिया का त्याग कर देते हैं और सीता आश्रम में चली जाती हैं । उन्हें निर्वासित नहीं किया जाता और न ही वह धरती में समा जाती हैं । दिलचस्प रूप से, वह ‘पउमचरियम’ ही ऐतिहासिकता का दावा करता है और कहता है कि ये घटनाएँ वास्तव में घटित हुर्इं थी । वह दावा करता है कि हम आपको बतायेंगे ये कैसे–कैसे घटित हुर्इं क्योंकि दूसरे संस्करण ठीक नहीं हैं । इस तरह वह दूसरे संस्करणों का विरोध करता है । यह एक ऐसा पाठ भी है जिसमें रावण और दूसरे राक्षसों को मेघवाहन वंश के सदस्य के रूप में वर्णित किया गया है जो चेदियों से सम्बन्धित है, जिसका एक बेहद दिलचस्प समानांतर ऐतिहासिक सन्दर्भ कलिंग के खारवेल के शिलालेख में मिलता है, जिसमें वह स्वयं को मेघवाहन कहता है और चेदियों का उल्लेख करता है । पउमचरियम का मुख्य तर्क यह है कि इन राक्षसों को कहानी के दूसरे संस्करणों में दुष्ट आत्माओं की तरह पेश किया गया है । रावण के दस सिर नहीं हैं । वह नौ विशाल मणियों वाला एक हार पहनता है जिसमें प्रत्येक में उसके सिर की झलक मिलती है । यह वाल्मीकि ‘रामायण’ और दूसरी रामायणों में दिये गये काल्पनिक चित्रों की तार्किक व्याख्या करने का प्रयास है ।
इतनी सारी रामायण क्यों लिखी गयीं ? यह हिन्दु धर्म की प्रकृति की वजह से है और यही वह बात है जो एक इतिहासकार के तौर पर मुझे हिन्दु धर्म के बारे में सबसे ज्यादा आकर्षित करती है । यह दूसरे धर्मों से बेहद अलग है । यह किसी एक ऐतिहासिक गुरु, एक पवित्र किताब, सामूहिक पूजापाठ, पंथ और सभी के लिए एकसमान आस्था, और यहूदी–ईसाई परम्परा जैसी दूसरी चीजों पर आधारित नहीं है । वास्तव में यह पथों का एक समूह है । आप किसी भी बात पर विश्वास कर सकते हैं, जब तक आप धार्मिक रस्मों को निभाते रहते हैं । और धार्मिक रस्में अक्सर जाति आधारित होती हैं । पुराने समय में आप किसी धार्मिक रस्म को निभाया जाता देखकर, उसमें इस्तेमाल की जाने वाली सामग्री और चढ़ावे को देखकर और वहाँ की जाने वाली प्रार्थनाओं को सुनकर यह अंदाजा लगा सकते थे कि यह ब्राह्मणवादी है या गैर–ब्राहमणवादी, या फिर यह निम्न जातियों की है या ऊपरी जातियों की । इसलिए मैं समझती हूँ कि सम्प्रदायों के सन्दर्भ में जाति एक बेहद महत्त्वपूर्ण पहलू है और अगर एक धर्म अनिवार्य रूप से अनेकों सम्प्रदायों के संसर्ग और सह–अस्तित्व पर आधारित है तो उसकी आस्था और रीतिरिवाजों के संस्करण भिन्न–भिन्न होंगे ।
इसलिए इन कहानियों की बहुलता है । और यह काफी हद तक उस सामाजिक संस्तर पर निर्भर है जहाँ लेखक का जन्म हुआ था । उदाहरण के लिए, कुछ लोक कथाओं में, जो शानदार कहानियाँ है और जिन्हें प्रायद्वीपीय भारत के कुछ हिस्सों के देहातों में सुनाया जाता है, उनमें सीता अक्सर लड़ाई का नेतृत्व करती है जो इस बात का प्रतीक है कि औरतों ने इस कहानी के अपने खुद के संस्करण गढ़े ।
यह कहीं भी किसी भी कहानी के लिए जायज है । आप देख सकते हैं कि लातिन अमरीका में ईसाई धर्म के साथ क्या हुआ, जिस भी इलाके में इसका प्रचार हुआ, वहाँ स्थानीय लोगों ने उसकी कहानी को अपनी खुद की परम्पराओं के अनुरूप ढाल लिया । यह वास्तव में किसी भी कहानी की महान संवेदनशीलता का लक्षण है कि कैसे वह लोगों की कल्पनाशीलता को आकर्षित कर लेती है और फिर वे उसे अपने अनुसार ढाल लेते हैं ।

मैंने बहुलता और विविधता के बारे में पूछा, क्योंकि आजकल इन बातों को सहन नहीं किया जाता । आपके नजरिये से एक लोकतांत्रिक समाज होने के नाते भारत के विकास के साथ ऐसा क्या गलत हुआ कि हम आज इस स्थिति में आ पहुँचे हैं ?
एक बार फिर ऐसा लगेगा कि मैं उपनिवेशवादियों पर आरोप लगा रही हूँ लेकिन यह सब ज्यादातर 19वीं सदी की विचारधारा पर आधारित है । औपनिवेशिक विद्वान और अधिकारी हिन्दु धर्म को लेकर भ्रमित थे, क्योंकि यह यहूदी और ईसाई धर्म के उनके अनुभव के साथ मेल नहीं खा रहा था । इसलिए उन्होंने सम्प्रदायों को एक रैखिक परम्परा में बाँध दिया और उन सबको मिलाकर एक धर्म का अविष्कार किया जिसे उन्होंने हिंदू धर्म कहा । आस्थाओं और रीतिरिवाजों का अपना खुद का इतिहास था, लेकिन उन्हें एक प्रारूप के अनुसार ढालने का विचार नया था । इनमें से कुछ परिशिष्ट तो बहुत पहले से अस्तित्व में थे । उदाहरण के लिए, शाक्त–शक्ति परम्परा –तांत्रिक परम्परा––को सातवीं या आठवीं इसवीं के स्रोतों से काफी प्रामाणिकता मिली । फिर भी शायद ये रीतिरिवाज और विचार कुछ विशेष श्रेणी के लोगों के बीच काफी समय पहले से अस्तित्व में थे । आम तौर पर लोग कहते हैं कि शायद यह गैर–वैदिक लोगों, निचली जातियों के लोगों, इत्यादि का धर्म था ।

मूर्तिकला इत्यादि में उनका विवरण किस तरह खुजराहो और कोणार्क के मंदिरों की दीवारों में स्थान पा सका ?
जैसे–जैसे समाज और उसका इतिहास बदलता है, अभिजात वर्ग के घटक भी बदलते हैं । हम सभी इस विचार के साथ बड़े हुए हैं कि जाति प्रथा एकदम दृढ और अवरुद्ध है । लेकिन वास्तव में अब हम देखते हैं कि राजनैतिक परिदृश्य काफी उदार था । जातियों के अन्तर्गत आने वाले समूह, सही परिस्थितियाँ मिलने पर, तिकड़म लगाकर उच्च सामाजिक स्थिति में पहुँच सकते थे ।


और इसके लिए उन्हें वंशावलियों को गढ़ना पड़ता था ।


हाँ, आप काफी हद तक सही हैं । कोई एक व्यक्ति या परिवार, प्रभुत्व और सत्ता तक पहुँच सकता था और उसके बावजूद भी वह उन देवताओं की पूजा कर सकता था जो शायद पौराणिक नहीं थे, उदाहरण के लिए कुछ देवियाँ । लेकिन चूँकि वे देवी–देवता अब नये अभिजात वर्ग द्वारा संरक्षित थे इसलिए उन्हें देव–समूह में शामिल किया जा सकता था और इस तरह वे पौराणिक हिंदू धर्म का हिस्सा बन गये । इसलिए पौराणिक हिंदू धर्म का अध्ययन आकर्षक और बेहद जटिल दोनों है, क्योंकि आप नहीं जानते कि कौन सी चीज कहाँ से आ रही है । परन्तु ऐतिहासिक रूप से इस बात का पता लगाना बहुत ही रोचक है कि ये विभिन्न घटक कहाँ फल–फूल रहे थे और कब और कैसे वे मुख्यधारा के धर्म का हिस्सा बन गये ।
जब मैंने 19वीं सदी के उपनिवेशवादियों का उल्लेख किया तब मैं एक धर्म वाले हिन्दुवाद के निर्माण की तरफ ध्यान आकर्षित करने का प्रयास कर रही थी जिसकी कुछ सुपरिभाषित चारित्रिक विशेषतायें हैं । जब धर्म के रूप और अन्तर्वस्तु को राजनीती तय करना शुरू करती है, तब वह साम्प्रदायिकता की परिघटना की शुरुआत करती है । मुस्लिम साम्प्रदायिकता के साथ ऐसा बड़ी आसानी से किया जा सका, क्योंकि यह पहले ही एक संस्थापक और उसकी शिक्षाओं इत्यादि के साथ एक ऐतिहासिक धर्म है । इसके समानांतर हिंदू साम्प्रदायिकता की शुरुआत हुई । ये दोनों एक–दूसरे के प्रतिरूप हैं । इसलिए हिंदू धर्म को फिर से इस तरीके से व्यवस्थित किया जाना जरुरी था, ताकि लोगों को राजनीतिक तौर से लामबंद करने के लिए धर्म का इस्तेमाल सम्भव हो । इसलिए ऐतिहासिकता का प्रश्न बेहद महत्त्वपूर्ण बन गया । अगर आप यह निश्चित करते हैं कि राम को धर्म के संस्थापक के रूप में स्थापित करेंगे तो आपको यह साबित करना होगा कि बुद्ध, ईसामसीह और मोहम्मद इत्यादि की तरह ऐतिहासिक रूप से उनका अस्तित्व था । उन लोगों के बारे में कोई विवाद नहीं है । अशोक ने लुम्बिनी में एक स्तंभ स्थापित किया, जिस पर लिखा है कि वहाँ बुद्ध का जन्म हुआ था । रोमन इतिहासकार ईसामसीह की गतिविधियों के बारे में लिख चुके हैं और अरब इतिहासकार मोहम्मद के बारे में लिख चुके हैं ।
इसलिए एक ऐतिहासिक संस्थापक और एक पवित्र किताब का होना जरूरी हो गया । जब बंगाल में पहली बार अदालतों का गठन किया गया तो जजों ने पंडितों से पूछा कि वे किस किताब पर हाथ रखकर शपथ लेंगे । आपकी बाइबल या कुरान कौन सी है ? तब कुछ लोगों ने रामायण का नाम लिया, कुछ ने उपनिषद और कुछ दूसरों ने गीता का नाम लिया । विवाद बरक़रार रहा । गांधीजी ने गीता को काफी ज्यादा महत्त्व दिया था, इसलिए बहुत से लोगों ने यह मानना शुरू कर दिया कि वह पवित्र किताब है । लेकिन जरुरी नहीं कि ऐसा हो । वह बहुत सी पवित्र किताबों में से एक है । इसी तरह राम बहुत से अवतारों में से एक थे, बहुत से भगवानों में से एक, बशर्ते आप यह मानते हों कि वह एक भगवान थे ।
उसके बाद एक संगठन का होना जरुरी था । अगर धर्म में विविध सम्प्रदाय शामिल हैं तब उन्हें एक साथ कैसे लाया जाय ? इस तरह, एक मायने में, ब्रह्म समाज, प्रार्थना समाज और आर्य समाज इत्यादि धर्म को इसी तरह संगठित करने के प्रारंभिक प्रयास थे कि वे संगठन संपूर्ण समुदाय की तरफ से बात रख सकें । लेकिन ऐसा नहीं हो पाया । इस तरह 1920 और 1930 के दशक में इन विभिन्न प्रयासों की असफलता के बाद हिन्दुत्व का उभार हुआ जो हिंदू धर्म की औपनिवेशिक समझ पर आधारित था और हिंदू धर्म से एक ऐसे धर्म के निर्माण का प्रयास किया गया जिसका राजनीतिक तौर पर इस्तेमाल किया जा सके । इसके लिए किस चीज की आवश्यकता थी ? हिंदुओं को एकमात्र मूलनिवासी परिभाषित किये जाने की आवश्यकता थी, क्योंकि उनका धर्म ब्रिटिश भारत के क्षेत्र में ही उत्पन्न हुआ था । इसके अतिरिक्त सभी धर्म विदेशी थे । इस तरह धर्म नागरिकता के अधिकार या विदेशी होने की परिभाषा तय करता है । यह राजनीतिक रूप से बेहद महत्त्वपूर्ण हो जाता है । ये एक बेहद महत्त्वपूर्ण संक्रमण है जो 19वीं सदी की विचारधारा पर आधारित है– औपनिवेशिक विचारधारा और साथ–साथ उसके प्रति भारतीय प्रतिक्रिया दोनों के रूप में ।

प्रतिरोधी धारा में लोकप्रिय रामकथा

इसका मतलब राजनीति ही है जो वेंडी डॉनिगेर कि ‘द हिंदूज , एन अल्टरनेटिव हिस्ट्री’ जैसी किताबों पर प्रतिबन्ध लगाने या उन्हें वापस ले लेने की मांग उठाती है ।


पेंगुइन द्वारा प्रकशित यह किताब उस बहुलता पर बहस करती है जिससे हिंदू धर्म की रचना हुई । यह विभिन्न सामाजिक सम्प्रदायों के बारे में और उनसे बने धर्मों के प्रकार के बारे में है, जिनके आधार पर हिंदू पूजा–पद्धति और विचार निर्मित हुए और इस बारे में है कि हिंदू धर्म के निर्माण में उन सम्प्रदायों का क्या योगदान है । एक किताब जो विकल्पों और बहुलता के बारे में बहस करती है, उसे प्रचारित किये जाने की अनुमति नहीं दी जा सकती । उन्होंने खुले तौर पर इस मुद्दे को नहीं उठाया, क्योंकि राजनीतिक रूप से इसे बहुत अच्छा काम नहीं कहा जाता । इसलिए उन्होंने इस तरह के मुद्दे उठाये कि डॉनिगेर कैसे कह सकती है कि राम एक ऐतिहासिक व्यक्ति नहीं थे । ज्ञान–विज्ञान की दुनिया में, ज्यादातर लोग यही कहेंगें कि अगर यह असत्य नहीं भी है तो इसका होना अनिश्चित अवश्य है ।
इसके अतिरिक्त उन पर शिव की विवेचना करने के लिए फ्रायड द्वारा इस्तेमाल किये जाने वाले तरीकों से विश्लेषण करने का आरोप लगाया गया और उनके कुछ वाक्यों पर आपत्ति जतायी गयी । यह ठीक है कि हर किसी को विरोध जताने का अधिकार है लेकिन विरोध जताने के लिए उन्हें यह समझाना चाहिए कि वे ऐसा क्यों सोचते हैं कि यह गलत है । उन्हें इसकी वजह बतानी चाहिए । आप सिर्फ यह कहकर अपना विरोध नहीं जता सकते कि इससे मेरी भावनाएँ आहत होती हैं, इसलिए मैं चाहता हूँ कि किताब पर प्रतिबन्ध लगा दिया जाय । यह एक ऐसी किताब है जो एक शोध प्रस्तुत करती है । आपको इसके खिलाफ शोध प्रस्तुत करना चाहिए । इसके खिलाफ शोध प्रस्तुत करना प्राचीन भारतीय परम्परा होगी । लेकिन दुर्भाग्यवश बहुत से ऐसे लोग जो “आहत भावनाओं’ के आधार पर किताबों पर प्रतिबन्ध लगाने की माँग रख रहे हैं, वे इसका विरोध करने के लिए शोध प्रस्तुत करने की योग्यता ही नहीं रखते ।
एक भावना यह भी है कि बहुत से लोग इतिहास के बारे में ऐसी लोकप्रिय किताबें लिख रहे हैं जो शायद तथ्यात्मक रूप से सही नहीं हैं । उदाहरण के लिए, चार्ल्स एलेन की ‘अशोका’ ।
इतिहास हमेशा ही दो बातों का शिकार हुआ है । पहली वजह के बारे में एरिक होब्सबान ने बहुत ही तीखेपन के साथ कहा है कि इतिहास, राष्ट्रवाद के लिए अफीम की तरह है । अतीत और भविष्य के सभी शानदार समाजों का निर्माण इतिहास के आधार पर हुआ है । इसलिए इतिहास ने हमेशा ही राष्ट्रवाद, और साथ ही राजनीति में, अत्यन्त महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी है । आप इस बात से बच नहीं सकते ।
दूसरी वजह यह है कि चूँकि इतिहास को कई मामलों में सिर्फ एक वृतांत के रूप में देखा जाता है–– जो समाजशास्त्र, अर्थशास्त्र, जनसांख्यिकी और अन्य क्षेत्रों से इस मामले में अलग है कि उनका अपना प्रणाली विज्ञान है । लोग यह मानते हैं कि जिस व्यक्ति ने इतिहास की छह किताबें पढ़ी हैं वह सातवीं किताब खुद लिखने की योग्यता रखता है । लेकिन हम लोग जो इस क्षेत्र में कार्य कर रहे हैं, लगातार यह बात कहते रहे हैं कि इतिहास का विश्लेषण का अपना एक तरीका है । जिन स्रोतों के आधार पर कोई राय बनाते हैं उनकी जांच करने की तमाम तरह की तकनीकी बारीकियाँ है । यह एक बेहद जटिल प्रक्रिया है । इसलिए यह एक और चीज है जिसकी वजह से इतिहास कष्ट उठाता है और भविष्य में भी उठाता रहेगा ।
इसलिए इतिहासकारों के बीच एक विभाजन रेखा है । एक तरफ वे इतिहासकार है जो पेशेवर रूप से प्रशिक्षित है और ऐतिहासिक विश्लेषण के तरीकों से वाकिफ हैं, और दूसरी तरफ वे शौकिया लेखक हैं जिन्होंने छह किताबें पढ़ी हैं और फिर वे खुद ही सातवीं किताब लिख देते हैं ।

50 साल पहले के मुकाबले इतिहास के अनुशासन की आज कैसी स्थिति है ?

