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बहन का प्रेमी: पांच कविताएं

पवन करण


पवन करण हिन्दी के महत्वपूर्ण कवि है, ग्वालियर में रहते हैं. इनसे इनके ई मेल आई डी pawankaran64@rediffmail.com पर संम्पर्क किया जा सकता है.

( अब प्रेम का सप्ताह शुरू  हो गया है -वसंत भी दस्तक दिया ही चाहता है . पिछले दिनों प्रेम को दक्षिणपंथी राजनीति का शिकार बनाया जाने लगा है . इस  सप्ताह को लेकर चरमपंथी संगठनों का सलाना विरोध फिर से अपने चरम पर है . स्त्रीकाल ने प्रेम के इस सप्ताह को प्रेम की स्त्रीवादी कविताओं , रचनाओं , आलेखों को समर्पित किया है . आज पवन करण की कविता से शुरुआत करते हैं , आप भी करें सहयोग . ) 


एक
एक तय जगह पर मैं उसे अक्सर
खडे़ हुए देखता हूं उसकी निगाह बार-बार
मेरे घर पर जा टिकती है ?

वह मुझे देखकर वहां से हट जाए
यह सोचकर मैं उसे टकटकी लगाए
देर तक रहता हूं घूरता लेकिन मेरी
इस जिद का उस पर कोई असर नही होता

मेरी तरकश के तीरों को बखूबी झेलते हुए
आगे बढ़े यह उसका रोज का सिलसिला है

मैं छुपकर उसे कई दफे वहां से
अपनी बहन की तरफ उंगलियों की भाषा में
शब्द उछालते हुए देखता हूं
वह वहां खड़े होकर रोजाना
मेरी बहन के घर से बाहर झांकने और उससे
आंखें मिलना का करता है इन्तजार

मजा तो तब आता है जब मेरी बहन उससे
रूठ जाती है और वह दिन-दिन भर
उसके दिखाई देने की प्रतीक्षा में
वहां खड़े़-खड़े़ गुजार देता है

तब दिन-दिन भर मेरा घर
रात के आकाश की तरह
उसकी आॅखों में अटका रहता है

 दो
वह जल्दी-जल्दी एक सकरी गली में घुसता है
जो बहन के काॅलेज के रास्ते में खुलती है जाकर

गली के मुहाने पर उसे खडे़ हुए देखकर
घर से काॅलेज के लिए निकली बहन भी
छोडकर अपना रास्ता गली में घुस जाती है

फिर वह पूरी गली मजे ले-लेकर
मेरी बहन और उसके प्रेमी को
आपस में शिकवे-शिकायत करते
रूठते मनाते एक दूसरे को
चिट्ठियां  लेते-देते देखती है

गली का एक-एक घर उन्हें
लैला मजनू की तर्ज पर पहचानता है
और गली ही नही घर से काॅलेज के लिए
निकली सड़क भी मेरी बहन को
आते देखकर फुसफुसाने लगती है

देख वह गली के मुहाने पर खड़ा हो गया आकर
और अब देखना वह आएगी और उसे
गली पर खड़ा देख सीधे गली में घुस जाएगी

कई दफे तो वह यह कहते हुए
यार हम भी इतने बुरे नही
मेरी बहन को छेड़ भी देती है
लेकिन एक पकी हुई प्रेमिका की तरह
मेरी बहन पर किसी की बात का
केाई खास असर नही होता

 तीन

मोहल्ले-भर को यह बात पता है
उसके पास मेरी बहन का फोटो है
काॅलेज के परिचय-पत्र से खींचकर निकाला गया
मासूम चेहरे वाला एक श्वेत -श्याम  फोटो

जिसे वह अपने मित्रों को अपनी जेब से निकालकर
खेल में जीती हुई किसी ट्राॅफी की तरह दिखाता है
किसी खिलाड़ी की तरह जब वह सबके बीच
चूमता है उसे उस समय
उसके चेहरे की अकड़ देखते ही बनती है

फिर अपने मित्रों के बीच भी वह अकेला ही है
जिसके पास अपनी प्रेमिका का फोटो है
उसके मित्र उसे कई दफे तंग करने की नीयत से
उससे उस फोटो को छीनने की करते है कोशिश

लेकिन वह हर बार उसे मित्रों के हाथों में जाने से
बचा लेता है भले ही इसके बदले में उसे
अपने मित्रों को पड़ता हो कुछ खिलाना -पिलाना

मैं उससे भिड़ना चाहूं तो मेरी बहन के उससे
फंसे होने का इससे बड़ा सबूत
मेरे लिए और क्या हो सकता है
कि उसकी जेब में हमेशा मेरी बहन का फोटो रहता है

 चार 

अपने हर पत्र में बहन उससे अनुरोध करती है
पढ़ने के बाद मेरा पत्र फाड़कर फेंक देना

वह भी अपने हर खत में उसे भरोसा दिलाता है
पढ़ने के बाद मैंने तुम्हारे पत्र को
फाड़कर फेंक  दिया लेकिन न तो बहन ही
उसकी बात पर भरोसा करती है
और न ही वह उसके पत्रों को फेंकता है फाड़कर

सिर्फ उसके लिए घरती पर उतरी होने का
भरोसा दिलाती बहन और बस बहन के लिए
जीने का वादा करते उसके प्रेमी को
पत्रों के मामले में एक-दूसरे पर कतई विश्वास  नही

बहन के मन में यह आशंका हमेशा रेंगती रहती है
कहीं वह उसके पत्रों को अखबार की तरह सबकी
आंखों के सामने न बिछा दे

और बहन के प्रेमी को भी यह डर डसता ही रहता है
घर के कहने पर अपने कहीं किसी रोज
वह भूलकर प्रेम-व्रेम उस पर ही पलट जाए तब
तब ये पत्र ही होगे जो उस वक्त
उसे बचाने ढाल की तरह आएंगे उसके काम

पांच 
बहन की किताबों-कांपियों में कई दफे
रंगे हाथ पकड़ा गया प्रेमी का नाम
प्रेमी और उसकी मुलाकातें शिकायतों की शक्ल में
घर के कानों तक पहुंची

घर में पिता के हाथों बुरी तरह पिटी बहन
और मेरे हाथों सड़क पर खुलेआम पिटा प्रेमी
दस-दस रोज बहन को घर ने खुद से बाहर
नही निकलने दिया दो-दो तीन-तीन रोज
बहन के हाथों ने खाना छुआ तक नही

कई दफे नौबत बहन की पढ़ाई-लिखाई
रोक देने तक आ पहुंची
मोहल्ला छोड़कर चले जाने पर भी घर ने
गम्भीरता से किया विचार

बहन और उसके प्रेमी के बीच छाई हुई चुप्पी देखकर
कई दफे लगा जैसे उनके बीच नही रहा कुछ
लेकिन वह लगातार प्रेमी की सोच में
अनार की तरह फूटती रही
और वह भी निरंतर उसके भीतर सुलगता रहा

धीरे-धीरे प्रेम करती बहन और उसका प्रेमी
घर और मेरी दिनचर्या में होता गया शामिल
और मेरे भीतर का भाई
गलकर घर के फर्श पर टपकता रहा

दो पीढी तीन कवितायें

( शेफलिका  कुमार और अंजना वर्मा दो पीढियों से हैं – बेटी और मां , दोनो की कवितायें एक साथ पढें )

शेफलिका कुमार की कवितायें



डॉ०  जैसमीन अरोड़ा


वह दिल्ली जाकर
यामीन से
जैसमीन क्या बन गयी
कि उसके छोटे- से कस्ॿे में
भूचाल आ गया
किसी ने कभी
उसे बिना दुपट्टे के देख लिया
और यह भी देखा कि
वह कुरते के साथ
टाइट जींस पहनती है
कुछ जानने की जरुरत नहीं

सबको  पता है
कि ज्यादा पढने वाली
फ्री माडर्न  लड़कियों को
कैसे-कैसे एसएमएस आते हैं
अरे!
वे माँ-बाप का नाम रोशन नहीं करती
रौशन के साथ भाग जाती हैं
कहा था न ?
फोन मत दो उसे
बारहवीं के बाद ही शादी करा दो
मटन कवाब कम खिलाओ
अरे! हमारे जमाने में तो
सब्जी मर्दों के लिए होती थी
हम तो रोटी अचार के साथ खाती थी

डॉ जैसमीन अरोडा!
आज तुम एक बच्चे की ‘मॉम’ हो
तुम कितने बच्चों को
अपने नरम हाथों से
इस दुनिया में लाती हो
पर याद है तुम्हें यासमीन ?
तुम्हारा वह छोटा कसबा
जो ऊंघता रहता था दिन में भी
उसमें जब भी तुम निकलती थी
दम-ख़म के सथ
होता था तुम्हारे नाम का तमाशा

शेफलिका कुमार 

भूल


कभी -कभी
कुछ नदियों को बांधकर
तुम यह समझने की भूल करते हो
कि एक दिन
सारी नदियां बंध जायेगी
और तुम्हारे इशारों पर बहेंगी
सिर्फ तुम्हारे इशारों पर

कभी बच्चे को देखा हैं?
बोतल में धुप को कैद करने की
कोशिश करते  हुए ?
धूप की किरणें जन्म लेती हैं
सिर्फ फैलने के लिए
तुम महसूस करो या नहीं
वे बिना रुके फ़ैल जाती हैं

हर वह चीज
जो तुम्हें लुभाती हैं
जिसकी खूबसूरती और ताकत के
कायल हो तुम
उसे मुट्ठी में दबाकर रखने की
कोशिश करना
फितरत है तुम्हारी

यद इसलिए रात के अँधेरे में
ये भेड़िये निकल आये हैं
अपने निगाहें पंजो और दांतों से
नोच नोचकर
हमें रोकने की कोशिश कर रहें हैं
पर वे दिन की सच्चाई में
गीदड़ों की तरह दम दबाकर
दांत दिखाते रहेंगे
हमारे कदम नहीं रुकेंगे
हम फैलते रहेंगी
धूप की किरणों की तरह

अंजना वर्मा की कविता 

अंजना वर्मा





एक साजिश हो रही है

अब वह अड़तीस पूरे करेगी
चलते -फिरते
दिमाग में एक फिल्म की तरह
वह अपनी ही काया देखने लगती है
देखती रहती है
यह कौन है कोट औए पैंट में?
हाथों में लैप टॉप लिये ?
अंकिता नाम है इसका -अंकिता मैडम
हठात कोई बात नहीं कर सकता मैडम से
चेहरे पर बहुराष्टृीय  कंपनी की छाप
बता देती है कि कमी किस बात की
पद, अपार्टमेन्ट, गाडी,बैंक बैलंस
सब कुछ तो है?

रोयें फुलाये चिड़िया- सी फूल उठती है वह
लेकिन  तुरत ही
अपने दिवास्वपन  में देखती है वह अपने जाल
जो परिपक्व  दीये – से रूखे हो गये हैं
बचपन से पिता कहते थे
“यह मेरी बेटी नहीं बेटा है”
माँ तो कहने ही लगी
“मेरी राजा बेटा ”
वह बन भी गयी बेटी से बेटा
और बन गयी राजा
किसी की रानी नहीं बन पाई अब तक
पहले जो संबोधन
उसे पंख दे देता था उडने के लिए
शहतीरों का दर्द दे जाता है
वह टूट-पिसकर धूल मिट्टी बन जाती है
अखबार के पन्नों में “वैवाहिक” देखते ही
वह चीखना चाहती है
“अरे! किसी को याद भी है
कि मैं बेटी हूँ?”

बिल्किस … तुम कहाॅं हो …. ?

प्रो.परिमळा अंबेकर

प्रो.परिमळा अंबेकर हिन्दी विभाग , गुलबर्गा वि वि, कर्नाटक में प्राध्यापिका और विभागाध्यक्ष हैं . परिमला अम्बेकर मूलतः आलोचक हैं हिन्दी में इनकी यह पहली कहानी है  संपर्क:09480226677

( एक ऐसे समय में जब देश का माहौल साम्प्रदायिक विषाक्तता से भरा जा रहा हो परिमला अम्बेकर की यह पहली कहानी हिन्दू -मुस्लिम लडकियों के आपसी साख्य से शुरु होती है और साझी संस्कृति की सुंदर अनुभूति से भर देती है . उत्तरी कर्नाटक के परिवेश में घटित की गई एक अनिवार्य पठनीय कहानी . ) 


अंजू की अम्मा !! अंजू की अम्मा !! आवाज सुनकर एक ही छलांग में बाहर के दरवाजे पर आ गयी थी मैं हमेशा की तरह । हाथ मे कटोरा थामे खडी थी बिल्किस !! हाथ को आगे बढाते हुए  कहा ‘‘ पम्माम्मा !…नानी बीमार है… निम्बू का अचार होना है … अम्मी ने कहा है ।”  कटोरा लेकर मैं भीतर आ गयी । उसे भीतर बुलाने की नाकाम कोशिश, इससे पहले मैं,मेरी माॅं और बहने बहुत बार कर चुकी थी । बिल्किस है कि हमारे घर के दहलीज कोे लक्षमण रेखा मानकर बाहर ही खडी होकर गुहार लगाती । अंजू की अम्मा !!अंजू की अम्मा !!
मुझे याद है , माॅं आम नींबू चिंच करेला … के अचारों के कनस्तर भर -भर कर रखती । अचार की तैयारी  के उसके हिसाब में केवल घर के ही सदस्य नहीं शामिल रहते, साथ में मुहल्ले  भर के लोग भी  फेहरिस्त जगह  बना लेते। उत्तर कर्नाटक का जिला यादगीर  आज से चालीस पैंतालीस साल पहले एक छोटा सा गाॅंवनुमा शहर था । बीचोबीच बसा बडा सा नहर, इसे स्टेशन और उूरू यानी शहर में बाॅंट दिया था । गाॅंव का स्टेशन का इलाका, जहाॅं अपना घर था, वहाॅं मुस्लिम -आबादी घनी थी । मेरे घर के अगल बगल में बसे मुसलमानों  के घर, उन घरों के सदस्य उनकी खुशियां, उनके गम उनके त्यौहार इन सबों में मुझे बिंदास एन्ट्री दिलानेवाली चीज थी तो यह आचार का कटोरा । माॅं के दिये आचार के कटोरे के दबदबे से, बडे शान और विश्वास के साथ उनके घरों में  मेरा आना जाना लगा रहता ।

बिल्किस और माॅं के हाथ का अचार मेरे लिये  द्वैत तत्व थे, दार्शनिक अंदाज मे कहूॅं तो,  इश्के मिजाजी भी थे,जिनके माध्यम से मैं, इन परिवारों के शादी -ब्याहो में, रमज़ान मुहर्रम में, बडों का ईद, मिन्नत फातेहा आदियों में शिरकत करने के अपूर्व आनंद के ईश्क ए  हकीकीे तक पहुॅंच जाती!!मैं किसी कीमत पर इन दोनों को खोना नहीं चाहती थी। कारण वक्त बेवक्त बिल्किस के हुक्म को सर आॅंखों पर बजा लाती । मै स्कूल से आकर, बस्ता पटककर सीधे बिल्किस के पास जाती । माॅं आवाज देती ही रहती लेकिन मैं हूॅं कि, अलादिन के जिन्न की तरह बिल्किस के घर के टाट के परदे के नीचे से होकर आंगन में दाखिल हो जाती । वहाॅं , मुर्गी के चूजों को टोकरी में बंद करने के लिये दौड लगाते -लगाते बिल्किस मुझे आदेश देती ‘‘पम्मम्मा जरा जवारी का टोकरा, गिरनी में जाको रख के आव , मैं अभी आयी ‘‘ जी आका ! कहते मै उसका हुक्म बजाती । उसके बाद क्या था, हाथ में फटी पुरानी थैली लेकर इस्मैल की दुकान से सौदा खरीदना !, दादी अम्मा के लिये हकीम से काढा लाना!, बीच बीच में मेरी माॅं और बहनों के आदेश बजाना ! आदि आदि । मेरी इस जी हुजूरी के बदले में क्या माॅंग मैं उसके सामने रखती,  उसका अंदाजा बिल्किस को पहले से ही रहता ।

खानदान के अच्छे दिनों के यादगार के रूप में बिल्किस के घर के कोने में लकडी के नक्काशीदार फ्रेम में जडा एक आलीशान ऐनक रक्खा रहता था। उसके नीचे के संदूक में चांदी के गिलिट का सुरमेदान भी रक्खा रहता । सब काम निपट जाने के बाद, उस सुरमेंदान की काडी को मेरी ओर बढाते,दबी आवाज में कहती ‘‘ जल्दी से लगा लो पम्माम्मा , नही तो आपा आजा यगी ‘‘ डरते डरते, अपने दोनों आॅंखों के कोरों में सुरमें की ठंडक को बसाकर , लंका जलाकर निकल पडे हनुमान केविजय की अंदाज में जब चुपके से परदा हटाकर बाहर निकलते तब , कोई  देखे या न देखे , नीले भुक्क हुए  मेरी आॅंखों को देख , दालान पर पान चबाती बैठी दादी माॅं के पोपले होटों पर हॅंसी की हल्की लालिमा का रस जरूर रिस जाता ।

खैर !! लगभग सात या आठ साल का मेरा बच्चापन पडोसी बिल्किस के लिये अलादिन का चिराग सा था । मुझसे चार पाॅचं साल बडी, पढायी लिखायी से दूर, घर के काम में जुटी जुती बिल्किस के लिए मै और मेरा साथ फ्रायड के कहे अवचेतन मन का वह हिस्सा था , जहाॅं  वह अपने चेतनमन के हर असंभव को मुझपर रौब जताकर संभव में परिवर्तित होते पाना चाहती!लेकिन इस मानसिक द्वन्द्व का सारा खमीर जब उसका उतर जाता तब शुद्धमन से मुझे प्यार भी बहुत करती ।  यूं तो मुझे उसके किसी बात से आपत्ति  नहीं रहती, बस रहती तो इस विषय को लेकर कि वह मेरे घर के सामने आकर, मेरी माॅं को अंजू की अम्मा के नाम से क्यूॅं बुलाती है। केवल बिल्किस ही नहीं सारे मोहल्ले भर के लोग भी मेरी माॅं को मेरे नाम नहीं बुलाते थें । उसकी पहचान बडी दीदी के साथ ही रहता । मैं माॅं से हमेशा कहती, ‘‘ अव्वा!ये सभी तुम्हें बडी दीदी की अम्मा! के नाम से क्यूॅं पुकारते हैं ?  आपत्ति भरे  मेरे लहजे को माॅं तो बस हॅंसकर,गब्बारे की तरह फुगे मेरे गालों की हल्की चुटकी लेते कहती ‘‘ क्यॅू कि तू हमारी नहीं हैं । दूधवाली मरेम्बी हैं न ..! तू उसकी बेटी है । भूसा देकर तुझे खरीदा है … ‘‘ इसे सुन दांत निपोरकर हॅंसने में मेरी बहनों को बडा मजा आता । मुगलयी कर्नाटक के इस प्रदेश में , बडे बच्चों के नाम से माॅं बाप को पहचानने का, बुलाने का रिवाज है । जैसे अंजू की अम्मा, रघू के अब्बा, हकूडी की अम्मा, खाजा के अब्बा …. !! इस व्यवहार ज्ञान का भान जब मुझे हुआ  तब तक बिल्किस के जीवन से मैं बहुत दूर जा चुकी थी ।

मेरे और उसके घर होनेवाले त्यौहारों के और उत्सवों के वजन हमारे संबंध के पलडे में  लगभग समान तुल जाते । जिसके ही बल, हम आपस में इतराते, दंभ भरते। दिवाली के पटाखे के साथ मैं अपना ताव दिखाती तो वह ईद के इत्र सुरमे के साथ, रंगीन दुपटटे को ओढकर मेरे सम्मुख  वह इठलाती । मेरे घर के बैठकखाने के आले में चकमकी बल्बों के प्रकाश मे बिराज रहे गणपति  को जब वह आॅंखें फाडे फाडे देखती तो मेरे गर्दन की  अकड कुछ बढ जाती  । इसका बदला वह अपने घर होनेवाले शादियों में लेती । मेहंदी रंगे हाथों में नगीने जडे लाख की चुडिया को भर भरकर मेरी कलई जरूर खोलती !हर बार उसे मात देने का मेरा पैतरा भी चुना चुना रहता । लेकिन मुझे मुॅंह की तब खानी जरूर पडती जब, मोहरम का महीना लग जाता। गली कूचे के इमाम बाडों में पीर बैठने , सजने लगते । मुहर्रम् के महीने में तो बिल्किस जैसे मुझे पूरा का पूरा अपना दास बना लेती। हर रोज शाम को,  हाथ में मोरा शक्कर की पुडगी ,अगरबत्ती और चिराग लिये जा रही होती . बिल्किस के साथ साथ खुद भी जाने का, माॅं के दिये अठन्नी से खुद भी मोरा शक्कर खरीदकर,लाल,पीले,हरे रंगों मे सजे पीरों के सामने चढाने का आनंद ही कुछ और होता!!

