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वेद का काल निर्धारण , एक नए परिप्रेक्ष्य में : दूसरी क़िस्त

रति सक्सेना 
(वेदों के काल निर्धारण प्रसंग से रति सक्सेना का यह विद्वतापूर्ण लेख वेदकालीन भारत को समझने में मदद करता है – स्त्रीकाल में पढ़ें दो किस्तों में)





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ए घोष ने १९५२ में सरस्वती की घाटी मे हनुमानगढ़ और सूरत गढ़ के बीच २५ हड़प्पाई स्थानों का पता लगाया। हड़प्पा काल का ह्रास सरस्वती का सूखना भी एक महत्वपूर्ण कारण है। इस बात पर रामविलास शर्मा जी का तर्क विचारणीय है ऋ्गवेद में सरस्वती का वर्णन विशाल तीव्रगामी नदी के रूप में किया गया है। इससे यह सिद्ध होता है कि वैदिक आर्य ापने जनपदों में पहले ही बस गए होंगे, हड़प्पा सभ्यता का ह्रास बाद में सरस्वती के क्षेत्र परिवर्तन के कारण  हुआ होगा, न कि आर्यों के आक्रमण से़ । शर्मा जी का यह तर्क बहुत महत्वपूर्ण है क्यों कि ना केवल ऋ्गवेद में अपितु अथर्ववेद में भी सिन्धु की स्तुति जलयु्कत नदी में रूप में हुई है।

हड़्प्पा सभ्यता मूलतः सारस्वत सभ्यता है। हड़प्पा सभ्यता का ह्रास हुआ है, नाश नहीं। पृ १४५
जैसा कि पहले भी कहा जा चुका है कि सूती कपड़ों और कपास का निर्यात होता था। जल की कमी से यह निर्यात बन्द हुआ होगा और अन्न की कमी हो गई होगी। क्रैमर मानते हैं कि अक्लदी दस्तावेजों का दिलमुन भारत है। असीरिया के राजा हम्मुरबी के पुत्र समसुइलुना के भवन के फर्श के नीचे सिन्धु लिपि में अभिलेख भी मिलता है। इसी तरह जलप्रलय की घटना के बारे में मैक्डोनल की राय महत्वपूर्ण है , १ अथर्ववेद की रचना बाइबिल से पहले हुई थी, दूसरा ऋग्वेद में जल प्रलय का उल्लेख नहीं है। अथर्ववेद में प्रलय के संकेत मात्र हैं, सही तौर से जल प्रलय की कथा शथपथ ब्राह्मण में मिलती है।

अतः यह हो सकता है कि जल प्रलय की कथा हड़प्पा से सुमेर की ओर गई हो, और वहाँ अलग रूप लेकर बाइबिल में उतरी हो। अतः शर्मा जी इस बात को मानते हैं कि ऋग्वेद की रचना का अन्तिम काल हड़प्पाई सभ्यता का आरम्भीक दौर हो सकता है। इन स्थापनाओं के अनुसार रामविलास जी ये निष्कर्ष निकालते हैं कि अधिकांश ऋग्वेद की रचना सारस्वत क्षेत्र में ३००० ईस्वी पूर्व हुई। इसके बाद सरस्वती प्रदेश के वासी पूरब की ओर गए। भरतों का विलय कुरुओं में हो गया। इन्द्र मरुत वरुण आदि सुमेर आदि से होते हुए यूरोप गए, ना कि यूरोप से भारत आए।

रामविलास जी हरप्पा और उस से पहले की सभ्यता के लिए एक सटीक शब्द का प्रयोग करते हैं– सारस्वत सभ्यता, और उनके अनुसार इस सारस्वत सभ्यता में आर्यजनों को दो बार विस्थापित होना पड़ा था, एक बार ऋग्वेद और यजुर्वेद की रचना के बाद, जल प्रलय के कारण, और दूसरी बार अथर्ववेद की रचना से पहले।

जैसा कि मैं पहले ही कह चुकी हूँ कि वैदिक साहित्य को  एक सीधी रेखा में रचित मानना भी एक भूल हो सकती है। यानी कि यह मानना कि एक बाद एक वेद रचे जाते गए, और फिर ब्राह्मण ग्रन्थ रचे जाने लगे। वैदिक कर्मकाण्ड रीति को देखते हुए यह मानना असंभव है। यही नहीं , ऋग्वेद में भी चारों वेदों का उल्लेख है। सबसे महत्वपूर्ण बात, अंगिरसो, गणौ की उपस्थिति अथर्ववेद का सूत्र ऋग्वेद काल में ही बताती है। यही नहीं कि यज्ञ क्रिया का आरम्भ ऋचाओं की रचना के साथ नहीं तो उनके आसपास हो ही गया होगा। और ऋचाओं के गायन में सामवेद, याज्ञिक विधि में यजुर्वेद कि उपस्थित आवश्यक है। अतः ब्राह्मणिक कर्मकाण्डों को रीतिबद्ध ना किया हो तो भी संस्कारित करना आरम्भ हो गया होगा। अथवा ऋग्वेद में परवर्ती वेदों का उल्लेख कैसे होता।

लेकिन जैसे कि मैंने अथर्ववेद के व्रात्य देव का उल्लेख किया है, अथर्ववेद में हड़प्पाई संस्कृति की अमिट छाप देखी  गई है। इस वेद में राजतन्त्र , समाज तन्त्र के साथ समाजज की अच्छाइयाँ बुराइयाँ एक साथ दिखाई दे जाती हैं. यहाँ हमे एक और पृथ्वी सूक्त, सभा और समीति सूक्त दिखाई देते हैं तो जुआरियों, शराबियों ही नहीं वैश्याओं की उपस्थिति भि दिखाई देती है। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अथर्ववेद में घर परिवार के साथ सामाजिक सामन्जस्य की बात ऋग्वेद से कहीं ज्यादा दिखाई देती है। निसन्देह एकता सदैव आपद की स्थिति या स्मृति से ज्यादा मजबूत होती है इसलिए यह तो माना जा सकता है कि सरस्वती के प्लावन नें समाज को प्रकृति और घर के साथ समाज और राज्य के बारे में सोचने को मजबूर किया है। अतः यह मानना असम्भव नहीं की अथर्ववेद के महत्वपूर्ण हिस्से मूल हड़प्पाई संस्कृति के रचना काल के हैं।

साथ में यह भी एक तर्क हो है सकता है कि ऋग्वेद आदि आरम्भ में मात्र ऋचाएँ या प्रार्थनाएँ थे, लेकिन उनका याज्ञक रूप काफी बाद में आया। लेकिन याज्ञिक रूप को आने में सदियों का वक्त नहीं लगा होगा, यह तो तय है। और यह भी तय है कि आरण्यक और उपनिषद याज्ञिक कर्मकाण्ड की अति का परिणाम भी माना जा सकता है। समाज में इस तरह का अन्तर्विरोध हर काल में दिखाई देता है जैसे  ज्यादा शिक्षित समाज में अँधविश्वास की अति, और अल्प शिक्षित समाज में कुछ अधिक खुलापन। हम समकालीन समाज में इसी स्थिति  का अनुभव कर रहे हैं। इसी तरह जब कर्मकाण्ड ज्यादा जकड़ लेता है तो उसे काट फैंकने की चाह भी बलवती हो जाती है। संभव यही कारण होगा कि अथर्ववेद में जहाँ उँचे दर्जे के दार्शनिक मंत्र हैं, और सामाजिक और पारीवारिक सन्तुलन की चाह है, दूसरी ओर वहीं काफीटोने टोटके वाले मन्त्र हैं जो इच्छा पूर्ति के लिए समान्य जन द्वारा किए जाते हो्गे। विद्वानों की दृष्टि में ये टोने टोटके जान  पड़े और अथर्ववेद को निकृष्ट कोटी  का मानते हुए एक तरह से बहिष्कार ही कर दिया गया।

दरअसल अपनी अगली पुस्तक भारतीय नवजागरण और यूरोप में इसी के पक्ष में तर्क दिए हैं। आर्य आक्रमण के  वैचारिक तत्व का महत्व इसलिए भी है कि वैचारिक तत्व ने भारतीय साहित्य, दर्शन और चिन्तन के पक्ष को बेहद संकीर्ण क्षेत्र में स्थापित कर दिया है।यूरोप में जब नव जागरण की बात होती है तो वे ऐसे युग की बात करते हैं, जो बर्बरता के युग से बाहर निकल कर कला, दर्शन और विज्ञान के क्षेत्र में कुछ नवीन रूप से चिन्तन करने लगे।लेकिन इस नवजागरण का यूरोपीयों की दृष्टि से क्या अर्थ हो सकता है, इस बारे में देखे तो  Renaissance जिसका इटेलियन भाषा में अर्थ है पुनर्जन्म । सांस्कृतिक रूप में इस शब्द का अर्थ है, सांस्कृतिक पुनर्जन्म। लेकिन भारतीय भाषाओं में विशेष रूप से हिन्दी में इसे नवजागरण कहा गया है। दरअसल शब्द को अर्थ की दृष्टि से देखा जाए तो दोनों मे काफी अन्तर है। पुनर्जन्म का अर्थ यह होता है कि एक जन्म पूर्ण होने के उपरान्त नया जन्म पूरी तरह नए चोले में होता है, ऐसी स्थिति में पूर्वजन्म की स्मृति का होना या ना होना आवश्यक नहीं है। लेकिन जब हम अपनी भाषा में इसे नवजागरण  कहते हैं तो मष्य में मात्र सुप्तावस्था होती हैजो स्मृतियों का पूरी तरह से विलोप नहीं करती है। यूरोपीय नवजागरण के बारे में कहा जाता है कि पाँचवी सदी के उत्रार्ध में रोमन राज्य ध्वस्त हो गया था, और करीब एक हजार वर्ष तक यह मध्य युग ही माना जाता रहा। हालाँकि यूरोप में आर्थिक विकास की दृष्टि से काफी अन्तर था, जब इटली सभ्यता का केन्द्र बना तब भी जर्मनी और ब्रिटेन में लोग अभी गण वाला जीवन बिता रहे थे। मध्यकाल में नागरी सब्यता का ह्रास हो गया और केन्द्र बने गाँव । लेकिन पन्द्रहवी सदी में नागरी सभ्यता का उत्थान शुरु हुआ, मशीनी उत्पादनों का दौर आरम्भ हुआ।

जैसा कि अनेक इतिहासकार मानते हैं कि यूरोप के मध्य काल में किसान खेतीहर थे। और उनका कृषि कौशल ज्यादा विकसित नहीं था। शहर और गाँव दोनों स्थानो पर  परिस्थितियाँ अस्वास्थ्यकारक थीं। जब गाँवों की समस्या से बचने के लिए लोग शहरों की पलायन करते तो शहरों की स््ित और बदतर हो जाती? दूषित जल, अन्न संकट  के अतिरिक्त अनेक समस्याएँ सिर उठाने लगीं थी। युद्धों के कारण महामारी आदि भी फैलने लगी। यहीं पर पूंजी को छिपाने , जमा करने का भाव आ गया। जब इटली में इसे पुनर्जन्म कहा गया तो उसके पीछे उनकी यह भावना रही होगी कि तीसरी चौथी, और माँचवीं सदी में जर्मन हमलावरों ने उनकी संस्कृति का नाश कर दिया था, वही संस्कृति अब पुनः जन्म ले रही है। लेकिन यदि हम भाषा की दृष्टि से देखें तो इसे नवजागरण कहना ज्यादा सही होगा।

इटली में अनेक यूरोपीय कुस्तुन्तुनिया आदि से भाग कर आए तो वे अपने साथ दर्शन और साहित्य भी लाए. इस तरह एशिया का साहित्य और दशन उनके पास पहुँचा और इस नयी प्रवृत्ति को व्यापाी वर्ग ने ही नहीं अपितु पोप ने भी संरक्षण दिया। इस तरह से एक अभूतपूर्व कला साहित्य का उद्भव हुआ। कऔनार्दो दा विंची. मिकेल आंजेलो, विल ड्यूरेन्ट , दाँते, मिलट्न आदि ना जाने कितने नाम हैं जो आज भी दुनिया में प्रसिद्ध हैं।
इस नवजागरण ने पूरे यूरोप पर प्रसार किया। फ्रान्स , ब्रटेन, जर्मनी आदि अनेक देशों में इस नवजागरण की लहर को महसूसा गया। लेकिन इस नवजागरण में अनत्र्विरोध भी शामिल है। जैसे कि जैसे ही कारीगर संघटित हुए, पूंजीपतियों ने उनका दमन किया। फ्लेरेंस ने पोप के विरुद्ध लाल झण्डा लहराया, जिस पर स्वतंत्रता लिखा हुआ था। १३७५ में चौंसठ नगर पोप को दुनिया का धार्मिक गुरु मानते थे. १३७६ में केवलऔर  किन्तु, और ोुनः सत्तापलटी गई, जिसमें व्यवसायी वर्ग को सत्ता मिली। लेकिन यह कम्यून सर्वहारा वर्ग का नहीं यह क्म्यून उसी तरह दबा दिया गया, जिस तरह कि पेरिस आदि अन्य यूरोपीय देशों में दबाया गया।  जिस समय कला साहित्य आदि उत्तम शास्त्र उन्नति पर थे, उसी समय दांते को अपने देश को छोरने को बाध्य होना पड़ा, शेली और बायरन के साथ भी यही स्थित पैदा हुई। यही वह वक्त था जब यूरोप में अन्धविश्वास , बुराइयाँ बीमारियाँ भी फैली। अतः नवजागरण का क्या अर्् और यह कैसा नव जागरण, इस विषय मतभेद की कई संभावनाएँ हैं।

इस दृष्टि से अरबिन्दों के लेख बहुत महत्वपूर्ण हैं। उनका यह कथन कई मुद्दों को खोलता है कि..भारत में नवजागरण के बारे में जो चर्चा चल रही है, उसके बारे में सबसे पहले हमे यह जानने की जरूरत है कि भारत में नवजागरण का अर्थ क्या है? क्या यूरोप के नवजागरण के तुलनीय हो सकता है, जो स्वयम में नवजागरण मात्र नहीं अपितु धार्मिकता ****जब  रामविलास शर्मा जी  भारतीय नवजागरण और यूरोप के बारे में विवेचन करते हैं तो उनके मन में भी कुछ ऐसे ही विचार है रहे लगते हैं।

यूरोपीय विचारकों ने तो भारतीय संस्कृति को ही नकार दिया, और   उसे बर्बर आर्यों की देन के रूप में प्रस्तुत किया, अतः उनसे भारतीय परिपेक्ष्य मेंनवजागरण पर सही दिशा में विचार करने की अपेक्षा नहीं की जाती। क्यो कि भारतीय संस्कृति में किसी खास ध्रामिक विचारधारा की अपेक्षा एक अन्तर्निहित अध्यात्मिकता है जो बाह्य धार्मिक विचारधारा से कहीं बड़ी है। विदेशी विचारकों ने वेदकालीन आध्यात्मिकता को इस लिए नकार दिया कि वे ईसाई धर्म की तरह किसी एक  देव पर विश्वास नहीं करते। उन्हे वेदों में अनेक देव दिखाई देते हैं जो उन्हें सीधे सीधे प्रकृति से जुड़ी लगती हैं। और ये विविधता यूरोपीय की दृष्टि में आदिम संस्कृति है। जब कि भारतीय संस्कृति जिस तरह से वैविध्यता को समेटे हुए एक विशिष्ट अध्यात्मिकता के सूत्र को लेकर चलती है, वह अपने में विशिष्ट है। यही कारण है कि वे भारतीय नवजागरन को सीधे सीधे ऋग्वेद से जोड़ते हैं। – यहूदी ईसाई परम्परा से प्रभावित कुछ पाश्चात्य विद्वान ऋग्वेद में विश्व प्रकृति से परे , उसके निर्माता, परम पिता परमेश्वर को ना पाकर उसे पिछड़े हुए आदिम समाज कि रचना मान लेता है। उन्हे यूरोप के, विशेष रूप से इंग्लैण्ड के काव्य. साहित्य के विकास पर ध्यान देना चाहिये। जब तक वहाँ समाज विश्व प्रकृति से परे, उसके निर्माता परम पिता की कल्पना से बँधे रहे, तब तक वहाँ का साहित्य मध्यकालिन जड़ता में फँसा रहा। पुनर्जागरण काल में यूनानी संस्कृति की हवा लगने पर यह जरता पहली बार टूटी है।…
भारतीय नवजागरण और यूरोप
पृ २६।

रामविलास जी ऋग्वेद के दर्शन, प्राकृतिक सन्दर्शन और दर्शन की विवेचना करते हुए भारतीय नवजागरण और  ऋग्वेद  के सम्बन्ध को खोजते हैं। उनका मानना है कि ऋग्वेद सा दार्शनिक वैभव यूनानी साहित्य में नहीं है। इसलिए साहित्य में जो आकर्षक देवकथाएँ है ,उन्हें ऋग्वेद में खोजना व्यर्थ है। वे इस बात को भी गलत मानते हैं कि हग्वेद काल तक इन  देवकथाओं का विकास नहीं हुआ था। वास्तब में ऋग्वेद देवकथाओं के विकास के बाद की रचना है, उन ऋषियों की रचना है जो देवकथाओं की भुमि से आगे निकल कर दार्शनिक काव्य के क्षेत्र में प्रवेश कर रहे थे। …ऋग्वेद का एकम प्रकृति से परे नहीं है, वह उसके प्रपंचों में व्याप्त एकता का सूचक है। यह एकता कर्मकाण्ड का खंडन है। कर्मकाण्ड देवता के पृ्थक अस्तित्व से जुड़ा हुआ है। ऋग्वेद के बाद, शथपथ ब्राह्मण के रचना काल से लेकर आज तक, कर्मकाण्ड के साथ देवता के पृथक अस्तित्व का सम्बन्ध चला आया है। ऋग्वेद की रचना से पहले ऐसा ही सम्बन्ध अवश्य रहा होगा। कवियों ने जैसे देवकथाओं को नया रूप दिया , वैसे उन्होंने कर्मकाण्ड को नया रूप दिया। देवतन्त्र के खोल में उन्होने यथार्थ दर्शन के नए तत्व भर दिए, वैसे ही उन्होंने कर्मकाण्ड के खोल में नए यथार्थवादी चित्रण और भक्ति के नए तत्व भरे। (भारतीय नवजागरण और यूरोप,पृ 26-27)

यहाँ रामविलास शर्मा जी भारतीय संस्कृति को ऋग्वेद से कहीं पहले ले जा रहे हैं, उनका विचार है कि ऋग्वेद भारत में पहले नवजागरण का प्रतीक है।रामविलास जी के इस विचार के पीछे यह भी करण हो सकता है कि वैदिक साहित्य के दो चरण महत्वपूर्ण माने जाते है, एक ऋग्वेद और दूसरा उपनिषदें। विशेष रूप से इतिहासकारों ०र दार्शनिकों की दृष्टि में।इसका कारण यह भी है कि  ऋग्वेद को वैदिक पण्डितों और परवर्ती विचारकों द्वारा बड़ा महत्व दिया गया है। ऋग्वेद और उपनिषदें एक तरह के रोमन्टिज्म का शिकार भी है। कारण यही है कि अन्य वेदों के बारे में जो विचार छठी सातवीं सदी से ही एक निश्चित आकार में ढ़ाल दिए गए। सायण ने सभी वेदों पर विचार किया , किन्त वे आधार ऋग्वेद को बनाते हैं। शंकराचार्य ने वेद के रूप में संहिताओं को लगभग छोड़ते हुए, उपनिषदनिक साहित्य को आधार बनाया। यह स्थिति निसन्देह वैदिक साहित्य की रचना के काफी बाद की स्थिति  है। वेदरचना प्रक्रिया या रचना काल में स्थितियाँ भिन्न भी हो सकती हैं। सबसे पहली बात तो यह है कि ववैदिक संहिताओं को एक दूसरे से पूर्णतया भिन्न मानना असम्भव है। यदि ऐसा होता तो ऋगवेद में सामवेद, यजुर्वेद का उल्लेख संभव नहीं होता़। अधिकतर स्थनों में ऋक् , यजु साम का उल्लेख एक साथ किया गया है। अथर्ववेद शब्द का उपयोग कम है और उसके लिए छन्दसि शब्द का प्रयोग किया गया है।  ऋग्वेद में न केवल अथर्ववेद के प्रधान ऋषियों जैसे अथर्वा और अंगिरसों का ना केवल उल्लेख है, बल्कि वे पणियों द्वारा पुजित भी हैं। इन्द्र जब पणियों के पास अपनी गायों को छुड़वाने के लिए जाती है तो वह उन्हें अंगिरसों का हवाला देती है। निरुक्त में यास्क ने उन्हे अग्नि का पुत्र माना है। याग में भी उन्हे महत्व दिया गया है। (R.V. 1.83.4,R.V-1.83.5).

इसमें कोई सन्देह नहीं कि यजुर्वेद और सामवेद के अधिकतर मन्त्र ऋग्वेद से लिए गए है, लेकिन उनके रचना काल में भोगोलिक विभिन्नता  होते हुए भी कहीं ना कहीं तारतम्य है। ये तीनों वेद एक दूसरे के पूरक हैं। संभव है कि ऋचाओं के रचना काल में याज्ञिक क्रिया उस रूप में प्रचलित ना  हो जैसी कि  परवर्ती काल में थी, लेकिन तीनों वेद ऋचाओं कें उपयोग के लिए एक दूसरे के पूरक थे। इसलिए ऋग्वेद को सबसे अलग कर लेना भी उचित नहीं हैं। जहाँ तक अथर्ववेद का विषय है तो यह वेद अपने पूर्ववर्ती वेदों से कहीं भिन्न है, क्यों कि इसमें परिवार , समाज, शासन और देश के विभिन्न तत्व हैं, सबसे बड़ी बात है कि अधर्ववेद में स्वास्थय और औषध सम्बन्धी अनेक मन्त्र हैं। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात है कि दर्शन के क्षेत्र में जो  ऊँचाई अथर्ववेद के कुछ मन्त्रों में दिखाई देती है, वह बारतीय दर्शन शास्त्र का आधार मानी जा सकती है। कई जगह तो यहाँ दर्शन अध्यात्म के ऊँचे स्तर पर पहुँच गया है़। जैसे कि नासदीय सूक्त को ऋग्वेद का सबसे महत्वपूर्ण दार्शनिक सूक्त माना जाता है, लेकिन इसी सूक्त की व्यख्या अधर्ववेद में काल सूक्त के रूप में हुई है।( अवे. का. १९. सूक्त ५३)

काल को अश्व के रूप में मानते हुए , उसे सप्त रश्मियों से युक्त चक्र की कल्पना परिपक्व दार्शनिक सोच का परिणाम है। काल के गूढता इस बात से भी व्यक्त होती है कि काल एक ऐसे पूर्ण कुम्भ के समान है जिसका मुँह ढका है, विद्वत जन बस यही अन्दाजा लगाते रहते हैं कि इसके भीतर क्या होगा , क्या नहीं होगा। यही पिता है, यही पुत्र है…

कालो अश्वों वहति सप्तरश्मिः सहस्राक्षो अजरो भुरिरेताः। अवे. का. १९.सूक्त ५३. म. १

पूर्ण कुम्भोSधि काल आहितस्तं वै पश्यामो बहुधा नु सन्तः। अवे. का. १९.सूक्त ५३. म.३

पिता सन्नभवतं पुत्र एषां तस्मादं वै नान्यत् परमस्त तेजः। अवे. का. १९.सूक्त ५३. म.४

इसी तरह अथर्ववेद का प्रण सूक्त परवर्ती दर्शन की भावभूमि को उर्वर करता है। प्राण हंस के समान एक पाँव उठाता है और एक जीवन रूपी सलिल पर रखे रहता है। यदि वह दोनों पाँव उठा ले तो न कल होगा ना दिन और रात। यहाँ प्राण को सामान्य दैहिक प्राण से ऊपर  जीवन शक्ति से जोड़ा है , जो तदेक की वह शक्ति है जिससे सांसार में जीवन चलता है।

एकं पादं नोत्खिदति सलिलाध्देस उच्चरन।
यदंग स तमुत्खिदेन्नैवाद्ध न श्वः स्यान्न रात्री नाहः स्यान्न व्युच्छेत् कदा चन।।

ध्यातव्य है कि चारों संहिता अपने मंत्रो  मे यज्ञ , तप, कर्म आदि का उपयोग करती रही हैं. अतः यज्ञ को कर्मकाण्ड मानते हुए संहिताओं से अलग सोचने की स्थिति भी सही नहीं है। यही नहीं कि ऋग्वेद रचना काल में नहीं तो परवर्ती संहिताओं के रचना काल में ब्राह्मण ग्रन्थों की रचना आरम्भ हो गई थी। इसी तरह उपनिषस साहित्य को भी याज्ञिक कर्मकाण्ड से अलग माना ही नहीं जा सकता। छान्दोग्य उपनिषद में उशति नामक ब्राह्मण की कथा है जिसे कुरु प्रदेश में अकाल पड़ने के कारण रथवान के झूठे उड़द खाने पड़े, यह ऋषिकुमार झूठे उड़दों को खाकर दूसरे दिन राजा के दरबार में पहुँचता है और यज्ञ में सामगान द्वारा काफी धन कमा लेता है।

अतः उपनिषद काल से काफी पहले ही यागादि कर्मकाण्ड बड़े पैमाने में किए जाने लगे थे।लेकिन अथर्ववेद में अनेक मन्त्र ऐसे हैं जो हमें ग्रामीण टोने टोटकों की स्मृति दिलाते हैं।  इतनी उच्च दार्शनिकता और वैज्णानिक सोच के साथ कर्मकाण्ड और टौने टोटके जैसे एहिक कर्मकाण्ड का सम्मिलित रूप किस तरह की व्यवस्था को द्यौतित करता है।

पूर्ण सतयुग की कल्पना निराधार होती है। उन्नत्ति के साथ साथ विघटन के लक्षण साथ साथ दिखाई देते हैं।

जैसा कि हम यूरोपीय नवजागरण की स्थिति में देखते हैं, सिन्धुघाटी और हड़प्पा की सांस्कृतिक भूमि ही नहीं, द्रविड़ प्रदेशों में भी सांस्कृतिक सम्मिश्रण उतना ही वैविध्यतापूर्ण रहा है, जितना की भारत में आज भी दिखाई देता है।

1.
It is from his bitter experience that EMS talks of the Rig Veda as something learnt only by rote traditionally and recited by persons without understanding a word of it. He recalls the six years (from the age of eight to 14) when he “was learning to repeat it, rik (verse) by rik,” as was “the practice for the Namboodiri boys of those days after their upanayanam [sacred-thread ceremony].”

2

“Sankara was one of the tallest of India’s (and the world’s) idealist philosophers; his Advaita Vedanta is one of the richest contributions India has made to the treasury of human knowledge.”

3

According to Marx, religion is an expression of material realities and economic injustice. Thus, problems in religion are ultimately problems in society. Religion is not the disease, but merely a symptom. It is used by oppressors to make people feel better about the distress they experience due to being poor and exploited. This is the origin of his comment that religion is the “opium of the masses” – but as shall see, his thoughts are much more complex than commonly portrayed.

Marx as social theorist is pretty narrowly read today by most sociologists who don’t specialize in Marxist criticism, focusing mostly on his analysis of capitalism as a social system. In cultural studies, 20th century dialogues with Marx’s ghost is practically a rite of passage. The obvious critiques of Marx have been made over and over, particularly his historical materialism, which so often devolves into a kind of gross determinism in Marx’s writings as to make you want to throw the whole thing out. But starting with his writings on the 18th Brummaire and culminating in Kapital, Marx had shifted to a depth of analysis of how capitalism functions to mix ideologies and social relations together (his notion of the fetishism of the commodity is fucking brilliant, and more salient today than he could have imagined). That contradiction between the irritating determinism and the powerful insights has plagued my relationship with Marx for years.

As a sociologist who sometimes studies religious cultures, I instantly felt the resonance of thinking of marxism as a religion. Anyone with the most cursory knowledge of religion knows that all religious systems are morally conflicted and internally inconsistent in their morals. The same religious system can produce massive violence and suffering in one context, and on another occasion be the source of humanity’s shining moments of compassion and healing. This contradiction makes religious cultures (that is, their symbolic contents) difficult to deal with empirically, because their effects in the social world are mixed and contradictory. Further, most world religions as they have survived today rely on texts and often on founders. Again, these founders are often the source of contradictory ideas: Jesus taught both “love they neighbor” and that his religion would tear apart families and bring violence (“the sword”); Mohamed taught both that the diversity of humans was divine, and that Arabs were god’s only people; the buddha taught that enlightenment lies within and is available to alll, but forbade women to practice or learn his methods. Of course I’m being overly simplistic here to illustrate a point, that religious systems are ethically and ideologically mixed and that the mixture can be traced back to its founders.

Man makes religion, religion does not make man.” (41)

* इन्द्रमहं वणिजं चोदयामि सन ऐतु पुरएता नो अस्तु।
नुदन्नरातिं परपन्थिनं मृगं स ईशानो धनदा अस्तु मह्यम्।। १।।
ये पन्थानो बहवो देवयाना अन्तरा द्यावा पृथवीं संचरन्ति।
ते मा जुषन्तां पयसा गषतेन यथा क्रीत्वा धनमा हराणि।।२।।
इध्मेनाग्न इच्छमानो धृतेन जुहोमि हव्यं तरसे बलाय।
यावदीशे ब्रह्मणा वन्दमान इमां धियं शतसेयाय देवीम्।।३।।
इमामग्ने शरणिं मीमृषो नो यमध्वानमगाम दूरम्।
शुनं नो अस्तु प्रपणो विक्यश्च प्रतिपणः फलिनं मा कृणोतु।
इदं हव्यं संविदानौ जुषेथां शुनं नो अस्तु चरितमुत्थितं च ।।४
येन धनेन प्रपणं चरामि धनेन देवा धनमिच्छमानः।
तन्मे भूयो भवतु मा कनीयोSग्म्ने सातध्नो देवान् हविषा निषेध।। ५   (काण्ड३,अध्याय३,  सूक्त १५औ

**

सीरा युज्जन्ति कवयों युगा वि तुन्वते पृथक्
धीरा देवेषुग्नयौ।।१
युनक्तु सीरा वि युगा तनोत कृते योनौ वपतेह बीजम।
विराजः श्नुष्टिः सभरा असन्नौ नेदीय इतं सृण्यः पक्वमा यवम्। (का.३, अ ४, सू १८) अवं सूक्त के अन्य मन्त्र।

***
शं नो आपो धन्वन्याः शमु सन्त्वनूप्याः शंनः खनितरिमा आपः
शमु याः कुम्भ आभृताः शिवा सन्तु वार्षिकी।। (का.१. अ.२. सू ६)

****

यददः संप्रयतीरहावनदता हते।
तस्मादा नद्यो नाम स्थ ता वो नामानि सिन्धवः।।
यतं प्रेषिता वरुणेनाच्छीबं समवल्गत।
तदाप्नोदिन्द्रो वो यतीस्तस्मादापो अनुष्ठन।।
अपकामं स्यन्दमाना अवीवरत वो हिकम्।
इन्द्रो वः अक्तिभिर्देवीस्तस्मादवार्नाम वो हितम।।
एको वो देवोSप्यतिष्ठत्, स्यन्दमाना यथावशम्।
उदानिषुर्महीरिति तस्मादुदकमुच्यते। अवे. का.३, अ. ३. सू. १३

Now these tales are mythical/ and tradition becomes mythical
when it reaches back to origins, yet such mythical tales can hardly
have sprung from pure imagination, and must have been developed
from some germ of reality. They certainly suggest that Pururavas^s
origin was in that north region ; and this agrees with and explains
the fact that that region, the countries in and beyond the middle of
the Himalayas, has always been the sacred land of the Indians.
Indian tradition knows nothing of any Aila or Aryan invasion of
India from Afghanistan, nor of any gradual advance from thence
eastwards. On the other hand it distinctly asserts that there
was an Aila outflow of the Druhyus through the north-west
into the countries beyond, where they founded various kingdoms
and so introduced their own Indian religion among those
nations.^
The north-west frontier never had any ancient sacred memories,
and was never regarded with reverence. All ancient Indian belief
and veneration were directed to the mid-Himalayan region, the only
original sacred outside land ; * and it was thither that rishis and
kings turned their steps in devotion, never to the north-west. The
list of rivers in Rigveda x, 75 is in regular order from the east to
the north-west^-not the order of entrance from the north-west,
but the reverse. If the iiryans entered India from the north-west,
and had advanced eastward through the Panjab only as far as the
Sarasvati or Jumna when the Rigvedic hymns were composed, it is
very surprising that the hymn arranges the rivers, not according
to their progress, but reversely from the Ganges which they had
hardly reached.^ This agrees better with the course of the Aila
expansion and its outflow beyond the north-west.” It was, however,
a route for any one travelling from the Ganges to the north-west.

Ma.tl3, 14. Pad V, 8, 119.

Other mythical details; MBh i, 75, 3144 : Va 3, 15 : Bd i, 3, 15.

P. 264. JEAS, 1919, pp. 358-61.
*
See the eulogy of the Noi’thern region, !MBk v, 110 : vi, 12.

So Sir M. A. Stein, JEAS, 1917, p. 91.

Macdonell, Sansk Lit. pp. 143, 145.

Perhaps the arguments used to prove the advance of the Aryans
from Afghanistan into the Panjab might simply be reversed.

