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अपने ही घर में खतरों से घिरी बेटियां

अरविंद जैन

स्त्री पर यौन हिंसा और न्यायालयों एवम समाज की पुरुषवादी दृष्टि पर ऐडवोकेट अरविंद जैन ने मह्त्वपूर्ण काम किये हैं. उनकी किताब ‘औरत होने की सजा’ हिन्दी में स्त्रीवादी न्याय सिद्धांत की पहली और महत्वपूर्ण किताब है. संपर्क : 9810201120
bakeelsab@gmail.com

( अरविन्द जैन ने अपनी कलम से लगातार स्त्रियों के लिए बेह्तर कानून और बेह्तर समाज की जंग लडी है . अपनी पहली किताब औरत होने की सजा में उन्होंने न्याय की प्रणाली , उसकी भाषा और उसके निर्णयों मे जेंडर भेद की विस्तृत विवेचना की. तब से वे लगातार कानून और साहित्य की स्त्रीवादी आलोचना में सक्रिय हैं. आज उनका जन्मदिन है . आयें इस स्त्रीवादी पुरुष को जन्मदिन की बधाई देते हुए उनके इस लेख मे व्यक्त उनकी चिंता ( अपने घरों में ही महिलायें असुरक्षित हैं )  शरीक हों और बेहतर समाज के लिए प्रबिद्ध सक्रियता के लिए संकल्पबद्ध भी हों . ) 


नाबालिग बेटियों-सौतेली बेटियों के साथ पिता द्वारा बलात्कार और यौन शोषण के मामले भारतीय समाज में भी लगातार बढ़ते जा रहे हैं, जो बेहद चिंताजनक और शर्मनाक है। किशोरियों के विरुद्ध लगातार बढ़ रहे यौन हिंसा के कारणों की विस्तार से खोजबीन अनिवार्य है। एक तरफ मीडिया में बढ़ते यौन चित्रण, पारिवारिक विखंडन, लचर कानून और न्याय व्यवस्था, ज्यादातर अपराधियों का बाइज्जत बरी हो जाना अपराधियों को बेखौफ बनाती है, दूसरी तरफ फैसले होने में बरसों की देरी और महंगी कानूनी सेवा चुप रहने को मजबूर। पीड़ित युवा स्त्री विरोध-प्रतिरोध कर सकती है, इसलिए भी अबोध बच्चियों पर हिंसा (हत्या) बढ़ रही है। नाबालिग लड़कियां अपने ही पिता या संबंधियों के खिलाफ न्याय की लड़ाई लड़ने की हिम्मत भी करें, तो आखिर किसके सहारे? कानून और रिश्तों की किसी भी छत के नीचे स्त्री, अपने आपको सुरक्षित महसूस नहीं कर पा रही।
बलात्कार की शिकार सौतेली बेटियां

कुछ ही दिन पहले अखबारों में समाचार छपा था कि ‘राजधानी दिल्ली के मंगोलपुरी इलाके में 14 वर्षीय सौतेली बेटी से बलात्कार करने के आरोप में, पिता को गिरफ्तार किया गया’। वह छह महीने से सौतेली बेटी का यौन उत्पीड़न कर रहा था’। खबर रेखांकित करती है कि वह उसकी अपनी नहीं, ‘सौतेली बेटी‘ थी। ‘सौतेली बेटी‘ से बलात्कार, क्या बलात्कार नहीं है? या ‘सौतेली बेटी‘ से बलात्कार, अपनी ही बेटी से बलात्कार से कमतर घिनौना अपराध है? अक्सर सौतेली बेटियां ही, बलात्कार की अधिक शिकार होती हैं।

शाहजहांपुर के कटरा इलाके में एक पिता ने अपनी बेटी को हवस का शिकार बनाया और राज तब खुला, जब वह गर्भवती हो गयी। अमृतसर की एक 20 वर्षीय कॉलेज छात्रा ने स्थानीय नेता व अपने पिता के खिलाफ पिछले आठ बरसों से बलात्कार करने का आरोप लगाया। पिता को गिरफ्तार किया गया, मगर हृदय की परेशानी और असामान्य महसूस करने के कारण अस्पताल में भर्ती करा दिया गया। रिश्तों को कलुषित और कलंकित करने का यह पहला और अंतिम मामला नहीं है। फिल्लौर-जालंधर में रक्त-संबंधों की तमाम मर्यादाओं को धूल में मिला, अपनी ही 13 वर्षीय बेटी के साथ बलात्कार करने वाले, प्रवासी पिता को पंजाब पुलिस ने गिरफ्तार किया, मगर आरोपी पिता का कहना है- ‘वह बिल्कुल निर्दोष है और उसे पैसे के मामले में विवाद होने के कारण, कुछ लोगों ने साजिश के तहत फंसाया है’।

पिता-पुत्री: रिश्तों की पवित्रता
हरियाणा के सोनीपत जिले के नीलोखेड़ी गांव में एक व्यक्ति ने पिता-पुत्री के रिश्ते की पवित्रता को खंडित करते हुए, अपनी ही 14 वर्षीय नाबालिग बेटी के साथ डेढ़ साल तक बलात्कार और यौन उत्पीड़न करता रहा। ऊपर से धमकी यह कि अगर किसी से भी शिकायत की तो, उसे जान से मार डालेगा। किसी तरह लड़की घर से भाग निकली और अपने ताऊ के पास जाकर अपनी ‘आपबीती‘ सुनाई, तो ताऊ ने पुलिस थाने में जाकर मुकदमा दर्ज करवाया। लड़की की मां का कई साल पहले देहांत हो चुका है, एक भाई और एक बहन अनाथालय में रहते हैं। वह भी पहले अनाथालय में रहती थी, लेकिन डेढ़ साल पहले उसके पिता उसे वहां से ले आये और तब से आए दिन वह अपने पिता की हवस का शिकार होती रही। आरोपी पिता फरार है..। पीड़िता को मेडिकल चेकअप के लिए भेज दिया गया है और पुलिस बलात्कारी पिता की तलाश में इधर-उधर घूम रही है।

थाना न्यू आगरा क्षेत्र में एक पिता पर अपनी 11 वर्षीय बेटी के साथ बलात्कार करने का आरोप है, मगर पिता घटना के बाद से फरार है और बेटी की मां डीआईजी ऑफिस के चक्कर काट रही है। उड़ीसा के मलकानगिरी के कुडुमुलुगुमा गांव में रहने वाले 37 वर्षीय भागबान दाकु को, अपनी 14 वर्षीय पुत्री के साथ बलात्कार करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया। जब ग्रामीणों ने उसकी बड़ी लड़की को गर्भवती अवस्था में पाया, तो भागबान  की जमकर पिटाई की और उसे पुलिस के हवाले कर दिया।

मुंबई ट्रैफिक कांस्टेबल गणोश तुकाराम पर, अपने ही सहयोगी पुलिसकर्मी की नाबालिग बेटी के साथ बलात्कार का आरोप लगा था। वह नवीं कक्षा में पढ़ने वाली लड़की को घुमाने के बहाने, गणोश विरार के पाटिल रिसॉर्ट ले गया था। पुलिस ही बलात्कारी हो जाए और औरतों की अस्मत से खिलवाड़ करने लगे, तो आम जनता की बहू-बेटियों की सुरक्षा कौन करेगा?

पोर्नोग्राफी और यौन अपराध  
रांची से सौ किलोमीटर दूर हजारीबाग जिले में पुलिस ने अपनी किशोरी बेटी (साइंस की इंटर की छात्रा) से कई वर्षो से कथित रूप से बलात्कार कर रहे पिता (सरकारी डॉक्टर) को गिरफ्तार किया। पिता उसे बचपन से ही ‘ब्लू फिल्में’ दिखाकर, अपने साथ सेक्स करने के लिए उकसाता रहा, मगर इस बात की शिकायत करने पर मां ने भी मामले में चुप रहने की सलाह दी। पिता के कथित यौन उत्पीड़न से हालत गंभीर होने पर एक बार उसे रांची के अपोलो अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा था, लेकिन वहां से घर वापस आने पर पिता उसके साथ बलात्कार करता रहा। गिरफ्तारी के बाद पिता ने कहा ‘बेटी मानसिक रूप से बीमार है’।

मार्च 2009 में ऑस्ट्रिया के सांक्ट पोएल्टेन शहर की अदालत ने, फ्रीत्ज्ल को अपनी बेटी को ‘सेक्स गुलाम’ बनाने और 24 साल तक अपने घर के तहखाने में कैद कर, उसके साथ व्यभिचार करने के अपराध में उम्रकैद और बाकी उम्र किसी पागलखाने में गुजारने की सजा सुनाई थी। मानसिक रोग विशेषज्ञ के अनुसार ‘73 साल का फ्रीत्ज्ल महसूस करता है कि उसका जन्म बलात्कार करने के लिए ही हुआ है’। ऑस्ट्रिया के जोसफ फ्रिट्जल के समान ही 2004 में एक मामला भोपाल में भी सामने आया था, जहां 13 साल की बेटी के साथ, उसका पिता बलात्कार करता था। अप्रैल-2005 में ऐसा ही अपराध हैदराबाद में भी हुआ, जहां 14 साल की बेटी पिता द्वारा बलात्कार के कारण गर्भवती हो गई थी। अक्टूबर-2006 में 25 साल की एक महिला ने भी अपने पिता (कानपुर में एसडीएम) पर आरोप लगाया था कि वह करीब एक साल से ज्यादा समय से उसके साथ बलात्कार कर रहा था। जून-2010 में मेरठ में ‘अपनी ही बेटी‘ से बलात्कार के आरोप में गिरफ्तार, एक पिता ने हवालात में रोशनदान की खिड़की से अपनी कमीज बांध फांसी लगाकर खुदखुशी कर ली। यहां आत्महत्या ‘अपनी ही बेटी‘ से बलात्कार के अपराध-बोध का परिणाम है या उम्रकैद की सजा और समाज में बदनामी का भय?

मुंबई पुलिस ने 60 साल के व्यापारी को ‘अपनी ही दो बेटियों के साथ बलात्कार‘ के आरोप में गिरफ्तार किया। इस कुकृत्य में बाप ही नहीं, लड़कियों की मां भी शामिल थी और दोनों पति-पत्नी ऐसा इसलिए कर रहे थे क्योंकि तांत्रिक ने कहा था- ‘ऐसा करने से उनके घर की उन्नति होगी’। व्यापारी ने पहले अपनी बड़ी बेटी के साथ 11 साल की उम्र से ही बलात्कार करना शुरू किया और कुछ महीने पहले 15 साल की बेटी को भी अपनी हवस का शिकार बना डाला।

कानूनी बारीकियां और अदालती सहानुभूति
अक्टूबर-2009 में ‘अपनी नाबालिग बेटी‘ से बलात्कार के दोषी एक व्यक्ति को मुंबई की अदालत ने उम्रकैद की सजा सुनायी, मगर अपराध में मदद करने और उकसाने की आरोपी उसकी पत्नी को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया गया। सत्र न्यायाधीश पी.ए वाघेला ने भरत राठौड़ को उम्रकैद की सजा सुनाते हुए कहा- ‘यह जघन्य और शर्मनाक घटना है और दोषी अधिकतम सजा पाने का हकदार है’। दरअसल, पिता से तो अपने बच्चों की सुरक्षा करने की उम्मीद की जाती है, परंतु वह ही शिकारी बन जाए, तो बच्चों की हिफाजत कौन करेगा? जनवरी, 2011 में मेरठ के अतिरिक्त जिला और सत्र न्यायाधीश श्याम विनोद ने एक पिता को ‘अपनी सात वर्षीय बेटी से बलात्कार‘ करने और बाद में हत्या कर देने के जुर्म में, मौत की सजा सुनाई। ऐसे ‘जघन्य’अपराधों में अभियुक्त के साथ किसी भी तरह की ‘सहानुभूति‘ समाज के लिए बेहद खतरनाक ही साबित होगी।

‘उम्र कैद‘ या ‘सजा-ए-मौत‘ के फैसले, अपीलों में अदालती सहानुभूति या कानूनी बारीकियों का फायदा उठाकर, सजा कम करवाने या छूट जाने में भी बदल सकते हैं।  छोटी बच्चियों से बलात्कार और हत्या के अनेक फैसले गवाह हैं। सो, गिनाने की जरूरत नहीं। अबोध-निर्दोष बच्चियों की (घर-बाहर-स्कूल-अस्पताल) सुरक्षा के लिए, नए सिरे से सोचना बहुत जरूरी है। सरकार, राष्ट्रीय महिला आयोग और महिला संगठन ही नहीं, बल्कि संपूर्ण समाज को इस विषय पर गंभीरतापूर्वक ठोस कदम उठाने होंगे। हालांकि अब भी काफी देर हो चुकी है।

खूबसूरत हर्फों की गवाही

निवेदिता


निवेदिता पेशे से पत्रकार हैं. सामाजिक सांस्कृतिक आंदोलनों में भी सक्रिय रहती हैं. हाल के दिनों में वाणी प्रकाशन से एक कविता संग्रह ‘ जख्म जितने थे’ के साथ इन्होंने अपनी साहित्यिक उपस्थिति भी दर्ज कराई है. सम्पर्क : niveditashakeel@gamail.com

( निवेदिता किस्तों मे अपना जीवन और गुजरते समय को दर्ज कर रही हैं अपने संस्मरणों में . इस किस्त में वे साक्षी भाव में अपने जन्म से लेकर अपने किशोर होने की कहानी कह रही हैं . कहानी में एक लडकी के  मन के और उसके समय की सांस्कृतिक हलचल के किस्से दर्ज हैं . स्त्रीकाल में इनके संस्मरणों के अन्य किस्त पढ़ने के लिए नीचे के लिंक क्लिक करें :  )

जब ज़रा गर्दन झुका ली देख ली तस्वीरे यार 
यही फ़िज़ा थी , यही रुत यही ज़माना था 

वह सुबह भी हमेशा  की तरह आम सी सुबह थी, जब डाक्टर ने कहा कि बेटी हुई है। घड़ी उसी तरह टिक- टिक कर रही थी। अप्रैल के महीने की चार तारीख को वह पैदा हुई। कमरे में रौशनी  कुछ धुधंली थी। नर्स ने बताया बच्ची खूब स्वस्थ्य है। नाजुक-नाजुक हाथ-पांव, पेट के ही बाल इतने घने और घुंघराले कि लगता था काले -काले बादल पिघले पिघले घूम रहे हैं !

जब वह पैदा हुई तो उसकी मां की उम्र 16 साल थी। डाक्टर ने कहा मां कमजोर है, खून की कमी है। ख्याल रखना होगा। पिता की पोस्टिंग किसी दूसरे शहर में थी । उन दिनों टेलिफोन का जमाना नहीं था। जबतक उनको खबर हुई वो पैदा हो चुकी थी। बड़े काका ने मां की हालत देखते हुए छोटे काका को बुला भेजा था। वे डाक्टर हैं इसलिए उनके रहने से सबको भरोसा होता है। काका का घर अस्पताल से पास में ही है। अस्पताल से सीधी सड़क घर की ओर जाती है। दाएं हाथ को जाने वाला रास्ता हर के बाहर खेतों की ओर चला जाता है। दूर तक फैले लहलहाते खेत और पीछे पहाड़ों की श्रृखंला। गया पहाड़ों का  शहर है। बाएं मुड़ने पर एक चैड़ी सड़क सीधे घर की तरफ जाती है।  घर पहुंचे  तो काकी इंतजार में थी। क्या हुआ?  हंसते हुए काका ने कहा लक्ष्मी आयी है। काकी खुश  हो गयी, पूछा  फूलो को खबर किया। हां, टेलिग्राम भेजा है। फूलो भागे-भागे पहुंचे। इन्दू की हालत बेहतर हुई तो सुधीर  पटना के लिए रवाना हुए। रास्ते में ही थे कि  बेटी के जन्म की खबर मिली। चार दिन पहले फूलों की बेटी जन्मी और चार दिन बाद सुधीर की। दोनों बेटी। एक का दुधिया सफेद रंग में गुलाल मिला हुआ। दूसरी तांबाई रंग। तराशे  हुए नैन -नक्ष। दोनों लड़कियां बड़ी हो रही हैं। एक फूल सी नाजूक दूसरी खुलता  हुआ गेहुंआ रंग,बड़ी बड़ी जामुनी आंखें। तराशे हुए नाक और गर्दन उंची,  घने धुधराले बाल। दोनों बहनें जब साथ होती लोग तुलना करने लगते। दुधिया रंग के सामने गेहुंआ रंग। आहें भरते काश , अगर इसका भी रंग दुधिया होता तो कयामत होती। वह नाराज होती । मुझे अपना रंग पसंद है। नहीं होना है उसकी रंग का।

 मां कहती,  ‘ दूध पी जाओ तो उसी की तरह गोरी होगी।’ वह गुस्से में पूरा गिलास खाली कर देती पर रंग ताबांई ही रहता।  धीरे-धीरे उसे पता चलने लगा कि उसके रंग में गजब का जादू है। लोग कहते उसकी आंखें ऐसी जैसे राधा के नीमबाज आंखें। वह सोचती राधा कौन है। एक दिन उसने मां से पूछा , मां ये राधा कौन है?
मां ने कहा , ‘ कृष्ण की प्रेमिका।’
मां सब कहते हैं, ‘ मेरी आंखें  राधा की तरह है।’
मां खिलखिलाई। विद्यापति के गीत में है ऐसी आंखों का वर्णन-राधा की अधखुली आंखें जैसे कमल के फूल पर भंवरा बैठा हो।

दो साल गुजरते गुजरते भाई आ गया। फिर तीन बहनें और एक भाई। मां को छोटे बच्चों से फुरसत नहीं मिलती। उसे अकेलापन लगता। कभी बागान में टहलती। कभी किचन में जाकर मां का हाथ बंटाती। रात में एक बड़े पलंग पर मां के साथ सारे बच्चे सोते। मां काफी सफाई पसंद करती थी। बच्चे बिस्तर गीला करते थे। बिस्तर पर बड़ा सा प्लास्टिक बिछाया जाता। उसके उपर मोटी सी चादर। उसे प्लास्टिक पर सोना पसंद नहीं।  पांच भाई-बहनों के बाद पलंग पर जगह बचती भी नहीं थी। वह मां के पायताने सोती। रात में कई बार डर लगता। मां अपना पांव बढ़ा देती। मां के पांव को सीने में चिपकाए वह सुकून की नींद सो जाती। 6 बच्चों को मां अकेले संभाल नहीं पाती। इसलिए नानी अक्सर मां को गांव ले आती।

निवेदिता के मां और पिता

नानी का घर सहरसा में है। सहरसा तक सब रेलगाड़ी से आते फिर वहां से सिमराही तक बस से। नाना सिमराही में बैलगाड़ी भेज देते। उसे बैलगाड़ी पर बैठना खूब पसंद था। बैलों के गले में लगी घंटी बजती रहती। धीमी-धीमी सुरीली। रास्ते में धान की पीली बालियां लहलहाती। उसकी पत्तीयां इतनी हल्की और इस कदर बारीक होती कि हवा के हल्के झोके से भी लचकती रहती।

गांव हमेशा  से उसे पसंद है। हरे भरे बागान। सामने आम का बगीचा। घर के पिछवाड़े साग-सब्जी उपजती थी। नानी के साथ उनकी मां भी रहती थीं। जिसे सब बड़ी नानी बुलाते। जबसे उन्हें देखा सफेद बाल और सफेद साड़ी में ही देखा.  उनके बाल कभी लंबे नहीं देखे। बाद में पता चला कि विधवाएं ऐसे ही रहती हैं। नानी बगीचे में ले जाती, ‘ देखों ये नेनुआ का बत्ती है और ये कटहल का पेड़। ‘ उसे लगता नानी को गांव के सारे गाछ के रहस्यों का पता है। नानी के साथ मिलकर घर के पिछवाडे में वह सब्जियां रोपती। नानी कहती किसानों के खेत से सब उपजना चाहिए नहीं तो खेत बांझ औरत की तरह लगते हैं। वह पूछ्ती ,  ‘नानी बांझ औरत क्या होती है?’  नानी हंसती अभी ही सब जान लोगी बिटिया। अच्छा चलों हम धनिया बो दें। वो क्यारियों में धनियां बोती। घर में रोज धनिया की चटनी बनती। आम के मौसम में धनिया में आम मिलाकर पीसा जाता। उसकी खुशबू से  गम-गम करता आंगन।  उसे बड़ी हैरानी होती की एक नन्हें से बीज से इतनी घनी-घनी हरी पत्तीयां फूटती कैसे हैं? आंखें खुलते ही भागती कि क्यारियों में धनिया बोया वह फूटा या नहीं। देखा तो बारीक-बारीक हरी हरी पत्तियां निकल आयीं थीं। चिकने -चिकने हरे रंग की  नन्हीं -नन्हीं पत्तीयां लहलहा रही हैं

नानी के घर में रहते हुए पढ़ाई का नुकसान हो रहा था यह सोच कर पापा उसे और छोटे भाई प्रियरंजन को पटना ले आए। मां के बगेर बच्चे अनाथ से ही रहते हैं। घर से दो किलोमीटर दूर स्कूल था। दोनों भाई-बहन ‘ बस्ता’ ( स्कूल बैग ) उठाए निकल पड़ते। उसके घर के पास एक बड़ा सा नाला बहता। नाले के किनारे-किनारे संकरी सी सड़क। चाॅय टोला के नाम से वह मुहल्ला जाना जाता था।  रास्ते में जितने पेड़ मिलते  वे गिनते जाते। दरख्तों पर फैली हुई बेलें। केले और ताड़ के पत्ते। नीम,पीपल ,कदंब, कटहल। कदंब के पेड़ को देखकर लगता जैसे कोई समाधी में लीन हों । पीपल की घनी छाया के बीच से सूरज की किरनें झरती। पेड़ों को छूते हुए दोनों भाई-बहन स्कूल पहुंच जाते।

टिफीन का समय उसके और भाई के लिए परेशान करने वाला होता। वह चाहती कि उसका टिफीन कोई ना देखे। उन दिनों उसकी मां नहीं रहती थीं। टिफीन अक्सर उसके चचरे भाई दिया करते थे। भात,दाल सब्जी और चीनी। चीनी दाल में धुल जाता और उसका मजा बेकार हो जाता। कभी सत्तु देते। बच्चे मजाक उड़ाते कि वे टिफीन में भात लाते हैं या सत्तू लाते हैं। कई बार शर्म से दोनों भाई-बहन छुप कर जल्दी जल्दी खाते। इस चक्कर में सत्तू बिना पानी मिलाए खाते। उनका पूरा मुंह उजला हो जाता। बच्चे हो-हो कर हंसने लगते। भाई के सारे दोस्त उसके दोस्त थे। सब सारे दिन छत पर पतंग उड़ाए फिरते। उनकी पतंग बादलों को छूती। कभी-कभी सूरज की किरणें बादलों के बीच से निकलती। उसमें नीलमी हीरे जैसी बुंदकियां चमकती। गहरे नीले रंग के आसमान पर हल्की-हल्की सूरज की किरणें पतंग पर फैल जाती। उसे लगता कि वह सूरज को छू रही है। पतंग उड़ाते हुए बचपन में पढ़ी एक कहानी ‘काकी’ की याद आती। जिसमें बच्चा पतंग के लिए पिता की जेब से पैसा चुराता है। उसे किसी ने बताया कि उसकी मां जो आसमान में रहती है उसतक वह पतंग के जरिये पहुंच  सकता है। वे दोनों भी उस कहानी की तरह मां के पास अपनी पतंग भेजेना चाहते । कई बार सोचते काश  कितना अच्छा होता अगर मां पतंग की डोर पकड़-पकडे़ हमारे पास आ जाती।   मां कि चिठ्ठियां आती, वे खुशी से भर जाते। जैसे उनके हाथ खजाना लग गया हो।  खत पढ़ते ही नन्हें भाई-बहनों की सूरतें साफ-साफ नजर आती।
बचपन की यादें मलगजी-मलगजी,धुंधली हैं ,लेकिन उन यादों में कहीं कोई अजनबीपन नहीं है। कभी-कभी नींद में ऐसे मंजर दिखाई पड़ते की वह बेचैन होकर जाग जाती।  निगाहों की हद के पास,मां बाहें फैलाए दिखतीं। जब वह करीब जाती तो मां गायब हो जाती। वह घबरा कर उठ जाती । फिर परेशान रहती कि इस ख्वाब का मतलब क्या है?

