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भारतीय पुलिस-तंत्र में महिलाओं की स्थिति: ‘गुनाह-बेगुनाह’ उपन्यास के विशेष सन्दर्भ में- केएम प्रतिभा

bhartiya pulish tantraभारतीय पुलिस-तंत्र में महिलाओं से सम्बंधित समस्याओं व अपराधों से निपटने के लिए महिला पुलिसकर्मियों की नियुक्ति की आवश्यकता महसूस की गयी । चूंकि महिलाओं से संबंधित अपराधों में जिस संवेदनशीलता की आवश्यकता होती है, पुलिस व्यवस्था में कहीं-न-कहीं उसकी कमी थी । इसलिए महिला पुलिसकर्मियों की नियुक्ति की गयी । ताकि महिलाओं से सम्बंधित समस्याओं का निपटारा उचित तरीके से हो सके और वे अपनी समस्याएँ सहज रूप में अभिव्यक्त कर सकें । दहेज, बलात्कार, छेड़छाड़, महिलाओं और लड़कियों की अनैतिक कार्यों में लिप्तता आदि-आदि समस्याओं जैसी अतिसंवेदनशील मुकदमों की देखभाल महिला पुलिसकर्मियों के कार्यों के अंतर्गत आते हैं । इसके अलावा पॉक्सो अधिनियम (यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण) जैसे विशेष विधान में भी महिला पुलिसकर्मी की उपस्थिति जरूरी होती है । किन्तु महिला पुलिसकर्मियों की राह इतनी आसान नहीं है । पुलिस सेवा में जाने के निर्णय से लेकर उसमें अपना योगदान देने तक उनकी राह में अनगिनत चुनौतियाँ पेश आती हैं । हालाँकि आधुनिक सन्दर्भों में, नौकरियों की पारंपरिक ‘लिंग टाइपिंग’ द्वारा निर्धारित हदबंदियों ने अपनी दृढ़ता और कठोरता खो दी है, जिस वजह से महिलाओं को पारंपरिक रूप से मर्दाना व्यवसायों में भी अनुमति मिल रही है । किन्तु ऐसे व्यवसायों में पुरुष वर्चस्व निरंतर बना हुआ है । सामान्यतया, पुलिस-व्यवस्था पुरुष-प्रभुत्त्व वाला रहा है । जिस कारण पुलिस-व्यवस्था में महिलाओं के पुलिसकर्मी की भूमिका को उसी प्रकार पारंपरिक महिला भूमिका के विस्तार के तौर पर नहीं देखा जाता है, जिस तरह शिक्षण, नर्सिंग, चिकित्सा आदि व्यवसायों में देखा जाता है । यही एक पुलिसकर्मी के रूप में महिलाओं की लगभग समस्त समस्याओं की जड़ है ।
अधिकांशतः महिला पुलिसकर्मियों के लिए थानों में न्यूनतम बुनियादी सुविधाएँ उपलब्ध नहीं होती हैं । जिसमें कार्यस्थल पर स्वच्छ शौचालय का अभाव, रेस्टरूम का अभाव, और क्रेच (कामकाजी स्थानों पर शिशुगृह, जहाँ स्तनपान कराने जैसी सुविधाएँ हों) की कमी, विषम कार्यघंटों के दौरान वाहन की अनुपलब्धता और आवास की सुविधा की कमी आदि प्रमुख असुविधाएँ हैं । अधिकांशतः कार्यस्थल पर साफ़-सुथरे शौचालय नहीं होते । जिसकी वजह से महिलाओं को यूटीआई और प्रजनन पथ-संबंधी बीमारियाँ तथा इसी तरह की अन्य गंभीर समस्याएँ होती हैं । थानों में महिला पुलिसकर्मियों के साथ-साथ महिला मुजरिमों के साथ किस तरह बर्ताव होता है ‘गुनाह-बेगुनाह’ उपन्यास में इन्हीं में से कुछ बुनियादी प्रश्नों और समस्याओं को मैत्रेयी पुष्पा ने उठाया है ।
मैत्रेयी पुष्पा ‘गुनाह-बेगुनाह’ (2011) उपन्यास के माध्यम से पुलिस व्यवस्था के दहशतनाक और विद्रूपतम चेहरे को महिला पुलिसकर्मियों की नज़र से देखने की कोशिश की है । इसके साथ ही, थानों में मुजरिम अथवा पीड़िता के साथ किस तरह का बर्ताव किया जाता है, उसकी भी चीर-फाड़ करती हैं । यह कहानी सालारपुर थाने में तैनात महिला पुलिसकर्मी इला चौधरी की है । कांस्टेबल इला चौधरी पुलिस- तंत्र के साथ-साथ अपने जीवन की कई कठिनाइयों से गुजरते हुए भारतीय पुलिस-तंत्र के क्रूर, हिंसालोलुप और स्त्रीभक्षक रूप को उजागर करती है । इस उपन्यास में “इला जो अपने स्त्री वजूद को अर्थ देने और समाज के लिए कुछ कर गुजरने का हौसला लेकर खाकी वर्दी पहनती है, वहाँ जाकर देखती है कि वह चालाक, कुटिल लेकिन डरपोक मर्दों की दुनिया से निकलकर कुछ ऐसे मर्दों की दुनिया में आ गई है जो और भी ज्यादा क्रूर, हिंसालोलुप और स्त्रीभक्षक हैं । ऐसे मर्द जिनके पास वर्दी और बेल्ट की ताकत भी है, अपनी अधपढ़ मर्दाना कुंठाओं को अंजाम देने की निरंकुश निर्लज्जता भी और सरकारी तंत्र की अबूझता से भयभीत समाज की नजरों से दूर, थाने की अँधेरी कोठरियों में मिलनेवाले रोज-रोज के मौके भी ।

1. पुलिस की नौकरी निचले स्तर पर यानी सिपाही के स्तर पर महिलाओं के लिए भयावह, दुष्कर और चुनौतीपूर्ण है । पारिवारिक शोषण और दमन से छुटकारा पाने और अपने अस्तित्व को बचाए रखने की आकांक्षा से आजीविका की तलाश में थोड़ा बहुत पढ़-लिखकर पुलिस में भर्ती होने का साहस दिखाने वाली स्त्रियों का जीवन निरंतर संघर्षों में गुजरता है । उपन्यास के आरम्भ में ही इला चौधरी एक बेचैनी और कश्मकश से गुजरती है । “सालारपुर थाना । इस थाने पर कांस्टेबल की तरह ड्यूटी है इला चौधरी की । इसी कस्बे में एक टूटा-फूटा कमरा रिहाइश के रूप में इंतज़ार करता है उसका । घबराहट भरे लमहे और कमरे में सनसनाती वीरानी । सूनेपन में किसको बताए कि उसकी ज़िन्दगी पर मज़बूरी का कैसा जखीरा उतरा है ! सहकर्मी हों या अफसर, साथ देनेवाले नहीं, कंधे उचकाकर जता रहे हैं कि इला कसूरवार है और कोई भी कसूरवार अपने किए को सही सिद्ध करता रहता है ।

2. इतना ही नहीं, वह मन-ही-मन एक प्रण करती है– “बता देना चाहिए कि मैं किस मकसद से पुलिस में आई हूँ । मुझे गलत मान रहे हो तो मैं गलत रहकर ही दिखाऊँगी क्योंकि पुलिस नियमावली में फेर-बदल की सख्त जरूरत है ।

3. लेखिका उपन्यास के आरम्भ में ही पुलिस नियमावली में फेरबदल की आवश्यकता महसूस करती हैं । क्योंकि इस नियमावली के भीतर महिलाएँ उस स्थान पर भी सुरक्षित नहीं हैं जिस स्थान पर उनकी सुरक्षा सुनिश्चित की गई है ।
भारतीय पुलिस-व्यवस्था में अपेक्षाकृत महिला पुलिसकर्मियों की संख्या बहुत कम है । अधिकांश थानों में एक या दो ही महिला पुलिसकर्मियों की नियुक्ति होती है । ऐसे में, जब महिला पुलिसकर्मी के साथ किसी तरह की घटना घटती है, ऐसी परिस्थिति में, उसके सहारे के लिए कोई अन्य महिला उपस्थित नहीं होती है । ‘गुनाह-बेगुनाह’ उपन्यास में इला चौधरी, जो सालारपुर थाने में कॉन्स्टेबल की ड्यूटी पर है, एक हट्टी-कट्टी महिला मुजरिम से डरती है–“अगर ये अपनी हट्टा-कट्टी देह को ताकत लगाकर खड़ी कर ले और इला पर पिल पड़े तो स्थिति कैसी होगी ? कम से कम दो महिला सिपाहियों की ड्यूटी होनी चाहिए । लाठी-डंडा अगर सिपाही चला सकती है तो तथाकथित वेश्या क्या पिटती रहेगी, आखिर इसने भी जीने के लिए जी भरकर संघर्ष करने का अभ्यास किया है ।…और यह बात तो हर थाने पर खासतौर पर मिलेगी कि महिला सिपाही अगर सहायता के लिए चिल्लाए तो कौन आएगा मदद के लिए ? हवलदार से एस.आई. तक सब छककर पीते हैं लुढ़के रहते हैं ।

4. वह इसलिए नहीं डरती है कि महिला कैदी उसको नुकसान पहुँचाएगी और उसके पास उससे निपटने का कोई तरीका नहीं हैं, बल्कि वह इसलिए डरती है क्योंकि महिला सिपाही के तौर पर थाने में वह अकेली है और पुरुष-प्रभुत्त्व वाले इस स्थान पर उसकी पहचान एक सिपाही से पहले एक महिला के रूप में है । वह किसी अप्रत्याशित घटना से भयभीत रहती है । अपराधी तो अपराधी, कई बार महिला सिपाहियों के साथ उनके पुरुष सहकर्मी भी दुर्व्यवहार करते हैं । उनके साथ मानसिक और दैहिक शोषण की घटनाएँ अक्सर होती रहती हैं । यह अलग बात है कि वह संज्ञान में नहीं आ पातीं । क्योंकि नैतिकता, शर्म और भय– उन पर अपनी अस्मिता से कहीं अधिक हावी हो जाती है ।
चूँकि ‘गुनाह-बेगुनाह’ उपन्यास महिला पुलिसकर्मियों से संबंधित है । अतः मैत्रेयी पुष्पा ने इस उपन्यास में नए दौर की जागरूक, संघर्ष करने वाली विभिन्न स्त्री-चरित्रों को केस हिस्ट्री के रूप में प्रस्तुत किया है । जिसमें देह श्रमिक रश्मि, पति की हत्या के आरोप में गिरफ़्तार कर लायी गई शीतल, बैंक में नौकरी करनेवाली अर्चना, अपने पुत्र की हत्या के जुर्म में पकड़कर लायी गई शारदा आदि न जाने कितनी ही स्त्रियों की बानगी प्रस्तुत करता है यह उपन्यास । उक्त सभी केसों में महिलाओं द्वारा अपने सगे-सम्बन्धियों की गई हत्याएँ किसी-न-किसी बड़ी मजबूरी के कारण हुई हैं । किन्तु थानों में उनके साथ निर्ममतम् व्यवहार किया जाता है । उनके साथ बदतमीजी, छेड़छाड़, बलात्कार किया जाता है । थानों में महिला मुजरिमों के साथ गाली-गलौज़ आम समस्या है । मैत्रेयी पुष्पा थानों में पुलिस द्वारा स्त्रियों के लिए प्रयोग किए जाने वाले अपशब्दों का विरोध करती हैं । इला के माध्यम से वह कहती हैं –  ‘औरत को गिरफ्तार करना है’ क्या यह काफी नहीं है, मर्दानी पुलिस के लिए ? नहीं है काफी क्योंकि यह जो अपमानमूलक शब्द तोहफे में मिला है, उसे औरत को भूलने नहीं दिया जाता । और मर्दानगी निरंतर अपनी ताकत दिखाती रहती है ।

5. थाने में स्त्रियों के साथ गाली-गलौच और अपशब्दों का प्रयोग अपने क्रूरतम स्तर पर आम बात है । देह श्रमिक महिलाओं के साथ सदैव अपशब्दों का प्रयोग किया जाता है। थानों में महिला फरियादियों के साथ पुलिसकर्मी अक्सर बदतमीजी करते हैं । ममता, जो अपने पति की रिहाई के लिए गुहार लगाती थाने में आती है । उसके साथ थाने के पुलिसकर्मी सामूहिक बलात्कार करते हैं– “हाँ, उसके साथ थाने के लोगों ने गैंग रेप किया । सामूहिक बलात्कार । पति की रिहाई का हर्जाना ।

6. कुछेक केस में थर्ड डिग्री का भी प्रयोग किया जाता है । और ये व्यवहार महिला पुलिसकर्मियों के सामने उनके उच्च अधिकारियों अथवा समकक्ष पुरुष पुलिसकर्मियों द्वारा किए जाते हैं । एक महिला होने के नाते पुलिसकर्मियों के सामने महिला मुजरिमों अथवा अपने साथ हुए अन्याय की रिपोर्ट लिखवाने आयीं स्त्रियों के साथ इस तरह का व्यवहार होते देखना उन्हें असहायता की चरम तक ले जाता है । इतना ही नहीं, थाने में इला, समीना, प्रिया, मनीषा, सुरेंदर कौर जैसी महिला पुलिसकर्मियों के साथ भी उच्च अधिकारी अथवा समकक्ष पुलिसकर्मी बदतमीजी करते हैं । किन्तु महिलाओं के साथ थानों में होने वाली इस बर्बरता का कोई लिखित इतिहास नहीं है । इला कहती है – “यह बात तो है कि विभाग में न आते तो कई राज-रहस्यों की गाँठ न खुलती । असलियतों से समाज कितना नावाकिफ है ! वह इसलिए कि हमें ढर्रों पर विश्वास करते रहने की आदत है । दहेज़ विरोधी क़ानून का राज, घरेलू हिंसा का रहस्य, सामूहिक बलात्कारों की असलियतें, यहाँ तक कि औरतों द्वारा अंजाम दिए गए हत्याकांडों के कच्चे चिट्ठे । हमारे इतिहास में कहाँ मिलेंगे ? इतिहास बड़ी फुरसत में, सोच-समझकर लिखा गया है । वंश और महान घटनाओं की सूचनाओं के साथ उसका महिमामंडन…

7. पुलिस विभाग में महिला पुलिसकर्मियों के लिए पदोन्नति बहुत बड़ी चुनौती है । “पुलिस विभाग में पदोन्नति के बारे में अनेक समस्याएँ ऐसी हैं जो पुलिस में महिलाओं को बुरी तरह प्रभावित करते हैं । सबसे पहले विभाग के भीतर पदोन्नतियाँ समस्याओं के दलदल में फंसी हुई हैं ।…मूल्याङ्कन प्रणाली और पदोन्नति में विषय निष्पक्षता और समानता के अभाव की चिंता की आवाज काफी पहले वर्ष 1981 में ही राष्ट्रीय पुलिस आयोग द्वारा उठा दी गयी थी जिसमें अभिलेख प्रबंधन के रख रखाव की कमियों और मूल्यांकन प्रपत्रों को भरने में पूर्वाग्रह और पक्षपात की गुंजाइश को उजागर किया गया था ।…महिला पुलिस के लिए तो समस्या आगे और चौगुणी बढ़ जाती है क्योंकि अधीनस्थ पदों पर महिला और पुरुष के लिए अलग-अलग कैडर सिस्टम है । महिला पुलिस के लिए हवलदार, उप निरीक्षक और निरीक्षकों के केवल कुछेक चुनिंदा पद आवंटित किए जाते हैं । परिणामस्वरूप पदोन्नति के अवसर काफी कम हो जाते हैं । एक पुरुष सिपाही अपने कैरियर के दौरान उप निरीक्षक तक के पद तक पहुँच सकता है किन्तु हवलदार और उप निरीक्षक के कुछ ही पद महिलाओं को देने से बहुत कम महिला सिपाही पदोन्नत हो सकती हैं ।

8. इस तरह, जिस क्षेत्र में निचले स्तर पर ही महिलाओं की भागीदारी और उनके अनुकूल वातावरण तथा सुरक्षा की कमी दिखाई पड़ती है, वहाँ उच्च पदों तक उनकी पहुँच की क्या स्थिति होगी इसका अंदाज़ा लगाना कठिन नहीं लगता है अक्सर पुलिस विभाग में महिला पुलिसकर्मियों को उसी परिस्थिति में सम्मान मिलता है जब वे उच्च पदाधिकारी हों अन्यथा उन्हें पदनुरूप बुनियादी सम्मान भी नहीं मिल पाता है । किन्तु कईयों बार पुलिस अधिकारी के रूप में भी महिलाएँ पुरुष वरिष्ठों पर निर्भरता के कारण समय पर स्वतंत्र निर्णय लेने में असमर्थ होती हैं । कई बार महिला पुलिसकर्मियों द्वारा पुरुष पुलिसकर्मियों के बराबर सराहनीय कार्य करने के बावजूद भी उन्हें उसका श्रेय नहीं मिलता है ; बल्कि उनके कार्यों का सारा श्रेय पुरुष सहकर्मी को दे दिया जाता है । जो महिला पुलिसकर्मियों के लिए अत्यंत अपमानजनक है । बहुत बार ऐसा भी होता है कि किसी मामले में महिला पुलिसकर्मियों की राय को तवज्जो ही नहीं दी जाती है । उनके पुरुष सहकर्मी अपने अनुरूप ही सारी प्रक्रिया को पूर्ण कर लेते हैं । ‘गुनाह-बेगुनाह’ में थाने में महिला पुलिसकर्मी इला की तैनाती के बावजूद भी उसके सहकर्मी बिना उसे बताए महिला मुजरिम की गिरफ़्तारी करते हैं । “इला जबर्दस्त आवेश में आगे बढ़ी । गुस्से से तिलमिला उठी । ‘मेरे बिना ही…लेडी कांस्टेबल के बिना ही इस औरत की गिरफ़्तारी…ड्यूटी के नाम पर इन निर्लज्ज पुलिसवालों ने मुझे छला है । मेरी भावनाओं को कुचला है, मेरे संकल्प को मटियामेट कर डाला’ ।

9. इला निरंतर पुलिस-व्यवस्था की स्त्रियों के प्रति बर्बरता के खिलाफ संघर्ष करती है । किन्तु कथा के चरमोत्कर्ष पर इला का तबादला कर दिया जाता है, वह भी मेवात की रेतीली और करील की झाड़ियों से घिरे जुझारगढ़ थाने में कर दिया जाता है । इस तरह पुरूष सत्ता और समाज अपनी मूल प्रकृति में सशक्त, ईमानदार तथा स्वावलंबी स्त्री को किस तरह रौंद डालता है इसका चित्रण भी मैत्रेयी पुष्पा ने बखूबी किया है । मैत्रेयी पुष्पा स्त्रियों के असुरक्षित अस्तित्व को लेकर अपने सम्पूर्ण लेखन में बेहद बेचैन और चिंतित रहीं हैं । अपनी इसी बेचैनी और स्त्रियों के उत्पीड़न की परतों को खोलने की उनकी उत्कंठा ही उन्हें इला जैसी सिपाही के मध्य खींच लाती है ।
पुलिस विभाग में महिलाओं का प्रतिनिधित्व अपर्याप्त रहा है । इसके पीछे सबसे बड़ा कारण उन्हें ‘वुमन फ्रेंडली’ माहौल का न मिल पाना है । जिसकी वजह से अक्सर वे तमाम तरह की समस्याओं से जूझती हैं । ऐसे में, सरकारी तंत्र की जिम्मेदारी है कि वह महिला पुलिसकर्मियों की प्रकृति और क्षमता के अनुरूप उसके लिए एक उचित प्रणाली अपनाए । ताकि महिला पुलिसकर्मी भी अपनी उत्पादक क्षमताओं की ऊर्जा को बनाए रखने में सफल हों और इस व्यवस्था में अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन कर सकें । साथ ही, महिला आवश्यकतानुरूप उनकी भर्तियाँ हों और महिलाएँ पुलिस की नौकरी को स्वयं के लिए उपयुक्त समझ पाएं । अक्सर पुलिस संगठन में पुरुष पुलिसकर्मी द्वारा महिला पुलिसकर्मी की भूमिका की पहचान और स्वीकार्यता के प्रति नकारात्मक रवैय्या देखने को मिलता है । इसका कारण है कि परंपरागत तौर पर कानून प्रवर्तन व्यवसायों पर पुरुष वर्चस्व रहा है । इस वजह से, बहुत बार महिला पुलिसकर्मियों के साथ पुरुष सहकर्मी तथाकथित पुरुषवादी रवैया अख्तियार करते हैं ।

सन्दर्भ सूची :
1. मैत्रेयी पुष्पा, गुनाह-बेगुनाह, राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली, 2014, कवर पेज.
2. वही, पृ. सं. 7.
3. वही, पृ. सं. 7.
4. वही, पृ. सं. 22.
5. वही, पृ. सं. 8.
6. वही, पृ. सं. 55.
7. वही, पृ. सं. 121.
8. https://crpf.gov.in/hi/Welfare/National-Conference-of-Women-in-Police
9. मैत्रेयी पुष्पा, गुनाह-बेगुनाह, राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली, पृ. सं. 15.

केएम प्रतिभा
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नयी दिल्ली- 110067.
मेल आईडी- pratibhajnu7@gmail.com

महिलाओं के हित में है जाति गणना

02 अक्टूबर, यानि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का जन्म दिवस।इस ऐतिहासिक तिथि को नीतीश कुमार और तेजस्वी यादव की सरकार ने जातिगत गणना के आंकड़े को जारी कर भारत के इतिहास में और भी खास बना दिया। सही मायने में सामाजिक न्याय की पैरोकारी में अपना सर्वस्व न्योछावर करने वाले राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को इससे सुंदर कोई श्रद्धांजलि हो ही नहीं सकती। इस ऐतिहासिक उपलब्धि के लिए बिहार की सरकार बधाई की पात्र है।

वस्तुतः बोलचाल की भाषा में हम जिसे जाति जनगणना कहते हैं उसे तकनीकी शब्दावली में सामाजिक एवं शैक्षणिक पिछड़ा वर्ग (SEBC) गणना कहा जाता है क्योंकि ओबीसी का अधिकारी संवर्ग नहीं है। ज्ञातव्य है कि आजादी के समय से ही दशकीय जनगणना में अनुसूचित जाति (एस0सी0) एवं अनुसूचित जनजाति (एस0टी0) के अन्तर्गत आने वाली जातियों को गिना जाता रहा है तथा शेष को सामान्य श्रेणी में मान कर उनकी जाति दर्ज नहीं की जाती है। परन्तु आजाद भारत के इतिहास में ये पहली बार हुआ है कि न सिर्फ जातियों की गिनती की गई है बल्कि इसके आंकड़े सार्वजनिक किए गए हैं।

इसके पूर्व 2011 में मुख्य जनगणना से अलग सामाजिक आर्थिक जाति गणना के तहत जातिगत जनगणना की गई थी, किंतु इनके आंकड़े अभी तक जारी नहीं किए गए। दरअसल समाज के एक बड़ा तबका (ओबीसी/ईबीसी) जो हजारों सालों से हाशिए पर रहा है के द्वारा जातिगत जनगणना की मांग की जाती रही है इसके जोर पकड़ने का सबसे प्रभावी कारण आरक्षण है। देखा जाए तो पिछड़ा वर्ग एवं अतिपिछड़ा वर्ग की कुल आबादी का 63 प्रतिशत होने के बावजूद भी समाज के हर क्षेत्र यथा राजनीति, नौकरशाही, न्यायिक व्यवस्था, सरकारी नौकरी, पत्रकारिता एवं अन्य महत्वपूर्ण क्षेत्रों में इनकी हिस्सेदारी नगण्य है। बीते समय के दो परिवर्तनों ने इसकी गति और तेज कर दी है, पहला ई0डब्लू0एस0 आरक्षण दूसरा राज्यों को ओबीसी वर्ग की पहचान करने का अधिकार दिया जाना। इन दोनों संशोधनों से दो संभावनाएं पैदा हुई। पहली यह है कि आरक्षण की 50 प्रतिशत सीमा अमान्य हो सकती है और दूसरी यह है कि राज्य अपने स्तर पर ओबीसी वर्ग की पहचान सुनिश्चित कर उसी अनुपात में उन्हें आरक्षण का लाभ दे सकें। सच कहा जाए तो इन्हीं दोनों संभावनाओं ने जाति आधारित गणना की मांग को सम्पूर्ण देश में मजबूत किया है। इस मांग को और गति मद्रास उच्च न्यायालय के एक फैसले ने दे दी जिसमें जाति आधारित गणना को आवश्यक बताया। अब जबकि बिहार की सरकार ने इस मांग के महत्व को समझते हुए जाति आधारित गणना को संभव बनाकर आंकड़े आम जनता के सामने रखे हैं, मेरा मानना है कि तीन कारणों से यह कदम सर्वाधिक सराहनीय है। पहला कारण यह है कि यदि कोई सामाजिक वर्ग वंचना का शिकार है तो उसे मुख्यधारा में ले आने के लिए सबसे प्राथमिक कार्य है उसकी वास्तविक स्थिति का अध्ययन किया जाय। बिहार सरकार द्वारा किये गये इस अध्ययन ने उनकी वास्तविक संख्या, सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक स्थिति को देश के सामने लाकर रख दिया है अब उनके उत्थान हेतु नीति का निर्माण संभव हो पायेगा। यह बात किसी से छिपी नहीं है कि पिछड़ा एवं अतिपिछड़ा समाज हजारों वर्षों से मनुवादियों द्वारा रचित सामाजिक अन्याय की व्यवस्था का शिकार रहा है और मैं यहां यह भी जोड़ना चाहूंगी  कि यदि किसी वर्ग की सामाजिक वंचना को समाप्त करने संबंधी उपयों में बहुत देरी की जाए तो उस वर्ग में असंतोष मुखर होने लगता है जो कि कभी-कभी हिंसा का मार्ग अपनाने तक चला जाता है। प्रगति की राह पर आगे बढ़ रहे देश में ऐसा न होने पाए उसके लिए समय पूर्व सतर्कता अतिआवश्यक है। बिहार की सरकार द्वारा उठाए गए इस कदम से सामाजिक न्याय और समावेशी विकास की अवधारणा साकार होने वाले सपने का रूप ले लेगी। कोई भी देश सही अर्थों में तभी विकसित व सफल राष्ट्र की श्रेणी में आता है, तब वह समाज के सभी वर्गों का कल्याण सुनिश्चित करता है। सरकार का यह कदम सभी जातियों के मध्य व्याप्त विसंगतियों के समाधान की ओर एक सार्थक कदम है। इन आंकड़ों के जारी होने के बाद से ही कुछ राजनीतिक दल एवं मीडिया का एक विशेष वर्ग इस बात को परोसने की लगातार कोशिश कर रहा है कि बिहार सरकार के इस कदम से जातिगत विद्वेष बढ़ेगा और देश में जाति आधारित राजनीति को बढ़ावा मिलेगा। यह तथ्य तो सर्वविदित है कि भारत की राजनीति में जाति का प्रभाव हमेशा से रहा है और आगे भी बने रहने की पूरी आशंका है। हमें यह समझना चाहिए कि यह समस्या लोकतंत्र की व्यवस्था में व्याप्त कमियों को दर्शाती है जिसका समाधान वैचारिकी के स्तर पर अभी बाकी है इस उपर्युक्त तर्क के आधार पर हजारों वर्षों से शोषित एवं वंचित समाज को उनके उचित अधिकार से दूर नहीं रखा जा सकता है। एक महिला की नजर से किसी भी राष्ट्र के सामाजिक और आर्थिक विकास में महिलाओं की भूमिका को कदापि नकार कर नहीं चला जा सकता है। महिला एवं पुरूष दोनों समान रूप से समाज के दो पहियों की तरह कार्य करते हैं और समाज एवं राष्ट्र को प्रगति की ओर ले जाते हैं। बिहार सरकार द्वारा जाति आधारित गणना के प्रकाशित आंकड़ों का सन्दर्भ देते हुए मैं इस विदित तथ्य को प्रकाश में लाना चाहती हूँ कि इन आंकड़ों में आधी आबादी भी शामिल है जो सामाजिक अन्याय की विभिषिका को वर्षों से झेल रही है। केन्द्र सरकार द्वारा लाए गए महिला आरक्षण में वंचित समाज की महिलाओं के लिए अलग से किसी प्रकार के प्रावधान नहीं किए गए हैं, यह दुर्भाग्यपूर्ण है। बिहार सरकार द्वारा उठाए गए इस कदम से महिलाओं के अंदर विशेष कर वंचित समाज की महिलाओं के अंदर तीव्र आशा का प्रकाश फैला है। विदित हो कि वर्ष 2006 में पंचायती राज में महिलाओं को 50 प्रतिशत आरक्षण देने वाला देश का पहला राज्य बिहार ही रहा है। बाद में कई दूसरे राज्यों ने इसका अनुकरण किया। जाति आधारित जनगणना से सभी वर्ग की महिलाएं और उनके परिवार के सदस्य आर्थिक, सामाजिक और शिक्षा के मामले में समृद्धि का मापदंड बना सकती हैं। सरकार के इस कदम से निम्नलिखित बिन्दुओं पर निश्चित रूप से महिलाओं को लाभ मिलने की उम्मीद की जा सकती है।

