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यौन शोषण के आरोपों से घिरी न्यायपालिका

अरविंद जैन

स्त्री पर यौन हिंसा और न्यायालयों एवम समाज की पुरुषवादी दृष्टि पर ऐडवोकेट अरविंद जैन ने मह्त्वपूर्ण काम किये हैं. उनकी किताब ‘औरत होने की सजा’ हिन्दी में स्त्रीवादी न्याय सिद्धांत की पहली और महत्वपूर्ण किताब है. संपर्क : 9810201120
bakeelsab@gmail.com

( पिछले दिनों मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश के ऊपर उसके अधीनस्थ न्यायालय की अतिरिक्त सेशन जज ने यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया . न्यायिक प्रक्रिया की इससे बड़ी विडम्बना और क्या हो सकती है ! इससे भी बड़ी विडम्बना यह थी कि जिस उच्चतम न्यायालय ने 10 से अधिक कर्मियों वाले कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न के खिलाफ ‘विशाखा समिति’ गठित करने के आदेश दिए थे वह खुद ही अपने यहाँ ऐसी समिति के प्रति अनिच्छुक रहा . ताजा घटना क्रम के बहाने एडवोकेट अरविन्द जैन न्यायपालिका के स्त्री विरोधी चरित्र की पड़ताल कर रहे हैं . )

इससे बड़ी न्यायिक विडम्बना और क्या होगी कि देश की सर्वोच्च अदालत ने (‘विशाखा’ बनाम राजस्थान राज्य, ए.आई.आर. 1997 सुप्रीम कोर्ट 3012 मामले में) ‘कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न’ रोकने के लिए, 13 अगस्त 1997 को जो एतिहासिक ‘दिशा-निर्देश’ जारी किये थे, उन्हें खुद अपनी अदालत में लागू करने में लगभग 17 साल लग गए. सरकार और कानून मंत्रालय भी विधेयक बनाने के बारे में 17 साल तक सोचते-विचारते रहे. आख़िरकार, 22 अप्रैल 2013 को कानून बन पाया. कारण एक नहीं, अनेक हो सकते हैं, पर इससे लिंग समानता और स्त्री रक्षा-सुरक्षा के सवाल पर, विधायिका और न्यायपालिका की गंभीरता का अनुमान तो लगाया ही जा सकता है.

पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायधीशों पर यौन शोषण के आरोप, वरिष्ठ अधिवक्ताओं पर यौन शोषण के आरोप , तहलका के संपादक तरुण तेजपाल पर अपनी एक सहकर्मी के साथ यौन शोषण, यौन उत्पीड़न के कारण इण्डिया टी.वी. की पत्रकार द्वारा आत्महत्या का प्रयास और आए दिन महिलाओं के साथ होने वाले यौन उत्पीडन,अत्याचार के दुखद हाद्सो के बावजूद  समाज, मीडिया और न्यायपालिका की रहस्यमय ख़ामोशी का मतलब क्या है? क्या यह सब होने-देखने के लिए ही औरतें अभिशप्त हैं?

न्यायपालिका में पारदर्शिता पर चल रही बहस के बीच में ही, एक और ‘दुर्घटना’ हमारा सामने है. मध्य प्रदेश उच्च-न्यायालय (ग्वालियर) के न्यायमूर्ती एस.के.गंगेले द्वारा यौन उत्पीड़न से परेशान महिला सत्र-न्यायाधीश का त्यागपत्र. राष्ट्रपति, कानूनमंत्री, सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और मध्य प्रदेश उच्च-न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को भेजी शियाकत पर, सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश आर.एम. लोढ़ा ने कहा है कि ”यह एकमात्र ऐसा पेशा है, जिसमें हम अपने सहयोगियों को भाई और बहन के रूप में देखते हैं। यह बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण घटना है. मेरे पास शिकायत आई है और मैं इस पर उचित कार्रवाई करूंगा.” कब और क्या कार्यवाही होगी, अभी कहना कठिन है.

न्यायमूर्ती एस.के.गंगेले ने सभी आरोपों का खंडन करते हुए कहा है कि “आरोप सिद्ध हों तो फाँसी पर लटका दें….किसी भी एजेंसी से जांच करवा लो….मैं निर्दोष हूँ.” हम सब जानते हैं कि आरोपों की जाच और सुनवाई के बिना तो कुछ होना नहीं है. भूतपूर्व अतिरिक्त महाधिवक्ता ने न्यायमूर्ति पर ‘महाभियोग’ चलाने की मांग की है. एक वकील और स्वयंसेवी का कहना है कि जज साहिबा चाहे तो पुलिस को शिकायत करे या मध्य प्रदेश उच्च-न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को. मतलब मामला मध्य प्रदेश का है. अन्य उत्साही वकील ने तो जनहित याचिका भी दायर कर दी.

मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के ग्वालियर बेंच के  एक न्यायाधीश पर अधीनस्थ कोर्ट की एक अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया

स्त्रीकाल पर अरविन्द जैन के दूसरे आलेख पढ़ने के लिए क्लिक करें :
( मर्दों के लिए घर आशियाना और औरतों के लिए जेलखाना है )
( दाम्पत्य में बलात्कार का लाइसेंस असंवैधानिक है )
( मनुवादी न्याय का शीर्षतंत्र )
( न्याय व्यवस्था में दहेज़ का नासूर )

आश्चर्यजनक है कि समाज के सर्वश्रेष्ठ और संदेह से परे तक सम्मानित माने-समझे जाने वाले क्षेत्रों (शिक्षा, चिकित्सा, न्यायपालिका, मीडिया आदि) से भी, महिलाओं के देह-दमन के अशोभनीय समाचार निरंतर बढ़ते जा रहे हैं. न्याय के प्रांगन से बचाओ…बचाओ की चीख-चिल्लाहट, अस्मत के बदले इंसाफ़ की दास्ताँ या किसी न्यायमूर्ति द्वारा नौकरी पाने-बचाने की ऐसी शर्मनाक शर्तें, सचमुच गंभीर चेतावनी है. न्याय और कानूनविदों के चाक-चौबंद किले में, ‘कुलद्रोहियों ’ का क्या काम? पुनर्विचार करना पड़ेगा कि न्यायधीशों की चुनाव प्रक्रिया में किस-किस खामी के कारण, अनैतिकता और बीमार मानसिकता भी चोरी छुपे प्रवेश कर रही है. चारों ओर से सवालों का घेरा, गहराता जा रहा है. न्याय की अंधी देवी के हाथों में, अवमानना के लिए सज़ा देने वाली तलवार को जंग लग चुका है या पीड़ित दंड के भय से मुक्त हो गया है?

दरअसल शिक्षित और स्वावलंबी स्त्रियों को दोहरी .  भूमिका निभानी पड़ रही है. आज़ादी के बाद शिक्षा-दीक्षा के कारण स्त्रियाँ बदली हैं..बदल रही हैं, परन्तु भारतीय पुरुष अपनी मानसिक बनावट-बुनावट बदलाने को तैयार नहीं है. एक तरफ पुरुषों के लिए यह सत्ता से भी अधिक, लिंग वर्चस्व की लड़ाई है. दूसरी ओर स्त्रियाँ अपने सम्मान और गरिमा पर हुए या होने वाले हमले का हर संभव विरोध करने लगी है. दमन और विरोध के इस दुश्चक्र में यौन शोषण, उत्पीड़न और हिंसा लगातार बढ़ रही है. समानता के संघर्ष में स्त्रियों का विरोध-प्रतिरोध या दबाव-तनाव बढ़ता है, तो कुछ उदारवादी-सुधारवादी ‘मेक-अप’ या ‘कॉस्मेटिक सर्जरी’ की तरह, नए विधि-विधान बना दिए जाते हैं और कुछ और सुधारों के सपने दिखा दिए जाते हैं. सच है कि सिर्फ कानूनी विधान-प्रावधान बना देने भर से, समस्या का समाधान नहीं होगा. विशाखा दिशा-निर्देशों की छाँव में ढले-पले अधिनियम में, अभी भी ढेरों अन्तर्विरोध और विसंगतियां मौजूद हैं. अधिनियम में ‘कानूनी गड्ढों’ और चोर रास्तों के रहते, स्त्री-विरोधी अपराधों पर लगाम लगा पाना मुश्किल होगा.

हमें नहीं भूलना चाहिए कि हक़ मांगने वाली आवाजों को चुप कराना या रख पाना अब  नामुमकिन है. शायद मीडिया को डरा-धमका कर झुकाया जा सकता हो, मगर सोशल मीडिया का गला घोंटना असंभव है. 1860 के न्याय-शास्त्रों और सिद्धांतों  से, इक्कीसवीं सदी के वर्तमान भारतीय समाज, विशेषकर स्त्री-समाज को नहीं चलाया जा सकता. बदलते समय-समाज में संविधान के मौलिक अधिकारों का अर्थ, स्त्री-पुरुष के लिए बराबर होना ही चाहिए.  ‘सार्वजानिक आस्था और विश्वास’ की, उच्च न्यायालय के हर न्यायमूर्ति से यह अपेक्षा रहती है कि वह  निष्ठा और नैतिक मानदंडों पर खरा उतरेगा. आम व्यक्ति की आखिरी उम्मीद हैं न्यायधीश. यह बहाना नहीं चलेगा कि समाज का नैतिक पतन हो रहा है और वो भी उसी समाज से आते हैं, सो आदर्श व्यवहार की आशा नहीं करनी चाहिए. न्यायधीश की निष्पक्षता और नैतिकता संदेह से परे होना लाज़िमी है. भारतीय समाज “न्यायधीश की बौद्धिक ईमानदारी और नैतिक चरित्र” को, “स्त्री के कौमार्य और पवित्रता” की तरह ही देखता-समझता है. स्वतंत्र और निष्पक्ष न्यायधीशों के बिना, प्रजातंत्र और कानून के राज्य की रक्षा कैसे होगी?

अगर संविधान के रक्षकों पर ही, स्त्री अस्मिता के भक्षक बनने के गंभीर आरोप (सही या गलत) लग रहे हैं, तो यह अपने आप में बेहद संगीन है. न्याय मंदिरों के ‘स्वर्ण कलश’ ही कलुषित होने लगे, तो फिर ‘लज्जा’ कहाँ फरियाद करेगी? समय रहते इस महामारी का समुचित समाधान ढूँढने और उसे कारगर रूप से लागू करने की मुख्य जिम्मेवारी, निस्संदेह न्यायिक परिवार के मुखिया की है. देश की “आधी आबादी” बड़ी उत्सुकता और बेचैनी से, निर्णायक फैसले और सम्पूर्ण न्याय की इंतज़ार में बाट जोह रही है. विश्वास करना होगा कि इस बार, इंसाफ़ होने में देर या अंधेर नहीं होगा.
( नवभारत टाइम्स  से साभार  )

प्रेमचंद का साहित्य और दलित स्त्री

( रानी कुमारी के द्वारा ‘प्रेमचंद का साहित्य और दलित स्त्री’ विषय पर आयोजित संगोष्ठी की रपट।  रानी दिल्ली वि वि में शोधरत  हैं.  )

“ प्रेमचंद पर बात करना मुश्किल हैं। कहाँ से शुरू करें! इस विषय पर एक खुली बहस होनी चाहिए। यह पहली बहस है जो इस मंच पर हो रही है। पिछले कुछ वर्षों से दलित  साहित्यकारों में कथाकार प्रेमचंद को लेकर विवाद है। यह विवाद सच में कोई मायने रखता है या केवल विवाद के लिए विवाद है। यह गौर करने वाली बात है प्रेमचंद और उनके साहित्य पर आज दलित साहित्य व साहित्यकारों द्वारा तीन प्रकार से चर्चा हो रही है, प्रेमचंद पर चर्चा करने वाली सबसे पहली धारा उन साहित्यकारों की हैं, जो दलित साहित्य में प्रेमचंद के योगदान को अमूल्य मानते हैं। दूसरी धारा में वे दलित साहित्यकार आते हैं, जो प्रेमचंद की वैचारिकी पर प्रश्न-चिन्ह लगाते हुए उन्हें एक तरफ पक्के ‘गांधीवादी’ और दूसरी तरफ कट्टर ‘अंबेडकर विरोधी’ घोषित करते हैं। इस धारा के साहित्यकार प्रेमचंद की कहानियों के कथ्य, भाषा और विचार पर  सवाल खड़े कर उन्हें दलित चेतना की दृष्टि से खारिज करते हुए ‘ब्राह्मणवादी’, हिंदुवादी और न जाने किस-किस पदवी से विभूषित करते हैं।  तीसरी तरह की विचारधारा दलित साहित्य में उन संकीर्ण जातिवादी दलित लेखकों की है, जो साहित्यकार प्रेमचंद के योगदान को पूर्वाग्रही नजरिये से अपने ही कुतर्कों, मनगढ़ंत, कुपाठ और गलत पाठ करते हुए उनकी जाति कायस्थ होने की कसौटी पर कसकर उनकी व उनके साहित्य की घोर जातिवादी आलोचना कर रहे है।‘

उक्त बातें अपेक्षा के सम्पादक डॉ. तेज़ सिंह की स्मृति में ‘प्रेमचंद का साहित्य और दलित स्त्री’ विषय पर ‘साहित्य सवांद’ के द्वारा आयोजित संगोष्ठी में ‘साहित्य संवाद’ की संस्थापिका और लेखिका तथा सामाजिक कार्यकर्ता अनिता भारती ने कही.

फोटो : संघपाली अरुणा लोकशक्ति

घर के ड्राईंग रूम से शुरु होकर डॉ. तेज सिंह की स्मृति में आयोजित ‘साहित्य संवाद’ की तृतीय संगोष्ठी गत शाम 28 जुलाई को गांधी शांति प्रतिष्ठान में सुगठित रूप से सम्पन्न हुई। हाल ही में स्थापित ‘साहित्य संवाद’ की यात्रा का विकास दिनोंदिन बढ़ रहा है। यह इसके लिए बहुत ही उत्साह की बात है। विकास यात्रा की कड़ी में “प्रेमचंद का साहित्य और दलित स्त्री” विषय पर आयोजित इस संगोष्ठी की अध्यक्षता रमणिका गुप्ता ने की तथा मुख्य वक्ता के रुप में सुमित्रा मेहरोल, वैभव सिंह, रजनी दिसोदिया, कवितेंद्र इंदु, गंगासहाय मीणा, प्रियंका सोनकर उपस्थित रहें। टिप्पणीकार के रूप में बहुत ही संक्षेप में विषय पर अपनी बात बजरंग बिहारी तिवारी और टेकचंद ने प्रस्तुत की। इस सारगर्भित संगोष्ठी के महत्वपूर्ण विषय से परिचय अनिता भारती ने करवाया। उसका सुनियोजित और सफल संचालन धर्मवीर सिंह ने. वहीं सभी अतिथियों का धन्यवाद ज्ञापन जे.एन.यू शोधछात्रा आरती रानी प्रजापति ने कर इस संगोष्ठी का समापन किया।

दलित साहित्यकार अनिता भारती ने इस विषय की गंभीरता, उस पर विमर्श की आवश्यकता और उस पर विवाद आदि इन बिंदुओं पर बात करते हुए प्रेमचंद को बिना किसी पूर्वाग्रह से ग्रसित एक सजग लेखक के रूप में समझने की बात कही। उन्होंने सवाल उठाया कि हमें उन पर आरोप लगाने से पहले यह सोचना चाहिए कि क्या प्रेमचंद स्त्री को स्त्रीत्व के सभी गुणों के साथ चित्रित करना चाहते थे और क्या वह ऐसा कर पाये हैं? उन्होंने कहा कि दलित साहित्य का अर्थ केवल प्रतिकार करना भर नहीं है। सुमित्रा मेहरोल कहा कि प्राय: दलित स्त्रियाँ जाति और पितृसत्ता से पीड़ित दिखाई देती है। उन्होंने कहा कि प्रेमचंद के यहाँ दलित स्त्रियों केवल डर, हीनता ही नहीं मिलती बल्कि उनमें निर्भीकता भी देखी जा सकती है। वैभव सिंह ने कहा कि प्रेमचंद के विश्लेषण का अर्थ है कि उनके समय का विश्लेषण। सेवासदन में उनकी जो संवेदना सवर्ण स्त्रियों के प्रति दिखाई देती है वह आगे चलकर दलित स्त्रियों के प्रति भी देखी जा सकती है। रजनी दिसोदिया ने कहा कि प्रेमचंद और हिंदी दलित आलोचना एक चलता सिक्का है जिसे हर कोई चलाता आ रहा है। हिंदी आलोचना की एक बनी बनाई पद्धति से किसी भी निष्कर्ष पर तुरंत पहुँचकर उसे सिद्ध सत्य मान लेना गलत है। उन्होंने ‘कफन’ कहानी में बुधिया के प्रसव के दौरान बेखबर और अनुपस्थित स्त्री समाज की मानवीयता पर सवाल उठाया। कवितेंद्र इंदु ने कहा क्या दलित स्त्रियों का सवाल स्त्रियों के सवाल से हटकर हैं? दलित स्त्रीवाद और प्रेमचंद में जरुर कुछ सामान है तभी दलित स्त्री पर यहां बात की जा रही है। जे.एन.यू से डॉ. गंगा सहाय मीणा ने प्रेमचंद साहित्य में एक दो स्थान पर मामूली रूप से चित्रित आदिवासी समाज के मुख्य या कहें तो गंभीर समस्या के रूप में चित्रण से नादारद पर गहरी चिंता जताई। उन्होंने बताया कि प्रेमचंद के समय में भी व्यापक स्तर पर कई आदिवासी आंदोलन चल रहे थे, जिनका कहीं कोई चित्रण प्रेमचंद की लेखनी नहीं कर पायी। जे.एन.यू. शोधछात्रा प्रियंका सोनकर ने कहा कि प्रेमचन्द को केवल दलित विरोधी मानना ठीक नहीं है। उन्होंने कहा प्रेमचंद के पूरे साहित्य में शोषितों वंचितों के प्रति संवेदनाएं ही चित्रित की हैं, जो उन्हें दलितों के पक्ष में भी खड़ा करती हैं।

फोटो : संघपाली अरुणा लोकशक्ति

वरिष्ठ आलोचक तथा संगोष्ठी की अध्यक्षा रमणिका गुप्ता प्रेमचंद को इस मामले में गलत नहीं ठहराती हैं उनके अनुसार कोई भी सजग से सजग लेखक समाज के सभी मुद्दों पर बात करें यह कोई जरुरी नहीं। ऐसे नियम लेकर आप किसी भी साहित्यकार का मूल्यांकन नहीं कर सकते। कहानीकार टेकचंद ने प्रेमचंद को अपने समय के आईने में ना देखने के बजाय उनके समय के आईने में देखने पर जोर दिया। वरिष्ठ दलित आलोचक बजरंग बिहारी तिवारी ने कहा कि इस संगोष्ठी में उठे गंभीर मुद्दे और निकले परिणामों को देखते हुए इस विषय पर किसी पत्रिका का विशेषांक जरुर आना चाहिए ताकि इससे जुड़े सभी बिंदु एक जगह देखे जा सके। उनके हिसाब से यह विषय एक केवल संगोष्ठी में संपूर्णता नहीं पा सकता यह इसकी शुरुआत हो सकती है अंत नहीं। इस तरह गंभीर और व्यापक विमर्श की मांग करती हुई यह संगोष्ठी सावन की हल्की-फुल्की रिमझिम की सौंधी महक के साथ समाप्त हुई।

नीला आसमान: पहली किश्त

शोभा मिश्रा


साहित्यिक -सामाजिक संगठन फर्गुदिया की संस्थापक ‘संचालक शोभा मिश्रा कवितायेँ और कहानियां लिखती हैं. ये सक्रिय ब्लॉगर के रूप में सम्मानित हैं और दिल्ली में रहती हैं. संपर्क : shobhamishra789@gmail.com

( शोभा मिश्रा की लम्बी कहानी दो किश्तों में )

अपने होने की अनुभूति से अनभिज्ञ जब उसने अपनी कोमल गुलाबी पंखुड़ियों सी पलकें हलके से ऊपर उठाईं तो नारंगी क्षितिज को मंत्रमुग्ध-सी निहारती रही, स्वर्ण सी दमकती बादलों की मुलायम रुई की मंडलियाँ एक दूसरे से गुँथी हुई बहुत नजदीक उसके गालों को अपने स्पर्श से गुदगुदा रही थीं।नन्हे पाँव के नीचे गीली रेत की गुदगुदी उसके हृदय और रोम रोम को उमंगों से भर रही थी, ठंडी नदी की धीमी लहरें बार-बार पाँवों में पायलों का आकार दे रही थी, ठंडी बूँदों की रुन-झुन कानों से होती हुई मस्तिष्क की शिराओं को विषाद से मुक्त कर ब्रह्मांण विचरण का आभास दे रही थी। देवदार के वृक्षों से ढँकी विशाल पर्वत श्रृंखला को वो अपनी नन्ही बाहों में समेट लेना चाहती थी। इन्द्रधनुष के सभी रंगों से सजी क्यारियाँ, फूलों की पंखुड़ियों पर इतराती तितलियाँ उसकी आँखों में सभी रंग भर दे रहीं थी।तभी अचानक पाँवों के नीचे की गीली नरम रेत पथरीली होती गई, पाँव में पायलें बनती ठंडी लहरें सख्त बेड़ियाँ बनती गईं।अपने रंगों, ख्यालों, उमंगों के आसमान में विचरती उन्मुक्त चिरैया सी वो लगातार उड़ती रहती… मोर के सतरंगी, इन्द्रधनुषी पंखों के रंगों से कभी नदी, झरने, पहाड़वाली सीनरी बना देती तो कभी फूलों पर रंग-बिरंगी तितलियाँ…लेकिन रूढ़िवादी परम्पराओं की सुनहरी कैद से वो अक्सर सहम जाती… समय से पहले पंखों के आने से पहले उसके लिए एक अलग पिंजरा तैयार करने की बातें की जाने लगी।

कुछ ही दिनों बाद उसकी बुआ की शादी थी। पूरा घर मेहमानों और रिश्तेदारों से भरा हुआ था। कुछ रिश्तेदार छोटी छोटी मंडली बनाकर बैठे थे, हँसी-मजाक कर रहे थे, कुछ नीचे बिछे गद्दे पर आराम फरमा रहे थे। हँसी मजाक और काम की बातों के साथ पूरे घर में हलके शोर के साथ मेले जैसा माहौल था।सुनैना स्कूल से लौटी। बैठक के बाद चाची के कमरे से गुजरते हुए रसोई की तरफ बढ़ गई। रसोई में अम्मा और चाची सबको खाना परोसने में लगीं थी, दादी…बुआ…अम्मा…चाची…दीदी मिलकर एक और ब्याह रचाने के लिए पंचायत बैठाये हुए थीं। दादी खाना खा रही थीं। सुन्दर सी बुआ के सर पर खूब तेल चुपड़ा हुआ था। शरीर और कपड़ों पर हल्दी का पीलापन साफ दिख रहा था, बुआ भी कोने में बैठी खाना खा रही थीं, मौसी खाना खाने के लिए अपनी बारी के इंतजार में थीं।

वह स्कूल का बस्ता पीठ पर लादे रसोई के दरवाजे पर खड़ी हो गई, उसे देखकर अम्मा और चाचीजी एक दूसरे की तरफ देखते हुए सहमकर चुप हो गईं। चाची और अम्मा जानती थी कि वह अपने ब्याह की बात सुनकर नाराज होती है, उसकी आँखें किसी को ढूँढ़ रही थीं, जैसे ही उसे गुडुआ नजर आया उसने उससे पूछ ही लिया…
‘‘ए गुड्डू … नानीजी कहाँ हैं रे? वो खाना खाईं की नहीं?’’
गुडुआ अपने में मस्त था। ‘‘हमको का पता… होंगी यहीं कहीं’’, कहकर बाहर भाग गया।
‘‘होंगी कहाँ…बैठी होंगी कहीं कोने में छिपकर… सुहागिनों के साथ बैठेंगी तो उनके सुहाग न उजड़ जाएंगे …वो तो हमारी अम्मा का मन था इसलिए नानीजी को शादी पर बुलवा लीं…नहीं तो बिटिया के घर बैठकर खाने में पुरानी सोच की हमारी दादी कम हंगामा नहीं करतीं…नानी और अम्मा को जीने नहीं देती दादी’’ वो भुनभुनाती हुई स्टोररूम की तरफ बढ़ गई …

नानी स्टोररूम में ही थीं, अम्मा का बक्सा ठीक कर रही थीं, वह नानी को देखकर चहककर बोली… नानी!!
नानी ने आँख उठाकर एक बार उसे देखा और मुस्कुराते हुए सर का आँचल ठीक करते हुए बोली ‘‘जा बाबू… पहले हाथ-मुँह धोलो… कुछ खा लो… फिर आराम से बैठकर बतियाएँ।’’

