अबरोध बासिनी

रुकैया सखावत हुसैन
सम्पादन,  अनुवाद और प्रस्तुति नासिरूद्दीन हैदर खाँ

(  आज, ( 9 दिसम्बर )   के ही दिन  19वीं और 20 वीं सदी की प्रसिद्ध लेखिका रुकैया सखावत हुसैन का इंतकाल हुआ था . वरिष्ठ पत्रकार और अनुवादक नासिरुद्दिन हैदर खां ने  रुकैया की किताब 'अबरोध बासिनी' का मूल बांग्ला से हिन्दी में अनुवाद किया है. स्त्रीकाल के पाठकों के लिए उसकी प्रस्तुति नासिरुद्दिन के द्वारा. रुकैया यहां अफसाने नहीं पर्दॆ की बेबसी  में जीती महिलाओं की हकीकतें बता रही हैं .  ) 

सम्पादक /अनुवादक  की टिप्पणी

हिन्दी का अवरोध बांग्ला का 'अबरोध' है। 'अबरोध बासिनी' यानी ऐसी महिलाएं जो हर तरह के अवरोध के बीच जिंदगी जी रही हैं। वह अवरोध सिर्फ पर्दानुमा कोई कपड़ा नहीं है। इसमें हर वह चीज शामिल है, जो महिलाओं की जिंदगी को किसी खास दायरे में कैद करती है। रुकैया ने इसे बहुत अच्छे तरीके से समझा और महसूस किया था। वह खुद अवरोधों के बीच रहीं लेकिन उससे जद्दोजहद भी करती रहीं।

रुक़ैया सखावत हुसैन (1880-1932) ने अवरोध में रहने वाली महिलाअों की जिंदगी के किस्से हमारे सामने 'अबरोध बासिनी' के रूप में 1931 में पेश किए। इसकी भूमिका में वह लिखती हैं, 'कई ऐतिहासिक और आंखन देखी सच्ची घटना के आधार पर हंसने- रुलाने वाली अबरोध बासिनी रची गई।' एकबारगी यह भले ही लगे कि यह उस वक्त की बात है पर ऐसा है नहीं। मुमकिन है, यह  ठीक उसी शक्ल में आज न हो पर महिलाओं की जिंदगी में अवरोध की निशानी आज भी देखी जा सकती है। इसीलिए आज भी इसे पढ़े जाने की जरूरत है। 


रुकैया
महिलाओं की आवाज

आज से 80 साल पहले यानी 9 दिसम्बर 1932 की सुबह एक ऐसी महिला इस दुनिया से अलविदा कह गई जिसकी चिंता में भारतीय महिला, खासकर मुसलमान महिला की जिंदगी आखिरी वक्त तक थी। जिंदगी के आखिरी लम्हे के चंद घंटे पहले वह 'महिलाओं के ह़क' पर एक लेख की शुरुआत कर रही थी। यह महिला भारतीय नारीवादी आंदोलन की अगुआ लोगों में थी। मुसलमानों में तो ये जाहिर तौर पर पहली पांत की विचारक थीं।महिलाओं की जिंदगी का आईना दिखाने और बेहतर दुनिया बनाने के लिए उसने लेख लिखे, कहानियाँ लिखीं, उपन्यास लिखें, व्यंग्य रचनाएं लिखीं, संगठन बनाया और मुसलमान लड़कियों के लिए सौ साल पहले एक स्कूल भी कायम किया।

यह महिला रुकैया खातून उर्फ रुकैया सखावत हुसैन थीं। रुकैया पैदा भले ही जमीदार घर में हुईं पर उनकी जिंदगी में यह खानदानी विरासत ढाल नहीं बना। महिलाओं के लिए आवाज उठाने वालों को जिन समाजी झंझावत से गुजरना पड़ता है, रुकैया को उन सबसे गुजरना पड़ा। उस समाज में जहां न कोई राम मोहन राय था न ईश्वरचंद विद्यासागर, रुकैया एक मशाल की तरह जलीं और खुद को होम कर दिया।

रुकैया की एक-आध रचनाएं हिन्दी में मिलती हैं और उनका स्रोत भी अंग्रेजी है। रुकैया का बड़ा रचना संसार बंगला में है। शायद यही वजह है कि दुनिया भर के नारीवाद की  चर्चा तो होती है लेकिन जितनी शिद्दत से रुकैया की चर्चा होनी चाहिए वह बंग्लादेश और थोड़ा बहुत अपने बंगाल को छोड़ कहीं और नहीं दिखती। यह भी चर्चा उनके जन्म और कायमशुदा स्कूल के शताब्दी साल में हुई। उनकी रचनाओं में विचार है। ख्वाब है। भविष्य की दुनिया के बीज हैं। 1903-4 में वह एक लेख में पूछती हैं, 'इसे पढ़ने वाली मेरी प्यारी बहनो। क्या आपने कभी अपनी बुरी हालत के बारे में फिक्र  किया है? बीसवीं शताब्दी के इस तहज़ीब व तमद्दुन वाले समाज में हमारी क्या हैसियत है? दासी यानी ग़ुलाम! हम सुनते हैं कि धरती से ग़ुलामी का निज़ाम ख़त्म हो गया है लेकिन क्या हमारी ग़ुलामी ख़त्म हो गई है? ना। हम दासी क्यों हैं?'

2.

अंग्रेजों का राज। उन्नीसवीं शताब्दी का आखिरी दौर। बंगाल में नवजागरण की मुहिम उरुज पर लेकिन इसकी रोशनी सब पर एक समान नहीं थी। समुदाय में यह हिन्दुओं पर असर डाल रही थी और हिन्दू महिलाओं की जिंदगी पर खुलकर चर्चा हो रही थी। नवजागरण के अगुआ भी इसी समुदाय से थे। मुसलमान और खासकर मुसलमान महिलाएं इससे अछूती थीं। मुसलमान मर्दों पर धीरे-धीरे नवजागरण का असर तो दिखने लगा लेकिन महिलाएं घर के चहारदीवारी में ही सांस लेने के लिए जद्दोजेहद कर रही थीं।

इसी माहौल में भारत के उत्तरी बंगाल के रंगपुर जिले के पैराबंद में एक जमीदार जहीरुद्दीन मोहम्मद अबू अली हैदर साबिर रहते थे। घर में किसी चीज की कमी नहीं। खुद पढ़ने लिखने के शौकीन। अरबी, फारसी, उर्दू, पश्तो, अंग्रेजी और बांग्ला जानते थे। उस वक्त बंगाल के भद्र मुसलमानों की जबान उर्दू थी। बंगला आमजन की जबान थी। इसलिए उन्हें बंगला बोलने और पढ़ने में हेठी का अहसास होता था।

सी जमीदार के घर 1880 में एक बच्ची का जन्म होता है। बच्ची को रुकु यानी रुकैया खातून नाम दिया गया। बाद में वही रुकैया सखावत हुसैन के नाम से मशहूर हुई। बंगाल में रहते हुए भी जमीदार साहेब के घर की जबान उर्दू थी। बेटों के लिए उन्होंने ऊंची तालीम का इंतजाम किया। वह बेटियों को तालीम दिए जाने के खिलाफ नहीं थे पर जमाना उनके साथ नहीं था। उस वक्त अमीर कुल की बेटियों को पढ़ाने की कोई व्यवस्था नहीं थी। जो पढ़ाना चाहता तो उसका विरोध होता। रुकैया में भी पढ़ने की जबरदस्त ललक थी। उसकी इस ललक को बड़ी बहन और भाई ने समझा। भाई ने बहन को सबकी नजरों से छिपाकर पढ़ाया। सोलह साल की उम्र में रुकैया की शादी 1896 में उम्र में काफी बड़े पर एक जहीन, पढ़े-लिखे, तरक्कीपसंद और अंग्रेज सरकार के अफसर सखावत हुसैन से हो गई। सखावत हुसैन बिहार के भागलपुर के रहने वाले थे। 1909 में सखावत हुसैन की मौत तक रुकैया यहीं रहीं।

ये चौदह साल एक ऐसी नारीवादी विचारक महिला के बनने के थे जो महिलाओं और खासकर मुसलमान महिलाओं को बराबरी का हक दिलाने के लिए जमीन तैयार कर रही थी। रुकैया इस मामले में पहली खातून हैं जसने शिद्दत के साथ महिलाओं के हक में न सिर्फ लिखा बल्कि  पति की मौत के बाद पहले भागलपुर और फिर कोलकाता में मुसलमान लड़कियों के लिए एक स्कूल की स्थापना की। रुकैया की रचनाएं ज्यादातर बंगला में और कुछ अंग्रेजी में हैं। रुकैया की रचनाएं बंगला की ढेरों पत्र-पत्रिकाओं में छपीं और उसने उस वक्त के समाज में खासी हलचल पैदा कर दी थी। रुकैया का इंतकाल 9 दिसम्बर 1932 को कोलकाता में हुआ। यह साल उसकी 80वीं बरसी का है।

रचनाएं

सुलतानाज ड्रीम (अंग्रेजी में लघु विज्ञान उपन्यास), मोतीचूर, खण्ड-1 और 2 (लेखों का दो संग्रह), पदमराग (उपन्यास), अबरोध बासिनी (व्यंग्य रचना संग्रह), कई कविताएं, कहानियां, अंग्रेजी और बंगला में ढेरों लेख 'रुकैया रचनावली' में हैं।

