इतिहास का अंधकूप बनाम बंद गलियों का रूह-चुह : गया में यौनकर्म और यौनकर्मी : पहली क़िस्त


संजीव चंदन

( यह आलेख २००९ में एक शोध के सिलसिले में किये गये केस स्टडी का एक हिस्सा है :दो किस्तों में प्रकाश्य  ) 

यद्यपि गया का रेड लाइट एरिया शहर के केन्द्र में टावर चैक के समीप बसा है। इसकी मौजूदगी आज भी है और कल भी थी, लेकिन ‘कल’ के इतिहास को व्यक्त करता कोई दस्तावेज नहीं है। तमाम दूसरे स्थानों, क्षेत्र अथवा राज्यों की तरह मगध और गया का इतिहास भी राजा-रजवाड़ों की सामारिक गतिविधियों से भरा है या फिर आजादी के पूर्व और बाद तक के सिलवटों से भरा है इतिहास। यौनकर्मियों का इतिहास! इतिहास नहीं; स्मृतियों, अफवाहों और गप्पों से टूट-बिखरकर इतिहास लायक जो कुछ भी है-समझा जा सकता है वही इतिहास हो सकता है इनका।



स्पष्ट है स्वीकार्यता और उपेक्षा के द्वैध में फँसी इनकी जिंदगी को लिपिबद्ध कौन करेगा? स्त्रिायों और दलितों का उपेक्षित इतिहास तो आधुनिक परिघटना है। गया का इतिहास खंगालते वक्त कुछ भी लिपिबद्ध नहीं मिलता इनके विषय में। गया में बोली जाने वाली ‘‘मगही’’ भाषा का इतिहास लिखते हुए अब तक कोई भी किसी एक अनाम धोबी तथा एक कुम्हार (अतिशुद्र) जाति के व्यक्ति के द्वारा लिखित रामायण पर शोध नहीं कर पाया है-उपेक्षित इतिहास का दंश झेलते इन समूहों का इतिहास लिखते हुए स्त्राीवादी, दलितवादी इतिहासकार कुछ चुनने-बीनने का काम कर सकते हैं। गया के इतिहास में टेकारी की रानी के आंशिक उल्लेख, अहल्याबाई के द्वारा मंदिर निर्माण की चर्चा के अलावा कहाँ हैं स्त्रियां ? 1995 में पत्थर तोड़ने वाली मुसहर स्त्री  भागवती देवी (भगवतिया देवी), जो गया की पहली महिला सांसद बनी, के विषय में भी बहुत कुछ लिखा उपलब्ध नहीं होगा। यदि इनके संदर्भ में कहीं उल्लेख है तो आखिरकार शासक समुदाय में शामिल स्त्रियों  का ही उल्लेख है। डाॅ. सुरेन्द्र चौधरी धरी जैसा मार्क्सवादी  आलोचक भी गया के इतिहास को स्मृत करते हुए टावर चैक से रेडलाइट तक की यात्रा तो करते हैं, परंतु उन बंद गलियों में प्रवेश से हिचक जाते हैं- इतिहास का अंधकूप है वहाँ!!

डाॅ. चौधरी उन बंद गलियों तक जाकर लौट आते हैं : ‘रमना’ में वे 18वीं सदी के कुछ बंगलों के भाग थे। पुरानी जेल, पिलग्रीम अस्पताल उत्तरी भाग में थे। सन् 1842 में गया का नक्शा शेरविल का मिलता है। रेनल के बाद यह बिहार का दूसरा पुराना  नक्शा है। 18वीं सदी के अंत में उत्तरी गया में एक चुंगी द्वारा बनाया गया था। यह द्वार आज दुःखहरिणी फाटक के नाम से प्रसिद्ध है। यहाँ पर हिन्दुओं का एक छोटा पूजा स्थल भी है।'  (डाॅ. सुरेन्द्र चैधरी)।