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There is a first question, whether at all there is really a
Renaissance in India. That depends a good deal on what we
mean by the word; it depends also on the future, for the thing
itself is only in its infancy and it is too early to say to what
it may lead. The word carries the mind back to the turningpoint
of European culture to which it was first applied; that
was not so much a reawakening as an overturn and reversal, a
seizure of Christianised, Teutonised, feudalised Europe by the
old Graeco-Latin spirit and form with all the complex and
momentous results which came from it. That is certainly not
a type of renaissance that is at all possible in India. There is
4 The Renaissance in India
a closer resemblance to the recent Celtic movement in Ireland,
the attempt of a reawakened national spirit to find a new impulse
of self-expression which shall give the spiritual force for
a great reshaping and rebuilding: in Ireland this was discovered
by a return to the Celtic spirit and culture after a long period
of eclipsing English influences, and in India something of the
same kind of movement is appearing and has especially taken a
pronounced turn since the political outburst of 1905. But even
here the analogy does not give the whole truth.
The Renaissance in India
with
A Defence of Indian Culture

पिगोट हड़प्पा की नगर योजना पर भी प्रकाश डालते हैं, जिसके अनुसार नगर की हर सुविधा का विशेष ध्यान रखा गया।

प्रति यदस्य वज्रं बाह्वोर्धुर्हत्वी दस्यून पुर आयसीर्नि तारीत्। ङज्. .२.२०, ८,
इन्द्राग्नि नवतिं पुरो दासपत्नीरधनुतम् साकमेकेन कर्मणा॥ ङज् ३.१२.६,
प्र ते वोचाम वीर्याइया मन्दसान  अरुज। पुरो दासीरमीत्य॥
ङज् ४.३२.४
पुनमैत्विन्द्रियं पुनरात्मा द्रविणं ब्राह्मणं च। पुनरग्नयो धिष्ण्या यथास्थाम कल्पयन्तामिहैव।ठ्ठ.ध्. ७.६७.१

यज्ञैरथवा र्प्रथम पथस्तते तत सूर्यों व्रतपा वेन  ाजनि।  ा गा  ाजदुशना     काव्य सचा यमस्य जातमतृतं यजामहे॥  ङ.ज्१.८३.५).

D.K Chakravarti captures this perspective with such statements as: “
सबसे पहले हम”
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वेद का काल निर्धारण , एक नए परिप्रेक्ष्य में : पहली क़िस्त

डा. रति सक्सेना 
(वेदों के काल निर्धारण प्रसंग से रति सक्सेना का यह विद्वतापूर्ण लेख वेदकालीन भारत को समझने में मदद करता है – स्त्रीकाल में पढ़ें दो किस्तों में)

 



ई एम एस नम्पूतिरि पाद नें अपनी जिन्दगी में यह अफसोस कई बार जताया कि उन्हें अपने बचपन का बड़ा हिस्सा ऋग्वेद की रटन्त क्रिया के हवाले कर देना पड़ा।1  ई एम एस के मन की कड़वाहट ना जाने कितने मनों का प्रभावित किया, इसका अनुमान  सिर्फ इस बात से लगाया जा सकता है कि २००५ तक केरल के किसी भी विश्वविद्यालय में वेद को संस्कृत शिक्षा  के पाय्यक्रम के रूप में शामिल नहीं किया गया। यद्यपि ई एम एस ने जिस पद्धत्ति के विरोध में यह कहा था, वह पद्धत्ति  बरकरार रही। केरल में नम्पूतिरि ब्राह्मण समुदाय का दबदबा काफी लम्बे काल से रहा है। इस समुदाय में भी अन्य ब्राह्मण समुदायों के समान अन्तर्निहित समुदाय होते हैं, जैसे कि ऋग्वेद पाठी नम्पूतिरि. यजुर्वेद पाठी नम्पूतिरि, या सिर्फ नम्पूतिरि, जिन्हे किसी भी वेद के पाठ की अनुमति नहीं दी जाती है। ऋग्वेद पाठी होना किसी कुटुम्ब या तरवाड के लिए सम्मान की बात हुआ करती थी़ क्यों कि ये वेद पाठी युवक देश के मन्दिरों या धार्मिक मठों में स्थान्तरित किए जाते थे जिसकी परम्परा शंकराचार्य स्वयं डाल चुके थे। बौद्ध विहारों की तर्ज में चलने वाले कई मठों में वेद रटन्ती की विद्या आज तक दी जाती रही है।

अब हम पुनः ई एम एस की बात की पड़ताल करे तो उन्होंने साफ ही रटन्ती क्रिया का विरोध जाहिर किया है, अध्ययन का नहीं। यदि हम इस रटन्ती क्रिया का अवलोकन करे तो पायेंगे कि एक वेद पाठी अध्यापक दो छात्रों की मुण्डियों को इस तरह से पकड़ता है जैसे कि खरबूजों को थाम रखा हो, और वह उनके सिरों को बाएँ दाएं, आगे पीछे हिलाते हुए लगातार एक ही वाक्य बुलवाता रहता है। करीब चार से आठ  वर्षों  के कठोर परिश्रम के उपरान्त सामान्यतया बालक सम्पूर्ण वेद को बकायदा स्वर ताल के रट लेता है, जिसका उपयोग वह मात्र मन्दिरों की पूजा में कर पाता है। दुखद स्थिति यह होती है कि ये लोग वेद के शब्द के अर्थ को बिल्कुल नहीं समझ पाते हैं।  निसन्देह नम्पूतिरिपाद इसी कठोर क्रिया से गुजरे और तमाम उम्र वेद को अपठनीय वस्तु मानते रहे। उनकी इस कड़वाहट को समझे बिना भारतीय विद्वत समाज इस बात का अनुकरण करता रहा। लेकिन उन्ही नम्पूतिरिपाद ने शंकराचार्य को भारत ही नहीं विश्व का सबसे महत्वपूर्ण दार्शनिक माना और उनके दर्शन पर पुस्तक भी रची  २ । शंकराचार्य के दार्शनिक रचनाओं के अतिरिक्त सबसे बड़ा योगदान देश में वेद की पुनर्प्रतिष्ठा था। उन्होंने वेदों के दार्शनिक पक्ष को  श्रेष्ठ साबित करते हुए पुनर्विवेचना की जो वेदान्त साहित्य एवं  इतर दार्शनिक ग्रन्थों की अपेक्षा अधिक सहज एवं गंभीर था, अतः शंकराचार्य को वेद के सही प्रणेता के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है जिन्होंने तत्कालीन कर्मकाण्डो की अवहेलना करते हुए ना केवल वैदिक साहित्य के सुन्दर पक्ष को सामने रखा, अपितु भारत जैसे विशाल उपद्वीप को एक सूत्र में बाँधा। निसन्देह ई एम एस नम्पूतिरि पाद का विरोध रटन्त क्रिया के प्रति था, ना कि दार्शनिकता या इतिहास के प्रति।

अब हम सीधे सीधे मार्क्स की बात करते हैं , कार्ल मार्क्स ने  धर्म द्वारा उपजाये गए वर्गभेद को निशाना बनाते हुए उसके समाज पर क्रूर प्रभाव को जताया  है।3  धर्म के इतिहास को देखा जाए तो मार्क्स की इस उक्ति पर विश्वास हो जाता है कि धर्म अफीम के समान है।यदि इतिहास को जानने के लिए धर्म का अवलोकन किया  जाए तो धर्म अफीम के अपेक्षा शराब के अधिक निकट ठहरता है, जो अपने मूल रूप में केवल मीठा रस होता है, जिसे काल की अन्धी सीलन में रख कर इस तरह से नशीले पदार्थ में बदल दिया जाता है उसे चखने वाला नशे की गुलामी में चला जाता है। 3

विचारधारा को समझने वालों की अपेक्षा विचारधारा के अनुकरण करने की संख्या अधिक होती है। संभवतया यही कारण रहा होगा कि भारतीय भाषाओं, विशेषतया हिन्दी और मलयालाम  के साहित्यकारों ने वैदिक  साहित्य पर कलम चलाने से अपने को बचाये रखा। इसका एक कारण यह भी है कि इस साहित्य का जिस तरह धर्म ने अपहरण कर इस तरह से अवरुद्ध कर दिया गया कि मूल रूप मात्र किंवदन्तियों का पिटारा बन कर रह गया।ऐसी स्थिति में रामविलास शर्मा जी का अध्ययन जिसे उन्होंने पश्चिमी एशिया और ऋग्वेद, भारतीय नवजागरण और यूरोप में संकलित किया है, न केवल विषय की दृष्टि से महत्वपूर्ण है अपितु अध्ययन की एक नई विचारधारा भी खोलता है।

यहाँ पर मैं स्पष्ट करना चाहूँगी कि इस क्षेत्र में इतिहासकारों और संस्कृत पंडितों ने अपनी अपनी दृष्टि से कार्य किया है, लेकिन इन दोनों तरह के अध्ययन की धाराएँ भिन्न हैं। इतिहासकार, वैदिक साहित्य में इतिहास खोजने का वक्त नहीं निकाल पाए। अधिकतर अनुवादों जो अपने में परिपूर्ण नहीं थे, को आधार बनाते रहे अथवा पूर्व स्थापित विचारधारा की लकीर में चलते रहे। संस्कृत पंडितों के साथ सबसे बड़ी समस्या अपने भूत से मुक्ति पाने कि थी, वे उन पुस्तकों से मुक्त होकर मात्र वैदिक साहित्य को केन्द्र में नहीं रख सकते थे, जो सदियों से वेद का अपनी अपनी तरह से विवेचन करती आ रहे थी। ऐसे में एक ऐसे लेखक का अध्ययन जो किसी भी तरह की पूर्वानुमानों से मुक्त है और साहित्य विशेष को अध्ययन करने सक्षम है, बड़ा महत्वपूर्ण हो जाता है। हम ज्यों ज्यों इस विषय में प्रवेश करते जाएंगे, विषय की गंभीरता से अवगत होते जाएंगे।

दरअसल वेदों का समय निर्धारण आज तक का सबसे जटिल विषय है. जिसके कई कारण हैं- 1-  वैदिक साहित्य ओल्ड टेस्टामेन्ट ,  न्यू टेस्टामेन्ट, अथवा कुरान या अन्य धर्म ग्रन्थों की तरह उपदेशपरक मात्र एक ग्रन्थ / पुस्तक नहीं है। यह एक विशद एवं जटिल साहित्य संग्रह जो अपने भीतर अनेक अन्तर्विरोधों को समेटे हुए है। इस सम्पूर्ण साहित्य को चार प्रमुख रूप में विभाजित किया जाता रहा है- संहिताए, ब्राह्मणग्रन्थ, आरण्यक और उपनिषद। सामान्यतया जब हम वेद नाम लेते हैं तो हम ऋग्वेद का उल्लेख करते हैं, पारम्परिक रूप से अथर्ववेद को महत्वपूर्ण स्थान दिया नहीं गया है और सामवेद और यजुर्वेद को ऋग्वेद का अंग ही मान लिया जाता है। स्थिति यह भी है कि ऋग्वेद भी  स्वयं में एक पुस्तक नहीं, अपितु अनेक सूक्तों का संग्रह है जिनमें से अधिकतर विभिन्न ऋषियों द्वारा रचित हैं। ऋग्वेद में प्रत्येक मण्डल एक एक कुल से सम्बन्धित है वस्तुतः संहिता का अर्थ ही भिन्न भिन्न सूक्तो को एक सूत्र मे पिरोना है। अतः ऋग्वेद आदि समस्त संहिताएँ अलग अलग ऋषियों द्वारा रचित है और विषय वस्तु की दृष्टि से भी वैविध्यपूर्ण हैं। 2- दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि ये ऋचाएं किसी तरह का उपदेश ना होते हुए विभिन्न विषयों से जुड़ी हैं,  जिनमें सहज प्रार्थनाओं एवं जीवन दर्शन के अतिरिक्त जीवन से जुड़ी अनेक छोटी बड़ी भावनाएं हैं। 3- यद्यपि वैदिक साहित्य को स्थूल रूप में चार खण्डों में विभाजित कर दिया गया है, किन्तु उनका रचनाक्रम विभाजन के समान सहज नहीं हैं। यदि ऐसा सोचा जाए कि पहले सभी संहिताएं रचनाएँ रची गई, फिर ब्राह्मण ग्रन्थ , फिर आरण्यक उपनिषदें आदि, तो यह पूर्णतया असत्य तथ्य होगा। निसन्देह संहिताओं के रचना काल में ही ब्राह्मण ग्रन्थों की रचनाएँ आरम्भ हो गईं होंगी। शतपथ ब्राह्मण का काल अथर्ववेद आदि के समकक्ष भी माना जाता है। अतः जितनी सरलता से वैदिक साहित्य का विभाजन कर दिया गया है उतनी सरलता से उनके निर्माण काल को विभाजित करना असम्भव है। 3- ध्यातव्य है कि संहिताएँ अपने में पूर्णतया स्वतन्त्र है, लेकिन ब्राह्मण ग्रन्थ उन ऋचाओं का कर्मकाण्ड में पुनर्पाठ है। ऋग्वेद और अथर्ववेद कि कुछ संहिताएँ स्पष्ट रूप से याज्ञिक क्रियाओं का आधार है, कुछ अपने रचना काल में भी आधार रही होंगी। लेकिन सभी ऋचाओं के साथ यह स्थिति नहीं है। यही नहीं आरण्यक एवं उपनिषदें कर्मकाण्ड का विरोध में उभरे स्वर हैं जो दैविक क्रियाओं को दैहिक क्रियाओं से परे करते हुए आत्मीयता से जोड़ते हैं। वैदिक साहित्य के भीतर का यह अन्तरद्वन्द्व परवर्ती संस्कृत साहित्य में स्पष्टतया दृष्टिगोचर होता है जब एक ही भूमि से छह से भी ज्यादा दार्शनिक वैचारिक धाराएँ प्रवाहित होने लगीं। भारतीय दर्शन इतने अधिक वादों से गुत्थम  गुत्था हो गया कि उसकी व्याख्या किसी सरल रेखा में नहीं कि जा सकती।

ऐसे विवादित साहित्य को इतिहास का आधार बनाना सहज नहीं रहा है। यही कारण है कि वेदों कों लेकर अनेक वाद उपजते गए, और वे सभी वाद अपने लिए कोई ना कोई आधार बनाने का दावा भी करते रहे।
रामविलास जी जैसे विद्वान, जो किसी भी तरह के पूर्वाग्रहों से मुक्त थे, वे हर एक तथ्य की पड़ताल करते हुए पूर्णतया सैद्धान्तिक सत्य सामने लाने का साहस करते हैं।शर्मा जी के शोध की प्रणाली पूर्णतया प्रासंगिक है, वे अपने विचार को रखने से पहले अन्य विद्वानों के विचारों की पड़ताल करते हैं। वे किसी वाद वशेष की वकालत नहीं करते , अपितु सीधे सीधे विषय में प्रवेश करते हैं, और विवध अध्ययनों का हवाला देने के उपरान्त अपने सशय या तर्को को प्रस्तुत करते हैं। उनके शोध का आधार अचानक उपजा देश प्रेम नहीं बल्कि यथार्थ को समझने की चाह है। वे सिकन्दर की विजय को आधार बनाते हुए यह तर्क उपस्थित करते हैं कि सिकन्दर के विश्वविजयी अभियान ने यूरोपीय विचारकों के मन में एक धारण पेठा दी कि जिस तरह सिकन्दर की सेना ने अनेक एशियायी मुल्कों पर आक्रमण कर दिया उसी तरह से यूनानी संस्कृति आरम्भ से एशियायी संस्कृति पर विजयी होती रही है। …प्रस्तावना. पृ १७

लेकिन उन्नीसवी शताब्दी में कुछ यूरोपीय विचारकों का ध्यान  सुमेरी और मिस्र , बैबिलोन की संस्कृति की ओर गया और उन्होंने इन संस्कृतियों को ऋग्वेद से प्राचीन माना, संभवतया इसलिए कि वे ऋग्वेद को आर्यो के आक्रमण से जोड़ते रहे और यूनानी संस्कृतियों का विकास इन एशियायी संस्कृतियों के काफी बाद में हुआ।आर्य आक्रमण के पुराने सिद्धान्तों की विवेचना करते हुए विलियम जोन्स उस वाद का विवेचन करते हैं जिसके आधार पर संस्कृत को भारोपीय भाषा की धारण प्रस्तुत की गई थी। यह वह वक्त था जब भारत में अंग्रेजों का राज्य सुदृढ़ हो चुका था, इसलिए संस्कृत को भारोपीय भाषा का उद्गम मानते हुए पूर्ण महत्व देना आसान नहीं था। इसलिए मिशैल आदि ने आर्य आक्रमण का विचार स्थापित किये, जिससे यह स्थापित किया जा सके कि भारत के पास साहित्य संस्कृति के नाम पर जो कुछ है वह इन्हीं यूरोपीय आक्रमणकारियों के बदौलत है। इस समय तीन धारणाएँ स्थापित की गईं-1- भारत पर आक्रमण के वक्त तक आर्य पशुचारण घुमन्तु प्रवृत्ति के थे। 2-आक्रमणकारियों ने आदिवासी भारतीयों के दुर्ग तोड़े3-तीसरी धारण यह होनी चाहिए कि घूमन्तु लुटेरों की वनिस्पत यहाँ दुर्गों में रहने वाले नागरिक अधिक सभ्य थे।
शर्मा जी इस बात को रेखांकित किया कि  ग्रिफिथ  अधिकतर विद्वानों द्वारा पहली दो धारणाओं को तो बल दिया गया लेकिन तीसरी धारणा को पार्श्व में रख दिया।

भाषा के सन्दर्भ में शर्मा जी खरे शब्दों में कहते हैं कि सघोष महाप्राण ध्वनियों वाले भारतीय शब्दों के ईरानी यूरोपीय प्रतिरूपों में सघोषता और महाप्राणता का संयोग नहीं होता। यह विशेषता केवल भारतीय आर्य भाषाओं की है। वे केंब्रिज एन्शेन्ट हिस्ट्री से आलब्राइट और लैम्बडिन की तीन महत्वपूर्ण बात रखते हुए कहते हैं १.मनुष्य का भाषा व्यवहार काफी प्राचीन है, कम से कम एक लख वर्ष प्राचीन। २. भाषाएँ और उनका प्रयोग करने वाले गतिशील रहे हैं। ३. भाषा तत्व परिवर्तनशील है। उनके अनुसार सुमेरी भाषा सबसे प्राचीन है  , सुमेरी भाषा और भारतीय मूल की भाषाओं में काफी समानता भी है। जैसे कि संख्या वाचक शब्दों का निर्माण द्रविड़न शैली से हुआ जान पड़ता है। पहले दहाई, फिर इकाई.

उ- दश, उ- अश् दश एक ग्यारह, उ- मिन-    दस दो बारहइराक के उत्तरी भाग में हुर्री नामक भाषा बोली जाती थी। तुर्की और द्रविड़ भाषाओं की तरह वह पदार्थ सूचक, क्रिया सूचक शब्दों में पर सर्ग जोड़कर अर्थविस्तार करती है। , सीरिया और फिलीस्तीन तक फैलते चले गए। शर्मा जी का तर्क है कि इतिहासकार आमतौर से यह कल्पना कर लेते हैं कि एक अभियान में एक ही भाषा के लोग होते हैं, जब कि यथार्थ में ऐसा नहीं होता। पुरातत्व से ये पता लग रहा है कि आर्यों के अबियान में हुर्री लोग भी साथ थे। रामविलास जी का कहना है कि आर्य  आक्रमण में सिद्धान्त में हुर्री साथ थे या नहीं, इसके बारे में ज्यादा जानकारी नहीं मिल रही है, लेकिन यह कैसे मान लिया जाए कि जब आर्य भारत से बाहर पश्चिम एशिया में गए तो हुर्री उनके साथ थे।

रामविलास जी का मत है कि भाषाएँ एक दूसरे को प्रभावित करती हैं, इसलिए किसी भाषा परिवार को नितान्त पृथक् इकाई मानकर उसका अध्ययन करने के बदले सांस्कृतिक रूप से सुसंबद्ध किसी विस्तृत क्षेत्र के समस्त भाषा समुदायो का अध्ययन करना चाहिए।एक शताब्दी के पुरात्विक अनुसंधान से एक बात स्पष्ट हो गई है भारत से लेकर मिस्र तक और मिस्र तथा भारत से लेकर यूनान तक, यह विशाल भूखखण्ड एक अन्तर्गठित , सुसंबन्ध इकाई है।जब 1920-21 में दयाराम साहनी नें पंजाब में हड़प्पा नामक एक शहर का पता लगाया, और 1921-22 में राखाल बनर्जी ने मोहनजोदड़ों का पता लगाया । इन खोज के आधार पर यह स्थापित करने की कोशिश की जाने लगी की कि हड़प्पा मोहनजोदड़ों के निवासी सुमेरी सभ्यता का प्रभाव है। और उस प्रभाव को खत्म किया आर्य आक्रमणकारियों ने। रामविलास शर्मा जी इसी सिद्धान्त के प्रतिपक्ष में सवाल उठाते हैं- ऋग्वेद के मन्त्र में अग्नि से प्रार्थना है कि वह आयस के पुर में रहने वालों की रक्षा करे। ( ऋ. 1.58.8) इसका अर्थ यह हुआ कि आर्य जन भी पुर में रहते थे। यही नहीं दिवोदास के सत्रु शंबर जैसे अनार्य ही नहीं , यदु और तुर्वस जैसे आर्य भी कर रहे थे।

यदि हमारे साहित्यकार ऋग्वेद के साथ साथ अथर्ववेद को भी आधार बनाते तो वे यह जानते कि अथर्ववेद काल में आर्य, अनार्य, दास दस्यु सभी एक संक्रमण भाव दिखाई देता है। यहाँ स्पष्ट रूप से शूद्र उत आर्य (शूद्र और आर्य ) का प्रयोग अनायास हुआ है, जो जन समाज के लिए उसकाल का प्रचलित प्रयोग रहा होगा।प्रियं प्र कृणु देवेषु प्रियं राजसु मा कृणु। प्रियं सर्वस्य पश्यत उत शूद्र उतार्ये॥ अथर्व.१९.६२.१॥

प्रियं मा दर्भ कृणु ब्रह्मराजन्याभ्यां शूद्राय चार्याय च। यस्मै च कामायामहे सर्वस्मै च विपश्यते॥ अथर्व.१९.३२.८॥

यहाँ पर रामविलास शर्मा जी की यह उक्ति कि “भारत पर आर्यों का आक्रमण , इस मान्यता का जन्म और प्रचार एशिया में यूरोपीयन साम्राज्यवाद के विस्तार से जुड़ा हुआ है। विस्तार के समय इस मान्यता का लक्ष्य आर्यों को द्रविड़ों से अलग करना है, ह्वास के समय उत्तर पश्चिमी भारत को शेष भारत से अलग करना है। (पश्चिमी एशिया और ऋग्वेद, भूमिका – 19)

अब इस बात पर गौर किया जाए कि विदेशी विचारकों की सोच समझी जा सकती है , देश के विचारकों ने इस सोच को क्यों अपनाया, इतना कि इस वक्त देश के सभी स्कूल कालेजों में यही विचार परोसा जाता है तो हमे डी के चक्रवर्ती के विचार हमें यह समझने में सहायता करते हैं-the Indian historians became increasingly concerned with the large number of grants, scholarships, fellowships and even occasional jobs to be won in Western universities, [and thus] there was a scramble for new respectability to be gained by toeing the Western line of thinking about India and Indian history.” (When Scholarship Matters:  The Indo-Aryan Origins Debate,Edwin F. Bryant,Rutgers University)

आक्रमण के नए सिद्धान्त मे शर्मा जी मोहनजोदड़ों और हड़प्पा को केन्द्र में रख कर अपनी बात रखते हैं। गौर्डन चाइल्ड आदि ने मोहनजोदड़ों की कब्रिस्तानों उल्लेख करते हुए यह स्थापित करने की कोशिश की कि यहाँ प्राप्त अस्थिपंजर आर्य के आक्रमण का परिणाम रहा है। शर्मा जी मैकाय की उक्ति का बयान करते हैं, जिसमें उन्होंने प्राप्त अस्थिपंजरों के सन्दर्भ में लिखा है.. इन चार व्यक्तियों की हत्या की होगी, इसमें कोई सन्देह प्रतीत नहीं होता। पर हत्यारे कौन थे, छापामार या लुटेरे, यह कहना कठिन है। वही मैंकाय मोहनजोदड़ों की सुरक्षा व्यवस्था के बारे में कहते हैं कि वहाँ पर  महल के किसी भाग के लूटे जाने या जलाए जाने के चिह्न नहीं मिलता जैसा कि मेसोपोटामिया के बहुत से नगरों के साथ एक से अधिक बार हुआ है। ( जी एल पोलेस, एशेंट सिटीज आफ इंडस पृ 181) लकिन व्हीलर ने कबालियों या लुटेरों के स्थान पर आर्य के आक्रमण के सिद्धान्त को रखा।

ऋग्वेद में जिस तरह से दुर्गों के तोड़े जाने का उल्लेख है, सिंधुघाटी में दुर्ग तो है, लेकिन उनके विन्ध्वस किए जाने के चिह्न नहीं है। ऐसे में दुर्गों के तोड़े जाने वाला तर्क आर्य आक्रमण के तर्क को यदि साहित्य के माध्यम से सिद्ध करने की कोशिश भी की जाए, सन्दर्भ खोजने कठिन हैं। हड़प्पा के साथ अन्य उत्खननों से यह बात स्पष्ट हो गई कि सिन्धु घाटी सभ्यता आर्येतर है और पश्चिमी सभ्यता के मुकाबले में दृढ़ थी।भारतीय अन्वेषण की समस्या यहाँ भी समाप्त नहीं होती हैं। क्यों कि हड़प्पा जैसी सभ्यता की खोज के उपरान्त पुनः इसे भारतीयता से अलग करने की कोशिश आरम्भ हो गई। जैसे कि पाकिस्तान बनने के दो वर्ष उपरान्त ही व्हीलर का लेख पाकिस्तान क्वाटर्ली में छपा-पाकिस्तान चार हजार वर्ष पहले, और अक वर्ष उपरान्त एक पुस्तक छपी- पाकिस्तान के पाँच हजार वर्ष , एक पुरातात्विक रूपरेखा।

इसके उपरान्त पाकिस्तान स्थित पंजाब को पूरे भारत से अलग करते हुए सिन्धु घाटी सभ्यता को भारतीय सभ्यता से काफी अलग मान लिया गया।किन्तु गुजरात और राजस्थान में अन्य स्थानो पर काली बंगा,लोथल और रंगपुर अदि में उत्खनन होने से विषय को कुछ परिवर्तन मिला। एफ ए खान ने एक लेख लिखा -मोहनजोदड़ों के हत्याकाण्ड की दंत कथा। उन्होंने यह स्पष्ट किया की मोहनजोदड़ो के अन्त और आर्यों के अन्वेषण के बीच कोई तालमेल नहीं बैठाया जा सकता है। मार्शल जैसे विद्वान सिन्धुघाटी सभ्यता की अनवरता पर प्रकाश डालते हुए कहते हैं कि सिन्धुघाटी सभ्यता का विकास है, जहाँ धरती,शिव,वृक्ष पशुपक्षियों आदि की पूजा है जो बाद तक भारतीय संस्कृति में निहित है।

मार्शल आदि विद्वानों का यह विचार इसलिए भी है कि उन्होंने अथर्ववेद को पूर्णतया नकार दिया है अथवा ध्यान नहीं दिया। धरती, नाग, रुद्र या व्रात्य अथवा रुद्र आदि की स्तुति अथर्ववेद में स्पष्टतया दिखाई देती है। वे मात्र यह बताना चाहते थे कि हिन्दु संस्कृति आर्येतर, अवैदिक या पर्ागवैदिक है, शर्मा जी इस बात पर जोर देते है यदि आर्यों द्वारा सिन्धुघाटी की सभ्यता के विनाश की बात मानी जाए तो विद्वान इस बात को कैसे मान सकते हैं कि भारत की वर्तमान संस्कृति सिन्धुघाटी सभ्यता की संस्कृति का अनवरत रूप है , यह कैसे सिद्ध हो सकता है?लैंगडन ने सिन्धुलिपि से ही ब्राह्मी लिपि के विकास की बात की है तो यह लिपि की धारा किस तरह अनवरत जीवित रही। मार्शल ने सिन्धु घाटी की लिपि को संस्कृत से भिन्न माना है, इस दृष्टि से सिन्धु लिपि या भाषा के पुनर्जीवन का विचार समज से परे है।
दरअसल भारत पर आर्यों के आक्रमण का सिद्धान्त उपनिवेशवाद का परिणाम है जिसे रेनफ्रीव ने स्वीकार किया और आर्यो को भारत का प्रचीन निवासी माना।

शर्मा जी अपनी प्रस्तावना में इस तथ्य को स्वीकारते हुए स्पष्ट रूप से कहते हैं... भारत पर आर्यो का आक्रमण, इस मान्यता का जन्म और प्रचार प्रसार एशिया में यूरोपियन साम्राज्यवाद के विस्तार से जुड़ा हुआ है। विस्तार के समय इस मान्यता का लक्ष्य आर्यों को द्विरों से अलग करना है, ह्वास के समय उत्तर पश्चिमी भारत को शेष भारत से अलग करना है।रामविलास जी कहते है कि – विश्व पूँजीवाद के संकटकाल में केन्द्रबद्ध, सुनियोजित अर्थतन्त्र को समाजवादी व्यवस्था की विशेषता कह कर उसकी खूब ले दे हुई है। वास्तब में भारतीय इतिहास के अनेक गौरवशाली युगों का सम्बन्ध इस अर्थतन्त्र से है। इसमें सबसे पहले आता है हड़प्पा संस्कृति का यह युग उस समय के सबसे बड़े राज्य में केन्द्रबद्ध राज्यसत्ता और सुनियोजित अर्थतन्त्र का युग है।  इस तथ्य को उजागर करने का श्रेय पुरातत्वज्ञ  पिगाट को है।  ( P n. 19)

इस सम्बन्ध में मेरा यह विचार है कि  अथर्ववेद को भी ऋग्वेद की तरह ध्यान में रखा जाए तो हड़प्पाकालीन संस्कृति के प्रतीक इस वेद में स्पष्टतया मिलते हैं। यह तथ्य रामविलास शर्मा जी के इस तथ्य को पुष्ट ही करेगा की ऋग्वेद का समय हड़प्पा सभ्यता से काफी पहले का था।अथर्ववेद का यदि सही तरीके से सांस्कृतिक अध्ययन किया जाए तो इस वेद में हड़प्पाकालीन संस्कृति के कई सन्दर्भ साफ साफ दिखाई देते हैं। रामविलास शर्मा जी अपनी पुस्तक में इस तरह के कई उदाहरण देते हैं, और उनकी अन्य इतिहासकारों  या पुरातत्वकारों के अध्ययन से तुलना करते हैं, कहीं भी ऐसा नहीं लगता कि वे अपनी बात थोप रहे हों , या अपनी अध्ययन के पक्ष में अन्य अध्ययनों को तोड़ मरोड़ रहे हो। रामविलास वर्मा जी अन्य अध्ययन कर्ताओं की तरह ऋग्वेद को ऐतिहासिक आधार बनाते हैं, यह उनकी भूल नहीं अपितु अथर्ववेद का दुष्प्रचार रहा है। जादू टोने की पुस्तक के रूप में उसका इतना अधिक दुष्प्रचार हो चुका है कि उसमें इतिहास की कल्पना को भी नकार दिया गया है। अथर्ववेद के प्राप्य अनुवाद भी इसी दृष्टि से किए गए हैं।

ऋग्वेद हड़प्पा के लिए ही नहीं अपितु मिस्र और सुमेर के लिए भी प्राचीन है। मिस्र से लेकर भारत तक, समस्त भूखण्ड एक सांस्कृतिक इकाई है। हड़प्पा की राज्यसत्ता के बारे में वे एक पूरा अध्याय लिखते हैं।
स्टुअर्ट पिगाट के की पुस्तक प्रागैतिहासिक भारत में हड़प्पा के आर्थिक पक्ष का मूल्यांकन किया गया है। लेकिन उनका महत्वपूर्ण तर्क यह है कि हड़प्पा सभ्यता पूर्णतया भारतीय सभ्यता है, बलूचिस्तानी सभ्यता आदि से भी मूल रूप में भेद है। वे यह भी मानते हैं कि हड़प्पा संस्कृति नाम ही दुर्बल पुरातात्विक नामकरण है। इसके पीछे पश्चिम एशिया का एक बड़े से बड़ा अनाम राज्य छिपा है। (एस पिगाट, प्रिहिस्टोरिक इंडिका, पृ. १३५) पिगाट समझते हैं कि यह राज्य ना तो इरान इराक के काल्पनिक घटक का अंग है, न ही नवनिर्मित पाकिस्तान तक सीमित है। वह काठियावाड़ से हिमालय की पदभुमि तक फैला है। उनके अनुसार यह बात भी दिलचस्प है कि हरप्पा के मानक अनुपात वाली ईंटें सिंध के अलावा सतलुज के ऊपरी भाग में रोपड़ तक, बीकानेर के पास डेरावार तक और काठियावाड़ और राजस्थान में रंगपुर तक मिलती हैं। (एस पिगाट, प्रिहिस्टोरिक इंडिका, पृ. १७७)

