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मनुष्य – आदिम मनुष्य भी – प्राकृतिक नहीं, सांस्कृतिक प्राणी है : अर्चना वर्मा

अर्चना वर्मा

अर्चना वर्मा प्रसिद्ध कथाकार और स्त्रीवादी विचारक हैं. संपर्क : mamushu46@gmail.com .

( प्रज्ञा पांडे के अतिथि सम्पादन में हिन्दी की पत्रिका ‘ निकट ‘ ने स्त्री -शुचितावाद और विवाह की व्यवस्था पर एक परिचर्चा आयोजित की है . निकट से साभार हम वह  परिचर्चा  क्रमशः प्रस्तुत कर रहे हैं , आज  चर्चित आलोचक एवम रचनाकार अर्चना वर्मा  के जवाब .  इस परिचर्चा के  अन्य  विचार पढ़ने के लिए क्लिक करें :  ) 

जो वैध व कानूनी है वह पुरुष का है : अरविंद जैन 

वह हमेशा  रहस्यमयी आख्यायित की गयी : प्रज्ञा पांडे 


अमानवीय और क्रूर प्रथायें स्त्री को अशक्त और गुलाम बनाने की कवायद हैं : सुधा अरोडा 

अपराधबोध और हीनभावना से रहित होना ही मेरी समझ में स्त्री की शुचिता है :  राजेन्द्र राव 



बकौल सिमोन द बोउआर ‘स्त्री पैदा नहीं होती बनायी जाती है’ आपकी दृष्टि में स्त्री का आदिम स्वरुप क्या है?
आदिम स्वरूप से आपका मतलब अगर प्राकृतिक स्वरूप से है तो वह तो केवल स्त्री-देह का माँस-पिण्ड है यानी वह सद्यजात शरीर जिसमें स्त्रीसूचक जननांग है – स्त्रीलिंग। और यद्यपि उसे स्वयं नहीं पता लेकिन उसके आसपास का समाज उसको जन्म के साथ ही स्त्री नाम से चिह्नित कर देता है और उसके साथ वैसा ही व्यवहार करने लगता है जिसकी वजह से वह अपनी चेतना पर पड़ती छापों के संचय से स्वयं को संज्ञान की क्षमता आते ही स्त्री के रूप में पहचानने लगती है और ‘स्त्रियोचित’ व्यवहार करने लगती है। ‘स्त्रियोचित’ व्यवहार सामाजिक सांस्कृतिक संरचना है और यद्यपि प्रत्येक समाज में उसकी अवधारणा अलग अलग होती है लेकिन इस बात में हर जगह समान है कि पुरुष की तुलना में वंचित और अन्यायग्रस्त है।
लेकिन यहाँ मैं ज़रा ठहरकर ‘आदिम’ और ‘प्राकृतिक’ के बारे एक बात कहना चाहूँगी। सिमोन द बोउवा ने जो बात कही उसे कैसे समझा जाय? ‘स्त्री पैदा नहीं होती’ का कुल मतलब क्या सद्यजात शिशु का इस बात से अनभिज्ञ होना है कि वह स्त्री है? ‘वह बनाई जाती है’ का अर्थ क्या यह है कि न बनाये जाने का भी कोई विकल्प मौजूद है? जैसे ही बीज गर्भ में स्थापित होता है, बल्कि उसके भी पहले, जैसे ही कोई युगल इसमें प्रवृत्त होता है वैसे ही इस बात से कि उस युग्म के दोनो सदस्य कौन हैं; किस पृष्ठभूमि, किस कुल, किस परिवार के हैँ; यह तय होजाता है कि इस गर्भस्थ शिशु को पारिवारिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, अनुवांशिक उत्तराधिकार के रूप में क्या मिलने वाला है। इन्सान का जन्म ही एक प्रदत्त परम्परा में, प्रदत्त उत्तराधिकार के साथ होता है और जन्म लेते ही उसका ‘बनाया जाना’ शुरू हो जाता है, बाद में वह चाहे तो विद्रोह कर सकता है लेकिन होश आने के पहले ही शायद वह इतना ‘बनाया जा चुकता’ है कि यह भी तय हो जाता है कि वह विद्रोह करना ‘चाहेगा’ या नहीं या अगर ‘चाहेगा’ भी तो उसके विद्रोह की दिशा क्या होगी। मेरा मतलब किसी किस्म के नियतिवाद से नहीं, मैँ केवल यह कहना चाहती हूँ कि ‘पैदा होना’ और ‘बनाया जाना’ असल में एक दूसरे से कोई खास अलग घटनाक्रम नहीं हैँ, सिवा इसके कि पैदा तो एक ही तरह से हुआ जाता है, लेकिन बनाया अलग अलग तरह से जाता है। न केवल स्त्री-पुरुष को एक दूसरे से बल्कि अलग अलग पारिवारिक सामाजिक सांस्कृतिक साँचों के अनुसार स्त्रियों को अन्य स्त्रियों से और पुरुषों को अन्य पुरुषों से भी अलग अलग। लेकिन ये साँचे भी कोई ऐसे ठोस और अनम्य नहीं कि उनमें ढल कर निकलने वाली हर प्रतिमा एक दूसरे की यथावत प्रतिकृति हो। कहने का मतलब यह है कि इंसान को जन्म के साथ जो बना बनाया बहुत कुछ मिलता है वह बड़ी हद तक निश्चित लेकिन एक हद तक अनिश्चि्त अतः लचीला हुआ करता है लेकिन वास्तव में मनुष्य का आदिम या प्राकृतिक रूप क्या है, कौन सा पशु? हम नहीं जानते। ‘जो बनाया गया है’ उसके विरुद्ध विद्रोह के क्षण में हम कहते तो है कि ” औरत पैदा नहीं होती, बनाई जाती है” लेकिन मतलब दरअसल  कुल मिला कर यही निकल सकता है कि ऐसी नहीं, वैसी भी बनायी जा सकती थी। जैसे पैदा होते हैँ वैसे ही कैसे बने रह सकते है ? ‘किसी और तरह से बनने या बनाये जाने’ की बात ही कर सकते हैँ। यानी मनुष्य – आदिम मनुष्य भी – प्राकृतिक नहीं, सांस्कृतिक प्राणी है और प्रकृति को तोड़ने, मरोड़ने, बदलने की दिशा में विकसित हुआ है। वह दिशा कहीं कहीं किसी किसी संस्कृति में प्रकृति के अनुकूल (जैसे परम्परागत भारतीय संस्कृति में) लेकिन आधुनिक संसार में अधिकतर प्रकृति के प्रतिकूल दिशा ही है। स्त्री के आदिम स्वरूप के बारे में सोचना हो तो या तो वन्य गुफ़ा नारी की कल्पना की जा सकती है या फिर स्त्री-शरीर के अन्तःस्रावों या हार्मोन्स के कारण निर्मित होने वाले किसी बुनियादी स्त्री-स्वभाव की।

क्या दैहिक शुचिता की अवधारणा स्त्री के खिलाफ कोई साजिश है ?
साजि़श में ऐसा ध्वनित होता है जैसे कोई सोचा समझा और जान बूझकर रचा गया षड्यन्त्र हो। सामाजिक आचार-संहिताओं की जकड़न और उससे छूटने की छटपटाहट और विद्रोह के दौर में ‘साजिश’ और ‘अभिशाप’ लोकप्रिय और बहुप्रयुक्त शब्द हो उठते है। तब ‘सहज’ और प्राकृतिक के अन्तर को समझने और स्वीकार करने की संभावना नहीं रह जाती क्योंकि सदियों के अभ्यास की वजह से वह आचरण-संहिता भी सहज और प्राकृतिक प्रतीत होने लगती है जिसकी बुनियाद में अन्याय होता है। इसलिये स्त्रीदेह के संग जुड़ी कोख और मासिक धर्म की अनिवार्यता, उसके प्रति पुरुष का दुर्निवार और आक्रामक आकर्षण भी स्त्री के ख़िलाफ़ प्रकृति की साजिश और अभिशाप की भाषा में कहे-समझे जाने लगते हैँ। परिवार, विवाह, दाम्पत्त्य जैसी सामाजिक संस्थाएँ, उनकी मर्यादाएँ, उनकी जड़ताएँ संस्कृति के विकास की सदियों के दौरान उगती, पनपतीं, विकसित, प्रतिष्ठित और जड़ होती हैं। समय समय पर समाज के नियन्ताओं के परस्पर विचार-विमर्श, चिन्तन-अनुचिन्तन से आचरण-संहिताएँ निर्मित और नैतिकताएँ निर्धारित की जाती हैं, शायद उस समय की ज़रूरत को जिस तरह से नियन्ताओं ने समझा, उसके अनुसार।
दैहिक शुचिता भी ऐसी ही एक अवधारणा है जो आज हमारे समाज में अपने एकतरफ़ा, अतिवादी, अविचारी स्वरूप में स्त्री के ख़िलाफ़ एक असम्भव सी सामाजिक साज़िश का रूप ले चुकी है। मूलतः वह किसी न किसी रूप में सारी दुनिया के समाजों में लागू थी, लेकिन दो विश्वे-युद्धों की परिणति में यूरोप मेँ पच्चीस वर्षों के अन्तराल मेँ पूरी की पूरी युवा-पुरुष-पीढ़ियों का सफ़ाया हो जाने की वजह से और जीवन में सृजन-समारोह के अविलम्ब आरम्भ की ज़रूरत से वहाँ नैतिकता-बोध और आचरण-संहिताओं की संरचना बदली। आधुनिकता, औद्योगीकरण, भूमण्डलीकरण इस बदलाव के अगले अध्याय कहे जा सकते हैं। बदलाव कभी इकहरे नहीं हुआ करते। अपने साथ अनेकपरतीय और अनेकतरफ़ा बदलाव लाते हैं।
आदिम वन्य गिरोह-समाज में परिवार की धारणा क्यों और कैसे विकसित हुई? स्त्री-पुरुष को यह जानने समझने में सदियाँ लग गयी होंगी कि सन्तान के जन्म में पुरुष का भी कोई योगदान या भूमिका है। उसके पहले तक प्रजनन की यह रहस्यमयी क्षमता स्त्री को एक रहस्यमयी शक्ति से मण्डित अस्तित्व बनाती थी जिससे वह भयभीत रहा करता होगा। एंगेल्स के अनुसार ‘अपनी’ सन्तान की धारणा के साथ ‘अपनी औरस सन्तान’ की निर्भ्रान्त पहचान की जरूरत से अपना कुटुम्ब, अपनी सम्पत्ति, अपना उत्तराधिकारी इत्यादि की धारणाओं और मर्यादाओं का विकास स्वाभाविक रूप से लाजमी था। उत्तराधिकार के लिये औरस सन्तान निश्चिंत करने के लिये स्त्री की प्रजनन-क्षमता पर कब्जे की ज़रूरत से दैहिक शुचिता की धारणा का विकास हुआ। वह स्त्री की यौनिकता पर एकतरफ़ा कब्जा था, पुरुष उससे मुक्त था।
हमारी परम्परा मेँ महाभारत में प्राप्त एक उल्लेख के अनुसार बृहदारण्यक और छान्दोग्य उपनिषदों के एक प्रमुख ऋषि श्वेेतकेतु को विवाह की संस्था के सूत्रपात का श्रेय प्राप्त है। उन्होंने देखा था कि उनके पिता की उपस्थिति में एक कामग्रस्त ब्राह्मण ने उनकी माँ का हाथ पकड़ा और पिता (सम्भवतः प्रथानुसार) मौन दर्शक बने रहे। माता-पिता और तीसरे आदमी से सन्दर्भित इस घटना से श्वेतकेतु को जो भी महसूस हुआ हो,उन्होंने इस अनुभव से स्त्री-पुरुष सम्बन्ध को गरिमा प्रदान करने की ज़रूरत को महसूस किया और स्त्री-पुरुष सम्बन्ध मर्यादाएँ निर्धारित कीं जो अन्ततः विवाह की संस्था के रूप में विकसित हुईं।
इस सन्दर्भ में संभवतः मनुष्य स्वभाव में निहित परस्पर अधिकार, ईर्ष्या और अनौचित्य की व्यंजनाएँ भी शामिल हैँ जिसकी वजह से भी सीमाओं का निर्धारण जरूरी हुआ होगा। तब का तो पता नहीं लेकिन अब तो जहाँ उत्तराधिकार के लिये सम्पत्ति नहीं होती वहाँ भी सन्तान की आकांक्षा और अधिकार भावना होती है। संभवतः महाभारत के पहले तक विवाह की मर्यादाएँ अनिर्धारित और पर्याप्त लचीली रही होंगीं। श्वेवतकेतु के निर्धारण में मर्यादाएँ दोतरफ़ा हैँ। विकासक्रम मेँ सारी मर्यादाएँ केवल स्त्री के लिये शेष रह गयीं और अन्ततः दाम्पत्य और मातृत्व उसके अस्तित्व का मूल्य निर्धारित करने लगा। इन दोनो स्थितियों को उनके सांस्कृतिक महिमामण्डन और भावुक विगलन से अलग कर दिया जाय तो स्त्री के पास जो अस्तित्व बच रहता वह देह पर कब्जा और प्रजनन-यंत्र का है। अतीत की जिस समाज व्यवस्था में आर्थिक उत्पादन का संसाधन मनुष्य था, उसमें स्त्री की प्रजनन-शक्ति संसाधन के उत्पादन-यंत्र का पर्याय थी और स्त्री स्वयं भी पशु सम्पत्ति के समकक्ष सम्पत्ति में बदल गयी थी। पशु और स्त्री बराबर से लूट का माल होते थे।
मातृसत्तात्मक आदिम समाज के केवल कुछ चिह्न बाकी हैं जिन्हें हम स्मृतिसूचक मानकर इतिहास की निशानदेही की कोशिश करते हैँ अन्यथा वस्तुतः वे मिथक और कल्पना की सत्ता के अधिक निकट हैँ। भारतीय सांस्कृतिक परम्परा में ऐसे बहुत से मिथक और वृत्तान्त हैं जो आज भी जीवित परम्परा की तरह हमारे साथ शेष और जीवन के समारोह का अंग हैं।

समाज के सन्दर्भ में शुचितावाद और वर्जनाओं को किस तरह परिभाषित किया जाए।
बात लम्बी होती जा रही है लेकिन पूरी अभी हुई नहीं है इसलिये ऊपर वाली बात के उत्तर को मैँ आपके इस प्रश्ना में भी जारी रखने की इजाज़त चाहूँगी। स्त्री-विमर्श का मूल वैचारिक आधार तो इसी पहचान से शुरू हुआ है कि अन्याय और उत्पीड़न स्त्री के प्रति सामाजिक व्यवहार की मुख्यधारा है। पितृसत्तात्मक समाज के सूत्रपात के प्रथम क्षण से अब तक का लम्बा इतिहास है, कोई नहीं जानता कितना लम्बा, शायद पूरा का पूरा दर्ज इतिहास, और बहुत सारे मोड़ों से गुजर कर यहाँ तक आया है, बदलाव की भी एक लम्बी यात्रा पूरी की है लेकिन सामाजिक ऐतिहासिक बदलावों के बावजूद ऐसा होता है कि हमारा सामूहिक अवचेतन हमारे पुराने भावात्मक व्यवहारों, मूल्यों, सामूहिक नैतिक निर्णयों के स्मृति-संचय को संस्कारों मे बदल कर वर्तमान तक साथ लिये चला आता है। संस्कृति के निर्माण में संस्कार ही सामग्री है क्योंकि संस्कार उन स्मृतियों का नाम है जो अवचेतन का हिस्सा बन चुकती हैं और अधिकार और कभी कभी तो पुनीत कर्तव्य जैसा भी कुछ मान रखा है क्योंकि उसमें स्त्री को उसकी जगह दिखाने, अनुशासन सिखाने, काबू में रखने, ‘मर्यादा’ का उल्लंघन न करने का पाठ पढ़ाने जैसा कोई भाव निहित और ध्वनित रहता है। शारीरिक ताड़ना, बलात्कार, तेजाबी हमले हत्या और आत्महत्या की ओर धकेलना जैसी हिंसाएँ इस पाठ के विविध अध्याय हैं। हमलावर को सदियों तक स्त्री की शर्म और चुप्पी पर भरोसा रहा है। इसलिये स्त्री के पक्ष में एक के बाद एक कानून बनाते जाने के बावजूद स्थिति बहुत सुधरी नहीं है। कानून का साथ और सहारा लेने के लिये भी चुप्पी तोड़ना ज़रूरी है। और अब वह चुप्पी टूट रही है, तोड़ी जा रही है, वह शर्म छोड़ी जा रही है, तोड़ने और छोड़ने के लिये वातावरण में प्रोत्साहन है। कानूनों की कार्यान्वित का हौसला है। शायद इसीके समतोल की तरह हिंसा और भी अधिक हिंसक, हमला और भी अधिक आक्रामक होता जा रहा है। समाज की इन प्रवृत्तियों और व्यवहारों को देखते हुए शुचितावाद और वर्जनाओं की परिभाषा केवल अन्याय और उत्पीड़न की तरह की जा सकती है लेकिन ये ही संस्कार भी हैं, मर्यादाएँ भी और नैतिक मूल्य भी और नैतिकता और सच्चरित्रता तो हमारे समाज के लिये जैसे कुल मिला कर स्त्री के शरीर मेँ ही बसती हैं। हमारे अनजाने भी/ही हमको नियंत्रित करती हैँ। स्त्री से जुड़ी सामाजिक मान्यताओं के बारे यह खास तौर से सच है। इसकी वजह पर ठीक ठीक उँगली रखना आसान नहीं। अनुमानतः शायद यही सच हो कि पुरुष की जिन आदिमवृत्तियों ने उसके अवचेतन में सबसे गहरी जड़ें जमा रखी हैँ – काम, संग्रह, वर्चस्व की मूलप्रवृत्तियाँ – वे सब की सब स्त्री के मामले में एकसाथ एकजुट सक्रिय होती हैँ और बहुत पुष्ट और सबल विवेक के अभाव में हावी हो बैठती हैं। युग बदल जाय, समाज बदल जाय, स्थितियाँ बदल जाय, यहाँ तक कि स्वयं संस्कृति भी कई सारी परत नीचे तक की गहराइयों में बदल जाय, सबसे निचली और गहरी परत में स्त्री के विषय में वही मान्यताएँ, वही कसौटियाँ जस की तस बनी रहती हैं।
शुचितावाद और देह से जुड़ी वर्जनाएँ हमारे समाज की ऐसी ही संस्कारजन्य मर्यादाएँ हैं लेकिन आज के समय में सिर्फ़ स्त्री के लिये। और उसकी रक्षा और पालन की जिम्मेदारी भी अकेले दम उसकी ही रहती आई है जबकि पितृसत्ता में अक्सर पुरुष-समाज ने उस पर हमले और उसके ध्वंस को अपना अधिकार और कभी कभी तो पुनीत कर्तव्य जैसा भी कुछ मान रखा है लेकिन इसके बावजूद स्त्री-समुदाय के लिये भी उनसे मुक्त होना बहुत आसान नहीं; क्योंकि उसका अपना मानस और आत्मबोध भी उन्हीं तन्तुओं से रचित है; हालाँकि पुरुष के मुकाबले, कम से कम कुछ अंशों में तो जरूर, अधिक आसान है क्योंकि उसके पास अपने साथ अन्याय और उत्पीड़न के लिये पितृसत्ता के विरुद्ध एक न्यायोचित मुकद्मा है। न्याय के पक्ष में खड़े होना, अन्याय सहने से इंकार करना, उत्पीड़न के लिये रोष, लड़ने का साहस और एकजुट आन्दोलन और मोर्चा – ये ऊर्जा का अक्षय स्रोत हैं। फिर स्त्री के पास तो केवल अपनी ही नहीं, सदियों की पीड़ा का उत्तराधिकार भी है। अतीत सदियों का फ़ैसला भी वर्तमान के मैदान में होने लगे तो वह ऊर्जा भी सैकड़ों गुना हो जाती है। तब वह केवल परिस्थितियों से नहीं, संस्कारों से लड़ाई भी बन जाती है।
शुचितावाद और वर्जनाओं का सामाजिक सन्दर्भ यही है कि बड़े पैमाने पर समाज के आग्रह जहाँ के तहाँ, जस के तस मौजूद हैं; स्त्री-पुरुष दोनो के लिये; और उनको एक अनुकरणीय आदर्श का दर्जा देकर रखा गया है लेकिन यह आदर्श स्त्री के लिये कुछ ‘अधिक’ आदर्श है। और दूसरी तरफ़ देह और काम भावना को लेकर उतने ही बड़े पैमाने पर कुण्ठाएँ, ग्रंथियाँ, असहजता और उनसे उत्पन्न झूठ, फरेब, बेइमानी, दोहरापन, व्यक्तित्व का विभाजन, यौन अपराध और हिंसा का अस्तित्व है। दोनो में एक भीतरी कार्य-कारण सम्बन्ध है। इस असम्भव आदर्श का उल्लंघन दोनो से होता हैँ, लेकिन अब तक दण्डनीय केवल स्त्री ही रहती आई है।
लेकिन ये सिर्फ अपने नहीं, पूरे समाज के, पितृसत्तात्मक समाज के संस्कार हैँ जिन्हें जड़ जमाये हुए सदियाँ बीत चुकी हैँ। जो इस अन्याय के विरुद्ध आत्मसजग या आत्मचेत होते हैँ वे भी प्रायः एक स्तर पर विभाजित व्यक्तित्व का शिकार हो जाते हैं। इस विभक्ति को पाटने में पीढ़ियाँ लग जाती हैं। हमारे समाज में विकास और परिवर्तन इतनी सीढ़ियों और इतनी पीढ़ियों से गुजरते हुए सम्पन्न हो रहा है कि मानो एक साथ कई सदियाँ गुजर रही हैँ।
संस्कार के विरुद्ध विद्रोह करते हुए भी एक असमंजस बना रहता है, कहाँ तक ? कितनी दूर तक? कई बार प्रतिक्रिया में या तो सोची समझी तर्कपरायण उग्रता का अतिशय दिखाई देता है या फिर बिना सोचे समझे छलांग या फिर एक हिचकिचाहट, अनिश्चयय, अनिर्णय या ढुलमुल-यकीनी। अक्सर और ज़्यादातर तो कहानियों, कविताओं, आलेखों, भाषणों में गोला-बारूद उगलने वाली महिलाएँ भी सचमुच की ज़िन्दग़ी में ज़मीनी स्तर पर बड़े बड़े समझौते करती नज़र आती हैं। सचमुच का विद्रोह तात्कालिक घटनाओं और परिस्थितियों की असहनीयता में से निकलता है और हमारे समाज में स्त्री के साथ ऐसा सलूक जिसमें से विद्रोह स्वयं फूट निकलता हो, नियम है अपवाद नहीं।