निवेदिता अपनी मां के साथ

कुछ दिनों बाद पिता मां को  ले आए। उन दिनों वे राजेन्द्र नगर  में रहते थे। उसका दाखिला 9वीं कक्षा में रवीन्द्र  बालिका विधालय में हुआ। स्कूल से लौटकर घर के पास के मैदान में सारी लड़किया जुटतीं और उनकी खिलखिलाहट से मुहल्ला गूंजता । ये उम्र ही ऐसी थी जिसमें बेवजह हंसना, इतराना चलता रहता था। सामने के घर में रज्जी रहता था। वे लोग इसाई थे। रज्जी के घर के उपर में शबनम चाचा। मुहल्ले में लड़कियों की पूरी फौज थी। उनके मजे थे। ईद-बकरीद में शबनम चाचा के यहां सारे बच्चे जमे  रहते। एक से एक लजीज गोश्त  और सेवैयां खाने को मिलती। क्रिसमस में सब मिलकर क्रिसमस ट्री सजाते। केक और मिटाईयां खा-खा कर अघा जाते। क्या होली, क्या दशहरा पूरा मुहल्ला इस तरह जीता जैसे सारे पर्व पर उनका हक हो। उसने कभी नहीं जाना की ईद मुसलमानों का पर्व है और क्रिसमस ईसाईयों का। मुहल्ले के लड़के-लड़कियों की टोली सारे दिन आवारागर्दी करती। इश्क  के किस्से चटकारे ले लेकर हम सुनते। आज कौन हलाल हुआ? किसकी नजरें चार हुई जैसे जुमले लोगों की जुबान पर होता। प्रेम पहले खिड़कियों के रास्ते आता । प्रेम पत्र भेजने के नए-नए तरीके ईजाद किये जाते।

पहली बार उसे वहीं देखा था। खाक और धूल से सने कपड़े। रुपहली बालों पर घनी घनी लटें कानों तक झूल रही थी। धूप से रंग कुछ और झुलसकर शोख हो गया था। होठों के दरमियान सितारों की लडि़या चमकी। दोनों ने एक -दूसरे को देखा। दिल में बादल फटे। बिजलियां चमक गयीं। उसके लिए दिल धड़का। फिर बाद में पता नहीं कितनों के लिए धड़का। हर दिन की तरह वह स्कूल जा रही थी। उसने महसूस किया कि कोई उसके पीछे चला आ रहा है। मुड़कर देखा तो वही था। उनकी नजर मिली । वह ठिठक गया। वह आगे बढ़ गयी। कई दिनों तक ये सिलसिला चलता रहा। उसे बुरा लगता । इस तरह पीछा करना बेवकूफी लगती। लोग क्या सोचेंगे? एक दिन उसने हिम्मत कर कहा -इस तरह पीछा क्यों कर रहे हो? वो खामोशी  से सर झुकाए खड़ा रहा। उसे वहीं छोड़ वह तेज कदमों से निकल गयी। उस दिन के बाद वह कई दिनों तक दिखा नहीं। उसे बुरा लग रहा था उसके लिए।
एक दिन वह छत पर थी। जाड़े का दिन था। गुनगुनी धूप फैली हुई थी। सामने ताड़ के बड़े बडे़ दरख्त उंचे होकर सुर्ख आसमान से जा लगे थे। वह किताब में डूबी हुई थी कि अचानक जोर से आवाज हुई। उसके सामने पत्थर में लिपटा कागज का दुकड़ा फड़फड़ा रहा था। उसने इधर-उधर नजर दौड़ाई तो देखा वह छत पर खामोश  खड़ा है। दिल में खलबली मच गयी। खत लेकर उसके हाथ कांपने लगे। उसने नजर बचा कर खत को जल्दी से स्वेटर के अंदर छिपा लिया। वह भागी -भागी जयश्री के पास गयी। जयश्री उसके साथ स्कूल में थी। दोनों गहरे दोस्त हैं। हमराज, हमख्याल। जयश्री समझ गयी। आज कोई खास बात है, निवेदिता सुबह-सुबह पंहुची है। दोनों ने कमरा बंद किया, और एक स्वास  में खत पढ़ गयी। पहला खत बड़ा फिल्मी था। जिसे पढ़कर दोनों सहेलियां देर तक हंसती रहीं । सफेद कागज पर खूबसूरत हर्फ चमक रहे थे-‘माना की तुम बेहद हंसीं इतने बुरे हम भी नहीं।’ बदले में उसने फैज की नज्म भेज दी। फिर ये सिलसिला चलता रहा। उसे देखकर उसका दिल उसकी तरफ खींचने लगता। वह कहीं भी होतीं, उसके वजूद का एहसास नब्ज की तरह धड़कता।  पहली बार वह उससे एक दोस्त के छत पर मिली। दोनों पर मुकम्मल खामोशी तारी थी। आसमान का रंग सूर्ख  था। उसने उसका हाथ अपने हाथ में लिया। सूरज पूरी तरह डूब चुका था। उसकी लाली रात की स्याही में तब्दील हो गयी। उसने चोर नजरों से उसे देखा। कद निहायत बुलंद ,पेशानी उंची,आंखें रौशन,सीना चैड़ा। सांवला रंग, घनी भवें, लंबी पलकें। एक लम्हें के लिए उसकी निगाहें उसके चेहरे पर टिक कर रह गयी। उसने देखा वह उसे देख रहा है अपलक। शर्म से उसका चेहरा लाल हो गया। धीमी-धीमी चांदनी फैली हुई खामोशी  को और भी पुरइसरार बना रही थी। बगैर  कुछ कहे वे एक-दूसरे से विदा हुए। उनकी आंखें कहती रहीं। प्रेम जब भी होता है तो इसी एहसास के साथ। वह दिन भी आया जब वे अलग हो गए। जानें कितनी रातें आसूंओं से तर होती रहीं।

जिन्दगी की खूबसूरती यही है कि वह अतीत में पड़ी नहीं रहती। उन मुश्किल   दिनों में फैज की नज्म खूब काम आयी। ‘राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा।’ वह स्कूल से काॅलेज में पहुंच  गयी। छात्र आंदोलन और इप्टा जैसे संगठनों से जुड़ाव ने जिन्दगी के नए मायने समझाए। उन्हीं दिनों पटना में प्रगतिशील  लेखकों की ओर से बड़ा मुशायरा का आयोजन किया गया था। देश  के बड़े नामी कलाकार,शायर जमा हुए थे। यह वह दौर था जब पटना की रचनात्मक सरगर्मियां बढ़ी हुई थीं। ऐसा लगता था जैसे शहर के रगों में रचनात्मकता दाखिल हो।  पहली बार वह कैफी और शौकत आजमी से यहीं मिली थी। एक बेहद खूबसूरत इंसान। बदन पर बारीक रेशमी कुर्ता। रंग निहायत गोरा। बड़ी-बड़ी आंखें। नाजुक-नाजुक होठ पर हल्की सी मुस्कान।  उनका चेहरा इस कदर पुरकशिश  कि देखते रहिए। उनकी आवाज में अजब लोच और दिलकशी  थी। निहायत साफ और खुली आवाज। मिठास ऐसी जैसे शब्द  श हद में लिपटे हों।

कैफी आज़मी  बेटी शबाना आज़मी के साथ

कैफी आजमी की देख-रेख का जिम्मा उसे और उसकी बहन जोना को सौपा गया। दोनों बहनें पहुंच गयीं। आदाब किया। इधर आओ बिटिया। जी हमें आप दोनों की देखभाल के लिए भेजा गया। वे हंसे। शौकत आजमी ने प्यार से उनके माथे पर हाथ फेरा, ‘  बैठ जाओ बिटिया। तुम्हें पता है शबाना भी हमदोनों का इसी तरह ख्याल रखती है।’
‘ जी वो तो बड़ी अदाकारा हैं।’
‘  हां वो तो है। आज हिन्दुस्तान को इतनी बड़ी अदाकारा नहीं मिलती अगर मैंने फैसला नहीं लिया होता। दोनों की आंखे चमकी।

शौकत आजमी अपनी रौ में बह रहीं थीं,  ‘ अब क्या बताएं वह जमाना ही कुछ और था। 1950 के आस-पास की बात है। कैफी साहब सारे दिन पार्टी के कामों में लगे रहते। न रहने का ठिकाना न खाने का। हम दोनों ने जीवन में कई उतार-चढ़ाव देखें हैं। शबाना पेट में थी। मुझ से मारे मारे फिरना अब मुमकिन नहीं लग रहा था। मुझे ठीक ठीक याद नहीं शायद उनदिनों बी.टी रणदिबे पार्टी के महासचिव थे। उन्होंने इन्हें बुलाया । हाल चाल पूछा । ये जानकर परेशान हुए की मैं गर्भवती हूं। उन्होंने कैफी से कहा तुम्हारी ये हालत नहीं कि अभी बच्चे पैदा कर सको। कैफी लौटकर आए तो उदास थे। उन्होंने मुझसे कहा कि हमलोग अभी बच्चे की जिम्मेदारी नहीं ले सकते। मुझे काफी गुस्सा आया । मैंने कहा  उन्हें झाडू मारुंगी। बच्चा मेरा है उसे पैदा करने की इजाजत पार्टी से नहीं लेना है। जैसे भी होगा हम पालेंगे। ‘

यह  किस्सा बताते हुए हंसने लगी, ‘  बिटिया अगर मैंने उस वक्त ये फैसला नहीं लिया होता तो देश  एक संवेदनशील अभिनेत्री से वंचित रह जाता।’

कैफी ने मजे ले-लेकर किस्सा सुना। फिर गंभीर होकर बोले, ‘  देखो इससे ये मत समझना की पार्टी हमारी जिन्दगी के निजी  फैसले भी तय करती है। वे मुश्किल  भरे दिन थे। हम अपने काॅमरेड के सुख-दुख के हिस्सेदार थे।  एक-दूसरे के जीवन में रचे-बसे रहते थे।’  पर आज न तो पार्टी वैसी रही न ही पार्टी कामरेड।
कैफी उस दौर के कम्युनिस्ट थे जो ये मानते थे कि पार्टी का उनपर पूरा इख्तियार है। वे लंबे समय तक कम्युनिस्ट पार्टी के होलटायमर रहे। कैफी की उबड़-खाबड़ संकटों और चुनतियों भरी जिन्दगी में एक अन्तर्निहित लय है। शायद इसलिए उनकी शायरी इनसान और इनसानियत के हक में आवाज उठाती रही है। उन्होंने एक मुसलसल लड़ाई लड़ी। दिल की गहराईयों में डूब कर लिखा। कैफी और उनके पाठकों के बीच गहरे संबंध हैं। वे उनकी नज्मों में सीधे उतरते हैं। कैफी की शायरी हिन्दी-उर्दू की साझी सांस्कृतिक विरासत का सबसे अहम सबूत है।

दोनों बहनों ने पूरा दिन उनके साथ गुजारा था। उनकी स्मृतियों में वे दिन आज भी हरे हैं। उनकी बातें खत्म ही नहीं हो रही थीं। शाम हो गयी थी। उन्हें मुशायरा के लिए जाना था। वे बाहर निकल आयीं। आसमान पर सूरज की पीली परत फैली थी। हवा में हल्की खूंनकी थी। दोनों बहने हाॅल पहुंच कर उनका इतंजार करने लगीं। एक बड़े से कमरे में कालीनों पर कोई 15-20 का मजमा लगा था। कमरे की रौशनी कुछ धुंधली  थी, मगर संदल और इत्र की गाढ़ी खुशबू हवा में तैर रही थी। बहुत बारीक धुंए की लकीरों के साथ शम्मा धीमें-धीमें जल रही थी। कैफी आए। महफिल में जान आ गयी। अजीजजाने-गिरामी,इरशाद फरमाएं-सब सुनने को तैयार हैं। अब इंतजार की ताब नहीं। कैफी बड़ी अदा से मुस्करये। भई पहले हम इन बच्चियों का शुक्रिया अदा करते हैं। सारे दिन दोनों ने मिलकर हमारी खितमत की। फिर वे लोगों  की तरफ मुखातिब हुए और निहायत दिलकश , अंदाज में नज्म पढ़ी……….

शौकत आज़मी

आज की रात बहुत गर्म हवा चलती है
आज की रात न फ़ुटपाथ पे नींद आएगी
सब उठो, मैं भी उठूँ तुम भी उठो तुम भी उठो
कोई खिड़की इसी दीवार में खुल जाएगी ।
ये जमीं तब भी निगल लेने को आमादा थी
पाँव जब टूटती शाखों से उतारे हमने
इन मकानों को ख़बर है न मकीनों को ख़बर
उन दिनों की जो गुफ़ाओं में गुज़ारे हमने ।

हाथ ढलते गए साँचों में तो थकते कैसे
नक़्श के बाद नए नक़्श निखारे हमने
की ये दीवार बुलन्द और बुलन्द और बुलन्द
बाम.ओ.दर और ज़रा और निखारे हमने ।

आँधियाँ तोड़ लिया करतीं थीं शामों की लौएँ
जड़ दिए इस लिए बिजली के सितारे हमने
बन गया कस्र तो पहरे पे कोई बैठ गया
सो रहे ख़ाक पे हम शोरिश ए.तामीर लिए ।

अपनी नस.नस में लिए मेहनत.ए.पैहम की थकन
बन्द आँखों में इसी कस्र की तस्वीर लिए
दिन पिघलता है इसी तरह सरों पर अब तक
रात आँखों में खटकती है सियाह तीर लिए ।

उनकी नन्म पर कुछ सिर झुकाए, कुछ निगाहें उठाए वल्लाह, सुब्हानल्लाह, वाह-वाह कह रहे थे। दोनों बच्चियां सुन रही थीं, भीग रही थीं, डूब रही थीं। विदा होते समय कैफी ने उनकी डायरी में लिखा बिटिया निवेदिता और जोना के लिए…..चंद कतरे। आज भी वो डायरी उसके पास सुरक्षित है। पुखराजी सुनहरी  रौशनाई, में खूबसूरत हर्फ उन दिनों के गवाह हैं।

महाभूत ( चन्दन राय ) की कवितायें

महाभूत चन्दन राय


कविताओं मे अपने बिम्ब और कथन के साथ उपस्थित युवा कवि महाभूत चन्दन राय युवा पीढी के कवियों मे एक मह्त्वपूर्ण नाम है. संपर्क :rai_chandan_81@yahoo.co.in

[ तुम्हारी नथ ]

मैं अपनी तलब और तुम्हारे बहक जाने के भरोसे के बीच
गुलाबी प्यास की तपस्या पर बैठा हूँ
पर कमबख्त इतनी हठीली है तुम्हारी नथ
की  अड़ी खड़ी  है तुम्हारे होठों की किवाड़ पर सांकल चढ़ाए
तनी हुई है मेरी सांसों पर भी / मुँह चिढ़ाती पहरा लगाएकोतवाल सी पूछती है  मुझसे  मेरे इरादे   ..
इन्हे उतार फेकों की इनका चाल-चलन कुछ ठीक नहीं…
ये मुझे तुम्हारी अम्मा  लगती हैं !

[ दिसंबर की सर्दियों सी तुम ]

तुम अपनी आँखों से…
खर्च करती हो जितनी मुहब्बत,
उनसे रजाइयाँ बनाकर
मैं कई सर्दियाँ बिता सकता था !!
तुम भाप बना कर उड़ा देती हो…
अपने होंठों से जितनी गर्मियां
मैं उससे चाय पकाया करता
इस कमर तोड़ महंगाई में !
इन कंपकपाती सर्दियों में
यूँ हुस्न खर्चना ठीक नहीं
बिस्तर पर यूँ तो अलाव बहुत है
बस थोड़ी सी शक्कर और जुटा लें

दिसंबर की सर्दियों सी तुम !!

[ शायद तुम्हे प्यार है… ]

शायद तुम्हे प्यार है इन फूलों से
जिनकी सांसो से तुम्हे अपने प्रेम की खुशबू की महक आती है

शायद तुम्हे प्यार है उस आईने से
जिसकी आँखों में तुम्हे अपनी सूरत नजर आती है

शायद तुम्हे प्यार है उस रात से
जिसकी गोद में तुम अक्सर अपना सर रख कर सोती हो

शायद तुम्हे प्यार है उस खुदा से
जिसकी तस्वीर भर पर तुम दुनिया में सबसे ज्यादा यकीन करती हो

शायद तुम्हे प्यार है मुझसे
जिसकी एक आहट भर भंग कर देती है तुम्हारी सारी साधना..

मैं इस यकीन पर रोज माँजता हूँ अपनी काया
रोज नई-नई छब बनाता हूँ
जाने तुम्हे कौन सा रूप सोहे !!

[ मुझे तुमसे प्रेम है ]

बहुत आसान है प्रिय
गर तुम समझना चाहती हो
तो मेरे सीधे-साधे सरल शब्द प्रभावशाली है
“मुझे तुमसे प्रेम है”
मैं अपनी  देह में तुम्हारा नाम
लिख-लिख कर तुम्हारी निशानदेही करता हूँ !

..और बहुत मुश्किल लगभग असम्भव
मेरा कहा कोई भी शब्द अपने प्रेम के प्रदर्शन में
अपने समर्पण की अभ्यर्थना में निरर्थक ही रहेगा
गर तुम समझना ही नहीं चाहती
“मुझे तुमसे प्रेम है” !!

कुह रिश्ते दुनिया की भीड़ में भी नहीं खोते
गर तुम्हे समझ आता है तो समझ लेना
अन्यथा समझ लेना हमारे बीच
कभी कोई रिश्ता था ही नहीं

बहुत आसान है प्रिय
गर तुम समझना चाहती हो
और बहुत मुश्किल लगभग असम्भव
गर तुम समझना ही नहीं चाहती
“मुझे तुमसे प्रेम है … !!

[ प्रिय तुम्हारा चेहरा ]


ऩऱम ऩऱम मख़मऴ सी मुलायम  ,
भीजे चाँद क़ी भीगी चाँदनी सी
सोकर उठी सुबह सी उज्जवल ,
ऩऩ्हे फूलो की हसँती क्यारी सी
साँझ के आक़ाश सी कुछ कुछ,
कुछ कच्ची माटी की पावऩ मूरत सी
निम॑ल ओस सी ताजा ,
मन्दिर की अलौकिक सजावट सी  !
सोने के तारो से मढ़ी भौंहों के नीचे
खुदा की जिन्दगी भर की कमाई…
ईश्वर का रूप है
“प्रिय तुम्हारा चेहरा” !

[ तुम जरा सा साथ दे देना ]

तुम जरा सा कहोगी
और मै तुम्हारे शब्दों के स्नान में
गंगा सा पवित्र हो जाऊँगा

तुम जरा सा हंसोगे
और चाँद से गिर रही इस मीठी ठंडी हंसी से
मै कुबेर धनी हो जाऊँगा

तुम्हारा घूँघट जरा सा ढलेगा
और तुम्हारे रूप के टपकते नूर से
मै मोतियों सा धुल जाऊँगा

तुम जरा सा साथ दे देना..
मै सच कहता हूँ
जन्मो-जन्मो तक संवर जाऊँगा !!

[ अपरिचित ]

तुमको देखा नहीं
पर शायद तुम्हे चाँद कहते हैं

तुमको सुना नहीं कभी
पर शायद तुम्हे गजल कहते हैं

तुमसे मिला भी नहीं कभी
पर शायद तुम्हे खुदा कहते है

अपरिचित इस दिल का हिर्स-ए-रजा हो तुम
तुम्हे दिल की वफ़ा हम कहते है !