अबरोध बासिनी : रुकैया सखाबत हुसैन 

निवेदन

कई ऐतिहासिक और आँखन देखी सच्ची घटना के आधार पर हँसने-रुलाने वाली 'अबरोध-बासिनी' रची गई। पाठक-पाठिकागण ज़्यादातर जगहों पर हँसेंगे/हँसेंगी, इसमें कोई शक नहीं है। हालाँकि किसी-किसी जगह पर उनके मन में हमदर्दी जागेगी और मुझे य़कीन है कि वे 'ताहेरा' मरहूम की अकाल मौत पर दो बूँद आँसू गिराने से अपने आपको रोक नहीं पाएँगी/पाएँगे।

मौलवी मोहम्मद ख़ैरूल अनाम खाँ साहेब ने ख़ास जोश दिखाते हुए 'अबरोध बासिनी' को छापने का पूरा भार उठाया है। और क्या बोलूँ, उनकी ही गुज़ारिश पर यह किताब की शक़्ल में छप रहा है। उन्हें दिल से शुक्रिया अदा करती हूँ।

रिटायर स्कूल इंस्पेक्टर परम भक्तिभाजन काबिल ज्ञानी मौलवी अब्दुल करीम साहेब, बी.ए. एम.एल.सी. ने मुझ पर बड़ा एहसान करते हुए 'अवरोध बासिनी' की भूमिका लिखी है। मैं दिल से उनकी एहसानमंद हूँ।

मैं जब कार्सियांग और मधुपुर घूमने गई तो वहाँ से ख़ूबसूरत पत्थर इकट्ठे (जमा) कर लाई, जब उड़ीसा और मद्रास के सागर तट पर घूमने गई तो अलग-अलग रंग और आकार के शंख-सीप इकट्ठे (जमा) कर ले आई। ... और अब जिंदगी के 25 साल समाजी ख़िदमत में लगाते हुए कठमुल्लाओं की गालियाँ और लानत-मलामत इकट्ठा (जमा) कर रही हूँ।

हज़रत राबिया बसरी ने कहा है, 'या अल्लाह! अगर मैं दोज़ख़ के डर से इबादत करती हूँ तो मुझे दोज़ख़ में ही डाल देना। और अगर बहिश्त यानी जन्नत की उम्मीद में इबादत करूँ तो मेरे लिए बहिश्त हराम हो।' अल्लाह के फजल से अपनी समाजी ख़िदमत के बारे में मैं भी यहाँ यही बात कहने की हिम्मत कर रही हूँ।

मेरा तो रोम-रोम गुनाहगार है। इसीलिए इस किताब की ग़लतियों और कमियों के लिए इस बार पाठक-पाठिकागण से मा़फी की गुजारिश नहीं की है।

विनीता
ग्रंथकर्त्री 

अबरोध-बासिनी

सालों-साल पर्दे में रहते-रहते अब हम इसके आदी हो चुके हैं। इसलिए पर्दे के ख़िला़फ बोलने के लिए हमारे और ख़ासकर मेरे पास कुछ नहीं है। अगर किसी मछुआरन से यह पूछा जाए कि, 'सड़ी हुई मछली  की बदबू अच्छी लगती है या ख़राब?'- तो वह क्या जवाब देगी?

यहाँ मैं अपनी बहनों को जाती तज़ुर्बे वाले कई वा़कये का तोह़फा दूँगी। उम्मीद करती हूँ, उनको ये दिलचस्प लगेगा।

यहाँ यह भी सा़फ करना बहुत ज़रूरी है कि सारे भारत में इज़्ज़तदार घरों की शरी़फ बेटियों का पर्दा सि़र्फ मर्दों से नहीं है। इनका पर्दा तो महिलाओं से भी है। जिन लड़कियों की शादी नहीं हुई है, उनका पर्दा तो ऐसा होता है कि उन्हें काफी नज़दीकी महिला रिश्तेदार और घर की नौकरानी को छोड़, कोई दूसरी महिलाएँ देख नहीं पाएँ।

शादीशुदा महिलाएँ भी तमाशा दिखाने वाली या इन जैसी और महिलाओं से भी पर्दा करती हैं। जो जितना पर्दा करती हैं, घर के अंदर उल्लू की तरह जो जितना कोने में छिपी रहती हैं, वे उतनी ज़्यादा शरी़फ हैं।

शहर में रहने वाली बीबियाँ तो मिशनरी मेम को देखते ही हड़बड़ाकर भाग खड़ी होती हैं। मेम तो मेम- ये तो साड़ी पहने वाली ईसाई और बंगाली महिलाओं को देखते ही अपने कमरे में भाग जाती हैं और दरवाज़ा बंद कर लेती हैं।

एक.

यह काफी पुराना वा़कया है- रंगपुर ज़िले के पैराबंद गाँव के ज़मीदार का घर। दोपहर के करीब एक-दो बज रहे हैं। ज़मीदार की बेटियां ज़ोहर का नमाज़ पढ़ने के लिए वज़ू कर रही थीं। बा़की सभी ने तो वज़ू कर लिया था सिर्फ 'आ' खातून नाम की साहेबज़ादी अब भी आँगन में वज़ू कर रही थी। आलता की माँ यानी मामा बदना हाथ में लिए वज़ू के वास्ते पानी गिरा रही थी। ठीक उसी वक्त एक मस्त लम्बी चौड़ी काबूली स्त्री आँगन में पहुँच गई! 

हाय, हाय, यह कौन सी आ़फत है! आलता की माँ के हाथ से बदना छूट कर गिर पड़ा। वह चिल्लाने लगी- 'अरे, अरे! ये मर्द यहाँ कैसे आ गया!'

वह औरत हँसते हुए बोली, 'हे, मर्दाना! हम मर्दाना है?'

उसकी आवाज सुनते ही 'आ' साहेबज़ादी की तो जैसे जान ही निकल गई। वह पूरी ता़कत से अपनी चाची जान के पास भागी। लड़की ने हाँफते-हाँफते और काँपते-काँपते कहा, 'चाची अम्मा! शलवार पहने एक औरत आई है!!'

चाची जान चौंकी और घबराकर पूछा, 'क्या उसने तुम्हें देख लिया?'

'आ'' ने सुबुकते हुए सिर हलाकर कहा, 'हाँ!'

यह सुनते ही बाकी लड़कियों ने घबराकर नमाज बीच में ही छोडा़ और दरवाजा बंद कर दिया- ताकि काबूली औरत इन कुँवारी लड़कियों को देख न सके।

शायद कोई बाघ-भालू के डर से भी इस तरह घबराकर दरवाज़ा बंद नहीं करेगा!



दो.

यह भी एक ऐतिहासिक घटना है। पटना के एक बड़े आदमी के घर शादी है।
इस मौ़के पर कई मेहमान ख़ातून आ रही हैं। बहुत सारी ख़ातून शाम के वक्त भी आ रही हैं। इन्हीं में एक मेहमान हशमत बेगम भी हैं। 

पालकियों के आने का सिलसिला चल रहा है। मामा आने वाली हर पालकी के दरवाज़े खोलती हैं। बेगम साहिबाओं का हाथ पकड़ कर पालकी से उतारकर उन्हें घर के अंदर ले जा रही है। इसके बाद कहार खाली पालकी को हटाकर एक ओर ले जा रहे हैं। एक-एक करके पालकियों के आने का सिलसिला जारी है। इसी बीच एक कहार ने आवाज लगाया- 'मामा! सवारी आया।' मामा धीरे-धीरे चलते हुए बाहर आ रही है। जब तक मामा हशमत बेगम की पालकी तक पहुँचती, कहारों ने सोचा 'सवारी' तो नीचे उतर चुकी होगी। उन्होंने पालकी उठाई और ले जाकर एक किनारे रख दिया। इसके बाद एक और पालकी आई। मामा ने पालकी का दरवाज़ा खोला और मेहमान को अंदर ले गई। यह सिलसिला चलता रहा।

जाड़े का दिन। कहार 'सवारियों' को उतारने के बाद ख़ाली पालकियों को एक किनारे बड़े से बरगद के पेड़ के नीचे रख दे रहे हैं। वहीं पास में ही कहार मस्ती करते हुए खाना बना रहे हैं। शादी वाले घर से उन्हें जमकर बख्शीश मिली है। रात में उन्हें और 'सवारी' ढोने की भी ि़फक्र नहीं है। इसलिए वे ख़ूब मस्ती में हैं- कोई  गाना गा रहा हैं, कोई हुक्का पी रहा, कोई खैनी खा रहा- इस तरह मस्ती करते, खाते-पीते रात के दो बज गए।

इस बीच जब मेहमान बेगम साहिबा खाने के लिए बैठीं तो पाया कि हशमत बेगम अपने छह महीने के बच्चे के साथ कहीं नज़र नहीं आ रहीं। किसी ने कहा, बच्चा छोटा है इसी वजह से नहीं आई होंगी। किसी ने कहा, उन्हें यहाँ आते हुए तो देखा था। जितनी मुँह उतनी बातें।

दूसरे दिन सुबह एक-एक कर मेहमानों की विदाई होने लगी। ख़ाली पालकी एक-एक कर आती और अपनी-अपनी 'सवारी' को लेकर चली जाती। कुछ पल बाद एक और 'खाली' पालकी आकर दरवाज़े पर खड़ी हुई। पालकी का दरवाज़ा खोला गया तो देखा गया कि हशमत बेगम बेटे को गोद में लिए बैठी हैं। पूस की सर्द लम्बी रात उन्होंने इसी तरह पालकी में बैठे-बैठे काटी थी!

हुआ यों कि हशमत बेगम पालकी से बाहर निकलतीं, इससे पहले ही कहार पालकी उठाकर ले गए- लेकिन उन्होंने इस डर से अपने मुँह से एक ल़फ्ज़ नहीं निकाले कि कहीं कहार उनकी आवाज़ न सुन लें। बच्चे को भी अपनी छाती से चिपटाकर रखा ताकि वह रोए नहीं- ताकि ऐसा न हो कि कहीं बच्चे का रोना सुनकर कोई पालकी का दरवाज़ा ही खोल कर न देख ले!