पिगाट के अनुसार इतने विशाल हड़प्पा स्रामाज्य की अर्थतन्त्र व्यवस्था भी संगठित थी़ कारीगर बाजार के हिसाब से माल तैयार करते थे, ओर बाजार भाव आदि से सम्बन्धित नीति भी तैयार करते थे। एशिया में हड़प्पा के उद्योग की तुलना मात्र सुमेरी सभ्यता से की जा सकती है। लेकिन पिगाट इस बात को मानते हैं कि “यह हड़प्पाई निर्माण व्यवस्था मिस्र से कम से कम एक हजार साल पुरानी है। “(एस पिगाट, प्रिहिस्टोरिक इंडिका, पृ. १७२)ऋग्वेद के पणि के उल्लेख करते हुए सदैव यह कहा जाता है कि पणि के पास धन था, इसलिए इन्द्र को उनसे द्वैष था, वह उन पणियों का धन लेकर सबमें बाँट देना चाहता है। इन विचारकों के सामने सबसे बड़ी समस्या भारतीय साहित्य का बृहद भण्डार रहा है। वैदिक साहित्य अपने में इतना बृहद है कि किसी निर्णय के लिए मात्र एक अंश को उद्धृत करना संभव नहीं है। जब पिगाट हड़प्पा के उद्योग की बात करते हैं तो संभवतया साहितय् से किसी उद्धृरण की जरुरत महसूस नहीं करते क्यों कि इन खुदाई में व्यापार के कई प्रमाण मिलते हैं, जैसे कि कि तोळने वाली मुद्राएँ। पिगाट यह तो मानते हैं कि हड़प्पाई मुद्राएँ सुमेरी मुद्राओं से काफी भिन्न हैं, लेकिन उनके सन्दर्भों को साहित्य में कोजने की कोशिश नहीं करते।
यह कार्य रामविलास शर्मा जी ने भी नहीं किया, संभवतया वे अथर्ववेद तक पहुँच नहीं पाए थे। अथर्ववेद में अथर्वा पण्यकाम ऋषि द्वारा रचित कई सूक्त हैं जिनमें व्यापार की उन्नति के लिए प्रार्थना की गई है। पण्यकामः शब्द का अर्थ धन प्राप्ति से सम्बन्धित है। एक मन्त्र में स्पष्ट रूप से वाणिज्य कर्म के लिए बड़ी यात्राओं का वर्णन है। — “हे इन्द्र! मैं तुमसे व्यापार के लिए पूछता हूँ, तुम हमारे इस कर्म में हमारा मार्ग दर्शन करो। मार्ग में अनेक दस्यु या जानवर मिलेंगे, तुम हमारी रक्षा करना। जिन पन्थों , मार्गों में बड़े बड़ देवता विचरण करते हैं, उन मार्गों से हम धन लेकर घर आए। मैं अग्नि प्रज्वलित करके घत की धारा के साथ आहुति देता हूँ जिससे मैं शीघ्र गमन कर सकूँ और धन से परिपूर्ण हो सकूँ। हम मार्ग पर दूर तक जाएँगे, अतः अग्नि हमारे ( अनजाने   )पापों को क्षमा करे। जिस मूल धन से मैं व्यापार करता घूमता, यदि उसे कुछ देवता गण चाहते हैं तो तुम उन्हे हविष से सन्तृप्त कर दो।  ” *

पिगाट ने हड़प्पाकालीन व्यापार का उल्लेख किया है। वे यह भी मानते हैं कि कपास की खेती और सूती कपड़ा बनाने का कौशल बारत से विश्व में फैला। डूर देशों में कपास के बदले सोना देने का चलन था, क्यों कि यही तत्कालीन वैश्विक मुद्रा थी। पिगोट का यह भी कहना है कि पश्चिमी एशिया में भारतीय कपास को सिन्धु कहते थे, ग्रीक में सिदान ड़ूप में पहुँचा। सूती कपड़े के व्यापार से सिंध प्रदेश का सम्बन्ध बना फिर बिगड़ा, लेकिन पूरी तरह टूटा नहीं। (पृ. ५० , पश्चिमी एशिया और ऋग्वेद) एस आर राव के अनुसार लोथल तथा अन्य हड़प्पाई नगर कपास और अन्य सूती कपड़ों का निर्यात करते थे। राव, लोथल एण्ड इण्डियन सिविलाइजेशन , पृ. ११५।

स्थितियाँ कैसे सदियों तक समान रहती हैं , उसका उदाहरण यह है कि आज भी तुर्क के डेन्जिली इलाके में सूती कपड़ो का व्यापार होता है, और उनका भारत से आज भी सम्बन्ध है़ मार्क्स ने १८५३ में कहा भी था कि ” भारत अनादिकाल से विश्व के लिए सूती माल तैयार करने का विशाल कारखाना रहा है। “मार्कस एंगेल्स , आन कोलोनियलिज्म पृ. ५२ . यहाँ पर हम पुनः अथर्ववेद के कृषि सम्बन्धी सूक्तों का अवलोकन करे तो यह स्पष्ट पता चलता है कि इस काल में कृषि में प्रयुक्त उपकरषों का काफी विकास हो चुका था। यह कृषि अनाड़ियों की कृषि नहीं थी। अथर्ववेद में हलों को जोतकर बेलों के द्वारा जमीन जोतने में जुए को सही तरीके से बनाने , बैलों के कंधो पर रखने , रज्जू के सही प्रयोग से लेकर बिज वपन की क्रिया तक का विस्तृत वर्णन है। **

रामविलास शर्मा जी अनुसार ऋग्वेद, हड़प्पा और सुमेर के आपसी सम्बन्धों को पहचानने का एक सूत्र क्रैमर ने दिया है । सूत्र यह है । सिन्धु कस्बों और नगरों की सबसे जयादा ध्यान आकर्षित करने वाली बात यह है कि जल और स्वच्छता की भूमिका है। शर्मा जी ऋग्वेद का उदाहरण देते हैं- आपों अस्मान् मातरः शुन्धयन्तु, आप माताएँ हमें पवित्र करें ( ऋगवे.1017.10 लेकिन अथर्ववेद में जल के व्यवहारिक पक्षों का पहले ही काण्ड से उल्लेख हुआ है और अनेक सूक्तों जल के विभिन्न पक्षों की अवतारणा करते हैं। वे परुस्थलो, जलसम्पन्न, कूप जल, कुम्भ जल सभी के सुख की कामना करते हैं। इस मन्त्र से यह तो ज्ञात हो जाता है कि इस काल की संस्कृति नदी विहीन से लेकर  नदी युक्त दोनों स्थानो तक विस्तृत थी। कूप जल की जरुरत वहां पर थी, जहाँ नदी का जल उपलब्ध नहीं था और कुम्भ जलनिसन्देह नदी से भर कर लाया गया था। इस सूक्त में जल के राष्ट्र की शक्ति के रूप में माना गया है। यही नहीं वे वर्षा के जल को भी महत्वपूर्ण मानते हैं कि काफी कुछ इलाकों में कृषि वर्षा जल पर निर्भर रही होगी। ***
यही नहीं अथर्ववेद में सिन्धु शब्द बहुवचन वाचक है जिससे यह भी ज्ञात होता है कि इस काल तक सिन्धु शब्द नदी वाचक बन  गया था़। ( सं सं स्वन्तु सिन्धवः… का.१. अ. १, अ. १५) यही नहीं नदी के विभिन्न नामों पर भी बेहद रुचिकर प्रकाश डाला है। नाद करते हुए बहने के कारण नदी नाम,  वरुण के पुकारने पर तुम एक साथ मिल कर नृत्य करते हो, अतः तुम्हारा नाम अपः पड़ा. देव की शक्ति से उदन , उपरिगमन किया अतः उदक नाम पड़ा। ****

पिगाट शकों और कुषाणों की तुलना ब्रिटेन के रोमन विजेताओं से करते हैं, शर्मा की की टिप्पणी रुचिकर है कि अन्तर सिर्फ इतना है कि रोमन विजेता ब्रिटेनवासियों को सब्य बना रहे थे, लेकिन भारतवासी शको और कुषाणो को ना केवल सभ्य बनाते हैं , बल्कि समाज में घुल मिल एक भी हो गए। रामविलास जी इस तथ्य पर जोर देते हैं कि हड़प्पा के राज्य के सही उत्तराधिकारी मौर्य रहे थे। हालाँकि वे पिगोट के सन्दर्भों को बिना लागलपेट के प्रस्तुत करते हैं, जिनमें कि “मौर्य साम्राज्य उस आर्यपरम्परा के देशी विकास का परिणाम भी हो सकती है जो पश्चिम में लट्ठों के झोपड़ों के निम्न स्तर से आरम्भ हुई और एक हजार साल बाद इस परिष्कृत नौकरशाही राज्यसत्ता तक पहुँची। पर क्या हम भारत की उस दूसरी, अधिक प्राचीन , नागर परम्परा की एक बारगी अनदेखी कर सकते हैं जो आर्यों को मिली थी। (“एस पिगोट , प्रहिस्टोरिक इंडिया, प॓. १३४.) इस तरह पिगोट आर्य आक्रमण को न नकारते हुए , उनके योगदान को स्वीकर करते हुए भी यह मौर्यों को हड़प्पा का उत्तराधिकारी मानते हैं। यही पर शर्मा जी इतिहास के ताने बाने को संभालते हैं।

हड़प्पा का उत्तराधिकार मौर्य साम्राज्य में दिखाई देता है, और ऋग्वेद या किसी भी वेद में आर्यों को आक्रमणकारियों के रूप में वर्णित नहीं किया गया है , साथ जिन्होने भी आर्य आक्रमण के समय पशुचारण प्रवृत्ति के थे, ये सब उक्तियाँ आर्य आक्रमण के सिद्धान्तों को परोसने वाले सभी विद्वानों ने की है। तो ऐसा नहीं हो सकता कि एक कालखण्द का इतिहास एक टेबलेट के रूप में सिकुड़ जाए और समस्त महत्वपूर्ण घटनाएं एक के बाद एक अनायास होने लगें। जैसे कि आर्य आक्रमण करते ही विद्वान बन गए, और अपने साथ लाई संस्कृति को भुल कर नई विचारधारा के परिपषक बन गए, अन्तर्द्वन्द्व युक्त साहित्य रचना आरम्भ हो गई़। और सिकन्दर के आक्रमण तक स्थितियाँ पुनः उसी स्थिति तक पहुँच गईं जहाँ से उन्होंने शुरुआत की थी। सिकन्दर के आक्रमण के वक्त मौर्य शासन था, और पिगाट आदि विद्वान मौर्य साम्राज्य को हड़प्पा संस्कृति का उत्तराधिकारी मानते हैं तो उस आर्य संस्कृति का क्या हुआ जिसे वे अपने साथ लाए थे?

पार्जीटर पहले विदेशी विद्वान थे, जिन्होंने आर्यों के आक्रमण को स्वीकार किया। १९२२ में अपनी पुस्तक भारत की प्राचीन ऐतिहासिक परम्परा पुस्तक में आपने लिखा है कि भारतीय ऋषि केवल मध्य हिमालय प्रदेश को पवोत्र मानते थे। उनन्होंने एक महत्वपूर्ण तथ्य पर ध्यान दिलवाया कि ऋग्वेद में नदियों का क्रम पूर्व से पश्चिम की ओर है। अतः यह आश्चर्य की बात है कि सूक्त में नदियों का क्रम उनकी प्रगति के अनुरूप नहीं है, वरन जहाँ वे अभी तक पहुँचे भी नहीं उलटा रखा गया। उनके अनुसार भारतीय परम्परा में विदेशी आक्रमण का पता तक नहीं है, अपितु दुह्यजनों का बहिर्गमन उल्लेखित है। पौराणिक वंशावलियों के अनुसार यह बहिर्गमन 1600 ई. पू. हुआ होगा। ये प्रवासी लोग अपने देवों के नाम तो वही बनाए रहे, किन्तु जब राजा और भाषा अलग होती गई तो उन्होंने अपने नामों में परिवर्तन किया। गूर्ने आदि विद्वानों ने अस्व संचालन और रथ विद्या से सम्बन्धित कुछ बाते रेखांकित की है, १६०० ईस्वी से पहले अरारहित पहिए वाले ठोस पहिए होते थे, जो काफी भारी हुआ करते हैं। ध्यातव्य है कि हग्वेद में चक्र के ना केवल अरा हैं, अपितु यह अक्ष के कारण काफी मजबूत भी है। ऋग्वेदकाल में चक्र और अरा इतनी व्यापकता से प्रयुक्त होते थे कि ये दर्शन का आधार भी बन गए। अधर्ववेद के काल सूक्त में तो काल को अरायुक्त चक्र वाले रथ पर रखे स्वर्ण पात्र में अधिनिहित रहस्यमय तत्व है जिसे समझने के लिए विद्वतगण परिकल्पनाएँ करते रहते हैं। सुमेरी संस्कृति ने १६०० वी सदी के आसपास अपने रथों में परिवर्तन किए. इस काल तक हड़प्पा सभ्यता में धातु का प्रयोग आरम्भ हो चुका था। यह सम्भव हैं हड़प्पन सभ्यता में इन रथों का प्रयोग युद्ध के लिए ना होता हो, लेकिन वे जीवन के अभिन्न अंग थे।

स्कंभ की अवधारण ऋग्वेद में स्थापित हुई है और अथर्ववेद में पल्लवित हुई है। ऋग्वेद में वरुण के लिए कहा गया है- ” स्कम्भेन वि रोदसी.. अधारयत् ( ऋग्वे. 8.41.10   ) अथर्ववेद में एक पूरा सूक्त स्कंभ सूक्त के रूप में प्रसिद्ध है। यहाँ पर स्कम्भ की अवधारणा ना केवल द्यौ और धरती के मध्य के आधार के रूप में दिखाई देती है अपितु परवर्ती उपनिधदिक दर्शन की भावभूमि भी तैयार दिखाई देती है। जो भूत भविष्य सभी में प्रविशित है,  जो अपने एक अंग को सहस्र कर लेता है, जिसमें ये समस्त लोक कोश आप ब्रहम जन निहित है , जिसमें सत्य और असत्य दोनों है, बताओं तो वह कहाँ है?

कियता स्कम्भः प्रविवेशतन्न यत्र प्राविशतं कियत् तद् बभूव।
एकं यद्गमकृणोत् सहस्रधा कियता स्कम्भः प्र विवेश तत्र।।
यत्र लोकांश्च कोशांश्चापो ब्रह्म जना विदुः।
असच्च यत्र सच्चान्तः स्कम्भं तं ब्रूहि कतमः स्विदेव सः।। (अथर्व. का.१०, सूक्त४, सूक्त ७ म. ९-१० )

होमर में अतलस नामक दैत्य का वर्णन है जो कंधों पर धरती और आकाश को उठाए है। लेकिन हम अथर्ववेद में स्कम्भ का वह दार्शनिक रूप उभर कर आया है जो परवर्ती दार्शनिकता की भावभुमि बनी।

ऋग्वेद और अन्य वेदों , उपनिषदों आदि में देवताओं का वर्णन है,लेकिन मन्दिर की स्थिति नहीं है। हड़प्पा सब्यता में भी मन्दिर का परवर्ती रूप नहीं दिखाई देता है।  पशुबलि, यागवेदी , तथा अनेक कर्मकाण्डों में मन्दिरों में प्रचलित वह उपासना पद्धत्ति नहीं दिखाई देती जिसमें समय पर ठाकुर जी को नहलाया जाता है। हित्ती राज्यों में मन्दिर में ठाकुर जी की पूजा की वह प्रणाली प्रचलित थी, जिसमें स्नान, वस्त्र , भोजन आदि दिया जाता था। (गूर्ने, द हिट्टाइट्स)।  तत्कालन भारतीय समाज में वैदिक देवताओं का मन्दिर में रूपायन एक दिलचस्प अध्ययनका विषय है।

इसी तरह रुद्र से मिलता जुलता एक देवता इराक के अक्कदि काल में प्रचलित रहा है। जिसके हाथ में त्रिशूल भी है। यह वैदिक रुद्र से काफी मिलता जुलता है। रुद्र का विशद रूप में ऋग्वेद की अपेक्षा अथर्ववेद में मिलता है। अथर्ववेद के ग्यारहवे काण्ड में रुद्र के लिए जो सूक्त है उसमें रुद्र के भयंकारी रूप का वर्णन करते हुए उससे दया की प्रार्थना है। यह रुद्र पशुपति के रूप में भी स्थापित है।

मानो रुद्र तक्मना मा विषेण मा नः सं स्त्रा दिव्येनाग्निना।
अन्यत्रास्मदं विद्युतं पातयैताम्।। २६।।
बवो दिवो भव ईशे पृथिव्या भव आ पप्रउर्न्तरिक्षम।
तस्मै नमो यतमस्यां दिशीतः।२७।।
अवे. का.११, अ. १, सूक्त .२

रुद्र और वृषभ का रूप हित्ती संस्कृति में है मिस्र में अनेक वृषभ देवों की पूजा की गई है। अथर्ववेद में वृषभ पूजा का विस्तृत रूप दिखाई देता है। वृषभ का अन्य रूप अनडवान को तो प्राण, रोहित आदि महत्वपूर्ण देवताओं के समान सर्वव्यापी रूप दिया गया है। अवे. 4.11.1-5
इसी तरह हित्ति संस्कृति में देववाद में काफी कुछ समानताएँ दिखाई देती हैं।

एक अन्य देवता के बारे में शर्मा जी ज्यादा कुछ नहीं कहते हैं, लेकिन चित्र जरूर दिखाते हैं, कारण यह है कि यह देवता अथर्ववेदकालीन है और वैदिक काल के उपरान्त विवादित रहा।

वे केल्त देवता का चित्र दिखाते हैं, जो १००० ई पू के भाण्ड पर अंकित है। जिसकी तुलना में वह सिन्धु घाटी की मुद्रा पर अंकित योगी से करते हैं। रामविलास जी उसकी ज्यादा विवेचना नहीं करते। इन दोनों चित्रों की विशेषता यह है कि दोनों योगी बैठना की मुद्रा में हैं। दोनों पशु पक्षियों के घिरे हैं। यह देवता निसन्देह अथर्ववेद में वर्णित व्रात्य देवता है जिसके लिए पूरा एक काण्ड रचा गया है (पन्दरहवाँ काण्ड) यह अथर्ववेद का सबसे महत्वपूर्ण देवता है जिसके कृत्यों पर पूरा कि पूरा काण्ड रचा गया है। व्रात्य गतिशील था। उसी ने प्रजापति को प्रेरणा दी। उसने अपने भितर स्वर्ण देखा वह एक बना, लालम बना, महान बना, ज्येष्ठ बना, ब्रह्मा बना, तप बना और सत्य बना। वह महान बना, महादेव बन गया।
अगले सूक्त में व्रात्य की गतिशीलता का वर्णन है। वह उठा पूर्व दिशा में गया। सभी दिशाओं ने उसका अनुकरण किया। वह उठा दक्षिण दिशा की ओर चला। यज्ञों का हितकारी वामदेव, यज्ञ के यजमान और पशु उसके पीछे पीछे चले। जो उस विद्वान वार्त्य को भला बुरा कहता है वह यज्ञों के हितकारी वामदेव, यज्ञ के यजमान पशुओं का दोषी होता है।
वह दक्षिण दिशा यज्ञों के हितकारी वामदेव, यज्ञ और यजमान तथा पशुओं का प्रिय धाम है। -(अथर्ववेद- 15-2-1-28)

व्रात्य के परिभ्रामण करने की कथा के उपरान्त बड़ी रोचक बात सामने आती है. सब दिशाओं में भ्रमण करने के उपरान्त वह वर्ष भर खड़ा रहा। देवताओं ने उससे पूछा , व्रात्य कहाँ बैठोगे? उसने कहा कि मेरे लिए आसन्दी लाओ। देवों ने आसन्दी बनाई। हमे मिस्र और हड़प्पा, दोनों के चित्रों में व्रात्य इसी आसन्दी पर बैठा दिखाई देता है, और यह बात पूरी तरह स्पष्ट हो जाती है परभ्रमण विशेष रूप से अथर्ववेद काल में काफी प्रचलित था। आसन्दी का प्रयोग किसी अन्य देवता के साथ नहीं दिखाई देता। व्रात्य जिस दिशा में जाता है, अपने साथ औषध, वनस्पि आदि ले चलता है। जहाँ वह जाता है, प्रजा उसके पीछे चलने लगती है़ सभा, समिति आदि सभी स्थानों पर उसे विशेष सम्मान मिलता है।  ” स विशोsनु व्यचलत्।।१।, तं सभा च समितिश्च सेना च सुरा चानुव्यचलन्।।२।। अवे.का.१५.अ.२.सु.९

सबसे रोचक बातें बात इसके उपरान्त है। अथर्वा ऋषि कहते हैं कि यदि वह विद्वान् व्रात्य किसी भी राजा का अतिथि बन कर आए तो उसका सम्मान करे, ऐसा करने से उसकी राष्ट्र शक्ति और क्षात्र शक्ति का नाश नहीं होता।

तदं यस्यैवं विद्वान् व्रात्यो राज्ञोSतिथिर्गृहानागच्छेत्।।१।।
श्रेयांसमेनमात्मनो मानयेत् तथा क्षत्राय ना वृश्चते तथा राष्ट्राय ना वृश्यते।।२।। अवे का.१५.अ.२.सु.१०

यदि वह किसी के भी घर अतिथि बन कर आए तो भी उसे उसका सम्मान करना चाहिए, उसे आसन देकर , जल देवे और उससे कुशल मंगल पूछे। ऐसा करने वाले को अभीष्ट प्राप्त होता है।

तदं यस्यैवं विद्वान् व्रात्योsतिथिर्गृहानागच्छेत्,।१।
सव्यमेनमभ्युदेत्य ब्रूयाद् व्रात्य क्वाSवात्सीर्व्रात्योदकं व्रात्य
तर्पयन्तु व्रात्य यथा ते प्रियं तथास्तु व्रात्य यथा ते वशस्तथास्तु व्रात्य यथा ते निकामस्तथास्तित्वति।२।।अवे का.१५.अ.२.सु.११

निसन्देह व्रात्य परिभ्रमण प्रवृति का ज्ञानी व्यक्ति  है, अथवा योग   पूर्ण जीवन व्यतीत करने वाले योगियों का समुदाय है। इनका भ्रमणशील स्वभाव इनके ज्ञान में वृद्धि करता है। लेकिन इस तरह के उपदेश देने की प्रवृत्ति वैदिक साहित्य में कम दिखाई देती है, राजाओं और अन्य जनों को यह निर्देश देना कुछ अजीब सा अवश्य लगता है। इसका अर्थ  अथर्ववेद के उपरान्त यह व्रात्य को सम्मान की दृष्टि से नहीं देखा गया, इन्हे उपनयन रहित ब्राह्मण माना गया, जिन्हे वेद पाठ का अधिकार नहीं था। स्मृति काल में तो पूर्णतया समाज से अलग मान लिया गया था। ध्यतव्य है कि व्रात्य को शूद्र कभी नहीं माना गया। इससे यह प्रतीत होता है कि ये व्रात्य प्रवजन प्रवृत्ति के योगादि को माहत्व देने वाले वैदिक कर्मकाण्ड रहित जन होंगे। ये बाहर से आए होंगे, ऐसा भी प्रतीत होता है क्यों कि ऐसा नहीं होता तो उनका राजा से लोगों से परिचय करवाने की आवश्यकता नहीं होती।

रामविलास शर्मा जी कहना है कि ऋग्वेद ने चाहे सुमेर को प्रभावित किया या स्वयं प्रभावित हुआ हो, दोनों तालमेल आकस्मिक नहीं हैं। वैदिक भारत और सुमेर में कोई सम्बन्ध अवश्य रहा होगा। हड़प्पा राज्य से सुमेर का सम्पर्क निर्विवाद है। या तो सांस्कृतिक तत्वों का आयात निर्यात हड़प्पा राज्य की स्थापना से पहले हुआ, या दौरान हुआ या बाद में हुआ। तीनों स्थितियों में भारत पर आर्यों के आक्रमण की धारण खण्डित होती है। यदि सांस्कृतिक तत्वों का आयात निर्यात हड़्पपा राज्य की स्थापना से पहले हुआ, तो ऋग्वेद की रचना तब तक हो चुकी होगी। यदि आयात निर्यात का वह काम हड़प्पा राज्य के दौरान हुआ हो तो वह क्षेत्र आर्य संस्कृति का क्षेत्र माना जाएगा़ क्योंकि दक्षिणी अफगानिस्तान से लेकर गुजरात तक और कुरुक्षेत्र से लेकर पश्चिमी सभ्यता का जो क्षेत्र हड़प्पा संस्कृति का है वही वैदिक सभ्यता है। पृ १३२।



शर्मा जी इतिहास और पुरातत्व के लिए सरस्वती के महत्व और जल प्रलय की घटना को ऋग्वेद के बाद की और अधर्ववेद से पहले की मानते हैं, जल प्रलय के बाद संस्कृत का केन्द्र कुरु पांचाल प्रदेश में सरक आया। यदि ऐसा है तो ऋग्वेद में व्रात्य की उपस्थिति का कारण समझ में आता है। इस सन्दर्भ में शर्मा जी क्रैमर के सूत्र को प्रस्तुत करते है.. सि्धु नगरों और कस्बों की तुरन्त ध्यान खि्चने वाली और प्रभावशाली विशेषता जल और स्वच्छता की भूमिका है। ऐसा लगता है कि जन जीवन में यह भूमिका महत्वपूर्ण थी। सार्वजनिक और निजी, दोनों तरह के भवनो् में कूपों तथा स्नानागारों की आश्चर्यजनक संक्या से और भट्टो से धँकी नलियों के सुनियोजित जाल से वह भूमिका स्पष्ट हो जाती है़। (पृ. १३२ , पश्चिमी एशिया और ऋग्वेद)

सिन्धु घाटी की सभ्यता के विकास का काल फेयर सर्विस के अनुसार २३००ई पू से लेकर १७०० ई पू तक माना है — (पोसेल , एन्शेन्ट सिटीज , आफ द इंण्डस, पृ.९१इस सभ्यता का एक महत्वपूर्ण केन्द्र था कालीबंगाँ और वह राजस्थान में सरस्वती नदी के किनारे बसा हुआ था। काली बंगा के ह्रास का कारण सरस्वती का मार्ग परिवर्तन माना जा सकता है। शर्मा जी भारत के सांस्कृतिक विकास में इस तथ्य को महत्वपूर्ण मानते हैं। अंग्रेज इतिहासकारों ने सरस्वती के प्राचीन जलमार्ग के बारे में शोध भी किया था। ओल्ढम के अनुसार वह नदीतल अबंला से होकर भटिंडा, बीकानेर, और बहावलपुर होता हुआ सिंध पहुँचता है। वाडिया, जिओलाजी आफ इंडिया, पृ ३६८

संपर्क : saksena.rati@gmail.com

बहस में डाक्यूमेंट्री

सुधा अरोड़ा/  अरविन्द जैन

( ‘ इंडियाज डॉटर’ डाक्यूमेंट्री के विवाद के दौरान स्त्रीकाल का अपडेट रुका था . उन्हीं दिनों लेखिका सुधा अरोड़ा और स्त्रीवादी कानूनविद  अरविन्द जैन के अपने -अपने मंतव्य सोशल मीडिया में आये . सुधा अरोड़ा के मंतव्य पर अरुण माहेश्वरी, मृदुला गर्ग आदि लेखकों -विचारकों के मंतव्य भी आये . स्त्रीकाल के पाठकों के लिए हम इन चर्चाओं को यहाँ लेकर आ रहे हैं और यू ट्यूब की मदद भी ली है . )

फिल्म ‘India’s.daughter’ को लेकर फेमिनिस्ट कार्यकर्ताएं बहुत हाइपर हो रही हैं ! फिल्म बेहद असंवेदनशील है, पीड़िता का पक्ष ठीक से उभर कर आ ही नहीं पाया, बलात्कारी को कॉर्नर नहीं किया गया , उसे इतने कम्फर्टेबल ज़ोन में क्यों रखा गया कि उसे अब तक इस बात का एहसास नहीं कि उसने इतना वीभत्स काण्ड किया। फिल्म में फेमिनिस्ट एंगल है ही नहीं।  पूरी फिल्म एक व्यावसायिक दृष्टिकोण से बनायीं गयी है यहाँ तक कि एडिटिंग में भी रोचक और मनोरंजक होने का ख्याल रक्खा गया है ! बहुत से सवाल हैं जो  फेमिनिस्ट की तरह या एक शुद्ध कला फिल्म समीक्षक की तरह उठाये जा सकते हैं ! लेकिन मैंने इस फिल्म को  दर्शक की तरह ही देखा और बतौर एक सामान्य दर्शक अपनी प्रतिक्रिया दे रही हूँ !

मैंने पूरी फिल्म देखी ! ऐसा कुछ भी नहीं है इस फिल्म में जो बलात्कारियों के लिए हमारे मन में दया या करुणा उपजाये या उनका महिमा मंडन करे ! मुकेश नामक अपराधी का सख्त और संवेदनहीन चेहरा देख कर हिकारत और गुस्सा ही उपजता है ! वह एक बे पढ़ा- लिखा अपराधी है,  जो जेल की सलाखों के पीछे है और अपने बचाव के वकीलों की सिखाई तोता रटंत भाव विहीन चेहरे से सुना रहा है ! सवाल यह है कि जो पढ़े लिखे, कानून विद् सलाखों से बाहर रहकर उसी की भाषा बोल रहे हैं, वे क्या बोल रहे हैं और उन्हें क्या स्वीकृति दी जानी चाहिए !
दोषी पक्ष के ये वकील ज़्यादा खतरनाक हैं ! जस्टिस ए पी सिंह कहते हैं – अगर मेरे घर की बेटी  शादी से पहले किसी अनजान के साथ घूमे फिरे , संबंध बनाये तो मैं अपने फार्म हाउस में सबके सामने उस पर पेट्रोल डालकर उसे ज़िंदा जला दूंगा !  एम एल शर्मा कहते हैं – लड़कियां फूल होती हैं, वे हीरे की तरह हैं, यह आप पर है कि  आप उन्हें कितना संभाल कर रखते हैं। उन्हें सड़क पर रख दो तो उन्हें कुत्ते छोड़ेंगे नहीं ! दोनों जज के पास आपत्तिजनक जुमलों की भरमार है ! सजा तय करनेवाले ये जज खुद सज़ा पाने के लायक हैं ! उनका कब नोटिस लिया जायेगा या उन्हें कब नोटिस इशू किया जायेगा कि उन्होंने यह सब क्यों कहा ?उनकी मानसिकता बदलने के लिए क्या किया जाना चाहिए, यह सोचने की ज़रूरत है ! 1972 में यानी बयालीस साल पहले 14 वर्षीय लड़की मथुरा का लॉक अप में पुलिसकर्मियों द्वारा रेप हुआ तब भी मथुरा के ही चरित्रहीन होने की दलीलें देकर गनपत और तुकाराम छूट गए थे ! आज चार दशकों के बाद भी, जिस लड़की ने रेप का प्रतिवाद किया, उसके किसी लड़के के साथ फिल्म देख कर रात को देर से (रात के आठ बजे) लौटने को लड़की की गलती बताया जा रहा है ! भले घर की लड़कियां रात आठ बजे तक घर के बाहर नहीं रहतीं !ए पी सिंह और एम एल शर्मा जैसे न्यायविद लड़कियों के लिए जैसी भाषा इस्तेमाल कर रहे हैं, सज़ा तो उन्हें मिलनी चाहिए! ये दोनों अकेले नहीं हैं ! ऐसे जस्टिस और वकील भरे पड़े हैं !

तीन साल पहले महिला दिवस पर जब सुबह के अखबार में मध्य प्रदेश के एक गाँव में एक आठ वर्षीय बच्ची से उसके नाना द्वारा बलात्कार कर उसकी क्षत विक्षत देह को दो हिस्सों में काट कर जंगल में फेंक देने की खबर आई (उस नाना की पीठ पर गोदना था – ‘मैं मर्द हूँ ‘), भोपाल में आयोजित महिलादिवस के कार्यक्रम में मंच पर जस्टिस गुलाब शर्मा (भूल नहीं रही तो यही नाम था) लड़कियों के पहरावे की खिल्ली उड़ाते हुए उन्हें ही दोषी ठहराने लगे ! सभागार में शोर होने के बाद उन्होंने बीच में ही अपनी गलती महसूस की और माफ़ी मांगी ! दो साल पहले शक्ति मिल कम्पाउंड में हुए एक फोटो जर्नलिस्ट के रेप पर मुंबई महिला आयोग की एक सदस्य दूरदर्शन पर लड़कियों को शाम के बाद घर रहने की सलाह देने लगीं ! मजलिस की संचालिका और मुंबई की फैमिली कोर्ट की जानी मानी एडवोकेट फ्लेविया एग्नेस ने हाईकोर्ट के एक जज का बयान उद्धृत किया, जिन्होंने कहा – ‘शादी के बाद लड़कियां माँ बाप के घर में मेहमान की तरह होती हैं ! ससुराल ही उनका घर है !’ ऐसे बयानों की एक लंबी लिस्ट है, जिन्हें न्यायालय के प्रतिष्ठित ओहदों पर आसीन इन जज और वकीलों का बाकायदा नाम लेकर बताया जा सकता है !

ए पी सिंह और एम एल शर्मा की जड़ सोच और मानसिकता के बरक्स ज्योति सिंह के माँ और पिता हैं जो उसी दकियानूसीपरंपरा से आये हैं पर बदलाव को समझ पा रहे हैं . जो सवाल कर रहे हैं कि उनकी बेटी का रात को आठ बजे लौटना इतना बड़ा गुनाह हो गया और उन लड़कों का कोई दोष नहीं जिनकी हैवानियत जहाँ तक पहुंची उसकी कल्पना भी भयानक है .उसे बताते हुए एक बलात्कारी इतना निर्लिप्त और इतना निर्भीक कैसे हो गया ? उसके सख्त और आश्वस्त चेहरे के पीछे की दुरभिसंधियों को पहचानने की ज़रूरत है ! ज्योति के एक परिचित छात्र ने बताया – कैसे एक बार ज्योति का पर्स किसी लड़के ने छीन लिया और पुलिस जब उस लड़के को पकड़ कर मारने लगी तो ज्योति ने पुलिस को रोक दिया और उस लड़के से बात की, उससे पूछा कि पर्स क्यों चुराया ,क्या लेना चाहते थे और उसे वे सारी चीज़ें खरीद कर दीं जो वह पैसे चुरा कर पाना चाहता था ! बदले में उससे वायदा लिया कि अब वह ऐसा काम कभी नहीं करेगा ! यह थी ज्योति की मानवीयता और उसका संवेदनशील पक्ष !