कार्बाइड का कलंक : औरतों की आपबीतियां

स्वाति तिवारी


लेखन की कई विधाओं में सक्रिय स्वाति तिवारी मध्यप्रदेश सरकार की एक अधिकारी हैं.   संपर्क : stswatitiwari@gmail.com

 ( ३० साल हो गए हैं उस  हादसे के जब यूनियन कार्बाइड ने भोपाल में हजारो
लोगों को तबाह कर दिया , देखते -देखते एक शहर मुर्दों के टीले में बदल गया
था. स्वाति तिवारी ने इस हादसे की शिकार परिवारों की औरतों का दर्द दर्ज
किया है , अपनी पुस्तक  ‘ सवाल आज भी ज़िंदा हैं’ में. दो दिसंबर को भोपाल
त्रासदी की बरसी है , स्त्रीकाल के पाठकों के  लिए स्वाति तिवारी की किताब
से दो अंश . कल ( एक  दिसंबर ) का  अंश  पढ़ने के लिए क्लिक लिंक पर करें  )


कार्बाइड का कलंक

तय वक्त से पहले ही रविवार को मैं पार्क जा पहुंची। पार्क में बने एक चबूतरे पर कुछ महिलाएं नजर आईं। बालकृष्ण नामदेव वहीं थे। महिलाएं उन्हें पिछले हफ्ते की अपडेट दे रही थीं। अपनी ताजा समस्याएं गिना रही थीं।मुन्नी बी से मेरी मुलाकात यहीं हुई। उम्र करीब  सत्तर साल। अब वह अर्जुन नगर में रहती हैं, पर हादसे के वक्त सेठी नगर कॉलोनी में थीं।  एक झुग्गी में। घर में सब कुछ था। भरापूरा घर था, शौहर शेरखां इतना कमाते थे कि दो बीवियों का खर्चा बिना तंगी के चल जाता था।  मुन्नी पहली किरदार थी, जिससे मेरा आमना-सामना हुआ। सालों से लोग आकर इन लोगों से मिलते रहे। उनके जख्मों को कुरेदते रहे। किसी ने कहीं लिखा, किसी ने तस्वीर छापी, कोई फिल्म बनाकर ले गया। लेकिन सबको आते-जाते हुए ये किरदार सालों से एक ही तरह के सवालों को सुनते रहे हैं और एक ही तरह के सवालों से अपनी निजी जिंदगी में घिरे रहे हैं। बाहर से आए लोगों के सवालों के जवाब तो इन्होंने दिए, लेकिन इनके सवालों के जवाब इन्हें अब तक नहीं मिले। ये औरतें हर जाति और मजहब की हैं। लेकिन इन्हें इस निगाह से देखना बेमानी है। इन्हें सिर्फ एक औरत की शक्ल में देखिए। वो मां हो सकती है, बीवी, बेटी या बहन। लेकिन उसका नसीब हर किरदार में एक जैसा है। चाहे किसी मजहब की हो। कुछ कम या ज्यादा। लेकिन हाल एक जैसे हैं। गैस हादसे ने इनकी जिंदगी किस कदर बरबाद की, अब हम सीधे इनके बीच चलते हैं। सबसे पहले मुन्नी बी…

मुन्नी से मैं सब कुछ जानना चाहती थी। मैं महसूस करना चाहती थी कि उस रात का दर्द किस तरह कहर बनकर इनके घरों में आया। मैं जानती थी कि मैं भी उनके जख्मों को हरा ही करूंगी, लेकिन एक औरत के लिए यह हादसा किस तरह पेश आया, इसे मैं तफसील से जानने को उत्सुक थी। मुन्नी ने बताया कि एक ही चूल्हे पर दोनों मिलकर रोटियां पकाती थीं। पर परवर दिगार ने जाने कैसा नसीब लिखा कि सब कुछ बर्बाद हो गया। जिस घर में दूध का धंधा चलता था उस घर का मालिक रोटी-पानी तक को मोहताज हो गया।उस रात हम अपने घरों में सोए थे, पड़ोस में शादी थी। हल्ले-गुल्ले में देर से ही नींद लगी थी कि अचानक लगा किसी ने चूल्हे में मिर्चें झोंक दी हैं। धुंआ नाक-कान गले में लगा और तेज जलन होने लगी। बाहर देखा तो शादी के पंडाल से लोग भाग रहेथे।चारों तरफ अफरा-तफरी। हम भी भागे। हमारे शौहर, हम दोनों बीवियां और हमारे बच्चे । वह अंधेरी रात गुजर गई। शेर खां फिर कभी खाट से उठ नहीं पाए। पेट में पानी भर जाता था। उस सुबह के बाद जिंदगी का नक्शा ही बदल गया। रोज पेट का पानी निकलवाने के लिए अस्पतालों की अंतहीन दौड़भाग हमारे हिस्से में आ गई। रोज पानी पेट में भरता, रोज अस्पताल जाते। एक साल बाद मेरे शौहर का इंतकाल हो गया।  सुगरा बी पहले ही गुजर गई थी। मेरा अपना बच्चा नहीं था पर सुगरा बी का बेटा मेरे साथ था। उसी के पास रहती थी। बाद में गैस के असर से बेटा बहू भी खत्म हो गए। तेरह साल का एक पोता है मेरा। वही संभालता है मुझे। हादसा याद करती हूं तो पड़ोस की बीबी जान का घर भी याद आता है। उस दिन उनके घर से चार-चार जनाज़े निकले थे। इतना कुछ देखा था.

 
उस हादसे में कि बताना मुश्किल है। सडक़  पर इंसानों की लाशों का ऐसा मंजर कभी देखा नहीं था। कभी जानवरों को भी इस बुरी हालत में मरते नहीं देखा। मुन्नी ने कहा, हमें जीते-जी बहुत इज्जत का अहसास जिंदगी में कभी नहीं हुआ था। मुश्किल हालातों में दो वक्त की रोटी कमा खा लेते थे। इज्जत से जीना क्या होता है, यह शायद ही हमारे आसपास के लोगों ने जाना हो। लेकिन मौत इतनी जलालत और बेइज्जती के आलम में आएगी, यह सोचकर भी आज रूह कांप जाती है…उस रात की याद मत दिलाइए। हमने न जाने कितनी रातें उसकी कड़वी यादों के साथ गुजारी हैं। अल्लाह रहम कर …..लाशें देखकर भागते हुए कोई रुकना ही नहीं चाहता था। कहां-कहां रुकता? जो भागते-भागते गिरा उसे वहीं छोडक़र लोग भाग रहे थे। ऐसा तो कभी किस्से कहानियों में भी नहीं सुना था। पर उस कहर बरपाती रात को सब कुछ देखा है इन आंखों ने। आज भी भूल नहीं पाती हूं। जब हालात काबू में हुए तो वापस लौटने पर घर के खूंटे में बंधी बेबस गाय और भैंस की फूली हुई लाशें आंखों के सामने थीं। एक हद के बाद दर्द के अहसास भी पथरा जाते हैं। घर लौटकर उस सन्नाटे में मैं इसी हाल में थी…
मुआवजे में पच्चीस हजार मिले थे। बैंक में रखे हैं। इसे मैं हज के लिए इस्तेमाल करना चाहती हूं। ताकि वहीं जाकर परवरदिगार से पूछूं कि यह कैसी तेरी दुनिया है? कैसा इंसाफ है? और कौन सा गुनाह था मेरा? इस उम्र में १३ साल के पोते को मजदूरी करते हुए देखती हूं तो सीने पर पहाड़ सा बोझ मालूम चलता है। हमारी दुनिया ही तबाह हो गई। लेकिन हम अकेले नहीं थे…

मुन्नी अपनी आपबीती सुनाती जाएगी। उसकी कहानी उस रात की अगली जहर से भरी सुबह के साथ खत्म नहीं होती। असल कहानी तो उस सुबह के बाद ही शुरू होती है। तकलीफों की एक अंतहीन दास्तान। अब नाम बदलते जाइए। मुन्नी की जगह कोई और नाम ले आइए। तारा, कलावती, कुसुम, चंपा, रानी, रशीदा…सिर्फकिरदार बदलते जाएंगे। लेकिन कड़वी यादें कम नहीं पड़ेंगी। इन कहानियों में दर्द का विस्तार पिछले पूरे 26 साल तक फैला हुआ है। जबकि जिंदगी है कि खत्म होने का नाम ही नहीं लेती…तारा बाई के पास चलिए। उम्र है करीब पैंतालीस साल। दिखने में सेहतमंद मगर भीतर शरीर बीमारियों का घर। दो साल पहले पति का देहांत हो गया। जब तक वे साथ रहे, दोनों मिलकर तकलीफों के हिस्सेदार बने रहे। अब सारी तकलीफें अकेले ढो रही हैं। क्या हुआ था उस दिन? यह सवाल अनगिनतबार पूछा गया है। जोर से एक पत्थर सा पड़ता है और यादों का दरिया फूट पड़ता है। सुनिए-वही हुआ था जो नहीं होना चाहिए था। तब मेरी शादी को तीन साल हुए थे। चार महीने का गर्भ था, नींद नहीं आ रही थी उस दिन। बीड़ी लपेट रही थी बैठे-बैठे। पड़ोस में शादी थी। हम भी शादी में खाना खाकर आए थे। पति सो गए थे। मुझे खांसी आई। लगा कि जैसे मिर्च जल रही है कहीं आसपास। दरवाजा खोलकर देखा तो भगदड़ मची थी। पति को उठाया और दोनों चूना-भट्टी की तरफ भागने लगे। रास्ते में हमने  लोगों से सुना कि कारखाने से जहरीली गैस निकली है – भागने में दम फूलने लगा। रास्ते में गिर पड़ी, पति ने उठाया पर अगले दिन अस्पताल में बच्चा गिर गया। वह कोख में ही मर गया था। बस मैं फिर मां नहीं बन पाई।

पति ने दूसरी शादी तो नहीं की। गैस ने बीमार  कर दिया और बीमारी झेलते-झेलते एक दिन वो भी चले गए।  सोचती हूं मैं जिन्दा हूं पर किसके लिए? कभी-कभी सुखद सपने देखती हूं। जागी आंखों से। सोचती हूं कि अगर बच्चा होता तो अब कितना बड़ा हो गया होता…कैसा दिखता वह? तारा की सूनी आंखों में अतीत की काली परछाइयां तैरने लगती हैं। वह सवालों के जवाब देती जाती है। हर जवाब के साथ वह भीतर ही भीतर पिघलने लगती है। आंखें बह निकलती हैं। फिर खामोशी घेर लेती है। वह मुंह छिपा लेती है। जैसे अपनी कड़वी यादों पर परदा डाल रही हो। हमेशा के लिए…उसे देखिए। कलावती बाई नाम है उसका। उम्र करीब 75 साल।  कुछ पूछती इसके पहले ही वह अपना आपा खो बैठी। चेहरा बोलने से पहले ही तमतमा उठा था। वह किसी सवाल का सामना करना नहीं चाहती थी। जोर से चिल्लाई,  नहीं बताती कुछ…। वो उठकर जाने लगी…। बालकृष्ण नामदेव बीच में आए। उसे प्यार से मनाया।  कहा, अरे बताओ अपने बारे में। दर्द बांटने से कम होता है। दुनिया को भी पता चलना चाहिए कि कलावती कितनी हिम्मतवालीऔरत है। किन-किन मुसीबतों को झेलकर भी गैस हादसे के शिकार लोगों के हक के लिए दम से दुनिया के सामने खड़ी है। बताओ। जो कुछ याद है कहो इनसे…कलावती सोच में पड़ गई। ठहरी। गहरी सांस ली। जैसे दिल से आह निकली हो। धीमी आवाज सुनाई दी, क्या बताऊं? कितनी बार बताऊं? ऐसा लगता है कि २६ बरस से सिर्फ बता ने के लिए ही हम जिन्दा हैं। लेकिन बार-बार दोहराने से मिला क्या है? उपेक्षा, बदहाली और बदकिस्मती?

फिर वो उतरती हुई धूप के टुकड़े  देखने लगी। फिर उसी पर जाकर बैठ गई। हल्के से मुस्कुराई। बोली, बेटा क्या बताऊं? पति पूरनचंद चालीस साल पहले ही मर गए थे। तीन बेटे थे मेरे। अब दो हैं, एक गैस की चपेट में आकर मर गया…उस रात सारा बरखेड़ी भाग खड़ा हुआ था और जब हम अपने घरों में वापस लौटे तो गैस बाहर नहीं फेफड़ों में भरी थी…आंखों में भरी थी…अब तक अंदर अपना असर दिखा रही है यह देखो, कैसी गिल्टी बन गई है।  छाती के पास। क्रोध से भरा चेहरा करुणा से कराह उठा। कहने लगी- मेरी नातिन १८ साल की उम्र में चली गई। एक बेटा भी गया। बचपन में मां मर गई थी। सौतेली मां ने मजदूरी कराई। तगारी उठाते बचपन से शादी ने मुक्ति दी तो बीच मझधार में छोडक़र पति भी चल बसे। तगारी फिर उठा ली। तगारी उठा-उठाकर पाले अपने  बच्चे की अर्थी उठते देखी तो मैं जीते जी मर गई। खूब चाहती कि बच्चे पढ़ते-लिखते। लेकिन ऐसा नहीं हो पाया।  मेरी तगारी उनके हिस्से में आ गई। मेरे बच्चे आज भी मजदूरी करते हैं। अब तो दिखता भी नहीं है मुझे…पर देखने को बचा भी क्या है? डॉक्टर दिखाई गिल्टी? बताती हैं, दवा मिले और लगे तभी तो फायदा है दिखाने का। मुआवजे के पच्चीस-पच्चीस हजार रुपए तो जाने कब इलाज पर ही खत्म हो गए। यहां तक क्यों आई हैं?  वह एक कार्ड दिखाती है – पेंशन कार्ड। मैंने देखा उस पर लिखा था-नाम कलावती, उम्र ७५ साल, पति का नाम स्व. पूरनचन्द।

कलावती की हथेली पर कार्ड वापस रखती हूं तो एक और महिला आगे आकर अपना कार्ड मेरे हाथ में रख देती है। उस पर लिखा है-प्रेमबाई, उम्र ५० साल, ग्राम बरखेड़ी। वह आगे बढक़र बताने लगती है, उस रात जो मेरे साथ हुआ था मैडम, वो तो सिनेमा में भी नहीं देखा होगा आपने? अच्छा!’ उस रात जब गैस रिसी, हम सब भागे…. रास्ते में उल्टी हुई और मेरी तीन महीने की छोरी छूट गई और गिर कर मर गई। सास, ससुर, पति, ननद, देवर भरा पूरा कुनबा था हमारा। सब विधानसभा वाली सडक़ की तरफ भाग रहे थे। दूसरी लडक़ी भी हादसे के बाद मर गई। अब कोई औलाद नहीं है मेरी..मुआवजा मिला? प्रेमबाई कहती हैं, उसी के लिए आज तक लड़ रही हूं, पर नहीं मिला। पति ने दूसरी औरत को रख लिया था। उसी को मेरी जगह खड़ा कर दिया, पैसा उसे मिला। भगवान दास की वह दूसरी पत्नी भी अब नहीं रही। केन्द्र सरकार के विभागीय कर्मचारी की इस परेशानहाल पत्नी का कहना है कि रिश्तेदार देवर वगैरह अब मुझे फिर परेशान करते हैं, क्योंकि प्रापर्टी की एक मात्र दावेदार हूं मैं, फिर पति की पेंशन और नौकरी के पैसे भी मिलेंगे। संतान नहीं है, तो देवर सब हड़पना चाहता है। मुआवजा भले ही नहीं मिला हो पर मैं आखरी दम तक संगठन के साथ मिलकर न्याय के लिए लड़ती रहूंगी। मेरे पास अपने लिए जीने के लिए कुछ नहीं बचा। इसलिए संगठन के लिए सक्रिय हूं। गैस ने सिर्फ लोगों को फौरन ही नहीं मारा। न ही हमेशा के लिए बीमारियों ने घर किया। आप सोच नहीं सकते कि मुआवजे और संपत्तियों के लिए हम किस तरह की मुसीबतों में पड़ गए। घरों में रिश्ते-नाते सब चकनाचूर हो गए…

किरदारों की यह एक अंतहीन कतार है। सबके पास सुनाने के लिए अपनी कोई न कोई दर्द भरी दास्तान है। सबके ह्दय भरे हुए हैं। जरा सी बात छेडि़ए या किसी के पास बैठकर उसे सुनिए। आसपास से न जाने कितने चेहरे जमा हो जाएंगे। सबके पास अपनी कहानी है। ये वो औरतें हैं, जो अब तक आंदोलनों में शामिल होने वाली भीड़ का हिस्सा रही हैं। अखबारों में छपने वाली तस्वीरों की भीड़। अनाम चेहरे। प्रेमबाई अपनी बात खत्म करे इसके पहले ही एक और चेहरा सामने आ जाता है। यह लक्ष्मीबाई है। करोंद की रहने वाली। नाम की लक्ष्मी है। दौलत की देवी का नाम ही है उसके पास।  वह अपनी आपबीती लेकर सामने आ जाती है। बताती है, ये देखिए गैस  शरीर पर जाने कौन-सा रोग छोड़ गई जो कुष्ठ रोग की तरह दिखाई देता है। गनीमत है हम बच गए थे, लेकिन देह पर यह निशान उभर आए। इसके बाद पति ने भी छोड़ दिया।  यह तो गैस का असर नहीं था। यह कैसे रिश्ते हैं? मैं दो दिसंबर की शाम तक यह सोच भी नहीं सकती थी कि मेरे पति कभी मुझे छोड़ देंगे। हम मिलजुलकर   रहते थे। सुख-दु:ख के साझीदार थे। गैस ने जान से तो नहीं मारा लेकिन इंसानी रिश्तों की परतें इतनी जल्दी छीलकर रख दीं और यह नंगी सच्चाई मेरे हिस्से में भोगने के लिए आई। भोपाल की जो औरतें गैस हादसे में चल बसे अपने पति के लिए रो रही हैं, उन्हें जरा मेरी हालत भी देखनी चाहिए…पचपन साल की आमना बी। कभी संगठन में सबसे आगे चलती थीं। लेकिन शरीर में कैंसर की शक्ल में मौत ने दस्तक दी और अपने साथ ले गई। इन औरतों के हक के लिए 26 साल से लड़ रहे नामदेव आमना को याद करके भावुक हो जातेहैं

कुछ बताने लगते हैं तभी उनका ध्यान पार्क के गेट पर जाता। वो देखिए इमली के नीचे शायद मस्जिद वाली बीबी खड़ी है ! मैंने देखा एक नाजुक सी औरत को। ७५ साल से कम क्या होगी उसकी उम्र। बुरके में थी वह। इमली और बरगद के दो बड़े घने पेड़ इस पार्क में इन औरतों की बातचीत सालों से सुन रहे हैं। हादसे के समय की भागमभाग भी इसी खामोशी से इन्होंने देखी होगी। जिसे नामदेव ने मस्जिद वाली बीबी कहा, वह इन्हीं दरख्तों के नीचे अपने संगठन के साथियों को तलाश रही थी। उनकी तस्वीर लेने के लिए मैं कैमरा खोलती हूं। पर बैटरी जवाब दे गई है। एक पल को मुझे कोफ्त होती है। मैं झुंझला जाती हूं अपनी लापरवाही पर। मुझे यहां आने की जल्दी थी। महीनों से सोचती रही थी इन औरतों के बारे में। इसलिए जब मिलने का वक्त आया तो ख्याल ही नहीं रहा।मैंनें देखा कि मस्जिद वाली बीबी वहीं बरगद के नीचे बैंच पर बैठ गई थीं। प्रेमबाई मुझसे कहती है वहीं चलना पड़ेगा आपको। चार कदम चलकर हम वहां पहुंचे। सामने हैं राशिदा सुल्ताना।  मरहूम अब्दुल मनान की बेसहारा बीबी। मस्जिद के पीछे इमली का पेड़ है। उसी के नीचे एक घर है। राशिदा का आशियाना। इसीलिए उन्हें उनके नाम से नहीं मस्जिद वाली बीबी के नाम से ही पहचाना जाता है। पास आते ही खुश होकर हाथ मिलाती हैं। फिर बताती हैं चेहरे पर आंखों के पास लगी चोट। आंखों से साफ दिखाई नहीं देता। रास्ते के पत्थर से टकराकर गिर गयी थी। कहती हैं, दवाइयों ने पीछा पकड़ लिया था, अब मैंने ही दवाई लेना छोड़ दिया है। कितना खाती?

मैं बाहर से मिलने आई हूं। इसका रशिदा को ख्याल है। वे शिष्टाचार निभाने का ख्याल नहीं भूलतीं। आसपास किसी को देखती हंै। चाय लेने का हुक्म देती हैं। मैं उनसे अदब से मना करती हूं। चाय की क्या जरूरत है? आपके साथ थोड़ा वक्त गुजार लूं।  आप कुछ बता दें। मेरे लिए आज इतना ही काफी है। चाय फिर कभी। लेकिन वे मानी नहीं। उनके लिए यह तहजीब का तकाजा था। चाय मंगाकर ही दम ली।  अब हमारे बीच एक मीठा रिश्ता बन गया था। हम काफी देर तक गुफ्तगू करते रहे। वे सुनाती रहीं। मैं सुनती रही। नोट्स लेती रही। अखबारों में अब तक इन बेसहारा औरतों की तस्वीरें देखी थीं। एक तस्वीर में अनगिनत चेहरे। लेकिन इनकी तस्वीरें अलग-अलग थीं। जितने चेहरे उतनी तस्वीरें। हर चेहरे की कई तस्वीरें। दर्द की परछाइयां। अपनों के खोने, रिश्तों के तार-तार होने, मुआवजे के लिए भटकने के अंतहीन किस्से। ये औरतें चलती-फिरती सजा से कम नहीं बची थीं। उस दिन घर लौटते हुए यही ख्याल दिलो-दिमाग में घूम रहा था कि इनके इस हालात के लिए कौन जिम्मेदार है?अब मुझे अगले गुरुवार का इंतजार था। एक-एक दिन इंतजार के बाद वह आ ही गया। बालकृष्ण बोले कि आज आप थोड़ा सा लेट हो गईं, वो अभी-अभी चली गईं।‘कौन?’

शांतिनगर में गांधीनगर स्कूल के पास रहती हैं भूरिया बाई। वहीं से आई थीं। गले का कैंसर है और इलाज को तरस रही हैं। भोपाल में गैस पीडि़तों के लिए ३३ चिकित्सा केन्द्र स्थापित किए गए। फिर इलाज के लिए तरसने का मतलब मेरी समझ में नहीं आया। मुझे मालूम था कि इस समय ६ चिकित्सालय, ९ डे-केयर यूनिट कार्यरत हैं। इसके अतिरिक्त देशी चिकित्सा पद्धति के अन्तर्गत आयुर्वेद, होम्योपैथी एवं यूनानी के तीन-तीन कुल नौ औषधालय भी हैं। भोपाल मेमोरियल हॉस्पिटल ट्रस्ट का एक मुख्य चिकित्सालय और इसकी ८ मिनी यूनिट, गैस पीडि़तों के लिए संचालित हैं। गैस राहत चिकित्सालयों में हर रोज करबी साढ़े तीन हजार मरीज आते हैं। गैस पीड़ितों की जांच एवं उपचार मुफ्त। फिर भूरिया बाई इलाज के लिए क्यों तरस रही है? वहां मौजूद संगठन के एक कार्यकर्ता ने आंकड़े और असलियत में अंतर को साफ करते हुए बताया कि आपकी जानकारी सरकारी आंकड़ों सहित एकदम सही है, पर समस्या यह है कि वहां वे लोग इलाज कराने आते हैं जो असल में गैस पीडि़त नहीं हैं। दवाइयों का तो सरकारी दवाखानों में सदा टोटा ही रहता है। उस पर ओ.पी.डी. चालू कर देने से सामान्य मरीजों को ही फायदा हुआ है। आप कभी गई हैं वहां? उन्होंने प्रश्न किया।‘नहीं।’
तो फिर आपको समझना होगा कि एक शानदार इमारत, आधुनिक और महंगी मशीनों के बावजूद गैस पीडि़तों के इलाज  के ऐसे हाल क्यों हैं? दवाइयां कई बार नहीं मिलतीं। ज्यादातर बाहर से ही लानी होती हैं। पांच रुपए की पर्ची बनवानी पड़ती है? एक लम्बी प्रक्रिया है। सब कुछ उतना आसान नहीं है, जितना दूर से दिखता  है।

आंकड़े बताते हैं कि केंद्र सरकार द्वारा चिकित्सा पुनर्वास हेतु प्रथम कार्ययोजना में १५०.३५ करोड़ रुपए मंजूर किए गए थे। अक्टूबर २०१० तक ४.२४ करोड़ रुपए खर्च भी हुए। २७३.७८ करोड़ रुपए राज्य सरकार ने किए। नई नीति के अनुसार अक्टूबर  २०१० तक कुल २३५ मरीजों को जवाहरलाल नेहरू कैंसर हॉस्पिटल में इलाज के लिए भेजा गया है। अब तक कुल दो हजार ६२८ गैस पीडि़त कैंसर मरीजों को इलाज के लिए इस अस्पताल में रैफर किया गया है। १४.७८ रुपए का भुगतान कैंसर चिकित्सा के लिए किए जाने के बावजूद भूरिया बाई के हाल ये थे। ऐसी न जाने कितनी औरतों को यह जिल्लत भोगनी पड़ रही थी। ऐसा क्यों है?एक औरत सहमकर कहती हैं, सुविधाओं का फायदा संपन्न तबके के लोगों ने लिया है। आम आदमी तो लम्बी लाइन में पर्ची कटवाने में ही लस्त-पस्त होकर लौट जाता है या लौटा दिया जाता है। आप समझ रही हैं ना मैं क्या कहना चाहती हूं? समस्या एक हो तो बताएं आपको, यहां तो हर रोज एक नई समस्या सामने आती है। सामाजिक सुरक्षा पेंशन को ही ले लो।‘क्यों उसमें क्या गड़बड़ है?’आपको पता है १९८४ तक वह सिर्फ साठ रुपए थी, हम तब से लड़ रहे हैं। नामदेव बताते हैं कि उन्होंने एक नारा दिया था, ‘साठ नहीं, डेढ़ सौ दो, भीख नहीं, पेंशन दो’, वे कहते हैं फार्म भरने की प्रक्रिया ही इतनी जटिल थी कि ये अनपढ़ निराश्रित महिलाएं क्या आवदेन कर सकती हैं!

