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योनि शुचिता: स्त्री की देह पर पितृसत्ता के नियंत्रण का परिणाम

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स्त्री की देह पर पितृसत्ता के नियंत्रण

देह-स्त्री और पुरुष दोनो की, परिवार, समाज और स्टेट की राजनीति के द्वारा निर्देशित और शासित होती है। स्त्रियों की देह को अधिक राजनीतिकरण का शिकार होना पड़ा है। उनकी यौनिकता पर पितृसत्तात्मक कब्जा और निर्देशन अधिक गहरा है। समाज, राज्य, परिवार, बाजार, सब उसकी निजता और उसकी देह पर उसकी अपनी एजेंसी को खत्म कर अपना प्रभुत्व जमाते हैं।

इस सेंट्रल आयडिया के साथ प्रेस क्लब, नई दिल्ली में 26 मई को देह की वैयक्तिकता और राजनीति पर देर शाम हुई विचार-गोष्ठी में वरिष्ठ स्त्रीवादी लेखिका आशा काचरू की किताब ‘ योनि पवित्रता’ पर बात करते हुए वक्ताओं ने अपनी बात रखी। किताब के विमोचन के बाद लेखिका आशा काचरू ने ‘ देह पर समाज, जाति, धर्म के नियंत्रण और देह शुचिता के कंसेप्ट के कारण महिलाओं पर अतिरिक्त शुचिता और नैतिकता के भार को चिह्नित करते हुए बताया कि योनि पर पवित्रता की जिम्मेवारी थोपने के कारण महिलाओं की दोयम स्थिति बनती है। देह संबंधों के प्रति अजनबियत भी पुरुषों की बलात्कारी कुंठा को बढ़ावा देता है।’ आशा काचरू कश्मीर के अपने शुरुआती जीवन के बाद जर्मनी में अपनी सक्रियता और 9वें दशक से भारत में महिला आंदोलनों के साथ सक्रियता से परिचित कराया। उन्होंने पश्चिम में आज भी भारतीय महिलाओं को एक टाइप्ड नजरिये से देखे जाने को चिह्नित करते हुए कहा कि उन्हें उनकी वास्तविक छवि में देखा जाना जरूरी है, जो वे हैं।

स्त्रीवाद की वैचारिकी में अपने शोधों और हस्तक्षेपों से योगदान कर रहे स्त्रीवादी विमर्शकार विजय झा ने कहा कि ‘ स्त्री की यौनिकता पर पुरुष के नियन्त्रण के लिए फ्रेडरिक ऐंगल्स की अवधारणा से अलग गर्डा लर्नर की अवधारणा रही है। ऐंगल्स ने परिवार, स्टेट और निजी संपत्ति को वजह बतायी है। गर्डा लर्नर निजी संपत्ति की अवधारणा के पहले से ही स्त्री की यौनिकता पर नियंत्रण की ऐतिहासिकता को सामने लाती हैं। विजय झा ने भारतीय स्त्रियों के लिए औपनिवेशिक समझ के जरिये एक खास वर्ग की स्त्रियों की समस्या को सबकी समस्या बना देने को चिह्नित किया- जिसने 19वीं सदी में सती, विधवा विवाह आदि सवर्ण समाज की बीमारियों को भारत के किसान और दलित समाज की स्त्रियों की भी समस्या बता दिया गया था।’

लेखिका और यौनिकता के प्रसंग में साहसिक और रैडिकल स्वर अणुशक्ति सिंह ने इस बात पर जोर दिया कि लिबिडो कारणों से स्त्रियों की यौनिक क्षमता से पुरुषों की यौनिक क्षमता कमजोर होती है। इसे स्वाभाविक न मानकर पुरुषों के भीतर ताकत के साथ खुद को सिद्ध करने की प्रवृत्ति पैदा हुई-बलात्कारी मानसिकता पैदा हुई, जिसे समाज के विविध स्तरों ने एक राजनीतिक तर्क दे दिया, संरक्षण दे दिया।’ अणुशक्ति ने समलैंगिक विवाह के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में पक्ष-विपक्ष की चल रही है बहसों के स्त्रीवादी पक्ष पर भी बात की।

स्त्रीकाल के संस्थापक संपादक संजीव चंदन ने कहा कि ‘ देह में प्राकृतिक रूप से जैव वैज्ञानिक स्थितियां ही सिर्फ व्यक्तिगत है-शेष राजनीतिक। जब स्त्री-पुरुष सामाजिक गढ़न हैं तो उनकी यौनिकता भी पूर्ण रूप से एक गढ़न ही है। उन्होंने कहा कि बलात्कारों में जाति और धर्म की सत्ता निहित होती है। लेकिन हर बलात्कार की घटनाओं में सिर्फ धर्म या जाति के अलग होने भर से उन्हें जाति या धर्म आधार के बलात्कार नहीं कहा जा सकता। संजीव ने कहा कि अनौपनिवेशीकरण की कोशिशों में सावधानी जरूरी है, वरना गोलवलकर की विचारधारा के अनुरूप प्राचीन महानता की ग्रंथि में फंसना संभव है। अंग्रेजों ने बेहद जरूरी स्त्रियों दलितों के जरूरी मुद्दों को भी सामने लाया। जैसे कैथरीन मेयो ने मदर इंडिया किताब में अथवा जॉन मिल स्कूल ने।

वक्ताओं ने और अन्य भागीदारों ने जंतर मंतर पर यौन उत्पीड़न के खिलाफ बैठी महिला पहलवानों के साथ सरकार और समाज के पितृसत्तात्मक रवैये को चिह्नित किया।

भागीदारों में कई लेखक, पत्रकार व संस्कृतिकर्मी शामिल रहे

संचालन करते हुए युवा आलोचक अरुण कुमार ने देह को जाति और धर्म के द्वारा नियंत्रित किये जाने को चिह्नित करते हुए अपनी भूमिका रखी।

टूट रही हैं वर्जनाएं: अनेक रिश्तों में होना आखिरी टैबू

एक ही समय में एक से अधिक लोगों के साथ रोमांटिक प्रेम में होना (पॉलिअमरी ) शायद आखिरी मौजूदा वर्जना है। यहां तक कि विचारों में बहुत खुले व्यक्ति भी तब हिचकते हुए पाए जाते हैं जब प्रेम की एकनिष्ठा को चुनौती दी जाती है।हमारी कहानियों, फिल्मों, गीतों और कविताओं में उस विक्षोह, मिलन, ‘सच्चे प्यार’ के खोने, पाने को सेलिब्रेट किया जाता है जिससे प्रेम में एकनिष्ठा को सामाजिक मुहर प्राप्त होता है,मान्यता मिलती है।

मैं 50 वर्ष की हूं। मैं किसी भी समय दो से चार भागीदारों के साथ सहमति से संबंधों में रही हूं। लेकिन मैंने देखा है कि पॉलिअमरी,अनेक संबंधों के इर्द-गिर्द होने वाली बातचीत अक्सर बेहद असहज होती है और बाज़ वक़्त एकदम घटियास्तर पर उतर जाती है। क्या यह इसलिए है, क्योंकि यह परिवार के उस विचार को खंडित कर देता है जिसके हम अभ्यस्त होते हैं? या इसलिए कि राज्य के लिए अपने नागरिकों को नियंत्रित करना यह असंभव बना देता है? जबकि कोई भी एक माँ के अपने सभी बच्चों को प्यार करने की क्षमता पर सवाल नहीं उठाता है, एक से अधिक लोगों को रोमांटिक और सेक्सुअल प्यार करने पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए जाते हैं।

 

इस प्यार का क्या नाम दूँ

मुझे जल्दी ही एहसास हो गया था कि मुझमें एक समय में एक से अधिक लोगों से प्यार करने की इच्छा और क्षमता है, जिनमें एक स्थायित्व की उम्मीद भी थी। लेकिन मैं आशंका भय से भर गयी थी। मेरा एक मित्र कौशिक था जिसके साथ मेरी इस बारे में पहली चर्चा तब हुई जब मैं अपने बीसवें साल में थी।

वह खुले तौर पर अनेक संबंधों,बहुप्रेम,में था। उसने मुझे ‘द एथिकल स्लट’पढ़ने की सलाह दी-एकल और जोड़ों के लिए कई, लेकिन नैतिक और भावनात्मक रूप से स्थायी संबंध, बनाने के लिए एक गाइड है यह किताब।वह अमेरिका में रह रहा था और गैर-पारंपरिक परिवारों को जानता था, जिसमें तीन या चार जोड़े शामिल थे, जो रोमांटिक, यौन और बच्चों के पालन-पोषण की जरूरतों को साझा करते थे।

लेकिन बहुत पढ़ने और आत्मीय लोगों के साथ बात करने के बाद मैं सहज हो सकी, अपने होने को स्वीकार किया, और अनेक संबंधों में होने के बारे में बात करने में सहज महसूस करने लगी।

पॉलीअमरी (बहुप्रेम) को परिभाषित करने के अनेक तरीके हैं, क्योंकि ऐसे रिश्ते में अनेक लोग भागीदार होते हैं-अनेक पुरुष अनेक स्त्री, अलग-अलग जेंडर आइडेंटिटी से, हेट्रोसेक्सुअल हो, बायसेक्सुअल हो, होमोसेक्सुअल हो। मैंने सुना है कि पॉलीअमरी (बहुप्रेम) को लोग सिर्फ ‘पॉली’ कहते हैं। इसका मतलब सिर्फ ‘बहुत’ है। मैं पूछती हूं, ‘ इसमें प्यार कहां है?’ मेरे लिए, पॉलीअमरी सभी शामिल लोगों की सहमति से, यौन अंतरंगता के साथ या उसके बिना प्यार के विभिन्न रिश्तों में जीना है ।

पॉलीअमरी (बहुप्रेम) अल्पकालिक या दीर्घकालिक हो सकते हैं, प्राथमिक भागीदार के साथ या उसके बिना, और कभी-कभी विभिन्न भागीदारों के साथ परिवार के वैकल्पिक सर्किल बना सकते हैं। पॉलीअमरी (बहुप्रेम) के लिए मैं सबसे करीबी बांग्ला शब्द ‘बहूमोनोरथ’ कह सकती हूं। इसका अर्थ है ‘कई इच्छाएं’। मुझे वास्तव में यह पसंद है।

 

अनेक भ्रांतियां

कौशिक ने एक बार मुझसे कहा था कि पॉलीअमरी (बहुप्रेम) के बारे में सबसे बड़ी ग़लतफ़हमियों में से एक यह थी कि यह ‘एक कथित सच्चे प्यार’ को पाने में असफलता की प्रतिक्रिया स्वरूप होता है। मुझे उन लोगों की याद आती है जो फुसफुसाते हैं ‘वह समलैंगिक है, क्योंकि उसे कोई पुरुष नहीं मिला है?’

मैं एक से अधिक लोगों से प्यार इसलिए नहीं करती कि ‘सभी ज़रूरतें एक व्यक्ति द्वारा पूरी नहीं की जाती’, या ‘एक व्यक्ति जल्दी ही उबाऊ हो जाता है’।

मैं ऐसा इसलिए करती हूं क्योंकि मेरा दिल सुंदरता, साहस ईमानदारी, दया और करुणा एक से अधिक लोगों में देखता है और उनसे जुड़ने की इच्छा होती है। – यही कुछ वजहें हैं कि कोई भी व्यक्ति एक व्यक्ति के प्यार में पड़ जाता है। मैं सिर्फ यह कहने से इनकार करती हूं कि ‘रुको, फिर से प्रेम में मत पड़ो । आपका ‘एक जीवन, एक प्यार’ का कोटा पूरा हो गया है।’

 

आर ने एक और गलतफहमी की ओर इशारा किया – ‘बहु-प्रेम वाले लोग किसी के भी साथ सोते हैं।‘ पुरुष अक्सर मेरे मेसेज में गंदे अनुरोधों और तस्वीरों के साथ आते हैं। लेकिन जो लोग एक से अधिक व्यक्तियों के साथ सेक्स करना पसंद करते हैं, उनके बारे मेंयह मान लेना कि उनका किसी के भी साथ यौन संबंध हो सकता है, ‘सहमति’ को अप्रासंगिक बना देता है।

इस समाज में अनेक रिश्तों में रहने वाले लोग और एक सेक्स वर्कर, दोनों ही भेदभाव झेलते हैं। प्यार के लिए भी यही सच है। एक बहुप्रेमी व्यक्ति को अक्सर दूसरों को समझाना पड़ता है कि वे उनके प्रति ‘प्यार’ क्यों नहीं महसूस करते हैं। यह परेशान करने वाला मसला हो सकता है, लेकिन यह महत्वपूर्ण है। मैं कभी-कभी बताती हूं कि एक व्यक्ति या कई लोगों से प्यार करना, दोनों समय के साथ व्यवहार में निर्मित एक कंस्ट्रक्ट है।

हमें यह विश्वास दिलाया जाता है कि एकल प्रेम स्वाभाविक है और बहुप्रेम विचलन। क्या एकल प्रेम अचूक होता है? मैं अपने आस-पास अलग-अलग तरह के एकलप्रेमी जोड़े को देखती हूं – खुश, संघर्षशील, इंसानी मुश्किलों से जूझते हुए ।कई लोगों के अपने एकल-रिश्ते (जोड़ी) के बाहर संबंध होते हैं, साथी पार्टनर की जानकारी में या बिना जानकारी के। जीवन जटिल है। बहुप्रेमी होने के नाते, मैं शरीर और आत्मा की ज़रूरतों को गहराई से समझती हूँ। मैं जिस चीज से असहमत हूं, वह ‘युगल-पवित्रता’ का अनुष्ठान है, इसे महिमामंडित करने के लिए बनाए गए मिथक हैं।और जो कुछ भी इसके बाहर है उसका तिरस्कार। बहुप्रेमी लोगों को अक्सर यह बोझ ढोना होता है गोयाइस पवित्र दुनिया में सिर्फ वे ही अपवित्र हैं।

सह-प्रेमी होना

बहुप्रेमी संबंधों में होने की राह सीधी नहीं है लेकिन असंभव भी नहीं है। हम कभी-कभी लंबी दूरी के रिश्तों में होते हैं। हम पल भर में अपने डेट्स तय नहीं कर सकते हैं, या बिना किसी योजना के एक से दूसरे ठिकानों पर जाते हुए सप्ताहांत व्यतीत नहीं कर सकते हैं। एक साथी की अन्य साथी के साथ प्रतिबद्धता हो सकती है। इसलिए हमें प्रत्येक साथी के खुलेपन, उसकी सीमा और उपलब्धता के प्रति सचेत रहने की आवश्यकता है। लेकिन उज्जवल पक्ष भी हैं। एक से अधिक साथी होने का मतलब है कि हम एक के साथ सांस्कृतिक अवकाश पर जा सकते हैं, तो दूसरे के साथ एक साहसिक यात्रा पर, निर्भर करता है साझा रूचियों के होने पर।

 

क्या आपको कभी जलन नहीं होती? यह एक और सवाल है जो मेरे दोस्त पूछते हैं। कई दार्शनिकों और मनोविश्लेषकों द्वारा पता लगाया गया है कि अगर हमारे प्रेमी दूसरों के साथ अंतरंग होते हैं तो हमें जलन या गुस्सा क्यों महसूस होता है?