1. सरकारी योजनाओं का लाभ:- जाति आधारित जनगणना से मिली सटीक जानकारी के आधार पर सामाजिक एवं आर्थिक रूप से हाशिए पर पड़ी महिलाओं को लाभ होगा। इन आंकड़ों का उपयोग सरकारी योजनाओं में होगा। महिलाएं विभिन्न सरकारी योजनाओं का लाभ उठा सकती हैं जैसे कि शिक्षा, आर्थिक सहायता और रोजगार के अवसर।

2. महिला शिक्षा को प्रोत्साहन:- जानकारी के आधार पर सरकार महिला शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए योजनाएं बना सकती हैं। बिहार में पुरूषों की तुलना में महिलाओं की शिक्षा की स्थिति अपेक्षाकृत कमजोर है (51.50 प्रतिशत, जनगणना 2011)

3. समाज में समानता की दिशा में कदम:- जनगणना में जाति आधारित जानकारी की उपलब्धता से समाज में समानता की दिशा में कदम बढ़ाया जा सकता है। इसके परिणाम स्वरूप महिलाएं समाज में अधिक भागीदारी कर सकती हैं और समाज में बेहतर स्थिति प्राप्त कर सकती हैं।

4. समृद्धि के लिए सरकारी नीतियां:- जनगणना के आंकड़ो के आधार पर सरकार नीतियों की समीक्षा कर सकती है और महिलाओं के लिए उन्हें अधिक समृद्धि के उपायों की ओर प्रेरित कर सकती है।

5. महिला विकास से महिला नेतृत्वकारी विकास की ओर:- जाति आधारित गणना से निश्चित रूप से वंचित समाज की राजनैतिक हिस्सेदारी भी बढ़ेगी। महिला नेतृत्वकारी विकास का श्रंृखला-प्रभाव निर्विवाद है क्योंकि एक शिक्षित और सशक्त महिला आनेवाली पीढ़ियों के लिए शिक्षा और सशक्तिकरण सुनिश्चित करेगी। बाबा साहब भीम राव अंबेडकर ने कहा था, ‘‘मैं किसी समाज के विकास की स्थिति वहां की महिलाओं द्वारा हासिल की गई प्रगति से मापता हंू’’। मुझे पूर्ण विश्वास है कि बिहार सरकार के इस कदम से बाबा साहेब की संकल्पनाओं को मूर्त रूप मिलेगा और यह कदम समाज के हर तबके को विकसित करने की दिशा में मील का पत्थर साबित होगा साथ ही सम्पूर्ण भारतवर्ष के लिए पथ-प्रदर्शक बनेगा।

ज़ैतून के साये

ज़ैतून के साये

  • नासिरा शर्मा

मैं एक पुरानी इमारत ज़रूर हूँ, मगर मेरे सीने पर ख़त-ए-कूफ़ी के अक्षरों का उभार आज भी ज़िन्दा है। मेरा सर वह तारीख़ी गुम्बद है जिसने ज़माने की धूप-छाँव के बाद भी अपना रंग व रोग़न खोया नहीं है। मेरी पेशानी पर यह झिलमिलाता सोने का पंजा देख रहे हो जो आज भी सूरज से आँख मिलाने का हौसला रखता है, जिसके ईमान की गर्मी दिलों में नूर की कंदीलें रौशन करती है, जिसका दीन इन्सान को इन्सान से मुहब्बत करना सिखाता है और जिसकी आवाज़ का पैग़ाम सूरज के निकलने से पहले चारों दिशाओं के बन्द दरवाज़े खोलता है, तुम उसे एक वीराना समझ बैठे हो? मैं एक पुरानी तारीख़ी इमारत ज़रूर हूँ, मगर खँडहर हरगिज़ नहीं। तौफीक़ की आँखों में फैली धूप में तड़पती यह सुनहरी इबारत साफ़ नज़र आ रही थी, जिसे पढ़ना इस्रायली कमांडर के लिए कोई मुश्किल काम नहीं था।

“मैं दोस्ती का हाथ तुम्हारी तरफ़ बढ़ाता हूँ हमें तुम्हारे अगले मंसूबों का खुलासा चाहिए…इसे हमारा मुहायदा समझो दोस्ती की कसौटी जो आगे फल-फूल सकती है…याद रखो दोस्त! हमसे चालाकी नहीं चलेगी। मत भूलो कि तुम निहत्थे हो और हमारी हिरासत में हो।” एक गहरी नज़र इस्रायली कमांडर ने तौफीक़ के चेहरे पर डाली और सिगार का आख़िरी कश खींचकर उसका लाल सिरा ऐश-ट्रे में रगड़ते हुए अपना दाहिना हाथ आगे बढ़ाया जो चन्द सेकंड बाद हवा में झूलता हुआ वापस उसकी पैंट की जेब में चला गया।

“कमांडर! तुम इस तारीख़ी इमारत के अँधेरे तहख़ानों में उतरना चाहते हो? तुम्हारे हाथ में पकड़ा यह जिज्ञासा से भरा चिराग़ चाहे कितना ही रौशन क्यों न हो मगर मेरे अँधियारे तहख़ानों में उजियारा नहीं भर सकता है। इन पेचदार गलियारों की अपनी एक तारीख़ है जो ग़म की रौशनाई और कशमकश के क़लम से लिखी गई है। इस किताबत को तुम्हारी आँखें कभी नहीं पढ़ सकती हैं, जिसे गुज़रते वक़्त ने अपने हाथों से इस इमारत की दीवारों पर लिखा है, जिसके हर लफ़्ज़ में धधकते ज्वालामुखी सोये पड़े हैं।” तौफीक़ की गर्दन उसी तरह तनी रही, जबड़े कसे रहे और होंठ एक-दूसरे पर जमे रहे।

“तुम कमांडर को ख़त्म करने आए थे मगर कमांडर के जाल में फँस अपने साथियों के साथ-साथ हैलिकॉप्टर से भी हाथ धो बैठे…” कमांडर ने वहशी क़हक़हा लगाया।

“कमांडर! तुम मुझ पर कटाक्षों के जितने तीर चाहो फेंककर अपना तरकश ख़ाली क्यों न कर डालो मगर मैं तुम्हारे उकसाने के बावजूद अपनी ज़बान नहीं खोलूँगा। चाहे मेरे दिल व दिमाग़ में उठता ग़म व गुस्से का यह असीमित समुंदर मुझे पीना ही क्यों न पड़ जाए। याद रखो, मेरी यह ख़ामोशी निहत्थी नहीं है, इसमें तलव की धार की तेज़ी है जो तुम्हारे सब को चाक-चाक कर तुम्हें दीवाना बना देगी।” तौफीक़ की आँखों की धूप उसके चेहरे पर चमकने लगी।

“यदि तुम कामयाब हो जाते तो हमेशा की तरह तुम्हारे इस गुरिल्ला हमले का जवाब तुम्हारी पूरी बस्ती उजाड़कर दिया जाता, मगर…देखो न, मैं बच गया …इसका इनाम तुम्हें यक़ीनन मिलेगा मैं बहादुरों और हौसलामंदों की बड़ी क़दर करता हूँ। इसलिए तुम्हारी जान बख़्शता हूँ, मगर एक शर्त के साथ कि अब तुम हमारे लिए काम करोगे और अपने संगठन के सारे भेद खोलोगे जिसके एवज़ में हम तुम्हें बाहिफाज़त सरहद पार पहुँचाने का क़ौल देते हैं।” कमांडर के मुस्कराते चेहरे पर एक ख़तरनाक संजीदगी छा गई।

“कमांडर! तुम्हें शायद पता नहीं है कि हमने दुनिया में झंडे गाड़े हैं, इसलिए हमारे उस आब-व-ताब को मत ललकारो वरना मौत की बाज़ी हम ही जीतेंगे। जिन्होंने पैदा होते ही सर पर कफ़न बाँध लिया हो, वह ज़िन्दगी की बख़्शिश क़बूल नहीं करते हैं बल्कि सर का नज़राना पेश करते हैं।” तौफीक़ की बड़ी-बड़ी शरबती आँखों में खिड़की से दिखते ज़ैतून के दरख़्तों का अक्स झूम उठा।

“तुम शायद थके हुए हो। आराम करना चाहते हो। तुम्हें मैं एक बात बताना चाहता हूँ कि एक फ़ौजी की ज़िन्दगी में उसका दाहिना हाथ कितना अहम मुक़ाम रखता है और अफ़सोस…तुम्हारा दाहिना हाथ कंधे से उखड़ा है और कलाई की हड्डी टूट चुकी है। इलाज न होने पर तुम ज़िन्दगी-भर झूलते हाथ के मालिक बन जाओगे अपनी ज़िन्दगी को बनाना और सँवारना अब तुम्हारे हाथों में है। वैसे तुम इस हक़ीक़त से आगाह होगे कि लँगड़े घोड़ों को गोली मार दी जाती है, क्योंकि वे फ़ौज के लिए नाकारा साबित होते हैं।” कमांडर धीरे-धीरे मुस्कराता हुआ तौफीक़ की तरफ़ बढ़ा और उसके शानों को हल्के से थपथपाया।

“मेरे ये दोनों कंधे उस तारीख़ी इमारत के दो छोटे गुम्बद हैं, जिनके अन्दर से ऊपर जाने वाली सीढ़ी बरसात की रात की तरह स्याह है, जिन पर चढ़ने का हौसला तुममें नहीं है। तुम शायद भूल गए हो कि मेरा वजूद वक़्त की तपिश से पिघलकर पहले से ज़्यादा मज़बूत हो गया है, जिसकी बुनियाद फिलिस्तीन की धरती में गहरी धँस गई है, जिसको उखाड़ना तुम इस्रायलियों के बस की बात नहीं है।” तौफीक़ की पुतलियों में झूमते दरख़्तों की शाख़ पर बैठे परिंदे चहचहा उठे।

“तुम जवान हो, समझदार हो। अच्छी तरह से जानते हो कि फिलिस्तीन नाम का कोई मुल्क दुनिया के नक़्शे पर बाक़ी नहीं बचा है, फिर उस धोखे में पड़े तुम अपनी जान गँवाने पर क्यों तुले हुए हो? आख़िर तुम यह सब किसके लिए कर रहे हो? अपने गुरिल्ला संगठन के अध्यक्ष के लिए, जिसके पास वापस लौटने का रास्ता भी नहीं बचा है, लेकिन तुम क्यों बन्द गली के सफ़र पर निकल पड़े हो? एक इनसान की ख़्वाहिश कभी भी पूरे समाज की भलाई की बराबरी नहीं कर सकती है। कट रहे हो मर रहे हो…आख़िर किसके लिए? फिलिस्तीन सिर्फ़ एक नाम है हवा में तैरता हुआ, जिसका ज़मीन पर अब कहीं कोई वजूद बाक़ी नहीं बचा है।” नर्मी से समझाते हुए कमांडर अन्त में ज़ोर से क़हक़हा मारकर हँस पड़ा।

“फिलिस्तीन को कौन मिटा सकता है कमांडर! फिलिस्तीन अज़ीम ताक़तों का फेंका सियासी सिक्का नहीं है, बल्कि धरती का वह जला आबला है, जो ठंडा होकर “केनानियों” की जन्मभूमि में ढला था। जेरूसलम दुनिया की सबसे पुरानी बस्ती “अमन का घर” तीनों मज़हबों की पैदाइश की जगह दरहक़ीक़त सभ्यता का दिल है। तुम! अज़ीम ताक़त के मुनादीगो! उधार माँगी वक़्ती बारूदी ताक़त से क्या तारीख़ बदल डालोगे? शताब्दियों से पड़े ख़तों खुतबों पर नया नाम खोद दोगे?” तौफीक़ की आँखों में झूमते ज़ैतून के दरख़्तों पर चहचहाते परिंदे कमांडर के ख़ौफ़नाक क़हक़हों के शोर से पंख फड़फड़ाकर उड़ गए और तौफीक़ की आँखों की इबारत का सोना झिलमिला उठा।

“आज नहीं तो कल तुम्हें मुँह खोलना पड़ेगा चाहे दोस्ती से और चाहे दुश्मनी से इसका चुनाव तुम पर छोड़ता हूँ, क्योंकि तुम अपने अध्यक्ष का दाहिना न सही बायाँ हाथ तो हो, यह राज़ तो हम पर खुल चुका है। कल सुबह तक तुम्हें सोचने का मौक़ा देता हूँ।” कमांडर के चेहरे पर फ़ैसले की सख़्ती उभर आई।

“फक़त कल सुबह तक क्यों?बल्कि कल की तरह कई हज़ार सुबह भी कमांडर, तुम इन्तज़ार करो तो भी मेरे हर इंकार पर मेरी एक हज़ार जानें कुर्बान!” तौफीक़ की आँखों में झूमते दरख़्त पक्की ज़ैतूनों को धरती पर गिराने लगे।

“मुझे पूरा यक़ीन है कि तुम एक समझदार नौजवान की तरह वक़्त की नज़ाकत को समझकर मुख़बरी करना मंजूर कर लोगे। बहरहाल कल के फ़ैसले के लिए मेरी नेक ख़्वाहिशात तुम्हारे साथ हैं। अब तुम्हें आराम की ज़रूरत है।” कमांडर की भवों के हिलते ही संतरी आगे बढ़े। मशीनगन थामे फ़ौजी तौफीक़ के दोनों तरफ़ आकर खड़े हो गए। तौफीक़ की आँखों में फैले सवालों के जंगल में डूबते सूरज ने आग-सी लगा दी थी। तौफीक़ उसी सूरज को गर्दन पर उठाए कमरे से बाहर निकला।

अधेड़ उम्र का इस्रायली कमांडर तौफीक़ के जाते ही गहरी सोच में डूब गया। चेहरे पर फैली संजीदगी ने उसे उम्र से ज़्यादा बूढ़ा बना दिया। थोड़ी देर वह दीवार पर लगे नक़्शे को घूरता रहा, फिर आगे बढ़कर उसने दराज़ खोला और एक रेखाचित्र मेज़ पर फैला दिया, फिर सोचती आवाज़ में सामने बैठे अफ़सरों से बोला, “कुछ दिनों के लिए हमें अपने दूसरे ठिकाने पर चला जाना चाहिए यह छावनी ख़तरे की नज़र हो चुकी है आज से ही कूच करना शुरू कर दो, हिफाज़त का सवाल अहम है।” कहता हुआ कमांडर पेंसिल से काग़ज़ पर निशान लगाने लगा।

मशीनगन की छाँव में जब तौफीक़ चलता हुआ कमरे से बाहर निकलकर खुले में आया तो सूरज डूब रहा था। उसकी विदा होती किरणें दरख़्तों के सायों को धरती पर लम्बाई में फैला रही थीं। रास्ता कच्ची-पक्की ज़ैतूनों से भरा हुआ था। बहुत सँभालकर क़दम रखने पर भी ज़ैतून उसके जूतों के नीचे दब-दबकर अजीब आवाज़ें पैदा कर रही थीं। उनकी इस तरह फटने की आवाज़ को सुन-सुनकर उसे बड़ी तकलीफ़ पहुँच रही थी। एकाएक उसका दिल बच्चों की तरह मचल उठा कि वह भागकर जाए और ज़मीन पर बिखरी ज़ैतूनों को बीन-बीनकर अपने मुँह में डाल ले। उनसे अपनी क़मीज़ का दामन और जेबें भर ले, मगर उसने अपनी इस ख़्वाहिश को रोका। भले ही यह उसकी अपनी धरती है, मगर फिलहाल तो वह इस्रायली सरहद के दायरे में है और वह अपने वतन का शहरी न होकर यहाँ एक क़ैदी है। अपने ही इलाक़े में बस एक क़ैदी।

तौफीक़ ज़ैतूनों को देखता हुआ रास्ता तय कर रहा था। तभी अपने चेहरे पर आकर लगे कंकर की चोट से वह चौंक पड़ा—एक-दो-तीन-चार। उसने अचकचाकर अपना चेहरा बचाव के लिए इधर-उधर घुमाया। क़हक़हों को सुनकर उसने नज़रें उठाई, बैरेक के सामने खड़े चन्द फ़ौजी ज़ैतूनें खाकर उनकी गुठली उसके मुँह पर थूक रहे थे। एक घिनौनी चिपचिपाहट चेहरे से गुज़रती हुई उसके सारे वजूद में सोज़िश की तरह फैल गई, जैसे तेल के कुएँ में पलीता लग गया हो। उनके क़हक़हे उसके कानों के पर्दे फाड़ने लगे। जैसे कह रहे हों, “देखा हमारा निशाना! अचूक है। तभी हम दुश्मन के शहरों को वीरानी में और उनके चेहरों को कूड़ेदान में बदल डालते हैं।”

तौफीक़ के वजूद में बैठा अरबी घोड़ा एकाएक हिनहिनाकर खड़ा हो गया। इससे पहले कि फ़ौजी कुछ समझते तौफ़ीक़ अपनी जगह से उछला और पलक झपकते ही एक सिपाही की गर्दन की नस बाएँ हाथ से दबाकर उसे गिरा दिया। फ़िज़ा हवाई फ़ायरों से गूँज उठी। उनके आपस में गुत्थमगुत्था होने से पहले सन्तरियों ने तौफीक़ को घेर लिया। उस फ़ौजी ने तौफीक़ का दाहिना हाथ मरोड़ दिया। दर्द का सोता उबल पड़ा। सामने से सिपाही भागकर आए और फ़ौजियों को आगे बढ़ने से रोकने लगे। अपने को सीधा खड़ा रखने की कोशिश में तौफीक़ की जान निकल गई। सारा बदन पसीने से नहा गया।

“यह शोर कैसा था?” कमांडर ने कमरे से निकलते हुए पूछा।

“नये क़ैदी से…” एक फ़ौजी ने इत्तला दी।

“उस नये क़ैदी को किसी तरह की तकलीफ़ न दी जाए कल सुबह तक वह हमारा मेहमान है।” बीच में ही कमांडर ने रोबदार आवाज़ में सबको ख़बरदार किया और कुछ दूर पर खड़े हैलिकॉप्टर की तरफ़ बढ़ा।

हैलिकॉप्टर के पंखे घूमने लगे। धूल का गुबार उठा। अपने सर के ऊपर से गुज़रते हैलिकॉप्टर को तौफीक़ ने देखा। कमांडर ने पहले अपना अँगूठा उसे दिखाया फिर दो उँगलियाँ अमन का निशान बनाकर दिखाईं। हैलिकॉप्टर पेड़ों से ऊपर उठता दूर आसमान की ऊँचाइयों में पेंगें लेने लगा।

तौफीक़ को पैदल चलते हुए लगभग बीस मिनट गुज़र चुके थे। उसके अन्दर दौड़ता घोड़ा थककर सुस्त पड़ने लगा। झुटपुटा फैल चुका था, जिसमें धीरे-धीरे ज़ैतून के दरख़्त ग़ायब होने लगे और इसी पल-पल बढ़ते अँधेरे में कहीं उसके वजूद का घोड़ा भी गुम हो गया था। अब वह सिर्फ़ तौफीक़ था। ज़ख़्मों से चूर थका-हारा एक फ़ौजी क़ैदी।

“बेचारा फिलिस्तीनी! पहली बार आज हमारा मेहमान बना और हम उसे पैदल चलाकर ले जा रहे हैं। फ़ौजी ज़िन्दगी भी कोई ज़िन्दगी है! न अपनों की ख़ातिर मुदारात कर सकें, न उनसे प्यार के दो मीठे बोल ही बोल सकें, सिवाय गोले-बारूद के।” एक सिपाही ने बड़े उदास लहजे से कहा और तौफ़ीक़ के चेहरे पर बहते पसीने को देखने लगा।

“सो तो है। कमांडर का हुक्म है इसलिए मेहमानदारी तो करनी पड़ेगी, चाहे हमारे पास कुछ हो या न हो।” उसी नाटकीय ढंग से दूसरी आवाज़ उभरी।

“इनसान के पास दिल होना चाहिए, दिल!” तीसरे ने सीने पर हाथ मारते हुए जज्बाती लहजे में कहा।

“चल भाई, आगे चल!” कहते हुए दो सिपाहियों ने उसे पीछे से धक्का दिया।

“आ जा मेरे शेर…यह रहा तेरा कटघरा छोटा है तो क्या यहाँ गुर्राने की पूरी आज़ादी होगी…” पहले से अन्दर पहुँचे सिपाही की हँसी गूँजी।

“यह तो जन्नत है जन्नत, मेरे यार! थोड़ी देर बाद ही हूरें शराब और शबाब का जाम लेकर आती होंगी। गुस्सा थूक देना और उनकी उड़ेली आबे-हयात को गटागट पी जाना, फिर देखना जलवा, यह कोठरी महल बन जाएगी और दीवारें हुक्म की गुलाम…फिर तुम्हारा कोई बाल भी बाँका नहीं कर पाएगा प्यारे!” लम्बे क़द के सिपाही ने सलाख़दार दरवाज़े में ताला लगाते हुए कहा।

“घबराना नहीं मेरे लाल…अभी तुम्हारा बाप भी आता होगा।” मज़ाकिया अन्दाज़ में कहा गया।

वह क्या आएगा?…अरे, माँग रहा होगा रहम और पैसे की भीख दुनिया से बड़ा मर्दे-मुजाहिद बना फिरता है!” कहक़हों में गंदी गालियाँ उलझकर रह गई बूटों की दूर होती आवाज़ के साथ। एक सन्नाटा तौफीक़ के चारों ओर पसरकर बैठ गया।

“यह सब कैसे हो गया?” सोच-सोचकर तौफीक़ का सर दर्द से फटने लगा। जब भी उसका कोई साथी पकड़ा जाता तो वह बड़े विश्वास से कहता, “मैं कभी इनके चंगुल में फँसने वाला नहीं हूँ। क़ैद का मतलब है, ज़िन्दा मौत यानी लड़ाई ख़त्म। बस, बैठे रहो हाथ पर हाथ रखकर क़ैदख़ाने में…लेनिन क्या कभी जेल गया था? एक इंक़लाबी को हमेशा चौकन्ना रहना चाहिए वरना…”

“यह कैसे मुमकिन है, वह भी गुरिल्ला लड़ाई में, कि आदमी कभी पकड़ा ही न जाए? कभी-कभी एक क़ैदी आने वाले इंक़लाब का नारा बनकर पूरे समाज की ताकत बन जाता है, जो एक सिपाही अपनी जान की कुर्बानी के बाद भी नहीं बन पाता है।” कामरेड असद कहता।

“देखो भाई! मुझे ज़िन्दगी एक मिली है, उसे मैं बैठकर नहीं गुज़ार सकता हूँ—हरकत करना ही मेरी ज़िन्दगी है और मेरी यह जद्दोजहद ही आज के समाज का नारा है।” ऊँचा क़हक़हा लगाता तौफीक। अपनी आवाज़ की प्रतिध्वनि सुनकर उस पर उदासी छा गई।

सुबह अँधेरे वे तीनों निकले थे। एक मास की लगातार कोशिशों से वह इस हमले में कामयाब हो पाए थे, मगर पल-भर में सबकुछ हो गया। जब उसे होश आया तो अपने को बड़ी-सी चट्टान पर औंधा पड़ा पाया। जैसे ही उसने घबराकर अपना सर ऊपर उठाया, टिड्डी दल की तरह इस्रायली फ़ौजी उसकी तरफ लपके। सामने उसके दोनों साथी मुर्दा पड़े थे। हैलिकॉप्टर में आग लग चुकी थी। उसने तेज़ी से हाथ जेब में डाला ताकि कैप्सूल निगल ले, मगर हाथ मुँह तक पहुँचा ही नहीं और किसी फ़ौजी ने उसके कंधे पर भरपूर बन्दूक़ का कुंदा दे मारा। कैप्सूल छिटककर दूर जा गिरी और उसका हाथ कुंदे की लगातार मार से भुर्ता बना दिया गया। वह बेहोश हो गया था। जब होश में आया तो उसकी जेबों की ज़बानें बाहर निकली हुई थीं। उसका परिचय-पत्र, नन्हा-सा चाकू, कमर पर बँधी पिस्टल और चुइंगम का पैकेट ग़ायब था।

रात आधी से ज़्यादा गुज़र चुकी थी। तौफीक़ की आँखों में नींद का कोसों पता नहीं था। नाउम्मीदी की गहरी खाई में वह एकाएक डूबने लगा था। उसे यक़ीन-सा होने लगा था कि जैसे वह इस क़ैदख़ाने से कभी आज़ाद नहीं हो पाएगा।

“अब यह मिट्टी ही मेरा बिछौना है। इस ज़मीन पर मैं घुटनों के बल चला हूँ और इसी मिट्टी को छुप-छुपकर खाने की आदत पर माँ के हाथों मार भी खाई है और इसी सरज़मीन को विदेशी हाथों से छुड़ाने के लिए मैंने हाथ में हथियार भी उठाया था। मेरे संग जाने कितने और हाथ भी उठे थे और वे उठे हाथ लगातार कट-कटकर गिरते गए। जैसे पानी की नहीं, बल्कि हाथों की बारिश हो रही हो जिससे नदी-नाले नहीं भरे, बल्कि मादरे-वतन के-सीने पर अपने बेटों के कटे अंगों से बने टीले और पहाड बनाए हैं।” सोचते-सोचते तौफीक़ ने अपना दाहिना हाथ सहलाया—दर्द की तेज़ल में दौड़ रही थी। उसने धीरे-धीरे ज़मीन पर फैले अपने जिस्म को समेटा। बड़ी मुश्किल से करवट ली और औंधा ज़मीन पर लेट गया। अपना चेहरा फ़र्श पर टिकाया फिर घुटने इस तरह से पेट की तरफ़ मोड़े जैसे नन्हा सा बच्चा माँ के सीने से लिपटकर सोना चाह रहा हो।

ऐसे ही किसी डरावनी रात के सन्नाटे में उसका जन्म हुआ था। उसके रोने की आवाज़ से फ़िज़ा पर तनी दहशत की चादर फट गई थी। माँ की दर्दभरी चीख़ों से मुर्दा पड़े गाँव में ज़िन्दगी फिर ख़ून से तर आँचल निचोड़कर उठ खड़ी हुई थी। माँ पूरे दिनों से थीं। उन दिनों गाँव में मर्द नहीं रहते थे; वे मोर्चा सँभालते थे, औरतें घर और बच्चों को…मर्दों का बदला औरतों और बच्चों से चुकाने की इस रस्म में पहले गाँव के सारे नई उम्र के लड़के गोली से भून दिए गए, फिर ऊपर से फेंके बमों से घर, खेत-खलिहान, कुएँ, तालाब सब तबाह कर दिए गए थे। जो चंद औरतें बच गई थीं, वे झुटपुटे को किसी काम से जंगल की तरफ़ निकल गई थीं। उनमें माँ और दोनों बड़ी बहनें भी थीं। जब वे लौटीं तो गाँव के क़रीब पहुँचकर अपनी आँखों के सामने गिरते गोलों और दम तोड़ते गाँव को देखकर माँ के बदन में ऐसी दहशत समाई कि उनके काँपते वजूद ने वहीं खुले आसमान के नीचे बिना किसी इन्तज़ाम के तौफीक़ के जन्म दिया था। दुश्मनों के न चाहने पर भी उस दिन गाँव में एक लड़के का जन्म हुआ था।