पिछले 50 सालों के दौरान इतिहास भारी परिवर्तन से होकर गुजरा है, जिसका शायद एक औसत पाठक को अंदाजा नहीं है । उनका इतिहास बोध 20वीं सदी के मध्य से पहले का है । बहुत से एनआरआई समूहों के साथ यह समस्या है कि वे इतिहास को उसी शब्दावली में व्यक्त करते हैं जिससे वे 50 साल पहले परिचित थे । और वे अगली पीढ़ी के लिए लगातार उसी को दोहराते रहते हैं, जबकि हम इस बोध से अलग हट चुके हैं । यही वजह है कि इतना कम संवाद है ।
जब 1960 के दशक की शुरुआत में मैंने दिल्ली विश्वविद्यालय में अध्यापन शुरू किया, तब हम लोगों के बीच इतिहास के पाठ्यक्रम को राजनैतिक और राजवंशीय इतिहास के दायरे से निकालकर सामाजिक और आर्थिक इतिहास तक विस्तृत करने की आवश्यकता पर जबरदस्त वादविवाद, बैठकें, बहसें और व्याख्यान आयोजित होते थे । कभी–कभार यह वादविवाद उग्र हो जाता था और लोग पूछते थे कि यह अभिनव सामाजिक और आर्थिक इतिहास क्या है । आज कोई भी इसके बारे में प्रश्न नहीं करता । इसमें कुछ भी अभिनव नहीं है । उसके बाद हम कई नयी चीजों और नयी दिशाओं की ओर आगे बढ़ गये । फिर मार्क्सवादी इतिहास लेखन का लंबा दौर चला । उसके बाद इस बारे में काफी दिलचस्पी पैदा हुई जिसे ‘साहित्यिक मोड़” कहा गया, जो वास्तव में सांस्कृतिक मोड़ के साथ उत्तर–उपनिवेशवाद था । इतिहासकारों ने मूलग्रंथों का अध्ययन शुरू किया और फिर से उनका विश्लेषण करना शुरू कर दिया ।

उत्तर–आधुनिकतावाद के बारे में क्या कहेंगी ?
उत्तर–आधुनिकतावाद भी आया है । इसलिए यहां अब एक संपूर्ण नया परिदृश्य उभरा है जिसमें हम में से कुछ लोग बेहद सशक्त दृष्टिकोण रखते हैं । लेकिन मुद्दा यह है कि आपको उन बौद्धिक परिवर्तनों की जानकारी होनी चाहिए जो घटित हुए हैं । मैं अहंकारी नहीं दिखना चाहती, लेकिन मैं कहना चाहती हूँ कि आज हमारे सामने यह परिस्थिति है कि जो लोग समाज विज्ञान के क्षेत्र में लेखन का कार्य कर रहे हैं वे बेहद सशक्त बौद्धिक दृष्टिकोण के साथ यह काम कर रहे हैं । उन्होंने काफी व्यापक अध्ययन किया है, सिद्धान्तों की रचना की है और अतीत को समझने का प्रयास किया है । लेकिन उनका सामना एक बेहद साधारण दृष्टिकोण से हो रहा है । इसलिए बहस करना बेहद कठिन हो गया है क्योंकि जिस आधार पर आज अच्छे इतिहासकार सिद्धान्त गढ़ते हैं, वह अक्सर एक औसत पाठक भी नहीं समझ पाता और वे लोग तो और भी कम समझ पाते हैं जो पढ़ते ही नहीं हैं । और बहुत से ऐसे लोग जो किताबों पर प्रतिबन्ध लगाने या उन्हें बाजार से हटाने की मांग करते हैं वे उन किताबों को नहीं पढ़ते, जिन्हें वे प्रतिबंधित करना चाहते हैं ।

नोट
1–  प्राच्यवादी का अर्थ पूर्वी संस्कृतियों का अ/ययन करने वाले पश्चिमी विद्वान से है ।
2– वैदिक इतिहास के अनुसार इक्ष्वाकु मनु का पुत्र और सूर्यवंश का पहला शासक था, जो अयो/या का राजा था और राम इसी वंश में पैदा हुए थे । रामायण और महाभारत में इसका जिक्र मिलता है ।

देश विदेश अंक १८ जुलाई २०१४ से साभार , अनुवाद दिनेश पोसवाल ( यह बातचीत मूलतः  अंग्रेजी  की पत्रिका गवर्नेंस नाउ के लिए की गई थी  और पहली बार वहीं प्रकाशित हुई थी।   )

विमर्श नहीं, विचारधारा : अस्मितावाद की जगह आंबेडकर-चिंतन

बजरंग बिहारी तिवारी

बजरंग बिहारी तिवारी हिंदी के प्रसिद्द आलोचक हैं।  दलित मुद्दों पर इनकी प्रतिबद्धता जगजाहिर है और यही इनके आलोचकीय व्यक्तिव की खासियत भी है। सम्पर्क  .९८६८२६१८९५

( बजरंग बिहारी का यह आलेख ऐतिहासिक तथ्यों , विभिन्न स्रोतों से डा बाबा साहब आम्बेडकर के वकतव्यों के आधार पर मार्क्सवाद और अम्बेडकरवाद में जरूरी साह्चर्य की स्थापना देता है . इस क्रम में वे अस्मितावाद के अगले विकास के रूप में इसे अम्बेडकर चिंतन पर आधारित विचारधारा और राजनीति के रूप में देख रहे हैं , जिसका अनिवार्य रिश्ता मार्क्सवाद से बनता है. )

हिंदी दलित साहित्य में नयी पीढ़ी के हस्ताक्षर राज वाल्मीकि ने पिछले हफ्ते फोन पर हुई अनौपचारिक बातचीत में इस प्रश्न पर मेरी राय जाननी चाही कि क्या दलित लेखन निष्क्रियता के दौर में है. तुरंत जो सूझा वह जवाब मैंने दिया लेकिन संतोष न हुआ. प्रश्न इतना आसान है भी नहीं. जिस पृष्ठभूमि में यह सवाल उठाया गया है उसका ध्यान न रहे तो प्रश्न की व्यंजना का अनुमान नहीं लगाया जा सकता. अभी कुछ दिन पहले ही नई सरकार की ताजपोशी हुई है. तमाम दलित नेता सीधे तौर पर या पार्टी के स्तर पर अलायंस करके सता में साझीदार हुए हैं. जिसे दलितों की पार्टी के रूप में पहचाना जाता है ,वह पराजय का कीर्तिमान बनाकर किंकर्तव्यविमूढ़ दिख रही है. महाराष्ट्र में दलित पैंथर के उदय की परिस्थिति कुछ ऐसी ही थी. रिपब्लिकन पार्टी के कई नेता तब अपने समर्थक-समुदाय को नज़रंदाज़ करते हुए सता में शामिल हो गए थे. मतदाताओं ने उन्हें इसका फल भी भली-भांति दे दिया था. वह युवा दलित पीढ़ी के लिए मोहभंग का दौर था. उस मोहभंग की ऐतिहासिक परिणति ‘दलित पैंथर’ का निर्माण थी. बीस से तीस वर्ष के नौजवानों ने स्वार्थी नेताओं को धिक्कारते हुए ‘विचारधारा’ की ओर रुख किया था.

पैंथर का मैनिफेस्टो इसी का दस्तावेज़ी सबूत है. ‘कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो’ की तर्ज़ पर निर्मित इस घोषणापत्र पर आंबेडकर-चिंतन की नई इबारत रची गयी है. पैंथर के संस्थापकों की दृढ़ धारणा थी कि- “समाजवादी समाज व्यवस्था की स्थापना की चेतना से लैस होकर दलित-आंदोलन में ईमानदारी और प्रतिबद्धता से काम किया जाए तो दलित सभी प्रकार के शोषण से मुक्त हो सकते हैं और उनका उद्धार होने से कोई रोक नहीं सकता है.” दोनों ही विचारधाराओं से सामग्री लेते हुए पैंथर के ऊर्जावान युवाओं ने लस्त-पस्त सामाजिक आन्दोलन को एक बार पुनः खड़ा कर दिया था. पैंथर की जन सभाओं में हजारों-लाखों का जन सैलाब उमड़ता था और स्थिति-परिवर्तन की उनकी ईमानदार कोशिश को अपना मुखर समर्थन देता था. उस समय के दलित असंतोष को शब्द देते हुए बेबी कांबले ने लिखा-“अब हमारे नेता भी भ्रष्ट हो गए हैं. उन्हें दिल्ली की गद्दी चाहिए.यह देख मेरा मन रो पड़ता है. अगर भीमदेव न होते तो हम लोग पड़े होते किसी टूटी-फूटी झोपड़ी में और अन्न के लिए जंगलों में भटक रहे होते. पेट की आग बुझाने के लिए मरे जानवर खा रहे होते.” (‘जीवन हमारा’ मूल मराठी 1986, हिंदी अनुवाद 1995, अंतिम अनुच्छेद से) दलित पैंथर अगर संगठित रहता तो वह निश्चय ही वर्चस्ववादी ताकतों को निर्णायक शिकस्त देता. लेकिन बहुत जल्दी ही उसमें फूट पड़ गई. अपने को शुद्ध आंबेडकरवादी कहने वाले एक तरफ हो गए और वामपंथी रुझान वाले दूसरी तरफ.पैंथर के कार्यकर्ताओं में प्रारंभ में यह सहमति बनी थी कि वे रिपब्लिकन पार्टी ऑफ़ इंडिया (आरपीआइ) में शामिल नहीं होंगे. यह सहमति टूटी और तमाम पैंथर सक्रिय राजनीति में आ गए.

धम्म चक्र प्रवर्तन दिवस पर डा बाबा साहब आम्बेडकर उपस्थित लोगों को 22 प्रतिज्ञाएं दिलाते हुए

कई गुटों में बंटी आरपीआइ में दो गुट मुख्य थे- रूपवते गुट और दादासाहेब गायकवाड़ गुट. दादासाहेब गायकवाड़ धड़ा सांस्कृतिक प्रश्नों के साथ आर्थिक मुद्दों को भी तरजीह देता था. उस पर आरोप लगा कि वह मार्क्सवादी है. क्योंकि उस समय इन दोनों गुटों में प्रतिद्वंद्विता अपने चरम पर थी ,इसलिए वे व्यापक राजनीति में अपने प्रतिपक्षियों को पहचानने और उनसे मुकाबला करने की बजाए आपस में ही ज्यादा उलझे रहे. रूपवते गुट की उग्रता और आक्रामक शैली ने दादासाहेब गायकवाड़ गुट के साथ मार्क्सवादी विचारधारा को भी निशाने पर लिया. भीतरी गुटबाजी ने बड़ी कटुता पैदा की. प्रसंग-विशेष में कम्युनिज्म पर डॉ.आंबेडकर की कही बातों को सिद्धांत-कथन मानकर और कई बार उन कथनों में फेरफार कर मार्क्सवाद को घृणा का प्रतीक बनाया गया. महत्त्वपूर्ण आंबेडकरवादी विचारक रावसाहेब कसबे की किताब ‘आंबेडकर और मार्क्स’ (हिंदी अनुवाद उषा वैरागकर आठले, संवाद प्रकाशन, मुंबई, 2009) इस इतिहास का बड़ा मूल्यवान विश्लेषण करती है. कभी रूपवते गुट से सम्बद्ध रहे रावसाहेब कसबे मार्क्सवाद के प्रति गहरे विद्वेष से भरे हुए थे. उन्होंने ज्यों-ज्यों मार्क्स का अध्ययन किया, मार्क्सवादी साहित्य पढ़ा और फिर उसके परिप्रेक्ष्य में पूर्वग्रह मुक्त हो कर आंबेडकर के कार्यों और लेखन पर निगाह डाली, त्यों-त्यों उनका विद्वेषभाव पिघलता गया. यह किताब एक कष्टसाध्य वैचारिक रूपांतरण से गुजरे चिंतक की मार्मिक कथा कहती है. अस्मितावादी विमर्श अभी जिस बिंदु पर आकर ठहर गया है ,वह डॉ. आंबेडकर को कतई स्वीकार्य न होता. वे स्वतंत्रता, समता, बंधुत्व और न्याय पर आधारित समाज चाहते थे. जाति-बोध की किसी भी किस्म की निरंतरता उन्हें असह्य थी. एक भिन्न वैचारिक या सामाजिक इयत्ता के रूप में दलितवाद का जड़ीभूत ठहराव उनको मंजूर न होता. दलित जनता की आकांक्षाओं का दोहन करके व्यक्तिगत महत्त्वाकांक्षाओं की पूर्ति करने वाले उनकी नज़र में अपराधी ठहरते हैं. आंबेडकर का मंतव्य पहचानने वाले रचनाकार समय के इस नाजुक मोड़ पर हमारा ध्यान इसी तरफ ले जाना चाहते हैं. बेबी ताई कांबले की वह व्यथाजनित अभिव्यक्ति आज की रचनाकार अनिता भारती की तमाम कविताओं में प्रतिध्वनित हो रही है. बानगी के तौर पर एक कविता का अंश देखा जा सकता है-

तुम ले आए थे बाबा को
बाज़ार में
लगा रहे थे बोली
कह रहे थे देखो-देखो
हमारे बाबा ने झेले थे
दुःख-तकलीफें
जो तुमने दी थी उन्हें
अब तुम्हें भरना पड़ेगा
सबका हर्जाना
तकलीफें सुविधाओं में बदल रही थीं
कर रहे थे तुम विदेश यात्राएं
बोल रहे थे सभा-सम्मेलनों में
धिक्कार रहे थे उन्हें
जो सदियों से कर रहे थे अत्याचार
पर तुम्हारे पास एक अत्याचारग्रस्त
औरत खड़ी थी
लेकिन तुम्हारी आँखे उसकी पीड़ा से दूर
आसमान पर टिकी थीं
जो तुम्हें मिलना अभी बाकी था.
अब तुम बाबा को
घसीट लाए हो
व्यापार में
लोगों को बाबा के अपनाने के
जंतर-मंतर, हानि-लाभ सिखा रहे हो
सिखा रहे हो उनको
सूदखोर की तरह लाभ बटोरना
जबकि तुम्हारे पास
तुम्हारे भाई-बहन
भूख से बिलख रहे हैं.
हासिल की हैं तुमने
बिजनेस यात्राएं
अपने इन्हीं भूखे भाई-बहनों के बूते
गले, हाथ, लाकेट में लटकाए
भीम नाम की माला
ठीक स्वर्णकार की तरह
जो तुम्हारी ही तरह
सिद्धान्तहीन लोगों को चाहिए
पहनने के लिए (‘एक कदम मेरा भी’, अनिता भारती, बुक्स इंडिया, दिल्ली, 2013, पृ. 84-85)

अनिता भारती हिंदी दलित नारीवाद के प्रतिनिधि स्वरों में से एक हैं, अस्मिता-विमर्श की ढलान को पहचान कर और उसके इस तरह अदूरदर्शी सत्ता-विमर्श में बदलते जाने पर सवाल उठाकर दलित नारीवाद ने बड़ा मूल्यवान योगदान किया है. इसे विमर्श की जगह विचारधारा और क्षुद्र वैयक्तिकता की जगह मूल्यनिष्ठ प्रतिबद्धता को प्रतिष्ठित करने के उपक्रम के रूप में देखा जा सकता है. बाबासाहेब आंबेडकर की प्रासंगिकता और यथास्थिति से टकराने में उनकी अनिवार्यता को महसूस करने का इससे बेहतर तरीका और क्या होगा! घातक विचलनों से आगाह करते हुए दलित आन्दोलन को पुनः उसके मूल स्रोत से जोड़ना विमर्श के निष्क्रिय कर्मकांड से परिवर्तन के सार्थक प्रयासों की रक्षा है. यहाँ इस तथ्य को याद किया जाना चाहिए कि अस्मिता-विमर्श की एक परिणति सत्ता की दिशाहीन दौड़ में दिखी और दूसरी मूलनिवासीवाद जैसे रोमानी भावबोध में. इन दोनों से बचकर ही परिवर्तन की धारा प्रवहमान रह सकती है. आंबेडकर की वैचारिकी इसी अर्थ में अपरिहार्य लगती है. इसे समझने के कारण आलोचक-संपादक डॉ. तेज सिंह दलितवाद त्याग कर आंबेडकरवाद के प्रबल आग्रही हुए थे.

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इस साल आंबेडकर जयंती (14 अप्रैल,2014) पर बिलासपुर में आयोजित एक कार्यक्रम में युवा मराठी लेखक, संपादक और आंबेडकरवादी कार्यकर्ता राहुल कोसंबी को सुनने का मौका मिला. अपने व्याख्यान में राहुल ने यह बात जोर देकर कही कि श्रम और पूँजी के सवालों तथा मजदूर आंदोलन पर डॉ.आंबेडकर की समझ व तमाम अवसरों पर इस संबंध में लिए गए उनके निर्णयों को नए सिरे से देखने की जरूरत है. डॉ. आंबेडकर जब-जब आम श्रमिकों के मुद्दों को लेकर आगे बढ़े, संगठन बनाया अथवा चुनाव लड़ा तब-तब उन्हें ज्यादा सफलता मिली. उदाहरण के तौर पर राहुल ने स्वतंत्र मजदूर दल (इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी) की चुनावी सफलता को उद्धृत किया. इस पार्टी का निर्माण आंबेडकर ने 1936 में किया था. इसके बरक्स 1942 में उनके द्वारा स्थापित अखिल भारतीय शिड्यूल कास्ट फेडरेशन की 1946 के प्रादेशिक चुनावों में मिली पराजय की बात राहुल ने उठाई. राहुल ने इस अल्पज्ञात तथ्य की ओर भी ध्यान दिलाया कि इस फेडरेशन का निर्माण क्रिप्स मिशन के (प्रत्यक्ष) दबाव के नतीजे के चलते हुआ था. स्टेफोर्ड क्रिप्स के नेतृत्व में जो केबिनेट मिशन मार्च 1942 में भारत आया था वह धार्मिक, जातीय या सांस्कृतिक प्रतिनिधियों को ही मान्यता देता था और उन्हीं से संवाद करता था. क्रिप्स ने आंबेडकर से पूछा था कि वे अछूतों के प्रतिनिधि हैं या मजदूरों के. (‘आंबेडकर और मार्क्स’, पृ.68)  अनुसूचित जाति के हितों की चिंता के चलते आंबेडकर ऐसे फेडरेशन के निर्माण में संलग्न हुए थे. फेडरेशन की स्थापना 18-19 जुलाई 1942 में नागपुर में आयोजित अखिल भारतीय अस्पृश्यवर्गीय परिषद् में मंजूर प्रस्ताव के आधार पर हुई थी. इस अधिवेशन के दूसरे ही दिन आंबेडकर ने वाइसराय के कार्यकारी मंडल में श्रम मंत्री बनने की स्वीकृति दी थी. (वही, पृ.135).  उन्होंने आगे इस संगठन को बनाए रखने की बजाए रिपब्लिकन पार्टी की योजना बनाई मगर यह योजना उनके जीवनकाल में साकार न हो सकी. यह अनुमान लगाना मुश्किल नहीं है कि अगर उनके रहते यह पार्टी अस्तित्व में आयी होती तो उसका स्वरूप क्या होता और उसके सरोकार कैसे होते.

