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शादी का झूठा आश्वासन यौन शोषण

अरविंद जैन

स्त्री पर यौन हिंसा और न्यायालयों एवम समाज की पुरुषवादी दृष्टि पर ऐडवोकेट अरविंद जैन ने मह्त्वपूर्ण काम किये हैं. उनकी किताब ‘औरत होने की सजा’ हिन्दी में स्त्रीवादी न्याय सिद्धांत की पहली और महत्वपूर्ण किताब है. संपर्क : 9810201120
bakeelsab@gmail.com

यौन शोषण (हिंसा) के अधिकांश मामले, अनियंत्रित काम-वासना को संतुष्ट करने के लिए, बेहद सावधानी से रचे होते हैं । कामुक फिल्मी छवियों का एहसास और उद्दाम ‘फैंटेसी’ का एक मात्र उद्देश्य, महिलाओं पर हावी होना है। दरअसल, वास्तविक बलात्कार या ‘डेट रेप’ करने से पहले, बलात्कारी के दिमाग में नशे की तरह, कई बार इसकी ‘रिहर्सल’ की गई होती है। मगर प्राय पीड़िता को ही सदा दोषी ठहराया और अपमानित किया जाता है । परिजनों द्वारा कथित ‘खानदान की इज्ज़त’ के नाम पर प्रताड़ित किया जाता है।

शादी का झांसा देकर किसी लड़की के साथ शारीरिक रिश्ते बनाना और बाद में शादी से मना करना, बलात्कार के दायरे में आता है । वह भी तब, जब लड़के का लड़की से शुरू से ही शादी करने का कोई इरादा न हो। हम इसे ‘शादी की आड़ में ‘यौन शोषण’ भी कह सकते हैं। अधिकतर लड़के शादी का झांसा देकर, शारीरिक रिश्ते बनाते हैं और तब तक बनाते रहते हैं, जब तक लड़की गर्भवती नहीं हो जाती। कुछ समय बाद, गर्भपात कराना भी मुश्किल हो जाता है और अंतत मामला परिवार और पड़ोसियों की नजर में आ ही जाता हैं। बाद के अधिकतर मामलों में, ऐसे दोषियों के खिलाफ मामले दर्ज होते हैं। रोज़ हो रहे हैं।

भारतीय अदालतों ने कई बार सवाल उठाए हैं– “किसी लड़की से शादी का झूठा वायदा करके, शारीरिक रिश्ते बनाना सहमति है या नहीं? यदि वह बलात्कार नहीं है तो यह धोखेबाजी है या नहीं?”

जयंती रानी पांडा बनाम पश्चिम बंगाल सरकार और अन्य के मामले में कलकता उच्च न्यायालय का मानना था कि अगर कोई बालिग लड़की शादी के वादे के आधार पर, शारीरिक रिश्ते को राजी होती है और तब तक इस गतिविधि में लिप्त रहती है, जब तक कि वह गर्भवती नहीं हो जाती, तो यह उसकी ओर से ‘स्वच्छंद संभोग’ के दायरे में आएगा। ऐसे में, तथ्यों को गलत इरादे से प्रेरित नहीं कहा जा सकता। भारतीय दंड संहिता की धारा-90 के तहत अदालत द्वारा कुछ नहीं किया जा सकता, जब तक यह आश्वासन न मिले कि रिश्ते बनाने के दौरान, आरोपी का इरादा आरम्भ से ही शादी करने का नहीं था। (1984 क्रिमिनल लॉ जर्नल 1535) बंबई उच्च न्यायालय ने कहा भारतीय दंड संहिता की धारा-415 में ‘धोखाधड़ी’ के अपराध को परिभाषित किया गया है।  शादी का झूठा वायदा कर, जानबूझकर दिए गए प्रलोभन के बाद शारीरिक रिश्ते बनाना, ‘धोखाधड़ी’ की परिभाषा के तहत ‘शरारत’ के दायरे में आते हैं और दंडनीय अपराध है। (आत्माराम महादू मोरे बनाम महाराष्ट्र राज्य (1998 (5) बीओएम सीआर 201)

पटना उच्च न्यायालय ने कहा कि यह बलात्कार का अपराध नहीं है। शादी के झूठे वायदे की आड़ में  आरोपी द्वारा वादी को धोखे में रखकर, लगातार शारीरिक रिश्ते बनाना  धारा-415 के तहत ‘धोखाधड़ी’ का प्रथम-दृष्ट्या अपराध सिद्ध होता है। (मीर वाली मोहम्मद उर्फ कालू बनाम बिहार सरकार (1991 (1) बीएलजेआर 247) सर्वोच्च न्यायालय  ने 2004 में एक  फैसला सुनाया- हमें इसमें संदेह नहीं कि आरोपी ने लड़की से शादी का वायदा किया था और इसी प्रभाव में लड़की ने उसके साथ शारीरिक रिश्ते भी बना लिए। आरोपी असल में विवाह का इरादा तो रखता था लेकिन परिवार के बड़े-बुजुर्गों के दबाव में ऐसा नहीं कर पाया। यह विवाह करने के वायदे को लेकर, वायदा खिलाफी का मामला प्रतीत होता है, न कि विवाह के झूठे वायदे का मामला। (दिलीप सिंह उर्फ दिलीप कुमार बनाम बिहार राज्य, 2005 (1) सुप्रीम कोर्ट केसेस 88)। उदय बनाम कर्नाटक सरकार के मामले (2003) में सर्वोच्च न्यायालय  ने दृढ़तापूर्वक कहा कि कोई कड़ा फार्मूला नहीं बनाया जा सकता लेकिन यदि लड़की की उम्र 19 साल है और उनमें इस करतूत के महत्व और नैतिक गुण की पर्याप्त समझ है, तो उसकी सहमति मानी जाएगी। न्यायाधीश एन. संतोष हेगड़े और बी. पी. सिंह ने गंभीर संदेह जताया कि याचिकाकर्ता के बुलाने पर चोरी-छुपे लड़की, रात 12 बजे सुनसान जगह पर चुपचाप गयी। जब दो लोग जवान हों, तो आमतौर पर ये होता ही है कि वे सभी अहम बातों को भुलाकर जुनून में आकर प्यार कर बैठें, खासकर तब जब वे कमजोर क्षणों में अपनी भावनाओं पर काबू न कर पायें। ऐसे में, दोनों के बीच शारीरिक रिश्ते कायम हो ही जाते हैं। लड़की स्वेच्छा से लड़के के साथ रिश्ते कायम करती है, वह उस लड़के से बेहद प्यार करती है, इसलिए नहीं कि उस लड़के ने उससे शादी के वायदा किया था, बल्कि इसलिए कि लड़की ऐसा चाहती भी थी। (2003 (4) सुप्रीम कोर्ट केसेस 46)

सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति ए.के माथुर और अल्तमस कबीर ने 2006 में एक और फैसला सुनाया- “हम संतुष्ट हैं कि आरोपी ने उसे राजी करते हुए सबकुछ किया, लेकिन वह ऐच्छिक भी नहीं था क्योंकि उसने शादी करने जैसा वायदा करके उसे फुसलाया। कानून इसकी इजाजत नहीं देता। पीड़ित लड़की और गवाहों की गवाही से पूरी तरह स्पष्ट होता है कि गवाह पंचायत की तरह काम कर रहे थे। आरोपी ने पंचायत के समक्ष स्वीकार किया कि उसने लड़की के साथ शादी करने का वायदा कर उसके साथ शारीरिक रिश्ते बनाये लेकिन पंचायत के समक्ष वायदे करने के बावजूद वह पलट गया। इससे पता चलता है कि आरोपी का शुरू से ही लड़की से विवाह करने का कोई इरादा नहीं था और वह पीड़िता से शादी नहीं करेगा, इसका झांसा देकर उसने शारीरिक रिश्ते बनाये। अतएव, हम संतुष्ट हैं कि प्रतिवादी को सजा देना न्यायसंगत है। हमारे निष्कर्ष के मुताबिक, कोई मामला नहीं बनता। अपील खारिज की जाती है।’ (यादला श्रीनिवास राव बनाम आंध्र प्रदेश राज्य) माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि ऐसे मामलों में लड़की की उम्र, उसकी शिक्षा और उसके सामाजिक स्तर और लड़के के मामले में भी इन्हीं सब पर गौर किया जाना जरूरी है। यदि आरोपी कम उम्र की लड़की को फुसलाकर उससे विवाह करने का वायदा कर ले, तो ऐसे में यह उसकी सहमति नहीं होती, बल्कि फुसलाकर किया गया कृत्य होता है। आरोपी शुरू से ही अपने वायदे को पूरा करने का इरादा नहीं रखता। ऐसी कपटपूर्ण सहमति को सहमति नहीं कहा जा सकता, क्योंकि अपराध के लिए हामी भराना आरोपी का अपराध है।

दिल्ली हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति वी.के. जैन ने 1 फरवरी, 2010 को आरोपी की जमानत याचिका खारिज करते हुए, ऐसे आपराधिक कृत्य की निंदा करते हुए लिखा- ‘इस पर गौर करने पर कि आरोपी ने शादी का झांसा देकर, लड़की से शारीरिक रिश्ते बनाये, इस आशय से कि उससे विवाह का उसका कोई इरादा नहीं था।  कोई बलात्कार का मामला नहीं बनता। यह न सिर्फ घोर निंदनीय कृत्य है बल्कि प्रकृति से भी आपराधिक है। यदि ऐसा होने रहने की अनुमति दी जाए, तो इससे इनसान अनैतिक और बेईमानी बनेगा। जो भी इस इरादे से इस देश में आएगा, शादी का ढोंग रचाएगा और कमजोर वर्ग की लड़की से शारीरिक रिश्ते बनाने का दबाव डालकर उनका शोषण करेगा। उधर, लड़की को यकीन रहेगा कि वह उसके साथ शादी करेगा। उसे भी यही लगेगा कि जिससे भविष्य में शादी होनी है, वह पति बनेगा ही, कम से कम उससे शादी से रिश्ते रखने में कुछ भी गलत नहीं है। इस वायदे का हवाला देकर उसके साथ दुष्कर्म करके आरोपी आराम से जब चाहे, चलता बनेगा। ऐसे मौकापरस्त लोगों को लड़की की भावनाओं के साथ खिलवाड़ करने का लाइसेंस नहीं दे सकती। इस तरह तो शादी के पवित्र रिश्ते में भारतीय लड़की को डाल देना कोई दो दिलों का मेल नहीं है। बेसहारा लड़कियों का शोषण करने वाले ऐसे लोगों को बेखौफ बच निकलना हमारे ऐसे कानून का मकसद कभी नहीं हो सकता, जो इस घिनौने कृत्य के बाद ताउम्र जेल की सजा का हकदार है।’ (निखिल पराशर बनाम राज्य)

विवाह करने संबंधी वायदे के साथ सेक्स करना और गर्भवती होने पर पुलिस रिपोर्ट वर्ग, धर्म, क्षेत्र, आयु या सामाजिक स्तर संबंधी ज्यादातर मामले एक जैसे होने पर आदमी लड़की पर सेक्स के लिए दबाव बनाता है, विवाह करने का भरोसा देकर गर्भवती करता है, परिवार और पुलिस का रिपोर्ट के संदर्भ में बरी होने, संदेह का लाभ पाने या उच्च अदालत में सजा..अपील और इस तरह अंतिम न्याय मिलने में पांच से बीस साल लगना। ये वे मामले हैं, जो समूचे मामलों की नजीर भर हैं।

इस खास संदर्भ में कानूनी राय और फैसले सीधे-सीधे बंटे हुए हैं। सहमति और तथ्यों के उलझाव में उलझे हुए हैं, क्योंकि कानून पूरी तरह पारदर्शी नहीं है और फैसले हर मामले के तथ्यों और हालातों के आधार पर होते हैं। न्यायिक राय को लेकर आमराय यही है कि विवाह का वायदा कर पीड़िता से शारीरिक रिश्ते की सहमति लेना कि भविष्य में वह विवाह करेगा, गलत तथ्यों के तहत ली गयी सहमति नहीं कही जा सकती। कुछ अदालतों का विचार है कि विवाह करने का झूठा वायदा करने को लेकर दी गयी कथित सहमति विवाह का राजीनामा नहीं है। इसके मुताबिक, विवाह के झूठे वायदे को लेकर पति-पत्नी जैसा शारीरिक रिश्ता बनाने संबंधी सहमति हासिल करना कानूनी नजरिये से सहमति ही नहीं है। ऐसे मामलों में सबसे कठिन काम यह साबित करना होता है कि आरोपी का शुरू से ही पीड़ित लड़की से विवाह करने का कोई इरादा नहीं था। वह कह सकता है कि मैं विवाह करना तो चाहता हूं लेकिन मेरा माता-पिता, धर्म, जाति, ‘खाप’ आदि इसके लिए अनुमति नहीं देते। औरत के खिलाफ अपराध संबंधी किंतु-परंतु को लेकर जब तक कानून में संशोधन नहीं होता, न्याय से जुड़े ऐसे कानूनी पेंच यूं ही कायम रहेंगे।

कर्मानंद आर्य की कवितायें : वसंत सेना और अन्य

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कर्मानन्द आर्य

कर्मानन्द आर्य मह्त्वपूर्ण युवा कवि हैं. बिहार केन्द्रीय विश्वविद्यालय में हिन्दी पढाते हैं. संपर्क : 8092330929

( कर्मानंद आर्य की इन कविताओं में इतिहास और वर्तमान के बीच एक सुन्दर सेतु बना है ,जिससे आवाजाही करते हुए दोनो ही एक दूसरे के काल को अतिक्रमित करते हुए गलबाहियां डाले हैं . स्त्री की अनंत यात्रा जारी है , जाति-वर्ग से सज्ज , जाति-वर्ग से परे भी – जाति -वर्ग दंश से  युक्त भी . )

वसंतसेना

नायकों की एक विशाल पंक्ति
बाहर खड़ी है
आज के दिन भी तुम उदास हो वसंतसेना

कितने बिस्मिल्लाह खड़े हैं
अपनी शहनाइयों के साथ
कितने तानसेन गा रहे हैं
सधे सुरों का गीत

अपने सधे क़दमों से
नृत्य की मुद्रा में आज है
‘दाखनिता कुल’

उल्लास का मद अहा
चोर, गणिका, गरीब, ब्राह्मण, दासी, नाई
हर आदमी आज है नायक

चारुदत्त आये हैं वसंतसेना
फिर भी हो तुम उदास

वसंतसेना निर्व्याज नही जायेगा तुम्हारा प्रेम
प्रकृति उत्तम है

उदास क्यों होती हो ?
क्या गणिकाओं का विवाह नहीं होता वसंतसेना

मत्स्यगंधा

एक:

जातियों का बंधन टूटता है
तुम्हारे प्रणय के स्पर्श से
जिसे तोड़ नहीं पायी
पवित्र माने जाने वाली ऋचायें
उसे तोड़ दिया
रूप की आकांक्षा ने

तृषा जागती है
देव, गंधर्व, कोल, किरात
सब लोटते हैं तुम्हारे चरणों में

अरे यह क्या ?
तुम समय की भाषा पढ़ने लगी हो
तुममें भी आ गए हैं
उच्च वर्णस्थ स्त्री के भाव

अच्छा है तुम्हारा यह निर्णय भी
तुम उसी से विवाह करोगी
जो देव, गन्धर्व, कोल, किरात नहीं
तुम्हारे आँखों के वर्ण का होकर रहेगा

दो:

तुम्हारा पति आज
मछलियाँ पकड़ने नहीं गया
उसे सता रही थी अद्भुत प्यास
वह तुम्हारे आसपास मंडराता रहा

यह बसंत की दोपहरी नहीं है
जब गाती है कोयल
कि… कि… कि….
करके दौड़ती है गिलहरी

वह आज तुम्हें
गिलहरी की तरह दौड़ाना चाहता है
रेंगती रहो जल, थल, आकाश

आज जाल के साथ नहीं
तुम्हारे साथ फसेंगा
उसका प्रथम प्रणय गीत

हर दिन काम का
हर दिन प्रेम का होना चाहिए!

‘होना चाहिए न मत्स्यगंधा’ !!!!!!

इस बार नहीं बेटी

मैं तुम्हें प्रेम की इजाजत देता हूँ
और काँपता हूँ अपने व्यक्तिगत अनुभवों से
अपने जीवन की सबसे अमूल्य निधि तुम्हें भी मिलनी चाहिए

देखता हूँ तुम तल्लीनता में खोई रहती हो
निश्चित तौर पर प्रेम बढ़ाएगा तुम्हारा अनुभव
तुम चाहो तो जी भरकर प्रेम करो

प्रेम करो इसलिए नहीं कि प्रेम पूजा है
प्रेम पर टिकी हुई है दुनिया
इसलिए क्योंकि सबसे बुरा अनुभव मिल सकता है प्रेम से
मिल सकता है रूठने मनाने का हुनर

जिसने सीखा है अपने अनुभवों से
वह जिन्दगी में कभी असफल नहीं हो सकता
कभी टूट नहीं सकता रूठने मनाने वाले का घर

प्रेम केवल कहने के लिए बुरा है
जबकि अच्छाई का स्श्रोत वहीँ से फूटता है

प्रेम प्रयोग की वस्तु है
प्रेम करो और बताओ अपनी सहेलियों को
अपनी माँ को बताओ अपनी मूर्खताएं

वह सब करो जो किया है मैंने
जो मैंने जिया तुम भी जी सकती हो
पर सीखना अपनी माँ से भी

वह प्रेम में हारकर सब हार गई

कादम्बरी
.

बर्फीली सर्दी की पहली रात
एक ही विस्तर पर लेटे हैं
अतीत और वर्तमान

कभी अतीत करवट बदलता है
कभी वर्तमान

नदियों में पानी आता है
डूब जाते हैं गाँव के गाँव
फिर धरती हरियाती है

नर्म विस्तर
जब ठंडा हो जाता है
तुम इसे सुखा लेती हो

सुख-दुःख
बरसों की कथा है
आज ही
क्यों पूछ रही हो कादंबरी?

अवंतिसुंदरी

वर्षा जाने को है
इस अर्धरात्रि में कोई तेज सुर में गा रहा है

मैं अप्रतिहत
सुन रहा हूँ तुम्हारा मादल
अविधावक्र, सूची, उत्तानवंचित, हंसपक्ष
कितना अदभुत है
हजार हजार पुष्पों से सजा तुम्हारा
जोगी नृत्य

अचानक बदल रहे हैं सुर
आवाज भारी हो रही है तुम्हारी
आज कोई बनावट भी नहीं तुम्हारी मुद्रा में

अदभुत है
यह कैसा मिलन है अवन्ति
कविता तुम्हारे अंग अंग पर
अठखेलियाँ कर रही है
शनैः-शनैः द्राक्षारस टपक रहा है
इस अर्धनिमीलित रात्रि में भी

कपाट बंद हैं
खुले हुए सीने पर लोट रहे हैं
जाने कितने प्रहरी

अब हम सो नहीं सकेंगे
अवन्ति
प्रेम ने आज ही तो मुझे जगाया है.

