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झाड़ू

सुशांत सुप्रिय


सुशांत सुप्रिय कथाकार, कवि और अनुवादक हैं. अब तक दो कथा-संग्रह ‘हत्यारे’ (२०१०) तथा ‘हे राम’ (२०१२) और एक काव्य-संग्रह ‘ एक बूँद यह भी ‘ ( 2014) प्रकाशित हो चुके हैं। अनुवाद की एक पुस्तक ‘ विश्व की श्रेष्ठ कहानियाँ ‘ प्रकाशनाधीन है ।संपर्क: 09868511282 / 08512070086

स्मृति की पपड़ी को मत कुरेदो ,
घावों से ख़ून निकल आएगा ।

एक दिन पत्नी ज़िद करने लगी — ” अपने पहले प्यार के बारे में बताइए न । आपके जीवन में मेरे आने से पहले कोई तो रही होगी । स्टूडेंट-लाइफ़ में आपने किसी से तो इश्क़ किया होगा । ”

मैंने मुस्करा कर उसे टालना चाहा ।लेकिन वह अड़ गई — ” आज तो आपको बताना ही होगा । मैं आपके बारे में सब कुछ जानना चाहती हूँ । देखिये, यह आपके जीवन में मेरे आने से पहले की बात है । मैं बिलकुल बुरा नहीं मानूँगी । मेरी ओर से निश्चिंत रहिए । बताइए न, प्लीज़ । ”

यह स्मृति की जमी हुई झील की सतह पर स्केटिंग करने जैसा था । ख़तरा यह था कि न जाने कहाँ बर्फ की सतह पतली रह गई हो । आपने वहाँ पैर रखा नहीं कि सतह चटख़ जाए  और आप उस झील में डूबने लग जाएँ ।

मैंने पत्नी को टालना चाहा ।पर वह नहीं मानी । हार कर मैंने जोख़िम उठाने का निश्चय किया ।

” आज मैं तुम्हें झाड़ू की कहानी सुनाऊँगा ।” मैंने कहा । मेरी स्मृति में कहीं एक सलोनी छवि अटकी थी । अधमिटे अक्षर-सी बची हुई थी कोई अब भी मेरी स्मृति के पन्ने पर । अस्फुट ध्वनि-सी बजती थी कोई अब भी मेरे ब्रह्मांड के निनाद में ।

 मैं झाड़ू की नहीं , आपके पहले प्यार की कहानी सुनना चाहती हूँ । ” पत्नी ने ज़रा खीझकर कहा ।

” सुन सकोगी? ” मैंने पूछा ।
” हाँ, मैं तैयार हूँ ।” जवाब आया ।
” मैं जब भी झाड़ू देखता  हँू , मुझे किसी की याद आ जाती है । ” मैंने कहा ।
” किसकी ?”
” उसकी जो कहती थी– यातनाओं के सैकड़ों-हज़ारों वर्ष ज़िंदा हैं झाड़ू में ।”
कुछ शब्द आपको फिर से पीछे ले जाते हैं । उस अतीत की ओर जो किसी मरी तितली-सी बंद पड़ी होती है बच्चे की किताब के किसी भूले हुए पन्ने में …

जब भी काम वाली बाई नहीं आती, मैं झाड़ू उठा कर सारा घर ख़ुद ही साफ़ कर देता । पत्नी रोकती भी — ” लाइए, मैं झाड़ू मार देती हूँ । आप क्यों तकलीफ़ कर रहे हैं? ” लेकिन मैं नहीं रुकता । हालाँकि बेटा यह देखकर नाक-भौं सिकोड़ता । वह काॅन्वेंट स्कूल में पढ़ता था । एक दिन वह कहने लगा– ” पापा, ये तो गंदा काम
है । मेड्स का काम है । वहाइ डु यू डू दिस डर्टी वर्क? ”

 तब मैंने उसे समझाया — ” बेटा, अपने घर का सारा काम ख़ुद करना आना चाहिए । कोई काम गंदा नहीं होता । अगर एक हफ़्ता मेड नहीं आएगी तो क्या तुम गंदगी में ही पड़े रहोगे? फिर जो काम पसीना बहा कर किया जाता है, जो काम मेहनत से किया जाता है , वह काम कभी डर्टी नहीं होता । “धीरे-धीरे बेटा भी यह बात समझ गया । अब कभी-कभी काम वाली बाई के नहीं आने पर वह भी घर में झाड़ू लगा देता है ।

” … पहेलियाँ मत बुझाइए । अब साफ़-साफ़ बताइए कि किसकी याद आ जाती है आपको झाड़ू देखकर ? ” पत्नी पूछ रही थी ।

 वह काॅलेज में मेरी सहपाठी थी । उसकी माँ लोगों के घरों में झाड़ू-पोंछा मारती थी । उस इलाक़े के एक मास्टर साहब ने उसे मुँहबोली बेटी बना कर पढ़ाया-लिखाया था । उसका नाम कुछ भी हो सकता था — धनिया, झुनिया … । लेकिन असल में उसका नाम कमला था । ” मैंने कहा ।

” तो आपको एक काम वाली बाई की बेटी से इश्क़ हो गया! ” पत्नी ने व्यंग्य से कहा ।
” क्यों? काम वाली बाई की बेटी इंसान नहीं होती ? उससे इश्क़ करना गुनाह है क्या ? ” मैं बोला ।
इस पर पत्नी चुप रही ।
मैंने फिर कहना शुरू किया — ” जितनी मेधावी छात्रा थी वह , उतना ही ख़ूबसूरत उसका व्यक्तित्व था ।”
” फिर क्या हुआ? आपने उसी से शादी क्यों नहीं कर ली ? ” पत्नी ने पूछा । उसके स्वर में थोड़ी जलन थी ।

” हालाँकि वह मेरे साथ पढ़ती थी , हँसती-बोलती थी , लेकिन उसके चेहरे पर उसका दर्द भरा इतिहास हमेशा ज़िंदा रहता था । हमारे बीच जातियों के जंजाल का बार्ब्ड-वायर फ़ेंस मौजूद था । मैं इस कँटीली तार के फ़ेंस को पार करना चाहता था । फ़ेंस के उस पार वह थी । फ़ेंस के इस पार मैं । ” कमला की माँ की झुग्गी जिस जे. जे. क्लस्टर में थी उस जगह को एक बिल्डर ने ख़रीद लिया था । बिल्डर के गुंडे झुग्गी वालों को वहाँ से खदेड़ने के लिए उन्हं  डरा-धमका रहे थे । हालाँकि कमला अपने मुँहबोले पिता मास्टरजी के घर रहती थी लेकिन वह हफ़्ते में एकाध बार अपनी माँ और भाई-बहनों से मिलने के लिए माँ की झुग्गी में ज़रूर जाती थी । ”

 ” कमला के पिता नहीं थे क्या ?” यह पत्नी की आवाज़ थी ।
 ” तुमने खैरलाँजी और मिर्चपुर की घटनाओं के बारे में पढ़ा-सुना है न । कमला के पिता अपने गाँव में उस ज़माने के खैरलाँजी-मिर्चपुर की बलि चढ़ गए । ऊँची जाति वालों के हमले में कमला के चाचा, ताऊ दादा वग़ैरह भी मारे गए थे । तब कमला की माँ किसी तरह जान बचा कर , कमला और उसके दो छोटे भाई-बहनों को लेकर इस शहर में भाग आई थी । ” मैंने कहा ।
” ओह ! ” पत्नी के मुँह से निकला । ” फिर क्या हुआ ? ”
” बिल्डर के गुंडे लगातार झुग्गी वालों को डरा-धमका रहे थे । स्थानीय राजनेता और माफ़िया भी बिल्डर से मिले हुए थे । एक रात कमला अपनी डरी-सहमी माँ और भाई-बहनों से मिलने गई । देर हो जाने की वजह से उस रात वह अपनी माँ की झुग्गी में ही रुक गई । वह रात उसकी अंतिम रात बन गई । ” बाहर पाशविक झुटपुटा ढह रहा था ।

” क्या? ” पत्नी को जैसे झटका लगा ।
” हाँ! बीच रात में बिल्डर के गुंडों ने पूरी झुग्गी बस्ती में जगह-जगह आग लगा दी । झुग्गी वाले नींद में ही जल कर मर गए । उनमें कमला , उसकी माँ और उसके भाई-बहन भी थे । ” मैंने कहा । मेरी आवाज़ रुँध गई थी । गले में कुछ फँस गया था । आँखें नम हो गई थीं ।

पत्नी ने मेरा हाथ पकड़कर मेरा सिर अपनी गोद में रख लिया । मुझ पर झुकते हुए उसने धीरे से पूछा — ” आप बहुत प्यार करते थे उससे ? ”

बाहर अब सलेटी अँधेरा चूरे-सा झरने लगा था । एक थरथराहट समूची शिला-सी बह रही थी मेरी धमनियों में । वह थरथराहट पत्नी के वक्ष में मुँह छिपाए थी ।
” बिल्डर के ख़िलाफ़ कार्रवाई नहीं हुई ? ” पत्नी ने पूछा ।
” उसकी एप्रोच ऊपर तक थी । उसके पास रुपया था । कांटैक्ट्स थे । इस घटना को शाॅर्ट-सर्किट की वजह से हुआ हादसा बता कर रफ़ा-दफ़ा कर दिया गया । कहा गया कि झुग्गी वालों ने पोल पर काँटे डाल कर बिजली के दर्जनों अवैध कनेक्शन ले रखे थे । उन्हीं में स्पार्किंग की वजह से यह दुर्घटना घटी । जानती हो , अब उस जगह पर क्या है ? ” मैंने पत्नी की गोद में से सिर उठा कर कहा ।
” क्या ?”
” वहाँ अब शहर का मशहूर अटलांटिक माॅल है जहाँ सभी मल्टी-नेशनल कम्पनियों की चमचमाती दुकानें हैं । शो-विंडोज़ में सजे-धजे मैनेक्विन्स हैं । एस्केलेटर्स हैं । शीशे वाली लिफ़्ट है । सारे चर्चित बहुराष्ट्रीय ब्रांड हैं । जहाँ रोज़ाना बाज़ार को ख़रीद कर घर ले आने के लिए अपार भीड़ जुटी होती है । वहीं जला कर मार डाली गई थी कमला , उसकी माँ, उसके भाई-बहन और उन जैसे दर्जनों बदक़िस्मत झुग्गी वाले । । ”
” अब आप उधर से गुज़रते हैं तो आपको कैसा लगता है? ”

 ” कहीं पढ़ा था — जगहें अपने-आप में कुछ नहीं होतीं । जगहों की अहमियत उन लोगों से होती है जो एक निश्चित काल-अवधि में वहाँ मौजूद होते हैं ।आपके जीवन में उपस्थित होते हैं । उसे भरा-पूरा बना रहे होते हैं । मैं जब-जब उस माॅल को देखता हूँ , मुझे कमला और दूसरे झुग्गीवालों की दर्दनाक मौत याद आती है । यह माॅल उनकी लाशों पर खड़ा है ।” मैंने कहा । एक पुराना दर्द जैसे ठण्ड के मौसम में फिर से उखड़ आया था ।

” एक बात पूछूँ ? क्या आपके कमला से अंतरंग सम्बन्ध थे? ” यह पत्नी थी । अपने अधिकार-क्षेत्र की सीमा पर मुस्तैद प्रहरी-सी …

और मुझे वह शाम याद आ गई जब काॅलेज के बाद कमला मेरे साथ मेरे किराए के मकान पर आ गई थी ।

सुबह मैं जल्दी-जल्दी काॅलेज के लिए भाग लिया था । सारा कमरा बेतरतीब पड़ा था । मेरा गीला तौलिया सिलवट भरी चादर वाले बिस्तर पर मुचड़ा पड़ा था । कुर्सी पर सुबह उतारे हुए जांघिया और बनियान पड़े हुए थे । ऐश-ट्रे बना दी गई एक कटोरी में ढेर सारी राख जमा थी और जल्दी में आधी पी कर बुझा दी गई एक सिगरेट भी वहीं पड़ी थी । कमरे में सुबह झाड़ू लगाना भूल गया था । फ़र्श गंदा था । मेज़ पर चाय की जूठी प्याली और एक तश्तरी पड़ी थी जिसमें सुबह हड़बड़ी में बनाकर खाए ब्रेड-आॅमलेट के कुछ टुकड़े भी बचे हुए थे । कोने में मकड़ी के जाले थे ।दीवार पर मधुबाला की पोस्टर थी जिस पर ग़र्द की एक परत कपड़े से साफ़ कर दिए जाने की प्रतीक्षा में बूढ़ी हो रही थी । तो यह था मेरा कमरा जहाँ कमला को बुलाने से पहले मैंने इस सब के बारे में सोचा ही नहीं था ।

मैंने जल्दी से कमरे की बेतरतीबी को कुछ ठीक किया । कमला कुछ सकुचाई-सी कुर्सी पर बैठ गई । पलंग के नीचे से झाड़ू निकाल कर मैं फ़र्श बुहारने लगा ।  और तब कमला ने कहा था — ” जानते हो प्रशांत, यातनाओं के सैकड़ों-हज़ारों वर्ष ज़िंदा हैं झाड़ू में ।” उसका आधा चेहरा रोशनी में , आधा अँधेरे में था । उसका कथन बिना प्रश्नवाचक चिह्न का एक सुलगता हुआ सवाल था जिसे अभी हल होना था । सदियों की पीड़ा जैसे उसके चेहरे पर जम गई थी ।

मैं झाड़ू बिस्तर के नीचे रख कर उसके पास चला आया था । कँटीली तारों के फ़ेंस के दूसरी तरफ़ । स्वेच्छा से    हौले से उसका हाथ पकड़ कर मैंने प्यार से कहा था — ” स्मृति की पपड़ी को मत कुरेदो । घावों से ख़ून निकल आएगा ।”

यह कह कर मैंने उसके चेहरे पर गिर आई बालों की लटों को पीछे हटा कर उसका माथा चूम लिया था ।कमला का खिंचा हुआ चेहरा मेरा स्पर्श पा कर धीरे-धीरे नर्म पड़ने लगा था ।फिर उसके चेहरे पर एक सलोनी मुस्कान आ गई थी जिसका मैं दीवाना था । हमारे भीतर इच्छाओं के निशाचर पंछी पंख फैलाने लगे थे । फिर कमरे की ट्यूब-लाइट बुझ गई थी और ज़ीरो वाट का बल्ब जल गया था । एक चाहत भरी फुसफुसाहट उभरी थी । फिर एक मादक हँसी गूँजी थी ।

खिड़की के बाहर एक सलेटी रात रोशनी के बचे-खुचे क़तरे बीन कर ले जा रही थी । लेकिन कमरे के भीतर हमारे अन्तर्मन रोशन थे ।

 धीरे-धीरे हवा कसाव से भर गई । दीवार पर दो छिपकलियाँ आलिंगन-बद्ध पड़ी थीं । मैं अपनी प्रिया के स्नेह-पाश में था ।जैसे सबसे ज़्यादा चमकता हुआ नक्षत्र मेरे आकाश में था । उसके भीतर से सम्मोहक ख़ुशबुएँ फूट रही थीं । ज़ीरो वाट के ताँबई उजाले में मांसल सुख अपने पैर फैला रहा था । मेरी धानी-परी मेरी बाँहों में थी । मेरी मरमेड मेरी निगाहों में थी । ऊपर गेंहुआ शंख-से उसके उत्सुक वक्ष थे जिनकी जामुनी गोलाइयों में अपार गुरुत्वाकर्षण था ।नीचे ठंडी सुराही-सी उसकी कमनीय कमर थी जहाँ पास ही महुआ के फूलों से भरा एक आदिम जंगल महक रहाथा । बीच समुद्र में भटकता जहाज़ एक हरे-भरे द्वीप पर पहुँच गया था ।

एक ऐसा समय होता है जब तन और मन के घाव भरने लगते हैं , जब सपने सच होने लगते हैं , जब सुख अपनी मुट्ठी में होता है और मुँदी आँखें फिर से नहीं खुलना चाहतीं । जब सारी चाहतें ख़ुशबूदार फूलों में बदल जाती हैं और जीभ पर शहद का स्वाद आ जाता है । वह एक ऐसा ही पल था — घनत्व में भारी किंतु फिर भी बेहद हल्का । समय का रथ एक उत्सव की राह पर से गुज़र रहा था ।

अब हम दोनों कँटीली तारों के फ़ेंस के एक ही ओर थे । मन में उजाला लिए । उस रात बिस्तर पर एक-दूसरे से लिपटे हुए हमने ढेर सारी बातें की थीं । सपने सँजोए थे । मुझे क्या पता था कि उन सपनों की तह में मौत थी । मुझे क्या पता था कि मैं फूटने से ठीक पहले एक पारदर्शी बुलबुले को देख रहा था । ठीक दो दिन बाद कमला अतीत बन गई थी ।  इतिहास बन गई थी । मेरी उड़ान का आकाश खो गया था…

 ” बताइए न , क्या आपके कमला से अंतरंग सम्बन्ध थे ? ” पत्नी दूरबीन ले कर मेरे अतीत की दिशा में दूर तक देखना चाह रही थी ।
मैंने अपने पैरों के नीचे स्मृति की जमी हुई झील की पतली परत को चटखते हुए महसूस किया । डूबने का ख़तरा मँडराने लगा था ।
जवाब में मैंने कुछ नहीं कहा । केवल पत्नी का माथा चूम लिया । मैं अपनी पत्नी से भी प्यार करता था । वह मेरे बच्चों की माँ थी ।
पता नहीं , पत्नी ने मेरी इस हरक़त का क्या अर्थ निकाला । शायद वह सब कुछ भाँप गई । स्त्री की छठी इंद्रिय सब जान जाती है । लेकिन वह इतनी बड़ी बात भी झेल गई । बहुत बड़ा कलेजा है उसका । मैं इसके लिए उसे सलाम करता हूँ ।

 इस घटना के बाद हमारे जीवन में केवल एक बदलाव आया । अब काम वाली बाई के नहीं आने पर जब कभी मैं पूरे घर में झाड़ू लगा रहा होता हूँ तो मेरी पत्नी मुझसे झाड़ू ले लेने का प्रयास नहीं करती है ।

महिला मताधिकार पर बहस : सन्दर्भ बिहार विधान परिषद ( १९२१ , १९२५, १९२९ )

डा मुसाफिर बैठा

डा मुसाफिर बैठा कवि और सामाजिक -सांस्कृतिक विषयों के चिन्तक हैं . सम्प्रति बिहार विधान परिषद् में कार्यरत हैं. संपर्क : 09835045947, musafirpatna@gmail.com

( बिहार विधान परिषद में महिला मताधिकार के प्रस्ताव तीन बार आये . १९२९ में महिला मताधिकार पारित करने वाला बिहार उन राज्यों में था , जो काफी हद तक इस अधिकार के खिलाफ  अड़ियल थे . १९२१ , १९२५ ,१९२९ में प्रस्ताव पर बहस में वे सारे पुरुषवादी विमर्श , कुतर्क और चालाकियां दिखते हैं , जो आज महिला आरक्षण बिल के सन्दर्भ में हमारे सामने हैं . अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद  और उसकी समीक्षात्मक प्रस्तुति कर रहे हैं डा. मुसाफिर बैठा .)

वाद-विवाद का यह भाग महिलाओं के मतदान के विषय में तीन मुद्दों पर बात करता है और यह उनके प्रतिनिधित्व के प्रश्न पर बहस का वृहतर हिस्सा बनता है.महिलाओं के शिक्षा, स्वास्थ्य-सुविधा से वंचित होने एवं बाल-विवाह की प्रथा से नकारात्मक रूप से प्रभावित होने के चलते बिहार की महिलाओं की स्थिति तत्कालीन पढ़े-लिखे बिहारी अभिजन वर्ग के लिए चिंतन का विषय थी. विगत शताब्दी के आरंभिक दशकों में, बंगाल तथा मद्रास एवं बॉम्बे प्रान्त के मुकाबले बिहार में महिलाओं की साक्षरता दर काफी कम थी. महिला साक्षरता के इस परिप्रेक्ष्य में बिहार के शिक्षित मध्यम वर्ग द्वारा विधान परिषद् एवं अन्य सार्वजनिक विमर्शों में बाल-विवाह पर रोक एवं महिलाओं के मताधिकार मिलने पर एक साथ जोर दिया जा रहा था.सन 1912में मोहन राय सेमिनरी में श्रीमती मधोलकर की अगुआई में आयोजित एक सभा में बाल-विवाह के अभिशाप को खत्म करने एवं महिलाओं के बीच शिक्षा का प्रसार करने के लिए कुछ जरूरी उपाय सुझाये गए.
बीसवीं शताब्दी के दूसरे दशक के आते-आते महिलाओं का मताधिकार विधान विषयक एक केन्द्रीय मुद्दा बन गया था. 22 नवंबर1921को बाबू देवकी प्रसाद सिन्हा ने सदन में महिला-मताधिकार पर एक विशेष संकल्प लाया. यह इस अर्थ में ‘विशेष’ था कि सदन द्वारा इसके पारित होने के बाद सरकार के लिए यह बाध्यकारी हो जाता कि वह इस सम्बन्ध में जरूरी कदम उठाये.अपने भाषण के केन्द्रीय बिंदु पर आने से पहले इस मुख्य वक्ता ने दो बातों पर जोर दिया. प्रथम कि महिलाओं के मताधिकार की मांग पर अन्य मंचों पर  बहस एवं विचार-विमर्श हुए हैं. उन्होंने 1918 के उस वाकये की भी हल्की चर्चा की कि कैसे बॉम्बे की कुछ नामचीन महिलाओं ने महिला-मताधिकार के प्रश्न पर बॉम्बे प्रांतीय सम्मलेन में प्रतिनिधित्व किया और सम्मेलन ने इसपर अपनी मुहर लगाई. उन्होंने सदन को यह भी बताया कि 1918 में ही भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस एवं ऑल इण्डिया मुस्लिम लीग दोनों ने इसी तरह के एक संकल्प को अपनी स्वीकृति दी थी. उन्होंने एक महिला संघ की कुछ महिलाओं के एक प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व करते हुए सरोजिनी नायडू के लन्दन दौरे का सन्दर्भ भी दिया जोमहिला-मताधिकार के मुद्दे पर समर्थन जुटाने के प्रयास में था. यह प्रयास फलीभूत भी हुआ. लन्दन की सदन (ब्रिटिश पार्लियामेंट) की संयुक्त समिति ने इस मुद्दे पर संज्ञान लिया.

अपने इस संकल्प में उन्होंने सदन के सदस्यों के उन पूर्वग्रहपूर्ण ‘भ्रांत धारणाओं’एवं ‘आशंकाओं’का भी संज्ञान लिया जो संकल्प के पारित होने के बाद के प्रभावों के बारे में थीं.पहला, सदन में लिंग की स्थिति में परिवर्तन का था जो अगले चुनाव के बाद विधान परिषद् में महिलाओं के बढ़ी संख्या में आने और बैठने के फलस्वरूप घटित होना था. दूसरे, ऐसी व्यवस्था लागूकरना सम्भव  होने पर ‘सामाजिक क्रांति’ घटित होती, क्योंकि तब महिलाएं अपनी नैसर्गिक/पुरुष निर्मित ‘घर की चहारदीवारी’ के अंदर ही सीमित नहीं रहती. तीसरे, यह भी महसूस किया गया कि चूँकि वे शिक्षा और उत्तरदायित्वों से वंचित हैं अतः वे गंभीर विमर्शों में हिस्सेदारी के योग्य नहीं हो सकतीं. चौथी धारणा यह रखी गयी कि महिलाओं को यदि निर्बाध मताधिकार दे दिया गया तो उन्हें पुरुषों के अनुपात से अधिक ही मताधिकार मिल जायेगा क्योंकि पुरुषों के मताधिकार पर कतिपय निर्बंध भी लगे हुए हैं.

महिलाओं के मताधिकार की आवश्यकता के कारणों में विस्तार से जाते हुए उन्होंने अनुभव किया कि  महिलाओं के बीच पर्दा प्रथा के रहने के चलते समाज में उनकी व्यापक भागीदारी में बाधा हुई. दूसरे, लेकिन, उनके अनुसार,अगर सरकार में समुचित इच्छाशक्ति होती तो इससमस्या से पार पाया जा सकता था. उन्होंने यह बात भी जोर देकर कही कि प्रान्त के बुद्धिजीवियों का एक बड़ा तबका महिलाओं को मताधिकार मिलते देखना चाहता है .तीसरे, वे मद्रास और बॉम्बे की महिलाओं का उदहारण रखकर बताते हैं कि जब उन्होंने चुनाव में सफलतापूर्वक भाग लिया है तो कोई कारण नहीं है कि बिहार में उनकी समानधर्मा वैसा न कर सके. महिलाओं द्वारा सरकार को टैक्स देने और फलतः मत देने का अधिकार रखने के अन्तःसम्बन्ध की भी चर्चा की. इसके बाद उन्होंने मातृत्व, बल कल्याण, स्वच्छता जैसे मुद्दों पर सदन में अपेक्षाकृत अधिक प्रभावी तरीके से अपनी बात रखने की महिलाओं की क्षमता का भी ध्यान कराया.अपने आप में यह भी रोचक था कि महिलाओं तक मताधिकार का विस्तार करते हुए मद्यपान निषेध की नीति को सफलतापूर्वक लागू करने के विषय को भी उससे नत्थी कर दिया गया. उन्होंने अमेरिकी राज्यों के उदहारण के हवाले से कहा कि जिन जिन प्रान्तों में महिलाओं को मताधिकार मिला वहाँ मद्यनिषेध लागू करने में सफलता मिली क्योंकि महिलाएं मद्यपान की बुराइयों को महसूस कर सकती थीं. और, इसी परिपेक्ष्य में उन्होंने आगे अपना पर्यवेक्षण रखते हुए कहा कि ‘जहाँ जहाँ महिलाओं ने मताधिकार पाया वहाँ वहाँ मद्यनिषेध तुरंत लागू होता गया’. फिर, उन्होंने महिला मताधिकार के समर्थन में कुछ मानवतावादी पहलुओं का जिक्र किया. उन्होंने उदाहरणों से अपने तर्क को समर्थित करते हुए कहा कि ‘राजनीति में महिला एवं पुरुष के बीच समानता एक जाना-माना सिद्धांत रहा है, लेकिन जब उन्हें वास्तवमें मताधिकार सौंपने का समय आता है तो हम इस कथन का सहारा लेते हैं- अभी तुम इस अधिकार को पाने योग्य नहीं हुए हो’. इस भेदभाव का सबसे बुरा पक्ष यह था कि वर्तमान मताधिकार नियमों के तहत महिलाओं को विदेशी, अल्पव्यस्क, पागल एवं बदमाश की श्रेणी में रखा गया था जिन्हें मतदान का अधिकार नहीं था.

बिहार विधान परिषद्

वाद-विवाद में हस्तक्षेप करते हुए राय बहादुर द्वारिकानाथ ने अपने युवा मित्र बाबू देवकी प्रसाद सिन्हा की उपर्युक्त बातों से अपनी सहमति जताई एवं उनकी भावप्रवण अपील की प्रशंसा की. उन्होंने अपनी त्वरित एवं सयानी टिप्पणी जड़ते हुए आगे कहा कि कोई भी युवा व्यक्ति इस तरह के परिवर्तनकारी संकल्प के लाये’ जानेपर गर्व महसूस कर सकता है. हालांकि लगे हाथ उन्होंने यह सुझाव भी दे डाला कि इस तरह के संवेदनशील मुद्दों पर हमें भावनाओं में न बहकर एक सतर्क रवैया अख्तियार करने की कोशिश करनी चाहिए.उनके अनुसार, ‘लिंगों की समानता’ एवं ‘बिना प्रतिनिधित्व के करअधिरोपन नहीं’ की संकल्पना वस्तुतः बहुत आकर्षक तो जरूर थी लेकिन, ‘प्रैक्टिकल पॉलिटिक्स’ के लिहाज से इनकी कुछ सीमाएं भी हैं. उन्होंने मशविरा दिया कि नगरपालिका के स्तर पर महिलाओं को मताधिकार प्रदान किया जा सकता है. और, इस प्रयोग के सफल होने पर परिषद् स्तर पर भी इसे विस्तारित किया जा सकता है.

मौलवी मलिक मुख्तार अहमद ने उक्त प्रस्ताव का का कुछ सतही एवं अगंभीर आधारों पर विरोध किया. उनका तर्क था कि पुरुषों एवं महिलाओं के बीच ‘कार्यों का बंटवारा’ सदियों से चला आ रहा है और उसी के अनुरूप महिलाओं को ‘गृह प्रशासन’ यानी घरेलू काम-काज की देखभाल का जिम्मा दिया गया है.महिलाओं के लिए घर की चहारदीवारी के अंदर रहना सर्वाधिक उपयुक्त है. दूसरी तरफ, राय बहादुर हरेन्द्र नारायण महाशय ने खुले ह्रदय से प्रस्ताव का समर्थन किया. उन्होंने बहस में हिस्सा लेते हुए कहा कि यद्यपि बंगाल में इसी तरह का एक प्रस्ताव अस्वीकृत हो गया था लेकिन बम्बई एवं मद्रास प्रान्तों के सम्मेलनों तथा भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के लगातार सत्रों में इस तरह के प्रस्ताव पारित किये गए हैं.

खान बहादुर ख्वाजा मुहम्मद नूर ने प्रस्ताव की मुखालफत इस आधार पर की कि बम्बई, मद्रास एवं बंगाल प्रान्तों के मुकाबले चूंकि बिहार में महिलाओं की साक्षरता दार काफी कम है अतः “उन्हीं स्थितियों एवं आधारों को लेकर पुरुषों की तरह महिलाओं को भी मताधिकार प्रदान करना व्यावहारिक नहीं होगा.”
बाबू उमेश चन्द्र बनर्जी ने भी प्रस्ताव का विरोध का विरोध किया और अपने निर्णय के औचित्य को आधार देते हुए कहा कि उन्होंने एक पुरानी अंग्रेजी कहावत का हवाला दिया जिसका आशय था कि ‘पहले योग्य बनो फिर पाने की इच्छा करो’. उन्होंने इस बात का भी ध्यान कि बिहार शैक्षिक दृष्टि से एक पिछड़ा राज्य है और ऐसे में बम्बई एवं मद्रास जैसे राज्यों के विकास से बराबरी की बात सोचना बैल के आगे गाड़ी को रखकर आगे बढने की बेतुका काम करने के समान है. प्रस्ताव का विरोध करने के क्रम में आये उनके कुछ तर्क तो अशोभनीय तक थे. जैसे, उन्होंने कहा कि ‘सच के प्रति महिलाओं में सम्मान-भाव कम ही होता है’ तथा ‘वे बहुत बातूनी होती हैं एवं गुप्त बातों व मंत्रणाओं को छुपा कर नहीं रख पातीं’. उन्होंने ‘स्त्री-बुद्धि प्रलयंकारी’ जैसी पुरानी कहावत का भी उद्धरण दिया.उनके अनुसार, महिलाओं के व्यवहार के ये नकारात्मक गुण उन्हें मताधिकार पाने के अयोग्य ठहराते हैं.

राय बहादुर पूर्णेंदु नारायण सिन्हा ने प्रस्ताव का भरपूर समर्थन किया. उनके तर्क सुगठित थे.उन्होंने तो प्रथमतः यह बात जोर देकर कही कि महिलाओं को मताधिकार से वंचित करना एक मनमानी निर्बंधता है और यह न तो ‘औचित्य के सिद्धांत और न ही नैसर्गिक न्याय’ पर आधारित है. उन्होंने यह भी कहा कि धार्मिक विधान भी पुरुषों एवं महिलाओं के समान अधिकार की हिमायत करते हैं. उन्होंने महिलाओं के पक्ष में यह भी जोड़ा कि ‘हम हिंदू अपनी नित-प्रति की प्रार्थनाओं में राम और सीता का नाम लेते लेते हुए सीता-राम कहते हैं, न कि राम-सीता.

मताधिकार का प्रयोग करती महिलायें

बाबू निरसू नारायण सिन्हा ने प्रस्ताव का विरोध अपनी इस भावना के आधार पर किया कि महिलाएं ‘जनाना’ के भीतर रहकर अधिक सुरक्षित रह सकती हैं. उन्होंने जोर दिया कि यह उनके निवास-स्थान में शामिल है. ‘जनाना’ महिलाओं की पवित्रता की रक्षा का स्थान है न कि कोई कोई जेल.वे आगे भी अपने विचार रखते हुए कहते हैं कि यद्यपि वे खुद पर्दा-प्रथा के विरोधी हैं और यह सच्चाई है कि यह प्रथा राज्य में महिला-मताधिकार लागु करने में एक बड़ी बाधा है. उनकी यह धारणा भी सामने आई कि वंश को चलाने के लिए महिलाओं को साथ लेना एक प्राथमिक शर्त है. यद्यपि वे इस बात पर सहमत दिखे कि भविष्य में महिलाओं को मताधिकार दिया जाए लेकिन वे इस बात पर अड़े मिले कि अभी इसका उपयुक्त समय नहीं आया है. उन्हीं के शब्दों में,”भविष्य में जब लोग यह मान लेंगे कि अब वक्त आ गया है कि तो वे यह कर सकेंगे. हमारी अभी की कोई बात अथवा कार्य भविष्य पर बाध्यकारी नहीं हो सकता. और, परिवर्तित स्थितियों में लोग अपनी मर्ज़ी से कुछ भी करने को स्वतंत्र होंगे. लेकिन आज हमें इस तथ्य पर विचार करने की जरूरत है कि क्या अभी का समय ऐसे प्रयोगों के लिए उपयुक्त है?” जाहिर है, प्रस्ताव के प्रति उनका विरोध बड़ा जोरदार था. उन्होंने काफी बल देकर अपना पक्ष रखा. उनके शब्दों में, “मैं प्रस्ताव के विरोध में हूँ क्योंकि इस मत का हँथ कि उन्नत संविधान वाले किसी यूरोपीय राष्ट्र ने इस व्यवस्था को नहीं अपनाया है. मैं इसलिए भी इसका विरोध करता हूँ कि इंग्लैण्ड तक में महिला-मताधिकार अपना तो लिया गया है पर यह अभी वहाँ भी शैशवावस्था में ही है. और, कौन जानता है कि आगे इसके विरुद्ध कोई मत बन जाए? मैं इस कर्ण भी इसका विरोधी हूँ कि अभी बिहार महिला मताधिकार अंगीकृत करने के लिए तैयार नहीं है क्योंकि अभी पुरुषों ने ही बिहार की प्रतिनिधित्व-प्रणाली को ठीक ढंग से नहीं आजमा पाया है. अतएव, मैं इस प्रस्ताव का पूरा विरोध करता हूँ और साथ ही, आशा करता हूँ कि इसे अपने समाज में लागूकरने की सहमति देने के पूर्व हमारे दोस्त बार-बार सोचेंगे क्योंकि इससे समाज में उथल-पुथल मचाने की प्रबल शक्ति है.

