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कला, धर्म, बाजार और स्त्री का द्वंद्व है रंग रसिया

 युवा पत्रकार रूद्रभानु प्रताप सिंह स्त्री और दलित की दृष्टि से हालिया प्रदर्शित फिल्म ‘ रंगरसिया’ देख रहे हैं.

 ऐसे समय में जब देश में बहुमत को आधार मान कर संस्कृति और अश्लीलता की परिभाषा तय करने की कोशिश की जा रही हो. इतिहास को बदलने का सिलसिला चल रहा हो. एक शंकराचार्य दलितों के मंदिर में प्रवेश पर पाबंदी लगा रहा हो. विश्वविद्यालय जैसी संस्थाओं से महिलाओं के खिलाफ तुगलकी फरमान जारी हो रहे हैं, नैतिकता व धर्म के ठेकेदारों को रोकने के लिए ‘किस ऑफ़ लव’ की मुहिम जोर पकड़ रही हो, तमाम प्रगतिशीलता के बावजूद एक स्त्रीवादी संस्थान से लगातार महिला उत्पीड़न की खबरें आ रही हों और प्रगतिशीलों की चुप्पी वैचारिक दोगलेपन की तरफ इशारा कर रही हो. ऐसे समय की रंग रसिया का प्रदर्शन किसी प्रतिरोध से कम नहीं है. केतन मेहता ने धर्म, कला, बाजार और स्त्री के द्वंद्व को बहुत बारीकी से पर्दे पर उतारा है. फ़िल्म जहां ख़त्म होती है वहीं से नई कहानी शुरू हो जाती है. राजा रवि वर्मा की कलाकृति को आजादी के बाद बाजार नीलाम करता है. कला प्रेमी बढ़-चढ़ कर बोली लगाते हैं. कला बिकती है मगर दशकों बाद भी हालात वही हैं. धर्म के ठेकेदार अपनी नैतिकता की चाकू से उस कलाकृति को फाड़ देतें हैं, जिसे रवि वर्मा ने उर्वशी और पुरुरवा की कहानी को आधार मान कर बनाया था. उर्वशी की तरह ही यहां भी सुगंधा छली जाती है. उसका वह स्वप्न टूट जाता है जो रवि वर्मा ने अपनी महत्वाकांक्षा या यूँ कहें कि कलाजन्य महत्वाकांक्षा के लिए दिखाया था– ‘जवानी और सौन्दर्य तो ढल जाएँगे, रहेगी तो बस कला’. उसका भ्रम तो उस समय भी टूटता है जब रवि वर्मा कहता है ‘मेरी कल्पना के बाहर तुम कुछ भी नहीं’.

फ़िल्म में  स्त्री के प्रति कलाकार के नजरिये को भी दिखाया गया है. यह कलाकार कभी दलित स्त्री और वेश्या को अपनी प्रेरणा बनता है तो कभी महिलाओं के साथ भोगविलास में डूब जाता है. वह एक वेश्या को देवी बनाता है. समाज और धर्म से संघर्ष करता है लेकिन मुसीबत के समय (प्रसिद्ध होने की लालसा भी रहती है) वह उसे बाज़ार में बेच देता है. बाज़ार उस कला को पैसे के लिए इस्तेमाल करता है और सालों अमर होने की आश लगाए बैठी सुगंधा आत्महत्या कर लेती है. रविवर्मा तो फिर भी आधुनिक भारतीय कला के जनक के रूप में चर्चित हो जाते हैं पर धर्म के ठेकेदार सुगंधा की उस अमरत्व की इच्छा का भी गला घोट देते हैं. आधुनिक युग में कला अश्लीलता और नैतिकता की भेंट चढ़ जाती है. क्या यह सवाल आपको आश्चर्य में नहीं डालता कि उर्वशी और पुरुरवा की कहानी और देवताओं का छल धर्मग्रथों में ‘अश्लील’ क्यों नहीं है? क्यों माध्यम बदलते है उसे अश्लील बना दिया जाता है?


फ़िल्म ने और भी कई पहलुओं पर प्रकाश डाला है. दलित विमर्श भी
इसका एक अहम् हिस्सा है. रवि वर्मा की पेंटिंग की  बदौलत की सदियों से मंदिरों में कैद और दलितों की पहुँच से दूर रहने वाले देवता बाहर आते हैं और दलित उनका दर्शन करते हैं. यह वही समय होता है जब देश में ज्योतिबा फुले छुआछूत के खिलाफ मुहिम चला रहे होते हैं. उनके प्रयास और रवि वर्मा के प्रयास में साफ अंतर है. एक तरफ समानता की लड़ाई होती है तो दूसरी तरफ अपनी कला को प्रतिष्ठा दिलाने की कोशिश. जब रवि वर्मा अपनी पेंटिंग के सामने उस बूढ़े को झुकते देखता है तो अपनी कला को विश्वव्यापी बनाने के लिए बाजार से हाथ मिलाता है. हो सकता है कि रवि वर्मा की सोच में कहीं दलित विमर्श के कुछ तत्व हों पर उसका व्यापारिक साझेदार इस बात को अच्छी तरह जानता है कि इस देश में धर्म से ज्यादा कुछ भी नहीं बिकता. तभी तो धर्म का सबसे बड़ा ठेकेदार रवि की कलाकृति देख कर पहले उसे अपनी संस्था में शामिल होने का लालच देता है पर जब वह इनकार करता है तो उसे धर्म विरोधी और अश्लील करार दे दिया जाता है.


अदालत में रवि वर्मा सवाल करता है ‘ये कौन लोग हैं जो यह तय करते हैं कि मेरी कला अश्लील है,
इन्हें यह अधिकार किसने दिया.’ यही सवाल संघ मुख्यालय के सामने खड़े होकर ‘किस ऑफ़ लव’ में शामिल हजारों युवक भी पूछ रहे हैं कि हमें नैतिकता का पाठ पढ़ाने, पार्कों में गुंडागर्दी करने और प्रेमी जोड़ों का मारने का अधिकार तुम्हे किसने दिया ? जज अपने फैसले में रवि वर्मा को बाइज्जत बरी करता है मगर यह पूछता है कि क्या कला को कैद किया जा सकता है? क्या इस देश में कला, धर्म और विज्ञान एक साथ विकास नहीं कर सकते? इसका जवाब तो बस यही है कि यह कामसूत्र का देश है जो हमें अपनी कमाना का, अपनी आत्मा का और अपनी मानवता का उत्सव मनाना सिखाता है.

स्त्री -पुरुष समानता के अग्रदूत डा.आम्बेडकर

अनंत

अनंत स्वतंत्र पत्रकार एवं शोधार्थी हैं. fanishwarnathrenu.com का संचालन एवं संपादन करते हैं. संपर्क newface.2011@rediffmail.com और 09304734694

डा. आम्बेडकर  दलितों -पिछड़ों के मुक्तिदाता हैं और स्त्री -पुरुष समानता के अग्रदूत। वे स्त्री के ज्वलंत सवालों के लिए धर्म व जाति को जिम्मेदार मानते हैं। राजनीति और संविधान के जरिये भारतीय समाज में स्त्री  और पुरुष  के बीच व्याप्त असमानता दूर करने का सार्थक प्रयास किया है। जाति-धर्म व लिंग निरपेक्ष संविधान में उन्होंने सामाजिक न्याय की पकिल्पना की है । हिन्दू कोड बिल के जरिये उन्होंने  संवैधानिक स्तर से महिला हितों की रक्षा का प्रयास किया । संविधान सम्मत सामाजिक न्याय के सूत्र और हिन्दू कोड बिल में ही            ‘‘ महिला-सशक्तिकरण ’’ की विशद् व्याख्या विद्यमान है। संविधान शिल्पी के प्रयासों का प्रतिफल है कि भारतीय समाज में महिलाओं को सुनहरा अवसर प्राप्त हुआ है , फिर भी समाज में व्याप्त रूढि़यां और पूंजीवाद आधारित उपभोक्तावादी संस्कृति महिला सशक्तिकरण के मार्ग में रूकावट पैदा कर रही है। दरअसल यह समाज सदियों से मनुवादी ग्रंथि से ग्रस्त रहा है। आजादी के बाद सत्ता  पर काबिज होने वालों की सामंती मानसिकता से पूर्व परिचित आंबेडकर आजाद भारत में ‘‘ महिलाओं की सामाजिक गुलामी ’’ खत्म करने के लिये स्टेटसमैन की भूमिका निभाते रहे। आजादी , पूर्व छत्रपति शाहू जी महाराज द्वारा कोल्हापुर राज में महिलाओं के हित में बनाये गये विशेष विधानों को आजाद भारत के संविधान में स्थान दिल्वाया । डा आंबेडकर रचित ‘‘ हिन्दु कोड बिल ’’ कोल्हापुर के राज-विधान से प्रेरित दिखता है। इसलिये डा . अंबेडकर को ‘‘ शाहू संहिता ’’ के  संरक्षक के रूप में भी याद किया जाना चाहिए।

भारतीय समाज में महिलाओं के हितों  की रक्षा के लिए समाज सुधार का कार्य 19 वीं शताब्दी में शुरू हुआ। इस सदी में कई नायक पैदा हुए लेकिन , अंबेडकर सबसे ज्यादा प्रभावित महात्मा फूले और छत्रपति शाहू जी महाराज से दिखते हैं। यह दिगर बात है भारत में सबसे पहले अंग्रेजों एवं ईसाई मिशनरियों द्वारा स्त्रियों को शिक्षित करने के उद्देश्य से 1810 में बंगाल और 1824 में महाराष्ट्र के अंदर स्कूल खोला गया। बंगाल के गुरुमोहन विद्यालंकार द्वारा 1819 में बंगला भाषा में स्त्री शिक्षा से संबंधित पहली पुस्तक लिखी गई। दरअसल सशक्तिकरण का मूलमंत्र है – शिक्षा। इस वजह से देश के विभिन्न हिस्सों में स्थानीय समाज सुधारक स्त्री शिक्षा पर जोर दे रहे थे। लिंग-विभेद और छुआछूत जैसी कुरीतियां शूद्र व महिला शिक्षा के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा थी। 1848 में महात्मा फूले और सावित्री बाई फुले ने शूद्र व अछूत वर्ग के लड़के-लड़कियों के लिए स्कूल खोला। ब्राह्मणों ने इसका तीखा विरोध किया। महात्मा फूले की विरासत को आगे बढ़ाने के लिए कोल्हापुर नरेश अप्पा साहब धाड़के ने विशेष राजकोश बनाया। इनकी मृत्यु के बाद छत्रपति शाहू जी महाराज कोल्हापुर के नरेश बने। शाहू जी ने अपने पिता के अधूरे कार्यों को आगे बढ़ाया। प्राथमिक शिक्षा , उच्च शिक्षा व व्यवसायिक शिक्षा पर भी विशेष बल दिया। परिणामस्वरूप 1887 में आनंदी बाई जोशी विदेश से मेडिकल की डिग्री प्राप्त कर पहली भारतीय महिला डाक्टर बनीं। कहने का आशय है कि समाज में व्याप्त कुरीतियों के खिलाफ सामाजिक समानता के लिए संघर्ष जारी था। ऐसे ही महौल में डा आंबेडकर का जन्म 1891 ईस्वी में हुआ था।। चूँकि डा .आंबेडकर अछूत जाति में जन्मे थे, इसलिए सामाजिक दासता का दंश  उन्होंने नित-दिन झेला  दलितों की स्थिति पशुओं से भी बदतर थी। तालाबों में पशुओं को पानी पीने की छूट थी , लेकिन दलितों को नहीं। मंदिर में भी प्रवेश वर्जित था। असमानता की चक्की में पिस रहे डा . आम्बेडकर ने शिक्षा को कर्म माना और ‘ शूद्रों’  का तकदीर बदलने का फैसला किया। उनकी मेधा से प्रभावित बड़ौदा और कोल्हापुर नरेश ने वजीफा दिया जिससे वह विदेश पढ़ने गए।

स्त्री शिक्षा और उनकी सामाजिक हैसियत को लेकर वह चिंतित रहा करते थे। इसका प्रमाण 1913 में पिता के मित्र को लिखे पत्र का मजमून है :- ‘‘ लड़के के साथ-साथ लड़कियों की शिक्षा पर भी जोर देना आवश्यक है। ’’ देश-विदेश में भ्रमण करने के बाद वह इस निष्कर्ष पर पहुँचे थे कि ‘‘ लड़का शिक्षित होगा तो सिर्फ एक व्यक्ति शिक्षित होगा , जब लड़की शिक्षित होगी तो पूरा परिवार शिक्षित होगा।’’ उच्च शिक्षा ग्रहण करने के दरम्यान अंबेडकर ने ‘‘ भारत में जातियां , उनकी व्यवस्था , उत्पत्ति एवं विकास ’’ नामक शोध आलेख प्रस्तुत किया। उन्होंने भारतीय समाज में महिलाओं की स्थिति पर प्रकाश डालते हुए कहा था कि सती प्रथा के तहत हिन्दू महिलाओं के साथ क्रूरता पूर्वक व्यवहार किया जाता है। जबरन जीने का अधिकार छीन लिया जाता है। सगोत्र विवाह के लिए दबाव डाला जाता है। वहीं इस्लाम धर्म आधारित मुस्लिम समुदाय में पर्दा प्रथा के जरिये महिलाओं के मानसिक और नैतिक जरूरतों का दमन किया जाता है। शोधार्थी के रूप मेंडा. अंबेडकर हिन्दू  व इस्लाम धर्म के साथ-साथ अन्य धर्मो का भी गहण अध्ययन किया था। शायद यही वजह है कि वह धर्म व जाति की कैद से स्त्रियों की मुक्ति के हिमायती बने रहे।

हिन्दू धर्मशास्त्रों में महिलाओं का स्थान और नियम-कानून महिलाओं के हक में नहीं हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार स्त्री   धन , विद्या और शक्ति की देवी हैं। मनु संहिता के तीसरे अध्याय के छप्पनवें श्लोक में जहां लिखा है:- ‘‘जहाॅं नारी की पूजा होती है वहां देवता रमण करते हैं।’’ वहीं दूसरी ओर पांचवे अध्याय के 155 वें श्लोक में लिखा है:- ‘‘स्त्री का न तो अलग यज्ञ होता है न व्रत होता है , न उपवास। ऋग्वेद में पुत्री के जन्म को दुःख का खान और पुत्र को आकाश का ज्योति माना गया है। ऋग्वेद में ही नारी को मनोरंजनकारी भोग्या रूप का वर्णन है तथा नियोग प्रथा को पवित्र कर्म माना गया है। अथर्ववेद में कहा गया है कि दुनियां की सब महिलाएं शूद्र है। हिन्दु धर्म शास्त्रों में नारी की स्थिति को लेकर काफी विराधाभास है। इस्लाम में भी महिलाओं की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। कुरानशरीफ के आयत ( 1-4-11 ) में संपति से संदर्भित मामले में स्पष्ट लिखा है कि ‘‘ एक मर्द के हिस्सा बराबर है दो औरत का हिस्सा ।’’