वह मुस्कुराती हुई रसोईघर की ओर बढ़ गई, हाथ-मुँह धोकर पाटे पर बैठ गई। अम्मा और चाची से दुलराते हुए खाना माँगने लगी, चाची उसको पुचकारते हुए बड़े प्यार से बोलीं, ‘‘बिटिया… बस अम्मा (दादी) को खिलाकर तुमको और तुम्हारी मौसी को एक साथ खाना परोस देंगे।’’ वह चाची की बात पर मुस्करा भर दी, अम्मा को तिरछी निगाह से देखती रही…उसे बार-बार अपने ब्याह की बात पसंद नहीं थी…नानीजी अम्मा को कितनी बार समझा चुकी हैं कि इसके ब्याह के लिए अभी लड़का देखना बंद करो…इसको पढ़ने दो…अभी तो ग्यारहवीं ही कर रही है लेकिन अम्मा तो मान जाएँ…दादी को कौन समझाएगा।चाचीजी दादी को पंखा झलते हुए अपना राग अलापे हुए थीं, ‘‘बस्ती वाला लड़का कम पढ़ा-लिखा जरूर है लेकिन उन सबके पास गाँव में खेती और बाग-बगीचा बहुत है…लड़के का बैंकाक में बढ़िया बिजनेस है…हर छः महीने में जब गाँव आता है तो मोटी-मोटी नोटों की गड्डी अपनी महतारी को पकड़ता है…ब्याह के बाद सबकुछ हमारी बिटिया का ही तो होगा।’’
दादी लोटे से पानी पीकर बोली, ‘‘उ तो सब ठीक है लेकिन बिटिया को परदेस भेजना ठीक नहीं…अपने देश में कहीं भी रहें…कम से कम दुःख-सुख…तीज-त्यौहार में हम सब मिल तो लेंगे।’’

मौसी की निगाह में उसके लायक एक लड़का था, वो उसका बखान करने में लगीं थीं, ‘‘लड़का पढ़ने में बहुत होशियार है…कहीं न कहीं उसकी सरकारी नौकरी जरूर लग जाएगी…परिवार बहुत आधुनिक विचारधारा का है…सास बहुत मॉडर्न है… बिटिया खुश रहेगी…और सबसे बड़ी बात ये है कि बिटिया हमारे पड़ोस में रहेगी… हमारी आँखांें के सामने…और इसके पास रहने पर हमको भी आराम हो जाएगा… बीमारी-हजारी में कितनी तकलीफ होती है…अकेले घर का सारा काम करना पड़ता है…ये बिना टिफिन के ड्यूटी चले जाते हैं…कई बार बच्चों को भूखा सोना पड़ता है।’’ कहते-कहते मौसी का गला भर्रा गया…आँख से आँसू टपकने लगे…वैसे बात-बात पर रोना मौसीजी की बचपन की आदत है …नानी ने उसे एक बार बताया था।उसको बहुत भूख लगी थी ऊपर से अपने ब्याह की बात सुनकर और खाक हुई जा रही थी…लगातार चुभती हुई नजर से अपनी अम्मा को देख रही थी …अम्मा किसी को बोलने से रोक नहीं पा रही थीं और कहीं उसके सब्र का बाँध टूट न जाये … वह कोई हंगामा खड़ा न कर दे इस बात से भी डर रही थीं।

उसे मौसी की नौटंकी पर बहुत गुस्सा आ रहा था …अपने गुस्से पर भरसक काबू करते हुए मुस्कराती हुई मौसी से बोली, ‘‘काहे मौसी…जब बड़का पैदा हुआ था तब तो बुलाने पर हम आये नहीं थे का? पूरे सवा महीने तुम्हरे पास रहकर हम घर का काम सँभाले थे और एक बार तुम्हारे पैर में फ्रैक्चर हुआ था तब रिंकी (उसके मामा की लड़की) ने पूरे एक महीने तुम्हरी देखभाल की थी…जरूरत पड़ने पर कोई न कोई जाता ही है तुम्हरे पास…अपनी परेशानी का बहाना लेकर क्यों हमारी बलि चढ़ाने पर लगी हो?’’

मौसी ने फिर रोना शुरू किया और बिलखते हुए कहने लगी, ‘‘अरे हमारी किस्मत में बिटिया का सुख नहीं है… तुमको गोदी में खिलाये हैं … हमने तुमको अपनी बिटिया से कम नहीं समझा है कभी…पड़ोस में रहोगी तो वोे कमी भी पूरी हो जाएगी।’’

अब तक खाने की थाली उसके सामने आ चुकी थी, गुडुआ भी बाहर से मटरगस्ती करके आ गया था…दादी के बगल में बैठकर सारी बातें सुन रहा था…मौसी की खिल्ली उड़ाते हुए बोला, ‘‘काहे मौसी! पूरी दुनिया के लड़के तुम अपने अंचरा में बाँधे फिरती हो का …? दूसरे शहर में रहते हुए हमरे मोहल्ले की खबर थी तुमका, एक साल पहिले भी तुम दीदी के लिए हमरे मोहल्ले का लड़का देखी थी…बाद में ताऊ को उ लड़का पसंद नहीं आया…ब्याह के लिए लड़के वालन का मना कर दिया गया …ओ के बाद भी उ लड़का दीदी जब स्कूल जाती थी तो ओका पीछा करत रहे…उ तो पापा एक बार ओका कनपटीयाये तब जाके कहीं उ दीदी का पीछा करना छोड़ा, ओ के नाते दीदी स्कूल जाये से डरत रही।’’

बारह साल का गुडुआ चाची का इकलौता बेटा होने से उसको सभी का बहुत प्यार मिलता था …इसलिए थोड़ा बिगड़ा हुआ भी था…घरेलू परपंच में उसे बहुत मजा आता था… वैसे तो उसकी और गुडुआ की खूब बनती थी लेकिन जब उसे कोई डांटता था तब गुडुआ के कलेजे को बहुत ठंडक मिलती थी।बुआ ने उसकी बात सुनकर एक बार जोर से उसे डांट लगाई, ‘‘चुप हो जा गुडुआ…बड़न के बीच में तेरे बोलने का क्या मतलब?’’ गुडुआ बुआ की बात सुनकर चुप हो गया।

सुनैना सबकी बकवास और ज्यादा देर तक नहीं सुन सकती थी …थाली जल्दी से अपने आगे खींचकर कटोरी की पूरी दाल चावल के ऊपर उड़ेलते हुए अम्मा से मिर्चे का अचार माँगने लगी…वो  जल्दी से खाना खत्म करके नानी के पास जाकर आराम करना चाहती थी…अम्मा अचार के साथ देसी घी का डब्बा भी लिए आईं …झट उसने अम्मा के हाथ से अचार ले लिया और घी के लिए मना कर दिया…अम्मा ने एक बार थोड़ा सा घी चावल दाल में डालने की जिरह की लेकिन उसने फिर मना कर दिया।कोने में बैठी बुआ को नाऊन उबटन लगा रही थी, उसके कान चाची और मौसी की बात सुनने में लगे थे।

दादी को सुनाई कम पड़ता था…वे लगातार बोले जा रही थीं ‘‘बढ़उ (दादाजी) के दिमाग का कौनो ठिकाना नहीं है…सुनरी बहुत पढ़ाकू बनत रहीं…बी. ए करे का चक्कर में उम्र हो गई और बढ़उ जल्दीबाजी में ठेठ देहाती से ओकर बियाह कर दिए…अब दिन-रात चूल्हा फूँकती हैं और कंडा पाथतीं हैं…अबहीं बियाहे के साल भर नाही हुआ… पेट फुलाये घूम रही हैं…पढ़ाई-लिखाई सब धरा रही गया…घर बैठे पड़ोस में बढ़िया परिवार मिल रहा है…जल्दी देख सुनकर बियाह कर दो सब।’’लगभग पैंसठ साल की दादी अपनी उम्र से दस साल ज्यादा बड़ी दिखतीं थीं, पापा और चाचा दादी के जने हैं…सुनरी और बुआ दादा के दूसरी पत्नी की बेटियाँ हैं…दूसरी दादी बहुत खूबसूरत थीं …उनके पिता पंडिताई करके घर का खर्च चलाते थे…बहुत गरीब थे …दादा बिना दहेज लिए अपने से आधी उम्र की दूसरी दादी को ब्याह लाये थे…दूसरी दादी गाँव में एक बार हैण्डपंप से पानी भर रहीं थीं…पाँव फिसल गया …सर में गहरी चोट आने की वजह से छोटी उम्र में ही चल बसी थी…बाद में बड़ी दादी ने ही दोनों बेटियों सुनरी और बुआ का पालन-पोषण किया।दादी मौसी से सहमत थी…दादी की जहर उगलती बातें सुनकर उसकी भूख वैसे ही मर गई थी …उसने अभी दो चार निवाले ही मुँह में डाले थे…वो अपने गुस्से को रोक नहीं पा रही थी…एक बार दादी की तरफ देखकर गुस्से से बोली, ‘‘लड़का इतना अच्छा है तो तुम ही काहे नहीं बियाह कर ले रही हो दादी?’’

दादी को सुनाई कम पड़ता था लेकिन उसके बोलने के ढंग और हाव-भाव से तुरंत समझ गई कि वो उन्हें ही कुछ व्यंग्य कर रही है…गुडुआ समझ गया कि दादी को कुछ सुनाई नहीं दिया …उसे तो मौका चाहिए था कि किसी तरह उसे डांट पड़े…गुडुआ दादी के कान के पास जाकर बोला, ‘‘दादी … दीदी कह रही है कि लड़का इतना अच्छा है तो तुम ही काहे नहीं बियाह कर लेती?’’कहकर गुडुआ गलहत्थी लगाकर मासूम बनकर उकडू बैठ गया और दादी गुस्से में जोर-जोर से चिल्लाने लगी, ‘‘अरे दुल्हिन… बिगाड़ो…खूब बिगाड़ो बिटिया का…जहाँ जहियें खूब नाम रोशन करिहें खानदान का…ई सब तुम्हरी अम्मा (नानीजी) का किया धरा है…रात-दिन उ स्टोर में अंचरा में छुपाये केई का जाने कौन पाठ पढ़ावा करती हैं…कुछ उँच-नीच होई ता उनका कछु न जाई…नाम डूबी हमरे बिटवा का… हमरे खानदान का…तुम और तुम्हरी महतारी मिलके सब इज्जत डुबाये दो…न जाने कौन संस्कार दे रही हो…जब नाक कटी तब पता लागी …तुम गोरी चमड़ी लेके घूँघट में रहत हो… अपने से ज्यादा गोरी चमड़ी वाली जनम के खुल्ला छोड़ दिए हो।’’

दादी एक सुर में जहर उगले जा रहीं थीं...अम्मा चुप थी…नाऊन बुआ को उबटन लगाना छोड़कर धीमी आवाज में दादी का पक्ष लेते हुए उसे ही उपदेश दे रही थी…‘‘ना बिटिया… दादी का कोई अईस कहत है… बिटियन के शादी-बियाह समय रहिते हो जाए तो तसल्ली होए जात है… बढ़िया परिवार मिली रहा है… पढ़ा-लिखा लरिका है… कौनो बुराई नाही है बियाह करे में।’’ इस बार वह अपने गुस्से को रोक नहीं पाई…उसका खाना अभी पूरा खत्म नहीं हुआ था …वह जोर से चीखकर बोली, ‘‘अम्मा और नानी को काहे कोस रही हो दादी… अंश तो तुम्हारे दुलारे बेटवा की ही हूँ…जब वो अम्मा को पीटते हैं…गन्दी-गन्दी गाली देते हैं…तब तुम्हरी जुबान को लकवा मार जाता है का …? तब तो खूब मजे लेकर सुनती हो…हमने ऐसा क्या कह दिया … काहे तुम सब अभी से हमरे बियाह के पीछे पड़ी हो…? अपने काम से काम काहे नहीं रखती?’’
गुडुआ सुनैना का गुस्सा और घर झगड़ा होते देखकर कुछ डर जरूर गया लेकिन उसको डाँट सुनवाने के उसके मनसूबे कम नहीं हुए थे…वह दादी की तरफ एक बार फिर बढ़ा…उसका कहा उनके कान में दोहराने के लिए…इस बार बुआ जल्दी से आगे बढ़ी और दो चाँटे लगाकर गुडुआ को बाहर का रास्ता दिखा दिया…बाहर जाकर गुडुआ रो रहा था।

इस बार दादी उसकी सारी बातें सुन चुकी थीं क्योंकि  उसने गुस्से में लगभग चीखते हुए ये बातें कही थी …अब दादी तेज आवाज में उसे गन्दी गालियाँ दे रही थी…अभी उसकी थाली में आधा खाना वैसे ही बचा हुआ था…वो झटके से थाली अम्मा की ओर सरकाकर खड़ी हो गई…दादी की जली कटी सुनते हुए उन्हें लगातार घूर रही थी…उसने अपनी मुट्ठियाँ कसकर भींच रखी थी और गहरी-गहरी साँसें ले रही थी…उसका चेहरा गुस्से से लाल हो गया था…वह भरसक प्रयास कर रही थी कि सबके सामने न रोये। वहाँ सभी उसके अपने थे लेकिन किसी के भी सामने रोना वह अपना अपमान समझती थी।अम्मा दादी को कुछ नहीं कह सकती थीं…वो सुनैना को समझाने आगे बढ़ीं लेकिन अम्मा को अपनी तरफ बढ़ता देख वो पाटे को जोर से लात मारकर भागती हुई स्टोररूम की तरफ बढ़ गई…

2
अप्रैल की दोपहर में कुछ रिश्तेदार फर्श पर चटाई और चद्दर बिछाकर सो रहे थे कुछ रसोईघर का शोर सुनकर उसी तरफ उत्सुकता से देख रहे थे…वह सोये हुए रिश्तेदारों को बचाकर उन्हें फांदती हुई आगे बढ़ी जा रही थी…गाँव से आये कुछ रिश्तेदार शिकायती लहजे में उसे ही घूर रहे थे… उसका मन हो रहा था कि उन्हें कुछ बढ़िया सुना दे…कोई तमाशा तो हो नहीं रहा था जो कान लगाकर सुन रहे थे और अब टकटकी लगाये देख रहे हैं।स्टोररूम के पास पहुची तो देखा नानी जी कुछ बदहवास सी उसकी तरफ ही भागी आ रही हैं…उन्होंने पाटा दीवार से टकराने की आवाज सुन ली थी…शायद दादी और उसका शोर भी…नानी को देखकर वो कुछ देर के लिए ठिठक गई…वो उनसे लिपटकर खूब रो लेना चाहती थी…मन का सारा गुबार निकाल लेना चाहती थी लेकिन आँखों में आँसू भरकर क्षण भर को उन्हें ऐसे निहारती रही…मन और आँखों में भारी बादलों का गुबार छिपाए शिकायत करती रही…मजबूर नानी अपनी दुलारी नतनी के मन का दुःख खूब समझ रही थी…अपने भविष्य को केनवास पर उतारनेवाली लाडली को आज वो असहाय देख रही थी…उसके भविष्य के सारे रंग जैसे उसी के आँसुओं में धुले जा रहे थे!

वह याचक निगाहों से नानी को देखती आगे बढ़ गई और स्टोररूम में एक कोने में धम्म से बैठ गई…नानी उसके पास आकर उसके सर पर हाथ फेरने लगी…नानी का स्पर्श पाकर उनकी गोद में लुढ़क गई…उनकी सूती साड़ी मुँह में ठूसकर फूट-फूट कर रो पड़ी…सब्र का बाँध टूट गया था…आँसू सैलाब बनकर बह निकले थे…सर नानी की गोद में छुपाकर वो नन्ही बच्ची की तरह दोनों घुटने मोड़कर सीने और पेट से सटाकर अपने आप में दुबक गई।

‘‘ना रो हमार बाबू…ना रो हमार बाबू,’’ कहकर नानी उसका चेहरा ऊपर करके उसके आँसू पोछने का प्रयास करती रही…नानी की आँखें भी भर आईं थी…सुनैना की हिचकियों में उलझे आधे-अधूरे शब्द नानी समझ रही थी, ‘‘ये सब जब इकट्ठी होतीं हैं मेरे ब्याह की बात क्यों करती रहतीं हैं…बुआ की शादी है सब खुश हैं लेकिन हमारे सर पर फिर वही बोझ ब्याह का…अब तो मौसी और चाची को एकसाथ देखकर डर लगता है…दादी कितना बेइज्जती की तुम्हारी और अम्मा की … तुम रसोईघर में सबके साथ बैठकर खाना क्यों नहीं खाती?’’नानी खुद भी रोती रहीं और उसके आँसू पोछती रहीं …सर पर हाथ फेरते हुए बोली, ‘‘उनको बियाह की बात करे दो… आज ई कोई नई बात तो ना है…पिछले दो साल से तुम्हरे लिए सब लड़का देख रहे हैं…अबहीं तक कहाँ कोई तय हुआ? तुम बिलकुल चिंता ना करो।’’ उसका मन कुछ शांत हुआ…नानी ने उसे प्यार से अपनी गोद से उठाया और खुद खड़ी होने लगीं…नन्ही बच्ची की तरह वो नानी का हाथ पकड़कर बोली, ‘‘कहाँ जा रही हो नानी?’’

‘‘बैठो आराम से…अभी आ रही हूँ,’’ कहकर सर का पल्लू ठीक करती हुई नानी दबे कदमों से रसोई की ओर बढ़ गई…घर में अब बिलकुल शांति थी…बस कूलर और पंखों के चलने की आवाज सुनाई देर ही थी।
कुछ देर में नानी प्लेट में खाना और लोटे में पानी लेकर आईं…कंधे पर सीधे पल्ले का आँचल ठीक करती हुई बैठ गई…अपनी हथेली में थोड़ा पानी लेकर उसका चेहरा और आँख भिगो दिया और अपने आँचल से पोंछकर बोली, ‘‘उठो बाबू अब कुछ खा लो।’’थकान और उदासी से अब उसे नींद आ रही थी…वो उँ$घती हुई बोली, ‘‘नहीं नानी… हम खा लिए हैं … अब नहीं।’’

नानी उसको दुलारती हुई बोली, ‘‘नहीं…हमको मालूम है हमारे बाबू को बहुत भूख लगी है… बाबू हमारे हाथ से खाना खाएगी।’’ कहकर नानी प्लेट में दाल-चावल और मिर्चे का अचार अपने हाथ से मिलाने लगी और फिर एक कौर बनाकर अपने हाथों से उसे खाना खिलाने लगी…पहला कौर खाते ही वो कुछ शिकायत करती हुई बोली, ‘‘घी क्यों डाल दी?’’नानी दूसरा कौर उसके मुँह में डालकर मुस्कराती हुई बोली ‘‘हमार बाबू घी नहीं खाई ता दूसरे घरे जाके आपन काम कैसे करी?’’ वो थोड़ा नाराज होकर नानी से बोली ‘‘नानी…तुम भी?’’
नानी वैसे ही मुस्कराती हुई बोली ‘‘अरे नहीं बाबू हम तो मजाक कर रहे हैं…अभी तो तुमको बहुत पढ़ना है… सयानी, होशियार बिटिया बनना है…और तुम्हरी पेंटिंग और सीनरी एक एक करके खूब बिक रही है…उसकी एक दिन प्रदर्शनी भी लगेगी…हमरी बिटिया का खूब नाम होगा।’’

नानीकी बातें सुनकर वह खुश हो रही थी...उसका पेट भी अब भर चुका था…उसने नानी को अब और खिलने से मना करते हुए सोने के लिए कहा…प्लेट में अब दो चार कौर खाना ही बचा था…नानी उसको पुचकारते हुए बोली, ‘‘बस ई चार कौर अब खतम कर लो’’ कहते हुए नानी ने प्लेट में चार अलग अलग कौर बना दिए…उसने फिर भी मना किया की अब उसे नहीं खाना है, नानी प्लेट के चार कौर उसे दिखाते हुए बोली ‘‘देखो तो ये किसका किसका कौर है… एक तुम्हरी अम्मा का…एक चाचा का … एक अतवरिया का और एक’’। इससे पहले कि नानी आगे एक और नाम लेतीं वो मुस्कराती हुई बोली पड़ी ‘‘एक तुम्हारा।’’ नानी उसकी ओर कौर बढ़ाती हुई बोली … ‘‘नहीं …ये एक तुम्हरी प्यारी दादी का।’’ उसने थोड़ा नाराज होती हुई कौर खा लिया। नानी उसे समझाती रहीं, ‘‘देखो बाबू…दादी तुम्हरे हित के लिए ही कह रही हैं…वो तुमसे बहुत प्यार करती हैं…शादी की बात कर रही हैं तो करने दो … इतनी जल्दी कहाँ लड़का मिलनेवाला है!’’नानी उसे समझाती रही और उसे माथे पर स्नेह से हाथ फिराती रही…माथा सहलाते- सहलाते नानी ने उसकी दोनों गुथी हुई चोटियाँ खोल दीं और बालों में उगलियाँ फिराती रही… टेबल फैन की हवा और नानी की गोद की ठंडक पाकर वो गहरी नींद में सो गई…नानी भी बैठे-बैठे उसका सर गोद में लिये हुए एकतरफ बिस्तरों के ढेर पर लुढ़क गईं!

3.
आज उसकी बुआ की शादी थी…रात के आठ बजे दुल्हन बनी बुआ स्टोररूम में बैठी थी…बुआ की सखी-सहेलियाँ और मोहल्ले की कुछ औरतें उन्हें घेरे खड़ी थीं! इधर सुनैना की मौसी न जाने क्यों उसके आस-पास ही मंडरा रही थीं…आज मौसी ने उसे अपनी पीली साड़ी पहनाकर उसका हल्का शृंगार भी किया था…इकहरे बदन की छरहरी …गोरी सुनैना पीली सितारोंवाली साड़ी में लिपटी जब आईने के सामने खड़ी हुई तो कुछ देर के लिए अपने ही रूप पर मुग्ध हो गई…फ्रॉक और स्कूल की युनिफॉर्म में वो खुद को नन्ही बच्ची या विद्यार्थी ही समझती थी लेकिन आज वो खुद में आश्चर्यजनक बदलाव महसूस कर रही थी…कहीं न कहीं अपने आप में एक सम्पूर्ण स्त्री के कुछ लक्षण देख रही थी!आईने में खुद को निहारती हुई उसे नानी जी की कहानी ‘बेलवति-कन्या’ की सुन्दर नायिका की छवि याद आ गई…कहानी में उसकी नानी ने बेलवति-कन्या का जैसे रूप-वर्णन किया था वो अपने रूप में उसे देख रही थी! मौसी उसे देखकर बहुत खुश हो रही थी…बार-बार कभी उसकी साड़ी का आँचल ठीक करतीं कभी उसके चेहरे पर गिरते बालों को सँभालती…गर्मी की वजह से आये पसीने को पोंछती हुई उसे पंखे के सामने रहने की ही सलाह देतीं…तब किसी की आवाज सुनाई दी, ‘‘बारात आ गई!’’

