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मौत तक जाने का रास्ता खुद बनाया पहले उसने

सुधा अरोड़ा

सुधा अरोड़ा सुप्रसिद्ध कथाकार और विचारक हैं. सम्पर्क : 1702 , सॉलिटेअर , डेल्फी के सामने , हीरानंदानी गार्डेन्स , पवई , मुंबई – 400 076
फोन – 022 4005 7872 / 097574 94505 / 090043 87272.

( पिछले दिनों स्त्रीकाल  द्वारा शर्मिला रेगे को सम्मानित किये जाने के अवसर पर सुधा अरोड़ा ने उनके लिए लिखी अपनी कविता पढ़कर उपस्थित लोगों को भाव विभोर कर दिया था . पाठकों के लिए सुधा जी की कविता  ) 

महीना भर पहले तुमने हमसे विदा ली
बहुत सलीके से
जैसे लंबी यात्रा पर निकलने से पहले
कोई आंख भर देखकर
गले मिलकर विदा लेता है ….
जैसे जाने से पहले कोई पलकों को
बंद कर देखने से बरज देता है …..
पर क्यों है ऐसा कि तुम जाकर भी गयी नहीं
हमारे भीतर सांस ले रही हो अब तक !

क्या इसलिये
कि तुमने मौत की ओर भीे वैसे ही हाथ बढ़ाया
जैसे हमारी ओर दोस्ती का हाथ बढ़ाया था एक दिन
और फिर
हमारे सारे दुःखों को अपने में समेट लिया
हमें तो पता भी नहीं चला
कि वे बड़े बड़े झुमके जो तुमने कानों में पहने थे
और वह मुड़ी हुई तार वाली नथनी
जो हमें भरमा रही थी
दरअसल हमारी मुसीबतें थीं
जिसे तुमने गिलट के आभूषणों की तरह पहन लिया था
और हमें अपने दुखों से आज़ाद कर दिया था।

तुमने हम सब के हिस्से की लड़ाई को अपने पर लिया
और इतिहास में उनके सूत्र तलाशे
हमें बताया
कि देखो, यह जगह तुम्हारी होनी चाहिये थी
जो तुमसे छीन ली गई
कि अपने हक को पहचानो और लड़ो
और अपनी ज़मीन से उखड़कर
तुम हमारे लिये जगह बनाने में जुट गयी
जैसे ईंट दर ईंट सजाता है मजदूर
और पक्की नींव तैयार कर चल देता है आगे
जैसे फूल गिरने से पहले साथ की टहनी पर
एक बंद कली को भर आंख देख जाता है……
जैसे कोई राजमिस्त्री अपना टाट का परदा हटाकर
अपने औजार साधता है
और दूसरे का घर बनाने में जुट जाता है ।

तुमने परवाह नहीं की अपने घरौंदे की
अपने टाट के परदे की
जो लगातार बारिश में, अंधड़ में छीज रहा था
अपनी भी परवाह नहीं की तुमने ……
नहीं सोचा
कि एक देह की प्रकृति में छह घंटे की नींद भी होती है
और कुछ पल का सुकून भी …..
अपने को उन सारी ज़रूरतों से महरूम रखा
जो सांस को चलाये रखने के काम आती हैं
क्योंकि तुम तो हमारी सांसों को
सम पर लाने में जुटी थीं ।

समय से पहले ही एक हड़बड़ी में
तुमने अपने सारे कामों को अंजाम दिया
और इस आपाधापी में समय से पहले ही थक भी गईं
फिर डूबते सूरज की लालिमा पूरे समंदर पर बिखेरते हुए
तुमने एक गुड़ुप सी डुबकी लगानी चाही अनंत में
और उसका ऐलान भी किया
कि खूब सुकून भरी जि़ंदगी भरपूर जी ली मैंने
कि बस, अब जाना चाहती हूं
वह देखो, तुम्हारे लिये इतना उजास ,
इतनी सारी लालिमा छोड़े जा रही हूं
जो डूब नहीं रही, उग रही है तुम सबके अंदर !

हां, सुनो
उगी तो है
पर इसमें तुम्हारा रेशा रेशा बिखरा है
हम उसे हाथों में भर कर अहद लेते हैं
अपने भीतर तुम्हें समेटेंगे
और इस बार तुम्हें थकने नहीं देंगे
इतनी आसानी से जा नहीं पाओगी अब !
हमारे जाने के बाद भी रहोगी
इतिहास के हर मोड़ पर
क्योंकि यही इतिहास उस आगत को बनायेगा
जिसे बनाने का हमने मिलकर सपना देखा था

13 अगस्त 2013

जाति, जेंडर और क्लास दलित स्त्रीवाद की धूरि

( काफी दिनों तक स्त्रीकाल का अपडेट नहीं हुआ. हम फिर से सक्रिय हैं. पुनः शुरू करते हुए स्त्रीकाल, साउथ एशिया वीमेन इन मीडिया, सेंट्रल यूनिवर्सिटी आॅफ बिहार एवं सीआईआईएल , रेनेसां , ऑक्सफैम के द्वारा आयोजित गया , बिहार में दो दिवसीय सेमिनार और कार्यशाला की अरुण नारायण के द्वारा रपट ) 
अरुण नारायण
वर्ष 2014 का ‘सावित्री बाई फुले वैचारिकी सम्मान’ शर्मिला रेगे को

 

जातिवाद के विरोध में हर समय में अपने
यहां लड़ाई लड़ी गईं।
सबसे पहले बुद्ध ने यह लड़ाई लड़ी। फिर कर्नाटक में बशेश्वर
ने, ज्योतिबा फुले ने 18वीं सदी में और डा. भीमराव आंबेडकर ने 19वीं सदी में इसके खिलाफ
आंदोलन किया। इन सब की जाति और वर्ग अलग-अलग थे। बुद्ध क्षत्रीय कुल से थे बशेश्वर
ब्राहमण , फूले की पृष्ठभूमि व्यापार से थी और आंबेडकर के
महार जाति के पिता सेना में सूबेदार थे। जाति व्यवस्था और गुलामी पर प्रहार का ऐसा
उदाहरण विश्व में कहीं नहीं मिलता।’ ये बातें दलित
स्त्रीवादी विमर्श्कार  सुजाता पारमिता ने
कही। गया के रेनेसां आडीटोरियम में  स्त्रीकाल, साउथ एशिया वीमेन इन मीडिया, सेंट्रल यूनिवर्सिटी आॅफ बिहार एवं
सीआईआईएल द्वारा पिछले दिनों आयोजित दो दिवसीय सेमिनार/ कार्यशाला में बंगाल, आसाम, दिल्ली, महाराष्ट,
बिहार, झारखंड आदि कई भागों से आए बुद्धिजीवियों
ने मीडिया, समाज, राजनीति साहित्य, और  सिनेमा में स्त्री की अभिव्यक्ति और भागीदारी को लेकर
चार सत्रों में विमर्श किया। नाटक और डाक्यूमेंटरी फिल्मों का प्रदर्शन भी इस विमर्श का ही एक हिस्सा रहे। इस आयोजन में
गैर सरकारी संगठन ओक्सफैम का भी सहभाग था.

सुजाता ने कहा कि ‘ बुद्ध ने ब्राहणवाद पर
सबसे पहला और कारगर चोट किया। उन्होंने अपने संघ के दरवाजे दलितों और स्त्रियों के लिए खोल दिए। यह पहली दफा हुआ
कि इसके फलस्वरूप बड़ी संख्या में स्त्रियों ने घर छोड़े, जिनके
पति थे, बच्चे थे उन्होंने  भी। संघ में कोई जाति या वर्ग नहीं था। ऐसे
माहौल में बहुत अच्छी कविता का जन्म हुआ-थेरीगाथा के रूप में।

सावित्री बाई फुले वैचारिकी सम्मान,
2014
 
प्रसिद्ध स्त्रीवादी विदुषी दिवंगत शर्मिला
रेगे को ‘ स्त्रीकाल’  की ओर से सावित्री बाई फुले वैचारिकी सम्मान, 2014 उनकी
संपूर्ण रचनात्मक वैचारिकी को लक्षित करते हुए उनकी किताब ‘  मैडनेस
ऑफ़ मनु : बी आर आम्बेडकरस राइटिंग ऑन ब्राह्मनिकल पैट्रिआर्की’ के लिए दिया गया। सुधा अरोड़ा ने रेगे की ओर से यह सम्मान ग्रहण किया। उन्होंने
रेगे को समर्पित एक भी कविता सुनाई। शर्मिला रेगे की चर्चा करते हुए पत्रिका के
संपादक संजीव चंदन ने कहा कि रेगे  दलित
स्त्रीवाद की सैद्धांतिकी गढ़ने में उनक काम बेहद महत्वपूर्ण रहा है।. इस अवसर पर
सुधा अरोडा ने रेगे की स्मृति को समर्पित
एक कविता का पाठ किया। रेगे को स्म्मान का निर्णय अर्चना वर्मा , अरविंद जैन , अनिता
भारती ,हेमलता माहिश्वर,
परमिला आम्बेकर और बजरंग बिहारी
तिवारी की सद्स्यता वाले निरणायक मंडल ने लिया था. हर वर्ष स्त्रीवादी वैचारिकी को
दिए जाने वाले इस सम्मान की राशि स्त्रीवादी विचारक अरविंद जैन के द्वारा दी
जायेगी, इस सम्मान की योजना उनकी ही प्रेरणा से बनी है .
जाति और जेंडर

 

 
साहित्य, कला,
और आज की वैचारिकी में स्त्रियां कहां खड़ी हैं उनकी क्या स्थिति है इस
सवाल को कवितेंद्र इंदु, सुनिता गुप्ता,
परिमला आंबेकर, कर्मानंद आर्य,
अनुज लुगुन,शातिभूषण और उषाकिरण खान ने संबोधित किया। कवितेंद्र इंदु ने सवाल किया कि ‘ दलित और
दलित स्त्री के अलग-अलग उत्पीड़न हैं या ये एक विराट जातीय तंत्र की समस्या है?
और कहा कि जाति जेंडर के बिना भी वजूद में रही है। दोनों ही तरह की
समस्याओं में जाति साथ-साथ काम करती रही है। स्त्री पराधीनता के बिना भी जाति को
बनाए रखना संभव था। जब हम जाति से जंेडर के सवालों को अलग करते हैं तो उत्पीड़न के
तंत्र को मदद मिलती है। उन्होंने कहा कि दलित स्त्रीवाद ने जाति जेंडर, और क्लास तीनों सवालों को उठाया है। उसका मिजाज इन्क्लूसिव रहा है।’  कवितेंद्र ने कहा कि ‘ दलित स्त्री लेखन महज वही नहीं जो सिर्फ दलित स्त्रियां
लिखें। बल्कि वह लेखन भी है जो उनके दृष्टिकोण के साथ लिखा जाए।’

युवा विमर्शकार  सुनीता गुप्ता ने कहा कि हिंदी साहित्येतिहास
लेखन में पितृसता की दखल रही है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल, नागेंद्र
और नागरी प्रचारिणी के वृहत इतिहास से लेकर परमानंद श्रीवास्तव और नंदकिशोर नवल की
आलोचना में स्त्रियों के प्रति उपेक्षा का भाव रहा है। इन सब की दृस्टि स्त्री
समाज के अनुकूल नहीं रही है। सुमन राजे का ‘हिंदी
साहित्य का आधा इतिहास’ या रेखा काष्तवार, रोहिणी
अग्रवाल,शालिनी माथुर और अनामिका की आलोचनाएं हमें इस दिशा
में आश्व्स्त करने वाली हैं। इनका लेखन आलोचना के सन्नाटे को तोड़ रहा है।

लेखक कर्मानंद आर्य ने अपनी कविता ‘इस बार नहीं बेटी’ के पाठ से अपनी बात
आरंभ की।
उन्होंने प्रतिमानीकरण की चर्चा करते हुए कहा कि निरंतर चलने वाले मूल्य
स्थापित हो जाते हैं, दूसरे शुरू हो जाते हैं। उन्होंने कहा कि
जो पाठ्यक्रमों में नहीं हैं, जिनका प्रतिमानीकरण
नहीं हुआ उनपर विचार करने की जरूरत है। प्रो. परिमला आंबेडकर ने कहा कि स्त्रियों
के जन्म के साथ ही उसके जच्चा घर में आते ही प्रतिमानीकरण की प्रक्रिया शरू हो
जाती है। उन्होंने कहा कि बौद्धिकता और भावनात्मकता-ये दो पहलू हैं समाज के।
स्त्री बौद्धिकता को अभिव्यक्त करना चाहती है तो पितृसता हमेशा उसे इससे महरूम
रखना चाहती है। कवि अनुज लुगुन ने कहा कि आदिवासी लड़कियों का वैसा शोषण  अपने यहां नहीं रहा जैसे हिंदू या मुस्लिम
समाजों में रहा है। उन्होंने सवाल उठाए कि आज क्यों कोई युवक किसी स्त्री पर एसिड
डाल देता है? इसलिए कि इन समाजों ने आदिवासी समाज की
तरह ऐसी संस्थाएं नहीं बनाई जहां लड़के-लड़कियां मिल सकें। आदिवासी समाज में घोटिल,
खगोडि़या और गीतिकोड़ा-जैसी संस्थाएं मौजूद रही हैं। यह दुखद है कि इन
संस्थाओं को यौन पोसन करने वाली संस्था के रूप में दुष्प्रचारित  किया गया।

युवा विचारक शांति भूषण ने कहा कि भारतीय समाज की
संरचना में
जाति एक बड़ा फैैक्टर रही  है।
आदिवासी समाज आज भी जल, जंगल और जमीन जैसी अस्तित्व और अस्मिता की
लड़ाई लड़ रहे हैं। उनके यहां ग्रीनहंट, सलवा जुडुम और
अफस्पा है। जो काम पुरोहित वर्ग करता रहा है वहां वही काम पुलिस और आर्मी कर रही
है।
मीडिया और फिल्म माध्यम में स्त्री की अभिव्यक्ति भागीदारी के सवाल को राणा अयूब, नीधीश त्यागी,
अनंदिता दास, अजिथा मेनन, स्वाति
भट्टाचार्य और मो. गन्नी ने वस्तुपरक ढंग से अलगाया। पत्रकारिता की दुनिया में
स्त्रियों के साथ किस तरह दोहरे नागरिक होने का अहसास कराया जाता है, इसे राणा अयूब
ने अपने ही अनुभवों की आपबीती के द्वारा बतलाया। कहा कि आज इन्वेस्टीगेटिव
जर्नलिज्म के लिए जिस तरह का काम रूलर इलाके में नई लड़कियां कर रही हैं वह कोई
नहीं कर रहा। वह हमारे समय की अनसंग हीरों हैं। स्वाति भट्टाचार्य ने माना कि
जनसंख्या केे अनुपात में मीडिया में स्त्रियों की उपस्थिति बहुत निराषापूर्ण है।
उन्होंने कहा कि कोलकाता में महज 10 प्रतिशत महिला पत्रकार हैं। स्त्री हिंसा की
बढ़ती प्रवृति का कारण हमारे पितृसमाज के सामंती ढांचे हैं। मीडिया के अंदर स्त्री
के प्रति कई तरह के दुराग्रह हैं। वहां एक रेप केस को दूसरे से कैसे अलग करके
दिखलाया जाए, ऐसा हर दिन हो रहा है।

सामाजिक कार्यकर्ता अमृता ने
टीवी में आ रहे स्त्री संबंधी विज्ञापनों की संकीर्णता को टारगेट करते हुए कहा कि
लड़किया जितनी ज्यादा दिखेंगी, निकलेंगी, जितनी ज्यादा संख्या होगी उनकी -वह उतनी ही सुरक्षित होंगी। अंजिता मेनन
ने कहा कि मुख्यधारा की मीडिया महिला सवालों को कवर ही नहीं करते। टीवी को हर क्षण
नई स्टोरी चाहिए। उन्होंने दिल्ली में हुए निर्भया कांड की चर्चा करते हुए बतलाया
कि चूंकि इसके विरोध में दिल्ली में एक साथ कई तरह की प्रतिरोधी आवाजें मुखर थीं,
उनके पास हर पल नए विजुअल्स थे इसलिए मीडिया ने दिखलया कि ये केस हमारे
लिए भी महत्वपूर्ण है। नीधीश त्यागी ने कहा कि गुजराती में जब मैंने अखबार निकाला
तो वहां न्यूज रूम में लड़कियां नहीं होती थीं। लोग यह मानने को तैयार ही नहीं कि
स्त्रियां यह काम करें। उन्हें फीचर में काम दिया जाता था। खाना पकाना और श्रृंगार
तक ही उनकी दुनिया मानी जाती थी। हमने वहां ट्रेनी लड़कियों को गुजराती मंे न्यूज
रूम में लाया। उन्होंने कहा कि हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि मीडिया एक उद्योग भी
है। सोषल मीडिया की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि हम सब मीडिया हंै इस बात का
अहसास सोषल मीडिया ने कराया है। बुरी से बुरी बात भी इस खतरनाक समय में इसी माध्यम
से कही जा सकती हैं। आनंदिता दास ने कहा कि मैं जिस नाॅर्थ ईस्ट से आती हूं वह
बहुत ही असुरक्षित इलाका है। उसके बारे में सो काॅल्ड नेशनल मीडिया कुछ लिखता ही
नहीं। वहां पर हम लोगों को स्पेस मिलना बहुत कठिन है। मनोरमा देवी रेप केस को इस
मीडिया में तब जगह मिली जब वहां की महिलाएं नग्न प्रदर्शन  में उतरीं।फिल्म निर्देशक मो. गन्नी दर्शकों से
अनौपारिक ढंग से मुखातिब हुए। कहा कि हिंदी में स्त्री प्रधान फिल्मों और अभिनेत्रियों
की संख्या बहुत है, हर पहलू पर है। 25-30 कमाल की महिलाएं हैं
जिन्हांेने जन सरोकार की फिल्में बनाई हैं। उन्होंने उतर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में
हुए दंगे की चर्चा करते हुए बतलाया कि उसपर फिल्म बनाते वक्त वहां की लड़कियों ने
कहा कि हमें दिक्कतें अपने घरों से जितनी है उतनी मुसलमानों से नहीं। उन्हांेने
कहा कि हमारी फिल्में जब डेढ़ हजार-ढाई हजार में बननी
शुरू होगी तब उसमें आपकी दिक्कत, आपकी दुनियाएं वहां
रिफलेक्ट होंगी।