धार्मिक आस्था और महिलाओं को कमजोर बनाकर रखने का ही परिणाम था कि 8 मार्च 1535 को चित्तौड़गढ़ की रानी कर्णवती सहित अन्य नारियों को जौहर की चिता में प्राणों की आहुति देनी पडी । मध्यकाल की नायिका मीराबाई ने जब महल से बाहर कदम निकाली तो उसे जहर देकर मार डाला गया। मैत्रेयी और गार्गी जब साध्वी बनीं तो साधुओं ने सवाल उठाया कि स्त्री  साधु कैसे बन सकती है ? इतिहास में मौजूद विरोधाभासों के कारण ही 1936 में लिखे आलेख के माध्यम से डा. आंबेदकर सवाल उठाया कि चातुर वर्ण व्यवस्था में महिलाओं को किस वर्ण में रखा जाएगा ? क्योकि इस समाज को स्त्री-पुरूष समानता से परहेज है। वे धर्म को महिलाओं की प्रगति में सबसे बड़ा बाधक मानते थे। यहां अहम सवाल यह भी है कि हिन्दू समाज ने सीता , लक्षमी , कुंती , पार्वती , सरस्वती जैसी मिथक नायिकाओं को जगत जननी माँ का दर्जा प्रदान किया है। इन लोगों की शिक्षा-दीक्षा किस गुरूकुल में हुआ था और गुरू कौन थे ? जबकि मिथक के नायको को शिक्षा देने वाले गुरूओं का महिमागान शस्त्रों में है। इससे स्पष्ट है कि देवी-देवताओं के यहां भी महिलाओं को दोयम दर्जा प्राप्त था।

18वीं शताब्दी में अंग्रेजों ने मुगल शासकों को परास्त कर अपना साम्राज्य कायम किया। अंग्रेजों के शासन काल में समाज सुधार का कार्यक्रम शुरू हुआ। जिसका परिणाम यह निकला कि 1857 के गदर में रानी लक्षमीबाई , झलकारी बाई , ऊदा देवी , रानी आवंती बाई , जैसी वीरांगनाएं सामने आई। महिला हितों की रक्षा के लिये सबसे पहला कानून लाने का श्रेय भी अंग्रेजों को जाता है। 1860 में अंग्रेजों ने भारत में कानून व्यवस्था को सुचारू ढ़ंग से चलाने के लिए आई0 पी0 सी0 की धाराओं का निर्माण किया। जिसमें महिलाओं का शील भंग एवं बलात्कार के खिलाफ कारवाई करने हेतु धारा 354 और 376 का निर्माण किया। दरअसल इसके पहले बलात्कारियों को धार्मिक कानून के आधार पर जाति-गोत्र , कुल-खानदान देखकर सजा सुनाने की प्रथा थी।  यह कानून बहुजन आबादी के हित में नहीं था। इसके लिए बहुजन आबादी को जागृत करना आवश्यक था। 20 जुलाई 1920 से  डा . आम्बेडकर ने ‘‘ मूकनायक ’’ नामक पत्र का प्रकाशन कोल्हापुर नरेश के सहयोग से प्रारम्भ किय.  इस पत्र के माध्यम से दलितों एवं महिलाओं के मुद्दों को उठाया। 1924 में बहिष्कृत हितकारिणी सभा नामक संस्था स्थापित की. बेणु बाई मटरकर , रंगूबाई शुभरकर और रमाबाई आदि महिलाएं उनके  आन्दोलन से जुड़ीं। सन 1927 में  सरकार ने उन्हें मुम्बई विधानमंडल के सदस्य नियुक्त किया। मार्च 1927 को उनके चावदार तालाब  आंदोलन में काफी संख्या में दलित महिलाओं ने भाग लिया। महिला आंदोलन को नई दिशा देने के महिला मंडल की स्थापना की गई। इस संस्था की अध्यक्ष उनकी पत्नी रमाबाई बनीं। 28 जुलाई 1928 को डा. आम्बेडकर ने मुम्बई विधान परिषद में कारखाना तथा अन्य संस्थानों में कार्यरत महिलाओं को प्रसूति अवकाश की सुविधा वेतन सहित प्रदान करने से संबंधित प्रस्ताव पारित करने की वकालत की.
1931 में , लंदन में गोलमेज सम्मेलन के अंतर्गत दलितों( स्त्री-पुरूष ) को पृथक मतदान देने के अधिकार दिलाने हेतु आवाज बुलंद किया। 1932 में पूना पैक्ट के अंतर्गत उन्होंने अछूत ( स्त्री-पुरूष ) को संसद , विधानसभा एवं सरकारी नौकरियों में आरक्षण दिलाने के लिए संघर्ष किया।


16 जून 1936 को मुम्बई के दामोदर हाल में महिलाओं को संबोधित करते
हुए उन्होंने कहा कि:- ‘‘ नारी समाज की गहना है , सभी को उसे सम्मान देना चाहिए।’’ इस सम्मेलन में अधिकांश वेश्याएं एवं जोगिनी थी। 20 जुलाई 1920 को नागपुर में महिला सम्मेलन को संबोधित करते हुये सशक्तिकरण पर प्रकाश डालते हुये कहा कि ‘ सशक्तिकरण का अर्थ है अपनी क्षमताओं को बनाना और उसे विकसित कर समाज की मुख्यधारा का एक अहम हिस्सा बनना।  । महात्मा गांधी से विचार-विमर्श कर पंडित नेहरू ने संविधान प्रारूप समिती का उन्हें अध्यक्ष नियुक्त किया। इस प्रकार उन्हें  समाज बदलने लायक विधान बनाने का सुनहरा मौका मिला। स्त्रियों और शूद्रों की मुक्ति और सशक्तिकरण का सवाल उनकी प्राथमिकता में था। महिला सशक्तिकरण  के संदर्भ में अंबेडकर का स्पष्ट दृष्टिकोण संविधान के अनुच्छेद 14 , 15 और 16 में झलकता है। लिंग समानता की प्रमुखता उन्होने मौलिक अधिकार , मौलिक दायित्वों के तहत निर्देशित सिद्धांतों के आधार पर किया है।धारा 14 के तहत महिलाओं को संपत्ति और शिक्षा का  अधिकार दिया। उनकी मान्यता थी कि ‘‘ शिक्षा शेरनी का दूध है शिक्षा के बिना जीवन व्यर्थ है। कुछ सोचने-समझने एवं चितन करने की ताकत शिक्षा से ही संभव है।’’ शिक्षित महिलाओं को योग्यता के अनुसार नौकरी करने का भी अधिकार दिया। बताते चले कि रवीन्द्र नाथ टैगोर की नतिनी सरला देवी घोषाल ने 1895 में बालिका विद्यालय में नौकरी करने का फैसला किया तो परिजनों ने इसका काफी विरोध किया था। उमा चक्रवर्ती लिखती हैं कि नौकरी करने से संबंधित सवाल जब सरला देवी से पूछा गया तो उनका कहना था कि:- ‘‘ वह अपने घर रूपी जेल की कैद से मुक्त होकर पुरूषों की भांति अपने जीवन-यापन के लिए आत्मनिर्भरता का अधिकार पाना चाहती थी।’

डा. आम्बेडकर  ने महिलाओं को मतदान करने का अधिकार प्रदान कर उनकी राजनैतिक अधिकारों की  सिर्फ रक्षा ही नहीं की अपितु संपूर्ण विश्व के समक्ष एक मिशाल भी पेश किया। क्योंकि प्रथम विश्वयुद्ध के पहले रूस को छोड़कर तमाम देशों में महिलाओं और अर्द्धविक्षिप्तों को मताधिकार से वंचित रखा गया था। इसके लिए अमेरिका , इंग्लैंड , आस्ट्रिया समेत कई देशों की महिलाओं को काफी संघर्ष करने के बाद मतदान में भाग लेने का अधिकार प्राप्त हुआ था। इस मुद्दे पर भारत के नेताओं में भी काफी मतभेद था। देश के अंदर इस मसले पर लंबे समय से बहस जारी था। संविधान निर्माण के वक्त डाक्टर राजेन्द्र प्रसाद सरीखे विद्वान यह अधिकार 1935 के एक्ट के अनुसार देने के हिमायती थे। 1935 के एक्ट के अनुसार यह अधिकार शिक्षित और 2 रुपया सालाना चैकीदारी टैक्स देने वाले नागरिकों को ही प्राप्त होता। अगर ऐसा हो गया होता तो इसका खमियाजा महिलाओं को कितना भुगतना पड़ता , इसका अंदाजा सिर्फ इस बात से लगाया जा सकता है कि 1951 में देश की साक्षरता दर 24% थी। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 45 में यह उल्लेख किया गया था कि राज्य 14 वर्ष के प्रत्येक बच्चों को संविधान लागू होने की 10 वर्षों की अवधि के भीतर अनिवार्य शिक्षा देने का प्रयास करेगा। इसके बावजूद 1971 में महिला साक्षरता दर 18% हो पाई थी। और रही बात 2 रुपया सालाना चैकीदारी टैक्स देने का तो महिलाएं किस श्रोत से अदा करती ? महिलाओं के प्रति हिंसा को रोकने के लिए धारा 313 के तहत हिंसात्मक और जबरन गर्भपात को अपराध की श्रेणी में रखा। हिन्दू धर्म में रीति-रिवाजों के नाम पर देवदासी बनाकर महिलाओं का यौन शोषण करने की परंपरा लम्बे अरसे से चली आ रही थी। इस प्रथा को खत्म करने के लिए धारा 17 का निर्माण किया।

खासतौर पर हिन्दू महिलाओं के हक में डा . आम्बेडकर रचित हिन्दू कोड बिल है। इसाई और मुस्लिम समुदाय की तरह हिन्दू समाज के लिए कोई पर्सनल लाॅ नहीं था। भारतीय हिन्दू समाज में विवाह , उतराधिकार , दत्तक  , निर्भरता या गुजारा भत्ता  आदि का नियम-कानून एक समान नहीं था। इसाई तथा पारसियों में एक समय में एक स्त्री से शादी का प्रावधान था। वहीं मुस्लिम समुदाय में चार शादियों को मान्यता प्राप्त है। लेकिन हिन्दू समाज में कोई पुरूष 100 शादियां कर ले कोई बंदिश नहीं था। विधवा को मृत पति के संपत्ति  पर हक नहीं था। सवर्ण समाज में विधवा विवाह की परंपरा नहीं थी। ‘अनुलोम विवाह’ , ‘सम्बन्धम विवाह’ जैसी स्त्री – शोषक परंपरा का दबदबा था। सदियों से महिलाओं के साथ हो रही अमानुषिक व्यवहार को समूल नष्ट करने के लिए 11 अप्रैल 1947 को लोकसभा में हिन्दू कोड बिल पेश किया। इस बिल के अंततर्गत हिन्दू विवाह अधिनियम , विशेष विवाह अधिनियम , गोद लेना ( दत्तक  ग्रहण ) अधिनियम , हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम , निर्बल तथा साधनहीन पारिवारिक सदस्यों का भरण पोषण , अप्राप्तव्य संरक्षण संबंधी अधिनियम , उतराधिकारी अधिनियम , हिन्दू विधवा को पुनर्विवाह अधिनियम आदि कानून बनाये।

इससे शादी-विवाह में उॅच-नीच व जातीय भेद-भाव को खत्म कर दिया गया। एक पत्नी के रहते दूसरी शादी पर रोक लगा दिया गया और दंड का प्रावधान किया गया। पत्नी को तलाक देने के बाद दूसरी शादी करने की इजाजत दी गई। पति-पत्नी को तालाक देने का समान अधिकार दिया गया। तलाक के लिए आठ शर्तो को रखा गया। पति की मृत्यु के पश्चात् उसके संतान के बराबर अधिकार दिया गया। पिता के मृत्यु के पश्चात पुत्री को भी भाईयों के बराबर जायदाद का वारिस बनाया। हिन्दू परिवार में जन्मे बच्चा-बच्ची को गोद लेने का प्रावधान किया गया। गोद लेने वाले की संपति में भी अधिकार का प्रावधान किया। बतातें चले कि छत्रपति शाहू जी महाराज कोल्हापुर राज में 1917 में विधवा पुर्नविवाह , 1918 में अंतर्जातीय विवाह , 1919 में विवाह विच्छेद , 1920 में देवदासी प्रथा से संबंधित कानून पारित चुके थे। लेकिन डा . आम्बेडकर  ने जैसे ही हिन्दू कोड बिल को संसद में पेश किया। संसद के अंदर और बाहर विद्रोह मच गया। सनातनी धर्मावलम्बी से लेकर आर्य समाजी तक अंबेडकर के विरोधी हो गए। संसद के अंदर भी काफी विरोध हुआ। अंबेडकर हिन्दू कोड बिल पारित करवाने को लेकर काफी चिंतित थे। वहीं सदन में इस बिल को सदस्यों का समर्थन नहीं मिल पा रहा था। वह अक्सर कहा करते थे कि:- ‘‘मुझे भारतीय संविधान के निर्माण से अधिक दिलचस्पी और खुशी हिन्दू कोड बिल पास कराने में है।’’ सच तो यह है कि हिन्दू कोड बिल के जैसा महिला हितों की रक्षा करने वाला विधान बनाना भारतीय कानून के इतिहास की महत्वपूर्ण घटना है। धर्म भ्रष्ट होने की दुहाई देने वाले विद्वानों की विशेष बैठक अंबेडकर ने बुलाई। विद्वानों को तर्क की कसौटी पर कसते समझाया कि हिन्दू कोड बिल पास हो जाने से धर्म नष्ट नहीं होने वाला है। कानून शास्त्र के नजरिये से रामायण का विश्लेषण करते हुए कहा कि ‘‘ अगर राम और सीता का मामला मेरे कोर्ट में होता तो मैं राम को आजीवन कारावास की सजा देता।’’ संसद में हिन्दू  कोड पर बोलते हुए डा . आम्बेडकर ने कहा कि ‘‘ भारतीय स्त्रियों की  अवनति के कारण बुद्ध नहीं मनु है।’’ काफी वाद विवाद के बाद चार अनुच्छेद पास हुआ। अंततः राजेन्द्र प्रसाद ने इस्तीफे की धमकी दे दी। पंडित नेहरू इस बिल के पक्ष में थे, लेकिन वे बिल पास नहीं करा सके.  अंततः डा. आम्बेडकर ने 27 सितंबर को हिन्दू कोड बिल सहित कई अन्य मुद्दों को लेकर कानून मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया। नये संसद में विधी मंत्री एच0 पी0 पटास्कर ने नये सिरे से टुकड़ों में बिल पास करवा लिया . यह भी सवाल है कि हिन्दू कोड बिल पर अंबेडकर का विरोध और पाटस्कर समर्थन क्यो ?