यदि स्वयं के लिए वर्जनाओं का निर्धारण स्वयं स्त्री करे तो क्या हो ?
तमाशा यह है कि बलात्कार अगर पकड़ा जाय तो उसे स्त्री की सहमति से सम्पन्न साबित करने की कोशिश की जाती है लेकिन जो होता है वह अगर सचमुच स्त्री की सहमति से हुआ हो तो स्त्री द्वारा मर्यादा के उल्लंघन और शुचिता के विसर्जन का मामला बना दिया जाता है। स्त्री की स्वेच्छा और सहमति बलात्कार से भी ज़्यादा संगीन और बड़ा अपराध है।
स्त्री स्वयं के लिये वर्जनाओं का निर्धारण करे, इसमें एक ओर यह ध्वनित होता है कि सामाजिक मान्यता प्राप्त वर्जनाओं को वह स्वेच्छा से स्वीकार कर ले और उन्हें स्वयं-निर्धारित मान ले लेकिन दूसरी ओर, अधिक औचित्यपूर्वक, इसमें यह भी निहित है कि उसके स्वयं-निर्धारण में इस तरह की मान्यता-प्राप्त कुछ वर्जनाओं का निषेध भी होगा। ऊपर वाले प्रश्न  में आपने शुचितावाद और वर्जनाओं को एक साथ ब्रैकेट किया है लेकिन वर्जनाओं का दायरा दैहिक शुचिता तक सीमित नहीं है, वह बहुत बड़ा है। उसमें खिलखिला कर हँसने से लेकर, सर उठाकर, गर्दन तान कर चलने, छोटे छोटे भी अपने निर्णय खुद लेने तक लगभग पूरी जीवनचर्या शामिल है। ज़्यादा बड़ा हंगामा प्रायः कपड़ों की नाप और शरीर के खुलेपन को लेकर मचता रहता है जिसे बलात्कार तक को जायज़ ठहराने का बायस बना लिया जाता है। अगर हमारी दुनिया केवल स्त्री आबादी के बसने के लिये उपलब्ध एक द्वीप हो तो, या फिर हमारी स्त्री अगर ‘वीरविहीन मही मैं जानी’ की तर्ज पर इतनी आत्मसम्पन्न, स्वयंपर्याप्त और स्वायत्त हो कि संस्कार के नाम रूढ़ि का प्रश्नहहीन पोषण करने वाले शेष ग्रन्थिबद्ध, कुण्ठाग्रस्त समाज को ठेंगे पर रखते हुए अपनी स्वच्छन्दता को चरितार्थ कर ले और उसके कोई आनुषंगिक नकारात्मक परिणाम न होते हों तो मैं शत प्रतिशत स्वच्छन्दता के पक्ष में हूँ। ( और स्त्री के सिलसिले मेँ वीर, महावीर – मेरा मतलब हनुमान से नहीं, वर्धमान से भी नही – तो हमारे सभी नरपुंगव ठहराये जा सकते हैँ) लेकिन उसका मतलब चाह कर भी मेरे लिये यह नहीं हो सकता, और असल में तो ऐसी चाहना भी मेरे लिये संभव नहीं कि मेरी ज़िन्दग़ी केवल मेरी ज़िन्दग़ी है और आनुषंगिक नकारात्मक वगैरह अगर किसी को कुछ होता है तो वह उसकी समस्या है, वह जाने! चाह कर भी ऐसा चाहा नहीं जा सकता। अपने निर्णयों का जिम्मेदार तो हमें होना ही होता है। मेरे निकट स्त्री होने का एक अर्थ यह भी है।
नयी पीढ़ी में उन लड़कियों/स्त्रियों की गिनती बढ़ रही है और उन्हें देख कर बेहद सुख, सन्तोष औरखुशी होती है जो आर्थिक रूप से इतनी पर्याप्त आत्म-निर्भर और संस्कारों की जकड़न से इतनी मुक्त हैँ कि एक स्वच्छन्द स्वायत्त जीवन जी सकें। उस धरातल पर अपने अस्तित्व के तरल प्रवाह की अनुभूति क्या होती है, उसे केवल वही जानता है जिसने उसको जीकर देखा है, वह जीकर देखना शायद किसी विचित्र भाव-रसायन के योग से सर्जनात्मक क्षमता से सम्पन्न लोगों के लिये ठोस माँसल धरातल पर बिना जिये भी सम्भव होता है कभी कभी। आपके प्रश्नष ‘अगर वर्जनाओं का निर्धारण स्वयं स्त्री करे तो क्या हो’ में ‘क्या हो’ का एक उत्तर इस तलाश की दिशा में जाता है कि उस निर्धारण के सामाजिक प्रभाव-परिणाम क्या होंगे और दूसरा उत्तर इस तलाश की दिशा में कि उन वर्जनाओं का स्वरूप क्या होगा। हमारे अनुमान कुल मिलाकर अकादमिक व्यायाम ही समझिये क्योंकि जमीनी स्तर पर जो कुछ होता है वह अकसर हमारे सारे अनुमानों के परे और कल्पनाओं को झुठलाता हुआ निकलता है। सामाजिक स्तर पर बात इस पर निर्भर है कि आत्मनिर्णय करने वाली स्त्री जिस समाज का हिस्सा है उसकी स्थापित और मान्य वर्जनाओं से वह स्वयं-निर्धारण में कितनी दूर जा रही है। फ़ासला जितना बड़ा उतनी ही खतरनाक परिणति। गाली-गलौज के वाचिक व्यवहार से लेकर बलात्कार और हत्या तक का शारीरिक सलूक भी।और तमाशा यह कि पूरी तरह से वर्जनाओं के दायरे मेँ रहने वाली स्त्री के साथ यह सलूक नहीं होगा , इस बात की कोई गारण्टी नहीं। जैसा कि मैँ बार बार कहती हूँ, वह तो स्त्री होने और पुरुष की पकड़ और पहुँच के भीतर होने मात्र से संभावित है। वर्जनाओं के स्वरूप की जहाँ तक बात है, स्वयं-निर्धारण का मतलब पूरी तरह से एक निजी और व्यक्तिगत चुनाव है। इसके अलावा किसी स्थिति के आमने सामने आ पहुँचने के पहले से ही वर्जनाएँ और निषेध तय करके नहीं रखे जा सकते। जब चौतरफ़ा दबाव के दमघोट में जीना ही ज़िन्दग़ी का पर्याय हो तो आप शायद खुद नहीं जानेंगे कि कब किस वर्जना को आपका आवेग बेसँभाल होकर चुनौती दे बैठेगा, वह आपकी खुद चुनी हुई हो, तो भी। इसलिये इसके बारे में कोई सामान्य सर्व-जन-स्वीकार्य जैसा सिद्धवाक्य मैँ नहीं कहना चाहती। अपने चुनाव का तरीका ही शेयर कर सकती हूँ, बस। निर्णय और निषेध तरह तरह के हो सकते हैं। जब स्त्री के प्रति प्रवृत्ति और व्यवहार के सिलसिले में पूरा का पूरा सामाजिक ढाँचा और सांस्कृतिक साँचा ही बदलने की ज़रूरत हो तो जाहिर है कि यह पीढ़ी-दर-पीढ़ी नये मूल्यों और विचारों के हस्तान्तरण की एक लम्बी और धैर्यसाध्य प्रक्रिया होने वाली है और आपको अपनी प्राथमिकताओं के चुनाव की ज़रूरत है। एक तो कपड़ों की नाप और फ़ैशन की काट जैसे दैनिकचर्या के सीधे और आसान किस्म के फ़ैसले होते हैं जो अपनी ज़िद से कठिन बनाये जा सकते हैं। किसी ने अगर इसीको अपनी आज़ादी/ सुविधा/स्वच्छन्दता की नाप बना रखा है तो उसकी खुशी; और जाहिर है कि अगर उसके तात्कालिक सामाजिक सन्दर्भ में किसी को उस पहनावे से दिक्कत नहीं है तो मामला यहीं खत्म होता है। इसके उलट हालात मेँ पहनावे को लेकर अशोभनीय किस्म की टीका-टिप्पणी और अभद्र किस्म की फ़िकरेबाज़ी जैसी अश्लीालताओं के मद्दे-नज़र अगर मैं चाहूँ तो इसे अपने शरीर के भीतर सहज भाव से निवास करने और उसे आत्माभिव्यक्ति का माध्यम बनाने के अधिकार को लेकर पूरा दर्शन शास्त्र रच डालने लायक तर्कजाल बुन सकती हूँ। लेकिन अगर सचमुच घूरती हुई और फिकरे कसती हुई और शायद नोच-खसोट जैसे ऐडवेन्चर भी आजमाती हुई तमाशबीनों की टोली के सामने मेरी सहजता और स्वच्छन्दता इस आजादी के आचरण से खण्डित होती है, अगर अपनी नयी काट की पोशाक में अपने सहज शारीरिक अस्तित्व में विचरण करते हुए मैं निर्बन्ध और स्वच्छन्द महसूस करते हुए आगे बढ़ जाने में खुद को असमर्थ महसूस करती हूँ तो व्यक्तिगत रूप से इस को मैँ अपनी आज़ादी के ‘ट्रिवियलाइज़ेशन’ का, अपनी ऊर्जा के अपव्यय का मामला महसूस करते हुए अपनी वर्जना का चुनाव करूँगी। ठहरे पानी में कंकड़ी फेंकने से भी लहरें उठती हैं। अब या तो लहरों से लड़ते रहो, उन्हें उठने से रोकने मेँ अपनी ऊर्जा खपाते रहो या फिर लहरों को वहीं उठता छोड़ कर आगे बढ़ जाओ। और औरत के साथ सलूक के ऐसे संगीन किस्म के हालात में जब ठहरे हुए जल में फेंकने के लिये बड़ी बड़ी चट्टानें और भारी भरकम पत्थर मौजूद हैँ तो कंकरी फेंक कर लहरों से लड़ने की तुक मेरी समझ में नहीं आती। लेकिन यह मेरा बिल्कुल व्यक्तिगत चुनाव है, किसी की आज़ादी की परिभाषा में हस्तक्षेप नहीं।

विवाह की व्यवस्था में स्त्री की मनोवैज्ञानिक ,सामाजिक एवं आर्थिक स्थितियां कितनी स्त्री के पक्ष में हैं ? 
वैसे तो इन स्थितियों की सूची में ‘शारीरिक’ भी जोड़ कर और सारी स्थितियों को शत-प्रतिशत स्त्री के विपक्ष में बता कर एक वाक्य में बात ख़त्म की जा सकती है। वह सामान्यतः दर-अस्ल हैं भी ऐसा ही लेकिन आपके इस प्रश्न  के उत्तर में मेरा संवाद उस स्त्री से है जिसे अपने विवाह को बचा रखने की इच्छा या मज़बूरी है।
विवाह सामाजिक संस्था होने के नाते एक व्यवस्था है तो सही लेकिन आज वह उस अर्थ में व्यावहारिक स्तर पर प्रायः बाकी नहीं कि उसके पास कोई बने बनाये पारिवारिक कायदे-कानून और सामाजिक संविधान है जिन्हें अब तक बड़े पैमाने पर कुल की रीत और परिवार की मर्यादा और खानदान की इज्जत के नाम से जाना जाता था।
दाम्पत्त्य का अर्थ मूलतः स्त्री-पुरुष के एक युगल के युग्मक-सम्बन्ध की सामाजिक मान्यता-प्राप्ति है। वह सृष्टि के ताने-बाने की लघुतम इकाई है। उसके इर्द-गिर्द परिवार है, सम्बन्धी-कुटुम्बी हैँ, नाते रिश्तों  का ताना-बाना है, भूमिकाएँ हैं, पदानुक्रम हैं। आज के दौर में समाज के कई हिस्सों में यह शुरुआत या कम से कम इसकी चेतना की सुगबुग होती नज़र आ रही है कि इनमे से कुछ भी सदा सर्वदा के लिये जड़ रूप से निश्चिेत और निर्धारित नहीं है। अपनी व्यावहारिक कार्यान्विति और दैनन्दिन परिणति मेँ वह नयी-नयी परिस्थितियों में रोज़-रोज़ की छोटी-छोटी समस्याओं, रोज़-रोज़ के समाधानों के द्वारा रोज़ रोज़ निर्धारित और परिभाषित होने वाली व्यवस्था है, या कम से कम ऐसी बनायी जा सकती है।
इस व्यवस्था को स्त्री के पक्ष में लाने मेँ कुछ हद तक आर्थिक स्तर पर स्त्री की आत्मनिर्भरता मददगार होती है लेकिन कुछ हद तक ही। अपवादों को छोड़ दें। अकसर तो उसकी वह आत्मनिर्भरता वास्तव में परिवार की आर्थिक ज़रूरतों के लिये एक पूरक योगदान होती है, इतनी स्वयंपर्याप्त नहीं कि स्त्री को आत्मनिर्भर बना सके। फिर उसके संस्कार जो आत्मनिर्भर होने के इतना विरुद्ध हैँ कि प्रायः वह इसके बावजूद निर्भर तथा स्वयं-अपर्याप्त होने का अभिनय करती पाई जाती है।
दूसरी तरफ़ पुरुष का दुर्बल और कातर अहं जो अपनी कातरता को उद्धत और प्रचण्ड होकर छिपाता है। पितृसत्ता के हाथो केवल स्त्री का ही सत्यानास नहीं किया धरा जाता, पुरुष को भी पौरुष का जो आत्म-बिम्ब थमाया और मरदानगी का खोल पहनाया गया है वह उसके अस्तित्व की नाप से छोटा तो है ही, इतना सख्त भी है कि उसके उगने, बढ़ने और फैलने लायक लचीला नहीं बन पाता। पालक और रक्षक की भूमिका इस तरह उसके आत्मबिम्ब को निर्धारित करती है कि ज़्यादातर उदाहरणों में स्त्री की आर्थिक आत्मनिर्भरता उसके स्वत्व को हालाडोला की हालत मेँ डाल देता है। हो सकता है कि कही कहीं स्त्री का व्यवहार भी इसका जिम्मेदार होता हो, पर जहाँ ऐसा नहीं होता, वहाँ भी स्त्री को उसकी औकात और हैसियत जताने के लिये उसके भीतर का पशु बल-प्रयोग को उतारू हो उठता है। स्त्री को भीत और चुप करके वह खुद को जीत गया समझता है। फिर भी सम्बन्ध अगर चलता है तो मनोवैज्ञानिक और सामाजिक स्थितियाँ इसके अलावा हैँ।
स्त्री की आर्थिक निर्भरता उसके अस्तित्व को पुरुष की मिल्कियत की तरह परिभाषित करती है और पुरुष इसे बोझ में बदल कर स्त्री को भयभीत और अहसानमन्द बनाये रखना चाहता है। घर की, सम्बन्धों की जिम्मेदारियों का, देखभाल और सार-सँभाल के स्त्री-श्रम का कोई आर्थिक मूल्य नहीं कूता जाता। लेकिन संभावना है कि सम्बन्ध के दायरे के भीतर स्त्री का आर्थिक अर्जन उसके लिये सम्मान के अर्जन का कारण भी बने या फिर उसे सम्बन्ध के बाहर आ जाने का साहस दे। बहुत बार सम्बन्ध में ऐसी बेमरम्मत किस्म की टूट-फूट बाहर आ जाने के सिवा दूसरा कोई विकल्प बाकी नहीं छोड़ती। सामाजिक, मनोवैज्ञानिक दबावों के भरोसे सम्बन्ध को ढोते जाने की ज़रूरत स्त्री के लिये अब वैसी विकल्पहीन मज़बूरी नहीं रह गयी है। बहुत अंशों में पुरुष भी अब पहले की अपेक्षा अधिक संवेदनशील बनता हुआ दिखाई दे रहा है। लेकिन कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि मौजूदा हालात में विवाह नामकी संस्था से स्त्री का मोहभंग उत्तरोत्तर बढ़ रहा है, अविवाहित जीवन का चुनाव करने वाले लोगों में स्त्रियों की संख्या बढ़ रही है। आर्थिक आत्मनिर्भरता, दैहिक शुचिता के पूर्वग्रह से मुक्ति, दाम्पत्त्य और परिवार के दायरे के बाहर भावात्मक सम्बल खोज पाने की मानसिक स्वतंत्रता, आत्म-विकासऔर आत्माभिव्यक्ति के लिये जगह इसका बड़ा कारण है। विवाह अब उसके लिये एकमात्र भविष्य अथवा अन्तिम गन्तव्य नहीं लेकिन फिर भी, अब भी विवाह और सन्तान और सन्तान का भविष्य बड़े पैमाने पर अपनाया जाने वाला विकल्प है और दम्पत्ति के सामने संभावना है की बनी बनाई भूमिकाओं और उनके मिथकों से निर्मित-निर्धारित कसौटियों से हट कर युगल अपनी भावात्मक, पारिवारिक, सामाजिक ज़रूरतों के हिसाब से अपने विवाह को परिभाषित और सम्बन्ध को निर्धारित करें। उसके लिये जिस धैर्य और प्रतीक्षा की दरकार है वह टोटे में है और उसी अनुपात मेँ हमारे जैसे समाज में स्त्री के प्रति असहिष्णुता और हिंसा में वृद्धि भी दिखायी देती है। समस्या को देखने समझने और सुलझाने की बजाय अनदेखा करने, दबा देने और कुचल देने का आग्रह अधिक है, बिना यह समझे कि स्त्री को कोसने गरियाने से अगर कुछ होगा तो कुल इतना कि स्थितियाँ और भी तेजी से उस विस्फोट के निकट जायेंगी जिसकी रोक थाम की कोशिश मेँ दमन की यह नीतिया अपनाई जा रही हैँ।

मातृसत्तात्मक व्यवस्था में विवाह-संस्था क्या अधिक सुदृढ़ और समर्थ होती। तब समाज 
भ्रूण हत्या दहेज़ हत्या एवं बलात्कार जैसे अपराधों से कितना मुक्त होता ? 
– यह पूरी तरह से एक अनुमानजनक प्रश्न  है। इसका कोई प्रमाणपुष्ट या सन्दर्भसहित उत्तर नहीं दिया जा सकता। कल्पना को तर्कसम्मत बनाने की सिर्फ कोशिश की जा सकती है। सो वही करती हूँ। वजह चाहे जो रही हो, सामाजिक व्यवस्था के रूप में मातृसत्ता संसार में बाकी नहीं रही। कोई तो वजह रही होगी, शायद बहुत सारी वजहें रही हों। शायद अलग अलग समाजों में अलग अलग वजहें रही हों।
बहरहाल, नतीजा सबका वही एक। कि नियामक व्यवस्था के तौर पर मातृसत्ता कहीं नहीं। हालाँकि पुनः सर्वथा असंभावित भी नहीं, तर्कसम्मत ढंग से कहूँ तो वर्चस्व में उतार-चढ़ाव, स्थानान्तरण, स्थिति-परिवर्तन के अपने नियम-अपवाद हुआ करते हैँ और वे शाश्वसत या सनातन नहीं होते इसलिये । स्त्री की बढ़ती हुई क्षमताओं, विकसित होते हुए व्यक्तित्व, क्षरित होती हुई बाधाओं और व्यवधानों, सामाजिक राजनीतिक व्यवस्था मेँ स्त्री के लिये बढ़ती हुई जगह, उत्पादन व्यवस्था में वन-मैन-इण्डस्ट्री और होम-ग्रोन-इण्डस्ट्री के बढ़ते हुए विकल्पों को देखते हुए इस संभावना को प्रमाण-पुष्ट संभाव्यता भी माना जा सकता है हालाँकि अब तक मातृसत्ता के जिस रूप से हम थोड़ा बहुत परिचित हैं, जैसे केरल का नायर समाज, उसके बारे में भी तथ्य यही है कि वह मातृकुल के नाम से वंशानुक्रम और उत्तराधिकार का पर्याय है लेकिन स्त्री के वास्तविक वर्चस्व का नहीं।
वैसे मातृसत्ता से उम्मीद यह की जाती है कि वह वर्चस्व और पदानुक्रम की धारणाओं और बन्धनों से मुक्त होगी। क्यों की जाती है, इसका अनुमानजन्य आधार किन्हीं सारभूत स्त्री-गुणों से मण्डित सारभूत स्त्री-स्वभाव है लेकिन इस अनुमान में शक्ति और वर्चस्व के परिणामस्वरूप आने वाले संभावित परिवर्तनों को नहीं जोड़ा गया है। यानी कल्पना यह है कि मातृसत्ता अपने मातृ-तत्त्व के कारण माँ के स्वाभाविक वात्सल्य, कृपा और करुणा से लैस व्यवस्था होगी लेकिन इस दिशा मेँ कल्पना को बढ़ाया नहीं गया है कि अपने सत्ता-तत्त्व के कारण उसमे ताकत का अहसास क्या जोड़ेगा या घटायेगा।
जहाँ तक सवाल है मातृसत्ता के समाज में भ्रूण-हत्या, दहेज-हत्या, बलात्कार से मुक्त होने की, अनुमान ही लगाना है और कल्पना ही करनी है तो यही क्यों न की जाय कि हाँ, वह इनसे पूरी तरह से मुक्त समाज होगा।कल्पना में ही खुशी का अनुमान कर लिया जाय।
या फिर पिछले पाँच सात हजार साल के इतिहास को देखते हुए अगले पाँच सात हजार साल के भविष्य की कल्पना मातृसत्तात्मक व्यवस्था के समाज रूप में करते हुए यही क्यों न मान लिया जाय कि जैसे परिस्थितियों के प्रतिबन्ध या ‘कण्डिशनिंग’ के चलते स्त्री ने अपनी वन्य गुफा़-नारी की शिकारी-ऊर्जा, आक्रामकता और शारीरिक बल, खो दिया, कोमल-कमनीय-दुर्बल हो गयी वैसे ही पुरुष भी अगले पाँच सात हजार साल में … लेकिन यह कल्पना मुझसे करते नहीं बनती, मैँ करना नहीं चाहती, कर नहीं सकती कि तब भ्रूण-हत्या, दहेज-हत्या और बलात्कार का शिकार पुरुष हो रहे होंगे। स्त्री के प्रति अन्याय का प्रतिकार जरूरी है लेकिन सदियों का अन्याय जिसने सहा है उसके बारे में कल्पना में भी मैँ सोचना यही चाहती हूँ कि प्रतिशोध के उन्माद से नहीं, परदुखकातरता की इतनी क्षमता से लैस ज़रूर होगी कि उसी अन्याय का विस्तार पुरुष तक न करे।
ऐतिहासिक उत्तराधिकार, खास तौर से पीड़ा और अन्याय के उत्तराधिकार के साथ दिक्कत यही है कि उसके प्रतिकार का उपाय करते समय हम उसके साथ इस तरह तादात्म्य करते हैँ कि याद नहीं रहता कि उस इतिहास में निजी हैसियत से हम मौजूद नहीं थे और प्रतिकार में प्रतिशोध-परायण हो उठते हैँ।
इस सवाल का हल कठिन है कि विवाह की संस्था उस समाज में अधिक सुदृढ़ और समर्थ होती अथवा नहीं। इस प्रश्ना में यह मान्यता निहित है कि उस समाज में भी स्त्री के लिये वही सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण होता जो आज पितृसत्ता के समाज में है – पति, परिवार, सन्तान। और उसमें मातृसत्ता से अन्तर सिर्फ़ इतना हुआ होता कि वह उसे अपने वर्चस्व से सुलभ और सुकर बना लेती।

 सह-जीवन की अवधारणा क्या स्त्री के पक्ष में दिखाई देती है ? 
उत्तर – हमारे सामाजिक जीवन का यह एक नया और बड़ा – कहना चाहिये क्रान्तिकारी – मोड़ है। कुछ दिन पहले तक विरल था, अब उतना विरल नहीं, बल्कि खासी तेजी से बढ़ रहा है।
स्त्री के पक्ष में है या नहीं? समझना होगा कि इस सिलसिले में स्त्री का अपना पक्ष क्या है?
मुझे अभी तक ठीक ठीक समझ में नहीं आया है कि सह-जीवन मेँ प्रवेश करने वाली स्त्री अपने सम्बन्ध और अपने भविष्य के बारे में किस इच्छा या कल्पना या अनुमान के साथ इसमें घुसती है? अलग अलग लोगों की अलग अलग समझ लेकिन इतना निश्चित है कि वह दाम्पत्त्य का या विवाह का स्थानापन्न नहीं है, न हो सकता है। उसका आविष्कार ही विवाह से भिन्न किसी जरूरत या मानसिकता या जीवन-दर्शन या स्वभाव के कारण हुआ है। जब पिछले किसी प्रश्ने के उत्तर में को ही पुनःपरिभाषित करने की बात कही है तो जाहिर है कि मेरी समझ से सह-जीवन तो ऐसा खुला समीकरण है जो शायद अवधारणा में बाँधा भी नहीं जा सकता। साथ साथ जीने में क्या क्या बाँटा जाना है यह भी शायद पूरी तरह से भागीदारों पर ही निर्भर करता है।
सिर्फ़ महँगे आवास में किराया और जगह बाँटने की सुविधा से शुरू होकर घर चलाने की जिम्मेदारियाँ, खर्चे, और अन्ततः शायद उपस्थिति और निकटता के कारण विकसित हो जाने वाला भावात्मक और शारीरिक सम्बन्ध, या फिर पहले भावात्मक और शारीरिक सम्बन्ध स्थापित हो जाने के बाद आवास और जिम्मेदारियाँ और खर्चे बाँटने का निर्णय – किसी भी दिशा से उसमें प्रवेश करने वाली स्त्री को इस विषय में स्पष्ट होना चाहिये कि उसके लिये इसका अर्थ क्या है।
वह क्या इसको विवाह का स्थानापन्न मान कर चल रही है? या इस उम्मीद से इस गली में घुस रही है कि वह अन्ततः उसे विवाह तक पहुँचा देगी? या उसको एक साथ-सहारे-सम्प्रेषण के अलावा अपनी स्वच्छन्दता से इतना प्यार है कि वह स्वयं भी किसी समय इस बन्धन से बाहर निकल आने की स्वच्छन्दता को अपने लिये सुरक्षित रखना चाहती है और अगर किसी समय उसके साथी को भी इसके बाहर निकल जाने की ज़रूरत – एकतरफ़ा भी – महसूस होती है तो इस स्थिति की समझ और स्वीकार की क्षमता रखती है। स्त्री के पक्ष से सहजीवन का औचित्य अथवा सार्थकता मेरी नज़र में तीसरी स्थिति में ही हो संभव है।
एक आत्मनिर्भर स्वच्छन्द जीवन में संयोगवश आ मिलने वाले और स्थानान्तरण या भावनात्मक फासला या किसी अन्य बाधा या कारण से दूर या अलग हो जाने वाले साथ के हिसाब से तय होने वाले सम्बन्ध में बुनियादी तौर पर अस्थायित्त्व की संभावना और स्वीकृति निहित है। ऐसा भी एक सम्बन्ध-विन्यास या जीवन-विन्यास हो सकता है – हालाँकि हमारे देश-समाज में विरल – जो अस्थायी सम्बन्धों द्वारा अपनी अलग अलग किस्म की जरूरतों के अलग अलग समीकरणों से पूरा होता हो। लेकिन उस विन्यास को चुनने वाला शायद व्यक्ति के रूप में भावनात्मक स्तर पर स्वतःपूर्ण, स्वयंपर्याप्त और स्वायत्त होता होगा। जब चाहा, पिट्ठू बाँधा और चल दिये।
चौबीस घण्टे के साथ का मतलब पिकनिक नहीं होता और स्वच्छन्दता – मुझे सोचकर ऐसा लगता है कि – अपनी आखिरी हदों पर दूसरे की उपस्थिति के आभास के दबाव मात्र से खण्डित और बाधित होने लगती है। एक तरह से वह अफाट अकेलेपन का पर्याय है, दोस्त अहबाब की मण्डली की चकल्लस के बावजूद। हर समय की चकल्लस जीवन का पर्याय नहीं होती।
लेकिन फैसला हमेशा स्च्छन्दता की जरूरत से नहीं होता। हमेशा क्या, शायद अक्सर। सहजीवियों की बढ़ती हुई गिनती के साथ अकसर इस किस्म के परिणाम देखने सुनने को मिलने लगे हैँ, जिनमें स्त्री की ओर से कभी विवाह के वादे पर विश्वासस करने के कारण सम्बन्ध में प्रवेश किन्तु विश्वािसघात का या कभी धोखा देकर शारीरिक सम्बन्ध बनाने का या बलात्कार का मुकदमा दायर किया जाता है, वह सहजीवन की अवधारणा को लेकर ही किसी नासमझी या ग़लतफ़हमी का आभास देते हैँ। उन स्थितियों मेँ सहजीवन एक समस्या बन कर सामने आता है।
सहजीवन के पास न कोई कानूनी सुरक्षा है और न मुआवजे इत्यादि का कोई प्रावधान। अगर वह अपनी स्वच्छन्दता की रक्षा के निर्णय से यह सम्बन्ध नहीं बनाती, सम्बन्ध टूटने की दिशा में कभी दुबारा किसी मन लायक साथी के मिलने पर ही फिर से सहजीवन या फिर एक आत्म-निर्भर स्वयं-पर्याप्त जीवन जीने की अनिश्चि त/दुर्लभ/असम्भव तत्परता को अपनी जीवन शैली नहीं मानती तो बेशक सहजीवन उसे शायद मनचाहे व्यक्ति के साथ बीते हुए उस थोड़े से समय की तृप्ति और तुष्टि – अगर मिली हो तो – के अलावा उसे कुछ और नहीं देगा। उतने समय के बाद उम्र का अकसर वह पड़ाव आ पहुँचा होता है जब पहले ही देर हो चुकी होती है और अगर वह उसी एक सम्बन्ध में इतनी तृप्ति ता ऊब पा चुकी हो कि दुबारा शुरू करना ही न चाहे तो बात अलग है अन्यथा हमारे अधिकांशतः शुचितावादी समाज में सहजीवन के अनुभव से निकली हुई स्त्री को दुबारा शुरू करने का मौका अक्सतर नहीं मिलेगा।इसलिये अपनी इच्छा और ज़रूरत को पहचानना और ऐसे किसी सम्बन्ध मेँ खुली आँखों कदम रखना बेहद ज़रूरी है।
स्त्री के अपने स्वभाव के हिसाब से ही तय होगा कि सहजीवन उसके पक्ष में है या विपक्ष में।