फार्म पर १२५० स्थित जेपी अस्पताल में डॉक्टर से दस्तखत कराना होते थे और डॉक्टर के पास फीस लेकर इलाज का तो समय नहीं है। वहां गरीबों के फार्म पर दस्तखत आसान काम लगता है आपको? आपको पता है सामाजिक सुरक्षा पेंशन अब एकीकृत वृद्धावस्था पेंशन है, जो १५० रुपए के लगभग मिलती है। इसे लेने में हजार पापड़ बेलने पड़ते हैं। इसका नाम सुरक्षा नहीं, समस्या पेंशन होना चाहिए।  नामदेव बेहद संयत और शांत प्रकृति के इंसान हैं, लेकिन बदइंतजामी पर बोलते हुए वे गुस्से को अपने चेहरे पर आने से रोक नहीं पाते। वे बताते हैं, २६ साल गुजर गए हादसे को। एक पीढ़ी बीत जाती है इतने वालों में। कितने लोग मर खप गए यहां मुआवजा और पेंशन मांगते-मांगते।एक महिला ने बताया कि कोई डॉ. अमर डूमर सिंह तोमर ४८ साल की उम्र में डॉक्टर होकर भी जिंदा नहीं रह पाए। उनकी दोनों किडनी खराब हो गई थीं गैस के असर से। फिर आम मरीजों की कल्पना ही कर लीजिए।एक और चेहरा उभरता है। रामकली बाई। उम्र पचपन साल।  पैरों में सूजन रहती है, सिर चकराता है। यह रोना हमेशा का है। वह बताती है, गैस ने उसके पति का लीवर खराब कर दिया था, वे नहीं बचे। मुआवजे के पैसों से इलाज हुआ और बेटों की शादी भी। अब उन्हें दवाई की दिक्कत है। कार्ड गुम हो गया है। पर्चा बनवाने में पाँच रुपये लगते हैं और ऊपर से दवाई भी बाहर से ही लाइए। कार्ड नया बने तो शायद कुछ हो।

रामकली के पास ही है एक और लक्ष्मीबाई, जिन्हें सब गहना भाभी बुलाते हैं। 65 साल की लक्ष्मी बताती हैं, उस रात बाजू वाले घर में राम प्रसाद की बेटी की बारात आई थी। भांवरें पड़ रही थीं। आधे फेरों में अचानक सबका जी मचलाने लगा। थोड़ी ही देर में हाल बुरे हो गए। दूल्हा-दुल्हन भी हाथ पकड़ कर भागने लगे। सडक़ का यह हाल था कि उस पर कंकड-पत्थर की तरह लाशें पड़ी थी। स्कूटर, सायकल, सामान, मवेशी..जिसके साथ जो था भागते हुए या गिरते हुए सडक़ पर ही छूट गया। किसी को घर, जायदाद, रुपया-पैसा, गहनों की चिन्ता नहीं थी। कई लोग सोते बच्चे छोडक़र भाग रहे थे। मौत की दस्तक घर-घर के दरवाजे पर थी। कहीं वह गैस का बादल बन कर उतरी तो कहीं सफेद जहरीला धुंआ बन कर। किसी को उबली बन्द गोभी की तीखी गंध लगी तो किसी को ताजी कटी घास की पर असर उसका जलती लाल मिर्च जैसा था। आंखों को जला देने वाला। भागते-भागते लोग सार्वजनिक नल खोल कर पानी के नीचे जमीन पर लोट रहे थे। छटपटा रहे थे। दिसम्बर की सर्द रात और शरीर के भीतर आग लगी हुई थी, जहर भरे धुएं के साथ।  लक्ष्मी पूछती है कि कहां हैं वे भविष्यवक्ता, जो सबका अलग-अलग भाग्य बांचते फिरते हैं…कोई बताये कि उस दिन उन सबकी राशियां और ग्रह दशाएं क्या एक जैसी ही थीं? इतनी शादियां थीं शहर में। हर गली में रात शहनाइयां बज रहीं थीं, जो मातम की खामोशियों में बदल गईं। क्या कुण्डलियों के मिलान करने वालों ने कुण्डलियां सही मिलाई थीं? कहां थे भाग्य के शनि-मंगल? क्या सब धरती पर उतर आए थे? अगर सितारे हमारे तकदीर के फैसले करते हैं तो उस रात पूरे

भोपाल के सितारे गर्दिश में थे। ज्योतिषियों को वॉरेन एंडरसन की कुण्डली भी देखना चाहिए और हमारे नेता-अफसरों की भी। क्या वे सब राजयोग लिखाकर लाए हैं? हमने क्या पाप किए थे, जो यह फल भोगे?  लक्ष्मी के पास तमाम सवाल हैं। वह रोकर अपनी बात नहीं कहती। तैश में आ जाती है। उसकी मुट्ठियां भिंच जाती हैं। आंखों से आग सी बरसने लगती है। वह सिर्फ यह जानना चाहती है कि उसका कुसूर क्या था, जो अपनी आंखों के सामने अपनी दुनिया उजड़ती देखी…
भोपाल के कवि राजेंद्र अनुरागी की पंक्तियां हैं-
एक और… एक और…
वे खरीदार हैं, थैली फुलाने वाले
और यह हालात हैं
हम सबको रुलाने वाले
कराहती पड़ी है यह
बूढी़ बीसवीं सदी
घाव सी कसकती है
भोपाल गैस त्रासदी

जेपी नगर कार्बाइड के एकदम सामने ही है, वह बस्ती जहां गैस ने सबसे ज्यादा कहर बरपाया था। उस रात यह मौत के मुहाने पर थी। गैस में मरने वाले अभागे सबसे ज्यादा इसी और इससे सटी दूसरी बस्तियों से ताल्लुक रखते हैं। बरबादी के सबसे पहले और सबसे ज्यादा हकदारों की बस्ती। ऐसा शायद ही कोई घर हो, जहां गैस से बीमार कोई न कोई न मिले।  एक दो नहीं सैकड़ों लोग गैस जनित बीमारियों से पीडि़त हैं। इनमें कुछ की उम्र तो पांच से २५ साल तक है यानी घटना के बाद पैदा हुए बच्चों को बीमारी विरासत में मिली। इनकी और इन्हें जन्म देने वाली महिलाओं की अजीब सी दिक्कत यह है कि कोई भी सरकारी फार्मूला इन्हें गैस पीडि़त मानने को तैयार नहीं है। मुआवजा तो बहुत दूर, दवाई तक के लिए पैसे नहीं मिलते। कैंसर पीडि़त  ६५ वर्षीय बाबू खां की बेटी सुरैया को दमा है। उनकी १६ वर्षीय नातिन गुलफशा को पेट की गंभीर बीमारी है। सुरैया बताती हैं, दस साल का अरबाज विक्षिप्त है। यहीं के बलराम और लीलाबाई का २३ वर्षीय बेटा जगदीश शारीरिक विकास रुकने की वजह से दस साल से ज्यादा का नहीं दिखता। लीला बाई की शादीशुदा बेटी गैस प्रभावित थी।

राजकुमारी के फेंफड़े खराब हुए। वह अंतत: मर गई। पचास वर्षीय रशीदा बेगम के पैरों में सूजन स्थाई घर बना चुकी है। पैर सुन्न हो जाते हैं। पर जिन्दगी उन्हीं के सहारे घिसट रही है। प्रमिला का दर्द यह है कि बीमारी ने उसका सुसराल से नाता ही तोड़ दिया है। वह जब करीब दस साल की थी तब हादसा हुआ था। प्रमिला ने भी अपने लोगों को खोया था। वक्त गुजरने के साथ प्रमिला पर भी बीमारी ने अपना असर दिखाया। इसके बावजूद वह जब १८ वर्ष की उम्र पार कर गई तो उसका विवाह हो गया। पति सरकारी कर्मचारी था और जिन्दगी पटरी पर चलती मालूम चलने लगी।  पर बढ़ती खांसी और आंखों की कम होती रोशनी के कारण बार-बार इलाज कराना पड़ता। इलाज पर होने वाला खर्च ससुराल वालों को खटकने लगा। उसे परेशान करने का एक  सिलसिला अनायास शुरू हो गया। वह घर के लोगों को खर्चीली साबित होने लगी। अब गुजारा मुश्किल था।  रात दिन  ताने सुन-सुन कर वह दुखी थी ही और आखिर में उसे इलाज के नाम पर मायके भेज दिया गया। तब से आज तक वह मायके में ही है। किसी ने आकर हाल पूछने की जहमत भी उसके बाद नहीं की। वह पूछती है
कि सरकारी बदइंतजामी को कोसना आसान है, लेकिन इन रिश्तों में इंसानियत को मैं जाकर तलाश करूं?
जन्म लेते ही थमी सांसें सफेद बाल। दुबली-पतली देह। लेकिन नाम है-शोभा। हादसे से जुड़े किसी भी सवाल पर

आज भी सदमे की हालत में पहुंच जाती हैं। गैस कांड के समय छोला मंदिर के पीछे शोभा का परिवार रहता था। तब उन्हें सात महीने का गर्भ था और पूरा घर आने वाले मेहमान की तैयारी में जुटा था। अचानक हादसे की चपेट में आने के बाद शोभा की हालत दिन-ब-दिन बिगडऩे लगी। हादसे के तीन महीने बाद एक दिन के अंतराल से जुडवां बेटों का जन्म हुआ, लेकिन दोनों ही बीमारियों की चपेट में आ गए थे। दोनों जन्म के तुरंत बाद ही चल बसे। सदमे से शोभा आज तक नहीं निकल पाईं। सांस की बीमारी ने इतना कमजोर कर दिया है कि ज्यादा दूर तक चल भी नहीं सकतीं। उसे मुआवजे के लिए तमाम मेडिकल जांचों के साथ मामला पेश होने पर सब कुछ मिलाकर महज एक लाख रुपए मिले। इलाज के अलावा काम नहीं कर पाने और जर्जर आर्थिक स्थिति के कारण परेशान शोभा को इतने साल बाद अब कोई उम्मीद नहीं बची है। सवालिया लहजे में वह कहती हैं कि अब बची-खुची ङ्क्षजदगी किस बूते काटूं, बुढ़़ापे के सहारे तो पैदा होते ही छिन गए। अदालत कहती है कि अगर दुर्घटना दोनों बेटे नहीं बचे तो इसकी एवज में हम क्या करें?

इन्हीं दिनों केन्द्र सरकार द्वारा गठित मंत्री समूह ने करीब ४८ हजार पीडि़तों को अतिरिक्त मुआवजा देने की घोषणा की है, लेकिन उसने ५ लाख २१ हजार गैस पीडि़तों को मुआवजे से वंचित कर दिया, जो त्रासदी के बाद स्थाई या अस्थाई रूप से विकलांग हुए थे। फेफड़ों और पेट संबंधी बीमारियों, आंखों की रोशनी पूरी तरह चली जाना और न्यूरोलॉजीकल या साइकेट्रिक समस्याओं से बेजार लोगों को सरकार ने अपने हाल पर छोड़ दिया है। सरकार का यह फरमान पीडि़तों के लिए एक और हादसे से कम नहीं है। ऐसे हजारों गैस पीडि़त हैं, जिन्हें पहले सामान्य श्रेणी में २५ हजार रुपए मुआवजा मिला, लेकिन बाद में वह घातक बीमारियों के शिकार हो गए। आईसीएमआर और कई रिसर्च एजेंसियों की रिपोर्ट बताती हैं कि एक लाख से ज्यादा गैस मरीजों को लगातार निगरानी और उपचार की आवश्यकता है, लेकिन उन्हें केन्द्र सरकार ने मुआवजे के रूप में कोई राहत नहीं दी है। रिपोर्ट यह भी बताती है कि कुल गैस पीडि़तों में से २० से २५ प्रतिशत न्यूरोलॉजीकल डिसऑर्डर के शिकार हैं। सेंटर फार रिहेबिलीटेशन स्टडीज की रिपोर्ट बताती है कि गैस पीडि़तों में श्वसन, नेत्र, पेट रोग और सामान्य बीमारियों की दर अप्रभावित लोगों के मुकाबले ४ से ५ गुना ज्यादा है। केन्द्र सरकार द्वारा गठित मंत्री समूह ने इन रिपोट्र्स पर ध्यान दिए बिना मुआवजे की राशि और मुआवजे की श्रेणियां घोषित कर दीं। मंत्री समूह ने १९८७ के आंकड़ों के हिसाब से मुआवजे की घोषणा की है, जबकि तब से लेकर अब तक मरीजों की तादाद तीन गुना बढ़ गई है।

हशमत बी को ही लीजिए। उसे सामान्य श्रेणी का मुआवजा २५ हजार रुपए मिला था, लेकिन बाद में वह गैस जनित कई बीमारियों में जकड़ गईं। उनकी आंखों की रोशनी अब पूरी तरह जा चुकी है। उनके अंधियारे जीवन में सरकारी फैसलों ने अंधेरे को और गहरा दिया है। बीबी जान को पहले तो कोई समस्या नहीं थी, लेकिन बाद में वह और उनके पति दोनों टीबी के मरीज बन गए। चांदबड़ निवासी रफीया ने जन्मजात विकृत बच्ची को जन्म दिया। काफी इलाज कराने के बावजूद वह बच नहीं पाई। रफीया को भी २५ हजार रुपए ही मिले। महामाई का बाग निवासी साजिदा बी को उस समय सामान्य श्रेणी में २५ हजार रुपए मुआवजा मिला, लेकिन वक्त बीता तो वह कई बीमारियां उभर आईं। अब उनसे जूझ रही हैं। उन्हें पथरी है, जिसका ऑपरेशन उन्होंने हाल ही में कराया है।  पसलियों में पानी भर जाने की समस्या से लड़ते हुए सालों गुजर गए। पति भी बीमार। मौत से बदतर जिंदगी जी रहे इन लोगों को कोई राहत नहीं है !यादगारे शाहजहांनी पार्क  सुल्तानिया अस्पताल के ठीक सामने यादगारे शाहजहांनी पार्क। यहां गैस पीडि़तों की आवाज हादसे के बाद से ही लगातार गूंज रही है। यह अनगिनत आंदोलनों का गवाह है। जब मैं कई सालों से यहां आती रही औरतों से मिलने पहुंची तब होली के दिन थे। पार्क में चारों तरफ बैनर लगे हुए थे। माइक पर एक महिला अपने हकों के लिए अपना और अपने संगठन का पक्ष रख रही थी। बड़ी तादाद में गैस पीड़ित एकत्र थे। मुझे लग रहा था कि होली जैसे त्योहार के वक्त कौन आएगा वहां? लेकिन जो लोग यहां जमा हुए थे, उनके लिए त्योहारों की अहमियत सालों पहले खत्म हो चुकी थी।

हर शनिवार की दोपहर बारह बजे ये यहीं एकत्र होते रहे हैं। कोई भी मौसम हो, त्योहार हो, कोई फर्क नहीं पड़ता। सभा समाप्त होते ही मैं उन औरतों तक पहुंची, जो न जाने शहर के किस-किस कोने से यहां आई थीं। जैसा छोला रोड पर फूटा मकबरा की रहने वाली नजबून बी। चलना-फिरना तक मुहाल है।  गैस ने पैरों में गठानें पैदा कर दीं। अब वे गठानें बड़ी हो गई हैं। शौहर आठ साल पहले करोंद अस्पताल में बीमारियों से लड़ते-लड़ते चल बसे। नजबून बी का एक बेटा है। वह भी हार्ट पेशेंट है। हादसे के बाद जिंदगी की हर सुबह-शाम घर और अस्पताल के बीच ही कटती रही है। लाचारी से कहती हैं, इससे तो वे लोग ठीक थे, जो हादसे की रात मर गए। कम से कम रोज-रोज की इस जिल्लत भरी जिंदगी से तो बच गए। यह मौत से बदतर है।
टीला जमालपुरा की एक और औरत।  हादसे के वक्त उसकी शादी हो चुकी थी। एक बेटा था तब। अब तीन बच्चे हैं। उम्र पैंतालिस साल है। गले और पेट में स्थाई छाले गैस के सबूत हैं। आंखों से भी पानी आता रहता है, जिसका आपरेशन हो चुका है। ये इलाज नाकाफी साबित हुए, क्योंकि आंखों से पानी का बहना बंद नहीं हुआ…   शमशाद बेगम जे.पी. नगर की हैं। गली नम्बर तीन, मकान नम्बर ८५/१। मौत का मंजर सबसे करीब से देखने वाले लोगों में वे भी हैं। उस रात के बारे में सोचकर आज भी आंखों में अंधेरा छा जाता है। पांच साल का मेरा बेटा उसी रात खोया था। दोजख जैसी जिंदगी जीते-जीते सात साल पहले शौहर भी चल बसे। नेहरू चिकित्सालय में इलाज चलता रहा उनका…

पुतलीघर के पीछे शाहजहांनाबाद की सईसा बी के पति और दो बच्चे हादसे के शिकार हुए। दोनों का आठ माह तक इलाज चलता रहा पर बेटे के दिमाग का संतुलन बिगड़ा हुआ है। कमाने वाले दोनों हाथ लाचार हो गए। ब्लूकार्ड है। राशनपानी का नाममात्र का जरिया…  जहांगीराबाद की रईसा बी। बरगद के नीचे ओटले पर बैठी थी। गैस ने इस औरत की आंखों की रोशनी मंद कर दी और सांसों को बेदम कर दिया। सुबह के उजाले में भी सुई नहीं दिखती। हादसे से पहले सिलाई करते थकती नहीं थी पर हाथों का यह काम तो जाता ही रहा। इलाज और दवाएं मुफ्त में मिलती रहीं हैं। धीरे-धीरे जिंदगी इसी के लिए बची रह गई कि अस्पताल जाना है। जांच करानी है। दवा लाना है।  सिर्फ 25 हजार रुपए पल्ले पड़े थे। उम्र के इस मोड़ पर पेंशन का इंतजार है..बिरजिश खातून। हादसे के वक्त 45 साल की थीं। अब ७१ की हैं। उम्र के इस फासले में दो बार दिल का दौरा पड़ा। शरीर के सारे जोड़ दुखते हैं। गुर्दे में गैस का असर ज्यादा हुआ था। वे हमेशा के लिए संक्रमित हो गए। गैस के तरह-तरह के असर दिखाई देते हैं। बिरजिश की जीभ आधी पतली, आधी मोटी हो गई। गला  इतना खराब रहता है कि पानी की घूंट भी रुक-रुककर पेट तक जाती है। बीमारियों का जखीरा सिर्फ उनके ही हिस्से में नहीं आया। शौहर मोहम्मद को कैंसर हुआ और बेटे को टी.बी.। दोनों इन घातक बीमारियों के कारण मारे गए। इस हाल में ये 26 साल बिताए हैं। इनके बारे में बताते हुए आज भी गश आ जाता है…

रानी राजपूत, टीला जमालपुरा की रहने वाली हैं। वे और उनके परिजन भागे नहीं थे उस रात। घर को बंद करके एक कमरे में बन्द हो गए थे। गैस के असर में आए ससुर की मृत्यु हो गई है। एक साथी राधा शर्मा की तब शादी हुई थी और छ: माह का बेटा था। गैस से बचने के लिए वे जरूर कहीं चले गए थे। इस बीच जो गैस लगी उसका नतीजा बीमारियों की शक्ल में सामने आया। हफिजा बी…कनीजा बी…कुरैशा बी…एक के बाद एक कई चेहरे। परदे के ये किरदार अपनी कहानियों से परदा उठाते गए। दिल दहलाने वाले किस्से।तार-तार हुए रिश्ते ! एक हिंदू औरत मिली। नाम नहीं दे रही हूं। कुछ भी हो सकता है। लीला या कला। क्या फर्क पड़ता है? इस औरत की मानसिक स्थिति इस कदर बिगड़ी कि वह आज भी खुद को पागल ही कहती है। इनके इलाज के लिए भोपाल में जगह नहीं थी। मानसिक संतुलन बिगड़ा तो ग्वालियर भेजा था समाज के लोगों ने। जब इलाज पूरा हो गया तो वापस आ गईं। गैस रिसी तब  बारह वर्ष की थी। भाई के साथ रहती थी। भाई भी पच्चीस एक साल का होगा तब।  पिता बचपन में ही गुजर गए थे। कुछ सालों बाद मां भी चली गईं। तब भाई का ही सहारा था। उस रात भाई गैस का शिकार हो गया। कहती हैं कि मेरा भाई अपनी जान की परवाह किए बगैर ढूंढता रहा मुझे और उसी रात मर गया। भाई के नाम पर मकान मिला और कुल दस लाख का मुआवजा भी। भावुक होकर कहती हैं कि मेरे भाई ने मेरे पालनपोषण के लिए शादी तक नहीं की थी। वह मां-पिता दोनों की भूमिका में था। तब भी और मरने के बाद भी उसी के नाम पर जिंदा रहने लायक रह पाई हूं।

भाई के गुजरने के बाद समाज के शुभचिंतकों ने एक फौजी से सात फेरे कराए। एक बेटा भी हुआ जो आर्मी के बोर्डिंग स्कूल में है। पति भी है और बेटा भी है पर भाग्य में सुख नहीं था। गैस का असर दिमाग पर हुआ था। अक्सर दौरे पड़ते थे। शरीर बेजान था। खून की कमी थी। वजन बढ़ता नहीं था। इस हाल में पति ने भी नजरें फेर लीं। उनकी अपनी जरूरतें थीं। एक दिन मैंने एक औरत के साथ उन्हें घर में देखा। मैं काबू में नहीं रह पाई। मेरे भाई के नाम पर मिली मुआवजे की रकम पति ने उड़ाई। वह औरत भी गैस पीडि़तों में थी। उसे पैसे चाहिए थे। जब पति ने सब पैसे उड़ा दिए तो उस औरत ने भी आंखेें फेर लीं। यह सब मैं देखती-भोगती रही। लेकिन मुश्किलें यहीं खत्म नहीं हुईं। जब मैं ग्वालियर के अस्पताल से लंबे इलाज के बाद लौटी तो देखा कि पति ने दूसरी लडक़ी से शादी कर ली। वे भोपाल छोडक़र चले गए। अब उनका अलग परिवार है। उनके दूसरी पत्नी से भी दो बच्चे हैंै। मैं किराए के मकान में रह रही हूं अकेली। एक डॉक्टर के घर खाना बनाकर गुजारा चलता है। गनीमत यह रही कि मुआवजे की बड़ी रकम आठ लाख रुपए अब मिली। इसी से एक घर खरीद लिया। सेहत बिल्कुल ठीक नहीं। यह औरत हिम्मत से कहती है कि मेरी कहानी पूरी लिखना। काट-छांट मत करना। ताकि दुनिया को यह पता चले कि गैस से लोग मरे ही नहीं, न ही बीमार पड़े, हम जैसों की जिंदगी में हालात ऐसे बने कि रिश्ते तार-तार हो गए, सब कुछ बरबाद ही बरबाद होता गया।