ज्योति सिंह के आखिरी शब्द थे – सॉरी माँ, मैंने आपको बहुत परेशान किया ! प्रीति राठी जो बांद्रा टर्मिनस पर एसिड अटैक का शिकार हुई , अपने आखिरी होशो हवास तक इसकी चिंता करती रही कि उसके इलाज़ पर बहुत खर्च हो रहा है ! निम्नमध्यवर्गीय परिवारों की ये नयी लड़कियां हैं, जो अपने परिवार को एक बेहतर जीवन दे पाने का जज़्बा लिए आगे आ रही हैं  और समाज की संकीर्ण मानसिकता की बलि चढ़ाई जा रही हैं ! ” इंडियाज़ डॉटर” फिल्म में एक बलात्कारी की पत्नी मांग भर सिन्दूर लगाये, गोद में एक मासूम सा बच्चा लिए अपने पति की रिहाई के लिए गुहार लगा रही है कि पति के बिना वह कैसे जी पायेगी। क्या यह सिर्फ एक अपढ़ हिंदुस्तानी पत्नी का पति प्रेम है ? इसे भी वैश्विक संदर्भों में देखा जाना चाहिए ! ब्रिटेन में एक कॉर्पोरेटर पर जब अनैतिक संबंध बनाने का आरोप लगा और उसके ओहदे पर बन आई तो उसकी कानूनी पत्नी जो जीवनभर उसकी करतूतों से त्रस्त रही थी , अचानक मंच पर प्रकट हो उसके हाथ में हाथ डाल कर उसके चरित्र को बेदाग़ बताते हुए उसकी वफ़ादारी के कशीदे पढ़ने लगी ! फिल्म अभिनेता शाइनी आहूजा पर, अपने घर में काम करने वाली 19 साल की लड़की से रेप का आरोप लगा तो उसे बेगुनाह साबित करने के लिए, उसकी पत्नी ने भी आगे बढ़ कर एक के बाद एक प्रेस आयोजन कर डाले ! दिल्ली रेप काण्ड के उस आरोपी की पत्नी और इन आधुनिक, आत्मनिर्भर पत्नियों में कितना फ़र्क़ है,सोच कर देखें ! इसके भी आकलन की ज़रूरत है !

फिल्म निर्माता को तिहाड़ जेल में जाने की अनुमति क्यों दी गयी जब मामला विचाराधीन था , वह एक अलग मुद्दा है ! इसफिल्म पर प्रतिबंध लगाकर बहुत अक्लमंदी का परिचय नहीं दिया गया है ! फिल्म जिन सवालों को उठाती है, उन पर बगैर किसी पूर्वाग्रह के बात होनी चाहिए और बलात्कारियों को सही और ज़रूरी सज़ा दिलवाने के हथियार के रूप में ही इस फिल्म को देखा जाना चाहिए !

अरुण माहेश्वरी:  इस फ़िल्म को दिखाना नहीं, न दिखाना अपराध है । हमने इसे देखी और शेयर भी की है । फ़िल्म पूरी होने के पहले ही अपनी रुलाई को रोक नहीं पाया था । काफी देर तक फफक कर रोता रहा । ज़ुल्म के प्रतिवाद में दिल्ली की सड़कों पर नौजवानों का आक्रोश किसी भी संवेदनशील आदमी की आत्मा को अंदर तक हिला देगा । इसपर पाबंदी बलात्कार के खिलाफ प्रतिवाद पर पाबंदी है । भारत में हर सुबुद्धिसंपन्न व्यक्ति को इस पाबंदी के विरुद्ध :खुल कर आवाज़ उठानी चाहिये । बलात्कारी की और स्त्रियों के प्रति रूढ़िवादियों की सोच में कितनी समानता है, इस फ़िल्म से जाहिर होती है । इसके प्रदर्शन से नहीं, प्रदर्शन पर रोक से दुनिया के सामने भारत की भद हो रही है ।

सुधा अरोड़ा : तीन दिन से लगातार इस फिल्म के विरोध में विस्तृत कमेंट्स पढ़ कर समझ नहीं पा रही हूँ कि फेमिनिस्ट फिल्म निर्माता महिलाओं की परेशानी क्या है ? क्या यह कि एक विदेशी महिला को अनुमति क्यों दी गयी ? उसने अपने भारतीय सह निर्देशक को पर्याप्त श्रेय नहीं दिया ? ये सब दीगर मुद्दे हैं ! फिल्म की इतनी बारीकी से छीछालेदर की जा रही है कि उसका मुख्य उद्देश्य ही छिप गया लगता है !

अरुण माहेश्वरी : ऐसा कर रहे लोग कुछ इतर इरादों से, एक सरकार के अविवेकपूर्ण निर्णय पर लीपापोती में लगे हुए है । फ़िल्म की गुणवत्ता या इसके संदेश से इनका कुछ लेना-देना नहीं है । एक महोदय कह रहे थे कि बलात्कारी को इतना स्थिर दिखा कर उसके प्रति सहानुभूति दिखाई गयी है । अब पूछिये उनसे कि बलात्कारी को रोता हुआ या काफी बेचैन दिखा कर क्या उसके प्रति नफ़रत पैदा होती । ये सब मूर्खतापूर्ण, बदइरादों से प्रेरित बातें हैं । इस फ़िल्म की जितनी तारीफ़ की जाय, कम है

अनुराग आर्य :  जो चीज़ मुझे भयभीत कर रही है वो है हम अपराधी को तो फांसी पर चढ़ा देगे पर उस ” विचार”को ज़िंदा रखे हुए है जो “अमर” प्रतीत होता है और इंडेमिक की तरह फैला हुआ है ।इस मेल मेन्टल कंडीशनिंग को मैंने एक डी एम् लेवल के व्यक्ति के मुंह से सुना है जिसने बलात्कार के केस के बाद कहा था ” रात को गर लड़की खेत में मिलेगी तो यही होगा “i was shocked .तब मैंने यही कहा था तो आपके जिले के आदमी इतने हिंसक है के स्त्री को अँधेरा देख अकेला देख बेकाबू हो जाते है ?

प्रभात  समीर : फ़िल्म मैंने भी देखी यद्यपि बहुत clear नहीं थी।मैं फ़िल्म के प्रतिबंध के पक्ष में नहीं लेकिन देखने वालों में एक व्यक्ति के कमेंट ने मुझे काफ़ी विचलित किया।आरोपी के माँ-बाप,पत्नी को देख कहने लगे’न निकलती वह बच्ची घर से तो इतने घर तो न उजड़ते’बहस होनी थी,हुई लेकिन एक बात मन में ज़रूर आयी कि ऐसे विषय समाज में प्रस्तुत करने से अगर बचा जाए तो हानि क्या?इस documentary से समाज में सुधार का तो कोई रास्ता दिखाई नहीं देता।

मृदुला गर्ग :  कम अज़ कम सब पुरुषों को तो देखनी ही चाहिए। जिससे वे यह प्रण ले सकें कि जहाँ तक उनके वश में है, वे अगली पीढ़ी में ऐसे पुरुषों को पनपने नहीं देंगे। अपने बेटों और छात्रों को बचपन से ऐसी संकीर्ण और हिंसक मानसिकता से परहेज़ ही नहीं, उसका विरोध करना सिखलायेंगे। बात-बात पर प्रतिबन्ध माँगने वालों का भी, चाहे वे नारीवादी क्यों न हों, जो सोचती हैं कि वे और उन जैसी कुछ महिलायें ही सोच-विचार करने का माद्दा रखती हैं, बाक़ी की सब औरतें कमज़ोर और बेवकूफ

‘इंडियाज़ डॉटर’: वाद-विवाद-संवाद
अरविंद जैन
अदालत के निषेधाज्ञा आदेश और गृह-मंत्रालय के सरकारी आदेशों के बावजूद, बी. बी.सी. ने ‘इंडियाज़ डॉटर’ तय समय (विश्व महिला दिवस, आठ मार्च) से चार दिन पहले ही दिखा दी. निर्माता भारत छोड़ इंग्लैंड चली गई. ‘यू ट्यूब’ से लेकर अधिकाँश सोशल साइट्स पर विडियो उपलब्ध है. मीडिया सरकार और अदालत से भी ज्यादा शक्तिशाली हो गया. ‘इंडियाज़ डॉटर’ का साफ़ सन्देश है कि, अपराधी गरीब-अनपढ़ थे. लड़कियों को ऐसी विकट स्थिति में विरोध-प्रतिरोध नहीं करना चाहिए. कसूर लड़कों का नहीं है. इस बार भी वकीलों के बयान तो और अधिक खतरनाक हैं. निसंदेह यह फिल्म  दुनिया भर की आम स्त्रियों को निरंतर भय और आतंक की मानसिकता में रखने में, महत्वपूर्ण भूमिका निभाने में सफल होगी.

‘इंडियाज़ डॉटर’ पर हर कोई (पक्ष-विपक्ष में) इतना लिख-बोल रहा (चुका) है कि चीखने को मन करता है….चुप हो जाओ ‘ब..ला..ओ’…चुप हो जाओ. निर्भया काण्ड के बाद, जो कानून भारतीय संसद द्वारा बना-बनाया गया है-पढ़ा है कभी! पढ़ लो फिर बोलना (ब…ह…स करना). जानते हो ना! कि ‘बलात्कार’ (भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 375) का दायरा बढाने के लिए गढ़ी भाषा-परिभाषा में, जो ‘यौन कार्य’ (यहाँ लिखना अशोभनीय होगा) शामिल किये गए हैं, उनमे से कोई या सब ‘यौन कार्य’ ‘बिना सहमति’ के करना अपराध है. इसका मतलब यह हुआ कि उनमे से कोई या सब ‘यौन कार्य’, सहमति से करना अपराध नहीं है. मालूम है ना कि अब पति को अपनी 15 साल से बड़ी उम्र की विवाहिता पत्नी के साथ, सम्भोग ही नहीं, उपरोक्त ‘यौन कार्य’ करने का भी ‘कानूनी लाइसेंस’ दे दिया गया है. (पढ़ें- भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 375 का अपवाद) संशोधन से पहले पति को अपनी 15 साल से बड़ी उम्र की विवाहिता पत्नी के साथ, सिर्फ ‘सम्भोग’ करने का ही कानूनी अधिकार था. अब अन्य ‘यौन कार्य’ करने की भी, कानूनी मंज़ूरी मिल गई. बताने की जरूरत नहीं कि इसी प्रावधान में सहमति से सम्भोग की उम्र (जो संशोधन से पहले 16 साल थी) अब 18 साल तय की गई है. शायद इसलिए कि विवाह कानूनों के अनुसार, विवाह के लिए लड़की कि उम्र 18 साल और लड़के कि उम्र 21 साल होनी चाहिए. (हालांकि 18 साल से कम उम्र का लड़का, अगर 18 साल से कम उम्र कि लड़की से भी विवाह करे, तो कानूनन कोई जुर्म नहीं है.)

हमारे ‘महान’ देश का कानून-विधान-संविधान इसे गलत नहीं मानता. भाइयो-बहनों! बहस शुरू करने से पहले इस संदर्भ में (वैवाहिक बलात्कार) पिछले दिनों आये, सुप्रीम कोर्ट और दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले भी देख-पढ़ लो. पूर्ण रूप से असंवैधानिक, अंतर्विरोधी, विसंगतिपूर्ण और स्त्री विरोधी कानूनों और ‘बलात्कार की संस्कृति’ पर, ‘सभ्य समाज’ की चुप्पी का षड्यंत्र, हमारी  समझदार बहस से बाहर क्यों है? गुस्सा आ रहा है….रक्तचाप बढ़ रहा है….या यह हमारी पवित्र और अटूट विवाह संस्था पर हमला लग रहा है?

खैर! ‘अभिव्यक्ति की आज़ादी’ की दुहाई देने वाले या विकृत मर्द मानसिकता को उजागर होने दो का नारा लगाने वाले, कृपया यह ना भूले कि निर्भया काण्ड के दोषियों की अपील पर, अभी सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई शेष है और फाँसी की सजा पर रोक लगी-लगाईं हुई है. पहले ही मामला ‘फ़ास्ट ट्रैक’ से ‘स्लो ट्रैक’ में चला गया है. क्या जाने-अनजाने मीडिया, इसे ‘नो ट्रैक’ तक पहुँचाना चाहता है! लगता है कि सुप्रीम कोर्ट में होने वाली बहस को, स्त्री के विरुद्ध बढती यौन हिंसा के सामजिक-आर्थिक परिप्रेक्ष्य और सजा-ए-मौत के मानवीय पक्ष की तरफ मोड़ा जा सकता है. कल फैसले में देरी पर बहस होगी…कहेंगे फाँसी की सज़ा (या देरी) अमानवीय…असंवैधानिक…न्यायिक पूर्वाग्रह-दुराग्रह…राष्ट्रपति को रहम की अपील…फाँसी की सज़ा माफ़ करो. अपराधियों की मानसिक सेहत ठीक नहीं…..देखो..देखो….डॉक्युमेंटरी ‘इंडियाज़ डॉटर’. आखिर एक ‘स्त्री’ द्वारा किया गया गंभीर शोध है….देसी मीडिया की नहीं मानते तो कोई बात नहीं, बी.बी.सी. तो दुनिया भर में सबसे ज्यादा विश्वसनीय मीडिया हाउस है.

सुप्रसिद्ध लेखिका सुधा अरोड़ा ने समझाया कि “इस फिल्म को लेकर आप बहुत हाइपर हो रहे हैं, जबकि इसमें ऐसा कुछ नहीं है जो बलात्कारियों के लिए हमारे मन में दया या करुणा उपजाये ! मुकेश नामक अपराधी के सख्त और संवेदनहीन चेहरे को देख कर हिकारत और गुस्सा ही उपजता है! वह तो एक बे पढ़ा लिखा अपराधी है जो जेल की सलाखों के पीछे है ! जो पढ़े लिखे, कानूनविद् सलाखों से बाहर रहकर उसी की भाषा बोल रहे हैं, वे ज़्यादा खतरनाक हैं, उन्हें कब सुधरने का नोटिस दिया जायेगा?”

अरुण महेश्वरी (कलकत्ता) ने लिखा “ये एक वक़ील की टिपिकल दलीलें हैं । पेशे का तर्क भूत की तरह सवार है । क़ानून की अदालत में ही सब कुछ तय नहीं होता कि उसी पर सोचते रहे और वर्तमान के अपने कर्त्तव्यों से आँख मूँद लें! क्या गारंटी है कि दुनिया चुप्पी साध लें तो तत्काल न्याय हो जायेगा? दूसरी किसी भी चीज़ से ज्यादा महत्वपूर्ण है सामाजिक मानसिकता को बदलना. इस शानदार फ़िल्म ने हमारे सामने एक आईना पेश किया है जिसमें अपने समाज की यह जघन्य असहनीय सूरत देखकर आदमी वह नहीं रह सकता जैसा है. यह किसी भी मनुष्य, जानवर को नहीं, को अंदर तक झकझोर देने के लिये काफी है. इसीलिये, सुप्रीम कोर्ट का फैसला आए न आए, इस फ़िल्म का अधिक से अधिक प्रदर्शन किसी भी दूसरी चीज़ से ज्यादा ज़रूरी है. जो इसके प्रदर्शन मंो बलात्कारी का प्रचार देखते हैं वे संभवत: खुद को ही सारी मानवीय संवेदनाओं और ज्ञान के अकेले अधिकारी माने हुए हैं और यह मानते हैं कि जो बलात्कारी और उसके पक्ष के वक़ील की घृणित बातों को सुनेगा, उससे प्रभावित हो जायेगा. जबकि सचाई बिल्कुल उल्टी है. बौद्धिकता का जामा पहन कर बैठे काठ के उल्लू का ही इसे देखकर दिल नहीं काँपेगा, आम आदमी तो हत्यारों और रूढ़िवादियों के इस अमानवीय गंठजोड़ से दहल जायेगा, उन्हें हृदय की अंतिम गहराई तक से कोसेगा और उनकी बर्बादी की प्रार्थना करेगा.“

हम सब जानते हैं कि साल भर से निर्भया मामले की अपील, माननीय सर्वोच्च न्यायालय में बहस के लिए विचाराधीन है. फाँसी की सजा पर रोक लगी है. दिल्ली की एक अदालत ने प्रसारण पर रोक भी लगा रखी है. विचाराधीन मामले के रहते और निषेधाज्ञा के विरुद्ध, फिल्म का प्रसारण स्पष्ट तौर पर अदालत की अवमानना है. फिल्म ‘दया या करुणा उपजाये’ या ‘हिकारत और गुस्सा’, दोनों ही स्थितियों में न्यायिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप है. बचाव पक्ष के वकीलों को ‘खतरनाक’ बयान पर, महिला संघठनों के विरोध को देखते हुए बार कौंसिल ऑफ़ इंडिया ने कारण बताओ नोटिस जारी किया है. ‘शानदार फिल्म’ के अधिकांश हिस्से (सिवा मुकेश के बयान) और वकीलों के ‘खतरनाक’ बयान, भारतीय मीडिया पहले ही (दिसम्बर 2012 से दिसम्बर 2013 में) दिखा-सुना चुका है. तब से अब तक, क्या सब सो रहे थे? विरोध किया तो क्या कानूनी कार्यवाही हुई? पुरानी खबरों की इस ‘कतर-ब्योंत’ में, आखिर नया क्या है? क्या मीडिया और बुद्धिजीवियों का भी ‘न्यायिक प्रक्रिया’ से विश्वास उठ गया है?

स्त्री के विरुद्ध हिंसा (यौन-हिंसा) सम्बन्धी कानूनी प्रावधान और प्रक्रिया नाकाफी हैं. सिर्फ ‘फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट’ इसका समाधान नहीं. अपील दर अपील दर अपील में ही उम्र बीत जाती है. छोटे-बड़े पर्दे पर उन्मुक्त सेक्स का ‘आनन्द बाज़ार’, अपराध और विशेषकर यौन हिंसा का प्रदर्शन लगातार बढ़ रहा है. बढ़ रहा है, क्योंकि बिक रहा है. स्त्री देह को देखते ही ‘मर्दों’ (मीडिया)  की लार टपकने  लगती  है  और  दिमाग  में हिंसक घोड़े  हिनहिनाने  लगते हैं. आम सामाजिक चेतना, इससे निष्प्रभावी रह नहीं सकती.

युवा पीढ़ी खासकर दिशाहीन, कुंठित, निर्धन और बेरोज़गार, नशे और अपराध के मायाजाल में फँसते जा रहे है. सुनियोजित अपराधों में सफेदपोश माफिया सक्रिय है. देशभर में राजनीति का अपराधीकरण और अपराधियों का राजनीतिकरण फल-फूल रहा है. आर्थिक दबाव और मानसिक तनाव भी, यौन विकृतियों, बर्बरता और पाशविकता को ही बढ़ावा देता है. निर्भया उर्फ़ ज्योति बलात्कार-हत्या काण्ड की विवेकहीन प्रतिध्वनियाँ, रह रह कर सुनाई पड़ती रहती हैं. कभी रोहतक और कभी गुजरात. व्यक्तिगत से सामूहिक और राजकीय होती जा रही हिंसा के इस दहशतज़दा माहौल में गंभीर चिंता की नहीं, बल्कि गंभीर चिंतन और आमूलचूल बदलाव (सामाजिक-मानसिक) की जरूरत है. स्थितियां निरंतर बेकाबू और विष्फोटक होती जा रही है. ‘नागपुर’ से लेकर ‘दीमापुर’ तक फैली अराजकता हमारे सामने है.

सरोज की डायरी के कुछ पन्ने

वीणा वत्सल सिंह

युवा रचनाकार वीणा वत्सल सिंह दो सालों तक दुमका में पढ़ाने के बाद आजकल लखनउ रहती हैं. संपर्क :veenavatsalsingh19libra@gmail.com>

१६ सितम्बर -, आज मौसम में ऊमस भरी गरमी है .मेरे मन में भी भावों की सघनता ने एक ऊमस भर दी है .आसमान में लगातार बादलों की आवाजाही लगी हुई है .बादल – हां उसका नाम बादल ही तो था .मैं कई बार हंसकर पूछ बैठती — ‘ बादल तुम्हारा नाम बादल ही क्यों है ?’ और ,बादल बड़े प्यार से हंसते हुए मेरी आँखों में झाँक कहता — ‘ क्योंकि बादल की ही तरह मैं तुमसे जो भी प्यार पाता हूँ वापस वही तुम्हारे ऊपर उड़ेल देता हूँ .मैं तुमसे अलग नहीं रह सकता हूँ सरोज .’ उसकी बातें ख़त्म होतीं और हम दोनों के ही ठहाके आसपास गूंजने लगते .हंसते – हंसते कभी मैं गंभीर हो उससे कहती — ‘ वैसे नामों का विन्यास देखें तो बादल के रहते सरोज का खिलना संभव नहीं उसे तो रवि चाहिए ‘ सुनकर ,बादल तड़प उठता और धीमे स्वर में पूछ बैठता — ‘ यह रवि कौन है ?’ उसके उतरे हुए चेहरे को देख मुसकुराते हुए मैं कहती — ‘ तुम्हें छोड़ मैं किसी और से प्यार नहीं कर सकती .क्या तुम यह नहीं जानते ?’ लेकिन ,मेरी इस बात से बादल की भाव – भंगिमा में कोई ख़ास फर्क नहीं पड़ता और वह मुंह फुलाकर चुपचाप दूसरी और देखने लगता .उसकी नाराजगी के ये गुजरते पल मेरे ऊपर भारी होते .एक – एक पल में लगता जैसे सांस घुटती जा रही है .मेरे लाख मनाने पर भी जब उसकी नाराजगी दूर नहीं होती मेरी आँखों से आंसू बहने लगते .बादल तड़प उठता और मुझे बांहों में भर दुखी स्वर से कहता — ‘ तुम ऎसी बातें करती ही क्यों हो जो मैं सुन नहीं पाता’ और तब झट आंसू पोछ हंसते हुए मैं कहती — ‘ तुम्हारी बांहों में आने के लिए ” प्रेम भरे दिन बस ऐसे ही बीतते जा रहे थे .लेकिन कहते हैं न कि समय सदा एक सा नहीं रहता .मैं और बादल समय की इस चाल से अनजान एक – दूसरे में डूबे हुए थे

१८ सितम्बर – मैं ने एक कागज़ लिया और उस पर बादल की शर्ट की जेब से पेन निकाल लिख दिया ‘मौन ‘ बादल  ने पढ़कर मुस्कुराते हुए कहा – ‘ ये शब्द तो बोल रहे हैं ‘मेरे चेहरे पर हंसी की लहर दौड़ गई .हंसते – हंसते मैं बोल पड़ी –‘यह एक शब्द और बादल तुम इसे कई बोलते शब्द कह रहे हो ?’सुनकर बादल की आँखें हंसने लगीं और धीरे – धीरे यह हंसी पूरे चेहरे पर फ़ैल गई .मेरे  लिए बादल का यह रूप बिलकुल नया था .हम दोनों को एक साथ ‘लिव इन रिलेशनशिप ‘ में रहते हुए पूरे दस माह हो चुके थे .मैं ने इस समय से पहले तक बादल को सिर्फ एक मदहोश प्रेमी के रूप में ही जाना था .उसके चेहरे की हंसी कुछ पलों के बाद गायब हो गई और वह गंभीर स्वर में बोला – ‘ मौन की भाषा की व्यापकता के बारे में जानना चाहती हो तो मौन को सुनने की कोशिश करो ‘ मैं ने हंसते हुए उसके संवारे बालों को अपनी उँगलियों से बिखराकर कहा – ‘क्या बात है बादल आज तुम बिलकुल अलग तरह की बातें कर रहे हो . तुम्हें शायद मालुम नहीं कि इस तरह की गंभीर बातों से मैं घबडा जाती हूँ .मेरी समझ के परे की होती हैं ये बातें .मैं ने तो कागज़ पर मौन बस तुम्हें चिढाने के लिए लिखा था कि आज मैं तुमसे बातें नहीं करूंगी .लेकिन तुम तो ..’ मुझे बीच में ही रोक कर बादल ने कहा – ‘सरोज तुमने मुझे जानने की कोशिश ही कहाँ की .मैं ने जब तुमसे अपने प्यार का इजहार किया तुमने बिना किसी झिझक के उसे एक्सेप्ट कर लिया .शायद ,मेरा ऑफिस में तुमसे बड़ा ओहदा और तगड़ी सैलरी भी एक कारण
रही हो. ’

बादल के इस अंतिम वाक्य से मेरे तन – बदन में आग सी लग गई और लगभग चीखते हुए मैं ने कहा – ‘ बादल क्या तुम मुझे एक छोटी सोच वाली लड़की समझते हो ? ‘
‘बिलकुल भी नहीं सरोज .’ बादल ने हंसकर मुझे अपनी मजबूत बांहों के घेरे में जकड लिया .उसकी पकड़ मेरे इर्द – गिर्द मजबूत होती जा रही थी और मैं उस पकड़ से खुद को आजाद कराने का असफल प्रयास लगातार करती जा रही थी .अपने प्रयास से हारने की अनुभूति होने पर मैं ने जैसे ही कुछ कहना चाहा बादल ने अपने अधर मेरे अधरों पर रख दिए और मेरी आवाज हलक में ही घुट सी गई .उस क्षण के बाद हम फिर से प्रेम की मदहोशी में खो गए और उसके बाद दो दिनों तक – जो कि वीकेंड था – हमारे बीच बातें केवल देह – भाषा में ही हुईं आज जब मैं बादल के साथ ‘लिव इन रिलेशनशिप ‘ में बिताये गए दिनों को याद करती हूँ तो फिर से मन उसके लिए ही बेचैन हो जाता है .लेकिन अब शायद बादल मेरे पास कभी नहीं आयेगा .

१९ सितम्बर – आज सुबह से मूसलाधार बारिश हो रही है .रुक – रुक कर जोरों से बादल गरज रहे हैं बिजली ऐसे चमक रही है जैसे धरती को लील जायेगी .उस दिन बादल के स्वर भी कुछ ऐसे ही कठोर थे .मुझे दो दिनों से बुखार था .बादल ने मुझे डॉक्टर से दिखा दवा देते हुए कहा – ‘ मैं ऑफिस जा रहा हूँ .तुम फ्रीज में रखा ब्रेड फीवर उतर जाने पर खा लेना .’ मैं ने हां में बस सर हिला दिया और दवा खाकर आँखें बंद कर चुपचाप लेट गई .फीवर उतरने पर भी कुछ खाने की इच्छा नहीं हुई .बादल बाहर से ही खा कर देर रात गए ऑफिस से आया .मेरे पूछने पर कि ‘ इतनी देर कैसी हुई ?’ उसने  जवाब देना भी जरुरी नहीं समझा और बिना कुछ पूछे चुपचाप बगल में बैठ थर्मामीटर से मेरा बुखार देख बोला – ‘अभी तो तुम्हे फीवर नहीं .चलो सो जाओ .सुबह बात करेंगे ‘
अगले दिन सुबह – सुबह बादल ने चाय की प्याली और एक प्यारी मुस्कराहट के साथ मुझे जगाया .चाय पीते हुए बादल ने पूछा – ‘कैसी बनी है चाय ?’ मैं ने जवाब में मुस्कराहट बिखेर दी .बादल के चेहरे पर भी मुस्कुराहट खिल गई .अभी उसने कुछ कहने के लिए मुंह खोला ही था कि दरवाजे की बेल बज उठी .बादल का एक मित्र ,जो किसी दूसरे ऑफिस में काम करता था दरवाजे पर खडा था .उसे अन्दर लाते हुए बादल ने कहा –‘ सरोज मिलो मेरे मित्र पुरु से .यह मेरे कॉलेज के समय का मित्र है .’

पुरु बड़े अपनेपन से मुझसे मिला .हममें बातें होने लगीं और बातों – बातों में पुरु ने जान लिया कि मेरी तबियत खराब है और बादल को खाना बनाना नहीं आता .फिर क्या था ,पुरु ने जल्दी से उठकर कहा – ‘मैं बहुत बढ़िया खाना बनाता हूँ .बादल तुम थोड़ी मेरी हेल्प करो .मैं आज तुम दोनों को खाना  बनाकर खिलाता हूँ ‘ – मैं और बादल दोनों ने इसकी बात का विरोध किया लेकिन उसके अपनेपन के आगे हमारी एक न चली .पुरु ने सचमुच काफी बढ़िया खाना बनाया था .मैं उसके खाने की तारीफ़ किये बिना रह न सकी .बादल ने उस दिन छुट्टी ले रखी थी .लेकिन पुरु को ऑफिस जाना था .अत: हमारे साथ खाना खा वह हमसे विदा लेकर ऑफिस चला गया .पुरु के जाते ही बादल की मुख – मुद्रा कठोर हो गई और कड़े स्वर में वह बोला – ‘ अब इतनी तारीफ़ क्यों कर रही थी पुरु की ?’

‘उसने सच में बढ़िया खाना बनाया था बादल .अब तारीफ़ तो बनती है न !’
सुनकर बादल के गुस्से में जैसे आग लग  गई .वह और भी कड़े स्वर में बोला – ‘ या तुम उसकी प्रशंसा कर मुझे नीचा दिखाना चाहती थी .क्योंकि मुझे खाना बनाना नहीं आता ‘
‘लेकिन बादल मैं ने ऐसा  तो सोचा ही नहीं ‘ – मेरा स्वर रुआँसा था
‘झूठ मत बोलो ‘ – बादल गरजा
‘तुम बहुत अधिक पजेसिव हो बादल .इतनी ज़रा सी बात तुहें बर्दाश्त नहीं हो रही ‘—कहते हुए मैं रो पड़ी .
मेरी परवाह किये बगैर बादल कपडे पहन चुपचाप घर से निकल गया .यह बादल से मेरी पहली मुलाक़ात थी – भावनाओं के स्तर पर .शारीरिक रूप से साथ रहते हुए भी हम कितने  अनजान थे एक – दूसरे से ?

२० सितम्बर – कई दिनों के बाद एक दिन पुरु फिर आया बादल के साथ .उसे देख कर मुझे काफी अच्छा लगा था लेकिन  बादल के उस दिन के व्यवहार को याद कर मैं ने पुरु से सीमित बातें की .शायद मैं बादल के साथ एक स्थायी रिश्ता चाहने लगी थी जो विवाह की संज्ञा तक पहुँच सके .ईमानदारी से आज सोचती हूँ तो लगता है इस चाह में बादल की मोटी तनख्वाह और उसका ऊंचा ओहदा भी था .लेकिन ,पुरु के जाने के बाद बादल उस दिन फिर मुझसे यह कहते हुए झगड़ पडा कि मैं उसकी और उसके मित्रों की इज्जत नहीं करती .अजीब मन:स्थिति थी उसकी .खैर ,उसके बाद एक दिन फिर उसने पुरु को खाने पर बुलाया मेरी सहमती से . बादल ने  जो कहा मैं ने वही सारी डिशेज बना दी बिना किसी नुक्ताचीनी के .बादल काफी खुश था .उसके चेहरे की खुशी से मैं ने राहत की सांस ली .पुरु ,हमेशा की तरह मुझसे काफी अपनेपन से ही मिला .पता नहीं ,पुरु कहाँ मेरे दिल में जगह बना पाया उस दिन और ,मैं ने उससे किस भाव के वशीभूत हो उसका फोन नंबर ले लिया .बादल ने इस पर कोई आपत्ति नहीं की .एक दिन मैं ने पुरु से फोन पर बातें भी की और बादल को बताया तो वह हंस पडा और बोला – ‘अब तुम मुझे रोज के क्रिया कलापों की लिस्ट मत दिया करो ‘ मुझे भी अपने इस बचकाने व्यवहार पर हंसी आ गई .पुरु से इसके बाद अक्सर बातें होने लगीं .कभी फोन कॉल से तो कभी मैसेजिंग से .व्हाट्स ऐप पर के मेरे मैसेजेज का जवाब पुरु कभी नहीं देता था इसलिए मैं उसे उसके फोन पर ही मैसेज करती जिसका जवाब वह पूरी मुस्तैदी से देता था ..