इतना निश्चित है कि तब यह जाति-विशेष की पार्टी के रूप में न पहचानी जाती और उसमें इतनी जल्दी तथा इतनी ज्यादा टूट-फूट न हुई होती. इस अनुमान का एक आधार बहिष्कृत हितकारिणी सभा का स्वरूप है. डॉ. आंबेडकर ने यह सभा अपनी आंदोलनधर्मी सक्रियता के शुरुआती दिनों 1924 में स्थापित की थी. सभा की कार्यकारिणी मिश्रित सदस्यों वाली थी. सभा का यह स्वरूप सचेत और सायास तरीके से निर्मित किया गया था. यह सिलसिला बाबासाहेब के पूरे जीवनकाल में कायम रहा. सन् 1927 में महाड़ के अस्पृश्यवर्गीय परिषद् में मनुस्मृति का दहन हुआ. परिषद् ने कई प्रस्ताव पास किए. इनमें दूसरा प्रस्ताव मनुस्मृति को जलाने का था. इसके प्रस्तावक सोशल सर्विस लीग के गं.नी. सहस्रबुद्धे थे. प्रस्ताव का समर्थन पां. ना. राजभोज ने किया था. मनुस्मृति को आग के हवाले करने का काम एक अछूत बैरागी के हाथों संपन्न हुआ. लंबे समय तक बाबासाहेब के सहयोगियों में शामिल रहे सहस्रबुद्धे जन्मना ब्राह्मण थे. राजभोज ग़ैरमहार (चमार जाति से) थे.डॉ. आंबेडकर की बड़ी स्पष्ट समझ थी कि “सामाजिक घटकों के परस्पर योग्य सहयोग पर ही सामाजिक पुनर्रचना निर्भर है.”(‘जीवन चरित’ धनंजय कीर, 1996, पृ. 38) आंबेडकर ने यह बात बर्ट्रेंड रसेल की एक किताब पर अपनी समीक्षा में लिखी थी. राजर्षि शाहूजी महराज की आर्थिक सहायता से उन्होंने ‘मूक नायक’ पत्र निकाला था. इसका पहला अंक 31 जनवरी  1920 को आया. अपनी दूरदर्शिता के चलते ही उन्होंने ‘मूक नायक’ का संपादक पांडुरंग नंदराम भटकर को बनाया था. भटकर महार थे और उनकी पत्नी ब्राह्मण परिवार से थीं. इस दंपत्ति को बहुत सामाजिक अपमान झेलने पड़े थे. प्रवेशांक में लिखा गया था-“अंग्रेजी राज के खिलाफ उठाया गया एतराज ब्राह्मणों के मुंह में यदि एक गुना शोभायमान होता है तो वही एतराज ब्राह्मणी राज के खिलाफ किसी बहिष्कृत व्यक्ति के उठाने पर हज़ार गुना शोभायमान होगा.” (वही, पृ.48) आंबेडकर का यह कथन आज वैश्वीकरण के ज़माने में और भी प्रासंगिक हो गया है. इसे अब यूं कहा जाना चाहिए कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों के बढ़ते-फैलते जाल पर व्यक्त की गई चिंता से कई गुना मूल्यवान चिंता दबंग जातियों द्वारा दलितों के उत्पीड़न की है. आंबेडकर का जीवन ताउम्र ऐसे ‘देशप्रेमियों’ की असलियत सामने लाता रहा जिनके देश के दायरे से दलित बहिष्कृत हैं. लोकमान्य तिलक ऐसे ही एक मान्य नेता थे. अखिल भारतीय अस्पृश्यता निवारण परिषद् का एक आयोजन उन्नीस मार्च 1918 में हुआ. तिलक ने इसमें हिस्सा लिया. अनपेक्षित पोजीशन लेते हुए तिलक ने अस्पृश्यता को मानने वाले ईश्वर को ईश्वर मानने से इनकार किया. लेकिन, परिषद् ने जब अस्पृश्यता के खिलाफ घोषणापत्र तैयार किया और उसे उपस्थित सदस्यों के सम्मुख हस्ताक्षर के लिए प्रस्तुत किया तो लोकमान्य तिलक ने उस पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया! टाइम्स ऑफ़ इंडिया के 16 जनवरी, 1919 अंक में डॉ. आंबेडकर ने लिखा-“स्वराज्य जैसा ब्राह्मणों का जन्मसिद्ध अधिकार है वैसा ही वह महारों का भी है… जब तक यह नहीं होगा तब तक स्वतंत्रता का दिन दूर रहेगा.”(वही, पृ.40 ) देश की स्वतंत्रता की चिंता डॉ.आंबेडकर को भी थी और तमाम राष्ट्रवादियों की तुलना में कहीं ज्यादा गहन व पुख्ता थी. ब्रिटिश शासन के प्रति उनका रवैया निर्भ्रांत तौर पर आलोचनात्मक था. इस बात पर काम ही लोगों का ध्यान जाता है कि डी. फिल.उपाधि हेतु लिखे उनके शोध-प्रबंध के सुपरवाइजर एडविन आर.ए. सेलिग्मन थे. सेलिग्मन मार्क्सवादी थे. उनकी कई किताबों में से एक ‘द इकॉनोमिक इंटरप्रिटेशन ऑफ़ हिस्टरी’ लेखक की वैचारिक रुझान की जानकारी के लिए देखी जा सकती है. आंबेडकर ने इनके मार्गदर्शन में 1916 में डी.फिल. किया था. यह प्रबंध आठ वर्ष बाद 1924 में ‘द इवोल्यूशन ऑफ़ प्रोविंशियल फाइनांस इन ब्रिटिश इंडिया’ शीर्षक से छपा. इस ग्रन्थ में आंबेडकर ने लिखा कि ब्रिटिश साम्राज्यवाद अपने देश के धनाड्यों और उनके उद्योगों के हित साधन में लगा हुआ है. यह सही है कि ब्रिटिश नौकरशाही ने देश में शांति और सुव्यवस्था स्थापित की. अब लोग इसका क्या करें? क्या वे इससे संतुष्ट हो जाएं? (वही, पृ.31) पूंजीवादी अर्थव्यवस्था और उसकी मूलाधार निजी संपत्ति की अवधारणा को समतामूलक समाज के निर्माण में बाधा मानना आंबेडकर के चिंतन में केंद्रीय मुद्दा है. इसे नज़रंदाज़ कर आंबेडकर की वैचारिकी को समझने का सिर्फ भ्रम पाला जा सकता है. यह बिडम्बना नहीं तो और क्या है कि अपने को आंबेडकर का उत्तराधिकारी घोषित करने वालों ने उनकी मृत्यु के तुरंत बाद समाजवादी विचार-दर्शन से संवाद और सहयोग करने की बजाए उससे शत्रुतापूर्ण रिश्ता बना लिया. इस रिश्ते के निर्माण और विकास में तथाकथित साम्यवादियो/समाजवादियों का भी कम योगदान नहीं है.

रावसाहेब कसबे की किताब उस वैचारिक परिदृश्य को मूर्त करती है, जो आंबेडकर के परिनिर्वाण के तुरंत बाद निर्मित हुआ था. डॉ.आंबेडकर ने रिपब्लिकन पार्टी की परिकल्पना स्वतंत्र मजदूर दल के विकसित संस्करण के रूप में की थी मगर वह अखिल भारतीय अनुसूचित जाति फेडरेशन की छाया-प्रति बन कर रह गया. दलितों के असली शत्रु कहीं पीछे ओझल कर दिए गए और मार्क्सवाद को दुश्मन की तरह देखा जाने लगा. दो-तीन पीढ़ियाँ इसी माहौल में पली-बढ़ीं. युवा होते रावसाहेब कसबे उन दिनों को याद करते हुए लिखते हैं-“उस समय कम्युनिस्टों के प्रति सहानुभूति रखना आंबेडकर-द्रोह की श्रेणी में आता था.”(आंबेडकर और मार्क्स’ पृ.२०) रावसाहेब इस बात को रेखांकित करते हैं कि रिपब्लिकन पार्टी के रूपवते गुट के नेताओं ने मार्क्सवाद विरोध का ऐसा वातावरण तैयार करने में अग्रणी भूमिका निभाई थी. उनकी पीढ़ी ने बाबासाहेब को देखा नहीं था. “बाबासाहेब के कुछ ही दिन पूर्व हुए महानिर्वाण के बाद हम इसी गुट को उनका सच्चा उत्तराधिकारी मानते थे…उनके विचारों को हम इन नेताओं के माध्यम से ही समझ रहे थे. हमें यह ढृढ़ विश्वास था कि हमारे नेता कभी झूठ नहीं बोल सकते.बाबासाहेब के साथ भावनात्मक तादात्म्य बनाने का एकमात्र रास्ता अपने नेताओं के प्रति निष्ठा रखना था.” (वही, पृ.२१) चीन का आक्रमण भी इन्हीं दिनों हुआ. कम्युनिस्ट चीन के प्रति गुस्सा सहज रूप से कम्युनिज्म के प्रति क्रोध में बदल दिया गया. कुल मिलाकर, “यह विचार हमारे दिल-दिमाग पर हावी था कि कम्युनिस्ट और उनकी विचारधारा ‘मार्क्सवाद’ हमारे देश की दुश्मन हैं…कम्युनिस्ट विरोध हमारे लिए अंतिम सत्य था.”(वही, पृ.२१) कई बार हुए एक ही प्रकार के अनुभव को याद करते हुए रावसाहेब लिखते हैं कि (चीन आक्रमण के समय बने) घोर राष्ट्रवादी माहौल में “जब रक्त संग्रह या चंदे के लिए कोई शासकीय सेवक या स्वयंसेवक उनके (कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं के) पास पहुंचता, तो वे डरते-डरते पूछ बैठते थे-“जिनके शरीर में पहले से ही खून की कमी है, उनसे क्यों खून माँगते हैं?” या फिर “जिनके पास दो जून की रोटी नहीं है, उनसे चंदा क्यों माँगते हैं?” सुनते ही उनका गला दबा देने की इच्छा होती.” (वही, पृ.२१) सारांश यह कि “समूचे वातावरण में कम्युनिस्टों के प्रति शत्रुता का भाव भरा हुआ था. इसी वातावरण में मैं बड़ा हुआ.”(वही, पृ.२१) रावसाहेब ने बड़े मार्मिक तरीके से अपने मानसिक रूपांतरण को शब्दबद्ध किया है. राजनीति शास्त्र में एम.ए.करते हुए उन्होंने मार्क्स और मार्क्सवादी सिद्धांतों के बारे में मजबूरन परीक्षा पास करने की गरज से पढ़ा. इससे उनके भीतर थोड़ी उत्सुकता जगी. इसी दौरान अहमदनगर में हुए बौद्ध साहित्य सम्मेलन में उन्हें रिपब्लिकन पार्टी के दूसरे धड़े के नेता दादासाहेब गायकवाड़ से मिलने और उनके साथ थोड़ा समय बिताने का मौका मिला. “उन्हें सुनने-समझने के दौरान मेरे अधिकांश पूर्वग्रह धीरे-धीरे पिघलने लगे और उनकी राजनीतिक भूमिका के बारे में पुनर्विचार करने की तीव्र आवश्यकता महसूस हुई.” इस उत्सुकता का विकास बाबासाहेब आंबेडकर के लेखन को परिवर्तित दृष्टि से पढ़ने के क्रम में हुआ.

 1916  में आंबेडकर ने जाति-व्यवस्था पर जो शोध निबंध लिखा था उसका आरंभिक वाक्य है- “समूची दुनिया का इतिहास वर्गीय समाजों का इतिहास है और भारत भी इसका अपवाद नहीं है”. बाबासाहेब के काठमांडू भाषण (जिसका आधा-अधूरा और गलत हवाला देकर मार्क्सवाद के प्रति नफरत में बढ़ोत्तरी की गई थी उसे) लेखक ने मूल रूप में पढ़ा. इसमें आंबेडकर ने बुद्ध की तुलना कार्ल मार्क्स से की है. इस भाषण का प्रास्ताविक अंश है- “भगवान बुद्ध और कार्ल मार्क्स की तुलना करना अत्यंत आकर्षक और मार्गदर्शक है. दोनों को पढ़ने और दोनों के दर्शन में गहरी रूचि होने के कारण, इनकी तुलना करने के लिए मुझे बाध्य होना पडा.” आंबेडकर की ‘गहरी रुचि’ से बावस्ता होने के बाद निरंतर अध्ययन के परिणामस्वरूप लेखक के “मन में जमा कट्टर कम्युनिस्ट विरोध और मार्क्सवाद संबंधी नफरत धीरे-धीरे समाप्त होने लगी. इस नई दृष्टि के आलोक में मैंने दीर्घ काल तक ढोए हुए जुए से मुक्ति पाने का संकल्प लिया और आंबेडकर तथा मार्क्स पर एक साथ विचार करना प्रारंभ किया.”(वही, पृ.24) अब जरूरत इस भीतरी परिवर्तन को सार्वजानिक करने की थी. जड़ीभूत परिवेश लेखक को इसकी अनुमति नहीं दे रहा था- “कार्ल मार्क्स के बारे में अनेक वर्षों से जमा हुआ मेरे मन का कलुष धीरे-धीरे घुलने लगा. मगर वह किसी से कहने की हिम्मत मुझमें नहीं थी.”(वही)जब भी किसी (दलित) व्यक्ति से उनकी मार्क्स पर चर्चा होती “तो वह उन्हें इस तरह भला-बुरा कहता कि मुझे कोफ़्त होती कि मैने यह बात छेड़ी ही क्यों!” सभा-संगोष्ठियो-जुलूसों में आते-जाते, अज्ञानजनित नफरत की परतों को जानते-बूझते और ‘लोक आग्रह के स्थान पर आत्मालोचना की आवश्यकता महसूस करने वाले’ दलित और दलितेतर युवकों से मिलते-जुलते क्रमशः साहस आता गया. बाबासाहेब के निकट सहयोगी रहे मिलिंद कॉलेज के यशस्वी प्राचार्य म.भि.चिटनिस की निकटता ने लेखक को अपने विश्वास के परीक्षण का अवसर उपलब्ध कराया.

रावसाहेब कसबे न तो आंबेडकरवाद को कम्युनिस्ट विचारधारा में शामिल करने की हिमायत करते हैं और न मार्क्सवाद को दलित आंदोलन में घुला देने की वकालत. उनका मानना है कि “दलित और वामपंथी आंदोलन को परस्पर शत्रुता रखकर अपनी सीमित शक्ति का दुरुपयोग करने की बजाए परस्पर सहयोग के द्वारा अपनी-अपनी सामर्थ्य का विस्तार करना चाहिए.” (वही, पृ.31) इस पारस्परिकता का विकास करने के लिए उन्होंने दोनों विचारधाराओं के उन पक्षों को रेखांकित किया जो संवाद और सहयोग में बढ़ोत्तरी कर सकते हैं. इस संदर्भ में आंबेडकर और मार्क्स के खुद के लेखन से ज्यादा सहायता और किस स्रोत से मिल सकती है! रावसाहेब कसबे की अगाध अध्ययनशीलता और तीक्ष्ण विश्लेषणात्मक दृष्टि से जन्मी यह किताब मानव-मुक्ति की चिंतनधारा में यादगार योगदान है. किताब का पहला संस्करण 1985 में आया था. सोवियत संघ के विघटन के छः वर्ष पहले. दूसरा संस्करण 2005 में आया. निजीकरण और अमेरिकीकरण की भव्य शुरुआत के डेढ़ दशक बाद. स्वाभाविक रूप से लेखक के सामने वैश्वीकरण एक बड़ा मुद्दा है. रावसाहेब वैश्वीकरण को ‘ऐतिहासिक विकासक्रम की नैसर्गिक व्यवस्था’ मानते हैं. अब उसके अच्छे या बुरे होने पर बहस करने का वक़्त नहीं बल्कि यह प्रयास करने का वक़्त है कि ‘उसे मानव जाति के लिए किस तरह पोषक और उपयोगी बनाया जा सकता है.’ लेखक के इस कथन की अनुगूंज पूरे अध्ययन में व्याप्त है कि “वैश्वीकरण की वर्तमान प्रक्रिया प्राकृतिक नहीं है बल्कि अमरीका जैसी महाशक्ति द्वारा अपने साम्राज्यवादी फैलाव के लिए एक साधन के रूप में इस्तेमाल की जा रही है.” सोवियत रूस के विघटन में पूंजीवादी ताकतों की सक्रियता को जिम्मेदार मानने से ज्यादा रावसाहेब ने वहां की खोखली और भ्रष्ट प्रशासकीय व्यवस्था को उत्तरदायी ठहराया है. मिखाइल गोर्बाचेव लिखित ‘पेरिस्त्रोइका’ को उन्होंने अपने विवेचन का आधार बनाया है. जनता की जरूरतों और आकांक्षाओं की रौशनी में अगर बेहतर से बेहतर व्यवस्था अपने को अद्यतन करते रहने को तैयार नहीं होती तो उसका ढह जाना अवश्यंभावी हो जाता है. दुनिया की तमाम क्रांतियों का जिक्र करते हुए रावसाहेब लेनिन के हवाले से यह बात कई बार रेखांकित करते हैं कि क्रांति एक सतत चलने वाली प्रक्रिया है. लेनिन का उद्धरण है- “इतिहास में ऐसी कोई भी क्रांति कभी भी संपन्न नहीं हुई जिसमें विजय पाने के बाद, बिना शस्त्र उठाए, बिना कुछ नया किए, सफलता की ख़ुशी मनाते हुए वह निश्चिन्त रह सकी हो. जिस समाजवाद का उद्देश्य सामाजिक विकासक्रम में पूंजीवाद से अधिक प्रभावी सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनैतिक परिवर्तन करना है,वह अपनी संपूर्ण क्षमता को प्रकट करके, अंततः एक मूलभूत नई रचना को साकार करने के लिए अनेक क्रांतिकारी चरणों से क्यों न गुजरे?”

