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हिन्दी पाठ्यपुस्तकों में स्त्री छवि

कमलानंद झा

कमलानंद झा केन्द्रीय विश्वविद्यालय बिहार में हिन्दी अध्ययन के विभागाध्यक्ष हैं. इन्होने पाठ्यक्रमों की सामाजिकी पर शोध किया है : मोबाइल : 08521912909

( कमलानंद झा इस आलेख में एन सी आर टी की पुस्तकों के हवाले से यह पड़ताल कर रहे हैं कि किस प्रकार हमारे बच्चों को बचपन से ही पितृसत्तात्मक व्यवस्था के लिए अनुकूलित किया जाता है .) 
अन्य अनुशासनों में शोध और अनुसंधान की स्थिति और गति क्या है, मैं नहीं जानता। किन्तु हिंदी में शोध की गुणवत्ता से हम सभी परिचित हैं। समकालीन दौर में जो विमर्श चर्चा के केन्द्र में  है उनमें स्त्री और दलित विमर्श सर्वाधिक महत्वूपर्ण है। हम सभी लोग इस बात को लेकर खूब दुखी  हो ले सकते हैं कि आखिर आज के इस अति वैज्ञानिक युग में भी स्त्रियों के प्रति हमारी धारणा घोर पारंपरिक और प्रतिक्रियावादी क्यों है? और दुख से उबरने के लिए हम इन विषयों को केंद्र में रखकर गुरू गंभीर शोध करते और करवाते हैं। मोटी-मोटी पुस्तकें लिखते हैं। पत्रिकाओं के विशेषांक निकालते हैं, सेमिनार गोष्ठियाँ करते हैं और न जाने क्या-क्या करते हैं? लेकिन हम इस विषय पर अपेक्षाकृत बहुत कम सोच पाते हैं कि जिस उम्र में बच्चों और किशोर-किशोरियों में  विचार की निर्मिति होती है, उस समय में हम उदासीन रह जाते हैं। वही वह उम्र होती है जब सभी तरह के पारंपरिक सोच उनमें पुख्ता रूप धारण कर लेती है। तात्पर्य यह कि स्कूली पाठ्यक्रम, पाठ्यपुस्तकों और बाल साहित्य के प्रति हमारी घोर उपेक्षा और उदासीनता पितृसत्ता पैरोकारों  को खुला चारागाह मुहैय्या करा देता है। जब वे अपनी फसल लहलहा लेते हैं तो हमें सिर धुनने और पछताने के अलावा कुछ भी हाथ नहीं लगता।

हम सभी जानते है कि विद्यालयी पाठ्यपुस्तकों में एनसीईआरटी सर्वाधिक गुणवत्तात्मक पुस्तकें प्रकाशित करती रही हैं। देश के सर्वाधिक विद्यार्थी इसे पढ़ते-गुनते है। अधिकांश निजी प्रकाशक इन्हीं पाठ्यपुस्तकों को अपना आदर्श मानकर पुस्तकें प्रकाशित करते है। लेकिन आप चकित और दुखी एक साथ होंगे जब बिगत दस-बीस वर्षों से प्रकाशित होने वाली पाठ्यपुस्तकों से गुजरेंगे। राष्ट्रीय पाठ्यचर्या 2005 के अंतर्गत जो पाठ्यपुस्तकें प्रकाशित हुई है उन्हें अगर हम थोड़ी देर के लिए छोड़ दें तो घोर निराशा होगी। एनसीईआरटी की पाठ्यपुस्तकें अगर सतीप्रथा का घोर महिमामंडन करे तो चिंतित होना स्वाभाविक है। सातवीं कक्षा के बच्चों को कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर सतीप्रथा को एक आदर्श प्रथा के रूप में  स्वीकार करने की वकालत करते है। ‘लाल अंगारों की मुस्कान’ नामक पाठ में रणथंभौर के राणा हमीर के जब सभी सैनिक खिलजी से युद्ध में मारे जाते हैं, तो लेखक महोदय बच्चों को बताते हैं कि ‘‘स्त्रियों ने फैसला किया कि हम किले के द्वार खुलने से पहले जौहर करेंगी। अब वे निश्चिंत थे। जैसे उन्हें जो करना था, वह कर चुके थे। रात को वे सब सो रहे थे सुबह जल्दी उठने के लिए और सुबह उनको जल्दी उठना था हमेशा को सोने के लिए। ऐसी जीवंत नींद रात के सितारों ने फिर नहीं देखी। यह वे आपस में अब भी कहा करते है।’’1

स्त्रियों द्वारा अपने आपको सती कर लेना-ऐतिहासिक सत्य हो सकता है लेकिन लेखक ने जिस उत्साह से इस दृश्य का वर्णन किया है वह सिर्फ ऐतिहासिक तथ्य भर नहीं है। लेखक के ही शब्दों में ‘‘पौ फटी तो सब जागे और पुरूषों ने नित्य कर्म से निवृत्त हो सबसे पहले एक चिता सजाई। स्त्रियों ने पूजन किया, कीर्तन किया अपने पतियों से मिल। पतियों ने उन्हेें प्यार से थपथपाया। उन्होंने उनके पैर छुए। आज वे अपने सर्वश्रेष्ठ श्रृंगार में  थी, जैसे जीवन की सर्वाेत्तम यात्रा पर उन्हें जाना था और यों वे दर्पदीप्त गति से चिता की ओर चली, जैसे स्वयंवर के बाद दुल्हनें अपने रथ की ओर बढ़ रही हों।2 जिस तरह से लेखक ने उपमादि अलंकारो के माध्यम से इस दृश्य का जीवंत वर्णन किया है, उनके निहितार्थ को आसानी से समझा जा सकता है। आगे की पंक्तियों में तो लखक ने इस राक्षसी प्रथा पर अपनी स्वीकृति की मुहर लगाकर एनसीईआरटी की नीतियों की धज्जियाँ उड़ा दी, ‘‘क्या आत्मा की अमरता का ऐसा विशाल और मृत्यु का इतना मनोरम विवरण इतिहास के किसी और पृष्ठ में  भी इतने प्रदीप्त रूप में  लिखा गया है?’’3 यह पाठ्यपुस्तक 1987 का संस्करण है। घोर आश्चर्य का विषय है कि एक दशक बाद सन् 1997 में सरस भारती, भाग-2 के नाम से प्रकाशित पुस्तक में  भी इस पाठ को हटाया नहीं गया। बल्कि इसके विपरीत शातिर चतुराई यह की गई कि ‘लाल अंगारों की मुस्कान’ जो प्रतीकात्मक अर्थ भी ध्वनित करता था बदलकर ‘शरणागत की रक्षा’ सदृश मानवतावादी नामकरण कर दिया गया और कुछ ‘मनोरम वर्णन’ को संपादित कर दिया गया।

ध्यान देने की बात यह है कि इन पाठ्यपुस्तकों के प्रकाशन से बहुत पहले यानि सन् 1975 में ही एनसीईआरटी की राष्ट्रीय परिसंवाद आधारित पुस्तक ‘स्टेटस आॅफ वीमेन’ में  बहुत सिद्दत से महसूस किया गया था कि ‘‘समाज में  औरतों के संबंध में दुष्प्रचारित मिथकों, प्रतीकों, लोकोक्तियों और कहावतों का समूल बहिष्कार किया जाना चाहिए।’’4 किन्तु कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर सरीखे विद्वानों के लिए इन पुस्तकों का कोई मूल्य-महत्त्व नहीं। सौतेली माँ का मिथ स्त्री उपेक्षा, चरित्र-हनन और स्त्री शोषण का सबसे कारगर हथियार है। कदाचित आज तक ऐसा कोई सर्वे या अनुसंधान नहीं हुआ है जो सौतेली माँ को खलनायिका प्रमाणित करे। किन्तु शायद ही हिन्दी की कोई पाठ्यपुस्तक होगी जिसमें सौतेली माँ के बहाने स्त्री को जलील न किया जाता हो। मैंने अपने शोध के दरम्यान सिर्फ 25 सौतेली माताओं से मिला तो उसका नतीजा आश्चर्यजनक था। सौतेली मां की हृदय विदारक पीड़ा यह थी कि उनके लिए ‘दूध-माछ’ दोनों हानिकारक था। उन्होंने कहा कि यदि मैं अपेन सौतेले बेटे को कुछ नहीं कहती हूँ और अगर वह शरारत करता है तो लोग कहते हैं कि सौतेली माँ है न? हमारे पड़ोस की महिला अपनी संतान को खूब मारती-पिटती है किन्तु उसे कोई कुछ नहीं कहता।

एनसीईआरटी की पाठ्यपुस्तक भी इस मिथ का शिकार रही है। हिन्दी के परमादरणीय विद्वान आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का एक निबंध नौवी कक्षा की पाठ्यपुस्तक पराग भाग-एक में संकालित है। 1989 में प्रकाशित ‘आत्मनिर्भरता’ नामक पाठ का आरंभ ही इन पंक्तियों से होता है, ‘‘नम्रता ही स्वतंत्रता की धात्री व माता है। लोग भ्रमवश अहंकार वृत्ति को उसकी माता समझ बैठते हैं, पर वह उनकी सौतेली माता है जो उनका सत्यानाश करती है।’’5 आचार्य शुल्क ने सौतेली माता को बच्चों का सत्यानाश करने वाली माना हैं। गनीमत है कि आगे उन्होंने इस सूत्र वाक्य को विस्तार नहीं दिया है। अभ्यास प्रश्न बनाने वालों को मानो इन दो पंक्तियों में ज्ञान की कुंजी मिल गई। सिर्फ इन दो पंक्तियों के आधार पर दो-दो सवाल पुस्तक में पूछे गए है: सवान नं.-1 ‘‘अहंकार वृत्ति सौतेली माता कैसे है?’’6 पाठ्यपुस्तक मंे इस प्रश्न के उत्तर का संकेत कहीं नहीं है। दावे के साथ कहा जा सकता है कि इस प्रश्न का उत्तर प्रश्न बनाने वाला भी नहीं कर सकता है?

सवाल नं.-2 ‘‘सौतेली माता अपने सौतेले पुत्रों को कैसे हानि पहुँचाती है?’’7 सवाल में इस उत्तर का स्पेस ही नहीं छोड़ा गया कि बच्चे यह लिखें कि कई सौतेली माताएँ ऐसी भी होती हैं जो कभी भी अपनी संतान को हानि पहुँचाती है। अभ्यास में पूछे गए प्रश्न के आधार पर ऐसे बच्चों की दुर्दशा की कल्पना की जा सकती है जिनकी सौतेली माँ बहुत अच्छी होंगी। ऐसे पाठों की संख्या भी कम नहीं है जो स्त्रियों को पति को परमेश्वर मानने की सीख देता है। यह मात्र संयोग नहीं है कि प्रो. कृष्ण कुमार को एक बच्ची का काँपी में लिखे प्रश्नोत्तर आज भी याद है जिसमें लिखा हुआ था – ‘‘सावित्री को आदर्श स्त्री क्यों कहा जाता है?’’8 उत्तर में  बच्ची ने लिखा था – ‘‘क्योंकि वह पतिव्रता नारी थी।’’9 उस बच्ची के लिए एक स्त्री का आदर्श सिर्फ और सिर्फ पतिव्रता होना है।

पाठ्यपुस्तकों में स्त्रियों और दलितों की अनुपस्थिति और हशिये पर उनकी दयनीय उपस्थिति का गहरा राजनीतिक सरोकार है। पुरुष वर्चस्व और सवर्ण वर्चस्व का सत्ता के साथ साँठ-गाँठ सर्वविदित तथ्य है। सीधे-सीधे राजनीति पर निम्न जातियों और दलितों का उभार तो वोट का समीकरण है। इस तरह की मानसिकता वाले रचनाकारों का सीधा प्रयास यह होता है कि भारत की संस्कृति को एक तथाकथित पुरुष-सवर्ण हिंदू संस्कृति के रूप में तब्दील कर दिया जाय। इसके लिए पाठ्यपुस्तक में हर प्रकार के गैर ब्राह्मणवादी और स्त्रियों के योगदान को झुठलाने की कोशिश की जाती है।

इसका पक्का प्रमाण पाठ्यपुस्तकों में विन्यस्त जीवन-चरित परक पाठ है। राम, कृष्ण, आदि खास तरह के मिथकीय चरित्रों से पाठ्यपुस्तक भरी होती है। उसमें गैर हिंदू, गैर-सवर्ण और गैर स्त्री चरित्र हाशिये पर भी शायद ही दिखें। जबकि दलितों और स्त्रियों मंे चरित नायकों की कमी नहीं है। देश के विभिन्न अंचलों में प्रचालित लोक गाथाओं के लगभग सभी चरित्र दलित वर्ग से आते है। जैसे सलहेस, दुलरादयाल, दीनाभ्रदी, सती मंजरी आदि। लेकिन ये पाठ्यपुस्तक में  नहीं आ सकते। देश की अधिकांश जनता जिन लोक गाथाओं और लोक संस्कृतियों में जीती है, उन्हें पाठ्यपुस्तकों में  फटकने न देना एक खास तरह की राष्ट्रीयता की अवरधारणा को सर्वानुमति प्रदान कराने का चालाक तरीका है। शिक्षाविद कृष्ण कुमार ने इसका तीखा विरोध करते हुए लिखा है, ‘‘अपनी सांस्कृतिक विरासत के सांचे में  डालने, अपने अतीत के गौरव में जीने और उसे जिलाने तथा अपने मिथकीय आख्यानों पर राष्ट्रीयता का मुलम्मा चढ़ाने की चेष्टाएँ एक भाग्यवादी मानसिकता से ही उत्पन्न होती है। राम, कृष्ण दुष्यंत कितने ही महान क्यों न रहे हों अंततः वे उस व्यवस्था के अंग के जिसमें राजा के जीवन, जन्म, विवाह और मरण उनक अतिविशिष्ट सामाजिक स्थिति के परिचायक होते थे।10

ऐसा नहीं कहा जा सकता है कि एनसीईआरटी के इन पाठ्यपुस्तकों में स्त्रियों की ऐसी ही घिसी-पिटी स्टीरियो  टाइप छवि से हमारा साक्षात्कार होता है बल्कि कई स्थानों पर स्त्रियों की छवि काफी प्रभावशाली भी दिखती है। किंतु कठिनाई यह है कि इन पाठ्यपुस्तकों में  दलितों और स्त्रियों के व्यक्तित्व विश्लेषण में  वैचारिक सुसम्बद्धता और परिपक्वता की घोर कमी है। सुखद तथ्य यह है कि राष्ट्रीय पाठ्यचर्या 2005 के अन्तर्गत प्रकाशित होने वाली पाठ्यपुस्तकों में इन कमियों को बहुत हद तक दूर करने की सफल चेष्टा की गई है। इन पाठ्यपुस्तकों में  सर्वाधिक ध्यान देने वाली बात यह है कि पाठों के चयन में रचनाकार की ‘महानता’ को शर्त नहीं माना गया है। पाठों के चयन में शुचिता से अधिक संवेदना की सच्चाई और गहराई पर ध्यान दिया गया है। पाठ्यक्रम में  दो टूक कहा गया है कि ‘‘स्त्रियों की आवाज को अपनी दमक ऐश्वर्य एवं विविधता के साथ हमारी पाठ्यपुस्तकों तथा शिक्षण पद्धतियों में महत्वपूर्ण स्थान देने की आवश्यकता है।12 यही कारण है की जहाँ
सातवीं की पुरानी पाठ्यपुस्तक औरतों के सती होने से उल्लसित थी वहीं नयी पाठ्यपुस्तक क्षितिज की चपला देवी 1857 के महासंग्राम में अंग्रेजों के खिलाफ जंग छेड़ देती है और अंग्रेज उसे जला डालते हैं। वह पति की मृत्युपरांत यौन शुचिता हेतु यहाँ जौहर नहीं करती बल्कि देश की आजादी हेतु मरना स्वीकार करती है। यह फर्क है दोनों पाठ्यपुस्तकों में। एक पाठ्यपुस्तक में वह अबला है, निरीह है तो दूसरी में वह अंग्रेजों से लड़ने के लिए कमर कसती है।

ग्यारहवीं की नयी आधार पाठ्यपुस्तक आरोह तथा अंतरा पुरानी पाठ्यपुस्तकों को  धता बताते हुए उभरते हुए किशोर-किशारियों को दलित और स्त्री विमर्श से साक्षात्कार कराती है। जड़ परंपरा और खास तरह की शुद्धतावादी-पवित्रतावादी अवधारणा के बरक्स सिक्के के दूसरे पहलू से कदाचित पहली बार विद्यार्थियों को रू-ब-रू कराने की कोशिश् की गई है। ऐसे दलित  और स्त्री विमर्श के पाठों को पढ़ाने में सर्वाधिक कठिनाई शिक्षकों को होगी। इन पाठों को पढ़ाते हुए शिक्षकों को सर्वप्रथम अपने-आप से जूझना होगा। आज तक वे जिस सांचे में सोच-विचार रहे थे, थोड़े बहुत हेर-फेर के साथ वही पढ़ा भी रहे थे। उन्हें पहली बार इन पंक्तियों को पढ़ाना पड़ेगा कि, ‘‘सच का सवेरा होते ही वेद डूब गए, विद्या शूद्रों के घर चली गई। भू देव ब्राह्मण शरमा गए।’’13 जिस वेद का यशोगान करते-करते उनकी जिह्वा थकती नहीं थी उन्हें ज्योतिबा फुले  के बारे में पढ़ाना पड़ेगा और जब उन्हें  ज्योतिबा फुले  सरीखे अद्भुत व्यक्ति की जीवनी पढ़ानी पड़ेगी तो उन्हें यह भी पढ़ाना पड़ेगा कि कैसे समाज सुधारकों की सूची से तथाकथित सम्भ्रान्त उच्च वर्ण के समीक्षकों/विद्वानों ने महात्मा फूले का नाम गायब कर दिया। पाठ्यपुस्तक के अनुसार, ‘‘यह ब्राह्ममणी मानसिकता की असिलयत का पर्दाफाश करता है। (अंतरा भाग-1) इस पाठ में ज्योतिबा फुले  के शब्दों में ‘‘यदि आधुनिक शिक्षा का लाभ सिर्फ उच्च वर्ण को मिलता है तो उसमें शूद्रों का क्या स्थान रहेगा? गरीबों से कर जमा करना और उसे उच्च वर्णाें के बच्चों की शिक्षा पर खर्च करना किसे चाहिए ऐसी शिक्षा?14

पहले की पाठ्यपुस्तकों में भी प्रेमचंद की कहानिायाँ संकलित होती रही है किन्तु कबीर और प्रेमचंद की रचना संकलन में संपादक अतिरिक्त सावधानी बरते रहे हैं। पंच परमेश्वर, ईदगाह तथा दो बैलों की कथा ही बच्चों को पढ़ने लायक समझा जाता रहा। ‘आरोह’ में प्रेमचंद की कहानी ‘दूध का दाम’ जाति प्रथा की अमानवीयता को
तार-तार करती निकलती है। अंतरा भाग-एक में सुप्रसिद्ध हिन्दी दलित कथाकार ओमप्रकाश बाल्मीकि की कहानी ‘खानाबदोश’ मजदूर वर्ग के शोषण, यातना और जाति विभेद की समस्या का समाजशास्त्रीय विश्लेषण करती है। दलित साहित्य के नाम से ही बिदकने वाले हिन्दी के अति शुचितावादी साहित्यकारों और शिक्षकों को ऐसी कहानियों को पढ़ाने में काफी परेशानी होगी। अपने को वर्गच्युत किए वगैर इन रचनाओं को पढ़ा पाना संभव नहीं है। अंतरा में ही श्रीकांत वर्मा की कविता ‘हस्तक्षेप’ केवल राजनीतिक-सामाजिक व्यवस्था में हस्तक्षेप करती कविता नहीं है बल्कि हिन्दी पाठ्यपुस्तक में हस्तक्षेप करती कविता है। वास्तव में प्रो. कृष्ण कुमार के निर्देशन मंे यह ऐसा हस्तक्षेप है जो बकोल श्रीकांत वर्मा ‘एक बार शुरू होने पर कहीं नहीं रूकता हस्तक्षेप’। और इसी हस्तक्षेप की अगली कड़ी है धूमिल की कविता ‘मोचीराम’ जिसकी नजर में
न कोई छोटा है, न कोई बड़ा
मेरे लिए, हर आदमी एक जोडी जूता है
जो मेरे सामने मरम्मत के लिए खड़ा है।15

