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दलित स्त्रीवाद : स्त्रीवाद और दलितवाद का विकास

बजरंग बिहारी तिवारी

बजरंग बिहारी तिवारी हिंदी के प्रसिद्द आलोचक हैं।  दलित मुद्दों पर इनकी प्रतिबद्धता जगजाहिर है और यही इनके आलोचकीय व्यक्तिव की खासियत भी है। सम्पर्क  .९८६८२६१८९५

सुनने में अटपटा भले लगे, पर दलित स्त्रीवाद का आगमन कुछ अवधारणाओं के अंत की सूचना देता है. इस कथन को नरम और ग्राह्य बनाने के लिए ऐसे भी कहा जा सकता है कि दलित स्त्रीवाद उन अवधारणाओं के वर्तमान स्वरूप की समाप्ति का सूचक है. ये अवधारणाएं हैं दलितवाद और स्त्रीवाद. अब अगर स्त्रीवाद और दलितवाद को प्रासंगिक बने रहना है, तो उन्हें दलित स्त्रीवाद की वैचारिकी को स्वीकार कर उसके अनुरूप ढलना होगा. विषमता-पीड़ित दुनिया के लिए जो महत्त्व कम्युनिस्ट घोषणापत्र का है, कम से कम भारत के लिए कुछ वैसा ही महत्त्व दलित स्त्रीवाद का है. सूक्ष्म भाषिक अभिव्यक्तियों से लेकर स्थूल जीवन व्यवहार में हिंसा की जैसी व्याप्ति इस समाज में है उसकी माकूल चिकित्सा दलित स्त्रीवाद के पास है. इतिहास के परिप्रेक्ष्य में यह विचित्र किंतु सुखद संयोग है कि जिस वर्ष 1848 में कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो आया उसी वर्ष महात्मा जोतीराव फुले ने प्रथम स्त्री विद्यालय खोला. स्त्री शिक्षा के इस प्रयास पर जिस तरह से हमले हुए, जितने सामाजिक कोनों से हमले हुए उससे वर्चस्व की प्रकृति और पकड़ का अनुमान किया जा सकता है. अपने उदय के साथ दलित स्त्रीवाद ने कुछ मिथकों को ध्वस्त किया है. ध्वस्त हुए मिथक मुख्यत: तीन वर्गों में रखे जा सकते है. एक, सभी स्त्रियों के दुख एक जैसे होते है. दो, सभी दलितों की पीड़ा एक-सी होती है. तीन, घर से बाहर निकलना, कामकाजी होना सशक्तीकरण का एकमात्र तरीका है. ‘सामान्य’ स्त्रीवादियों में जाति और वर्गबोध की जैसी जकड़बंदी है उसका ठीक से खुलासा मुश्किल था, अगर दलित स्त्रियों ने अपनी आवाज बुलंद न की होती.

दलितवाद समता के अपने दावे में पितृसत्तात्मक पूर्वाग्रहों और मूल्यों को किस तरह संजोए हुए है इसका प्रत्यक्षीकरण कठिन था, अगर आंदोलन में दलित स्त्री की भागीदारी न हुई होती. दलित स्त्रियां तो पहले से घर से बाहर जाकर काम करती रही हैं, फिर भी उनकी हालत बदतर बनी रही है. इससे कुलीन विचारकों की यह मान्यता संदिग्ध हो जाती है कि घर से बाहर निकलना और काम करना बेहतर जीवन की अनिवार्य पूर्वशर्त है. जिस समय किस्म-किस्म  के अस्मितावादी चयनित मिथकों के उन्नयन और नए मिथकों के निर्माण में लगे हुए हैं, उस समय मिथक-मात्र के प्रति दलित स्त्रीवाद का रवैया बेरुखी भरा है. यह बात गौरतलब है कि अपने आंदोलन और आकांक्षित समाज के लिए दलित स्त्रीवाद मिथकों या मिथकीय चरित्रों को गैर-जरूरी मानता प्रतीत होता है. मिथकों से मुक्ति के लिए मिथकशास्त्र का अध्ययन आवश्यक है. इस अध्ययन में दलित स्त्रीवाद की बेशक दिलचस्पी है, लेकिन आगम-निगम स्रोतों से मिथकीय पात्र खोज कर लाने और उन्हें आदर्श की तरह या अभीप्सित ‘विक्टिम’ की तरह प्रस्तुत करने, तदनुरूप रणनीति बनाने से भरसक बचने की प्रवृत्ति दृष्टिगोचर होती है. भविष्योन्मुखी आंदोलन के हामी जानते हैं कि मिथक-मार्ग स्निग्ध और इसलिए रपटीला होता है. निस्संदेह स्निग्धता आकर्षित करती है, पर यह प्रलोभन देर तक, दूर तक साथ नहीं देता. उदाहरण के लिए एकलव्य का मिथक ले. पतित गुरु द्रोण से शिष्य बनाने का अनुरोध करता एकलव्य बार-बार अपने को राजा का बेटा बताता है. अगर द्रोण के गुरुकुल में राजा के बेटे ही प्रवेश पा सकते हैं, तो वह भी यह अर्हता पूरी करता है. अब जो न तो राजपरिवार के हैं और न राजकुमार, वे भला इस मिथक को अन्यों के समान क्योंकर अपनाएंगे!

चूंकि दलित स्त्रीवाद दलितवाद और स्त्रीवाद दोनों के लिए असुविधाजनक था, इसलिए इनमें से किसी ने उसका इस्तकबाल नहीं किया. स्त्रीवाद ने मुख्यतया खामोशी अख्तियार कर और दलितवाद ने मुखर विरोध कर अपनी मंशा जाहिर की. जितनी उग्रता से हिंदी में दलित स्त्रीवाद पर आक्रमण हुए उसकी मिसाल किसी दूसरी भारतीय भाषा में नजर नहीं आती. अपनी विकासयात्रा में दलितवाद फुले-आंबेडकर से दूर चला गया था. दलित स्त्रीवाद ने फिर उनकी वैचारिकी से सीधा और सार्थक संवाद कायम किया. आंबेडकरी आंदोलन में कार्यकर्त्ता रहीं मराठीभाषी कौशल्या बैसंत्री ने हिंदी में आत्मकथा लिख कर युगांतकारी दायित्व निभाया, तो उसी पृष्ठभूमि की विमल थोरात ने दलित स्त्री की चिंतनशील धारा को मजबूती दी. अपने ‘पदचाप’ काव्य संग्रह से रजनी तिलक ने दलित साहित्य में वृहद् संस्थागत विमर्श से आगे जाकर बुनियादी सामाजिक ईकाइयों पर पुनर्विचार का सूत्रपात किया और सामान्य स्त्रीवाद की विकट सीमाएं रेखांकित करते हुए अनिता भारती ने शिद्दत से अहसास कराया कि आंतरिक असहमतियों पर परदा डालने से समस्याएं जटिलतर होती जाएंगी. उन्हीं के प्रयास से प्रथम दलित शिक्षिका सावित्रीबाई फुले की रचनाएं हिंदीभाषियों को उपलब्ध हो सकी. फुले-आंबेडकर के आंदोलन और बौद्धिक संपदा की उत्तराधिकारी इन संघर्षचेता लेखिकाओं ने दलित स्त्री आंदोलन की बुनियाद मजबूत की और ऊर्जा और दिशा के मूल स्रोत से उसका जुड़ाव सुनिश्चित किया.

पिकासो की पेंटिंग

अकारण नहीं है कि दोनों तरफ के वर्चस्ववादियों के निशाने पर यही लेखिकाएं है. दलित साहित्य की पहचान उसकी कथ्य केंद्रीयता है. यहां अंतर्वस्तु ही मुख्य है, शिल्प नही. समस्त जोर इस पर रहता है कि क्या कहना है, कैसे कहना है यह मुद्दा पीछे पड़ जाता है. दलित स्त्रीवाद ने इसे बदल दिया. अंतर्वस्तु मूल्यवान है, इसलिए उसके संप्रेषण की प्रक्रिया पर भी उतना ही ध्यान दिया जाना चाहिए. दलित स्त्रीवाद इसीलिए ‘क्या कहा जा रहा है’ के साथ ‘कैसे कहा जा रहा है’ को भी बराबर का महत्त्व देता है. दलित अनुभव वैयक्तिक संपत्ति नहीं है. वह सामुदायिक पूंजी है. उसे बरतने में गहन दायित्वबोध का होना अपेक्षित है. इस भेद को समझने के कारण ही दलित स्त्रीवाद अनुभवपूरित अंतर्वस्तु को लेकर बेहद संवेदनशील है. शिल्प, शैली, भाव, भाषा, भंगिमा सब उसके लिए कथ्य जितना वजन रखते है. दलित साहित्य का स्वर आक्रामक है. आक्रोश उसकी पहचान है. यह आक्रामकता भीतरी और बाहरी दबावों से उपजी है. अटूट सामाजिक हिंसा से टकराती कलम स्वाभाविक रूप से आक्रामक हो जाएगी. दलित स्त्रीवाद ने इस ‘स्वाभाविकता’ में परिवर्तन किया. आक्रोश की धार कुंद किए बगैर अपने लेखन को संवादधर्मी बनाया. संवादधर्मिता की गुंजाइश रचने के लिए विषयवस्तु में विस्तार किया गया, अंदाजे-बयां में किंचित तब्दीली की गई और धीरज का अनुपात बढ़ाया गया. लेखन की एक थीम के तौर पर प्रेम का पहली बार प्रवेश हुआ. जो कथ्य कभी विचलन के रूप में देखा जाता था उसे स्वीकार करने के निहितार्थों और नतीजों पर अभी ठीक से विचार नहीं किया गया है.

प्रतिरोधी धाराओं में अक्सर घालमेल कर दिया जाता है. एक से दूसरी धारा का फर्क समझना कई कारणों से जरूरी है. जाति-वर्ण विरोधी चेतना, दलित चेतना और दलित जीवनानुभव में पगी चेतना भिन्न-भिन्न है. साहित्य से उदाहरण दें तो कबीर पहले वर्ग में आएंगे. ध्यान न रहने से अक्सर उन्हें दलित चेतना का कवि बता दिया जाता है.दलित चेतना में पैंथर और उससे निसृत धाराओं के रचनाकार आएंगे. तीसरे वर्ग में दलित स्त्रीवादी रचनाकार है. इस वर्ग के आदि कवि संत रविदास है. दलित स्त्रीवाद कबीर के भाव-जगत से संबद्ध होने में दिक्कत का अनुभव करता है, जबकि रविदास को वह सहज ही अपना सकता है. इसकी कुछ तो वजह होगी कि कबीर को अपने गुरुओं की सूची में रखने के बावजूद डॉ. आंबेडकर ने उन पर शायद ही कभी लिखा, जबकि बुद्ध और फुले को उन्होंने कभी विस्मृत नहीं किया. फुले को अपनी महत्त्वपूर्ण किताब समर्पित की और जीवन का आखिरी वृहद् ग्रंथ बुद्ध और उनके धम्म पर लिखा.

जनसत्ता से साभार 

प्रेम अब भी एक सम्भावना है, ‘सैराट’

दिवस

 दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में शोधरत सिनेमा में गहरी रुचि. समकालीन जनमत में फ़िल्मों की समीक्षाएँ प्रकाशित. संपर्क : dkmr1989@gmail.com

‘भारतीय सिनेमा का अधिकांश जो सर के बल उल्टा खड़ा है, उसे जो फिल्मकार अपने सिनेमा से पैर के बल सीधा खड़े करने में लगे हैं उनमें से एक मराठी फिल्मकार नागराज मंजुले भी हैं.’ तो शायद मैं इसमें अतिशयोक्ति नहीं पाता. नागराज के यहाँ ‘प्रेम’ इस बार भी एक सम्भावना है. पिछली दफा ‘फंड्री’ में ‘जब्या’ को प्रेम के ‘वंचित स्वप्न के चारागाह’ में उसकी सामाजिक, आर्थिक हैसियत और सदियों से उसके हिस्से टांक दिए गए काम की बेड़ियों ने चौकड़ी मारने से रोक दिया था.  जिसकी खीज के फलस्वरूप उसने जो पत्थर उठाकर पूरी नफ़रत के साथ हम पर चलाया था उसकी तासीर हम अपने-अपने माथों में अब तक महसूस कर रहे हैं. इस बार ‘सैराट’ के माध्यम से नागराज ने हमें निर्वात में ले जाकर पटक दिया है जहाँ दिलों में उठती हूक, कंठ में अवरुद्ध आक्रोश, आँखों की पुतलियों में अटके आंसुओं के कतरों और मन में ‘इन्सां समाजों की दुश्मन इस दुनिया को फूंक’ देने की ‘प्यासा’ के गुरुदत्त की सी बेचैनी के सिवा कुछ नहीं रह जाता.

 अगर नागराज की इस बात को याद किया जाये जिसमें वे कहते हैं कि ‘बॉलीवुड मुझे सिखाता है कि क्या नहीं करना चाहिए.’ उनकी इस बात को ध्यान में रखकर यदि ‘ट्रेजिक लव स्टोरीज’ पर बनी फिल्मों की पड़ताल की जाये तो इन फिल्मों की सीमाएं तुरंत स्पष्ट हो जायेंगी. ‘सैराट’ को मीडिया द्वारा ‘क़यामत से क़यामत तक’ और ‘एक दूजे के लिए’ जैसी फिल्मों को ‘ट्रिब्यूट’ बताया जा रहा है, हालाँकि नागराज ने ऐसी किसी बात से इंकार किया है. लेकिन हम इन फिल्मों को बतौर उदाहरण इस्तेमाल कर सकते हैं कि इनसे ‘सैराट’ कैसे अलग है. बॉलीवुड का ‘पॉपुलर सिनेमा’ अपनी सुविधाओं से परे नहीं जाता, वह पहले एक लकीर खींचता है फिर उस पर चलता है. उससे इतर कैमरा नहीं घुमाया जाता. अगर आप ऊपर दोनों फिल्मों को देखें तो पायेंगे कि वह दो परिवारों, उनके बीच के रिश्तों, षडयंत्रों और इन सब से पैदा हुए वायवीय सा ट्रेजिक वातावरण के कुछ शॉट्स तक महदूद रह जाती हैं. ‘सैराट’ का सेट किसी ‘सेट डिजायनर’ द्वारा जरुरत भर की मांग से तैयार नहीं किया गया. ‘सैराट’ का सेट हमारी-आपकी जिन्दगी है जिसे नागराज ने ‘मराठियों के रोजमर्रे का हिस्सा’ बताया है. जिसमें कैमरा को जल्दबाजी नहीं है. कैमरा इत्मीनान से ‘पर्श्या’ (आकाश ठोसर)   को ‘आर्ची’ ( रिंकू राजगुरू ) के घर के सामने लगे हैंडपंप से दूसरों की बाल्टियाँ भरने के बहाने ‘आर्ची’ की एक झलक पाने की उसकी व्यग्रता को कैद करता है फिर क्रिकेट खेल के बीच में ही अम्पायर ‘बिली बोवडेन’ बने एक लड़के की माँ द्वारा छड़ी से उसकी पिटाई करने वाले दृश्य को पकड़ता है. इन दोनों दृश्यों को भारतीय समाज के प्रमाणिक दृश्य होने से इंकार नहीं किया जा सकता. कैमरे का यह इत्मीनानपन दर्शकों को अभ्यस्त बनाता चला जाता है और फिर किसी ऊँची पहाड़ी में ले जाकर  जैसे धक्का दे देता है जिसका जादू हम फिल्म के बिलकुल अंत में देखते हैं.

सैराट’ में नागराज मंजुले एक नितांत नई सिनेमाई भाषा से दर्शकों का तआरुफ़ करवाते हैं जो अपने अन्दर गूढ़ अर्थों को छुपाये हुए है. जो इसकी सिनेमाई भाषा, इसकी सांकेतिकता, इसके विषय के चयन के पीछे की राजनीति को नहीं समझेंगे, वे कभी नहीं जान पायेंगे कि ‘सैराट’ एक नए तरह के भारतीय सिनेमा की धमक है जो अपने स्वरुप में वैश्विक दर्शक वर्ग को प्रभावित करने की ताकत रखता है, वे कभी नहीं जान पायेंगे कि ‘सैराट’ को फिल्म का कथानक, फिल्म को बनाने का तरीका और दर्शकों से उसका जुड़ाव इसे किस पायेदान पर खड़ा करता है.

सैराट का गीत 

मुझे आश्चर्य होता है जो ‘सैराट’ में प्रेम की पृष्ठिभूमि को दर्शकों को गुदगुदाने का महज एक जरिया भर मानते हैं या तो उनके पास बॉलीवुड की तथाकथित मुख्यधारा की प्रेम-कहानियों वाली फिल्मों से अलग एकदम देशज कलेवर को पहचान पाने की नजर नहीं बची या फिर वे भी किसी खास राजनीतिक चालबाजी से प्रेरित होकर फतवे सुना रहे हैं. हमें भूलना नहीं चाहिए कि नागराज मंजुले महाराष्ट्र के एक दलित परिवार से आते हैं और उनके जीवन में फुले-अम्बेडकर के विचारों के असर से इनकार नहीं किया जा सकता, जिनके बारे में उन्हें उनके तमाम साक्षात्कारों में बोलते हुए सुना जा सकता है. क्या यह अनायास है कि उन्होंने फिल्म के कथानक को एक दलित लड़के और सवर्ण लड़की के प्रेम को केंद्र-बिंदु बनाया है? मैं केंद्र-बिंदु इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि जब इस केंद्र-बिंदु से सूत्र पकड़कर कहानी आगे बढती है तो वहां प्रेम में होने वाले द्वंद्वों की तीव्रता और नारकीय जिंदगियों के पथरीले यथार्थ का बड़ी बेहरमी से दर्शकों का वाबस्ता होता है, जिस पर मैं बाद में आऊंगा.