२५ सितम्बर – सब कुछ सामान्य चल रहा था कि एक दिन बादल ऑफिस से आते ही मुझ पर आग – बबूला हो गया और बोला – ‘तुम्हें पता है आज पुरु मुझसे मिलने ऑफिस आया था .’
‘हां ,मैं ने उसे तुम्हारे केबिन में जाते हुए देखा तो था .लेकिन वह मुझसे बिना मिले ही चला गया ‘
‘तुम उसे इतने प्यार भरे मैसेज क्यों करती हो ?जबकि रह तुम मेरे साथ रही हो .’—बादल गुस्से से गरजा
मैं ने आश्चर्य से उसे देखते हुए कहा – ‘ लेकिन बादल मैं ने उसे ऐसा कोई मैसेज नहीं किया ?’
‘तो क्या पुरु झूठ बोल रहा है ?’
मैं ने बादल की बातों का कोई जवाब नहीं दिया .लेकिन उसी क्षण मैं ने निर्णय ले लिया कि मैं अब पुरु को न तो फोन करूंगी और न ही कोई मैसेज .कुछ दिनों तक सबकुछ शांत रहा .एक दिन फिर बादल मेरे ऊपर गरज पडा –‘तुम इतनी गिरी हुई होगी मैं ने यह सोचा भी न था ‘
‘ क्यों क्या हुआ ? ‘ मेरा स्वर गुस्से से काँप रहा था .
‘पुरु को तुम इतने अश्लील मैसेज कर रही हो कि मुझे शर्म महसूस हो रही है ‘
‘पर .मैंने उसे न तो कोई मैसेज किया है और न ही कोई कॉल ‘— जाने क्यों मैं अपनी सफाई देने लगी
जवाब में बादल का स्वर  काफी तेज था – ‘ उसने तुम्हारे मैसेजेज दिखाए हैं मुझे .मैं ने पढ़ा भी है सारे ही तुम्हारे नंबर से थे .मुझे घिन्न आ रही है तुम पर ‘ — और उसी समय बादल अपने सारे कपडे सूटकेस में भर कहीं और चला गया .बिना मेरा कोई जवाब सुने .मैं उसके इस व्यवहार से हतप्रभ थी .मैं ने उस समय पुरु से मिलने का मन बनाया लेकिन जाने क्यों  मन अवसाद से भर गया मुझे अपने आप से और बादल से घिन्न आने लगी ‘बादल के साथ बिठाये  दिनों की याद कर मुझे उबकाई सी आने लगी .मैं ने ऑफिस से दो दिनों की छुट्टी ले ली और अपने आप को इस नई परिस्थिति से जूझने की हिम्मत बंधाने लगी .दो दिनों बाद हिम्मत कर मैं ऑफिस गई .मेरे और बादल के रिश्ते टूटने की बात ऑफिस में फ़ैल चुकी थी .मेरी कुछ महिला कलिग मुझे सांत्वना दे रही थीं तो कुछ लिव इन रिलेशनशिप की कमियाँ भी समझा रही थीं .कारण सभी जानना चाहते थे लेकिन मैं कुछ बता नहीं पाई .शायद बादल भी इस विषय पर मौन ही रहा होगा क्योंकि रिलेशन टूटने से अधिक किसी को कुछ मालुम न था .इस घटना के कई महीने बीत गए .मैं इस बीच रोज अपने आप से लड़ती रहती .कई बार तो मुझे रात में नींद भी नहीं आती थी .अत: मैं ने डॉक्टर से मिलकर नींद की दवा लेना शुरू कर दिया .अब तो मुझे बिना दवा के नींद ही नहीं आती. उन्हीं मुश्किल दिनों में से एक दिन जब मैं तबीयत ढीली होने के कारण कुछ देर से ऑफिस पहुंची तो देखा ऑफिस में भीड़ लगी हुई थी .ऑफिस एक मल्टीनेशनल कम्पनी के कस्टमर केयर का था तो कस्टमर अपनी समस्याएं लेकर आते ही रहते थे लेकिन इतनी बड़ी संख्या में एकदम से उनका जमा होना आश्चर्य की बात थी .मैं ने अपने साथ काम करने वाली मित्र सुधा से जानकारी लेनी चाही तो सुधा ने बताया – ‘हमारे ऑफिस के फोन नंबर से सभी कस्टमर्स के फोन पर यह मैसेज चला गया है कि वे कम्पनी के सारे प्रोडक्टस के पैसे वापस ले सकते हैं क्योंकि हमारे प्रोडक्ट में एक ख़ास किस्म की गड़बड़ी पाई गई है ,जिसके लिए हम शर्मिन्दा हैं .’ सुनते ही मेरा सर घूमने लगा .मैं ने अपनी आवाज को किसी  तरह ठेलते हुए कहा – ‘क्या यह सच है ?’  ‘नहीं ‘ सुधा ने कहा ‘फिर मुझसे वहाँ रहा नहीं गया और मैं उस दिन छुट्टी लेकर वापस घर आ गई .घर आकर नींद की एक टेबलेट निगल मैं सो गई .कॉलबेल की तेज आवाज से मेरी आँख खुली .दरवाजा खोला तो देखा पुरु और बादल दोनों ही खड़े थे .मैं ने बिना कुछ कहे उन्हें अन्दर आने के लिए रास्ता दिया .अन्दर आकर कुछ मिनट चुप बैठने के बाद बादल ने कहना शुरू किया – ‘आज ऑफिस के फोन से हुई याँत्रिक भूल या कहें किसी शरारती दिमाग की चूक ने मुझे सच का अहसास करा दिया है .सरोज ,मैं समझ गया हूँ कि तुम गलत नहीं थी .’
बादल की बातों का जवाब देने का मन मेरा बिलकुल भी नहीं हुआ मैं चुपचाप निर्विकार बैठी रही .शायद मेरे चेहरे का भाव कुछ अधिक ही कठोर रहा होगा क्योंकि इस वाक्य से आगे बात बे बात गरजने वाले बादल के शब्द भी खामोश हो गए .पुरु चुपचाप सर झुकाए बैठा रहा .लगभग आधे घंटे की खामोश मुलाक़ात के बाद बादल और पुरु चुपचाप उठकर चले गए .दोनों में से किसी ने अपने व्यवहार के लिए मुझसे माफी नहीं मांगी और न ही शब्दों में कोई शर्मिंदगी जाहिर कीं .मैं ने उस दिन के बाद वह कम्पनी छोड़ दी और एक दूसरी कम्पनी में नौकरी कर ली .कई महीनों  बाद सुधा मुझसे अचानक  मिली थी .तो ,बातों – बातों में उसने मुझे बताया कि बादल ने अपने माता – पिता की पसंद की किसी लड़की से शादी कर ली है और अब वह यहाँ की नौकरी छोड़ कम्पनी के मेन ब्रांच जर्मनी जा रहा है .मैं ने उसकी बातों में कोई दिलचस्पी नहीं जाहिर की लेकिन मेरे अन्दर कहीं कुछ गहरे टूट गया .शायद वह आशा थी कि बादल मेरे पास ही आयेगा .आखिर हममें इतना प्यार जो था .
आज अपनी डायरी का यह पन्ना लिखते हुए सोच रही हूँ कि अगर बादल और मैं विवाह के बंधन से बंधे होते तो शायद मेरे अन्दर की वह प्यारी स्त्री आज भी ज़िंदा रहती या फिर नहीं भी रहती .मुझे अहिल्या की कहानी याद आ रही है .छल और गलतफहमी के बीच एक रेखा खिंची हुई तो रहती है लेकिन स्त्री के लिए परिणाम एक सा ही होता है .काश !कि मैं बादल हो पाती और फिर से अपना जीवन शुरू कर पाती .



५ दिसंबर – आज कुरियर से मुझे एक मोटा सा लिफाफा मिला
.देखा डाक जर्मन से आई थी .धड़कते दिल और कांपते हाथों से मैं ने लिफाफा खोला एक डायरी के साथ पत्र भी था .मैं ने पहले पत्र पढ़ना शुरू किया — “ सरोज जी ,आप शायद मुझे जानती नहीं .मैं आपके बादल की पत्नी सुपर्णा हूँ .बादल आज भी आपके हैं .हालांकि उनहोंने मुझे कुछ नहीं बताया .लेकिन कई बार नशे में – हां बादल अब काफी शराब पीने लगे हैं — रात में सोते हुए अक्सर आप का नाम बडबडाते हैं .मैं कुछ पूछती हूँ तो बिना कोई जवाब दिए चुपचाप सूनी आँखों से छत  को देखने लगते हैं .आज अचानक उनकी अलमारी ठीक करते हुए मुझे एक फ़ाइल नजर आई .जो काफी एहतियात से कपड़ों के बीच छुपाकर रखी गई थी शायद .मैं ने उत्सुकतावश जब उसे खोला तो उसमें से यह डायरी रखी हुई मिली .आप खुद ही पढ़ लें .” पत्र पढ़कर मेरी समझ उलझ गई .कांपते हाथों से मैंने डायरी के पन्ने पलटे  .बिना कोई डेट दिए पहले पन्ने पर लिखा था – ‘ सरोज ,मैं तुम्हें सच में बहुत प्यार करता हूँ .तुम्हारे साथ ही जीवन की कल्पना की थी मैं ने लेकिन आज की परिस्थिति के लिए मैं  दोष किसे दूं यह मैं समझ नहीं पा रहा .तुमसे माफी की इच्छा मन में लेकर मैं उस दिन पुरु को लेकर तुम्हारे पास गया लेकिन शायद हमारे बीच का सम्बन्ध इस हद तक जम चुका था कि वह कुछ भी संभव नहीं हो सका जो मैं चाहता रहा . मैं ने माँ के कहने पर जिन्दगी  दुबारा शुरू तो की है .पर ,मैं शायद अब और इस शहर में नहीं रह सकूंगा .सुपर्णा एक भली लड़की है शायद एक अच्छी पत्नी भी साबित हो लेकिन मैं जीवन में उसके साथ न्याय नहीं कर पाऊँगा .न्याय तो मैं तुम्हारे साथ भी नहीं कर पाया .जिन गलतफहमियों  से मैं घिर गया था अगर तुम उन परिस्थितियों में घिरी होती तो शायद तुम भी वही करती जो मैं ने किया .’—- ‘नहीं बादल ,मैं वह नहीं करती जो तुमने किया .शायद मैं एक झटके में अपने रिश्ते को तोड़ नहीं पाती .शायद मैं अपने रिश्ते को थोड़ा समय देती सुलझाने के लिए .मैं तम्हारे साथ अपना पूरा जीवन बीताना चाहती थी ‘—- डायरी पढ़ते हुए मैं बुदबुदा उठी .आँखों में तीखी जलन महसूस हुई और आगे के शब्द धुंधले हो गए .बहुत रोकने पर भी आंसुओं की धार बहने लगी .मैं ने डायरी बंद कर दी और बिस्तर पर लेट गई .मन किया जोर – जोर से चिल्लाकर रोती जाऊं .क्यों हुआ यह सब ? हां बादल मैं ने जीवन में सिर्फ और सिर्फ तुमसे प्यार किया था .जब रोते – रोते आँखों के आँसू सूख गए तो मैं ने वह डायरी फिर से उठा ली  और आगे पढ़ने लगी – ‘ मुझे नहीं पता मैं क्यों अपने मन की बात इन पन्नों में कैद कर रहा हूँ . जानता हूँ तुम तक मेरे शब्द कभी नहीं पहुँच पायेंगे . लेकिन शायद इन्हें लिख लेने के बाद सुपर्णा के साथ न्याय कर पाऊँ .सरोज ,आज भी मैं प्यार के पलों में तुम्हें ही सुपर्णा में ढूँढता हूँ .तुम्हें वहाँ न पा मैं हताश हो जाता हूँ और सुपर्णा की अतृप्त निगाहें मेरे अन्दर एक अजीब सी शर्मिंदगी भर देती है ..सरोज .तुम्हारे बिना मैं जिन्दगी और मौत के बीच झूलता अनुभव कर रहा हूँ .’–   बस इसके आगे सुपर्णा का एक छोटा सा नोट था ;जिसमें बादल का फोन नंबर देते हुए लिखा था – ‘ अब तक आप मेरी और बादल की मुश्किलों को समझ गई होंगीं और मैं आशा करती हूँ कि आप बादल को जरुर फोन करेंगीं .शायद आपसे बात कर बादल अपनी कुंठाओं से मुक्त हो सकें और हमारा जीवन सामान्य हो सकें ‘
डायरी के सच से अधिक मुझे सुपर्णा  के पत्र और नोट ने व्यथित कर दिया .मैं समझ नहीं पा रही कि मैं क्या करू ?

१५ दिसंबर – आज मैं ने सुपर्णा का पत्र और बादल की डायरी जला दी .हां ,लम्बे मानसिक द्वन्द्व के बाद यही फैसला लिया मैं ने .सॉरी बादल ,मैं तुम्हे तुम्हारे हाल पर ही छोड़ती हूँ .समय तुम्हारे और सुपर्णा के साथ खुद ही न्याय करेगा .हां ,तुम्हारी तरह मैं दोहरी जिन्दगी नहीं जी पाऊँगी कभी .मैं ने अभी तक अपने माँ – पापा की बात नहीं मानी .नहीं स्वीकार पा रही हूँ मैं एक नए रिश्ते को .शायद वक्त लगेगा एक नए रिश्ते से बंधने में लेकिन मैं जीऊंगी और तुमसे बेहतर एक जिन्दगी जीऊंगी .ऐसा विश्वास है मुझे – खुद पर और अपनी क्षमताओं पर .

उषा प्रियंवदा की कहानियों में स्त्री-अस्मिता का प्रश्न

मंजू कुमारी


स्त्री-अस्मिता से अभिप्राय: स्त्री के स्व की ‘पहचान’ या उसके ‘अस्तित्व’ से है। जब कोई व्यक्ति अपने समाज, परिवार और परिवेश में अपने हिसाब से जीना चाहता है और जी नहीं पाता है, तब वह परिवार और समाज में अपने अस्तित्व की तलाश करता है। जबकि देखा जाय तो परिवार और समाज में मनुष्य का अधिकांश व्यक्तित्व दूसरों द्वारा निर्धारित होता रहा है। परिवार में ‘स्त्री’ हो या ‘पुरूष’ दोनों अपने अनुसार अपने व्यक्तित्व को बनाना या निखारना चाहते हैं। लेकिन “धर्मतंत्र और सामाजिक अर्थव्यवस्था ने स्त्रियों को शिक्षा और संपत्ति के अधिकार तथा सामाजिक हैसियत से वंचित कर उसे विवाह और परिवार से इस तरह बांध दिया कि वह अपनी स्वतंत्रता का विसर्जन और आत्मसमर्पण करने की कीमत पर ही सम्मान की जिंदगी बिता सकती है। धर्म ने परिवार और विवाह कर नीतितत्व, पतिव्रत और यौन-शुचिता की अनिवार्यता सुनिश्चित कर स्त्री की अस्मिता, स्वायत्तता और संबंधों की स्वाधीनता पर अंकुश लगा दिया।”1 इस प्रकार स्त्री को आज तक समाज और परिवार में बेटी, बहू, माँ के रूप में ही पहचाना जाता रहा है। लेकिन आज की स्त्री इन तमाम बंधनों से निकलकर ‘स्वतंत्र व्यक्तित्व’ के रूप में अपनी ‘पहचान’ कायम करना चाहती है। फिर यही से शुरू हो जाती है उनकी अपनी अस्मिता और अस्तित्त्व की तलाश।

रमणिका गुप्ता स्त्री–अस्मिता के प्रश्न पर विचार करती हुई कहती हैं “आखिर स्त्री अस्मिता है क्या? दरअसल यह पुरुष के समान स्त्री का समान अधिकार, स्त्री के प्रति विवेकमूलक दृष्टिकोण तथा स्त्री द्वारा पुरुष के वर्चस्व का प्रतिरोध है। औरत का केवल स्वतन्त्र होकर निर्णय ले सकना या आर्थिक रूप से स्वतंत्र हो जाना ही उसकी अस्मिता नहीं है। सही मायने में स्त्री अस्मिता का अर्थ होगा स्त्री के प्रति समाज के दृष्टिकोण और मानसिकता में बदलाव जिसमें स्त्री का खुद का दृष्टिकोण भी शामिल हो।”2 वर्तमान समय में स्त्री के सामने स्त्री-अस्मिता का प्रश्न सबसे बड़ा प्रश्न है। स्त्री-अस्मिता की लड़ाई, स्त्री स्वाभिमान की लडाई है। भारतीय समाज में स्त्री अस्मिता का प्रश्न आधुनिक चेतना का प्रतीक है। आधुनिक स्त्री को जब अपनी भारतीय परंपरा में अपना चेहरा दिखाई नहीं देता है तब वह अपनी परंपरा की तलाश करती हुई इतिहास में लौटती है और अपने को स्थापित कराना चाहती है। समाज में पुरुषवर्ग को यह समझना ही होगा कि “स्त्री समानता की लड़ाई बुनियादी लड़ाई है। इससे उसे स्वतंत्रता, आत्मनिर्भरता एवं अस्मिता की पहचान मिलेगी। इस संघर्ष के प्रति तदर्थभाव, दयाभाव या सहानुभूतिभाव, स्त्री के संघर्ष एवं अवदान को कम करेगा। स्त्री की समानता के संघर्ष के प्रति दया या सहानुभूति की जरूरत नहीं है बल्कि यह महसूस करने की जरूरत है कि यह तो उसका अधिकार था जो उसे दिया जाना चाहिए।”3

सदियों से समाज में चली आ रही परम्पराओं और रूढ़िवादी मानसिकता के कारण स्त्री चाहे जिस भी वर्ग, जाति, समूह की रही हो वह जन्म से ही अपने आपको असहाय और अबला समझकर सदैव पुरुषवादी मानसिकता का शिकार होती रही है। आज समाज में तमाम तरह के बंधनों से जकड़ी महिलाएं स्वयं की मुक्ति और अपनी अस्मिता के लिए, देश के हर कोने से आवाज उठा रही हैं। स्वामी विवेकानंद ने भी कहा है कि ‘जब तक महिलाएं स्वयं अपने विकास के लिए आगे नहीं आएंगी तब तक उनका विकास असंभव है।’ किसी ने ठीक ही कहा है कि किसी देश के सांस्कृतिक स्तर का पता लगाना है तो पहले यह देखो कि वहां की स्त्रियों की अवस्था कैसी है। मनु ने भी कहा है– ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:।’4 अर्थात जहाँ स्त्रियों को सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है। वहाँ पर पुरुषों की गिनती स्वत: देवताओं की कोटि में की जाती है। इस परिवर्तनशील समाज में वैदिक काल के बाद, स्त्रियों की स्थिति काफी उतार-चढ़ाव भरी रही है। आज भी स्त्रियाँ अपने अधिकार के लिए सामाजिक रूढियों, परम्पराओं और अपने अस्मिता के प्रश्न को लेकर जूझती नजर आ रहीं हैं। “स्त्री की स्थिति भी युगों से ऐसी ही चली आ रही है। उसके चारों ओर संस्कारों का ऐसा क्रूर पहरा रहा है कि उसके अंतरतम जीवन की भावनाओं का परिचय पाना ही कठिन हो जाता है। वह किस सीमा तक मानवी है और उस स्थिति में उसके क्या अधिकार रह सकते हैं, यह भी वह तब सोचती है जब उसका हृदय बहुत अधिक आहत हो चुकता है।”5 ऐसा नहीं है कि हमारे भारतीय समाज में स्त्री स्वतंत्रता, उसकी आजादी के लिए प्रयास नहीं किया गया। वैदिक काल के बाद “अठारहवीं शताब्दी में स्त्रियों की हालत जितनी ख़राब थी उसमें 19वीं सदी में कुछ सुधार आया। धार्मिक आडम्बर, रूढिगत विचार, परंपरागत सामाजिक संस्कार सभी ने मिलकर अन्धकार का ऐसा परिवेश भारतीय जीवन के चारों तरफ निर्मित कर दिया था कि उसे तोड़ सकना सहज संभव नहीं था।”6 ऐसी स्थिति में स्त्री शोषण के विरुद्ध उसके अधिकारों के लिए समाज में तमाम तरह के सामाजिक व राजनैतिक आंदोलनों की शुरुआत हुई। जिसमें स्त्री प्रश्न एक-बहुत बड़ा मुद्दा रहा है। जिसके माध्यम से स्त्री से जुड़े हर तरह के शोषण के विरुद्ध राजा राममोहन राय, ईश्वरचन्द्र विद्यासागर, दयानन्द सरस्वती, स्वामी विवेकानंद, महात्मा ज्योति बा फूले व सावित्री बाई फूले आदि विभिन्न महान लोगों ने आवाज उठाई और महिलाओं को तमाम तरह की सामाजिक रूढियों, बन्धनों से मुक्त करा कर उन्हें उनका हक़ दिलाया। लेकिन आज भी उनकी समस्याएं हल नहीं हो सकी हैं | आखिर क्यों? क्योंकि- “पुरूषों द्वारा नियंत्रित–संचालित यह आन्दोलन आज के स्त्री–आन्दोलन से मौलिक भिन्नता रखता है। सबसे बुनियादी फर्क यह है कि पुरूष सुधारक समाज के पितृसत्तात्मक ढ़ाचे पर हमला नहीं करते थे बल्कि इसे सुरक्षित रखते हुए ही इसके अन्दर कुछ सुधार लाना चाहते थे। पितृसत्तात्मक ढांचे का मतलब सिर्फ परिवार में पुरुष का मुखिया होना नहीं है बल्कि समाज के सभी पक्षों में आर्थिक, सामाजिक, वैधानिक और धार्मिक व्यवस्था तथा मूल्यों-मर्यादाओं, आदर्शों और चिंतन के रूपों तथा विचारधाराओं आदि में पुरुषों को खासकर प्रधानता देना है। पुरुष सुधारक इस ढांचे पर सवाल खड़ा किए बिना ही स्त्रियों की दशा में कुछ सुधार लाना चाहते थे।”7 इसी वजह से अब तक स्त्रियों के अधिकारों और उनकी स्वतंत्रता के लिए समाज और साहित्य जगत में पुरुषों द्वारा उनकी निजी मानसिकता और स्वार्थ के आधार पर स्त्री-शिक्षा और उनके अधिकारों के लिए आवाज उठाई गई, लेकिन उनकी छवि को अपने अनुसार गढ़ा जाता रहा है। “स्वतंत्रता के पश्चात पुरुषों के समक्ष बराबरी से आने का हौसला नारी में हुआ। नारी मुक्ति की चेतना नवीन संकल्पनाओं के साथ विकसित हुई– पुरातनता के साये में नवीनता को अपनाना ही नवीन चेतना के रूप में नारी मुक्ति चेतना बनी।”8

हिंदी कथा साहित्य में नई कहानी के दौर की लेखिकाओं ने स्त्री शोषण के विरुद्ध आवाज उठायी। वे अपने ‘स्व’ की पहचान के लिए रूढ़िवादी मान्यताओं का खंडन कर, यथार्थ की उस गहराई तक पहुँच गई हैं, जहाँ पर वह अपनी अस्मिता की खोज में रत हैं और अपने अस्तित्व को उभारने-संवारने के लिए अस्मिता के प्रश्न को लेकर सामने आ रही हैं। “स्त्री-अस्मिता को माँ, बहन, बेटी, बीवी, रखैल, वेश्या, की कोटियों से बाहर लाकर एक स्त्री के रूप में देखे जाने की मानसिकता का प्रादुर्भाव स्त्री साहित्य से ही हुआ है।”9 आधुनिक स्त्री यह मांग कर रही है कि उसे स्त्री के रूप में, एक स्वतंत्र व्यक्तित्व के रूप में पहचाना जाय। अस्मितामूलक इस दौर में (वह चाहे दलित-अस्मिता, आदिवासी-अस्मिता या स्त्री-अस्मिता का प्रश्न हो) नये कहानीकार समिष्टगत चिंतन को आधार बनाकर व्यक्तिगत चिंतन को केंद्र में रखकर अपने रचना संसार का सृजन करते हुए ‘अस्मिता’ के सवाल को उठा रहे हैं। हिंदी साहित्य में स्त्री-अस्मिता का प्रश्न मुख्य विषय रहा है। जिस पर साहित्य की लगभग सभी विधाओं में लेखनी चलाई जा चुकी है और चलाई भी जा रही है। “स्त्री-साहित्य ने स्त्री की अस्मिता और अनुभवों को केन्द्रीय  महत्त्व दिया। साहित्य की मुख्यधारा ने स्त्री की अस्मिता, आकांक्षाओं, इच्छाओं, जरूरतों, अनुभवों एवं मन:स्थिति की कुल मिलाकर उपेक्षा की।”10 नई कहानी के दौर की लेखिकाओं की कहानियों में स्त्री-अस्मिता के प्रश्न को मुख्य विषय बनाया गया है, जिनमें से उषा प्रियंवदा भी एक हैं। इनकी कहानियों में हम स्त्री जीवन में आने वाली परंपरा और आधुनिकता के बीच की टकराहट को देख सकते हैं। इनकी कहानियों में स्त्रियाँ आर्थिक दृष्टि से संपन्न, स्वतन्त्र, भावात्मक रूप से परिपक्व और बौद्धिक रूप से सजग, संघर्षशील स्त्री की झांकी प्रस्तुत करती हैं। “नारी, नारी दृष्टि से रचनात्मकता का सृजन करना चाहती है। सृजनात्मकता की रूपरेखा बनाने में वह समाज में निश्चित भागीदारी चाहती है। देह से परे, बुद्धि और मन की निर्भरता से, निजता व सम्मान का हक मांगती है। स्त्री को शोषण से, दमन से, पुरुषवादी सोच से मुक्ति चाहिए, मुक्ति ऐसी, जो गरिमामय उड़ान के लिए नया आकाश प्रदान करे।”11 समाज में स्त्री और पुरुष दोनों का अपना वजूद और अपना अस्तित्व है। लेकिन दोनों एक–दूसरे के पूरक हैं इस बात से भी इन्कार नहीं किया जा सकता है। इसलिए एक–दूसरे को नकार कर न स्त्री का विकास हो सकता है और न ही पुरुषवर्ग का, और न ही राष्ट्र का। स्त्री-अस्मिता के प्रश्न को लेकर निर्मला जैन ने कहा भी है कि “बिना पुरूष के सहयोग से स्त्री की पहचान नहीं बदल सकती। स्त्री को मुकम्मल होने के लिए पुरुष की मदद लेनी ही पड़ेगी। सच्चे अर्थों में नारी अस्मिता तभी आकार लेगी जब पुरुष स्त्री के पक्ष में खड़ा होने की बात करें।…जब तक नारी में अपने फैसले करने का हक़ लेने का विचार नहीं आएगा तब तक वह अपने को स्वतंत्र मानने की अधिकारिणी कहाँ है। अब समय नहीं रहा जब स्त्री बच्चे पैदा करने के अलावा संगीत और सूई के सहारे घर की लक्ष्मी बनकर कैद रहे। उसे अपने पैरों पर खड़ा होना होगा और अच्छा होगा कि पुरूष मानसिकता का समाज उसको सहयोग प्रदान करे।”12

आज की स्त्रियाँ अपने सफर में संघर्ष करने से पीछे नहीं हट रहीं हैं। खुद की ‘पहचान’ और अपने ‘अस्तित्व’ को स्थापित करने की लड़ाई स्त्री व्यक्तित्व को ऐसी ऊर्जा प्रदान कर रहा है कि “वह नित्य नयी ऊँचाईयों को छूती, विकास यात्रा में पूरे मनोयोग से जुड़ी हैं। उसका यह बदला व्यक्तित्व जरूर अचम्भित कर रहा है, किन्तु यह सादियों से निरंतर होने वाली स्वाभाविक परिणति है।”13 स्त्रियाँ समाज में अपनी ‘पहचान’ को स्थापित करने के लिए निरंतर संघर्षशील हुई हैं। आधुनिक भारतीय समाज में नये जीवन-मूल्यों की तलाश करने वाली स्त्री परिवार के विरुद्ध नहीं है बल्कि वह समाज में शोषण और अन्याय के विरुद्ध है। जिसकी वजह से इन्हें हमेशा झुकाया जाता रहा है। महादेवी वर्मा के शब्दों में कहे तो आज की स्त्रियाँ कहती हैं कि “हमें न किसी पर जय चाहिए, न किसी से पराजय; न किसी पर प्रभुता चाहिए, न किसी का प्रभुत्व। केवल अपना वह स्थान, वह स्वत्व चाहिए जिनका पुरूषों के निकट कोई उपयोग नहीं है परन्तु जिनके बिना हम समाज का उपयोगी अंग बन नहीं सकेंगी।”14

‘स्त्री-अस्मिता’ या उसके अधिकार का प्रश्न केवल नारी का प्रश्न नहीं है बल्कि सम्पूर्ण मानवता का प्रश्न है, जिस पर सभी को विचार करने की जरूरत है। समाज में जब स्त्री अपने अधिकार या स्वतंत्रता की मांग करती है तो उसका मतलब यह नहीं होता है कि वह परिवार या समाज के अलग रहना चाहती है। “पुरूष से अलग रहकर संसार बसाने की बात नारी नहीं करती, समाज को भी स्त्री को अपनी मुट्ठी में कैद करने की ललक से आजाद होना चाहिए।”15 जब तक समाज स्त्री के प्रति सहज नहीं होगा, उसके अस्तित्व को नहीं समझेगा तब तक स्त्री मुक्ति या कहे स्त्री-अस्मिता का प्रश्न अधूरा ही रहेगा। क्योंकि समाज में मानवता का प्रश्न सम्पूर्ण मानव जाति का प्रतिनिधित्व करता है न कि केवल स्त्री या केवल पुरूष का।

उषा प्रियंवदा की शुरुआती दौर की कुछ कहानियां भारतीय परिवेश की हैं और कुछ कहानियों में परिवेश विदेशी है लेकिन पात्र भारतीय विदेशी दोनों हैं। जिस कारण भारतीय संस्कृति और विदेशी संस्कृति की टकराहट के साथ-साथ स्त्री-मुक्ति और उसकी अस्मिता का प्रश्न अलग-अलग रूपों में उजागर हुआ है। इनकी कहानियों में बदलती स्त्री की छवि, उनकी जागरूकता और स्वच्छंदता को देखकर यह अनुमान स्वत: लगाया जा सकता है कि बदलते समय और समाज की तत्कालीन स्थिति को उजागर किया गया है। उस समय की अपेक्षा आज के समय और समाज में इनकी कहानियों की स्त्री पात्र और ज्यादा मुखर हुई हैं। उषा प्रियंवदा ने अपनी कहानियों में जिस प्रकार स्त्री के आतंरिक द्वंद्व की एक-एक परत को बहुत ही सहजता से खोलने में सफल हुई हैं वह अन्यत्र दुर्लभ है। इन्होंने अपनी कहानियों में ‘स्थितियों’ को उजागर कर जीवन में आने वाली समस्याओं की तरफ इशारा मात्र करके छोड़ दिया है। अब पाठक अपने अनुकूल समस्याओं को समझकर उसके समाधान के बारे में स्वयं निर्णय ले सकता है कि उसे अपने जीवन में क्या और कैसे करना है? जहाँ तक उषा प्रियंवदा की कहानियों में स्त्री–अस्मिता का प्रश्न है, इसे हम दो रूपों में देख सकते हैं। पहला यह कि इनकी भारतीय परिवेश की कहानियों में स्त्री–पात्र अपने विवेकपूर्ण निर्णय से किन-किन रूपों में रूढ़िवादी परम्पराओं से मुक्ति का प्रश्न उठाती हैं। दूसरा यह कि भारतीय समाज और संस्कृति पर पश्चिम में हुए स्त्री-मुक्ति आन्दोलन का प्रभाव तथा स्त्री–अस्मिता के प्रश्न को किन-किन रूप में इनकी विदेशी परिवेश की कहानियों में उजागर किया गया है।

(1)सामाजिक परंपरा और रूढ़ियों से मुक्ति का प्रश्न :
 (भारतीय परिवेश की कहानियों के विशेष सन्दर्भ में)
“पुरुष सांस्कृतिक सत्ता ने स्त्री को वह सामाजिक सुविधा नहीं दी, जोकि पुरुष को परम्परा से मिलती रही। स्त्री ने एक जीव के रूप में जन्म तो लिया, मगर इसके बाद पुरूष की सभ्यता और सत्ता पर अपनी मान्यताएं ही नहीं, सब कुछ समर्पित करती रही।”16  लेकिन आधुनिकता ने स्त्री की सोयी हुई चेतना में जान भरने का काम किया है। आधुनिक स्त्रियाँ बरसों से रूढ़िवादी परंपरा की बेड़ियों में बंधी रहना नहीं चाहती हैं। वह पितृसत्ता का विरोध करती हुई नजर आ रही हैं। उनके पास अपनी स्वतन्त्र राय है। भारतीय स्त्री की मुक्ति का प्रश्न अन्य पश्चिमी देशों की स्त्रियों की मुक्ति से अलग है। भारतीय समाज और संस्कृति अन्य देशों की सभ्यता और संस्कृति से भिन्न है। भारतीय स्त्रियों के लिए स्त्री-मुक्ति का अर्थ अपनी परम्परा से पूर्ण मुक्ति का कभी नहीं रहा। भारतीय स्त्रियाँ समाज में व्याप्त रूढ़िवादी परम्पराओं से मुक्ति चाहती है। ऐसा नहीं है कि वह परिवार तोड़ने या पुरुषवर्ग का विरोध करती है वरन वह परिवार भी चाहती है और पुरुष का सहारा भी लेकिन साथ ही साथ वह स्वतन्त्र ‘पहचान’ और अपना स्वतन्त्र ‘अस्तित्व’ भी कायम करना चाहती है। समकालीन अस्मितामूलक विमर्श के दौर में आज स्त्री-साहित्य में स्त्री-अस्मिता का प्रश्न मुख्य विषय बना हुआ है। स्त्री–लेखन के द्वारा स्त्री से जुड़े सभी प्रश्नों को उठाया जा रहा है। वह चाहे हमारे समाज और संस्कृति में व्याप्त रूढ़िवादी मानसिकता हो या आधुनिकता की चकमक में स्त्री का बदलता स्वरूप।

उषा प्रियंवदा की शुरुआती दौर की कुछ कहानियों में स्त्री पात्र पढ़ी-लिखी और नौकरी-पेशा वाली होने के बावजूद अपनी रूढ़िवादी मान्यताओं के प्रति आवाज नहीं उठा पाती हैं। “हम वर्तमान समय में यह तो कह सकते हैं कि महिलाओं के साक्षरता प्रतिशत में वृद्धि हो रही है परन्तु इस पर विचार करना भी आवश्यक है कि क्या वर्तमान शिक्षा महिलाओं को सदियों की रूढ़िवादी मान्यताओं से मुक्त कराकर उसे महिला से पहले इंसान होने का दर्जा दिला पा रही है या फिर उन बेड़ियों को ज्यादा से ज्यादा मजबूत करने का ही काम कर रही हैं, उनकी पारम्परिक भूमिका में ही उनका अस्तित्व तलाश रही हैं।”17 उषा प्रियंवदा ने जहाँ अपनी कहानियों में एक तरफ भारतीय पारम्परिक तथा रूढ़िवादी मान्यताओं के प्रति सहज स्त्री पात्र खड़ा किया हैं, उन स्त्री-पात्रों के माध्यम से यह भी बताने की कोशिश करती हैं, किस प्रकार अपनी परंपरा में दबी स्त्री की दशा इतनी असहाय होती है कि वह न चाहते हुए भी ‘परंपरा’ के अनुसार जीवनयापन करने के लिए मजबूर हो जाती है। कहानी की दूसरी स्त्री पात्र को देखे तो वह पारम्परिक मूल्यों का विरोध कर आधुनिक मूल्यों को वरीयता देती हुई नजर आती हैं। इस प्रकार हम देख सकते हैं कि एक ही समय और समाज में किस तरह स्त्री की अलग-अलग छवि को उजागर किया गया है। प्रश्न–उत्तर कहानी की स्त्री पात्र बन्नो बुआ अपनी परंपरा को सहज भाव से बिना किसी विरोध के स्वीकार कर लेती हैं। वहीँ दूसरी तरफ लता जैसी आधुनिक युवा पीढ़ी अपनी परम्पराओं में बंधकर रहना स्वीकार नहीं करती है बल्कि वह विरोध करती हुई नजर आती है। अकेली राह– इस कहानी में गौरी और रहमान के प्रेम सम्बन्ध के बारे में पता चलने पर गौरी का भाई उससे पूछता है कि “तुमने ऐसा क्यों किया, गौरी।” बहुत ही सहज भाव से गौरी जवाब देती है कि “जो हो गया, वह तो बदला नहीं जा सकता, इसलिए मैं जा रही हूँ, भाई साहब।” उसका दृढ़ स्वर सुनकर श्याम स्तब्ध रह गया। आगे वह कहता है- “तुम्हें जल्दी में कोई काम नहीं करना चाहिए, गौरी। माँ आखिर माँ हैं। गुस्से में आकर कह दिया, तो क्या हुआ ?” लेकिन आधुनिक पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करने वाली गौरी को यह सहन नहीं है कि उसका कोई अपमान करे, वह चाहे समाज या अपने लोग ही क्यों न हो। वह आगे कहती है “जो माँ बेटी की खुलेआम इज्जत उतार ले, उस माँ के लिए, मेरे दिल में कोई जगह नहीं बची।”18 आज की युवा पीढ़ी को हमारी पुरानी पीढ़ी के लोग स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं उन्हें नयी पीढ़ी के द्वारा लिए गए निर्णय जल्दबाज़ी में लिया गया फैसला लगता है। वह अपनी रूढ़ियों से निकलना नहीं चाहते या यूं कह सकते हैं कि चाहकर भी वो निकल नहीं पा रहे हैं। क्योंकि इन्सान से ज्यादा उन्हें समाज और अपनी झूठी इज्जत प्यारी है। चाहे इसके लिए उन्हें अपनी जान ही क्यों न गवानी पड जाय। लेकिन आधुनिक पीढ़ी किसी को भी कटाक्ष या कुछ कहने या सुनने का मौका देना नहीं चाहती है। माँ के द्वारा हुए अपमान का गौरी विरोध करती है और अपने हिसाब से जीवनयापन करने का निर्णय लेती है। गौरी सारी समस्याओं को झेलती हुई अपने ‘स्व’ की पहचान के लिए एक संघर्षशील स्त्री के रूप में सामने आती है। वह परिस्थितियों से भयभीत नहीं होती है। एक प्रसंग आता है कि “गौरी ने न तो आत्महत्या की, न ही उसे क्षय ही हुआ। पहले की तरह काम में व्यस्त रहती।”19