“मुझे कमांडर ज़िन्दगी की भीख देकर ख़रीदना चाहता है। वह क्या जाने कि जिसका जन्म ही दायरों और बन्दिशों के बाहर खुले आसमान के नीचे हुआ हो, और जिसने जुल्म की छाँव में ही आँखें खोली हों, वह आज़ादी का मतलब अच्छी तरह समझ सकता है। उसे कोई बंधन बाँध नहीं सकता, न कोई लालच उसे ख़रीद सकता है।” तौफीक़ के दिल पर छाए काले बादल छँटने लगे। अँधेरे तहख़ानों में रोशनी के दीये जल उठे।

जब कभी बाबा मोर्चे से थके-हारे लौटते, उस वक़्त घर की रौनक़ देखते बनती थी। माँ खुशमज़ा, ख़ुशबूदार खाना बनातीं, सारे भाई-बहन रंगीन फूलदार कपड़े पहनकर जश्न मनाने के अन्दाज़ से अन्दर-बाहर भागते होते। शाम ढलते घर के हाते में इकलौते ज़ैतून के पेड़ के नीचे बैठकर बाबा तराने गाते और मद्धिम सुरों में दो तारे छेड़ते। हम भाई-बहन उनके साथ कभी-कभी कोरस में गाते और कभी वह नये तरानों को हमें सिखाते जो वह मोर्चे पर सुनकर-सीखकर गाकर आते थे। माँ पूरी गरिमा और संतोष से भरी सबके चाय के गिलास ख़ाली होने से पहले भरतीं और खाने की चीज़ें आगे बढ़ाती जाती थीं। हम दीवाने मौत और खुशी, रोने और गाने के हर मौक़े पर इंक़लाबी गाना गाते थे। यह ख़याल मुझे आज आ रहा है कि अरसे बाद मिलने पर खुशी की जगह हम शहादत की धुनें बजाते थे; शायद इसलिए कि हो सकता है, यह हमारी आख़िरी मुलाक़ात हो। अपना अलविदाई मर्सिया हम खुद पढ़ लें। बाबा के चले जाने के बाद माँ एकदम बदल जातीं। सारे दिन काम में मसरूफ़ रहतीं। आराम उन्हें रात गए नसीब होता था। तब हम तीनों भाई-बहन तारों की छाँव में एक-दूसरे से लिपटे माँ के पास घुसे होते और उस वक़्त वह अपने बचपन की बातें सुनातीं। तौफीक़ को लगा कि वह माँ की कमर में हाथ डाले, अपना बायाँ पैर उनके पेट पर रखे उनके बग़ल और छाती की खुशबू सूँघता उनकी आवाज़ में डूबता जा रहा है…

“जब दारयासीन गाँव तबाह हुआ तो मरने वालों में दो सौ चालीस लोग थे, जिन्हें उँगली पर गिना जा सकता था। वह पहला हमला था इस्रायलियों का हम पर …पूरे गाँव की तबाही देखकर खुद यहूदियों ने दाँतों तले उँगली दबा ली थी कि इस क़त्लेआम और नाज़ियों द्वारा यहूदियों के क़त्लेआम में कोई फ़र्क़ नहीं रह गया है। तारीख़ यदि अपने को यूँ दोहराती रहेगी तो इस तरह की तबाहियाँ कभी ख़त्म नहीं होंगी। उस वक़्त मैं दस साल की थी, यह बात मैं 1948 की बता रही हूँ। तब से आज तक हमने आठ-नौ जगहें और ठिकाने बदले हैं। कितनी बार ख़मों में रहे, कितनी बार इस्रायली फ़ौजों की निगरानी में बन्दियों की तरह वर्षों गुज़ारे। बस, समझो ख़ानाबदोश न होकर भी हमने घर कंधों पर रखकर चलना सीख लिया था।”

“मगर माँ, आख़िर हम कब तक यूँ फिरते रहेंगे?” राबिया घबराकर पूछ बैठती।

“यह हमारी नहीं फिलिस्तीन की तक़दीर है। जो धरती अट्ठारह बार विदेशी हुकूमतों को झेलकर भी अपनी पहचान को न खोने की क़सम खा बैठी हो, उसका मुक़द्दर तो बस जद्दोजहद करना रह गया है। कल और आज के कशमकश में बुनियादी फ़र्क़ यह है कि पहले फिलिस्तीनियों को देशनिकाला नहीं मिलता था बल्कि विदेशी हममें घुल जाते थे और आज विदेशी हुकूमत के साथ फिलिस्तीनियों से उनकी अपनी धरती से उनका हक़ भी ळीना जा रहा है “बस, यही बदलाव आया है इस लड़ाई में, जो हम शताब्दियों से लड़ते आए हैं।” माँ ठण्डी साँस भरकर कहतीं।

“माँ, तुम्हें यह सब किसने बताया?” तौफीक बीच में घबराकर उठ बैठता और पलकें झपका-झपकाकर माँ को ताकता।

“बेटे! जिस बदनसीब मुल्क में मदरसे बन्द हो जाएँ, किताबें ग़ायब हो जाएँ, वहाँ माँ-बाप ही बच्चों के मक़तब और उस्ताद होते हैं ये बातें मैंने अपनी माँ से सुनीं और तुम अपनी माँ से सुन रहे हो ये हादसे तो हमारे सीनों पर लिखी तारीखें हैं जो एक ज़बान से दूसरी ज़बान तक अपना सफर तय करती हुई एक-दूसरे के सीनों में दफ़न हो जाती हैं” कौन जाने ये तारीख़ी सनदें, ये तारीख़ी यादें हमारे वजूद में कब तक फैलती जाएँगी” कौन जाने?” माँ तौफीक़ का माथा चूमकर कहतीं।

“आगे बताओ न!” बेचैनी से तौफीक़ कहता। उसे महसूस होता जैसे माँ की बातें उसके अन्दर कई रास्तों को बना रही हैं। इन राहों से बने डेल्टा के बीच वह उलझकर खड़ा रह जाता और उसे लगता कि आगे सब अँधेरा है। जहाँ उसे जाना है वहाँ सबकुछ स्याही में डूबा हुआ है।

“जब जेरूसलम को बाँटा गया, उस वक्त विदेशी यहूदी तिहाई हिस्से पर क़ाबिज़ हो गए। उस वक़्त उस दीवार से लिपटकर केवल यहूदी पछतावे के आँसू नहीं बहाते थे बल्कि जाने कितनी फिलिस्तीनी औरतें रोतीं—उनके घर, उनकी ज़मीन, उनकी यादें दीवार के दूसरी तरफ़ छूट गई थीं फिर बेचैन दिलों ने दीवार में छेद करने शुरू कर दिए नई खींची सरहद पर खड़ी वह दीवार छलनी हो गई और उसी से झाँकती प्यासी आँखें घंटों अपने घरों और इबादतगाह को ताकती रहतीं तुम्हारी नानी आँसू पोंछते-पोंछते जिनकी आँखें ज़ख़्मों से चूर हो गई थीं, मगर बेनूर आँखें लिए वह दीवार से सटी बैठी रहतीं जैसे…” माँ की आवाज़ भारी होते-होते उनके गले में फँस जाती।

डरकर तौफीक़ अपनी आँखों पर हाथ रख लेता। तौफीक़ अकसर बीच में ही सो जाता था और सारी रात सपने में जेरूसलम, दार, यासीन, पश्चिमी तट और गाज़ा पर घूमता रहता, फिर मशीनगन की आवाज़ से डरकर चीख़ पड़ता और काँपता हुआ माँ के सीने से लिपटकर फफक उठता।

वह बीज जो माँ ने उसके कोमल मन की धरती पर बोया था, वह अब बड़ी भारी कैक्टस की झाड़ में बदल गया था, जिसमें सिर्फ़ प्रतिशोध के काँटे ही काँटे उगे थे। उनके बीच जब कभी सुर्ख़ फूल खिलता था तो तौफीक़ का मन आशा से भर उठता था कि एक दिन वह अपने वतन को आज़ाद करा लेगा फिर किसी एक दिन गिरते बम, उड़ती-ढहती इमारतें, उजड़ती बस्ती उसके आशा के लाल फूल को मुरझाकर गिरा देतीं और उसे लगता कि वह कभी भी फिलिस्तीन की सीमा को दोबारा निर्धारित नहीं कर पाएगा टुकड़े-टुकड़े हुए फिलिस्तीन को कभी नहीं जोड़ पाएगा अपने खेत कभी नहीं जोत पाएगा। ख़ानाबदोश भटके फिलिस्तीनियों को कभी जमा नहीं कर पाएगा और अपने आने वाले कल में जब बरसों बाद उदास बेघर नस्लें अपनी सोच में सिर्फ़ फिलिस्तीन को देख पाएँगी और उसके बाद की आने वाली नस्लें सिर्फ़ इतिहास की किताबों में फिलिस्तीन के बारे में जान पाएँगी जहाँ न ज़ैतून की महक होगी न मिट्टी की गंध, वहाँ सिर्फ़ काग़ज़ की फड़फड़ाहट पर काले अक्षर और रंगीन रेखाओं से फिलिस्तीन का मुर्दा नक़्शा होगा। उसके अन्दर कँटीली झाड़ी में अटकी सिर्फ़ तार-तार उसकी आत्मा होगी—“तौफीक़ ने ठंडी साँस भरी और बाएँ हाथ पर अपने बदन का बोझ डालकर वह उठने लगा।

पौ फट चुकी थी। कोठरी के मुख्खे से फ्रीकी रोशनी की पतली लकीर अँधेरे को चीरने लगी थी। तौफीक़ ने हाथ मुँह पर फेरा। दाढ़ी बढ़ गई थी। उसने ज़ोरदार जम्हाई के साथ पैरों को झटका और दीवार से पीठ लगाकर बैठ गया। थोड़ी देर बाद धूप का नन्हा-सा चकत्ता उसके हाथ पर आकर ठहर गया। पहले वह इस नन्हे से उगे सूरज की गोलाई को ताकता रहा फिर सर झुकाकर उसे चूम लिया। जाने कब तक वह सिज़दे में गिरा रहता, यदि दरवाज़ा खुलने के साथ भारी आवाज़ उसे चौंका न देती।

“बाहर निकलो!”

तौफीक़ दीवार का सहारा लेकर खड़ा हो गया, फिर लड़खड़ाता हुआ-सा आगे बढ़ा। उसका बदन पत्थर की ऊबड़-खाबड़ ठंडी ज़मीन पर लेटने से अकड़ गया था।

“तुम अरब तो बड़े जंगजू मशहूर हो, लड़ते-लड़ते स्पेन तक पहुँच गए थे; मगर यहाँ एक रात में ही कमर के सारे टाँके ढीले हो गए!” फ़ौजी ने उसकी कमर पर धौल जमाई।

“दोग़ला है!” क़हक़हा गूँजा।

यह जुमला सोटे की तरह तौफीक़ की पीठ पर पड़ा। अन्दर बैठा घोड़ा हिनहिनाकर खड़ा हो गया। ख़ून ग़र्दिश में आ गया। कान की लवें गर्म हो गईं। गालों से भाप उठने लगी। दिल चाहा कि अपनी वहशी टापों से दुश्मन का सीना कुचलकर रख दे।

“बैठो!” कमरे में घुसते ही भर्रायी आवाज़ गूँजी।

तौफीक़ किसी अड़ियल घोड़े की तरह अड़ा रहा। कान में सिर्फ़ एक झनझनाहट गूँज रही थी और आँखें जैसे ख़ून का कटोरा बन गई थीं। कुछ देर पहले कही गई बात उस पर लगातार कोड़े बरसा रही थी।

“कम सुनता है क्या?” वही आवाज़ उभरी।

“बैठ जाओ।” कहते हुए लम्बे क़द के अफ़सर ने तौफीक़ के शानों को नीचे दबाया। पीछे से फ़ौजियों ने धक्का दिया। तौफीक़ स्टूल पर बैठ गया। चट-चट करके उसके पैर की हड्डियाँ बोल उठीं।

“हाँ, तो तुमने क्या फ़ैसला किया है?” सवाल उभरा।

“फ़ैसला हमारा वही पुराना है। मरो तो शहीद कहलाओ और मारो तो ग़ाज़ी।” तौफीक़ की आँखों में दिखती पत्थर की दीवार उसके सर पर बँधे चारख़ाने के रूमाल की तरह ख़ून में तैर रही थी। होंठ एक-दूसरे पर जमे थे, जैसे सबकुछ ठहर गया हो।

“क्या सचमुच तुमने मरने की ठान ली है?” सामने बैठा हुआ आदमी चिंघाड़ा। “अगर हम चाहें तो तुम्हारी यह ख़ामोशी पल-भर में गुब्बारे की तरह फट जाएगी और तुम्हारी वह आख़िरी चीख़ हमारे ज़ख़्म पर मरहम का काम करेगी।” लाल मुँह वाले अफ़सर ने अपनी ख़ामोशी तोड़ी।

“कोशिश करके देखो।” तौफीक़ का वजूद चुनौती में ढल गया।

“हम भूले नहीं हैं अपने ऊपर हुए जुल्म को, जिसमें सिर्फ़ हिटलर के नहीं, बल्कि तुम अरबों के हाथ भी रँगे हुए हैं। जब हम ज़िन्दा जलाए जा रहे थे। हमारी राख से ज़मीनें ज़रख़ेज़ बन रही थीं। हमारे अर्क़ से साबुन और चमड़े से जूते बनाए जा रहे थे। हमारी नई नस्लों को गैस के चैम्बर में बन्द कर दिया जाता था। उस वक्त तुम्हारी यह दुनिया कहाँ थी? जब हम इधर-उधर पनाह की तलाश में अपने ही ख़ून से नहाए भाग रहे थे, उस वक़्त ये हमदर्द लोग कहाँ थे जो आज फिलिस्तीन से हमदर्दी दिखा रहे हैं? क्या इनसानियत का पैमाना हर इनसान के लिए अलग होता है? अब हम यहूदी हुकूमत की मोहर को न सिर्फ़ अरबों बल्कि दुनिया के सारे ज़ालिमों के दिलों पर ठोंकेंगे कि अब हम “यहूदी सरग़र्दान” नहीं रह गए हैं जिस पर आज तुम सितम तोड़ सको। अब दर-ब-दर की ठोकरें खाने वाली क़ौम का भी अपना मुल्क है जिसका नाम इस्रायल है…।” ताँबे की रंगत वाला अफ़सर नफ़रत से तौफीक़ को देखते हुए बोला।

“अपनी धरती को छोड़कर जगह-जगह बसने वाले तरह-तरह का नमक चखने वाले दुष्ट व्यापारी! तुम किस धरती के हक़दार बनने का ख़्वाब देख रहे हो? भूल गए कि स्पेन में हमने तुम्हें जुल्म के चंगुल से आज़ाद कराया था?” तौफीक़ के अन्दर उठता तर्क का तूफ़ान उसके हलक में फँसने लगा।

“पहली आसमानी किताब “तौरेत” मूसा पर नाज़िल हुई थी। उसमें लिखा है कि ख़ुदा ज़मीन देने के लिए वचनबद्ध है और तुम उस हुक्म के ख़िलाफ़ बन्दूक़ उठाते हो? हम क्यों मिस्र में बसें? हम क्यों कीनिया जाएँ? हमारा मज़हब, हमारी इबादतगाह जेरूसलम में है, जहाँ हमने सत्तर साल हुकूमत की है और अब तुम कहते हो कि पुरानी तौरीद जल गई और यह नई तौरीद लिखी गई है, जिसमें हमने वह सब अपने से लिख दिया है जो हम चाहते हैं। यह मत भूलो कि यहूदी और मुसलमान एक ही आईने के दो रुख़ हैं— झिलमिलाता शफ़्फ़ाफ़ रुख वह यहूदी है जो अपने को पहचानता है और दुनिया उसे पहचानती है और तुम मुसलमान अरब आईने का वह अंधा हिस्सा हो जो याकूती रंग के बावजूद अपने को न देख पाता है और न पहचान पाता है। तुम हम यहूदियों का विस्तार होकर भी एक भटकी क़ौम हो जो तेरह सौ साल से फिलिस्तीन पर अपनी सल्तनत जमाए हुए थी।” वह ताँबे की मूर्ति गुस्से में तमतमा उठी।

“ आज तुम्हें हज़ारों साल बाद अपने पूर्वजों का घर याद आ रहा है, नमकहरामो! तुम कैसे साबित करोगे कि तुम ख़ालिस अरब यहूदी हो? क्या भूल गए कि तुम मूसा के साथ उनके मुरीद बनकर हमारी धरती पर आए थे! ख़ैर, पुरानी बहस छोड़ो। आज तक जिस धरती का नमक बरसों से खाते आए हो वह क्यों नहीं तुम्हारा वतन बन पाया? माना तुम्हारा ग़म बहुत बड़ा है, मगर हमारे ग़म से बड़ा नहीं है। यदि सदियाँ गुज़र जाने के बाद नस्लें अपने पूर्वजों के घर आज तुम्हारी तरह ढूँढ़ने और उन स्थानों पर जाकर बसने की ज़िद कर बैठें तो जानते हो, क्या होगा? उस वक़्त यह धरती सिर्फ़ उदास नस्लों का मरघट बनेगी।” तौफीक़ के ख़ूनी कटोरे छलक पड़ने को बेचैन हो उठे।

“तुम ज़ाहिलों के पास आज एक भी नाम ऐसा नहीं है जो पूरी सदी पर छा सके। आइंसटाइन…दूसरा नाम जिसने दुनिया को एक नया फ़लसफ़ा दिया कार्लमार्क्स। काले सोने के ठेकेदारो! तुम्हारे पास दूसरी दौलत भी इतनी नहीं है जो हमारी तरह तुम अज़ीम ताक़तों को नाकों चने चबवा सको। अगर आज हम महाशक्ति के बैंकों से अपना धन निकाल लें तो उनकी अर्थव्यवस्था चरमरा जाएं तुम क्या हो, सिर्फ़ अय्याश! जुआरी लड़ाकू ने अपना सबकुछ अज़ीम ताक़तों के सुपुर्द कर देने वाले अहमको। मध्यपूर्व के फैले विस्तार में हमारा नन्हा-सा वजूद देखो, कल क्या गुल खिलाता है। देखते जाना समुद्री लुटेरो! देखते जाना” लाल मुँह वाले अफ़सर ने नफ़रत से एक-एक शब्द चबाकर कहा।

“विलायती ख़यालों के समुंदर पर किश्ती खेने वाले विलायती यहूदियो! तुम हम सबको मौत के घाट उतारकर भी किनारे नहीं पहुँच पाओगे, बल्कि जिस गलत धारा पर तुम सवार हो वह तुम्हें हमारे बहे खून में डुबो देगी—फिलिस्तीन तो एक ऐसा चौराहा था जिसका महत्त्व स्वेज़ नहर के खुलने से पहले भी विलायती समझता था, क्योंकि उसे हिंदुस्तान को क़ब्ज़े में करना था। तेल तो आज निकला है। जब तेल नहीं था उस वक्त से बाहरी ताक़तें हमें ग़ुलाम बनाने के लिए बेचैन थीं। क्या तारीख़ भी नहीं जानते तुम? क्या यह भी नहीं समझते कि हमारे दिनों और वर्षों को किस तरह तबाह किया जा रहा है, ताकि हमारा उज्ज्वल अतीत ख़ूनी वर्तमान में डूब जाए? हमें तुम ही तो फूट डलवाकर बिखेर रहे हो? सदी और सरहदों पर छा जाने वाले दिमाग़ों को नस्ल के दायरे में मत बाँधो…उससे तुम्हारे गुनाह सवाब में नहीं बदल पाएँगे सुनो यहूदी कंजूस! अपना घर दूसरों की ज़मीन पर बनाओगे तो वे अपना हक़ माँगेंगे और तुम नाहक़ बेघर होने का ग़म झेलोगे। ताक़त के ज़ोर पर कही बात ज़रूरी नहीं तथ्यपूर्ण भी हो और सच्ची भी।” तौफीक़ के ख़ामोश चेहरे पर उसकी बोलती आँखें बिजली की तरह तड़पने लगीं।

सामने का दरवाज़ा खुला। एक लम्बा-चौड़ा अफसर दाखिल हुआ। सबसे सलाम-दुआ करके वह एक तरफ़ सोफ़े में धँस गया। उसके पीछे ही क़हवे की सेनी उठाए फ़ौजी दाख़िल हुआ और सैल्यूट के बाद उसने सेनी सबके आगे बढ़ाई।

“कुछ बताया?” नए आए अफसर ने पूछा।

“नहीं।” ताँबे के चेहरे वाले ने नफ़रत से कहा।

“हमारा दोस्ती का मुहायदा सुबह दस बजे तक था। अब ग्यारह बज रहे हैं। “ घड़ी देखते हुए नए आए अफ़सर ने कहा।

“नम्बर पाँच?” लाल मुँह वाले ने पूछा।

“अभी नहीं।” नए अफ़सर ने क़हवे की ख़ाली प्याली रखते हुए कहा।

“तुम्हारा अगला मंसूबा क्या है?” नए आए अफ़सर ने खड़े होकर तौफीक़ से पूछा।

“तुम लोगों की तबाही।” तौफीक़ के ख़ामोश कसे होंठ आपस में बिंध गए।

“तुम्हारा अध्यक्ष कहाँ है?” लहजा इस बार सख़्त हो गया।

“एक जगह हो तो बताऊँ” जब पूरी क़ौम बिखर गई हो तो उसका अध्यक्ष क्या एक जगह रह सकता है?” तौफीक़ की आँखों में चट्टानों की सख़्ती उभर आई थी।

“बताओ!…” कहकर एक ज़न्नाटेदार चाँटा तौफीक़ के मुँह पर पड़ा।

ख़ून की पतली लकीर होंठों के कोने से निकलकर क़मीज़ पर टपकने लगी।

“अच्छी तरह ख़ातिर करके इसकी लाश को सरहद पर टाँग देना, ताकि चील-कौओं की दावत के साथ दूसरे बेवाकिफ भी अपने अंजाम को जान सकें।” कहता हुआ अफ़सर तौफ़ीक़ को घूरने लगा।

“तुममें से कोई भी शख़्स इस तारीख़ी इमारत के अँधेरे तहखानों में उतर नहीं सकता है…यह जगह इस्रायलियों के बीच वर्जित है। इन राहदारियों में सिर्फ़ फिलिस्तीनी सफ़र कर सकते हैं, जिनकी मंज़िल आज़ादी है, जिनकी पहचान फिलिस्तीन है।” सामने दीवार पर टँगी राइफलों का क्रॉसचिह्न तौफीक़ की पुतलियों पर अंकित हो गया।

कल दोपहर से तौफीक़ की हर दो घंटे बाद पेशी होती और पूछताछ का भयंकर अज़दहा मुँह खोलकर उसके सामने बैठ जाता था। अपने तेज़ नुकीले दाँतों से उसकी ख़ामोशी को तोड़ने की नाकाम कोशिश में वह तौफीक़ की मांसपेशियों के चिथड़े-चिथड़े कर देता था और तौफीक़ अपने को मज़बूती से पकड़े रहने की कोशिश में मर-मरकर जीता और हर बार सोचता…

ये लोग मुझे मौत से क्या डराएँगे जिसने दस साल की उम्र में अपने बाप को फाँसी पर चढ़ते देखा हो। जिनके मुँह से उबलते ख़ून को ज़मीन पर लोटती अपनी माँ और बहन के चेहरे पर टपकता देखा हो। उसी दिन से मेरे अन्दर गुस्से का उफनता समुंदर हिलोरें ले रहा है। जैसे मैं एक ताक़तवर अरबी घोड़े में बदल गया हूँ जो एक दिन अपनी वहशी टापों से दुश्मन का सीना कुचल देगा। अपने मज़बूत दाँतों से दुश्मनों की गर्दन चबा जाएगा तब से अब तक पूरे बीस साल से मैं एक दीवाने वहशी घोड़े की तरह दौड़ रहा हूँ हर बार थककर शाम को लौटते हुए महसूस होता था कि मैं मंजिल से बहुत दूर हूँ, मगर हर सुबह सूरज की पहली किरण फिर क़ासिद की तरह मेरा दरवाज़ा खटखटाकर पैग़ाम दे जाती कि…

“उठो! माँ को आज़ाद कराओ उसका जिस्म दुश्मन अपनी ज़ंजीरों में बाँध रहे हैं।” और मैं सबकुछ भूलकर सरपट मैदाने जंग की तरफ भागता।

“कल सुबह का सूरज मुझे क्या पैग़ाम देगा?मौत का? मौत से अब क्या डरना?” सोचता हुआ वह आगे बढ़ा और कोठरी के मुख्खे के नीचे जाकर खड़ा हो गया। बाहर गूँजता शोर धीरे-धीरे करके कम हो रहा था, शायद आधे से ज़्यादा सिपाही कूच कर गए थे।

“काश! यह मुख्खा थोड़ा बड़ा होता।” सोचता हुआ थका-थका-सा तौफ़ीक़ चबूतरे पर बैठ गया।

राबिया और समीरा उसकी बड़ी बहनें थीं और रूया सबसे छोटी। बाबा के फाँसी चढ़ने के ठीक तीन मास बाद पैदा हुई थी। तीनों के चेहरे तौफीक के सामने एक-एक करके कौंध गए। जब समीरा के सामने के दाँत टूटे थे तो वह अपना चेहरा आईने में देख-देखकर ख़ूब रोती थी। बड़ी मुश्किल से उसे यकीन आया था कि दाँत दोबारा निकल आएँगे। समीरा का ख़याल आते ही उसके चेहरे पर मुस्कराहट फैल गई। अपनी पीठ पर पड़ते दनादन घूँसों का ख़याल आया जो हर बार खेल में हारने के बाद समीरा उसे मारती थी कि तौफीक ने बेईमानी की है।

तौफीक़ के चेहरे की मुस्कराहट ग़ायब हो गई। पीठ पर पड़ते घूँसों का दर्द तपकन बनकर सीने में फैल गया, जहाँ रूया का चेहरा खिल उठा था दो साल की रूया, सफ़ेद चेहरा और सुनहरे बालों वाली रूया! एकाएक हमेशा के लिए आँखें बन्द करके माँ की गोद में सो गई थी। बमबारी में पार्क में खेलते-दौड़ते बच्चे एकाएक ठहर गए थे। उनमें रूया भी थी। उसके दोनों पैर झुलस गए थे। वह बाबा की दूसरी तस्वीर थी। माँ उसकी लाश दफ़नाने के बाद एकदम से टूटकर बिखर गई थीं, जैसे बाबा उनसे इस बार सचमुच हमेशा के लिए बिछुड़ गए हों—

तौफीक़ की आँखों में बस्ती का आँगन फैल गया, जहाँ गलियाँ थीं, घर थे, दीवारें थीं, छत और ज़मीन थी। जहाँ दरख़्तों के झुंड थे। जहाँ पकी अंजीरों को तोड़कर खाने का मुकाबला होता था। जहाँ खेल-कूद, मार-पीट के साथ “मिल्ली” और “कुट्टी” होती। यही सबकुछ बोलता था, चहकता था, मगर कोई सुस्त बैठकर इस तरह गुज़री बातों को सोचता नहीं था,बल्कि सब ज़िन्दगी के बहाव में बह रहे थे।

मौत किसी वक़्त भी आ सकती है। उसकी अचानक आमद का ख़ौफ़ ज़िन्दगी से ज़्यादा मोहब्बत करना सिखाता है, तभी हर लमहे उमंगों से भरपूर सब एक-दूसरे के दुख-सुख में डूबे एक-दूसरे के लिए हँसते-मुस्कराते थे। उनके लिए अपना-पराया कुछ नहीं रह गया था। अभी तौफीक़ जाने कब तक सोच में डूबा रहता, यदि संतरी ने उसे पुकारकर जँगले से उसकी तरफ रोटी उछालकर न फेंकी होती।

कल की रोटी भी पड़ी सूख रही है। वह क्यों इनका दिया अनाज खाए? उसे तो यहाँ से निकल भागना चाहिए सुबह से पहले इनकी पहुँच से दूर। तौफीक ने चारों तरफ़ नज़रें घुमाईं, जैसे अन्दाज़ा कर रहा हो कि कैसे भागा जा सकता है।

घुड़म-घड़ाम…घड़…हवाई जहाज़ शोर करते गुज़र गए। बम के गिरते गोलों से धूल और बारूद के कण मुख्खे से अन्दर कोठरी में आने लगे। तौफीक़ के अपनी आज़ादी की तलाश में पत्थर टटोलते हाथ एकाएक जम गए। वह ठिठका-सा रह गया, फिर खुशी के मारे उसका दिल ज़ोरों से धड़कने लगा। उसके हमवतन आख़िर आ ही गए—दूसरे ही लमहे वह उचका और मुख्खे में अपना मुँह डालकर बाहर झाँकने की कोशिश करने लगा। मगर वही मुट्ठी भर आसमान, दो शाख़ जो धूल के गुबार में धुँधला गई थीं।

जहाज़ गुज़र चुके थे। छावनी बर्बाद हो चुकी थी। अब सिर्फ़ सन्नाटा था। जैसे भी सहमकर ठिठक गई हो।

मैं कैसे बच गया? ताज्जुब और खुशी से तौफीक ने अपने चारों तरफ ताका, जैसे यकीन नहीं आ रहा हो…।

“मुझे सुबह गोली से उड़ाने वाले थे। खुद उड़ गए सबके सब तौफीक उठा और मुख्खे की तरफ बढ़ा। उसका सीना इस वक्त नए हौसलों से चौड़ा हो गया था। उसके चेहरे पर नई उमंग का रंग बिखर गया था।

“यह क्या?” एकाएक उसकी नज़र छत पर टिक गई। पता ही न चला कब कोठरी का कोना बम के किसी टुकड़े से उड़ गया था। ऊपर दिखते छेद से नीला आसमान और ज़ैतून की शाखे झाँक रही थीं। धूल बैठ गई थी, मगर बारूद की गंध अभी बाकी थी।

“आह! नीला आसमान!” तौफीक का दिल खुशी के मारे धड़कने लगा।

छत का छेद इतना बड़ा था कि वह उससे आसानी से बाहर निकल सकता था, मगर वहाँ तक पहुँचे कैसे? पैर टिकाने में पत्थर की दीवार ने घुटने और उँगलियों को छीलकर रख दिया था। अभी वह हिम्मत नहीं हारा था। उसे पूरी उम्मीद थी कि वह यहाँ से निकल भागेगा। खुशी से वह उछला और कोठरी के कोने में रखे मटके की तरफ बढ़ा अन्दर झाँका पानी ऊपर तक भरा था।

“इसका पानी बाहर निकालकर अगर मैं मटके को घसीटकर सुराख़ के नीचे रख दूँ तो छत तक पहुँच सकता हूँ।” चमकती आँखों से तौफीक ने सोचा और बर्तन अन्दर डालकर पानी निकालने लगा। तभी उसकी नज़र मटके के नीचे जाकर टिक गई।

“नहीं!” मायूसी से डूबी आवाज़ निकली, मटका पत्थर की थाल में गोलाई से जड़ा हुआ था। तौफीक ने लम्बी साँस खींची और नज़रें छत पर गाड़ दीं।

सूरज धीरे-धीरे ऊपर आ रहा था। छत के छेद से फूटती रोशनी कोठरी में उजाला भरने लगी। वह मुख्खे में मुँह डालकर चिल्लाया :

“फिलिस्तीन ज़िन्दाबाद…।”

वह पूरे दम से चीख़ा मगर…? सिर्फ़ हवा साँप की तरह रेंगकर मुख्खे के बिल में घुसी और उसके लफ्ज़ निगल गई। उसने मुँह नीचे किया। गूँ-गूँ…गाँ जैसी गरगराहट के अलावा उसके गले से कोई आवाज़ नहीं निकली। उसने सारी ताक़त जमा करके पुकारा, “मदद…मदद…!”