 

मुझे अपने लिए दो उत्तर मिले। सबसे पहले, कोई प्रेमी को अपनी संपत्ति के रूप में देखता है। ‘तुम मेरे हो’ ने कई सदाबहार गीतों के बोल तय किये हैं, जो किसी ‘अतिक्रमण’, ‘हद पार करने’ के विचार को नकारते हैं। संपत्ति पर कानूनी अधिकारों की तरह प्रेमी पर ‘वफादारी’ का अधिकार प्रबल होता है।
दूसरे, प्रेमी को अपने ही विस्तार के रूप में देखा जाता है। ‘तुम और मैं एक’ भी लोकप्रिय गीत हैं। इस मामले में, बिना सहमति केअंतरंगता, स्वयं पर, स्वत्व पर हमला बन जाती है।

इस तरह हम सोचने और महसूस करने के लिए अनुनुकूलित हैं। हालांकि, अगर हम चाहें तो इस तरह की सोच को बदलना असंभव नहीं है। लेकिन इसमें समय लगता है,और दिल को पीड़ा भी होती है।

सम्मिलन का विचार

मुझे भी कभी-कभी जलन महसूस होती थी। लेकिन ईर्ष्या के बरक्स मेरी खोज में मैं ‘सम्मिलन’ पर आकर ठहर गयी, जिसमें एक प्रेमी यह जानकर खुशी महसूस करती/ता है कि उसके प्रियजन को दूसरों से प्यार और खुशी मिलती है।

मैं समझती हूँ कि सम्मिलन बहुप्रेम की आधारशिला है। जिस व्यक्ति के साथ आपके प्रेमी का रिश्ता है, वह ‘सह-प्रेमी’ बन जाती/ता है, यह एक नया शब्द है, जो मैंने सीखा। मैंने सह-प्रेमियों के मामले में दो समस्याओं पर ध्यान दिया है।

इतिहास में ‘बहुपत्नी विवाह’ में एक पुरुष की सह-पत्नियों के पूर्व उदाहरण हैं। हालांकि महिलाओं के खित्ते में बहनापा और दोस्ताने पाए जाते रहे हैं,अक्सर बैडरूम में पहुँच, उपस्थिति और पहुँच की बारंबारता पितृसत्ता के एक टूल की तरह इस्तेमाल किए गए हैं -पुरुष और महिला दोनो द्वारा। बहुप्रेम में सीधे प्रतिस्पर्धा के लिए कोई जगह नहीं है, लेकिन कोई भी उस दिशा में बढ़ सकती/ता है अगर वह सावधान नहीं है।

पितृसत्ता हममें गहरे पैठी है। मैंने खुद अपने साथी के अन्य प्रेमियों की तुलना में खुद को हीन महसूस किया है और कई दिनों तक दुखी महसूस किया है।

 

 

हालाँकि, सह-प्रेमियों के रूप में पुरुषों के लिए स्थिति लगभग अभूतपूर्व है क्योंकि अधिकांश संस्कृतियों में पुरुषों के बीच बहुविवाह प्रचलित था। इसलिए पुरुषों को शून्य से शुरू करना होगा यह समझने के लिए कि सह-प्रेमियों के साथ कैसे रहना है। लेकिन यहां भी मैंने देखा है कि पुरुष इसका इस्तेमाल अपने साथी से स्नेह का फायदा उठाने और सोने के बहाने के रूप में करते हैं।
मुझे लगता है कि हमारे जीवन के पितृसत्तात्मक संदर्भ को देखते हुए, महिलाओं को बहुप्रेम में पुरुषों की तुलना में अधिक सावधान रहना होगा।

मुझे कई स्थितियों में जलन महसूस होती रहती है। लेकिन मैं अलग तरह से प्रतिक्रिया देने के लिए खुद को प्रशिक्षित करना जारी रखती हूं। मैं इसके बारे में अपने सहयोगियों से बात करती हूं जो ध्यान से सुनते हैं, इसके कारणों का पता लगाते हैं। मैं खुद को याद दिलाती हूं कि मैं बहुप्रेम का अभ्यास क्यों करती हूं।

और खुशियाँ इस तुच्छ बेचैनी से कहीं अधिक हैं। मुझे लगता है कि बहुप्रेम के अभ्यास के लोग ईर्ष्या के बारे में ज्यादा बात नहीं करते। उन्हें बात करनी चाहिए। इस तरह, हम सनकी के रूप में नहीं देखे जाएँगे, बल्कि हमें दूसरों की तरह ही देखा जायेगा, किसी भी अन्य की तरह, जो इन सब से संघर्ष कर रहे हैं।

विभिन्न सह-प्रेमियों के साथ वर्षों तक बात करने के बाद, मुझे लगता है कि कोई व्यक्ति किसी व्यक्ति को वैसे ही प्रेम कर सकती/ताहै जैसे किसी कविता के अनुगूंज को या महासागर के किनारे को करती/ता है बिना उसपर अधिकार जताये। जब दूसरे उनका आनंद लेते हैं तो वह भी आनंदित हो सकती/ता है।

कुछ मायनों में,

बहुप्रेम में सह-प्रेम का अभ्यास पारंपरिक ‘अन्य’ को स्वीकार करना, गले लगाना और उसका जश्न मनाना सीखने की एक प्रक्रिया है।

मुश्किल है या आसान?

एकल प्रेम की जरूरतों से जूझ रहे मेरे दोस्तों को लगता है कि बहुप्रेम आसान है। दोनों के मेरे अनुभव से मैं कह सकती हूँ कि ऐसा नहीं है। दोनों के ही अपने अलग संघर्ष हैं। हमारी कंडीशनिंग के कारण, पारंपरिक प्रेम और रिश्तों को भूलना मुश्किल था।

ये जटिल बहुमुखीसंबंध हैं, जहां एक के बारे में निर्णय दूसरों को प्रभावित करते हैं। साथ ही,लोग बेशक हमारे बारे में कुछ भी सोचें, हमारी प्रतिबद्धताएं वास्तविक होती हैं और चूंकि वे अलग-अलग लोगों के साथ होती हैं, इसलिए हमें सचेत रहना चाहिए कि उनमें परस्पर संघर्ष नहीं हो।

 

मिमी,एक प्रिय मित्र जो एकल प्रेम की अभ्यासी है,अक्सर मेरे साथ चर्चा करती है कि अलग-अलग जीवन की अपनी पसंद के लिए हम अलग-अलग कीमत चुकाते हैं, वे कठिन तो होते हैं पर हमें अधिक समृद्ध करते हैं – उसे अधिक स्थिर और मुझे अधिक स्वतंत्र के रूप में देखा जाता है।

मैं कहूंगी कि यह कमजोर दिल वालों के लिए यात्रा नहीं है, या वह यात्रा नहीं है जिसे आप अपने साथी की सहमति के बिना वैवाहिक प्रतिज्ञाओं के पीछे छिपकर करते हैं। सहमति की तरह ईमानदारी कुंजी है। बेईमानी एक डीलब्रेकर है।
अगर मुझे लोग ‘दिलचस्प’ लगते हैं,तो मैं उन्हें यह बताने के लिए सही समय का इंतजार नहीं करती कि मैं बहुप्रेमी हूं। मैं इसे सीधे तौर पर कहती हूं और उनसे अपेक्षा करती हूं कि वे अपनी स्थिति के बारे में भी बतायें। इस सब के बावजूद मुझे भी केई ऐसी दुर्घटनाओं से गुज़रना पड़ा है -‘सुखद दुर्घटनाएँ’ नहीं हैं।

 

दीपिका का कहना है कि एक बहुप्रेमी व्यक्ति के रूप में वह अक्सर अकेले कई काम करती है। लोग हमारे बारे में जो सोचते हैं, यह उसके बिल्कुल विपरीत है। एकल प्रेम में युगल से एक साथ काम करने की अपेक्षा की जाती है – अक्सर इच्छा न रहते हुए भी और कभी-कभी दिखावे के लिए। हालांकि बहुप्रेम में जब हम चाहें तब हमारे साथी हमारे लिए हाज़िर नहीं हो सकते हैं। ऐसे में उनके प्यार पर सवाल उठाना आसान है।

लेकिन मैं एक अलग सवाल पूछती हूं – क्या इससे हमारे रिश्ते की प्रकृति बदल जाती है, या मुझे बस चोट लगती है? क्या आहत होने को रिश्ते की गुणवत्ता में बदलाव से अलग देखा जा सकता है’? मुझे समय-समय पर उम्मीदों के व्यापक नक्शे बनाना और भागीदारों के साथ साझा करना पसंद है, यह पता लगाना कि हमारे लिए सबसे अच्छा क्या है। उनसे समान प्रतिबद्धताओं की अपेक्षा ज़रूरी नहीं है, बशर्ते वे सहमति के साथ हैं। और अगर वे बदलते हैं,तो मुझे फिर से खुद को समायोजित करना होगा। रोज़ाना इस धैर्य और समझ का अभ्यास करते रहना थका देने वाला हो सकता है।

 

मेरे लिए अपने बहुप्रेम के जीवन में सबसे कठिन समय वह रहा है, जब कुछ साल पहले एक साथी को किसी एक से प्यार हो गया और उसने एकल प्रेम के रिश्ते में रहने का फैसला किया। यह दुखद था, क्योंकि यह सिर्फ मेरे लिए सिर्फ शोक का विषय नहीं था। उसने बहुप्रेम के बारे में एक ‘मूल्य निर्णय’ के साथ इसे छोड़ा, एक वैकल्पिक जीवन और दुनिया को एक साथ बनाने का वादा छोड़ दिया।

मैं अपने अन्य साथियों के साथ अपने दिल टूटने पर चर्चा नहीं करना पसंद करती हूं। वे क्यों व्यर्थ कष्ट सहें? लोग मुझसे पूछते हैं कि क्या मैंने ‘प्यार’ से ब्रेक ले लिया है। खैर, मुझे लगता है कि मैं भाग्यशाली रही हूं कि मुझे लगातार दोस्तों और दोस्तों के दोस्तों के बीच अद्भुत साथी मिले। मैं डेटिंग ऐप्स के लिए बहुत पुराना स्कूल की हूं, लेकिन इसके लिए जरूरी साहस से मैं चकित रहती हूं जो मेरे कुछ दोस्तों के पास है।

अनेक प्रेम के अभ्यासी के रूप में, मैं जितना आनन्दित हुई हूँ, उससे कहीं अधिक दुखी हुई हूँ, टूटी हूँ और विफल हुई हूँ। मैं पारंपरिक, ज्ञात, करने योग्य अभ्यस्तता की सुरक्षा की ओर भागी हूँ । हालांकि, ये भावनाएं बीत चुकी हैं। जो चीज मेरे लिए इसे संभव बनाती है और इसके प्रतिआकंक्षा से भरी रखती है, वह एक ऐसी दुनिया को चाहने का जुनून है जहां प्यार ‘कब्जे’ से मुक्त हो। मैंने कुछ लोगों को एकल प्रेम में वापस जाते देखा है। प्रभात की तरह, जिसने कहा कि यह बहुत कठिन था।

 

लेकिन क्या मैं ‘सेटल’ नहीं होना चाहती? मेरी माँ, हालांकि मेरी पसंद को स्वीकार करती है और मेरे पार्टनर्स को, या ‘दोस्तों'(जैसा कि वह उन्हें बुलाना पसंद करती है) को स्वीकृति देती है, फिर भी मेरे जीवन में अकेले और स्थायी साथी की कमी के बारे में चिंता करती है- यही अंतिम गंतव्य है, अधिकांश आपको यही बताएंगे। लेकिन मैं अपनी बहुप्रेम यात्रा में इतनी आनंदित हूं कि ‘अंतिम गंतव्य’ सारहीन है। सिर्फ ‘धूल ही तो जमती है’।

और इसलिए…

एक समय था जब मैंने ‘प्यार’ को संरक्षित सीमाओं के भीतर परिभाषित किया था, जहाँ आवारा जीवन पर सख्त प्रतिबन्ध होता था और स्वच्छंद जीने की जबरदस्त मनाही। आज, मेरे उम्र के इस मुक़ाम पर मैं प्यार को एक अलग नज़र से देखती हूं- नाजुक, धूसर, धुंधलाया,आप्लावित जो रोमांस, दोस्ती, प्रेम, परिवार के बीच की सीमाओं को मिटा देता है। परिभाषाएँ अब मायने नहीं रखतीं। मैं अपने दिल पर हाथ रखकर समझती हूँ कि जब निर्वासितों के लिए प्यार और जमीन उदार होते हैं,तब जीवन समृद्ध होता है।

डेक्कन हेराल्ड से साभार।

अंग्रेजी से अनुवाद: संजीव

(नोट: मेरे अनुभव ज्यादातर विषमलैंगिक संबंधों के भीतर रहे हैं, इसलिए मेरी अंतर्दृष्टि उस दृष्टिकोण से है। बहुप्रेम में अन्य लिंगों और कामुकता से अन्य कहानियां हो सकती हैं।)

पत्रकारिता जगत में जातीय भेदभाव से जूझ रहे दलित-पिछड़े पत्रकारों की कहानी

वरिष्ठ पत्रकार जितेंद कुमार ने अपने फेसबुक पोस्ट में पत्रकारिता जगत में जातिगत भेदभाव का एक मुद्दा वरिष्ठ पत्रकार अजित शाही के एक पोस्ट के बहाने उठायी है। स्त्रीकाल के पाठकों के लिए साभार।

“अमेरिका रहते हुए दो साल हुए थे. मैं एक इंटरव्यू पैनल में था. कैंडिडेट से सवाल जवाब चल रहे थे. मैंने पूछ लिया, “How old are you?” क्योंकि एप्लिकेशन पर डेट ऑफ़ बर्थ नहीं लिखी थी.
इंटरव्यू ख़त्म होने के बाद फ़ौरन इंटरव्यू पैनल के चीफ़ मुझे बोले, “ये अमेरिका है. यहाँ आप किसी भी उम्मीदवार से उम्र, वैवाहिक स्टेटस, धर्म, परिवार, आदि के बाबत कोई पर्सनल सवाल नहीं कर सकते. आइंदा ऐसा मत करिए.
लखनऊ से चौवालीस साल पहले अमेरिका आए एक प्रोफ़ेसर साहब से पिछले दिनों बातचीत हुई. अपने करियर में प्रोफ़ेसर साहब बहुत सफल हैं. उनको बाइडेन सरकार में डेपुटेशन पर रखा गया है.
प्रोफ़ेसर साहब मुझे बोले,

“अजित भाई. चालीस सालों से यहाँ अमेरिका में काम कर रहा हूँ. काम करने की जगह पर आज तक किसी ने मुझसे नागरिकता नहीं पूछी. हम यहाँ किसी की भी नागरिकता नहीं पूछते हैं.”