खून की श्रेष्ठता की झूठी बुनियाद पर खड़ी भारतीय समाज की जाति व्यवस्था को कैसे ध्वस्त किया जाये यह शाश्वत सवाल अपने पूरे तीखेपन के साथ आज भी दरपेश है. जाति-व्यवस्था के उन्मूलन पर बात करते हुए कभी डॉ. अम्बेडकर ने अपने लंबे भाषण जो बाद में  ‘एनहिलेशन ऑफ़ कास्ट’ नाम से छपा, जिसमें उन्होंने जाति-उन्मूलन के लिए अंतर्जातीय विवाहों पर भरोसा जताया था. अपेक्षाकृत लम्बा उद्धरण है लेकिन उसे यहाँ फिर याद करना जरुरी है, “रक्त के एकीकरण से ही आपसी भाईचारे की भावना पैदा की जा सकती है, और जब तक बंधुत्व की यह भावना नहीं होगी, सम्बन्धी होने, जुड़े होने की भावना सर्वोपरि नहीं होगी तब तक जाति द्वारा पैदा की गई अलगाव की भावना, भिन्न होने की भावना समाप्त नहीं होगी. अन्य धर्मों की अपेक्षा, हिन्दुओं के सामाजिक जीवन में तो अंतर्जातीय विवाह अत्यधिक महत्वपूर्ण व प्रभावशाली सिद्ध होंगे. क्योंकि जिस समाज में अन्य संयोजन-सूत्र अथवा सहयोग के आधार उपलब्ध होते हैं उनमें विवाह एक साधारण घटना मात्र होते हैं. परन्तु जहाँ समाज अन्दर से नारंगी की भांति विभक्त हो, वहीँ उसे जोड़ने के लिए नारंगी के छिलके की भांति विवाह-बंधन आवश्यक है. अतः अंतर्जातीय विवाह ही रोग का सही उपचार है, अन्य और कोई इलाज इस जाति-प्रथा की कुरीति को दूर करने की क्षमता नहीं रखता.”

पुनर्जागरण काल के सुधार आंदोलनों से लेकर तमाम राजनीतिक आंदोलनों के बावजूद एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था को बना पाने में हम बुरी तरह विफल हुए हैं जहाँ हम अंतर्जातीय विवाहों को सहज सफल बना पाते. तो रास्ता क्या है? मैंने ऊपर कहा कि नागराज के यहाँ प्रेम अब भी एक सम्भावना है, ‘द हिन्दू’ में नम्रता जोशी के साथ साक्षात्कार में नागराज मंजुले एक जगह कहते हैं, “प्रेम एकमात्र सम्भावना है. प्रेम ही उन हथकड़ियों को तोड़ सकता है जिनसे हम बंधे हुए हैं. मैं यह बात कहने वाला अकेला नहीं हूँ; प्रत्येक कवि, हर संत ने अपने साहित्य में यही बात की है. मराठी कवि कुसुमाग्रज ने तो यहाँ तक कहा है कि अकेले प्रेम ही वह सम्भावना है जो संसार को एक खूबसूरत अस्तित्व दे सकता है.” ये प्रेम विवाह ही हैं जो ज्यादा से ज्यादा अंतरजातीय  विवाहों के लिए जमीन तैयार करेंगे. आज ये जो प्रेमी जोड़ों को मार दिया जा रहा है, ये जो खाप पंचायतें बनाई जा रहीं हैं, ये जो ऑनर किलिंग की जा रही हैं. इन सबका सम्बन्ध उच्च जाति और निम्न जाति के भेद को बनाए रखने के लिए है क्योंकि जाति की जो व्यवस्था है वह कुछ समुदायों के लिए विशेषाधिकार, साधन-सम्पन्नता, भोग-विलास और श्रेष्ठता बोध को बनाए/बचाए रखने की व्यवस्था है जिसे वह छोड़ना नहीं चाहता.

यह जानना बहुत दिलचस्प होगा कि अब तक सम्मान के नाम पर जितनी हत्याएं प्रेमी जोड़ों की हुई हैं उनमें से कितने सजातीय हैं? शायद यह दूर की कौड़ी लगे क्योंकि अलग-अलग जातियों,  उनमें भी ज्यादातर सवर्ण और दलित जोड़ों की सम्मान के नाम पर होने वाली हत्याओं के आंकड़े ही सबसे ज्यादा सामने आते हैं. फिल्म में एक सबका बहुत ही जाना-पहचाना सा दृश्य है. वैलेंटाईन डे है, ‘आर्ची और पर्श्या’ एक-दूसरे को विश करके स्कूटी से पार्क के सामने से गुजर रहे हैं और वे कुछ पुलिसवालों के साथ गले में भगवा गमछा डाले हुए लोगों द्वारा प्रेमी-जोड़ों को पीटते और उनको सार्वजनिक रूप से अपमानित करते हुए देखते हैं. क्या यह दृश्य अनायास है? या संस्कृति की रक्षा के नाम पर जो इस व्यवस्था को बनाए रखने के लिए ऐसे संगठनों, समूहों, पार्टियों की राजनीति है उसे अब तक ‘आर्ची और पर्श्या’ की कहानी से पूरी तरह तादात्म्य बना चुके दर्शकों के सामने बेनकाब कर देने वाला है?  यहाँ यह जोड़ना जरुरी है कि फिल्म ‘ऑनर किलिंग’ से ज्यादा ‘पितृसत्ता’ की क्रूरताओं से मुख़ातिब है. ‘ऑनर किलिंग’ जाति-व्यवस्था और पितृसत्ता का अंग होते हुए दण्डित करने की एक तात्कालिक कार्यवाही है लेकिन ‘पितृसत्ता’ आपका अंत तक पीछा नहीं छोड़ती जिसकी कई परते हैं. जिसे फिल्म के अंत में उसकी सम्पूर्ण क्रूरता में देखने से पहले हम दो छोटे दृश्यों में देखते हैं. पहला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि सामाजिक रूप बिल्कुल निचले पायेदान पर खड़े दलितों की पंचायत ने ‘पर्श्या’ के बाप को बिरादरी बाहर कर दिया है. जिसके चलते उसे अपनी बेटी की शादी करने में मुश्किलातों का सामना करना पड़ रहा है. वह तथाकथित अपने बेटे की गलती की सजा पंचायत के सामने खुद को थप्पड़ मार कर देता है.


यह जातिगत आधार पर विभक्त समाज की विडंबना है  कि एक तरफ अछूत कहकर कुछ जातियों को पद-दालित बनाया गया और दूसरी तरफ परम्परा व रीतियों के नाम पर उन्हें समाज व्यवस्था का चौकीदार भी बना दिया गया. दूसरा दृश्य है जब ‘आर्ची’ के मोबाइल में रात में उसकी कलीग का कॉल आता है और ‘पर्श्या’ के मन में शक पैदा होता है. वह उसका मोबाइल चेक करता है. सिनेमा हॉल में आर्ची को उसके बॉस के साथ बात करते हुए देखता है, शक और गहराता है, वह इस विषय में उससे बात करना चाहता है और आक्रोश में रेस्तरां में सबके सामने ‘आर्ची’ को थप्पड़ मार देता है. यह समझना बेहद जरुरी है की जो ‘आर्ची’ शुरू में बेहद साहसी नजर आती है और वह अपने प्रेम के लिए सबसे टकरा जाने की हिम्मत रखती है अंत में सामाजिक रूप से कोई हैसियत न रखने के बावजूद ‘पर्श्या’ महज पुरुष होने के चलते अपना यह विशेषाधिकार समझता है कि वह ‘आर्ची’ पर सिर्फ शक के चलते हाथ उठा देने का अधिकार रखता है. ‘आर्ची’ के साहसीपन को हमें दो स्तरों में समझना होगा एक तो निर्देशक के नजरिये से,  जिसमें वो एक पुरुष निर्मित संसार के स्टीरियोटाइप से उकता गया है, उसके सामने स्त्रीवाद का वह ज्वलंत प्रश्न है कि सवर्ण और दलित होने के बावजूद एक स्त्री, एक स्त्री है. जिसे स्त्रीवाद की भाषा में कहा जाता है कि एक स्त्री ‘डबल प्रोलेतेरियत’ है. जहाँ उसका शोषण ‘परिवार, संपत्ति और राज्य’ के स्तरों में हो रहा है. जिसके सामाजिक आयामों को समझते हुए वह एक स्त्री को अपनी फिल्म में वह रूप देता है जहाँ वह एक निर्णायक भूमिका में सामने आती है. वह एक बहनापे से प्रेरित होकर दलित स्त्री को ‘माँ’ कहकर संबोधित करती है, एक दलित स्त्री के हाथ से उसी निश्छलता के साथ पानी लेकर पीती है,



वह एक दलित अध्यापक को अपने भाई द्वारा थप्पड़ मारे जाने पर विक्षुब्ध होती है, वह अपने सामाजिक-आर्थिक रूप से शक्तिशाली पिता द्वारा अपने प्रेमी और उसके दोस्तों को गलत ढंग से फंसाये जाने का पूरी ताकत से विरोध करती है, वह अपने प्रेमी और उसके दोस्तों को पिटते हुए देखकर उनके बचाव में खुद कूद पड़ती है. लेकिन दूसरी चीज वह है कि उसे सिर्फ उतनी ही स्वतंत्रता मिली हुई है जितनी उसके परिवार की मर्यादाएं उसे इजाजत देती हैं, उसके पार जाने पर उसका परिवार उसकी जान लेने में भी कोई मुरौव्वत नहीं करता. नागराज मंजुले के यहाँ जो सबसे खास बात है कि वह एक प्रेम कहानी को सिर्फ ‘प्रेम अँधा होता है जाति-पाति नही देखता’ वाले वायवीय अंदाज में सामने नहीं लाते. ऊपर जो इशारा किया गया है कि वहां प्रेम में होने वाले द्वंद्वों की तीव्रता और नारकीय जिंदगियों के पथरीले यथार्थ का बड़ी बेरहमी से दर्शकों का वाबस्ता होता है, बहुत सचेतन ढंग से वे ऐसे दृश्य रचते हैं जब ‘आर्ची’ और ‘पर्श्या’ भागकर हैदराबाद आते हैं और एक ठेले में खाने के बाद पानी पीना होता है तो ‘आर्ची’ उस ठेले का पानी नहीं पी पाती जिसे ‘पर्श्या’ बहुत सहजता के साथ पी जाता है ‘पर्श्या’ को ‘आर्ची’ के लिए एक बोतल वाला पानी लेना पड़ता है. दूसरा दृश्य जिसमें झुग्गियों में बने सार्वजनिक शौचालयों का प्रयोग करना पड़ता है जिसमें एक संभ्रांत परिवार से ताल्लुक रखने वाली लड़की के लिए जाना मुश्किल होता है. एक दृश्य में ‘आर्ची’ को देखकर ऐसा लगता है जैसे वह प्रेम की खातिर अपनी सुख की जिन्दगी छोड़कर जिस नारकीय जीवन में रहने को अभिशप्त हो गई है, इस जिन्दगी को जीते हुए वह अपनी अभ्यस्त जिन्दगी के चलते गहरे द्वंद्व में है जिसे वह ‘पर्श्या’ से बांटते हुए कहती है.‘मुझे सच-मुच नहीं पता मैं क्या करूँ, घर में अकेले-अकेले बैठे-बैठे मुझे बुरे-बुरे ख्याल आते रहते हैं.’ कई बार आभास होता है जैसे ‘आर्ची’ को प्रेम में अपने लिए गए निर्णय के लिए दुःख है और वह अपने सुविधा-संपन्न, सहूलियत की जिंदगी में वापस लौट जाना चाहती है.

उस दृश्य को भुलाया नहीं जा सकता, जिसे संभवतः मैं फिल्म का सबसे अर्थवान और कलात्मक दृश्य मानता हूँ, जहाँ ‘आर्ची’ एक झुग्गी के सामने बैठी है और उसकी नजर के साथ-साथ कैमरा भी उठता है और दर्शकों के सामने विस्तीर्ण में फैली टीन की क्षत वाली झुग्गियां आती हैं. यह दरअसल ‘प्रेम’ के बाद की चीज है ठीक ‘डिक्लास’ होने जैसी स्थिति. हमारे ऐशो-आराम, सुख-सुविधा सम्पन्न जिन्दगी से इतर एक यह दुनिया भी है. जिसे ‘आर्ची’के साथ-साथ थिएटर में बैठा खाता-पीता मध्यवर्ग भी देख रहा है. ये दृश्य दर-असल दो दुनियाओं, दो संस्कारों के दृश्य हैं जहाँ जिन्दगी की रंगीनियत और स्याह पक्षों की बहुत गहरी लकीर खिंची हुई है जिसे मानवता के हक़ में मिटाना ही होगा. चूँकि फिल्म का अंत ‘ट्रैजिक’ है. अब सवाल यह है कि ‘ट्रैजडी’ को समझा कैसे जाये? ‘ट्रैजडी’ दरअसल दो तरह से अपना असर छोड़ती हैं, पहला जब किसी भी कला विधि में नायक-नायिका की संवादहीनता के चलते एक-दूसरे के बारे में बना ली गईं खतरनाक अवधारणाएं,  जिनके बारे में दर्शक जानता है कि ये सच्चाई नहीं है, दूसरा, जब पाठक, श्रोता या दर्शक सम्बंधित पात्रों से अपना तादात्म्य बना ले, उनका अप्रत्याशित अंत; ये दोनों तरह की ‘ट्रैजडियां’ दर्शकों पर गहरा असर छोड़ती हैं. इस बहाने मैं बहुत संक्षेप में ‘नीरज घेवन’ की ‘मसान’ को याद करना चाहता हूँ.  इस फिल्म में भी एक सवर्ण लड़की और दलित लड़के के प्रेम का पहलू है, यहाँ निर्देशक लड़की की किसी सड़क दुर्घटना में मृत्यु दिखाकर एक समझौता करते हुए प्रतीत होते हैं इसलिए फिल्म की ‘ट्रैजडी’ अपनी पूरी सघनता में असर नहीं छोड़ पाती. लेकिन जैसा की ऊपर कहा गया है कि ‘सैराट’ में कैमरा दर्शकों को अभ्यस्त बनाता चला जाता है. याद कीजिये वे दृश्य जब एक बच्चे के साथ, किसी निर्माणाधीन इमारत में फ़्लैट देख रहे ‘आर्ची’ और ‘पर्श्या’,

अपनी माँ से मोबाइल से बात करती हुई ‘आर्ची,’ घर से आये उसके भाई और अन्य लोगों के हाथों माँ द्वारा भिजवाये बच्चे के लिए कपड़े, मिठाइयाँ, गहने देख रही ‘आर्ची’, मेहमानों को चाय दे रहे ‘पर्श्या’ को देखकर उनकी जिंदगी एक सामान्य ढर्रे में शुरू होने की दर्शक कल्पना कर लेता है लेकिन फिर जैसे ‘आर्ची’ और ‘पर्श्या’ की अप्रत्याशित हत्या दर्शको के बीच सन्नाटा भर देती है जिसे बच्चे के पैरों से बनते खून से सने पदचिन्ह और बिना साउंड का दृश्य और गाढ़ा बना देता है जिसे थिएटर हॉल में बैठा हर दर्शक गहराई तक महसूस करता है.  अजय-अतुल के संगीत के जिक्र के बिना फिल्म पर बात अधूरी होगी. संगीत फिल्म का कुछ इसतरह हिस्सा बन गया है कि वह प्रेम में पड़े दो युवाओं के अन्दर से स्वतःस्फूर्त ढंग से फूट कर बहने वाली सिम्फनियाँ लगती हैं, जिसके असर और महत्व पर पूरी सम्पूर्णता में अलग से लिखे जाने की जरुरत है. जो ‘सैराट’ में सिर्फ गीत-संगीत होने के चलते व्यावसायिक होने के लक्षण देख रहे हैं उन्हें सिर्फ नागराज के पक्ष को ध्यान में रखना चाहिए कि, ‘ये गाने और संगीत सिर्फ आंतरिक भावनाओं को व्यक्त करने के लिए बैकग्राउंड में इस्तेमाल किये गए हैं.’ प्रेम के दृश्यों में स्लोमोशन व सिम्फनी और सुधाकर रेड्डी के जिग-जैग और लॉन्ग कैमरा शॉट्स वाली सिनेमैटोग्राफी फिल्म को बिना सेट के जो भव्यता दे देती है वह अकल्पनीय है. अंत में यह जो व्यावसायिक, लोकप्रिय और यथार्थपरकता के बीच बहुत झीनी सी अनसुलझी रेखाएं हैं उन्हें हम जितनी जल्दी सुलझा लें तो शायद हम भारतीय सिनेमा के उस पहलू का जो एक साथ लोकप्रिय भी है, व्यवसाय भी कर रहा है और यथार्थपरक भी है, कहीं ज्यादा खुलकर स्वागत कर पायेंगे.

