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सावन और काँवर

बचपन की यादों में, कुछ धुंधली यादें हैं काँवड़ से संबंधित। 1 जुलाई से स्कूल खुलते। दो महीने की गर्मियों की छुट्टियों का अलसाया शरीर पन्द्रह- बीस दिन बाद ही रूटीन में आता। तब तक सावन की आहट होने लगती। कक्षा की सहेलियाँ दाहिने हाथ में एक-एक हरी चूड़ी पहन कर आती। दसवीं- बारहवीं की दीदियाँ सोमवार का व्रत करने लगती। पूछने पर कहतीं- माँ ने कहा है, सावन के सोमवार करने से अच्छा वर मिलता है। एक दिन घर जाकर मम्मी से पूछा तो मम्मी ने सख्त हिदायत दे डाली “हमनी किहाँ कुआँर लड़की संकर जी के ना पूजेला। संकरे जी जइसन अड़भंगी दूलहा मिली।” यह कैसा विरोधाभास ! उत्तराखंड और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में इतना सम्मान, और बिहार पूर्वी उत्तर प्रदेश में एकदम अड़भंगी! आज सोचती हूँ तो लगता है, ऐसा शायद इसलिए क्योंकि आज भी बिहार का लोक पार्वती के चयन से नाराज है। आज भी शिव को भोला, अड़भंगी और एक कन्या के अयोग्य वर मानता है। लड़कियों के ब्याह में आज भी गीत गाया जाता है- “ए अड़भंगी बर से गौरा नाहीं बियहब, भले गौरा रहिहें कुआँर….”। अधिकांश घरों में मांसाहार बंद हो जाता, पर सभी घरों में नहीं। हाँ, हम बच्चे लंच में अंडा वगैरह ले जाने से परहेज करते। इसी दौरान एक और हल्ला उठता काँवड़ ले जाने का। पूरी कॉलोनी के बड़े-बड़े लड़के, जो पढ़ाई छोड़कर घर बैठ गए थे, जो किसी काम धंधे में भी नहीं लगे थे, उनका बैचलर गिरोह काँवड़ लेकर जाता। इस बैचलर गिरोह के माता-पिता उनसे परेशान थे। वो चाहते थे दिनभर घूमता रहता है, कोई काम धंधा पकड़ ले, तो इसकी शादी करवा दें। घर वाले 15 दिन चैन की साँस लेते । पड़ोसन आंटी कहती- “जाने दो! जाएगा तो इतने दिन किसी से झगड़ा झंझट तो नहीं करेगा। क्या पता भोले बाबा इसे सद् बुद्धि ही दे दें।” शादीशुदा, बाल बच्चे वालों को तो काँवड़ ले जाने की ना फुर्सत थी, ना हौसला।

मोहल्लो में मेहंदी प्रतियोगिता होती। समूह में बैठकर, दूध वाली प्लास्टिक की थैलियों से बनी कीप से मेहंदी लगती। छोटे बच्चे भी जिद करने लगते, तो उनकी हथेलियों पर मेहंदी की बूंदे रख दी जाती। बैठे बैठे गीत भी होते- “नन्हीं नन्हीं बुंदिया रे सावन का मोरा झूलना….” हरे कपड़े पहने जाते। हाथों में हरी चूड़ियाँ। बसंती आंटी चूड़ी पहनते हुए मौज में गा उठती- “गोरी है कलाइयाँ, दिला दे मुझे हरी हरी चूड़ियाँ….” पेड़ों पर तो झूले नहीं लगते, परंतु पार्क में लटके झूलों पर भीड़ लग जाती। हलवाई की दुकानों पर घेवर की बहार होती। मन आश्चर्य चकित रहता, यह कैसी मिठाई है जो केवल सावन में ही बनती है। फिर एक दिन शोर होता काँवड़िये आ गए। सभी लोग उनके स्वागत के लिए तैयार रहते। महिलाएँ शिव भजन गाते हुए, काॅलोनी के गेट तक जाती। वह हरिद्वार से लाया जल, मंदिर में शिवलिंग पर चढ़ाते , फिर घर आते। हम बच्चे उनके हाथी जैसे फूले पैरों को देखकर डर जाते। फिर शुरू होती पैरों की मालिश और सिकाई। कुछ दिनों बाद रक्षाबंधन आ जाता, और सावन के उत्सव का समापन हो जाता। आँखें बंद करके पीछे मुड़कर देखने पर सावन में जरा सा काँवड़ दिखता है, पर आज आँखें खोल कर देखती हूँ तो काँवड़ में जरा सा सावन दिखता है।

आज काँवड़ यात्रियों की संख्या बढ़ने लगी है। जो हरिद्वार जाने में सक्षम नहीं, वह अपने नजदीक की नदियों से काँवड़ में जल लाकर, शिवलिंग पर चढ़ा रहे हैं। बिहार में देवघर की काँवड़ यात्रा प्रसिद्ध है। महिलाएँ भी काँवड़ लेकर जा रही हैं। इसी बहाने देवघर का मेला देखकर आ रही हैं। सावन में हरी चूड़ियाँ और काँवड़ के लिए केसरिया चूड़ियाँ। अब क्या करें? महिलाओं ने एक उपाय निकाला है। दो हरी और दो केसरिया मिलाकर डिजाइन बनाकर पहनने लगी हैं। पिछले वर्षों खबर देखने को मिली कि, पुत्र और पुत्रवधू माता-पिता को काँवड़ में बिठाकर ले जा रहे हैं। रेल यात्रा के दौरान देखा श्रावण स्पेशल केवल काँवड़ियों से भरी हुई है। पता चला सब काँवड़ लेकर जा रहे हैं। प्लास्टिक के काँवड़ ऊपर की बर्थ पर बांध कर रखे गए थे। एक सज्जन कह रहे थे- “काँवड़ यात्रा को आप लोग धर्म से ना जोड़िए। यह एक अभ्यास है, जो हर वर्ष दोहराया जाता है। मीलों पैदल चलने का अभ्यास। मशीनों के इस युग में तो, हम लोग पैदल चलना भूल ही गए हैं।” पिछले वर्ष खबर मिली कि उत्तर प्रदेश के कई जिलों ने काँवड़ यात्रियों की सुविधा के लिए विद्यालय बंद कर दिए हैं। इस वर्ष सुन रही हूँ कि, काँवड़ यात्रा के मार्ग में पड़ने वाली दुकानों, होटलों, फल की रेहड़ी वालों को अपना नाम लिखा बोर्ड लगाना होगा। कहा जा रहा है कि काँवड़ियों की शुद्धता, पवित्रता और शुचिता भंग ना हो इसलिए ऐसा आदेश दिया गया है। समझ नहीं आ रहा है कि केवल नाम जानने से, कैसे ज्ञात होगा कि अमुक व्यक्ति शुद्ध, पवित्र है और अमुक व्यक्ति अशुद्ध और अपवित्र!! सोच रही हूँ कि काँवड़ के बीच मनभावन सावन कहाँ खो गया है?

ईना, मीना के बहाने “अकिला फुआ”

प्रीति प्रकाश की कहानी “ईना, मीना और अकिला फुआ” के बहाने आज अकिला फुआ पर बात की जाए। यह कहानी प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका “हंस” में छपी थी। यूपी, बिहार में अकिला फुआ बहुत प्रसिद्ध चरित्र है। हालांकि वह कोई विशेष पात्र नहीं, बस अक्ल से अकिला बना लिया गया है। अकिला यानी जो ज्यादा बुद्धिमान हो, जिसके पास ज्यादा अक्ल हो। गौर तलब है कि यह प्रशंसा में नहीं बल्कि व्यंग्य में दी जाने वाली पदवी है। जैसे हर पुरुष अपनी पत्नी को व्यंग्य से “ज्यादा बुद्धिमान हो??” कहना अपना हक समझता है। चाहे वह चौथी फेल और पत्नी मैट्रिक ही क्यों ना हो (याद करें ‘दृश्यम्’ फिल्म) और यह भारतीय समाज में पूरी तरह स्वीकार्य है। पत्नी है तो कमअक्ल होगी ही।

हाँ तो पुनः आते हैं अकिला फुआ पर। अकिला फुआ ही क्यों है? चाची, काकी, दादी या मौसी क्यों नहीं? इसका जवाब है- जिसकी शादी नहीं हुई, होकर टूट गई, विधवा हो गई, अर्थात जो पति के साथ नहीं है, संतानहीन अकेली स्त्री! वही अकिला हो सकती है। ज्यादातर ऐसी स्त्रियां मायके में आश्रय लेती हैं। अपने भाई के यहाँ आश्रय मिले तो ठीक, वरना मायके के गाँव में ही दूसरा घर बना कर रहती हैं। इसलिए रिश्ते में गाँव भर की फुआ लगती हैं। ज्यादातर ऐसी महिलाएँ दबंग, वाचाल, निडर और सशक्त होती हैं। आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर भी। जीवन यापन के लिए खेतों में काम करना, सब्जियाँ बेचना, बकरी पालन, से लेकर सिलाई कढ़ाई कुछ भी करती हैं, पर दूसरे के भरोसे नहीं रहती। अकिला फुआ होने की दूसरी शर्त मुँहफट और निर्भीक होना है। इसी निर्भीकता से डर कर व्यंग्य से अकिला फुआ की उपाधि दी जाती है। अकिला फुआ का परिवार नहीं होता। बाकी महिलाओं की तरह दस तरह के झंझट नहीं होते। इस बात की ईर्ष्या से सामान्य महिलाएँ उन्हें ताना भी देती हैं (याद करें फणीश्वर नाथ रेणु की “लाल पान की बेगम” की मखनी फुआ) “बिरजू की माँ के आगे नाथ और पीछे पगहिया ना हो तब ना”01 कभी-कभी अकिला फुआ को भी घर परिवार की अभिलाषा होती है। किसी बच्चे की मालिश कर देना, दस्त लग रहे हैं तो अजवाइन की फंकी बना कर दे देना, किसी का आचार बनवा देना, शादी ब्याह में सारा इंतजाम देखना, गाँव भर के कार्यों पर नजर रखकर, वह अपनी इन अभिलाषाओं की पूर्ति कर लेती हैं। ऐसी अकिला फुआएँ हर गाँव में मिल जाएंगी।

अब बात करते हैं प्रीति प्रकाश की अकिला फुआ के बारे में। प्रीति ने पहले भी अकिला फुआ से संबंधित छोटे-छोटे प्रसंग अपने फेसबुक वाल पर पोस्ट किए हैं। यह प्रसंग तत्कालीन समस्याओं से संबंधित होते थे। 3 जुलाई 2023 की फेसबुक पोस्ट देखिए- “सर्वधर्म सर्वजाती यूपी बिहार एकीकृत पति सम्मेलन का आज आयोजन हुआ। जिसमें बहुमत से सभी पतियों ने यह निर्णय लिया कि बजाय अपनी पत्नियों को पढ़ाने के वह खुद पढ़कर एसडीएम बनेंगे। अकिला फुआ- ई मरकी लगौना सन के त बुझाता कि एसडीएम बनल दूल्हा बने खानी आसान बा।”02 “ईना मीना और अकिला फुआ” कहानी में अकिला फुआ न सिर्फ दो युवा लड़कियों को मानसिक शोषण से मुक्त करवाती हैं, बल्कि उनकी पढ़ाई भी नहीं छूटने देती। जैसा कि अकिला फुआ होती हैं, वह भी बहुत सख्त हैं। मोहल्ले वाले उन पर व्यंग्य करते हैं “अपना सुख चैन प्यारा हो, और अगर शहर में कोई भी दूसरा घर खाली हो, तो उस महिला के आसपास से गुजरो भी मत।”03 ईना और मीना द्वारा छेड़खानी की शिकायत करने पर, एक और ईना की माँ ने वापस घर आ जाने के हिदायत दी, तो वहीं दूसरी ओर अकिला फुआ संघर्ष करने की प्रेरणा देती हैं। ईना और मीना अनुसूचित जाति से आती हैं, इसलिए उनकी राह और कठिन है। उनके सपने, उनकी माँ के सपने रौंद दिए जाते, अगर अकिला फुआ नहीं होती। मोहल्ले में, घर में, बल्कि हर महिला में अकिला फुआ का होना आवश्यक है। रिश्तो में बंधी महिलाओं को भी अन्याय के खिलाफ संघर्ष करने की हिम्मत होनी चाहिए। परिवार और बाल-बच्चों वाली महिलाएँ भी अन्याय के खिलाफ बोलें। अपनी बेटियों को चुप रहना और सहना नही बल्कि बोलना और गलत का विरोध करना सिखाएँ। आज के समय में भी अकेली औरत को अपने निर्णय स्वयं लेते देखकर, उसे दबाने के लिए समाज निकल पड़ता है। अकिला फुआ जैसी दबंग महिला को देखकर, चढ़बाक, झगड़ालू, घमंडी कह कर उसे हतोत्साहित करता है। ऐसे समय में हम सबको अकिला फुआ बनने की आवश्यकता है। छोटे या बड़े अन्याय का सामना करना है। संघर्ष करना है ।प्रीति प्रकाश की कहानी यही संदेश देती नजर आती है।

संदर्भ सूची

1. “लालपान की बेगम”, फणीश्वरनाथ रेणु https://hindwi.org

2. प्रीति प्रकाश की फेसबुक वाल 03-07-2023

3. “ईना मीना और अकिला फुआ” हंस पत्रिका, अंक- दिसम्बर 2023

सुनीता मंजू

उम्मीदों के आतिशदाने

विभा रानी के कहानी संग्रह ‘आतिशदाने’ में मुस्लिम विमर्श की कहानियाँ है। अन्य विमर्शों से भिन्न मुस्लिम विमर्श वास्तव में मुसलमानों विशेषकर भारतीय मुसलामानों को जानने समझने का विमर्श है। अन्य विमर्श जहां शोषण के  विरोध, विद्रोह और सहानुभूति अथवा अधिकारों के साथ शुरू होते हैं आगे बढ़ते हैं मुस्लिम विमर्श के अंतर्गत हम यह जानने का प्रयास करते हैं कि हमारे भारत में उनका धर्म, आचार विचार त्योहार आदि का संबंध भारतीय परिवेश से किस तरह से संबंधित है, उनका इतिहास उनका विकास और भारत में उनकी स्थिति का अध्ययन मुस्लिम विमर्श के प्रमुख बिंदु है । मुस्लिम विमर्श मुस्लिम तथा गैर मुस्लिम चिंतक या लेखक द्वारा किया जाता है ।  गैर मुस्लिम उनकी स्थिति किस रूप में जानते समझते और व्यक्त करते हैं जबकि मुसलमान के लिए उनके सोचने  समझने का मनोवैज्ञानिक तरीका क्या है। वास्तव में यह मुस्लिम समाज का मनोवैज्ञानिक अध्यन भी है । कुल मिलाकर भारतीय संदर्भ में मुस्लिम विमर्श की वैचारिकी उनकी पहचान और अस्तित्व पर आए संकट पर चिंता व्यक्त करती है जिसके अंतर्गत माना जाता है कि उन्हें मुख्य धारा से जानबूझकर काटा जाता है जबकि देश के विकास में भी बराबर के सहभागी रहे हैं।जो मुसलमान भारत में जन्मे हैं शतकों से यहां रह रहे हैं वे भारतीय क्यों नहीं माने जा सकतें, उनके देश-प्रेम पर चिह्न क्यों उठाए जाते हैं और विशेषकर विभाजन के बाद उन्हें अपनी  भारतीयता बार-बार प्रमाणित क्यों करना पड़ती है। इन सभी प्रश्नों आलोक में यदि हम इन कहानियों का अध्ययन करते हैं तो पाते हैं कि ये कहानियाँ भारतीय मुसलमान को जानने समझने का एक महत्वपूर्ण जरिया बन सकती  है क्योंकि जैसा कि खुद विभा रानी भूमिका में लिखती है कि वे  बचपन से ही मुस्लिम समाज और संस्कृति से  जुड़ी रही है इसलिए उन्होंने कभी अपने भीतर इनके प्रति किसी तरह का अलगाव अनुभव नहीं किया कि यह हमसे कहीं अलग है। खानपान में बर्तन अलग रखना जैसे कुछ भेदभाव को यदि अलग कर भी दिया जाए, तो भी इनके साथ हमेशा एक मजबूत रिश्ता रहा है। खान साहेब कहानी हिन्दू चरना और अन्य गाँव वालों के साथ इस मुस्लिम परिपार के साथ पनपते विकसित होते संबंधों को बेहद खूबसूरती के साथ प्रस्तुत करती है कि भारत के लोग साझी संस्कृति, अनेकता में एकता में विश्वास रखते रहे हैं लेकिन विभाजन ने लोगों के मन मस्तिष्क के साथ साथ साहित्य में भी विभाजन कर दिया।

जबकि आरंभ से ही हमारे हिंदी साहित्य में मुस्लिम लेखक (अब्दुल रहमान, जायसी, ख़ुसरो) तथा कथा साहित्य में मुस्लिम पात्र नजर आते रहे हैं लेकिन धीरे-धीरे हिंदी साहित्य में उनकी स्थिति समाप्त होने लगी ऐसे मैं गैर-मुस्लिम द्वारा एक पूरा कथा संग्रह मुस्लिम विमर्श को समर्पित करना  हिंदी साहित्य के लिए महत्वपूर्ण देन है । मुस्लिम समाज की इन इन कहानियों के अध्ययन से हमें है समझ आता है कि सभ्यता और संस्कृति का संबंध कभी भी धर्म के साथ बांधकर नहीं देखा जा सकता बल्कि संस्कृति राष्ट्र की धरोहर है जो इतिहास के साथ बनती, बिगड़ती और विकसित होती रहती है उस पर किसी एक किसी धर्म जाति और संप्रदाय का आधिपत्य नहीं है हमारे देश में अब फ्रेंच, तुर्क, मुगल, अंग्रेज अनेक जातियां धर्म संप्रदाय के लोग आए और यही की मिट्टी में रच-बस गए देश में वे अपनी इच्छा अनुसार रहे तो हमारे देश ने भी उन्हें अपनाया और धीरे-धीरे साझा संस्कृति का विकास होने लगा पर अंग्रेजों ने भाषा के आधार पर  फूट डालो शासन करो से विभाजन की नीव बनाई । आज उस पर विभाजन की बहुत बड़ी बिल्डिंग खड़ी हो चुकी है और इस बिल्डिंग की दीवारों को तोड़ना आसान नहीं लग रहा इसलिए भी आज मुस्लिम विमर्श की जरूरत है ताकि इन दीवारों को तोड़कर पुन: एक  साझा संस्कृति विकसित हो जिसमें सभी का समान विकास हो । पर साम्प्रदायिकता और अलगाववादी विचारधाराओं ने दंगो की आग ने विकास की गति को अवरुद्ध कर दिया “लौटेगी सबीहा ?” कहानी हो या ‘इसी देश के इसी शहर में’ वर्ष 92,9/11 या 13 दिसम्बर के कुपरिणामों के बाद इनकी स्थितियों को मार्मिकता से उभरने का प्रयास करती है । मुस्लिम होने के कारण सईद साहब को घर नहीं मिल पा रहा तो आबिद मियां और सबीहा जैसे परिवार मुंबई शहर के विकसित परिवेश को छोड़ गाँव के पिछड़ेपन की और लौटने को विवश है

जब मुस्लिम स्त्री की बात आती है तो हमारे सामने बुर्के में कैद स्त्री का बिंब आता है जहाँ हम उसका चेहरा भी नही देख पा रहे उसे समझेगे कैसे ? इसी देश के इसी शहर में की टीचर नबीला को यह सुनना पड़ता है कि नजर रखो इस पर जाने हमारे बच्चों को क्या क्या पढ़ाने लग जाए या तुम ये बुर्का उतार क्यों नहीं देती ताकि उनकी औरतों जैसी लगो !  ऐसी स्थिति में मुस्लिम स्त्री को जानना समझना और भी कठिन काम है तो लेकिन विभा रानी के स्त्री पात्र अपनी मूल प्रकृति के साथ ही आते हैं जो जहां वे पितृसत्ता के साथ साथ से धार्मिक कट्टरता से भी संघर्ष कर रही हैं। उनके स्त्री पात्र अपनी सादियों की खामोशी को तोड़ रही है अब और अत्याचार सहने को तैयार नहीं बल्कि जा ज़रीना की पति के साथ हाथा-पाई होती है तो वह बराबरी का मुकाबला करती है और पुलिस में खबर करती है । बेमुद्दत कहानी की बड़ी बी अपनी बहू शब्बो को इन रूढ़ियों के खिलाफ लड़ने के लिए मानसिक रोप से तैयार कर रही है जबकि पितृसत्ता को बनाए रखने में  सास का महत्वपूर्ण योगदान रहता है     औरतें, अक्से वज़ूद, कठपुतली, रोल में परवीन अजब शीला की गज़ब कहानी स्त्रियां भी अपनी अस्मिता, आत्म चेतना और अस्तित्व दिशा के प्रति जागृत हो रहे हैं अपने साथ होने वाले भेदभाव शोषण अत्याचार के प्रति कहीं  विद्रोह करतीहैं कही बच्चों की खातिर समझौता लेकिन अपनी आवाज़ उठने की पुरज़ोर कोशिश में लगी हैं ।इन कहानियों में पिता तो बदल रहें हैं लेकिन पति का स्वरूप अभी भी कट्टरता लिए हुए है लेकिन ये औरतें पितृसत्ता विशेष कर धार्मिक कुरीतियों से रूढ़ियों से सीधे टक्कर ले रहीं हैं धर्म के नाम पर होने वाले अपने साथ अनाचारों पाखंडों के के खिलाफ संघर्ष कर रही है