मान और हठ- कहानी की नायिका अमृता एक स्वाभिमानी स्त्री के रूप में सामने आती है। वह अपने स्वाभिमान के आगे झुकती नहीं है और न ही समझौता करना पसंद करती है। अमृता का अपनी चाहत के हिसाब से पति न मिल पाने के कारण दु:खी होना तो स्वाभाविक था लेकिन पति द्वारा उसका अपमान किये जाने पर वह चुप नहीं रहती है। जब पति मुकुल कहता है कि “मैं तुम्हारी जैसी हजारों को ख़रीद सकता हूँ। तुम्हें अगर अपने रूप का घमण्ड है, तो मैं भी तुम्हें दिखा दूँगा। सिसककर, डूबे स्वर में अमृता ने कहा, “आपको अपनी दौलत का घमण्ड है, तो मैं भी आपको दिखा दूँगी।”20 समाज में आज भी बहुत सी स्त्रियां हैं, वह मुकुल जैसे अमीर और घमण्डी व्यक्तियों के जाल में फंसकर अपना जीवन बर्बाद कर रही हैं लेकिन आवाज नहीं उठा पाती हैं। उषा प्रियंवदा अमृता के माध्यम से समाज में व्याप्त ऐसी रूढ़िवादी मानसिकता को नकारती हैं। स्त्री-अस्मिता के प्रश्न और उसके वजूद की तरफ इशारा करती हैं कि स्त्री का खुद का भी अस्तित्व है। पति मुकुल “सोचता था कि पतिव्रता स्त्री की भांति वह आकर पैरों पड़ेगी, क्षमा माँगेगी, मगर वह नहीं आई।”21 अमृता आधुनिक स्त्री का प्रतिनिधित्व करती है। एक स्वाभिमानी स्त्री होने के नाते बिना वजह वह किसी के सामने झुकना पसंद नहीं करती हैं। एक संघर्षशील स्त्री के रूप में पढ़ाई पूरी कर नौकरी करने का निश्चय करती है। इस प्रकार वह समाज में व्याप्त पुरुष वर्चस्व और रूढ़िवादी व्यवस्था को चुनौती देती है। माँ के कहने पर कि हमने तुम्हारा भला ही चाहा है वैसे भी “इज्जत तो रूपये की होती है।” जवाब में अमृता कहती है कि “तो इसका मतलब है कि चाहे जिससे भी शादी कर दो ? मेरे भी हाथ-पैर हैं, कमा खा लूंगी। उनका रूपया मुझे नहीं चाहिए।”22 पति मुकुल का यह कहना सही है कि “उसे अपने रूप का मान है। अगर उसे इतना ही मान था तो मुझे शादी से पहले ही क्यों नहीं देख लिया। लेकिन मुकुल का यह कहना कि उसे भी अमीरी का घमण्ड है। अगर “झुकेगी, तो अमृता–वह नारी है, पत्नी है। मैं पति हूँ।”23  मुकुल का यह अक्कड़पन पितृसत्तात्मक व्यवस्था का प्रतीक है। यह व्यवस्था स्त्री को वस्तु से ज्यादा कुछ नहीं मानती है। अमृता इसी पितृसत्तात्मक व्यवस्था को चुनौती देती है।

तूफ़ान के बाद- (1957) इस कहानी में मन्नो का भाई मन्नो के प्रेम विवाह करने का विरोध करता है, इस प्रकार बहन की शादी किसी और से कर देता है। वही भाई अपनी बेटी के कहने पर प्रेम-विवाह लिए वर के विजातीय होने पर भी हाँ कर देता है। ऐसा करने के बाद उसे बहुत शांति मिलती है। दूसरी तरफ मन्नो को हमेशा दु:खी और उदास देखकर वह पश्चाताप भी करता है। वह कहता है कि जो काम उसने अभी किया उसे बहुत पहले कर देना चाहिए था। कहानी की नायिका मन्नो भाई की आत्मग्लानि को देखकर बहुत दु:खी होती है। भाई के कहने पर अपनी बरसों की पीड़ा को भूलकर नये सिरे से जीवनयापन करने का निश्चय करती है। यहाँ पर मन्नों बदले की भावना से पेश नहीं आती है। वह समाज और परिवार के साथ-साथ लोगों की मानसिकता को बदलने और सही–गलत का बोध कराना चाहती है। जिससे आने वाली युवा पीढ़ी को ऐसी रूढ़िवादी मानसिकता से छुटकारा मिल सके और वह अपने विकास पथ पर अग्रसर हो सके। इसलिए बरसों से अपने दुःख में डूबी होने के बावजूद मन्नो भाई की आत्मग्लानि को देखकर पुनः नये सिरे से जीवनयापन करने का निर्णय करती है।

जिंदगी और गुलाब के फूल – कोई भी व्यक्ति वह चाहे स्त्री हो या पुरुष अपने जीवन में आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होने पर ही स्वतन्त्र निर्णय ले पाने में सक्षम हो पाता है। इस कहानी में भी वृंदा अपने भाई से अभी तक सीधे बात नहीं कर पाती थी, वह कहती है-“दादा, आप क्या करेंगे मेज का? मुझे काम पड़ेगा।”24  जब तक वृंदा आर्थिक दृष्टि से आत्मनिर्भर नहीं हुई थी, तब तक अपने ही घर–परिवार और समाज में उसकी कोई अहमियत नहीं थी। आधुनिक स्त्री का प्रतिनिधित्व करने वाली वृंदा अपनी पहचान के लिए प्रयत्नशील है। एक तरफ जहाँ घर-परिवार और समाज में पुरुष वर्चस्व क्रमश: कमजोर पड़ता जा रहा है वहीँ दूसरी तरफ स्त्रियां अपनी भूमिका घर-परिवार और समाज में दर्ज करा रही हैं। आधुनिक स्त्रियों ने पुरुष वर्चस्व को चुनौती देना शुरू कर दिया है। पुरुष वर्चस्व के कमजोर पड़ने की  छटपटाहट को हम सुबोध की बेचैनी के रूप में देख सकते हैं।

मोहबंध- कहानी की स्त्री पात्र नीलू किसी भी प्रकार के बंधन में बंधकर रहना पसंद नही करती है। पति राजन के बार-बार टोकने पर वह कहती है कि “तुम समझने की कोशिश क्यों नहीं करते राजन ! मैं एक दायरे में बंधकर नहीं रह सकती।,”25 नीलू एक सुन्दर और आधुनिक स्त्री है, तो अचला का भी चरित्र स्वाभिमानी है। नीलू केवल अपने पति और परिवार में बंधकर रहना पसंद नहीं करती। इसलिए वह सामाजिक गतिविधियों में भाग लेने तथा दोस्तों की पार्टी आदि में व्यस्त रहती है। वह अपनी ‘पहचान’ और अपने स्वतंत्र अस्तित्त्व के साथ जीवनयापन करने में विश्वास रखती है। अचला भी देवेन्द्र के प्यार में धोखा खाने पर थोड़ा विचलित जरूर होती है लेकिन बाद में उसे एहसास होता है “इस मोहबंध को तोड़कर उसे जाना ही है क्योंकि वे भीगी आँखे उसकी अपनी हैं।”26

इस प्रकार हम देखते हैं की उषा प्रियंवदा की कहानियों में स्त्री पात्र स्वयं के व्यक्तित्व को ज्यादा महत्व देती हैं। इसलिए वह अपनी सामाजिक परंपरा और रूढ़िवादी विचारधारा से मुक्ति के लिए हमेशा संघर्षशील रहती हैं। महादेवी वर्मा ने भी कहा है- “केवल स्त्री के दृष्टिकोण से ही नहीं वरन हमारे सामूहिक विकास के लिए भी यह आवश्यक होता जा रहा है कि स्त्री घर की सीमा के बाहर भी अपना विशेष कार्यक्षेत्र चुनने को स्वतंत्र हो। गृह की स्थिति भी तभी तक निश्चित है जब तक हम गृहिणी की स्थिति को ठीक-ठीक समझ कर उससे सहानुभूति रख सकते हैं और समाज का वातावरण भी तभी तक सामंजस्यपूर्ण है, जब तब स्त्री तथा पुरुष के कर्त्तव्यों में सामंजस्य है।”27 आज की स्त्री समाज में बहुत पहले अपने हक़ और अस्मिता की तलाश के लिए जागरूक हो चुकी थी। 60-70 के दशक से उषा प्रियंवदा तथा उनकी जैसी अन्य रचनाकारों ने अपनी कहानियों में जो भूमि तैयार किया, वर्तमान ‘स्त्री की छवि’ उसी की देन कही जा सकती है। उनके योगदान ने स्त्रियों को उनके अस्तित्व और अस्मिता की पहचान ही नहीं कराया है बल्कि उनके सामने जीवन को नये सिरे से जीने के लिए बहुत से विकल्पों को भी उजागर किया है।

(2)पश्चिमी स्त्री-मुक्ति आन्दोलन का प्रभाव और स्त्री-अस्मिता :
(विदेशी परिवेश की कहानियों के विशेष सन्दर्भ में)
1960-70 के दशक में पश्चिम में चल रहे स्त्री-मुक्ति आन्दोलन का प्रभाव कही न कही उषा प्रियंवदा की कहानियों पर साफ़ दिखाई पड़ता है। भारतीय परिदृश्य में स्त्री-मुक्ति की अपेक्षा पश्चिमी परिदृश्य में स्त्री-मुक्ति का प्रश्न काफी अलग है। पश्चिम में देखा जाय तो ‘स्त्री मुक्ति’ के नए दौर की शुरूआत फ्रांस की ‘सिमोन दा बोउवार’ की पुस्तक ‘द सेकेण्ड सैक्स’ से होती है। ‘सिमोन द बोउवार’ की पुस्तक आने के बाद पश्चिम में पहली बार स्त्रियों ने अपने अस्तित्व और अस्मिता के बारे में गंभीरता से सोचना शुरू किया। “1968 में जब फ्रांस में नारी आन्दोलन विकसित हुआ तो सिमोन भी उसमें शामिल हो गयीं। गर्भपात को क़ानूनी स्वीकृति दिलाने के अभियान का उन्होंने नेतृत्व किया। अलग से महिला संगठन बनाने की बात भी कहीं। नारी की आर्थिक स्वतन्त्रता की अहमियत को भी उन्होंने स्वीकारा।”28  इन्होंने स्त्री के सम्बन्ध में लिखा भी कि “स्त्री पैदा नहीं होती, बल्कि उसे बना दिया जाता है।”29

इस आन्दोलन का प्रभाव यह हुआ कि पश्चिम की स्त्रियां अपने हर तरह के बन्धनों से मुक्ति की कामना करती हुई, काफी आगे बढ़ती जा रही थी। सन 1970 के दशक में अमेरिकी और अन्य तमाम देशों की स्त्रियां यह मांग करते हुए सड़कों पर उतर आयी थी कि ‘हमें आजाद करो’ अब उन्हें किसी प्रकार का बन्धन स्वीकार नहीं था। इस प्रकार धीरे-धीरे इस आन्दोलन ने अतिवादी रूप ले लिया। यहाँ तक कि स्त्रियाँ अपने अंग वस्त्रों की होली जलाती हुई नजर आने लगी। पश्चिमी स्त्री-मुक्ति आन्दोलन की मांग ‘स्त्री की देह’ मुक्ति से सम्बन्धित था। स्त्रियों ने विवाह-सम्बन्धों को नकार दिया। जिस कारण परिवार टूटने लगे, बिना विवाह किये स्त्रियाँ ‘लिविंग’ में रहना स्वीकार करने लगी। इस प्रकार हम देखते हैं कि जहाँ एक तरफ ‘परिवार तोड़ो’ का नारा गूँज रहा था वहीँ दूसरी तरफ नारीवादी अतिशयता की वजह से कुछ ही समय बाद ‘परिवार की ओर लौटो’ का भी नारा गूंजने लगा। स्त्री-मुक्ति की अतिशयता को देखकर स्त्री-मुक्ति को हवा देने वाली ‘बेट्टी फ्रीडन’ ने अपने आपको इस आन्दोलन से अलग करते हुए ‘द सेकेण्ड स्टेज’ नामक पुस्तक लिखकर ‘परिवार’ को महत्त्व देना शुरू किया। लेकिन पश्चिम में कुछ दिनों तक चले इस आन्दोलन स्त्रियों को अपनी दासता के प्रति चेतनशील बना दिया। इस स्त्री मुक्ति-आन्दोलन का प्रभाव भारतीय स्त्रियों पर भी पड़ा, इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता है। जैसाकि उषा प्रियंवदा की अधिकांश कहानियों पर इस आन्दोलन का प्रभाव स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। उषा प्रियंवदा अपनी कहानियों में स्त्री-मुक्ति की अतिशयता की वजह से उनके जीवन में आने वाली उस भयावह स्थिति की तरफ इशारा करती हैं जिसकी वजह से स्त्री मात्र वस्तु बनकर रह जाती है। इनकी कहानियों में पश्चिमी स्त्री-मुक्ति आन्दोलन का प्रभाव या कहे स्त्री जीवन में आये उत्तर-आधुनिकता का बहुत ही उन्मुक्त रूप इनके विदेशगमन के बाद आता है। उषा प्रियंवदा की कहानियों में हम पश्चिम में हुए स्त्री-मुक्ति आन्दोलन की सहज परिणति को देख सकते हैं।

सम्बन्ध – यह कहानी 1971 के दौर की है। इस कहानी की स्त्री पात्र श्यामल बन्धन मुक्ति जीवनयापन में विश्वास करती है। वह शादी एवं परिवार का सहज रूप से विरोध करती है। कहानी में एक संवाद आता है “सर्जन ने कहा था– श्यामला, मैं तुम्हें प्यार करता हूँ। मैं घर-बार, बाल-बच्चे सब तुम्हारे लिए छोड़ सकता हूँ…। श्यामला ने हथेली से उसका मुँह बंद कर दिया। बहुत देर बाद कहा– क्या हम ऐसे नहीं रह सकते प्रेमी, मित्र, बन्धु ! क्या वह सब छोड़ना जरूरी है ? मैं तो कुछ नहीं मांगती।”30  आधुनिक स्त्री केवल परिवार तक ही बंधकर रहना पसंद नहीं करती है। दूसरी तरफ सुनीता आधुनिक होते हुए भी परम्परावादी होती है। वह ‘अबार्शन’ न हो पाने के कारण, इसलिए आत्महत्या कर लेती है कि लोग क्या कहेंगे? वह भारत वापस बिना ‘आबार्शन’ कराये नहीं जाना चाहती थी। इस प्रकार हम देख सकते हैं कि इनकी बाद की कहानियों पर ‘पश्चिमी स्त्री-मुक्ति आन्दोलन’ का प्रभाव पड़ता है। जहाँ एक तरफ सुनीता जैसी स्त्री की छवि दिखाई पड़ती है, वही दूसरी तरफ श्यामल जैसी बहुत ही स्वच्छंद स्त्री की छवि का भी दर्शन होता है।

प्रतिध्वनियाँ – यह कहानी सन 1969 के दौर की है। जिस पर पश्चिम के स्त्री-मुक्ति आन्दोलन का प्रभाव स्पष्ट देखा जा सकता है। कहानी की स्त्री पात्र वसु पति श्यामल और बेटी रुचि को भारत में छोडकर विदेश में रहने का निश्चय करती है। वसु जैसी आधुनिक कामकाजी स्त्री पति और बेटी से ज्यादा अपने काम को वरीयता देती है। वह परिवार को बन्धन समझकर उससे अलग हो स्वतन्त्र जीवनयापन करना पसंद करती है। जैसाकि पश्चिम में स्त्री आन्दोलन के बाद वहां की स्त्रियाँ ‘परिवार तोड़ों’ तथा ‘बंधन मुक्त करो’ आदि इच्छाओं की पूर्ति के साथ-साथ स्वतंत्र जीवनयापन की मांग करती हैं। ऐसी ही इच्छा शक्ति रखने वाली वसु कुछ ही दिनों में अपनी स्वच्छंद जीवनयापन की शैली से ऊब जाती है। उसे अपनी जिंदगी में निराशा, ऊब और अकेलापन के शिवाय कुछ नसीब नहीं होता है। इस प्रकार वह अपनी जिंदगी में इतनी आगे निकल चुकी होती है कि चाहकर भी उसे वापस आने का रास्ता नजर नहीं आता है। उषा प्रियंवदा ने अपनी कहानियों के माध्यम से 60-70 के दशक की उन स्त्रियों की स्थिति को उजागर किया हैं, जिन पर पश्चिमी स्त्री-मुक्ति आन्दोलन का प्रभाव बहुत ज्यादा पड़ा है। उस समय भारतीय समाज में वसु जैसी स्त्रियाँ बहुत कम थी, जिनकी तरफ उषा प्रियंवदा इशारा करती हैं लेकिन आज के समय और समाज में ऐसी ‘कैरियरिस्ट स्त्रियों’ की संख्या बहुत ज्यादा बढ़ गई है। वह अपने जीवन में छोटे से लाभ के लिए अपना सब कुछ दाव पर लगा दे रहीं हैं। इस प्रकार इनके पास जिंदगी में ऊब निराशा और अकेलेपन के अलावा कुछ नहीं बचता। आज के दौर में अगर हम उषा प्रियंवदा की कहानियों का मूल्यांकन करे तो इनकी कहानियों की पात्रों की स्थिति, आज के समय और समाज में ज्यादा प्रासंगिक हो उठती है।

पश्चिम के स्त्री-मुक्ति आन्दोलन से भारतीय स्त्रियाँ पहले की स्त्रियों की अपेक्षा ज्यादा जागरूक और चेतनशील हुई हैं, इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता है। भारतीय स्त्रियाँ यहाँ की संस्कृति से ओतप्रोत होने के कारण वह देश में हो या विदेश में कहीं न कही वह अपनी भारतीय जीवन शैली से पूर्णत: मुक्त नहीं हो पाती हैं। जैसा कि कहानी की पात्र वसु का चरित्र। नींद- कहानी की नायिका जिनके जीवन में संख्या महत्वपूर्ण नहीं है उनके लिए महत्वपूर्ण है वह हर तीसरा व्यक्ति। वह जीवन में आने वाले किसी भी तीसरे व्यक्ति से नहीं डरती, अगर डरती है तो अपने अकेलेपन या रात के अँधेरे से। पश्चिमी स्त्री-मुक्ति आन्दोलन से प्रभावित इनकी सारी कहानियों में यौन-स्वच्छंदता यानी देह-मुक्ति को केन्द्रीय महत्त्व दिया गया है। वह चाहे ‘सम्बन्ध’ कहानी की श्यामला हो या ‘प्रतिध्वनियाँ’ कहानी की वसु या फिर ‘नींद’ कहानी की नायिका। इन सभी के जीवन में संख्या महत्त्वपूर्ण नहीं है अगर महत्त्वपूर्ण है तो वह हर तीसरा व्यक्ति। उसी प्रकार ‘सुरंग’- कहानी की अरूणा, ‘चाँद चलता रहा’- की नायिका रोहिनी, ‘टूटे हुए’ की प्रोफेसर की पत्नी तंत्री त्रिपाठी (टीटी), ‘सागर पार का संगीत’ की देवयानी ‘पुनरावृति’(1989) कहानी में आने वाली भारतीय और विदेशी छात्राएं एवं स्त्रियां उसी स्वच्छंद यौन-सम्बन्ध यानी देह-मुक्ति के प्रश्न को महत्व देती हैं जो कि पश्चिमी स्त्री-मुक्ति आन्दोलन की मांग थी।

मछलियाँ – कहानी में विजी (विजयलक्ष्मी) प्रेमी ‘मनीश’ के कहने पर उससे शादी करने के उद्देश्य से विदेश आ जाती है। लेकिन जिस दिन विजी वहां पहुँचती है मनीश सब कुछ जानते हुए भी मैक्सिको चला जाता है। विजी अपने घर के लोगों के मना करने पर भी मनीश के कहने पर अपने प्यार के लिए विदेश पहुँच जाती है। मनीश के मुकर जाने पर वह उसके लिए परेशान जरूर होती है लेकिन स्वयं निर्णय लेने में भी सक्षम है। एक संवाद आता है “विजी जाते-जाते भी एक बार मनीश से मिलने का मोह न छोड़ सकी। इस भेंट से उसे थोडी यातना ही और मिलेगी। पर नटराजन जानता है कि विजी के अंदर बल का एक स्रोत है; टूटती है, बिखरती है, पर अपने को संभाल लेती है। कोई और लड़की इन परिस्थितियों में पागल हो गई होती।”31  आधुनिक स्त्रियाँ पहले की परंपराओं में जकड़ी स्त्रियों की तरह भावनाओं में बह जाना स्वीकार नहीं करती हैं। वह परिस्थितियों से लड़ती है, आँसू भी बहाती हैं लेकिन टूटती नहीं हैं और न ही हार मानती है। वह विपरीत परिस्थितियों में भी अपने अन्दर नया जोश और नयी राह की तलाश कर लक्ष्य की ओर अग्रसर होती रहती हैं। मुकी (नयनतारा मुखर्जी) भी स्वाभिमानी स्त्री के रूप में सामने आती है। वह भी अपने उसूलों पर जीवन जीना स्वीकार करती है।
प्रसंग- (1988) इस कहानी की नायिका ममता कामकाजी और अपने काम में अत्यधिक व्यस्त होने के कारण शादी को महत्व नहीं देती है। वह काम के उद्देश्य से विदेश में रहना उचित समझती है। वहां पहुंचने के बाद वह मशीन की तरह केवल काम को ही महत्त्व देती है। उसने अपने जीवन में प्यार नाम की चीज को कभी कोई महत्त्व नहीं दिया। यहाँ तक कि अपनी यौन-इच्छाओं की पूर्ति को भी जिंदगी में एक काम से ज्यादा कभी कुछ नहीं समझा। उम्र की ढ़लान के साथ कुछ ही सालों बाद वह अपनी इस तरह की मशीनी जिन्दगी से ऊबकर वापस शादी कर परिवार की तरफ लौटना उचित समझती है। इस प्रकार हम देखते हैं कि पश्चिमी स्त्री-मुक्ति आन्दोलन की विचारधारा के अनुसार ‘परिवार तोड़ो’ शादी के बन्धनों से मुक्ति एवं अंत में ‘परिवार की ओर लौटना’। उषा प्रियंवदा की इस कहानी में स्त्री की उस वेदना को पकड़ने की कोशिश की गई हैं जो शादी और परिवार को बन्धन समझ अचानक सभी तरह के बन्धनों से मुक्ति की कामना से आधुनिकता की चकमक में अत्यधिक स्वच्छंद जीवनयापन की वजह से अपने जीवन का सुख-चैन सब कुछ नष्ट कर देती है। जिस वजह से उसके जीवन में निराशा, ऊब और अकेलेपन के अलावा कुछ शेष नहीं बचता है।

आधा शहर – (1984) इस कहानी की नायिका इला स्वाभिमानी स्त्री की तरह अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाती है। वह बचपन में घर से भागकर कही गलत जगह नहीं पहुँचती है बल्कि विदेश पहुँचकर अपनी पढ़ाई पूरी कर अपने आपको स्थापित करने का प्रयास करती है। उसे समाज में व्याप्त पुरुषवादी सोच से नफरत होती है। वह पितृसत्ता को चुनौती देते हुए कहती है “एक पुरूष पचास स्त्रियों से प्रेम करता फिरता है, उसे तुम्हारा समाज कुछ नहीं कहता? एक स्त्री अगर अकेली सम्मान से जीना चाहती है तो उसके चारों तरफ गिद्ध नोच खाने को तैयार रहते हैं।”…..“और होता क्या है चरित्रहीन होना? चरित्र है क्या? उसकी परिभाषा? उसका सामाजिक संदर्भ दिया किसने है, तुम्हीं पुरुषों ने न ? ठीक है– मान भी लो अगर अभय के बाद मेरे प्रेमी रहे भी तो क्या? मुझमें कोई गंदगी लगी रह गई ? मैं जानती हूँ मैं क्या हूँ।”32 वह अपने अस्तित्व और अस्मिता के लिए खुलकर आवाज उठाती है।

इस प्रकार हम देखते हैं कि 1975 के बाद हिंदी साहित्य में स्त्री-अस्मिता का प्रश्न ज्यादा मुखर हुआ है। स्त्रियां अपने हक़ के लिए देश के हर कोने से आवाज उठा रही हैं। “जब तक पितृसत्तात्मक पूँजीवादी समाज में व्यक्तिगत सम्पत्ति के उत्तराधिकार के लिए वैध पुत्रों (यानी विवाह संस्था अपरिहार्य) की अनिवार्यता और परिवार में पुरुष (पिता-पति-पुत्र) का अधिनायकवादी वर्चस्व बना रहेगा, तब तक औरत की अस्मत और अस्मिता, अस्तित्व और व्यक्तित्व, अधिकार और अभिव्यक्ति, समानता और सम्मान का हर संघर्ष अधूरा और सारे ‘घोषणापत्र’ बेमानी हैं। सम्पत्ति और सत्ता में बराबर हिस्से के लिए स्त्रियों को वैधानिक–संवैधानिक और अन्य सभी अधिकारों का इस्तेमाल हथियारों की तरह और हथियारों का उपयोग अधिकारों की तरह करना होगा।”33 उषा प्रियंवदा ने अपने कथा साहित्य में सहज सामाजिक चेतना और स्त्री के अधिकारों को बखूबी उभारने का प्रत्यन किया है। समाज में नये और पुराने मूल्यों की टकराहट तथा स्त्री के द्वारा अविवेकपूर्ण निर्णयों से आने वाली जीवन की कटु सच्चाई को भी लेखिका ने बहुत ही सहज ढंग से उभारा है।

स्वतन्त्रता के बाद भारतीय समाज में बदलाव की स्थिति पैदा हुई हैं। आधुनिक मूल्यों को स्वीकारने और पुराने मूल्यों को नकारते हुए आधुनिक स्त्रियाँ बिना सोचे-समझे आधुनिकता को अपनाने के लिए व्याकुल हैं। इतना ही नहीं अपनी कहानियों के माध्यम से उषा प्रियंवदा ने उस तरफ भी इशारा किया हैं कि किस प्रकार पूरी तरह से परिवार को नकारते हुए, यौन-स्वच्छंदता और स्वतंत्र जीवनयापन को महत्त्व देने वाली आधुनिक स्त्रियों को अपने जीवन में बहुत सी विपरीत मन:स्थितियों का सामना करना पड़ा है। जिस कारण वह निराशा, ऊब, घुटन, और अकेलेपन जैसी आधुनिक बीमारियों की शिकार हुई हैं और आज भी हो रही हैं। ‘कँटीली राह’- की मधु की स्थिति को उजागर करते हुए उषा प्रियंवदा ने आज की स्त्रियों को अपने अस्तित्व और अस्मिता के प्रति चेतनशील रहने की दिशा देती हैं। आज की स्त्रियाँ बहुत जागरूक हो चुकी हैं। वह कहीं भी खुद की गलती की वजह से झुकना नहीं चाहती है। यहाँ तक कि आधुनिक स्त्री अपनी अस्मिता की खोज शादी से पहले प्रेम-सम्बन्धों में भी करती हुई नजर आ रही हैं। बदलते समय और समाज में जहाँ स्त्री-पुरूष का परस्पर आकर्षण जितना सहज हुआ है वहीँ पर प्रेमी के साथ सम्बन्ध स्थापित करने की प्रक्रिया काफी जटिल हुई है। आधुनिक स्त्रियाँ प्रेम से पूर्व अपनी निजी अस्मिता और अस्तित्व को महत्त्व दे रही हैं। इस पारंपरिक समाज में पुरुषवादी मानसिकता को, आधुनिक स्त्री की बदलती सोच ने चुनौती देना शुरू कर दिया है। स्त्री-पुरुष के बीच प्रेम सम्बन्धों में पुरुष प्रेम पाना चाहता है लेकिन स्त्री उस प्रेम में पूर्ण समर्पण करने से पहले अपने प्रेमी पुरुष में अपने अस्तित्व और सम्मान को पाना चाहती है।

उषा प्रियंवदा ने अपनी कहानियों के माध्यम से स्त्रियों को सचेत करने का काम किया है। जैसा कि इनकी कहानियों में पश्चिमी स्त्री-मुक्ति आन्दोलन का प्रभाव तथा भारतीय स्त्रियों का उसमें बह जाना, जिसकी तरफ उषा प्रियंवदा इशारा करती हैं। स्त्री के लिए आधुनिकता या कहे अत्याधिक स्वच्छंदता की मांग और यौन-सम्बन्धों या कहे देह मुक्ति का प्रश्न, विवाह-संस्था या परिवार का विरोध, जिंदगी को मशीन बना अपनी सहज इच्छाओं को भी केवल काम समझ उसकी पूर्ति की व्यवस्था करना, प्रेम का विकृत रूप आदि। और अंत में पुन: उसकी परिणति दुःख, निराशा, ऊब, घुटन और अकेलापन की स्थिति आदि दिखाकर पाठक और समाज को अपनी ‘पहचान’ और ‘अस्तित्व’ के लिए जागरूक और चेतनशील होने की तरफ इशारा करती हैं। उषा प्रियंवदा के कथा संसार पर टिप्पणी करते हुए डॉ. नामवर सिंह लिखते हैं – “उषा प्रियंवदा का हाथ समाज की फड़कती नाड़ी पर न होकर व्यक्ति की दुखती रग पर क्यों है ?”34 वह इसीलिए कि आधुनिक समाज में पढ़ी-लिखी, कामकाजी स्त्रियाँ बाहर से जितनी सुखी और खुश दिख रही हैं वह अन्दर से अपने निजी जीवन में उतनी ही द्वंद्वग्रस्त और बेचैनी की शिकार हैं। आधुनिक स्त्रियाँ या “कई बार हम मात्र ‘वेस्टर्नाइजेशन’ को ‘मार्डन’ होना मान लेते हैं, जो कि पूरी तरह भ्रम मूलक है। ध्यान से देखने पर पता चलता है कि भारतीयता के रंगों के बीच भी अगाध खुलापन है, स्वातंत्र्य है, इज्जत है, बराबरी है। इस समाज में माता-पिता के अनुरोध पर कभी पुरातन काल में राजकुमारी सावित्री ने खुद अपना वर पसंद करने के लिए पूरे देश का भ्रमण किया था, तब उन्होंने सत्यवान को पसंद किया था।”35

इस प्रकार हम आज के संदर्भ में बात करे तो कह सकते हैं कि भारतीय समाज में आधुनिक स्त्रियों के अस्तित्व और उसकी अस्मिता के प्रश्न को लेकर आज की युवा पीढ़ी काफी जागरूक हुई है। स्त्री शोषण के विरुद्ध देश के आम जन की आवाज स्त्री की आवाज के साथ जुड़ चुकी है। वर्तमान समय में “बदलते यथार्थ ने स्त्री के अंत:करण को भी बदल डाला है। भ्रष्टाचार के विरुद्ध हुए आन्दोलन ने जहाँ आम आदमी के सोए हुए विवेक को जगाकर उसे किसी भी अन्याय के विरुद्ध एकजुट होना सिखाता तो निर्भया आन्दोलन ने इसे और हवा दी।… सारे टीवी चैनल, सारे छात्र, देश के सारे युवा स्त्री के पक्ष में खड़े हो गए।”36 स्त्री-शोषण के विरुद्ध उठी जनसमूह की आवाज स्त्री की स्थिति में सुधार और उसकी उन्नति का सूचक है।

