स्त्री की अपनी जगह

शीला रोहेकर
यहूदी मूल की हिन्दी की वरिष्ठ रचनाकार शीला रोहेकर लखनउ रहती . संपर्क : .05222308102
( प्रज्ञा पांडे के अतिथि सम्पादन में हिन्दी की पत्रिका ' निकट ' ने स्त्री -शुचितावाद और विवाह की व्यवस्था पर एक परिचर्चा आयोजित की है . निकट से साभार हम वह  परिचर्चा  क्रमशः प्रस्तुत कर रहे हैं , आज  सुप्रसिद्ध लेखिका शीला रोहेकर   के जवाब.   इस परिचर्चा के  अन्य  विचार पढ़ने के लिए क्लिक करें :  ) 

जो वैध व कानूनी है वह पुरुष का है : अरविंद जैन 

वह हमेशा  रहस्यमयी आख्यायित की गयी : प्रज्ञा पांडे 


अमानवीय और क्रूर प्रथायें स्त्री को अशक्त और गुलाम बनाने की कवायद हैं : सुधा अरोडा 

अपराधबोध और हीनभावना से रहित होना ही मेरी समझ में स्त्री की शुचिता है :  राजेन्द्र राव 

परिवार टूटे यह न स्त्री चाहती है न पुरुष : रवि बुले 
मेरे समक्ष प्रज्ञा पांडे का एक प्रपत्र है ,  जिसमें उसने ‘शुचितावाद एवं विवाह की व्यवस्था’ विषय पर आठ प्रश्न रखे हैं। और मैं सोच रही हूँ कि यह कैसी विडंबना है कि इक्कीसवीं सदी में पदार्पण कर चुका यह हमारी  पांच हजार वर्ष पुरानी संस्कृति एवं परम्पराओं वाला देश आज भी स्त्री  और उसके अधिकारों को  लेकर न स्पष्ट है और न ही रज़ामंद। स्त्री की स्वतंत्राता, स्वप्न और उड़ान स्त्री-विमर्श के किसी सकुचाये ढांचे के बाहर ठिठके-से खड़े हैं। क्या एक इतने बड़े बहुभाषी, बहुधर्मी , बहुआयामी एवं बौद्धिकता  के धनी  देश के लिए यह लाज़मी है?
बहरहाल...मैं उस तथाकथित ‘आधी  दुनिया’ की उस स्त्री के लिए कुछ कहना चाहूँगी जो अपने कैचुल से बाहर निकल रही है, जो सजग व संघर्षशील है और जो युगयुगान्तर से अपनी भूमिकाओं में बदलाव चाहती है जिससे महादेवी जी की तरह व्यथित होते उन्हें कहना न पड़े :
‘विस्तृत नभ’ का कोई कोना/मेरा न कभी अपना होना/
परिचय इतना, इतिहास यही/उमड़ी कल भी मिट आज चली।
आज की  स्त्री अपने जीवन में जूझारू ही नहीं वरन् जिजीविषा से भरी है और मिटने से पहले सार्थकता की इच्छा रखती है। उसे पता है कि इन ‘आधी दुनिया’, ‘स्त्री-वादी’ या ‘घाघरा पलटन’ जैसे उपनामों को बदलने का जोखिम तो उठाना ही है जिससे उससे आगे आने वाली पीढि़याँ कुछ बेहतर और साफ आसमां पा सके।