साथ होकर भी पुरुष एवं स्त्री की स्वतंत्र परिधि क्या है ? 
आज के समय में उग आई स्थितियों ने ऐसा कर दिया है कि किसी युगल के लिये यह बात आपस में उन दोनो के अलावा कोई तीसरा नहीं परिभाषित कर सकता और उन दोनों में से कोई भी एक अकेला भी नहीं कर सकता। करेगा भी तो उसमें सहमति दूसरे की भी चाहिये। पुराने जमाने के विवाह का नमूना परिवार के सन्दर्भ में स्त्री-पुरुष के कर्तव्य और दायित्त्व के क्षेत्र में अपने अपने वर्चस्व के इलाके बाँट कर चलता है। जहाँ दोनो को घर बाहर दोनो सँभालना होता है वहाँ भी सहयोग के नमूने गढ़े जाते हैं। लेकिन जहाँ ‘स्वतंत्र’ और परिधि में टकराहट हो वहाँ? दाम्पत्त्य की परिधि का ही जहाँ उल्लंघन हो वहाँ?
सुना है कि हमारे समाज के ही किन्हीं इलाकों में ‘ब्लाइण्ड-डेट’, ‘वाइफ़-स्वॉपिंग,’ ‘बेटिंग,’ ‘न्यूड पार्टीज़्, ‘रेव पार्टीज़’ आदि तरह तरह के खेल चला करते हैँ। इन जगहों पर दाम्पत्य में दैहिक एकनिष्ठता की परिधि दोनो की सहमति से भंग होती है और दोनो को स्वीकार भी होती है। स्वतंत्रता के नाम पर यही परिधिभंग विवाहेतर साहसिक अभियानों का भी है, जिसमें अभी तक तो पति ही इकलौता खिलाड़ी हुआ करता था। अब सुना है कि बराबरी का जोड़ होने लगा है। दोनो सहमत हैं तो क्या कीजियेगा। और ज़रूरत भी क्या है कुछ करने की? वह कोई दूसरी दुनिया है। दाम्पत्त्य की परिधि अब परस्पर सहमति है, जहाँ तक भी जाये।
स्वतंत्र परिधि के भीतर एक और ज़रूरत आती है अपनी अपनी स्पेस की। अपनी हॉबीज़, या अपनी अभिव्यक्ति के इलाके, अपना पढ़ना-लिखना या चित्र बनाना या गाना या ऐसा ही कुछ और। और अपने निजी एकान्त स्पेस के मनबहलाव से उसे निकाल कर बाहर अपनी पहचान के तौर पर ले जाना। ऐसी स्थितियों में जहाँ ‘साथ’ भी है और ‘स्वतंत्रता’ भी वहाँ एक दूसरे पर अभिमान किया जाता है। लेकिन बहुत बार, शायद ज्यादातर, ऐसी स्थितियों में प्रतिद्वन्द्विता जागती है। अहंकार आहत होता है। ज़्यादातर पुरुष का जिससे स्त्री की उपलब्धि बर्दाश्ता नहीं होती। इसके बाद, प्रलय!
परिधि के साथ स्वतंत्रता को परिभाषित करना कठिन है। दाम्पत्त्य में दोनो में ही एक लचीलापन रखना ज़रूरी है, ज़रूरी बात है, मंशा में खोट न होना और अपने पक्ष में दूसरे का अनुचित लाभ न लेना। बुनियादी बात एक दूसरे का सम्मान है जिसके कारण ऐसा सम्भव हो सकता है।
नयी पीढ़ी के जिन कुछ युगलों को जानती हूँ उनमेँ आपस का सहयोग, साझेदारी, परस्परता और पूरकता देखकर बेहद खुशी होती है। लगता है कि इस सम्बन्ध जैसा दूसरा कुछ हो नहीं सकता, जैसे एक सपना है, सच होने की दिशा में अपनी यात्रा शुरू कर चुका है। लेकिन उस सम्बन्ध को रचने मेँ बहुत समझदारी, बहुत धैर्य, बहुत समय, बहुत श्रम लगता है, वह बना बनाया नहीं मिलता, वह एक दिन में नहीं बनता, उसमें पुरुष की हिस्सेदारी शत-प्रतिशत दिखती है, उस पुरुष के लिये मन में आभार जागता है।

प्रेमरिक्‍त दैहिक सम्‍बन्‍ध निस्‍संदेह अनैतिक होते हैं : कात्यायनी

कात्यायनी

कात्यायनी चर्चित कवयित्री एवमऐक्टिविस्ट हैं  . संपर्क : katyayani.lko@gmail.com

 ( प्रज्ञा पांडे के अतिथि सम्पादन में हिन्दी की पत्रिका ‘ निकट ‘ ने स्त्री -शुचितावाद और विवाह की व्यवस्था पर एक परिचर्चा आयोजित की है . निकट से साभार हम उस परिचर्चा को क्रमशः प्रस्तुत कर रहे हैं , आज  चर्चित कवयित्री कात्यायनी  के जवाब .  इस परिचर्चा के  अन्य  विचार पढ़ने के लिए क्लिक करें :  ) 

जो वैध व कानूनी है वह पुरुष का है : अरविंद जैन 

वह हमेशा  रहस्यमयी आख्यायित की गयी : प्रज्ञा पांडे 


अमानवीय और क्रूर प्रथायें स्त्री को अशक्त और गुलाम बनाने की कवायद हैं : सुधा अरोडा 

अपराधबोध और हीनभावना से रहित होना ही मेरी समझ में स्त्री की शुचिता है :  राजेन्द्र राव 


परिवार टूटे यह न स्त्री चाहती है न पुरुष : रवि बुले 

 

बकौल सिमोन द बोउवार, ” स्‍त्री पैदा नहीं होती, बनायी जाती है। ” आपकी दृष्टि में स्‍त्री का आदिम स्‍वरूप क्‍या है ?
स्‍त्री और पुरूष के बीच जेण्‍डर का जो भेद है, वह प्राकृतिक है और वह भेद स्‍त्री और पुरूष के बीच के सामाजिक अन्‍तर का, स्त्रियों की सामाजिक पराधीनता एवं उत्‍पीड़न का कारण नहीं है। स्त्रियों की पराधीनता, उत्‍पीड़न, दोयम दर्जे की नागरिकता और पुरूषवर्चस्‍ववाद का मूल कारण सामाजिक-आर्थिक संरचना में निहित है। यह सामाजिक ढांचा ही स्‍त्री मानस को भी अनुकूलित और नियंत्रित करता है। इन अर्थों में सिमोन द बोउवार का कहना सही है। स्‍त्री का सामाजिक अस्तित्‍व,पारिवारिक जीवन और अन्‍तर्जगत समय विशेष के समाज विशेष की निर्मिति होता है। निजी सम्‍पत्ति, वर्ग, राज्‍यसत्‍ता और परिवार के उद्भव से पूर्व आदिम स्‍त्री स्‍वतंत्र थी और वर्ग समाज के विलोपन के बाद फिर वह स्‍वतंत्र होगी।

 क्‍या दैहिक शुचिता की अवधारणा स्‍त्री के खिलाफ कोई साजिश है ?
वास्‍तविक प्रेम एकल ही हो सकता है, यानी एक समय में किन्‍हीं दो व्‍यक्तियों के बीच ही हो सकता है और प्रेमरिक्‍त दैहिक सम्‍बन्‍ध निस्‍संदेह अनैतिक होते हैं। इन अर्थों में दैहिक शुचिता का एक सन्‍दर्भ हो सकता है। लेकिन समाज में दैहिक शुचिता की पाबन्दियॉं सिर्फ स्‍त्री के लिए होती है, पुरूष वस्‍तुत: उससे मुक्‍त होता है। इसी दृष्टि से पहले किसी से प्रेम या विवाह करके अलग हो चुकी स्‍त्री या विधवा स्‍त्री भी हेय दृष्टि से देखी जाती है। बेशक हमारे समाज में व्‍याप्‍त दैहिक शुचिता की धारणा एक पुरुषस्‍वामित्‍ववादी धारणा है जो घोर स्‍त्री विरोधी है।

समाज के  सन्‍दर्भ में शुचितावाद और वर्जनाओं को किस तरह परिभाषित किया जाये ?
हर समाज नैतिक मूल्‍यों और वर्जनाओं की परिभाषाऍं वर्चस्‍वशाली वर्गों और समुदायों के हितों को ध्‍यान में रखकर गढ़ता है। सामंती समाज की अपेक्षा खुला और लोकतांत्रिक होने के बावजूद मौजूदा पूँजीवादी समाज भी एक पुरुष प्रधान समाज है। यह स्‍त्री के पारिवारिक और धार्मिक गुलामी के बंधनों को एक सीमित हद तक ही ढीला करता है, लेकिन पुरुष स्‍वामित्‍व को एक हजार एक रूपों में बरकरार रखता है। यह स्‍त्री श्रम शक्ति को ही नहीं बल्कि देह को भी एक ‘कमोडिटी’ में तब्‍दील कर देता है, लेकिन साथ ही पुरुष स्‍वामित्‍व आधारित परिवार के ढॉंचे और सम्‍पत्ति की विरासत की वंशानुगतता को बचाने के लिए स्त्रियों पर तमाम वर्जनाऍं और यौन शुचिता के तमाम बंधन आरोपित करता है। यानी स्त्रियॉं ”आजाद” तो हों, लेकिन अपने लिए नहीं पुरुषों का आखेट बनने के लिए। दूसरी ओर, पुरुष यौन शुचिता विषयक सभी वर्जनाओं से मुक्‍त होता है।
निस्‍सन्‍देह हर समाज के अपने नैतिक मूल्‍य होते हैं। एक शोषण-उत्‍पीड़न मुक्‍त समाज के नैतिक मूल्‍यों को शुचितावाद और वर्जनाओं की भाषा में नहीं देखा जा सकता। जाहिरा तौर पर जोर-जबर्दस्‍ती, धोखा, बेवफाई और शरीर की खरीद-फरोख्‍त एक आदर्श समाज में अनैतिक और वर्जित होगा। एक समय में एक व्‍यक्ति एक व्‍यक्ति से ही प्‍यार कर सकता है। यानी प्‍यार एकल ही हो सकता है। प्‍यार विहीन दैहिक सम्‍बन्‍ध भी अनैतिक ही होगा। ” मुक्‍त प्रेम ” और ” मुक्‍त यौन सम्‍बन्‍ध ”की अवधारणाऍं विकृत बुर्जुआ मानस की प्रतिक्रियात्‍मक अभिव्‍यक्तियॉं हैं। एक उन्‍नत और समतामूलक समाज स्‍त्री और पुरुष को सम्‍बन्‍ध बनाने और उन्‍हें तोड़ने की बराबर स्‍वतंत्रता देगा और उसमें समाज या राज्‍यतंत्र की कोई भी दखलंदाजी नहीं होगी।

विवाह  की व्‍यवस्‍था में स्‍त्री की मनोवैज्ञानिक, सामाजिक एवं आर्थिक स्थितियॉं कितनी स्‍त्री के पक्ष में है?
उत्‍तर: सामंती समाज की अपेक्षा पूँजीवादी समाज में विवाह की संस्‍था के अन्‍तर्गत, स्त्रियों को बेशक संवैधानिक और वैधिक तौर पर कुछ अधिकार मिले हैं, लेकिन सामाजिक संस्‍थाऍं और मूल्‍य-मान्‍यताऍं काफी हद तक इन अधिकारों को बेमानी बना देती है। भारत जैसे पिछड़े पूँजीवादी समाजों पर यह बात विशेष तौर पर लागू होती है। उन्‍नत से उन्‍नत पूँजीवादी समाजों में भी विवाहोपरान्‍त पारिवारिक जीवन में अहम मामलों में निर्णय की शक्ति पुरुष के हाथों में केन्द्रित होती है और स्‍त्री की घरेलू दासता अनेकश: सूक्ष्‍म रूपों में बरकरार रहती है। विवाह की संस्‍था किसी भी रूप में अपने मौजूदा स्‍वरूप में स्‍त्री के पक्ष में नहीं है। पुरुष यदि वास्‍तव में प्रगतिशील दृष्टि रखता है (वैसे ज्‍यादातर कथित प्रगतिशील अपने निजी जीवन में पुरुषवर्चस्‍ववादी ही होते हैं), तो पत्‍नी के साथ सम्‍मान और समानता का व्‍यवहार करता है। लेकिन यह तो एक विशेष स्थिति की बात है, इसमें विवाह संस्‍था की कोई सकारात्‍मकता नहीं देखी जा सकती। विवाह अपने प्रातिनिधिक रूप में ”संस्‍थाबद्ध वेश्‍यावृत्ति ” के अतिरिक्‍त और कुछ भी नहीं है।

मातृसत्‍तात्‍मक व्‍यवस्‍था में विवाह संस्‍था क्‍या अधिक सुदृढ़ और समर्थ होती? तब समाज भ्रूण हत्‍या, दहेज हत्‍या और बलात्‍कार जैसे अपराधों से कितना मुक्‍त होता ?
यह एक परिकल्‍पनात्‍मक प्रश्‍न है। मातृसत्‍तात्‍मक व्‍यवस्‍था उत्‍पादन और वितरण की आदिम सामाजिक अवस्‍थाओं की देन थी। हम इतिहास में पीछे की ओर वापस नहीं लौट सकते। इतिहास-विकास में पीछे छूट गये जिन जनजातीय समाजों में मातृसत्‍तात्‍मकता बची हुई थी, पूँजी की सर्वग्रासी, सर्वभेदी शक्ति के प्रभाव में वे भी नष्‍ट हो गयीं या हो रही हैं। आने वाले युगों में मातृसत्‍तात्‍मक व्‍यवस्‍था वापस नहीं आयेगी, बल्कि स्‍त्री-पुरुष समानता पर आधारित नयी सामाजिक संस्‍थाऍं अस्तित्‍व में आयेगी।

 सहजीवन की अवधारणा क्‍या स्‍त्री के पक्ष में दिखायी देती है?
उत्तर सापेक्षिक  रूप से सहजीवन की अवधारणा विवाह से बेहतर है, क्‍योंकि इसमें सम्‍बन्‍ध जोड़ने और तोड़ने के मामले में स्‍त्री भी स्‍वतंत्र होती है, और दूसरे, यह विवाह से जुड़ी धर्मशास्‍त्रीय रूढि़यों-मान्‍यताओं के विराध में खड़ा होता है। लेकिन बुनियादी बात सामाजिक-आर्थिक ढॉंचे की है। जबतक सामाजिक-आर्थिक तौर पर स्‍त्री उत्‍पीडि़त होगी और दोयम दर्जे की नागरिक होगी, तबतक विवाह हो या सहजीवन, स्‍त्री-पुरुष अंतरंग सम्‍बन्‍धों में भी स्‍त्री का दर्जा दोयम ही रहेगा, निर्णय की स्‍वतंत्रता के मामले में वह पुरुष के बराबर नहीं हो पायेगी।

 साथ होकर भी स्‍त्री और पुरुष की स्‍वतंत्र परिधि क्‍या है ?
उत्‍तर: पहली बात, दोनों रिश्‍ता बनाने के लिए जितने स्‍वतंत्र हों, तोड़ने के लिए भी उतने ही स्‍वतंत्र हों। स्‍त्री का आर्थिक रूप से स्‍वतंत्र और स्‍वावलंबी होना अपरिहार्य है। पुरुष की तरह स्‍त्री की भी अपनी ‘सोशल सर्किल’ हो, वह अपने शौक, पेशा, सामाजिक गतिविधियों के बारे में स्‍वतंत्र निर्णय ले सकती हो। परस्‍पर सम्‍बन्‍धों में संदेह की स्थिति न हो और ऐसा होते ही अलग हो जाने की पूरी आजादी हो। घरेलू कामकाज और बच्‍चों की देखभाल में पुरुष बराबर का भागीदार हो और सभी बाहरी कामों में स्‍त्री भी बराबरी से हाथ बँटाती हो। घर-गृहस्‍थी के सभी निर्णयों में दोनों बराबरी के हिस्‍सेदार हों। मौजूदा सामाजिक ढॉंचे में हर परिवार को तो इन मानकों पर ढाल पाना सम्‍भव ही नहीं है। हॉं, वैज्ञानिक प्रगतिशील दृष्टि वाले लोग यदि इन्‍हें अपने जीवन पर लागू करें तो जीवन बेशक कुछ सुन्‍दर हो जायेगा और स्त्रियों की इस हद तक की मुक्ति भी सामाजिक मुक्ति के महासमर में आधी आबादी की भागीदारी को बढ़ाकर उसकी सफलता की एक बुनियादी गारण्‍टी हासिल करने की दिशा में एक महत्‍वपूर्ण उत्‍प्रेरण का काम करेगी।

परिवार टूटे, यह न स्त्री चाहती है और न पुरुष

रवि बुले

हाल के दिनों में प्रकाशित ‘ दलाल की बीबी’ उपन्यास के रचनाकार रवि बुले पेशे से पत्रकार हैं. संपर्क : 09594972277 

( प्रज्ञा पांडे के अतिथि सम्पादन में हिन्दी की पत्रिका ‘ निकट ‘ ने स्त्री -शुचितावाद और विवाह की व्यवस्था पर एक परिचर्चा आयोजित की है . निकट से साभार हम उस परिचर्चा को क्रमशः प्रस्तुत कर रहे हैं , आज  साहित्यकार एवं मीडियाकर्मी रवि बुले के जवाब  इस परिचर्चा के  अन्य  विचार पढ़ने के लिए क्लिक करें :  ) 

जो वैध व कानूनी है वह पुरुष का है : अरविंद जैन 

वह हमेशा  रहस्यमयी आख्यायित की गयी : प्रज्ञा पांडे 


अमानवीय और क्रूर प्रथायें स्त्री को अशक्त और गुलाम बनाने की कवायद हैं : सुधा अरोडा 


अपराधबोध और हीनभावना से रहित होना ही मेरी समझ में स्त्री की शुचिता है :  राजेन्द्र राव 


बकौल सिमोन द बोउआर स्त्री  पैदा नहीं होती, बनाई जाती है। आपकी दृष्टि में स्त्राी का आदिम स्वरूप क्या है?
मनुष्यता के जैविक-ऐतिहासिक कालक्रम में पुरुष और स्त्राी दोनों ने विकास किया है। परंतु माना यही जाता है कि चूँकि स्त्री  के पास प्रजनन की प्राकृतिक और समूह/समाज द्वारा दी गई पारिवारिक जिम्मेदारियाँ थीं, इसलिए वह पुरुषों के मुकाबले भौतिक विकास की दौड़ में पिछड़ गई। उसका विकास पुरुष के मुकाबले कम हुआ/आँका गया। हम परिवारों के विकास पर अमूमन चर्चा नहीं करते। परिवारों के बनने और उनके बहाने सामाजिक/राष्ट्रीय विकास में  स्त्री की भूमिका पर बात नहीं होती। विकास की अवधरणा चूँकि सामाजिकता, राष्ट्रीयता और अंतरराष्ट्रीयता से जुड़ी है अतः यह सहज पुरुषों के विकास के जोड़ दी गई
स्त्री  घर में थी, अतः उस पर ध्यान नहीं गया। बाहर पुरुष का आधिपत्य  था, तो मान लिया गया कि घर और  स्त्री पर भी उसका ही अधिकार  है।  स्त्री  का सब कुछ पुरुष का है,  स्त्री पुरुष की है। इस तरह  स्त्री के उस चरित्र की नींव रख दी गई, जिसकी पुरुष और उसके बाहुबल से चलने वाला समाज अपेक्षा करता है। ऐसे में सिमोन का यह कथन सही साबित हुआ कि  स्त्री  पैदा नहीं होती, बनाई जाती है। बाहर ही नहीं, घर के लिए बने नियम कायदे उसके आचार-विचार को तराशते रहे हैं। प्राकृतिक रूप से  स्त्री  शारीरिक रूप से पुरुष से थोड़ी भिन्न है। मगर यह भिन्नता इतनी बड़ी बना दी गई कि कालक्रम में शरीर ही  स्त्री  की मुख्य पहचान बन गया। यह आज भी है। अतः पुरुष से इतर  स्त्री  केंद्रित हर किस्म के बाजार विकसित हुए। जिसने  स्त्री  को  स्त्री  बनाए रखने में बड़ी भूमिका निभाई। अब भी यह जारी है।

क्या दैहिक शुचिता की अवधरणा  स्त्री के खिलापफ कोई साजिश है?
यह समाज के विकासक्रम में  स्त्री -पुरुषों, वर्ण-धर्मों  और जाति-वर्गों के लिए तय की गई तमाम अवधरणाओं में से एक है। मनुष्य समाज ने ऐसी कई साजिशें आपस में एक-दूसरे के लिए रची हैं। स्त्री की दैहिक शुचिता का संबंध् यौन प्रकरणों से है। प्रकृति का सारा कारोबार ही इसी यौनिकता से चल रहा है। पेड़-पौधे से लेकर पशु-पक्षी तक अपनी संतति के लिए निरंतर गतिवान हैं। इसमें एक साथी के साथ संबंधें की मजबूरी या बाध्यता कहीं नहीं है। मानव समाज ने देश-काल के अनुसार इस बारे में नियम बनाए, जो बदलते भी रहे। चूंकि  स्त्री  को पुरुष के मुकाबले कमजोर माना गया, ऐसे में पुरुष की इच्छा और बल को ही प्राथमिकता मिलती रही। दैहिक/यौनिक शुचिता  स्त्री  को घर में कैद रखने का एक खास बहाना रही, जिसने सदियों तक उसके विकास में सबसे बड़ी बाध का काम किया।  स्त्री  अपने पिता, भाई और पति की संपत्ति बनी रही। उसकी दैहिक शुचिता परिवार के पुरुष के मान-सम्मान का प्रतीक रही। विवाह में सदियों तक यह शुचिता सबसे ऊपर रही। हालांकि यह अब भी सबसे ऊपर मानी जाती है, परंतु आंशिक ही सही यह मान्यता नई पीढ़ी में खंडित हो रही है। इसी बीच सदियों तक स्वयं  स्त्री  को अपनी पवित्राता के प्रति सजग और जिम्मेदार बनाया जाता रहा है। माहवारी के दिनों में उसे घर की  स्त्री  ही एहसास दिलाती रही हैं कि वह अपवित्र है। ऐसा धर्म ग्रंथों  में भी लिखा है। हालाँकि अब ऐसी देह-शुचिता के मसले पर समाज में धीरे -धीरे  परिवर्तन देखने को मिल रहे हैं।

समाज के संदर्भ में शुचितावाद और वर्जनाओं को किस तरह परिभाषित किया जाए ?
शुचितावाद और वर्जनाएँ  स्त्री  के प्रति परिवार और समाज के व्यवहार को तय करती हैं। इसमें  स्त्री  के प्रति  स्त्री  का और  स्त्री  के प्रति पुरुष का व्यवहार शामिल है। वक्त के साथ इनमें सेंध् लग चुकी है। खास तौर पर टेलीविजन के विस्तार ने इसमें परिवर्तन लाना शुरू किया है। उसने लोगों को जागरूक बनाया है। अब गाँवों में भी यह संदेश पहुँचने लगा है कि बेटी किसी बेटे से कम नहीं है। ऐसे में शुचिता की अवधरणाएँ और वर्जनाओं में ढील आने लगी है। हालाँकि इनसे पूरी तरह मुक्त होने में वक्त लग सकता है।