बारह  बजते हलगी की आवाज , बुरखे से बाहर झांकते औरतों के चेहरे, शक्कर पर बिनबिनाती मक्खियाॅं … !! सजदे के लिए झुका मेरा माथा ! जब उठता तब, चमकीले लाल पीले हरे चमकीले रंगों में ,अलग अलग आकारो में सजे इमामबाडे के पीर मेरे बचपन को अद्भुत विशालता से भर देते थे। अजीब सिहरन और कंपकंपी सर से लेकर पैर तक दौड जाती ! हडबडाकर, पास खडी बिल्किस का हाथ थाम लेती। मेरे भय को अपनी , खुशी में तब्दील करते, विश्वास के साथ मेरा हाथ था लेती । तब हम, हरा साफा, कौडियों की माला, चौकोनाकार लंुगी बांधे, मोर के पंखे की जादू दिखाने हाथ में झाडू लिये खडे इमाम के सामनेेघुटने के बल खट् से झुक जाते।यह सिलसिला यूूॅं ही महीने भी चला चलता। हमारा मन नहीं भरता था जब तक कि अलग अलग गलियों बस्तियों में जाकर वहाॅं सजे सारे पीरों के दर्शन नहीं कर लेते और उन पीरों की तुलना में अपनी बस्ती  के पीरों का ही अधिक अच्छे होने का, अधिक सच्चे होने का दम भरते भरते घर न लौटते ।

मेरे घर के सामने से दो रास्ते निकलते थे । एक सीधा हनुमान मंदिर की ओर और उससे लगे आटे की गिरनी की ओर जाता, जिस गिरनी को बिल्किस के गौस चाचा चलाते थे और दूसरा रास्ता यल्लम्मा के मंदिर के पिछवाडे चबूतरे से जा लगता । यल्लम्मा मंदिर के बडे से चबूतरे की बायीं ओर काले पत्थरों से चुनी बावडी बनी थी, जिसके मुंडेर पर बरगद का पेड अपनी लंबी -लंबी बाहें  फैलाये खडा था । मंदिर के सामने बहुत बडा खुला मैदान था,  जिसका दायी ओर का छोर हनुमान मंदिर के चैकाकार चबूरते को समेटे रक्खा था ,जिससे जाकर पहला रास्ता मिलता था। यलम्मा मंदिर के सामने का खुला मैदान कोई  साधारण मैदान नहीं था, उसे, अपने में  दिल्ली का प्रगति मैदान ही समझिये!! उत्तर कर्नाटक के देसी नाटकों की मंडलियाॅं,बयलाट, दोड्डाट की टोलियाॅं अपना स्टेज इसी मैदान में जमाते । यल्लम्मा के उत्सव में चढावे के लिये लायी गयी असंख्य बकरी और भैंसों के सिर यहीं हलाल होते । भरी दुपहरिया में, बर्तनों पर गिलिट चढाकर उसे चांदी की तरह चमका देनेवाले कारीगर,  टिन के डब्बों को काटकर उसे अलग अलग आकर के छोटे छोटे डिब्बे बनानेवाले कामगर ,खोमचेवाले, चूडियाॅं बेचनेवाले, लगभग सभी यहीं, इसी खुले मैदान में अपना डेरा डालते । गाय भैंसों के पैरों में नाल चढाने के लिए, उनके बदन पर गरम सलाखों से दाग के पहचान चिन्ह बनानेवाले मुश्टंडे भी अपने जानवरों के साथ इसी मैदान में आकर जुट जाते । और तो अैार इस मैदान को, गाय और भैंसों को गभाने के लिए भी काम में लिया जाता था। मैं और बिल्किस अपने और यार दोस्तों के साथ इन सारी प्रक्रियाओं को आॅंखे फाडे यंत्रवत् देखते ठहरते या मंदिर के कट्टे पर कतार बांधकर बैठकर अपने मुहल्ले के इस प्रगति मैदान में घटने वाली हर घटनाओं के लिए मूक साक्षी बनते जाते। अंधेरा घिरते न घिरते, मंदिर के कट्टे पर बैठकर संजोये बटोरे अपने इस लोकज्ञान के पिटारे को , बिल्किस की दादी माॅं के सामने एक- एक करके खोलते जाते । और दादी माॅ थी की एक -एक किस्से को बडे चाव से सुनते जाती और अपने पोपले मुॅंह को खोले -खोले हॅंसते जाती । लेकिनहमें पता ही नहीं चलता कि , अगल बगल में बैठी बिल्किस की अम्मा और उसकी चाचियाॅं भी मुॅंह में साडी का पल्लू ठूॅंसे ठूॅंसे हॅंसते जा रही है ! हॅंसते जा रही है !!

खैर ! यादगिर का, मेरे मुहल्ले का यह प्रगति मैदान इसलिये भी मुझे अजीज था, क्यूंकि  मुहल्ले भर के सारे पीर, मुहर्रम के आखिर दिन दफ्फन के लिए यहीं इसी मैंदान में आ जमा होते । लोगों से ठसा ठस्स भरा मैदान, मंदिर का चबूतरा, बावडी का मुंडेर, काले काले मुंडियों के खेत में उॅूचें उूॅंचे उगे लाल पीले हरे रंग के चमकीले, फूलों से सजे,सॅंवरे लहराते पीर !! एक ही धुन में एक ही ताल में बीस -बीस जोडे हलगी के बजने की ऊंची  दिल दहलानी आवाज, अलग अलग घेरों में बटे उठते झुकते , लहराते , दौडते पीर !!साथ में ‘‘ पीरों की दोस्तराओद्दीन…. !! ‘‘ की आकाश गुंजादेनेवाली ध्वनि  …!! हम सभी बच्चों के छक्के छूट जाते।इमाम बाडों में सजे बैठे पीरों की सौम्यता, अद्भुत  सौन्दर्य, खुले मैदान में घिरे लोगों के समंदर के बीचों बीच खडे पीरों की रौद्रता और उग्रचेतना के सौन्दर्य में पर्यवसित होते जाता… हमें पता तक नहीं चलता । हमारी लीडर बिल्किस हमें समझाती, बहते मेरे आॅंसुओं को अपनी चुनरी के कोर से पोंछतीं और कहती ‘‘ पम्माम्मा रोना नै… रोना नै… ”

मेरी छोटी सी खोपडी में यह बात समा नहीं पाती कि आखिर पीर जाते कहाॅं है ? मेरे इस प्रश्न का कोई  उत्तर नहीं देता । दफ्न के अंतिम क्षणों में उदासी इतनी घनी हो जाती कि , हर कोई  अब रो पडा ,तब रो पडा । मेरे बचपन  की कल्पना शक्ति ने एक तिलिस्म भरे राज को मेरे सामने खोल दिया था । मै सोचती, शायद उस बावडी में प्रकाश का कोई अंतर्जलीयसुरंग मार्ग जरूर होगा, जिसके ही जरिये सारे देवी देवता, चाहे ओ मेरे हो या बिल्किस के, अपने अपने घरों को पहुॅंच जाते होंगे !!

शाम से ही पीरों के पीछे -पीछे दौडते फिरते जैसे पैरों में सीसा भरने लगता । मनभर के अपने पैरों को खींचते -खींचते घर की ओर जब लौट पडते ( वह भी दो तीन बार अपने अपने घरों से हिदायतेे आने के बाद) ,हमारा मन तब भी मैदान की धूली में ही रमे रहता । जैसे जैसे घर की ओर हमारे कदम बढते जाते पीछे पीछे, हलगियों की धुन , मातम के अवसाद की रूह छेडने लगते। शाम का सारा उल्लास उम्मंग, रात के घिरते न घिरते सारे जहाॅं में उदासी का सामान सजाने लगता।

गहन अंधेरी रात मे, बिस्तर पर चद्दर ओढे सोये मेरे कानो में , दूर से हवा के सहारे लहराते आते गीतों के धुन की उदासी , जैसे कोहरा बनकर टपक रही होती !मेरे कान उसी दिशा में लगे रहते । माॅं के मना करने पर भी, उठ पडती, और खिडकी के किवाड से झांकने लगती । धुप्प अंधेरे में रास्ता बनाते हुए  मेरी आॅंखें , सर पर बडे- बडे गठ्ठर बांधे,अवसाद भरे कदमों को उठाते हुए , रूंधे गले से गीत गाते हुए  गली के उस छोर से मुडते अदृश्य होते जाते उस काफिले को पहचान जाते । गीतों के बोल हवा में घुलते जाते, काफिला आगे बढता जाता और उसके पीछे जैसे रूलायी का समंदर ही ठाठे मारने लगता। खिडकी के सलाखों को पकडे मेरे दोनों हथेलियों पर टप् टप् आॅंसू टपकने लगते !!

अरे… यह क्या… आज क्यूूॅं बचपन के वे ही आॅंसू के बू6द  फिर से मेरी हथेली पर टपकने लगे हैं ? आॅंसू में वही गंध, वहीं सिहरन !! टी वी  के सामने बैठी मैं , आॅंसुओं से भीगे अपने निस्तब्ध हथेली को देखते जाती हूॅं। आॅंसुओं के पार से टी वी  पर के उठते बदलते चित्र अस्पष्ट होने लगते हैं । लेकिन कान… कान तो खुले ही हैं …!!कानों पर चैनल समाचार विशेषज्ञ की आवाज हथोडे की तरह बजने लगती है  । आज पेशावर में ………फौजियों के बच्चों के स्कूल में ……… !!!
मन चीखने लगा … बिल्किस….. तुम कहाॅं हो….?

महिला मानवाधिकार बनाम घरेलू हिंसा

डा . परवीन कुमारी रमा


स्त्री -पुरुष  के बिना विश्व की निरन्तरता, विकास असम्भव है।  इन दोनों के बिना विश्व, परिवार और मानव जीवन अधूरा एवं रिक्त है। दोनों का अस्तित्व एक-दूसरे की अनिवार्य शर्त है।

स्त्री और पुरुष , ‘तुम’ और ‘मैं’ एक समस्या रहे हैं   जे. कृष्णमूर्ति के अनुसार –
“You and I are the Problem
and not the world, 
because the world is the 
Projection of ourselves and 
to understand the world we
must understand ourselves,
The world is not separate from
us, we are the world, and our
problems are the world’s problems.”

अर्थात ‘तुम और मैं समस्या हैं, हम संसार नहीं हैं।  क्योंकि संसार तो हमारी अपनी प्रतिच्छाया है और इस संसार को समझने केलिए हमें स्वयं को समझना है।  यह संसार हमसे अलग नहीं है, हम ही यह संसार हैं और हमारी समस्याएँ ही संसार की समस्याएँ हैं।”  अंतत:  इन प्रत्येक समस्यों का समाधान हम अधिकार टकराव में न रखकर स्वयं में ही खोजें, हम अपनत्व में खोजें आत्मियता की सरसता.   यह अधिकार चेतना मानवाधिकार के  संदर्भ में अर्थपूर्ण सिद्ध होगी।

डाँ. जगदीश्वर चतुर्वेदी जी ‘स्त्रीवादी साहित्य विमर्श’ में  लिखते हैं कि “स्त्री की समानता के संघर्ष के प्रति दया या सहानुभूति की ज़रूरत नहीं है बल्कि, यह महसूस करने की ज़रूरत है कि यह तो उसका अधिकार था जो उसे दिया जाना चाहिए और इसे देने में अगर मनोवैज्ञानिक, राजनीतिक, सामाजिक या आर्थिक असुविधाएं आये तब भी उसे दिया जाना चाहिए क्योंकि, स्त्री तो सर्जक है, उत्पादक है, श्रमिक है, वह उपभोक्ता नहीं है।  स्त्री को सर्जक की बजाय ज्योंही हम उपभोक्ता बनाते हैं तो एक ओर उसकी सामाजिक सीमा बांध देते हैं वहीं दूसरी ओर उसके सारे अधिकार भी छीन लेते हैं।  उसे उसकी स्वतंत्र पहचान से भी वंचित कर देते हैं अत: स्त्री समानता केलिए चलाया गया संघर्ष पितृसत्ताक विचारधारा के साथ-साथ उपभोक्तावादी पूंजीवादी विचारधारा के साथ भी है। स्त्री समानता का संघर्ष सामाजिक-आर्थिक एवं राजनीतिक इन तीनों स्तरों पर एक ही साथ चलना चाहिए।  इस क्रम में पुंसवादी विचारधारा द्वारा स्त्रियों में पैदा किया गया विभाजन (दलित महिला, सवर्ग महिला, पिछड़ी महिला आदि)  टूटेगा साथ ही स्त्रियों में समानता का बोध पैदा होगा।”  अर्थात अधिकार मानव होने के कारण उसे जो अधिकार प्राप्त हो वे क्या हैं?  कौन उन अधिकारों से उसे वंचित करता आया है? अंतत: जीवित रहने का अधिकार, जो अधिकार सर्व वांछित है, अर्थात सुरक्षा का अधिकार एवं संरक्षण अधिकार।  जीवन कल्याण अधिकार।  ये मुख्य अधिकार हैं। ये अधिकार कब मिल सकते हैं, इसके लिए वर्तमान तथा आने वाली पीढ़ी दोनों को ही स्वयं आत्म-निरीक्षण करना होगा और उक्त दोनों अधिकार उनके कर्तव्य बोध के संदर्भ में तय किया जाने चाहिए।

अब प्रश्न यही उत्पन्न होता है कि क्या भारतीय संविधान में मूल अधिकारों के रूप में इन अधिकारों के प्रावधित करने के पश्चात भी भारतीय स्त्री  को क्या  समान अधिकार प्राप्त हुआ है?  क्या उसको संविधान के प्राक्कथन में किया गया वादा न्याय – सामाजिक, आर्थिक तथा राजनीतिक,  उन सच्चे व सत्य अर्थों में प्राप्त हुआ जिसका वादा 26 जनवरी 1950 को किया गया था।  संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा प्रकाशित ‘ दी ह्रूमन डेवेलपमेन्ट रिर्पोट: दी प्रोग्रेस ऑफ दी वर्ल्ड्स वीमेन  रिपोर्ट’ में भारतीय  महिलाओं की स्थिति में सुधार बताया गया है।  उसके पश्चात दी ‘ यू. एन. डी. पी. डाक्यूमेन्ट के समान’ ही ‘ दी यू. एन. फण्ड फॉर डेवेलपमेन्ट आँफ विमेन (यू. एन. आई. एफ. ई. एम.)’ के  स्कोरकार्ड में  भारतीय प्रयासों की सराहना की गई है,  जिसके अन्तर्गत भारतीय महिला के लिंग समानता के क्षेत्र में कार्य किया जाना बताया गया है लेकिन व्यवहारिक आकलन यही सिद्ध करता है कि अभी कुछ अधिक प्राप्त नहीं हुआ है और अधिक दूर जाने की आवश्यकता है।
“The advances towards the gender equality have been uneven and there is still a long way to go to make the premises made at Beijing a reality.” अर्थात जेंडर समानता के क्षेत्र में जो प्रगति हुई है, वह समतल नहीं है और बिजिंग सम्मेलन में जो वादे किया गये हैं , उनको वास्तविकता में बदलने केलिए बहुत लम्बी यात्रा तय करनी है।  अर्थात महिलाओं को सबल बनाने केलिए निर्णय लेने के स्तर पर महिलाओं का प्रतिनिधित्व आवश्यक है व महत्वपूर्ण स्थान रखता है।

आज मुख्य असमानता का कारण समाज में महिलाओं का निम्न स्तर होना है, जिसमें कानून में भेदभाव तथा महिलाओं के प्रति अत्याचार एवं हिंसा भी सम्मिलित है।  महिलाओं के प्रति मानसिक तथा शारीरिक हिंसा जन्म से मृत्यु तक बराबर होती रहती है।  आज सभी देशों में महिलाएँ जहाँ इक्कीसवीं सदी की वैश्विक समस्याओं और चुनौतियों से जूझ रही हैं, वहीं बढ़ती गरीबी और आर्थिक अनिश्चितता तथा आए दिन बढ़ते महिला उत्पीड़न और दिल दहला देने वाली हिंसात्मक घटनाओं का शिकार होती महिलाओं ने एक बार फिर विश्व में मानव अधिकारों के हिमायती, समानता और सुरक्षा तथा शांति की दुहाई देनेवाले राष्ट्रों के नेताओं,  अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं और समुदाओं के सामने इस कड़वे सच को उजागर करके, उनके मुखौटे उतार फेंके हैं।  क्योंकि महिलाओं को लिंग भेद के कारण कानूनी अधिकार, सामाजिक अधिकार और आर्थिक अधिकारों का न मिलना आज भूमण्डलीकरण की एक बड़ी चुनौती बन गई है।  इसी कारण महिलाओं का आज सबसे अधिक शोषण हो रहा है।  इसकी सबसे भयावह समस्या अवैध देह व्यापार के रूप में पूरे विश्व के सामने खड़ी है।  अवैध – देह – व्यापार में शोषण, वेश्यावृत्ति, बलपूर्वक श्रम कराना या गुलाम बनाकर देह-व्यापार करना शामिल हैं।  भूमण्डीकरण की इन तमाम चुनौतियों के मद्दे नजर रखते हुये आज महिलाओं की मांगे निरन्तर बढ़ती जा रही हैं।  “विश्व इक्कीसवीं  सदी में प्रवेश कर चुका है।  नई विश्व-व्यवस्था महिला और पुरुषों के समान अवसरों से ही प्राप्त हो सकती है। जब तक विश्व में महिलाओं की आधी आबादी त्रासदी से मुक्त होकर पुरुषों के समान अवसर युक्त जीवनयापन नहीं कर सकेगी,  विश्व-विकास का सपना अधूरा ही रहेगा।  अपनी योग्यता एवं क्षमता के अनुसार हर क्षेत्र में महिलाओं को जब समान अवसर उपलब्ध होंगे, तभी सही विकास होगा।  यद्यपि विश्व में और खासकर भारत में विछले वर्षों में काफी प्रयत्न किया हैं, तदापि अभी भी बहुत कुछ करना बाकी है।”

