जोहरा आपा तुम्हें लाल सलाम!

स्वतंत्र मिश्र
स्वतंत्र मिश्र अपनी प्रतिबद्ध पत्रकारिता के लिए जाने जाते हैं. उनकी सरोकारी पत्रकारिता के लेखन का एक संकलन 'जल, जंगल और जमीन : उलट-पुलट पर्यावरण' नाम से प्रकाशित हो चुकी है.स्वतंत्र स्त्रीकाल के प्रिंट एडिशन के सम्पादन मंडल के सदस्य भी हैं . इनसे उनके मोबाइल न 9953404777 पर सम्पर्क किया जा सकता है.
( स्वतंत्र मिश्र ने १० जुलाई को दुनिया को अलविदा कह गई जोहरा सहगल को याद करते हुए मशहूर अदाकारा की जिन्दादिली  तथा शासन व्यवस्था और तंत्र की बेदिली का चित्र खींचा है और स्त्री स्वतन्त्रता तथा   कला के प्रति जोहरा के जज्बे को सलाम किया है. )

इसी साल,   अभी-अभी तो बीते 27 अप्रैल को ,  मशहूर नर्तकी-कोरियोग्राफर-अभिनेत्री (रंगमंच और फिल्म)जोहरा सहगल, ने 102 साल पूरे किए थे और इतनी जल्दी दुनिया को उनके अलविदा कह जाने की खबर से थोड़ा सकते में हूं ,क्योंकि जोहरा का मतलब जिंदगी और जिंदादिली से है। ऐसा उनके नाम का शाब्दिक अर्थ है या नहीं है, मुझे नहीं पता है। हां,  उनकी जीवटता को देखकर उनके नाम का अर्थ यूं ही कुछ-कुछ हो सकता है। उन्होंने कुछ साल पूर्व एक साक्षात्कार के दौरान एक पत्रकार के यह पूछे जाने पर कि वे 97  की हो गई,  उन्हें मौत से डर नहीं लगता तो उन्होंने पलट कर इस बेहूदे सवाल के जवाब में एक सवाल किया- ‘कौन दुनिया से पहले जाएगा,  मैं या आप,  यह कौन तय करेगा ?’ इसके बाद उन्होंने उस पत्रकार से कहा- ‘ मौत तय है, फिर क्यों डरना ! हां,  जिंदगी अनिश्चित है ,इसलिए  खुशी और सुकून पाने के लिए कुछ चीजें जरूरी हैं , मिसाल के तौर पर , मेहनत  , और मैं ताउम्र ऐसा करती रहूंगी।‘ जाहिर है कि उन्होंने अपने जीवन के लिए तय किए गए इस अनुशासन का सामर्थ्य  रहने तक दृढ़ता से पालन किया। टाइम्स ऑफ इण्डिया को एक साक्षात्कार में उन्होंने ९७ साल में भी अपनी जीजीविषा के लिए ' ह्यूमर और सेक्स' को श्रेय दिया था. उन्होंने कहा था कि ' ह्यूमर के बिना जिन्दगी बोरियत से भर जाती है और सेक्स मैं आज भी चाहती हूँ , क्योंकि वह आपकी सक्रियता को बनाए रखता है.'  उन्होंने 95 वर्ष तक फिल्मों में काम किया। इसी साल की सर्दियों में मुझसे ‘शुक्रवार’ के तात्कालिक संपादक विष्णु नागर ने सरकार द्वारा उन्हें एक भूतल का मकान मुहैया नहीं कराने को लेकर एक स्टोरी करने को कहा। यह तो मेरे लिए मानो बिन मांगी मुराद जैसी ही बात थी। मैंने फिल्म निर्माण से जुड़े अनवर जमाल से उनकी बेटी किरण का मोबाइल नंबर लिया।किरण ने भी बहुत सहजता से समय दे दिया और उनके दिल्ली स्थित मंदाकिनी एन्कलेव वाले घर में हुई बातचीत के दौरान उन्होंने ही बताया कि अनवर ने जोहरा सहगल पर एक शानदार डाक्यूमेंट्री फिल्म भी बनाई है। मेरे साथ ‘शुक्रवार’ के ही मेरे वरिष्ठ सहयोगी मित्र नरेंद्र कुमार वर्मा और छाया पत्रकार मित्र रवि गिरोटा ने भी जोहरा से मिलने के लोभ में साथ चलने की इच्छा जताई। हम उनके घर पहुंचे। किरण से खूब सारी बातचीत हुई लेकिन जोहरा आपा से मिलने की मुराद पूरी नहीं हो पाई। इसकी वजह उनका स्वास्थ्य का दिन-ब-दिन गिरता चला जाना था। इसकी वजह केंद्र और दिल्ली सरकार द्वारा उनकी एक अदना से भूतल वाले घर की मांग पूरी न किया जाना था। एक वजह शायद यह भी हो कि जिन्होंने सात दशक से भी ज्यादा समय तक रंगमंच, कोरियोग्राफी,  विज्ञापन और फिल्मों में काम किया हो और कभी हार न मानी हो। जिसने हर बार कैमरे या व्यक्तिगत जीवन में सभी से पूरे जोशोखरोश से मिलना-मिलाना किया हो, जिनके पांवों ने कभी थिरकने से मना न किया हो, अब वे पूरी तरह अशक्त और कुर्सियों से बंध सी गई थी,  ऐसे में वे किसी के सामने कैसे आना मंजूर करतीं ! जो हमेशा यह कहतीं रही कि मैं रोहिल्ला पठान हूं, कभी हार नहीं मानूंगी,  ऐसे में  भला शून्य में टकटकी लगाए हुए जोहरा क्यों किसी से मिलना पसंद करतीं। सो हम उनके दर्शन से वंचित रह गए। हालांकि ओडिशी की मशहूर नृत्यांगना किरण ने हमारा बहुत गर्माहट से स्वागत किया और हम जोहरा से नही ,तो उनके अक्श, उनकी बेटी से तो मिल ही आए। वे भी सत्तर से ज्यादा की हो चुकी हैं। बच्चों को नृत्य सीखाने का काम करती हैं।