गया टावर चौक इसी इलाके में हैं  यौनकर्मियों के घर 

यानी डाॅ.  चौधरी पिलग्रीम अस्पताल से आगे बढ़ते हुए रुक जाते हैं, फिर दुःखहरिणी फाटक के पास ही आकर विराम ले लेते हैं, क्योंकि इसी प्रभाग में बसा है यौनकर्मियों का मुहल्ला, जोकि इतिहासकारों के लिए बंद गलियों जैसा ही है। गया के चौक  पर बने टावर (1888, में कलक्टर ओल्डहम के द्वारा) के पास ही बसा है यह मुहल्ला, जो कि नर्तकियों का मुहल्ला है, जिससे थोड़ी दूरी पर लगे मानपुर पुल से रमना रोड होते हुए स्टेशन तक जाने वाले रोड पर खानगी (देह व्यापार) से जुड़ी महिलाएँ रहती हैं, यहीं आकर इतिहास थम जाता है।
इतिहास के अंधकूप में प्रवेश के लिए जनश्रुतियों पर निर्भर होना पड़ता है अथवा गया की संस्कृति में इनके महत्वपूर्ण अवदान के कारण सांस्कृतिक झरोखे से देखना पड़ता है। शेष कुछ अनुमानित ही हो सकता है इतिहास की चुप्पियों से।

कोई डाक्यूमेंटड साक्ष्य तो नहीं उपलब्ध है, लेकिन इस इलाके को अकबर के मनसबदार मानसिंह (1540-1614) के द्वारा बसाया गया माना जाता है, जब उसने मानपुर(गया) की यात्रा की थी। यह व्यवस्था मानसिंह के सैनिकों के लिए की गयी मानी जाती है, परंतु इस पर न तो बुकानन ने कोई उल्लेख किया है या न ही राय चैधरी अथवा अन्य इतिहासकारों ने। मानसिंह 1588 में बिहार का सुबेदार (गवर्नर) नियुक्त हुआ था।

विष्णुपद में विष्णु का चरण 

गणिकाओं की परंपरा बड़ी समृद्ध थी। भारतीय सिनेमा की सिरमौर-स्त्री  नर्गिस की माँ जद्दन बाई को यहाँ खूब शोहरत थी। ढेलाबाई की ठुमरी दूर-दूर तक मशहूर थी। चैक के इलाके में संगीत का एक केन्द्र ‘शनिश्चरी क्लब’ हुआ करता था। क्लब के संस्थापक थे टिकारी-राज के कैप्टन गोपाल शरण सिंह के राजगुरू पंडित वंशीधर शुक्ल! अध्यक्ष स्वयं गोपाल शरण सिंह थे तथा सचिव हुआ करते थे मुजफ्फर  नवाब। शनिवार को समृद्ध गयावालों की बिसात जमती थी, जहाँ गणिकाओं के नृत्य हुआ करते थे। 1918-30 तक यह क्लब गया के चौक  पर सक्रिय था। शिरकत करती थी चुलबुले वाली मलिका, छोटी मलिका, जद्दनबाई, छप्पनछुरी राजेश्वरी, तुलाबाई अथवा देश के दूसरे हिस्सों की मशहूर गणिकायें।

गणिकाओं की इन सार्वजनिक गतिविधियों के अतिरिक्त उनका कुछ भी व्यक्तिगत दर्ज नहीं है, लोगों की स्मृतियों में। व्यक्तिगत सार्वजनिक होकर जब कोई हलचल  पैदा करता, तो वह सब भी स्मृतियों का अंग बन जाता। मसलन गणिकाएं समृद्धों की ‘‘रखैल’’ भी हुआ करती थीं जो कभी-कभी दो ‘‘आन’’ वालों के बीच टकराव पैदा करती। समृद्ध परिवारों के संपर्क का यह दास्तान 80 के दशक तक भी यथावत रहा। मध्य बिहार के एक बाहुबली ने एक प्रसिद्ध गणिका को अपनी पत्नी बनाकर संपत्ति में हिस्सेदारी देते हुए मिसाल पेश की। यही गणिका 20वीं सदी के अंतिम दशकों में नगर-चुनावों में उम्मीदवार भी बनी।