देह बनाम मन की स्वतंत्रता की कहानियाँ

भावना मासीवाल

भावना मासीवाल महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय में शोध छात्रा हैं.   संपर्क :bhawnasakura@gmail.com;

कहानी का संसार कल्पना और यथार्थ के बीच चित्रित महीन तंतुओं से सृजित होता है. यह महीन तंतु ही कहानीकार की अपनी लेखन या कहें की रचना कला है जो उसकी लेखकीय दृष्टि को जीवंत करती है. लेखिका की लेखकीय दृष्टि भी कल्पना और यथार्थ के बीच के इन तंतुओं से सृजित है जहाँ वह लिखती है. ‘समाज का वो अंतिम आदमी ही मेरी कहानियों का स्रोत और लेखन की प्रेरणा है . उसकी भाषा, मेरी भाषा . उसके भीतर की घुटन को स्वर व आकार देना ही मेरा ध्येय.’ 21वी सदी की समकालीन समस्याओं को जिन कहानीकारों ने अपनी रचना का विषय बनाया उनमें हुस्न-तबस्सुम निहां का नाम भी प्रमुख रूप से लिया जाता है. इनकी कहानियाँ जीवन से होकर गुजरती हैं और उन अनछुए पहलुओं को सामने लाती हैं जिन्हें हमारी नजरें न देख पाती हैं और न ही समझ पाती है. ‘नर्गिस …फिर नहीं आएगी’ हुस्न तबस्सुम निहां का दूसरा कहानी संग्रह है इसके पूर्व इनका चर्चित कहानी संग्रह ‘नीले पंखों वाली लड़कियाँ’ रहा है. ‘नर्गिस …फिर नहीं आएगी’ संग्रह में सत्रह कहानियाँ संग्रहित है. सभी कहानियों का कैनवास भले ही अलग-अलग रंगों से रंगा गया हो परंतु उन अलग रंगों में चित्रित सभी दृश्य ‘स्त्री’ पर केन्द्रित देखें जाते है. साथ ही इनकी कहानियाँ आज के बदलते मानवीय सरोकारों को भी अभिव्यक्त करती है. स्त्री स्वतंत्रता, समानता व अधिकार के मुद्दों को इनकी कहानियाँ उठाती हैं और स्त्री की दैहिक स्वतंत्रता पर चल रही लंबी बहसों से हमें बाहर निकाल ‘निर्णय’ की स्वतंत्रता के प्रश्न से रूबरू करवाती है.  आज़ादी के इतने लंबे संघर्ष और स्त्री अधिकारों के लिए ज़ारी संघर्षों के उपरांत आज भी हमारी बहस का केंद्र स्त्री की ‘सेक्सुअलिटी’ ही होती है.  जबकि उससे गंभीर बहस का मुद्दा उसके ‘निर्णय’ व ‘सोचने’ की आज़ादी का है ।


हुस्न तबस्सुम निहां ने स्त्री स्वतंत्रता का आशय स्त्री के खुद के प्रति लिए गए निर्णयो की आज़ादी को माना है. इसी कारण इनकी कहानियों के महिला पात्र अपने जीवन के निर्णय खुद लेते देखे जाते हैं फिर वह ‘तालों के तलातुम’ कहानी में कैद ‘मिसेज डिसूजा’ का व्यक्तित्व हो , जो अपनी जॉब से इस्तीफा देकर अपने और परिवार के लिए जीने का निर्णय लेती है या ‘थैंक्यू नेपोलियन’ कहानी की शमिता का व्यक्तित्व जो जिंदगी जीने के लिए बिना शादी के माँ बनने का निर्णय लेती है या फिर उन महिलाओं के अपने प्रति लिए गए निर्णयो की आज़ादी का संघर्ष हो जिसमें ‘तय्यब अली प्यार का दुश्मन’ कहानी की ‘नूरा’, ‘दैहिक ऋतुओं के पार’ की ‘रजनी’ या ‘वंचित मन’ कहानी की ‘नायिका’ का व्यक्तित्व, अपनी पूरी गरिमा के साथ उभर कर सामने आता है. यह तीनो कहानियाँ समाज के जाति आधारित असमान विभाजन पर भी प्रश्न उठाती है और एक ऐसी युवा पीढ़ी की ओर हमारा ध्यान केन्द्रित करती हैं जो समाज के रूढ़ मूल्यों को चुनौती देता है और अपने निर्णयों के प्रति सही साबित होकर दिखाता है. ‘तय्यब अली प्यार का दुश्मन’ कहानी की नूरा और अबरार सामाजिक बंधनों को तोड़कर प्रेम करते हैं उनका यह प्रेम भले ही समाज के तय शुदा मानदंडों में फिट नहीं बैठता परंतु दोनों का प्रेम उनके परिवारो को अनचाहे ही आत्मिक रूप से जोड़ देता है.  ‘वंचित मन’ कहानी का कैनवास भी समाज में जाति पवित्रता के प्रश्न पर केन्द्रित है. आज भी समाज में जाति के स्तर पर अपने से निम्न जाति को अस्पृश्य या कहे की अपवित्र समझा जाता है और शुद्ध होने के लिए ‘गंगा जल’ का प्रयोग किया जाता है. वंचित मन कहानी की नायिका कहती है ‘क्या माँ, आपकी ये गंगा-मैया कितनी पवित्र होगी, ये तो आप ही जाने.

शहर के सारे नाले, परनाले, सीवरेज उसी में जाके गिरते हैं, सारा कूड़ा-कचरा उसी में फेंका जाए, फिर भी वो पवित्र है. कहानी की नायिका अपनी जाति से बाहर शिखर से प्रेम करती है. उसका यह प्रेम प्रतिष्ठा, कर्तव्य और दायित्वों के भारी भरकम शब्दों के जंजाल में फस कर दम तोड़ देता है. परंतु भविष्य में जब उसके अपने पिता तथाकथित निम्न जाति की महिला से विवाह कर घर छोड़ देते हैं तो एक आत्मिक संतोष का भाव कहानी की नायिका में देखने को मिलता है ‘आखिर पिता भी इस बंधी-बंधाई तथा प्रतिष्ठा और उमस भरी पवित्रता से पलायन कर ही गए.’  ‘दैहिक ऋतुओं के पार’ कहानी जातीय और वर्गीय असमानता के घेरो से बाहर निकल रजनी और फेरु के सात्विक प्रेम की कहानी है.  रजनी जो विवाह के 5 साल तक पति के प्रेम में सुखी थी अचानक चर्म रोग से ग्रसित हो जाती है और पति द्वारा तिरस्कृत कर घर से निकाल दी जाती है क्योंकि उसकी सुंदरता अब दागदार हो गई थी. वहीं फेरू रजनी को उसके वास्तविक रूप में अपनाता है और कहता है ‘बदन की छोड़ो. प्रेम दागी नहीं होता रज्जों, प्रेम-प्रेम होता है. स्त्री मन से अधिक तन की सुंदरता का आज का कांसेप्ट स्त्री को उसकी यौनिकता में ही देखने की बात करता है. ‘तुम्हारी यात्रा तो देह से शुरू होके देह पर ही समाप्त हो जाती है. तुम्हें क्या पता दैहिक यात्राओं के पार भी एक यात्रा है.’ ‘दैहिक ऋतुओं के पार’ कहानी के माध्यम से लेखिका ने स्त्री मन के भीतर उठते उन प्रश्नों को उठाया है जो हर स्त्री के भीतर है.  क्या स्त्री महज शरीर से अधिक कुछ नहीं है ? उसका अपना शरीर ही क्यों उसका व्यक्तित्व निर्धारित करता है ?

‘आँधियों के छोर’ कहानी इस संग्रह की पहली कहानी है जो एन.आर.आई पुरुषों या कहें की दुल्हों पर केन्द्रित है जिनका सोचना है कि ‘इंडियन लडकियाँ चीप एण्ड बेस्ट होती है..और मैरेज करके लड़कियाँ यूज करो तो खर्च कम आता है.’  आज भी हमारे समाज में लड़कियों की शादी एन.आर.आई. लड़को से करना गर्व की बात मानी जाती है और लडकियाँ भी उज्जवल भविष्य के प्रति चिंतामुक्त हो यह विवाह स्वीकार कर लेती है. परंतु जिस भविष्य की उज्ज्वलता उन्हें इस ओर आकर्षित करती है वही जब यथार्थ होकर सामने आता है तो उनकी स्थिति भी सिम्मी की तरह हो जाती है. हाल के कुछ वर्षों में भारत में इस तरह के बहुत से ‘केस’ सामने आए हैं. यह हमारे समाज के बीच एक ज्वलन्त मुद्दा है जिसे लेखिका अपनी कहानियों में उठाती हैं इसके अतिरिक्त कई ओर मुद्दे भी इनकी कहानियों में उठाए गए हैं जिनमें बाजार और बाजार से उपजी संवेदनहीनता का मुद्दा प्रमुख है .भूमंडलीकरण के इस दौर में पारंपरिक संबंधों में तेज़ी से हो रहे संक्रमण के बदलाव को भी लेखिका ने अपनी कहानियों में दिखाया है. आज के बदलते परिवेश में पूंजी के वर्चस्व ने कैसे मनुष्य के संबंधों व उसकी प्राथमिकताओं को बदला है ‘तन्हाइयाँ’, ‘वापसी’, ‘भीतर की बात’ और ‘…कि शो खत्म हुआ’ संग्रह की कहानियाँ इन मानवीय संवेदनाओं पर केन्द्रित है. तन्हाइयाँ कहानी का नायक जहाँ अपने ही परिवार के भीतर अकेलेपन का शिकार है जो ताउम्र परिवार के लिए ओवरटाइम करता है अपनी जिम्मेदारियों के प्रति प्रतिबद्ध है बावजूद इन सब के अपने ही परिवार में संवादहीनता का शिकार होता है. यह कहानी आज के परिवारों की यथा-स्थिति पर केन्द्रित है जो ‘सेल्फ सेण्टरड’ होते जा रहे है.

‘पर्सनल स्पेस’ और प्राइवेसी ने जहाँ न केवल परिवार में माता-पिता और बच्चों के बीच दूरी कायम कर दी है बल्कि एक पिता का अपने बच्चों के कमरे में जाना भी बच्चों की निजता का अतिक्रमण लगता है. ‘थके क़दमों से आगे बढ़े और सहसा ऋतु के कमरे के सामने ठिठक गये. कमरे की सारी खिड़कियाँ भटो-भट खुली हैं और ऋतु कैनवास पर झुकी है . भीतर एक विचित्र भयावह बैचेनी चुभ गई.  वह तेज़ी से पीछे हट गए.  कहीं ऋतु देख ना ले, कहीं पकड़े ना जाएं; उनकी निजता का अतिक्रमण करते हुए.’  कहानी का पूरा कैनवास अकेलापन, अजनबीयत, प्राइवेसी और जीवन से विरक्ति के भाव को दिखाता हैं जो आज कि परिस्थितियों की उपज है. ‘भीतर की बात’ कहानी का कैनवास पूंजी और मनुष्य के बीच के बदलते और नए स्थापित रिश्तों की ओर ले जाता है. चन्दर और रमा के बीच आए दिन होती मार-पीट से सारा मोहल्ला परेशान है और इस मार-पीट का कारण उससे भी दिलचस्प. ‘रमा तू सोच, हमारे घर और हमारे बाल-बच्चों का खर्च कहाँ से पूरा होता है ? हमारी परचून की दूकान में कितनी आमदनी होती है ? इसी पर रहूं, तो एक रोटी भी ढंग से ना खाई जाए । सब चलता है अम्मा को मिलने वाली बापू की पेंशन से । पेंशन है कब तक ? जब तक अम्मा की सांस चले है .इसीलिए इसे खूब खिला-पिलाकर टाठी रखना है. इसे मरने नहीं देना है. ना ही बीमार होने पाए. नहीं तो सारा पैसा दवा-दारू पे उड़ जाएगा. सो, समझ-बूझकर काम ले. बच्चे को एक पहर दूध ना मिले तो ना सही मगर अम्मा की रातिब में कमी ना होने पाए .बूढी हड्डियाँ हैं, एक बार लड़खड़ाई तो ढ़हने में देर नहीं लगेगी.


वह दस बार दूध पिए, फल खाए, सोने का अंडा पाने के लिए मुर्गी को तंदुरुस्त रखना ही पड़ेगा रमा, इसमें ढिलाई का मतलब है, अपने हाथ-पांव काट लेना.’ परिवार के भीतर गहराती यह मानसिकता प्रेम से नहीं बल्कि पूंजी से उपजी है. यह आज की भौतिकतावादी संस्कृति की देन है जिसने मानवीय संबंधों को पूंजी से कमतर बना दिया है. वापसी कहानी भी इसी भौतिकतावादी संस्कृति से उपजी कहानी है जो एक ओर सरकारी नीतियों व कार्यशैलियों से त्रस्त ग्रामीण समाज की मनः स्थिति और गरीबी को दिखाती है तो दूसरी ओर मानवीय संबंधों से अधिक पूंजी की महत्ता के वर्चस्व को. दुर्घटना में केशव का मरना और मुआवजे के समय ठीक होकर लौट आना, न उसकी अपनी माँ स्वीकार पाती है न पत्नी. माँ की आँखों में तमाम प्रयास के बाद भी वह चमक नहीं आ पा रही थी जो माँ को अपने खोए हुए बेटे को पाकर आती है …बरसाती से कुछ कदम की दूरी पर. बैठक से आती पुकार पत्नी को छेद रही थी. उसका नम्बर अब कभी नहीं आएगा.’अम्मा हैरान थी. नियति भी क्या चीज है….’ ग्रामीण समाज की यह सामाजिक और आर्थिक स्थितियां ही हैं जिनके आगे आज का मनुष्य खुद को लाचार पाता है,  केशव की पत्नी और माँ का चरित्र इन्ही स्थितियों की तरफ हमारा ध्यान खींचता है.
भूमंडलीकरण ने जहाँ विश्व को ग्लोबल विलेज में तब्दील किया वहीं मानवीय संवेदनाओं और रिश्तों को भी आभासी बनाया.‘…कि शो खत्म हुआ’ कहानी इसी आभासी दुनिया के भीतर से उपजी शिखर और तरंग के प्रेम संबंधों की कहानी है जो यथार्थ में सामने आते ही टूट जाते है. आभासी दुनिया ने आज हमें इस कदर जकड़ा है कि हमारे अपने पास के रिश्ते दूर होते चले जाते है.

इनकी कहानियाँ जहाँ एक ओर प्रेम के आभासी स्वरूप की ओर हमे ले जाती है, तो दूसरी ओर आध्यात्मिक व आत्मिक स्वरूप की ओर भी. ‘मेरा ख़त तुम्हारे नाम’, ‘कनक चंपा’ और ‘तेरी धूप, तेरी छाव’ तीनों कहानियाँ इसी पृष्ठभूमि पर लिखी कहानियाँ है. ‘तेरी धूप, तेरी छाव’ कहानी जरीना के प्रेम व समर्पण की कहानी है तो वहीं ‘मेरा ख़त तुम्हारे नाम’ कहानी प्रेम के आत्मिक क्षणों में नायक का अपनी मृत प्रियसी को याद करते हुए लिखी गई खतनुमा कहानी है. वहीं ‘कनक चंपा’ यथार्थ के धरातल पर उपजे आकस्मिक प्रेम की कहानी है  जिसे पढ़ते समय एक बार हमें फ्लैश बेक में ‘उसने कहा था’ कहानी याद हो आती है. आज के दौर में साहित्यिक दुनियां की चकाचौंध में नए लेखकों की क्या स्थिति है व उन्हें अपने लेखन को पाठक तक पहुँचाने के लिए किन-किन मुश्किलो से गुजरना पड़ता है और यदि वह प्रकाशक तक पहुँच बनाने व छपने में सफल भी हो जाते है तो प्रकाशक द्वारा उनके लेखन का किस रूप में शोषण होता है.‘स्वप्निल कैनवास के धुन्घले-घुन्घले रंग’ कहानी लेखक, रचना और प्रकाशक के बीच के इन्हीं संबंधों पर विस्तार से प्रकाश डालती है. साथ ही लेखक होने और भविष्य में नई पीढ़ी के लेखक नहीं बनने की भयावह पीड़ा को अभिव्यक्त करती है. हुस्न तब्सुम निहां की कहानियाँ उतर आधुनिकता के दौर में पूंजी और तकनीक के वर्चस्व से हास होती मानवीय संवेदनाओं से रूबरू कराती है. साथ ही आम आदमी की आर्थिक स्थितियों और उससे जद्दोजहद करती उसकी जिंदगी तक भी पाठक को ले जाती है. स्त्री होना आज हमारे समाज की सबसे बड़ी त्रासदी है

ऊपर से आर्थिक रूप से गरीब परिवार में होना. ‘और शाम ढल गयी’ कहानी ऐसे ही परिवेश से उपजी है जहाँ लड़की होकर पैदा होने और उसके प्रति जिम्मेदारियों से उसे बचपन से ही अहसास कराया जाता है. यही ज़िम्मेदारी बारह साल की ‘छुटकी’ को कब बड़ा बना देती है वह खुद भी नहीं जान पाती. छुटकी का आत्महत्या का निर्णय उसके परिवार के प्रति ज़िम्मेदारी का अहसास कराता है ‘अम्मा, हम लोग बड़ी निर्धनता में जी रहे हैं, सभी लोग दुःखी है.  तुम, बापू, दद्दा और इरा.  इसलिए मैं आत्महत्या कर रही हूँ. जब मेरे प्राण निकल जाए तो मेरी आँखे दद्दा को, मेरी किडनी बापू को लगवा देना, जब दोनों अच्छे हो जाएंगे तो इरा दी का ब्याह भी खूब अच्छा हो जाएगा …मेरे बलिदान को व्यर्थ ना जाने देना अम्मा’, तो दूसरी तरफ लड़की होकर पैदा होना जिंदगी की सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी व बोझ होने का. हमारे समाज में आर्थिक हालात स्त्रियों को स्वतः ही सबसे पहले ज़िम्मेदार बना देते हैं क्योंकि अधिकांशतः उन आर्थिक स्थितियों के लिए उन्हें ही दोषी ठहराया जाता है.
हमारे समाज में आज भी महिलाएं स्वतंत्र होकर या कहें कि अपने निर्णय स्वयं लेने के लिए आजाद नहीं है वह क्या सोचती हैं या चाहती हैं उनकी प्राथमिकताएं आज भी गौण है. समाज में आज भी विधवा, तलाक शुदा और अकेली महिलाओं को जो ‘सिंगल वुमेन’ और ‘सिंगल मदर’ की अपनी भूमिका में खुश हैं साथ ही आर्थिक रूप से स्वतंत्र है. समाज व परिवार द्वारा अकेले होने और पुरुष के साथ की आवश्यकता का अहसास कराया जाता है  महिला का समाज में अकेला या सिंगल चाइल्ड मदर होना समाज में गुनाह है.