इस दृष्टि से रहा-सहा कसर पांडेय वेचन शर्मा उग्र की आत्मकथा ‘अपनी खबर’ पूरा कर देती है। इस आत्मकथा के मार्फत ब्राह्मणवाद की सारी कुलीनता श्रेष्ठता पछाड़ खाकर गिर पड़ती है। यही वजह है कि इन पाठों के विरोध में कुछ खास तरह के लोगों ने जोरदार विरोध किया। इस विरोध के कारण एनसीईआरटी को तत्काल कुछ पाठों को संकलन से हटाना पड़ा।सारे विरोध के बावजूद इन पाठ्यपुस्तकों में  दलित और स्त्री उपस्थिति उम्मीद जगाती है। हम सभी जानते है कि अगर दुनिया सुंदर है, सुविधापूर्ण है तो उसमें दलितों का सर्वाधिक योगदान है। लेकिन पूर्व के पाठ्यपुस्तकों में उनके इस महत्वूपर्ण योगदान को रेखांकित नहीं  किया गया था। आठवीं की नयी पाठ्यपुस्तक वसंत-भाग-तीन में सुभाष गताडे का एक पाठ है-‘पहाड़ से ऊँचा आदमी’। गया जिले के गेलौर गाँव में 1934 ई. में एक ऐसे सख्श का जन्म हुआ, जिसके कारनामे चकित ही नहीं दंग भी करते है। घोर दलित दशरथ मांझी ने 360 फीट लंबा और 30 फीट चैड़ा पहाड़ काट कर रास्ता बनाने का ऐतिहासिक काम किया। गेलौर गाँव से अस्पताल 80 किलोमीर दूर था। दशरथ मांझी ने बुलंद हौसले के बदौलत 30 वर्षाें में उस रास्ते को घटाकर महज 13 किलोमीटर मंे तब्दील कर दिया। दूरी की वजह से देर से अस्पताल पहुंचने के कारण दशरथ मांझी की पत्नी उस पहाड़ी रास्ते मंे दम तोड़ दी थी। उसी दिन उसने तय किया कि अब कोई दूरी की वजह से नहीं मरेगा ‘नया दौर’ फिल्म मंे साहिर लुधियानवी के गीत –
फौलादी है सीने अपने फौलादी हैं बाहें
हम चाहें तो चट्टानों में पैदा कर दें राहें।
को दशरथ माँझी ने सच साबित कर दिया। कदाचित इसीलिए पाठ्यपुस्तक में इस फिल्मी गीत को भी संकलित किय गया है। आज जब हम लड़कियों को साइकिल चलाते देखते हैं तो वह सामान्य-सी बात लगती है, किन्तु लड़कियों में आत्मविश्वास और साहस का संचार करने में  साइकलिंग की भूमिका अत्यंत महत्वूपर्ण है। इसी पाठ्यपुसतक में ‘जहाँ पहिया है’ नाम से एक ऐसा पाठ संकलित है जो तमिलनाडु के पडुकोट्टई गाँव में  साइकिल के माध्यम से हुए सामाजिक आंदोलन की रोचक और रोमांचक घटना को रेखांकित करता है। बारहवीं की पाठ्यपुस्तक वितान भाग-2 में ऐन फ्रैंक के डायरी अंश ‘द डायरी आॅफ ए गर्ल’ तथा इसी कक्षा की पूरक पाठ्यपुस्तक वितान, भाग-एक में बेबी हालदार का ‘आलो आंधारि’ (अंधेरे का उजाला) का अंश स्त्री विमर्श पर छात्र-छात्राओं को नयी रौशनी प्रदान करेगी। कक्षा नौ की पाठ्यपुस्तक में सर्वप्रथम एवरेस्ट पर चढ़ने वाली महिला बचेंद्रीपाल पर आधारित पाठ लड़कियों में यह विश्वास दिलाने में सफल होगा कि दुनिया का कोई भी काम स्त्रियों के लिए असंभव नहीं है। ज्योतिबा फूले सन् 1840 के आस-पास इस बात को समझ रहे थे कि स्त्री पराधीनता के बीज तत्व विवाह और वैवाहिक मंत्रों में निहित हैं। इसलिए उन्होंने विवाह के नये मंत्र बनाने शुरू किए। ज्योतिबा फूले की जीवनी पर आधारित पाठ में उनके द्वारा निर्मित कुछ मंत्रों का उल्लेख किया गया है। उसमें एक मंत्र  इस प्रकार है, ‘‘स्वतंत्रता का अनुभव हम स्त्रियों में है ही नहीं। इस बात की आज हम शपथ लें कि स्त्री को उसका अधिकार देंगे और उसे अपनी स्वतंत्रता   का अनुभव करने देंगे।’’

ऐसा नहीं कहा जा सकता है कि राष्ट्रीय पाठ्यचर्या-2005 के अंतर्गत प्रकाशित सभी पाठ्यपुस्तकें बिल्कुल ठीक और चुस्त-दुरूस्त है, उसमें भी अपेक्षित सुधार की आवश्यकता है। बच्चों की पाठ्य सामग्री अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। हम सबों को इन सामग्रियों पर ध्यान देने की आवश्यकता है। अगर हमें बच्चों का बचपना, बचाकर रखना है, उन्हें स्वस्थ लोकतांत्रिक नागरिक बनाना है तो इसके लिए हम सबों को सामूहिक प्रयास करना होगा।’’ ‘अरोह’ पाठ्यपुस्तक में संकलित निर्मला पुतुल के शब्दों में –
इस अविश्वास भरे दौर में
थोड़ा – सा विश्वास
थोड़ी सी उम्मीद
थोड़े से सपने
आओ मिलकर बचाएँ
कि इस दौर में भी बचाने को
बहुत कुछ बचा है,
अब भी हमारे पास।17

संदर्भ स्रोत:
1. किशोर भारती, भाग-2, एनसीईआरटी 1987, पृ. 120
2. उपर्युक्त, पृ. 120.
3. उपर्युक्त,
4. इमेज आॅफ वूमेन एंड कैरिकुलम इन मदर टंग-एनसीईआरटी 1991, पृ. 17.
5. पराग भाग-एक, एनसीईआरटी 1989, पृ. 17.
6. उपर्युक्त.
7. उपर्युक्त.
8. राज, समजा और शिक्षा कृष्ण, कुमार, राजकमल प्रकाशन, 1999, पृ. 91-92.
9. उपर्युक्त
10. परिप्रेक्ष्य, नीपा, वर्ष-1, अंक-1, पृ. 21.
11. भाषाओं को पढ़ाने के लिए पाठ्यक्रम, मई 2005, हिन्दी, एनसीईआरटी पृ.8
12. अंतरा, भाग-एक, एनसीईआरटी, 2006, पृ. 56
13. उपर्युक्त, पृ. 57.
14. उपर्युक्त, पृ. 173.
15. उपयुक्त, पृ. 58.
16. आरोह, एनसीईआरटी, 2006 पृ. 181.

अरूणा शानबाग – आखिर कब तक???

ज्योति गुप्ता

अरूणा शानबाग का निधन हमारी खोखली व्यवस्था पर कई सवाल उठाता है। यातना में बिताए उसके हर वो पल पूछ रहे हैं कि कब होगा इस अमानवीय मनोवृत्ति का अंत , कब लड़कियाँ निकल पाएंगी बिना किसी भय के बाहर , कब आयेगा वह दिन जब हम स्त्री और स्त्री शरीर से नहीं मनुश्य के स्तर पर जाने जाएंगे , उसकी
मौत चीख रही है , चिल्ला रही है , बलात्कारियों के खिलाफ आवाज़ उठा रही है। हमारी न्याय व्यवस्था से पूछ रही है कि कब होगा इस अमानवीय सिलसिला का अंत।

औरत बलात्कार तथा यौन-शोषण की आड़ में सिर्फ शरीर है जिस पर आदमी के मन में बैठा राक्षस कभी भी टूट पड़ता है। अरूणा शानबाग पिछले 42 सालों से जिस जिंदगी को जी रही थी या यूं  कहें कि जिसे जीने के लिए वह अभिशप्त थीं , उसकी जवाबदेही कौन है। पीडि़ता के अपराधी को सात साल की सजा़ हुई लेकिन जो कष्ट अरूणा ने झेला उसका अंदाजा नहीं लगाया जा सकता।

 सदियों से स्त्री के आंसू बहते आ रहे हैं। युग बदला , समय बदला , औरत की स्थिति  नहीं बदली। अरूणा की कल्पना करते दिल दहल उठता है , वितृष्णा होती है हमारी न्याय व्यवस्था के प्रति क्योंकि अपराधी सात साल की सज़ा काटकर छूट जाता है लेकिन पीडि़ता बयालिस साल तक लाश बनकर जीती रही। केईएम के वार्ड नं0 चार से लगे एक छोटे से कक्ष में बयालिस वर्षों  से जिंदगी से जूझ रही थी। इस पीडि़ता ने आदमी की मार तो झेली साथ ही प्रकृति तथा हमारी कानून व्यवस्था की मार भी झेली , जिसमें उसे इच्छा मृत्यु भी नसीब न हुई।

 मौत से बदतर जिंदगी उसने क्यों जिया , कानून ने उसे इच्छा मृत्यु क्यों नहीं दी , बलात्कार के बाद लड़की समाज की नज़र में उपेक्षित क्यों हो जाती है,  ऐसे न जाने कितने प्रश्न हैं जिसका जवाब अरूणा की मौत मांगती है। छिन्नमस्ता की प्रिया,सोना चैधरी, इमराना ,कोलकाता की नन या निर्भया इत्यादि न जाने कितनी पीडि़ता हैं जो चीख-चीखकर पूछ रही हैं कि आखिर कब तक हमें सिर्फ शरीर के रूप में देखा जाएगा , कब थमेगा यह सिलसिला। निर्भया की मौत हमारी न्याय व्यवस्था का कौन सा रूप दिखा रही है , जहाँ आरोपी से की गई पूछताछ में वह निर्भया को ही दोषी ठहराता है। लड़की के साथ हुए बलात्कार के बाद बचाव पक्ष की जो दलील  आती है,  उसमें लड़की को दोषी ठहराते हुए यह कहा जाता है कि उसने भड़काउ कपड़े पहने थे,लड़कियों           को देर रात घर से बाहर नहीं निकलना चाहिए इत्यादि- इत्यादि। यहां एक प्रश्न उठता है कि क्या दो या पांच साल की बच्ची के साथ जो रेप होते हैं, उसके लिए भी उनके कपड़े जिम्मेदार हैं। हिंदी की प्रसिद्ध लेखिका प्रभा खेतान अपनी उपन्यास छिन्नमस्ता में इसका जवाब मांगती हुई कहती हैं ‘‘कब और कहां मुझ पर आक्रमण नहीं हुआ? वह कैसा बचपन था? क्या पुरूश की कामुक हवश का शिकार होने से मासूम लड़कियां बच पाती हैं? क्या मेरा बचपन न केवल भाई ने बल्कि एक दिन एक नौकर ने भी मुझे अपने गोद में बिठाया था। बहुत छोटी थी , पाॅच साल की।’’1 प्रभा खेतान का यह सवाल पूरी पुरूष जाति से है , पूरी व्यवस्था से है ,जो अपनी  क्रूरता तले हर लड़की को रौंदना चाहता है।

अरूणा शानबाग के साथ एक विडम्बना और जुड़ी है जो संभवतः हर औरत के साथ है – वह है औरत की इज्जत और मान-मर्यादा, जिसकी दुहाई देते हुए औरत को इस अमानवीयता को बर्दाश्त करने के लिए बाध्य किया जाता है। अरूणा पर बलात्कार , अप्राकृतिक यौन हमला और कुत्ते की चेन से उसकी हत्या के प्रयास के बाद भी उसकी तथाकथित बदनामी के भय से आरोपी के खिलाफ हत्या की कोशिश और डकैती का मामला दर्ज किया गया। यह इस क्रूर व्यवस्था का ही कुप्रभाव है , जिसकी शिकार हर स्तर पर औरत है। नमिता सिंह ने अपने आलेख ‘कुचला जाता हर रोज आंचल’ में लिखा है ‘‘दो-दो साल की बच्ची से लेकर प्रौढा तक। कैसा राक्षस छिपा बैठा है आदमी के मन में। वह कुछ नहीं देखता,कुछ नहीं सोचता। कोई संवेदना…जरा सी भी कोमल भावना … स्नेह की  गर्माहट…शेष  नहीं रहती। सब कुछ सिर्फ औरत-मर्द के आदिम रिश्तों तक सीमित हो जाता है। यह एक ऐसा छिपा हुआ राक्षस है जो दिखाई नहीं देता। जिसके दंश औरत जात को कब लहु लूहान कर दे, कोई पता नहीं। यहां सिर्फ चित्कार है, विस्फोट है जिसकी गंूज बाहर नहीं जाती। घुट कर रह जाती हैं कभी अपने अंदर और कभी चहारदिवारी के भीतर। रोना मना है… बोलना, कुछ भी कहना मना है। घर की इज्जत , घर की मान-मर्यादा। पता नहीं क्यों हमारे समाज में ईंट -गारे -मिट्टी से बने घर की मर्यादा होती है लेकिन जीती जागती …हाड़-मांस की बनी औरत की इज्जत और मर्यादा की बात कोई नहीं करता।’’2 अतः हमें इस सोंच से निकलना होगा। ये तमाम पीडि़ता अपनी मौत के बाद भी हमारी व्यवस्था के सामने एक प्रश्न बनी रहेंगी। प्रभा खेतान ने भी बड़े दुख के साथ छिन्नमस्ता में कहा ‘‘औरत कहां नहीं रोती? सड़क पर झााड़ू लगाते हुए , खेतों में काम करते हुए , एयरपोर्ट पर बाथरूम साफ करते हुए या फिर सारे भोग- ऐश्वर्य के बावजूद मेरी सासूजी की तरह पलंग पर रात-रातभर अकेले करवट बदलते हुए। हाड़-मांस की बनी ये औरतें …अपने-अपने तरीके से जिंदगी जीने की कोशिश में छटपटाती ये औरतें। हजारों सालों से इनके आंसू बहते आ रहे हैं।3 अतः हम कह सकते हैं कि औरत को औरत होने की सज़ा मिलती है। बाहर निकली, अपनी इच्छा से जीने वाली हर स्त्री को पल-पल यह डर बना रहता है कि उसके साथ कुछ गलत न हो जाए , घर में रहने वाली औरत तमाम तरह के घरेलू हिंसा सहने के लिए बाध्य है।

औरत घर में भी बलात्कार तथा यौन शोषण का शिकार होती है। व्यभिचार तथा संभोग में स्त्री की सहमति हाती है लेकिन बलात्कार उसकी इच्छा के विरूद्ध एक अमानवीय अत्याचार है। इसके उपरांत समाज लड़कियों को हीन नज़र से देखता है, हमें इस मनोवृत्ति को बदलना चाहिए तथा किसकी शीलता भंग हुई , किसकी नहीं , यह सोचे बिना पीडि़ता आत्म निर्भर जिंदगी जी सके , इस दिशा में उन्हें प्रोत्साहित करना चाहिए।

संदर्भ-सूची

1. खेतान प्रभा – छिन्नमस्ता, पहला संस्करण-1993,दूसरी आवृत्ति-2004, राजकमल प्रकाशन प्रा0 लि0,नई दिल्ली-110002,पृ0 सं0-119

2.सिंह नमिता – ‘कुचला जाता हर रोज आंचल’,संपादक-महेंद्र मोहन गुप्ता,दैनिक जागरण कसौटी अंक-2 सितम्बर,2005,जमशेदपुर,पृ0 सं0-1

3.खेतान प्रभा – छिन्नमस्ता, पहला संस्करण-1993,दूसरी आवृत्ति-2004, राजकमल प्रकाशन प्रा0 लि0,नई दिल्ली-110002,पृ0 सं0-220

संपर्क : jyotigupta1999@rediffmail.com

अरुणा , मथुरा , माया , प्रियंका , निर्भया , इमराना : क्या आप इन्हें जानते हैं !



कल अरुणा शानबाग ने आख़िरी सांस ली . कल फिर उसके साथ हुए वीभत्स अत्याचार की कहानी मीडिया और सोशल मीडिया में ताजा हो गई. हम जिस समाज में रहते हैं , वहां स्त्री न सिर्फ एक देह है, बल्कि पुरुष की कुंठा , उसके बदले की भावना , जातीय अहम के लिए एक प्राइम साइट की तरह हैं . आज अरुणा के बहाने स्त्रीकाल के पाठकों को हम बलात्कार की कुछ ऐसी घटनाओं की याद दिला रहे हैं , जिनका समाज पर न सिर्फ व्यापक असर हुआ  बल्कि  स्त्री के पक्ष में कानूनी बदलाव के कारण बने वे. ये वैसी घटनायें हैं , जो स्त्री को कम कपड़े और मर्यादा में रहने की हिदायत देने वाली जमात को जवाब दे सकें , क्योंकि इन घटनाओं में स्त्री पर यौन हिंसा , जातीय घृणा , मर्दवादी अकड़, ताकत और शौर्य के प्रदर्शन , बदले की भावना  के कारण हुए  है , जिसके पीछे धार्मिक नियमों का वहशीपन भी उजागर हुआ है . 

1. मथुरा

महाराष्ट्र के चन्द्रपुर जिले के नवरगाँव में रहने वाली आदिवासी महिला मथुरा वह पीडिता थी , जो भारत में बलात्कार के क़ानून में बदलाव के लिए हुए पहले आन्दोलन का कारण बनी . इस केस के बाद ८० के दशक में महिलाओं के खिलाफ यौन हिंसा के विरोध में और महिलाओं के पक्ष में सम्मानजनक क़ानून बनवाने के लिए देशव्यापी आन्दोलन हुए तथा १९८३ में भारत सरकार बलात्कार संबंधी क़ानून को लेकर महिलाओं के पक्ष में एक कदम और आगे बढ़ी. १९८३ में क़ानून में बदलाव के बाद भारतीय दंड संहिता ( IPC) में बलात्कार की धारा ३७६ में चार उपधाराएं ए, बी ,सी और डी  जोड़कर हिरासत में बलात्कार के लिए सजा का प्रावधान किया गया . बलात्कार पीडिता से ‘बर्डन ऑफ़ प्रूफ’ हटाकर आरोपी पर डाला गया , यानी अपने ऊपर बलात्कार होने को सिद्ध करने के लिए पीडिता को जिस जहालत और अपमान से गुजरना पड़ता था , उससे उसे मुक्ति मिली और अब आरोपी के ऊपर खुद को निर्दोष सिद्ध करने की जिम्मेवारी आ गई. भरी अदालत में अपमानजनक प्रक्रिया से गुजरना भी ख़त्म हुआ और ऑन कैमरा सुनवाई की व्यवस्था हुई .

१९७२ में महाराष्ट्र के गढ़चिरोली जिले  के देसाईगंज  थाने में अपने दोस्त अशोक के खिलाफ अपने भाई के द्वारा दर्ज मामले में बयान के लिए आई १६ वर्ष की मथुरा मडावी के साथ थाने के दो पुलिस कांस्टेबल गणपत और तुकाराम ने थाना परिसर में ही बलात्कार किया था. मथुरा के भाई ने मथुरा के दोस्त पर उसे बहलाने और अपहरण करने की कोशिश का आरोप लगाया था. इस घटना के विरोध में स्थानीय लोगों के हंगामे के बाद थाने में केस तो दर्ज हुआ लेकिन १९७४ में निचली अदालत  ने दोनो आरोपियों को इस बिना पर छोड़ दिया कि मथुरा ‘सेक्स की आदि’ थी और उसपर चोट के कोई निशान नहीं थे , तथा उसने विरोध  या हंगामा नहीं किया था . बॉम्बे उच्च न्यायालय के नागपुर बेंच ने  निचली अदालत के निर्णय को इस आधार पर खारिज कर दिया कि थाना परिसर में पुलिस के कांस्टेबल के द्वारा डरा कर किया गया बलात्कार सहमति के साथ संबंध नहीं हो सकता. १९७९ में सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को फिर से बहाल कर दिया और आरोपियों को दोषमुक्त कर दिया. आरोपियों की ओर से वकील थे प्रसिद्द एडवोकेट राम जेठमलानी. सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ क़ानून के प्राध्यापकों , उपेन्द्र बक्सी , रघुनाथ केलकर , लोतिका सरकार और वसुधा धागम्वार ने सुप्रीम कोर्ट को एक खुला पत्र लिखा. इसके बाद देशव्यापी महिला -आन्दोलन शुरू हुए और १९८३ में भारत सरकार को बलात्कार क़ानून को और संवेदनशील बनाना पडा .

2. अरुणा शानबाग़ 


अरुणा शानबाग केईएम अस्पताल मुंबई में काम करने वाली एक नर्स थीं. जिनके साथ 27 नवंबर 1973 में अस्पताल के ही एक वार्ड ब्वॉय ने बलात्कार किया था. उस वार्ड ब्वॉय ने यौन शोषण के दौरान अरुणा के गले में एक जंजीर बांध दी थी. उसी जंजीर के दबाव से अरुणा उस घटना के बाद कोमा में चली गयीं और फिर कभी सामान्य नहीं हो सकीं. उस घटना के बाद पिछले 42 वर्षों से अरुणा शानबाग कोमा में थीं. अरुणा की स्थिति को देखते हुए उनके लिए इच्छा मृत्यु की मांग करते हुए एक याचिका भी दायर की गयी थी, लेकिन कोर्ट ने इच्छामृत्यु की मांग को ठुकरा दिया था.  हालांकि इस मामले की सुनवाई करते हुए मौत और जिन्दगी के बीच जूझ रहे लोगों के लिए क्रमिक इच्छामृत्यु का प्रावधान कोर्ट ने कर दिया . यानी परिवार के चाहने पर ऐसे व्यक्ति को जीवन रक्षक उपायों से धीरे -धीरे मुक्त करते हुए मरने की अनुमति दे दी . अरुणा की जिंदगी के साथ खिलवाड़ करने वाले दरिंदे का नाम सोहनलाल था. जिसे कोर्ट ने सजा तो दी, लेकिन वह अरुणा के साथ किये गये अपराध के मुकाबले काफी कम था.