ख़ैर, जो तकली़फ न बर्दाश्त कर सके तो फिर उस 'अबरोध वासिनी' की बहादुरी ही क्या!

तीन.
लगभग 40-45 साल पुरानी घटना है।
कुछ घरों की बंगाली ज़मीदारों की माँ, खाला, बुआ, बेटी और कई लोग एक साथ हज करने जा रहे थे। उनकी तादाद 20-25 के करीब थी। वे कलिकता रेलवे स्टेशन पहुँचे। इसके बाद साथ आए मर्द किसी काम के वास्ते स्टेशन से कहीं बाहर चले गए। लेकिन ज़मीदार साहब अपने एक ख़ास और भरोसेमंद मर्द को बेगम साहिबाओं की हि़फाज़त के लिए छोड़ गए। इन शरी़फ साहब को लोग हाजी साहब बोलते थे। हम भी यही बोलेंगे। हाजी साहब बेगम साहिबाओं को वेटिंग रूम में बिठाने की हिम्मत नहीं जुटा पाए। उनके समझाने-बुझाने और सलाह के बाद सभी बीबी साहिबा मोटे-मोटे काले कपड़े का बुर्का पहने हुए प्लेटफार्म पर ही उकड़ू होकर बैठ गईं। हाजी साहब ने एक ख़ूबसूरत शतरंजी (मोटा और भारी रंगीन दरी जैसा) उनके ऊपर डाल कर उन्हें ढक दिया। इस हालत में ये सब बेचारी बड़े-बड़े सामान की गठरी या ढेर सारे पार्सल की तरह दिख रही थीं। इन लोगों को इस तरह ढक कर रखने के बाद हाजी साहेब एक कोने में खड़े हो कर पहरा दे रहे थे। सि़र्फ अल्लाह ही जानता है कि हज के लिए निकलीं ये बीबियाँ इस हालत में कितने घंटे तक इंतज़ार करती रहीं। ... और यह भी सि़र्फ अल्लाह ताला का ही करम रहा कि इनका दम घुटने से नहीं निकला।

जब ट्रेन आने का व़क्त हुआ तो कई अंग्रेज़ मुलाज़िम वहाँ पहुँचे और टूटी-फूटी हिन्दी में हाजी साहब से बोले, 'मुंशी! तोमारा असबाब हियासे हाटा लो। अभी ट्रेन आवेगा। प्लेटफार्म पर ख़ाली आदमी रहेगा। आसबाब नहीं रहेगा।' हाजी साहब हाथ जोड़ कर बोलें, 'हुजूर, एइ सब आसबाब नाही- औरत है।' एक मुलाज़िम को य़कीन नहीं हुआ। उसने एक 'असबाब' को जूते से ठोकर मारते हुए कहा, 'हा, हा-एइ सब आसबाब हटा लो।'

बीबी साहिबाओं ने पर्दे की लाज रखते हुए जूते की ठोकर खाना कुबूल किया लेकिन मुँह से एक ल़फ्ज़ नहीं निकाला।

छह.

ढाका जिले के एक ज़मीदार के बड़े शानदार घर में भरी दुपहरिया
आग लग गई। घर का सामान जल कर राख़ हो गया- तब भी कोशिश कर घर के कई सामान, फर्नीचर वग़ैरह निकाल लिए गए। तब ही लोगों को घर की औरतों को भी  बाहर करने का ख़्याल आया। अब अचानक पालकी की ज़रूरत आन पड़ी। पूरे गाँव में भी एक साथ दो-चार पालकी कहाँ मिलेगी? आख़िर में तय पाया कि एक बड़ी रंगीन मसहरी (मच्छरदानी) के अंदर बीबी लोग रहेंगी। मसहरी के चार कोने को बाहर से चार लोग पकड़कर ले कर चलेंगे। यही हुआ- आग के बीच मसहरी को पकड़कर चार जन दौड़ने लगे। मसहरी के अंदर चल रही बीबियाँ उसी तेज़ी से नहीं दौड़ पाईं और लड़खड़ाकर गिर पड़ीं। दाँत और नाक टूट गई। कपड़े फट गए। आख़िरकार, धान के खेत और काँटों के बीच भागते-भागते मसहरी भी तार-तार हो गई।

अब और कोई चारा नहीं बचा था। बीबियाँ धान के एक खेत में छिप कर बैठ गईं। शाम में आग बुझ गई। तब पालकी से एक-एक कर उन्हें घर लाया गया।


नौ.

एक मौलवी साहब का इंत़काल हो चुका था। घर में अब सि़र्फ एक बेटा और उनकी पत्नी बची थीं। मौलवी साहब कुछ जमा पूँजी छोड़कर नहीं गए थे। इसीलिए उनकी पत्नी का़फी तकली़फ से घर-बार चलातीं। बेटे की शादी के लिए उसने का़फी कष्ट करके कुछ ज़ेवर इकट्ठा किए। ज़ेवर बनवाने में का़फी पैसा खर्च हो गया। शादी से दो-तीन दिन पहले सेंध काटकर कुछ चोर घर में घुस गए। उस कमरे में उनके साथ एक नौकरानी भी सो रही थी। चोर की आहट पाकर वह उठकर बैठ गईं और धीरे-धीरे नौकरानी को जगाया। चोर ने सोचा, सर्वनाश- अब यहाँ से भागा जाए!

लेकिन चोर का एक साथी बोला, अच्छा, थोड़ी देर रुक कर देखा जाए कि क्या होता है? हुआ तो बहुत मज़ा-

बीबी साहिबा का इशारा पाकर नौकरानी ने एक कपड़े से उनके खाट के सामने में पूरी तरह पर्दा बनाकर टाँग दिया। इसके बाद चाबी का गुच्छा दिखाते हुए चोरों को बोली, 'भई। तुम सब पर्दे के इस तऱफ न आना। तुम्हें जो चाहिए ले लो, मैं संदूक खोलकर बाहर कर दे रही हूँ।' फिर उसने सभी ़कीमती कपड़े और ज़ेवर निकाल कर चोरों के हवाले कर दिए। चोरों ने गहनों को उलट-पुलट कर देखने के बाद पूछा, 'नथ कहाँ है?- लगता है संदूक में ही रह गया है?' मालकिन का इशारा पाकर नौकरानी बोली, 'दुहाई! दुहाई! तुमलोग इस तऱफ नहीं आना- अम्मा सा'ब ने सि़र्फ नथ ही रखी है। परसों ही तो शादी है। अब कोई गहना तो बचा नहीं- नथ भी नहीं रहेगा तो ब्याह कैसे होगा? इसके बाद भी अगर तुम्हारी इच्छा है तो ले जाओ - नथ भी ले जाओ- पर्दे के इस तऱफ नहीं आना।'

चोर ख़ुशी से लबरेज़ आपस में बातचीत करते-करते चले गए। उस वक़्त रात के तीन-चार बजे थे। इतनी आसानी से इतना माल मिलने की ज़बरदस्त ख़ुशी में चोर का़फी ज़ोर-जोर से बात करने लगे। रास्ते में चौकीदार ने उनकी बात सुन ली और पकड़ने के लिए उनके पीछे दौड़ा। चोर भागे। एक चोर ठोकर खाकर गिर पड़ा। चौकीदार ने उसे पकड़ लिया। जब कोई चारा नहीं बचा तो वह चौकीदार के साथ वह घर दिखाने के लिए चल पड़ा, जहाँ से चोरी की थी। तब तक भोर हो चुका था। चौकीदार जब पहुँचा तो पाया कि बीबी साहिबा उस वक्त भी पर्दे के अंदर से बाहर नहीं निकली थीं- 'अगर वे बदमाश कहीं फिर आ गए' तब भी वे उनको देख लेते तो! नौकरानी को भी उन्होंने शोर मचाने नहीं दिया। क्योंकि कहीं ऐसा न हो कि शोरगुल सुनकर कोई मर्द उनके घर में न घुस जाए! चोरों के हाथों अपना सब कुछ गँवाकर भी उन्होंने पर्दे के इज्ज़त की हि़फाज़त करना ज़रूरी समझा!

दस.

किसी ज़मीदार के घर की बड़ी बहू अचानक छोटे भाई की बीबी को लाने उसके ससुराल गई। अचानक पहुँची तो देखा कि नई नवेली बहू की भाभी उसे भात खिला रही है। थाली में भात के साथ एक हरी मिर्च भी थी। उसने बड़े ही मासूमियत से पूछा, 'हमारी बहू को तीता खाना अच्छा लगता है क्या?' बहू की भाभीजान ने जवाब दिया, 'हाँ, बहुत ही तीता खाती है।'

दूसरे दिन वह बहू को लेकर नौका से कलिकाता चली। रास्ते में तीन-चार दिन नाव में ही रहना पड़ा। इस दौरान वह जो कुछ भी खाना पकवातीं, उसमें ज़्यादा मिर्चा डलवा देतीं। हालाँकि असल बात तो ये थी कि बहू बिल्कुल ही तीता खाने की आदी नहीं थी। खाते व़क्त हरी मिर्च की खुशबू सूँघ-सूँघ कर भात खाने की आदत थी। इसी वजह से हँसी-ठिठोली में उसकी भाभी ने तीता खाने की बात कह दी थी। नतीजतन बेचारी के जान पर बन आई।

भाई-बहू के आदर में जेठानी हरी मिर्च के साथ अपने पास बैठाकर उसे खाना खिलाती। बहू की दोनों आँखों से झर-झर कर पानी बहता- मुँह और ज़बान जल जाते- तब भी बड़ी जेठानी को बोलने के लिए मुँह से बोल नहीं फूटे कि वह तीता नहीं खाती!! ओह... सत्यानाश! एक तो नई नवेली बहू- उस पर से बड़ी जेठानी- जान जाए पर मुँह से बोल नहीं फूटे।

ग्यारह.