समाज और राजनीति में महिलाओं की स्थिति
बहुत कुछ बदली है
और बहुत कुछ बदले जाने की जरूरत है। इस सवाल को सुनीता, रामपरी, सुधा अरोड़ा और निवेदिता आदि ने अपने
तर्कपूर्ण दलिलों से विचारोतेजक विमर्श  में तब्दील किया। कामायनी ने समाज में
लैगिंक असमानता से जुड़े कई अनुभव साझा किए। उतर बिहार के अनुभवों की चर्चा करते
हुए कहा कि वहां सामाजिक राजनैतिक संघर्सों में स्त्रियों की भरपूर भागीदारी रही।
लेकिन जब लाभ की बारी आई तो 98 प्रतिशत पदों पर पुरूष आ गए। यह परिदृश्य कोई नया
नहीं है। आयडवा की बिहार अध्यक्ष रामपरी ने मजदूर आंदोलन की चर्चा के साथ ही महिला आरक्षण बिल का जिक्र
करते हुए कहा कि यह दुखद है कि समाजवादी विचार वाले नेताओं ने इसे अगड़े और पिछड़े
वर्ग की पेंच पैदा कर पास नहीं होने दिया। उन्होेंने कहा कि राज्य विधान मंडलों और
संसद में आज भी महिलाओं की भागीदारी महज 10-11 प्रतिशत तक ही सीमित है।

समाज की जड़ों में धर्म, परंपरा और प्रथा के नाम पर जो स्त्री विभेद कायम रहे हैं उसे सुनंदा
दीक्षित, हेमलता माहेश्वर,  नीलिमा सिन्हा,
कौशल पंवार, कमलानंद झा और शैलेंद्र सिंह ने चिह्ति
किया। सुनंदा दीक्षित ने कहा कि जेंडर जस्टिस शुरू होती है हमारे घरों से। क्या
दलित और क्या आदिवासी सब समझते हैं कि बराबरी का अधिकार लेना कितना मुश्किल है, क्योंकि  वह बहुत ताकतवर से लेनी है। उन्होंने कहा कि गैर बराबरी हमारे
खून में, परवरिश  में डाली जाती है। रोजमर्रे के सामाजिक
जीवन में हमारे जो रिएक्षन होते हैं वह भी हमारी इस धकियानूसी प्रवृति को सामने
लाती है। आज मैं चमारिनी लग रही हूं या जंगलिया की तरह हूं जैसी प्रतिक्रियाएं
सामंती पितृसोच को प्रतिबिम्बित करती हैं। प्रो. हेमलता माहेश्वर  ने कहा कि आज 25
चैनल बाबाओं के नाम के चल रहे हैं। वे किस तरह की दकियानूसी सोच को सामने ला रहे हैं
यह किसी से छुपा नहीं है। उन्हांेने सवाल उठाए कि सारा धैर्य स्त्रियों के हिस्से
ऐसा क्यों? उन्होंने कहा कि अपने यहां एक बहस चली थी
कि जो केप्ट होगी उसका सारा भार पुरूष वहन करेगा। इस सवाल को लेकर महाराष्ट्र मेें
बड़ा आंदोलन हुआ। कुमुद पावड़े ने कहा कि इसका मतलब केप्ट को संवैधानिक दर्जा देना
होगा। इस सत्र में ओम सुधा, वंदना मुन्ना झा,
सुमेधा विद्युत प्रभा और आर.के. राजन ने भी अपने हस्तक्षेप से विचारोतेजक
बनाया।

विमर्श सत्र के बाद परवेज अख्तर निर्देशित
और मोना झा के एकल अभिनय पर आधारित नाटक ‘एक अकेली औरत’
का मंचन हुआ। इसमें स्त्री हिंसा की कई परतों  को सशक्त ढंग से सामने लाया गया। मोना का अभिनय  प्रभावश्याली था। मो. गन्नी निर्देषित ‘कैदी’ बाल मनोविज्ञान की तहकीकात करने वाली
विमर्ष प्रधान फिल्म थी। गन्नी की दूसरी फिल्म में एक वृहत कोलाज षैली में मिथकों,
प्रथाओं, परंपराओं और पितृसता द्वार विभेद के
बहुआयामी जटिल तंतुओं का उद््भेदन किया गया।
गोष्ठी का पटाक्षेप करते हुए स्त्रीकाल के
संयोजक संजीव चंदन ने कहा , ‘हम एक आजाद मुल्क
और संविधान निर्देषित समाज में जी रहे हैं। जिसे बनाने का पूरा श्रेय बाबा साहब
भीम राव आंबेडकर को जाता है। हमें उनके प्रति पूरी विनम्रता के साथ आभारी होना
चाहिए। हम स्त्री स्वाधीनता की ओर चार कदम बढे हैं , इसीलिए प्रचलित व्यव्स्था क्रूर प्रतिकार कर रही है. शेफाली फ्रोस्ट के मीरा और फैज अहमद फैज
के गीतों के सुमधुर गायन से कार्यक्रम का प्रारंभ और समापन हुआ।
संपर्कः अरुण नारायण द्वारा रामेश्वर  प्रसाद चौधरी, साकेतपुरी पो बी.भी. कालेज, राजाबाजार, पटना 800014 मोबाईल 8292253306

स्त्री के रंगों की दुनिया

परिमला अंबेकर
कलाकारों की कल्पना में कैद स्त्री, कलाकारों के सौन्दर्यबोध की कसौटी स्त्री, कलाकारों के रंगों के लिए कैनवास पर वस्तू बनकर बिखरती स्त्री, सदियों से अपने आप को रंग, शब्द, रूपों के सम्मुख परोसती आयी स्त्री, गढी

गढायी मिथक को तोडकर, खुद रंग की तूली को अपने हाथ जब लेती है तो नया इतिहास ही कैनवास पर बिछलने लगता है। रंगों को अपने हिसाब से वस्तु के चुनाव का छूट मिलने लगता है। स्त्री संबंधी, कल्पित मानित स्वरूप, अपने बदलाव के लिए जब छटपटाने लगें, तब स्त्री की मानसिकता अपने ही ढंग की स्पेस को पाने के लिए,कैनवास पर अपने ही अंदाज में लकीरों एवं रंगों में ढालने के लिए सम्मुख आती है। स्त्री कलाकार के हाथों ने, याने वुमेन आर्टिस्टों ने,  जब से रंग की तूली संभालना प्रारंभ किया तबसे परंपरागत, पुरूष केन्द्रित कला और सौन्दर्य बोध के मानदंड, अपने आप टूटने लगे हैं, बखरने लगे हैं ।

परंपरा का कैनवास, जिस पुरूष सत्तायी दृष्टिकोण के रंगों और लकीरों को आकार स्वरूप देते आया था, स्त्री की कला में प्रवेश ने, उन सारे पुरूषप्रधान मानसिकता रूपी कलात्मक कसौटियों को अपने ही अंदाज में पुनः परिभाषित करने लगा और प्रश्नांकित  भी करने लगा। चित्रकला में स्त्री के प्रवेश से जो नये सजे सजे कैनवास उभरने लगे, वे ही आज के स्त्री कलाकारिता के नये अंदाजो बयाॅं हैं !!, उसके अपने सुख दुख हैं, उसके अपने सपने हैं उसके अपने होने हैं। अर्थात वुमेन आर्ट, वह दुनिया है जहाॅं स्त्री अपनी ही आॅंखों से दुनिया देखती है, परखती है, अपनी संवेदना और सोच को लकीरों में उभारकर उसमें अपने ही अंदाज में, रंग भरती है। उसकी कला वह सच्चाई है, जिसे खुद उसका ज़मीर कल्पना और मिथक में बंधकर कैनवास पर फैलता है।
उसका आर्ट वह यथार्थ है, जिसे स्वयं उसकी संवेदना, उसका आंतरिक संघर्ष, उसके अपने विश्वास मान्यताएॅं, कैनवास पर के रूपाकार को तराशते हैं, उसमें रंगों का जीवन भरते हैं । वुमन आर्ट यानी  जीवन का वह इतिहास जो अब तक लिखा नहीं गया है, मनुष्य संसार का वह वर्तमान, जिसमें पुरूष के साथ साथ स्त्री भी अपना जीवन जीती है साथ साथ भी और साथ रहित भी याने स्वतंत्र और स्वछंद भी । और वुमन आर्ट याने मानवीय जीवन का वह भविष्य है जिसमें स्वतंत्रता के स्वप्न बिखरें है, स्वछंदता के छंद खिले हैं । मुक्ति के गीत गाते हुए, प्रगति के सुर मिलाते हुए…मनुष्य मात्र के ।

चित्रकला में स्त्री के प्रवेश ने कला को जेंडर पहचान दिलाया है और निस्संदेह कला को एक प्रत्येक दृष्टि और आधार भी प्रदान कराता है। स्त्री केवल देह बनकर जहाॅं पुरूष के कलात्मक विज़न के कैनवास पर वस्तूगत आधार की लकीरों को अपने जिस्म के कोरों और आकारों में उभरता हुआ महसूस करती थी, वही स्त्री अपनी कला की तूली को स्वयं अपने हाथ पकडकर, अपनी आर्ट द्वारा, देह के परे भी अपने अस्तित्व के होने की उसकी अपनी निजी अस्मिता के वस्तुता के तात्पर्य को प्रस्तुत करने लगी। साथ ही अपनी कला में जीवन के उन बारीकियों को भी उभारने लगी जो पुरूष दृष्टि से वंचित रहे थे, या यूॅं भी कह सकते हैं कि जो अबतलक पुरूष संवेदना के चौखटें से बाहर पडते रहे थे ।

यॅूं तो भारतीय संदर्भ के, पुराण कथाओं में, इतिहास प्रसिद्ध प्रेम कथाओं में नायिका के हाथों रंग की तूली का होना, और वह अपनी प्रेमी की कल्पना में डूबी होकर, रूमानी कलाओं के चित्रों को और चित्र परिसर को उकेरने के दृश्य वर्णन मिलते जरूर हैं । यानी, प्राचीन काल से, चित्रकला स्त्री के सोलह कलाओं में एक बनकर प्रस्तुती पाते आती रही है। लेकिन यही चित्रकला, स्त्री के जीवन में, गुण से भी आगे बढकर, एक प्रोफेशन के रूप प्रवेश पाने का इतिहास, आधुनिक युग की देन है । यूॅं तो लोक कलाओं का इतिहास रचा ही है स्त्री के हाथों ने। लेकिन स्त्री का एक कलाकार बनकर पुरूष की तरह उभरने का इतिहास बहुत पीछे का नहीं है । भारत में लगभग स्वतंत्रता पूर्व के संदर्भ टैगोर के परिवार में, अपने भाइयों के साथ अपनी चित्रकला को रखने का धैर्य दिखाया था सुनयना देवी ने । उसके बाद हम कुछाध नामेां को गिना तो सकते हैं जैसे अमृता शेरगिल्, अंजोली इला मेनन्, अर्पिता सिंग, नीलिमा शेख … इत्यादि ।

लेकिन लगभग १९७० के बाद, स्त्रियों का दखल चित्रकला में विशेषतया देखा जा सकता है। स्त्री कलाकार भी पुरूषों की तरह एकल शो करने का धैर्य दिखाने लगी, कला समीक्षक भी स्त्री की कला को विशेष अंदाज में देखने परखने लगे , उसकी प्रत्येकता को पहेचानने लगे, और इसी संदर्भ में हम कुछाध स्त्री साहित्यकार एवं कवियों को भी देख सकते हैं जिन्होनें, अपनी शब्द साधना के साथ साथ रंगों और तूली के माध्यम से भी अपनी भावना एवं विचारों को अभिव्यक्ति दी है। इस कोटी के कला साधकों में हम महादेवी वर्मा का नाम बडे ही विश्वास के साथ ले सकते हैं । बहुत सी स्त्रियों का हम, आर्ट कैंपों को, गैलरियों को संस्थाओं को चलाने का अद्भुत योग्यता और प्रतिबद्धता को रखता हुआ देख सकते हैं ।

स्वतंत्र, व्यक्तिगत चित्रसाधना के साथ साथ आज बतौर शिखा और शैक्षणिक कोर्सों द्वारा स्त्रियों का कला के क्षेत्र में अपना हुनर आजमाना,उत्तर आधुनिक युग की पहेचान बन रही है । शैक्षणिक संस्थाएॅं, काॅलेज और विश्वविद्यालयों में पुरूष कलाकारों के साथ स्त्री को भी अपनी कला को, शिष्टबद्ध अभ्यास और ट्रेनिंग के माध्यम से निखारने का, हर आधुनिक जीवन के माॅंग के मुताबिक अपनी चित्रगत अभिव्यक्ति को शिद्धत से संवारने का समान स्पेस और मौका मिल रहा है । आज चित्रकला को स्त्रियाॅं , बतौर प्रोफेशन के रूप में निस्संकोच अपना रही है । पुरूषों के साथ साथ भी, और विशेषतया, स्त्रियों के लिए ही, अलग से आर्ट कैंपों का संयोजन करते हुवे, वुमेन आर्ट ओरिऐंटेंड वर्कशाॅपों को चलाने के माध्यम से शैक्षणिक संस्थाएॅं , कला अकादमियाॅं और विश्वविद्यालयों के विजुवल आर्टस् के विभाग, कला के क्षेत्र में स्त्रियों को विशेष अवसर और जगह प्रदान करने के प्रयत्नों में जुटे हुए हैं ।

ऐसे ही प्रयत्नों के चलते, गुलबर्गा विश्वविद्यालय में स्थित, विजुवल आर्टस् का विभाग, कर्नाटक ललित कला अकादमी के सहयोग से, फरवरी 2015 मेंअखिल भारतीय महिला आर्ट कैंप का आयोजन किया था। देश के विविध भागों से आयी वुमेन आर्टिस्टों की तूली से निखरे चित्र, उनकी संवेदना कल्पना के रंगों से सजे संवरे कैनवास, कुछ अलग ही दास्तां बयां कर गयीं ….

‘‘आर पार है इस जहाॅं आसमान की जिंदगी … ऐ मेरे साथी…. मेरे गुइंया….. बस एक मुठ्ठिी भर का अहेसास !! मुझे भी जीने दे.. रंगों का इतिहास … अपनी बयां का ….मुझे भी रचने दे !!

1 . मुक्ता अवचट शिरके (पूना, महाराष्ट्र)

बच्ची की मासूमियत बच्ची के जुबान !! बच्चियों की मासूमियतता, उनका अगाध विश्वास, हर बाहरी व्यक्ति या वस्तू, जो कोमल है सुंदर है उसे अपना लेने की अपना मान लेने की अगाध मुग्धता को अपने कैनवास में कैद करने के लिए उठायी गयी मुक्ता अवचट शिरके की तूली, इस पेंटिंग में बोल रही है । उडती तितलियाॅं, तितलियों के उडान की चंचलता, रंगीन पंखों के खुलने और बंद होने की आॅंख मिचैली । मुग्ध कोमल बच्चियों का लुभावना रूप और उन तितलियों को देखने की सहज आतुरता, मुक्ता अवचट के रंगों द्वारा आकार पायी है । मुक्ता द्वारा कैनवास पर उभरे ये रंगहमें कहीं दूर ले जाकर,भारतीय बच्चियों की मासूमियता को बचाने की, उनकी टिमटिमाते आॅंखों की रोशनी और कदमों की फुदकनी को तितली के मानिंद संजोये रखने की सौगात तो नहीं दे रहे हैं …… ?

2 . डाॅ शुभ्रा चंद (गाजियाबाद, यूपी)

लगभग 25 सोलों से रंगों के मार्फत अपनी पर्यायी दुनिया को बसाने वाली, रंगों और तूलियों के आयाम से मन की बातों को कैनवासों पर फैनानेवाली डाॅ शुभ्रा चंद, अपने अमूर्त चित्रकारी याने, एब्स्ट्राक्ट आर्ट के लिए पहेचानी जाती रही है । गोल्ड धातू बेशकीमती भी है और औरतों का मनपसंदीदा लोहा भी । जहाॅं सोना औरतों के श्रृंगार के आभूषणों के हेतू अनेक सुंदर आकर्षक आकारों में ढलता है, वहीं वह अर्थ का पर्याय बनकर भी प्रस्तुत होता है । डाॅ शुभ्रा लगभग, गोल्ड के इस धातूयी अस्तित्व और चमक को अपने कैनवासपर कलर एफेक्ट के लिए बरबस उपयोग करती हैं । जैसे सोने की आभा, कला की कीमत को बयाॅं कर रही हो !! जैसे कह रही हो art is as valuable … as gold ..!!

3 . कामिनी बाघेल (झाॅंसी)

ग्रामीण औरतों का जीवन, उनके अपने विश्वास, उनके अपने जीवन मूल्य मान्यताएॅं, उनकी अपनी आशाएॅं उनके अपने सपने जैसे कामिनी बाघेल की रंगों की दुनिया है । उनके लगभग हर कैनवास पर के चित्र याने, जैसे झाॅंसी की औरतों की कहानी बोल रही हो !! झाॅंसी के औरतों की आशा और बदलाव की चाहत ली हुयी जिज्ञासा और भरोसे मंद आॅंखे, हर अलग और विश्वसनीय पहेल का बाॅडी लैंग्वेज, और हर विरोधों में अपना स्पेस ढॅूॅढ रहे उनके कदम, और इन तमाम संवेदना और शिद्धतों को रंगों में आकार देकर अपने कैनवास को खोलनेवाली कामिनी बाघेल की कला, एक पर्यायी फेमिनिसम् को रूपायित करती है । बाघेल की कला वह है, जहाॅं जेहाद की लडायी लडती केवल औरतें ही हैं ! और वह भी पूरी कद्दावरता के साथ !!

4 . जिज्ञासा ओझा (बड़ोदा )



वर्तमान चाहे बरगद के पेड की तरह अपने फैलाव की बाहें चारों ओर पसारे खडे क्यूॅं न हो, लेकिन परंपरा और संप्रदाय है कि, बीज की तरह ,वर्तमान के रेशे रेशे में घुले मिले रहते हैं, बस आवश्यक है उसे महेसूसने की, उसे संजोने की !!कलाकार जिज्ञासा ओझा अपने नाम की सार्थकता को अपनी कला में देखती है । उनके रंग बोलते हैं ‘‘नानी की कहानी पोती की जुबानी …!! ‘‘ आश्चर्य और जिज्ञासा से लडकी झुककर देखती है अपने वर्तमान के जडों को और बदले में पाती हैपरंपरा तथा संस्कारों के आधुनिक अर्थ को और मजबूत होता हुआ , और अधिक प्रासंगिक होता हुआ !! tradition & traditional के अद्भुत समीकरण को संजोते हुवे वर्तमान के गणित को हल करने की कला, जिज्ञासा को सिद्धहस्त है। अलग अलग रंगों के शेड्स से संवरे कैनवास पर उभरने जा रहा है मासूम कटे बाल, आधुनिक लिबास के माडर्न ढब की लडकी का ब्रहत् इमेज जो झुककर बडे ही संवेदनीय हाथों से राजस्थानी परंपरा और सांप्रदायिकता के रूप को, जिज्ञासा भाव से देख रही है, उसे सहज स्वीकारते हुवे, झुककर …आश्चर्य की अदायगी के साथ!!