कहने लगे,

“जिन मुल्कों से अमेरिका की दुश्मनी रही है जैसे ईरान वहाँ से भी आए लोगों के साथ मैंने काम की जगह भेदभाव नहीं देखा है. हमें अंदाज़ा है कि फ़लाना ईरानी मूल का है लेकिन न हमें पूछने का हक़ है और न ही सरकारी तौर पर ये शेयर किया जाता है कि उनका मूल क्या है.”

मेरा निज अनुभव यही है. चार साल से अमेरिका में रह रहा हूँ. किसी दफ़्तर में, दुकान में, पड़ोस में किसी ने आज तक इनडायरेक्टली भी जानने की कोशिश नहीं की कि मैं किस मूल का हूँ.
मेरी पोस्ट पर आपत्ति जताने वाले मित्रों को पहले ही बता देता हूँ कि ये मेरा निजी अनुभव है. आप मुझे गैसलाइट न करें कि मेरा अनुभव ग़लत है और अमेरिका के बारे में आपके आयडियोलॉजिकल पूर्वाग्रह ही सही हैं.
Ajit Sahi के पोस्ट को आगे बढ़ाते हुए

‘मी टूः’ न्यूज रुम में जाति

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अपने देश, खासकर गर्व करनेवाले गोबरपट्टी में हम नाम इसलिए पूछते हैं कि सामने वाले की जाति व धर्म का पता चल जाए (वैसे भी, धर्म तो पहले से ज्ञात ही रहता है). पूछनेवालों को पहली दिक्कत तब होती है जब नाम से उसकी जाति का पता नहीं चलता है, फिर वह महान आत्मा बाप (मां का नहीं) का नाम पूछता है, उससे भी पता नहीं चलता है तो प्रांत, जिला या उस सामनेवाले के लोकल रिहाइश तक पहुंचता है, फिर वहां के जातीय समीकरण का अनुमान लगाकर आपकी जाति जानने की भरसक कोशिश करता है, फिर भी असफल होता है तो अंत में यह कहते हुए पूछ ही लेता हैः ‘वैसे मेरा इस सबमें कोई विश्वास नहीं है, और हम बिल्कुल नहीं मानते हैं लेकिन आप कौन जाति या समाज से आते हैं?’
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मैं अपना एक निजी अनुभव यहां शेयर करना चाहता हूं.

साल ठीक से याद नहीं (शायद 2002-03 हो सकता है), लेकिन अटल बिहारी वाजपेयी देश के प्रधानमंत्री थे. मैं एक सज्जन से नौकरी के सिलसिले में उनसे मिलने उनके दफ्तर गया था. उपर लिखी सारी बातें मेरे साथ भी हुई. अगर उनमें धैर्य होता तो शुरु में ही पता चल जाता कि मेरी जाति क्या है, क्योंकि मेरे बायोडेटा में इसका जिक्र है, चूंकि मैंने अपना सीवी उनको मेल पर भेजा था और अटैचमेंट में था और शायद वे सज्जन उस समय तक इतने भिज्ञ नहीं थे कि तत्काल सीवी को खोलकर देखा जा सकता है इसलिए इनको काफी कवायद करनी पड़ी और अंततः मुझसे पूछकर मेरी जाति जान ली गयी थी!
तब तक लगभग दस मिनट का वक्त गुजर चुका था, उन्होंने मेरे लिए चाय भी मंगवा ली थी और वास्तव में इंटरव्यू का सिलसिला शुरु हो गया था.

उन्होंने मुझसे पूछ लिया था कि मेरा वैचारिक रूझान क्या है और मैंने उन्हें बता भी दिया था कि मैं वामपंथी हूं या कह लीजिए कि अति वामपंथी हूं. चूंकि उनको पता चल गया था कि- मैं यादव हूं- इसलिए उनका सवाल था कि मुझे लालू यादव, मुलायम सिंह यादव और शरद यादव में कौन पसन्द है? इसपर मेरा जबाव था-तीनों. मेरे इस जबाव से उन्होंने आश्चर्य वक्त किया और चौंकते हुए पूछा-क्यों? इसपर मैंने उनसे कहा, ‘ठीक वैसे ही, जैसे आपको अटल बिहारी वाजपेयी पसन्द है!’

मेरे इस वाक्य पर उन्होंने हल्के से प्रतिवाद किया और कहा कि यार देखो, पूरी तरह मैं उन्हें पसन्द नहीं करता हूं लेकिन यह बताओ, उनके स्टेचर का नेता अभी देश में कोई है क्या? लेकिन आपको तीनों क्यों पसन्द है? इसपर मैंने उनसे कहा कि सर, आपको वाजपेयी तो सिर्फ जातीय आधार पर पसन्द है न, वैचारिक रुप से तो आप कांग्रेसी है और आप जानते हैं कि वाजपेयी न सिर्फ घटिया राजनीतज्ञ है बल्कि बहुत ही अलोकतांत्रिक व अलोकतांत्रिक संगठन से जुड़ा है जो देश में एक समुदाय के रहने के पूरी तरह खिलाफ है, जो संविधान विरोधी काम है (शब्द पूरी तरह याद नहीं है लेकिन भावार्थ बिल्कुल यही थे). लेकिन लालू यादव ने संविधान की रक्षा के लिए लालकृष्ण आडवाणी को गिरफ्तार किया था और मुलायम सिंह यादव ने संविधान को बचाने के लिए कार सेवकों पर गोलियां चलवायी थीं (मैंने शरद यादव के बारे में कुछ नहीं कहा क्योंकि तबतक वह एनडीए का हिस्सा बन चुके थे और उनके बचाव में मेरे पास कोई तर्क नहीं था सिवा इसके कि शरद यादव ने मंडल आयोग को लागू करवाया था).

वैसे वे तीनों ऐसे लोग हैं जिन्होंने गैरसंवैधानिक कुछ भी नहीं किया है. आपको यह भी पता है कि वामपंथी हूं फिर भी आप मुझसे मेरी जाति से जोड़कर सवाल पूछ रहे हैं और अपेक्षा करते हैं कि मैं आपके नजरिए से तीनों को बदमाश, भ्रष्टाचारी व अपराधियों को शरण देनेवाला बताऊं? आपलोगों की जातिवादी सोच जाती ही नहीं है. इतना सुनाने-सुनने से शायद वे दंग रह गये थे. उन्हें शायद कल्पना ही नहीं थी कि कोई याचक (हिन्दी पत्रकारिता में पत्रकारों की हैसियत उस समय तो याचक की होती ही थी, संभवतः आज भी पुराने लोगों के सामे यही है) नौकरी की परवाह किए बगैर इतना खरी-खरी बोल सकता है!
मैंने उनसे चाय पिलाने के लिए उन्हें धन्यवाद भी कहा और बाहर निकलने लगा, फिर उन्होंने मुझे बैठाने की कोशिश की और कहा कि आपके साथ काम करके मजा आएगा, बताइए आप क्या-क्या करना चाहेंगे? मैंने विनम्रता से नहीं लेकिन साफगोई से कह दिया कि मुझे आपके साथ काम करने में बड़ी परेशानी होगी और मैं परेशानी में काम नहीं कर पाता हूं. फिर मैं वहां से निकल आया.

बाद में तो ‘न्यूज रुम में जाति’ को लेकर अनिल चमड़िया और योगेन्द्र यादव के साथ जो सर्वे किया उसके बाद तो अपवादों को छोड़कर हिन्दी के सभी सवर्ण पत्रकारों का जानी दुश्मन ही बन गया. हां, अंग्रेजी वालों ने उस रुप में मेरे साथ जातीय भेदभाव नहीं किया जो हिन्दी के बड़े-बड़े व ‘प्रखर’ पत्रकारों, संपादकों व बुद्धिजीवियों ने की है! एक बात और, इस जातीय भेदभाव को मैंने सहा है, एक ओबीसी होकर, तो दलितों के साथ कितना भेदभाव होता होगा, इसका अंदाजा लगाइए!
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सभी के कुछ न कुछ अनुभव होंगे-खासकर पत्रकारिता में जूझ रहे पत्रकारों की. अगर मीडिया में मौजूद न्युनतम दलित-पिछड़ों की अपनी कोई कहानी हो तो उसे शेयर करें जिससे कि बात अधिक लोगों तक पहुंचे!

मीडिया में गैर सवर्ण समाज कहां है- गैर सवर्ण पत्रकारिता सम्‍मान 2023 से सम्‍मानित हुए बिहार के12 पत्रकार

पटना: मासिक पत्रिका वीरेंद्र यादव न्‍यूज और वीरेंद्र यादव फाउंडेशन चेरिटेबुल ट्रस्‍ट के संयुक्‍त तत्‍वावधान में गैर सवर्ण पत्रकारिता सम्‍मान समारोह का आयोजन पटना के जगजीवनराम संसदीय अध्‍ययन और शोध संस्‍थान में किया गया। बिहार विधान परिषद के उप सभापति रामचन्द्र पूर्वे की अध्यक्षता में आयोजित इस कार्यक्रम में बिहार विधान परिषद सदस्य प्रो रामबली सिंह, श्रीमती कुमुद वर्मा, पूर्व मंत्री श्याम रजक, पूर्व विधान पार्षद उपेन्द्र प्रसाद विधायक छत्रपति यादव और जगजीवनराम के निदेशक नरेंद्र पाठक ने क्रमशः रामअवधेश सिंह पत्रकारिता सम्‍मान वेद प्रकाश को, राजेंद्र प्रसाद यादव पत्रकारिता सम्‍मान को हेमंत कुमार, कृष्‍ण मुरारी किशन पत्रकारिता सम्‍मान छायाकार जावेद आलम को , सूर्यनारायण चौधरी पत्रकारिता सम्‍मान प्रमोद यादव को, उपेंद्र नाथ वर्मा पत्रकारिता सम्‍मान योगेश च्रक्रवर्ती को, रघनुीराम शास्‍त्री पत्रकारिता सम्‍मान राजीव कुमार को, मधुकर सिंह पत्रकारिता सम्‍मान उपेंद्र कश्‍यप को, प्रभात शांडिल्‍य पत्रकारिता सम्‍मान सन्‍नी कुमार को, गुलाम सरवर पत्रकारिता सम्‍मान अनवार उल्‍लाह को, रवींद्र सिंह लड्डू पत्रकारिता सम्‍मान प्रसिद्ध यादव को, अब्‍दुल कय्यूम अंसारी पत्रकारिता सम्‍मान वकील प्रसाद को और आरएल चंदापुरी पत्रकारिता सम्‍मान से डा.दिनेश पाल को सम्‍मानित किया। सम्मान स्वरूप, प्रशस्ति पत्र, शाल और 4 किताबें प्रत्येक सम्मानित पत्रकारों को भेंट की गई।

गैर सवर्ण पत्रकारिता सम्‍मान समारोह 2023
गैर सवर्ण पत्रकारिता सम्‍मान समारोह 2023

इस मौके पर वीरेंद्र यादव न्यूज के गैर सवर्ण मीडिया विशेषांक का लोकार्पण किया गया। तत्पश्चात् मीडिया के सामाजिक सरोकार विषय पर बातचीत हुई। डा. मो. दानिश ने बहुत गहराई और बेबाकी के साथ अम्बेडकर के दौर से लेकर आज तक की की मीडिया पर अपना पक्ष रखा। उन्होंने कहा कि इस मीडिया में जबतक व्यापक समाज की हिस्सेदारी सुनिश्चित नहीं की जाएगी यह लोकतांत्रिक नहीं हो पाएगा। सम्मानित होने वाले पत्रकारों ने अपने जीवन और पेशे में जाति के कारण हुए कटु अनुभव साझा किए और वैकल्पिक मीडिया विकसित करने की जरूरत पर बल दिया। इन पत्रकारों ने जाति जनगणना पर कोर्ट द्वारा रोक लगाये जाने से लेकर बिहार में विभिन्न आयोगों और निकायों की निष्क्रियता के कारण बहुजन समाज पर हो रहे प्रभाव के संबंध में अपनी चिंताएं साझी की।