किसी को जानने के लिए जब  तक आपके भीतर जिज्ञासा नहीं होगी आप जोखिम नहीं ले सकते क्योंकि जिज्ञासाएं आपको उत्तर खोजने के लिए विवश करती है, आपको साहसी बनती है अगर दूसरे को जानने समझने से पहले ही यदि आपकी आंखों पर पूर्वाग्रह के चश्मा चढ़ा दिया जाएं तो असुरक्षा, संदेह, भय और विश्वास ही पनपता है जो आपको आगे नहीं बढ़ने देता। खान साहेब के चरना नामक कपड़े देखकर समझ जाता है और मुस्लिम को अपने तांगे में नहीं बैठाता लेकिन अनजाने खान साहेब को जा लेकर जाता है तो उनसे जुड़कर उसके तमाम पूर्वाग्रह टूट जाते है विभा रानी के इस कहानी संग्रह का मकसद भी यही है कि हिन्दू मुस्लिम एक दुसरे के प्रति पूराव्ग्र्हों की दीवार को ढहा दें । यह समझना बहुत जरूरी है कि किसी भी समाज विशेष में रहने वाले लोगों का मनोविज्ञान उसके सामाजिक परिवेश के आधार पर बनता है इसके लिए आपको उनके भीतर झांकना होता है उनके व्यक्तित्व से जुड़ना होता है जब तक आप उनसे बात नहीं करेंगे उनके साथ नहीं रहेंगे आप नहीं जान पाएंगे जब आपको पहले ही समाज बता दिया जाता है कि इसे दूर रहना है फल से दूर रहो उससे दोस्ती मत करो उनका खाना नहीं खाना है तो बात कैसे आगे पड़ेगी विमर्श तो बहुत दूर की बात है। लेकिन अगर जैनेंद्र त्यागपत्र लिख सकते हैं विष्णु प्रभाकर आवारा मसीहा लिख सकते हैं प्रेमचंद ठाकुर का कुआं लिख सकते हैं तो विभा रानी आतिशदाने    लिख सकती है परदे के पीछे छिपी औरत के मन में झाँक सकती है,यह वास्तव में लेखक की प्रतिबद्धता से जुड़ा प्रश्न है क्योंकि लेखक का कोई धर्म नहीं होता

संस्कृति का संबंध मात्र ईद या होली दीवाली से नहीं होता । आज़ाद भारत में अगर हम देखे तो पायेंगे कि किस तरह से धीरे-धीरे हर राज्य, शहर मोहल्ले में हिंदू और मुस्लिमों के मोहल्ले अलग होने लगे अब जब मोहल्ले अलग होंगे तो ये दोनों एक दूसरे की संस्कृतियों को जानेंगे समझेंगे कैसे? और फिर उनके बारे में कैसे लिखा जायेगा ।    विभाजन की त्रासदी पर हमने खूब कहानी पढ़ी है और उनके भीतर के दर्द को महसूस किया है लेकिन वर्तमान समय में जिस तरह सांप्रदायिकता का रंग मनुष्यता पर हावी हो चुका है, ऐसे में मुस्लिम विमर्श की कहानी लेकर आना और यथा स्थिति को हमारे सामने रख देना आसान काम नहीं था लौटेगी सबीहा? कहानी विभाजन के दृश्यों की पुनरुक्ति लगता है जबकि वह आज़ाद भारत के बड़े शहर मुबई की कहानी है इसी तरह खान साहेब कहानी पढ़ते हुए आपको यदि रामवृक्ष बेनीपुरी का संस्मरण सुभान खान याद आ जाए आपकी संवेदनाएं आंदोलित होने लगे  तो मान लीजिये विभा रानी का प्रयास सफल है दोनों ही कहानियों में धर्म से ऊपर एक सांस्कृतिक पक्ष सामने लाती है ।    

कहानी “लौटेगी सबीहा?’ शीर्षक में भले ही प्रश्न चिह्न है लेकिन कहानी का अंत उस आशा के साथ होता है जो हमें जीने की, संघर्ष की, ताकत देता है कहानी पढ़ते हुए एक बार को लग सकता है कि विभाजन के दौरान की कहानी है वही भय के दृश्य वही असुरक्षा का माहौल, अविश्वास, भविष्य का संशय ? यह कैसा विभाजन हुआ जो आज तक सभी के मनों को विभाजित किए हुए हैं ?  सबीहा के परिवार ने इस मुंबई में और मुंबई ने सबीहा को पनाह दी, तरक्की दी, जीवन जीने का हौसला दिया लेकिन धर्म और राजनीति का ऐसा चक्रव्यूह भी रचा गया जिसमें मानवीयता पिस रही है, आज हर आम और खास इसमें फँसते चले जा रहे हैं। गाँव में  जहां सबीहा की ननदें तीसरी जमात में घर पर बैठा दी गई थी शर आकर तरक्की पसंद आबिद मियां ने उन्हें पढ़ाया लिखाया इस काबिल बनाया कि आज वे अपने पैरों पर खड़ी है , एक सामान्य सा परिवार स्वाभाविक गति से विकास कर रहा था लेकिन अचानक इस गति में ब्रेक लग गया ‘सांप्रदायिकता’ ने एक तरक्की पसंद शहर को भी नहीं बख्शा। मुंबई के दंगों ने सारा परिदृश्य बदल दिया। वे सपरिवार वापस गांव की ओर लौट रहे हैं । वापस लौटने की कोई उम्मीद है? हां है! यह उम्मीद लेखक ने उस टैक्सी वाले के रूप में दिखाई है जिसकी हँसी में पहले पूर्वाग्रह के चलते कांइयापन झलक रहा था लेकिन जब उसने गणपति बप्पा मोरया कहते हुए “उनलोगों” से कहा कि यह अपनी ही फैमिली है और वह आगे बढ़ गए ! आज सबीहा यह सोच रही है कभी तो हम वापस लौटेंगे, फिर विकास का मंजर देखेंगे । कहानी में ‘लौटना’ वस्तुतः हिंदू मुस्लिम के पहले- से संबंधों की खोज है , जिज्ञासा जरूर है जिस पर प्रश्न चिन्ह है लेकिन अंत में एक आशा भी है।”

संग्रह की प्रमुख कहानी ‘आतिशदाने’ पढ़ते हुए लगेगा ज़रीना इकबाल की प्रेम कहानी है, जिसमें इकबाल और ज़रीना विवाह के दायितों से भटक गये लेकिन भटक कर जाएंगे कहाँ? रहना तो इसी समाज में है! यह कहानी विवाह से थके-पके,संबंधों से ऊबे हुए दो लोगों के संबंधों की कहानी है जिसमें इकबाल की पत्नी या बेगम के रूप में तमाम पत्नियों के बेचारगी को भी हमारे सामने रखा है तो उनके स्वाभिमान की भी रक्षा की गई है। इनमें ख़ास यही है कि ये विभा रानी की क़लम से निकले पात्र हैं। एक टेनिस कोर्ट में बॉल से अकेले खेलते हुए खिलाड़ी की तरह विभा रानी संवादों से खेलती हैं, पात्रों के सूक्ष्म से सूक्ष्म भाव, मनोभाव और उनकी संवेदना को उजागर करतीं हैं इसलिए हर बार ‘पति-पत्नी और वो’ सभी अपनी-अपनी जगह सही लगते हैं क्योंकि ‘चोट’ बिल्कुल सही जगह लग रही है। लेखनी का बल्ला हर संवाद को चरित्र की कसौटी पर खरा उतरा प्रतीत होता है और तब आप ‘व्यक्ति’ से होते हुए पितृसत्तात्मक समाज की संरचना पर पुनः विचार करने लगते हैं जहाँ शौहर या बेगम/ पति-पत्नी एक ही साँचे में कैद कर दिए जाते हैं जिसमें पड़े-पड़े व्यक्तित्व सड़ जाते हैं, ताजी हवा के झोंके के लिए वे तरस जाते हैं, कोई नन्हा सा रोशनदान भी नहीं होता जिसकी धूप से उनका कोई चारित्रिक विकास ही हो पाए लेकिन जहाँ कहीं थोड़ी भी खुली हवा का झोंका दिखाई पड़ता है, मर्द अंगड़ाई लेने लगता है लेकिन ‘घर’ नहीं छोड़ना चाहता दोनों हाथों में लड्डू लेना चाहता है और औरत की बात करें तो अनामिका के शब्दों में वह एक ‘दरवाजा’ होती है जिसे जितना पीटा जाए वह उतना खुलती जाती है ‘ज़रीना’ एक दरवाजा है वह खुलती तो है, लेकिन अपनी शर्त पर! और यही उसके चरित्र की खूबी भी है, अब वापस उसी दरवाज़े के भीतर क़ैद नहीं होना चाहती, प्रेम की स्वच्छंद उड़ान और विवाह की कैद दोनों पक्षों को अपने-अपने ढंग से समझता है।यह एक बहुत ही दिलचस्प रोचक और विचारोत्तेजक कहानी है  आप ज़रीना की मोहब्बत और नफरत दोनों की दिलेरी पर हैरान हो सकते हैं इकबाल की तरह इकबाल से मोहब्बत की तो वह भी उतनी ही शान से और शहर को हवालात भेजा वह भी इतनी हिम्मत से।

रोल में परवीन रोल मतलब भूमिका में विभा बताना चाहती है आपकी पहचान आपके कर्मों से होती है इसलिए जब परवीन तमाम कटाक्षों को सुनकर भी अन्य लड़कियों को अपनी समझदारी और बहादुरी से गुंडों से बचा लाती है तो सभी का नजरिया बदल जाता है आज वह हीरो बन चुकी थी। ये दो साल कहानी के मिस्टर शौकत को जब नौकरी के दो साल और मिल जातें हैं तो वे खुश होने के बजाये चिंता में पड़ जाते हैं उन्हें याद आतें है अपने दोनों बेरोजगार बेटों के उदास चेहरों के साथ-साथ लाखों युवकों की बेरोजगारी। कहानी सिक्के का दूसरा पहलू हमारे सामने रखती है। हालांकि खान साहेब की ही तरह शौकत बाबू का किरदार आपको आदर्शवादी या फिल्मी लग सकता है जो जरूरत से ज्यादा नेक बेहद अच्छा नजर आता है लेकिन क्या इन पर सिर्फ इसलिए विश्वास न किया जाए क्योंकि ये मुस्लिम हैं? शौकत साहब के दोनों बेटे भी नेकमंद दानिशमंद है। यह कहानी भी इस यकीन और आशा के साथ खत्म होती है यह हमारे मुल्क के ये आफताब मेहताब और सितारे हैं उनके वजूद के चिराग को आबाद कर, इनके आसमान में आबाद रहे । खान साहब की नजरों में भी धर्म का इतना ही है कि लोग अपने काम में पूरा करें ईश्वर पर यकीन करें।

बेमुद्दत कहानी मुस्लिम समाज में इद्दत जैसी रूढ़ परम्परा का विरोध कराती है मुस्लिम औरतों की विधवा होने पर 4 महीने 10 दिन का अंधेरे कमरे में बिताने होते हैं जिस दौरान वे किसी पुरुष के संपर्क में नहीं आती लेकिन बड़ी बी को उनका 8 महीने का पोता जो की देख लेता है और उसे नए सिरे से इद्दत शुरू करनी पड़ती है। बड़ी बी बेटी जाहिदा माँ के प्रति सहानुभूति नहीं रखती लेकिन बहू शब्बो सास के लिए ननद के आगे लगभग गिड़गिड़ा रही है । ‘अमी की उम्र देखो उनके सेहत देखो यह दोहरी इद्दत उनके लिए क्या जायज है। पर बेटी अम्मी की तकलीफ को समझने की बजाय  दुगना कर रही है तुम औरत औरत के दर्द को बेहतर समझ सकती हो पर नहीं समझ रही हो। शब्बो कहती है ‘हम औरतें ही औरतों की दुश्मन है’ यह कैसा महा वाक्य है जो भाईचारे के सामने बहनापा सखियापा या सिस्टर हुड के महत्व को सामने लाना चाहता है कठपुतली कहानी की निलोफर विवाह की डोरी से बंधी नाज़ुक लड़की के दर्द को बयां कराती है। निलोफर तरह-तरह के डोरियों में फँसी हैं, यह डोरियां संबंधों की, रूढ़ियों की, जिम्मेदारियां की हैं ।

बेवजह कहानी लिखने की बहुत वजह हमारे सामने आती हैं जैसे यह कहानी लेखन की प्रतिबद्धता पर प्रश्न उठाती है  इसीलिए विभा रानी कहती है कि मैं जो यह कहानी कह रही हूं उससे आपको हँसी  आए तो हँस लेना है रोना आए तो रो लेना यदि मूड ऑफ हो तो होने दीजिए लेकिन यह मेरी मेहरबानी है विनती है प्रार्थना है गुजारिश है कि इन आफसानो को सुनकर अपना आपा मत खोइये क्योंकि यह तो एक दास्तान गोई है। बेवजह कहानी लिखने का मकसद अगर हम समझने की कोशिश करें तो सबसे पहले तो लेखक और लेखन की प्रतिबद्धता पर प्रश्न चिह्न  उठाती हैं जनता से अपील करती हैं कि अफसाना या अफवाह पर यकीन ना करो अपनी विवेक का इस्तेमाल करो क्योंकि  कल्पना की उड़ान पर आप तो हकीकत के दंगे फोड़ देंगे अपना आपा खो बैठेंगे  कहानी बेवजह लिखने की दूसरी वजह है कि जब तक आपकी जरूरत है आप एक हैं यानी संगी-साथी की जरूरत बनी रहने तक आप धर्म, जाति, संप्रदाय के झंझट में नहीं पड़ते लेकिन जैसे ही ज़रूरतें पूरी हो जाती हैं आपको धर्म, जाति, संप्रदाय सब नजर आने लगते हैं जैसे कहानी में  दो राहगीर एक ही रास्ते चलते जा रहे हैं ये राहगीर इस धरती संसार के प्राणी है जिनकी मंजिल एक है यानी मृत्यु ही सबका अंतिम लक्ष्य यदि सबका एक काशी है तो रास्ते में टकराहट क्यों? कहानी का तीसरा मकसद जो प्रत्यक्ष नजर नहीं आता लेकिन देश के विकास पर अपनी नजर गढ़ाते हुए सरकार की योजनाओं पर व्यंग करना क्योंकि गांव में भी आज विकास के नाम पर कुरूपता,अभाव, गंदगी और साम्प्रदायिक दंगे बढ़ते चले जा रहे हैं जैसे ‘गांव है क्या बाबा आदम जमाने का है जिसमें बिजली के तार है बिजली नहीं नलकूप दिखते हैं नाल में पानी नहीं और चौथा और सबसे महत्वपूर्ण मकसद है कि भगवान ईश्वर अल्लाह परम शक्ति जो भी है वह मनुष्य मनुष्यता मानव या मानवता में भेदभाव नहीं करता यह तो मनुष्य ही है जिसे ईश्वर का बटवारा कर दिया वह कहता है मेरी मर्जी क्या कहीं तुम्हारे शास्त्र में लिखा है कि हम तुम्हारे भगवान का नाम नहीं ले सकते? कहानी काल्पनिक थी मगर दंगा सचमुच का हो गया ।

अपने लोग  कहानी बस को देश के प्रतीक के रूप में हमारे सामने रखती है यह बस जिसमें सब सफर कर रहे हैं लेकिन सभी एक दूसरे को अविश्वास की नजर से देख रहे हैं। एक धर्म विशेष के बच्चे बड़े होकर क्या बनेंगे और दूसरे धर्म के बच्चे बड़े होकर क्या बनेंगे यह पहले से ही सब निर्धारित कर दिया गया जैसे माँ बाप कहते है मेरा बेटा डॉक्टर बनेगा बेटे से कोई नही पूछता कौन आतंकवादी बन जाएगा कौन देश भक्त ये कपड़ों से बिंदी सीधे पल्ले की साड़ी और सिंदूर से तय कर दिया जाता है ।  घटना प्रधान इस कहानी के दृश्य हमारे मस्तिष्क में उतरते चले जाते हैं और हृदय को आंदोलित  करते हैं। कहानी बताती है कि हम कितने असहिष्णुता और असंवेदनशील होते जा रहे हैं ।  इस कहानी में विभा रानी शाहरुख खान का उदाहरण देता है डॉक्टर कलाम का उदाहरण देकर सप्शत करना चाहती हैं कि लोकप्रिय हस्तियों के साथ है कि हम ऐसे दौर में जी रहे हैं कि यह हिंदी ह्यूमुलेशनसे गुजरना पड़ता है तो आम मुसलमान के मानसिक आघातों का क्या जिनसे वे पल पल गुजरतें है!

आतिशदाने कहानी संग्रह आपको सिर्फ इसलिए नहीं पढ़ना चाहिए कि यह मुस्लिम विमर्श की पृष्ठभूमि तैयार करती है बल्कि ये कहानियां आपको चेतना के स्तर पर संवेदनशील बनाती हैं मानवीयता का सबक सिखाती है, वर्तमान परिदृश्य में सोचने समझने के लिए भी तैयार करतीं हैं जिसे हमने नज़रन्दाज़ किया हुआ है। भाषा के स्तर पर भी देखे तो उर्दू को थोपा नहीं गया पात्र स्वाभाविक ढंग से हिन्दुस्तानी का प्रयोग कर रहें पात्रों की संकल्पना भी स्टीरियोटाइप नही अपने स्वाभाविक स्वरुप में विकसित किये गयें है जिन्हें अलग से मुस्लिम जामा पहनाने की कोशिश नज़र नहीं आती । पात्र आदर्शवादी और यथार्थवादी दोनों ही तरह के है लेकिन मंतव्य को सिद्ध करतें है । आतिशदाने की भी विचारोत्तेजक कहानियाँ बहुत सूक्ष्मता से हमें समझाती हैं हमें मुस्लिम विमर्श की क्यों आवश्यकता है!    