घर के लगभग सभी पुरुष बाहर ही थे। कुछ महिलाएँ जल्दी से घर के दरवाजे के बाहर खड़ी हो गई कुछ बारात और दूल्हा देखने के लिए छत पर खड़ी हो गईं! सुनैना अपनी बुआ के पास ही बैठी रही। बारात आने के बहुत पहले से मौसी सुनैना को किसी न किसी बहाने बाहर ले जा रही थी और बाहर खड़ी होकर बेचैनी से उनकी आँखें किसी को ढूँढने लगती…एक बार फिर मौसी सुनैना को बाहर चलने के लिए कहने लगी तो उसने कहा, ‘‘मौसी! हमने दूल्हा पहले ही देखा हुआ है … अभी थोड़ी देर में फिर जयमाला में देखना ही है।’’ उसकी बात सुनकर मौसी सहमति में सर तो हिला दी लेकिन परेशान होकर कभी अन्दर तो कभी बाहर फिरती रहीं।
सुनैना कुछ देर के लिए रसोई में नानी के पास गई…ये जानते हुए भी कि नानी उसकी बात नहीं मानेंगी फिर भी उनसे एक बार बोली, ‘‘चलो न नानी … द्वार चार हो रहा है … एक बार से हरे में सजे-धजे दूल्हा को देख लो।’’ नानी उसकी बिंदी और हलके से हार को ठीक करते हुए बोली, ‘‘अभी नहीं बाबू … बाद में देख लूँगी।’’ उसे मालूम था …नानी यही जवाब देंगी लेकिन वो मजबूर थी …कुछ भी बदल नहीं सकती थी…रूढ़िवादी विचारधारा के शिकार लोगों के बीच उसे अपनी नानी दयनीय सी लग रही थी लेकिन आज हलके सुनहरे किनारी वाली आसमानी साड़ी में नानी उसे बहुत प्यारी लग रही थीं। हलकी झिझक में भी चेहरे पर गरिमा साफ झलक रही थी! एक असफल कोशिश नानी जी को बाहर ले जाने की करती हुई उनका हाथ थामे बैठी थी तभी मौसी भागी-भागी उत्साहित सी रसोई में दाखिल हुई और उसका हाथ पकड़कर ये कहती हुई बाहर ले गई कि ‘‘चलो … अब जयमाला होने वाली है।’’

बुआ को उनकी सखियाँ और मुहबोली बहन जयमाला के लिए लेकर जा रहीं थी। मौसी सबको धकियाती हुई सुनैना का हाथ पकड़े जयमाला के लिए जाती बुआ के पास ले गई और बुआ के बगल वाली एक लड़की को हटाकर सुनैना को उनके बगल में खड़ी कर…जिस लड़की को मौसी ने बुआ के बगल से हटाया वो आश्चर्यचकित सी उनसे पूछ ही बैठी, ‘‘क्या हुआ मौसी ऐसी क्या आफत आ गई जो भागदौड़ मचाये हो…तुम का इहो खयाल नाही की सामने बाराती खड़े हैं।’’ मौसी उस लड़की को लगभग फटकारती हुई बोली, ‘‘ओकी बुआ है…बगल माँ ओके साथ चले देयो!’’लड़की थोड़ा गुस्से से ठुनकती हुई पीछे दूसरी लड़कियों के साथ होली…सुनैना को ये सब बड़ा अजीब लग रहा था…एकांतप्रिय सुनैना शादी-ब्याह या किसी भी फंक्शन में खुद को असहज महसूस करती थी! जयमाला के लिए बने स्टेज तक पहुँचकर सुनैना ने एक नजर बाँके दूल्हे पर डाली उसके बाद पीछे हटने को हुई तभी मौसी ने पीछे से उसकी पीठ पर हाथ रखकर हलके से धकियाते हुए स्टेज पर जाने का इशारा किया…उसने आँखों ही आँखों में मौसी को लगभग घूरते हुए स्टेज पर जाने से मना किया लेकिन मौसी ने इस बार लगभग पूरे गुस्से उसे घूरते हुए आदेशात्मक संकेत में उसे स्टेज पर जाने के लिए कहा…इस बार सुनैना थोड़ा सहम गई और बुआ के साथ स्टेज की तरफ बढ़ गई…मौसी के चेहरे पर अब तसल्ली भरी एक मुस्कान थी!
जयमाला की रस्म में सुनैना ने महसूस किया कि कोई है जो लगातार उसे चोर नजरों से देख रहा है…दूल्हे के दोस्तों में मैरून रंग के पैजामे-कुर्ते में उसे अपना ही हमउम्र लगातार उसके आस-पास नजर आ रहा था। उसकी नजर मौसी की तरफ गई तो मौसी भी उसी मैरून रंग के वस्त्र वाले लड़के को देख रही थी और उसे सुनैना की तरफ दिखाकर कुछ इशारा कर रही थी…इस बार सुनैना ने भरपूर नजर से उस मैरून वस्त्रवाले लड़के को देखा!

लगभग पाँच फिट ग्यारह इंच का शालीन सा दिखनेवाला लड़का उसी की तरफ देख रहा था…दोनों की नजरें मिलीं…वह औचक सी उसे देख रही थी…कुछ-कुछ उसे बुआ की चाल का अंदाजा लग गया था…नजरें मिलते ही लड़का थोड़ा झिझका और जयमाला देखने की खुशी में शामिल हो गया। सुनैना को वहाँ खड़ा होना अब भारी लग रहा था…उसे ये बात समझ आ गई कि मौसी ने से यहाँ एक कठपुतली की तरह किसी के सामने पेश किया है!जैसे ही जयमाला की रस्म खत्म हुई सुनैना अपनी साड़ी सँभालती हुई लगभग भागती हुई घर की तरफ बढ़ गई…घर में घुसते ही नानी को ढूँढ़ती हुई रसोई की तरफ बढ़ गई…नानी वहीं थी …उसे देखते ही मुस्कराती हुई पूछने लगी कि ‘‘दूल्हा कैसा लग रहा था? जयमाला ठीक से हो गई।’’

सने हाँ में सर हिलाया और पास ही पड़ी मचिया पर धम्म से बैठ गई …अपनी चूड़ियाँ और दूसरे जेवर उतारकर अपनी गोद में रखती हुई बड़बड़ाने लगी, ‘‘मौसी का वही पुराना नाटक…हमको जयमाला दिखाने नहीं ले गई थी…किसी के सामने प्रदर्शनी बनाकर दिखाने ले गई थीं!’’नानी उसकी साड़ी में से पिन खोलने में उसकी मदद करती हुई उसे पुचकारती हुई पूछ बैठी ‘‘हुआ का … कछु कहो तो!’’

 इतने में मौसी भी रसोई में दाखिल हुई और उतावली हुई सुनैना के बाल ठीक करती हुई उससे पूछने लगी ‘‘ काहे सुनैना! मैरून शेरवानी वाले लड़के को देखी? हम इसी लड़के की बात कर रहे थे … तुम्हरे होए वाले फूफा के रिश्तेदारी मा है और हमरे पड़ोस मरहत है…दिखे में तो ठीक-ठाक है न बिटिया?’’वो कुछ भी नहीं बोली शादी में ही पहनने के लिए जो गुलाबी सलवार-कुर्ता सिलवाया गया था वो उठाकर गुसलखाने की तरफ बढ़ गई…पीछे से उसके कानों में मौसी और नानी की आवाजें आती रहीं…मौसी लड़के का बखान करने में लगी थी और नानी कह रही थी, ‘‘वैसे अब ही उसकी पढ़ाई पूरी नहीं हुई है…और जो भी हो … बिटिया के मन का जरूर ध्यान रखिहो!’’

मुँह-हाथ धोकर कपड़े बदलकर सुनैना छत पर चली गई...रंग-बिरंगी इलेक्ट्रॉनिक लड़ियों वाली झिलमिलाती झालरें उसके मन में आते अच्छे-बुरे और असमंजस भरे ख्यालों की तरह कभी ठहर जातीं थी कभी तरंगित लहरों की तरह दौड़ने लगती थी…सरकारी दोमंजिला मकान के बगल के नीम के पेड़ की डालियाँ उसके छत की रेलिंग पर झुकी हुई थी…हलके हवा के झोंके से उसे राहत मिल रही थी…नीचे शादी-ब्याह के भगदड़ जैसे माहौल से और शोर-शराबे से भी कुछ देर के लिए उसने निजात पा ली थी…घर के पीछे की तरफ छोटे से आँगन में बने मंडप में शादी की तैयारी में लगे लोग भाग-दौड़ कर रहे। वह किनारे खड़ी रेलिंग का सहारा लिए चुपचाप तैयारी देखती रही फिर टहलती हुई छत पर बिछी चारपाई पर निढाल सी लेट गई…आँखें बंद करते ही न जाने क्यों उसे जयमाला के स्टेजवाली आँखें अपनी ओर बहुत प्यार से देखती नजर आईं। वह हड़बड़ाकर उठ बैठी। उसे न जाने क्या हुआ उठकर घर की छत के आगे वाली रेलिंग का सहारा लेकर खड़ी हो गई और नीचे खाना खा रहे बारातियों में किसी को ढूँढने लगी। आखिर वह उसे नजर आ ही गया…नीम की एक बड़ी टहनी के घने गुच्छे के पीछे से छिपकर सुनैना उसी मैरून शेरवानी वाले लड़के को ध्यान से देखती रही …दोस्तों के साथ बैठा वह भी खाना खा रहा था …हँसी-मजाक के माहौल में जहाँ सभी लड़कों के हाव-भाव बहुत ही उन्मुक्त और आजाद थे वहीं वह उसे कुछ शर्मीला और शालीन लगा…दूसरे हम-उम्र लड़कों के हुड़दंगई वाले व्यवहार के आगे वो शांत… स्थिर सा कभी- कभी मुस्कराकर सभी की खुशी में शामिल हो जा रहा था! गेंहुआ रंग … हलकी मूँछंे और सलीके से कुछ-कुछ मिलिट्री स्टाईल में कटे बालों में वो  गँवई लड़कों से कुछ अलग लग रहा था!
नीम के झुरमुट में छिपी न जाने कितनी देर तक वह उसे निहारती रही…उसकी मुस्कराहट में वो अपने लिए आजादी का छोटा सा खुला आसमान देख रही थी…उसका बचपन कहीं पीछे छूटा जा रहा था…अभी तक जिन हथेलियों के बीच में मेहँदी का गोल ठप्पा और उँगलियों के पोरों को ढंकनेवाले डिजाईन की आदत थी उन्हीं हथेलियों में उसने प्रीत की बेल-बूटियों को सजता हुआ महसूस किया! कोई अनजाना अहसास उसके बचपन की उँगली पकड़कर अपने साथ ले जा रहा था और उमंग भरे यौवन को कंधों से पकड़कर उसके समक्ष खड़ा करने की कोशिश कर रहा था!

सुनैना न जाने कब तक उसे निहारती हुई उसी में खोई रही,…उसकी तंद्रा टूटी सीढ़ियों से आती चिर-परिचित कदमों की आहट सुनकर …रेलिंग से हटकर वह सीढ़ियों की तरफ बढ़ गई …उसे जिसका अंदाजा था वही थीं…नानीजी एक हाथ में ढँकी हुई थाली और एक हाथ में लोटे में पानी लेकर चली आ रही थीं…उसने बढ़कर नानी के हाथ से थाली और लोटा पकड़ते हुए कहा ‘‘नानी! खाना ऊपर काहे ले आई … हम नीचे आने ही वाले थे!’’‘‘नहीं …हमको मालूम है तुम सो जाती …! चलो आओ बैठो यहाँ … हम तुमको अपने हाथ से खाना खिलाएँगे!’’ सुनैना को खाना खिलाने के बाद नानी उसे पंखा झलने लगी। पंखा झलते-झलते उसका मन टटोलने के लिए पूछ बैठी, ‘‘बिटिया! आज तुम उस लड़के को देखी?’’ सब कुछ समझते हुए भी सुनैना अनजान बन गई, ‘‘किस लड़के को नानी?’’ नानी अपने सर का आँचल सही करते हुए उसे समझाते हुए बोली-‘‘देखो बिटिया! जईसे अब तक तुम्हरे घरे की बिटियन का बियाह होता आया है वई से तुम्हरे दादाजी तुम्हरा बियाह भी करी दिहें…तुम्हरी मौसी ने जो लड़का देखा है उ लड़का और परिवार तुम्हरे लिए हर लिहाज से बढ़िया है…पढ़े-लिखे लोग हैं…तुमको भी आगे पढ़वाए देंगे…अपने घरे की दूसरी बहिन न को देखो…कहाँ गाँव-देहात में ब्याह दी गई हैं … ई लड़का और परिवार को कम से कम बिट्टो (मौसी) अच्छी तरह जानती तो हैं … कहीं गाँव माँ ब्याहे से अच्छा है शहर को ई परिवार…तुम अपने दादा-दादी को ब्याह के लिए हाँ करी दो … देखो बाबू … एक बार तुमको अच्छा घर-ससुराल मिल जाए तो हमहूँ चैन की साँस ले!’’

वह नानी की आँखों में झाँकती हुई बोली, ‘‘आपको मौसी हमें समझाने के लिए भेजी हैं न?’’ नानी उसका माथा सहलाती हुई स्नेह से बोली, ‘‘मौसी और तुम्हरी अम्मा को तुम्हरी बहुत चिंता है बाबू।’’ वह नानी की गोद में करवट बदलकर लेट गई और उनका हाथ अपने हाथ में लेकर गहरी साँस लेते हुए बोली, ‘‘जैसा आप ठीक समझो नानी।’’ और आँखें बंद कर लीं! आँखों से निकली कुछ बूँदों में अपने मन में उभर आये गुलाबी रंग का कुछ अंश मिलाकर उसने अपने मन को प्रेम रूपी रंग का एक हल्का सा शेड दे दिया…

4
मौसी को और क्या चाहिए था…सुनैना को लेकर वो बहुत खुश थी...नानी को कंधों से पकड़कर बोली, ‘‘देखना अम्मा …इस बार गोरखपुर जाते ही शुकुल परिवार में सुनैना का रिश्ता तय करवाने की पूरी कोशिश करेंगे…लड़के से तो जिक्र कर ही दिया है…घरवाले भी मान ही जायेंगे!’’सुनैना के विवाह को लेकर घर में जो माहौल था उससे तो ये तय ही था कि उसके लिए पिंजरा ढूँढ़ने की पूरी तैयारी हो गई है…उसने भी अनमने मन से ही सही घरवालों की खुशी में खुश होते हुए पिंजरे में कैद होने का मन बना ही लिया…कम से कम इस बार पिंजरा उसे भा तो रहा था!

बुआ विदा हो रहीं थी…उनकी सिसकियाँ रुक नहीं रही थी …दादी का भी मन डूबा जा रहा था! अपने होश में सुनैना अपने घर की ये पहली शादी ढंग से देख-समझ रही थी…गुडुआ और सुनैना बुआ से लिपटकर खूब रोये …बुआ के विदा होते ही घर में गहरा सन्नाटा पसर गया!दूसरे दिन नानी भी मामा के साथ सुनैना को ब्याह के लिए समझा-बुझाकर गाँव चली गईं…मौसी भी विवाह के लिए सुनैना की सहमति पाकर संतुष्ट होकर वापस अपने घर चली गई!

5
बुआ की शादी को लगभग एक महीना बीत गया था। अब सुनैना जब भी उजले…गुलाबी, हल्के रंगों की चद्दरों पर फेब्रिक कलर से रंग भरती या सीनरी और गिलास पेंटिंग बनाती तो अम्मा उसके पास बैठकर प्यार से उसकी कला की खूब तारीफ करतीं और जो गिलास पेंटिंग, सीनरी और चद्दरें ज्यादा सुन्दर बन जाती थी तो उन्हें अलग करके सँभालकर रख देतीं! पूछने पर कहती कि ‘‘ई सब अपने ससुराल ले जाना!’’
पेंटिंग्स में अपनी बिल्लियों के जोड़ेवाली गिलास पेंटिंग्स देखकर सुनैना को कुछ महीने पहले की बातें याद आ गई!

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उस दिन अम्मा और बुआ को स्टोररूम में देखकर सुनैना बहुत खुश हुई…अम्मा का स्टोररूम में व्यस्त होना मतलब अम्मा ने बड़का बक्सा खोला होगा! अम्मा ने बक्से का सारा सामान निकालकर स्टोररूम के बाहर रखा था और बक्सा में वापस सलीके से सब सामान लगाने में जुटी थीं!लकड़ी के फ्रेम में मढ़ी मछली, वृक्ष के नीचे बाँसुरी बजाते कृष्णा, मटकी से मक्खन गिराते कृष्णा, तोता, खरगोश जैसी सुन्दर फोटो देखकर सुनैना की आँखें चमक उठीं …उसका मन चिड़ियों जैसा चहक उठा …अम्मा अपनी ब्याह की पियरी के साथ एक सूती साड़ी में बाँधकर वो सब फोटो वापस बक्से में रखने जा रही थीं!‘‘अम्मा! ई का है? तनिक हमको दिखाओ ना,’’ सुनैना उत्साहित होती हुई अम्मा का हाथ पकड़कर दुलराती हुई बोली, अम्मा सर का आँचल ठीक करते हुए बोलीं, ‘‘बिटिया! हमको बहुत काम है … ई सब जल्दी रखे दो।’’

‘‘नाही अम्मा, एक बार हमको देखे दो...बहुत सुन्दर फोटो दिख रही है…’’अम्मा सूती साड़ी में सँभालकर पकड़ी हुई सारी फोटो आहिस्ते से खटिया पर रखते हुए बोली ‘‘अच्छा लो …जल्दी देख लो बिटिया … तब तक हम दूसरा सामान बक्से माँ रख देते हैं।’’सुनैना खुश होकर एक-एक फोटो उठाकर निहारने लगी …लकड़ी के फ्रेम में सीसे मढ़ी कृष्णा की फोटो सुनैना मुग्ध होकर देखती रह गई …पीले सिल्क के कपड़े पर रुई से अम्मा ने कैसे बाँसुरी धरे कृष्णा और बालरूप में मटकी गिराकर माखन खाते कृष्णा बनाया है, सुनैना … अम्मा का हुनर देखकर हैरान थी …पेड़ की एक टहनी पर बैठा तोता अम्मा ने लाल रंग के कपड़े पर कढ़ाई करके बनाया था…रंग-बिरंगी मोतियाँ … लाल रिबन … सुनहरे गोटे… इन्द्रधनुषी रंगों की रेशमी धागों की कढ़ाई से बनी फोटो देखकर सुनैना चकित थी!‘‘अम्मा! ई सब तुमने कैसे बनाया और कब बनाया,’’ सुनैना ने उत्सुकता से अम्मा से प्रश्न किया!
‘‘बिटिया ई सबकुछ तो कपड़े पर काढ़ा गया है कुछ रुई को कपड़े पर रखकर सिलाई करके उसे मोतियों और रिबन से सजाया गया है …ई सारी फोटो शादी के पहिले की हैं’’
सब फोटो तो बहुत सुन्दर थीं और बनाने में अम्मा ने मेहनत भी खूब की होगी…सुनैना यही सब सोचती रही और उन फोटो को मढ़ने में जिन पारदर्शी शीशों का इस्तेमाल किया गया था उन्हें फोटो से अलग करके अपने ऑइल कलर से उन्हें नया रंगरूप देने के ख्वाब बुनती रही!‘‘अब लाओ बिटिया … बहुत काम बिखरा पड़ा है … ई फोटो रखे दो … बाद मा फिर कभी देख लिहो।’’ कहकर अम्मा ने फोटो और पियरी साड़ी एक सूती साड़ी में बाँधकर सँभालकर बक्से में रख दिया!…

स्त्री के विरूद्ध स्त्री कठघरे में ( !)

अनीता मिश्रा


अनीता मिश्रा स्त्री मुद्दों पर काफी सक्रिय रहती हैं . स्त्री के पक्ष में बेबाक टिप्पणियों के साथ सोशल मीडिया में इनकी उपस्थिति अत्यंत महत्वपूर्ण है. संपर्क: anitamisr@gmail.com

( हाल के दिनों में कुछ घटनाएँ ऐसी रहीं , जो काफी चौकाने वाले थीं. स्त्री अधिकारों के लिए प्रतिबद्ध लोगों पर अलग -अलग आरोप लगे और उनके बचाव के तर्क वैसे ही थे जैसे किसी स्त्रीविरोधी मर्द के अपने बचाव के  होते रहे हैं. यह सब स्त्री अधिकारों की लड़ाई को कम से कम तीन दशक पीछे ले जाने वाले तर्क थे . हिन्दी के घोषित वाम रुझान ( !) वाले एक आलोचक और बी एच यू के प्रोफ़ेसर द्वारा अपनी पत्नी की प्रताड़ना के बाद के तर्क भी इसी परम्परा के थे . इस सन्दर्भ में अनीता  मिश्रा का यह आलेख .)

पिछले  दिनों एक मुद्दा सोशल मीडिया पर काफी चर्चित रहा। यह मुद्दा था ,हिंदी के लेखक-आलोचक प्रोफ़ेसर कृष्ण मोहन द्वारा अपनी पत्नी के साथ पीटते-घसीटते हुए करके घर से निकालने का। जैसे ही इस घटना का वीडियो सामने आया, बुद्धिजीवियों के बीच काफी हलचल मच गई। कुछ ही देर में मुद्दा कबड्डी के खेल में बदल गया। किस पाले में कितने लोग हैं। तमाम तरह के तर्क-वितर्क, कुतर्क शुरू हो गए। वीडियो में जो दृश्य था, उसे देख कर कोई भी संवेदनशील व्यक्ति नहीं कहेगा कि प्रोफ़ेसर साहब ठीक कर रहे हैं। बुरी तरह से लात-घूंसे खाती एक रोती-कलपती स्त्री को देखकर कौन कहेगा कि ऐसा करना उचित है। लेकिन हैरानी और चौंकाने वाली बात है कि कुछ लेखकों ने इस बात पर न सिर्फ प्रोफ़ेसर साहब का अश्लील बचाव किया, बल्कि उनके कदम को उचित ठहराया, यह कह कर कि मामले को पूरा जाने बिना प्रोफ़ेसर कृष्मोहन की आलोचना गलत है।

जो भी मामले पिछले कुछ दिनों में सामने आए हैं उन सब पर गौर करें तो हिंदी के कुछ बुद्धिजीवियों और लेखकों के बीच की एक खास तरह की प्रवृत्ति सामने आई है कि वे सही गलत का फैसला घटना देख कर नहीं, अपने संबंधों के आधार पर करते हैं। हम फलां को इतने दिनों से जानते हैं, वे ऐसे हैं, वैसे हैं आदि-आदि उनके व्यक्तित्व के तमाम उदहारण गिना डालते हैं। कुछ समय पहले जब एक युवती के साथ रेप की घटना हुई थी, तब यही हुआ था। सबने अपने संबधों का हवाला देकर एकतरफा फैसला सुना दिया था। तब ज्यादातर लोगों के तर्क थे कि ऊपरी तौर पर लग रहा है कि लड़की ही दोषी है। इस मामले में कहा गया कि ऊपरी तौर पर मार खाती स्त्री को मत देखिये, मामला अंदर तक समझिए। वाह! अपनी सुविधा से एक मामले को ऊपर से देखिए, एक मामले को अंदर तक समझिए। दोनों हाल में स्त्री को कटघरे में खड़ा कर दीजिये और एकतरफा फैसला सुना दीजिये।

फिलहाल बात इस मामले की है जो लोग प्रोफ़ेसर साहेब के बचाव में तमाम तर्क गढ़ रहें हैं। उनका कहना है कि वह जबरन घर में घुस रही थी; वह काफी झगड़ालू स्त्री है; उनके बीच तनाव था और कि यह उनका निजी मामला है, सबको अपनी राय नहीं देनी चाहिए। पहली बात जब बात घर से सड़क पर आ गई और नेशनल चैनल पर दिखाई जा चुकी तो मामला निजी कहां रहा। दूसरे कि अगर दो पक्षों में किसी एक को अपनी पीड़ा किसी और से कहने की जरूरत पड़ी तो यह सिर्फ दो पक्षों के बीच का मामला कैसे रहा। इसके अलावा, अगर वह स्त्री दुनिया की सबसे बुरी स्त्री भी थी, तो भी पति या किसी और को उसे इस तरह मारने-पीटने का अधिकार कैसे है। अगर वाकई वह कुछ ऐसा कर रही थीं जो कानून के विरुद्ध था तो प्रोफ़ेसर साहब पुलिस को बुला सकते थे। अब उनके समर्थक जो लोग बोल रहें है कि बिना मामला समझे ठीक नहीं है। कल्पना कीजिये कि ये मामला अगर टी वी चैनेल की वजह से सामने नहीं आया होता और ये सारी हिंसा घर के अंदर हुई होती तब तो प्रोफ़ेसर साहेब के सारे समर्थक भी इस मामले की आलोचना करने वालों के पीछे लाठी डंडा लेकर पड़ जाते और ऐसे लोग सोशल मीडिया पर भी गलियां खा रहे होते।

मीडिया में वायरल हुए वीडियो से एक तस्वीर : प्रोफ़ेसर के द्वारा पत्नी की पिटाई

यह बात सही है किसी के निजी जीवन को समझे बिना टिप्पणी करना ठीक नहीं है। लेकिन जो लोग भी प्रोफ़ेसर साहब की इस हरकत के खिलाफ बोल रहे थे, कोई उनके निजी जीवन पर  बात नहीं कह रहा था। सबका कहना यही था कि किसी भी सूरत में अपनी पत्नी के साथ इस तरह की हिंसा गलत है। मान लिया उनकी पत्नी ही मीडिया वालों को लेकर आई थी (ऐसा कहना है कुछ लोगों का) तो यह भी सोचने की बात है कि जबकि केस चल रहा था और गुजारा भत्ता वगैरह सब तय हो गया था फिर आखिर उनको क्यों इस तरह का कदम उठाना पड़ा। ज़ाहिर है, जो तय था उसमें कोई अड़चन डाली जा रही थी। इसके अलावा, तलाक की प्रक्रिया पूरी भी नहीं हुई थी कि उनके पति ने किसी अन्य के साथ रहना भी शुरू कर दिया था। मान लिया कि उनकी पत्नी तमाशा बना कर यही पक्ष सबको दिखाना चाहती थीं तो इसमें गलत क्या है। आखिर एक महिला के रूप में वह भुक्तभोगी हैं, सारी प्रताड़ना उनके हिस्से में आई है, एक प्रेम विवाह का दुखद अंत हुआ, घर छूटा है एक स्त्री का। जाहिर है वह रिएक्ट करेगी।

हालांकि यह एक अलग बहस का मुद्दा है कि जब प्रेम नहीं रहा, तब साथ रहने का क्या फायदा या फिर उस तीसरी औरत की बात भी करनी चाहिए। अगर इन सारे मुद्दों पर चर्चा होगी तब फिर बात दूर तक जाएगी। बात फिर प्रेम पर उलझ जाएगी जो किसी खास व्यक्ति के भीतर वाकई कोई शाश्वत भावना नहीं है या एक दफा हो गया तो दुबारा नहीं होगा। लेकिन यहाँ चर्चा का विषय है एक स्त्री के साथ सार्वजनिक रूप से की गई हिंसा जो किसी सूरत में उचित नहीं हैं। प्रेम चाहे कोई कितनी दफा करे, कोई किसे रोक सका है। लेकिन ध्यान रहे कि आप प्रेम किस कीमत पर पा रहे हैं। अगर प्रेम की कीमत एक स्त्री सार्वजनिक रूप से मार खाकर चुका रही है, तो इसका समर्थन किस हद तक किया जाएगा। दो शानदार इंसान भी एक दूसरे की ज़िंदगी साथ रहकर नर्क कर सकते हैं। वे अलग-अलग बेहतर होकर भी एक दूसरे के लिए बदतर हो सकते हैं। लेकिन हालात जो भी हों, किसी भी सूरत में इस तरह एक स्त्री को पिटते देख कर कोई तर्क देकर उसे जस्टीफाई करना या उसका बचाव करना निहायत हास्यास्पद है। मुझे वाकई ऐसे लेखकों और बुद्धिजीवियों पर तरस आती है जो घटना को सही गलत के परिप्रेक्ष्य में न देख कर अपने संबंधों के हिसाब से देखते हैं। यही नहीं, वे  एकतरफ़ा फैसला भी सुना डालते हैं। ऐसे में उन लेखकों की तारीफ करनी चाहिए जो सिर्फ साहित्य ही नहीं, जीवन में भी स्टैंड लेना जरूरी समझते हैं।

सोशल मीडिया में इस प्रकरण पर हुई बहस की एक झलक के लिए क्लिक करें : ( और यह स्त्री पक्षधर समाज है )

उन्हें लड़ना ही होगा अपने हिस्से के आसमान के लिए

निवेदिता


निवेदिता पेशे से पत्रकार हैं. सामाजिक सांस्कृतिक आंदोलनों में भी सक्रिय रहती हैं. हाल के दिनों में वाणी प्रकाशन से एक कविता संग्रह ‘ जख्म जितने थे’ के साथ इन्होंने अपनी साहित्यिक उपस्थिति भी दर्ज कराई है.निवेदिता से niveditashakeel@gamail.com पर सम्पर्क किया जा सकता है.