सवाल - जवाब 

बकौल सिमोन द बोउआर "स्त्री पैदा नहीं होती बनायी जाती है " आपकी दृष्टि में स्त्री का आदिम स्वरुप क्या है ? 
बकौल सिमोन द बोउआर ‘स्त्री पैदा नहीं होती बनायी जाती है’ का सच क्या केवल उस पुरुष-वर्ग और मर्यादा की रक्षा और दिशा तय करने वाली स्त्रियों के  हिस्से हैं?स्त्री को स्त्री’ बनने में जितना इस समाज, व्यवस्था व ध्र्म का योगदान रहा है उससे कुछ कम प्रतिशत स्त्राी की खुद की मानसिकता का भी रहा है। अधिकांशतः स्त्री खुद को कमजोर, अनिर्णित या डांवाडोल तार्किकता वाली, विवश और अधीन  समझती है।इसी अवस्था के लिए मैं मानती हूँ कि बाहरी दबावों, नियमों, आचार सहिताओं और सार्थक-साक्षरता अभावों का योगदान भी है किंतु इन दबावों से हावी होते देखते रहना भी क्या उसी परम्परागत श्रंृखला को शुरू नहीं करती?
स्त्री का आदिम स्वरूप ‘मानवी’ का है। मानव रूपी पुरुष के विपरीत स्त्री-रूपी ‘मानवी’। किन्हीं सामाजिक दबावों, परम्परागत मूल्यों, धर्मिक कठमुल्लाओं की परिधियों  और नारी शरीर के अनगिनत डरों को अपने वजूद से झंखाड़ता-बिल्कुल बेलौस...नभ से गिरती मुक्त, स्वच्छंद और पारदर्शी बून्द  सा जीवन ही स्त्री का आदिम स्वरूप होना चाहिए। जैसे ऊंची पर्वत श्रंखला से गिरते अबाध प्रपात जैसा या खिलते फूल की प्रसन्नता जैसा। गरिमामय, आर्थिक व सामाजिक तौर पर सुरक्षित व स्वाधीन  जीवन जीना नारी का स्वप्न है। क्या यह संभव है?

क्या दैहिक शुचिता की अवधारणा  स्त्री के खिलाफ कोई साजिश है ?
वैदिक शुचिता की अवधारणा  स्त्री के खिलाफ साजिश ही नहीं अपितु अपराध की  पहली सीढ़ी है। इसी अवधा रणा को ढाल ताने पितृ-सत्तात्मक समाज उस घिनौनी सीढ़ी को पफटापफट चढ़ता सभी को गुलाम, कमतर, भोग्या, मूढ़-गंवार-पशु और दुलक्षित चीज़ समझने की हिमाकत कर लेता है और उसका ब्रेन-वाॅश कर उसे भी खुद के विषय में यही समझ लेने के लिए सफल हो जाता है। यहाँ तक कि अधिकांश स्त्रियां पुरुषों की दृष्टि से खुद को आँककर प्रतिष्ठित समझने का भ्रम पाल लेती हैं।

दैहिक शुचिता का प्रश्न प्राचीन समय से चला आ रहा है और आज भी बदस्तर चालू है। समाज का एक खास वर्ग मानता है कि दो प्रकार के स्त्री वर्ग होते हैं। एक बिंदास, खुले विचार-आचार रहन-सहन वाली, झपट्टा मारी जाए वर्ग की या देह-व्यापार कर धन  अर्जित करने वाली और दूसरे प्रकार में पतिव्रता, सती-साध्वी प्रकार । पहले वर्ग के साथ पुरुष अपनी काम-पिपासा की पूर्ति कर सकता है , उसे ‘चीज़’ या ‘माल’ समझ सकता है किन्तु ‘घर’ की स्त्रियां  बिल्कुल गौउएँ बनी रहें, अपनी आने वाली पीढ़ी को भी देह के ऊंच -नीच का पाठ रट्टा मारकर पढ़ाती रहें, आँख में तेल आँजकर लड़कियों की रखवाली करें और उनके जीवन की पहली कोंपल फूटते ही उसे घोंट कर रखे दें। ऐसे वर्ग के लिए पिता या पिता-समान, भाई या भाई-समान तो हो सकते हैं किन्तु केवल एक और एक मात्र, जैसा भी नसीब में हो पति ;प्रेमी नहीं  होना चाहिए। जिसके साथ वह शारीरिक-मानसिक और आत्मिक तौर पर सुरक्षित या असुरक्षित रहे किन्तु कम-से-कम सात जन्मों का बंधन  स्वीकारते हुए घर से विदा ले।
क्या वह आदर्श संयोजना है? मेरा मानना है कि स्त्री के विरुद्ध  यह ऐसा अपराध और षड्यंत्र है कि उसे छिन्न-भिन्न करने में स्त्री की कई पीढि़याँ चाहे खप जाएँ किन्तु इस ‘वन वे ट्रैफिक’ के दोनों सिरे खोलने की जरूरत महसूस करती स्त्री को समझने की आवश्यकता है। घर, परिवार, समाज, धर्म  और कानून स्त्री-शोषण के विविध पहलुओं पर मनन-मंथन करे और फिर  अपनी राय जाहिर करे तभी स्त्री-शुचिता का यह मकड़जाल सा प्रश्न सरल होने लगेगा।