सन् 1924 में मैं आरा गई थी। मेरी दो नातिनों की शादी एक साथ हो रही थी। उसी शादी के लिए बुलावा आया था। मेरी नातिनों के घर का नाम मंगू और सबू है। ये बेचारी उस व़क्त 'माईया ख़ाना' में थीं। कलकत्ता में तो शादी के सिर्फ 5-6 दिन पहले लड़कियों को 'माईया ख़ाना' नाम के बंदीख़ाना में रखते हैं। लेकिन बिहार मेें 5-7 महीने तक लड़कियों को इस तरह एक कोने में जेल की बंदी की तरह रखकर अधमरा किया जाता है।

मैं मंगू के जेलख़ाना में गई लेकिन बहुत ज़्यादा देर वहाँ नहीं बैठ पाई - उस अँधेरी बंद कोठरी में मेरा दम घुटने लगा। आखि़रकार एक दिन एक जंगला खुलवा दिया। दो मिनट में ही एक समझदार बीबी आईं और बोलने लगीं- 'दुल्हिन को हवा लगेगी।' उन्होंने जंगला बंद करवा दिया। मैं वहाँ और रुक नहीं पाई और उठकर चली आई। मैं सबू के जेलख़ाना में भी गई, वहाँ भी बैठ नहीं पाई।  लेकिन वे बेचारी छह महीने से इन्हीं अंधेरे जेल में बंद थीं। आखि़र में सबू को हिस्टीरिया रोग हो गया। इसी तरह हमलोगों को पर्दे (अवरोध) में रहने का आदी बनाया जाता है।


बारह.

पश्चिम देश की एक हिन्दू बहू अपनी सास और शौहर के साथ गंगा स्नान करने गई। स्नान करने के बाद जब लौटने की बारी आई तो उसे भीड़-भाड़ में अपने शौहर और सास कहीं दिखाई नहीं पड़े। अंत में वह एक साहब के पीछे-पीछे चल दी। कुछ देर बाद पुलिस का हल्ला हुआ। - उस साहब को कांस्टेबिल ने पकड़ा और  कहा- 'तुम फलाँ शख़्स की बीबी को भगा कर ले जा रहे हो।' उन्होंने चौंकते हुए पीछे मुड़कर देखा: अरे, यह किसकी बीबी मेरी धोती का कोना पकड़े चली आ रही है। - पूछने पर बहू ने जवाब दिया, वह हमेशा घूँघट में रहती है। उसने अपने शौहर को आज तक अच्छे तरीके से देखा नहीं है।  शौहर ने पीले पार वाली धोती पहन रखी है, यही देखा था। इन साहब की धोती की पार भी पीले रंग की है, यही देखकर उनके साथ चल दी।

पन्द्रह.

हुगली में एक अमीर आदमी के घर में शादी के मौ़के पर एक कमरे में ढेर सारी बीबियाँ इकट्ठा थीं। रात करीब 12 बजे उन्हें लगा कि कोई बाहर से कमरे का दरवाज़ा ठेल रहा है। कभी ज़ोर से तो कभी आहिस्ता। तरह-तरह से दरवाज़ा ठेलने की कोशिश हो रही है। सभी बीबियाँ जाग गईं और डर के मारे थर-थर काँपने लगीं। उन्हें पक्का य़कीन हो गया कि चोर दरवाज़ा तोड़ कर अंदर घुस आएगा और सभी बीबियों को देख लेगा। तब ही एक चालाक बीबी भी ने सभी ज़ेवर उतार कर एक पोटली में बाँधा और छिपा कर रख दिया। फिर बुर्का पहन कर दरवाज़ा खोला। दरवाज़े के बाहर थी- एक कुतिया! उसके दो बच्चे किसी तरह कमरे में रह गए थे और वह बाहर थी। बच्चों के पास आने के लिए वह कुतिया दरवाज़ा ठेल रही थी।

सोलह.

बिहार शरी़फ के एक बड़े आदमी दार्जीलिंग जा रहे थे।
उनके साथ एक दर्जन 'आदमियों का बोझा' यानी ख़ाला, फूफू सहित सात महिलाएँ और 6 से 17 साल की पाँच लड़कियाँ भी थीं। वह ट्रेन और स्टीमर बदलने के दौरान हर जगह पालकी का इंतज़ाम करते। मनिहारी घाट, सकरीगली घाट वगैरह जगहों पर पालकी  का इंतज़ाम था। बीबी लोगों को पालकी में भर कर स्टीमर के डेक पर रखा जाता। फिर ट्रेन पर चढ़ते व़क्त उन लोगों को पालकी के साथ माल गाड़ी पर रखा जाता। लेकिन ई.बी. रेलवे लाइन पर और पालकियाँ नहीं मिलीं। तब वे ट्रेन रिजर्व कराकर सेकेण्ड क्लास डिब्बे में बैठने पर मजबूर हुए।

सिलीगुड़ी स्टेशन पर भी पालकी ढोने वाले कहार नहीं मिले। बड़ी ही मुसीबत थी- बीबी लोग दार्जीलिंग की ट्रेन में कैसे चढ़ेंगी? इसके बाद दो चादरों को चार जन ने दो तरफ से पकड़ा- इस चादर के बीच-बीच में बीबी लोग चलीं। बदनसीब पर्दानशीं पहाड़ों के उबड़-खाबड़ रास्ते पर नौकरों के ताल में ताल मिलाकर नहीं चल पा रही थीं। कभी दाहिने तऱफ का पर्दा आगे जाता तो बायाँ वाला पर्दा पीछे रह जाता। कभी बाएँ तऱफ का पर्दा आगे खिसक जाता और दाहिने का पर्दा पीछे। बेचारी बीबियाँ तो चलने में और ही ना़काबिल- वे कभी पर्दा से निकलकर आगे जातीं तो कभी पीछे रह जातीं! किसी का जूता बाहर निकल गया तो किसी का दोपट्टा उड़ गया!

सत्रह.

करीब 14 साल पहले हमारे स्कूल में लखनऊ की एक टीचर थी-
अख़्तर जहाँ। उनकी तीन बेटियाँ इसी स्कूल में पढ़ती थीं। एक दिन वह आजकल की लड़कियों की बेशर्मी की शिकायत करते-करते अपनी बेटियोकी बेशर्मी के बारे में बताने लगीं। वह का़फी तकलीफ में थीं। बात-बात में उन्होंने अपनी ब्याहता ज़िंदगी का एक वा़कया सुनाया- 11 साल की उम्र में उनकी शादी हो गई थी। जब वह ससुराल गईं तो उन्हें घर के एक कोने की कोठरी में रखा गया। छोटी ननद दिन में तीन-चार बार उनके पास आती और जरूरी काम निपटाने के लिए बाथरूम ले जाती। एक दिन न जाने क्या वजह हुई, वह का़फी देर तक उनका हालचाल लेने नहीं आई। इस बीच नई नवेली दुल्हन बेचारी बाथरूम जाने के लिए बेचैन हो रही थी। लखनऊ की तऱफ लड़कियों को दहेज में ताँबे के बड़े-बड़े पानदान मिलते हैं। उनके शानदार पानदान में कई ख़ाने थे। उन्होंने पानदान खोला। सुपारी वाला डिब्बा बाहर निकाला और सारी सुपारी को एक रूमाल में बाँध दिया। इसके बाद उन्होंने जिस चीज से उस खाली डिब्बे को भरकर खाट के नीचे रख दिया, वह यहाँ लिखने लायक नहीं है! शाम के व़क्त उनके नैहर से एक नौकरानी बिछौना ठीक-ठाक करने आई। उन्होंने भर्राए गले से नौकरानी से डिब्बे की बुरी हालत की कहानी बयान की। वह उन्हें दिलासा देते हुए बोली, 'ठीक है, तुम रो मत। मैं कल ही डिब्बे पर फिर से कलाई चढ़वा कर ले आऊँगी। सुपारी को अभी उसी तरह रूमाल में ही रखो।'

बीस.