जनादेश की दिशा को कब समझेगा विपक्ष

पिछले 20 दिनों में दर्ज़नो इलाकों में मुसलमानों पर भीड़ द्वारा बर्बर हमले किए गए हैं.इन हमलों का दायरा अखिल भारतीय है,क्या दक्षिण क्या उत्तर,हर तरफ़ ये आग फैलती ही जा रही है.हिमांचल,तेलंगाना, मध्यप्रदेश,छत्तीसगढ़, गुजरात,उत्तर प्रदेश,हर जगह एक ही तरह का पैटर्न हैं मुसलमानों को सबक़ सिखाना,हत्या कर देना,घर गिरा देना या दूकान लूट लेना.
अगर आप ध्यान से देखें,तो क्या इस मसले पर भारतीय महादेश के किसी कोने से कोई आवाज उठ रही है-बिल्कुल नही-इतने गंभीर मसले पर नये जनादेश के बावजूद,नयी संसद में भी पुराने तरह का ही सन्नाटा पसरा हुआ दिख रहा है,सदन के अंदर संविधान तो लहराया जा रहा है,संविधान को बचा लेने की कसमें तो खायी जा रही हैं.पर सड़क पर मुसलमानों की हत्या भी, आराम से होने दिया जा रहा है,सहजता से दुकाने लूटने दी जा रही है,और उनके घरों को बुल्डोज कर दिया जा रहा है.यह सब ऐसे हो रहा है,जैसे हिंदुत्व की ताकतों को यह संवैधानिक अधिकार मिल चुका है कि वे मुसलमानों को उनकी हद में रख सकें,उन्हें उनकी हैसियत बता सके.
यह सब उन राज्यों में भी,उतनी ही बर्बरता से होने होने दिया जा रहा है,जहां पर विपक्ष की सरकारें हैं, हिमाचल में कांग्रेस की सरकार है और नाहन में संगठित भीड़ ने पीड़ित की दुकान लूट ली,बहुत सारे लोगों को नाहन छोड़कर भागना पड़ा,पर हिमाचल के मुख्यमंत्री ने अभी तक अपना मुंह नही खोला है,मोहब्बत की बंद पड़ी है.
तेलंगाना में भी,संगठित भीड़ नारे लगाती हुई,तैयारी के साथ आती है और कुर्बानी की तैयारी कर कर रहे मुसलमानों के एक समूह पर हमला कर देती है,दर्जनों लोग बुरी तरह घायल होते हैं,उन्हें अस्पताल ले जाया जाता है,अस्पताल के बाहर भी,नफ़रती भीड़ को हिंसक नारे लगाने दिया जाता है, दहशत पैदा करने दिया जाता है,इस मसले पर भी संविधान की कसमें खाने वाले लोकप्रिय कांग्रेसी मुख्यमंत्री, बोलना जरूरी नही समझते हैं,यहां भी मोहब्बत,नफ़रत का जबाब देती हुई नही दिखती है.
उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ में एक मुस्लिम नौजवान पर चोरी का इल्ज़ाम लगाया जाता है,एक संगठित भीड़ द्वारा उसे पीट-पीटकर मार दिया जाता है,पूर्वांचल में जहां चुनाव में जनता ने भाजपा को इस बार जोर का झटका दिया है वहां पीछले 15 दिनो के अंदर,दर्जन भर मसीही समुदाय के लोगों को धर्मांतरण का फर्जी आरोप लगा जेल भेज दिया गया है. वही सारा पैटर्न यहां भी दोहराया जाता है,यह सच है कि यहां पर योगी की सरकार है,जहां पर इस तरह के हमले लगातार होते ही रहते हैं..
पर यह भी तो एक नया सच है,कि अभी-अभी इस राज्य में इंडिया गठबंधन,ताकतवर होकर उभरा है,खासकर समाजवादी पार्टी को उत्तर प्रदेश की सेकुलर जनता ने खासकर अल्पसंख्यकों ने,नफ़रती राजनीति को शिकस्त देने के मकसद से,लगातार अलगाव झेलते हुए भी,भारी समर्थन दिया है,और कांग्रेस को भी मजबूत किया है..
ऐसे में लोग यह मानकर चल रहे थे,कि अब उत्तर प्रदेश में भी सपा व कांग्रेस की देह भाषा बदलेगी,वे अपने कोर्स का करेक्शन करेंगे,अपनी प्राथमिकताओं में परिवर्तन लाएंगे,पर यह भी होता हुआ नही दिखा है.
जनता का जनादेश,बेहद स्पष्ट था,भारतीय मतदाताओं ने कोई द्वंद नही रहने दिया.
संविधान,सामाजिक न्याय और सेकुलरिज्म के पक्ष में, जनता ने 18वीं लोकसभा चुनाव को एक जनमत संग्रह में तब्दील कर दिया था,हर तरह की विभाजनकारी और नफ़रती राजनीति को जोर का झटका देते हुए सामाजिक न्याय के बुनियादी प्रश्नों को संभवतः पहली बार चुनाव के केंद्र में ला दिया था.
आप इस जनादेश को इस तरह से भी समझ सकते हैं कि नफ़रत,घृणा व विभाजन की राजनीति को कमजोर किए बगैर संविधान,सामाजिक न्याय, आरक्षण व रोजगार के प्रश्न को केंद्र में लाया ही नही जा सकता था,और फिर इस चुनाव में यही हुआ भी,चरण दर चरण नफ़रती तापमान कम होता गया और सामाजिक-आर्थिक-धार्मिक असमानता से पीड़ित समुदायों की एकता बढ़ती ही गई,जिसके चलते हिंदुत्व के गढ़,अयोध्या सहित आस-पास की सभी सीटें भाजपा हार गई,वाराणसी के आस-पास की ज्यादातर सीटों को भी भाजपा ने खो दिया,और खुद ब्रांड मोदी भी हारते-हारते बचे,
इस चुनाव के जरिए जनता ने स्पष्ट इशारा कर दिया कि भारत की जो, बहुसांस्कृतिक,बहुधार्मिक, बहुजातीय या बहुभाषी विविधता है,वो उसकी कमज़ोरी नही उसकी ताकत है,यानि भारतीय गणतंत्र की केंद्रियता,बहुसंख्यकवाद में नही बल्कि बहुलतावाद में है,और सामाजिक न्याय व धर्मनिरपेक्षता असल में वो दो बुनियादी खंबे हैं,जिन्हें कमजोर करने की कोशिश, भाजपा लंबे समय से कर रही थी,जिसके चलते ही भारतीय मतदाताओं ने उसे दंडित कर, एक नया एक संदेश दिया है.
पर इस संदेश को विपक्ष कैसे ग्रहग कर रहा है,जब हम इसकी पड़ताल करने की तरफ बढ़ते हैं,तो यहां भी उत्साह के बिंदु कम मिलते हैं
लंबे समय से मुख्यधारा के विपक्ष का एक हिस्सा बहुसंख्यक सवर्ण हिंदू दायरे के अंदर ही राजनीति करता रहा है,और इस लिए सामाजिक न्याय और सेकुलरिज्म के सवाल को केंद्रिय प्रश्न मानते-समझते हुए भी,बार-बार सतही रुख़ लेता रहा है,इन बेहद गंभीर मसलों के गहराई में जाने से बचता रहा है,द्विज जातियों को नाराज़ करने का साहस नही जुटा पाता है,इसी लिए आप देखेंगे कि उन्हें A To Z का नारा देना पड़ता है, इडब्ल्यूएस का समर्थन करना पड़ता है और पसमांदा व समग्र अल्पसंख्यकों के सवालों पर चुप रहना पड़ता है.हालांकि इस विचार का असर विपक्ष के दूसरे हिस्से पर भी है,पर विपक्ष के इस दूसरे हिस्से का एक वैचारिक संकट भी है.
विपक्ष का यह दूसरा हिस्सा,मजदूर-किसान आंदोलन के ताकतवर विस्तार के जरिए,जाति और सांप्रदायिकता के प्रश्न को हल कर लेने मंसूबा पाले रहता है, बुनियादी बिंदु के बतौर इन मुद्दों को देखता ही नही है,सो अलग से इन प्रश्नों पर उसके पास कोई कार्यक्रम ही नही होता है.इसी लिए यह हिस्सा भी भारतीय गणतंत्र के इन दो बुनियादी मुद्दों के समर्थन में तो रहता है,पर इन्हें सड़कों का केंद्रीय मुद्दा बनाने या जनता के बीच ले जाने बचता रहता है.
18 लोकसभा चुनाव को भी अगर ध्यान से देखने की कोशिश करें तो पाएंगे कि भारतीय मतदाताओं ने तो जरूर अपने सामुहिक प्रयासों के जरिए,सामाजिक न्याय और धर्मनिरपेक्षता के सवालों को,चुनाव के केंद्र में ला दिया था,पर विपक्ष अपने वैचारिक-राजनीतिक संकटों के चलते,जनता के इस मूड को,ठीक-ठीक समझने में असफल रहा.विपक्ष यह बिल्कुल ही नही समझ पाया कि जिस समय सामाजिक अस्मिता का प्रश्न चुनाव के केंद्र में आ रहा था,ठीक उसी समय धार्मिक अस्मिता का प्रश्न उसी अनुपात में हाशिए पर जा रहा था.विपक्षी नजरिए में इस असंतुलन के चलते ही,कई चरण बीत जाने के बाद,सामाजिक अस्मिता के प्रश्न को तो जरूर एक स्तर पर संबोधित करने की कोशिश की गई,पर अंततः यह चुनाव भी विपक्ष द्वारा हिंदू दायरे में रह कर ही लड़ा गया.
ज्यादातर विपक्ष के घोषणापत्रों में,भाषणों में मुसलमानों-ईसाइयो का नाम तक लेने से परहेज़ किया गया.उन्हे सार्वजनिक दायरे से लगभग ओझल कर दिया गया.
चुनाव के बाद भी समूचा विपक्ष अपनी पुरानी रणनीति पर ही क़ायम है जब कि भारतीय मतदाताओं ने अपना पाठ्यक्रम बदल लिया है,जनता अपने मूल व बुनियादी प्रश्नों की ओर लौट रही है.उसे इतंजार है और उम्मीद भी है कि भारत का विपक्ष भी अपने पुराने पाठ्यक्रम को बदलेगा,एक नया कोर्स तैयार करेगा,पर ऐसा दिख नही रहा है.
ये अनायास नही है कि ठीक चुनाव के बाद लिंचिंग की घटनाएं बढ़ गई है और पटना हाईकोर्ट ने अतिरिक्त आरक्षण को रद्द कर दिया है.
असल में दोनो ही मसलों पर विपक्ष को चेक किया जा रहा है,कि क्या उनकी सड़कों पर उतरने की या जनता के बीच जाने की कोई तैयारी है,पर ऐसा कुछ भी नही दिख रहा है, विपक्ष की ऐसी कोई तैयारी नही दिख रही है.
यह तय है कि आने वाले समय में भाजपा,विपक्ष के सामने इस तरह की चुनौती बार-बार पेश करती रहेगी,क्यों कि उसे ये अंदाजा है कि बदली हुई परिस्थितियों के बावजूद,विपक्ष,इन चुनौतियां का सामने आकर,आगे भी जबाब देने से बचता रहेगा.
और वास्तव में अगर आने वाले समय में भी विपक्ष अपनी इसी पुरानी रणनीति पर ही चलता रहा,जनादेश के साथ चलने की हिम्मत नही जुटा पाया,तो निश्चित तौर पर संघ-भाजपा के लिए ताकतवर पुनर्वापसी की संभावना बराबर बनी रहेगी,जो कि भारतीय गणतंत्र के लिए बेहद चिंता का विषय होना चाहिए.

दलित कहानियों में संवेदनात्मक पक्ष, परिवर्तन और दिशा

 

दलित कहानियों में संवेदनात्मक पक्ष, परिवर्तन और दिशा

 राजकुमारी

असिस्टेंट प्रोफ़ेसर (हिन्दी )

ज़ाकिर हुसैन दिल्ली कॉलेज (सांध्य)

संवेदना मनुष्य और साहित्य की किसी भी विधा का मूलभूत आधार होती हैं। अपनी ज्ञानेंद्रियों के द्वारा ही मनुष्य जो सुखानुभूति और दु:खानाभूति करता है; उसकी अभिव्यक्ति ही वह रचना में करता रहा है। हिन्दी साहित्य में कथाओं का वृहद इतिहास रहा है, कभी कथाएँ  मौखिक तो कभी लिखित रूप में रही हैं। पाश्चत्य देशों से प्रारंभ हुई इस विधा ने हिन्दी साहित्य को अत्यंत प्रभावित किया और अंग्रेज़ी कथाओं का प्रत्यक्ष प्रभाव भी हिन्दी कथासाहित्य पर सप्ष्ट रूप में परिलक्षित होता है। आधुनिक युग में कहानी विधा का हिन्दी साहित्य में आगमन हो चुका था। भारतेंदु युग के अंतिम दशक में इस विधा की उत्पत्ति हो चुकी थी। प्रारंभिक कहानियों में सामाजिक कुरीतियों और समाज सुधार का स्वर दृष्टव्य होता है- “आज की हिन्दी कहानी गतिशील है, आधुनिकता की चुनौती को स्वीकार कर रही है और आधुनिकता एक प्रक्रिया है जिसे नई कहानी ने मूल्य में परिणित कर इसे रूढ़ बनाया है। इसीलिए नई कहानी अपने नयेपन को छोड़कर नए नाम धारण करने को विवश है।”1

नयापन और नवजागरण दलित साहित्य में भी बखूबी उभरा है। कविता, उपन्यास और कहानी, नाटक आदि विधाओं के रूप में इसे देखा जाता रहा है। इसी परम्परा में कथा के क्षेत्र में एक ख्याति प्राप्त नाम है रतनकुमार सांभरिया। सांभरिया जी दलित साहित्य लेखन के अप्रतिम साहित्यकार हैं। उनकी कहानियों में सामाजिक शोषित व्यक्तियों के संवेदनात्मक पहलुओं के साथ अस्मिताबोध, चेतना और आत्मचिन्तन की छवि   प्रत्यक्ष नज़र आती है। वर्तमान युग में हाशिए पर खड़े समुदाय और जातियों के अविकसित समाज की यथार्थ अभिव्यक्ति कथाओं में हुई है। एक ओर जहां बंजारे, कंजर, सपेरे, जैसी समस्त कहानियाँ खानाबदोश जीवन जीने वाली जातियों के खुरदुरे जीवन के कटुतापूर्ण सत्यों का उदघाटन करती हैं तो वहीं दूसरी ओर आँचलिक जीवन में सामान्य श्रमिक, लघु उद्योग से जुड़े लोगों, जातीय पेशे से जुड़े समाज, विधवा जीवन, स्त्री जीवन, विदुर पुरुष और वृद्धावस्था में कठिन परिस्थितियों में गुजरती जिंदगी और उनके साथ हो रहे मानवीय व्यवहार के सत्य को चित्रित करती हैं । ये कहानियाँ संवेदना की आत्मिक अभिव्यक्ति  को जीवंत करती हैं ।

उनकी कथाओं में सशक्त बात ये भी है कि एक ओर यथास्थिति के अनुकूल नारी पात्र अपने निर्णय स्वयं लेते हैं, तो वहीं दूसरी ओर अंतर्विरोध की स्थिति से निपटना भी भली- भांति जानते हैं। विपरीत परिस्थियों से जूझते जरूर हैं किंतु निराशावाद का दामन थामने के लिए विवश नहीं होते। जैसे-जैसे कथा आगे बढ़ती है रोचक होती चली जाती है। पाठकों को मुग्ध करने की सारी गुणवत्ता कथाओं में निहित है और वही उनके कथानक को सुदृढ़ बनाती है। संघर्षरत पात्रों को निर्मिति परिवेश की जटिलताओं को साहसपूर्वक पार करती है। आंचलिक क्षेत्र में जातीयता की जटिलता, शोषण की पराकाष्ठा, अपमान की लीक , संघर्ष का संकल्प, जन चेतना, खानाबदोश जीवन की यथार्थ अभिव्यक्ति को बड़ी ईमानदारी के साथ कथाकार ने शब्दबद्ध किया गया है।

सांभरिया जी की कहानियों में नारी शोषण, भारतीय जन जीवन, वर्ग संघर्ष, मानवीय मूल्यों की स्थापना, मानवीय संबंधों में उभरता द्वंद, बहुत गहन चिंतन हृदय को गहराई से प्रभावित करता है। कहानियों के कथ्यों में चेतनता के स्वर उभरते हैं। वृद्ध सेवक जो अपने घर को वृद्धों के लिए वृद्धाश्रम बना देते हैं, ये उनकी जिंदगी से मिले सबक से वो सीखते हैं कि बुजुर्ग होने पर एक सहारे की अवश्यकता होती है। ‘ आश्रय ‘ कहानी का कथानक इसी मूल भाव को रुपायित करता है। सेवक का बेटा जो शहर में निवास करता है वो पिता के उस घर का भी सौदा करना चाहते हैं जिसमें सेवक जी दीन दुखी, रोगग्रस्त वृद्ध व्यक्तियों को आश्रय दिए हुए हैं जिन्हें उनके परिवार त्याग चुके हैं, रिटायरमेंट और पत्नी की मृत्यु के पश्चात वे धन और मन दोनों से ही बेसहारा लोगों के जीवन का संबल बने उदारवादी भावना से ओतप्रोत सेवक अपने बेटे परमेश्वर का कंधा थपका कर कहते हैं – “परमेश्वर जी, रिटारमेंट के बाद मुझे लगा कि बहु बेटे पर आश्रित होने की बजाय मेरा घर और धन बुजुर्गों का आश्रय बन जाए। आप जब भी आश्रय आएं, बेसहारा को जरूर लाएं।”2

पिता की गीली आंखों और इन शब्दों ने अपनी अंतर्वेदना के बहाव को बहा दिया। अप्रत्यक्ष रुप में उस मकान को न बेचने की घोषणा भी कर चुके थे। उनकी कहानियाँ नए सोपानों को स्पर्श करती हुई आगे बढ़ती हैं नारी पात्र जीवन की विभिन्न चुनौतियों को स्वीकार करते हुए आजीवन संघर्षशील बने रहते हैं। अस्मिता की धुरी पर घुमती स्त्रियां बहुयामी व्यक्तित्व में दिखाई पड़ती हैं।

भारतीय कृषक वर्ग, गरीब किसानों की पीड़ा को दर्शाती कहानी ‘ खेत ‘ जिसके माध्यम से कथाकार अपनी ज़मीन खोने की टीस लिए हैं, सड़क के किनारे स्थित ज़मीन हो या सड़क से दूर किसान का लगाव उससे माँ सरीखा होता है, उसी के सहारे से अपने परिवार का लालन-पालन करते हैं। ज़मीन उनकी जिंदगी होती है। औद्योगिकीकरण के कारण पूंजीपति वर्ग की पैनी नज़र उसी ज़मीन पर गड़ी रहती है जहाँ वे अपने लाभ हेतु कारखाने, मॉल निर्मित कर एक उद्योगिक नगर बनाकर अपनी आर्थिक स्थिति को अधिक मज़बूत कर सकें, किंतु इसके परिणामस्वरूप आर्थिक रूप से कमज़ोर किसान बलि का बकरा बन जाता है।

‘हथौड़ा’ कहानी “मूर्तिकार पत्थर पर बैठकर उसे मूर्ति बनाता है। मंदिर में जब मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा हो जाती है, वह उसे छू तक नहीं पाता है। मजूर की नियति। अपना श्रम स्वेद दफन कर जिस मकान का निर्माण करता है, नांगल मंगल के बाद उसी में जाते पीछे हटता है।”3

समाज में एक ये भी परंपरा रही कि खेत मजदूरी में जाने वाले निम्न जाति के लोग जिनके खेतों में काम करते उन्हें अपना जमींदार और वे उन्हें अपने चमार, नाई होने का हक जमाते थे वे उनके अतिरिक्त किसी अन्य बड़े परिवारों का काम नहीं कर सकते थे। वैसा ही एक उदाहरण हमें ‘ चमरवा ‘ कहानी में प्राप्त होता है चमारवा एक ऐसी जाति है जो पूर्वी और हरियाणा के पश्चिमी छोर पर रहती है, चमरवा एक बाभन जाति है जो चमारों के कर्मकांडों को पूर्ण कराते रहे हैं और अपना गुजर बसर करते हैं किंतु उसकी पहचान चमारों के बीच ब्राह्मण और ब्राह्मणों के मध्य चमार की है। प्रस्तुत कहानी में दरपन ब्राह्मण का पुत्र अपने दोस्त के मशवरे पर नौकरी के लिए जाति प्रमाण पत्र बनवाता है दरपण को इस प्रमाण पत्र को देखकर क्षोभ और झल्लाहट से भरकर क्रोधित हो उठता है और जातीय घृणा के कारण बौखला उठता है – ” करण के हाथों ‘ चमार’ का प्रमाण पत्र देखकर दरपन की आँखें मशाल बन गई। बाज़ परिंदे भी इतनी तेज़ नज़र नहीं खोजता होगा, जितना दरपन ने करण के हाथ पर झपटा मारा, प्रमाण पत्र फाड़ कर चिंदियां की और चूल्हे की जलती आग में भाड़ में भूसे की तरह झोंक दी, चमार बनने चला बेवकूफ।”4 

रस्सी जल गई पर बल नहीं गया। जातीय दंभ भरने वाले दरपन का पेट हालाँकि चमारों के कर्मकांडो से चलता है उनका दिया खाते हैं , लेकिन जाति प्रमाण पत्र को देखकर उनके अन्दर निम्न जाति के प्रति घृणा की पराकाष्ठा देखने को मिलती है। मृत्यु के वक्त अछूतपन की भावना भी सपष्ट दिखाई पड़ती है।

 कहानीकार अपनी कहानियों में सामंतवाद से टकराते सजीव पात्रों का भी चित्रण करते हैं और निम्न जातियों में सामाजिक चेतना का विकास भी करते हैं। उन्होंने गैर दलित समाज के व्यवहार को यथार्थ रूप में प्रस्तुत किया है। अत्याधिक लोग जातीय अभिमान में इंसानियत को भूला  दिया गया है।

 ‘बात ‘ जैसी कहानी में विधवा सुरती मर्द की तरह अपनी दी गई ज़बान को पूरा करती है और अपने बेटे की पढ़ाई के साथ-साथ अपनी इज्ज़त की रक्षा भी कर लेती है, इससे ये सिद्ध होता है कि ज़बान का पक्का होने में कहीं भी लिंग का कोई महत्व नहीं होता। वह स्त्री-पुरुष कोई भी हो सकता है। गरीब की भी इज्ज़त आबरू होती है तथा वह मेहनतकश भी है, यही कारण है कि सुरती अपने स्वाभिमान को सुरक्षित रख पाती है। असल में वह भारत की हर श्रमिक स्त्री के स्वाभिमान का प्रतिनिधित्व करती है। ‘ काल ‘ कहानी भारतीय गरीब किसान की व्यथित कथा है जिसमें सूरदास बैल को भूख प्यास से राहत दिलाने के लिए खूंटे से खोलकर न चाहते हुए भी आज़ाद कर देता है ताकि वह मर न जाए, किंतु कुएं के निकट स्थित सूरदास बैल की मौत अकाल के कारण भूख प्यास से हो ही जाती है। जो मनुष्य और जानवर दोनों की विवशता और मौत का परिदृश्य दिखाती है।

कहानीकार अपनी कथाओं के माध्यम से भारतीय आँचलिक, शहरी क्षेत्रों के समाज में अपनी मज़बूत जड़े जमा चुकी विद्रूपताओं, पिछड़ेपन की जटिलताओं को चित्रित करते हैं।  जनजातियों की दशा, सामंती मानसिकता, अभावग्रस्त जीवन, अकाल के समय की त्रासदी, भ्रष्टाचार की दिन ब दिन बढ़ती स्थिति ग्रामीण और देश की राजनीतिक स्थिति , जीवन में तीव्रता से हो रहे परिवर्तन आदि विभिन्न पहलुओं को जीवंत वातावरण के साथ प्रस्तुत करते हैं। स्त्रियों में अपनी अस्मिता को लेकर संजीदापन, अपने अपमान के प्रति प्रतिरोध, स्वर मुखरित करने की हिम्मत बा- कमाल है। शोषित वर्ग में चेतना, मनोवैज्ञानिक बदलाव, उनकी सक्रिय भूमिका को उभारते हैं। सभी कथाएं कालक्रमानुसार आए परिवर्तन का सार्थक निरूपण हैं।