किरण ने हमसे मां और खुद के प्रति सरकारी उपेक्षा का दुःख बांटा और उम्मीद भी की कि शायद खबर छपने से कुछ असर हो जाए। हमारे  सहित तमाम अखबारों का कोई असर नहीं हुआ और सरकार ने उन्हें मरने तक भी भूतल का मकान नहीं मुहैया कराया। हां, मेरी खबर का असर इतना जरूर हुआ कि मुझे प्रसिद्ध पर्यावरणविद् अनुपम मिश्र, वरिष्ठ कहानीकार अशोक गुप्ता सहित कुछ और लोगों ने फोन करके इस बारे में दिल्ली, केंद्र सरकार को पत्र लिखने की बात की थी पर यह किसी वजह से नहीं हो पाया। हम जिंदगी की तेज रफ्तार में कई बार कीमती आखिरी सांसों की परवाह करना तो दूर उन्हें रौंदते हुए आगे बढ़ जाना चाहते हैं। ऐसा ही इस मामले में भी हुआ। आज जब दफ्तर से जब घर लौटा तो जिंदगी और रोजीरोटी की जद्दोजहद में शरीर पस्त हो चुका था। संजीव चंदन का फोन आया कि जोहरा ने दुनिया को अलविदा कह दिया। मैं अवाक रह गया। संजीव चंदन ने पूछते हुए और लगभग याद दिलाते हुए उनके घर, उनकी बेटी के साथ की मुलाकात को समेटते हुए स्त्रीकाल वेबसाइट के लिए कुछ लिखकर देने का आग्रह किया। थोड़ी देर के लिए मुझे लगा कि क्या लिखूं और इस समय क्या लिखूं। पर उनकी जीवनी के किस्से मुझे एक-एक करके याद आने लगे। मेरे अंदर एक आवेग पैदा हुआ। मुझे लगा शायद इसी आवेग का नाम जोहरा है।