समाज  के सन्दर्भ में शुचितवाद और वर्जनाओं को किस तरह परिभाषित किया जाए ? 
समाज में शुचितावाद और वर्जनाओं को मोटे तौर पर देखा जाए और उसको एक शब्द में आँकना हो तो केवल एक ही शब्द सूझता है...और वह है स्वार्थ। माना कि घर-परिवार स्त्री  को किन्हीं मर्यादाओं-वर्जनाओं में कुंठित करता है,  क्योंकि वे सामाजिक अराजकता, अपराध, राजनैतिक वर्चस्व और सूचना-सिनेमा के बढ़ते प्रभाव से डरे हुए हैं किन्तु उनके डर से समाज में दिनोंदिन बढ़ते ये हादसे, प्रभाव व अराजकता कम नहीं होगी बल्कि वे स्त्री  को अज्ञानतावश और भीरू, असुरक्षित और लभ्य बना देगी।
दूसरी बात यह है कि यह मनुष्य स्वभाव में है कि जिसका निषेध् हो वही करने-देखने-बरतने को मन ललचाता है। ऐसे में असामाजिक तत्वों, बाजार, सूचना के विविध् उपकरणों या सिनेमा-चैनलों के भड़काउफ-उत्तेजक, लुभावने भ्रमों में ऐसी पाबंदियों में रहती स्त्री  का आकर्षित हो जाना स्वाभाविक है और वह रौशनी के उस घेरे में चली तो जाती है किन्तु सजगता, संघर्ष या साहस की कमी के कारण दम तोड़ देती है।
मैं मुकम्मल तौर पर मानती हूँ कि आज की स्त्री  को ऐसे शुचितावाद और वर्जनाओं की बंद गली का वह अंध, संकरा और दमघोटू सिरा जिसके मुहाने पर पितृसत्तात्मक संस्थाएँ, धर्म  के मोटे-मोटे पोथे और नियमावली-व्याख्याएँ और संवैधनिक न्याय की पुरानी नीतियों-कानूनों को नकारने की, उसके समक्ष खड़े होकर लड़ने की और ललकारने की जरूरत है।

यदि स्वयं के लिए वर्जनाओं का  निर्धारण  स्वयं स्त्री करे तो क्या हो ? 
स्त्री  के पास अध्किार हो कि वर्जनाओं का निर्धरण स्वयं करे तो इस पूरी परिचर्चा की आवश्यकता ही नहीं रहती क्योंकि स्त्री  के लिए निर्धरित वर्जनाएँ ऐसे वर्गों ने लगाई है , जो खुद को स्त्री  का पैरोकार, शुभचिंतक व निर्णायक समझकर सारे नियम और निर्णय निर्धरित करता है और उस के पालन पर कड़ी नज़र रखता है। क्योंकि घर, व्यवस्था और समाज की कोई भी वर्चस्वी संस्था स्त्री  को अपनी पकड़ और जकड़ से मुक्त करने की संभावनाओं के विषय में सोचना नहीं चाहती है।
ऐसा भी नहीं कि अपवादों की कमी रही हो। पौराणिक समय से लेकर आज तक में ऐसी विदुषियाँ, वीरांगनाएँ, निडर-प्रखर और जुझारू  नारियों ने स्त्री  मस्तिष्क और गौरव को उपर उठाया है और वे उदाहरण बन गई हैं। ऐसी महिलाएँ भी हैं जो हर क्षेत्र में पुरुषों का मुकाबला कर रही हैं या उनसे आगे हैं। किन्तु यह पूरा वर्ग पूरी समाज-व्यवस्था का छोटा-सा हिस्सा है। उच्च वर्ग व मीडिया-सिनेमा से जुड़े वर्ग को अपने से श्रेष्ठ समझता  है , इसलिए जिस वर्ग के लिए इनमें से अधिकांश  प्रश्न निहित हैं वे समाज के सबसे बड़े वर्ग-मध्यम वर्ग या आम मनुष्य के हैं , जो ताउम्र इन प्रश्नों में घिरा रहता है।
फिर  भी यदि ऐसा कोई यक्ष प्रश्न है,  तो जरूर कहना चाहूँगी कि यदि सामाजिक परिवर्तन व सांस्कृतिक चेतना में इजाफा हो, प्रजातांत्रिक मूल्यों व मानवाधिकार  के प्रति जागरूकता पनपे,स्त्री  को अपने निर्णय स्वयं लेने की स्वतंत्रता प्राप्त हो, सामाजिक आर्थिक व धर्मिक दबावों के कारण मजबूरी न स्वीकारनी पड़े और अपना निजत्व व सम्मान बचाने के लिए किन्हीं समझौतों की आवश्यकता न हो तो यह आदर्श स्थिति हो सकती है। यह मुक्ति की राह बन सकता है।

विवाह की व्यवस्था में स्त्री  की मनोवैज्ञानिक ,सामाजिक एवं आर्थिक स्थितियां  कितनी  स्त्री  के पक्ष में हैं ? 