एक पंजाबी बेगम साहिबा ने ये
किस्सा किसी उर्दू अख़बार में लिखा था: मैं कभी किसी गाँव में कुछ दिन के लिए गई थी। एक बार वहाँ के एक अमीर शख़्स के घर से मुझे बुलावा आया। वहाँ गई तो कुँवारी लड़कियों को का़फी 'मज़लूम' देखा। उनकी हालत देखकर मेरे दिल को गहरा सदमा पहुँचा।

मैं ठीक व़क्त पर उनके घर पहुँच गई। मैंने जानना चाहा, घर की बेटियाँ कहाँ हैं? सुनते ही किसी ने जवाब दिया कि सभी बावर्चीख़ाना में बैठी हैं। मैंने उनसे मिलने की ख़्वाहिश ज़ाहिर की। मुझे सिर्फ अकेले वहाँ बुलाकर ले जाया गया। बावर्चीख़ाना में ज़बरदस्त गर्मी थी और जगह भी छोटी सी। लेकिन कोई और उपाय न देखकर वहीं बैठ गई और इन 'मज़लूम' मीठे बोल बोलने वाली लड़कियों के साथ बात करने लगी।

एक बीबी ने हम पर नरमदिली दिखाते हुए कहा, 'तुमलोग होशियारी से छिपते हुए ऊपर चली जाओ।'

मैंने मन ही मन सोचा, मुमकिन है मर्दों के सामने आ जाने का डर हो तब ही उन्होंने होशियारी से छिपते हुए जाने को कहा। लेकिन बाद में पता चला, यह पर्दा तो घर में आने वाली आम महिलाओं से था। उन बीबी साहब का हु़क्म पाकर दो महिलाओं ने मोटा चादर पकड़कर पर्दा किया। हम सब इस चादर के बीच से होते हुए ऊपर चले गए।

ऊपर जाने पर मैं बड़े ही आ़फत में पड़ गई। मुझे लगा था कि छत के ऊपर आराम से बैठने के  लिए कोई कमरा होगा या बारिश से बचने के लिए कोई छज्जा ही होगा। लेकिन वहाँ तो कुछ नहीं था। एक तो कड़ी धूप, दूसरा बैठने के लिए कुछ भी नहीं। पूरी छत पर गीला गोईंठा छितरा पड़ा था। उसकी बदबू से तो जान निकली जा रही थी। बहुत तकली़फ कर एक नौकरानी ने एक खटिया ला दी। मरती क्या न करती, हम उसी पर बैठ गए। नीचे ढोल ताशे बज रहे थे। महि़फल जमी थी। लेकिन ये बदि़कस्मत लड़कियाँ किसी मुजरिम की तरह तेज़ धूप में बैठी गोईंठे के बदबू में साँस ले रही थीं। कोई भी इनके आराम के वास्ते ज़रा भी ख़्याल नहीं कर रहा था।

इक्कीस.

बंगदेश के एक ज़मीदार के घर किसी ख़ास शुभ मौ़के पर नाच-गाना हो रहा था। नर्तकियाँ बाहर लगे शामियाने के नीचे जहाँ नाच रही थीं, वह जगह घर की ड्योढ़ी के पास बने कमरे से दिखाई देता था। लेकिन घर की बीबियाँ ड्योढ़ी के पास बने इस कमरे में नहीं जाती थीं। बीबियों के लिए इस धरती पर नाच देखने और संगीत सुनने की जगह नहीं थी।

ज़मीदार साहब की तीन साल की उम्र की एक बेटी थी। लड़की ख़ूब गोरी थी। कोई उसे प्यार से चीनी गुडि़या कहता तो कोई मोम की नाज़ुक गुडि़या। नाम था साबेरा। भोर के व़क्त जब भैरवी की अलाप सुनकर सोते पक्षियों ने जागकर चहचहाना शुरू कर दिया तब ही साबेरा की खेलाई (आधुनिक जबान में 'आया') भी जागकर उठ गई। उसकी ख़्वाहिश हुई कि ज़रा नाच देख लिया जाए। लेकिन साबेरा तब भी सो ही रही थी। इसलिए खेलाई ने सोते हुए बच्चे को गोदी में लिया और नाच देखने के लिए ड्योढ़ी की ओर चली गई।

जब मुसीबत आती है तो कई तऱफ से आती है! ज़मीदार साहब इसी व़क्त बाहर के कमरे से होते हुए अंदर अपने कमरे में जा रहे थे। उन्होंने देखा, साबेरा को गोदी में लिए खेलाई गेट के पास खड़ी तमाशा देख रही थी। उनके हाथ में एक मोटी लाठी थी। उन्होंने उसी लाठी से खेलाई को पीटना शुरू कर दिया। खेलाई के चिल्लाने की आवाज़ सुनकर बीबियाँ ड्योढ़ी घर में भागी आईं। एक लाठी साबेरा के जाँघ पर भी लगी। तब भी जमीदार साहब के भाई के दोस्त दौड़ते हुए आए और कहा, 'छोटे साहब, क्या कर रहे हैं। क्या कर रहे हैं। बेटी को मार डालेंगे?' तुरंत ही लाठी का वार थम गया। गुस्से में ज़मीदार साहब ने कहा, 'मनहूस, तुझे नाच देखना है तो देख न। लेकिन मेरी बेटी को नाच दिखाने के लिए यहाँ क्यों लाई?'

हालाँकि असलियत तो यह थी कि बच्ची खेलाई के कँधे पर सर रखकर नींद में मग्न थी। उस बेचारी ने तो कुछ देखा ही नहीं। घर में कोहराम मच गया।

साबेरा के दूध जैसे झक सफेद जाँघ पर लाठी की चोट से एक काला भद्दा दाग बन गया था। इसे देखकर ज़मीदार साहब के दिल में गहरी चोट लगी। जैसे जीते जी मर गए हों।

इस तरह लाठी के ज़ोर पर हमें अवरोध के जेल में बंदी बनाया जाता है!


बाईस.

शाम का व़क्त था। सियालदह स्टेशन पर ट्रेन के इंतज़ार में एक साहेब प्लेटफार्म पर
चहलकदमी कर रहे थे। कुछ ही दूर पर एक और साहेब खड़े थे। उनके पीछे गद्दा-बिछौना और दूसरी चीज़ें रखी थीं। पहले वाले साहेब को जब थोड़ी थकान महसूस हुई तो वह उस गद्दे के ऊपर बैठने के लिए बढ़े। उनके बैठते ही बिछौना हिलने-डुलने लगा- वह तुरंत हड़बड़ा कर उठ गए। इसी व़क्त दूसरे साहब जो खड़े थे, दौड़ते हुए आए और गुस्से में बोले- 'मोशाय, यह क्या कर रहे हैं? आप स्त्रियों के सिर के ऊपर कैसे बैठने गए? बोलिए?' वह बेचारे चौंकते हुए बोले, 'माफ कीजिए, मोशाय! शाम के अँधेरे में मैं ठीक से देख नहीं पाया। इसलिए बिछौना-गद्दा समझ कर बैठ गया था। बिछौना जब हिलने-डुलने और चलने लगा तो मैं डर गया कि आख़िर ये माज़रा क्या है!'

चौबीस.

बिहार अंचल की शरी़फ घरानों की महिलाएँ आमतौर पर रेल के रास्ते जाते
व़क्त ट्रेन पर नहीं चढ़ती हैं। उन लोगों को बड़े से कपड़े से ढके पालकी के अंदर ठूँस दिया जाता है और यही पालकी ट्रेन के मालगाड़ी में चढ़ा दिया जाता है। नतीजतन, ये बीबियाँ रास्ते में पड़ने वाले किसी नज़ारे को नहीं देख पातीं। वे लोग ब्रुकबॉण्ड चाय के डिब्बे की तरह खाली टिन में पैक होकर देश का स़फर करती हैं। 

लेकिन इसी कलिकाता का एक नामी-गिरामी ख़ानदान तो इससे भी आगे है। उनके घर की बीबियों को अगर रेल के रास्ते कहीं जाना होता है तो सबसे पहले हर एक की पालकी में एक छोटा बिछौना रखा जाता है। साथ में ताड़ के पत्ते का हाथ पंखा और गिलास के साथ एक सुराही पानी भी। फिर उन्हें इन पालकियों में बंद कर दिया जाता है। इसके बाद, इन पालकियों को इनके बाप या बेटे के सामने नौकर ऐसे बंद करते हैं- (1) बड़े से कपड़े के पर्देसे पैक करते हैं। (2) उसके ऊपर मोम लगे कपड़े से सिलाई करते हैं (3) उसके ऊपर खारुआर कपड़े से घेर कर सिलाई करते हैं। (4) उसके ऊपर बम्बइया चादर से सिलाई करते हैं। (5) आख़िर में चट से ढक कर सिलाई करते हैं। सिलाई का यह काम तीन-चार घंटे तक चलता रहता है। ...और चार घंटे तक घर के मालिक साहब एक पाँव पर खड़े होकर पहरा देते हैं।

इसके बाद कहारों को बुलाया जाता है। कहार पालकियों को ट्रेन के ब्रेकवैन में चढ़ाते हैं। फिर जहाँ इन्हें जाना होता है, पालकियाँ वहाँ पहुँचती हैं। किसी मर्द गार्जियन के सामने एक-एक करके पालकियों की सिलाई खोली जाती है। सिलाई खोलने के बाद नौकर पालकियों को कपड़े के पर्दे से ढक कर चले जाते हैं। इसके बाद मालिक ख़ुद और कोई रिश्तेदार और दूसरी महिलाएँ आकर पालकी का दरवाज़ा खोलती हैं। मरी हालत में बेहोश पड़ी बंदिनियों को बाहर निकालती हैं। उनके सिर पर गुलाबजल और ब़र्फ रखा जाता है। चम्मच से मुँह में पानी डाला जाता है। आँख और चेहरे पर पानी के छींटे मारे जाते हैं। पंखे झले जाते हैं। दो घंटा और कभी-कभी तो इससे भी ज़्यादा, ख़िदमत के बाद तब कहीं जाकर बीबियों की हालत सुधर पाती है।

पच्चीस.