आयोजन के उद्देश्य की चर्चा करते हुए पत्रकार वीरेंद्र यादव ने बताया कि गैर सवर्ण समाज के 12 पत्रकारों की याद में आयोजित यह कार्यक्रम मीडिया में गैर सवर्ण पत्रकारों को एक सम्मान जनक जीवन जीने की प्रेरणा दे और वे अपने समाज के सरोकार को डंके की चोट पर उठाते रहें। यही हमारा मूल मकसद है। जगजीवनराम के निदेशक नरेंद्र पाठक ने आगत अतिथियों का स्वागत किया। इस मौके पर उन्हें पुस्तक भेंट की गई।
कार्यक्रम के आरंभ में मशहूर कवि हीरा डोम की कविता अछूत की शिकायत का पाठ किया गया। इसे बहुत ही सस्वर और प्रभावी रूप में पटना विश्वविद्यालय की छात्रा पूजा कुमारी ने संभव किया।
बिहार विधान परिषद के उप सभापति श्री रामचंद्र पूर्वे ने कहा कि जाति आधारित समाज में भेदभाव का प्रभाव हर दौर में प्रभावी रहा है ।अंबेडकर की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि उन्होंने भी जब राजनीति में कदम रखा तो उन्हें महसूस हुआ इस जाति आधारित समाज में जबतक हम नेहरू, मालवीय सी राजगोपालाचारी नहीं बनेंगे यह समाज हमें प्रतिष्ठा नहीं देगा। फलस्वरूप उन्होंने अपने समाज को संगठित किया जिसने उन्हें सामाजिक राजनीतिक ताकत दी। उन्होंने माना कि समाज में बहुजन समाज में विकास के लिए कभी भी स्थितियां अनुकूल नहीं रहीं। उन्होंने वीरेंद्र यादव की इस पहल की तारीफ की और नियमित रूप से इस तरह के कार्यक्रम आयोजित करते रहने का आग्रह किया।
समारोह को मंच पर आसीन श्याम रजक, उपेंद्र प्रसाद, छत्रपति यादव, कुमुद वर्मा और रामवली सिंह चंद्रवंशी ने भी संबोधित किया। इन सभी वक्ताओं ने वीरेंद्र यादव की इस पहल की तारीफ की और धारावाहिकता में इस तरह के कार्यक्रम किये जाने की जरूरत पर बल दिया।
कार्यक्रम का संचालन अरुण नारायण ने किया। इस मौके पर श्रीमती अलका वर्मा, अरुण कुशवाहा, प्रो दिलीप कुमार, सुबोध कुमार, विनोद पाल, संतोष यादव, शशिप्रभा, रमाशंकर,कासिफ, महेंद्र यादव, मीरा यादव, मुसाफिर बैठा, हरेंद्र कुमार, गौतम कुमार,प्रमोद यादव, आदि लोगों की उपस्थिति अंतिम समय तक बनी रही।

द केरला स्टोरी – क्या वाकई 10 साल के बाद केरल एक मुस्लिम स्टेट हो जाएगा?

द केरला स्टोरी सुदीप्तो सेन के निर्देशन में बनी फिल्म है. इसके निर्माता विपुल अमृतलाल शाह हैं, द केरला स्टोरी, यह फिल्म रिलीज से पहले से काफी चर्चा में है, चर्चा में होने की एक बड़ी वजह यह भी मानी जा रही है कि यह फिल्म इस देश के एक अल्पसंख्यक धार्मिक समुदाय को टारगेट करती है और कुछ एक उदाहरण जो रहे होंगे कन्वर्जन के,धर्म परिवर्तन के उनको पेश करके यह उस धार्मिक समुदाय को लक्षित करती है और यह बताती है अगर नहीं रोका गया तो पता नहीं केरल के किसी मुख्यमंत्री ने कभी कहा था कि 10 साल के पश्चात केरल एक मुस्लिम स्टेट हो जाएगा. धारणा आप समझ सकते हैं, इरादा आप समझ सकते हैं,  इंटेन्ट आप समझ सकते हैं.

फिल्म के बहाने – कहीं पे निगाहें, कहीं पे निशाना

हिंदी फिल्म इंडस्ट्री और व्यापक रूप से पूरी भारतीय फिल्म इंडस्ट्री में जो एक दक्षिणपंथी प्रतिक्रियावादी और भक्त समुदाय का उदय हुआ है और वे जिस तरीके से फिल्में बना रहे हैं या दिखाना चाह रहे हैं और जिस लक्ष्य की पूर्ति करना चाह रहे हैं जिस विचार को वे फैलाना चाह रहे हैं यह उसी मकसद से बनी हुई फिल्म है,यह पूरी तरह से एजेंडा परक  फिल्म है, प्रोपेगेंडा फिल्म है. अगर फिल्म की कसौटी पर, सिनेमाक्राफ्ट की कसौटी पर इस फिल्म को कसेंगे तो यह एक बहुत ही कमजोर फ़िल्म है. स्क्रिप्ट में दिक्कतें हैं, अभिनय में दिक्कतें हैं, परफॉर्मेंस  क्वालिटी नहीं है, क्यों नहीं है? एक तो कलाकार ही ऐसे चुने गए हैं, अदा शर्मा  हिन्दी फिल्मों की एक अभिनेत्री रही हैं,उन्हें मुख्य भूमिका  मिली है, उनके अलावा लगभग नई लड़कियां हैं, लगभग नए लड़के हैं. नए लोगों को लेना कोई गलत बात नहीं है यह बहुत अच्छी बात है कि आपने नई  प्रतिभाओं को मौका दिया है लेकिन क्या नई प्रतिभाओं में वह क्षमता है जो आपका अभिप्रेत है उसको अच्छे तरीके से पेश कर सके? ऐसा नहीं होता है.

क्या है इस फिल्म की कहानी

फिल्म की कहानी केरल के पृष्ठभूमि में है. वहां दिखाया गया है कि एक क्लास में पढ़ रही चार लड़कियां है. उनमें से एक मुस्लिम समुदाय की है, दो हिंदू धार्मिक समुदाय की  है और एक  ईसाई है. मुस्लिम लड़की आसिफा काफी एक्टिव है वह इन दोनों- तीनों को बरगलाती है और कोशिश करती है कि इनका धार्मिक परिवर्तन कर दिया जाए वो इस्लाम कबूल कर ले. वह हमेशा इनका ब्रेनवाश किया करती है. यहां तक कि हिंदू देवी देवताओं का भी मजाक उड़ाती है और ईसा मसीह का भी मजाक उड़ाती है और बताती है कि सिर्फ अल्लाह ही है जो इस दुनिया को बचा सकता है. यह बिल्कुल एकांगी चित्रण है उस मुस्लिम लड़की का और कहीं ना कहीं निर्देशक और लेखक यह साबित करना चाहते हैं  या बताना चाहते हैं कि यह समुदाय कितना प्रोएक्टिव है और किस तरीके से कन्वर्जन की तैयारियां कर रहा है, लोगों को कन्वर्ट कर रहा है.

क्या है धर्मान्तरण की असली हकीकत

ऐसा कहते हैं कि केरल में कन्वर्जन हुआ है तो कन्वर्जन की वजहों में जाना चाहिए. यह फ़िल्म उन वजहों की बात नहीं करती है. क्यों किसी एक खास धर्म के नागरिक एक खास समय पर।धर्म परिवर्तन करते हैं. धर्म परिवर्तन करने की जो कहानियां हैं उनके पीछे आप जाएं तो सबसे बड़ा कारण आर्थिक उसके अलावा असमानता  उसके अलावा प्रलोभन. प्रलोभन किस चीज का?  कैरियर का.प्रलोभन, एक अच्छी जिंदगी का प्रलोभन अगर कोई धार्मिक समुदाय अपने पंथ के व्यक्तियों को अपने पंथ के नागरिकों को सही जीवन नहीं दे पा रहा है और वह कहीं घुटन महसूस कर रहा  है  तो वह दूसरे धर्म में जाता है. अंबेडकर के समय  काफी लोगों ने बौद्ध धर्म धारण कर लिया था, ऐसे ही इस्लाम में काफी लोग गए. हिंदू धर्म में भी काफी लोगों को लाया गया है. यह हमेशा होता रहा है, किस प्रकार से बौद्ध धर्म जो भारत में बहुत ही प्रचलित धर्म था, उसको खत्म किया गया और कैसे हिंदू आए यह सभी कहानी अगर आप इतिहास में जाते हैं, अगर हम इस तरह की बातें करते हैं  तो इन सारे डिटेल में  भी जाना पड़ेगा. मुझे यह फिल्म बेहद कमजोर लगी है, प्रोपेगैंडिस्ट लगी है. एजेंडा परक  लगी है. और एक खास इरादे से बनाई गई फिल्म जान पड़ती है, बाकी आप  जब देखे अपनी राय दें.

 

WFI के अध्यक्ष बृज भूषण सिंह के खिलाफ POCSO कानून के तहत FIR दर्ज, लेकिन अब तक गिरफ़्तारी क्यों नहीं?

भारतीय कुश्ती महासंघ के अध्यक्ष बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ देश के दिग्गज पहलवानों का धरना जारी है. कुश्ती संघ के अध्यक्ष बृजभूषण शरण सिंह की मुसीबत बढ़ गई है. दिल्ली पुलिस ने आखिरकार बृजभूषण शरण के खिलाफ दो FIR दर्ज कर ली हैं. अहम बात ये है कि इनमें (POCSO) पोक्सो एक्ट के तहत भी केस दर्ज किया है. FIR दर्ज होने के बाद भी पहलवान धरने पर बैठे हुए हैं. कुश्ती संघ के अध्यक्ष बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ पॉक्सो एक्ट और यौन शोषण के आरोप में केस दर्ज हुआ है. ये कार्रवाई एक नाबालिग समेत 7 महिला रेसलर्स की शिकायत पर हुई है. इस आरोप पर बृजभूषण शरण सिंह ने कहा कि मेरे खिलाफ जो आरोप लगाए हैं वो बेबुनियाद हैं.

आपको बता दें कि इस (POCSO) एक्ट के अंतर्गत केस दर्ज होने पर तुरंत गिरफ़्तारी का प्रावधान है. बावजूद इसके बृजभूषण शरण सिंह को दिल्ली पुलिस ने अबतक गिरफ्तार नहीं किया है.

गिरफ़्तारी में देरी पर क्या है कानून के एक्सपर्ट्स की राय

यूपी के पूर्व DGP विक्रम सिंह के मुताबिक पुलिस गिरफ्तारी से पहले आरोप की सत्यता की जांच कर सकती है, लेकिन अगर प्राथमिक जांच में पुलिस को आरोप सही लगता है तो आरोपी को गिरफ्तार होने से कोई नहीं रोक सकता है।

सुप्रीम कोर्ट के एडवोकेट विराग गुप्ता के मुताबिक पॉक्सो कानून में केस दर्ज होने के बाद अपराधों की जांच और उनके ट्रायल के लिए विशेष व्यवस्था बनी है. ऐसे मामलों में गिरफ्तारी के बाद जमानत मिलना भी आसान नहीं होता है और काफी मुश्किलें आती हैं.

संसद सत्र के दौरान यदि किसी सांसद की गिरफ्तारी होती है तो स्पीकर को सूचित करने का नियम और प्रोटोकॉल है, लेकिन भारतीय कुश्ती संघ के अध्यक्ष और सांसद होने के नाते बृजभूषण शरण को विशेष कानूनी कवच नहीं मिला है.

 

 बृज भूषण सिंह को कितना सजा होगी?

बृज भूषण सिंह के खिलाफ महिला की लज्जा भंग करने के आरोप में IPC की धारा 354, 354(A), 354(D) के तहत केस दर्ज किया गया है. इस मामले में अगर वो दोषी पाए जाते हैं तो उन्हें अधिकतम 3 साल तक की सजा हो सकती है. वहीं, एक केस पॉक्सो एक्ट में भी दर्ज किया गया है. पॉक्सो एक गैर-जमानती अपराध है. इसमें दोषी पाए जाने पर कम से कम 7 साल की जेल और अधिकतम उम्रकैद तक की सजा हो सकती है.

वहीँ जंतर मंतर पर धरने पर बैठीं विनेश फोगाट ने  24 अप्रैल को कहा था कि –

‘हम तीन महीने से मेंटल टॉर्चर से गुजर रहे हैं. सिर्फ इसलिए कि हमें इंसाफ मिले. यह खिलाड़‍ियों के सम्‍मान की बात है. अगर इस देश में ही हम सुरक्षित नहीं हैं तो बाकी लड़कियों के भविष्‍य के बारे में हम क्‍या सोच सकते हैं.’

बृजभूषण के आरोपों के जवाब में विनेश फोगाट

इस मामले में कुश्ती महासंघ के अध्यक्ष ने खुद सामने आकर अपना बचाव किया और पहलवानों पर साजिश रचने का आरोप लगाया. अब पहलवान विनेश फोगाट ने बृजभूषण सिंह के आरोपों पर पलटवार किया है. पहलवान विनेश फोगाट ने कहा कि उन्होंने केवल चार नेशनल नहीं खेले हैं बीते 14 साल में, मैंने पहले भी नेशनल खेला और आज भी खेलूंगी. बजरंग और बाकी लोग भी ट्रायल देकर ही गए थे, कोई भी खिलाड़ी देश से बड़ा नहीं है. नेशनल के नियम बदलने की बात बेबुनियाद और झूठी है. वहीं बजरंग पूनिया ने कहा कि शिकायतकर्ता नाबालिग है ये बात बृजभूषण को आखिर कैसे पता चली, हम ये सवाल पूछना चाहते हैं.

पहलवान बजरंग पूनिया ने कहा कि हम संवैधानिक पदों पर बैठे सभी लोगों का मानसम्मान करते हैं. हम कोई ऐसी बात नहीं कहते हैं कि उनके मानसम्मान को चोट पहुंचे. लेकिन हमारा भी मानसम्मान है, हमारा भी सम्मान है. इस बात का जवाब दें कि कैसे कमेटी की गोपनीय बातें उनतक पहुंची. यहां का बिजली , पानी तक काट दिया गया और बेड और बिस्तर भी नहीं है. पहले हमारी मजबूरी थी कि हम नहीं बोल पाए.