“क्या वह गूँगा हो गया है?क्या उसकी बोलने की ताक़त जाती रही? हो सकता है, वह गूँगा नहीं बहरा हो गया हो? क्या हो रहा है उसे?” तौफ़ीक़ पसीने से सराबोर हो गया। इतना तन्हा, इतना कमज़ोर, इतना बेचारा उसने अपने को पहले कभी महसूस नहीं किया था। उदासी के गहरे भँवर में डूबने से पहले फिर एक बार वहशत से चीख़ा। मगर बाहर हवा का चलना और उसके अन्दर बढ़ता ख़ामोश सन्नाटा साँय-साँय करता हुआ उसकी चेतना पर छाने लगा।

“मेरे साथी मुझे ढूँढ़ने आएँगे। माना यह हिस्सा छावनी से बहुत दूर है, तो भी वे मुझे ढूँढ़ लेंगे…कोई न कोई आएगा ज़रूर।” नीले धुले आसमान को धीरे-धीरे अँधेरे में घुलते देखकर तौफीक़ ने अपने को दिलासा दिया।

इस कोठरी में तौफीक़ का आज सातवाँ दिन है। भूख से उसकी अन्तड़ियाँ खुद अपने को खाने लगी थीं। कोठरी में रखे घड़े का पानी काफ़ी कम हो गया था। सूखी रोटियों के ढेर पर बारूदी गोले ने गिरकर मलबे का ढेर बना दिया था, वरना तौफीक सारा मान-सम्मान छोड़कर ज़िन्दा रहने के लिए ज़रूर वह सूखी रोटी चबाकर कुछ दिन अपनी आज़ादी की उम्मीद का दीया जलाए रखता। आख़िर दुश्मनों से घिरकर जब “तक़इया” की इजाज़त दीन देता है तो फिर मजबूरी में दुश्मन की रोटी तो खा ही सकता था और अब यह ताक़तवर बदन भी तो पिछले सात दिन में घुल-घुलकर तौफीक़ को पानी के बलबूते पर सँभाले हुए है। मगर यह सब कब तक चलेगा?

एक दिन तेज़ हवा ने बचे दरख़्तों की किसी एक शाख़ से पक्की काली ज़ैतून को उड़ाकर मुख्खे की ढाल पर रख दिया था। रोशनी में चमकती काली ज़ैतून तौफीक़ को दुनिया की सबसे बड़ी नियामत लगी थी। वह अपनी सारी ताक़त बटोरकर उठा और इससे पहले कि उसका हाथ मुख्खे तक पहुँचता, हवा के दूसरे झोंके ने उसे झटके से बाहर की तरफ़ गिरा दिया। तौफीक़ दिल मसोसकर रह गया। पपड़ी पड़े होंठों पर सूखी ज़बान फेरता हुआ वह वहीं चबूतरे पर बैठ गया। थोड़ी देर तक हारा-सा बैठा रहने के बाद वह चबूतरे पर लेट गया और पत्थर की दीवारों को ताकता रहा।

आजकल मुझे खाने के सिवा कुछ भी याद नहीं आता…। आख़िर मुझे होता क्या जा रहा है? सोता हूँ तो, जागता हूँ तो माँ के हाथों से बने पकवान…।

माँ का ख़याल आते ही उसे अपना घर याद आने लगा। ख़बर सुनते ही वह भागा-भागा गया था। आधा शहर ऊँची-ऊँची इमारतों के साथ ढह गया था। वह कैसी काली रात थी। बारिश की बूँदों ने मलबे को धो डाला था। एम्बुलेंस, फ्रायर ब्रिगेड और रेडक्रॉस की भागती गाड़ियों की हैडलाइट में मलबों पर थरथराती बूँदें चमक उठती थीं। फ्रायर ब्रिगेड स्टोर की आग पर काबू पा चुकी थी। मलबे पर चलते हुए सड़क नाम की चीज़ टूटी खिड़कियों, दरवाज़ों, दीवारों, सामानों के ढेर में कहीं गुम हो गई थी। इसी मलबे के ढेर पर चलकर उसे अपना घर ढूँढ़ना था।

अभी थोड़ी ही दूर चला था कि पैरों के नीचे कुछ नर्म-सी चीज़ आ दबी। सारे बदन में झुरझुरी-सी दौड़ गई। माथे पर पसीना छलक आया। किसी मृत देह का कोई अंग…यह उसी का मोहल्ला है होगा कोई जान-पहचान वाला या साथी-संगी एक लम्बी साँस लेकर उसने टॉर्च रौशन की। उसके जूते के नीचे रबर की बहुत बड़ी-सी गुड़िया थी। ठीक रूया जैसी सुनहरे घुँघराले बाल उसने झुककर गुड़िया उठा ली।

पानी से भीगी गुड़िया मुस्करा रही थी। जाने किस जज़्बे के तहत उसने गुड़िया को सीने से लगाकर ज़ोर से भींच लिया। फिर उसके गालों और बालों पर बेतहाशा प्यार करने लगा।

उसका घर क़रीब आ चुका था। उसने बहन का लाया उपहार जेब में टटोला। डिबिया मौजूद थी। बड़ी मुश्किलों से कई जगह कई दुकानें देखकर वह इस बार उसकी फ़रमाइश पूरी कर पाया था। नाजुक ज़ंजीर में क़ैद परिंदा उड़ने को बेचैन था। बहन की सफ़ेद गर्दन पर लटकता यह परिंदा उसे हमेशा अपने फ़र्ज़ की याद दिलाएगा। मगर वह गर्दन सबकुछ आगे का सबकुछ टूटते सितारों में बदलने लगा।

तौफीक़ का घर सामने साबुत खड़ा था।

एक बार गाँव तबाह हुआ तो मैं पैदा हुआ, मगर हमारे खेत हमसे छिन गए। दोबारा जब हमारा आधा शहर उजड़ा तो मेरा ख़ानदान मुझसे बिछुड़ गया और आज जब दुश्मनों की छावनी पूरी की पूरी उजड़ गई तो मैं अपनी ही धरती पर बन्दी बना अपनों से दूर पड़ा हूँ क्या यहाँ से मैं कभी आज़ाद हो पाऊँगा? मुझे यहाँ कोई लेने आएगा? इन अँधेरी सुरंगों का सफ़र कब ख़त्म होगा? हम फिलिस्तीनी कब गुफ़ाओं से निकलकर इनसानों की तरह धरती को जोतेंगे, बोएँगे, फ़सलें उगाएँगे?

इससे तो कहीं अच्छा था कि मैं उसी यहूदी अफ़सर के हुक्म से गोलियों से बींध दिया जाता। कम-से-कम उस मौत में कोई मक़सद तो होता इस तरह से बेमतलब एड़ियाँ तो न रगड़ता—भूख, ख़ौफ़, तन्हाई, ख़ालीपन कैसे बाँझ दिन गुज़र रहे हैं! तौफीक़ के अन्दर सुस्त पड़ा घोड़ा एकाएक उछलकर खड़ा हो गया। उसकी नसों में दौड़ता ख़ून पछाड़ें खाने लगा। तौफीक़ ने दरवाज़े को पूरी ताक़त से झँझोड़ा। उस पर दीवानगी-सी छा गई थी। उसने सलाखों पर सर दे मारा, मगर बेसूद सामने पत्थर की दीवार मुँह खोले खड़ी थी। उसके अन्दर तड़पते-उफनते तूफ़ान से बेपरवाह। तैश में आकर वह कोठरी की दीवार पर अपनी बँधी मुट्ठी मारने लगा।

मजबूरी…बेबसी उसके वजूद पर छा गई। साँसों के गर्म अलाव ने आँखों से सोते बहा दिए। आँखों पर रखी हथेली का ख़ून खारे पानी में मिलकर चेहरे से टपक-टपककर क़मीज़ में जज़्ब होने लगा।

अभी सूरज ऊपर नहीं आया था कि आसमान गड़गड़ाहटों से भर गया। एक के बाद एक जहाज़ गुज़रने लगे। तौफीक ने झट अपनी कमीज़ उतारी और मुख्खे से बाहर हाथ निकालकर हिलानी शुरू कर दी। उम्मीद की लहर उसके सारे बदन में थरथराती दौड़ रही थी…सारे जहाज़ गुज़र गए। उसका हाथ ढीला पड़ने लगा। आँखों के सामने तारे टूटने लगे। नामुराद, नाउम्मीद वह चकराता-सा चबूतरे पर बैठ गया।

“मेरा अतीत आज फिर मुझे आवाज़ दे रहा है। अपनी स्याह बाँहें फैलाकर मेरे वजूद को अपनी आग़ोश में भरना चाहता है, जो भविष्य की तरफ भागना चाहता है, जहाँ आज़ादी की चाँदी बरस रही है जहाँ ज़िन्दगी का कोलाहल बिखर रहा है मुझे इतनी जल्दी मौत की आरामगाह नहीं चाहिए बल्कि एक ऐसा सूरज चाहिए जो मुझे रोशनी से नहलाए ताकि मेरे अँधियारे तहखानों की तारीख़ी इबारत का सोना फिर से झिलमिला उठे, मगर इस क़ैदख़ाने में सूरज की किरणें भी नहीं पहुँच पाती हैं, ऊपर से यह बन्दिशों का घेरा जो जीते-जी मेरा मक़बरा बन गया है।”

उसके हलक में काँटे-से चुभने लगे। बदन में ठंडी-सी सनसनाहट। थकन उसकी रग-रग में टपक रही थी। बड़ी मुश्किलों से उठकर किसी तरह वह मटके तक पहुँचा, बर्तन अन्दर डाला, तल में पानी की बूँद भी नहीं बची थी। बर्तन ख़ाली मटके से टकराता, आवाज़ करता उसके हाथ से छूट गया और उसका सर घड़े के उभार पर टिक गया।

तौफीक़ के अन्दर का मौसम बदल रहा था। वजूद के अन्दर छिटकी धूप का लावा ठंडा पड़ते-पड़ते सख़्त चट्टानों में बदलने लगा था, जहाँ बहाव और टकराव की जगह ठहराव ने अपना डेरा जमा लिया था। हर नया दिन पुराने दिन को निगलता हुआ तेज़ी से उसके बचे सालों को दुगुनी रफ्तार से खाए जा रहा था।

“यह मैं हूँ?” सूखे डंठल जैसे कमज़ोर हाथ को देखकर तौफ़ीक़ जैसे अपने से पूछता, फिर वीरान आँखों से पत्थर की नंगी दीवारों को ताकने लगता।

वह मैं था?-हाँ, वह मैं ही तो था ताक़त और जोश से भरा आबशार, जिसे कोई भी हादसा न रोक सकता था, न बाँध सकता था। वह जवान होता लड़का मैं ही तो था, जो रोटी कमाने के लिए इस्रायल जाने लगा था और एक दिन थकन से चूर जब वह सरहद पार न कर सका और वहीं रास्ते में पड़ गया तो इस जुर्म में सीमा सुरक्षा पुलिस के जूतों और लातों की ठोकरों से उसे फुटबाल में बदल दिया गया था। थकन कहीं भाग गई थी और वह लुढ़कता हुआ अँधेरी रात को पार करता घर पहुँचा था फिर उस लड़के की माँ ने उसका बाहर निकलना बन्द कर दिया था। भुखमरी, ग़रीबी, बेकारी, महँगाई…कैसे बुरे दिन थे, तो भी वह लड़का मुरझाकर टूटा तो नहीं था?

उस वक़्त फिलिस्तीन की ज़मीन पर रहकर भी हमें वोट डालने का हक़ नहीं था, न सरकारी सम्मेलनों में बैठने और बोलने का हक़ था। जिनके पास इल्म था, उन्हें कुछ लिखने के जुर्म में जेल काटनी पड़ती या फिर इस्रायल को स्वीकार न करने के दंड में जलावतन का दर्द सहना पड़ता फिर एक दिन इन सारी लड़ाइयों और कशमकश से घबराकर ख़ामोशी से यह तय पाया कि फिलिस्तीन की धरती से बाहर निकलकर जंग करने में ज़्यादा जान है…बेरूत, लेबनान सब आग में जल उठे और महसूस हुआ कि जो वतन से निकला वह कहीं का न रहा।

मेरा ख़ून अब उबलता क्यों नहीं है? ये पुरानी यादें भी रगों में अंगारे नहीं भर पाती हैं…मेरे अन्दर की जलती आग राख में क्यों बदल रही है? यह क़सूर मेरा है या इस चहारदीवारी का है? मेरे वजूद का घोड़ा हिनहिनाना, टापें मारना, दौड़ना क्यों भूल गया है? इस तरह से मुँह डाले सुस्त क्यों पड़ा है काश! मैं इस अपाहिज घोड़े को गोली से उड़ा सकता!

मशीनगन की लगातार तग-तगतग तौफीक़ का पीछा कर रही थी। वह भागता हुआ ढाल की तरफ़ लपका। माँ का दिया आटे का थैला उसने कसके बग़ल में दबा लिया और ढलान पर अंगूरों की बेलों के नीचे रेंग गया तो भी एक गोली उसके बाज़ू को छीलती हुई निकल गई। ख़ून की पतली धार दर्द से फूटकर थैले को भिगोने लगी। दूसरे हाथ में थैला लेकर वह बाज़ार की तरफ़ लपका। परचूनिया उसकी यह हालत देखकर चीख़ा…

तौफ़ीक़ चौंककर उठ बैठा। उसके कानों में अब भी आवाज़ें गूँज रही थीं, दिल धड़क रहा था। हलक में काँटे चुभ रहे थे और ज़बान सूखकर तालू से जा लगी थी। कमज़ोरी के मारे उसका बुरा हाल था।

कोठरी से बाहर रात पत्थरों पर पसर गई थी। तौफीक़ के अन्दर छाया अँधेरा गहराने लगा था। एक घुटन उसके अन्दर घुमड़ने लगी थी।

“मैं आज किसी से बातें करना चाहता हूँ। अपना दिल ख़ाली करना चाहता हूँ। मगर बातें किससे और कैसे करूँ?पत्थर की ये बेजुबान दीवारें मुझे दिलासा भी नहीं दे सकती हैं, न मेरे टूटते वजूद का सहारा बन सकती हैं यह मुख्खा—अँधेरे की आँख—इस पर आज तक कोई परिन्दा आकर नहीं बैठा है—मेरा रिश्ता हर जानदार से टूट चुका है और हर बेजान चीज़ मेरी साथी बन चुकी है।

“जब मैं जंग के मैदान में मौजूद था तो सबका था, आज उस बहाव से छिटक गया तो कोई मेरा हमदम, कोई मेरा दोस्त न रहा। मुझे सब भूल गए अपने भी, पराए भी—सच है, अब मुझे मौत के अलावा किसी का बुलावा नहीं आएगा, कोई मुझे आवाज़ नहीं देगा कोई मुझे लेने नहीं आएगा।”

रात ख़ामोश क़दमों से पत्थरों पर पैर जमाती सुबह की तरफ़ बढ़ रही थी। ऐसे वीराने में, दिन, तारीख़, महीने, साल को कौन गिनता है? यहाँ कुदरत का पहिया ख़ामोशी से इन्हें निगलता घूमता रहता है। बस, घूमता रहता है

इस बीच कितनी बार सूरज उगा, कितनी बार डूबा, तौफीक़ को कुछ याद नहीं—हाँ—काल-कोठरी ने भूली-बिसरी बहुत-सी बातों को फिर से दोहराया जिन्हें न वह भूल चुका था, बल्कि यह सबकुछ उसकी ज़िन्दगी में होते हुए हादसों तले दब गए थे। मगर आज उसे फिर याद आकर ज़िन्दगी का एक नया नज़रिया समझा रहे थे।

“कल जब इस्रायली फैलाव और अरब राष्ट्र एकता का बुख़ार दिमाग़ों से उतर जाएगा उस समय क्या बचेगा?सिर्फ़ लोग बचेंगे मगर कहाँ के लोग? कौन-सी सरहद? सरहदें तो आदिकाल से तलवार की झंकार के साथ अपना रुख बदलती आई हैं, मगर ज़मीन पर रहने वाले लोग तो वही पुराने रहते हैं जिनकी पैदाइश का स्रोत एक है, जो एक ही तरह से गढ़े जाते हैं फिर यह रोज़ नई बनती सरहदें धर्मयुद्ध क्या सचमुच पुराने को मिटाकर नया कुछ आता है और हर इंक़लाब अपने ही बच्चों को निगलने लगता है?…

“एक इस्रायली जो तेलअबीब में यहूदी माँ-बाप से पैदा हुआ हो और पोलैंड का पनाहगीर हो“एक लड़का जो अरब माँ-बाप से गाज़ा में पैदा हुआ हो और ज़ाफ़ा का पनाहगीर हो—“क्या इनका कुछ भी नहीं पीछे छूटता? इस्रायल का वजूद मिट गया तो फिर यह विदेशी यहूदी दोबारा लौटकर कहाँ जाएँगे? तब क्या फिर किसी और सरज़मीन पर टैंकों के दहाने अंगारे उगलेंगे, लाशों का अम्बार लगेगा और सरहदों का नया दायरा नापा जाएगा?…

“फिलिस्तीन मोर्चा संगठनों का अभिन्न शाख़ों में बँट जाना, फिर आपसी विचारों के बिखराव में अपनों से टूटकर मुखालिफ देशों से मिलकर अपने ही उद्देश्य के ख़िलाफ़ अपने लोगों के विरोध में खड़ा हो जाना, यह किस बात की तरफ इशारा करता है?

“मान लो, कल हमारा प्यारा फिलिस्तीन हमें वापस मिल जाए और सारी दुनिया में बिखरे ख़ानाबदोश फिलिस्तीनी अपने वतन की तरफ़ लौट आएँ तो क्या उस नई नस्ल की याद का हिस्सा लेबनान, ट्यूनिस, जॉर्डन, बेरूत नहीं रहेंगे, जहाँ वह पैदा हुए, पले-बढ़े और जवान हुए? दूसरी तरफ़ अरब भाईचारे के बावजूद इस चोट को सहते आए कि वह फिलिस्तीनी पनाहगीर हैं। क्या वह अपने वतन फिलिस्तीन की अजनबी धरती से जुड़ सकेंगे, जिससे वह बरसों दूर रहे और पहली बार उस सरज़मीन पर क़दम रखेंगे? दिल और दिमाग़ के बीच होती जंग उन्हें बार-बार यह समझाएगी कि सरहदों की भी अपनी ज़बान होती है। क्या इनसान की पहचान अहसास और फ़िक्र न होकर सिर्फ़ सरहदों का गुज़रनामा-भर होती है?”

तौफीक़ के दिमाग़ की खिड़की खुल गई थी जिससे सरहदों का उलझा जाल उसे ज़िन्दा सवालों पर बिखरा नज़र आ रहा था। पूरी दुनिया निगाहों में इस तरह से खुलकर घूम रही थी,जैसे जमशेद का “जामे जहाँनुमा” उसके हाथों में आ गया हो और वह उस प्याले में झाँककर दुनिया की असलियत का नज़ारा देख रहा हो।

नीम बेहोशी में तौफीक़ की आँखों के सामने एक पुराना शहर फैला हुआ है। चलती ट्रेन रुकती है और वह उस गाड़ी से उतरता है। बड़े-बड़े बूढ़े दरख़्तों के साये में रेल की पटरी तन्हा ख़ामोश रह जाती है। वह पटरी पर बिखरे पत्थरों को फिर दरख़्तों के साये में बढ़ते अँधेरे को फैलता देखता है। माहौल का जादू उसे अपनी बाँहों में भींचने लगता है। वह एक अजनबी की तरह क़दम आगे बढ़ाता है।

दूर मीनारों से फूटती रोशनी गुम्बद पर सुनहरा रंग फैला रही है। वह सहरज़दा-सा उस तरफ़ खिंचता चला जाता है। सामने पुराना बाज़ार फैला है जहाँ अजीब शक्ल के बर्तन, मूर्तियाँ और मोटी-मोटी किताबें भरी हैं। एक दुकान में दाख़िल होकर जब वह किताब उठाता है और उसे खोलता है तभी ख़त-ए-कूफ़ी की लिखावट से भरा वह ख़स्ता काग़ज़ उसके हाथों के छुलते ही नन्हे-नन्हे टुकड़ों में बदल जाता है। वह घबराकर किताब वापस रखता है। काग़ज़ की बोसीदा महक उसके नथुनों में सनसनाने लगती है।

गलियाँ कच्चे मकानों से भिंची अपने में दुबकी-सहमी-सी खड़ी थीं। वह उनके अन्दर दाख़िल होता है। सोचता है कि ईसा भी “जुलजुता” तक अपनी सलीब पर लटकने के लिए इसी किसी घर से निकालकर ले जाया गया होगा। यहीं आसमान के नीचे उसका शिकवा गूँजा होगा कि खुदा, क्या तू भी मुझे भूल गया? यहीं इसी धरती पर सुकरात ने ज़हर का प्याला पीकर अल्फ़ाज़ का दरिया बहाया था और हल्लाज़ ने रूह की किस गहराई में डूबकर “अनलहक़” का नारा लगाया था।

सामने ऊँची मीनारें इस तंग गली से भी नज़र आ रही थीं। मुझे वहीं पहुँचना है। तौफीक घुमावदार गलियों की भूलभूलैया में खो गया। इसी कूफ़ा की ज़मीन पर हुसैन पानी से भरी दज़ला और फरात नदियों के बावजूद क्यों प्यासे शहीद हुए? इन सबकी निगाहें कौन से वक़्त पर किस नुक्ते पर टिकी थीं? हक़ की लड़ाइयाँ लड़कर उन्होंने कौन-सी क़दरें और मर्यादाएँ हमें दी हैं?

अब तंग गली खुले मैदान में आकर ख़त्म हो गई, जहाँ मिट्टी, मिट्टी को खा रही थी और उससे वक़्त की महक का पुरानापन फूट रहा था। गिरती ढहती बादामी भूसा हुई इबादतगाहों के बीच धूल के गुबार के परे नई ऊँची इबादतगाहों की नई तराश नज़र आने लगी। ख़स्ता इमारतों के बीच घूमते हुए तौफीक़ को याद आया कि इसी सरज़मीन पर तौरेत, बाइबिल, क़ुरान—तीन आसमानी किताबें नाज़िल हुई थीं, तीन फ्रिक्र, तीन मज़हब, तीन समाजी बदलाव…बड़े-बड़े धर्मयुद्ध का फैलता दायरा…। फिर साम्यवाद व साम्राज्यवाद की रस्साकशी वक़्त ने हमेशा इनसान से उसके जीने की क़ीमत माँगी है। किसी ने अदा की और किसी ने कर्ज़ा छोड़कर अपनी आँखें मूँद लीं।

नई इबादतगाहों की काशीकारी और फ़ानूस से जगमगाती मेहराब के नीचे आकर तौफीक़ रुक गया। शीशेकारी और ग़चबरी की नक़्क़ाशी और जाली के गुलबूटे पर उसकी नज़र ठहर गई।

“क्या मेरा वक़्त भी मुझसे मेरे जीने की क़ीमत माँग रहा है?” तौफीक़ नींद से चौंककर उठ बैठा। आँखें फाड़-फाड़कर चारों तरफ देखा, पुराना शहर ग़ायब था। नई इमारतें ग़ायब थीं,बस सामने पत्थर की दीवारें थीं।

बूँदाबाँदी शुरू हो गई थी। बड़ी-बड़ी बूँदें धरती पर पहुँचने से पहले ही हवा के डोले पर सवार होकर दरख्तों की शाख़ों से लिपटकर झूम उठती थीं।

तौफीक़ के अहसास की दुनिया अभी मरी नहीं थी। उसके कान अपने चारों तरफ़ छाए माहौल की मुख़्तलिफ़ आवाज़ों के सुर व ताल को पकड़ने की क्षमता रखे थे। इस वक़्त बिना देखे ही उसे सबकुछ नज़र आ रहा था कि हवाएँ पक्की ज़ैतूनों को धरती ज़ैतून के स्वाद की याद से पर गिरा रही हैं। टप…टप…टप…तालू से लगी सूखी ज़बान नर्म-सी पड़ने लगी थी।

“खुदा तुझे इतनी तौफीक़ दे कि तू हमारी खोई मंज़िल को पा सके इसी उम्मीद पर मैंने तेरा नाम तौफीक़ रखा है।”

माँ की आवाज़ के साथ सीना कूटती, बैन करती औरतें काले कपड़ों और सफेद स्कार्फ़ के साथ दिल की सुरंग से होकर गुज़र जाती हैं। महसूस होता है कि ज़ैतून के साए उस पर चारों तरफ़ से झुक आए हैं। शाख़ों के डोलने में माँ के हाथों का लम्स है। एक गर्मीभरी महक के गुबार में तौफीक़ डूबने लगा। गिरती ज़ैतूनें उसके मुर्दा होते बदन को ढाँक रही हैं। मौत की आगवानी में…तौफीक़ के माथे पर मौत का पसीना छलक आया। आँखें दुलकने लगीं। हाथ-पैर ढीले पड़ने लगे।

“क्या इस गुनाहगार सरज़मीन को फिर किसी नये पैग़म्बर की आमद का इन्तज़ार है?”