प्रेमी पहरुआ

रूप लुभाता है
रूप की दीप्ति ह्रदय से आँख में आती है

मेरा प्रेमी रूप का लोभी है
यही मुझे कभी कभी गुण लगता है
कभी कभी अवगुण

गुण तब लगता है
जब वह मुझे देखता है
अवगुण तब जब उसे मेरे सिवा
कुछ और भी दिखाई देने लगता है

जहन्नुम में जाए मेरा प्रेमी
अब मैं ऐसा नहीं सोचती
बस उसे करती हूँ प्रेम
उसपर दुनिया की हर ख़ुशी वारती हूँ

कभी कभी उसके कंधे पर मेरे कई सिर होते हैं
मेरे कई कई रूप होते हैं
वह जानता है मेरे सारे दुर्गुण

जानती हूँ
उसकी कई प्रेमिकाएं और हैं
उसके कई ठिकाने और हैं
जिन्हें वह सिर्फ दुःख में याद करता है

उसके पास कई प्रयोगशालायें हैं
मेरी आग को जलाने बुझाने के लिए
सुलगाने के लिए भी हैं उसके पास
हजारो टन बारूद

वह मेरी मनोग्रंथियों को पढ़ लेता है
फिर वह आता है मेरे पास
गोद, प्रेम, गर्माहट और देखभाल के लिए
जाने कितनी कमजोरियां साथ

वह मेरा प्रेमी है
वह मेरा पति
मैं उसके खिलाफ कुछ भी नहीं सोच सकती

सिवाय इसके कि मुझे वह ऐसे ही पसंद है

तुम्हारी उदासी मेरी कविता की पराजय है

सच कह रहा हूँ
नहीं लिख सकूंगा इस जंगल का इतिहास
इस जंगल से गुजरने वाली नदियों का आत्मवृत्त
मछलियों और केकड़ों की जीवंत कहानी
सच कहूँ यहाँ इतिहास है ही नहीं

यहाँ कुछ टटोलेंगे
तो मिलेगा कुछ और

राजाओं के नाख़ून हैं यहाँ इतिहास की जगह
रानियों का क्रीड़ालाप और फंसी हुई कंचुकी है
सीताओं का मृगचर्म पड़ा हुआ है
सच कह रहा हूँ
नहीं लिख सकूंगा इस जंगल का इतिहास

यह आदिमानवों की नगरी है
जंगली और असभ्य
अपनी अनोखी दुनिया और प्रतिमानों से भरे हुए
फूलों की नाजुक कहानी है यहाँ

देवता, जाख, केंदु और पलास
भालू और मनुष्य का सामूहिक नृत्य
यहाँ पशु हैं लेकिन पशुता आयी नहीं आजतक

जोंक, घोंघे, केकड़े, शैवाल और नदियाँ
उन्होने सोचा नहीं अपने पुरुखों के बारे में
बस खाया पिया और खोये रहे अपनी दुनिया में
नदियों के किनारे रखे कुछ सूत्र
पाणिनी के व्याकरण से पहले लिखे हुए

हाँ एक इतिहास है उनके पास
उनके औजार और गीत कहते हैं कोई कहानी
पर वाह कहानी राजाओं की नहीं है
वह केवल प्रजा और प्रजा की कहानी है

जानता हूँ दोस्त तुम बेचैन हो
तुम्हारी उदासी मेरी कविता की पराजय है

क्रान्ति के कपड़े

अर्चना वर्मा

अर्चना वर्मा प्रसिद्ध कथाकार और स्त्रीवादी विचारक हैं.  ई मेल :  mamushu46@gmail.com

2007 के अन्तरराष्ट्रीय -वाणिज्य-मेले के समय ‘हिन्दुस्तान टाइम्स’ में एक रिपोर्ट प्रकाशित हुई थी जिसमेँ अठारह दिसंबर, दो हजार पांच के ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ की रिपोर्ट को उद्धृत करते हुए बताया गया था कि सन दो हजार तीन के मेले में सेल्स-गर्ल की स्कर्ट की लंबाई अठारह इञ्च और दैनिक भुगतान पंद्रह सौ रूपया था जो दो हजार पांच में बढ़ कर दो हजार हो गया था। उस समय, 2007 मेँ चालू मेले में स्कर्ट की लंबाई बारह इञ्च और दैनिक भुगतान तीन हजार रूपया था। लेकिन यह भुगतान सबके लिये समान दर से होने वाला नहीं था।

मेले के दौरान दिल्ली शहर के युवा छात्र छात्राएं वहाँ अस्थायी रोज़गार के तौर पर जेबखर्च कमाने के लिये ‘सेल्स बॉयज़ ‘ और ‘ सेल्स गर्ल्स ‘ की हैसियत से काम कर लिया करते हैं। भुगतान की दर अलग अलग किस्म की दूकानों पर अलग अलग किस्म के ड्रेस कोड के अनुसार अलग अलग हुआ करती है। घरेलू उपयोग का साजसामान बेचने वाली दूकान पर साड़ी या सलवार कमीज़ में उपस्थित विक्रय–परिचारिका का वेतन उस रिपोर्ट के अनुसार तब तीन सौ रूपया प्रतिदिन था और ‘इलेक्ट्रॉनिक गुड्स’ की दूकान पर ‘ मिनी स्कर्ट ‘ में आपका स्वागत करनेवाली ‘सेल्सगर्ल’ तब दिन भर की मेहनत के बदले मे तीन हज़ार रूपया पाती थी। ज़ाहिर है कि वहाँ पर ख़रीद में सामान के साथ सुंदर सुडौल अनावृत्त टांगों का दर्शन अतिरिक्त पाया जाता रहा होगा और कुछ न भी खरीदना हो तो भी दुकान तक जाने का एक आकर्षण तो रहता ही होगा। चले ही गये होंगे लोग तो क्या पता शायद कुछ खरीद भी लाये होंगे। बहेलिये तो लासा लगा कर जाल फैलाते ही हैँ।

तब से अब तक सात या आठ बरस और बीत गये हैं। तब से अब तक में हमारी रिहायशी दुनिया की सूरत ही अब एक लम्बे लगातार मेले मेँ बदल चुकी है और उसके अनुरूप समाज के एक वर्ग में हमारी जीवन पद्धति भी। उस वर्ग में अब हमें याद भी नहीं आता कि मेला रहने की जगह नहीं, थोड़ी देर घूम कर लौट आने की जगह है।लेकिन लौट कर अब आयें कहां? मेले ने तो घर में भी घर कर लिया है। इस मेले की न कोई चौहद्दी न चारदीवारी। लेकिन बेहतर है कि इस पैमाने के मेले मेँ मौका है, हर एक के लिये। बेहतर है कि यह खेल का, ‘सेल’ का, एक समतल मैदान है। उन के लिये यह मौका और मैदान कुछ और अधिक बेहतर और समतल है जिनके पास बोलने के लिये अंग्रेज़ी और दिखाने के लिये सुंदर, सुडौल, अनावृत्त टांगे मौजूद हैं।

मुझे अहसास है कि मेरी ये टिप्पणियाँ हद दर्जे की ‘सेक्सिस्ट’ करार दी जाने वाली हैँ। अहसास है इस बात का भी कि अपने बारे मेँ खुले दिमाग़ का मेरा मुगालता भी बस चकनाचूर किया जाने को है लेकिन फिर भी मैँ पूछूँगी अपना सवाल कि आदमी ने कपड़ा आखिर बनाया ही क्यों? यह जवाब पुराना और अप्रासंगिक हो चुका है कि नग्नता उसके लिये असहनीय रूप से बदसूरत थी और सभ्यता की दिशा में पहला कदम उसने शरीर को ढक कर बढ़ाया था। जी नहीं, इस अन्तर्राष्ट्रीय-वाणिज्य-मेले का जवाब शायद यह होगा कि वही एक उत्पाद था जिसको सबसे पहले ‘मार्केट’ किया जा सकता था। सिर से पांव तक ढकने की संस्कृति क्यों आई? क्योंकि कपड़ा बेचना था। कहां से आई? कपड़े का बाज़ार बढ़ाने की ज़रूरत से। अब क्यों गायब होती जा रही है ? क्योंकि कपड़े के अलावा अब इतना बहुत कुछ है बेचने के लिये जिसे बेचने में कपड़े कम से कम होकर ज़्यादा से ज़्यादा मददगार हैं। भूमण्डलीय ग्राम के वाणिज्य मेले की दिशा में गंतव्य तक दौड़ के लिये देह सबसे सहज सवारी है। एक मैराथॉन दौड़ जो शॉर्ट-कट की फ़िलॉसफ़ी के तहत दौड़ी जा रही है।

सच कहूं तो लड़कियों का अपनी देह में यह सहज स्वच्छंद, निस्संकोच वास मन को मुग्ध करता है। भले ही अभी समाज के कुछ ही हिस्सों में व्याप्त हो लेकिन है यह सचमुच क्रान्ति। लेकिन क्रान्ति क्या किसी खास नाप या डिज़ाइन के ही कपड़े पहनती है तभी क्रान्ति कहलाती है? मामला जब ‘लाइफ़स्टाइल’ और ‘स्टैण्डर्ड आफ़ लिविंग’ का बना दिया जाय और ‘स्टैण्डर्ड आफ़ लिविंग’ जब ‘क्वालिटी ऑफ़ लाइफ़’ का स्थानापन्न बन जाय तब ऐसी भी परिणतियाँ होती हैं। ये वाक्यांश इसलिये अंग्रेजी में दिये जा रहे हैँ क्योंकि उस वर्ग के ये प्रचलित मुहावरे हैँ और हिन्दी में अनूदित होकर अपनी आन-बान-शान खो बैठते हैं। तो बिल्कुल ज़रूरी नहीं रहता कि स्पगेट्टी स्ट्रैप, हेल्टर टॉप, बैकलेस ब्लाउज़ में पीठ, कन्धे या वक्ष को खुला/अधखुला छोड़ने वाला शरीर दिमाग़ से भी खुला हो। बल्कि शायद वह सहज स्वच्छन्द की ठीक उलटी दिशा में असहज-स्वच्छन्द होने की कोशिश कर रहा हो। अनावश्यलक ही आत्म-सजग। एक साथ विरोधी दिशाओं में दौड़ता हुआ। कोई देख तो नहीं रहा? कोई देख क्यों नहीं रहा? देख रहा है तो ऐसे क्यों देख रहा है?

कैसे भूला जा सकता है हम किसी सामाजिक-सांस्कृतिक शून्य मेँ नहीं रहते और हमारी स्वच्छन्दता किसी शून्य में सक्रिय नहीं होती। समाज के अलग अलग इलाकों में अलग अलग संस्कृति के पास अपनी अलग अलग आचरण संहिता या ‘कोड ऑफ़ कंडक्ट’ है। खेल के मैदान में सानिया मिर्ज़ा के स्कर्ट की नाप को लेकर मचाया गया हल्ला ग़लत और बेकार था, क्योंकि स्कर्ट की वह नाप अन्य प्रतियोगियों के साथ उसकी प्रतिद्वन्द्विता को अधिक समतल धरातल पर स्थापित करती है और खेल के संदर्भ–समाज में ‘कोड ऑफ़ कंडक्ट’ के अधीन है लेकिन सेल के मैदान मेँ सेल्सगर्ल के स्कर्ट की नाप के पास कोई कोड ऑफ़ कण्डक्ट नहीं, वह उसे बिकने वाले सामान के पैकेज का हिस्सा बनाती है और साड़ी या सलवार कमीज पहनने वाली विक्रय-परिचारिका के लिये अवसर को असमान और मैदान को असमतल कर देती है। जिस समुद्रतट पर पूरी की पूरी भीड़ स्विमिंग सूट में हों वहाँ किसी का शरीर अलग से नहीं दिखता, न्यूड-फार्म पर किसी की नग्नता महसूस नहीं होती, अपने घर पर पार्टी की निजता मेँ या पाँच सितारा होटल में पार्टी की सामूहिकता में जो स्पगेट्टी स्ट्रैप, हेल्टर टॉप, बैकलेस ब्लाउज़ और उनमे खुले/अधखुले पीठ, कन्धे या वक्ष सहज होते हैँ वे ही सड़क पर, कॉलेज में या मेट्रो और बस में आक्रामक हो उठते हैँ। हर खम्भे, हर दीवार, हर बिल-बोर्ड हर सम्भव जगह पर टँगा और घूरता सौन्दर्य और शृंगार पहले कभी इतना आक्रामक नहीं रहा होगा जितना अब। प्रतिक्रिया में प्रत्याक्रमण भी प्रत्याशित ही होगा। नहीं, इस बात की कोई गारण्टी नहीं की शरीर ढका होगा तो बलात्कार से सुरक्षित भी होगा। वह असुरक्षा तो स्त्री-शरीर नामके जन्मजात वस्त्र की है।

मैँ बात अपनी आज़ादी और क्रान्ति के चुनाव-चिह्न की कर रही हूँ। जिस सामाजिक ‘कोड ऑफ़ कंडक्ट’ की बुनियाद में अन्याय निहित हो उसे ललकारने और बदलने की ज़रूरत होती है। लेकिन हम उसे कैसे चुनते हैँ? जिस समाज में अधिकतम संख्या अभी उन स्त्रियों की हो जो बुनियादी न्यूनतम मानवाधिकारों से भी वंचित हैं वहाँ हमारी प्राथमिकताएँ क्या हैं? क्या हम देख पा रहे हैँ कि जिसे हम स्वच्छंदता का दावा बना कर पेश कर रहे हैँ वह केवल फ़ैशन है, ‘स्किनडीप’ तक भी नहीं, ‘स्किन’ के भी ऊपर, केवल कपड़ों तक बाकी रह जाता है। और अक्सर तो कुल क्रान्ति कपड़ों मेँ ही रह जाती है। जब घूंघट उठाना ही विद्रोह हो तब इस ललकार की कीमत समझी जा सकती है। लेकिन घूँघट में कैद हो सीता तो राधा को अपने कपड़े उतार कर यह दावा नहीं कर सकती कि सीता की आज़ादी का बिगुल बज रहा है। वह बजेगा ही नहीं।

यह शायद पिछली सदी से आई एक औरत का पूर्वग्रह ही हो लेकिन मुझे लगता है कि जब स्वच्छंदता का बोलबाला हो चुका हो तब स्वेच्छा से कुछ निषेधों का चुनाव उचित है। निषेधों के चुनाव की स्वेच्छा में स्वतंत्रता सुरक्षित है। निषेध नहीं होते तो विधेयों की कीमत भी जाती रहती है और अन्ततः उस स्वच्छंदता की भी जिसे हमारी पिछली पीढ़ी ने महंगे मोल कमाया और विरासत में हमें दिया।

( जनसत्ता से साभार )

सुनीता झाड़े की कवितायें : हम गुनाहगार औरतें और अन्य

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सुनीता झाड़े


सुनीता झाड़े मराठी और हिन्दी में कवितायें लिखती हैं . नागपुर में रहती हैं . संपर्क: commonwomen@gmail.com

१ . हम गुनहगार औरतें

सांझ की धुप
जाने कितनी ही देर से किवाडो पर ही टीकी थी
इस इंतजार में कि
जमीं  की चादर पर बिखर के एक गहरी सांस ही ले ले
और मैं बेखबर
बेखबर अपने आपसे पतंग मांजा करते हुए
मांजा जो दिखाई नही देता और पतंग है
जो उडने को बेकरार

किसीने दरवाजे पर दस्तक दी
कोई आया नही बस बाहर से ही दस्तखत लिए
जुर्म के कागज थमा गया.
कितने गुनाहो के कागजाद आते हैं
और मैं, जो हर एक कागज पर दस्तखत करती,
अपने आप को सजा देती हूं
देखो तो, जैसे सजा के लिए दरवाजा खोला
सलाखो वाले दरवाजे के भीतर अपने आप को पाया
अब तक किवाडो पर टिकी धूप भी
मेरी परछाई लिए कुछ इस तरह फैली
मानो मुझे पकडकर जेल के अंदर बंद कर दिया हो
चलो अब मैं तुम्हारी भी गुनहगार हूं

किवाड को खुला कर किवाड के पास ही बैठी रही
उस धूप को देखते जो धीरे धीरे अलसा रही थी.
गहरे सुनहरे रंग की पलके अब डूब  जाना चाहती थी
मैं चाहती थी वो और कुछ समय मेरे साथ रुके
इन दिवारो को उन के धुप  की कहानी सुनाए

अक्सर जेल की  दीवारो में देखा गया है कि
किसी कोने में पानी का एक मटका होता है.
उसपर जर्मन की थाली.
उसपर संतरे के रंग का प्लास्टीक का ग्लास.
डुबाओ और पियो
बस उस खाली से समय में पानी पीयो
प्यास लगी इसलिए , भूख  लगी इसलिए
कोई याद आया इसलिए , किसे भूल जाना है इसलिए,
आसू जो पत्थर बन गले में अटक गया है इसलिए
और इसलिए भी कि सजा कट जाए, खतम हो जाए
रिहा हो जाए सारे शिकवे- शिकायत से रिहा हो जाए
एसे अनगिनत वजह से,
एसे ही अनगिनत बार मैने भी पानी पीया  है…
पानी जो जीवन है, पानी जो जीना सिखाता है,
पानी जो सोच को सोख भी लेता है…
बहरहाल मै अपने आप को उस जेल से आजाद कर
एक मग पानी पीने निकल गई.

तुम्हे किसी भी समय प्यास लगती है,
मेरे पानी पीने पर उसका एतराज  याद आया

जब वापस उस जेल  में जाना चाहा तो पाया
जेल, जेलर, दरवाजे सब गायब. मुझसे  सब आजाद

कोई है ?
हर कोने को दी गई आवाज;
जो एक दिया जलाए
शाम होते ही यादो की परछाईया जैसे घेर लेती हैं
उठने ही नही देती. किसी का संगीत,
किसी की शहनाई, किसी की बिदाई,
कितनी ही कोशिशें , कितनी ही कहानियाँ
और एक इकट्ठी  आवाज
तुम कुछ कहती क्यूं  नही?
तुम कैसे बर्दाश्त करती हो?
तुम गलत कर रही हो?
तुम गुनहगार हो

हाँ
हम गुनहगार है
कि सच का परचम उठा के निकले
तो झूठ के शाह राहें अटी मिलीं
हर एक दहलीज पें सजाऒं की दास्तानें रखी मिलीं
जो बोल सकती थी वो जबानें कटी मिलीं

२. आशियाना

भीतर दीवारो में अंधेरा छिपा था शायद
या फिर अंधेरो में दीवारें गढी थीं
पता नही पर उस अंधेरे मे उसका उजला सा चेहरा अच्छा लगा.

अच्छी लगी परोस कर खतम किये गये
चावल की महक
लगा चावल की तरह अधपके ढके हुए से हैं
भांप में खुशबू -खुशबू खेलते

पता चला कुछ धीमे  से उजाले जलाये थे उसने
जिनमें  किसी भी प्रहर का पता नही चलाता था.
एक समय था, जो कई युगों से वही थमा था,
और उस ठहरे से समय की कुर्सी   पर
सामने वो किसी पोट्रेट की तरह
साडी सरकी थी कंधो से नीचे
खुली बाह में अटकी
गले मे मोतियों  की लड़ी
फिर सुनहरे बाल सुनहरा रंग
बला की खूबसूरती
हसती थी तो मानो
लेकिन  उस हंसी में कुछ सिसकियाँ  सी थी
बातो में चुभन

नीचे देखा कालीन पर पैर कुछ ज्यादा ही काले दिख रहे थे
सिकुडकर भिंच लिए गए भीतर
कछुये की काया की तरह
बस नजरो का पता चले
नजर उन तख्त, ताज को देखती
यहां से, वहां से, उस से
कितनो से सुना फिर से सुन सुन
उसपर एक नक्काशी हंसी
नक्काशीदार कारागीरी में विलीन होती

पुरखो की तस्वीरें ताजा तरीन
मानो तस्वीर में ही उनका अपना मकान हो
और देख रहे हो शायद कुछ इस अंदाज से
कौन…? कौन है…?
हर सीढी के साथ उपर ले जाती
और हर तस्वीर से आती अवाज
कौन है… कौन है… कौन…?
और फिर
और भी ज्यादा सिकुडकर
उनके पीछे  उनके स्ट्डी में दाखिल.
एसी लगे कमरे में अलगाववादी पुस्तकें
कोई लगाव ही  नही हो जैसे

फिर झट से बेडरुम की तरफ
यह मेरा बेडरूम है
हर बार बेडरुम देखते समय
नजर बेड पर से ऎसे गुजरती है जैसे…
एक तस्वीर थी ’उनका’ माथे चुमते हुए
और सवाल, क्या अभी भी इतना ही प्यार
कितने ही जवाब एक नहीं  के बदले

और फिर उस बर्फीली जमीन की छत, उंची
कभी बर्फबारी हो भी तो सीने से उतर जाये
पिघल जाये  सफेद चादर में लिपटी यादें.
मैं तो यूं  ही थम गयी
उन यादों के साथ उसे देखते
और वह बारी बारी बताती रही
ये वो, यहां से, वहां से
गमले, पेड, पौधे, बेल… बल पडे माथे के साथ
फिर सीढ़ियों  से नीचे  उतर
एक और बगल के कमरे मे दाखील
कमरे में ताजा सिगरेट की तलब से निकला धुआँ
उंची एडी की चप्पलें , कुछ बैग ,  कुछ किताबें
टेबल के पिछली दीवार र पर टंगी   हुई
कुछ तस्वीरें, कुछ सपने,  कुछ ख्वाहिशें
अपने आपसे की कुछ गुजारिश
देखना चाहा था उसे पर ना वो दिखी
ना उसकी कोई तस्वीर…
सुना किउससे बडी वाली ज्यादा सुंदर है

और..
फिर वापस उन सारी तस्वीरों के सामने से
जो एक एक कर बुदबुदा रही थी मन ही मन
फिर से कौन… कौन है???
वापस हॉल में पहुंच
अपने ऊंचे लकडे के सामान को लेकर
वह उत्तेजित कितने ही वृक्ष दोष लगे होगें इन्हे, पितृदोष जैसे…

पिछेसे उंची कढाई वाली अलमारी में
भारी काच का सामान देखा, सुनहरे  रंग की कुछ बोतलें
न जाने क्यूं  मुझे युहीं दिख गया
पतले से कांच के ग्लास को भींच के तोडा हुआ एक हाथ
और हांथ  में काच के टुकडे, रक्त से सिलसिलाते….
वॉशरुम???
वह बाहर
और में भीतर देख रही थी उसे
आईने के सामने, फ्लॅश खोल उसकी रुआसां सूरत
जाने कितनी ही देर
फिर हाथों से पानी ले चेहरा ढकती
कई बार.
उन सब यादों पर पानी फेरती,
आंखो की कड़ाही तक पोछती

उस छलके हुए काजल के लकीर को देख
ठहरी रही फिर से उसकी राह देखते
जो कह गया था,
इस फैले से काजल में तुम
और भी सुंदर दिखती हो

इस घर को देखने से पहले तुम्हारी बात मान लेनी थी मुझे
‘ मिलने जा रहे हो, वहीं खो न जाना सुकूंन
दिखाऒं तो कहां हूँ  मैं !

३. सफर 

वहां दीवार पर लिखा था
यह कब्रिस्तान  है यहां पेशाब न करें

दस कदम की दूरी  पर
सात जन्मो के
धागों से बंधा हुआ बरगद
पांच कदम की दूरी  पर पाठशाला

कब्रिस्तान का एक भूत
बरगद पर सात धागो से बंधा
अपनी सत्तो की राह देखता

सत्तो जो अभी सातवी कक्षा की तयारी में है

न जाने अभी और कितने जनम

यही फ़िज़ा थी, यही रुत, यही ज़माना था

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निवेदिता


निवेदिता पेशे से पत्रकार हैं. सामाजिक सांस्कृतिक आंदोलनों में भी सक्रिय रहती हैं. हाल के दिनों में वाणी प्रकाशन से एक कविता संग्रह ‘ जख्म जितने थे’ के साथ इन्होंने अपनी साहित्यिक उपस्थिति भी दर्ज कराई है. सम्पर्क : niveditashakeel@gamail.com

( किश्तों  में लिखा जा रहा यह संस्मरण निवेदिता के निजी जीवन और तत्कालीन समय को एक साथ दर्ज कर रहा है . इनमें एक स्त्री की यात्रा और कालचक्र एकाकार हो गए हैं . )

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जब ज़रा गरदन झुका ली देख ली तस्वीरें यार 

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उन्हें लड़ना ही होगा अपने हिस्से के आसमान के लिए 

हवा के साथ कुछ जलने की तीखी गंध मेरे भीतर उतर आयी।  नीले धुंए की लट उपर उठ रही थी।  कुछ जल रहा है।  मैं भागी। पतीली में मैंने दूध चढ़ाया था। जो उबल उबल कर  आग की लपटों में समा गया। मां दौड़ते आयी,  ‘ ओह! तुमने सारा दूध जला दिया। ध्यान कहां है तुम्हारा? ‘ मैंने कुछ नहीं कहा गीली पलकों से बूंद टपक पडे। मैं लिपट गयी मां से । मां रोक लो हरमीत को।  रोक लो मां । मैं रो रही थी बच्चों की तरह, जैसे उससे उसका कोई खिलौना छीन कर ले जा रहा हो। दंगे के दौरन हरमीत को पंजाब जाना पड़ा । मैं सोच रही थी किसी को अपनी जगह क्यों छोड़ना पड़े? सिर्फ इसलिए की वह सिख है.. मुसलमान है…इसाई है !