( काठमांडू में सात देशों की महिला पत्रकारों के एक सम्मलेन से लौट कर वरिष्ठ पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता निवेदिता इन  देशों की महिला पत्रकारों के  समान संघर्षों की कहानी  स्त्रीकाल के पाठकों से साझा कर रही हैं. )


पिछले पांच दिनों तक पूरी दुनिया हमारी थी । हमने सरहदों की सीमा पार की। मुल्क की दीवारों को पार किया । हमसब मिले काठमांडू में। अलग-अलग भाषा,संस्कृति  के बावजूद हम मुहब्बत के रंग में डूबे रहे। हमने जाना पूरी दुनिया की पत्रकारिता में क्या कुछ चल रहा है। पाकिस्तान,बंगलादेश ,अफगानिस्तान समेत कुल सात देशों  की महिला पत्रकारों ने पत्रकारिता और उससे जुडे मसलों पर बात की ।इन देशों  से आयी महिला पत्रकारों ने बताया कि दुनिया तक खबरें पहुंचाने की बड़ी कीमत चुकानी पड़ती हैं उन्हें। पिछले दस सालों में सिर्फ पाकिस्तान में 100 से ज्यादा पत्रकार मारे जा चुके हैं। भय और आतंक के बीच महिलाएं काम करती हैं। वे हिंसा का सामना करती हैं। उनकी कलम पर पहरे लगें हैं। जुबा पर मुहर लगी है। बमों और गोलियों के बीच पत्रकारिता करने वाली महिला पत्रकार कहती हैं कि ‘दुनिया में वह गोली कहीं नहीं बनी जो सच को लगे।’
पर वो वहां मात खा जाती हैं जहां महिला होने की वजह से एक खास तरह की मानसिक और शारीरिक हिंसा क्षेलती हैं।  दुनिया की पत्रकारों के लिए पत्रकारिता से बडी चुनौती है लैंगिक विभेद। ये पत्रकार जो खबरों से लड़ती हैं, जो दूर-दराज गांवों,शहरों कस्बों और महानगरों से खबरें ले आती हैं, उन सब को लैंगिक विभेद का समाना करना पड़ता है। पाकिस्तान की सना मिर्जा ने बताया कि कई अखबार महिलाओं को नहीं रखते । यह एक तरह की अघोषित नीति है। पेशावर की महिला पत्रकार आॅफिस से काम नहीं करती। उन्हें हर जगह तालिबान से खतरा रहता है। वे नहीं चाहते औरतें मीडिया में काम करें। इसलिए वे छुपकर अपने घरों से खबरें भेजती हैं। सरकार के पास महिलाओं की सुरक्षा को लेकर कोई नीति नहीं है। उन्होंने स्वीकार किया कि इस दौर में पत्रकारिता के मूल्य बदले हैं, तेवर बदले हैं।

वैश्वीकरण  मीडिया पहले से ज्यादा आक्रामक  बनाया है। मनोरंजन से लेकर खबर परोसने के तरीके बेहद आक्रमणकारी और विखंडनकारी है। पूंजी के इस खेल में मीडिया के लिए महिला पत्रकार भी बाजार का हिस्सा है। बाजार बनाए रखने के लिए उसे खूबसूरत एंकर व रिपोटर्र चाहिए। खबरों से ज्यादा मीडिया का ध्यान इस बात पर रहता है कि उनके चैनल की एंकर की शक्ल  इस बाजार को लुभा सकती है या नहीं। सना कहती हैं मेरे लिए एंकरिंग बड़ी चुनौती है। हम रोज वैसी खबरों से गुजरते हैं जो दिल दहलाने वाली होती है। उन स्थितियों में एक एंकर के लिए जरुरी होता है कि वह अपनी बात इस तरह से कहे कि किसी की भावना आहत नहीं हो। पाकिस्तान में महिला हिंसा की खबरें काफी बढ़ी है पर उन खबरों को जगह नहीं मिल पाती।  उन खबरों को जगह मिले,खबरे संवेदनशील  तरीके से लिखे जाएँ  और न्याय के पक्ष में आवाज उठाए इसके लिए भी पाकिस्तान की पत्रकारों को  मीडिया के भीतर दबाव बनाना पड़ता है।

निवेदिता के दूसरे आलेखों को  स्त्रीकाल में पढ़ने के लिए क्लिक
करें : ( जब जरा गरदन झुका ली देख ली तस्वीरें यार )
( यह चुप्पी खतरनाक है )

 अफगानिस्तान  के हालात और भी खराब हैं। मैकिया मुनीर ने बताया कि पत्रकारों पर हमले होते हैं। आतंकवादी संगठनों का दवाब रहता है। कई बार ऐसे संगठन पत्रकारों का इस्तेमाल अपने लिए करते हैं। महिला पत्रकारों को पुरुषों के मुकाबले कम पैसे मिलते हैं। महिला पत्रकारों ने कहा कि उनके सामने इस बात का दवाब रहता है कि न्यूज बुलेटिन को अधिक से अधिक आकर्षक व बिकाउ बनाएं। बाॅडी लैगवेज उत्तेजक हों और पोशाक  पारदर्शी  हों। दरअसल पूंजीवाद के लिए हर चीज कामोडिटी है। वह पुराने मिथकों को तोड़ता है और नए मिथकों को गढ़ता है। दुनिया के सभी देशों  में कमोवेश  महिलाएं लैंगिक विभेद की शिकार हैं। आज भी महिला पत्रकारों की संख्या कम है। सभी देशों में शीर्ष  पर पहुंचने वाली महिलाओं की संख्या कम है ।  महिलाओं को पुरुषों के मुकाबले कमतर आंका जाता है।

श्रीलंका की पत्रकार दिलरुकशी,आॅस्टेलिया की जेना,बंगालादेश  की नाडिया, हिन्दुस्तान की लक्ष्मी और नेपाल की निर्मला समेत सभी महिला पत्रकारों ने महसूस किया कि कार्यस्थल  पर यौन उत्पीड़न के अधिकांश  मामलों में महिलाओं को न्याय नहीं मिलता। ऐसे कई मामले सामने आए पर न्याय नहीं मिला।
खबरों को लेकर भी विभेद है। महिलाओं को राजनीतिक,अपराध,वाणिज्य,प्रशासन जैसे बीट नहीं दिये जाते हैं। एक पत्रकार ने बताया कि सालों तक उसे धर्मगुरुओं के प्रवचन पर रिपोर्ट बनाना पड़ा।यह माना गया कि मीडिया की कार्य संस्कृर्ति महिला पत्रकारों के विरोध में खड़ी है। उनके उठने, बैठने से लेकर उनकी निजी  जिन्दगी में भी ताक-झांक की कोशिशें  होती रहती हैं। महिला पत्रकारों की स्थायी नियुक्ति एक बड़ा मसला है। अधिकांश  महिलाएं अस्थायी नियुक्ति की वजह से असुरक्षित हैं। उन्होंने पाया कि अखबारों में शहरी,ग्रामीण,गरीब,दलित औरतों के जिन्दगी के संघर्षों  को कम जगह मिलती है पर मीडिया में मनोरंजन के नाम पर विघटन,अविश्वास ,परिवार विभाजन,विवाहेतर संबंध जैसी खबरों को ज्यादा तरजीह मिलती है। दरअसल मीडिया का मूल स्वर स्त्री विरोधी है। मीडिया इसी पितृसत्तात्मक समाज से निकला है। इसलिए मीडिया में महिला पत्रकारों के सामने कई तरह की चुनौतियां है। उन्हें लड़ना ही होगा अपने हिस्से के आसमान के लिए।

क्या सजा के खौफ से तेजाब हमलों को रोका जा सकता है ( ! )

संजय स्वदेश


संजय स्वदेश जन पक्षधर पत्रकार हैं. संप्रति हरिभूमि में कार्यरत हैं. संपर्क : 99691578252 .

( तेजाब हमले के एक मामले में एक साल के अन्दर  मध्यप्रदेश के एक न्यायालय के द्वारा फांसी की सजा के सन्दर्भ से संजय स्वदेश की यह रपट इन हमलों की समाजिकी की पड़ताल करता है और कठोर सजाओं में इस समस्या का एक हल देखता है. स्त्रीकाल फांसी की सजा के प्रावधान के प्रति असहमत होते हुए भी इस आलेख के इस निष्कर्ष से सहमत है कि कानूनी प्रावधानों में उपलब्ध कठोरतम सजा भी इस समस्या के समाधान की दिशा में एक पहल हो सकती है . इन घटनाओं में निहित क्रूरता को देखते हुए इनके लिए दी जाने वाली फांसी की सजा से सहमति का ही मन बनता है. )

1979-80 में भगलपुर जेल में कैदियों की आंख में तेजाब डाल कर अंधा करने का आंखफोड़वा प्रकरण हुआ। जेल की चाहरदिवारी की यह क्रूर  घटना मीडिया माध्यम से समाज तक पहुंची।  देश में किसी महिला पर तेजाब फेंकने का पहला मामला 1982 में आया। तकनीक के युग में मीडिया मजबूत हुआ तो दूर दराज की तेजाब हमले की घटनाएं भी सामने आने लगी हैं। खबरों से अपराधी अपराध के तरीके जानने लगे हैं। बदायूं कांड़ के बाद कई महिलाओं के शव हत्या के बाद पेड़ से लटकाए गये। शायद अपराधियों में सजा का  खौफ किसी पर तेजाब फेंकने के  क्रूर कर्म से रोक सके.

बीते 25 जुलाई को मध्य प्रदेश के मुरैना जिले की अंबाह तहसील की एक अदालत ने एक ऐतिहासिक फैसला दिया। एक साल पहले तेजाब डालकर अपनी शादीशुदा कथित प्रेमिका की हत्या करने के मामले में एक युवक को फांसी की सजा सुनाई। फांसी की सजा देते वक्त कोर्ट ने यह टिप्पणी भी की कि ‘इस अपराध के लिए आजीवन कारावास की सजा पर्याप्त नहीं है, इसलिए मृत्युदंड दिया जाता है। इससे मृतक के परिजनों के साथ-साथ समाज की आत्मा भी आहत हुई है।’ देश में संभवत: यह पहला मामला है, जब किसी व्यक्ति पर तेजाब फेंकने वाले अपराधी को फांसी की सजा कोर्ट ने सुनाई है। इसी दिन सुप्रीम कोर्ट ने तेजाब के हमलों, विशेषकर ठुकराये हुए  प्रेमियों द्वारा किये जा रहे ऐसे हमले की बढ़ती घटनाओं पर चिंता व्यक्त करते हुए  कहा कि स्थिति दयनीय है। सुप्रीम कोर्ट ने इस समस्या से निबटने के प्रति केंद्र सरकार की सुस्ती पर सवाल उठाया। यह पहला ऐसा मामला नहीं है, जिसमें कोर्ट ने सरकार की उदासीनता पर निशाना साधते हुए उसे कटघरें में खड़ा किया हो। चाहे फटकार जितनी भी पड़े, सरकार की सुस्ती उसी बेरहमी से बनी रही है, जिस बेरहमी से कोई अपराधी किसी मासूम के चेहरे पर तेजाब फेंक का उसकी जिदंगी नरक बना देता है। कोर्ट ने इसी दिन तेजाब हमलों की पीड़ितों के पुनर्वास की नीति तैयार करने का भी निर्देश दिया।

तेज़ाब हमले की पीडिता

यह भी कोई पहला निर्देश नहीं है। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने इसी साल 31 मार्च तक तेजाब की खरीद-बिक्री और दूसरे विषाक्त पदार्थों के दुरुपयोग की रोकथाम के लिए राज्य सरकारों को नियम बनाने का निर्देश दिया था। अक्सर कोर्ट के ऐसे आदेश-निर्देश और टिका-टिप्पणी संबंधित प्रकरणों के तारीख वाले दिन के अगले दिन अखबारों में होते हैं। फिर न इस पर कोई चर्चा करता है और न ही कोई पीड़िता की सुध लेता है। पीड़िता की हर दिन की जिंदगी असमान्य अवस्था में कटती है। जो निराश हो चुकी हैं, वे मौत का इंतजार कर रही हैं। जिन्हें अपराधियों को सजा दिलाने का हौसला है, वे आत्मविश्वास से लवरेज होकर बेरहम समाज में अपनी लड़ाई लड़ रही है। ऐसी पीड़िताओं में लक्ष्मी मिशाल है। उसे हर संवेदनशील सैल्यूट करता है।

देश के हर राज्य में तेजाबी हमले कई दर्दनाक कहानियों के उदाहरण हैं। विभिन्न रिपोर्ट के अनुसार ऐसा अनुमान लगाया जाता है कि हर साल देश में करीब एक हजार मासूम तेजाब हमले की शिकार हो रही हैं। लेकिन सरकारी आंकड़ों में यह महज सौ, सवा सौ की होता है। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो से ऐसे मामलों का स्पष्ट आंकड़ा नहीं मिल पाता क्योंकि तेजाब हमले का अधिकतर मामला आईपीसी की धारा 307 (हत्या का प्रयास), धारा 320 (गम्भीर चोट पहुंचाना) और धारा 326 (घातक हथियारों से जान-बूझकर प्रहार करके चोट पहुंचाने) के तहत दर्ज किए जाते हैं। लिहाजा, तेजाब हमले के सही आंकड़ें सामने नहीं आ पाते हैं। इसे घटनाओं के खिलाफ लड़ने वाले विभिन्न स्वयंसेवी संगठन उन्हीं घटनाओं का ब्यौरा जुटा पाते हैं, जो किसी तरह मीडिया में आ जाए। देश के दूर दराज में होने वाली ऐसी घटनाएं वहीं तक रह जाती है। हालांकि आजकल मीडिया की सक्रियता के चलते ऐसे मामले राष्ट्रीय  स्तर की मीडियों की सुर्खियों में आने लगे हैं। लेकिन इस क्रूरता  को अंजाम देने वाले अपराधियों के दिल  में खौफ नहीं बैठ पा रहा है।

तेज़ाब हमलों और स्त्री के खिलाफ अन्य हिंसा के खिलाफ जन जागृति के लिए राकेश कुमार सिंह देश भर में सायकल से यात्रा कर रहे हैं. समस्या के स्थाई समाधान के लिए सामाजिक चेतना ज्यादा जरूरी है .

आजाद भारत की आजादी की  वर्षगांठ की 66वीं सालगिरह सामने हैं। गौर  कीजिए, गुलाम भारत और आजादी भारत के अगले तीन दशक में तेजाब फेंकने की बेरहम प्रकरण सामने आने का उल्लेख नहीं मिलता है। गूगल में एशिड फैक्ट्री खोजो तो हिंदी फिल्म की कहानी मिलती है। बताया जाता है कि भारत में किसी महिला पर 1982 में भारत में तेजाब हमले का पहला मामला प्रकाश में आया था। 1979-80 में भगलपुर जेल में कैदियों की आंख में तेजाब डाल कर अंधा करने का आंखफोड़वा प्रकरण हुआ। जेल की चाहरदिवारी की यह क्रूर  घटना मीडिया माध्यम से समाज तक पहुंची। संभवत समाज के कुंठित  मन वाले अपराधियों ने जान लिया कि बदला लेने का यह भी एक तरीका हो सकता है। अस्सी का  दशक देश का वह दौर था, जब एक  नया भारत करवट ले रहा था, धीरे-धीरे विकास की ओर अग्रसर, देश-दुनिया से कदमताल करने की बेताबी के साथ। तब स्वर्णकार तेजाब का उपयोग करते थे। मतलब तेजाब के उपभोक्ताओं का वर्ग एक ही था। धीरे-धीरे देश में वाहन चले। उसमें लगने वाली बैट्री के लिए तेजाब की खपत बढ़ी। उत्पादन भी बढ़ा। लिहाजा, विकास की गति के साथ-साथ जैसे-जैसे तेजाब सर्व सुलभ होते गया, समाज में क्रूरतम सोच रखने वालो ने  इसे अपना हथियार बनाना शुरू किया। यह भी गौर की बात है कि जैसे-जैसे देश ने विकास किया, देश में तेजाब हमले की घटनाएं बढ़ी। तकनीक के युग में मीडिया मजबूत हुआ तो दूर- दराज की तेजाब हमले की घटनाएं भी सामने आने लगी हैं।

समाज का संवेदनशील तबका इन खबरों से चिंता जताने लगा है। इसके अपराधियों को कठोर सजा के लिए एकजूट  स्वर भी उठने लगे हैं। लेकिन कुंठित और क्रूर  मानसिकता वाला मन कहां बदल रहा है? वे खबरों से ऐसे अपराध के तरीके जानने लगे हैं। हाल ही में उत्तर प्रदेश के बदायूं कांड को देंखे। दुष्कर्म के बाद हत्या कर शव को पेड़ पर लटकाने की घटना जैसे सुर्खियों में आर्इं, देश के दूसरे हिस्सों में एक के बाद इसी तरह की कई घटनाएं हुर्इं, जिसमें हत्या के बाद शव को पेड़ से लटका दिया गया। एक स्थान के अपराधी के अपराध के तरीके पढ़ कर दूसरे क्षेत्र के अपराधी उससे प्रेरित  हो रहे हैं। मतलब यह बीमारी और क्रूर  मानसिकता  का समाजिक सक्रमण है। अपराधियों में कानून की लंबी प्रक्रिया और बच कर निकलने की पूरी संभावना के कारण सजा का खौफ नहीं पल रहा है। मुरैना जिले की अंबाह तहसील कोर्ट ने घटना के एक साल के अंदर फैसला सुना कर भले ही सराहनीय कार्य किया हो, लेकिन दूसरे की जिंदगी नरक बना कर अपनी जिंदगी बचाने के लिए ये अपराधी शीर्ष कोर्ट तक न जाने कितने साल खुली हवा में मौज की सांस लेते रहेंगे और पीड़िता हर दिन नरक भोगती रहेगी।  मध्यप्रदेश में 25 जुलाई को निचली अदालत ने तेजाब हमले के दोषी को फांसी की सजा सुनाई और इसके चौथे दिन 28 जुलाई को पश्चिम बंगाल के हुगली जिले के आरामबाग इलाके में चार लोगों ने एक कॉलेज छात्रा के उपर तेजाब का हमला कर भाग गए। शायद अपराधियों में सजा के खौफ का सामाजिक संक्रमण की किसी पर तेजाब फेंकने के कूृ्रर कर्म से रोक सकें।

रजनी अनुरागी की कवितायें

रजनी अनुरागी


रजनी अनुरागी कविता में एक महत्वपूर्ण उपस्थिति हैं . रजनी कविताओं के लिए शीला सिद्धान्तकर सम्मान से भी सम्मानित हैं . संपर्क:rajanianuragi@gmail.com



1.मां का बक्सा

बहुत दिनों से मां कलेजे से लगाए हुए थी बक्सा
उसे अपनी टूटी खाट के नीचे रखती थी
बड़ा-सा ताला लगा था
जब भी मौका मिलता वह उसे खोलती
जी भर देखती और किसी की आहट पाकर उसे बंद कर देती
कई बार बेटों को शक हुआ
अम्मा ने जरूर इसके अंदर छिपा रखा है माल
कई बार चोरी-छिपे चाभी ढूंढ़ने के असफल हुए प्रयास
बेटे कितनी बार मां से लड़ चुके –
‘अपनी बेटी को ही देगी सारा माल’
कह चुके थे सगे भाई-
‘अब बुढ़िया मरे तो माल मिले’

काल के चक्र से एक दिन मर गयी बुढ़िया
बेटों ने मरने की खबर पहुंचने से पहले चाबी ढुंढ़वायी
बड़े उत्साह से बक्सा खोला और देखकर रह गए दंग

उसमें थी
बेटों को बालपन में पहनायी काले धागे की तगड़ी
रंग-बिरंगे झुनझुने,  लोहे की तार पर कूदता-फिसलता बंदर
छोटी-छोटी कुछ चूं-चूं चप्पलें, कुछ छोटे छोटे स्वेटर
मोजे, दस्ताने,छठी के कपड़े,काजल की सूखी डिब्बी
कुछ पीतल के घुंघरू, पुराने काले-सफेद फोटो
कुछ फटी पीली जर्जर किताबें, लकड़ी के टूटे खिलौने
बेसब्र भाई एक-एक कर जल्दी-जल्दी
कूड़ा निकालकर फेंकने लगे
और फिर उन्होंने पलट दिया बक्सा

छोटे बच्चे उन्हें उठा-उठाकर चहकने लगे
बेटे गुस्से से हाथ-पांव फटकते हुए छीनने लगे
बच्चों के हाथों से तार पर झूलता मुंह चिढ़ाता बंदर
रख देना इसे भी बुढ़िया के साथ
रोते हुए बोले
हाय ! हाय ! यही कबाड़ ताले के अंदर

2. मां
मां सब कुछ सहेजकर रखती है
हमेशा संभालती है उन चीजों को जो हैं बेकार
खाली डिब्बे, रैपर ,पॉलिथीन,फटे-पुराने कपड़े , ब्रश
उसने आज तक नहीं फेंके पुराने टूटे बर्तन
चाय की पत्ती को भी वह बना देती है खाद
आज तक नहीं फेंकी मेरी छोटी फ्रॉक
मेरा लिखा पहला अक्षर उसके संग्रहालय में
आज भी सुरक्षित है

अब वह मुझे ठीक से नहीं देख पाती
हाथों  से देखती है मेरा चेहरा चेहरा
महसूस करती है मेरा दर्द   पोंछती है अपने आंसू
अब वह ऊंचा सुनती है   लेकिन मेरे बोलने से पहले ही
न जाने कहां से उस तक पहुंच जाती है मेरी आवाज
मेरे लिए बनाती है आलू की सब्जी
पूरी अचार और घीए का रायता
वह निकालती है मलाई से घी और वर्ष भर जोड़ती है
फिर बांट देती है
असली घी देकर होती है खुश

मैं बरस दर बरस फैलती जा रही हूं
वह कहती है तू कितनी बोदी हो चली है
सिर पर हाथ फैरते हुए बना देती है अब भी मेरी चोटी
बटा हुआ चुटिला और उसमें लटकते फुंदने
मेरी कमर पर थिरकने लगते हैं

उसके दिल की गठरी में नजरबंद हैं कई पुराने दर्द
कभी कभी वह उन्हें धूप दिखाती है
वरना बक्से में बंद ही रखती है
कुशल हाथों से तहाये हुए जीवन के सत्तर साल
वहां करीने से रखे हुए हैं
उनकी तहों में जब कहीं से पुरानी टीस निकल आती है
तो झटके से दबा देती है
वह किसी को बक्से से हाथ नहीं लगाने  देती
वह संपत्ति है  उसकी

सोचती हूं   क्या मैं भी एक दिन मां जैसी हो जाऊंगी
लेकिन मुझमें इतना सब्र कहां
कि चीजों को संभाल कर रख पाऊं
मैं अभी से चीजों को भूलने लगी हूं
दिखता है कम   हड्डियां हैं बेदम
और दर्द
दर्द तो अब होता नहीं शायद

3.मां के विदा होते ही

मां के विदा होते ही
बेटों ने संभाले ज़मीन जायदाद के कागज़ात
बहुओं ने सभाले ऐंटिक जेवरात
बेटियों को मिली पुरानी साड़ियों की सौगात
पर उनकी छोड़ी किताबों का न रहा कोई नाम लेवा

अब उन्हें कौन सम्भाले…??
मां के साथ ही क्रिया कर्म कर देते तो अच्छा था
कितना मना करते थे पर मां मानती ही कहां थीं
मरते दम तक किताबों में जाने क्या ढूंढ़ती रहती थीं
(वैसे भी मां की सुध किसे थी)
घर भर घेर रक्खा है इन रद्दी किताबों ने
अब किताबों  की अंतिम यात्रा शुरु होनी तय थी
किताबें पहुंचा दी गईं किसी सिरफिरे के पास
उसने ज़रुरत भर की किताबें छाटीं
बाकी कर दीं आगे पास
अगले ने उड़ती नज़र से बांचा
एक आध का हो गया उद्धार

किताबें बाट जोहती रहीं
बहुत सी किताबों को नहीं मिला कद्रदान
किस रास्ते जाएंगी किताबें
कहा भटकेंगी कोई नहीं जानता
किताबों की आंखें हैं नम
वे पहुंचा दी गईण कबाड़ी के द्वार
किताबों मे जगी नई आस
रिसाइकिल होकर फिर बन जाएंगी
किसी किताब का आधार

4.