5 . एस्.एम बानू  मुनाफ़ (तुमकूर, कर्नाटक)





एस्.एम्.बानू मुनाफ इंडियन ट्रेडिशनल् आर्ट में खासा हस्तक्षेप रखती है । यॅूॅ तो श्रृंगार और प्रसाधन पर हर स्त्री का अधिकार है, वह सजती है अपने लिए, अपने मनभावन के लिए । साज श्रृंगार के अपने रूप और मायने है । कर्नाटक के बेलूर हळेबीडू के मंदिरों की भित्तियों पर खिले शिल्पाकृतियाॅं, स्त्री के इन अद्भुत मनोल्लास के रूप को दर्शाते हैं । बानू का कैनवास उसी औरत के मनभाव को कैद कर रहा है , जहाॅं स्त्री तल्लीन है अपना जूडा बांधने में, लेकिन उसकी देह की भंगिमा, कसक कुछ और ही कहानी केह रहे हैं … ? जैसे वह यह गीत गुन गुना रही हो … सजना है मुझे…सजना के लिए …!! उसकी सजावट, उसका श्रृंगार केवल और केवल उसका है !!

6 . हूमा उल्लाह खा़न (भोपाल)

कैनवास पर जब रंग फैलने लगते हैं तब उसकी तबीयत स्वछंद रहती है … रंग अपने ढंग से आकार लेते जाते हैं…. लेकिन इन फैलते हुवे रंगों का भी अपना दायरा होता है … कैनवास के ये रंग अपने दायरे में , अभिव्यक्ति के अद्भुत लकीरों को चित्रपटल पर बिखेरते जाते हैं .. ! हूमा उल्लाह खा़नके चित्र कला की इसी सच्चाई को दर्शाते हैं । टिंट मीडिया में अपना खासा दख़ल रखने वाली हूमा, रंगों और कैनवास का अत्यंत किफायती उपयोग करते हुवे भी अधिक दूरस्थ की और अधिक गहनस्थता की बातें कह जाती हैं । ब्लाॅंक आंड व्हाइट में खिला उनका यह चि़त्र रंग और तूली की इसी सार्थकता को बताने जा रहा है ।

7 . अंजली एस् अग्रवाल (चंडीगढ़)

यूॅं तो प्रतिबद्ध आर्टिस्ट अपनी हर कलाकृति में अपने सिग्नेचर कोआंकते जाता है , कवियों द्वारा प्रयोगित काव्यनाम या अंकितनाम की तरह । खरगोश अपनी मासूमियत के लिए, कोमलबोध के लिए और निरीहता के लिए भी प्रतीकबद्ध है। अंजली अग्रवाल, खरगोश को आंकते जाती है, कैनवास में अपने सत्यताबोध के अहेसास में, वास्तविक आॅबर्सेशन् के रूप में और जीवन के अहसास के अर्थ में । बौद्धदर्शन को रंगों के माध्यम से रिफ्लेक्ट करने की अदम्य लालसा उनके रंगों और भावों में ध्वनित है । पानी अपने गुण के अनुकूल उूॅंचायी से नीचे की ओर बहता है । जीवन दायिनी स्वरूप को समेटते हुवे, वहीं जीवन विकास की धारा उूघ्र्वमुखी होती है !! मृण्मय जीवन के संघर्षों से उूपर उठकर आध्यात्मिकता या भौतिकेतर जीवन की सच्चायी को छूने की उजास को लिये लिये !! मानवीय विकास के उूध्र्वमुखी जिजीविषा को अपने आगोश में समेटते हुवे !! अपने कैनवास में इसी जीवन विकास और अर्थ की सच्चाई को आंकने में मगन हैं अंजली अग्रवाल ।

8. ज्योति हत्तरकी (गुलबर्गा कर्नाटक)

ट्रेडिशनल आर्ट को समकालीनता के आकार प्रकार में ढालते जाना अपने आप में चुनौती है । पारंपरिक या पौरिणक प्रसंग चरित्रों कोकन्टेंपररी बनाना और कंटेंपररी व्यवस्था या जीवन को पौराणिक रूप या मिथकों के ढब में चित्रित करना ज्योति हत्तरकी की चित्रकला की विशेषता रही है । वह लगभग हर अपने विज़न को फोक याने जनपदीय टच के साथ प्रसुत करते आयी है । उनके कैनवास पर, धार्मिक एवं जातीय प्रतीक चिन्हों का साथ ही आधुनिक जीवन के प्रतीकों का सुन्दर फयूज़न मिलता है । अर्थात ज्योति हत्तरकी बडे ही सलीके से ,जीवन तात्पर्य को पारंपरिक एवं आधुनिकता के समीकरण के रंग एवं चित्रों के बिंबोंद्वारा अर्थ देते जाती है । अर्धनारीश्वर का यह बिंब दांपत्य जीवन की वास्तविकता में सहभागिता के साथ साथ स्त्री और पुरूष के स्वतंत्र अस्मिता को भी चुपके से आंक देता है । अपने हर कलाचित्रों में हत्तरकी, उत्तर कर्नाटक की प्रादेशिक मिट्टी के महेक को लेकर आती है साथ ही जीवन युग्म के सिद्धांत को भी प्रस्तुत करती है ।
गुलबर्गा विश्वविद्यालय के कैम्पस में आयोजित इस महिला कलाकारों के कैप्म में, कुलपति महोदय प्रो जी.आर.नायक ने इन पोट्रेटों को देखते हुवे , सराहनीय प्रतिक्रिया भी दी । कला के क्षेत्र में महिलाओं के योगदान को रेखांकित किया साथ ही बडेही संवेदनीयता के साथ कहा‘‘ कैम्प में भागलेने वाली सारी महिलाएॅं निस्संदेह अपनी अकादमिक और कलात्मक योग्यता के प्रभावी रिज्यूम को ली हुयी हंै, लेकिन इस आयोजन का उपयोग इस अर्थ में हमें, जरूर हो रहा है कि आगे जाकर, इन सभी स्त्री कलाकारों के रिज्यूम में गुलबर्गा विश्वविद्यालय का नाम जुड जायगा !!
देश का इक्कीसवां दशक, नये नये उभरते हुवे महिला चित्रकारों को देख रहा है । विमेन् आर्टिस्ट सारे अवरोधकों को पार कर कैम्पों में ,गैलरियों में, शो आदियों में अपना हिस्सेदारी निभा रही है । स्त्री कलाकारों द्वारा उठाये गये इन तमाम अहम कदमों के बावजूद भी यह प्रश्न जरूर लटका रह जाता है कि ‘ क्या अपने देश में , इन महिलाओं की कला के लिए पुरूष के समानांतर स्थान है ? क्या देश मानसिकता महिलाओं की कला को भी संजीदगी से परख रही है ? आखिर उसके मेहनत और हुनर का कद्र करना हम जान गये हैं ? कला को चाहने वाले कहीं दूर निगाह में अपने, स्त्री और पुरूष कला रूपी जेंडर विभाजन की रेखा तो नहीं खींच रहे ? और इस मानसिकता के चलते, पुरूष की तुलना में स्त्री की कला को कम अर्थ में (कीमत के रूप में भी) आंकने की बाध्यता तो समाज में नहीं पाला जा रहा ?
कला के क्षेत्र में इस जेंडर पेरैटी को भांपते ,नीलांजना राॅय ने अपने लेख में , इतिहासकार एवं समीक्षक गायत्री सिन्हा को कोट किया है । गायत्री सिन्हा कहती हैं‘‘ यूॅं तो सन् सत्तर के दशक के बाद, स्त्रियों के लिए सारे दरवाजे खुल तो गये और पुरूष के समनांतर ही स्त्री की कला को गैलरियों में और समीक्षा में समान स्पेस तो मिलने लगा है । लेकिन प्रश्न यह लगा ही रहता है कि क्या आज भी स्त्रियों की चित्रकला को वही दाम और वही स्थान मिल रहा है जो पुरूष की कला को प्राप्त है ‘‘ ?
यूॅं तो हर लडायी चाहे वह कला के माध्यम से लडी गयी हो या आंदोलनों के माध्यम से, तात्पर्य तो यही बंधा रहता है कि हरेक व्यक्ति को उसके हिस्से की धूप मिले !! उसके हिस्से की जमीन उसे नसीब हो !! चाहे वह व्यक्ति स्त्री हो या पुरूष हो । क्यूॅं कि हमेशा कला की लडायी लोकतांत्रिकता मूल्यों की होती है ।
ऐसे आयोजित कैम्पों द्वारा, गैर समानतावादी मूल्यों की सामाजिक प्रतीती संभव हो पाती है, कहीं न कही मानवीय आनंद के रंगों को आंकने के लिए,जीवन का कैनवास बिछते जाता है, या एक बेहतर दुनिया के बसाने के पर्यायी सोच की कल्पना में, अदृश्य हथेलियाॅं कूॅंची धरकर रंग भरने लग जाते हैं, तो समझिये, हम और आपके प्रयत्नों की मेहंदी, रंग चढगयी !!
प्रो. परिमला अंबेकर
हिन्दी विभाग, गुलबर्गा विश्वविद्यालय गुलबर्गा- 06 कर्नाटक

सुनो चारुशीला और अन्य कवितायें

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कर्मानन्द आर्य

कर्मानन्द आर्य मह्त्वपूर्ण युवा कवि हैं. बिहार केन्द्रीय विश्वविद्यालय में हिन्दी पढाते हैं. संपर्क : 8092330929

( यह  प्रेम का सप्ताह  है -वसंत भी दस्तक दिया ही चाहता है . पिछले दिनों प्रेम को दक्षिणपंथी राजनीति का शिकार बनाया जाने लगा है . इस  सप्ताह को लेकर चरमपंथी संगठनों का सलाना विरोध फिर से अपने चरम पर है . स्त्रीकाल ने प्रेम के इस सप्ताह को प्रेम की स्त्रीवादी कविताओं , रचनाओं , आलेखों को समर्पित किया है . पवन करण की कविताओं और निवेदिता की यादों के बाद कर्मानंद की कवितायें  आप भी करें सहयोग . ) 

 

अब अमूमन हर किसी की बहन जाती है पार्क


पहले मेरी बहन गई
फिर मेरे दोस्त की
अब अमूमन हर किसी की बहन जाती है पार्क

वे तंग जगहें हैं
जहाँ नहीं होता पार्क और फूल
जहाँ नहीं होती नदियाँ

विकृतियों का जमघट होता है
अपने ही करते हैं व्यभिचार
मेरी बेटी बताती है
‘एक कहानी उसको भी पता है’

मैं पूछते हुए डरता हूँ
अपनीही बेटी से
बंदकमरे कैसे सड़ जाते हैं
बंद गली कैसे ख़त्म हो जाती है
पार्कों का होना अच्छा है
पहले मेरी बहन गई
फिर मेरे दोस्त की
अब अमूमन हर किसी की बहन जाती है पार्क

ओ मोरे बासंती बालम !

कहाँ हो ? तुम्हारी याद सता रही है. गंधमादन
निहार रही हूँ तुम्हारा पथ
सच कह रही हूँ पैसे की जरुरत नहीं है
अब सोना भी नहीं मांगती
आ जाओ ! बेकार में क्यों परेशान होते हो

जानती हूँ जितना तुम कमाते हो
उतना सब कबीर की भेंट चढ़ जाता है. अब कबीर के नाम पर लड़ना नहीं
दूध और ट्यूशन का पैसा तो मैं ही पूरा करती हूँ
मैं और मेहनत करुँगी
ओ मोरे बासंती बालम !
तुम्हारे प्यार में मैं मजदूरिन सी कमसिन हो आयी
देखो न !

तुमने ही कमाने से रोक दिया था
जानती हूँ जरुरत में दो हाथ मिलें तो
तो….क्या…..
घरबसता है बुद्धू !

मोरे बासंती पिहू !
हम लड़कियां कमजोर नहीं होती
न ही होती हैं लकड़ियाँ
बस हमें कह कहकर कमजोरी का काढ़ा पिला दिया जाता है
समय समय पर सर्दी की आग बना
ताप लिया जाता है
जियत मरत घूंट घूंट कर पीती हैं हम
काढ़ा और सर्दी

कहाँ हो!बासंती बालम
तुम्हारी याद सता रही है
अबकी बार वीकेण्ड पर भी मिलना नहीं हुआ

बसंत 

ओ मेरी चन्द्रवर्णी प्रियतमा
बसंत आ गया है
सरसों पियरा गई है
तुम्हेंमटर काटने जाना है

पिछले कई सालों से
तुम्हारे जूड़े और खेत से जूझते हुए
तुम्हारी चोटी नहीं संवार पाया

हमकिसान ऐसे मनाते हैं बसंत
मिलजुल बोते हैं
रखवाली में जागते हैं सारी सारी रात

बसंत भी तो यही करता है
फुरसत के पलों में
देहसे लिपटकर
काट लेता है एक फसल

ओमेरी चन्द्रवर्णी प्रियतमा
इस बार हम दोनों की सावधानी से
उगेंगी अच्छी फसलें

सुनो कात्यायनी

सुनो! उतारता हूँ सब तीर, धनुष, गांडीव
कवच कुंडल
सब तुम्हारे निमित्त था
वन प्रांतर, साम्राज्य की इच्छा
सत्ता के लोलुप दोस्त
सब छोड़ता हूँ अब

ये घोड़ो की टापें नहीं चाहिए
यह पीठ पर लदी जीन भी
सब कुछ तुम्हारे निमित्त रहा
हजारो किलोमीटर का भटकाव
तुम्हारी यादों के साथ
अब नहीं चाहिए कुछ

कह दो राजाओं ने छोड़ दिया सिंघासन कीइच्छा
कुछ खास करने का लोभ त्याग दिया
अब वे नीले आसमान के तले
कुछ न पाने की कसम खायेंगे

जो कुछ था वह तुम्हारे निमित्त था
घन गरजता था
बारिस की बूंदें उठती थीं
वन प्रांतर महकता था
सब कुछ तुमसे संदर्भित था

तुम नहीं तो विराग की यह रात किस काम की

सुनो चारुशीला

मैं तुम्हें तुम्हारी गंध से नहीं पहचान सकता
न तुम्हारे आम्रकुचों से जान सकता हूँ
तुम्हारे मन की अमराई
हाँ तुम्हें छूता हूँ तो इस बात से बेखबर
कि तुम एक देह हो
मद और पसीने से लथपथ

तुम्हारा स्वाद कितना खट्टा है
यह विषय बहुत गूढ़ है
कितना नमक बचा है तुम्हारी नाभि में
यह भी जानना कठिन है
कितनामीठा,तीखा, कसैला एवं कड़वा है
तुम्हारी इस रंग का स्वाद
कह नहीं सकता

मैं यह स्वीकारता हूँ
तुम्हारी अमूल्य प्रतिभा ने किया है प्रभावित
तुम्हारी कविताओं किताबों ने जादू बिखेरा है
तुम्हारी छवियों से होता हूँ प्रभावित
तुम्हें मंचों पर देखकर खुश होता हूँ
पर यह भी स्वीकारता हूँ
तुम्हारा लावण्य भी खींचता है उससे तेज

दुनिया की कोई किताब
मेंहदी की कुछ पंखुरियां जो छोड़ जाती है लाल निशान
वही रंग है आज मेरे मन का
मेरा मन लाल है
तुम चाहो तो छू सकती हो अपनी देह से
मेरे मन के लाल आन्तरांग

किताब में नहीं है
गुलाब में नहीं है
चम्पा,बेला, जूही, रोज़ी, लिली,
यासमीन, सुंबुल, नर्गिस
कहीं नहीं है इस मन की भावना

जो है सो देह में है
तुमभी देह में हो
तुम्हारा मन भी देह में है
देह में ही है सब सुनो

तुम्हें तुम्हारे ही हाथों ने छुआ होगा बार बार
तुम्हें कई और हाथों ने सहलाया होगा कई बार
इस बात से अंजान कि तुम सिर्फ देह हो
सिर्फ मिट्टी

देह से उपजता है प्रेम
देह से उपजती है गंध
देह से उपजता है एक नरक
जो जीवन देता है
तुम वही नरक हो सुनो चारुशीला

मुझे नरक अच्छा लगता है
तुम्हारी देह भी
और वह मुझे उसी तरह पसंद है
जैसे जीवन

मैं तुम्हें तुम्हारी गंध से नहीं पहचान सकता
न तुम्हारे आम्रकुचों से जान सकता हूँ
तुम्हारे मन की अमराई
हाँ तुम्हें छूता हूँ तो इस बात से बेखबर
कि तुम एक देह हो
मद और पसीने से लथपथ

बहन का प्रेमी: पांच कविताएं

पवन करण


पवन करण हिन्दी के महत्वपूर्ण कवि है, ग्वालियर में रहते हैं. इनसे इनके ई मेल आई डी pawankaran64@rediffmail.com पर संम्पर्क किया जा सकता है.

( अब प्रेम का सप्ताह शुरू  हो गया है -वसंत भी दस्तक दिया ही चाहता है . पिछले दिनों प्रेम को दक्षिणपंथी राजनीति का शिकार बनाया जाने लगा है . इस  सप्ताह को लेकर चरमपंथी संगठनों का सलाना विरोध फिर से अपने चरम पर है . स्त्रीकाल ने प्रेम के इस सप्ताह को प्रेम की स्त्रीवादी कविताओं , रचनाओं , आलेखों को समर्पित किया है . आज पवन करण की कविता से शुरुआत करते हैं , आप भी करें सहयोग . ) 


एक
एक तय जगह पर मैं उसे अक्सर
खडे़ हुए देखता हूं उसकी निगाह बार-बार
मेरे घर पर जा टिकती है ?