पहलवानों के समर्थन में उतरी प्रियंका गाँधी, पहुंची जंतर मंतर

इस बीच कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी जंतर मंतर पर पहलवानों से मिलने के लिए पहुंची.बृजभूषण सिंह पर महिला पहलवानों के साथ कथित तौर पर यौन उत्पीड़न का आरोप है.पहलवानों का कहना है कि सिर्फ़ एफ़आईआर दर्ज होने से वे प्रदर्शन बंद नहीं करेंगे.उनका कहना है कि जब तक बृजभूषण सिंह की गिरफ्तारी नहीं होती, तब तक वे घर नहीं जाएंगे.

पहलवानों से मिलने जंतर-मंतर पहुंची प्रियंका गांधी वाड्रा
पहलवानों से मिलने जंतर-मंतर पहुंची प्रियंका गांधी वाड्रा

कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा ने शनिवार को भारतीय कुश्ती महासंघ के अध्यक्ष के खिलाफ कार्रवाई को लेकर धरने पर बैठे पहलवानों से मुलाकात की और उनके प्रति समर्थन जताया. दिल्ली पुलिस ने शुक्रवार को सांसद बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ दो प्राथमिकी दर्ज की थी. इस दौरान मीडिया से बातचीत करते हुए प्रियंका गांधी ने कहा,

‘जो एफआईआर दर्ज कराई गई है, उसमें क्या है, इसकी जानकारी किसी को नहीं है. वे इसे क्यों नहीं दिखा रहे हैं?’

सरकार बृजभूषण शरण सिंह को क्यों बचा रही है?: प्रियंका गांधी

प्रियंका गाँधी वाड्रा ने कहा कि जब ये पहलवान पदक जीतते हैं तो हम सभी ट्वीट करते हैं और गर्व महसूस करते हैं. लेकिन आज ये सड़क पर बैठे हैं और इन्हें न्याय नहीं मिल रहा है. ये सभी महिला पहलवान इस मुकाम तक आने के लिए काफी संघर्ष करती हैं और मैं यह नहीं समझ पा रही हूं कि सरकार उन्हें (बृजभूषण शरण सिंह) क्यों बचा रही है?

प्रियंका गांधी ने कहा कि मुझे पीएम से कोई उम्मीद नहीं है, क्योंकि अगर उन्हें इन पहलवानों की चिंता है तो उन्होंने अभी तक उनसे बात या मुलाकात क्यों नहीं की. देश उनके साथ खड़ा है और मुझे बहुत गर्व है कि इन पहलवानों ने ऐसे मुद्दे के खिलाफ आवाज उठाई है. प्रियंका गांधी कर्नाटक विधानसभा चुनाव के लिए प्रचार के लिए रवाना होने से पहले शनिवार की सुबह-सुबह जंतर-मंतर पहुंची. उन्होंने महिला पहलवानों से अलग से बातचीत भी की और कुछ देर वहां बैठीं रहीं. इस दौरान राज्यसभा सदस्य दीपेंद्र हुड्डा भी उनके साथ थे.

छुट्टी लेकर आएं और पहलवानों का साथ दें: सीएम केजरीवाल

जंतर-मंतर पर पहलवानों के धरने पर शनिवार को दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल भी पहुंचे. यहां पहुंचकर उन्होंने पहलवानों से मुलाकात की और मौजूद लोगों को संबोधित करते हुए कहा कि, मुझसे जो बन पड़ेगा मैं पहलवानों का साथ देने के लिए वो करूंगा. इस दौरान  सीएम ने कहा कि, मैं लोगों से अपील करता हूं कि वे यहां छुट्टी लेकर आएं और पहलवानों का समर्थन करें.

जंतर मंतर पर पहलवानों के धरने के समर्थन में पहुंचे दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल
जंतर मंतर पर पहलवानों के धरने के समर्थन में पहुंचे दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल

“हमारे देश के वो पहलवान, जिन्होंने दुनिया में भारत का नाम रोशन किया वो एक हफ्ते से जंतर मंतर पर प्रदर्शन कर रहे हैं क्योंकि इनकी पार्टी के नेता ने भारत का नाम  रोशन करने वाली लड़कियों के साथ गलत काम किया. कोई लड़कियों के साथ छेड़छाड़ करें तो ऐसे व्यक्ति को फांसी पर लटका देना चाहिए, लेकिन इस मामले में देरी क्यों हो रही है ?”

 

ये जंतर-मंतर बहुत पवित्र जगह है. हम भी यहां से निकले हैं. अन्ना हजारे ने यहीं भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन खड़ा किया था. इसलिए मैं आप से अपील करता हूं कि यहां आकर पहलवानों का साथ दीजिए. सीएम ने अपनी इस अपील को दोहराते हुए कहा कि जो भी पहलवानों के साथ है वह छुट्टी लेकर यहां पहुंचे और इनका समर्थन करे.

कानून में विश्वास, कहीं भाग नहीं रहा: WFI चीफ बृजभूषण सिंह

भारतीय कुश्ती महासंघ (WFI) के अध्यक्ष बृजभूषण शरण सिंह ने अपने खिलाफ लगे यौन उत्पीड़न के आरोपों के बीच  कहा कि वह एफआईआर दर्ज करने के सुप्रीम कोर्ट के आदेश का ‘स्वागत’ करते हैं, क्योंकि उन्हें कानून में विश्वास है और वे आरोपों की जांच करने में हर तरह से सहयोग करने के लिए तैयार हैं.

 ‘देखिए मैं न्यायपालिका के निर्णय से खुश और बेहद प्रसन्न हूं. दिल्ली पुलिस को जांच मिली है. मैं कहीं भाग नहीं रहा. अपने आवास पर ही हूं. जांच में जहां भी सहयोग की आवश्यकता होगी, मैं सहयोग करने के लिए तैयार हूं. न्यायपालिका से बड़ा कोई नहीं है इस देश में. मैं भी न्यायपालिका से बड़ा नहीं हूं.’

मैं सुप्रीम कोर्ट से बड़ा नहीं हूं. मैं उस फैसले का स्वागत करता हूं. जब ओवरसाइट कमेटी बनी थी, तब भी मैंने सवाल नहीं उठाया था. मैंने हर नियम कानून को माना था. इन लोगों को इंतजार करना चाहिए था. इंतजार नहीं किया. सुप्रीम कोर्ट गए. सुप्रीम कोर्ट ने संज्ञान लिया और ये फैसला लिया.

 

 

 

 

 

 

बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ 2 FIR दर्ज

दिल्ली पुलिस ने बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ सात महिला पहलवानों द्वारा लगाए गए यौन उत्पीड़न के आरोपों के सिलसिले में शुक्रवार को दो प्राथमिकी दर्ज की. इनमें पहली प्राथमिकी एक अवयस्क पहलवान के आरोपों पर पॉक्सो कानून के तहत दर्ज की गई, जबकि दूसरी मर्यादा को ठेस पहुंचाने के संबंध में है.

बृजभूषण ने कहा , ”महिला पहलवानों की सभी मांगें मान ली गई हैं, मेरे खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की जा चुकी है, फिर भी वे धरने पर बैठे हैं. क्यों?’ उन्होंने कहा कि उनका कार्यकाल पूरा हो चुका है और महासंघ के अध्यक्ष के चुनाव के साथ अपने आप ही इस्तीफा हो जाएगा. नए चुनाव तक वह सिर्फ कार्यवाहक की भूमिका निभा रहे हैं. उन्होंने सवाल दागा कि यदि वह पिछले 12 साल से खिलाड़ियों का यौन शोषण कर रहे था, तो वे आज तक कभी पुलिस स्टेशन, फेडरेशन अथवा सरकार के पास शिकायत लेकर क्यों नहीं गए? सीधा जंतर-मंतर पर धरना देने क्यों पहुंच गए.

डब्ल्यूएफआई के चीफ बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ पहलवान जंतर-मंतर पर जमकर प्रदर्शन कर रहे हैं। रेसलर्स ने बृजभूषण सिंह के खिलाफ यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया है। ओलिंपिक मेडलिस्ट बजरंग पूनिया, साक्षी मलिक जैसे बड़े पहलवान इस प्रदर्शन को लीड कर रहे हैं। कई सीनियर रेसलर्स इस प्रोटेस्‍ट का हिस्‍सा हैं।

Same Sex Marriage | समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता देने का विरोध | कपिल सिब्बल- क्या समाज इसे सुनने को तैयार

Same Sex Marriages: भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट के 5 जजों की पीठ सेम सेक्स मैरिज को मंजूरी की मांग को लेकर दायर याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है. केंद्र सरकार ने इन याचिकाओं का विरोध करते हुए एक अलग याचिका दायर की है. केंद्र ने समलैंगिंग विवाह को ‘शहरी एलीट’ विचार बताते हुए कहा है कि इस पर कानून बनाने का अधिकार संसद को है. केंद्र ने यह भी कहा है कि इस पर कोई कानून बनाने से पहले सक्षम विधायिका को धार्मिक संप्रदायों के विचारों को भी ध्यान में रखना होगा. चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया डीवाई चंद्रचूड, जस्टिस एसके कौल, एसआर भट, हिमा कोहली और पीआर नरसिम्हा की बेंच इस मामले की सुनवाई कर रही है.

पूर्व केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल ने मंगलवार को सुनवाई से पहले ट्वीट किया और पूछा कि समलैंगिक विवाह, सुप्रीम कोर्ट सुनने को तैयार है, लेकिन क्या समाज सुनने को तैयार है।

सेम सेक्स मैरिज के विरोध में सरकार का तर्क

सुप्रीम कोर्ट ने साल 2018 में धारा 377 को रद्द कर दिया था. इसके बाद से भारत में समान लिंग के बीच संबंध बनाना अप्राकृतिक नहीं रह गया था. धारा 377 खत्म करने के बाद से देश में लगातार समलैंगिक विवाहों को कानूनी मान्यता देने की मांग उठ रही थी. हालांकि, केंद्र इस मामले का शुरू से विरोध कर रहा है.

 

 

 

2018 में सुप्रीम कोर्ट ने समलैंगिक संबंधों को अपराध के दायरे से बाहर कर दिया था, लेकिन इसके आधार पर सेम सेक्स मैरिज को मान्यता देने का दावा नहीं किया जा सकता. केंद्र ने कहा है कि 18 अप्रैल को कानूनी मामलों के विभाग ने राज्यों के सभी मुख्य सचिवों को भी लिखा है कि अगर उन्हें नोटिस जारी नहीं किया जाता है तो समलैंगिक विवाह पर अपने विचार प्रस्तुत करें. राज्य 10 दिन में अपनी राय दें, ताकि केंद्र पहले अपना पक्ष रख सके.

सेम सेक्स मैरिज मामले में दूसरे दिन की सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने राज्यों की भागीदारी की बात रखी. SG तुषार मेहता ने कहा कि राज्यों से परामर्श शुरू किया है. राज्यों को भी पार्टी बनाकर नोटिस किया जाए. ये अच्छा है कि राज्यों को भी मामले की जानकारी है. याचिकाकर्ता के वकील मुकुल रोहतगी ने इसका विरोध किया और कहा कि ये पत्र कल लिखा गया है, लेकिन अदालत ने पांच महीने पहले नोटिस जारी किया था. ये गैरजरूरी है. केंद्र की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि इस केस में हमारी प्रारंभिक आपत्ति है. ये संसद के क्षेत्राधिकार का मामला है.

“सवाल ये है कि क्या अदालत खुद इस मामले पर फैसला कर सकती है? ये याचिकाएं सुनवाई योग्य नहीं हैं. केंद्र को पहले सुना जाना चाहिए क्योंकि वह अदालत के समक्ष 20 याचिकाओं के सुनवाई योग्य होने का विरोध कर रहा है. सुप्रीम कोर्ट इस मुद्दे पर फैसला नहीं कर सकता. संसद उपयुक्त मंच है. ये नीतिगत मामले हैं. बड़ी संख्या में हितधारकों से परामर्श करने की आवश्यकता है. ये सवाल है कि कौन सा मंच इस मामले में विचार कर सकता है. यह एक संवेदनशील मुद्दा है.”

याचिकाकर्ता की ओर से मुकुल रोहतगी ने कहा कि स्पेशल मैरिज एक्ट में जहां भी पति या पत्नी का जिक्र है, उसे जीवनसाथी से बदला जाए. जहां भी पुरुष या महिला का उल्लेख किया गया है, उसे लिंग तटस्थ बनाते हुए ‘व्यक्ति’ के तौर पर बदला जाए.

“हम जहां भी जाते हैं और आवेदन करते हैं, तो हमें ऐसे देखा जाता है जैसे हम सामान्य लोग नहीं हैं. यही मानसिकता है जो हमें परेशान कर रही है. मेरे पास ढाल है, लेकिन वह स्पष्ट होना चाहिए. निजता का अधिकार नैतिक है. मुझे पीड़ित या कलंकित नहीं किया जाएगा, क्योंकि मैं विषमलैंगिक समाज के अनुरूप नहीं हूं.”

रोहतगी ने कहा कि अगर अदालत आदेश देगी तो समाज इसे मानेगा. अदालत को इस मामले में आदेश जारी करना चाहिए. हम इस अदालत की प्रतिष्ठा और नैतिक अधिकार पर भरोसा करते हैं. संसद कानून से इसका पालन करे या न करे, लेकिन इस अदालत का आदेश हमें बराबर मानेगा. अदालत हमें समान मानने के लिए समाज पर दबाव डाले. ऐसा ही संविधान भी कहता है. इस अदालत को नैतिक अधिकार और जनता का विश्वास प्राप्त है.