बाहर तूफ़ान का झक्कड़ तेज़ हो गया था। बौछारें छत के सुराख़ से तौफीक़ तक पहुँच रही थीं। उसके बालों, दाढ़ी और भवों पर बिखरी नन्ही-नन्ही बूँदें अलमास की तरह झिलमिला रही थीं।

आसमान से गिरती बारिश की लड़ियों को चीरती आवाज़ वक़्त के रथ पर सवार शताब्दियों का सफ़रतय करती किसी पैग़ाम की तरह चहारसू के दरवाज़े खोलती है। मुक़द्दस क़िबले के आगे झुके सिजदे ने अँधियारे तहखाने में नूर की कन्दील रौशन कर दी। ख़त-ए-कूफ़ी के सुनहरे अक्षरों के फैलते हाले से रूह का परिंदा, अमन की फ़ाख़्ता की तरह चोंच में ज़ैतून की शाख़ पकड़े मुख्खे से इस तरह उड़ा जैसे नोह* को खुश्की का पता चल जाए।

  • इस्लामी रिवायत के मुताबिक़ ख़ुदा के हुक्म से पैग़म्बर नोह ने साल का पौधा लगाया था, फिर उस पेड़ से तीन सौ गज लम्बी, पचास गन्न चौड़ी और तीस गज गहरी तीन मंज़िला किश्ती बनाई थी। जब दुनिया पानी के तूफ़ान में घिर गई थी, उस वक्त हज़रत नोह अपने परिवार के साथ उस किश्ती में सवार हो गए और बच गए। उनके परिवार में इनसान, जानवर और परिन्दे शामिल थे। उस वक्त फाख्ता ने उन्हें खुश्की का पता बताया था। अरब विश्वास है कि आत्मा परिन्दे में बदल जाती है। दूसरे मध्यपूर्वी देशों में जैतून न केवल जीवनदायिनी स्रोत है बल्कि फिलिस्तीन के संघर्ष व राष्ट्रीयता का निशान भी है। फ़ाख़्ता की चोंच में जैतून की शाख़—यह चित्र इस देश के लिए बहुत पवित्र है।

महिलाओं और अन्य आदिवसियों पर मणिपुर में हिंसा के खिलाफ स्त्रीवादियों का प्रस्ताव

वरिष्ठ साहित्यकार उर्मिला पवार और सुशीला टाकभौरे की अध्यक्षता में मणिपुर की वीभत्स हिंसा पर पारित प्रस्ताव।

यह प्रस्ताव स्त्रीकाल के 20वें वर्ष की शुरुआत के लिए 23 जुलाई 2023 को हुई बैठक (गूगल मीटिंग) के प्रारम्भिक एजेंडों में रखा गया और पारित हुआ । यह बैठक नागपुर में बाबा साहेब अम्बेडकर की उपस्थिति में हुए अखिल भारतीय शेड्यूल्ड कास्ट महिला सम्मेलन (20 जुलाई, 1942) की ऐतिहासिकता में हुई।

प्रस्ताव :

मणिपुर में दो आदिवासी (कुकी जनजाति) महिलाओं को निर्वस्त्र कर जिस तरह एक भीड़ ने उन्हें घुमाया और उनपर सामूहिक बलात्कार किया उसने हमें दुःख और क्षोभ से भर दिया है। मणिपुर में तीन महीने से जातीय हिंसा जारी है। मैतेई और कुकी समुदाय के बीच संघर्ष को शांत करने में मणिपुर की भाजपा सरकार और उसके मुख्यमंत्री एन. बिरेन सिंह की विफलता तथा केंद्र की भाजपा सरकार की पूरे प्रकरण में दिखी भूमिका ने ‘राज्य’ को एक बार फिर बहुसंख्यकों के हित का रक्षक ही सिद्ध किया है। एक लोकतांत्रिक राज्य की भूमिका अकलियतों, हाशिये के लोगों, वंचितों की संरक्षा की होती है। भारत का संविधान इस मूलभूत सिद्धांत की नीव पर खड़ा है।

मणिपुर के मुख्यमंत्री की भूमिका पर सवाल खड़े हो रहे हैं। मैतेई समुदाय से आने वाले मुख्यमंत्री एन. बिरेन सिंह अपने समुदाय के साथ और कुकी जनजाति के खिलाफ, पक्षपाती भूमिका में हैं। भारत के प्रधानमंत्री को पिछले तीन महीने से हो रही जातीय हिंसा के प्रसंग में कोई चिंता नहीं दिखती। केंद्र सरकार का गृहमंत्रालय इस मामले में विफल है। मणिपुर में हिंसा के पैटर्न और राज्य व राज्य की मशीनरी पर काबिज लोगों की भूमिका को देखते हुए मणिपुर-हिंसा को 2002 में गुजरात दंगों की अनुकृति कहा जा सकता है। यह एक दुखद और भारतीय लोकतंत्र के लिए खतरनाक पुनरावृत्ति है।

भारत के प्रधानमंत्री ने महिलाओं के निर्वस्त्र किये जाने और उनपर सामूहिक बलात्कार की वीभत्स घटना के बड़ा खुद को क्रोधित और पीड़ा से भरा बताया, लेकिन घटना की गम्भीरता और मणिपुर में भाजपा सरकार की विफलता पर पर्दा डालने के लिए एक सामान्यीकृत बयान दिया। उन्होंने सभी राज्यों के मुख्यमंत्री को ऐसी घटनाओं पर प्रभावी कार्रवाई का सुझाव दिया। प्रधानमंत्री ने इस बयान के लिए भी कृपा तब की जब घटना का वीडियो वायरल हुआ। जबकि इस घटना के खिलाफ दो महीने पहले ही एफआईआर दर्ज हो चुकी थी और कोई कार्रवाई बिरेन सिंह सरकार ने नहीं की थी।
क्या प्रधानमंत्री का खुफिया तंत्र इतना विफल है कि इस वीभत्स कृत्य की खबर उन्हें वायरल वीडियो से मिली? जबकि मणिपुर के मुख्यमंत्री खुद बयान दे रहे कि ऐसी कई घटनाओं को राज्य में अंजाम दिया जाए रहा है।

इस घटना को लेकर राष्ट्रीय महिला आयोग की भूमिका भी बेहद आक्रोशित करने वाली है। महिला आयोग ऐसे मामलों में प्रायः राजनीतिक रूप से सक्रिय या निष्क्रिय रहता है। उसकी अध्यक्ष अपने नियोक्ता राजनीतिक जमातों के हितों को देखते हुए काम करती हैं। इस मामले में महिला आयोग की अध्यक्ष रेखा शर्मा का बयान आयोग के अस्तित्व को ही निरर्थक बनाता है। आयोग को इस घटना की जानकारी एक शिकायत के जरिये 12 जून को ही हो गयी थी और उसपर आयोग ने खानपूर्ति की कार्रवाई करते हुए राज्य सरकार को रस्मी चिट्ठी भर लिखी। 37 दिनों वीडियो वायरल होने पर आयोग की अध्यक्ष ने कोई सार्वजनिक बयान दिया।

उच्चतम न्यायलय ने इस मामले का संज्ञान लिया है। इसके बाद ही भारत के प्रधानमंत्री ने बयान जारी कर सरकार के लिए सेफगार्ड का काम किया। उच्चतम न्यायालय की भी अपनी सीमा है। बिना कार्यपालिका के सहयोग के न्यायालय कोई अधिक प्रभावी भूमिका नहीं निभा सकता है।

भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू भी अब इस घटना से अवगत हो गयी होंगी। उन्हें भी इस मामले में अबतक चुप्पी रखी है। सरकार से कोई सवाल नहीं किया है। वे आदिवासी समुदाय से भी आती हैं। आदिवासी महिलाओं के साथ हुए इस नृशंस काण्ड से वे बेहद दुखी होंगी, होनी चाहिए। भारत में किसी भी महिला के साथ ऐसी घटनाओं पर देश के सर्वोच्च को शर्मिंदा होना ही चाहिए। लेकिन उन्होंने चुप्पी रखी है। हम यह नहीं मानते कि एक आदिवासी और एक महिला होने के कारण इन घटनाओं पर उन्हें अधिक सम्वेदनशीलता और सक्रियता के साथ सामने आना चाहिए था, या उनकी कोई अतिरिक्त जिम्मेवारी बनती है। ऐसा मानना जनाक्रोश को उत्पीड़ित समुदाय के किसी व्यक्ति की ओर ही मोड़ देना होता है। लेकिन वे जिस सामाजिक लोकेशन से हैं, एक महिला और एक आदिवासी, वह स्वाभाविक रूप से भारत के लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति अधिक सजगता और समर्पण के लिए प्रेरित करता है। बाबा साहेब डा. अम्बेडकर के नेतृत्व में देश ने खुद को एक संविधान आत्मार्पित किया, जिसका गुणात्मक असर देश के वंचितों, दलितों, आदिवासियों, पसमांदाओं, महिलाओं और अन्य हाशियाकृत समुदायों पर पड़ा है और वे इससे खुद को ज्यादा जुड़ा हुआ समझते भी हैं। इस कारण से भी उनसे हमारी अपेक्षा अधिक है।

सबसे दुखद है ऐसे मामलों में महिलाओं की संलिप्तता। महिलाओं के खिलाफ हिंसा में महिलाओं की भागीदारी का बढ़ता ट्रेंड बेहद खतरनाक है। मणिपुर में भी ऐसी घटनाओं में महिलाओं के शामिल होने की खबरें आ रही हैं। मणिपुर में ‘मीरा पैबिज’ नाम से सक्रिय रहे महिलाओं के समूह पर भी सवाल उठ रहे हैं। राज्य में महिलाओं पर ऐसी किसी भी बर्बरता के खिलाफ हाथों में मशाल लेकर निकलने वाला यह समूह इस या पिछले तीन महीने में इस जैसी कई घटनाओं पर चुप हैं। इस संगठन में मैतेई महिलाओं का ही नेतृत्व है। उनसे भी मानवाधिकार के पक्ष में अपने जातीय हितों से ऊपर जाकर सक्रियता की उम्मीद स्वाभाविक है।

ज़मीन और प्राकृतिक संसाधनों की लूट से उपजी दो समुदायों के बीच हिंसा का यह बीज सत्ता द्वारा प्रायोजित है और इसमें एक खास समुदाय की हानि ही हम देख रहे हैं। एथनिक क्लींजिंग का यह मसला स्पष्ट रूप से दिखता है। सत्ता व पूंजीपतियों को न कुकी से न मैतई से मतलब है, बल्कि वहां संविधान द्वारा प्रदत्त अनुसूचित क्षेत्र को कैसे पूँजीपत्तियों के हवाले किया जाए उनकी यह मंशा दिखती है। कई प्राकृतिक संसाधनों का क्षेत्र होने के कारण यह क्षेत्र आज जबरन डिस्टर्ब एरिया में परिणत किया गया है।
साथ ही हिन्दू बनाम क्रिस्चियन हिंसा के बतौर भी यह जगजाहिर है। एक धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक राज्य के नागरिक के रूप में हम इसका विरोध करते हैं।

हम भारत के नागरिक के रूप में इस घटना या मणिपुर में हो रही ऐसी और वीभत्स हिंसा की घटनाओं पर बेहद आक्रोशित हैं और खुद को विफल पा रहे हैं। राज्य की निष्क्रियता सबसे अधिक पीड़ादायी है।समाज के रूप में भी ऐसी घटनाएं हमें और भी यथास्थितिवाद को ओर ले जाती हैं।एक लोकतांत्रिक राज्य के नागरिक के रूप में सामाजिक-आर्थिक-सांस्कृतिक लोकतंत्र के जिम्मेवारी हम सबकी है। प्रथम नागरिक होने के नाते भारत की राष्ट्रपति से हमारे आक्रोश और दुःख को व्यक्त करने की हम मांग करते हैं और न सिर्फ प्रत्यक्ष दोषियों, अपितु इस वीभत्स घटना को अंजाम देने में शामिल तंत्र के दोषियों, पर स्पष्ट कार्रवाई की पहल चाहते हैं। भारत के प्रथम नागरिक,भारत की राष्ट्रपति के जरिये हम सभी नागरिक इस घटना के जिम्मेवार तंत्र पर कार्रवाई कर लोकतंत्र के पक्ष में संदेश देने की मंशा रखते हैं।

प्रस्तावक:
स्त्रीकाल और उसके साथ जेंडर-जस्ट समाज के प्रति समर्पित साथी

23 जुलाई, 2023 को पारित प्रस्ताव के अध्यक्ष:

उर्मिला पवार
सुशीला टाकभौरे

अन्य :

संजीव चंदन
नूतन मालवी
मनोरमा
अरुण कुमार
बिनय ठाकुर
विवेक सिन्हा
सुधा अरोड़ा
छाया खोब्रागडे
अनिता भारती
नूर ज़हीर
कल्याणी ठाकुर
कुसुम त्रिपाठी
नीतिशा खलखो
जमुना बिनी
मीना कोटवाल
जितेंद्र बिसारिया
कविता कर्मकार
क्विलिन काकोती
प्रिया राणा
दीप्ति
आफरीन
सुनीता

Resolution passed on gruesome violence in Manipur under the chairmanship of senior
litterateurs Urmila Pawar and Sushila Takbhaur

The manner in which two Adivasi (Scheduled Tribe Kuki) women were stripped naked, paraded and gang-raped by a mob in Manipur filled us with sadness and anger. Ethnic violence continues in Manipur for last three months. Failure of Manipur’s BJP government and its Chief Minister N. Biren Singh in defusing the conflict between Meitei and Kuki Tribes of Manipur and the visible role of the BJP government at the Centre in the entire episode has once again proved the ‘state’ to be the saviour of the interests of the majority. The role of a democratic state is to protect the minorities, the marginalised, the deprived. The Constitution of India stands on the foundation of this fundamental principle.

Questions are being raised on the role of the Chief Minister of Manipur. Coming from the Meitei community, Chief Minister N. Biren Singh is in a partisan role, with his community and against the tribal Kuki community. The Prime Minister of India has not shown any concern in the context of caste violence that has been going on for the last three months. The Home Ministry of the Central Government has failed in this matter. Looking at the pattern of violence in Manipur and the role played by people in possession of the state and state machinery, the Manipur-violence can be said to be a replica of the 2002 Gujarat riots. This is a sad and dangerous recurrence for Indian democracy. These violent incidents are also fuelled by the ideology and activities of the RSS. Organizations like this have a role to play in promoting and airing references like Bhumiputra and Bahri.

The Prime Minister of India described himself as angry and pained after the gruesome incident of women being stripped and gang-raped, but made a generalized statement to cover up the seriousness of the incident and the failure of the BJP government in Manipur. He suggested the Chief Ministers of all the states to take effective action on such incidents. The Prime Minister did the favour to make this statement only when the video of the incident went viral, whereas an FIR had been registered against the incident two months ago and no action was taken by the N. Biren Singh’s government. Has the Prime Minister’s intelligence system failed so much that he got the news of this heinous act from the viral video? While the Chief Minister of Manipur himself is giving statements that many such incidents are being carried out in the state.

The role of the National Commission for Women regarding this incident is also very shocking. The Women’s Commission often remains politically active or inactive in such matters. Its chairperson works keeping in view the interests of her employer political groups. In this matter, the statement of Rekha Sharma, Chairperson of the Women’s Commission, makes the existence of the Commission meaningless. The commission was already informed about this incident through a complaint on 12th June and on that, the commission just took a ritualistic action of writing a formal letter to the state government. Even after 37 days of the video went viral, Did the Chairperson of the Commission made any public statement?

The Supreme Court has taken cognizance of the matter. It was only after this that the Prime Minister of India acted as a safeguard for the government by issuing a statement. Even the Supreme Court has its limits. Without the cooperation of the executive’s, the court cannot play any more effective role.

India’s President Draupadi Murmu must also have become aware of this incident by now. She has also kept quite in this matter till now. Haven’t asked any questions to the government. She also comes from the tribal community. She will be deeply saddened by this brutal incident with tribal women, and She should be. President of India should be ashamed of such incidents with any woman in India. But She kept her silence. We do not believe that being a tribal and a woman, she has any additional responsibility for these incidents. To believe so is to divert public anger towards a person from the oppressed community. But the social location she is from, a woman and a tribal, naturally inspires more awareness and dedication towards the democratic values of India, so she must have come forward with more sensitivity and activism. Under the leadership of Baba Saheb Dr. Ambedkar, the country dedicated itself to a constitution, which has had a multiplier effect on the underprivileged, Dalits, Adivasis, Pasmandas, women and other marginalized communities of the country and they also consider themselves more connected to it. For this reason also our expectation from her is more.

The role of India’s media and social media in such incidents is anti-democratic and in favor of the majority community. Internet ban in Manipur has prevented such violent incidents happening there from coming out. The Chief Minister himself said this. Such internet shutdowns done to control rumours also affect the speed and veracity ( authenticity ) of information.

The saddest part is the involvement of women in such cases. The rising trend of women’s involvement in violence against women is extremely alarming. In Manipur also there are reports of involvement of women in such incidents. Questions are also being raised on the group of women who have been active in Manipur by the name of ‘ Meira Paibis’. This group, which has come out with a torch in its hands against any such barbarism on women in the state, is silent on many such incidents like this or many like this in the last three months. This Organization is led by Meitei women only. It is natural to expect activism from them in favour of human rights by going above their caste interests.

This seed of violence between two communities stemming from the loot of land and natural resources is sponsored by the state and we are seeing the loss of a particular race. This issue of ethnic cleansing is clearly visible. Power and capitalists do not care about cookies or maitai, but how to hand over the scheduled area provided by the constitution to the capitalists. Their intention is visible. Being land of many natural resources, this area has been forcibly transformed in to a disturbed area today. as well as, this is also well known in the form of Hindu vs Christian violence. As citizens of a secular democratic state, we oppose this.
We as citizens of India are extremely outraged and find ourselves failing at this incident or other such heinous incidents of violence happening in Manipur. The inaction of the state is most painful. As a society, such incidents also lead us towards status quoism. As citizens of a democratic state, we all have the responsibility of socio-economic-cultural democracy.

As a first citizen of this country, we demand from the honorable President Draupadi Murmu, to express our indignation and grief and initiate clear action against not only the direct culprits, but also the culprits of the system involved in carrying out this heinous incident. Through the first citizen of India, the President of India, all of us citizens intend to send a message in favour of democracy by acting on the mechanism responsible for this incident.

Proponent:
StreeKaal and with it a dedicated partner towards gender-just society
Urmila Pawar
Sushila TakbhaureS
Sanjeev Chandan
Nutan Malvi
Manorama
Arun Kumar
Binay Thakur
Vivek Sinha
Sudha Arora
Chhaya Khobragade
Noor Zaheer
Kalyani Thakur
Kusum Tripathi
Meena Kotwal
Nitisha Xalxo
Jitendra Bisaria
Kavita Karmakar
Quilin Kakoty
Priya Rana
Deepti
Afreen
Sunita

मदर इंडिया: एक संघर्षरत भारतीय स्त्री की अमर कथा

अंशु यादव और अरुण कुमार

मदर इंडिया: एक संघर्षरत भारतीय स्त्री की अमर कथा
‘मदर इंडिया’ फ़िल्म 25 अक्टूबर 1957 को प्रदर्शित हुई थी जिसके निर्माता और निर्देशक महबूब खान थे। यह भारतीय फिल्म इतिहास की अमर एवं महान कलाकृति है। यह फ़िल्म महबूब खान द्वारा ही सन 1940 में निर्देशित फिल्म ‘औरत’ की रीमेक थी। ‘मदर इंडिया’ फ़िल्म का शीर्षक कैथरीन मेयो की पुस्तक ‘मदर इंडिया’ जो 1927 में प्रकाशित हुई थी, से लिया गया था। इस पुस्तक में भारतीय समाज की काफी आलोचना की गई थी। ‘मदर इंडिया’ फ़िल्म ‘द मदर’ (1934) पर आधारित है जिसमें एक चीनी महिला के संघर्ष को दिखाया गया है जिसका उसके पति ने परित्याग कर दिया था और वह महिला अकेले ही अपने बच्चों की परवरिश करती है व उन्हें काबिल बनाती है। ‘मदर इंडिया’ फ़िल्म में भी एक ऐसी ही भारतीय स्त्री के जीवन और उसके संघर्षों को दिखाया गया है जो पति की अनुपस्थिति में अपने परिवार का न केवल पालन पोषण करती है बल्कि सामंती समाज में अपने सम्मान और संपत्ति की रक्षा भी करती है।
‘मदर इंडिया’ फ़िल्म के पहले ही दृश्य में बुजुर्ग राधा का चेहरा क्लोज अप शॉट के साथ पूरे पर्दे पर दिखाई देता है जो मिट्टी को चूमते हुए अपने माथे से लगाती है। यह दृश्य मातृभूमि के प्रति प्रेम की सुन्दर अभिव्यक्ति है। यह फिल्म स्वतंत्रता प्राप्ति के 10 वर्षों के बाद प्रदर्शित हुई थी और यह समय राष्ट्रवाद और राष्ट्र निर्माण का है। हमें सैकड़ों वर्षों की गुलामी के बाद स्वतंत्रता मिली थी। देशवासियों के मन में स्वतंत्रता के प्रति ढेर सारी आशाएँ और आकांक्षाएँ थीं। यह फिल्म भी वर्षों की गुलामी के बाद देशवासियों के मन में जो आशाएँ और आकांक्षाएँ थीं उनकी अभिव्यक्ति है। वृद्ध महिला जब मिट्टी को चूम रही होती है उसके पीछे ट्रैक्टर से खेत जोता जा रहा होता है। इसके बाद बिजली के खंभे दिखाए गए हैं जिससे पता चलता है कि गाँव में बिजली आ गई है। फिल्म के अगले दृश्य में वही वृद्ध महिला अपने बेटे के साथ जीप में सवार होकर कहीं जाती हुई दिखाई देती है। फिर आधुनिक मशीनों से सड़क और पुल बनाने का दृश्य है। यह स्वतंत्रता के बाद विकास और आधुनिकता की ओर तेजी से कदम बढ़ाते भारत और उसके गांवों की तस्वीर है। इसके बाद नवनिर्मित बांध और नहर में बहते पानी को दिखाया गया है। इसके बाद गाँधीवादी टोपी और खादी का कुर्ता पहने कुछ सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता उसी वृद्ध महिला को नवनिर्मित बांध का उद्घाटन करने के लिए निवेदन करते दिखाई देते हैं। वृद्ध महिला झूले पर बैठी है और उसके पीछे उसका बेटा रेडियो बजा रहा है। वृद्ध महिला जहां बैठी है उसके आसपास का भी दृश्य दिखाया गया है जिसमें कुछ लोग बोरे में अनाज ढो रहे हैं। इससे पता चलता है कि यह महिला आर्थिक रूप से सम्पन्न है। पहले तो महिला बांध का उद्घाटन करने से मना करती है लेकिन लोगों के समझाने पर मान जाती है। बांध का उद्घाटन करते समय एक व्यक्ति उसे फूलों की माला पहनाता है और वह फूलों को सूँघती हुई अतीत में खो जाती है। अब फिल्म फ्लैशबैक में चली जाती है जहां यह वृद्ध महिला एक नई-नवेली दुल्हन बनी है और उसका विवाह शामू (राजकुमार) से हो रहा है।
‘मदर इंडिया’ में राधा (नरगिस) एक नई नवेली दुल्हन, एक पीड़ित लेकिन संघर्षरत मां और अंत में एक अत्यंत सम्मानित वृद्ध महिला की भूमिका में है। यह महिला एक के बाद एक नई त्रासदी झेलती है लेकिन हार नहीं मानती संघर्ष करती है। फ़िल्म के पहले भाग में एक खुशहाल किसान का जीवन दिखाया गया है। राधा विदा होकर ससुराल आती है और कुछ समय तक पति के साथ मधुर पलों का आनंद लेती है। यहाँ प्रेम भी है, श्रम भी है, सामाजिक मर्यादाएँ, तीज-त्योहार सबकुछ है। विवाह के कुछ दिन बाद राधा बुजुर्ग महिलाओं से नई बहू की खूबसूरती के साथ-साथ ऋण लेकर विवाह की चर्चा सुनती है। तभी उसकी सास आकर बुजुर्ग महिलाओं को डांटती हुई कहती है कि कौन नहीं पैसे उठाकर विवाह करता है, उतर जाएगा एक दिन। वह राधा को भाग्यशाली मानकर ऋण उतारने की कामना करती है। राधा गेंहू पीसती है, पशुओं को चारा खिलाती है, दूध दूहती है और घर के सारे काम करती है। शामू राधा को दिन भर काम करने पर मना भी करता है। एक गरीब किसान के पास प्रेम के लिए समय कहाँ मिलता है साथ ही भारतीय परिवारों में प्रेम बड़े-बुजुर्गों से बचकर करना पड़ता है। शामू कहता भी है- घर में मां का डर, बाहर दुनिया का डर प्रेम के लिए समय ही नहीं मिलता। इसके बावजूद फिल्मकार ने शामू और राधा के प्रेम के लिए समय निकाल ही लिया है। शामू को फसल के लिए भगवान पर भरोसा है तो पत्नी से वर्ष में चार बच्चों की कामना करता है। यह प्रेम और श्रम का अद्भुत संयोजन है।

राधा अपने पहले बेटे को जन्म देती है और शामू इतना खुश होता है कि फसलों में से ही दान करने लगता है। यहीं कहानी में सुखी लाला (कन्हैया लाल) का प्रवेश होता है जो राधा और शामू के खुशहाल जीवन में ग्रहण की तरह है। सुखी लाला महाजनी व्यवस्था का ऐसा क्रूर परजीवी प्राणी है जिसने भारतीय किसानों के जीवन को नारकीय बना दिया है। सुखी लाला के आते ही राधा और शामू के खुशहाल जीवन पर संकटों के पहाड़ टूटने शुरू होते हैं। सुखी लाल शामू से कहता है कि इन फसलों में उसका भी हिस्सा है और उसके हिस्से से वह दान न करे। शामू पूछता है कि उसका हिस्सा कितना है तो लाला जवाब देता है तीन हिस्सा मेरा और एक हिस्सा तेरा। दरअसल, शामू और उसके जैसे सारे किसान अशिक्षित हैं जिसके कारण सुखी लाला जैसे लोग उनसे ऋण के बदले कागज पर कुछ भी लिखवा लेते हैं और उसी के आधार पर जीवन भर शोषण करते हैं। सुखी लाला ने शामू से कर्ज के बदले ब्याज में कुल फसलों का तीन हिस्सा स्वयं लेने की बात इकरारनामा पर लिखवा ली है। ऋण के इस दुष्चक्र में फंसा किसान मृत्यु के बाद भी लाख प्रयासों के बावजूद इसके शोषण से मुक्त नहीं हो पाता। मदर इंडिया भी इसी ऋण के दुष्चक्र से बाहर निकलने के लिए छटपटाते भारतीय किसान की कहानी है। फिल्म की नायिका राधा इस कर्ज के दुष्चक्र से निकलने का जितना प्रयास करती है उतना ही अधिक फँसती जाती है।