एक संस्था के रूप में  सिमोन ‘विवाह’ का विरोध करती  हैं। उनके अनुसार, विवाह की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि यह ‘सुख’ के विषय में किसी प्रकार का आश्वासन नहीं देता।विवाह की व्यवस्था में अधिकतर  स्त्रियों  की मनोवैज्ञानिक, सामाजिक एवं आर्थिक स्थितियाँ स्त्री  के पक्ष में बहुत कम दिखाई देती हैं। फिर  भी स्त्री  विवाह संस्था को चाहे वह पारंपरिक विवाह हो या प्रेम-विवाह उसे आदर्श का पर्याय समझ लेती है। क्योंकि विवाह संस्था में वह खुद को सबसे अधिक  सुरक्षित और सम्मानित समझती है। किन्तु हकीकत चौकाने वाली है।सबसे पहले तो स्त्री को सुंदरता के मानदंडों पर तौला जाता है। चरित्र के विषय में पड़ताल होती है। उपयोगिता और औकात ( माता-पिता की दौलत) पर नज़र गड़ाई जाती है तब जाकर उसे मर्यादित पुत्रों को जन्म देने वाली, पुरुष-अनुगामिनी, दामी, भोग्या, सहनशील, पतिव्रता या फिर  समर्पिता की डोरियों से बाँधकर  लाया जाता है। स्त्री  के स्वप्न, उसकी इच्छाएँ, उसके रुझान, उसके निर्णय या सरोकार की कोई खोज-खबर नहीं ली जाती। वह या तो पुत्रावधुएं  पत्नी है, माँ है या भाभी है...स्त्री  नहीं है। उसकी अपनी कोई एकल पहचान नहीं है। और तब शुरू होती है स्त्री की घुटन।
यह घुटन सामाजिक बंधनों  से अनेकानेक धागों में बेतरतीब उलझने लगती है और वह स्वयं को और अकेला, असहाय और असम्मानित पाती है। मोहभंगों का सिलसिला शुरू हो जाता है तो वह अपनी बची-खुची चेतना,सामर्थ्य  और आत्मविश्वास भी खोने लगती है और रीती हो जाती है। ऐसे में वह केवल कठपुतली रह जाती है। स्वप्न और संवेदनाहीन हाड़-मांस का पुतला।
भारतीय समाज के मध्यवर्गीय ढांचे में स्त्री  आध्ुनिक और आत्मनिर्भर तो हो गई है पर वह माहौल नहीं बना जहाँ स्त्री  अपनी आत्मनिर्भरता को खुद का हक समझकर उसका निर्वाह करे क्योंकि ससुराल में उसकी कमाई को हमेशा ‘चार पैसे कमा लिए तो क्या महारानी हो गई’ की दृष्टि से देखा जाता है और घर के किसी भी कार्यभार में रत्ती भर भी हमदर्दी नहीं मिलती। ऐसे में स्त्री  खुद को केवल एक एटीएम मशीन समझने लगती है,  जिसका काम केवल पैसे देना है! उसका सहयोग, एकनिष्ठता और भावनात्मक कोनों को नज़रअंदाज़ कर कई बार शक के दायरों में देखा जाता है। कई गृहणियाँ इन वैवाहिक जटिलताओं को स्वीकार कर लेने में भलाई सोचती हैं किन्तु आर्थिक रूप से सक्षम और मानसिक तौर पर सजग-स्वतंत्र स्त्रिायाँ ऐसी गुलामी से बाहर भी निकल आती हैं और अपने मानदंडों पर जीती हैं।