किताबें और बेटियां
किताबें और बेटियां एक सी होती हैं
कभी भी उठकर पुकारा जा सकता है
कभी वर्षों तक बेखबर भी रहा जा सकता है
मगर जब भी पुकारो दौड़ी चली आती हैं
पुरानी मधुर स्मृतियों सी सुख दुख सांझा करतीं

५. प्रेम कविता

जब भी पुरुष पढ़तें हैं प्रेम कविता
चारों ओर वसंत सा छा जाता है
आंखों के लश्कारे तरल हो जाते हैं
स्मित मुस्कान के दिए जल जातें हैं सभागार में

और स्त्री की प्रेम कविता पर
प्रश्न आंखों की पुतलियों में अड़ जाते
दृष्टि राडार सी घूमने लगती
करने लगती है सवाल
( जैसे अनाधिकार क्षेत्र में प्रवेश कर लिया हो
या अवांछित सा कुछ कह दिया हो )
ढूंढ़ते लगते हैं किसी बेनाम को
देने लगते हैं उसके प्रेम को नाम

और यह स्त्री -पक्षधर हिन्दी समाज है ( !)

(  हिन्दी के एक प्रोफेसर और हिन्दी के आलोचक , जिन्हें प्रतिष्ठित  देवी शंकर अवस्थी सम्मान हासिल है , के द्वारा अपनी पत्नी की पिटाई का वीडियो मीडिया में  वायरल होने पर स्वाभाविक    सी प्रतिक्रया हुई . फेसबुक पर भी इस प्रसंग में सक्रियता रही. हमेशा की तरह इस मसले पर भी आपसी          संबंध निर्णायक भूमिका में आने लगे . दृश्य  चर्चित ‘ छिनाल प्रकरण’ और ‘ खुर्शीद प्रकरण’ से बहुत अलग      नहीं थे. यहाँ भी तर्कों -कुतर्को की बाढ़ आई , अपने से भिन्न मत रखने वाले के खिलाफ गाली और                  अवमानना की हद तक बातचीत हुई.  स्त्रीकाल के पाठकों के लिए फेसबुक पर इस सन्दर्भ में सक्रियता के        कुछ प्रसंग. इस प्रस्तुति में . अशोक आजमी , अनिता मिश्रा , अरविंद शेष , गीता श्री , अभिषेक श्रीवास्तव  शायक आलोक और मजदूर झा के फेसबुक वाल पर चली बातचीत को शामिल किया गया है.    )

पत्नी की पिटाई करता बी एच यू प्रोफ़ेसर

अशोक आजमी ( अशोक पांडे ) की फेसबुक वाल पर हुई बहस , अशोक जी की टिपण्णी से शुरू हुई : 

अशोक आजमी : डा कृष्णमोहन प्रकरण पर युवा कथाकार चन्दन पांडे ने अपने ब्लॉग नई बात पर एक टिप्पणी लिखी है. मैं नहीं जानता कि उस वीडियो में दिख रहे पिटाई के दृश्य को कैसे जस्टिफाई किया जा सकता है? हाँ यह ज़रूर मानता हूँ कि प्रेम हो जाने, तलाक़ या अलगाव में ऐसा कुछ भी अस्वाभाविक नहीं है..पर पिटाई!  खैर चन्दन की बात पढ़िए और फिर ख़ुद ही फैसला लीजिये : ( चन्दन पांडे ने अपने ब्लॉग पर डा कृष्ण मोहन का बचाव किया है . जिसे इस सिसिलेवार बातचीत के ठीक नीचे पढ़ा जा सकता है.)

अमलेन्दु उपाध्याय : चंदन पांडे ने जो लिखा है, वह घटना के चित्र देखते ही पहली नज़र में मेरे दिमाग़ में गया था। अब चंदन ने घटना के पीछे की पूरी कहानी भी बता दी है।……

अशोक आजमी : फिर भी क्या कृष्णमोहन का व्यवहार आपको सही लग रहा है?  भाई मामला तो पब्लिक में है ही। मैंने कल भी और आज भी उचित क़ानूनी कार्यवाही की मांग की है। कृष्णमोहन जी की पत्नी का बयान भी है टी वी पर। चन्दन कृष्णमोहन के मित्र हैं। उनकी रायल्टी का मामला भी उठा चुके हैं जब फेसबुक पर थे तो उनके बयान को भी एक तरफ़ा क्यों न माना जाए?

गीता श्री : घरेलू कलह, अलगाव, झगड़े ये सब होते हैं, पर इस तरह रोड पर सबके सामने पत्नी की पिटाई करेंगे और उसके बाद मनुष्य होने का दर्जा भी चाहिए, संभव नहीं. मारपीट सामने दिखाई दे रही है, हमारा रिएक्शन उस मार पिटाई को देख कर उपजा है. लोग क्या चाहते हैं, हम चुप रहें. सरेआम पिटाई होते देख कर भी उसे सच न मानें? आप लड़ाई को घर के अंदर निपटाएं. पत्नी के साथ सड़क पर ऐसा व्यवहार करेंगे तो निंदा तो होगी , चाहे इसे मीडिया ट्रायल कहें या कुछ और. आप कानून तोड़े और उस पर बात हो तो ये मीडिया ट्रायल, वाह. अशोक, इसीलिए मैंने कहा था, खुद लोग टीवी देखें और रिएक्ट करें. मैं तो चुप रहूंगी.

गीता श्री : अशोक, इस मर्दवादी समाज से मुझे कोई उम्मीद नहीं. मैं इसीलिए अपने पोस्ट में नाम नहीं लेती किसी का पर जो सामने दिखेगा, उस पर बात होगी, कौन रोक लेगा. शशि थरुर का मीडिया ट्रायल बंद करिए पहले, या जितने अपराधी हैं, रेपिस्ट हैं, जब तक अपराधी साबित नहीं होते, उन पर बात करना यहां बंद करिए. वो मीडिया ट्रायल नहीं है क्या? अपने परिचितो के साथ हो तो मीडिया ट्रायल और गैरो के साथ हो तो बड़े शुभचिंतक बन कर उभरना चाहते हैं लोग. दोहरे मानदंड समझ में आ जाते हैं. अपना पक्ष हमेशा स्पष्ट रखना चाहिए, नहीं तो शामत किसी के घर का दरवाजा खटखटा सकती है.

रश्मि मुन्द्रा माहेश्वरी :अमलेंदु जी का कमेंट पढ़कर बेहद हैरानी हो रही है। घटना के पीछे की पूरी कहानी बता दी है, अमलेंदु जी, आप भी बहुत जल्दी निष्कर्ष पर पहुंच गए हैं। खैर किसी भी स्थिति में मारपीट तो बेहद निंदनीय है ही। इसका बचाव किसी भी तरह से नहीं किया जा सकता। हरगिज नहीं…
मनोरमा सिंह : नहीं उनका व्यवहार बिल्कुल सही नहीं था बल्कि अगर ये अलग रहने और अदालत में तलाक का केस फ़ाइल होने के बाद उनकी पत्नी के जबरदस्ती घर में घुसने का मामला था तो उन्हें भी तुरंत पुलिस की मदद लेनी चाहिए थी, विडिओ फुटेज उनके कपड़े फट जाने के बाद से है जाहिर है कुछ जबरदस्ती उनके साथ भी हुई होगी अब ये साफ़ नहीं है उनकी पत्नी ने खुद के डिफेन्स में उनके कपडे फाड़े या उकसाने के लिए , जहाँ तक प्रेम की बात है तो ये दो लोगों का निजी मामला है कोई किसी से जबरदस्ती प्रेम नहीं करवा सकता ये भी उतना ही बड़ा सच है !

अमलेन्दु उपाध्याय : व्यवहार को हम अभी कैसे तय कर सकते हैं जब तक कि वस्तु स्थिति सामने न आए ?

रमाकांत राय : जब किसी मोहन जी को मालूम था कि मीडिया इसी ताक में है तो उन्हें पुलिस की मदद लेनी चाहिए थी। सड़क पर जो वे घसीट रहे हैं धक्का दे रहे हैं तो उसे कैसे जस्टिफाई करेंगे।
यह भी पूछा जाना चाहिए कि शिल्पी जी वहां क्या कर रही थी और उनका बेटा किस हैसियत से धक्का देकर निकाल रहा था। मीडिया ट्रायल कहकर इसे हल्का न करें प्लीज।

अम्लेन्दु उपाध्याय  : संदेह इसलिए है कि मीडिया साथ में क्यों गया था ? मतलब व्यूह रचना पहले से तैयार की गई थी। बाकी किसके किससे संबंध हैं, इस पर कोई टिप्पणी नहीं।
रश्मी मुन्द्रा माहेश्वरी : व्यवहार को हम अभी कैसे तय कर सकते हैं जब तक कि वस्तु स्थिति सामने न आए ?……………..लेकिन आपके पूर्वाग्रह तो आपने अपने पहले कमेंट में बयां कर ही दिए हैं। अमलेंदु जी, आपके कमेंट से स्पष्ट है कि चंदन जी ने जो कुछ अपने दोस्त के बचाव में लिखा है, उससे आपके सामने पूरी कहानी सामने ही आ गई है..

गीता श्री : रमाकांत जी की बात से सहमत हूं. जो चीजें साफ साफ दिख रही हैं, उससे कैसे इनकार कर सकते हैं ? हम गलत हो सकते हैं, जो दिख रहा है, वह क्या है? दो लोग मिल कर क्रूर तरीके से एक औरत को सड़क पर घसीट रहे हैं, मार रहे हैं और धक्का दे रहे हैं. क्या है ये सब???

अमलेन्दु उपाध्याय : जी रश्मि जी, बिल्कुल, चंदन ने कृष्णमोहन जी का पक्ष सामने रखा है, उससे सहमत होना या न होना आपका या मेरा विवेक है। जहां तक पूर्वाग्रह की बात है तो मेरा नहीं, आपकी बातों में झलक रहा है। मेरी आदत है मैं किसी भी घटना को केवल आंखों या कानों से ग्रहण नहीं करता। इसलिए किसी भी इल्जाम को प्रथम दृष्टया कतई स्वीकार नहीं कर सकता…

रश्मि..: चंदन पांडे ने जो लिखा है, वह घटना के चित्र देखते ही पहली नज़र में मेरे दिमाग़ में गया था। अब चंदन ने घटना के पीछे की पूरी कहानी भी बता दी है।……आपके इस कमेंट के बाद यदि आप मुझे पूर्वाग्रह युक्त बताते हैं तो , है आपको..

अम्लेन्दु : महोदया, मेरा पूर्वाग्रह इसलिए नहीं है क्योंकि मैं कृष्णमोहन जी से उतना ही परिचित हूँ जितना आपसे। न मेरी उनसे किसी बिजनेस में साझेदारी है न किसी आंदोलन वगैरह में। लेकिन आप कृष्णमोहन जी को फांसी देने को तैयार लग रही हैं।

अशोक : जी, शिल्पी अगर उनके घर में हैं तो हैसियत पूछने का हक किसी को भी नहीं. न वह बच्ची हैं, न कृष्णमोहन. अगर वे साथ रहना चाहें तो इसमें ग़लत मेरी नज़र में कुछ नहीं. यह आप किस आधार पर कह रहे हैं कि वह लड़का शिल्पी जी का है? मेरी जानकारी में यह ग़लत सूचना है आपके पास.

रश्मि : अमलेंदु जी, आपको मुगालता है कि मेरा परिचय यकीनन किसी से कम और किसी से ज्यादा है। आखिरी लाइन में फिर आपका एक और पूर्वाग्रह सामने आ गया है। तैयार लग रही हैं, आप विवेक का इस्तेमाल करके महज इतना भर बता दीजिए कि मेरी किस बात से आपको लग गया कि उन्हें मैं फांसी देने के लिए तैयार बैठी हूं??…उल्टा आप उनके बचाव के लिए कमर कसे बैठे हैं….!!!

अशोक :  और अमलेन्दु जी, इसे व्यक्तिगत लड़ाई में क्या बदलना दोस्तों. जो है सब सामने दिख रहा है. अपनी अपनी नज़र…

रमाकंत : मैंने कृष्ण मोहन जी के बेटे की बात की है शिल्पी जी के नहीं।
दूसरे, अगर तलाक नहीं हुआ है तो उनका रहना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है। बाकी आप समझ रहे हैं कि शिल्पी वहां क्यों थीं?

अनिता मिश्रा : मुझे पता था जी कि कल तक कुछ तर्क खोज लिए जायेंगे जिससे प्रोफ़ेसर साहेब का आसन विचलित ना हो। मैंने माना वो स्त्री बेहद बुरी थी पर उसको इस तरह लात घूंसों से सड़क पर पीटना। और विरोध करने वाले से कहना दूसरा पक्ष देखो ।जब सब सड़क पर है मामला तब निजी कहाँ रहा।और माफ़ करिए वीडियो में उनकी क्रूरता देख के जिसे उन्हें महान मानना हो माने।मै नहीं मान सकती।दुनिया की सबसे दुश्चरित्र और दुष्ट औरत पर भी क्यों हाथ उठाना कानून किसलिए है।

अशोक : रमाकांत जी, मेरे लिए यह नैतिकता का मामला नहीं है. कौन किसके साथ रहे, कानून से परे भी मेरे लिए यह पर्सनल च्वायस और म्यूचुअल अंडरस्टैंडिंग का मामला है. मेरी सारी आपत्ति उस हिंसक घटना से है. जैसा कि मनोरमा जी ने कहा किसी भी हाल में हिंसा की जगह पुलिस का आप्शन चुनना चाहिए था. तमाशा तो बन ही गया है. बनियान फटना कोई बम फटना नहीं है और वह पूरी घटना देखते हुए कहीं नहीं लगता कि कृष्णमोहन आत्मरक्षा में यह सब कर रहे हैं…इसीलिए यह निंदनीय घटना है. इसकी सज़ा मिलनी चाहिए.

रमाकांत : मैं जबाब में बातें कह रहा था। मैं भी इसे मानता हूँ कि कृष्णमोहन और उनके बेटे का किया कृत्य किसी भी तरह से उचित नहीं ठहराया जा सकता।

उपाध्याय प्रतिभा : स्त्री होना ही निर्दोष होने की निशानी नहीं है. तलाक की अर्जी के रहते साथ रहने की जिद के पीछे की मंशा शातिराना ही हो सकती है.

रमाकांत :  और विवाह विच्छेद से पहले यह कानूनन जुर्म है जिसे कृष्णमोहन जी कर रहे थे।

अशोक : मैं सहमत हूँ. लेकिन फिर भी पिटाई को और उस व्यवहार को जस्टिफाई नहीं कर सकता.

गीताश्री : मुझे भी अंदेशा था अनिता, इसीलिए मैंने बिना नाम लिए पोस्ट लिखा था. बचाव पक्ष यहां बहुत कैलकुलेटिव ढंग से उतरे हैं. हमारा कोई स्वार्थ नहीं. हमने जो देखा, उस पर प्रतिक्रिया दी. उनकी लड़ाई पुरानी है, पर लड़ाई की नौबत के पीछे जो बेवफाई है, उस पर कोई बात नहीं करता. एक प्रेम कथा का यह दुखद अंत सड़क पर लात घूंसो के साथ…और हम कुछ कहें को प्रो. साब के शान के खिलाफ. उनके दोस्त तिलमिला रहे हैं. और चोट खाई औरत.. जिसने कभी नौकरी नहीं की और पूरा जीवन इनके पीछे लगा दिया, उसे उम्र के इस ढलान पर क्या मिला? हमें पीड़ा होगी और हम बोलेंगे चाहे आप इसे मीडिया ट्रायल कहें. तब तो बिगाड़ के डर से इमान की बात न कहें हम…

अशोक : रमाकांत जी, जार्ज फर्नांडीज जीवन भर पत्नी के साथ नहीं किसी और महिला के साथ रहे, ऐसे पचास उदाहरण है. प्रेम जबरदस्ती नहीं हो सकता. वह बयान भी सुनिए कृष्णमोहन जी की पत्नी का (उनका नाम नहीं याद मुझे) जिसमें वह कहती हैं, जीवन भर तलाक़ नहीं दूँगी. तो उचित वह बयान भी नहीं है.
खैर वह मेरे लिए अभी बहस का मुद्दा नहीं.

अशोक : मैं यह नहीं समझ पा रहा था कि प्रेम विवाह, कामरेडरी के इतने वर्षों बाद रिश्ता इतना कटु कैसे हो सकता है? क्या शान्ति से दो लोग रह नहीं सकते तो अलग भी नहीं हो सकते?

रमाकांत : और यह मारपीट नई नहीं है। उनको जानने वाले जानते हैं कि वे पहले भी घरेलू हिंसा में संलग्न रहे हैं। यह सबके सामने ऐसे आया है।

अशोक : दिक्कत यही है कि आप इसे नैतिकता के किसी शुद्धतावादी पैमाने पर देख रहे हैं, मैं नहीं. मैं इस आधार पर न जार्ज को ग़लत ठहराता हूँ न ही गुजरात की वर्तमान मुख्यमंत्री को. दिग्विजय सिंह का तो खैर केस ही अलग है. जीवन भर अविवाहित रहकर भी डा कॉल की पत्नी से रिश्ता निभाने वाले अटल बिहारी बाजपेयी से भी मुझे कोई दिक्कत नहीं.मेरी दिक्कत हिंसा और उत्पीडन से है. और प्लीज़ बहस को भटकाइए मत.

श्रुति कुमुद : आप सब पहले ही फैसला ले चुके हैं इसलिए देख कर भी नहीं देखते. मामला पिटाई का नहीं है. मामला घर में जबरिया घुसने का है और न घुसने देने का है. जब दो जने अलग अलग रहने का फैसला किया है तो वो जबरिया क्यों घुसना चाह रही हैं ?

रश्मि : मुझे नहीं लगता कि यहां कोई भी केवल और केवल उसी दृश्य को सच्चाई मान रहा है। हां, हम इतना जरूर कह रहे हैं कि पीछे भले ही दोनों ही पक्षों की सही गलत स्थितियां हों, , फिर भी जो सामने है, वो तो यकीनन बेहद निंदनीय है।

दुनिया भर में ७० % से अधिक महिलाओं ने अपने जीवन में वैवाहिक हिंसा को किसी न किसी रूप में झेला है

अशोक : एकदम रश्मि जी, यही कह रहा हूँ तबसे.

गीता श्री : जबरिया घुसेंगी तो मारपीट करेंगे? पुलिस को बुलाएं, घर के अंदर बात करें, सड़क पर लाकर मारेंगे और धक्का देंगे, घसीटेंगे, छड़ी लेकर खदेड़ेंगे?

श्रुति : यह तर्क आपका बेहद सही है गीता जी. जबरिया घुसने वालों की पहले आरती उतारिये, लेकिन उसे कोई दोष मत दीजिए.

रश्मि : पुलिस को बुलाएं, घर के अंदर बात करें vs आरती उतारें, वाह क्या तुलना है…!!!

श्रुति : वाह क्या समझ है कि घर से बाहर निकालने को मारपीट कहा जाए !!

अशोक : खुदा करें कि आपको कभी यह आरती न झेलनी पड़े श्रुति जी. अगर वह वीडियो आपको हिंसक नहीं लगता तो आपकी आँखों पर ज़रूर को मोटा पर्दा है.धन्यवाद रश्मि जी.

उपाध्याय प्रतिभा : बेशक कृष्णमोहन की हरकत निंदनीय है, इसके लिए प्रोफ़ेसर महोदय पर कार्यवाही होनी चाहिए. लेकिन यह स्थिति आई क्यों? तलाक का केस होते हुए घर में स्वयम घुसने की ज़रूरत क्यों आ पड़ी?
जैसे खुर्शीद अनवर के मामले में एक प्रश्न ही समस्या का मूल है कि वह लड़की किसी अनजान के घर पर अकेले क्यों रुकी , ठीक वैसे ही यहाँ प्रश्न है कि तलाक का केस चल रहा है , तो प्रोफ़ेसर साहब के घर क्यों जाया गया? चन्दन पांडे द्वारा दी गई इस जानकारी से पहिले क्या मिडिया ने यह बताया कि उनका तलाक का मामला चल रहा है? क्या किसी मामले में पुलिस तुरंत आ जाती है?

अरविन्द शेष : किसी भी दलील पर कोई अगर उस महिला को उस तरह पीटे-घसीटे जाने का समर्थन या बचाव कर रहा है, तो उसके दिमागी विकास पर तरस खाना चाहिए। उस खास आपराधिक घटना (पीटते-घसीटते हुए घर से बाहर फेंकने) के प्रत्यक्ष होने के बावजूद अगर कोई इस घटना की “पृष्ठभूमि” की व्याख्या परोस रहा है तो जाने-अनजाने वह एक अपराध और आपराधिक प्रवृत्ति की हिमायत और उसका बचाव कर रहा है।अपने ऊपर ऐसा कोई भी हमला किसी भी महिला को किसी भी हाल में बर्दाश्त नहीं करनी चाहिए। वरना पहले एक ऐसी संस्कृति और सामाजिक व्यवस्था बनाइए जिसमें एक स्त्री भी ऐसे मामलों में “बराबर” का व्यवहार करे! अपने पति से दिक्कत होने पर उसे ऐसे ही पीटे, घसीटे और लतियाते हुए घर से बाहर फेंके। और ऐसा करते हुए वह उतनी ही सहज रहे, जितना वह कथित बुद्धिजीवी और उसके झंडाबरदार दिख रहे हैं…!

अशोक : क्या आप कहेंगे कि मारपीट नहीं हुई? वह हुई है और मेरे लिए निंदनीय है दो पुरुषों का लाठी डंडा लिए एक महिला को पीटना।

अरविन्द शेष : ज्यादा अफसोसनाक यह है कि इस बहाने फिर महिलाओं और दलितों-वंचितों के हक की रक्षा के लिए बने कानूनों के दुरुपयोग का राग अलापा जा रहा है…!

श्रुति : अरविन्द जी, दिमागी विकास जैसे मुहावरों से बचना चाहिए. आपको नहीं लगता कि बिना पढ़े बात करना भी दिमागी विकास वाले मुहावरे की श्रेणी में आता है. या क्या यह मूर्खता की श्रेणी में नहीं आता कि जब लेखक दो बार इस बात की दुहाई दे कि वह न्याय का पक्षधर है फिर भी हम इसलिए तड़प रहे हैं क्योंकि उसने किसी का पक्ष लिखा. तो क्या यह मान लिया जाए कि आज के बाद जितने भी अपराध होन्गे, उसमें “तथा कथित” अपराधी का पक्ष लिखना गलत होगा !! वाह ! यह सिर्फ कोई मूर्ख ही कहेगा कि वो प्रस्तुत वीडियो की निन्दा नहीं कर रहा. यह तो मानी हुई बात है. पर आपका और अन्य साथियों का यह तर्क गजब है कि किसी भी कार्रवाई के लिए वह वीडियो अंतिम सत्य मान लिया जाए.