मिस्टर ह्विटले ने मताधिकार के प्रस्तावक-पैरोकार बाबू पूर्णेंदु नारायण सिन्हा एवं प्रस्ताव के प्रमुख विरोधी बाबू निरसू नारायण सिन्हा के वाद-विवाद में सम्मोहक-प्रभावोत्पादक एवं ओजपूर्ण वक्तव्यों के सन्दर्भ लिए. उन्होंने कहा कि जिस पर्दा-प्रथा को महिला मताधिकार के प्रभावी होने में एक बढ़ा के रूप में देखा गया है, वह बहुत दमदार और विचारयोग्य तर्क नहीं है. उन्होंने इस बात भी बल देकर कही कि एक तर्क यह दिया जा रहा है कि बंगाल की विधान परिषद् ने इसे अभी नहीं अपनाया है. पर मैं समझता हूँ कि बिहार के मामले में इसको मद्देनजर रखने की कोई आवश्यकता नहीं है. उन्होंने एक शानदार प्रतिप्रश्न से सदन के समक्ष इस बात का जवाब यों रखा-“बिहार ही क्यों नहीं बंगाल के लिए एक पूर्वोदाहरण के रूप में सामने आये? सदन यह कदम उठा सकती है जिससे यह सन्देश जाए कि महिलाओं के चरित्र एवं क्षमताओं पर हमलोगों को भरोसा है”.
पी.के. सेन ने तो भारत के साथ-साथ समस्त संसार में ही महिला मताधिकार की मांगों में अन्तःसूत्रता जोड़ने पर बल देते हुए कहा कि मताधिकार की यह प्रक्रिया पूरे विश्व में ‘उद्भव का उत्पाद’ है न कि किसी किसी क्रांति की.और, इस मुद्दे कोप्रथम विश्व युद्ध ने निश्चित रूप से सामने लाया. वे आगे चर्चा करते हैं कि ‘प्रतिनिधित्व’ की संकल्पना हमारे देश में भी स्वीकृत हो चली है, और, इस परिप्रेक्ष्य में उन्होंने स्पष्ट रूप से बताया कि इस पूरी बहस में वे (विरोधी) महिलाओं के प्रतिनिधित्व के अधिकार पर निषेध के पक्ष में एकी भी तथ्यपरक एवं तार्किक उदहारण नहीं जुटा सके. अपनी बातों का समाहार करते हुए उन्होंने कहा कि ‘यह एक गंभीर प्रश्न है और मुझे आशा एवं विश्वास है कि प्रस्ताव के परिणाम को निर्धारित करने में किसी पूर्वग्रह से काम नहीं लिया जाएगा तथा इसमें कोई पक्षपात नहीं बरता जाएगा, बल्कि महिलाओं को उनके यथोचित अधिकार दिलाए जाने के लिए तथ्य एवं न्याय से काम लिया जा सकेगा.डी.एन. मदन ने बहस में हस्तक्षेप करते हुए मजबूती से अपना पक्ष रखा, कहा कि, स्वराज के लिए महिलाओं का शिक्षा एवं मताधिकार का पाना जरूरी है. इसके अलावा उन्होंने जोश-औ-जोर से कहा कि इन सवालों को ‘बिलकुल नयाय-दृष्टि’ से देखा जाना चाहिए.

बाबू गणेश दत्त सिंह ने यह मत रखा कि प्रस्ताव में अभी वैचारिक कच्चापन झलक रहा है. अभी की स्थिति में अधिक जरूरी स्त्री मृत्य दर में कमी और स्त्री शिक्षा में प्रसार करना है. स्त्री-शिक्षा पर बात करने के क्रम में उन्होंने कहा कि “मैं कहूँगा कि आप उन्हें मताधिकार दिलाने की बजाये शिक्षा दिलाएं एवं तत्पश्चात, शिक्षा के परिणामस्वरूप मताधिकार उन्हें स्वतः मिल जाएगा”. प्रस्ताव पर विरोधी मत रखते हुए उन्होंने आगे कहा कि “तत्कालीन मतदान-प्रणाली के चलन एवं सामाजिक स्थितियों से प्राप्त अनुभवों के आलोक में इस मुद्दे पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए”. उन्होंने यह भी कहा कि महिला मताधिकार पर जिस तरह से सदन ने फोकस किया है उसी गंभीरता से सदन ने उन दमित जातियों पर ध्यान नहीं दिया जो मताधिकार सम्बंधित समूह का बड़ा हिस्सा हैं. उन्होंने मशविरा दिया कि महिला मताधिकार के विचार को सबसे पहले नगर निकायों एवं डिस्ट्रिक्ट बोर्डों में अजमाया जाए.

मधुसूदन दास ने वाद-विवाद में भाग लेते हुए जोर दिया कि नारी सभी दैवी एवं ईश्वरीय तत्वों को समावेशित करने वाली है, उसका जीवन बलिदान का दूसरा नाम है. उनके अनुसार, महिलाओं के वोट देने कि अयोग्यता ने राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया में बाधा पहुंचाई है, अतः इस परिपेक्ष्य में यह संगत होगा कि उनतक मताधिकार का विस्तार किया जाए. लेकिन बाबू अम्बिका प्रसाद उपाध्याय ने उनके इस प्रस्ताव को ‘अव्यवहारिक, अनावश्यक एवं नितांत अपरिपक्व करार दिया”. हालाँकि अपने विमत को वे संतुलित करने का प्रयास भी करते नजर आये, क्योंकि उन्होंने महिला मताधिकार की संकल्पना को सैद्धांतिक रूप से उचित माना. इसमें उनका तर्क था कि ‘प्रैक्टिकल-पॉलिटिक्स’के ख्याल से यह करना अभी संभव नहीं है. उनके अनुसार, मुट्ठीभर महिलाओं की मांग को प्रान्त की समस्त महिलाओं की प्रामाणिक आवाज नहीं माना जा सकता.
उधर, बाबू छोटे नारायण सिंह प्रस्ताव से सहमत दिखे. उन्होंने यह मत व्यक्त किया कि सभ्यता के विकास में हर व्यक्ति को अपना विकास करने का अधिकार है तथा महिलाओं कि नैसर्गिक मेधा को पुष्पित-पल्लवित करने के लिए मताधिकार एक प्राथमिक पूर्व शर्त की तरह है. मौलवी सैय्यद मुबारक अली ने प्रस्ताव को अस्वीकार करते हुए कहा कि महिलाओं को ब्रिटिश शासकों के संपर्क में नहीं आने देना चाहिए.कहा कि वे पर्दा के भीतर रहते हुए ही अपने गुणों एवं लाज को बचाए रख सकती हैं. हालांकि वे इस बात से इत्तिफाक रखते मिले कि स्वराज प्राप्ति के बाद महिला-मताधिकार को लागू किया जा सकता है.

महिलाओं का राजनीतिकरण : अधिकार लेने की पहल

बाबू श्याम नारायण शर्मा ने संक्षिप्त पर प्रभावी हस्तक्षेप करते हुए पूरे वाद-विवाद पर अपनी सार-टिप्पणी रखी. सर्वप्रथम उन्होंने यह निष्कर्ष रखा कि प्रस्ताव के समर्थक अपने विचारों के गंभीरी अथवा सार्थकता से सदन को आश्वत करने में सफल नहीं रहे हैं. न तो महिलाओं के बारे में आये संकीर्ण विचारों एवं पूर्वग्रहों को काटने में वे सफल हुए हैं और न ही बहस के विषय की गंभीरता को वे समझ सके हैं. उनके अनुसार, इतिहास का निर्णय महिलाओं के विरुद्ध है. उन्होंने आगे बताया कि पुरुषों की नजर में राजनीति से उनके बहिष्करण को नैसर्गिक माना जाता है और इसे महिलाओं पर पुरुषों का सामंती वर्चस्व एवं अन्याय में शुमार नहीं किया जाता. और, इस तरह, उन्होंने प्रस्ताव के विरोध में अपना मत दिया.बाबू देवकी प्रसाद सिन्हा, संकल्प के प्रस्तावक, अपने विचार पर अंत तक अडिग रहे. उन्होंने इस तथ्य को रेखांकित किया कि यहाँ तक कि मताधिकार से विरोध करने वाले भी इस बात पर सहमत हैं कि यह सिद्धांत सही है परन्तु वे सावधानी बरतने पर जोर देते हुए इस ख्याल के हैं कि महिलाओं को पहले शिक्षित हो जाना चाहिए. लेकिन उन्होंने यह भी ध्यान कराया कि जो महिला-शिक्षा को पूर्व शर्त के रूप में रखने की वकालत करने वाले लोग हैं स्वयं उन्होंने महिलाओं को शिक्षित करने कि दिशा न के बराबर काम किया है तथा शिक्षा पर फोकस किये जाने परजोर दिए जाने के मूल में प्रस्ताव को निष्क्रिय करने की एक चाल है. उन्होंने यह भी कहा कि “पहले शिक्षा” का तर्क अब गलित सिद्धांत में आता है. मैं नहीं समझता कि बीसवीं शताब्दी में किसी के हाथों में इस मताधिकार को नकारा भी जा सकता है.

महिला मताधिकार’ पर दूसरा संकल्प बिहार विधान परिषद् के 20 मार्च, 1925को डी.एम. मदन द्वारा लय गया. उन्होंने कहा कि ‘महिला मताधिकार’ के समर्थकों को इसके पक्ष में बात-बहस करने की कोई जरूरत नहीं है बल्कि समर्थन को निर्योग्यता की समाप्ति तथा जो वर्ग इस निर्योग्यता को महिलाओं पर थोपने के लिए सबसे पहले उत्तरदायी ठहराए जा सकते हैं उनके द्वारा एक स्वतंत्रतादायी युक्ति की ओर बढा एक कदम समझा जाए. प्रस्ताव के समर्थन में अपने तर्क रखते हुए उन्होंने अपने विचार सामान्य तौर पर व्यक्त किये. प्रथमतः उन्होंने इस तथ्य की ओर ध्यान आकृष्ट कराया कि चूँकि महिलाओं को संपत्ति एवं भूमि रखने का अधिकार प्राप्त है अतः उन्हें मताधिकार देने की गरज से भी पुरुषों के समान माना जाना चाहिए. उन्होंने यह भी कहा कि अगर महिलाएं बड़े जमीन-जायदाद को सुचारू रूप से सँभालने में सक्षम हैं और वे उनपर कर-अदायगी करने के काबिल हैं तो उन्हें मताधिकार नहीं सौंपने का कोई तर्क नहीं बनता, क्योंकि यह सर्वमान्य सिद्धांत है कि ‘अगर कोई कर-अदायगी के लिए जिम्मेवार है तो उसे प्रतिनिधित्व का अधिकार भी जरूर दिया जाना चाहिए. उन्होंने आगे कहा कि मतदाता सूची में महिलाओं को दर्ज कर लेने मात्र से यह अर्थ कतई ध्वनित नहीं हो जाता कि सभी महिलाएं अपने मताधिकार का प्रयोग करने को बाध्य ही हो जाएंगी. और अगर, अपने विविध सामाजिक पूवग्रहों एवं दकियानूस चालानों के चलते उनमें से अधिकतर अपने मत का उपयोग नहीं करना चाहतीं, तो अपेक्षाकृत कम जनसँख्या वाली इस महिला आबादी के मताधिकार को अतिक्रमित भी नहीं किया जाना चाहिए. उन्होंने एक अभूत ही संगत सवाल बहस में सहभाग करते विधायकों के समक्ष रखा कि “क्या आप सर्वथा उपयुक्त उस व्यक्ति को केवल इस आधार पर वोट देने के अधिकार से वंचित कर देंगे कि अभी बहुत से लोग वोट देने में रूचि नहीं रखते.

उन्होंने आगे सन 1921 के वाद-विवाद का सन्दर्भ दिया जिसमें यह कहा गया था कि बिहार और उड़ीसा में महिलाओं को मताधिकार सौंपने से पहले वे देश के विभिन्न हिस्सों में महिला मताधिकार के प्रभावों का आकलन करना चाहेंगे. इस परिपेक्ष्य में उन्होंने इंग्लैण्ड तथा अन्य भारतीय प्रान्तों से अनेक उदहारण दिए जिनमें पटना उच्च न्यायलय का ‘बार’ सीनेट एवं विभिन्न विश्वविद्यालयों के सिंडिकेट आदि पुरुष-वर्चस्व वाले संस्थाओं में महिलाओं को सम्मिलित किया गया है. उन्होंने कहा कि कहीं भी यह नहीं देखा गया है कि इन विशेषाधिकारों का कहीं गलत उपयोग अथवा दुरूपयोग हुआ है. उन्होंने पुनः दुहराया कि महिला मताधिकार न प्रदान कर विधायक बलात निर्योग्यता थोपने की कोशिश कर रहे हैं जबकि यह सब करने का कोई कारण नहीं रह गया है. बल्कि इसका प्रतिफल उस प्रांत विशेष के विकास को अवरुद्ध करने वाला है.
तीसरे, उन्होंने कहा कि महिलाओं को मताधिकार नहीं प्रदान करने में एक बहुत बड़े मानवतासमूह को सताना-दबाना हो जाता है.और,यह प्रांत के विकास की गति को कमतर करने वाला है. उन्होंने कहा कि ऐसे में यह समस्या उत्पन्न करेगा क्योंकि एक राष्ट्र के रूप में भारत को विकसित करने के प्राथमिक लक्ष्य की प्राप्ति हमारे विधायकोंको कभी नहीं हो सकेगी. इस लक्ष्य की प्राप्ति तभी हो सकेगी जब भारत के सभी प्रान्त इस दिशा में प्रयत्नशील होंगे.

चौथे, उन्होंने महिला मताधिकार के प्रायोगिक पहलुओं की विवेचना करते हुए कहा कि मैं यह नहीं कह रहा कि प्रान्त की समस्त वयस्क महिलाओं के नाम मतदाता सूची में दर्ज हो ही जाएँ बल्कि मैं इस विचार का हूँ कि एक ऐसी व्यवस्था हो जिसमें मताधिकार पाने की इच्छुक महिलाओं को अपना नाम दर्ज कराने का मौका मिले.उन्होंने आगे अपनी बात रखते हुए कहा कि इससे पहला काम यह होगा कि सरकार के संसाधन का अनावश्यक रिसाव रुकेगा, दूसरे, समाज में मताधिकार की वास्तविक मांग एवं इच्छा करने वालों का पता लग सकेगा. उन्होंने यह भी कहा कि इससे “शिक्षित नारियों, मेधावी एवं संस्कारी नारियों’ का सामने आना सुनिश्चित हो सकेगा. उन्होंने यह भी बताया कि इससे यह भी सुनिश्चित हो सकेगा कि वैसी महिलाएं (जैसे कि पर्दानशीं महिलाएं) जो इस मत-प्रणाली में भाग नहीं ले सकेंगी उन्हें मतदातासूची के तैयार होने की प्रक्रिया में किसी असुविधा का सामना नहीं करना पड़ेगा. उन्होंने यह भी जताया कि यद्यपि मैं सामाजिक मूल्यों एवं पूर्वग्रहपूर्ण प्रचलनों के प्रति अत्यंत सम्मान-भाव रखता हूँ पर एक समाज सुधारक के रूप में इन प्रचलनों को उन महिला-समूहों पर जबरदस्ती थोपने पर अपनी सहमती नहीं दूँगा. अतः मताधिकार के प्रयोग के मामले में सभी महिलाओं को खुद ही निर्णय करने का अधिकार दिया जाना चाहिए. इसके बाद उन्होंने इस बात की विवेचना की कि कोई सरकार उन लोगों से मिलकर ही बननी चाहिए जिनपर शासन किया जाना है, और, इस हिसाब से मताधिकार के प्रश्न पर महिलाओं को अपवाद में रखना सही नहीं हो सकता. उन्होंने बतलाया कि अन्य मामलों में भी शैक्षणिक स्थिति काफी निम्न है, और ऐसे में अगर महिलाओं को अपना प्रतिनिधि खुद चुनने दिया जाता है तो इनसे जुड़ी समस्याओं का हल निकालने में काफी मदद मिल सकती है. और, इसके बाद उन्होंने अंतत अपना अंतिम निष्कर्ष विधायकों को इस तरह से संबोधित करते हुए रखा, “क्या आप महिलाओं को वह समानता का अधिकार, खुद को अपने प्रतिनिधियों द्वारासुने  जाने का अधिकार, अपना काम खुद अपने हाथ से करने का अधिकार तथा स्वयं को शासित करने  के अधिकार देने से मना कर सकते हैं जिसपर उनका हक बनता है?”

बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री के साथ महिला विधायक

इस प्रस्ताव पर बाबू बिशुन प्रसाद ने अपना विरोधी मत रखा. उनका तर्क था कि पर्दा प्रथा के कारण मतदाता सूची तैयार करने वाले कर्मचारियों सेघरों के ‘जनाना’ के बीच संपर्क कराय जानाचूँकि संभव न होगा अतः ऐसी मतदाता सूची का तैयार किया जाना वस्तुतः संभव न होगा. इसी तरह उन्होंने कहा कि चूँकि प्रस्तावक बिहारी समाज से नहीं आते अतः उनके प्रस्ताव-विषयक उनके अधिकांश तर्क बिहार के सन्दर्भ में उपयोगी नहीं जंचते.और, अन्तः में उन्होंने यह दलील भी दी कि महिलाओं को मताधिकार सौंपने से पहले शिक्षित किये जाने की जरूरत है ताकि वे मताधिकार अमल में लाने के प्रभावों को समझने के काबिल बन सकें.

बी.ए. कॉलिंस ने भी प्रस्ताव के विरोध में अपनी बातें रखीं. उन्होंने कहा कि भारत और इंग्लैण्ड की यहाँ तुलना करना अनावश्यक प्रतीत होता है क्योंकि दोनों देशों की परिस्थितियाँ बिलकुल अलग-अलग हैं.उन्होंने बताया कि ब्रिटेन में तो पढ़ी-लिखी एकल जिंदगी जीने वाली महिलाओं की अच्छी-खासी संख्या है जो अपने जीविकोपार्जन के लिए काम करती हैं, वहाँ इस तरह के विधान उनकी जिंदगी को सीधे-सीधे प्रभावित करने में सक्षम हैं.लेकिन भारत में यह बात लागू नहीं होती क्योंकि यहाँ संयुक्त परिवार की परिपाटी में परिवार के पुरुष की कमाई पर महिलाएं आश्रित होती हैं और इसलिए ऐसे विधानों से महिलाओं को प्रत्यक्षतः कोई लाभ नहीं मिलने वाला.उनका यह भी कहाँ था कि यहाँ इस प्रांत में महिला-मताधिकार की वस्तुतः कोई मांग उठी भी नहीं है. जहाँ तक इंग्लैण्ड की बात है, तो वहाँ युद्ध के प्रभाव में महिला-मताधिकार को लागू किया गया जबकि अभी भारत में इस तरह की कोई बात है भी नहीं. अंत में उन्होंने महिला-मताधिकार को लागू किये जाने परसंभावित नकारात्मक प्रभावों की चर्चा करते हुए कहा कि चूँकि महिलाओं में अधिकतर अशिक्षित ही हैं अतः मत प्रयोग के सिद्धांतों की बहुत समझ नहीं हो सकती और ऐसे में राजनेताओं एवं उनके एजेंटों द्वारा उन्हें बहलाना, फुसलाना और भरमाया जाने का डर हमेशा बना रहेगा, और ऐसा होने पर लोकतंत्र और कमजोर हो जाएगा. अंत में, प्रस्ताव पर वोट कराए जाने के पूर्व बाबू राजीव रंजन प्रसाद ने भी प्रस्ताव का विरोध करते हुए अपनी बात रखी. उन्होंने कहा कि पुराने समय में महिलाओं को मताधिकार देने अथवा राज-काज चलने में उनको हिस्सेदारी सौंपने की कोई जरूर नहीं महसूस की गयी क्योंकि महिलाओं को पुरुषों का अभिन्न अंग ही माना जाता रहा है, और अब भी ऐसा ही है, अतः महिलाओं को अलग से मताधिकार देने की कोई आवश्यकता नहीं है.और, अपने तर्क के समर्थन में में उन्होंने भारतीय सन्दर्भ के ‘अर्द्धांगिनी’ शब्द  का हवाला दिया जिसको विवाहित स्त्रियों के लिए पति के आसंग में प्रयुक्त किया जाता हैऔर जिसका शाब्दिक अर्थ ‘आधा अंग’ होता है.

और, इसके पश्चात प्रस्ताव पर मतदान कराया जाता है जो अस्वीकृत हो जाता है.


तीसरी बार महिला-मताधिकार के अनुमादन के लिए बिहार विधान परिषद् में 06 फरवरी, 1929  को प्रस्ताव लाया जाता है.वाद-विवाद की शुरुआत करते हुए बाबू गोदावरी मिश्रने कहा कि इसी तरह के प्रस्ताव पूर्व में दो बार सदन में लाए जा चुके हैं. उन्होंने जोर देते हुए कहा कि ‘पुरुषों की दासता’ से उबार कर महिलाओं का सशक्तिकरण करने के प्रयास वाले अनेक आन्दोलन दुनिया भर में फ़ैल गए हैं और पुरुषों की तरह ही नारियां भी सार्वजनिक जीवन में दखल पाने के लिए कृतसंकल्पित हो रही हैं. उन्होंने आगे कहा कि राजनीति में महिला भागीदारी की अनुपस्थिति के चलते नीति निर्धारण में महिला हितों की अनदेखी हुई है जिसे राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया के एक महत्वपूर्ण तत्व में शामिल होना चाहिए था. उन्होंने बताया कि राजनीतिक हलके में महिलाओं की भागीदारी उनकी राजनीतिक समझदारी एवं नेतृत्व क्षमताको बढाएगा. उन्होंने बल देते हुए कहा कि इसी पृष्ठभूमि में बिहार और उड़ीसा प्रांत में महिलाओं को मताधिकार प्रदान किया जाना चाहिए.
प्रस्ताव के समर्थन में कृष्ण महापात्र पहले वक्ता थे. उन्होंने कहा कि प्राचीन काल में भारत में महिलाओं को बतौर राजनीतिज्ञ महत्वपूर्ण हैसियत प्राप्त थी लेकिन उनपर सामाजिक निर्योग्यताएं थोपे जाने के फलस्वरूप उनकी इस स्थिति में ह्रास आया है. उन्होंने बताया कि प्रांत में पर्दा विरोधी आंदोलन एवं अखिल भारतीय नारी सम्मलेन जैसे होने वाले आयोजन राज्य की महिलाओं के प्रगति-पथ पर अग्रसर होनेके सुबूत हैं.और, ऐसे संकल्पों के देश के अन्य हिस्सों में पारित होने को दृष्टिगत रखते हुए मैं इस पक्ष में हूँ कि यह प्रस्ताव बिहार विधान परिषद् में भी पास किया जाए.

शरत चंद्र राय ने भी इस प्रस्ताव का यह आधार लेते हुए स्वागत किया कि अब वह समय नहीं रहा कि महिलाओं को चुनावोंमें मतधिकार से वंचित रखा जाए.उन्होंने ‘दकियानूस मुस्लिम तुर्की’ एवं भारत के अन्य प्रान्तों द्वारा महिलाओं को मताधिकार दिए जाने के उदाहरणों को रखते हुए इस बात पर खास जोर दिया कि अगर यह नहीं होता है तो बिहार की छवि एक दकियानूस एवं पिछड़े प्रांत की बनेगी. लेकिन उन्होंनेयह भी कहा कि चूँकि संपत्ति धारण करने की सामान्य अर्हता अधिकांश महिलाओं में नहीं है अतः इसी अनुरूप अर्हता में भी बदलाव किया जाना चाहिए तथा इसमें न्यूनतम शैक्षिक अर्हता विषयक कोई परंतुक डाला जाना चाहिए. ब्रजनंदन दास ने भी प्रस्ताव का समर्थन किया और कहा कि महिलाओं को वोट देने का अधिकार प्रदान कर हम पुरातनपंथी समाज की जकड़नों से उन्हें मुक्त करने, उन्हें शिक्षित करने एवं एक सम्मानपूर्ण जीवन जीने की दिशा में उनके प्रयासों में उत्साहवर्द्धन कर सकेंगे.
केसरी प्रसाद सिंह संकल्प का समर्थन करते हुए इस मत के थे कि महिलाओं को मताधिकार से वंचित रखकर हम स्वराज नहीं प्राप्त कर सकते क्योंकि स्वराज के लक्ष्य की प्राप्ति में महिलाओं का साथ लिया जाना नितांत आवश्यक है. उन्होंने यह भी कहा कि यह पुरुषों के हित में है कि महिलाओं को जल्द से जल्द मताधिकार मुहैया किया जाए न कि हम इस बात का इंतज़ार करे कि अंग्रेजी आन्दोलन की तरह हमारी महिलाएं भी मताधिकार के लिए कोई आन्दोलन छेड़े.

लेकिन सर गणेश दत्त इस प्रस्ताव के पुरजोर विरोध मेंउतरे. उन्होंने सबसे पहले यह कहा कि चूँकि महिलाएं अभी शैक्षणिक दृष्टि से काफी निम्न स्तर पर हैं, राजनीति की वास्तविकताओं का उन्हें ज्ञान नहीं है और पर्दा प्रथा चल रही है अतः अभी वेवोट देने का अधिकार रखने के योग्य नहीं हैं. उन्होंने कहा कि केवल कुछ महिलाएं ही मताधिकार पाने की इच्छुक हैं और व्यापक मताधिकार पाने हेतु उन्हें पहले अपने आपको इस अधिकार पाने लायक बनाना चाहिए तथा इसके बाद ही उन्हें इसकी चाह करनी चाहिए. उन्होंने प्रस्ताव के सम्बन्ध में आने वाली कुछ प्रत्यक्ष कठिनाओं की ओर भी ध्यानाकर्षण कराया. मसलन, संपत्ति रखने के अधिकार विषयक बंधन के चलते बहुत कम ही महिलाएं मताधिकार की योग्यता पा रही थीं. दूसरे, पर्दा प्रथा के चलन के चलते पूरी मतदाता सूची तैयार करना संभव न था. और, उन्होंने यह भी तर्क रखाकि महिलाओं को वोट देने का अर्थ उन्हें राजनीति के लिए और अधिक समय खर्च करने का अवसर देना तथा अपने घरेलू दायित्वों को नज़रअंदाज़ का मौका देना होगा.

जी.ई. ओवेन ने संकल्प का पक्ष लिया. उन्होंने कहा कि यूँ तो महिलाओं को मताधिकार सौंपने मात्र से समग्र राजनीतिक परिदृश्य में कोई बड़ा परिवर्तन नहीं लाएगा पर यह महिलाओं के विकास, सामाजिक उत्थान एवं शिक्षा विषयक विधेयकों पर विचार-विमर्श पर जरूर सकारात्मक प्रभाव डालनेवाला साबित हो सकता है. उन्होंने यह भी कहा कि प्रान्त में महिलाओं को जकड़ रखने वाली पर्दा प्रथा एवं तमाम अन्य दुर्बलताओं का खात्मा भी इसके परिणामस्वरूप हो सकेगा.

द्वारिका नाथ, जिन्होंने इसी भाव के पिछले दो प्रस्तावों का विरोध किया था, इस बार पक्ष में बोले. उन्होंने कहा कि मैं पिछले दो मौकों पर प्रस्ताव के विरोध में रहा क्योंकि तब मुझे लगा था कि बिहार और उड़ीसा प्रान्त की महिलाएं आमतौर पर उतना विकसित एवं शिक्षित नहीं हो सकी हैं कि वे मताधिकार पा सकें, लेकिन राज्य में विभिन्न पर्दा प्रथा विरोधी आंदोलन एवं महिला सम्मेलनों को देखते हुए मुझे यह एहसास हो चला है कि अब हमारे प्रदेश की आम महिलाएं विकसनशील शील हैं और इसलिए मैंने महिला-मताधिकार के पक्ष में मत देने का फैसला लिया है. उन्होंने यह भी कहा कि इससे विधान परिषद की सदस्यता तक पाने और ऐसे तमाम अन्य राजनीतिक अधिकार लेने की उनकी योग्यता की परीक्षा भी हो सकेगी.

पिछले दो अवसरों पर सदन में आये इस तरह के प्रस्तावों का जिन निरसू नारायण सिन्हा ने विरोध किया था, इसबार वे भी संकल्प के पक्ष में उतरे. उन्होंने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि पूर्व के ऐसे अवसरों पर संकल्प के विरोध में मत डालने का मेरा कारण यह था कि मैंने देखा था कि अभी तो विकसित देशों में भी महिलाओं को यह मताधिकार प्राप्त नहीं है, लेकिन इस समय तक अधिकांश विकसित राष्ट्रों ने महिलाओं को वोट का अधिकार प्रदान कर दिया है और उन्होंने यह सिद्धांत स्वीकार कर लिया है कि महिलाओं को पुरुषों के सामान ही राजनीति में भाग लेने का स्वाभाविक अधिकार है तथा इन अधिकारों से उन्हें वंचित रखना पुरुषों का अन्याय है. उन्होंने महिलाओं को बौद्धिक रूप से पुरुषों की बराबरी में रखते हुए कहा कि अगर शैक्षिक योग्यता को अगर अनिवार्य किया जाता है तो भारतीय आबादी का एक काफी बड़ा हिस्सा राजनीति में भागीदारी करने के अधिकार से वंचित रह जायेगा, अतः साक्षरता दर के कम होने के बहाने से इस मताधिकार को सीमित नहीं किया जाना चाहिए. निम्न साक्षरता स्तर, पर्दा प्रथा, राजनीति का जमीनीज्ञान आदि की निर्योग्यताओं के आधार पर वोट के अधिकार को स्थगित करने के सर गणेश दत्त की हिमायत का विरोध करते हुए उन्होंने कहा कि इन निर्योग्यताओं की प्रकृतिचक्रानुगामी होती है क्योंकि ये निर्योग्यताएं आम महिलाओं के राजनीतिक अधिकारों की वंचना के आधार पर पलती हैं. उन्होंने एक वैधानिक स्थिति का हवाला दिया जिसके तहत महिलाओं एवं पागलों को वोट देने का अधिकार नहीं है. उन्होंने एक बेहद तर्कसमृद्ध सवाल प्रतिभागी पार्षदों के समक्ष रखा कि “क्या आप किसी नियम के तहत अपने घर की महिलाओं को पागलों के साथ रखते देखना पसंद करेंगे?” उन्होंने अपनी बातों का समाहार करते हुए कहा कि यदि यह प्रस्ताव महिला समुदाय के लिए विशेषतः एवं समग्रतः देश की प्रगति के उद्देश्य से लाया गया है तो पार्षदों को इस संकल्प के पक्ष में वोट करना चाहिए.

इस संकल्प का सैयद अब्दुल अज़ीज़ द्वारा विरोध किया गया. उनका कहना था कि महिलाओं को मताधिकार प्रदान करने का अभी उपयुक्त समय नहीं आया है क्योंकि महिलाओं को वोट का अधिकार दिए जाने से उनके विकास एवं उत्थान में पुरुष अपना समर्थन देने में उदासीनता बरतने लगेंगेऔर इससे इन आन्दोलनों को धक्का लगेगा. उन्होंने यह भी बताया कि बिना समुचित विकास किये महिलाओं को मताधिकार दिलाने पर उन्हें चुनावी धंधेबाजों द्वारा आसानी दिग्भ्रमित किये जाने एवं बहलाए-फुसलाये जाने की सम्भावना रहेगी. अतएव, उन्होंने निष्कर्ष रखा कि महिला-मताधिकार प्रदान करने का समय अभी नहीं आया है. और, इस प्रकार से संकल्प/प्रस्ताव पर वाद-विवाद/बहस पूरी हुई एवं यह 14 के मुकाबले 47 के बहुमत से पारित हुआ.
ऊपर विश्लेषित किये गए तीनों वाद-विवादों में पहला, जो 1921 में घटित हुआ, तर्क-वितर्क की विविधता, भावनाप्रण/ज़ज्बाती अपीलों, तीव्र राजनीतिक तथ्यबयानी के साथ साथरूढ़िवादीअभिव्यक्तियों के ख़याल से एक शानदार दस्तावेज़ है.हम महसूस करते हैं कि इन वाद-विवादों का प्रकाशन और पहले होना चाहिए था क्योंकि स्त्री-इतिहास का कोई छात्र अथवा स्त्री विषय पर काम करने वाला कोई सामाजिक कार्यकर्ताआरंभिक चरणों के महिला-मताधिकार के एजेंडे की सघनता को इन बहसों में उतरे बिना नहीं समझ सकता.यद्यपि कि 1921 में आया यह प्रस्ताव गिर गया था लेकिन दीवार पर इसके द्वारा लिखी गयी इबारत का सन्देश साफ़ था, कि इस विचार को अपनाने का समय आ गया था. इसे कुछ समय के लिए टाला तो जा सकता था पर इसकी अनिवार्यता को झुठलाया कतई नहीं जा सकता था. आगे हुए 1925 एवं 1929 के वाद-विवाद इसका विस्तार मात्र थे जिससे यह ध्वनित हो रहा था कि महिला-मताधिकार को सहमति देने वाले स्वरों की संख्या में उतरोत्तर बढ़ोतरी ही नहीं हो रही थी बल्कि यह अधिक सकारात्मक आकार ग्रहण कर रही थी.