वह मुझे देखकर वहां से हट जाए
यह सोचकर मैं उसे टकटकी लगाए
देर तक रहता हूं घूरता लेकिन मेरी
इस जिद का उस पर कोई असर नही होता

मेरी तरकश के तीरों को बखूबी झेलते हुए
आगे बढ़े यह उसका रोज का सिलसिला है

मैं छुपकर उसे कई दफे वहां से
अपनी बहन की तरफ उंगलियों की भाषा में
शब्द उछालते हुए देखता हूं
वह वहां खड़े होकर रोजाना
मेरी बहन के घर से बाहर झांकने और उससे
आंखें मिलना का करता है इन्तजार

मजा तो तब आता है जब मेरी बहन उससे
रूठ जाती है और वह दिन-दिन भर
उसके दिखाई देने की प्रतीक्षा में
वहां खड़े़-खड़े़ गुजार देता है

तब दिन-दिन भर मेरा घर
रात के आकाश की तरह
उसकी आॅखों में अटका रहता है

 दो
वह जल्दी-जल्दी एक सकरी गली में घुसता है
जो बहन के काॅलेज के रास्ते में खुलती है जाकर

गली के मुहाने पर उसे खडे़ हुए देखकर
घर से काॅलेज के लिए निकली बहन भी
छोडकर अपना रास्ता गली में घुस जाती है

फिर वह पूरी गली मजे ले-लेकर
मेरी बहन और उसके प्रेमी को
आपस में शिकवे-शिकायत करते
रूठते मनाते एक दूसरे को
चिट्ठियां  लेते-देते देखती है

गली का एक-एक घर उन्हें
लैला मजनू की तर्ज पर पहचानता है
और गली ही नही घर से काॅलेज के लिए
निकली सड़क भी मेरी बहन को
आते देखकर फुसफुसाने लगती है

देख वह गली के मुहाने पर खड़ा हो गया आकर
और अब देखना वह आएगी और उसे
गली पर खड़ा देख सीधे गली में घुस जाएगी

कई दफे तो वह यह कहते हुए
यार हम भी इतने बुरे नही
मेरी बहन को छेड़ भी देती है
लेकिन एक पकी हुई प्रेमिका की तरह
मेरी बहन पर किसी की बात का
केाई खास असर नही होता

 तीन

मोहल्ले-भर को यह बात पता है
उसके पास मेरी बहन का फोटो है
काॅलेज के परिचय-पत्र से खींचकर निकाला गया
मासूम चेहरे वाला एक श्वेत -श्याम  फोटो

जिसे वह अपने मित्रों को अपनी जेब से निकालकर
खेल में जीती हुई किसी ट्राॅफी की तरह दिखाता है
किसी खिलाड़ी की तरह जब वह सबके बीच
चूमता है उसे उस समय
उसके चेहरे की अकड़ देखते ही बनती है

फिर अपने मित्रों के बीच भी वह अकेला ही है
जिसके पास अपनी प्रेमिका का फोटो है
उसके मित्र उसे कई दफे तंग करने की नीयत से
उससे उस फोटो को छीनने की करते है कोशिश

लेकिन वह हर बार उसे मित्रों के हाथों में जाने से
बचा लेता है भले ही इसके बदले में उसे
अपने मित्रों को पड़ता हो कुछ खिलाना -पिलाना

मैं उससे भिड़ना चाहूं तो मेरी बहन के उससे
फंसे होने का इससे बड़ा सबूत
मेरे लिए और क्या हो सकता है
कि उसकी जेब में हमेशा मेरी बहन का फोटो रहता है

 चार 

अपने हर पत्र में बहन उससे अनुरोध करती है
पढ़ने के बाद मेरा पत्र फाड़कर फेंक देना

वह भी अपने हर खत में उसे भरोसा दिलाता है
पढ़ने के बाद मैंने तुम्हारे पत्र को
फाड़कर फेंक  दिया लेकिन न तो बहन ही
उसकी बात पर भरोसा करती है
और न ही वह उसके पत्रों को फेंकता है फाड़कर

सिर्फ उसके लिए घरती पर उतरी होने का
भरोसा दिलाती बहन और बस बहन के लिए
जीने का वादा करते उसके प्रेमी को
पत्रों के मामले में एक-दूसरे पर कतई विश्वास  नही

बहन के मन में यह आशंका हमेशा रेंगती रहती है
कहीं वह उसके पत्रों को अखबार की तरह सबकी
आंखों के सामने न बिछा दे

और बहन के प्रेमी को भी यह डर डसता ही रहता है
घर के कहने पर अपने कहीं किसी रोज
वह भूलकर प्रेम-व्रेम उस पर ही पलट जाए तब
तब ये पत्र ही होगे जो उस वक्त
उसे बचाने ढाल की तरह आएंगे उसके काम

पांच 
बहन की किताबों-कांपियों में कई दफे
रंगे हाथ पकड़ा गया प्रेमी का नाम
प्रेमी और उसकी मुलाकातें शिकायतों की शक्ल में
घर के कानों तक पहुंची

घर में पिता के हाथों बुरी तरह पिटी बहन
और मेरे हाथों सड़क पर खुलेआम पिटा प्रेमी
दस-दस रोज बहन को घर ने खुद से बाहर
नही निकलने दिया दो-दो तीन-तीन रोज
बहन के हाथों ने खाना छुआ तक नही

कई दफे नौबत बहन की पढ़ाई-लिखाई
रोक देने तक आ पहुंची
मोहल्ला छोड़कर चले जाने पर भी घर ने
गम्भीरता से किया विचार

बहन और उसके प्रेमी के बीच छाई हुई चुप्पी देखकर
कई दफे लगा जैसे उनके बीच नही रहा कुछ
लेकिन वह लगातार प्रेमी की सोच में
अनार की तरह फूटती रही
और वह भी निरंतर उसके भीतर सुलगता रहा

धीरे-धीरे प्रेम करती बहन और उसका प्रेमी
घर और मेरी दिनचर्या में होता गया शामिल
और मेरे भीतर का भाई
गलकर घर के फर्श पर टपकता रहा

दो पीढी तीन कवितायें

( शेफलिका  कुमार और अंजना वर्मा दो पीढियों से हैं – बेटी और मां , दोनो की कवितायें एक साथ पढें )

शेफलिका कुमार की कवितायें



डॉ०  जैसमीन अरोड़ा


वह दिल्ली जाकर
यामीन से
जैसमीन क्या बन गयी
कि उसके छोटे- से कस्ॿे में
भूचाल आ गया
किसी ने कभी
उसे बिना दुपट्टे के देख लिया
और यह भी देखा कि
वह कुरते के साथ
टाइट जींस पहनती है
कुछ जानने की जरुरत नहीं

सबको  पता है
कि ज्यादा पढने वाली
फ्री माडर्न  लड़कियों को
कैसे-कैसे एसएमएस आते हैं
अरे!
वे माँ-बाप का नाम रोशन नहीं करती
रौशन के साथ भाग जाती हैं
कहा था न ?
फोन मत दो उसे
बारहवीं के बाद ही शादी करा दो
मटन कवाब कम खिलाओ
अरे! हमारे जमाने में तो
सब्जी मर्दों के लिए होती थी
हम तो रोटी अचार के साथ खाती थी

डॉ जैसमीन अरोडा!
आज तुम एक बच्चे की ‘मॉम’ हो
तुम कितने बच्चों को
अपने नरम हाथों से
इस दुनिया में लाती हो
पर याद है तुम्हें यासमीन ?
तुम्हारा वह छोटा कसबा
जो ऊंघता रहता था दिन में भी
उसमें जब भी तुम निकलती थी
दम-ख़म के सथ
होता था तुम्हारे नाम का तमाशा

शेफलिका कुमार 

भूल


कभी -कभी
कुछ नदियों को बांधकर
तुम यह समझने की भूल करते हो
कि एक दिन
सारी नदियां बंध जायेगी
और तुम्हारे इशारों पर बहेंगी
सिर्फ तुम्हारे इशारों पर

कभी बच्चे को देखा हैं?
बोतल में धुप को कैद करने की
कोशिश करते  हुए ?
धूप की किरणें जन्म लेती हैं
सिर्फ फैलने के लिए
तुम महसूस करो या नहीं
वे बिना रुके फ़ैल जाती हैं

हर वह चीज
जो तुम्हें लुभाती हैं
जिसकी खूबसूरती और ताकत के
कायल हो तुम
उसे मुट्ठी में दबाकर रखने की
कोशिश करना
फितरत है तुम्हारी

यद इसलिए रात के अँधेरे में
ये भेड़िये निकल आये हैं
अपने निगाहें पंजो और दांतों से
नोच नोचकर
हमें रोकने की कोशिश कर रहें हैं
पर वे दिन की सच्चाई में
गीदड़ों की तरह दम दबाकर
दांत दिखाते रहेंगे
हमारे कदम नहीं रुकेंगे
हम फैलते रहेंगी
धूप की किरणों की तरह

अंजना वर्मा की कविता 

अंजना वर्मा





एक साजिश हो रही है

अब वह अड़तीस पूरे करेगी
चलते -फिरते
दिमाग में एक फिल्म की तरह
वह अपनी ही काया देखने लगती है
देखती रहती है
यह कौन है कोट औए पैंट में?
हाथों में लैप टॉप लिये ?
अंकिता नाम है इसका -अंकिता मैडम
हठात कोई बात नहीं कर सकता मैडम से
चेहरे पर बहुराष्टृीय  कंपनी की छाप
बता देती है कि कमी किस बात की
पद, अपार्टमेन्ट, गाडी,बैंक बैलंस
सब कुछ तो है?

रोयें फुलाये चिड़िया- सी फूल उठती है वह
लेकिन  तुरत ही
अपने दिवास्वपन  में देखती है वह अपने जाल
जो परिपक्व  दीये – से रूखे हो गये हैं
बचपन से पिता कहते थे
“यह मेरी बेटी नहीं बेटा है”
माँ तो कहने ही लगी
“मेरी राजा बेटा ”
वह बन भी गयी बेटी से बेटा
और बन गयी राजा
किसी की रानी नहीं बन पाई अब तक
पहले जो संबोधन
उसे पंख दे देता था उडने के लिए
शहतीरों का दर्द दे जाता है
वह टूट-पिसकर धूल मिट्टी बन जाती है
अखबार के पन्नों में “वैवाहिक” देखते ही
वह चीखना चाहती है
“अरे! किसी को याद भी है
कि मैं बेटी हूँ?”

बिल्किस … तुम कहाॅं हो …. ?

प्रो.परिमळा अंबेकर

प्रो.परिमळा अंबेकर हिन्दी विभाग , गुलबर्गा वि वि, कर्नाटक में प्राध्यापिका और विभागाध्यक्ष हैं . परिमला अम्बेकर मूलतः आलोचक हैं हिन्दी में इनकी यह पहली कहानी है  संपर्क:09480226677

( एक ऐसे समय में जब देश का माहौल साम्प्रदायिक विषाक्तता से भरा जा रहा हो परिमला अम्बेकर की यह पहली कहानी हिन्दू -मुस्लिम लडकियों के आपसी साख्य से शुरु होती है और साझी संस्कृति की सुंदर अनुभूति से भर देती है . उत्तरी कर्नाटक के परिवेश में घटित की गई एक अनिवार्य पठनीय कहानी . ) 


अंजू की अम्मा !! अंजू की अम्मा !! आवाज सुनकर एक ही छलांग में बाहर के दरवाजे पर आ गयी थी मैं हमेशा की तरह । हाथ मे कटोरा थामे खडी थी बिल्किस !! हाथ को आगे बढाते हुए  कहा ‘‘ पम्माम्मा !…नानी बीमार है… निम्बू का अचार होना है … अम्मी ने कहा है ।”  कटोरा लेकर मैं भीतर आ गयी । उसे भीतर बुलाने की नाकाम कोशिश, इससे पहले मैं,मेरी माॅं और बहने बहुत बार कर चुकी थी । बिल्किस है कि हमारे घर के दहलीज कोे लक्षमण रेखा मानकर बाहर ही खडी होकर गुहार लगाती । अंजू की अम्मा !!अंजू की अम्मा !!
मुझे याद है , माॅं आम नींबू चिंच करेला … के अचारों के कनस्तर भर -भर कर रखती । अचार की तैयारी  के उसके हिसाब में केवल घर के ही सदस्य नहीं शामिल रहते, साथ में मुहल्ले  भर के लोग भी  फेहरिस्त जगह  बना लेते। उत्तर कर्नाटक का जिला यादगीर  आज से चालीस पैंतालीस साल पहले एक छोटा सा गाॅंवनुमा शहर था । बीचोबीच बसा बडा सा नहर, इसे स्टेशन और उूरू यानी शहर में बाॅंट दिया था । गाॅंव का स्टेशन का इलाका, जहाॅं अपना घर था, वहाॅं मुस्लिम -आबादी घनी थी । मेरे घर के अगल बगल में बसे मुसलमानों  के घर, उन घरों के सदस्य उनकी खुशियां, उनके गम उनके त्यौहार इन सबों में मुझे बिंदास एन्ट्री दिलानेवाली चीज थी तो यह आचार का कटोरा । माॅं के दिये आचार के कटोरे के दबदबे से, बडे शान और विश्वास के साथ उनके घरों में  मेरा आना जाना लगा रहता ।

बिल्किस और माॅं के हाथ का अचार मेरे लिये  द्वैत तत्व थे, दार्शनिक अंदाज मे कहूॅं तो,  इश्के मिजाजी भी थे,जिनके माध्यम से मैं, इन परिवारों के शादी -ब्याहो में, रमज़ान मुहर्रम में, बडों का ईद, मिन्नत फातेहा आदियों में शिरकत करने के अपूर्व आनंद के ईश्क ए  हकीकीे तक पहुॅंच जाती!!मैं किसी कीमत पर इन दोनों को खोना नहीं चाहती थी। कारण वक्त बेवक्त बिल्किस के हुक्म को सर आॅंखों पर बजा लाती । मै स्कूल से आकर, बस्ता पटककर सीधे बिल्किस के पास जाती । माॅं आवाज देती ही रहती लेकिन मैं हूॅं कि, अलादिन के जिन्न की तरह बिल्किस के घर के टाट के परदे के नीचे से होकर आंगन में दाखिल हो जाती । वहाॅं , मुर्गी के चूजों को टोकरी में बंद करने के लिये दौड लगाते -लगाते बिल्किस मुझे आदेश देती ‘‘पम्मम्मा जरा जवारी का टोकरा, गिरनी में जाको रख के आव , मैं अभी आयी ‘‘ जी आका ! कहते मै उसका हुक्म बजाती । उसके बाद क्या था, हाथ में फटी पुरानी थैली लेकर इस्मैल की दुकान से सौदा खरीदना !, दादी अम्मा के लिये हकीम से काढा लाना!, बीच बीच में मेरी माॅं और बहनों के आदेश बजाना ! आदि आदि । मेरी इस जी हुजूरी के बदले में क्या माॅंग मैं उसके सामने रखती,  उसका अंदाजा बिल्किस को पहले से ही रहता ।

खानदान के अच्छे दिनों के यादगार के रूप में बिल्किस के घर के कोने में लकडी के नक्काशीदार फ्रेम में जडा एक आलीशान ऐनक रक्खा रहता था। उसके नीचे के संदूक में चांदी के गिलिट का सुरमेदान भी रक्खा रहता । सब काम निपट जाने के बाद, उस सुरमेंदान की काडी को मेरी ओर बढाते,दबी आवाज में कहती ‘‘ जल्दी से लगा लो पम्माम्मा , नही तो आपा आजा यगी ‘‘ डरते डरते, अपने दोनों आॅंखों के कोरों में सुरमें की ठंडक को बसाकर , लंका जलाकर निकल पडे हनुमान केविजय की अंदाज में जब चुपके से परदा हटाकर बाहर निकलते तब , कोई  देखे या न देखे , नीले भुक्क हुए  मेरी आॅंखों को देख , दालान पर पान चबाती बैठी दादी माॅं के पोपले होटों पर हॅंसी की हल्की लालिमा का रस जरूर रिस जाता ।

खैर !! लगभग सात या आठ साल का मेरा बच्चापन पडोसी बिल्किस के लिये अलादिन का चिराग सा था । मुझसे चार पाॅचं साल बडी, पढायी लिखायी से दूर, घर के काम में जुटी जुती बिल्किस के लिए मै और मेरा साथ फ्रायड के कहे अवचेतन मन का वह हिस्सा था , जहाॅं  वह अपने चेतनमन के हर असंभव को मुझपर रौब जताकर संभव में परिवर्तित होते पाना चाहती!लेकिन इस मानसिक द्वन्द्व का सारा खमीर जब उसका उतर जाता तब शुद्धमन से मुझे प्यार भी बहुत करती ।  यूं तो मुझे उसके किसी बात से आपत्ति  नहीं रहती, बस रहती तो इस विषय को लेकर कि वह मेरे घर के सामने आकर, मेरी माॅं को अंजू की अम्मा के नाम से क्यूॅं बुलाती है। केवल बिल्किस ही नहीं सारे मोहल्ले भर के लोग भी मेरी माॅं को मेरे नाम नहीं बुलाते थें । उसकी पहचान बडी दीदी के साथ ही रहता । मैं माॅं से हमेशा कहती, ‘‘ अव्वा!ये सभी तुम्हें बडी दीदी की अम्मा! के नाम से क्यूॅं पुकारते हैं ?  आपत्ति भरे  मेरे लहजे को माॅं तो बस हॅंसकर,गब्बारे की तरह फुगे मेरे गालों की हल्की चुटकी लेते कहती ‘‘ क्यॅू कि तू हमारी नहीं हैं । दूधवाली मरेम्बी हैं न ..! तू उसकी बेटी है । भूसा देकर तुझे खरीदा है … ‘‘ इसे सुन दांत निपोरकर हॅंसने में मेरी बहनों को बडा मजा आता । मुगलयी कर्नाटक के इस प्रदेश में , बडे बच्चों के नाम से माॅं बाप को पहचानने का, बुलाने का रिवाज है । जैसे अंजू की अम्मा, रघू के अब्बा, हकूडी की अम्मा, खाजा के अब्बा …. !! इस व्यवहार ज्ञान का भान जब मुझे हुआ  तब तक बिल्किस के जीवन से मैं बहुत दूर जा चुकी थी ।

मेरे और उसके घर होनेवाले त्यौहारों के और उत्सवों के वजन हमारे संबंध के पलडे में  लगभग समान तुल जाते । जिसके ही बल, हम आपस में इतराते, दंभ भरते। दिवाली के पटाखे के साथ मैं अपना ताव दिखाती तो वह ईद के इत्र सुरमे के साथ, रंगीन दुपटटे को ओढकर मेरे सम्मुख  वह इठलाती । मेरे घर के बैठकखाने के आले में चकमकी बल्बों के प्रकाश मे बिराज रहे गणपति  को जब वह आॅंखें फाडे फाडे देखती तो मेरे गर्दन की  अकड कुछ बढ जाती  । इसका बदला वह अपने घर होनेवाले शादियों में लेती । मेहंदी रंगे हाथों में नगीने जडे लाख की चुडिया को भर भरकर मेरी कलई जरूर खोलती !हर बार उसे मात देने का मेरा पैतरा भी चुना चुना रहता । लेकिन मुझे मुॅंह की तब खानी जरूर पडती जब, मोहरम का महीना लग जाता। गली कूचे के इमाम बाडों में पीर बैठने , सजने लगते । मुहर्रम् के महीने में तो बिल्किस जैसे मुझे पूरा का पूरा अपना दास बना लेती। हर रोज शाम को,  हाथ में मोरा शक्कर की पुडगी ,अगरबत्ती और चिराग लिये जा रही होती . बिल्किस के साथ साथ खुद भी जाने का, माॅं के दिये अठन्नी से खुद भी मोरा शक्कर खरीदकर,लाल,पीले,हरे रंगों मे सजे पीरों के सामने चढाने का आनंद ही कुछ और होता!!