श्रुति : आलेख में साफ तौर पर लिखा है कि अधिकारियों ने यह बात अप्रतक्ष्य तौर पर स्वीकारी है.
अरविन्द शेष : मैंने उस महिला को उस तरह पीटे-घसीटे जाने का समर्थन या ऐसा करने वालों का बचाव करने वालों पर सवाल उठाया है। अगर कोई उस महिला को इस तरह पीटे-घसीटे जाने और घर से बाहर फेंके जाने को गलत मानता है तो उसे मेरी बात से कोई परेशानी नहीं होगी। हमारे सामने पीटने-घसीटने और घर से बाहर फेंके जाने का संदर्भ है और मैं हर हाल में उसकी निंदा करता हूं, उसकी पृष्ठभूमि चाहे जो हो..

गीता श्री : कुमुद जी, पहली बार यहां इतनी सक्रिय दिखाई दे रही हैं, साथियो, कोई बड़ी वजह है कि वे इस तेवर और भाषा में बात कर रही है. मुझे अफसोस है कि वे लगातार बचाव के लिए गलत दलील देती जा रही हैं. अच्छा ये है कि वे मेरी लिस्ट में नहीं हैं, न कभी होंगी. उनका हर तर्क लचर और उनके बनारस कनेक्शन की ओर संकेत करता है. दुखद.

( यह वाद -प्रतिवाद और भी लंबा है , इसमें वे लोग भी शामिल हैं , जो खुर्शीद प्रकरण में उनके बचाव में गाली गलौच कर रहे थे .  यहाँ संक्षिप्त प्रस्तुति है )

कथाकार चन्दन पांडे के द्वारा उनके ब्लॉग पर कृष्ण मोहन का बचाव : 


मीडिया के शिकार होते जा रहे डॉ. कृष्णमोहन के मामले का सच 

डॉ. कृष्णमोहन और किरण का मुद्दा स्त्री-पुरुष के साथ दो इंसानों का भी है. सीमित समझ की पतित मीडिया ने इसे पीड़ित स्त्री बनाम प्रताड़क पुरुष बना दिया है. यहाँ तक कि प्रशासन भी मक्कार मीडिया के दबाव में कार्र्वाई करने की बात, अप्रत्यक्ष तौर पर, स्वीकार रहा है. इससे शायद ही किसी को गुरेज होगा कि सबको न्याय मिले पर ऐसा भी क्या भय खाना कि आप दूसरे की गर्दन देकर अपनी गर्दन बचाएँ.
ऐसे में यह बेहद जरूरी है कि सच सामने हो.
यह बात दुहरा देना चाहता हूँ ( ताकि लोग “कौआ कान ले के भागा” वाले अन्दाज में हमला न करें ) कि किसी भी मामले में न्याय ही अंतिम पैमाना होना चाहिए और हम सब उसकी तरफ हैं जो निर्दोष है पर इसका क्या अर्थ कि हम मामले को जाने भी नहीं ? तो आखिर यह फैसला कैसे होगा कि कौन निर्दोष है और कौन दोषी ?
मामला यह है कि इनके बीच अलगाव/ तलाक से सम्बन्धित मुकद्मा न्यायालय में है. किरण घोषित तौर Krishna Mohan से अलग रहती है. इस बाबत उनके बीच समझौता भी हुआ था कि तलाक होने तक वो दोनों अलग रहेंगे. एक निश्चित माहवार भत्ता भी तय हुआ था. कोई भी यह समझने की कोशिश नहीं कर रहा है कि जब अलग रहना तय हुआ है तो क्यों किरण बार बार घर में प्रवेश करने की जुगत लगाती रहती हैं ?
यह कई मर्तबा हो चुका है जब किरण ने मीडिया के सह-प्रायोजन में कृष्णमोहन के घर के सामने धरना प्रदर्शन या घर में भीतर जाने की कोशिश की हैं. ध्यान रहे कि मामला जब अदालत में है तो मेरी समझ के बाहर यह है कि जबरिया घर में घुसने की कोशिश को क्या कहा जाए ? अगर कोई ‘हिडेन अजेंडा’ न होता तो किरण को मीडिया और पुलिस के लाव-लश्कर के साथ घर में घुसने की कोशिश का कोई मतलब नहीं था. कायदे से उन्हें न्यायालय के निर्णय का इंतजार करना चाहिए. सस्ते सिनेमा के अलावा यह कहीं भी सम्भव नहीं दिखता कि तलाक की अर्जी भी पड़ी रहे और साथ साथ रहा भी जाए. यह भी ध्यातव्य हो कि किरण अपना सारा सामान घर से लेकर बहुत समय पहले ही जा चुकी हैं. अगर उन्हें कोई सुबहा है तो उन्हें पुलिस में शिकायत दर्ज करानी चाहिए. लोमड़ी मीडिया को थानेदार बनाने का शगल गलत है.मानवाधिकार व्यक्ति के, भी, होते हैं, सिर्फ समूह के ही नहीं.
घर से अलग रहने का निर्णय लेने के बाद, अदालत की कार्र्वाई के दरमियान, घर में घुसने की कोशिश क्या इस कदर निर्दोष है ? वो भी तब जब आप पहले से ही अलग रह रहें हों. या क्या भारतीय व्यव्स्था ने ठान लिया है कि दो ही छोर पर रहना नसीब है, एक छोर जिसमें आप स्त्री को इंसान भी न समझे और दूसरा छोर यह कि स्त्री होना ही निर्दोष होने की निशानी हो.
जिस वीडियो का हवाला मन्द-बुद्धिजीवी, मीडिया और साथी, दे रहे हैं उन्हें यह भी देखना चाहिए कि आखिर उस विडियो में कृष्णमोहन के कपड़े फटे हुए हैं. और कोई भी समझ सकता है कि वह वीडियो घर में घुसने की जिद और न घुसने देने की जद्दोजहद की है. यह सारा मामला उन्हें उकसाने के लिए प्रायोजित किया गया था. आखिर वही मीडिया इस बात का जबाव क्यों नहीं देता कि जब अलग रहना तय हुआ था तो किरण वहाँ क्या कर रही थीं ? अगर उन्हें शक था तो क्या उन्हें कानूनी मदद नहीं लेनी चाहिए थी ? घर में घुसकर तमाशा करना भी एक नीयत हो सकती है. वरना जहाँ प्रेम विवाह रहा हो, वहाँ ब्याह के इतने वर्षों बाद दहेज उत्पीड़न के तहत मामला दर्ज करना साफ नीयत का मामला नहीं है.
उस वीडियो को बनाने वालों से यह क्यों न पूछा जाए कि जिस स्त्री के पक्ष में तुम वीडियो उतार रहे हो, अगर – तुम्हारे अनुसार – उस पर जुल्म हो रहा था तो तुम कैमरा पकड़ने की बजाय उस स्त्री को बचा भी तो सकते थे.
अभी जो आतंकवादी मीडिया को समझने की कोशिश नहीं कर रहे हैं उन्हें ध्यान देना चाहिए कि पिछले दिनों इस मीडिया ने खुर्शीद अनवर का क्या किया. बाजार की पतलून के पिछले हिस्से से गिरा यह मीडिया स्त्री-पुरुष मामलों में इतना एकतरफा होता है कि इसके सामने आप अपनी बात भी नहीं रख सकते.
मैं इन्हें व्यक्तिगत तौर पर जानता हूँ. अपनी इस उम्र तक मैं जितने भी लोगों से मिला हूँ उसमें शायद ही कोई मिला हो जो कृष्णमोहन के स्तर का हो. गज़ब के इंसान हैं. मैने देखा है कि इंसान तो इंसान अपने कुत्ते की मामूली बीमारी तक में वे अन्दर से परेशान हो उठते हैं. घर के सभी सदस्यों का ख्याल रखना कोई उनसे सीखे. ऐसे में टुकड़े टुकड़े खबरों से किसी को परेशान किया जाता हुआ देखना दु:खद है.और इतनी तो इल्तिजा कर सकता हूँ कि पुलिस अपनी किसी भी कार्र्वाई में मीडिया के दबाव को कारण न बनाए.

महिलाओं को संबोधित कर गाली देने वाले हिन्दी वि वि के पूर्व कुलपति विभूति राय के खिलाफ प्रदर्शन

अनिता मिश्रा  अपनी वाल पर : बेरहमी से अपनी पत्नी की पिटाई करके घर से निकालते ये जनाब कोई साघारण व्यक्ति नहीं हैं। ये जाने कितनी डिग्रियां ले चुके नामचीन प्रोफेसर और लेखक हैं। ये प्रतीक भर हैं उस समाज के जो बौद्धिक होकर भी सिर्फ ” मर्द ” ही बना रहता है। इनके अंदर के सामंती मर्द की ताकत सिर्फ स्त्री पर निकलती है। कितने सेमीनारों में, किताबों में स्त्री समानता पर ना जाने क्या -बोला होगा पर मेरी नज़र में इनका सारा ज्ञान ”गोबर” है और किताबें ”कूड़ा” अगर ये इतनी तमीज नहीं सीख पाये कि एक स्त्री के साथ कैसे पेश आया जाता है। वैसे कई किस्से सुन कर मैं इस गलतफहमी से बाहर आ चुकी हूँ कि लेखक या आर्टिस्ट संवेदनशील व्यक्ति होता हैं।
( अगर ये फोटो बाहर ना आते और ये महिला डोमेस्टिक वायलेंस का केस करती तब तमाम इनके जैसे इनके पक्ष में कहते कि कानून का दुरूपयोग कर रहीं है स्त्रियां )

गीता श्री की वाल पर कथाकारों की अपील :
हम हिंसा का प्रतिरोध करते हैं।

हम इक्कीसवीं सदी के तकनीकि युक्त अत्याधुनिक समय में जी रहे हैं लेकिन लगता है जैसे सदियों पूर्व की तरह आज भी, स्त्री को सामाजिक रूप से इंसान समझने या इंसानी बराबरी में देखना तक गवारा नहीं है । स्त्री के लिए समानाधिकार और न्याय आज भी किसी अनसुलझी पहेली की तरह है तब आधुनिकीकरण की बातें सुनना या कहना ठीक “दिल बहलाने को ग़ालिब ख़याल अच्छा है” की तरह ही लगता है। स्त्रियों के मानसिक, शारीरिक, और दैहिक उत्पीड़न की ख़बरें सुनने या पढ़ने से शायद ही कोई व्यक्ति या वक्त अछूता रहता हो।
तभी आलोचक कृष्ण मोहन द्वारा अपनी पत्नी के रूप में एक स्त्री के साथ किये गए अमानवीय और हिंसा की घटना को भी इससे इतर नहीं देखा जा सकता। पति-पत्नी या स्त्री-पुरुष के बीच वैचारिक मतभेद, आंशिक विवाद या बहस एक सहज स्वाभाविक इंसानी प्रक्रिया है लेकिन उसकी परिणति का स्त्री हिंसा तक पहुंचना बेहद निंदनीय और शर्मनाक है। यहाँ हमारा काम किरण जी और कृष्ण मोहन के बीच हुए विवाद पर चर्चा करके किसी भी व्यक्ति के निजी और व्यक्तिगत जीवन में दखल देने का नहीं है और न ही यह जांचने और फैसला करने का कि किसकी कितनी और क्या ग़लती थी । यह जानने, जांचने और फैसला सुनाने का काम क़ानून का है, हमारा नहीं।
यहाँ हमारा मकसद उस क्रूरतम अमानवीय प्रवृति की भर्तसना करना है जो पुरुष द्वारा की जाने वाली स्त्री हिंसा के रूप में समाज में देखने को मिलती रही है। देखने के लिए भले ही यह महज़ शारीरिक हिंसा हो किन्तु गहरे और बड़े संदर्भों में ऐसे सभी कृत्य, डरा धमका कर, स्त्री को सामाजिक समानाधिकार और न्याय से वंचित रखने की परोक्ष कोशिश हैं। इसलिए भी न केवल हमें बल्कि दुनिया के हर जिम्मेदार व संवेदनशील व्यक्ति को ऐसी प्रवृतियों और अमानवीय कृत्यों की न केवल निंदा करनी चाहिए बल्कि इनके खिलाफ आवाज़ उठाकर खुद के जिन्दा होने का सुबूत भी देना चाहिए।
किरण जी के साथ हुई यह समाज की पहली घटना नहीं है। ऐसी घटनाएं लगभग हर रोज ही असंख्य शिक्षित-अशिक्षित स्त्रियों के साथ घरों में या सार्वजनिक जगहों पर घटित होती हैं किन्तु कतिपय कारणों से प्रकाश में नहीं आ पातीं। हालिया घटना के वस्तुगत यह वक्तव्य उन तमाम पीड़ित महिलाओं के पक्ष में हमारी आवाज़ है। तब ज़ाहिर है यहाँ हमारा उद्देश्य कृष्ण मोहन को सार्वजनिक रूप से अपमानित करना या व्यक्तिगत रूप से विरोध करना नहीं है । यह विरोध उस प्रवृति से है जो कृष्ण मोहन जी ने पत्नी किरण जी के लिए अपनाई जो सामाजिक रूप से अशोभनीय है।
जबकि हर विवाद और समस्या का समाधान आपसी संवाद और न्यायायिक रूप से भारतीय संविधान में अंतर्निहित है। बावजूद इसके महिलाओं के प्रति होने वाले ऐसे घिनौने और अमानवीय कृत्यों का हम सामूहिक रूप से एक स्वर में विरोध करते हैं तथा किरण जी और अनेक ऐसी पीड़ित स्त्रियों के लिए न्यायायिक इन्साफ़ और सामाजिक सम्मान की मांग करते हैं।

अभिवादन के साथ
कथाकार समूह

सत्यनारायण पटेल, अमिताभ राय, एम.हनीफ. मदार, सूरज प्रकाश, गीता श्री, तेजेन्दर शर्मा, कविता, सुभाष चन्द कुशवाह, आकांक्षा पारे काशिव, जयश्री राय, विभा रानी, मनोज कुलकर्णी, बहादुर पटेल, चरण सिंह पथिक, भागचन्द गुर्जर, संदीप मील, कैलाश वानखेड़े, आशीष मेहता, संजय वर्मा, प्रेरणा पांडे, विपिन चौधरी, योगेन्द्र आहुजा, कात्यायनी, सत्यम, जीवेश चौबे, तरुण भटनागर, यामिनि सोनवने, अनिता चौधरी, ममता सिंह, युनूस ख़ान, हिमांशु पंड्या, रोहिणी जी, राकेश बिहारी, प्रज्ञा पांडेय

हिन्दी जगत की एक प्रतिक्रया : संयोग अच्छा है कि अभियुक्त कृष्ण मोहन न तो कहीं किसी संस्थान के हेड हैं और न नियुक्तियां करने -करवाने , पैनल में जाने वाले प्रोफ़ेसर . नहीं तो  हिन्दी विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति द्वारा महिलाओं को गाली देने के बाद विरोध और हस्ताक्षर करने वालों का हस्र यह समाज देख चुका है !

अरविन्द शेष  अपनी वाल पर : एक पत्नी-पति के बीच तलाक की प्रक्रिया पूरी नहीं हुई, संपत्ति संबंधी विवाद (पति की संपत्ति में महिला का अधिकार) का कानूनी तौर पर निपटारा नहीं हुआ… और हम यह मूर्खाना सवाल उठाने में लगे हैं कि वह महिला पति के घर में गई क्यों..! यह सवाल जितना सामाजिक-संवैधानिक अधिकारों के सामंती दमन के “पुरुषार्थ” का है, उससे ज्यादा इसके मूल का है, जहां पितृसत्तात्मक मर्दाना कुंठा के बूते स्त्री पर शासन, उसे गुलाम बनाए रखने की सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्था रची जाती है। फिर अगर उस लाचार “मर्द” ने पत्नी के हंगामे से “मजबूर” होकर उसे पीटा-घसीटा और घर से बाहर फेंका तो वह महिला किस बात से कथित हंगामा करने पर मजबूर हुई? पीटने-घसीटने और घर से बाहर फेंकने के लिए “वजह है” महिला का हंगामा, और महिला ने अगर हंगामा किया, तो उसकी वजह? उसे नहीं खोजेंगे? प्रगतिशीलता का पाखंड ओढ़ा जाता है तो हम इसी तरह के दोहरे पैमानों की सौदागरी करते हैं। और किसी भी स्त्री के पास इस व्यवस्था से लड़ने के लिए अगर पुरुष-सत्ता के बरक्स बराबर के तौर-तरीके होते तो वह किसी कथित “सुनियोजित” तरीके का इस्तेमाल नहीं करती। पहले हम बराबरी की वह व्यवस्था तैयार करें, फिर स्त्री के खिलाफ चिचियाएं कि तुमने “युद्ध” में फलां तरीके क्यों अपनाए, चिलां का सहारा क्यों लिया…! इसके अलावा, जब उसके पति के घर में जाने को ही उसके उस तरह पीटते-घसीटते हुए बाहर फेंक दिए जाने की वजह के तौर पर पेश किया जाएगा तो फिर स्त्री के भी कानूनी-सामाजिक-राजनीतिक अधिकारों का सवाल उठेगा। एक सवाल यह है कि अगर कोई महिला दूसरी शादी कर लेती है और गुजारा भत्ता का दावा भी करती है, तब हम वीर-बहादुरों का स्टैंड क्या होगा? इसी लोकेशन से यह भी पूछा जाएगा कि अगर तलाक की प्रक्रिया अधूरी है तब किसी पुरुष को अपनी पत्नी को अपने घर से बाहर फेंकने के लिए पीटने-घसीटने का अधिकार किसने दिया? कथित सहजीवन से किसी को दिक्कत नहीं है। लेकिन अगर यह किसी के अधिकारों का दमन करके चलता है तो दमित व्यक्ति को विरोध करने का अधिकार है। उस विरोध का स्वरूप क्या होगा, यह हम नहीं तय करेंगे।
और हमारे जैसे लोग जो क्रांति और प्रगतिशीलता का परदा अपने थोबड़े पर टांगे फिरते हैं, अगर शासक और शासित, दमनकर्ता और दमित की पहचान नहीं कर पाते, उस व्यवस्था की परतों को जानबूझ कर ढके रहते हैं, तो ऐसा हमें घोषित तौर पर करना चाहिए कि हम असल में कूढ़मगज दक्षिणपंथी सामाजिक सत्ताधारी मर्द हैं जो अपने हर पाखंड से एक सामंती मर्दाना व्यवस्था को खाद-पानी पहुंचाते हैं, मजबूत करते हैं।

अभिषेक श्रीवास्तव अपनी वाल पर  कौन कहता है कि हिंदी साहित्यं के आलोचकों को मीडिया नहीं पूछता? शर्त ये है कि आलोचना दमदार होनी चाहिए… बौद्धिकता और विवेक से मुक्तन एकदम फिजि़कल… डायरेक्ट .

शायक आलोक : ” देखिये विभूति जी .. आपने जो छिनाल कहा तो उसके लिए हम आपका सार्वजनिक अपमान या व्यक्तिगत विरोध नहीं करना चाहते .. वो क्या है कि हम काहे आप से सींग टकरायें .. हे हे हे .. है कि नहीं .. हम तो बस इस प्रवृति का विरोध करते हैं ” ..

…………………एक सच यह भी…….
हिंदी वालों महानुभावों .. अपने शब्दजाल से दुनिया को बेवकूफ बनाना बंद करो.. रीढ़ की हड्डी चाहिए होती है सही को सही और गलत को साफ़ साफ़ गलत कहने के लिए .. वहां स्पष्टीकरण नहीं होता .. लानतें भेजता हूँ तुम्हें .. शर्मसार किया तुम लोगों ने मुझे ..

सन्दर्भ : कृष्ण मोहन को हिंदी वालों की फेसबुक चिट्टी ..
**विभूति प्रकरण को याद किया मैंने हायपोथेतिकल संवाद के साथ

मजदूर झा अपनी वाल पर : डॉ. कृष्णमोहन का सच चाहे जो भी हो, जिस तरह से उन्होने अपनी पत्नी को सरे-आम पीटा है, इसकी वकालत करना वहशी समाज का समर्थक होना है। चन्दन पांडे ने जिस चालाकी के साथ उनकी वकालत की है, आश्चर्य से कम नहीं है। मैं उनसे कहना चाहूँगा कि आप निर्दोष और दोषी की तलाश जिस लोकतान्त्रिक ढांचे में रहकर करना चाहते हैं, उनका पीटना क्या इसी लोकतान्त्रिक अधिकार के दायरे में आता है? आपने कहा कि दोनों के बीच तलाक का फैसला होना है, भत्ता बंद इसलिए किया गया क्योंकि वो ज्यादा पैसे मांगने लगी… समूची घटना को आपने घटिया पुरुष मानसिकता के नज़रिए से देखा है। ये तलाक देने कि कोई उम्र-सीमा होनी चाहिए कि नहीं? एक परिवार में पढ़ने-लिखने का मौका या अन्य सुविधाएं पुरुष को पहले दी जाती है, वह उन सुविधाओं के दम पर व्यवस्थित होता है, तब जाकर उसे अपने लेबल के लोग ज्यादा पसंद आते हैं, तलाक कि प्रक्रिया डॉ. कृष्णमोहन जी के उम्र में ऐसे ही शुरू होता है, फिर जब आपकी पत्नी या घर वाले आपको बनाने में लगे होने के कारण किसी लायक नहीं बचते हैं, तब आप उनको तलाक देते हैं या किनारा कर लेते हैं। ये कौन सा न्याय है चन्दन बाबू? जब गुजारा भत्ता आप दे रहे थे, तो अचानक बंद क्यों कर दिया. ‘और ज्यादा मांगने लगी’ तो आपने बंद ही कर दिया। यह तर्क बेवकूफ़ों को भी बेवकूफ बनाने में कारगर साबित नहीं होगा। मामला जब कोर्ट में था, जब तलाक की पूरी प्रक्रिया समाप्त नहीं हुई थी तब आपने किस अधिकार से अपनी प्रेमिका को अपने घर में रहने दिया या रख लिया। और यहीं मैं आपको यह भी बताना चाहूँगा कि जब तक यह प्रक्रिया पूरी नहीं होती कानूनन आपकी पत्नी उस घर में आ जा सकती है। चलिये यहाँ तक भी ठीक है अब आप ये बताइये कि—आपने मारा क्यों, घसीटा क्यों?? आ गए न अपने फूहड़ मर्दानगी की औक़ात पे। और चन्दन बाबू, जितनी संभावना इस बात की है कि महिला ने धक्का-मूक्की में उनका बनियान फाड़ा तो क्या इस बात की संभावना नहीं है कि–बचाव या मार खाती एक महिला की स्वाभाविक प्रतिक्रिया में ऐसा हुआ हो? खैर, छोड़िए मैं तो आप जैसे लोगों से इस बात के लिए भी तैयार रहता हूँ कि दामिनी प्रकरण में, ईंट, छड़ इस्तेमाल करने वाला बलात्कारी सज्जन आपका कोई संबंधी नहीं निकला नहीं तो माशाअल्लाह आपके तर्क देखने लायक होते और उन गरिमामयी तर्कों को शेयर करते हमारे दूसरे कहानीकार मनोज पांडे क्या खूब जँचते…. ख़ैर, खेमेबाज़ कहानीकारों की अंतिम परिणति यही होती है।

क्या पुरुष अपने समदुखी ‘मीत’ की व्यथा -कथा समानुभूति से लिखेंगे ?

सुधा अरोड़ा

सुधा अरोड़ा सुप्रसिद्ध कथाकार और विचारक हैं. सम्पर्क : 1702 , सॉलिटेअर , डेल्फी के सामने , हीरानंदानी गार्डेन्स , पवई , मुंबई – 400 076
फोन – 022 4005 7872 / 097574 94505 / 090043 87272.

( मन्नू भंडारी की ‘ एक कहानी यह भी’ की समीक्षा करते हुए प्रसिद्ध आलोचक मैनेजर पांडे का एक आलोचनात्मक लेख मार्च २०१० में हंस में छापा था . उसी आलेख के सन्दर्भ में आलोचना की पुरुष दृष्टि की पड़ताल कर रही हैं , सुधा अरोड़ा . यह आलेख में हंस में २०१० में ही प्रकाशित हुआ था .)