गणिकायें परिवार की परंपरा जीती है, कुछ सिंदूर लगाती है। शोध के दौरान कमलादेवी का सिंदूर और उनके द्वारा उनके सबसे यादगार लम्हे के रूप में ‘‘पति-पत्नी के वे दिन’’ का दर्ज होना पारिवारिक आस्था को व्यक्त करता है। गया के गणिकाओं के कई बच्चे उँचे पदों पर है और अपने अतीत के संपर्क में भी।
कोठों की नवाबी संस्कृति आजादी के दिनों के बाद सिमटती चली गयी। पंडों की समृद्धि में गिरावट आई, नवाबी और जमींदारी समाप्त हुई। गणिकाएँ अब नए अवतार में शादी-विवाह अथवा अन्य उत्सवों पर नर्तकियां थी ,यही उनका आजीविका का मुख्य साधन बना। मुजरे कम हो गये, धीरे-धीरे समाप्त हो गए।
नवे दशक तक गया के गाँव सांस्कृतिक और आर्थिक टकराव के केन्द्र बनते गए। अति वामपंथी संगठनों के साथ-साथ सवर्ण जाति की सेनाओं ने भी उत्सवों के अवसर पर नर्तकियों की उपस्थिति को अपने नैतिक एजेण्डे का टारगेट बनाया। फलतः इनकी आजीविका का एक बड़ा हिस्सा इनसे छिनता गया। मुजरे पर निर्भरता बढ़ी, जिसका प्रचलन नवाबों और जमींदारों की विदाई के साथ समाप्त हो गया था। नर्तकियों के पास भी देह व्यापार का विकल्प शेष था-जिसे आज वे थोड़ी उँची कीमत पर (तुलनात्मक) और नृत्य-संगीत के आवरण के साथ अपनाने के लिए बाध्य हैं। कभी-कभी कोई मुजरा भी सज जाये, तो ‘रइसों’ के लिए नहीं ‘अवारा युवाओं के लिए’।



इतिहास के अंधकूप में सबसे उपेक्षित जीवन, जो कि स्मृतियों में भी शेष नहीं, ‘‘खानगी’’ से जुडी स्त्रियों  का है, कोई इतिहास नहीं-सिर्फ एकरूपीय वर्णन या अनुमान! देह व्यापार के प्रभागों का भी फैलाव हुआ है। गया जैसे छोटे शहरों में भी काॅल-गर्ल बड़ी संख्या में इस पेशे से आ जुड़ी हैं। एक गैर-सरकारी संस्था में कार्यरत  ऐसी ही काॅल-गर्ल की मां ‘‘सराय’’ की नर्तकी एवं गायिका थी। गावों में भी जी.टी.रोड अथवा अन्य मुख्य मार्गों से जुड़े गावों में स्त्रियाँ  इस पेशे से जुड़ी हैं। उपभोक्ता वहां भी और सराय में भी प्रायः ट्रक-ड्राइवर, रिक्शा-चालक अथवा मध्यमवर्गीय युवा है ,जो सस्ते दामों वाला क्रेता हैं। क्रेताओं में पारिवारिक अथवा यौन कुंठाओं के शिकार कुछ युवेतर भी है।

अभी गया के इस मुहल्ले में यौन-सेवा-प्रदाता स्त्रियों  को मुख्यतः दो भागों में विभक्त किया जा सकता है। परिवार आधारित ,  अर्थात् नर्तकियों का लायसेंस प्राप्त घर तथा ब्रोथल आधारित यानी चकलाघर .

इन दिनों शहर में कई गैर-सरकारी संस्थायें भी काम कर रही हैं, जो कि इनके अधिकारों के लिए किसी संगठनात्मक गोलबंदी की जगह यथास्थिति के बीच इन्हें रोगमुक्त रखने के एजेंडे से काम कर रही हैं अथवा पुनर्वास का काम संपन्न करती हैं। इन संगठनों में दो प्रकार की स्त्रिायां पेशे से जुड़ी महिलाओं के बीच जाती है-
1 पेशे से अभी या अतीत में जुड़ी रही महिलायें
2 पेशे से बाहर की महिलाएं, पुरूष भी

काल-गर्ल्स  की संख्या में भी इजाफा हुआ है, परंतु स्थयी घरों में रहका सेवा-प्रदाता स्त्रिायों से वे अधिक मुक्त और निर्णयों के मामले में स्वावलंबी है। इनका समाजीकरण दूसरी प्रकार की स्त्रियों  से भिन्न है। ये आम समाज से मिलकर दूसरी अन्य सामाजिक गतिविधियों में भी शामिल हैं।

संजू’ जो कि पेशे से कालगर्ल है, वह भी किसी गैर-सरकारी संगठन से जुड़ी है। इसने गया के प्रतिष्ठित राजकीय कन्या विद्यालय ये दसवीं तक की पढ़ाई की है। इसकी मां भी नर्तकियों के पेशे से जुड़ी थी, जिसे संजू के शब्दों में पिता ने छोड़ दिया था। वह 2005 से इस पेशे में कार्यरत है। वह दूरदर्शन पर धारावाहिक भी देख लेती  है। 12 से 1 बजे तक आने वाला ‘‘स्त्री ’’ धारावाहिक उसे पसंद है।