मैं कमरे से बाहर निकल आयी। कच्ची रौशनी में भीगी हुई शाम पसरी थी। मां चाय बना कर ले आयी। तारों के फीके आलोक में सड़क की तरफ उतरती पगड़डियां किसी नदी की तरह लग रही थी, जो धीमें-धीमें बह रही हो।यूनीवर्सिटी खुली और पढ़ाई तेजी से शुरु हो गयी। मेरे पास कई किताबें नहीं  थीं। काफी दिन हो गए थे लायब्रेरी का मुंह देखे। उन दिनों लायब्रेरी में किताबें मिल जाया करती थीं। काॅलेज कैंपस की ये सबसे खूबसूरत इमारत है। अंग्रेजों के जमाने का। सायेदार रास्तों से गुजरते हुए जब लाइब्रेरी पहुंचे  तो गेट पर श्रीकांत मिल गया .  उसने बताया आज कलाकारों की बैठक है। हमने कहा, ‘ आते हैं’ .  लाइब्रेरी से दो किताबें इशु कराया। मुझे पता था कि कौन सी किताब किस कोने में दुबकी रहती है। धूल भरे शीशों के भीतर मन माफिक किताबें तलाशना आसान नहीं था। हम लाइब्ररी से बाहर निकल आए। पीपुल्स बुक हाउस के पास जमघट लगी थी। देखा राणा बनर्जी  अपने चिर परिचित मुद्रा में गुणगुणा रहे हैं। हाथ में सिगरेट है। मैंने पीछे से एक हाथ जमाया , ‘  जब देखो सिगरेट पीते रहते हो।’  ‘ ओह! तुम हो। पता होता तो पहले पी लेता’.

राणा की आवाज पर हमसब मरते थे। वह जब गाता तो लगता धरती डोल रही है। लंबी-लंबी पलकें,सांवला रंग। खालिश  रोमैंटिक शक्ल  और ऐसा आदमी जिसपर बंगाली बालाएं जान देती थीं। राणा के पिता गुरुदत्त बनर्जी  खुद कम्युनिस्ट थे। राणा पर उनका गहरा असर था। राणा का छोटा भाई है संजीव, जो पत्रकारिता से जुड़ा है। जिसे हमलोग प्यार से तूफान कहते हैं। राणा जब आंठवी में पढ़ रहा था उसी समय वह वाम आंदोलन के सम्पर्क में आया और बाद में सीपीआई एम एल से जुड़ा । पर उसका एमएल के साथियों से ज्यादा समय हमलोगों के साथ गुजरता। इप्टा में वह खूब दिलचस्पी लेता। उसकी गहरी सांस्कृतिक समझ ने ही उसे दूसरे विरादराना संगठनों के नजदीक ला दिया था। उसकी शक्ल  मशहूर गायक हेमंत कुमार से काफी मिलती थी। बल्कि उसके पिता बिल्कुल हेमंत कुमार ही लगते थे। कई बार ट्रेन में सफर के दौरान लोगों ने हेमंत कुमार समझ कर उन्हें घेर लिया था बड़ी मुश्किल  से उन्हें यकीन दिलाना पड़ा कि वे हेमंत कुमार नहीं गुरुदत्त बनर्जी  हैं। राणा ने एक दिन यह किस्सा बताया था। हमलोग खूब हंसे थे।

वह चाय लिए मेरे पास आ गया। हम पीपुल्स बुक हाउस के पीछे वाले कमरे में बैठ गए।  मैंने पूछा, ‘ क्या हो रहा है ?’  उसने कहा, ‘इनदिनों नेहरु को पढ़ रहा हूं।’ मैंने तंज लहजे में कहा, ‘अच्छा अति क्रांतिकारी लोग भी नेहरु को पढ़ते हैं। वह हंसने लगा। तुम जानती हो व्यक्तिगत रुप से नेहरु मुझे काफी पसंद है। उनको पढ़ते हुए हैरानी होती है। वे तो मार्क्सवाद  के पक्षधर रहे हैं। तुम पढ़ोगी तो कायल हो जाओगी। एक जगह उन्होंने कहा-‘ मुझे पक्का यकीन है कि आज दुनिया और हिन्दुस्तान के सामने जो समस्याएं मुंह बाएं खडी  हैं,उन्हें हल करने की एकमात्र कुंजी समाजवाद है,जब मैं यह शब्द  जुबान पर लाता हूं तो उसके वैज्ञानिक,आर्थिक मतलब में इस्तेमाल करता हूं। समाजवाद सिर्फ आर्थिक सिद्धांत नहीं है। मुझे भारत के लोगों की गरीबी ,बेरोजगारी और गुलामी के खात्में के लिए कोई और रास्ता नहीं सूझता। इसके लिए हमारी राजनीतिक व समाजिक व्यवस्था में बड़ी और क्रांतिकारी तब्दिलियां जरुरी है। खेती में, उद्योग में अमीरों के बोलबाले को खत्म करना जरुरी है। हिन्दुस्तान के रजवाड़ों, सामंती तानाशाह  निजामों का  उखड़ना जरुरी है।’ राणा ने मुझे देखा, ‘  हमारे नेता क्या इससे ज्यादा क्रांतिकारी  बातें करते हैं?  मैंने चुटकी ली, ‘ तो अब एक क्रांतिकारी  बुर्जुआ से प्रभावित हो रहा है। वैसे मैं तुमसे सहमत हूं। नेहरु मुझे भी पसंद हैं। मैं उन कम्युनिस्टों में से नहीं हूं जो उन्हें सिरे से खारिज करते है !’  हमारी बातचीत लंबी हो रही थी। तबतक तनवीर अख्तर आ गए , ‘ अरे अभी तक तुमलोग यहीं हो, मिटिंग का समय हो गया।’ हमलोग मिटींग के लिए निकल गए। पटना के सभी कलाकारों की मौजूदगी थी। बिहार के सांस्कृतिक इतिहास में फिर कभी कलाकारों की इतनी एकता दिखी नहीं। मसला था प्रेमचन्द्र रंगशाला  में सीआरपीएफ के कब्जे का। मिटिंग लंबी चली। तय हुआ कि इस सवाल पर हमलोग जुलूस निकालेंगे। बिहार की सांस्कृतिक जमीन उर्वर रही है। यह वह दौर था जब सांस्कृतिक हलचल के लिए बिहार जाना जाता था। भारतीय जननाट्य संध इप्टा की बिहार में पहचान थी।  कलासंगम, अंकुर, बिहार आर्ट थियेटर,अनागत, किसलय,कला त्रिवेणी, मित्रम, भंगिमा, निमार्ण कला मंच, सर्जना और प्रेरणा जैसे संगठन भी कला के क्षेत्र में लगातार सक्रिय थे।

वापसी नाटक में निवेदिता , श्रीकांत और रूपा

देश राजनीतिक उथल-पुथल के दौर से गुजर रहा था। जनता पार्टी का प्रयोग विफल रहा था। बिहार की सामाजिक, राजनीतिक  और आर्थिक स्थितियों ने नक्सलवाद के लिए नई जमीन तैयार की,  जिसके असर से कलाकार भी अछूते नहीं थे। गीतों में कहानियों में, नाटकों के जरिये इस विचार धारा के पक्ष में सामाजिक स्थितियां तैयार की जा रही थी। अनागत जैसी मजबूत संस्था में बिखराव आ चुका था। अनागत से निकले परवेज अख्तर,रश्मी  सिन्हां, विनीत,और जावेद अख्तर अनागत छोड़कर इप्टा में शामिल  हुए। इन्हीं राजनीतिक पृष्ठभूमि में बिहार में इप्टा का पुर्नगठन हुआ। इप्टा के पुर्नगठन के बाद रंगमंच एक नए तेवर में जनता के बीच था। तनवीर अख्तर, कवि और लेखक कन्हैया जी,राजेन्द्र सिंह राजन, डा0 ए0के सेन जैसे लोगों के समूह ने, जिनका रुझान मार्क्सवाद  की तरफ था , इप्टा को नयी शक्ल  दी। उसी दौर में मैं इप्टा से जुड़ी। इप्टा में मेरा पहला नाटक प्रेमचन्द्र लिखित इस्तीफा था। मेरे लिए नाटक बिल्कुल नया अनुभव था। एक दिन पापा ने कहा कि चलों तुम्हें कुछ कलाकारों से मिलाते हैं। उन दिनों इप्टा का आॅफिस एनीबेंसेन्ट रोड में हुआ करता था। जिसे मैत्री-शान्ति  भवन के नाम से जानते हैं लोग। शाम  का समय था। जब मैं इप्टा के दफ्तर पहुंची तो  देखा कई नौजवान लड़के लड़कियां हाथ में कागज लिए जोर-जोर से संवाद बोल रहे हैं।

कुछ लोग हारमोनिम पर तान दे रहे हैं। मुझे काफी दिलचस्प लगा ये नजारा। पापा ने मेरा परिचय कन्हैया जी से कराया। मेरी बेटी है नाटक करना चाहती है। वे काफी खुश  हुए। थियेटर में लड़कियों की कमी हमेशा  रही है। उन्होंने बताया कि एक साथ कई लघु नाटक किए जा रहे हैं। हम चाहते हैं कि निवेदिता करे। तनवीर अख्तर ने कहा कि कल शाम  को आएं। हमलोग तय करते हैं। दूसरे दिन इप्टा पहुंची। देखा एक  खूबसूरत शक्ल  वाला लड़का गा रहा है। मेरा परिचय कराया गया। ये संजय उपाध्याय हैं। अच्छे गायक हैं। उसने बड़ी शाइस्तगी से हाथ बढ़ाया। मैंने तपाक से हाथ मिलाया। इप्टा के शुरुआती  दौर में जो कुछ गहरे दोस्त बने उसमें संजय थे। समय के साथ जीवन में बहुत कुछ बदलता है। दोस्ती के रंग भी फीके पड़ते हैं।

मुझे बताया गया कि प्रेमचन्द्र की कहानी ‘  इस्तीफा’  के लिए मेरा चयन हुआ है। मेरे साथ अभिनय करेंगे परवेज अख्तर। मुझे स्क्रीप्ट दे दिया गया। मेरा दिल घबरा रहा था। परवेज अख्तर मंजे हुए कलाकार थे। मैं उनकी पत्नी की भूमिका कर रही थी। परवेज अख्तर बड़े इख्लाक़ से मिले। बड़ी अदा से आदाब अर्ज किया। मैंने देखा उंची पेशानी  , आंखें रौशन  और मुस्कुराती हुई। चेहरा इसकदर पुरकशिश कि देखते रहिए। मैं खुद  शर्मा गयी और ये सोच कर धबरा गयी की कहीं इन्होंने मुझे धूरते हुए देख तो नहीं लिया।

निवेदिता की बहन सोना  थियेटर के साथ धारावाहिक और फिल्म करती हैं

पापा ने उनलोगों सेे कल भेजने का वादा कर विदा लिया।  सारी रात मैं प्रेमचन्द्र की कहानी इस्तीफा में डूबती-उतरती रही। मुझे ठीक -ठीक याद नहीं पर कुल 6 लधु नाटकों का मंचन हुआ था। एक नाटक में रश्मि अभिनय कर रही थीं । उसी दौरान मेरे कई गहरे दोस्त बने। रश्मि  उस दौर की बड़ी अभिनेत्री थी। उसे देखकर लगता था कि वह अभिनय के लिए ही बनी है। रंगमंच का यह मेरा दूसरा अनुभव था। जब स्कूल में थी तो एन0एन0 पांडे के निर्देशन में ‘घर का भेदी’ नाटक किया था। एन0एन0 पांडे उन दिनों रंगमंच में काफी सक्रिय थे। राजेन्द्र नगर में रहते थे। हमलोग उनके पड़ोसी थे। उस नाटक की खूब तारीफ हुई थी। इस्तीफा नाटक में मूल रुप से तीन पात्र थे। पति-पत्नि और उनका बेटा। नाटक में बेटा के किरदार के लिए बच्चे की खोज शुरू हुई। हमारे निर्देशक  परेशान  थे। मेरी छोटी बहन सोना उस समय 10 साल की थी। मैंने कहा कि इस नाटक में अगर आप कहें तो बच्चे के रोल के लिए सोना को ले सकते हैं। नाटक मंचित हुआ। परवेज अखतर की वजह से नाटक सफल रहा। मैंने महसूस किया कि अभिनय मेरे बूते की चीज नहीं है। मैं अभिनय नहीं कर रही थी। बाद में अपूर्वानंद ने नाटक की समीक्षा करते हुए लिखा कि ‘मेरा चेहरा काठ का चेहरा था’। यह दूसरी बात है कि बाद में वही चेहरा उसे भाता था।

मेरी उम्र उस समय 16-17 साल रही होगी। नाटक को जीने का यह मेरा पहला अनुभव था। अभी मैं सीख रही थी। अभिनय की बारीकियों से मेरा वास्ता नही पड़ा था। एक कलाकार, जिस किसी भी कला माध्यम में काम करता हो, चाहे शब्द  में ,चाहे रंग में, उसका अनुभव क्षेत्र बहुत विशाल  होता है, जटिल भी। मैंने महसूस किया कि अभिनय के लिए यह जरुरी है कि आप अभ्यास में रहें। कई बार मांजते-मांजते भी अभिनेता में चमक आती है। मैंने कभी भी अभिनय में अपना पूरा समय नहीं दिया। बहुत बाद में वापसी नाटक के मंचन के बाद यह भरोसा हुआ कि शायद हम भी नाटक कर सकते हैं। वापसी की कहानी मजदूरों की जिन्दगी पर आधारित थी .  इस नाटक में मेरे पति की भूमिका श्रीकांत कर रहे थे। तनवीर अख्तर का निर्देशन  था। यह संयोग है कि दोनों नाटक में बच्चे की भूमिका में मेरी बहनों ने अभिनय किया। इस्तीफा में सोना ने अभिनय किया तो वापसी में रुपा बाल कलाकार के रुप में काफी सराही गयी। उन दिनों अक्सर दोपहर में हमारे नाटक का रिहर्सल  होता था .  हम काॅलेज से सीधे रिहर्सल में आ जाते थे। ऐनी बेसेन्ट की तंग गलियों के पास ही शांति-मैत्री भवन था। जहां हमलोग रिहर्सल किया करते थे। बरामदे के ठीक सामने एक बड़ा कमरा था, दाई तरफ आंगन, दालान के दूसरे सिरे पर चैकोर कमरा था, जिसमें सामान रखे जाते थे। खिड़कियों और दरवाजे से छनकर रौशनी आती थी। कमरे की चैड़ाई में एक पुरानी दरी बिछी हुई थी।  कमरे का यह हिस्सा सामने आम सतह से कुछ उंचा और नुमायां हो गया था। श्रीकांत वही धुनी  रमाये बैठे थे। कुछ लड़के चाय बनाने में लगे हुए थे। तनवीर अख्तर अभी आए नहीं थे। मैं सामने बैठ गयी। श्रीकांत के साथ नाटक करना सबसे ज्याद सहज था। वह हमेशा  मुझे भरोसा देता। मेरे संवाद पर मेहनत करता। अक्सर रिहर्सल से जब फुरसत मिलती हम किसी न किसी की कविताएं और नज्म पढ़ते रहते। फैज और साहिर मेेरे प्रिय शायर रहे हैं। श्रीकांत की आवाज में उनको सुनना अच्छा लगता था। रिहर्सल के बाद कई बार हमारा अड्डा विनोद के घर लगता था। साहिर की लंबी नज्म ‘ परछाईयां’  को मैंने श्रीकांत से ही सुना। विनोद को ये नज्म खूब पसंद थी। कभी-कभी दोनों इसका पाठ करते।
जिन्दगी अजीब होती है। जब आप अपने समय को जीते हैं तोे पता नहीं चलता कि उसमें कितना कुछ है जिसने आपके जीवन को बनाया। गुजरी हुई घटनाएं ऐसे याद आती हैं जैसे कल की बात हो। मुझे याद है। उस शाम,   जब विनोद के घर पहुंचे,  सूरज ढ़ल गया था, आसमान पर पीली रौशनी फैली थी। हमसब उसके कमरे में बैठ गए। श्रीकांत ने अदा के साथ कहा मतला हाजिर करता हूं, फिर वो शेर  पेश  करुंगा, जिसका वादा है। हमलोगों ने भी बड़ी अदा से कहा  , ‘  इरशाद  अता हो ! ‘  श्रीकांत की आवाज लोचदार और नफासत से भरी है। सुर निहायत साफ और उसमें दूर तक पहुँच  जाने की खसियत है। उसने साहिर को सुनाना शुरू  किया-

रूपा अब पत्रकारिता करती हैं

जवान रात के सीने पे दूधिया आँचल
मचल रहा है किसी ख्वाबे.मरमरीं की तरह
हसीन फूल , हसीं पत्तियाँ , हसीं शाखें
लचक रही हैं किसी जिस्मे.नाज़नीं की तरह
फ़िज़ा में घुल से गए हैं उफ़क के नर्म खुतूत
ज़मीं हसीन है ,ख्वाबों की सरज़मीं की तरह
  तसव्वुरात की परछाइयाँ उभरतीं हैं


कभी गुमान की सूरत कभी यकीं की तरह
वे पेड़ जिन के तले हम पनाह लेते थे
खड़े हैं आज भी साकित किसी अमीं की तरह
इन्हीं के साए में फिर आज दो धड़कते दिल
खामोश होठों से कुछ कहने.सुनने आए हैं
न जाने कितनी कशाकश से कितनी काविश से
ये सोते.जागते लमहे चुराके लाए हैं


यही फ़िज़ा थी, यही रुत, यही ज़माना था
यहीं से हमने मुहब्बत की इब्तिदा की थी
धड़कते दिल से लरज़ती हुई निगाहों से
हुजूरे.ग़ैब में नन्हीं सी इल्तिजा की थी
कि आरज़ू के कंवल खिल के फूल हो जायें
दिलो.नज़र की दुआयें कबूल हो जायें
 तसव्वुरात की परछाइयाँ उभरती हैं

हम दम साधे सुनते रहे, बहते रहे। परछाइयां लंबी नज्म है। हमने ऐसी विचलित करने वाली लंबी नज्म इसके पहले नहीं सुनी थी।  देर काफी हो गयी थी। घर जाना था। मन में साहिर को लिए विदा हुई। आसमान साफ था। बहुत धीमी हवा थी,जो पेड़ों को छूकर हल्के से निकल गयी। वृक्षों की घने चमकीले पत्तों की सरसराहट में जैसे किसी ने कानों में चुपके से कहा- तसव्वुरात  की परछाइयां उभरती है।

दूसरे दिन हमारा रिहर्सल सुबह 10 बजे से ही था। मैं अपनी बहन रुपा को लेकर आयी थी। नाटक का एक संवाद ‘मछली चारा खायेगी’ बोलने में रुपा को मुश्किल  होती थी। तनु भैया ने देखा बच्ची परेशान हो रही है उन्होंने कहा तुम्हें जिस तरह बोलना हो बोलो। रुपा बचपन से ही जहीन है। वह जो भी करती थी समां बांध देती थी। लोग कहते नन्हीं सी बच्ची में ख़ुदा आ बसा है। एक दृश्य  में मुझे और श्रीकात को काफी करीब आना था। तनवीर अख्तर कहते- तुम दोनों को पति-पत्नी की तरह दिखना है। इस दृश्य  में ऐसा लगना चाहिए कि एक -दूसरे के प्रति गहरा अनुराग है। श्रीकांत को मुश्किल  हो रही थी। मैंने हंसते हुए कहा , ‘  भूल जाओ कि ये मैं हूं। मेरा आंलिगन इस तरह से करो’ – यह कहते हुए मैंने उसे समेट लिया। मेरा ये तरीका काम कर गया। श्रीकांत सहज हो गए। वह दृश्य  खूबसूरत बन पड़ा। नाटक लोगों को पसंद आया। मुझे भी भरोसा हुआ कि मैं अभिनय कर सकती हूं।

प्रसिद्ध रंगकर्मी जावेद

यादें खामोशी से सुलग रही हैं। कबीर की तरह, लुकाठी लिए हमसब बाजार में खड़े हैं। अपने अनुभवों को लिखते हुए मैंने कोशिश  की है कि उस समय को समग्रता में देख सकूं। इन्सान की शुरू  की आधी जिन्दगी पहाड़ की चढ़ाई की तरह होती है, दूसरा आधा हिस्सा ढ़लान का। अभी हम पहाड़ पर चढ़ रहे हैं। उबड़-खाबड़ और चुनौतियों से भरे पहाड़ पर।बिहार के सांस्कृतिक आंदोलन में प्रेमचंद रंगशाला  एक ऐसा आंदोलन है,  जिसने देश की सांस्कृतिक व राजनीतिक परिदृष्य को बदला। इस आंदोलन के पक्ष में देष भर के साहित्यकार , कलाकार व वामपंथी छात्र संगठन एकसाथ आए।

1971 में प्रेमचन्द्र रंगशाला बनकर तैयार था। पहली बार बिहार में कोई रंगशाला इतना खूबसूरत  बना, जिसमें मंचीय प्रस्तुति के लिए कई संभावनाएं थीं। उसमें कुछ कार्यक्रम भी हुए। पर बिहार में 74 आंदोलन के दौरान प्रेमचंद रंगशाला में सीआरपीएफ का कब्जा हो गया था। रंगशाला के मंच को जवानों ने अपना रसोईघर बना लिया था। हालात ये हुए कि स्टेज तक जल गया। परदे फट गए। करोड़ों की लागत से बना रंगशाला सीआरपीएफ के खाना बनाने और रहने में इस्तेमाल हो रहा था। उसी दौरान कुछ नौजवानों ने यह सवाल उठाया कि प्रेमचन्द्र रंगशाला में सीआरपीएफ क्यों है?