‘‘ साहित्य समाज का दर्पण है ’’ उक्ति घिस घिस कर पुरानी हो गई , पर साहित्य का समाजशास्त्रीय विश्लेषण  आज भी साहित्य का एक अनिवार्य हिस्सा नहीं बन पाया । साहित्य और समाजविज्ञान के बीच की इस खाई ने साहित्य और साहित्यिक समीक्षाओं को शद्ध कलावादी बना दिया और समाजविज्ञान के मुद्दों को एक अलग शोध  का विषय  , जिसका साहित्य से कोई वास्ता नहीं ।

हिन्दी साहित्य में महिला रचनाकारों की आत्मकथाएं उंगलियों पर गिनी जा सकती हैं । पुरुषवर्ग अक्सर यह सवाल पूछता है कि लेखिकाएं अपनी आत्मकथाएं क्यों नहीं लिखतीं ? पर लिखी गयी आत्मकथाओं को इस या उस कारण से कठघरे में खड़ा करता रहता है।  हमारा भारतीय लेखक समाज काफी क्रूर और निर्मम है ।  बाहर बाहर से सहानुभूति जताता हुआ , यह एक लेखिका के पर कतरने को और उसके औरत होने के कारण जन्मे दुख , उसकी तकलीफ और उसकी व्यथा पर ठहाका लगाने की मंशा  रखता हुआ , शातिर अंदाज में मंद- मंद मुस्कुराता और व्यंग्यात्मक टिप्पणियां करता है ।

हंस के मार्च 2010 अंक में ‘‘ आत्मा का आईना ’’ आलेख में वरिष्ठ समीक्षक मैनेजर पांडे ने बेहद उदारमना होकर मन्नू जी की किताब ‘ एक कहानी यह भी ’ की एक बेहतरीन विश्लेषणात्मक समीक्षा की है , लेकिन अंत तक आते -आते उनकी आलोचकीय दृष्टि  पर पुरुषवादी सोच ने धावा बोल दिया है। उनका एक लंबा पैराग्राफ है जिसमें मीता के प्रति गहरी समानुभूति से उन्होंने एक टिप्पणी दी है । वे लिखते हैं –
‘‘ इस कहानी में एक पात्र और उससे जुड़ा प्रसंग ऐसा है जिस पर अगर मन्नू परानुभूति या समानुभूति के साथ सोचतीं और लिखतीं तो उनकी आत्मकथा असाधारण होती . वह पात्र है मीता, जो एक ओर राजेन्द्र यादव के बौद्धिक छल का शिकार हुई है तो दूसरी ओर मन्नू तथा राजेन्द्र के बीच तनाव और अलगाव का कारण भी है. मेरे सामने सवाल यह है कि क्या मीता के कुछ दुख-दर्द नहीं होंगे. अगर वे हैं तो उनकी चिंता किसी को नहीं है, न राजेन्द्र को और न मन्नू को. मन्नू तो एक स्त्री हैं और संवेदनशील  लेखिका भी . यही नहीं , वे स्वयं राजेंद्र  के छल से पीड़ित स्त्री हैं इसलिए उनसे यह उम्मीद की जा सकती है कि वे मीता की पीड़ा को एक समदुखिनी के दर्द को समझने और व्यक्त करने की कोशिश करतीं ,लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया . मीता तो लेखिका नहीं है फिर उसके दुख दर्द की कहानी कौन कहेगा ? लगता है कि दूसरी असंख्य स्त्रियों की तरह मीता की पीड़ा भी अनकही रह जाएगी . ’’ (हंस: मार्च 2010 – पृष्ठ -54 )

इस पैराग्राफ में प्रश्नकर्ता का भी बौद्धिक छल उजागर होता है । वह लेखिका से उस विश्लेष्ण  की मांग कर रहा है जो कृति का अभीष्ट है ही नहीं । हाल ही में मन्नू जी से एक पत्रकार ने साक्षात्कार लिया और हंसःमार्च में प्रकाशित इस आलेख ‘ आत्मा का आईना ‘ के अंतिम पैराग्राफ पर उनकी राय पूछी । मन्नू जी ने कहा – ‘‘ जब मीता ने राजेंद्र जी से सारे सम्बन्ध तोड़ लिए थे , उनके सारे पत्र भी लौटा दिए थे , तो जैसे ही उसे पता चला कि वह मुझसे शादी कर चुके हैं , दोबारा वह उनकी जिन्दगी में दाखिल हो गई । अगर उसकी जगह मैं होती और राजेंद्र किसी और से शादी कर रहे होते या कर चुके होते , तो मैं तो अपने को पूरी तरह उनसे काट लेती , उनकी जिंदगी में कोई दखल न देती और एक पत्नी का अधिकार छीन कर कभी अपना घर बसाने का सपना तो नहीं ही देखती । ’’ मन्नू जी की इस उक्ति से आप स्त्रियों की किस्मों के बीच एक स्पष्ट  विभाजक रेखा खींच सकते हैं । इस विभाजक रेखा के दूसरी ओर पड़ी स्त्रियों का दुख उनके अस्तित्व का नहीं , उनकी आकांक्षाओं ( आज  के संदर्भ में महत्वाकांक्षाओं ) का है, जिसमें प्रेम या भावना से पैदा होने वाली पीड़ा-व्यथा का कहीं नामो निशान नहीं है। अगर कुछ है तो वह तहस- नहस करने का एक त्रासजनित सुख है ।

सुप्रसिद्ध रचनाकार मन्नू भंडारी

समीक्षक ने बड़ी तकलीफ से लिखा है – ‘‘ मीता तो लेखिका नहीं है ,फिर उसके दुख दर्द की कहानी कौन कहेगा ? लगता है कि दूसरी असंख्य स्त्रियों की तरह मीता की पीड़ा भी अनकही रह जाएगी !’’ समीक्षक महोदय भूल गये कि ‘ अन्या से अनन्या ‘ की लेखिका प्रभा खेतान मीता ही हैं ! क्या उस ‘मीता’ की भरी पूरी आत्मकथा से मीताओं की तथाकथित अनकही पीड़ा की भरपाई नहीं हो गई ? मैनेजर पांडे जी को चाहिए कि जब -जब मीताओं की व्यथा कथा पढ़ना चाहें , इस आत्मकथा का आद्योपांत पाठन कर लें । मन्नू जी ने तो फिर भी मीता के कोण से कई कहानियां लिखीं – जिनमें ‘स्त्री सुबोधिनी’ , ‘एक बार और’ चर्चित भी हुईं क्योंकि उसकी स्थिति में कल्पना का पुट देकर कहानियां लिखना ही उनके लिए संभव था । मीता के वास्तविक जीवन की न तो मन्नू जी को जानकारी थी , न वे उसके निजी जीवन से वाकिफ होना चाहती थीं तो वे आत्मकथा जैसी विधा में उसका क्या बयान करतीं – जो पूरी तरह सच और वास्तविकता पर आधारित होती है ।  जिस ‘व्यथा’ को हाईलाइट करने की बात हमारे वरिष्ठ  समीक्षक करते हैं , शायद वे यह नहीं जानते  कि यह मीता ‘तनाव’ का कारण जरूर थी ,पर ‘अलगाव’ का नहीं । मीता – चाहे वह जैसी भी हो – का एकवचन तो पत्नी स्वीकार करके जीवन के तीसेक साल गुजार देती है पर बहुवचन में ‘ मीताओं ’ को स्वीकार करना मुश्किल होता है ।

विडम्बना तो यह है कि इनमें से कुछ मीताओें के भी एक नहीं , कई मीत होते हैं । आज के समय में बहुवचन में ‘मीत’ पालने वाली इन ‘मीताओं’ का दुख दर्द कैसा ? अनकही पीड़ा का अर्थ क्या है ? यह अनकही पीड़ा-व्यथा किस किस्म के समीक्षकों को आलोड़ित करती है ? ऐसी मीताएं पुरुषों  के ‘‘बौद्धिक छल का शिकार ’’ नहीं होतीं , वे तो सबकुछ जानते -समझते एक पिता और पति के दायित्व से पुरुष  को डिगा कर उसका प्रेमी के रूप में खुद शिकार  करती हैं । इस शिकार  में उसे न सिर्फ विवाहित पुरुष  से प्रेम (!) करने का , बल्कि सिर्फ अपनी देह के तांडव के बूते पर एक समर्पित-समझदार-विदुषी  औरत को उसके अधिकार से अपदस्थ और उसकी ‘स्पेस’ से बेदखल करने का दोहरा सुख शामिल हो जाता है, जो उसे एक त्रासदी निर्मित करने का और संगति में विध्वंस करने का भी क्रूर त्रासजनित आनंद देता है । हमारे समीक्षकों के पास इन देहवादी ‘मीताओं’ को पहचानने की निगाह क्यों नहीं है ? समीक्षकीय दृष्टि  की सारी स्पष्टता  इस ‘मीता’ के संबंध पर आकर धुंधलके में क्यों बदल जाती है ?

 संभवतः इसका कारण यह है कि हिन्दी साहित्य मीताओं से अंटा पड़ा है । आज के अधिकांश  लेखकों- कवियों-समीक्षकों के जीवन में एक -एक मीता है । ये सब मीताओं वाले पुरुष  हैं – गांव में जिनकी बेपढ़ी बीवियां या शहर में जिनकी पढ़ी लिखी बीवियां उनके बच्चों को बगैर किसी गिले-शिकवे के पाल रही हैं, इसलिए अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़कर इन मीताओं के प्रति उनकी सहानुभूति का पलड़ा भारी है । हिन्दी साहित्य में पुरुष  रचनाकारों ने भी आत्मकथाएं लिखी हैं । क्या हमारे वरिष्ठ  समालोचक पुरुष – आत्मकथा लेखक से आग्रह करेंगे कि उनकी पत्नी का अगर कोई ‘मीत’ रहा है तो उस समदुखी ‘मीत’ की व्यथा कथा का वे संवेदनशीलता  से बयान करें ? आखिर संवेदनशीलता सिर्फ महिलाओं की बपौती तो नहीं है न !

मन्नू भंडारी , राजेन्द्र यादव और बेटी रचना

 प्रभा खेतान की ‘‘अन्या से अनन्या’’ की काफी चर्चा हुई क्योंकि खुलकर उन्होंने विवाहित पुरुष  से अपने प्रेम संबंध का खुलासा किया । राजेंद्र जी ने भी प्रभा खेतान से अपनी मित्रता को सात्र  और सिमोन के संबंधों के बरक्स रखा और एक साक्षात्कार में यह भी कहा – ‘‘ प्रभा खेतान मेरी बहुत इंटीमेट फ्रेंड रही  हैं ।’’ ( 23 लेखिकाएं और राजेंद्र यादव – पृष्ठ  85) । मुझे हैरानी तब होती है जब मैं देखती हूं कि प्रभा खेतान की आत्मकथा   ‘‘अन्या से अनन्या ’’ के बारे में प्रकाशित  तमाम समीक्षाओं में , एक भी आलोचक ने यह सवाल नहीं उठाया कि सहजीवन निभाने वाले जिन अपने प्रेमी डा  गोपालकृष्ण  सराफ के बारे में उन्होंने इतने विस्तार से लिखा है , वह संवेदनशील  लेखिका जरा अपनी समदुखिनी – पांच बच्चों की मां , डा सराफ की पत्नी की पीड़ा , यातना के बारे में भी कुछ लिखतीं कि पति को अन्या के पास जाते देखकर उन महिला पर क्या बीतती होगी ? कलकत्ता के तमाम साहित्यकार ‘जन्नत की हकीकत’ जानते हैं पर जाहिर है , हमें सिर्फ उतना ही दिखाई देगा और उतना ही समझ में आएगा , जो शब्दों में कह दिया गया है । उस आत्मकथा में बस इतना ही जिक्र है कि डा सराफ कहते हैं कि वह हर समय रोती रहती है , उसे तो रोने की आदत पड गयी है । ‘अन्याओं ’ से संबंध रखने वाले अधिकांश  लेखक-कवि- कलाकारों की बीवियों को रोने की आदत पड़ जाती है, जिससे बचने के लिए वे साइकिएट्रिस्ट के चक्कर लगाती हैं या एंटी डिप्रेसेंट दवाइयां खाती हैं । इनसे हमारे समीक्षक वर्ग का कोई सरोकार नहीं है क्योंकि एक रोने-कलपने वाली , चिड़चिडी , बुझी हुई पत्नी कमोबेश  सबके घरों में मौजूद है जो खुद तनाव और बीमारियों से ग्रस्त होते हुए भी , गैर जिम्मेदार पति को बख्शते  हुए बच्चों समेत परिवार के दोनों पहियों को अपने मजबूत (!) कंधों पर यथासंभव भरसक खींचती चली जाती हैं । इसी श्रेणी में आती हैं मन्नू जी । मन्नू जी की किताब एक कहानी यह भी – जिसके बारे में भूमिका में ही उन्होंने स्पष्ट  कर दिया है कि यह किताब चैदह साल में टुकड़ों टुकड़ों में लिखी गयी ।  यह उनके जीवन की लेखकीय यात्रा है , आत्मकथा नहीं है और उन्होंने अपने निजी जीवन के प्रसंग खोलकर नहीं लिखे , एक पूरक प्रसंग भी उन्होंने एक संपादक के दबाव के तहत ही लिखा वरना वह उतना भी नहीं लिख पातीं , फिर भी समीक्षक ढिठाई से कहे चले जा रहे हैं कि मीता के बारे में वे परानुभूति या समानुभूति के साथ सोचतीं और लिखतीं तो उनकी आत्मकथा असाधारण होती ।…….

आज भारतीय समाज और जीवन में ही नहीं , साहित्य में भी मूल्य बदल रहे हैं । अनैतिकता हमें चैंकाती नहीं , आकर्षित  करती है । उसका बयान हमें रोमांचकारी लगता है । दूसरे तमाम मुद्दों को दरकिनार कर , हम ललक कर उस किताब को पढ़ना चाहते हैं । साहित्य का प्रकाशक  इस तथ्य से अच्छी तरह वाकिफ है । मैत्रेयी की आत्मकथा का फलैप मैटर देखें -‘‘ मैत्रेयी ने डा . सिद्धार्थ   और राजेंद्र यादव के साथ अपने संबंधों को लगभग आत्महंता बेबाकी के साथ स्वीकार किया है।’’ अंदर पूरी किताब का एक एक पन्ना पढ़ जाइए , आप उस ‘आत्महंता बेबाकी’ (!) को ढूंढते रह जाएंगे । इसके उत्तर में फरवरी 2009 के आउटलुक में राजेंद्र यादव की अपनी एक टिप्पणी पर्याप्त है -‘‘ मैत्रेयी ने मुझे कुछ जरुर जाना होगा पर लिखने में शायद वह भी चूक गई है । चूकने से ज्यादा कहना चाहिए कि वह छिपा गई है। वह जो इबारत में नहीं झांकता , पर पीछे से झांकता जरूर दिखता है। जाने उसने ऐसा क्यों किया ? ’’ ( आउटलुक: फरवरी 2009 – पृष्ठ – 75 )

आत्मकथा लेखन की सबसे बड़ी चुनौती है – अपने जीवन , बल्कि कहना चाहिए , अपनी व्यथा से , अपने झेले हुए से , एक दूरी बनाने की । आत्मकथा लेखन में सेल्फ सेंसरशिप  – स्व प्रतिबंध – अपना अंकुश सबसे पहले सबसे आड़े आता है । भारतीय समाज में परिवार एक बहुत महत्वपूर्ण इकाई है । अगर हम सच बोल रहे हैं तो हमारे अपने परिवार के या करीबी लोग नाराज हो सकते हैं। तो मेरा मानना यह है कि इस तरह के प्रतिबंधों के बीच आत्मकथा नहीं लिखी जानी चाहिए । एक ईमानदार आत्मकथा तभी लिखी जा सकती है, जब आप यह मानकर चलें कि आपके पास खोने के लिए कुछ नहीं बचा , सिवाय उन जंजीरों के जो समाज ने हमारे इर्द -गिर्द जकड़ रखी हैं ।   वास्तविकता यह है कि एक औरत का अपनी आत्मकथा लिखना स्त्री सशक्तीकरण की ओर बढ़ता पहला चरण है । ईमानदारी इसकी पहली शर्त है । अपने जीवन को और अपनी कलम को महिमामंडित करने या अपने गुनाहों पर परदा डालने के लिए लेखकीय बुनावट के साथ शब्दों से खेलना , भाषा  की कशीदाकारी करना और कला के कीमखाबी लिहाफ में अपनी करतूतों को सजा- धजाकर प्रस्तुत करना आत्मकथा की विधा के मकसद को ही डिफ्यूज करना है ।

डा लाल रत्नाकर की पेंटिंग

हिन्दी में जिन महिला रचनाकारों की आत्मकथाएं आई हैं – उनमें से सच पूछें तो आत्मकथा के मूलभूत सरोकार और ईमानदारी ही गायब है । अपने जीवन और लेखन को महिमामंडित करना या अपने किए को अपने नजरिए से जायज ठहराना आत्मकथा लिखना नहीं होता । मन्नू भंडारी में ईमानदारी कूट कूट कर भरी है पर उनकी   आत्मकथा तो आत्मकथा है ही नहीं । वह सचमुच उनके लेखकीय संस्मरण हैं जिसे प्रकाशक आत्मकथा नाम से बेच रहे हैं  क्योंकि आत्मकथा एक सेलेबल विधा है ।

अंत में कुछ जरूरी बातें — 

सबसे पहले मन्नू जी की इस पुस्तक ‘एक कहानी यह भी ’ को पढ़ते हुए यह स्पष्ट कर लिया जाना चाहिए कि यह पुस्तक दाम्पत्य के दैनंदिन के छलावों में मरती खपती एक ईर्ष्यालू  स्त्री का सियापा नहीं , बल्कि इसमें  एक स्त्री रचनाकार की बौद्धिक दृष्टि  और उस दृष्टि  का आलोक भी है ,जो एक ‘सामान्य‘ स्त्री का ‘रचनाकार’ स्त्री में कायांतरण करता है। दाम्पत्य के अलावा भी साहित्यिक और सामाजिक अंतर्विरोधों  के कई मुद्दों को रचनात्मकता के पार्श्व  में रखकर देखने की इस पुस्तक में वस्तुगत और निरपेक्ष कोशिश  है । यहां स्त्री के किसी गोपन जगत को खोलकर लोलुप पाठकीय उपभोग के लिए किया गया मुआयना नहीं है, बल्कि आत्मसजग भाषा  में एक स्त्री रचनाकार के परिवेश  की मार्मिक मीमांसा है । लेकिन इसका क्या किया जाए कि हिन्दी साहित्य में आलोचना क्षेत्र के अधिपतियों की आस्वाद ग्रंथि में जादुई यथार्थ ( मैजिकल रिएलिज़्म ) के बदले आभासी यथार्थ ( वर्चुअल  रिएलिज़्म ) का चस्का लग गया है। यह एक दुखद स्थिति है कि वे महिला रचनाकारों की आत्मकथाओं में प्रेम के पुराने त्रिकोण के रोमांच का अतिरेक में आख्यान सुनने की अपेक्षा रखते हैं और ऐसी तमाम मीताओं की मर्मकथा सुनना चाहते हैं ,ताकि बौद्धिक लंपटई का साहित्यीकरण कर सकें । पुरुष  रचनाकारों की आत्मकथा में क्या उन्होंने किसी छूटे हुए प्रसंग या छूटे हुए पात्र को लाने की मांग कभी की जो लेखक की पत्नी का लंपट प्रेमी रहा हो ?

जहां तक संवेदनशीलता के साथ पीड़ा और दुख दर्द को व्यक्त करने का सवाल है तो वे तो क्रिमिनल्स – जघन्य अपराधियों – के भी हो सकते हैं तो इन मीताओं के क्यों नहीं ? मीताएं बहुत हैं और उनकी आबादी में उत्तरोत्तर इजाफ़ा हो रहा है क्योंकि साहित्य के बाजार का विचार उनकी रचनात्मकता का राजमार्ग बन रहा है । यह मुद्दा अलग है और इस पर विस्तार से फिर कभी लिखा जाएगा । अभी सिर्फ इतना ही कि आत्मकथात्मक रचना से उस ब्यौरे की अनावष्यक मांग बार बार क्यों की जाती है जो उस रचना का अभीश्ट है ही नहीं ?
( हंस से साभार )

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सोनिया गांधी का नागरिकता प्रसंग : पितृसत्ता का राग-विराग

संजीव चंदन

( २०१४ में टेनिस खिलाड़ी सानिया मिर्जा को तेलंगाना का ब्रांड अम्बेसडर बनाए जाने पर सांस्कृतिक राष्ट्रवादियों के द्वारा किये जा रहे हंगामे का सीन और उसके तर्क १० साल पहले २००४ में सोनिया गांधी की नागरिकता के सवाल पर हुए हंगामे की याद दिलाते हैं . यह आलेख २००५ में गोवा में आल इंडिया असोसिएशन फॉर वीमेन स्टडीज़ के कांफ्रेंस में प्रस्तुत किया गया था, यह एक बार फिर से प्रासंगिक हो गया है.  सोनिया गांधी इटली की बेटी थी , बहु भारत  की थी , तो उनकी नागरिकता और निष्ठा पर संदेह किया गया  . अब सानिया मिर्जा इस  देश की बेटी है और पड़ोसी देश की बहु ,तब भी उनकी  नागरिकता और निष्ठा पर संदेह है . पितृसत्तात्मक व्यवस्था में स्त्रियों का  न तो कोइ घर होता है , न देश !)

सोनिया गांधी के प्रधानमंत्री बनने की योग्यता-अयोग्यता के विवाद से जो निहितार्थ बनते हैं, उनका मूल संदर्भ भारतीय समाज की पितृसत्तात्मक सोच और समझ से है। सोनिया के सवाल पर कट्टर रुढि़वादियों से लेकर मध्यममार्गियों के पक्ष-विपक्ष की भाषा, तर्क, तर्कों की समझ पितृसत्तात्मक समाज की विचार-परम्परा से ही संचालित है। इस आलेख में सोनिया गांधी से जुड़े गहरे शास्त्रीय  राजनीतिक निष्कर्षों से विशेष सरोकार न रखकर इसके सामाजिक संदर्भों की ही पड़ताल की गयी है, जबकि भविष्य की राजनीतिक दशा-दिशा के सूत्र इन संदर्भों में सूत्रबद्ध भी हैं, क्योंकि पिछले कुछ दशक से जिस राजनीतिक विचारधारा ने भारतीय राजनीति में अपनी पकड़ मजबूत की है, वह परिवार और राष्ट्र की पितृसत्तापेक्षी भाषा में ही बात करती है तथा इसका पूर्वज संस्कार भारतीय नवजागरण के राष्ट्रवादी स्वरों से भी जा जुड़ता है।

सोनिया गांधी भारत के  पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के साथ : आत्मीय क्षण

सोनिया गांधी, जो कि इटली में पली-बढ़ी, भारत में एक राजनीतिक परिवार की बहू बनकर आयी, जिसके दो-दो सदस्य (पंडित जवाहरलाल नेहरू तथा श्रीमती इंदिरा गांधी) इस देश के प्रधानमंत्री बन चुके थे, तीसरे का  बनना तब शेष था। यह परिवार राजनीति की धूरि में था। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारतीय राजनीति का चक्का इसी धूरि के इर्द-गिर्द नाचता रहा। देश को इस विवाह पर कोई विशेष एतराज नहीं था बल्कि एक गर्व-भाव ही रहा होगा, जो अक्सर पितृसत्तात्मक समाज के वर-पक्ष को होता है, विजेता भाव एक भारतीय की गैर भारतीय नस्ल, वह भी गोरे  नस्ल ,की कन्या पर विजय। विदेशी कन्या, गोरे नस्ल की अंग्रेज कन्या पर विजय, आहत भारतीय मन को आत्मतुष्ट करता है, जिसके स्वाभिमान को उपनिवेशवादी गुलामी ने चोट पहुंचाई थी।

परिवार, समाज या राष्ट्र का भाव अथवा राष्ट्रवाद  मूलतः पुरुषवादी स्मृति, आहत पौरुष और पुरुषवादी आशा से उत्पन्न हुआ है। राष्ट्र अपना गौरव ‘स्त्री-छवि’ को निर्मित कर गढ़ता है और अपने अपमान का बदला शत्रु  राष्ट्र की स्त्रियों के अपमान से लेता है। पितृसत्तात्मक समाज में स्त्रियां परिवार, समाज और राष्ट्र की इज्जत का प्रतीक होती हैं, इसीलिए इतिहास गवाह है कि विजेता जातियां/ राष्ट्र विजितों की स्त्रियों पर बलात्कार कर उनका अपमान कर उनके मान-सम्मान का दलन करते हैं। भारतीय संदर्भ में ‘ब्रिटिश  -राष्ट्र’ पर किसी विजय की गुंजाइश नहीं होने के कारण हर वह अवसर जब भारतीय पुरुष विदेशी कन्या को विवाह लाता है, भारतीय मानस की आत्मतुष्टि का कारण बनता है।