मेरे शोध (केस-स्टडी) के कुछ माह पूर्व ही रेड-लाइट एरिया पर पुलिस ने छापा मारा था। इसमें दो पुरूष संचालक, जिसके घर पर ये स्त्रियाँ किराये  पर रहती हैं, को गिरफ्तार किया गया। दरअसल सराय में प्रायः ब्रोथल -आधारित यौन-कर्म किराये के मकानों में ही संचालित हो रहा है। पकड़ी गई चार लड़कियों को जागरण नामक संस्था में पुनर्वास कराया गया था। पुनर्वास केन्द्र में मैं उनसे मिलने पहुंचा तो सिलिगुड़ी की दो लड़कियां अपने-अपने घरों में जा चुकी थीं, दो नाबालिक लड़कियों के परिवार वाले नहीं आये थे। बातचीत के दौरान भावुक लड़कियों ने बताया कि उनके मां-बाप नहीं हैं। चाचा-चाची ने उन्हें किसी के साथ घर से भेजा था, काम करने के लिए।

बंद गलियों में जीवन

‘चक्की पीसने वाली औरत, जो दिन भर काम करती है और रात को इत्मीनान से सोती है, मेरे अफसाने की हीरोईन नहीं हो सकती। मंटो की हीरोईन एक चकले की टखयाई (रंडी) हो सकती है, जो रात को जागती है और दिन को सोते समय कभी-कभी यह डरावना ख्वाब देखकर उठ बैठती है कि बुढ़ापा उसके दरवाजे पर दस्तक देने आ रहा है। उसके आरी-आरी पपोटे, जिसमें वर्षों की नींद जम गई है, मेरे अफसानों का मौजू बना सकते हैं। उसकी गलाजत, उसकी बीमारियां चिड़चिड़ापन, उसकी गालियां सबकुछ भाती हैं। मैं उसके मुताबिक लिखता हूं और घरेलू औरतों की शाइस्ता कलामी उनकी सेहत और नफासत पसंदी को नजर अंदाज करता हूँ ।’

सआदत हसन मंटो के उपरोक्त बयान यौनकर्मियों की गलाज़त भरी जिंदगी का खुलासा करता है-मंटो, जिन्होंने इन ‘त्याज्य मानी जाने वाली मानवों के अस्तित्व के सम्मान के साथ कहानियां लिखी हैं, इस शोध के लिए केस-स्टडी भी थोड़ी उपरोक्त अनुभूति और थोड़े भिन्न अनुभवों के साथ संपन्न हुआ-क्या यौनकर्मियों के पास है फुर्सत के वक्त? यदि है तो क्या करती हैं वे ऐसे समयों में?

फुर्सत अथवा अवकाश के वक्त से शोध का तात्पर्य मार्क्सवादी  अवधारणा के लीजर ( leisure) से है, जिसका अर्थ होता है, स्वतंत्र होना, फुर्सत में होना।  मूलतः लैटिन और  शब्द फ्रेंच के से चैदहवीं शताब्दी के प्रारंभिक वर्षों में अस्तित्वगत माना जाता है। लीजर तथा लीजर टाइम (अवकाश) विक्टोरियन ब्रिटेन में 19वीं शताब्दी के अंतिम दशकों में अपने वर्तमान अर्थबोध के साथ अस्तित्व में आया हुआ माना जाता है। 1870 के पूर्व फैक्टरियां अपने कामगारों को एक दिन में 18 घंटे काम के लिए बाध्य करती थीं, जबकि छुट्टी का दिन सिर्फ रविवार होता था। 1870 के बाद उद्योग जगत में मशीनीकरण की दक्षता तथा ट्रेड यूनियन के उद्भव ने सप्ताह में दो छुटिट्यां व्यवस्थित करायी और काम के घंटे कम करवाये।


लीजर (अवकाश) को एक ऐसे समय के रूप में परिभाषित किया जा सकता है, जो काम और घरेलू काम (गतिविधियों) से मुक्त हो-शरीरतः, मानसिक भी। परंतु सवाल यह है कि क्या स्त्रिायाँ खासकर यौनकर्मियों  के पास वे अवकाश के समय हैं, जब वे अपने आर्थिक गतिविधियों से शारीरिक और मानसिक तौर पर मुक्त हों तथा आत्मगत हो मनोरंजन कर रहे हों।