कोई भी व्यवस्था अंततः समाज में रहने वालों के लिए और उन मनुष्यों के अनुरूप होती है. कम्युनिस्ट विचारधारा के आधार पर सोवियत संघ में जो व्यवस्था लागू की गई उसने ‘नए मनुष्य’ के निर्माण का काम अपने हाथ में नहीं लिया. नतीजतन, व्यक्ति और व्यवस्था में दूरी बनती-बढ़ती रही. इस दूरी का अंदाज हम सोवियत संघ के ढहने के चंद दिनों के भीतर चर्चों की बेतहाशा वृद्धि में देखते हैं. नए युवा जोड़ों ने अपनी सगाई की अंगूठियां तक इन चर्चों के निर्माण के लिए दान कर दीं. व्यक्तिगत संपत्ति के निषेध की संकल्पना के साथ अस्तित्व में आयी व्यवस्था अपने कार्यकर्ताओं, प्रशासकों और कर्मचारियों को अनैतिक, भ्रष्ट और बेतरह संपन्न होते देखती रही. बिडम्बना के दूसरे छोर पर निपट गरीबी में छटपटाते लोगों की दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ती संख्या दिखी. आंबेडकर को इस स्थिति का पूर्वाभास भले न रहा हो मगर वे इस बात पर आग्रह करते नज़र आते हैं कि कम्युनिस्ट समाज को बनाए रखने में बुद्ध धम्म सहायक हो सकता है. उन्होंने कहा- “बल प्रयोग हटाने पर साम्यवादी व्यवस्था का संरक्षण सिर्फ धर्म ही कर सकता है.” अब सवाल है कि यह काम कौन-सा धर्म करेगा? लेकिन, उससे पहले यह कि क्या कम्युनिस्ट धर्म वाले विकल्प को स्वीकार भी करेंगे? ईसाइयत को कम्युनिस्ट स्वीकार नहीं कर पाते. ईसाई धर्म ने ‘गरीबी का उदात्तीकरण किया और गरीबों को स्वर्ग की सुखद कल्पना में भटका दिया.’ लेकिन बुद्ध का धम्म ऐसा नहीं. वह साम्यवाद के लिए उपयोगी हो सकता है. डॉ.आंबेडकर के शब्द हैं- “रूसी लोग बल-प्रयोग समाप्त करने के बाद साम्यवाद को मजबूत आधार प्रदान करने के लिए एक पुख्ता सहायक की दृष्टि से बौद्धधम्म के बारे में नहीं सोच रहे हैं.” सोवियत संघ की स्थापना के साढ़े तीन दशक बाद आया यह सुझाव किस चिंता से प्रेरित है, इसे अलग से स्पष्ट करने की जरूरत नहीं. आंबेडकर की इस पीड़ा का मूल्य साम्यवादी व्यवस्था के समर्थकों की समझ में क्यों नहीं आया यह किसी भी नए अध्येता के लिए आश्चर्य का विषय हो सकता है. रावसाहेब कसबे ने लिखा- “आंबेडकर ने बौद्धधम्म को साम्यवाद का अंतिम सहायक माना, इस बात को बौद्ध जगत भी स्वीकार करेगा कहा नहीं जा सकता. साथ ही मूलतः कम्युनिस्ट-विरोधी और स्वयं को आंबेडकरवादी कहने वाले तक आंबेडकर द्वारा दी गई इस प्रस्थापना को पचा पाएंगे, यह कहना मुश्किल है. बाबासाहेब द्वारा बौद्धधम्म को प्रदान किए गए इस श्रेष्ठतम स्थान को समझने में कम्युनिस्टों की तरह वे भी ‘कोरे’ हैं. कम्युनिस्ट और बौद्ध दोनों ही परस्पर एक-दूसरे की परिभाषाओं को नहीं समझना चाहते और दोनों ही अब विनाश के कगार पर खड़े हैं.” (वही, पृ.48)

साम्यवाद पर सबसे ज्यादा हमला ‘सर्वहारा के अधिनायकत्व’ को लेकर होता है. आलोचक इसे ‘कम्युनिस्ट तानाशाही’ कहते हैं. आंबेडकर ने इस तानाशाही पर विचार किया. उन्होंने ‘दीर्घकालीन तानाशाही’ से असहमति जताई परंतु साथ ही यह भी स्वीकारा कि ‘सोवियत संघ में कम्युनिस्ट तानाशाही ने आश्चर्यजनक प्रगति की है, इसे झुठलाया नहीं जा सकता.’ इससे एक कदम आगे बढ़कर उन्होंने सुझाव दिया कि “सोवियत तानाशाही अन्य पिछड़े देशों के लिए भी उपयुक्त हो सकती है.” बेहद अंतर्दृष्टिपूर्ण ढंग से उन्होंने कहा कि मनुष्य को भौतिक विकास के साथ आत्मिक विकास भी करना होता है. “दीर्घकालीन तानाशाही ने मनुष्य के आत्मिक मूल्यों की ओर कोई ध्यान नहीं दिया.”समानता पर्याप्त नहीं है. वह स्वतंत्रता और बंधुत्व के साथ मिलकर ही पूर्णतर होती है. साम्यवाद समानता पर एकाग्र होकर रह जाता है. ‘बुद्ध के बताए रास्ते का अनुसरण करने पर ही ये तीनों चीजें एक साथ मिल सकती हैं.’

आंबेडकर का धम्म परंपरागत बौद्ध मत नहीं है. वह हीनयान और महायान से भिन्न नवयान है. यह संघबद्ध या संस्थागत धर्म न होकर मुक्ति का वैयक्तिक मार्ग है. बिचौलियों से रहित. इसमें संघम् शरणम् गच्छामि की जगह ‘अत्त दीप भव’ (‘अप्प दीपो भव’- स्वयं अपना दीपक बनो) पर ज़ोर है. मार्क्स ने जिस ‘समग्र मानव’ का सपना देखा था उसका गहरा संबंध इस नवयान की अवधारणा में स्थित मनुष्य से है. वैयक्तिकता की चिंता आंबेडकर के यहाँ मिलती है तो मार्क्स भी इस चिंता में साझीदार नज़र आते हैं. पूंजीवादी हड़पू व्यक्तिवाद भी वैयक्तिकता की बहुत परवाह करता प्रतीत होता है. इनमें अंतर व्यक्तिगत संपत्ति के मुद्दे पर है. आंबेडकर और मार्क्स दोनों ही निजी संपत्ति की अवधारणा को ख़ारिज करते हैं.आंबेडकर यों तो हिंसा के प्रयोग को प्रायः किसी भी स्थिति में समर्थन नहीं देते लेकिन निजी संपत्ति में निहित हिंसाचार को पहचानने के कारण वे कहते हैं-“अतः जिसकी निजी संपत्ति अन्य लोगों के दुःख का कारण बनती है, ऐसे अर्थ-पिशाच को क्यों न मारा जाए? कोई निजी संपत्ति को इतना पवित्र क्यों माने?” आंबेडकर इस आरोप पर कि सिर्फ कम्युनिस्ट राज्यों में हिंसा होती है निराकरण करते हुए कहते हैं-“ग़ैर कम्युनिस्ट देश एक-दूसरे से युद्ध करते हैं, उन युद्धों में लाखों लोग मारे जाते हैं, क्या यह हिंसा नहीं है?” हिंसा के प्रश्न पर बुद्ध और मार्क्स की तुलना करते हुए उन्होंने लिखा-“बुद्ध और मार्क्स के बारे में कुछ गलतफहमियां हैं, पहले उन्हें दूर करना जरूरी है. सबसे पहले हम हिंसा पर विचार करते हैं. कुछ लोग हिंसा के बारे में सोचते ही थर-थर कांपने लगते हैं. यह सिर्फ एक भावना हैं. मानव-जाति कभी भी हिंसा से दूर नहीं रह पाई है… बुद्ध भी हिंसा का विरोधी था, परंतु वह न्याय के पक्ष में था. जहां न्याय की प्राप्ति के लिए बल प्रयोग की अनिवार्यता हो, वहां इसका प्रयोग करने की वह अनुमति देता था.”(पृ.45-46)

सिद्धांत और व्यवहार में एकरूपता पर बल मार्क्स और आंबेडकर दोनों के यहाँ समान रूप से है. किसी भी कार्य के पीछे चिंतन का होना जरूरी है और बगैर क्रियाशीलता के कोई चिंतन बेमतलब का है. मार्क्स का क्रांतिकारी कथन है- “बिना कर्म का कोई दर्शन या तो हवा में उड़ जाने वाला होता है या फिर श्रद्धा को धंधा बनाने वालों की रूढ़ियों में जड़ हो जाता है. बिना दर्शन के कोई क्रिया निकट-दृष्टिदोष बन जाती है या फिर औपचारिक और नीरस कर्मकांड बन जाती है.” मार्क्स से पहले का भौतिकवाद मनुष्य को परिस्थितियों के अधीन मानता था. मार्क्स ने ‘थीसिस आन फायरबाख’ में लिखा कि ‘मनुष्य स्वयं भी परिस्थितियों को बदलता है.’ पुराने यांत्रिक भौतिकवाद से मार्क्स के क्रांतिकारी भौतिकवाद का यह फर्क है. रावसाहेब कसबे बताते हैं कि “बुद्ध और उनका धम्म पुस्तक में बाबासाहेब ने कार्ल मार्क्स का व्यावहारिक दर्शन (प्रैक्सिस) उनकी भाषा में ही प्रस्तुत किया है.” (पृ.82) अपनी इस बात के समर्थन में उन्होंने पुस्तक से दो उदाहरण दिए है. पहला उदाहरण उस समय का है जब ज्ञान-प्राप्ति के बाद बुद्ध के मन में अंतर्द्वंद्व चल रहा था कि उपदेश दिया जाए अथवा नहीं. आंबेडकर ने लिखा- ‘भगवान बुद्ध को अहसास हुआ कि इस दुनिया को बदल कर बेहतर बनाना जरूरी है.’ मार्क्स का प्रसिद्ध कथन है- “अनेक दार्शनिकों ने अब तक दुनिया की सिर्फ व्याख्या की है, परंतु असली सवाल है उसे बदलना.”बुद्ध और उनका धम्म में आंबेडकर पारम्परिक धर्म से अपने धम्म का अंतर बताते हुए कहते हैं- “ ‘धर्म’ का उद्देश्य इस दुनिया की उत्पत्ति को समझाना है, परंतु ‘धम्म’का उद्देश्य इस दुनिया की पुनर्रचना करना है.” (पृ.82) रावसाहेब की टिप्पणी है कि बुद्ध और उनका धम्म में अपने नव बौद्ध धम्म की प्रस्थापना करते हुए आंबेडकर कार्ल मार्क्स के नजदीक पहुंचते हैं और “उनकी प्रस्थापना मार्क्सवाद का विकल्प देने के स्थान पर मार्क्सवाद के पूरक (अल्टीमेट ऐड) के रूप में दिखाई देती है.” (पृ.81)

मार्क्स दुनिया के इतिहास को वर्गीय इतिहास के रूप में देखते थे. आंबेडकर भी इससे असहमत नहीं- “वर्गीय समाज का अस्तित्व एक वैश्विक तथ्य है इसलिए आरंभिक हिंदू समाज भी इसका अपवाद नहीं है.” अब सवाल था कि इस वर्ग से जाति कैसे बनी? आंबेडकर ने लिखा-“भारत में वर्ग गोलबंद हो गए, परंतु अन्य देशों में ऐसा नहीं हुआ. जाति और वर्ग एक दूसरे के पड़ोसी हैं और जाति ही गोलबंद वर्ग है.” (पृ.92) मनुस्मृति में जाति प्रथा का समर्थन है परंतु मनु इस प्रथा का जनक नहीं. उसने जाति-संस्था को सैद्धांतिक रूप देने में अपनी भूमिका निभाई. अगर धर्मग्रन्थ जाति के निर्माण और निरंतरता के जिम्मेदार नहीं तो उनकी आलोचना तक सीमित रहकर इस प्रथा का उन्मूलन भी नहीं किया जा सकता. आंबेडकर के शब्द हैं- “जाति-संस्था का निर्माण उपदेश मात्र से नहीं हुआ है और न ही उसे केवल उपदेशों से समाप्त किया जा सकता है.” जब तक आर्थिक संबंध नहीं बदलते, उत्पादन के साधनों पर पारंपरिक स्वामित्व का अंत नहीं होता तब तक जाति संरचना में आधारभूत परिवर्तन संभव नहीं लगता. जो विचारक मात्र धर्मग्रंथो की निंदा को जाति-उन्मूलन का हेतु मानकर संतुष्ट हो जाते हैं और आंदोलन का ध्यान वास्तविक भौतिक स्थितियों की ओर जाने में रुचि नहीं लेते उसके नतीज़ों पर रावसाहेब कसबे लिखते हैं-“आजकल दलित सांस्कृतिक आंदोलन में जो उग्रता दिखाई देती है, उसके मूल में संस्कृति के उद्भव के प्रति अज्ञान है.सांस्कृतिक संघर्ष महज देवी-देवता, धर्म-ग्रंथ और दर्शन का विरोध करके सफल नहीं होता बल्कि यह संस्कृति जिस भौतिक आधार पर खड़ी है उसे बदलना अनिवार्य है.बाबासाहेब के संस्कृति संबंधी इन विचारों को यदि स्वीकार कर लिया जाए, तो सांस्कृतिक आंदोलन में अग्रिम पंक्ति में लड़ने वालों को हवा में तलवार भांजने की आवश्यकता महसूस नहीं होगी.”(पृ.97)

डा आम्बेडकर के बाद के भारत में दलित आन्दोलन के प्रमुख हस्ताक्षर नामदेव ढसाल

अपने वक्त की राजनीतिक शक्तियों के वर्गीय स्वरूप की पहचान आंबेडकर को थी. 1937 में मैसूर में दलित-वर्ग की जिला परिषद आयोजित की गई थी. इसके अध्यक्षीय भाषण में उन्होंने गांधीजी और कांग्रेस के वर्ग-चरित्र पर टिप्पणी करते हुए कहा-“मुझे पूरी आशंका है कि गांधीजी कभी भी मजदूरों और दलितों का पक्ष नहीं लेंगे…साधारण मनुष्य को अपना विकास करने की स्वतंत्रता और अवसर मिले, इस सामाजिक-आर्थिक समानता स्थापित करने के उद्देश्य को घोषित करने की हिम्मत कांग्रेस में नहीं है. जब तक उत्पादन के साधनों पर अपनी स्वार्थ-सिद्धि के लिए कुछ लोगों का ही अधिकार होगा, तब तक साधारण मनुष्य के विकास की आशा नहीं की जा सकती.”(पृ.128) आंबेडकर की ऐसी स्पष्ट समझ परवर्ती दलित आन्दोलन में विस्मृत होती गई लेकिन साथ ही उनके समर्थकों की संख्या और समाज में उनकी दृश्य-स्वीकृति का दायरा बढ़ता गया. 1938 में आंबेडकर ने कहा कि “कांग्रेस यदि सचमुच ब्रिटिश-साम्राज्यवाद के खिलाफ संघर्ष छेड़ती तो मैं इसमें शामिल हो जाता. परंतु वस्तुस्थिति विपरीत है. कांग्रेस द्वारा प्राप्त राजनीतिक शक्ति का उपयोग स्वार्थी लोगों के हितों के पोषण के लिए किया जा रहा है और वह किसान-मजदूरों के हितों की अनदेखी कर रही है.” (पृ.129)आंबेडकर की छवि को धूमिल करने के तमाम प्रयास हुए. उनकी राष्ट्रनिष्ठा पर शक किया गया. उनके चरित्र पर कीचड़ उछाला गया. इन कुचेष्टाओं के बावजूद उनकी छवि चोटिल होने की बजाए निखरती गई. असल में उनका राष्ट्रवाद राजाओं, नवाबों, जमींदारों, महंथों की चिंता से परिभाषित न होकर मजदूरों-दलितों-किसानों-स्त्रियों के सरोकारों से निर्मित था. वे इनके लिए स्वराज चाहते थे.