सब कुछ उजड़ते देखा

सुमन कहती है मेरी आंखों में दिल दहला देने वाले वे दृश्य हमेशा के लिए ठहर गए हैं, ऐसे दृश्य हैं वे जो आंखें बंद करती हूं तो दिखाई देते हैं और आंखें खोलती हूं तो याद आ जाते हैं। सारे के सारे चेहरे इतने सालों बाद भी मेरे जेहन में ज्यों के त्यों हैं। होंगे भी क्यों नहीं? वह मेरा बचपन था और बचपन का हर दृश्य अपने मां-बाप और भाई बहनों से जुड़ा होता है, उनके सुख-दुख सब साझा होते हैं। स्वार्थ से परे का जीवन होता है बचपन, तब मैं सात साल की थी। तीसरी में पढ़ती थी। कैंची छोला में था घर हमारा। वह घर जहां मैं अपने माता-पिता, और तीन भाईयों की अकेली बहन लाड़-प्यार से रहती थी। भाई तीनों मुझसे छोटे उनकीउम्र क्रमश: ड़ेढ साल, तीन साल और पांच साल थी। मां गर्भवती थी। मेरे पिता नाथूराम कुशवाह रेलवे में ड्रायवर थे! बदकिस्मती ही थी कि वे उस दिन ट्रेन की ड्यूटी पर नहीं गए थे और उस रात मेरे बचपन ने एक नई अंधेरी गली देखी। एक भयावह दृश्य था, हम सब उनींदे से उठकर रेलवे स्टेशन की तरफ भागे। भीड़ उसी तरफ भाग रही थी।पर अगली सुबह सात बजे माँ ने दम तोड़ा, दस बजे भाई ने और दूसरे दिन पिता ने भी। सात साल की एक बच्ची और दो नन्हें भाई? आज भी सिर्फ जिक्र करने भर से आंसुओं की धाराएं बहने लगती हैं।                  

शिवनगर की एक पतली गली में रहने वाली सुमन कुशवाह का दर्द है यह। आज उनके पास पक्का मकान है परवाह करने वाला पति है और हंसती खेलती दो बेटियां हैं। घर में जरूरत का सब सामान है। एक व्यवस्थित गृहस्थी। सुमन कहती है यूं तो सब सामान्य है पर मेरे भीतर जो सन्नाटा विगत २६ सालों से सांय-सांय करता है, उसका अन्दाजा बाहर कोई नहीं लगा सकता। गैस ने शरीर पर और परिजनों की मौत ने मन पर इतना असर डाला है कि सरदर्द से परेशान रहती हूं। यहां तक कि बालों को तक बांध नहीं सकती। बुआ ललिताबाई ने ही तब से लेकर आज तक मां-बाप बन कर पाला पोसा। बी. ए. तक पढ़ाया और स्कूल टीचर चन्द्रकिशोर कुशवाह के संग सात फेरे हो गए। लेकिन मां-बाप और भाई-बहनों के लाचार चेहरे अब भी आंखों में कौंधते हैं। काश यह सब न हुआ होता! ऐसा भी हुआ उस रातमनोहर लाल अंतिम संस्कार का सामान बेचते हैं। वे उस दिन सुबह आठ बजे तक दुकान पहुंचे ही थे लोगों की कतार लग गई। क्या हिन्दू और क्या मुसलमान। इस शख्स ने अपना कारोबार बेहतर चलाने के लिए ऐसी दुआएं कभी ईश्वर से मांगी थीं। उस दिन एक औरत आई, जिसकी आंखों से लगातार आंसू बह रहे थे।  उसका इकलौता बेटा गैस से मारा गया था।  बेटे ने अपने होने का फर्ज निभाया था।  

जब गैस रिसी तो बेटे ने मां को बचाने के लिए कपड़ों से ढक दिया और खुद ढेर से लिपटकर बैठ गया। गैस उसे लगती रही। आखिरी सांस तक भी वह अपनी मां की जान बचाने के लिए ही जिंदा रहा। फिर दम तोड़ दिया। वह रात बीत चुकी थी और वह औरत सुबह अपने उसी बेटे के लिए कफन मांग रही थी। दर्द कहीं कम नहीं शायद डॉक्टर भी सालों से पीडि़तों को देखते-देखते तंग आ गए हैं। अस्पतालों के चक्कर लगा रही औरतें कहती हैं कि संवेदनहीन ही है कि डॉक्टर अब पीडि़तों को देखते तक नहीं हैं। बेमन से टरका देते हैं। हादसे के वक्त नौ साल की थी रानी यादव। पांच भाई-बहन थे। सबसे छोटी बहन जो एक साल नौ माह की थी उसी वक्त मर गई। जे.पी. नगर गली नम्बर दस में रहते थे। आज भी वहीं हैं। त्रासदी के तेरह साल बाद रानी की शादी हो गई। गैस पीडि़त गरीब लडक़ी की गाँव के किसी मंद बुद्धि लडक़े से शादी हुई। पर रानी की किस्मत ही खराब थी कि वह भी पिछले कई सालों से गायब है। कोई नहीं जानता कहां चला गया। इसलिए मां-बाप के घर में ही रहती है। भाई के दो बच्चे हुए, दोनों विकलांग हैं। भाभी भी गैस पीडि़त है। दवाई के बगैर चार कदम नहीं चल सकती। छोटी बहन के बच्चे के हार्ट में छेद है। दो बच्चे हैं जिन्हें रोज ही ‘फिट’ (मिर्गी) आते हैं। रानी कहती है, बीमारियां हमारे चारों तरफ पसरी हुई हैं। यह एक अंतहीन संघर्ष है। सिवाय बीमारियों के हमारे घरों में बातचीत का कोई दूसरा विषय ही नहीं बचा। सरकारी दवाखाने को लेकर रानी का गुस्सा सातवें आसमान पर  है। वह कहती हैं कि डॉक्टर नजर उठाकर देखता भी नहीं है।

एक वरिष्ठ डॉक्टर ने बताया कि हर मरीज अपने लिए खास तवज्जो चाहता है। हमारे पास दिन भर मरीजों की कतारें रहती हैं। यह सिलसिला थोड़े समय का नहीं है। ढाई दशक से ज्यादा वक्त गुजर गया। यह रोज का काम है। साधन और समय सीमित है। स्टाफ भी इनकी तादाद के आगे नाकाफी है। ऐसे में संवेदनहीन होने का आरोप गलत है। हमारी मजबूरियां भी देखिए। हमें सिर्फ दो चार मरीजों को ही नहीं देखना है। दिन भर अंतहीन कतारें हैं। रानी मुझे ङ्क्षचगारी ट्रस्ट के म्यूजियम में ले जाती है। वह पांच साल से ट्रस्ट से जुड़ी है। इस म्युजियम में हादसे के शिकार हुए लोगों की निशानियां सहेज कर रखी गई हैं। किसी बच्चे के गरम कपड़े, किसी की शादी का जोड़ा, किसी का चश्मा तो किसी बच्चे की सायकल। एक सिलाई मशीन, बच्चों के खिलौने हैं, चप्पलें हैं। यादों का एक अजीब सा अजायबघर। कवि प्रो. सरोजकुमार ने लिखा था-
वैसे ही नहीं रही जिन्दगी कभी निरापद।
अब तो व्यवस्थाओं से डर लगता है।
शिराओं में बहती है बदबू भरी नदियां
किडनियां सूजी हैं शहर की।
अणुबम की रिहर्सल हो गई भोपाल में!

कार्बाइड का कलंक

स्वाति तिवारी


लेखन की कई विधाओं में सक्रिय स्वाति तिवारी मध्यप्रदेश सरकार की एक अधिकारी हैं.   संपर्क : stswatitiwari@gmail.com

( ३० साल हो गए हैं उस  हादसे के जब यूनियन कार्बाइड ने भोपाल में हजारो लोगों को तबाह कर दिया , देखते -देखते एक शहर मुर्दों के टीले में बदल गया था. स्वाति तिवारी ने इस हादसे की शिकार परिवारों की औरतों का दर्द दर्ज किया है , अपनी पुस्तक  ‘ सवाल आज भी ज़िंदा हैं’ में. दो दिसंबर को भोपाल त्रासदी की बरसी है , स्त्रीकाल के पाठकों के  लिए स्वाति तिवारी की किताब से दो अंश . कल ( दो दिसंबर ) का  अंश  पीड़ित/ प्रभावित  स्त्रियों से बातचीत और मुलाक़ात पर आधारित होगा . )

शुरू करते हैं यूनियन कार्बाइड से। एक ऐसा कलंक, जो हमारे माथे पर गहरा लगा है। हादसे ने तो इसे दुनिया के सामने जाहिर कर दिया। देश भर में हर दिन होने वाले छोटे-मोटे हादसों का एक सबसे बड़ा प्रतीक, जिनमें हमारी व्यवस्था उतने ही निष्ठुर और निर्मम रूप में सामने आती है, जितनी भोपाल में देखी गई। तारीख 11 जनवरी 2011। गैस पीडि़त औरतों की दुनिया में दाखिल होने से पहले मैं इसी कलंकित कार्बाइड को नजदीक से देखना चाहती थी। कीटनाशकों के उत्पादन का वह अमेरिकी उद्योग, जो भारत में मौत का दूसरा भयावह नाम बन गया। हादसे के ढाई दशक गुजरने के बाद वह किस हाल में है, यह जानने के लिए मैंने उसी की तरफ कदम बढ़ाए। मैंने जानबूझकर वहां तक जाने का लम्बा रास्ता चुना जो पुराने भोपाल से होकर जाता है। भोपाल की इन्हीं सडक़ों पर उस रात मौत का तांडव हुआ था। इन पर अब तक लाखों पन्ने लिखे जा चुके हैं। हजारों ब्लैक एंड व्हाइट तस्वीरें छपी हैं। मैंने भी देखीं हैं। लाशों के ढेर। बच्चे, बूढ़े, जवान, औरतें और पशु-पक्षियों की मौत से लबालब तस्वीरें। मौत अपनी फितरत के मुताबिक ही बेरहम थी। उसने हिंदु, मुसलमान, सिख, ईसाई, अमीर, गरीब सब पर एक साथ हमला बोला। उसकी आमद सबसे ज्यादा थी इसी इलाके में।

जब मैं कार्बाइड के करीब जा रही थी तो बाजारों में रौनक दिखी और रास्तों पर भीड़। सडक़ किनारे सब्जी, भाजी के ठेले लगातार मुश्किल होते यातायात में सदाबहार किरदारों की तरह भीड़ जुटाए खड़े थे। ड्रायवर ने गाड़ी गलती से कारखाने के मुख्य दरवाजे से कुछ आगे बढ़ा दी थी। रुककर एक ऑटो वाले से कार्बाइड में जाने का रास्ता पूछा। उसने बायां हाथ उठाया और कहा, वो मौत का कारखाना तो पीछे छूट गया है। मैं जैसे ही पीछे मुड़ी तो देखा सामने एक स्मारक है, जो दुनियाभर में इस त्रासदी की पहचान बन चुका है। यह एक आदमकद मूर्ति है। एक मां की मूर्ति, जिसकी गोद में एक बच्चा है। बच्चा उसके आंचल को थामे हुए है। एकदम सादा इस सफेद मूर्ति को मैंने छूकर देखा, नीचे से ऊपर तक। फिर एक परिक्रमा की। मैं चारों ओर से उसे देखना चाहती थी। मां के अलावा और कोई शिल्प इतना बोलता, झकझोरता और मार्मिक नहीं हो सकता था। भोपाल की उस भयावह रात का सबसे संजीदा प्रतीक। मुझे इस प्रतिमा में वह युवती नजरआई, जो अपने होने वाले पहले बच्चे के लिए गुलाबी स्वेटर बुन रही थी। अगर उसका बच्चा हो भी जाता तो शायद इसी हाल में वह कहीं भीड़ में भागती हुई मारी जाती। मौत से बचने की कोई सूरत उस रात नहीं थी। यह सोचते हुए मेरी आंखें भीग गईं। मुझे लगा कि मैं ही हूं, जो भागते हुए गैस की शिकार हो गई हूं। मैं ही हूं, जिसके हाथों बना गुलाबी स्वेटर कहीं पीछे छूट गया है।
मैं सोच ही रही थी कि इस प्रतीक को एक मां ही गढ़ सकती है। तभी मेरी निगाह मूर्ति पर उकेरे शब्दों पर गई, जिस पर लिखा था-रुथ वाटरमेन। पता किया तो मालूम चला कि यह महिला नीदरलैंड  से कुछ दिनों के लिए भोपाल आई थी। यह मार्मिक यादगार उसी की बनाई है। एक स्त्री और मां ही यह कर सकती थी। फिर वह चाहे हिन्दुस्तान की हो या नीदरलैंड  की। औरत औरत होती है। उसकी प्रकृति और उसका अंतस एक सा ही होता है। वह किसी मुल्क, किसी मजहब और किसी कालखंड  की ही क्यों न हो।

हादसे का यह यादगार प्रतीक किसी हरे-भरे उद्यान से घिरे मैदान में इज्जत से स्थापित नहीं है, जैसा कि आमतौर पर अंतरराष्ट्रीय पहचान के ऐसे स्मारक होते हैं। यह माँ तो कार्बाइड के ठीक सामने सडक़ पर खड़ी है, न कोई रखवाली करने वाला है और न ही कोई देखभाल करने वाला। भारत की उपेक्षित अवाम, खासतौर पर औरतों की एक सबसे असल और सशक्त प्रतीक! न जीते-जी किसी ने परवाह की और मरने के बाद बना दिए गए इस बेजान बुत के साथ भी वही सलूक। हमेशा से यही होता आया है। वे तहजीब के नाम पर परदों के अंधेरों में धकेली जाएं या ऑनर के नाम पर किल की जाएं। उन्हें इज्जत से बराबरी के दर्जे पर रखना अभी एक सुनहरा ख्वाब भर है!

इस स्मारक से सटी हैं वे इंसानी बसाहटें, जहां गैस ने सबसे पहले हवाओं में दस्तक दी थी। कार्बाइड की मौत उगलती चिमनियों से महज पांच सौ कदमों के फासले से शुरू होती हैं ये अभागी बस्तियां। वक्त के साथ तब की झुग्गियों की बनावट जरूर बदल गई है। कई रहने वाले भी बदल गए। अब यहां एक नई पीढ़ी सांसें ले रही है। लेकिन यहां की तीन पीढिय़ों को हादसे की स्मृतियां अनेक हैं। भोपाल हादसा और हिटलर के गैस चेम्बर अलग नहीं हैं। प्रथम विश्व युद्ध में फास्जीन मस्टर्ड गैस का उपयोग किया गया था। इसी जहरीली गैस ने दूसरे विश्व युद्ध में भी कहर ढाया था। हिटलर ने जर्मनी में लाखों यहूदियों को मौत के घाट उतारने के लिए इसी जहरीली गैस का इस्तेमाल कुख्यात गैस चेंबरों में किया था। वही गैस पूरे भोपाल को भी जहरीले चेम्बर में बदल चुकी थी।

रूथ वाटरमेन के लिए यह मानसिक स्मृति यातना का दौर रहा होगा और जब पीड़ा का आवेग असहनीय हो गया होगा तो वे भारत की यात्रा पर निकल पड़ी होंगी। अपनी स्मृतियों में खोई हुई अपनी मां को यहां किसी मां में ढूंढती हुई वे जब यहाँ अनाथ ममता से मिली तो माँ की ममता का यह यादगार मूर्त रूप खड़ा कर गयी। मैंने कहीं  ‘रूथ वाटरमेन एण्ड स्टोरी आफ ममता।’ यह एक व्यथा है। ममता भी रूथवाटरमेन की तरह हादसे में माता-पिता और भाई को खो चुकी थी। स्मारक में ममता माँ के पीछे खड़ी है। यह उसकी जिंदगी में आई हादसे की काली रात की कहानी है। तब वह भी अपनी माँ के भी पीछे-पीछे थी। कब साथ छूटा पता ही नहीं चला। ममता की मां की बांहों में झूलता वह छोटा बच्चा वहीं मर गया था और रोती बिलखती बेबस मां भी मौत के मुंह में समा गई। उसे न इलाज का पैसा मिला न  इसीलिए वह पढ़ाई नहीं कर सकी। रूथ वाटरमेन अपनी ही तरह की पीड़ा से लड़ती उस नन्हीं ममता से मिली। ममता में उसने खुद की तकलीफों को जिंदा देखा तो जो शिल्प की शक्ल में सामने आया, वह यही स्मारक दुनिया के सामने था। स्मारक के रूप में यह गैस त्रासदी की पहचान बन चुकी मां है। कारखाने को पीठ दिखाती इस प्रतिमा पर तीन तरफ शिलालेख लगे हैं, जिन पर उर्दू, अंग्रेजी और हिन्दी में लिखा  है – हिरोशिमा नहीं..भोपाल नहीं..हम जीना चाहते हैं..उन हजारों लोगों को समर्पित जो २ और ३ दिसंबर की रात, बहुराष्ट्रीय हत्यारे यूनियन कार्बाइड के हाथों मारे गए।

ऐसा विकट हादसा झेलने वाला भोपाल दुनिया में इकलौता शहर है और भोपाल में यह जगह इकलौता ठिकाना है, जहां एक यादगार बननी ही चाहिए थी, जो आने वाली पीढिय़ों को इस भयानक हादसे की याद दिलाती। लेकिन हम यह नहीं कर सके। हम यह जाहिर नहीं कर सके कि हमने कोई सबक भी सीखे हैं। बल्कि हमने यह जाहिर किया कि हम दिसंबर 1984 के पहले जैसे थे। वैसे ही अब हैं। सुधार में हमारी कोई दिलचस्पी नहीं है। जो हो रहा है, होने दीजिए। जो चल रहा है, चलने दीजिए। परवाह मत कीजिए। यहां लोगों की याददाश्त बहुुत कमजोर होती हैं। वे सब भूल जाएंगे। थोड़े दिन गुस्सा होंगे। गरियाएंगे। फिर किसे याद रहेगा कि क्या हुआ था? आप तो मजे कीजिए।क्या हमारी व्यवस्था और व्यवस्थापकों की नजर में गैस हादसा, हर दिन होने वाली दूसरी मामूली दुर्घटनाओं की तरह एक और दुर्घटना थी, जो उस रात घटी? अदालत में तो बाकायदा इस हादसे को इसी दिशा में मोड़ भी दिया गया था। हादसे के वक्त देखा ही कि किस तरह सरकारें सबूत मिटाने में लगी थीं। वे किसके लिए काम कर रही थीं? जाहिर है कि फिर किससे उम्मीद की जाए? यूनियन कार्बाइड के बाहर और इस बुत के सामने कई सालों से देश-विदेश के संवेदनशील कार्यकर्ता और कलाकार अपने दिल की बात दीवारों पर उकेरने आते रहे हैं। मैंने देखा कि एक जगह म्यूरल बनाकर कलाकारों ने अपने दर्द को दीवारों पर कुछ इस तरह बयान किया-
हमारे शहर पे जब मौत का गुबार गिरा
हवास खो गए, पैदल गिरा सवार गिरा।
जरा सी देर में सांसों के पड़ गए लाले
गिरा जमीन पर जो भी, वो बेकरार गिरा।
सिवाए अपने किसी जात की खबर न रही
सडक़ पे टूटके रिश्तों का एतबार गिरा।
वो हंसता-खेलता भोपाल बन गया मकतल
हर एक कूचे में लाशा जो बेशुमार गिरा।
-ज़फर सेहवाई

स्मारक और आसपास की कार्बाइड की दीवारों पर दर्ज तस्वीरों और नारों को पढ़ते हुए मैं 93 एकड़ के उजाड़ परिसर की तरफ बढ़ती हूं। अब यह ताकतवर अमेरिकी उद्योग परंपरा एक शानदार कारखाना नहीं बल्कि जहरीले अपशिष्ट से भरा एक सिरदर्द बन चुका है। अंदर-जाने के लिए कोई रोक-टोक नहीं है अब। कीटनाशकों के उत्पादन के अपने बेहतरीन दौर में शायद ही कोई बाहरी आदमी यहां दूर भी फटक पाता होगा। लेकिन अब इसका काम खत्म हुए 26 साल गुजर गए हैं। यह अपने घातक रसायनों के इस्तेमाल का असर इंसानी चूहों पर देख चुका है।

मुझे अंदर जाते हुए किसी ने नहीं रोका। होमगार्ड के चंद जवान सर्दी में धूप सेंकते हुए इसकी सुरक्षा के लिए तैनात जरूर थे, लेकिन शायद अब किसी को रोकने की जरूरत ही कहां थी? यह हत्यारी फैक्टरी अपना काम खत्म कर चुकी थी। धातु के इस बेजान ढांचे और खंडहर होती इमारतों में हर तरफ मख्खी और मच्छर जैसे कीटों की भरमार थी, जो बीमारियों की शक्ल में इंसानों के लिए हमेशा से ही मुश्किल पैदा करते रहे हैं। यूनियन कार्बाइड में इन्हीं कीटों के नाश के उपाय किए गए थे, लेकिन उन्होंने इंसानों के साथ ही कीट-पतंगों का सलूक किया। मैंने महसूस किया कि हमारे आसपास मंडरा रहे अनगिनत कीट-पतंगे कार्बाइड को चिढ़ा रहे हैं। मैं देख रही थी एक अमेरिकी आसुरी उद्योग का मायाजाली विस्तार। करीब 80 एकड़ जमीन पर। जहरीली दवा बनाने वाली फैक्ट्री के संयंत्र में हर तरफ झाड़-झंखाड़ और गाजर घास का कब्जा था। यह कारखाना भारत में इस बात का स्मारक जरूर है कि ताकतवरों के आगे अवाम की हैसियत कीड़े-मकोड़ों से ज्यादा न आजादी के पहले थी, न आजादी मिलने के बाद है! जीते-जी यह कारखाना भी इसी हकीकत की मिसाल था और इसने दिसंबर 1984 में दुनिया के सामने इस हकीकत के सबूत भी दे दिए। बंद होने के बाद उजाड़ शक्ल में भी यह उसी हकीकत की याद दिलाता रहा है। शायद इसीलिए सरकारों को लगा हो कि अलग से किसी स्मारक को बनाने की जल्दी क्या है? लोग सीधे असली स्मारक को ही आकर देख लें। सर्दी की इस सुबह मैं इसी असली स्मारक के सामने थी।