 कथ्य में नवीनीकरण मिलता है,भाषा में ठेठ खड़ी बोली, राजस्थानी के शब्द प्रयोग हुए हैं, 

“जीवन पचासेक के नीडे था।”5

खाट, गुदड़गाबा, चौसड़, आदि शब्द 

 गुण, शब्द शक्ति, लोकोक्ति, मुहावरे सभी उनके लेखन के मज़बूत पक्ष हैं। वर्णनात्मकता, प्रवहमयता, बिंब, ध्वन्यात्मकता, प्रतीकात्मकता ,कलात्मकता कथा उद्देश्य, शिल्प को विशिष्टता प्रदान करता है।

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि उनकी कहानियों में आंचलिक मिट्टी की गंध समाई है, संवेदना पक्ष जनमानस के भावों का आदान-प्रदान करने में सफ़ल है। उनकी राजस्थानी, मेवाती मिश्रित भाषा उनके कथा संसार को सजीव बनाती है। सभी कहानियां सुन्दर सौष्ठव लिए सफ़ल कहानियां हैं।

‘पाठशाला’ युवा कथाकार सुनील पंवार की वर्ष 2018 में  लिखित कहानी है। कहानी का परिवेश राजस्थान का क्षेत्र है। लेखक ने जहाँ एक ओर सामाजिक कुरीतियों और रीति-रिवाजों को दृष्टिगत कराया है, वहीं दूसरी ओर समाज के परिवर्तित स्वरूप व दलित चेतना को भी महत्वपूर्ण स्थान दिया है। कहानी ‘पाठशाला’ में नयापन ये है कि इसमें समस्याएँ एवं समाधान दोनों ही मौजूद हैं। शिक्षा के माध्यम से सामाजिक परिवर्तन होंगे ये सुनिश्चित किया गया है। शिक्षा से दृष्टिकोण बदलेंगे और फिर नवजागरण से देश बदलेगा; यही दशा और दिशा कहानी की विषयवस्तु है।

कहानी के मुख्य पात्र ‘सुखिया’ के द्वारा बाल मन की जिज्ञासाओं ने प्रश्न को जन्म दिया और तर्क ने एक दिशा। पाठशाला में जाते समय बालक सुखिया की परेशानी, मन की उलझन, पाठशाला जाने से बचने की तरकीबें, कथा को रोचक बनाती हैं। घर से पाठशाला तक पहुँचने से पूर्व मध्य मार्ग में कहानीकार ने कथा के मूल पात्र सुखिया की बौद्धिक क्षमता, पाठशाला न जाने के भिन्न-भिन्न बहाने, उसकी जिज्ञासा से उपजी तर्कशील बुद्धि, बाई में बापू को समझाने की क्षमता की पहचान व हाज़िरज़वाबी का बेजोड़ चित्रण किया है। उसकी शिक्षा से कहीं अधिक गृहकार्यों में रुचि, बाई को प्रसन्न करने और रीति-रिवाज पर प्रश्न खड़े करने की अद्भुत शक्ति को कथाकार ने सूझबूझ के साथ लिखा है। बाई स्कूल नहीं जाती वह जानता है, बाई सारा दिन काम में व्यस्त रहती है इसलिए वह उनके मर्म को पकड़ कर उनकी फिक्र में घर के काम में हाथ बटाने की तरकीब लड़ाते हुए फिक्रमंद होने का नाटक करता है। तब बाई सुखिया की चालाकी को पहचानते हुए कहती है- 

“तू मेरी फिक्र न कर सुखिया, मेरा क्या है मैं तो पराया धन हूं, बापू मेरा ब्याह कर देगा, तो मैं चली जाऊंगी।”6

बाल मन चिंताग्रस्त होकर एक और प्रश्न कर बैठता है-

“तुम कहां चली जाओगी बाई?” सुखिया ने बडे़ आश्चर्य से पूछा।

“अपने घर… और कहां?” बाई ने उत्तर दिया।

 “तुम्हारा घर?  वह कहां है बाई?” सुखिया ने कौतूहल से पूछा।

“म्हारे सासरे में।” बाई ने हल्की सी हँसी के साथ ज़वाब दिया। 

“तो क्या बापू का घर तुम्हारा नहीं है?”7

 “नहीं!” 

“ये पराया धन क्या होता है?”

“बेटी पराई हाेती है। वो ब्याह के बाद दूसरे घर चली जाती है, जैसे मां नानी का घर छोड़कर हमारे घर आई।” 

“बापू मेरा ब्याह कर देगा तो क्या मैं भी चला जाऊंगा?” सुखिया के मासूम सवाल में बड़ा आश्चर्य था एवं स्त्री मन की दृढ़ता और स्वीकार्यता भी। वह खुद को पराया मान चुकी है। यह बात सामाजिक परंपरा ने उसे सीखा दी है। 

“हा हा हा! बावले! छोरे थोड़े ही जाते हैं, बेटियां होती हैं पराई।”8 बाई उसे समझाती है।

परम्पराओं ने दर्शाया है कि स्त्री धन है, संपत्ति है। वह मनुष्य नहीं बल्कि अपनी इच्छा एवं अधिकार से वंचित एक स्थान से दूसरे स्थान पर भेजी जाने वाली वस्तु मात्र है।  वह केवल पुरुष की सत्ता की वाहक, इससे अधिक कुछ नहीं। 

दोनों बहन-भाइयों के बीच बेहद रोचक संवाद शैली है, जो पाठकों में रुचि पैदा करने के साथ ही भेदीय नीतियों का भी खुलासा करती है।

 “बाई। तुम बापू को समझाती क्यों नहीं? मैं पढ़-लिखकर क्या करूंगा?” सुखिया ने एकाएक बाई से पूछा-

“तू अनपढ़ रहकर भी क्या करेगा?” बाई ने सवाल का ज़वाब सवाल से दिया।

 “मैं खेत में बापू की मदद करूंगा। तुम्हारी काम में भी मदद करूंगा और माँ का भी हाथ बटांऊंगा।” उसने चतुराई से ज़वाब दिया।9

“बाई…! अगर मैं रोज पाठशाला जाऊंगा, तो तुम्हारे साथ पानी लेने कौन जाएगा? बापू की रोटी देने खेत में कौन जाएगा? तुम बिल्कुल अकेली हो जाओगी बाई।” सुखिया ने बाई को काम का प्रलोभन दिया ताकि बाई अपना इरादा बदल दे और उसे पाठशाला के झमेले से मुक्ति मिल जाए। वह बातें बनाने में तो बहुत माहिर था, किंतु आज बाई के सामने दाल गलती नज़र नहीं आ रही थी। बाई निरक्षर होने के बावजूद भी शिक्षा के महत्व को समझती है यही मूल कारण है कि वह सुखिया का दाखिला करवाने पाठशाला जाती है।

सुखिया की माँ बाई ही थी ये तो कहानीकार ने लिखा लेकिन क्यों थी ? ये स्पष्टीकरण पूरी कहानी में कहीं भी नहीं लिखा गया। माँ जीवित थी या नहीं थी? कामकाज से घर से बाहर रहती थी? इसलिए वह बड़ी बहन होने के नाते देखभाल करती थी? या बीमार थी? इस बात का कोई भी संकेत कथा में नहीं मिलता। बाई जो की लड़की है और निम्न वर्ग से संबंध रखती है, पराया धन भी है शायद यही कारण है कि वह पाठशाला नहीं गई या उसे पाठशाला नहीं भेजा गया। कहानी का प्रथम भाग यही है।  दूसरे भाग में पाठशाला के बाह्य रूप को चित्रित किया गया है। गांव देहात की कच्ची मिट्टी की दीवार वाली लोहे की सलाखों वाला गेट, सफेदी से अंदर की लीपी-पुती दिवारे, पेड़ों के नीचे लगी कक्षाएं, पानी के मटकों की हालत, वातावरण की वास्तविकता और सरकारी स्कूलों की जर्जर हालत को बयान करती है। सुखिया की शरारतों और बौद्धिक शक्ति से गुरू जी भी परिचित हैं, किंतु सामाजिक बाध्यताओं के आगे वे भी बेबस हैं। यही कारण है कि वे सुखिया को पढ़ाने को राज़ी तो हुए परन्तु शर्त पर कि टाट और पानी ख़ुद का होगा। क्यों कि वो पढ़े लिखे तो हैं किंतु सामाजिक परपंराओं से टकराने की ताकत उनमें भी नहीं है। दूसरी महत्वपूर्ण बात ये थी कि वह गांव का पहला बच्चा था, जो नीची जाति से विद्यार्थी जीवन में भी प्रवेश करने वाला था। 

शिक्षक किस जाति से संबंध रखता है इसका भी कोई ब्यौरा नहीं दिया गया जो कहानीकार का शुरुआती कहानी होने के कारण क्षम्य है या अंडरस्टूड बात मान सकते हैं।

लेखक शिक्षक और शिक्षा पर बहुत अहम सवाल खड़ा करते हैं कि शिक्षा भी सामाजिक वर्ण विभाजन, रीति- रिवाज, जाति भेद, लिंग भेद नहीं बदल पाई। लेकिन गुरू जी इस बात का आश्वासन देते हैं कि भविष्य में ये होगा। शिक्षा केवल सामाजिक कायाकल्प ही नहीं करेगी वह वैचारिक काया भी पलट देगी। गुरू जी एक शिक्षक होने के नाते सर्व मानवाधिकार सुखिया को देते हैं। कथा स्वतंत्र भारत की पृष्ठ भूमि में लिखी गई है इसीलिए बहुत सहजता से विद्यालय प्रवेश तो हो गया, परंतु उच्च जाति का भय अब भी गले की फांस बनी हुई है। गुरू जी अपने शिक्षक होने के कर्तव्य का भली-भांति पालन कर रहे हैं। सहयोगी के रूप में अपना योगादान, स्थिति और गलत परम्पराओं से बाहर निकलने की दिशा दे, सुखिया का मार्ग दर्शन ही नहीं, बल्कि सम्पूर्ण समाज की गलत परम्पराओं से मुक्ति का प्रतिनिधित्व भी कर रहे हैं। वहीं कहानी को नया मोड़ देने के लिए लेखक ने सुखिया की वेशभूषा सफ़ेद कमीज़ को, जिसका जिक्र विषयवस्तु के आधार पर कहानी में पूर्व में भी  होना चाहिए था, किन्तु नहीं हुआ। ऐसा लगता है जैसे कहानीकार को यकायक इसे लिखने की जरूरत पड़ी, ताकि कथा के उद्देश्य की पूर्ति हो सके। 

अंतिम भाग में डॉ.आंबेडकर के स्लोगन से चमकती दीवार शिक्षा की ताकत का महत्व बता रही है।

 “सुखिया देखो, अपने पीछे की इस भीत को देखो। जब तुम पाठशाला आए थे, तब क्या ये भीत ऐसी ही थी?” “नहीं।” 10 सुखिया ने पलटकर भीत को देखा जिस पर सफ़ेदी पुती थी, जिसने दिवारों और गिरे हुए लेवड़ो को ढक दिया था और उस पर मध्यम, मध्य में नीले रंग का अशोक चक्र बना था व नीचे बडे़ बड़े सुंदर अक्षरों से महापुरूषों के कथन अंकित थे। सुखिया उस कथन को तो पढ़ नहीं पाया किंतु भीत को देखकर उसे अच्छा लगा।

“अब ये दीवार अच्छी दिख रही है न?”

 “हां, गुरू जी।” 

“देखो। चार अक्षर लिखने के बाद ये भीत भी बोलती हुई नज़र आ रही है। इसकी दरारें, इसकी जर्जरता सब इन अक्षरों के नीचे दब गई है न?”

 “हां, गुरु जी।” 

“बस यही बदलाव लाएगी। तुम्हारी पढ़ाई-लिखाई। जिसने दीवार को जीवंत कर दिया वह एक दिन रीतियों, कुरीतियों, जाति, वर्ग और सामाजिक व्यवस्था की सभी दरारों को ढक देती। नीला रंग क्रांति का, धोला रंग शांति का। ये दोनों ही शिक्षा से संभव हो सकेंगे। समय के साथ बदलाव ज़रूर होंगे सुखिया, ज़रूर होंगे।” 11

     कहानी सफ़ेद और नीले रंग के व्यापक अर्थ को दृष्टिगत कराती है। बालमन को आंदोलित कर मुक्ति की आस, सपने जगा रही है। समस्या और समाधान दोनों ही कहानी में हैं। कहानी में तर्कसम्मत विवेचन, कहानीकार की विचारक, चिंतक छवि का बोध भी कहानी कराती है।

प्रगतिशील कहानी है, जो स्वस्थ मानसिकता वाले समाज की परिकल्पना लिए है। संवादों की जितनी प्रशंसा की जाए उतनी कम है। कहानी पूर्णतः अधिकार चेतना, सामाजिक चेतना व समानता की बात करती है व गैर दलित जाति के इंसान के दलित समाज के सहयोग को स्थापित करती कथा है। कहानी संवाद, शैली वैविध्य, मौलिकता व आत्मीय स्वर लिए है। कहानी संवादों से आरंभ होकर भविष्य के उज्ज्वल सपने और नई सुबह जो नया प्रकाश फैलाएगी; पर अंत की गई है। कथावस्तु, गठन, वाक्य संरचना, व्यंग्य विनोद व सपाटबयानी कहानी की गुणवत्ता है। इसके लिए कहानीकार श्लाध्य योग्य हैं।

  1. हिन्दी कहानी एक नई दृष्टि – इंद्र मदान – पृष्ठ -35
  2. समकालीन भारतीय साहित्य – पत्रिका मार्च, अप्रैल अंक -2021
  3. हथौड़ा – 135
  4. चमरवा रतनकुमार सांभरिया की प्रतिनिधि कहानियां – डॉ. लोकेश गुप्ता – पृष्ठ – 44

 5 – खेत और अन्य कहानियां संग्रह – रत्नकुमार सांभरिया – पेज – 90

  1. एक कप चाय और तुम (कहानी संग्रह)- सुनील पंवार -73
  2. एक कप चाय और तुम द्वितीय संस्करण –  सुनील पंवार – 73
  3. एक कप चाय और तुम –           ”            – सुनील पंवार  -74
  4.   एक कप चाय और तुम –     ”             -सुनील पंवार – वही 
  5. एक कप चाय और तुम – (कहानी संग्रह) सुनील पंवार – 75

 

 

 


 

 

 

 

 

 


 

  चमकीला का स्याह समाज  

   चमकीला का स्याह समाज  

रंगों की बात करते हुए चटकीले रंगों को हम विशेष अवसरों और लोगों के लिए जोड़ कर देखा करते हैं।स्याह ब्लैकबोर्ड पर हमें चमकीला के जीवन के चटक रंग दिखाई पड़ते हैं जो इसी समाज की देन है।‘ब्लैक बोर्ड’ यानी समाज और समाज का एक ख़ास वर्ग जिसे जीवन की “रंगीनियां” या कि खुशियाँ ‘चमकीला’ के गीतों में मिलती है। चमकीला “आज भी चमक रहा है” संभवतः इम्तियाज भी जानते हैं कि ‘चमकीला’  ही वो कलाकार है जिसकी लोकप्रियता को ‘चमकीली पन्नी’ की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है। इम्तियाज उसकी इसी लोकप्रिय छवि को भुना रहा है हालाँकि  ‘भुनाया’ शब्द कहना ठीक नहीं होगा। असल में चमकीला जिस “ब्लैक बोर्ड” पर आज भी चमक रहा है, इम्तियाज उस “ब्लैक बोर्ड” की कहानी कह रहें है जो चमकीला के गीत सुनकर रंगीन होना चाहता है। चमकीला के बहाने  इम्तियाज कला-क्षेत्र के उस काले सच को भी दिखा रहें है जिसमें प्रतिस्पर्द्धा बढ़ने पर ईर्ष्या के वशीभूत षड्यंत्र हत्याएँ की जाती रहीं है, ‘कला’ फिल्म से पता चला कि जगन का किरदार उस समय के वास्तविक गायक मदन से प्रेरित है जिसे मात्र 14 -15 वर्ष कम उम्र में, उसकी बढ़ती लोकप्रियता देखकर उसके ही साथी गवैयों ने दूध में पारा देकर हत्या कर दी। एक साक्षात्कार में स्वर कोकिला लता मंगेशकर ने बताया था कि उन्हें धीमा ज़हर देकर मारने की कोशिश की गई। स्थापित कलाकारों द्वारा नए कलाकारों को उभरने न देने के किस्से भी हम सुनते ही रहते हैं। पंजाब में कला क्षेत्र में जातिगत भेदभाव पर पंजाब के हमारे मित्र ‘सत्येन्द्र मट्टू’ याद करते हुए बताते हैं कि उस समय भी चमकीला हर घर में सुना जाता था अखाड़ें में भी और छिप छिपकर भी। ‘चमकीला’ की हत्या के संदर्भ में लिखतें है- यहां (पंजाब) जातिवाद और गायकों की आपसी रंजिश भी एक बड़ा कारण रही थी। चमकीला आज से करीब 30 साल पहले भी अपने शीर्ष पर था और आज भी है। उसके गीतों में समाज का ताना-बाना भी है और आदमी औरत के सम्बन्धों पर गीत और मज़ाकिया प्रश्नोतरी भी है। उसने क्या गाया, इसे एक तरफ रखें तो ऐसे कलाकार विरले ही होते है”। कहा जाता है कि अमरजोत से दूसरी शादी करने के बाद दोनों की लोकप्रियता अधिक हो गई कनाडा,यूएस, दुबई बहरीन जैसे देशों में लाइव शो किये और अब शादी में गाने के लिए 4000 रूपये लिया करते थे। उनकी लोकप्रियता का ग्राफ फिल्म में बताया भी बताया गया है कि कनाडा के जिस हॉल में उन्होंने पेर्फोर्मेंस करना था ठीक उसके पहले अमिताभ बच्चन का शो था जिसके लिए 137अतिरिक्त सीटें लगवानी पड़ी थी जबकि चमकीला के शो के लिए उसे 1024 अतिरिक्त सीटें लगवानी पड़ी। फिल्म इंडस्ट्री का काला सच ‘चमकीला’ के सन्दर्भ में भी काला ही है। मूसेवाला को भी आपसी रंजिश की वजह से कत्ल किया गया उनके अंतिम गीत के बोल थे “उम्र दे हिसाब नाल दूना” यानी इतनी कम उम्र में दुगनी शोहरत मिली। हमें गुलशन कुमार की हत्या भी याद है जिसने एच. एम. वी.जैसी कंपनी को टक्कर दी थी, खूब पैसा और शोहरत और उसकी लोकप्रियता ही उसकी दुश्मन बन गई ? सुशांत सिंह की दर्दनाक मौत से कौन वाकिफ नहीं

इसमें पितृसत्ता में फल-फूल रही ओनर किलिंग’ के संकेत भी छिपे हुए हैं चमकीला की साथी गायिका तथा दूसरी पत्नी अमरजोत जो उससे ऊँची जाति की थी । भाई और पिता द्वारा होने वाले अपने आर्थिक शोषण और कैद-सी जिंदगी से परेशान थी क्योंकि भाई-पिता उसकी सारी कमाई लेकर उसे अपने हिसाब से रहने भी नहीं देते थे, उसका पिता कहता भी “लड़का कुँवारा है नज़र रखना” जब उसे शक होता है वह चमकीला से अलग होने की बात करता है लेकिन अमरजोत ने चमकीला से शादी कर लेती है ज़ाहिर है अब उसकी कमी पर पति का पहला हक़ हो गया था। फिल्म का अंत जिस गीत ‘विदा…करो’ से होता है वो ‘प्यासा’ तथा ‘कागज़ के फूल’ में कलाकारों की शोचनीय स्थिति को बयां करती है। उसके गीतों की लोकप्रियता पूरे पंजाब में बिना किसी भेदभाव के थी जो आज भी कायम है लेकिन कलाकारों में तो भेदभाव था चम्कीला जिस लोकप्रिय और सीनियर गायिका के साथ गाना शुरू करता है जनता उसमें भी चमकीला ही को पसंद किया करती थी चमकीला गीत लिखता,धुन तैयार करता लेकिन फिर भी उसे बहुत कम पारिश्रमिक दिया जाता यहाँ तक कि जो लोग ख़ुशी और आनंद से झूमते हुए पैसा लुटाया करते थे वह भी मैनेजर रख लिया करता था उसने जब बराबर का पैसा माँगा तो उसे उसकी जाति के नाम पर दुत्कारा गया।तब एक पंथ दो काज करने वाला यह संवाद  कहता है कि चमार हूँ भूखा तो नहीं मरूँगा  यह वास्तव में आत्मविश्वास से लबरेज़ ‘कलाकार’ की आवाज़ है जो मानता है, कला का कोई जाति-धर्म नहीं होता क्योंकि शादी के बाद भी चमकीला और अमरजोत के प्रशंसकों में कोई कमी नहीं आई भले ही यह चमकीला की दूसरी शादी थी,पर पंचायत ने कुछ रुपये जुर्माना लेकर उसे माफ़ कर दिया,चमकीला की पत्नी ने भी पति को माफ़ कर दिया उसका कहना है कि चमकीला ने उससे और दोनों बच्चों की तरफ से कभी मुँह नहीं मोड़ा और वह उन्हें हमेशा खर्चा दिया करता था और बच्चों से मिलने भी आया करता था वैसे भी हम जानते हैं फ़िल्मी दुनियां में यह बहुत आम होता आया है, जनता की पसंद में कहाँ फर्क आता है वे उतने ही जोश से अपने नायक को पसंद करतें हैं यह ‘मास’- मनोविज्ञान  है कि दर्शक अपने आइकॉन को अपने से बहुत दूर होने के यथार्थ को समझतें हुए भी उसके प्रति असीम प्रेम लुटाता है।अपने कलाकारों विशेषकर पुरुष कलाकारों की निजी जिंदगी पर वे कोई प्रतिक्रिया नहीं दिखाते बल्कि समाज उन्हें फॉलो करता है जबकि स्त्री कलाकारों के विषय में उनकी प्रतिक्रिया कुछ और ही रहती है जिसे वास्तव में अश्लील कहा जाना चाहिए।     