पढ़ें  :  ( अरुणा शानबाग सिर्फ बलात्कार पीडिता ही नहीं थी .)


3. माया त्यागी  : 

गाजियाबाद निवासी ईश्वर त्यागी अपने दो साथियों और पत्‍‌नी माया त्यागी के साथ 18 जून 1980 को बागपत के पास एक शादी में शरीक होने आ रहे थे। बागपत में उनकी कार पंचर हो गई। कार ठीक करने के दौरान बागपत में तैनात एक एसआई नरेंद्र सिंह के साथ ईश्वर त्यागी और उनके साथियों की कहासुनी हो गई। नरेंद्र सिंह उस समय तो वहां से चला गया और कुछ ही देर बाद अपने कुछ साथी पुलिसकर्मियों के साथ वापस लौटा। नरेंद्र सिंह ने ईश्वर त्यागी और उनके दोनों साथियों की गोली मारकर हत्या कर दी और ईश्वर की पत्‍‌नी माया त्यागी को पूरे बाजार में निर्वस्त्र घुमाया। बाद में उनके खिलाफ कई मुकदमें दर्ज कर दिए।

आरोप था कि पुलिसकर्मियों ने माया के साथ दुष्कर्म भी किया। इस प्रकरण के बाद महिला आन्दोलन का गुस्सा फूटा , जनांदोलन तेज हुआ  । सरकार को न्यायिक जांच और सीबीसीआईडी जांच का आदेश देना पड़ा जिसमें 11 पुलिसकर्मियों को दोषी पाया गया। कोर्ट ने इनमें से 6 पुलिसकर्मियों को उम्र कैद की सजा सुनाई थी। मुख्य आरोपी नरेंद्र सिंह की घटना के कुछ ही दिन बाद हत्या हो गई थी, जिसके आरोप में माया त्यागी के देवर विनोद त्यागी जो उत्तरप्रदेश पुलिस में कांस्टेबल था उसे फंसा दिया गया। हालांकि वर्ष 2009 में विनोद त्यागी को नरेंद्र सिंह की हत्या के आरोप से कोर्ट ने बरी कर दिया था।

4. प्रियंका 

महाराष्ट्र के भंडारा के खैरलांजी में  सन् 2006 सिंतबर में करीब 50 लोगों ने दलित किसान भैयालाल भोतमांगे की पत्नी और उनके तीन बच्चों की गला काट कर निर्मम तरीके से हत्या कर दी थी। ह्त्या के पूर्व भैया लाल की बेटी ‘ प्रियंका पर यौन हिंसा भी की गई थी . उसके गुप्तांगों में रॉड डालने का आरोप भी है .  इसके बाद दलितों ने व्यापक विरोध प्रदर्शन किया था। राज्य सरकार ने मामला तूल पकड़ता देख पूरे मामले की छानबीन सीबीआई से कराने का आदेश दिया था।सीबीआई ने 11 लोगों के खिलाफ आपराधिक षड्यंत्र रचने, हत्या, महिलाओं की गरिमा से खिलवाड़ करने और सबूत मिटाने की कोशिश करने का आरोप दाखिल किया था।  समूचे महाराष्ट्र को हिला देनेवाले खैरलांजी हत्याकांड में दोषी 8 लोगों में से 6 को फांसी की सजा और 2 को उम्रकैद की सजा सुनाई गई. यह घटना जातीय हिंसा और बदले का उदहारण है .

5. इमराना 

उत्तरप्रदेश के मुजफ्फरनगर की इमराना के साथ उसके 69 वर्षीय ससुर ने बलात्कार किया था. इसके बाद धार्मिक पंचायत ने उसके पति को उसका बेटा करार दिया. और पति के साथ उसके निकाह को अवैध घोषित कर दिया. दारूल उलूम देवबंद ने भी धार्मिक पंचायत के फैसले को जायज ठहराया , जबकि बाद में देवबंद ने ऐसा कोई फतवा घोषित करने से इनकार कर दिया. हंगामे के बाद अभियुक्त मोहम्मद अली गिरफ्तार हुआ.

6. निर्भया 


दिल्ली में अपने पुरुष मित्र के साथ बस में सफर कर रही निर्भया के साथ 16 दिसम्बर 2012 की रात में बस के ड्राईवर , कंडक्टर  व उसके अन्य साथियों द्वारा पहले भद्दी-भद्दी फब्तियाँ कसी गयीं और जब उन दोनों ने इसका विरोध किया तो उन्हें बुरी तरह पीटा गया। जब उसका पुरुष दोस्त बेहोश हो गया तो उस युवती के साथ उन बहशियों ने बलात्कार करने की कोशिश की। उस बहादुर युवती ने उनका डटकर विरोध किया परन्तु जब वह संघर्ष करते-करते थक गयी तो उन्होंने पहले तो उससे बेहोशी की हालत में बलात्कार करने की कोशिश की परन्तु सफल न होने पर उसके यौनांग में व्हील जैक की रॉड घुसाकर बुरी तरह क्षतिग्रस्त कर दिया। बाद में वे सभी वहशी दरिंदे उन दोनों को एक निर्जन स्थान पर बस से नीचे फेंककर भाग गये। किसी तरह उन्हें दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल ले जाया गया। वहाँ बलात्कृत युवती की शल्य चिकित्सा की गयी। परन्तु हालत में कोई सुधार न होता देख उसे 26 दिसम्बर 2012 को सिंगापुर के माउन्ट एलिजाबेथ अस्पताल ले जाया गया , जहां जहाँ उसने अंतिम सांस ली .  30 दिसम्बर 2012 को दिल्ली लाकर पुलिस की सुरक्षा में उसके शव का अंतिम संस्कार कर दिया गया। इस घटना के बाद देशव्यापी आन्दोलन छिड़ा और भारत में यौन हिंसा के क़ानून में और सुधार हुए .

पढ़ें :  ( जो बदल रहे हैं रेप केस की जांच का तरीका )

पढ़ें : ( नाबालिग पत्नी से बलात्कार का कानूनी अधिकार )

पढ़ें : ( औरत होने की सजा )

हव्वा की बेटी : उपन्यास अंश, भाग 2

जयश्री रॉय

जयश्री रॉय कथा साहित्य में एक मह्त्वपूर्ण नाम हैं. चार  कहानी संग्रह , तीन उपन्यास और एक कविता संग्रह प्रकाशित हैं . गोवा में रहती हैं. संपर्क: jaishreeroy@ymail.com

हिंदी साहित्य की वर्तमान सक्रिय पीढी के एक सशकत हस्ताक्षर जयश्री रॉय का आज जन्मदिन है. पिछले 10 मई को स्त्रीकाल के पाठकों ने  उनके आगामी उपन्यास ‘ हव्वा की बेटी’  का एक अंश पढा था. किसी रचनाकार के जन्मदिन पर उसकी रचना का पाठ उसके पाठकों की ओर से उसे दी गई सबसे महत्वपूर्ण शुभकामना है . जयश्री को शुभकामनाओं के साथ  उनके उपन्यास का एक और अंश.  हव्वा की बेटी का स्त्रीकाल में प्रकाशित पहला अंश पढने के लिए नीचे लिंक पर किल्क करें : 


हव्वा की बेटी : उपन्यास अंश

( उपन्यास के बारे में : अफ्रीकी  महादेश के सत्ताईस से ज्यादा देशों में महिलाओं के सुन्ना की प्रथा आज भी जारी है। ‘सुन्ना’ महज एक प्रथा नहीं बल्कि वहां की औरतों की ज़िन्दगी की त्रासदी का सबसे बड़ा कारण है। माहरा की कहानी के बहाने जयश्री रॉय ने अपने चौथे और नवीनतम उपन्यास ‘हव्वा की बेटी’ में स्त्री जीवन के उसी कसैले यथार्थ को उद्घाटित किया है। माहरा और उसकी जैसी औरतें नस्ल, मज़हब, जुबान और रंग से परे वस्तुत: एक स्त्री होती हैं. आंसुओं का खारापन, दर्द का स्वाद, काली त्वचा के नीचे बहने वाले लहू का रंग… इनका सब कुछ दुनिया के हर कोने में बसने वाली औरतों के समान ही है. इन औरतों का औरत होना दुख में होना है, बददुआ में होना है, अज़ाब में होना है… अफ्रीका के जंगलों और धू-धू करते रेगिस्तानों की स्याह-शुष्क दुनिया के चप्पे-चप्पे में माहरा जैसी लाखों बदनसीब औरतों की दर्द भरी कहानी धूल, बवंडर और आंधी के साथ रात दिन उसांसें लेती रहती हैं. यह उपन्यास उसी दुःख और उससे मुक्त होने की चाहत में लड़ती स्त्रियों की संघर्ष गाथा है। )

दूसरा भाग : 

दूसरे दिन रात के अंतिम पहर मैं एक बार फिर अनगढ़ पत्थरों के
उस स्याह टीले के पास अपनी मां के साथ खड़ी थी और वह कुरुप और डरावनी बंजारन अपनी कालीन के टुकड़ों की पैबंद लगी झोली से तरह-तरह के औज़ार और भोंथरे-नुकीले हथियार निकाल-निकालकर ज़मीन पर तरतीव से रख रही थी. आज हमारे साथ पड़ोस की सामोआ आपा भी थीं. आपा और मां ने मेरे दोनो हाथ दो तरफ से पकड़ रखे थे और मेरे घुटनों में धीरे-धीरे कंपन हो रहा था. पेट के नीचले हिस्से में कुछ घुलाता हुआ. मैं बड़ी मुश्क़िल से सीधी खड़ी रह पा रही थी.

तेज़ी से फैलती रोशनी में मैंने चाकुओं और दूसरे हथियारों पर जमे हुये काले खून के धब्बों को देखा था जिन्हें वह बंजारन औरत जिसे मां जाबरा कहकर सम्बोधित कर रही थीं, अपनी थूक से गीला कर लहंगे से पोंछ रही थी. उसके दोनों हाथ की बड़ी और बीचवाली उंगलियों के नाखून बहुत लंबे थे, मुर्गे के चंगुल की तरह आगे से झुके हुये. उन्हें देखकर मेरे पूरे शरीर में बार-बार झुरझुरी-सी दौड़ जा रही थी.

एक समय के बाद जाबरा ने अपना चेहरा उठा कर मां की ओर अजीब ढंग से देखा था, जैसे कुछ आंखों ही आंखों में कह रही हो और इससे पहले की मैं कुछ समझती या करती, मां और आपा ने मुझे जबरन खींच कर ज़मीन पर लिटा दिया था. मां ने बैठ कर मेरे सर को अपने सीने से लगा लिया था तथा आपा ने मेरे पैरों को दोनों तरफ फैला कर उनपर मां के पैर चढ़ा दिये थे. मां ने भी झट पूरी ताक़त से मेरे पांव अपनी हड़ियल जांघों से चांप दिये थे. इस बीच आपा ने पीठ की तरफ से मेरी दोनों बांहों को मोड़ कर सख़्ती से पीछे की तरफ से पकड़ लिया था. अब मां ने फिर कल जैसी ठंडी आवाज़ में कहा था- “माहरा! ज़रा बर्दास्त करना, सब जल्दी हो जायेगा!”

मैं बिना कुछ कहे अपनी विस्फारित आंखों से जाबरा को देखती रही थी जो मेरे फैली हुयी टांगों के बीच बैठी ठंडी आंखों से मेरा मुआयना कर रही थी. फिर मैंने देखा था उसके हाथ में ब्लेड का वह टुकड़ा जो दूसरे ही पल मेरी नर्म त्वचा में जाने कहां तक उतर गई थी. मेरी आंखों के आगे अचानक बिजली के नीले-पीले फूल-सा कुछ कौंधा था और मैं हलक फाड़ कर चिल्लाती चली गई थी! दर्द का ऐसा भीषण अनुभव मुझे पहले कभी नहीं हुआ था. मैं ईद-बकरीद के मौकों पर जानवरों को हलाल होते हुये देखती आई थी. अब्बू या कोई और जानवरों के मुंह काबा की तरफ करके उनके गले में ढाई दफा चाकू रेत कर छोड़ देते. उसके बाद वे जानवर देर तक तड़प-तड़प कर अपनी जान देते. उनकी उबली हुई आंखें, खुला हुआ मुंह, गले से भल-भल बहता खून, उनकी छटपटाह्ट के साथ चारों तरफ उड़ते खून के छींटे…. यह सब आमतौर पर हमारे लिये मनोरंजन के दृश्य हुआ करते थे, मगर आज एक तरह से मुझे भी ज़िन्दा ही जिबह किया जा रहा था. जाबरा के उठते-गिरते हाथ के साथ मेरे शरीर में तेज़ पीड़ा की लहरें उठ रही थीं, बिस्फोट-से हो रहे थे. कभी जाबरा के हाथ में चाकू होता, कभी पत्थर के टुकड़े तो कभी ब्लेड… भय, पीड़ा से अवश होते हुये मैंने देखा था, उसने अपने दोनों गंदे हाथों के लम्बे नाखूनों को मेरे भीतर खुबा दिये थे. दर्द के अथाह समुद्र में डूबते हुये मैंने महसूस किया था, वह अपने नाखूनों से मुझे नोंच-खसोट रही है, चीर-फाड़ रही है, कुतर रही है! उस समय आग़ की सलाइयां-सी मेरे जांघों के बीच चल रही थी. लग रहा था, ढेर सारी जंगली, विषैली चिंटियां मेरे अंदर घुस गई हैं और मुझे खोद-खोद कर खा रही हैं! या फिर कोई बिच्छु लगातर डंक मार रहा है. तेज़ जलन हो रही है. मेरे दोनों पैर बुरी तरह थरथरा रहे हैं, पूरा शरीर पसीने से भीग गया है. चिल्ला-चिल्ला कर गला फट गया है. मां का चेहरा मुझ पर झुका हुआ है और उन्होंने मुझे बुरी तरह जकड़ रखा है. उनकी आंखों में इस समय अजीब-सी चमक और मुग्धता हैं! जैसे कोई धार्मिक अनुष्ठान देखते हुये लोगों की आंखों में अक़्सर होती है. मेरे मुड़े हुये हाथ शायद टूट गये हैं और कमर से नीचे का शरीर शून्य पड़ गया है. मुझ से और चिल्लाया नहीं जाता… मेरे गले से घुटी-घुटी आवाज़ें निकल रही हैं. एक समय के बाद खून के बहाव को रोकने के लिये जाबरा मेरे जख़्म पर जानवरों की लीद और मिट्टी डालने लगती है. ऊपर आकाश फटकर धीरे-धीरे सफ़ेद पड़ रहा है… पास ही कहीं सियार हुंक रहा है, ताड़ के नंगे माथे पर एक गिद्ध बैठा है. उसकी नंगी, रोमहीन गर्दन, खून में डूबी पलकहीन आंखें, विशाल डैनों की झपट… सब धीरे-धीरे आपस में गडमड हो जाता है और फिर वह काली, बड़ी चादर आकाश के जिस्म से खिसक कर जाने कब मेरे ईर्द-गिर्द फैल जाती है और मैं उसके तरल, सुखद अंधकार में डूब जाती हूं… आह! मृत्यु… यह इस जघन्य पीड़ा, इस नरक से कहीं बेहतर है. उस क्षण मैं सचमुच मर जाना चाहती थी. यह एक बेहतर विकल्प था. उस ठंडी, काली, निविड़ शून्यता को मैंने किस आवेग से स्वयं में निर्बाध उतरने दिया था…

ना जाने कितनी देर बाद मेरी आंखें खुली थीं. मैं मरी नहीं थी, जिन्दा थी… ओह! यह प्रतीति कितनी भयावह थी मेरे लिये! जीवन यानी पीड़ा और… पीड़ा! मेरे कमर से नीचे का हिस्सा नरक बन गया है. एक धधकता हुआ कुंड! ऐसे जल रहा है कि जैसे किसी ने ताज़े ज़ख़्म पर नमक छिड़क दिया है. अंदर कुछ धप-धप कर रहा है. सारी शिरायें सुलग रही हैं. एक चीरता हुआ दर्द बिच्छु के डंक की तरह रह-रह्कर लहर उठता है…
मेरा चेहरा सूखे हुये आंसुओं से चिटचिटा रहा है, होंठों पर पपड़ियां जम गयी हैं. किसी तरह सर उठा कर मैं अपने आसपास देखने की क़ोशिश करती हूं. मां हाथ में एक सूखी लकड़ी लेकर आस पास झपटते हुये गिद्धों को भगाने की क़ोशिश कर रही हैं. गिद्ध हड़बड़ा कर थोड़ा उड़ते हैं, फिर वापस लौट आते हैं. चारों तरफ अजीब-सी बदबू है. दूर सूखे नाले के पास दो लकड़बग्घे अपनी लम्बी जीभ निकालकर हांफ रहे हैं… गिद्धों की कर्कश चीख, डैनों की झपट, साथ लकड़बग्घों की डरावनी आवाज़- जैसे कई चुड़ैलें नकिया कर एक साथ हंस रही हों!
मैंने सिहर कर उस तरफ से अपनी आंखें फेर ली थी और दायीं तरफ देखा था. सामने पत्थरों और झाडियों में मेरे शरीर के छोटे-छोटे टुकड़े-

अरुणा शानबाग सिर्फ बलात्कार पीडिता ही नहीं थी




अरुणा शानबाग सिर्फ बलात्कार पीडिता ही नहीं थी . पिछले 42  सालों में वह समाज के सामने एक सवाल थी, एक आईना थी. बलात्कार और औरत होने की पीड़ा में जीती मुम्बई की वह नर्स आज भी चीख -चीख कर पूछ रही है कि मेरे बाद भी क्यों नहीं थमा सिलसिला  ! उस पर बलात्कार , अप्राकृतिक यौन हमला और कुत्ते की चेन से उसकी ह्त्या के प्रयास के बाद वह कोमा में चली गई थी. 42 सालों तक कोमा में रहने के बाद वह आज सुबह हमें , हमारी जलील दुनिया, जहां औरत औरत होने की सजा पाती है , को अलविदा कहकर चली गई. 
त्रासदी यह कि उसपर बलात्कार करने वाले को मात्र 7 साल की सजा मिली . सवाल यहाँ भी हमारी मानसिकता का है – उसपर हुई इस क्रूर यौन हिंसा के बाद उसकी तथाकथित बदनामी के भय से आरोपी के खिलाफ ह्त्या की कोशिश और डकैती का मामला दर्ज किया / करवाया गया , बलात्कार और अप्राकृतिक यौन हमला का मामला दर्ज नहीं हुआ .  यौन हिंसा की शिकार स्त्री पर यह आरोपित बदनामी आज भी उसकी 42 सालों की यातना के  बाद यथावत है . हम एक ऐसी क्रूर व्यवस्था हैं कि हमारे न्यायालय ने उसे ‘ मर्सी किलिंग’ की अनुमति भी नहीं दी. 

अरुणा की त्रासदी की कहानी प्रभात खबर से साभार : 
अंतत: अरुणा शानबाग की आज मौत हो गयी. पिछले 42 वर्षों से कोमा में रहने के बाद अरुणा को अंतत: मौत नसीब हुई. अरुणा का निधन आज सुबह लगभग 10 बजे केईएम अस्पताल में हुआ. वह 67 वर्ष की थीं. वह पिछले 42 वर्षों से इसी अस्पताल में जिंदगी से जूझ रहीं थीं. पिछले दिनों उन्हें निमोनिया हो गया था और फेफड़े में भी संक्रमण था. किंग एडवर्ड मेमोरियल (केईएम) अस्पताल के सूत्रों ने बताया कि 66 वर्षीय अरुणा को निमोनिया का संक्रमण हो गया था और वह जीवनरक्षक प्रणाली पर थीं.

वह मुंबई के परेल इलाके में स्थित इस अस्पताल के आईसीयू में थीं. पिछले चार दशक से अरुणा अस्पताल के वार्ड नंबर चार से लगे एक छोटे से कक्ष में थी. मंगलवार को अरुणा की देखरेख कर रही नर्सों ने देखा कि उसे सांस लेने में दिक्कत हो रही थी। तब उन्होंने उसे कक्ष से बाहर निकाला और आईसीयू ले गयीं जहां उसे एंटीबायोटिक दवाएं दी गयीं.

के ईएम अस्पताल के डीन डॉ अविनाश सुपे ने बताया कि हाल ही में उसे निमोनिया होने का पता चला था और उसे जीवन रक्षक प्रणाली पर रखा गया था. जांच में पता चला कि अरुणा को फेफड़ों में संक्रमण था। उसे नलियों की मदद से भोजन दिया जाता था.  अरुणा केईएम अस्पताल में जूनियर नर्स के तौर पर काम करती थी। 27 नवंबर 1973 को वार्ड ब्वॉय सोहनलाल भरथा वाल्मीकि ने अरुणा पर यौन हमला किया और कुत्ते के गले में बांधने वाली चेन से अरुणा का गला घोंटने की कोशिश की जिससे अरुणा के मस्तिष्क में ऑक्सीजन की आपूर्ति बाधित हो गई. हमले के बाद से अरुणा निष्क्रिय अवस्था में आ गई.