संदर्भ–सूची :
(1) हंस जनवरी,2002, पृष्ठ सं.- 83
(2) रमणिका गुप्ता-स्त्री–विमर्श: कलम और कुदाल के बहाने पृष्ठ-सं.55
(3) जगदीश्वर चतुर्वेदी-स्त्रीवादी साहित्य विमर्श, पृष्ठ-204,
(4) उमा शुक्ल-भारतीय नारी अस्मिता की पहचान, पृष्ठ- 14
(5) वर्मा- शृंखला की कड़ियाँ- पृष्ठ-92
(6) उमा शुक्ल-भारतीय नारी अस्मिता की पहचान, पृष्ठ-15
(7)  वीरभारत तलवार-राष्टीय नवजागरण औए साहित्य, पृष्ठ-124
(8) http://chhattisgarhvivek.blogspot.in/2011/12/blog-post_8143.html
(9) डॉ.फिरोज जाफ़र अली-स्त्री-अस्मिता का संघर्ष: नये प्रश्न और नई चुनौतियाँ 2011
http://chhattisgarhvivek.blogspot.in/2011/12/blog-post_8143.html
(10) जगदीश्वर चतुर्वेदी-स्त्रीवादी साहित्य विमर्श- पृष्ठ-7
(11) डॉ.फिरोज जाफ़र अली-स्त्री-अस्मिता का संघर्ष : नये प्रश्न और नई चुनौतियाँ- 2011
http://chhattisgarhvivek.blogspot.in/2011/12/blog-post_8143.html
(12) हंस जनवरी-2002, पृष्ठ-82-83
(13) स्त्रीवादी साहित्य विमर्श-कवर पेज से, डॉ. मुदिता चंद्रा
(14) महादेवी वर्मा-शृंखला की कड़ियाँ- पृष्ठ सं. 23-24
(15) हंस, जनवरी 2002, पृष्ठ-84
(16) अरविन्द जैन-औरत: अस्तित्व और अस्मिता- पृष्ठ-14,
(17) ‘स्त्री मुक्ति’ फरवरी 2014, पृष्ठ सं-15
(18) उषा प्रियंवदा-सम्पूर्ण कहानियां–पृष्ठ सं.109
(19) वही पृष्ठ सं.111
(20) वही पृष्ठ सं.57
(21) वही पृष्ठ सं .57
(22) वही पृष्ठ सं. 58
(23) वही पृष्ठ सं. 58
(24) वही पृष्ठ सं.136
(25) वही पृष्ठ सं.192
(26) वही पृष्ठ सं.196
(27) महादेवी वर्मा-शृंखला की कड़ियाँ- पृष्ठ सं. 55
(28) सरला माहेश्वरी-नारी प्रश्न- पृष्ठ सं. 35
(29) स्त्री उपेक्षिता- कवर पेज से
(30) उषा प्रियंवदा-सम्पूर्ण कहानियां- पृष्ठ सं.324
(31) वही पृष्ठ सं. 393
(32) वही पृष्ठ सं. 450
(33) अरविन्द जैन- औरत होने की सज़ा–भूमिका से– पृष्ठ सं. 8
(34) डॉ. इन्द्रनाथ मदान-हिंदी कहानी एक नयी दृष्टि- पृष्ठ सं. 144
(35) जनसत्ता- 9 मार्च 2014
(36) स्त्री मुक्ति, फरवरी 2014 पृष्ठ सं. 23

संपर्क :  रूम.न. 245, गोदावरी हॉस्टल,  जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय,  नई-दिल्ली -110067
ईमेल-manjoo89jnu@gmail.com

विसंगतिग्रस्त समाज और स्त्री

इति शरण

युवा पत्रकार इति आईआईएमसी से रेडियो टीवी पत्रकारिता करने के बाद पटना में रिर्पोटींग कर रही हैं और जी न्यूज़ के वेब DNA में रिर्पोटर के रूप में कार्यरत हैं. संपर्क : ई मेल- itisharan@gmail.com

कुछ साल पहले सीमा बिस्वास का एक नाटक देखने को मिला था। रबीन्द्रनाथ रचित स्त्री पात्र केंद्रित नाटक ‘स्त्रीर पत्र‘ समाज में स्त्रियों की दयनीय स्थिति को बयां कर रहा था। एक स्त्री के जीवन की कहानी के द्वारा समाज में स्त्रियों के लिए बनाई मानसिकता को सार्वजनिक करने की कोशिश की जा रही थी।
हालांकि, इन मुद्दों पर कई नाटक पहले भी देख चुकी थी। मगर सीमा बिसवास के नाटक में एक अलग बात थी।

कुछ अलग, कुछ नया। नायिका हर तरफ से ठुकराई जाती है। उसका अपमान किया जाता है। उसकी प्रतिभा और सुन्दरता को नकार दिया जाता है। उस वक्त शायद किसी के मन में भी यही खयाल आता कि वह स्त्री अब अपना आत्मबल खो देगी। सामान्यतः हमारे समाज में महिलाओं के साथ जैसा व्यवहार किया जाता है उसका परिणाम महिलाओं की आत्मविश्वास में कमी के रूप में सामने आता है। कई बार यह आत्महत्या का रूप भी ले लेता है। मगर यहां कुछ अलग होता है। यहां नायिका कहती हैं, आपने क्या सोचा कि मैं मर जाऊंगी। मैं आत्महत्या कर लूंगी। नहीं, मैं मरूंगी नहीं। नायिका द्वारा कहे ये चंद शब्द अपने में अनेक अर्थों को समाहित किये हुए थे। इनमें एक स्त्री का आत्मबल दिखता है। एक नई उम्मीद, एक नई  सोच, एक नई मंजिल की तलाश दिखती है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक पूरे विश्व में होने वाली मौत के 1.5 प्रतिशत मौत का कारण आत्महत्या ही होती है। इसमें से 20 प्रतिशत  आत्महत्या की घटना भारत में पाई जाती है। इनमें महिलाओं का प्रतिशत ज्यादा देखा जाता है। अगर आत्महत्या की बात की जाए तो मनोचिकित्सकों ने इसे एक मानसिक बीमारी की श्रेणी में रखा है। सबसे पहले व्यक्ति किसी चीज से डरने लगता है। यह डर कोई परिस्थिति भी हो सकती है, जिसके बाद धीरे-धीरे वो मानसिक तनाव से गुजरने लगता है। मानसिक तनाव फिर स्थायी रूप ले लेता है और वह लगातार उसी तनाव की स्थिति में रहने के कारण आत्महत्या के बारे में सोचने लगता है और अंत में उसे अंजाम भी दे देता हैं। कई बार ये आत्महत्या की कोशिश कोशिश तक ही रह जाती है मगर अधिकांशतः परिणाम मौत के रूप में ही सामने आती है। कुछ लोग अपने मानसिक तनाव को अन्य पीड़ादायी तरीकों से कम की कोशिश करते हैं ,जिसे ‘डेलिब्रेट सेल्फ हार्मिंग‘ कहते हैं।

सामाजिक आर्थिक स्टेटस में कमी, बेरोजगारी, बढ़ती उम्र, महिलाओं का घर की चार दिवारी तक ही सिमट कर रह जाना, बाहर काम ना करना, घरेलू हिंसा, पार्टनर से मनमुटाव, विश्वास में कमी आदि आत्महत्या के कारण देखे जाते हैं। हमारे देश में आत्महत्या का ज्यादा प्रतिशत महिलाओं में देखा जाता है। मगर विश्वविख्यात फ्रंेच समाजशास्त्री ‘ऐमेल दख्राईम‘ के अनुसार समाज में महिलाओें की तुलना में पुरूषों की आत्महत्या का दर ज्यादा होता है। कारण कि महिलाएं समाजिक बंधन से ज्यादा जुड़ी होती हैं। यह उनके सामान्य स्वाभाव का हिस्सा होता है और वो एक सामाजिक कर्तव्य, पारिवारीक जिम्मेदारी को लेकर चलती है। ऐसी हालत में आत्महत्या करने के पहले उनके सामने अनेक परिस्थितयां और जिम्मेदारियां दिखने लगती हैं, जो कहीं-ना-कहीं उन्हें आत्महत्या करने से रोक देती है। मगर हमारे भारतीय समाज में और साथ ही कई अन्य समाज में भी ऐमेल दख्राईम की बात कुछ रूपों में सही साबित नहीं होती। ये कहना बिलकुल गलत नहीं कहा जा सकता कि भावनात्मक रूप में महिलाएं पुरूषों की अपेक्षा ज्यादा मजबूत होती हैं। मगर इस भावनात्मक मजबूती की भी एक सीमा होती है। हमारे समाज में महिलाओं की आत्महत्या के प्रायः दो प्रमुख कारण देखते हैं ,घरेलू हिंसा और उनके अस्त्तिव को नकारा जाना और ये दोनों ही प्रवृत्तियां महिलाओं को आत्महत्या की ओर प्रवृत करने के लिए हमारे भारतीय समाज में धड़ल्ले से जारी है।

आकंडे बताते हैं कि देश भर में हर तीसरी में से एक महिला घरेलू हिंसा की शिकार होती हैं। दुर्भाग्य की बात तो ये हैं कि आधी से ज्यादा ऐसी घटनाएं सामने आ ही नहीं पाती हैं। उसे दबा दिया जाता है। मगर वास्तविकता तो यह है कि सिर्फ घटनाओं को नहीं दबाया जाता इसके साथ कई अस्तित्व को भी दबा दिया जाता है। ‘स्त्रीर पत्र‘ नाटक में कुछ इन्हीं प्रमुख दोनों घटनाओं को चित्रित करने की कोशिश की गई थी। मुख्य पात्र की सुंदरता को उसके परिवार सहित सबने नकार दिया था। उसकी प्रतिभा सबकी आंखों में खटकती है इसलिए उसकी अवहेलना की जाती है। उसकी प्रतिभा को कुचलने और रोकने के प्रयास के रूप में उसे घरेलू कामों की परिधि से वंचित कर उसके अस्तित्व को नकार दिया जाता है। उसे कई बार घरेलू हिंसा का भी सामना करना पड़ता हैं। मगर यहां वह हार नहीं मानती है बल्कि परिस्थितियों से लड़ने की कोशिश करती है। और जब हर प्रयास के बाद भी परिस्थिति उसके अनुकूल नहीं होती तब भी वह हार नहीं मानती। वह अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए अपने विवाह से जुड़े सारे संबंधों का परित्याग कर स्वतंत्र हो जाती है। मगर समाज में हर औरत के पास इतना साहस और इतनी सहनशक्ति शायद ही होती है या फिर कह सकते हैं कि समाज उनके इस हिम्मत को बाहर निकलने ही नहीं देता या उनके इस प्रयास को बड़ी बेहरहमी से नकार देता है। ऐमेल दख्राईम की यह बात यहां बिलकुल सही साबित होती है कि आत्महत्या कोई व्यक्तिगत कदम या परिस्थिति नहीं हैं, बल्कि यह एक सामाजिक परिस्थिति हैं। और इस परिस्थिति को समाज का एक हिस्सा पैदा करता है और बढ़ावा देता है।

किसी व्यक्ति के लिए उसका अस्तित्व, उसका वजूद बहुत मायने रखता है। चाहे वह स्त्री हो या पुरूष उसके लिए उसका अस्तित्व ही सबसे सर्वोपरि होता है जो उसके आत्मबल को सबसे अधिक प्रभावित करता है। और हमारे समाज में स्त्रियों के अस्तित्व को ही सबसे अधिक नकारने की कोशिश की जाती है। उसका अस्तित्व पुरूष के अस्तित्व के साथ ही जोड़ कर रख दिया जाता है। उसके स्वतंत्र अस्तित्व को गौण बना दिया जाता है। हालांकि अगर समाज के प्रारंभिक विकास की बात की जाए तो समाज में स्त्री की ही प्रमुखता/प्रधानता थी। उनके वजूद से ही प्रायः समाज को पहचान होती थी। ‘एंगेल्स‘ ने अपनी किताब ‘परिवार, राज्य और संपत्ति‘ में इस बात को बड़े ही अच्छे से बताया है। शुरूआत में जब विवाह नामक संस्था का कोई अस्तित्व नहीं था तब स्वच्छंद सेक्स का प्रचलन था। कोई भी पुरुष किसी भी औरत से और कोई भी औरत किसी भी पुरूष के साथ संबंध बना सकती थी। ऐसी परिस्थिति में औरत के पेट में पल रहे बच्चे के पिता की निश्चित पहचान के अभाव में बच्चे की पहचान मां के नाम से होती थी। मगर धीरे-धीरे समाज में औरत की प्रधानता को खत्म कर दिया जाने लगा। वर्तमान में भी दक्षिण भारत के एक समुदाय में स्वतंत्र सेक्स का प्रचलन है। मगर वहां बच्चे की पहचान मां  के नाम से नहीं होती है। पुरुष प्रधानता की मानसिकता के तहत वहां एक कार्यक्रम का आयोजन किया जाता है जिसमें उस बच्चे का एक पिता चुना जाता है और फिर उस सामाजिक बाप के नाम से बच्चे की पहचान की जाती है। इससे साफ पता चलता है कि स्त्रियों के अस्तित्व को नकाराने का कैसा-कैसा उपक्रम किया जाता है। हमारे देश की पहली महिला शासक को भी पुरूष मानसिकता का शिकार होना पड़ा था। हम सब जानते हैं कि उसका पहला नाम ‘रजि़या सुलताना‘ था मगर उसे ‘रजि़या सुलतान‘ के नाम से सामने आना पड़ा। उसे अपना पहनावा भी पुरूषों की तरह करना पड़ा। क्योंकि महिला पहचान के साथ शायद ही उसे शासक के रूप में कुबूल नहीं करता।

बहरहाल, इस सबके बावजूद लोगों का मानना है कि आज समाज बदल रहा है। समाज में स्त्रियों के अस्तित्व की पहचान की जा रही है। तो ये बात भी गलत नहीं मानी जाएगी। आज काफी बदलाव देखने को मिल रहें। मगर इसके साथ ही स्त्रियों को नकारे जाने की सच्चाई भी अब कहीं बड़े रूप में मौजूद है। उसके अस्तित्व को नकारना और हर तरह की हिंसा का शिकार होना आज भी धड़ल्ले से जारी है। ‘सीमौन दे बुगवा‘ की किताब द सैकेंड सेक्स (जीम ेमबवदक ेमग)  में औरतों को समाज द्वारा अलग जेण्डर बनाए जाने की बात भी यहां स्त्रियों को नकारे जाने और उनके आत्मबल में कमी की बात करता हुआ दिखता है। किताब में कहा गया है कि स्त्री पैदा नहीं होती उसे समाज पैदा करता है।  प्रकृति ने स्त्री पुरूषों में सिर्फ बायलाॅजिकल अंतर बनाया है। मगर समाज ने इसे अलग जेण्डर बनाकर इसके साथ अलग व्यवहार करना शुरू कर दिया। और समाज का यह व्यहवहार ही वह जड़ है जिससे समाज आज स्वयं सबसे अधिक, सबसे जटिल विसंगतियों और त्रासदियों से घिरा दिखता है।

मौत तक जाने का रास्ता खुद बनाया पहले उसने

सुधा अरोड़ा

सुधा अरोड़ा सुप्रसिद्ध कथाकार और विचारक हैं. सम्पर्क : 1702 , सॉलिटेअर , डेल्फी के सामने , हीरानंदानी गार्डेन्स , पवई , मुंबई – 400 076
फोन – 022 4005 7872 / 097574 94505 / 090043 87272.

( पिछले दिनों स्त्रीकाल  द्वारा शर्मिला रेगे को सम्मानित किये जाने के अवसर पर सुधा अरोड़ा ने उनके लिए लिखी अपनी कविता पढ़कर उपस्थित लोगों को भाव विभोर कर दिया था . पाठकों के लिए सुधा जी की कविता  ) 

महीना भर पहले तुमने हमसे विदा ली
बहुत सलीके से
जैसे लंबी यात्रा पर निकलने से पहले
कोई आंख भर देखकर
गले मिलकर विदा लेता है ….
जैसे जाने से पहले कोई पलकों को
बंद कर देखने से बरज देता है …..
पर क्यों है ऐसा कि तुम जाकर भी गयी नहीं
हमारे भीतर सांस ले रही हो अब तक !

क्या इसलिये
कि तुमने मौत की ओर भीे वैसे ही हाथ बढ़ाया
जैसे हमारी ओर दोस्ती का हाथ बढ़ाया था एक दिन
और फिर
हमारे सारे दुःखों को अपने में समेट लिया
हमें तो पता भी नहीं चला
कि वे बड़े बड़े झुमके जो तुमने कानों में पहने थे
और वह मुड़ी हुई तार वाली नथनी
जो हमें भरमा रही थी
दरअसल हमारी मुसीबतें थीं
जिसे तुमने गिलट के आभूषणों की तरह पहन लिया था
और हमें अपने दुखों से आज़ाद कर दिया था।

तुमने हम सब के हिस्से की लड़ाई को अपने पर लिया
और इतिहास में उनके सूत्र तलाशे
हमें बताया
कि देखो, यह जगह तुम्हारी होनी चाहिये थी
जो तुमसे छीन ली गई
कि अपने हक को पहचानो और लड़ो
और अपनी ज़मीन से उखड़कर
तुम हमारे लिये जगह बनाने में जुट गयी
जैसे ईंट दर ईंट सजाता है मजदूर
और पक्की नींव तैयार कर चल देता है आगे
जैसे फूल गिरने से पहले साथ की टहनी पर
एक बंद कली को भर आंख देख जाता है……
जैसे कोई राजमिस्त्री अपना टाट का परदा हटाकर
अपने औजार साधता है
और दूसरे का घर बनाने में जुट जाता है ।

तुमने परवाह नहीं की अपने घरौंदे की
अपने टाट के परदे की
जो लगातार बारिश में, अंधड़ में छीज रहा था
अपनी भी परवाह नहीं की तुमने ……
नहीं सोचा
कि एक देह की प्रकृति में छह घंटे की नींद भी होती है
और कुछ पल का सुकून भी …..
अपने को उन सारी ज़रूरतों से महरूम रखा
जो सांस को चलाये रखने के काम आती हैं
क्योंकि तुम तो हमारी सांसों को
सम पर लाने में जुटी थीं ।

समय से पहले ही एक हड़बड़ी में
तुमने अपने सारे कामों को अंजाम दिया
और इस आपाधापी में समय से पहले ही थक भी गईं
फिर डूबते सूरज की लालिमा पूरे समंदर पर बिखेरते हुए
तुमने एक गुड़ुप सी डुबकी लगानी चाही अनंत में
और उसका ऐलान भी किया
कि खूब सुकून भरी जि़ंदगी भरपूर जी ली मैंने
कि बस, अब जाना चाहती हूं
वह देखो, तुम्हारे लिये इतना उजास ,
इतनी सारी लालिमा छोड़े जा रही हूं
जो डूब नहीं रही, उग रही है तुम सबके अंदर !

हां, सुनो
उगी तो है
पर इसमें तुम्हारा रेशा रेशा बिखरा है
हम उसे हाथों में भर कर अहद लेते हैं
अपने भीतर तुम्हें समेटेंगे
और इस बार तुम्हें थकने नहीं देंगे
इतनी आसानी से जा नहीं पाओगी अब !
हमारे जाने के बाद भी रहोगी
इतिहास के हर मोड़ पर
क्योंकि यही इतिहास उस आगत को बनायेगा
जिसे बनाने का हमने मिलकर सपना देखा था

13 अगस्त 2013

जाति, जेंडर और क्लास दलित स्त्रीवाद की धूरि

( काफी दिनों तक स्त्रीकाल का अपडेट नहीं हुआ. हम फिर से सक्रिय हैं. पुनः शुरू करते हुए स्त्रीकाल, साउथ एशिया वीमेन इन मीडिया, सेंट्रल यूनिवर्सिटी आॅफ बिहार एवं सीआईआईएल , रेनेसां , ऑक्सफैम के द्वारा आयोजित गया , बिहार में दो दिवसीय सेमिनार और कार्यशाला की अरुण नारायण के द्वारा रपट ) 
अरुण नारायण
वर्ष 2014 का ‘सावित्री बाई फुले वैचारिकी सम्मान’ शर्मिला रेगे को

 

जातिवाद के विरोध में हर समय में अपने
यहां लड़ाई लड़ी गईं।
सबसे पहले बुद्ध ने यह लड़ाई लड़ी। फिर कर्नाटक में बशेश्वर
ने, ज्योतिबा फुले ने 18वीं सदी में और डा. भीमराव आंबेडकर ने 19वीं सदी में इसके खिलाफ
आंदोलन किया। इन सब की जाति और वर्ग अलग-अलग थे। बुद्ध क्षत्रीय कुल से थे बशेश्वर
ब्राहमण , फूले की पृष्ठभूमि व्यापार से थी और आंबेडकर के
महार जाति के पिता सेना में सूबेदार थे। जाति व्यवस्था और गुलामी पर प्रहार का ऐसा
उदाहरण विश्व में कहीं नहीं मिलता।’ ये बातें दलित
स्त्रीवादी विमर्श्कार  सुजाता पारमिता ने
कही। गया के रेनेसां आडीटोरियम में  स्त्रीकाल, साउथ एशिया वीमेन इन मीडिया, सेंट्रल यूनिवर्सिटी आॅफ बिहार एवं
सीआईआईएल द्वारा पिछले दिनों आयोजित दो दिवसीय सेमिनार/ कार्यशाला में बंगाल, आसाम, दिल्ली, महाराष्ट,
बिहार, झारखंड आदि कई भागों से आए बुद्धिजीवियों
ने मीडिया, समाज, राजनीति साहित्य, और  सिनेमा में स्त्री की अभिव्यक्ति और भागीदारी को लेकर
चार सत्रों में विमर्श किया। नाटक और डाक्यूमेंटरी फिल्मों का प्रदर्शन भी इस विमर्श का ही एक हिस्सा रहे। इस आयोजन में
गैर सरकारी संगठन ओक्सफैम का भी सहभाग था.

सुजाता ने कहा कि ‘ बुद्ध ने ब्राहणवाद पर
सबसे पहला और कारगर चोट किया। उन्होंने अपने संघ के दरवाजे दलितों और स्त्रियों के लिए खोल दिए। यह पहली दफा हुआ
कि इसके फलस्वरूप बड़ी संख्या में स्त्रियों ने घर छोड़े, जिनके
पति थे, बच्चे थे उन्होंने  भी। संघ में कोई जाति या वर्ग नहीं था। ऐसे
माहौल में बहुत अच्छी कविता का जन्म हुआ-थेरीगाथा के रूप में।

सावित्री बाई फुले वैचारिकी सम्मान,
2014
 
प्रसिद्ध स्त्रीवादी विदुषी दिवंगत शर्मिला
रेगे को ‘ स्त्रीकाल’  की ओर से सावित्री बाई फुले वैचारिकी सम्मान, 2014 उनकी
संपूर्ण रचनात्मक वैचारिकी को लक्षित करते हुए उनकी किताब ‘  मैडनेस
ऑफ़ मनु : बी आर आम्बेडकरस राइटिंग ऑन ब्राह्मनिकल पैट्रिआर्की’ के लिए दिया गया। सुधा अरोड़ा ने रेगे की ओर से यह सम्मान ग्रहण किया। उन्होंने
रेगे को समर्पित एक भी कविता सुनाई। शर्मिला रेगे की चर्चा करते हुए पत्रिका के
संपादक संजीव चंदन ने कहा कि रेगे  दलित
स्त्रीवाद की सैद्धांतिकी गढ़ने में उनक काम बेहद महत्वपूर्ण रहा है।. इस अवसर पर
सुधा अरोडा ने रेगे की स्मृति को समर्पित
एक कविता का पाठ किया। रेगे को स्म्मान का निर्णय अर्चना वर्मा , अरविंद जैन , अनिता
भारती ,हेमलता माहिश्वर,
परमिला आम्बेकर और बजरंग बिहारी
तिवारी की सद्स्यता वाले निरणायक मंडल ने लिया था. हर वर्ष स्त्रीवादी वैचारिकी को
दिए जाने वाले इस सम्मान की राशि स्त्रीवादी विचारक अरविंद जैन के द्वारा दी
जायेगी, इस सम्मान की योजना उनकी ही प्रेरणा से बनी है .
जाति और जेंडर

 

 
साहित्य, कला,
और आज की वैचारिकी में स्त्रियां कहां खड़ी हैं उनकी क्या स्थिति है इस
सवाल को कवितेंद्र इंदु, सुनिता गुप्ता,
परिमला आंबेकर, कर्मानंद आर्य,
अनुज लुगुन,शातिभूषण और उषाकिरण खान ने संबोधित किया। कवितेंद्र इंदु ने सवाल किया कि ‘ दलित और
दलित स्त्री के अलग-अलग उत्पीड़न हैं या ये एक विराट जातीय तंत्र की समस्या है?
और कहा कि जाति जेंडर के बिना भी वजूद में रही है। दोनों ही तरह की
समस्याओं में जाति साथ-साथ काम करती रही है। स्त्री पराधीनता के बिना भी जाति को
बनाए रखना संभव था। जब हम जाति से जंेडर के सवालों को अलग करते हैं तो उत्पीड़न के
तंत्र को मदद मिलती है। उन्होंने कहा कि दलित स्त्रीवाद ने जाति जेंडर, और क्लास तीनों सवालों को उठाया है। उसका मिजाज इन्क्लूसिव रहा है।’  कवितेंद्र ने कहा कि ‘ दलित स्त्री लेखन महज वही नहीं जो सिर्फ दलित स्त्रियां
लिखें। बल्कि वह लेखन भी है जो उनके दृष्टिकोण के साथ लिखा जाए।’

युवा विमर्शकार  सुनीता गुप्ता ने कहा कि हिंदी साहित्येतिहास
लेखन में पितृसता की दखल रही है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल, नागेंद्र
और नागरी प्रचारिणी के वृहत इतिहास से लेकर परमानंद श्रीवास्तव और नंदकिशोर नवल की
आलोचना में स्त्रियों के प्रति उपेक्षा का भाव रहा है। इन सब की दृस्टि स्त्री
समाज के अनुकूल नहीं रही है। सुमन राजे का ‘हिंदी
साहित्य का आधा इतिहास’ या रेखा काष्तवार, रोहिणी
अग्रवाल,शालिनी माथुर और अनामिका की आलोचनाएं हमें इस दिशा
में आश्व्स्त करने वाली हैं। इनका लेखन आलोचना के सन्नाटे को तोड़ रहा है।

लेखक कर्मानंद आर्य ने अपनी कविता ‘इस बार नहीं बेटी’ के पाठ से अपनी बात
आरंभ की।
उन्होंने प्रतिमानीकरण की चर्चा करते हुए कहा कि निरंतर चलने वाले मूल्य
स्थापित हो जाते हैं, दूसरे शुरू हो जाते हैं। उन्होंने कहा कि
जो पाठ्यक्रमों में नहीं हैं, जिनका प्रतिमानीकरण
नहीं हुआ उनपर विचार करने की जरूरत है। प्रो. परिमला आंबेडकर ने कहा कि स्त्रियों
के जन्म के साथ ही उसके जच्चा घर में आते ही प्रतिमानीकरण की प्रक्रिया शरू हो
जाती है। उन्होंने कहा कि बौद्धिकता और भावनात्मकता-ये दो पहलू हैं समाज के।
स्त्री बौद्धिकता को अभिव्यक्त करना चाहती है तो पितृसता हमेशा उसे इससे महरूम
रखना चाहती है। कवि अनुज लुगुन ने कहा कि आदिवासी लड़कियों का वैसा शोषण  अपने यहां नहीं रहा जैसे हिंदू या मुस्लिम
समाजों में रहा है। उन्होंने सवाल उठाए कि आज क्यों कोई युवक किसी स्त्री पर एसिड
डाल देता है? इसलिए कि इन समाजों ने आदिवासी समाज की
तरह ऐसी संस्थाएं नहीं बनाई जहां लड़के-लड़कियां मिल सकें। आदिवासी समाज में घोटिल,
खगोडि़या और गीतिकोड़ा-जैसी संस्थाएं मौजूद रही हैं। यह दुखद है कि इन
संस्थाओं को यौन पोसन करने वाली संस्था के रूप में दुष्प्रचारित  किया गया।

युवा विचारक शांति भूषण ने कहा कि भारतीय समाज की
संरचना में
जाति एक बड़ा फैैक्टर रही  है।
आदिवासी समाज आज भी जल, जंगल और जमीन जैसी अस्तित्व और अस्मिता की
लड़ाई लड़ रहे हैं। उनके यहां ग्रीनहंट, सलवा जुडुम और
अफस्पा है। जो काम पुरोहित वर्ग करता रहा है वहां वही काम पुलिस और आर्मी कर रही
है।
मीडिया और फिल्म माध्यम में स्त्री की अभिव्यक्ति भागीदारी के सवाल को राणा अयूब, नीधीश त्यागी,
अनंदिता दास, अजिथा मेनन, स्वाति
भट्टाचार्य और मो. गन्नी ने वस्तुपरक ढंग से अलगाया। पत्रकारिता की दुनिया में
स्त्रियों के साथ किस तरह दोहरे नागरिक होने का अहसास कराया जाता है, इसे राणा अयूब
ने अपने ही अनुभवों की आपबीती के द्वारा बतलाया। कहा कि आज इन्वेस्टीगेटिव
जर्नलिज्म के लिए जिस तरह का काम रूलर इलाके में नई लड़कियां कर रही हैं वह कोई
नहीं कर रहा। वह हमारे समय की अनसंग हीरों हैं। स्वाति भट्टाचार्य ने माना कि
जनसंख्या केे अनुपात में मीडिया में स्त्रियों की उपस्थिति बहुत निराषापूर्ण है।
उन्होंने कहा कि कोलकाता में महज 10 प्रतिशत महिला पत्रकार हैं। स्त्री हिंसा की
बढ़ती प्रवृति का कारण हमारे पितृसमाज के सामंती ढांचे हैं। मीडिया के अंदर स्त्री
के प्रति कई तरह के दुराग्रह हैं। वहां एक रेप केस को दूसरे से कैसे अलग करके
दिखलाया जाए, ऐसा हर दिन हो रहा है।

सामाजिक कार्यकर्ता अमृता ने
टीवी में आ रहे स्त्री संबंधी विज्ञापनों की संकीर्णता को टारगेट करते हुए कहा कि
लड़किया जितनी ज्यादा दिखेंगी, निकलेंगी, जितनी ज्यादा संख्या होगी उनकी -वह उतनी ही सुरक्षित होंगी। अंजिता मेनन
ने कहा कि मुख्यधारा की मीडिया महिला सवालों को कवर ही नहीं करते। टीवी को हर क्षण
नई स्टोरी चाहिए। उन्होंने दिल्ली में हुए निर्भया कांड की चर्चा करते हुए बतलाया
कि चूंकि इसके विरोध में दिल्ली में एक साथ कई तरह की प्रतिरोधी आवाजें मुखर थीं,
उनके पास हर पल नए विजुअल्स थे इसलिए मीडिया ने दिखलया कि ये केस हमारे
लिए भी महत्वपूर्ण है। नीधीश त्यागी ने कहा कि गुजराती में जब मैंने अखबार निकाला
तो वहां न्यूज रूम में लड़कियां नहीं होती थीं। लोग यह मानने को तैयार ही नहीं कि
स्त्रियां यह काम करें। उन्हें फीचर में काम दिया जाता था। खाना पकाना और श्रृंगार
तक ही उनकी दुनिया मानी जाती थी। हमने वहां ट्रेनी लड़कियों को गुजराती मंे न्यूज
रूम में लाया। उन्होंने कहा कि हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि मीडिया एक उद्योग भी
है। सोषल मीडिया की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि हम सब मीडिया हंै इस बात का
अहसास सोषल मीडिया ने कराया है। बुरी से बुरी बात भी इस खतरनाक समय में इसी माध्यम
से कही जा सकती हैं। आनंदिता दास ने कहा कि मैं जिस नाॅर्थ ईस्ट से आती हूं वह
बहुत ही असुरक्षित इलाका है। उसके बारे में सो काॅल्ड नेशनल मीडिया कुछ लिखता ही
नहीं। वहां पर हम लोगों को स्पेस मिलना बहुत कठिन है। मनोरमा देवी रेप केस को इस
मीडिया में तब जगह मिली जब वहां की महिलाएं नग्न प्रदर्शन  में उतरीं।फिल्म निर्देशक मो. गन्नी दर्शकों से
अनौपारिक ढंग से मुखातिब हुए। कहा कि हिंदी में स्त्री प्रधान फिल्मों और अभिनेत्रियों
की संख्या बहुत है, हर पहलू पर है। 25-30 कमाल की महिलाएं हैं
जिन्हांेने जन सरोकार की फिल्में बनाई हैं। उन्होंने उतर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में
हुए दंगे की चर्चा करते हुए बतलाया कि उसपर फिल्म बनाते वक्त वहां की लड़कियों ने
कहा कि हमें दिक्कतें अपने घरों से जितनी है उतनी मुसलमानों से नहीं। उन्हांेने
कहा कि हमारी फिल्में जब डेढ़ हजार-ढाई हजार में बननी
शुरू होगी तब उसमें आपकी दिक्कत, आपकी दुनियाएं वहां
रिफलेक्ट होंगी।

समाज और राजनीति में महिलाओं की स्थिति
बहुत कुछ बदली है
और बहुत कुछ बदले जाने की जरूरत है। इस सवाल को सुनीता, रामपरी, सुधा अरोड़ा और निवेदिता आदि ने अपने
तर्कपूर्ण दलिलों से विचारोतेजक विमर्श  में तब्दील किया। कामायनी ने समाज में
लैगिंक असमानता से जुड़े कई अनुभव साझा किए। उतर बिहार के अनुभवों की चर्चा करते
हुए कहा कि वहां सामाजिक राजनैतिक संघर्सों में स्त्रियों की भरपूर भागीदारी रही।
लेकिन जब लाभ की बारी आई तो 98 प्रतिशत पदों पर पुरूष आ गए। यह परिदृश्य कोई नया
नहीं है। आयडवा की बिहार अध्यक्ष रामपरी ने मजदूर आंदोलन की चर्चा के साथ ही महिला आरक्षण बिल का जिक्र
करते हुए कहा कि यह दुखद है कि समाजवादी विचार वाले नेताओं ने इसे अगड़े और पिछड़े
वर्ग की पेंच पैदा कर पास नहीं होने दिया। उन्होेंने कहा कि राज्य विधान मंडलों और
संसद में आज भी महिलाओं की भागीदारी महज 10-11 प्रतिशत तक ही सीमित है।