बिना शोहर की औरते आज भी समाज में अपमान की नजरों से देखी जाती है. माँ की शादी की बात, राहुल को जहाँ ख़ुशी देती है वही माँ भविष्य के प्रति आशंकित है क्योंकि वह जानती उसका यह सहारा किन शर्तो पर उससे बाधा जा रहा है समाज महिलाओं से पुरुष रूपी लादे गए सहारा देने की दकियानूसी सोच के तहत उनका आर्थिक व सामाजिक सहारा छीन लेता है व पुनः उन्हें अस्तित्वहीन बना देता है. ‘मेरी माँ की शादी’ ऐसी ही एक ‘सिंगल चाइल्ड मदर’ की कहानी है. समाज ने स्त्री को सदैव ही कमज़ोर माना और बनाया । उसके शरीर और उसकी यौनिकता को उसके चरित्र का मापदंड, जिसकी चाबूक हमेशा पुरुषों के हाथों में ही रही. ‘नर्गिस ….फिर नहीं आएगी’ कहानी इस संग्रह की अंतिम व ऐसी ही स्त्री पात्र की कहानी है जो अपने ही शौहर द्वारा चरित्रहीन बताकर घर से निकाल दी जाती है और पूरी उम्र उस चरित्रहीनता के दाग को साबुन से धोने का प्रयास करती हुई निमोनिया से मर जाती है. दूसरी और यह ऐसे मानसिक रूप से अस्वस्थ पुरुष पात्र की कहानी है जो यौनिकता को घर की चारदीवारी के भीतर भी ‘पति की चारदीवारी’ में कैद करने की इच्छा रखता है. यह कहानी प्रश्न करती है हमारे समाज में स्त्री-पुरुष सम्बंधों को हमेशा ही यौनिक संबंधों के पलड़ो में रख कर ही क्यों देखा जाता है. क्यों एक महिला को कमज़ोर करने के लिए उसके चरित्र को हथियार बनाया जाता ? शुद्ध-अशुद्ध, पवित्र-अपवित्र, सद्चरित्र-चरित्रहीन क्या तमाम तमगे महिलाओं के लिए ही निर्मित हैं ? ‘नर्गिस …फिर नहीं आएगी’ एक मार्मिक कहानी है परंतु साथ ही कमज़ोर भी.

 कहानी अपने शिल्प में नहीं बल्कि अपनी पात्र नर्गिस के रूप में कमज़ोर प्रतीत होती है. नर्गिस का घर से निकलते समय कहना ‘ठीक है, अगर आपको यही मंजूर है तो यकीन मानो नर्गिस फिर नहीं आएगी.’ नर्गिस के व्यक्तितत्व की दृढ़ता को दर्शाता है वहीं नर्गिस का अपने चरित्र पर लगाए गए हर दाग़ को साबुन से धोने का प्रयास ‘नर्गिस बाजी, हर दाग साबुन से नहीं धुलता. वैसे अब तुम पर कोई दाग नहीं रहा, बिल्कुल साफ-सुथरी हो गयी. अब ये नहाना-धोना खत्म कर दो.’ नर्गिस का कहना ‘वाह भाभी अगर ऐसा होता तो क्या जहीर हमें लेने ना आ जाता’ कहानी में नर्गिस के चरित्र को कमज़ोर दिखाता है. जो इनके संग्रह की अन्य कहानियों के महिला पात्र शमिता, मिसेज डिसूजा, रजनी, नूरा आदि में नहीं देखने को मिलता है. कुल मिलाकर देखे तो ‘नर्गिस…फिर नहीं आएगी ’ कहानी संग्रह की सभी कहानियाँ परिवेशगत निर्मित है.  उनके पात्र, घटनाएँ भले ही हमे काल्पनिक प्रतीत हो परतुं वह सभी ही यथार्थ की भूमि से उपजे और कहानी में आए है. जहाँ एक ओर मुस्लिम परिवेश और उससे जुड़े मसले इनकी कहानियों का हिस्सा बनते हैं तो दूसरी तरफ हिंदू परिवेश भी उससे अछुता नहीं है. मसलन देखा जाए तो समस्याएं दोनों जगह समान हैं केवल अंतर है तो उनके स्वरूप का. स्त्री स्वतंत्रता का जो मुद्दा पश्चिम में उठा वह कुछ परिवर्तित रूप में भारत में आया. भारत में भी धर्म और सांस्कृतिक स्वरूप की भिन्नता ने उसे अलग-अलग रूपों में अपनाया. बावजूद इन सबके समस्यां का केंद्रीय बिंदु आज भी ‘स्त्री की यौनिकता’ है. स्त्री की यौनिकता के मसले को भले ही आज के लेखकों की तरह हुस्न तबस्सुम निहां अधिक तरजीह नहीं देती लेकिन वह उससे बड़े मसले पर बात करती है जिसे आज की महिलाएं सोचती और महसूस करती है. आज महिलाएं देह की आज़ादी से अधिक मन की आजादी या कहें की निर्णय की आजादी चाहती है. जिस दिन वह निर्णय लेने की स्वतंत्रता को पा सकेगी उस दिन उनकी देह खुद ब खुद स्वतंत्र हो जाएगी. ‘थैंक्यू नेपोलियन’ कहानी की शमिता का व्यक्तित्व कुछ इसी तरह का है.

हवा सी बेचैन युवतियां ‘दलित स्त्रीवाद की कविताएं’

 बेनजीर


रजनी तिलक को मै क्रांतिकारी कवयित्री के रूप में देखती हूँ. .इनकी कविताओं में जो बेबाक अभिव्यक्ति का स्वर  है , वह अद्भुत है. पदचाप कविता संग्रह में ‘औरत औरत में अन्तर है’ ‘भ्रूण हत्या ‘, जैसी कविताओं ने दलित स्त्रियों के लिए समाज में एक मशाल जलाने का काम किया या यूं  कहें  कि रजनी मिलक अपने समय और समाज को चुनौती देने वाली एक महत्वपूर्ण कवयित्री हैं . कवयित्री रजनी तिलक को क्रान्तिकारी मानने का सबसे बड़ी वजह यह भी है कि यह सिर्फ कवयित्री तक ही सीमित नहीं है बल्कि स्त्रीमुक्ति आन्दोलन की नेता भी हैं,  छात्र जीवन में ही ये दलित आन्दोलन एवं स्त्रीमुक्ति आन्दोलन के साथ शामिल हो गयी और महिलाओं के विरुद्ध  भेदभाव के खिलाफ संघर्ष करती रही हैं . इसका पूरा पूरा प्रभाव हमें इनकी कविता 1984 की लपटें, भंगिन, अर्धांगिनी जैसी कविताओं में देखने को मिलता है. ये उस दौर की  कविताएं है, जब इनका झुकाव महिला आन्दोलन की तरफ हो रहा था. आज अगर दलित साहित्य में स्त्रियां अपनी जगह बना पाई हैं तो उसमें रजनी तिलक का सबसे अहम भूमिका है. इसका सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि रजनी तिलक खुद ‘‘हवा सी बेचैन यूवतियां’ कविता संग्रह की भूमिका में लिखती है ‘‘मेरा पहला कविता संग्रह ‘पदचाप’ 2000 में तब आया, जब दलित साहित्य मुख्य धारा में अपनी जगह बना रहा था और साहित्य जगत में हिन्दी दलित साहित्य को लेकर काफी हलचल थी. संवाद और बहस की तीखी झड़पे चल रही थी. दलित साहित्य की इस बहस में पुरूष साहित्यकार ही सक्रिय थे महिला दलित साहित्यकार पर्दे के पीछे थी।(पृ. 9) ’’1 दूसरा कविता संग्रह ‘हवा सी बेचैन युवतियां’ तक आते-आते अब दलित साहित्य स्थापित हो चुका है.

 रजनी तिलक अपनी कविताओं में दलित  स्त्रीवाद की बुनियाद रखते हुए  पूरे हिन्दी दलित साहित्य को ही चुनौती देती हैं .  इनकी यही विशेषता इन्हें अन्य स्त्रीवादी कवयित्रियों या लेखकों से अलग और विशेष बनाती है. ‘आदिपुरूष’ नामक कविता में लिखती है कि ‘‘ कथित दलित साहित्यकारों/तुम्हारी ओछी  नजर में/स्त्री का सुन्दर होना/उसका ‘मैरिट’/सुन्दर न होना उसका ‘डीमैरिट’! सवर्णों की नजर में/वे ही है मैरिट वाले/तुम हो डीमैरिट!, मैरिट का मैरिट का पहाड़ा उनका जैसा/वैसा ही तुम्हारा, फिर/ तुम्हारा विचार नया क्या? कौन सा सामाजिक न्याय कौन सा वाद तुम्हारा? जरा सोचकर बताओं’’(पृ.15)2 । कवयित्री केवल दलित स्त्रियों की ही समस्याओं को ही नहीं देखती बल्कि अन्य स्त्रियों को भी शामिल करती है. सवर्ण स्त्रियों की तरह दलित स्त्रियां भी किस तरह से पितृसत्ता का दंश झेलती है. क्योंकि समाज में हर औरत एक तरह से दलित ही है. जिसके कारण स्त्री समाज में दोयम दर्जे की नागरिक मानी जाती है. समाज में कोई भी स्त्री चाहे वह किसी भी धर्म जाति की क्यों न हो वह किसी न किसी रूप में पितृसत्ता को झेलती ही है. बात यहाँ  दलित स्त्रियों की है दलित स्त्री अन्य स्त्रियों की अपेक्षा दोहरा ही नहीं बल्कि तिहरे शोषण की शिकार है. एक साक्षात्कार में प्रसिद्ध चिंतक आलोचक डा. मैनेज़र पाण्डेय कहा भी है कि ‘‘ स्त्री के रूप में दलित स्त्री का शोषण और मजदूर के रूप में दलित स्त्री का शोषण, तिहरे शोषण का शिकार भी दलित स्त्री होती है. दूसरे वर्णों और वर्गों के पुरूषों की तरह दलित भी अपने घर- परिवार में स्त्री के साथ लगभग वैसा ही व्यवहार करता है, जैसा दूसरे वर्णो-जातियों के लोग अपनी स्त्रियों के साथ करते है। ’’3

‘हवा सी बेचैन युवतियां राजनी तिलक की की पैतीस कविताओं का कविता संग्रह है. लेकिन मैं इस कविता संग्रह की कुछ विशेष कविताओं को दलित स्त्रीवादी कविता के रूप में देखती हूं,  जैसे भंगिन, बलात्कार, कहूं क्या, कौन नाच रहा है, दलित की बेटी, अनकही कहानियां, योनि है क्या औरत?,रजनी तिलक की इन कविताओं में दलित स्त्री की संवेदना और उनके विभिन्न स्वरूपों को जिस तरह से अभिव्यक्त किया है उन सब की अलग अलग मार्मिक अभिव्यक्ति देखने को मिलती है. सारी उम्र गरीबी में जीवन जीने वाली और सड़को के कचड़े साफ करने वाली ऐसी बूढ़ी औरत के बारे में कवियित्री लिखती है कि वह कितने आत्मविश्वास धैर्य सहनशीलता, मेहनत के साथ अपने रोजमर्रा के काम को करती है जैसे ‘‘हमारी बस्ती में/काली सी बुढ़िया/हर रोज बिना रूके आंधी हो या तुफान/ रविवार हो या तीज त्यौहार/सुबह होते ही/हाथ में बाल्टी झाड़ू थामें/आती है।…..वो सहनशीलता धैर की मूर्ति/सत्तर बरस की मैया/ धैर्य इनका टूटता नहीं मेेहनत को आत्मसात किया/ उम्र कोई बाधा नहीं/ धिक्कार की बात है/लोग इन्हें /भंगिन कहकर पुकारतें है.’’(पृ.62-63)4 ‘दलित की बेटी’ ऐसे दलित औरत की कथा है जो कि सत्ता में अपना पैर जमा चुकि है जिसके सर पर पुरी तरह देश की रक्षा का भार है. उसके क्या क्या दायित्व है देश और समाज के प्रति वह और ऐसा क्या कर सकती है समाज की ऐसी सशक्त औरत के बारे में भी कवयित्री कहती है ‘‘ प्रिय/ दलित की बेटी/ उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री/ भावी प्रधानमंत्री पद की दावेदार/ वहन जी सु़श्री मायावती/तुम सोते से जागी/ अच्छा लगा/ सत्ता के गलियारे में/अपमानित हुई/ बुरा लगा।…….जाति-पाति से इपर उठ गयी / तुम्हारा कद बढ़ गया, और तुम्हारा वर्ग भी बदल गया /परन्तु तुम्हारी सामाजिक हकीकतें वहीं की वहीं रहीं !दलित की बेटी. तुम सत्ता की हवा का रूख/मोड़ सकती थी / इतिहास बदल सकती थी.

आगे कवयित्री कहती है कि ‘‘प्रधानमंत्री  बनो परन्तु भुलना मत/उन दलित की बेटियों को जो करोड़ो- करोड़ो है. वे दूर गावों में / शहर की फैक्टिरियों में/विश्वविद्यालयों /दफ्तर अस्पतालों में/श्रम के पसीने से लथपथ है/ सड़क बुहारती है/बिन बिजली/ रात के अंधेरे में/बिन पानी/ क़च्ची कालोनी/ मलिन बस्तियों की झुंग्गियों / अपने जने बच्चों को / पुलिस की ठोकरो से बचाती हड्डियों के ढाचे पर अपना जिस्म को ढोती…. सत्ता बदल ही नहीं तुम इतिहास बदल सकती हो/ तुम सत्ता का रूख बदल सकती हो।(पृ.50-51)5. ‘योनि है क्या औरत’ कविता में कवयित्री ने समाज में उन स्त्रियों के सन्दर्भ में कहा है जो कि जो न शिक्षित है न रोजगाररत  वह पुरूषों की नजर में केवल योनि है. इनका शरीर ही सब कुछ है इसके एलावा वह और कुछ भी नहीं इसकी भावना, इच्छाएं आजादी, महत्वाकांक्षा इन सब चीजों की इस दुनिया में कोई जगह नहीं है. इसलिए कवयित्री कहती है कि ‘‘हर स्त्री मर्द के लिए /एक योनि…./एक जोड़ी स्तन…./लरजतें होठ है ! सब हमारे व्यक्तिगत है!../ हमारा शरीर हमारा है/ हमारी भावनाऐं, हमारी आज़ादी इच्छाएं/……. हम कहां है इस दुनिया में भारत के नक्शें पर भिनभिनातीमक्ख्यिों सी? हुनर नहीं शिक्षा नहीं/रात के अंधेरे में डूबी हुई आंखें हैं/निराशा में डूबे मां बाप/सुबह सवेरे दुधमुहो को भेजते है सड़को पर/बटोरती है /लोहा रद्दी, कूड़ा/बुहारती/बुहारती/सड़क गली ,चौबारा !/तुमने हमसे कहा / क्या हुआ अगर/तुम्हारे पास स्किल नहीं /शिक्षा नहीं पैसे  की विरासत नहीं /अस्तित्व नहीं ,अभिजात नहीं वर्ण शंकर देवदासी हो/कोल्हाटी की बार गर्ल या नौटंकी की बेड़िनी/एक योनि तुम्हारी भी है/ तुम इसे जमी बना लो…..’’।(पृ.81-83)6


  पूरे दलित समाज को लेकर बाबा साहब डाॅ भीमराव अम्बेडकर ने जो संघर्ष किया और सावित्री बाई फूले, जिन्होंने स्त्री शिक्षा के लिए , चाहे दलित स्त्री हो उच्च जाति की हो उसके लिए जो महत्वपुर्ण प्रयास किया,  इसको भी आधार बनाकर कवयित्री ने ‘अनकही कहानियां’ कविता लिखी . कह सकते है इस कविता  में पूरे दलित समाज और दलित स्त्रियों के उत्थान किस प्रकार से हुआ और क्या प्रयास किये जा सकते है इसकी पूरी पड़ताल देखने को मिलती है. जैसे ‘‘सुनाना चाहती हूं/ अनकही अनसमझी/ठुकराई गई/धारा से छिटकी/बेज़ार औरतों की कहानियां/लड़ रही है हमेशा से/ जाति के खिलाफ समाज से/राज्यसत्ता से अपने पारिवारिक द्वंद्व और पितृसत्ता से. हमें नकारा समाज ने / रहने को मजबूर किया /शहरो कस्बों गावों से बाहर /खने को दिया सड़ा मांस/दुत्कार अपमान तिरस्कार !…..हम गुलामो से भी बदतर अछूत थे/ हमारी नेता सावित्री बाई फूले/भारत की पहली टीचर, जिसने न केवल हमें पढा़या/ उंची जात को भी पढ़या/ हमारे नेता डाॅ अम्बेडकर जिसने सड़क पर लड़कर/हमें पानी पीने का अधिकार दिलाया/भारत में लोकतंत्र हेतु संविधान बनाया/ संविधान ने हमें बराबरी दिलायी परन्तु समाज ने हमें अछूत रखा ।(56-57)‘‘7  समाज में व्याप्त जाति, वर्ग लिंग के आधार पर जो असमानता है इस पर भी कवयित्री ने  उठाया है . कौन नाच रहा है. कविता में कवयित्री का कहना है कि 7 वा राष्ट्रीय अधिवेशन/स्त्री अधिकारों का रेला मेला….