जब इस हालत में पडे पडे अरुणा को 38 साल हो गए तब 24 जनवरी 2011 को उच्चतम न्यायालय ने अरुणा की मित्र पत्रकार पिंकी विरानी की एक अपील पर अरुणा की जांच के लिए एक स्वास्थ्य दल गठित किया. पिंकी ने अरुणा के लिए इच्छा मृत्यु की मांग की थी. अदालत ने सात मार्च 2011 को इच्छा मृत्यु संबंधी याचिका खारिज कर दी. पिंकी ने उत्तर प्रदेश के हल्दीपुर की रहने वाली अरुणा की कहानी वर्ष 1998 में अपनी नॉन फिक्शन किताब अरुणा स्टोरी में बताई. अरुणा पर दत्तकुमार देसाई ने 1994….95 में मराठी नाटक कथा अरुणाची लिखा जिसका वर्ष 2002 में विनय आप्टे के निर्देशन में मंचन किया गया.

इस बीच, स्थानीय निकाय अधिकारियों ने अरुणा के रिश्तेदारों से अस्पताल के कर्मचारियों से संपर्क करने को कहा है. अरुणा की आखिरी ज्ञात संबंधी एक बहन थी जिसका कुछ साल पहले निधन हो चुका है.

कौन थीं अरुणा शानबाग
अरुणा शानबाग केईएम अस्पताल मुंबई में काम करने वाली एक नर्स थीं. जिनके साथ 27 नवंबर 1973 में अस्पताल के ही एक वार्ड ब्वॉय ने बलात्कार किया था. उस वार्ड ब्वॉय ने यौन शोषण के दौरान अरुणा के गले में एक जंजीर बांध दी थी. उसी जंजीर के दबाव से अरुणा उस घटना के बाद कोमा में चली गयीं और फिर कभी सामान्य नहीं हो सकीं. उस घटना के बाद पिछले 42 वर्षों से अरुणा शानबाग कोमा में थीं. अरुणा की स्थिति को देखते हुए उनके लिए इच्छा मृत्यु की मांग करते हुए एक याचिका भी दायर की गयी थी, लेकिन कोर्ट ने इच्छामृत्यु की मांग को ठुकरा दिया था. अरुणा की जिंदगी के साथ खिलवाड़ करने वाले दरिंदे का नाम सोहनलाल था. जिसे कोर्ट ने सजा तो दी, लेकिन वह अरुणा के साथ किये गये अपराध के मुकाबले काफी कम था.

अरुणा के साथ हुए अन्याय की नहीं की गयी थी सही शिकायत

अरुणा के साथ जब सोहनलाल ने दरिंदगी की, उसके पहले अरुणा शादी का निश्चय कर चुकी थी और जल्दी ही उसकी शादी होने वाली थी, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था. सोहनलाल अरुणा की जिंदगी में काल बनकर आया और सबकुछ तहस-नहस कर गया, लेकिन अरुणा के साथ हुए यौन शोषण के मामले को कुछ और ही रूप दिया गया था. अस्पताल के डीन डॉक्टर देशपांडे ने डकैती और लूटपाट का केस दर्ज कराया, अरुणा की बदनामी ना हो, इसलिए यौन शोषण के केस को दबाया गया, जिसके कारण सोहनलाल को सिर्फ सात साल की सजा हुई और उसके बाद वह आजाद हो गया, जबकि अरुणा 42 वर्षों तक उसके कुकर्म की सजा भोगती रही.

स्त्री आत्मकथा – अस्मिता संघर्ष तथा आत्मनिर्भर स्त्री

कुमारी ज्योति गुप्ता


कुमारी ज्योति गुप्ता भारत रत्न डा.अम्बेडकर विश्वविद्यालय ,दिल्ली में हिन्दी विभाग में शोधरत हैं सम्पर्क: jyotigupta1999@rediffmail.com

संदर्भ-प्रभा खेतान और मैत्रेयी पुष्पा 


हिंदी जगत में प्रभा खेतान एक ऐसा नाम है जो अपनी पहचान कई स्तर पर दर्ज कर चुका है। स्त्री सशक्तिकरण तथा स्त्री अस्मिता की लड़ाई लड़ने वाली लेखिका के रुप में हिंदी जगत उन्हें जानता है साथ ही एक सफल उद्योगपति महिला के रुप में उन्होंने देश ही नहीं बल्कि विदेशों में भी अपनी उपस्थिति दर्ज की। डा0 प्रभा खेतान ने समकालीन कथा-साहित्य में यदि अपनी पहचान कथा-लेखन तथा स्त्री विमर्श के क्षेत्र में बनाई तो दूसरी तरफ सीमोन द बोउवार की प्रसिद्ध पुस्तक ‘द सेकेण्ड सेक्स’ के अनुवाद के साथ सात्र्र और कामू के जीवन दर्शन पर चिंतन से। प्रभा खेतान का अधिकांश लेखन आत्मकथात्मक है, मारवाड़ी समाज की दकियानूसी पारंपरिक संकीर्णता के बीच उनका नारी मन जिस तरह विद्रोह करता है, अपनी अस्मिता और आजादी की लड़ाई लड़ता है हिंदी जगत में विलक्षण है।

इनकी आत्मकथा ‘अन्या से अनन्या’ सन् 2007 में प्रकाशित हुई। हंस में धारावाहिक रुप में प्रकाशित इस आत्मकथा को जहां एक तरफ अकुंठ प्रशंसाएँ मिली वहीं दूसरी तरफ अपने साहस या यूँ कहे अपने दुस्साहस के कारण पितृसत्तात्मक मारवाड़ी समाज की घोर निंदा भी सहनी पड़ी। पूरी आत्मकथा के दौरान हमने देखा कि इस महिला में एक जिद्द थी, जो साधारणतः बहुत कम देखने को मिलती है, जिसके कारण ये न सिर्फ मारवाड़ी पुरुषों की दुनिया में कदम रखती हैं बल्कि कलकत्ता चेम्बर आॅफ कामर्स की अध्यक्ष भी बनती हैं। इस आत्मकथा में एक सफल उद्योगपति बनने की कथा-यात्रा में एक ऐसी बोल्ड स्त्री सामने आती है, जो न केवल परिवार बल्कि पूरे समाज को चुनौती देते हुए अपनी अस्मिता की लड़ाई लड़ती है। लेखिका कहती हैं ‘‘मैं अपनी पहचान चाहती थी, एक ऐसा जीवन जो स्थानीयता के साथ वैश्विक हो। जीवन, रोमांस, सेक्स, सम्बन्ध सबके अलग-अलग कोड होते हैं। इन चिन्हों के अर्थ अलग होते हैं। बंगाली और पंजाबी समाज से हमारा मारवाड़ी समाज भिन्न था। प्रगतिशीलता के सन्दर्भ में मैं किसी समाज को कम ज्यादा कहकर नहीं तौलना चाहती। लेकिन यही सोचती हूँ कि आखिर कौन इन्हें निर्मित करता है? व्यक्ति ही ना। इनमें से बहुतेरे कोड हैं,  जिन्हें तर्क के सरौते से मैं काटना चाहती हूँ। बादाम की गिरी जैसी इनकी भी कोई अलग गिरी होगी और कैसा होगा उसका स्वाद? किन्तु यह भी जानती हूँ कि इसे इतनी आसानी से तोड़ा नहीं जा सकता। बड़ा सख्त है इनका छिलका।’’1  इन पंक्तियों के माध्यम से लेखिका यह बताना चाहती हैं कि इस तरह की जिंदगी की शुरुआत करना आसान नहीं था क्योंकि दिन भर की मेहनत, संघर्श जोखिम और जिम्मेदारी का रास्ता बिल्कुल अलग और नया था बावजूद इसके प्रभा खेतान इस संघर्ष को स्वीकार करती हैं और फिर शुरु होता है एक और सफर। पहले एक लेखिका के रुप में और फिर एक स्वतंत्र उद्यमी के रुप में। दोनों ही स्तर पर वे सफल रहीं। बतौर लेखिका वे हिंदी की चर्चित उपन्यासकार और कई वैचारिक पुस्तकों की लेखिका रहीं और बतौर उद्यमी उन्होंने निर्यात के व्यवसाय में अपनी जगह बनाई। इसलिए यह आत्मकथा एक स्तर पर प्रेम की अवसादमय गाथा है और साथ-साथ एक औरत के व्यक्तित्व के रुपांतरण और संघर्ष की कहानी भी।

आर्थिक आत्मनिर्भरता प्रभा खेतान के जीवन की महत्वपूर्ण उपलब्धि थी। निर्यात व्यापार की आर्थिक सलता ने उनके व्यक्तित्व को ऊँचाई प्रदान की। डाॅ0 सर्राफ के परिवार में वे ‘अन्या’ थीं, वे कहती भी हैं ‘‘मैं वह अन्य थी जिसे निरन्तर निर्मित किया जा रहा था। क्योंकि महज मेरा होना पत्नीत्व नामक संस्था को चुनौती दे रहा था। सहमति की खोज में मैं बुरी तरह थकने लगी थी। मैं बस पति-पत्नी के बीच ‘एक वह’ थी। एक बाहरी तत्व, अनचाही स्वीकृति।’’2 लेकिन सुदृढ़ आर्थिक आधार ने धीरे-धीरे उन्हें अनन्या बना दिया जो मारवाड़ी समाज उन्हें मंचासीन नहीं देखना चाहता था और कहता था ‘‘इस औरत को हम मंच पर कैसे बैठाएँ? माना कि पढ़ी-लिखी, आत्मनिर्भर स्त्री है पर ऐसी स्त्री समाज की नाक नहीं हो सकती।’’3  उसीने उन्हें कलकत्ता चेम्बर आॅफ कामर्स की प्रथम महिला अध्यक्षा का पद प्रदान किया।

स्त्री मुक्ति की पहली शर्त आर्थिक आजादी है। प्रभा खेतान ने अपने निजी जीवन में इस सच को शिद्दत से महसूस किया। आर्थिक आजादी को महत्व देते हुए उन्होंने अपने एक साक्षात्कार में कहा भी है ‘‘औरत समाज में दोयम स्तर पर है, मैं खुद एक दोयम दर्जे की जिंदगी जी रही थी, जिससे निकलने को छटपटा भी रही थी और सीमोन के इस कथन को आत्मसात कर लिया-फ्रीडम स्टार्टस फ्राॅम पर्स ,  मुक्ति की पहली शर्त है कि स्त्री आर्थिक रुप से स्वावलंबी हो। यदि इस एक शर्त को कोई औरत पूरा कर ले तो वह अपनी जिंदगी की आधी से अधिक लड़ाई जीत लेगी।’’4 प्रभा खेतान मानती हैं कि विवाह, पति, बच्चे आदि से परे भी औरत का अस्तित्व है औरत की जिन्दगी सिर्फ पुरुष की तलाश नहीं उसकी अपनी सार्थकता भी है। इसीलिए पितृसत्तात्मक समाज द्वारा स्त्रियों की तय नियति को वे स्वीकार नहीं करती। क्योंकि इस समाज ने सारे अधिकार पुरुषों को दिए हैं वे कहती भी हैं ‘‘पितृसतात्मक परंपरा ने निश्चित कर रखा है कि अधिक से अधिक शिक्षा पुरुष को मिलनी चाहिए, क्योंकि उसे कमाना है। उसे पौष्टिक भोजन मिलना चाहिए क्यांेकि उसके श्रम की कीमत है। पुरुष को इसलिए राजनीतिक चुनाव का अधिकार दिया गया है क्योंकि भेद-भाव करने और दूसरों का शोषण करने के मामले में वह ज्यादा ताकतवर साबित होता है साथ ही वह से भिन्न को नियंत्रित करने की क्षमता भी रखता है। यहाँ तक कि विरोध और विद्रोह की उपेक्षा भी पुरुष से अधिक की जाती है।’’5  अतः हम कह सकते हैं कि पहचान का आत्मसंघर्ष हर नारीवादी लेखिका में दिखता है लेकिन स्त्री नियति तथा पितृसत्ता के दुष्प्रभाव  पर इतनी बारीकी दृष्टि प्रभा खेतान के पास ही है,  इनकी आत्मकथा हो या वैचारिक पुस्तकें, अपने-अपने स्तर स्त्री नियति तथा आत्मसंघर्ष का नया पाठ पढ़ाते हैं।

निस्संदेह  ‘अन्या से अनन्या’ डा0 सर्राफ के जिंदगी में अनन्या न बन पाई प्रभा जी की पीड़ा को व्यक्त करता है साथ ही इस विवाहेतर संबंध को स्वीकार करने का साहस तथा पितृसत्तात्मक समाज की चुनौतियों को स्वीकारते हुए अपनी पहचान दर्ज करने वाली महिला का अदम्य तथा असाधारण रुप भी व्यक्त करता है। प्रभा जी कहती हैं ‘‘हम औरतें प्रेम के जितनी गंभीरता से लेती हैं उतनी ही गंभीरता से यदि अपना काम लेती तो अच्छा रहता जितने आंसू डाक्टर साहब के लिए गिरते हैं उससे बहुत कम पसीनों भी यदि बहा सकूं तो पूरी दुनिया जीत लूंगी।’’6 अतः प्रभा खेतान यह जानती थी कि प्रेम उनके जीवन का अहम हिस्सा है डा0 सर्राफ से अलग जीवन की कल्पना भी वे नहीं कर सकती,  लेकिन सम्मान प्राप्त करने के लिए अपने पैरों पर खड़ा होना जरुरी है तथा एक सफल उद्योगपति बनने में अपनी सारी उर्जा झोंक देती हैं वे कहती हैं ‘‘कुछ लोगों की नजर में यह एक छोटी विजय है, मेरी दृष्टि में यह आजादी की लड़ाई से कम नहीं। नियति उद्योग कितनी शहादत और कितनी कुर्बानियाँ माँगता है इसे हर निर्यातक जानता है। चार डाॅलर बचाने के लिए भूखे पेट बक्सा उठाए न जाने कहाँ-कहाँ फिरती रहती हूँ।’’7  उद्योग जगत में अपनी पहचान बनाने के लिए लेखिका को बहुत संघर्ष का सामना करना पड़ा। पितृसत्तात्मक समाज एक औरत को आगे बढ़ते नहीं देखना चाहता लेकिन प्रभा खेतान की जिद्द ऐसी थी जिसके कारण वे न सिर्फ मारवाड़ी पुरुषों की दुनिया में घुसपैठ करती हैं बल्कि अपनी अस्मिता की नींव भी रखती हैं वे कहती हैं ‘‘औरतपने का हीनभाव पुरुषों की दुनिया में बार-बार अपना औचित्य स्थापित करना चाहता रहा है। क्या मैं औरत हूँ इसलिए यह काम नहीं करुँगी? करके दिखा दूंगी। दिखाया भी पर देखा भी कम नहीं।’’8 अतः औरतपने की हीन भावना से निकलना तथा अपने को स्थापित करने का जज्बा ही प्रभा खेतान को प्रसिद्धि और सफलता प्रदान करता है। सात्र्र तथा सीमोन के जीवन से प्रभावित प्रभा खेतान पूरी भारतीय समाज का प्रतिनिधित्व करती हुई तथा पितृसत्तात्मक चुनौतियों को स्वीकारते हुए अपने जीवन को नई दृष्टि प्रदान करती हैं।

अर्थ जीवन की बुनियादी जरुरत है जिसकी ओर महादेवी वर्मा ने भी इशारा किया है ‘‘अर्थ सामाजिक प्राणी के जीवन में कितना महत्व रखता है, यह कहने की आवश्यकता नहीं। इसकी उच्श्रृंखला बहुलता में कितने दोष हैं वे अस्वीकार नहीं किए जा सकते, परंतु इसके नितांत अभाव में जो अभिशाप है वे भी उपेक्षणीय नहीं। विवश आर्थिक पराधीनता अज्ञात रुप से व्यक्ति के मानसिक तथा अन्य विकास पर ऐसा प्रभाव डालती रहती है, जो सूक्ष्म होने पर भी व्यापक तथा परिणामतः आत्मविश्वास के लिए विष के समान है। दीर्घकाल का दासत्व जैसे जीवन की स्फूर्तिमती स्वच्छन्दता नष्ट करके उसे बोझिल बना देता है, निरंतर आर्थिक परवशता भी जीवन में उसी प्रकार प्रेरणा शून्यता उत्पन्न कर देती है। किसी भी सामाजिक प्राणी के लिए ऐसी स्थिति अभिशाप है,  जिसमें वह स्वावलंबन का भाव भूलने लगे,  क्योंकि इसके अभाव में वह अपने सामाजिक व्यक्तित्व की रक्षा नहीं कर सकता।’’9 मैत्रेयी पुष्पा की आत्मकथा के दोनों खंड महादेवी वर्मा की इन बातों को पूरी तरह चरितार्थ करते हैं। ‘कस्तूरी कुंडल बसै’ में कस्तूरी स्त्रियों पर थोपी नियति को अस्वीकार कर अपनी नियति खुद गढ़ती है।

‘‘माँ का मानना है कि संसार में औरत के मुकाबले कोई सख्तजान नहीं। बेटों को रोग-धोग व्यापे, इसे कभी छींक तक न आई। अरे… गाय मरे अभागे की, बेटी मरे सुभागे की। मगर बेटी मरे तो सही।’’10 अतः कस्तूरी एक ऐसे समाज में जन्मी थी जहाँ बेटी को अभिशाप माना जाता है लेकिन कस्तूरी इस समाज की मान्यता को तोड़ना चाहती है कलम, खडि़या, तख्ती और पोथी की फिराक में वह दिन-भर घूमा करती है, जिसके कारण माँ और भाई के कोप का भाजन उसे बनना पड़ता है। इस तरह के समाज में लड़कियों का पढ़ना-लिखना मान्य नहीं है इसलिए मैत्रेयी कहती हैं ‘‘पढाई के कलम-खडि़या जैसे साधन प्राप्त करना कस्तूरी जैसी लड़की के न भाग्य में है, न बस में।’’11 अतः हम कह सकते हैं कि कस्तूरी जिस ग्राम-समाज में है वहां बिकने वाली चीजों में गाय, बैल, भैंस, अनाज और लड़कियाँ हैं। लगान के रुपये जूटाने के लिए भाई बहन को बेचता है। रुग्ण बेटे को ब्याहने के बदले में माँ अपनी बेटी को बूढ़े से ब्याहने का सौदा करती है। आठ सौ चाँदी के सिक्कों में बिककर पति के घरवालों द्वारा ‘खरीदी हुई घोड़ी’ का दर्जा दिए जाने के बाद स्वयं कस्तूरी को असमय वैधव्य की यातना से गुजरना पड़ता है। विवाह संस्था के इस दंश को झेलती कस्तूरी पारंपरिक विधवा की भूमिका का परित्याग कर नौकरीपेशा स्वावलंबी स्त्री की भूमिका में उपस्थित होती हैं। वह गांव की विधवा की परंपरागत छवि को तोड़कर अपनी नई पहचान बनाने का निश्चय करती है। परदे को त्यागकर वह अपने ससुर को आश्वस्त करते हुए कहती है ‘‘मेरा भरोसा करो दादाजी। मैं अपनी बेटी को पढ़ा-लिखाकर बड़ा करुँगी कि मेरे तुम्हारे बाद वह अपने दुश्मनों का मुकाबला करें।’’12 अतः गांव का विरोध कर वह मैत्रेयी को शिक्षा प्रदान कराने के लिए तत्पर हो जाती है और खुद भी अपने अस्तित्व के राह पर निकल पड़ती है इसलिए उसे समाज के ताने सुनने पड़ते हैं ‘‘यह रांड क्या सांड हो गई। न छोरी पर ममता, न बूढ़े ससुर का रहम। ‘पढ़ाई-लिखाई’ का भजन करती हुई दोनों को रौंद रही है। अरे तू डाॅव-डाॅव डोलेगी तो बच्चा की ऐसी ही गत बनेगी। बनी है महात्मा गाँधी की चेली।’’13 अतः गांव की वे स्त्रियाँ, जो अपने जीवन में कुछ नहीं कर पाई वे ही कस्तूरी पर इस तरह का व्यंग्य करती है। कस्तूरी पारंपरिक विधवा विवाह की भूमिका का परित्याग कर नौकरी पेशा स्वावलंबी स्त्री के रुप में उपस्थिति होती है। वह अपनी बेटी मैत्रेयी को भी इसी भूमिका में ढालना चाहती है। पुरुष वर्चस्व का विरोध कर वह अपनी नियति खुद गढ़ना चाहती है, अपने स्तर पर इस तरह के विद्रोह की शुरुआत भी करती है। अपने अस्तित्व तथा होने वाली बच्ची के भविश्य के लिए वह पितृसत्तात्मक समाज के खिलाफ खड़ी होती है तथा यह संकल्प लेती है ‘‘अब मेरी बेटी का मामला है मेरी कोख में जन्म लेने वाली मैत्रेयी का। मैं इसको उस खड्ड में नहीं गिरने दूंगी, जिसमें गिरकर औरत जीवन-भर निकलने को छटपटाती रहती है और एक दिन खत्म हो जाती है।’’14 अपनी कोख पर हाथ रखकर लिया गया यह निर्णय कस्तूरी को गहरी सोंच, उसके साहस और अस्तित्व का ही सूचक है। कस्तूरी अपनी अस्मिता के लिए पूरे पितृसत्तात्मक समाज का सामना करने को तैयार है। वह सिर्फ अपने विषय में नहीं सोचती बल्कि एक समाज सेविका बनकर पूरे गांव की औरतों का कल्याण करना चाहती है तथा पारंपरिक, रुढ़ और जर्जर सोंच से गांव की औरतों को मुक्त करना चाहती है।