बहरहाल, कानून मंत्री के रूप में डा. आम्बेडकर की शहादत पर ही भारतीय स्त्रियाँ  सशक्त होती रही हैं.  29 दिसंबर 1946 को भारतीय संविधान सभा की पहली बैठक हुई थी। 203 सदस्यों की बैठक में महिलाओं की संख्या महज 8 थी। 1957 के लोकसभा चुनाव में महिला उम्मीदवारों की  जीत का प्रतिशत  था। लोकसभा के चुनावी राजनीति के इतिहास में महिलाओं की यह सर्वाधिक शानदार जीत है। वहीं आजाद भारत की राजनीति में इंदिरा गाँधी , प्रतिभा देवी सिंह पाटिल , सोनिया गांधी , श्रीमती मीरा कुमार , मायावती , ममता बनर्जी , जय ललिता , राबड़ी देवी , सहित दर्जन भर से अधिक महिलाओं ने अपनी पहचान बनाई है। फिर भी विधान सभा और लोकसभा में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण का मसला वर्षों से खटाई में पड़ा है। अरूधती राय , सुनीता विलियम , महाश्वेता देवी , मेधा पाटेकर , असंतुता लकड़ा सहित कई अन्य महिलाएं विभिन्न क्षेत्रों में अपनी विशिष्टता के कारण चर्चित हैं। राजनीति , शिक्षा , खेल , साहित्य , समाज सेवा के अलावे फिल्म और गलैमर के क्षेत्र में भी शोहरत बटोर रही हैं  सत्ता , शोहरत और बौद्धिक जगत से इतर बिहार के वैशाली जिला की किसान चाची और पटना जिला के नौबतपुर की लालमुनी देवी की गिनती देश के गिने-चुने महिला किसानों में हो रही है। गाँव कस्बे में बसने वाली महिलाएं राजनैतिक सत्ता  से लेकर पुरूष सत्ता को चुनौती दे रही है और अपने संघर्षों के माध्यम से नित-नई महिला सशक्किरण की दास्तान लिख रहीं हैं।

आजादी के 65 वर्ष बाद भी सामाजिक रूढि़यों , पुरूषवादी सामंती ढ़ाचा और बाजारीकरण के खिलाफ महिलाएं सशक्तिकरण के लिए संघर्ष कर रही है। भारतीय समाज में जाति और धर्म का ढ़ाचा अभी भी मजबूत है। सामंतवाद के बाद पूंजीवाद के आगमन के बाद पितृ सत्तात्मक  समाज महिलाओं के समक्ष नित-नई चुनौतियां पेश कर रहा है। दहेज दानव जनित भ्रूण हत्या से बेटियों की संख्या में लगातार कमी आ रही है। बेटियों की संख्या में हो रही कमी पर नामचीन लेखिका तस्लीमा नसरीन ने टिप्पणी ने टिप्पणी की है , ‘ भारत एक दिन पुरूषों का देश बनकर रह जाएगा।’ स्त्री-पुरूष समानता के सवाल पर समाज की मानसिकता में अमूल-चूल बदलाव आना आवश्यक है। जिसकी प्रक्रिया काफी धीमी है।

स्वर्णलता ठन्ना की कवितायें

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स्वर्णलता ठन्ना

युवा कवयित्री स्वर्णलता ठन्ना फिलहाल विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन में शोधरत हैं . संपर्क :swrnlata@yahoo.in

1. प्रकृति

कल रात मैंने
एक स्वप्न देखा
नींद, सुख,
आराम ,चैन
सब भुलाकर
बहने वाली सहिष्णु नदी
धीरे-धीरे सूख गई
और बच गए
केवल पत्थरों भरे किनारे …

जंगली वृक्ष लताएँ
धीरे-धीरे हटाने लगी
अपने जमे पैर
वृक्ष से
और टूट कर
विलीन हो गई धरा में
पत्तियां, कोपलें और
कलियाँ
एक-एक कर
खत्म होती गई
जंगल से
और बचे रह गए
कुछ ठूँठ पेड़ …

साहित्य की पुस्तकों से
विलुप्त होने लगी
श्रृंगार , करुण, अद्भुत
और शांत रस की रचनाएँ
लोप होने लगी
प्रेम पर लिखी
अनेकानेक कविताएँ
बचा तो केवल
वीभत्स को दर्शाता
कुछ साहित्य …

और सबसे वीभत्स
जो घटित हो रहा है
वह है
बाँझ हो जाना
उन कोखों का
जो गवाह थी
कन्या भ्रूण हत्या की
क्योंकि उन्होंने चाहा था
केवल पुरुष
प्रकृति नहीं …

उन्हें नहीं पता
वे कर चुकी है
अनजाने में ही
नदी ,लताएँ
और रस की हत्या … |


2. टूटता-सा कुछ मेरे भीतर

जीवन के दरख्त की
शाखों से जब
बिन पतझड़ के भी
झड़ जाती है
सुहाने सपनों की पत्तियाँ
तब
बिना आहट के
बिखर जाता है
बहुत कुछ
मेरे भीतर…।

जंगली आवारा
हवा की तरह बहते
मेरे अलहदा अनुभवों को
बाँटते
एहसास के समक्ष
जब खड़ी कर दी जाती है
दीवारे
तब
भरभरा कर
टूट जाता है बहुत कुछ
मेरे भीतर…।

देखती हूँ जब
संवेदनाओं को, स्नेह को
छटपटा कर
दम तोड़ते हुए
हाथों से छूटती
मानवता की डोर को
पकड़ने की
अदम्य कोशिशों के बाद भी
जब
खत्म हो जाती है
कोई जिंदगी
तब
सारे जहान के
होते हुए भी
वीरान हो जाती है
मासूमियत की दुनिया
और तब
मृत संवेदनाओं के बीच
खंडहर में तब्दिल हो जाता है
बहुत कुछ
मेरे भीतर….।

  3. सुकरात

अमृत की चाह में
कितने घूंट
हलाहल का पान
किन्तु
नीलकंठ नहीं बन पाई…

विष मेरे हलक से
नीचे उतर चुका था
किन्तु नहीं बना
यह कृष्ण  का
चरणामृत…
जिसे पीकर मीरा
भक्ति  के चरम को
छू गई…

इस गरल ने
मुझे कर दिया
समाप्त
और मृत्युदंड को प्राप्त
मैं बन गई
सुकरात………!!!

संजय इंगले तिगांवकर की कवितायें

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संजय इंगले

संजय इंगले तिगांवकर मराठी के रचनाकार है और अंधश्रद्धा निर्मूलन के सक्रिय कार्यकर्ता हैं. संपर्क : मोबाईल : 09765047672

( मूलतः मराठीकी इन कविताओं का अनुवाद किया है अशोक काम्बले ने  ) 


१. तू बता मेरी बेटी तुम्हें  क्या पसंद है

मुझे एक बार तुमसे पूछना चाहिए था कि
तू बता मेरी बेटी तुम्हें क्या पसंद है .
रंग –बिरंगी तितलियों के पीछे दौड़ने की उम्र तेरी
तेरा दौड़ के चलना , तेरा लय में बोलना
घर ही तेरी आकाश गंगा
तेरी आलमारी तुम्हारा बैग
उसी में तुम्हारी दुनिया सारी
रंगीन कांच , गोल पत्थर , चमकने वाले टैटू
स्कूल के पुराने फोटो , कुछ चित्र और कार्टून्स
देखकर यह सब
चिडचिडाती थी तुम्हारी माँ
पर उसे भी याद आती होगी बचपन की
उसके भी बस्ते में होंगे रंगीन चूड़ियों के टुकडे
नदी किनारे के शंख , शिंपले , चिचोके बिट्टे
घर संवारते हुए चिड़ती वह
थक जाती तुम्हारी तैयारी कराते हुए

पहली बारिस में तुम्हारा छत पर नाचना
भरी धूप में सायकिल पर घूम कर आना
कार्टून फिल्म देखना
और अपने हाथों से सुन्दर ग्रीटिंग बनाना
  
तुम्हारी आँखों में भी होंगे ख्वाब
जो मुझे दिखे नहीं, पता नहीं क्यों
दूर होकर तुम्हारी दुनिया से मैं
करता रहा अपने व्यवहार का हिसाब
     
घर के सामने से अभी गई तुम्हारी स्कूल बस
पर तुम्हारे लिए अब हॉर्न नहीं बजेगा
अब भी होंगे तुम्हारे स्कूल अनेक कार्यक्रम
पर अब वह आकर्षण नहीं होगा
अब कौन पीछे पडेगा पैरेंट्स मीटिंग में आने के लिए

पिछले चार दिनों से तुम्हारा निःशब्द होना
अँधेरे कमरे में घंटों बैठे रहना
मुरझाया चेहरा निस्तेज आँखें
तेरे माथे पर पड़े बल
क्यों लगाया परिणाम को ऐसे दिल  पर

बहुत बार मुझे लगा तुम्हें यह सब बताऊँ
पास बुलाऊं प्यार करूँ सहलाऊँ
अब ऐसा लगने का कोइ अर्थ नहीं
समझ नहीं पाया तेरा भाषांतर

तुम्हारे आइसक्रीम का एक कप
तुम चार दिनों तक बचा कर रखती
जीवन भी ऐसा ही होता है पगली
काश , धीरज रख पाती !
 
छत के  पंखे का पत्ता अब भी लटका हुआ है
कोने में खामोश पडी है रस्सी
एक बार सोचना चाहिए था मेरी बच्ची
गुम हुआ घर के घर होने का अहसास
मैं निःशब्द

मुझे एक बार तुमसे जरूर पूछना चाहिए था
तू ही बता मेरी बेटी तुम्हें क्या पसंद है

२. सावित्री

सावित्री
अब तक तुम्हारे हाथ में पूजा का पात्र है
तुम्हें मालूम नहीं
यहाँ के वटवृक्षों में पुरुषत्व नहीं के बराबर
सावित्री
तू ऐसी कब तक वक्त की कसौटी पर घिस कर
और कितनी बार प्रतिमा के नाम पर तरस कर निकलोगी
सावित्री
यहाँ का कोई भी परंपरागत वटवृक्ष
अब सत्यवान नही रहा .
तुम्हारी हजार जन्मों की इच्छाओं का क्या !
  
सावित्री
कभी रूपकँवर , कभी मनोरमा बन कर
बता ऐसा कौन सा दिन है
जब तू जलती नहीं
सावित्री , तेरी चिता पर जाने की परंपरा अब भी यथावत है

सावित्री
सत्ययुग गया और अब भी तू गाफिल है
अब तो सत्यवान भी यम की टोली में शामिल है
अब तो अग्नि परीक्षा का आयोजन राम रावण के साथ मिलकर कर रहा है
और वस्त्र हरण की स्कीम दुर्योधन को कृष्ण ही देता है .
    

सावित्री
इसलिए अब हमें तुम्हारे साथ
विचारों का अस्त्र देखना है
एक दिन तुम्हारे हाथों में
दुर्योधन का वस्त्र देखना है

  

मजदूर-वर्ग के दृष्टिकोण से स्त्री-मुक्ति : १५-१६ नवम्बर,२०१४, गाँधी- आश्रम , सेवाग्राम, में दो दिन का कार्यशाला

विषय प्रवेश:

आज विश्वस्तर पर महिलाओं की स्थिति को समझने के लिए
हमें गहरे विश्लेषणात्मक साधनों की आवश्यकता नहीं है. यह स्पष्ट है कि सबसे अच्छे स्थिति में महिलाएं आज  दोयम दर्जे की नागरिक हैं एवं सबसे बदतर स्थिति में बलात्कारी पुरुषों के हवस की सामग्री हैं! स्त्री एवं पुरुषों के बीच श्रम का सामाजिक विभाजन, यही स्त्रियों की गुलामी की स्थिति के केंद्र में है,जिसकी अभिव्यक्ति शारीरिक हिंसा, सामजिक अलगाव एवं लिंग-भेद आधारित थोपी गई भूमिकाओं को वैधता प्रदान करने में होती है.

निजी एवं सार्वजनिक क्षेत्रों में जनवादी अधिकारों के सन्दर्भ में महिलाएं आज बड़े पैमाने पर पुरुषों के द्वारा बनाये गए नियमों के अधीन हैं.आज की स्थिति में महिलाओं के लिए विवाह तथा वेश्यावृत्ति के  बंदीशाला से छुटकारा पाना कठिन हैं, क्योंकि ऐतिहासिक रूप में  वे मजदूर वर्ग के भीतर एक अधीनस्थ  भूमिका निभाते हैं एवं ‘परिवार’ अथवा घरेलू /पुनरुत्पादन के क्षेत्र में बिना मजदूरी के काम करने के लिए मजबूर हैं. इस सन्दर्भ में पूंजीवाद ने एक साथ  दो काम किये हैं—आधुनिक कारखानों एवं अन्य कार्यक्षेत्रों मे स्त्रियों   को काम देकर एक ओर उनकी आर्थिक परिस्थिति में सुधार लाया है तो  दूसरी ओर उनके शोषण-उत्पीडन में बृद्धि की है, और साथ ही मुक्ति के लिए उनके अपने प्रयासों को  हिंसा के जरिये कुचलने का प्रयास किया है ,क्योंकि परिवार एवं पूंजी के खिलाफ स्त्रियों का संघर्ष ‘उत्पादन’ एवं ‘पुनरुत्पादन’ क्षेत्र के विभाजन को समाप्त करने का संघर्ष है. पूंजीवादी उत्पादन पद्धति (CMP) ने परिवार नाम के संस्था का कायापलट करने ,अर्थात नकारात्मक  ढंग से नष्ट करने में भी सफल रही है—जिसका खामियाजा स्त्रियों  को ही अधिक भुगतना पड़ रहा है –जो अक्सर बच्चों के साथ अकेले छोड़ दी जाती हैं.

विकसित पूंजीवादी देशों में (अर्थात पूंजी के केन्द्रों में) स्त्रियों को बड़े पैमाने पर वेतन-व्यवस्था में शामिल कर लिया गया है-जहाँ घरेलू  काम का आंशिक रूप में सामाजिकरण एवं मशीनीकरण किया गया है, जिसके फलस्वरूप इन देशों के स्त्रियों को पूंजीवादी उत्पादन पद्धति के अंतर्गत कुछ हद तक “स्वतंत्रता” एवं “समानता” मिली है; उदहारण के लिए मजदूर वर्ग की  स्त्रियों को विवाह न करने की आजादी मिली है(बावजूद इसके कि उनमे गरीबी का प्रमाण अधिक है) अथवा पूंजीपति वर्ग की स्त्रियों को बड़ी कंपनियों के संचालन का मौका मिला है.लेकिन मजदूरी के क्षेत्र में आम तौर पर स्त्रियों  को निचले दर्जे का काम दिया जाता है, जहाँ औसत मजदूरी पुरुषों के मुकाबले कम से कम २० प्रतिशत कम है.दूसरी ओर स्त्री होने के नाते इन महिलाओं को आज भी घरेलू  काम का अधिकतम बोझ उठाना पड़ता है, जिसका अर्थ यह है कि उन्हें डबल ड्यूटी करनी पड़ती है,साथ ही पूंजीवादी समाज में स्त्रियों को पुरूषों के द्वारा उनके शरीर, मन, लैंगिकता के वस्तुकरण, बाजारीकरण के साथ  समझौता करना पड़ता है. उन्हें आज भी रोजाना परिवार के भीतर एवं परिवार के बाहर, ‘कार्यक्षेत्रों’ में एवं सम्पूर्ण समाज में हिंसा का सामना करना पड़ता है.