संयुक्त राष्ट्र संघ की संस्था यूनिफेम की एक रिपोर्ट के अनुसार 45 देशों ने महिलाओं के साथ होने वाली घरेलू हिंसा को रोकने के लिए सुनिश्चित कानून बनाए।  महिलाओं के साथ विभेदकारी व्यवहार की समाप्ति की घोषणा 7 नवम्बर, 1967 को संयुक्त राष्ट्र संघ महासभा द्वारा अंगीकृत किया गया था।  इस घोषणा के अनुच्छेद 10 के अन्तर्गत यह प्रावधान किया गया है कि महिलाओं को फिर वे चाहे विवाहित हों अथवा अविवाहित, पुरुषों के साथ आर्थिक तथा सामाजिक क्षेत्र के सभी समान अधिकार प्रदान किये जाने केलिए समुचित व्यवस्था की जायेगी और विशेषकर –
(क) विवाहित स्तर के आधार पर अथवा किसी अन्य आधार पर बिना किसी भेदभाव के कार्य के व्यवसाय सम्बन्धी प्रशिक्षण प्राप्त कर सके तथा व्यवसाय चयन और रोजगार में उसके साथ किसी प्रकार का भेदभाव न करें।
(ख) पुरुषों के समान मजदूरी तथा उसी के समान कार्य में समान व्यवहार हो।
(ग) वेतन सहित अवकाश का अधिकार, सेवामुक्ति, विशेषाधिकार तथा बेरोजगारी, बीमारी,  वृद्धावस्था  अथवा काम करने की अन्य अयोग्यताओं की दशा में सुरक्षा सम्बन्धी प्रावधान।
(घ) पुरुषों के समान शर्तो पर पारिवारिक भत्ता प्राप्त करने का अधिकार महिलाओं के विरुद्ध विवाह के आधार पर अथवा मातृत्व के आधार पर विभेद को समाप्त करने केलिए तथा उन्हें प्रभावकारी अधिकार दिलाने केलिए कार्य किये जाऐंगे तथा उनको आवश्यक सामाजिक सेवायें जिसके अन्तर्गत बच्चों की देखरेख, रोजगार सम्बन्धी सेवायें आदि सम्मिलित होंगी फिर भी शारीरिक प्रकृति की भिन्नता के कारणों से कुछ प्रकार के कार्यों में महिलाओं की सुरक्षा केलिए स्तर निर्धारित किया जायेगा जो कि विभेदकारी नहीं होगा।

10 दिसम्बर को पूरी दुनिया  में “मानावाधिकार दिवस” के रूप में मनाया जाता है। “10 दिसम्बर 1948 को संयुक्त राष्ट्र की साधारण सभा ने संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकारों की विश्वव्यापी घोषणा को अंगीकृत किया गया।  मानवाधिकारों की विश्वव्यापी घोषणा में प्रस्तावना एवं 30 अनुच्छेद हैं।”  इस विश्वव्यापी घोषणा की प्रस्तावना में कहा गया है कि “मानव समुदाय के सभी सदस्यों के गौरवपूर्ण जीवन एवं समानता के अधिकार विश्वव्यापी स्वतंत्रता, न्याय एवं शान्ति के अधिकार केलिए है, जहाँ पुरुष एवं महिला अच्छे सामाजिक विकास के साथ अधिक से अधिक स्वतंत्रता प्राप्त कर सके।”  अर्थात अनुच्छेद 1 से लेकर अनुच्छेद 20 तक व्यक्ति के नागरिक तथा राजनीतिक अधिकारों की व्याख्या की गई है तथा अनुच्छेद 21 से 30 तक व्यक्ति के सामाजिक, सांस्कृतिक एवं आर्थिक अधिकारों को सम्मिलित किया गया है।

महिलाओं के साथ हिंसा, विश्व में आज मानव अधिकार उल्लंघन का सबसे घिनौना रूप माना जा रहा है।  आज पूरे विश्व की महिलायें इस समस्या का सामना कर रही है।  यदि हम वैश्विक दृष्टि से देखें तो प्रत्येक तीन महिला में से एक महिला के साथ बलात्कार होगा या उसे पीटा जाऐगा या सेक्स के धंधे में जाने केलिए उसे विवश किया जाऐगा या पूरे जीवन हिंसा के अभिशाप को भोगने केलिए तत्पर रहना होगा।  आज ‘घरेलू हिंसा’ एक चिन्ता का विषय बन चुका है।  वास्तव में महिलाओं के विरुद्ध होने वाली आपराधिक हिंसा का कारण कोई एक तथ्य नहीं है।  अर्थात ‘घरेलू हिंसा’ महिलाओं एवं लड़कियों के विरुद्ध यह एक ऐसी भूमण्डलीय गंभीर समस्या है जो उसे शारीरिक, मानसिक, यौनाचार और आर्थिक रूप से उसकी हत्या करती या उसे अपंग बना देती है।  मानव अधिकारों का यह सर्वाधिक व्यापक उल्लघंन है जिसके द्वारा महिलाओं तथा लड़कियों को सुरक्षा, सम्मान, समानता, आत्म उत्कर्ष और बुनियादी आजादी के अधिकारों से वंचित रखा जाता है।  अर्थात ‘घरेलू हिंसा’ एक ऐसा अपराध है जो न तो सही गैर पर रिकॉर्ड किया जाता है और न ही इसकी सही तौर पर रिपोर्ट की जाती है। अंतत: जब कोई महिला रिपोर्ट लिखवाना चाहती है या मदद चाहती है तो पुलिस उसके प्रति उदासीनता का व्यवहार करती है।  इसके साथ-ही-साथ महिला का यह भी सत्य है कि शर्म, बदला लिए जाने का भय, कानूनी अधिकारों की जानकारी न होना, अदालती प्रक्रिया के प्रति विश्वास की कमी या भय, कानूनी कार्यों पर होने वाले खर्च भी ऐसे ही कारण हैं जो घरेलू हिंसा से उत्पीडित महिला को रिपोर्ट न लिखवाने केलिए विवश करते हैं।  विश्व स्वास्थ्य संगठन ने महिलाओं के विरुद्ध हिंसा का पूरा जीवन क्रम यों उजागर किया है।
1) जन्मपूर्व हिंसा – लिंग चुनाव केलिए भ्रूण हत्या, लिंग-जाँच हो जाने पर गर्भावस्था के दौरान औरत पर अत्याचार क्योंकि वह बालिका शिशु को जन्म देने वाली है।
2) शैशव हिंसा – बालिका शिशु के जन्म लेते ही उसकी हत्या। इसके साथ ही उसे जन्म देने वाली औरत को दिए जाने वाले शारीरिक, यौन और मानसिक उत्पीड़न।
3) बालिका उत्पीड़न – बाल विवाह, महिलाओं का खतना, शारीरिक, यौन और मानसिक उत्पीड़न, दुराचारपूर्ण व्यवहार, बाल वेश्यावृत्ति और अश्लील सामग्री तैयार करने केलिए उनका इस्तेमाल।
4) किशोरावस्था और प्रौढ़ावस्था में हिंसा-डेटिंग और सामंती हिंसा (एसिड फेंकना, डेट के दौरान बलात्कार करना), गरीबी के कारण मजबूर करके यौनाचार करना (जैसे लड़कियों द्वारा अपनी स्कूल फीस के बदले, फीस देनेवाले के साथ यौन-संबंध बनाना), दुव्र्यवहार, कार्यस्थल पर यौनशोषण, बलात्कार, यौन उत्पीड़न, जबरदस्ती करवाई गई वेश्यावृत्ति, अश्लील सामग्री केलिए दुरुपयोग और हत्याएँ, मानसिक उत्पीड़न, विकलांग महिलाओं का यौन शोषण, बलात करवाया गया गर्भधारण।
5) वृद्ध महिलाओं के साथ हिंसा – आत्महत्या करने के लिए विवश कर देना या आर्थिक कारणों से की गई हत्या। यौन, शारीरिक और संवेदना के स्तर पर मानसिक उत्पीड़न। अर्थात आज वैश्विक स्तर पर बचपन से लेकर वृद्धावस्था तक लड़कियों और महिलाओं के साथ हो रही हिंसा की इस महामारी ने सारे विश्व को जकड़ लिया है।

घरेलू हिंसा के तहत पति द्वारा किया गया यौन-उत्पीड़न या बलात्कार अधिकांश देशों में अपराध नहीं माना जाता है।  कहने का अभिप्राय यदि एक बार एक महिला विवाह बंधन में बंध जाती है तो पुरुष (पति) उसके साथ मनचाही यौन क्रिया करने का अधिकारी हो जाता है।  इस समस्या को हल करने केलिए अनेक देशों ने ‘दांपतिक बलात्कार के विरुद्ध कानून’ बनाने की दिशा में कार्य किया है।  जिनमें – “आस्ट्रेलिया, आस्ट्रिया, बाखाडोस, कनाडा, साईप्रस, जर्मनी, आयरलैंड, मेक्सिको, नामीबिया, डेनमार्क, दि डोमिनिकल रिपब्लिक, इक्वेडोर, फिनलैंड, फ्रांस, न्यूज़ीलैंड, स्वीड़न, नार्वे, दि फिलिपाइंस, पोलैंड, रूस, दक्षिणी आफ्रिका, स्पेन, यु.के, ट्रिनिड़ाड, टोबैगो और अमेरिका।” घरेलू हिंसा को रोकने केलिए जो कानून बनाये जा रहे हैं उसमें प्रगति हो रही है किन्तु समस्या यह उत्पन्न होती है कि, पीड़ित महिला अपराध संबंधी कानूनों को आरोपों की पुष्टि केलिए आवश्यक सबूत उपलब्ध नहीं करा सकती है। स्टीफेनी ए. आइसेनटैट और लुंडी बैक्राफ्ट के अनुसार ‘घरेलू प्रातड़ना या उत्पीड़न दांपत्य संबंधों में पति द्वारा किया गया मानसिक, आर्थिक और बलपूर्वक यौनाचार का ऐसा स्वरूप है, जिसे शारीरिक चोटों या शरीर को क्षति पहुँचाने वाली विश्वसनीय घमकियों द्वारा चिन्हित किया जाता है।  महिला उत्पीड़न या घरेलू हिंसा उन सोचे-समझे नियन्त्रणकारी आचरणों और प्रवृत्तियों का जोड़ा है जिन्हें सांस्कृतिक रूप से समर्थन प्राप्त होता है और जो पाशबद्धता वाले संबंध-स्वरूप को जन्म देते हैं।  इस प्रताड़ना का लक्ष्य आमतौर से महिलाएँ और बच्चे ही होते हैं और एक महिला को इन बेड़ियों से मुक्त होने में वर्षों लग जाते हैं और इस पूरी अवधि में प्रताड़ना का स्तर निरन्तर बढ़ता चला जाता है।” अर्थात विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट 2002 में हिंसा (जिस में घरेलू या दांयतिक हिंसा भी सम्मिलित है) को व्यापक रूप से परिभाषित किया गया है।  अरविंद जैन जी ‘औरत होने की सज़ा’ में स्त्री उत्पीड़न के बारे में यों लिखते हैं कि “समाजसेवी संस्थाओं, शोधकर्ताओं और विचारकों के सुझाव पर 1986 में एक बार फिर बिल नंबर 44 प्रस्तावित किया गया जो राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद 26 जनवरी, 1987 से लागू हो गया है।  इस अधिनियम का नाम ‘महिला और बालिका अनैतिक देह-व्यापार नियंत्रण अधिनियम’ कर दिया गया है।  यहाँ उल्लेखनीय है कि ‘दमन’ के स्थान पर ‘नियंत्रण’ शब्द का प्रयोग किया गया है।” अंतत: शारीरिक प्रताड़ना में ऐसा कोई भी कार्य या आचरण सम्मिलित नहीं है जो इस तरह का हो कि वह उत्पीड़ित महिला, लड़की को शारीरिक पीड़ा या अन्य कोई हानि या शरीर के अंगों या स्वास्थ्य को उत्पीडित करके उसे क्षति पहुँचाए।  जिसमें उसका अपमान, उपहास, नीचा दिखाना, अनादर करना, भद्दे नामों से पुकारना आदि भी आ जाते हैं।

हमारे भारतीय समाज में पुरुष के सम्मान के लिए महिलाओं की ज़िन्दगी ले ली जाती है।  उदाहरणतया पुरुष का सम्मान, प्राय: उसके परिवार की महिला की मानी हुई यौन ‘पवित्रता’ से जुडा होता है। यदि किसी भी औरत या लड़की का यौन दूषित हो जाती है जैसा कि बलात्कार या वैवाहिक संबंधों के होते हुए स्वेच्छा से किसी और से यौनसंबंध बना लेती है उसके प्रति समाज व परिवार का मानना है कि उसने समाज व परिवार का सम्मान घटाया है तथा अपमानित किया है।  अनेक बार तो उसे इस अपमान व सम्मान के लिए अपने प्राणों की आहूति तक देनी पड़ती है।  यहाँ समस्या यह उजागर होती है कि लड़की या महिला के साथ यौन शोषण हो रहा है तो केवल वही दण्ड की अधिकारणी क्यों? पुरुष केलिए कोई दण्ड क्यों नहीं है? यौन शोषण तो पुरुष ही करता है महिला का फिर महिला किस भांति अपवित्र या अपमानित हो सकती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन 2002 की रिपोर्ट के अनुसार – “दाम्पत्यमूलक हिंसा के बारे में पूरे विश्व में किए गये 48 प्रतिशत सर्वक्षण बताते हैं कि 10 प्रतिशत से 69 प्रतिशत महिलाओं ने बताया कि उसके जीवन में कभी न कभी पति द्वारा हिंसा अवश्य की गई है। दाम्पत्य संबंधों में शारीरिक प्रताड़ना के साथ-साथ मानसिक प्रताड़ना भी शामिल होती है, और एक तिहाई से लेकर आधे मामलों में यौन प्रताड़ना भी होती है” अर्थात पति-पत्नी के मध्यम विभिन्न प्रकार की प्रताड़नाएँ एक-दूसरे से जुड़ी रहती है।  जीवन-साथी द्वारा की गई घरेलू हिंसा कभी-कभी महिलाओं की मौत का कारण भी बनती रहती है।  भारत में महिलाओं की अधिकतर हत्यायें पिटाई और आग से होती है।  औरत पर किरोसिन डालकर आग लगा दी जाती है और बाद में कहा जाता है कि ‘रसोईघर में दुर्घटनावश’ मृत्यु हो गई।  यह घरेलू हिंसा आखिर होती क्यों है?  पहला वह कि जिसमें हिंसा गम्भीर तथा उग्र रूप ले लेती है जैसे भद्दी व गन्दी गालियाँ देना, आतंकित करना व प्रताड़ित करना। साथ ही उसका नियन्त्रणकारी एवं एकाधिकार प्रदर्शित करनेवाला व्यवहार।  दूसरी हिंसा यों कह सकते हैं कि लगातार चलनेवाली कुंठा और क्रोध कभी-कभी शारीरिक प्रताड़ना के रूप में प्रकट हो जाते हैं।  घरेलू हिंसा का भड़काने का कारण भी कभी-कभी यह कह सकते हैं –
1) पुरुषों की आज्ञा न मानना।
2) उलटकर बहस करना या जवाब देना।
3) वक्त पर खाना तैयार न करना।
4) घर के बच्चों की ठीक से देखभाल न करना।
5) पुरुषों के धन या गर्लफ्रेंड़स के बारे में पूछताछ करना।
6) पति की अनुमति के बगैर कहीं चले जाना।
7) पुरुषों को सेक्स केलिए मना करना।
8) पुरुषों को पत्नी पर विश्वासघाती होने का संदेह।

प्राय: पूरे विश्व की महिलायें यह मानती हैं कि पुरुषों को अपनी पत्नी को अनुशासित में रखने का अधिकार है और आवश्यकता पड़ने पर वह उसे बलपूर्वक प्रताड़ित भी कर सकता है, लेकिन जहाँ की संस्कृतियाँ स्वयं पुरुष को महिलाओं के व्यवहार और नियंत्रण का अधिकार देती है, वहाँ सदैव दुराचारी पुरुष प्राय. सीमाएँ लाँघ जाते हैं।  अर्थात दाम्पतिक हिंसा विश्व के प्रत्येक भागों में गंभीर और व्यापक रूप से फैली हुई एक गंभीर समस्या है।  इसीलिए इस दिशा में ठोस परिणाम देनेवाले कार्यों को पूर्ण करना आवश्यक माना जाने लगा है।
महिलाओं के विरुद्ध हिंसा समाप्त करने हेतु संयुक्त राष्ट्र महासभा घोषण-पत्र वियना में संपन्न मानव अधिकार विश्व सम्मेलन (1993) द्वारा अपने घोषणा पत्र में महिलाओं के विरुद्ध हिंसा को रोकने संबंधी घोषणा को सम्मिलित करने का यह परिणाम हुआ कि 20 दिसम्बर, 1993 को संयुक्त राष्ट्र महा सभा ने ‘महिलाओं के विरुद्ध हिंसा’ को समाप्त करने केलिए एक विस्तृत घोषणा-पत्र जारी किया।  इस घोषणा-पत्र के जारी होने से ‘महिलाओं के विरुद्द हिंसा’ एक अंतर्राष्ट्रीय समस्या के रूप में सामने आई और संयुक्त राष्ट्र संघ के सभी सदस्य देशों केलिए इसका पालन अनिवार्य बन गया।  इस प्रकार घरेलू हिंसा को समाप्त करने की एक वैश्विक मुहिम प्रारम्भ हुई।  इस अंतर्राष्ट्रीय मानव अधिकार संधि को मनाने केलिए 179 देशों ने हस्ताक्षर किये थे।  यह ध्यान देते हुए कि वे अधिकार और सिद्धान्त उन अंतर्राष्ट्रीय साधनों में समाहित हैं, जैसे – मानव अधिकारों का सार्वभौमिक घोषणा-पत्र, नागरिक और राजनीतिक अधिकारों संबंधी अंतर्राष्ट्रीय प्रतिज्ञा-पत्र, महिलाओं के विरुद्ध हर तरह के भेदभाव को समाप्त करने संबंधी सम्मेलन का घोषणापत्र और प्रताड़ना तथा अन्य क्रूर मानवीय, अपमानजनक व्यवहार या दण्ट देने के विरुद्ध सम्मेलन का घोषणा-पत्र।

निष्कर्ष के रूप में कह सकते हैं कि महिलाओं के विरुद्ध हो रही ‘घरेलू हिंसा’ को स्पष्ट और व्यापक रूप से परिभाषित किया जाये तथा महिलाओं के विरुद्ध हिंसा के प्राय: सभी रूपों को समाप्त करने केलिए और अधिक प्रयास किया जाये। क्योंकि एक ओर तो जहाँ कानून बनाये जा रहे हैं, संशोधित किये जा रहे हैं तो वहीं दूसरी ओर सरकारी घोषणाओं में उन्हें लागू किये जाने की बात कही जाती है।  किन्तु वास्तव में जो परिणाम सामने आना चाहिए वह नहीं आ पाता।  आवश्यकता है तो जनता, प्रशासन और कानून तथा उसे लागू करनेवालों के नज़रिए में बदलाव की।  सादियों से जो घोषणाएँ, पारंपरिक मान्यताएँ, धार्मिक विचार, नैतिक मूल्य महिलाओं की सामाजिक, आर्थिक या व्यक्तिगत स्थिति पर अत्याचार करती आ रही है, निस्संदेह उसे एक दिन में समाप्त नहीं किया जा सकता।  लेकिन अगर व्यापक पैमाने पर प्रत्येक वर्ग और प्रत्येक माध्यम इस अभियान में पूरी शक्ति व निष्ठा से साथ दे तो विश्चित ही इस हिंसात्मक हिंसा का अंत हो सकता है।
डा . परवीन कुमारी रमा हिन्दी साहित्य में पी एच डी हैं , केरला में रहती हैं . संपर्क : Mail idparvilordshiva7@gmail.com

अधिकांश दलित परिवारों में मातृसत्ता के अवशेष अभी भी दिखते हैं : अनिता भारती

अनिता भारती


अनिता भारती साहित्य की विविध विधाओं में जितना लिखती हैं , उतना ही या उससे अधिक सामाजिक मोर्चों पर डंटी रहती हैं  खासकर दलित और स्त्री मुद्दों पर. सम्पर्क : मोबाईल 09899700767.