‘गुडि़या भीतर गुडि़या’ मैत्रेयी की आत्मकथा का दूसरा खंड है,  जिसका रहस्य इस बात में है कि ऊपर से आम जिन्दगी जीने वाली औरत के मन में क्या बात थी जिसने उसे हिंदी जगत की सर्वोपरि लेखिका सिद्ध कर दिया। मैत्रेयी विवाह करना चाहती थी , आम औरत की तरह उसके मन ने भी चूड़ी, सिन्दूर, बिन्दी से सजे गृहणी के सपने देखे ये। पति को ही अपना सुहाग भाग मानने वाली मैत्रेयी एक वक्त के बाद अपनी अस्मिता के लिए इतनी सजग हो जाती है कि पति से तलाक लेना चाहती है . वह कहती है ‘‘मैं इस आदमी से अलग ही है? जाऊँ…। विवाह का गठबंधन चाहत का गला घोंट रहा है, छुड़ाने वाला यहाँ कोई नहीं,… मैं इस आदमी को छोड़ ही दूँ… मेरे भीतर हूक उठी।’’15 अतः कहने का तात्पर्य यह है कि पहले तो मैत्रेयी माँ के सपनों को रौंदती हुई वैवाहिक जीवन चुनकर खुद उनसे अलग हुई थी। उनकी तो बस यही आकांक्षा थी कि पुरुष साथी मिलने से मेरे रात दिन सुरक्षित हो जाएँगे। आखिर ऐसी क्या बात थी कि विवाह को ही अपनी मुक्ति मानने वाली मैत्रेयी इस संबंध से अलग हो जाना चाहती थी। वह उसका स्वाभिमान, स्त्री का स्वाभिमान जो हर पल पुरुष सत्ता के अधीन समर्पित होने से इनकार कर रहा था। पति द्वारा मैत्रेयी पर थोपी गई आधुनिकता के खिलाफ उनका स्त्री मन विद्रोह करता है.  डा0 सिद्धार्थ उन्हें दीक्षंत समारोह में नहीं ले जाते घर पर आए यू.पी.एस. के चेयरमैन से पत्नी को अभिवादन करने का भी अवसर नहीं दिया गया, रसोई में सिकुड़े रहने को कहा गया। हिंदी में एम.ए. उपाधि प्राप्त कर मैत्रेयी ने पी.एच.डी. करने की सोची। इस चक्कर में उन्होंने बहुत कुछ सहा तथा अपनी रचनात्मक विकसित करने में अपने को झोंक दिया। घर गृहस्थी के बंधे दायरे को तोड़कर अपनी रचनात्मकता (साहित्य लंखन) को विकसित करती हैं। मैत्रेयी ने साहस पूर्वक पुरुषद्वारा निर्धारित नियमों का उल्ंलघन किया तभी साहित्य जगत में अपनी पहचान दर्ज कर पाईं। वे लिखती भी हैं ‘‘यदि मैंने अपने भीतर सुकुमारता को तोड़ न दिया होता तो सचमुच मैं आज मन-मोहिनी गुडि़या का अनुपम रुप होती… लेकिन मैं सोचकर आश्वस्त होती हूँ कि गुडि़या की छवि तोड़ डालने से ज्यादा मुझे कहीं मुक्ति नहीं।’’16 अतः यह स्पष्ट है कि अपने अंदर बैठी पारंपरिक स्त्री की छवि को तोड़कर ही मैत्रेयी अपनी पहचान हासिल करती हैं।

इस प्रकार हम कह सकते हैं कि हिंदी की स्त्री आत्मकथाएँ सिर्फ व्यथा कथाएँ नहीं हैं बल्कि तमाम तरह की पितृसत्तात्मक चुनौतियों को स्वीकार करते हुए स्त्री के बनने की कथाएँ हैं। इस बनने के क्रम में बहुत कुछ जर्जर मान्यताएँ टूटती हैं लेकिन जो बनती है उसे या उसके अस्तित्व को पूरी दुनिया स्वीकार करती है। प्रभा खेतान तथा मैत्रेयी का जीवन कुछ इसी तरह की स्त्री अस्मिता की कथा है।

संदर्भ सूची
1. खेतान प्रभा: अन्या से अनन्या, पहला संस्करण-2007ए राजकमल प्रकाशन प्रा0 लि0, नई दिल्ली-110002ए प्र0 सं0 210
2.  वही … पृ0 सं0-175
3.  वही … पृ0 सं0-98
4.  खेतान प्रभा – साधना अग्रवाल द्वारा प्रभा खेतान का लिया गया साक्शात्कार, वागर्य, सित्मबर – 2003 भारतीय भाशा परिशद, कोलकाता-700017ए पृ0 सं0-37
5.  खेतान प्रभा – उपनिवेश में स्त्री, पहला संस्करण-2003ए तीसरी आवृत्ति-2010ए राजकमल प्रकाशन प्रा0 लि0 नई दिल्ली-110002ए पृ0 सं0-14.15
6.  खेतान प्रभा – अन्या से अनन्या, पहला संस्करण-2007ए राजकमल प्रकाशन प्रा0 लि0, नई दिल्ली-110002ए प्र0 सं0 15
7.  वही … पृ0 सं0-226
8.  वही … पृ0 सं0-226
9.  वर्मा महादेवी – श्रृंखला की कडि़याँ, चतुर्थ लोकभारती संस्करण-2004ए लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद-1 पृ0 सं0-102.103
10. पुष्पा मैत्रेयी – कस्तूरी कुंडल बसै, पहला संस्करण-2009ए राजकमल प्रकाशन प्रा0 लि0 नई दिल्ली-110002,  पृ0 सं0-13
11.  वही … पृ0 सं0-12
12.  वही … पृ0 सं0-29
13.    वही … पृ0 सं0-42
14.  वही … पृ0 सं0-62
15.  पुष्पा मैत्रेयी – गुडि़या भीतर गुडि़या, पहला संस्करण-2009ए राजकमल प्रकाशन प्रा0 लि0 नई दिल्ली-110002,  पृ0 सं0-293.294
16.  वही … पृ0 सं0-246

नाबालिग पत्नी से, बलात्कार का कानूनी अधिकार (हथियार): अरविंद जैन

  ( इन दिनों ‘ वैवाहिक बलात्कार ‘ को लेकर काफी मुखरता बनी है – जो स्वागत योग्य है,  तो विरोध के भी स्वर हैं . स्त्रीकाल ने इसके कानूनी और सामाजिक पहलुओं पर बात की वरिष्ठ स्त्रीवादी चिंतक और अधिवक्ता अरविंद जैन से.  व्यक्त की जा रही शंकाओं के प्रसंग में भी बातें की गई हैं . अरविंद जैन कहते हैं कि वयस्कों से वैवाहिक बलात्कार का मामला गंभीर है ही लेकिन कानूनी पेचदगियों के कारण 15 से बडी और 18 से कम उम्र की लडकियों से बलात्कार का वैध स्वरूप ज्यादा खतरनाक है , कम से कम उसे दुरुस्त कराने की जरूरत है . ‌) 
बलात्कार और ‘वैवाहिक बलात्कार’ कानून को आप कैसे परिभाषित करते है?

आज के दिन 18 साल से बड़ी (बालिग़) लड़की अपनी मर्जी से विवाह कर सकती है, बिना विवाह के यौन सम्बन्ध बना सकती है, ‘सहजीवन’ में किसी के भी साथ रह सकती है, बच्चा गोद ले सकती है, स्वयं बच्चा कर सकती है, artificial insemination का रास्ता अपना सकती है- मतलब बालिग़ लड़की अपने ‘कानूनी अधिकारो’ का उपयोग कर सकती है।

लड़की के बालिग़ होने या विवाह योग्य उम्र 18 साल थी/है, मगर 1949 से 2013 (संशोधन से पहले) तक तो 16 साल से बड़ी उम्र की (नाबालिग) लड़की, अपनी मर्ज़ी से किसी के भी साथ यौन सम्बन्ध बना सकती थी।16 साल से बड़ी उम्र की (नाबालिग) लड़की की सहमति  को भी,सहमति  माना जाता रहा है।नाबालिग लड़की-विवाह-योग्य नहीं थी, पर अपनी मर्ज़ी से यौन सम्बन्ध बना सकती थी। 16 साल की लड़की का विवाह करना भले ही ‘अपराध’ है/था,परन्तु बिना विवाह के भी यौन सम्बन्धों की भरपूर आजादी थी। शायद बेटियों को कहीं जरूरत से ज्यादा ही आज़ादी दे रखी थी, इसलिए 2013 में ‘सहमति से सम्भोग’ की उम्र, 16 साल से बढ़ा कर 18 साल करनी पड़ी। बहुत साफ़ है कि ‘देश की बेटियों’ को ‘यौन हिंसा’ से भी बचाना था और ‘कानूनी विसंगतियो और अंतर्विरोधों’ को भी समाप्त करना था।आपराधिक संशोधन अधिनियम, 2013 में सहमति से सम्भोग की उम्र 16 साल से बढ़ा कर 18 साल कर दी गई, मगर 15 साल से बड़ी उम्र की (नाबालिग) अपनी पत्नी से सहवास को अभी भी बलात्कार नहीं माना। अपनी ‘बेटियों’ को तो यौन सम्बंधों से सुरक्षित रखना है,पर नाबालिग पत्नी (बहुओं) से सहवास (बलात्कार) करने का कानूनी अधिकार (हथियार), बनाये-बचाये रखना है।वरना विवाह संस्था या परिवार चलेगा कैसे! 

अगर ऐसा है तो फिर परेशानी या विवशता क्या है?
 मुझे लगता है कि सरकार की असली मजबूरी यह है कि तमाम कोशिशों के बावजूद बाल विवाहों को रोकना असंभव है, इसलिए बाल विवाह दंडनीय अपराध घोषित करने के बावजूद, ‘अवैध’ नहीं, ‘अवैध होने योग्य’ ही हैं। वो कहते हैं कि हम क्या करें! अधिकांश ग्रामीण जनता गरीब..अनपढ़..अन्ध-विश्वासी है और विवाह के ‘अटूट बंधन’ को ‘पवित्र संस्कार’ मानती-समझती है।‘वोट बैंक की राजनीति’-जिंदाबाद..जिंदाबाद। तभी तो सरकार ने नहीं मानी विधि आयोग की 205वी रिपोर्ट की सिफारिश और जे. एस. वर्मा आयोग की राय क़ि “भारतीय दंड संहिता की धारा 375 के अपवाद को खत्म कर दिया जाना चाहिए”। संक्षेप में यही है भारतीय समाज (संसद से अदालत तक) का दोहरा चरित्र(हीन) और असली चेहरा। अब आप ही बताएं कि 15 साल की नाबालिग पत्नी से बलात् यौन हिंसा की ‘शर्मनाक’ कानूनी छूट को, कैसे न्यायपूर्ण माना-समझा जा सकता है? सत्र-न्यायाधीश से ले कर सुप्रीम कोर्ट तक के न्यायमूर्ति, ना अपील सुनने को राज़ी हैं ना दलील। ‘बलात्कार की संस्कृति’ को पोषित करते और बढ़ावा देते इन अर्थहीन, विसंगतिपूर्ण और अंतर्विरोधी कानूनों से, ना बाल विवाह रोके जा सकते हैं और ना ही बाल वेश्यावृति.

इन कानूनों की समवैधानिक वैधता को चुनौती देने की बात कैसे आई?
दरअसल दिल्ली हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति विक्रमजीत सेन (अब सुप्रीम कोर्ट में) और वी.के.शाली ने  बाल विवाह पर अदालत के अनेकों अंतर्विरोधी निर्णयों को देखते हुए, मामला दिल्ली हाई कोर्ट की पूर्ण खंडपीठ को भेजा था। बाद में पूर्ण खंडपीठ (न्यायमूर्ति विक्रमजीत सेन, संजीव खन्ना और वी.के.शाली) के समक्ष 2008 में बाल विवाह की वैधता  को लेकर, लज्जा देवी बनाम सरकार, महादेव बनाम सरकार और ऐसे ही कुछ और मुकदमें विचाराधीन थे। मैं महादेव का वकील था, जिसकी साढ़े पंद्रह साल की बेटी ने किसी लड़के के साथ भागकर शादी कर ली थी। पुलिस में मामला दर्ज हुआ और जब वह मिली, तो वह गर्भवती थी। मजिस्ट्रेट ने उसे नारी-निकेतन भेज दिया,जहाँ  वह बालिग़ होने तक रही। उसकी डिलीवरी भी नारी निकेतन में ही हुई थी। पूर्णपीठ के समक्ष बाल विवाह की वैधता को लेकर बहुत से विरोधाभासी सवाल थे। इस विषय पर सालों से लिखता-बोलता रहा हूँ। मुझे लगा कि इस मामले में मैरिटल रेप (वैवाहिक बलात्कार) पर बहस शुरू की जा सकती है।बाल विवाह निषेध अधिनियम 2006 के मुताबिक, किसी भी लड़की की शादी के लिए  उम्र 18 साल और लड़के की उम्र 21 होनी अनिवार्य है. 18 साल से कम उम्र की लड़की की शादी 21 साल से कम उम्र के लड़के के साथ कराना दंडनीय अपराध है और दो साल का सश्रम कारावास या एक लाख रूपये तक का आर्थिक दण्ड या फिर दोनों हो सकते हैं. मगर ना तो विवाह ‘अवैध’ माना जाता है और ना ही शादी के वक़्त यदि लड़के की उम्र 18 साल से कम है, तो इसे अपराध नहीं माना जाता है।  महादेव का वकील होने के नाते मैंने दिल्ली हाई कोर्ट में एक और याचिका दायर की, जिसमें भारतीय दण्ड संहिता की धारा 375 के अपवाद (15 साल से बड़ी पत्नी के साथ सेक्स को बलात्कार नहीं माना गया है) की समवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई। भारतीय दण्ड संहिता की धारा 376 में उस वक्त यह प्रावधान किया गया था कि 12-15 साल तक की बीवी के साथ संबंध बनाने पर, पति को दो साल की कैद या जुर्माना हो सकती है। यह जमानत योग्य अपराध था और जिसमें अधिकारिक रूप से जमानत मिल सकती थी. इस प्रावधान की समवैधानिक वैधता को भी चुनौती दी गई. सीआर.पी.सी की धारा 198 (6) में यह प्रावधान किया गया था कि कोई भी कोर्ट ‘मैरिटल रेप’ के मामले को संज्ञान में नहीं लेगा। इसका मतलब यह हुआ कि आप अपने ऊपर हो रहे अन्याय के खिलाफ अदालत भी नहीं जा सकते हैं। इसमें पत्नी की उम्र का भी कोई जिक्र नहीं किया गया था, मतलब पत्नी किसी भी उम्र की हो सकती है।15 साल से कम उम्र की नाबालिग पत्नी के साथ बलात्कार के मामला में भी पुलिस कोई भी करवाई नहीं कर सकती थी। ऐसे मामलों में गरीब नाबालिग लड़की को खुद ही कोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ता और जटिल कानूनी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता था। यही नहीं, हिन्दू अल्पवयस्कता और संरक्षकता अधिनियम, 1956 की धारा में 6 (सी) के तहत एक और विचित्र प्रावधान है कि अगर पति और पत्नी नाबालिग हों तो पति पत्नी का अभिवावक होगा। कानून के इन सभी प्रावधानों की समवैधानिक वैधता को हाई कोर्ट में चुनौती दी गई थी।लम्बी सुनवाई के बाद पूर्णपीठ का ऐतिहासिक फैसला (लज्जा देवी बनाम सरकार)2012 में आ पाया, मगर ‘वैवाहिक बलात्कार’ वाली याचिका पूर्ण पीठ ने खंडपीठ (न्यायमूर्ति रविन्द्र भट्ट और एस.पी.गर्ग) के पास भेज दी।  दिल्ली हाई कोर्ट की खंडपीठ (न्यायमूर्ति रविन्द्र भट्ट और एस.पी.गर्ग) में मामले पर बहस चलती रही।सरकारी वकीलों ने लगातार यह कर तारीख ली कि सरकार कानून में उचित संशोधन कर रही है। आपराधिक संशोधन विधेयक 2010, 2011 और 2012 के प्रारूप अदालत में पेश किये गए थे। सात दिसम्बर 2012 को आपराधिक संशोधन विधेयक पर बहस चल ही रही थी, कि 16 दिसम्बर 2012 को ‘निर्भया बलात्कार कांड’ आ खड़ा हुआ। देशभर में जोरदार आंदोलन हुए जिसके दबाव-तनाव में सरकार ने अध्यादेश जारी किया। वर्मा कमीशन की रिपोर्ट भी आई और अंततः 3 फ़रवरी 2013 से आपराधिक संशोधन अधिनियम, 2013 लागू हुआ। महादेव केस के तमाम मुद्दे ‘निर्भय कांड’ के पीछे कहीं दब-छुप गए.

‘निर्भया काण्ड’ के बाद हुए आमूल-चूल संशोधन 2013 से कानून में क्या बदलाव हुए? 
हाँ! यह समझ लेना भी ज़रूरी होगाया है कि अपराधिक संशोधन अधिनियम, 2013 से पूर्व और संशोधन के बाद कानून के प्रावधानों में क्या फर्क आया। एक ही महत्वपूर्ण बदलाव हुआ कि अब 15 साल से कम उम्र की पत्नी से बलात्कार के मामले में, सजा में कोई ‘विशेष छूट’ नहीं मिलेगी। संशोधन के बाद इस प्रावधान को भारतीय दण्ड संहिता से हटा लिया गया। मगर मुझे लगता है कि कुल मिला कर स्त्री अधिकारों के सम्बन्ध में स्थिति, पहले से ज्यादा खराब और विष्फोटक हुई है।
अपराधिक संशोधन अधिनियम 2013 में बलात्कार को अब ‘यौन हिंसा’ मान लिया गया है। इसमें सहमति से सम्भोग की उम्र 16 साल से बढाकर 18 साल कर दी गयी है जबकि धारा 375 के अपवाद में पत्नी की उम्र 15 साल ही है। अपराधिक संशोधन अधिनियम 2013 से पहले पति को सिर्फ ‘सहवास’ करने की छूट थी, मगर संशोधन के बाद तो ‘अन्य यौन क्रीडाओं’ का भी अधिकार दे दिया गया है. यह किसी भी सभ्य समाज में उचित, न्यायपूर्ण नहीं माना-समझा जा सकता। कानून अभी भी पति को अपनी 15 साल से बड़ी उम्र की नाबालिग पत्नी के साथ बलात्कार करने का ‘कानूनी लाइसेंस’ देता है, जो निश्चित रूप से नाबालिग बच्चियों के साथ मनमाना और विवाहित महिला के साथ कानूनी भेदभावपूर्ण रवैया है. यह भेदभावपूर्ण कानूनी प्रावधान संविधान के अनुच्छेद -14 और 21 में दिए गए मौलिक अधिकार का हनन तो करता ही है और यह मानवाधिकार का भी हनन है।

 स्त्री चाहे तो घरेलू हिंसा अधिनियम के अधीन मुकदमा कर सकती है या तलाक भी तो ले सकती है? अधिकांश का तो कहना है कि स्त्रियाँ इस कानून का दुरूपयोग कर सकती हैं? 
हाँ! बहुत सही कह रहे हो मगर  यह है कि शादीशुदा महिलाओं के पास चुपचाप यौन हिंसा सहन करने, बलात्कार की शिकार बने रहने या फिर मानसिक यातना के आधार पर पति से तलाक लेने या घरेलू हिंसा अधिनियम के अधीन मुकदमा करने के अलावा कोई विकल्प नहीं रहा जाता है, जो नाकाफी है। पति को नाबालिग पत्नी तक के साथ बलात्कार करने का कानूनी लाइसेंस और पत्नी को कोर्ट-कचहरी करने का विकल्प? वाह! क्या बंटवारा है-कानून और बराबरी के अधिकारों का!

भारतीय समाज में अब काफी विविधता है, जाति, वर्ग आदि की, क्या इस क़ानून के लिए इन विविधताओं के असर का ख्याल नहीं रखना होगा ? खासकर तब, जब शुद्धि और अग्नि परीक्षा के मामले आज भी आते हैं ? 