धर्म और राजनीति में आई विकृति पर भी इम्तियाज़ इशारों-इशारों में हस्तक्षेप कर जाते हैं जैसे विशेष नरेटिव स्थापित करने के लिए प्रोपेगैंडा के तहत फिल्मों का निर्माण किया रहा है वही तो  संगीत की दुनिया में चमकीला के साथ हो रहा था, उसकी लोकप्रियता को भुनाने के लिए? उस पर धार्मिक गीत गाने के लिए दबाब डाला गया पर चमकीला की गायिकी की विशेषता ही थी कि वे टेप भी खूब हिट हुए। लोक की माँग, प्रतिद्वंद्वी अथवा अवांछनीय ग्रुप्स की धमकियाँ, जाति का समीकरण, गाँव की सवर्ण जातियों का दुर्व्यवहार व्यवहार तो नहीं दिखाया लेकिन चमकीला के पिता का शराब पीकर जमींदार के घर पर उसके जातीय दंभ को पैसों के बल पर चुनौती देना, ये भी कहीं लुका-छिपा कारण हो सकता है उसकी हत्या का तो प्रेमविवाह के विरोधी भी शक के दायरे से बाहर नहीं है! कुल मिलाकर चमकीला चौतरफ़ा घिरा हुआ था लेकिन अपने गायन को उसने विराम नहीं लगाया क्योंकि वह खुद भी अपनी लोकप्रियता को अंत तक निचोड़ लेना चाहता था “आज अखाड़ो में मेरी मांग है कल का कुछ पता नहीं जितना कमा सकतें है कमा लो” इसलिए एक समय आया कि उसने डरना छोड़ दिया तो उसका बेख़ौफ़ रवैया लोगों को रास न आया । उसने डरना बंद कर दिया “चमकीला पागल हो गया अब उसे डर नहीं लगता”  ये संवाद बताता है कि समाज हमें भय में रहने की आदत डालता है और जो इससे विपरीत जाता है उसे पागल करार कर दिया जाता है। अत: इम्तियाज अली “चमकीला” की कहानी नहीं कह रहा बल्क़ि यदि उसे गोली न लगती तो उसकी कहानी में किसी को दिलचस्पी थी भी नहीं, हाँ, उसके गीतों में आज भी सबकी दिलचस्पी है, वस्तुत: गीतों की विषय वस्तु में, जिसे हर वर्ग,वर्ण और लिंग समान रूप से लिक-छिप कर ही सही सुनता है झूमता है और अपनी कामेच्छाओं को अभिव्यक्त करने का साधन मानता है। फिल्म समीक्षक तेजस पुनिया के ठीक कह रहें हैं  सच तो ये है कि चमकीला आज भी उतने ही जोश और खुशी से सुना जाता है हर उम्र के लोगों द्वारा पंजाब और स्थानीय राज्यों में। रही कहानी की बात तो उसे भी बहुत से लोग जानते हैं हां आज की पीढ़ी न जानती हो ये हो सकता है

इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि चमकीला के माध्यम से यह भी रेखांकित किया गया है कि क्योंकि पितृसत्ता में यौन इच्छाओं, किशोर सुलभ जिज्ञासाओं और उनकी अभिव्यक्ति पर मौन कर दिया जाता है इसलिए बढ़ते किशोर युवक युवतियों से लेकर बुजुर्गों तक अपने आधे-अधूरे ज्ञान आपस में बांटकर आधा-अधूरा आनंद प्राप्त करतें है और उसे ही विरासत में सौंपता है जो विविध सामाजिक सेंसरों,टैबुओं के साथ फैन्तासियों से युक्त हो विकृत भी होता जाता है। पहले ही दृश्य में जब बालक चमकीला “खड़ा” शब्द पर जब जिज्ञासा प्रकट करता है तो उसे थप्पड़ मिलता है, यौनाचारों पर समाज की चुप्पी से उत्पन्न मानसिकता के चलते ही द्विअर्थी गीत लोकप्रिय होतें है फिल्म का एक यह उद्देश्य भी समझ आता है, जो OMG का भी था।यदि जिज्ञासाओं को मारपीट कर दबाया जाएगा तो लाभ उठाने वाले नीम हकीमों, नौसीखियों के पास जाकर ये युवा ग़लत दिशाओं में अपना समाधान करतें हैं जो कई दफा उनका भविष्य भी स्वाह कर देता है।  अश्लील गीतों की धूम के सन्दर्भ में हमें याद आता है, भदेस, भदेसपन जिसका अर्थ है भद्दा,भौंडा,कुरूप ,बदशक्ल,अंग्रेजी में जो अन्सोफिस्टिकेट्ड डिसअप्रिप्रिअट है यानी अपरिष्कृत, असंगत है समाज जिस सभ्यता का आवरण ओढ़े हुए है उसमें इस भदेसपन को स्वीकार नहीं जाता जबकि ये भी सच है कि इसी समाज में भाई-भाई एक दूसरे से बात करते हुए माँ-बहन की गालियाँ तकिया कलाम की तरह देते हैं, जिसे सभा में वर्जित माना जाता है। अब आप कहेंगे कि एक ग़लत बात को दूसरी गलत बात से काटा नहीं जा सकता। वास्तव में चमकीला ने वही लिखा और गाया जो पहले से भी लोग गा रहे थे जिसकी बहुत डिमांड थी उसने दर्शकों की पसंद के हिसाब से वही लिखा जिसे वह अपने आस पास देख सुन रहा था। फिल्म चमकीला का संघर्ष सामाजिक परिप्रेक्ष्य में दिखाती है जिसमें समाज भले ही संकेतों में आया लेकिन चमकीला को बनाने में इस समाज महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

लैंगिक भेदभाव भी फिल्म में सीधे-तौर पर नहीं आता लेकिन लड़की को लेकर पितृसत्तात्मक अश्लील सोच जगजाहिर है तभी चमकीला के द्विअर्थी गीतों पर सभी आयु वर्ग के पुरुष झूमतें है, अखाड़े में धार्मिक गीत गाने पर लोग चिल्ला-चिल्ला कर उन्ही अश्लील गीतों की मांग करतें हैं जबकि लड़कियों में यौनिक इच्छाओं को व्यक्त करने की पाबंदी है तो वे जब छत पर छिपकर लडकियाँ उसे सुनने को आईं तो छत ही गिर गई और उसका नाम छत फोड़-चमकीला हो गया एक गीत की शूटिंग के दौरान अलग-अलग जगहों पर हर वर्ग शहर गाँव की कोई 300 लड़कियों पर फिल्माया गया है जो इस बात की गवाही देता हैं कि चमकीला के गीत को लडकियाँ भी लोकप्रिय है यानी स्पष्ट है अपनी यौनिक इच्छाओं की अभिव्यक्ति की तीव्र आकांक्षा उन्हें भी है लेकिन उन्हें अपने देह पर ही अधिकार नहीं दिया गयाइसलिए छिप कर उसके गीत सुनती है।

फिल्म आने के बाद सोशल मीडिया पर चमकीला को लेकर मिली जुली प्रतिक्रियाएं आई जिसमें समाज के वीभत्स अथार्थ को स्वीकार करतें हैं जबकि कुछ का मानना है कि इम्तियाज़ चमकीला के बहाने अश्लील गानों को जस्टिफाई करतें है! स्त्री पुरुष संबंधों के बहुते लोक गीत हैं तो क्या उनका महिमामंडन किया जाए,बॉलीवुड हो या भोजपुरी गीत इन्हें खूब सुना जाता है सिर्फ इसलिए चमकीला के जीवन का फिल्मीकरण सही नहीं ठहराया जाना चाहिए लेकिन जैसे मैंने पहले भी लिखा कि यह चमकीला की बायोपिक नहीं है बल्कि चमकीला की चमक में  समाज के विविध स्याह पक्षों को संकेतों में रेखांकित किया गया है जो आज भी लगभग ज्यों की त्यों विद्यमान है । ओनर किलिंग हो या समाज और सिनेमा में जातिवाद होकहाँ खत्म हुए? सोशल मीडिया पर पोर्न साइट्स की भरमार, लड़के लड़कियों दोनों का देह व्यापार की और आकर्षित होने के क्या कोई अलग से कारण है वे भी इसी समाज से उपजे है ये सभी आज  हमारे समाज की मानसकिता की बखिया उधेड़ रहें है, हम हमारी नई पीढ़ी को सेक्स रेकेट्स के जंजाल में फंसने से नहीं बचा पा रहें । वास्तव में सिनेमा के साथ साथ लोकगीतों में भी विकृतियाँ आई हैं जिन्हें नज़रन्दाज़ नहीं किया जा सकता परम्परागत लोकधुनों को चुरा कर उन्हीं की तर्ज पर जनता की ही माँग पर उन्हें अश्लील और भौंडा बना दिया जाता है जो शादी ब्याहों में खूब धड़ल्ले से ऊंची आवाज़ में गाये जाते है जिन पर घर भर के लोग मदमस्त नाचतें है यह मशहूर है कि चमकीला के पास अगर डेट नहीं होती थी तो लोग अपनी शादी की डेट बदल दिया करते थे ।आज जबकि बिग बॉस कपिल शर्मा जैसे शो की टी. आर.पी. यानी लोकप्रियता देखकर लोगों की पसंद पर तरस आता है हालाँकि इसका एक कारण लोगो में सामाजिक डिप्रेशन बढ़ना भी एक कारण बताया जाता है जिसमें आज के लोगों के पास करने को कुछ भी क्रिएटिव नहीं बेरोजगारी चरम पर है और बुजुर्ग भी अपना समय काट रहें हैं उनकी आज सुनाता कौन है? समाज के इसी मनोविज्ञान को फ़िल्म वाले भुनाते आयें हैं ।अत:

चमकीला तो एक प्रतीक भर है उसके गीत समाज मनोविज्ञान का सूक्ष्मता से विश्लेषण कर रहें हैं, अश्लील समाज की सोच है चमकीला जैसे लोग तो उस सोच का फायदा उठाते हैं फ़िल्म समाज की हिप्पोक्रेसी का उदाहरण है,चमकीला के गीत उसकी लोकप्रियता फिर उसकी हत्या और अंत में गीत की पंक्तियाँ आपको निश्चित ही रुलायेंगी ।तुम सभी साफ सही, हूँ मैं मटमैला”  समाज की मानसिकता और चमकीला के गीतों में आज भी कोई बदलाव नहीं आया है हर राज्य क्षेत्र में आपको कई कई चमकीला आज  भी मिल जायेंगे और उनको सुनकर आनंद से झूमने वाले भी । जब मंटो हो या उग्र अथवा इस्मत आपा समाज का काला सच दिखाते हैं तो उन्हें भी साहित्य समाज से बहिष्कृत किया गया उन पर केस चले लेकिन उनके और इम्तियाज़ के प्रस्तुतीकरण का अंतर सिनेमा और साहित्य का ही अंतर है क्योंकि साहित्य यथार्थ को बिना किसी लाग लपेट के प्रसुत किया जबकि इम्तियाज़ ने समाज के स्याह पक्ष के लिए चमकीला की चमक को आधार बनाना व्यावसायिक विवशता लेकिन फिल्म का अंत और उसका गीत विदा करो चमकीला के व्यक्तित्व तमाम कमजोरियों के बावजूद उसे नायकत्व के उच्च पद पर प्रतिष्ठित कर जाता है लगभग शहीद की तरह जो फ़िल्मी दुनिया की विशेषता है । फिल्म के अंत में इंस्पेक्टर की जीप में से चमकीला की कैस्सेट निकालती है तो घर पहुँचने पर उसका बेटा भी वही गीत सुन रहा है तो उसकी हत्या से भावुक होने वाला पिता जब कहता है, “जब कभी मन करे चमकीला को सुन लिया करो” ये चमकीला के सुनने की बात से कहीं ज्यादा “अपने मन की सुन लिया करो” पर ख़त्म होती है फिल्म के पहले दृश्य में बच्चे को थप्पड़ पड़ता है जबकि अंतिम दृश्य के बच्चे को पिता का साथ जिसे समझना ज़रूरी है कि जैसे मन के भाव शाश्वत है वैसे ही तन की आवश्यकताएँ जिन्हें दबाने का अर्थ है समाज और व्यक्ति दोनों के स्वाभाविक विकास को अवरुद्ध करना ।

पंगत

कुछ लोग बहुत मिस करते हैं,
पंगत को!
बैठकर ठाठ से जीमना,
शायद वो भूलते नहीं,
अपना ‘परमीन’ होना!

परमीन के लिए ‘पक्की’
बाकियों के लिए ‘कच्ची’!
ये इंतजाम ‘बफर’ में कहाँ?
जो पंगत में था!

‘परमीन’ के लिए अलग पाँत,
जिसके साथ जुड़ी है जात!

कुंडली मारकर बैठी,
ग्रामीण समाज पर!
जमकर बैठे रहने से,
नहीं टूटती जात- पाँत!

इसके लिए तो,
खड़ा होना ही होगा!
शुक्र है ‘बफर’ में,
नहीं कोई ‘परमीन’!

सभी के लिए हैं,
सभी व्यंजन,
‘कच्ची’ या ‘पक्की’!
शुक्र है ‘बफर’ ने,
जात- पाँत की बरफ को,
थोड़ा तो तोड़ा!!

शब्दार्थ:-
परमीन:- परबीन, प्रवीण, उच्च जातीय, साधारणतः ब्राह्मण
कच्ची:- दाल, भात, रोटी, कढ़ी इत्यादि(जिस व्यंजन में घी का प्रयोग न हो)
पक्की:- पूरी, सब्जी, मिठाई इत्यादि

साहित्यकार सुनीता मंजू जयप्रकाश विश्वविद्यालय छपरा के एक कॉलेज में पढ़ाती हैं।(फोटो गूगल से साभार)

क्या गाँधी का नाम, लोकप्रियता और प्रतिष्ठा “गाँधी” फिल्म की मोहताज है ?

एम ज़ाहिद

46 किलो 5 फिट 5″ के महात्मा गाँधी को ब्रिटेन में आयोजित 1931 में गोलमेज सम्मेलन में शामिल होने का न्योता मिला।जब गाँधीजी गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने लन्दन पहुंचे तो ब्रिटेन के कुछ समाचार पत्रों में उनकी हंसी भी उड़ाई गयी थी। एक अंग्रेज पत्रकार ने लिखा कि”गाँधी धोती में ब्रिटेन के सम्राट जार्ज पंचम के सामने घुटने के बल बैठकर हाथ जोड़कर उनसे आजादी की भीख मांगेंगे।”लंदन के कई अख़बारों में आधी धोती पहने अर्धनग्न गांधी की तस्वीरें पहले पन्ने पर प्रमुखता से छपीं।

तब ब्रिटेन के प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल गाँधी जी के लगभग जान के दुश्मन थे , उनके गोलमेज सम्मेलन में शामिल होने के बारे में सुनते ही चर्चिल ने कहा कि “अरे गाँधी मरा नहीं ?”…मगर गाँधी कोई ज्ञानचंद तो थे‌ नहीं कि चर्चिल को बुलाकर साबरमती आश्रम में झूला झुलाते , पहुंच गए, एक धोती और चादर लपेटे।गाँधी जी ने गोलमेज सम्मेलन में ब्रिटिश सरकार की मेजबानी ठुकराते हुए मोरियल लैस्टर में रुकने का फैसला किया।

गाँधी जी को वहां ब्रिटेन के राजा जार्ज पंचम से मिलने का प्रोटोकॉल समझाया गया। थ्री पीस सूट , टाई , हैट और चमकदार जूते , कैसे बैठना है , कैसे बात करना है , ब्रश करके आना है , बाल संवार कर आना है , ज़ोर से बात नहीं करना है , पलट कर किसी बात का जवाब नहीं देना है‌ , इत्यादि इत्यादि।

उस वक्त ब्रिटेन के राजा जार्ज पंचम का तीन चौथाई अर्थात दुनिया के 75% भाग पर शासन था , एक धमक थी , उनसे मिलने का सोच कर लोगों को दस्त हो जाती थी।

गाँधी जी तो गाँधी जी , 46 किलो के शरीर में 156 इंच का सीना था , चर्चिल से बेपरवाह गाँधी जी पहुंच गए बर्मिघम पैलेस, उसी धोती में चादर लपेटे चप्पल पहने।वहां बर्मिघम पैलेस के गेट पर उन्हें इस हाल में देख कर पूरा राजशाही अमला परेशान। राजा का ओएसडी भागा भागा जार्ज पंचम के पास पहुंचा और बोला कि “गाँधी तो नंगा आया है” अंदर लाऊं? उस वक्त दुनिया के सबसे ताकतवर राजा की हिम्मत नहीं हुई कि गाँधी जी को मना कर दे।

जार्ज पंचम ने कहा कि बुलाओ , गाँधी जी गये और जार्ज पंचम के सामने बैठ गये , जार्ज पंचम ने कहा “मिस्टर गाँधी आपके कपड़े कहां हैं? गाँधी जी ने जवाब दिया,”मिस्टर जार्ज मेरे और सारे हिंदुस्तानियों के कपड़े तो आपने छीन लिए”जार्ज पंचम गाँधी जी का चेहरा देखते रह गए .

बाहर प्रतीक्षा करते पत्रकारों ने पूछा कि ‘क्या सम्राट ने आपके कपड़ों के बारे में कुछ नहीं कहा?’ अपनी खिली हुई हंसी के साथ गांधीजी ने कहा : ‘कपड़ों के बारे में वे क्या कहते? हम दोनों के कपड़े तो उन्होंने अकेले ही पहने हुए थे!’इसके बाद गाँधी जी ने लन्दन में जनसभाओं को संबोधित करते हुए कहा

“इंग्लैंड ज़रूरत से ज़्यादा कपड़े बनाता है फिर उसे खपाने के लिए दुनिया में बाज़ार ढूंढता है। इसे मैं लूट और डकैती कहता हूं। आज लुटेरा और डकैत इंग्लैंड पूरी दुनिया के लिए ख़तरा है। इसलिए अगर मैं इंग्लैंड की वेशभूषा का इस्तेमाल शुरू कर दूं, तो भारत में ज़रूरत से ज़्यादा कपडे तैयार करने होंगे और इतने बड़े भारत को अपना बाजार खोजने और अपना माल खपाने के लिए संसार ही नहीं दूसरे ग्रहों पर बाजार ढूंढना होगा।”

इंग्लैंड की जनता पर गाँधीजी ने अपनी गहरी छाप डाली। औद्योगिक अशांति, बेरोजगारी, गहरा सामाजिक अन्याय और अधिभौतिकतावाद के शिकंजे में जकड़ी इंग्लैंड की जनता को सूती चादर ओढ़े और आधी धोती पहने पूर्व के इस शांतिदूत में प्रेम का संदेश देते ईसा मसीह दिखे।अंततः गाँधीजी का मज़ाक उड़ाने वाले दुनिया भर के समाचार पत्रों के सम्पादक मोरियल लैस्टर के घर गांधीजी के इंटरव्यू लेने लाइन में लगे गए।

गाँधीजी ने किंग जॉर्ज पंचम पर हमला करते हुए कहा, ‘कुछ लोगों को मेरा ये पहनावा अच्छा नहीं लगता, मेरी वेशभूषा का मजाक उड़ाया जा रहा है। मुझसे पूछा जा रहा है कि मैं इसे क्‍यों पहनता हूं। मैंने इस वेषभूषा को सोच समझकर पहना है। मेरे जीवन में जो परिवर्तन लगातार होते गये हैं, उनके साथ पोशाक में भी परिवर्तन हो गए।”

गाँधी जी पूरी दुनिया में मशहूर हो गए, 1929 में जन्मे अमेरिका के गांधी कहे गए मार्टिन लूथर किंग हों, 1918 में जन्मे दक्षिण अफ्रीका के गांधी कहे गए नैल्सन मंडेला जीवन भर गांधी जी को अपना आदर्श मानते रहे।गांधी जी की हत्या के बाद उनके सम्मान में पूरी दुनिया में उनकी प्रतिमाएं चौराहे चौराहे पर लगने लगीं।

क्या यह सब 1982 में रिलीज फिल्म “गांधी” के बाद हुआ?