( प्रज्ञा पांडे के अतिथि सम्पादन में हिन्दी की पत्रिका ‘ निकट ‘ ने स्त्री -शुचितावाद और विवाह की व्यवस्था पर एक परिचर्चा आयोजित की है . निकट से साभार हम वह  परिचर्चा  क्रमशः प्रस्तुत कर रहे हैं , आज  सुप्रसिद्ध लेखिका और विचारक अनिता भारती के जवाब.  इस परिचर्चा के  अन्य  विचार पढ़ने के लिए क्लिक करें :  ) 

जो वैध व कानूनी है वह पुरुष का है : अरविंद जैन 

वह हमेशा  रहस्यमयी आख्यायित की गयी : प्रज्ञा पांडे 


अमानवीय और क्रूर प्रथायें स्त्री को अशक्त और गुलाम बनाने की कवायद हैं : सुधा अरोडा 

अपराधबोध और हीनभावना से रहित होना ही मेरी समझ में स्त्री की शुचिता है :  राजेन्द्र राव 

परिवार टूटे यह न स्त्री चाहती है न पुरुष : रवि बुले 

प्रेमरिक्‍त दैहिक सम्‍बन्‍ध निस्‍संदेह अनैतिक होते हैं : कात्यायनी

मनुष्य – आदिम मनुष्य भी – प्राकृतिक नहीं, सांस्कृतिक प्राणी है : अर्चना वर्मा 

मातृसत्तातमक व्यवस्था स्त्रीवादियों का लक्ष्य नहीं है : संजीव चंदन

आधुनिक पीढ़ी से मुझे आशा है कि परिवर्तन लाएगी : ममता कालिया

स्त्री  की अपनी जगह : शीला रोहेकर

बकौल सिमोन द बोउआर ‘स्त्री  पैदा नहीं होती बनायी जाती है’ आपकी दृष्टि में स्त्री  का आदिम स्वरूप क्या है ? 
आदिम रूप में स्त्री  स्वतन्त्र थी क्योंकि हमारे यहाँ मातृसत्ता थी। औरतें पुरुषों की तरह शिकार पर जाती थीं,  बच्चे माँ के नाम से जाने जाते थे पिता के नाम से नहीं। बच्चे पालना और घर चलाना दोनों की साँझी जिम्मेदारी होती थी। कालांतर में स्त्री को ज्यादा से ज्यादा बंधनों  में जकड़ा जाने लगा। इसमें धर्म  की भूमिका बहुत अधिक  थी। धर्म  ने स्त्री  को बन्धनों  में जकड़ कर विभिन्न भूमिकाओं में बाँध दिया  और पुरुष को उसका स्वामी बना दिया। परन्तु लाख कोशिशों के बाद भी , धर्म  की पूरी घेराबंदी करने के बाबजूद भी दलित आदिवासीस्त्री  की देह और आजादी पर उस तरह का कब्जाकरण नहीं हो पाया जैसा सवर्ण स्त्रियों का हो गया। दलित स्त्रियों को अभी भी वह स्पेस प्राप्त है, जिससे वह पूर्ण मादा या स्त्री  बनाने की प्रकिया से छूट गई। इसका कारण दलित परिवारों में एक तरह की लोकतांत्रिक मूल्यों का होना और दूसरास्त्री  पुरुष दोनों का जाति और गरीबी के कारण शोषण की चक्की में लगातार पिसना रहा है। हाँ यह बात जरूर है कि दलित आदिवासी समाज में औरत हमेशा से पुरुष से ज्यादा शोषित, दमित, उत्पीडित और हिंसा की आसान शिकार रही है।

समाज  के सन्दर्भ में शुचितवाद और वर्जनाओं को किस  तरह परिभाषित किया जाए ? 

शुचितावाद पवित्रतावाद का ही दूसरा नाम है और यह औरतों की आजादी के खिलाफ रचा गये षड्यन्त्र है। समाज में पुरुषों के लिए स्त्रियों के दैहिक शुचितावाद और पवित्र होने की शर्त धर्मिक तथा ब्राह्मणवादी पितृसत्तात्मक समाज की पहली शर्त है। धर्म  और उसके शास्त्र हमें सिखाते है कि रजकाल में स्त्री  अपवित्र होती है, उसकी देह अपवित्र होती है। वह अपनी पहली रजकाल से पहले कौमार्य रूप में ही पवित्र होती है, कन्या पूजा यानि कन्याओं को देवी मानकर पूजना उनके कौमार्य रहते ही होता है। शुचितावाद की धारणा रक्त शुचिता से भी संबंधित  है,  जिसमें किसी कन्या के विवाह से पहले उसकी देह किसी के द्वारा ना छुई गई हो। मतलब वह अपने पवित्रतम रूप मे शादी के बाद पति को भोग के लिए मिले। हैरानी की बात है ऐसी दैहिक शुचिता कभी पुरुषों के लिए नहीं देखी जाती। यह सिर्फ स्त्रियों तक ही सीमित है। जो स्त्री  पवित्र  है वह शुद्ध  है,  और जो अपवित्र वह पतित है या अशुद्ध है। यहाँ सारे तर्क आध्ी आबादी को कैद में रखने के लिए गढ़े गए है। क्या आपने कभी सुना है कि वह आदमी अपवित्र या अशुद्ध  है?

समाज के सन्दर्भ में शुचितावाद और वर्जनाओं को किस तरह परिभाषित किया जाए ?
भारतीय सामज एक ब्राह्मणवादी पितृसत्तात्मक समाज है। यह मूल्यबोध यहाँ के लोगों में चाहे वह स्त्री हो या पुरुष सबके के खून में रचा बसा है। यहाँ स्त्रियाँ भी उसी तरह व्यवहार कर सकती है,  जैसे पुरुष। यही कारण है कि वर्जनाओं से लड़ने वाली ताकत कम है और वर्जनाओं को बचाने वाली और ढोने वाली ज्यादा है।

यदि स्वयं के लिए वर्जनाओं का निर्धरण स्वयं स्त्री  करे तो क्या हो ? 
भारतीय  सामज एक ब्राह्मणवादी पितृसत्तात्मक समाज है। यह मूल्यबोध यहां  के लोगों के और सामज के खून में रचा बसा है। यही कारण है कि वर्जनाओं से लड़ने वाली ताकत कम है और वर्जनाओं को बचाने वाली और उन्हें ढोने, लादने और ओढ़ने वाली ज्यादा है। अक्सर देखा गया है कि मौका मिलने पर या सत्ता का केन्द्र बनने पर स्त्रियाँ भी उसी तरह व्यवहार कर सकती है जैसे पुरुष करते है। हम देखते ही है कि परिवार में एक स्त्री  अक्सर दूसरी स्त्री  के लिए शत्रु  बन जाती है। अक्सर स्त्रियाँ परंपरा से लड़ने के लड़ने के बजाय परंपरा का जटिल अंग बन जाती है। वह एक-दूसरे के लिए वर्जनाओं की दीवार खड़ी कर देती है। यह सब इसलिए भी होता है क्योंकि उनकी परवरिश, उनके जीवन मूल्य, उनकी आकांक्षाएँ और उनके अंदर बैठी क्रूरताएँ इसी ब्राह्मणवादी पितृसत्तात्मक समाज की देन ही है। हम देख ही रहे है कि विचारों से प्रगतिशील होने और खूब पढ़-लिख लेने के बाबजूद भी स्त्रियाँ अपनी गुलामी के चिह्न  मंगलसूत्र, माँग आदि धारण  करना तक नहीं छोड़ पाती है।

विवाह की व्यवस्था में स्त्राी की मनोवैज्ञानिक, सामाजिक एवं आर्थिक स्थितियां। कितनी स्त्री  के पक्ष में हैं ? 
विवाह अगर लोकतान्त्रिक मूल्य बोध पर  खड़ा तो वह सामान्य होने वाले विवाहों की स्थितियों से काफी बेहतर हो सकता है। पारम्पारिक विवाह स्त्रियों को पुरुष के सामने एक गुलाम और एक उपभोग के सामान की तरह प्रस्तुत करती है। इसमें स्त्रियों की इच्छा, उसकी आजादी, उसके अधिकार , उसके सपनों का कोई मूल्य नहीं होता। सारी स्थितियाँ स्त्री के विरुद्ध ही होती है। कोई कितनी भी कोशिश करें पारम्परिक विवाह सम्बन्धें में स्त्रियों का दर्जा हमेशा पुरुष से नीचा ही रहता है।

मातृसत्तात्मक व्यवस्था में विवाह-संस्था क्या अधिक  सुदृढ़ और समर्थ होती तब समाज भ्रूण हत्या एवं बलात्कार जैसे अपराधें से कितना मुक्त होता?
उत्तर-मुझे लगता है मातृसत्तात्मक व्यवस्था में विवाह संस्था मजबूत नही हो सकती है। सारी कहानी स्त्रियों को दैहिक रूप से पवित्र रखने और उससे सिर्फ अपने लिए इस्तेमाल करने के पुरुषों द्वारा विवाह संस्था के नाम पर रचे गए षड्यंत्र को मातृसत्ता धक्का देती  है। मातृसत्ता में बच्चा माँ के नाम से जाना जाता है। माँ को ही पता होता है कि उसके पेट में पल रहा बच्चा किसका है। दरअसल विवाह संस्था सुदृष्ट और मजबूत इसलिए ही है कि उसकी केन्द्र की धूरी  पुरुष है और परिवार में हर चीज के लिए निर्णायक स्थिति में वही रहता है। वंश चलाने व वंश बढाने से लेकर सम्पति पर एकाधिकार  करने और इन सब के माध्यम से स्त्रियों पर दैहिक कब्जाकरण करके वह परिवार को मजबूत रखता है। इसलिए स्त्री  की स्थिति परिवार में दोयम दर्जे की होती है। उसके सारे निर्णय उसकी ओर से उसका पुरुष ही लेता है। अब यदि परिवार में मातृसत्ता यानि औरतों की सत्ता होगी तो सम्भवत भ्रूण हत्या, बलात्कार कम होगे, क्योंकि तब औरतों की कमजोर अबला, मादा की छवि से बाहर निकलेगी। अधिकांश  दलित परिवारों में मातृसत्ता के अवशेष अभी भी दिखते है,  इसलिए परिवारों में लड़कियाँ पैदा होना या भ्रूण हत्या होना बाकि समाज के बनिस्पत बहुत कम है।

सह जीवन की अवधरणा क्यास्त्री  के पक्ष में दिखाई देती है। 

सहजीवन एक आदर्श व्यवस्था हो सकती है, पर हो नहीं पा रही है, क्योंकि यहाँ सामाजिक ढाँचा जाति और शोषण पर आधरित है। इसलिए सहजीवन में भी वही चीजें असर करती है। औरतें सहजीवन में भी अपने साथ रहने वाले साथी से मार खा रही है, जातीय प्रताड़ना झेल रही है। और सबसे बड़ी बात सहजीवन में रहकर वे अपने आप को बेहद असुरक्षित महसूस करती है। जिस सहजीवन की नीव प्यार, भरोसा और प्रतिबद्धता  की नीव पर खड़ी होती है, और अगर उसकी नीव मजबूत है और उस सहजीवन में लोकतान्त्रिक मूल्य निहित है तो यह स्त्री के पक्ष में हो सकता है अन्यथा सहजीवन स्त्रियों के लिए पारंपरिक विवाह से भी सबसे ज्यादा शोषणकारी हो सकता है।

साथ होकर भी पुरुष एवं स्त्री  की स्वतंत्र परिधि क्या है ? 
साथ  होकर भी पुरुष और स्त्री  यदि एक-दूसरे की आजादी का सम्मान करें, एक-दूसरे के काम की इज्जत करें और एक-दूसरे को भावनात्मक सपोर्ट करते हुए जिए तो इससे बेहतर कोई और रास्ता हो ही नहीं सकता। एक स्वतंत्रस्त्री  और स्वतंत्र पुरुष के रूप में हमारे सामने ज्योतिबा फुले और सावित्री  बाई फुले का उदाहरण है,  जिन्होंने एक साथ मिलकर तथा एक स्वतंत्र ईकाई के रूप में भी रहते हुए सामाजिक राजनैतिक और सांस्कृतिक बदलाव के लिए जीवन भर बहुत महत्वपूर्ण काम किये।

स्त्री की अपनी जगह

शीला रोहेकर

यहूदी मूल की हिन्दी की वरिष्ठ रचनाकार शीला रोहेकर लखनउ रहती . संपर्क : .05222308102

( प्रज्ञा पांडे के अतिथि सम्पादन में हिन्दी की पत्रिका ‘ निकट ‘ ने स्त्री -शुचितावाद और विवाह की व्यवस्था पर एक परिचर्चा आयोजित की है . निकट से साभार हम वह  परिचर्चा  क्रमशः प्रस्तुत कर रहे हैं , आज  सुप्रसिद्ध लेखिका शीला रोहेकर   के जवाब.   इस परिचर्चा के  अन्य  विचार पढ़ने के लिए क्लिक करें :  ) 

जो वैध व कानूनी है वह पुरुष का है : अरविंद जैन 

वह हमेशा  रहस्यमयी आख्यायित की गयी : प्रज्ञा पांडे 


अमानवीय और क्रूर प्रथायें स्त्री को अशक्त और गुलाम बनाने की कवायद हैं : सुधा अरोडा 

अपराधबोध और हीनभावना से रहित होना ही मेरी समझ में स्त्री की शुचिता है :  राजेन्द्र राव 

परिवार टूटे यह न स्त्री चाहती है न पुरुष : रवि बुले 

मेरे समक्ष प्रज्ञा पांडे का एक प्रपत्र है ,  जिसमें उसने ‘शुचितावाद एवं विवाह की व्यवस्था’ विषय पर आठ प्रश्न रखे हैं। और मैं सोच रही हूँ कि यह कैसी विडंबना है कि इक्कीसवीं सदी में पदार्पण कर चुका यह हमारी  पांच हजार वर्ष पुरानी संस्कृति एवं परम्पराओं वाला देश आज भी स्त्री  और उसके अधिकारों को  लेकर न स्पष्ट है और न ही रज़ामंद। स्त्री की स्वतंत्राता, स्वप्न और उड़ान स्त्री-विमर्श के किसी सकुचाये ढांचे के बाहर ठिठके-से खड़े हैं। क्या एक इतने बड़े बहुभाषी, बहुधर्मी , बहुआयामी एवं बौद्धिकता  के धनी  देश के लिए यह लाज़मी है?
बहरहाल…मैं उस तथाकथित ‘आधी  दुनिया’ की उस स्त्री के लिए कुछ कहना चाहूँगी जो अपने कैचुल से बाहर निकल रही है, जो सजग व संघर्षशील है और जो युगयुगान्तर से अपनी भूमिकाओं में बदलाव चाहती है जिससे महादेवी जी की तरह व्यथित होते उन्हें कहना न पड़े :
‘विस्तृत नभ’ का कोई कोना/मेरा न कभी अपना होना/
परिचय इतना, इतिहास यही/उमड़ी कल भी मिट आज चली।
आज की  स्त्री अपने जीवन में जूझारू ही नहीं वरन् जिजीविषा से भरी है और मिटने से पहले सार्थकता की इच्छा रखती है। उसे पता है कि इन ‘आधी दुनिया’, ‘स्त्री-वादी’ या ‘घाघरा पलटन’ जैसे उपनामों को बदलने का जोखिम तो उठाना ही है जिससे उससे आगे आने वाली पीढि़याँ कुछ बेहतर और साफ आसमां पा सके।

सवाल – जवाब 

बकौल सिमोन द बोउआर “स्त्री पैदा नहीं होती बनायी जाती है ” आपकी दृष्टि में स्त्री का आदिम स्वरुप क्या है ? 
बकौल सिमोन द बोउआर ‘स्त्री पैदा नहीं होती बनायी जाती है’ का सच क्या केवल उस पुरुष-वर्ग और मर्यादा की रक्षा और दिशा तय करने वाली स्त्रियों के  हिस्से हैं?स्त्री को स्त्री’ बनने में जितना इस समाज, व्यवस्था व ध्र्म का योगदान रहा है उससे कुछ कम प्रतिशत स्त्राी की खुद की मानसिकता का भी रहा है। अधिकांशतः स्त्री खुद को कमजोर, अनिर्णित या डांवाडोल तार्किकता वाली, विवश और अधीन  समझती है।इसी अवस्था के लिए मैं मानती हूँ कि बाहरी दबावों, नियमों, आचार सहिताओं और सार्थक-साक्षरता अभावों का योगदान भी है किंतु इन दबावों से हावी होते देखते रहना भी क्या उसी परम्परागत श्रंृखला को शुरू नहीं करती?
स्त्री का आदिम स्वरूप ‘मानवी’ का है। मानव रूपी पुरुष के विपरीत स्त्री-रूपी ‘मानवी’। किन्हीं सामाजिक दबावों, परम्परागत मूल्यों, धर्मिक कठमुल्लाओं की परिधियों  और नारी शरीर के अनगिनत डरों को अपने वजूद से झंखाड़ता-बिल्कुल बेलौस…नभ से गिरती मुक्त, स्वच्छंद और पारदर्शी बून्द  सा जीवन ही स्त्री का आदिम स्वरूप होना चाहिए। जैसे ऊंची पर्वत श्रंखला से गिरते अबाध प्रपात जैसा या खिलते फूल की प्रसन्नता जैसा। गरिमामय, आर्थिक व सामाजिक तौर पर सुरक्षित व स्वाधीन  जीवन जीना नारी का स्वप्न है। क्या यह संभव है?