आपबीती लिखने वाली सजग रिंकी/हां नाचने आयी,  क्योंकि/वे कुछ मुक्ति चाहती थी/नारी मुक्ति के महासमुन्द्र में/अपनी मुक्ति ढूँढने  आयी थी/सवाल यह है कि कौन नाच रही है? जाति? वर्ग? लिंग?(पृ.29-30)’’8
‘बलात्कार’ रजनी तिलक की ऐसी कविता है , जिसमें निर्भया कांड को आधार बनाकर बेजोड़ सम्भावना की अभिव्यक्ति हुई है . जिस तरह से दामिनी के बलात्कार पर पूरा भारत अन्याय का प्रतिरोध करने सड़को पर निकल पड़ा, भयभीत लड़कियां भी साहसपूर्वक लड़कियों पर हो रहे जुल्म के खिलाफ लड़ने के लिए तत्पर हो गयी.  कवयित्री को पूरा यकीन है पूरी सिविल सोसायटी और मीडिया हमारे साथ है.  दामिनी जैसे और जितने भी बलात्कार हुए है उन बलात्कारियों को सजा जरूर मिलेगी. ‘‘ दामिनी के बलात्कार पर/ थर्रा गयी पूरी दिल्ली/कांप उठा पूरा भारत/शर्मसार हुई पूरी मानवता/अन्याय का प्रतिरोध करने/निकल पड़ा युवको का हुजूम/भयभीत लड़कियां निर्भय हो/उतर आई सड़को पर……खैरलांजी भंवरी और दामिनी/ हर दलित की बेटी के बलात्करी को/बहुत मंहगी  पड़ेगी अब ये मस्ती….अब वह दिन दूर नही, तब /तुम सड़को पे  मारे जाओगे…जनता ही मुम्हें सजा देगी….मीड़िया सिविल सोसायटी क्या खड़े रहो हमारे साथ भी?/मथुरा, खैरलांजी,भवरी/दामिनी के बलात्कारियों/को सजा दिलवाओगे न ?(21-23)’’9 हम जानते है दलित स्त्री और सवर्ण स्त्रियों को लेकर साहित्य के केन्द्र में जो मुख्य सवाल है जैसे दलित स्त्रीवाद क्या है ? दलित स्त्रीवाद और सवर्ण स्त्रीवाद के विचारधारा में मुख्य अन्तर क्या है ? दलित स्त्रीवाद के स्त्रीमुक्ति के सवाल सवर्ण स्त्रीवाद के स्त्री मुक्ति से किस प्रकार भिन्न है ? रजनी तिलक जैसी स्त्रीवादी कवयित्री दलित स्त्रीवाद की प्रक्रिया को बखूबी महसूस कर रहीं है और इस बहस को आगे बढ़ाने में पूरी तरह से लगी हुई है.

आज समाज में लगभग हर स्त्री की समस्याएं एक जैसी ही है. ओमप्रकाश बाल्मीकि ने ठीक ही कहा है कि ‘‘स्त्री दलितो में भी दलित है.’’ राजेन्द्र यादव भी कुछ इसी तरह की बात करते है कि वर्णव्यवस्था चूकि शुद्रों और स्त्रियों के साथ एक सा सुलूक करता है इसलिए स्त्रियों को दलित मानना चाहिए. रजनी तिलक ऐसी कवयित्री है जो सिर्फ अपने को दलित स्त्रियों तक ही सीमित नहीं रखती है,  बल्कि इस कविता संग्रह में कुछ कविताएं ऐसी भी है जो कि भारत में रह रही अन्य स्त्रियों की भी व्यथा को व्यक्त करती है और ये स्त्रियां भी पितृसत्ता को चुनौती देती हैं जैसे- ‘जीरो हुं’ कविता स्त्रियों में आत्मविश्वास पैदा करने वाली एक महत्वपूर्ण कविता है ‘‘स्त्री हू/जीरो हूं/हर बार प्लस होती हूं/बनती हूं प्यार का दरिया/आशाओं का क्षितिज/समा लेती हूं सारी कुंठाएं सारी निराशाऐं !…. जीरो हूं…..स्त्री हुं पर कर सकती हूं/ वो सब/जो असम्भव है….मैं जीरों हूँ जारों से संख्या में बदलती हूं और अपना स्थान रखती हू….’’(पृ.12-13)।10 इसी प्रकार से कवयित्री ‘हिंसा मुक्त’ कविता में स्त्रियों की मुक्त अभिलाषा को अभिव्यक्त करती है और कहती है कि ‘‘एकल हूं /मै आज़ाद इंसा की तरह/सम्पूर्ण  जीवन चाहती हूं/ कंठामुक्त मर्द दर्प से दूर/प्यार में प्रतिबद्वता/रिश्ते में उष्मा चाहती हुं’’(पृ14)।11 कही पर कवयित्री लड़कियों पर आये दिन हो रहे शोषण और बलात्कार के प्रति कुछ इस प्रकार से सचेत करती है इसको ‘ए लड़की’ कविता में लिखती है कि ‘‘ऐ लड़की/ अंधेरे में आंख फाड़कर चल/बलात्करी/ घूम रहे हैं अंधेरे में’’’ ‘एकल मां’ कविता में कुछ अलग तरह से सम्पूर्ण पितृसत्ता के प्रति कवयित्री सचेत करती है ‘‘तुम एकल मां की बेटियों/निरखों….संभलो…जमाने को समझो/स्त्रीवाद नहीं है ‘मात्र’ ‘स्त्री’ होने में/वह उत्पीड़न-पीड़ा अकेलेपन की/दीवारों को तोड़कर कहा जायेगा/पितृसत्ता की ताकत को भेदेगा’’(पृ.47-49) ।12

 समाज में अधिकांश पुरूषों की नजर एक औरत की क्या छवि होती उसको भी कवयित्री ‘प्यार, औरत’ ‘न जाने कब से’ जैसी कविता में अभिव्यक्त करती है. सोचा था/प्यार की दुनिया/बड़ी हसीन होगी…परन्तु वह निकली एक रसोई और बिस्तर/और आकाओं का हुक्म’’(प्यार पृ.64)13 औरत /एक जिस्म होती है/रात की नीरवता/बंद खामोश कमरे में उपभोग की वस्तु होती है.(औरत पृ.65)14 ‘न जाने कब से’ कविता में कवयित्री स्त्रियों पर जबरन थोपी गयी रूढ़िवादी परम्परा पर चोट करती है। ‘‘ न जाने कब से/मैं रिवाजों की बनियाद में/चिनी जा रही हुं/ परम्परीओं की बेड़ियो में जकड़ी जा रहीं हूं ’’(पृ.75)।15 फिर आगे दृढ़ होकर कवयित्री ‘सांकल’ कविता में कहती है कि ‘‘चार दीवारों की घुटन/घुघट की ओट/सहना ही नारित्व तो/बदलनी चाहिए परिभाषा!/परम्पराओं का पर्याय/ बन चैखट की सांकल/है जीवन सार/ तो बदलना होगा जीवन सार ’’(पृ.66)।16 रजनी तिलक की कविताओं पर कवि और आलोचक प्रो. गोविन्द प्रसाद ने बड़ी ही सटीक टिप्पणी की  है. ‘‘संग्रह की अधिकांश कविताओं की सांसे स्त्री-मन में उठने वाले सहज और चिंताओं से बुनी गयी है। चिंताओं का स्वरूप सुविधाभोगी समाज और दलित-सवर्ण स्त्रियों की आकांक्षा-अभाव के प्रश्नाकुल धागों से रचा गया है. स्त्री और स्त्री के बीच विषमता के कई रंग , कई चेहरे है. मगर ये रंग ये चेहरे घृणा, आक्रोश के अतिरेक की उपज नहीं इसमें ब्राहमणवादी मांसिकता को कोसा नहीं गया है. प्रतिपक्ष के प्रति दर्पभरी ललकार-फटकार भी नहीं है. बल्कि इनके बरअक्स इन कविताओं संवादधर्मिता के कई भावस्तर ज्यादा प्रतीत होते है. आकांक्षा से लेकर उपेक्षा के कई स्तर आकांक्षा का यह स्तर सपने से शुरू होता है।(फ्लैश पेज)’’17 जैसा कि कवयित्री ‘फर्क’ कविता में कहती है ‘‘मौन आंखों के कोर से /चिंगारी बन फूटेगा,/पैदा होगा मुक्तिबोध/जो तुम्हारे मेरे अन्तर को पाटेगा।(पृ.26)’’18

 इस संग्रह की सारी कविताओं में सबसे महत्वपूर्ण कविता ‘हां मै लड़ाकी हूं’ भी है. कवयित्री ने इस कविता को आत्मकथात्मक ढंग लिखा है जिसमें ये बड़े ही गर्व के साथ कहती है कि ‘हां मै लड़ाकी हूं’और छद्म को तोड़ने की बात करती है ‘‘लड़ाकी हूं ‘टाइप्ड’ कर दो/मेरी यही रूप/तुम्हारे छदम को तोड़ेंगे…’’(पृ.37)।19 इस प्रकार से कवयित्री ने स्त्री जीवन की विभिन्न परतो को और भी महत्वपूर्ण कविताओं के माध्यम से खोलती है. इनकी ये कविताएं अर्धांगिनी नहीं पूरा शरीर हूं, सुन्दरता तुम्हारी शान है ,मेरे भाई, वजूद है, तुम्हारी आस्थाओं ने ,कासे कहूं ,वेश्या आदि है. रजनी तिलक एक बहुत बड़ी विशेषता यह भी है कि ये जितने ही बेबाक और मार्मिक ढंग से स्त्रियों की समस्याओं से पाठक वर्ग को रूबरू कराती है ठीक उसी प्रकार से अपने समय और समाज में घटित होने वाली घटनाएं भी इनसे अछूती नहीं है जिसमें देश की संस्कृति एवं राष्ट्रीय एकता का प्रश्न भी शामिल है. इसका सबसे बड़ा उदाहरण 1984 में सिक्ख दंगे पर आधारित जिस मार्मिक कविता का सृजन किया है वह कविता है ‘1984’ की लपटें’ इसमें कवयित्री का कहना है कि ‘‘ सिक्ख समाज के साथ/ जो हुआ/वह देखकर मन तड़प उठा /आखों में अभी तक अजीब बेचैनी है/रूक-रूक मुटठी भींचती है/वह नृशंस दृश्य सताते है/हर छड़ आंखों में उभरते है !…..देश संस्कृति, राष्टीय एकता का  नारा/अपने ही घर में हम हुए बेगाने/गुंडों के सामने बेबस’’(पृ.70-71)।20


यकीनन एक कवि या लेखक की साहित्य में उसकी अहमियत इसी वजह से बढ़ जाती है वह अपने समाज में घटित होने वाली घटनाएं और अपने परिवेश तथा परिस्थितियों को बखूबी देखता,परखता और गहराई से महसूस करता है / करती है इसको अपने लेखन में दर्ज करता है/ करती है . कवयित्री रजनी तिलक जहां एक ओर स्त्री की संवेदना, प्यार, इर्ष्या  मनोभावों को अभिव्यक्त करती है वही दुसरी ओर प्रकृति, तकनीकि, सूचन समाज , धर्म संस्कृति रातनीति आदि सभी को अपने साहित्य में समेटती है. कह सकते है कि कवयित्री रजनी तिलक का बहुआयामी व्यक्तित्व उभरकर सामने आता है. ये समाज में सारे परिवर्तन सिर्फ आज में  देखती जिसमें कोई ठहराव नहीं है और अपनी बात को जिस यथार्थपूर्ण और कलात्मक ढंग से कविता के मर्म में पिरोने का प्रयास करती हैं . इनकी कविताओं में व्यक्तित्व की पड़ताल और मुक्त जीवन जीने जो इच्छा आकांक्षा है, वह पूरी तरह खुलकर बाहर आती है और कही न कहीं भविष्य को बेहतर बनाने का भावी संकेत भी मौज़ूद है.

सन्दर्भ 
 रजनी तिलक  , हवा सी बेचैन युवतियां, दलित स्त्रीवाद की कविताएं स्वराज प्रकाशन 4648/1, 21 अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली-110002

अनीता भारती,  (अतिथि सं) स्त्रीकाल,(स्त्री का समय और सच) अंक 9 सितम्बर 2013 साक्षात्कार मैनेजर पाण्डेय   

 यह आलेख भारतीय भाषा केंद्र, जवाहर लाल नेहरू विश्विद्यालय,  में महात्मा फुले जयंती, 2016,  के अवसर पर प्रो. रामचन्द्र के द्वारा आयोजित कार्यक्रम में पढ़ा गया था. 

सखी तुम्हारा जाना मलय पवन का दह जाना है

सोनी पांडेय

कवयित्री सोनी पांडेय साहित्यिक पत्रिका गाथांतर की संपादक हैं. संपर्क :dr.antimasoni@gmail.com

आज तरंग सर के यहाँ से अभिनव कदम ले आई और खोलते ही एक युग भहरा कर यों गिरा की यादों की बस्ती में सैलाब आ गया. मैं चीख कर मन भर रोना चाहती हूँ. मन में हाहाकार मचा है …. जयप्रकाश सर को फोन किया ….. सर अंशु कैसे मरी ?….एक लम्बी साँस छोड़ कर उन्होने बुझे मन से कहा …. तुम सोचना कैसे मरी …..तुम उसे जानती हो ? सर ने पूछा ….जी .. मेरी क्लास मेट थी.  जयप्रकाश धूमकेतु सर ने उसकी कविताओं से बड़ी ही मर्मभेदी पंक्ति शीर्षक के लिये चुना था … “मौन बेबस बाँसुरी कोने लगी ” ,पहली ही पंक्ति ….अंशुरानी नहीं रही …..  वो नहीं रही … शायद हार गयी या तोड़ दी गयी ,अपनी अनन्त कहानियों के साथ एक मृत्यु पुन: कील की तरह आ चुभी. अभी जैसे कल की ही बात हो …एक बेहद गम्भीर लड़की हमारे स्कूल सोनी धापा खण्डेलवाल बालिका विद्यालय में दाखिल होती है. मैं चंचला , बातुनी और वह ….एक दम उसके विपरित. आकर अगली सीट पर बैठ जाती है ,किसी से कोई संवाद नहीं.कंधे तक  कटे खुले बाल ,गेहुँए रंग की दुबली -पतली लड़की में कुछ तो था जो मुझे तमाम नये चेहरों के बीच खींच रहा था. आँखों पर चश्मा चढ़ाऐ उसकी गर्दन नब्बे अंश का कोण बनाए किताबों  में मुँह ड़ाले झूकी रहती. संगीता सारस्वत ने गर्दन नचाकर कहा था ….ये तो गजब पढ़ाकू आईं. नर्गिस मुझे देख कर मुस्कुरा उठती …शायद मुझे उकसाती ,कुछ पूछो ,……महीना बीत गया ,वह रहस्य ही रही.साधारण शक्लोसूरत की लड़की मुझे अपनी पहचान बनाने के लिए खूब संघर्ष करना पड़ा था स्कूल में. नौवीं – दसवीं में निरन्तर श्रम का परिणाम था कि मैं तीन हजार लड़कियों में विशेष पहचान बना चुकी थी.दो सालों से डिवेट चैंपियन. प्रार्थना कराने से लेकर क्लास मानीटरी तक में मेरी धाक बन चुकी थी. अंशु मुझे कभी कभार कनखियों से देखती और नज़र मिलते ही चेहरा घुमा लेती.

एक विचित्र आकर्षण हमारे बीच पैदा हो रहा था .. अनजाना सा. पहला संवाद हमारे बीच तब हुआ जब अगस्त में कक्षाऐं सुचारु रुप से चलने लगीं. हिन्दी टीचर आशा मैम ने दहेज पर निबन्ध लिखने को दिया ,सख्त हिदायत के साथ कि गाईड या भाषा भाष्कर से छपाई हुई तो कॉपी फाड़ दूगीं. अगले दिन पहली घंटी में सबकी कॉपीं जमा हो गयी. चेक कॉपियाँ हम मानीटर सबके नाम पढ़ कर बाँटती थीं. उत्तम ,अति उत्तम तो कई कॉपियों में दर्ज था पर सर्वोत्तम इस बार मेरी जगह अंशु की कॉपी में देख सारी लड़कियाँ उछल गयीं. मैं सोच में पड़ गयी , उसकी कॉपी खोल पढ़ने लगी ….. उसने बहुत प्रभावशाली लिखा था , पुष्ट भाषा , सशक्त उदाहरण. मैं मुस्कुरा उठी , उसे कॉपी पकड़ा मैंने मुस्कराकर कहा.. गजब ,क्या लिखा है तुमने .उसने मुस्कुराकर धीरे से थैक्स कह कॉपीं अपने बैग में रख लिया. मेरी मण्डली को बात हजम होने का नाम ही नहीं ले रही थी. रिकार्ड टूटा था ….शालिनी ने कहा ……यार लैंग्वेज तो देखो , किसी मोटी किताब से टीपा होगा देवी जी ने. शैल ने हामी भरी. विरोधी टीम अंशु की पीठ ठोंक रही थी ,कोई तो आया मुझे पटकनी देने वाला ….  हिन्दी में मेरे और अंशु के बीच खुली जंग छीड़ चुकी थी. वो नम्र – मैं उदण्ड , वो शीतल पवन मैं गर्मी की थपेड़े खाती – खिलाती लू , मैं भयंकर बातुनी वो हद से ज्यादा शान्त. हमारा कोई मेल नहीं था. पन्द्रह अगस्त के सांस्कृतिक कार्यक्रमों में मेरा भाषण अनीवार्य होता. संगीत टीचर सुशीला मैम कहतीं …. बाप की तरह नेता बनेगी. उस वक्त राजनीति में जाना पहला विकल्प था. प्रिंसपल शैलजा मैम मेरे मंच पर आते माईक बन्द करवा देतीं और हँस कर कहतीं ….इसकी आवाज तो यूँ ही डी.सी.एस. के.तक जाती है. मेरा उत्साह उस क्षण हिमालय हो जाता. मैं पूरे जोश में बोलती और तालियों की गड़गड़ाहट से प्रांगण गूंज उठता. कहना न होगा वो मेरे जीवन का स्वर्णीम दौर था.