ब्रिटिश उपनिवेश ने अपने आर्थिक प्रभावों के अतिरिक्त और ज्यादा समय तक असरकारी प्रभाव सांस्कृतिक स्तर पर डाले थे। गुलाम भारतीयों के लिए अंग्रेज स्त्रियां  आदर्श थीं, उनके रहन-सहन बोल-चाल के मद्देनजर सुधारवादी भारतीयों ने अपनी पत्नियों को भी सुशिक्षित गृहिणी बनाने के भरपूर प्रयास किए थे, परंतु आकर्षण की हदें गोरे चमड़े में बसी थीं, गोरी नस्ल में समाहित थीं। गोरों का यह आतंक आज भी है, इसलिए सोनिया गांधी का श्वेत नस्ल से होना भी एक विशेष स्थिति पैदा करता है। कैम्ब्रिज से एक व्यक्ति ने इंटरनेट पर एक सवाल छोड़ रखा है कि क्या सोनिया गांधी Mary Antonitee नाम से इटली मूल की होने के बजाय ‘अबेबी गांधी’ नाम से अफ्रीकन मूल की काली महिला होती तब भी क्या उसके प्रधानमंत्री  होने के प्रति आग्रह-दुरग्रह ऐसे ही होते। स्पष्ट है कि रंगीन भारतीयों के लिए काले नस्ल की विविधता श्रेष्ठता पूर्ण चुनौती नहीं देती है या आकर्षण पैदा नहीं करती है, स्पष्ट ही है कि सोनिया के प्रसंग में आहत राष्ट्रीयता और नस्ल-श्रेष्ठता के आधार पर भेद-भाव की दुहरी प्रवृत्ति है। यहां अफ्रीकी नामांकन में एक सचेत संदर्भ भी है। नाइजीरिया में अबेबी का अर्थ होता है ‘चाहा और पा लिया’ अर्थात् आसानी से प्राप्य। आसानी से प्राप्यता की गुंजाइश गोरे नस्ल की सोनिया गांधी के साथ नहीं बनती है,अर्थात् विजेता भाव की संभावना और भी प्रबल हो जाती है तथा आगे चलकर अतिरिक्त आग्रह को प्रेरित भी करती है।

सोनिया और राजीव का विवाह  साथ में राजीव गांधी की माँ और भारत की पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी

भारतीय विवाह-संस्था यद्यपि अंतरजातीय विवाहों को हतोत्साहित करती है, परंतु विवाह कोई समर्थ उच्च वर्गीय पुरुष कर रहा है, तो उसकी व्यवस्था भी करती है;
शुद्रैव भार्या शुद्रस्य सा चस्वा च विशः स्मृते
ते चस्वा चैव राजश्च ताश्व स्वा चाग्रजन्मनः।
यद्यपि स्वतंत्र भारत का आधुनिक संविधान कानून के समक्ष सबकी समानता की घोषणा करता है, परन्तु उच्चवर्गीय श्रेष्ठता का ऐतिहासिक श्रोत आज भी मनुस्मृति जैसे प्राचीन कानून-ग्रंथ हैं, जो आम भारतीय मानस को गहरे स्तर पर प्रभावित करते हैं, और खासकर जब सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का प्रयास राष्ट्रीयता को एक होमोजेनाइज्ड हिन्दू राष्ट्रीयता में समेटकर पेश करने का है तब इस प्रकार की मानसिक उर्वरता और भी उपयोगी सिद्ध होती है।

सोनिया के प्रसंग में भारतीय मानस का आह्लाद इसलिए भी चरम पर था कि गांधी-नेहरू परिवार, जिसे असंवैधानिक तौर पर परम्परा से भारत के प्रथम परिवार या राज-परिवार का दर्जा प्राप्त था, उसका उत्तराधिकारी उसे ब्याह कर लाया था, अर्थात् एक जातीय गौरव का सर्वोत्तम प्रसंग बनता था। समस्या तब उठ खड़ी हुई जब सोनिया का राजनीति में आना उसकी और कांग्रेस  की मजबूरी बनी तथा वह प्रधानमंत्री पद की प्रबल दावेदार बनती चली गयी। समस्या की हास्यास्पद गंभीरता तब तक बनी रही जब तक स्वयं उसने यह घोषणा नहीं कर दी कि प्रधानमंत्री का पद उसके लक्ष्यों में नहीं है। इस पूरे प्रकरण में पक्ष-विपक्ष की भाषा और समझ को समझा जाना चाहिए, जो अधिकांशतः राजनीति-प्रेरित हाते हुए भी एक पितृसत्तात्मक सामाजिक सच का प्रतिनिधित्व कर रही थी।

राष्ट्रवाद की अपनी मूल प्रवृत्ति के अनुरूप ही भारतीय राष्ट्रवाद ने स्वयं को परिवार की भाषा में ही अभिव्यक्त किया है और केन्द्र में रही स्त्री । भारत-देश की तस्वीर उभरते राष्ट्रवाद के दौरान शृंखलिता देश माता के रूप में बनायी गयी थी, जिसे विदेशियों के शृंखलाबंध से आजाद होना था। बंकिम चंद्र की शस्य-श्यामला भारत-भूमि अंग्रेजों के द्वारा बलात्कृत थी। इसी भाषा में भारत के प्रथम प्रधानमंत्री भी समस्या को संबोधित करते थे। भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन और उसके पूर्व सुधारवादी आंदोलनों में स्त्री  की मातृ छवि ही अधिक समादृत थी। जननी और जन्मभूमि, जिन्हें वाल्मीकि रामायण ‘स्वर्गादपि गरियसी’ बनाता एक दूसरे का प्रतिनिधित्व कर रहे थे। सुधार आंदोलनों में स्त्री शिक्षा का जो मूल उद्देश्य था वह रक्त-शुद्ध आर्य नस्ल के लिए सुशिक्षित माता और सुगृहिणी के निर्माण को ही लक्ष्य कर निर्मित था। एकमात्र फुले और उनके साथ दलित चिंतक स्त्री -शिक्षा को स्त्री -पुरुष समानता के लिए उपयोगी बता रहे थे अथवा 1848 में प्रथम महिला विद्यालय खोलकर एक क्रांतिकारी पहल ले रहे थे। पत्नी सावित्री बाई फुले समाज की लांछना सहकर भी अथवा अपने ऊपर पत्थर, गोबर के आक्रमण को झेलते हुए भी लड़कियों को पढ़ना अपनी प्राथमिकताओं में शामिल कर चुकी थीं। वैसे भी पुरुष सुधार आंदोलनों से अलग स्त्री -चिंतक, लेखिकाओं की चिंताओं में विवाह और मातृत्व प्राथमिक तौर पर शामिल नहीं थे। पंडित रमाबाई, ताराबाई शिंदे, एक अज्ञात हिन्दू महिला, स्त्री -मुक्ति के अन्य जरूरी मुद्दों पर ज्यादा जोर दे रही थी। परंतु बाद में भी राष्ट्रीय आंदोलन की सबसे बड़ी पार्टी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से ऐतिहासिक तौर पर विरादराना सिद्ध करने वाली कांग्रेस में सोनिया के प्रसंग में एक बार फिर स्त्री  का मातृ-रूप, पालक-रूप ही मुखर हो उठा।

जब सोनिया गांधी ने भारत का प्रधानमंत्री होने से इनकार कर दिया

मरती हुई कांग्रेस को जिलाने की  गुहार परिवार की विरासत बचाने में मां की भूमिका को निभाने के नाम पर कांग्रेस जन सोनिया से करते रहे। सोनिया के छवि-निर्माण की योजना बनाने वालों ने भी सुहागिन मां और फिर विधवा का ही आदर्श गढ़ा, जिसमें वह भारतीय परिवार में ब्याह कर आती है और फिर मां बनती है फिर विधवा, राष्ट्र के लिए शहीद पति का पत्नी के रूप में। शहादत और बलिदान देने वाली स्त्री -छवि को आसानी से आम भारतीय जन के बीच भुनाया जा सकता है। भारतीय सांस्कृतिक राष्ट्रबोध में जाति की शहादत के बाद जौहर करनेवाली स्त्री  (मुंडमाल, शिवपूजन सहाय) को विशेष आदर प्राप्त है। यहां जौहर य सती होना महिमामंडित तो नहीं हो सकता (सती प्रथा का महिमामंडल रूपकंवर कांड से ही कानूनन अवैध है) लेकिन पति और बच्चों का शहादत देने के लिए तैयार मामतामयी मां का महिमामंडन तो संभव ही है, भारतीय हिन्दू समाज से वोट प्राप्ति के लिए आवश्यक भी। अब 21वीं शताब्दी में राष्ट्रवाद का सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के रूप में मस्जिद भंजन नुमा विकास की स्थिति में भी भाषा वही रही, भय भी वही विदेशी पद दलन का। सोनिया गांधी के सवाल को भारतीय राष्ट्र के लिए खतरा निर्धारित किए जाने में राष्ट्रवाद की चिंताएं उपनिवेशकालीन चिंताओं से ही जा जुड़ती है, तभी जार्ज फर्नाडिज को दो घटनाएं एक जैसी ही दिखती हैं, ईस्ट इंडिया कंपनी के बहाने गोरों का राज्य या सोनिया के प्रधानमंत्रीत्व  के रास्ते विदेशी साम्राज्य।

भयदोहन के इस खेल में एक-से-बढ़कर एक ऐतिहासिक संदर्भों का इस्तेमाल किया गया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के साप्ताहिक ऑर्गनाइजर ने 6 जून 1999 के अंक में इसे इवेन्जलाइजेशन की संज्ञा दी तो उर्दू साप्ताहिक ‘हमारा कदम’ के मुख्य संपादक सोहैल ने सोनिया गांधी को ‘सोनिया डी गामा’ नाम से संज्ञेय किया। एस. गुरुमूर्ति ने ‘स्वदेशी जागरण मंच’ के 15 मई 99 के अंक में  लिखा , ‘ All that  nation has told Sonia in silent mode is : Madam, it is India now, not East India any more… The conviction that Sonia as Prime Minister of India will be a national shame cut across all parties including the Congress.’
यहां यह भी गौर किए जाने लायक है कि भारत की पुनः गुलामी का यह आतंक भारतीय राजनीति की तमाम वर्चस्वशाली विचारधारा तब बना रही है, जब उनके ही नेतृत्व में भूमंडलीकरण के रास्ते आर्थिक उपनिवेश की हकीकत सामने है, अथवा राष्ट्र राज्यों की सीमा को सैन्य-अतिक्रमण के द्वारा या सैन्य ताकत के बल पर उपनिवेश बनाना आवश्यक नहीं है, जब इंटरनेशनल कंपनियां या अन्तरराष्ट्रीय संस्थाएं सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक स्तर पर नये-नये उपनिवेशों को रौंदने में लगी हैं।

केन्द्र में स्त्री  है, विदेशी स्त्री ,जो भारतीय परिवार की बहू बनी है परंतु विदेशी होने के नाते वह मूल देश से ही जा जुड़ती है, उसके हित वहीं से जुड़ते हैं। इसीलिए वह ‘भारत-माता’ की पार्थिव प्रतिनिधि या मातृ-भाव की भौतिक छवि नहीं हो सकती। यहां मानदंड दोहरा अपनाया जा रहा है। भारतीय समाज में ‘बेटी’ ब्याह के बाद ससुराल के परिवार में जा मिलती है तथा उसके हित नए परिवार के हितों से जुड़ते हैं, उसकी अर्थी  ही बाहर निकलती है, वह नहीं। स्त्री  का अपना अस्तित्व पति और परिवार से ही निर्धारित होता है, उसमें ही निहित होता है। अनिच्छुक सोनिया को कांग्रेसी-जनों ने इसी तर्क से कांग्रेस की जिम्मेदारी संभालने के लिए मनाया तथा इसी तर्क से वे उसके प्रधानमंतरी  होने को भी गलत  नहीं मानते। किसी विदेशी पुरुष के भारतीय परिवार में विवाह के बाद क्या तर्क ऐसे ही बनते, यह भी विचारणीय है।

सुषमा स्वराज ने सोनिया गांधी के प्रधानमंत्री होने का यह कह कर विरोध किया था कि वे उनके प्रधानमंत्री बनने पर अपना सिर मुड़वा लेंगी

सोनिया गांधी भी पति-गृह की जिम्मेदारियों को संभालती हुई उत्तराधिकारी (राहुल गांधी) के संरक्षण और उसके इसी दिशा में विकास का बखूबी काम करती रहीं। ध्यात्व है कि पितृसत्तात्मक परिवार की परंपरा के अनुरूप राहुल गांधी को ही कांगे्रस का भावी नेता बनाया जा रहा है, जबकि उससे कम कुशल और अनुभवी प्रियंका गांधी सिद्ध नहीं हुई। पितृसत्ता पुरुष-रेखा (Male –lienage ) में ही पुनर्जीवित होती है।यहां जो और भी उल्लेखनीय है, वह सोनिया की संतान के प्रधानमंत्री बनने पर  किसी सवाल का स्वतः नहीं उठना। स्पष्ट है सोनिया भले ही विदेशी हो परंतु पितृसत्ता की व्याख्या में संतान विदेशी नहीं होगी, क्योंकि शास्त्रों की व्याख्या में स्त्रियां खेत (क्षेत्र)  मानी जाती हैं और फसल (संतान) ,उसकी जिसका बीज (वीर्य) हो। इस प्रकार सोनिया की संतान स्वतः ही खेत (सोनिया) के ख्यातनाम मालिकों नेहरू-गांधी परिवार की वंश-परंपरा का वाहक हो जाती है, भले ही प्राथमिकता पुरुष-सतान को दी जा रही हो।

पति-गृह या उसकी पार्टी की जिम्मेदारी का निर्वहन  पति की मृत्यु के बाद, भारतीय पितृसत्तात्मक परिवार के अनुरूप ही बनता है, जहां स्त्री  का जीवन पति के जीवन की ही प्रतिच्छाया बन जाती है तथा जिसकी पराकाष्ठा स्त्री  के ‘सतीत्व’ में अभिव्यक्त होती है। भारतीय पुरुष का मोक्ष ऊर्ध्वमूलीय  है, जगत से परे ब्रह्मचिंतन के माध्यम से और स्त्री  को मोक्ष मिलता है, देह के माध्यम से पति-सेवा के द्वारा। रूपकंवर  को लेकर परंपरा और अस्मिता के नाम पर उत्साहित होने वाली जमात को सानिया का भी राजीव गांधी के साथ सती होना शायद मर्यादित लगता, उसके स्वागत में पलक-पावड़े बिछाए जाते और सोनिया भारतीय परंपरा की एक आदर्श बहू के रूप में अमर बनायी जातीं। जो विदेश में जन्म लेकर भी, पल-बढ़कर भी ‘भारतीय-संस्कृति’ में संस्कारित हुईं। विदेशी स्त्री  का भारतीयकरण सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के लिए एक अलग और विशिष्ट रोमांच पैदा करता। यहां पति के जीवन-उद्देश्यों को ही अपना जीवन-उद्देश्य मानकर स्वयं को लगभग समाप्त कर जीने और सती हो जाने में कोई विशेष फर्क भी नहीं है। अर्थात् परिवार की जिस भाषा में पक्ष के प्रयास और तर्क बने, उसकी खतरनाक संगति परंपरावादी पितृसत्तात्मक समझ से ही बनती है, जो सोनिया के प्रधानमंत्री होने का विरोध कर रही है।

सोनिया के द्वारा प्रधानमंत्री का पद ठुकराए जाने पर विभिन्न टी.वी. चैनलों ने विमर्श आमंत्रित किए। एन.डी़ टी.वी. ने ‘क्या सोनिया के समक्ष सभी भारतीय नेता बौने हो गए’ सवाल पर बातचीत आयोजित की। समस्या तो इस विषय में ही है जो सोनिया (विदेशी) और अन्य नेताओं (भारतीय) का द्वैध बना रही है। बातचीत के दौरान जिस त्याग और तपस्या को लेकर राजनीतिज्ञ और चिंतक सोनिया के पक्ष में अपनी बात कर रहे थे, उसी त्याग और तपस्या की भूरि-भूरि प्रशंसा भारतीय जनता पार्टी के प्रतिनिधि-विचारक भी कर रहे थे, जिन्हें सोनिया गांधी का प्रधानमंत्री बनना सर्वाधिक संक्रामक प्रतीत हो रहा था। त्याग-तपस्या की जिस अवधारणा से सोनिया बड़ी बनायी जा रही थी वही त्याग-तपस्या और मातृत्व और मातृत्व की तथाकथित महानता, आदि स्त्रिायों को छद्म आदर पहले भी दिलवाते रहे हैं
कुपुत्रो जायेत क्वचिद्पिकुमाता न भवति (दुर्गा सप्तशती)
अहल्या और अनुसूइया की प्रशंसा की परंपरा इस देश में प्राचीनतम है। परंतु स्त्री  के स्वयं के कर्तापन का क्या? सोनिया की तमाम सक्रियता, सशक्तता के बावजूद यदि स्त्री  के रूप में सोनिया से कुछ छिना है तो उसका कर्तापन, क्योंकि  उसके कार्य पति गृह से नियंत्रित हैं और मानकर चला जा रहा है कि वह जो भी करेगी, शुभ ही करेगी।

सोनिया राय बरेली में , उन्होंने अपने नेतृत्व का लोहा मनवाया , विरोध करने वाले शरद पवार जैसे नेता भी बाद में उनका नेतृत्व स्वीकार करने को बाध्य हुए

यदि प्रधानमंत्री के सवाल पर सोनिया का पक्ष बनाना ही था तो उसे वैश्विक संदर्भ में बनाना चाहिए था, जिसको लेकर विश्व-ग्राम के पक्षधर आशान्वित दिखते हैं, तर्क गढ़ते हैं। ऐसा कहते हुए मैं स्पष्ट करना चाहता हूं कि वैश्वीकरण पूंजी  के जिस आतंक से संचालित है, यहां बात उसकी नहीं की जा रही है। पूंजी राष्ट्र राज्य की सीमाएं तोड़ती है, तो यह टूटन अपने साथ वैश्विक समता-समानता का कोई आदर्श लेकर नहीं आता बल्कि पूंजी  के क्षुद्र स्वार्थों के लिए एक छद्म ही गढ़ता है। यही कारण है कि पूंजी के स्वतंत्र आवागमन के साथ ही विभिन्न देशों में राष्ट्रवाद का कट्टर चरित्र भी उभरा है। इससे ही जोड़कर समझा जा सकता है कि जिस राजनीतिक जमात की सरकार विदेशी-निवेश के लिए बेचैन-प्रयासरत है ,वही जमात सोनिया के सवाल पर इतना अधिक संवेदनशील क्यों हो गया?

सोनिया के प्रसंग में स्त्रियो की नागरिकता के सवाल पर भी गौर किया जाना चाहिए। यद्यपि सोनिया गांधी ने 1983 में विधिवत भारतीय नागरिकता ग्रहण कर ली थी परंतु 1980 से ही उसका नाम वोटर लिस्ट में था, उन्हें  मतदाता का अधिकार प्राप्त था, अर्थात् उनकी नागरिकता पति की नागरिकता से पुष्ट हो रही थी। मनुस्मृतीय व्यवस्था में पति का घर ही स्त्री  का घर होता है। अन्यथा स्त्रियों का अपना कोई घर नहीं। भारत पाकिस्तान बंटवारे में किसी देश की संपत्ति, जमीन, मकान पर स्त्रियों का अधिकार नहीं था। उनकी नागरिकता धर्म से निर्धारित हो रही थी। विभाजन के बाद दोनों देशों की अपहृत महिलाओं की पुनर्वापसी अभियान में स्त्रियों की नागरिकता के संदर्भ में अपनी राय का कोई अधिकार नहीं था, जबकि दोनों राष्ट्र बनना इसी आधार पर तय हुआ था कि किसी भी राष्ट्र में रहने का चुनाव नागरिक की स्वेच्छा पर निर्भर करेगा। परंतु पुनर्वापसी में हिन्दू और सिख महिलाओं के लिए उनका घर भारत ही था और मुस्लिम महिलाओं का स्वाभाविक घर पाकिस्तान। धर्म किस प्रकार नागरिकता तय करती है अथवा किसी दूसरे राष्ट्र में, जहां किसी अन्य धर्म को नागरिकता की बहुलता है, एक धर्म दुर्राभसंधि की संभावनाएं पैदा करता है, इसका उदाहरण अशोक सिंघल के 12 जून 1999 में नागपुर में दिए गए भाषण में मिलता है, ‘सोनिया गांधी के छद्म वंश में पोप भारत पर शासन करना चाहता है।’

सांस्कृतिक राष्ट्रवाद तो धर्म के आधार पर नागरिकता को अपना व्यापक सरोकार भी घोषित करता है। भारतीय मुसलमानों के लिए हिन्दुवादी विचारधारा की स्पष्ट घोषणा है कि भारत में रहना होगा तो वंदेमातरम् कहना होगा, रामकृष्ण को अपना पुरखा मानना होगा और मुहम्मदी हिन्दू बनकर रहना होगा।
सोनिया स्वयं भी पोपुलर  राजनीति के मानस से संचालित अपने संबोधनों में भारत में अपनी नागरिकता के आधार पर स्वयं को प्रस्तुत नहीं करती हैं बल्कि भावनात्मक दोहन का प्रयास करती हैं, ‘मैं यही सुहागिन बनी फिर मां बनी और विधवा भी हुई।’ यानी पत्नी और मां के रूप में स्त्री  को प्रतिष्ठा देने वाली भारतीय पितृसत्तात्मक समाज को वे सुविधा ही मुहैया करा रही होती हैं।

इस पूरे प्रकरण में विवाद के तौर-तरीके भी पितृसत्ता की लम्पट भाषा के साथ ही शालीन तर्क के भीतर थे। स्त्री  के खिलाफ स्त्रियां खड़ी हुईं। सोनिया को सुषमा स्वराज और उमा भारती ललकार रही थी। एक विदेशी (सोनिया) के खिलाफ पिछड़ी जाति (उमा भारती) अखाड़े में उतरी,सब कुछ सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और पितृसत्ता के सपनों के अनुरूप ही था, मलेच्छ के खिलाफ पिछड़े – दलित भी सवर्ण हितों के साथ जा खड़ा होता है, हिन्दू हित के नाम पर और स्त्री  के खिलाफ स्त्रियां ही जाती हैं। इसी दौरान किसी तमिल पत्रिका ने सोनिया गांधी की एक विवादास्पद तस्वीर छापी-प्रयास ‘इज्जत-हरण’ का था, इज्जत सोनिया की, स्त्री की, और चूंकि वह परिवार की इज्जत है इसलिए कांग्रेस की। पक्ष के बौखलाए लोगों की चिंता भी इसी इज्जत की धारणा से संचालित थी क्योंकि सोनिया का अपमान संपूर्ण राष्ट्र का अपमान था, क्योंकि  वह इस राष्ट्र की बहू हो चुकी थी। है न पितृसत्ता की लम्पट भाषा और उसके शालीन तर्क!

फोटो प्रकरण का एक और खतरनाक निहितार्थ है। पुरुष-दर्शन के लिए निर्मित तस्वीर या स्त्रिायों के भीतर की पुरुष-दृष्टि (Male Gaze) की तुष्टि के लिए बनायी गयी तस्वीर दर्शकों/ पाठकों की एक मनोग्रंथि को संतुष्ट करती है, जिसे Voeurism कहते हैं, कामुक नग्नता/अश्लीलता को देखकर प्राप्त आनंद। सोनिया विदेशी है, उच्च वर्ग की लोकप्रिय महिला है, इसीलिए मनोग्रंथि के तमाम फण्टैसियों के लिए उपयुक्त पात्रा भी है, बाजार पाठकों/दशकों/क्रेताओं की हर कमजोरी और ताकत से रुपए बनाता है, फिर राजनीतिक कृपालुओं की कृपा भी पाना चाहता है।

१० सालों बाद वही नागरिकता विवाद , भावुक सानिया मिर्ज़ा

इस प्रकार के संवेदनशील मुद्दों पर बेवाक राय बनाने में सावधानी बरतने की आवश्यकता इसलिए है कि रुढि़वादी भी यदि आपके निष्कर्षों तक ही पहुंचते हैं या इन निष्कर्षों में उन्हें आंशिक समर्थन भी प्राप्त होता है, तो उनका गलत इस्तेमाल आसानी से किया जा सकता है। सोनिया गांधी को सिर्फ राजीव की विधवा होने के कारण प्रधानमंत्री नहीं होना चाहिए का निष्कर्ष इस स्थापना के साथ दिया जाए कि परिवारवाद का लोकतंत्र में कोई स्थान नहीं होना चाहिए  तथा बहू होने के नाम पर प्रधानमंत्री पद की दावेदारी का तर्क बनाना लोकतांत्रिक  समाज के लिए बाधा है, तो परंपरावादियों को ही बल मिल रहा होगा। इसके पूर्व भी शाहबानों प्रकरण में नारीवादियों की चिंताओं को हिन्दूवादी राजनीति के नेताओ ने भुनाया था तथा प्रकरण की आड़ में ही समान नागरिक संहिता की राय को अधिक मजबूती देने की कोशिश की थी। गड्डमड होने के इस खतरे के बावजूद स्त्रीवादी  दृष्टि तो इस प्रकरण पर बनायी ही जानी चाहिए।