वाद-विवाद में संकल्प/प्रस्ताव के पक्ष-विपक्ष में रहे प्रतिभागी पार्षदों के नाम :

वर्ष 1921
प्रस्ताव के पक्ष में                                        मत प्रस्ताव के विपक्ष में मत
(21 वोट)                                                                    (31 वोट)

वर्ष 1925

प्रस्ताव के पक्ष में मत                                                                प्रस्ताव के विपक्ष में मत
(18 वोट)                                                                                       (32 वोट)

वर्ष 1929


प्रस्ताव के पक्ष में मत                                                                प्रस्ताव के विपक्ष में मत
(47 वोट)                                                                                    (14 वोट)

(बहस की यह प्रस्तुति अरुण नारायण के अतिथि सम्पादन और नीलिमा सिंह के सम्पादन में प्रकाशित ‘ निरंजना ‘ में प्रकाशित हुई थी . )

इस दुनिया से परे आख़िर है क्या

प्रांजल धर

( सविता सिंह के कविता संग्रह ‘स्वप्न समय’ की समीक्षा प्रांजल धर के द्वारा  )

कविता का एक काम यह भी है कि हमें वह एक ऐसी दुनिया में ले जाए जो हमारे अपने अनुभव के दायरे से, चाहे जिस वज़ह से सही, ज़रा दूर ही छूट जाया करती है। परिवर्तन की तरह स्थिर शायद ही कुछ होता हो, और इसी बात के काव्यात्मक पहलू को पकड़ने वाला सविता सिंह का कविता संग्रह ‘स्वप्न समय’ हमें एक ऐसे लोक का चरम निदर्शन कराता है जहाँ हम होकर भी नहीं होते और न होकर भी हम कहीं न कहीं अवश्य होते हैं। समाज में स्त्रियों की दशा किसी से छिपी नहीं है लेकिन यह बात भी जगज़ाहिर ही है कि स्त्री-विमर्श के नाम पर अधिकतर कबाड़ ही हिन्दी जगत में ‘रचा’ जा रहा है। कुछ ही रचनाएँ ऐसी हैं जो लैंगिक भेदभावों और उनके मूल में निहित आधारिक संरचनाओं का सार्थक वर्णन-विश्लेषण करती हैं और लैंगिक न्याय के स्वतःसिद्ध औचित्य को वज़नदार तरीके से रखती हैं। सविता सिंह जेण्डर और सेक्स के फ़र्क के प्रति बेहद सजग हैं और किसी कालातीत अव्याख्येय को सधे हुए अक्षरों में पिरोने का शानदार जतन करती हैं। उनका यह कविता संग्रह ‘स्वप्न समय’ मानवता के विशाल फलक को सामान्य तौर पर और आधे आसमान को सिर पर उठाने वाली स्त्रियों को विशेष तौर पर अपनी कविताई के केन्द्र में रखता है। ‘अपने जैसा जीवन’ और ‘नींद थी और रात थी’ के बाद सविता सिंह का हिन्दी में यह तीसरा कविता संग्रह है और इसमें कुल इकसठ कविताएँ हैं।

पहले के दोनों संग्रहों में अपनाए गये काव्यात्मक उपकरणों का विकास सहज ही इस तीसरे संग्रह की कविताओं में दिखता है। एक ख़ास अर्थ में यह पहले के दोनों संग्रहों की अगली कड़ी और उनका आनुभविक विस्तार है क्योंकि इस संग्रह की कविताओं में सविता सिंह ने न सिर्फ़ स्वयं को दुहराया नहीं है, बल्कि अपनी इन नवीन कविताओं के माध्यम से पाठकों को एक नितान्त भिन्न साहित्यिक स्वाद से परिचित भी कराया है। तमाम ऐतिहासिक आख्यानों से लेकर वर्तमान फ़ेमिनिज़्म तक स्त्री हाशिये की और दोयम दर्ज़े की ही नागरिक रही है। और तो और, सभ्य कहे जाने वाले प्राचीन यूनान के सिटी-स्टेट्स तक में स्त्रियों को तो नागरिकता ही नहीं प्राप्त थी, दोयम नागरिकता की तो बात ही दूर है। सविता सिंह की कविताएँ बड़ी सूक्ष्मता से असन्तुलित राजनीति और बेढंगे समाज में बेहद गम्भीर राजनीतिक हस्तक्षेप करती हैं और नारीवाद के इस ज़रूरी दर्शन से वाकिफ़ हैं कि जो भी व्यक्तिगत है, वही राजनीतिक है। ‘रक्त प्रेम का’ एक ऐसी कविता है जो किसी हतदर्प स्त्री के पराजय बोध से नहीं उपजी है, बल्कि किसी भी आम स्त्री को घेरने वाली विसंगतियों, विडम्बनाओं और निहायत दैनंदिन व्यतिक्रमों से पैदा हुई है। यहाँ स्व का विस्तार है और ऐसा विस्तार है जिसके क्षितिज तक पहुँचने के लिए किसी भी स्त्री को अपने कोमल स्वप्नों पर लम्बे समय तक कठोर और गम्भीर प्रयास करने पड़ते हैं।

आज जब मात्र यौनिकता के सहज, उच्छृंखल और बेहद चलताऊ वर्णनों को ही स्त्री विमर्श का पर्याय मान लिया गया है, तब यह बात उल्लेखनीय है कि इस ख़ास विषय पर लिखने वाला कोई रचनाकार अपने रूपकों की सर्जना किस अनोखे तरीके से करता है। कविता का एक अंश देखिये, “चली गयी थी/ उन विधवाओं के पास/ जिन्हें संभोग वर्जित है/ जिनके रेशमी स्तनों पर/ नहीं पड़ता बाहर का कोई प्रकाश/ मैं लौट सकने की हालत में नहीं थी वर्षों/ मैंने काट लिए थे अपने हाथ/ जिनसे स्पर्श कर सकती उस हृदय का/ जिसमें मेरे लिए उद्दाम वासना थी।” पश्चिम की चाहे जितनी बड़ी नारीवादी महिला क्यों न हो, चाहे वह उत्कट नारीवादी मेरी डॉली ही क्यों न हो, वह ठेठ भारतीय परिस्थितियों को समझने में समर्थ नहीं है और सविता सिंह की कविताएँ हमें इस बात की व्याख्या देती हैं कि क्यों पश्चिमी दुनिया के अनेक सिद्धान्त हमारे यहाँ लागू नहीं हो पाते। यहाँ आकर सविता की कविताएँ वैचारिकी का एक ऐसा पुख़्ता धरातल रचती हैं, जो हमारे लिए दुर्लभ क्या, करीब-करीब अलभ्य ही है।

सविता सिंह

सविता की कविता जीवन के खुरदुरे यथार्थ के पोर-पोर का जीवन्त रूपायन करती है। कला की महीन समझ रखने वाले एक दक्ष शिल्पी की तरह कवयित्री अपनी रचना-प्रक्रिया के हरेक बिन्दु पर सजग रही हैं। यह सजगता ‘सपने और तितलियाँ’, ‘चाँद तीर और अनश्वर स्त्री’ और ‘स्वप्न के ये राग’ जैसी कुछ लम्बी कविताओं में ख़ास तौर से महसूस की जा सकती है। पर, इन लम्बी कविताओं के बारे में सबसे महत्वपूर्ण चीज़ क्या है? यह, कि इतने महीन मानसिक संसार में चलते हुए, जिसमें कि इस संग्रह की कवयित्री ने लगातार विचरण किया है, इतनी देर तक एकाग्रता से टिककर किसी भाव को लगभग असंदिग्ध अर्थों वाले चुनिन्दा शब्दों में बाँध ले जाना। और शायद इसीलिए ये कविताएँ अपने आकार में कुछ लम्बी हो गयीं हैं। संग्रह की एक कविता ‘तुम्हें लिखना’ इस दुनिया से और यहाँ के जाल-बवाल से पाठक को बहुत परे ले जाती है। पर, यह परे ले जाना पलायन हर्गिज नहीं है। और अपने गहनतम अर्थों में कविता है क्या ? उसे करना क्या चाहिए ? चाहे वह क्रान्तिगीतों से लबरेज कविताएँ हों या विश्व साहित्य की अन्य भावप्रवण कविताएँ, क्या यह सच नहीं है कि उन्होंने वर्तमान व्यवस्था की बुनियादी खोट को पुरअसर तरीके से उकेरा है ? ग़ौर से देखें तो सविता की कविता ‘तुम्हें लिखना’ अपने आप में ही एक कविता संग्रह है। यह हमें आधुनिक समय की जटिलताओं से जूझ रहे किसी पथिक के जीवन के उस अँधेरे कोने से दो-चार कराती है जहाँ जाने के बाद लौटना और भटकना एक जैसा ही हो जाता है, जहाँ डरना अतार्किक लगने लगता है क्योंकि डरने की चरम सीमा निडरता ही है। किसी ने शायद ठीक ही कहा है कि भय की चरम सीमा और कुछ नहीं, केवल आतंकवाद ही है। इसमें एक बारीक नज़रिये से सम्पन्न एक समर्थ कवयित्री की किंकर्तव्यविमूढ़ता है, “क्या लिखूँ यह देखने के बाद क्या कहूँ/ क्या करूँ कि अब लौटना और भटकना एक-सा हो/ खोना और मिल जाना एक/ तुम्हें लिखना इन्हीं को लिखना है/ प्रवेश करने जैसा उस अन्धकार में/ ले जाता है जो किसी अज्ञात प्रकाश की तरफ़।” पर इस किंकर्तव्यविमूढ़ता को अनिवार्य रूप से तथाकथित संकोच या हिचकिचाहट से अलग करके ही देखा जाना चाहिए। इस कविता में हरेक किस्म की अनभिज्ञता के ऐसे शव पसरे पड़े हैं जो अपनी मासूम मनुष्यता की छाप छोड़ना चाहते हैं, जिनके परिधान कठोर ज्ञान के उलझे तन्तुओं से बुने गये हैं।

सविता सिंह की कविताएँ कुछ हद तक रेडिकल हैं, पर अतार्किकता की उस सीमा तक नहीं कि मारिया रोजाइ, डाला कास्टा या सेलमा जेम्स की तरह घरेलू श्रम के लिए वेतन का प्रश्न उठाएँ, न ही इतनी ज़्यादा ठण्ढी हैं कि चुपचाप शोषण को सहन करते हुए घर-परिवार से नाना किस्म के तमगों को हासिल करती रहें। संकुचित अर्थों में कहें, तो यहाँ हमें ठेठ भारतीय मध्य मार्ग भी दिखता है जो सबके हित में ही अपना हित समझता है और यही तो साहित्य भी है शायद ! यहाँ एक कवयित्री की छोटी-छोटी नॉस्टैलजिक कामनाओं की व्याप्तियाँ हैं, तमाम बिसरी-भूली चीज़ों से जुड़ी आकांक्षाएँ हैं और आज के आपाधापी भरे जीवन की विडम्बनाएँ हैं : “आओ समा जाओ मुझमें हवा/ खेलो मुझसे/ देखूँ अपने चाँद, पहाड़, आकाश और चिड़िया/ सँभालना मुझको/ उमड़ी आती है भीतर सोन और गंडक नदियाँ/ अंग-प्रत्यंग टूटता है जाने क्यों/ बेमिल हो रही है चिरपरिचित भीतरी शालीनता/ उठती हैं लहरें ये कौन सी/ इतनी नयी।” कवयित्री यहाँ आधी दुनिया के उस कष्ट से भलीभाँति वाकिफ़ है जिसे जुडिथ मिलर ने ‘जेण्डर ट्रबल’ कहा है। इसी कष्ट का ही दुष्परिणाम है कि स्त्रियाँ चाहकर भी वह होना नहीं चाहतीं जो वे स्वयं तय करती हैं, बल्कि स्वयं अपनी ही मर्ज़ी के ख़िलाफ स्त्रियाँ वह होना चाहने लगती हैं जो होना उन्हें बताया, पढ़ाया या सिखाया जाता है। कहना चाहिए कि प्राथमिक समाजीकरण के दौरान ही ओढ़ा दिए गए उस लबादे को; जिसके कारण सिमोन ने कहा था कि स्त्री पैदा नहीं होती, बनाई जाती है; स्त्रियाँ शायद चाहकर भी उतार नहीं पातीं। इसीलिए जब वेशभूषा, परिधान और आचार-व्यवहार जैसी बाहरी चीज़ों से लेकर संसर्ग तक की भीतरी और अन्तरंग चीज़ों पर भी तरह-तरह की बन्दिशें लगाकर उन्हें नियन्त्रित करने का प्रयास किया जाता है तब स्त्री पुरुष से न सही, प्रकृति से ही संसर्ग-सुख प्राप्त करने की तरफ मुड़ती है। ‘ऐ हवा’ कविता इसी मोड़ का हृदयस्पर्शी दस्तावेज़ है।

स्त्रियों के अलावा हाशिये पर रहने वाले अन्य लोगों के प्रति भी कवयित्री सावधान और संवेदनापूर्ण हैं। अगर ‘शैटगे : जहाँ ज़िन्दगी रिसती जाती है’ नामक कविता में वे रेड-इण्डियंस और पश्चिम के आदिवासियों का ज़रूरी उल्लेख करती हैं तो सुदीप बनर्जी को समर्पित कविता ‘स्वप्न के ये राग’ भारत के आदिवासियों के ऐसे आवासों का प्रभावशाली रेखांकन करती है, जिन्हें सभ्यताओं के आत्मतोष के लिए ‘जंगल’ कह दिया जाता है और उनमें रहने वाले लोगों को ‘जंगली’। खाँचे में बाँधकर देखना मनुष्य का प्रायः स्वभाव ही है क्योंकि इसमें उसे सुविधा है। लेकिन सविता सिंह की कविताएँ इस सुविधावादी सोच से जबरदस्त मुठभेड़ करती हैं। एलीना के बहाने व्यष्टि के ज़रिये समष्टि को अपने दायरे में लेने वाली कविता ‘शैटगे : जहाँ ज़िन्दगी रिसती जाती है’ पाठकों को भीतर तक झकझोर देने में सक्षम है क्योंकि यहाँ आकर अमरता मरणशील नज़र आने लगती है और मुमुक्षु जन मुमूर्षा के शिकार-से दीखते हैं। ज़िन्दगी का दरकना यहाँ कई मायनों में मौज़ूद है।

गुलज़ार हुसैन का चित्रांकन

भारत जैसे तीसरी दुनिया के किसी देश की ही बात नहीं है, जिस एंग्लो-सैक्शन धुरी को शक्ति और सत्ता का केन्द्र माना जाता था, वह भी अब उतना शक्तिशाली नहीं रह गया है। समकालीन एकध्रुवीय विश्व-व्यवस्था में एक ग़ैर-यूरोपीय देश की ही तूती बोलती है और शक्ति के वैकल्पिक केन्द्रों की तलाश ज़ारी है। यह तलाश धुँधली अस्मिताओं की मुक्ति की आकुलता से भरी है। इसीलिए कभी यह आसियान, कभी सार्क यानी दक्षेस तो कभी यह यूरोपीय संघ के सत्ता समीकरणों से व्यक्त होती रहती है। फ्रांसिस फुकुयामा के इतिहास के अन्त और डैनियल बेल के विचारधाराओं के अन्त के इस अन्तवादी घोषणाओं के दौर में सविता की कविता अन्त की नहीं, नवीन प्रारम्भ और नयी सुबह की पहली वेला का व्यापक वितान रचती है। ये कविताएँ वहाँ तक जाती हैं जहाँ बिछड़ने की आशंका ज़ेहन में घर बनाने लगती है, जहाँ स्वप्न जागने लगते हैं, जहाँ एक नीला विस्तार है जिसका ज़्यादातर हिस्सा अज्ञात है। ज्ञात पर रुक जाना ज्ञान की दिशा नहीं है, जो ज्ञात हो जाता है उसे छोड़ना पड़ता है ताकि जो अज्ञात है वह ज्ञात हो सके। ये कवितायें इन्हीं अज्ञात या अल्पज्ञात इलाकों का संधान करती हैं और पाठकों को कोरी कल्पना की बजाय एक ऐसी दुनिया में ले जाती हैं जिसकी निर्मिति यथार्थ के थपेड़ों से हुई है।

संग्रह में प्रेम की गहन भावनाओं से परिपूरित अनेक कविताएँ हैं लेकिन ये वैसी प्रेम कविताएँ नहीं हैं जिनमें जब तक दो-चार बार प्रेम-प्रेम शब्द न आए तब तक हम मान ही न पाएँ कि यह भी भला कोई प्रेम कविता है ! यहाँ प्रेम कविताओं में सहज सौन्दर्य है, त्याग और परित्याग की भावनाओं की लम्बी-सपाट और दुर्गम सड़कें हैं, विसंगतियों का नया व्याकरण है, विडम्बनाओं से मुक्त एक प्रतिसंसार है : “जाओ अब तक वहीं पड़ा है वह चुम्बन/ जिसे छोड़ गयी थी लाल आँखों वाली चिड़िया/ उठा लाओ वह सफेद पंख/ जिसे गिरा गयी थी वह किसी और के लिए।” इसी और के लिए गिराए गए पंखों पर कितने ही लोग अपनी ज़िन्दगी और अपना घर-परिवार चला रहे हैं। जीवन में सर्वोत्तम कहाँ मिलता है किसी को ! शायद इसीलिए कहा भी जाता है कि हम बेस्ट नहीं, सेकेंड बेस्ट जैसी कुछ चीज़ों और लोगों से अपना जीवन संचालित करते हैं। ऐसे जीवन के द्वन्द्व इन कविताओं में बारम्बार उतरे हैं लेकिन ये द्वन्द्व अच्छे और बुरे के नहीं हैं, बल्कि उत्तम और सर्वोत्तम के हैं। पुनश्च, ये कविताएँ द्वन्द्वों में उलझकर ख़त्म या खर्च नहीं हो जातीं, बल्कि द्वन्द्वातीत मोहक जगत की कल्पना से हमें सराबोर करती हैं। यह इनकी प्रस्थापना है कि कोई भी यथार्थ फिर से नहीं आता, वह ख़ुद को दुहराता नहीं। उस तरह तो कतई नहीं जिस तरह नियतिवादी सिद्ध-अन्तों ने हम सबको बताया है।

ये कविताएँ एक दृष्टि देती हैं कि हम यथार्थ और स्वप्न के बीच के भावों का अहसास कर सकें, पल-पल उगती और पल-पल मिटती महत्वाकांक्षाओं की ऊँचाई और उनका भावात्मक आयतन माप सकें, गझिन होती कामनाओं के घनत्व को अपने हृदय में उतार सकें और अपने अस्तित्व के विचलन को अपने मनोमस्तिष्क में दर्ज़ कर सकें। ये कविताएँ बताती हैं कि औरत केवल रात नहीं है, महज़ रात की स्याही से उभारा गया एक जड़ रेखांकन नहीं है और वह केवल रात का स्वप्न भी नहीं है। किसी भी बात या विचार को व्यक्त करने की सविता सिंह की अपनी ही अनोखी शैली है और उनकी कविताओं में सदैव ऐसी कोई मर्मवेधी बात अवश्य मौज़ूद रहती है जिसका ज़िक्र उन्होंने अपनी कविता में किया ही नहीं होता है। उदासियों के महासमन्दर में गोते लगा-लगाकर खोजे गये ऐसे रत्न इन कविताओं में चमकते हैं जिनके बल पर कविता को रोशनी फैलाने वाली कोई ख़ास मार्गदर्शिका भी कहा जाता रहा है।

देश-देशान्तर से सम्बद्ध अन्तरभाषायी और अन्तर-अनुशासनिक समझ कवयित्री को एक नैसर्गिक शक्ति देती है जिससे वे जीवन की जटिलताओं में छिपे तथ्यों और घटनाओं को पहचानने में अनुपमेय कुशलता का परिचय देती हैं। कुछ यों कि इन इकसठ कविताओं में मानो जीवन के द्वन्द्व और घर्षण को समझने के इकसठ नए क्षेत्रों की खोज की गयी हो और उनके बारे में बिखरी-पसरी अनुभूतियों की तीव्रता को लिपिबद्ध किया गया हो। यहाँ हम स्वप्न की परतों को अनावृत होता हुआ पाते हैं, यहाँ कोई ग्रीवाविहीन शख़्स हार पहनता है और सुन्दरतम परिधान किसी अशरीरी देह की शोभा बढ़ाते हैं। यही तो इस कविताई का ढब है। चुकती-सी प्रतीत होती मनुष्यता की नई आवाज़ों में बचा हुआ धीरज हमें हमारी दुनिया के प्रति स्नेहपूरित ढाँढस बँधाता है। सच कहा जाए तो इन कविताओं के बारे में सबसे उल्लेखनीय बात यह है कि ये किस अप्रत्यक्ष तरीके से किस तरीके के प्रत्यक्ष और ज़रूरी सवालों को मुख्यधारा में खड़ा कर रही हैं। स्त्रियों का तो दरअसल यथार्थ ही इतना क्रूर और अमानवीय है कि रचनाकार को स्वप्न में जाना पड़ सकता है, जो कि यथार्थ की ही एक छाया और यथार्थ का ही एक बिम्ब है। कथ्य के स्तर पर तो ये बातें यहाँ लागू ही होती हैं, शिल्प के नज़रिये से भी देखें तो कविता की आन्तरिक लय, उनका आकार और वर्णनों का क्रम हमें इस दुनिया से भिन्न किसी चीज़ और इस यथार्थ से अलग किसी यथार्थ का अहसास कराते हैं। स्त्री-मुक्ति की कविता का जो सटीक शिल्प है, वह शायद जादुई यथार्थ से ही जुड़ता है और वह यहाँ मौज़ूद है। यहाँ एक चित्र पर दूसरा चित्र और एक बिम्ब पर दूसरा बिम्ब कुछ इस तरह गिरता है कि पाठक इस प्रक्षेपण पर भी कुछ सोचने को विवश हो जाता है। इस दुनिया से परे किसी जादुई जगत में ले जाने वाला यह संग्रह न सिर्फ़ पठनीय, बल्कि संग्रहणीय भी है।

समीक्ष्य कविता संग्रह – ‘स्वप्न समय ’
कवयित्री – सविता सिंह
प्रकाशक – राधाकृष्ण प्रकाशन प्राईवेट लिमिटेड, 7/31, अंसारी मार्ग, दरियागंज, नयी दिल्ली – 110002
संस्करण – प्रथम संस्करण 2013
मूल्य – दो सौ पचास रुपये

नगाड़े की तरह बजते है शब्द

डा सुनील जाधव

डा सुनील जाधव यशवंत कालेज नांदेड में हिन्दी पढ़ाते हैं . कवितायें और आलोचनात्मक आलेख लिखते हैं . संपर्क : मोबाईल : ०९४०५३८४६७२ , इ -मेल : suniljadhavheronu10@gmail.com

 ‘नगाड़े की तरह बजते हैं शब्द’  संथाल आदिवासी लेखिका निर्मला पुतुल जी का  पहला कविता संग्रह हैं | साहित्य जगत में प्रवेश करते ही इसने तहलका मचा दिया था | पहली बार जंगल के बाहर शहर में किसी आदिवासी स्त्री ने अपने अस्तित्व का नगाड़ा बजाया था | जिसकी अनुगूँज सम्पूर्ण साहित्य में आज भी अपनी सम्पूर्णता में सुनाई देती है | आदिवासी स्त्री एवं आदिवासियों की  वेदना, पीड़ा, दर्द, टीस , उपेक्षा, अपमान, घुटन-टूटन, विवशता, विपन्नता, बदहाली के साथ,….. अपने अस्तित्व  की खोज करने वाली स्त्री, सदियों से पुरुष व्यवस्था की चूभन को सहते-सहते…. उसके भीतर के आक्रांत स्त्री ,ने विद्रोह का बिगुल बजाते हुए पितृसत्ता  सत्ता को चुनोती दे डाली | निर्मला जी की कवितायेँ मात्र स्त्री के दर्द की अभिव्यक्ति  एवं पुरुष व्यवस्था का विरोध ही नहीं करती अपितु स्वयं के अस्तित्व  की तलाश करती आदिवासी स्त्री, आदिवासी जनजाति के प्रत्येक क्षेत्र में किये जानेवाले शोषण को भी सशक्त रूप में उघाड़ती है | शहर के ठेकेदार एवं समतावादी राजनेताओं द्वारा विपन्न निरीह आदिवासियों के भोलेपन का फायदा उठाकर उनका ‘’यूज़ एंड थ्रो’’ करना एक हकीकत है  |

निर्मला अपने कविता में जंगलोसे धडल्ले से गायब होते पेड़ों को बचाने का सन्देश भी देती हैं  | आदिवासियों के जीवन पद्धतियाँ-  नृत्य,गीत-संगीत, श्रद्धा-अंधश्रद्धा के साथ आदिवासी स्त्री-पुरुष, लड़का-लड़की, माता-पिता, भाई-बहन, कबीले का सरदार आदि भी उनकी कविताओं के विषय रहे हैं | उनकी कविता आदिवासी स्त्री को केवल भोग्य वस्तु की दृष्टी से देखनेवाले पुरुष- समाज पर आक्रोश प्रकट करते हुए आदिवासी लड़कियों को विभिन्न प्रकार से सावधान करती है | इतना ही नहीं मुखिया एवं जंगल के आदिवासी पुरूषों-भाईयों से आदिवासी लड़कियों की अस्मिता के पक्ष में लड़ने  का आग्रह भी करती है |


इस संग्रह को निम्नांकित बिन्दुओं में पढ़ा जा सकता है : 


१.स्व का अस्तित्व  तलाशती आदिवासी स्त्री
२.पुरुष  व्यवस्था के प्रति विद्रोह
३.आदिवासी स्त्री के दर्द एवं वेदना की अभिव्यक्ति
४.आदिवासी लड़की और विवाह :-
५.आदिवासी स्त्री सौन्दर्य, गीत संगीत और नृत्य
६.आदिवासियों को फटकार
७.सभ्य शहरी समाज पर व्यंग्य
८. मुक्ति की चाहत

१.स्व का अस्तित्व  तलाशती आदिवासी स्त्री :- 


निर्मला पुतुल की स्त्री अपने होने की, स्वंय के अस्तित्व  की तलाश करती नजर आती है | वह पुरुष प्रधान समाज में घर, परिवार, प्रेम, रिश्ते-नाते सम्बन्धों में अपने स्थान को ढूंडती है | वह सदियों से किसी न किसी पुरुष पर निर्भर रही ,या फिर उसे रहना पड़ा , या उसे वैसा रहने के लिए बाध्य किया गया | उसे पिता, भाई, पति, पुत्र के सहारे जीवन जीना पड़ा | वह एक ही साथ स्थापित और निर्वासित होती रही है | बचपन से लेकर विवाह तक माता-पिता के घर और विवाह के बाद पति का अनजाना घर ..| वह प्रत्येक एकांत समय महसूस करती रही कि ‘मैं कोन हूँ ? मेरा स्थान क्या है ? मेरा अस्तिव क्या है ? जिन्होंने मुझे जन्म से लेकर अट्ठारह वर्षों तक लाड-प्रेम, ममत्व दिया | जिस कारण लड़की अपने परिवार से बिछड़ने की कल्पना भी नहीं कर सकती | आचानक विवाह होने के उपरांत अनजाने घर में प्रत्येक स्थितियों में स्थापित करना पड़ता है | इसी दर्द ,पीड़ा, वेदना को पूरी संवेदना के साथ अपनी कविता में अभिव्यक्त करते हुए वह कहती है :

‘क्या तुम जानते हो
अपनी कल्पना में
किस तरह एक ही समय में
स्वंय को स्थापित और निर्वासित
करती है एक स्त्री ?’’ १

निर्मला जी की कविताओं में अभिव्यक्त स्त्री अस्तित्व हीनता से उत्पन्न पल-पल के प्रश्नों का शमन चाहती है |  वह सदियों से अपना घर, अपनी जमीन तलाशती रही | ‘’अपने घर की तलाश में ‘’ कविता में वह कहती है :
‘’ धरती के इस छोर से उस छोर तक
मुट्ठी भर सवाल लिए मैं
दौड़ती-हाँफती-भागती
तलाश रही हूँ सदियों से निरंतर
अपनी जमीन, अपना घर
अपने होने का अर्थ ..’’ २

स्त्री चाहे माता-पिता के घर रहे या पति के घर में रहे , भले ही वह वहाँ समर्पित है, पर उसके भीतर के सुने एकांत में अक्सर एक प्रश्न उसका पीछा करते रहता है | मेरा घर कौनसा हैं ?,

‘’अंदर समेटे पूरा का पूरा घर
मैं बिखरी हूँ पूरे घर में
पर यह घर मेरा नहीं है |’’ ३

निर्मला जी ने स्त्री के उस रहस्य को उजागर किया है, जो शायद रहस्य न होते हुए भी रहस्य के समान लगता है |

२.पुरुष  व्यवस्था के प्रति विद्रोह:-

स्त्री को सदियों से चार दीवारों, चूल्हा-चक्की, घर-गिरस्ती तथा बच्चों को सम्हालना… तक सीमित रखा गया था | उसे प्रत्येक अवसर पर  घर रूपी पिंजरे में कैद तोते की  भांति जीवित रखा गया था | जब-जब उसने चौखट  लांघने की कोशिश की, या पुरुष के अन्याय के विरुद्ध आवाज उठायी, तब-तब उसे प्रेम से या क्रोध से पुन: अँधेरी खोह में धकेल दिया गया | उसमें हीरे की भांति चमक तो थी पर उसके लिए बहार की दुनिया प्रतिबंधित थी |  प्रत्येक अवसरों पर उसकी चाहत को दबा दिया गया था | वास्तव में उसे चाहने लायक रखा ही नही गया था | कभी उसे देवी  बनाकर उसके पैरों को जकड़ा गया तो कभी उसके शरीर को आघात पहुँचा कर अनंत काल तक सहन करने के लिए छोड़ दिया गया था | निर्मला पुतुल की कविताओं में अभिव्यक्त आदिवासी स्त्री भी ऐसे ही दर्द को सहते हुए नजर आती है |

आर्थिक विपन्नावस्था, पुरुष द्वारा किये जानेवाले अत्याचार से वह इतनी पीड़ित हुई कि उस दर्द को भीतर ही भीतर सहते-सहते वह दर्द का लावा बन गया | प्रकृति का नियम है कि जब-जब किसी बात का अतिरेक होता है ,तब-तब प्रकृति अपना रोद्र रूप दिखाती है | भूकंप से सारी धरती काँप उठती है | मार्ग में आनेवाली वनस्थली, जीव-जंतु, मानव आदि सबका वह विनाश करते चलती हैं | वैसे ही निर्मला पुतुल की स्त्री पुरुष व्यवस्था के खिलाफ विद्रोह का शंखनाद कर देती है | कविता संग्रह की पहली ही कविता ‘’ क्या तुम जानते हो ‘’ में वह कहती है :

‘’ क्या तुम जानते हो
पुरुष से भिन्न
एक स्त्री का एकांत |
घर प्रेम और जाति से अलग
एक स्त्री को उसकी अपनी जमीन
के बारे में बता सकते हो तुम ?’’ ४

पुतुल जी की नजरों में स्त्री पुरुषों के लिए मात्र भोग्य वस्तु रही है | पुरुष ने स्त्री को इसके परे जाकर कभी समझा ही नहीं | ना ही स्त्री होने का दर्द कभी महसूस किया है | इसीलिए वह पुरुषों से आक्रांत होकर प्रश्न करती है कि तुम स्त्री के गर्भ में बीज तो छोड़ देते हो पर कभी गर्भवती स्त्री का दर्द, वेदना,पीड़ा को तुमने कभी समझा है | महसूस किया है | स्त्री पुरुष के नजरों में केवल शरीर ही रही | उससे परे उसने उसे नहीं समझा | यही कारण है कि निर्मला पुतुल अपनी कविताओं में आक्रोश प्रकट करते हुए प्रश्न करती है ,

‘’ तन के भूगोल से परे
एक स्त्री के
मन की गाँठे खोल कर
कभी पढ़ा है तुमने
उसके भीतर का खौलता ईतिहास ?
अगर नहीं !
तो फिर जानते क्या हो तुम
रसोई और बिस्तर के गणित से परे
एक स्त्री के बारें में …|’’ ५

निर्मला पुतुल

निर्मला पुतुल आँखें होकर आँखें बंद नहीं करना चाहती | कान होकर भैरी नहीं बनना चाहती | और जबान होकर गूंगी | उन्होंने जो समाज देखा, भोगा उसे किसी के भय के कारण झूठ की थाली में परोसा नहीं | वह तो कबीर,निराला, नागार्जुन की भांति डंके की चोट पर अपनी बात कहने की हिमायती है | उन्हमें जंगल की शेरनी की तरह गर्जना है, वे ‘’ खून को पानी कैसे लिख दूँ ‘’ कविता में कहती है:

‘’ पर तुम्ही बताओं, यह कैसे सम्भव है ?
आँख रहते अन्धी कैसे हो जाऊं मैं ?
कैसे कह दूँ रात को दिन ?
खून को पानी कैसे लिख दूँ |’’ ६

३.आदिवासी स्त्री के दर्द एवं वेदना की अभिव्यक्ति :-


एक ओर विश्व चाँद-मंगल ग्रह पर बस्ती बनाने की योजना बना रहा है | वहीं आदिवासी स्त्री की ओर नजर डालें  तो पता चलता है कि वह सिर्फ जंगल तक ही सीमित है | उसके लिए बाहर का विश्व अजनबी है | उसे पता ही नहीं कि उसके जंगल की  दुनिया के बाहर भी कोई दुनिया है , ‘’आदिवासी स्त्रियाँ ‘’ कविता में वह कहती है:

‘’ उनकी आँखों की पहुँच तक ही
सीमित होती उनकी दुनिया
उनकी दुनिया जैसी कई-कई दुनियांये
शामिल है इस दुनिया में ‘’ ७

आदिवासी स्त्रियाँ परिश्रमी होती हैं | वे पुरुषों के कंधो से कन्धा मिलाकर ही नहीं बल्कि उससे भी ज्यादा परिश्रम करती है | ऐसा कहना असंगत नही होगा | वह खेतों में काम करती हैं | पत्तल, चटई, पंखा, झाड़ू बनाकर बाजार में बेच कर अपना तथा परिवार की उपजीविका चलाने में विशेष योगदान देती है | जीन हाथों से वह वस्तु बनाती है, उन वस्तुओं का कोई ओर उपयोग करता है | उसे प्रतीक्षा करनी पड़ती है, अपने ही पेट भरने की | इसी विडम्बना को व्यक्त करते हुए ‘’ बाहामुनी ‘’ कविता में कहती है:

‘’ तुम्हारे हाथों बने पत्तल पर भरते है पेट हजारों
पर हजारों पत्तल भर नही पाते तुम्हारा पेट
कैसी विडम्बना है कि
जमीन पर बैठ बुनती हो चटाईयाँ
और पंखा बनाते टपकता है
तुम्हारे करियाये देह से टप..टप ..पसीना |’’ ८

आदिवासी स्त्री को पता ही नही होता कि उसकी बनाई चीजे, उसकी तस्वीरें देश की राजधानी दिल्ली कैसे पहुँच जाती हैं | जब उसी स्त्री पर शहरी पुरुष की ललचाई नजर पड़ती है | स्त्री के विवशता का फायदा उठाकर उसे मात्र भोग्य समझा जाता है, तब निर्मला जी ‘’ ये वे लोग है ‘’ कविता में कहती है :

‘’ ये वे लोग है जो खींचते है
हमारी नंगी-अधनंगी तस्वीरें
और संस्कृति के नाम पर
करते हमारी मिटटी का सौदा
उतार रहे है बहस में हमारे ही कपड़े …
जो हमारे बिस्तर पर करते है
हमारी बस्ती का बलात्कार |’’ ९

कवयित्री अपनी कविताओं में दुखी है, क्योंकि लोगों को हमारा सबकुछ चलता है | फूल-फल, लकड़ियाँ, सब्जियाँ | पर वर्जित है हमारा उनके घर में प्रवेश | वे हमारे अनगढ़  शरीर पर व्यंग्य करते है | हमारे हाथों छुआ पानी नही चलता है | चलता है तो सिर्फ उपयोगी वस्तु | ‘’ मेरा सबकुछ अप्रिय है उनकी नजर में ‘’ वे कहती है,

‘’ उन्हें प्रिय है
मेरी गदराई देह
मेरा मांस प्रिय है उन्हें |’’ १०

उनकी कविताओं में आदिवासी लड़की इसीलिए दुखी है क्योंकि उसे मात्र शरीर समझा जाता है | वह चाहती है कि उसके देह को छोड़ कर उसके परिश्रम, भोलेपन, ईमानदारी की प्रशंसा करें | ‘’ सुगिया’’ कविता में वह कहती है:

‘’ काश, कोई कहता कि
तुम बहुत मेहनती हो सुगिया
बहुत भोली और ईमानदार हो तुम
काश कहता कोई ऐसा |’’ ११

४.आदिवासी लड़की और विवाह :-

स्त्री के विभिन्न रूप होते है | माँ-बेटी, साँस-बहु, देवरानी-जिठानी, बहन आदि | उसे आदि रिश्ते निभाने पड़ते है . विवाह से पूर्व उसकी सारी यादे घर-आँगन, माता-पिता,भाई-बहनों में, गाय-भैंसों, भेड़-बकरियों, खेतों में, पानी के घड़े में आदि में बसी होती है | जब उसका विवाह कर दिया जाता है | तब अपना सबकुछ छोड़ कर दूसरों के आँगन को अपना बनाना पड़ता है | ऐसे समय ससुराल जाने से पूर्व अपनी माँ के सम्मुख रोते हुए अपना दर्द सुनाती है | ‘’ माँ के लिए, ससुराल जाने से पहले ‘’ कविता दृष्टव्य है:

‘’पर क्या सचमुच
जा सकूँगी पूरी की पूरी यहाँ से ?
आँगन में पड़े टूटे झाड़ू-सा
पड़ी रह जाऊँगी कुछ न कुछ यहाँ …
पानी के खली घड़े में
भरी रह जायेंगी मेरी यादे .. |’’ १२

आदिवासी लड़की अपना विवाह जंगल के बाहर कोसो दूर शहर में न कराने की बात जब अपने पिता से करती है, तब उसकी वेदना से ह्रदय द्रवित हो जाता है |

‘’ बाबा !
मुझे उतनी दूर  मत ब्याहना
जहाँ मुझसे मिलने जाने खातिर
घर की बकरियाँ बेचनी पड़े तुम्हे ..|’’ १३

वह इसीलिए शहर में ब्याहना नहीं चाहती कि वहाँ इंसान से ज्यादा भगवान बसते है |  वह ऐसे लड़के से विवाह करना चाहती है, जिसमें इंसानियत हो  | वह अपने ही जंगल के किसी लडके से विवाह करना चाहती है |  जो ढोल-मांदल, बाँसुरी बजाने में पारंगत हो | जो बसंत में उसके जूडे के लिए फूल लाये….