छोटे शहरों में एवं ग्रामीण क्षेत्रों में(अर्थात पूंजी के सीमान्त क्षेत्रों में)  स्त्रियों को मजदूर एवं स्त्री होने के नाते बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है.विवाह-बंधन को स्वीकारने के लिए वे अत्यधिक सामाजिक एवं आर्थिक दवाव में होती हैं, अक्सर ऐसे पुरुषों के साथ ,जिन्हें उन्होंने खुद नहीं चुना है. इस वजह से वे परिवार की ‘इज्जत’ एवं अपनी ‘पवित्रता’(सतीत्व) बनाये रखने के लिए हमेशा सामजिक दबाव में रहती है. अक्सर उन्हें गर्भ-धारण,गर्भ-निरोध,गर्भपात के मामले में निर्णय लेने की आजादी नहीं होती.आज सम्पूर्ण विश्व में स्त्रियों को शारीरिक हिंसा का शिकार होना पड़ता है.यहाँ तक कि बड़े पैमाने पर वे हत्या के शिकार होते हैं, अक्सर जन्म लेने के साथ ही.शिक्षा के क्षेत्र में उन्हें कम अवसर प्राप्त है; आर्थिक स्वायत्तता उन्हें आज तक नहीं मिल पाई है.
केवल पूंजीवादी समाज में ही नहीं,बल्कि प्राक-पूंजीवादी समाजों में भी स्त्री गुलाम थी.वास्तव में स्त्रियों की गुलामी मानवजाति के शुरूआती दौर से ही,अर्थात जबसे स्त्री-पुरुष के बीच पहला श्रम-विभाजन ने मानवजाती के पुनरुत्पादन प्रक्रिया  में अपना घर बना लिया है-तबसे मौजूद है. ‘परिवार’ इस संस्था ने स्त्री-पुरुष के बीच इस श्रम-विभाजन को अधिक मजबूती प्रदान की है.

पूंजीवादी उत्पादन पद्धति के भीतर स्त्री का मजदूर के रूप में शोषण एवं स्त्री के रूप में उत्पीडन विशिष्ट स्वरुप अख्तियार करता है.इसलिए आवश्यक यह है कि विभिन्न कार्यक्षेत्रों में स्त्रियों  की स्थिति      (शिक्षा,ट्रेनिंग,काम का विभाजन,मजदूरी का स्तर, श्रेणी विभाजन इत्यादि) ) पर हम विशेष रूप में ध्यान दें. साथ ही परिवार संस्था(अर्थात विवाह,यौन-जीवन,गर्भ-धारण/गर्भ-निरोध,घरेलु काम,बच्चों का पालन-पोषण, इत्यादि) पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है. इनके आलावा,उत्पादन-पुनरुत्पादन की महत्वपूर्ण प्रक्रिया की ओर भी ध्यान देने की आवश्यकता है कि इनके बीच किस तरह के परस्पर सम्बन्ध हैं, ताकि हम पूंजीवाद के भीतर स्त्रियों  की स्थिति को ठीक से समझ सकें. साथ ही इस बात को ध्यान में रखते हुए कि पूंजीवादी उत्पादन पद्धति ने स्त्रियों की स्थिति को हर जगह एक जैसा नहीं बना दिया  है, विभिन्न देशों में स्त्रियों  की स्थिति पर विस्तृत अध्ययन की आवश्यकता है, ताकि हम उनके उत्पीडन के विशिष्ट स्वरूपों को समझ सके–जैसे उदहारण के लिए भारत में,जहाँ जाति-प्रथा के चलते स्त्रियों के उत्पीडन को एक विशेष आयाम मिला है.

कम्युनिस्ट दृष्टिकोण से हमारी मान्यता यह है कि स्त्रियों की मुक्ति (एवं सम्पूर्ण मानव समाज की मुक्ति) पूंजीवादी उत्पादन पद्धति  के भीतर हासिल नहीं हो सकती—बावजूद इसके की इस उत्पादन पद्धति के भीतर कुछ सकारात्मक परिवर्तन दिखाई देती है. हम भी इनेस्सा अरमंड(रूसी कम्युनिस्ट क्रन्तिकारी) के साथ कह सकते  हैं: “अगर कम्युनिज्म के बिना स्त्री-मुक्ति संभव नहीं है ,तो स्त्री-मुक्ति के बिना कम्युनिज्म भी असंभव है”.लेकिन कम्युनिस्ट क्रांति अथवा पूंजीवाद का खात्मा अपने आप में समस्या का समाधान नहीं है ,क्योंकि पूंजीवाद के पहले भी स्त्रियों का उत्पीडन मौजूद था. एक उत्पीडित समूह के रूप में स्त्रियों को स्त्री-मुक्ति के इस निरंतर संघर्ष को अपने कन्धों पर लेना है.इस संघर्ष में उन्हें अपने पुरुष सहयोगिओं को भी साथ में लेना होगा और कभी उनके खिलाफ संघर्ष भी करना पड़ेगा, क्योंकि पुरुषों में  स्त्रियों की अधीनता की स्थिति का फ़ायदा उठाने की वृत्ति मौजूद रहती है. स्त्रियों की आज़ादी सम्पूर्ण मानव समाज की मुक्ति का मार्ग है.


चर्चासत्र

१५ नवम्बर :

सत्र १:   स्त्री-पुरुषों के बीच लैंगिक एवं सामाजिक श्रम-विभाजन के मद्देनजर, आदिम साम्यवाद एवं वर्गीय समाज के उदय के सन्दर्भ में, स्त्रियों के उत्पीडन के आदि-कारण(उद्गम) को मार्क्स,एंगेल्स की  कृतियों  के आधार पर कैसे समझें?

सत्र २:   स्त्रियों के शोषण एवं उत्पीडन  के  स्वरुप निर्धारण में पूंजीवादी उत्पादन पद्धति (CMP) की विशेषताएँ क्या है? मार्क्सवादी अर्थनीति के निश्चित विचार-प्रणाली के मुताबिक पूंजीवाद ने कार्यक्षेत्र में एवं परिवार में स्त्रियों की स्थिति पर   क्या असर डाला है एवं आज भी डाल रहा है? श्रम-शक्ति के पुनरुत्पादन एवं  मूल्य तथा अतिरिक्त मूल्य के पूंजीवादी उत्पादन, इनके बीच क्या रिश्ता है? दुसरे शब्दों में पूंजीवादी उत्पादन पद्धति किस तरह स्त्री-मजदूरों का उपयोग करती है (उदहारण  के लिए “अतिरिक्त श्रम” के बतौर) जिसका प्रभाव मजदूरी के स्तर पर पड़ता है? एक पृथक घरेलु क्षेत्र की मौजूदगी किस तरह पूंजीवादी उत्पादन पद्धति (CMP) को फ़ायदा पहुंचती है, जहाँ ‘श्रम-शक्ति का पुनरुत्पादन’ मुफ्त में होता है?

१६ नवम्बर :

सत्र १:  भारत में कार्यक्षेत्रों एवं परिवार में स्त्रियों की स्थिति क्या है? मजदूरवर्ग, पूंजी-पति वर्ग एवं उच्च-जाति की स्त्रियों के अनुभवों में भिन्नता एवं साम्य क्या है? पुनरुत्पादन क्षेत्र के नियमन के लिए राज्य की भूमिका क्या है? क़ानूनी एवं आर्थिक साधनों के जरिये स्त्रियों की शोषित उत्पीडित परिस्थिति को बनाये रखने में राज्य की भूमिका क्या है? स्त्रियों के खिलाफ हिंसा से पूंजीवादी उत्पादन पद्धति किस तरह लाभान्वित होती है? इस विषय पर राज्य की क्या प्रतिक्रिया होती है?

सत्र २:  क्या हम २०१२ भारत में उभरे बलात्कार-विरोधी विशाल आन्दोलन( जो आज भी जीवित है ) को क्रन्तिकारी जनवादी आन्दोलन कह सकते हैं? राज्य पर दबाव डालने के दृष्टि  से इस तरह के आन्दोलन  क्या अवसर प्रदान करते हैं एवं इन आन्दोलनों की सीमारेखा क्या है? अंतिम प्रश्न: स्त्रियों के उत्पीडन को समाप्त करने के लिए कौनसे कदम उठाने होंगे एवं किस तरह हम स्त्रियों को स्वतंत्र रूप से एवं वर्गीय आधार पर संगठित होने में मदत कर सकते हैं?

स्त्री -मुक्ति एवं मजदूर-मुक्ति के लिए कार्यरत सभी (स्त्री एवं पुरूष) कार्यकर्ताओं को हम आगामी १५-१६ नवम्बर २०१४ को सेवाग्राम में आयोजित इस दो-दिवसीय कार्यशाला में आमंत्रित करते है.दो-दिन का यह चर्चासत्र यात्री निवास, गाँधी-आश्रम, सेवाग्राम में १५ नवम्बर सुबह १० बजे शुरू होगा एवं १६ नवम्बर शाम ५ बजे तक जारी रहेगा.इस आमंत्रण-पत्र  में  उल्लेखित विभिन्न पहलूओं पर जो साथी पेपर भेजना चाहेंगे उनसे अनुरोध है कि वे अपना पेपर १५ अक्टूबर तक हमारे पास भेजने का कष्ट करें. दो दिन के इस कार्यशाला को आयोजित करने में जो खर्च आयेगा उसे सभी साथिओं को मिलकर उठाना है.

मजदूर-वर्गीय राजनीति पर सेवाग्राम–नई दिल्ली चर्चासत्र आयोजन समिति.

धीय बिनु धरम न होय….!

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जितेन्द्र विसारिया

युवा कथाकार जितेन्द्र विसारिया की यह कहानी भ्रूण हत्या के खिलाफ चुप्पी तोडती एक स्त्री की कहानी है . सम्पर्क : मोबाईल न : 09893375309

ठाकुर हर परसाद के आँगन में गाँव भर की जनीमाँसें रंग-बिरंगे गहने-कपड़ों में सजी-धजी, समवेत स्वर में सौहर गाने में मगन हैं। और गाती भीं क्यों नहीं, चार मोंड़ियों के बाद हुआ है छोरा ठाकुर के घर। बड़े दिनों बाद लड़कियों के सिर का ढकौंना पाकर अपने को धन्य मान रही हैं ठकुराइन। सारे नगरा गाँव में तीन दिन से होली-दिवाली जैसा माहौल बना हुआ है। ठाकुर ने बेटे के जनम पर उसकी सलामी में अटारी से माउजर के सात फैर करवाये हैं। पोरसा से लतीफ़ का बैंड और रेशमपुरा से पाँच बेड़िनियाँ आईं है बधाई डालने।….ठाकुर ने सातो जात में दस-दस रुपये और लड्डू घर-घर बँटवाए हैं। हरीरा और विसवार के लड्डुओं की महक से भरी गाँव की नाइन रामकली बुआ ‘ कौशिल्या के जनमें राम अजुद्धिया  फूलन छाय रही है; गीत गाती  पूरे गाँव में घर-घर बुलउआ देती चकरी-भौंरी बनी फिर रही हैं।

चँदा भी काकी के बुलावे पर अपनी सास के साथ ठाकुर के घर चली आई थी। ठाकुर की ठकुराइन का आज ‘ बहार ’ था। द्वार पर गोबर और जौ के दानों के प्रयोग से कलात्मक साँतिया बनाये गये हैं। सारा आँगन गेरू और गोबर से ढिंग देकर लीपा गया है।… आँगन के बीच में गाय के गोबर से बना अठकलियाँ चैक चैक पर ‘पाटा’ और पाटे पर चुनरियाऊ साड़ी में ठकुरायन अपने नव जातक के साथ घूँघट काढ़े खड़ी हुई हैं। अभी-अभी उनका छोटा देवर ज्ञान सिंह सौर से उनकी साड़ी का छोर पकड़कर चैक पर लाया है। ठकुराइन ने नेग में उसे सोने की अंगूठी  देने का वादा किया है।…साथ ही अपने पीठ-पीछे भाई लाने के कारण ठकुराईन की छोटी मोड़ी राधा की पीठ को भी घी-गुड़ से पूजा गया था !

 चँदा ने देखा कल तक चार बेटियाँ जनने के कारण लटे बरदा से कँधा डालकर न्यौहरें-न्यौहरें चलने वाली ठकुराइन बेटा जनने के कारण चैक पर तनकर खड़ी हुईं हैं। उनके गुलाबी घूँघट से फूटकर बिखरती हँसी जैसे पूरी बखरी में फैल गयी है। ठकुराइन को विहँसता देख वहाँ बैठी पुरा-पड़ौस से आईं सब औरतें सिहा उठीं। आँगन में जाजिम पर गड़रिया टोला से आकर बैठीं मंगलो आजी  उत्साहित होकर पीछे से अपनी पुरानी चाल का सौहर उन्सार दिया था- ‘ आज बधाये कौ दिन नीको बेटा जियाये को दिन नीको।‘ जिसके बोल तुरंत ही वहाँ बैठी सब जनीमाँसों ने उठा लिए थे, बड़ी गितार हैं मंगलो आजी। गाँव का कोई भी ब्याह-कारज मंगलो आजी के गाये गीतों के बगैर पूरा नहीं होता। ढोलक सप्तम पर चली गई थी।

चैक पर उधर सीराम पुरहेत की अम्मा रामा पंडिताइन रामकली बुआ के साथ काँसे की थाली में हल्दी, चावल, पाँच सुपारी, बतासे और काँस की नई सात सींकें लेकर जच्चा के सामने आकर खड़ी हो गई थीं। पंडिताइन ने पहले धोती के छोर में बेटे के साथ सगुन का नाज लिए खड़ी ठकुराइन के आँचल से वह अनाज चैक पर छुड़वाया। काँस की सींके लेकर जच्चा-बच्चा पर न्यौछावर कर चारो दिशाओं में उछालीं फिर अक्षत-हल्दी से जच्चा का तिलक कर बतासे से मुँह मीठा कराया और थाल बगल में खड़ी रामकली बुआ को देकर बच्चे की बलैयाँ ले पीछे हट गईं थीं। उसके बाद गाँव की अन्य स्त्रियाँ अपने साथ बिलिया-कटोरियों में लाई अनाज और पैसा बारी-बारी से जच्चा-बच्चा पर न्यौछावर कर चैक पर छोड़ती, थार से हल्दी-अक्षत लेकर ठकुराइन को तिलक लगाती, बच्चे की बलैयाँ लेती अपनी-अपनी जगह पर आ-आकर बैठने लगी थीं। कुछ देर बाद चँदा की सास की बारी आई। सास ने घर से लाये गेहुँओं का बेला एक हाथ में लिया और दूसरे हाथ के झाले से पास बैठी चँदा को उठाकर अपने साथ चैक पर चलने के लिए तैयार कर लिया था। चँदा बगैर कुछ कहे भोली बछिया सी चुपचाप उठकर सास के पीछे-पीछे चैक पर चली आई थी। चैक पर औरों की तरह चँदा की सास ने भी सबसे पहले अपने साथ लाये बेला के गेहुँओं को ठकुराइन और उनके बच्चे पर उसार कर चैक पर डाला, हल्दी-अक्षत से टीका किया और फिर थाल चँदा को सौंप दिया। चैक पर सुनहरे तारों से कढ़ी सितारों वाली गुलाबी साड़ी और ब्याह वाली सफेद चदरिया ओढ़े। गोद में रेशम के मखमली गदेले में नन्हें चूजे सा ओंठ खोले। आँख बंद किए। माथे पर ढिटौंना लगायें। वसंत में श्याम आभा लिए आम की गुलाबी कोपलों जैसा कोमल नर शिशु। जिसे देखकर मन ही मन हर्षाती चँदा की सास। बच्चे की बलैयाँ लेने के उपरांत ठकुराइन से अर्ज पर उतर आई थी-‘ दुलहिन! हमाई बहू कों हू आशीष देउ जाके पहलौठी में कुँअर कन्हआई होंय…’