'अबरोध बासिनी' के11वें नम्बर पर मैंने लिखा है कि 1924 में मैं अपनी
दो नातिनों की शादी के मौके पर आरा गई थी। लेकिन मैंने आरा शहर में उस घर और वहाँ से दिखने वाले आसमान को छोड़ और कुछ नहीं देखा। मेरी 'बेटी' (यानी बेटी की मौत के बाद दामाद की दूसरी स्त्री) की भी यही कहानी थी। उसने बहुत ही मिन्नत करते हुए मुझसे कहा, 'अम्मा, अगर आप शहर देखना चाहती हैं तो रहम करके हमें भी ले चलिए। आपकी जूती के बरकत से हम भी ज़रा शहर देख लेंगे। मुझे यहाँ आए हुए सात साल हो गए हैं लेकिन आज तक शहर में कुछ नहीं देखा।' नई नवेली दुल्हन मजू और सबू ने भी इल्तिजा भरी नज़रों से कहा, 'हाँ, नानी अम्मा। आप ही अब्बा को बोलेंगी तो होगा।'

मैं लगातार कई दिनों तक जमाई राजा को एक गाड़ी का इंतज़ाम करने के लिए कहती और वह हर रोज़ का़फी मुलायमियत से जवाब देते कि गाड़ी तो मिली नहीं! आख़िर एक दिन सुबह-सुबह उनका 11 साल का बेटा हमारे पास ख़बर लेकर आया कि भाड़े की एक गाड़ी तो आ रही है लेकिन उसकी खिड़की का एक हिस्सा टूटा है। मजू ने इल्तिज़ा करते हुए कहा, 'उस जगह तो हम पर्दा कर लेंगे- अल्लाह के वास्ते तुम गाड़ी वापस न करना।' सबू फुसफुसाते हुए बोली, 'अच्छा ही तो है। ऊ टूटी हुई खिड़की से सब कुछ साफ-साफ दिखेगा।' हम सब बे़करार थे। जितनी बार गाड़ी में बैठने के लिए उठते उतनी बार आवाज़ सुनाई देती- सब्र कीजिए, बाहर अभी पर्दा नहीं हुआ है।

कुछ पल बाद जब हम गाड़ी में बैठने के लिए गए तो देखा, सुबहान अल्लाह! दो-तीन बम्बइया चादर से पूरी गाड़ी को चारों ओर से ढक दिया गया था। दामाद साहब ने ख़ुद ही दरवाज़ा खोला। गाड़ी में हमारे बैठने के बाद उन्होंने खुद अपने हाथों से दरवाज़े को कपड़े से बाँध दिया। गाड़ी कुछ ही दूर गई होगी कि मजू ने सबू से कहा, 'देखो-देखो टूटी हुई खिड़की यहाँ है।' उस पर्दे में एक जगह छेद था। मजू, सबू और उनकी माँ उस छेद से झाँकते हुए बाहर की दुनिया देखने लगीं। और मैंने उस छेद से बाहर देखने के लिए उनसे कोई जद्दोजेहद नहीं की।

उनतीस.

एक बार मैं किसी लेडीज़ कांफ्रेंस में शामिल होने के लिए अलीगढ़ गई थी।
वहाँ आईं महिलाओं के पास मैंने तरह-तरह के बु़र्का देखे। एकजन का बु़र्का एकदम अलग फैशन का था। उनके साथ मेलजोल हुई। बातचीत बढ़ी तो मैंने उनके बु़र्के की तारी़फ की। बु़र्के की तारी़फ सुन कर वह बोलीं, 'अरे मत बोलिए, इस बु़र्के की वजह से मुझे कितनी शर्मिंदगी उठानी पड़ती है।' बाद में उन्होंने शर्मिंदगी और बेइज़्ज़ती के जो ि़कस्से सुनाए, उन्हें आप भी सुनिए:

वह किसी बंगाली भद्रलोक के घर शादी में गई हुई थीं। (बु़र्के के साथ) उन्हें देखकर वहाँ मौजूद बच्चे-बच्चियाँ चिल्लाने लगे। इधर-उधर भागने लगे। जिसे जहाँ जगह मिली, वहाँ छिप गए। उनके स्वामी की कई और बंगाली भद्रलोक के साथ दोस्ती थी। स्वामी के संग वह उनके घर आया-जाया करती थीं। मगर वह जितनी बार उनके घर गईं, बच्चे डर के मारे रोने-चिल्लाने लगते। बच्चे डर के मारे थर-थर काँपते।

वह एक बार कलिकाता आईं। चार-पाँच महिलाओं के संग वह एक खुली मोटरगाड़ी में घूमने निकलीं। सभी ने बु़र्का पहन रखा था। राह चलते बच्चों ने जब उन्हें देखा तो बोल उठे, 'उई माँ! ये क्या है?' एक लड़के ने बाि़कयों से कहा, 'चुप कर!- रात में तो यही सब भूत हो जाता है न।' तेज हवा के झोंके से बु़र्का के आगे का हिस्सा ऊपर-नीचे होते देख एक बोला, 'देखोगे, देखो! भूत सब अपना सूँड हिला रहा है! बाबा रे! भाग रे!'

वह एक बार दार्जीलिंग गई थीं। गाड़ी जब एक स्टेशन पर रुकी तो देखा, ढेर सारे लोग एक वामन (छोटे कद-काटी का शख़्स) को घेरे खड़े उसे देख रहे हैं। वामन की लम्बाई यही कोई 7-8 साल के बच्चे के बराबर होगी लेकिन चेहरा एक बड़े नौजवान का था। चेहरे पर दाढ़ी-मूँछ भी थी। अचानक उन्होंने देखा कि सारे लोग आँखे फाड़े उनकी ओर नज़र गड़ाए हैं! तमाशबीन उस वामन को छोड़ बुर्का पहनी मुझ महिला को देखने लगे!

इसके बाद वह दार्जीलिंग पहुँची और खाना खाने के बाद बाहर घूमने निकलीं। यानी रिक्शागाड़ी से जा रही थीं। मॉल रोड पहुँचने पर देखा, वहाँ भीड़ जमा थी। उस दिन तिब्बत से फौज़ वापस आ रही थी। उसी को देखने के लिए भीड़ जमा थी। रिक्शेवाला ने अपना रिक्शा सड़क के एक किनारे खड़ा किया और वह भी देखने लगा कि क्या हो रहा है? थोड़ी देर बाद उन्होंने ध्यान दिया, वहाँ खड़े सभी लोग बारी-बारी से रिक्शा के अंदर झाँक कर उन्हें देखते हुए आगे बढ़े जा रहे थे।

जब वह घूमने के लिए पैदल बाहर निकलती तो गली के कुत्ते घेऊघेऊ करते हुए उन पर हमला करने के लिए दौड़ते। पहाड़ पर चढ़ने वाले एक-दो घोड़े तो उनको देखकर डर के मारे इधर-उधर भागना शुरू कर देते। एक बार वह चाय बग़ान घूमने पहुँची तो देखा कि एक तीन-चार साल की बच्ची उनको मारने के लिए पत्थर का टुकड़ा उठाई हुई है। * (* बांगाली और गोरखा लोगों का ़फ़र्क देखिए। जिस उम्र में बंगाली बच्चे डर के मारे चिल्लाते इधर-उधर भागते फिरते हैं, उसी उम्र के गोरखा बच्चे अपनी हि़फाज़त के लिए पत्थर का टुकड़ा उठाकर उस डरावनी चीज़ को मारते हैं!)

एक बार उनकी कोई मिलने जुलने वाली चार-पाँच और बीबियों के साथ घूमते हुए एक छोटे से झरने तक पहुँच गईं। झरने की धार के पास कंकड़-पत्थर और कीचड़ था। उनके बुर्के उनमें लटपटा गए और वे गिर गईं। पास में ही एक चाय बाग़ान था। वहाँ काम कर रहे मज़दूरों ने इन्हें देखा तो दौड़ते हुए आए और इन्हें बाहर निकाला। मज़दूरों ने प्यार से ही डाँटते हुए कहा, 'एक तो जूता पहना और उसके ऊपर इतना बड़ा लबादा ओढ़ लिया। इस हालत में तुम सब गिरोगी नहीं तो क्या होगा?' अहा, बीबियों का शानदार कढ़ाई किया हुआ दोपट्टा कीचड़ में लतड़-पतड़ और बु़र्का भीग कर तर-बतर। सि़र्फ यही नहीं, रास्ते में आते-जाते लोग अपने रोते बच्चे को चुप कराने के लिए इन्हें दिखाते हुए कहते, 'चुप कर, एई देख मक्का-मदीना जा रहा है, ए देख! काला कपड़ा ओढ़े कौआ हकनी (बिजूका) - वही तो मक्का मदीना‼'


तैंतीस.

लगभग 18 साल पहले की बात है। कलिकाता में रहने वाली
डेढ़ साल की एक बच्ची को बुख़ार हुआ। उसके घर में पर्दे का बड़ा ज़बरदस्त रिवाज़ था। इतना कड़ा रिवाज की इस छोटी सी बच्ची को किसी 'ही-डॉक्टर' से दिखाने को घर वाले राज़ी नहीं थे। इसलिए 'शी-डॉक्टर' आई थीं। घर में महिलाओं की कमी नहीं थी। लेकिन शरा़फत छोड़, उनके पास कोई और गुण नहीं था। ये सब महिलाएँ लेडी डॉक्टर गुप्त को घेर कर खड़ी थीं। मिस गुप्त ने रोगी की कैि़फयत देखने-सुनने के बाद बच्ची को गर्म पानी से नहलाना चाहा। शी-डॉक्टर मिस गुप्त चाहीं गर्म पानी- बीबियों ने एक-दूसरे का मुँह निहारना शुरू कर दिया! वह चाहीं ठंडा पानी- बीबियों ने कहा, 'बाप रे! ठंडे पानी से नहलाएँगी तो लड़की का बुख़ार और बढ़ जाएगा।' नतीजतन, बेचारी मिस गुप्त अपनी कोई भी बात इन लोगों को समझा नहीं पाईं। उन्होंने बाहर आकर घर के मालिक के नायब साहब को सारी बात बताई और जाते वक्त बोलीं, वह इस घर में अब आगे नहीं आएँगी। नायेब साहब ने बहुत मिन्नत की। उनके हाथ में बतौर फीस 16 रुपए दिए और दूसरे दिन फिर आने को कहा।