श्रमिकों के श्रम से भी जो सरप्लस (अधिशेष समय) बनता है उसे अपने अवकाश के रूप में इस्तेमाल करनेवाला एक वर्ग पैदा होता है, जो इसका इस्तेमाल अपने सामाजिक अवस्थिति  ( Status)  विस्तृत करने में करता है। स्त्रिायों के श्रम से उत्पन्न सरप्लस पुरुष इस्तेमाल करता है अपने लीजर के तोर पर।

अगले जनम मोहे बिटिया ही कीजौ

मेरे शोध क्षेत्र (गया का रेड लाइट एरिया) के नागरिक ही नहीं संबद्ध मगध क्षेत्र सहित देशभर में घरेलू काम और घर की जिम्मेदारियों से मुक्त अपने लिए स्त्रियाँ  नहीं जीती हैं.  मगध के गाँवों में, ड्योढ़ी में (घर के आगे के हिस्से), जो कि जनाने का पब्लिक स्फीअर होता है, स्त्रिायाँ (40-50 के बाद) यदि कुछ स्त्रियों  के साथ बातचीत करती दिखें भी, तो उनके हाथ से कुछ बीनने, चुनने अथवा अन्य घरेलू जिम्मेवारियों की गतिविधियाँ संचालित हो रही होती हैं। मुक्त अवकाश संभव ही नहीं, तो फिर यौनकर्मियों को अवकाश! त्याज्य और हाशिये की जिंदगी जी रही स्त्रियों  को अवकाश!!

मैं अपने शोध के लिए उन से मिलने गया तो प्रश्नावली का कोई पुलिंदा मेरे हाथ में नहीं था। डर थ कि वे उन प्रश्नों की औपचारिकता में जबरदस्त ‘दूसरेपन’ के भाव में न आ जायें।उन्हीं दिनों गया के रेड-लाइट पर पुलिस ने छापा मारा था। यौनकर्मियों को लगता था कि यह छापा उनके बीच काम कर रहे एक गैर सरकारी संस्था ने मरवाया था, जो कि एक पुनर्वास केन्द्र भी चलाता है। दरअसल उसी पुनर्वास केन्द्र के छापे से बरामद नाबालिग लड़कियों को पुलिस ने सुपुर्द किया था। मेरे प्रति भी उनका अविश्वास हो सकता था, ऐसा मेरे मार्गदर्शकों ने बताया था। हां, मरे ऊपर  विश्वास का एक कारण अवश्य था कि मेरी मार्गदर्शिका उनके बीच कभी काम कर चुकी महिला थी, जो कि अब एक सामाजिक संस्था की कार्यकर्ता थीं। एन.जी.ओ. की शब्दावली में उन्हें ' Peers'  (आंतरिक) कहा जाता है।

पहली बार जाते हुए, अपने शहर में होने के कारण, मैं थोड़ी झिझक में था। वहां सामान्य आना-जाना यद्यपि उसका प्रयोजन क्रेता या विक्रेता का न भी हो, तब भी, सामाजिक अपवाद का विषय है। मेरे एक परिचित कत्थक शिक्षक किसी नर्तकी के घर (कोठे पर) जाते हुए मुझे थोड़ी दूरी से दिखे। शायद मैं भी उन्हें दिखा होउंगा .  उन्होंने अपने सर पर नीेचे तक लटकता हुए गमछा रख लिया। वे शहर की सभ्य (तथाकथित) बस्तियों के भी शिक्षक थे।

मैं करीब 2 बजे के आस-पास शनिवार को नर्तकियों और यौनकर्मियों का मेहमान था। सवाल लिखित तौर पर तो नहीं थे, परंतु निश्चित सवालों के साथ मैं उनके अवकाश को जानने-समझने तो जरूर गया था।मरे पड़ाव दो समूहों में विभक्त थे, नर्तकियों के बैठक खानों में और खानगी (देह-व्यापार) से जुड़ी स्त्रियों  के मेहमान खानों में। नर्तकियां स्वयं को खानगी स्त्रियों  से श्रेष्ठ मानती हैं। मेरे मार्गदर्शिका भी दुनियादारी समझती थी। उनका हृदय खानगी स्त्रिायों से सहज जुड़ा था, लेकिन उन्होंने मेरे नर्तकी मेहनाननवाजों के समक्ष उनकी श्रेष्ठता को स्थापित करते हुए बहुत चतुराई से मेरा परिचय कराया।