रंगशाला एक बड़ा मुद्दा  बना। 1980 में प्रख्यात साहित्यकार महादेवी वर्मा की अध्यक्षता में पटना में प्रेमचंद जयंती मनायी जा रही थी। उसी साल दुनिया के कई हिस्सों में प्रेमचंद जयंती मनी। उन दिनों प्रेमचंद रंगशाला का नाम राजकीय रंगशाला था। सम्मेलन के दौरान साहित्यकारों के बीच से किसी ने ये सवाल उठाया कि राजकीय रंगशाला का नाम प्रेमचंद रंगशाला होना चाहिए। महादेवी वर्मा ने कहा कि ‘ यह कितना बुरा है कि एक रंगशाला में सीआरपीएफ का कब्जा है।’  यह हैरानी की बात है कि कुछ अझात नौजवानों ने प्रेमचंद रंगशाला से सीआरपीएफ का कब्जा हटाओ के नारे लगाये। यह नारा देश भर का मुद्दा बना। हमलोग प्रेमचंद रंगशाला के मसले को लेकर बात-चीत कर रहे थे। तनवीर अख्तर ने कहा कि शहर में प्रेस बिल के मामले को लेकर धरना चल रहा है। हमलोगों को भी शामिल होना चाहिए।

1982 के आस -पास प्रेस बिल लागू हुआ। जिसके खिलाफ सारे पत्रकार सड़क पर आए। पत्रकारों का साथ सभी वाम-जनवादी संगठनों ने दिया। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर खतरे के सवाल ने आंदोलन की जड़े मजबूत की। हमलोगों को पोस्टर बनाने का जिम्मा था। फ़ैज़ की नज्म- ‘बोल की लब आजाद हैं तेरे’ और जुबां पर मुहर लगी तो क्या ग़म है कि खूने -दिल में डूबो ली है उंगलियां मैंने’ जैसी नज्मों का खूब इस्तेमाल किया। कहते हैं फूलों की शक्लों  और उनकी रंगों-बू से सरावोर शायरी से भी अगर आंच आ रही हो तो यह मान लेना चाहिए कि फ़ैज़ वहां पूरी तरह मौजूद हैं।

लंबे आंदोलन के बाद सरकार को प्रेस बिल कानून वापस लेना पडा़। यह ऐसी जीत थी, जिसने यह हौसला दिया कि संघर्ष की जीत होती है। पर अभी लंबी लड़ाई थी। कई और मोर्चे पर डटे रहना था। शायद वह नवंबर का महिना था। धुली-धुली रुपहली घूप फैली थी। बिहार भर के कलाकार एस के मेमोरियल हाॅल में जमा हुए थे। युवा महोत्सव का आयोजन किया गया था। कलाकार संधर्ष समिति ने तय किया था कि जबतक प्रेमचंद रंगशाला खाली नहीं होता कोई भी सरकारी आयोजन नहीं होने देंगे। साथियो ने पुरुस्कार वितरण का बहिष्कार किया। पर्चा बांटा गया। जिसमें यह लिखा हुआ था कि हम क्यों बहिष्कार कर रहे हैं। बहिष्कार के आरोप में पांच छात्र गिरफ्तार कर लिए गए। जावेद अख्तर,अशोक  आदित्य,पुष्पेन्द्र,राणा बनर्जी ,  एक का नाम याद नहीं। जावेद उन दिनों बीएन काॅलेज के छात्र थे। उनकी गिरफ्तारी से हंगामा हो गया। बीएन काॅलेज के छात्रों को लगा कि उनके काॅलेज के छात्र को पुलिस ले गयी।  छात्रों ने खुद उस आयोजन का बहिष्कार कर दिया। नीरज, जो इनदिनों जद यू का एमएलसी है,  वह बीएन काॅलेज में एआईएसएफ का लीडर था। उसने अगुवाई  की, और प्रशासन को धमकी दी  कि गिरफ्तार किए गए छात्रों को छोड़ दिया जाय। प्रशासन पर छात्रों का इतना दबाव पड़ा की 24 घंटे के अंदर सभी छात्र रिहा कर दिए गए। कलाकार संघर्ष समिति ने तय किया कि वे सरकारी युवा महोत्सव के समानान्तर युवा महोत्सव आयोजन करेंगे। आयोजन के लिए पांच कनवेनर रखे गए। अपूर्वानंद, जावेद अख्तर खान,पुष्पेन्द्र,प्रो0 संतोष, कुमार ध्रुव । इतने बड़े आयोजन करने के लिए हमारे पास कोई साधन नहीं था। हमलोगों ने चंदा जमा करने के कई तरीके इजाद किया। जिसमें सड़को पर गाते हुए चंदा मांगना शामिल था। हर सुबह एक नये संघर्ष की सुबह होती थी। कोई लंबी चैड़ी महत्वकांक्षाएं नहीं थीं। सबके सब रंगकर्मी,छात्र, जिनकी आंखों ने छोटेे-छोटे सपने देखे। वह सपना था कि बिहार में प्रेमचंद रंगशाला मुक्त हो।

निवेदिता

1986 की बात है। पटना इप्टा की टीम गुवाहाटी गयी थी ,जहां ब.व कारंत से साथियों की मुलाकात हुई । परवेज  ने विस्तार से कारंत को बिहार में चल रहे आंदोलन की जानकारी दी। उसी के कुछ दिन बाद साहित्यक पत्रिका नटरंग में ब.व कारंत का साक्षात्कार छपा। जिसमें उन्होंने कहा-‘मुझे शर्म आती है कि मैं एक ऐसे देश  में रहता हूं जहां रंगशाला में सीआरपीएफ का कब्जा है.’ वहां से लौटने के बाद इप्टा के साथी युवा महोत्सव की तैयारी में लग गए। पटना में जितने भी हाॅल थे सब हमलोगों ने बुक कर लिया था। बिहार के सभी जिलों से कलाकार आए। उनदिनों रंगकर्मियों और लेखकों की कई जमातें थी। एक जमात वैसे लोगों की थी ,जो आर्थिक रुप से अच्छी स्थिति में थे। पर ज्यादातर लोगों की हालत खस्ता थी। फिर भी हमसब जीवन से भरे हुए थे। रोज एक नए अनुभवों से गुजरते हुए। मुझे याद है कि मेरा जिम्मा कालिदास रंगालय में था। कौन से नाटकों का मंचन होगा,  कितनी कविताओं का पाठ होगा। मैं कविताएं लिखती थी। पर अपने लिखे पर भरोसा नहीं करती। शर्म  आती थी अपनी रचनाओं के बारे में कुछ कहते हुए। यह संकोच आज भी बना हुआ है। अपूर्व ने कहा तुम्हें भी अपनी कविता का पाठ करना चाहिए। मैं धबरायी। उसने मेरा साहस बढ़ाया। अपनी तरह जीने और अपनी तरह कविताएं लिखने की जिद में मैंने काफी चोटें खाई है, अपमान सहा। पर मैं जानती थी कि मेरा फैसला मेरे पाठक करेंगे। हाॅल खचाखच भरा था। मैंने अपनी कविता पढ़ी। लोग खामोश  थे। अचानक तालियों की गड़गड़ाहट से महसूस हुआ कि कविता मेरी पीठ घीमें-धीमें थपथपा रही है। मेरी आंखों में खुशी  के आंसू थे। इस आयोजन का ये असर हुआ कि सरकार को अपना कार्यक्रम बंद करना पड़ा। नवंबर की गुलाबी ठंड भी हम कलाकारों का हौसला पस्त नहीं कर पायी। आंदोलन अपने चरम पर था।  1987 में केन्द्रीय संगीत अकादमी ने बिहार में राष्ट्रीय नाट्य महोत्सव का आयोजन किया। जिसमें देश  के सभी वरिष्ठ संस्कृतिकर्मी शामिल थे। ब. व कारंत, रतन थियेम,प्रतिभा अग्रवाल, बंगाल के बड़े अभिनेता कुमार राय और नेमीचन्द्र जैन आयोजन में शामिल थे। जिस दिन कार्यक्रम की शुरुआत थी हमलोगों ने एक बड़े कैनवास पर कारंत के बयान को लिखा-‘मुझे शर्म आती है कि मैं एक ऐसे देश  में रहता हूं,  जहां रंगशाला में सीआरपीएफ का कब्जा है’। यह बैनर लिए हुए हमसब हाॅल के अंदर गए और मंच पर कब्जा जमा लिया। शायद संस्कृति के इतिहास में यह पहली परिधटना होगी कि जब सरकारी आयोजन में शामिल होने आए सभी बड़े कलाकारों ने आंदोलन के पक्ष में अपनी आवाज दी। टाइम्स आॅफ इंडि़या ने इस खबर को फस्ट लीड़ बनाया और लिखा-‘ए टाईम टू प्रेाटेस्ट’।

आंदोलन ने गति पकड़ ली थी। आंदोलन करते हुए लगभग  एक साल गुजर गए थे। यह हमारा आखरी दांव था। हमसब ने तय किया कि प्रेमचंद जयंती  के मौके पर रंगशाला के मसले पर प्रदर्शन होगा । बिहार के सभी प्रमुख साहित्यकारों से अपील की गयी। डा0 ऐ.के सेन ने झंडी दिखाकर हमारे जुलूस को रवाना किया। नागार्जुन जुलूस का नेतृत्व कर रहे थे। सैकड़ों नौजवानों ने लाल, पीली और सफेद झंडिया लहराई। बड़े बडे कैनवास पर यह लिखा हुआ था कि प्रेमचंद रंगशाला मुक्त करो। जिन शायरों और अदीबों ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर लिखा था , उनके लिखे शब्द  जुलूस में झिलमिला रहे थे। जुलूस शान्ति  से आगे बढ़ रहा था। आगे-आगे बाबा नागार्जुन,कविवर कन्हैया जी चल रहे थे। पुलिस ने चारों ओर से हमें घेर लिया। हम बढ़ते जा रहे थे। हमसब ने कहा कि आज प्रेमचंद रंगशाला को खाली कराये बगेर साथी पीछे नहीं हटेंगे। आर.ब्लाॅक चैराहे पर जुलूस रोक दिया गया। कन्हैया जी,बाबा नागार्जुन समेत सभी वरिष्ठ रंगकर्मी और साहित्यकार जमीन पर बैठ गए। सिर के उपर आसमान दहक रहा था। पुलिस का एक बड़ा जत्था  सामने आया। उसने चेतावनी  दीे, ‘ आपसब ये जगह खाली कर दें। नहीं तो हमें मजबूर होना होगा।’  हमलोग डटे रहे। सबने एक दूसरे का हाथ थामा। और हम आगे बढ़ने लगे। अचानक पुलिस की लाठियां बससने लगी। लोग डटे रहे। कन्हैया जी  के सिर पर लाठी पड़ी खून की धार बह गयी। पुलिस ने सबको खदेड-खदेड कर पीटा। हम खड़े रहे। एक दूसरे की बांह को कस कर थामें हुए। हमारी आवाज गीली थी,होठों पर लब्ज सूखे नहीं थे। हमलोगों ने चीखकर कहा-  संस्कृतिकर्मियों पर फैाजदारियां करने वालों और गोलियों चलाने वालों से कह दो कि दुनिया में वह गोली कहीं नहीं बनी है,  जो सच को लगे। शाम  हो गयी थी। कन्हैया जी को काफी चोट आयी थी। लहू उनके कंधों तक बहकर सूख चुका था। बाबा को भी गहरी चोट लगी थी। कई साथी बुरी तरह घायल हुए। हमसब घर की ओर निकले। कुछ दिनों बाद अखबारमें बड़ी सी खबर छपी प्रेमचंद रंगशाला सीआरपीएफ से मुक्त हुआ। जारी……

महिलाओं के खिलाफ हिंसा सिर्फ यौन हिंसा तक सीमित नहीं है : एनी राजा

( नेशनल फेडरेशन ऑफ़ इन्डियन वीमेन  ११ -१२ -१३ सितम्बर को अपनी स्थापना का ६०वां वर्ष मना रहा है . इसकी राष्ट्रीय महासचिव एनी राजा से स्त्रीकाल के लिए बातचीत की पत्रिका के सम्पादक द्वय संजीव चन्दन और धर्मवीर सिंह ने . प्रस्तुति और ध्वन्यांकन : रजनीश कुमार आंबेडकर )


महिला आरक्षण बिल नई सरकार के पहले लम्बे सत्र में भी लोकसभा में पेश नहीं हुआ, बल्कि एजेन्डॆ में था ही नहीं, 20 बिल एजेंडे में थे. आप इसको कैसे देखती है. जबकि कांग्रेस के शासन में बी जे पी ने पूर्ण समर्थन दिया था और आज यह तो पूर्ण बहुमत में है. राज्य सभा में यह बिल पास हो चुका है. और लोक सभा में किया जा सकता था यदि इरादा होता तो.





वर्तमान समय में महिलाओं के समक्ष कई तरह की चुनौतियां है और सरकार की नीति उस चुनौती को एड्रेस करना है भी नहीं.  16 दिसम्बर के बाद साईलेंटली ऐसा प्रयास हो रहा है कि महिला हिंसा को सिर्फ यौन-हिंसा तक सीमित मान लिया जाए . महिलाओं के खिलाफ हिंसा  की अगर बात करेगें तो सिर्फ यौन-हिंसा  , ही नहीं सांस्थानिक हिंसा , स्ट्रक्चरल हिंसा, घरेलू हिंसा ,  साइलेंट हिंसा ,लाउड हिंसा , आदि कई प्रकार की हिंसा की बात होनी चाहिए. तक भारतीय संविधान ने हर नागरिक को जो हक़ दिया है. वह हक़  हर एक महिला के लिए जब तक सुनिश्चित नहीं होगा , तब तक महिलाओं के खिलाफ हिंसा होती रहेगी . जब तक यह समझदारी राजनीतिक पार्टियों को , खासकर  सत्ता में जो भी राजनीतिक पार्टी है,  उसको नहीं होगा तब तक महिलाओं के प्रति यौन-हिंसा  बढ़ती जाएगी. एक तरफ पुरूष प्रधान समाज है और दूसरी तरफ  नई आर्थिक नीति है, जिसका का मूल मंत्र है कि ‘मनी-मनी-मनी’.  ‘मनी’ के लिए किसी को भी आप एक वस्तु की तरह प्रयोग करना चाहते है. सबसे आसान है, बिना किसी निवेश के महिला को एक वस्तु के रूप में प्रयोग करना , जिससे अच्छी प्रॉफिट मिलती है . इसलिए ट्रैफिकिंग का रिश्ता सिर्फ सेक्स से नहीं है ‘लेबर’ से भी है. बहुत सारी चीजों के लिए है. महिला के खिलाफ हिंसा बंद तो नहीं ही हुई है, उसका नेचर भी बदल गया है . अब उसकी आक्रमकता बढ़ी है . अब सिर्फ बलात्कार ही नहीं होता , पीडिता को मार भी देते हैं .

यह  तो इविडेंस खत्म करने का मामला है. यह  पितृसत्ता का एक रूप है.  अभी जो  नई सरकार बनी है , उसकी महिलाओं के पक्ष में राजनीतिक इच्छा शक्ति के बारे में बताइए.. 


राजनीतिक इच्छा शक्ति की ही बात कर रही हूँ . बहुत ही मजबूती के साथ पैट्रीयार्की और न्यू लिबरल इकॉनोमी  (नव उदारवादी आर्थिक नीति),  दोनों ही महिला के ऊपर हिंसा कर रहे है. महिला के संवैधानिक अधिकारों का हनन हो रहा है. जब से नई सरकार आयी है तब से देश के अन्दर एक नया कम्यूनल वातावरण पैदा हो गया. किसी भी  भी वायलेंस में खासकर कम्यूनल वायलेंस  में महिला सबसे ज्यादा पीड़ित होती है. पिछले कुछ सालों के अन्दर हम देख रहे है कि महिला के शरीर को तो  एक हथियार के रूप में प्रयोग कर रहे ही रहे हैं महिलाओं  को फ़ोर्स भी कर रहे है. महिला के खिलाफ  हिंसा में शामिल होने के लिए. पहले सिर्फ पुरुष  शामिल होते थे. अभी हमने यह  देखा है  चाहे वह  मध्यप्रदेश हो या उड़ीसा हो या फिर गुजरात ,हम देख रहे है कि महिला को फ़ोर्स किया जा रहा है. महिला के खिलाफ  हिंसा में शामिल होने के लिए.  नई सरकार मनुवाद को लेकर चलने वाली सरकार है. वह मानती है कि महिला को एक सीमित दायरे  में रखना है, उनकी स्वतंत्रता एक सीमा तक हो , उससे आगे नहीं जाना है. इसलिए हर सरकार, हर पार्टी महिला की ड्रेस पर फोकस कर रही है . सोचने वाली बात  यह है कि महिला सुरक्षा के नाम के पर महिला के लिए अलग पार्क बना रहे है. महिला के लिए अलग बस सुविधा दे रहे हैं . ये सारे प्रयास महिलाओं  को पीछे हटाने का काम कर रहे है. ऐसी सोच रखने वाली सरकार केंद्र में है, जिससे महिलाओं के लिए चुनौती बढ़ना स्वाभाविक है.

सीधा सवाल है कि आरक्षण को लेकर बी.जे.पी. की एक पालिसी रही है, उसने राज्यसभा में बिल को पास होने दिया/ या समर्थन किया. लोकसभा में भी पालिसी वाइज ये कहते रहे है, वीमेन रिजर्वेशन के पक्ष में स्टैंड लेते रहे हैं,  फिर यहां कहां समस्या आ रही है.


हमारे  संविधान संशोधन  के लिए क्या होना चाहिए?  दो तिहाई बहुमत . यह बहुमत बहुत दिनों से है. मगर महिला आरक्षण बिल पास नहीं हो सका. कांग्रेस की सरकार बार-बार बोल रही थी सर्व सहमति चाहिए. संविधान के अनुसार दो तिहाई बहुमत की बातो को सर्व सहमति में बदल देना संविधान के उल्लंघन की बात हो गई .  अभी की सरकार यह बोल रही है किसी की जरुरत नहीं है, पूर्ण बहुमत में सरकार है, तो फिर  हमने  उनको यह बोला सबसे पहले  महिला रिजर्वेशन बिल पारित होना चाहिए. हम डेलिगेशन लेकर गए सुमित्रा महाजन के पास, एन एफ आई डवल्यु की तरफ से डेलिगेशन लेकर गए थे.  वह भी महिला के खिलाफ यौन हिंसा पर ज्यादा बात कर रही थी . हमने कहा कि महिलाओं पर दूसरी अन्य प्रकार की गंभीर हिंसा भी हैं. सबसे निपटने के लिए एक बड़ा कदम होगा महिला आरक्षण बिल . वह बोलती रही , हम देखते हैं . जब विपक्ष में थी तो सुषमा स्वराज भी इस पर गंभीर थी . अभी बोल रहे थे कि सेशन को बढ़ाने के लिए भी वे  तैयार हैं   आबादी की लगभग 50% महिलाओं के राजनीतिक सशक्तिकरण में बी.जे.पी.यदि वास्तविक विश्वास रखती है तो प्रथम बिल होना महिला आरक्षण बिल होना चाहिए था. लेकिन मुद्दा क्या  है ? मुद्दा यह है कि दोनो ही , बी जे पी , पितृसत्ता  और मनुवाद को बहुत मजबूत करने वाली पार्टी है. इनके  लिए महिला को  कुर्सी देना कोइ प्राथमिकता नहीं है . यह  सरकार तो बिल्कुल नहीं चाहती है.

जो दिखता है, उसके अनुसार  मुलायम या लालू की पार्टी महिला आरक्षण का विरोध करती रही हैं . लेकिन उनका जो मुद्दा है उससे हम सहमत हैं.  रिजेर्वेशन बिल को लेकर अब मजेदार बात यह है इस बार के चुनाव में प्रतिशत के आधार पर यदि देखें तो त्रिणमूल कांग्रेस के बाद दूसरे नम्बर पर समाजवादी पार्टी ने महिलाओं को रखा. पार्टी के स्तर पर आपकी पार्टी की तरफ से यह  होना चाहिए था. आपकी पार्टी की तरफ से भी ऐसा नहीं हुआ ! 


पार्टी की तरफ से होना चाहिए था ,इसमें कोई दो राय नहीं है. ऐसा होता तो अभी 50% महिला संसद के अन्दर होती. मगर यह  देश एक पुरूष प्रधान समाज है. इसमें हर एक पार्टी इसके  प्रभाव में है, वामपंथी पार्टियां भी हैं . इसमें कोई दो राय नहीं है. उसमें सिर्फ डिग्री में थोड़ा फर्क होगा. वामपंथी पार्टियां  हमेशा हम महिलाओं  की सशक्तिकरण के साथ हैं , महिला की आर्थिक सशक्तिकरण के साथ है. जब भी मौका मिलाता है ये लोग महिला के साथ खड़ी होती है. मगर अपने आप एक पहल कदमी करके महिला के साथ नहीं खड़ी होतीं . वामपंथी पार्टियों  के अन्दर भी लीडरशिप पुरूषों के हाथ में है. ये पार्टियां भी  पुरूष प्रधान सोच से मुक्त नहीं हैं . इसलिए चुनाव के समय सीटें  देते समय महिला सक्षम है कि नहीं यह  देखा जाता है. मगर जब पुरूष को सीट देते हैं , उस समय ऐसी कोई प्राथमिकता नहीं है. तो ऐसा है कि पार्टियां ,  वामपंथी पार्टियां भी ,यदि महिलाओं पर विश्वास रखतीं  तो आज संसद के अन्दर बहुत ज्यादा महिलाएं होती. मगर ऐसा नहीं हुआ.  पहले हमारा  संगठन ‘भारतीय महिला फेडरेशन ’ महिला आरक्षण के पक्ष में नहीं था. हम भी यही सोच रही थी कि आजादी मिली देश को अभी शिक्षा मिलेगी देश को एक समान शिक्षा मिलेगी. जिसमें महिलाएं भी आगे आ सकेंगी . इसलिए हमारी मगर  1975 में  ‘ टुवर्ड्स द इक्वालिटी रिपोर्ट’  , फुलरेणु गुहा की रिपोर्ट, ने हमारी आंखे खोली.