विविधता जाति, धर्म,वर्ग,क्षेत्र,परम्परा,संस्कार का कानूनी अधिकारों पर प्रभाव नहीं पड़ना चाहिए। यह सब ध्यान में रखेंगे तो बदलाव की सभी संभावनाओं की  ‘ हत्या’ ही करनी होगी  पति को अपनी 15 साल से बड़ी उम्र की पत्नी के साथ ‘बलात्कार करने का कानूनी लाइसेंस’ देना, ‘बलात्कार कि संस्कृति’ को बढ़ावा ही देता है। स्त्री को कब तक धार्मिक आस्थाओं-अनास्थाओं की बलि चढाते रहेंगे? क्या हर बार परिवर्तन के लिए किसी एक ‘फुलमनी’ को सुहाग सेज पर अंतिम साँस लेनी पड़ेगी? 2015 में भारतीय शादी-शुदा महिलाओं की स्थिति ‘सेक्सवर्कर’ और ‘घरेलू दासियों’ से भी बदतर है। ‘सेक्स वर्कर’ को ना कहने का अधिकार तो है, शादीशुदा महिला को वो भी नहीं है। पुरुष के लिए कानून ‘उपयोग’ और स्त्री के लिए हो तो ‘दुरूपयोग’-यह कहाँ का न्याय हुआ?

 दुनिया के अन्य देशों में क्या और कैसे कानून हैं?

लगभग 76 मुल्कों में वैवाहिक बलात्कार को दंडनीय अपराध की श्रेणी में रखा गया है। नेपाल जैसे छोटे से मुल्क में वैवाहिक बलात्कार को अपराध माना गया है। नेपाल के सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले में कहा था- ‘पत्नी की सहमति के बिना सम्भोग बलात्कार के दायरे में आएगा. धार्मिक ग्रंथों में भी पुरुषों को द्वारा पत्नी के बलात्कार की अनदेखी नहीं की है। हिन्दू धर्म में पति और पत्नी की आपसी समझ पर जोर दिया गया गया है’



अदालतों का इस पर क्या नजरिया रहा है?
देश में प्रजातंत्र और ‘कानून का राज’ है, मगर घर में पितृसत्ता कि तानाशाही. अदालतों का तो यहाँ तक कहना है कि “संविधान को परिवार में लागू करना, सांड को ‘चाइना शॉप’ में घुसाने जैसा होगा”। इसका अर्थ-अनर्थ है ‘संविधान की मर्दवादी व्याख्या’। यह ‘नाबालिग पत्नी’ के साथ मनमाना और विवाहित महिला के साथ अन्यायपूर्ण ‘कानूनी भेदभाव’ है। यह कानूनी प्रावधान दमनकारी, असंवैधानिक, संविधान के अनुच्छेद-14, 21 में दिए गए मौलिक अधिकारों ही नहीं, बल्कि मानवाधिकारों का भी हनन है।

एक बात और यह कि आखिर दाम्पत्य में बलात्कार कानून से पुरुष समाज क्यों डरा हुआ है? परिवार को तो हमेशा से निजी और पवित्र दायरा मानते रहे हैं, सो हस्तक्षेप के लिए गुंजायश कहाँ है? 
इस कानून को न बनाये जाने वाले यह तर्क देते हैं कि वैवाहिक बलात्कार कानून बन जाने से विवाह और परिवार जैसी पवित्र संस्था को खतरा पहुँच सकता है. मैं जवाहर लाल नेहरु जी के शब्दों को याद करके इसका जवाब देना चाहूँगा- ‘हम हर भारतीय स्त्री से सीता होने की अपेक्षा करते हैं, लेकिन पुरुषों से मर्यादा पुरुषोतम राम होने की नहीं.’ मेरा मानना है कि कानूनानुसार लड़की के बालिग़ होने, शादी और सहमति से यौन सम्बन्ध बनाने की उम्र 18 साल है, मगर देश में 15-18 साल उम्र की लाखों नाबालिग विवाहित स्त्रियों और नाबालिग सेक्स वर्कर्स’ के साथ रोज़ बलात्कार हो रहा है। एक रिपोर्ट तक दर्ज़ नहीं होती। लगता है कि इस मुद्दे पर कानून चुप, संसद खामोश, समाज मौन, अदालतें तटस्थ और बाकी अधिकाँश लोग ‘षड्यंत्र’ में शामिल हैं। अंत में इतना ही कहना काफी होगा कि कानूनों में अंतर्विरोधी, विसंगतिपूर्ण या ‘सुधारवादी-उदारवादी मेकअप’ से, राष्ट्र का बहुमुखी विकास असंभव है। राष्ट्र को आज नहीं तो कल, इस पर गंभीरता से विचार करना होगा….पहले ही बहुत देर हो चुकी है।

 मान लो कानूनी छूट खत्म हो जाए तो विवाह के भीतर बलात्कार के अभियुक्तों को सजा दिलवाना क्या और टेढी खीर नहीं होगी?
अरविन्द जैन- क्या मौजूदा किसी भी भी कानून में सजा दिलवाना बहुत सस्ता-सुंदर और निश्चित न्याय मार्ग है? कानून अपना काम करेगा या नहीं, वो एक अलग बहस का मुद्दा है। इस डर से क्या कोई कानून ही ना बनेगा?  

हव्वा की बेटी: उपन्यास अंश

जयश्री रॉय

जयश्री रॉय कथा साहित्य में एक मह्त्वपूर्ण नाम हैं. चार  कहानी संग्रह , तीन उपन्यास और एक कविता संग्रह प्रकाशित हैं . गोवा में रहती हैं. संपर्क: jaishreeroy@ymail.com

( अफ्रीकी  महादेश के सत्ताईस से ज्यादा देशों में महिलाओं के सुन्ना की प्रथा आज भी जारी है। ‘सुन्ना’ महज एक प्रथा नहीं बल्कि वहां की औरतों की ज़िन्दगी की त्रासदी का सबसे बड़ा कारण है। माहरा की कहानी के बहाने जयश्री रॉय ने अपने चौथे और नवीनतम उपन्यास ‘हव्वा की बेटी’ में स्त्री जीवन के उसी कसैले यथार्थ को उद्घाटित किया है। माहरा और उसकी जैसी औरतें नस्ल, मज़हब, जुबान और रंग से परे वस्तुत: एक स्त्री होती हैं. आंसुओं का खारापन, दर्द का स्वाद, काली त्वचा के नीचे बहने वाले लहू का रंग… इनका सब कुछ दुनिया के हर कोने में बसने वाली औरतों के समान ही है. इन औरतों का औरत होना दुख में होना है, बददुआ में होना है, अज़ाब में होना है… अफ्रीका के जंगलों और धू-धू करते रेगिस्तानों की स्याह-शुष्क दुनिया के चप्पे-चप्पे में माहरा जैसी लाखों बदनसीब औरतों की दर्द भरी कहानी धूल, बवंडर और आंधी के साथ रात दिन उसांसें लेती रहती हैं. यह उपन्यास उसी दुःख और उससे मुक्त होने की चाहत में लड़ती स्त्रियों की संघर्ष गाथा है। 


मदर्स डे पर स्त्रीकाल के पाठकों के लिए  ख़ास प्रस्तुति के रूप में यह उपन्यास-अंश .. कहानी के इस भाग में मां  है , जो स्नेह और परम्परा के बोझ के बीच द्वैध में फंसी अपनी बेटी के  लिए क्रूर होने को मजबूर है- पीढी -दर पीढी दासता और अनुकूलन को ट्रांसफर करती है , बेटी स्नेह और परंपरा के बोझ तले बिखर जाती है . स्त्रीकाल ने अफ्रीकी देशों की इस अमानवीय परंपरा की दर्दनाक तस्वीर छापी थी इसके सम्पादन मंडल की सदस्य निवेदिता की एक रिपोर्ट के रूप में , आज यह कथात्मक दास्तान …. ! लेखिका यद्यपि उस परिवेश से नहीं हैं  , लेकिन कथा की विश्वसनीयता उनके लेखकीय कौशल और संवेदना के कारण संभव हो पायी है .  )  

माहरा… ए माहरा… मां ने बिल्कुल फुसफुसा कर मुझे पुकारा था, मगर ना जाने क्यों कच्ची नींद में ही उनकी किसी खंडहर से गुज़रती हवा की तरह सिसकारी भरती आवाज़ सुनकर मेरा गला अनायास सूख आया था. उस समय हमारी झोंपड़ी के बाहर फीके होते आकाश की पृष्टभूमि में ठीक ताड़ के बूढ़े पेड़ के माथे पर सुबह का तारा बहुत उजला हो आया था. मैंने बिस्तर से उठते हुये बगल में निश्चिंत सोती हुयी अपनी छोटी बहन मासा को देखा था. चेहरे पर बिखरे हुये घुंघराले बाल और भरे हुये अधखुले होंठ… ना जाने क्यों उस पल मेरा जी चाहा था, उससे लिपट जाऊं! मुझे उनींदी, चुपचाप बैठी देख मां ने इस बार कुछ अस्थिर होकर मुझे झिंझोरा था- “माहरा…!”

मैंने अब जल्दी से बिस्तर छोड़ा था और मां के पीछे अपने एक कमरे की उस छोटी-सी झोंपड़ी से बाहर निकल आई थी. कितनी तेज़ चल रही थी मां! दो-चार क़दमों में ही मवेशियों के बाड़े के पार! उनके साथ बने रहने के लिये मुझे लगभग दौड़ना पड़ रहा था. कुछ ही पलों में हम आठ-दस झोंपड़ियों की अपनी उस छोटी-सी बस्ती को पार कर कैक्टस के बौने और बेतरतीव जंगल में आ गये थे. सितंबर की यह एक मीठी और गुनगुनी ठंड की भोर थी. हवा में कुछ रेशम-सा मुलायम और सुखद घुला था. पूरब के क्षितिज में अब तक केसर के कुछ सुर्ख रेशे चमकने लगे थे. दूर कहीं सुतूरमूर्ग बोला था और इसके साथ ही पास की घनी झाड़ियों से निकलकर एक मटमैला सियार हड़बड़ा कर भागा था. यह सब देखते हुये शायद मेरे क़दम कुछ धीमे पड़ गये थे. मां ने मुड़कर दबी आवाज़ में फिर मुझे पुकारा था और मैंने दौड़ना शुरु कर दिया था.

एक बेडौल, काले पत्थरों के टीले के पास आकर मां रुकी थी और इधर-उधर देखा था. शायद उन्हें किसी का इंतज़ार था. मैं उनकी कमर से लगी सर उठाकर उन्हीं को देख रही थी. हिज़ाब में लिपटा मां का गहरा स्याह आधा चेहरा और नाक की नोंक पर चमकती ओस की एक छोटी-सी बूंद- उजली होती भोर की हल्की उजास समेटे! कितनी रहस्मयी दिख रही थी वो इस समय! इन्हीं अनगढ़ पत्थरों की तरह ठोस और निर्विकार, मगर सांस लेती हुई, धड़कती हुई, जीवित… जाने क्यों उन्हें देखते हुये उस समय मुझे अनायास रोना-सा आ रहा था…

दो-चार दिन पहले ही मैंने मां को नीची आवाज़ में अब्बू से बात करते हुये सुना था. बात करते हुये वे मेरी तरफ मुड़-मुड़कर देख रहे थे. ’बंजारन’, ’पैसे’, ’बहुत जल्द’ जैसे कुछ अस्पष्ट शब्द मेरे कानों में पड़े थे. दीदी को पूछते ही उसने मुझे डपट दिया था- “बड़ों की बातें छिपकर नहीं सुना करते…!” मुझे अचानक अजाने डर ने घेर लिया था. स्मृतियों में कुछ धुंधली-सी परछाइयां उभरी थीं- जंगल में घास-फुस की एक छोटी झोंपड़ी में पड़ी हुई दीदी… खून से लिथड़ी और बेतरह गोंगियाती हुई! मां जब उसे खाना पहुंचाने जाती थीं, मैं उनके पीछे चुपके से हो लेती थी. कई बार उन्होनें अपने पीछे आते देख मुझे वहां से डांटकर भगाया भी! मुझे चटाई में रस्सियों से बंधी पड़ी दीदी की कातर आंखें अक़्सर याद आती हैं! ठीक जैसे जिबह होती किसी मवेशी की आंखें- कोटर में उबली हुई, लाल और पनीली… ओह! उन्हें याद कर कितना डर लगता था मुझे रातों को! अक़्सर अपने बगल में सोई हुई मासा से लिपट जाती थी. पसलियों में दिल धरकता रहता था देर तक!जाने क्यों आज यहां, इस जंगल में मां के साथ खड़ी होकर मुझे दीदी की वही खून चढ़ी आंखों की रह-रहकर याद आ रही थी…

कल रात मां ने खाना परोसते हुये मेरी थाल में ऊंट का मांस, रोटी और खीर सबसे ज़्यादा परोसी थी. ऊंट की पीठ का गुमड़वाला यह हिस्सा मुझे हमेशा बहुत स्वादिष्ट लगता था. चर्बी से ठसाठस भरा हुआ! मासा ने मेरी चोटी खींची तो मां ने उसे मारा भी. बड़े भैया तारिक से कहा कि वह मुझे तंग ना करे और कोठरी के एकमात्र लकड़ी के साफ़ चादर वाले बिस्तर पर सोने दे. मुझे यह सब अच्छा तो लग रहा था, मगर जाने क्यों कहीं एक डर-सा भी बना हुआ था जिसे मैं समझ नहीं पा रही थी. अब्बू ने शाम को मवेशियों को उनके कांटेदार बाड़े में डालते हुये बहुत नर्म आवाज़ में मुझसे कहा था, गांव की औरतें मुझे कल के बाद तरह-तरह के उपहार देनेवाली हैं. मां ने आंखों में चमक भरकर कहा था- अब तू भी ख़ास बन जायेगी, औरत का दर्ज़ा पायेर्गी… औरत का दर्ज़ा! ख़ास हो जायेगी! मां की कही ये चंद बातें मेरे जेहन में देर रात तक उमड़ती-गुमड़ती रही थीं. सीने के अंदर दिल की धड़कने भी साथ बढ़ती-घटती रही थी. ये ख़ास होना क्या होता है!

जब से होश सम्हाला है, हाथ में लकड़ी लेकर गाय-बकरियों को रेत के सूखे, कंटीले जंगलों में हांकती-चराती रही हूं… तेज़ धूप और बारिश में, अंधड़-पानी में. इस मैदान से उस मैदान, ढलान और पहाड़ियां… कभी लकड़बघ्घे के पीछे शोर मचाते हुये भागना तो कभी किसी सियार के मुंह से मेमना छीन लाना! एक पल लापरवाह हुये नहीं कि कोई ना कोइ जानवर आपकी मवेशी उठा ले जायेगा. साथ ही अपनी जान की भी चिंता! पूरा ईलाका शेर, तेंदुओं से भरा हुआ है! मां कहती थीं, शेर सामने पड़ जाये तो भागना मत. चुप खड़ी होकर उसकी आंखों में देखती रहना. एक पलक झपकी तुम्हारी कि शेर तुमपर टूट पड़ेगा! रोज़ हमें जंगलों में भेजते हुये मां जानती थीं कि वे हमें मौत के मुंह में भेज रही हैं. मगर भेजती थीं. ज़िंदगी कुछ इतना ही मजबूर कर देती है हमें! जीने के लिये ही हम जैसे लोगों को रोज़-रोज़ मरना पड़ता है! हर दिन मौत के मुंह से हम ज़िंदगी का एक कौर छीन लाते थे! शायद तभी हमारे जीवन में बिना अतिरिक्त चीनी, नमक के इतना स्वाद होता था… भूख हर चीज़ को ज़ायकेदार बना देती है और हमारी ज़मीन से भूख का तो एक बहुत पुराना संबंध है! मैं शायद अपने जन्म से इस स्वाद, इस संबंध को जानती-जीती आई हूं!

सोचते हुये मैं अपनी चादर को अपने इर्द-गिर्द लपेटकर ज़मीन पर बैठ गई थी और जाने कब सो भी गई थी. नींद में मेरी सोच अजीब-अजीब-सी शक़्लों में बदल गई थी! रेत के सुनहरे टीले, धूप की सफ़ेद आग़ में झुलसते पेड़ और कैक्टस के गुलाबी, पीले, बैंजनी फूल- दूर-दूरतक! और आकाश में वह बड़ी चील… उसके विशाल, काले डैने… तेज़ टिंहकारी… उसके पंखों के पीछे सूरज छिप गया है… हर तरफ अंधेरा फैल रहा है… मैं डर कर उठ बैठी थी और अपने चेहरे पर उस चील के काले, भीषण डैनों को छाये हुआ पाया था. ओह! कितनी ज़ोर से चीख कर खड़ी हो गई थी मै! उस स्याह गिद्ध के बगल में ही मां खड़ी थी. एकदम शांत और निर्लिप्त! मेरी चीख को उन्होंने जैसे सुना भी नहीं था.

उस समय तक काफी रोशनी फैल चुकी थी. ताड़ के इक्के-दुक्के पेड़ों पर जंगली सुग्गे कलरव कर रहे थे. पूरब का आकाश गहरा सुनहरा हो उठा था. मैंने मां के पीछे छिप कर उस गिद्ध जैसी शक़्ल वाली बंजारा औरत को अब ध्यान से देखा था. ओह! यह एक गेद्दा थी लड़कियों की सुन्ना करवाने वाली! गेद्दा मिडगान सम्प्रदाय की होती हैं- एक बार मां ने ही कहा था. छींटदार लहंगे के ऊपर काली, मोटी, खुरदरी चादर से उसने अपना माथा और आधा चेहरा ढंक रखा था. रंग-बिरंगे मोती, चटक रंग पछियों के पर, जानवरों की हड्डी, शेर के दांत और नाखून… जाने उसने क्या-क्या गले में डाल रखे थे! साथ में चोंच जैसी नाक में पीतल का चौकोर नथ, कलाइयों में शंख, गिलट और पत्थर के कड़े, पांव में कांसे के झांझर और सिक्कों की खन-खन बजती लड़ियां… गोदने से उसकी खुली बांहें एकदम काली पड़ी हुई थीं. सबसे अजीब थीं उसकी आंखें- गंदले सफ़ेद में भुरी-पीली पुतलियां और उनपर इंद्रधनुष-सी खींची जुड़वां भौंहें- मटमैली! जले उपले-से झुरझुरे, धंसे गाल और पोटली-से सिकुड़े काले-बैंजनी होंठ! बलगम से भरी घरघराती आवाज़ में मां से कह रही थी कि पड़ोस के गांव से एक शादी की दावत खाकर आते हुये इतनी देर हो गई. वह अपने कालीन के मुलायम और रंग-बिरंगे टुकड़ों से बने झोले से जाने क्या-क्या बाहर निकाल रही थी- पत्थर के नुकीले टुकड़े, भोंथरा चाकू, हैंडल टूटी कैंची, ब्लेड का टुकड़ा… देखते हुये मेरे भीतर का सोया हुआ डर एकबार फिर जाग उठा था. क्या है यह सब, किसके लिये है!

चीज़ों को ज़मीन पर फैलाकर उसने एकबार बड़ी हिकारत से मुझे देखा था और फिर मां को आदेश दिया था- “अब पकड़ो इसे… देर हो रही है!”उसकी बात पर मां मेरी ओर मुड़ी थी- “माहरा! मेरी अच्छी बेटी… आज वह ख़ास मौका आ गया है जिसका इंतज़ार इस देश के हर नेक मुसलमान औरत को होता है! पाकीजा और ख़ास होने का अवसर! औरत होने, निकाह के और मां होने के काबिल होने का कीमती मौका! तुम्हें हिम्मत और सव्र रखना है और बस, सबकुछ आसान और जल्द हो जायेगा. अल्ला तुम्हारा निगहेबान है!” कहते हुये वे मेरी तरफ धीरे-धीरे बढ़ रही थी और जाने क्यों मैं धीरे-धीरे पीछे की ओर सरक रही थी. मुझे उस पल अपनी मां से डर लग रहा था. उनकी शांत, ठंडी आंखें, ठहरी हुई आवाज़, भींचा हुआ जबड़ा… सबकुछ मुझे दहशत में डाल रहा था. जाने क्यों मुझे ऐसा लग रहा था कि मेरे खिलाफ कोई बड़ी साजिश रची जा रही है और मां भी उस में शामिल है!
पहले अपने हर डर, दुविधा के क्षण मैं जिस गोद में अपना आश्रय ढूंढ़ती थी, आज मुझे वह किसी शेर की मांद की तरह भयावह लग रही थी. कितना दुर्भाग्यपूर्ण था यह! मुझे पास आते ना देख मां एकदम से अस्थिर हो उठी थीं और अपने दोनों हाथ फैला कर मेरी ओर लपकी थीं- “माहरा! पास आओ बच्ची!” उनकी एक पल को धधक उठीं आंखें, सख़्त हुआ जबड़ा और चील की झपट-सी बांहें देख जाने मुझ में क्या घटा था, मैं अचानक मुड़कर भाग खड़ी हुई थी. मां चीखती हुई मेरे पीछे भाग रही थीं, मगर मुझे पकड़ पाना उनके वश की बात नहीं थी. दस साल में सात बच्चे पैदा कर मां छीज गयी थीं. घर के काम, मवेशियों की देख-रेख, ऊपर से कई नामालूम-सी बिमारियां… कभी-कभी दिनों तक बिस्तर से उठ नहीं पाती थीं. और इधर मैं- तेरह साल की उमर! ऊंट का पौष्टिक दूध, खजूर और मधु से बनी सेहत! रोज़ अपने ढोर-डंगर के साथ मीलों रेत की ढूंहों और कांटों-कैक्टस के जंगलों में सुबह से शाम तक भटकती फिरती हूं. कभी जंगली कुत्तों के झुंड के पीछे भागना पड़ता है तो कभी शेर, चीते से अपनी जान बचानी पड़ती है. दौड़-दौड़कर मैं हिरण ही बन गई हूं. एक सांस में रेत के कई टीले पार कर सकती हूं. बिना पानी पीये गुस्सैल सूरज को सर पर उठा कर मीलों चल सकती हूं.