बारह  बजते हलगी की आवाज , बुरखे से बाहर झांकते औरतों के चेहरे, शक्कर पर बिनबिनाती मक्खियाॅं … !! सजदे के लिए झुका मेरा माथा ! जब उठता तब, चमकीले लाल पीले हरे चमकीले रंगों में ,अलग अलग आकारो में सजे इमामबाडे के पीर मेरे बचपन को अद्भुत विशालता से भर देते थे। अजीब सिहरन और कंपकंपी सर से लेकर पैर तक दौड जाती ! हडबडाकर, पास खडी बिल्किस का हाथ थाम लेती। मेरे भय को अपनी , खुशी में तब्दील करते, विश्वास के साथ मेरा हाथ था लेती । तब हम, हरा साफा, कौडियों की माला, चौकोनाकार लंुगी बांधे, मोर के पंखे की जादू दिखाने हाथ में झाडू लिये खडे इमाम के सामनेेघुटने के बल खट् से झुक जाते।यह सिलसिला यूूॅं ही महीने भी चला चलता। हमारा मन नहीं भरता था जब तक कि अलग अलग गलियों बस्तियों में जाकर वहाॅं सजे सारे पीरों के दर्शन नहीं कर लेते और उन पीरों की तुलना में अपनी बस्ती  के पीरों का ही अधिक अच्छे होने का, अधिक सच्चे होने का दम भरते भरते घर न लौटते ।

मेरे घर के सामने से दो रास्ते निकलते थे । एक सीधा हनुमान मंदिर की ओर और उससे लगे आटे की गिरनी की ओर जाता, जिस गिरनी को बिल्किस के गौस चाचा चलाते थे और दूसरा रास्ता यल्लम्मा के मंदिर के पिछवाडे चबूतरे से जा लगता । यल्लम्मा मंदिर के बडे से चबूतरे की बायीं ओर काले पत्थरों से चुनी बावडी बनी थी, जिसके मुंडेर पर बरगद का पेड अपनी लंबी -लंबी बाहें  फैलाये खडा था । मंदिर के सामने बहुत बडा खुला मैदान था,  जिसका दायी ओर का छोर हनुमान मंदिर के चैकाकार चबूरते को समेटे रक्खा था ,जिससे जाकर पहला रास्ता मिलता था। यलम्मा मंदिर के सामने का खुला मैदान कोई  साधारण मैदान नहीं था, उसे, अपने में  दिल्ली का प्रगति मैदान ही समझिये!! उत्तर कर्नाटक के देसी नाटकों की मंडलियाॅं,बयलाट, दोड्डाट की टोलियाॅं अपना स्टेज इसी मैदान में जमाते । यल्लम्मा के उत्सव में चढावे के लिये लायी गयी असंख्य बकरी और भैंसों के सिर यहीं हलाल होते । भरी दुपहरिया में, बर्तनों पर गिलिट चढाकर उसे चांदी की तरह चमका देनेवाले कारीगर,  टिन के डब्बों को काटकर उसे अलग अलग आकर के छोटे छोटे डिब्बे बनानेवाले कामगर ,खोमचेवाले, चूडियाॅं बेचनेवाले, लगभग सभी यहीं, इसी खुले मैदान में अपना डेरा डालते । गाय भैंसों के पैरों में नाल चढाने के लिए, उनके बदन पर गरम सलाखों से दाग के पहचान चिन्ह बनानेवाले मुश्टंडे भी अपने जानवरों के साथ इसी मैदान में आकर जुट जाते । और तो अैार इस मैदान को, गाय और भैंसों को गभाने के लिए भी काम में लिया जाता था। मैं और बिल्किस अपने और यार दोस्तों के साथ इन सारी प्रक्रियाओं को आॅंखे फाडे यंत्रवत् देखते ठहरते या मंदिर के कट्टे पर कतार बांधकर बैठकर अपने मुहल्ले के इस प्रगति मैदान में घटने वाली हर घटनाओं के लिए मूक साक्षी बनते जाते। अंधेरा घिरते न घिरते, मंदिर के कट्टे पर बैठकर संजोये बटोरे अपने इस लोकज्ञान के पिटारे को , बिल्किस की दादी माॅं के सामने एक- एक करके खोलते जाते । और दादी माॅ थी की एक -एक किस्से को बडे चाव से सुनते जाती और अपने पोपले मुॅंह को खोले -खोले हॅंसते जाती । लेकिनहमें पता ही नहीं चलता कि , अगल बगल में बैठी बिल्किस की अम्मा और उसकी चाचियाॅं भी मुॅंह में साडी का पल्लू ठूॅंसे ठूॅंसे हॅंसते जा रही है ! हॅंसते जा रही है !!

खैर ! यादगिर का, मेरे मुहल्ले का यह प्रगति मैदान इसलिये भी मुझे अजीज था, क्यूंकि  मुहल्ले भर के सारे पीर, मुहर्रम के आखिर दिन दफ्फन के लिए यहीं इसी मैंदान में आ जमा होते । लोगों से ठसा ठस्स भरा मैदान, मंदिर का चबूतरा, बावडी का मुंडेर, काले काले मुंडियों के खेत में उॅूचें उूॅंचे उगे लाल पीले हरे रंग के चमकीले, फूलों से सजे,सॅंवरे लहराते पीर !! एक ही धुन में एक ही ताल में बीस -बीस जोडे हलगी के बजने की ऊंची  दिल दहलानी आवाज, अलग अलग घेरों में बटे उठते झुकते , लहराते , दौडते पीर !!साथ में ‘‘ पीरों की दोस्तराओद्दीन…. !! ‘‘ की आकाश गुंजादेनेवाली ध्वनि  …!! हम सभी बच्चों के छक्के छूट जाते।इमाम बाडों में सजे बैठे पीरों की सौम्यता, अद्भुत  सौन्दर्य, खुले मैदान में घिरे लोगों के समंदर के बीचों बीच खडे पीरों की रौद्रता और उग्रचेतना के सौन्दर्य में पर्यवसित होते जाता… हमें पता तक नहीं चलता । हमारी लीडर बिल्किस हमें समझाती, बहते मेरे आॅंसुओं को अपनी चुनरी के कोर से पोंछतीं और कहती ‘‘ पम्माम्मा रोना नै… रोना नै… ”

मेरी छोटी सी खोपडी में यह बात समा नहीं पाती कि आखिर पीर जाते कहाॅं है ? मेरे इस प्रश्न का कोई  उत्तर नहीं देता । दफ्न के अंतिम क्षणों में उदासी इतनी घनी हो जाती कि , हर कोई  अब रो पडा ,तब रो पडा । मेरे बचपन  की कल्पना शक्ति ने एक तिलिस्म भरे राज को मेरे सामने खोल दिया था । मै सोचती, शायद उस बावडी में प्रकाश का कोई अंतर्जलीयसुरंग मार्ग जरूर होगा, जिसके ही जरिये सारे देवी देवता, चाहे ओ मेरे हो या बिल्किस के, अपने अपने घरों को पहुॅंच जाते होंगे !!

शाम से ही पीरों के पीछे -पीछे दौडते फिरते जैसे पैरों में सीसा भरने लगता । मनभर के अपने पैरों को खींचते -खींचते घर की ओर जब लौट पडते ( वह भी दो तीन बार अपने अपने घरों से हिदायतेे आने के बाद) ,हमारा मन तब भी मैदान की धूली में ही रमे रहता । जैसे जैसे घर की ओर हमारे कदम बढते जाते पीछे पीछे, हलगियों की धुन , मातम के अवसाद की रूह छेडने लगते। शाम का सारा उल्लास उम्मंग, रात के घिरते न घिरते सारे जहाॅं में उदासी का सामान सजाने लगता।

गहन अंधेरी रात मे, बिस्तर पर चद्दर ओढे सोये मेरे कानो में , दूर से हवा के सहारे लहराते आते गीतों के धुन की उदासी , जैसे कोहरा बनकर टपक रही होती !मेरे कान उसी दिशा में लगे रहते । माॅं के मना करने पर भी, उठ पडती, और खिडकी के किवाड से झांकने लगती । धुप्प अंधेरे में रास्ता बनाते हुए  मेरी आॅंखें , सर पर बडे- बडे गठ्ठर बांधे,अवसाद भरे कदमों को उठाते हुए , रूंधे गले से गीत गाते हुए  गली के उस छोर से मुडते अदृश्य होते जाते उस काफिले को पहचान जाते । गीतों के बोल हवा में घुलते जाते, काफिला आगे बढता जाता और उसके पीछे जैसे रूलायी का समंदर ही ठाठे मारने लगता। खिडकी के सलाखों को पकडे मेरे दोनों हथेलियों पर टप् टप् आॅंसू टपकने लगते !!

अरे… यह क्या… आज क्यूूॅं बचपन के वे ही आॅंसू के बू6द  फिर से मेरी हथेली पर टपकने लगे हैं ? आॅंसू में वही गंध, वहीं सिहरन !! टी वी  के सामने बैठी मैं , आॅंसुओं से भीगे अपने निस्तब्ध हथेली को देखते जाती हूॅं। आॅंसुओं के पार से टी वी  पर के उठते बदलते चित्र अस्पष्ट होने लगते हैं । लेकिन कान… कान तो खुले ही हैं …!!कानों पर चैनल समाचार विशेषज्ञ की आवाज हथोडे की तरह बजने लगती है  । आज पेशावर में ………फौजियों के बच्चों के स्कूल में ……… !!!
मन चीखने लगा … बिल्किस….. तुम कहाॅं हो….?

महिला मानवाधिकार बनाम घरेलू हिंसा

डा . परवीन कुमारी रमा


स्त्री -पुरुष  के बिना विश्व की निरन्तरता, विकास असम्भव है।  इन दोनों के बिना विश्व, परिवार और मानव जीवन अधूरा एवं रिक्त है। दोनों का अस्तित्व एक-दूसरे की अनिवार्य शर्त है।

स्त्री और पुरुष , ‘तुम’ और ‘मैं’ एक समस्या रहे हैं   जे. कृष्णमूर्ति के अनुसार –
“You and I are the Problem
and not the world, 
because the world is the 
Projection of ourselves and 
to understand the world we
must understand ourselves,
The world is not separate from
us, we are the world, and our
problems are the world’s problems.”

अर्थात ‘तुम और मैं समस्या हैं, हम संसार नहीं हैं।  क्योंकि संसार तो हमारी अपनी प्रतिच्छाया है और इस संसार को समझने केलिए हमें स्वयं को समझना है।  यह संसार हमसे अलग नहीं है, हम ही यह संसार हैं और हमारी समस्याएँ ही संसार की समस्याएँ हैं।”  अंतत:  इन प्रत्येक समस्यों का समाधान हम अधिकार टकराव में न रखकर स्वयं में ही खोजें, हम अपनत्व में खोजें आत्मियता की सरसता.   यह अधिकार चेतना मानवाधिकार के  संदर्भ में अर्थपूर्ण सिद्ध होगी।

डाँ. जगदीश्वर चतुर्वेदी जी ‘स्त्रीवादी साहित्य विमर्श’ में  लिखते हैं कि “स्त्री की समानता के संघर्ष के प्रति दया या सहानुभूति की ज़रूरत नहीं है बल्कि, यह महसूस करने की ज़रूरत है कि यह तो उसका अधिकार था जो उसे दिया जाना चाहिए और इसे देने में अगर मनोवैज्ञानिक, राजनीतिक, सामाजिक या आर्थिक असुविधाएं आये तब भी उसे दिया जाना चाहिए क्योंकि, स्त्री तो सर्जक है, उत्पादक है, श्रमिक है, वह उपभोक्ता नहीं है।  स्त्री को सर्जक की बजाय ज्योंही हम उपभोक्ता बनाते हैं तो एक ओर उसकी सामाजिक सीमा बांध देते हैं वहीं दूसरी ओर उसके सारे अधिकार भी छीन लेते हैं।  उसे उसकी स्वतंत्र पहचान से भी वंचित कर देते हैं अत: स्त्री समानता केलिए चलाया गया संघर्ष पितृसत्ताक विचारधारा के साथ-साथ उपभोक्तावादी पूंजीवादी विचारधारा के साथ भी है। स्त्री समानता का संघर्ष सामाजिक-आर्थिक एवं राजनीतिक इन तीनों स्तरों पर एक ही साथ चलना चाहिए।  इस क्रम में पुंसवादी विचारधारा द्वारा स्त्रियों में पैदा किया गया विभाजन (दलित महिला, सवर्ग महिला, पिछड़ी महिला आदि)  टूटेगा साथ ही स्त्रियों में समानता का बोध पैदा होगा।”  अर्थात अधिकार मानव होने के कारण उसे जो अधिकार प्राप्त हो वे क्या हैं?  कौन उन अधिकारों से उसे वंचित करता आया है? अंतत: जीवित रहने का अधिकार, जो अधिकार सर्व वांछित है, अर्थात सुरक्षा का अधिकार एवं संरक्षण अधिकार।  जीवन कल्याण अधिकार।  ये मुख्य अधिकार हैं। ये अधिकार कब मिल सकते हैं, इसके लिए वर्तमान तथा आने वाली पीढ़ी दोनों को ही स्वयं आत्म-निरीक्षण करना होगा और उक्त दोनों अधिकार उनके कर्तव्य बोध के संदर्भ में तय किया जाने चाहिए।

अब प्रश्न यही उत्पन्न होता है कि क्या भारतीय संविधान में मूल अधिकारों के रूप में इन अधिकारों के प्रावधित करने के पश्चात भी भारतीय स्त्री  को क्या  समान अधिकार प्राप्त हुआ है?  क्या उसको संविधान के प्राक्कथन में किया गया वादा न्याय – सामाजिक, आर्थिक तथा राजनीतिक,  उन सच्चे व सत्य अर्थों में प्राप्त हुआ जिसका वादा 26 जनवरी 1950 को किया गया था।  संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा प्रकाशित ‘ दी ह्रूमन डेवेलपमेन्ट रिर्पोट: दी प्रोग्रेस ऑफ दी वर्ल्ड्स वीमेन  रिपोर्ट’ में भारतीय  महिलाओं की स्थिति में सुधार बताया गया है।  उसके पश्चात दी ‘ यू. एन. डी. पी. डाक्यूमेन्ट के समान’ ही ‘ दी यू. एन. फण्ड फॉर डेवेलपमेन्ट आँफ विमेन (यू. एन. आई. एफ. ई. एम.)’ के  स्कोरकार्ड में  भारतीय प्रयासों की सराहना की गई है,  जिसके अन्तर्गत भारतीय महिला के लिंग समानता के क्षेत्र में कार्य किया जाना बताया गया है लेकिन व्यवहारिक आकलन यही सिद्ध करता है कि अभी कुछ अधिक प्राप्त नहीं हुआ है और अधिक दूर जाने की आवश्यकता है।
“The advances towards the gender equality have been uneven and there is still a long way to go to make the premises made at Beijing a reality.” अर्थात जेंडर समानता के क्षेत्र में जो प्रगति हुई है, वह समतल नहीं है और बिजिंग सम्मेलन में जो वादे किया गये हैं , उनको वास्तविकता में बदलने केलिए बहुत लम्बी यात्रा तय करनी है।  अर्थात महिलाओं को सबल बनाने केलिए निर्णय लेने के स्तर पर महिलाओं का प्रतिनिधित्व आवश्यक है व महत्वपूर्ण स्थान रखता है।

आज मुख्य असमानता का कारण समाज में महिलाओं का निम्न स्तर होना है, जिसमें कानून में भेदभाव तथा महिलाओं के प्रति अत्याचार एवं हिंसा भी सम्मिलित है।  महिलाओं के प्रति मानसिक तथा शारीरिक हिंसा जन्म से मृत्यु तक बराबर होती रहती है।  आज सभी देशों में महिलाएँ जहाँ इक्कीसवीं सदी की वैश्विक समस्याओं और चुनौतियों से जूझ रही हैं, वहीं बढ़ती गरीबी और आर्थिक अनिश्चितता तथा आए दिन बढ़ते महिला उत्पीड़न और दिल दहला देने वाली हिंसात्मक घटनाओं का शिकार होती महिलाओं ने एक बार फिर विश्व में मानव अधिकारों के हिमायती, समानता और सुरक्षा तथा शांति की दुहाई देनेवाले राष्ट्रों के नेताओं,  अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं और समुदाओं के सामने इस कड़वे सच को उजागर करके, उनके मुखौटे उतार फेंके हैं।  क्योंकि महिलाओं को लिंग भेद के कारण कानूनी अधिकार, सामाजिक अधिकार और आर्थिक अधिकारों का न मिलना आज भूमण्डलीकरण की एक बड़ी चुनौती बन गई है।  इसी कारण महिलाओं का आज सबसे अधिक शोषण हो रहा है।  इसकी सबसे भयावह समस्या अवैध देह व्यापार के रूप में पूरे विश्व के सामने खड़ी है।  अवैध – देह – व्यापार में शोषण, वेश्यावृत्ति, बलपूर्वक श्रम कराना या गुलाम बनाकर देह-व्यापार करना शामिल हैं।  भूमण्डीकरण की इन तमाम चुनौतियों के मद्दे नजर रखते हुये आज महिलाओं की मांगे निरन्तर बढ़ती जा रही हैं।  “विश्व इक्कीसवीं  सदी में प्रवेश कर चुका है।  नई विश्व-व्यवस्था महिला और पुरुषों के समान अवसरों से ही प्राप्त हो सकती है। जब तक विश्व में महिलाओं की आधी आबादी त्रासदी से मुक्त होकर पुरुषों के समान अवसर युक्त जीवनयापन नहीं कर सकेगी,  विश्व-विकास का सपना अधूरा ही रहेगा।  अपनी योग्यता एवं क्षमता के अनुसार हर क्षेत्र में महिलाओं को जब समान अवसर उपलब्ध होंगे, तभी सही विकास होगा।  यद्यपि विश्व में और खासकर भारत में विछले वर्षों में काफी प्रयत्न किया हैं, तदापि अभी भी बहुत कुछ करना बाकी है।”

संयुक्त राष्ट्र संघ की संस्था यूनिफेम की एक रिपोर्ट के अनुसार 45 देशों ने महिलाओं के साथ होने वाली घरेलू हिंसा को रोकने के लिए सुनिश्चित कानून बनाए।  महिलाओं के साथ विभेदकारी व्यवहार की समाप्ति की घोषणा 7 नवम्बर, 1967 को संयुक्त राष्ट्र संघ महासभा द्वारा अंगीकृत किया गया था।  इस घोषणा के अनुच्छेद 10 के अन्तर्गत यह प्रावधान किया गया है कि महिलाओं को फिर वे चाहे विवाहित हों अथवा अविवाहित, पुरुषों के साथ आर्थिक तथा सामाजिक क्षेत्र के सभी समान अधिकार प्रदान किये जाने केलिए समुचित व्यवस्था की जायेगी और विशेषकर –
(क) विवाहित स्तर के आधार पर अथवा किसी अन्य आधार पर बिना किसी भेदभाव के कार्य के व्यवसाय सम्बन्धी प्रशिक्षण प्राप्त कर सके तथा व्यवसाय चयन और रोजगार में उसके साथ किसी प्रकार का भेदभाव न करें।
(ख) पुरुषों के समान मजदूरी तथा उसी के समान कार्य में समान व्यवहार हो।
(ग) वेतन सहित अवकाश का अधिकार, सेवामुक्ति, विशेषाधिकार तथा बेरोजगारी, बीमारी,  वृद्धावस्था  अथवा काम करने की अन्य अयोग्यताओं की दशा में सुरक्षा सम्बन्धी प्रावधान।
(घ) पुरुषों के समान शर्तो पर पारिवारिक भत्ता प्राप्त करने का अधिकार महिलाओं के विरुद्ध विवाह के आधार पर अथवा मातृत्व के आधार पर विभेद को समाप्त करने केलिए तथा उन्हें प्रभावकारी अधिकार दिलाने केलिए कार्य किये जाऐंगे तथा उनको आवश्यक सामाजिक सेवायें जिसके अन्तर्गत बच्चों की देखरेख, रोजगार सम्बन्धी सेवायें आदि सम्मिलित होंगी फिर भी शारीरिक प्रकृति की भिन्नता के कारणों से कुछ प्रकार के कार्यों में महिलाओं की सुरक्षा केलिए स्तर निर्धारित किया जायेगा जो कि विभेदकारी नहीं होगा।