आज उदारता की खान बनीं ठकुरायन ने मुस्कराते हुए चँदा के सिर पर हाथ रख दिया था-‘कौन सा महीना चल रऔ ए…’ ‘ दूसरा…।‘ ’चँदा ने भी अपनी साड़ी का पल्ला सिर पर डाल लिहाज के साथ झुककर ठकुराइन के पैर छू लिए थे। यह देख वहाँ बैठा सारा नारी-वृंद चंदा की सास से उसकी ऐसी हीरा-बहु  की  प्रशंसा  में पुल बाँध उठा था।  गाना-बजाना लगभग अब मद्धिम  पड़ चुका था। रामकली बुआ ठकुराइन को चैक से उठाकर पुनः सौर वाले मढ़ा में कर आयीं थीं। उधर हरप्रसाद की काकी धनकुँवरि और रामा पंडिताइन आज ही मुरैना से बायने के लिए मँगायी स्टील की नई कटोरियाँ और बूँदी के लड्डू उठाने तिवारे के भीतर चली गई थी। इधर फुर्सत के क्षण पाकर आँगन में बायने की आस में बैठी रह गई गाँव की लुगाईयाँ आपस में इते-उते की बातें कर उठीं थीं।

जाजिम पर चंदा की सास के बगल बैठीं कछियाने से आई लछिमन की अम्मा ने ही सबसे पहले बात उन्सारी-‘देख लओ रामदत्त  की अम्मा! बेटा भए पे ठकुरायन को मुँह कैसो दिपदिपाय रहो तो विचारी के दिन फिर गए कहाका ने साँची ई कही है-‘ बिटिया जियायें दुःख बिटिया ब्याहें दुःख। बेटा जियायें सुख बेटा ब्याहें सुख…’ ‘ हाँ! साँची कह रही हो लछिमनू की अम्मा पहलौठी में बिटिया पैदा करके ठकुरायन के दिना बड़े कसाले में कटे हैं। …न मायके में दर न ससुरार में!! सुन्यौ है अपना ठाकुर हू नशा करके रोज़ रात ठकुराइन की धुनाई देत तो, ‘ ससुरी जे धिधरियाँ पैदा कर-कर कैं धरत जाय रही हैं, कौन-कौन के द्वार पे नाक रगड़ेंगे इनके रिश्ते के काजैं…दारी पे तमाखू धरकें या खटिया के पाये के नीचें दबाय कैं नहीं मारी गईं। मद उतर जाता तो ठाकुर मोंड़ियन के भोले मुख देखकें उन्हें इकठौरी कर गरे से लगाकर रोता भी सुना है-कोट नवें,पर्वत नवें,बाबुल कौ सिर तब नवै जब घर साजन आवें!!! क्या करे विचारा लाचार था ठाकुर…।‘तभी सबसे पीछे चमार टोला से आई बिरखे की लुगाई भी इनकी बातें सुनकर थोड़े और आगे सरक आई थी। उसने धीरे से इसमें एक नई बात और जोड़ दी-‘ बहन! अपने गाँव के ठाकुर तो हू भले हैं। मेरे श्यौपुर में तो इनको एक गाँव ऐसो है, जहाँ अबै तक काऊ दूसरे गाँव की बरात नहीं चढ़ी!! मोड़ियन की होते ई घिटी मसक देत हत्यारे!!! फिर बहुँए भलेई ले आये माराष्ट-बिहार ते बा में इनके कुल की नाक नीची नई होत…’ आगे-पीछे सारी जाजिम स्तब्ध।

इन बातों को कहने-सुनाने का कोई मकसद नहीं था, ना ही यह बाते आगे बैठी चँदा को सुनाकर कहीं गईं थीं,पर उसने यह बातें अच्छी तरह से सुन ली थीं। …सुनी तो उसने रात में अपने पटवारी जेठ और सास द्वारा पति को अपने कमरे में बुलाकर चुपचाप कही यह बात भी है-‘ रामदत्त  बहू की महतारी के पहलौठी में जा समेत तीन मोड़ी ई मोड़ीं भई हैं सो हमें पूरा-पूरा-अंदेशा है कि बहू के हू पहलौठी में मोड़ी ई होवेगी, कल तैं धौलपुर जायके बहू की सोनोग्राफी काराय लिया मोंड़ी होय तो वहीं… अपने पोस्से-मुरैना में तो भारी कड़ाई है…और न इतनी अच्छी सुविधा.’  चँदा के मन में तब से ही एक गहरी फाँस बैठ गई है। उसे लगता है जैसे कोई उसके प्राण खींच रहा हैं। कोई उसके मन का सबसे सुन्दर और शुभ चुराना चाहता है। छीनना चाहता है उसके हिस्से की प्यास। निचोड़ लेना चाहता है उसकी आत्मा का रस।… मानो वह हजारों-हजार नख-दंत वाले मादा-भक्षी हिंसक जानवरों में आ फँसी हो।…

हाँ चँदा का कोई भाई नहीं है। जो हुआ था वह तमाम इलाज़ के बाबजूद बचाया नहीं जा सका। समाज में बिना भाई की बहन और नठिया बाप की बेटी होने का लाँछन सुनते-सहते चँदा और उसकी बहने बड़ी हुई हैं । उसकी माँ पति के वंश को एक कुलदीपक न दे पाने की हीनग्रंथि के चलते सार्वजनिक पर्व-उत्सव और नाते-रिश्तेदार से कब का कनाव काट बैठी है।… घर में यदि किसी ने हार नहीं मानी तो उसके सहृदयी किन्तु दृढ़ निश्चयी दद्दा ने, जिन्होंने माँ के सहयोग से अपनी तीनों बेटियों की परवरिश कुछ इस तरह से की कि चँदा को फिर कभी किसी भाई की ज़रूरत महसूस नहीं हुई थी। दद्दा ने किसी के लाड़ले बेटों की तरह ही उसे मुरैना से लेकर ग्वालियर तक पढ़ाया और अपने साथ पढ़कर ही टीचर बने लड़के के संग उसी की मर्जी से शादी भी कर दी थी।ब्याह में “ ‘भतैया’ लेते समय एक बिन भैया की बहन कुँअल ठाड़ी रौवे,  जैसे अँसुआ ढरकाऊ गीत और भाँवरों के समय “मड़यै के नीचे बरातियों से-सारे बिना सूनी ससुरार “ जैसी मन फटाऊ लोकोक्ति सुनकर शर्मिन्दा हुए पति को देख द्रवित हुई चँदा ने जब अन्य लड़कियों की भाँति विदा के समय अपने दद्दा के गले लग हिलक कर रोना चाहा था। तब दृढ़-निश्चयी पिता ने उसे उसी समय बरज दिया था- “ बेटा! रोना निबल की निशानी है, और तुम तो हमारी नाहर हो काहे रोतीं!! भीख सा माँगकर जो भात-पछ भैया से लेतीं और भौजाई के ताने सुनतीं,बाकी भरपाई तो हमने तुम्हें अपनी संपत्ति का वारिस बनाकर पहले ही पूरी किए देत हैं। …हम जब तक जिन्दा हैं तब तक हम तिहारे नीके-बुरे में शामिल हैं ई और मर गए तब हमारी जाजाइत तिहारे संग रहेगी ही!!! …और बेटा! दुनिया में धन-दौलत नाते-रिश्तेदार तो आदमी के संग-साथ होते भी है और नहीं भी, मनुख का सबसे गाढ़ा सगा और संपत्ति  तो उसके अपने मन का भरोसा है, उसे बनाये रखियो.”

पर चंदा के मन का वह भरोसा आज टूट क्यों रहा है ? क्यों वह उसी समय अपने जेठ से प्रतिवाद नहीं कर सकी कि “ दादा! बेटी-बेटा सब बराबर होते हैं, ईश्वर हमें जो देगा उसे अपना आँचल पसार कर ले लेंगे।…जब दोनों एक ही माँ-बाप के रक्त-बिन्दु से पैदा होते हैं और दोनों एक ही हाड़-माँस-मज्जा से बने फिर यह दुभाँति क्यों…”  क्यों आज वह इस उत्सव की रंगीनियों में अपने मन का भरोसा खोये दे रही है। …एक स्त्री के लिए केवल पुरूष पैदा करना ही यदि दुनिया का सबसे बड़ा गौरव है, तो यह गौरव उसे अस्वीकार क्यों नहीं ! माँटी मिल गई उसकी सारी पढ़ाई-लिखायी। व्यर्थ गया उसका शिक्षक बनना। चँदा मन ही मन रो पड़ी थी। कुछ देर बाद पता नहीं फिर  मन में क्या आया कि वह सास की आज्ञा लिए बगैर ही वहाँ से उठ खड़ी हुई और घर के लिए चल दी थी।… ठाकुर हर प्रसाद का आँगन तब तक पुत्र जन्म के अवसर पर बँटने वाले लड्डुओं की महक और नई कटोरियों की खनक से भर चुका था। चंदा को यों एकाएक चुपचाप उठकर जाता देख जाजिम पर वहाँ बैठी रह गईं अन्य स्त्रियों से न रहा गया। उन्होंने उसे लक्ष्य करते हुए इस अवसर पर गाया जाने वाला यह सौहर छेड़ दिया था-
‘अबै तो मेरे धिय नहीं जनमी
जनमें आछे लाल………….!
अबै तो मेरी दौरानी बड़ी जू
तुम काहे कों रूठी जाओ
अबै तो मेरे मायके के हरवा
सो लयें घर जाओ……….!
अबै तो मेरे धिय नहीं जनमी
जनमें आछे लाल…………!

कोई और होता तो सखियों की इस चुहल और गीत की आत्मीयता देखकर मगन मन वहीं फिरक लेकर नाच उठता, पर चँदा ने ऐसा नहीं किया…। उसने अपनी धोती के ऊपर ओढ़ रखी चदरिया को थोड़ा और ठीक किया, द्वार से सटकर रखे सेंडिल पहने और आगे बढ़ गई थी। चंदा की सास को उसका इस तरह उठकर जाना अपना कम ठकुराइन और वहाँ बैठे सखी समाज का अपमान ज्यादा लगा। वह वहीं से खड़े होकर चिल्लायी थी- “ बहूऽऽ नेक और रुक जाऽ हमहू तो चल रहे?थोड़ी ही देर की तो बात हैं बटौना तो ले लें…” पर उसने नहीं सुना। सास ने सबके सामने बहाना बनाया- “घर कौ पूरो काम-धाम करकें स्कूल पढ़ाइवे जात है बैठें-बैठें चक्कर आने लगे होंयगे…।“  तब औरों की अपेक्षा सहज विश्वासी हर प्रसाद की काकी ने आँगन से चलकर पौर तक जा पहुँची चँदा को लड्डुओं से भरी नई कटोरी हाथ में ले जाकर थमा दी थी- “ बहूऽ जे का अनर्थ करती हो अपनो बायना तो लेके जाओ…।“  चंदा ने बगैर किसी प्रति-प्रश्न के काकी का मान रखते हुए मुस्करा कर कटोरी हाथ में ले ली , “ ऐसी कोई बात नहीं है आजी! बैठे-बैठें मूँड़ में घुमेर उठी सो चल दए…।“ काकी ने भी उसकी मज़बूरी समझकर क्षमा कर दिया था-“ जाओ बेटा! घरे आराम करो…पेटहूली जनीमान्स के संग जे समस्या आवत ई है –राम करे दूधो हनाओ पूतों फरौ…!” चंदा के मन में काकी के इस निरापद स्नेह और आशीष पर एक साथ श्रद्धा और घृणा जागी!!! जिसमें से उसने एक को दबाकर गाँव की उस सम्मानीय वृद्धा को प्रणाम किया और अपने में ही खोई वहाँ से चलकर गली में निकल आई थी।

“द्ददा! क्या बेटे अपने मैया-बाप को साँचे हू मोक्ष दिवात हैं…”  उसने एक दिन बातों ही बातों में अपने द्ददा से यह प्रश्न पूछ धरा था। तब उसके द्ददा ने बड़े ही व्यंग्यात्मक रूप में हँसते हुए उसे समझाया  “ नहींऽ री! यह सब चतुरन के चोचले हैं, मद्द को जनी से बड़ा बनाये रखने की चाल! …जो ईसुर को नहीं मानत वे कहत हैं कि मनुख के करम परछाँही की नाईं सदा उसके पीछे लगे रहत हैं वह उसका फल यहीं पाता है न कहूँ सरग है और ना नरक.!! …जई बात दूसरी तरह से ईसुरवादी भी मानत हैं कि यह सिंसार करम पिरधान है, जो जैसे करम करता है ईसुर उसे वैसा ई फल देता है!!! …जब कोई किसी के करमन का भागी ही नहीं फिर उसका बेटा मोच्छदाता कैसे हुआ री” चँदा ने तभी से यह बात अपनी गाँठ बाँध ली है। द्ददा द्वारा समय-समय पर उसके मन के ज़िरह-बख्तर में इस तरह के विचारों की जो छुरी-कटारियाँ खोंसी गई थीं, अब तक वह उन्हीं से अपना बचाव करती आई है। रात में जेठ द्वारा पति को रामचन्द्र जी की तरह आज्ञा देते और उस आज्ञा को पति द्वारा लक्ष्मण-भरत भाईयों की तरह शिरोधार्य करते उसे कार्यरूप रूप में परिणित करने को तत्पर देखा है। चँदा को तभी से अपने प्रिय द्ददा और उनके द्वारा कही वे बातें ही याद आ रही हैं। बड़ा भरोसा है उसे अपने द्ददा की बातों पर।

रास्ते में किस का घर पड़ा, किसने देखा और किसने टोका, चँदा को इसका कुछ भान नहीं था। …पेट में अपने होने का अहसास कराते नये मेहमान की चिंता उसे साल रही थी। वह हर कीमत पर उसे बचाना चाहती है। इससे क्या फर्क पड़ता है कि वह बेटा है या बेटी, वह हर स्थिति में उसकी अविभावक है। वह उसकी हत्या नहीं होने देगी। वह उस हर शख्स से लडे़गी, जो उसकी कोख में पल रहे अंश को जरा सी भी क्षति पहुँचाने की चेष्टा करेगा…! यह चंदा नहीं उसके मन का भरोसा बोल रहा था। उस भरोसे में बैठे बोल रहे थे उसके अपने द्ददा, जिन्होंने उसके साथ कभी कोई दुर्भाव नहीं किया। …फिर भला वह अपनी औलाद के बीच दुभाँति कैसे होने दे !
इस उधेड़-बुन में  उलझते-सुलझते जाने कब घर आ गया, चँदा को पता ही नहीं लगा। द्वार के सामने गली में लगे हेंडपम्प पर मोटर साइकिल धोकर पोंछ रहे पति ने जब हाथ में लड्डुओं की कटोरी लिए चली आ रही चँदा को देखा,तो उसकी आँखें में एक अजीब तरह की चमक थी। वह प्रसन्न होकर बोला- “चलो अच्छा हुआ तुम आय गईं तुम्हें टिराने अभिहाल लोहरी जिज्जी को हम पहुँचाय ई रहे थे . अम्मा तो जहाँ जायेंगी वहाँ मेल के ही रह जाती हैं–हमें अभईं धौलपुर चलना है”
“ नहीं…”

पति ने जिस स्नेह,लगाव और दृढ़ता के साथ अपनी बात कही, चँदा ने ठीक उसी प्रकार निर्विकार होकर अपना पक्ष रख दिया था। चँदा की कत्थई बनारसी साड़ी के भीतर आत्मविश्वास और दृढ़ता परिपूर्ण गोरे मुख से प्रस्फुटित तेजोदीप्त आलोक ने घूँघट से बाहर का सारा वातावरण अपने प्रभाव में ले लिया था।
दो घर दूर पाँच नुकरिया बेटों के होते हुए भी गाँव में अकेली और बेसहारा रह रहीं बूढ़ी राधा काकी अपनी सूनी देहरी पर बैठीं-बैंठी गौरैयों को चुगा चुनाती एक पुराने गीत की कड़ी दोहरा रहीं थीं-

“घी बिन होम दहीं बिन टीका सो धीय बिनु धरम न होंय”
कि हाँ जू धिय बिन धरम न होंय…!”