दीवार फांदकर भीतर आने वाले बच्चे, जो पतंगें उड़ा रहे थे। बकरी चराती एक बूढ़ी औरत, जो सूनी आंखों से कभी कारखाने को देखती है तो मुंह फेर लेती है। कार्बाइड के पड़ोस की ये दो पीढिय़ां कभी भी यहां देखी जा सकती हैं। एक पीढ़ी ने हादसे को देखा और भोगा है और नई पीढ़ी ने सिर्फ सुना है या तस्वीरों और खबरों में देखा-पढ़ा है। कारखाने के बाहर आंखों के सामने हैं घनी बस्तियां। संकरी गलियां। गंदगी। बदइंतजामी। फटेहाली। बेबसी। गलियों में अंदर चहलकदमी कीजिए। किसी घर के दरवाजे पर दस्तक दीजिए। बेमकसद बैठे या टहलते लोगों की शक्लें देखिए। एक अजीब सा अहसास भीतर कड़वाहट घोल देता है। यहां आकर गैस हादसा पीछे छूट जाता है। सिर्फ सवाल सर्प की तरह फन उठाने लगते हैं। साठ साल से सरकारों के दावे, आश्वासन, नीयत और नीतियों, अरबों की योजनाओं और उनके बेईमान अमल का सबूत है यह सब। एक दिशाहीन देश की दर्दनाक तस्वीर! शाम ढले जब कारखाना देखकर घर लौटी तो सबसे पहले भरे मन से मैंने अपनी डायरी में लिखा-
कार्बाइड के इस आंगन में
उग आए हैं कुछ नीम के प़ेड
फुदकने लगी हैं कहीं-कहीं गौरय्या
दूर ऊंचे ताबूत पर आ बैठे हैं कबूतर
वो अनजान गाय चरती बैठी हैं
भोले बच्चे ले आए हैं पतंग की डोर
डर लगता है मुझको अब……
कहीं ऐसा ना हो…..
कहीं से कोई ले आए अनुमति
की कोई नई पतंग,
लिख दे जिस पर हुक्मरान
यहां फिर बनेगी जहरीली गैस
यह कहकर किसी बच्चे को
पक ड़ा दे डोर….जाओ उड़ाओ
हजारों चेहरों के गुब्बारे
भरकर मिक या फास्जीन
या कोई और
क्या पता…….?
पड़ी मशीनों पर तरस खाकर
उद्योगों को मध्यप्रदेश की धरती पर
जमाने की चाह में एक बार फिर
बनने लगे ऐसी ही कोई जहरीली चीज
खुदा ना करे….. फिर कहीं भोपाल
की पुनरावृत्ति हो…

यूनियन कार्बाइड वही है जिसे अमेरिका की वित्तीय मामलों की प्रसिद्ध पत्रिका ‘वाल स्ट्रीट जर्नल’ ने १९७९ के प्रारंभ में एक ‘भारी भरकम, भद्दा जोखिम भरा उद्योग’ कहा था। दुनिया भूली नहीं है कि साठ-सत्तर के दशक में इसे पर्यावरण का सबसे बड़ा दुश्मन ठहराया गया था। जो कुछ भोपाल ने भोगा इसी भयावह नतीजेे की आशंका को देखते हुए कई देश इसे नकार चुके थे। इसी कार्बाइड को कनाडा तथा स्कॉटलैण्ड से बाहर निकाल दिया गया था। वही जिसके बारे में अमेरिकी व्यापारिक पत्रिका ‘फॉरचून’ ने कहा, ‘यूनियन कार्बाइड मुनाफा खोरी से ग्रस्त एक ऐसा प्रतिक्रियावादी राक्षस है, जिसे नागरिकों की भलाई से कोई वास्ता नहीं है।’ भोपाल इस बात का गवाह है कि इसमें से कुछ भी गलत नहीं था। लेकिन गलती की परवाह हमारे यहां कौन करता है। भारत शायद दुनिया का अकेला देश है, जो मुसीबतों को गले लगाता है और इतिहास से कभी कोई सबक नहीं सीखता।
तभी तो यहां एक बड़े उद्योग की स्थापना के नाम पर कृषि मंत्रालय ने किसी बड़ी खुश खबरी की तरह बाकायदा अधिकारिक के जरिए एडुआर्डो म्यूनाज को सूचित किया था कि सरकार यूनियन कार्बाइड को प्रतिवर्ष पांच हजार टन कीटनाशक के उत्पादन का लाइसेंस प्रदान कर रही है।  यह वास्तव में सेविन के उत्पादन का निमंत्रण था, जिसका अर्थ था इस संयोजन में शामिल सभी रासायनिक तत्वों को भारत में ही तैयार किया जा सकेगा। शायद यही वह पहली भूल थी, जिसने भोपाल को मौत के मुंह में ढकेल दिया था।

बहुराष्ट्रीय कम्पनी यूनियन कार्बाइड ने सन् १८८६ के आरंभ में शुष्क सेल बेटरी बनाना शुरू किया था। सन् १९१४ से १९१८ तक कुछ नए उत्पादों को इसने अपनी योजना में शामिल करते हुए बैटरियां, एसीटिलीन स्ट्रीट लाइट के लिए आर्म लैम्प और कारों के लिए हेड लैम्प बनाकर लोकप्रियता हासिल की।  इस तरह यह एक स्थापित कम्पनी बन गई। १९१७ में यूनियन कार्बाइड ने अपने कार्यक्षेत्र का विस्तार शुरू किया और चार अन्य कम्पनियों का संविलियन करते हुए यूनियन कार्बाइड एवं कार्बन कार्पोरेशन की स्थापना की। देखते-देखते यह विश्व के ३८ देशों में १३४ विभिन्न उद्योगों का एक बड़ा साम्राज्य बनाने में कामयाब हो गई। पेट्रोल, कोयला और प्राकृतिक गैस के भण्डार खोजने वाली इस कम्पनी ने कनावा घाटी में ही विभिन्न कारखानों में दो सौ रासायनिक द्रव्यों का उत्पादन किया था।

कार्बाइड ने बहुत से द्रव्य एथलीन आक्साइड, क्लोरोफार्म, एक्रीलोनीट्राइल, बेंजीन, विनाइल क्लोराइड जैसे घातक रसायन तो बनाए ही, साथ ही पेट्रो केमिकल्स उद्योग में उपयोग की जाने वाली गैसों, नाइट्रोजन, ऑक्सीजन, कार्बनिक गैस मिथेन, एथीलीन प्रोपेन और रासायनिक द्रव्यों, अमोनिया और यूरिया की भी सबसे बड़ी आपूर्तिकर्ता बन गई। उच्च तनाव उपकरण एरोप्लेन टर्बाइन में प्रयुक्त कोबाल्ट, क्रोम, टंगस्टन जैसे उपकरण बनाकर अपने भाग्य को आजमाने लगी। इसके साथ ही वह संवेदनशील धातुओं के निर्माण के अलावा घरेलू उपयोग में आने वाली छोटी-छोटी वस्तुओं के निर्माण में भी लगी थी। जहर से लेकर रोजमर्रा तक अपना व्यवसाय फैलाने वाली यूनियन कार्बाइड प्लास्टिक बोतलें, खाद्य पदार्थ पैङ्क्षकग, फोटोग्राफिक फिल्म, एरोसोल लाई, ङ्क्षसथेटिक हीरे बनाते-बनाते मच्छर मारने का स्प्रे तक बनाने लगी और मच्छर मारते-मारते यह कृषि की तबाही के जिम्मेदार कीट पतंगों को मारने के स्प्रे भी बनाने का सोचने लगी।

प्रथम विश्व युद्ध में एक जहरीली गैस के प्रयोग ने कार्बाइड को एक नए कारोबार का विचार दिया। प्रथम विश्वयुद्ध में फॉस्जीन मस्टर्ड गैस का उपयोग किया था। इस जहरीली गैस ने हजारों लोगों को मौत के घाट उतार दिया था। इसी जहर से प्रेरित होकर कम्पनी रसायनों के प्रति ज्यादा उत्साही हुई।  मीडिया प्रकाशनों और लेखकों ने इस जहरीली परंपरा के घातक परिणामों पर खूब लिखा है।दिनमान साप्ताहिक ने १६ दिसम्बर, १९८४ को बताया, ‘दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान नागासाकी में इसी गैस ने कहर बरपाया था। हिटलर ने जर्मनी में लाखों यहूदियों को मौत के घाट उतारने के लिए इसी जहरीली गैस का इस्तेमाल कुख्यात गैस चैंबरों में किया था।’  जनसत्ता ने बताया, ‘फॉस्जीन गैस पहली बार प्रथम विश्वयुद्ध में इस्तेमाल हुई। १९१८ की २५ एवं २६ जनवरी को जर्मनी ने पेनसेविले के नजदीक मित्र राष्ट्रों के सैनिकों पर इसका इस्तेमाल किया था और बदले की राजनीति की तरह इसके जवाब में जून १९१८ में अमेरिका ने भी फ्रांस के बोस-द-मोर्ट नामक स्थान पर जर्मनी के खिलाफ फॉस्जीन नामक इसी गैस का इस्तेमाल किया।’ मैक्सिको में इस गैस की मामूली मात्रा ने मौत और दहशत का बवंडर खड़ा कर दिया था। भोपाल का दुर्भाग्य था कि यह मात्रा पूरे चालीस टन थी। हादसे से जाहिर है कि यह 15 हजार लोगों को मौत के घाट उतारने के लिए काफी थी और लाखों को हमेशा के लिए अपाहिज बनाने में। अगली पीढिय़ों तक इसके असर दिखाई देेने वाले थे।

डोमिनीक लापिएर और जेवियर मोरो बताते हैं  कि 38 देशों, जहां यूनियन कार्बाइड ने अपना नीला और सफेद ध्वज फहराया था, इनमें से किसी भी देश ने कम्पनी के साथ इतने दीर्घकालिक एवं उत्साहपूर्ण सम्बन्ध स्थापित नहीं किए थे, जितने भारत ने। शायद ऐसा इस तथ्य के चलते था कि यह बहुराष्ट्रीय कम्पनी लगभग एक शताब्दी से करोड़ों भारतीयों को बिजली उपलब्ध करा रही थी। कार्बाइड के लैंपों ने भारतीय उप-महाद्वीप के सर्वाधिक दूर-दराज के गांवों में प्रकाश फैला दिया था। वार्षिक बीस करोड़ डॉलर टर्नओवर वाली, यूनियन कार्बाइड इंडिया लिमिटेड न्यूयार्क मल्टीनेशनल ग्लोबलाइजेशन पॉलिसी का सफल नमूना था। भारत में यूनियन कार्बाइड सन् १९०५ में नेशनल कार्बन कम्पनी (इंडिया) लिमिटेड के नाम से आई। यहां सबसे पहले कम्पनी ने बैटरी के क्षेत्र में काम शुरू किया। यूनियन कार्बाइड कार्पोरेशन (अमेरिका), भारत में यूनियन कार्बाइड (इंडिया) लिमिटेड के नाम से सन् १९३४ में कलकत्ता में स्थापित हुई। इसका रजिस्टर्ड कार्यालय कलकत्ता में ही है। भारत में इसने तेरह कारखाने डाले। पहला केमिकल संयंत्र १४ दिसम्बर, १९६६ को स्थापित  किया। यह ट्राम्बी द्वीप के ऊपर था।

१९७० में यूनियन कार्बाइड ने भारत में ‘सेविन’ बनाने का लाइसेंस मांगा। सन् १९७३ में यूनियन कार्बाइड (इंडिया) लिमिटेड और यूनियन कार्बाइड कार्पोरेशन (अमेरिका) के बीच एक समझौता हुआ। इस समझौते में तय हुआ कि ‘सेविन’ और कुछ अन्य कीटनाशक भारत में ही बनाए जाएंगे लेकिन इसके लिए मिथाइल आइसोसाइनेट को अमेरिका से आयात किया जाएगा। साथ ही साथ सेविन बनाने के लिए आवश्यक मशीनरी भी आयात होगी। इस अभागे शहर में १९६७-६८ में जब कार्बाइड की स्थापना की गई तब यह इलाका नगर निगम क्षेत्र के बाहर था। आबादी बढ़ी तो शहर ने पैर पसारे। धीरे-धीरे शहर कार्बाइड के करीब आ गया। १९७५ में तत्कालीन नगर निगम प्रशासक महेश नीलकंठ बुच द्वारा यूनियन कार्बाइड को नोटिस दिया गया कि यह क्षेत्र अब निगम सीमा क्षेत्र में है। अत: कारखाने को शीघ्र ही सीमा से बाहर ले जाया जाए। कार्बाइड के सितारे बुलंद थे। बुच कुछ कह पाते इसके पहले ही उनका तबादला हो गया। कार्बाइड के तत्कालीन महाप्रबंधक सी.एस. राम द्वारा नगर निगम को वद्र्धमान पार्क के निर्माण के नाम पर २५ हजार रुपए का चन्दा दिया गया। नोटिस ठण्डे बस्ते में चला गया। और भोपाल में काली ग्राउंड स्थित कार्बाइड संयंत्र सघन आबादी के बीचों-बीच शान से खड़ा रहा।

कम्पनी ने अपनी सुविधाएं देखीं और सरकार ने एक बड़ा जोखिम अनदेखा कर दिया। अनदेखी का परिणाम ही था कि सरकार ने भोपाल स्थित काली परेड ग्राउंड की पांच एकड़ जमीन यूनियन कार्बाइड को आवंटित कर दी। यही सबसे खतरनाक भूल थी। सरकार ने यह जानने की कोशिश भी नहीं की कि इस कारखाने में किस तरह के रसायनों का उत्पादन किया जाएगा। वैज्ञानिकों और पत्रकारों की चेतावनी को भी नकार दिया कि ये रसायन मनुष्यों और प्रकृति के लिए कहीं घातक तो नहीं। भोपाल संयंत्र १९६९ में प्रारंभ हो गया था, जिसमें सबसे पहले सांद्रित द्रव से कार्बमेट पेस्टीसाइड बनाता था। उसके बाद १९७५ में भारत सरकार ने यू.सी.आई.एल. को सेविन के नाम से कार्बोरिल बनाने का लाइसेंस दे दिया। इसके बाद इंडिया में जैसे यूनियन कार्बाइड की हर मांग को आंखें बंद कर स्वीकार करते जाने का चलन हो गया और १९७८ में वीरेन्द्र कुमार सकलेचा के मुख्यमंत्रित्वकाल में कम्पनी ने मध्यप्रदेश के प्रदूषण नियंत्रण मंडल से हरी झंडी हासिल की। यह ग्रीन सिगनल एक और बड़ी भूल साबित हुआ, क्योंकि यूनियन कार्बाइड ने फॉस्जीन जैसी अति घातक गैस बनाने का कनाडा प्लान्ट भोपाल स्थानान्तरित कर लिया। कनाडा सरकार ने जिसे हटाने का नोटिस दे दिया था।

कुछ वर्ष तक एम.आई.सी. वेस्ट वर्जीनिया स्थित यूका कारखाने से आयात की जाती थी। सन् १९७९ में भोपाल में ही दूसरी जहर एम.आई.सी. उत्पादन की इकाई भी स्थापित हो गई।  कारखाने के टैंक ६१० एवं ६११ में परिष्कृत एम.आई.सी. का संग्रहण किया जाने लगा। यह भोपाल में मौत की दस्तक की उलटी गिनती की शुरुआत थी…सरकार भले ही आंखें मूंदे रही हो, लेकिन ऐसा नहीं था कि सब सोए हुए थे। भोपाल मूल के वरिष्ठ पत्रकार राजकुमार केसवानी के खाते में सिर्फ यह चमकदार क्रेडिट है कि उन्होंने सबसे पहले दुनिया को कार्बाइड के खतरे से चेताया।  एक अक्टूबर १९८२ को उन्होंने लिखा था कि ‘मानवीयता के विरुद्ध एक घृणित षडय़ंत्र चल रहा है। अपनी-अपनी धुन में डूबे लोग बेखबर से हैं जिनको खबर है वे चुप हैं। मौत दबे पांव आगे बढ़ती आ रही। भोपाल सो रहा है, फिलहाल अगली सुबह तक के लिए और किसी दिन शायद बिना अगली सुबह को जागने के  लिए।’

कार्बाइड के परिसर में जारी उत्पादन की गतिविधियों से भोपाल और देश का अवाम अनभिज्ञ था। यह बातें उसकी समझ के परे थीं कि कीटनाशक कितने खतरनाक रसायनों के सम्मिश्रण होते हैं एवं उनको प्रयोग करते वक्त किस तरह की जानलेवा लापरवाहियां होती हैं। दिसंबर 1984 में जो हुआ, वह तो दुनिया ने देखा ही, लेकिन यह एकमात्र हादसा नहीं था। यह हादसा कई छोटी-छोटी लापरवाहियों और दुर्घटनाओं के बाद का बड़ा धमाका था। एकमुश्त आखिरी धमाका। खुद तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुनसिंह ने माना था कि इससे पहले भी यूनियन कार्बाइड में गैस कई बार रिस चुकी थी। लेकिन न तो हमने केसवानी की चेतावनी पर कान दिए और न ही उन दुर्घटनाओं से कुछ सीखा, जो आने वाले कल की भयावता के इशारे कर रही थीं। क्या यह हादसा सोची-समझी चाल थी? क्या वाकई कोई परीक्षण हो रहे थे? इसलिए जब हादसा हो गया तो प्रतिष्ठित संस्था ‘एकलव्य’  ने लिखा कि एम.आई.सी. का प्रभाव मनुष्यों पर क्या होता है, दुनिया में इसका सबसे बड़ा प्रयोग भोपाल में हुआ। अभी तक प्रयोगशालाओं में एम.आई.सी. के प्रभाव के प्रयोग चूहों पर होते थे, लेकिन भोपाल ने तो जानवरों की जगह ‘मानव चूहे’ प्रयोग के लिए उपलब्ध करा दिए।

‘जन विज्ञान का सवाल’ शीर्षक से जारी दस्तावेज में दर्ज है कि ‘रसायन और जैविक युद्ध के बहुत से विशेषज्ञ, मनुष्य पर मिक के प्रभाव के अध्ययन करते हैं। क्लोरीन, फॉस्जीन, मिथाइल आइसोसाइनेट गैस सहित अन्य गैसों का उपयोग युद्ध में मनुष्यों को मारने के लिए कैसे किया जा सकता है। शायद आने वाले (तीसरे महायुद्ध) युद्धों में मिक के उपयोग पर उनकी आंख है।’ यूनियन कार्बाइड में जिस तरह से ये खतरनाक रसायन उपयोग होते थे, उसके हिसाब से सुरक्षा व्यवस्था और खतरे की चेतावनी देने वाले सूचक यंत्र बेहद नाकाफी थे। जो उपलब्ध थे वे काम नहीं कर रहे थे। खतरनाक मिक की इतनी ज्यादा मात्रा का भण्डारण क्यों किया गया? जबकि वैज्ञानिक जानते थे कि जरा सी भी लापरवाही बर्बादी का मंजर खड़ा कर सकती है तो उत्पादन बन्द होने की स्थिति में कर्मचारी एवं जनता व प्रशासन को खतरे की सूचना क्यों नहीं दी गई। यूनियन कार्बाइड ने सभी सुरक्षा साधन एक साथ निष्क्रिय कैसे होने दिए और आसपास के रिहायशी क्षेत्रों को बचाव की दृष्टि से प्रथम चिकित्सा प्रशिक्षण क्यों नहीं दिया गया। क्या हादसे में जीते-जी तबाह हो गई औरतों को यह कभी पता चल पाएगा कि हादसा होने दिया गया या हो गया?

मैंने यूनियन कार्बाइड के परिसर और आसपास के इलाकों को खामोशी से देखा। यह शहर मेरे लिए नया था। लेकिन अलग कुछ नहीं था। आमतौर पर जो अव्यवस्था और लापरवाही सडक़ों और टे्रफिक में देश में करीब-करीब हर जगह नजर आती है, वही बदइंतजामी यहां भी भरपूर थी। मुझे आश्चर्य हुआ कि इन 26 सालों में कम से कम इस इलाके को तो रौनकदार बनाया ही जा सकता था। कुछ तो ऐसा हो सकता था, जो हमारे मानवीय सरोकारों का प्रमाण होता। क्या जापान ने हिरोशिमा और नागासाकी या अमेरिका ने वल्र्ड ट्रेड सेंटर के बरबाद बिंदुओं को नक्शे पर यूं ही रफा-दफा कर दिया था? नहीं। उन्होंने इन जख्मों को न सिर्फ भरा बल्कि इन जगहों को दुनिया की याददाश्त में लगातार जिंदा भी रखा है ताकि सदियों तक सनद रहे। भोपाल हादसे के इस इलाके में आकर किसी को लगेगा ही नहीं कि यहां कभी कुछ हुआ था? और यह वो देश है, जो अपने राजनेताओं के मरने पर आलीशान समाधियों और स्मारकों पर अरबों रुपए फूंक देता है, जबकि उनमें से ज्यादातर को लोग अपनी नजरों और यादों से उतार फेंक चुके होते हैं!

कार्बाइड के केम्पस से लौटने के बाद ऐसे ही कई सवालों से मैं घिरी रही। मैं उन लोगों से मिलना चाहती थी, जो असल में गैस की चपेट में आए। उन औरतों से जिनका सब कुछ बरबाद हो गया। वे किस हाल में रही हैं? मुझे गैस पीडि़त मजबूर औरतों के एक जनसंगठन के जाने-माने कार्यकर्ता बालकृष्ण नामदेव के बारे में पता चला। पता चला कि लिली टॉकीज के सामने तिब्बतियों की स्वेटर की मौसमी दुकानों के पीछे हर रविवार और शुक्रवार एक बैठक होती है। यह है भोपाल का नीलम पार्क। कई सालों से गैस पीडि़त निराश्रित महिलाएं यहां आती रही हैं। बैठक का तय वक्त रहा है-दोपहर बारह से चार बजे। नामदेव ने कहा कि आप वहीं आ जाइए…मुलाकात हो जाएगी। अब मैं उन महिला किरदारों से रूबरू होने वाली थी, जिनके सवाल मेरे लिए सबसे अहम थे। मेरा फोकस उन्हीं पर था। उनके बीच जाते हुए मैं डरी हुई थी। मैं एक ऐसी जमात से मिल रही थी, जो  26 साल से सिर्फ उम्मीदों के आसरे थी। जिसके लिए जिंदगी जीते-जी बोझ बन गई थी। एक हादसे ने उनकी दुनिया को उलट-पलट कर रख दिया था। कैसी दिखती होंगी वे? क्या सोचती होंगी? उनके दिन और रात कैसे कटते होंगे? जो खो गए उन अपनों की यादों के कितने टुकड़े उनके भीतर तैरते रहते होंगे? वे जो बेमौत मारे गए। आंखों के सामने। अपनी गोद में। हंसते-खेलते। मां, बाप, भाई, बहन, पति, बच्चे और पड़ोसी!