तो मां के बार-बार पुकारने के बावजूद मैं रुकी नहीं थी और लगातार भागते हुये रेत के कई टीले एक साथ पार कर गई थी. दिन के चढ़ने के साथ हवा गर्म हो गई थी, पांव के नीचे बालू तपने लगा था. बीच में रुक कर मैंने कुछ मोटे पत्तों वाले रेगिस्तानी पौधों के पत्ते निचोड़ कर उनका रस पिया था, जंगली फूलों का मधु चुसा था. कुछ कच्ची-पक्की बेरियां भी खाई थी. शाम घिरने तक मैं थक कर चूर हो गयी थी. एक सायेदार पेड़ के नीचे खड़ी होकर मैंने दूर-दूर तक नज़रें दौड़ाई थी. शाम की मुलायम धूप में रेत के टीले ठंडी, सुनहरी आग़ में नहाये हुये थे. हल्की चलती हवा से बालू के गर्म, बादामी आंचल में लहरें और भंवर-से पड़ रहे थे. मुझे घर की याद आई थी, मां और मासा की भी. तीन साल की मासा मेरे सबसे क़रीब थी. एकदम गुड़िया! मुझे ज़ोर से रोना आया था- मां… मासा… और वही बैठकर रोते हुये जाने मुझे कब नींद आ गई थी.

जब आंख खुली थी, सामने अब्बू और बड़े भैया तारिक को खड़े पाया था. रेत पर मेरे पांव के निशान ढूंढ़ते हुये वे आख़िर मुझ तक पहुंच ही गये थे. मैं एकदम हड़बड़ा कर उठी थी और फफकने लगी थी. उस समय मुझे बहुत डर लग रहा था. उस वीरान जगह में अपने भाई और अब्बू को देखकर जहां एक तरफ मुझे राहत का अहसास हुआ था, वही घर से भाग आने की ग्लानि ने मुझे सहमा भी दिया था. लगा था, अब वे मुझे डांटेंगे, मारेंगे… मगर अब्बू ने कुछ भी नहीं कहा था. बड़े भैया ने बस साधारण ढंग से कहा था- घर चलो! उनके पीछे सिसकते हुये मैं सर झुका कर चल पड़ी थी. उस समय रात का जाने क्या बजा था. बिना चांद के गहरे काले आकाश में लाखों-करोड़ों सितारे टिमक रहे थे. पूरब की ओर हवा में रेत के कण उड़ रहे थे शायद. बारिश की-सी झर-झर आवाज़ आ रही थी. भैया और अब्बू ने रेत के उड़ते कणों से बचने के लिये साफ़े से अपना चेहरा ढंक लिया था. मगर मैं नंगे सर चलती रही थी. मेरे पूरे जिस्म में रेत के महीन रेज़े सूई की नोंक की तरह चुभ रहे थे मगर उस समय मुझे किसी बात का होश नहीं था. छीली हुई देह और मन से उनके पीछे बदहवाश चलती रही थी!

समकालीन हिंदी आलोचना का स्त्री स्वर

कर्मानन्द आर्य

कर्मानन्द आर्य मह्त्वपूर्ण युवा कवि हैं. बिहार केन्द्रीय विश्वविद्यालय में हिन्दी पढाते हैं. संपर्क : 8092330929

इक्कीसवीं सदी संक्रमण के दौर से गुजर रही है. भारतीय समाज में पहले आधुनिकता और फिर उत्तर आधुनिकता को लेकर काफी बहस मुबाहिसा हो चुका है. विमर्शों का जन्म कहीं इसी कोख से हुआ है.विमर्श चाहे वह किसी भी तरह का हो अब लगातार अपनी धुरी प्राप्त कर रहा है. समय का सातत्य यह है कि चाहे साहित्य हो अथवा समाज चारो तरफ उथल पुथल मच रही है. यही कारण है कि आधुनिक भारतीय समाज अब ज्यादा प्रजातान्त्रिक और लोक उन्मुख हुआ है. सबको अपना हक मिल पा रहा है और लोग बिना झिझक के खुद सबके सामने ला पा रहे हैं. ‘सिगमण्ड फ्रायड का यह बयान मशहूर है कि मनोविश्लेषण के क्षेत्र में इतने वर्ष काम करने के बाद भी मैं यह नहीं समझ पाया कि स्त्री आखिर चाहती क्या है?’  शायद इसीलिए स्त्री को ‘अंतिम उपनिवेश’ कहा गया है. स्त्री के लिए जो भी जगह छोड़ी गई है उसका वृतांत निश्चय ही कारुणिक है. लेकिन यह वृतांत हमेशा डराने वाला नहीं होना चाहिए. नहीं तो स्त्री अपनी वाजिब जगह ढूंढने से हमेशा खौफ खाती रहेंगी.’
साहित्य के बिना समाज और समाज के बिना साहित्य की कल्पना असंभव है. समाज एक सामूहिक इकाई है और साहित्य भी बहुत सारी इकाइयों से मिलकर बनता है. यह तथ्य सृजन के हर क्षेत्र में लागू होता है. हिंदी साहित्य का अपना सात-आठ सौ वर्षों का इतिहास है. लेखन की एक बड़ी संख्या में इसमें आमद रही है. साहित्य की बहुत सी विधाओं का अब तक जन्म हो चुका है और कुछ काल के गाल में खुद को समाहित करने से नहीं रोक पायी हैं. प्रतिरोध के इस साहित्य ने वैसे अनेक मुकाम हासिल किये हैं पर साथ की एक जाति विशेष की कृपा के कारण इस का समुचित विकास नहीं हो पाया. साहित्य उन अर्थों में प्रजातान्त्रिक नहीं हो पायी जहाँ उसे समाज के अन्य वर्गों का भी समुचित योगदान प्राप्त होता. अपनी पुस्तक ‘आलोचना और विचारधारा’ में डॉ. नामवर सिंह लिखते हैं कि आलोचना की दुनिया विचारों की दुनिया है. और विचार के लिए चाहे गुरु-शिष्य परंपरा हो या विदग्ध लोगों का समुदाय, उनके बीच बातचीत और शास्त्रार्थ जरुरी है. बहस के जरिये एक पीढ़ी में जो सवाल उठते हैं उनके जबाब अगली पीढ़ी को देने होते हैं . यह सच है कि हिंदी आलोचना का विकास पश्चिम की तरह नहीं हुआ. यहाँ आलोचना का विकास

कुछ आलोचों के द्वारा नहीं वरन संस्थाओं के द्वारा हुआ है. वह संस्था चाहे कोई पत्र, पत्रिका, प्रतिष्ठान के रूप में हो चाहे शिक्षणसंसथान के रूप में. साहित्य और समाज का रिश्ता द्वंदात्मक है.

बात आलोचना की है. यह कला की वह कसौटी है जिसपर साहित्य का ढांचा जांचा परखा जाता है. आलोचना साहित्य के सौन्दर्य को निखारने का कार्य करती है. शब्द अर्थ के निहितार्थों से अलग यह विधा साहित्य के उन तत्वों की बात करती है जो साहित्य सौन्दर्य के कारक हैं. आलोचना की यह परम्परा मनुष्य को सीखने सिखाने पर नहीं अपितु जीवन निर्माण करने की प्रक्रिया स्वरूप प्राप्त हुई. आलोचना के क्षेत्र में जब हम हिंदी पट्टी की स्त्री आलोचकों पर बात करते हैं तो एक शून्य स्थिति दिखाई देती है. आज भी स्त्री आलोचकों की संख्या अँगुलियों पर गिनाने लायक है. स्त्री सैधान्तिकी के लिए आज भी हिंदी जगत कोई ऐसी समीक्षक, आलोचक नहीं पैदा कर पाया जिसको तथाकथित मुख्यधारा बेझिझक उल्लेख कर सके. छिटपुट प्रसंगों को छोड़ दें तो एक खालीपन नजर आता है. यह खालीपन बहुत गहरा है और इसकी लतरें बहुत सारे प्रश्नों को जन्म देती है. क्या कारण है की जहाँ रचनात्मक साहित्य में स्त्री रचनाकारों का बोलबाला है वहीँ वे अपने रचनात्मक साहित्य का मूल्यांकन स्वयं नहीं कर पायीं. आज भी वे नामवरों, नामचीनों के द्वारा पददलित हैं. हिंदी की आलोचना आज भी कहने पर केवल पुरुष का ही नाम सामने आता है. क्या पुरुष आलोचकों ने उन्हें हासिये पर नहीं धकेल दिया.

क्या यह सच नहीं है कि जिन्होंने कुछ काम किया वे भी पुरुष के संरक्षण के बदौलत ही. क्या यही कारण नहीं है उनकी रचनाधारा का सही मूल्यांकन नहीं हो पाया. भारत में स्त्रीविमर्श लगभग अपने चौथे दशक में है इसपर भी इतिहास में उनका नाम कहीं हासिये पर चला गया. हिंदी के इतिहास ग्रंथों में उनके लिए मात्र कुछ पन्ने लिखे गए. आधी आबादी वहां एक सिरे से गायब नहीं तो दबाई अवश्य गई है.

कुछ काम हुआ है पर उसे पर्याप्त नहीं कहा जा सकता. क्योंकि पुरुष रचनाकारों का ही प्रभुत्व चारो तरफ रहा है अतः आलोचना भी इससे अछूती नहीं रही है. यहाँ उन पुरुषों के योगदान को कमतर आंकने का आशय नहीं है अपितु उनकी सदाशयता को बार बार प्रणाम है. पुरुषों ने भी स्त्री आलोचना को काफी आगे बढ़ाया है. स्त्री आलोचना के विकास में समकालीन पत्रिकाओं का बड़ा ही महत्वपूर्ण स्थान है. पत्र-पत्रिकाओं, महिला-लेखन विशेषांक निकाल कर पुनर्जीवन देती रही हैं. विमेन्स स्टडीज विश्वविद्यालयों का एक अलग विषय बन गया है. जगह-जगह विद्यार्थी महिला रचनाकारों के कृतित्व पर शोधकर्ता में संलग्न है. यह हक और दर्जा पाने के लिए महिला रचनाकारों ने अथक परिश्रम और निरंतर साधना की है. महिला लेखन की जमीन तैयार होने में लाखों अनाम स्त्री रचनाकारों की मेधा लगी है. जिनमें बहुत बड़ी संख्या उनकी भी है जिन्होंने लिख-लिखकर अपना साहित्य कॉपियों में दबा दिया, खुद भी कभी दुबारा निकालकर नहीं देखा कि शब्द की यह मौन सम्पदा उनसे छिन न जाए.

प्रजातान्त्रिक मूल्यों में लगातार स्त्री की सहभागिता बढ़ रही है. आज भारतीय राजनीति में स्त्रियों को केवल प्रतीक रूप में ही नहीं वाकई उनकी यथार्थ सहभागिता है. स्त्रियों ने लगभग उन क्षेत्रों में प्रवेश पा लिया है जो आज तक उनके लिए प्रतिबंधित था. अब वह केवल आत्मकथा, संस्मरण या कविता तक ही सीमित नहीं है अपितु वाब साहित्य के हर क्षेत्र में उसकी धमक महसूसी जा सकती है. समकालीन हिंदी आलोचना में स्त्री

आलोचना के उभार को कुछ इन्हीं विन्दुओं के माध्यम से जाना परखा जा सकता है. आजकल की आलोचना की तरह खुद को पुरुष के आईने में देखे कि वह अच्छी दिखाई दे रही है की नहीं, उसे कोई देखेगा कि नहीं. पुरुष ने अपने स्वार्थ के लिए कैसे प्रकृति या स्त्री के दोहन की शब्दावली रची है. वह गाय से दूध निकाल कर ही रहेगा. माँ के शोषण के लिए बस उसपर कोमलतम कवितायें ही लिखता रहेगा उसका शोषण रोकने के लिए उसे अपने संपत्ति में भागीदार नहीं बनाएगा. जैसा कि हम ‘इकोफेमिनिज्म’ में देखते हैं. यहाँ मुझे गोदान में प्रेमचंद की वह पंक्तियाँ याद आती हैं जहाँ पुरुष समाज के प्रतिनिधि के रूप में प्रेमचंद स्वयं को प्रस्तुत करते हैं ‘जब पुरुष में स्त्री के गुण आ जाते हैं तब वह देवता बन जाता है और जब स्त्रियों में पुरुषों का गुण आ जाता है तो वे कुलटा हो जाती हैं. यह कैसी पुरुष विडम्बना है. वह कैसे अपने स्वार्थ के लिए स्त्री के मन का अनुकूलन करता है. आज हम इसे साहित्य का गोपी भाव कह सकते हैं. पुरुष जैसे चाहे उसे नचाये, घुमाये और जब काम निपट जाए तो वह उसे योग मार्ग की शिक्षा दे या सन्यासी का चोला पहना कर उसके मन में यह भाव भर दे कि ‘मेरो को गिरधर गोपाल दूसरो न कोई’. यह मनःस्थिति रखते हुए स्त्री आलोचना का विकास कदापि संभव नहीं है. उसे अपने सम्पूर्ण व्यक्तित्व में महादेवी का अक्स दे दिया जाय जो ‘मैं नीर भरी दुःख की बदरी’ की करुना जनित पीड़ा से बाहर न निकल पाए. बस जिन्दगी भर वह केवल स्यापा ही रोती रहे. ‘हूम-हूम करे’ का आपाद मस्तक भजन कीर्तन करती रहे. क्या यह सच नहीं है कि पुरुष वादी आलोचना और स्त्री मस्तिष्क में घुसी हुई वही पुरुषवादी आलोचना है.

अन्तराष्ट्रीय महिला-वर्ष के बीस बरस से अधिक बीत जाने के बावजूद भी भारत में अभी तक कोई ऐसा मुखर स्त्री विमर्श नहीं आया जिसे हम भारतीय स्त्री विमर्श मान सकें. जो कुछ उपलब्ध है उसे केवल प्रॉक्सी द्वारा ही हिंदी का अपना विमर्श कहा जा सकता है. बकौल अर्चना वर्मा ‘’हिंदी के अपने स्त्रीविमर्श का अर्थ क्या हो सकता है इसकी कोई साफ़ तस्वीर भी हमारे पास नहीं थी और इस सन्दर्भ में शुद्ध हिन्दीनुमा किसी वैचारिक साम्पदायिकवाद या बौद्धिकजातीयतावाद जैसा कोई खास दुराग्रह भी नहीं था’’ . अब प्रश्न पैदा होता है जब स्त्रीवाद को लेकर ही बहुत गहरे प्रश्न हैं तो वहां स्त्री आलोचना को ढूढ़ पाना थोड़ा कठिन कार्य अवश्य है. यह देखा जाना यहाँ लाजिमी है की आज हिंदी साहित्य की अन्य विधाओं में स्त्री रचनाकारों की संख्या संतोषजनक है. वह कविता कहानी, उपन्यास, आत्मकथा, जीवनी आदि का काम तो प्रचुर मात्रा में कर रही है पर आलोचना जो वैचारिकी को स्थापित करने का मुख्य और सशक्त विन्दु है वह वहां पिछड़ रही है. यह स्त्री आलोचना की महज एक पंक्ति है. माया एन्जेलों कि उन पंक्तियों को संबोधित करती हुई जिसमें वह कहती हैं ‘मैं रोज उदित होती हूँ’.हिंदी ने पचास वर्षों ने पचास से भी अधिक महत्वपूर्ण महिला रचनाकार दीं. जिनमें महादेवी वर्मा, सुमद्राकुमारी चौहान, चंद्र किरण सोनरिक्सा, कृष्णा सोबती, मन्नू भण्डारी, उषा प्रियंबदा, मंजुला भगत, मृदुला गर्ग, चित्रा मुद्गल, मृणाल पाण्डेय, नमिता सिंह, नासिरा शर्मा, अलका सरावगी, मधु काँकरिया, अनामिका, अनीता भारती, रजतरानी मीनू, गीतांजलि श्री, पद्मा सचदेव, मीराकांत, चन्द्रकांता राजा सेठ, सूर्यबाला और सुधा अरोड़ा, ने अपनी स्वतंत्र छवि बनाई है. इनकी मौलिकता पर कोई शंका नहीं की जा सकती. कुछ लेखिकाओं ने तो इस विषय पर बहुत बार और निरंतरता में लिखा है.

स्त्री स्वाभाविक आलोचक होती है और प्रकृति ने उसे स्वभावतः जो गुण दिया है वह उसमें ही कहीं पीछे दिखाई देती है. उसका रचनात्मक फैलाव बहुत विशाल है पर जब उसके साहित्य की परिधि का निर्माण करना होता है तो वह कहीं बहुत पीछे रह जाती है. यह सब जानबूझ कर और साजिसन किया गया है क्योंकि इससे पुरुष आलोचकों का एकाधिकार टूटेगा. अनेक खेमों में बंटा हुआ आज का हिंदी आलोचक ग्यारह वर्षों के लम्बें अंतराल में कुछ ऐसी स्त्री आलोचकों को नहीं पैदा कर पाया जिसे मुख्यधारा गर्व से धारित करती हो. आज भी भारतीय पुरुष समाज उतना ही बर्बर और क्रूर है जितना सामंती युग में था. स्त्री का लेखन उसे दोयम दर्जे का लगता है, उसकी आलोचना भी पुरुष को सुहाती नहीं है. यही कारण है कि जब हम हिंदी आलोचन की बात करने चलते हैं तो वहां से स्त्री पक्ष गायब मिलता है. कुछ नाम हम अपनी अँगुलियों पर रखने के सिवा कोई विकल्प नहीं ढूढ पाते. वह हजारो वर्षों से पुरुष की कृपा पर जीती आ रही है. जब पुरुष की इच्छा होती है तब वह रोटी डाल देता है नहीं तो सन्नाटा ही सन्नाटा दिखाई देता है. देश के और भागों में अमूमन स्त्री की दशा-दिशा भले अच्छी हो पर आज जिसे हम हिंदी पट्टी कहते हैं वहां की स्थितियां बहुत ही ख़राब हैं. समाज और साहित्य दोनों में वह आज भी बर्बरता ही झेल रही है. उन्हीं की कृपा है जो स्त्री विमर्श आज विमर्श की जगह अपनी मनोग्रंथियो को सहलाने का उपक्रम भर हो गया है.

मृणाल पांडे की ‘स्त्री लंबा सफर’ अनामिका की ‘स्त्री विमर्श की उत्तर-गाथा’ चारू गुप्ता की ‘स्त्रीत्व से हिंदुत्व तक’ तथा ‘मौसम बदलने की आहट’ तथा सुधीरचन्द्र की ‘रमाबाई: स्त्री अधिकार और कानून’देह की राजनीति से देश की राजनीति तक -मृणाल पांडे, दुर्ग द्वार पर दस्तक – कात्यायनी, स्त्रीत्व का मानचित्र – अनामिका, उपनिवेश में स्त्री – प्रभा खेतान, औरत के लिए औरत-नासिरा शर्मा, स्वागत है बेटी – विभा देवसरे, स्त्री पुरुष कुछ पुनर्विचार – राजकिशोर, स्त्री के लिए जगह – सं. राजकिशोर, स्त्रीत्ववादी विमर्श समाज और साहित्य – क्षमा शर्मा, स्त्री : मुक्ति का सपना – सं. प्रो. कमला प्रसाद, राजेन्द्र शर्मा, अतिथि सं. अरविन्द जैन व लीलाधर मंडलोई, स्त्री उपेक्षिता – सीमोन द बुआ, विद्रोही स्त्री – जर्मन ग्रेयर, स्त्री अधिकारों का औचित्य साधन – मेरी, वोल्स्टनक्राफ्ट, औरत की कहानी – सं. सुधा अरोड़ा’ अपना कमरा – वर्जीनिया वुल्फ, एक स्त्री की ज़िंदगी के चौबीस घंटे – स्टीफन ज्विग इस संदर्भ में पठनीय पुस्तकें है. आज वैचारिक परिपक्वता की भी कमी नहीं है.