आज अगर आंबेडकर होते तो उनकी क्या भूमिका होती? वे निश्चित तौर पर नवसाम्राज्यवादी हमलों के विरुद्ध मोर्चा खोलते, बहुराष्ट्रीय कंपनियों के बढ़ते जाल को छिन्न-भिन्न करने में संलग्न होते, राष्ट्रीय संपत्तियों (जल-जंगल-जमीन) को निजी हाथों में सौंपे जाने के खिलाफ़ लोगों को लामबंद करते. दलितों पर बढ़ रही हिंसा का पुरजोर प्रतिरोध तैयार करते… जो उनकी विरासत से अपने को जोड़ते हैं आज उनका यही कार्यभार होना चाहिए. साथ ही, मार्क्सवादी धारा से जुड़े दलों, संगठनों और व्यक्तियों को भी नए सिरे से सक्रिय होने की जरूरत है. दोनों विचारधाराओं में सच्चा सहयोग भाव अगर आज नहीं बना तो फिर कब बनेगा! रावसाहेब कसबे की चेतावनीभरी सलाह समय रहते सुन-समझ लेनी होगी. अभी पूना के भारत भूषण तिवारी (विचारक-अनुवादक) से मिली सूचना थोड़ी आश्वस्ति पैदा करने वाली है. नई सरकार ने आते ही सबसे पहले रेलवे के विनिवेशीकरण का द्वार खोलने की घोषणा की. भारतीय रेलवे सबसे अधिक नौकरियाँ प्रदान करने के लिए जाना जाता है. उसमें दलित समुदाय के कर्मचारियों की भी अच्छी संख्या है. उसके विनिवेशीकरण का नतीजा बहुत स्पष्ट है. शायद इस खतरे को भांपने का परिणाम है कि पहली बार ‘द सेंट्रल रेलवे एम्प्लाइज कोआपरेटिव क्रेडिट सोसाइटी लिमिटेड (ई.सी.सी. सोसाइटी)के पंचवर्षीय चुनाव (गुप्त मतदान) में सीटू (CITU) से जुड़े नेशनल रेलवे मजदूर यूनियन (NRMU) का आल इंडिया शिड्यूल कास्ट एंड शिड्यूल ट्राइब रेलवे एम्प्लाइज एसोसिएशन से गठबंधन हुआ है. दूसरी ओर कांग्रेस/इंटक से जुड़े सेंट्रल रेलवे मजदूर संघ का अपेक्षाकृत नए संगठन रेल कामगार सेना (भारत भूषण का अनुमान है कि यह महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना की शाखा होगी) से अलायंस हुआ है. एक शताब्दी पुरानी ई.सी.सी.सोसाइटी में घटने वाली यह चुनावी परिघटना दूरगामी आशय समेटे हुए है. आखिरकार, हम सबको अपना-अपना पक्ष चुनना ही होगा.
वरिष्ठ आंबेडकरवादी आलोचक और ‘अपेक्षा’ पत्रिका के संपादक डॉ. तेज सिंह का पंद्रह जुलाई को दिल का दौरा पड़ने से अकस्मात निधन हो गया. एक दर्ज़न से अधिक किताबों के लेखक-संपादक डॉ.तेज सिंह दलित लेखक संघ के पहले अध्यक्ष थे. वे इससे पहले जनवादी लेखक संघ के सक्रिय सदस्य थे. उनकी हमेशा यह कोशिश रही कि दोनों विचारधाराओं में सार्थक संवाद और नीतिगत मुद्दों पर एका हो. उनके परिनिर्वाण से समूचे परिवर्तनकामी और प्रगतिशील आंदोलन को धक्का लगा है. यह लेख उन्हीं की स्मृति को समर्पित है.

( कथादेश से साभार )

ज्यादा अश्लील हैं मर्दों के पहनावे : बुल टीशर्ट यानी अश्लील टीशर्ट!

स्वतंत्र मिश्र


स्वतंत्र मिश्र पेशे से पत्रकार हैं ,स्त्रीकाल के प्रिंट एडिशन के सम्पादन मंडल के सदस्य भी हैं . इनसे उनके मोबाइल न 9953404777 पर सम्पर्क किया जा सकता है.

( विचित्र बात है कि संसद से लेकर सड़क तक स्त्रियों के कपड़ों को कोसने का नैतिक कर्म हमारे  दैनंदिन में शामिल है. कल भी संसद इसका गवाह बनी. इस नैतिकता के  प्रवचन  -कर्ताओं को शायद ६ माह  की बच्ची से लेकर ८० साल की बूढ़ी  स्त्रियों पर बलात्कार नहीं दिखते -जिनमें कपड़ों का कोई रोल नहीं है.  हम  स्त्रियों के पहनावे पर बोलते हुए शायद पुरुषों की भाषा , उनके गानों की पसंद , उनके पहनावे को भूल जाते हैं।  मानो यह दुनिया पुरुषों की है , जिसमें सबको कायदे से रहना सीखना होगा , ख़ास कर स्त्रियों को।  स्वतंत्र मिश्र की यह रपट पुरुषों   की टी शर्ट पर पसरी अश्लीलता की पड़ताल कर रही है। )

‘युवा होने का मतलब उत्साह से भरा होना हो सकता है पर उत्साहित होने का मतलब यह तो कतई नहीं हो सकता है कि आप सड़क पर अश्लील स्लोगन लिए घूमते फिरेंगे। यह सब महिलाओं को अपमानित करने के लक्ष्य से गढ़े जा रहे हैं और इसका कारोबार भी फल- फूल  रहा है। औरतों के प्रति बढ़ रही हिंसा को देखते हुए इन प्रवृत्तियों पर लगाम लगाया जाना जरूरी है।’ – स्वाति नौडियाल, ड्रेस डिजाइनर
युवाओं के बीच हनी सिंह जैसे दर्जनों ऐसे गायकों या ऐसी फिल्मों को प्रामाणिकता तब और तेजी से मिलने लगती है जब उस अश्लीलता को टीशर्ट बनाने वाली कंपनियां बुल और पैंकी  टीशर्ट के नाम पर बाजार में धड़ल्ले से बेचने में यह कहकर जुट जाती हैं कि हम सबके चेहरों पर मुस्कान बिखेरना चाहते हैं

नोएडा के ग्रेट इंडिया पैलेसे के वाटर पार्क में  कुछ लड़के समूह में मौज करने पहुंचे थे। इसी में से एक ने दूसरे मित्र से बातचीत के क्रम में ताली पीटते हुए कहा -‘ओ तेरी के… प्रदीप तू यार भैंस की आंख…।’ मैं भी उसके पीछे-पीछे ही अपने परिवार के सदस्यों के साथ चल रहा था। वे सबके सब बिंदास थे। उनका बिंदासपन आकर्षित तो कर रहा था पर हंसी-ठिठोली के बीच वे बेलौस अंदाज में एक-दूसरे से कभी ‘अबे चू…’, ‘तेरी तो मां की…’  तो कभी अंग्रेजी का एक अल्फाज ‘फ…’ बार-बार कह रहे थे। उनमें से एक की टीशर्ट पर रोमन और देवनागरी में लिखा था ‘दिल्ली से हूं बेहन…’ तो एक की टीशर्ट पर लिखा था -‘मेरे पास माल है।’ उनमें से एक से पूछा कि ये ‘मां की आंख’ और ‘भैंस की आंख’ का मतलब क्या होता है, इसके जवाब में उसने कहा- ‘गाली का रिप्लेसमेंट है सरजी।’ ये सारे लड़के दिल्ली के रोहिणी और प्रीतमपुरा के निवासी थे और सभी के सभी खाते-पीते घरों से थे।

भाषा की दरकती इस दीवार के बारे में जब पड़ताल करनी शुरू की तो पता चला कि यह फिल्म, टेलीविजन और एफएम रेडियो चैनल के जरिए जरिए  बरसाती नदी की तरह अबाध बढ़ती चली जा रही है। इस बेलगाम भाषा को महानगरों में ‘बुल -पैंकी ’ या ‘सुपर बुल’ होने के लिए कम से कम युवा वर्गों में जरूरी माना जाने लगा है। एक पब्लीकेशन हाउस में काम करने वाले हिमांशु भट्ट ने इस मुद्दे पर बातचीत में कहा- ‘हम लड़के तो कुछ भी नहीं करते हैं। आपने एफएम पर रेडियो जॉकी को बोलते सुना है? कभी टेलीविजन पर चलने वाले विज्ञापन की द्विअर्थी भाषा सुनी हैै? कभी आपने रियल्टी शो मसलन बिग बॉस या कॉमेडी नाइट की भाषा सुनी हैै? अगर नहीं सुनी हो तो आप एक बार उनकी गली होकर आइए फिर आपको हम उनकी औलाद से भी                                                 कमजोर लगेंगे।’

‘ बुल टीशर्ट’ का कलैक्शन लेकर बाजार में उतरी दिल्ली की टीशर्ट कंपनी  ‘तपस्या’ ने दो दर्जन से भी ज्यादा स्लोग्न (नारों) वाले राउंडनैक (गोल गले) टीशर्ट बाजार में उतारे हैं। इस टीशर्ट की कीमत ४९९ रुपये है लेकिन देश के अलग-अलग हिस्सों और स्टोर पर यह ३९९ रुपये में उपलब्ध है। तपस्या कंपनी  के मालिक राजीव गुप्ता और इस  कंपनी की वेबसाइट का कहना है, ‘हम टीशर्ट का व्यापार करने नहीं विचारों का व्यापार करने

आए हैं। आप हमारी वंâपनी की टीशर्ट पर धार्मिक मसलन ‘ओम, भगवान गणेश या किसी धार्मिक संदेश को पाएंगे या फिर कुछ ऐसा जिसकी वजह से हर किसी के चेहरे पर मुस्कराहट तैर जाए।’ यह सच है कि तपस्या कंपनी की टीशर्ट पर्यावरण बचाने से लेकर शांति-सुकून  की बात तो करती है लेकिन दूसरी ओर वह सीधे-सीधे तो किसी टीशर्ट पर भाषा और चित्र, रोमन और देवनागरी के कॉकटेल के साथ अश्लील नारों से भरे टीशर्ट बाजार में बेच रही है। दिल्ली विश्वविद्यालय के एक प्रसिद्ध कॉलेज कैम्पस  में नामकरण के लिए पहुंचे नितिन की टीशर्ट पर प्रसिद्ध अंतरराष्ट्रीय रैगे गायक बॉब मारले का नाम तीन अलग-अलग रंगों के बॉक्स में अंग्रेजी में ‘बॉब मार …’ लिखा हुआ था। इस कंपनी  के वेबसाइट पर बुल  टीशर्ट के उदाहरण यहां उद्धृत किए जा रहे हैं – ‘बापू कमावे कैश ते पुत्तर करे एैश’, ‘यौन संबंध’, ‘अ मग अ डे कीप्स द डॉक्टर अवे (बीअर की बोतल का चित्र)’, ‘विच वे यू लाइक? ९६,६९’…आदि-इत्यादि।  ’, इस बारे में पूछा तो नितिन ने बताया, ‘आपको दो अर्थों या इस तरह के बुल -पैंकी  टीशर्ट देखनी हो तो बेवकूफ  डॉटकॉम पर थोड़ी देर के लिए जाओ।’ वेबकूफ डॉटकॉम को खंगाला तो पता चला कि अश्लील स्लोग्न वाले टीशर्ट की बाढ़ है। यहां तो दो अर्थ वाले नहीं, यहां तो सीधे-सीधे अर्थों वाले स्लोग्न टीशर्ट की भरमार है।

दिल्ली स्थित एक एक्सपोर्ट हाउस ‘अनंत इंटरनेशनल’ में डिजाइनर का काम करने वाली स्वाति नौडियाल के अनुसार ‘इन दिनों फिल्म, गाने और रेडियो पर युवा होने का मतलब बिंदास बताया जा रहा है। यह ठीक है कि युवा होने का मतलब उत्साह से भरा होना हो सकता है पर उत्साहित होने का मतलब यह तो कतई नहीं हो सकता है कि आप सड़क पर अश्लील स्लोगन लिए घूमते फिरेंगे। बेशर्मी की हद को पार कर जाने वाली युवाओं की भाषा और संवाद होंगे। यह सब महिलाओं को अपमानित करने के लक्ष्य से गढ़े जा रहे हैं और इसका कारोबार भी फल-पूâल रहा है। औरतों के प्रति बढ़ रही हिंसा को देखते हुए इन प्रवृत्तियों पर लगाम लगाया जाना जरूरी है।’

शैफ़ाली फ्रॉस्ट की कवितायें

शैफ़ाली फ्रॉस्ट

शैफ़ाली फ्रॉस्ट, पिछले कई सालों से टेलीविज़न में  एडिटर और फिल्म मेकर रही हैं।  कहानियाँ  और कवितायें लिखती हैं . लखनऊ में पली बढ़ी शैफ़ाली भारत और यू. के. में रहती हैं।  संपर्क  : shephali1@hotmail.com



( नए मुहावरों और बिम्बों के साथ  शैफ़ाली हिन्दी कविता में दस्तक दे रही हैं।   स्त्रीकाल के द्वारा इस प्रवेश का स्वागत ! )


1. बढ़ती लड़की 


भरे हुए पानी को
फिर-फिर पीती गीली मिट्टी,
अपनी कौंध में फुंकी
अपनी ही रौशनी में बुझी,
खुली ज़ुबान, बंद शब्द
कटकटाते दांत लिए,
फूलती, फटती, फिर बनती
बड़ी होती बच्ची

नुक्कड़ पर मरे जिनावर की गंध जैसी
मंदिर की हर घंटी में बजती है
उसकी आस,
चाह चलती है घुटने तले,
रुके तलुवे से चाटती है आसमान,
सबकी आँखों में चुभती है
इठला के चलती है सड़क पर
वो बढ़ती लड़की

अँधेरे का रास्ता रोकती कीचड़,
कुछ बची-खुची बदनाम रौशनी,
धुंए की फांक सी
आँखों को चबाती है
बंजर माँ की छाती की मूंग,
थके बाप की डरी पसलियां
पूरी तरह बिखेर चुकी अपनी लोच,
धौंकते चौराहों की नज़र बचा
सड़कों पर सर धुनती हैं,
छज्जे ही छज्जे हैं
इस शहर में
हर उबलती खिड़की के नीचे

निर्जल बाढ़ में फूले हुए जिन्न
एक हाथ में आसमान
एक हाथ में परछाई पकड़े
बहते हैं,
जमते हैं बहते हैं
जम जम के बहते हैं,
मरने वाली हर मांसपेशी के
अधकच्चे खोखलों पर
रुक रुक के चढ़ती है परवान,
उस घर की अकेली ज़िंदा आवाज़

अपनी भागती हथेली को
पत्ती भर डन्डियों के पेड़ तले,
देह भर के सूंघती है
अनायास कभी कभी,
वो बड़ी लड़की,
जैसे भौंचक्की सी किसी चाह को
अनजाने में
कोई सपना मिले,
दस उँगलियाँ और एक छोटी सी नाक लिए,
अधपक्का सा
अकेला

2. झरिया  में है नोकिया  का टावर

तुम आयी हो
लपटती ज़मीन की गुफाओं से निकल,
तुम आयी हो
दो दिन तीन रात के सफर के बाद,
तुम उतर के इधर देखती हो
फिर उधर

बिछा देती हो नए शहर की नालियों में
अपना बिस्तर,
सुखा देती हो
नए मकानों के वॉल पर अपना स्वैटर,
बिखर जाती है गेट पर उनके
तुम्हारी हैरत से खुली आँख,
बाँध लेती हो संथाली कन्धों में अपनी
बाज़ुओं का फैलाव

उतर रहे हैं चौबिस मंज़िली लिफ़्ट से
मालिक के सजनित कुत्ते,
बंधे बाजू, सधे पाँव,
चमकदार पट्टों में,
पुरानी कंपनियों का नया नाम,
नए नक्शों का कथानक,
साढ़े तैंतीस आरपीएम का रिकॉर्ड,
मिला देती हो फटी हुई बिवाई
बूटों से इनकी,
खोंस लेती हो स्वैटर में अपने
नयी मंज़िलों का आतंक

खेल रही हैं चौहद्दी में
किरकेट, बास्केट बॉल
मालिक की संवर्धित औलाद,
भरे हैं विरासती पेट उनके
पेट के सहारे तुम्हारे,
तुम चढ़ाती हो
थोड़ी सी भूख
दबी छाती के नाराज़ कोने में,
झरिया में खनकता है टावर !