एम ज़ाहिद के फेसबुक पोस्ट साभार

कमला: मौत एक क्रमिक आत्म(हत्या)  

 

संदर्भ है नेटफ्लिक्स पर आई इजिप्ट की पृष्ठभूमि पर बनी अरबी फिल्म “कमला” का। विवाह संस्था में लड़कियों की योनि-पवित्रता, ख़तना और स्त्री-देह सुख से जुड़े कई संवेदनशील पक्षों और पूर्वाग्रहों को फ़िल्म मार्मिकता से उद्घाटित करती है। ‘रेड सी इंटरनेशनल फेस्टिवल’ में सिलेक्ट होने के बाद कमला पहली इजिप्शियन फिल्म बन गई है। जॉन इकराम द्वारा निर्देशत यह फ़िल्म मुस्लिम समाज के ख़तना जैसे स्टिग्मा यानी कलंक से लड़कियों की मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना को संवेदनशील ढंग से प्रस्तुत करती है। समाज में किसी भी वर्ग की लड़की   शारीरिक मानसिक प्रताड़नाओं से अछूती नहीं। कमला की भूमिका में अभिनेत्री इंजी एल मोक्कोडेम ने बहुत सहज अभिनय किया है, सामाजिक-भय हर पल उसकी आँखों से झाँकता है, हाँ, कुछ समय के लिए खुश,निर्भीक और चमकदार आँखों से अपने प्रेमी को देखती है लेकिन वह भी उसके साथ सम्बन्ध बनाकर उसे सोता हुआ छोड़कर चला जाता है। पिता की मृत्यु के बाद वह पूर्णतया अकेली रह जाती है, उसकी बुआ हमेशा उसे शादी के लिए कोसती रहती है। 40 वर्षीय मनोचिकित्सक अविवाहित कमला संवेदनशील मनोचिकित्सक होने के साथ-साथ साहित्य अध्येता भी है और एक तथाकथित फेमिनिस्ट लेखक से वह प्रभावित है जो बाद में प्रेमी के रूप में उसके जीवन में आता है पर कमला लेखन और लेखक में अंतर नहीं समझ पाती उसे कहती भी है कि ‘उसके उपन्यासों के जैसे पुरुष क्या हक़ीकत की दुनिया में होते भी हैं!’

फिल्म देखते हुए मुझे 1989 में बासु चटर्जी द्वारा निर्देशित के फिल्म ‘कमला की मौत’ याद आ रही थी सिर्फ ‘कमला’ नाम की वजह से नहीं बल्कि दोनों में एक समानता यौन-शुचिता भी है कि प्रेम में लड़की विवाह पूर्व गर्भवती हो जाए तो उसका क्या हश्र हो सकता है ? प्रेमी शादी नहीं करता तो इसके पीछे का कारण जिम्मेदारियों से बचकर भागना नहीं होता बल्कि सामाजिक और पारिवारिक दबावों का भय होता है। प्रेम में धोखा खाने के बाद कमला आत्महत्या कर लेती है,असली फिल्म उसके बाद शुरू होती है, कमला के पड़ोस में रहने वाला परिवार कमला की मौत के बाद डरा सहमा है, उसके अंजाम से नहीं बल्कि अपने अतीत और भविष्य को लेकर सशंकित और बैचैन है जिसमें कमला की आयु की दो लड़कियां, पृष्ठभूमि में पिता-माँ दोनों की प्रेम कहानियाँ चलती है जिसमें प्रेम में धोखा खाने के बाद, पिता की प्रेमिका ने आत्महत्या नहीं की,   माँ का प्रेमी भी उसे छोड़ भाग गया लेकिन आज वो सुखद (?) वैवाहिक जीवन जी रही है, दोनों बहनों को लगता है कि उनका प्रेमी उन्हें धोखा नहीं देगा। प्रेम-विवाह और विवाह पूर्व यौन संबंधों को केंद्र में रखकर भूत, वर्तमान और भविष्य की त्रासदी, भय, संशय और आशंकाओं के बीच यह प्रश्न भी उठता है कि कमला की आत्महत्या को ‘मौत’ क्यों कहा है ? मौत जो एक हादसे की तरह आकर गुजर गयी ! गहराई से देखें तो पायेंगे कि 35 साल पहले आईकमला की मौत’ से हमारा समाज आज भी डरा-सहमा हुआ है, लड़की विवाह पूर्व गर्भवती हो जाए इस यथार्थ को आज भी स्वीकार नहीं किया जाता। ‘ओनर-किलिंग’ के केंद्र में प्रेम ही होता है! प्रेम विवाह पूर्व हो अथवा विवाहेतर स्वीकार्य नहीं। ‘हसीन दिलरूबा’ फ़िल्म की नायिका कहती है कि ‘हाँ मैंने प्यार किया! शादी में होते हुए भी किया पर प्यार गलत नहीं था, लेकिन अगर वह लड़का गलत निकल गया तो मेरी क्या गलती है?” और वह डटकर समाज परिवार का सामना करती है। लेकिन हर लड़की इतनी बहादुर नहीं होती या तो मार दी जाती है या आत्महत्या के लिए विवश की जाती है।

अरबीफ़िल्म ‘कमला’ एक यौनकर्मी पेशेंट आस्मां की भी कहानी बताती है। जो कमला से प्रश्न करती है ‘तुम्हारा खतना हो गया ? जबकिकमला के खानदान में सभी लड़कियों का खतना हुआ था पर उसका खतना नहीं हुआ था, तो भी कमला विचलित हो जाती है, धीरे-धीरे दोनों में दोस्ती हो जाती हैं, एक दूसरे से सुख-दुःख की बातें करतीं हैं। कारण चाहे कोई हो कमला अभी भी वर्जिन है (पितृसत्ता में ‘वर्जिन’ की संकल्पना कई स्तरों परिभाषित की जा सकती है )कमला किसी के भी साथ मानसिक अथवा शारीरिक धरातल पर नहीं जुड़ी थी जबकि यौनकर्मी आस्मां के कई पुरुषों के साथ सम्बन्ध हैं उसे ख़तना के मानसिक और शारीरिक दर्द से आज भी निजात नहीं मिली। पारिवारिक,शैक्षणिक,आर्थिक पृष्ठभूमि में बड़ा अंतर होने के बाद भी दोनों मानसिक और भावनात्मक रूप से इसलिए जुड़ती चली जाती है कि जिस पितृसत्तात्मक समाज में दोनों रहतीं हैं, वहाँ आर्थिक सामाजिक अथवा राजनैतिक किसी भी तरह की अच्छी बुरी स्थितियों में स्त्री रहे, स्त्री को कुछ ‘प्रिविलेज’ नहीं मिला करते, उन्हें तो पुरुष की सुविधाओं के आधार पर तैयार किया जाता है,गढ़ा जाता है, स्त्री होने के नाते वे दोनों अपने-अपने ढंग से सामाजिक चुनौतियों का सामना कर रही हैं लेकिन आस्मां आत्महत्या कर लेती है जबकि कमला संघर्षरत है। आस्मां यौनकर्मी कैसे या क्यों बनी एक मार्मिक दृश्य के माध्यम से बहुत सूक्ष्म ढंग से उसके विद्रोह को समझा जा सकता है जब आस्मां अपने ग्राहक के दिए हुए नोट फाड़ देती है,क्योंकि वह किसी भी रूप में यौन सुख नहीं ले पाई , ख़तना की वजह से सम्बन्ध बनाते हुए हर बार भयंकर पीड़ा झेलनी पड़ती है, जबकि उसकी देह यौन सुख के लिए भीतर तक जल रही है, अपनी ही देह से परेशान आस्मां मानसिक रोगी हो जाती है। जब आस्मां का भाई उसका निकाह करना चाहता है तो वह आत्महत्या कर लेती है क्योंकि यौनकर्मी के रूप में तो फिर भी अपनी इच्छानुसार सम्बन्ध बनाती है लेकिन विवाह के बाद तो अपनी अनिच्छा से सम्बन्ध बनाने ही होंगें, हर बार दर्दनाक प्रक्रिया से गुजरना होगा, और आस्मां यह भी जान रही है कि विवाह की आड़ में भाई उसका सौदा करने जा रहा है, माँ जानकर भी चुप है । ये माएँ, दादी, नानी, चाची, बुआ ‘ये कैसे बच जाए की भावना के साथ, अपने अनुभवों को भूल जाती हैं और पारिवारिक उत्पीड़न और शोषण की चरम पराकाष्ठा में पितृसत्ता को बनाए रखने में पूरी सहभागिता निभाती है।

पढ़े-लिखे लेकिन रूढ़िवादी परिवार की मनोचिकित्सक कमला अपने जीवन के 40वें दशक में भी अविवाहित है उसके पिता बीमार है, बुआ उसे हर समय शादी के लिए टोकती है हालाँकि उसकी नजर उसकी जायदाद पर है। प्रेमी युसूफ के पूछने पर कि वो नाम के आगे डॉ क्यों नहीं लगाती? कमला कहती है कि वैसे तो पिता उदार थे जिन्होंने हमेशा उसका साथ दिया पर इतने भी आज़ाद ख्यालात नहीं थे उनके कि अपनी बेटी को बेली डांसर बनाने की अनुमति दे देते लेकिन उन्होंने डॉक्टर बनने दिया, वह डॉ बनाना नहीं चाहती थी। डॉ न लगाना उसका अनोखा  विद्रोह ही है। कमला का जीवन बड़े ही सामान्य ढंग से चल रहा था लेकिन आस्मां और लेखक प्रेमी युसूफ से मिलने के बाद उसके जीवन में हलचल शुरू हो जाती है। मनोचिकित्सक होते हुए भी आस्मां से बात करते हुए कमला विचलित होने लगती है, उसे नींद नहीं आती आस्मां की आत्महत्या के बाद से हर समय परेशान रहने लगती है। जब उसकी मुलाकात अपने पसंदीदा और आकर्षक लेखक युसूफ से होती है जो अपने उपन्यासों में महिलाओं के हक़ की बात करता है। यूसुफ के उपन्यास विमोचन समारोह की प्रश्नोत्तर श्रृंखला में कमला एक प्रश्न पूछती है कि उनके उपन्यास में नायिका को आत्महत्या क्यों करनी पड़ी? क्यों लड़कियों को ही आत्महत्या करनी पड़ती है (यही उपन्यास कमला ने आस्मां को पढ़ने के लिए दिया था,उसे इस बात का भी मलाल है कि उसने यह उपन्यास आस्मां को पढ़ने को क्यों दिया, शायद इसलिए भी आस्मां आत्महत्या के लिए प्रेरित हुई ) युसूफ उसके प्रश्न से कहीं अधिक उसके व्यक्तित्व से प्रभावित होता है,जिसकी स्वीकारोक्ति बाद में वह करता भी है कि ‘हमारी दूसरी मुलाक़ात इत्तफाक़ नहीं थी बल्कि मैं जानबूझकर तुम्हारे पीछे आया था’। यूसुफ के उपन्यासों को पढ़कर और यूसुफ से मिलकर कमला को लगता है कि यूसुफ अन्य पुरुषों से अलग उदार मानसिकता वाला है वह अपने जीवन की कई बातों को साझा करती है जैसे पारिवारिक प्रतिष्ठा बचाने के लिए उसने मनोचिकित्सा का कैरियर अपनाया। दोनों एक दूसरे से खूब बातें करते हैं युसूफ के प्रति उसका प्रेम और विश्वास बढ़ने के साथ-साथ उसका आत्मविश्वास बढ़ता चला जाता है हर अगले दृश्य में कमला के व्यक्तित्व और चेहरे में निखार-सा दिखाई पड़ता है, भय गायब होने लगता है। दोनों के प्रेममय दृश्य बहुत ही ख़ूबसूरती से फिल्माएँ गए हैं, लेकिन युसूफ उसके साथ विश्वासघात करता है वास्तव में कमला उसका लेखकीय प्रयोग था। युसूफ जो यह समझे बैठा था कि जिस लड़की का ख़तना भी नहीं हुआ उसने अपनी उम्र के चालीस वर्ष तक अपनी देह को कैसे सुरक्षित रखा हुआ है! कैसे अपनी यौन वासनाओं पर नियंत्रण रखा हुआ है, इसी सत्य का पता लगाने के लिए वह उससे यौन सम्बन्ध बनाता है यह प[अत लगने के बाद कि उससे सम्बन्ध बनाने के पूर्व तक वह वर्जिन थी, घबरा जाता है पर पछताने के सिवा उसके पास कोई चारा नहीं रहता, वह अपने आप को माफ नहीं कर पा रहा है, अपना लिखा हुआ सब फाड़ देता है। लिखे हुए को फाड़ डालना इस बात का संकेत है कि सांस्कृतिक आवरण में अब तक जो परम्पराएँ रूढ़ियाँ है उन्हें उखाड़ फेंक नए अध्याय लिखने होंगे। यूसुफ कमला को सोती छोड़कर चला जाता है, कारण जानने के बाद कमला हैरान-परेशान हो जाती है,बल्कि कुछ विक्षिप्त-सी हो जाती है।

आत्महत्या के पूर्व कमला के साथ अपनी बातचीत के समय आस्मां बताती है, कि वह किसी के साथ भी अंतरंग होने पर बहुत भयंकर दर्दनाक अनुभवों से गुजरती है वह कहती है कि “वह एक ऐसी बर्फ बन चुकी है जिसके भीतर बहुत आग है”। आस्मां के भाई के लिए आस्मां एक वस्तु से अधिक कुछ नहीं । आस्मां की माँ से पूछने पर कि उसने आस्मां को क्यों मरने दिया? वह कहती है हम कुछ नहीं कर सकते, मैं नहीं चाहती कि वह कुंवारी रहे। युसूफ के छोड़ कर जाने के बाद पिता की मृत्यु और फिर आस्मां की आत्महत्या, कमला मानसिक रूप से दिन प्रतिदिन कमजोर बनाती जाती है । अन्य रोगियों में भी उसे आस्मां ही दिखाई पड़ती है, मनोचिकित्सक होने के बावजूद सपने में खुद को मनोचिकित्सक के पास बैठा देखती है।

जबकि हमें लगता भर है कि आर्थिक निर्भरता से कोई भी स्त्री अपना भाग्य खुद बदल सकती है,कमला फ़िल्म इस भ्रम को भी तोड़ती है क्योंकि पितृसत्ता में शिक्षा, पद, पैसा, आत्मनिर्भर व्यक्तित्व होने पर भी सिर्फ स्त्री होने के कारण कमला सुरक्षित महसूस नहीं कर पा रही   सामाजिक दबाव किसी को भी तोड़ सकता है जैसे युसूफ जैसा लेखक जो पितृसत्तात्मक    संरचना में गढ़ा पुरुष होने की वजह से स्त्री के सन्दर्भों को उन्हीं के हिसाब से तौलता है, सामाजिक पूर्वाग्रहों के चलते ही उसकी मानसिकता कमला के साथ खिलवाड़ करने से नहीं चूकती पर अब वह नहीं सह पा रहा उसका लेखकीय संस्कार नयी शुरुआत करेगा? ये प्रश्न महत्त्वपूर्ण है। फिल्म के अंत में कमला सपना देखती है वह ट्रेडमिल पर भाग रही है, उसकी चाची और कुछ महिलाएँ ब्लेड लेकर उसका खतना करने के लिए उसके पीछे भाग रही है, डर के मारे पसीना-पसीना हो बाथरूम में बंद हो चुकी है फिर अचानक वह भागना बंद कर देती है और बेली डांसर की तरह नृत्य करने लगती है जोकि उसकी बचपन की इच्छा थी। कमला जो प्रेम और विवाह दोनों क्षेत्रों में मानसिक प्रताड़ना का शिकार बनती है, प्रेम में प्रेमी द्वारा भावनात्मक शोषण उसे तोड़ कर रख देता है, परिवार में बुआ जो उसका विवाह करवाने पर तुली है। फिल्म का अंत दर्शकों की मानसिकता पर निर्भर करता है कि वह एक सपना है या हकीकत! क्या स्त्रियों के शोषण,उत्पीड़न के संदर्भ में कुछ उम्मीद कर सकतें हैं? 

फ़िल्म मुस्लिम परिवेश में संस्कृति के नाम पर रूढ़ परंपराओं और खतना जैसी दर्दनाक परंपरा के खिलाफ आवाज़ उठाती है। यौनकर्मी आस्मां और सफल पेशेवर मनोचिकित्सक कमला, दोनों ही सड़ी-गली परम्पराओं को ढोने को विवश है, आत्महत्या की कगार पर है। कमला और आस्मां जैसी लड़कियों के सन्दर्भ में समाज तो बाद में रुकावटें पैदा करता है,पहले परिवार के लोग ही शोषण उत्पीड़न करतें हैं, विवाह संस्था में सुरक्षा के नाम पर लड़कियों को विविध रिश्तों की बलि चढ़ा दिया जाता है जिसमें उनका अपना वजूद खो जाता है कमला की बुआ अपने शादी- शुदा लड़के से उसकी शादी सिर्फ इसलिए करवाना चाहती है ताकि परिवार की इज्जत भी बनी रहे और जायदाद पर हिस्सा भी बना रहे वो किसी बाहरी के हाथ न आये। खुद को संभालने के क्रम में जब कमला को लगता है कि वो गर्भवती है तो वह तनाव की वजह से खुद को संभाल नहीं पाती, लेकिन टेस्ट नेगेटिव आता है, आस्मां के आत्महत्या लिए भी खुद को जिम्मेदार मानने लगती है,वह घबरा जाती है कि उसका हश्र भी क्या आस्मां जैसा होगा?लेकिन वह खुद को बेली डांसर के रूप में देखती है जो इस बात का प्रतीक है कि उसने खुद को मज़बूत बना लिया।

आपको बता दें कि ‘ख़तना’ एक दर्दनाक प्रक्रिया है जिसमें बचपन में ही लड़की की योनि सिल दी जाती है, ताकि विवाह पूर्व वे शारीरिक सम्बन्ध न बना सके लेकिन इसके बाद उसे कई प्रकार की तकलीफों को लगातार सहन करना पड़ता है कई इन्फेक्शन यौन बीमारियां उसे इल्ति है , सामाजिक मर्यादा और शर्म-हया के नाम पर उनका इलाज भी नहीं होता। दर्द लगातार  बना रहता है, जिस कारण उसकी शारीरिक यौन इच्छाएँ कम हो जाती है, जबकि ये भी भूख ही तरह सहज और प्राकृतिक है जिस पर कृत्रिम सामाजिक प्रतिबन्ध लगा दिया जाता है, वे बाकी सभी सांसारिक कामों को करती रहती हैं लेकिन यौन-सुख नहीं ले पाती। नाइजीरिया की पूर्व राष्ट्रपति स्टेला ओबासांजो ने ख़तना के विरोध में आवाज़ उठाई और संयुक्त राष्ट्र द्वारा 6 फ़रवरी 2024 को महिला जननांग विकृति यानी ख़तना ज़ीरो टोलरेंस दिवस दिवस FGM फीमेल जेनिटल म्युटीलेशन दिवस के रूप में बनाया जाता है, 2030 तक इस प्रथा को समाप्त करने की मुहेम को ध्यान में रखकर ही इस विषय को सिनेमा पर उतारा गया,ताकि समाज में जागरूकता बढ़े। यूनिसेफ़ 2020 के आंकड़ों के अनुसार 92 देश में महिलाओं का ख़तना आज भी जारी है,इस प्रक्रिया में महिला को शारीरिक और मानसिक कष्ट दिया जाता है ताकि वह यौन सुख से वंचित रहे और इसकी इच्छा भी ज़ाहिर न करें। परम्पराओं के नाम पर लड़कियों के साथ होने वाले इस अमानवीय और जघन्य हिंसा कानून रूप में अपराध होने के बावजूद जारी है।