मैं स्पीच देकर मंच से उतरी तो अंशु ने चमकती आँखों से मेरा स्वागत किया ….हाथ बढ़ाकर बधाई देते हुए कहा ….तुम बहुत अच्छा बोलती हो ,मैं मुग्ध हो गयी उसके इस पहल पर. दूसरे के विशिष्ट गुण को सम्मानीत करने का ये नायाब ढ़ंग मैंने अपने जलते हुए परिवेश में पहली बार देखा था.  हम उस दिन दोस्त हुए ….और शुरु हुई एक नयी कहानी. अंशु पढ़ने में तेज थी. मैं ठीक -ठाक. अगले दिन से हमारी सीट एक हो गयी. मैं कभी डांस में भाग लेती कभी कला प्रतियोगिता में ,कभी ऐंकरिंग तो कभी अभिनय. वाद -विवाद पर एकछत्र अधिकार था ही सो पढ़ाई का औसत होना लाज़मी था. कथकडांस क्लासेज भी जारी था. मोहित कृष्ण हफ्ते में एक दिन बनारस से हमें सुशीला मैम के घर डांस सिखाने आते थे. मैं अच्छी नृत्यांगना थी सो एक विकल्प क्लासिकल डांसर बनने का भी सामने आ रहा था. मैं खाली घण्टी में क्लास में जम कर धमाल मचाती ……मैं नाचती ….मधुबन में राधिका नाचे रे ….अंशु तालियाँ बजाती. कुछ था हम दोनों के बीच जो दिलों में जुड़ाव के पौधे रोप रहा था. आशा मैम ने निबन्थ लिखने को दिया …..हमारा जीवन -हमारा समाज , मेरे जीवन में अजब उथल -पुथल थी. बड़ी बहन की शादी दहेज के कारण टूट चुकी थी. ससुराल वालों की प्रत्याणना से उसके दिमाग में  खून का थक्का जमा जो काफी दिनों बाद सामने आया और परिणाम बहुत त्रासद रहा ….दी का मानसिक संतुलन बिगड़ने लगा. परिवार अग्रमुख से पतन की ओर मुड़ा ,पिता के थोक कपड़ों का व्यवसाय दी के इलाज में दर -दर भटकने के कारण डूबने लगा. दुकान बन्द रहने लगी. बाबूजी के पास सरकारी प्राध्यापकी होने के कारण अर्थ संकट तो नहीं आया किन्तु व्यवसाय डूबने से भारी क्षति उठानी पड़ी. शादी में अगुवाई मझले मामा के करने के कारण ननिहाल से सम्बन्ध विच्छेद हो गया. घर में माता -पिता के बीच दी की दूसरी शादी को लेकर कोहराम मचा रहता .

 दी दूसरी शादी को तैयार नहीं थी. उसके ससुर ने छोटी दी से जीजा की शादी का प्रस्ताव भेजा ,ये कहकर कि बड़ी का दिमाग खराब हो गया. घर में भूचाल उठ खडा हुआ.  बाबूजी की चहेती दिव्य सुन्दरी ,स्कालर बेटी के लिए ये प्रस्ताव …. बाबूजी धधक उठे. हम चार बहनों में या ये कहें कि पिता की पाँच संतानों में प्रभा के गौर वर्ण और तीव्र बुद्धिमत्ता के आगे सभी उपेक्षित थे.  मैं श्यामवर्णा तो घर में होकर भी उनकी दृष्टि में शून्य थी. प्रभा के सौन्दर्य की आभा में मैं निरा अन्धेरी चिन्ताओं में धकेली पिता की तीसरी कन्या सन्तान अपने अस्तित्व की लड़ाई अपने ढंग से लड़ती कब इतनी तूफानी नदी बनती चली गयी , पता ही नहीं चला. चारों तरफ प्रभा की जयकार ….. बाबूजी ने सख्ती से मना कर दिया और बड़ी दी के कोमल ह्रदय पर इस खबर से बज्र आ गिरा. वह और गुमसुम रहने लगी. अम्मा की दौड़ मुल्ला के मस्जिद की दौड़ की तरह गाँव से मऊ ,मऊ से गाँव की लगी रहती । लम्बी खेती का पूरा बोझ बाबूजी अम्मा पर डाल शिक्षक संघ की राजनीति में रम गये. इसी बीच मऊ स्वतंत्र रुप से जिला बना. घर में मुझे घुटन होती …..बड़ी बहन जिन्दा लाश बन चुकी थी. दूसरी अपने आगे हम दोनों छोटी बहनों को कुछ समझती ही नहीं थी. जब तक अम्मा रहतीं , घर में काम का कुहराम नहीं मचता ,उनके जाते ही पूरा घर मुझे सम्हालना पडता. मेरी देवी सी साध्वी बड़ी बहन तील -तील गीली लकड़ी की तरह सुलगती मृत्यु की तरफ बढ रही थी. घर मुझे काटता ,एक भी दिन स्कूल बंक नहीं करती. मेरे पास संवेदनशील दोस्तों का समृद्ध संसार था. सुधा ,सुनीता , मीरा ,शालिनी ,शैल और रंजना ये वो लड़कियाँ थीं जो मेरी दुखद घड़ी की शीतल छांव बन दुख हर लेती थी. अम्मा ने मेरी शादी के बाद पहली बार मायके जाने पर हँस कर नाउन से कहा था  ……


.ये आ गयी , अब मेरे घर चीनी-चाय की पत्ती का खर्च बढ़ जाएगा. सहेलियों का जमघट लगता तो अम्मा की खैर नहीं ….. शालिनी सीधे अम्मा का फर्श टटोल कर पचास की नोट निकाल लाती और भाग कर गली में से चौहान की दुकान से गरम -गरम समोसे ले आती.  अम्मा हँस कर दे देती. मेरी सहेलियों के घर से अम्मा का आना जाना तक होता. स्नेहिल रिश्तों की कड़ी मेरे पिता का घर छोड़ने के बाद भी जस का तस चल रहा है.
ऐसे ही रिश्ते की कड़ी अंशु से जुड़ी ….अंशु हमारी मित्र मण्डली में आ जुड़ी.  निबन्ध लिखा गया.  आशा मैम मौलिकता पर विशेष ध्यान देती ,हम युध्दस्तर पर किताबों पढ़ – पढ़ कर उदाहरण ढ़ूढ़ते और निबन्ध लिखते. पढ़ाई में मैं औसत छात्रा हमेशा रही जिसका कारण बाबूजी मेरी उल -जुलूल किताबों में रुचि को ठहराते रहे. आज भी कहते हैं जितनी शिद्दत से प्रेमचन्द और हंस पढ़ती रही कोर्स पढ़ती तो आई.ए.एस.बनती. साहित्यिक किताबों के पढ़ने का नशा अंशु की सोहबत में परवान चढ़ने लगा. उसके दादा  साहित्यिक व्यक्ति थे. हंस की पुरानी प्रतियाँ अँशु बैग में छिपा कर लाती और धीरे से मेरे बैग में डाल देती. एक दिन छोटी दी  ने किसी बात पर चिढ़ कर  बाबूजी से लहरा दिया …..”आज कल नावेल पढ़ रही है.” मेरा बस्ता चेक हुआ ….. माधुरी खन्ना मैम की राग – दरबारी और हंस निकल कर बाहर आई ….मुझे तीनों त्रिलोक दीखने लगा …..छोटे भाई -बहन सहमें खड़े मेरी कितनी कुटाई होगी की कल्पना कर रो रहे थे . दोनों किताबें जब्त हो गयी. मुझे काटो तो खून नही.अँशु खुद मुझे अपनी दादी से चोरी किताबें देती थी ,कारण ये किताबें उसकी दादी के पास पति की स्मृतियों की अन्तिम कड़ी थी ..जिसे वह गहनों से ज्यादा सहेज कर रखती थीं.

 बाबूजी ने शाम को मुझे बुलाया और पूछा किताबें किसकी हैं ?…..मैने बता दिया …..अँशु के परिवार के बारे में मेरी जानकारी अब तक ना के बराबर थी. इतना जानती थी महरनिया पर रहती है …..पिता व्यापारी हैं और दादी राजकीय स्कूल में टीचर है. एक बात मैं नोटिस कर रही थी ,मैं उसे बार – बार घर बुलाती थी लेकिन वह भूले से घर आने का न्यौता नहीं देती. बाबूजी के कोप से मैं बच गयी. छोटी दी कविताऐं लिखती थी ….उसकी लिखी कविताऐं स्थानीय देवल दैनिक और वनदेवी समाचार पत्रों में छपते ….आत्ममुग्द्धता और सौन्दर्य बोध की पराकाष्ठा ने उसे अंहवादी बना दिया था ….उस पर से पिता की सिर चढ़ी …..बाबूजी के सामने मेरी सारी अच्छाइयाँ शून्य बटा सन्नाटा सिद्ध होती. अँशु का मेरे घर आना -जाना शुरु हुआ. वह अक्सर रविवार के दिन अपनी छोटी बहन अपराजिता के साथ आने लगी ….कभी -कभी उसका छोटा भाई हिमालय भी आता …घुंघराले बालों वाला हिमालय हमारे साथ खूब उछल -कूद करता. दोनों बहनें उसे कुँवर जी कह कर बुलाती थी .धीरे -धीरे संकोच कम होने लगा.अंशु बड़ी दी को खूब ध्यान से देखती …..एक शून्य उसकी गहरी आँखों का शांकल खोल चारों तरफ फैल जाता. हमारे घर में कोई परदेदारी दी को लेकर नहीं थी. एक दिन उसने मुझसे कहा – सोनी ! तुम्हें दुख होगा …. कुछ लड़कियाँ कहती हैं कि तुम्हारी बहन पागल है …… मैं नम आँखों से उस वृहद शून्य के वृत्त से जा टकराई ……पागल तो वो लोग हैं जो ससुराल वालों को छोड़ इसका मूल्यांकन करने में लगे हैं कि मेरी बहन क्या है ? अंशु …जानती हो डॉक्टर बेहरे कहते हैं कि इसे ठीक करने के लिए पति और ससुराल की सहानुभूति चाहिए ….और वह मिलने से रहा. ससुराल और समाज से उपेक्षित स्त्री आखिर जीए तो कैसे जीए ? मैं बिफर पड़ी

 उस दिन अंशु भी शालिनी और शैल की तरह खूब दी से बतियायी .दी खुश थी ….उस दिन उसने कई दिनों बाद खाना बनाया …..एक उम्मीद ने दस्तक दी …..अम्मा खुश थी ….शायद दी लौट आए पुराने जीवन में की आहट ने उस दिन सबको उम्मीदों का सूत्र पकड़ा दिया.अंशु मेरे घर में देखते -देखते सबकी चहेती हो गयी. अंशु हँसती नहीं थी …..मुस्कुरा भर देती हँसने वाली बात पर. उसकी मोती जैसी दंतपंक्तियाँ सावलें चेहरे की रौनक बढ़ा देतीं . एक दिन अचानक अंशु ने घर बुलाया ,मैं अम्मा से पूछ झट छोटी बहन लाडली के साथ उसके घर जाने को तैयार हो गयी. मुंशीपुरा  से हम दोनों बहने रिक्शे से महरनिया मुहल्ले उसके घर पहुँचे और क्या देखते हैं कि उसका घर हमारे पुरोहित बल्लभ महाराज के घर से बिल्कुल सटा हुआ था. हम चुपचाप छिपते हुए गली में पहुँचे, क्यों कि यदि कमलेश बुआ देख लेतीं तो पकड़ कर पहले अपने घर ले जातीं. अंशु के दो मंजिले मकान के निचले हिस्से में हिमालयन ट्रेडर्स नाम से पिता ने दैनिक उपभोग के ब्रांड़ेड़ सामानों की एजेंसी खोल रखी थी. अच्छे व्यापारी थे. हम दुकान में चाचाजी को नमस्ते कर नौकर के साथ अन्दर गये. अंशु को खबर लग चुकी थी …..वो सीढ़ियों से धड़धड़ाती हुई नीचे उतर रही थी. मेरे गले लग जोर से चीख उठी …..हैप्पी बर्थ ड़े सोनी ……मैं थोड़ी देर उसे नम आँखों से  निहारती रही …..शायद पहली बार मेरे वजूद पर किसी ने खुशी ज़ाहीर की थी. पकड़ कर अपने कमरे में ले गयी. बहुआ ने हँस कर मेरा स्वागत किया ,कुँवर जी और अपराजिता हमारे आस – पास उछल -कूद कर रहे थे …अचानक ,कितना शोर हो रहा है कि एक रौबदार चेतावनी आयी और सभी सहम गए. बहुआ उठ कर चली गयी. सफेद साड़ी में एक लम्बी कद -काठी वाली बेहद गम्भीर महिला अंशु की दादी सीढ़ियाँ चढ़ती उसकी माँ पर भनभना रही थी. सभी शान्त थे. वह सीधे कमरे में आई……अंशु ने बताया ….ये सोनी है …..दादी  मेरे घर परिवार की गहन पड़ताल में लग गयी.

 बाबूजी को पूरे शिक्षक जानते थे.माध्यमिक शिक्षक संघ के महामंत्री बाबूजी जिले के शिक्षकों में गहरी पकड़ रखते थे. महरनिया दक्खिन टोले से अम्मा -बाबूजी का पुराना जुड़ाव था. यही से बाबूजी ने अपने जीवन संघर्ष का आरम्भ किया था.  बाबूजी जब मऊ आए तो यहीं अपने कुल गुरु देवकीनन्दन महाराज के मकान में कमरा लेकर रहते थे. अम्मा -बाबूजी के संघर्ष का चरम काल था. बाबा ने घर से किसी भी प्रकार की मदद देने से इन्कार कर दिया था. उन्हे जानकर खुशी हुई कि मैं शेषमणि त्रिपाठी की लड़की हूँ. उनके जाने के बाद हमारे लिए चाय नाश्ता लेकर उसकी माँ आई. अँशु और उसके भाई बहन माँ को बहुआ कहते थे. बहुआ बीए 0 बीएड 0थी. नौकरी न करने का उनको गहरा मलाल था. सास से खूब डरती थी. हमारी दोस्ती की गाड़ी सरपट भाग रही थी. हम खूब लिखते ….कविताऐं अधिक.  मैं स्कूल में सभी गतिविधियों में आगे रहती लेकिन अंग्रेजी बहुत कमजोर थी …बाबूजी ने ट्यूशन नहीं लगवाया …..अन्त में फेल होने के डर से मैंने अंग्रेजी छोड़ कला ले लिया. कला अच्छा था मेरा …संगीत ,साहित्य और कला मैं माँ से और वक्तव्य कौशल पिता से ले पूरे जोश में जीवन के स्याह पक्ष से लड़ रही थी. दी की स्थिति बद से बद्तर होती जा रही थी. लोग पकड़ पकड़ कर पूछते पुष्पा का क्या हुआ ?
मैं एक ऐसी मानसिक यातना के दौर से गुजर रही थी जिससे निजात केवल किताबें दिला सकतीं थी.  अब समस्या यह थी किताबें कैसे मिले ? हल निकल गया ….माधुरी खन्ना मैंम के पास अक्सर साहित्यिक किताबें रहती…. मैं उनसे किताबें तेल -पालिश लगा, लेती और झट- पट पढ़ कर लौटा देती. राग दरबारी से लेकर मैला आँचल ,पचपन खम्भे लाल दीवारे जैसी पुस्तकें चाटने की हद तक पढ़ चुकी थी.
  
 हम स्कूल में हर जगह हाथ में हाथ डाले घूमते और लड़कियाँ तोता -मैना कह कर चिढ़ाती. आशा मैम की अंशु चहेती छात्रा थी …कुछ -कुछ शायद मैं भी ,वह उन्हें अपना लिखा अक्सर दिखाती , मैम खूब ध्यान से पढ़ती. कई बार मुझसे भी कहती. ” दिखाओ भाई ….. मैं भी तो देखूं क्या लिखती हो ..और ये सुनते ही मुझे पतली टट्टी महसूस होने लगती. भय था ….बड़ा जबर …. शायद उनसे ज्यादा बाबूजी का ….कहीं कह न दें और मेरी कुटायी न हो जाए. हम ग्यारहवीं पास कर गये. एक दिन बल्लभ महराज के घर अम्मा मुझे लेकर गयी तो मैं सीधे बिना बताए उसके घर भागी. उस दिन एक नया सच मेरे सामने आया उसके जीवन का. जो हाल मेरी बहन का था ठीक वही उसकी  छोटी बुआ का था , जिसे वह हमसे छुपा कर रखती चली आ रही थी. शायद उसकी दादी नहीं चाहती थी.सभी आवाक मुझे देखते रहे ….दादी की आॉखों से बिना नाक किए आने की नाराजगी साफ पता चल रही थी. माहौल उस दिन उसके घर का भारी हो गया.अंशु असहज थी और मैं बेचैन …एक और स्त्री की छटपटाहट मेरे सामने  …..ज्यादा देर नहीं ठहर पाई. उसके रहस्यमयी संसार से पर्दा उठ चुका था. मैं बुझे मन से घर लौट आई. स्त्री जीवन का हाहाकार मुझे मरघट सी निशब्द अगियाए अगन मे डूबे रहा था. बड़ी बहन की मृत्यु का उत्सव ,हाँ उत्सव ही तो था …..वह मरी और बहुतो ने चैन की साँस ली. पति त्याज्या का मर जाना उचित था …क्या करती जी कर ? किसके लिए जीती ? पति ने क्या त्यागा संसार ने त्याग दिया. संसार का सबसे स्याह पक्ष उसके हिस्से था  …उसकी सिसकती कराहो में गूँजता वह गीत याद आता है जिसे वह अक्सर बचपन में अन्ताक्षरी में अपनी बारी आने पर सर झूका कर गाती थी …लो आ गयी उनकी याद वो नहीं आए …..