10 दिसम्बर को पूरी दुनिया  में “मानावाधिकार दिवस” के रूप में मनाया जाता है। “10 दिसम्बर 1948 को संयुक्त राष्ट्र की साधारण सभा ने संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकारों की विश्वव्यापी घोषणा को अंगीकृत किया गया।  मानवाधिकारों की विश्वव्यापी घोषणा में प्रस्तावना एवं 30 अनुच्छेद हैं।”  इस विश्वव्यापी घोषणा की प्रस्तावना में कहा गया है कि “मानव समुदाय के सभी सदस्यों के गौरवपूर्ण जीवन एवं समानता के अधिकार विश्वव्यापी स्वतंत्रता, न्याय एवं शान्ति के अधिकार केलिए है, जहाँ पुरुष एवं महिला अच्छे सामाजिक विकास के साथ अधिक से अधिक स्वतंत्रता प्राप्त कर सके।”  अर्थात अनुच्छेद 1 से लेकर अनुच्छेद 20 तक व्यक्ति के नागरिक तथा राजनीतिक अधिकारों की व्याख्या की गई है तथा अनुच्छेद 21 से 30 तक व्यक्ति के सामाजिक, सांस्कृतिक एवं आर्थिक अधिकारों को सम्मिलित किया गया है।

महिलाओं के साथ हिंसा, विश्व में आज मानव अधिकार उल्लंघन का सबसे घिनौना रूप माना जा रहा है।  आज पूरे विश्व की महिलायें इस समस्या का सामना कर रही है।  यदि हम वैश्विक दृष्टि से देखें तो प्रत्येक तीन महिला में से एक महिला के साथ बलात्कार होगा या उसे पीटा जाऐगा या सेक्स के धंधे में जाने केलिए उसे विवश किया जाऐगा या पूरे जीवन हिंसा के अभिशाप को भोगने केलिए तत्पर रहना होगा।  आज ‘घरेलू हिंसा’ एक चिन्ता का विषय बन चुका है।  वास्तव में महिलाओं के विरुद्ध होने वाली आपराधिक हिंसा का कारण कोई एक तथ्य नहीं है।  अर्थात ‘घरेलू हिंसा’ महिलाओं एवं लड़कियों के विरुद्ध यह एक ऐसी भूमण्डलीय गंभीर समस्या है जो उसे शारीरिक, मानसिक, यौनाचार और आर्थिक रूप से उसकी हत्या करती या उसे अपंग बना देती है।  मानव अधिकारों का यह सर्वाधिक व्यापक उल्लघंन है जिसके द्वारा महिलाओं तथा लड़कियों को सुरक्षा, सम्मान, समानता, आत्म उत्कर्ष और बुनियादी आजादी के अधिकारों से वंचित रखा जाता है।  अर्थात ‘घरेलू हिंसा’ एक ऐसा अपराध है जो न तो सही गैर पर रिकॉर्ड किया जाता है और न ही इसकी सही तौर पर रिपोर्ट की जाती है। अंतत: जब कोई महिला रिपोर्ट लिखवाना चाहती है या मदद चाहती है तो पुलिस उसके प्रति उदासीनता का व्यवहार करती है।  इसके साथ-ही-साथ महिला का यह भी सत्य है कि शर्म, बदला लिए जाने का भय, कानूनी अधिकारों की जानकारी न होना, अदालती प्रक्रिया के प्रति विश्वास की कमी या भय, कानूनी कार्यों पर होने वाले खर्च भी ऐसे ही कारण हैं जो घरेलू हिंसा से उत्पीडित महिला को रिपोर्ट न लिखवाने केलिए विवश करते हैं।  विश्व स्वास्थ्य संगठन ने महिलाओं के विरुद्ध हिंसा का पूरा जीवन क्रम यों उजागर किया है।
1) जन्मपूर्व हिंसा – लिंग चुनाव केलिए भ्रूण हत्या, लिंग-जाँच हो जाने पर गर्भावस्था के दौरान औरत पर अत्याचार क्योंकि वह बालिका शिशु को जन्म देने वाली है।
2) शैशव हिंसा – बालिका शिशु के जन्म लेते ही उसकी हत्या। इसके साथ ही उसे जन्म देने वाली औरत को दिए जाने वाले शारीरिक, यौन और मानसिक उत्पीड़न।
3) बालिका उत्पीड़न – बाल विवाह, महिलाओं का खतना, शारीरिक, यौन और मानसिक उत्पीड़न, दुराचारपूर्ण व्यवहार, बाल वेश्यावृत्ति और अश्लील सामग्री तैयार करने केलिए उनका इस्तेमाल।
4) किशोरावस्था और प्रौढ़ावस्था में हिंसा-डेटिंग और सामंती हिंसा (एसिड फेंकना, डेट के दौरान बलात्कार करना), गरीबी के कारण मजबूर करके यौनाचार करना (जैसे लड़कियों द्वारा अपनी स्कूल फीस के बदले, फीस देनेवाले के साथ यौन-संबंध बनाना), दुव्र्यवहार, कार्यस्थल पर यौनशोषण, बलात्कार, यौन उत्पीड़न, जबरदस्ती करवाई गई वेश्यावृत्ति, अश्लील सामग्री केलिए दुरुपयोग और हत्याएँ, मानसिक उत्पीड़न, विकलांग महिलाओं का यौन शोषण, बलात करवाया गया गर्भधारण।
5) वृद्ध महिलाओं के साथ हिंसा – आत्महत्या करने के लिए विवश कर देना या आर्थिक कारणों से की गई हत्या। यौन, शारीरिक और संवेदना के स्तर पर मानसिक उत्पीड़न। अर्थात आज वैश्विक स्तर पर बचपन से लेकर वृद्धावस्था तक लड़कियों और महिलाओं के साथ हो रही हिंसा की इस महामारी ने सारे विश्व को जकड़ लिया है।

घरेलू हिंसा के तहत पति द्वारा किया गया यौन-उत्पीड़न या बलात्कार अधिकांश देशों में अपराध नहीं माना जाता है।  कहने का अभिप्राय यदि एक बार एक महिला विवाह बंधन में बंध जाती है तो पुरुष (पति) उसके साथ मनचाही यौन क्रिया करने का अधिकारी हो जाता है।  इस समस्या को हल करने केलिए अनेक देशों ने ‘दांपतिक बलात्कार के विरुद्ध कानून’ बनाने की दिशा में कार्य किया है।  जिनमें – “आस्ट्रेलिया, आस्ट्रिया, बाखाडोस, कनाडा, साईप्रस, जर्मनी, आयरलैंड, मेक्सिको, नामीबिया, डेनमार्क, दि डोमिनिकल रिपब्लिक, इक्वेडोर, फिनलैंड, फ्रांस, न्यूज़ीलैंड, स्वीड़न, नार्वे, दि फिलिपाइंस, पोलैंड, रूस, दक्षिणी आफ्रिका, स्पेन, यु.के, ट्रिनिड़ाड, टोबैगो और अमेरिका।” घरेलू हिंसा को रोकने केलिए जो कानून बनाये जा रहे हैं उसमें प्रगति हो रही है किन्तु समस्या यह उत्पन्न होती है कि, पीड़ित महिला अपराध संबंधी कानूनों को आरोपों की पुष्टि केलिए आवश्यक सबूत उपलब्ध नहीं करा सकती है। स्टीफेनी ए. आइसेनटैट और लुंडी बैक्राफ्ट के अनुसार ‘घरेलू प्रातड़ना या उत्पीड़न दांपत्य संबंधों में पति द्वारा किया गया मानसिक, आर्थिक और बलपूर्वक यौनाचार का ऐसा स्वरूप है, जिसे शारीरिक चोटों या शरीर को क्षति पहुँचाने वाली विश्वसनीय घमकियों द्वारा चिन्हित किया जाता है।  महिला उत्पीड़न या घरेलू हिंसा उन सोचे-समझे नियन्त्रणकारी आचरणों और प्रवृत्तियों का जोड़ा है जिन्हें सांस्कृतिक रूप से समर्थन प्राप्त होता है और जो पाशबद्धता वाले संबंध-स्वरूप को जन्म देते हैं।  इस प्रताड़ना का लक्ष्य आमतौर से महिलाएँ और बच्चे ही होते हैं और एक महिला को इन बेड़ियों से मुक्त होने में वर्षों लग जाते हैं और इस पूरी अवधि में प्रताड़ना का स्तर निरन्तर बढ़ता चला जाता है।” अर्थात विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट 2002 में हिंसा (जिस में घरेलू या दांयतिक हिंसा भी सम्मिलित है) को व्यापक रूप से परिभाषित किया गया है।  अरविंद जैन जी ‘औरत होने की सज़ा’ में स्त्री उत्पीड़न के बारे में यों लिखते हैं कि “समाजसेवी संस्थाओं, शोधकर्ताओं और विचारकों के सुझाव पर 1986 में एक बार फिर बिल नंबर 44 प्रस्तावित किया गया जो राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद 26 जनवरी, 1987 से लागू हो गया है।  इस अधिनियम का नाम ‘महिला और बालिका अनैतिक देह-व्यापार नियंत्रण अधिनियम’ कर दिया गया है।  यहाँ उल्लेखनीय है कि ‘दमन’ के स्थान पर ‘नियंत्रण’ शब्द का प्रयोग किया गया है।” अंतत: शारीरिक प्रताड़ना में ऐसा कोई भी कार्य या आचरण सम्मिलित नहीं है जो इस तरह का हो कि वह उत्पीड़ित महिला, लड़की को शारीरिक पीड़ा या अन्य कोई हानि या शरीर के अंगों या स्वास्थ्य को उत्पीडित करके उसे क्षति पहुँचाए।  जिसमें उसका अपमान, उपहास, नीचा दिखाना, अनादर करना, भद्दे नामों से पुकारना आदि भी आ जाते हैं।

हमारे भारतीय समाज में पुरुष के सम्मान के लिए महिलाओं की ज़िन्दगी ले ली जाती है।  उदाहरणतया पुरुष का सम्मान, प्राय: उसके परिवार की महिला की मानी हुई यौन ‘पवित्रता’ से जुडा होता है। यदि किसी भी औरत या लड़की का यौन दूषित हो जाती है जैसा कि बलात्कार या वैवाहिक संबंधों के होते हुए स्वेच्छा से किसी और से यौनसंबंध बना लेती है उसके प्रति समाज व परिवार का मानना है कि उसने समाज व परिवार का सम्मान घटाया है तथा अपमानित किया है।  अनेक बार तो उसे इस अपमान व सम्मान के लिए अपने प्राणों की आहूति तक देनी पड़ती है।  यहाँ समस्या यह उजागर होती है कि लड़की या महिला के साथ यौन शोषण हो रहा है तो केवल वही दण्ड की अधिकारणी क्यों? पुरुष केलिए कोई दण्ड क्यों नहीं है? यौन शोषण तो पुरुष ही करता है महिला का फिर महिला किस भांति अपवित्र या अपमानित हो सकती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन 2002 की रिपोर्ट के अनुसार – “दाम्पत्यमूलक हिंसा के बारे में पूरे विश्व में किए गये 48 प्रतिशत सर्वक्षण बताते हैं कि 10 प्रतिशत से 69 प्रतिशत महिलाओं ने बताया कि उसके जीवन में कभी न कभी पति द्वारा हिंसा अवश्य की गई है। दाम्पत्य संबंधों में शारीरिक प्रताड़ना के साथ-साथ मानसिक प्रताड़ना भी शामिल होती है, और एक तिहाई से लेकर आधे मामलों में यौन प्रताड़ना भी होती है” अर्थात पति-पत्नी के मध्यम विभिन्न प्रकार की प्रताड़नाएँ एक-दूसरे से जुड़ी रहती है।  जीवन-साथी द्वारा की गई घरेलू हिंसा कभी-कभी महिलाओं की मौत का कारण भी बनती रहती है।  भारत में महिलाओं की अधिकतर हत्यायें पिटाई और आग से होती है।  औरत पर किरोसिन डालकर आग लगा दी जाती है और बाद में कहा जाता है कि ‘रसोईघर में दुर्घटनावश’ मृत्यु हो गई।  यह घरेलू हिंसा आखिर होती क्यों है?  पहला वह कि जिसमें हिंसा गम्भीर तथा उग्र रूप ले लेती है जैसे भद्दी व गन्दी गालियाँ देना, आतंकित करना व प्रताड़ित करना। साथ ही उसका नियन्त्रणकारी एवं एकाधिकार प्रदर्शित करनेवाला व्यवहार।  दूसरी हिंसा यों कह सकते हैं कि लगातार चलनेवाली कुंठा और क्रोध कभी-कभी शारीरिक प्रताड़ना के रूप में प्रकट हो जाते हैं।  घरेलू हिंसा का भड़काने का कारण भी कभी-कभी यह कह सकते हैं –
1) पुरुषों की आज्ञा न मानना।
2) उलटकर बहस करना या जवाब देना।
3) वक्त पर खाना तैयार न करना।
4) घर के बच्चों की ठीक से देखभाल न करना।
5) पुरुषों के धन या गर्लफ्रेंड़स के बारे में पूछताछ करना।
6) पति की अनुमति के बगैर कहीं चले जाना।
7) पुरुषों को सेक्स केलिए मना करना।
8) पुरुषों को पत्नी पर विश्वासघाती होने का संदेह।

प्राय: पूरे विश्व की महिलायें यह मानती हैं कि पुरुषों को अपनी पत्नी को अनुशासित में रखने का अधिकार है और आवश्यकता पड़ने पर वह उसे बलपूर्वक प्रताड़ित भी कर सकता है, लेकिन जहाँ की संस्कृतियाँ स्वयं पुरुष को महिलाओं के व्यवहार और नियंत्रण का अधिकार देती है, वहाँ सदैव दुराचारी पुरुष प्राय. सीमाएँ लाँघ जाते हैं।  अर्थात दाम्पतिक हिंसा विश्व के प्रत्येक भागों में गंभीर और व्यापक रूप से फैली हुई एक गंभीर समस्या है।  इसीलिए इस दिशा में ठोस परिणाम देनेवाले कार्यों को पूर्ण करना आवश्यक माना जाने लगा है।
महिलाओं के विरुद्ध हिंसा समाप्त करने हेतु संयुक्त राष्ट्र महासभा घोषण-पत्र वियना में संपन्न मानव अधिकार विश्व सम्मेलन (1993) द्वारा अपने घोषणा पत्र में महिलाओं के विरुद्ध हिंसा को रोकने संबंधी घोषणा को सम्मिलित करने का यह परिणाम हुआ कि 20 दिसम्बर, 1993 को संयुक्त राष्ट्र महा सभा ने ‘महिलाओं के विरुद्ध हिंसा’ को समाप्त करने केलिए एक विस्तृत घोषणा-पत्र जारी किया।  इस घोषणा-पत्र के जारी होने से ‘महिलाओं के विरुद्द हिंसा’ एक अंतर्राष्ट्रीय समस्या के रूप में सामने आई और संयुक्त राष्ट्र संघ के सभी सदस्य देशों केलिए इसका पालन अनिवार्य बन गया।  इस प्रकार घरेलू हिंसा को समाप्त करने की एक वैश्विक मुहिम प्रारम्भ हुई।  इस अंतर्राष्ट्रीय मानव अधिकार संधि को मनाने केलिए 179 देशों ने हस्ताक्षर किये थे।  यह ध्यान देते हुए कि वे अधिकार और सिद्धान्त उन अंतर्राष्ट्रीय साधनों में समाहित हैं, जैसे – मानव अधिकारों का सार्वभौमिक घोषणा-पत्र, नागरिक और राजनीतिक अधिकारों संबंधी अंतर्राष्ट्रीय प्रतिज्ञा-पत्र, महिलाओं के विरुद्ध हर तरह के भेदभाव को समाप्त करने संबंधी सम्मेलन का घोषणापत्र और प्रताड़ना तथा अन्य क्रूर मानवीय, अपमानजनक व्यवहार या दण्ट देने के विरुद्ध सम्मेलन का घोषणा-पत्र।

निष्कर्ष के रूप में कह सकते हैं कि महिलाओं के विरुद्ध हो रही ‘घरेलू हिंसा’ को स्पष्ट और व्यापक रूप से परिभाषित किया जाये तथा महिलाओं के विरुद्ध हिंसा के प्राय: सभी रूपों को समाप्त करने केलिए और अधिक प्रयास किया जाये। क्योंकि एक ओर तो जहाँ कानून बनाये जा रहे हैं, संशोधित किये जा रहे हैं तो वहीं दूसरी ओर सरकारी घोषणाओं में उन्हें लागू किये जाने की बात कही जाती है।  किन्तु वास्तव में जो परिणाम सामने आना चाहिए वह नहीं आ पाता।  आवश्यकता है तो जनता, प्रशासन और कानून तथा उसे लागू करनेवालों के नज़रिए में बदलाव की।  सादियों से जो घोषणाएँ, पारंपरिक मान्यताएँ, धार्मिक विचार, नैतिक मूल्य महिलाओं की सामाजिक, आर्थिक या व्यक्तिगत स्थिति पर अत्याचार करती आ रही है, निस्संदेह उसे एक दिन में समाप्त नहीं किया जा सकता।  लेकिन अगर व्यापक पैमाने पर प्रत्येक वर्ग और प्रत्येक माध्यम इस अभियान में पूरी शक्ति व निष्ठा से साथ दे तो विश्चित ही इस हिंसात्मक हिंसा का अंत हो सकता है।
डा . परवीन कुमारी रमा हिन्दी साहित्य में पी एच डी हैं , केरला में रहती हैं . संपर्क : Mail idparvilordshiva7@gmail.com

अधिकांश दलित परिवारों में मातृसत्ता के अवशेष अभी भी दिखते हैं : अनिता भारती

अनिता भारती


अनिता भारती साहित्य की विविध विधाओं में जितना लिखती हैं , उतना ही या उससे अधिक सामाजिक मोर्चों पर डंटी रहती हैं  खासकर दलित और स्त्री मुद्दों पर. सम्पर्क : मोबाईल 09899700767.