यदि स्वयं के लिए वर्जनाओं का निर्धरण स्वयं स्त्री  करे तो क्या हो ?
स्त्री  क्यों अपने लिए वर्जनाएँ स्वीकार करे और किसके लिए करे? इन वर्जनाओं की शुरुआत संभवतः इस बात को लेकर है कि उसके पास प्रजनन की जिम्मेदारी है। यह प्राकृतिक तथ्य है कि नर अपनी संतति को आगे बढ़ाता रहना चाहता है। इसके लिए वह ज्यादा से ज्यादा मौके और गर्भ तलाशता है। सदियों तक  स्त्री  के गर्भ पर भी पुरुष का अधिकार  रहा है। लेकिन अब आधी  सदी से ज्यादा हो चुका है जब गर्भनिरोधकों के आविष्कार के साथ  स्त्री  अनिच्छा से गर्भाधरण की लड़ाई जीत चुकी है। वैसे उल्लेखनीय तथ्य यह है कि तमाम सर्वे बताते हैं, अधिकांश पुरुष अपने इस्तेमाल के लिए बने गर्भनिरोधक  (कंडोम ) का इस्तेमाल करने से कतराते हैं। अतः आज भी गर्भनिरोधक  के प्रयोग कि जिम्मेदारी ज्यादातर  स्त्री  को ही उठानी पड़ती है। वैसे विज्ञान की तरक्की के नजरिये से देखें तो आने वाले कुछ दशकों में स्त्री  अपने गर्भ से भी आजाद हो सकती है। फिलहाल इतना तो हो ही चुका है कि वैज्ञानिक एक तय समय सीमा तक गर्भ के अंडाणुओं को फ्रीज  करके रख लें, जिन्हें पुनः  स्त्री  के गर्भ में स्थापित किया जा सकता है। आज यह खास तौर पर बेहद प्रतिभाशाली और बड़ी कंपनियों में बड़े ओहदों पर काम करने वाली  स्त्री के लिए बेहद मुफीद है। वे किसी भी उम्र में अपने बच्चे की माँ बन सकती हैं। सरोगेट मदर एक और राह है। हालाँकि ये नई बहसों के मुद्दे हैं कि इनसे  स्त्री का जीवन कितना आसान होगा और कितना जटिल। वैसे विज्ञान इस बात की भी संभावना टटोलने में लगा है कि भविष्य में प्रजनन के लिए  स्त्री  को पुरुष की आवश्यकता ही न रहे। आश्चर्य नहीं होगा अगर अगले कुछ दशकों में सचमुच यह हुआ। इसके बाद का समाज फिलहाल सिर्फ कल्पनाओं में हो सकता है।

विवाह की व्यवस्था में स्त्री  की मनोवैज्ञानिक, सामाजिक और आर्थिक स्थितियाँ कितनी  स्त्री  के पक्ष में है ?
इस वक्त यह व्यवस्था बहुत ज्यादा  स्त्री  के पक्ष में नहीं है। यही कारण है कि जहाँ-जहाँ  स्त्री  अपने लिए निर्णायक संघर्ष करती है, वहाँ अधिकतर  मामलों में विवाह टूट जाते हैं। इस वक्त समाज में कम से कम यह तो हुआ है कि विवाह टूटना अजूबा नहीं माना जाता और इसमें सिर्फ  स्त्री को कठघरे में नहीं खड़ा किया जाता। मनोवैज्ञानिक रूप से परिवार की जिम्मेदारियाँ आज भी पूरी तरह से  स्त्री  पर हैं। टीवी पर आने वाले विज्ञापन में हम देखते हैं कि दफ्तर  में जो  स्त्री  पति की बाॅस है वही घर में आकर खाना पकाती है। किचन परिवार के केंद्र में है और यह  स्त्री  की ही चिंता है। मनोवैज्ञानिक-सामाजिक रूप से भी विवाह  स्त्री  के लिए संसार में उसका अपना ‘घर’ होने की विधि है । करिअर  में सफल होने के बाद भी उसकी अंतिम परिणती अपना परिवार, अपना घर, अपने बच्चे ही है। आर्थिक मोर्चे पर  स्त्री  जरूर पहले के मुकाबले कुछ राहत की स्थिति में है। परंतु जहाँ परिवार की जिम्मेदारी कमोबेश उसके कंधें पर है, वहाँ आर्थिक राहत ही उसके लिए बोझ बन जाती है। आर्थित जरूरतों को पूरी करने का ध्न के अलावा और कोई विकल्प किसी के पास नहीं है।

मातृसत्तात्मक व्यवस्था में विवाह संस्था क्या अधिक  सुदृढ़ और समर्थ होती। तब समाज भ्रूण हत्या, दहेज, हत्या एवं बलात्कार जैसे अपराधें से कितना मुक्त होता?
पारंपरिक अवधरणा के रूप में विवाह की संस्था आज भी सुदृढ़ और समर्थ है। परिवार टूटे, यह न  स्त्री  चाहती है और न पुरुष। बात सिर्फ इस संस्था में स्त्री  के साथ समानधर्म  व्यवहार की है। समय के साथ हो रहे सामाजिक बदलावों को स्वीकारने और उन्हें अनुकूल ढंग से जीवन में स्थान देने की है। मातृसत्तात्मक व्यवस्था में निःसंदेह अपराध आज के मुकाबले काफी कम होते।

सह जीवन की अवधरणा क्या  स्त्री  के पक्ष में दिखाई देती है?
दिखती तो है, मगर सह-जीवन अगर वैवाहिक जीवन के जैसा है तो  स्त्री पुरुष के लिए वह विशिष्ट कैसे हो सकता है। वही उम्मीदें, वही अपेक्षाएँ, वही चक्र। सिर्फ एक सुविधा  कि जिस पल किसी को और साथी पसंद आ जाएगा या आगे साथ जीवनयापन की इच्छा नहीं होगी तो सह-जीवन से जाने की स्वतंत्राता है! फिर सवाल कि यह स्वतंत्रता रास न आई तब? मनुष्य सिर्फ समाज में ही जीवन नहीं जीता, वह अपने मन-मस्तिष्क में भी जीता है।

साथ होकर भी पुरुष एवं स्त्री  की स्वतंत्रापरिधि  है?
साथ होकर दोनों ही स्वतंत्र नहीं हो सकते। ज्यादा से ज्यादा यह कर सकते हैं कि एक-दूसरे को अधिक  समझें। एक-दूसरे के पूरक बनें।

नरेन्द्र मोदी से नहीं मिलना चाहती है कलावती

संजीव चन्दन

कलावती बांदुरकर अब भूमिहीन मजदूर नहीं रही, उसके पास भी अब ठेके पर ली गई छः  एकड़ खेती है . अपने खेत में काम करती हुई अब वह मजदूरों की कमी की समस्या से जूझ रही है. वह भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से नहीं मिलना चाहती है . वह स्पष्ट करती है कि ‘ पहले नरेन्द्र मोदी खेती –किसानी के लिए कुछ ठोस करें तो मैं उनसे मिलना पसंद करूंगी. उन्होंने बड़े –बड़े वायदे किये हैं , उन्हें पूरा करें.’ कलावती राहुल गांधी की चुनाव में पराजय को उनकी अलोकप्रियता से अलग करके देखती है . वह मोदी से मिलने की किसी इच्छा से इनकार करते हुए राहुल गांधी की प्रशंसा करती है कि ‘उन्होंने गरीबों के लिए बहुत किया है. उनकी सरकार ने किसानों की कर्जमाफी से कई औरतों को विधवा होने से बचाया है .’ राहुल और कांग्रेस की हार पर अफ़सोस जाहिर करते हुए कहती है, ‘ पहले बी पी एल कार्ड पर २० किलो राशन मिलता था , अब मोदी के राज में 12- 13 किलो मिलता है.’

कलावती

नरेन्द्र मोदी ने उडाया था कलावती का मजाक 
2013 में नरेन्द्र मोदी ने फिक्की के एक आयोजन में कलावती का मजाक उड़ाते हुए कहा था कि “गुजरात में जस्सू बेन जैसी आदिवासी स्त्री है , जिसका लिज्जत पापड़ आज ब्रान्ड है, वह कलावती की तरह नहीं है .’ ठेके पर ली गई  अपने कपास की खेत में काम करती हुई कलावती नरेन्द्र मोदी की तरह उनका मजाक तो नहीं बनाती है लेकिन किसानों के लिए किये गए अपने वायदे पूरे करने के लिए उन्हें ललकारती है , ‘  राहुल गांधी और उनकी सरकार ने गरीबों के लिए काफी काम किये हैं, योजनायें चलाई हैं , मोदी भी किसानों के लिए कुछ ठोस करें .’ यह पूछे जाने पर कि वे फिर भी हार गए , वह विश्वास के साथ कहती है कि वे दुबारा आयेंगे . ‘मैं यह नहीं कह सकती कि कब, लेकिन वे प्रधानमंत्री जरूर बनेंगे और तब मैं अपने बच्चों की नौकरी के लिए उनसे मिलाने जाउंगी , उन्होंने वायदा किया था .’

झोपडी की जगह पक्के ईटों का घर

कौन है कलावती बांदुरकर 
किसान आत्महत्या ग्रस्त विदर्भ के यवतमाल जिले के जालका गाँव की किसान –विधवा और 8 बच्चों की माँ ( 2 साल पहले ही मर गए थे , यानी 10 बच्चों की माँ) कलावाती उस समय सुर्खियों में आई जब 2008 में कांग्रेस नेता राहुल गांधी उसके घर पहुंचे और बाद में संसद में किसान आत्मह्त्या ग्रस्त इलाके में गरीब किसान विधावाओं के लिए प्रतीक  के तौर पर  कलावती का उल्लेख किया . इस उल्लेख ने उसे ‘पोस्टर वुमन’ बना दिया . इसके बाद सुलभ इंटरनेशनल ने उसे 36 लाख रुपये देने की घोषणा की और पहली किश्त के तौर पर ६ लाख रुपये का भुगतान भी किया , बाद में 30 लाख रुपये उसके नाम से बैंक में जमा करवा दिए . उसे दूसरी सरकारी सहायता भी महाराष्ट्र सरकार की तरफ से उपलब्ध कराई गई  .

पिछले छः सालों में कलावती 
सुर्ख़ियों में आने के बाद और सरकारी- गैरसरकारी सुविधाएं मिलने के बाद भी कलावती का दास्तान अंतहीन  दुःख और उससे उबरने के संघर्ष का दास्तान है . एक ओर तो सुलभ इंटरनेशनल के द्वारा बैंक में जमा किये गए रुपयों के ब्याज से उसके घर का मासिक खर्च पहले की तुलना में ज्यादा आसान हो गया तो दूसरी ओर उसके दामाद के बाद एक –एक कर दो बेटियाँ  मरती चली गई. विधवा बेटी के बच्चे और अपने बच्चे उसकी परवरिश के जिम्मे हैं . वह कहती है , ‘ अभी एक बेटी की शादी में तीन लाख रुपये खर्च हुए , जिसमें से डेढ़ लाख रुपये लड़के वालों ने लिए . और अब लड़का मेरी बेटी को मारने –पीटने लगा तो वह मेरे घर वापस आ गई है .’  इस बीच उसका घर झोपडी से ईटों के छोटे से घर में तब्दील हो गया , ठेके पर 6 एकड खेती भी ले ली . नियमित आमदनी के ये स्रोत यद्यपि उसके बच्चों की परवरिश को सुविधाजनक , बनाते हैं लेकिन क्रमशः  10 वीं और 12 वीं पढ़ रहे अपने बेटों के खर्चों को चलाने में खुद को असमर्थ बताते हुए वह कांग्रेस के नताओं की वादाखिलाफी को कोसने लगती है , ‘ कांग्रेस के अध्यक्ष माणिक राव ठाकरे ने कहा था कि वे बच्चों को गोद ले लेंगे , यानी दो बच्चों की पढ़ाई का खर्चा देंगे . कांग्रेस के नेताओं के कहने से मेरे घर पर बिजली का मीटर लग गया और ठाकरे ने कहा था कि 20 साल तक बिजली का कोई  बिल नहीं आएगा , लेकिन बिजली का बिल भी मैं दे रही हूँ और बच्चों की पढाई भी जैसे –तैसे करवा रही हूँ .’ संपर्क करने पर माणिकराव ठाकरे इस सन्दर्भ में कुछ भी नहीं कह सके .

राजनीति की डगर और कलावती की राह 
2009 में कलावती के चुनाव लड़ने की घोषणा ने कांग्रेस के खेमे में हडकंप पैदा कर दिया था . कलावती कहती हैं , ‘ वह सब एक धोखा था , मुझे विदर्भ जनांदोलन समिति के नेता किशोर तिवारी के घर पर किसानों और किसान विधवाओं की हालात पर सवाल किये गए थे , जिसपर मैंने कहा था कि उनकी स्थिति बुरी है, किसी एक कलावती की मदद से सारी किसान –महिलाओं की समस्या का समाधान नहीं हो जाता . इसके बाद मुझसे चुनाव संबधी बात धोखे से कहवा ली गई थी .’ तिवारी कहते हैं कि उसके साथ किये गए वायदे जब पूरे नहीं हो रहे थे तो उसे न्याय दिलाने के लिए चुनाव में खड़े होने की घोषणा की गई थी . कलावती के अनुसार वह उन दिनों काफी परेशान रही . 2011 में कलावती को भाजपा के लोगों ने भाजपा नेता लालकृष्ण आडवानी के मंच पर लाने की कोशिश की. उसी समय 24 साल की अपनी बेटी की मौत से दुखी कलावती इससे बचने के लिए घर से गायब हो गई थी .

तालेगाँव में एक किसान विधवा के घर सोनिया गांधी , 2008 में

बड़े नेताओं के आने से नहीं सुधरते हाल  :
किसान नेता विजय जावंधिया कहते हैं ,‘ किसी एक को ब्रांड बनाने से ज्यादा जरूरी है समस्या का सही समाधान’ . पिछले दिनों कलावती के गाँव में ही एक और किसान ने आत्मह्त्या कर ली, जिसकी पत्नी अपने चार बच्चों के साथ  जीवन –संघर्ष कर रही है . वायफड़ में , जहां मनमोहन सिंह ने 2006में किसानों के लिए पॅकेज और कर्जमाफ़ी की घोषणा की थी , वहाँ मनमोहन सिंह के आने के पहले तक कोइ आत्महत्या नहीं हुई थी , जबकि उसके बाद दो आत्महत्याएं हो गईं. वर्धा के तालेगाँव में किसान विधवा रंजना देशमुख से मिलकर सोनिया गांधी ने 18 जुलाई , 2008 को उसे 1 लाख का चेक दिया था . उसके पति की मौत का मुख्य कारण था उसके चार एकड़ जमीन का गाँव के जल निकास में डूब जाना , वह समस्या सोनिया गांधी के जाने बाद काफी सालों तक बनी रही.

अपराधबोध और हीनभावना से रहित होना ही मेरी समझ में स्त्री की शुचिता है

राजेन्द्र राव 


( प्रज्ञा पांडे के अतिथि सम्पादन में हिन्दी की पत्रिका ‘ निकट ‘ ने स्त्री -शुचितावाद और विवाह की व्यवस्था पर एक परिचर्चा आयोजित की है . निकट से साभार हम उस परिचर्चा को क्रमशः प्रस्तुत कर रहे हैं , आज वरिष्ठ साहित्यकार एवं पुनर्नवा के संपादक राजेन्द्र राव  के जवाब .  इस परिचर्चा के  अन्य  विचार पढ़ने के लिए क्लिक करें :  ) 



जो वैध व कानूनी है वह पुरुष का है : अरविंद जैन 

वह हमेशा  रहस्यमयी आख्यायित की गयी : प्रज्ञा पांडे 



अमानवीय और क्रूर प्रथायें स्त्री को अशक्त और गुलाम बनाने की कवायद हैं : सुधा अरोडा 
बकौल सिमोन द बोउआर “स्त्री पैदा नहीं होती बनायी जाती है ” आपकी दृष्टि में स्त्री का आदिम स्वरुप क्या  है।

सभी स्त्रियां किसी सांचे में ढ़ाल कर बनाई जाती हों ऎसा नहीं है।हां पितृसत्तात्मक समाज में कुछ रूढ़ियां हैं जो सामाजिक दबाव में चली आ रही हैं।धीरे धीरे बदलाव भी आ रहा है,बहुत सी स्त्रियां अपने दम खम पर इस कैद से बाहर आ रही हैं।आदिम स्वरूप तो यहां अप्रासंगिक है मगर मुखर होती मुक्तिकामिता जरूर दिशासूचक कही जा सकती है।

क्या दैहिक शुचिता की अवधारणा  स्त्री के खिलाफ कोई साजिश है ?

शुचिता चाहे दैहिक हो या आत्मिक मानव के लिए काम्य है।अपराधबोध और हीनभावना से रहित होना ही मेरी समझ में स्त्री की शुचिता है।

समाज  के सन्दर्भ में   शुचितवाद और  वर्जनाओं को किस  तरह परिभाषित किया जाए ? 

प्रत्येक समाज के अपने कुछ नियम होते हैं,आचरण संहिताएं होती हैंं।ये संहिताएं समय समय पर परिवर्तित होती रहती हैं।गौर से देखें तो हर वर्जना के पीछे कुछ इतिहास होता है,कुछ घटनाएं होती हैं।मैं नहीं समझता कि कोई सामाजिक निषेध किसी को शोषित या उत्पीड़ित करने के उद्देश्य से लागू किया जाता होगा,हां प्रकारांतर में भले ही वह अन्याय और अनीतिपूर्ण सिद्ध हो जाए।यह मानना अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण हो सकता है कि स्त्रियों को पूरी तरह सभी प्रकार की वर्जनाओं और निषेधों से मुक्त कर दिया जाए तो वे अधिक तेजस्वी और प्रगतिशील होकर उभरेंगी।किसी भी किस्म का अनाचार,भ्रष्टाचार,छल,प्रपंच और अपराधिक कार्य वर्जित और दंडनीय होना चाहिये।स्त्री होने के लिए कोई छूट इसमें मिले तो यह न्याय के सिद्धांत के विपरीत होगा।एक सास यदि बहू का गर्भपात(भ्रूणहत्या) या उस पर मिट्टी का तेल डाल कर फूंक देती है तो इस संदर्भ में सामाजिक वर्जना और स्त्री के इस कदाचरण(अशुचिता) के लिए उसे छूट कैसे दी जा सकती है ?

यदि स्वयं के लिए वर्जनाओं का  निर्धारण  स्वयं स्त्री करे तो क्या हो ? 

यह तो उसी तरह की बात हो गई कि बजाए चिकित्सक के रोगी अपना उपचार स्वयं करे।छात्राएं अपनी कापी स्वयं जांचें,स्त्रियों के लिए अलग कानून और दंड संहिता हो जिसे वे स्वयं बनाएं।

विवाह की व्यवस्था में स्त्री  की मनोवैज्ञानिक ,सामाजिक एवं आर्थिक  स्थितियां  कितनी  स्त्री  के पक्ष में  हैं ? 

यह इस बात पर निर्भर करेगा कि विवाह किस श्रेणी का है और पति पत्नी संबंधों का स्तर कैसा है।जहां तक औसत मध्यवर्गीय विवाहों का संदर्भ है सामान्य स्थिति में स्त्री को विवाह उपरांत सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा प्राप्त होती है।रही बात मनोविज्ञान की तो यह व्यक्ति विशेष की मनोदशा पर निर्भर करता है।मोटे तौर पर यह माना जाता है कि एक सफल विवाह स्त्री-पुरुष दोनों को जीवन की सार्थकता प्रदान करता है।कुछ अपवादों को छोड़ कर।साहित्य में चूंकि इस समय स्त्री विमर्श का क्रांतिकारी दौर चल रहा है इसलिए सुखी वैवाहिक जीवन जी रही लेखिकाएं भी विवाह की निरर्थकता को रेखांकित करने के लिए भारी दबाव में हैं।यह उनके साहित्यिक कैरियर का सवाल बन जाता है।इसमें हर्ज भी क्या है?दोनों हाथों में लड्डू हैं।

सहजीवन तो पारंपरिक विवाह में भी होता है।यहां लिविंग इन रिलेशन की बात हो रही है जो एक खूबसूरत परिकल्पना के समान है।रूप-रस-गंध उड़ जाने पर भंवरा किसी और फूल पर जाकर बैठ जाएगा।आखिर वृद्धावस्था में कहां जाएगी स्त्री ?और भी बहुत से प्रश्न हैं जो पूछे तो जाएंगे ही।

साथ होकर भी पुरुष एवं  स्त्री की स्वतंत्र परिधि क्या है ? 
यह अलग अलग लोगों पर अलग अलग तरह से निर्भर करता है।एक मूलभूत स्वायत्तता प्रत्येक मनुष्य को प्रकृति से प्राप्त रहती है,उसे परिधि में बांधना संभव नहीं है।

अमानवीय और क्रूर प्रथायें स्त्री को अशक्त और गुलाम बनाने की कवायद हैं

सुधा अरोड़ा

सुधा अरोड़ा सुप्रसिद्ध कथाकार और विचारक हैं. सम्पर्क : 1702 , सॉलिटेअर , डेल्फी के सामने , हीरानंदानी गार्डेन्स , पवई , मुंबई – 400 076
फोन – 022 4005 7872 / 097574 94505 / 090043 87272.

( प्रज्ञा पांडेय के अतिथि सम्पादन में हिन्दी की पत्रिका ‘ निकट ‘ ने स्त्री -शुचितावाद और विवाह की व्यवस्था पर एक परिचर्चा आयोजित की है . निकट से साभार हम उस परिचर्चा को क्रमशः प्रस्तुत कर रहे हैं , आज सुधा अरोड़ा के जवाब  .  अरविंद जैन का जवाब और प्रज्ञा पांडे का सम्पादकीय पढ़ने के लिए क्लिक करें  ) 
जो वैध व कानूनी है वह पुरुष का है : अरविंद जैन 


वह हमेशा  रहस्यमयी आख्यायित की गयी : प्रज्ञा पांडे 




बकौल सिमोन द बोउआर स्त्री पैदा नहीं होती बनायी जाती है – आपकी दृष्टि में स्त्री का आदिम स्वरुप क्या है ?

आदिम स्वरूप हो या आधुनिक – स्त्री का बायोलाॅजिकल पक्ष शुरु से एक जैसा ही रहा है। समाजविज्ञान के अनुरूप लैंगिक स्वरूप और धारणाएं बदली है और लगातार बदल रही है। पुरातन समय में स्त्री को पूरी तरह उसकी प्रजनन क्षमता से जोड़कर देखा जाता था । पुरुष अपने भीतर से एक नये मानव का सृजन कर नहीं सकता था इसलिये पचास के दशक तक स्त्री का सारा महत्व उसकी प्रजनन क्षमता के इर्द – गिर्द समेट दिया गया। सन् 1950 के बाद ही प्रजनन से होने वाले हानिकारक प्रभाव जब स्त्री देह पर देखे गये, तभी प्रजनन को नियंत्रित करने और रोकने के उपाय तलाश  जाने लगे और उनका इस्तेमाल स्त्री के स्वास्थ्य की बेहतरी के लिये सफलतापूर्वक किया गया । मसाला कूटने और चक्की पीसने की मशीनों, कोयले और लकड़ी के चूल्हों की जगह गैस के चूल्हे आविष्कृत  हुए और स्त्री को घरेलू श्रम से राहत मिली । महिला अधिकारों का फिनाॅमिना भी औद्योगिक विकास, लोकतांत्रिक समाज और विज्ञान और तकनीकी प्रगति से बावस्ता है।

सिमोन द बोउआर  का समय वही है जब समाज एक बदलाव की करवट ले रहा था। सिमोन के व्यक्तित्व में एक खास किस्म की सादगी थी जो स्त्रियों के लिये बनाये नियमों और पुरुश वर्चस्व वाले समाज में मानवीय बराबरी के भाव से ही पैदा होती है। सिमोन का पूरा जीवन स्त्री की शारीरिक मानसिक और बौद्धिक स्वतंत्रता का पर्याय बन गया। सिमोन जीवन भर स्त्री के दैहिक आकर्षण , चेहरे पर सौंदर्य प्रसाधनों के इस्तेमाल से पुरुषों को आकर्षित  करने की कोशीशों के बेहद खिलाफ थीं और उन्होंने निजी तौर पर न केवल इसका विरोध किया बल्कि तत्कालीन फ्रांस में विवाह और परिवार की अवधारणा से बहुत आगे बढ़कर सहजीवन का चुनाव किया। सात्र्र के साथ उनके संबंधों का एक आयाम यह भी है कि दोनों ने अपने जीवन, अपने संबंधों और अपनी भावनाओं को कभी छिपाया नहीं। सिमोन ने सार्त्र से  अलग प्रेम संबंध को भी स्वीकृति दी। ऐसी सिमोन जब ‘ स्त्री बनाई जाती है’ , जैसा वक्तव्य देती है ,तो इसके पीछे उसकी जैविकी के आधार पर तय किये जाने वाला दर्जा, शारीरिक बदलावों और जरूरतों के हिसाब से स्थापित मूल्यों और पुरुष  वर्चस्व के अनुरूप गढ़े गये स्त्री विरोधी मिथकों का खंडन एक आधारभूत कारण रहता है।

मेरी अपनी दृष्टि  – पीढि़यों से चली आ रही परंपरा, उनमें आये बदलाव और उसके बाद अपनाए गए आधुनिकता के विचारों से बनती है । मैंने अपनी मां दादी नानी सास ननदों के रिश्ते  में आने वाली स्त्रियों को हमेशा  पारिवारिक और सामाजिक मूल्यों में जकड़े पाया। वस्तुतः यह मूल्य उनकी बेडि़यां ही थीं जैसे सामाजिक सम्मान और सुरक्षा, पिता और पति की आर्थिक हैसियत के अनुरूप संपन्नता जिसका सीधा अर्थ था – खाने पहनने और रहने के लिये मूलभूत सुविधाएं। शिक्षा के क्षेत्र में भी हमें उतना ही आगे बढ़ने की छूट थी, जिससे हम पारिवारिक दायरे और मूल्यों के लिये चुनौती न बन सकें। आत्माभिव्यक्ति के स्तर पर एक संकट यह आया कि स्त्री और पुरुष  के बीच सैद्धांतिक और व्यावहारिक रूप से एक गहरी फांक थी। निर्णय पुरुषों  के और मानना स्त्रियों को पड़ता था। यह प्रक्रिया एक अन्तरपीढ़ी- स्त्रीजगत की ओर जब ले जाती है,  तो यह सवाल बार बार उठता है कि केवल भारत ही नहीं, दुनिया की सारी सभ्यताओं में स्त्री को जैविक कारणों से ही क्यों गुलाम बनाने की शुरुआत की गई होगी और उसके लिये नियमों और मिथकों का इतना भयानक जेलखाना बनाया गया होगा ।

सिमोन

मुझे लगता है कि प्राचीन काल से जब स्त्री पुरुष  के कंधे से कंधा मिलाकर आगे बढ़ी होगी और दो कदम और आगे बढ़कर तत्कालीन जरूरतों के हिसाब से बच्चे पैदा करने में लगी होगी तब उसे जबरन जंगलों की खोज, युद्धों और विजयों से काटकर कबीले, तंबू और बस्तियों के जीवन में समेटा गया होगा और वह इससे कभी आजाद न हो सके इसके लिये उसके आसपास नियम और मिथक गढ़े गये होंगे। आदिम समाज की यह परिपाटी सभ्यताओं के विकास के साथ साथ विकसित होती रही और आज हम उसको एक पतनशील व्यवस्था के रूप में देख सकते हैं इसका एक उदाहरण महानगरों में कामकाजी औरतों का ट्रेन और बसों में ठुंसकर कार्यस्थल पर जाना, घर और बाहर खटना लेकिन दाम्पत्य की सुरक्षा के लिये करवाचैथ या ऐसे अनेक व्रत उपवास रखना आदि में देखा जा सकता है।

क्या दैहिक शुचिता की अवधारणा स्त्री के खिलाफ कोई साजिश है ?