समाज की जड़ों में धर्म, परंपरा और प्रथा के नाम पर जो स्त्री विभेद कायम रहे हैं उसे सुनंदा
दीक्षित, हेमलता माहेश्वर,  नीलिमा सिन्हा,
कौशल पंवार, कमलानंद झा और शैलेंद्र सिंह ने चिह्ति
किया। सुनंदा दीक्षित ने कहा कि जेंडर जस्टिस शुरू होती है हमारे घरों से। क्या
दलित और क्या आदिवासी सब समझते हैं कि बराबरी का अधिकार लेना कितना मुश्किल है, क्योंकि  वह बहुत ताकतवर से लेनी है। उन्होंने कहा कि गैर बराबरी हमारे
खून में, परवरिश  में डाली जाती है। रोजमर्रे के सामाजिक
जीवन में हमारे जो रिएक्षन होते हैं वह भी हमारी इस धकियानूसी प्रवृति को सामने
लाती है। आज मैं चमारिनी लग रही हूं या जंगलिया की तरह हूं जैसी प्रतिक्रियाएं
सामंती पितृसोच को प्रतिबिम्बित करती हैं। प्रो. हेमलता माहेश्वर  ने कहा कि आज 25
चैनल बाबाओं के नाम के चल रहे हैं। वे किस तरह की दकियानूसी सोच को सामने ला रहे हैं
यह किसी से छुपा नहीं है। उन्हांेने सवाल उठाए कि सारा धैर्य स्त्रियों के हिस्से
ऐसा क्यों? उन्होंने कहा कि अपने यहां एक बहस चली थी
कि जो केप्ट होगी उसका सारा भार पुरूष वहन करेगा। इस सवाल को लेकर महाराष्ट्र मेें
बड़ा आंदोलन हुआ। कुमुद पावड़े ने कहा कि इसका मतलब केप्ट को संवैधानिक दर्जा देना
होगा। इस सत्र में ओम सुधा, वंदना मुन्ना झा,
सुमेधा विद्युत प्रभा और आर.के. राजन ने भी अपने हस्तक्षेप से विचारोतेजक
बनाया।

विमर्श सत्र के बाद परवेज अख्तर निर्देशित
और मोना झा के एकल अभिनय पर आधारित नाटक ‘एक अकेली औरत’
का मंचन हुआ। इसमें स्त्री हिंसा की कई परतों  को सशक्त ढंग से सामने लाया गया। मोना का अभिनय  प्रभावश्याली था। मो. गन्नी निर्देषित ‘कैदी’ बाल मनोविज्ञान की तहकीकात करने वाली
विमर्ष प्रधान फिल्म थी। गन्नी की दूसरी फिल्म में एक वृहत कोलाज षैली में मिथकों,
प्रथाओं, परंपराओं और पितृसता द्वार विभेद के
बहुआयामी जटिल तंतुओं का उद््भेदन किया गया।
गोष्ठी का पटाक्षेप करते हुए स्त्रीकाल के
संयोजक संजीव चंदन ने कहा , ‘हम एक आजाद मुल्क
और संविधान निर्देषित समाज में जी रहे हैं। जिसे बनाने का पूरा श्रेय बाबा साहब
भीम राव आंबेडकर को जाता है। हमें उनके प्रति पूरी विनम्रता के साथ आभारी होना
चाहिए। हम स्त्री स्वाधीनता की ओर चार कदम बढे हैं , इसीलिए प्रचलित व्यव्स्था क्रूर प्रतिकार कर रही है. शेफाली फ्रोस्ट के मीरा और फैज अहमद फैज
के गीतों के सुमधुर गायन से कार्यक्रम का प्रारंभ और समापन हुआ।
संपर्कः अरुण नारायण द्वारा रामेश्वर  प्रसाद चौधरी, साकेतपुरी पो बी.भी. कालेज, राजाबाजार, पटना 800014 मोबाईल 8292253306

स्त्री के रंगों की दुनिया

परिमला अंबेकर
कलाकारों की कल्पना में कैद स्त्री, कलाकारों के सौन्दर्यबोध की कसौटी स्त्री, कलाकारों के रंगों के लिए कैनवास पर वस्तू बनकर बिखरती स्त्री, सदियों से अपने आप को रंग, शब्द, रूपों के सम्मुख परोसती आयी स्त्री, गढी

गढायी मिथक को तोडकर, खुद रंग की तूली को अपने हाथ जब लेती है तो नया इतिहास ही कैनवास पर बिछलने लगता है। रंगों को अपने हिसाब से वस्तु के चुनाव का छूट मिलने लगता है। स्त्री संबंधी, कल्पित मानित स्वरूप, अपने बदलाव के लिए जब छटपटाने लगें, तब स्त्री की मानसिकता अपने ही ढंग की स्पेस को पाने के लिए,कैनवास पर अपने ही अंदाज में लकीरों एवं रंगों में ढालने के लिए सम्मुख आती है। स्त्री कलाकार के हाथों ने, याने वुमेन आर्टिस्टों ने,  जब से रंग की तूली संभालना प्रारंभ किया तबसे परंपरागत, पुरूष केन्द्रित कला और सौन्दर्य बोध के मानदंड, अपने आप टूटने लगे हैं, बखरने लगे हैं ।

परंपरा का कैनवास, जिस पुरूष सत्तायी दृष्टिकोण के रंगों और लकीरों को आकार स्वरूप देते आया था, स्त्री की कला में प्रवेश ने, उन सारे पुरूषप्रधान मानसिकता रूपी कलात्मक कसौटियों को अपने ही अंदाज में पुनः परिभाषित करने लगा और प्रश्नांकित  भी करने लगा। चित्रकला में स्त्री के प्रवेश से जो नये सजे सजे कैनवास उभरने लगे, वे ही आज के स्त्री कलाकारिता के नये अंदाजो बयाॅं हैं !!, उसके अपने सुख दुख हैं, उसके अपने सपने हैं उसके अपने होने हैं। अर्थात वुमेन आर्ट, वह दुनिया है जहाॅं स्त्री अपनी ही आॅंखों से दुनिया देखती है, परखती है, अपनी संवेदना और सोच को लकीरों में उभारकर उसमें अपने ही अंदाज में, रंग भरती है। उसकी कला वह सच्चाई है, जिसे खुद उसका ज़मीर कल्पना और मिथक में बंधकर कैनवास पर फैलता है।
उसका आर्ट वह यथार्थ है, जिसे स्वयं उसकी संवेदना, उसका आंतरिक संघर्ष, उसके अपने विश्वास मान्यताएॅं, कैनवास पर के रूपाकार को तराशते हैं, उसमें रंगों का जीवन भरते हैं । वुमन आर्ट यानी  जीवन का वह इतिहास जो अब तक लिखा नहीं गया है, मनुष्य संसार का वह वर्तमान, जिसमें पुरूष के साथ साथ स्त्री भी अपना जीवन जीती है साथ साथ भी और साथ रहित भी याने स्वतंत्र और स्वछंद भी । और वुमन आर्ट याने मानवीय जीवन का वह भविष्य है जिसमें स्वतंत्रता के स्वप्न बिखरें है, स्वछंदता के छंद खिले हैं । मुक्ति के गीत गाते हुए, प्रगति के सुर मिलाते हुए…मनुष्य मात्र के ।

चित्रकला में स्त्री के प्रवेश ने कला को जेंडर पहचान दिलाया है और निस्संदेह कला को एक प्रत्येक दृष्टि और आधार भी प्रदान कराता है। स्त्री केवल देह बनकर जहाॅं पुरूष के कलात्मक विज़न के कैनवास पर वस्तूगत आधार की लकीरों को अपने जिस्म के कोरों और आकारों में उभरता हुआ महसूस करती थी, वही स्त्री अपनी कला की तूली को स्वयं अपने हाथ पकडकर, अपनी आर्ट द्वारा, देह के परे भी अपने अस्तित्व के होने की उसकी अपनी निजी अस्मिता के वस्तुता के तात्पर्य को प्रस्तुत करने लगी। साथ ही अपनी कला में जीवन के उन बारीकियों को भी उभारने लगी जो पुरूष दृष्टि से वंचित रहे थे, या यूॅं भी कह सकते हैं कि जो अबतलक पुरूष संवेदना के चौखटें से बाहर पडते रहे थे ।

यॅूं तो भारतीय संदर्भ के, पुराण कथाओं में, इतिहास प्रसिद्ध प्रेम कथाओं में नायिका के हाथों रंग की तूली का होना, और वह अपनी प्रेमी की कल्पना में डूबी होकर, रूमानी कलाओं के चित्रों को और चित्र परिसर को उकेरने के दृश्य वर्णन मिलते जरूर हैं । यानी, प्राचीन काल से, चित्रकला स्त्री के सोलह कलाओं में एक बनकर प्रस्तुती पाते आती रही है। लेकिन यही चित्रकला, स्त्री के जीवन में, गुण से भी आगे बढकर, एक प्रोफेशन के रूप प्रवेश पाने का इतिहास, आधुनिक युग की देन है । यूॅं तो लोक कलाओं का इतिहास रचा ही है स्त्री के हाथों ने। लेकिन स्त्री का एक कलाकार बनकर पुरूष की तरह उभरने का इतिहास बहुत पीछे का नहीं है । भारत में लगभग स्वतंत्रता पूर्व के संदर्भ टैगोर के परिवार में, अपने भाइयों के साथ अपनी चित्रकला को रखने का धैर्य दिखाया था सुनयना देवी ने । उसके बाद हम कुछाध नामेां को गिना तो सकते हैं जैसे अमृता शेरगिल्, अंजोली इला मेनन्, अर्पिता सिंग, नीलिमा शेख … इत्यादि ।

लेकिन लगभग १९७० के बाद, स्त्रियों का दखल चित्रकला में विशेषतया देखा जा सकता है। स्त्री कलाकार भी पुरूषों की तरह एकल शो करने का धैर्य दिखाने लगी, कला समीक्षक भी स्त्री की कला को विशेष अंदाज में देखने परखने लगे , उसकी प्रत्येकता को पहेचानने लगे, और इसी संदर्भ में हम कुछाध स्त्री साहित्यकार एवं कवियों को भी देख सकते हैं जिन्होनें, अपनी शब्द साधना के साथ साथ रंगों और तूली के माध्यम से भी अपनी भावना एवं विचारों को अभिव्यक्ति दी है। इस कोटी के कला साधकों में हम महादेवी वर्मा का नाम बडे ही विश्वास के साथ ले सकते हैं । बहुत सी स्त्रियों का हम, आर्ट कैंपों को, गैलरियों को संस्थाओं को चलाने का अद्भुत योग्यता और प्रतिबद्धता को रखता हुआ देख सकते हैं ।

स्वतंत्र, व्यक्तिगत चित्रसाधना के साथ साथ आज बतौर शिखा और शैक्षणिक कोर्सों द्वारा स्त्रियों का कला के क्षेत्र में अपना हुनर आजमाना,उत्तर आधुनिक युग की पहेचान बन रही है । शैक्षणिक संस्थाएॅं, काॅलेज और विश्वविद्यालयों में पुरूष कलाकारों के साथ स्त्री को भी अपनी कला को, शिष्टबद्ध अभ्यास और ट्रेनिंग के माध्यम से निखारने का, हर आधुनिक जीवन के माॅंग के मुताबिक अपनी चित्रगत अभिव्यक्ति को शिद्धत से संवारने का समान स्पेस और मौका मिल रहा है । आज चित्रकला को स्त्रियाॅं , बतौर प्रोफेशन के रूप में निस्संकोच अपना रही है । पुरूषों के साथ साथ भी, और विशेषतया, स्त्रियों के लिए ही, अलग से आर्ट कैंपों का संयोजन करते हुवे, वुमेन आर्ट ओरिऐंटेंड वर्कशाॅपों को चलाने के माध्यम से शैक्षणिक संस्थाएॅं , कला अकादमियाॅं और विश्वविद्यालयों के विजुवल आर्टस् के विभाग, कला के क्षेत्र में स्त्रियों को विशेष अवसर और जगह प्रदान करने के प्रयत्नों में जुटे हुए हैं ।

ऐसे ही प्रयत्नों के चलते, गुलबर्गा विश्वविद्यालय में स्थित, विजुवल आर्टस् का विभाग, कर्नाटक ललित कला अकादमी के सहयोग से, फरवरी 2015 मेंअखिल भारतीय महिला आर्ट कैंप का आयोजन किया था। देश के विविध भागों से आयी वुमेन आर्टिस्टों की तूली से निखरे चित्र, उनकी संवेदना कल्पना के रंगों से सजे संवरे कैनवास, कुछ अलग ही दास्तां बयां कर गयीं ….

‘‘आर पार है इस जहाॅं आसमान की जिंदगी … ऐ मेरे साथी…. मेरे गुइंया….. बस एक मुठ्ठिी भर का अहेसास !! मुझे भी जीने दे.. रंगों का इतिहास … अपनी बयां का ….मुझे भी रचने दे !!

1 . मुक्ता अवचट शिरके (पूना, महाराष्ट्र)

बच्ची की मासूमियत बच्ची के जुबान !! बच्चियों की मासूमियतता, उनका अगाध विश्वास, हर बाहरी व्यक्ति या वस्तू, जो कोमल है सुंदर है उसे अपना लेने की अपना मान लेने की अगाध मुग्धता को अपने कैनवास में कैद करने के लिए उठायी गयी मुक्ता अवचट शिरके की तूली, इस पेंटिंग में बोल रही है । उडती तितलियाॅं, तितलियों के उडान की चंचलता, रंगीन पंखों के खुलने और बंद होने की आॅंख मिचैली । मुग्ध कोमल बच्चियों का लुभावना रूप और उन तितलियों को देखने की सहज आतुरता, मुक्ता अवचट के रंगों द्वारा आकार पायी है । मुक्ता द्वारा कैनवास पर उभरे ये रंगहमें कहीं दूर ले जाकर,भारतीय बच्चियों की मासूमियता को बचाने की, उनकी टिमटिमाते आॅंखों की रोशनी और कदमों की फुदकनी को तितली के मानिंद संजोये रखने की सौगात तो नहीं दे रहे हैं …… ?

2 . डाॅ शुभ्रा चंद (गाजियाबाद, यूपी)

लगभग 25 सोलों से रंगों के मार्फत अपनी पर्यायी दुनिया को बसाने वाली, रंगों और तूलियों के आयाम से मन की बातों को कैनवासों पर फैनानेवाली डाॅ शुभ्रा चंद, अपने अमूर्त चित्रकारी याने, एब्स्ट्राक्ट आर्ट के लिए पहेचानी जाती रही है । गोल्ड धातू बेशकीमती भी है और औरतों का मनपसंदीदा लोहा भी । जहाॅं सोना औरतों के श्रृंगार के आभूषणों के हेतू अनेक सुंदर आकर्षक आकारों में ढलता है, वहीं वह अर्थ का पर्याय बनकर भी प्रस्तुत होता है । डाॅ शुभ्रा लगभग, गोल्ड के इस धातूयी अस्तित्व और चमक को अपने कैनवासपर कलर एफेक्ट के लिए बरबस उपयोग करती हैं । जैसे सोने की आभा, कला की कीमत को बयाॅं कर रही हो !! जैसे कह रही हो art is as valuable … as gold ..!!

3 . कामिनी बाघेल (झाॅंसी)

ग्रामीण औरतों का जीवन, उनके अपने विश्वास, उनके अपने जीवन मूल्य मान्यताएॅं, उनकी अपनी आशाएॅं उनके अपने सपने जैसे कामिनी बाघेल की रंगों की दुनिया है । उनके लगभग हर कैनवास पर के चित्र याने, जैसे झाॅंसी की औरतों की कहानी बोल रही हो !! झाॅंसी के औरतों की आशा और बदलाव की चाहत ली हुयी जिज्ञासा और भरोसे मंद आॅंखे, हर अलग और विश्वसनीय पहेल का बाॅडी लैंग्वेज, और हर विरोधों में अपना स्पेस ढॅूॅढ रहे उनके कदम, और इन तमाम संवेदना और शिद्धतों को रंगों में आकार देकर अपने कैनवास को खोलनेवाली कामिनी बाघेल की कला, एक पर्यायी फेमिनिसम् को रूपायित करती है । बाघेल की कला वह है, जहाॅं जेहाद की लडायी लडती केवल औरतें ही हैं ! और वह भी पूरी कद्दावरता के साथ !!

4 . जिज्ञासा ओझा (बड़ोदा )



वर्तमान चाहे बरगद के पेड की तरह अपने फैलाव की बाहें चारों ओर पसारे खडे क्यूॅं न हो, लेकिन परंपरा और संप्रदाय है कि, बीज की तरह ,वर्तमान के रेशे रेशे में घुले मिले रहते हैं, बस आवश्यक है उसे महेसूसने की, उसे संजोने की !!कलाकार जिज्ञासा ओझा अपने नाम की सार्थकता को अपनी कला में देखती है । उनके रंग बोलते हैं ‘‘नानी की कहानी पोती की जुबानी …!! ‘‘ आश्चर्य और जिज्ञासा से लडकी झुककर देखती है अपने वर्तमान के जडों को और बदले में पाती हैपरंपरा तथा संस्कारों के आधुनिक अर्थ को और मजबूत होता हुआ , और अधिक प्रासंगिक होता हुआ !! tradition & traditional के अद्भुत समीकरण को संजोते हुवे वर्तमान के गणित को हल करने की कला, जिज्ञासा को सिद्धहस्त है। अलग अलग रंगों के शेड्स से संवरे कैनवास पर उभरने जा रहा है मासूम कटे बाल, आधुनिक लिबास के माडर्न ढब की लडकी का ब्रहत् इमेज जो झुककर बडे ही संवेदनीय हाथों से राजस्थानी परंपरा और सांप्रदायिकता के रूप को, जिज्ञासा भाव से देख रही है, उसे सहज स्वीकारते हुवे, झुककर …आश्चर्य की अदायगी के साथ!!

5 . एस्.एम बानू  मुनाफ़ (तुमकूर, कर्नाटक)





एस्.एम्.बानू मुनाफ इंडियन ट्रेडिशनल् आर्ट में खासा हस्तक्षेप रखती है । यॅूॅ तो श्रृंगार और प्रसाधन पर हर स्त्री का अधिकार है, वह सजती है अपने लिए, अपने मनभावन के लिए । साज श्रृंगार के अपने रूप और मायने है । कर्नाटक के बेलूर हळेबीडू के मंदिरों की भित्तियों पर खिले शिल्पाकृतियाॅं, स्त्री के इन अद्भुत मनोल्लास के रूप को दर्शाते हैं । बानू का कैनवास उसी औरत के मनभाव को कैद कर रहा है , जहाॅं स्त्री तल्लीन है अपना जूडा बांधने में, लेकिन उसकी देह की भंगिमा, कसक कुछ और ही कहानी केह रहे हैं … ? जैसे वह यह गीत गुन गुना रही हो … सजना है मुझे…सजना के लिए …!! उसकी सजावट, उसका श्रृंगार केवल और केवल उसका है !!

6 . हूमा उल्लाह खा़न (भोपाल)

कैनवास पर जब रंग फैलने लगते हैं तब उसकी तबीयत स्वछंद रहती है … रंग अपने ढंग से आकार लेते जाते हैं…. लेकिन इन फैलते हुवे रंगों का भी अपना दायरा होता है … कैनवास के ये रंग अपने दायरे में , अभिव्यक्ति के अद्भुत लकीरों को चित्रपटल पर बिखेरते जाते हैं .. ! हूमा उल्लाह खा़नके चित्र कला की इसी सच्चाई को दर्शाते हैं । टिंट मीडिया में अपना खासा दख़ल रखने वाली हूमा, रंगों और कैनवास का अत्यंत किफायती उपयोग करते हुवे भी अधिक दूरस्थ की और अधिक गहनस्थता की बातें कह जाती हैं । ब्लाॅंक आंड व्हाइट में खिला उनका यह चि़त्र रंग और तूली की इसी सार्थकता को बताने जा रहा है ।

7 . अंजली एस् अग्रवाल (चंडीगढ़)

यूॅं तो प्रतिबद्ध आर्टिस्ट अपनी हर कलाकृति में अपने सिग्नेचर कोआंकते जाता है , कवियों द्वारा प्रयोगित काव्यनाम या अंकितनाम की तरह । खरगोश अपनी मासूमियत के लिए, कोमलबोध के लिए और निरीहता के लिए भी प्रतीकबद्ध है। अंजली अग्रवाल, खरगोश को आंकते जाती है, कैनवास में अपने सत्यताबोध के अहेसास में, वास्तविक आॅबर्सेशन् के रूप में और जीवन के अहसास के अर्थ में । बौद्धदर्शन को रंगों के माध्यम से रिफ्लेक्ट करने की अदम्य लालसा उनके रंगों और भावों में ध्वनित है । पानी अपने गुण के अनुकूल उूॅंचायी से नीचे की ओर बहता है । जीवन दायिनी स्वरूप को समेटते हुवे, वहीं जीवन विकास की धारा उूघ्र्वमुखी होती है !! मृण्मय जीवन के संघर्षों से उूपर उठकर आध्यात्मिकता या भौतिकेतर जीवन की सच्चायी को छूने की उजास को लिये लिये !! मानवीय विकास के उूध्र्वमुखी जिजीविषा को अपने आगोश में समेटते हुवे !! अपने कैनवास में इसी जीवन विकास और अर्थ की सच्चाई को आंकने में मगन हैं अंजली अग्रवाल ।

8. ज्योति हत्तरकी (गुलबर्गा कर्नाटक)

ट्रेडिशनल आर्ट को समकालीनता के आकार प्रकार में ढालते जाना अपने आप में चुनौती है । पारंपरिक या पौरिणक प्रसंग चरित्रों कोकन्टेंपररी बनाना और कंटेंपररी व्यवस्था या जीवन को पौराणिक रूप या मिथकों के ढब में चित्रित करना ज्योति हत्तरकी की चित्रकला की विशेषता रही है । वह लगभग हर अपने विज़न को फोक याने जनपदीय टच के साथ प्रसुत करते आयी है । उनके कैनवास पर, धार्मिक एवं जातीय प्रतीक चिन्हों का साथ ही आधुनिक जीवन के प्रतीकों का सुन्दर फयूज़न मिलता है । अर्थात ज्योति हत्तरकी बडे ही सलीके से ,जीवन तात्पर्य को पारंपरिक एवं आधुनिकता के समीकरण के रंग एवं चित्रों के बिंबोंद्वारा अर्थ देते जाती है । अर्धनारीश्वर का यह बिंब दांपत्य जीवन की वास्तविकता में सहभागिता के साथ साथ स्त्री और पुरूष के स्वतंत्र अस्मिता को भी चुपके से आंक देता है । अपने हर कलाचित्रों में हत्तरकी, उत्तर कर्नाटक की प्रादेशिक मिट्टी के महेक को लेकर आती है साथ ही जीवन युग्म के सिद्धांत को भी प्रस्तुत करती है ।
गुलबर्गा विश्वविद्यालय के कैम्पस में आयोजित इस महिला कलाकारों के कैप्म में, कुलपति महोदय प्रो जी.आर.नायक ने इन पोट्रेटों को देखते हुवे , सराहनीय प्रतिक्रिया भी दी । कला के क्षेत्र में महिलाओं के योगदान को रेखांकित किया साथ ही बडेही संवेदनीयता के साथ कहा‘‘ कैम्प में भागलेने वाली सारी महिलाएॅं निस्संदेह अपनी अकादमिक और कलात्मक योग्यता के प्रभावी रिज्यूम को ली हुयी हंै, लेकिन इस आयोजन का उपयोग इस अर्थ में हमें, जरूर हो रहा है कि आगे जाकर, इन सभी स्त्री कलाकारों के रिज्यूम में गुलबर्गा विश्वविद्यालय का नाम जुड जायगा !!
देश का इक्कीसवां दशक, नये नये उभरते हुवे महिला चित्रकारों को देख रहा है । विमेन् आर्टिस्ट सारे अवरोधकों को पार कर कैम्पों में ,गैलरियों में, शो आदियों में अपना हिस्सेदारी निभा रही है । स्त्री कलाकारों द्वारा उठाये गये इन तमाम अहम कदमों के बावजूद भी यह प्रश्न जरूर लटका रह जाता है कि ‘ क्या अपने देश में , इन महिलाओं की कला के लिए पुरूष के समानांतर स्थान है ? क्या देश मानसिकता महिलाओं की कला को भी संजीदगी से परख रही है ? आखिर उसके मेहनत और हुनर का कद्र करना हम जान गये हैं ? कला को चाहने वाले कहीं दूर निगाह में अपने, स्त्री और पुरूष कला रूपी जेंडर विभाजन की रेखा तो नहीं खींच रहे ? और इस मानसिकता के चलते, पुरूष की तुलना में स्त्री की कला को कम अर्थ में (कीमत के रूप में भी) आंकने की बाध्यता तो समाज में नहीं पाला जा रहा ?
कला के क्षेत्र में इस जेंडर पेरैटी को भांपते ,नीलांजना राॅय ने अपने लेख में , इतिहासकार एवं समीक्षक गायत्री सिन्हा को कोट किया है । गायत्री सिन्हा कहती हैं‘‘ यूॅं तो सन् सत्तर के दशक के बाद, स्त्रियों के लिए सारे दरवाजे खुल तो गये और पुरूष के समनांतर ही स्त्री की कला को गैलरियों में और समीक्षा में समान स्पेस तो मिलने लगा है । लेकिन प्रश्न यह लगा ही रहता है कि क्या आज भी स्त्रियों की चित्रकला को वही दाम और वही स्थान मिल रहा है जो पुरूष की कला को प्राप्त है ‘‘ ?
यूॅं तो हर लडायी चाहे वह कला के माध्यम से लडी गयी हो या आंदोलनों के माध्यम से, तात्पर्य तो यही बंधा रहता है कि हरेक व्यक्ति को उसके हिस्से की धूप मिले !! उसके हिस्से की जमीन उसे नसीब हो !! चाहे वह व्यक्ति स्त्री हो या पुरूष हो । क्यूॅं कि हमेशा कला की लडायी लोकतांत्रिकता मूल्यों की होती है ।
ऐसे आयोजित कैम्पों द्वारा, गैर समानतावादी मूल्यों की सामाजिक प्रतीती संभव हो पाती है, कहीं न कही मानवीय आनंद के रंगों को आंकने के लिए,जीवन का कैनवास बिछते जाता है, या एक बेहतर दुनिया के बसाने के पर्यायी सोच की कल्पना में, अदृश्य हथेलियाॅं कूॅंची धरकर रंग भरने लग जाते हैं, तो समझिये, हम और आपके प्रयत्नों की मेहंदी, रंग चढगयी !!
प्रो. परिमला अंबेकर
हिन्दी विभाग, गुलबर्गा विश्वविद्यालय गुलबर्गा- 06 कर्नाटक

सुनो चारुशीला और अन्य कवितायें

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कर्मानन्द आर्य

कर्मानन्द आर्य मह्त्वपूर्ण युवा कवि हैं. बिहार केन्द्रीय विश्वविद्यालय में हिन्दी पढाते हैं. संपर्क : 8092330929

( यह  प्रेम का सप्ताह  है -वसंत भी दस्तक दिया ही चाहता है . पिछले दिनों प्रेम को दक्षिणपंथी राजनीति का शिकार बनाया जाने लगा है . इस  सप्ताह को लेकर चरमपंथी संगठनों का सलाना विरोध फिर से अपने चरम पर है . स्त्रीकाल ने प्रेम के इस सप्ताह को प्रेम की स्त्रीवादी कविताओं , रचनाओं , आलेखों को समर्पित किया है . पवन करण की कविताओं और निवेदिता की यादों के बाद कर्मानंद की कवितायें  आप भी करें सहयोग . ) 

 

अब अमूमन हर किसी की बहन जाती है पार्क


पहले मेरी बहन गई
फिर मेरे दोस्त की
अब अमूमन हर किसी की बहन जाती है पार्क

वे तंग जगहें हैं
जहाँ नहीं होता पार्क और फूल
जहाँ नहीं होती नदियाँ

विकृतियों का जमघट होता है
अपने ही करते हैं व्यभिचार
मेरी बेटी बताती है
‘एक कहानी उसको भी पता है’

मैं पूछते हुए डरता हूँ
अपनीही बेटी से
बंदकमरे कैसे सड़ जाते हैं
बंद गली कैसे ख़त्म हो जाती है
पार्कों का होना अच्छा है
पहले मेरी बहन गई
फिर मेरे दोस्त की
अब अमूमन हर किसी की बहन जाती है पार्क

ओ मोरे बासंती बालम !

कहाँ हो ? तुम्हारी याद सता रही है. गंधमादन
निहार रही हूँ तुम्हारा पथ
सच कह रही हूँ पैसे की जरुरत नहीं है
अब सोना भी नहीं मांगती
आ जाओ ! बेकार में क्यों परेशान होते हो

जानती हूँ जितना तुम कमाते हो
उतना सब कबीर की भेंट चढ़ जाता है. अब कबीर के नाम पर लड़ना नहीं
दूध और ट्यूशन का पैसा तो मैं ही पूरा करती हूँ
मैं और मेहनत करुँगी
ओ मोरे बासंती बालम !
तुम्हारे प्यार में मैं मजदूरिन सी कमसिन हो आयी
देखो न !

तुमने ही कमाने से रोक दिया था
जानती हूँ जरुरत में दो हाथ मिलें तो
तो….क्या…..
घरबसता है बुद्धू !

मोरे बासंती पिहू !
हम लड़कियां कमजोर नहीं होती
न ही होती हैं लकड़ियाँ
बस हमें कह कहकर कमजोरी का काढ़ा पिला दिया जाता है
समय समय पर सर्दी की आग बना
ताप लिया जाता है
जियत मरत घूंट घूंट कर पीती हैं हम
काढ़ा और सर्दी

कहाँ हो!बासंती बालम
तुम्हारी याद सता रही है
अबकी बार वीकेण्ड पर भी मिलना नहीं हुआ

बसंत 

ओ मेरी चन्द्रवर्णी प्रियतमा
बसंत आ गया है
सरसों पियरा गई है
तुम्हेंमटर काटने जाना है

पिछले कई सालों से
तुम्हारे जूड़े और खेत से जूझते हुए
तुम्हारी चोटी नहीं संवार पाया

हमकिसान ऐसे मनाते हैं बसंत
मिलजुल बोते हैं
रखवाली में जागते हैं सारी सारी रात

बसंत भी तो यही करता है
फुरसत के पलों में
देहसे लिपटकर
काट लेता है एक फसल

ओमेरी चन्द्रवर्णी प्रियतमा
इस बार हम दोनों की सावधानी से
उगेंगी अच्छी फसलें

सुनो कात्यायनी

सुनो! उतारता हूँ सब तीर, धनुष, गांडीव
कवच कुंडल
सब तुम्हारे निमित्त था
वन प्रांतर, साम्राज्य की इच्छा
सत्ता के लोलुप दोस्त
सब छोड़ता हूँ अब

ये घोड़ो की टापें नहीं चाहिए
यह पीठ पर लदी जीन भी
सब कुछ तुम्हारे निमित्त रहा
हजारो किलोमीटर का भटकाव
तुम्हारी यादों के साथ
अब नहीं चाहिए कुछ

कह दो राजाओं ने छोड़ दिया सिंघासन कीइच्छा
कुछ खास करने का लोभ त्याग दिया
अब वे नीले आसमान के तले
कुछ न पाने की कसम खायेंगे

जो कुछ था वह तुम्हारे निमित्त था
घन गरजता था
बारिस की बूंदें उठती थीं
वन प्रांतर महकता था
सब कुछ तुमसे संदर्भित था

तुम नहीं तो विराग की यह रात किस काम की

सुनो चारुशीला

मैं तुम्हें तुम्हारी गंध से नहीं पहचान सकता
न तुम्हारे आम्रकुचों से जान सकता हूँ
तुम्हारे मन की अमराई
हाँ तुम्हें छूता हूँ तो इस बात से बेखबर
कि तुम एक देह हो
मद और पसीने से लथपथ

तुम्हारा स्वाद कितना खट्टा है
यह विषय बहुत गूढ़ है
कितना नमक बचा है तुम्हारी नाभि में
यह भी जानना कठिन है
कितनामीठा,तीखा, कसैला एवं कड़वा है
तुम्हारी इस रंग का स्वाद
कह नहीं सकता

मैं यह स्वीकारता हूँ
तुम्हारी अमूल्य प्रतिभा ने किया है प्रभावित
तुम्हारी कविताओं किताबों ने जादू बिखेरा है
तुम्हारी छवियों से होता हूँ प्रभावित
तुम्हें मंचों पर देखकर खुश होता हूँ
पर यह भी स्वीकारता हूँ
तुम्हारा लावण्य भी खींचता है उससे तेज

दुनिया की कोई किताब
मेंहदी की कुछ पंखुरियां जो छोड़ जाती है लाल निशान
वही रंग है आज मेरे मन का
मेरा मन लाल है
तुम चाहो तो छू सकती हो अपनी देह से
मेरे मन के लाल आन्तरांग

किताब में नहीं है
गुलाब में नहीं है
चम्पा,बेला, जूही, रोज़ी, लिली,
यासमीन, सुंबुल, नर्गिस
कहीं नहीं है इस मन की भावना

जो है सो देह में है
तुमभी देह में हो
तुम्हारा मन भी देह में है
देह में ही है सब सुनो

तुम्हें तुम्हारे ही हाथों ने छुआ होगा बार बार
तुम्हें कई और हाथों ने सहलाया होगा कई बार
इस बात से अंजान कि तुम सिर्फ देह हो
सिर्फ मिट्टी

देह से उपजता है प्रेम
देह से उपजती है गंध
देह से उपजता है एक नरक
जो जीवन देता है
तुम वही नरक हो सुनो चारुशीला

मुझे नरक अच्छा लगता है
तुम्हारी देह भी
और वह मुझे उसी तरह पसंद है
जैसे जीवन

मैं तुम्हें तुम्हारी गंध से नहीं पहचान सकता
न तुम्हारे आम्रकुचों से जान सकता हूँ
तुम्हारे मन की अमराई
हाँ तुम्हें छूता हूँ तो इस बात से बेखबर
कि तुम एक देह हो
मद और पसीने से लथपथ