( प्रज्ञा पांडे के अतिथि सम्पादन में हिन्दी की पत्रिका ‘ निकट ‘ ने स्त्री -शुचितावाद और विवाह की व्यवस्था पर एक परिचर्चा आयोजित की है . निकट से साभार हम वह  परिचर्चा  क्रमशः प्रस्तुत कर रहे हैं , आज  सुप्रसिद्ध लेखिका और विचारक अनिता भारती के जवाब.  इस परिचर्चा के  अन्य  विचार पढ़ने के लिए क्लिक करें :  ) 

जो वैध व कानूनी है वह पुरुष का है : अरविंद जैन 

वह हमेशा  रहस्यमयी आख्यायित की गयी : प्रज्ञा पांडे 


अमानवीय और क्रूर प्रथायें स्त्री को अशक्त और गुलाम बनाने की कवायद हैं : सुधा अरोडा 

अपराधबोध और हीनभावना से रहित होना ही मेरी समझ में स्त्री की शुचिता है :  राजेन्द्र राव 

परिवार टूटे यह न स्त्री चाहती है न पुरुष : रवि बुले 

प्रेमरिक्‍त दैहिक सम्‍बन्‍ध निस्‍संदेह अनैतिक होते हैं : कात्यायनी

मनुष्य – आदिम मनुष्य भी – प्राकृतिक नहीं, सांस्कृतिक प्राणी है : अर्चना वर्मा 

मातृसत्तातमक व्यवस्था स्त्रीवादियों का लक्ष्य नहीं है : संजीव चंदन

आधुनिक पीढ़ी से मुझे आशा है कि परिवर्तन लाएगी : ममता कालिया

स्त्री  की अपनी जगह : शीला रोहेकर

बकौल सिमोन द बोउआर ‘स्त्री  पैदा नहीं होती बनायी जाती है’ आपकी दृष्टि में स्त्री  का आदिम स्वरूप क्या है ? 
आदिम रूप में स्त्री  स्वतन्त्र थी क्योंकि हमारे यहाँ मातृसत्ता थी। औरतें पुरुषों की तरह शिकार पर जाती थीं,  बच्चे माँ के नाम से जाने जाते थे पिता के नाम से नहीं। बच्चे पालना और घर चलाना दोनों की साँझी जिम्मेदारी होती थी। कालांतर में स्त्री को ज्यादा से ज्यादा बंधनों  में जकड़ा जाने लगा। इसमें धर्म  की भूमिका बहुत अधिक  थी। धर्म  ने स्त्री  को बन्धनों  में जकड़ कर विभिन्न भूमिकाओं में बाँध दिया  और पुरुष को उसका स्वामी बना दिया। परन्तु लाख कोशिशों के बाद भी , धर्म  की पूरी घेराबंदी करने के बाबजूद भी दलित आदिवासीस्त्री  की देह और आजादी पर उस तरह का कब्जाकरण नहीं हो पाया जैसा सवर्ण स्त्रियों का हो गया। दलित स्त्रियों को अभी भी वह स्पेस प्राप्त है, जिससे वह पूर्ण मादा या स्त्री  बनाने की प्रकिया से छूट गई। इसका कारण दलित परिवारों में एक तरह की लोकतांत्रिक मूल्यों का होना और दूसरास्त्री  पुरुष दोनों का जाति और गरीबी के कारण शोषण की चक्की में लगातार पिसना रहा है। हाँ यह बात जरूर है कि दलित आदिवासी समाज में औरत हमेशा से पुरुष से ज्यादा शोषित, दमित, उत्पीडित और हिंसा की आसान शिकार रही है।

समाज  के सन्दर्भ में शुचितवाद और वर्जनाओं को किस  तरह परिभाषित किया जाए ? 

शुचितावाद पवित्रतावाद का ही दूसरा नाम है और यह औरतों की आजादी के खिलाफ रचा गये षड्यन्त्र है। समाज में पुरुषों के लिए स्त्रियों के दैहिक शुचितावाद और पवित्र होने की शर्त धर्मिक तथा ब्राह्मणवादी पितृसत्तात्मक समाज की पहली शर्त है। धर्म  और उसके शास्त्र हमें सिखाते है कि रजकाल में स्त्री  अपवित्र होती है, उसकी देह अपवित्र होती है। वह अपनी पहली रजकाल से पहले कौमार्य रूप में ही पवित्र होती है, कन्या पूजा यानि कन्याओं को देवी मानकर पूजना उनके कौमार्य रहते ही होता है। शुचितावाद की धारणा रक्त शुचिता से भी संबंधित  है,  जिसमें किसी कन्या के विवाह से पहले उसकी देह किसी के द्वारा ना छुई गई हो। मतलब वह अपने पवित्रतम रूप मे शादी के बाद पति को भोग के लिए मिले। हैरानी की बात है ऐसी दैहिक शुचिता कभी पुरुषों के लिए नहीं देखी जाती। यह सिर्फ स्त्रियों तक ही सीमित है। जो स्त्री  पवित्र  है वह शुद्ध  है,  और जो अपवित्र वह पतित है या अशुद्ध है। यहाँ सारे तर्क आध्ी आबादी को कैद में रखने के लिए गढ़े गए है। क्या आपने कभी सुना है कि वह आदमी अपवित्र या अशुद्ध  है?

समाज के सन्दर्भ में शुचितावाद और वर्जनाओं को किस तरह परिभाषित किया जाए ?
भारतीय सामज एक ब्राह्मणवादी पितृसत्तात्मक समाज है। यह मूल्यबोध यहाँ के लोगों में चाहे वह स्त्री हो या पुरुष सबके के खून में रचा बसा है। यहाँ स्त्रियाँ भी उसी तरह व्यवहार कर सकती है,  जैसे पुरुष। यही कारण है कि वर्जनाओं से लड़ने वाली ताकत कम है और वर्जनाओं को बचाने वाली और ढोने वाली ज्यादा है।

यदि स्वयं के लिए वर्जनाओं का निर्धरण स्वयं स्त्री  करे तो क्या हो ? 
भारतीय  सामज एक ब्राह्मणवादी पितृसत्तात्मक समाज है। यह मूल्यबोध यहां  के लोगों के और सामज के खून में रचा बसा है। यही कारण है कि वर्जनाओं से लड़ने वाली ताकत कम है और वर्जनाओं को बचाने वाली और उन्हें ढोने, लादने और ओढ़ने वाली ज्यादा है। अक्सर देखा गया है कि मौका मिलने पर या सत्ता का केन्द्र बनने पर स्त्रियाँ भी उसी तरह व्यवहार कर सकती है जैसे पुरुष करते है। हम देखते ही है कि परिवार में एक स्त्री  अक्सर दूसरी स्त्री  के लिए शत्रु  बन जाती है। अक्सर स्त्रियाँ परंपरा से लड़ने के लड़ने के बजाय परंपरा का जटिल अंग बन जाती है। वह एक-दूसरे के लिए वर्जनाओं की दीवार खड़ी कर देती है। यह सब इसलिए भी होता है क्योंकि उनकी परवरिश, उनके जीवन मूल्य, उनकी आकांक्षाएँ और उनके अंदर बैठी क्रूरताएँ इसी ब्राह्मणवादी पितृसत्तात्मक समाज की देन ही है। हम देख ही रहे है कि विचारों से प्रगतिशील होने और खूब पढ़-लिख लेने के बाबजूद भी स्त्रियाँ अपनी गुलामी के चिह्न  मंगलसूत्र, माँग आदि धारण  करना तक नहीं छोड़ पाती है।

विवाह की व्यवस्था में स्त्राी की मनोवैज्ञानिक, सामाजिक एवं आर्थिक स्थितियां। कितनी स्त्री  के पक्ष में हैं ? 
विवाह अगर लोकतान्त्रिक मूल्य बोध पर  खड़ा तो वह सामान्य होने वाले विवाहों की स्थितियों से काफी बेहतर हो सकता है। पारम्पारिक विवाह स्त्रियों को पुरुष के सामने एक गुलाम और एक उपभोग के सामान की तरह प्रस्तुत करती है। इसमें स्त्रियों की इच्छा, उसकी आजादी, उसके अधिकार , उसके सपनों का कोई मूल्य नहीं होता। सारी स्थितियाँ स्त्री के विरुद्ध ही होती है। कोई कितनी भी कोशिश करें पारम्परिक विवाह सम्बन्धें में स्त्रियों का दर्जा हमेशा पुरुष से नीचा ही रहता है।

मातृसत्तात्मक व्यवस्था में विवाह-संस्था क्या अधिक  सुदृढ़ और समर्थ होती तब समाज भ्रूण हत्या एवं बलात्कार जैसे अपराधें से कितना मुक्त होता?
उत्तर-मुझे लगता है मातृसत्तात्मक व्यवस्था में विवाह संस्था मजबूत नही हो सकती है। सारी कहानी स्त्रियों को दैहिक रूप से पवित्र रखने और उससे सिर्फ अपने लिए इस्तेमाल करने के पुरुषों द्वारा विवाह संस्था के नाम पर रचे गए षड्यंत्र को मातृसत्ता धक्का देती  है। मातृसत्ता में बच्चा माँ के नाम से जाना जाता है। माँ को ही पता होता है कि उसके पेट में पल रहा बच्चा किसका है। दरअसल विवाह संस्था सुदृष्ट और मजबूत इसलिए ही है कि उसकी केन्द्र की धूरी  पुरुष है और परिवार में हर चीज के लिए निर्णायक स्थिति में वही रहता है। वंश चलाने व वंश बढाने से लेकर सम्पति पर एकाधिकार  करने और इन सब के माध्यम से स्त्रियों पर दैहिक कब्जाकरण करके वह परिवार को मजबूत रखता है। इसलिए स्त्री  की स्थिति परिवार में दोयम दर्जे की होती है। उसके सारे निर्णय उसकी ओर से उसका पुरुष ही लेता है। अब यदि परिवार में मातृसत्ता यानि औरतों की सत्ता होगी तो सम्भवत भ्रूण हत्या, बलात्कार कम होगे, क्योंकि तब औरतों की कमजोर अबला, मादा की छवि से बाहर निकलेगी। अधिकांश  दलित परिवारों में मातृसत्ता के अवशेष अभी भी दिखते है,  इसलिए परिवारों में लड़कियाँ पैदा होना या भ्रूण हत्या होना बाकि समाज के बनिस्पत बहुत कम है।

सह जीवन की अवधरणा क्यास्त्री  के पक्ष में दिखाई देती है। 

सहजीवन एक आदर्श व्यवस्था हो सकती है, पर हो नहीं पा रही है, क्योंकि यहाँ सामाजिक ढाँचा जाति और शोषण पर आधरित है। इसलिए सहजीवन में भी वही चीजें असर करती है। औरतें सहजीवन में भी अपने साथ रहने वाले साथी से मार खा रही है, जातीय प्रताड़ना झेल रही है। और सबसे बड़ी बात सहजीवन में रहकर वे अपने आप को बेहद असुरक्षित महसूस करती है। जिस सहजीवन की नीव प्यार, भरोसा और प्रतिबद्धता  की नीव पर खड़ी होती है, और अगर उसकी नीव मजबूत है और उस सहजीवन में लोकतान्त्रिक मूल्य निहित है तो यह स्त्री के पक्ष में हो सकता है अन्यथा सहजीवन स्त्रियों के लिए पारंपरिक विवाह से भी सबसे ज्यादा शोषणकारी हो सकता है।

साथ होकर भी पुरुष एवं स्त्री  की स्वतंत्र परिधि क्या है ? 
साथ  होकर भी पुरुष और स्त्री  यदि एक-दूसरे की आजादी का सम्मान करें, एक-दूसरे के काम की इज्जत करें और एक-दूसरे को भावनात्मक सपोर्ट करते हुए जिए तो इससे बेहतर कोई और रास्ता हो ही नहीं सकता। एक स्वतंत्रस्त्री  और स्वतंत्र पुरुष के रूप में हमारे सामने ज्योतिबा फुले और सावित्री  बाई फुले का उदाहरण है,  जिन्होंने एक साथ मिलकर तथा एक स्वतंत्र ईकाई के रूप में भी रहते हुए सामाजिक राजनैतिक और सांस्कृतिक बदलाव के लिए जीवन भर बहुत महत्वपूर्ण काम किये।

स्त्री की अपनी जगह

शीला रोहेकर

यहूदी मूल की हिन्दी की वरिष्ठ रचनाकार शीला रोहेकर लखनउ रहती . संपर्क : .05222308102

( प्रज्ञा पांडे के अतिथि सम्पादन में हिन्दी की पत्रिका ‘ निकट ‘ ने स्त्री -शुचितावाद और विवाह की व्यवस्था पर एक परिचर्चा आयोजित की है . निकट से साभार हम वह  परिचर्चा  क्रमशः प्रस्तुत कर रहे हैं , आज  सुप्रसिद्ध लेखिका शीला रोहेकर   के जवाब.   इस परिचर्चा के  अन्य  विचार पढ़ने के लिए क्लिक करें :  ) 

जो वैध व कानूनी है वह पुरुष का है : अरविंद जैन 

वह हमेशा  रहस्यमयी आख्यायित की गयी : प्रज्ञा पांडे 


अमानवीय और क्रूर प्रथायें स्त्री को अशक्त और गुलाम बनाने की कवायद हैं : सुधा अरोडा 

अपराधबोध और हीनभावना से रहित होना ही मेरी समझ में स्त्री की शुचिता है :  राजेन्द्र राव 

परिवार टूटे यह न स्त्री चाहती है न पुरुष : रवि बुले 

मेरे समक्ष प्रज्ञा पांडे का एक प्रपत्र है ,  जिसमें उसने ‘शुचितावाद एवं विवाह की व्यवस्था’ विषय पर आठ प्रश्न रखे हैं। और मैं सोच रही हूँ कि यह कैसी विडंबना है कि इक्कीसवीं सदी में पदार्पण कर चुका यह हमारी  पांच हजार वर्ष पुरानी संस्कृति एवं परम्पराओं वाला देश आज भी स्त्री  और उसके अधिकारों को  लेकर न स्पष्ट है और न ही रज़ामंद। स्त्री की स्वतंत्राता, स्वप्न और उड़ान स्त्री-विमर्श के किसी सकुचाये ढांचे के बाहर ठिठके-से खड़े हैं। क्या एक इतने बड़े बहुभाषी, बहुधर्मी , बहुआयामी एवं बौद्धिकता  के धनी  देश के लिए यह लाज़मी है?
बहरहाल…मैं उस तथाकथित ‘आधी  दुनिया’ की उस स्त्री के लिए कुछ कहना चाहूँगी जो अपने कैचुल से बाहर निकल रही है, जो सजग व संघर्षशील है और जो युगयुगान्तर से अपनी भूमिकाओं में बदलाव चाहती है जिससे महादेवी जी की तरह व्यथित होते उन्हें कहना न पड़े :
‘विस्तृत नभ’ का कोई कोना/मेरा न कभी अपना होना/
परिचय इतना, इतिहास यही/उमड़ी कल भी मिट आज चली।
आज की  स्त्री अपने जीवन में जूझारू ही नहीं वरन् जिजीविषा से भरी है और मिटने से पहले सार्थकता की इच्छा रखती है। उसे पता है कि इन ‘आधी दुनिया’, ‘स्त्री-वादी’ या ‘घाघरा पलटन’ जैसे उपनामों को बदलने का जोखिम तो उठाना ही है जिससे उससे आगे आने वाली पीढि़याँ कुछ बेहतर और साफ आसमां पा सके।

सवाल – जवाब 

बकौल सिमोन द बोउआर “स्त्री पैदा नहीं होती बनायी जाती है ” आपकी दृष्टि में स्त्री का आदिम स्वरुप क्या है ? 
बकौल सिमोन द बोउआर ‘स्त्री पैदा नहीं होती बनायी जाती है’ का सच क्या केवल उस पुरुष-वर्ग और मर्यादा की रक्षा और दिशा तय करने वाली स्त्रियों के  हिस्से हैं?स्त्री को स्त्री’ बनने में जितना इस समाज, व्यवस्था व ध्र्म का योगदान रहा है उससे कुछ कम प्रतिशत स्त्राी की खुद की मानसिकता का भी रहा है। अधिकांशतः स्त्री खुद को कमजोर, अनिर्णित या डांवाडोल तार्किकता वाली, विवश और अधीन  समझती है।इसी अवस्था के लिए मैं मानती हूँ कि बाहरी दबावों, नियमों, आचार सहिताओं और सार्थक-साक्षरता अभावों का योगदान भी है किंतु इन दबावों से हावी होते देखते रहना भी क्या उसी परम्परागत श्रंृखला को शुरू नहीं करती?
स्त्री का आदिम स्वरूप ‘मानवी’ का है। मानव रूपी पुरुष के विपरीत स्त्री-रूपी ‘मानवी’। किन्हीं सामाजिक दबावों, परम्परागत मूल्यों, धर्मिक कठमुल्लाओं की परिधियों  और नारी शरीर के अनगिनत डरों को अपने वजूद से झंखाड़ता-बिल्कुल बेलौस…नभ से गिरती मुक्त, स्वच्छंद और पारदर्शी बून्द  सा जीवन ही स्त्री का आदिम स्वरूप होना चाहिए। जैसे ऊंची पर्वत श्रंखला से गिरते अबाध प्रपात जैसा या खिलते फूल की प्रसन्नता जैसा। गरिमामय, आर्थिक व सामाजिक तौर पर सुरक्षित व स्वाधीन  जीवन जीना नारी का स्वप्न है। क्या यह संभव है?