मृत्यु की अन्तिम बेला तक वह हा रमेश कहते मर गयी. बस एक बार उस निष्ठुर को देखना चाहती थी जो लेने तो आया पर शरीर चेतना शून्य होने पर. अपनी जिद की विजयी मेरी राजरानी बहन जीत गयी …उमड़ा पूरा ससुराल पक्ष…जिस घर डोली चढ़ गयी ,जिद थी अरथी भी वहीं से उठे. चार कांधों पर चढ़ कर गयी ..उसका शव पिता की देहरी से विदा हुआ. शहर के सारे ब्राह्मण सुबह से शाम तक बाबूजी को समझाते रहे …..पिता के हाथों मुक्ति नहीं मिलेगी ….लाश उठ गयी ….कमलेश बुआ ने कहा -“जियते पियवा बात न पूछे मुअले पिपरे पानी.  ” शायद उसके ससुराल मुन्ना भईया या उनके पिताजी खबर लेकर गये थे .. हम सब बेसुध थे….उसकी स्वर्ग की सिdhiयाँ उन्हीं लोगों ने बनवायी थी …..अब सुना है बड़े पत्रकार हो गये हैं .. उस दिन हमारे घर की आपदा के सबसे बड़े साथी …..मृत्यु की टीस में अक्सर याद आते है. वो दिन मृत्यु का कोलाहल और आज का दिन मृत्यु का सन्नाटा ….जोर का तमाचा ….अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी का आर्त नाद ….मैं फिर से रोती हूँ .इतना की धरती फट जाए और आकाश सुने भी न . तकिये को गार दूँ तो डूब जाए समुची सृष्टि …..
हम इण्टर पास कर गये. मैं कला वर्ग में सर्वोच्च अंक ले प्रथम श्रेणी में  वह सेकेण्ड क्लास. मेरे घर कोई खुशी नहीं ….वह जा रही थी उत्सवी मुस्कान संग गोरखपुर विश्वविद्यालय सतानन्द चाचा संग जाना तो मुझे भी था ,मेरिट सूची मे उससे ऊपर थी ,….सवाल पैसे का था …..बाबूजी कालिका सिंह से कह रहे थे …..तीन साल में तीस हजार बी.ए.करने में खपाऊँगा बाऊसाहब तो तिलक क्या चढ़ाऊँगा. उन दिनों पचास हजार में ठीक ठाक लड़के मिल जाते थे . मैं रह गयी अपनी विवशताओं संग उसे पंख मिला.  उन्ही दिनों एक साझा काव्य संग्रह में उसकी कुछ कविताऐं छपी. सतानन्द चाचा जी संग वह कभी आकाशवाणी तो कभी काव्य गोष्ठियों में शिरकत कर रही थी .

मैं एक बार फिर अपने खोह में.  शुरु में एकाध बार वह चाचा जी संग मेरे घर जरुर आई पर अब मिजाज बदला रहता. उसके चाचा जी मेरे आगे के दो उठे दाँत को देख बडदन्तुल कह परिहास उडाते. अम्मा को अब उसका आना खटकने लगा और हमारे मीठे सम्बन्धों का बन्धन सफलता -असफलता के प्रदर्शन में दरकने लगा.
याद आती हैं मुझे कई लड़कियाँ….एक वन्दना सिंह ….गजब की प्रतिभा नृत्यांगना तो ऐसी की मैं उन्हें नाचते देख मुग्ध हो जाती ….मोतियों सी लिखावट …. कविता वह भी लिखती थी और फिर एक दिन सुना जल कर मर गयी …..दूसरी दीपा शाही जिनकी कविता की पंक्ति ” अन्दर बाहर बड़ी घुटन है , ये पल जीना बड़ा कठिन है ……. एक हाहाकार था इन लड़कियों की अन्तस चेतना में मुक्ति का ….और एक ठस से मन भर का प्रहार …..अम्मा ने बताया …बच्चा नहीं हो रहा था …. मर गयी.  ये सारी लड़कियाँ सपने देख रही थीं ..शैलजा मैम कहतीं -“फिल्ड में जाओ तो सिल्ड लेकर आओ. “आशा मैम का गुरु मन्त्र -हक मिलता नहीं ,छीनना पड़ता है. याद आता है कल्पनाथ राय का व्यंग्य ” सोनी धापा की कितनी लड़कियाँ चिट्ठी -पतरी से आगे बढ़ी ? तडप उठीं थीं सपने देखने वाली सारी लड़कियाँ.  मन करता है भर दूँ ढेर सारे सिल्ड – मेडल शैलजा मैम के आँचल में ….ये रास्ते उन्हीं की कमाई है. मै भारी मन से डी .सी .एस .के .से ग्रेजुएशन करने लगी. अब जीवन में साहित्य और साहित्यिक पत्रिकाओं का मोहभंग था. अम्मा ने उम्मीद से कहा था – अब इस डूबते घर की तुम्ही पतवार …..ऊपर की दो मंजिले ढह चुकी  थीं…बड़ी नियति की मार से दूसरी अपने जिद से …..


प्रेम की तलाश में प्रेम विवाह और सजनी अमीर सजना गरीब के समीकरण ने जम कर उथल पुथल मचाया ….. परिणाम ,मायके ठिकाना.  माँ ने कहा -तुम्हें सेतु बनना है. समझ में आ चुका था ….मुझे अच्छी लड़की बनने की अग्नि परीक्षा देनी है. अच्छी लड़कियों की तरह मैं  सिलाई कढ़ाई बुनाई और कुकरी कोर्स करने लगी. एक अच्छी बहू और पत्नी बनना मेरे लिए चिड़िया की आँख बेधना था.  साधारण शक्लोसूरत वाली सांवली लड़की मेरे समाज में घर भर की चिन्ता का विषय. जैसे तैसे एम. ए .किया और अम्मा का राग भैरवी चालू -“जाहिं घरे कन्या कुँवारी निंन्द क ईसे आई ………” बाबूजी दर दर वर तलाशते हताशा और निराशा के बीच गिरते -उठते घर लौटते तो अपने वजूद पर गहरा क्षोभ होता ….हम बेटियों की अन्तर वेदना का मापन यदि किसी मापक यन्त्र से हो सकता तो निश्चित उस क्षण वह  तड़ाक से फट पड़ता जैसे हाई वोल्टेज से बिजली के यन्त्र भड़ाम से फटते है. शादी की कथा फिर कभी …..कोई सन् 2001-2की बात होगी ….अंशु को बाबूजी चौक पर मिल गये ….मैं उन दिनों मऊ में थी ,पता चलते अंशु अपराजिता संग मेरे घर आ धमकी ..वही पुरानी चहक ….भोलू मेरी गोद में था ….तेल ,बुकवा ,दूध की गन्ध में नहाई मैं लरकोर औरत वो चहकती प्यारी मैना. छोटी बहन चाय -नाश्ता लेने चली गयी. मैंने पूछा क्या कर रही हो ?सम्पूर्णानन्द से पी एच डी …मैं मुस्कुरा उठी ….ये हमारा कभी साझा सपना हुआ करता था. मेरे बेटे को दुलारते हुए उसने कहा ….ये तो भक्क गोरा है सोनी …शायद अपने पापा जैसा ….मैंने सहमति में गर्दन हिलाया. वह नाराज थी ….शादी में नहीं बुलाया …..तुम भी तो भूल गयी …मैं उसकी गहरी आँखों में देखते हुए कहा. अपराजिता ने आश्चर्य से कहा – दीदी आपका घर कितना बड़ा बन गया है.

अम्मा ने झट से टोका -तुम्हारा भी तो बड़ा है …..नज़र लगने के भय से. दोनों बहनों का चेहरा बुझ गया …..सोनी अब पहले जैसे हालात नहीं रहे ….पापा का बिजनेस डूब गया ……दादी नहीं रहीं …..घर गिरवी है ,मैं पढाती हूँ बनारस में ,छोटी को कहा …ये भी ट्यूशन पढ़ाती है ….हिमालय भी सेल्समैनी कर रहा है ….। बहुआ का चेहरा घूम गया …..एक पढ़ी लिखी औरत को नौकरी न करने देने का विभत्स परिणाम बच्चों के संघर्ष के रुप में सामने था. अंशु उस दिन कुछ कहना चाहती थी …..उसकी आँखों में तीव्र बेचैनी के भाव थे ….अम्मा थी की ठसक के चौकी पर हमारे पास बैठी उठने का नाम ही नहीं लेती ….मैं भी पूछना चाहती थी बहुत कुछ पर अम्मा तो अम्मा ….अब कोई खतरा वह मोल नहीं लेना चाहती ….ड़टी रही जैसे सीमा पर प्रहरी …उसकी नज़रों में वह बुरी लड़की थी …अपने मन की ….ना जाने क्या -क्या महरनिया पर सुनती थी ….मैं पूछती तो उठ कर चल देती . रह गयी बहुत सारी बातें ,…..मुलाकातें …आज होती तो मेरी दुनिया रंग खूब गाढ़ा होता ….बसन्त जैसा .
वह चली गयी लिख कर ….
गन्ध बारुदी हवाओं में भरा
 मौन बेबस बाँसुरी कोने लगी ..….
कोने लग गयी एक मेधावी लड़की ना जाने किस परिस्थिति में नहीं जानती. उसके घर जाने का साहस नहीं होता वह चाहती थी ये दुनिया प्रेमिका के चेहरे सा सुन्दर हो जाए ….जो होने से रहा. आज मन में बार -बार एक ही हूक उठती है …….सखी तुम्हारा जाना ,मलय पवन का दह जाना है.

सोनी मणि
संपादक
गाथांतर हिन्दी त्रैमासिक
9415907958

व्यस्तताओं और विवशताओं के बीच से गुजर कर ही राह जीवन की ओर मुड़ती है

रोहिणी अग्रवाल

रोहिणी अग्रवाल स्त्रीवादी आलोचक हैं , महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर हैं . ई मेल- rohini1959@gmail.com

(’पत्नी’ और ’उनकी व्यस्तता’
वाया
रवींद्रनाथ टैगोर)

चूंकि उपन्यास का वास्तविक जीवन से संवाद
होता है, इसलिए इसके मूल्य भी कुछ हद तक वास्तविक जीवन के मूल्य होते हैं. लेकिन यह स्पष्ट है कि औरतों के मूल्य मर्दों द्वारा निर्मित मूल्यों से अक्सर
भिन्न होते हैं. स्वभावतः मामला ऐसा ही है. फिर भी मर्दाना मूल्य ही प्रभावी होते
हैं. अगर बिना किसी लाग-लपेट के कहा जाए तो फुटबाल और खेल ’महत्वपूर्ण’ है ,
फैशन
की पूजा और कपड़ा खरीदना ’महत्वहीन’ है. और ये मूल्य
अनिवार्यतः जीवन से कथा-साहित्य में स्थानांतरित हो जाते हैं. आलोचक मान लेता है
कि यह महत्वपूर्ण किताब है क्योंकि यह युद्ध से संबंधित है. यह एक महत्वहीन किताब
है क्योंकि इसमें ड्राइंग रूप में बैठी औरतों की अनुभूतियों का वर्णन किया गया है. किसी दुकान के दृश्य के मुकाबले युद्धभूमि का कोई दृश्य अघिक महत्वपूर्ण है.’’
(वर्जीनिया
वुल्फ, अपना कमरा, पृ0 78).  मैं बड़े-बड़े हरफों में पहले ही अपनी बात खोल कर
साफ कर देना चाहती हूं कि आपसी प्रतिदुंदिता और वैपरीत्य के अभाव में दोनों
कहानिया ’पत्नी’ (जैनेंद्रकुमार)
और ’उनकी व्यस्तता’ (अल्पना मिश्र) एक ही भावभूमि का
विस्तार हैं; नैरेटर के भीतर तक उतर कर दूसरे पक्ष को एक
प्रामाणिक ईमानदारी के साथ उकेर देना चाहती हैं, और सदा के अ-डोल
और जल-जल कर राख हुए जा रहे सवालों को अजस्र ऊष्मा से तमतमाए विकसनशील
विचार-प्रवाह के बीचोबीच रख देना चाहती हैं कि घर-परिवार में क्या सब कुछ ठीक चल
रहा है? इस सवाल में यदि नकारात्मक उत्तर की निश्चयात्मक गूंज सुनाई पड़ रही
है तो तय है कि तलवार लेकर मच्छर के पीछे भागने से मलेरिया के स्रोत के सफाया नहीं
होगा.

इसलिए क्यों न तलवार को म्यान में रख कर कुछ देर को छुट्टी दे दी जाए;
और
खुद को मिट्टी के किनारों से उमग कर प्रकाश फैलाते दीए के हवाले कर दिया जाए?
न,
भीतर
के तहखानों में बिजली की फिटिंग का आडंबर नहीं रचाया जा सकता कि खट से खटका दबा कर
सब कुछ जगर-मगर कर दिया जाए. वहां तो अपने ही चाक पर दीया गढ़ कर अपनी ही चेतना की
बाती से टिमटिमाता आलोक फैलाना पड़ता है. लेकिन यह जो ऊपर वर्जीनिया वुल्फ कह गई हैं,
सुन
कर कैसे कोई स्थितप्रज्ञ भाव से अपनी प्रज्ञा-जोत जलाए रखे ? पाखंड पर
जतनपूर्वक ओढ़ाई गई चादर को कोई बेशर्मी से उघाड़ दे तो क्यों नहीं ’नग्न’
होने
की लाज अपने अहं और ताकत को गूंध-सान कर आतंक में फूट पड़े ? मैं जानती हूं
पिछले अस्सी बरस से दीवार से लग कर द्वार की ओट में खड़ी ’सुनंदा’ से
कभी किसी ’कालीचरण’ ने खौफ नहीं खाया है, बल्कि अदृश्य
सुनंदा की ठोस उपस्थिति ने उसे सुख ही दिया है – एक पुकार की दूरी पर खड़ी कामधेनु
की तरह. वह ’अपने पुराने बक्से से अब तक जोड़ी पूंजी निकाल
कर’ बस-स्टेशन की ओर लपकती पत्नी की ’गति’ से
भी भयभीत नहीं. जानता है मुल्ला की दौड़ मस्जिद तक सरीखी कहावतें यूं ही नहीं
बनतीं. इसलिए लक्ष्मण-रेखा के भीतर कितना ही कूद-फांद ले स्त्री, खूंटा
तुड़ा कर ज्यादा दूर तक भागना आसान नहीं रहता.

’’ऐसा ?’’ चेहरे पर दृढ़ मुस्कान की आलोक-रश्मियां
लिए मृणाल (रवीन्द्रनाथ टैगोर की कहानी ’पत्नी का पत्र’) की निःशब्द
टंकार में जाने ऐसा क्या था कि हुआं-हुआं की जमात बौखला-बिलबिला कर अपनी-अपनी
खोहों में दुबक गई.

बौखला तो मैं भी गई हूं. अचानक यह मृणाल धम्म
से सुनंदा और पत्नी (अल्पना मिश्र की कहानी की मिसेज सुदामाप्रसाद, या
शैलजा की अम्मा ? अहा! कितनी भाग्यवती है यह स्त्री कि पति-सेवा
का पुण्य लूटते-लूटते अपना नाम भी विसर्जित कर दिया उसने! ) के बीच क्यों आ बैठी है?
इन
दोनों की सीधी-सपाट कहानी का सीधा-सतही इकहरा विश्लेषण करने के मेरे मंसूबों पर
पानी फेरने के लिए ? लेकिन देख क्या रही हूं कि मृणाल की तेजस्विता
के स्पर्श मात्र से ये दोनों सूखी-मुरझााई स्त्रियां मानो जी उठी हैं. न, वे
सत्यनारायण की कथा की कलावती-लीलावती नहीं है कि कोई दैवीय (या लौकिक) शक्ति
सत्यनारायण का नाम धर कर मिट्टी के लोंदों की तरह उन्हें घड़ी-घड़ी बनाता-मिटाता
रहे. मृणाल की उपस्थिति ने मुझे भी छूकर स्पंदित कर दिया है. अपनी बात कहने के लिए
वर्जीनिया वुल्फ के शब्दों को चुरा कर मैं यह जो आंख-मिचैली का खेल खेल रही थी,
उसे
बनाए रख कर क्यों देर तक अपनी आंख में घूल झोंकती रहूं ? हां, मैं
स्वीकार करती हूं कि आज की इक्कीसवीं सदी के इस ’चेतन’ युग
में भी स्त्री, स्त्री-प्रश्न और स्त्री का वजूद हाशिए पर हैं. अस्पतालों की तर्ज पर साहित्य में भी ’गाइनी वार्ड’ की परिकल्पना कर
ली जाती है ताकि स्त्रियां अपने सुख-दुख और सवालों को लेकर बतियाती-उलझती रहें. मर्दानी दुनिया स्त्री को चैपाल की चकल्लस देकर अपना पल्ला झाड़ लेती है कि
स्त्रियों के तंग दायरे और वही तीन सवाल – प्रेम, पति और परिवार. वे मानते हैं, पुरुषों की दुनिया बड़ी है और बेहतर भी, जहां घर के बाड़े
से बाहर निकल कर समय और समाज को आंदोलित करने वाले बड़े-बड़े सवालों से सिर खपाने के
बड़े-बड़े कुलाबे हैं.