नीलिमा सिन्हा की कवितायें : वर्किंग वीमेन और अन्य

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नीलिमा सिन्हा

कथाकार नीलिमा सिन्हा कवितायें भी लिखती रही हैं. संप्रति संस्कृत विश्वविद्यालय दरभंगा में प्रतिकुलपति के रूप में कार्यरत . संपर्क neelima_sinha04@rediffmail.com  

वर्किंग  वीमेन

बड़े तड़के
दादी जी की चाय से लेकर
मुन्ने की टिफीन तक निबटाती है,
पेट में कुछ डालने की सुध हो, न-हो,
सैंडिल में पाँव और पर्स में कलम सरकाती है,
अफरा-तफरी में फिट-फाट
घर से निकलती है औरत
दफ्तर  जाने को।

स्मार्ट दिखना उसकी मजबूरी है
और बदनामी का बायस भी।
उपर से तेज-तर्रार दिखती औरत भीतर-भीतर डरती है
उसे शराब समझ कर गटक जाने वाली आँखों से,
हर उठी उंगली  से
कि ना जाने कब
उंगली  के इशारे पर वही हो।

दफ्तर  !
एक दुधारी तलवार!
जो हर पल काटती है उसके औरत-पने को
और बनने नहीं देती
कभी-भी उसे
पूरा का पूरा एक मर्द।
चाहता है दफ्तर
कि दिखे वह औरत की तरह
और काम करे मर्दो की तरह,
हँसे एक मदमाती हँसी
जिसमें सराबोर दफ्तर
फड़फड़ाए गुड़ पर लगी मक्खी की तरह
और दरकिनार कर दिया जा सके गुड़
कभी भी घिनौना करार देकर।
जारी है एक मुसलसल रेस
जिसमें अन्ततः जुत ही जाती है औरत
मजबूरन एक हार स्वीकार करने के लिए।

ऋषि   ने बनाया अहिल्या को पत्थर
राम ने बनाया पत्थर को औरत
और दफ्तर  बनाता है औरत को मशीन
– स्वेटर बुनने की मशीन, कपड़े धोने की मशीन,
खाना पकाने की मशीन, सिक्के ढ़ालने की मशीन
… एक सम्पूर्ण मानवोपयोगी मशीन
जो बच्चे भी पैदा कर लेती है अक्सरहाँ!
दो़ महीने गर्भ में रखने का
और दो महीने दूध पिलाने का हक होता है
बाकी सब दूसरों की दया
और ईश्वर की कृपा है।

कुछ भी तो नहीं करती ढ़ंग से यह औरत
करती है सब कुछ
पर कामचलाउ  ढंग से
‘कामचलाउ  औरत’
अर्थात
‘वर्किंग वीमेन’।

एक वेद चाहिए मुझे अपने लिए भी

ओ ब्राह्मण !
तुम्हारे चरण-रज लेकर आज्ञा चाहती हूँ तुम्हारे चरणों में बैठने की
नितांत जिज्ञासु भाव से
हे गुरू !

शास्त्रार्थ नहीं करूँगी तुमसे, हे याज्ञवल्क्य !
जानती हूँ –
यदि मैं हारती हूँ
तो हांक ले जाओगे तुझ मुझे भी अपनी सहस्त्र गौवों के साथ
और यदि मैं जीतती हूँ
डाल दोगे तुम मेरे गले में अपने हाथों की जयमाला,
छीन लिया जाएगा मुझसे मेरा सहजप्राप्य स्वयंवर भी।
हर हाल में स्वीकारना ही होगा मुझे
तुम्हारा स्वामित्व !

तुम चतुर ! हर हाल में छल ही लेते हो मुझे !
यद्यपि मैं मूर्ख नहीं कि समझ न सकूँ तुम्हारा छल
परन्तु छली न जाऊं तो करूॅ क्या?
रचा गया है वह माया – मृग मेरे ही लिए तो
जो तुम्हारी देवत्व सिद्धि का अंतिम साधन है।
घर हर स्त्री की लक्ष्मण-रेखा है
जिसे लाँघने पर सीता-हरण होता हो अथवा नहीं
देनी तो पड़ती ही है एक अग्नि परीक्षा
और भोगना तो पड़ता ही है
एक निर्वासन !

अतएव,ओ मनीषि !
पूछने दो मुझे एक प्रश्न
नितांत जिज्ञासु-भाव से।

बतलाओ ऋषि ! प्राप्य क्या है मेरा?
धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष – ये तो ‘पुरूषार्थ’ हैं, ‘पुरूष’ अर्थात तुम्हारे लिए,
किंतु मेरे लिए क्या है ऋषि ?
… पतिव्रत धर्म ? समर्पण-मात्र ?
… किंतु वह तो देय है, प्राप्य क्या है मेरा ?
… पति-प्रेम ?
किंतु वह तो कहीं भी उसके कर्मों में विहित नहीं,
स्त्री-प्रेम तो देय नहीं, आसक्ति है पुरूष की,
जिससे मुक्त होना ही है उसे हर हाल  में।
तब,
मेरे लिए क्या है ऋषि ?
… क्या यही लांछना, कि
मैं आसक्ति में डाल भटकाती हूँ उसे ?
बतलाना, हे ऋषि !
भटकता वह है, आसक्त वह
पर लांछित मैं क्यों ऋषि ?

हे शतपथ ब्राहमण  !
तुमने मुझे आशीष  दिया
सहस्त्र पुत्रों और अपने ही पति की माता बनने का
बतलाओं ऋषि !
परशुरामों की इस मातृहंता संस्कृति में क्या करूँ तुम्हारे इस आशीष का ?
यहाँ तो पिता की अंध-आज्ञा ही उबार ले जाती है
पाप-पुण्य, प्रायश्चित -पश्चाताप  के समस्त प्रश्नों  से।
क्या करूँगी मैं सहस्त्र पुत्रों
अथवा अपने ही पति की माता बन कर ?
मेरा वध करने को तो, बस एक पुत्र
और निरा एक पति
ही पर्याप्त हैं !

ओ ज्ञानी !
हिसाब नहीं मांगती तुमसे परम्पराओं का
क्योंकि सहभागिनी मैं भी तो रही हूँ,
मेरे भी तो हैं वे मूल्य, वे परम्पराएँ, वे आदर्श ।
और आज भी मैं उपज हूँ उसी संस्कृति की
जहाँ स्त्रियाँ देवी बना कर पूजी जाती हैं
प्रस्तर-प्रतिमा बनने को बाध्य।
कहो ऋषि ! क्या यह परम्परा मुझे स्वीकार होनी चाहिए ?

… किंतु मार्ग क्या है ?
कैसे जीवित रहूँगी अपनी मिट्टी से कट कर ?
क्या करूँगी आकाश -कुसुम से अस्तित्व का ?
कहाँ  होऊं  पुष्पित-पल्लवित ?
… ओ ऋषि !
मुझे मेरा मार्ग, मेरा बोध, मेरा प्राप्य, मेरा सच्चिदानन्द दे दो ऋषि !

जानती हूँ,
स्वयं ही ढूँढ़ने होंगे  मुझे अपने प्रश्नों  के उत्तर,
स्वयं ही निर्धारित करना होगा मुझे अपना मार्ग
किंतु
प्रश्न तो किए हैं मैंने तुम्हारी प्रतिमा से ही !

अतएव, हे द्रोण !
भयभीत हूँ
अपने अँगूठे के प्रति।

वसीयतनामा

मेरी बच्ची !
मैं देती हूँ तुम्हें उत्तराधिकार में
एक निरंतर प्रवाहमान अजर अस्तित्व,
एक तेजपुंज,
एक समरभूमि,
चंद लड़ाईयाँ
और दो हथियार !

ये हथियार –
तुम्हारी  शिक्षा और संस्कृति,
आजन्म पैनाए हैं मैंने
मैंने सिखलाया भी है तुम्हें
इन हथियारों का प्रयोग
मेरी लाड़ली !
एक सिपाही के सबसे बड़े साथी उसके हथियार होते हैं ।
कभी छोड़ना नहीं
अपनी शिक्षा और संस्कार
सामने चाहे तुम्हारा पिता हीं क्यों न हो
या कि
कोई अत्यन्त घृणित भयावह शत्रु
श्रद्धा या भयवश
न मोड़ना, न रखना
अपने हथियार – यह शिक्षा, यह संस्कृति।

याद रखना !
संभव नहीं इस युद्ध क्षेत्र से पलायन।
हर किसी को लड़नी हीं पड़ती है
अपने-अपने हिस्से की लड़ाई, खुद ही
वरना जो मैंने  पाला है तुम्हें फूलों की तरह
लड़ती रही निरन्तर
ताकि तुम जी सको एक सुखद जीवन
और पैनाती रही अपने हथियार्
मेरी लाल !
मैं लड़ गई होती
तुम्हारे हिस्से की भी लड़ाई, तुम्हारे मोहवश  !
क्योंकि लड़ना कभी सुखद नहीं होता
मैं जी गई होती
एक सुविधाजनक जीवन
दूर से देखती हुई तमाम लड़ाईयाँ
और लपक गई होती
किसी की भी विजय, अपने जिम्मे
पर मैंने चुना
यह युद्ध क्षेत्र
क्योंकि वह सुविधाजनक जीवन छीन लेता मुझसे मेरे होने का अर्थ
और, तुम्हें भी मुझसे, मेरी बच्ची !

अपने अस्तित्व के प्रति यह मोह हीं मुझे योद्धा बना गया
और यदि तुम चाहती हो
अपनी संतति,
मोह है तुम्हें अपने अस्तित्व से
लड़ना ही पड़ेगा तुम्हें भी
यह युद्ध, ऐसे हीं निरन्तर
पैनाने होंगे अपने हथियार
और विरासत में देनी होगी यह लड़ाई
अपनी अगली पीढ़ी को।

यद्यपि लड़ना
सुविधाजनक नहीं होता
परन्तु मृत्यु पर जीवन की विजय
और अस्तित्व की निरंतरता ही
सभी सुविधाओं के चरम अर्थ हैं।

प्रश्न  नहीं उठाना जय-पराजय के
क्योंकि
युद्ध, सिर्फ ‘विजय’ नहीं होता।
सच तो यह है कि
‘विजय’ होता ही नहीं युद्ध
अतः, डरना नहीं कभी पराजय से
अथवा मृत्यु से
और याद रखना यह अमृत मंत्र
कि
मृत्यु छल सकती है तुम्हें एक बार, सिर्फ एक बार
पर तुम छलती हो मृत्यु को प्रतिदिन, प्रतिपल
और तब भी छलती रहोगी
जब मृत्यु सोच चुकेगी कि अंततःउसने तुम्हें पराजित किया;
क्योंकि
मर कर हीं अमर होती है
हुतात्मा।
याद रखना मेरी बच्ची!
पीछे हटना पराजय नहीं, रणनीति है,
पराजय है चुप बैठ जाना और निरंतर बैठे रहना।

उठा सकता है कोई प्रश्न
क्या पाया है मैंने इस युद्ध से ?
और, क्या दूँगी तुझे ?
तुम क्यों लड़ो यह युद्ध ? किसलिए ?
तुम्हें घृणा हो सकती है युद्ध से मुझे क्षत विक्षत देखकर
पर मेरी आस !
यह ठीक है
कि शान्ति  युद्ध से बड़ी है
और जीवन का पाथेय प्रेम हीं है जिसे व्यक्ति निरंतर खोता है, युद्ध में।
पर यह भी याद रखना
शांति से भी बड़ी चीज है
आत्म-सम्मान और अस्तित्व की गरिमा,
और आजादी प्रेम से भी बड़ी प्यास है।
तुम लड़ना
इस गरिमा, सम्मान और आजादी की लड़ाई।
अगर प्रेम का पाथेय लेकर लड़ सको तो अच्छा है,
और सर्वोत्तम है
यदि गरिमा, सम्मान, प्रेम और आजादी सभी पा सको
फिर भी,
लड़ना तो पड़ेगा हीं इन्हें सुरक्षित रखने का भी युद्ध,
यह याद रखना कि ये चीजें विरासत में नहीं मिलतीं।
विरासत में मिलते हैं –
माहौल, रणभूमि और हथियार।

मेरी बच्ची !
मैं सौंप रही हूँ तुझे
विरासत में वही माहौल, एक रणभूमि
चंद लड़ाईयाँ,
और
दो हथियार
– अपनी  शिक्षा और अपनी संस्कृति !
मेरी बच्ची !
हारना नहीं !