बजती है गले में तुम्हारे
नोकिआ की धुन,
खींच लेता है ज़ुबान से लोरी
तुम्हारे अपने का तोतला प्रतिरोध,
दबा देती हो स्वेटर तले सर अपना,
बुझने लगती है
आँखों में तुम्हारे
दबे कोयले की आग

चार कुत्तों वाली मालकिन
दरवाज़ों के अंदर
खा रही है
तुम्हें, तुम्हारे ही हाथ,
तुम करती हो दरकार
थोड़ी सी सांस,
मुंडारी बोलता है न सुनता है
चबाते मुंह का दांत वाला कोना,
बाँध कर कपड़ा नाक पर
खाती जा रही है वो

बजती है एक बार फिर
नोकिया  की धुन
खाए हुए कानों में तुम्हारे,
तुम कलपती हो उलगुलान
झरिया की पहाड़ी में जलता है टावर,
दबाती हो बटन क्रांति का,
दौड़ के बुलाती हो उतरती हुई लिफ़्ट,
भौंकता है साढ़े तैंतीस आरपीएम में
लिफ़्ट वाला कुत्ता,
पकड़ लेता है स्वैटर तुम्हारा
चमकीले पट्टों का कथानक,
अधचबे नक्शों का आतंक

गिरती हो गुज़री हुई
शहर की नालियों में तुम,
फाड़ देती हो
कालका मेल का टिकिट
पट्टे वाले हाथ से,
बिछ जाती हो
चुके साये में,
उठ कर गुज़रने को
कल सुबह,
एक बार फिर

3. इन्तजार 

रात
थके पैरों का मनहूस रुकना,
कितनी चुप्पी है
मेरी सरहद में

इस बंद कमरे में
जो भूल चुकी हूँ
वो भी है,
भाप की तरह

सुबह के बँटते ही,
चुके साये में
रोकूंगी नहीं शरीर

सुनती, थरथराती, सांस लेती,
मेरे मरने में
मृत्यु दुखती है मेरी

पलकों पर भारी है
सन्नाटा
आभास का

आज भी नहीं आये
तुम शोर बन कर

४. प्रलय  से पहले


छोड़ न दे उसे पीछे कहीं
निकल जाए नावों में नयी,
दो हथेलियाँ पकड़ रही हैं
उस भागते पाँव को
हो रहा है उनसे अलग ,
जो ढूंढ रहा है घर
उन तमाम गड्ढों में
जहां शायद पानी हो

हथेली की लकीरों में
सो रही है वो चिड़िया,
जिसका रिश्ता
दोनों के इतिहास से टूट चुका है,
जिसका संगीत
बै-मौसम पानी से रूंध चुका है

वो पाँव जो ऊपर से
लात मार रहा है,
वो हथेली जो पिट रही है
उस पाँव से,
दोनो की संधि में
अटक गयी है
वो चिड़िया

अमन का दूत
पुरानी टहनी, दांतों में पहन,
जली जा रही है, ठंडे गुस्से से ,
डूब रही है
आग और पानी के भंवर में,
पर गाए जा रही है
शांति का गीत
अब भी

५. . शाम 

आज नीचे से देख रहे हैं
ऊपर हम,
उस पुराने दिन को
जब तन्हा गुंथे हुए हाथ लिए
हवा से हिलती पहाड़ी पर
मैने पहला नाख़ून रखा था

लहरों की कुर्सियां
नदी के हर छोटे पत्थर पर
पैर रख कर कूद रही थीं ,
उस दिन
तुमने कहा था ,
पास आ कर बैठो
मेरे …

गुज़रते रहे
कितने नदी, नाले, चश्मे, समंदर
माथे की शिकन पर अपनी,
मैने बादल में मुहँ डाल लिया
तुमने बिजलियाँ कानों पर चढ़ा ली थीं

‘देखो ,
सवेरा बरस रहा है !’
तुमने कहा,
और नाख़ून के पोरों से
मेरी पलकें बंद कर दीं

बंद आँखें ढूंढने लगीं
हमारी गुंथी उँगलियों का हुसूल,
ताकते रहे
बरसाती नदी का उफ़ान
तैरती कुर्सियों से हम

ऊतर गयी शाम आखिर
उस पहाड़ की छाँव में,
न तुम मिल सके
न मैं,
चुभता रहा
कुर्सियों की पीठ पर
इस नज़्म का नाख़ून

6. आख़िरी मादा 

ज़िंदा नालों की सांस बसी है
रौशनी में गुलाबों की,
गजब खिड़कियां हैं देखो
इस बदनाम ईमारत की,
सजा हैं हड्डियों पर मांस
चमकते शीशों के पीछे ,
टंगे हैं बदन कई
धुले बालों के नीचे,
लिपटी है हर होंठ से
बिगड़े साम्राज्यों की औलाद,
हर स्राव से उठती है रह रह
न मरने की वास

नाम की तख्ती से
तारीख़ दी गयी हैं मिटा,
तारीख़ की किताबों से
नाम हो गए हैं फना,
लुटो और लूटो, खूब
कहते हैं अशआर,
हर हवस बिकाऊ है यहाँ
हर भूख ख़रीदार

रंग लगी आखें
ओढ़ के रिसती है करुणा,
कलफ लगी पलकें
तोड़ के घिरता है अँधेरा,
गुलकार बस्तों  में खोंस टूटा सर्वांग,
छिपी जेबों से निकलती है
कतरी हुई ज़ुबान,
कांख कांख कर
स्याह रातों को,
चखाती है
सय्यादों का गोश्त,
तुम्हीं खा लो इन्हे, तो टूटे
इन मरे सायों का तिलिस्म

फाड़ डाले
अपनी ही गन्दगी
बदबूदार हवा का नासूर,
बहते मवाद की राह
तैर कर निकल जाये
यह आख़री मादा,
तख्ती पटक
कांच तोड़,
मरे नालों की सांस से परे
आदम-औ- हव्वा की
बची खुची औलाद,
टूटी टाँग
टूटे दांत
टूटे हाथ लिए,
एक नयी नाव की आस में
इस डूबती हैवानियत से दूर

7. मोटी औरत 

जिसकी गर्दन बँट रही है
टैलकम पाउडर की लकीरों से,
कलफ़ लगी हरी साड़ी में लिपटी, दिन चढ़े
पोंछती है पसीना चेहरे का, फाउंडेशन लगा,
खरीदती है सड़क से सूती रुमाल
दस रूपये में चार,
वो मोटी औरत
जिसे नहीं पता
कब लड़की से आंटी, आंटी से माताजी हो गयी,
रिक्शे वाला भी पूछता है आँख भर कर जिससे
‘भार होगा, तो दाम बड़ा लगेगा न माई’

जिसके टखनों में कालिख है
घिसी हुई पाजेब की,
छिपाती है बिवाई, छितरी हुई
चप्पल में डॉक्टर शोल की,
वो मोटी औरत
जिसने पान मसाला खाना शुरू नहीं किया अब तक,
गुडगाँव शहर में मॉल के बाहर
कर रही है इंतज़ार
जवान बेटी का,
जिसे ले जा कर अंदर
देखेगी सजता हुआ,
अपने आप से बिलकुल अलग

जिसे थोड़े ही समय के लिए
घर में रुक जाना था,
जिसके बढ़ते बच्चों को
अंग्रेज़ी मीडियम किताबों में डूब जाना था
और उसे वापस दफ़्तर निकल जाना था,
वो मोटी औरत
जिसके काम बंद कर चुके अंग
उगल रहे हैं आग,
हर महीने, तेईस तारीख से सत्ताईस तक
उसे निचोड़ने के बाद,
लोटती है, टाइल लगे ठंडे फर्श पर,
ग्रुप हाउसिंग के बंद मकानों में
हर दोपहर, अकेली
अट्ठारह साल बाद

जिसके सर की मांग के दो पार
उभर रही हैं लकीरें सफ़ेद रंग की सपाट,
मारती है रंग वो हर उगते नयेपन पर अपने
काला और खुशबूदार,
वो मोटी औरत
जो चिपचिपी कंघी से काढ़ती है बाल,
सजती है चाय की प्याली में
गरम पोहे के साथ,
जिसे देख कर खुश होता है तैंतीस साल पुराना
दफ़्तर से लौटा
अफ़सरनुमा अजनबी हर शाम

जिसकी हिलती खाल पर खिंच गए हैं
लिसड़ती उम्र के नाखून,
जो कपडे उतारती है, दरवाज़े के पीछे
अपनी ही नज़र बचा कर हर रात,
वो मोटी औरत
देती है अपनापन
उस चुने हुए अजनबी को,
बत्ती बुझा कर
चादर में छुप कर,
मांगे जाने पर, कभी कभार

8. प्रतिरोध 

तुम्हारे जूते चल रहे हैं
हाथ पर मेरे,
मैं चिल्लाना चाहती हूँ,
चिल्लाती हूँ ,
डर जाती हूँ
आतंकित तो नहीं हो गए तुम ?

मेज़ पर मेरे सामने
बैठा है, एक बच्चा
पैर झुलाता
खुजली मचाता उँगलियों पर
निडर,
“लकड़ी के पटरे पर खड़े होने के लिए
जलती हुई पेन्सिल पर घिसने के लिए
आ गया हूँ मैं !”

मिला रहा है शकल
उसका मुहं, मेरे हाथ से,
आज नहीं तो कल
उसका गुस्सा लिखेगा मुझे,
सूरज सा जलता,
पानी सा बुझता

उलट कर गिरता है
कुर्सी से,
पहुंचता है लगा कर कलाबाजी,
डालता है जूते में तुम्हारे, पाँव अपना
छोटा सा,
रुक जाती है एक क्षण को
तुम्हारी धार,
चिल्ला देते हो तुम भी
मेरे साथ,
खिलखिला के हँस देता है
मेरा हाथ

सुधा उपाध्याय की कवितायें

सुधा उपाध्याय

सुधा उपाध्याय महत्वपूर्ण साहित्यकार हैं। इनके दो कविता संग्रह -‘इसलिए कहूँगी मैं’और
‘बोलती चुप्पी’- प्रकाशित हो चुके हैं। एक आलोचना पुस्तक भी प्रकाशित है। संपर्क : sudhaupadhyaya@gmail.com

1. युद्धरत औरत

सुबह सवेरे
एक बनावटी मुस्कान पहने निकलती है घर से
बार-बार मुखौटे बदलते थक जाती है
कृत्रिम हंसी, खुश्क आंखें और खोखले मन
आतंकित करते हैं
तब भी विशिष्टों में नहीं रच पच पाती
थकी हुई वापस लौटती है अपनी दुनिया में
जहां राह देख रहे हैं
जाने कब से भूखे बच्चे,
बिखरा घर, उलझी आलमारी
दूध राशन सब्जी की खरीदारी
करती युद्धरत औरत
डांट डपटकर सुला देती है बच्चों को
पड़ जाती है निढाल बिस्तर पर
ताकि कल फिर जिरहबख्तर के साथ
निकल सके घर से।

     2.  नहीं फेंक सकती

तुम अकसर कहते हो मुझे
अव्यवस्थित
कर चुके हो शिकायत
संग्रह भावना की
पर क्या करूं
मैं नहीं फेंक सकती जिए हुए
किसी पल को कुड़ेदान में
चाहे वो बच्चों के बनाए सुंदर कार्ड हों
उनके तुतलाते हस्ताक्षर,

रंगीन ड्राइंग
क्लासरूम नोट्स
यूं ही कागज के ठोंगे पर लिखी कोई कविता
डायरी का कोई पन्ना
कहीं से मिल गई कोई अच्छी शायरी
या फिर चिंदियों में
तुम्हारे तमाम प्यारे संबोधनों का इतिहास
हर ब्यौरा सुरक्षित रखा है मन के कोने में
फिर भी उसे दुलराने के लिए
उसका बाहर होना भी
उतना ही जरूरी है

4.   क्यों करती हो वाद-विवाद

क्यों करती हो वाद-विवाद
बैठती हो स्त्री विमर्श लेकर
जबकि लुभाते हैं तुम्हें
पुरुषतंत्र के सारे सौंदर्य उपमान
सौंदर्य प्रसाधन, सौंदर्य सूचक संबोधन
जबकि वे क्षीण करते हैं
तुम्हारे स्त्रीत्व को
हत्यारे हैं भीतरी सुंदरता के
घातक हैं प्रतिशोध के लिए।
फिर क्यों करती हो वाद-विवाद।

5.    बोनजई

तुमने आँगन से खोदकर
मुझे लगा दिया सुंदर गमले में
फिर सजा लिया घर के ड्राइंग रूम में
हर आने जाने वाला बड़ी हसरत से देखता है
और धीरे-धीरे मैं बोनज़ई में तब्दील हो गई
मौसम ने करवट ली
मुझमें लगे फल फूल ने तुम्हें फिर डराया
अबकी तुमने उखाड़ फेंका घूरे पर
आओ देखकर जाओ
यहां मेरी जड़ें और फैल गईं हैं

6.       कूबत

चट्टानों को तोड़ देने का हौंसला
तूफानों को चीरकर निकलने का साहस
शहर भर की भेदती निगाहों से बचती
अंधेरों से लड़ने की कूबत
औरत तूने कहां से जुटाई
ये आईना जो दरक गया था कभी का
इसे फिर कहां से उठा लाई

7.    खानाबदोश औरतें

सावधान ….
इक्कीसवीं सदी की खानाबदोश औरतें
तलाश रहीं हैं घर
सुना है वो अब किसी की नहीं सुनतीं
चीख चीख कर दर्ज करा रही हैं सारे प्रतिरोध
जिनका पहला प्रेम ही बना आखिरी दुःख
उन्नींदी अलमस्ती और
बहुत सारी नींद की गोलियों के बीच
तलाश विहीन वे साथी जो दोस्त बन सकें
आज नहीं करतीं वे घर के स्वामी का इंतज़ार
सहना चुपचाप रहना कल की बात होगी
जाग गयी हैं खानाबदोश औरतें
अब वे किस्मत को दोष नहीं देतीं
बेटियां जनमते जनमते कठुवा गयी हैं

8.       अक्षत

सुनो मैंने आज भी सहेज कर रखा है
वह सबकुछ जो अम्मा ने थमाई थी
घर छोर कर आते हुए
तुम्हारे लिए अगाध विश्वास
सच्ची चाहत ,धुले पूछे विचार
संवेदनशील गीत ,कोयल की कुहुक
बुलबुलों की उड़ान ,ताज़े फूलों की महक
तितली के रंग ,इतर की शीशी
कुछ कढाई वाले रुमाल
सोचती हूँ हवाई उड़ान भरते भरते
जब तुम थक जाओगे
मैं इसी खुरदुरी ज़मीन पर तुम्हे फिर मिल जाउंगी
जहाँ हम घंटों पसरे रहते थे मन गीला किये हुए
वे सब धरोहर दे दूँगी ख़ुशी से वे तुम्हारे ही थे
अक्षत तुम्हारे ही रहेंगे ….

9. मौसम

मुझपर फब्ती है
जेठ की दुपहरी
पूस की रात
बरसात की उमस
सबकुछ जीती हूं एक साथ
क्यों कि मौसम ऐसे ही करवट लेता है।

नीला आसमान : दूसरी किश्त

शोभा मिश्रा


साहित्यिक -सामाजिक संगठन फर्गुदिया की संस्थापक ‘संचालक शोभा मिश्रा कवितायेँ और कहानियां लिखती हैं. ये सक्रिय ब्लॉगर के रूप में सम्मानित हैं और दिल्ली में रहती हैं. संपर्क : shobhamishra789@gmail.com

( शोभा मिश्रा की यह लम्बी कहानी भारतीय समाज के उस बडे
हिस्से की कहानी है, जहां औरत तय भूमिकाओं के लिए गढ़ी जाती है. छोटे -छोटे
वे हर प्रसंग यहाँ बारीकी से और सहज भाषा में शामिल किये गए हैं , जो उन
भूमिकाओं को तय करते हैं . उसी  परिवेश की लडकी सुनैना अपने मायके में अपने
वजूद और निर्णयों के लिए लड़ते हुए अपने ससुराल में हार जाती है. हालांकि
इस हार के लिए मायका भी उतना ही जिम्मेवार है, जितना ससुराल, फिर भी मायके
और माँ के स्नेह को वह अपना अंतिम राजदार बनाती है , आख़िरी पत्र के द्वारा .
)

केनवास पर सीनरी और चद्दरों, रूमालों पर रंग भरकर अपने मास्टरजी से सुनैना खूब स्नेह पाती थी…उसकी बनाईं सीनरी रिश्तेदार और पड़ोसी कभी -कभी खूब सराहकर माँग लेते …वह और उसके घर के सदस्य संकोचवश मना नहीं कर पाते थे लेकिन रंग, केनवास और कपड़ों का खर्च निकालने के लिए सुनैना कभी-कभी अपनी सीनरी बेच भी देती थी! मास्टर जी चाचाजी के दोस्त थे…रंगों की दुनिया की विभिन्न कलाओं, विधाओं में वे माहिर थे…कभी-कभी जब घर आते तो सुनैना को पेंटिंग की बारीकियों के बारे में सिखाते थे! एक दिन सुनैना मास्टरजी के घर गई…मास्टरजी ग्लास पेंटिंग्स से भरा आर्टरूम देखकर हैरान रह गई…ग्लास पेंटिंग देखते-देखते बिल्लियों के जोड़ेवाली एक पेंटिंग पर उसकी निगाह ठहर गई …मास्टरजी से पेंटिंग की इस नई विधा की जानकारी लेने के बाद बिल्लियों जैसी पेंटिंग बनाने की इच्छा जाहिर की…मास्टरजी ने छोटे-छोटे पारदर्शी शीशे के टुकड़े देते हुए उससे कहा कि जैसे समझाया है अभी तुम इस पर फूलों और सब्जियों की आकृति बनाकर प्रेक्टिस करना सीखो! बिल्लियों की आँखों और बालों में रंग भरना ये ग्लास पेंटिंग्स के मँझे हुए पेंटर भी ढंग से नहीं कर पाते हैं! लेकिन सुनैना तो बिल्लियों की आँखों में मन ही मन रंग भर चुकी थी!

उस दिन मास्टरजी के घर से लौटकर सुनैना भूरी ...सफेद और काली बिल्लियों के पेयर के बारे में ही सोचती रही …मास्टरजी ने ग्लास पेंटिंग कैसे बनाई जाती है,…कैसे पारदर्शी शीशे पर पहले आकृति की सूक्ष्म लाइनों और शेड्स में रंग भरने होते हैं और बाद में बेस में रंग भरना होता है…जो समझाया था उसी के बारे में सोचती रही!दूसरे दिन ट्यूशन से लौटते समय फोटोफ्रेम करनेवाले की दुकान के आगे उसके पाँव थम गए, आगे बढ़कर फ्रेम में लगाये जानेवाले शीशे का दाम पूछ ही लिया…छः बाई चार इंच के पारदर्शी शीशे की कीमत पाँच रुपये थी!

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घर आकर अम्मा से सुनैना ने अपने मन की बात कही, पहले भी पेंटिंग के लिए रंग और कपड़ों का खर्च तो देना ही पड़ता था, अम्मा शीशे का पैसा देने के लिए भी राजी हो गई! दूसरे दिन ही सुनैना ने शीशा खरीदा और मन में उतरी बिल्लियों की आँखों की लाल-नीली नसों को शीशे पर सबसे पहले प्रत्यक्ष रूप दिया उसके बाद उनके शरीर के भूरे…पीले…सफेद … काले रोयें में रंग भरती गई! एक धुन में पूरी रात शीशे पर बिल्लियों में रंग भरने में डूबी रही! सुबह होने वाली थी …खिड़की से बाहर हल्का नीला उजाला बिखरा हुआ था इधर सुनैना के सामने शीशे पर बनी बिल्लियों का जोड़ा मुस्करा रहा था!शाम को जब उसने मास्टरजी को अपनी ग्लास पेंटिंग दिखाई…खुशी से स्तब्ध मास्टरजी पेंटब्रश मुँह में दबाये बस पेंटिंग निहारते रह गए …बोले कुछ भी नहीं! थोड़ी देर बाद सुनैना के सर पर हाथ रखकर बस इतना ही कहा कि ‘‘ऐसे ही आगे बढ़ती जाओ…मेरा आशीर्वाद तुम्हारे साथ है!’’