मातृसत्तात्मक व्यवस्था में विवाह-संस्था क्या अधिक  सुदृढ़ और समर्थ होती। तब समाज भ्रूण हत्या दहेज़ हत्या एवं बलात्कार जैसे  अपराधों से कितना मुक्त होता ? 
मानव-संस्कृति की शुरुआत मातृ-सत्तात्मक व्यवस्था से हुई थी,  क्योंकि स्त्री  के पास ही गर्भ-धरण करने का और एक नए जीव को इस पृथ्वी पर लाने का अधिकार  था। किन्तु जैसे-जैसे समय व्यतीत होता गया वैसे पुरुष ने गौर किया कि स्त्री उससे शारीरिक संरचना में कमतर और कोमल है। उसको मासिक-धर्म ,  जन्म देते समय कष्ट सहन करने पड़ते हैं और तब वह बेहद कमजोर हो जाती है। शिकार करते समय और दुश्मनों के साथ लड़ाई में भी उसका काम नहीं होता तो फिर  उसका वर्चस्व क्यों?
पुरुष वर्चस्व का नशा इक्कीसवीं सदी तक ऐसा बढ़ गया है कि स्त्रियों  का शिक्षित-सक्षम-आत्मनिर्भर होना, उनका बौद्धिक  और आक्रामक होना, उनका दमन व अवमानना को नकारना पुरुष सत्ता को चुभने लगा है। ऐसी संस्थायें येन-केन-प्रकारेण स्त्री  को काबू करना चाहती है। और इसकी सबसे सटीक लाठी है स्त्री  को अपमानित करना...। ब्लात्कृत स्त्री  सबसे अधिक  अपने निजत्व पर हमला महसूस करती है , जो उसे तोड़ता है शारीरिक, मानसिक  और भावनात्मक स्तर पर। बलात्कार करने वाला पुरुष प्रेमी, पति या कोई सगा-संबंधी  या अराजक तत्व भी हो सकता है लेकिन निष्पात एक ही है...उसके निजत्व के सम्मान को चोट पहुँचाना।
ऐसे में मातृ-सत्तात्मक समाज में ऐसे उदाहरण काफी कम मिलते हैं। हमारे देश में ही केरल, नार्थ-ईस्ट के प्रदेश और कुछ कबीलाई गुटों में यह व्यवस्था आज भी लागू है। चूंकि ऐसे समाज की स्त्रियाँ अपनी अस्मिता और आत्मनिर्भरता पर वर्चस्व करती है,  इसलिए वे समाज की दूसरी स्त्रियों के प्रति अधिक  संवेदनशील और उदार हैं। वे उनकी समस्यायें अधिक  संवेदनशीलता से समझ सकती है और मददगार व उदार होती हैं। पुरुष अहमन्यता को नकारती वह स्त्री -भ्रूण-हत्या को तरजीह नहीं देकर स्त्री  को अवसाद से बचा लेती है और ऐसा समाज एक बेहतर मानव-संस्कृति का उदाहरण पेश करता है , जो सराहनीय है।