अब राधा सुखी लाला से लिए गए ऋण को चुकता करने का बीड़ा उठाती है। इसी समय वह एक अन्य बच्चे बिरजू को जन्म देती है। राधा शामू के साथ मिलकर अपनी बंजर जमीन को उपजाऊ बनाने का प्रयास शुरू करती है ताकि अधिक फसलों का उत्पादन कर कर्ज के बोझ को कम किया जा सके। लेकिन नियति को कुछ और मंजूर था। शायद भारतीय किसान की भी यही नियति है। तमाम प्रयासों के बावजूद असफल होना ही उसकी नियति है। राधा और शामू द्वारा अपनी बंजर जमीन को उपजाऊ बनाने के प्रयास में उसका बैल मर जाता है फिर पत्थरों से दबकर शामू के दोनों हाथ खराब हो जाते हैं। कर्ज में फंसा भारतीय किसान या तो मर जाता है या फिर सबकुछ छोड़कर भाग जाता है। कर्ज और विकलांगता के बोझ से दबा शामू भी अपने परिवार को छोड़कर कहीं दूर चला जाता है लेकिन राधा कहाँ भागे? वह अपने बच्चों के भविष्य के लिए संघर्ष का रास्ता चुनती है। वह हल चलाते हुए गीत गाती है- दुनिया में हम आए हैं तो जीना ही पड़ेगा/ जीवन है अगर जहर तो पीना ही पड़ेगा। ‘मदर इंडिया’ में पहली बार भारतीय स्त्री की एक ऐसी छवि प्रस्तुत की गई थी जो अपने परिवार की आजीविका के लिए खेत में बैल की जगह स्वयं को जोत देती है। एक ऐसी स्त्री जो तमाम अभावों में जीते हुए अपने सम्मान की भी रक्षा स्वयं करती है। भारतीय स्त्री की ऐसी छवि बाद की हिन्दी फिल्मों में भी बहुत कम दिखी। हिन्दी सिनेमा की अनगिनत नायिकाएँ तो बचाओ बचाओ की मुद्रा में ही दिखाई देती हैं। यह एक ऐसी फिल्म है जो भारतीय समाज में निर्मित स्त्री की पारंपरिक छवि को तोड़ती है। इस फ़िल्म ने स्त्री को नायक के रूप में प्रस्तुत किया। महबूब खान आधुनिक विचारों से युक्त फिल्मकार माने जाते हैं। उनकी फिल्मों में स्त्री का क्रांतिकारी रूप देखने को मिलता है। उनकी फिल्मों की स्त्रियां अपने अधिकारों और अस्मिता के लिए मुखर दिखाई देती हैं।
कर्ज के दुष्चक्र में फंसी राधा धीरे-धीरे बर्तन, जेवर, जमीन सबकुछ गिरवी रख देती है। पीतल के बर्तन में खाना खाने वाला परिवार मिट्टी के बर्तन में खाने लगता है। इसके बावजूद वह अपने स्वाभिमान से समझौता नहीं करती है। हर संकट का और भी अधिक मजबूती से सामना करती है। राधा पर आए संकट का लाभ उठाने की चाह में सुखी लाला उसका शारीरिक शोषण करना चाहता है। राधा ऐसा नहीं होने देती। वह खेतों में बैलों की जगह स्वयं को और अपने बेटों को जोत देती है। फसल कटने वाली होती है कि गांव में बाढ़ आ जाती है। इस बाढ़ में उसकी पूरी फसल डूब जाती है, मकान गिर जाता है, सारे सामान बह जाते हैं। वह अपने तीसरे बच्चे को खो देती है। इसके बावजूद हार नहीं मानती। गांव के बहुत सारे लोग पलायन कर जाते हैं लेकिन वह इसलिए गांव नहीं छोड़ती क्योंकि उसे लगता है कि उसका शामू लौटकर जरूर आएगा। राधा शिक्षा के महत्व को जानती है इसलिए वह अपने दोनों बेटों को स्कूल भेजती है। यहाँ शिक्षक भी गरीबों और किसानों के बच्चों को शिक्षित करने के विरोधी हैं इसलिए वे राधा के दोनों बेटों की बेवजह पिटाई करते हैं। बिरजू शिक्षक की आंख में गुलेल से मारकर भाग जाता है और दुबारा कभी स्कूल नहीं जाता। बाद में रामू भी स्कूल छोड़ देता है।
राधा के दोनों बेटे रामू और बिरजू दो अलग-अलग विचारों के हैं। ये दोनों दो विचारधाराओं के प्रतिनिधि पात्र हैं। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया पर कई विचारधाराओं का प्रभाव पड़ा। गाँधीवादी, समाजवादी, मार्क्सवादी आदि कई विचारधाराओं से लोग प्रभावित हुए। इन सभी विचारधाराओं से प्रभावित लोगों ने अपने-अपने तरीके से राष्ट्र निर्माण की रूप रेखा तय की। इनमे दो विचारधाराओं गांधीवाद और मार्क्सवाद से भारत के युवा खूब प्रभावित थे। गाँधीवाद अहिंसा में विश्वास करता है और अहिंसक तरीके से ही राष्ट्र निर्माण और सामाजिक परिवर्तन का पक्षधर है तो वहीं मार्क्सवाद सामाजिक परिवर्तन के लिए हिंसा का भी सहारा लेता है। राधा का बड़ा बेटा रामू अहिंसा में विश्वास करता है इसलिए वह गाँधीवाद का प्रतिनिधि पात्र है। छोटा बेटा बिरजू हिंसा में विश्वास करता है इसलिए वह मार्क्सवाद का प्रतिनधि पात्र है। फिल्म में कई जगहों पर रामू अपने छोटे भाई बिरजू को हिंसा करने से रोकता है। ऐसा लगता है कि जैसे महात्मा गांधी ही अहिंसा का संदेश दे रहे हों। महबूब खान मार्क्सवाद से प्रभावित थे इसलिए फ़िल्म की कहानी बिरजू पर केंद्रित हो गयी है। बिरजू एंटी हीरो है लेकिन दर्शकों की सहानुभूति उसी के साथ है। बिरजू हिंसा के बल पर शोषण और अत्याचार को खत्म करने का पक्षधर है। एक बार जब सुखी लाला फसलों में से अपना तीन हिस्सा लेने आता है तो बिरजू को गेहूं के बोरों की ढेर पर कटार लेकर बैठा हुआ दिखाया गया है। बिरजू लाला को धमकाता हुआ कहता है- ‘तुमने कौन सा हल चलाए जो हिस्सा लेने आ गए?’ मार्क्सवाद स्पष्ट मानता है कि जो जोतेगा वही काटेगा। वह लाला की साढ़े पांच रुपए की छतरी तोड़ देता है। ऐसा लगता है कि सुनील दत्त द्वारा निभाया गया बिरजू का यह किरदार 1960 के बाद के दशक में अमिताभ बच्चन के ‘एंग्री यंगमैन’ के रूप में विकसित हुआ है।
बिरजू शोषण और अत्याचार से मुक्ति के लिए डाकू बन जाता है। हालांकि हमारा समाज जिस बिरजू को डाकू कहता है उसे पान सिंह तोमर फिल्म का नायक उसे बागी कहता है। सुखी लाला की बिटिया के विवाह की रात बिरजू डाकुओं के अपने गिरोह के साथ धावा बोलता है। वह सुखी लाला की तिजोरी से अपनी मां के कंगन सहित गाँव वालों की जमीनों के कागजात निकाल लेता है। बिरजू उन कागजातों को आग के हवाले कर देता है। राधा लगातार बिरजू को ऐसा करने से मना करती है लेकिन वह नहीं मानता। जब बिरजू सुखी लाला की बिटिया का अपहरण करके घोड़े पर ले जा रहा होता है तो राधा उसे गोली मार देती है। एक स्त्री की सम्मान की रक्षा के लिए एक मां अपने ही बेटे की हत्या कर देती है। एक ऐसी स्त्री जो पूरी फिल्म में अहिंसा की पक्षधर है अपने ही बेटे की हत्या कर देती है। वह भी उस स्त्री के सम्मान की रक्षा के लिए जिसका पिता ही उसके दुखों का कारण है और जो हमेशा उसे अपमानित करता रहता है। यहीं राधा का ध्यान टूटता है और कहानी फ्लैशबैक से निकलकर वर्तमान में आ जाती है। वह बांध का उद्घाटन करती है और नहर का पानी खेतों में पहुंचकर फसलों को सींचने लगता है।

‘मदर इंडिया’ की कहानी दो भागों में विभाजित है। कहानी का एक भाग स्वतंत्र भारत में हो रहे विकास कार्यों को चित्रित करता है। राधा का बड़ा बेटा रामू स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद की परिस्थितियों में आर्थिक रूप से सम्पन्न हो गया है। यहाँ राधा का भी खूब सम्मान है और सभी उसे माता कहते हैं और उसी से बांध का उद्घाटन कराते हैं। तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू को यह बात इतनी अधिक पसंद आई थी कि उन्होंने भी छह दिसंबर 1959 को झारखंड में दामोदर वैली कॉर्पोरेशन द्वारा बनाई गई पंचेत बांध का उद्घाटन एक मजदूर आदिवासी महिला बुधनी माँझिआइन से कराया था। कहानी का दूसरा भाग स्वतंत्रता प्राप्ति से पहले का है जहां सामंती व्यवस्था में पिसते एक गरीब किसान स्त्री के जीवन की दयनीय स्थिति और उसके संघर्ष का चित्रण है। महबूब खान ने कहानी के दोनों भागों को इतना संतुलित ढंग से प्रस्तुत किया है कि फिल्म एक महाकाव्य बन गई है। इस फ़िल्म की शूटिंग मुम्बई के मेहबूब स्टूडियो व महाराष्ट्र, गुजरात और उत्तर प्रदेश के गांवों में हुई थी। फ़िल्म का फिल्मांकन मुख्य रूप से समन्वयक (सिंक) साउंड पर किया गया था। मेहबूब खान डबिंग को बहुत कम पसंद करते थे इसलिए डबिंग बहुत कम की गई थी। फ़िल्म के संवाद हिन्दी और स्थानीय देशी भाषा में थे। फ़िल्म के संगीत निर्देशक नौशाद ने पश्चिमी शास्त्रीय संगीत के लिए आर्केस्ट्रा के साथ-साथ कुछ अभिनव प्रयोग भी किए थे जिसके कारण इसके गाने आज भी लोकप्रिय हैं। अभिनय के लिए इस फिल्म ने नरगिस, सुनील दत्त, राजकुमार, राजेन्द्र कुमार और कन्हैया लाल को अमर कर दिया। फ़िल्म को 5 फिल्मफेयर और 2 राष्ट्रीय पुरस्कार सहित 9 पुरस्कार मिले थे। यह पहली ऐसी भारतीय फिल्म थी जिसे विदेशी भाषा समूह में ऑस्कर पुरस्कार के लिए नामित किया गया था लेकिन 1 वोट कम मिलने के कारण वह पुरस्कार से वंचित रह गयी थी। भारत में इस फ़िल्म को अपार सफलता मिली इस कारण इसे स्पेनिश, फ्रेंच, रूसी भाषाओं में भी डब किया गया था। दर्शकों ने यूरोपीय देशों में भी इस फ़िल्म को खूब पसंद किया था।

लेखक परिचय:

डॉ अंशु यादव, असिस्टेंट प्रोफेसर, हंसराज कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय

डॉ अरुण कुमार, असिस्टेंट प्रोफेसर, पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय, पटना।
सम्पर्क- 8178055172

समान नागरिक संहिता (UCC) पर स्त्रीवादी संगठनों और व्यक्तियों के सुझाव

विधि आयोग (LCI, Law Commission of India) द्वारा सभी मान्यता प्राप्त धार्मिक संगठनों एवं आम जन समूह सहित सभी  हित धारकों को समान नागरिक संहिता कर पर अपनी राय साझा करने के आमंत्रण के जवाब में कुछ स्त्रीवादी समूह एवं व्यक्ति  4-5 जुलाई 2023 को दिल्ली में जुटे, ताकि इसके ऊपर एक राय-मश्विरे से विचारपूर्ण  मसविदा तैयार किया जा सके।  स्त्रीवादी समूहों द्वारा द्वारा समान नागरिक संहिता पर दशकों से चर्चा होती रही है और 1990 के बाद से एक आम राय उभरी है कि  परिवार संबंधित कानूनों ( Family Laws) के केंद्र में लैंगिक न्याय होना चाहिए ना कि एकरूपता ( यूनिफॉर्मिटी) या समानता,  फिर चाहे  वे कानून  पर्सनल लॉ,  अल्पसंख्यक धार्मिक समुदाय से संबंधित हों,  या फिर अनुसूचित जनजाति के कस्टमरी लॉ से।  इस परिचर्चा के आधार पर एक आम राय बनी, जो स्त्रीवादी समूह द्वारा इन मुद्दों पर दशकों से चली आ रही गंभीर बहस पर आधारित थी।

सेवा में,
माननीय आध्यक्ष महोदय व सदस्य
भारतीय विधि आयोग

14 जुलाई 2023

विषय: भारतीय विधि आयोग द्वारा 14 जून, 2023 को समान नागरिक संहिता पर राय देने के सार्वजनिक सूचना के प्रत्युत्तर में  स्त्रीवादी, स्त्री अधिकार समूह, क्वीयर अधिकार समूह व निजी हैसियत में कुछ स्त्रीवादियों की प्रतिक्रिया

माननीय अध्यक्ष एवं सदस्य, भारत सरकार विधि आयोग, हम यहां स्त्रीवादी क्वीयर, स्त्री अधिकार समूह के साथ ही सरोकारी नागरिक के प्रतिनिधि के तौर पर राय दे रहे हैं,जो भारत भर में फैले विविध समुदाय में जेंडर जस्टिस और स्त्री समानता के मुद्दे पर काम करते रहे हैं। हम समान नागरिक संहिता के प्रसंग में  वर्तमान में हो रही चर्चा पर दशकों के अपने साझे अनुभव के आधार पर राय रख रहे हैं।

हमारा निवेदन तीन खंड में खंडों है:

  1.  इस विषय में विधि आयोग द्वारा अपनायी गयी चर्चा आरंभ करने की प्रक्रिया को लेकर
    2.  जेंडर जस्टिस ((लैंगिक न्याय)  के बर-अक्स एकरूपता, समानता और भेदभाव-विरोधी मुद्दों को लेकर की गयी टिप्पणी से संबंधित
    3.  सभी को जेंडर जस्टिस दिलाने के प्रयास के आधार भूत सिद्धांत को लेकर
  2. मकसद, प्रक्रिया और असर से संबंधित सरोकार:

हम विधि आयोग द्वारा सार्वजनिक सूचना जारी  कर आम लोग एवं मान्यता प्राप्त धार्मिक समूह के विचार आमंत्रित करने करने पर अपनी गंभीर आपत्ति व्यक्त करें कर रहे हैं /  हमारी चिंता व आपत्ति  इस तरह से है:

अ) यह विडम्बना पूर्ण है कि विधि आयोग द्वारा आम लोगों से इस पर राय देने का देने के आमंत्रण के बावजूद  इसको लेकर इन बिंदुओं पर जानकारी का घोर अभाव है:

i)वास्तव में समान नागरिक संहिता है क्या, कौन से मुद्दे उसके तहत आयेंगे?

ii)ऐतिहासिक भौगोलिक रूप से भिन्न-भिन्न स्थानों पर स्थित विविध समुदाय के लिए शादी के संदर्भ में, विवाह-तलाक, संरक्षण, गोद लेना या दत्तक ग्रहण, भरण-पोषण और उत्तराधिकार के मामले में समरूपता का क्या मतलब होगा और विवाहेतर मामलों में इसका अर्थ होगा?

iii) इसके क्रियान्वयन के बारे में विधि आयोग की क्या दृष्टि है?

ब)  बिना किसी ठोस प्रस्ताव, कोई रूपरेखा के लोगों को अपनी राय देने के लिए दिये गये अपर्याप्त समय के कारण एक बहस, जो लोगों के लिए एक गंभीर चर्चा बन सकती थी, उसे एक अत्यंत अपारदर्शी प्रक्रिया में बदल दिया गया, पॉलीटिकल नारेबाजी और सोशल मीडिया-अभियान द्वारा प्रचारित।

विभिन्न स्वार्थी समूह, जिनमें मंदिर से जुड़े संगठन, रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन, और अन्य ऐसे समूह शामिल हैं,जो अत्यंत सांप्रदायिक अभियान छेड़ने के पक्ष में रहे हैं, वे विधि आयोग के समान नागरिक संहिता को लेकर अल्पसंख्यक धार्मिक समुदायों पर हमलावर हो  रहे हैं। भाजपा के नेतृत्व वाली सरकारों के पिछले इतिहास को देखते हुए हो रहे पूरे प्रक्रम पर भारत भर धार्मिक अल्पसंख्यक समुदाय, जनजातीय समाज और आदिवासी समाजों के द्वारा गंभीर चिंता जाहिर की गई है । यह अत्यंत निराशाजनक है कि कानूनी विचार करने वाली देश की संवैधानिक संस्था, भारतीय विधि आयोग (LCI),  जिसका कानूनी सुधारों को लेकर 200 वर्षों का पुराना इतिहास रहा है, इतने गैर जवाबदेह व अभिमान पूर्ण तरीके से सार्वजनिक सूचना जारी कर रही है। एक ऐसे मुद्दे पर, जो बेहद जटिल और संवेदनशील है और जिसको लेकर दशकों से विरोध भी होता रहा है,  उसके संबंध में एक बेहद कम जानकारी से लैस अलोकतांत्रिक प्रक्रिया को आरंभ किया गया है ।

यह और भी चिंताजनक है कि वर्तमान विधि आयोग इसी मुद्दे पर  2018 में 21वें विधि आयोग द्वारा जारी रिपोर्ट का पर्याप्त संदर्भ लिए बिना इस मुद्दे को उठा रही है। ‘फैमिली लॉ में सुधार’ विषय पर अपने पत्र में जेंडर समानता के मुद्दे पर 21वें  विधि आयोग ने कई अनुशंसाएं की है। अपने निष्कर्ष में आयोग ने कहा कि समान नागरिक संहिता इस समय न तो जरूरी है, और न ही अपेक्षित। इस समय समान नागरिक संहिता देश में सामाजिक सौहार्द के लिए नुकसानदेह है। आयोग ने सुझाया  कि पर्सनल लॉ में सुधार संशोधनों के जरिए होना चाहिए, न कि उनको हटाकर। विधिक आयोग ने यह भी चिन्हित किया कि असमानता की जड़ में भेदभाव है, ना कि भिन्नताएं। आयोग ने प्राथमिकता तय करते हुए कहा कि जेंडर समानता धार्मिक समूहों के भीतर कायम की जानी चाहिए, न कि दो भिन्न धार्मिक समुदायों के बीच में ।

इसलिए 14 जून 2023 की सूचना सीधे तौर पर कहती है कि 22 वां भारतीय विधि आयोग इस मुद्दे पर नए सिरे से विचार करने और उपाय ढूंढने को जरूरी समझता है, बिना इस बात को साफ किए कि दोबारा सोचने की जरूरत क्यों पड़ी।  आगोग  इस मुद्दे की गंभीरता को नजरअंदाज करता है,  जो कि उन तमाम लोगों के जीवन पर असर डालेगी,  खासकर महिला नागरिकों के जीवन पर।  यह बहुत अस्पष्ट रूप से बहुत सारे अदालती आदेशों का उल्लेख करती है बिना इस बात की चिंता किये कि वह कौन से अदालती आदेश हैं, और उसमें किस मुद्दे को उठाया गया है, का उल्लेख किया जाए। किसी टर्म ऑफ रेफरेंस के अभाव में यह पूरी कवायद राजनीतिक ज्यादा और कानूनी कम मालूम पड़ती है ।

स) यह काफी परेशान करने वाली बात है की विधि आयोग ने समान नागरिक संहिता पर आम लोगों और मान्यता प्राप्त धार्मिक संगठनों की राय मांगी है । सबसे बढ़कर यह त्रुटिपूर्ण अवधारणा  कि भारतीय समाज को धार्मिक आधार पर समूहों में बांटा गया है और यह माना गया है कि उसका प्रतिनिधित्व केवल धार्मिक नेता या तथाकथित मान्यता प्राप्त धार्मिक संगठन कर सकते हैं । परिणाम स्वरूप यह सार्वजनिक अधिसूचना इस बात को स्वीकार करने या मान्यता देने में असफल रहती है कि इस कानून से प्रभावित होने वाले प्राथमिक समूह में धार्मिक जातीय, जनजातीय, आदिवासी लैंगिक अल्पसंख्यक, अनिश्वरवादी निरीश्ववादी समूह की महिलाएं होंगी । इसलिए यह कदम महज पितृसत्तात्मक मान्यताओं को मजबूत करने का काम करेगा, जो यह मानती है कि  जेंडर-जस्ट पारिवारिक कानून सुधार की पहल में उपरोक्त समूह प्राथमिक हितधारक नहीं है-जो इसे गहरे तौर पर भेदभावकारी प्रक्रिया बना देता है ।  ‘वाजिब तौर पर  मान्यता प्राप्त धार्मिक संगठन’ शब्दावली भारतीय संविधान में कहीं भी उल्लिखित नहीं है, ना ही इसका उल्लेख किसी और कानून में है, जिससे धर्मनिरपेक्ष  भारतीय संवैधानिक गणतंत्र शासित होता है ।

सरकार की ओर से विरोधाभासी और परस्पर विरोधी सार्वजनिक घोषणाएं यूसीसी को लेकर भ्रम की स्थिति को बढ़ा रही हैं। 2 जुलाई 2023 को भोपाल में, प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने दावा किया कि भारत को यूसीसी की आवश्यकता है क्योंकि देश “अलग-अलग समुदायों के लिए अलग कानून” की दोहरी प्रणाली के साथ नहीं चल सकता। फिर 7 जुलाई, 2023 को गृह मंत्री अमित शाह ने नागालैंड के मुख्यमंत्री को आश्वासन दिया कि, “सरकार ईसाइयों और कुछ आदिवासी क्षेत्रों को प्रस्तावित समान नागरिक संहिता (यूसीसी) से छूट देने पर सक्रिय रूप से विचार कर रही है।” कानून और न्याय पर संसदीय समिति के अध्यक्ष सुशील मोदी ने यह भी कहा है कि छूट अनुच्छेद 371 के तहत महाराष्ट्र, गुजरात, नागालैंड, असम, मणिपुर, आंध्र प्रदेश, सिक्किम, मिजोरम और अरुणाचल प्रदेश जैसे राज्यों तक विस्तारित होगी। यदि ऐसा है, तो प्रस्तावित यूसीसी देश के किन हिस्सों और किन समुदायों में ‘एकरूपता’ लाने के लिए है? यह लैंगिक न्याय से किसकी रक्षा करेगा?

लैंगिक न्याय के संदर्भ में समरूपता समानता और  भेदभाव पर टिप्पणी

अ) इस बात को दोहराना बहुत महत्वपूर्ण  है कि भारत जैसे बहुविध विविधता पूर्ण समाज वाले देश में विभिन्न समाजों के संदर्भ में, उनके भोगे यथार्थ में समाज के भीतर और दो समाजों के बीच भी काफी विविधता होती है।

1) प्रथागत कानूनों (Customary Laws )और प्रथाओं के अपवाद अधिकांश धार्मिक कानूनों में  शामिल किए गए हैं, पाए जाते हैं।

2) आम पब्लिक धारणा के विपरीत यदि समान नागरिक संहिता लागू होती है तो हिंदू, मुस्लिम, इसाई पारसी सभी धर्मों के पर्सनल लॉ के साथ ही धर्मनिरपेक्ष कानूनों पर भी इसका असर होगा।

3) इसका प्रभाव सभी पारंपरिक कानूनों और आदिवासी एवं जनजातीय लोक व्यवहार पर पड़ेगा, जोकि संविधान के पांचवें और छठे शेड्यूल के द्वारा संरक्षित हैं। वह प्रचलन जो ना केवल परिवार और विवाह को लेकर है, बल्कि भूमि और संसाधनों के बंटवारे को लेकर प्रचलित व्यवहार को भी प्रभावित करेगा।

4) इसके अतिरिक्त प्रस्तावित समान नागरिक संहिता कानून पहले से अस्तित्व में गोवा के समान नागरिक संहिता कानूनों को भी प्रभावित करेगा जिस पर विचार किए जाने की आवश्यकता है। इस पर और अधिक विश्लेषण और समझ कायम करने की आवश्यकता है।

ब) राज्य अर्थव्यवस्था द्वारा परिवार, समाज कानून और राजनीतिक दायरे में लैंगिक रुप से हाशिये पर स्थित लोगों के अधिकार न केवल धर्म बल्कि जाति,वर्ग, प्रजातीयता या विकलांगता और यौनिकता के द्वारा निर्धारित होते हैं। इसलिए यह धारणा की एकरूपता विभिन्न पदानुक्रम के आर-पार समानता की गारंटी होगी, एक  धोखा देने वाली बात है, जो बहुसंख्यकवादी  प्रवृत्ति के लिए चोर दरवाजा खोलती है।

स) विवाह संबंधी कानूनों के संबंध में केंद्र सरकार की स्थिति विरोधाभासी बनी हुई है:

(i) विवाह समानता के मामले पर सुप्रियो @ सुप्रिया चक्रवर्ती बनाम भारत संघ, डब्ल्यूपी (सी) संख्या 1011/2022 की सुनवाई में भारत संघ का प्रतिनिधित्व करने वाले भारत के सॉलिसिटर जनरल ने विवाह कानूनों में किसी भी बदलाव या हस्तक्षेप के खिलाफ जोरदार तर्क दिया, जिसमें कहा गया कि यह परिवार, विवाह, विरासत, गोद लेने के क्षेत्रों को नियंत्रित करने वाले कानूनों में 157 से अधिक कानूनी प्रावधानों को प्रभावित करेगा।

(ii) इसके अलावा, सुप्रीम कोर्ट के समक्ष विवाह समानता मामले में केंद्र सरकार ने यह भी कहा कि विवाह एक धार्मिक संस्था है और व्यक्तिगत कानूनों के संहिताकरण के बावजूद, यह एक “संस्कार” है और इस प्रकार, व्यक्तिगत कानूनों की “पवित्रता” में हस्तक्षेप नहीं किया जाना चाहिए।

यह दोहरे चेहरे का प्रसंग है कि  एकरूपता के नाम पर, भारत का वही संघ सभी व्यक्तिगत कानूनों को खारिज कर रहा है और परिवार में लैंगिक समानता से संबंधित सभी मुद्दों को संबोधित करने के लिए एक सर्वव्यापी कानून का प्रस्ताव कर रहा है!