पहली बात तो यह कि अपनी शुरुआत में दैहिक पवित्रता न तो अवधारणा जैसी कोई चीज़ थी और न ही इसे साजिश  के रूप में देखा जाना चाहिये। यह एक तरह से प्रजनन की आधारभूत प्रक्रिया को न समझकर एक स्वाभाविक प्रतिक्रिया थी । एक बच्चे की मां को पहचान पाना जितना आसान था, पिता या पुरुष  की शिनाख़्त उतनी ही मुश्किल  थी । इसलिये स्त्री पर अपना अंकुश  और नियंत्रण बनाने के लिये दैहिक शुचिता को एक मूल्य के रूप में धीरे धीरे स्थापित कर दिया गया और बाद में यह पितृसत्ता की मशीनरी के तहत स्त्री को अनुशासित करने का एक ठोस औजार बन गया ।

आखिर किसे दैहिक शुचिता की ज़रूरत है और क्यों ? यह अवधारणा स्त्री के मनोबल को तोड़ने की एक ऐसी प्रक्रिया है, जहां पहले ही वार में उसकी स्वतंत्रता का सवाल स्वाहा हो जाता है और वह पुरुष  की ऐसी कृपा पर या हिकारत पर आजीवन जीने के लिये अभिशप्त हो जाती है,  जिसका पुरुष  को कोई अधिकार नहीं है, लेकिन अपनी सत्ता बनाये रखने और मनमानेपन और अत्याचार को जायज ठहराने के लिये वह अलिखित रूप से इसका इस्तेमाल आजीवन करता रहता है ।

शुचिता का विचार इतना घातक होता है कि न सिर्फ स्त्री के हंसने बोलने और चहकने को कठघरे में खड़ा कर देता है बल्कि उसकी बौद्धिकता, संवेदनशीलता और समूचे विवेक को भी कुंद कर देता है और वह सिर्फ हां में हां मिलाने के लायक रह जाती है। उसके युवा होते ही उसपर प्रेम न करने की पाबंदियां लगा दी जाती हैं। प्रेम करने पर उस पर पूरा हक और दखल परिवारवालों का होता है। वह किसके साथ जीवन बिताने का निर्णय ले, यह अधिकार उसे नहीं दिया जाता – यह कहकर कि वह नासमझ है, उसे अपने अच्छे बुरे की पहचान नहीं ।

इन स्थितियों के खिलाफ़ बहुत कम लड़कियां सिर उठा पाती हैं, बल्कि ज्यादातर लड़कियां जीवन भर इस अनकिये अपराध की सजा भुगतती रहती हैं। सामान्य रूप से यदि एक मोटा आंकड़ा भी लिया जाए तो लाखों रचनात्मक प्रतिभाएं इस प्रक्रिया में मिट्टी में मिल जाती हैं, जबकि होना इसका उल्टा चाहिये । दैहिक शुचिता का सवाल पुरुषों  के लिये उठाया जाना चाहिये, क्योंकि उन्हें आज़ादी मिली हुई है और सब जानते हैं कि उसने इस आज़ादी का दुरुपयोग स्त्री के खिलाफ़ ही किया है।

भारत की खाप पंचायत इसका एक ठोस उदाहरण है । इसके अलावा मिडल ईस्ट, अफ्रीका , लैटिन अमरीकी देश  और पूर्वी एशिया के कुछ देषों में स्त्रियों को तथाकथित रूप से शुद्ध और सुरक्षित रखने के लिये सुन्नत, लोहे के जांघिये जैसी अमानवीय और क्रूर प्रथाओं  का शिकार बनाया जाता रहा है। चीन में लड़कियों के पैर बांधने की क्रूर प्रथा उन्हें खूबसूरत और कमसिन बनाने के बजाय अशक्त और गुलाम बनाने की ही कवायद थी ।

समाज के सन्दर्भ में शुचितावाद और वर्जनाओं को किस तरह परिभाषित किया जाए ?  

हम शुचितावाद की प्रक्रिया को देखें तो यह समझ पायेंगे कि अब शुचिता के निर्वाह की अपेक्षा रखना स्त्री की वैयक्तिक आज़ादी से उसे बेदखल करना है । सारी हिदायतें, वर्जनाएं और प्रतिबंध एकबारगी अतार्किक होकर खारिज हो जाते हैं , अगर हम किसी भी मनुष्य  की वैयक्तिक आज़ादी को सबसे ऊंचा दर्जा  देते हैं ।

आज के दौर में शुचितावाद और यौन वर्जनाएं मूलतः स्त्री यौनिकता और भावना पर सीधा हमला है। पुरुष  के मुकाबले स्त्री की यौनेच्छा और कामभावना को हमेशा  दोयम दर्जे  पर डाल दिया जाता रहा है, इसलिये उसकी संतुष्टि – असंतुष्टि  का तो सवाल ही बेमानी हो जाता है। शास्त्रों में जिस भारतीय नारी की कल्पना की गई है,  और आज भी जिसे सामाजिक स्वीकृति मिली हुई है वह वस्तुतः एक दमित स्त्री है,  जो अपनी इच्छाओं के मुकाबले पति और परिवार की कल्याण भावना से ही संचालित होती है। स्त्रियों की सारी भावनाओं का दायरा उनके पति की इच्छा -अनिच्छा तक सीमित कर दिया जाता है। इस तरह व्यभिचारियों और नपुंसकों की बहुत बड़ी फ़ौज समाज में नाक ऊपर उठाये हुंकार भरती हुई मिल जायेगी और दुर्भाग्य से ऐसे ही लोग स्त्रियों के नियंता बन जाते हैं।

इसका एक दुर्भाग्यपूर्ण पहलू है – स्त्री का सामान्य जीवन से उदासीन होते हुए संपत्ति का केअरटेकर भर रह जाना और अपने आनंद और सुख को हर तरह भूल जाना। कभी -कभी स्त्रियां इन सब के खिलाफ़ एक विद्रोही  तेवर लेकर शब्दों में उतर जाती हैं और मूल्यवान रचनाएं हमारे बीच आती हैं। लेकिन आज का अधिकांश  स्त्री लेखन देह की आज़ादी से प्रेरित फूहड़ लेखन है, जो वस्तुतः स्त्री की आज़ादी और गुलामी के असली निकष  पहचान ही नहीं पाता और पुरुष  सत्ता में शामिल होने के लिये उसका मोहरा बनकर रह जाता है। यौन केंद्रित दृष्यों की बहुलता और संबंधों के द्वंद्वविहीन विन्यास असल में इसका बहुत बड़ा रूपक है कि स्त्री अपनी बेडि़यों को पहचान ही नहीं पा रही है और न ही उससे पैदा हुई तकलीफों का उसे कोई आभास है और इसीलिये वह पुरुषों की आज़ादी के अनुकूल एक और बेड़ी अपने ऊपर स्वेच्छा से डाल लेती है, जिसकी उसे पहचान तक नहीं होती जबकि उसके भीतर अतीत से गहरा संघर्ष  और भविष्य  की चुनौतियां स्वीकारने का माद्दा होना अधिक जरूरी है।

स्त्रियाँ, जिनका हस्तक्षेप है

यदि स्वयं के लिए वर्जनाओं का निर्धारण स्वयं स्त्री करे तो क्या हो ?

वैयक्तिक स्तर पर स्त्रियों को संबंधों का चुनाव करते समय अपनी भीतरी खुशी और तनावमुक्त स्थिति पर अपने को फोकस करना चाहिये । साथ ही साथ वह इस बात का भी ख्याल रखे कि उसके निजी चुनाव किसी दूसरे की आज़ादी और सुरक्षा में खलल तो नहीं डाल रहे। अपनी आज़ादी को बचाये रखने के साथ उसे दूसरे की आज़ादी पर हमला करने का भी कोई हक नहीं है। यह स्त्री पुरुष  का नहीं, मानवीयता का तकाज़ा है। उसे लिंग विभाजन और लिंग प्राथमिकता के तहत अपनी दिशा  तय नहीं करनी है। सामाजिक स्तर पर भी यही रवैया कारगर होगा। वर्ग, वर्ण और जाति के तहत उसे विभेद रेखायें नहीं खींचनी हैं। हमेशा  यह संभव नहीं होता पर अपनी सीमाओं और मानवीयता की पहचान एक ज़रूरी धरातल है।

आज़ादी को लड़की के लिए कुफ्र माना जाता है।  बहुत सी बातें उनके ऊपर थोप दी जाती हैं।  इसके बरक्स समाजों और राष्ट्रों को सभ्य बनाने की अधिक जरूरत है।  जब स्त्री अपने लिए वर्जनाएं तय करेगी तो मुझे नहीं लगता कि वह बराबरी और मनुष्यता से बाहर कोई मांग करेगी। उसका तो मूलभूत हक भी अब तक उसे मिला नहीं है।  अगर वह अपने हकों के लिए संघर्ष कर रही है और आप उसे अराजक और आवारा समझ रहे हैं तो ठीक वही अपराध कर रहे हैं जो पीढि़यों से लोग करते आ रहे हैं।  आजादी और अपराध की सीमारेखा को एक में नहीं मिलाया जा सकता।

विवाह की व्यवस्था में स्त्री की मनोवैज्ञानिक ,सामाजिक एवं आर्थिक स्थितियां  कितनी स्त्री के पक्ष में हैं ? 

विवाह की शुरूआती अवधारणा ही पूरी तरह से ग़ैरबराबरी पर टिकी है। स्त्री और पुरुष मिलकर एक पारिवारिक इकाई का निर्माण करते हैं लेकिन इस इकाई में कार्यविभाजन, भूमिकाओं के निर्धारण और निर्णय के अधिकार में दोनों को समान  नहीं रहने दिया जाता और इसका बुनियादी कारण संपत्ति और अर्थोपार्जन है। एक समय तो रनिवासों और हरमों में स्त्री की हैसियत एक गुलाम से भी बदतर हो गई। गौरतलब है कि इनमें बंदियों की ही संख्या नहीं थी बल्कि ब्याहताओं की भी संख्या थी।  चूँकि यह परिदृश्य शासक वर्ग के भीतर था इसलिए सामान्य जीवन भी इस असर से अछूता न रहा और इसका सबसे बड़ा असर स्त्री की अस्मिता पर पड़ा और वह सामाजिक जीवन की सबसे उपेक्षित स्थिति तक जा पहुंची।

विवाह का निर्धारण पुरुष के अनुकूल होता रहा है और स्त्री की सहमति-असहमति का उसमें कोई मतलब नहीं रह जाता है।  अक्सर देखा गया है कि बीमार और फटेहाल पति भी अपनी कामकाजी पत्नी को केवल इसलिए दबाता रहा है कि वह पुरुष है। आर्थिक स्थिति में स्त्री के प्राधिकार का अभाव इसका मुख्य कारण था।  पारम्परिक विवाह की व्यवस्था में मनोवैज्ञानिक, सामाजिक एवं आर्थिक स्थितियां स्त्री के पक्ष में अमूमन कम ही रही हैं। हाँ, प्रेम विवाहों और नई अर्थव्यवस्था में चीजें तेजी से बदलने का आभास ज़रूर हुआ पर दोनों पक्षों में गहरे तक परंपरागत संस्कार धंस चुके थे इसलिये मानसिकता को बदल पाना बहुत मुश्किल  हो गया।

समय के साथ साथ इनमें परिवर्तन हुए। आज विवाह में इस गैरबराबरी की प्रचलित अवधारणा से बाहर निकलने की ज़रूरत है। लड़कियों को पहले की तरह इसे भाग्य और नियति मानकर एक गलत संबंध में आजीवन टिके रहकर अपने को होम करने की ज़रूरत नहीं है। सामाजिक सुरक्षा और सुविधा के संबंध को विस्तार देते हुए प्रेम के संबंध में बदलने की भरपूर कोषिष की जानी चाहिये । यह इस बात पर निर्भर करता है कि एक स्त्री अपनी अस्मिता को बरकरार रखते हुए एक कोमल रिश्ता  बनाये रखने में कितनी आश्वस्त  और सर्जनात्मक है। स्त्रियों में प्रेम देने की अंतहीन संभावनाएं हैं। पुरुषों  में भी हैं पर उनका अहं भरपूर आड़े आता रहता है। दो साथियों के बीच अगर मूल्यों , आस्थाओं और अस्तित्व का भीषण  टकराव है , तो उसी स्थिति में विवाह से बाहर निकलकर दोनों का अपने को सम्मान के साथ बचाये रखना निहायत ज़रूरी है ।

मातृसत्तात्मक व्यवस्था में विवाह-संस्था क्या अधिक सुदृढ़ और समर्थ होती ? तब समाज भ्रूण हत्या दहेज हत्या एवं बलात्कार जैसे अपराधों से कितना मुक्त होता ?

मातृसत्तात्मक व्यवस्था की अवधारणा एक यूटोपिया से ज्यादा कुछ नहीं। सत्ता  – वह किसी भी तरह की हो – पितृसत्ता  या मातृसत्ता  – हमेशा  से ही त्याज्य है। उसे स्वीकृति नहीं दी जा सकती। नारीवाद लोकतंत्र और उदारवाद का इच्छुक है। समानता और बराबरी इसका मूलमंत्र है और इसी के तहत हर व्यक्ति को न्याय और सम्मान दिलाया जा सकता है । फेमिनिज़्म में यह स्पष्ट  रूप से कहा गया है कि पितृसत्ता की आलोचना या भर्त्सना  करते हुए वह मातृसत्ता  की स्थापना का हिमायती नहीं है।

यह निहायत गलत अवधारणा है कि भ्रूण हत्या, दहेज हत्या और बलात्कार जैसे अपराध पुरुषसत्तात्मक समाज की विशेषतायें हैं और ज्यादातर मातृसत्तात्मक व्यवस्थाओं में ये कुरीतियां नहीं होतीं।  नारीवादी महिलाएं अगर समाज में बदलाव चाहती हैं तो इसका यह अर्थ बिल्कुल नहीं लगाया जाना चाहिये कि वे पितृसत्तात्मक व्यवस्था की जगह एक मातृसत्तात्मक व्यवस्था चाहती हैं। नारीवादी अवधारणा बराबरी का हक, निर्णय लेने की आज़ादी और मानसिक गुलामी से मुक्ति की अवधारणा है,  जिसमें पुरुष को साथ लेकर ही समाज को बदला जा सकता है, अलग से एक मातृसत्तात्मक व्यवस्था कायम करके नहीं। यह एक शोषक  व्यवस्था से निदान नहीं, सिर्फ़ खुद दूसरी भूमिका में उतर आना है।

सह जीवन की अवधारणा क्या स्त्री के पक्ष में दिखाई देती है ?

सहजीवन की अवधारणा विवाह संस्था की हिलती हुई नींव का ही नतीजा है। ज़ाहिर है इसमें स्त्री और पुरुष  (या समान लिंग के दो साथी भी) दोनों के लिये अपेक्षाकृत ज्यादा आज़ादी है। सहजीवन सबसे पहले संयुक्त परिवार की अवधारणा और बंधन से मुक्ति का रास्ता दिखा देता है,  जिसमें हमेशा  परंपरागत विवाह के छत्र तले आमतौर पर स्त्रियों को ही समझौते करने पड़ते थे। विवाह दो व्यक्तियों के बीच होता है पर एक लड़की को सिर्फ़ अपने पति से नहीं, उसके पूरे परिवार से समझौता करते हुए, तालमेल बिठाते हुए और आखिरकार इस प्रक्रिया में अपने को होम करते हुए इस संबंध को निभाना पड़ता है। अच्छे और सकारात्मक अर्थों में जिसे गठबंधन कहा गया वह अंततः पूरी तरह गर्दन पर जकड़ा हुआ बंधन साबित हुआ । दो वयस्क एक दूसरे के लिये जि़म्मेदार होते हैं और उन्हें इस जि़म्मेदारी को एक खुले मन और दिमाग़ से निभाना चाहिये।

सहजीवन खासतौर पर स्त्रियों के लिये आज़ादी की ओर बढ़ता अगला कदम है पर परिवार और विवाह की पारंपरिक अवधारणा ऐसे सहजीवन को स्वीकृति न देकर इन आज़ाद ख्याल व्यक्तियों को समाज से अलग-थलग रखने का उपक्रम रचती है। अगर कोई औरत ऐसे सहजीवन में रहते हुए मां बनना चाहती है, तो उसे एक लंबे अनुबंध की राह तकनी होती है। मध्यवर्ग की लड़की को सामाजिक रूप से अकेले पड़ जाना प्रभावित करता है। इसलिये सहजीवन का निर्णय एक मध्यवर्ग की लड़की ( और लड़के के लिये भी – क्योंकि परिवार उसे भी छोड़ देता है ) के लिये संकरी रस्सी पर चलने जैसा है। मध्यवर्ग से आये संस्कारी युवाओं के लिये यह एक कठिन निर्णय है। पर आज का युवा वर्ग, विवाह के साइड अफेक्ट्स देखते हुए इस प्रयोग को अंजाम देने से नहीं हिचकता और अक्सर उसे इसका लाभ भी मिलता है।

साथ होकर भी पुरुष एवं स्त्री की स्वतंत्र परिधि क्या है ?

किसी भी संबंध में – चाहे वह शादी हो या सहजीवन – अपनी निजी स्पेस को बनाये रखना बहुत ज़रूरी है। अगर दोनों साथी एक दूसरे की स्वायत्तता बनाये  रखने में मददगार हों तो वे एक दूसरे के साथ रहते हुए अपने को समृद्ध करेंगे और अपना विकास एक स्वस्थ तरीके से कर पायेंगे। इससे सहजीवन का भी स्वस्थ विकास होगा। यह पारस्परिक समृद्धि योजना है । स्वायत्तता  को बरकरार रखना इसमें हमेशा  इजाफ़ा करता है ।

एक दूसरे का ख्याल रखना और सम्मान करना तो पुरुष और स्त्री की स्वतंत्र परिधि का एक आधार होता ही है लेकिन इसके पीछे काम करनेवाले बुनियादी घटकों को और अधिक ध्यान से समझने की जरूरत है। जब तक स्त्री के श्रम , उसकी बौद्धिकता और क्षमता को पूरा महत्व नहीं मिलेगा, तब तक स्त्री स्वतंत्रता पुरुष की दयानतदारी पर निर्भर रहेगी। इसके साथ ही जबतक स्त्री का अपना घर, संपत्ति पर अपना हक, अपना खाता और नियमित आय नहीं होगी और उसको खर्च करने का निर्णय उसका अपना नहीं होगा तब तक यह परिधि कमजोर होगी और स्त्री सुरक्षा के लिए हमेशा पुरुष की चहारदीवारी में जाती रहेगी !

वह हमेशा रहस्यमयी आख्यायित की गयी

प्रज्ञा पांडे

कवयित्री , कथाकार प्रज्ञा पांडे निकट पत्रिका की कार्यकारी सम्पादक हैं और वर्तमान अंक की अतिथि संपादक. संपर्क : ई-मेल :  pandepragya30@gmail.com

( प्रज्ञा पांडेय के अतिथि सम्पादन में हिन्दी की पत्रिका ‘ निकट ‘ ने स्त्री -शुचितावाद और विवाह की व्यवस्था पर एक परिचर्चा आयोजित की है . निकट से साभार हम उस परिचर्चा को क्रमशः प्रस्तुत कर रहे हैं , आज खुद अतिथि संपादक का सम्पादकीय .  कल शुरुआत की थी अरविंद जैन के जवाब से. अरविंद जैन का जवाब पढ़ने के लिए क्लिक करें  ) 


जो वैध व कानूनी है वह पुरुष का है : अरविंद जैन 


सभ्यता के प्रारंभिक दौर की स्त्री  श्रेष्ठ  थी।  आडम्बरपूर्ण  पूर्वाग्रहों से, आधिपत्यपूर्ण आक्रमणों  से दूर  अपने स्वाभाविक स्वरुप में,  प्राकृतिक गुणों से लबरेज ,  देह के स्तर पर  बलिष्ठ ,नेतृत्व  करने की क्षमता के  साथ वह युद्ध करने में और  शिकार करने में   भी पुरुष की सहायक   हुआ करती थी। महामानव  राहुल सांकृत्यायन की मानें तो उसमें सबको साथ लेकर चलने की शक्ति थी, वह झुण्ड में आगे चलती थी ,वह अपना साथी खुद चुनती थी ।” वोल्गा से  गंगा ” में वे  एक जगह लिखते हैं ” पुरुष की भुजाएं भी ,स्त्री की भुजाओं की  तरह बलिष्ठ थीं ” यानी स्त्री की  भुजाएं तो बलिष्ठ  थीं  ही ……। यो तो  संगठन करने की शक्ति देह=बल से नहीं मानसिक लचीलेपन से  आती है, तभी तो  तमाम नियम कायदों के बंधनों में बंधी हुई भी स्त्री वर्तमान वैवाहिक व्यवस्था में जल्दी ही  अपने नए घर में, जहाँ वह दुबारा रोपी जाती है, वहां अपने लिए जगह बना पाने में कामयाब होती है बल्कि कुछ जगहों पर घर का निपुण संचालन भी करती  है..यह अलग  बात है कि  वह अपना सब कुछ यानी अपने अस्तित्व को बचाने की जद्दोजहद में अपना सम्पूर्ण जीवन,  अपनी रचनात्मकता और अपनी समस्त  ऊर्जा होम करती है।

स्त्री में नेतृत्व  करने  का  आधार   उसके विस्मृत  आदिम गुण ही  हैं।  सदियों से वैधव्य ,सतीत्व , बाँझपन  ,घर के परकोटे, पर्दादारी, शुचिता, वर्जनायें  अशिक्षा और  चरित्र के मारक  चौखटों को झेलती हुई  उसकी वह शक्ति   कमजोर अवश्य  पड़  गयी है और अपनी अस्मिता , अपने अधिकार और  अपनी चेतना से  अनजान वह कई तरह  के समझौते भी  करने लगी है, फिर भी  परिवार से मिले  आत्महनन के  संस्कारों से लड़ती  स्त्री ने खुद को अपराजेय  रखा है तो यह उसका जीवट है। संयुक्त , बड़े परिवारों   में स्त्रियां अपने  एकमात्र  बहुमूल्य जीवन की  आहुति दे देतीं हैं।मेरे पिता अक्सर कहा करते थे कि  लड़की का ब्याह  जितने ही ऊंचे   घर में होता है  उसके संकट उतने  ही बड़े   होते हैं।

साहित्य ,भाषा  और शास्त्र  भी स्त्री को देह बनाने में और उसे भरमाने  में बड़ी भूमिका  निभाते हैं। विश्व की  लगभग हर भाषा के साहित्य में स्त्री   सुकोमल , मधुर और कामिनी  रूप में चित्रित की गयी  है।  उसकी मुष्टिग्राह्या कमर  , उसके भारी नितम्ब , जो उसे गजगामिनी बनाते हैं उसकी वल्लरी सी बाहें और दाड़िम के रंग के होंठ अनारदानों सी दन्तपंक्ति , मृग जैसे नयन, सुराही सी ग्रीवा   और चाँद सा चेहरा  । उसका सौंदर्य ही नहीं उसके श्रृंगार उसके वस्त्र -आभूषण में इतना   सौंदर्य देखा गया कि उसका नखशिख वर्णन करने में जाने कितनी  पोथियाँ भर गयीं।उम्र के अनुसार नायिकाओं के भी  प्रकार बने। सोलह वर्ष से नीचे की स्त्री ,सोलह वर्ष की स्त्री , उससे अधिक और फिर उससे अधिक उम्र की स्त्री।   वह नगर वधू  चुनी जाती रही उसके लिए कोठे बनाये गए। सवाल यह है कि   प्रकृति की बनाई किस चीज़ में सौंदर्य नहीं है लेकिन स्त्री के अप्रतिम प्राकृतिक  गुणों की जगह स्त्री के दैहिक सौंदर्य का  बखान  साहित्य  और शास्त्रों   के प्रति ही नहीं उसको रचने वालों के प्रति भी घोर  संदेह पैदा करता है।इस तरह  प्रकृति की रची स्त्री कहीं गायब हो  गयी । वह हमेशा  रहस्यमयी आख्यायित की गयी।