यह रिपोर्ट तो वीणा मजुमदार की थी न ?

बीना मजुमदार ने रिपोर्ट लिखा फूलरेणु गुहा की अध्यक्षता में  कमिटी गठित हुई थी. NFIW, AIWC और महिला कांग्रेस, तीनों संगठनों ने मिलकर सर्वे किया था.

आप लोग आरक्षण बिल में आरक्षण के भीतर आरक्षण से सहमत क्यों नहीं हैं ? 


हम इसके खिलाफ नहीं हैं  यदि संसद इसको लेकर आए तो हम लोग कौन होते हैं, जो इसका विरोध करें. पहले हमारा ऐसा सोचना था सबसे पहले महिला आरक्षण बिल आए, इसके बाद तो अपने आप भी ये महिलाएं इसमें शामिल हो जायेंगी . फिर हमारे ऊपर आरोप आने लगा कि इन महिला संगठनों की वजह से महिला आरक्षण बिल पास नहीं हो रहा है क्योंकि आरक्षण के भीतर आरक्षण से हम ये सहमत नहीं हो रही हैं . फिर हमने एन एफ आई डवल्यु की ओर से एक मीटिंग बुलाई. इस मीटिंग में एन एफ आई डवल्यु ने साफ़ स्टैंड लिया कि हम इसके खिलाफ नहीं है यदि संसद उसी प्रकार का एक बिल लेकर आती है तो हम उसके साथ हैं . लिखित में यह बात सरकार को बताया और लिखित में यह बात सभी पार्टियों को भी बताया.

यह कहना कि संसद लेकर आती है तब हम सहयोग करेगें कि जगह यह कहा गया होता कि आरक्षण के भीतर आरक्षण ही हमारी मांग है, तो क्या बेहतर नहीं होता ? 


हमारी बेसिक मांग महिला आरक्षण ही है . आरक्षण में तो एस सी एस टी स्वतः आ जायेंगे, लेकिन ओ बी सी और धार्मिक मायनारिटी नहीं आ पायेंगे , संविधान में इसका प्रावधान नहीं है.  सबसे पहले संविधान संशोधन होना चाहिए इन्हें चुनाव में आरक्षण देने के लिए. हमारा कहना है कि पहले संविधान संशोधन बिल संसद में पेश होना चाहिए.   इसलिए हमारा कहना है कि पहले उसको लाना चाहिए.हमने सभी राजनीतिक पार्टियों से कहा कि पहले संविधान संशोधन बिल लाओ हम आरक्षण के भीतर आरक्षण के खिलाफ नहीं हैं . बिल का पास न होना राजनीतिक इच्छा शक्ति की कमी और सामाजिक प्रतिबद्धता की कमी को बताता है .

आप  मैरिटल रेप को लेकर भी शायद कोई  कदम उठाना चाह रही थीं ? 


मैं चाहती हूँ कि मैरिटल रेप को लेकर क्रिमिनल एक्ट बने ,उसका दंड निर्धारित हो .

दिक्कत है कि बाल विवाह स्वीकार नहीं है उसके लिए 18 साल होना चाहिए. लेकिन अगर किसी की शादी हो गई और वह 16 साल से नीचे भी है,  तो उसके साथ यौन संबंध को बलात्कार नहीं माना जाता है . 


यही तो  एक कानून दूसरे कानून के काफी विपरीत हैं .  चाइल्ड की परिभाषा क्या है, लेबर के लिए 14 साल, शादी के लिए 18 साल और फांसी के लिए 16 साल होने वाला  है. सबसे पहले चाइल्ड की उम्र क्या है उसको अभी तक परिभाषित नहीं किया गया है.

उस दिशा आप में आप लोगों ने सरकार से बात की है क्या ? 


इस दिशा में अभी इस सरकार से हमने कुछ बात नहीं की है .

पिछली सरकार से आपने बात की थी ? 


हाँ , लेकिन कोई जवाब नहीं मिला. मैं यह देख रही हूँ कि अभी भारत की महिला एक  वार लाइक सिचुएशन से गुजर रही है. यहाँ तक कि न्यायपालिका बार-बार  कहती है कि मैरिटल रेप अपराध नहीं है , अगले सप्ताह वह बोलती है  कि पति-पत्नी अकेले रह सकते हैं . लेकिन पत्नी ने अगर बच्चे का नामकरण किया और उस समय पति को नहीं सूचित किया क्योंकि दोनों अलग रह रहे है तो पति के केस पर वही कोर्ट बोल रहा है  कि इस केश में पति को न बुलाना बहुत बड़ा गुनाह है. पत्नी को बोला जा रहा है कि नामकरण में पति को नहीं बुलाया इसलिए उसको मानसिक क्षति पहुंची है. तो बहुत बड़ा गुनाह किया है. वही मैरिटल रेप उसे गुनाह नहीं लगता . न्यायपालिका भी महिला विरोधी है .

आपका संगठन  महिलाओं के राजनीतिकरण के लिए क्या कर रहा है ?  


जितनी हमारे  संगठन की क्षमता है, उतना हम प्रयास कर रहे है. इसलिए हमने 11,12,13 सितम्बर 2014 को राष्ट्रीय सम्मलेन बुलाया है.नए राजनीतिक परिप्रेक्ष्य के अन्दर हमारे  संगठन का रोल कैसा हो , हम इस पर  बात कर रहे हैं ?

आम तौर पर देखा जा रहा है कि राजनीतिकरण के अभाव में महिलायें यह नहीं समझ पा रही हैं कि उनका हित कहाँ है . बी.जे.पी. की सभाओं में मोदी को सुनने के लिए  महिलाएं पहुंच रही हैं…. 


मुझे नहीं लगता कि मोदी की सभाओं में अपने आप लोग पहुँच रहे हैं . उस भीड़ को देखकर हमारे संगठन पर आप सवाल नहीं कर सकते

मेरा खुद का शोध रहा महिलाओं के वोट बैंक को लेकर, मैंने कई जगह यह भी देखा कि मोदी फैक्टर कोइ फैक्टर नहीं था . यह सही है. लेकिन जब आप कोई मास स्तर पर आयोजन करें तो आप के साथ क्यों नहीं जुड़ पाती है ! 


इस सन्दर्भ में थोड़ी गहराई से देखा जाना चाहिए . देश में बढ़ती हुई मंहगाई से जनता बहुत परेशान है. कहीं स्वास्थय सेवाओं तक पहुँच नहीं है तो कोई शिक्षा नहीं दिला पा रहा है, तो कहीं रोजगार की  दिक्कत है. परिवार एक बहुत संकट के दौर से गुजर रहा है. इसको एड्रेस करने का काम पिछले 10 सालों से सरकार ने किया नहीं है. एन आर जी ए ( नरेगा ) लेकर आई जरूर  लेकिन ठीक से चला नहीं पाई . कम से कम इसको ठीक से चलाये तो बहुत कुछ ठीक हो सकता था . बाजार में काम नहीं, खाने के लिए पैसा नहीं है, लोग बहुत संकट के दौर से गुजर रहे है. परिवार संकट में है . जब मैं खुद संकट से गुजर रही हूँ और  मुझे आके कोई बोले,  हर वक्त टी.वी. में दिखा के बोले कि हमने बहुत सहा है अब बदलाव जरूरी है , तो असर पड़ता है. इधर क्या हो गया वामपंथी पार्टियों  ने एक राष्ट्रीय कन्वेंशन किया. उसमे पारित  प्रस्ताव को कूड़ेदान में डाल के वामपंथी पार्टियों ने बड़ी गलती की. उन्होंने जनता को कोइ भरोसा नहीं दिलाया . कोइ विकल्प सामने नहीं रखा . सरकार किसके साथ बनायेंगे यह भी विकल्प नहीं दिया. इसलिए वामपंथी पार्टियां फेल हो गयीं . कांग्रेस चुनाव से पहले ही भाग गई. फिर जनता को ये पूरा विश्वास हो गया कि ये लोग तो जितने वाले नहीं. इसलिए  वामपंथी पार्टीयां और लोकतांत्रिक पार्टियां असफल हो गयीं . हमारा  संगठन सीधे चुनाव में शामिल नहीं होता  है. हम  मुद्दे  उठाते हैं  राशन का मुद्दा, काम का मुद्दा, समानता का मुद्दा , हम संघर्ष करते हैं  मगर हम सीधे तौर  पर चुनाव में नहीं जाते है.

एक आम महिला की क्या समस्या है ?  हेल्थ है,  बच्चों की शिक्षा है, रोटी कपड़ा मकान है . आप लोग ट्रेड यूनियन की तरह  काम तो कर लेती हैं , आंगनवाडी की महिला को एड्रेस कर लेती है, लेकिन आंगनवाडी की महिलाएं जिनके लिए काम करती है उनको आप एड्रेस नहीं कर पाती हैं . मेरा सिर्फ इतना  कहना है कि रोज-रोज  की जिन समस्याओं से जो महिलाएं जूझ रही है. उनको नहीं एड्रेस करने के कारण  आप उनका  राजनीतिकरण नहीं कर पा रही हैं . 


NIFW एड्रेस कर रहा  है, लेकिन उन तक ये बात पहुंच नहीं पा रही है. गाँव की महिला को  एक मुत्यु प्रमाणपत्र बनवाने के लिए पंचायत में 10 बार जाना पड़ता है. उसको क्यों जाना पड़ रहा है ?  पंचायतमें ये  मुद्दे  हम लोग उठा रहे है. इधर एन जी ओ ने भी काफी नुकसां किया है . एन जी ओ का भी अराजनीतिकरण करने में बहुत बड़ा हाथ रहता है. बहुत सारे एन जी ओ हैं , उनको ले जाके 100 रुपये हाथ में देंगी . हमारे साथ 100 रूपये खर्च करके आना पड़ेगा.  एन जी ओ में जाने पर 100 रूपये उनको मिलेगा.  उन्हें पता है कि राजनीतिक संगठन उनके लिए काम कर रहे हैं . लेकिन यह भी नहीं हो सकता कि भूख से रोते हुए बच्चों को छोड़कर वे हमारे बुलाने पर आ
जाएँ .

आगे आने 5 सालों में आप क्या मुद्दें तय कर रही है?


इस देश की आम महिला के जो मुद्दें हैं, हम  उनको उठाते आ रहे है. महिला के स्वास्थ्य का एजेंडा है, महंगाई का मुद्दा है, फ़ूड सिक्यूरिटी एक्ट को लेकर काम कर रहे है. रोजगार गारंटी को लेकर, भ्रष्टाचार को लेकर, RTI के  सेक्शन 4 का ,जो सबसे बड़ा हथियार है, उसको कैसे ज्यादा प्रयोग करके निचले स्तर पर जो भ्रष्टाचार को ख़त्म किया जाए , इसके लिए हम काम कर रहे हैं.

आरक्षण को लेकर अगले संसद सत्र तक क्या योजना है ..  

संसद के अन्दर बैठने वाला खुद बोल दे कि मैं रेप करूंगा विपक्ष की महिला का तो स्थिति की गंभीरता को समझा जा सकता है . हमलोग फिर भी इस विपरीत परिस्थिति में महिला आरक्षण के लिए दवाब बानाएंगे कि अगले सत्र में इसे जरुर लाना है.

लित महिलाओं के साथ  यौन-हिंसा में  जाति भी शामिल है कोई भी पार्टी इसे एड्रेस नहीं करती , वामपंथी पार्टियां  भी.  अभी भी वे क्लास तक सीमित हैं . अभी भगाणा कांड के लोग बैठे थे.


भगाणा कांड के खिलाफ  जो लोग बैठे हैं ,  उनके साथ हम ज्यादा सक्रिय तो नहीं हो पाए लेकिन उनके  मुद्दे  को जरुर उठाया है. चाहे वो महिला आयोग के स्टार पर हो या अनुसूचित जाति –जनजाती आयोग के स्तर पर. क्योंकि यह  सिर्फ एक रेप का मामला नहीं है. बलात्कार  तो इसलिए हो गया क्योंकि दलितों को  उधर से भगाना है. उसमें  भूमि का भी मामला है. जिन दलितों  के हाथ में भूमि है,  वे  पढ़ रहे हैं , आगे आ रहे है. यह उच्च जाति के लोगों को अच्छा नहीं लगा. निस्संदेह यह ‘जाति-हमला’ था.

संगठन के स्तर पर आपके यहां दलित महिलाएं है ! 
क्यों नहीं हमारे  संगठन में हर  ग्रुप की महिलाएं है. सिर्फ दलित  ही नहीं, मैं भी हूँ .

आप तो दलित नहीं कहलाएंगी ! 
मेरे  दोस्त दलित हैं . मैं क्रिश्चन हूँ.  ऐसा नहीं है कि मैंने जन्म से दलित नहीं हूँ तो मुझे कुछ पता नहीं है.

पार्टी लाइन से ऊपर उठ कर महिला राजनीतिज्ञों की एक एकता बनी , अब लगता है टूट जाएगी. 


आरक्षण के मुद्दे को लेकर अभी भी एक जुट है.

लेकिन परिणाम कहां है ?


देखो एक दिन में ये परिणाम नहीं आयेगें. आजादी एक दिन में लड़कर मिलने वाली नहीं थी. ड्रेस कोड का जब मामला उठा तो सभी पार्टियों की महिलायें एक साथ आ गयीं . पितृसत्ता को चुनौती देना इतना आसान नहीं है. नहीं तो महिला आरक्षण बिल कब के  पास नहीं हो गया होता !  इस देश की पैट्रीयार्की इतना आसानी से कुर्सी नहीं देना चाहती है. हमारे देश में पूंजीवाद एक बहुत ही आधुनिक रूप में पहुंच गया है  मगर रूढ़िवादिता आज भी आधुनिकता के साथ बहुत मजबूती के साथ बढ़ रही है . लड़ना इतना आसान नहीं है , हम भी अब और अनुभव ले रहे हैं . हम 11 सितम्बर को ‘यंग वीमेन डे’  मना रहे हैं .  उसमे हमारी प्राथमिकता दलित, आदिवासी और अल्पसंख्यक वर्ग की युवा महिला रहेगी.

स्त्री – संस्कृति का हरकारा : यू आर अनंतमूर्ती

प्रो.परिमळा अंबेकर

प्रो.परिमळा अंबेकर हिन्दी विभाग , गुलबर्गा वि वि, कर्नाटक में प्राध्यापिका और विभागाध्यक्ष हैं . परिमला अम्बेकर मूलतः आलोचक हैं तथा कन्नड़ में हो रहे लेखन का हिन्दी अनुवाद भी करती हैं . संपर्क:09480226677

( यूआरअनंतमूर्तीको याद करती प्रोफ. परिमला अम्बेकर )

उडुपी.राजगोपालाचार्य अनंमूर्ति का रचना संसार अपने आप में जीवन की
हर संभवित और संभावी सीमाओं को पहचानकर उन सीमाओं को तोडने की सृजनात्मक
प्रक्रिया का विराट स्वरूप है , उनके द्वारा प्रतिपादित वैचारिक कहन, हर
व्यक्ति के घर की अगली और पिछली दालानी व्यवस्था के साथ , बाहरी व्यवस्था
को समीकृत करने के टूकों को बताते हैं , और उनके द्वारा दिये गये अपने ही
तरीके के तर्क, विमर्शात्मक कथन, विवाद संवाद की अंगीठी की आग को फूॅंक
देकर हर जमीनी संवेदना को और हर प्रगतिशील सोच को जीवंत रखते हैं। देशीय
संवेदना और प्रादेशिक संस्कृति की महेक से स्पंदित यू आर अनंतमूर्ति का
रचना संसार बडी गंभीरता से राष्ट्रीय समकालीन और सार्वकालिक वास्तविकताओं
की ओर और जीवन के शाश्वत मूल्यों की ओर एक साथ, अपने मानवीयता के हाथ बढाता
है । विरोध विभाजन और विषमताओं के मध्य समन्वय, समीकरण और सामंजस्यता के
जीवन मूल्यों को खोज निकालने की पनडुब्बे की माहिरता  एवं प्रतिबद्धता
अनंतमूर्ति को हासिल थी । वर्ण ,जाति धर्म और भाषायी व्यवस्था के मूल में
निहित भारतीय मानसिकता को पहचानकर, अनुभव और चिंतन के बलबूते, मानवाधारित
मान्यताओं के तर्क प्रस्तुत करने  का तर्ज हमें , अनंतमूर्ति के जीवन और
साहित्यिक व्यक्तित्व में सहजता से मिलता है ।

कन्नड साहित्य लोक में, ये दो उपमाये अधिक प्रचलित है
एक, सनातनी  व्यवस्था के लिए अश्वथ् वृक्ष के प्रतीक का और दूसरा, जमीनी
संस्कृती की संवेदना को अपने व्यक्तित्व में रचायेबसाये , आध्यात्मिक चेतना
की ऊर्ध्वमुखी  विकास की व्यक्ति प्रज्ञा के लिए श्रवणबेलगोळ के
गोम्मटेश्वर की मूर्ति की प्रतिमा का सार्थक प्रयोग मिलता है ।  यू आर ए का
व्यक्तित्व इन उभय प्रतीकों के तात्पर्य को अपनी आंतरिक चेतना में बसाकर,
मानवीय समुदाय के विकास के लिए प्रस्तुत रहा एक कथात्मक प्रयोग लगता है ।
इसीलिए तो मूर्ति बडी सहजता से मातृ संवेदना को अपनी चेतना का हिस्सा बना
सके और मातृ संस्कृति को अपनी सोच का आधार भी। जितनी गंभीरता से यूआरए
परंपरा एवं आधुनिक प्रज्ञा पर अपनी लेखनी चलाते थे उतनी ही सहजता से वे
देशीय परिसर की संवेदना को अपनी कहानियों में चरित्र के रूप में गढते थे ।
ज्ञानपीठ पुरस्कार के अपने अधिवकतव्य में जितनी जागरूकता से भूमंडलीकरण और
आधुनिकता की होड में देसी संस्कृति और भाषायी अस्तित्व के प्रश्नों से
जूझते दिखायी देते हैं उतनी ही सहजता से वे भारतीय समाज के देसीय परिसर के
संरक्षण की और मातृ संस्कृति के पोषण के  सामाजिक दायित्व की भी चर्चा करते
थे ।

यू आर अनंतमूर्ती

मातृ संवेदना का एक और आयाम है आपसी साझेदारी की
, आपसी मेलमिलाप की । आधुनिक विकास, मेट्रो कल्चर की बेरोक दौड के चलते ,
मिटते जा रहे सामाजिक आपेदारी और आपसी मेलमिलाप के संदर्भ में प्रतिक्रिया
करते मंगलूर के किसी कार्यक्रम  में उन्होने कहा था, ‘‘ हमें फिर से जुओं
की संस्कृति को गले लगाने की जरूरत है । आज हम समाज के हर वर्ग और क्षेत्र
से इस संस्कृति  को मिटता हुआ देख रहे हैं । सिर के बालो में पलने वाले
जुएॅं सामान्य नही होते। वे हमारे समाज के बडे गंभीर सामाजिक अंर्तजालिक
व्यवस्था
(Social Networking System)
के हिस्से हैं । ‘ अनंतमूर्ति  का मानना था कि, पहले, घर का सारा कामकाज
खत्म करके मुहल्ले की सारी औरतें घर के आंगन में बैठ जाती थी । बोलती थी ,
सारे जहाॅं की बातें आपस में बाॅंटती थी साथ ही साथ अपने बच्चों के बालों
में पडे जुएॅं भी बीनती थी, मारती थी । इसीलिए जुएॅं की संस्कृति दुनिया
जहान  को जोडता है, आपसी साझेदारी की भावना को बढावा देता है और तो और आपसी
बहनापे की , आपसी नोक- झोक की , आपसी सामाजिक सहयोग की मातृ संस्कृति की
ऊष्मा  को भी बचाये रखता है ।

सनातन, संप्रदाय, आध्यात्मिकता , जीवनदर्शन के  गंभीर चिंतन
और वाद विवाद में डूबी हुई  प्रबुद्ध चिंतक और साहित्यकार की लेखनी और
सोच, अपने समाज में प्रचलित सहज देसीय आचार व्यवहार को , आचरण संवेदना को
भी उतनी ही गंभीरता से परिगणित करते हुए , अतीव आधुनिकीकरणता के टक्कर में
देसीय एवं अंचलीय अस्तित्व को बचाने की ,उसे फिर से अपनाने की माॅंग रखती
है , यह निस्संदेह अतीव सहज है प्रामाणिक है, अनुभव जन्य है । जैसे कबीर की
विरहिणी , परमात्मा के प्रति के अपने हृदयस्थ प्रेम को, आध्यात्मिक दर्शन
को यूॅं इतनी सहजता से, जमीनी अहसास के साथ बाॅंटती है – दुलहनी गावहुॅं
मंलचार।घरि आये हौं राजा राम भरतार ।’ मातृ या स्त्री संवेदना , की पहचान
जितनी सहजता से मध्ययुगीन भक्त कवि कर पायें हैं ,उतनी ही सरलता से यूआरए
कर सके हैं । सारे संबंधों से ऊपर उठकर, जिस तरह मातृ हृदय, अपने कोख के
जायों की, घर परिवार वालों की, सगे संबंधियों की अपने घेराव के सारे
सामाजिक अस्तित्व की अच्छाई और प्रगति चाहता है ठीक उसी तरह मूर्तिजी का
साहित्य और विचार, बहुभाषी और संस्कृति बहुल भारतीय समाज के विकास और
सौहार्दता के पक्ष में ठहरते दिखता है।