वीणा वत्सल सिंह की कवितायें : रेहाना जब्बारी और अन्य

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वीणा वत्सल सिंह

युवा कवयित्री वीणा वत्सल सिंह दो सालों तक दुमका में पढ़ाने के बाद आजकल लखनउ रहती हैं. संपर्क :veenavatsalsingh19libra@gmail.com>

रेहाना  जब्बारी
रेहाना
तुम मरना नहीं चाहती थी कभी
तभी तो अपने को रेप से बचाने के लिए
लड़ पड़ी थी तुम सात साल पहले
जब तुम उम्र के उठान पर मात्र उन्नीस वर्षों की थी
नहीं था उस दरिन्दे को जीने का हक़
एक स्त्री के नाते
तुम्हारे भावों को पी
सहमत हूँ मैं
तुम्हारे द्वारा की गई ह्त्या से
रेहाना ,
वहाँ के क़ानून के अनुसार
अपनी मौत निश्चित जान कर भी
तुमने काल – कोठरी के
उन सात वर्षों में
जगाये रखी जीवन की लौ ह्रदय में
तभी तो ,
कब्र के सडांध से आगे की जिन्दगी चुन
देह – दान कर गई तुम
अपनी जिन्दगी को बनाए रखने का
इससे खुबसूरत भाव कुछ और नहीं हो सकता
रेहाना ,
तूम बहुत खुबसूरत हो
इस देह से ऊपर
विश्व के हर कोने में ज़िंदा रहोगी
जब ,
कहीं भी
कोई स्त्री अपने अस्तित्व की
रक्षा की आवाज उठायेगी
तुम उस आवाज से झाँकोगी
रेहाना ,
जब कहीं भी
कोई भी
स्त्री अपने अस्मत की रक्षा के लिए हथियार उठायेगी
तुम उस हथियार की धार में चमकोगी
रेहाना ,
जब – जब इस दुनिया में
स्त्री रौंदी जाकर भी
जीने के लिए उठ खडी होगी
तुम उस जीवन में खिलखिला उठोगी
रेहाना ,
तुम मर नहीं सकती
तुम ‘कब्र की सडांध’
और ‘गमों के काले लिबास’ के लिए
बनी ही नहीं
तुम्हारे हर पल का संघर्ष
तुम्हे हवा में घुलाकर
हर स्त्री की साँसों में उतारेगा
तुम हर स्त्री के ह्रदय में धड़कती

ज़िंदा होकर
फिर फिर से लड़ोगे

अपने होने की
एक और लड़ाई

वह कुटिया वाली स्त्री 

मन के जिस हिस्से में
गंगा की धारा बहती है
उसी के सुरम्य तट पर
बनी कुटिया में
एक और स्त्री रहती है
जो आम स्त्री से बिलकुल अलग है
आईने में दिखते चेहरे से भी
वह एकदम अलग है
लोलुप दृष्टियों से स्वयं को बचाती छवि से
वह स्त्री अलग है
रोज के क्रिया – कलापों में संलग्न स्त्री से
वह कुटिया में रहने वाली स्त्री अलग है
वह कुटिया वाली स्त्री प्रेम जीती है
संसार को रंगना चाहती है अपने रंग में
पुरुष उसके लिए
कुंठा नहीं
मात्र प्रेम का अवलंब है
पुत्र ,पति ,पिता,भाई ,सखा
हर रूप में उसमें बसा
वह कुटिया वाली स्त्री
पुरुष के इस प्रेम से ही बनी है
वह धड़कती है हर आम स्त्री में
और उसका जीना
जीवन में समरसता घोल जाता है
हर बेचैनी
हर कडवाहट
हर तकलीफ के बाद भी

मलाला युसुफजई 

मुझे अचंभित करती है
तालीबानी समाज की वह
सत्रह साला लड़की
खेलने ,नाचने ,गाने की उम्र में
पढ़ने की लगन ओढ़
तालीबानी समाज की लड़कियों के बीच
जगाती है शिक्षा की लौ
वह सत्रह साला लड़की
बेख़ौफ़ वह
ऐसा सबकुछ बोलती और करती है
जिससे तालीबानी मिजाज आहत होता है
जबकि ,
दुनिया भर की लड़कियां
उस उम्र में
‘बार्बी ‘ से खेलती
और उस जैसी स्लीम दिखने की चाहत रखती हैं

वह लड़की
मलाला युसुफजई
इन सबसे परे
तालीबान की गोलियां खा
मौत को हराती है
झंझावात में दीपक जलाती
मलाला का संघर्ष
दुनिया के हर संघर्ष से कहीं अधिक बड़ा है
हर पुरस्कार से
विश्वव के सर्वोच्च सम्मान से भी
कही बहुत आगे है
मलाला युसुफजई
अपनी छोटी सी जिन्दगी में ही
मिथक बन जाना
शायद मलाला को ही कहते हैं

स्वर्णलता हँसती है 

स्वर्णलता हँसती है
खूब हँसती है
जब कोई उससे कहता है
उसके घर के पिछवाड़े
नीम के पेड़ के पास वाले
पीपल के पेड़ पर भूत रहता है
स्वर्णलता ,
बेख़ौफ़ ,बेरोक – टोक
रात – बिरात चली जाती है
उस पीपल के पेड़ के पास
और ,जोर से बोलती है –
‘पीपल के पेड़ के भूत बाबा ,आओ
मुझे तुम्हे देखना है ‘
किसी को आया न देख
स्वर्णलता ,खिलखिलाकर हँस देती है
एक दिन
अजब – गजब कुछ हो गया
स्वर्णलता अचानक चुप हो गई
हँसना भूल गई
लोग कहते ,स्वर्णलता
उस पीपल के पेड़ पर भूत रहता है
स्वर्णलता ,चुपचाप उन्हें सूनी आँखों से
घूरती रहती
ओझा – गुनी
डॉक्टर -वैद्य
सब कुछ हुआ
लेकिन ,स्वर्णलता का हँसना
वापस नहीं आया
हारकर ,माता – पिता ने
सुयोग्य वर ढूंढ
विवाह कर दिया स्वर्णलता का
शादी के बाद भी
स्वर्णलता ,बस मुस्कुराती
हँसती नहीं थी
ससुराल में भी उसके घर से कुछ दूरी पर
एक भूतों वाला पीपल का पेड़ था

सांझ होते
लोग – बाग़ उस पेड़ से होकर
जाने वाला रास्ता छोड़ देते
स्वर्णलता को भी सख्त मनाही थी
उस पीपल के पेड़ तक जाने की
लेकिन ,एक दिन फिर
अजब – गजब कुछ हो गया
पड़ोस के एक लडके ने
स्वर्णलता को भूत के साथ
बतियाते देख लिया
स्वर्णलता के मना करने पर भी
सबने उसे डायन-जोगिन कह
घर से निकाल दिया
कुछ महीनों बाद ,
पड़ोस के उसी लडके ने
स्वर्णलता को
किसी पीपल के पेड़ वाले भूत के साथ
विराने में घूमते देखा
सूखे हलक से
‘स्वर्णलता भूतनी हो गई
स्वर्णलता भूतनी हो गई ‘
कहकर वहाँ से भागा
स्वर्णलता ,
उस, किसी पीपल के पेड़ वाले भूत का हाथ पकड़
पड़ोस के उस लडके के हाल पर
खिलखिलाकर हँसती
कहीं चली गई
आज भी ,
लोगों को कभी – कभार
स्वर्णलता की हँसी की गूंज
और ,उस पीपल के पेड़ वाले भूत से बतियाने की
आवाजें
सुनाई देती हैं
लोग कहते हैं –
‘जब कभी पड़ोस का वह लड़का डरकर चीखता है
स्वर्णलता हँसती है
जब किसी घर में बेटी पैदा होती है
स्वर्णलता हँसती है ‘
स्वर्णलता की हँसने की आवाजें सुनना
लोग अपशगुन मानते हैं
लेकिन ,अपनी ही धुन में मगन
स्वर्णलता आज भी हँसती है
खूब हँसती है

धर्म की खोखली बुनियादों में दबी स्त्री

वसीम अकरम

वसीम अकरम युवा पत्रकार हैं . इन दिनों प्रभात खबर में कार्यरत हैं. संपर्क : ई -मेल : talk2wasimakram@gmail.com : 9899170273 

संस्कृति, परंपरा, आदर्श, तहज़ीब, रीति रिवाज़ और शरियत जैसे बड़े वज़नदार शब्द सुनने में बड़े अच्छे लगते हैं, और यह  भी कि इनको शिद्दत से मानना चाहिए और इनका पालन करना चाहिए,  जिससे समाज में कोई बुराई जड़ न कर जाए। मगर यही शब्द कभी कभार जड़ता का रूप लेकर इंसानी ज़िंदगी में सड़ांध पैदा करने लगते हैं और इन शब्दों की आवाज़ तब इतनी बदबूदार हो जाती है कि इंसान अपने कान सिकोड़ने लगता है। ऐसे शब्दों को नहीं सुनना चाहता। क्यों?

उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले में एक कस्बा है बहादुरगंज। वहां मुसलमानों की अक्सरियत है। हिंदू विरादरी भी है लेकिन बहुत कम। मुस्लिम बहुल इलाका होने की वजह से वहां इस्लामी तहजीब की झलक चारों तरफ दिखाई देती है, मगर वह तहजीब सिर्फ बाहरी आवरण भर है। उस तहजीब की बेरंग सूरतें तो उस आवरण के भीतर मौजूद हैं। और विडंबना देखिए कि इन सूरतों में एक भी सूरत किसी पुरूष की नहीं है। पुरूष सत्तात्मक इस समाज ने औरत के पैरों में धर्म और परंपरा की बेड़ियां डालकर उन्हें किस तरह तड़पने पर मजबूर कर दिया है, इसकी बानगी उस कस्बे के घरों की खिड़कियों से असहाय झांकते उन अबला चेहरों को पढ़कर देखा जा सकता है। वो चेहरे हैं उन लड़कियों के जिन्हें शादी के बाद या तो छोड़ दिया गया है या तलाक दे दिया गया है। उस कस्बे में 50 प्रतिशत ऐसी लड़कियां हैं, एक घर में चार लड़कियों में से दो लड़कियां तलाकशुदा हैं या उन्हें उनके पतियों द्वारा प्रताड़ित कर छोड़ दिया गया है। समाज के लोकलाज से डरी सहमी, अवसादग्रस्त ये लड़कियां अपने मायके में अपने छोटे बच्चों को लेकर किसी कैदी की तरह कैद हैं। भरी जवानी में तलाक का दंश झेल रही इन लड़कियों की पहाड़ सी जिंदगी सिर्फ अल्लाह मियां के भरोसे कैसे कट रही है, इसका अंदाजा लगाना बहुत मुश्किल है। और गरीब मां बाप के पास इतना पैसा नहीं कि वो अपनी बेटियों की मान मर्यादा के लिए केस लड़ सकें।

कबीर दास जी कहते हैं ‘‘खाला केरे बेटी ब्याहे, घरहीं में करे सगाई।’’ उन लड़कियों के हालात के मद्देनजर इन पंक्तियों की प्रासंगिकता यह है कि मुसलमानो में चार शादियां जायज हैं ,लेकिन इन चार शादियों के लिए कैसी कैसी कितनी सूरतें हैं, ये ज्यादातर मुसलमान  इसे नहीं जानते। और शरियत ये कि दूध के रिश्ते को छोड़कर किसी भी लड़की से शादी जायज मानी जाती है। ऐसी स्थिति में चाचा, मामा, बुआ, मौसी की लड़की या गांव की किसी और हमबिरादर लड़की से वहां का कोई भी लड़का शादी कर सकता है। इस्लामी शरीयत और तहजीब के चश्में से देखें तो यह अच्छा लग सकता है, लेकिन जब इसके सामाजिक परिणाम को देखते हैं तो गुस्सा फूट पड़ता है।

दरअसल इसके पीछे एक जबरदस्त कारण है मुस्लिमों का अशिक्षित होना। मुसलमानों में साक्षरता की दर बहुत ही कम है। अगर वो पढ़ते भी हैं तो सिर्फ अपनी धार्मिक किताबों और शरीयत को ही पढ़ते हैं। इनके अंदर दुनिया, समाज की समझदारी कम है और रूढ़िवादिता, कट्टरता ज्यादा है, जिसके परिणाम स्वरूप चार शादी को जायज मानकर तीन को तलाक देकर उनकी जिंदगी बद से बदतर बनाने जैसा घृणित काम करते हुए ये बिल्कुल नहीं सकुचाते, बल्कि ये कहते हैं हम धर्म पे हैं क्योंकि हम जायज पे हैं। मगर तलाक के बाद की नाजायज होने वाली चीजें ये नहीं समझ पाते। यहां तक कि एक घर में जिसने तीन शादियां कर सबको छोड़ दिया है उसी की तीन बहने तलाक लिए बैठी हैं। अब आप सोच सकते हैं कि जहां इस तरह की तहजीब होगी वहां का माहौल क्या होगा? एक तो इनमे शिक्षा की वैसे ही कमी है, दूसरे दारूल ओलूम के मुफ्ती मुल्ला रोज़ कोई न कोई फतवा देते रहते हैं। अभी पिछले दिनो एक फतवा आया था कि ‘‘ मुस्लिम महिलाओं का मर्दों के साथ काम करना गैरइस्लामी है।’’ क्या ये बताएंगे कि तलाक देकर या छोड़कर उन लड़कियों की जिंदगी बरबाद करना कितना इस्लामी है, जिनकी गोद में एक दो बच्चे हैं। ये ओलमा बहादुरगंज या उस जैसे सैकड़ों गांवों और कस्बों की लड़कियों, औरतों के हालात पर क्यों कुछ नहीं बोलते? क्या सारे फतवे औरतों के लिए है, मर्दों के लिए कुछ नहीं? क्या इन्हें इन सब बातों का इल्म नहीं? है। क्योंकि बहादुरगंज जैसे सैकड़ों गांवों और कस्बों के कुछ लोग ही सही उसी दारूल ओलूम में पढ़ाई करते हैं।

ये सारे ओलमा भी एक तरह से सत्ताभोगी हैं, जो धार्मिक लबादा पहने
अपने मतलब की शरई सियासत करते हैं। मुसलमान गरीब हैं, अशिक्षित हैं, बेरोजगार हैं और लाचार हैं मगर इन मुल्लाओं को इनकी चिंता नहीं है। ये तो बस तब्लीग की दावत देते हैं और बड़ी बड़ी किताबी, शरई बातें करना जानते हैं। ये हाईटेक ओलमा अपनी दुकान चलाने के लिए टीवी पर आकर सानिया मिर्जा की शादी पर और उसके स्कर्ट पर तो ख़ूब बोलते हैं, मगर उन अबलाओं, तलाकशुदा लड़कियों की जिंदगी को देखते हुए, जानते हुए भी कुछ नहीं बोलते। हिन्दुस्तान में आज ज्यादातर मुसलमानो को ये नहीं पता कि मानवाधिकार क्या है? महिला आयोग क्या है? ये खुद के लिए भी कोई कानूनी लड़ाई से डरते हैं, जिसके परिणाम स्वरूप हमेशा दबे कुचले रहते हैं। लेकिन इसके साथ ही साथ इनमे कट्टरता ऐसी है कि अपने नजदीकी मस्जिदों में नमाज भले न पढ़ें मगर बाबरी मस्जिद बनवाकर वहां नमाज पढ़ने की ख्वाहिश पाल रखे हैं।