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अब तो ग्लास पेंटिंग बनाने में सुनैना का मन खूब रमने लगा…शीशे के लिए अम्मा कभी-कभी पैसे दे देती थीं लेकिन कभी-कभी पेंटिंग्स के लिए रंग और शीशे…कपड़े के लिए पैसे माँगने पर घर में माहौल बहुत बिगड़ जाता था! चाचाजी सुनैना को हमेशा यही नसीहत देते की तुम अपनी पढ़ाई पर ध्यान दो …बहुत मुश्किल से पास भर हो जाती हो, ये सब चित्रकारी-वारी में कुछ नहीं रखा है! चाचाजी की बातों का कभी वह विरोध नहीं करती थी लेकिन अकेले में यही सोचा करती कि पढ़ाई में होशियार होना और कक्षा में अव्वल आना ही सबकुछ होता है क्या? आज हमारी बनाई कितनी सीनरी बिक जाती हैं। कुछ ग्लास पेंटिंग्स और सीनरी मास्टरजी की पेंटिंग्स के साथ प्रदर्शनी में भी शामिल की गई! दिल्ली के एक बड़े चित्रकार मास्टरजी की पेंटिंग्स के साथ हमारी भी पेंटिंग्स खरीदकर ले गए थे! ये सब छोटी-छोटी मन को संतोष देनेवाली उपलब्धि कम हैं क्या?

एक दिन जब सुनैना को शीशे के लिए पैसे नहीं मिले तो वो बहुत रोई …अम्मा उसे समझाती रहीं, ‘‘रो मत … जब हमरे पास होगा तब हम तुम का पेंटिंग के सामान के लिए पैसा जरूर देंगे!’’ सुनैना के पास आयल कलर और ब्रश था लेकिन उसे पेंटिंग बनाने के लिए शीशे की जरूरत थी! एक दिन दोपहर में अम्मा के पास लेटी- लेटी सुनैना ने अम्मा का हाथ अपने हाथ में लेकर बड़े प्यार से उनसे बक्से में रखी उनकी कढ़ाई की हुई फोटो के बारे में बात करने लगी! ‘‘अम्मा! उस फोटो का क्या करोगी? इत्ते साल से उसको बक्से में काहे रखी हो? उसको कमरे में सजा क्यों नहीं देती दीवार पर?’’ अम्मा स्नेह से उसके सर पर हाथ फिराती हुई बोली, ‘‘वो फोटो हमारे मायके की याद है…गर्मियों की दुपहरिया में ओसारा में तुम्हारी नानी के साथ बैठकर…साँझ को छत पर सखियों के संग हँसी -ठिठोली करते हुए … दूर खेतांे में डूबते सूरज को निहारते हुए वो सब फोटो हम काढ़े हैं…दीवार पर सजाकर रंग खराब होई … गिरके टूट भी सकत है…एक बार मायके की यादन के सँजोई धरोहर खत्म हुई जाई तब कहाँ मिली?’’

अम्मा का मायके की यादों से जुड़ी अपनी कला के प्रति इतना मोह देखकर सुनैना से कुछ कहते नहीं बना…चुपचाप अम्मा का हाथ पकड़कर सो गई! लेकिन एक दिन दोपहर में जब अम्मा और चाची बुलउवा में गईं थी तब सुनैना ने अम्मा का बक्सा खोलकर उनकी काढ़ी हुई कुछ फोटो से शीशा अलग कर लिया … बहुत दिन से वो अम्मा और चाचा से पेंटिंग के सामान के लिए पैसा माँग रही थी…अम्मा तो मजबूर थी लेकिन चाचा ने गुस्से में पैसा नहीं दिया! रुई और रंग-बिरंगे सिल्क के कपड़े पर काढ़े हुए राधा- कृष्णा, तोता, मछली और खरगोश को उसने शीशे से अलग कर दिया…कुछ सितारे…मोती और टिकुलियाँ काढ़े हुए कपड़े से निकलकर नीचे फर्श पर गिर गए! अम्मा बुलउवा से लौटी तो ये सब देखकर थोड़ा दुखी तो हुईं लेकिन सहमी हुई सुनैना को देखकर मुस्करा दीं!

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आज सुनैना स्कूल से लौटी तो अम्मा, चाची, दादी खुश होकर आपस में कुछ बातें कर रही थी …अम्मा के हाथ में अंतर्देशीय-पत्र था! वो अपना बस्ता रखकर सीधा अम्मा के पास गई और उतावली होकर अम्मा से पूछने लगी ‘‘किसकी चिट्ठी है अम्मा?’’ उसे लगा मामाजी के गाँव से चिट्ठी आई होगी तो उसमें नानीजी का भी हाल-चाल होगा! अम्मा प्यार से उसकी तरफ देखकर मुस्कराने लगी…दादी बोल पड़ी, ‘‘तुम्हरी मौसी की चिट्ठी है हफ्तेभर बाद तुमका लड़केवाले देखने आयेंगे!’’सुनैना चुपचाप उठकर वहाँ से चली गई…पिछले दो साल से अपने लिए विद्रोह करके वो थक गई थी …अब सबकुछ स्वीकार कर चुकी थी! हाथ-मुँह धोकर अम्मा के कमरे में नीचे चटाई बिछाकर लेट गई! थोड़ी देर में अम्मा खाना लेकर आ गईं …सुनैना अपनी आँखों और माथे पर बाँह रखकर सोने का प्रयास कर रही थी …अम्मा ने धीरे से उसकी बाँह हटाते हुए उसे प्यार से खाना खाने के लिए कहा! वह उठकर बैठ गई और खाना खाकर फिर लेट गई…आज अम्मा उससे बहुत बात करना चाह रही थी…अम्मा का मन भारी हो रहा था लेकिन बिटिया की मनःस्थिति का ध्यान रखते हुए वह उसके पास से हट गई! अम्मा के जाते ही सुनैना ने अपनी आँखें खोल ली और कुछ सोचते हुए छत पर धीरे-धीरे घूमते पंखे को निहारने लगी!

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आज अम्मा सुनैना को अपनी शादी में मिली सितारे जड़ी गुलाबी साड़ी पहनाकर तैयार कर रही थीं, सुनैना के लम्बे बालों को समेटकर अम्मा ने एक सुन्दर लम्बी छोटी गूंथ दी थी, माथे पर छोटी सी लाल बिंदी सजा दी और कानों में अपने सोने के छोटे झुमके पहना दिए! चाची ने उसके दाहिने हाथ में अपने आर्टिफिशियल सुन्दर कड़ों का सेट पहना दिया, एक हाथ में सुनैना को शादी में देने के लिए घड़ी जो पहले ही खरीद ली गई थी वो अम्मा ने पहना दी! सावन के महीने में अगर दिनभर बरसा हुआ आसमान साफ हो तो वो शाम कुछ गुलाबी आभा लिये हुए मासूम सी सुन्दर सी नवयौवना लगती है, सुनैना वैसी ही शाम की तरह सुन्दर राजकुमारी जैसी लग रही थी!

एक अजीब उदासी सुनैना के चेहरे पर छाई हुई थी, वो बस लगातार शून्य में कुछ निहारे जा रही थी, अम्मा ने उसकी ठोढ़ी को अपने अंगूठे और अनामिका उँगली से ऊपर उठाकर उसका चेहरा अपनी तरफ किया…अम्मा और सुनैना की आँखंे मिली…अम्मा ने सुनैना की और सुनैना ने अम्मा की आँखों में उदासी के घिरे बादलों को देख लिया…इससे पहले कि सुनैना की आँखों के बादल बरसते …अम्मा ने खटिया पर बैठी सुनैना का सर अपनी गोद में समेट लिया…अंकवार में भरकर धीरे से बस इतना ही बोल पाई, ‘‘देवी जइसन … बिटिया हमार!’’
भीतर मन में तो दोनों के हृदय के धरातल पर बिछोह के बादल लगातार बरस रहे थे लेकिन दोनों ने ही आँखों में घिर आये बादलों को अभी फटने नहीं दिया था! अम्मा सुनैना का सर अपनी छाती से लगाए उसके माथे पर स्नेह से हाथ फिरा रहीं थी और सुनैना ने अम्मा की छाती में अपना चेहरा छिपाकर आँखें बंद कर ली थी!
‘‘ए ताईजी! वो लोग आ गए।’’

अम्मा ने हड़बड़ाकर सुनैना को अपने से अलग किया और गुडुआ से बोली, ‘‘ए बाबू! तुम्हरे पापा तो दरवज्जे पर हैं ना उनके स्वागत के लिए?’’ गुडुआ बहुत उत्साहित था अपनी ताईजी की बात सुनकर ये कहता हुआ घर के द्वार की तरफ भागा। ‘‘हाँ ताईजी … पापा वहीं हैं!’’चाची भी भागकर घर की खिड़की से बाहर झाँकने लगी…अम्मा रसोई की तरफ दौड़ी…घर में सभी उत्साहित होकर लड़केवालों की आवभगत के लिए इधर-उधर दौड़- भाग करने लगे! दादी बड़बड़ाती हुई अम्मा को धीमी आवाज में नसीहत देने लगी – ‘‘ई रोना-धोना बाद में करिहो बहुरिया… अब ही तो मेहमान न के खातिरदारी करो जल्दी जायके।’’

चाचीजी और एक अनजान पुरुष की हँसी के साथ कुछ आवाजें सुनैना और उसकी अम्मा के करीब आती गईं!‘‘रस्ते में कोई परेशानी तो नहीं हुई?’’ ये चाचाजी की आवाज थी!‘‘नाही … सुबह बहुत जल्दी -जल्दी करने के बाद भी घर से निकलने में दस बज गए … रस्ते में दो जगह रुके … लम्बे सफर में रिंकू की माँ की तबियत थोड़ी बिगड़ जाती है।’’अम्मा और चाची रसोई में मेहमानों के चाय-पानी के इंतजाम में व्यस्त थी…उदासी और घबराहट के मिलेजुले भाव के साथ बैठी सुनैना की आँखें जिज्ञासावश खिड़की की तरफ उठ ही गईं …मार्च के महीने की हलकी गर्मी में सीलिंग फैन चल रहा था …खिड़की पर लगा पर्दा पंखे की हवा से कभी-कभी ऊपर उठ जाता! करीब पैंतालिस साल की उस महिला की छवि गरिमामय थी लेकिन चेहरे पर मुस्कराहट के बाद भी एक हल्के अहंकार का भाव था…अधेड़ उम्र के हिसाब से उन्होंने खूब चटख बैंगनी रंग की साड़ी पहनी थी… सुनैना ने अंदाजा लगा लिया कि ये उसकी होनेवाली सासू माँ हैं! मौसी ने अम्मा…दादी … चाची और नानी के सामने इनकी तारीफों के पुल बाँध दिए थे, पढ़ी- लिखी हैं … घर सलीके से रखती हैं और बहुत शांत भाव की हैं! साथ में जो पुरुष थे उन्होंने सलेटी रंग की सफारी पहनी हुई थी, पैंतालिस के आस-पास उनकी भी उम्र होगी…चाचाजी से बात करते हुए उनके व्यवहार में सरलता झलक रही थी… चेहरे पर गंभीर भाव थे!

दो कमरों के बीच की दीवार की खिड़की से उठते-गिरते परदे से कभी-कभी सुनैना घरवालों द्वारा चुने हुए अपने ससुराल वालों को निहार लेती कभी अपने छोटे से कमरे की बाहरी दीवार की खिड़की से बाहर खड़ी फिएट को देख लेती …क्रीम रंग की फिएट की तारीफों के पुल बाँध दिए थे मौसी ने, वो लोग बहुत अमीर हैं … अपना बड़ा घर है… जमीन है … कार है … सुख और धन की कमी नहीं है घर में … अपनी बिटिया राज करेगी उस घर में। गुडुआ अपने हम उम्र दोस्तों के साथ कार के आस-पास ही मंडरा रहा था …सुनैना का मन हो रहा था कि जाकर उसको दो थप्पड़ लगा आये लेकिन दादी पास बैठी थी और अम्मा ने सख्त हिदायत दी थी कि जब तक लड़के वाले घर में रहे तुम बाहर मत निकलना!

तभी उसे चाचाजी की आवाज सुना ई दी, ‘‘जाइये ... आप भीतर जाकर बिटिया से मिल लीजिये।’’ कहकर चाची को आवाज लगाने लगे …चाची और अम्मा उन लोगों को चाय नाश्ता कराने के बाद इसी इंतजार में बैठी थी कि शुक्लाईन (सुनैना की होनवाली सासू माँ) कब सुनैना बिटिया को देखने अन्दर आएँ!कमरे के दरवाजे का पर्दा हटाकर शुक्लाईन कमरे में दाखिल हुई…उन्हें देखते ही सुनैना खटिया पर से उठ गई और एक किनारे सर झुकाकर खड़ी हो गई…दादी ने पहले से ही सिखाया था कि उनके पैर छूले ना लेकिन सुनैना ने आज तक अपने घरवालों के अलावा किसी के पैर नहीं छुए थे …उसे हिचकिचाहट हो रही थी लेकिन जब उसकी नजर दादी से मिली तो वो सहम गई …दादी आँखें बड़ी करके उसे घूर रही थी और शुक्लाईन का पैर छूने का इशारा कर रहीं थी! सुनैना ने आगे बढ़कर पैर छू लिये …सुनैना के दोनों कंधे को हाथ लगाकर शुक्लाईन ने उसे उठाया और कहने लगी, ‘‘अरे! जीती रहो … आओ इहाँ हमरे पास बयिठो।’’

सुनैना खटिया पर उनके पास बैठ गई ...दादी नीचे पाटा लेकर बैठ गई …चाची और अम्मा दरवाजे पर अपने आँचल को पकड़कर खड़ी थी! शुक्लाईन चाची और अम्मा की तरफ इशारा करती हुई बोली कि, ‘‘आपो लोग बईठ जाओ।’’ अम्मा और चाची भी नीचे चटाई बिछाकर बैठ गई! इधर-उधर घर- परिवार की बातें होती रही…बीच-बीच में शुक्लाईन सुनैना से बात करके उसकी पढ़ाई-लिखाई और दूसरे हुनर के बारे में उससे पूछतीं रहीं…दादी ने जैसे-जैसे समझाया था वैसे ही सुनैना उन्हें जवाब देती गई! दादी तो जैसे उतावली हुई जा रही थी कुछ ऐसा सुनने के लिए जिससे वो आश्वस्त हो जाएँ कि शुक्लाईन को सुनैना पसंद है! एक बार तो वो बोल ही पड़ीं कि बिटिया आपके घर की हुई…अब ईका अपने घर लई जाओ!

सुनैना चुपचाप दादी की बात सुनकर मन ही मन कुढ़ती रही! तभी दूसरे कमरे से शुकुलजी ने शुक्लाईन को आवाज लगाई, ‘‘अरे अब चला जाए … घर पहुँचते-पहुँचते देर रात होई जाई।’’ शुक्लाईन उठते हुए अपने बड़े पर्स में से अंगूठी निकालकर सुनैना को पहनाती हुई बोली, ‘‘अब हमरे रिंकू ने तो बहुरिया को पसंद ही कर लिया है तो हम कैसे मनाकर सकते हैं … आपकी बिट्टो (मौसी) ने हमरे बेटे पर न जाने कौन सा मंत्र मारा है कि उ ब्याह के लिए इत्ती छोटी उम्र मा तैयार हो गया…। नाही तो अब ही हमरे बिटवा की उम्र ही कित्ती है … खेले-खाए … पढ़े-लिखे की उम्र माँ हमरे बिटवा को प्रेम का रोग लग गया।’’ शुक्लाईन मखौल वाली हँसी हँस पड़ीं!सुनैना को उनकी बात नागवार गुजरी लेकिन करती भी क्या…चुप रह गई! वो तो अपनों से हारी थी! अँगूठी पहनाने के बाद शुक्लाईन फिर बैठक में चली गईं। बैठक में बैठे चाचाजी और शुक्लाजी कुछ संकल्प की बात कर रहे थे…सुनैना को ये बातें कुछ कम समझ आ रही थी वह ध्यान से उनकी बातें सुनने लगी …चाचाजी याचना करते हुए कह रहे थे, ‘‘बीस हजार हम आपको कैश देंगे उसके बाद शादी का खर्च भी तो है…आप जिद पर न अड़े रहिये!’’

इस बार सुनैना शुक्लाईन की बात सुनकर क्रोध और घृणा के भाव से भर गई! हँसकर शुक्लाईन चाचाजी से कह रही थी कि तब आप रहे दियो पाड़ेजी हमर बिटवा कौनो मछली नाही है ,जो सड़ जाई!इस बार के व्यंग्य से सुनैना ने दादी और अम्मा को घूरकर देखा…अम्मा आश्वासन में एक हाथ उठाकर दूसरे हाथ की उँगली चुप कराने के संकेत में अपने होठों पर रखती हुई सुनैना को चुप रहने का इशारा किया! उसके बाद सुनैना वहाँ से उठकर रसोई में कपड़े बदलने चली गई! चाचाजी उन लोगों के साथ कुछ देर बात करते रहे उसके बाद बैठक में सभी लोग लड़केवालों को विदा करने के लिए इकट्ठे हो गए! विवाह की तारीख की कुछ बातें करते-करते सभी घर से बाहर निकल गए! सुनैना खिड़की से बाहर उन्हें वापस जाता हुआ देखती रही!