  • समलैंगिक विवाह भारत के परम्पराओं के खिलाफ 
  • इसे देश की नागरिकों की निजता का मुद्दा नहीं माना जा सकता 
  • शादी के बाद झगडा होने पर पति और पत्नी की पहचान कैसे होगी 

विभिन्न धार्मिक संगठनों और एनजीओ ने समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता दिए जाने का विरोध करते हुए उनका पक्ष भी सुने जाने की मांग की है.आखिर श्री सनातम धर्म प्रतिनिधि सभा ने कहा कि समलैंगिक विवाह की अवधारणा “विनाशकारी” है और इसका भारतीय संस्कृति और समाज पर “हानिकारक प्रभाव” होगा. हिंदू संगठन ने इसके विरोध में वेदों का हवाला दिया है. सभा के मुताबिक, वेदों में कहा गया है कि जिनके पास पत्नियां हैं. उनके पास वास्तव में एक पारिवारिक जीवन हैं. जिनकी पत्नियां हैं, वे सुखी हो सकते हैं. जिनके पास पत्नियां हैं, वे पूर्ण जीवन जी सकते हैं. मनुस्मृति का भी उदाहरण दिया, जिसमें कहा गया कि महिलाओं को मां बनने के लिए और पुरुष को पिता बनने के लिए बनाया गया है.इस विवादास्पद मुद्दे पर धार्मिक संगठनों की क्या राय है, आइए एक नजर डालते हैं.

सनातन धर्म प्रतिनिधि सभा 

श्री सनातम धर्म प्रतिनिधि सभा ने कहा कि समलैंगिक विवाह की अवधारणा “विनाशकारी” है और इसका भारतीय संस्कृति और समाज पर “हानिकारक प्रभाव” होगा. हिंदू संगठन ने इसके विरोध में वेदों का हवाला दिया है. सभा के मुताबिक, वेदों में कहा गया है कि जिनके पास पत्नियां हैं. उनके पास वास्तव में एक पारिवारिक जीवन हैं. जिनकी पत्नियां हैं, वे सुखी हो सकते हैं. जिनके पास पत्नियां हैं, वे पूर्ण जीवन जी सकते हैं. मनुस्मृति का भी उदाहरण दिया, जिसमें कहा गया कि महिलाओं को मां बनने के लिए और पुरुष को पिता बनने के लिए बनाया गया है.

 

 

 

 

जमीयत-उलेमा-ए-हिंद

मुसलमानों की संस्था जमीयत-उलेमा-ए-हिंद ने भी समलैंगिक विवाह का विरोध किया है. जमीयत ने कहा है कि दो विपरीत लिंग वालों में शादी होना, विवाह की मूल विशेषता है. इस्लाम में शुरुआत से ही समलैंगिकता को लेकर पाबंदी रही है. जमीयत ने एलजीबीटीक्यूआईए को पश्चिमी यौन मुक्ति आंदोलन से उपजा बताया है.

 

अखिल भारतीय संत समिति

हिंदू संगठन अखिल भारतीय संत समिति ने कहा है कि पति और पत्नी को साथ रखना ये प्रकृति का कानून है. हिंदू विवाह के दौरान कन्यादान और सप्तपदी मुख्य संस्कार हैं. संगठन ने समलैंगिक विवाह को पूरी तरह अप्राकृतिक बताया है.

तेलंगाना मरकजी शिया उलेमा काउंसिल

इस्लाम के शिया मत में भी समलैंगिक विवाह को लेकर ऐसा ही विचार है. तेलंगाना मरकजी शिया उलेमा काउंसिल ने दावा किया कि समलैंगिक जोड़ों द्वारा पाले गए बच्चों में आगे चलते डिप्रेशन, कम पढ़ाई लिखाई और नशा फूंकने की प्रवृत्ति अधिक पाई जाती है. इसने आगे कहा है कि पश्चिम में धर्म काफी हद तक कानून का स्रोत नहीं रह गया है और यह निजी जीवन इसकी बहुत भूमिका नहीं रह गई है. दूसरी ओर, भारत में धर्म पारिवारिक और सामाजिक संबंधों के साथ ही व्यक्तिगत कानून को आधार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है.

 

 

‘हिंदू धर्म में शादी केवल यौन सुख का अवसर नहीं’, समलैंगिक विवाह पर VHP का बड़ा बयान

विश्व हिंदू परिषद (विहिप) ने कहा कि समलैंगिक विवाह को मान्यता देने के लिए दायर याचिका का निस्तारण करने में उच्चतम न्यायालय जिस प्रकार की ‘जल्दबाजी’ कर रहा है, वह किसी भी तरह से उचित नहीं है. विहिप के संयुक्त महामंत्री डॉ. सुरेंद्र जैन ने कहा कि यह नए विवादों को जन्म देगा और भारत की संस्कृति के लिए घातक सिद्ध होगा. उन्होंने कहा कि इसलिए इस विषय पर आगे बढ़ने से पहले उच्चतम न्यायालय को धर्मगुरुओं, चिकित्सा क्षेत्र, समाज विज्ञानियों और शिक्षाविदों की समितियां बनाकर उनकी राय लेनी चाहिए.

सुप्रीम कोर्ट में समलैंगिक शादी को मान्यता देने की याचिका के साथ सुनवाई के लिए एनसीपीसीआर ने भी अपनी याचिका लगा दी है. राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग यानी NCPCR भी सुप्रीम कोर्ट पहुंचा है. सुप्रीम कोर्ट में समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता के खिलाफ NCPCR भी कोर्ट पहुंचा है.  NCPCR ने कहा है कि समलैंगिक जोड़े द्वारा बच्चों को गोद लेने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए. NCPCR ने कहा है कि समान लिंग वाले अभिभावक द्वारा पाले गए बच्चों की पहचान की समझ को प्रभावित कर सकते है. इन बच्चों का एक्सपोजर सीमित रहेगा और उनके समग्र व्यक्तित्व विकास पर असर पड़ेगा.

गौरतलब है कि इससे पहले दिल्ली सरकार के बाल अधिकार संरक्षण आयोग (DCPCR) ने सुप्रीम कोर्ट में एक अर्जी दाखिल कर समलैंगिक विवाह को मान्यता देने की मांग वाली याचिकाओं के साथ सुनवाई की मांग की है. डीसीपीसीआर ने कहा है कि समलैंगिक जोड़ों को भी बच्चे गोद लेने की अनुमति मिलनी चाहिए. इसके लिए याचिका में अलग-अलग तर्क दिए गए हैं. इसमें कहा गया है कि विषमलिंगी जोड़ों की तरह ही समलैंगिक जोड़े भी अच्छे या बुरे अभिवावक बन सकते हैं. इनका तर्क है कि दुनिया के 50 से ज्यादा देश समलैंगिक जोड़ों को बच्चा गोद लेने की इजाजत देते हैं.

साथ ही इन लोगों का कहना है कि ऐसा कोई सबूत नहीं है कि समलैंगिक जोड़ों के बच्चों के मनोवैज्ञानिक विकास पर असर पड़ता है.

बार काउंसिल ऑफ इंडिया (बीसीआई) ने समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता देने का विरोध करते हुए एक प्रस्ताव पारित किया है. बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने अपने प्रस्ताव में कहा है,

‘ज्वाइंट मीटिंग की एकमत राय है कि समलैंगिक विवाह के मुद्दे की संवेदनशीलता को देखते हुए और विविध सामाजिक-धार्मिक पृष्ठभूमि के हितधारकों के एक स्पेक्ट्रम को ध्यान में रखते हुए, यह सलाह दी जाती है कि यह सक्षम विधायिका द्वारा विभिन्न सामाजिक, धार्मिक समूहों को शामिल करते हुए एक विस्तृत परामर्श प्रक्रिया के बाद निपटाया जाए.’

CJI चंद्रचूड़ ने कहा कि याचिकाओं पर फैसला करते समय बेंच पर्सनल लॉ के पहलुओं को नहीं छूएगी. पीठ ने कहा कि इस मामले में विधायी कार्रवाई का एक एलिमेंट शामिल है और इस प्रकार स्पेशल मैरिज एक्ट (SMA) के तहत समलैंगिक विवाहों को मान्यता देने के मामले के दायरे को सीमित करना विवेकपूर्ण होगा.

 

समाज में 15 प्रतिशत लोग ही सभी क्षेत्रों में अपना एकाधिकार जमाये हुए हैं: जीतनराम मांझी

बाबा साहेब डॉक्टर भीमराव अम्बेडकर 132 वीं जयंती पर स्त्रीकाल परिवार की ओर से सादर जय भीम!

 ‘बाबा साहब भीमराव आंबेडकर ने इस देश के लिए जो काम किया, वह मील का पत्थर है। अपने समय का कोई भी ऐसा विषय नहीं रहा जिसपर उन्होंने विचार न किया हो। सेपरेट इलेक्ट्राल और काॅमन स्कूल सिस्टम आज देश भर में लागू करने की जरूरत है तभी बाबा साहब के सपने पूरे होंगे।’

 

ये बातें पूर्व मुख्यमंत्री श्री जीतनराम मांझी ने स्थानीय बिहार इंडस्ट्रीज एसोसिएशन हाॅल सभागार में कही। उन्होंने यह बात बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर की 132वीं जयंती पर स्त्रीकाल और रिफार्मर्स की संयुक्त पहल पर आयोजित परिसंवाद ‘डाॅ. आंबेडकर: स्वतंत्रता और समता के पक्षधर’ विषय पर आयोजित परिसंवाद में कही।
इस गोष्ठी को वरिष्ठ लेखक प्रेमकुमार मणि, संजीव चंदन, शांति यादव और डाॅ. मो. दानिश ने भी संबोधित किया। इन वक्ताओं ने बाबा साहेब के स्त्रीवादी, दलितवादी और मानवतावादी सरोकार के मुताल्लिक बहुत गंभीर और सारगर्भित बातें कहीं।

’15 प्रतिशत लोग ही सभी क्षेत्रों में अपना एकाधिकार जमाये हुए हैं’

पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी ने आगे कहा कि ‘समाज में भले ही 85 प्रतिशत लोग बहुजन हैं लेकिन आज भी सच्चाई यही है कि अपने समाज में 85 प्रतिशत का चलता नहीं है, 15 प्रतिशत लोग ही सभी क्षेत्रों में अपना एकाधिकार जमाये हुए हैं। जो लोग कभी-कभार यथार्थ की बातें करते हैं, उस विचार को पनपने ही नहीं दिया जाता। अमीरों की खामियों को कोई नहीं देखता, गरीबों का मजाक उड़ाया जाता है।’
वरिष्ठ लेखक एवं पूर्व विधान परिषद सदस्य श्री प्रेमकुमार मणि ने बाबा साहब के संघर्ष से जुड़े कई घटना प्रसंग साझा किये। 1932 के कम्युनल अवार्ड की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि अपने समय में बाबा साहब किस तरह के संघर्ष कर रहे थे, कैसी उनकी अनुभूति थी, उसका वस्तुनिष्ठ अध्ययन अभी शेष है। उन्होंने कहा कि तब गांधी के आमरण अनशन के समय बाबा साहब गांधी के सिरहाने बैठकर बात करते हैं यह समझ लीजिए कि बाबा साहब का तर्क सुनकर गांधी हिल जाते हैं गांधी को मुक्ति बाबा साहब दिलाते हैं इसके बाद गांधी वही गांधी नहीं रह जाते। श्री मणि ने बाबा साहब के स्त्री और अल्पसंख्यक संबंधी विचारों पर भी रोशनी डाली।
स्त्रीकाल के सम्पादक संजीव चंदन ने कहा कि बाबा साहब इस देश के ठोस स्त्रीवादी थे। उन्होंने कहा कि वे दो कारणों से बाबा साहब के प्रति आसक्त रहते हैं इसका एक कारण उनकी वैचारिक दृढ़ता में निहित है और दूसरा कारण मनोवैज्ञानिक है। उन्होंने स्त्रीवादी अनुशासन में काम करने वाले बौद्धिक जमात पर चोट करते हुए कहा कि वहां भी जातिवाद की संकीर्णता अभी तक गई नहीं है यह दुखद है कि जिस बाबा साहब ने महिला आरक्षण का सवाल 42 में ही उठाया, किसी भी महिला इतिहासकार ने उसकी नोटिश नहीं ली।
वरिष्ठ साहित्यकार शांति यादव ने भी विस्तार से बाबा साहब के योगदान की और उनके स्त्री विषयक योगदान को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि भारतीय समाज और राजनीति में बाबा साहब पहले व्यक्ति हैं जो स्वतंत्रता और समता की अवधारणा को भारतीय संविधान में उसकी व्यापकता में उभारते हैं। शांति यादव ने धार्मिक जड़ता में लिप्त लोगों को उससे बाहर निकलने पर जोर दिया।
डाॅ. मो.दानिश ने कहा कि मुसलमानों और अल्पसंख्यकों के सवाल पर बाबा साहब की सोच अपने दौर के अन्य नेताओं से न सिर्फ भिन्न थी अपितु दूरगामी भी। उन्होंने मुस्मिल वैल्यूज के सवाल को अपने तरीके से एड्रेस किया लेकिन यह दुखद है कि हिन्दुत्वादी शक्तियां उसे विकृत रूप में मुसलमानों के खिलाफ कड़े करने के षड्यंत्र में शामिल है।
स्वागत भाषण लारेब अकरम और पहले सत्र का संचालन अरुण नारायण ने किया। मंच पर आगत अतिथियों को भेंट स्वरूप स्त्रीकाल पत्रिका और किताब क्रमशः संतोष यादव, कंचन राय, गायत्री और गीता पासवान भेंट की।
कार्यक्रम के दूसरे सत्र में आंबेडकरवादी कविताओं का पाठ का कार्यक्रम था जिसमें एनके नंदा, शांति यादव, साकिब अशरफी, कृष्ण समिद्ध, मृत्युंजय पासवान, सुरेश महतो, राकेश शर्मा, कंचन राय, ज्योति स्पर्श, श्वेता शेखर, कुणाल भारती, संतोश यादव, लता प्रासर और नवीनत कृष्ण सरीखे कवियों ने अपनी अलग-अलग भावभंगिमा से पूर्ण समाजिक यथार्थ के अनुभवों से मुठभेड़ करती कविताओं का पाठ किया। इस सत्र का संचालन नवीनत कृष्ण ने किया।
इस मौके पर सुबोध कुमार, शैलेंद्र कुमार, मुसाफिर बैठा, रणविजय, पूनम कुमारी, अनुज, अमरनाथ यादव, नीला विजय कुमारी चैधरी, विनय कुमार चौधरी, रामविलास प्रसाद, अनिल कुमार रजक, आदि लोगोें की उपस्थिति अंत तक बनी रही।