 प्रकृति की व्यवस्था में  स्वच्छंदता की मनाही है। सामाजिक मूल्यों की सुरक्षा का पूरा  दारोमदार स्त्री के कन्धों पर डालकर पुरुष उसके मूल्यों  के निर्वहन के  प्रति गैरजिम्मेदार होने की हद तक लापरवाह होता है।  आज की स्थितियां, पुरुषसत्तात्मक   स्वच्छंद व्यवस्था ने  पैदा की हैं, जिसका  परिणाम है- दहेज़ हत्याएं ,भ्रूण हत्याएं  और बलात्कार। कारणों की पड़ताल में जाएँ  बिना  इन अपराधों के लिए स्त्री  की दुश्मन स्त्री  यह कहकर  आज भी व्यवस्था रचने वालों को बरी  करके दोष स्त्री के सिर मढ़ने की पुरजोर  साजिश  जारी  है।  स्त्री भी  विनत भाव से यह स्वीकार करती है  और उपकृत  महसूस करती है कि आज भी बहुत से पुरुष अच्छे हैं। ठीक है कि आज भी कुछ पुरुष अच्छे हैं  पर क्या यह सामन्य स्थितियां हैं?  वह इस बात से खुश होती है कि उसका भाई राखी और तीज में उसके लिए साड़ी लाया है।पिता की  संपत्ति पर   उसका कितना हक़ है यह  सवाल कभी उसके मन उठता  भी नहीं।विवाह के बाद  पति के घर में वह स्वामिनी नहीं सेविका की तरह आती है। अधिकतर वे स्त्रियां ही  झगड़ालू और कुलटा कही जातीं हैं जो सवाल पूछतीं हैं। मध्यम वर्ग    में जहाँ परिवार सर्वोपरि है जहाँ स्त्रियां गौण हैंऔर पुरुष प्रधान. स्त्रियों का बहुत बड़ा तबका ऐसा है जो पति का अनुगमन आँखें बंद कर करता है जिनका मानना है  की पति का नाम लेने से , सिन्दूर न लगाने से ,पति  निर्जल व्रत न करने से पति की उम् घटती है इसलिए वे ताजिंदगी पति का नाम नहीं लेतीं ,वे पति को साथी नहीं परमेश्वर कहतीं हैं।ऐसे ही पारिवारिक वातावरण में समाज के  भविष्य का पुरुष बड़ा होता है जो खुद को स्वयंभू और स्त्री को सामान और सेविका से अधिक नहीं  मानता हैं । असल में स्त्री  खुद को पूरी तरह से खो चुकी है।

  सच यह है कि स्त्री की गरिमा पुरुष बनने में नहीं है.स्त्री  तो स्वयं ही अतुलनीय रूप से महत्वपूर्ण है परन्तु  हालात बेहद विडम्बनापूर्ण हैं।   गर्भाशय जो स्त्री   होने की पहली पहचान  है. गर्भधारण उसके लिए  प्रकृति   का   एक वरदान  है  इसलिए स्वछंद और अधीर होना उसका स्वभाव ही  नहीं है तब  समझ में नहीं आता कि  स्त्री के लिए वर्जनाओं का निर्धारण करने का  कोई अधिकार पुरुष   के पास कैसे हो सकता है. स्त्री के लिए जो वर्जित है उसे वह अच्छी तरह पहचानती है। यदि वह अपने अधिकारों का इस्तेमाल करने की आज़ादी पाये तो क्या  पुरुष स्वयं ही अनुशासित नहीं हो जाएगा? पुरुष   सत्तात्मक व्यवस्था ने स्त्री  के लिए  वर्जनाओं का निर्धारण करने में भी दोनों पहलू अपने पक्ष में रखे   हैं।   एक ओर घरेलू स्त्री है और दूसरी ओर बाजारू स्त्री। क्या कोई स्त्री बाजारू होना चाहती है ? क्या उसे कोठों पर सुख मिलता है ? इसीलिए आज  की स्त्री का एक नया चेहरा उभरने लगा है और वह है विद्रोहिणी स्त्री का, जो इस समाज  से नाराज़ होकर अकेली रहती है। विद्रोहिणी स्त्री की शुचिता को लेकर सवाल नहीं उठते तब स्त्री की शुचिता की जिम्मेदारी पुरुष  क्यों लेता है।  वह अपनी शुचिता की जिम्मेदारी क्यों नहीं लेता।  स्त्री की शुचिता उसका अपना अधिकार है।
स्त्री से शुचिता को लेकर सवाल करना  स्त्री  के अस्तित्व पर सवाल करना है।

 आज स्त्री बहुत सी दुविधाओं के बीच  है।  क्या गलत और क्या सही है , इसका निर्णय करने में उसे बहुत सी परेशानियां उठानी पड़ती हैं।उसके पास अधिकार तो हैं लेकिन सामजिक मान्यताएं उसके साथ नहीं हैं। इस भौतिकता के युग में वह खुद को कमोडिटी होने से किस तरह बचाये। चेतना के स्तर  पर यह जागृति अभी  धुंधली है। बहुत  मामलों में वह देह को इस्तेमाल करने लगी है लेकिन यह  क्या उसको उसकी मंज़िल तक  ले जायेगा।   खुले कपडे पहनना कोई अपराध नहीं है  लेकिन उसके पीछे उसकी मंशा  क्या साफ़ है।  क्या वह अपनी देह से इतनी मुक्त है। यदि नहीं तो देहप्रदर्शन को  स्वयं अपना हथियार बना रही है जिसमें पीछे पहाड़  तो आगे खाई  है।  क्या  कपड़ों से प्रगति आयेगी ?आदिवासी स्त्रियां   जिनके स्तन खुले  होते हैं और उनके कपडे  घुटनों  तक  हटे  होते हैं  वे  अश्लील नहीं लगतीं क्योंकि वे अपनी लड़ाई लड़ने में समर्थ हैं देह का  इस्तेमाल  उनकी नीयत में शामिल  नहीं हैं  ।   सच यह है कि  प्रदर्शन की  नीयत से पहने जाने   वाले कपडे  स्त्री को देह-रूप में ही प्रस्तुत करते हैं।उसे अपनी अस्मिता को  पहचानना होगा।

जब तक स्त्री अपने  लिए आर्थिक आधार नहीं खड़ा करती , संगठित होकर अपनी लड़ाई नहीं लड़ती , अपने फैसले खुद नहीं करती तब तक सहजीवन में भी कोई सुख नहीं। पुरुष की मानसिकता ही नहीं स्त्री की मानसिकता भी बदले यह ज़रूरी है नहीं तो वह तो सप्तपदी और वैदिक रीति से   ब्याह न करने भर तक ही अलग है। आज की स्त्री को  आत्मरक्षा के   लिए मार्शल आर्ट की शिक्षा  और स्वावलम्बी होना बहुत  ज़रूरी है ताकि  भाई  ही नहीं  पति भी  गर्व से कह सके कि यह स्त्री  मेरी बहन है  , पत्नी है और यह अपनी रक्षा स्वयं करती  है। ताकि स्त्री अपने आने वाली पीढ़ी को भी आत्मरक्षा के लिए दीक्षित करे।

इस बार  निकट – १० के सम्पादन  के  जिम्मेदारी जब कृष्ण बिहारी जी ने मुझे दी  तो  जिम्मेदारी लेते हुए और विषय को चुनते हुए एक डर  भी शामिल था कि  गुरुतुल्य हमारे वरिष्ठ रचनाकार और मित्र रचनाकार  यदि एक साथ न आये तो यह अंक  तरह अपनी सार्थकता साबित कर सकेगा। मैं यह कहते हुए कृतकृत्य हूँ कि “स्त्री शुचितावाद और विवाह की व्यवस्था ” इस विषय को हमारे वरिष्ठ  और मित्र रचनाकारों ने हाथोंहाथ लिया और खुलकर अपनी बात रखी। राजकिशोर ,अर्चना वर्मा ,नासिरा  शर्मा , सुधा अरोड़ा , शीला रोहेकर ,राजेन्द्र रॉव् , अमरीक सिंह डीप  अरविन्द जैन , कात्यायनी  , तेजिंदर गगन ,देवेन्द्र,  गीताश्री , विभा रानी , रवि बुले ,अनीता भारती एवं  संजीव चन्दन। मैं इन सभी लोगों के प्रति ह्रदय से आभार व्यक्त करतीं हूँ।

इस बार हमारे स्तम्भ ” धमक ” में पहली कहानी दिव्या शुक्ला की है जोअ पनी परिपक्व भाषा  के साथ  कविताओं से  अपनी पहली कहानी  गिद्ध के माध्यम  से कहानी विधा में कदम रख  रहीं हैं। सुशील सिद्धार्थ का  व्यंग्य , कपिल आर्य के संस्मरण के साथ ही विश्वम्भर  नाथ शर्मा “कौशिक” की अप्रकाशित कहानी   के साथ ही आज की कहानी   एवं कविता के महत्वपूर्ण हस्ताक्षर  हमारे इस अंक में मौजूद हैं।’ दखल” के माध्यम से जो भी मुझे  कहना  था   वह मैंने  सम्पादकीय में कहा  है।

आख़िर हम भी तो इंसान ही हैं, हमें भी दर्द होता है : रवीना बरीहा

( थर्ड जेंडर, ट्रांस जेंडर, तृतीय लिंग, किन्नर आदि नामों से जाना जाने वाला यह समुदाय भारतीय समाज के सबसे उपेक्षित तबकों में से एक है। आज राजनैतिक-सामाजिक-आर्थिक दृष्टि से इसकी शिनाख़्त सबसे उत्पीड़ित तबकों के रूप में की जा रही है। वर्षों से दुत्कार, प्रताड़ना और अपमान झेलने वाला यह तबका अब धीरे-धीरे अंगड़ाई लेने लगा है। मसला शिक्षा का हो, संगठन बनाने-सामाजिक काम करने का हो या फिर राजनीति में सक्रिय भागीदारी का, इस समुदाय की छटपटाहट खुल कर सामने आने लगी है। इन्हीं में से एक हैं छत्तीसगढ़ की रवीना बरीहा, जो रायपुर में ‘मितवा’ नाम की स्वयं सेवी संस्था के जरिये सामाजिक चेतना जगा रही और थर्ड जेंडर के हक-अधिकार के लिए भी प्रयत्नशील है। स्त्रीकाल के पाठकों के लिए डा.  मुकेश कुमार व डिसेन्ट कुमार साहू की उनसे लंबी बातचीत के प्रमुख अंश. स्त्रीकाल में थर्ड जेंडर से संबंधित अन्य आलेख पढने के लिए क्लिक करें  ) :
किन्नर अब थर्ड जेंडर की तरह पहचाने जायेंगे : स्वतंत्र मिश्र 
कब तक नचवाते और तालियां बजवाते रहेंगे हम : धर्मवीर सिंह 

रवीना बरीहा से बात करते डा. मुकेश

आप अपने जीवन-संघर्षों के बारे में बताएं।
इस मामले में मैं थोड़ा भाग्यशाली रही, हमारे समाज में थर्ड जेंडर को जितनी प्रताड़ना झेलनी पड़ती है, उतनी मुझे नहीं झेलनी पड़ी। सामाजिक उपेक्षा और बहिष्कार की जितनी पीड़ा हमारे समुदाय के अन्य लोगों को झेलनी पड़ती है, उसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता। लेकिन मुझे यह सब कम झेलना पड़ा। छठी कक्षा की पढ़ाई मैंने अपने घर पर ही रह कर की। उस समय तक घर वालों को समझ ही नहीं आया कि मैं ‘किन्नर’ हूँ। उसके बाद रायपुर के रामकृष्ण मिशन स्कूल में मेरा चयन हो गया, जहां रहकर मैंने बारहवीं कक्षा तक की पढ़ाई की। इस आश्रम में मेरी सही ढंग से परवरिश हुई, मुझे कहीं से भी यह एहसास नहीं होने दिया गया कि मैं ‘किन्नर’ हूँ। मानव के व्यक्तित्व के विकास के लिए शिक्षा, भोजन-वस्त्र आदि जिन बुनियादी चीजों की आवश्यकता होती है, सारी चीजें मुझे वहाँ उपलब्ध हुईं। जीव-विज्ञान से 12वीं कक्षा पास करने के बाद मैंने रायपुर के दुर्गा महाविद्यालय से कला (दर्शन, हिन्दी साहित्य, राजनीति विज्ञान) में स्नातक किया। तदुपरांत माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय से संबद्ध एक संस्थान से मैंने रायपुर में ही एक वर्ष का फिल्म मेकिंग (पोस्ट ग्रेजुएशन डिप्लोमा इन डिजिटल विडियोग्राफी) कोर्स किया। इसी दौरान मैंने रायपुर के दैनिक अखबार ‘हरीभूमि’ में काम किया। वहाँ मैं प्रूफ-रीडर और संपादकीय में प्रांतीय डेस्क देखती थी। मैंने तीन वर्षों तक वहां काम किया। वर्ष 2009 में हमलोगों ने खुद का एक संगठन बनाने के बारे में सोचा। और हमलोगों ने अन्य चार-पाँच किन्नर साथियों के साथ मिलकर ‘मितवा’ नामक संस्था बनाई।

तब तक आपकी पहचान किन्नर के तौर पर समाज के सामने आ गई थी?
हाँ, बारहवीं की पढ़ाई पूरी कर लेने के बाद मैं खुलकर अपनी जेंडर पहचान के साथ सामने आ गई थी।

बारहवीं के बाद तक भी आपका अपने घरवालों से रिश्ता बना रहा?
बारहवीं के बाद भी मैं आश्रम में ही रही। अपनी पहचान स्पष्ट कर देने के बाद मुझको घर जाना नहीं पड़ा। पढ़ाई करते हुए मैंने टायपिंग भी सीख ली थी। इसी कारण मुझे अखबार में नौकरी मिल गई। प्रारंभ में मैंने देशबंधु अखबार में काम किया। इन पड़ावों से गुजरते हुए मुझे समझ में आया कि थर्ड जेंडर के प्रति समाज की धारणा कैसी है! तब से मेरे मन में एक बीज डल गया कि, मैं अपने लिंग- तृतीय लिंग के लोगों के लिए काम करूंगी। खासकर इन्हें सामाजिक समानता हासिल हो, इसके लिए काम करने का जज़्बा मेरे भीतर पैदा हुआ। इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए हमने ‘मितवा’ संस्था बनाई।

‘मितवा’ अत्यंत ही प्यारा नाम रखा आप लोगों ने अपनी संस्था का। इसके पीछे भावना क्या थी? 
तृतीय लिंग समुदाय के हक-अधिकार पर काम करने के लिए हम लोगों ने यह संस्था बनाई। हम यह बताना चाहते हैं कि, हम न कोई दैवीय रूप हैं और न ही उपेक्षा के पात्र। हम ‘मित्र’ हैं। उपनिषदों के ‘एक साथ चलें, एक साथ मिलकर उपभोग करें, एक साथ तेजस्वी बनें’ वाक्य के मद्देनजर हम लोगों ने मित्रता को ‘इष्ट’ और श्रेष्ठ सदगुण समझा। इसी मित्रता के भाव को मितवा का नाम दिया गया। इस संस्था के जरिये हम लोग समाज की मुख्यधारा से थर्ड जेंडर को जोड़ने हेतु तरह-तरह की गतिविधियां चलाते हैं। हर वर्ष नवरात्रि के दिन हमलोग नर्सों का सम्मान करते हैं। उसी प्रकार ट्रैफिक पुलिस को अंबेडकर जयंती के दिन सम्मानित किया जाता है और रक्षा-बंधन के दिन पेड़-पौधों को हमलोग राखी बांधते हैं। रामनवमी में हमलोग गरीबों को भोजन कराते हैं। अस्पताल जाकर हम मरीजों को फल आदि वितरित करते हैं। इन गतिविधियों के जरिये हम समाज की मुख्यधारा से जुडने का लगातार प्रयास चला रहे हैं।

‘मितवा’ के लिए शुरुआती दिनों में आपलोगों ने फंड जेनरेट कैसे किया?
‘मितवा’ के सारे सदस्य कहीं न कहीं काम कर रहे थे, मैं खुद पत्रकारिता में थी, और अन्य सदस्य में से एक वहीं के किसी होटल में वरिष्ठ कुक थे, एक का बहुत अच्छा ब्यूटी-पार्लर था, एक-दो लोग बधाई मांगने का काम करते थे। इन सबके साझे आर्थिक सहयोग से संस्था का काम शुरू किया गया। संस्था को आज भारत सरकार के स्वास्थ मंत्रालय की ओर से लक्ष्यगत हस्तक्षेप परियोजना के अंतर्गत एक प्रोजेक्ट मिला हुआ है। एचआईवी-एड्स और टीबी पर जागरूकता के लिए इस प्रोजेक्ट के तहत संस्था के द्वारा पूरे रायपुर जिले में कार्य किया जा रहा है। इसके तहत जगह-जगह शिविर लगाकर खून की जांच करायी जाती है। स्वास्थ्य जागरूकता के लिए नुक्कड़-नाटक, कार्यशाला-सेमिनार आदि भी आयोजित किए जाते हैं। संस्था में आज 52 वेतनभोगी स्टाफ हैं, जिसमें से सत्तर फीसदी थर्ड जेंडर हैं। संस्था ने यौन-रोग, एचआईवी आदि से संबंधित निःशुल्क जानकारी देने के लिए एक सहायता केंद्र भी खोला था, जहां ऐसे मरीजों को जरूरी जानकारी व काउंसलिंग की जाती थी।

भारतीय समाज में ‘थर्ड जेंडर’ को आप कहाँ पाते हैं? 
यदि हम भारतीय समाज को धार्मिक व व्यावहारिक दोनों दृष्टि से देखें तो जहां धार्मिक दृष्टि से थर्ड जेंडर- किन्नरों को पवित्र और ऊंचा स्थान दिया गया है। लेकिन व्यवहार में थर्ड जेंडर को अत्यंत ही हेय दृष्टि से देखा जाता है। भारतीय समाज में थर्ड जेंडर को हासिये पर रखा गया है। वस्तुतः थर्ड जेंडर आज न्यूनतम मानवाधिकारों से भी वंचित है।

थर्ड जेंडर को लेकर भारतीय व पाश्चात्य अवधारणा में क्या भिन्नताएँ हैं?
भारतीय समाज में थर्ड जेंडर को सामाजिक मान्यता और जेंडर की भूमिका में देखा जाता है। जबकि पश्चिम में केवल यौनिकता ही इसका मूलआधार रहा है। हमारी यौन प्रवृत्ति, यौन-व्यवहार या यौनिकता के आधार पर इस जेंडर को अलग रखा गया है। पर भारतीय समाज में सामाजिक मान्यता और सामाजिक जेंडर के हिसाब से थर्ड जेंडर को देखा जाता है। यूं कहें कि जहां पश्चिम में हमारी बुनियाद ‘यौनिकता’ है वहीं भारत में हमारी बुनियाद ‘जेंडर’ है।

भारत में थर्ड जेंडर को कैसे वर्गीकृत किया गया है? 
भारत में वर्गीकरण सामाजिक और पारंपरिक आधार पर किया गया है। जबकि पश्चिम में सेक्सुअलिटी के आधार पर। वहाँ कई ट्रांस जेंडर बाइ-सेक्सुअल, होमो-सेक्सुअल होते हैं। पश्चिम में आठ प्रकार की यौनिकता के आधार पर वर्गीकरण किया गया है। जबकि भारत में यौनिकता के बजाय परंपरा और सामाजिक-सांस्कृतिक स्थिति के आधार पर यह वर्गीकरण हुआ है। थर्ड जेंडर में जो भिक्षावृत्ति के पेशे में शामिल हैं उन्हें ‘हिजड़ा’ कहा गया, घरों में रहकर सामान्य लोगों की भांति जीवन-यापन करने वालों को ‘ट्रांस-जेंडर’, जो शर्ट-पेंट में रहते हैं उन्हें ‘कोती’ कहा जाता है। कुछ थर्ड जेंडर जो धार्मिक-आध्यात्मिक मार्ग पर चलते हैं, उसे ‘जोगप्पा’ कहा जाता है। यहां मैं यह भी कहना चाहूंगी कि, थर्ड जेंडर के वर्गीकरण की भारतीय और पश्चिमी दोनों अवधारणा अपने आप में एकांगी है। यौनिकता और सामाजिक-सांस्कृतिक दोनों पहलुओं को ध्यान में रखकर ही हमारे साथ वास्तविक न्याय किया जा सकता है और इसी से हमारा समुचित विकास भी होगा।

आपकी नज़र में सेक्स , सेक्सुअलिटी और जेंडर के बीच क्या फर्क है?

सेक्स तीन हैं- एक पुरूष, दूसरा स्त्री  और तीसरा जिनके सेक्स अंगों का सही विकास नहीं हो पाया। ये तीन ही सेक्स मानते हैं हम लोग। जबकि सेक्सुअलिटी कई प्रकार की होती है। हो सकता है किसी को होमो-सेक्सुअलिटी पसंद आये, कोई विषम लैंगिक हो, कोई ट्रांस-जेंडर के साथ सेक्से करना पसंद करें, तो कुछ लोग ऐसे होंगे जो स्त्रीी-पुरूष दोनों के साथ समान रूप से सेक्सुअल संबंध बनाना पंसद करेंगे। इसके और भी बहुत सारे प्रकार हो सकते हैं। हम मानते हैं कि सेक्सप प्रकृति-प्रदत्त अवस्थाएं हैं। जबकि यौनिकता मनुष्य का यौन-व्यवहार है। यह प्रवाहमान होता है और बदल भी सकता है। आज का विषम-लैंगिक कल समलैंगिक हो जा सकते हैं, आदि-आदि। कहने का अभिप्राय यह कि, यौनिकता परिवर्तनशील धारणा है। वहीं ‘जेंडर’ समाज प्रदत्त है, सामाजिक निर्मिति है। इसके जरिये समाज आपकी स्थिति को निरूपित करता है।

आमतौर पर थर्ड जेंडर के प्रति समाज का नजरिया कैसा रहता है? यानी समाज आपके साथ कैसा बर्ताव करता है?
थर्ड जेंडर के प्रति हम लोग समाज की मिलीजुली प्रतिक्रिया देखते हैं। समाज के जिन लोगों का थर्ड जेंडर-किन्नरों के साथ पहले कभी अथवा लगातार मेल-जोल रहा है, वे बहुत जल्दी हमलोगों को एक्सेप्ट (स्वीकार) करते हैं। हमसे अच्छा व्यवहार करते हैं। कई बार तो हमलोगों को एक दैवीय रूप में देखा जाता है। लेकिन समाज का एक बड़ा तबका ऐसा है, जो अपने कुछ पूर्वाग्रहों के कारण हमसे दूर भागता है। शायद थर्ड जेंडर का समाज से पर्याप्त मेल-जोल नहीं होने से वे एक झिझक के कारण हमें कबूल नहीं करते। इस प्रकार हम लोग समाज से दो भिन्न प्रकार की प्रतिक्रियाएं देखते हैं – एक बहुत साकारात्मक तो दूसरा अत्यंत ही नाकारात्मक-उपेक्षात्मक है।

इसका मतलब यह हुआ कि थर्ड जेंडर को समाज ‘मनुष्य’ के तौर पर कबूल नहीं करता? या तो उसमें ‘देवत्व’ ढूंढा जाता है या फिर उसे हंसी-व्यंग्य और अपमान का पात्र समझा जाता है!
आपने सही कहा, हमारे प्रति ये दोनों नजरिया समाज का रहता है। हमें या तो ‘दैवीय शक्ति’ के तौर पर देखा जाता अथवा उपेक्षा व उत्पीड़न का पात्र समझा जाता है। और समाज का ये दोनों ही अतिवादी नजरिया हमारे विकास के लिए सही नहीं है, बल्कि सच कहें तो बाधक है। क्योंकि हम समाज में यदि बहुत ऊंचे, पूजनीय रूप में माने जायेंगे तो भी हम समाज की मुख्यधारा से नहीं जुड़ पायेंगे। और यदि हम उपेक्षित हैं, तो वह हमारे लिए कष्टदायक है ही। इसलिए हम चाहते हैं कि हमारे साथ भी बाकी लोगों जैसा समानता का बर्ताव हो। हमें भी समानता, न्याय व अवसर की मुकम्मल गारंटी मिले। तभी थर्ड जेंडर का समुचित विकास हो सकेगा और हम समाज की मुख्यधारा से जुड़कर समाज के समुचित-संतुलित बदलाव-विकास में योगदान कर सकेंगे।

आमतौर पर थर्ड जेंडर के साथ पुलिस-प्रशासन का व्यवहार कैसा रहता है ?  
हमारे प्रति पुलिस का व्युवहार नकारात्म क ज्यांदा है। कई बार गंभीर मामलों में भी पुलिस एफआईआर तक दर्ज नहीं करती। यहां तक कि एफआईआर दर्ज कराने जाने पर पुलिस स्टेआशन से हमें भगा दिया जाता है। खासकर रेलवे स्टेकशन में तो मारा-पीटा तक जाता है। कई बार ‘असली’ हो या ‘नकली’ कह कर पुलिस हमारे समुदाय के लोगों से कपड़े तक उतरवाती है। सोचिये महज़ एफआईआर लिखाने के पहले कितनी प्रताड़ना से गुजरना पड़ता है। पीड़ित को पुलिस द्वारा दोबारा उत्पींड़ित किया जाता है। जबकि एफआईआर तो कोई भी लिखा सकता है। चाहे वह स्त्री  – पुरूष या थर्ड जेंडर ही क्यों न हो। इस स्थिति को देखते हुए हमने रायपुर में पुलिस के साथ वर्कशॉप किया था, वहां थोड़ी स्थिति बदली है। लेकिन ज्यादातर जगहों पर पुलिस का हमारे प्रति अमानवीय व्यीवहार ही रहता है। पुलिस को हमारे प्रति अपना व्यवहार नकारात्मक नहीं रखना चाहिए। आख़िर हम भी तो इंसान ही हैं, हमें भी दर्द होता है इससे।