देखा जाए तो मुसलमानो के लिए हिन्दुस्तान से सुरक्षित जगह पूरी दुनिया में कहीं नहीं, लेकिन फिर भी अपने आस पड़ोस की बुराईयों को नजरअंदाज कर दूसरे मुल्कों के मुसलमानों की हालत पर तरस खाकर कहते हैंदृ‘‘हमें सताया जा रहा है।’’ इन तमाम मौलवी, मुफ्ती, मुल्लाओं को ये सोचना चाहिए कि मुसलमानो में शिक्षा का विस्तार कैसे हो, तभी बहादुरगंज जैसी जगहों पर लड़कियों के साथ हो रहे इन अत्याचारों को रोका जा सकता है। और एक जायज़ समाज का निर्माण किया जा सकता है।

स्त्री को जननी कहा जाता है, मगर कुरआन के मुताबिक ईश्वर ने सबसे पहले एक पुरूष आदम को बनाया और फिर आदम की तरह स्वतंत्र श्रृजन न करके उसी पुरूष की बाईं पसली से एक स्त्री हव्वा को बनाया। जिसे हम अर्धांगिनी की संज्ञा देते हैं। आज भले ही हम स्त्री को आधी दुनिया का दर्जा देकर उसको पुरूष के बराबर हक देने की बात करें लेकिन पुरूष रुपी ईश्वर की सत्ता ने सबसे पहले एक पुरूष को पैदा कर और उसकी बाईं पसली से एक स्त्री को पैदा कर एक पुरूष सत्तात्मक संरचना की नींव डाली, जिसके परिणाम स्वरूप हमारा समाज एक पुरूष सत्तात्मक समाज कहलाने लगा। बाइबल भी यही मानता है, हिन्दू देवी देवताओं में सर्वपरि ब्रम्हा, विष्णु, महेश भी पुरूष देवता हैं। ऐसी मान्यता है, सच क्या है पता नहीं। इस तरह देखा जाए तो हमारी धार्मिक मान्यताओं मे स्त्री के उपेक्षित होने के लिए ईश्वर ही दोषी है। शुरू से ही पुरूष खुद को सबल मानता रहा है और स्त्री को अबला। स्त्री के उपेक्षित होने एक वृहद और प्राचीनतम इतिहास है। तभी तो हम दिन पर दिन आधुनिक होते जा रहे हैं फिर भी हमारी मानसिकता जस की तस, वहीं की वहीं है। अगर हमें उनको पुरूष जैसा हक देना है तो सबसे पहले उस इतिहास को भूलकर पुरूष मानसिकता में बदलाव लाना होगा। जो अभी संभव नहीं लग रहा।

छठवीं शताब्दी में मुसलमानों के आखिरी पैगम्बर मुहम्मद साहब जब मक्का में पैदा हुए तो उनके जमाने में लड़कियों, स्त्रियों पर तरह तरह के जुल्म ढाए जाते थे। पैदा होते ही लड़कियों को ज़िंदा जमीन में दफना दिया जाता था, वो इसलिए कि उनको अपनी नाक प्यारी थी। मुहम्मद साहब ने इस कुप्रथा को खत्म किया और इस्लाम धर्म की स्थापना की। मगर उसी इस्लाम ने मर्दों के लिए चार शादी जायज मानकर तलाक की ऐसी व्यवस्था दी जिसमें अगर एक मर्द किसी औरत को तलाक देता है और यदि फिर उसे अपनाना चाहता है तो उस औरत को पहले किसी और मर्द से निकाह करना होगा और फिर उस निकाह को तोड़कर अपने पहले पति से निकाह कर सकेगी। चार शादी सिर्फ मर्दों के लिए, यह एक स्त्री संवेदना के साथ खिलवाड़ सा लगता है। सीता की अग्नि परीक्षा से लेकर सती प्रथा तक में सिर्फ स्त्री ने ही अपने शरीर और संवेदनाओं की बलि दी है।

उत्तर प्रदेश, हरियाणा, बिहार, झारखंड जैसे राज्यों में सगोत्र विवाह के खिलाफ उठ खड़ा हुईं सर्वखाप पंचायतें भी इसी मानसिक अतिवाद का नतीजा हैं। इन पंचायतों में सिर्फ पुरुष भाग लेते हैं, चाहे मसला भले ही किसी स्त्री से जुड़ा हो। जिस पंचायत में महिलाओं की कोई भागीदारी नहीं वहां कैसा फैसला हो सकता है ये समझना बहुत आसान है। ये कैसी विडम्बना है रूढ़िवादिता और धर्म की सगोत्र विवाह की सजा के नाम पर उस लड़की के साथ पहले सामुहिक बलात्कार और फिर हत्या जो उनके गांव और गोत्र के ही हैं, जिन्हें पंचायतें भाई बहन तक मानती हैं।

18 जून 2010 को दिल्ली हाई कोर्ट ने नरेश कादियान के हिन्दू विवाह अधिनियम में संशोधन कर गोत्र शादियों पर प्रतिबंध लगाने की जनहित याचिका को खारिज कर दिया। न्यायमूर्ति शिवनारायण ढींगरा व न्यायमूर्ति एके पाठक की खंडपीठ ने सुनवाई में याची से पूछा कि गोत्र क्या होता है? याची ने कहा, यह हिन्दू मान्यता है। कोर्ट ने इस मान्यता के तर्क को खारिज करते हुए कहा, किसी भी हिन्दू ग्रंथ में इस प्रकार के विवाह पर प्रतिबंध के बारे में नहीं लिखा गया है और ना ही कोई मान्यता है। जाहिर सी बात है ये परंपरायें,मान्यताएं किसी विशेष देश काल का परिणाम हैं,, जिन्हें आज के परिप्रेक्ष्य  में देखना सरासर अनुचित है। इन मान्यताओं का कोई प्रमाणिक धर्मग्रंथ या शास्त्र नहीं है। दरअसल गोत्र का ये मसला सिर्फ गोत्र का नहीं लगता। इस गोत्रीय मान्यता की आड़ में ये सवर्ण पंचायतें दलितों, गरीबों में पनप रहे प्रेम और आधुनिकता को फूटी आंख नहीं देखतीं। इन पंचायतों के सदस्य रसूख वाले होते हैं जहां सिर्फ उन्ही की मरजी चलती है। यह परंपरा का ढोंग ही तो है जो सामुहिक बलात्कार करते समय ये नहीं सोच पाते कि वो लड़की उन्ही के गांव की उन्ही की बहन है। जाहिर है परंपरा, मान्यता या आडम्बर के बीच किसी सोच के लिए कोई जगह नहीं बचती। ये 21वीं सदी के भारत का वीभत्स चेहरा है जहां एक तरफ तो आधुनिक होने की बात की जाती है तो दूसरी तरफ स्त्रियों का मानसिक, शारीरिक शोषण किया जाता है और उनकी संवेदनाओं पर रूढ़िगत परंपराओं का कुठाराघात किया जाता है।

बिहार के भागलपुर में बलात्कार की कोशिश : जेंडर और जाति के समुच्चय का घिनौना चेहरा

 ( बिहार के भागलपुर में एक डाक्टर के द्वारा उसके मरीज पर बलात्कार की कोशिश के बाद स्थानीय जाति समीकरण खुला खेल के रूप में सामने आया है , जिसके कारण न्यायालय से अग्रिम जमानत खारिज होने के बाद भी आरोपी डाक्टर की गिरफ्तारी नहीं हुई है . शहर आंदोलित है लेकिन मेडिकल असोसिएशन और डाक्टरकी जाति ने पुलिस पर दवाब बना रखा है .भागलपुर से  डा मुकेश कुमार की रपट बलात्कार के पीछे जेंडर और जाति के समुच्चय को स्पष्ट कर रही है .डा मुकेश से संपर्क : 09431690824

 भागलपुर शहर के एक निजी नर्सिंग होम (तपस्वी) के डाक्टर मृतुंजय कुमार ने ईलाज कराने गई एक महिला मरीज अमृता तिवारी के साथ पिछले 31 अक्तूबर को ऑपरेशन थियेटर में छेड़खानी और बलात्कार करने की कोशिश की। जब अमृता व उनके परिजनों ने इसका प्रतिवाद किया और चिकित्सक पर कार्रवाई की मांग की तो उल्टे डाक्टर के लोगों ने महिला के परिजनों पर हमला कर दिया। पीड़ित पक्ष द्वारा तत्काल इस घटना की सूचना पुलिस को दी गई, पुलिस दल-बल के साथ नर्सिंग होम तो पहुंची किंतु आरोपी डाक्टर को गिरफ्तार करने के बजाय उनके आगे ही आत्मसमर्पण कर दिया। शहर के कांग्रेसी विधायक तक आरोपी को खुलेआम बचाने आ पहुंचे और उन्हें अपनी गाड़ी में भगा ले गए, पुलिस तमाशा देखती रह गई। डाक्टर के इस घिनौने कारनामे के सामने आने के बाद एक और महिला ने ईलाज के क्रम में उसी डाक्टर पर बलात्कार करने का आरोप लगाया है। ऐसे और भी कई आरोप उसी डाक्टर पर दाबी जुबान से सामने आ रहे हैं जो अमृता के आरोप की पुष्टि करते प्रतीत हो रहे हैं।

गिरफ्तारी की मांग करती महिलायें

चिकित्सा के पेशे को कलंकित करने वाले इस शर्मनाक मामले के सामने आते ही डाक्टर्स एसोसिएशन (आल इंडिया मेडिकल एसोसिएशन) खुलकर आरोपी के पक्ष में उतर आया है। दिल्ली गैंग रेप मामले के खिलाफ बलात्कारी को फांसी देने की मांग के साथ सड़कों पर उतरने वाले एसोसिएशन ने इस बार पलटी मारते हुए पीड़िता पर ही मुकदमा वापसी का दबाव डालना शुरू कर दिया। आरोपी के पक्ष में पूरी बेशर्मी के साथ सभाएं भी की। इतना ही नहीं भागलपुर स्थित मेडिकल कालेज के जूनियर डाक्टरों ने तो तमाम हदों को पार करते हुए आरोपी डाक्टर के समर्थन में एक दिन का हड़ताल तक रखा। आरोपी डाक्टर के लोगों ने इस पूरे मामले को ब्रहमणों द्वारा भूमिहार पर हमला बताकर समर्थन जुटाने की मुहिम भी चलाई। यथास्थितिवादी-पितृसत्तात्मक-सामंत पक्षधर कांग्रेस-भाजपा-राजद-जद-यू सबके सब पसोपेश में पड़ गए हैं। जहां राजद के स्थानीय सांसद बुलो मंडल इस मामले में अपनी जुबान तक नहीं खोल पा रहे हैं। वहीं यहाँ के पूर्व सांसद-भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता शाहनवाज़ हुसैन की शर्मनाक चुप्पी बनी हुई है। जबकि ये वही नेता हैं जिनके बयान हर छोटी-मोटी बात पर स्थानीय मीडिया की आए दिन सूर्खियाँ बनती रहती हैं।

भाजपा सहित अन्य शासकवर्गीय व नवकुलकों की पार्टियों के भूमिहार जाति से आने वाले नेता प्रत्यक्ष-परोक्ष आरोपी का पक्ष ले रहे हैं और मनगढ़ंत कहानी बनाकर आरोपी डाक्टर को कैरेक्टर सर्टिफिकेट जारी करते हुए पीड़ित महिला को ही दोषी ठहरा रहे हैं। महिला के साथ छेड़खानी-बलात्कार की कोशिश जैसे गंभीर मामले में जातिवाद का यह घिनौना चेहरा अत्यंत ही खतरनाक रूप में सामने आया है। राजद के मधेपुरा सांसद पप्पू यादव व उनकी पत्नी एवं सांसद रंजीता रंजन ने पीड़िता से मिलकर उन्हें समर्थन का इजहार किया है, साथ ही यह भी आश्वासन दिया कि यदि आरोपी डाक्टर की गिरफ्तारी नहीं होती है तो वे इस मामले को संसद में उठाएंगे.  जबकि सत्ताधारी जद-यू के नेताओं के गोलमोल बयान आ रहे हैं। इन सबसे इतर भाकपा-माले ने आरोपी डाक्टर एवं पीड़िता के परिजनों पर हमला करने वाले डाक्टर के लोगों  की तत्काल गिरफ्तारी और घटना के दिन आरोपी डाक्टर को बचाने-भगाने में शामिल पुलिस-प्रशासन के आलाधिकारियों के निलंबन की मांग की है। घटना का विरोध कर रहे लोगों को शांत कराने के क्रम में भागलपुर सीटी डीएसपी वीणा कुमारी ने महिला विरोधी यह शर्मनाक बयान दिया था कि ‘क्यों हल्ला कर रहे हैं, बलात्कार हुआ तो नहीं न!’ माले ने उक्त डीएसपी के भी निलंबन की मांग की है। इसके साथ ही भागलपुर जिले में बलात्कार-छेड़छाड़-हत्या के सभी मामलों के छुट्टा घूम रहे तमाम आरोपियों की गिरफ्तारी की मांग भाकपा-माले धारावाहिक आंदोलन के जरिये कर रहा है। पिछले तीन दिनों से माले का इन सवालों पर अनशन जारी है। आरोपी डाक्टर के पक्षधर लोग आंदोलनकारियों पर शहर की शांति भंग करने का सोशल मीडिया-प्रिंट मीडिया में बयान जारी कर और नागरिकों के बीच प्रचार चला कर आरोप लगा रहा। माले नेताओं ने ऐसे लोगों को आड़े हाथों लेते हुए कहा है कि ऐसे लोग शांति का राग अलापते हुए आरोपी डाक्टर को बचाने की कोशिश में लगे हैं, जिन्हें कामयाब नहीं होने दिया जाएगा। डाक्टर के इस कुकृत्य के खिलाफ पीड़िता के गाँव सहित आस-पास के ग्रामीण भी संगठित होकर आरोपी डाक्टर की गिरफ्तारी और न्याय की मांग को लेकर चरणबद्ध आंदोलन चला रहे हैं। आगामी 12 नवंबर को माले और पीड़िता के ग्रामीणों ने संयुक्त रूप से डीएम के घेराव का ऐलान किया है।

 इधर स्थानीय न्यायालय ने आरोपी की ओर से दाखिल एंटीसीपेट्री बेल को रिजेक्ट कर दिया है। भागलपुर में इस बात की खुली चर्चा है कि आरोपी डाक्टर को राज्य के चर्चित भूमिहार नेता-सांसद का संरक्षण हासिल है और वे उन्हीं की देखरेख में राजधानी पटना में हैं। राज्य के आला पुलिसधिकारी भी भागलपुर एसएसपी पर आरोपी के ‘पक्षधर एंगिल’ पर जांच को केन्द्रित करने का दबाव बनाए हुए हैं। यही कारण है कि इस घटना के एक सप्ताह बीत जाने के बाद भी ऐसे संगीन मामलों के हाई-प्रोफाईल आरोपी की गिरफ्तारी नहीं हो पाई है। यह भी संभावना व्यक्त की जा रही है कि इस मामले की जांच सीआईडी को सौंप कर रफा-दफा कर दिया जाय। हाल ही में भागलपुर में हत्या के हाई-प्रोफाईल दो आरोपियों को इसी रास्ते बचाया जा चुका है।