कमला देवी (उम्र 50 के आस-पास) नर्तकियों के पेशे से जुड़ी हैं। मैं पहले उनका मेहमान बना। शनिवार को 2 बजे के वक्त महफिल सजी थी। दीदी (सीता देवी, मेरी मार्गदर्शिका) ने महफिल के बीच से उन्हें बुलाया, महफिल से घुंघरू और गाने की आवाज आती रही। मैं झिझक रहा था इसलिए समय लेकर आने की बात करता रहा, लेकिन उन्होंने उसी वक्त मुझे एक कमरे में बैठाया। मैंने सामान्य परिचय के बाद माहौल को हल्का करते हुए उनके सबसे यादगार क्षणों के विषय में कुरेदा। उनका जवाब था सबका प्रायः ‘पति-पत्नी का वो क्षण’ ही यादगार होता है। पूरी बातचीत में वे परिवार के फ्रेम में ही बात करती रही। 2009 तक तो अधिकांश नर्तकियों के पास तो काम नहीं थे। इक्के-दुक्के ग्राहक आ जायें तो बात अलग है। 90 के बाद ही विवाह आदि समारोहों में उनके नाच-गाने की परंपरा पर कुठाराघात हुआ था। फिर  कभी-कभी सट्टा पर वे जाती ही हैं, यानी अवकाश ही अवकाश (?)।


सवाल यह है कि क्या यह अवकाश है? जब काम, आजीविका और जीवन का मुख्य साधन, प्रभावित हो तो खाली समय अवकाश नहीं हो सकता। अवसाद पैदा करता है। काम की चिंता से मुक्ति के बाद ही लीजर का पूर्ण संदर्भ बनता है। गया की नर्तकियों के लिए तो काम ही नहीं है, उससे अधिक काम पाने का तनाव है। कुछ नर्तकियां थोड़े अधिक पैसों में यौन सेवा भी दे रही है। ऐसा कुछ लोग बताते हैं। परंतु कमलादेवी जैसी नर्तकियां इसे स्वीकार नहीं करतीं। वे परिवार और विवाह के फ्रेम में ही सोचती हैं। खाली समय में ये टी.वी. देखती हैं। कमला देवी को टी.वी. के धारावाहिकों से सास-बहू पसंदीदा धारावाहिक है। नर्तकियाँ बाजार भी घूम आती हैं, जो कि उनके मनोरंजन का एक साधन भी है। सिनेमा भी जाती हैं। नर्तकियों के यहाँ मेरा सैम्पल बहुत ही छोटा था। वैसे इनकी संख्या भी बहुत कम है।

आपसी साहचर्य के तौर पर इनके बीच पारिवारिक रिश्ते हैं। एक कोठे पर रहने वाी लड़कियां आपस में बहनें हैं। इनके बच्चे अच्छे स्कूलों में भी पढ़ते हैं। पर्व-त्योहार (हिंदू और मुस्लिम अथवा अन्य धार्मिक परंपरा के अनुसार) उनके आपसी साहचर्य का एक माध्यम है। ईश्वर में वे समान रूप से आस्था रखती हैं। मेरे पास जो सुनिश्चित सवाल थे, उनके इर्द-गिर्द ही मैंने उनसे बातचीत की।फुर्सत के वक्त-अंतराल और दिन के भाग(घंटो, अवधि) के सांचे में मेरा पहला सवाल था। पुनः ऐसे अवकाश की अवधि में वे क्या करती है? मेरा दूसरा सवाल। तय था कि अवकाश जीवन के दैनंदिनी में कहीं पारिभाषिक तौर पर शामिल नहीं है-काम नहीं है, तो बोरियत है। यह जरूरी नहीं है कि दरवाजे पर बैठी कोई कोठे की मालकिन या नर्तकी अवकाश की स्थिति में बाहरी दुनिया का विहंगावलोकन कर रही होती है। काम का हिस्सा, मेहमान के आने का इंतजार। समारोहों में भागीदारी मेरे सवालों के दायरे में था। समारोह अधिकांशतः पर्व-त्योहार ही थीं, लेकिन पर्वों के दिनों में ग्राहकी भी बढ़ जाती है। यानि सामान्य उत्सव के बाद पर्व उनके लिए व्यस्तता के सर्वाधिक बड़े अवसर होते हैं।