जाहिर है कि थर्ड जेंडर मूलतः एक उत्पीड़ित सामाजिक वर्ग है। भारतीय समाज में दलित-आदिवासी और महिला आदि भी इसी श्रेणी में आते हैं। इस मायने में अन्य उत्पीड़ित समूहों से थर्ड जेंडर कैसे अलग है? 
थर्ड जेंडर से इतर जिन समूहों के बारे में आप कह रहे हैं, वे सचमुच उत्पीड़ित हैं। किंतु कहीं न कहीं इन समूहों को कानून व राज्य का संरक्षण प्राप्त है। अनुसूचित जाति-जनजाति के लिए कई कानूनी प्रावधान और आयोग बने हुए हैं, स्त्रियों के लिए भी इसी प्रकार की व्यवस्था है। यहाँ तक कि बच्चों, पशु-पक्षियों व पेड़-पौधों के संरक्षण-विकास की व्यवस्था है। पर हमारा दुर्भाग्य है कि किन्नरों के लिए कुछ भी नहीं है। वर्ष 2014 में हमें सर्वोच्च न्यायालय के माध्यम से पहचान मिला। जबकि यह ऐतिहासिक तथ्य है कि मुगलकाल और उससे पहले थर्ड जेंडर को बराबर या समानांतर दर्जा प्राप्त था। हमलोगों ने अपने अध्ययन में पाया कि औपनिवेशिक काल में अंग्रेजों ने किन्नरों को दुरावस्था की स्थिति तक पहुंचाया। अंग्रेजों ने ऐसे-ऐसे कानून बनाये, जो किन्नरों को अपराधी ठहराता था। इसी काल में धारा-377 भी बना। आज हम इन काले क़ानूनों को बदलने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। सरकार से हमलोगों का इस मसले पर संवाद चल रहा है। हमें उम्मीद है कि इन काले क़ानूनों को जल्द ही बदला जा सकेगा। इसलिए इस मायने में हमारी उपेक्षा अन्य सामाजिक वर्गों से भिन्न प्रकार की है।

आपकी बातचीत से लगता है कि थर्ड जेंडर की स्थिति में साकारात्मक बदलाव आ रहे हैं। इन बदलावों की आप क्या वजहें मानती हैं?
इस बदलाव के दो-तीन कारण हैं। पिछले दो दशकों में मानवाधिकारों को लेकर देश में आयी जागरूकता एक बड़ी वजह है। पहले इस दिशा में लोग बात तक करने के लिए तैयार नहीं थे। दूसरा कारण, देश के साकारात्मक सोच रखने वाले, जो हमारे प्रति संकीर्ण-नाकारात्मक दृष्टिकोण नहीं रखते, उनलोगों की भूमिका रही है। ऐसे लोगों ने हमारा साथ दिया है। शिक्षा के प्रचार-प्रसार ने भी इस सूरत-ए-हाल को बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है।

थर्ड जेंडर की संस्कृति पर कुछ प्रकाश डालिए…  
भारतीय वर्गीकरण, जिसकी चर्चा मैंने आपसे की, जिन सामाजिक-सांस्कृतिक आधारों पर किया गया है, वही उनकी संस्कृति है। हिजड़ा समुदाय, जो भिक्षावृत्ति करता है, उसमें गुरू-शिष्य की परंपरा होती है। उसी प्रकार जो आध्यात्मिक-धार्मिक परंपरा से संबद्ध होते हैं, उनके पहनावे भिन्न होते हैं। वे जाप, भजन-कीर्तन आदि करते हैं। जो लोग घरों में रहते हैं, वे सामान्य लोगों की ही तरह जीते-रहते हैं।

पर्व-त्योहारों में भी इनमें आपस में भिन्नता रहती है क्या? 
हां, पर्व-त्योहार भी इसी वर्गीकरण के आधार पर है। हिजड़ों के पर्व-त्योहार अलग हैं। ये ‘गौचरा माता’ को मानते हैं। गुजरात में इनका तीर्थ-स्थल है। अंतिम संस्कार का भी इनका विधि-विधान अलग है। घरों में रहने वाले अपनी सामाजिक-सांस्कृतिक परंपरा के मुताबिक होली-दीवाली, ईद मनाते हैं। मंदिरों में रहने वाले मंदिरों की मान्य सांस्कृतिक परंपरा को मानते हैं। इस प्रकार थर्ड जेंडर की कोई सर्वमान्य विशेष परंपरा नहीं है।दुर्भाग्यवश समाज हिजड़ों की संस्कृति को देखकर पूरे थर्ड जेंडर की एक ही संस्कृति मान लेता है, जबकि ऐसा है नहीं।

कुछ लोगों को लगता है कि हिजड़ा समुदाय को बगैर मेहनत के काफी पैसे मिल जाते हैं। एक प्रकार से इन्हें मुफ्तखोर के बतौर देखा जाता है। आपकी प्रतिक्रिया…
हां, भिक्षावृत्ति के द्वारा कुछ लोग आजीविका प्राप्त करते हैं। लेकिन हमलोगों ने जब इस पर सर्वेक्षण किया तो यह बात सामने आयी कि ऐसे लोगों की संख्या बहुत कम है। गांव-कसबों  में रह रहे थर्ड जेंडर के ज़्यादातर लोगों की आर्थिक स्थिति अत्यंत ही दयनीय है। ये अत्यंत ही कम मजदूरी की दर पर अपना पेट पालते, इनके पास वोटर-कार्ड तक नहीं है। ये जहां श्रम करते, कार्य-स्थल पर भी भेदभाव के शिकार बनते हैं। कुछ-कुछ जगह है, जहां किन्नर समुदाय के लोगों ने संगठित तौर पर भिक्षावृत्ति जैसी चीज को बढ़ावा दिया है। लेकिन इनकी संख्या बहुत अधिक नहीं। आज अगर पूरे भारतवर्ष में थर्ड जेंडर की स्थिति का अध्ययन करें तो हम पायेंगे कि इनकी आर्थिक स्थिति अत्यंत ही निम्न है। चूंकि समाज में भिक्षावृत्ति करने वाले दीख जाते हैं, इसलिए लोगों को ऐसा लग सकता है। किंतु थर्ड जेंडर के इससे कई गुना ज़्यादा लोग हैं, जो मेहनत-मजदूरी करके बड़ी कठिनाई से अपना गुजर-बसर कर रहे हैं।

हिजड़ों के बारे में समाज में कई तरह की भ्रांत धारणा है। अक्सर यह कहा जाता है कि इनके जो गुरू होते हैं, वे पूरे रुतबे और भोग-विलास की जिंदगी जीते हैं ! इस पर आपकी टिप्पणी…

यह सही है कि मठाधीशों के पास जब बहुत पैसा आ जाता है तो वे विलासिता का जीवन जीने लग जाते हैं। इनमें से कुछ लोग बहुत संपन्न हो भी गये हैं। आज दिल्ली, इंदौर, जबलपुर, रायपुर आदि कुछ शहरों में उनके अपने बड़े-बड़े फ्लैट हैं। रायपुर में तो लगभग आधे किलोमीटर का उनका कॉम्प्लेक्स है, जिसमें बड़ी-बड़ी दुकानें चलती हैं। यह जो उनकी संपत्ति और विलासिता है उसके पीछे समाज का वह नजरिया, कि लोगों ने उन्हें देवत्व के तौर पर माना है। लोगों ने उन्हें पैसा देना शुरू कर दिया। इसी कारण वे लोग भी अपने इसी दैवीय रूप को बरकरार रखना चाहते हैं। उन लोगों ने अपना अलग-अलग ‘घराना’ बना लिया है। एक-एक घराने में कई शिष्य होते हैं, जिन्हें गुरू का निर्देश रहता है कि बाहर के लोगों से एक सीमा के बाद दूरी बनाए रखें। अपने बारे में ज्यादा जानकारी न दें और न ही लोगों से घुलें-मिलें। अगर कोई बात भी करना चाहे तो उनसे उन्हें गाली-गलौज करने की शिक्षा दी जाती है। इस तरीके से उनको ऐसे नियमों में बांधा जाता है। इन घरानों में कायदे-कानून इतने सख्त हैं जिसके चलते थर्ड जेंडर के सभी लोग वहां नहीं जा सकते। उन्हें जानवरों की तरह रखा जाता है। यह एक बहुत बड़ा सामाजिक दोष है। उनकी स्थिति को बदलकर ही इस समस्या को दूर किया जा सकता है।
इस सबके बावजूद हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि जिस समय बच्चे को ‘तीसरा लिंग’ का होने के कारण उनके मां-बाप द्वारा परिवार-समाज से निकाल दिया जाता है, ये गुरू-मठाधीश ही उन्हें संरक्षण देते हैं। उनका भरण-पोषण करते हैं, उन्हें ठौर देते हैं। इन दोनों पहलुओं को हमें देखना चाहिए। क्योंकि जब इनके पास खाने को नहीं था, फुटपाथ पर रात बिताते थे, आए दिन कुछ न कुछ अप्रिय घटनाएँ घटती थीं, तब उन्होंने ही सहारा दिया।

आज की तारीख में देशभर में किन्नरों पर काम करने वाले कितने संगठन सक्रिय हैं?
2009 तक तो केवल 5 संगठन ही सक्रिय थे। 2011 में अखिल भारतीय स्तर पर काम करने के लिए एक नेटवर्क – ‘हमसफर’ का निर्माण किया गया। यह हर राज्य में जाकर वहाँ के किन्नरों को संगठित करने के साथ संगठन को एक संस्था का रूप देता है। आज भारत में उत्तर-पूर्व के राज्यों को छोड़कर, क्योंकि वहाँ किन्नर शेष भारत की तुलना में पहले से ही बेहतर स्थिति में हैं, हर राज्य की राजधानी में एक संस्था का गठन किया जा चुका है। ये संस्थाएं किन्नरों के हितों की ‘एडवोकेसी’ करते हैं और उन्हें संगठित भी।

थर्ड जेंडर को लेकर भारत में अब तक क्या-क्या कानूनी प्रावधान किये गए हैं? 
अभी सर्वोच्च न्यायालय ने थर्ड जेंडर को मान्यता दी है। सामाजिक न्याय मंत्रालय की एक टीम ने कुछ-कुछ बिन्दुओं पर राज्य सरकारों को निर्देश दिया है। सर्वोच्च न्यायालय और मंत्रालय द्वारा दिये गये निर्देशों पर अमल करने का दायित्व राज्य सरकारों का है। जिन राज्य सरकारों ने इन सुझावों पर अमल किया वहां थर्ड जेंडर को सुविधाएं मिलनी शुरू हुई है। जैसे तमिलनाडू में सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के बहुत पहले से ही थर्ड जेंडर के लिए अलग से अधिनियम है। वहां 2002 में ही इसके लिए बोर्ड का गठन हो चुका है। राजस्थान में भी कुछ-कुछ कानून आया है। छत्तीसगढ़ में अभी हाल ही में अलग बोर्ड का गठन किया गया है। किन्नरों के हितों के मद्देनजर देश के सभी राज्यों की सरकारों को चाहिए कि इस दिशा में त्वरित कदम उठायेँ। इस हेतु हमलोग विभिन्न राज्य की सरकारों से संवाद भी चला रहे हैं।

थर्ड जेंडर के सशक्तीकरण के लिए आप लोगों की प्रमुख मांगें क्या हैं?  
हमलोगों ने दो-तीन चीजें निर्धारित की हैं। पहला तो शिक्षा है। आजीविका है। न्याय के समक्ष समानता है। आर्थिक अवसरों में उन्नति की समानता है। कुछ अधिनियम हैं, जिन्हें सभी राज्यों में लाया जाना चाहिए। सभी राज्यों में बोर्ड का गठन होना चाहिए। केंद्र स्तर पर भी अनुसूचित जाति-जनजाति, महिला आयोग आदि की भांति थर्ड जेंडर के लिए भी स्वतंत्र आयोग का गठन किया जाना चाहिए। इन मांगों को लेकर शासन से हमलोग लगातार बात कर रहे हैं। तीन राज्यों- छतीसगढ़, महाराष्ट्र और तमिलनाडु की सरकार ने अपने यहां बोर्ड का गठन किया भी है। मध्यप्रदेश और बिहार में यह प्रक्रियाधीन है। यदि हमारी इन मांगों पर राज्य सरकारें समुचित ध्यान दें तो किन्नरों की दशा-दिशा बदल सकती है।

थर्ड जेंडर के शिक्षा की स्थिति में सुधार के लिए सरकार को क्‍या कदम उठाने चाहिए? जिस प्रकार सरकार द्वारा बोर्डिंग स्कूहल, नवोदय विद्यालय, सैनिक स्कूरल और अनुसूचित जाति-जनजाति के लिए अलग आवासीय विद्यालय चलाये जा रहे हैं, क्याच किन्नजरों के लिए भी उसी प्रकार की अलग से व्येवस्था  होनी चाहिए?
यह जरूरी है कि हमलोगों के लिए अलग से आवासीय विद्यालय की व्यजवस्था् हो। हर राज्यस में थर्ड जेंडर के लिए कम से कम एक आवासीय विद्यालय हो तो तत्काल हमारी शिक्षा की जरूरतें पूरी हो सकती है। इस दिशा में केन्द्रय और राज्यी सरकार को यथाशीघ्र कदम उठाना चाहिए। थर्ड जेंडर के लिए ब्यूटीशियन, टेलरिंग, बागवानी आदि के प्रशिक्षण की भी व्यकवस्थाय सरकार को करनी चाहिए। ताकि इनके स्वरोजगार का रास्ता खुल सके।

देश में अब तक किन-किन प्रांतों में थर्ड जेंडर को सरकारी नौकरियों में आरक्षण की सुविधा दी गयी है?
अभी आरक्षण केवल तमिलनाडू राज्यश में ही मिल पाया है। बाकि राज्योंि में यह प्रक्रियाधीन है। केन्द्रं सरकार ओबीसी कोटे के भीतर थर्ड जेंडर को आरक्षण देने की बात कर रही है। लेकिन हम लोग कह रहे हैं कि जो अनुसूचित जाति-जनजाति से आये किन्निर हैं, उन्हेंं उसी कोटे से आरक्षण दिया जाना चाहिए। हालांकि अभी यह विचाराधीन है, इस पर अब तक कोई ठोस निर्णय सामने नहीं आया है।

पिछड़े-दलितों के कोटे से थर्ड जेंडर को आरक्षण देने की स्थिति में इनसे टकराहट की स्थिति भी पैदा हो सकती है। आपको क्या लगता है? 

मुमकीन है कि टकराहटें हों। हमें इसका डर भी है। इसी कारण हम लोग यह मांग कर रहे हैं कि हमें अल्प संख्यडकों की भांति संरक्षण प्रदान किये जायें। जातिगत दायरे में हमारे लिए आरक्षण की व्यसवस्थाी होने से राजनीतिक समीकरण प्रभावित होंगे, जिससे तनाव की स्थिति पैदा हो सकती है। हमलोग दीर्घकाल तक आरक्षण के बजाय मात्र 10-20 वर्षों तक संरक्षण देने की मांग कर रहे हैं। बीस वर्ष बाद सरकार हमारी स्थिति का अध्य यन करा ले और जरूरी समझे तो उसे समाप्त् कर दे।

देश में व्याप्त बेरोजगारी, गरीबी, विषमता, भ्रष्टाचार, मंहगाई और यौन-हिंसा जैसी गंभीर समस्याओं को आप बतौर ट्रांस-जेंडर किस रूप में देखती हैं?
हमारी लड़ाई इसी समाज में जाने की है। इसलिए हमारी प्राथमिकता है कि यह समाज हमें अपना माने। यही वजह है कि अभी हमलोग इन सवालों पर बहुत सोच नहीं पा रहे हैं। हमारी पहली कोशिश सामाजिक समानता लाने की है। पर हम इतना जरूर चाहते हैं कि जो अशिक्षा, गरीबी, भ्रष्टाचार, यौन हिंसा आदि समस्याएँ हैं, वे दूर हों। क्योंकि ये समस्याएँ ऐसी हैं जो पूरे समाज को प्रभावित करने वाली हैं और निश्चित रूप से हमें भी। इन समस्याओं को लेकर हम केंद्र-राज्य की सरकारों से मांग करते हैं कि वे इसका सार्थक समाधान निकालें। सरकार अपने काम-काज में पारदर्शिता लाये। मानवाधिकारों की गारंटी हो। हम चाहते हैं कि सरकार वैज्ञानिक दृष्टि अपनाते हुए इन सवालों का समाधान करे। ये समस्याएँ खत्म होंगी तो हमारे हालात भी बदलेंगे।
आपकी सद-इच्छाएं वाजिब हैं। किन्तु सरकारें बनाने-चलाने वाली पार्टियों की खास विचारधारा व खास समूहों के प्रति प्रतिबद्धताएं होती हैं, सत्ता में रहते हुए इनके नीति-व्यापार सबके सब इसी बिना पर निर्धारित होते हैं।

मुख्यधारा की इन पार्टियों का अपना एजेंडा रहता है, जिसपर ये पार्टियां काम करती हैं। इन पार्टियों के एजेंडे में ‘थर्ड जेंडर’ को आप कहाँ पाती हैं?
इस बार लोकसभा चुनाव के पहले हमलोगों ने मुख्यधारा की पार्टियों के ‘मेनिफेस्टो’ में अपने सवालों को शामिल कराने का प्रयास किया था। दक्षिण भारत के विभिन्न राजनीतिक दलों, पश्चिम बंगाल की तृणमूल कांग्रेस पार्टी, कांग्रेस पार्टी और आम आदमी पार्टी ने हमारे सवाल को अपने चुनावी घोषणा-पत्र में शामिल किया भी था। हमारे संपर्क के पूर्व भाजपा का घोषणा-पत्र छप चुका था, इसलिए उसमें यह शामिल नहीं हो पाया। शेष राजनीतिक पार्टियों से हमलोग समय से संपर्क नहीं कर पाये इसलिए उनके घोषणा-पत्र में हमारी बात शामिल नहीं हो पाई। लेकिन मैं यहाँ एक बात कहना चाहूंगी कि जब हम लोगों ने इन पार्टियों का घोषणा-पत्र देखा तो हमें नहीं लगा कि उनमें बहुत अंतर है। सभी विकास, सुशासन, शिक्षा, गरीबी पर बात करते हैं। इसलिए हमलोगों ने तय किया कि हम किसी पार्टी विशेष का पक्ष नहीं लेंगे। इसलिए हमलोग किसी दल को ‘फॉलो’ करने अथवा उनपर टिप्पणी करने से बचते हैं। बावजूद इसके यह बात तो है कि, हमारी कोशिश रहनी चाहिए कि सभी दलों तक हम अपनी बात पहुंचाएं। इस बार हमलोग यह पूरे तौर पर नहीं कर पाये, क्योंकि किन्नर समाज में पढ़े-लिखे लोगों का काफी अभाव है और संगठन में सक्रिय लोगों की संख्या भी अभी पर्याप्त नहीं है। लेकिन आगे हम इसकी कोशिश जरूर करेंगे। जो राजनैतिक दल हमारे लिए काम करेंगे हम उनके साथ हैं।

इन आदर्शवादी अपेक्षाओं के बावजूद इतना तो मानना पड़ेगा कि व्यवहारतः मुख्यधारा की ये पार्टियां /गठबंधन – एनडीए-यूपीए अंतिम तौर पर समाज में यथास्थितावाद बहाल रखने के लिए ही प्रयत्नशील हैं। ऐसी स्थिति में उत्पीड़ित समूह, चाहे वह दलित-आदिवासी व महिला हो या फिर ट्रांस-जेंडर, इनके हक-अधिकार की मुकम्मल गारंटी तब तक संभव नहीं हो सकती जब तक इस यथास्थितिवाद को पलटते हुए पूरे समाज का क्रांतिकारी-समता आधारित मूल्यों के आधार पर पुनर्संगठन न किया जाय। इसी रास्ते उत्पीड़ित समूहों को ‘मनुष्य’ का दर्ज़ा भी हासिल हो सकेगा। क्या कहना चाहेंगी आप? 


इस बात को हमलोगों ने भी महसूस किया। अगर कोई राजनीतिक पार्टी है तो वह बहुत सारे लोगों का जिस चीज पर दबदबा है, उसी को साथ लेकर चलती है। जिनकी संख्या कम है, वे हमेशा उपेक्षित रह जाते हैं। हम इस बात को मानते हैं कि पार्टी वोट बैंक से चलती है, जिस सामाजिक समूह से ज्यादा वोट हासिल होता है, उसी को वे देखती हैं। यह चलता आ रहा है और शायद आगे भी बहुत दिनों तक चलेगा। इसलिए हमलोग दो दिशाओं में काम कर रहे हैं – राजनीतिक पार्टियों से भी संपर्क-संवाद कर रहे हैं और न्यायपालिका का भी दरवाजा खटखटा रहे हैं। वर्तमान में हम देख रहे हैं कि सर्वोच्च न्यायालय ने कई बड़े मामले पर हस्तक्षेप किया है और सरकारों को भी फटकार तक लगाई है। इसे देखते हुए हमलोगों ने महसूस किया कि हम केवल राजनीतिक पार्टियों के भरोसे नहीं रहेंगे बल्कि न्यायपालिका की भी मदद लेंगे। हमें न्यायपालिका पर पूरा भरोसा है। इसलिए हमलोगों ने तय किया है कि, कानूनी लड़ाई भी लड़ेंगे और लगातार विधायिका-कार्यपालिका के समक्ष अपनी मांगें भी रखेंगे।

संपर्क : 
डॉ. मुकेश कुमार, पोस्ट डॉक्टोरल फ़ेलो, आईसीएसएसआर, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा – 442005, महाराष्ट्र.; मो.: 09431690824; ई-मेल: drmukeshkumar.bgp@gmail.com 


डिसेन्ट कुमार साहू, जूनियर रिसर्च फ़ेलो, यूजीसी, समाज-कार्य, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा – 442005, महाराष्ट्र.; मो.: 08855868445 ; ई-मेल: dksahu171@gmail.com 

उज्जवल भट्टाचार्य की कवितायें : ब्रह्मज्ञान व अन्य

उज्जवल भट्टाचार्य

उज्ज्वल भट्टाचार्य 1979 से 2011 तक जर्मनी में रेडियो पत्रकार के रूप में कार्यरत रहे हैं. कविता और कहानियां आलोचना, पहल, हंस व अन्यत्र प्रकाशित. बैर्तोल्त ब्रेख्त (एकोत्तरशती), एरिष फ़्रीड (वतन की तलाश), हान्स-माग्नुस एन्त्सेन्सबैर्गर (भविष्य संगीत) व गोएथे के जर्मन से हिंदी अनुवाद के संग्रह प्रकाशित. इन दिनों कोलोन, जर्मनी व वाराणसी में रहते हुए स्वतंत्र लेखन.
संपर्क :9717274668

ब्रह्मज्ञान

यह सच है
तुम्हारी हवस के मारे
मुझे भागते फिरना पड़ रहा है
और जिधर भी मैं भागती हूं
तुम्हारा एक चेहरा उभर आता है –
पर इतना जान लो :
मैं नहीं पैदा हुई
तुम्हारे ध्यान से…
तुम्हें धरती पर लाया गया
मेरी जांघों के बीच से…


वो और उसकी कविता

बेचारी औरत का दर्द
दुनिया के सामने रखने की ख़ातिर
एक कविता लिखनी थी
अपनी तसव्वुर से
सहूलियत के मुताबिक
करीने से बनाई
बेचारी औरत की तस्वीर
एक ज़बरदस्त कविता बनी
और मेरी ओर देखते हुए
मुस्कराने लगी.

कौरव सभा में

द्रौपदी की साड़ी खुलती जा रही है
और लिपटती जा रही है
मेरे जिस्म पर
वह शर्म से पानी-पानी हुए जा रही है
नंगी होने के डर से
मैं भी शर्म में डुबा हूं
पुंसत्व का अभिमान खोकर
और टकटकी लगाकर
हम दोनों को देखते हुए
कुत्सित मुस्करा रहा है
हस्तिनापुर !

एक ताकतवर महिला नेता की कविता

मैं जान चुकी थी
औरत होना मेरी कमज़ोरी थी
और सारे मर्द इसका फ़ायदा उठाते थे
चुनांचे मैंने औरत होना छोड़ दिया
और मुझे सबकुछ मिलती गई –
इज़्ज़त, ताकत, धन-दौलत…
सिर्फ़ कभी-कभी
रात को अकेले
सितारों से भरे आसमान की ओर
बांहे फैलाकर अरज करती हूं –
इज़्ज़त, ताकत, धन-दौलत…
एकबार औरत बनकर इन्हें पा लेने दो !

बेचारा मर्द

मां के गर्भ से निकलने के बाद से ही
वह परेशान है
छूट चुका है
उसका बसेरा
जहां उंकड़ू मारकर
घर जैसा महसूस किया जा सके
अब हाथ-पैर फैलाने हैं
धरती-आसमान-समंदर
हर कहीं बनाने हैं बसेरे
डाह भरी नज़रों से
वह देखता है औरत को
उसे बसेरे नहीं बनाने हैं –
बसेरा बनना है !

जो वैध व कानूनी है वह पुरुष का ……..