द) महिलाओं के खिलाफ असमान अधिकारों/भेदभाव को समाप्त करने के मामले पर, वर्तमान सरकार का रुख चयनात्मक और समस्याग्रस्त  है। उदाहरण के लिए मुस्लिम समुदायों के बीच बहुविवाह के बहुचर्चित मुद्दे को लें, जिसके आसपास यूसीसी के वर्तमान प्रचार का अधिकांश भाग केंद्रित है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण – 5 (2019-20) से पता चलता है कि बहुविवाह का प्रचलन ईसाइयों में 2.1%, मुसलमानों में 1.9%, हिंदुओं में 1.3% और अन्य धार्मिक समूहों में 1.6% है। फिर भी, मुस्लिम समुदायों के भीतर बहुविवाह पर रोक लगाने पर ध्यान केंद्रित किया गया है, विभिन्न समुदायों में ऐसे द्वि- या बहुविवाह में महिलाओं के अधिकारों को सुरक्षित करने के किसी भी स्पष्ट इरादे के बिना। इसलिए हम सवाल करते हैं कि क्या सरकार सभी महिलाओं के लिए न्याय सुनिश्चित करने के लिए यूसीसी का प्रचार कर रही है, या इसे एक समुदाय को महिलाओं के प्रति भेदभावपूर्ण होने के रूप में चिह्नित किये जाने के अवसर के रूप में उपयोग कर रही है, भले ही डेटा एक अलग वास्तविकता का खुलासा करता है।

क) इसके अतिरिक्त, इस बात का कोई संकेत नहीं है कि प्रस्तावित यूसीसी निजी डोमेन में भेदभाव को खत्म  करने के लिए 2018 से ही कानूनी परिवर्तनों को कैसे संबोधित करना चाहता है, जैसे:

(i) NALSA निर्णय, 2014 और परिणामी ट्रांसजेंडर व्यक्ति consequent Transgender Persons (Protection of Rights) Act, 2019.  के माध्यम से ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के अधिकारों की मान्यता।

(ii) विवाह, परिवार और रिश्तेदारी की उभरती और बदलती अवधारणाओं को समाज में और अदालतों के माध्यम से सभी पहचानों ( धार्मिक-सामजिक) के उन लोगों द्वारा व्यक्त किया जा रहा है जो पारिवारिक कानूनों से सबसे अधिक प्रभावित हैं।

(iii) वैवाहिक संघर्षों के समाधान  के रूप में वैवाहिक अधिकारों की बहाली की संवैधानिकता और निकाह ,हलाला की प्रथा के साथ-साथ विवाह समानता से संबंधित याचिकाएं, जो भारत के सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष लंबित हैं।

एक महिला के रूप में  जीवन और हमारी स्वतंत्रताएं बढ़ते राजनीतिक बहुसंख्यकवाद के साथ-साथ समुदाय और राज्य  के बढ़ाते रूढ़िवाद  से प्रभावित हो रही हैं, जिसमें अंतरजातीय, अंतरधार्मिक और यहां तक कि अंतर-लिंग , मित्रता और विवाह का हिंसक विरोध किया जा रहा है। विभिन्न स्थानों से नारीवादियों के रूप में, हम एकरूपता नहीं बल्कि समानता की धारणा के लिए प्रतिबद्ध हैं, और विवाह और परिवार की संरचनाओं के भीतर और बाहर महिलाओं की स्वायत्तता की पुष्टि करते हैं।

लैंगिक समानता और न्याय सुनिश्चित करने के लिए शासकीय सिद्धांत:

यह महत्वपूर्ण है कि कानून सुधार के सभी प्रयास इस समझ को पहचानें और इस समझ पर आधारित हों कि:

(i) लैंगिक असंतुलन और भेदभाव के पितृसत्तात्मक रूपों को ध्यान में रखते हुए विवाह और परिवार का क्षेत्र ऐसा होना चाहिए जिसमें परिवार और समुदाय में हाशिए पर/अल्पसंख्यक हितधारकों, जैसे कि विवाह संस्था के भीतर और बाहर की महिलाएं, समलैंगिक और ट्रांसजेंडर व्यक्ति, विकलांग व्यक्ति आदि को विवाह, तलाक, संरक्षकता, विरासत और पारिवारिक कानूनों से संबंधित अन्य मामलों में समान अधिकार प्राप्त होने चाहिए और इस प्रकार सुरक्षित किए गए अधिकार सुलभ और संरक्षित होने चाहिए, ताकि उनका प्रयोग हो सके।

(ii) इसके अलावा, कानून द्वारा संरक्षित  को लागू करने की जिम्मेवारी सम्बंधित राज्य की सुनिश्चित की जानी चाहिए। सभी महिलाओं, विशेषकर हाशिए पर रहने वाले समुदायों और स्थानों की महिलाओं के लिए नागरिक, राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक अधिकार संरक्षित करने में राज्य की भूमिका महत्वपूर्ण और महत्वपूर्ण है। नागरिकों, विशेष रूप से अपने परिवारों के साथ तनाव  में रहने वाले लोगों को दी गई मजबूत और सम्मानजनक सामाजिक सुरक्षा के आश्वासन के बिना, लैंगिक न्याय तक पहुंच और कार्यान्वयन सम्भव नहीं हो सकता है। भोजन, आश्रय, शिक्षा, स्वास्थ्य, आजीविका, पेंशन आदि की बुनियादी पात्रता एक जनादेश और दायित्व है जिसे राज्य को साक्ष्य के रूप में ठोस सकारात्मक उपायों और अधिनियमों के माध्यम से आश्वस्त करना होगा कि वह लैंगिक न्याय के बारे में गंभीर है।

(iii) लैंगिक न्यायसंगत ( जेंडर-जस्ट) पारिवारिक कानूनों की दिशा में कोई भी सुधार विविध धार्मिक कानूनों और प्रथागत प्रथाओं से सर्वोत्तम लैंगिक न्यायसंगत प्रथाओं पर आधारित होना चाहिए, जो वर्तमान समय की वास्तविकताओं के अनुरूप हों।

(iv) लैंगिक न्याय और समानता को साकार करने के लिए कानूनी प्रणाली पहुंच और सामर्थ्य के सिद्धांतों पर आधारित होनी चाहिए, खासकर हाशिए पर रहने वाले समुदायों के लिए।

(v) सभी वयस्क व्यक्तियों की व्यक्तिगत स्वायत्तता, और स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता का सम्मान किया जाना चाहिए।

हम भारत के विधि आयोग से इस गंभीर समस्याप्रद और अपारदर्शी प्रक्रिया पर पुनर्विचार करने का आग्रह करते हैं। 2018 में अपने आखिरी निष्कर्षों के बाद से पूरे पांच साल बाद इस प्रक्रिया को 30 दिनों में पूरा करने की इतनी असाधारण जल्दबाजी इस ओर इशारा करती है कि यह प्रक्रिया राजनीतिक विचारों और दुर्भावनापूर्ण इरादे से अधिक निर्देशित हो रही है, न कि लैंगिक न्याय के से, जैसा कि दावा किया जा रहा है।

हम विधि आयोग से देश भर में सार्थक सार्वजनिक परामर्शों की एक श्रृंखला बुलाने का आग्रह करते हैं ताकि यह विचार किया जा सके कि देश भर में व्यापक रूप से भिन्न-भिन्न कानूनों, रीति-रिवाजों और प्रथाओं के सामने लैंगिक समानता कैसी होगी। सांस्कृतिक और धार्मिक विविधता को देखते हुए, व्यक्तिगत और प्रथागत कानूनों में कोई भी बदलाव जटिल होना तय है, और इसे भारतीय संविधान के ढांचे के भीतर खुले, पारदर्शी, लोकतांत्रिक और समावेशी तरीके से किए जाने की आवश्यकता है। ये परामर्श तब सभी भेदभावपूर्ण व्यक्तिगत और साथ ही धर्मनिरपेक्ष नागरिक कानूनों में बहुत जरूरी बदलावों की जानकारी दे सकते हैं।

जैसा कि 21वें विधि आयोग ने सही कहा है, “पारिवारिक कानून ( Family Law )  में सुधार के मुद्दे को ऐसी नीति के रूप में देखने की जरूरत नहीं है जो व्यक्तियों की धार्मिक संवेदनाओं के खिलाफ है, बल्कि इसे केवल धर्म और संवैधानिकता के बीच सद्भाव को बढ़ावा देने वाली नीति के रूप में देखा जाना चाहिए, ताकि कोई भी नागरिक अपने धर्म के कारण वंचित न रह जाए और साथ ही प्रत्येक नागरिक के धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार को समान रूप से संरक्षित किया जा सके।”

मुद्दे पर गहरे ध्रुवीकरण और विशिष्ट समुदायों को व्यवस्थित रूप से निशाना बनाए जाने को देखते हुए, उन सभी लोगों के साथ उचित बातचीत और परामर्श के लिए अनुकूल माहौल बनाने की जिम्मेदारी LCI  पर है, जो ऐसे किसी भी कानूनी संशोधन से सबसे अधिक प्रभावित होंगे। इसके बिना, महिलाओं और अन्य कमजोर हितधारकों को, जिनके नाम पर यह अभियान कथित तौर पर किया जा रहा है, फिर से चुप करा दिया जाएगा और अदृश्य कर दिया जाएगा और पूरी कवायद केवल कुछ निहित राजनीतिक हितों की पूर्ति करेगी।

अंत में, हमारा मानना है कि विधि आयोग को परिवार-व्यवस्था में हाशिए पर मौजूद लोगों के विभिन्न नागरिक समाज संगठनों के साथ जुड़ना चाहिए। और जब आप अंततः ऐसा करेंगे तो हम आपके साथ आकर चर्चा करने को तैयार होंगे।

समान नागरिक संहिता (UCC) पर स्त्रीवादी समूहों का सबमिशन

अनुवाद: विनय ठाकुर

Contact:

  1. Saheli Resource Centre, Delhi

Email:  saheliwomen@gmail.com

Tel: Vani Subramaniam 9821198911

2. Forum Against Oppression of Women

email: faow1979@gmail.com

Tel: Chayanika Shah 9819356365

साभार: काफिला।

Name Organization
Aarti Mundkur Advocate
Abha Bhaiya Jagori G
Abirami Jotheeswaran All India Dalit Mahila Adhikar Manch
Aisha Bashir Anhad
Amritananda Chakravorty Advocate, Delhi
Amrita Johri Social activist
Anita Cheria Indian Christian Women’s Movement, ICWM
Anjali Bhardwaj Social activist
Annie Raja NFIW
Apila Sangtam Lawyer
Archana Dwivedi Researcher, Trainer
Ashima R C Saheli
Bhavna Sharma Anhad
Bondita Mrina WinG-India
Brinelle D’souza TISS
Chayanika Shah Forum Against Oppression of Women;Hasrat-E-Zindagi Mamuli
Devika Tulsiani Advocate
Dhiya Ann Mathew YWCA of India
Dr Syeda Hameed Muslim Women Forum
Erica Roseline Toppo Law Student
Eva Lance Law Student
Gurbani Kaur B. Law Student
Hasina Khan FAOW, Bebaak Collective
Jaya Sharma Activist
Jhuma Sen Advocate
Kavita Srivastava PUCL
Kunjamma Mathew YWCA of India
Madhu Bhushan Gamana Naveddu Nilladiddare
Madhu Mehra Partners for Law In Development
Maimoona AIDWA
Mannat Tipnis Advocate
Maya John Centre for Struggling Women (CSW)
Navsharan Singh Independent researcher and social activist
Neha Mishra YWCA of India
Nivedita Menon JNU
Puja Lawyer
Purnima Gupta Feminist Educator
Ratna Appnender Lawyer
Rituparna Activist, Delhi
Ruchika Khavadiya Law student
Sabah Khan Parcham
Sadhna Arya Saheli
Sagrika PLD
Saumya Uma Academic
Shabnam Hashmi Anhad
Shashi Khurana UWAD
Sheba George Activist
Shomona Khanna Advocate
Shreosi Ray Sappho
Sitamsini Ch Advocate
Uma Chakravorty Feminist Historian
Urvashi Butalia Zubaan
Vani Subramanian Saheli
Vasudha Katju Academic
Veena Gowda Advocate
Vertika Mani Lawyer PUCL
Vrinda Grover Advocate
Zeba Lawyer

मणिपुर में बलात्कार एक सुनियोजित नरसंहार का हिस्सा है।

दो महिलाओं को नग्न करके घुमाने के बाद उसके साथ बेरहमी से सामूहिक बलात्कार करने और उन्हें उपद्रवियों के हवाले छोड़ देने का कृत्य एक सुनियोजित नरसंहार है। इस घटना का एक वीडियो वायरल है। एक महिला के रूप में, यह कहना कि यह वीडियो रीढ़ तक भय और क्षोभ की झिनझिनाहट से भरा है कोई अतिशयोक्तिपूर्ण कथन नहीं है। यह किसी बात पर गुस्साये लोगों द्वारा बेहद सुनियोजित ढंग से किया गया कृत्य है। लगता है कि उनके क्रोध ने उनक विवेक को नष्ट कर दिया है। हालांकि इस कृत्य को अंजाम देने से लगता है कि वे विवेक शून्य ही थे।

हमेशा क्या करना है ये मिथ्याचारी स्त्रीद्वेषी लोग हैं जिन्हें किसी काम को पूरा करने के किराये पर लगाया जा सकता है। और वह कार्य क्या है? सरल भाषा में कहें तो यह कुकी समुदाय के लोगों के बीच इतना आतंक पैदा करने का काम है कि वे स्वेच्छा से मणिपुर से बाहर चले जाएं और जिसके बाद इम्फाल घाटी के मैतेई लोगों द्वारा उन छोड़ी गई जगहों पर कब्जा कर लिया जाएगा, यही कार्यप्रणाली रही है। यह तथ्य कि नफरत और बदले की विचारधारा से प्रेरित ये युवा खुद मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह की देखरेख में प्रशिक्षण ले रहे हैं और उन्होंने उनके प्रति अटूट वफादारी की शपथ ली है, बताने के लिए काफी है कि उन्हें एक कार्य दिया गया था और उन्होंने इसे अंजाम तक पहुंचाया है। न केवल शरीर बल्कि दो पूरी तरह से असहाय महिलाओं की आत्मा को नष्ट करने के भयानक कृत्य को दर्ज किया जाना चाहिए। इस कृत्य में परपीड़कता की झलक है, निम्नतम स्तर की चरित्रहीनता साफ दिख रही है, जिसके बारे में लोग मानते हैं कि सभ्य समाज में अब मौजूद नहीं है लेकिन क्षमा करें, मणिपुर में दूसरों के दमन, परपीड़न की प्रवृत्तियां मौजूद है और मैतेई समाज की तथाकथित महिला संरक्षकों- मीरा पैबिज- द्वारा इनका उत्साहवर्धन किया जाता है। उन्होंने अतीत में ऐसे रक्त-पिपासु खलनायकों की गिरफ्तारी को इस दलील पर रोका है कि वे मैतेई गौरव की रक्षा कर रहे हैं। और अब ‘मीरा पैबिज’- माशलची महिला संरक्षक चुप हैं! उनका दावा रहा है मानवाधिकारों के लिए मशाल जलाने का।

क्या उनके पास कहने के लिए कुछ नहीं है जब दूसरे समुदाय की महिलाओं को सबसे क्रूर दुर्व्यवहार का शिकार होना पड़ता है? क्या महिलाएं आदिवासी और जातीय वफादारियों से इतनी बंधी हो सकती हैं कि वे बैठकर अपने बेटों और भाइयों को स्त्रीत्व की पवित्रता को तार-तार करते हुए देख सकें? मणिपुर में भी बहुत सारे शिक्षाविद हैं जो इस मुद्दे पर वाक्पटुता से बात कर रहे हैं और उन्होंने खुले तौर पर पक्षपातपूर्ण रुख अपनाया है। क्या वे अब इस बर्बर कृत्य के खिलाफ बोलेंगे जो न केवल ‘कुकी-ज़ो’ महिलाओं के खिलाफ, बल्कि मानवता के खिलाफ अपराध है? किसी ने ठीक ही कहा है कि जब कोई दार्शनिक राजनीतिज्ञ बनने का प्रयास करता है, तो वह दार्शनिक नहीं रह जाता।
युद्ध में बलात्कार को एक हथियार माना जाता है। तो क्या मणिपुर में कोई युद्ध चल रहा है, जहां कुकी-ज़ो लोगों को वश में करने और आतंकित करने के लिए बलात्कार को एक उपकरण के रूप में इस्तेमाल किया गया है? इन अत्याचारों की उत्पत्ति इस कथा में है कि कुकी-ज़ो लोग मणिपुर के मूल निवासी नहीं हैं, बल्कि बर्मा की चिन पहाड़ियों से आए प्रवासी हैं।

इतिहास हमें बताता है कि कुकी-ज़ो-पाइते लोग बर्मा की चिन पहाड़ियों में रहते थे जब क्षेत्रीयता का विचार अभी तक अज्ञात था और जब आज का उनका इलाका कम ऊबड़-खाबड़ और अधिक उत्पादक लगा तो वे मणिपुर में चले गए। तथ्य यह है कि उन्हें मैतेई राजाओं ने स्वीकार कर लिया और 1820 के दशक में बर्मा के खिलाफ लड़ाई में उनके योद्धा बन गए। बर्मा में भी मैतेई रहते हैं, इसलिए यह कहना कि कुकी-चिन घुसपैठिए हैं जिन्हें अब उनके घरों और चूल्हों से बाहर निकालने की जरूरत है, न केवल किसी भी सूरत में काबिले-बर्दाश्त नहीं है, बल्कि यह इतिहास को फिर से लिखने जैसा है, जो जोखिम भरा है।

सोशल मीडिया पर बातचीत में अंतर्निहित क्रूरताएं; लोकप्रिय मैतेई गायक ताप्ता द्वारा रचित गीत, जो खुले तौर पर कुकी के नरसंहार का आह्वान करता है और जिसके खिलाफ 13 जुलाई को शत्रुता, मानहानि और हिंसा को बढ़ावा देने के लिए एक प्राथमिकी दर्ज की गई थी, सभी एक ही बात की ओर इशारा करते हैं – कुकी-ज़ो के लिए अंतर्निहित नफरत।
ध्यान रखें, तप्ता मैतेई के लिए एक नायक है। यह कुकी के प्रति जन्मजात घृणा है जो इतने समय से निष्क्रिय पड़ी है और जो अब अलग-अलग तरीकों से और विभिन्न चरमपंथी संगठनों द्वारा प्रकट हो रही है, जिनके पास हथियारों की कोई कमी नहीं है। यह पूछना ज़रूरी है कि हथियार कहां से आ रहे हैं! ताजा वीडियो का मामला, जिसने भारत और दुनिया भर में महिलाओं और पुरुषों के एक बड़े वर्ग के वजूद को झकझोर दिया है और जो अब कुकी-ज़ो समुदाय के साथ एकजुटता में खड़े हैं, केवल एक निंदा में समाप्त नहीं होना चाहिए। विवेक की इन आवाज़ों को क्षेत्र में जातीय-केंद्रित संघर्षों और दुर्लभ संसाधनों, विशेष रूप से भूमि की लड़ाई में अंतर्निहित संरचनात्मक हिंसा के ट्रिगर्स को खत्म करने पर काम करना चाहिए।आज मणिपुर को शीर्ष पर एक प्रबुद्ध व्यावहारिक व्यक्ति की जरूरत है, न कि एक ऐसे मुख्यमंत्री की जो खुले तौर पर पक्षपाती राजनीतिज्ञ है और जो मणिपुर को एक विफल राज्य में बदलते हुए देख रहा है। एक राज्य, जहां कानून का शासन खत्म हो गया है और वह केवल एक समुदाय (मैतेई ) के साथ खड़ा है। कुकी-ज़ो लोग मणिपुर की पहाड़ियों के निवासी हैं और उनके खिलाफ कोई भी उत्पीड़न तथ्यों को नहीं बदल सकता है।


अचानक के इस संघर्ष में वे शायद अब लड़ने में सक्षम नहीं होंगे। लेकिन आज के पीड़ित कल के उत्पीड़क हो सकते हैं। मनोवैज्ञानिक और मनोचिकित्सक हमें यही बताते हैं। भारत के उत्तर पूर्व में आदिवासी सुन्न मनस्थिति में हैं; वे स्तब्ध हैं, प्रतिक्रिया नहीं दे पा रहे, लेकिन वे किसी बिंदु पर प्रतिक्रिया देंगे और यह कुछ ऐसा है, जिससे भारतीय राज्य को दो-चार होना पड़ेगा, संघर्ष करना पड़ सकता है ।

याद रखें यह एक संघर्ष क्षेत्र रहा है। भारत सरकार के साथ कई समूह अपनी गतिविधियों के निलंबन के समझौते के तहत रुके हैं। यदि ये समूह भूमिगत हो जाते हैं और फिर से राज्य से लड़ते हैं तो यह देश के हितों के विरुद्ध होगा।

India Today से साभार। अनुवाद: स्त्रीकाल डेस्क

परिवारो में असमानता

इस आलेख में प्रज्ञा मेश्राम बेहद छोटी और सामान्य सी दिखती घटनाओं के जरिये समाज में सहज हो चुकी स्त्री-पुरुष असमानता को स्पष्ट कर रही हैं:

यू तो भारतीय परिवार व्यवस्था के गुणगान गाये जाते हैं। कहा यह जाता है कि हमारी संस्कृति और संस्कारो की वजह से भारतीय परिवार व्यवस्था टिकी हुई है। यह कुछ मायनो में सही है।क्योकि भारतीय परिवार व्यवस्था मे लडकियों को अलग संस्कार और लडको को अलग संस्कार दिये जाते है। लडकी को खाना बनाना आना ही चाहिये और लडको को खेलकूद मे आगे बढने मे । पूरा घर लडके के करिअर की चिंता करता है। लडकी के देखभाल उसके व्यक्तिमत्व को सवारने मे किसी को ज्यादा रुचि नहीं होती है। लडकियों को थोडा बहुत पढाया भी इसलिए जाता है ताकी अच्छा लडका घर परिवार मिले । लडकी की जिम्मेदारी शादी तक ही समझी जाती है। कई बार लड़कियां इस प्रक्रिया में पढ़ लेती हैं। अच्छी डिग्रियां ले लेती हैं।

फिर शादी के बाद लडकी की जिंदगी जैसे गीता से सीता बना दी जाती है। उससे अपेक्षा की जाती है कि वो सभी घरवालों के लिए नास्ता बनाये । बेचारी लडकी रात को इसी चिंता में सोती है की सुबह को नास्ते मे क्या बनाये ? अगर इडली डोसा बनाना है तो एक दिन पहले लिए ना बनाये।बेचारी लडकी रात कोइ सी चिंता में सोती है की सुबह को नाश्ते मे क्या बनाये ?अगर इडली डोसा बनाना है तो एक दिन पहले सुबह उसे दाल चावल़ भिगो के रखना पडता है और रात को पीस कर रखना पडता है। ढोकला, दोसा इडली के साथ कौन सी चटनी बनानी है उसकी साम्रगी घर पर लाके रखनी पडती है । साथ मे सांबर छोले भटूरे बनाने है तो रात को ही छोले भिगा कर मसाला पीस कर रखना पडता है ताकि सुबह जल्दी से नास्ता तैयार हो जाये। अब आप बोलेंगे पोहा बनाओ जल्दी हो जाता है लेकिन रोज रोज पोहा कौन खाता है भला ?

तो आपने देखा जो लडकी अपने सौहर जितना ही पढी लिखी थी, लडके जैसे ही होस्टेल मे या बाहार जाकर पढी थी, शादी हो तेही उससे अपेक्षा बदल गई जबकी लडके के साथ ऐसा कुछ बदलाव नही हुआ उल्टा उसके हाथ में टिफीन, टावल, मोबाईल, शर्ट , पॅन्ट साथ मे नास्ता खाना पानी देने वाली आ गई आप को लगेगा इसमे क्या बडी बात है। सभी करते आ रहे है। परंपरा है। इतना औरते करती ही हैं। क्या आपको इसके पिछे छिपी हिंसा नजर नही आ रही । लडकी का शोषण नही दिख रहा।एक ही जेंडर को क्यों करना है ये सब? कहाँ है समानता?

साथ में खाना खाना-
हम देखते है कि संयुक्त परिवार पद्धति में साथ में खाना खाने पर बहुत जोर दिया जाता है । कहा जाता है इससे परिवार में प्यार बढता है। पर क्या आपने गौर किया अगर प्रगतिशील घरो में भी महिला पुरूष साथ में खाना खा भी ले तो परोसता कौन है ?औरत । खाना बनाया किसने ? और कुछ कम ज्यादा लगा तो डायनिंग रूम से दौडकर किचन में किसको जाना है -नमक कम है तो औरत दौड लागाएगी, सलाद की फरमाईश हुई तो औरत बनाएगी । यहाँ पर कुछ पुरुष आकर बोलेंगे की हम भी खाना बनाते है । भाई महीने मे एक बार खाना बनाने मे और दिन में तीन बार खाना बनाने का मुकाबला क्या है?

बातचीत बंद-
घर में अगर कहा सुनी हो जाती है तो, या औरत से कुछ कम ज्यादा हो जाये तो, सीधे पुरूष बातचीतत बंद कर देते हैं- क्योंकि वह तो प्रगतिशील है, मार नही सकता । मारना गुनाह है, ये इनको पता है। या एक-आध बार एक-आध थप्पड लगा भी देते हैं। इसमे कौन सी बडी बात रहती है उनके लिए। अगर लडका बहू को मार भी रहा है यह पता भी चले तो वही संयुक्त परिवार पद्धति के घर के सद्स्य उनके बीच नही आयेंगे। उनके अनुसार ये दोनो के आपस का मामला है कहेंगे। इस बीच घरवाले बातचीत बंद कर देते है। लडकी को ही इग्नोर करते है । उसी की गलती निकालते है। ‘‘चुप्प रहना था, उस समय इसने बोलना नही चाहिए था’’। ‘‘इसने आवाज उॅंची करके बात नही करनी चाहिए थी’’। ‘‘मायके नही जाना चाहिए था’’। ‘‘सहेलियों संग जाना नही चाहिए था’’। ‘‘घर आने में देरी नही करनी चाहिए थी’’। ‘‘महंगी साडी नहीं खरीदनी चाहिए थी’’। ‘‘बाहर खाने की मांग नही करनी चाहिए थी’’। ‘‘वही जोर से हसना नही चाहिए था’’। ‘‘ऐसे कपडे नही पहनने चाहिए थे’’। ‘‘घरवालों की सेवा करेगी तो क्या मर जाएगी’’। ‘‘हमारे जमाने मे तो क्या-क्या नही करते थे’’। ‘‘ससुरालवालो तक का मारना पीटना सह लेते पर उफ्फ तक नही करते थे।” ‘‘आजकल की लड़कियां एक थप्पड नही सह सकती’’। ‘‘इनके माँ बाप कुछ संस्कार ही नही दिये लडकी को’’। ‘‘इतना पढाने से अच्छा होता घर के काम काज सिखाते लडकी को तो आज ऐसे दिन न देखने पडते’’।

छिपी हिंसा :
रात को पति का मुंह मोड़ कर सोता है, या किसी-किसी का मॅरीटल रेप होता है। तो कोई कोई कपल महीनो तक संबंध नही बनाते हैं।यह भी तो हिंसा है।अगर शादी के बाद लडकी की इच्छा होने के बावजूद उसको नौकरी या व्यवसाय नही करने दिया जाता, यह भी हिंसा ही है। वह लडकी रात-रात भर को जागकर दिनरात एक करती है। पढाई करती है और फिर किसी दिन उसकी शादी होने के कारण उसके नौकरी करने पर रोक लगा दी जाती है , यह भी तो छिपी हिंसा ही है।

दोहरा बोझ
अगर किसी घरमें नौकरी या व्यवसाय करने भी दिया जाता है।तो घर की पूरी जिम्मेदारी संभालकर नौकरी/व्ययसाय करने की अपेक्षा की जाती है। ‘‘करना है तो कर, नही तो छोड दे’’। हम ने तो पहले ही बोला था नही करना। अब ज्यादा काम होते हैं। तो हम क्या करे’’। ‘‘जबसे नौकरी करने लगी है मेरे बेटे की तरफ तो ध्यान ही नही इसका, अरे मेरे बेटे का नही कम से कम अपने बच्चों का खयाल करना चाहिए’’।तो मुझे जानना है कितने प्रतिशत पुरूष घर के काम करके नौकरी करने जाते है ? और कितने परसेंट पुरूष आफिस छुटते ही घर की ओर आते है? ‘हिरणी’ की तरह? काम से लौटते ही काम पर लग जाते है? फिर औरत पर ही क्यों है ये डबलबर्डन? इसमें औरत को मानसिक और शारीरिक हालत कमजोर होने की संभावना होती है।

नाम बदलना-
शादी के बाद कुछ लड़कियों के नाम बदले जाते हैं। कारण दिया जाता है हमारे घराने मे फलाने फलाने अक्षर की बहुएं घर के लिए सफल साबित हुई है । हमारे घर में यह नाम पहले से है । इसका भी यही नाम, उसका भी वही नाम, इसलिए।तो इस तरह के ढेरों कारण बताये जाते है।शादी के बाद पुरूष के नाम बदलते है ये सुना है कभी आपने?

सरनेम बदलना-

शादी के बाद तुरंत लड़की अपने पति की सरनेम की पूछ जोड देती है। अपना नाम बताते हुए अपना सरनेम पुरी तरह से बाद में महत्त्वपूर्ण कागजों पर भी बदल ही देती है। शादी के बाद लडकी का सरनेम बदलने के रिवाज का इतना सामान्यी करण हुआ है कि, यह पढते वक्त भी पाठकों को लगेगा यह क्या बात है, यह तो सदियों से चलता आ रहा है। अगर शादी के बाद लडके का नाम नही बदलता, तो सिर्फ लडकी का नाम ही सदियों से क्यों बदला जा रहा है?

कन्यादान-
आज भी लडकी को दान में दिया जाता है। यह दान बडी धूम धाम से हजारों लोगो के सामने दिया जाता है।कन्यादान प्रथा बंद होना जरूरी है । क्यों देना है दान ?क्या बेटादान सुना है कभी आपने?