‘’ जिससे खाया नहीं जाये
मेरे भूखे रहने पर,
उसी से ब्याहना मुझे |’’ १४

५.आदिवासी स्त्री सौन्दर्य, गीत संगीत और नृत्य :-

निर्मला पुतुल जी अपनी कविताओं में स्त्रियों के दर्द, वेदना, पीड़ा के साथ उनकी समस्या, चाहत , अजनबीपन का चित्रण करते हुए, उसके पारिश्रमिक सौन्दर्य को उसके गीतों, नृत्यों की भी अभिव्यक्ति करती हैं | ‘’ सुगिया’’ कविता में पुरुष की नजर से उसके सौन्दर्य को व्यक्त करते हुए कहती है:

‘’ तुम हँसती हो तो
बहुत अच्छी लगती हो सुगिया |
बादलों में बिजली से चमकते
उसके दांतों को देख ..
तुम बहुत अच्छा गाती हो
बिल्कुल कोयल की तरह
और नाच का तो क्या कहने
धरती नाच उठती है
जब नाचती हो तुम |’’ १५

६.आदिवासियों को फटकार एवं प्रोत्साहन  :- 

निर्मला पुतुल जब अपनी आँखों के सामने अपने भोले-भाले, ईमानदार एवं परिश्रमी आदिवासी भाई-बहनों का लोगों द्वारा स्तमाल होते देखती है | तब उनसे रहा नहीं जाता | वह अपने लोगों की आँखे खोलने के लिए फटकार लगाती है | झारखण्ड के लिए संघर्ष करने वाले अपने आदिवासी भाई को ‘’ भाई मंगल बसेरा’’ कविता में  कहती है:

‘’अभी यद्ध विराम हुआ है भाई
खत्म नहीं हुई है तुम्हारे हिस्से की लड़ाई
देखना वे फिर सटने की कोशिश करेंगे जो कल
साथ छोड़ गये थे तुम्हारा
मंजिल नहीं है यह
जो दे रहा है मंजिल होने का भरम
एक पड़ाव है तुम्हारी लम्बी यात्रा का |
थक गये हो तो थोड़ा सुसता लो
पर देखना कहीं निश्चिन्त होकर सो मत जाना मेरे भाई |’’ १६
बस्ती का प्रधान जब विदेशी दारू के बदले पूरा गाँव गिरवी रख देता है | तब पुतुल जी बेहद दुखी होती है ,
‘’ कैसे बिकाऊ है तुम्हारे बस्ती का प्रधान
जो सिर्फ एक बोतल विदेशी दारु में रख देता है
पूरे गाँव को गिरवी
और ले जाते है कोई लकड़ियों के गट्ठर की तरह
लादकर अपनी गाड़ियों में तुम्हारी बेटियों को
हज़ार पाँच-सौ  हथेलियों पर रखकर
पिछले साल
धनकटनी में खाली पेट बंगाल गयी पड़ोस की बुधनी
किसका पेट सजाकर लौटी है गाँव |’’ १७
स्त्री जो घर-परिवार, समाज-पुरुष सभी को सहती रहती है | और किसी एकांत कोने में घुट-घुट कर रोती है | तब वह उनके इस रूप को देखकर व्यंग्यात्मक शैली में फटकारते हुए कहती है,
‘’ हक की बात न करो मेरी बहन
मत मांगों पिता की सम्पत्ति पर अधिकार
जिक्र मत करों पत्थरों और जंगलों की अवैध कटाई का
सूदखोरों और ग्रामीण डॉक्टरों के लूट की चर्चा न करो बहन
मिहिजाम के गोआकोला की
सुबोधनी मारण्डी की तरह तुम भी
अपने मगजहीन  पति द्वारा
भरी पंचायत में डायन करार कर दण्डित की जाओगी
माँझी हाडाम ‘पराणिक’ ‘गुडित’ ठेकेदार
महाजन और जान गुरुओं के षड्यंत्र का शिकार बन |’’ १८

७.सभ्य शहरी समाज पर व्यंग्य :-


 निर्मला पुतुल जी ने अपनी कविताओं में शहर के उन लोगों पर व्यंग्य किया जो अपने आप को  सभ्य समझते है | पर भीतर से आदिवासियों से घृणा करते है | उन्हें नीचा दिखाते हैं | उनके अनघड शरीर का मजाक उड़ाते हैं | आदिवासियों को वे यूज़ एंड थ्रो करते हैं | अंतर्राष्ट्रीय महिला दिन के अवसर पर  शहरी महिलाओं को पुरुष के विरुद्ध आवाज उठाते हुए देखती हैं |  उन्हें वह सिर्फ दिखावा लगता हैं | उनपर ‘’ एक बार फिर’’ कविता में व्यंग्य करती हैं | ताकि सच में ही वे कार्य करें:

‘’ एक बार फिर
अपनी ताकत का सामूहिक प्रदर्शन करते
हम गुजरेंगे शहर की गलियों से
पुरुष-सत्ता के खिलाफ
हवा में मिट्ठी-बँधे हाथ लहराते
और हमारे उत्तेजक नारों की ऊष्मा से
गर्म हो जायेगी शहर की हवा |’’ १९

८. मुक्ति की चाहत :-

अपनी जमीन तलाशती आदिवासी स्त्री की मुक्ति की चाहत को अपनी कविताओं में वाणी दी है | स्त्री को सदियों से दबाया गया | चार दीवारों में कैद किया गया | उसकी चाहत का किसीने ख्याल नहीं रखा | आज वही स्त्री घर-प्रेम,जाति से अलग अपना अस्तित्व बनाना चाहती है :

‘’ मैं स्वंय को स्वंय की दृष्टी से देखते
मुक्त होना चाहती हूँ अपनी जाति से
क्या है मात्र एक स्वप्न के
स्त्री के लिए घर सन्तान और प्रेम ?
क्या ? ‘’ २०

वह अपना एक विशेष स्थान बनाना चाहती है | उसे किसी ओर के कारण नहीं बल्कि उसकी पहचान  स्वंय से करना चाहती है | वह ऐसी जमीन चाहती है, जिसे वह अपना कह सके:

‘’ अपनी कल्पना में हर रोज
एक ही समय में स्वंय को
हर बेचैन स्त्री तलाशती है
घर प्रेम और जाति से अलग
अपनी एक ऐसी जमीन
जो सिर्फ उसकी अपनी हो |’’ २१

वह मुक्त आकाश में खुली साँस लेते हुए बिनधास्त, बन्धनों से परे मुक्त होकर स्वच्छंद उड़ना चाहती है | वह ऐसा आधार चाहती है, जो उसे उसकी इच्छाओं को पूरा करने दें | जिसमे अपनापन हो:

‘’ एक उन्मुक्त आकाश
जो शब्द से परे हो
एक हाथ
जो हाथ नहीं
उसके होने का आभास हो ! ‘’ २२

वस्तुतः निर्मला पुतुल की कविताओं में स्त्री घर, परिवार, जाति, प्रेम, से परे अपना अस्तित्व तलाशती हुई दिखाई देती है | सदियों से पुरुष व्यवस्था द्वारा सतायी गई , प्रताड़ित की गई  स्त्री को पुरुष ने केवल उपभोग्य वस्तु समझा | स्त्री का अस्तिव घर, शरीर से परे भी है  | पुरुष ने कभी उसे स्त्री के रूप में समझा ही नहीं | इसीलिए वह आक्रांत होकर पुरुष व्यवस्था से प्रश्न करते हुए अपने मन की  भडास निकालते हुए कहती है,’’अगर नही ! /तो फिर जानते क्या हो तुम /रसोई और बिस्तर के गणित से परे / एक स्त्री के बारे में ..?’’

निर्मला पुतुल जी ने अपने कविता संग्रह में न केवल पुरुष व्यवस्था के प्रति विद्रोहात्मक कवितायेँ लिखी बल्कि आदिवासी स्त्री की वेदना, दर्द की अभिव्यक्ति करने वाली कवितायें कठोर हृदय को पिघला भी देती है | उन्होंने देखे और भोगे होए सत्य का काव्य में हुबहू चित्र खिंचा हैं | उन्होंने जो भी कहना चाहा, कबीर और निराला की भांति बेबाक एवं बिनधास्त कहा | वह डंके की चोट पर कहती है –‘’पर तुम बताओं, यह कैसे संभव है/  आँख रहते अन्धी कैसे हो जाऊ मैं ?/ कैसे कह दूँ रात को दिन ?/  खून को पानी कैसे लिख दूँ ?/’’
संग्रह की अन्य कविताओं में झारखण्ड के संथाल आदिवासी स्त्री के सौन्दर्य, गीत, संगीत और नृत्य का चित्रण हुआ है | साथ ही आदिवासियों के भोलेपन, ईमानदारी , दरिद्रता का बाहरी लोग किस तरह फायदा उठाते है | आदिवासियों को ‘’यूज एंड थ्रो’’ किया जाता है | इस पर कवियत्री उन्हें अपने अस्तित्व  का अहसास दिलाते हुए फटकार भी लगाती है | सदियों से पुरुष व्यवस्था को सहने वाली स्त्री घर, प्रेम, जाति, समाज से परे आक्रोश प्रकट करते हुए अपना अस्तित्व बनाना चाहती है | वह मुक्त गगन में स्वच्छंद उड़ना चाहती है |

स्त्री एवं भाषा : तीसरी परम्परा की खोज एवं वैकल्पिक भाषावैज्ञानिक अध्ययन

प्रो.शैलेन्द्र सिंह

प्रो.शैलेन्द्र सिंह पूर्वोत्तर में नार्थ इस्टर्न यूनिवर्सिटी ( नेहू ) में पढ़ाते हैं संपर्क : tosksinghnehu@gmail.com

( प्रोफ. शैलेन्द्र सिंह ने स्त्रीकाल और गुलबर्गा वि वि के द्वारा आयोजित सेमिनार     में  ‘ स्त्री एवं भाषा’  विषय पर एक आलेख प्रस्तुत किया था , जो शीघ्र ही        स्त्रीकाल   के प्रिंट एडिशन में प्राकाश्य है . उस आलेख का एक हिस्सा स्त्रीकाल के  पाठकों के लिए . शैलेन्द्र सिंह की प्रस्तुति के बाद वहाँ मौजूद स्त्रीवादियों ने उनसे जम  कर बहस की थी. असहमति की स्थिति में आलेख आमंत्रित हैं. )

वैज्ञानिक सोच,भाषा को ईश्वरीय देन एवं वरदान नहीं मानती है। अर्थात मनुष्य ने भाषा को रचा और संवारा, तो भाषा ने मनुष्य को। भाषायी निर्माण की उक्त प्रक्रिया में स्त्री एवं पुरुष एक दूसरे काप्रतिभागी नहीं रहा है, बल्कि एक ही मानवीय सिक्के के दो पहलूकी तरह दिखाई देते हैं। नतीजतन, भाषा न तो स्त्री की अनुपस्थिति में साकार हो सकती है, और न तो पुरुष की अनुपस्थिति में। अगर समाज निर्माण में स्त्री एवं पुरुष की उपस्थिति बुनियादी शर्त है, तो भाषा निर्माण की प्रक्रिया में भी स्त्री एवं पुरुष की उपस्थिति अनिवार्य शर्त है। अर्थात एक दूसरे की अनुपस्थिति में भाषा एवं समाज दोनों की उपस्थिति असंभव है। नितान्तः जिस कदर समाज निर्माण की प्रक्रिया में दोनों की समान सहभागिता है, वैसे ही दोनों की समान सहभागिता है भाषा निर्माण की प्रक्रिया में। जिस तरह स्त्री एवं पुरुष की अनुपस्थिति में समाज की उपस्थिति असंभव है, वैसे ही स्त्री एवं पुरुष की अनुपस्थिति में भाषा की उपस्थिति असंभव है। यह भी लाजिमी है, कि किसी विशिष्टभाषा की रचना न तो स्त्री की है और न तो पुरुषकी।पुरुष एवं स्त्री दोनों एक ही भाषा का प्रयोग करते आए हैं और करेंगे भी। कुछ भिन्नताएं सहज हैं, जिसको लेकर भाषाविदों ने अवश्य माथापच्ची की है।  भाषा एवं स्त्री के अंतरसंबंधों को भिन्न धाराओं के तहत परिभाषित एवं विश्लेशित करने की कोशिश की गयी है।

स्त्री, भाषा एवं सैद्धांतिकीः
भाषा एवं स्त्री के अंतरसंबंधों को निम्नलिखित सैद्धांतिक परिपाटियों के तहत समझना समीचीन होगाः

मूल सिद्धांतः


प्रथमतः भाषा, लिंग एवं स्त्री के अंतरसंबंधों के वैज्ञानिक सत्यापन, शोध एवं निष्कर्ष के लिए मूल सिद्धांत के तहत अध्ययन करना समुचित होगा। भाषाविज्ञान वैज्ञानिक विद्या है, इसलिए इसे सिर्फ सौन्दर्य शास्त्रीय मानकों की जरूरत नहीं है। वहीं दूसरी ओर इसे सिर्फ किसी विशिष्ट विचारधारा के तहत भी परिभाषित करना अनुचित होगा। विशुद्ध ज्ञान का हिस्सा बनकर इसे कद्र मुक्त होना होगा ताकी निष्पक्ष अध्ययन किया जा सके। मूल सिद्धांत, वैज्ञानिक अन्वेषण के तहत इसका अध्ययन करता है। सिद्धांत प्रतिपादन का आधार वस्तुनिष्ठ होता है। वैज्ञानिक सोच यह मानती है कि भाषा एवं लिंग के अन्तरसंबंधों को प्राथमिक डेटा संग्रह के द्वारा सत्यापित किया जा सकता है। अतः सिद्धांतो को वैज्ञानिक स्वीकृति की आवश्यकता होती है। मूल सिद्धांत विशुद्ध ज्ञान से प्रेरित एवं आश्रित भी होता है। लाजिमी है कि यह कद्र मुक्त एवं निष्पक्ष होता है।

सेमिनार में श्रोता

किसी भी भाषा की संरचना का समग्र विश्लेषण, लिंग विश्लेषण के बिना संभवनहीं है, क्योंकि भाषा संरचना में लिंग एक महत्वपूर्ण संरचनात्मक इकाई होती है। एक ओर अगर भाषा के बिना सम्प्रेषण संभव नहीं है, तो वहीं दूसरी ओर भाषा के बिना ‘‘स्व’’ की तलाश भी संभव नहीं है। भाषा प्रत्येक मनुष्य के ‘‘स्व’’ को पहचानने में हमारी मदद करती है। मनुष्य का ‘‘स्व’’ नारी एवं पुरुष में सदैव से विभाजित रहा है, जिसका सत्यापन भाषा के माध्यम से भी होता है। भाषामनुष्य को पहचानती है और साथ ही संरचनात्मक स्तर पर स्त्री एवं पुरुष की भिन्नता को सहज स्थान देती है। यही कारण है कि विश्व कीअधिकांशभाषाओं में लिंग भेद किसी न किसी रूप में भाषा संरचना का हिस्सा है। भाषा अगर मनुष्य द्वारा निर्मित धरोहर है, तो मनुष्य ने ही स्त्री एवं पुरुष को पहचानने के तरीकों का प्रावधान भाषा के माध्यम से भाषा के अन्दर भी किया है। सृष्टि में तीन मुख्य जातियां हैंः स्त्री,पुरुष एवं जड़। विश्व की अधिकांशभाषाओं में इन्हीं जातियों के आधार पर तीन भेद किए गए हैंः पुल्लिंग, स्त्री लिंग एवं नपुसंक लिंग। कुछ भाषाओं में लिंग की अभिव्यक्ति वाक्यों मेंभी होती है, तभी संज्ञा पदों का लिंग भेद स्पष्ट होता है। स्पष्ट है, कि संज्ञा के जिस रूप से व्यक्ति या वस्तु के लिंग भेद का बोध होता है, उसे भाषाविज्ञान में ‘लिंग’ कहते हैं। संज्ञा के रूप, लिंग, वचन एवं कारक के कारण बदलते है। उदाहरण के लिए, हिन्दी में ‘लड़का जाता है’ एवं ‘लड़की जाती है’, होता है तो वहीं ‘लड़कियां जाती हैं’ एवं ‘लड़के जाते हैं’ होता है। अंग्रेजी मेंभी लिंग का निर्णय इसी व्यवस्था के आधार पर है। कुछ आधुनिक भारतीय आर्य भाषाओं में भी लिंग भेद इसी आधार पर होता है। मराठी, गुजराती आदि भाषाओं में ऐसी व्यवस्था है, परन्तु, हिन्दी में नपुंसक लिंग नहीं है। हिन्दी में लिंग, विशेषण, सर्वनाम, क्रिया, विभक्ति में विकार उत्पन करता है। लिंग भिन्नता के प्रति हिन्दी भाषा इतनी संवेदनशील है, कि विभक्तियों में भी लिंग भेद पाए जाते है – जैसे कि, उसका मुख एवं उसकी नाक। आधुनिक भारतीय भाषा की जननी संस्कृत में लिंग का अर्थ ‘चिन्ह’ या ‘निशान’ होता है। भाषा में संज्ञा चिन्ह एवं निशानी समेटी होती है। सरल शब्दों में किसी वस्तु, भाव और जीव के नाम को संज्ञा की संज्ञा दी जाती है। वस्तु मुख्यतः चार वर्गों में विभक्त हैः- जाति, व्यक्ति, समूह एवं द्रव्य। स्पष्ट है, कि वस्तु या तो पुरुष जाति की होगी या स्त्री जाति की। संज्ञा के भी दो रूप हैं: प्राणीवाचक एवं अप्राणीवाचक। कुछ भाषाओं में अप्राणीवाचक संज्ञा में भी लिंग भेद के प्रावधान हैं। लिंग भेद के उपरोक्त तथ्यों को भाषाविज्ञान के मानदंडों के आधार पर सत्यापित किया जा सकता है। भाषाओं के लिंग भेद को विश्लेषित करना भाषावैज्ञानिकशोध का हिस्सा हो सकता है। इण्डो-यूरोपियन भाषा में लिंग भेद पाए जाते हैं। स्वाहिलीभाषा में सोलह प्रकार के लिंग भेद पाए जाते हैं, परन्तु कुछ भाषाओं में लिंगभेदकर्ता में निहित होता है। जैसे कि, अंग्रेजीमें- he left, she left औरit left। कुछ भाषाओं में लिंग वर्गीकरण का औचित्य सर्वथा वैज्ञानिक, भाषा वैज्ञानिक एवं संज्ञानिक नहीं होता है,बल्कि तार्किक, यादृच्छिक एवं स्थानीय होता है। उदाहरण के लिए जर्मन में ‘पेड़’पुल्लिंग है, तो ‘कलियां’ स्त्री लिंग एवं ‘पत्ते’ नपुसंग लिंग। हिन्दी में ‘पेड़’पुल्लिंग है, तो ‘कलियां’ स्त्रीलिंग परन्तु ‘पत्ते’ के लिए पुल्लिंग एवं स्त्रीलिंग दोनों भेदविद्यमान हैं। यही स्थिति हिन्दी की भी है क्योंकि ‘बस’ स्त्रीलिंग तो ‘ट्रक’पुल्लिंग। वहीं दूसरी ओर ‘घोड़ा’ जर्मन में लिंगविहीन है, तो हिन्दी में पुल्लिंग। वहीं दूसरी ओर कुछ भाषाओं में लिंग विशेष तौर परभाषिक प्रतीक से चिन्हित किया जाता है, जैसे किः खासी, ग्रीक, जर्मन एवं फ्रेंच। जर्मन एवं खासी का उदाहरण प्रस्तुत हैः

Der-man
पुल्लिंग-पुरुष
Die-frau
स्त्रीलिंग- महिला
das –kind
नपुंसकलिंग- बच्चा

भारत के चारों भाषा परिवार में लिंग निर्धारण की प्रक्रिया में भिन्नता है। कहा जा सकता है कि भाषा भी स्त्री एवं पुरुष के बीच के नैसर्गिक विभाजन को भाषिक इकाईयों एवं संरचना के माध्यम से प्रदर्शित करती है। इसके लिए उस भाषा एवं समाज में गुजर-बसर करने बाले व्यक्ति को गलत नहीं ठहराया जा सकता है क्योंकि अगर मानव जाति की संरचना की बुनियाद मानव जाति के दो प्राणियों के अन्तरण में निहित है तो भाषा में ऐसे अन्तरण को पहचानने की शक्ति भला गलत कैसे हो सकती है। भले ही आज यह समाज भाषाविज्ञान का नया अंग है, परन्तु भाषा एवं लिंग संबंधी अध्ययन की परम्परा बौद्धिक लेखन की शुरूआत से होती है। अरस्तु के अनुसार-“ग्रीक दार्शनिक पाइथोगोरस ने व्याकरणिक लिंग की अवधारणा की पुष्टि के लिए संज्ञा के साथ प्रयुक्त होने वाले पुल्लिंग, स्त्री एवं नपुसंक भाषिक कोटियों की चर्चा की।” ऐसा माना जाता है कि- सुमेरियन महिला Emesal नाम की विशिष्टभाषा का प्रयोग करती थीं, जो कि मुख्य भाषा से भिन्न थी। वहीं दूसरी ओरEmegir स्त्री एवं पुरुषदोनों के द्वारा बोली जाती थी। महिलाओं की भाषा में विशिष्ट प्रकार के शब्दों का प्रयोग होता था।  पौराणिक ग्रंथों में देवियों की भाषाशैली में भिन्नता के प्रमाण मिलते हैं एवं स्त्रियों द्वारा किए जाने वाले धार्मिक अनुष्ठानों में भाषिक भिन्नता की चर्चा है। ऐसे प्रमाण भारत में भी मिलते हैं। कुछ संस्कृत नाटकों में महिलाओं की बातें प्राकृत भाषा में हैं। इस तरह के भरपूर उदाहरण निम्नवर्गीय एवं अशिक्षित लोगों के लिए भी मिलते है। गारिफुना में स्त्री एवं पुरुष द्वारा प्रयुक्त भाषा में भिन्न शब्दों के प्रयोग के प्रमाण मिलते हैं। हांलाकि इससे भाषा प्रभावित नहीं होती है। सच यह है कि पुरुष द्वारा प्रयुक्त शब्द अधिकाशतः Carib के होते हैं, वहीं दूसरी ओर स्त्रियों द्वारा प्रयुक्त शब्दArawak के। ग्रीक भाषा में भी स्त्री एवं पुरुष द्वारा प्रयुक्त भाषा में अन्तर के कुछ नमूने मिलते है। यह भी प्रमाणित है,कि नृजातीय आस्ट्रेलियन भाषा‘ऐनयुवा’ में भी स्त्री एवं पुरुष की बोलियों में अन्तर है।

शैलेन्द्र सिंह का स्वागत

अतिवादी सिद्धांतः


अतिवादी सिंद्धात जीवन की विविध धाराओं से जुड़ी होती है। अतः इसे दैनिक जीवन का सिद्धांत भी कहा जा सकता है, जिसे वैज्ञानिकता की कसौटियों पर बांधा नहीं जा सकता है। शायद यही कारण है, कि स्त्री अध्ययन  में आज नव विमर्शों की भरमार है। कुछ विचार धाराएं तो फैशनयुक्त हैं। अतिवादी सिंद्धात स्त्री एवं भाषा के अन्तर्संबंधों को सुविधानुकूल नजरिया एवं दृष्टिकोण से देखने का प्रयास करता है। इसमें खास वैचारिक मंथन का गुंजाइश बनी रहती है। स्त्री एवं भाषा के अन्तर्संबंधों को परिभाषित करने के नए हथकण्डे़ अपनाए जाते हैं। कुछ हद तक तो यह छिद्रान्वेषण है, जिसमें सबकुछ विचाराधीन नजर आता है। अतिवादियों को ऐसा हक प्राप्त है। इन्हीं कारणों से उक्त श्रेणी के सिद्धान्त को प्रायोगिक नहीं माना जा सकता है। इन्हें तो खेमायी प्रश्नों को उछालने में विश्वास है न कि सार्थक उत्तर खोजने में। किसी भी प्रश्न का ठोस उत्तर तो संभव ही नहीं है। अर्थात इसकी गति प्रश्नों एवं विचारधाराओं में है। यह खेमायी रूझानों से लबालब होता है। खुशी इस बात कीहै कि स्त्री से संबंधित भाषायी प्रयोग का मामला आज गहन विमर्श का हिस्सा बन चुका है। साथ में आम सहमति बनाने में भी सफलता प्राप्त की है। किसी भी सिद्धांत के लिए अस्वीकृति  विफलता नहीं है बल्कि नयी सोच का हिस्सा। डोना हारवे बायम की विचार धारा plurist है जो वर्तमान स्त्री आलोचना में प्रतिबिंबित Shouldएवंmusts के मानदण्ड़ों का रोना रोती है। कोलोडनी ने यहां तक कह दिया कि- “Seminar in the feminist theory has become soley a means to profession advancement”। अर्थात व्यक्तिगत, स्थानीय, एवं बौद्धिक दृष्टियों की गुंजाइश सदैव बनी होती है। कभी कभार अतिवादि सोच को मुख्यधारा का हिस्सा बनाना खतरनाक भी साबित होता है।

कैमरॉन (1992) का मानना है कि स्त्री अध्यन साहित्यिक अध्ययन का चहेता है और भाषावैज्ञानिकदृष्टि से अभी इसमें अभी बहुत कुछ करना बाकी है। उनका यह भी कहना है कि ध्वनि विज्ञान, वाक्य विज्ञान एवं भाषाविज्ञान की कोरशाखाओं में इसके अध्यन के गुंजाइश अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान की तुलना में बहुत कम है, क्योंकि भाषिक परिवर्तनस्त्री-पुरुष के वजूद के कारण आम-तौर पर बहुत नहीं दिखायी पड़ता है,परन्तु भाषाविज्ञान की अन्य उप-शाखाओं में, जैसे कि समाजभाषाविज्ञान, मनोभाषाविज्ञान, प्रोक्ति, अनुवाद एवं कई अन्य में इसकी तमाम संभावनाएं बरकार हैं। इन विद्याओं के जरिए नयी सोच, प्रविधि एवं विचारधाराओं को शामिल किया जा सकता है। कैमरॉन ने यह भी साबित करने की कोशिश की है, कि किस तरह से ‘स्व’निम विज्ञान एवं वाक्य विज्ञान भाषा एवं स्त्री अध्ययन को प्रभावित नहीं कर पाया है। अतः मुख्य धारा से इतर नयी सोच की आवश्यकता है, जिसमें अतिवादियों को समझना समीचीन होगा।

वैकल्पिक सिद्धांतः


अपनी किताब ‘ओरिएण्टलिज्म’ में एडवर्ड सईद  (1978:1995) ने ठीक ही कहा है, कि पूरब के बारे में पश्चिमी दृष्टिकोण अविवेकी, अकारण, अयुक्तिक, विकृत और बचपना पूर्ण रहा है। भिन्न सांस्कृतिक अस्मिताओं के प्रति संवेदनशीलता और सजगता ही ‘‘स्व’’ के पुनर्प्रतिस्थापन के प्रति सबसे बड़ी श्रद्धांजलि हो सकती है, जिसके लिए स्त्री के प्रति आभार प्रकट करना आवश्यक है। आज गैर-पश्चिमी छवि को बिगाड़ने वाले के विरूद्ध  वैकल्पिक पश्चिम का अभ्युदय हो चुका है। लेकिन आक्रामकता में अभी भी कमी है। वास्तविक स्थिति,रूख,दृष्टिकोण और कथन के स्थापन को देशीय अलंकारों के साथ आक्रामक तरीके से दर्ज करने की आवश्यकता है। नृजातीय एवं स्थानीय आवाजों को  लयात्मक होना आवश्यक है। वैकल्पिक पश्चिम में बौद्धिक गरिमा पुनर्जीवित हो रही है। वैकल्पिक पश्चिम निष्प्राणीयता के चंगुल से छुटकारा पाने की भरपूर कोशिश कर रहा है। हालांकि और अधिक आक्रामक होने की जरूरत है। इसलिए गायत्री तीसरी दुनिया की नारीवादी लेखन,“not fully at one with the rhetoricity of language” (1993:2000) मानती है । भारतीय नारीवादी पाठ को गायत्री प्रभावशाली तो मानती हैं, लेकिन साथ में यह भी कहती हैं, कि इसमें नृजातीय चारित्रिक जीवनता की बड़ी कमी है, जिसके कारण वे अपनी विशिष्ट छाप बनाने में असफल हैं। गायत्री अपने लेखन में ब्रिटिश अंग्रेजी का प्रयोग न कर अमेरिकी अंग्रेजी का प्रयोग करती हैं, ताकि भारतीय पाठक औपनिवेशिक बू से एक हद तक दूर रह सकें। आज ऐसे प्रयोगों की जरूरत भी है।

यदि स्त्री अध्ययन का उद्देश्य संसाधन निर्माण है, तो मूल्य मानवीय है एवं सीमा सार्वभौम। आज उचित संदेश देने की जरूरत है। 21वीं सदी में नयी पीढ़ी को सही संदश देने का समय आ गया है। आज स्त्री विमर्श महज अकादमिक उतरदायित्व नहीं है, बल्कि वैकल्पिक सामाजिक यथार्थ। निरन्तरता बनाए रखने की जरूरत तमाम वर्गों में है। आमहित के लिए नयी आकांक्षाओं को गढ़ना होगा ताकि हाशिए पर रह रहे वर्गों को केन्द्र की नयी भूमिका में अवस्थित किया जा सके। स्त्री विमर्शकों की नयी पीढ़ी में सृजनात्मकता की नयी शक्ति सृजित हो रही है। कौन? क्या? कहां ? किससे? क्यों ? कैसे? किसलिए? जैसे प्रश्नों का सार्थक हल नये पैमानों पर होगा,अर्थात 21वी सदी में स्त्री विमर्श का विमर्श बदलेगा, स्त्री विमर्श की भाषा बदलेगी एवं स्त्रियों की भाषा बदेलगी ।

धारा 304 IPC के बहाने एक चर्चा : एक विचार यह भी

प्रो.परिमळा अंबेकर

प्रो.परिमळा अंबेकर हिन्दी विभाग , गुलबर्गा वि वि, कर्नाटक में प्राध्यापिका और विभागाध्यक्ष हैं . परिमला अम्बेकर मूलतः आलोचक हैं तथा कन्नड़ में हो रहे लेखन का हिन्दी अनुवाद भी करती हैं . संपर्क:09480226677

( दहेज़ कानून को कमजोर करने की कोशिशों के विरोध में देश भर से आवाज है . स्त्रीकाल भी इस मुहीम  में शामिल है. यहाँ हम इस संबंध में आलेख और रपटें प्रकाशित करते रहे हैं . संयोग से दो महिलाओं ने ही ऐसे आलेख लिखे , जो यह राय रखते हैं  कि इस कानून पर पुनर्विचार की जरूरत है . हमने इस आवाज को भी यहाँ जगह दी है . गुलबर्गा वि वि की हिन्दी प्राध्यापिका प्रो. परिमला अम्बेकर भी दहेज़ कानूनों को जंग लगा हथियार बता रही हैं , इन्हें बदलने की जरूरत पर जोड़ दे रही हैं . असहमति हो सकती है , लेकिन सहमति का बिन्दू यहाँ स्त्रियों को पैतृक सम्पत्ति में अधिकार की सुनिश्चितता की मांग है.  )

स्त्रीकाल में इस सबंध में प्रकाशित विचार / रपट पढ़ने के लिए क्लिक करें :

१. न्याय व्यवस्था में दहेज़ के नासूर 
२. हम चार दशक पीछे चले गए हैं 
३. सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ आगे आये महिला संगठन 
४. दहेज़ विरोधी क़ानून में सुधार की जरूरत 

जब जंग खाया हथियार, अपनी धार खोते जाता है, तब उस हथियार की उपयोगिता या तो परंपरा की एंटिक निशानी के रूप में रह जाती है या  उसकी उपयोगिता केवल झूठमूठ में डराने धमकाने के लिए की जाती है,बच्चों के खिलौनों की तरह ! संविधान और न्यायपालिका द्वारा  गढे गये कुछ कानून भी मेरे ख्याल से , समय और परिस्थिति के बदलाव के साथ साथ , इन्हीं जंग खाये हथियार के माफिक अपनी न्यायिक और सामाजिक असर को खोते जाते हैं । यूं तो, संवैधानिक कानूनी नियम ,कलम या धाराएॅं , अपनी संवैधानिक माॅडिफिकेशन के पर्याय के साथ तो प्रस्तुत रहते हैं लेकिन कभी कभी, अपनी परिसीमा के समाज में हो रहे आर्थिक शैक्षणिक और सांस्कृतिक बदलाव के चलते कुछ  विधिक नागरिक प्रवाधान , अपनी न्यायिक और सामाजिक धार  खो द्ते हैं । जैसे स्त्रियों की सुरक्षा एवं संरक्षण हेतू बनाये गये दहेज निग्रह के कानून !!  आज दहेज निग्रह कानून ( IPC )   धारा 498 अ )  की इंटेसिटी को कम करके उसमें शिथिलता ,  सुधार लाने की संसदीय एवं कानूनी कार्यवाही की पहल हो रही है। मेरी राय में, भारतीय स्त्रियों एवं परिवार की सुरक्षा और संरक्षण के लिए बने दहेज  संबंधी अपराध के रोकथाम के लिए बने दहेज विरोधी कानून की स्थिति भी आज जंग खाये हथियार के माफिक है। संक्रमण दौर की स्थिति में, आज भले ही  इस कथन की पुष्टि के लिए हमें , वास्तविक आधार हाथ न लग रहे हो।  लेकिन लगता जरूर है कि इक्कीसवी सदी के बनते समाजशास्त्र की यह आंतरिक चेतना है!