क्या दैहिक शुचिता की अवधारणा  स्त्री के खिलाफ कोई साजिश है ?
वैदिक शुचिता की अवधारणा  स्त्री के खिलाफ साजिश ही नहीं अपितु अपराध की  पहली सीढ़ी है। इसी अवधा रणा को ढाल ताने पितृ-सत्तात्मक समाज उस घिनौनी सीढ़ी को पफटापफट चढ़ता सभी को गुलाम, कमतर, भोग्या, मूढ़-गंवार-पशु और दुलक्षित चीज़ समझने की हिमाकत कर लेता है और उसका ब्रेन-वाॅश कर उसे भी खुद के विषय में यही समझ लेने के लिए सफल हो जाता है। यहाँ तक कि अधिकांश स्त्रियां पुरुषों की दृष्टि से खुद को आँककर प्रतिष्ठित समझने का भ्रम पाल लेती हैं।

दैहिक शुचिता का प्रश्न प्राचीन समय से चला आ रहा है और आज भी बदस्तर चालू है। समाज का एक खास वर्ग मानता है कि दो प्रकार के स्त्री वर्ग होते हैं। एक बिंदास, खुले विचार-आचार रहन-सहन वाली, झपट्टा मारी जाए वर्ग की या देह-व्यापार कर धन  अर्जित करने वाली और दूसरे प्रकार में पतिव्रता, सती-साध्वी प्रकार । पहले वर्ग के साथ पुरुष अपनी काम-पिपासा की पूर्ति कर सकता है , उसे ‘चीज़’ या ‘माल’ समझ सकता है किन्तु ‘घर’ की स्त्रियां  बिल्कुल गौउएँ बनी रहें, अपनी आने वाली पीढ़ी को भी देह के ऊंच -नीच का पाठ रट्टा मारकर पढ़ाती रहें, आँख में तेल आँजकर लड़कियों की रखवाली करें और उनके जीवन की पहली कोंपल फूटते ही उसे घोंट कर रखे दें। ऐसे वर्ग के लिए पिता या पिता-समान, भाई या भाई-समान तो हो सकते हैं किन्तु केवल एक और एक मात्र, जैसा भी नसीब में हो पति ;प्रेमी नहीं  होना चाहिए। जिसके साथ वह शारीरिक-मानसिक और आत्मिक तौर पर सुरक्षित या असुरक्षित रहे किन्तु कम-से-कम सात जन्मों का बंधन  स्वीकारते हुए घर से विदा ले।
क्या वह आदर्श संयोजना है? मेरा मानना है कि स्त्री के विरुद्ध  यह ऐसा अपराध और षड्यंत्र है कि उसे छिन्न-भिन्न करने में स्त्री की कई पीढि़याँ चाहे खप जाएँ किन्तु इस ‘वन वे ट्रैफिक’ के दोनों सिरे खोलने की जरूरत महसूस करती स्त्री को समझने की आवश्यकता है। घर, परिवार, समाज, धर्म  और कानून स्त्री-शोषण के विविध पहलुओं पर मनन-मंथन करे और फिर  अपनी राय जाहिर करे तभी स्त्री-शुचिता का यह मकड़जाल सा प्रश्न सरल होने लगेगा।

समाज  के सन्दर्भ में शुचितवाद और वर्जनाओं को किस तरह परिभाषित किया जाए ? 
समाज में शुचितावाद और वर्जनाओं को मोटे तौर पर देखा जाए और उसको एक शब्द में आँकना हो तो केवल एक ही शब्द सूझता है…और वह है स्वार्थ। माना कि घर-परिवार स्त्री  को किन्हीं मर्यादाओं-वर्जनाओं में कुंठित करता है,  क्योंकि वे सामाजिक अराजकता, अपराध, राजनैतिक वर्चस्व और सूचना-सिनेमा के बढ़ते प्रभाव से डरे हुए हैं किन्तु उनके डर से समाज में दिनोंदिन बढ़ते ये हादसे, प्रभाव व अराजकता कम नहीं होगी बल्कि वे स्त्री  को अज्ञानतावश और भीरू, असुरक्षित और लभ्य बना देगी।
दूसरी बात यह है कि यह मनुष्य स्वभाव में है कि जिसका निषेध् हो वही करने-देखने-बरतने को मन ललचाता है। ऐसे में असामाजिक तत्वों, बाजार, सूचना के विविध् उपकरणों या सिनेमा-चैनलों के भड़काउफ-उत्तेजक, लुभावने भ्रमों में ऐसी पाबंदियों में रहती स्त्री  का आकर्षित हो जाना स्वाभाविक है और वह रौशनी के उस घेरे में चली तो जाती है किन्तु सजगता, संघर्ष या साहस की कमी के कारण दम तोड़ देती है।
मैं मुकम्मल तौर पर मानती हूँ कि आज की स्त्री  को ऐसे शुचितावाद और वर्जनाओं की बंद गली का वह अंध, संकरा और दमघोटू सिरा जिसके मुहाने पर पितृसत्तात्मक संस्थाएँ, धर्म  के मोटे-मोटे पोथे और नियमावली-व्याख्याएँ और संवैधनिक न्याय की पुरानी नीतियों-कानूनों को नकारने की, उसके समक्ष खड़े होकर लड़ने की और ललकारने की जरूरत है।

यदि स्वयं के लिए वर्जनाओं का  निर्धारण  स्वयं स्त्री करे तो क्या हो ? 
स्त्री  के पास अध्किार हो कि वर्जनाओं का निर्धरण स्वयं करे तो इस पूरी परिचर्चा की आवश्यकता ही नहीं रहती क्योंकि स्त्री  के लिए निर्धरित वर्जनाएँ ऐसे वर्गों ने लगाई है , जो खुद को स्त्री  का पैरोकार, शुभचिंतक व निर्णायक समझकर सारे नियम और निर्णय निर्धरित करता है और उस के पालन पर कड़ी नज़र रखता है। क्योंकि घर, व्यवस्था और समाज की कोई भी वर्चस्वी संस्था स्त्री  को अपनी पकड़ और जकड़ से मुक्त करने की संभावनाओं के विषय में सोचना नहीं चाहती है।
ऐसा भी नहीं कि अपवादों की कमी रही हो। पौराणिक समय से लेकर आज तक में ऐसी विदुषियाँ, वीरांगनाएँ, निडर-प्रखर और जुझारू  नारियों ने स्त्री  मस्तिष्क और गौरव को उपर उठाया है और वे उदाहरण बन गई हैं। ऐसी महिलाएँ भी हैं जो हर क्षेत्र में पुरुषों का मुकाबला कर रही हैं या उनसे आगे हैं। किन्तु यह पूरा वर्ग पूरी समाज-व्यवस्था का छोटा-सा हिस्सा है। उच्च वर्ग व मीडिया-सिनेमा से जुड़े वर्ग को अपने से श्रेष्ठ समझता  है , इसलिए जिस वर्ग के लिए इनमें से अधिकांश  प्रश्न निहित हैं वे समाज के सबसे बड़े वर्ग-मध्यम वर्ग या आम मनुष्य के हैं , जो ताउम्र इन प्रश्नों में घिरा रहता है।
फिर  भी यदि ऐसा कोई यक्ष प्रश्न है,  तो जरूर कहना चाहूँगी कि यदि सामाजिक परिवर्तन व सांस्कृतिक चेतना में इजाफा हो, प्रजातांत्रिक मूल्यों व मानवाधिकार  के प्रति जागरूकता पनपे,स्त्री  को अपने निर्णय स्वयं लेने की स्वतंत्रता प्राप्त हो, सामाजिक आर्थिक व धर्मिक दबावों के कारण मजबूरी न स्वीकारनी पड़े और अपना निजत्व व सम्मान बचाने के लिए किन्हीं समझौतों की आवश्यकता न हो तो यह आदर्श स्थिति हो सकती है। यह मुक्ति की राह बन सकता है।

विवाह की व्यवस्था में स्त्री  की मनोवैज्ञानिक ,सामाजिक एवं आर्थिक स्थितियां  कितनी  स्त्री  के पक्ष में हैं ? 


एक संस्था के रूप में  सिमोन ‘विवाह’ का विरोध करती  हैं। उनके अनुसार, विवाह की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि यह ‘सुख’ के विषय में किसी प्रकार का आश्वासन नहीं देता।विवाह की व्यवस्था में अधिकतर  स्त्रियों  की मनोवैज्ञानिक, सामाजिक एवं आर्थिक स्थितियाँ स्त्री  के पक्ष में बहुत कम दिखाई देती हैं। फिर  भी स्त्री  विवाह संस्था को चाहे वह पारंपरिक विवाह हो या प्रेम-विवाह उसे आदर्श का पर्याय समझ लेती है। क्योंकि विवाह संस्था में वह खुद को सबसे अधिक  सुरक्षित और सम्मानित समझती है। किन्तु हकीकत चौकाने वाली है।सबसे पहले तो स्त्री को सुंदरता के मानदंडों पर तौला जाता है। चरित्र के विषय में पड़ताल होती है। उपयोगिता और औकात ( माता-पिता की दौलत) पर नज़र गड़ाई जाती है तब जाकर उसे मर्यादित पुत्रों को जन्म देने वाली, पुरुष-अनुगामिनी, दामी, भोग्या, सहनशील, पतिव्रता या फिर  समर्पिता की डोरियों से बाँधकर  लाया जाता है। स्त्री  के स्वप्न, उसकी इच्छाएँ, उसके रुझान, उसके निर्णय या सरोकार की कोई खोज-खबर नहीं ली जाती। वह या तो पुत्रावधुएं  पत्नी है, माँ है या भाभी है…स्त्री  नहीं है। उसकी अपनी कोई एकल पहचान नहीं है। और तब शुरू होती है स्त्री की घुटन।
यह घुटन सामाजिक बंधनों  से अनेकानेक धागों में बेतरतीब उलझने लगती है और वह स्वयं को और अकेला, असहाय और असम्मानित पाती है। मोहभंगों का सिलसिला शुरू हो जाता है तो वह अपनी बची-खुची चेतना,सामर्थ्य  और आत्मविश्वास भी खोने लगती है और रीती हो जाती है। ऐसे में वह केवल कठपुतली रह जाती है। स्वप्न और संवेदनाहीन हाड़-मांस का पुतला।
भारतीय समाज के मध्यवर्गीय ढांचे में स्त्री  आध्ुनिक और आत्मनिर्भर तो हो गई है पर वह माहौल नहीं बना जहाँ स्त्री  अपनी आत्मनिर्भरता को खुद का हक समझकर उसका निर्वाह करे क्योंकि ससुराल में उसकी कमाई को हमेशा ‘चार पैसे कमा लिए तो क्या महारानी हो गई’ की दृष्टि से देखा जाता है और घर के किसी भी कार्यभार में रत्ती भर भी हमदर्दी नहीं मिलती। ऐसे में स्त्री  खुद को केवल एक एटीएम मशीन समझने लगती है,  जिसका काम केवल पैसे देना है! उसका सहयोग, एकनिष्ठता और भावनात्मक कोनों को नज़रअंदाज़ कर कई बार शक के दायरों में देखा जाता है। कई गृहणियाँ इन वैवाहिक जटिलताओं को स्वीकार कर लेने में भलाई सोचती हैं किन्तु आर्थिक रूप से सक्षम और मानसिक तौर पर सजग-स्वतंत्र स्त्रिायाँ ऐसी गुलामी से बाहर भी निकल आती हैं और अपने मानदंडों पर जीती हैं।

मातृसत्तात्मक व्यवस्था में विवाह-संस्था क्या अधिक  सुदृढ़ और समर्थ होती। तब समाज भ्रूण हत्या दहेज़ हत्या एवं बलात्कार जैसे  अपराधों से कितना मुक्त होता ? 
मानव-संस्कृति की शुरुआत मातृ-सत्तात्मक व्यवस्था से हुई थी,  क्योंकि स्त्री  के पास ही गर्भ-धरण करने का और एक नए जीव को इस पृथ्वी पर लाने का अधिकार  था। किन्तु जैसे-जैसे समय व्यतीत होता गया वैसे पुरुष ने गौर किया कि स्त्री उससे शारीरिक संरचना में कमतर और कोमल है। उसको मासिक-धर्म ,  जन्म देते समय कष्ट सहन करने पड़ते हैं और तब वह बेहद कमजोर हो जाती है। शिकार करते समय और दुश्मनों के साथ लड़ाई में भी उसका काम नहीं होता तो फिर  उसका वर्चस्व क्यों?
पुरुष वर्चस्व का नशा इक्कीसवीं सदी तक ऐसा बढ़ गया है कि स्त्रियों  का शिक्षित-सक्षम-आत्मनिर्भर होना, उनका बौद्धिक  और आक्रामक होना, उनका दमन व अवमानना को नकारना पुरुष सत्ता को चुभने लगा है। ऐसी संस्थायें येन-केन-प्रकारेण स्त्री  को काबू करना चाहती है। और इसकी सबसे सटीक लाठी है स्त्री  को अपमानित करना…। ब्लात्कृत स्त्री  सबसे अधिक  अपने निजत्व पर हमला महसूस करती है , जो उसे तोड़ता है शारीरिक, मानसिक  और भावनात्मक स्तर पर। बलात्कार करने वाला पुरुष प्रेमी, पति या कोई सगा-संबंधी  या अराजक तत्व भी हो सकता है लेकिन निष्पात एक ही है…उसके निजत्व के सम्मान को चोट पहुँचाना।
ऐसे में मातृ-सत्तात्मक समाज में ऐसे उदाहरण काफी कम मिलते हैं। हमारे देश में ही केरल, नार्थ-ईस्ट के प्रदेश और कुछ कबीलाई गुटों में यह व्यवस्था आज भी लागू है। चूंकि ऐसे समाज की स्त्रियाँ अपनी अस्मिता और आत्मनिर्भरता पर वर्चस्व करती है,  इसलिए वे समाज की दूसरी स्त्रियों के प्रति अधिक  संवेदनशील और उदार हैं। वे उनकी समस्यायें अधिक  संवेदनशीलता से समझ सकती है और मददगार व उदार होती हैं। पुरुष अहमन्यता को नकारती वह स्त्री -भ्रूण-हत्या को तरजीह नहीं देकर स्त्री  को अवसाद से बचा लेती है और ऐसा समाज एक बेहतर मानव-संस्कृति का उदाहरण पेश करता है , जो सराहनीय है।

सह जीवन की अवधारणा  क्या स्त्री के पक्ष में दिखाई देती है ? 
कहा गया है कि, ‘संविधान  पैतृक व्यवस्था को समस्या नहीं समझता, यह उसे अस्वाभाविक नहीं मानते हैं। भारतीय संविधन बहुत ठंडे ढंग से एक पुरुष-प्रधान  भारतीय समाज की कल्पना करता है।’
जब संविधान , समाज और मानसिकता पैतृक-व्यवस्था  विवाह  प्रथा को जायज़ और उत्तम समझते हों वहाँ सहजीवन को तरजीह देने वाला ही समाज का अपराधी  बन जाता है।
सहजीवन का प्रश्न  दो धारी तलवार है। यानी जितनी लुभावना व सुनहरा आभास देता है उतना ही घुटनभरा है। सहजीवन को अपनाना और उसे अर्जित करना…इन दोनों कथनों में फर्क है। एक में स्वेच्छा व बेबाकी है, जबकि दूसरे में निष्ठा, सम्मान और बोध है। जहाँ स्त्री खुद  को मुक्त समझ अपनी शर्तों पर जीने की आकांक्षा रखती है और सोचती है कि विवाह की घुटनभरी शर्तों से उसे मुक्ति मिल जाएगी तथा उसके चुने हुए रास्ते पर उसके मान, प्रतिभा, स्वप्नों, निजत्व और पारस्परिक संबंधें की रक्षा हो जाएगी…उसको प्ूरा-पूरा समझा जाएगा, उसे उन उबाउ परम्पराओं, बंधनों  अपमानों, दायित्वों या सीमाओं में ताउम्र बंधकर  नहीं रहना पड़ेगा…तो ऐसा नहीं है। क्योंकि विवाह संस्था या सहजीवन इन दोनों के साथ या आसपास एक पितृसत्तात्मक समाज फैला होता है , जो स्त्री को कोई स्वतंत्र और स्वायत्त जीव समझने से इनकार करता है। इसलिए स्त्री  के वजूद और आत्मा पर समाज, खाप पंचायतों, पंचों के न्यायिक फैसलों या धर्मिक दखलों और नियमों के रूप में दखल देने उसे नष्ट करने में अपनी पूरी ताकत झोंक देता है।
ऐसे मेंस्त्री को समाज की ओर से सम्मान, अधिकार , विश्वास और  आधार तो नहीं ही मिलता, वरन् उसे हमेशा तौलती और दुर -दुराती दृष्टि का सामना झेलना पड़ता है। ऐसी परिस्थितियों में स्त्री यहाँ भी घुटती है और एकाकी हो जाती है। विवाह-संस्था की गरिमामय व आभासी आवरण के नीचे जो अपराध,  असहमतियाँ, दुर्बोध्, कटुताएँ या अपमान दबे या छिपे रहते हैं…वे सहजीवन जीते युग्म में उघारे पड़ जाते हैं…और स्त्री -त्रासदी का वही खेल फिर  से शुरू हो जाता है।
सर्वेक्षण के मुताबिक सहजीवन में होते बलात्कार, सम्मान, हनन, पुरुष-एकाधिकार , प्रताड़नाएँ और परस्त्री  संबंधें का प्रतिशत वैवाहिक संबंधें से अधिक  है , क्योंकि वहाँ पुरुष किसी का जवाबदेह नहीं है और स्त्री  की यह मुक्ति समाज में अवांछनीय है। ऐसे में सहजीवन में रहती स्त्री यदि माँ भी है तो इस बंधन  से दस, पंद्रह या बीस वर्षों पश्चात मुक्त होती किस एकांत और उदासी को अर्जित करती है वह एक शोचनीय प्रश्न है।
बौद्धिक  आत्मनिर्भर, सजग और स्वतंत्र विचार और व्यक्त्वि रखने वाली स्त्री  के लिए तो सहजीवन में रहना या उससे बाहर निकलना इतना कष्टप्रद और असहनीय नहीं होगा किन्तु कमजोर वर्ग व मानसिकता वाली स्त्रियाँ अपने सहजीवन के स्वप्न के टूटने के बाद जीवन भर सामाजिक संस्थाओं, साध्ुओं-बाबाओं या न्यायपालिकाओं के चक्कर लगाती रहती हैं।
आज जब तमाम कायदे-कानून सजीवन की वैधता  पर मुखर होते दिखते हैं। समाज-सेवी संस्थायें महिलाओं के हकों की लड़ाई में उभर कर साथ आ रही हैं, विमेन हेल्प लाइन, पुलिस हेल्प नम्बर जैसे सहारे विकसित हो रहे हैं और कानूनों में कई फेर  बदल किये गये हैं तब भी स्त्री  की आगे बढ़ने की लगन, उसकी जिजीविषा, जुझारूपन व साहस को स्वीकार करने में पुरुष को दिक्कतें आ रही हैं। इसलिए अधिकारों, स्थिति और जगह, सम्मान और स्पेस तथा जीवन ;भ्रूण-हत्या, बलात्कार के बाद हत्या, प्रेम-विवाह में होती दुर्दशा आदि  की लड़ाई जब स्त्री जीत  जाएगी तब रास्ते अपने आप जगह दे देंगे।

साथ होकर भी पुरुष एवं स्त्री की स्वतंत्र परिधि क्या है? 

साथ रह कर भी पुरुष एवं स्त्री  की स्वतंत्रा परिधि तो  यही है कि दोनों को समान पारिवारिक व नागरिक अधिकार  मिलें, अनुचित भौतिक व भावनात्मक दबाव न हों, परिवार व समाज में बराबर स्तर का सम्मान मिले। स्त्री  अस्मिता का न खंडन हो न उसे उजागर कर स्वामित्व का ढोल पीटा जाए और सबसे अहम स्त्री  के स्पेस , निजत्व पर किसी तरह का हमला, दखल या नज़रअंदाजी न की जाए। एक आदर्श विवाह, आदर्श युग्म व आदर्श जीवन के यही मानदंड होने चाहिए।