अरविंद जैन

स्त्री पर यौन हिंसा और न्यायालयों एवम समाज की पुरुषवादी दृष्टि पर ऐडवोकेट अरविंद जैन ने मह्त्वपूर्ण काम किये हैं. उनकी किताब ‘औरत होने की सजा’ हिन्दी में स्त्रीवादी न्याय सिद्धांत की पहली और महत्वपूर्ण किताब है. संपर्क : 9810201120
bakeelsab@gmail.com

( प्रज्ञा पांडेय के अतिथि सम्पादन में हिन्दी की पत्रिका ‘ निकट ‘ ने स्त्री -शुचितावाद और विवाह की व्यवस्था पर एक परिचर्चा आयोजित की है . निकट से साभार हम उस परिचर्चा को क्रमशः प्रस्तुत कर रहे हैं , प्रारंभ करते हैं अरविंद जैन के जवाब से ) 
बकौल सिमोन द बोउआर “स्त्री पैदा नहीं होती बनायी जाती है”. आपकी दृष्टि में स्त्री का आदिम स्वरुप क्या है।
सिमोन द बोउआर (सेकंड सेक्स) की यह अवधारणा कि “स्त्री पैदा नहीं होती बनाई जाती है” अपने समय और समाज में सही रही है. दरअसल स्त्री पैदा ही नहीं होती बनाई भी जाती है, ताकि वो ज्यादा से ज्यादा ‘पुरुष’ पैदा करे, जिन्हें पितृसत्ता ‘मर्द’ बना अपना व्यापार चला सके. व्यापक स्तर पर यह फैलाया गया कि मातृत्व  के बिना स्त्री अधूरी है. अविवाहित, विधवा, तलाकशुदा और ‘बाँझ’ स्त्री समाज पर बोझ मानी-समझ जाती हैं.
पूरी साज़िश समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि सारी दुनिया की धरती और (स्त्री) देह यानी उत्पादन और उत्पत्ति के सभी साधनों पर पुरुषों का ’सर्वाधिकार सुरक्षित” है. उत्पादन के साधनों पर कब्जे के लिये ‘उत्तराधिकार कानून’ और उत्पत्ति यानी स्त्री देह पर स्वामित्व के लिये ‘विवाह संस्था’ की स्थापना (षड्‌यन्त्र) बहुत सोच-समझकर की गयी होगी.
भारतीय विधि-व्यवस्था में भी उत्तराधिकार के लिए ‘वैध संतान’ और ‘वैध संतान’ के लिए ‘वैध विवाह’ होना अनिवार्य है. कानून और न्याय की नज़र में, ‘वैध संतान’ सिर्फ पुरुष की और ‘अवैध’ स्त्री की समझी जाती है. इसीलिए वैध संतान का ‘प्राकृतिक संरक्षक’ पुरुष (पिता) और ‘अवैध’ की संरक्षक स्त्री (माँ) होती है. विवाह संस्था की स्थापना से बाहर पैदा हुए बच्चे ‘नाजायज’, ‘अवैध’, ‘हरामी’ और ‘बास्टर्ड’ कहे-माने जाते हैं. इसलिए पिता की संपत्ति के कानूनी वारिस नहीं हो सकते. हाँ, माँ की सम्पत्ति (अगर हो तो) में बराबर के हकदार होंगे.
इसका मतलब यह हुआ कि जो वैध और कानूनी है, वो पुरुष का और जो अवैध है या गैरकानूनी है, वो स्त्री का. ‘वैध-अवैध’ बच्चों के बीच यही कानूनी भेदभाव (सुरक्षा कवच) ही तो है, जो विश्व-भर में ‘विवाह संस्था’ को अभी तक बनाए-बचाए हुए है. जी हाँ! फिलहाल यही और ऐसे ही दोहरे और चरित्र(हीन) हैं हमारे कानून.
अन्तर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (संयुक्त राष्ट्र) की एक रिपोर्ट के अनुसार “दुनिया की 98 प्रतिशत पूँजी पर पुरुषों का कब्जा है. पुरुषों के बराबर आर्थिक और राजनीतिक सत्ता पाने में औरतों को अभी हज़ार वर्ष और लगेंगे.” पितृसत्तात्मक समाजों के अब तक यह पूँजी पीढ़ी-दर-पीढ़ी पुरुषों को पुत्राधिकार में मिलती रही है, आगे भी मिलती रहेगी. आश्चर्यजनक है कि श्रम के अतिरिक्त मूल्य को ही पूँजी माना जाता है, मगर श्रम की परिभाषा मे घरेलू श्रम या कृषि श्रम शामिल नहीं किया जाता. परिणामस्वरूप आधी दुनिया के श्रम का अतिरिक्त मूल्य यानी पूँजी को बिना हिसाब-किताब के ही परिवार का मुखिया या पुरुष हड़प कर जाते हैं. उत्तराधिकार कानूनों के माध्यम से पूँजी और पूँजी के आधार पर सम्पत्ति, समाज, शिक्षा, न्यायपालिका और राजसत्ता पर मर्दों का कब्ज़ा है. आदिम स्त्री ऐतिहासिक प्रक्रिया से होते हुए ही वर्तमान स्थिति तक पहुँची है. जाहिर है कि पूँजी पर पुत्राधिकार  और विवाह संस्था में कैद स्त्री के सामने पुरुष वर्चस्व के विरुद्ध लड़ाई बहुत लम्बी और पेचीदा है.

क्या दैहिक शुचिता की अवधारणा स्त्री के खिलाफ कोई साजिश है ?
निसंदेह अक्षत योनि की कामना और वैध संतान की सुनिश्चितता के लिए स्त्री देह पर ‘पूर्ण स्वामित्व’ तथा नियंत्रण बनाए रखने की ही साज़िश है- यौन-शुचिता, पवित्रता, सतीत्व, नैतिकता या मर्यादा. तथाकथित महान भारतीय सभ्यता,संस्कृति, धर्म ग्रन्थ और परम्परा हमेशा सिर्फ स्त्रियों को ही शील, संयम, मर्यादा, नैतिकता, आदर्श और देह शुचिता के पाठ पढ़ाती रही है. सहमती से सम्भोग की उम्र सीमा 18 साल तय करने के पीछे भी यही अवधारणा रही है. इन संस्कारों की सीलन अभी भी मौजूद है, सो बदलते समय और समाज में महिलाओं को इससे मुक्त हो कर ही अपनी भूमिका निभानी होगी.

समाज  के सन्दर्भ में शुचितावाद और वर्जनाओं को किस तरह परिभाषित किया जाए।
सच तो यह है कि समाज के सन्दर्भ में “शुचितावाद और वर्जनाओं” को भी उन्ही  मौजूदा दोहरी सामजिक नैतिकता और चरित्रहीन मानसिकता में देखना होगा, जिनके अनुसार यौन संबंध ‘वैवाहिक पार्टनर’ के बीच ही ‘नैतिक’ है, बाकी सब ‘अनैतिक’. हालांकि कानून का ‘नैतिकता’ या ‘अनैतिकता’ से कोई लेना-देना नहीं है. आपसी सहमती से दो बालिग स्त्री-पुरुष के बीच विवाह-पूर्व यौन सम्बन्ध भले ही ‘अनैतिक’ माने-समझे जाते हों, मगर कानूनन कोई अपराध नहीं है.
‘व्यभिचार’ (धारा-497 आई.पी.सी.) सम्बन्धी कानून के अनुसार पुरुष (भले ही विवाहित हो) किसी भी अविवाहित, विधवा या तलाकशुदा स्त्री (स्त्रियों) के साथ सहमती से यौन रिश्ते (आप कहते रहें ‘अनैतिक’) बना सकता है। आपसी सहमती से दूसरे पुरुष की पत्नी के साथ यौन संबंध ‘व्यभिचार’ है (अगर उसके पति की सहमति या मिलीभगत नहीं है) लेकिन यदि पति (मालिक) भी सहमत हो तो, यह कोई अपराध नहीं। यानि आपस में पति-पत्नियाँ बदलना विधान-सम्मत है.
हालांकि ‘व्यभिचार’ एक मायने में स्वेच्छा से ‘सहमती’ नहीं, मानसिक अनुकूलन के बाद ‘बलात्कार’ ही है. पुरुष विवाह संस्था से बाहर जब चाहे ‘व्यभिचार’ करे, मगर पत्नी को पति या उसकी प्रेमिका के विरुद्ध आपराधिक शिकायत करने तक का अधिकार नहीं. इस आधार पर वह  तलाक लेना चाहे तो ले सकती है, बशर्ते कि प्रामाणित कर सके. यही वो कानूनी संरक्षण है जिसकी छत्रछाया में देह व्यापार फल-फूल रहा है. वर्जित समलैंगिक संबंधों को भी अपराध-मुक्त करने के लिए, सुप्रीम कोर्ट से लेकर संसद तक बहस जारी है. कभी भी ‘अध्यादेश’ जारी हो सकता है. कानूनी जाल-जंजाल में, ऐसे और भी बहुत से प्रावधान हैं मगर उन पर फिर कभी…..

बाल विवाह की ‘सामजिक कुप्रथा’ अभी भी जिन्दा है. समाज ही नहीं, बाकायदा कानून-विधि-विधान में फल-फूल रही है. वर्तमान कानून के अनुसार विवाह के लिए लड़के की उम्र 21 साल और लड़की की उम्र 18 साल होनी चाहिए, पर यदि कोई 18 साल से कम उम्र का लड़का, 18 साल से कम उम्र कि लड़की से विवाह करे, तो ना कोई कानूनी जुर्म है और ना कोई सजा. 18 साल से कम उम्र की लड़की से विवाह दंडनीय अपराध है (अगर लड़का 18 साल से बड़ा हो) और सहमती से यौन सम्बन्ध बनाने  की उम्र भी 18 साल है, मगर 15 साल से बड़ी उम्र की अपनी पत्नी से जबरदस्ती यौन सम्बन्ध ‘बलात्कार’ नहीं.
भारतीय कानून-विधान-संविधान पत्नी से ‘बलात्कार का कानूनी लाइसेंस या अधिकार’ और समाज ‘बलात्कार की संस्कृति’ को बढ़ावा देता है. विवाहित स्त्री की स्थिति “घरेलू गुलाम’ या ‘यौन दासी’ से बेहतर नहीं. स्त्री देह शोषण के लिए विवाह और वेश्यावृति की जड़ें तो भारतीय समाज की महान सभ्यता और संस्कृति का स्वर्णिम अध्याय माना जाता है. विवाह संस्था में स्त्री, पति की ‘निजी संपत्ति’ है और वेश्यावृति के प्राचीनतम धंधे में स्त्री ‘सार्वजनिक संपत्ति’. देवदासी से लेकर आधुनिकतम ‘एस्कॉर्ट्स’ तक, यह मर्दों का ‘आनंद बाज़ार’ ही नहीं ‘व्यवसाय भी है. हालांकि वेश्या या ‘काल-गर्ल’ से यौन सम्बन्ध बनाना, भले ही ‘अनैतिक’ बताया जाता है, मगर पुरुष ग्राहक पर कोई अपराध नहीं. पकड़ी गई तो वेश्या को ही जेल जाना होगा.
ऐसे आधे-अधूरे और गड्ढे भरे कानूनों से ना तो ‘बाल विवाह’, ‘बाल तस्करी’, ‘बाल वेश्यावृति’ को रोका जा सकता है और ना ही स्त्री विरोधी हिंसा या यौन हिंसा को. वैधानिक प्रावधानों में अंतर्विरोधी और विसंगतिपूर्ण ‘सुधारवादी मेकअप’ से, स्त्री के विरुद्ध हिंसा कम होने की बजाये बढ़ी है, बढती रही है और बढती रहेगी। ऐसे में सामाजिक नैतिकता और शुचिता या वर्जना को भी नए सिरे से परिभाषित करना होगा.

यदि स्वयं के लिए वर्जनाओं का  निर्धारण  स्वयं स्त्री करे तो क्या हो? 

वर्जनाओं का स्वयं निर्धारण करने वाली शहरी, शिक्षित, साधन संपन्न स्त्री (बागी  नायिकाओं) का निर्णय हमारे सामने है कि “हम देह नहीं सिर्फ देह की (कामुक-उतेजक) छवि बेच रही हैं, जो सचमुच देह बेचने या गुजारे के लिए विवाह बंधन में बंधने से कहीं ज्यादा फायदेमंद और सम्मानजनक है”. सह जीवन में भी वह अपनी स्वतंत्रता, प्रेम, इच्छा, आकांक्षा और सपने को ही अभिव्यक्त कर रही है. विशेषकर आज़ादी के बाद शिक्षा-दीक्षा के कारण स्त्रियाँ निरंतर बदली हैं, बदल रही हैं, मगर यह भी मत भूलें कि देश की अधिकांश ‘आधी आबादी’ अभी भी अशिक्षित, निर्धन और अधिकारहीन हैं….दलित और आदिवासी हैं.
अधिकांश भारतीय पुरुष या ‘मर्द’ अपनी मानसिक बनावट-बुनावट बदलने को तैयार नहीं है. उनके लिए यह सत्ता से भी अधिक, लिंग वर्चस्व की लड़ाई है. राष्ट्रीय स्तर पर हम लोकतांत्रिक देश के नागरिक हैं, जिन्हें संविधान के तहत तमाम मौलिक अधिकार प्राप्त हैं. लेकिन घर में तो अभी भी मुखिया की तानाशाही चलती है, गाँव में ‘खाप’ का हुकुम चलता है और ‘सभ्य समाज’ हरदम स्त्री पर ‘स्टेनगन’ ताने रहता है. समानता के संघर्ष में स्त्रियों का दबाव-तनाव बढ़ता है, तो कुछ ‘कॉस्मेटिक सर्जरी’ की तरह नए विधि-विधान बना दिए जाते हैं और कुछ और सुधारों के सपने दिखा दिए जाते हैं.

विवाह की व्यवस्था में स्त्री  की मनोवैज्ञानिक ,सामाजिक एवं आर्थिक स्थितियां कितनी स्त्री  के पक्ष में  हैं?  
इस संदर्भ में दहेज़, दहेज़ हत्या, हत्या, आत्महत्या, घरेलू हिंसा और मानसिक उत्पीड़न के आंकड़े   बताने-गिनानें की जरूरत नहीं है. जैसा मैंने पहले कहा कि उत्तराधिकार के लिए ‘वैध संतान’ और ‘वैध संतान’ के लिए ‘वैध विवाह’ होना अनिवार्य है. मौजूदा उत्तराधिकार कानून और विवाह व्यवस्था का कारगर विकल्प तलाशे बिना, स्त्री की सामाजिक और आर्थिक स्थिति में कोई आमूल-चूल बदलाव होना असंभव है. स्त्री के लिए विवाह संस्था सचमुच एक ऐसा कारागार है, जिससे भागना नामुमकिन और भागो तो संगीन अपराध. तमाम विधि शास्त्र पुरुषों ने अपने ही   पक्ष में गढ़े है. वैवाहिक पुनर्स्थापना ( Restitution of conjugal rights) से लेकर विवाह विच्छेद तक सारे कानून, स्त्री के खिलाफ इतने हत्यारे शब्दों में रचे-बसे हैं कि सालों कोर्ट-कचहरी करने के बाद भी समझना मुस्किल है.
अंतरजातीय और अंतर्धार्मिक विवाहों में तो हालात और जटिल हैं. भारत की संसद ने ‘विशेष विवाह अधिनियम,1954’ बनाया, जिसमें अलग अलग धर्म से सम्बद्ध दो वयस्कों के विवाह का प्रावधान है, जिसमें जरूरी नहीं कि कोई स्त्री या पुरुष अपना धर्म बदले। मगर इस कानून में आज भी यह प्रावधान है कि अगर कोई अविभाजित हिन्दू परिवार का सदस्य गैर धर्म के व्यक्ति से विवाह करता है, तो विवाह के फ़ौरन बाद उसके अविभाजित हिन्दू परिवार से सारे सम्बन्ध समाप्त माने जायेंगे। संपत्ति में अगर कोई हिस्सा बनता है तो ले लो, लेकिन सदा के लिए दफ़ा हो जाओ। हम (हिन्दू) अपने परिवार में, गैर धर्म की बहू या दामाद को स्वीकार नहीं कर सकते और नहीं करेंगे। भारत बना रहे, ‘धर्म-निरपेक्ष’ और ‘लोकतांत्रिक’ देश।

मातृसत्तात्मक व्यवस्था में विवाह-संस्था क्या अधिक  सुदृढ़ और समर्थ होती। तब  समाज भ्रूण हत्या, दहेज़ हत्या एवं बलात्कार जैसे  अपराधों से कितना मुक्त होता? 
नहीं… मातृसत्तात्मक व्यवस्था में भी पूँजी का नियंत्रण मर्दों के ही हाथ में (रहता) है. बीना अग्रवाल की पुस्तक ‘ए फील्ड ऑफ़ ओन’ पढ़ कर देख लें. इस संदर्भ में यह किताब दक्षिण एशिया के देशों के में महिलाओं की आर्थिक स्थिति के बारे में एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है. सामजिक-आर्थिक-राजनीतिक सत्ता पर, वहाँ भी पुरुषों का ही कब्जा और कानून लागू है. संसद और विधान सभा में मर्दों का बहुमत है, सो वो ऐसा कोई कानून नहीं बनायेंगे, जो उनकी जड़ों में मट्ठा डालने का काम करे. ‘महिला आरक्षण विधेयक’- अभी नहीं, कभी नहीं. सारे कानून मर्दों के हितों और वर्चस्व को बनाये-बचाये रखने वाले ही बने-बनाये गए हैं. हालांकि उपरी तौर पर ढिंढोरा यह पीटा जाता है कि ‘स्त्री सशक्तिकरण’ के लिए, संसद और विधान ने ना जाने कौन-कौन से विधेयक पारित किये है. वास्तविकता यह है कि दांपत्य में यौन संबंधों के बारे में सदियों पुराने कानून, सामंती सोच और सीलन भरे संस्कारों में, कोई बदलाव नहीं हो पा रहा। मालूम नहीं इस सवाल पर सबने, क्यों ‘मौनव्रत’ धारण कर लिया है।
मातृसत्तात्मक व्यवस्था वाले राज्यों में भी अपराधियों का राजनीतिकरण और राजनीति का अपराधीकरण बढ़ गया है. राजनीति में वहां भी, स्त्रियाँ परिधि पर हैं और निर्णायक स्थलों पर उनकी भूमिका गौण ही है. वर्तमान दहशतज़दा माहौल में यौन हिंसा की शिकार औरत की चीख, आखिर कौन और कब सुनेगा? मेरे विचार से स्त्री के दमन, उत्पीड़न और शोषण के खिलाफ़ कानून बनने-बनाने में सबसे बड़ी बाधा है- राजनीति और सत्ता में ‘मर्दवादी’ नेताओं की षड्यंत्रपूर्ण चुप्पी और अपने अधिकारों के प्रति स्त्री आन्दोलन के दिशाहीन भटकाव. 67 साल से दमित, शोषित और पीड़ित आत्माओं की चीत्कार, न संसद को सुनाई देती है और न ही सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच पाती है। इसे ‘आधी दुनिया’ का दुर्भाग्य कहूं या अपने ही पिता-पति और पुत्र का सुनियोजित षड्यंत्र?

सह जीवन की अवधारणा क्या स्त्री के पक्ष में दिखाई देती है। 
सह-जीवन मौजूदा कानूनों के जाल-जंजाल से बचने के विकल्प के तौर पर ही अपनाया      गया लेकिन इसके अपने अंतर्द्वंद और विसंगतियां हैं. विवाह संस्था में सड़ते संबंधों और घुटन की वजह से ही ये नई पगडंडियाँ विकसित हुई हैं. सहजीवन की अवधारणा स्त्री के पक्ष में कितनी कारगर सिद्ध होगी अभी कहना मुश्किल है. यह सही है कि फिलहाल संकट टालने के लिए संसद ने “घरेलू हिंसा अधिनियम” में इसे स्वीकार कर लिया, लेकिन समाज ही नहीं बल्कि सर्वोच्च न्यायालय तक, समय-समय पर विरोधी मुद्रा अपनाता रहता है और सहजीवन में स्त्री और बच्चों की वैधानिक स्थिति, विवाह में पत्नी और बच्चों की वैधानिक स्थिति के बराबर मानने को तैयार नहीं है. इस संदर्भ में आये निर्णय बेहद विवादास्पद है. उपनिवेशों को सम्पूर्ण रूप से मुक्त ना होने देने के हर संभव प्रयास किये जा रहे हैं. धार्मिक, साम्प्रदायिक, जातीय और सांस्कृतिक पहचान के संकट और संघर्ष भी निरंतर गहरा रहे हैं.
धार्मिक आस्थाओं और विश्वास की नींव पर निरंतर बढ़ रहे उन्माद और हिंसक माहौल में सहजीवन का हार्दिक स्वागत कैसे हो सकता है? ‘धर्म का सवाल’ अभी भी बहुत से ‘अगर-मगर’ और ‘किन्तु-परन्तु’ से बुरी तरह घिरा हुआ है। जन्म से लेकर अंतर्धार्मिक विवाह, गुजाराभत्ता, बच्चों की द्त्तकता, संरक्षता, उत्तराधिकार, नौकरियों में आरक्षण और धर्मांतरण तक, धर्म के बन्धनों से मुक्ति के यक्ष प्रश्न समाप्त नहीं हुए। दरअसल ऐसे ‘विद्रोही स्वर’ को लेकर संविधान और समाज के बीच पसरे अन्तर्विरोध और विसंगतियां, रोज़ नए भेष-भूषा में नज़र आयेंगे। सहजीवन में भी रही या रह रही स्त्री के विरुद्ध हिंसा, यौन हिंसा, उत्पीड़न, शोषण और अत्याचार किसी भी मायने में कम होने की बजाय बढ़ा ही है. ऐसे में स्त्री पहले से अधिक अकेली खड़ी दिखाई देती है, क्योंकि घर छोड़ने के बाद परिवार भी साथ नहीं देता.
संयुँक्त परिवार लगभग टूट चुके हैं, एकल परिवार गंभीर संकट में हैं, युवा रक्त सहजीवन में नव परिवार और प्रेम की सहज अभिव्यक्ति के साथ अपने सुखद भविष्य या विकल्प की खोज में लगा है. कारण स्पष्ट है कि विवाह और तलाक़ सम्बन्धी एक तरफ़ा कानून स्त्री को सुरक्षा कम देते हैं, भयभीत ज्यादा करते हैं. उम्र से लम्बी, उबाऊ-थकाऊ और घर बिकाऊ ‘कोर्ट-कचहरी’ से हैरान-परेशान स्त्री-पुरुष, निश्चित रूप से एक नए समाज की संकल्पना करेंगे…कर रहे हैं. यहीं से व्यक्ति, परिवार और समाज के बीच आपसी टकराहट शुरू होती है, जो सांस्कृतिक क्रांति को जन्म देगी.
8. साथ होकर भी पुरुष एवं स्त्री की स्वतंत्र परिधि क्या है।
कैसे बताऊं- समझाऊं कि जिस समाज में आये दिन (दलित) महिलाओं को कहीं न कहीं निर्वस्त्र घुमाया या जिंदा जलाया जाता हो, धमकाया जाता हो, जबरन वेश्या बनाया जाता हो, धर्म के नाम पर बहलाया- फुसलाया जाता हो, बेटियों को गर्भ में ही मरवाया जाता हो, भेड़-बकरियों की तरह खरीदा-बेचा जाता हो और  खाप पंचायतों के आदेश-अध्यादेश पर प्रेमी युगलों को पेड़ों पर लटकाया जाता हो- वहाँ पुरुष और स्त्री की स्वतंत्र परिधि क्या हो सकती है.
हां! शिक्षित-समृद्ध-साधन-सम्पन्न और कुछ अति-आधुनिक शहरी औरतों को थोड़ा आजाद  माना-समझा जा सकता है, जिनकी पहुंच ‘ऊपर तक’ है. मगर देश की उन आम औरतों का क्या, जिनकी व्यथा-कथा सुनने वाला कोई नहीं. अफसोस कि अधिकांश प्रतिभाशाली और क्रांतिकारी संभावनाओं को,  सत्ता संस्थानों ने खरीद लिया हैं या राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय पूंजी की गुलाम या पेशेवर दलाल बना दिया हैं.
लेकिन धीरे-धीरे स्त्री ने इसे सड़क से संसद और सर्वोच्च अदालत तक, भरपूर चुनौती देते हुए तोड़ना शुरू कर दिया है. उसने अपने आप को “मर्दों के पाँव की जूती”, बनने-मानने से मना कर दिया है. तमाम अवरोधों और सीमाओं के बावजूद, वह “स्त्री उपेक्षिता” नहीं, बल्कि खुद अपने आप को तलाशती-तराशती रही है. पुरुषों की “यौन राजनीती” के चक्रव्यूह को भेद ध्वस्त करती रही है. स्त्री- देह, धरती या योनि नहीं है, इसलिए ‘वसुंधरा’ और ‘बीज’ के अंतर्संबंधों की प्रक्रति, नए सिरे से गढ़ी जा रही है. यौन शोषण-उत्पीड़न और दमन के खिलाफ़ लामबंद हो, पुरजोर विरोध (विद्रोह) करती रही है. भ्रूण हत्या, दहेज़ हत्या, हत्या, यौन हिंसा, घरेलू-हिंसा से लेकर यौन शोषण और अन्याय के विरुद्ध, इंसाफ़ की तलाश में निर्णायक स्त्री-संघर्ष लगातार मुखर होता जा रहा है. ‘चुप्पी का षड्यंत्र’ या “षड्यंत्र की चुप्पी’ निरंतर टूट-फूट रही है. अपने कानूनी और मानवीय अधिकारों के प्रति सचेत-सजग और जागरूक होती ‘मानुषी’ सिर्फ अपने अस्तित्व की ही नहीं, बल्कि अस्मिता की भी लड़ाई लड़ती रही है.
यह सच है कि जैसे-जैसे स्त्री का विरोध-विद्रोह बढ़ रहा है, वैसे-वैसे पुरुष अधिक हिंसक और हत्यारा होता जा रहा है. स्त्री के विरुद्ध पुरुष जितना हिंसक और हत्यारा हो रहा है, स्त्री का “घरे-बाहिरे” प्रतिरोध-प्रतिशोध भी उतना ही बढ़ रहा है. मैं इसे ‘वस्तु से व्यक्ति बनती’ औरतों की “मौन क्रांति” मानता हूँ, जो सतह पर कम मगर समाज में भीतर-ही-भीतर ज्वालामुखी की तरह फैल रही है. कहना कठिन है कि संरचना की इस ऐतिहासिक प्रक्रिया में ज्वालामुखी, कब-कहाँ और कैसे नज़र आएगा. ‘स्त्री मुक्ति का सपना’, हर स्तर पर बराबरी और इन्साफ का ही सपना है.