नर्तकियों और खानगी पेशे की  स्त्रियाँ एक साथ ईश्वर में विश्वास रखती हैं, बिना किसी गिला-शिकवा के। देवालय नहीं जाती है, लेकिन ईश्वर अराधना में विश्वास है। कमला देवी खूबसूरत हैं। वे ठुमरी गाती हैं-दूसरे अन्य क्लासिकल (शास्त्रीय ) संगीत भी। उनके कोठे पर जब मैं गया तब फिल्मी गीत चल रहा था। मुजरे के तौर पर ग्राहक आज भी फिल्मी गीत पसंद करते हैं। मुकद्दर का सिकंदर का गाना ‘सलामे इश्क’ की आवाज ‘महफिल खाने’ से आ रही थी। गायन बहुत सुरीला नहीं था, गायिका बाहर जो बैठी थी हमारे साथ।

हमारे दूसरे पड़ावों में थे देह-व्यापार से जुड़ी स्त्रियों  के मेहमानखाने- दार्जलिंग से आयी दो बहनों के यहां, बहन 22-23 की। कोठे की मालकिन भी वहीं थी और सेवा प्रदाता भी। दिन के तीन बजे के आस-पास बड़ी बहन कौरीडोर से बाहर झांक रही थी, ग्राहकों के लिए प्रदर्शन का यह रूटीन काम था उनका। कौरीडोर भी हो सकता है क्या? एक रूम और बाहर के खाली स्पेस का दरबा जैसा है घर। नर्तकियों के घर की तुलना में अधिक सीलन भरा। खाली जगह रोड पर खुलता है, वही है कौरीडोर। बहने काम पर थीं यानी अवकाश का सवाल ही कहां हैं? छोटी बहन बड़ी के(चार-पांच साल) बच्चे के साथ कमरे में थी। हम लोगों के जाने पर बड़ी बहन ने अपने खुले घुटनें पर तौलिया डाल लिया, तय था कि सीता दीदी के साथ आने वाला मैं उनका ग्राहक नहीं था, ऐसा ही समझा होगा उसने। हमारे स्वागत के लिए स्टूल था, जिस पर मैं बैठा। दरवाजे की चैखटे पर सीता दी। उसने छोटी बहन को बुलाया और चार ग्लास मैंगो-ज्यूस भी।


वे खाना खुद नहीं पकाती हैं- खाना पकाने और बर्तन धोने के लिए काम वाली बाई आती है। यानी घरेलु काम से मुक्त हैं वे। वे ही नहीं इसके बाद में जिस किसी यौनकर्मी से मिला, सभी। सबका एकमात्र काम है, ग्राहक की सेवा। वे या तो ग्राहक की सेवा के पूर्व की स्थिति में होती है, ग्राहक की सेवा कर रही होती है या एक ग्राहक के सेवा के बाद दूसरे के इंतजार  के अंतराल (बचे समय) के बीच होती हैं-अवकाश का सवाल ही कहां है?

दार्जलिंग की इन लड़कियों की जिंदगी मोबाइल है। वे पांच-छह सालों से गया में है। बड़ी बहन छोटी को बहुत प्यार करती है- 'है न सुंदर और मासूम मेरी बहन।’ दोनों बहनें कोठे से बाहर नहीं निकलतीं। स्कूल दोनों हीं बहनें कभी नहीं गयीं। एक दिन में दोनों बहनें चार-पांच या उससे अधिक ग्राहकों को निपटाती हैं दिन भर में 500 रूपये मिल गये तो काफी है, दलालों का भी रेट बंधा है। किराया देना है। घर भेजना है। बच्चे का भविष्य है। घर में न टीवी है और न टीवी देखने की फुर्सत। फिल्म नहीं देखतीं-देख भी नहीं सकती। गया के बाहर कभी कोई फिल्म देखा था। मैं गया में ही धंधे में हूं। दार्जलिंग में कोई नहीं जानता। अपना देश नहीं गंवाना चाहिए।’ वैसे दोनो के मां-बाप नहीं है। भाई-बहन हैं।