क्या दैहिक शुचिता की अवधारणा  स्त्री के खिलाफ कोई साजिश है ?
वैदिक शुचिता की अवधारणा  स्त्री के खिलाफ साजिश ही नहीं अपितु अपराध की  पहली सीढ़ी है। इसी अवधा रणा को ढाल ताने पितृ-सत्तात्मक समाज उस घिनौनी सीढ़ी को पफटापफट चढ़ता सभी को गुलाम, कमतर, भोग्या, मूढ़-गंवार-पशु और दुलक्षित चीज़ समझने की हिमाकत कर लेता है और उसका ब्रेन-वाॅश कर उसे भी खुद के विषय में यही समझ लेने के लिए सफल हो जाता है। यहाँ तक कि अधिकांश स्त्रियां पुरुषों की दृष्टि से खुद को आँककर प्रतिष्ठित समझने का भ्रम पाल लेती हैं।

दैहिक शुचिता का प्रश्न प्राचीन समय से चला आ रहा है और आज भी बदस्तर चालू है। समाज का एक खास वर्ग मानता है कि दो प्रकार के स्त्री वर्ग होते हैं। एक बिंदास, खुले विचार-आचार रहन-सहन वाली, झपट्टा मारी जाए वर्ग की या देह-व्यापार कर धन  अर्जित करने वाली और दूसरे प्रकार में पतिव्रता, सती-साध्वी प्रकार । पहले वर्ग के साथ पुरुष अपनी काम-पिपासा की पूर्ति कर सकता है , उसे ‘चीज़’ या ‘माल’ समझ सकता है किन्तु ‘घर’ की स्त्रियां  बिल्कुल गौउएँ बनी रहें, अपनी आने वाली पीढ़ी को भी देह के ऊंच -नीच का पाठ रट्टा मारकर पढ़ाती रहें, आँख में तेल आँजकर लड़कियों की रखवाली करें और उनके जीवन की पहली कोंपल फूटते ही उसे घोंट कर रखे दें। ऐसे वर्ग के लिए पिता या पिता-समान, भाई या भाई-समान तो हो सकते हैं किन्तु केवल एक और एक मात्र, जैसा भी नसीब में हो पति ;प्रेमी नहीं  होना चाहिए। जिसके साथ वह शारीरिक-मानसिक और आत्मिक तौर पर सुरक्षित या असुरक्षित रहे किन्तु कम-से-कम सात जन्मों का बंधन  स्वीकारते हुए घर से विदा ले।
क्या वह आदर्श संयोजना है? मेरा मानना है कि स्त्री के विरुद्ध  यह ऐसा अपराध और षड्यंत्र है कि उसे छिन्न-भिन्न करने में स्त्री की कई पीढि़याँ चाहे खप जाएँ किन्तु इस ‘वन वे ट्रैफिक’ के दोनों सिरे खोलने की जरूरत महसूस करती स्त्री को समझने की आवश्यकता है। घर, परिवार, समाज, धर्म  और कानून स्त्री-शोषण के विविध पहलुओं पर मनन-मंथन करे और फिर  अपनी राय जाहिर करे तभी स्त्री-शुचिता का यह मकड़जाल सा प्रश्न सरल होने लगेगा।

समाज  के सन्दर्भ में शुचितवाद और वर्जनाओं को किस तरह परिभाषित किया जाए ? 
समाज में शुचितावाद और वर्जनाओं को मोटे तौर पर देखा जाए और उसको एक शब्द में आँकना हो तो केवल एक ही शब्द सूझता है…और वह है स्वार्थ। माना कि घर-परिवार स्त्री  को किन्हीं मर्यादाओं-वर्जनाओं में कुंठित करता है,  क्योंकि वे सामाजिक अराजकता, अपराध, राजनैतिक वर्चस्व और सूचना-सिनेमा के बढ़ते प्रभाव से डरे हुए हैं किन्तु उनके डर से समाज में दिनोंदिन बढ़ते ये हादसे, प्रभाव व अराजकता कम नहीं होगी बल्कि वे स्त्री  को अज्ञानतावश और भीरू, असुरक्षित और लभ्य बना देगी।
दूसरी बात यह है कि यह मनुष्य स्वभाव में है कि जिसका निषेध् हो वही करने-देखने-बरतने को मन ललचाता है। ऐसे में असामाजिक तत्वों, बाजार, सूचना के विविध् उपकरणों या सिनेमा-चैनलों के भड़काउफ-उत्तेजक, लुभावने भ्रमों में ऐसी पाबंदियों में रहती स्त्री  का आकर्षित हो जाना स्वाभाविक है और वह रौशनी के उस घेरे में चली तो जाती है किन्तु सजगता, संघर्ष या साहस की कमी के कारण दम तोड़ देती है।
मैं मुकम्मल तौर पर मानती हूँ कि आज की स्त्री  को ऐसे शुचितावाद और वर्जनाओं की बंद गली का वह अंध, संकरा और दमघोटू सिरा जिसके मुहाने पर पितृसत्तात्मक संस्थाएँ, धर्म  के मोटे-मोटे पोथे और नियमावली-व्याख्याएँ और संवैधनिक न्याय की पुरानी नीतियों-कानूनों को नकारने की, उसके समक्ष खड़े होकर लड़ने की और ललकारने की जरूरत है।

यदि स्वयं के लिए वर्जनाओं का  निर्धारण  स्वयं स्त्री करे तो क्या हो ? 
स्त्री  के पास अध्किार हो कि वर्जनाओं का निर्धरण स्वयं करे तो इस पूरी परिचर्चा की आवश्यकता ही नहीं रहती क्योंकि स्त्री  के लिए निर्धरित वर्जनाएँ ऐसे वर्गों ने लगाई है , जो खुद को स्त्री  का पैरोकार, शुभचिंतक व निर्णायक समझकर सारे नियम और निर्णय निर्धरित करता है और उस के पालन पर कड़ी नज़र रखता है। क्योंकि घर, व्यवस्था और समाज की कोई भी वर्चस्वी संस्था स्त्री  को अपनी पकड़ और जकड़ से मुक्त करने की संभावनाओं के विषय में सोचना नहीं चाहती है।
ऐसा भी नहीं कि अपवादों की कमी रही हो। पौराणिक समय से लेकर आज तक में ऐसी विदुषियाँ, वीरांगनाएँ, निडर-प्रखर और जुझारू  नारियों ने स्त्री  मस्तिष्क और गौरव को उपर उठाया है और वे उदाहरण बन गई हैं। ऐसी महिलाएँ भी हैं जो हर क्षेत्र में पुरुषों का मुकाबला कर रही हैं या उनसे आगे हैं। किन्तु यह पूरा वर्ग पूरी समाज-व्यवस्था का छोटा-सा हिस्सा है। उच्च वर्ग व मीडिया-सिनेमा से जुड़े वर्ग को अपने से श्रेष्ठ समझता  है , इसलिए जिस वर्ग के लिए इनमें से अधिकांश  प्रश्न निहित हैं वे समाज के सबसे बड़े वर्ग-मध्यम वर्ग या आम मनुष्य के हैं , जो ताउम्र इन प्रश्नों में घिरा रहता है।
फिर  भी यदि ऐसा कोई यक्ष प्रश्न है,  तो जरूर कहना चाहूँगी कि यदि सामाजिक परिवर्तन व सांस्कृतिक चेतना में इजाफा हो, प्रजातांत्रिक मूल्यों व मानवाधिकार  के प्रति जागरूकता पनपे,स्त्री  को अपने निर्णय स्वयं लेने की स्वतंत्रता प्राप्त हो, सामाजिक आर्थिक व धर्मिक दबावों के कारण मजबूरी न स्वीकारनी पड़े और अपना निजत्व व सम्मान बचाने के लिए किन्हीं समझौतों की आवश्यकता न हो तो यह आदर्श स्थिति हो सकती है। यह मुक्ति की राह बन सकता है।

विवाह की व्यवस्था में स्त्री  की मनोवैज्ञानिक ,सामाजिक एवं आर्थिक स्थितियां  कितनी  स्त्री  के पक्ष में हैं ? 


एक संस्था के रूप में  सिमोन ‘विवाह’ का विरोध करती  हैं। उनके अनुसार, विवाह की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि यह ‘सुख’ के विषय में किसी प्रकार का आश्वासन नहीं देता।विवाह की व्यवस्था में अधिकतर  स्त्रियों  की मनोवैज्ञानिक, सामाजिक एवं आर्थिक स्थितियाँ स्त्री  के पक्ष में बहुत कम दिखाई देती हैं। फिर  भी स्त्री  विवाह संस्था को चाहे वह पारंपरिक विवाह हो या प्रेम-विवाह उसे आदर्श का पर्याय समझ लेती है। क्योंकि विवाह संस्था में वह खुद को सबसे अधिक  सुरक्षित और सम्मानित समझती है। किन्तु हकीकत चौकाने वाली है।सबसे पहले तो स्त्री को सुंदरता के मानदंडों पर तौला जाता है। चरित्र के विषय में पड़ताल होती है। उपयोगिता और औकात ( माता-पिता की दौलत) पर नज़र गड़ाई जाती है तब जाकर उसे मर्यादित पुत्रों को जन्म देने वाली, पुरुष-अनुगामिनी, दामी, भोग्या, सहनशील, पतिव्रता या फिर  समर्पिता की डोरियों से बाँधकर  लाया जाता है। स्त्री  के स्वप्न, उसकी इच्छाएँ, उसके रुझान, उसके निर्णय या सरोकार की कोई खोज-खबर नहीं ली जाती। वह या तो पुत्रावधुएं  पत्नी है, माँ है या भाभी है…स्त्री  नहीं है। उसकी अपनी कोई एकल पहचान नहीं है। और तब शुरू होती है स्त्री की घुटन।
यह घुटन सामाजिक बंधनों  से अनेकानेक धागों में बेतरतीब उलझने लगती है और वह स्वयं को और अकेला, असहाय और असम्मानित पाती है। मोहभंगों का सिलसिला शुरू हो जाता है तो वह अपनी बची-खुची चेतना,सामर्थ्य  और आत्मविश्वास भी खोने लगती है और रीती हो जाती है। ऐसे में वह केवल कठपुतली रह जाती है। स्वप्न और संवेदनाहीन हाड़-मांस का पुतला।
भारतीय समाज के मध्यवर्गीय ढांचे में स्त्री  आध्ुनिक और आत्मनिर्भर तो हो गई है पर वह माहौल नहीं बना जहाँ स्त्री  अपनी आत्मनिर्भरता को खुद का हक समझकर उसका निर्वाह करे क्योंकि ससुराल में उसकी कमाई को हमेशा ‘चार पैसे कमा लिए तो क्या महारानी हो गई’ की दृष्टि से देखा जाता है और घर के किसी भी कार्यभार में रत्ती भर भी हमदर्दी नहीं मिलती। ऐसे में स्त्री  खुद को केवल एक एटीएम मशीन समझने लगती है,  जिसका काम केवल पैसे देना है! उसका सहयोग, एकनिष्ठता और भावनात्मक कोनों को नज़रअंदाज़ कर कई बार शक के दायरों में देखा जाता है। कई गृहणियाँ इन वैवाहिक जटिलताओं को स्वीकार कर लेने में भलाई सोचती हैं किन्तु आर्थिक रूप से सक्षम और मानसिक तौर पर सजग-स्वतंत्र स्त्रिायाँ ऐसी गुलामी से बाहर भी निकल आती हैं और अपने मानदंडों पर जीती हैं।

मातृसत्तात्मक व्यवस्था में विवाह-संस्था क्या अधिक  सुदृढ़ और समर्थ होती। तब समाज भ्रूण हत्या दहेज़ हत्या एवं बलात्कार जैसे  अपराधों से कितना मुक्त होता ? 
मानव-संस्कृति की शुरुआत मातृ-सत्तात्मक व्यवस्था से हुई थी,  क्योंकि स्त्री  के पास ही गर्भ-धरण करने का और एक नए जीव को इस पृथ्वी पर लाने का अधिकार  था। किन्तु जैसे-जैसे समय व्यतीत होता गया वैसे पुरुष ने गौर किया कि स्त्री उससे शारीरिक संरचना में कमतर और कोमल है। उसको मासिक-धर्म ,  जन्म देते समय कष्ट सहन करने पड़ते हैं और तब वह बेहद कमजोर हो जाती है। शिकार करते समय और दुश्मनों के साथ लड़ाई में भी उसका काम नहीं होता तो फिर  उसका वर्चस्व क्यों?
पुरुष वर्चस्व का नशा इक्कीसवीं सदी तक ऐसा बढ़ गया है कि स्त्रियों  का शिक्षित-सक्षम-आत्मनिर्भर होना, उनका बौद्धिक  और आक्रामक होना, उनका दमन व अवमानना को नकारना पुरुष सत्ता को चुभने लगा है। ऐसी संस्थायें येन-केन-प्रकारेण स्त्री  को काबू करना चाहती है। और इसकी सबसे सटीक लाठी है स्त्री  को अपमानित करना…। ब्लात्कृत स्त्री  सबसे अधिक  अपने निजत्व पर हमला महसूस करती है , जो उसे तोड़ता है शारीरिक, मानसिक  और भावनात्मक स्तर पर। बलात्कार करने वाला पुरुष प्रेमी, पति या कोई सगा-संबंधी  या अराजक तत्व भी हो सकता है लेकिन निष्पात एक ही है…उसके निजत्व के सम्मान को चोट पहुँचाना।
ऐसे में मातृ-सत्तात्मक समाज में ऐसे उदाहरण काफी कम मिलते हैं। हमारे देश में ही केरल, नार्थ-ईस्ट के प्रदेश और कुछ कबीलाई गुटों में यह व्यवस्था आज भी लागू है। चूंकि ऐसे समाज की स्त्रियाँ अपनी अस्मिता और आत्मनिर्भरता पर वर्चस्व करती है,  इसलिए वे समाज की दूसरी स्त्रियों के प्रति अधिक  संवेदनशील और उदार हैं। वे उनकी समस्यायें अधिक  संवेदनशीलता से समझ सकती है और मददगार व उदार होती हैं। पुरुष अहमन्यता को नकारती वह स्त्री -भ्रूण-हत्या को तरजीह नहीं देकर स्त्री  को अवसाद से बचा लेती है और ऐसा समाज एक बेहतर मानव-संस्कृति का उदाहरण पेश करता है , जो सराहनीय है।

सह जीवन की अवधारणा  क्या स्त्री के पक्ष में दिखाई देती है ? 
कहा गया है कि, ‘संविधान  पैतृक व्यवस्था को समस्या नहीं समझता, यह उसे अस्वाभाविक नहीं मानते हैं। भारतीय संविधन बहुत ठंडे ढंग से एक पुरुष-प्रधान  भारतीय समाज की कल्पना करता है।’
जब संविधान , समाज और मानसिकता पैतृक-व्यवस्था  विवाह  प्रथा को जायज़ और उत्तम समझते हों वहाँ सहजीवन को तरजीह देने वाला ही समाज का अपराधी  बन जाता है।
सहजीवन का प्रश्न  दो धारी तलवार है। यानी जितनी लुभावना व सुनहरा आभास देता है उतना ही घुटनभरा है। सहजीवन को अपनाना और उसे अर्जित करना…इन दोनों कथनों में फर्क है। एक में स्वेच्छा व बेबाकी है, जबकि दूसरे में निष्ठा, सम्मान और बोध है। जहाँ स्त्री खुद  को मुक्त समझ अपनी शर्तों पर जीने की आकांक्षा रखती है और सोचती है कि विवाह की घुटनभरी शर्तों से उसे मुक्ति मिल जाएगी तथा उसके चुने हुए रास्ते पर उसके मान, प्रतिभा, स्वप्नों, निजत्व और पारस्परिक संबंधें की रक्षा हो जाएगी…उसको प्ूरा-पूरा समझा जाएगा, उसे उन उबाउ परम्पराओं, बंधनों  अपमानों, दायित्वों या सीमाओं में ताउम्र बंधकर  नहीं रहना पड़ेगा…तो ऐसा नहीं है। क्योंकि विवाह संस्था या सहजीवन इन दोनों के साथ या आसपास एक पितृसत्तात्मक समाज फैला होता है , जो स्त्री को कोई स्वतंत्र और स्वायत्त जीव समझने से इनकार करता है। इसलिए स्त्री  के वजूद और आत्मा पर समाज, खाप पंचायतों, पंचों के न्यायिक फैसलों या धर्मिक दखलों और नियमों के रूप में दखल देने उसे नष्ट करने में अपनी पूरी ताकत झोंक देता है।
ऐसे मेंस्त्री को समाज की ओर से सम्मान, अधिकार , विश्वास और  आधार तो नहीं ही मिलता, वरन् उसे हमेशा तौलती और दुर -दुराती दृष्टि का सामना झेलना पड़ता है। ऐसी परिस्थितियों में स्त्री यहाँ भी घुटती है और एकाकी हो जाती है। विवाह-संस्था की गरिमामय व आभासी आवरण के नीचे जो अपराध,  असहमतियाँ, दुर्बोध्, कटुताएँ या अपमान दबे या छिपे रहते हैं…वे सहजीवन जीते युग्म में उघारे पड़ जाते हैं…और स्त्री -त्रासदी का वही खेल फिर  से शुरू हो जाता है।
सर्वेक्षण के मुताबिक सहजीवन में होते बलात्कार, सम्मान, हनन, पुरुष-एकाधिकार , प्रताड़नाएँ और परस्त्री  संबंधें का प्रतिशत वैवाहिक संबंधें से अधिक  है , क्योंकि वहाँ पुरुष किसी का जवाबदेह नहीं है और स्त्री  की यह मुक्ति समाज में अवांछनीय है। ऐसे में सहजीवन में रहती स्त्री यदि माँ भी है तो इस बंधन  से दस, पंद्रह या बीस वर्षों पश्चात मुक्त होती किस एकांत और उदासी को अर्जित करती है वह एक शोचनीय प्रश्न है।
बौद्धिक  आत्मनिर्भर, सजग और स्वतंत्र विचार और व्यक्त्वि रखने वाली स्त्री  के लिए तो सहजीवन में रहना या उससे बाहर निकलना इतना कष्टप्रद और असहनीय नहीं होगा किन्तु कमजोर वर्ग व मानसिकता वाली स्त्रियाँ अपने सहजीवन के स्वप्न के टूटने के बाद जीवन भर सामाजिक संस्थाओं, साध्ुओं-बाबाओं या न्यायपालिकाओं के चक्कर लगाती रहती हैं।
आज जब तमाम कायदे-कानून सजीवन की वैधता  पर मुखर होते दिखते हैं। समाज-सेवी संस्थायें महिलाओं के हकों की लड़ाई में उभर कर साथ आ रही हैं, विमेन हेल्प लाइन, पुलिस हेल्प नम्बर जैसे सहारे विकसित हो रहे हैं और कानूनों में कई फेर  बदल किये गये हैं तब भी स्त्री  की आगे बढ़ने की लगन, उसकी जिजीविषा, जुझारूपन व साहस को स्वीकार करने में पुरुष को दिक्कतें आ रही हैं। इसलिए अधिकारों, स्थिति और जगह, सम्मान और स्पेस तथा जीवन ;भ्रूण-हत्या, बलात्कार के बाद हत्या, प्रेम-विवाह में होती दुर्दशा आदि  की लड़ाई जब स्त्री जीत  जाएगी तब रास्ते अपने आप जगह दे देंगे।

साथ होकर भी पुरुष एवं स्त्री की स्वतंत्र परिधि क्या है? 

साथ रह कर भी पुरुष एवं स्त्री  की स्वतंत्रा परिधि तो  यही है कि दोनों को समान पारिवारिक व नागरिक अधिकार  मिलें, अनुचित भौतिक व भावनात्मक दबाव न हों, परिवार व समाज में बराबर स्तर का सम्मान मिले। स्त्री  अस्मिता का न खंडन हो न उसे उजागर कर स्वामित्व का ढोल पीटा जाए और सबसे अहम स्त्री  के स्पेस , निजत्व पर किसी तरह का हमला, दखल या नज़रअंदाजी न की जाए। एक आदर्श विवाह, आदर्श युग्म व आदर्श जीवन के यही मानदंड होने चाहिए।

स्वप्न समय : बीहड़ में उतरती भाषा

( सुप्रसिद्ध कवयित्री सविता सिंह की किताब स्वप्न समय की समीक्षा कर रहे हैं युवा समीक्षक आशीष मिश्र और इसी किताब की कविताओं के प्रसंग से सुप्रसिद्ध आलोचक विजय कुमार का एक पत्र कवयित्री के नाम ) 


आशीष मिश्र

इस बीच स्त्री लेखन के प्रति हिन्दी में एक स्वीकार भाव आया है, बाजार और मीडिया ने जगह दी  है, पर सजग और सशक्त आलोचना के अभाव में बहुत कुछ कूड़ा-करकट भी उड़ रहा है। अभी तक हिन्दी आलोचना में पुरुष ही प्रभावी हैं, जो स्त्री-लेखन को अपने ही बोध के दायरे में समझने का प्रयास कर रहे हैं। यह आज़ भी श्लील और अश्लील के विवाद में उलझा हुआ है। हिन्दी के महाबली आज़ भी इसे वर्ग की धारणा में किसी तरह समंजित कर या फ़िर अपने सांस्कृतिक अतीत-व्यतीत की सीमा में किसी तरह खपा कर प्रतिमान गढ़ने का प्रयास कर रहे हैं। स्त्री-कविता लेखन इससे बहुत गहरे में प्रभावित भी हुआ है। स्त्री-लेखन का बड़ा हिस्सा मर्दवादी भाव-बोध की ही पुनर्रचना या पुनरुत्पादन है। यह न रचने की अपेक्षा घातक है। यह अपने प्रतिरोधी संसार को ही सांस्कृतिक स्तर पर मज़बूत करना है। अपने मौलिक आत्म पर एक और परत चढ़ा लेना है। इस सबसे निकल पाना एक स्वचेतस आत्म के बिना असम्भव है। इन स्थितियों में सविता सिंह की कविताओं की निर्व्याज दृष्टि, उसकी शुभाकांक्षा और इन सबके साथ गहराइयों में उतर पाने और उसे अभिव्यक्त कर पाने में समर्थ भाषा आशा जगाती है।