राजेन्द्र सजल: एक कहानी सजग कहानीकार

सबसे पहली बात जो राजेन्द्र सजल जी के बारे में कही जानी चाहिए कि वे एक कहानी सजग कहानीकार हैं। हमारे यहाँ लेखक की सजगता का आकलन समाज के संदर्भ में ही किया जाता है। कोई लेखक अथवा कहानीकार समाज के मुद्दों को और उसकी समस्याओं को अपनी कहानियों में कितना उठाता है, कितना रचता है उतना ही हमारे लिए वह कहानीकार एक सजग कहानीकार होता है। किंतु कोई कहानीकार कितना कहानी सजग कहानीकार है यह बात प्राय: और कम से कम दलित आलोचकों और रचनाकारों के बीच तो चर्चा या आलोचना का विषय नहीं बनती। ऐसा करते ही हमें लगता है कि हम रूपवादी हो रहे हैं। हम साहित्य के सौन्दर्यशास्त्र के प्रति झुकाव या लगाव प्रदर्शित कर रहे हैं और जैसे यह एक साहित्यिक अपराध है जो हम कर रहे हैं। असल में यह सब हमने शुरू भी नहीं किया। जैसे जैसे साहित्य में तथाकथित प्रगतिशील चेतना का वर्चस्व स्थापित हुआ वैसे वैसे संस्कृति, सौन्दर्य-शास्त्र, परंपरा नाम की प्रत्येक चीज से हमने दूरी बरतनी शुरू कर दी। उसे त्याज्य और घृणित मान लिया गया। यद्यपि नामवर सिंह इसके अपवाद रहे और नई कहानी के नएपन को उन्होंने कहानी के शिल्प के आधार पर ही चिह्नित किया। यहाँ यह बात बराबर ज़ोर देकर कहने की जरूरत है कि क्योंकि हिन्दी के दलित साहित्यकारों का पालन-पोषण इसी तथाकथित प्रगतिशील आंदोलन की निगरानी में हुआ इसलिए दलित आलोचकों और साहित्यकारों ने भी रचना में रचनात्मकता पर बात करने से परहेज किया। न केवल परहेज किया बल्कि बाद में तो एक हद तक कठहुज्जती भी की। यह सब बहुत ही सहज था। क्रिया की प्रतिक्रिया की तरह। ‘सौंदर्यशास्त्र’ के नाम तक से हमने नफ़रत होने लगी थी। जबकि कमाल की बात यह है कि हमारी रचनाओं में, कहानियों में, कविताओं में कमाल की रचनात्मकता मौजूद रही है। कहानी की कला, कविता की बुनावट के मामले में हमारे रचनाकार विशेष रूप से आश्वस्त करते रहे हैं। उनके भीतर अनुभूति की आँच इतनी प्रखर है कि वह आंच अपनी अभिव्यक्ति के लिए अपने आप एक ताल, एक धुन, एक रचनात्मक शिल्प तैयार करती है। कोई भी रचना अच्छी हुए बिना पाठकों के बीच जगह बना ही नहीं सकती। हांलाकि यह एक अलग और गंभीर मुद्दा है कि खानदानी प्रकाशकों, पार्टी चालित आलोचकों और अकादमिक ठेकेदारों के रहते अच्छी रचनाएँ पाठकों तक पहुँच भी नहीं पाती।

राजेन्द्र सजल एक कहानी सजग कहानीकार हैं, इसकी दो वजहें हैं एक, अपने कहानी संग्रह की भूमिका में उन्होंने अपनी इस सजगता का परिचय दिया है। और दूसरा संग्रह में शामिल उनकी कहानियों की शिल्पगत विविधता इसका परिचायक है। पहले बात करें भूमिका की, जहाँ वे लिखते हैं—“असल बात यह है कि कहानी, कहानी रहनी चाहिए और उसमें कहानीपन होना चाहिए।” अब ये कहानीपन किसी कहानी में आता कैसे है या उसे कैसे समझा जा सकता है? इसे समझाते हुए वे आगे लिखते हैं कि “जिसका (कहानी का) इस विशाल दुनिया में एक छोटा-सा संसार होता है। जिसमें पात्र और घटनाएँ इस दुनिया के प्रेम, पीर और प्रतिरोध को उमड़-घुमड़कर अभिव्यक्त करती रहें। जिसको पढ़कर लगे कि ‘हाँ, ये मेरा भोगा हुआ यथार्थ है, या फिर मुझसे जुड़े किसी शख्स, परिवेश अथवा समय की कहानी है। कहानी की दुनिया पाठक की अपनी दुनिया से जुड़ती चली जाए।” मतलब कहानी के पाठक को यह पता रहता है कि वह कोई कहानी पढ़ रहा है पर उसके बाद भी वह वहाँ घटित हो रही घटनाओं से, वहाँ विचरते चरित्रों से आत्मीय संबंध बना पाता है। कहानी के भीतर के देशकाल और वातावरण को वह महसूस करता है। यह महसूस करना,उसे जीना है। जैसा कि स्वयं राजेन्द्र सजल जी ने लिखा है कि “उस जमीन पर ( कहानी में) होने वाले हर मौसम को पाठक महसूस कर सके। कभी भीगता रहे तो कभी ठिठुरता- तपता रहे और आखिर बासन्ती रंग में रंगा हुआ महसूस करे।”  यह ठिठुरना, तपना, बासंती रंग में रंगा जाना भावना के धरातल पर कहानी को महसूस करना ही है। अपने वास्तविक जीवन के साथ कहानी के जीवन को भी जीना है।यहाँ विभिन्न तरह के भाव, जिन्हें काव्यशास्त्र में स्थायी भाव कहा गया है जो रस के रूप में पाठक के भीतर संचरित होते हैं; उन्हीं के बारे में राजेन्द्रसजल जी बात कर रहे हैं। असल में कहानी का कहानीपन यही हैकि कहानी पाठक के भीतर विभिन्न भावों (रसों) का संचार कर सके।

साथ ही यह भी सत्य है कि आज के पाठक या कहें आधुनिक पाठक की बुद्धि भी उतनी ही सजग है जितनी उसकी भावनाएँ। वह स्थितियों और घटनाओं को जीवन में ही नहीं कहानी के भीतर भी तर्क और अपने विवेक के धरातल पर जाँचता और परखता है। यह उसके आधुनिक होने का प्रमाण है। अब उसकी प्रवृति ही ऐसी बन चुकी है। ऐसे में कहानीकार को कहानी में दिमाग भी लगाना पड़ता है। पाठक इतना भी भावुक नहीं है कि बिना किसी ठोस आधार के उसकी भावनाएँ संचरित होना शुरू कर दें। अगर ऐसा है तो भी यह हमारे साहित्यकारों और आलोचकों का दायित्व है कि वे पाठकों को सावधान, और जिम्मेदार पाठक बनने की ओर अग्रसरित करें। दलित साहित्य या कहें विशेष रूप से अस्मिता धर्मी साहित्य में पाठकों के ही नहीं रचनाकारों में भी अपनी अस्मिता को लेकर भावुक हो जाने की पूरी संभावना रहती है। राजेन्द्र सजल जी के यहाँ आधुनिक पाठक होने की यह सजगता पूरी तरह से विद्यमान है। उनकी कहानियाँ कोरी भावुक बनाकर रुलाने वाली, क्रोध में और आवेश में मुट्ठियाँ भींचने वाली कहानियाँ नहीं हैं। वे सबसे पहले पाठक के भीतर विश्वास पैदा करती हैं कि वे सच्चाई को दिखाने वाली कहानियाँ है। जैसे किसी कोर्ट में अपनी कोई भी बात रखने से पूर्व कटघरे में खड़ा व्यक्ति यह कसम खाता है कि “मैं जो कुछ कहूँगा सच कहूँगाँ, सच के सिवा कुछ नहीं कहूँगा।” ऐसी ही कोई कसम लेकर राजेन्द्र सजल कहानी लिखना आरंभ करते हैं। यह तो हम जानते ही हैं कि बाहरी दुनिया का सच कहानी में ज्यों का त्यों नहीं आता, उसे तराशना, काटना-छाँटना पड़ता है। और इस काम में राजेन्द्र जी माहिर शिल्पकार हैं। वे पूरी तरह जानते हैं कि “कहानी आनंद के साथ-साथ हृदय की उर्वरता को न बढाए और झकझोर कर चेतना को जगाए नहीं तो फिर क्या कहानी हुई।” (भूमिका से) इस प्रकार हम कह सकते हैं कि राजेन्द्र सजल जी की कहानियाँ एक ओर पाठक के भीतर विभिन्न रसों का संचार तो करती ही हैं। उसके भीतर सोए स्थायी भावों को रस के रूप में परिणत करती ही हैं, साथ ही वे ऐसा समाज और जीवन की विविध स्थितियों का यथार्थ चित्रण करके करती हैं। ये स्थितियाँ परिवेश और इतिहास जन्य हैं कोरी भावुकता या कल्पना इनके पीछे नहीं है।

अब इन बातों को उनकी कहानियों के जरिये जाने। इस संग्रह में कुल जमा उनकी दस कहानियाँ संग्रहित हैं। कहानियों की विषयवस्तु अपने समय के तमाम बड़े और गंभीर मुद्दों को समेटे हुए हैं। जातिवाद, संप्रदायवाद, ब्राह्मणवाद, पितृसत्ता और इन सबसे परिचालित अपने समय की राजनीति, सभी जरूरी मुद्दे इनकी कहानी में गुँथे हुए हैं। साथ ही साथ मनुष्य मात्र की विभिन्न प्रवृतियाँ, जिसमें प्रेम, ईर्ष्या, डर और लालच, चालाकी, समझदारी, हताशा और निराशा, संघर्ष और टकराव, जीत और हार सभी स्थितियाँ कहानियों को सहज बनाए रखती हैं। जैसे पहली ही कहानी ‘मास्टर माई’ को लें। कहानीकार इस कहानी में प्रेमचंद टाईप का कहानीकार है। प्रेमचंद टाईप से मेरा मतलब है ऐसा कहानीकार जो अपने पाठक का बहुत ध्यान रखता है। वह चाहता है कि वह जो कहानी कह रहा है उसे समझने में उसके पाठक को कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए। इसलिए वह कहानी में पात्रों की मन:स्थितियों की व्याख्या बहुत मन लगाकर करते हैं। मास्टर माई का अपने बेटे पर वैसे ही प्रेम और भरोसा है जैसे प्राय: माँओं का होता है। पर संतान के रंग-ढंग कैसे बदल जाते हैं, यही इस कहानी में बताया गया है। निश्चित रूप से यह कोई नया विषय नहीं है। संतानों का मतलबी निकलना, धोखेबाज होना सर्वविदित है। इस कहानी को विशेष बनाता है। माँ (मास्टर माई) को इस बात का एहसास क्रमश: किस तरह होता है और उसकी वह अजीब मुस्कान जो इस एहसास के बाद उसके चेहरे पर चिपक जाती है। अपने बेटे को जवाब देती मास्टर माई की वह मुस्कान और गहरी हो जाती है। “हाँ, बेटा ढोर ही चर रहे हैं और मैं सो रही हूँ।” यहाँ व्यंजनार्थ में सामने खेत को चरते रोजडों का जिक्र नहीं है बल्कि मास्टर माई और उसके पति की कमाई आज कैसे उन्हीं का नकारा और निकम्मा सपूत चर रहा है और वह माँ अपने अंधे प्रेम में अब तक देख ही नहीं पा रही थी, इस बात का जिक्र है। ठीक वैसे ही जैसे “ बड़े घर की बेटियाँ ऐसी ही होती हैं।” कह कर प्रेमचंद कहानी का सारा मर्म एक वाक्य में निचोड़ देते हैं। कहानी में खेत, और खेतों पर रहने और काम करने वालों की जिंदगियों का चित्रण कर कहानी को विश्सनीय बनाया गया है। असल में राजेन्द्र सजल जी जानते हैं कि किसी कहानी को विश्वसनीय उसका कथानक नहीं बनाता बल्कि कथानक को अपने ऊपर खड़ा करने वाला परिवेश और देशकाल बनाता है। राजेन्द्र सजल की कहानियों में राजस्थान के एक क्षेत्र विशेष का जीवन इस कदर पिरोया गया है कि कहानी अपने आप जी उठती है।

राजेन्द्र जी की कहानियों में अधिकाँश कहानियाँ स्त्री चेतना की कहानियाँ हैं। इन कहानियों को यहाँ स्त्री विमर्श की कहानियाँ न कहकर स्त्री चेतना की कहानियाँ इसलिए कहा जा रहा है क्योंकि कहानियों में जो केन्द्रीय स्त्री किरदार हैं वे पूरी तरह से अपने ऊपर हो रहे अनाचार और दुर्व्यवहार के प्रति सजग हैं। वे न केवल जानती हैं कि जो हो रहा है वह गलत हो रहा है बल्कि अपनी जितनी सामर्थ्य उनमें है उसके बल पर वे उन स्थितियों, परिस्थितियों से जूझती हैं, लड़ती हैं। वे चुपचाप आँसू नहीं बहाती। अब सारी करामात इसी बात में है कि उनकी यह लड़ाई कहानी के कहानीपन और पाठक के आधुनिक पाठक होने को कितना साथ लेकर चल पाती है। जैसे उनकी ‘मास्टर माई’, ‘इत्ती सी बात’, ‘बावली’ और ‘झमकू’  ये चार कहानियाँ सीधे-सीधे स्त्री चेतना की कहानियाँ हैं। ‘बावली’ श्यामवर्णी लड़की जिसे ब्याह के बाद उसका पति इसीलिए त्याग देता है कि वह सुन्दर नहीं। भारतीय समाज में सुंदरता का पैमाना गौरा होना ही है। गुण कोइ नहीं देखता। कृष्ण श्यामल हैं तो भी पूज्य हैं पर राधा तो गौरी ही होनी है। सांवली जिसे गाँव-मौहल्ले वाले ‘बावली’ कहने लगते हैं क्योंकि वह रोज-रोज ससुराल में अपना अपमान सह नहीं पाती और एक टूटी खंडहरनुमा हवेली में जाकर विक्षिप्त की तरह वहाँ रहने लगती है। यही बावली जब बिल्कुल विपरित हालातों में भी जी जाती है और एक बेटे को जन्म देती है तब उसका पति, उसके सास-ससुर उसे वापस ले जाना चाहते हैं। अब तो वह एक बेटे की माँ है। बेटे की माँ होते ही उसका मोल बढ़ जाता है। पर बावली अपने आत्मसम्मान से समझौता नहीं करती। वह जानती है कि यह उसका स्वीकार नहीं बल्कि उसके बेटे का (घर के वंश चलाने वाले) का स्वीकार है। जो पति उसे सबके सामने पत्नी मानने को तैयार नहीं है, जिसे उसकी शक्ल से घिन आती है, वह रात के अँधेरे में अपनी हवस मिटाने उसी के पास आता था। उस पर जबरदस्ती करता था,उसी का परिणाम वह बेटा है। वह कैसे उस पति के घर वापस लौट सकती थी। “…ना माई ना! आज लल्ले की माँ हूँ, लल्ला खिलाने का सुख दुनियाँ का सब से बड़ा सुख है माई। इस सुख की खातिर वो राजी है, पण माई यो सुख मिलणो….तरसन दे माई, उनको तरसन दे। पतो तो चाले, बिछोह की पीड़ा काँई व्हे/ फेर माई, यो तो लल्लो हुयो परमात्मा भली करी, जे लल्ली होति तो म्हारो कांई होतो,…. दादा-दादी नै पोतो चाहे, बाप नै बेटो, अर मैं?” इस मैं का कोई जवाब नहीं है दुनिया के पास। इस ‘मैं’ का जवाब न मिलने  का सारा भार वह बावली अपने जीवन को कुछ बेहतर बना पाने के रास्ते को ठुकराकर चुकाती है। वह भीख माँगकर खाती है, कोई यह भी कह सकता है कि बदले की भावना से भरी वह अपने बेटे की जिंदगी भी कष्टदायक बना देती है, पर जो है सो है। उसका यही तरीका है समाज से बदला लेने का। आज भी स्त्री इस बात का जवाब माँग रही है दुनिया से, क्या संतान पैदा करने (बेटा पैदा करने) के अलावा भी स्त्री की कोई जरूरत है पुरुष की जिंदगी में? और न भी हो तो क्या स्त्री को किसी पुरुष के बिना जीने की आज़ादी है?

राजेन्द्र जी की कहानियाँ स्त्री चेतना के चलताऊ मुद्दों की बजाए बहुत गहरे पैठे और बहुत हद तक सहज स्वीकृत मान लिये गए व्यवहारों पर सवाल उठाती हैं। उनकी नायिकाएँ ग्रामीण समाज की तथाकथित अनपढ़ औरतें हैं जिनके बारे में पढ़ा-लिखा समाज प्राय: यह सोच रखता है कि उनमें किस बात की स्त्री चेतना हो सकती है।इन औरतों के अवसर कितने भी सीमित क्यों न हों परवे भरपूर जवाब देती हैं। इस जवाब में उसकी सारी जिन्दगी निकल जाती है। पर यही उनकी जीत है कि वे लड़ती हैं और अंत तक समझौता नहीं करती।  “इत्ती सी बात” बहुत ही भावुक कर देने वाली और भीतर तक भेद जाने वाली कहानी है। मुझे यहाँ रजनी तिलक की वह कविता याद आ रही है जिसमें वे सहज स्वीकार करती हैं कि ‘हाँ मैं लड़ाका हूँ।’ पर इसका मतलब यह नहीं है कि ये स्त्रियाँ प्रेम, अपनेपन और जिम्मेदारी के एहसाससे रहित है। दलित स्त्री के व्यक्तित्व की एक जो खास पहचान है वह है उसका कर्मठ होना। वह बहुत मेहनती और बड़े जिगरे वाली होती है। प्रसिद्ध साहित्यकार रांगेय राघव की बहुत प्रसिद्ध कहानी ‘गदल’ भी इसी तरह की कहानी है। ‘गदल’ और इत्ती सी बात की ‘दादी’ स्त्री मुक्ति की आदर्श कही जा सकती हैं। वास्तव में मुक्ति दिमाग से चाहिए। कोई दूसरा, सामने का पुरुष और समाज आपको मुक्त नहीं करता, आप स्वयं इस मुक्ति की एहसास को अपने भीतर धारण करते हैं। निश्चित रूप से समाज में गैर बराबरी है पर आप आपकी जो भी स्थितियाँ हैं उनके बीच ही अपनी लड़ाई भरपूर लड़ते हैं, लड़ सकते हैं, आपको लड़नी चाहिए।‘इत्ती सी बात’ की दादी बहुत कर्कश है, उसे कभी किसी ने हँसते नहीं देखा। पर इसका अर्थ यह भी नहीं है कि वह अपनी जिम्मेदारी और जवाबदेही से पीछे हटती है। बल्कि अपने कर्मठ व्यक्तित्व के बल पर ही उसने वह औरा हासिल किया है कि अपनी शर्तों पर जी सके। खुश होना और अपनी खुशी को हँस कर अभिव्यक्त करना यह नेमत प्रकृति ने अपने किसी जीव को नहीं दी। केवल मनुष्य है जो खुश होकर हँसता है और अपनी खुशी का इज़हार करता है। पर दादी के वैवाहिक जीवन की शुरुआत होती है उस झन्नाटेदार थप्पड़ से जो उसे इसलिए रसीद कर दिया जाता है कि नई नवेली आई बहु जो मात्र तेरह साल की है, ननदों के साथ मिल कर हँस बोल रही है। उसकी उन्मुक्त हँसी बाहर उससे लगभग दूनी उम्र के पति को सुनाई देती है और बस झन्नाटेदार थप्पड़ के साथ “शर्म-हया है कि नहीं, बाबले (मायके) ने कुछ नहीं सिखाया। बाहर मेहमान बैठे हैं और ही-ही कर रही है।”  औरत को सासरे में कोई और इज्जत दे न दे। कोई और समझे चाहे न समझे। पर पति नाम के प्राणी के साथ जिसके पीछे वह अपना सबकुछ छोड़ कर चली आती है, उससे प्यार और अपनेपन की वह उम्मीद करती है। और पति भी जब दूनी उम्र का हो, उससे समझदारी की उम्मीद ज्यादा रहती है।  वह चाहती तो थी कि  गौना कराकर वापस न आए। पर पिता ने अपनी इज्जत की पग़ड़ी उसके पैरों में रख दी। मजबूरन वह ससुराल आई पर अपने भीतर इस कसम के साथ कि वहाँ कभी नहीं हँसूगी। उसकी इस कसम से उसका पूरा जीवन रसहीन हो जाता है। अपनी इस कसम को पालने की खातिर वह अपना सारा जीवन प्यार और अपनत्व के इज़हार से रहित हो कर जीती है। यह एक ऐसा दंड है जो वह स्वयं के माध्यम से समाज को देती है। यह एक ऐसी कसम बन जाती है जिसका तावान उसे अपने आप को निचोड़ कर भरना पड़ता है। सबसे बड़ी बात सारी उम्र बीत जाती है और मरते समय तक किसी को उसके दुख का पता नहीं चलता। पति को तो अपनी उस गलती की गंभीरता का एहसास उस समय भी नहीं होता जब मरने से पहले वह उसे बताती है। “बस, इत्ती-सी बात! और तू उम्र भर…!” उसकी समझ में ही नहीं आता कि औरत की भी इज्जत है, उसका स्वाभिमान है। उसके स्वाभिमान को केवल उस पर हिंसा या यौन हिंसा करके ही नहीं कुचला जाता बल्कि उसके उठने, बैठने, हँसने और बोलने पर सरेआम प्रतिबंध लगाकर भी कुचला जाता है। जब एक नवयौवना को इस आधार पर, उसके घर वाले घुड़कते हैं तो उसका कोमल हृदय, उसका व्यक्तित्व जो अभी आकार ग्रहण करने ही लगे हैं कुंठित और विकृत हो जाता है।  यह समाज के लिए इत्ती सी बात हो सकती है पर दादी मुँह फेर कर यह कहते हुए मर जाती है “इत्ती सी बात?” कहानी में अंत मे आकर इन शब्दों की व्यंजना स्पष्ट होती है। यहाँ कोई भी यह कह सकता है कि आखिर इस कसम से उसने क्या पाया। पर कहने वाला इसकी व्याख्या किसी तरह से करता रहे पर कहानी अपना मकसद पूरा कर देती है। वह अपने पति से यह कह कर मरती है कि “अगले जन्म में मैं आदमी बनूँगी और तुम लुगाई बनना। मैं तुझे खूब हँसाऊँगी। तू हँसना, मैं नहीं मारूँगा…”ऐसा नहीं है उसे अपने पति से प्रेम नहीं है। वह उसकी इज्जत के लिए दोहरी मेहनत करती है। मरते-मरते यह कह कर जाती है कि “अगले जन्म की तैयारी है। तू बेगा आना। मैं बाट देखूँगी…” सारी उम्र उसका बेचारा पति यह समझ ही नहीं पाता कि उसकी हर सुविधा का ध्यान रखने वाली, उसकी सारी जिम्मेदारियों को अपने कंधों पर ढोने वाली उसकी औरत को आखिर दो बोल हँसकर बोलने से क्यों परहेज है। झमकू भी एक ऐसी ही कहानी है जो समाज के इस सत्य को बयां करती है किसंतान न होने की जिम्मेवारी सिर्फ़ औरत को उठानी पड़ती है। गाँव में ब्याहली आई झमकू को उसका पति सास-ससुर इसलिए त्याग देते हैं कि सात साल में वह एक बार भी पेट से नहीं हुई। पर झमकू इस बात को नहीं मानती उसके भीतर कहीं विश्वास है कि बिना किसी सबूत के ऐसे कैसे उसे बाँझ करार किया जा सकता है। वह वहीं रहती है अनाथ हरिया का घर बसाती है। उसका विश्वास जीतता है जब वह पहले ही साल में गर्भ धारण करती है।