औरत ’चुप‘ रहे, तभी ’महान‘ है

सुधा अरोड़ा 
आज स्त्रीकाल के पाठकों के लिए सुधा अरोड़ा की एक छोटी सी टिप्पणी जो १९९७ में जनसत्ता में छपी थी . यह टिप्पणी सुधा अरोड़ा और अरविन्द जैन के स्त्रीकाल में प्रकाशित पिछले लेखों के साथ पढी जानी चाहिए . आलेखों के लिए नीचे के लिंक पर क्लिक करें :

कलाकार के सौ गुनाह माफ़ हैं : सुधा अरोड़ा 
डार्क रूम में बंद आदमी की निगाह में औरत : अरविन्द जैन 

यूं भी औरत को भारतीय संस्कृति में इंसान का दर्जा दिया कब गया ? वह तो देवी है , श्रद्धा की मूर्ति है , पूजनीय-वंदनीय है और देवियां बोला नहीं करतीं। वे तो पूजा के पंडाल में सजी-धजी , मूक-बधिर ही अच्छी लगती हैं।

अपनी इस फितरत से हटकर जब वह बोलती है तो एक प्रबुद्ध पत्रकार उसे राय देते हैं – ’’आपको देर से ही सही ,अपनी-अपनी औकात का पता चल गया है तो उसको चैराहे पर चड्ढी  की तरह फींचने से कौन सा राष्ट्रीय पुरस्कार मिल जाएगा ?‘‘ (क्या आपने यह ’ चड्ढी  फींचना‘ मुहावरा सुना है ? मैंने तो नहीं सुना। वैसे यह अंग्रेजी के ’वाॅशिंग डर्टी लिनेन इन पब्लिक‘ का ’मौलिक‘ हिंदी रूपांतर है। )

12 जनवरी 1995 के जनसत्ता की रविवारीय साहित्य-पत्रिका ’सबरंग‘ के पृष्ठ  18 पर सत्येंद्र राणे का एक रेखांकन है, जिसमें औरत के चेहरे पर आंखें बंद हैं और होठों की जगह एक बंद ताला है। आज भी एक आदर्श औरत की तस्वीर यही है। यह बंद ताला जैसे ही खुलता है, औरत अपने सदियों पुराने गरिमामय-महिमामंडित ’एन्टीक‘ आसन से नीचे गिरा दी जाती है।

यह महज एक संयोग  नहीं है कि अस्मिता से जुड़े अधिकांश शब्द स्त्रीलिंग हैं – मर्यादा-प्रतिष्ठा, गरिमा-महिमा, व्यथा-पीड़ा, इज्जत-आबरू-हया, लज्जा-शर्म-यातना आदि आदि… क्योंकि ’लाज‘ रखने की पूरी जिम्मेदारी एक औरत के ही खाते में डाली गई है। एक अंग्रेजी पत्रिका ’सैवी‘ ने अपने 16 नवंबर 1995 के अंक में राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त अभिनेत्री लीला नायडू का एक लंबा साक्षात्कार प्रकाशित किया था। 1940 में जन्मी लीला का सोलह वर्ष की उम्र में प्रसिद्ध रायबहादुर ओबेराय खानदान के पुत्र तिलक राज उर्फ टिक्की से विवाह हुआ और एक साल बाद वह दो जुड़वां बेटियों की मां बनीं। दो साल तक, शिकार के शौकीन अपने रईस शराबी पति से लगातार पिटने के बाद सिर्फ़ अठारह साल की उम्र में, 1958 में ही, वह ओबेराय खानदान से अलग हो गई। उसके बाद उन्होंने कुछ फिल्में की, जिसमें अनुराधा, द हाउसहोल्डर काफी सराही गईं। बलराज साहनी के साथ अभिनीत फिल्म अनुराधा में लीला नायडू को राष्ट्रीय  पुरस्कार भी मिला।

ग्यारह साल बाद, 29 साल की उम्र में, 1969 में उन्होंने अंग्रेजी के सुप्रतिष्ठित कवि डाॅम माॅरेस से प्रेम विवाह किया और उनकी तीसरी पत्नी बनी। दांपत्य जीवन के सत्ताइस साल साथ रहने के बाद डाॅम माॅरेस अपने से आधी उम्र की पत्रकार सरयू आहुजा के प्रेम में पड़ कर लीला नायडू से अलग हो गए।

यह कहानी न तो नई है, न अविश्वसनीय।

लीला नायडू, कमला दास या मल्लिका अमरशेख जैसी लेखिका नहीं हैं जो अपनी तकलीफ को शब्दजाल में लपेटकर शुगर कोटेड कुनैन की तरह ’माय स्टोरी‘ या ’मला उध्वस्त व्हायचंय‘ जैसी कहानी प्रस्तुत करने की कला में माहिर हों। आत्मदया के बगैर उन्होंने अपनी जिंदगी की आधी सदी की दास्तान बिना किसी लाग-लपेट के तटस्थ नजरिए से बयान की है।

उनके इस बयान का रस लेते हुए हिंदी के एक वरिष्ठ पत्रकार-कवि ने (नूतन सवेरा-12 जनवरी 1997, पृष्ठ  49-50) अपने साप्ताहिक स्तंभ ज़रिया-नज़रिया में ’शादी और बरबादी के बाद का नजारा‘ लिखकर सवाल पर सवाल उठाए हैं – ’’जिसे आप समाज के सामने गधा सिद्ध करना चाहती हैं , उसी के साथ सत्ताइस साल हम बिस्तर रहीं ?…….. इतने साल साथ रहने के बाद ’मोहतरमा‘ को यह तथ्य समझ में आया ? ……….यह समझने के लिए ’मैडम‘ को दो-दो पतियों और साल-दर-साल घुटने रहने की जरूरत पड़ी, यही हैरत है।……..‘‘

बोलना ही इंसान को इंसान बनाता है पर यही ’बोलना‘ एक औरत को इंसान के दरजे से गिराकर ’मैडम‘ और ’मोहतरमा‘ बना देता है। मैं यह नहीं कहती कि मैडम और मोहतरमा गालियां हैं  ,पर जिस अंदाज़ में इन संबोधनों का इस्तेमाल किया गया है ,वह मुंह खोलनेवाली औरत के प्रति लेखक का नजरिया स्पष्ट करता है जो मुझे खासा आपत्तिजनक लगा ।

यूं भी औरत को भारतीय संस्कृति में इंसान का दर्जा दिया कब गया ? वह तो देवी है , श्रद्धा की मूर्ति है , पूजनीय-वंदनीय है और देवियां बोला नहीं करतीं। वे तो पूजा के पंडाल में सजी – धजी , मूक-बधिर ही अच्छी लगती हैं।

अपनी इस फितरत से हटकर जब वह बोलती है तो एक प्रबुद्ध पत्रकार उसे राय देते हैं – ’’आपको देर से ही सही ,अपनी-अपनी औकात का पता चल गया है तो उसको चैराहे पर चड्ढी  की तरह फींचने से कौन सा राष्ट्रीय पुरस्कार मिल जाएगा ?‘‘ (क्या आपने यह ’ चड्ढी  फींचना‘ मुहावरा सुना है ? मैंने तो नहीं सुना। वैसे यह अंग्रेजी के ’वाॅशिंग डर्टी लिनेन इन पब्लिक‘ का ’मौलिक‘ हिंदी रूपांतर है। कोई शराबी पति अगर पत्नी के बालों को पकड़कर उसे घसीटता हुआ कार तक ले जाता है तो ’बालों‘ का अनुवाद ’झोंटे‘ हो जाता है, यह भी मुझे इसी टिप्पणी से मालूम हुआ। )दिक्कत यह है कि अगर एक पुरुष अपनी आत्मकथा में अपने या अपनी पत्नी के इतर संबंधों को उजागर करता है तो उसकी आत्मकथा का खुली बांहों से स्वागत किया जाता है, उसे बोल्ड लेखन का खिताब मिलता है, पर अगर महिला अपने शादीशुदा जीवन की परतें खोलना चाहे या अपनी तकलीफ बयान करे तो उसे चैराहे पर चड्ढी  की तरह फींचने की संज्ञा दी जाती है । 

बहरहाल, पंद्रह पृष्ठों में बिखरी एक अभिनेत्री की दिल दहला देने वाली और गंभीरता से कुछ सोचने पर मजबूर करने वाली इस यातनाकथा को ’शादी और बरबादी के बाद का नजारा‘ के रूप में एक तमाशबीन की तरह दूर से देखने, मजा ले-लेकर पढ़ने और तथ्यों को अपने अनुरूप तोड़-मरोड़ कर उस पर गैर-जिम्मेदार, उथली और सतही टिप्पणियां करने वाले प्रबुद्ध पत्रकार कब अपने सामंती गिरेबान में झांकने के लिए, अपनी गर्दन को भी थोड़ा सा नीचे झुकाएंगे ?

(जनसत्ता, मुंबई, शुक्रवार 17 जनवरी 1997 से साभार )

स्त्री के प्रेम की अभिव्यक्ति – ‘अन्या से अनन्या’

कुमारी ज्योति गुप्ता


कुमारी ज्योति गुप्ता भारत रत्न डा.अम्बेडकर विश्वविद्यालय ,दिल्ली में हिन्दी विभाग में शोधरत हैं सम्पर्क: jyotigupta1999@rediffmail.com

( इस आलेख मे प्रेम और खासकर स्त्री के प्रेम की व्याख्या के प्रति  स्त्रीवादी दृष्टि से कई सवाल हो सकते हैं , लेकिन प्रभा खेतान के प्रेम को समझने का एक स्त्री शोधकर्ता का यह भी एक नजरिया हो सकता है . स्त्रीकाल में हम अन्या से अनन्या तक की आलोचना करते हुए स्त्रीवादी व्याख्यायें किंगसन पटेल और भावना इशिता के आलेखों  में पढ चुके हैं.)
प्रेम के संबंध में बायरन ने लिखा है- ‘‘पुरुष का प्रेम पुरुष के जीवन का एक हिस्सा भर होता है। लेकिन स्त्री का तो यह सम्पूर्ण अस्तित्व ही होता है।’’ इसका अर्थ यही है कि स्त्री जब किसी से प्रेम करती है तो वह सिर्फ ईमानदार ही नहीं होती बल्कि उसमें समर्पण का भाव भी होता है। इस भावना के कारण ही वह भविष्य  का सुनहरा सपना देखती है। ऐसा ही प्रेम प्रभा खेतान ने किया। उन्होंने कहा ‘‘प्रेम कोई योजना नहीं हुआ करता और न ही यह सोच समझकर किया जाने वाला प्रयास है। इसे मैं नियति भी मानूँगी क्योंकि इसके साथ आदमी की पूरी परिस्थिति जुड़ी होती है।’’ अतः सोच समझकर लाभ-हानि देखकर प्यार नहीं होता और न ही अकेलेपन को भरने के लिए। प्रभा खेतान का प्यार भी जीवन के खालीपन को भरने का माध्यम नहीं था बल्कि उनका सम्पूर्ण अस्तित्व था, जिसकी ओर बायरन ने इशारा किया है।

बाइस साल की उम्र में प्रभा खेतान का पेशे  से चिकित्सक और उम्र में अठारह साल बड़े डाॅक्टर सर्राफ से जो रिश्ता  बना, उसे ‘प्रेम’ कहते हैं। निस्वार्थ, निश्छल  प्रेम। जिन रूढ़ परम्परावादियों को इस आत्मकथा में वासना और व्यभिचार नज़र आता है उन्हें ‘प्रेम’ और ‘व्यभिचार’ शब्द का अर्थ समझ लेना चाहिए। मैत्रेयी पुष्पा  ने लिखा है ‘‘मेरी दृष्टि  में ‘प्रेम’ शब्द और ‘व्यभिचार’ शब्द को अलग-अलग देखा जाय तो दोनों एक-दूसरे के विपरीत आचरण में दिखते हैं। प्रेम जहाँ निश्छलता, विश्वास  और ईमानदारी भरा लगाव है वहीं व्यभिचार कपट चोरी और बेईमानी है। लेकिन सामाजिक विडम्बना यह है कि अक्सर ही प्रेम  को व्यभिचार से जोड़ दिया जाता है।’’ प्रभा खेतान के प्रेम को भी व्यभिचार का नाम दिया गया जिसकी अच्छी-बुरी प्रतिक्रिया समय-समय पर देखने को मिली। व्यभिचार देह से जुड़ा मामला है और प्रेम मन से। इसे व्यक्त करते हुए प्रभा खेतान ने कहा है- ‘‘प्रेम के कई रूप हैं और प्रेम की उम्र बहुत लंबी होती है, जिसकी तुलना में देह की उम्र छोटी। कामना का सुख तो हार्मोन पर आधारित होता है और यह बड़े सीमित समय के लिए मनुष्य को उपलब्ध होता है लेकिन प्रेम तो उसे हर समय उपलब्ध है। यह आपके व्यक्तित्व पर निर्भर है कि आप देह से परे जा सकें और प्रेम को अपने जीवन में महसूस कर सकें।’’ अतः यह कह सकते हैं कि देह की अपेक्षा प्रेम की उम्र बहुत लम्बी होती है। जिसके अन्दर यह अहसास जीवित  है वह इंसान भी जीवित  है, जिसने इस एहसास को महसूस किया ही नहीं उसे तो हर जगह वासना और व्यभिचार ही नज़र आयेगा।

किसी भी रिश्ते  को निभाने का भाव स्त्रियों की अपेक्षा पुरुषों  में कमजोर होता है। अधिकांश  आत्मकथा और हिंदी कथा साहित्य में ऐसे अनेको उदाहरण हैं जो इस तथ्य की प्रामाणिकता सिद्ध करते हैं। चूँकि स्त्रियाँ ज्यादातर संवेदनशील होती हैं इसलिए इस तरह के संबंध की प्रतिक्रिया से ज्यादा आहत भी होती हैं।प्रभा  खेतान के इस प्रेम-संबंध में कहीं भी चालाकी नहीं है, वह समझदारी या यूँ कहे कि वह दुनियादारी भरी समझ नहीं है जिसकी वजह से उनपर ऊँगलियाँ उठती रहीं। एक नज़र के आकर्शण से उत्पन्न प्रेम को आत्मसात कर जिंदगी भर का जोखि़म उठाने वाली स्त्री चालाक तो नहीं हो सकती। हाँ ! निश्छलता और मासूमियत की प्रतिमूर्ति जरूर थी। उन्होंने लिखा ‘‘जिस राह पर मैं चल पड़ी हूँ वह गलत-सही जो भी हो पर वहाँ से वापस मुड़ना संभव नहीं। इसे ही प्रेम कहते है।’’ अतः निर्णय पर कायम रहना और संबंध को निभाने का जज्बा होना चाहिए तभी प्रेम किया जा सकता है।

डाॅ0 सर्राफ ने प्रभा खेतान से कभी पे्रम किया ही नहीं उनके लिए यह क्षणों का आकर्षण  था, जिसे उन्होंने स्वयं स्वीकारा भी लेकिन प्रभा खेतान के लिए उनका प्रेम उनका पूरा बजूद था, उनका अस्तित्व था जिसे वे पीड़ा सहकर भी अंत तक कायम रखती हैं। उनका कथन इस बात का प्रमाण है-
‘‘वेदना की कड़ी धूप में
खड़ी हो जाती हूँ क्यों
बार-बार ?
प्यार का सावन लहलहा जाता है मुझे
किसने सिखाया मुझे यह खेल
जलो !जलते रहो
लेकिन प्रेम करो और जीवित रहो’’

यातना की भट्टी में जलकर, सारी उपेक्षा सहकर, प्रेम करने और अन्त तक अपने निर्णय पर कायम रहने का साहस प्रभा खेतान ने ही दिखाया। इनके प्रेम में कहीं भी सयानापन नहीं, कपट नहीं, निश्छल मन से सबकुछ देने का भाव दिखता है और अपनी आत्मकथा में सबकुछ स्वीकार कर लेने का साहस भी। चूँकि बात प्रेम की हो रही है तो एक प्रेमिका की आकांक्षा को जानना जरूरी है ,जो खलील जिब्रान की महबूबा ने अपने महबूत कवि के लिए की थी ‘‘मैं चाहती हूँ कि तुम मुझे उस तरह प्यार करो जैसे एक कवि अपने ग़मग़ीन ख्यालात को करता है। मैं चाहती हूँ, तुम मुझे उस मुसाफिर की याद की तरह याद रखो जिसकी सोंच में पानी से भरा तालाब है, जिसका पानी पीते हुए उसने अपनी छवि उस पानी में देखी हो। मेरी इच्छा है, तुम उस माँ की तरह मुझे याद रखो, जिसका बच्चा दिन की रौशनी देखने से पहले मौत के अंधेरे में डूब गया हो। मेरी आरजू है कि तुम मुझे उसे रहमदलि बादशाह की तरह याद करो जिसकी क्षमा घोशणा से पहले कै़दी मर गया हो।’’ प्रभा खेतान ने कभी ऐसे ही प्रेम की कल्पना की थी। लेकिन अफसोस, डाॅ0 सर्राफ से ऐसा प्यार उन्हें नहीं मिला। समय के साथ उन्हें ये  आभाष होने लगा था कि मैंने और डाॅ0 साहब ने जिस चाँद को साथ-साथ देखा था वह नकली चाँद था। प्यार को निभाने का जो उत्साह प्रभा खेतान में था वह डाॅ0 सर्राफ में दिखा ही नहीं। निष्कपटता , निश्छलता प्रेम की कसौटी है। इसमें लेने का नहीं, देने का भाव होना चाहिए। लेखिका ने तो अपना हर कर्तव्य निभाया लेकिन डाॅ0 सर्राफ ने इस रिश्ते  के प्रति अपनी कोई जिम्मेदारी नहीं निभाई। घनानंद के शब्दों में कहें तो-
‘‘तुम कौन धौं पाटी पढ़े हो लला
मन लेहु पै देहु छटाँक नहीं।’’

पूरी आत्मकथा में एक निष्ठा आस्था व्यक्त हुई है जिसके कारण उन्हें पारिवारिक और सामाजिक स्तर पर बहुत कुछ झेलना पड़ा। उनका अन्तर्मन उनसे पूछता है ‘‘आखिर मैं क्यों नहीं अपने लिए जीती ? मैं क्यों एक परजीवी की तरह जी रही हूँ। किसलिए ? हिसाब लगाऊँ तो एक महीने में चैबीस घंटे से अधिक  समय मैं और डाॅ0 साहब साथ नहीं रहते फिर भी उनके प्रति यह कैसा दुर्निवार आकर्षण  है जो खत्म नहीं हो रहा ? डाॅ0 साहब को मेरी पीड़ा का अहसास क्यों नहीं होता ?’’ साधारणतः किसी भी संबंध में जब इतने तनाव हो तो उन्हें खत्म करना ही उचित है लेकिन ये संबंध ऐसा था जो न पूरी तरह से जुड़ा और न टूट ही पाया। क्योंकि लेखिका अपने निर्णय को खारिज नहीं करना चाहती थीं। उन्हें भले ही प्यार नहीं मिला लेकिन जितनी शिद्दत  से उन्होंने निभाया वह अद्भुत है। तू नहीं और सही, और नहीं और सही वाला भाव यदि इनमें होता तो शायद सफल उद्योगपति के साथ आदर्श  महिला भी होती क्योंकि मरे हुए संबंध को विवाह के नाम पर निभाना हमारे समाज को स्वीकार है, लेकिन आजीवन किसी से निश्छल प्रेम करना, महापाप। ये निर्णय तो पाठकों का है कि वे इस प्रेम-संबंध को किस तरह देखना चाहते हैं।

प्रेम एक ऐसा अहसास है,  जिसे करने वाला ही जानता है। हिन्दी की प्रतिष्ठित  लेखिका कुसुम अंसल ने लिखा है – ‘‘प्रेम एक इच्छा है, एक इच्छा जो विशेष इच्छा के रुप में प्रत्येक हृदय में बहती तरंगित होती है। यह इच्छा मात्र स्त्री-पुरुष  ही नहीं वृक्ष की जड़ और फूलों में भी होती है, श्वास  और वायु में भी होती है। प्रेम स्त्री-पुरष के मध्य घटित होता है जिसे शायद शरीर के पाँच तत्व भी चाहें तो ढूँढ नहीं पाते। प्रेम को हवा की तरह ओढ़ा जा सकता है, समुद्र सा लपेटा जा सकता है और पर्वतों की तरह बाहों के बंधन में आलिंगित किया जा सकता है। प्रेम हमारा वायदा है अपने आपसे से किया हुआ जिसे हमें निभाना होता है। मुझे लगता था प्रेम कोई प्रक्रिया या प्रोसेस नहीं है ,जिसमें शरीरों का जुड़ना या बिछुड़ना शामिल होता है, प्रेम तो बीज की तरह अंकुरित होता है, और फूल सा खिलता है। यह मनुष्य  के भीतर सूक्ष्म सी मानवीय चेतना है जो ऊपर उठकर अजन्मा शाश्वत  में बदल जाती है।’’ अतः प्रभा खेतान का प्रेम एक ऐसा ही सूक्ष्म  अहसास है जो वाद-विवाद, नैतिकता-अनैकिता की परवाह किये बिना सिर्फ मन की आवाज सुनता है।

जख्म हरे हैं आज भी

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निवेदिता


निवेदिता पेशे से पत्रकार हैं. सामाजिक सांस्कृतिक आंदोलनों में भी सक्रिय रहती हैं. हाल के दिनों में वाणी प्रकाशन से एक कविता संग्रह ‘ जख्म जितने थे’ के साथ इन्होंने अपनी साहित्यिक उपस्थिति भी दर्ज कराई है. सम्पर्क : niveditashakeel@gamail.com

( भागलपुर दंगों के 25 साल पूरे हो गए , स्वतंत्र भारत का एक ऐसा दंगा , जो पिछले दंगों से इस मायने में अलग था कि इसकी लपटें गाँव -गाँव तक फ़ैली , महीनो चली . शोधकर्ताओं ने बाद में उद्घाटित किया कि लोगों को मारकर लाश छिपाने के लिए गोवी के फूल उगा दिये गये थे. इस दंगे की दुःखद स्मृतियों को याद कर रही हैं निवेदिता. यह आलेख पिछले दिनों जनसत्ता में भी प्रकाशित हुआ था. )
25 साल पहले एक शहर जख्मों से भर गया था, आज फिर उसके जख्म हरे हो गए। वर्षो से जमा मवाद बाहर आ गया। फोड़े की तरह,जो न दबता है, न फूटकर बाहर आता है। स्मृति भी किस अंधेरे में अपना राज खोलती है। मुद्दत पहले गुजरी घटनाएं ऐसे याद आ रही हैं जैसे आज की बात हो। भागलपुर दहक रहा था। दंगे की आग में झुलसे घरों की लपटें मंद पड़ने लगी थीं, पर धुएं की तीखी गंध हवा में वर्षो तैरती रही थी।

मुझे याद है कि भैया की कांपती आवाज फोन पर देर तक हम सुनते रहे थे। वे दहशत में थे। हम उन्हें रीयाज भाई बुलाते हैं। मेरे पति के बड़े भाई। नाथनगर ब्लाॅक के पास उनका घर था। भाभी सरकारी मुलाजिम हैं। उन्हें क्वार्टर मिला हुआ था। भाभी बच्चों के साथ अपने मायके गयीं हुई थी। उसी दौरान शहर में तनाव बढ़ा। वे लोग वहीं रुक गए। भैया घर की ओर निकले। दूर से ही देखा की उनके घर में दंगाईयों ने आग लगा दी है। आग की लपटें कई किलोमीटर दूर से दिखायी दे रही थीं। एक ठंडी सी झुरझुरी पूरे बदन में भर गयी। वे रो रहे थे । आंखों के सामने सबकुछ जल कर खाक हो गया। वर्षो से तिनका-तिनका जोड़ कर जो घर बनाया था, वह पलक झपकते ही मलवे के ढ़ेर में तब्दील हो गया। वे भागे थे। दहशत और ड़र पीछा कर रहे थे । उनके पास स्कूटर  था । अभी अपना मुहल्ला पार भी नहीं किया कि लोग हथियारों से लैस खड़े दिखे। उन्हें लगा अब बच पाना मुमकिन नहीं है। अपनी पूरी ताकत लगा कर वे भागे। जब तक दंगाई समझते की कौन आ रहा है वे पार कर गए। भैया ने फोन पर सब बताया था।  हम बुत बने खड़े थे। कुछ भी नहीं बचा था। बच्चों के कपड़े तक जला दिये गए। जो बचा वे पड़ोसी लूट कर ले गए। इस से भयावह क्या होगा जिनलोगों के साथ सालों जीवन गुजरा, दुख-सुख साझा किया वे ही कातिल थे। उन्होंने कहा था अगर हो सके तो कुछ कपड़े और कुछ जरुरी सामान भिजवा दो। मैंने दूध के डब्बे, बरतन,साड़ी बच्चों के कपड़े भेजे थे। जब कोई दंगा होता है तो सिर्फ लाश  ही नहीं गिरती, मनुष्यता भी हारती है।

भागलपुर दंगा के 25 साल पूरे हुए। दंगा ने जो जख्म दिए  उसे पाटने में जाने कितनी सदियां बीतेंगी । भैया कहते हैं उन हादसों को हम याद नहीं करना चाहते। दुख बीत जाता है पर डर ठहरा रहता है। एक ऐसे देश  में, जिसके संविधान में देश  के सभी नागरिकों को जीने का अधिकार है। उस देश  में कोई इसलिए नफरत का शिकार होता है कि वह एक दूसरे घर्म को मानता है। उनकी स्मृतियों में 24 अक्टूबर 1989 का दिन आज भी ताजा हैं।  1989 में 24 अक्तूबर को भागलपुर  शहर में दंगा भड़का था. इस दंगे में सरकारी आंकड़ों के अनुसार ग्यारह सौ से ज्यादा लोग मारे गये थे.  दंगे ने धीरे-धीरे शहर के साथ-साथ तत्कालीन भागलपुर जिले के अठारह प्रखंडों के 194 गांवों को अपने चपेट में ले लिया था.