पश्चिम बनाम पूरब, यूरोप बनाम भारत, अंग्रेज़ी बनाम हिंदी, राजनीति बनाम संस्कृति, वर्ग बनाम अस्मिता – नए विमर्शों का समायोजन

(यह रिपोर्ट शोधार्थी शशांक कुमार ने लिखी है)

भारतीय साहित्य सिद्धांत और नए विमर्शों के समायोजन

28-29 मार्च, 2023 को ‘हिंदी साहित्य पर पश्चिमी प्रभाव और देशज प्रतिमान’ विषय पर दो दिन की विचार गोष्ठी का आयोजन दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर की एनेक्सी में किया गया। आयोजन डॉ. बी. आर. अम्बेडकर विश्वविद्यालय, दिल्ली की साहित्य अध्ययन पीठ के देशिक अभिलेख-अनुसंधान केंद्र (सीआए-आईआईएलकेएस) ने किया।

गोष्ठी का केंद्र बिंदु जिन प्रश्नों के इर्दगिर्द बुना गया था, उनमें प्रमुख थे कि साहित्यिक विधाओं की भारतीयता का क्या तात्पर्य है, तथा क्या भारतीय साहित्य सिद्धांत की आज कोई प्रासंगिकता है? जैसा कि आलोचक वैभव सिंह ने  विचार गोष्ठी के बीज पत्र को प्रस्तुत करते हुए कहा कि

“वर्तमान पीढ़ी आलोचना व साहित्य की पूर्व-परम्पराओं को विस्मृत कर रही है। उससे बौद्धिक जुड़ाव भी बाधित हो रहा है।” उन्होंने इस क्रम में गोष्ठी के वक्ताओं के समक्ष कई सवाल रखे, जिनमें प्रमुख थे कि  “क्या इस समस्या से उबरने में पश्चिम बनाम पूरब, यूरोप बनाम भारत, अंग्रेज़ी बनाम हिंदी, राजनीति बनाम संस्कृति, वर्ग बनाम अस्मिता के विचारधारात्मक द्वैत से संचालित बौद्धिकताएँ मददगार हो सकती हैं? क्या हिंदी आलोचना के इतिहास को नई दृष्टि से समझने की कोशिश नये रास्ते खोल सकती है? क्या दलित, ओबीसी, स्त्री और मार्क्सवादी विमर्श का इन सिद्धांतो से कोई समायोजन संभव है, या इन विमर्शों के प्रभाव में ये सिद्धांत हमारे किसी काम के नहीं रह गए हैं? पुराने पाठों को पढ़ने का कोई विउपनिवेशीकृत तरीका भी है या इसके लिए हमें पश्चिमी साहित्यशास्त्र के पास जाना ही पड़ेगा? क्या पश्चिम का प्रतिवाद हिंदी साहित्य-चिंतन का एक संभव एजेंडा बन सकता है?”

गोष्ठी में दो दिनों तक इन मुद्दों पर जमकर चर्चा हुए। कई नई स्थापनाएं सामने आईं, कई समस्याग्रस्त पदों पर नई रोशनी पड़ी और जैसा कि किसी बौद्धिक गोष्ठी के लिए स्वभाविक है, अनेक मुद्दे अनसुलझे भी रहे।

गोष्ठी में कवि उदयन वाजपेयी ने ‘औचित्य-विचार व शृंगार’ विषय पर अपना मत रखा। औचित्य विचार की व्याख्या करते हुए उन्होंने कहा, हम सब एक दूसरे से विशिष्ट इसलिए हैं,

क्योंकि हमारी औचित्य बोध अलग है और इसकी चेतना ही हमें सृजनशील बनाती है। इस औचित्य बोध के आत्मबोध से ही सृजन किया जाता है। एक साहित्यिक रचना में इस औचित्य बोध से जब सौन्दर्य की रचना होती है तो उसी समय एक विशिष्ट नैतिक बोध भी अनुस्यूत हो जाता है। चूँकि यह नैतिक बोध अन्य प्रकार के बोध से अलग होता है, इसके कारण यह हमारे कार्यकलापों को प्रश्नांकित करता है। राजनीति एक औसत नैतिक बोध से कार्य करती है, जब पाठक ऐसी कृति को पढ़ता है तो उसके भीतर विवेक और वह विशिष्ट नैतिक बोध उत्पन्न होता है जिससे वह राज्यसत्ता द्वारा व्यवहृत औसत नैतिक बोध को प्रश्नांकित करने में सक्षम होता है।”

जबकि आलोचक मदन सोनी ने ‘आलोचना की भारतीयता’ निमित्त कहा कि-

“हमारे आलोचना कि समस्या यह नहीं है कि वह पश्चिम से प्रभावित है, उसकी समस्या किसी विजातीय जमीन पर रोपे गये उस पौधे की तरह है जो निरंतर कुपोषण का शिकार बनाये रहते हुए एक ओर अपनी मूल जातीय पहचान खो चुका होता है, और दूसरी ओर उस जमीन से अपनी पहचान अर्जित नहीं कर पाता जिस पर उसे रोपा गया होता है। हमारी आलोचना का विद्रूप का स्रोत इस दोहरे अलगाव में है।”

प्रो. नन्द किशोर आचार्य ने ‘रस की अवधारणा’ पर कहा कि “साहित्य रचना की प्रक्रिया हो, सम्प्रेषण की प्रक्रिया हो और उस प्रक्रिया की जो व्याख्या रस सिद्धांत या दृष्टि करती है वो एक प्रकार से आत्म और स्व के पार्थक्य पर टिकी है, और जो उस पार्थक्य के आग्रह के कारण से जीवन के एकत्व पर आघात करती है उसका एक सौन्दर्यशास्त्रीय प्रतिवाद रस में द्रष्टव्य है।”

गोष्ठी का एक सत्र ‘मार्क्सवादी, स्त्री, दलित, ओबीसी और आदिवासी विमर्श’ पर केंद्रित था।  इस सत्र में असम विश्वविद्यालय के डॉ प्रमोद रंजन, दिल्ली विश्वविद्यालय डॉ. सुजाता चोखेरबाली और प्रोफेसर संजीव कुमार ने अपनी राय रखी।

प्रमोद रंजन का वक्तव्य ‘बहुजन साहित्य के प्रश्न’ पर केंद्रित था। अपनी बातों को रखते हुए बहुजन साहित्य की अवधारणा को पेश की। उन्होंने कहा कि ऐसा माना जाता रहा है कि महराष्ट्र में 1972 में दलित पैंथर की स्थापना से दलित साहित्य की शुरुआत हुई, जबकि वास्तविकता यह है कि दलित साहित्य उससे पहले से चला आ रहा था। दलित पैंथर ने दलित साहित्य को जन्म नहीं दिया बल्कि सिर्फ व्यापक बनाया, या दूसरे शब्दों में कहें कि उसका भूमंडलीकरण किया। इस तथ्य को नहीं जानने के कारण न सिर्फ साहित्य के इतिहास संबंधी हमारी समझ गड्मड् हो जाती है, बल्कि हम उन तंतुओं को भी समझने में असफल रहते हैं, जिन्होंने इसे निर्मित किया है। दलित पैंथर का जन्म अमेरिकी-अफ्रीकी लोगों के ब्लैक पैंथर की तर्ज पर हुआ था और दलित साहित्य में इसके दायरे में सिर्फ अनुसूचित जातियां नहीं बल्कि सामाजिक रूप से वंचित अन्य समुदाय भी थे। बाद में इस धारा का जोर अस्पृश्यता से मुक्त होने तक सीमित हो गया। यह एक बहुत महत्वपूर्ण और कठिन कार्यभार था, लेकिन इसके दायरे को अब फिर से विस्तृत करने की जरूरत है।

प्रमोद रंजन ने अपनी वक्तव्य में कहा कि पिछले कुछ समय से भारत के विभिन्न हिस्सों में साहित्य पर केंद्रित ऐसे अनेक कार्यक्रम होने लगे हैं, जिनमें किसी-न-किसी रूप में ‘बहुजन साहित्य’ शब्द-बंध का प्रयोग किया जा रहा है। सन् 2017 में जयपुर में बहुजन साहित्य महोत्सव’ मनाया गया, जिसमें ‘समकालीन साहित्य में बहुजन चेतना’ पर विस्तार से चर्चा हुई थी। सन् 2018 में जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी में ‘बहुजन साहित्य संघ’ की स्थापना की गयी और ‘बहुजन साहित्य की अवधारणा और सौन्दर्यबोध’ समेत बहुजन साहित्य से सम्बन्धित अन्य कार्यक्रम हुए। बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी में ‘बहुजन साहित्य:दशा और दिशा’ विषय पर गोष्ठी हुई। ऐसे दर्जनों कार्यक्रम हो रहे हैं, जिनमें बड़ी संख्या में लोग भागीदारी कर रहे हैं। इन कार्यक्रमों को गूगल अथवा फेसबुक के सर्च इंजन में आसानी से तालाशा जा सकता है। हिन्दी के अतिरिक्त मराठी, गुजराती और तमिल में भी बहुजन साहित्य पर केंद्रित आयोजनों के होने की सूचनाएँ मिल रही हैं। तेलांगना में बहुजन साहित्य अकादमी सक्रिय है, जिसका एक बड़ा आयोजन पिछले दिनों दिल्ली में हुआ था। इस प्रकार केरल में बहुजन साहित्य अकादमी स्थापित हुई है।

ये आयोजन बहुजन अवधारणा के तहत होने वाले दलित,आदिवासी, मध्यवर्ती जातियों; जिन्हें भारतीय संविधान में ओबीसी कहा गया है; तथा हमारे विमर्श के दायरे से अलक्षित रहे अन्य सामाजिक समूहों की संस्कृति और साहित्यिक अभिव्यक्तियों में व्यक्त मूल्यों के साझेपन को अपने-अपने तरीक़े से चिह्नित कर रहे हैं। साथ ही इनमें सामाजिक स्तर पर द्विजवाद से संघर्ष के मुद्दों के साझेपन की तलाश की जा रही है। इन आयोजनों के संदर्भ में महत्त्वपूर्ण यह भी है कि इन कोशिशों के पीछे कोई सुव्यवस्थित संगठन नहीं है, बल्कि यह स्वयमेव हो रहा है।

उन्होंने इस बात पर विशेष तौर पर गौर करने की आवश्यकता को रेखांकित किया किया कि साहित्य, संस्कृति को देखने का यह नया नज़रिया क्यों विकसित हो रहा है?

डॉ प्रमोद रंजन ने कहा कि बहुजन अवधारणा जाति व्यवस्था से उपजे अन्य कष्टकारी स्वरूपों को भी शामिल करते हुए भारतीय आवश्यकताओं के अनुरूप विकसित हो रही है। इस अवधारणा का सूत्र वाक्य ‘बहुजन हिताय बहुजन सुखाय’ है। यह अवधारणा जाति के स्थान पर विचार को प्रमुखता देती है। इसमें वंचित तबके आदिवासी, घुमंतू जातियां, अन्य धर्मों के पसमांदा, LGBTQ समुदाय मुख्य रूप से शामिल है।

उन्होंने कहा कि आधुनिक काल में हिंदी में भिक्खू बोधानंद (1874-1952) से ‘बहुजन अवधारणा’ की शुरूआत को हम देख सकते हैं। उनके शिष्य चन्द्रिका प्रसाद जिज्ञासु (1885-1974) ने  ‘बहुजन साहित्य की अवधारणा’ को प्रसारित किया था। इतिहास के पन्नों में इस धारा के खो जाने की मुख्य कारणों में से एक कारण था ‘भारतीय साहित्य को अपनी दृष्टि से न देखना।’ बहुजन अवधारणा की सैद्धांतिकी बुद्ध की वैज्ञानिकता की नींव पर खड़ा है, जिसका जोर नित नई खोजों पर दृष्टि रखने के लिए प्रेरित करता है। रंजन ने यह भी कहा कि, बोधानंद की पुस्तक- ‘भारतवासी और आर्य’ , त्रिवेणी संघ का घोषणापत्र ‘बिगुल’ का पाठ बहुजन साहित्य के संदर्भ में होना चाहिए।

 

आलोचक संजीव कुमार ने ‘आलोचना- जितनी मार्क्सवादी, उतनी ही हिंदी’, विषय पर हिंदी की मार्क्सवादी आलोचना को रेखांकित करते हुए बताते है कि हिंदी की मार्क्सवादी आलोचना कभी एकास्म नहीं रही और न ही भारतीय बनाम अभारतीय, पूरब बनाम पश्चिम, परम्परा बनाम आधुनिकता, जैसी कोई केंद्रीय विचार श्रेणियां रही। उन्होंने कहा कि “न तो अल्पमत में धकेले गये मार्क्सवादियों ने कथित परम्परा भंजन में भंजन जैसी कोई चीज थी, न ही बहुमत द्वारा स्वीकृत परम्परा के संतुलित द्वंद्वात्मक मूल्यांकन में कोई विशेष संतुलन और द्वंद था। अलबता इन दोनों पक्षों हिंदी के साहित्यिक परम्परा में अवगाहन सराहनीय और संस्मरणीय है। इस लिहाज से हिंदी की मार्क्सवादी आलोचना जितनी मार्क्सवादी रही है उतनी ही हिंदी भी रही है। जहां-जहां उसने ज्यादा हिंदी होने की कोशिश की है, हिंदी साहित्य के प्रति अतिरिक्त गौरव बोध जगाने के प्रति कोशिश रहा है वहां वह समस्याग्रस्त रहा है।”