सम्मानित होते अनंत मूर्ती

सूरदास की गोपिकायें, अपने घर आंगन में उद्धव को घेरकर बैठती हैं,
उसके सामने अपना दुखडा रोती हैं, अपने प्रेम की असहायता की बातें करती
हैं, उद्धव को बातों में भरमाती हैं , व्यंग्य कसती हैं और अंत में अपने
सगुन प्रीति की सच्चाई का, सार्थकता का , अपने प्रेम की ब्रजीय अस्मिता का
ऐलान करती है, डंके के चोट पर अपने को कृष्ण की आराधिका होने की बात कहती
हैं, उनके गणित के अनुसार उनका सगुन कृष्ण, ईशपुर काशी के निरगुन रूपपर
हजार गुना भारी पडता है । मुझे लगता है , यू आर अनतमूर्ति भी सूर की गोपिका
की संवेदना रखते हैं । उनकी मानसिक संवेदना भी वैभव भरे मथुरा की तुलना
में प्रेमनेह भरे ब्रज की मिट्टी को चाहने वाली यशोदा और गोपियों की मानसिक
संवेदना के साथ टयूनिंग रखती हैं ।  ‘हे उद्धव हमतो नंदघोष के वासी ‘के
ऐलान में छिपी आंचलीय संवेदना की तीव्रता, स्थानीय अस्मिता का अहसास,
क्षेत्र एवं प्रदेश का नाभीनाल संबंध की चेतना हमे उडुपी.राजगोपालाचार्य
अनंमूर्ति की संवेदना और सोच के संसार में मुखरित मिलता है ।

भारतीय भाषा साहित्य में ऐसे अनेको अंग्रेजी/हिन्दी प्रोफेसरों के उदाहरण मिल जाएंगे,
जो अपने अध्ययन अध्यापन की भाषा और भाषा -संस्कृति को त्यागकर, रचनाकर्म
के लिए मातृभाषा की ओर अपनी मातृसंस्कृति की ओर मुडे  हैं । बी.एम.श्री की
ही तरह , उनके बाद, कन्नड के रोमांटिक युग के कवि ( कुवेंपु कुप्पळ्ळी
वेंकटप्प पुट्टपप)  की लेखनी ,Beginner’s Muse,
से निकल तो पडती है लेकिन वे बहुत जल्द ही मातृभाषा कन्नड का पांचजन्य
फॅूंकते हैं । अंगेजी में लिखना आरंभ करने वाले अनंतमूर्ति बडी ही
प्रज्ञापूर्वक मातृभाषा कन्नड में लिखना आरंभ करते हैं । भाषा समुदाय की
पहचान, भाषायी अस्मिता की संवेदना और भाषायी संस्कृति का अहेसास और अनुभव,
किसी भी गंभीर लेखक को अपनी जडों से दूर नहीं ले जा सकते । स्थानीय भाषा
एवं संस्कृति और वतनी संस्कारों की प्रामाणिकता अनंतमूर्ति को भी अधिक समय
तक अंग्रेजी भाषा संसार में ठहरने नहीं देती । उनका यह मानना था कि ‘‘मातृ
भाषा को त्यागकर अंग्रेजी में लिखना जैसे अपने बचपन को खोना है, अपनी बीती
दुनिया से जैसे दूर लेजाना है, अपने यार रिश्तेदारों को खोना है और तो और
अपने जडों को ही खोना है । ‘‘  भारतीपुर, संस्कार, घटश्राद्ध सुरगी, सूर्यन
कुदुरे आदि कथासृजन के परिश्रम की सफलता का श्रेय उनके अनेक विमर्शक और तो
और स्वयं अनंतमर्ति जी भी अपने इन्हीं जडों की पहेचान की दृष्टि को देते
हैं ।

मातृ संस्कृति हमेशा से मातृ भाषा का पोषक  रही है । आॅंचल
का आगोश, मातृत्वता और वात्सल्यता के संवहन के लिए सर्वदा से मातृ भाषा का
समर्थन करते आयी है ।  कारण अनंतमूर्तिजी सर्वदा से  मातृभाषा में शिक्षा
देने की वकालत करते रहे थे । उनका यह मानना था कि देश में श्रेष्ठ साहित्य
का सृजन केवल मातृ भाषा में शिक्षा प्रदान करने से  संभव है । कल्पना और
सपनो के पंखों का खिलना, सोच विचार की बुद्धिमत्ता की गहनता का रोपण केवल
मात्र मातृ भाषा के व्यवहार और अभ्यास से संभव है। प्रादेशिक भाषा साहित्य
की जडों को प्रादेशिक भाषाओं की संसकृति में पहेचानते हुए मूर्तिजी कहते थे
,‘‘ साहित्य को अल्पसंख्यक  और बहुसंख्यक  जैसे धार्मिक वर्गो में बाॅंटा
नहीं जा सकता। क्यूॅं कि साहित्यकार का परिचय तो उसकी प्रोदशिक भाषा और
संस्कृति के आधार को पाती है, धर्म का वह मोहताज नहीं।‘‘ एक और गंभीर अंश
की ओर अनंतमूर्ति संकेत करते रहे थे , ‘‘ जिस तरह पहले साहित्यकार का परिचय
अंतरपा्रंतीय होता था, बंगाली के टैगोर की और कन्नड के कारंत के साहित्य
की चर्चा दूसरे प्रांतों में भी होती थी, उस संस्कृती और सोच को हमें फिर
से दोहराना है ।
विचारगोष्ठियों में अपनी प्रांतीय साहित्य के साथ साथ
दूसरे भाषा और साहित्य को स्थान देना अधिक जरूरी है.’

मोदी आये तो उन्होंने देश का दुनिया ही छोड़ दी

सुरगी कर्नाटक के ब्राम्हण संप्रदायस्थ परिवारों में प्रचलन में रही प्रथा है ।
सुरगी, हर धार्मिक एवं उत्सविक आचरणों में संपन्न होने वाली विशिष्ठ मंगल
स्नान की विधि आचरण का नाम है। विवाह, उपनयन जैसे समारोह में वधू और वर को,
उपनयन के वटु को उनके अपने कुटुंब के सदस्यों के साथ बिठाकर, चहुॅं ओर
कलशों को धागे से बांधकर , सारी सुहागिनें मिलकर मंगल स्नान कराती है ।  यह
अपने आप में अद्भुत पवित्र प्रथा है जिसके साथ हर परिवार की अपनी अनिवार्य
सांस्कृतिक और धार्मिक प्रतिबद्धताएॅं बंधी हुई  होती हैं। यह सचमुच
प्रतिकात्मक और संवेदनीय है कि यूआरए  ने अपनी आत्मककथा को सुरगी का नाम
दिया है ।  दिसंबर 21, 1932 में जिला शिवमोग्गा के तीर्थहळ्ळी के घने अरण्य
प्रदेश के मेळगे गाॅव से आरंभ हुआ उनका जीवन विभिन्न सामाजिक, राजकीय एवं
साहित्यिक लोक के घेराव की जिंदगी जीते जाता है । काल चक्र की अनंतता,
वर्तमान भूत और भविष्य के चिरंतन नित्य नूतन संबंध की कडियों को अपने
अद्भुत प्रामाणिक चिंतन और भावना की सूक्ष्मता से वे जोडते जाते हैं । हर
आधुनिक सोच और भाव के पीछे के विशाल और गहन परंपरा एवं संप्रदाय के कैनवास
को अपने साहित्य में उकेरते हैं और साथ ही परंपरा एवं संप्रदाय की अतीव
कट्टर प्रतिगामी आडंबरी आयाम की निष्क़्रियता  के जडों को प्रखर व्यंग्य और
खंडनात्मक रवैय्ये  का मठ्ठा देते हैं । स्थानीय मलेनाडू प्रदेश के
अजीबोगरीब जीवन संस्कृति, वहाॅं के जीवंत चरित्र और आंचलीय जीवन व्यवस्था
एवं मान्यताओं का विशाल सृष्टि रचते हैं । सुरगी के धागों के घेर में
परिवार और संप्रदाय के संस्कारों के बंधन से लेकर , बाह्य समाज और उसकी
व्यवस्था, समाज के अपने प्रतिबंधन, उसका अपना प्रामाणिक सांस्कृतिक जीवन और
हर जनांग और समुदाय वर्ग की अपनी धार्मिक प्रतिबद्धताओं के बंधन के धागे
भी जुडे हुये हैं । और इन सबसे बढकर धागों का एक अव्यक्त बाहरी घेराव भी
बंधा जुडा मिलता है , मानवीय जीवन बंधुत्वता का !! स्नेहमय विकासपूर्ण
संसार का !! यूआरए अपने लेखलोक में सुरगी के मंगन स्नान की पवित्रता और
श्रृजुता के माध्यम से जीवन के इन्हीं अंतरी और बाहरी प्रतिबद्धता के धेरों
के रूपक बांधते जाते हैं ।

आंतरिक संघर्षो में, भीतरी समाज- व्यवस्था के वर्ग-वर्णगत क्लेशों में,
विवादों के घेरों में सदा अपने आप को झोंकने वाले यूआरए ने  सर्वदा ही
बहुजन हिताय की सोची है । हर सोच और संवेदना के पक्ष और विपक्ष को एक साथ
परखकर विरोध के सारे संभावनाओं को प्रस्तुत करनेवाले सचेता वे रहे हैं ।
इसीलिए तो उन्होंने कहा हैं    ‘‘मैं जातिवादी ब्राह्मणों का समर्थन नहीं
कर सकता । उनके विरोधी रहे, लेकिन उनके ही जैसे ही रहे ब्राह्मणविरोधियों
का भी मैं समर्थन नहीं कर सकता । इसीलिए इन लोगों के आंतरिक कलहों में, मैं
कहाॅं अपने आप को खडा पाता हूॅं, इसका विवरण देने में ही मेरी सारी आंतरिक
शक्ति व्यय हो जाती है .’

मातृ संस्कृती का हरकारा, यू आर अनंतमूर्ति, अगस्त 22, 2014 के रोज ,
अपने जीवनरूपी सुरगी के आखरी मंगलस्नान को अग्निस्नान का रूपक प्रदान कर
गये । अनंत में लीन उस अनंत के प्रति, अनंत नमन प्रस्तुत है ……’लोचन
अनॅंत उघाडिया, अनॅंत दिखावणहार।’

सहायता सौजन्य:
1 विजय कर्नाटका , दैनिक, कन्नड पत्रिका .
2 डेक्कन हेराल्ड, दैनिक, अंग्रेजी पत्रिका .
3 कन्नड प्रभा, दैनिक, कन्नड पत्रिका .
4 विजय विहार, दैनिक, कन्नड पत्रिका .

वे लाइव पोर्न में प्रदर्शन के पूर्व ईश्वर को प्रणाम करती हैं !

स्वतंत्र मिश्र


स्वतंत्र मिश्र पेशे से पत्रकार हैं ,स्त्रीकाल के प्रिंट एडिशन के सम्पादन मंडल के सदस्य भी हैं . इनसे उनके मोबाइल न 9953404777 पर सम्पर्क किया जा सकता है.

( स्वतंत्र मिश्र ने थाईलैंड की यात्रा के अपने बहुपठित यात्रा वृत्तांत का यह अंश स्त्रीकाल के प्रिंट एडिशन के लिए तैयार किया था . विशेषांकों के प्रकाशन के कारण हम इसे प्रकाशित नहीं कर पाए थे. स्त्रीकाल के ऑनलाइन पाठकों के लिए हम इसे यहाँ प्रकाशित कर रहे हैं .)

थाईलैंड, मलेशिया, सिंगापुर आदि कुछ ऐसे एशियाई देश हैं, जिन्हें ‘सेक्स टूरिज्म’ के रूप में प्रसिद्धि मिली या यूं कहें कि इनकी पहचान के तौर पर ये बातें चस्पां हो गई हैं। यही वजह है कि बिजनेस भास्कर में काम करने के दौरान मेरे संपादक यतीश के. रजावत ने आकर थाईलैंड जाने की पेशकश दी तो आॅफिस के ज्यादातर लोगों को लगा कि अब तो स्वतंत्र तो देह-स्नान (सेक्स) कर आएंगे। हमारे बीच ज्यादातर लोग धरती पर स्वर्ग का पाना कई-कई या रोज-रोज सेक्स मिलने को मानते हैं। आप ज्यादातर पत्र-पत्रिकाओं और उनके वेबसाइट को देखकर इस बात का अंदाजा ले सकते हैं। खैर, तीन-चार दिन की यात्रा में मैंने वहां की औरतों की जिंदगी को और वहां देह-व्यापार के बीच उनके भीतर दया,माया और करूणा को समझने की कोशिश की। इंदिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय एयरपोर्ट से उड़ान भरने के बाद बैंकाक और उसके बाद वहां से घरेलू वायु सेवा के जरिये फुकेट पहुंचा। फुकेट एयरपोर्ट पर टैंपो ट्रेवलर हमें अंडमान सागर की लहरों पर मौज कराने के लिए हमारा इंतजार करा रही थी। बहुत ज्यादा थके होने के बावजूद मैंने समुद्र के सीने पर खूब धमाचैकड़ी की। नमकीन पानी के छींटे आंखों में तेजाब की तरह जलन पैदा करते और अगर स्टीमर की तेज गति से उड़ने वाले पानी के छींटे मुंह के अंदर घुस जाते तो एकबार तो उल्टी करने का जैसा मन हो जाता था। पूरे दिन हम अलग-अलग पत्रकारिता संस्थान के पत्रकार मित्रों के साथ रिलायंस द्वारा प्रायोजित इस ट्रिप का लुत्फ उठाते रहे। ज्यादातर पत्रकार कई देशों का दौरा कर चुके थे। मेरे लिए हवाई जहाज और विदेश दौरे का यह पहला मौका था। दिनभर भर कुदरती नजारों का लुत्फ उठाने के बाद हमें एक पांच सितारा होटल ले जाया गया और यह तय हुआ कि दो घंटे बाद हम डिनर के लिए चलेंगे। एक भारतीय रेस्टोरेंट में स्वादिष्ट भोजन करने के बाद रिलायंस के अधिकारी शरद गोयल ने हमें सेक्सी शो जाने का आमंत्रण दिया। आज की तारीख में सेक्सी शब्द का इस्तेमाल बेटी अपने बाप को सुंदर या स्मार्ट बताने के लिए करती हैं, सो हमने इसे बहुत अनौपचारिक तौर पर लिया और पांच लड़कियों के साथ हम तीन लड़के जाने को तैयार हो गए। वहां हमें हमारी गाइड नाडिया के साथ भेजा गया। ढाई हजार बाट यानी तब भारतीय मुद्रा 4,000 रुपये के करीब का एक-एक टिकट लेकर हमें थमा दिया गया।

स्त्रीकाल पर स्वतंत्र मिश्र को पढ़ने के लिए क्लिक करें :

जोहरा आपा तुम्हें लाल सलाम

किन्नर अब ‘ ‘थर्ड जेंडर’ की तरह पहचाने जाएंगे 

ज्यादा अश्लील हैं मर्दों के पहनावे : बुल टी शर्ट यानी अश्लील टी शर्ट !

थाईलैंड में देह व्यापार

सेक्सी नहीं, सेक्स शो था वह


हम अब जे. जे. क्लब के अंदर जाने की तैयारी करने लगे। मुझे लगा कि यहां डिस्को या ओपेरा जैसा कुछ चलता होगा। औरतें थीं इसलिए अंदर क्या होगा की कल्पना इससे ज्यादा करना मुनासिब भी नहीं था। हट्टे-कट्टे नौजवानों (बाउंसर) ने कैमरा और मोबाइल लाॅकर में रखवा लिया और हमें चाबी पकड़ा दी। अंदर घुसते ही औरतें अलग बैठ गईं और हम अलग। अंदर जो दृश्य दिखा, बस उलटे पैर भाग खड़े होने का मन हुआ। लेकिन बाउंसर की फड़कती भुजाएं और तने हुए चेहरे देख डर से एक कुर्सी से चिपक गया। मंच पर लड़कियां पूरी नंगी होकर मर्दों की हुकूमत को चुनौती देती हुई मुस्करा रही थीं। स्टेज पर पूरे लाइव पाॅर्न का बंदोबस्त था। लड़कियां अपने हाव-भाव से थियेटर में बैठे लोगों को उकसा रही थी। स्टेज के पीछे से एक नंग-धडंग छोटी उम्र का लड़का, छोटी कद-काठी, लेकिन सुडौल शरीर वाला पाॅर्न किंग की तरह दर्शकों के सामने पेश हुआ। उसने चुनौती देने वाली इन वस्तु किस्म की लड़कियों से चुनौती ली और यहां मौजूद लोगों को यह समझाने की कोशिश की कि इनका भोग किस-किस तरीके से किया जा सकता है। वह लड़की से सेक्स करता है और उसकी कोशिश होती है कि लोगों को यह सब साफ-साफ दिखाई दे। वे अपने उपभोक्ता से वफादारी जो निभाना चाहते हैं। अब तक सड़कों पर या खुले में सेक्स करते तो कुत्ते, घोड़े, गधों या किसी अन्य जानवरों को ही देखा था। जानवरों को भी इस प्रक्रिया में बाधा पड़ने पर गुस्साते हैं। मनुष्यों ने अपने को सभ्य बनाया और उसने सेक्स जैसी बात को बहुत पर्दे में या निजी तौर पर रखने की कोशिश की। सेक्स उसे शरीर और मन की एक बड़ी जरूरत के तौर विकसित किया। इसे प्रेम की उन्नत अभिव्यक्ति के तौर पर जाना-समझा। सेक्स के सार्वजनिक प्रदर्शन को मनुष्य ने अश्लील माना। यही वजह है कि बिस्तर की बात उसे बहुत निजी लगती है। यह निजत्व उसे अधिकार और खुशी भी देती है। लेकिन पूंजीवाद ने इसे दिखावे और प्रदर्शन की वस्तु बना दिया। प्रेमी अपनी प्रेमिका के साथ हमबिस्तर होते हैं और उसका एमएमएस बनाकर प्रचारित करने लगे हैं।
यह सच है कि आज की तारीख में भारतीय समाज में ‘नंगा’ एक निरर्थक और घृणा के तौर पर इस्तेमाल होने वाला शब्द है। पर मैं यह देखकर हैरत में पड़ गया कि यहां तो नंगई देखने के लिए इतनी महंगी कीमत देने को भी लोग तैयार हैं। यह हमारे सभ्य समाज के विरोधाभास को भी उजागर करती है।

श्रमशील थाई स्त्री

यहां मंटो की एक कहानी ‘आवाजें’ की याद हो आई। कहानी में एक युवा किरदार की शादी होती है। वह दुल्हन को अपने घर ले आता है। उसका घर लोगों से भरा-पूरा है। कमरे कम हैं। इसलिए निजी क्षणों के लिए उसे कोई अलग से कमरा मुहैया नहीं कराया गया है। वह रात के समय छत पर या खुले में सोता है और अपनी उमंगों को परवान चढ़ाने की स्वभाविक ताक में भी रहता है। वह जब यौन-क्रिया में लिप्त होता है तो कभी किसी के खांसने या फिर करवट लेने में आवाज होने से उसे ब्रेक लगाना पड़ता है। उसकी सारी क्रियाएं ढीली पड़ जाती हैं और उसकी हताशा बढ़ने लगती है। प्रेम के लिए दो निजी पल मुहैया नहीं हो सकने की हालत में अंततः वह पागल ही हो जाता है। इस तरह के हालत आपको भारत की तमाम झुग्गियों में देखने को मिल जाएंगे। वास्तविकता तो यह है कि कोई भी संवेदनशील आदमी इस निहायत निजी क्रियाओं को जान-बूझकर सार्वजनिक होने की इजाजत नहीं दे सकता। संभोग के सार्वजनिक प्रदर्शन की इजाजत कोई बीमार मानसिकता वाला व्यक्ति ही दे सकता है। अंग्रेजी में भी सेक्स के लिए एक बहुत ही प्यारा शब्द ‘लव मेकिंग’ है। थियेटरनुमा इस हाॅल में गोरे और गोरियों की संख्या दो-तिहाई से भी ज्यादा थी। हाॅल के अंदर दर्शकों में कोई स्थानीय नागरिक नहीं नजर आ रहा था। वहां काम करने वाली लड़कियों और लड़के को स्थानीय तौर पर परेशानी नहीं पैदा हो, इसलिए ऐसी व्यवस्था की गई थी। औरतों को वस्तु के तौर पर दिखाने का सीधा प्रसारण मैने पहले सुने या काॅलेज में पोर्न मूवीज और टेलीविजन में ही देखे थे। हालांकि लगभग हिंदी सिनेमा में अब औरतों को वस्तु के तौर पर पेश किया जाता है। अब औरतें भी इसमें विशेषज्ञता हासिल कर चुकी हैं और उन्हें पता है कि किनके साथ किस तरह का व्यवहार किया जाना चाहिए। किनके लिए कितना किया जाना चाहिए। मैं यहां ग्लैमर्स जीवन जीने की आकांक्षा रखने वाली औरतों के बारे में बात कर रहा हूं। आम जीवन में भी खासकर महानगरों में लड़कियां खुद को कमोडिटी की तरह पेश कर रहीं हैं। खैर, नंगी आखों से यह सब देखने के बाद मुझे यह अनुभव हो गया था कि भारत के संपन्न लोग इन देशों में क्यों आते हैं? और क्या करने आते हैं? किन बातों के दम से इन देशों का पर्यटन गुलजार हो रहा है? यहां की सरकारों ने पर्यटन में मसाला डालने के लिए औरतों को वस्तुवादी बनाने की मौन सहमति दे रखी है।