किरण ने जोहरा से मिलने की बात करने पर कहा कि वे मुलाकात के लिए 5000 रुपये और फोटो खीचने के दस हजार रुपये मांगती हैं। मैंने अफसोस जताया कि मेरे पास अगर 15 हजार रुपये होते तो मैं मुलाकात के पांच और फोटो के दस हजार रुपये जरूर देता क्योंकि मेरा मानना यह था कि जोहरा की मुलाकात का कीमत नहीं लगाया जा सकता है। मुंबई में कुछ होटल सिने तारिकाओं के साथ डिनर करने के भारी-भरकम रकम वसूल करता है। यह रकम उनकी चमकती त्वचा और उनके ग्लैमर की होती है। जोहरा के पास अब यह सब कुछ भी नहीं था ,लेकिन जोहरा के पास अतीत में किए गए काम की लंबी-चैड़ी पूंजी थी, जो किसी भी संवेदनशील व्यक्ति के लिए जोहरा के एक दर्शन पर न्योछावर करने के लिए काफी थी। अब उनके दांत टूट चुके थे। उन्हें न के बराबर दीखता है। सुनने की मशीन (हियरिंग एड) लगाने के बाद वह अपनी बेटी किरण सहगल से शाम के समय 15-20 मिनट बात कर पाती थीं। उल्लास और पूरे लय के साथ जिंदगी की गाड़ी खींच लेने के बाद सरकारी रवैये से खिन्न होकर जोहरा सबसे दूर अपने कमरे में ही बंदी जैसा जीवन बिता रही थीं। डाक्टर ने उन्हें अनिवार्य तौर पर सर्दियों में धूप खाने को कहा था लेकिन दूसरे मंजिल पर स्थित  से नीचे पार्क तक पहुंचने का मतलब एक भीषण पीड़ादायी प्रक्रिया से गुजरना होता था। जोहरा और किरण ने संयुक्त रुप से केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय, राज्यसभा सांसद श्याम बेनेगल,संगीत नाटक अकादमी और दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री और दिल्ली के वर्तमान लेफ्टिनेंट गवर्नर को एक सरकारी आवास (ग्राउंड फ्लोर) मुहैया कराने के बारे में लिखा था, लेकिन मंत्रालय ने उनकी फाइल पर इस आशय का एक नोट लिखा कि कलाकार श्रेणी के अन्तर्गत 40-60 साल के लोगों को ही आवास मुहैया कराए जाने का प्रावधान है और वे इस श्रेणी में नहीं आती हैं। किरण ने बताया था कि ऐसी स्थिति में कैबिनेट से मंजूरी लेकर सरकार जोहरा और किरण को आवास मुहैया करा सकती थीं लेकिन उन्हें ऐसा करना बीते चार सालों में मुनासिब नहीं लगा। कभी जिनके पांवों के थिरकने और भाव-भंगिमा को देखने के लिए दुनिया के अलग-अलग मुल्कों में उनके प्रशंसक मचल उठते थे अब वे पैर कुर्सियों से बेजान होकर बंध से गए थे।

 जोहरा का जन्म 27 अप्रैल 1912 में उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में एक रोहिल्ला पठान के घर हुआ था। एक साल की उम्र में उनकी आंखों की रोशनी ग्लूकोमा की वजह से खो गई थी। वर्मिंघम में काफी इलाज के बाद उनमें रोशनी लौट पाई। छोटी सी उम्र में उनकी मां गुजर गईं लेकिन मां की इच्छा थी कि उनकी बेटियां लाहौर में पढ़ें। जोहरा को शिक्षा-दीक्षा के लिए लाहौर भेज दिया गया। वे वहां से जर्मनी के ड्रैसडेन स्थित मैरी विगमैन नृत्य स्कूल में दाखिला लिया। वे यहां दाखिला लेने वाली पहली भारतीय थीं। उन्होंने यहां बुर्का उतारकर फेंक दिया और कहा कि इस कपड़े से अच्छा पेटीकोट बन सकता है। उस जमाने के मशहूर नर्तक उदयशंकर अपनी टीम के साथ नृत्य प्रदर्शन के लिए यूरोप की यात्रा पर थे।
किरण सहगल के साथ स्वतंत्र मिश्र : छाया रवि गिरोटा