सविता सिंह की कविताएं एक मुक्त आत्म से पैदा नई कविताएं हैं। इस संग्रह को हिन्दी स्त्री कविता लेखन की परम्परा में समझने का प्रयास गलत निष्कर्ष पर ले जाएगा। मुक्ति इनके सृजन का सब-सेट नहीं है। एक-एक शब्द मुधुमक्खी की तरह इसी सजग कर्म में नियोजित है। यहाँ स्त्रीवादी नारों का अभाव मिलेगा(फलतः पल्लवग्राहकता सम्भव नहीं)। अतः एक-दो कविताएँ और कविता की(से) छिटकी हुई पंक्तियाँ उठा कर यूरेका-यूरेका चिल्लाते हुए इस गहरे सांस्कृतिक कर्म का इतिसिद्धम कहना कठिन। इस संग्रह की कविताओं से गुजरते हुए गहन सर्जनात्मकता जिस सहजता से हमारे चेतन-अवचेतन के विविध स्तरों को बदलने में सक्रिय होता है, इसका अनुभव हमें अपनी दुनिया के प्रति और ज़्यादा सजग और संवेदनशील बनाता है। सर्जनात्मकता के साथ सहजता इस बात का प्रमाण है, कि उनका मक़सद सिर्फ़ हंगामा खड़ा करना नहीं है; इसके उलट बे-आवाज़ सब कुछ बदल देना है। इस  संग्रह की दूसरी ही कविता में सविता सिंह अपने जीवन और सृजन का एक बिम्ब रचती हैं; जो उनके रचना-कर्म को समझने में एक सूत्र हो सकता है–
“और यह जीवन भी है जैसे अपना ही हाथ उलटा पड़ा हुआ
किसी पत्थर के नीचे
इसे सीधा करते रहने का यत्न ही जैसे सारा जीवन”
संग्रह की छोटी-लम्बी अधिकांश कविताएं एक सांस्कृतिक व्यूह रचना की तरह लगती हैं। कविताओं के तल में इस बात की सु-व्यग्रता मिलती है, कि हमारे चरों तरफ़ स्त्री आत्म को निरस्त करते हुए जो कुछ फैला है, उसे कैसे बदल दिया जाए। सविता सिंह के पास एक संवेदनशील हृदय और दुनिया-जहान के विस्तृत अनुभवों के साथ जरूरी दार्शनिक विवेक भी है। बिना विवेक के अनुकूलित संवेदन स्त्री के लिए पाश बनता जाता है। और दूनिया का मर्दवादी बोध इसे प्रमाणित करता है। इस तरह एक स्त्री अपने दमन के खडयंत्र में स्वयं ही सम्मिलित हो जाती है। वे एक कविता में लिखती हैं– “मेरे होने और देखने के बीच थी सारी सृष्टि”। स्त्री के लिए अपना ‘स्व’ हो पाना और उसको देख पाना सबसे बड़ा संकट है। उसके होने और देखने के बीच उसे स्थगित रखने वाला पूरा दृश्यप्रपंच है। विवेक और सदाकांक्षा के अभाव के कारण ही स्त्री-लेखन का बहुत बड़ा हिस्सा सह-उत्पादन या पुनरुत्पादन-जैसा है। मर्दवाद के कन्धे पर बैठ कर उसी को गुदगुदाने वाले सांस्कृतिक उत्पादन में लेखिकाओं की बड़ी संख्या नियोजित। इसे बाजार और बहुराष्ट्रीय पूँजी-तंत्र की सह भी प्राप्त है। बाज़ार को आह चाहिए और उन्हें वाह- विन-विन थियरी! स्वप्न के फ़ूल शीर्षक कविता की कुछ पंक्तियाँ

“कमरे के किनारे की गोल मेज़ पर
सजे प्लास्टिक के फूलों की तरह
वह यथार्थ है जिसे वह कुछ और समझ बैठी है
कोई भरमाये हुए है उसको जबकि वह जाए अगर अपनी प्रिय कविताओं की तरफ़
वे दिख सकती हैं किस तरह चीजें रहती हैं
अपनी उदास कृतिमताओं में
हमारी लिप्साओं से कैसे जन्म लेती हैं पुरुषार्थ की शक्तियाँ
महत्वाकांक्षाएं किस तरह वेश्याएँ बनाती हैं”

सविता सिंह एक-एक शब्द का चुनाव बहुत सचेत ढ़ंग से करती हैं। पहली पंक्ति में आए ‘किनारे की गोल मेज़’ पर ध्यान दें,इन्हें खोले बिना लेखिका के रचना-केंद्र तक पहुँचना कठिन है। संग्रह की कविताओं से पता चलता है कि सविता सिंह का स्त्रीवाद बहुत व्यापक है और उनके लिए मुक्ति सिर्फ़ स्त्री-मुक्ति नहीं है। यहाँ कविताएं मुक्त करती हैं; सीमा नहीं बनाती हैं। इनके लिए सीमाएँ और किसी भी तरह का शोषण मर्दवाद का ही प्रतीक है। सभी सुन्दर चीज़ों को बचाना उनके स्त्रीवाद का ही अंग है। उनके यहाँ प्राकृत और उसके विविध उपदानों को विषय बनाने वाली ढ़ेरों कविताएँ हैं। संग्रह में एक कविता है– नई आवाज़ें। सुबह की बारिश का संवेदनशील चित्रण है। इस चित्रण में प्रकृति के साथ भाव और व्यंजना की विविध परतें हैं। अगली पंक्ति में लिखती हैं –“जिनके यूँ होने से बचा रहता है बहुत कुछ”। उनके लिए स्त्रीवाद सबकुछ को मुक्त करने और सुन्दर को बचा लेने की ललक का नाम है। उनके इस स्वप्न का दायरा बहुत व्यापक है। इसमें मध्य भारत के धधक रहे जंगलों की भी अनुगूँज हैं। इस संग्रह में ‘स्वप्न के राग’ और ‘कारतूस’ शीर्षक कविताएं इस सन्दर्भ में उल्लेखनीय हैं।

सविता सिंह के साथ हिन्दी कविता सृजन के उन क्षेत्रों में प्रवेश करती है जहाँ इसके पहले कभी नहीं गयी। मेरी समझ से इसका कारण यह है कि लेखकों का जीवन-बोध सापेक्षतः जीवन का सामान्य बोध होता या उससे बहुत ज़्यादा समंजित। अतः भाषा के लिए भी कोई नितांत मौलिक संघर्ष नहीं होता, भाषाएँ समान्यतः उनके बोध से अनुकूलित हैं। लेखिकाएँ पुरुषों द्वारा गढ़े गए स्त्रीवादी नारों में उलझ कर अपने प्रतिरोधी दुनिया को ही रचती रहती हैं। इस तरह जीवन बोध का एक प्रतिगामी सम्बद्धता बनती है। इसे तोड़ने के लिए एक विरल मेधा की अवश्यकता है होती है। सविता सिंह की कविताएं इस सम्बद्धता को तोड़ती हुई अपने बोध को रोप देती हैं। यहाँ कविता विविध स्तरों पर पुंसत्त्वादी अनुभवों को डिकोड करती हुई अपने अनुभवों की कोडिंग करने में सक्रिय दिखेगी। यह चेतन-अवचेतन के जिन गहरे स्तरों की बात है वहाँ मुक्तिबोध के बाद हिन्दी कविता में किसी ने उतारने की कोशिश नहीं की। ये कविताएं वहाँ पहुँचने और उसे बदलने के लिए नई भाषा, नई प्रविधियाँ ईज़ाद करती हैं। इस प्रक्रिया में अगर संग्रह की कुछ कविताएं मेटाफ़िजिकल लगें तो स्वाभाविविक है। यह एक भाषिक प्रविधि है। यह बात सर्व विदित है कि मुक्तिबोध की भाषा के बारे में रामविलास शर्मा ने यही भूल की थी। यहाँ भाववादी और मेटाफ़िजिकल प्रतीकों का उपयोग है। पर बहुत सजग ढ़ंग से उन्हें नये संदर्भों में अपने अनुकूल ढ़ाल लिया गया है। संग्रह के शीर्षक कविता की आरंभिक पंक्तियाँ

“यूँ स्वप्न से शुरू हुआ यह जीवन
जैसे कि इससे पहले कुछ और न था
चेतना थी तो स्वप्न की ही
नीली सफ़ेद कहीं चितकबरी
किसी भूरे विस्तार में अधलेटी
अलसाई उठती फिर गिरती किसी नीद में”


यह कविता वहाँ खड़ी है, जहाँ एक स्त्री-आत्म मर्दवादी सांस्कृतिक अतीत से अपने वर्तमान को, अपने होने को संभव करती है। यहाँ अपने स्व को उसके वास्तविक रूप में पाने की छटपटाहट है।
एक कविता में लिखती हैं, कि ‘यदि मैं सच्चाई को जानना चाहूँ तो मुझे नीद के उस तट पर जाना होगा जहाँ स्वप्न की नदी बहती है और फ़िर उसके नीले जल में उतरना होगा’। यह एक फांतासी है। संग्रह में एक कविता है-‘चाँद तीर और अनश्वर स्त्री’। यह इनकी सर्जनात्मक क्षमता का प्रमाण है। मुझे लगता है इस संग्रह की कविताओं की भाषा पर अलग से और गम्भीरता से विचार करने की जरूरत है; इसमें ऐसा बहुत कुछ है जो हिन्दी कविता के लिए नया है तथा जिससे कविता के भविष्य के प्रति आशा बँधती है।

विजय कुमार का पत्र 

प्रिय सविता जी

आपकी कविताओं से गुज़रना सचमुच एक आह्लादकारी अनुभव है..सोचते हुए कई बातें दिमाग में आती रहीं. मैं उन्हें लिख देना चाहता हूं.  लेकिन सच तो यह भी है कि आपकी कविताओं पर एक औपचारिक सी प्रतिक्रिया लिखना मुझे एक गहरे संकोच से भी भर दे रहा है  . भीतर उत्साह और संशय दोनों है.   क्योंकि कविताओं को पढना एक बात है और अपने इम्प्रेशंस को  शब्दों में बांधना एक बिल्कुल दूसरी बात . दूसरी बात  यह भी है कि आपने जिस मनोभूमि का संधान किया है  उसे रेखांकित करने और उस  पर कुछ कहने के लिये ज़रूरी टूल्स भी उपलब्ध नहीं है .

ईमामदारी की बात है कि हिन्दी काव्य की आलोचना जिन अवधारनाणों  पर पली- पुसी है वे ज्यादा  काम भी नहीं आते ऐसे वक्त. . मैंने शायद उस  दिन आपसे कहा था कि संवेदन और भाषा की द्वंद्वात्मकता के वे तमाम दुर्गम  इलाके होते हैं , उन्हें परिभाषित करना अपने आप में एक चुनौती होती है.   ऐसी किसी द्वन्द्वात्मकता को निभाते हुए  आप जिस प्रकार के एक sense of inversion को  रचती हैं वह हिन्दी कविता में अनूठा है , गहन है, जोखिम से भरा हुआ है. उसका फौरी अर्थ नहीं लिया जा सकता .मेरा जैसा व्यक्ति इन कविताओं को पढकर एक पाठक के रूप में अपना एक ‘ पाठ ’ ही तो बना सकता है जो कि सम्भव है कि सिरे से गलत भी हो. पर उसके अलावा कोई और राह भी दिखाई नहीं पडती .

कवयित्री सविता सिंह

मैं अपनी बात को इसी  रूप में  कह सकता हूं  कि मेरे लिये रचित  के भीतर से झांकती यह द्वंद्वात्मकता सबसे महत्वपूर्ण चीज़ है ., आपके इस कविता संग्रह के शीर्षक में यह उभयधर्मिता  है और तमाम कविताओं में भी. . स्वप्न और समय के ये रिश्ते जिनमें परिचित , अभ्यस्त और ज्ञात के सीमांत पर वह झिलमिलाता हुआ , अभी दिखता और अभी विलुप्त होता हुआ संसार . वही तो  इन कविताओं की सबसे बडी मार्मिकता है. अपने होने या दिये हुए बोध का अतिक्रमण करने की वह बुनियादी इच्छा . समर्पण और एकांत की विभाजित उपस्थिति – उसका यह निराला sensation  पढने वाले को बांधता है . इस sensation को आप कुछ भी नाम दे सकते हैं. चाहे तो उसे आजकल की दुनिया में सुविधा के लिये ‘स्त्री चेतना ‘ भी कह सकते हैं. पर कविता जैसी विधा में कोई भी अर्थ इतने भर से व्याख्यायित नहीं हो जाता. यह   जिस तरह की कविता  हैं वह निष्कर्षों की नहीं, प्रक्रियाओं की कविता कहलायेगी.सूक्ष्म और जटिल संवेगों की कविता.  वहां  अनुभव प्रक्रियाओं का एक खुला और निष्प्रभ संसार है. अर्थ को आमंत्रित करता हुआ भी और उसे नाकाफी बनाता हुआ भी.  इस द्वंद्वात्मकता में वे चरम से दिखायी देने वाले सारे क्षण जहां रचयिता का सबसे अधिक आत्म- विसर्जन है और सबसे अधिक आत्म -चेतस स्थिति भी;  जहां वजूद की चरम सांसारिकता भी है और एक अधिभौतिकता भी ; मनोभावों के वेग की रचना भी और उन्हें देखनें निरखने की आवश्यक तटस्थता भी . इसे कोई दूसरे से यूं ही सहज उपलब्ध नहीं कर सकता , यह एक रचनाकार की  कुल जमा मानसिक संरचना , यथार्थ बोध और उसके अनुभूति विधान का एक अभिन्न हिस्सा होता है. कहना न होगा कि  कला में ऐसी कोई भी द्वंद्वात्मकता एक सजग रसिक को  हमेशा आकर्षित करती है क्योंकि वह जानता होता है कि इसी मे रचनाकार की रचनात्मक ऊर्जा का वास  है . दूसरे शब्दों में कहूं कि कोई भी रसिक   उस ज़मीन से गहरे obsessed  होने के लिये बाध्य  है जहां उसे एक कलाकार सबसे अधिक निर्वैयक्तिक लगता  है और सबसे अधिक subjective    भी  .

इसी बात पर मुझे याद आता है कि अपने चारों ओर के निज़ाम और जीवन परिस्थितियों के बीच हमारी subjectivities  किस प्रकार से अपना आकार लेती हैं , हमारी ‘ आइडेंटिटी ‘ किस तरह से बनती है, कैसे दैनंदिन हमारी चेतना में शामिल हुआ रहता है , किस प्रकार से वह कला अभिव्यक्तियों  में अपनी भूमिका अदा करता है , इसकी रुचि आज हमारी भाषा में तो लगभग नहीं के बराबर है, पर है वह बहुत बुनियादी और  महत्वपूर्ण बात.  Zizek  को पढता हूं तो उनकी एक दिलचस्प बात याद आती है कि the identity of something is outside of itself. There is, as it were , a hole in everything, a little piece  missing that can be found beyond itself, revealing the truth of being.  यह जो रिश्ता है हमारा अपने चारों ओर से वह किस तरह से हमारे भीतर से अपना रास्ता बनाता है इसे जानना बहुत उत्तेजक अनुभव है. अपने होने के सेंसेशन और और सपूर्णता की किसी छवि , किसी मिथ के बीच पसरा हुआ वह तनाव जिसमें हम कला की दुनिया को रचते हैं , यह लगातार बहुत चुनौतीपूर्ण बना रहता है.
‘ देह ‘ को एक बुनियादी मैटाफर बनाना   और उसी के  आधार पर तमाम तरह के रहस्यों , पार्थिव कामनाओं , गतिशीलताओं , द्वंद्वों  , एहिकताओं,  जकडनों , स्वप्नों , मुक्ति की अभीप्साओ,   , राग- विराग की सघनताओं को रचना , ठहरना , उनका गहन  पर्यवेक्षण  और उनके  पार चले जाने की यह विकलता . सदियों  से स्त्री ने अपनी इस देह के ऑबसेशन को कला में रचा है क्योंकि इसी से गुज़र कर वह वास्तव में देहहीन हो जाना चाहती है –  यही शायद इन कविताओं की अधिभौतिकता है. चेतना पर तमाम तरह के इतिहास , परम्परा , सामाजिकता, समकालीनता के बोझ को आप इनके पीछे लरजता हुआ देख सकते हैं. पर कोई भी अच्छी  कविता उन्हें सीधे सीधे व्यक्त करना नहीं चाहेगी .वह तो भाषा में उन इलाकों का विचरण है जो घटित तो हैं पर अरूप हैं , अमूर्त हैं. कला शायद इन्हीं अर्थों में  किसी immediacy  को रचती है . वह अपनी इस समस्त भटकन का एक रूपांतरण चाहती  है. . आपकी ही उन पंक्तियों को उद्धृत करूं कि –
.
“ किसी ने सुनी है वह सांस हवा की
   जिसमें  चलती रहती है प्यास जीवन की ” 


सविता जी मैं अधिक तो नहीं जानता , पर मुझे अच्छा लगा वह कौशल जहां कविता  एक निरंतरता का  बोध देते देते  हठात किसी जगह चीजों को ‘ फ्रीज़ ‘ कर देती है. या वैसा पढने वाले को लगता है. यह अप्रत्याशित मुझे भाता है . इसमें प्रश्नाकुलता भी होती है,आश्वस्ति भी,  व्यतिक्रम भी, विभाजन भी , मनोदशाओं का एक सुकुमार  अल्हडपन भी ,  अवश उत्तेजना और उन्माद का रचाव भी ,सिमटना – लौटना , एकांत ,  स्मृति और व्यथा भी ,  गुह्य और गोपन की तमाम तरह की अनूगूंजें भी और फिर एक अगले प्रस्थान की एषणा  भी-.. ये अलग अलग शेड्स हो सकते हैं.  कुछ कविताओं के ऐसे अंत दिलचस्प हैं –  .
वह कौन सा रंग है  अकेला

नीले को प्रिय
 क्या कोई जानता है


  *     *    *
हवा आती है सारी छुपी हुई  अतृप्तियों को
उजागर करती
जगाती किन वासनाओं को , आह !
 *    *   *
क्या है जिसके लिये  फिर भी
 यूं गिरती है देह अपने भीतर


 *   *   *


मैं हूं सुकून से जैसी पहले कभी न थी
आस्वस्त भी कि प्रेम पहचान लेगा इस नये एकांत को

शायद मेरी एक बात यहां पहले कही गयी कुछ बातों का दोहराव लगे पर फिर भी मैं यह कहना चाहता हूं कि   आपकी कविताओ में  जो विपर्यय भाव का ताप बना रहता है उसे संवेदन और भाषा की किसी निरंतर और बुनियादी द्वंद्वात्मकता में लक्षित किया जा सकता है.  यह अकारण नहीं है कि आप की बहुत सारी कविताओं में भाषा के इन  सीमांतों  की गवाही है . यह बात ही कितनी अजीब है कि भाषा एक हद तक ही हमारे बहुत सारे  सेंसेशंस  को पकड सकती है  पर भाषा के बाहर उन सेंसेशंस  का कोई अर्थ भी नहीं बनता . जिस भी कलाकार ने प्रत्यक्ष इसे जाना है वह किसी न किसी रूप में इस स्थिति को व्यक्त  करता भी है. हर महत्वपूर्ण कला भाषा की इन सरहदों पर अपनी एक अपूर्णता के बोध के साथ ठिठकी खडी होती है . आपकी कितने सहज तरीके से जगह जगह  से इसे व्यक्त किया है-
 हैं,जहां दिखती हूं खुद को अदृश्य  फिर
प्रकट होती हुई
  *    *
        शब्द उजडे हुए उखडे उखडे  इधर – उधर भटकते
       अस्त व्यस्त  भाषा ज्यों हाथ  बांधे खडी हो
    *    *
       क्या लिखूं यह देखने के बाद क्या कहूं
       क्या करूं कि अब लौटना और भटकना एक सा हो
    *      *
      मेरे लौटने में ज़रूर कोई  विवशता रही होगी
      तभी मैं शब्दों और सभ्यताओं में लौटी
   *        *
     कोई भाषा नहीं वहां कि वह कुछ कहे भी
     एक चुप्पी में सब कुछ होता चला जाता है