थाई महिलायें शुक्रवार के बाजार में सामान बेचती हुई

यहां सेक्स या देह-व्यापार अपराध नहीं एक काम की तरह लिया जाता है। यात्रा के दौरान ही एक पत्रकार मित्र ने बताया कि यहां देह-व्यापार करने वाली औरतें अपनी बदन को पेश करने से पहले ईश्वर को याद करती हैं। हाथ जोड़ती है और फिर ग्राहकों के सामने खुद को परोसती हैं  शायद वे ऐसा अपने को इस पेशे को चुनने और अनजान लोगों के साथ हमबिस्तर होने के पाप ग्रंथि से बाहर करने के लिए करती होंगी। दूसरे या अनजान लोगों के साथ सेक्स एक पेशे के बतौर करना निश्चित तौर पर बहुत पीड़ादायी होता होगा। सेक्स दो लोगों को जोड़ने का काम करता है इसलिए वह बहुत आनंददायी भी होता है। लेकिन पेशा करते वक्त आप पैसा तय कर सकते हैं न कि किसके साथ और कब सेक्स करना है कि आजादी नहीं ले सकते हैं। जाहिर सी बात है कि ऐसे सेक्स का सुख तो पैसा देने वाले को ही मिल सकता है क्योंकि उसका हाथ वहां खरीददार की तरह उपर होता है। जो भी हो, वहां इस पेशे में नैतिकता भी है। अगर कोई व्यक्ति सेक्स का सौदा तय करने के बाद ऐसा नहीं करना चाहे तो उसे आदरपूर्वक पैसे वापिस कर दिए जाते हैं। ईश्वर का धन्यवाद तो थाईलैंड में लड़कियां बाॅडी मसाज करने से पहले भी करती हैं, इसका अनुभव तो मुझे भी अब है। खैर, इस शो के दौरान एक के बाद एक वाह्यात दृश्य पेश होतेे रहे और मैं तनावग्रस्त। इन बातों का मुझे इतना बुरा लगा कि मेरी नींद कम हो गई और डाॅक्टर राजीव कौशिक को मेरे उच्च रक्तचाप की गोली बदलनी पड़ी। अन्यथा, पिछले तीन साल से भी ज्यादा समय से सबकुछ सामान्य ही रह रहा था। लगभग 20-25 मिनट तक इसे झेलने के बाद मेरे साथ बैठे दो श्रद्धालु योद्धाओं को भी उबकाई आने लगी। हम बाहर आ गए। हमारे साथ गई लड़कियां हमसे पहले ही थियेटर से रफा-दफा हो गई थीं।

थाई दुल्हन

लगभग 12 बजे रात का समय हो रहा था सड़कों पर यातायात कम जरूर हो गया था लेकिन अभी भी रौनक कम नहीं हुई थी। सड़क के दोनों किनारों पर झुंड की झुंड सुंदर लड़कियां खड़ी थीं और लंबा आलाप लेकर राहगीरों और खासकर पर्यटकों को कामोत्तेजक अंदाज में ‘है……..ललो म…साज, है………ललो म…….साज’ कहकर आकर्षित करने की कोशिश में जुटी थीं। लेकिन न मेरे पास अनाप-शनाप पैसे थे और न ही जिंदगी में ऊर्जा की इतनी कमी। वैसे भी परदेस में हम जैसे वीर लोग पहली बार गांव से दिल्ली आते समय बुजुर्गों की दी गई सलाह (जीभ और ….. पर कंट्रोल रखोगे तो जहां में प्रतिष्ठा बची रहेगी) का खयाल रखने की कोशिश करते हैं। बुजुर्गों की कही बात मुझे सौ फीसदी सच लगती है। मैने उनकी बात लगभग 18 साल से ताबीज की तरह संभाल कर रखी हुई है। रास्ते में चलते-चलते ही जोयता और महुआ मिल गईं। वे खरीदारी कर रही थीं। मैं उनके साथ ठहर गया और देखने लगा कि शब्द (बेटा) या रीना (पत्नी)  के लिए कोई ऐसी चीज मिल जाए। आधे-पौने घंटे के बाद इस दुकान से उस दुकान में मोलभाव करने के बाद उन्होंने एक ढाबे पर ग्रीन चिकन और चावल खाया। यहां के ढाबे पंजाब की तरह चटख रंगों से सजे हुए थे। मुझे भी खाने के लिए उन्होंने बहुत कहा पर मेरी हिम्मत नहीं हुई। खाना खाने के बाद हम पैदल चलते हुए होटल आ गए।

मैं अपने कमरे पहुंचा तो उमेश्वर जी वहां नहीं मिले। आधे घंटे बाद जब वह आए तब मैंने उनसे शो के बारे में बताया तो उन्होंने कहा कि स्वतंत्र यहां की अर्थव्यवस्था इसी इंडस्ट्री पर टिकी हुई है। हमलोग इस प्रण के साथ नींद की आगोश में गए कि सुबह पाटोंग बीच पर माॅर्निंग वाॅक के लिए जाएंगे। लेकिन सुबह किसी अनजाने फोन काॅल के बार-बार आने के बाद हमारी नींद खुल रही थी और उसके बंद होते ही थकान की वजह से फिर आंख लग जा रही थी। लेकिन हमारे पास जगने के अलावा अब कोई चारा नहीं था। नहाने-धोने के लिए गया तो फिर से संडास के आगे झक सफेद तौलिया पड़ा हुआ पाया। उमेश्वर जी से पूछा तो उन्होंने कहा कि यह परंपरा है। मुझे समझ में आया कि होटल अपनी सफाई की मिसाल पेश करने के लिए ऐसा करता हो। सुबह नाश्ता करके हम दिनभर रिलायंस के प्रेस कांफ्रेस में बैठे रहे और पेन और पेपर का खेल खेलते रहे। शाम को हमें होटल से 25-30 किलोमीटर दूर ‘फैंटेशिया’ शो दिखाने ले जाया गया। यहां औरतों की दूसरी तस्वीर हमें देखने को मिली जिसका जिक्र हिन्दुस्तान में मुझसे किसी भी मित्र ने नहीं किया था। इस शो में औरत की दया और करुणा की तस्वीर का रंग ज्यादा गहरा था। प्रेम में विरह पाने की पीड़ा की अभिव्यक्ति ने मेरे सामने थाईलैंड की बिल्कुल अलहदा तस्वीर रखी।

ओ कमला……..तुम कहां गई?


‘फैंटेशिया’ के इस शो के पोस्टर मैंने फुकेट एयरपोर्ट पर भी देखे थे। यहां खूब चटकीले रंगों से खिलौने और खाने-पीने की दुकानें सजी-धजी हुई थीं। थाईलैंड को हाथियों का देश क्यों कहा जाता है, अब समझ में आ रहा था। यहां बहुत सारे हाथियों की मूर्तियां लगी थीं। कहीं चीनी मिट्टी तो कहीं लोहे के तार से तो कहीं काले पत्थरों से बने हाथी स्वागत की मुद्रा में लगे हुए थे। बहुत सारी जगहों पर सचमुच के भी हाथी थे, जिनके साथ हमने फोटो भी खिंचवाई। गुफानुमा रास्तों से होकर हम एक भव्य थियेटर में पहुंचे। हाॅल खचाखच भरा था। थोड़ी देर में लेजर लाइट का प्रदर्शन शुरू हो गया। उसके बाद ओ कमला…….. (बाकी थाई भाषा में था इसलिए शब्द नहीं भावों को पढ़ने की कोशिश की) से शो शुरू हुआ। दरअसल, इस शो में एक प्रेमी और प्रेमिका के विरह का वर्णन दिखाया जाता है। शो के साथ जादू, जानवरों और पक्षियों के खेल भी दिखाए जाते हैं। कुछ सर्कस में जिमनास्टिक अदाओं वाले खेल भी होते हैं। वास्तविकता में ये सारे खेल विरह कथा के साथ चल रहे होते हैं। दर्शकों को बांधे रखने के लिए तो कुछ ऐसे खेल जरूरी होते हैं। इस शो में राक्षस, भगवान सबकुछ भारत जैसे ही दिख रहे थे। हमारे भगवान या नायक जिस तरह कोमल और मासूम छवि वाले होते हैं। उनके भी हू-ब-हू वैसे ही।एक घंटे के शो में बकरी, घोड़े, हाथी और कबूतर भी पूरी तरह प्रशिक्षित दिखे। सचमुच मैं इस शो को देखकर धन्य-धन्य हो गया। शो के बाद हम एक भारतीय रेस्तरां में खाने गए। इस रेस्तरां में मछली की रेसेपी बहुत ही लाजवाब। मजा आ गया। हम थके-मांदे होटल आए।

 दूसरे दिन सुबह 12 बजे हमें फुकेट एयरपोर्ट के लिए निकलना था। हम अपने-अपने कमरों में जा सो गए। हम अपने तय कार्यक्रम के हिसाब से टैंपो टेªवलर में 12 बजे दोपहर में बैठ गए और भारतीय समयानुसार रात 9 बजे हम दिल्ली के एयपोर्ट पहुंच गए। रीना और शब्द मेरा इंतजार करते हुए मेट्रो के बाहर मिले। शब्द अजीबोगरीब आवाजें निकालाता हुआ दौड़ा और कूदकर मेरी गोद चढ़ गया। दूसरे दिन जब आॅफिस  पहुंचा तो जाने से पहले वाले कल्पना लोक में ही मेरे मित्र घूम रहे थे। उन्हें मैंने भी जगाने का काम नहीं किया। मैंने उनकी उत्सुकता वाले पहलू पर कोई खास बातचीत नहीं की। मैं उन्हें जो बताना चाहता था, वे उसे सुनने की मानसिकता में नहीं थे। वहां खीची गई तस्वीर में भी उन्हें ऐसा कुछ नहीं देखने को मिला तो उन्होंने मुझे बुद्धू मान लिया। मैं भी उन्हें होशियार कहां मानता था, सो हम अपनी-अपनी बुद्धि के सहारे ही चलना ठीक मानते रहे।

प्रियंका सिंह की कवितायें

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प्रियंका सिंह


प्रियंका सिंह कवितायें और कहानियां लिखती हैं . दिल्ली में रहती हैं . संपर्क: priyanka.2008singh@gmail.com

१. तुम कुछ नहीं

तुम पढ़
गयी हो
बिगड़ गयी हो
अच्छा होता
दीवार सी चिपकी रहती
अपनो की तस्वीर से

तुम बाहर क्या जाने लगी
बदचलन हो गयी
बेहतर होता बंधी रहती
हीरा जैसी आँगन में

तुम्हें सोचने को कहा था
बोलने को नहीं….
क्यूँ
सोचती हो
दिमाग से तुम्हारा
वास्ता नही जब
सही था गर तुम बस
पौध जनती और जनती जाती

बदज़बानी न करो
तुम मिट्टी हो…उसी में रहो
तुम प्यास बुझा सकती हो
पर अमृत नहीं बन सकतीं
तुमसे रिश्ता जोड़ना
तुमपे एहसान है पड़ी रहो चुपचाप

औकात तुम्हारी
भोगन भर की और ज़िम्मेदारी
मेरे घर की
मुंह सी ले…नज़रें जमीं और
मन कब्र में दफन कर दें
तब जी तुझे जैसा जीना है

ज़हर भी जो लगे ज़िन्दगी
पी….रोज़ पी
तुझे ये जीवन यूँही पीना है…

२. उपयोगिता

मैं नहीं जानती
उपयोग करने की कला
किसे…..? कैसे….?
किस लिए……? कब तक ?
उपयोग करना नहीं आता
नहीं …….
कभी ख्याल नहीं आता

हाँ
उपयोग होना सीखा है
माँ से.……
माँ कहती है इसमें सुख है.…

सुख ?
हाँ…….सुख
दबा-दबा सा सुख
झाँकता-छुपता सा सुख
कभी मंद-मंद सा मुस्कुराता सुख और
वक़्त के गुज़रते जाते ही
उसके चाको में
पिसता सुख, घिसता सुख
करहता सुख, दम तोड़ता सुख

देखा है मर्तबा मैंने
उपयोग चीज़ों का बेहतरी से
पर इंसान का उपयोग
डराता है

समझ नहीं पाती हूँ
कैसे वस्तु का स्थान
एक साँस लेते जीवित व्यक्ति को
दे दिया जाता है

यह शर्मनाक है, घिनौना है
अमानवीय है, दर्दनाक और वीभत्स है

मैं उपयोगिता के
स्तर को बाँट चुकी हूँ
बाँट रही हूँ……..
कई अर्थों में और
मज़बूर हूँ समय के आगे
उसके सामने मेरे हाथ फैले है
जिस पर समय ने
उपयोगिता की मुहर लगा रखी है और
अब मैं उपयोग होने के अलावा
कुछ नही कर सकती तब तक
जब तक
मुझ पर बैठा
वक़्त का तानाशाह
मुझे अपनी कैद से आज़ाद नहीं करता

जब तक
मेरी उपयोगिता की
समय सीमा समाप्त नहीं हो जाती
मुझमें बसने वाली एक भी उपयोगिता की नब्ज़
अपना दम नहीं तोड़ देती
तब तक……..
मेरे हाथ यूँही फैले रहेंगे

समय की मुहर
मेरे हाथों की लकीरों में
समा कर मेरे अंतर-मन में जा बैठी है
जो अब मुझे सोचने नहीं देती
समझने नहीं देती
जैसे मेरे मन का एक हिस्सा
सुन्न हो गया है, सब शान्त हो गया है

बस
समय है और उसमें बहती
मेरी उपयोगिता……..

तुम आए हो ना शब -ए-इंतज़ार गुज़री है …….

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ऋतुपर्णा मुद्राराक्षस


ऋतुपर्णा मुद्राराक्षस कवितायें और कहानियां लिखती हैं . नोएडा में रहती हैं . संपर्क: rituparna_rommel@yahoo.co.in

जय और दिल की इस कहानी में शायद आपको कुछ नया नहीं लगे क्योंकि  पहले भी कितनी ही बार इस फ़साने का ज़िक्र बातों में आया ही करता है…  लेकिन नामालूम सी कोई कशिश ज़रूर है इस अफ़साने में कि हर बार उतनी ही शिद्दत से इसे दोहराती हूँ…  इस बार सोचा कि बेतरतीब  यादों को सिलसिलेवार वर्कों में टाँक दूँ…  और फिर से उन वक्तों को जी लूँ जब ज़िन्दगी इतनी उलझी   इतनी बिखरी नहीं  थी.

-पहला सफा-

पहली नज़र में प्यार जैसा इस किस्से में कुछ नहीं है. जय से पारिवारिक रिश्ते थे. घर में आना -जाना , मिलना जुलना एकदम सामान्य सा ही था. यह सन छियासी के शुरूआती महीनों की बात रही होगी … 16 साल की उम्र में भी दिल का बचपना या कहें कि खिलंदड़ापन बरक़रार था. बी एस सी फर्स्ट इयर के प्रैक्टिकल सर पर थे और हरबेरियम फाइल नदारद… क्या किया जाये… जंगली फूल-पौधों का कुछ तो जुगाड़ करना होगा.  क्या करूँ… ? अरे हाँ ! जय के घर के सामने एक बड़ा सा खाली मैदान है, जहाँ बहुत सारे जंगली पौधे , ख़त-पतवार उग आये हैं. वहीँ से कुछ तो मिल ही जाएँगे . दिल ने साइकिल उठाई और सीधे जय के घर.  आंटी  से अपनी परेशानी बताई  और उन्होंने परेशान दिल की मदद करने के लिए जय को बुलाया, जो शायद अपने कमरे में बैठा कुछ पढ़ रहा था. ‘ अच्छा हुआ जो माँ साथ नहीं हैं’ , दिल ने मन ही मन सोचा वरना अभी एक लेक्चर सुनने को मिल जाता. पढ़ने-लिखने में दिल ठीक-ठाक थी, दिमाग भी तेज़ था लेकिन थी एक नंबर की आलसी. जब तक बात सर पर ना आ पड़े तब तक सुध नहीं लेती थी . उधर  जय  एकदम सिन्सीयर … अच्छा बच्चा… जिसे पढ़ने के सिवाय कोई दूसरा काम नहीं था. और दिल को ऐसे पढ़ाकू बच्चों को लेकर अक्सर माँ के उलाहने सुनने पड़ते थे. खैर, आंटी के कहने पर जय दिल के साथ सामने वाले मैदान में फूल-पत्तियाँ तुड़वाने चला गया और दिल को याद है कि इस ‘ फूल-पत्ती तोड़ो अभियान’ के दरम्यान दिल ने अपनी आदतनुसार बकबक करके जय को खूब पकाया. बेचारा जय… चुपचाप दिल की बेफिजूल सी बातें सुनता और गाहे-बगाहे हाँ-हूँ करता रहा. लेकिन उस दिन जय से मन ही मन दिल ने दोस्ती का एक रिश्ता बुन लिया था. अब जब भी जय अंकल के साथ घर आता तो दिल को अच्छा लगता.  जय कम बोलता था. एम एस सी फिजिक्स का स्टूडेंट था, लेकिन साहित्य में उसकी रूचि,  उसके शब्दों में संजीदगी , परिष्कृत भाषा  दिल को भाती थी.  दिल के मन में जय की एक खास जगह बन रही थी जिसका आभास दिल को भी नहीं था.

– दूसरा सफा –

दिसम्बर की कड़कड़ाती सर्दियाँ थीं. रात से बारिश हो रही थी. ऐसे में कॉलेज जाने का मन किसका होता भला लेकिन मनोधीर सर की क्लास मिस नहीं की जा सकती. बहुत इम्पोर्टेन्ट टॉपिक पर है. खैर , देखा जाएगा.  अगर सीमा आती है तो चली जाऊँगी वरना आरामसे घर बैठूंगी. दिल सोच ही रही थी कि सीमा जी हाज़िर.
कॉलेज पहुँचे तो मालूम हुआ कि एम डी सर अभी नहीं आए हैं. क्लास-रूम में तीन- चार लड़कियाँ ही थीं . बाहर बारिश अभी भी हो रही थी और अन्दर सभी की कुल्फी जमी जा रही थी. मन ही मन सीमा पर गुस्सा भी आ रहा था लेकिन सीनियर थी तो बरदाश्त करना ही था . गाने – वाने गाते हुए समय बिताया जा रहा था लेकिन उफ़्फ़ यह सर्दी तो…  लगता है हड्डियाँ कीर्तन कर रही हैं. तभी दिल ने क्लास के सामने से जय को जाते हुए देखा. कुछ सोचा और सबसे कहा ,” चाय- समोसा कौन-कौन खाएगा… ?” सभी तैयार ! पर्स टटोले गए. हम्म्म्म ! पैसे तो है लेकिन कैंटीन जाकर लाएगा कौन ? सवाल मुश्किल था . आज का समय होता तो यह बात किसी के दिमाग में आती भी नहीं लेकिन वो दूरदर्शन का ज़माना था और वो भी ताज़ा-ताज़ा ही रंगीन हुआ था . उस दौर में सीनियर लडकियाँ ही कॉलेज कैंटीन के दर्शन करने की कूवत रखती थीं .  लेकिन इस मुश्किल को दिलेरी से हल करते हुए दिल ने बेबाकी से कहा, ” मेरे अंकल के बेटे हैं यहीं … तुम लोग कहो तो उनसे कहूँ ? ” इस पर किसको ऐतराज़ था भला . दिल और सीमा बाहर निकलीं तब तक जय अपने एक और दोस्त के साथ ज़रा दूर निकल गया था.  भीगते-भागते दोनों जय तक पहुँचीं और  कैंटीन से चाय समोसे लाने की फरमाइश कर दी . ” पैसे यह रहे…!” , दिल ने कहा. ” समोसे चाय ले आने दो, पैसे तभी दे देना” . जय ने हौले से  मुस्कुराते हुए कहा.   “ठीक है .” दिल बस इतना भर कह पाई और वापिस क्लास की तरफ मुड़ गई.

थोड़ी देर बाद जय अपने साथी के साथ क्लास में था. हाथ में चाय और समोसे .  लड़कियाँ खुश.  अब बारी थी पैसे देने की. महीने का आखिर था. ज़्यादातर की पॉकेट – मनी आखिरी साँसे गिन रही थी . वैसे भी पॉकेट- मनी के नाम पर जो भी मिलता था उसका अधिकतर हिस्सा तो सुशीला कॉलेज के पास फ्रूट चाट बेचने वाले मामाजी को हस्बेमामूल दे दिया जाता था . खैर , तमाम खंगाली के बाद जो भी बरामद हुआ सब जय के हाथों में रख दिया गया .

” कहाँ बैठ कर आई हो तुम लोग ! ”
” मतलब ? ”
” मतलब   यह कि इतनी चिल्लर कहाँ से बटोरी ! ”    जय के चेहरे पर एक शरारत भरी मुस्कराहट थी.

अल्लाह !  इस लड़के को कोई बताता क्यों नहीं कि उसकी मुस्कराहट दिल के दिल में उतरने लगी है   धीमे- धीमे .

तीसरा सफा-

जय की  मेहनत और प्रतिभा रंग लाई और पढ़ाई ख़त्म करते न करते  उसे नेवी में चुन लिया गया . बम्बई में ट्रेनिंग के बाद पहलीपोस्टिंग मिली उड़ीसा में. उस दौरान , फ़ोन-वोन तो नहीं हाँ कभी-कभार पापा के नाम जय के ख़त ज़रूर आते थे लेकिन उनमें दिल के बारे में अलग से ज़िक्र होता हो, ऐसा नहीं था.

एक दिन सुबह-सुबह दरवाज़े की घंटी बजी. दिल अपने कमरे में थी . सर्दियों में दिल की सुबह ज़रा देर से होती थी . घंटी फिर बजी. माँ दरवाज़ा क्यों नहीं खोल रहीं ? हो सकता है , छत पर कपड़े सुखाने गईं हो . दिल बिस्तर से उठी और दरवाज़ा खोला. दरवाज़े पर जय . चेहरे पर दिल के दिल में उतरने वाली वही पहचानी   खिली सी मुस्कराहट. अचरज और ख़ुशी का अजीब सा आलम था उसे देखकर . दिल ने जय को अन्दर आने को कहा और खुद सीधे गुसलखाने में . माँ के आने से पहले मुँह-हाथ धोकर फ्रेश हो जाना चाहिए वरना बेभाव की पड़ेगी . यह जय भी ना…. इतनी सुबह ही आ गया . एकदम औचक. लेकिन यह भी तो सच था कि जय के यही सरप्राइज दिल को भाते थे.