एन् सी आई बी  ( NCIB ) राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो द्वारा सन् 2012  में दिये गये दहेज हत्या संबंधी आॅंकडें जरूर चैकाने वाले हैं । सेक्शन 302/304   के तहत सन् 2008  में ( 8172 ) से लेकर 2011 में ( 8618)  तक के दहेज संबंधी स्त्रियों की मौत की बढती संख्या में सन् 2012 में ( 8233 )  में  हठात 4.5 प्रतिशत की  गिरावट  का आना, निस्संदेह विचारणीय है । क्या इसे हम, भारतीय महिला की शिक्षा, उसकी अस्मिता, उसके द्वारा प्राप्त की जा रही आर्थिक संबलता, जिये जा रही स्वछंदता की चेतना और तो और स्त्री के व्यक्तित्व और चरित्र को लेकर स्थापित रूढबद्ध सामाजिक सोच एवं दृष्टि में पड रही शिथिलता आदि के जरिये  हो रहे सामाजिक एवं आर्थिक बदलाव की चेतना का, शुभ संकेत मान सकते है ?

आज दहेज निग्रह कानून  IPC   धारा 498 A  में लायी जानेवाली शिथिलता याने सुधार की पहेल और उस संबंधी संसदीय कार्यवाही का समाचार और उच्च न्यायलय द्वारा इस संबधी व्यक्त चिंता की चर्चा प्रिंट एवं तकनिकी माध्यमों की सुर्खियों में हैं । ये खबरें ऊपर से स्त्री सुरक्षा विरोधी या घरेरू हिंसा को बढावा देने की पुरूष वर्चस्वता के दाॅंव पेंच भले ही लगे , लेकिन यह निस्संदहे एक शुभ संकेत भी है। क्यूॅंकि अब समय आ गया है कि हमें सामाजिक तौर पर इस वास्तविकता को स्वीकार कर लेने का कि दहेज विरोधी कानून और बहू बचाओ की विधिक धाराएॅं बस अब जंग खाये हथियार बन गयी हैं जिसे केवल अब व्यक्ति और परिवार के सदस्यों को डराने धमकाने के लिए प्रयोग में लाये जा रहे हैं। अर्थात स्त्री की शिक्षा, बढते उद्योगों के अवकाश, आर्थिक स्वतंत्रता, इक्कीसवी सदी के बाजारवाद की माॅंग और आपूर्ती के बदलते क्षेत्र,पुरूष की तुलना में स्त्री का संख्यागत आनुपातिक पतन के चलते  समाज के हर वर्ग और जाति में लडकियों की बढ़ती  माॅंग आदि ने आज दहेज और उससे जुडी पारिवारिक एवं सामाजिक चैखटे की परिभाषा ही बदल दी  है । स्त्री की सामाजिक चेतना और अपने बलबूते पर पाई गई उसकी सशक्तिकरण की ऊर्जा  के सम्मुख आज दहेज, शतरंज के खेल में मार खाये प्यादे की तरह, कोने में खिसका जा  रहा है । लेकिन सावधानी तो चाहिए कि कहीं यह मार खाया पुरूषसत्ता का प्यादा ,पैतरा बदलकर, रूप बदलकर पुनः अपनी व्यवस्था में आ तो न जाय !! अंग्रेजी फिल्मों के खलनायक टर्मिनेटर की तरह !

आज दहेज निग्रह कानून  ( IPC   धारा 498 A)  को लेकर सभी स्तरपर यह शंका झांक रही है कि अपने संरक्षण के लिए बने कानूनी प्रावधानों को स्त्रियाॅं अब ढाल की तरह नहीं तलवार की तरह इस्तेमाल कर रही है !! हो क्यूॅं नहीं !! यह तो निर्विवाद सच है कि कानून जब अपनी सामाजिक प्रखरता या धार , अपनी अस्मिता को खोने लगता है तब वह खिलवाड बन जाता है। कानून का जब सामाजिक दायरा खिसकते जाता है तब उसके मानवीय मूल्य कूच करने लगते हैं । परिवर्तित समाजिक व्यवस्था और वास्तविकता के आधार पर, स्त्री पुरूष के वैवाहिक संबंध के मूल में रही परंपरागत रूढी वरदक्षिणा के नये सरोकार और नयी परिभाषा को गढने की आवश्यकता की माॅंग आज प्रस्तुत है । भारतीय समाज में  दहेज नाम की प्रथा के या रूढी के, अनेक अर्थ और परिभाषाएॅं हैं । पिता की संपत्ति  पर अपना कानूनी अधिकार को जताने या  चलाने की मानसिकता के अभाव में दहेज भारतीय ब्याहता लडकी को स्त्रीधन के रूप में सहेजता है। लेकिन दुराग्रह में, सामाजिक प्रतिष्ठा का पर्याय बनकर यही स्त्रीधन , अपनी बाजारू मूल्य के चलते उसीके गले का फंदा भी बन सकता है ! और तो और दहेज जुटाने में असमर्थ लडकी के माता पिता, सामाजिक स्थानमान की झूठी प्रतिष्ठा में पडकर , बेटी के जीवन को असहनीय बना डालने के बहुत से किस्से भी हमे मिलते हैं । उपन्यासकार प्रेमचंद की निर्मला, दहेज संबंधी इन्हीं संगीन परिस्थितियों और बिखराव को झेलती है । अपने समय की सामाजिक विद्रूपता और स्त्री जीवन की अनकही वास्तविकता को प्रेमचंद कैनवास प्रदान करते हैं, निर्मला के जीवन संघर्ष और दारूण अंत का चित्रण करके । लेकिन गंभीर प्रश्न यह उभरता है कि क्या प्रेमचंद की निर्मला आज की वास्तविकता  है ? प्रेमचंद के उपन्यासकालीन समय और समाज , क्या इक्कीसवी सदी के स्त्री जीवन की वास्तविकता को और आज के समाज के बदले तेवर और रवय्ये को अपने में पचा पायेगा ?

भारतीय न्याय देवता के तराजू के पलडे में पडे दहेज उत्पीडन, दहेज हिंसा और हत्या रोक संबंधी कानून, दूसरे पलडे में हजारों लाखों भारतीय लडकियों औरतों की जलने के कटने के संगीन हत्याओं के भार से भी भारी पडने की कथा का, सहज बयान करते आ रहे हैं। लेकिन आज स्त्री शिक्षा, उसकी तरक्की पसंद मानसिकता, आर्थिक आत्मनिर्भरता, जाति व्यवस्था में विवाह संबंधी उभरती शिथिलता, पुरूष की तुलना में स्त्री का अनुपात का गिरना , वधू दक्षिणा का उभरता रूप इत्यादि इस भारी भरकम पलडे को अपना अंजाम दिखा रहे हैं । सन् 2013-2014 तक की अवधि में दहेज संबंधी वारदातों की घटती संख्या , अंधकार मे प्रखरता से जलते उस लौ की तरह जरूर है, जिसका होना मात्र, स्त्रियों में पनप रहा आत्मस्थैर्य , अंकुरित हो रही जागरूक चेतना और स्वतंत्र निर्णय शक्ति के धैर्य की आशा को बंधवाते जा रहा है । यूॅं तो वरदक्षिणा का कानूनी या सामाजिक पर्याय वधूदक्षिणा नहीं हो  सकता । वरदक्षिणा अर्थात दहेज कुछ हद तक स्त्रीधन के अर्थ में समीकृत होकर, स्त्री के भावी जीवन की सुरक्षा का आर्थिक आधार तो बन सकता है । जैसे इस्लाम धर्म में प्रचलित मेहर की राशि, पति के न होने या तलाक की स्थिति में , स्त्री के अस्थिर जिन्दगी में आर्थिक सहारा बनने ,उसमें आत्मस्थैर्य भरने के लिए होता है । लेकिन आज हमारे समाज में स्त्री और पुरूष के मध्य की बिगडती सानुपातिकता, लडकियों की गिरती संख्या ने वधूदक्षिणा के चोर दरवाजे खोल रही है । यूॅं तो भारतीय समाज के अनेक जाति एवं जनजातियों में, कस्बों में वधूदक्षिण, का रिवाज है, एक प्रथा के रूप में । मध्य प्रदेश के भील जनजाती में आचरण में रही भगोरिया पर्व हो या कर्नाटक और महाराष्ट्र के निचली जातियों में प्रचलन में रहे विवाह इसके उदाहरण है। लेकिन अधिक गंभीर आपत्तिजनक  ढंग से आज समाज के मध्यवर्ग एवं निम्नमध्यवर्ग में वधूदक्षिणा याने, लडकी के पिता को आपसी बातचीत से तय हुई राशि  को थमाकर लडकी को अपने बेटे से ब्याहने का व्यवहार, बडी तेजी से पनप रहा है ।

चाहे विवाह में तय किया गया व्यवहार वरदक्षिणा का हो या वधूदक्षिणा का, कहर तो बरपेगा, लडकी पर ही । माता पिता की स्वार्थ घिनौनी मानसिकता के चलते, बडी आसानी से वधूदक्षिणा  के नाम पर बेटी बेचने  के बाजार को गर्माते जाने में देर नहीं लगेगी ।  वधूदक्षिणा का यह नया रूप, परिवार की बाजारी मानसिकता के चलते, अपने कोख जाये लडकियो को बेचने के फ्लश् मार्केट के अत्याधुनिक रूप में तब्दील होने में कोइ  कसर नहीं छोडेगा।  भले ही प्रेमचंद की निर्मला की समस्याएॅं आज की कडवी सच्चायी न हो लेकिन, आधुनिकीकरण की मानसिकता का यह नंगापन , हमारी बहू बेटियों को निर्मला के जीवन की संघर्षों के ऐवज में कही विजय तेंडूलकर की कमला की घिनौनी यातनाओं को न थमा दे !!कारण , महिला की सुरक्षा और विकास संबंधी संवैधानिक प्रवधानो  को, उसके आरक्षण और प्रगति हेतु बनाये गये कानून को,  बदलते परिवेश के अनुसार, उसके व्यक्तित्व और अस्मिता में आए परिवर्तन के आधार पर फिर से खंगालने की आवश्यकता है । दहेज के रोकथाम के लिए बनी  विधियाॅं, पारिवारिक हिंसा और दौर्जन्य पर अंकुश लगाने  के लिए  कानूनी धाराएॅं,  वैवाहिक जीवन के क्लेश और विवाह विच्छेद संबंधी कानूनी नीतियाॅं, जितनी व्यक्ति सापेक्ष है, उससे अधिक गुना वे समय और परिवेश सापेक्ष भी हैं  । ये कानून पुरूष विचार या स्त्री विचार के एकपक्षीय संकीर्ण नीतियों के दायरे में बांधे भी नहीं जा सकते । इसीलिए जागरूकता हमारी सोच की यह होनी चाहिए कि कही हम अपने बहू बेटियों की सुरक्षा और उनके संरक्षण के लिए नये सिरे से गढने जा रही नीतियाॅं, विधियाॅं , कहीं उसी के पैर की कुल्हाडी न बने !!

चर्चा को हम इन आम प्रश्नों पर केन्द्रित कर सकते हैं  – 


 क्या लडकियाॅं, पिता की संपत्ति  में  अपने अधिकार को अपनी भविष्य सुरक्षा निधि ( दहेज/स्त्रीधधन )  के रूप में पाने की  हकदार हैं  ?
 दहेज/स्त्रीधन का प्रमाण और स्वरूप निर्धारित करने का अधिकार देनेवाले के हाथों में सुरक्षित रक्खें  कि लेनेवालों के ?
 दहेज रोकथाम कानून को जंगखाये हथियार मानकर, उसे सिरे से ही मिटाकर, नये परिवेश के अनुकूल नये कानून को ऐसे गढे, जो दहेज के स्थान पर लडका और लडकी के समान संपत्ति  के अधिकार को सामाजिक बल प्रदान करता हो ।
 इक्कीसवी सदी की मुक्त व्यापार और आर्थिक नीतियों के चलते, समाज के ऊंचे  वर्ग से लेकर , निचले वर्ग तक की स्त्रियों द्वारा, अपने आसमान को छूने की जद्दोजहद  और संघर्ष की  मानसिकता के कारण , प्राप्त की हुई  आर्थिक संबलता के सम्मुख, दहेज और उसके रोकथाम संबंधी बने कानून क्या फिसड्डी हो रहे हैं ? और उसके सुधारित रूप की चर्चा करना, बेकार है?
 अपने गिरेबान में झांक कर देखें कि कही हमारे शास्त्रीय और जनजातीय जीवन की प्रथाएॅं, स्त्री पुरूष संबंधों को लेकर उनके द्वारा गढी गयी प्राचीन मानकताएॅं, विवाह , दहेज , विच्छेद संबंधी पारंपरिक नीतियाॅं और कानून ही न कहीं आज की मांगे हैं ? परंपरा एवं शास्त्र को, जनजातीय जीवन व्यवस्था को बौना, कूढा अवैज्ञानिक मानकर समाज एवं नृतत्वशास्त्र के साचे में ढलते आ रही नीति और कानून पर सनातनी और कस्बायी का हव्वा बिठाने की गलती कहीं  हम कर तो न  गये हैं ?
 NCB  की  रिपोर्ट के मुताबिक अंडमान निकोबार में दहेज संबंधी किसी भी स्त्री के मौत का न पाया जाना , कहीं अपने आधुनिक अत्याधुनिक जीवन शैली के सामने ,फिर से आत्मावलोकन के लिए उठा हुआ बृहत्त प्रश्न चिन्ह तो  नहीं है ?
 इन तमाम गुत्थियों का उत्तर श्रम श्रद्धा और सृजन में ढली भारतीय स्त्री के अपने जीवन विमर्श में है, जो ही इक्कीसवी सदी का नया   स्त्री विमर्श कहलायेगा । इस नये स्त्री विमर्श का पहला पडाव, स्त्री विचार ,पुरूष विचार, दलित स्त्री दलितेतर स्त्री जैसे विभाजनों से समाज को मुक्त करना है । तदनुरूप प्रगतिगामी विचार को प्रतिष्ठित करनेवाली लिंगविहीन , तात्पर्य जैविक पहचान को खोना नहीं , जातिविहीन विचारवाद को बढावा देनेवाली मानसिकता को व्यक्तियों में पनपाना है।  और अंतिम लक्ष्य समाज के आचार व्यवहार में बसी बसायी तमाम आचारण और विचार भेदों को मिटाकर , मानवीय विचार वाद को बढावा देकर हर व्यक्ति को चाहे स्त्री हो या पुरूष उसके अधिकार का स्पेस प्रदान करना ह। इसके लिए लडायी जिनती कानूनी होगी उतनी ही गहरायी में वह मानसिक भी होगी, आर्थिक भी होगी और राजनयिक   भी । तभी जाकर इस मंथन अर्थ निकलेगा , खंगालन की प्रक्रिया का सार्थक परिणाम निकलेगा !!

औरत : आजाद होने का अर्थ !

अरविंद जैन

स्त्री पर यौन हिंसा और न्यायालयों एवम समाज की पुरुषवादी दृष्टि पर ऐडवोकेट अरविंद जैन ने मह्त्वपूर्ण काम किये हैं. उनकी किताब ‘औरत होने की सजा’ हिन्दी में स्त्रीवादी न्याय सिद्धांत की पहली और महत्वपूर्ण किताब है. संपर्क : 9810201120
bakeelsab@gmail.com

( इस आजादी का औरत के लिए क्या मायने हैं , पत्र शैली में बता रहे हैं अरविंद जैन. )

प्रिय पुत्र प्रिंस / शुभ आशीर्वाद !

स्वतंत्रता दिवस के बहाने, जन्मदिन पर शुभकामनाओं के लिए आभारी हूं। मैं सचमुच नहीं जानती-समझती कि तुमने क्या सोच कर लिखा है- ‘माई डियर मदर इंडिया!’। मैं ‘अंगूठा छाप’ औरत- ‘मदर इंडिया’! नहीं..नहीं.., नहीं हो सकती मदर इंडिया! सच तो यह है कि मैं, सिर्फ तुम्हारी अभागी मां ही बनी रही। अगर निष्पक्ष होकर सोचूं- कहूं तो मैं केवल ‘गांधारी’ से बेहतर नहीं बन-बना सकी अपने आपको। काश! ‘मदर इंडिया’ होती और अपने तमाम हत्यारे, बलात्कारी, भ्रष्टाचारी, दुराचारी, निकम्मे और दुष्ट बेटों को गोली मार देती, काश!

स्वाधीनता और जन्म दिवस के ऐसे शुभ अवसरों पर, हम औरतों को भी राष्ट्र की आर्थिक समृद्धि, सामाजिक कल्याण, सुख-शांति और न्याय की भावी योजनाओं, कल्पनाओं और सरकारी घोषणाओं के बारे में ही विचार-विमर्श करना चाहिए। करना चाहिए, इसीलिए तो 67 साल करते रहे उम्मीद कि एक दिन, हम भी आजाद होंगे और हमें भी मिलेंगे बराबर कानूनी हक, सामाजिक मान-सम्मान, आर्थिक आत्म-निर्भरता और राजनीतिक सत्ता में समान भागेदारी। हम चुप रहे अब तक मगर अब देश के हालात और औरतों की दयनीय स्थिति-नाकाबिले बर्दाश्त हो चुकी है। चाहो तो इसे अग्रिम चेतावनी या चुनौती भी समझ सकते हो।


1947 की आधी रात, जब सारी दुनिया सो रही थी और देश जीवन और आजादी के लिए जाग रहा था, उसी समय तुम्हारी नानी मुझे जन्म देकर, कोख के भार से मुक्त हुई थी। लेकिन मुझे या मुझ जैसी करोड़ों ‘अबलाओं’ को कोख से कब्र तक, न जाने कब छुटकारा मिलेगा। मिलेगा भी या नहीं। 67 साल से दमित, शोषित और पीड़ित आत्माओं की चीत्कार, न संसद को सुनाई देती है और न ही सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच पाती है। इसे ‘आधी दुनिया’ का दुर्भाग्य कहूं या अपने ही पिता-पति और पुत्र का सुनियोजित षड्यंत्र?
क्या हुआ ‘हर आंख से आंसू’ पोंछने वाले, बापू और उनके सपने का? क्या आज भी हर औरत की आंखों में आंसू और आंचल में असहनीय कष्ट और पीड़ा मौजूद नहीं है? कहां गये सपनों को यथार्थ में बदलने के वायदे, पद ग्रहण के समय ली गई शपथ, संविधान द्वारा घोषित मौलिक और मानवीय अधिकार या हर पांचवें साल, आम चुनावों के समय किये गए वायदे और घोषणाएं? गरीबपुरा से लेकर देश की राजधानी तक, है कोई ऐसा गांव, शहर या महानगर, जहां स्त्रियां हिंसा और यौन हिंसा की शिकार न हो रही हों? हर दिन..हर घंटे..हर मिनट! राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो के आधे-अधूरे आंकड़े भी, क्या किसी ‘माई के लाल’ को दिखाई नहीं देते!

लाखों महिलाओं को मौत के घाट उतारा जा चुका है और न्याय या कानून-व्यवस्था से आम औरतों ही नहीं, आदमियों का भी भरोसा उठता जा रहा है। लगता है किसी दिन, कागजी कानून की विशाल इमारतें अपने ही भार तले दब जायेंगी, बशर्ते कि समय रहते इन जर्जर संस्थाओं की ठीक से ‘मरम्मत’ नहीं की गई। मैं तो अब भी आशा और उम्मीद करती हूं कि हमारी मंगल कामनाओं के साथ, ‘राष्ट्र के प्रहरी’ विश्वासघात न करें। जो हुआ सो हुआ.. अब और नहीं। अब तुम्हें क्या-क्या और कैसे बताऊं- समझाऊं कि हम (दलित) महिलाओं को आए दिन, कहीं न कहीं निर्वस्त्र घुमाया जाता है, जिंदा जलाया जाता है, रिपोर्ट करो तो धमकाया जाता है, जबरन वेश्या बनाया जाता है, धर्म के नाम पर बहलाया- फुसलाया जाता है, बेटियों को गर्भ में ही मरवाया जाता है, भेड़-बकरियों की तरह खरीदा-बेचा जाता है, खाप पंचायतों के आदेश-अध्यादेश पर प्रेमी युगलों को पेड़ों पर लटकाया जाता है…..फांसी चढ़ाया जाता है।

‘भ्रूणहत्या’ से लेकर ‘सती’ तक बने-बनाये गये कानून, स्त्री हितों की रक्षा-सुरक्षा कम, आतंकित अधिक करते हैं, ‘रमीजा बी’ अब भी बलात्कार (सामूहिक) का शिकार हो रही है, तो ‘मथुरा’ और ‘सुमन रानी’ खाकी वर्दी वालों की हवस को शांत कर रही हैं। देवराला सतीकांड के तमाम हत्यारे बाइज्जत बरी कर दिये गये हैं। ‘निर्भया’ के हत्यारों की फाँसी पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा राखी है, इंसाफ की आस में औरतों की चीखती-चिल्लाती-भटकती आत्माएं, सालों से कोर्ट-कचहरी के चक्कर काट रही हैं। जिन्दा औरतें अपने ही घरों में असुरक्षित हैं, ‘अपना घर’ बेटियों के यौन शोषण-उत्पीड़न का अड्डा बना है और ‘आशा किरण’ में अंधेरे पसरे पड़े हैं।

‘फिजा’ अपने ही घर में मरी हुई पाई गई और ‘गीतिका’ ने आत्महत्या करना बेहतर समझा। बहुएं दहेज की बलिवेदी पर और बेटियां तेजाब काण्ड या गैंगरेप के दुष्चक्र में मर-खप रही हैं। अपराधी (अग्रिम) जमानत पर, छुट्टे घूम रहे हैं। ऐसे हत्यारे और दहशतजदा माहौल में, आजाद देश की औरतों को गुलामों से बेहतर नहीं कहा जा सकता। हां! शिक्षित-समृद्ध-साधन-सम्पन्न और कुछ अति-आधुनिक शहरी औरतें, इससे थोड़ा अलग मानी-समझी जा सकती हैं, जिनकी पहुंच ‘ऊपर तक’ है। मैं तो सिर्फ देश की उन आम औरतों की बात कर रही हूं, जिनकी व्यथा-कथा सुनने वाला कोई नहीं। राष्ट्रीय महिला आयोग और महिला संगठनों से लेकर राष्ट्रीय मीडिया तक।

अयोध्या-गोधरा से कुरुक्षेत्र तक, हर खुदाई में मिलेंगे स्त्री कंकाल ही। इन सब पर सोचने-समझने पर घोर घृणा भी हो रही है और पश्चात्ताप भी। पैदा होते ही ऐसे विषधरों का गला, क्यों न घोंट दिया माताओं ने। अब तो प्रायश्चित भी, असंभव-सा लगने लगा है। 67 साल की यह बूढ़ी मां क्या करेगी? अफसोस कि तमाम प्रतिभाशाली और क्रांतिकारी बेटे-बेटियां, जो सचमुच स्वाधीनता संघर्ष के दौरान बुने सपनों को साकार कर सकते थे या जिनमें देश की नियति बदलने की सारी संभावनाएं मौजूद थीं, सत्ता संस्थानों ने खरीद लिए, राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय पूंजी की गुलामी करने लगे या पेशेवर दलाल हो गये। कुछ ने सपनों के स्वर्ग अमेरिका, फ्रांस, इंग्लैंड या कहीं और जाकर ‘आत्महत्या’ कर ली।
जिनके बस का यह सब करना नहीं था, वो ‘फर्जी मुठभेड़’ में मारे गये या फिर अराजक जीवन की शराब पीते-पीते एक दिन, खून की उल्टियां करते हुए मिले। ऐसी विश्वासघाती और आत्मघाती होनहार पीढ़ियों को या राष्ट्र कर्णधारों को, यह बूढ़ी मां क्या कहे, कैसे कहे- ‘आजादी मुबारक’ हो। मुझे माफ करना पुत्र! यह सब लिखने के लिए।


तुमको मैं कुछ कहना ही नहीं चाहती थी, कभी कहा भी नहीं। सारी उम्र तुम्हारे नाम की, कभी सौंगध तक नहीं उठाई। पता नहीं क्यों, अब चुप रहना-सहना मुमकिन नहीं। ‘स्वाधीनता दिवस की पूर्व-संध्या पर, राष्ट्रपति का राष्ट्र के नाम संदेश’ सुनते-सुनते और लालकिले की प्राचीर से प्रधानमंत्री के भाषण में दिखाये सब्ज बागों से कान पक गये हैं। दुख तो यह भी है कि महिला प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, मुख्यमंत्री, गवर्नर, सुप्रीम और हाईकोर्ट की न्यायमूर्तियां और अन्य सांसद, मंत्री, अफसर वगैरह के होने के बावजूद, हम आम औरतों के हालात बद से बदतर होते गये हैं।कुर्सी मिलते ही औरत, औरत नहीं रहती, सत्ता के इशारे पर नाचने वाली ‘गुड़िया’ बन जाती है, गुड़िया। राजपथ पहुंचते ही सब भूल जाते हैं कि ‘दुर्गा पूजा’ पर घर भी जाना है, जहां यह बूढ़ी मांसालभर इंतजार करती रहती है। तुमने जाने-अनजाने मालूम नहीं कितने पुराने घाव, हरे-भरे कर दिये बेटा! किसी की लिखी दो लाइनें, रह-रहकर याद आ रही हैं-

“मां-बाप बहुत रोए, घर आ के अकेले में, मिट्टी के खिलौने भी, सस्ते न थे मेले में”

खैर..छोड़ो देश-दुनिया की बातें। सबसे पहले तो यह बताओ कि तुम और तुम्हारा घर-परिवार कैसा है? बहू रानी मस्त होंगी। बेटे, पोते कैसे हैं? बड़े वाले की बहू की, तो शक्ल तक न देखी। पोतों को भी, फोटो में ही देखा था सालों पहले। सुना था कि तुमने शानदार कोठी खरीद ली है। चलो, अच्छा है, बढ़िया है, खुश रहो, खुशहाल रहो। अब तो हम सब, ‘ग्लोबल विलेज’ में ही रहते हैं ना! सुना है कि देशों की सीमा-रेखाएं समाप्त हो गई, पर क्या सच में कभी होंगी? याद रखना कि तुम ‘हिन्दुस्तानी’ हो। जरूरत पड़ने पर सबसे पहले, तुम्हें ही देखा-परखा-पहचाना और खदेड़ा जाएगा।

हां! मैंने अपनी वसीयत ‘रजिस्ट्रेड’ करवा दी है। मृत देह अस्पताल को और चल-अचल सम्पत्ति, ‘राष्ट्रीय शिक्षा संस्थान’ के नाम कर दी है।

बहुत-बहुत स्नेह सहित
तुम्हारी मां उर्फ ‘मदर इंडिया’

कविता विकास की कवितायेँ

कविता विकास


कविता विकास   पेशे से अध्यापिका हैं , धनवाद में रहती हैं। एक काव्य संग्रह ‘लक्ष्य’ प्रकाशित।  संपर्क : 09431320288 ,kavitavikas28@gmail.com

१. धूरि 

अब  कोई तुम्हे  अबला कहे
तो बतला देना कि कैसे
उस दिन ज्वर में तपते हुए
तुम्हारी आँख क्या लग गई कि
गृहस्थी की गाड़ी रुक गयी
अस्त – व्यस्त हो गया माहौल
पता नहीं तुम्हे अबला समझने वाले
कद्देवार मर्द यह
समझ भी पाये या नहीं कि
तुम परिवार की धूरि  हो।
तुम्हारी पसंद – नापसंद को दरकिनार कर
कोई कौड़ियों की मोल तुम्हे बेच दे
तो प्रतिकार करना
कुलटा कहने वाले लोग
चंद दिनों में तुम्हारी अहमियत
समझ जायेंगे।
और हाँ ,पैसों की थैली फेंक कर
एक रात की दुल्हन तुम्हे बनाने वाले
वेश्या कहते थे न ,
अब उनकी पैसों की थैली
उनपर ही फेंककर जतला देना कि
उन्होंने अपनी आत्मा गिरवी रखी है
तुमने नहीं ,तुम तो प्राणवायु हो
जिसके बिना जीवन की कल्पना भी नहीं। 

२. बोंसाई

मैं कोई बोंसाई का पौध नहीं
जिसकी जड़ों को काट कर
शाखाओं – प्रशाखाओं को छाँट कर
एक गमले में रोप दिया ।
मैं तो मैं हूँ ।
बेटी ,बहन और पत्नी  के रिश्तों का
निर्वहन करती हुई भी
एक स्वतंत्र व्यक्तित्व  हूँ ।
अपना एक वजूद है
एक ठोस ज़मीनी सतह हूँ
जिस पर काल के झंझावातों ने
कम विनाश नहीं रचा।

फिर भी सुनहरी किरणों वाला सूर्य
हर दिन उगता है ।
हवाएँ सुरमयी संगीत बिखेरती हैं
नव पल्लवन को मैं उल्लसित रहती हूँ ।
मेरे अंतर को चीर कर देखो
गर्म लावा प्रवहित है   ।
जब भी मेरे वजूद को ललकारा
मैं ज्वालामुखी बन जाती हूँ ।
नहीं बनती मैं बेवज़ह बर्बादी का सबब
लेकिन मेरी कोमलता कायरता नहीं है ।
बंधी है इसमें एक कूल की मर्यादा
और आँगन की किलकारियों का अविरल प्रवाह ।
कुम्हार के चाक सा सुगढ़ निर्माण
लिखा है मेरी हथेलियों में
फिर भला क्यूँकर इनसे हो  विनाश ?
अपने सर्ग का उपहार
बस यही माँगू  मैं
कि बढ़ने दो मुझे वट सा विस्तृत ।
मेरी छांव से ना कर गुरेज
प्रकृति ,प्राणी ,प्रयास
मैं ही तो हूँ ।

बोंसाई के बगल में
अपनी पौध लहरा कर
सामंजस्य कैसे कर पाओगे तुम ?
दो एक विशाल आयाम मुझे
और अगर नहीं  दे पाए
तो मेरे आकाश को ना बाँधो
उड़ने दो मुझे स्वतः
जैसे नील गगन में उड़ता जाता है
पक्षी क्षितिज के पार ।

अतीत और वर्तमान को समझने की दिशा में एक प्रयास : रोमिला थापर के साथ कुलदीप कुमार की बातचीत

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” 1961 में ‘अशोका एंड द डिक्लाइन ऑफ द मौर्यास’ (अशोक और मौर्यों का पतन) के प्रकाशन के साथ ही, रोमिला थापर प्राचीन भारत के सर्वश्रेष्ठ इतिहासकारों के रूप में उभरकर सामने आयीं । 43 साल बाद भी, यह किताब उस महान सम्राट और उसके समय के बारे में सबसे ज्यादा प्रमाणिक व्याख्या बनी हुई है । 1966 में जब पेंग्विन ने उनकी किताब हिस्ट्री ऑफ इंडिया वोल्यूम 1 प्रकाशित की, तब लोगों ने महसूस किया कि इतिहास को इतनी स्पष्टता के साथ भी लिखा जा सकता है । जल्दी ही यह किताब हर उस व्यक्ति के लिए जो भारत के इतिहास को गहराई से समझना चाहता हो, एक मानक पाठ्यपुस्तक बन गयी । उसके बाद अनेकों और किताबें प्रकाशित हुर्इं और जैसा कि क्लुज पुरस्कार द्वारा उनके लिए सम्मान लेख में कहा गया, “प्राचीन भारत के विशिष्ट इतिहासकार” के तौर पर उन्हें व्यापक रूप से स्वीकार कर लिया गया । इतिहास के लिए उनकी अपनी तार्किक और वैज्ञानिक पद्धति के साथ–साथ धर्मनिरपेक्ष ध्येय के प्रति अपने निर्भीक समर्थन के कारण, उन्हें भारत और विदेश दोनों जगह हिंदुत्ववादी समर्थकों के हमलों और घृणित प्रचारों का निशाना बनना पड़ा । 
दिल्ली विश्वविद्यालय और कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में अध्यापन के बाद,1972 में उन्होंने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में प्राचीन भारत के इतिहास के प्रोफेसर का पदभार ग्रहण किया । अब वहाँ मानद प्रोफेसर हैं । रोमिला थापर विश्वविद्यालय के लेडी मार्गरेट हाल, ऑक्सफोर्ड की मानद सदस्य हैं तथा कार्नेल विश्वविद्यालय और युनिवर्सिटी ऑफ पेंसिल्वेनिया के साथ–साथ कॉलेज डी फ्रांस, पेरिस में अतिथि प्रोफेसर हैं । 1983 में उन्हें भारतीय इतिहास कांग्रेस का अध्यक्ष और 1999 में ब्रिटिश एकेडमी का सदस्य चुना गया था ।
रोमिला थापर दो बार, 1992 और 2005 में, पद्म भूषण ठुकरा चुकी हैं । तब राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम को लिखे अपने पत्र में उन्होंने स्पष्ट किया– “मैंने कुछ साल पहले ही यह निश्चय कर लिया था कि मैं सिर्फ अकादमिक संस्थानों या अपने पेशे से जुड़े संस्थानों के द्वारा दिये जाने वाले सम्मान ही स्वीकार करूँगी । मैं सरकारी सम्मान स्वीकार नहीं करूँगी ।” 2008 में, उन्हें इतिहासकार पीटर ब्राउन के साथ “स्टडी ऑफ ह्यूमैनिटी विषय” पर लाइफटाइम एचीवमेंट के लिए प्रतिष्ठित क्लुज पुरस्कार दिया गया । यूस लाइब्रेरी ऑफ कांग्रेस ने उन विषयों को सम्मिलित करने के लिए यह पुरस्कार शुरू किया था जिन्हें नोबेल पुरस्कार में शामिल नहीं किया जाता । कुलदीप कुमार ने उनसे  इस बारे में बातचीत की कि कैसे भारतीय इतिहास लेखन सदियों के दौरान विकसित हुआ । उन्होंने भारत में असहमति की परम्परा और वर्तमान समय में बौद्धिक अभिव्यक्ति का गला घोंटने के प्रयासों के बारे में भी बात की । ” 

प्रसिद्द इतिहासकार रोमिला थापर

आपकी हाल ही में प्रकाशित किताब “द पास्ट बिफोर अस” प्राचीन उत्तर भारत में ऐतिहासिक परम्परा के बारे में विस्तार से चर्चा करती है । फिर भी इस बात पर हैरानी होती है कि क्यों और कैसे यह दृष्टिकोण स्वीकार कर लिया गया कि भारतियों में ऐतिहासिक चेतना का अभाव है ?