सविता जी यह अतिशयोक्ति नहीं यदि मैं कहूं कि आपकी इन कविताओं में ऐसा कुछ है जो हमारे समूचे कविता – परिदृश्य में मुश्किल से कहीं और कहीं दिखायी पडता है. यदि मैं गलत हूं तो कोई इसे प्रमाणित करे .अपने  वस्तुपरक संसार को जज़्ब कर उसे लांघ जाने की यह क्षमता ;  अपनी ‘ सब्जेक्टिविटी की ऐसा अध्ययन ; अपने होने का यह प्रतिनिधित्व ;  एषणा, अकुलाहट , आवेग , करुणा , उत्ताप , आशंका  ,समर्पण, एकांत ,  फैलने और सिमटने के संवेगों का यह प्रकटीकरण  , उनके रूपांतरण का यह  सामर्थ्य ;  किसी अबूझ विस्तार की दहलीज पर खुद को विलयित कर देने  की यह सतत गतिशीलता  ;  मैं और ‘ पर’ का यह निरंतर तनाव – क्या कहीं और इस तरह से दिखाई दे रहा है ? हमारे बुनियादी संवेग वही रहते हैं पर उन्हें व्यक्त करने की विधियां बदलती जाती हैं. हम अपने समय के नये सन्दर्भों में सारी चीजों का पुनराविष्कार करते है   ;  वह सब जो  किन्हीं नये  अनुभवों का विमर्श तैयार करने लगता   हैं. इन अर्थों में आपकी   यह कविता जीवन से लबालब भरी एक ‘ इंटेस  ‘ कविता लगती है.. ऐसे अस्थिर  अर्थों के संसार की कविता लिख कर  आपने  हमारी मौजूदा काव्य अभिरुचियों को बहुत सम्पन्न बनाया है.. कुल मिलाकर यह मेरी बहुत निजी किस्म की प्रतिक्रिया है . यद्यपि बहुत सारी बातें मैं ठीक से लिख नहीं पाया . फिर भी …..जैसा भी लगा , आपको लिख दिया है. .
साभिवादन ,
विजय कुमार

आधुनिक पीढ़ी से मुझे आशा है कि परिवर्तन लाएगी : ममता कालिया

( प्रज्ञा पांडे के अतिथि सम्पादन में हिन्दी की पत्रिका ‘ निकट ‘ ने स्त्री -शुचितावाद और विवाह की व्यवस्था पर एक परिचर्चा आयोजित की है . निकट से साभार हम वह  परिचर्चा  क्रमशः प्रस्तुत कर रहे हैं , आज  सुप्रसिद्ध लेखिका ममता कालिया  के जवाब.   इस परिचर्चा के  अन्य  विचार पढ़ने के लिए क्लिक करें :  ) 

जो वैध व कानूनी है वह पुरुष का है : अरविंद जैन 

वह हमेशा  रहस्यमयी आख्यायित की गयी : प्रज्ञा पांडे 


अमानवीय और क्रूर प्रथायें स्त्री को अशक्त और गुलाम बनाने की कवायद हैं : सुधा अरोडा 

अपराधबोध और हीनभावना से रहित होना ही मेरी समझ में स्त्री की शुचिता है :  राजेन्द्र राव 

परिवार टूटे यह न स्त्री चाहती है न पुरुष : रवि बुले 



बकौल सिमोन द बोउआर “स्त्री पैदा नहीं होती बनायी जाती है ” आपकी दृष्टि में स्त्री का आदिम स्वरुप क्या है ?

सिमोन द बोउआर  का सारा जोर इस बात पर है की स्त्री को पहले मनुष्य समझा जाय.स्त्री की शारीरिक संरचना ने उसको बाधित और सीमित किया है.

क्या दैहिक शुचिता की अवधारणा  स्त्री के खिलाफ कोई साजिश है ?
निस्संदेह.समाज में नियम निर्धारण की स्वाधीनता न जाने कब पुरुष ने अपने हाथ में ले ली और स्त्री के आचरण और मान प्रतिष्ठा के प्रतिमान तय कर डाले.वह स्वयं उसकी रक्षा जब नहीं कर पाया उसने स्त्री के अन्दर इज्ज़त नाम का हौवा बैठा दिया.मनोवैज्ञानिक स्तर पर उसने स्त्री को अस्थिर बना कर देह को  उसकी चलती फिरती जेल बना दिया. देह कितनी ढकी उघाडी जाय , अन्य पुरुष उस के किस अवयव  पर दृष्टि डाले या नहीं ये सब पुरुष तय करने लगा.इसी अवधारणा के रहते बलात्कार एक भीषण मनोसामाजिक ग्रंथि के रूप में सामने आया. अगर शुरू से इस दुर्घटना को भी अन्य दुर्घटनाओं की तरह सामान्य मान कर देखा जाता तो स्त्री का जीवन अपेक्षाकृत सरल होता. बलात्कार को ऐसे लिया जाता जैसे घुटने पर चोट ,जैसे टखने में मोच,तो स्त्री के मान सम्मान की अधिक रक्षा होती और उसे ज्यादा संतुलित जीवन जीने का अवसर मिलता.

समाज  के सन्दर्भ में  शुचितवाद और  वर्जनाओं को किस  तरह परिभाषित किया जाए ?
कई बार हमारे समाज की संरचना खुद हमारी समझ के बाहर  हो जाती है.शुचितावाद का समस्त बोझ स्त्रियों को ही क्यों उठाना होता है. क्या पुरुष की शुचिता के विषय में इतनी चिंता दर्शायी जाती है या उस पर इतना चिंतन होता है ? वर्जनाएं भी इसी कोटि की ग्रंथियां हैं. समस्त वर्जनाएं स्त्री पर लागू की जाती है. स्त्रियाँ भी भय वश इन प्रतिबंधों को स्वीकार कर लेती हैं. इस अतिचार से मुक्त होने के लिए स्त्रियों में शिक्षा और जागरूकता की ज़रुरत है. समाज विमर्श का भी नया लिखित पाठ सामने आना चाहिए.

यदि स्वयं के लिए वर्जनाओं का  निर्धारण  स्वयं स्त्री करे तो क्या हो ? 
बेहतर हो.

विवाह की व्यवस्था में स्त्री  की मनोवैज्ञानिक ,सामाजिक एवं आर्थिक  स्थितियां  कितनी  स्त्री  के पक्ष में हैं ? 
प्रस्तुत समय में जो ढांचा हमें परंपरा से मिला है,वह पूरी तरह से  पुरुष प्रधान है. इसमें पुरुष और उसके
परिवार की सुख सुविधाओं का अचूक ध्यान रखा गया है.शादी के बाद पत्नी को प्रिय की जगह परिचारका की भूमिका में जीना पड़ता है. सभी गंदे काम कर्त्तव्य की कोटि मे डाल कर पुरुष निश्चिन्त हो जाता है.सबसे ज़रूरी है विवाह के बाद स्त्री का आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होना. तब उसके जीवन की अधि समस्याएं कम हो जाएँ .संभव है किन्तु यह आशंका होती है की शायद  मातृपक्ष  फिर वैसा ही चालाक निकले जैसा पितृ पक्ष.

मातृसत्तात्मक व्यवस्था में विवाह-संस्था क्या अधिक  सुदृढ़ और समर्थ होती। तब समाज भ्रूण हत्या दहेज़ हत्या एवं बलात्कार जैसे  अपराधों से कितना मुक्त होता ? 
हाँ भ्रूण हत्या और बलात्कार की घटनाएं ज़रूर कम हो जाएँगी.

सह जीवन की अवधारणा क्या स्त्री के पक्ष में दिखाई देती है ?
.सहजीवन एक कामचलाऊ व्यवस्था के तहत कुछ समय के लिए स्वीकार्य हो सकता है.किन्तु इसमें जोखिम है की स्त्री ज्यादा पीड़ा पा जाय. जब तक शुचितावाद का चौखटा उसके ऊपर कसा रहेगा किसी भी सह सम्बन्ध से निकलना स्त्री के विरुद्ध ही देखा जाएगा.

साथ होकर भी पुरुष एवं स्त्री की स्वतंत्र परिधि क्या है ? 
.निर्भरता दो प्रकार की होती है.१.आर्थिक.2.वैचारिक . दोनों ही घातक हैं. अपनी स्वतंत्र इकाई के लिए ज़रूरी है की स्त्री के पास हर हाल में अपना काम हो. दूसरे ने वाला उसके मनोविज्ञान को नष्ट न करने पाए,यह आसान न होगा. फासले तय करने का वक़्त है यह. विवाह के वक़्त पंडित जो श्लोक वगैरह संस्कृत में अगड़म बगड़म उच्चारित करते हैं, समे हिंदी व्याख्या शामिल होनी चाहिए. साथ ही लड़के लड़की से पूछ कर उनकी उम्मीदों को भी उसमे स्थान दिया जाए. आधुनिक पीढ़ी से मुझे आशा है कि परिवर्तन लाएगी.

नरेश मेहता के उपन्यासों में स्त्री-जीवन

नितिका गुप्ता

नितिका गुप्ता डा. बाबा साहब आम्बेडकर विश्वविद्यालय , दिल्ली से शोध कर रही हैं.   संपर्क : nitika.gup85@gmail.com .

नरेश मेहता (जन्म 15 फरवरी 1922, मृत्यु 22 नवम्बर 2000) स्वातंत्र्योत्तर भारत के प्रमुख रचनाकारों में गिने जाते हैं। नरेश मेहता का वास्तविक नाम पूर्णशंकर मेहता था। उनकी काव्य प्रतिभा से प्रभावित होकर एक दिन नरसिंह गढ़ की राजमाता ने उन्हें ‘नरेश‘ नाम से सम्बोधित किया। बस तभी से वह नरेश मेहता नाम से पहचाने जाने लगे। उन्होंने साहित्य की हर विधा-काव्य, खण्डकाव्य, उपन्यास, कहानी, नाटक, एकांकी, निबंध, यात्रा-वृत्तांत आदि में रचना की है। उनकी अब तक लगभग 40 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।

नरेश जी ने लगभग तीन दशकों में कुल सात उपन्यासों की रचना की थीं। उनका प्रथम उपन्यास डूबते मस्तूल सन् 1954 में और अंतिम उपन्यास उत्तरकथा भाग दो सन् 1982 में प्रकाशित हुआ। ‘डूबते मस्तूल’ उपन्यास में रंजना नाम की एक आधुनिक स्त्री का चरित्र, उसी के शब्दों में प्रस्तुत किया गया है। इस उपन्यास की अवधि16 घंटों की है। इन 16 घंटों में रंजना अपनी संपूर्ण जीवनगाथा को (पूर्वदीप्ति पद्धति में) अपरिचित स्वामीनाथन को परिचित अकलंक का आवरण देकर सुनाती है। रंजना का चरित्र पाल-पतवार रहित नौका की तरह उद्देश्यहीन, रोचक और करुण, पर अविश्वसनीय है। उसे जीवनभर कोई भी स्थायी सहारा नही मिलता है। वह जिस भी व्यक्ति के करीब जाती है वहीं उससे दूर चला जाता है या वह खुद ही उससे दूर हो जाती है। जिस कारण वह जिन्दगी भर भटकावग्रस्त जीवन व्यतीत करती रहती है।

8 वर्ष के बाद मेहता जी का दूसरा उपन्यास ‘यह पथ बन्धु था’ सन् 1962 में प्रकाशित हुआ। इस उपन्यास ने उन्हें एक उपन्यासकार के रूप में स्थापित किया। यह उपन्यास एक आदर्शवादी, ईमानदार, स्वाभिमानी युवक श्रीधर की पराजय, थकान और टूटन की कहानी है। साथ ही इस उपन्यास में भारतीय स्त्री की भी करुण गाथा कही गयी है। नरेश मेहता ने मध्यवर्गीय परिवार की सरस्वती, गुणवन्ती के साथ ही सामन्तवर्गीय परिवार की इन्दु का भी यथार्थ चित्रण प्रस्तुत किया है। इस उपन्यास मे नरेश जी ने शिल्प मे प्रौढ़ता प्राप्त कर ली है।
नरेश मेहता ने चार खंडों में एक बृहत् उपन्यास की योजना बनाई थी। इसका प्रथम खंड ‘धूमकेतु: एक श्रुति’ सन् 1962 में और द्वितीय खंड ‘नदी यशस्वी है’ सन् 1967 में प्रकाशित हुआ। लेकिन किसी कारणवश इस उपन्यास का तृतीय और चतुर्थ खंड या तो लिखे ही नही गये या प्रकाशित नही हो सके। लेखक ने इस उपन्यास को संगीत के आधार पर विभाजित किया है। इसके प्रथम खंड को ’श्रुति-विस्तार’ की और द्वितीय खंड को ’श्रुति-आलाप’ की संज्ञा दी गयी हैं। इस उपन्यास में उदयन की आत्मकथा प्रस्तुत की गयी है। जहाँ ‘ धूमकेतु: एक श्रुति’  मे उसके शैशवावस्था का चित्रण है तो वहीं ‘ नदी यशस्वी है’  मे उसकी किशोरावस्था का चित्रण किया गया है।

मेहता जी का ’दो एकांत’ उपन्यास सन् 1964 में प्रकाशित हुआ। इस उपन्यास में विवेक और वानीरा के माध्यम से शिक्षित मध्यवर्गीय दम्पति का चित्रण प्रस्तुत किया गया है। लेखक ने इन दोनों के माध्यम से प्रेम और प्रेम के तनाव की कथा कही है। विवेक और वानीरा एक-दूसरे के साथ होते हुए भी अपने मन की व्यथा एक-दूसरे को नही बता पाते। जिस कारण उनका रिश्ता धीरे-धीरे भस्म होता जाता है और उपन्यास के अंत मे वह दोनों दो एकांत बनकर रह जाते हैं।नरेश जी का अगला उपन्यास ’प्रथम फाल्गुन’ सन् 1968 में प्रकाशित हुआ। इस उपन्यास का केन्द्रीय विषय प्रेम है। गोपा और महिम एक-दूसरे को पहली बार फाल्गुन मे ही मिलते हैं और अगले फाल्गुन मे ही हमेशा के लिए अलग हो जाते हंै। जहाँ गोपा का प्रेम धरती के गर्भ में छिपे जल की तरह है वहीं महिम अन्तरालाप के रूप में गोपा के प्रति तड़पता है। जब गोपा महिम के समक्ष अपने जारज संतान होने की बात स्वीकारती है तो महिम समाज-भीरु होने के कारण उससे अपने सारे नाते तोड़ लेता है। इस तरह एक प्रेम कहानी का दुखद अंत हो जाता है।

प्रथम फाल्गुन के 11 वर्षों  बाद नरेश मेहता का अंतिम उपन्यास ’उत्तरकथा’ दो भागों (प्रथम भाग सन् 1979 और द्वितीय भाग सन् 1982) में प्रकाशित हुआ। यह उनका ’यह पथ बंधु था’ के बाद दूसरा महाकाव्यात्मक उपन्यास है। इसमे भारतीय मध्यवर्ग के जीवन को उकेरा गया है। इसके केन्द्र में ब्राह्मण परिवार की तीन पीढि़यों का चित्रण किया गया है। इसका प्रथम भाग 1900 से 1930 तक के और द्वितीय भाग 1930 से 1948 तक के काल समय में व्यक्ति और समाज के बिखराव को समेटे हुए हैं।नरेश जी ने अपने उपन्यासों में स्त्री के हर रूप-बेटी, बहन, पत्नी, बहू, माँ, सास, प्रेमिका आदि का चित्रण किया हैं। वह स्त्री को आदर्श या पतिता के रूप में चित्रित ना करके मानवीय रूप मे चित्रित करते हैं । उनके उपन्यासों में स्त्री परम्परागत और आधुनिक दोनों रूपों में आई हैं। वह स्त्री के ममतामयी और त्यागमयी रूपों के साथ ही उसके स्वच्छन्द और आत्मनिर्भर रूपों को भी प्रस्तुत करते हैं। उनके उपन्यासों के केन्द्र में हर आयु वर्ग की स्त्रियाँ हैं। प्रभाकर श्रोत्रिय कहते हैं कि “सर्वत्र स्त्री को अपार संवेदना देकर, भाँति-भाँति के प्रदेशों, आयुवर्ग की स्त्रियों का अकंन कर नरेश ने समूची मानवता और उसकी करुणा-धैर्य-संयम-बलिदान की प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति कर के समूचे असहिष्णु समाज के प्रति इसी माध्यम से अपनी वितृष्णा और असहमति जताई है।”1

नरेश मेहता ने अपने समय की स्त्री का यथार्थ चित्रण अपने उपन्यासों में किया हैं। उन्हें स्त्री के परम्परागत स्वरूप में जो कुछ भी गलत लगा, उसका उन्होंने पुरुष होते हुए भी खुलकर विरोद्ध किया है। वह अपने समाज में स्त्री की स्थिति का गहनता से अध्ययन करते हुए, उसका मार्मिक चित्रण अपने उपन्यासों में प्रस्तुत करते हैं। उन्होंने अपने उपन्यासों में स्त्री जीवन की विभिन्न समस्याओं जैसे-अनमेल विवाह, बहुविवाह, दहेज प्रथा, वेश्यावृत्ति, यौन-उत्पीडि़न, जारज संतान आदि का दारुण चित्र प्रस्तुत किया हैं। साथ ही वह स्त्री जीवन के सबसे महत्त्वपूर्ण पक्ष-मातृत्व भाव का भी हृदयस्पर्शी चित्रण प्रस्तुत करते हंै। वह स्त्री की सभी समस्याओं का हल शिक्षा को मानते हैं। वह स्त्री को घर की चारदीवारी में ना रखकर, उसे समाजसेवा और देशसेवा करने के लिए भी प्रेरित करते हैं।

मेहता जी ने स्त्री के विधवा हो जाने पर उसके जीवन में आने वाले उतार-चढ़ावों को अपने उपन्यासों में चित्रित किया हैं। धूमकेतु: एक श्रुति उपन्यास में उदयन की बुआ दादी (माँ) बाल विधवा है, वह श्रृंगार नही करती है, उसके बाल नही है, सफेद साड़ी पहनती है और वह किसी शुभ कार्य में भाग नही लेती है। वहीं रत्नशंकर की विधवा पत्नी को जायदात मे हिस्सा यह कहकर नही दिया जाता कि ’यह शास्त्रगत नही है’। नरेश मेहता ने सूर्यशंकर द्वारा यह प्रश्न भी उठाया है कि-पुरुष को तीन-तीन विवाह करने का हक है तो स्त्री दूसरा विवाह क्यों नही कर सकती? लेकिन उनका यही पात्र सूर्यशंकर अपनी पत्नी को कुरूप होने के कारण त्याग देता है। यह स्त्री जीवन की कितनी बड़ी विडबंना है कि उसके गुणों को ना देखकर उसकी खूबसूरती को देखा जाता है। नरेश जी अनमेल विवाह की समस्या को भी चित्रित करते हंै। यह पथ बंधु था उपन्यास की इन्दु का विवाह एक बुढ़े जमींदार से कर दिया जाता है। विवाह के कुछ समय बाद ही वह विधवा हो जाती है और उसे अपना पूरा जीवन तीर्थाटन करते हुए व्यतीत करना पड़ता है। वहीं अगर स्त्री माँ नही बन पाती तो उसे सामाजिक बहिष्कार झेलना पड़ता है। धूमकेतु: एक श्रुति उपन्यास की मनुमाँ माँ ना बन पाने के कारण समाज द्वारा डाक्कन कहकर पुकारी जाती है। उत्तरकथा भाग एक उपन्यास मे वसुन्धरा के माँ ना बन पाने का कारण उसका बाँझ होना माना जाता है। जबकि वह दुर्गा को बताती है कि ’कमी उसमे नही है उसके पति मे है’। वहीं प्रथम फाल्गुन उपन्यास मे श्रीमती नाथ के माँ ना बन पाने के कारण रिटायर जस्टिस नाथ बाबू दूसरा विवाह कर लेते हंै। नरेश मेहता बताते हैं कि “लग्नोपरान्त भी जब अनेक वर्षों तक कोई सन्तान न हुई तब नाथ बाबू को दूसरे विवाह के लिए बाध्य होना पड़ा।”2 यह स्त्री जीवन का कितना बड़ा दुर्भाग्य है कि अगर वह माँ नही बन पाती है तो उसमे ही कमी मानी जाती है और पुरुष को दूसरा विवाह करने का अधिकार प्राप्त हो जाता है। जबकि इस समस्या का समाधान बच्चा गोद लेकर भी किया जा सकता है।