जोहरा ने उदयशंकर से मिलकर उनके साथ काम करने की इच्छा व्यक्त की तो उदय ने पाठ्यक्रम पूरा करने के बाद उन्हें अपनी टीम में नौकरी देने का वादा किया लेकिन जोहरा को अचानक एक दिन उदयशंकर जी का एक तार मिला-‘हमलोग जापान नृत्य-यात्रा पर जा रहे हैं, क्या तुम हमारे साथ आ सकोगी?’  1935 में वे उदयशंकर के साथ जुड़ीं और पांच साल लगातार मिस्र, यूरोप और अमेरिका के अलग-अलग इलाकों में नृत्य टोली के साथ मुख्य नर्तकी की भूमिका का निर्वहन किया। इसके बाद उदयशंकर ने अल्मोड़ा में ‘उदयशंकर इंडियन कल्चरल सेंटर’ की नींव रखी। यहां जोहरा लोगों को नृत्य सिखाती थीं। उदयशंकर नृत्य शैली की उस जमाने में इतनी धूम थी कि उनसे नृत्य सीखने के लिए बॉलीवुड के मशहूर अभिनेता और निर्देशक गुरूदत्त भी कुछ महीने अल्मोड़ा में टिक गए थे। जोहरा ने उदयशंकर के साथ आठ साल काम किया। यहीं जोहरा की मुलाकात वैज्ञानिक, पेंटर और नर्तक कामेश्वर सहगल से हुई। जोहरा ने कामेश्वर के खुद से आठ साल उम्र में छोटे होने और रूढि़वादी परिवार से नाता रखने के बाद भी शादी की। शादी के दो दिन बाद ही भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान गांधी जी को समर्थन देने के चलते पति-पत्नी दोनों को जेल जाना पड़ा। जेल से छूटने के बाद वे मुंबई पलायन कर गए।

जोहरा 1945 में पृथ्वीराज कपूर की पृथ्वी थियेटर से जुड़ गईं। उनकी छोटी बहन उजरा बट्ट पहले से ही पृथ्वी थियेटर के लिए काम कर रही थीं। इन्हीं दिनों जोहरा इंडियन पीपल्स थियेटर एसोसिएशन (इप्टा) से जुड़ गईं। इन्होंने इप्टा से जुड़कर 14 साल तक काम किया। इप्टा के प्रोडक्शन में बनी ख्वाजा अहमद अब्बास द्वारा निर्देशित फिल्म ‘धरती के लाल’ में इन्होंने पहली बार पर्दे पर काम किया। इसके बाद इन्होंने चेतन आनंद की ‘नीचा नगर’ और गुरुदत्त की ‘बाजी’ में काम किया। सलमान खान के साथ ‘हम दिल दे चुके हैं सनम, शाहरुख खान के साथ ‘वीरजारा’ रणवीर कपूर के साथ ‘सांवरिया’ में काम किया। इन्होंने 2007 में आखिरी फिल्म ‘चीनी कम’ में  अमिताभ बच्चन के साथ काम किया था।

जोहरा के इस दुनिया से चले जाने के बाद क्या अपसंस्कृति के इस दौर में सांस्कृतिक अभियान को खड़ा करने के लिए कोई मुहिम छेड़ी जा सकेगी ? अगर ऐसा कुछ भी किया जा सका ,तो निश्चित तौर पर यह जोहरा के प्रति दी गई सच्ची श्रद्धांजलि होगी,  अन्यथा यह दुनिया तो आनी-जानी है ही। दिलों में वही पीढ़ी दर पीढ़ी बने रह जाते हैं, जो जीवन या समाज के लिए कुछ रच देना चाहते हों। जोहरा का इप्टा से 14 वर्षों तक जुड़े रहना, शादी के दो दिन बाद जेल जाना, यह अपने आप में यह बताता है कि वे मुक्ति का सपना देखती थीं। वे औरतों, बच्चों, युवाओं की मुक्ति का सपना देखती थीं तभी तो उन्होंने बहुत छोटी उम्र में बुर्का उतारकर फेंक दिया था। जोहरा का पर्देदारी और घुटन से भरी इस दुनिया से आज तक मुक्ति मिल पाई है ? आज भी औरतों के चेहरे को तेजाब से जलाने की कोशिश जारी है। आज उनकी देह पुरुषवादी सत्ता के निशाने पर है और यही वजह है कि यहां हर 22वें सेकेंड में दुष्कर्म की घटना को अंजाम दिया जा रहा है। जोहरा के सपनों की दुनिया को पूरा करने की मुहिम चल रही है पर उसकी धार अभी भी मर्दवादी समाज की कोशिशों के आगे कमजोर दिखाई पड़ते हैं। जोहरा को श्रद्धांजलि देने का मतलब तभी पूरा हो पाएगा जब मर्दवादी समाज की दीवारें ध्वस्त करके समतामूलक और स्वतंत्र समाज की स्थापना की जा सकेगी।

जोहरा आपा तुम्हें लाल सलाम!

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