असल में राजेन्द्र जी की कहानियाँ अपने विषय- मुद्दों को लेकर इतना ध्यान नहीं खीँचती जितना उस विषय या मुद्दे के ट्रीटमेंट को लेकर। राजस्थानी आबो-हवा, भाषा, बोली बानी और मन:स्थतियों विशेष का चित्रण इन कहानियों को विशेष बनाता है। अलग अलग कहानियाँ अलग-अलग तरह से आगे बढ़ती हैं। कहानी काअपने भीतर के देशकाल में आगे-पीछे होना, कहानी में रोचकता पैदा करता है। झमकू कहानी की शुरूआत झमकू के इस एहसास के साथ होती है कि आज शायद तबियत कुछ गड़बड़ है। “झाड़ू उठाया ही था कि धरती घूमती सी जान पड़ी। वह आँख मूँदकर आँगन में बैठ गई। कुछ देर बाद उठी तो जी मतलाने लगा।….”  एक समझदार पाठक को बताने की जरूरत नहीं कि यह सब किस बात का संकेत है। वह अनुमान लगा लेता है कि यह उसके गर्भवती होने का संकेत है। और उस पर “झूँठ हुआ तो? लोग हँसेगे! हँसे तो हँसे। बाकी रहा ही क्या है।” से पाठक को समझ आता है कि ऐसा बहुत कुछ है जो घटित हो चुका है उसे जानकर ही कहानी को पूरा जाना जा सकता है। फिर, धीरे धीरे पीछे की कहानी खुलती है, और वापस वर्तमान में आकर खत्म होती है। वहाँ पहुँचकर झमकू को ही नहीं बल्कि उसके साथ पाठक को भी असीम शांति मिलती है। “चौधरी का झुका सिर मुश्किल से उठा। आसमान में उमड़ती बादली चाँद को ढक रही थी। वह जल्दी-जल्दी हवेली की तरफ़ बढ़ा। उसके कानों में शूल-सी हँसी टकराई। उसने पलट कर देखा, झमकू पागल-सी खिलखिला कर हँस रही थी। ”‘बादली’ झमकू थी जिसने चाँद के दाग को ढ़क लिया थाऔर साथ में चाँद को भी। अपने इस पुरुषार्थ पर वह खिलखिला के हँस रही थी।

राजेन्द्र जी के यहाँ कहानियों के मामले में काफ़ी विविधता है।यह विविधता कहानी लिखने और कहने के ढंग में भी है और जो कहा जाना है उसे लेकर भी है। एक तरफ़ जैसाकि पहले भी कहा गया कि वे प्रेमचंद टाइप के कहानीकार हैं। जो, जो कहना चाहते हैं उस पर केन्द्रित रहते हैं। आलतू-फालतू के वर्णन और विवरण वहाँ नहीं होते। अब तक हमने जिन कहानियों पर बात की वे ऐसी ही कहानियाँ हैं। बेशक कहानी के देशकाल और पात्रों के भीतर के जज्बातों का चित्रण करने में वे काफ़ी समय लेते हैं। इससे पाठकों को कहानियाँ बहुत बेहतर ढंग से समझ आती हैं। पर सभी कहानियाँ इस तरह की कहानियाँ नहीं हैं। ‘अंतिम रामलीला’ अपने भीतर औपन्यासिक कलेवर लिये हुए हैं तो ‘दिल्ली के बादशाह के दुख’ बाणभट्ट की ‘कादंबरी’ का सा असर पैदा करती है।

‘अंतिम रामलीला’ आजादी के दौर का बहुत नया और देसी विश्लेषण प्रस्तुत करती कहानी है। अपने बीते इतिहास को देखने समझने की एक दम नई समझ देने वाली। यह हनुतपुरा गाँव की कहानी है। गाँव जो आजादी से पहले मुस्लिम तेलियों का गाँव होता था। यहाँ की जमीन में तिलहन, सरसों, मूँगफली की जबरदस्त खेती होती थी। उस इलाके की रानी साहिबा ने यह सब देख समझकर गाँव बसाया था। गाँव में खेती करने वाली जातियों के साथ-साथ तेलियों और विभिन्न शिल्पी जातियों को भी बसाया गया। सबसे ज्यादा काम फलाफूला तेलियों और रैगरों का था। खेती के लिए रेगिस्तान में चड़स की जरूरत थी। चड़स बनाने केलिए रैगरों की। जो बूढ़े और मरे बैलों का इस्तेमाल करके प्रकृति का इको सिस्टम बनाये रखते थे। जल्द ही इन दोनों जातियों का वर्चस्व छा गया। उनकी हवेलियाँ बन गईं। गाँव बहुत खुशहाल था। गाँव में नहीं थे तो राजपूत, ब्राह्मण और महाजन। लेखक लिखता है कि बेशक देश गुलाम था पर गुलामी का दंश इस गाँव ने सीधे नहीं झेलाथा और न ही किसी को ऊँच-नीच के कारण हटकार-फटकार की वेदना से गुजरना पड़ा था। आपस में झड़पे हो जाती थीं पर उनपर जाति और धर्म का रंग नहीं था। पर यह सब बदल गया जब देश आजाद हुआ। भारत-पाकिस्तान का विभाजन हुआ, धीरे-धीरे बाहर की खबरें (मुसलमानों पर अत्याचार और उनके द्वारा देश छोड़ कर जाने की) तेलियों को बेचैन करने लगीं। अंतत: उन्होंने भी गाँव छोड़ कर जाने का निर्णय लिया। इसके बाद उनकी हवेलियों, मकानों और दुकानों को सरकार नेबाहर से आए ब्राह्मणों और बनियों को सौंप दिया गया। ये ब्राह्मण और बनिये अकेले नहीं आए इनके साथ आई हिन्दू धर्म की विभाजनकारी नीति। पहली बार गाँव वालों को पता चला कि कौन जात ऊँची है और कौन नीची।  इस तरह से राजेन्द्र सजल जी यह कहना चाहते हैं कि बेशक विभिन्न पेशों पर आधारित जातियाँ भारतीय गाँवों की सच्चाई है पर उनके बीच मनुस्मृति के विभाजन कारी सिद्धान्त बाद में थोपे गए। यह सब भारतीय गाँवों पर अंग्रेजों के समय,आजादी के दौरान विकसित हुआ। वे कहना चाहते हैं कि भारतीय गाँवों का जातीय वैर-भाव बनियों और ब्राह्मणों का पैदा किया हुआ है। क्योंकि अंग्रेजी शासन और छापेखाने के विकास ने न केवल लिखे शब्द की कीमत बढ़ा दी बल्कि उन जातियों की सामाजिक आर्थिक हैसियत भी बहुत बढ़ गई जो परपंरा से लिपि पढ़ना और लिखना जानती थीं।  उन्होंने रातोरात नए नए शास्त्र रच कर ऐसे प्रचारित कर दिये कि जैसे वे हमेशा हमेशा से जन सामान्य में मान्य थे। खैर कहानी में केवल इतना ही नहीं है। वह रैगरों के अपने हक और संघर्ष की कहानी भी है। कहानी कावितान बहुत विस्तृत और व्यापक है। बनियों और ब्राह्मणों के बीच की राजनीति भी है। ब्राह्मणों की मक्कारी और बनियों की चतुराई भी है। गाँव की छोटी बड़ी करार कर दी गई जातियों के बीच फूट की राजनीति भी है। सबसे बड़ी बात है गाँव के सरपंच (जो जात से रैगर है।) द्वारा ब्राह्मणों और बनियों की इस राजनीति और चतुराई को समझ कर उसका ऐसा तोड़ निकालना की वह शातिरपना बेअसर हो जाए। गाँव में चुनाव होते हैं और ब्राह्मण और बनियों की सारे षड़यंत्र के बाद भी चूहे रैगर का बेटा सरपंच बन जाता है। अब ब्राह्मणों और बनियों ने यह देख लिया है कि लोकतंत्र के चलते उन्हें राजनैतिक सत्ता सभी जातियों के साथ बाँटनी पड़ेगी। कहानी में ब्राह्मणों के नेता आचार्य जी और बनियों के नेता सेठ धनपत जी की बातचीत का नमूना देखिये।बनियों का नेता सेठ धनपत आचार्य जी से कहता है कि… “यह तो निश्चित है कि अब सत्ता मंदिर से निकलकर खेत-खलिहानों और कांकड़ पर बसी बस्तियों में चली जाएगी और हम देख रहे हैं, आज़ादी के बाद से ही कई संगंठन बन गए हैं। आए दिन उनके नेता राजनैतिक जागरुकता के लिए सभाओं का आयोजन करते रहते हैं। ऐसे में अब न तो उनको धर्म और शास्त्र का हवाला देख आप नियंत्रित कर सकते हैं और न ही अछूत कहकर किसी को बहिष्कृत कर सकते हैं।”आचार्य जी जवाब देते हैं “नहीं, ऐसा नहीं है। धर्मस्थलों का सत्ता शून्य होने का अर्थ है, निष्प्राण होना और यह कभी संभव नहीं है। हाँ, कभी कभी सत्ता अपने मार्ग से भटक जाती है। यह एक जंगली हथिनी की तरह होती है, जो न तो अनाड़ियों के काबू में आती है और न ही अपना पुराना आवास भूलती है, देखना एक दिन फिर लोट आएगी।” इसके लिए वे पूरी योजना बनाकर काम करते हैं। सबसे पहले गाँव के पिछड़ी जातियों (किसानों) और दलित जातियों के बीच एक दूसरे के खिलाफ़ एक नए संघर्ष को जन्म दे देते हैं। और दूसरी और धर्म को खाने कमाने का धंधा बनाते हैं और गाँव वालों का आर्थिक शोषण करते रहते हैं। गाँव में होने वाली रामलीला केवल भगवान राम की लीला नहीं बल्कि बनियों और ब्राह्मणों की लीला है। गाँव की किसान जातियों और दलित जातियोंके बीच रामलीला में ज्यादा से ज्यादा दान देने का कंपीटिशन करवाके दोनों से न केवल रुपये ऐंठते हैं बल्कि दोनों के बीच कभी न मिटने वाली विभाजक रेखा भी खींचते हैं। वर्तमान भारत में हम यह देखते ही हैं कि दलितों को जाति के नाम पर प्रताडित करने वाले ज्यादातर पिछड़ी किसान जातियों के ही लोग हैं। इस कहानी में गाँव का सरपंच जो एक पढ़ा लिखा दलित युवक है इस चाल को समझ जाता है और वहरातोंरात उस रामलीला मंडली का तंबू वहाँ से उखड़वाकर फेंक देता है।और फिर कभी उस गाँव में रामलीला न करवाने का निर्णय लेता है। यहाँ आकर कहानी खत्म होती है।  वास्तव में मैंने जैसा कहा कि कहानी का कथानक इतना विस्तृत और व्यापक है कि उस पर उपन्यास लिखने की जरूरत थी। यूँ भी कहानी पचास पेज तक फैली है। कहानी को पढ़ते हुए बार-बार पिछले पन्नों पर लौटने की जरूरत होती है। इतने सारे पक्ष और झरोखें हैं कि बहुत कुछ एक साथ मौजूद है। पाठक ‘जय भीम’ भी सुनता है। रैगरों के लिए ‘गंगापुत्र’ होने की व्याख्या भी सुनता है। हिन्दू-मुसलमान भी है तो गाँव के वे मुहावरे जो इस कहानी को उस गाँव विशेष हनुतपुरा की कहानी बनाते हैं।

“हो ग्यो म्याऊँ को सो मूँडों

थारी शान बिगड़गी जी

आंटी मूँछयाळी बालम

थारी ढीली पड़गी जी”

‘दिल्ली के बादशाह के दुख’ कहानी मृणाल पाण्डे के उपन्यास‘हिमुली हीरामन की कथा’ की याद दिलाती है। दोनों कहानियों का कथानक वर्तमान की राजनीति और राजनैतिक हस्तियों पर केन्द्रित है। यह वास्तव में अपने समय के राजनैतिक इतिहास को लिखने का परंपरागत भारतीय अंदाज है।  स्वयं पत्रिका के संपादक संजीव चंदन की कुछ कहानियों में कथा कहने का यह अंदाज मिलता है। इसमें लेखक सूत्रधार य़ा नट और नटी की तरह कहानी सुनाना आरंभ करते हैं। “एक राजा था। लोगों का मानना था कि वह राजा कम बादशाह ज्यादा था। अत: वह बिना किसी बहस में पड़े यह घोषित कर चुका था कि जिसको जैसा लगे, मान सकता है उसको कोई आपत्ति नहीं हैं। ‘राजा साहब कहो या फिर बादशाह सलामत। फिर भी जब किसी के मुख से वह ‘जहाँपनाह ! संबोधन सुनता तो छाती दूनी हो जाती थी।”यह सबकुछ बहुत व्यंजना परक है। कथा लोककथा की तरह कही गई है। पर लेखक बराबर यह आग्रह करता रहता है कि यह कहानी सच्ची कहानी है। वास्तव में यह लोककथ कहने का ढंग ही है। “कहानी को आगे बढ़ाने से पहले मैं यह बताना उचित समझता हूँ कि यह कहानी मुझे मेरे दादाजी ने सुनाई थी। उस वक्त मेरे और दादाजी के बीच जो संवाद हुआ वह उतना ही रोचक और जरूरी है जितनी कहानी है।” किसी लोककथावाचक की तरह लेखक भी यह दावा करता है कि यह कहानी पीढ़ी दर पीढ़ी इसी तरह सुनाई जाती रही है। कहानी की सच्चाई के बारे में दादाजी कहते हैं कि “हाँ, मैं तुम्हें यह जरूर बता दूँ कि यह कहानी एक सच्ची कहानी है। भले ही इतिहास के पन्नों में इस कहानी के पात्रों और घटनाओं का कहीं जिक्र नहीं मिलेगा, किंतु एक सच्ची कहानी की यह विशेषता होती है कि जो भी उसको पढ़ता है या सुनता है वह उसकी अपनी हो जाती है। उसको लगता है कि यह मेरी या फिर मेरे समय की कहानी है।…” और सच में जब पाठक इस कहानी को पढ़ता है। तो अपने समय के राजनैतिक गलियारों में पहुँच जाता है। इस तरह की कहानियाँ जो अपने समय के शासन और शासक की सच्चाईयों को अपने कथानक के दायरे में लेकर आती हैं वहाँ लेखक को यही शैली अपनानी पड़ती है। इस तरह की कहानियाँ इसी तरह लोककथा शैली में जादुई यथार्थ की तकनीक से कही जाती हैं। इस तरह की कहानियों में लेखक का ध्यान देशकाल और वातावरण को उसके यथार्थ में पकड़ने पर नहीं रहता। वह विवरण नहीं देता। वहाँ एक के बाद एक घटनाएँ कहानी को आगे बढ़ाती हैं। और पाठक बिना कोई सवाल किये कुतुहलवश आगे बढ़ता रहता है। यहाँ कहानी के भीतर एक नई कहानी है। बिल्कुल अलिफ़ लैला की तरह। हाँलाकि यहाँ आधुनिक कहानी का पक्ष कमजोर पड़ता है।

एक और कहानी है ‘कोख कोठरी और अनसुलझा रहस्य’। रहस्य और रोमांच से भरी यह कहानी राजेन्द्र सजल की कहानी कला का एक और नमूना है। जहाँ ‘मास्टर माई’ जैसी कहानियों में लेखक प्रेमचंद सरीखा कहानी को बहुत खोल कर एक एक बात समझाकर कहने वाला कहानीकार दिखता है वहीं इस कहानी में लेखक पूरी कहानी संकेतों में कहता है। उन संकेतों को पकड़कर और खोल पाने में सफ़ल होकर पाठक को एक अलग ही तरह का आनंद मिलता है। कहानी में एक नवाब साहब हैं जिनकी दो बीबियाँ हैं और है एक उनका घरेलू नौकर। बढ़ती उम्र के नवाब साहब की बीबियों से नौकर से बढ़ती नजदीकियाँ जहाँ नवाब साहब को बाप बनने का सुख देती हैं वहीं नवाब साहब का खानदानी खून उस नौकर की मौजूदगी से बार बार पछाड़ खा खाकर गिरता और उठता रहता है। उसी के कारण नवाब साहब भारत छोड़ कर पाकिस्तान जाने का निर्णय करते हैं। पर छोटी बीबी हैं कि वह उस नौकर को भी साथ लेकर चलना चाहती है।इसकी क्या वजह है इसे भी संकेतों में कहा गया है। अंत तक यह रहस्य सुलझ ही नहीं पाता कि असल में पाकिस्तान कौन दो लोग गए और किन दो लोगों को वहीं मारकर हवेली में ही बंद कर दिया गया। पाठक यहाँ अपनी सुविधा से कहानी को जिस तरह पढ़ना चाहें पढ़ सकते हैं। हो सकता है कि हवेली में मिलीं लाश छोटी बीवी और उस नौकर ही हो क्योंकि नवाब साहब उस नौकर को अपने साथ पाकिस्तान नहीं लेकर चलना चाहते थे, क्योंकि उसके सामने रहने से उन्हें हमेशा अपने नामर्द होने की याद आती रहेगी। हो सकता है वह लाश बड़ी बीबी और उस नौकर की हो क्योंकि उस बड़ी बहु का ही तो अवैध संबंध उस नौकर से था। यह भी तो हो सकता है कि वह लाश स्वयं बड़ी बीबी और नवाब साहब की ही हो, कहीं छोटी बीवी ने नौकर के साथ मिलकर उन दोनों की हत्या कर दी हो।  पाठक जिस दिशा में चाहे सोच सकता है, उसी के अनुसार उसे तर्क कहानी में मिल जाएँगे। इस तरह यह कहानी लगातार उसके जेहन में बनी रहेगी। यह इस कहानी की बहुत खास विशेषता है। इसके अलावा भारत पाकिस्तान के बँटवारे की पृष्ठभूमि में इस कहानी को जो खड़ा किया गया है उससे कहानी सच्ची होने का पूरा आभास देती है। बल्कि उसी के कारण कहानी जिंदा हो जाती है। प्रसिद्ध शिक्षाविद् कृष्णकुमार ने अपने एक व्याख्यान में बच्चों को कहानी से कैसे जोड़ें इस मुद्दे पर विचार करते हुए कहा कि कहानी इस तरह कही चाहे कि बच्चों को कहानी, सच्ची लगे। इसके उदाहरण के लिए उन्होंने अपने एक प्रयोग के बारे में बताया कि कैसे एक स्कूल के छोटे बच्चों को उन्होंने एक बार‘ बुढ़िया कीरोटी’ कहानी सुनाई जिस दिन कहानी समाप्त हुई उस दिन वे अपने साथ रात की बासी रोटी ले गए और ले जाकर उस रोटी को उन्होंने यह कहकर अपनी मेज पर रख दिया कि यह उसी बुढ़िया की वही रोटी है जिसे कव्वा ले गया था। बस फिर क्या था वह कहानी जैसे बच्चों के लिए जिन्दा अनुभव हो गई। वे उस रोटी को उसी विश्वास के साथ देख रहे थे हो न हो यही वह रोटी है। क्योंकि वह रोटी साक्षात सामने थी इसलिए उन्हें बुढ़िया और कव्वे की लड़ाई पर पूरा भरोसा हो गया। ठीक यही काम राजेन्द्र सजल जी ने अपनी इस कहानी के साथ किया कोख कोठरी और अनसुलझे रहस्य को भारत-पाकिस्तान के विभाजन की सच्ची घटना के बीच पिरो दिया।

रजनी दिसोदिया मिरांडा हाउस