सर्दियों की शामें कितनी खूबसूरत होती हैं और कितनी रूमानी ! घर जाने की उतावली में सूरज बादलों की कूची से अनगिनत रंगों को आसमान में बिखेर देता है . ऐसी ही शामों की खुशबू दिल के अंतस में महकती है   इन दिनों .उन्हीं दिनों की बात है . पापा के एक पुराने मित्र सपत्नीक अमेरिका से आये हुए हैं . रात के खाने पर आमंत्रित हैं . उसी शाम जय भी घर आया . पापा को अचानक किसी काम से बाहर जाना पड़ा  और  अब मेहमानों की ज़िम्मेदारी दिल के जिम्मे . माँ रसोई में व्यस्त थीं. पापा की कुछ कविताओं की हाल में ही दूरदर्शन के लिए रिकॉर्डिंग हुई थी .  उनमें से कुछ कविताएँ दिल ने रिकॉर्ड कर रखी थी . उन अंकल की फरमाइश पर कैसेट प्लेयर में उन्हीं कविताओं का कैसेट था . पापा का स्वर और  सूफियाना मिज़ाज के उनके गीत मानों दिल की आत्मा को मथते हैं और एक अनकही सी बैचैनी आँखों के रास्ते धाराधार बहती है . यही हुआ उस दिन भी . आँसुओं से भीगे चेहरे को छुपाती दिल कमरे से बाहर निकल आई . खुद को सँभालने की कोशिश में थी कि दो मज़बूत बाजुओं ने उसे घेर लिया . दिलासा देते हाथ उसके बालों को धीमे-धीमे सहला रहे थे और जय के कंधे से लगी दिल बस रोये जा रही थी. निशब्द !

पहला स्पर्श !   एक अनछुए अहसास ने मन के आँगन को हरसिंगार के फूलों से भर दिया था .  रातें अब रूपहली थी और दिन नवेले.

– चौथा सफा – 

तेरह जनवरी का दिन यानी लोहड़ी . बरसों पहले का यह दिन दिल की यादों में आज भी गहरे बसा है . कुछ दिन से जय की तबीयत ठीक नहीं थी . पाँव में चोट थी . चलने में दिक्कत थी . लोहड़ी से दो दिन पहले की बात है . आँगन में मीठी – मीठी सर्दियों की धूप . जय आँखे बंद किए अपने ख्यालों में ही था कि तभी दिल की आवाज़ सुनाई दी . जब तक जय संभलता   दिल सामने . माँ से उसकी बातें बदस्तूर जारी  . ‘ यह लड़की इतनी बातें कहाँ से बटोरती है  ! ‘ जय सोच ही रहा था कि दिल अब उससे मुखातिब थी . ” कल अंकल आए थे . उन्हीं ने बताया कि आपके पैर में चोट है . अब कैसे हैं ? ”   जय मुस्कुरा दिया , ” ठीक हूँ .  एक- दो दिन में पट्टी खुल जाएगी तब मिलता हूँ .”

लोहड़ी की उस सुबह छुटकी स्कूल जाने के लिए तैयार हो रही थी . दिल ने एक कागज पर कुछ लिखकर उसे दिया . ” स्कूल जाते समय इसे जय को देती जाना प्लीज़ ! ”  दिल की बात को छुटकी किसी हाल में नहीं टाल सकती सो जय के घर पहुँचकर उसे दरयाफ्त किया गया और आंटी और भैया की मौजूदगी में वही पुर्जा उसने जय को थमा दिया   ” दी ने आपके लिए दिया है. आप शाम को आएंगे ? ” जय भला क्या कहता  बस मुस्कुराकर हाँ में सर हिला दिया .

स्कूल से लौटकर छुटकी ने जय का सन्देशा दिल को दिया और   इंतज़ार की घड़ियाँ शुरू ! ‘ यह वक़्त इतना धीमे क्यों बीतता है ! शाम मानों दिल के सब्र को तौल रही हो और समय ज्यों ठहर ही गया हो .
शाम आई और  धीमे – धीमे रात में तब्दील हो गई . जय कहकर आया क्यों नहीं .  कहीं दिल का उसे यूँ आने को कहलवा देना जय को बुरा तो नहीं लगा .

तमाम ख्यालों से घिरी वो रात बड़ी उदास थी . लेकिन साहिर ने कीट्स को दोहराते हुए यूँ ही नहीं कहा था कि हर गहरी और मुश्किल रात के बाद सुबह बेतरह खुशनुमा होती है . आने वाला दिन भी दिल के लिए कई शीरीं और प्यारी स्मृतियों की सौगात लेकर आने वाला था .

– पाँचवां सफा –

आज इतवार है . हर बार की तरह आज भी पापा अपने दो तीन मित्रों के साथ डाइनिंग टेबल के इर्द-गिर्द बैठे टी वी पर ‘महाभारत’ देख रहे हैं . माँ चाय नाश्ते के इंतजाम में लगी हुई हैं .

रात की खलिश ज़हन में अभी भी घुमड़ रही है . ज़ाहिर सी बात है कि दिल का मूड उखड़ा हुआ है . देर तक अपने कमरे में बंद दिल किसी उधेड़बुन में उलझी है . ‘ दोपहर बाद दीया के घर ही चली जाती हूँ . शायद उस से बात करके चित्त ज़रा सहज हो. ‘ दिल ने सोचा , खुद को सहेजा  और फिर रोज़मर्रा के कामकाज में व्यस्त हो गई . वक़्त अपनी रफ़्तार से बीत रहा था . तीन बजे के आसपास का समय होगा दिल छत पर थी . हाथों में कोई पत्रिका थी  और ज़हन में जय के ख्याल  कि अचानक छुटकी की आवाज आई ,” ओ दी ! नीचे आओ , जय भैया आएँ हैं .”    दिल को लगा  छुटकी खिंचाई कर रही है लेकिन जाकर देखने में कोई हर्ज़ नहीं.   नीचे  जनाब बाकायदा कमरे में बैठे थे .  चेहरे पर वही ‘ किलर स्माइल ‘.    दिल के दिल को चुराने की जय की यह अदा कमाल है .  थोड़ी देर इधर-उधर की बातें करने के बाद दिल ने कहा ,” मझे दीया के घर जाना है . आप मुझे वहां तक छोड़ देंगे ? मैं बस दो मिनिट में  तैयार होकर आती हूँ .”  जय असमंजस में . ” हाँ कहूँ कि ना . यह लड़की उलझा देती है . जहाँ कह रही है वहाँ ले जाना ही होगा  और कोई उपाय नहीं .”  जय अपनी सोच में ही था कि माथे पर नन्हीं सी काली बिंदी और गुलाबी शलवार कुर्ते में दिल सामने . “चलिए! ”  अजीब थी दिल भी .  दीन दुनिया से बेखबर  अपनी ही रौ में रहती .  ज़रा ना सोचा कि जय के साथ यूँ स्कूटर पर पीछे बैठकर जाएगी तो आसपास वाले क्या सोचेंगे  या  किसी अनजान लड़के को उसके साथ देखकर दीया के माँ- पापा क्या कहेंगे .  निपट बावरी लड़की है यह दिल भी !

दीया को दिल के आने की खबर थी लेकिन उसके साथ जय का होना बेचारी दीया के लिए भी किसी झटके से कम नहीं था .  जय को ड्राइंगरूम में बैठा छोड़ दिल दीया के कमरे में थी .
” इसे क्यों साथ ले आई ? ”
” क्यों ? तूने ही तो कहा था कि अब उसके मन में क्या है जान लेना चाहिए . तो चल , कहीं बाहर चलते हैं . कॉफ़ी-वॉफी पीएँगे . मैं तो नहीं कह पाऊँगी तू ही उससे इस बारे में बात कर लेना . ”
” ठीक ! लेकिन अम्मी को क्या बोलूँ कि कौन है यह ? ”
” अरे ! इसमें क्या ?  कह दे कि दिल के अंकल का बेटा है . ” दिल ने सुझाया .
” अम्मी , मैं दिल के साथ जा रही हूँ . कुछ किताबें लेनी है . जय हमें मार्केट तक छोड़ देगा .”
जबतक अम्मी की हाँ या ना होती  दिल और दीया दोनों घर से बाहर .
जय ड्राईवर की सीट पर   उसके पीछे थी दिल और फिर बैठी दीया . ” कहाँ चलना है ?”  जय ने कहा . ” ऐसा करते हैं कि  नवीन मार्किट चलते हैं . वहीँ कुछ खा – पी कर , किताबें लेकर वापिस आ जायेंगे .” यह दीया थी .

स्कूटर अब नवीन मार्केट की सड़कों पर था .  दीया के कहने के मुताबिक वहां के नामचीन साउथ इंडियन रेस्तरां में कॉफ़ी पीने के इरादे से तीनों पहुँचे तो देखा कि रेस्तरां खचाखच भरा .  ” ओह ! आज इतवार है . आज तो यहाँ भीड़ रहती ही है .  चलो कोई नहीं यहाँ पास में ही एक चाट वाले की दुकान है. चल वहीँ चाट खाते है .” दीया का प्लान टू रेडी था .   ” यह लड़की भी ना  जब देखो बस खाने की सूझती है इसे . गोलगप्पे  खाते खाते जय से क्या खाक बात करेगी मेरे बारे में .  दिल मन ही मन कुढ़ रही थी .  खाने-पीने का सेशन ख़त्म हुआ .  दीया को अब याद आया कि अम्मी से किताबें लेने की बात कह कर आई है . किताबें लिए बिना घर पहुँची तो अम्मी के हज़ार सवाल होंगे . ” यार, अभी किताबें भी लेनी हैं . तू चलेगी ? ”
” नहीं . तू जा . मुझे जय घर छोड़ देगा .” दिल ने दीया को टरका दिया .
अब स्कूटर पर दो ही जन थे . ” चलो, तुम्हें एक बढ़िया जगह कॉफ़ी पिलाऊँ .” हम्म्म ! तो जय भी उसके साथ समय बिताना चाहता है .”  दिल खुश .  लेकिन स्कूटर या बाइक पर पीछे बैठी लड़की की बाहें या तो  लड़के की पीठ को घेरे होतीं हैं या उसके काँधे पर टिकी होती हैं .  फिल्मों-विल्मों में कुछ ऐसा ही होता है ना . अब ऐसे ही  जय को छुए दिल तो जय  ना जाने क्या सोचे उसके बारे में . थोडा वक़्त यूँ ही  उहापोह में बीता .  अब दिल तो आखिर दिल   सो कह ही दिया , ” जय , मैं आपके कंधे पर हाथ रख लूँ ?”

जय के सामीप्य के अहसास ने मानों दिल की आकांक्षाओं को नयी परवाज़ दे दी हो . ” दीया की सारी आशंकाएँ – शंकाएँ गलत . जय मुझे चाहता है . यही सच है . बस्स ! ”

जय के साथ बीता हर एक लम्हा गुलाबी था . आज के इस दिलफरेब दिन के लिए जय को शुक्रिया कहना तो बनता ही था . घर के रास्ते में दिल ने जय को एक गिफ़्ट शॉप पर रुकने को कहा और जब लौटी तो उसके हाथ में जय के लिए एक छोटा सा पैकेट था  . आज की इस प्यारी शाम के लिए उस नई रोमांटिक फिल्म के गानों के कैसेट से बेहतर जय को दिल और क्या दे सकती थी भला !   जय अब जब भी यह कैसेट सुनेगा दिल की याद उसे पक्का आएगी .

कल की शाम कितनी बैचैन थी  लेकिन आज देखो  दिन इन्द्रधनुषी रंगों की छटा से लबरेज़  है . यह पहले नेह का राग-रंग है.

और   उस रात दिल ने बंद पलकों में संजोए स्वप्नों के फलक पर चाहत और उमंगों की कलम से एक नई इबारत लिखी थी.

– छठा सफा-

चौदह तारीख को जय से हुई मुलाक़ात पूरे चाँद की धवल रात सी दिल के ज़हन में बसी है . उस एक मुलाक़ात के बाद दिल ने जय के साथ आने वाले अनदेखे दिनों को ना जाने कितनी ही बार जिया . घर की छत पर दीया के साथ जय की अनगिन बातें बुनीं . अल्हड़पने के दिन थे वो . आँखों में रूपहले सपने संजोने के दिन .  अपनी ही जुगत से सोचने के मासूम दिन . उन्हीं दिनों की बात है !  हुआ यूँ कि,  दीया ने दिल को सुझाया कि दिल को लेकर जय की सोच को भी जान लिया जाये .  इस सारी कवायद के लिए उन्नीस तारीख़ तय की गई . जय को एक दिन पहले ही संदेशा भेज दिया गया . जगह वही . नवीन मार्किट का दक्षिण सागर रेस्तरां .सुबह से ही दिल के मन में धुकुर सी थी .   जय को पसंद हूँ मैं ? हाँ कहेगा वह ?  खुद बात करना ठीक भी होगा ?  दीया ने भी किस पचड़े में फंसा दिया ! लेकिन जय की दिल की बात जानने की उत्सुकता दिल को भी तो है . थोड़ी हिम्मत करनी होगी !

उन्नीस तारीख़ ! तीन बजे ! उस वक़्त भीड़ भाड़ ज़रा कम रहती है .बात आराम से हो जाएगी .  रेस्तरां के बाहर दिल और दीया .  जय को आने में कुछ देर थी .
” दीया , वो हाँ कहेगा ना ? !!! ”
” परेशान क्यों हो रही है ? मुझे तो लगता है उसकी हाँ ही है .” दीया ने दिल को दिलासा दिया .
” अच्छा ऐसा कर तू ही बात कर लेना  लेकिन मेरे सामने नहीं . वह खुलकर नहीं कह पाएगा . मैं बहाने से चली जाऊँगी फिर तू उससे पूछकर मुझे बताना . ”
“ठीक !”
तभी जय आता दिखाई दिया .  वही दिलफरेब मुस्कराहट . ” बाहर खड़ी हो तुम दोनों ? चलो , भीतर बैठते हैं !”
” अल्लाह , यह बस हाँ कह दे .” दिल अपनी ही सोचों में गुम थी .
” क्या लोगी ?  क्या सोच रही हो ? ”  जय पूछ रहा था .
” कुछ नहीं !”  दिल ने धीमे से कहा .  दिल ने इडली और जय और दीया ने दोसा मँगवाया .
” हुम्म ! बोलो , क्या बात है ? यहाँ क्यों बुलाया ? कुछ खास बात ? ” जय ने खाते- खाते पूछा .
” कुछ खास नहीं , बस यूँ ही ! दीया को आपसे कुछ बात करनी है ” दिल की आवाज़ में झिझक और हकबकाहट को छुपाने का प्रयास स्पष्ट था .
दीया ने दिल को इशारे से वहां से जाने को कहा . ” अभी आई  मैं .” कहकर दिल चली तो गई लेकिन मन में क़यामत की उथल-पुथल.
अब तक तो बात हो गई होगी . दिल मेज के पास पहुँची . दीया ने हल्के से ‘ ना ‘ में सिर हिलाया . मतलब  जय का इनकार . सपनों का शीराज़ा टूटने की आवाज़ नहीं होती बस उसकी किरचें अंतस को चीरती जाती हैं . गहरे तक ! यही हुआ था उस लम्हे .
” तुम दोनों बैठो . मुझे जाना है . अम्मी को जल्दी ही लौटने को कहकर आई हूँ . ”  कहकर दीया चली गई .
“जय ,  कहीं और चलते हैं . ” दिल बड़ी मुश्किल से आँसू रोक रही थी .”मुझे आपसे बात करनी है .”

सूकून !   नाम के मुताबिक ही जगह भी है . लेकिन पाँच दिनों में ही इस जगह का माहौल कितना बदला सा लग रहा है . दिल में अजीब सी बेचैनी है . आँखें में खारापन .
” देखो दिल , ग़लत मत समझना .मैंने अभी सेटल होने के लिए सोचा नहीं . शादी वगैरह की जिम्मेदारी के लिए अभी मुझे वक़्त चाहिए. ” कॉफ़ी पीते हुए जय कह रहा था .  दिल की बची हुई उम्मीदों को ध्वस्त करते हुए जय के शब्द मानों दिल के कानों तक पहुँच ही नहीं रहे .
” जय ,प्लीज़ ! मैं आप पर शादी के लिए कोई दबाव नहीं बना रही . मैं आपको पसंद नहीं हूँ या फिर कोई और बात है तो प्लीज़ आप मुझे बताएँ…  मैं बस आप के साथ रहना चाहती हूँ . आप चाहे तो मैं यूँ ही आपके साथ रह लूँगी लेकिन मुझे अपने साथ रहने दीजिये ना   प्लीज़ ! ”  दिल ने रूँधी आवाज़ में कहे जा रही थी .  किसी तरह … बस किसी तरह जय उसकी बात मान जाए . खुदाया !

” दिल ऐसी कोई बात नहीं . तुम अच्छी लड़की हो . मुझे पसंद भी हो लेकिन प्रॉब्लम मेरी है . मैं शादी के लिए अभी तैयार नहीं हूँ . वक़्त चाहिए मुझे . हो सकता है दो तीन साल बाद मुझे लगे कि शादी करनी चाहिए तो मैं इस बारे में ज़रूर सोचूँगा .”
” तब मेरे बारे ही सोचेंगे आप ? मुझसे ही शादी करेंगे ना ? !!! ”   दिल का मन में उम्मीद की हल्की सी रोशनी उमगी .
” हाँ , बिल्कुल ! और वैसे भी सभी उगते सूरज को ही सलाम करते हैं . तीन साल में स्थितियाँ बदलेंगी  थोड़ी .” वही दिलफरेब मुस्कराहट अब दिल को राहत सी दे रही थी .

तीन साल …!

घर आई तो मन बुझा सा था . बीते वाकये को रात को फिर से
जीते हुए दिल की आँखें फिर पनीली थीं . रात बेहद बोझिल थी . नींद ना जाने कहाँ गुम थी . तीन साल का अरसा . दिमाग बस वही अटका था. मालूम नहीं कि जय अब उससे मिलना भी चाहेगा भी या नहीं .क्या करूँ कि जय मान जाए . दीया कहती है कि जय को मैं पसँद हूँ . फिर  उसने मना क्यों किया . नहीं , उसने मना थोड़ी किया है बस तीन साल का वक़्त ही तो माँगा है.  दिमाग में ऊहापोह जारी थी .

अगला दिन बेहद मुश्किल था . दिल जितना कल की बातों को परे धकेलने की कोशिश करती रह रहकर वहीँ बातें ज़हन में घुमड़ रही थीं. खुल कर रो भी नहीं सकती . माँ पूछेंगी तो दिल के पास कोई जवाब नहीं होगा . शाम को दिल दीया के घर गई लेकिन वहाँ भी कुछ राहत नही . कितनी छटपटाहट … कितनी बेचैनी … कितनी पीड़ा …  मन को समझाने की सारी कोशिशें बेकार … बस एक ही बात पर सोच अटकी थी कि जय ने आखिर ऐसा किया क्यों ?  शायद दिल ने जिसे जय की चाहत समझा वह सिर्फ जय की शाइस्तगी थी. लेकिन दिल के साथ जय का वक़्त बिताना … यूँ गाहे बगाहे घर आकर दिल से बतियाना … क्या सचमुच जय की चाहत दिल का ख्याल भर ही थी . मालूम नहीं !  उन्नीस जनवरी के बाद जय से बस एक बार ही मिलना हुआ . छब्बीस जनवरी को दोपहर बाद जय घर आया था . दिल से जय की ज्यादा बात नहीं हुई . बस , माँ को उसने बताया कि अगले हफ़्ते वह वापिस जा रहा है .उस शाम दिल छत पर खूब रोई .

निराशा इतनी कि कभी शादी ना करने का फैसला ... और कभी सब कुछ छोड़ छाड़ कर नन बनने का इरादा . लेकिन खुद को संभालना होगा . सो दिल ने दिल्ली के एक इंस्टिट्यूट में पत्रकारिता का कोर्स ज्वाइन कर लिया . एक साल इसमें बीत जाएगा और फिर दो साल ही तो बचेंगे . दिल खुद को दिलासा देती . एक दिन बातों बातों में दीया ने उसे बताया कि उसने जय को देखा है . जय दिल से मिलने नहीं आया ? पहले तो ऐसा कभी नहीं हुआ . छुट्टियों में जय घर आता  दिल से ज़रूर मिलता . जय बदल रहा है ? !!!

वक़्त बड़ी तेज़ी से बीतता है . नया परिवेश … नया माहौल … नए दोस्त ! ज़्यादातर उड़ीसा के भुवनेश्वर शहर के बाशिंदे . यह संजोग था ?!!!   जय की पोस्टिंग भी तो उड़ीसा में भुवनेश्वर के पास चिल्का में ही है .  दिल दोस्तों से उनके शहर की खूब बातें करती.  उड़िया के नए नए शब्द सीखती . आखिर  शादी के बाद उसे उड़ीसा ही रहना है . उनसे मिलने आएगी वहाँ . अब बॉयफ्रेंड  गर्लफ्रेंड तुम्हीं सब को मुबारक . दिल का दिल तो पहले से ही जय के पास है . दिल दोस्तों से कहा करती .

उन्नीस सौ बयानवें का साल .  जय से मिले दो साल हो गए . इस बीच कोई खबर नहीं .  कोई राब्ता नहीं उससे . दिल की याद आती होगी उसे ? दिल अकेले में जय के बारे में सोचती .  एक ही साल बाक़ी है . जय आएगा ?!!!
फ़रवरी की जाती सर्दियाँ .  दिन का तीसरा पहर . दिल माँ के साथ सब्ज़ियाँ छिलवा रही है .  छुटकी का स्कूल से आना. गुस्से से बस्ता पटकना . ” माँ ,  अंकल ने हमें जय भैया की शादी में क्यों नहीं बुलाया ?  अनुभूति बता रही थी कि आठ तारीख़ को जय भैया की शादी थी . हमें नहीं बुलाया ?

माँ चुप !  दिल आँसू आँसू !!  छुटकी हैरान !!!
फिर लोकल अखबार में छपे छोटे से नोट से छुटकी की बात की तस्दीक !
दिल टूट गई थी .

तीन बरस का इंतज़ार कभी कभी एक ज़िन्दगी लम्बे इंतज़ार में तब्दील हो जाता है . बिखरे वक्तों के वर्कों को सहेजने के लिए कभी कभी सदियाँ भी कम होती हैं . उन्नीस जनवरी उन्नीस सौ नब्बे को दिल को इसका ज़रा इल्म ना था …..