सह जीवन की अवधारणा  क्या स्त्री के पक्ष में दिखाई देती है ? 
कहा गया है कि, ‘संविधान  पैतृक व्यवस्था को समस्या नहीं समझता, यह उसे अस्वाभाविक नहीं मानते हैं। भारतीय संविधन बहुत ठंडे ढंग से एक पुरुष-प्रधान  भारतीय समाज की कल्पना करता है।’
जब संविधान , समाज और मानसिकता पैतृक-व्यवस्था  विवाह  प्रथा को जायज़ और उत्तम समझते हों वहाँ सहजीवन को तरजीह देने वाला ही समाज का अपराधी  बन जाता है।
सहजीवन का प्रश्न  दो धारी तलवार है। यानी जितनी लुभावना व सुनहरा आभास देता है उतना ही घुटनभरा है। सहजीवन को अपनाना और उसे अर्जित करना...इन दोनों कथनों में फर्क है। एक में स्वेच्छा व बेबाकी है, जबकि दूसरे में निष्ठा, सम्मान और बोध है। जहाँ स्त्री खुद  को मुक्त समझ अपनी शर्तों पर जीने की आकांक्षा रखती है और सोचती है कि विवाह की घुटनभरी शर्तों से उसे मुक्ति मिल जाएगी तथा उसके चुने हुए रास्ते पर उसके मान, प्रतिभा, स्वप्नों, निजत्व और पारस्परिक संबंधें की रक्षा हो जाएगी...उसको प्ूरा-पूरा समझा जाएगा, उसे उन उबाउ परम्पराओं, बंधनों  अपमानों, दायित्वों या सीमाओं में ताउम्र बंधकर  नहीं रहना पड़ेगा...तो ऐसा नहीं है। क्योंकि विवाह संस्था या सहजीवन इन दोनों के साथ या आसपास एक पितृसत्तात्मक समाज फैला होता है , जो स्त्री को कोई स्वतंत्र और स्वायत्त जीव समझने से इनकार करता है। इसलिए स्त्री  के वजूद और आत्मा पर समाज, खाप पंचायतों, पंचों के न्यायिक फैसलों या धर्मिक दखलों और नियमों के रूप में दखल देने उसे नष्ट करने में अपनी पूरी ताकत झोंक देता है।
ऐसे मेंस्त्री को समाज की ओर से सम्मान, अधिकार , विश्वास और  आधार तो नहीं ही मिलता, वरन् उसे हमेशा तौलती और दुर -दुराती दृष्टि का सामना झेलना पड़ता है। ऐसी परिस्थितियों में स्त्री यहाँ भी घुटती है और एकाकी हो जाती है। विवाह-संस्था की गरिमामय व आभासी आवरण के नीचे जो अपराध,  असहमतियाँ, दुर्बोध्, कटुताएँ या अपमान दबे या छिपे रहते हैं...वे सहजीवन जीते युग्म में उघारे पड़ जाते हैं...और स्त्री -त्रासदी का वही खेल फिर  से शुरू हो जाता है।
सर्वेक्षण के मुताबिक सहजीवन में होते बलात्कार, सम्मान, हनन, पुरुष-एकाधिकार , प्रताड़नाएँ और परस्त्री  संबंधें का प्रतिशत वैवाहिक संबंधें से अधिक  है , क्योंकि वहाँ पुरुष किसी का जवाबदेह नहीं है और स्त्री  की यह मुक्ति समाज में अवांछनीय है। ऐसे में सहजीवन में रहती स्त्री यदि माँ भी है तो इस बंधन  से दस, पंद्रह या बीस वर्षों पश्चात मुक्त होती किस एकांत और उदासी को अर्जित करती है वह एक शोचनीय प्रश्न है।
बौद्धिक  आत्मनिर्भर, सजग और स्वतंत्र विचार और व्यक्त्वि रखने वाली स्त्री  के लिए तो सहजीवन में रहना या उससे बाहर निकलना इतना कष्टप्रद और असहनीय नहीं होगा किन्तु कमजोर वर्ग व मानसिकता वाली स्त्रियाँ अपने सहजीवन के स्वप्न के टूटने के बाद जीवन भर सामाजिक संस्थाओं, साध्ुओं-बाबाओं या न्यायपालिकाओं के चक्कर लगाती रहती हैं।
आज जब तमाम कायदे-कानून सजीवन की वैधता  पर मुखर होते दिखते हैं। समाज-सेवी संस्थायें महिलाओं के हकों की लड़ाई में उभर कर साथ आ रही हैं, विमेन हेल्प लाइन, पुलिस हेल्प नम्बर जैसे सहारे विकसित हो रहे हैं और कानूनों में कई फेर  बदल किये गये हैं तब भी स्त्री  की आगे बढ़ने की लगन, उसकी जिजीविषा, जुझारूपन व साहस को स्वीकार करने में पुरुष को दिक्कतें आ रही हैं। इसलिए अधिकारों, स्थिति और जगह, सम्मान और स्पेस तथा जीवन ;भ्रूण-हत्या, बलात्कार के बाद हत्या, प्रेम-विवाह में होती दुर्दशा आदि  की लड़ाई जब स्त्री जीत  जाएगी तब रास्ते अपने आप जगह दे देंगे।

साथ होकर भी पुरुष एवं स्त्री की स्वतंत्र परिधि क्या है? 

साथ रह कर भी पुरुष एवं स्त्री  की स्वतंत्रा परिधि तो  यही है कि दोनों को समान पारिवारिक व नागरिक अधिकार  मिलें, अनुचित भौतिक व भावनात्मक दबाव न हों, परिवार व समाज में बराबर स्तर का सम्मान मिले। स्त्री  अस्मिता का न खंडन हो न उसे उजागर कर स्वामित्व का ढोल पीटा जाए और सबसे अहम स्त्री  के स्पेस , निजत्व पर किसी तरह का हमला, दखल या नज़रअंदाजी न की जाए। एक आदर्श विवाह, आदर्श युग्म व आदर्श जीवन के यही मानदंड होने चाहिए।
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