शादी की भिन्न जिम्मेदारी-
शादी के बाद शादीसुदा दिखने की जिम्मेदारी भी औरतो पर ही है। वह शादी कर चुकी कि नहीं, यह बिन बताये समझने के लिऐ मंगलसूत्र, बिछुये पहना दिए जाते हैं और मांग मे सिंदुरभर दिया जाता है। जबकि शादी के बाद पुरूष की शादी हुई है या नही हुई है यह जानने के लिए उसके शरीर पर कोई निशानी नही लादी जाती है । न वह मंगलसूत्र पहनता है, वो मांग में सिंदुर भरता है, न वह बिछुये पहनता है।यह सब परंपरा औरतो के सिर परही मढी जाती है ।

व्रत-
करवाचौथ जैसे व्रत, छठ पूजा जैसे तमाम व्रत औरतो को ही करने पडते हैं। जबकी त्योहार मे दोहरा श्रम औरतो को करना पडता है और उपर से भूखा भी रहना पडता है ।

स्थानांतरण-
अ) घर और अपनो को छोडना-
भारतीय परिवार व्यवस्थामें शादी के बाद लडकी को ही अपना घर छोडना पडता है।उसके अपने घर छोडने पडते है।एक दो मामले मे ही लडका घरजमाई बनकर आता है। घर जमाई बनना भी समाज की नजर मे निचलेस्तर का समझा जाता है । इसमें वो सम्मान नही दिया जाता जो ‘घरबहू’बनाने मे दिया जाता है । घरजमाई भी घरबहू की तरह काम नही करते। इसमे उनको विशेषाधिकार मिल जाते हैं।

ब) शादी करते समय ही लडकी हर तरह से कमजोर देखी जाती है। लडके से कम पढी, लडके से कम हाईट की, लडके से कम कमाने वाली, लडके से कमजोर आर्थिक स्थिति की, ताकि वो शादी के बाद भी दबी हुई रहे, जो घर की राजनीति में सत्ताधारी है उसकी गुलाम बनकर रहे। शादी के बाद वह अपना मायका छोडकर लडके के घर रहने आती है।यह उसका पहला स्थानांतरण होता है। बाद में लडका जहाँ-जहाँ जाब करेगा उसके पीछे पीछे उसका भी सिर्फ घर संभालने के लिए स्थानांतरण होता है। सरकारी नौकरी वाला पति हो, तो जहाँपति का ट्रान्सफर हुआ, उसके पीछे चली जाती है।उसका करिअर, उसके सपने, इनका मोल बहुत ही कम है।

क) बिदाई-
अगर जेंडर इक्वालीटी के हिसाब से देखा जाये तो एक ही जेंडर की बिदाई प्रथा पर रोक लगानी चाहिए।विदेशों की तरह दोनो की बिदाई उनके अपने घर में होनी चाहिए।

स) वेशभूषा में परिवर्तन-
शादी के वक्त से ही लडकी की वेशभूषा में परिवर्तन अपेक्षित रहता है। टी शर्ट, लोअरमें घुमनेवाली लडकी साडी और भारी भरकम लहंगे में शादी करती है।शादी मे पारंपारिक कपडे फैशन के नाम पर पहना दिये जाते है । क्योंकि ये समाज स्वीकृत होते है । शादी के बाद लडकी जो कपडे पहनती है उसको समाज की स्वीकृति होना अति आवश्यक समझा जाता है। ज्यादा से ज्यादा सलवार पहनने की सहुलि यत कुछ परिवारों में मिल जाती है। शादी के बाद सिर्फ साडी ही नहीं पहनना होता है, साड़ी का पल्लू ओढकर घर के काम करना पडता है । यह हिंसा बुजुर्ग के मानसम्मान के नाम पर होती है। मानसम्मान लडकी को ही क्यो करना है? लडका शादी के बाद एक आध टावल, दुपट्टा ओढकर अपने ससुराल वालों का मानसन्मान क्यो नही करता? यह अपेक्षा एक ही जेंडर से क्यो की जाती है?

बच्चे किसके पास रहते है?
देखा जाता है कि, जहा स्त्री और पुरूष दोनो नौकरी करने वाले होतो हैं, घर में वापस आने के बाद घर का दोहरा बोझ औरत ही उठाती है। साथ-साथ यह भी देखा जाता है कि दोनो अलग-अलग जगह पर नौकरी पर हो तो बच्चे हमेशा नौकरी करनेवाले औरत के साथ ही रहते हैं, अगर बच्चे दूध पीते नही हों, फिर भी। यह भी बडी असमानता भारतीय परिवारो मे देखी जाती है।

इस तरह से हम देखते है अनेक घरों में विविध तरह की असमानतायें देखी जा सकती है अगर हम जागरूक होकर जेंडर-समानता की दृष्टि से देखना चाहें तो।

सामाजिक न्याय की विरासत को बचाओ यारो

एक इंसान की जिंदगी के कई पहलू हो सकते हैं– इसमें आम पहलू तो सबको पता होता है लेकिन कुछ अनछुए पहलू ऐसे होते हैं जो कभी आम नहीं हुए होते। एक बिजनेसमैन की जिंदगी के अलग पहलू हो सकते हैं तो एक कलाकार के अलग पहलू। किसी के पास सिर्फ एक ही पहलू हो सकता है तो किसी के पास कई पहलू। लेकिन एक नेता की जिंदगी के दो पहलू बहुत खास होते हैं। एक तो यह कि वह सार्वजानिक जीवन में क्या कर रहा है और दूसरा यह कि उसकी निजी जिंदगी कैसी है!

जब एक इंसान अपनी जिंदगी को सामाजिक न्याय को स्थापित करने के लिए आंदोलन की राह पकड़कर राजनीति की मंजिल तय करता है तो उसकी निजी जिंदगी कहीं गुम सी हो जाती है और उसकी राजनीतिक जिंदगी उसके व्यक्तित्व पर हावी हो जाती है। आगे चलकर यही राजनीतिक जिंदगी उसकी पहचान बनती है। इस बात को अंग्रेजी के वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक फ्रैंक हुजूर ने बड़ी ही शिद्दत से महसूस किया और पाया कि सार्वजनिक जीवन जी रहे एक व्यक्ति की राजनीतिक जीवनी बहुत सारे अनछुए पहलू भी सामने आ सकते हैं। इसी सिलसिले में फ्रैंक हुजूर ने ‘नेताजी’ के नाम से मशहूर राजनेता धरतीपुत्र मुलायम सिंह यादव की राजनीतिक जीवनी लिखने की परिकल्पना को साकार किया। इसके लिए उन्हें नेताजी से जुड़े बेशुमार लोगों से मिलना पड़ा और उनसे उन अनछुए पहलुओं पर बात करनी पड़ी जिनके बारे में भारत का राजनीतिक तबका भी ज्यादा कुछ नहीं जानता। जब यह किताब तैयार हुई तो फ्रैंक ने इसका शीर्षक रखा– ‘सोशलिस्ट: मुलायम सिंह यादव’। यह किताब मूलत: अंग्रेजी में है जिसका अनुवाद किया है नीरज कुमार ने।

किताब– सोशलिस्ट: मुलायम सिंह यादव

लेखक– फ्रैंक हुजूर

समीक्षक– वसीम अकरम

मूल्य– 499

हिंद युग्म प्रकाशन से छपी इस किताब की प्रस्तावना लिखने वाले अमेरिका के अटलांटा में स्थित सीएनएन के वरिष्ठ पत्रकार रहे मरहूम जिम सदरलैंड कहते हैं– ‘मेरे हिसाब से यही सही वक्त है जब सोशलिस्ट (एक समाजवादी) जैसी किताब लिखी जा रही है। कैसे देश के पिछड़े इलाके में भाषा पढ़ाने वाला एक मास्टर ऐसी ताकत बन जाता है और जो कामगारों की बेहतरी, उनकी हालत सुधारने और उनकी सुरक्षा के लिए कदम उठाकर दुनिया के सामने अपने राज्य को एक उदाहरण के तौर पर पेश करता है। हम उनके उदाहरण से सबक ले सकते हैं और इसे दुनिया के तमाम देशों में पिछड़े समाज की बेहतरी के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं।’

जिस सदरलैंड की यह बात निश्चित रूप से एक राजनीतिक सीख की तरह है। क्योंकि आज का राजनीतिक माहौल जिस तरह से कुत्सित हो गया है और सामाजिक समरसता का ताना-बाना छिन्न-भिन्न हो गया है, देश में सांप्रदायिकता अपने चरम पर है, ऐसे में नेताजी की राजनीतिक जिंदगी इस समाज का मार्गदर्शन कर सकती है। आज केंद्र में विपक्ष जैसी किसी ताकत की कल्पना करना भी नामुमकिन नजर आ रहा है। लेकिन नेताजी कहते थे कि विपक्ष ही लोकतंत्र का दिल होता है। यानी उनका मानना था कि बिना विपक्ष के लोकतंत्र एक तानाशाही प्रवृत्ति अख्तियार कर लेता है जो आम जनता के लिए बहुत घातक सिद्ध होता है।

इसका दूसरा पहलू यह भी है कि जो नेताजी हमेशा हिंदी की वकालत करते रहे (नेताजी अंग्रेजी के खिलाफ नहीं थे) उनकी जीवनी जब फ्रैंक हुजूर ने लिखी तो अमेरिकी बड़ी अंग्रेजी मीडिया कंपनी सीएनएन के वरिष्ठ पत्रकार जिम सदरलैंड ने इस किताब की प्रस्तावना लिखी। इससे यह बात भी साबित होती है कि नेताजी की शख्सियत दुनिया में सराही जा रही है और लोग उनकी राजनीति को भारत के लिए बेहद जरूरी मान रहे हैं। तभी तो ऑस्ट्रेलिया के कैनबरा में रहने वाले विवेक ग्लेनडेनिंग उमराव मानते हैं कि– ‘जनता और मीडिया द्वारा जिस तरह रूस में लेनिन का मान-सम्मान किया जाता है, ठीक उसी तरह मुलायम सिंह को भी भारत में जनता और मीडिया द्वारा मान-सम्मान दिया जाना चाहिए था।’ जाहिर है, समाजवाद की राह पर चलकर ही जातिवादी क्रूरता को खत्म किया जा सकता है क्योंकि भारतीय समाज में जाति-व्यवस्था के कारण ही योग्यता और प्रतिभा को अब तक अच्छी तरह से सहेजा ही नहीं जा सका है।

क्या ही अफसोस की बात है कि नेताजी के इस दुनिया से चले जाने के बाद उनकी राजनीतिक जीवनी हमारे बीच आई है। यह तो समय का चक्र है। समय का चक्र तो नेताजी का भी था जो गांव से शुरू होकर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बनने से होते हुए देश का रक्षा मंत्री बनने तक पहुंचा। समाजवादी आंदोलन के प्रखर योद्धा ‘धरतीपुत्र मुलायम सिंह यादव’ का इस दुनिया से जाना देशभर के समाजवादियों के लिए एक बड़े दुख का दिन था जब 10 अक्टूबर 2022 की सुबह 82 वर्ष की उम्र में उनका देहांत हुआ। हम सब उन्हें नेताजी के नाम से भी जानते हैं। भारत की राजनीति में एक बड़ी ही लंबी पारी खेलने वाले नेताजी कुल 9 बार विधायक रहे, 7 बार सांसद रहे, उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य के 3 बार उत्तर मुख्यमंत्री रहे और एक बार वो देश के रक्षामंत्री भी रहे। नाम से मुलायम मगर अपने राजनीतिक फैसलों के लिए उतने ही सख्त नेताजी ने कभी भी विपरीत हालात से समझौता नहीं किया। यही अदा उन्हें भारतीय राजनीति में एक कद्दावर सख्सियत की पहचान दिलाती है। हर हाल में गरीबों, पिछड़ों और वंचितों की लड़ाई लड़ने की पहचान। और इसी पहचान को अपनी लेखनी में शामिल करते हुए वरिष्ठ पत्रकार और लेखक फ्रैंक हुजूर ने नेताजी की राजनीतिक जीवनी लिखने की ठानी जो अब ‘सोशलिस्ट: मुलायम सिंह यादव’ के रूप में आपके सामने है। इस किताब के छपते ही ढाई-तीन महीने में ही इसके पहले एडिशन का बिक जाना इस बात की गवाही देता है कि नेताजी को बड़ी शिद्दत से चाहनेवाले लोग हैं।

बिहार के बक्सर में जन्मे फ्रैंक हुजूर मूलतः अंग्रेजी के लेखक और जर्नलिस्ट हैं। राँची के सेंट जेवियर्स, और दिल्ली यूनिवर्सिटी के हिंदू कॉलेज से शिक्षा प्राप्त फ्रैंक अपनी इंगलिश पोएट्री और ड्रामा (हिटलर इन लव विथ मैडोना) से चर्चित हुए। इसके बाद इन्होंने नाटक ‘ब्लड इज बर्निंग’ और ‘स्टाइल है लालू की जिंदगी’ लिखा। मात्र बीस वर्ष की उम्र में अंग्रेजी मैगजीन ‘यूटोपिया’ के संपादक बनने वाले फ्रैंक ने प्रख्यात क्रिकेटर और पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान की राजनीतिक जीवनी ‘इमरान वर्सेस इमरान: दी अनटोल्ड स्टोरी’ भी लिखी है। मुलायम सिंह की राजनीतिक जीवनी ‘सोशलिस्ट: मुलायम सिंह यादव’ लिखने के बाद फ्रैंक अपने पहले नॉवेल पर काम कर रहे हैं। फ्रैंक का यह शानदार लेखकीय सफर यह साबित करता है कि उनकी किताबें कितनी गहराई लिए होंगी। ऐसे में देशभर के सुधी पाठकों के लिए ‘सोशलिस्ट: मुलायम सिंह यादव’ किताब को पढ़ा जाना बेहद जरूरी हो जाता है।

किसी भी व्यक्ति की जीवनी का आधार उसकी जड़ों में ही निहित होता है। इसलिए राजनीतिक जीवनी को जानने-समझने से पहले यह जानना जरूरी है कि नेताजी की जड़ें कहां से लगती हैं और किस तरह वह राजनीति में आकर एक बड़े राज्य का मुख्यमंत्री बने। नेताजी का जन्म 22 नवंबर 1939 को उत्तर प्रदेश के सैफई गांव में एक यादव परिवार में हुआ था जो कि एक किसान परिवार था। जैसे-तैसे पढ़ाई पूरी करके वो अध्यापक तो बन गए लेकिन शरीर से इस पहलवान का मन पढ़ाने में नहीं लगा और राम मनोहर लोहिया के विचारों के प्रभाव में आकर महज 21 साल की छोटी उम्र में मुलायम ने अपने राजनीतिक सफर की शुरुआत कर दी। हालांकि राजनीति में कदम रखने के साथ ढेर सारी मुश्किलें उनकी जिंदगी पर हावी होती चली गईं लेकिन उन्होंने कभी पीछे पलटने के बारे में नहीं सोचा। हमेशा अपनी जड़ों से जुड़े रहे और 51 की उम्र में पहली बार 1989 में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बन गए और आखिरी सांस तक अपनी जन्मभूमि को नहीं छोड़ा। लोगों को जरा-सी प्रसिद्धि क्या मिलती है वो सब कुछ पीछे छोड़कर आगे बढ़ने लगते हैं। लेकिन मुलायम ऐसे राजनेता नहीं थे, बल्कि वो तो जननायक थे और किसानों, पिछड़ों और गरीबों की आवाज बुलंद करते रहते थे। इसीलिए पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह ने मुलायम को ‘नन्हे नेपोलियन’ के खिताब से नवाजा था।

नेताजी के समकक्षों ने इस किताब में दर्ज अपने साक्षात्कारों में यह बताया है कि समाजवाद की सशक्त आवाज और देशहित के लिए शानदार नीतियां बनाने वाले नेताजी की जिंदगी राजनीतिक आदर्शों की एक बहुत बड़ी मीनार है जहां से सांप्रदायिक सौहार्द से ओतप्रोत एक खूबसूरत हिंदुस्तान दिखाई देता है। भारतीय राजनीति के अक्षयकोष नेताजी समाजवादी सोच एवं निडर शख्सीयत थे जिसने गांव-समाज की राजनीति को सत्ता की कुर्सी पर ला बिठाया। लोहिया के सिपाही नेताजी के दिल में हमेशा गांव, खेती-किसानी, हिंदी भाषा को लेकर मुहब्बत बनी रही और यही वजह है कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में नेताजी के साहस के चलते ही आज सामाजिक रूप से पिछड़े और गरीबों का राजनीतिक प्रतिनिधित्व दिखाई दे रहा है। लेकिन इस प्रतिनिधित्व को जिस तरह से खत्म करने की साजिश चल रही है, उसमें फिर से नेताजी की जिंदगी प्रासंगिक बनके उभरती है। यह किताब इसी बात को जगह-जगह रेखांकित करती है कि आज देश में नेताजी जैसी शख्सियत की कितनी जरूरत है।

इस किताब में यह पड़ताल दर्ज है कि समाजवादी पार्टी (सपा) के संस्थापक मुलायम सिंह यादव किस तरह से लगभग पांच दशक से ज्यादा समय तक देश की राजनीति में सक्रिय रहे। उनकी पहचान एक राष्ट्रीय नेता की भले रही, लेकिन उन्होंने कभी अपनी जमीन और अपने राज्य उत्तर प्रदेश को नहीं छोड़ा और हमेशा उसे उत्तम प्रदेश बनाने के बारे में सोचते रहे, तत्पर रहे। भले ही वह सत्ता में रहे हों या न रहे हों। इस सियासी मुहिम में वो एक हद तक कामयाब भी हुए लेकिन राजनीतिक जिंदगी में कुछ खास करने के मौके भी कुछ साल के लिए ही आते हैं।

इस राजनीतिक जीवनी को पढ़ते हुए नेताजी के विचारों और उनके चिंतन को समझा जा सकता है। धर्मनिरपेक्षता और समाजवाद को मजबूत करने की उनकी सोच इतनी गहरी थी कि इसके लिए वो राज्य के किसी भी कोने में अपने कार्यकर्ताओं से मिलने पहुंच जाते थे और उनको संबल प्रदान करते थे। इस बारे में नेताजी के चचेरे भाई रामगोपाल यादव बताते हैं कि– ‘उत्तर प्रदेश में ऐसी कोई तहसील नहीं जहां के गांवों में नेताजी न गए हों। लोगों से मिलना उन्हें अच्छा लगता था क्योंकि लोगों से मिलकर ही उनका दुख-दर्द समझा जा सकता है।’ शायद इसीलिए उन्हें धरतीपुत्र कहा जाता है।

कुल 39 अध्यायों वाली इस किताब में कुछ अध्याय तो इतने प्रासंगिक हैं कि उन्हें देश-दुनिया के विश्वविद्यालयों के राजनीतिक विभागों में पढ़ाए जाने की जरूरत है। उन अध्यायों में– नन्हा समाजवादी, शहनाई की गूँज, सियासत भी रोमांस भी, सियासत और जंगबाजी, समाजवाद की राह, किसानों का मसीहा, क्रांति रथ का घूमता पहिया, गुलाब क्रांति, मंडल और कमंडल की आग, मंदिर या मस्जिद, जिसका जलवा कायम है उसका नाम मुलायम है, धर्मनिरपेक्षता का रक्षा कवच, कार्यकर्ताओं के अभिभावक, जमीन से निकला मजबूत समाजवादी, और मुलायम बनाम लेनिन आदि प्रमुख हैं। इन अध्यायों के शीर्षक से यह साफ जाहिर है कि नेताजी की राजनीतिक राह बिल्कुल भी आसान नहीं रही होगी। और जाहिर है, मुश्किल राहें ही तो आगे आने वाले पथिकों के लिए बेहतरीन मार्गदर्शक बनती हैं। इसलिए यह किताब राजनीति के विद्यार्थियों के लिए, मीडिया के क्षेत्र में राजनीतिक अध्ययनों के लिए और शोध छात्रों के लिए किसी मार्गदर्शक से कम नहीं है।

लोहिया की राजनीति के ब्राइट स्कॉलर-स्टूडेंट प्रोफेसर आनंद कुमार जेएनयू से समाजशास्त्र के रिटायर्ड प्रोफेसर हैं और वह आम आदमी पार्टी के संस्थापकों में से एक हैं। प्रोफेसर आनंद कुमार बताते हैं– ‘अगर देश भर में किसी ने लोहिया को जिंदा रखा है तो वो मुलायम सिंह ने उत्तर प्रदेश में जिंदा रखा है। मुलायम के कई अच्छे कामों में यह सबसे बड़ा कामयाब काम है। बहुत हिम्मत की बात थी। अपनी मजबूरियों के बीच में नेताजी ने ऐसा कर दिखाया। मुलायम को राम मनोहर लोहिया का राजनीतिक वारिस भी कह सकते हैं क्योंकि यदि किसी ने लोहिया के समाजवाद को सत्ता तक पहुँचाया है तो वो मुलायम सिंह ही हैं।’ यह सच बात है– आज हिंदुस्तान में अगर समाजवाद कुछ बचा हुआ है तो वह मुलायम की ही देन है। यह किताब इस बात की ओर इशारा भी करती है कि जिस तरह आज सांप्रदायिकता का माहौल बना हुआ है उसमें मुलायम का समाजवाद कितना जरूरी हो जाता है। लोहिया के समाजवाद को तो मुलायम आगे ले आए, लेकिन क्या ऐसा कोई नेता है जो मुलायम की विरासत यानी उनके समाजवाद को आगे लेकर जाए ताकि सांप्रदायिकता को कड़ी टक्कर देकर कुत्सित राजनीति को सामाजिक न्याय के हथौड़े से बार-बार ‘ऑर्डर’ कहकर किसी कोने में बिठाया जा सके। ऐसा हुआ तभी देश में समरसता का समाज स्थापित हो पाएगा।

मुलायम की राजनीतिक शख्सियत के अनछुए पहलुओं को सामने लाने के लिए लेखक फ्रैंक हुजूर ने एक से बढ़कर एक प्रतिष्ठित और सम्मानित शिक्षाविदों, सांसदों एवं विधायकों के साथ नेताजी के साथ काम कर चुके उनके कार्यकर्ताओं के दिल की बातों को जानने की जो कोशिश इस किताब में की है, वह बहुत ही बड़े कौशल का काम है। भारतीय राजनीति का आदर्श चेहरा बन चुके नेताजी की महानता के पीछे उनके जो छुपे हुए संघर्ष हैं, उनकी जो मेहनत है, उनका जो विजन है, उनकी जो सकारात्मकता है, उन सबको बाहर लाकर फ्रैंक ने शब्दों का जो गुच्छा तैयार किया है, वह बहुत ही प्रेरणादायी है। इसके साथ ही इस किताब में मुलायम की कुछ तस्वीरें भी हैं जिनमें उनके साथ कुछ राजनीतिक तो कुछ गैर-राजनीतिक लोग मौजूद हैं। यह देखना भी अपने आप में दिलचस्प है और इस नतीजे पर पहुंचना भी है कि नेताजी ने अपने मूल्यों से समझौता न करते हुए भी किस तरह प्रतिद्वंद्वी पार्टियों के लोगों के साथ रिश्ते निभाते आ रहे थे। यह कोई राजनीति का विरला ही होगा जो अपने खिलाफ खड़े लोगों की भी इज्जत करता हो।

पेड पीरियड लीव के लिए अभियान गीत हुआ रिलीज

नई दिल्ली, 28 मई, विश्व माहवारी-स्वच्छता दिवस पर बिहार निवास में पेड पीरियड लीव (सवैतनिक माहवारी अवकाश) पर एक विचार गोष्ठी हुई एवं इस अवसर पर पेड पीरियड लीव की मांग को प्रोमोट करने के लिए एक गाने को भी रिलीज किया गया। ‘पेड पीरियड लीव’ गाने का लेखक और उसके फिल्मांकन का निदेशक सुमन्त यादव हैं तथा गायक होमेन्द्र भारती और दीक्षा धनगर हैं। इसे मयारू स्टूडियो ने प्रोड्यूस किया है। इसे 28 मई को ब्रॉडकास्ट रिलीज खबर लोक चैनल ने किया।

 

गौरतलब है कि बिहार पहला राज्य है जहां 1992 में दो दिवसीय सवैतनिक पीरियड अवकाश घोषित की गयी थी। महिला संगठनों की मांग पर सरकारी महिलाकर्मियों के लिए महीने में दो दिन के विशेष अवकाश की व्यवस्था तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद ने की थी।

ओडिशा के संबलपुर की रहने वाली कानून की पढ़ाई कर चुकी रंजीता प्रियदर्शिनी ने अपनी नौकरी छोड़कर पेड पीरियड अभियान शुरू किया है। रंजीता ओडिशा, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश, दिल्‍ली, राजस्‍थान, बिहार, मध्‍य प्रदेश, हरियाणा, पश्चिम बंगाल, मणिपुर, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, पुडुचेरी व झारखंड समेत अन्य कई राज्‍यों के नेताओं से मुलाकात कर पेड पीरियड लीव लागू करवाने के लिए ज्ञापन दे चुकी है।कामकाजी महिलाओं को पेड पीरियड लीव की सुविधा मुहैया करवाने के लिए वह केंद्रीय मंत्रियों से भी मिलती रही हैं।

रंजीता के अभियान ने कई निजी कंपनियों में पेड पीरियड लीव लागू कराया है। रंजीता लंबे दौर तक कॉरपोरेट में एचआर में काम कर चुकी हैं और अपने काम के लिए नेशनल सम्मानों से सम्मानित भी हैं।

उनकी पहल पर बिहार निवास में गोष्ठी का आयोजन किया गया।
मुख्य अतिथि थे विधायक ललन कुमार, जिन्होंने बिहार विधानसभा में बजट सत्र में यह मांग उठाई कि निजी क्षेत्रों में भी यह छुट्टी मिले।

हालांकि जिस दिन विधायक ने यह मांग की उसके दूसरे दिन ही बिहार में ठेके पर कार्यरत महिला कर्मियों को पेड माहवारी लीव की सुविधा से वंचित कर दिया गया था। जिसका व्यापक विरोध हुआ।

इस पृष्ठभूमि में बिहार निवास में हुई गोष्ठी बेहद महत्वपूर्ण है। पेड पीरियड लीव के लिए गाने को रिलीज करने के बाद इस पर इसी नाम से फ़िल्म बनाने की घोषणा भी पेड पीरियड गाने के निदेशक सुमन्त यादव ने किया।

इस अवसर पर स्त्रीकाल के सम्पादक संजीव चंदन , छत्तीसगढ़ में सीआरपीएफ बोर्ड मेम्बर, डा. आशा, सुप्रीम कोर्ट की अधिवक्ता अनिता महापात्रा आदि वक्ताओं ने पेड लीव की आवश्यकता पर बात की और इस अभियान को समर्थन दिया।

वक्ताओं ने इस अभियान को एक व्यक्ति के रूप में महिलाओं को स्वीकार किये जाने का एक अभियान और प्रसंग बताया। माहवारी महिला स्वास्थ्य से जुड़ा मामला है और उनके रिप्रोडक्टिव राइट्स से भी।

रंजीता जुनून और जज्बे व समझदारी से काम पर लगी है। यह गोष्ठी उसी शाम हुई जब भारतीय रिपब्लिक की विदेश मंत्री निर्मला सीतारामन भगवाधारी पंडितों से दूर खड़ी होने के लिए विवश की गयीं-वजह साफ है। स्त्रियां माहवारी के कारण अछूत हैं इन पंडितों के लिए।

रंजीता जहां एक ओर पेड लीव के लिए आर्टिकल 15 के रेफरेंस से राजनीतिक हस्तक्षेप के जरिये पहल चाहती हैं। वे उस देश में बोल रही हैं जहां देश की एक विधानसभा माहवारी की छुट्टी पर बात करने से इसलिए इनकार कर देती है कि ऐसे अपवित्र विषय के लिए विधानसभा नहीं है।

रंजीता प्रियदर्शिनी के अभियान को सपोर्ट करने के लिए चेंज डॉट ओरजी पर उन्हें समर्थन दें।

कार्यक्रम में कई साहित्यकार, संस्कृतिकर्मी, सोशल एक्टिविस्ट शामिल हुए।

रंजीता जल्द बिहार में लालू प्रसाद जी और माननीय मुख्यमंत्री श्री नीतीश कुमार जी व अन्य नेताओं से मिलकर अपने अभियान को गति देने वाली हैं।