‘ईश्वर को मानती हूं। ईश्वर न हो तो दुनिया चलेगी ही नहीं।’ मैं उनसे पूछ  नहीं सकता था कि फिर ईश्वर उनके लिए किसी वैकल्पिक व्यवसाय की व्यवस्था क्यों नहीं देता? उमड़ता हुआ यह मेरा  सवाल ‘दूसरे पन’ की मेरी अवस्थिति के कारण था। वे अपने इस पेशे से शिद्दत से जुड़ी हैं। ग्लानि बोध में नहीं है। उनका कहना है, ‘हमलोग कई मां-बहनों को बचा रही हैं। अभी पुलिस का रेड हुआ, धंधा बंद रहा। मानपुर पुल पर बलात्कार हुआ। ‘हमलोग तो समाज को बचा रही हैं।’

पर्व मानती है, धार्मिक मान्यताओं के अनुरूप। जीवन में कोई यादगार क्षण नहीं है इन बहनों के। छोटी सिर्फ मुस्कुराती है, बोलती कम है। दोनो बहनों की दिली ख्वाहिश है स्वतंत्र घूमने की, फिल्म देखने की बिना किसी घूरती निगाह के, अवकाश कहां!!

थोड़ी देर बाद हम किसी दूसरे कोठे पर बढ़ रहे थे कि इस घर पर हो रही हमारी मेहमाननवाजी को देख रही सामने के कोठे की लड़की ने हमें बुलाया। सीता दी सबसे घुली-मिली थी। बल्कि यहां ज्यादा सहज थी। इस घर की भी मालकिन आम छवि में बैठी कोई मौसी नहीं है, बल्कि वही लड़की है, जिसने हमें बुलाया ‘रेखा’। वह भी तथाकथित कौरीडोर से झांक रही थी। दो बूढ़ी स्त्रियाँ  सो रही थी। नीचे फर्श पर। बुआ कहकर उसने उन्हें जगाना चाहा। जागकर भी वे उठकर बैठी नहीं। वह बहुत बोलने वाली लड़की है, ऐसा उसने स्वयं बताया। कपड़े छोटे थे घुटनों से ऊपर , और नाभी  से भी। उसने कोई तौलिया नहीं डाला। बेफिक्र सी बैठी बातें करती रही चाय मंगवाना चाहा, लेकिन हमने मना कर दिया-अभी ज्युस पिया था।’

वह सिलीगुड़ी की है। रवीन्द्र संगीत जानती है-बंगला गीत गा सकती है।घर में टीवी नहीं है। डेक है, वह बातचीत के बीच उन्हें बजाना शुरू कर देती है। मैंने भी सिर्फ आवाज कम करवायी वह 12 साल से गया में है। उम्र 25-26 साल के बीच। उसने कोई फिल्म नहीं देखी है। ब्यूटी पार्लर भी नहीं गयी।

फुर्सत के वक्त। वह हंसने लगती है। कोई अपराध बोध नहीं। बुढि़या, जिन्हें वह बुआ कह रही थी, उनके प्रति वह बहुत स्नेहिल है और जिम्मेवारी से भरी है। बुढ़ापे के डरावने ख्वाब से उन्हें उसने लगभग मुक्त रखा है यानी जिम्मेवार पारिवारिकता से बंधी है। आपस में एक-दूसरे से मिलती है, लेकिन बहुत कम। ग्राहकों के इंतजार में झांकते हुए कई बार दूसरे से बात कर लेती हैं। वह किसी अपराध बोध से मुक्ति हैं, ‘गलत है, तो गया में ही गया के बाहर बताते भी नहीं।’

पुलिस तंग भी करती है, लेकिन यह सब रूटिन का हिस्सा है। उनके मानसिक उतार-चढ़ाव का अध्ययन अथवा मनोवैज्ञानिक बारीकियां मेरे शोध में शामिल नहीं थे। फिर भी मैने पूछा,
‘पुलिस तंग करती है।’
‘नहीं प्यार करती है।’
सीता देवी ने कहा, ‘तू आसानी से दे देती होगी।’
‘मैं बहुत बोलती हूं। मेरे बक-बक से वे भी परेशान हो जाते हैं।

इसी बीच सीढि़यों के पास दरवाजे पर दस्तक हुई। कौन के जवाब में उसने कहा, ‘मैं तुम्हारा चाचा’।
उसने दरवाजा खोलकर दुत्कारते हुए उसे भगा दिया। फिर शांत बातचीत में तल्लीन हो गयी। सीता दी ने बताया ग्राहक था। बहुत पीकर आए ग्राहकों को ये भगा देती हैं ।

‘खूब सोने की, निश्चित खाने की और प्यार करने की तीव्र इच्छा महज ख्वाब भर है।’

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