मेरी यह किताब जो छह महीने पहले प्रकाशित हुई यह उस समय की ऐतिहासिक परम्परा के बारे में है जिसे मैं प्राचीन उत्तर भारत कहती हूँ – वह काल जो लगभग 1000 ईसापूर्व से 1300 ईसवी तक का है । यह किताब मूलरूप से इतिहास–लेखन का अध्ययन है और यह ऐतिहासिक लेखन का वह क्षेत्र है जिस पर भारत में हमने बहुत ज्यादा ध्यान नहीं दिया है, विशेष तौर पर प्राक–आधुनिक भारत के सन्दर्भ में । यह आधुनिक भारतीय इतिहास के लिए बेहद महत्त्वपूर्ण बनता जा रहा है लेकिन प्राक–आधुनिक भारतीय इतिहास के लिए इसका महत्त्व थोड़ा कम है । यह महत्त्वपूर्ण है क्योंकि यह उस समय के इतिहासकारों और विचारधारा का अध्ययन है जो हमारे इतिहास लेखन को प्रभावित करते हैं । इसलिए यह इतिहास लेखन पर इतिहास द्वारा की गयी टिप्पणी है ।
इसकी शुरूआत मेरे इस प्रश्न पर विचार करने से हुई  कि हर कोई यह क्यों कहता है कि भारतीय सभ्यता में इतिहासबोध का अभाव है । मैं यह नहीं समझ सकी कि क्यों एक जटिल सभ्यता का अतीत के बारे में कोई बोध विकसित नहीं हुआ और क्यों वह विशिष्ट तरीकों से अतीत से अपना सम्बन्ध कायम नहीं कर सकी । प्रत्येक समाज की अपने अतीत के बारे में एक समझ होती है और वह अपने अतीत को लेखन के भिन्न–भिन्न रूपों में अभिव्यक्त करता है ।

ऐसा क्यों कहा जाता है कि भारतीय सभ्यता में इतिहासबोध का अभाव है ? मेरा यह मानना है कि इसका सम्बन्ध भारतीय इतिहास के औपनिवेशिक लेखन से है । आपका अभिप्राय प्राच्यवादियों से है ?


कुछ हद तक प्राच्यवादियों  से, और कुछ हद तक प्रशासक–इतिहासकारों से, जैसा कि उन्हें अक्सर कहा जाता है । ये ब्रिटिश प्रशासक थे जिन्होंने इतिहास लेखन भी किया था और निश्चय ही इसका सबसे प्रमुख उदाहरण विंसेंट स्मिथ है । लेकिन उससे पहले भी 19वीं सदी में, प्राचीन भारतीय इतिहास को एक ऐसे इतिहास के तौर पर देखा जाता था जो एक ठहरे हुए समाज से आता था । जिसमें कोई बदलाव नहीं होता था । यह तर्क दिया जाता था कि अगर समाज में कोई परिवर्तन नहीं होता है तो यह स्पष्ट है कि उसके लिए इतिहास का कोई महत्त्व नहीं है, क्योंकि इतिहास परिवर्तन का दस्तावेज है, परिवर्तन की व्याख्या है । इसलिए अगर आप कहते हैं कि समाज ठहरा हुआ है तो एक हद तक आपका यह कहना उचित है कि उस समाज में इतिहास बोध का अभाव है ।

कुलदीप कुमार चर्चित स्तंभकार हैं , जनसत्ता के नियमित स्तम्भ -लेखक

ठहरा हुआ किस अर्थ में ?
इस अर्थ में कि बिलकुल ही कोई सामाजिक परिवर्तन नहीं हुआ और समाज का ढाँचा निरंतर एक जैसा ही बना रहा । इसके बाद उन्होंने इसे काल के सिद्धान्त के साथ जोड़ दिया और कहा कि काल का प्राचीन भारतीय सिद्धान्त पूरी तरह चक्रीय है । यह एक ही चक्र का निरंतर बार–बार दोहराया जाना है, जो निश्चय ही तकनीकी रूप से सही नहीं है, क्योंकि अगर आप चक्रीय समय की भी व्याख्या को पढ़ते हैं तो यह एकदम स्पष्ट हो जाता है कि चक्र का आकार परिवर्तित होता है और हर चक्र में मौजूद धर्म की मात्रा में भी परिवर्तन होता है ।

वास्तव में, यह कम होता जाता है ।
हाँ, कम होता जाता है । इसलिए यह आवश्यक है कि ऐसा होने के पीछे कोई न कोई सामाजिक परिवर्तन जरूर होना चाहिए । लेकिन इसे स्वीकार नहीं किया गया । हालाँकि इससे भी बढ़कर सबसे महत्त्वपूर्ण कारक यह था कि एक औपनिवेशिक ढाँचा, एक उपनिवेशी शासन, उस समाज के लोगों पर उपनिवेश या औपनिवेशिक समाज की अपनी खुद की समझ थोपना चाहता है । और ऐसा करने का सबसे बेहतर तरीका यह कहना है कि “हम तुम्हारे लिए तुम्हारे इतिहास की खोज करेंगे और फिर तुम्हें बताएँगे कि वह क्या था ।” ब्रिटिश उपनिवेशवाद ने इस काम को मुख्य रूप से प्राक–आधुनिक भारतीय इतिहास के बारे में इस समझ के साथ सम्पन्न किया कि इसका सारतत्व दो धार्मिक समुदायों के मेल से निर्मित हुआ है ।

हिंदू और मुसलमान ?
हाँ । यह जेम्स मिल्स के काल विभाजन तक (हिंदू, मुसलमान और ब्रिटिश काल) और भारतीय समाज को इन दो धार्मिक समुदायों के सन्दर्भ में देखने की सनक तक जाता है ।

महाभारत को पारम्परिक रूप से इतिहास के तौर पर श्रेणीबद्ध किया गया था । क्या अतीत को देखने का भारतीय तरीका बहुत अलग था ?
जब कोई प्राचीन भारत के पाठ का अवलोकन करता है तो यह सम्भव है कि उसे कुछ ऐसे पाठ देखने को मिलें जिनमें उसे इतिहास के किसी पहलू की झलक दिखायी दे । ब्रिटिश उपनिवेशवाद ने तर्क दिया कि सिर्फ कश्मीर में 12वीं सदी के दौरान लिखी गयी कल्हण की रचना ‘राजतरंगिणी’ में ही कश्मीर में इतिहास की झलक दिखायी देती है । उनका कहना था कि यह एक अपवाद था । हालाँकि मूल पाठों को सतर्कतापूर्वक देखने पर कुछ दिलचस्प पहलुओं की जानकारी मिलती है । उदाहरण के लिए, मूल पाठों के कुछ हिस्से का वर्णन ‘इतिहास’ के तौर पर किया गया है । इस शब्द का अर्थ उस तरह से ‘इतिहास’ नहीं है जैसा हम आज समझते हैं । इसका अर्थ केवल इतना है कि ‘अतीत में ऐसा हुआ था’ । अगर हम ‘इतिहास–पुराण’ शब्द को लें, तो उसका अर्थ है कि यह वही है जैसा हम सोचते हैं कि अतीत में घटित हुआ था । लेकिन इसके बारे में जो महत्त्वपूर्ण बात है वह यह है कि यहाँ एक खास तरह के इतिहास के बारे में एक सचेतनता है, भले ही वह ऐतिहासिक रूप से सही न हो । यही वह चीज है जिसमें मेरी दिलचस्पी है ।  इसलिए मैंने किताब में तर्क दिया कि इस प्रश्न के तीन पहलू हैं जिनकी जाँच–पड़ताल की जानी चाहिए । पहला, वह कौन से पाठ हैं जो ऐतिहासिक चेतना को प्रदर्शित करते हैं और जिन्हें हमें ऐतिहासिक तौर पर सही मानने की आवश्यकता नहीं है लेकिन जो उन लोगों की तरफ संकेत करते हैं जो कुछ हद तक इस दिशा में सोच रहे हैं । उसके बाद दूसरा पहलू वह है जिसे मैं ऐतिहासिक परम्परा कहती हूँ, जहाँ जो भी आँकड़े, विवरण या अतीत के बारे में जो कुछ मिल जाये, उसे हासिल करने का जान–बूझकर  प्रयास किया जाता है और फिर उसे एक साँचे में ढालने के लिए चालाकी से उसमें फेरबदल किया जाता है । मेरा तर्क यह है कि विष्णु पुराण के बारे में एक किताब में ऐसा किया गया है जहाँ अतीत का एक कथा के रूप में वर्णन किया गया – प्रारम्भ मिथकीय मनु से और उसके बाद उत्तराधिकारी समूहों, वंश समूहों, मध्य युग में गोत्रों और अन्त में राजवंशों और उसके शासकों को सूचीबद्ध किया गया है । आधुनिक इतिहासकारों के लिए जरूरी नहीं कि ऐतिहासिकता का प्रश्न महत्त्वपूर्ण हो – यानि यह महत्त्वपूर्ण नहीं कि कौन से व्यक्ति और घटनाएँ वास्तविक हैं – कि उस आख्यान में समाज के दो विभिन्न रूपों और ऐतिहासिक परिवर्तन की झलक प्रतिबिम्बित होती है ।

अशोक चक्र

आपका अभिप्राय इक्ष्वाकु से है ?2
हाँ, इक्ष्वाकु से आने वाली कुछ वंशावलियाँ और इला से आने वाली दूसरी वंशावलियाँ । मूल रूप से यह गोत्र समाज का एक रूप है जो राजवंशों से भिन्न है । इसके बाद आने वाले उत्तर–गुप्त काल में, रूपों में परिवर्तन होता है और वहाँ आख्यान का स्पष्ट और सचेत लेखन है जिसके बारे में दावा किया जाता है कि घटनाएँ वैसी ही लिखी गयी हैं जैसी वे वास्तव में घटित हुर्इं थीं । और दिलचस्प यह कि इनमें सबसे पहले बौद्धों और जैनियों के आख्यान शामिल हैं । बौद्धों और जैनियों की परम्पराओं में एक तीव्र इतिहास बोध पाया जाता है, वह शायद इसलिए है क्योंकि उनकी शिक्षाएँ और चिंतन ऐसे ऐतिहासिक व्यक्तियों पर आधारित हैं जिनका वास्तव में अस्तित्व था । इतिहास में उनका स्थान कोई भी स्पष्ट रूप से देख सकता है । दूसरी ओर, उत्तर–पौराणिक ब्राह्मणीय परम्परा तीन प्रकार की रचनाओं को देखती है जो वर्तमान और अतीत के अभिलेख हैं और इसलिए वह इतिहास लेखन में सहायक है । पहला, राजाओं के जीवन–वृतांत– ‘चरित्र’ साहित्य । हर्षचरित्र, रामचरित्र और इस प्रकार का अन्य आख्यान उपलब्ध है । दूसरा शिलालेख हैं जो लगभग हर राजा ने जारी किये । कुछ शिलालेख बेहद लंबे हैं जो राजवंशों का थोड़ा संक्षिप्त इतिहास और अलग–अलग राजाओं की गतिविधियों की जानकारी देते हैं । अगर किसी एक राजवंश के सभी शिलालेखों को कालक्रम में शुरु से अन्त तक एकसाथ रखा जाय तो उसका परिणाम उस राजवंश का एक खास तरह का इतिहास होगा । हमारे आज के बहुत से अध्ययन कि उत्तर–गुप्त काल में क्या हुआ था– कम से कम कालक्रम और राजवंशों से सम्बन्धित अध्ययन– मुख्य रूप से इन शिलालेखों पर आधारित हैं । और अभी हाल ही में इन शिलालेखों ने भूमि सम्बन्धों, श्रम और सत्ता के पदानुक्रम से सम्बन्धित राजनीतिक आर्थिक परिवर्तनों के प्रमाण भी उपलब्ध कराये हैं ।

यहाँ तक कि अशोक के आदेशपत्रों में भी एक इतिहास बोध दिखायी देता है । उसने ये आदेशपत्र अपनी प्रजा को निर्देश देने के तात्कालिक उद्देश्य से जारी किये थे, लेकिन भावी पीढ़ी भी उसके दिमाग में अवश्य रही होगी

हाँ, ऐसा ही हुआ होगा । उनमें से कुछ में तो वह यहाँ तक कहता है कि उसे उम्मीद है कि उसके पुत्र और पौत्र हिंसा का त्याग कर देंगे और अगर वे ऐसा नहीं कर पाये, तब भी कम से कम वे दंड देने के मामले में दयालु होंगे । इसलिए वहाँ भावी पीढ़ी के लिए लिखित निर्देश जारी करने की भावना है और मैं यह सोचती हूँ कि यह विशेष तौर से शिलालेखन से सम्बन्धित साहित्य में एकदम स्पष्ट है । एक पत्थर या ताम्रपत्र पर या एक खास तरह से बनाये गये स्तंभ या शिला के अग्रभाग या मंदिर की दीवार पर खुदवा कर लिखने का कष्ट क्यों उठाया गया ? ऐसा इस इच्छा के चलते किया गया ताकि अगली कई पीढ़ियों तक इसे लगातार पढ़ा जाय ।
तीसरे प्रकार का इतिहास लेखन निश्चय ही कालक्रम से किया गया अभिलेखन है । राजतरंगिणी कश्मीर का वृतांत है और वह बेहद शानदार और उच्चस्तरीय है । लेकिन इसके अलावा कई इससे छोटे वृतान्त भी इतिहास लेखन के उदाहरण हैं जिन्हें संजो कर रखा गया, हालाँकि वे कल्हण के इतिहास लेखन जितने उत्कृष्ट नहीं हैं ।
मध्यकाल में राजदरबारों में महाकाव्य साहित्य के नये संस्करणों का कालक्रमानुसार लेखन जारी रहा, रामायण और महाभारत के नये संस्करण लिखे गये और बाद में जन्मी कई नयी भाषाओँ में भी इनके नये संस्करण लिखे गये ।

आप दो महाकाव्यों – रामायण और महाभारत– को कैसे समझती हैं ? आम तौर पर हिंदू यह सोचते हैं कि उनमें जो कुछ भी वर्णन दिया गया है, ठीक वैसा ही घटित हुआ था । इन महाकाव्यों की ऐतिहासिकता को सुनिश्चित करने के लिए हस्तिनापुर और अयोध्या में खुदाई का काम भी किया गया ।
भारतीय महाकाव्यों की व्याख्या करने में इतिहासकारों के सामने दो समस्यायें पेश आती हैं । एक तरीके से यह भारत की विशिष्ट समस्या है, क्योंकि अन्यत्र कहीं भी महाकाव्य अनिवार्य रूप से धार्मिक पाठ नहीं बन पाये हैं । वे प्राचीन समय के नायकों का वर्णन करने वाली कविता ही बने रहे । लेकिन यहाँ ये पवित्र या अर्द्ध–पवित्र ग्रन्थ बन गये हैं । इसकी वजह से हमारे सामने दो समस्याएँ आती हैं । पहली बहुत ही आधारभूत समस्या है जो आजकल हर वक्त हमारे सामने पहले हमेशा से ज्यादा ही सामने आती रही है । यह समस्या आस्था और इतिहास के बीच सीमारेखा खींचने से सम्बन्धित है । यहाँ यह प्रवृति मौजूद है कि अगर आप एक इतिहासकार के रूप में महाभारत का अध्ययन कर रहे हैं तो महज इसलिए कि आप उसे एक पवित्र साहित्य की तरह देखते हैं । लेकिन आप ऐसा नहीं करते । एक इतिहासकार होने के नाते आप लेखन को उस दौर के समाज के सन्दर्भ में देखते हैं और आप उसे एक धर्मनिरपेक्ष, तर्कसंगत ढंग से विश्लेषित करते हैं ।
इससे समस्या पैदा होती है क्योंकि, आस्थावान व्यक्ति के लिए ये घटनाएँ वास्तव में घटीं । उनके लिए ये वे लोग थे जिन्होंने जिंदगी जी और जिन्होंने शिक्षा प्राप्त की, इत्यादि । जबकि एक इतिहासकार के लिए यह प्रमुख ऐतिहासिक चिंता नहीं है कि ये व्यक्ति और घटनाएँ ऐतिहासिक हैं या नहीं । महत्त्वपूर्ण बात उस व्यापक ऐतिहासिक सन्दर्भ को सुनिश्चित करना है, जिसका मूलपाठ में वर्णन किया गया है और यह देखना है कि साहित्य के रूप में उस समाज का सार प्रस्तुत करने में उसकी क्या भूमिका है । हमारे पास कोई ऐसा वास्तविक प्रमाण नहीं है कि इन लोगों का वास्तव में अस्तित्व था । जब तक हमें इस बात का वास्तविक प्रमाण नहीं मिल जाता, हम इस बारे में कोई फैसला नहीं ले सकते । ये दो अलग–अलग क्षेत्र हैं, लेकिन दुर्भाग्यवश आज हो यह रहा है कि आस्था के आधार पर बोलने वाले कुछ लोगों में– सब में नहीं, बल्कि एक छोटे–से हिस्से में – यह माँग करने की प्रवृति रखते हंै कि इतिहासकार ऐतिहासिकता को महज उसी आधार पर स्वीकार कर लें कि आस्थावान लोग इसे इतिहास मानते हैं । इतिहासकार ऐसा नहीं कर सकते । आज इतिहास को आस्था पर नहीं, आलोचनात्मक जाँच–पड़ताल पर आधारित होना चाहिए ।

प्रतिबंधित पुस्तक द  हिंदूज : ऐन  अल्टरनेटिव हिस्ट्री का कवर

यही वजह है कि इतिहास की पाठ्यपुस्तकों में परिवर्तन की माँग उठायी जाती है ?
हाँ, बिल्कुल । उदाहरण के लिए यह बहुत ही दिलचस्प है कि एनसीआरटी की उन पाठ्यपुस्तकों पर बहस की जा रही है, जिनमें हमने प्राचीन, मध्य काल और यहाँ तक कि आधुनिक समय तक का पूरा इतिहास लिखा । आज उन किताबों की आलोचना और उनमें बदलाव की माँग धार्मिक संगठनों और धार्मिक संस्थाओं की ओर से पेश की जाती है । ऐसी माँग दूसरे इतिहासकारों की ओर से नहीं की जाती । यह इस बात का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण लक्षण है कि कैसे आस्था, एक मायने में, इतिहासकारों के कार्यक्षेत्र में दखलंदाजी करती है ।
दूसरे, कोई भी यह प्रश्न पूछ सकता है कि क्या यह सिर्फ आस्था का मामला है, या जिसे आस्था की तरह पेश किया जाता है उसमें कोई राजनीतिक तत्व भी शामिल है ? क्योंकि जिन संगठनों द्वारा ये माँग पेश की जाती है, उनके राजनीतिक संगठनों से जुड़ाव हैं । हर हालत में, समाज में जिस संगठन का एक दबदबा होता है उसका कोई राजनीतिक रवैया भी होता है, जिसका ‘राजनीतिक’ शब्द के व्यापक अर्थ में इस्तेमाल किया जाता है । इसलिए, इतिहास के क्षेत्र में आस्था की दखलंदाजी सिर्फ धर्म और इतिहास का टकराव नहीं है । यह एक खास तरह की राजनीति के साथ टकराव भी है ।

आजकल हर किसी की धार्मिक भावनायें आहत होने के लिए उत्सुक रहती हैं । क्या हमारे यहाँ असहमति की परम्परा रही है ? प्राचीन भारत में किस हद तक असहमति को सहन या स्वीकार किया जाता था ?
निश्चय ही, हमारे यहाँ असहमति की परम्परा रही है । मैं इसे उदाहरण देकर समझाती हूँ । जब अतीत में लोग, खासकर बाहर से आने वाले लोग, भारत में धर्म के बारे में लिखते थे तब वे अक्सर दो मुख्य धार्मिक समूहों का सन्दर्भ लेते थे– ब्राहमण और श्रमण । वह चाहे ईसापूर्व चैथी सदी में मेगास्थनीज हो या 12वीं इसवीं में अल–बरूनी हो, वे सभी ब्राहमणों और श्रमणों की बात करते थे । वास्तव में, जैसे अशोक ने पंथों का जिक्र करते हुए अपने शिलालेखों में इनके बारे में बात की ।

क्या यह वैदिक और गैर–वैदिक का भेद है ?
इससे कहीं ज्यादा । क्योंकि जब हम अल–बरुनी के काल में आते हैं, तब ब्राहमण ही वेदों की और साथ ही पुराणों की भी शिक्षा दे रहे थे । पुराणों पर आधारित हिन्दुवाद ज्यादा लोकप्रिय था जैसे कि शिल्पकला, चित्रकला और कुछ साहित्यिक श्रेणियों में दिखायी देता है । श्रमणों में बुद्ध और जैन शामिल थे, जिन्हें ब्राह्मण नास्तिक कहते थे । सम्भव है कि इस शब्दावली में दूसरे सम्प्रदायों को भी शामिल किया गया हो जो वैदिक आस्था के अनुयायी नहीं थे, जैसे कि भक्तिमार्गी गुरू । इस दुचितेपन के बारे में दिलचस्प बात यह है कि पंतजलि ने संस्कृत के अपने व्याकरण–सम्बन्धी अध्ययन में इन दोनों का जिक्र विरोधियों की तरह किया है और इन्हें साँप और नेवले जैसा कहा है । इसका अर्थ यह है कि ब्राह्मणवादी परम्परा में गम्भीर असहमतियाँ मौजूद थीं ।

क्या यह संघर्ष में तब्दील हुआ ?


हाँ, कुछ मामलों में ऐसा हुआ । राजतरंगिणी में कल्हण वर्णन करते हैं कि उस काल के एक विशेष दौर में, पहली सदी के मध्य के आसपास बौद्ध सन्यासियों पर हमले हुए और बौद्ध मठों को तबाह किया गया । इसके बाद, तमिल स्रोत जैनियों को सूली पर चढ़ाये जाने का जिक्र करते हैं । शिलालेख शैवों और जैनियों के बीच, शैवों और बौद्धों के बीच और अन्य मतों के बीच असहमतियों का भी जिक्र करते हैं । लेकिन उनके बीच कभी भी जिहाद या धर्मयुद्ध नहीं हुए, हालाँकि असहिष्णुता की घटनाओं के प्रमाण जरूर मिले हैं ।
इसकी वजह यह हो सकती है कि प्राक–आधुनिक भारतीय सभ्यता में धार्मिक प्रवृति का उतना भेदभाव नहीं था । इसके बजाय उसका स्वरुप यह था कि जाति से सम्बन्धित लोग जाति के बाहर के लोगों को इंसानों से कमतर समझते थे । यह भारत में हर धर्म का चरित्र है भले ही वह धर्म यहीं का हो या कहीं बाहर से आया हो ।    असहमति इस अर्थ में दिलचस्प रूप ले लेती थी कि खुद दोनों परम्पराओं के भीतर भी असहमतियाँ थीं – ब्राह्मणवादी और श्रमणवादी दोनों में । यह बहस और विचारविमर्श की प्रचलित और स्थापित प्रक्रियाओं में भी स्पष्ट दिखायी देता है । पहले विरोधी पक्ष का दृष्टिकोण सम्पूर्णता में और निष्पक्ष रूप से पेश किया जाता और उसके बाद उस विचार के प्रस्तुतकर्ता की अन्तरविरोधी बातों को विस्तार से पेश किया जाता । उसके बाद ही सहमति या असहमति का निर्णय किया जाता । उल्लेखनीय यह है कि असहमति को मान्यता दी जाती और उस पर बहस की जाती । इस बात के अनेकों प्रसंग मौजूद हैं जब राजाओं के दरबार में लोग बहस के बाद विजयी हुए या पराजित हुए ।

और विरोधियों के दृष्टिकोण यानि पूर्वपक्ष के दृष्टिकोण को ईमानदारी से पेश किया जाता था ?
हाँ, क्योंकि वाद–विवाद सार्वजनिक रूप से आयोजित होता था ।

क्या लेखन के क्षेत्र में भी ऐसा होता था ?


हाँ, यहाँ लेखन के क्षेत्र में भी ऐसा होता था । जैसा कि किसी भी अच्छे विद्वता के क्षेत्र में किया जाता है कि अगर आपको किसी चीज का खण्डन करना है, तो पहले आपको उसे पूरी तरह समझना चाहिए । अन्यथा वह एक सतही आलोचना होगी । यह एक बेहतर पांडित्य का सार है और स्पष्ट रूप से यह उस वक्त अस्तित्व में था । असहमति का सामना करने का दूसरा तरीका जिसे काफी प्रभावी माना जाता था, वह यह था कि ब्राहमणवादी परम्परा उन लोगों को सहजता से नजरंदाज कर देती थी, जिनसे वे सहमत नहीं होते थे । विष्णुपुराण में ब्राहमणों, बौद्धों और जैनियों के बीच के तनाव की दिलचस्प झलक मिलती है जिसमें बौद्धों और जैनियों को महामोहा कहा गया है, जिसका अर्थ है – भ्रमित करने वाले । और इसके पीछे कहानी यह है कि उन्होंने ब्रह्माण्ड की व्याख्या करने वाले एक सिद्धान्त की कल्पना की, जो एक भ्रम था और जो लोगों को गलत दिशा में ले गया । इसलिए उन्हें भ्रमित करने वाला कहकर उनकी भर्त्सना की गयी । असहमति का मुकाबला करने का यह एक अलग ही तरीका था ।
आम तौर पर यह कहा जाता है कि वह शंकराचार्य ही थे जिन्होंने हिन्दुत्व की रक्षा की । लेकिन मुझे यह तर्क अस्वीकार्य लगता है क्योंकि उन्होंने बौद्ध धर्म के कुछ विचारों को हथिया लिया था । इसके अतिरिक्त बौद्ध धर्म के पतन के और भी कई कारण थे । यह दिलचस्प है कि मठों की स्थापना की व्यवस्था, जो पहले उस रूप में अस्तित्व में नहीं थी, वह कुछ हद तक बौद्ध और जैन विहारों के मठनुमा ढाँचे के समानान्तर खड़ी की गयी प्रतीत होती है । इसका प्रभाव यह था कि जब शिक्षा देने के काम को बड़े पैमाने पर संगठित और विस्तृत करना हो, तब उसका समर्थन करने के लिए एक संस्थान का होना आवश्यक था ।

कुछ भी हो, शंकराचार्य को ‘प्रच्छन्न बुद्ध” – एक गुप्त बुद्ध – की उपाधि दी गयी ।
हाँ, वह थे । लेकिन मैं सोचती हूँ कि ऐसा इसलिए था, क्योंकि उन्होंने आन्दोलन को संगठित करने के लिए श्रमणिक परम्परा की कुछ विशिष्टतायें अपनायी और यह एक ऐसा तथ्य है जिसे हम स्वीकार नहीं करते । विचारधारा की जाँच–पड़ताल करते समय यह देखना दिलचस्प है कि विरोधी परम्परा से क्या सीखा और हथिया लिया गया ।

रामायण की कई कथायें  प्रचलित हैं

रामकथा की बहुलता के बारे में आपकी क्या राय है ? बौद्ध और जैन परम्परा में इसके अनेकों रूपांतर पाये जाते हैं ।
लोगों के बीच इन कहानियों के अपने अलग–अलग संस्करण हैं । रामकथा एक बेहद लोकप्रिय कहानी थी और आज भी है । और बौद्ध जातक कथाओं में भी इसके कुछ हिस्से कई स्थानों पर पाये गये हैं । जिसे दशरथ कथा कहा जाता है वह कहानी का सिर्फ एक हिस्सा है । इसमें राम और सीता वनवास के लिए जाते हैं, वापस लौटते हैं और फिर एकसाथ 36,000 साल तक शासन करते हैं । मुख्य अन्तर यह है कि बौद्ध संस्करण में, राम और सीता भाई–बहन हैं । जैन संस्करण (पउमचरियम) पूरी तरह से जैन लोकाचार के अनुसार लिखा गया है । इसमें सभी (दशरथ, राम, सीता और दूसरे) जैन हैं । स्पष्ट रूप से यह एक मुख्य नायक की बड़ी कहानी पर अपना अधिकार जमा लेना है ।

इस संस्करण में, अन्त में दशरथ दुनिया का त्याग कर देते हैं–––
हाँ, दशरथ दुनिया का त्याग कर देते हैं और सीता आश्रम में चली जाती हैं । उन्हें निर्वासित नहीं किया जाता और न ही वह धरती में समा जाती हैं । दिलचस्प रूप से, वह ‘पउमचरियम’ ही ऐतिहासिकता का दावा करता है और कहता है कि ये घटनाएँ वास्तव में घटित हुर्इं थी । वह दावा करता है कि हम आपको बतायेंगे ये कैसे–कैसे घटित हुर्इं क्योंकि दूसरे संस्करण ठीक नहीं हैं । इस तरह वह दूसरे संस्करणों का विरोध करता है । यह एक ऐसा पाठ भी है जिसमें रावण और दूसरे राक्षसों को मेघवाहन वंश के सदस्य के रूप में वर्णित किया गया है जो चेदियों से सम्बन्धित है, जिसका एक बेहद दिलचस्प समानांतर ऐतिहासिक सन्दर्भ कलिंग के खारवेल के शिलालेख में मिलता है, जिसमें वह स्वयं को मेघवाहन कहता है और चेदियों का उल्लेख करता है । पउमचरियम का मुख्य तर्क यह है कि इन राक्षसों को कहानी के दूसरे संस्करणों में दुष्ट आत्माओं की तरह पेश किया गया है । रावण के दस सिर नहीं हैं । वह नौ विशाल मणियों वाला एक हार पहनता है जिसमें प्रत्येक में उसके सिर की झलक मिलती है । यह वाल्मीकि ‘रामायण’ और दूसरी रामायणों में दिये गये काल्पनिक चित्रों की तार्किक व्याख्या करने का प्रयास है ।
इतनी सारी रामायण क्यों लिखी गयीं ? यह हिन्दु धर्म की प्रकृति की वजह से है और यही वह बात है जो एक इतिहासकार के तौर पर मुझे हिन्दु धर्म के बारे में सबसे ज्यादा आकर्षित करती है । यह दूसरे धर्मों से बेहद अलग है । यह किसी एक ऐतिहासिक गुरु, एक पवित्र किताब, सामूहिक पूजापाठ, पंथ और सभी के लिए एकसमान आस्था, और यहूदी–ईसाई परम्परा जैसी दूसरी चीजों पर आधारित नहीं है । वास्तव में यह पथों का एक समूह है । आप किसी भी बात पर विश्वास कर सकते हैं, जब तक आप धार्मिक रस्मों को निभाते रहते हैं । और धार्मिक रस्में अक्सर जाति आधारित होती हैं । पुराने समय में आप किसी धार्मिक रस्म को निभाया जाता देखकर, उसमें इस्तेमाल की जाने वाली सामग्री और चढ़ावे को देखकर और वहाँ की जाने वाली प्रार्थनाओं को सुनकर यह अंदाजा लगा सकते थे कि यह ब्राह्मणवादी है या गैर–ब्राहमणवादी, या फिर यह निम्न जातियों की है या ऊपरी जातियों की । इसलिए मैं समझती हूँ कि सम्प्रदायों के सन्दर्भ में जाति एक बेहद महत्त्वपूर्ण पहलू है और अगर एक धर्म अनिवार्य रूप से अनेकों सम्प्रदायों के संसर्ग और सह–अस्तित्व पर आधारित है तो उसकी आस्था और रीतिरिवाजों के संस्करण भिन्न–भिन्न होंगे ।
इसलिए इन कहानियों की बहुलता है । और यह काफी हद तक उस सामाजिक संस्तर पर निर्भर है जहाँ लेखक का जन्म हुआ था । उदाहरण के लिए, कुछ लोक कथाओं में, जो शानदार कहानियाँ है और जिन्हें प्रायद्वीपीय भारत के कुछ हिस्सों के देहातों में सुनाया जाता है, उनमें सीता अक्सर लड़ाई का नेतृत्व करती है जो इस बात का प्रतीक है कि औरतों ने इस कहानी के अपने खुद के संस्करण गढ़े ।
यह कहीं भी किसी भी कहानी के लिए जायज है । आप देख सकते हैं कि लातिन अमरीका में ईसाई धर्म के साथ क्या हुआ, जिस भी इलाके में इसका प्रचार हुआ, वहाँ स्थानीय लोगों ने उसकी कहानी को अपनी खुद की परम्पराओं के अनुरूप ढाल लिया । यह वास्तव में किसी भी कहानी की महान संवेदनशीलता का लक्षण है कि कैसे वह लोगों की कल्पनाशीलता को आकर्षित कर लेती है और फिर वे उसे अपने अनुसार ढाल लेते हैं ।