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अम्मा-बाबा के साथ साथ गुड्डे-गुड़िया का, सखियाँ, बचपन सब पीछे छूट गया! दादी की इस सीख, ‘‘बिटियाँ! ससुराल में सबके खूब इज्जत करिहो … मायके जइसन गुस्सा ससुराल माना करिहो…बिटिया! नई बहुरिया कुछ साल धीरज धरके बड़न के सेवा-सत्कार करीले और छोटन के स्नेह दे तो बाद मा ससुरालवाले ओका सर-आँख पर बईठा के रखत हैं…सोवे से पहिले सास के गोड़ जरूर दबायो … सर मा तेल रखि के दबा दिहा करियो … एक बार रसोई ढंग से सँभाल लिहो तो ससुराल माँ राज करिहो!’’ के साथ सुनैना मायके से विदा हो गई …मायके की यादों के साथ उसी की बनाईं सीनरी, चद्दरें, रूमाल, मेजपोश और गिलास पेंटिंग अम्मा और दादी ने एक अलग बक्से में रख दिया … रंगों से सजे अपने भविष्य के सपनों को वो अपने साथ दूसरी दुनिया में ले जा रही थी इस उम्मीद के साथ कि उसके सपनों की बेल जिसकी नर्म, नन्ही टहनियाँ आतुर हैं एक मजबूत सहारे को…वो उसे एक ना एक दिन जरूर मिलेगी और उसके सपनों की बेल ऊँचे आसमान की ओर बढ़कर अपने रंगों की छटा बिखेरेगी!

सुनैना को विदा करते समय अम्मा तो एक बार फिर जैसे मानसिक प्रसव पीड़ा से गुजरी…!पारंपरिक रीति-रिवाजों के अनुसार ससुराल में द्वार से ही खूब मान-सम्मान के साथ के साथ सुनैना को घर के भीतर लाया गया …सफर की थकान … अपनों से दूर होने के दुःख के साथ पियरी साड़ी में लिपटी बुत बनी सुनैना को उसकी नन्द और दूसरी औरतें स्नेह से सँभालकर हँसी-ठिठोली करती हुई घर के भीतर ले गईं … बाँस की और मूँज की हाथ से बनी रंग-बिरंगी डलिया में पैर रखकर घर के भीतर जाती हुई सुनैना अपने पाँव के नीचे से अपने ही वजूद की जमीन से छीनी जानेवाली मिटटी से अनजान जो जिस दिशा ले गया … उसी ओर बढ़ती गई!
कोहबर पूजन की रस्म के बाद मुँह दिखाई की रस्म हुई … टोले-मोहल्ले और परिवार की औरतों सुन्दर बहुरिया को देखकर खुश थीं …‘‘शुक्लाइन! अब तो तुम आराम करो…बाजार-हाट और बुलउवा घूमो … तुम्हार घर और रसोई सँभालेवाली आ गई!’’

शादीशुदा नन्द और उनकी जेठानियाँ उसे अकेली देखकर पास में बैठकर अम्मा-चाची के जैसे सासु को खुश रहने के तरीके समझाती…अपनी नन्द की एक बात उसकी समझ नहीं आई, ‘‘देखो बहुरिया! रात का कमरे में आये के देरी मत करिहो … दिनभर घर के बहुत काम होत है… रसोई के काम निपटावे लगो तो पूरी रात बीत जाए…रात के बर्तन एक किनारे रख दिहा करिहो…मरद-मनई राती के अपनी मेहरारू समय से पास देखा चाहत हैं!’’ वो बस चुपचाप कभी अपनी नन्द का कभी उनकी जेठानी का चेहरा देखती रही! थकी-हारी, उँघती सुनैना ये सब बातें सुनती रही … जमीन पर बिछे गद्दे पर बैठी ना जाने कब उसे नींद आ गई…!

अम्मा, नानी और चाची की नसीहत के अनुसार सुनैना ने ससुराल की गृहस्थी सँभाल ली…दस-बारह सदस्यों के संयुक्त परिवार का भार उसने अपने नन्हे कन्धों पर उठा लिया…सुबह पाँच बजे उठकर पूरे घर का झाड़ई-बुहारू करने के बाद नहा -धोकर दादी सास की पूजा की तैयारी और फिर उसके बाद रसोई में का काम खत्म करके सफाई- करते दोपहर हो जाती … थकी – हारी कुछ देर आराम करती फिर से शाम की रसोई…देर रात तक दादी-सास और सासू-माँ के पैर दबाकर बिस्तर पर निढाल ऐसे गिरती जैसे मीलों पैदल ऊँचे पहाड़ की चढ़ाई चढ़कर आई हो! उस रात नींद आँखों से कोसों दूर थी लेकिन ब्रह्ममुहूर्त में एक चिड़िया की आवाज सुनकर देह और उससे भी ज्यादा मन के घाव भूलकर सुनैना ने आँखें खोल लीं … ये एक नया अनुभव था, जिसके बारे में चाची, दादी और अम्मा किसी ने भी नहीं समझाया था। अम्मा के कहे अनुसार रिंकूजी बहुत ही सभ्य और शालीन थे। सुनैना के हर सुख-दुःख में उसका खयाल रखते थे लेकिन बीती रात क्या हुआ था उन्हें … रिंकूजी जानते थे कि वो तीन दिन से बुखार से तप रही थी…अन्न का एक दाना भी उसके मुँह में नहीं गया था…अपनी तरफ से बस हलका विरोध भरकर सकी थी लेकिन रिंकूजी की जिद के आगे उसे झुकना पड़ा…कमजोर शरीर ये अप्रत्याशित नोच-खसोट सह गया लेकिन आत्मा कहीं भीतर तक छिल गई! उसे बचपन में सुनी नानीजी की कहानियाँ याद आ गई… राजकुमारी और राजकुमार की कहानी में एक राक्षस भी होता था जो राजकुमारी पर हमेशा बुरी नजर रखता था और उनसे दुर्व्यवहार करता था…राजकुमार उस राक्षस से राजकुमारी की रक्षा करता था…वह कहानी सुनते-सुनते नानीजी को बीच में ही रोककर पूछती बैठती कि बुरी नजर क्या होती है नानी …दुर्व्यवहार क्या होता है। नानी राक्षस को बुरा बताते हुए कहती कि बाबू! राक्षस ने राजकुमारी के साथ बुरा किया…उस पर बुरी नजर डाली।

आज रिंकू में सुनैना को नानी जी की कहानियों वाला राक्षस नजर आया … देर तक अपनेे बिस्तर पर बैठी रोती रही … समझ ही नहीं पा रही थी कि किससे क्या कहे।बगल में ही बिस्तर पर रिंकू बेसुध सो रहे थे …आज पहली बार रिंकूजी के साथ वह भयभीत थी। खुद में ही सवाल-जवाब और वेदना में डूबी उसकी तंद्रा तब टूटी जब रिंकू के हाथों का स्पर्श उसने अपने पैरों में महसूस किया। रिंकू उसके पैरों के पास बैठे फूट-फूट कर रो रहे थे … रिंकू का यह रूप देखकर वो हैरानी और असमंजस में पड़ गई ,‘‘पति परमेश्वर होता है,’’ दादी, चाची और नानी ने अभी तक यही पाठ पढ़ाया था … झट से रिंकू जी को कंधों से पकड़कर उठाती हुई सुनैना बोली…‘‘ये आप क्या कर रहे हैं? हम पर पाप चढ़ाएँगे क्या?’’ रिंकूजी को अपनी रातवाली गलती का अहसास था!
अम्मा और नानी से चिट्ठी में ससुराल की हर बात का जिक्र करने वाली सुनैना आज रात का जिक्र कैसे करती? आज उसे शादी के पहले दिन अपनी नन्द और उनकी जेठानी की कही बात याद आ गई कि- ‘‘मरद-मनई अपनी मेहरारू के राती में समय से अपने पास देखा चाहत हैं!’’कुछ ही दिनों में रिंकू जी की सरकारी नौकरी लग गई दूसरे शहर में…कुछ महीने बाद घर देखकर वे उसे अपने साथ ले जायेंगे…जाते समय सुनैना को ये दिलासा दे गए थे।

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आज सुनैना की अम्मा की खुशी का ठिकाना नहीं था...मास्टर जी जो खुशखबरी लेकर आये थे उससे वह खुशी से फूली नहीं समा रही थी…मास्टर जी ने अपनी पेंटिंग की प्रदर्शनी में सुनैना की जिन पेंटिंग्स को भी शामिल किया था उसमें से बिल्लियों के जोड़े वाली ग्लास पेंटिंग्स को एक प्रतिष्ठित अकादमी द्वारा सम्मानित करने के लिए चुना गया था! अम्मा ने चिट्ठी में ये शुभ संदेश लिखकर सुनैना को भेज दिया! अम्मा अब सुनैना के भविष्य को लेकर आश्वस्त थी…उनकी बिटिया के सपनों को सतरंगी आसमान मिल गया था…उसके हुनर को एक दिशा मिल गई थी…अम्मा के मन में एक उम्मीद की किरण दिखाई दी कि शायद इस उपलब्धि से सुनैना के परिवार वालों का मन भी बदल जाए…चिट्ठी पढ़कर उनकी फूल-सी बिटिया कितनी खुश होगी … इसका अंदाजा वह लगा सकती थी… आखिरकार उसकी माँ जो थी…

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ससुराल में सुनैना के हाथ से रंग और ब्रश तो जैसे छूट ही गया था…कभी-कभी दोपहर में रंग-ब्रश लेकर बैठती भी तो जान बूझकर सासू-माँ कोई न कोई काम उसे बता देतीं… मायके की बनाई पेंटिंग सुनैना ने ससुराल की घर के सभी कमरों की दीवार पर सजा दिया…सासू-माँ के कहने पर चद्दरें और मेजपोश भी बिस्तर और मेज पर बिछा दिए…घर और रसोई के कामों से कभी भी सासू माँ संतुष्ट नहीं होती थी … कुछ न कुछ कमी निकलकर सुनैना और उसके मायके वालों की उसी के सामने खूब इज्जत उतारती थी! लेकिन सुनैना को विश्वास था कि एक दिन सब ठीक हो जायेगा…चिट्ठी में अम्मा से अपनी सासू माँ के बुरे व्यवहार का जिक्र तो करती थी लेकिन मानसिक और शारीरिक रूप के प्रताड़ना की असह्य पीड़ा को छिपा ले जाती थी … अम्मा पत्रों के जवाब में यही दिलासा देतीं कि एक दिन जब रिंकू जी की नौकरी लग जायेगी तब सब ठीक हो जायेगा!

एक शाम सासू-माँ कहीं पड़ोस में गई थी...घर में कम ही लोग थे…सुनैना आज बहुत दिन के बाद ऑयल कलर लेकर बैठी थी…शीशे पर ऊँचे बर्फ से ढँके पहाड़, चिनार-देवदार के वृक्ष और गहरी नील झीलवाली सीनरी अभी पूरी ही होने वाली थी कि उसे सासू-माँ की तेज चीख सुनाई दी…सब कुछ छोड़कर वो रसोई की तरफ भागी…चूल्हे पर दूध उफन कर नीचे बह गया था… जल भी गया था… वह रंगों में इतनी ज्यादा खोई थी कि उसे दूध जलने कि महक भी नहीं आई!सासू-माँ क्रोध से काँप रही थी… लगातार चीख रही थी… ‘‘कौन बुरे कर्म किये थे कि ई दिन देखे पड़त है… जब से ई घर माँ आई है … एक्को दिन हमार चैन से ना बीता…रोज कौनो न कौनो बर्बादी … अरे हमहूँ तो इत्ता बड़ा परिवार सँभाले रहे…कब्बो केहू हमरे काम पर उँगली नाही उठाया।’’ बड़बड़ाती हुई सासू माँ उसके कमरे के बाहर आकर रुक गई … फर्श पर रंग की शीशियाँ और ब्रश देखकर उनका गुस्सा सातवें आसमान पर चढ़ गया…कमरे के भीतर जाकर अपने पाँव से सारे रंग बिखेर दिए … पूरे कमरे में पानी और रंग बिखर गया… उससे भी उनका गुस्सा शांत नहीं हुआ बिस्तर और मेज पर चढ़कर दीवार से सारी पेंटिंग्स उतारकर फेंकने लगी…उसके कमरे के बाद बाकी दूसरे कमरों से भी उन्होंने पेंटिंग्स उतार कर नीचे फर्श पर पटक दी…इससे पहले कि सुनैना कुछ समझ पाती … सासू-माँ सबकुछ चकनाचूर कर चुकी थी…घर के सभी लोग उसे ही बुरा-भला कह रहे थे … सासू-माँ को दिलासा दे रहे थे…वह खुलकर रो भी नहीं सकी…कुछ देर बाद झाड़ू लेकर पूरे घर को साफ करने लगी … काँच के टुकड़े समेटते हुए उसे अम्मा बहुत याद आई…उसे बिखरे कांच के टुकड़ों के पीछे से झाँकती अम्मा की बनाईं रोती-बिलखती फोटो नजर आ रह थी…मानो कह रही हों कि तुमने अपनी अम्मा के मायके की यादों को मिटा दिया…आँसुओं से भरी आँख से भी स्मृतियों के साफ आसमान पर उसे अम्मा की शादी से पहले बनाई हुई फोटो साफ दिख रही थी!
रात का काम खत्म करके वो रसोई में ही बैठ गई…देर रात घर में सभी लोग सो चुके थे…पेंटिंग के साथ-साथ उसके भीतर बहुत कुछ टूट गया था…घुटनों में मुँह छिपाकर वो खूब रोई … विक्षिप्त, बदहवास …कोई उसे सँभालने वाला नहीं था… ना जाने कब तक अकेली रोती रही… अचानक उठकर अनाज के ड्रम में कुछ ढूँढ़ने लगी… अनाज के ड्रम से छोटी-छोटी पुड़िया निकालकर जल्दी से हाथ में उसकी गोलियाँ ले ली… कुछ देर गोलियों को देखकर कुछ सोचती रही उसके बाद सारी गोलियाँ झटके से मुँह में रख ली … आधा गिलास पानी पीकर सर दीवार से टिकाकार आँखें बंद करके बैठ गई…अचानक उसे अपनी अम्मा और नानी का ध्यान आया … अपने प्रति भी मोह जागा लेकिन शायद अब देर हो चुकी थी…एक कागज और कलम लेकर बैठ गई और अपनी अम्मा को चिट्ठी लिखने लगी…

अम्मा!

हम बहुत बुरे हैं अम्मा, हमने तुम्हारी सीसे मढ़ी हुई रुई की मछरी …खरगोश… सुग्गावाली कलाकृतियाँ अपने लिए उधेड़कर- बिखेर दीं थी, आज बहुत दुःख हो रहा है। अम्मा, लाल टिकुली से तुमने सुग्गे की आँख बनाईं थी, लाल रिबन से बना उसके गले का घेर कितना सुन्दर था, छोटी-छोटी रंग-बिरंगी मोतियों से उसके हरे पंखों को तुमने सजाया था! अम्मा! तुम्हारी मायके की यादों को नोच-नोचकर हमने नष्ट कर दिया, सिर्फ अपना स्वार्थ सोचती रही, रुई से बनी कलाकृतियों में तुम्हारी आत्मा बसती थी, अपनी कला को निखारने के लिए तुम्हारी बुनी हुई कला को मिटाती रही! तुमने उफ तक नहीं किया अम्मा! आधा तुम्हारा… आधा हमारा मिलकर भी कुछ पूरा नहीं बन सका अम्मा! जानती हो? जिस पेंटिंग के लिए हमने तुम्हारी सुन्दर फ्रेम में शीशे मढ़ी रुई से बनी पक्षियों, जल-जीवों को खंड-खंड बाँट दिया था और उस शीशे पर सुन्दर आयल पेंटिंग बनाई थी आज वो सारी पेंटिंग सासू माँ ने गुस्से में तोड़ दी! मेरा तो कुछ नहीं बचा अम्मा, सख्त संगमरमर की फर्श पर गिरते ही शीशे की पेंटिंग चूर-चूर हो गई। लेकिन हमको ध्यान है अम्मा, जब हम तुम्हारी बनाई फोटो में से शीशा अलग कर रहे थे तब सूत पर रुई से बनाईं कलाकृतियों को हमने फर्श पर लापरवाही से फेंका था और शीशे को अपने लिए सहेज लिया था, जो हमने फेंक दिया था वह टूटा-बिखरा नहीं था, जो सहेजा था आज वो सब चकनाचूर हो गया!
तुम तो हर चीज सँभालकर रखती थी न अम्मा? हमको उम्मीद है जो हमने फेंक दिया था वो तुमने सँभालकर रखा होगा! हम तो तुम्हारी बिगड़ी संतान पहले से ही थे, ब्याह के सात साल बाद भी कुछ नहीं सीख पाए, तभी तो आज हमको ये सजा मिली है, अम्मा! तुम नहीं जानती, उस पेंटिंग के साथ हम भी आज चूर-चूर हो गए, आज हम हार गए अम्मा…किसी भी इंसान की रुचियाँ, उसका हुनर शायद उसकी आत्मा होता है…हम अपनी काया के भीतर अपनी आत्मा को बचाये रखने के लिए संघर्ष करते रहे…लेकिन अंततः उसको बचा नहीं सके … अब काया को कब तक ढोएँ? तुम होती तो उदासी और हताशा में हमारा सर सँभाल लेतीं लेकिन बिखरे-बिखरे आज हम को होश नहीं कि हमने कितनी बार दीवार में अपना सर पटका है, बहुत दर्द हो रहा है अम्मा! तुम तो हमको समझाई थी कि जब भी दुखी होना … हमको चिट्ठी लिख देना, वही चिट्ठी लिख रहे हैं अम्मा! तुमसे और नानी से बहुत कुछ बतियाने का म…न्न्न् ,इसके बाद सुनैना की आँखों के सामने से अपने ही लिखे अक्षर धुँधलाने लगे…
अवचेतन में भी उसे नानीजी का स्नेहिल स्पर्श महसूस हो रहा था…रुँधे स्वर में अम्मा की पुकार मानो उसे रोक लेना चाहती थी ! नीला आसमान …हरे-भरे वृक्षों वाली सीनरी … तन्मयता से रंग भरी बिल्ली के जोड़ों वाली पेंटिंग्स…मास्टर जी की हौसला-आफजाई…चद्दरें … मेजपोश के रंग! उसे उम्मीदों के नए आसमान में ले जाना चाहते थे लेकिन चाहकर भी वो उन रंगों को ज्यादा देर तक देख नहीं सकी। धीरे-धीरे उसकी आँखों के आगे स्याह अँधेरा छाता जा रहा था। शून्य विराम की… एक अनंत यात्रा की शुरूआत थी ये…शायद…।