दूसरे दिन भी शी-डॉक्टर मिस गुप्त के आने पर घर की महिलाओं के बीच काना़फूसी शुरू हो गई। घर का माहौल देखकर नायब साहेब ने अपनी एक मुला़काती महिला को बुलाया और मिस गुप्त के पास भेज दिया। वीणापाणी (नायेब साहेब की मुला़काती वह बंगाली महिला) आईं तो देखा, लेडी डॉक्टर गुस्से के मारे भूत हो रही थीं। और सारी बीबियाँ खड़ी डर के मारे थर-थर काँप रही थी- ताँहादेर मुखे धान दिले खोई फोटे! ऐसे तो हँसी-ठिठोली और ज़बान चलाने में वे काफी माहिर थीं। आख़िर में मिस गुप्त गरजते हुए बोलीं, 'मैं तमाशा देखने नहीं आई हूँ।'

वीणापाणी ने चुपके से बीबियों से जानना चाहा कि आख़िर माज़रा क्या है? उन्होंने कहा, 'हम भी नहीं समझ पा रहे- उन्होंने तौलिया चाहा, टब चाहा, लेकिन जब हमने ये सारा ला कर दिया तो इन सबको दूर फेंक दिया।'

इसके बाद उन्होंने मिस गुप्त से गुस्से की वजह पूछी तो उन्होंने कलाई पर बँधी घड़ी देखते हुए बोलीं, 'देखिए, देखिए! आधा घंटा से ऊपर होने को आया, अब तक लड़की को नहलाने के लिए कोई सामान मुझे नहीं मिला।' वीणा डरते-डरते बोलीं, 'इन लोगों ने जो सामान दिया, क्या आपको वह पसंद नहीं आया?'

मिस गुप्त बोलीं, 'देखिए तो इसमें पसंद की क्या बात है? मैंने माँगा एक बाथ-टब, जिसमें बैठाकर बच्ची को नहलाऊँगी। इन लोगों ने मुझे दी इत्ती सी एक सेरा देगची- उसको मैंने फेंक दिया। आप ही बताइए कि इत्ती सी देगची के अंदर मैं बच्ची को कैसे बैठाऊँगी? मैंने बच्ची का बदन पोंछने के लिए माँगा नरम पुराना कपड़ा। इन लोगों ने मुझे लाकर दिया नया कड़कड़कदार तौलिया-उसको भी इसीलिए मैंने फेंक दिया! ये लोग मुझे अपनी अमीरी दिखा रही हैं कि इनके पास नई तौलिया है। यह अपने आपको पीर समझ रही हैंऔर इसलिए सबको इनकी इबादत करनी चाहिए!'

आख़िर में, वीणा ने ये सभी सामान जुगाड़ कर उन्हें दिया। बच्ची को नहलाने में मिस गुप्त की मदद की। तब जाकर उनके चेहरे पर गुस्से की जगह हँसी फूटी। तब बीबी जनों ने भी राहत की साँस ली।


छत्तीस.

जाड़े का दिन। वह भी माघ महीने का जाड़ा। उस व़क्त गाँव में
कहीं से भालू का नाच दिखाने वाला आया। गाँव में नया कुछ भी आता तो उसे सबसे पहले ज़मीदार के घर हाज़िरी देनी होती। भालू वाले ने भी ऐसा ही किया और वह ज़मीदार के घर मेहमान बन गया। बड़े से दालान के उत्तर में मैदान पर भालू का नाच होता- पूरे गाँव के लोग आते और नाच देखते। लेकिन घर की बहू-बेटी वह नाच देखने से वंचित रहतीं।

छोटे बच्चे और बूढ़ी नौकरानियाँ महिलाओं के पास आकर नाच के बारे में बात करतीं- भालू कैसे हवा में उछलकर नाचता है... ठुमक-ठुमक कर कैसे नाचता है... इस तरह से भालूवाले के साथ कुश्ती लड़ता है... इस तरह से पीछे से पकड़ता है... वग़ैरह... वगैरह। ये बातें सुन-सुन कर ज़मीदार की दो नाबालिग बहुओं को भी ख़्वाहिश हुई कि एक बार नाच देखा जाए। ज़्यादा दूर नहीं जाना होगा। छोटी बहू बेग़म के कमरे के उत्तर में एक झरोखा है। वहाँ से झुककर देखने पर सा़फ दिखाई देगा।

ये दोनों बहुए झुकी नाच देख रही थीं, तब ही उनकी चार बरस की ननद ज़ोहरा दौड़ती आई और बोली, वह भी देखेगी। एक जन ने उसे गोदी में उठाया और झाँककर देखने लगी। ज़ोहरा ने आज तक घर के बरामदे के बाहर कुत्ता-बिल्ली भी नहीं देखा था- यहाँ उसने सीधे भालू ही देख लिया। भालू कुश्ती लड़ रहा था। उसे लड़ते देख ज़ोहरा डर के मारे चिल्लाई और बेहोश हो गई। भालू का नाच तो रह गया- वे दोनों ज़ोहरा को सम्हालने में लग गईं।

ज़ोहरा को होश तो आया लेकिन उसका डर नहीं गया। रात में वह अचानक चिल्लाकर जाग उठती। डर के मारे थर-थर काँपने लगती। उसकी ख़राब हालत को देखते हुए दूर सदर ज़िले से का़फी पैसा ख़र्च एक डॉक्टर को बुलाया गया। डॉक्टर साहब ने सारी बात सुनने और जानने के बाद पूछा, बच्ची किसी बात से डरी तो नहीं है? बात छिपी नहीं रही, पता चला कि भालू का नाच देखने से डर गई है।

अब ज़मीदार साहब ने पूछताछ शुरू की, ज़ोहरा को भालू का नाच दिखाया किसने? खेलाई, अन्ना जैसियों ने एक लाइन में मना कर दिया कि उन्होंने ज़ोहरा साहेबज़ादी को भालू का नाच दिखाया है। आख़िर में पता चला कि बहू बेग़मों ने दिखाया था। यह सुनते ही उनका गुस्सा साँतवें आसमान पर चढ़ गया। ज़ोहरा मरे तो मरे, ज़मीदार साहब को इस बात की फिक्र  नहीं थी लेकिन ये जो घर में सबको पता लग गया कि उनकी बहुएँ बेगाना मर्द का तमाशा देखने गई थीं, वह इस शर्मिंदगी को कहाँ और कैसे छिपाएँगे? छी! छी! दूसरे मज़हब वाले सिविल सर्जन यह सब सुनकर मंद-मंद मुस्कुराए कि बहुएँ भालू का नाच देखने गई थीं।

शर्म, पछतावा और ग़ुस्से से भरे ज़मीदार साहब ने बहुओं को तलब किया। सर पर एक हाथ लम्बा घूँघटा टाने ससुर के सामने खड़ी दोनों बहुएँ शर्म और डर के मारे थर-थर काँप रही थीं। (माघ महीने की ठंड थी) पसीने-पसीने हो रही थीं और पैर के नीचे पत्थर के फर्श को शायद घिसते हुए बोल रही थीं- हे धरती माता जल्दी से फट जा और हम तुम में ही समा जाएँ।

सही है, पर्दानशीनों को धरती पर रहने का मतलब ही क्या है? बऊ माँ सुनो तो- दाँत पीसते हुए ज़मीदार साहब ने इतना कहा कि ग़ुस्से से उनकी आवाज़ ही फँस गई। उस व़क्त ग़ुस्से से उनका पूरा बदन काँप रहा था और आँखें लाल हो रही थीं। वह  ठीक-ठीक समझ नहीं पा रहे थे कि इनका क्या करें- बिना नमक इन्हें चबा कर खा जाएँ या पूरा का पूरा निगल जाएँ!

उनतालिस.

समाज हमें सि़र्फ अवरोध-कारागार में कैद करके ही चुप नहीं बैठता।
ऐसा कहा जाता है कि हज़रता आयेशा सिद्दिका 9 साल की उम्र में बालिग़ हो गई थीं। इसी वास्ते अमीर मुसलमानों के घरों में लड़की की उम्र आठ साल हुई नहीं कि उसके ज़ोर से हँसने पर पाबंदी। ऊँची आवाज़ में बोलने पर पाबंदी। दौड़ने-कूदने वग़ैरह सभी चीज़ों पर पाबंदी। और तो और... उनके इधर-उधर जाने पर भी रोक। वे घर के किसी कोने में सिर झुकाए महज़ सीना-पिरोना ही कर सकतीं। और तो और तेज़-तेज़ चल भी नहीं सकतीं।

किसी अमीर घर में आठ साल की एक बच्ची थी। एक दिन वह का़फी सुबह उठी और बावर्चीख़ाने की तऱफ गई। उसने देखा कि बावर्चीखाने में एक छोटी सी सीढ़ी है। ताहिरा (वह बच्ची) के मन में न जाने क्या आया, वह अनमने ढँग से इस सीढ़ी के ऊपर दो कदम चढ़ गई। ठीक उसी व़क्त ताहिरा के अब्बा वहाँ पहुँच गए। उन्होंने एक झटके से ताहिरा को नीचे खींचकर उतार दिया।

ताहिरा अब्बा की बहुत दुलारी इकलौती बेटी- अब्बा ने उसे हमेशा लाड़-प्यार ही किया। कभी भी उसने अब्बा का गुस्से से भरा चेहरा नहीं देखा था। अब जो उसने अब्बा को गुस्से में देखा और जिस तरह उन्होंने ज़ोर से उसे खींचा तो वह बहुत ज़्यादा डर गई। वह अपना आपा खो बैठी और कपड़े नोंच कर फेंकने लगी।

ग़लत व़क्त नहला देने और बहुत ज़्यादा डर जाने की वजह से उस रात ताहिरा को बुख़ार चढ़ गया। एक अमीर बड़े घर की बेटी और उस पर से बहुत ही दुलारी बेटी, इसलिए इलाज में कोई कसर नहीं रखी गई। दूर सदर ज़िला से सिविल सर्जन डॉक्टर बुलाए गए। उस व़क्त (यानी 40-45 साल पहले) डॉक्टर को बुलाना आसान काम नहीं था। डॉक्टर साहब की चार गुना फीस, पालकी भाड़ा, इसके अलावा बत्तीस कहारों का खाना-पीना, तम्बाकू का ख़र्च- यह बड़ा काम था।

इतना सब उपाय करने के बाद भी ताहिरा का बुख़ार तीसरे दिन भी कम नहीं हुआ। डॉक्टर साहब कुछ उपाय होते न देख निराश हो विदा हुए। अब्बा के रूखे बर्ताव का कड़ा जवाब देते हुए ताहिरा हमेशा हमेशा के लिए आज़ाद होकर चली गई। (इन्नालिल्लाही व इन्ना इलाही राज़ीउन)


चालीस.