यह दंगा इस मायने में भी अलग है कि दंगे के 25 सालों बाद भी पीडि़तों के दावों की जांच-पड़ताल के बाद मुआवजा राशि का भुगतान किया गया है. लेकिन अब भी बड़ी संख्या में पीडि़त अलग-अलग आधार पर मुआवजे की मांग कर रहे हैं. जिस दंगे में हजारों लोग मरे, लापता हुए, वहां सरकार ने मृत व लापता व्यक्तियों के 861 मामले ही स्वीकार किये हैं. उनके परिजनों को अब तक प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष से दस हजार, बिहार सरकार से एक लाख और फिर सिख दंगों के तर्ज पर साढ़े तीन लाख रुपये की सहायता राशि मिली है. लेकिन जिनके दावे स्वीकार नहीं किये गये हैं वे हर तरह की सहायता राशि  से अब तक वंचित हैं. दिल्ली स्थित संस्था सेंटर फाॅर इक्विटी स्टडीज ने दंगा पीडि़तों की हालात जानने और उनके उनकी मदद के लिये पिछले तीन सालों के दौरान 50 दंगा प्रभावित गांवों के दो हजार पीडि़त परिवारों से संपर्क किया.

संस्था के अनुसार इस दौरान उसे 50 से अधिक ऐसे परिवार मिले जिनके यहां दंगे के दौरान लोग मारे तो गये लेकिन उन्हें अब तक कोई सहायता राशि नहीं मिली है. सरकार की मुआवजा नीति के तहत ऐसे परिवार हकदार तो हैं लेकिन उस नीति के तहत अपने दावे के समर्थन में साक्ष्य नहीं जुटा पा रहे हैं. ऐसे परिवार दंगे के दौरान या उसके कुछ दिनों बाद अगर किसी भी कारण से एफआईआर दर्ज नहीं करवा सके तो उनका दावा प्रशासन स्वीकार नहीं करता है.हालांकि ऐसे दावों के सत्यापन के लिये भी मुआवजा नीति में व्यवस्था है. लेकिन सरकारी अधिकारियों के सत्यापन के सहारे पूरी होने वाली यह लंबी प्रक्रिया शायद ही किसी परिवार की मददगार साबित हुई हो.

मैं नहीं जानती 25 साल बाद मिले इन मुआवजा से जख्म भरेंगे या नहीं पर एकबार भी हम अपने लहुलुहान अतीत से सबक ले सकते हैं। सबक वो पार्टियां भी ले सकती हैं जिसने ऐसी हिंसा की जमीन बनायी। हम सबक ले सकते हैं देश में फिर से पैदा किये जा रहे साम्प्रदायिक तनाव के खिलाफ। याद कर सकते हैं उन बुरे वक्त को जिसमें भाजपा द्वारा राम मंदिर अंदोलन चलाना और बाबरी मस्जिद का ध्वंस शामिल है.

अवनीश गौतम की कवितायें : सफाई कार्यक्रम और अन्य

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अवनीश गौतम


दिल्ली की एक एड एजेंसी में क्रियेटिव डायरेक्टर अवनीश गौतम की कवितायें हंस, दलित साहित्य वार्षिकी, नया ज्ञानोदय आदि में प्रकाशित हुई हैं . सम्पर्क: 9891570925

१. सफाई कार्यक्रम 

जिन्हे जलाया जा रहा है
उन्हे बताया जा रहा हैं कि
सफाई है सबसे ज़रूरी
जैसे वे बने ही नहीं हैं हाड़ मांस से
बस थोड़ा हंसिया खुरपी चलाई
थोड़ा तेल तीली डाली और बस्स देखो कैसा
भह-भह के जले हैं होलिका की तरह

दुनिया भर के अखबारों और
टीवी चैनलों से बाहर
बिखरी पड़ी हैं लाशें
उत्तर से दक्षिण तक
पूरब से पश्चिम  तक
अंग- भंग, लथ – पथ,
जली -अधजली
जवान मर्दों की
औरतों की, बच्चों की लाशें

सफाई कार्यक्रम जोरों पर है
और ये कोई आज की बात नही
यह तो सांस्कृतिक कार्यक्रम है
जो चलता रहता है
धार्मिक अनुष्ठानो के साथ साथ

अब तो हत्यारो ने
नए तंत्रो,
नए यंत्रों
नए मंत्रों से
वधस्थलों का ऐसा आधुनिकीकरण कर दिया हैं
कि लाशें भी शामिल होती जा रही हैं
अपनी मृत्यु के उत्सव मे

२. वे सबसे पवित्र कहलाते हैं 

वे मुर्गा नही खाते
वे मच्छी नहीं खाते
वे दारू नहीं पीते
वे अगरबत्तियों की भीनी भीनी खुशबू  मे
हमारी औरतों की छातियाँ सहलाते हैं
फिर उन्हे काटते है और नोच नोच कर
हवा मे उड़ाते हैं

वे ठीक उसी जगह से हमारा सीना फाड़ते हैं
जहाँ बमुश्किल हम प्रेम की जगह बना रहे होते हैं
उनके लिए भी

हम भूख से लड़ कर अपने
सम्मान की तलाश मे निकल रहे होते हैं
वे शोहदों की तरह पकडते हैं हमारे गिरहबान
बिना किसी की नज़र मे आए
वे आज भी भरते है हमारे कानों में पिघला सीसा
हमारे समय के सबसे सभ्य सबसे सुसंस्कृत लोग
हमारी अस्थियों पे अपनी विजय पताका फहराते हैं
हमारी अंतड़िया निकाल कर खाते हैं
फिर भी सांस्कृतिक डियोडरेंट लगाने के कारण
सबसे पवित्र कहलाते हैं

3. मैं आता हूँ 

आपको गुस्सा अच्छा नही लगता
लेकिन आपको गुस्सा आता है
आपको घिन अच्छी नहीं लगती
लेकिन आपको घिन आती है
मैं आता हूँ तो आपको गुस्सा आता है
मैं आता हूँ तो आपको घिन आती है
वैसे आती है तो आए मेरी बला से
मैं तो अब आता हूँ
आपका एक एक दरवाजा
आपका एक एक ताला तोड़ते हुए
मैं तो अब आता हूँ
ये घर मेरा है और
अब मैं इसमे रहने आता हूँ
कब्जेदारों!
जो तुमने जला रखे हैं अपनी महान
संस्कृति के हवन कुंड
ए पवित्र देवताओ उन्ही में तुम्हारी हुंडियाँ
जलाने आता हूँ
ये जो तुमने चमका रखी हैं
अपनी झूठी और विशाल छवियों को प्रक्षेपित
करती विशाल काँच की दीवारें
उनको अपनी चीत्कारों से गिराने आता हूँ
ड्योढ़ी से ले कर गुसलखाने तक
अपना दावा जताने आता हूँ
अपने घर को मैं अपना बनाने आता हूँ
क्या करूँ
मुझे भी गुस्सा अच्छा नही लगता
लेकिन मुझे भी गुस्सा आता है

4. आपके जैसा
आप कहते हैं
मैं प्यार की बात नहीं करता
आप पर भरोसा नही करता
तो आप ही बताएँ
आप पर भरोसा कैसे किया जाए
आपने प्यार से मुझे शक्कर कहा
और अपने दूध में घोल कर मुझे गायब कर दिया
गायब क्या कर दिया आप तो मुझे पी ही गये
फिर आपने मुझे नमक कहा और
अपनी दाल में डाल कर मुझे गायब कर दिया
गायब क्या कर दिया आप तो मुझे खा ही गये
आपको धोखा पसंद नहीं
लेकिन आपको धोखा देना आता है
मुझे भी धोखा देना पसंद नहीं
लेकिन मैं भी सीख लूँगा
सब्र कीजिए एक दिन
आपको वैसा ही प्यार करूँगा
जैसे आपने मुझको किया

कलाकार के सौ गुनाह माफ हैं ।

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सुधा अरोडा


सुधा अरोडा सुप्रसिद्ध कथाकार और विचारक हैं. सम्पर्क : 1702 , सॉलिटेअर , डेल्फी के सामने , हीरानंदानी गार्डेन्स , पवई , मुंबई – 400 076
फोन – 022 4005 7872 / 097574 94505 / 090043 87272.

ऑस्कर वाइल्ड से लेकर वॉल्टेयर तक ने कलाकार के असाधारण तरीके से जीवन जीने की हिमायत की है। उनका कहना है कि सामान्य ढर्रे में बंधा हुआ जीवन किसी भी कलाकार को स्थितियों का गुलाम बना देता है, जरूरी है कि वह जीने के सामान्य ढांचे को ध्वस्त करे ! यह भी कहा गया है कि कलाकार में लुम्पेन तत्व होना ही चाहिए। अगर वह थोड़ा आवारा नहीं है, अगर उसमें आधी रात को खुली सड़क पर नंगे निकल जाने का हौसला नहीं है,  अगर खूबसूरत औरत देखकर उसके साथ की इच्छा उसमें नहीं जागती तो वह सही मायने में कलाकार नहीं है। हमारे अपने जैनेन्द्र कुमार इसी बात को ज्यादा सीधे ढंग से कहते हैं कि रचनाकार को प्रेरणा के लिए पत्नी के साथ एक प्रेयसी की भी जरूरत है और राजेन्द्र यादव तो इस तरह की टिप्पणियों के लिए कुख्यात हैं, जब वह कहते हैं कि सात्विक किस्म का भला सा आदमी कथाकार कैसे बन सकता है! लफंगई ही किसी व्यक्ति को साहित्यकार बनाती है,  शराफत तो उसे विष्णुकांत शास्त्री बना देती है।

इन्हीं उक्तियों की ओट लेकर हमारे देशी-विदेशी रचनाकार सीना ठोंककर, डंके की चोट पर अपने अनैतिक सम्बन्धों का खुलासा करते रहे हैं और इस खुलासे से उनकी रचनात्मक ईमानदारी में बढ़ोत्तरी होती रही है (कमलेश्‍वर की आत्मकथा या राजेन्द्र यादव की मुड़ मुड़ के देखता हूं इसकी गवाह है) यानी कला का जरदोजी वाला जामा पहनने के बाद, लफ़्ज़ों के कीमखाबी लिहाफ के भीतर उसके सारे कुकृत्य माफ होते हैं। कलाकार के व्यक्तिगत जीवन की नंगई और चरित्रहीनता के प्रसंगों की फेहरिस्त से उसके प्रभामंडल की आभा क्षीण नहीं होती।

कला में अभिव्यक्ति की आजादी के साथ-साथ कलाकार को अपना जीवन चुनने और अपनी तरह से जीवन जीने की छूट कहां तक दी जानी चाहिए?  जहां एक की आजादी दूसरे की गुलामी न बन जाये! जहां एक का वर्जनाहीन दुस्साहस दूसरे के शोषण का बायस न बने! पर वास्तविकता इससे अलग है। कलाकार होने के नाम पर उसके सौ गुनाह माफ हैं। एक कलाकार की रचनात्मकता के शिखर तले उसके कितने गुनाह सिसक रहे हैं , उसकी चौंधियाती कृतियों की इमारतें कितनी प्रताड़नाओं की बुनियाद पर खड़ी हैं, इसका लेखा-जोखा करना साहित्य की चौहद्दी में नहीं आता।

कला और लम्पटता,  कलाकार और आक्रामकता, रचना और नंगई में कैसा इक्वेशन होता है, इस पर चर्चा की जानी चाहिए। कलाकार पुरुष के निजी जीवन की तमाम बदकारियों और बेइमानियों का असर उसकी कृतियों के मूल्यांकन पर नहीं होता। अपनी पत्नी या बच्चों के प्रति आक्रामकता, अवहेलना या हिंसा, विवाहेतर संबंधों से एक आत्ममुग्ध रचनाकार की रचनात्मक गरिमा पर कोई आंच नहीं आती। रचना का प्रकाश वृत्त इतना बड़ा होता है कि रचनाकार के जीवन की छोटी बड़ी सब बदकारियों का अंधकार उसके आलोक में छिप जाता है!

कला के विभिन्न क्षेत्रों के शिखर पुरुषों के उदाहरण हमारे सामने हैं! उस्ताद अलाउद्दीन खां की जहीन बेटी अन्नपूर्णा को मंचीय सितारवादन से परे, एक बन्द कमरे में कुछ शागिर्दो को सितारवादन की कला में पारंगत करने की उम्र कैद देकर, भारत-रत्न पंडित रविशंकर अपनी कला साधना के झंडे दिक् दिगन्त में गाड़ते रहेंगे! यशोदा पाडगांवकर की ‘ कुणास्तव कुणीतरी’ में एक प्रतिष्ठ‍ित कवि की पत्नी की यातना को एक ओर धकेलकर मंगेश पडगांवकर अपनी ऊंचाई से नीचे नहीं गिरेंगे। मल्लिका अमरशेख कितना भी ’मळा उध्वस्त व्हायचय’ लिख लें, नामदेव ढसाल की काव्य प्रतिभा के चर्चे होते रहेंगे और अन्ततः मल्लिका अमरशेख ’ शित्जोफ्रेनिया’ की कगार पर धकेल दी जायेंगी। कान्ता भारती की ’रेत की मछली’ जैसे आत्मकथात्मक उपन्यास के एक-एक प्रसंग के त्रासद सच की भयावहता को दरकिनार कर डॉ. धर्मवीर भारती के चहेते पाठकगण उनकी दूसरी पत्नी-प्रेयसी को लिखे प्रेम पत्रों में प्रेम की दिव्य और ओजस्वी छवि के दर्शन कर अलौकिक रस से सराबोर होते रहेंगे। मन्नू भंडारी अपने अकेलेपन से ग्रस्त और शारीरिक-मानसिक यंत्रणा से संत्रस्त होकर डाक्टरों-अस्पतालों के चक्कर लगाती रहें,  उनके प्रतिष्ठित लेखक-पति राजेन्द्र यादव के जन्मदिन के शाही आयोजनों में कोई कमी नहीं आयेगी । सोफिया टॉलस्टॉय की आत्मकथा में ऐसे प्रसंग आते रहेंगे, जब अपने पुत्र की अंत्येष्टि से लौटकर सोफिया दीवार से सर टकरा-टकरा कर रोती है और उनसे सांत्वना का एक शब्द कहे बगैर लियो टॉलस्टॉय धुले सफेद कपड़े पहन बाहर टहलने निकल जाते हैं।

अन्नपूर्णा और पंडित रविशंकर

सोफिया की आत्मकथा हो या दलित रचनाकार कौशल्या बैसंत्री की – कलात्मकता के अभाव में सपाटबयानी अपने नंगे सच के बावजूद हाशिये पर धकेल दी जाएगी। स्त्रियों पर बेहद कोमल और संवेदनशील कवितायें लिखने वाले कवि अपनी पत्नी को एक कोने में बिलखता छोड़कर घर से निकल जायेंगे क्योंकि अपनी पत्नी के आंसू उनमें कोई संवेदना नहीं जगा पाते और गाहे-बगाहे अपनी दब्बू और डेढ़ हड्डी की पत्नी को पीटने से भी उन्हें कोई परहेज नहीं होगा। सवाल उठाए जाने पर वे शहीदाना अंदाज़ में अपनी पत्नी को मानसिक रोगी और अपने को ही पत्नी द्वारा प्रताडि़त घोषित कर देंगे और पुरुषप्रधान समाज के एक बड़े हिस्से की सहानुभूति भी बटोर लेंगे। हिन्दी फिल्मों की दुनिया में बीना राय और परवीन बाबी से लेकर राहुल देव बर्मन की पत्नी तक की एक लंबी कतार है! यही है सच हमारे समाज का जहाँ स्त्री हर हाल में कटघरे में हैं, उसके साथ खड़े होने में स्त्रियां भी हिचकती नज़र आती है!

संवेदनशील कहलाये जाने वाले इन सर्जकों की निजी दुनिया इतनी क्रूर और अमानवीय क्यों है, और ये सवाल साहित्य के दायरे से, विश्‍वासघातों के स्त्री विमर्श से बाहर क्यों हैं ?  इन सवालों को समाजषास्त्रीय अध्ययन के लिए छोड़ दिया जायेगा और समूचा साहित्यिक समाजशास्त्र  ’’ नत्थिंग सक्सीड्स लाइक सक्सेस’’ (Nothing succeeds like success ) के बैनर तले धूल फांकता नजर आता हैं।

ऐसे में स्त्री विमर्श के हमारे प्रबल पैरोकार बड़े उदारमना होकर सवाल उठाते हैं कि प्रताडि़त पत्नियां अपनी आत्मकथाएं क्यों नहीं लिखतीं ? अधिकांश स्त्रियां तो चुप रहना ही श्रेयस्कर समझती हैं, लेकिन जो सच बोलने का साहस दिखाती हैं, उन्हें मित्रों-परिचितों-पाठकों द्वारा हमेशा  कटघरे में खड़ा कर दिया जाता है। ’सैवी‘ में अंग्रेजी के प्रख्यात कवि डॉम मोरेस की पत्नी लीला नायडू के विस्तृत साक्षात्कार के साथ यही हुआ। प्रख्यात फिल्म निर्माता निर्देशक बासु भट्टाचार्य की पत्नी रिंकी भट्टाचार्य को भी 1984 में ’ मानुषी ‘ को एक लम्बा साक्षात्कार  देने के एवज में खरी-खोटी सुनाई गयी । आखिर घर की ‘गोपनीय’ बातों को बाहर उजागर करने में कैसी शान है ? ‘वॉशिंग डर्टी लिनेन इन पब्लिक’ का एक पत्रकार द्वारा मौलिक हिन्दी अनुवाद किया गया – ”चौराहे पर चडढी फींचना” इस दुस्साहस को लज्जाजनक बताया गया। आखिर लौह महिला-सी दिखने वाली रिंकी अपने पति से लगातार बारह लम्बे बरसों तक कैसे पिटती रह सकती हैं। इसे अविश्‍वसनीय ही माना गया जबकि सच्चाई यही है कि इस बयान में से रिंकी का नाम हटा दें तो यह बहुत-से जाने माने, प्रतिष्ठित और नामी कलाकारों की पत्नियों की गाथा है!

निम्नमध्यवर्गीय तबके से आयी कार्यकर्ता सुगन्धि की कहानी से लेकर उच्च मध्यवर्गीय तबके की रिंकी भट्टाचार्य की कहानी में समानता के कई कोण सहज ही तलाशे जा सकते हैं। रिंकी की केस हिस्ट्री को सोशल साइंसेज के संस्थानों में घरेलू हिंसा के तहत विश्लेषण का आधार बनाया जा रहा है पर साहित्य की हदों से इसे बाहर ही रखा जाता है। सच्चाई के सपाट बयान में कलात्मक सौन्दर्य के लिए ज्यादा जगह नहीं होती । बेबी कांबले (जीवन हमारा), कौसल्या बेसंत्री (दोहरा अभिशाप) और बेबी हालदार (आलो आंधारी) का बयान साहित्य में कारगर हस्तक्षेप है और इसलिए स्वागत योग्य है। इनमें सिद्धहस्त रचनाकारों की तरह शब्दों के लागलपेट में झूठ को सच और गलत को सही बनाने और बुनने का कौशल नहीं है और यही इन आत्मकथाओं की सबसे बड़ी
खूबी है।

कई बार आत्मकथा लिखने वाली इन लेखिकाओं पर मानसिक अस्वस्थता का आरोप भी लगाया जाता रहा है। दरअसल, पागलखाने या मानसिक अस्पतालों की चहारदीवारी के भीतर भी घोषित रूप से पागल औरतों के अपने संसर्ग में आये पुरुषों के बारे में दिल दहला देने वाले बयान एक भयावह सच होते हैं,  बजाय उन सदगृहस्थिनों के जो अपने पूरे होशोहवास में अपने पति की प्रतिष्ठ‍ित इमेज को खंडित होने से बचाये रखने के लिए उसकी बदकारियों के सामने हमेशा अपने ढाल कवच के साथ पति की सुरक्षा में हाथ फैलाकर खड़ी हो जाती हैं। जो नहीं खड़ी होतीं,  वे रिंकी की तरह पुरुष समाज के ढेले और पत्थरों का शिकार होती हैं।

चुनाव हर महिला का अपना है, वे सदगृहस्थिनों की एक अंतहीन जमात में बिला जाएं या जनमघुट्टी में घोल कर पिला दी गई चुप्पी को तोड़कर बगावत पर आमादा हो जाएं !!
(कथादेश : मार्च 2006 से साभार)