मैंने बहुलता और विविधता के बारे में पूछा, क्योंकि आजकल इन बातों को सहन नहीं किया जाता । आपके नजरिये से एक लोकतांत्रिक समाज होने के नाते भारत के विकास के साथ ऐसा क्या गलत हुआ कि हम आज इस स्थिति में आ पहुँचे हैं ?
एक बार फिर ऐसा लगेगा कि मैं उपनिवेशवादियों पर आरोप लगा रही हूँ लेकिन यह सब ज्यादातर 19वीं सदी की विचारधारा पर आधारित है । औपनिवेशिक विद्वान और अधिकारी हिन्दु धर्म को लेकर भ्रमित थे, क्योंकि यह यहूदी और ईसाई धर्म के उनके अनुभव के साथ मेल नहीं खा रहा था । इसलिए उन्होंने सम्प्रदायों को एक रैखिक परम्परा में बाँध दिया और उन सबको मिलाकर एक धर्म का अविष्कार किया जिसे उन्होंने हिंदू धर्म कहा । आस्थाओं और रीतिरिवाजों का अपना खुद का इतिहास था, लेकिन उन्हें एक प्रारूप के अनुसार ढालने का विचार नया था । इनमें से कुछ परिशिष्ट तो बहुत पहले से अस्तित्व में थे । उदाहरण के लिए, शाक्त–शक्ति परम्परा –तांत्रिक परम्परा––को सातवीं या आठवीं इसवीं के स्रोतों से काफी प्रामाणिकता मिली । फिर भी शायद ये रीतिरिवाज और विचार कुछ विशेष श्रेणी के लोगों के बीच काफी समय पहले से अस्तित्व में थे । आम तौर पर लोग कहते हैं कि शायद यह गैर–वैदिक लोगों, निचली जातियों के लोगों, इत्यादि का धर्म था ।

मूर्तिकला इत्यादि में उनका विवरण किस तरह खुजराहो और कोणार्क के मंदिरों की दीवारों में स्थान पा सका ?
जैसे–जैसे समाज और उसका इतिहास बदलता है, अभिजात वर्ग के घटक भी बदलते हैं । हम सभी इस विचार के साथ बड़े हुए हैं कि जाति प्रथा एकदम दृढ और अवरुद्ध है । लेकिन वास्तव में अब हम देखते हैं कि राजनैतिक परिदृश्य काफी उदार था । जातियों के अन्तर्गत आने वाले समूह, सही परिस्थितियाँ मिलने पर, तिकड़म लगाकर उच्च सामाजिक स्थिति में पहुँच सकते थे ।


और इसके लिए उन्हें वंशावलियों को गढ़ना पड़ता था ।


हाँ, आप काफी हद तक सही हैं । कोई एक व्यक्ति या परिवार, प्रभुत्व और सत्ता तक पहुँच सकता था और उसके बावजूद भी वह उन देवताओं की पूजा कर सकता था जो शायद पौराणिक नहीं थे, उदाहरण के लिए कुछ देवियाँ । लेकिन चूँकि वे देवी–देवता अब नये अभिजात वर्ग द्वारा संरक्षित थे इसलिए उन्हें देव–समूह में शामिल किया जा सकता था और इस तरह वे पौराणिक हिंदू धर्म का हिस्सा बन गये । इसलिए पौराणिक हिंदू धर्म का अध्ययन आकर्षक और बेहद जटिल दोनों है, क्योंकि आप नहीं जानते कि कौन सी चीज कहाँ से आ रही है । परन्तु ऐतिहासिक रूप से इस बात का पता लगाना बहुत ही रोचक है कि ये विभिन्न घटक कहाँ फल–फूल रहे थे और कब और कैसे वे मुख्यधारा के धर्म का हिस्सा बन गये ।
जब मैंने 19वीं सदी के उपनिवेशवादियों का उल्लेख किया तब मैं एक धर्म वाले हिन्दुवाद के निर्माण की तरफ ध्यान आकर्षित करने का प्रयास कर रही थी जिसकी कुछ सुपरिभाषित चारित्रिक विशेषतायें हैं । जब धर्म के रूप और अन्तर्वस्तु को राजनीती तय करना शुरू करती है, तब वह साम्प्रदायिकता की परिघटना की शुरुआत करती है । मुस्लिम साम्प्रदायिकता के साथ ऐसा बड़ी आसानी से किया जा सका, क्योंकि यह पहले ही एक संस्थापक और उसकी शिक्षाओं इत्यादि के साथ एक ऐतिहासिक धर्म है । इसके समानांतर हिंदू साम्प्रदायिकता की शुरुआत हुई । ये दोनों एक–दूसरे के प्रतिरूप हैं । इसलिए हिंदू धर्म को फिर से इस तरीके से व्यवस्थित किया जाना जरुरी था, ताकि लोगों को राजनीतिक तौर से लामबंद करने के लिए धर्म का इस्तेमाल सम्भव हो । इसलिए ऐतिहासिकता का प्रश्न बेहद महत्त्वपूर्ण बन गया । अगर आप यह निश्चित करते हैं कि राम को धर्म के संस्थापक के रूप में स्थापित करेंगे तो आपको यह साबित करना होगा कि बुद्ध, ईसामसीह और मोहम्मद इत्यादि की तरह ऐतिहासिक रूप से उनका अस्तित्व था । उन लोगों के बारे में कोई विवाद नहीं है । अशोक ने लुम्बिनी में एक स्तंभ स्थापित किया, जिस पर लिखा है कि वहाँ बुद्ध का जन्म हुआ था । रोमन इतिहासकार ईसामसीह की गतिविधियों के बारे में लिख चुके हैं और अरब इतिहासकार मोहम्मद के बारे में लिख चुके हैं ।
इसलिए एक ऐतिहासिक संस्थापक और एक पवित्र किताब का होना जरूरी हो गया । जब बंगाल में पहली बार अदालतों का गठन किया गया तो जजों ने पंडितों से पूछा कि वे किस किताब पर हाथ रखकर शपथ लेंगे । आपकी बाइबल या कुरान कौन सी है ? तब कुछ लोगों ने रामायण का नाम लिया, कुछ ने उपनिषद और कुछ दूसरों ने गीता का नाम लिया । विवाद बरक़रार रहा । गांधीजी ने गीता को काफी ज्यादा महत्त्व दिया था, इसलिए बहुत से लोगों ने यह मानना शुरू कर दिया कि वह पवित्र किताब है । लेकिन जरुरी नहीं कि ऐसा हो । वह बहुत सी पवित्र किताबों में से एक है । इसी तरह राम बहुत से अवतारों में से एक थे, बहुत से भगवानों में से एक, बशर्ते आप यह मानते हों कि वह एक भगवान थे ।
उसके बाद एक संगठन का होना जरुरी था । अगर धर्म में विविध सम्प्रदाय शामिल हैं तब उन्हें एक साथ कैसे लाया जाय ? इस तरह, एक मायने में, ब्रह्म समाज, प्रार्थना समाज और आर्य समाज इत्यादि धर्म को इसी तरह संगठित करने के प्रारंभिक प्रयास थे कि वे संगठन संपूर्ण समुदाय की तरफ से बात रख सकें । लेकिन ऐसा नहीं हो पाया । इस तरह 1920 और 1930 के दशक में इन विभिन्न प्रयासों की असफलता के बाद हिन्दुत्व का उभार हुआ जो हिंदू धर्म की औपनिवेशिक समझ पर आधारित था और हिंदू धर्म से एक ऐसे धर्म के निर्माण का प्रयास किया गया जिसका राजनीतिक तौर पर इस्तेमाल किया जा सके । इसके लिए किस चीज की आवश्यकता थी ? हिंदुओं को एकमात्र मूलनिवासी परिभाषित किये जाने की आवश्यकता थी, क्योंकि उनका धर्म ब्रिटिश भारत के क्षेत्र में ही उत्पन्न हुआ था । इसके अतिरिक्त सभी धर्म विदेशी थे । इस तरह धर्म नागरिकता के अधिकार या विदेशी होने की परिभाषा तय करता है । यह राजनीतिक रूप से बेहद महत्त्वपूर्ण हो जाता है । ये एक बेहद महत्त्वपूर्ण संक्रमण है जो 19वीं सदी की विचारधारा पर आधारित है– औपनिवेशिक विचारधारा और साथ–साथ उसके प्रति भारतीय प्रतिक्रिया दोनों के रूप में ।

प्रतिरोधी धारा में लोकप्रिय रामकथा

इसका मतलब राजनीति ही है जो वेंडी डॉनिगेर कि ‘द हिंदूज , एन अल्टरनेटिव हिस्ट्री’ जैसी किताबों पर प्रतिबन्ध लगाने या उन्हें वापस ले लेने की मांग उठाती है ।


पेंगुइन द्वारा प्रकशित यह किताब उस बहुलता पर बहस करती है जिससे हिंदू धर्म की रचना हुई । यह विभिन्न सामाजिक सम्प्रदायों के बारे में और उनसे बने धर्मों के प्रकार के बारे में है, जिनके आधार पर हिंदू पूजा–पद्धति और विचार निर्मित हुए और इस बारे में है कि हिंदू धर्म के निर्माण में उन सम्प्रदायों का क्या योगदान है । एक किताब जो विकल्पों और बहुलता के बारे में बहस करती है, उसे प्रचारित किये जाने की अनुमति नहीं दी जा सकती । उन्होंने खुले तौर पर इस मुद्दे को नहीं उठाया, क्योंकि राजनीतिक रूप से इसे बहुत अच्छा काम नहीं कहा जाता । इसलिए उन्होंने इस तरह के मुद्दे उठाये कि डॉनिगेर कैसे कह सकती है कि राम एक ऐतिहासिक व्यक्ति नहीं थे । ज्ञान–विज्ञान की दुनिया में, ज्यादातर लोग यही कहेंगें कि अगर यह असत्य नहीं भी है तो इसका होना अनिश्चित अवश्य है ।
इसके अतिरिक्त उन पर शिव की विवेचना करने के लिए फ्रायड द्वारा इस्तेमाल किये जाने वाले तरीकों से विश्लेषण करने का आरोप लगाया गया और उनके कुछ वाक्यों पर आपत्ति जतायी गयी । यह ठीक है कि हर किसी को विरोध जताने का अधिकार है लेकिन विरोध जताने के लिए उन्हें यह समझाना चाहिए कि वे ऐसा क्यों सोचते हैं कि यह गलत है । उन्हें इसकी वजह बतानी चाहिए । आप सिर्फ यह कहकर अपना विरोध नहीं जता सकते कि इससे मेरी भावनाएँ आहत होती हैं, इसलिए मैं चाहता हूँ कि किताब पर प्रतिबन्ध लगा दिया जाय । यह एक ऐसी किताब है जो एक शोध प्रस्तुत करती है । आपको इसके खिलाफ शोध प्रस्तुत करना चाहिए । इसके खिलाफ शोध प्रस्तुत करना प्राचीन भारतीय परम्परा होगी । लेकिन दुर्भाग्यवश बहुत से ऐसे लोग जो “आहत भावनाओं’ के आधार पर किताबों पर प्रतिबन्ध लगाने की माँग रख रहे हैं, वे इसका विरोध करने के लिए शोध प्रस्तुत करने की योग्यता ही नहीं रखते ।
एक भावना यह भी है कि बहुत से लोग इतिहास के बारे में ऐसी लोकप्रिय किताबें लिख रहे हैं जो शायद तथ्यात्मक रूप से सही नहीं हैं । उदाहरण के लिए, चार्ल्स एलेन की ‘अशोका’ ।
इतिहास हमेशा ही दो बातों का शिकार हुआ है । पहली वजह के बारे में एरिक होब्सबान ने बहुत ही तीखेपन के साथ कहा है कि इतिहास, राष्ट्रवाद के लिए अफीम की तरह है । अतीत और भविष्य के सभी शानदार समाजों का निर्माण इतिहास के आधार पर हुआ है । इसलिए इतिहास ने हमेशा ही राष्ट्रवाद, और साथ ही राजनीति में, अत्यन्त महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी है । आप इस बात से बच नहीं सकते ।
दूसरी वजह यह है कि चूँकि इतिहास को कई मामलों में सिर्फ एक वृतांत के रूप में देखा जाता है–– जो समाजशास्त्र, अर्थशास्त्र, जनसांख्यिकी और अन्य क्षेत्रों से इस मामले में अलग है कि उनका अपना प्रणाली विज्ञान है । लोग यह मानते हैं कि जिस व्यक्ति ने इतिहास की छह किताबें पढ़ी हैं वह सातवीं किताब खुद लिखने की योग्यता रखता है । लेकिन हम लोग जो इस क्षेत्र में कार्य कर रहे हैं, लगातार यह बात कहते रहे हैं कि इतिहास का विश्लेषण का अपना एक तरीका है । जिन स्रोतों के आधार पर कोई राय बनाते हैं उनकी जांच करने की तमाम तरह की तकनीकी बारीकियाँ है । यह एक बेहद जटिल प्रक्रिया है । इसलिए यह एक और चीज है जिसकी वजह से इतिहास कष्ट उठाता है और भविष्य में भी उठाता रहेगा ।
इसलिए इतिहासकारों के बीच एक विभाजन रेखा है । एक तरफ वे इतिहासकार है जो पेशेवर रूप से प्रशिक्षित है और ऐतिहासिक विश्लेषण के तरीकों से वाकिफ हैं, और दूसरी तरफ वे शौकिया लेखक हैं जिन्होंने छह किताबें पढ़ी हैं और फिर वे खुद ही सातवीं किताब लिख देते हैं ।

50 साल पहले के मुकाबले इतिहास के अनुशासन की आज कैसी स्थिति है ?

पिछले 50 सालों के दौरान इतिहास भारी परिवर्तन से होकर गुजरा है, जिसका शायद एक औसत पाठक को अंदाजा नहीं है । उनका इतिहास बोध 20वीं सदी के मध्य से पहले का है । बहुत से एनआरआई समूहों के साथ यह समस्या है कि वे इतिहास को उसी शब्दावली में व्यक्त करते हैं जिससे वे 50 साल पहले परिचित थे । और वे अगली पीढ़ी के लिए लगातार उसी को दोहराते रहते हैं, जबकि हम इस बोध से अलग हट चुके हैं । यही वजह है कि इतना कम संवाद है ।
जब 1960 के दशक की शुरुआत में मैंने दिल्ली विश्वविद्यालय में अध्यापन शुरू किया, तब हम लोगों के बीच इतिहास के पाठ्यक्रम को राजनैतिक और राजवंशीय इतिहास के दायरे से निकालकर सामाजिक और आर्थिक इतिहास तक विस्तृत करने की आवश्यकता पर जबरदस्त वादविवाद, बैठकें, बहसें और व्याख्यान आयोजित होते थे । कभी–कभार यह वादविवाद उग्र हो जाता था और लोग पूछते थे कि यह अभिनव सामाजिक और आर्थिक इतिहास क्या है । आज कोई भी इसके बारे में प्रश्न नहीं करता । इसमें कुछ भी अभिनव नहीं है । उसके बाद हम कई नयी चीजों और नयी दिशाओं की ओर आगे बढ़ गये । फिर मार्क्सवादी इतिहास लेखन का लंबा दौर चला । उसके बाद इस बारे में काफी दिलचस्पी पैदा हुई जिसे ‘साहित्यिक मोड़” कहा गया, जो वास्तव में सांस्कृतिक मोड़ के साथ उत्तर–उपनिवेशवाद था । इतिहासकारों ने मूलग्रंथों का अध्ययन शुरू किया और फिर से उनका विश्लेषण करना शुरू कर दिया ।

उत्तर–आधुनिकतावाद के बारे में क्या कहेंगी ?
उत्तर–आधुनिकतावाद भी आया है । इसलिए यहां अब एक संपूर्ण नया परिदृश्य उभरा है जिसमें हम में से कुछ लोग बेहद सशक्त दृष्टिकोण रखते हैं । लेकिन मुद्दा यह है कि आपको उन बौद्धिक परिवर्तनों की जानकारी होनी चाहिए जो घटित हुए हैं । मैं अहंकारी नहीं दिखना चाहती, लेकिन मैं कहना चाहती हूँ कि आज हमारे सामने यह परिस्थिति है कि जो लोग समाज विज्ञान के क्षेत्र में लेखन का कार्य कर रहे हैं वे बेहद सशक्त बौद्धिक दृष्टिकोण के साथ यह काम कर रहे हैं । उन्होंने काफी व्यापक अध्ययन किया है, सिद्धान्तों की रचना की है और अतीत को समझने का प्रयास किया है । लेकिन उनका सामना एक बेहद साधारण दृष्टिकोण से हो रहा है । इसलिए बहस करना बेहद कठिन हो गया है क्योंकि जिस आधार पर आज अच्छे इतिहासकार सिद्धान्त गढ़ते हैं, वह अक्सर एक औसत पाठक भी नहीं समझ पाता और वे लोग तो और भी कम समझ पाते हैं जो पढ़ते ही नहीं हैं । और बहुत से ऐसे लोग जो किताबों पर प्रतिबन्ध लगाने या उन्हें बाजार से हटाने की मांग करते हैं वे उन किताबों को नहीं पढ़ते, जिन्हें वे प्रतिबंधित करना चाहते हैं ।

नोट
1–  प्राच्यवादी का अर्थ पूर्वी संस्कृतियों का अ/ययन करने वाले पश्चिमी विद्वान से है ।
2– वैदिक इतिहास के अनुसार इक्ष्वाकु मनु का पुत्र और सूर्यवंश का पहला शासक था, जो अयो/या का राजा था और राम इसी वंश में पैदा हुए थे । रामायण और महाभारत में इसका जिक्र मिलता है ।

देश विदेश अंक १८ जुलाई २०१४ से साभार , अनुवाद दिनेश पोसवाल ( यह बातचीत मूलतः  अंग्रेजी  की पत्रिका गवर्नेंस नाउ के लिए की गई थी  और पहली बार वहीं प्रकाशित हुई थी।   )

विमर्श नहीं, विचारधारा : अस्मितावाद की जगह आंबेडकर-चिंतन

बजरंग बिहारी तिवारी

बजरंग बिहारी तिवारी हिंदी के प्रसिद्द आलोचक हैं।  दलित मुद्दों पर इनकी प्रतिबद्धता जगजाहिर है और यही इनके आलोचकीय व्यक्तिव की खासियत भी है। सम्पर्क  .९८६८२६१८९५

( बजरंग बिहारी का यह आलेख ऐतिहासिक तथ्यों , विभिन्न स्रोतों से डा बाबा साहब आम्बेडकर के वकतव्यों के आधार पर मार्क्सवाद और अम्बेडकरवाद में जरूरी साह्चर्य की स्थापना देता है . इस क्रम में वे अस्मितावाद के अगले विकास के रूप में इसे अम्बेडकर चिंतन पर आधारित विचारधारा और राजनीति के रूप में देख रहे हैं , जिसका अनिवार्य रिश्ता मार्क्सवाद से बनता है. )

हिंदी दलित साहित्य में नयी पीढ़ी के हस्ताक्षर राज वाल्मीकि ने पिछले हफ्ते फोन पर हुई अनौपचारिक बातचीत में इस प्रश्न पर मेरी राय जाननी चाही कि क्या दलित लेखन निष्क्रियता के दौर में है. तुरंत जो सूझा वह जवाब मैंने दिया लेकिन संतोष न हुआ. प्रश्न इतना आसान है भी नहीं. जिस पृष्ठभूमि में यह सवाल उठाया गया है उसका ध्यान न रहे तो प्रश्न की व्यंजना का अनुमान नहीं लगाया जा सकता. अभी कुछ दिन पहले ही नई सरकार की ताजपोशी हुई है. तमाम दलित नेता सीधे तौर पर या पार्टी के स्तर पर अलायंस करके सता में साझीदार हुए हैं. जिसे दलितों की पार्टी के रूप में पहचाना जाता है ,वह पराजय का कीर्तिमान बनाकर किंकर्तव्यविमूढ़ दिख रही है. महाराष्ट्र में दलित पैंथर के उदय की परिस्थिति कुछ ऐसी ही थी. रिपब्लिकन पार्टी के कई नेता तब अपने समर्थक-समुदाय को नज़रंदाज़ करते हुए सता में शामिल हो गए थे. मतदाताओं ने उन्हें इसका फल भी भली-भांति दे दिया था. वह युवा दलित पीढ़ी के लिए मोहभंग का दौर था. उस मोहभंग की ऐतिहासिक परिणति ‘दलित पैंथर’ का निर्माण थी. बीस से तीस वर्ष के नौजवानों ने स्वार्थी नेताओं को धिक्कारते हुए ‘विचारधारा’ की ओर रुख किया था.

पैंथर का मैनिफेस्टो इसी का दस्तावेज़ी सबूत है. ‘कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो’ की तर्ज़ पर निर्मित इस घोषणापत्र पर आंबेडकर-चिंतन की नई इबारत रची गयी है. पैंथर के संस्थापकों की दृढ़ धारणा थी कि- “समाजवादी समाज व्यवस्था की स्थापना की चेतना से लैस होकर दलित-आंदोलन में ईमानदारी और प्रतिबद्धता से काम किया जाए तो दलित सभी प्रकार के शोषण से मुक्त हो सकते हैं और उनका उद्धार होने से कोई रोक नहीं सकता है.” दोनों ही विचारधाराओं से सामग्री लेते हुए पैंथर के ऊर्जावान युवाओं ने लस्त-पस्त सामाजिक आन्दोलन को एक बार पुनः खड़ा कर दिया था. पैंथर की जन सभाओं में हजारों-लाखों का जन सैलाब उमड़ता था और स्थिति-परिवर्तन की उनकी ईमानदार कोशिश को अपना मुखर समर्थन देता था. उस समय के दलित असंतोष को शब्द देते हुए बेबी कांबले ने लिखा-“अब हमारे नेता भी भ्रष्ट हो गए हैं. उन्हें दिल्ली की गद्दी चाहिए.यह देख मेरा मन रो पड़ता है. अगर भीमदेव न होते तो हम लोग पड़े होते किसी टूटी-फूटी झोपड़ी में और अन्न के लिए जंगलों में भटक रहे होते. पेट की आग बुझाने के लिए मरे जानवर खा रहे होते.” (‘जीवन हमारा’ मूल मराठी 1986, हिंदी अनुवाद 1995, अंतिम अनुच्छेद से) दलित पैंथर अगर संगठित रहता तो वह निश्चय ही वर्चस्ववादी ताकतों को निर्णायक शिकस्त देता. लेकिन बहुत जल्दी ही उसमें फूट पड़ गई. अपने को शुद्ध आंबेडकरवादी कहने वाले एक तरफ हो गए और वामपंथी रुझान वाले दूसरी तरफ.पैंथर के कार्यकर्ताओं में प्रारंभ में यह सहमति बनी थी कि वे रिपब्लिकन पार्टी ऑफ़ इंडिया (आरपीआइ) में शामिल नहीं होंगे. यह सहमति टूटी और तमाम पैंथर सक्रिय राजनीति में आ गए.

धम्म चक्र प्रवर्तन दिवस पर डा बाबा साहब आम्बेडकर उपस्थित लोगों को 22 प्रतिज्ञाएं दिलाते हुए

कई गुटों में बंटी आरपीआइ में दो गुट मुख्य थे- रूपवते गुट और दादासाहेब गायकवाड़ गुट. दादासाहेब गायकवाड़ धड़ा सांस्कृतिक प्रश्नों के साथ आर्थिक मुद्दों को भी तरजीह देता था. उस पर आरोप लगा कि वह मार्क्सवादी है. क्योंकि उस समय इन दोनों गुटों में प्रतिद्वंद्विता अपने चरम पर थी ,इसलिए वे व्यापक राजनीति में अपने प्रतिपक्षियों को पहचानने और उनसे मुकाबला करने की बजाए आपस में ही ज्यादा उलझे रहे. रूपवते गुट की उग्रता और आक्रामक शैली ने दादासाहेब गायकवाड़ गुट के साथ मार्क्सवादी विचारधारा को भी निशाने पर लिया. भीतरी गुटबाजी ने बड़ी कटुता पैदा की. प्रसंग-विशेष में कम्युनिज्म पर डॉ.आंबेडकर की कही बातों को सिद्धांत-कथन मानकर और कई बार उन कथनों में फेरफार कर मार्क्सवाद को घृणा का प्रतीक बनाया गया. महत्त्वपूर्ण आंबेडकरवादी विचारक रावसाहेब कसबे की किताब ‘आंबेडकर और मार्क्स’ (हिंदी अनुवाद उषा वैरागकर आठले, संवाद प्रकाशन, मुंबई, 2009) इस इतिहास का बड़ा मूल्यवान विश्लेषण करती है. कभी रूपवते गुट से सम्बद्ध रहे रावसाहेब कसबे मार्क्सवाद के प्रति गहरे विद्वेष से भरे हुए थे. उन्होंने ज्यों-ज्यों मार्क्स का अध्ययन किया, मार्क्सवादी साहित्य पढ़ा और फिर उसके परिप्रेक्ष्य में पूर्वग्रह मुक्त हो कर आंबेडकर के कार्यों और लेखन पर निगाह डाली, त्यों-त्यों उनका विद्वेषभाव पिघलता गया. यह किताब एक कष्टसाध्य वैचारिक रूपांतरण से गुजरे चिंतक की मार्मिक कथा कहती है. अस्मितावादी विमर्श अभी जिस बिंदु पर आकर ठहर गया है ,वह डॉ. आंबेडकर को कतई स्वीकार्य न होता. वे स्वतंत्रता, समता, बंधुत्व और न्याय पर आधारित समाज चाहते थे. जाति-बोध की किसी भी किस्म की निरंतरता उन्हें असह्य थी. एक भिन्न वैचारिक या सामाजिक इयत्ता के रूप में दलितवाद का जड़ीभूत ठहराव उनको मंजूर न होता. दलित जनता की आकांक्षाओं का दोहन करके व्यक्तिगत महत्त्वाकांक्षाओं की पूर्ति करने वाले उनकी नज़र में अपराधी ठहरते हैं. आंबेडकर का मंतव्य पहचानने वाले रचनाकार समय के इस नाजुक मोड़ पर हमारा ध्यान इसी तरफ ले जाना चाहते हैं. बेबी ताई कांबले की वह व्यथाजनित अभिव्यक्ति आज की रचनाकार अनिता भारती की तमाम कविताओं में प्रतिध्वनित हो रही है. बानगी के तौर पर एक कविता का अंश देखा जा सकता है-

तुम ले आए थे बाबा को
बाज़ार में
लगा रहे थे बोली
कह रहे थे देखो-देखो
हमारे बाबा ने झेले थे
दुःख-तकलीफें
जो तुमने दी थी उन्हें
अब तुम्हें भरना पड़ेगा
सबका हर्जाना
तकलीफें सुविधाओं में बदल रही थीं
कर रहे थे तुम विदेश यात्राएं
बोल रहे थे सभा-सम्मेलनों में
धिक्कार रहे थे उन्हें
जो सदियों से कर रहे थे अत्याचार
पर तुम्हारे पास एक अत्याचारग्रस्त
औरत खड़ी थी
लेकिन तुम्हारी आँखे उसकी पीड़ा से दूर
आसमान पर टिकी थीं
जो तुम्हें मिलना अभी बाकी था.
अब तुम बाबा को
घसीट लाए हो
व्यापार में
लोगों को बाबा के अपनाने के
जंतर-मंतर, हानि-लाभ सिखा रहे हो
सिखा रहे हो उनको
सूदखोर की तरह लाभ बटोरना
जबकि तुम्हारे पास
तुम्हारे भाई-बहन
भूख से बिलख रहे हैं.
हासिल की हैं तुमने
बिजनेस यात्राएं
अपने इन्हीं भूखे भाई-बहनों के बूते
गले, हाथ, लाकेट में लटकाए
भीम नाम की माला
ठीक स्वर्णकार की तरह
जो तुम्हारी ही तरह
सिद्धान्तहीन लोगों को चाहिए
पहनने के लिए (‘एक कदम मेरा भी’, अनिता भारती, बुक्स इंडिया, दिल्ली, 2013, पृ. 84-85)

अनिता भारती हिंदी दलित नारीवाद के प्रतिनिधि स्वरों में से एक हैं, अस्मिता-विमर्श की ढलान को पहचान कर और उसके इस तरह अदूरदर्शी सत्ता-विमर्श में बदलते जाने पर सवाल उठाकर दलित नारीवाद ने बड़ा मूल्यवान योगदान किया है. इसे विमर्श की जगह विचारधारा और क्षुद्र वैयक्तिकता की जगह मूल्यनिष्ठ प्रतिबद्धता को प्रतिष्ठित करने के उपक्रम के रूप में देखा जा सकता है. बाबासाहेब आंबेडकर की प्रासंगिकता और यथास्थिति से टकराने में उनकी अनिवार्यता को महसूस करने का इससे बेहतर तरीका और क्या होगा! घातक विचलनों से आगाह करते हुए दलित आन्दोलन को पुनः उसके मूल स्रोत से जोड़ना विमर्श के निष्क्रिय कर्मकांड से परिवर्तन के सार्थक प्रयासों की रक्षा है. यहाँ इस तथ्य को याद किया जाना चाहिए कि अस्मिता-विमर्श की एक परिणति सत्ता की दिशाहीन दौड़ में दिखी और दूसरी मूलनिवासीवाद जैसे रोमानी भावबोध में. इन दोनों से बचकर ही परिवर्तन की धारा प्रवहमान रह सकती है. आंबेडकर की वैचारिकी इसी अर्थ में अपरिहार्य लगती है. इसे समझने के कारण आलोचक-संपादक डॉ. तेज सिंह दलितवाद त्याग कर आंबेडकरवाद के प्रबल आग्रही हुए थे.

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इस साल आंबेडकर जयंती (14 अप्रैल,2014) पर बिलासपुर में आयोजित एक कार्यक्रम में युवा मराठी लेखक, संपादक और आंबेडकरवादी कार्यकर्ता राहुल कोसंबी को सुनने का मौका मिला. अपने व्याख्यान में राहुल ने यह बात जोर देकर कही कि श्रम और पूँजी के सवालों तथा मजदूर आंदोलन पर डॉ.आंबेडकर की समझ व तमाम अवसरों पर इस संबंध में लिए गए उनके निर्णयों को नए सिरे से देखने की जरूरत है. डॉ. आंबेडकर जब-जब आम श्रमिकों के मुद्दों को लेकर आगे बढ़े, संगठन बनाया अथवा चुनाव लड़ा तब-तब उन्हें ज्यादा सफलता मिली. उदाहरण के तौर पर राहुल ने स्वतंत्र मजदूर दल (इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी) की चुनावी सफलता को उद्धृत किया. इस पार्टी का निर्माण आंबेडकर ने 1936 में किया था. इसके बरक्स 1942 में उनके द्वारा स्थापित अखिल भारतीय शिड्यूल कास्ट फेडरेशन की 1946 के प्रादेशिक चुनावों में मिली पराजय की बात राहुल ने उठाई. राहुल ने इस अल्पज्ञात तथ्य की ओर भी ध्यान दिलाया कि इस फेडरेशन का निर्माण क्रिप्स मिशन के (प्रत्यक्ष) दबाव के नतीजे के चलते हुआ था. स्टेफोर्ड क्रिप्स के नेतृत्व में जो केबिनेट मिशन मार्च 1942 में भारत आया था वह धार्मिक, जातीय या सांस्कृतिक प्रतिनिधियों को ही मान्यता देता था और उन्हीं से संवाद करता था. क्रिप्स ने आंबेडकर से पूछा था कि वे अछूतों के प्रतिनिधि हैं या मजदूरों के. (‘आंबेडकर और मार्क्स’, पृ.68)  अनुसूचित जाति के हितों की चिंता के चलते आंबेडकर ऐसे फेडरेशन के निर्माण में संलग्न हुए थे. फेडरेशन की स्थापना 18-19 जुलाई 1942 में नागपुर में आयोजित अखिल भारतीय अस्पृश्यवर्गीय परिषद् में मंजूर प्रस्ताव के आधार पर हुई थी. इस अधिवेशन के दूसरे ही दिन आंबेडकर ने वाइसराय के कार्यकारी मंडल में श्रम मंत्री बनने की स्वीकृति दी थी. (वही, पृ.135).  उन्होंने आगे इस संगठन को बनाए रखने की बजाए रिपब्लिकन पार्टी की योजना बनाई मगर यह योजना उनके जीवनकाल में साकार न हो सकी. यह अनुमान लगाना मुश्किल नहीं है कि अगर उनके रहते यह पार्टी अस्तित्व में आयी होती तो उसका स्वरूप क्या होता और उसके सरोकार कैसे होते.