एक अमीर घर की लड़की की शादी के मौ़के पर का़फी धूमधड़ाका हो रहा था।
मेहमानों और रिश्तेदारों के शोरगुल से घर गुलज़ार था- किसी तरह की कोई कमी नहीं थी। मेहमानों में से कई को नए-नए बने कुटिया में ठहराया जा रहा था। एक दिन भरी शाम में क्या हुआ कि फूस की एक नई कुटिया में आग लग गई। शोरगुल सुनकर बाहर से नौकर-चाकर, दूसरे लोग दौड़े आए और ड्योढ़ी के पास पहुँच कर रुक गए और इंतज़ार करने लगे। वे बार-बार चिल्लाकर पूछते जाते, पर्दा हुआ कि नहीं- वे अंदर आ सकते हैं या नहीं? मगर जनाना से जवाब दे तो कौन? आग देखकर तो जैसे उनके होश ही उड़ गए थे। एक ओर आग लगी थी और घर के अंदर बीबियाँ एक-दूसरे से पूछ रही थीं कि बाहर पर्दा है कि नहीं- अगर बाहर गई और कोई लड़का उन्हें बाहर खड़ा मिला तो क्या करेंगी?

आख़िर में एक बुज़ुर्ग बीबी मारे डर के परेशान होकर बोली, 'अरे कोई लड़का है! आग बुझाने आ न! इस व़क्त भी पूछ रहा है कि पर्दा है कि नहीं?'

तब सभी हाँफते हुए आग बुझाने के लिए भागे आए। मगर जिस घर में आग लगी थी, जब वहाँ से बीबियाँ बाहर निकलीं तो देखा, बाहर तो मर्द भरे पड़े हैं। अब वे फिर घर के अंदर जाकर छिप गईं। ख़ुशि़कस्मती थी कि वहाँ मौजूद कई हिम्मती नौजवान खींचतान कर बीबियों को बाहर निकाल लाए। वरना ये सब आग में जलकर पसंदा कबाब बन जातीं।


सैंतालीस.

किसी शायर की ज़बान में बोलने की ख़्वाहिश हो रही है,


''काव्य उपन्यास नोहे, ऐ मम जीबन,

नाट्यशाला नोहे, इहा प्रकृत भवन''


शायरी या फसाना नहीं, ये हमारी ज़िंदगी है

रंगमंच नहीं, यही मेरा असली घर है

करीब तीन साल पहले का वा़कया है। हमारी पहली मोटर बस आने वाली थी। इससे एक दिन पहले स्कूल की एक टीचर मेम साहिबा गैराज गईं और बस देख कर आईं। उन्होंने आते ही बताया कि मोटर के अंदर तो भयानक अँधेरा है ... ''ना बाबा! मैं तो कभी इस मोटर से नहीं जानेवाली।''

बस जब आ गई तो देखा गया- बर्स के पिछले दरवाज़े के ऊपर एक जाल लगा है और सामने भी ऊपर की ओर एक जाल है। अगर तीन इंच चौड़े और डेढ़ फुट लम्बे जाल के ये दो टुकड़े न होते तो बस को आराम से ''एयर टाइट'' कहा जा सकता था।

पहले दिन नई मोटर गाड़ी लड़कियों को घर पहुँचाने के लिए गई। उनके साथ गई स्कूल की आया ने लौटते ही बताया, - गाड़ी बड्ड गर्म है। घर जाते व़क्त लड़कियाँ का़फी बेचैन हो रही थीं। कुछ ने तो उलटी भी कर दी। छोटी लड़कियाँ तो अँधेरे के मारे डर से रोने लगीं।

दूसरे दिन लड़कियों को लाने के लिए जब मोटर निकलने लगी तो उस टीचर मेम साहिबा ने दरवाज़े के शटर को निकालकर एक रंगीन कपड़े का पर्दा टाँग दिया। फिर भी बस जब लौट कर स्कूल आई तो देखा गया कि दो-तीन लड़कियाँ बेहोश हो रही हैं। दो-चार उलटी कर रही हैं। कई तो सर पकड़कर बैठी हैं... वगैरह वगैरह। शाम में मेम साहिबा ने बस के पीछे लगी दो और खिड़कियों को खोला और उनकी जगह कपड़े के दो पर्दे टाँग दिए। फिर लड़कियों को घर पहुँचाया गया।

उस दिन शाम में मेरी एक पुरानी दोस्त मिसेज मुखर्जी मुझसे मिलने आईं। स्कूल की तरक्की की कहानी पर ख़ुशी ज़ाहिर करते हुए बोलीं- ''आपकी मोटर बस तो बहुत ही शानदार हो गई है! पहली बार जब सड़क पर देखी तो लगा कि कोई आलमारी तो नहीं चली जा रही- चारों तऱफ से एक बार में ही बंद, इससे तो बड़ी आलमारी का भ्रम होता है! मेरा भतीजा तो बोलने लगा, अरे बुआ! देखो...देखो वह "moving Black Hole" (घूमता हुआ अंधा कुआँ) जा रहा। .. और, उसके अंदर लड़कियाँ बैठती कैसे हैं?''

तीसरे दिन दोपहर बाद चार-पाँच लड़कियों की माएँ मुझसे मिलने पहुँचीं। आते ही शुरू हो गईं, ''आपका मोटर तो ख़ोदा का पनाह! आप लड़कियों को जीते जी कब्र में भर रही हैं!'' मैंने का़फी बेबसी से कहा, क्या करती? अगर इस तरह न होता तो आप लोग ही बोलतीं, ''बे-पर्दा गाड़ी।'' तब वे सब का़फी ग़ुस्से में बोलीं, ''तब क्या आप जान मारकर पर्दा करेंगी? कल से हमारी लड़कियाँ स्कूल नहीं आएँगी।'' उस दिन भी दो-तीन लड़कियाँ बेहोश हो गई थीं। हर घर से आया के मा़र्फत फरियाद आ रही थी कि लड़कियाँ मोटर बस से अब और नहीं आएँगी।

उसी शाम डाक से चार ख़त मिले। इनमें भेजने वाले का पता नहीं था।  अंग्रेजी में चिट्ठी लिखने वाले ने नाम की जगह "Brother-In-Islam" (ब्रदर इन इस्लाम यानी एक ही मज़हब इस्लाम को मानने वाले) लिखा था। बा़की तीन चिट्ठियाँ उर्दू में थीं। इनमें दो बेनामी और चौथी पर पाँच जनों ने अपने नाम लिखे थे। सभी ख़त के मज़मून एक जैसे ही थे- सभी ने रहम की बरसात करते हुए मेरे स्कूल की भलाई की दुआ की थी। साथ ही लिखा था, मोटर के दो हिस्से में जो पर्दा लटकाया गया है, वे हवा के झोंके से उड़ते रहते हैं। इससे गाड़ी बे-पर्दा होती है। अगर कल तक मोटर में पर्दे का अच्छी तरह से इंतजाम न हुआ तो वे और रहम की बरसात करेंगे और 'खबीछ' , 'पलीद' जैसे उर्दू अख़बार में स्कूल के ख़िलाफ लिखेंगे। यह भी लिखा था- देख लेंगे कि इस तरह बे-पर्दा गाड़ी से लड़कियाँ कैसे आती हैं।

यह तो बड़ी भारी मुश्किल है-

न धरिले राजा बधे, धरिले भुजंग।

राजा का आदेश है, साँप पकड़ो। न पकड़ो तो राजा मार डालेगा और पकड़ा तो साँप। यानी किया तो मुसीबत न किया तो मुसीबत।

राजा का हुक्म इस तरह मानने का मतलब है, जिंदा साँप पकड़ना। है न!

अबरोध -बंदिनी की तऱफ से बोलने की ख़्वाहिश हो रही है-

''केन आसिलाम हाय! ऐ पोड़ा संसारे,

केन जनम लभिलाम पर्दा-नशीन घरे!''

हाय, मैं क्यों आई इस बदनसीब दुनिया में

क्यों पैदा हुई पर्दा-नशीन घर में।

(हिन्दी में अबरोध बासिनी के कुछ अंश सबसे पहले हिन्दुस्तान और हाल ही में वर्तमान साहित्य में छपे। ये अंश इन्हीं दोनों जगहों से साभार लिया गया है।)
Blogger द्वारा संचालित.