आज जहाँ पश्चिम के विषद साहित्य ने भारतीय मानस को झकझोरा है वहीँ पर भारतीय भाषाओँ में कैद ज्ञान भी एक दूसरे के बहुत निकट आया है. दरवाजे अब लोग अपने पड़ोसियों के लिए खोल रहे हैं. फिर भारतीय साहित्य और हिंदी का पूरा परिक्षेत्र भी इससे कैसे अछूता रह सकता है. यदि हम हिंदी आलोचना के प्रथम पुरुषों पर ध्यान दें तो हम पायेंगे कि हिंदी में आलोचना के पुरस्कर्ता  आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने आरम्भ के सवा सौ पृष्ठों में एक जगह स्त्री प्रसंग की चर्चा की है कि सास-ननद के लाख समझाने के बाद भी स्त्रियाँ कापालिकों के प्रति उसी तरह से आकर्षित होती थीं जैसे कृष्ण के प्रति गोपियाँ. आचार्य के इस मत से कम से कम तीन तथ्यों पर बात होने की गुंजाइश बनती है – स्त्रियों का कापालिकों के प्रति आकर्षण एक समस्या थी. कृष्ण के प्रति गोपियों का प्रेम इस कापालिक प्रेम के विकल्प के रूप में प्रस्तावित किया गया. आकर्षण के बाद इन स्त्रियों का क्या हुआ? सिद्धों की सूची में लगभग सभी प्रमुख इतिहासकारों ने कुछ योगिनियों के नाम दिए हैं. मजेदार बात है कि ये सिद्ध अधिकतर कवि हैं और कोई भी योगिनी कविता करना नहीं जानती. किसी की भी एक पंक्ति उदाहरण के रूप में आज तक सामने क्यों नहीं आई?मूल्यांकन का मसला आरक्षण के मसले की तरह ठंडे बस्ते में ही पड़ा हुआ है. दरअसल हिंदी के पेशेवर आलोचक की रणनीति और राजनीति महिला लेखन को मुख्यधारा का अविभाज्य अंग मानने से सशंकित हो उठती है. स्त्री रचनाकारों की रचनाओं ने अपनी सहजता, सरसता और शालीनता से एक विशाल पाठक-वर्ग तैयार किया है. यह कोई कम बड़ा योगदान नहीं है.

बड़ी बात यह नहीं है कि आज भी हिंदी पट्टी में स्त्री आलोचना का अभाव है. इधर के कुछ वर्षों में कुछ नई स्त्री आलोचकों का आगमन तेजी से हुआ है या यह कहें कि अमूमन आजकल की आलोचिकाएं मुख्यतः रचनाकार हैं और प्रकरांतर से आलोचना के कार्य में प्रवृत्त हुई हैं. अपितु बड़ी बात यह है की बहुत सारी स्त्री आलोचना पुरुषवादी आलोचना का विस्तार भी है. कथादेश का जून, 2012 का अंक ‘औरत के नजरिये से’स्तंभ में ‘व्याधि पर कविता या कविता की व्याधि’नामक लेख में शालिनी माथुर ने पवन करण की कविता ‘स्तन’ और अनामिका की ‘ब्रेस्ट कैंसर’ को सटीक विश्लेमषण के ऑपरेशन थिएटर में बुद्धि की मेज पर रख अपने अचूक तर्कों के पैने औजारों की मदद से दोनों कविताओं के रोगग्रस्त अंग/अंगों – उपमानों/रूपकों – की सफल शल्यक्रिया कर दी है. इस आलेख ने मानो हिंदी आलोचना में स्वयं तहलका मचा दिया. उन्हीं का ‘तहलका’ में प्रकाशित एक अन्य आलेख ‘मर्दों के खेला में औरत का नाच’ ने भी बहुत सनसनी फैलाई और साथ में समकालीन स्त्री आलोचकों को आगाह भी किया. आलेख कहता है कि स्त्री आज भी सच्चे अर्थों में पुरुष की चेरी मात्र है. हालाँकि यह लेख स्वयं भी विशुद्धतावादी और स्त्री की छवि को एक विशेष घेरे में खड़ा करने वाला ताब पर साथ ही इस आलेख ने पुरुषवादी स्त्रीआलोचना पर जमकर प्रहार किया. इसमें उन स्त्रियों की भी खोज खबर ली गई है जो आज भी पुरुषवादी आलोचना से बाहर नहीं निकल पायीं.अर्चना वर्मा आज की हिंदी आलोचना में एक बड़ा समादृत नाम है. आलोचना और तीखी आलोचना करने वाली अर्चना वैसे तो समग्रतः रचनाकार हैं पर आलोचना में भी उनका कोई सानी नहीं है. उन्होंने राजेंद्र यादव के साथ मिलकर स्त्री की एक अलग दुनिया की स्थापना की है. ‘हंस’ में 1986 से लेकर 2008 तक निरंतर संपादन सहयोग रहा है. उनके रचनात्मक साहित्य में कविता संग्रह : कुछ दूर तक, लौटा है विजेता, कहानी संग्रह : स्थगित, राजपाट तथा अन्य कहानियाँ, आलोचना : निराला के सृजन सीमांत : विहग और मीन, अस्मिता विमर्श का स्त्री-विचार आदमी की निगाह में औरत – राजेन्द्र यादव, अतीत होती सदी और स्त्री का भविष्य – अर्चना वर्मा, औरत उत्तरकथा – राजेन्द्र यादव के साथ मिलकर उन्होंने बड़ा काम किया है. आज के भी रचना जगत में वे इस फलक को और मजबूत ही कर रही हैं.

व्यक्तिगत तौर पर मेरा यह मानना है कि स्त्री स्वयं में आलोचकीय प्रतिभा से युक्त होती है. जितना सही और सटीक मूल्यांकन वह कर सकती है वैसा कहीं संभव नहीं है. हिंदी के तथाकथित बड़े विचारक यह मानते हैं हैं कि हिंदी भाषा और साहित्य को हम लिंग, जाति, समूह में बांटकर नहीं देख सकते. ‘आलोचना और विचारधारा’ सम्पादित डॉ. आशीष त्रिपाठी के माध्यम से नामवर सिंह एक बड़ा प्रश्न उभरते हैं. वे कहते हैं कि ‘ साहित्य में मुख्यधारा जैसी कोई चीज नहीं होती, धाराएँ होती हैं. काशी में मिश्रबंधुओं ने नवरत्नों में कबीर को शामिल नहीं किया था तो क्या हो गया? जिस समय साहित्य में जिस सौंदर्यशास्त्र और आलोचना सिद्धांत का वर्चस्व होता है, वह अपने से अलग साहित्य को हासिये पर डाल देता है.’’ स्त्री ने स्वयं को इतना आबद्ध पाया है कि वह पुरुष के बिना अपना अस्तित्व स्वीकार ही नहीं पाती है. आलोचना करने वालों में रोहिणी हैं, अच्छी आलोचना करती हैं. निर्मला जैन, सुनीता जैन, राजी सेठ हैं, इनकी आलोचना भी आती है. मगर ये मात्र आलोचक नहीं हैं, रचनाकार भी हैं. हिन्दी में किसी रचना की आलोचना उसे खांचों में बांट कर किया जा रहा है. स्त्री विमर्श, दलित विमर्श, आदिवासी विमर्श ये और वो, इन्हीं खांचों में रचनाओं को देखा जाता है. दूसरी बात जब महिला रचनाकारों की लेखनी को ही स्वीकृति नहीं मिली तो फिर वे आलोचना के क्षेत्र में कैसे जातीं. उनकी रचनाओं का न तो ढंग से मूल्यांकन होता, न जिक्र होता, न ही किसी तरह का पुरस्कार दे कर प्रोत्साहित किया जाता, तो उनमें आत्मविश्वास कैसे आएगा. अपने लेखन पर उन्हें कैसे विश्वास होगा.

स्त्री अपनी दुर्गति के लिए स्वयं जिम्मेदार है. आज भी हमें ऐसी स्त्रियाँ मिल जायेंगी जो स्वयं को पुरुष से अलगाकर नहीं देखतीं. जैसे वे दो स्वतंत्र नहीं एक शरीर हों. हिंदी के प्रतिष्ठित विद्वान राजेन्द्र यादव लिखते हैं कि ‘ इधर महिला लेखिकाओं की ओर से यह आग्रह बार-बार किया जा रहा है कि उनके लेखन को जनाना या मर्दाना कहकर न अलगाया जाय. लेखक सिर्फ लेखक होता है. उसके साथ महिला विशेषण लगते ही हम उसे ऐसे वर्ग में आरक्षित कर देते हैं जहाँ उसका लेखन ‘ कुछ ऐसा ही’ सा हो जाता है और लिहाज या प्रोत्साहन से देखे जाने वाली वस्तु की गंध देने लगता है…..यानि यह विभाजन एक षड़यंत्र है.’ कहते हैं समय अपने आलोचक स्वयं पैदा करता है. समकालीन रचना विमर्श में यदि रोहिणी अग्रवाल का नाम न लिया जाय तो सब कुछ अधूरा सा रहेगा. रोहिणी अग्रवाल समकालीन हिंदी आलोचना में उभरता हुआ एक दूसरा बड़ा नाम है. खासकर विमर्श और समकालीन हिंदी उपन्यासों पर उनके आलेख बहुत रोचक और ग्रहणीय हैं. वे अपनी बात बहुत अलग ढंग से रखने वाली आलोचक है. कहानी संग्रह : घने बरगद तले, आओ माँ हम परी हो जाएँ. आलोचना : स्त्री लेखन : स्वप्न और संकल्प, हिंदी उपन्यास में कामकाजी महिला, एक नजर कृष्णा सोबती पर, इतिवृत्त की सरंचना और संरूप (पंद्रह वर्ष के प्रतिमानक उपन्यास), समकालीन कथा साहित्य : सरहदें और सरोकार ‘साहित्य की ज़मीन और स्त्री-मन के उच्छवास’संपादन : प्रतिनिधि कहानियाँ (मुक्तिबोध) आदि. इधर के कुछ वर्षों में रचनाशीलता और व्यावहारिक आलोचना का एक बड़ा नाम है सुधा अरोड़ा. एक औरत की नोटबुक, जिस हिंसा के निशान दिखाई नहीं देते, स्त्री-शक्ति की भूमिका से उठते कई सवाल, आदि कृतियों ने लगातार स्त्री होने के अस्तित्व को चेताया है. अनामिका भी स्त्री विषयों को लगातार अपनी रचनाओं में उठा रही हैं. वे एक कवि ह्रदय के साथ एक समर्थ आलोचिका भी हैं. इधर आई उनकी पुस्तक स्त्रीत्व का मानचित्र – अनामिका ने काफी ख्याति अर्जित की है. हाँ कभी कभी वे अपनी आलोचना में उस पुरुष वादी परंपरा का नकार नहीं कर पातीं.डॉ. सुमन राजे लिखती हैं कि ‘समकालीन समीक्षा में डॉ. निर्मला जैन का नाम उल्लेखनीय है. यद्यपि ‘रस सिद्धांत और सौंदर्यशास्त्र’ उनकी डीलिट की थीसिस है, परन्तु तुलनात्मक सैद्धांतिक समीक्षा की एक दुर्लभ कृति है. आगे चलकर लेखिका ने मुख्यरूप से नयी समीक्षा को अपना कार्यक्षेत्र बनाया. नाट्य समीक्षा के सन्दर्भ में डॉ. गिरीश रस्तोगी का नाम महत्वपूर्ण है. उन्होंने एक सीमित क्षेत्र का चयन करके उसपर जमकर लिखा है.’’  इस क्षेत्र में स्वयं सुमन राजे का काम बहुत ही महत्वपूर्ण है. उनकी पुस्तक ‘ हिंदी साहित्य का आधा इतिहास’  ने स्वयं एक इतिहास की रचना की. उन्होंने अपने पुस्तक में स्त्री इतिहास के उन पन्नों को उजागर किया जो आजतक कहीं दबकर रह गए थे.

इक्कीसवीं सदी के आगमन के साथ हिंदी आलोचना में दलित आदिवासी आलोचकों की आमद बढ़ी है. वे विमर्श के सरोकारों को तो उठा ही रही हैं साथ ही हिंदी आलोचना के प्रतिमानों को नकार कर नए प्रतिमानों का गठन भी कर रही हैं. आदिवासी साहित्य की नामचीन रचनाकार रोज केरकेट्टा कहती हैं ‘स्त्री को स्कूल के दिनों में ही हमें संक्षेपण करना सिखाया जाता है. स्त्रियों के बारे में समाज भी हमें ऐसा नजरिया देता है. हम जीवन के हर क्षेत्र में स्त्रियों का संक्षेपण करते हैं. हमारा लेखन ऐसे संक्षेपण के खिलाफ है’. उनकी नई किताब ‘स्त्री महागाथा की महज एक पंक्ति’इसी स्थापना का विश्लेषण है.अभी हाल ही में ‘स्त्री महागाथा की महज एक पंक्ति’ का लोकार्पण झारखंडी भाषा साहित्य संस्कृति अखड़ा द्वारा रांची के सूचना भवन सभागार में आयोजित किया गया था. पुस्तक का लोकार्पण झारखंड के तीन पीढ़ी की प्रमुख स्त्री लेखिकाओं ने सामूहिक रूप से किया. समारोह में झारखंड के बौद्धिक समुदाय सहित युवाओं ने अच्छी-खासी भागीदारी थी. ‘पुरुष जगत में बराबरी का दर्जा मांगती स्त्री-लेखिकाएं और अधिकांश नामवर समीक्षक मासूम विनोभाई वक्तव्य देकर तालियाँ बटोरते हैं कि लेखन में स्त्री पुरुष विभेद गलत है: रचना सिर्फ रचना है. ईमानदारी से कहा जाय तो यह समानता बारीक पुरुष साजिस है.’

भारतीय भाषाओं में दलित स्त्री लेखन को रूपाकार लिए हुए दो दशक से ज्यादा गुजर चुके हैं. यह पूरा दौर दलित स्त्रीवादी कार्यकर्ताओं, रचनाकारों के लिए कठिन संघर्षों का रहा है.दलित स्त्रीवादी आन्दोलन का जन्म भले ही अस्मितावाद की जमीन पर हुआ मगर जल्दी ही इस आन्दोलन ने अपने को अस्मितावाद की अनुदार चौहद्दी से मुक्त कर लिया.अब यहाँ दलित स्त्रीवाद की आलोचना का भी जन्म हो रहा है.गंभीर अध्येता और चिंतक अनीता भारती की रचनाएँ उनके वैचारिक संघर्ष का ही हथियार है. यहाँ वही जद्दोजेहद और उत्पीडक सामाजिक संस्थाओं के खिलाफ वही क्रोध से भरा, लेकिन तार्किक प्रतिरोध है जो उनके गद्य में दिखता है. अभी हाल ही में दलित स्त्रीवाद पर अनीता भारती की महत्वपूर्ण पुस्तक ‘समकालीन नारीवाद और दलित स्त्री का प्रतिरोध” पुस्तक आई है., स्त्रीकाल पत्रिका का “दलित स्त्रीवाद” पर विशेषांक ने भी स्त्री आलोचना को नया आयाम दिया है.‘स्त्रीकाल’ पत्रिका और उसके संपादक लगातार स्त्री आलोचकों को एक प्लेटफ़ॉर्म उपलब्ध करा रहे हैं. हां जहाँ अभी तक शून्य पसरा हुआ था वहीँ पर सैकड़ो स्त्री रचनाकार अपनी रचनाओं, विमर्शों और आलोचना से हिंदी साहित्य को अनवरत समृद्ध कर रही है.

आये तुम इस धरती पर बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय !

  प्रो. परिमळा. अंबेकर


( कर्नाटक के गुलबर्गा में १० दिनों तक के एक कला शिविर में महात्मा बुद्ध की विभिन्न भंगिमाओं को उकेरा कलाकारों ने , प्रो. परिमळा अंबेकर की रिपोर्ट ) 



बुद्ध  के चरित्र की अनेक भंगिमाओं को पत्थरों में उकेरना , मूर्तिकार की कला के लिए वह कसौटी है जहाॅं उसका हथोडा और छेनी प्रस्थरों के गीत गाने लगते हैं । मूर्तिकार की कलासाधना की मेहक उसके दैहिक परिश्रम के स्वेद से मिलकर कठिन पत्थरों में जीवन और राग भरने लगती है । ऐसी एक प्रायोगिक चुनौती को रक्खा था युवामूर्तिकारों के सम्मुख,कर्नाटक मूर्तिकला अकादमी बेंगलूर ने,गुलबर्गा के सिद्धार्थ ट्रस्ट के साथ मिलकर ।

गुलबर्गा बुद्ध विहार के विशाल प्रांगण में आयोजित ‘‘शिला शिल्पकला शिविर‘‘ (14 मार्च से लेकर 28 मार्च

2015 तक )  में कर्नाटक राज्य के विविध भागों से लगभग दस से भी अधिक शिल्पकारों ने अपनी छेनी और हथोडे की कलात्मक गरिमा को, कला के प्रति के अपनी समर्पणबोध को इन सबसे बढकर , महाबोधी, गौतमबुद्ध के प्रति की अपनी सृजनात्मक अनन्यता को, अमिताभ के अद्वितीय निर्वेद्यबोध के प्रति मूर्तिकार की प्रामाणिक सजगता को दर्शाया । हेग्गडदेवनकोटे, बागलकोट आदि कर्नाटक के प्रस्थरी भागों में उपलब्ध कृष्णशिला ( ब्लैक स्टोन )  में, गौतमबुद्ध की निर्वेद्य बोध की विविध भंगिमा, तपश्चर्या की मुद्रायें और महानिद्रा की भव्य अनुभाव को इन कलाकारों ने उकेरा ।

इन मूर्तिकारों के सम्मुख फैले प्रस्थर के बडेबडे खंड, उनपर बडीही शालीनतासे चलते इनके हथोडे और अत्यंत
ही सधी हुई  छेनी की बारीक कटाव ,और… धीरे…धीरे….उन पत्थरों से उभरता हुआ अमिताभ का रूपाकार !! तल्लीनता से झुके कलाकरों की आॅंखें ,मुंडियाॅं, झुके बालों से टपकती श्रमस्वेद की बूॅंदे, छेनी हथोडा धरे हथेली के छालों से रिसते रक्त के थक्के, और… और…. उन कृष्णशिलाओं पर उभरता महाबोधी का मंदहास, एक विलक्षण ही कथा बयान कर रहे थे ।
अज्ञेय की पंक्तियाॅं , बुद्ध विहार के उस पवित्र प्रांगण में जैसे गूॅंजने लगीं-

वहीं-वहीं प्रत्येक भरे प्याला जीवन का,
वहीं-वहीं नैवेद्य चढा
अपने सुन्दर आनन्द-निमिषका,
तेरा हो ,हे विगतागत के वर्तमान के, पद्मकोश!
हे महाबद्ध !

कर्नाटक शिल्पकला अकादमी बेंगलूरू के अध्यक्ष श्री महादेवप्पा.शंभुलिंगप्पा. शिल्पी  , गुलबर्गा बुद्ध विहार के

विशाल बाह्य आवरण में आयोजित प्रस्तुत शिल्पकला शिबिर के निर्देशक शिल्पी श्री एस्.पी.जयण्णाचार एवं शिबिर के सदस्य संचालक श्री महेशकुमार.डी. तळवार, पंद्रह दिन के इस क्यांप में प्रस्थरों में गौतम बृद्ध की प्रतिमाओं को खिलाने में ,जो लगन और निष्ठा दिखायी वह विशिष्ठ रही !!

दस से भी अधिक युवा मूर्तिकार अपने सहायक साथियों के साथ अपने हाथों की अद्भुत प्रतिभा, हथोडा और छेनी की तिलिस्मभरी कला से गौतमबृद्ध की अलौकिक साधना को यथा संभव साकार रूप देने में निमग्न रहे । शिल्पि श्री कांतराज.आर ;बेंगलूरूद्ध , शिल्पि श्री शशिधरआचार्य ;दक्षिणकन्नडजिल्लाद्ध , शिल्पि श्री महेशकुमार.एम्.एस् ;मंड्या जिलाद्ध, शिल्पि श्री होन्नेश्वर.बडिगेर ;हावेरीजिलाद्ध, शिल्पि श्री शांतगौडर्.एस्.तिम्मगौडर् ;गदगजिलाद्ध,  शिल्पि श्री नागराज.एम्.एस ;चिक्कमंगळूरू जिलाद्ध, शिल्पि श्री लक्षमणराॅव जादव ;मैसूरजिलाद्ध, शिल्पि श्री गोपाल.वी.पांचाळ ;गुलबर्गाजिलाद्ध, शिल्पि श्री मौनेशकम्मार ;रायचूरजिलाद्ध, शिल्पि श्री राजेश.के.बी ;शिवमोग्गाजिलाद्ध आदि युवामूर्तिकारों ने कर्नाटक के विविध जिलों का प्रतिनिधित्व किया ।

सिद्धार्थ की महानिर्वाण की यात्रा महाबोधी के निर्वेद्य ,विकास और शांति का महामंत्र इस भरतभूमि का शाश्वत सत्य है । यह वह इतिहास है जो सार्वकालिक है । बहुजन हिताय  है !! बहुजन सुखाय है !! जो हर कला शिबिरों में खिलते आ रहा है और खिलते ही रहेगा ! जैसे प्रस्थरों में खिला हुआ पद्मकोश !! अंत में  ‘महादेवी वर्मा‘ को कोट करते हुए

तुमसे ही घोषित हुआ सत्य
हिंसा न कभी हिंसा उपाय !
आये तुम इस धरती पर
बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय !

प्रो. परिमळाअंबेकर,अध्यक्ष,हिन्दीविभाग ,गुलबर्गाविश्वविद्यालय,गुलबर्गा-06 कर्नाटक.
सं/ 09480226677. ई-मेल : parimalaambekar@gug.ac.in