मेहता जी अपने उपन्यासों में आए दिन दहेज की बलि चढ़ने वाली स्त्रियों का भी हृदयस्पर्शी चित्रण प्रस्तुत करते हैं। डूबते मस्तूल की रंजना, यह पथ बंधु था की गुणवन्ती, उत्तरकथा के त्र्यम्बक की पहली पत्नी और दुर्गा दहेज के लिए प्रताडि़त की जाती हैं। गुणवन्ती को दहेज के लिए इतना मारा-पिटा जाता है कि वह लंगड़ी हो जाती है। वहीं त्र्यम्बक की पहली पत्नी को दहेज में सोने का पानी चढ़े जेवर लाने के कारण त्र्यम्बक की माँ कृष्णादेवी उसे कुएं में धक्का देकर मार देती है । गोपाल राय सही ही कहते हैं कि “भावनाप्रवण और दुखी स्त्रियों के चित्रण में नरेश मेहता शरच्चन्द्रीय भावुकता के शिकार तो हैं, पर वे उस भारतीय नारी का अत्यंत मार्मिक चित्रण करने में सफल हुए हैं जो करुणा, त्याग, सहिष्णुता, स्नेह और आत्मबलिदान की सजीव मूर्ति होती है।”3
नरेश मेहता बहुविवाह के प्रचलन को भी अपने उपन्यासों में प्रस्तुत करते हैं। उत्तरकथा उपन्यास मे त्र्यम्बक के दादा त्रिलोचन शुक्ल पहली पत्नी के जीवित होते हुए और भरापूरा परिवार होते हुए भी अपने दोस्त की बहन पार्वतीदेवी से दूसरा विवाह कर लेते हैं। इन्होंने  पति-पत्नी के रिश्ते मे किसी तीसरे के आने पर होने वाले दुःखदायी अंत का भी चित्रण किया है। उत्तरकथा उपन्यास मे मनोहरलाल उपाध्याय (कामदार साहब) अपनी पत्नी गायत्रीदेवी को उपेक्षित करके कमला नाम की स्त्री के साथ रहते हैं। उनका यही सम्बन्ध उनकी मृत्यु का कारण बनता है। कमला के भाई रुपयों के लालच मे अपनी बहन और मनोहरलाल उपाध्याय की हत्या कर देते हैं। नरेश मेहता कहते हैं कि लोगों ने कामदार साहब और कमला की इस प्रेम -कथा से यही शिक्षा ग्रहण की कि “पत्नी के अतिरिक्त किसी दूसरी स्त्री के होने पर मनुष्य का ऐसा ही दुःखदायी अंत होता है।”4

नरेश जी ने परित्यक्ता स्त्रियों का भी यथार्थपूर्ण चित्रण प्रस्तुत किया है। यह पथ बंधु था उपन्यास मे जब श्रीधर घर छोड़कर चला जाता है तो सरस्वती जीवन के 25 वर्ष परित्यक्ता स्त्री के रूप मे व्यतीत करती है। वह अपने इस दुःख के कारण यक्ष्मा रोग से भी पीडि़त हो जाती है। वहीं उसकी बड़ी बेटी गुणवन्ती को उसका पति त्याग देता है जिस कारण उसे परित्यक्ता स्त्री बनकर अपना जीवन व्यतीत करना पड़ता है। साथ ही इन्होंने वेश्या जीवन की त्रासदी का भी मार्मिंक चित्रण प्रस्तुत किया है। वैसे तो वेश्या का सामाजिक बहिष्कार किया जाता है लेकिन विवाह समारोह, जनेऊ संस्कार आदि में इन्हीं वेश्यों को बुलाकर नचाया जाता है। यह पथ बंधु था उपन्यास की मालिनी, वेश्या होते हुए भी धार्मिक प्रवृति की स्त्री है, फिर भी उसे समाज द्वारा उचित सम्मान नही दिया जाता।

मेहता जी ने अपने उपन्यासों में स्त्रियों पर हो रही यौन-हिंसा का भी संवेदनशील चित्रण प्रस्तुत किया है। डूबते मस्तूल उपन्यास की रंजना के साथ एक रात रेनाल्ड नामक व्यक्ति बलात्कार करता है। जिससे रंजना को अत्यधिक मानसिक आघात पहुँचता है। धूमकेतु: एक श्रुति उपन्यास मे विधवा वल्लभा का पिता ही उसका शारीरिक शोषण करता है। जब इस शारीरिक शोषण के कारण वल्लभा को गर्भ ठहर जाता है, तो वह आत्महत्या कर लेती है। वहीं उत्तरकथा उपन्यास की दुर्गा को घर मे अकेला पाकर उसका देवर विश्वनाथ उसके साथ बलात्कार की कोशिश करता है। लेकिन दुर्गा यहाँ पर रंजना और वल्लभा की तरह हार नही मानती बल्कि उसे मारकर भगा देती है। नरेश मेहता के उपन्यासों में इन प्रकरणों से पता चलता है कि स्त्री घर के बाहर तो सुरक्षित है ही नही, घर के अंदर भी सुरक्षित नही है। और ऐसी स्थिति मे तो बिल्कुल भी नही, जब उसका रक्षक ही (जन्मदाता ही), उसका भक्षक बन जाए। उन्होंने हिन्दू स्त्रियों के साथ ही मुस्लिम स्त्रियों के शोषण का भी हल्के से रूप मे चित्रण प्रस्तुत कर दिया है। नदी यशस्वी है उपन्यास मे मुनीर खां उदयन को बताता है कि जब वह पांच वर्ष का था तो उसके पिता के जाने के बाद ’उसकी मां को मौलवी साहब ने घर में डाल लिया’ और उसे धक्के मारकर घर से निकाल दिया। अतः स्त्री किसी भी धर्म की हो, पुरुषों द्वारा उन पर एकाधिकार जताया ही जाता है।

नरेश जी स्वतंत्र विचारों वाली और अतिभौतिकताग्रस्त स्त्रियों का भी चित्रण प्रस्तुत करते हैं। दो एकांत उपन्यास की वानीरा वैवाहिक होते हुए भी दूसरे पुरुषों से सम्बन्ध बनाती है। ऐसे ही सम्बन्धों से उत्पन्न संतान है- प्रथम फाल्गुन उपन्यास की गोपा। गोपा जारज संतान होने के कारण अपने प्रेम को विवाह मे परिणत नही कर पाती। समाज उसे ’एक घटिया औरत की संतान कहकर बुलाता है’ साथ ही यहाँ तक कहा जाता है कि ’ऐसी नाजायज औरत को उसकी संतानें कैसे अपनायेंगी’। वहीं यह पथ बंधु था उपन्यास की कमल एक पढ़े-लिखे परिवार की और खुले विचारों वाली स्त्री हैं। पर जब वह अपने परिवार के खिलाफ जाकर, बिशन से प्रेम विवाह कर लेती है तो उसके परिवारजन उसको खूब मारते-पीटते हंै और पुलिस मे झूठा ब्यान दिलवाते हैं कि ’बिशन ने मेरा अपहरण करके जबरदस्ती मुझसे विवाह किया है’। अतः स्त्री संभ्रंात परिवार से ही क्यों न हो उसकी नियति भी समाज की और स्त्रियों जैसी ही होती हैं। यह पथ बंधु था की सावित्री और उत्तरकथा की शारदा अतिभौतिकता से ग्रस्त स्त्रियाँ हैं। वह अपने पतियों के कान भरकर घर का बंटवारा कर देती हैं।  मेहता जी स्त्रियों को समाजसेवा व देशसेवा करने के लिए प्रेरित करते हैं। जहाँ प्रथम फाल्गुन की गोपा समाजसेवा को जीवन का लक्ष्य बना लेती है, वहीं उत्तरकथा की दुर्गा और नर्मदादेवी उपाध्याय स्वतंत्रता आंदोलन के लिए लोगों को जागरूक करके देशसेवा करती हैं। तो दूसरी और यह पथ बंधु था की रतना देश की स्वाधीनता के लिए फांसी पर चढ़ जाती है। साथ ही वह स्त्रियों को शिक्षा द्वारा आत्मनिर्भर भी बनाना चाहते हैं। वह उत्तरकथा उपन्यास मे दुर्गा को पढ़ने के लिए प्रेरित करते हैं और आंनदशंकर दवे (दुर्गा के मामा) भी अपनी विधवा बहू शकुंतला को पढ़ाते हैं । जिससे वह आत्मनिर्भर होकर अपना जीवन व्यतीत कर पाती है।

अंत मे हम कह सकते हैं कि नरेश मेहता ने अपने उपन्यासों के द्वारा समाज मे स्त्री की स्थिति का मर्मंभेदी चित्रण प्रस्तुत किया हैं। स्त्री चाहे पढ़ी-लिखी हो, किसी भी वर्ग की हो या किसी भी धर्म की हो, उसे परिवार द्वारा, समाज द्वारा और पुरुषों द्वारा प्रताडि़त किया ही जाता है। उन्होंने स्त्रियों की अच्छाईयों के साथ ही उनकी बुराईयों को भी चित्रित किया हैं।

संदर्भ-सूची:-
1. श्रोत्रिय प्रभाकर, भारतीय साहित्य के निर्माता नरेश मेहता, साहित्य अकादेमी, पुनर्मुद्रण 2013, पृष्ठ-107
2. मेहता नरेश, प्रथम फाल्गुन, लोकभारती प्रकाशन इलाहाबाद, पहला पेपरबैक संस्करण 2012, पृष्ठ-7
3. राय गोपाल, नरेश मेहता के उपन्यास, वागर्थ पत्रिका, भारतीय भाषा परिषद कोलकाता, नवम्बर 2001, पृष्ठ-19
4. मेहता नरेश, उत्तरकथा भाग एक, लोकभारती प्रकाशन इलाहाबाद, चतुर्थ संस्करण 2011, पृष्ठ-358

मातृसत्तातमक व्यवस्था स्त्रीवादियों का लक्ष्य नहीं है : संजीव चंदन

( प्रज्ञा पांडे के अतिथि सम्पादन में हिन्दी की पत्रिका ‘ निकट ‘ ने स्त्री -शुचितावाद और विवाह की व्यवस्था पर एक परिचर्चा आयोजित की है . निकट से साभार हम वह  परिचर्चा  क्रमशः प्रस्तुत कर रहे हैं , आज  स्त्रीकाल के संपादक संजीव चंदन के जवाब.   इस परिचर्चा के  अन्य  विचार पढ़ने के लिए क्लिक करें :  ) 

जो वैध व कानूनी है वह पुरुष का है : अरविंद जैन 

वह हमेशा  रहस्यमयी आख्यायित की गयी : प्रज्ञा पांडे 


अमानवीय और क्रूर प्रथायें स्त्री को अशक्त और गुलाम बनाने की कवायद हैं : सुधा अरोडा 

अपराधबोध और हीनभावना से रहित होना ही मेरी समझ में स्त्री की शुचिता है :  राजेन्द्र राव 

परिवार टूटे यह न स्त्री चाहती है न पुरुष : रवि बुले 

बकौल सिमोन द बोउआर”स्त्री पैदा नहीं होती बनायी जाती है.आपकी दृष्टि में स्त्री का आदिम स्वरुप क्या  है ?

स्त्री के बनाये जाने की प्रक्रिया उसके जन्म से ही शुरु हो जाती है , उसके मनोवैज्ञानिक मानस की तैयारी . बल्कि उसके आस -पास यह माहौल जन्म के पूर्व से बनने लगता है . भारत के कुछ अंचलों में यह मान्यता है कि लडकी के जन्म लेते ही धरती तीन ऊंगल नीचे चली जाती है और बेटे के पैदा होते तीन ऊंगल ऊपर. चीन में लडकियों  के पांव छोटे बनाने के लिए उन्हें लोहे के जूते पह्नाने की प्रथा है तो अफ्रीका के कुछ इलाकों में लडकियों  का खतना किया जाता है. पाठ्य पुस्तकों पर काम करने वालों ने उनमें जेंडर आधारित भेद भाव का विषद वर्णन किया है कि कैसे एक लडकी  गढी जाती है , पिता को अखबार पढते दिखाकर और मां को रसोई में खाना बनाते दिखा कर या राम को पाठशाला जाते दिखाकर और सीता को गुडिया से खेलते दिखाकर . फिर सवाल यह बनता है कि यदि स्त्रियां ऐसे गढी जाती हैं , तो कोई तो समय होगा , जब स्त्रियों का इस गढन से अलग स्वरूप होगा , जिसे आप आदिम स्वरूप कह रही हैं . निस्सन्देह ! इतिहासकारों ने आदिम स्त्री को पुरुषों के साथ बिना काम के जेंडर आधारित बंटवारे के एक साथ काम करते और फैसले लेते हुए बतलाया है , यह भी कि मातृवंशात्मक समाज का इतिहास रहा है , आदिम समाजों मे.

क्या दैहिक शुचिता की अवधारणा  स्त्री के खिलाफ कोई साजिश है ?

यह एक व्यव्स्था बनी होगी अनुमानतः स्त्री -पुरुष के यौन सम्बन्धों में आई अराजकता के कारण . ‘ वोल्गा से गंगा’ मे राहुल सांकृत्यायन दिखाते हैं कि कैसे अपनी  पसन्द के यौन सम्बन्ध के लिए आदिम मानव हत्यायें कर रहे थे . दैहिक शुचिता  रुढ होना प्रारम्भ कैसे हुआ होगा , इसके लिए समझ बनाती है फ्रेडरिक ऐंगल्स की किताब ‘ परिवार , निजी सम्पत्ति और राज्य’ . निजी सम्पत्ति की अवधारणा के साथ विवाह और परिवार संस्था बनी . फिर निजी सम्पत्ति को अक्षुण्ण रखने के लिए स्त्री की यौनिकता पर ‘शुचिता’ का नियंत्रण प्रारम्भ हुआ, ताकि अपनी ही संतान के पास अपनी सम्पत्ति जाये . यही वह पेंच है जिससे स्त्री को कसा जाने लगा और उसके खिलाफ  क्रूरता बनती गई , ‘ दैहिक शुचिता’ उसके अस्तित्व से ज्यादा मह्त्वपूर्ण  होती  गई. इतिहास के विकासक्रम मे यह सब हुआ , धीरे -धीरे व्यवहारगत  पतन  और क्रूरता की ओर उन्मुख होते हुए  . सभ्यता के इतिहास क्रम में हर प्रसंग किसी साजिश का हिस्सा नहीं होता . ऐसा नहीं है कि चार मर्दों ने बैठ कर स्त्रियों  को गुलाम रखने की कोई दीर्घगामी साजिश रची , योजना बनाई.

समाज  के सन्दर्भ में   शुचितवाद और  वर्जनाओं को किस  तरह परिभाषित किया जाए ?

शुचिता , पवित्रता एक ऐसा शब्द है , जो थोडे लोगों का बाकी बचे लोगों पर श्रेष्ठता कायम करते हैं . भारत में जातिवाद का यह सबसे बडा आधार है और स्त्रियों के शोषण का भी . गौरतलब है कि जो समाज स्त्री के रजस्वला होने को ‘ दैवीय घट्ना’ मानता है , वही इस मासिक चक्र को उसकी पवित्रता से भी जोड देता है . पहले दूसरे प्रश्न के उत्तर में मैनें दैहिक शुचिता की संकल्पना के ऐतिहासिक आधार पर बात की. शुचिता और वर्जनायें स्त्रियों की गत्यातमकता पर प्रहार करती हैं , उसे एक देहरी में , लक्ष्मण रेखा के दायरे में बान्ध देती  है. यह लक्ष्मण रेखा सिर्फ दृश्य भर नहीं होती , अदृश्य रहकर मानस को भी नियंत्रित करती है , स्त्रियों के पूरे जीवन पर अदृश्य आंखों की निगरानी बैठा देती है . स्त्री की देह ही उसके अधिकार से निकल जाती है इसप्रकार .  इस निकलने के कारण सिर्फ उसका यह निर्णय ही नही प्रभावित होता कि वह किसके साथ सोये या किसके साथ नहीं सोये , बल्कि धीरे -धीरे उसका यह अधिकार भी छिन जाता है कि वह कब और कैसे तथा किस बच्चे को पैदा करे या नहीं करे. इसे परिवार और उसके बाद ज्यादा ‘ पवित्र ‘ से दिखते कारण के लिए राज्य तय करता है . उसका यह अधिकार भी छिन जाता है कि वह अपने दैहिक श्रम का उपयोग कब और कितना करे , कब उस की देह पवित्र  है और कब नहीं . मैं  यह समझता हूं कि बहुत सारी स्त्रियों के लिए यह प्राथमिक मुद्दा नहीं है कि वह सोये किसके साथ बल्कि उसके दैहिक श्रम पर उसका अधिकार और देह पर लाद दी गई अपवित्रता ज्यादा बडा मुद्दा है . परिभाषा और क्या हो सकती है !

यदि स्वयं के लिए वर्जनाओं का  निर्धारण  स्वयं स्त्री करे तो क्या हो ?

इसमे दो प्रसंग होंगे , चुकी पितृसत्ता ‘ सहमति’ हासिल कर दीर्घकालिक गुलामी तय करती है अतः एक कारण हो सकता है कि ‘अनुकूलित स्त्री’ ऐसे निर्णय ले , लेती भी है , यह उसकी गुलामी को और पुख्ता करती है . दूसरा कारण हो सकता है कि एक सचेत स्त्री अपने पूरे अधिकार से यह निर्णय़ ले ,यह अच्छा है, क्योंकि यह उसका निर्णय है , लेकिन वह किसी सूरत में ऐसा कोई निर्णय शुचिता के सन्दर्भ मे नहीं करेगी , वर्जना वह अपने लिए जीने के अपने तरीके के तौर पर तय कर सकती  है .
विवाह की व्यवस्था में स्त्री  की मनोवैज्ञानिक ,सामाजिक एवं आर्थिक   स्थितियां  कितनी  स्त्री  के पक्ष में  हैं ? 
अभी तो एकदम नहीं .

 मातृसत्तात्मक व्यवस्था में विवाह-संस्था क्या अधिक  सुदृढ़ और समर्थ होती. तब   समाज  भ्रूण हत्या दहेज़ हत्या एवं बलात्कार जैसे  अपराधों से कितना मुक्त होता ?

मातृसत्तातमक व्यवस्था जैसी कोई व्यव्स्था न हुई , न होगी और न यह स्त्रिवादियों का लक्ष्य है . मातृवंशात्मकता  हालंकि ऐतिहासिक हकीकत है , जो अभी भी देश के कुछ राज्य या समाज का सच है . स्त्रीवादियों का लक्ष्य है समानता आधारित समाज , व्यवस्था  , जहां लिंग , जाति , रंग और  वर्ग आधारित असमानतायें न हों . ऐसा हुआ तो स्त्रीविरोधी अपराधों से समाज निश्चित ही मुक्त होगा.

सह जीवन की अवधारणा  क्या स्त्री के पक्ष में दिखाई देती है?

बिल्कुल , दो वयस्कों का निर्णय है यह .

साथ होकर भी पुरुष एवं  स्त्री की स्वतंत्र परिधि क्या है?

जहां से दोनो का अपना अस्तित्व बनता है . वे साथ होते हुए भी दो इकाई है, अपने स्व का वृत्त होता है , उसकी परिधि होती है . इसी लिए वर्जीनिया वुल्फ  ‘ अपना कमरा ‘ चाहती हैं स्त्री के लिए