प्रोफेसर संजय कुमार ने ‘पाठ और साहित्य में गायन’, विषय पर बोलते हुए कहा कि आधुनिक पश्चिमी सभ्यता और उसके साथ-साथ आये प्रिंट कल्चर से नतीजा यह निकला कि साहित्य श्रेणी में जो वाचिक था उसको एक तरह से बहिष्कृत कर दिया, इससे यह मानने की शुरूआत हो गयी कि लिखित साहित्य ही साहित्य है। उन्होंने संगीत और गायन कला की महत्ता बताते हुए उसे साहित्य से जोड़ने पर बल दिया।

आलोचक गरिमा श्रीवास्तव ने ‘हरदेवी का वृत्तांत’ में श्रीमती हरदेवी के बारे में अपने ताजा शोध के बारे में बताया। उन्होंने कहा कि श्रीमती हरदेवी 1887 में उत्तर-भारत से शिक्षण-यात्रा पर लन्दन जाने वाली पहली हिन्दी भाषी स्त्री हैं। उनके लन्दन-यात्रा और लन्दन जुबली शीर्षक वृत्तान्त भी हैं। एक बहुत प्रगतिशील परिवार से ताल्लुक रखने के बावजूद भी एक स्त्री का पढ़ाई के लिए उत्तर भारत से लन्दन जाना उन दिनों एक बड़ी खबर थी। इस खबर को कई अंग्रेजी और हिन्दी पत्रों ने इस खबर को सुर्ख़ियों में रखा। उनकी लन्दन यात्रा अकारण और निरुद्देश्य नहीं थी, वे लन्दन रहकर पढ़ीं वहां की संस्कृति को नज़दीक से देखा और पहले की अपेक्षा तीक्ष्ण दृष्टि सम्पन्न होकर भारत लौटीं। पुरुषों की दुनिया में श्रीमती हरदेवी ने अपनी उच्च शिक्षा के लिए कैसे स्पेस बनाया होगा, यह वास्तव में विचारणीय है।

पाठांतर के साथ कोई आख्यान कैसे परिवर्तित होता है और पहचान कैसे आमूल-चूल रूप से बदल जाती है इस बदलाव के क्या निहितार्थ होते हैं, इन प्रश्नों पर केंद्रित अपने वक्तव्य के माध्यम से डॉ. तृप्ति श्रीवास्तव ने ‘कबीर की पहचान के बदलते आख्यान’ को रखा, कबीर की वर्तमान छवि बनने में दो धाराओं की मुख्य भूमिका है। पहली प्राच्यवादी जिसमें कबीर को धर्मगुरु, भारत का मार्टिन लूथर, रहस्यवाद और पंथ संस्थापक बताया गया है, जबकि दूसरी धारा भारतीय है जिसमें कबीर का ब्राह्मणीकरण और अवतारीकरण किया गया है।

 

संगोष्ठी में  ‘विधाओं की भारतीयता का प्रश्न’ केंद्रित सत्र का उद्देश्य साहित्यिक विधाओं की भारतीयता से क्या तात्पर्य है्र इसे समझना था। इस सत्र में बीएचयू के प्रो. राजकुमार ने ‘विधाएँ-छापेखाने के इधर-उधर’ विषय पर, बीएचयू के प्रो. आशीष त्रिपाठी ने ‘हिंदी नाटक’ विषय पर तथा अम्बेडकर युनिवर्सिटी के प्रो. सत्यकेतु सांकृत ने ‘विधाओं पर पश्चिमी प्रभाव’ विषय पर अपनी-अपनी बातों को रखा।

संगोष्ठी में ‘भारतीय साहित्य सिद्धांत की प्रासंगिकता’ पर केंद्रित सत्र की अध्यक्षता प्रो. सुधीश पचौरी ने की। इस सत्र में जेएनयू के प्रोफेसर रमण सिन्हा ने ‘प्रासंगिकता के व्यापक आयाम’ विषय पर, प्रो. विनोद शाही ने ‘भाषा-चिंतन का संदर्भ’ विषय पर तथा प्रो. विश्वनाथ मिश्र ने ‘प्रामाणिक भविष्य का प्रश्न’ पर अपनी बातें रखीं।

गोष्ठी का उद्घाटन वक्तव्य वरिष्ठ कवि एवं कला-मर्मज्ञ अशोक वाजपेयी ने उद्घाटन वक्तव्य दिया। समाज विज्ञानी अभय कुमार दुबे ने गोष्ठी की संक्षिप्त प्रस्तावना रखी। गोष्ठी का समापन वक्तव्य आलोचक एवं मीडिया विश्लेषक सुधीश पचौरी ने दिया। संगोष्ठी का स्वागत वक्तव्य डॉ. नितिन मलिक (कुलसचिव, अम्बेडकर विश्वविद्यालय) द्वारा दिया गया।

 

शशांक कुमार ‘भूमंडलीकृत ग्रामीण यथार्थ और हिंदी उपन्यास’ विषय पर शोध कर रहे हैं.

हाशिये का समाज एवं रमणिका गुप्ता का संघर्ष

रमणिका गुप्ता ने आदिवासी, दलित, पिछड़ी महिलाओं के उत्थान के लिए सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में काम शुरू किया। इनका जन्म पंजाब में 22 अप्रैल1930 में हुआ। इनका कर्मक्षेत्र झारखंड और बिहार रहा। विधान परिषद की सदस्यता या विधानसभा के लिए चुनावी यात्राएं, केदला-झारखंड की कोयला खदानों के राष्ट्रीयकरण के लिए लम्बी हड़तालें, आदिवासियों, दलितों और किसानों के विस्थापन और पलायन के विरुद्ध मुहिम,महिलाओं को डायन कहकर मारने वालों का विरोध, प्रेम-विवाह का विरोध करने वालों के खिलाफ जिहाद, आदिवासियों के लिए जल-जंगल-जमीन की संघर्ष यात्राओं को आखिरी समय तक जारी रखा। इन्होंने भारत- यायावर और रामविलास शर्मा की प्रेरणा से लेखन के माध्यम से भी अपनी लड़ाई जारी रखीं जिनमें प्रमुख रचना उनकी आत्मकथा “हादसे”और “आपहुदरी” में उनकी संपूर्ण जीवन संघर्ष की प्रस्तुति है।’हादसे’ में हजारीबाग के संघर्षों को दर्ज किया है तो वहीं स्त्री दृष्टि से ‘आपहुदरी’में अपने निजी जीवन और संघर्ष को आज के परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत करने की कोशिश की है।

एक कहानी संग्रह-“बहु जुठाई”जिसमें स्त्री के अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए किए गए संघर्षों को कहानी के माध्यम से दिखाया गया है। इनकी दो उपन्यास “सीता”और “मौसी”जिसमें स्त्री के दोहरे शोषण के साथ-साथ उसके प्रतिकार स्वरूप को दिखाया गया है। “सीता” उपन्यास में सीता को~”त्याग और तपस्या की प्रतीक,सीता जब रामायण के युग से निकलकर आज के संघर्षों में भूख से जूझती हुई जवान होती है तो वह सर्वहारा वर्ग के लिए आधुनिक रावणों से लड़ती है।आज की सीता जूझी है हर रिश्ते से, उम्र के हर मोड़ पर। उसने मौत से छीना है जिंदगी को। सीता अब अपने से बाहर खड़ी सीताओं के लिए लड़ने लगी है। सीता अब एक कतार है, एक श्रृंखला है, एक पात है। पात-जो चुप थी आज तक अब बोलने लगी है। पांत-जो जड़ थी सदियों से अब फुंकारने लगी है। आज की सीता अपने बदलाव की बाढ़ में गली-सड़ी मानसिकता  को बहाए ले जा रही है समुद्र के गर्त में दफनाने के लिए।”

इस उपन्यास के माध्यम से लेखिका प्राचीन भारत की स्त्रियों की स्थिति को दिखाते हुए वर्तमान में कहां तक पहुंची है और किस तरह अपने अस्तित्व के लिए लड़ना जारी रखती हैं और आगे भी हार नहीं मानने वाली है। सीता के बदलते स्वरूप को दिखाया है लेखिका ने। रमणिका गुप्ता के शब्दों में कहें तो-“सही मायने में दरअसल स्त्री- मुक्ति का अर्थ है पुरानी परंपरा, प्रतिबन्ध या प्रथाएं जो समाज,पुरुष सत्ता या धर्म ने उस पर थोप रखी हैं,उनसे मुक्त होकर एक मनुष्य की तरह आचरण करने का निर्णय लेने की स्वतंत्रता। “रमणिका गुप्ता ने अपनी कविता संग्रह के माध्यम से मानवीय संवेदना को गति प्रदान की । “गीत-अगीत” इनका पहला कविता संग्रह है जिसके माध्यम से वह काव्य जगत में आईं। उनकी कविताओं में राजनीतिक, सामाजिक कार्यकर्ता, मजदूर यूनियन की नेता और बिहार विधान सभा/विधान परिषद की सदस्यता के खट्टे -मीठे अनुभव, त्रासदी, संघर्ष,उपलब्धि, सबकी झलक मिलती है। लेकिन अपने अनुभव को काव्य की सुंदरता के साथ गढ़ने की पूरी कोशिश रमणिका जी ने की है।

रमणिका जी अपने निजी जीवन की कठिनाइयों से संघर्ष करते हुए संपूर्ण मनुष्य जाति के लिए लड़ती हैं  जो समाज में दोयम दर्जे के दंश को झेल रहे हैं। जिसमें समस्त स्त्री -जाति की पीड़ा और मजदूरों -किसानों के दुःख -दर्द से रूबरू होकर कविता में भी गूंज उठी -“कहते हैं लोग मेरे पास गवांने को कुछ नहीं,सिवा अपनी- बेड़ियां-गुलामी की-भूख की-लाचारी की।”
रमणिका गुप्ता ने लगभग 19 देशों की यात्रा की जिसका विवरण उन्होंने “लहरों की लय”नामक यात्रा संस्मरण लिखा। “आदिवासी अस्मिता का संकट”नामक अपनी पुस्तक में रमणिका जी ने आदिवासियों की क्या स्थिति है उसे दिखाने की पूरी कोशिश करती हैं और कहती हैं भारत में आदिवासियों के शोषण के लिए विदेशी उपनिवेशवाद से ज्यादा आंतरिक उपनिवेशवाद दोषी है। आदिवासियों के बसने में भारतीय प्रशासकों द्वारा दमन और शोषण तो होता ही रहा है।

रमणिका जी ने अपने साक्षात्कार में बहुत स्पष्ट व सहज रूप में सवालों के जवाब देती हैं और कहती कैसे शिक्षा दलित, पिछड़ों के लिए समाज में उनकी गैर बराबरी को खत्म कर सकता है। श्यौराज सिंह बेचैन जी ने भी इन दलित मुद्दों पर रमणिका जी से बहुत ही प्रासंगिक सवाल जवाब किए।


रमणिका जी ने अपने संघर्ष के एक बड़े हिस्से में उन सभी के लिए लड़ती है  जो हाशिए के समाज हैं। आदिवासियों एवं दलितों की स्थिति में एक बड़ा अंतर लेखिका यह दिखाती है कि-“दलितों को गांव के बाहर भारतीय संस्कृति से बहिष्कृत करने के बाद भी, उसी के अधीन रहकर उसे मानने पर मजबूर किया गया उसे जीने की मानवीय शर्तों से वंचित रखा गया।उसका आत्मसम्मान ध्वस्त कर दिया गया। इसके विपरीत आदिवासियों को सभ्यता से बहिष्कृत कर जंगलों में ठेल दिया गया। उनके पास जंगल और जमीन दोनों थे। आदिवासी ने अपनी संस्कृति की विरासत हमेशा कायम रखी और वह आत्मसम्मान के साथ जीता रहा, लेकिन अब उसकी सांस्कृतिक और सामाजिक संरचना, स्वायत्तता और अस्तित्व पर ही खतरा पैदा हो गया है। उसका स्वावलंबी स्वभाव और आत्मसम्मान डगमगाने लगा है और वह भी हीनता -बोध का शिकार हो गया है। “रमणिका गुप्ता ने समस्त ज्वलंत प्रश्नों पर एवं समस्याओं पर ध्यान देकर उसका हल ढूंढने का प्रयास किया है।जो अन्याय उन पर हो रहे हैं उनका डटकर मुकाबला भी किया है। रमणिका गुप्ता एक सशक्त स्त्री के रूप में देखी जाती हैं। उन्होंने अपनी अदम्य इच्छाशक्ति, दृढनिश्चय के बलबूते पर जो भी कार्य हाथ में लिया उसे पूर्ण करके ही छोड़ा। अपनी सक्रिय राजनीति द्वारा दलितों की समस्याओं का निराकरण किया। विशेषत: कोयला खदानों का सरकारीकरण करके शोषण करने वालों के चंगुल से मजदूरों को आजाद कराकर उनके जीवन में खुशहाली भर दी। इस दृष्टि से उनका योगदान महत्वपूर्ण है। उन्होंने अपनी मर्जी से पूरी श्रद्धा, लगन, श्रम और दुर्दम्य इच्छाशक्ति से महिलाओं, मजदूरों, भूमिहीनों की समस्याएं , खदानों के प्रश्नों के लिए वह संघर्ष करती रही हैं। इनकी मृत्यु 89 वर्ष की अवस्था में 26 मार्च 2019 को नई दिल्ली में हुई। रमणिका जी एक गैर दलित लेखिका होने के बावजूद पिछड़े,दलितों, मजदूरों के बीच रहकर उनकी  संघर्ष भरी जिंदगी को जिया है और न केवल जिया है बल्कि पूरे दम – खम के साथ लड़ी भी हैं। इसके लिए यहां तक कि उनकी हत्या की भी पूरी कोशिश की गई फिर भी इन्होंने हार नहीं मानी। इनके अपने घर में ही इनको “आपहुदरी”कहा जाने  लगा , जो की एक पंजाबी शब्द है जिसका हिंदी अर्थ जिद्दी लड़की है।