इतना निश्चित है कि तब यह जाति-विशेष की पार्टी के रूप में न पहचानी जाती और उसमें इतनी जल्दी तथा इतनी ज्यादा टूट-फूट न हुई होती. इस अनुमान का एक आधार बहिष्कृत हितकारिणी सभा का स्वरूप है. डॉ. आंबेडकर ने यह सभा अपनी आंदोलनधर्मी सक्रियता के शुरुआती दिनों 1924 में स्थापित की थी. सभा की कार्यकारिणी मिश्रित सदस्यों वाली थी. सभा का यह स्वरूप सचेत और सायास तरीके से निर्मित किया गया था. यह सिलसिला बाबासाहेब के पूरे जीवनकाल में कायम रहा. सन् 1927 में महाड़ के अस्पृश्यवर्गीय परिषद् में मनुस्मृति का दहन हुआ. परिषद् ने कई प्रस्ताव पास किए. इनमें दूसरा प्रस्ताव मनुस्मृति को जलाने का था. इसके प्रस्तावक सोशल सर्विस लीग के गं.नी. सहस्रबुद्धे थे. प्रस्ताव का समर्थन पां. ना. राजभोज ने किया था. मनुस्मृति को आग के हवाले करने का काम एक अछूत बैरागी के हाथों संपन्न हुआ. लंबे समय तक बाबासाहेब के सहयोगियों में शामिल रहे सहस्रबुद्धे जन्मना ब्राह्मण थे. राजभोज ग़ैरमहार (चमार जाति से) थे.डॉ. आंबेडकर की बड़ी स्पष्ट समझ थी कि “सामाजिक घटकों के परस्पर योग्य सहयोग पर ही सामाजिक पुनर्रचना निर्भर है.”(‘जीवन चरित’ धनंजय कीर, 1996, पृ. 38) आंबेडकर ने यह बात बर्ट्रेंड रसेल की एक किताब पर अपनी समीक्षा में लिखी थी. राजर्षि शाहूजी महराज की आर्थिक सहायता से उन्होंने ‘मूक नायक’ पत्र निकाला था. इसका पहला अंक 31 जनवरी  1920 को आया. अपनी दूरदर्शिता के चलते ही उन्होंने ‘मूक नायक’ का संपादक पांडुरंग नंदराम भटकर को बनाया था. भटकर महार थे और उनकी पत्नी ब्राह्मण परिवार से थीं. इस दंपत्ति को बहुत सामाजिक अपमान झेलने पड़े थे. प्रवेशांक में लिखा गया था-“अंग्रेजी राज के खिलाफ उठाया गया एतराज ब्राह्मणों के मुंह में यदि एक गुना शोभायमान होता है तो वही एतराज ब्राह्मणी राज के खिलाफ किसी बहिष्कृत व्यक्ति के उठाने पर हज़ार गुना शोभायमान होगा.” (वही, पृ.48) आंबेडकर का यह कथन आज वैश्वीकरण के ज़माने में और भी प्रासंगिक हो गया है. इसे अब यूं कहा जाना चाहिए कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों के बढ़ते-फैलते जाल पर व्यक्त की गई चिंता से कई गुना मूल्यवान चिंता दबंग जातियों द्वारा दलितों के उत्पीड़न की है. आंबेडकर का जीवन ताउम्र ऐसे ‘देशप्रेमियों’ की असलियत सामने लाता रहा जिनके देश के दायरे से दलित बहिष्कृत हैं. लोकमान्य तिलक ऐसे ही एक मान्य नेता थे. अखिल भारतीय अस्पृश्यता निवारण परिषद् का एक आयोजन उन्नीस मार्च 1918 में हुआ. तिलक ने इसमें हिस्सा लिया. अनपेक्षित पोजीशन लेते हुए तिलक ने अस्पृश्यता को मानने वाले ईश्वर को ईश्वर मानने से इनकार किया. लेकिन, परिषद् ने जब अस्पृश्यता के खिलाफ घोषणापत्र तैयार किया और उसे उपस्थित सदस्यों के सम्मुख हस्ताक्षर के लिए प्रस्तुत किया तो लोकमान्य तिलक ने उस पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया! टाइम्स ऑफ़ इंडिया के 16 जनवरी, 1919 अंक में डॉ. आंबेडकर ने लिखा-“स्वराज्य जैसा ब्राह्मणों का जन्मसिद्ध अधिकार है वैसा ही वह महारों का भी है… जब तक यह नहीं होगा तब तक स्वतंत्रता का दिन दूर रहेगा.”(वही, पृ.40 ) देश की स्वतंत्रता की चिंता डॉ.आंबेडकर को भी थी और तमाम राष्ट्रवादियों की तुलना में कहीं ज्यादा गहन व पुख्ता थी. ब्रिटिश शासन के प्रति उनका रवैया निर्भ्रांत तौर पर आलोचनात्मक था. इस बात पर काम ही लोगों का ध्यान जाता है कि डी. फिल.उपाधि हेतु लिखे उनके शोध-प्रबंध के सुपरवाइजर एडविन आर.ए. सेलिग्मन थे. सेलिग्मन मार्क्सवादी थे. उनकी कई किताबों में से एक ‘द इकॉनोमिक इंटरप्रिटेशन ऑफ़ हिस्टरी’ लेखक की वैचारिक रुझान की जानकारी के लिए देखी जा सकती है. आंबेडकर ने इनके मार्गदर्शन में 1916 में डी.फिल. किया था. यह प्रबंध आठ वर्ष बाद 1924 में ‘द इवोल्यूशन ऑफ़ प्रोविंशियल फाइनांस इन ब्रिटिश इंडिया’ शीर्षक से छपा. इस ग्रन्थ में आंबेडकर ने लिखा कि ब्रिटिश साम्राज्यवाद अपने देश के धनाड्यों और उनके उद्योगों के हित साधन में लगा हुआ है. यह सही है कि ब्रिटिश नौकरशाही ने देश में शांति और सुव्यवस्था स्थापित की. अब लोग इसका क्या करें? क्या वे इससे संतुष्ट हो जाएं? (वही, पृ.31) पूंजीवादी अर्थव्यवस्था और उसकी मूलाधार निजी संपत्ति की अवधारणा को समतामूलक समाज के निर्माण में बाधा मानना आंबेडकर के चिंतन में केंद्रीय मुद्दा है. इसे नज़रंदाज़ कर आंबेडकर की वैचारिकी को समझने का सिर्फ भ्रम पाला जा सकता है. यह बिडम्बना नहीं तो और क्या है कि अपने को आंबेडकर का उत्तराधिकारी घोषित करने वालों ने उनकी मृत्यु के तुरंत बाद समाजवादी विचार-दर्शन से संवाद और सहयोग करने की बजाए उससे शत्रुतापूर्ण रिश्ता बना लिया. इस रिश्ते के निर्माण और विकास में तथाकथित साम्यवादियो/समाजवादियों का भी कम योगदान नहीं है.

रावसाहेब कसबे की किताब उस वैचारिक परिदृश्य को मूर्त करती है, जो आंबेडकर के परिनिर्वाण के तुरंत बाद निर्मित हुआ था. डॉ.आंबेडकर ने रिपब्लिकन पार्टी की परिकल्पना स्वतंत्र मजदूर दल के विकसित संस्करण के रूप में की थी मगर वह अखिल भारतीय अनुसूचित जाति फेडरेशन की छाया-प्रति बन कर रह गया. दलितों के असली शत्रु कहीं पीछे ओझल कर दिए गए और मार्क्सवाद को दुश्मन की तरह देखा जाने लगा. दो-तीन पीढ़ियाँ इसी माहौल में पली-बढ़ीं. युवा होते रावसाहेब कसबे उन दिनों को याद करते हुए लिखते हैं-“उस समय कम्युनिस्टों के प्रति सहानुभूति रखना आंबेडकर-द्रोह की श्रेणी में आता था.”(आंबेडकर और मार्क्स’ पृ.२०) रावसाहेब इस बात को रेखांकित करते हैं कि रिपब्लिकन पार्टी के रूपवते गुट के नेताओं ने मार्क्सवाद विरोध का ऐसा वातावरण तैयार करने में अग्रणी भूमिका निभाई थी. उनकी पीढ़ी ने बाबासाहेब को देखा नहीं था. “बाबासाहेब के कुछ ही दिन पूर्व हुए महानिर्वाण के बाद हम इसी गुट को उनका सच्चा उत्तराधिकारी मानते थे…उनके विचारों को हम इन नेताओं के माध्यम से ही समझ रहे थे. हमें यह ढृढ़ विश्वास था कि हमारे नेता कभी झूठ नहीं बोल सकते.बाबासाहेब के साथ भावनात्मक तादात्म्य बनाने का एकमात्र रास्ता अपने नेताओं के प्रति निष्ठा रखना था.” (वही, पृ.२१) चीन का आक्रमण भी इन्हीं दिनों हुआ. कम्युनिस्ट चीन के प्रति गुस्सा सहज रूप से कम्युनिज्म के प्रति क्रोध में बदल दिया गया. कुल मिलाकर, “यह विचार हमारे दिल-दिमाग पर हावी था कि कम्युनिस्ट और उनकी विचारधारा ‘मार्क्सवाद’ हमारे देश की दुश्मन हैं…कम्युनिस्ट विरोध हमारे लिए अंतिम सत्य था.”(वही, पृ.२१) कई बार हुए एक ही प्रकार के अनुभव को याद करते हुए रावसाहेब लिखते हैं कि (चीन आक्रमण के समय बने) घोर राष्ट्रवादी माहौल में “जब रक्त संग्रह या चंदे के लिए कोई शासकीय सेवक या स्वयंसेवक उनके (कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं के) पास पहुंचता, तो वे डरते-डरते पूछ बैठते थे-“जिनके शरीर में पहले से ही खून की कमी है, उनसे क्यों खून माँगते हैं?” या फिर “जिनके पास दो जून की रोटी नहीं है, उनसे चंदा क्यों माँगते हैं?” सुनते ही उनका गला दबा देने की इच्छा होती.” (वही, पृ.२१) सारांश यह कि “समूचे वातावरण में कम्युनिस्टों के प्रति शत्रुता का भाव भरा हुआ था. इसी वातावरण में मैं बड़ा हुआ.”(वही, पृ.२१) रावसाहेब ने बड़े मार्मिक तरीके से अपने मानसिक रूपांतरण को शब्दबद्ध किया है. राजनीति शास्त्र में एम.ए.करते हुए उन्होंने मार्क्स और मार्क्सवादी सिद्धांतों के बारे में मजबूरन परीक्षा पास करने की गरज से पढ़ा. इससे उनके भीतर थोड़ी उत्सुकता जगी. इसी दौरान अहमदनगर में हुए बौद्ध साहित्य सम्मेलन में उन्हें रिपब्लिकन पार्टी के दूसरे धड़े के नेता दादासाहेब गायकवाड़ से मिलने और उनके साथ थोड़ा समय बिताने का मौका मिला. “उन्हें सुनने-समझने के दौरान मेरे अधिकांश पूर्वग्रह धीरे-धीरे पिघलने लगे और उनकी राजनीतिक भूमिका के बारे में पुनर्विचार करने की तीव्र आवश्यकता महसूस हुई.” इस उत्सुकता का विकास बाबासाहेब आंबेडकर के लेखन को परिवर्तित दृष्टि से पढ़ने के क्रम में हुआ.

 1916  में आंबेडकर ने जाति-व्यवस्था पर जो शोध निबंध लिखा था उसका आरंभिक वाक्य है- “समूची दुनिया का इतिहास वर्गीय समाजों का इतिहास है और भारत भी इसका अपवाद नहीं है”. बाबासाहेब के काठमांडू भाषण (जिसका आधा-अधूरा और गलत हवाला देकर मार्क्सवाद के प्रति नफरत में बढ़ोत्तरी की गई थी उसे) लेखक ने मूल रूप में पढ़ा. इसमें आंबेडकर ने बुद्ध की तुलना कार्ल मार्क्स से की है. इस भाषण का प्रास्ताविक अंश है- “भगवान बुद्ध और कार्ल मार्क्स की तुलना करना अत्यंत आकर्षक और मार्गदर्शक है. दोनों को पढ़ने और दोनों के दर्शन में गहरी रूचि होने के कारण, इनकी तुलना करने के लिए मुझे बाध्य होना पडा.” आंबेडकर की ‘गहरी रुचि’ से बावस्ता होने के बाद निरंतर अध्ययन के परिणामस्वरूप लेखक के “मन में जमा कट्टर कम्युनिस्ट विरोध और मार्क्सवाद संबंधी नफरत धीरे-धीरे समाप्त होने लगी. इस नई दृष्टि के आलोक में मैंने दीर्घ काल तक ढोए हुए जुए से मुक्ति पाने का संकल्प लिया और आंबेडकर तथा मार्क्स पर एक साथ विचार करना प्रारंभ किया.”(वही, पृ.24) अब जरूरत इस भीतरी परिवर्तन को सार्वजानिक करने की थी. जड़ीभूत परिवेश लेखक को इसकी अनुमति नहीं दे रहा था- “कार्ल मार्क्स के बारे में अनेक वर्षों से जमा हुआ मेरे मन का कलुष धीरे-धीरे घुलने लगा. मगर वह किसी से कहने की हिम्मत मुझमें नहीं थी.”(वही)जब भी किसी (दलित) व्यक्ति से उनकी मार्क्स पर चर्चा होती “तो वह उन्हें इस तरह भला-बुरा कहता कि मुझे कोफ़्त होती कि मैने यह बात छेड़ी ही क्यों!” सभा-संगोष्ठियो-जुलूसों में आते-जाते, अज्ञानजनित नफरत की परतों को जानते-बूझते और ‘लोक आग्रह के स्थान पर आत्मालोचना की आवश्यकता महसूस करने वाले’ दलित और दलितेतर युवकों से मिलते-जुलते क्रमशः साहस आता गया. बाबासाहेब के निकट सहयोगी रहे मिलिंद कॉलेज के यशस्वी प्राचार्य म.भि.चिटनिस की निकटता ने लेखक को अपने विश्वास के परीक्षण का अवसर उपलब्ध कराया.

रावसाहेब कसबे न तो आंबेडकरवाद को कम्युनिस्ट विचारधारा में शामिल करने की हिमायत करते हैं और न मार्क्सवाद को दलित आंदोलन में घुला देने की वकालत. उनका मानना है कि “दलित और वामपंथी आंदोलन को परस्पर शत्रुता रखकर अपनी सीमित शक्ति का दुरुपयोग करने की बजाए परस्पर सहयोग के द्वारा अपनी-अपनी सामर्थ्य का विस्तार करना चाहिए.” (वही, पृ.31) इस पारस्परिकता का विकास करने के लिए उन्होंने दोनों विचारधाराओं के उन पक्षों को रेखांकित किया जो संवाद और सहयोग में बढ़ोत्तरी कर सकते हैं. इस संदर्भ में आंबेडकर और मार्क्स के खुद के लेखन से ज्यादा सहायता और किस स्रोत से मिल सकती है! रावसाहेब कसबे की अगाध अध्ययनशीलता और तीक्ष्ण विश्लेषणात्मक दृष्टि से जन्मी यह किताब मानव-मुक्ति की चिंतनधारा में यादगार योगदान है. किताब का पहला संस्करण 1985 में आया था. सोवियत संघ के विघटन के छः वर्ष पहले. दूसरा संस्करण 2005 में आया. निजीकरण और अमेरिकीकरण की भव्य शुरुआत के डेढ़ दशक बाद. स्वाभाविक रूप से लेखक के सामने वैश्वीकरण एक बड़ा मुद्दा है. रावसाहेब वैश्वीकरण को ‘ऐतिहासिक विकासक्रम की नैसर्गिक व्यवस्था’ मानते हैं. अब उसके अच्छे या बुरे होने पर बहस करने का वक़्त नहीं बल्कि यह प्रयास करने का वक़्त है कि ‘उसे मानव जाति के लिए किस तरह पोषक और उपयोगी बनाया जा सकता है.’ लेखक के इस कथन की अनुगूंज पूरे अध्ययन में व्याप्त है कि “वैश्वीकरण की वर्तमान प्रक्रिया प्राकृतिक नहीं है बल्कि अमरीका जैसी महाशक्ति द्वारा अपने साम्राज्यवादी फैलाव के लिए एक साधन के रूप में इस्तेमाल की जा रही है.” सोवियत रूस के विघटन में पूंजीवादी ताकतों की सक्रियता को जिम्मेदार मानने से ज्यादा रावसाहेब ने वहां की खोखली और भ्रष्ट प्रशासकीय व्यवस्था को उत्तरदायी ठहराया है. मिखाइल गोर्बाचेव लिखित ‘पेरिस्त्रोइका’ को उन्होंने अपने विवेचन का आधार बनाया है. जनता की जरूरतों और आकांक्षाओं की रौशनी में अगर बेहतर से बेहतर व्यवस्था अपने को अद्यतन करते रहने को तैयार नहीं होती तो उसका ढह जाना अवश्यंभावी हो जाता है. दुनिया की तमाम क्रांतियों का जिक्र करते हुए रावसाहेब लेनिन के हवाले से यह बात कई बार रेखांकित करते हैं कि क्रांति एक सतत चलने वाली प्रक्रिया है. लेनिन का उद्धरण है- “इतिहास में ऐसी कोई भी क्रांति कभी भी संपन्न नहीं हुई जिसमें विजय पाने के बाद, बिना शस्त्र उठाए, बिना कुछ नया किए, सफलता की ख़ुशी मनाते हुए वह निश्चिन्त रह सकी हो. जिस समाजवाद का उद्देश्य सामाजिक विकासक्रम में पूंजीवाद से अधिक प्रभावी सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनैतिक परिवर्तन करना है,वह अपनी संपूर्ण क्षमता को प्रकट करके, अंततः एक मूलभूत नई रचना को साकार करने के लिए अनेक क्रांतिकारी चरणों से क्यों न गुजरे?”

कोई भी व्यवस्था अंततः समाज में रहने वालों के लिए और उन मनुष्यों के अनुरूप होती है. कम्युनिस्ट विचारधारा के आधार पर सोवियत संघ में जो व्यवस्था लागू की गई उसने ‘नए मनुष्य’ के निर्माण का काम अपने हाथ में नहीं लिया. नतीजतन, व्यक्ति और व्यवस्था में दूरी बनती-बढ़ती रही. इस दूरी का अंदाज हम सोवियत संघ के ढहने के चंद दिनों के भीतर चर्चों की बेतहाशा वृद्धि में देखते हैं. नए युवा जोड़ों ने अपनी सगाई की अंगूठियां तक इन चर्चों के निर्माण के लिए दान कर दीं. व्यक्तिगत संपत्ति के निषेध की संकल्पना के साथ अस्तित्व में आयी व्यवस्था अपने कार्यकर्ताओं, प्रशासकों और कर्मचारियों को अनैतिक, भ्रष्ट और बेतरह संपन्न होते देखती रही. बिडम्बना के दूसरे छोर पर निपट गरीबी में छटपटाते लोगों की दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ती संख्या दिखी. आंबेडकर को इस स्थिति का पूर्वाभास भले न रहा हो मगर वे इस बात पर आग्रह करते नज़र आते हैं कि कम्युनिस्ट समाज को बनाए रखने में बुद्ध धम्म सहायक हो सकता है. उन्होंने कहा- “बल प्रयोग हटाने पर साम्यवादी व्यवस्था का संरक्षण सिर्फ धर्म ही कर सकता है.” अब सवाल है कि यह काम कौन-सा धर्म करेगा? लेकिन, उससे पहले यह कि क्या कम्युनिस्ट धर्म वाले विकल्प को स्वीकार भी करेंगे? ईसाइयत को कम्युनिस्ट स्वीकार नहीं कर पाते. ईसाई धर्म ने ‘गरीबी का उदात्तीकरण किया और गरीबों को स्वर्ग की सुखद कल्पना में भटका दिया.’ लेकिन बुद्ध का धम्म ऐसा नहीं. वह साम्यवाद के लिए उपयोगी हो सकता है. डॉ.आंबेडकर के शब्द हैं- “रूसी लोग बल-प्रयोग समाप्त करने के बाद साम्यवाद को मजबूत आधार प्रदान करने के लिए एक पुख्ता सहायक की दृष्टि से बौद्धधम्म के बारे में नहीं सोच रहे हैं.” सोवियत संघ की स्थापना के साढ़े तीन दशक बाद आया यह सुझाव किस चिंता से प्रेरित है, इसे अलग से स्पष्ट करने की जरूरत नहीं. आंबेडकर की इस पीड़ा का मूल्य साम्यवादी व्यवस्था के समर्थकों की समझ में क्यों नहीं आया यह किसी भी नए अध्येता के लिए आश्चर्य का विषय हो सकता है. रावसाहेब कसबे ने लिखा- “आंबेडकर ने बौद्धधम्म को साम्यवाद का अंतिम सहायक माना, इस बात को बौद्ध जगत भी स्वीकार करेगा कहा नहीं जा सकता. साथ ही मूलतः कम्युनिस्ट-विरोधी और स्वयं को आंबेडकरवादी कहने वाले तक आंबेडकर द्वारा दी गई इस प्रस्थापना को पचा पाएंगे, यह कहना मुश्किल है. बाबासाहेब द्वारा बौद्धधम्म को प्रदान किए गए इस श्रेष्ठतम स्थान को समझने में कम्युनिस्टों की तरह वे भी ‘कोरे’ हैं. कम्युनिस्ट और बौद्ध दोनों ही परस्पर एक-दूसरे की परिभाषाओं को नहीं समझना चाहते और दोनों ही अब विनाश के कगार पर खड़े हैं.” (वही, पृ.48)

साम्यवाद पर सबसे ज्यादा हमला ‘सर्वहारा के अधिनायकत्व’ को लेकर होता है. आलोचक इसे ‘कम्युनिस्ट तानाशाही’ कहते हैं. आंबेडकर ने इस तानाशाही पर विचार किया. उन्होंने ‘दीर्घकालीन तानाशाही’ से असहमति जताई परंतु साथ ही यह भी स्वीकारा कि ‘सोवियत संघ में कम्युनिस्ट तानाशाही ने आश्चर्यजनक प्रगति की है, इसे झुठलाया नहीं जा सकता.’ इससे एक कदम आगे बढ़कर उन्होंने सुझाव दिया कि “सोवियत तानाशाही अन्य पिछड़े देशों के लिए भी उपयुक्त हो सकती है.” बेहद अंतर्दृष्टिपूर्ण ढंग से उन्होंने कहा कि मनुष्य को भौतिक विकास के साथ आत्मिक विकास भी करना होता है. “दीर्घकालीन तानाशाही ने मनुष्य के आत्मिक मूल्यों की ओर कोई ध्यान नहीं दिया.”समानता पर्याप्त नहीं है. वह स्वतंत्रता और बंधुत्व के साथ मिलकर ही पूर्णतर होती है. साम्यवाद समानता पर एकाग्र होकर रह जाता है. ‘बुद्ध के बताए रास्ते का अनुसरण करने पर ही ये तीनों चीजें एक साथ मिल सकती हैं.’

आंबेडकर का धम्म परंपरागत बौद्ध मत नहीं है. वह हीनयान और महायान से भिन्न नवयान है. यह संघबद्ध या संस्थागत धर्म न होकर मुक्ति का वैयक्तिक मार्ग है. बिचौलियों से रहित. इसमें संघम् शरणम् गच्छामि की जगह ‘अत्त दीप भव’ (‘अप्प दीपो भव’- स्वयं अपना दीपक बनो) पर ज़ोर है. मार्क्स ने जिस ‘समग्र मानव’ का सपना देखा था उसका गहरा संबंध इस नवयान की अवधारणा में स्थित मनुष्य से है. वैयक्तिकता की चिंता आंबेडकर के यहाँ मिलती है तो मार्क्स भी इस चिंता में साझीदार नज़र आते हैं. पूंजीवादी हड़पू व्यक्तिवाद भी वैयक्तिकता की बहुत परवाह करता प्रतीत होता है. इनमें अंतर व्यक्तिगत संपत्ति के मुद्दे पर है. आंबेडकर और मार्क्स दोनों ही निजी संपत्ति की अवधारणा को ख़ारिज करते हैं.आंबेडकर यों तो हिंसा के प्रयोग को प्रायः किसी भी स्थिति में समर्थन नहीं देते लेकिन निजी संपत्ति में निहित हिंसाचार को पहचानने के कारण वे कहते हैं-“अतः जिसकी निजी संपत्ति अन्य लोगों के दुःख का कारण बनती है, ऐसे अर्थ-पिशाच को क्यों न मारा जाए? कोई निजी संपत्ति को इतना पवित्र क्यों माने?” आंबेडकर इस आरोप पर कि सिर्फ कम्युनिस्ट राज्यों में हिंसा होती है निराकरण करते हुए कहते हैं-“ग़ैर कम्युनिस्ट देश एक-दूसरे से युद्ध करते हैं, उन युद्धों में लाखों लोग मारे जाते हैं, क्या यह हिंसा नहीं है?” हिंसा के प्रश्न पर बुद्ध और मार्क्स की तुलना करते हुए उन्होंने लिखा-“बुद्ध और मार्क्स के बारे में कुछ गलतफहमियां हैं, पहले उन्हें दूर करना जरूरी है. सबसे पहले हम हिंसा पर विचार करते हैं. कुछ लोग हिंसा के बारे में सोचते ही थर-थर कांपने लगते हैं. यह सिर्फ एक भावना हैं. मानव-जाति कभी भी हिंसा से दूर नहीं रह पाई है… बुद्ध भी हिंसा का विरोधी था, परंतु वह न्याय के पक्ष में था. जहां न्याय की प्राप्ति के लिए बल प्रयोग की अनिवार्यता हो, वहां इसका प्रयोग करने की वह अनुमति देता था.”(पृ.45-46)

सिद्धांत और व्यवहार में एकरूपता पर बल मार्क्स और आंबेडकर दोनों के यहाँ समान रूप से है. किसी भी कार्य के पीछे चिंतन का होना जरूरी है और बगैर क्रियाशीलता के कोई चिंतन बेमतलब का है. मार्क्स का क्रांतिकारी कथन है- “बिना कर्म का कोई दर्शन या तो हवा में उड़ जाने वाला होता है या फिर श्रद्धा को धंधा बनाने वालों की रूढ़ियों में जड़ हो जाता है. बिना दर्शन के कोई क्रिया निकट-दृष्टिदोष बन जाती है या फिर औपचारिक और नीरस कर्मकांड बन जाती है.” मार्क्स से पहले का भौतिकवाद मनुष्य को परिस्थितियों के अधीन मानता था. मार्क्स ने ‘थीसिस आन फायरबाख’ में लिखा कि ‘मनुष्य स्वयं भी परिस्थितियों को बदलता है.’ पुराने यांत्रिक भौतिकवाद से मार्क्स के क्रांतिकारी भौतिकवाद का यह फर्क है. रावसाहेब कसबे बताते हैं कि “बुद्ध और उनका धम्म पुस्तक में बाबासाहेब ने कार्ल मार्क्स का व्यावहारिक दर्शन (प्रैक्सिस) उनकी भाषा में ही प्रस्तुत किया है.” (पृ.82) अपनी इस बात के समर्थन में उन्होंने पुस्तक से दो उदाहरण दिए है. पहला उदाहरण उस समय का है जब ज्ञान-प्राप्ति के बाद बुद्ध के मन में अंतर्द्वंद्व चल रहा था कि उपदेश दिया जाए अथवा नहीं. आंबेडकर ने लिखा- ‘भगवान बुद्ध को अहसास हुआ कि इस दुनिया को बदल कर बेहतर बनाना जरूरी है.’ मार्क्स का प्रसिद्ध कथन है- “अनेक दार्शनिकों ने अब तक दुनिया की सिर्फ व्याख्या की है, परंतु असली सवाल है उसे बदलना.”बुद्ध और उनका धम्म में आंबेडकर पारम्परिक धर्म से अपने धम्म का अंतर बताते हुए कहते हैं- “ ‘धर्म’ का उद्देश्य इस दुनिया की उत्पत्ति को समझाना है, परंतु ‘धम्म’का उद्देश्य इस दुनिया की पुनर्रचना करना है.” (पृ.82) रावसाहेब की टिप्पणी है कि बुद्ध और उनका धम्म में अपने नव बौद्ध धम्म की प्रस्थापना करते हुए आंबेडकर कार्ल मार्क्स के नजदीक पहुंचते हैं और “उनकी प्रस्थापना मार्क्सवाद का विकल्प देने के स्थान पर मार्क्सवाद के पूरक (अल्टीमेट ऐड) के रूप में दिखाई देती है.” (पृ.81)

मार्क्स दुनिया के इतिहास को वर्गीय इतिहास के रूप में देखते थे. आंबेडकर भी इससे असहमत नहीं- “वर्गीय समाज का अस्तित्व एक वैश्विक तथ्य है इसलिए आरंभिक हिंदू समाज भी इसका अपवाद नहीं है.” अब सवाल था कि इस वर्ग से जाति कैसे बनी? आंबेडकर ने लिखा-“भारत में वर्ग गोलबंद हो गए, परंतु अन्य देशों में ऐसा नहीं हुआ. जाति और वर्ग एक दूसरे के पड़ोसी हैं और जाति ही गोलबंद वर्ग है.” (पृ.92) मनुस्मृति में जाति प्रथा का समर्थन है परंतु मनु इस प्रथा का जनक नहीं. उसने जाति-संस्था को सैद्धांतिक रूप देने में अपनी भूमिका निभाई. अगर धर्मग्रन्थ जाति के निर्माण और निरंतरता के जिम्मेदार नहीं तो उनकी आलोचना तक सीमित रहकर इस प्रथा का उन्मूलन भी नहीं किया जा सकता. आंबेडकर के शब्द हैं- “जाति-संस्था का निर्माण उपदेश मात्र से नहीं हुआ है और न ही उसे केवल उपदेशों से समाप्त किया जा सकता है.” जब तक आर्थिक संबंध नहीं बदलते, उत्पादन के साधनों पर पारंपरिक स्वामित्व का अंत नहीं होता तब तक जाति संरचना में आधारभूत परिवर्तन संभव नहीं लगता. जो विचारक मात्र धर्मग्रंथो की निंदा को जाति-उन्मूलन का हेतु मानकर संतुष्ट हो जाते हैं और आंदोलन का ध्यान वास्तविक भौतिक स्थितियों की ओर जाने में रुचि नहीं लेते उसके नतीज़ों पर रावसाहेब कसबे लिखते हैं-“आजकल दलित सांस्कृतिक आंदोलन में जो उग्रता दिखाई देती है, उसके मूल में संस्कृति के उद्भव के प्रति अज्ञान है.सांस्कृतिक संघर्ष महज देवी-देवता, धर्म-ग्रंथ और दर्शन का विरोध करके सफल नहीं होता बल्कि यह संस्कृति जिस भौतिक आधार पर खड़ी है उसे बदलना अनिवार्य है.बाबासाहेब के संस्कृति संबंधी इन विचारों को यदि स्वीकार कर लिया जाए, तो सांस्कृतिक आंदोलन में अग्रिम पंक्ति में लड़ने वालों को हवा में तलवार भांजने की आवश्यकता महसूस नहीं होगी.”(पृ.97)

डा आम्बेडकर के बाद के भारत में दलित आन्दोलन के प्रमुख हस्ताक्षर नामदेव ढसाल

अपने वक्त की राजनीतिक शक्तियों के वर्गीय स्वरूप की पहचान आंबेडकर को थी. 1937 में मैसूर में दलित-वर्ग की जिला परिषद आयोजित की गई थी. इसके अध्यक्षीय भाषण में उन्होंने गांधीजी और कांग्रेस के वर्ग-चरित्र पर टिप्पणी करते हुए कहा-“मुझे पूरी आशंका है कि गांधीजी कभी भी मजदूरों और दलितों का पक्ष नहीं लेंगे…साधारण मनुष्य को अपना विकास करने की स्वतंत्रता और अवसर मिले, इस सामाजिक-आर्थिक समानता स्थापित करने के उद्देश्य को घोषित करने की हिम्मत कांग्रेस में नहीं है. जब तक उत्पादन के साधनों पर अपनी स्वार्थ-सिद्धि के लिए कुछ लोगों का ही अधिकार होगा, तब तक साधारण मनुष्य के विकास की आशा नहीं की जा सकती.”(पृ.128) आंबेडकर की ऐसी स्पष्ट समझ परवर्ती दलित आन्दोलन में विस्मृत होती गई लेकिन साथ ही उनके समर्थकों की संख्या और समाज में उनकी दृश्य-स्वीकृति का दायरा बढ़ता गया. 1938 में आंबेडकर ने कहा कि “कांग्रेस यदि सचमुच ब्रिटिश-साम्राज्यवाद के खिलाफ संघर्ष छेड़ती तो मैं इसमें शामिल हो जाता. परंतु वस्तुस्थिति विपरीत है. कांग्रेस द्वारा प्राप्त राजनीतिक शक्ति का उपयोग स्वार्थी लोगों के हितों के पोषण के लिए किया जा रहा है और वह किसान-मजदूरों के हितों की अनदेखी कर रही है.” (पृ.129)आंबेडकर की छवि को धूमिल करने के तमाम प्रयास हुए. उनकी राष्ट्रनिष्ठा पर शक किया गया. उनके चरित्र पर कीचड़ उछाला गया. इन कुचेष्टाओं के बावजूद उनकी छवि चोटिल होने की बजाए निखरती गई. असल में उनका राष्ट्रवाद राजाओं, नवाबों, जमींदारों, महंथों की चिंता से परिभाषित न होकर मजदूरों-दलितों-किसानों-स्त्रियों के सरोकारों से निर्मित था. वे इनके लिए स्वराज चाहते थे.

आज अगर आंबेडकर होते तो उनकी क्या भूमिका होती? वे निश्चित तौर पर नवसाम्राज्यवादी हमलों के विरुद्ध मोर्चा खोलते, बहुराष्ट्रीय कंपनियों के बढ़ते जाल को छिन्न-भिन्न करने में संलग्न होते, राष्ट्रीय संपत्तियों (जल-जंगल-जमीन) को निजी हाथों में सौंपे जाने के खिलाफ़ लोगों को लामबंद करते. दलितों पर बढ़ रही हिंसा का पुरजोर प्रतिरोध तैयार करते… जो उनकी विरासत से अपने को जोड़ते हैं आज उनका यही कार्यभार होना चाहिए. साथ ही, मार्क्सवादी धारा से जुड़े दलों, संगठनों और व्यक्तियों को भी नए सिरे से सक्रिय होने की जरूरत है. दोनों विचारधाराओं में सच्चा सहयोग भाव अगर आज नहीं बना तो फिर कब बनेगा! रावसाहेब कसबे की चेतावनीभरी सलाह समय रहते सुन-समझ लेनी होगी. अभी पूना के भारत भूषण तिवारी (विचारक-अनुवादक) से मिली सूचना थोड़ी आश्वस्ति पैदा करने वाली है. नई सरकार ने आते ही सबसे पहले रेलवे के विनिवेशीकरण का द्वार खोलने की घोषणा की. भारतीय रेलवे सबसे अधिक नौकरियाँ प्रदान करने के लिए जाना जाता है. उसमें दलित समुदाय के कर्मचारियों की भी अच्छी संख्या है. उसके विनिवेशीकरण का नतीजा बहुत स्पष्ट है. शायद इस खतरे को भांपने का परिणाम है कि पहली बार ‘द सेंट्रल रेलवे एम्प्लाइज कोआपरेटिव क्रेडिट सोसाइटी लिमिटेड (ई.सी.सी. सोसाइटी)के पंचवर्षीय चुनाव (गुप्त मतदान) में सीटू (CITU) से जुड़े नेशनल रेलवे मजदूर यूनियन (NRMU) का आल इंडिया शिड्यूल कास्ट एंड शिड्यूल ट्राइब रेलवे एम्प्लाइज एसोसिएशन से गठबंधन हुआ है. दूसरी ओर कांग्रेस/इंटक से जुड़े सेंट्रल रेलवे मजदूर संघ का अपेक्षाकृत नए संगठन रेल कामगार सेना (भारत भूषण का अनुमान है कि यह महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना की शाखा होगी) से अलायंस हुआ है. एक शताब्दी पुरानी ई.सी.सी.सोसाइटी में घटने वाली यह चुनावी परिघटना दूरगामी आशय समेटे हुए है. आखिरकार, हम सबको अपना-अपना पक्ष चुनना ही होगा.
वरिष्ठ आंबेडकरवादी आलोचक और ‘अपेक्षा’ पत्रिका के संपादक डॉ. तेज सिंह का पंद्रह जुलाई को दिल का दौरा पड़ने से अकस्मात निधन हो गया. एक दर्ज़न से अधिक किताबों के लेखक-संपादक डॉ.तेज सिंह दलित लेखक संघ के पहले अध्यक्ष थे. वे इससे पहले जनवादी लेखक संघ के सक्रिय सदस्य थे. उनकी हमेशा यह कोशिश रही कि दोनों विचारधाराओं में सार्थक संवाद और नीतिगत मुद्दों पर एका हो. उनके परिनिर्वाण से समूचे परिवर्तनकामी और प्रगतिशील आंदोलन को धक्का लगा है. यह लेख उन्हीं की स्मृति को समर्पित है.

( कथादेश से साभार )