स्त्रियां क्या जानें कि राजनीतिक मसलों पर देश-दुनिया और
भविष्य की तरक्की टिकी है; कि सांप्रदायिक विद्वेष और आतंकवादी
गतिविधियों के अलावा किसान-कामगार आंदोलन, दलित आंदोलन, नक्सली हिंसा,
बाजार
की संस्कृति और प्राकृतिक आपदाओं से निपटने के लिए उन्हें हर पल सिर पर कफन बांधे
रखना पड़ता है. घर की महफूज चारदीवारी पुरुष के ’नसीब’ में
कहां ? इसलिए जिस अहं भाव से पुरुष (लेखक-पाठक दोनों) इन तथाकथित ’बृहत्तर’
सवालों
से जूझता है, उतनी ही हेय दृष्टि से स्त्री-लेखन और
स्त्री-प्रश्नों को बिना टकराए खारिज कर देता है. बिना पढ़े ही खारिज कर दिए जाने
की आशंका के बावजूद मैं घर-परिवार और स्त्री-पुरुष संबंध से जुड़े तमाम सवालों से
बार-बार  जूझते रहना चाहती हूं क्योंकि
जानती हूं कि आतंकवाद, सांप्रदायिक विद्वेष, घृणा और अलगाव
की राजनीति, गुटबंदी जैसी परिणतियां भयावह रूप लेकर एकाएक आसमान
से नहीं आतीं. वे बरसों-बरस घर की दुनिया और मनुष्य के अंतस के भीतर चुपचाप
पलती-सुगबुगाती हैं. पुरुषों की दुनिया के इन बड़े-बड़े मुद्दों की विभीषिका को
स्त्री देह के साथ-साथ आत्मा के स्तर पर भी झेलती है, इसलिए चाहती है
पुरुषों की भीड़ से नहीं, अपने घर के पुरुष के साथ अपने भय,
दुःस्वप्न,
अपमान
और अरमान साझा करे; उसे बताए कि स्त्री को हीन समझे जाने का भाव
पुरुष का कभी अपनी हीनता (जिसे श्रेष्ठता के गुब्बारे में फुला कर वह आंखों में
धूल झोंकने के मद में उन्मत्त रहता है) से मुक्त कर दूसरे के भीतर पैठने की विवेकशील
संवेदना नहीं देगा.

बहुत छोटी इकाई है घर, लेकिन निजता की महीन परत के नीचे वह
विषमता, विभाजन, आतंक, हिंसा, अपराध और
राजनीति से खदबदाता एक समूह भी है. भीड़ में नजर बचा कर अपराध करने और नजर आ जाने
पर फरार हो जाने की गुंजाइश हमेशा बनी रहती है. जाहिर है वहां रक्तरंजित हाथ और
पाक-साफ दामन साथ-साथ चल सकते हैं. लेकिन घर साफ-सुथरा पारदर्शी आइना है जो धब्बे
को एनलार्ज कर पूरे व्यक्तित्व के दागदार हो जाने की चेतावनी देता है. घर बड़े-बड़े
मुद्दों को लघु स्तर पर सफलतापूर्वक सुलझा लेने की प्रयोगशाला है जहां फैसले
अदालती कार्रवाइयों की तरह लंबे नहीं टलते चलते। चूंकि यहां फौरी तौर पर सुनवाई और
कार्रवाई होती है, इसलिए कठघरे में खड़े होने की अप्रीतिकर अनुभूति
’बड़े मुद्दों’ की ओट में रिहाई पा जाना चाहती है.ठीक कहते हैं विचारक कि स्त्री की स्थिति ही
समाज के विकसित होने की पहली कसौटी है क्योंकि घर समाज का आंगन है, ’समाजसेवियों’
का
रैन-बसेरा नहीं.’’मेरे लिए तो दुनिया है ही नहीं. मैं तो बस मन
के सहारे ही रहती हूं’’ (’दृष्टिदान’, रवींद्रनाथ
टैगोर) बनाम ’’घर और दफ्तर को अलग-अलग रखना चाहिए’’ (’उनकी
व्यस्तता’ अल्पना मिश्र) शरतचंद्र चट्टोपाध्याय की तरह जैनेंद्रकुमार
से अपने को संबंध को लेकर मैं सदा असमंजस में बनी रहती हूं. दोनों अपने पात्रों के
साथ अनायास मन के भीतर गहरी पैठ बनाते हुए मुझे अपने रंग में रंगने लगते हैं,
लेकिन
जैसे ही अपनी शख्सियत पर मृणाल-सुनीता या सावित्री-किरणमयी-राजलक्ष्मी का लबादा
ओढ़ने को होती हूं कि जाने कहां से वितृष्णा तैर कर आती है और सम्मोहन जाल छिटका कर
मुझे अपने में लौटा लेती है. विश्लेषण करने पर पाती हूं कि विद्रोह के सब्जबाग
दिखा कर स्त्री की पीड़ा और त्याग का महिमामंडन करते हुए वे भी तो स्टीरियोटाइप्स
को पुख्ता कर रहे हैं. अलबत्ता आधा सच पूरी ईमानदारी से बयान करने की दृढ़ता तो
उनमें है ही.

’पत्नी’ कहानी को ही लूं तो वह पति के भोजन की
प्रतीक्षा में अस्त-व्यस्त सामान्य स्त्री की सामान्य दिनचर्या का आख्यान नहीं है,
व्यवस्था
द्वारा एक भरी-पूरी शख्सियत को प्रतीक्षा और जड़ता के दो खूंटों से बांध कर बधिया
कर दिए जाने की पड़ताल है. उल्लेखनीय है कि बधिया कर दिए जाने का क्षोभ मौन हाहाकार
बन कर कहानी की नायिका सुनंदा को जब-तब जकड़ लेता है. तब वह ’भीतर ही भीतर
गुस्से से घुट कर रह’ जाती है, या पति का जी
दुखाने के लिए उसकी उपस्थिति का नोटिस न लेकर ’कठोरतापूर्वक
शून्य को ही देखती रहती’ है; या ’हाथ
की बटलोई को खूब जोर से फेंक’ देना चाहती है ताकि बता सके कि ’किसी
का गुस्सा सहने के लिए वह नहीं’ है. लेकिन इस सारे मानसिक ऊहापोह के
बाद अपने में लौटने पर पाती है कि वह ’जहां थी, वहां’ अब
भी है – गीली लकड़ी की तरह धुंआती हुई या अंगीठी की आग की तरह राख हुई जाती हुई. घटनाओं की न्यूनता, स्थितियों की
गतिहीनता एवं पात्रों के विकास की संभावनाओं का अभाव – जैनेंद्रकुमार की कहानी-कला
की कुछ विशेषताएं हैं जो कहानी में स्फूर्ति, उत्साह और आशा
जैसी सकारात्मक चटखदार रेखाओं को उभरने नहीं देतीं. लेखक व्यक्ति की मनःस्थितियों
के जरिए सामाजिक विडंबनाओं और पाखंड का उद्घाटन करते हैं और इस प्रक्रिया में
पात्र के अंतद्र्वंद्वों या दो पात्रों को आमने-सामने रख कर कहानी को खुद अपनी
यात्रा तय करने का अवसर देते हैं. ’पत्नी’ कहानी में
जैनेंद्रकुमार एक-दूसरे की प्रतिद्वंद्विता में तन कर खड़े दो विरोधी पात्रों या
स्थितियों को नहीं गढ़ते, बल्कि उनकी संवादहीनता के भीतर बोलती
चुप्पियों के जरिए उनके मानसिक गठन को उद्भासित करते हैं.

अपनी नित्यक्रमिकता को
यांत्रिक भाव से
जीती सुनंदा कहानी में शुरु से अंत तक अवरुद्ध कर दी गई लहर के
बिंब की सृष्टि करती है, मानो लेखक कहना चाह रहा हो कि जीवन की
गत्यात्मकता के भीतर जीवन का क्षरण करने वाली स्थितियों को चीन्हने के लिए हमें
स्वयं उनके भीतर उतरना होगा. इस अवरुद्ध लहर के धु्रवांत पर है कालिंदीचरण जो
मित्र-मंडली के साथ हवा के झोंके की मानिंद घर और समाज में बेरोक-टोक मनचाही गति
और समय के साथ घूमता है. उसके पास संवारने को संघर्ष-संकुल वर्तमान है, और
विचरण के लिए भविष्य का आसमान। सुनंदा के पास न वर्तमान है, न भविष्य. बस,
उसकी
थाती है अतीत – पुत्र की अकाल मृत्यु के कारण चोट खाया, बिलबिलाती
स्मृतियों से भरा अतीत. यह अतीत उसे खाली देखते ही गहरे सख्य भाव से बतियाने हेतु
उसके पास आ पहुंचता है. लेकिन दोनों जैसे ही मिल-बैठ कर साझा भाव से अपने-अपने
जख्म चाटने लगते हैं, सुनंदा अश्रुपूरित नेत्र लिए उसे जहां का तहां
छोड़ वर्तमान में लौट आती है. वह जानती है वर्तमान का स्वामी उसका पति कालिंदीचरण
है और वह स्वयं उसकी छाया या अनुगूंज. वर्तमान उसे पलायन की सुविधा देता है
क्योंकि यहां उसे विचारशून्य सेवादारिन की भूमिका निभानी है. सुनंदा पाठक के भीतर गहरे भावोद्वेलन की सृष्टि
करती है, लेकिन लेखक उसके चरित्र की बारीक परतों को एक निश्चित अंतराल में
उठने वाली परस्पर विरोधी विचार-लहरियों के जरिए बुनता-उकेरता है. एक ओर किसी भी
सामान्य स्त्री की तरह सतीत्व उसकी पूंजी है और पति-सेवा सौभाग्य. यही उसके
दायित्व की जमीन है और सपनों का आसमान भी.

मन में उठती टीस और हुलसते अरमान दोनों की ’भू्रण हत्या’ करने के लिए वह किसी न किसी ’व्यस्तता’
की
तलाश में अपने स्वत्व और ऊर्जा को क्षरित करती चलती है. लेकिन इसके बावजूद पढ़-लिख
कर भारतमाता को स्वतंत्र कराने जैसे ’बड़े’ और ’पुरुषेचित’
मुद्दों
को समझने की ललक सुनंदा को निरी छाया या अनुगूंज नहीं रहने देती. उसमें अपनी कमतरी
पर ग्लानि है तो उसी सांस में कमतर बनाए रखने वाले घटकों की शिनाख्त की तमीज भी. ’’उसने
बहुत चाहा है कि पति उससे भी कुछ देश की बात करे. उसमें बुद्धि तो जरा कम है,
फिर
धीरे-धीरे क्या वह भी समझने नहीं लगेगी ? सोचती है, कम पढ़ी हूं तो
इसमें मेरा ऐसा कसूर क्या है? अब तो प़ढ़ने को मैं तैयार हूं, लेकिन
पत्नी के साथ पति का धीरज खो जाता है.’’ आत्मविस्मरण से आत्मान्वेषण की उत्कंठा
के बीच निरंतर दोलायमान सुनंदा की विचार-यात्रा दरअसल यथास्थितिवाद के अभिशाप से
उबरने के लिए स्पेस पाने की चाहत है जिसे पितृसत्तात्मक व्यवस्था के प्रतिनिधि
पुरुष/पति कालिंदीचरण ने पूरी तरह घेर लिया है. ’माथे को
उंगलियों पर टिका कर’, ’बैठी-बैठी सूनी सी’ अदृश्य को ताकती
सुनंदा ऊपरी तौर पर लकड़ी के कुंदे सी ठस्स भले ही दीखती हो, वक्त से पिछड़ने
की पराजय ने उसके भीतर क्षीणकाय संघर्ष-चेतना अवश्य भरी है. बेशक ’’उत्साह
उसके लिए अपरिचित है’’ और ’’जीवन की हौंस उसमें बुझती जा रही है’’,
पर
फिर भी वह ’जीना चाहती है’  रेंग-रेंग कर
नहीं, पति के साथ कंधे से कंधा मिला कर भारतमाता की स्वतंत्रता के यज्ञ में
आहुति डाल कर.

जैनेंद्रकुमार आत्मसंकोच और आत्म-दीनता में
दुबकी-सिमटी सुनंदा को दयनीयता में ढाल कर विघटित नहीं करते, उसमें
सेवा, त्याग, नैतिकता का बल गूंध कर आक्रांता सरीखे
कालिंदीचरण के सामने खड़ा कर देते हैं. निश्चय ही यह शेर और मेमने की लड़ाई है. सुनंदा के पास आत्म-बलिदान के तेज से परिपूर्ण आत्मबल है तो कालिंदीचरण के पास
पुरुष होने के दंभ से उपजा अहं भाव. एक ओर अपने मान की रक्षा की मूक मिन्नतें हैं,
दूसरी
ओर सब कोमल चकनाचूर कर देने की उद्धत लापरवाही. दोनों ओर बिना कहे अपने को समझे
जाने की चाहतें हैं, और दोनों ओर समझबूझ कर भी अनजान बने रहने की
भंगिमाएं हैं. संभवतया इसलिए कि बरसों से पसरी संवादहीनता संबंध को कुतरते-कुतरते
दो व्यक्तियों को परस्पर अजनबी बना देती है. पति के पास यदि क्रुद्ध होकर बाहरी
दुनिया में जा रमने का विकल्प है तो पत्नी के पास और अधिक कड़ाई से अपने दायित्व को
निभाए चलने की विकल्पहीनता. अलबत्ता खाना न परोसने के हुक्म का उल्लंघन करते हुए
वह खाना परोसने के साथ-साथ अपने आहत अभिमान को भी अनबोले ठसके के साथ परोस आती है. लेकिन यह क्षणिक उत्तेजना की तात्कालिक प्रतिक्रिया भर है. अपने-अपने खांचों में
बंधे सुनंदा और कालिंदीचरण जानते हैं कि स्त्री की कमजोरी ही पुरुष की ताकत है. इसलिए आंख में आंख डाल कर पंजा लड़ाने की यह क्षणिक प्रक्रिया अंततः पति-पत्नी की
समाजानुमोदित भूमिकाओं की पारंपरिक लय-ताल में विलीन हो जाती है, जहां
अपनी छोटी से छोटी जरूरत की पूर्ति के लिए हांक लगा कर पत्नी को हड़का देने के
विशेषाधिकार हैं तो दूसरी ओर अपनी भूख और जरूरतों को मुल्तवी कर पति के लिए जान की
बाजी लगा देने की दीनता. लेकिन जैनेंद्रकुमार का लक्ष्य ऊबड़खाबड़ जमीन पर स्थित
दांपत्य संबंध की कथा कहना नहीं है.

 वे इस तथ्य की ओर पाठक का ध्यान आकृष्ट करना
चाहते हैं कि सृष्टि के विकास- क्रम को निरंतर बनाए रखने के लिए स्त्री और पुरुष
की दो पूरक इकाइयां कैसे समाज व्यवस्था के हत्थे चढ़ कर एक-दूसरे की
प्रतिद्वंद्विता में तनी दो लैंगिक इकाइयां बन जाती हैं। चूंकि एक पक्ष को श्रेष्ठ
अथवा कर्ता मानते ही अपने आप दूसरा पक्ष हीन और अनुकर्ता की भूमिका में आ
विराजता है, इसलिए दमनकारी तंत्र में सहभागिता की बात
बेमानी हो जाती है. यह व्यवस्था के आंतरिकीकरण की मनोवृत्ति ही है कि सुबह के
उपासे पति की प्रतीक्षा में अंगीठी की आग लहका कर बैठी सुनंदा की चिंता और चेतना
में पति की भूख ही जब-तब आ विराजती है, अपनी नहीं. ’’कुछ हो, आदमी
को अपनी देह की फिक्र तो करनी चाहिए’’ खीझ में वात्सल्य भर कर सुनंदा सोचती
है तो उसकी सोच में ’आदमी’ यानी कालिंदीचरण ही है, अपनी
आदमियत नहीं. यह स्त्री द्वारा अपनी देह (अस्तित्व) को नकार कर स्वत्वहीन हो उठने
का संस्कार है जो देह के भीतर स्थित दिमाग और देह पर आच्छादित व्यक्तित्व दोनों से
पिंड छुड़ाने के अभ्यास में उभरता है. लेखक ने एकाधिक बार सुनंदा को अपनी देह के
प्रति असावधान दिखाया है और कालिंदीचरण की देह के प्रति ममत्वपूर्ण, मानो
देह जैविक संरचना न होकर ठोस व्यक्तित्व हो. ’’उन्हें न खाने
की फिक्र है, न मेरी फिक्र. मेरी तो खैर कुछ नहीं, पर
अपने तन का ध्यान तो रखना चाहिए’’  सुनंदा की यह आत्म-दीनता एक ऐसी
स्त्री-छवि की रचना करती है जो चोट खाकर आत्माभिमान में फुफकार उठती है और फिर
आत्मपीड़न में ढल जाती है. इसके विपरीत देह के स्वीकार के साथ अनिवार्य रूप से
व्यक्तित्व के स्वीकार और संवार का भाव व्यक्ति में पनपता है जो स्वाभिमान के
सहारे अपनी परिधि का विस्तार करता चलता है.

मैं सुनंदा को वहीं छोड़ चुपके से ’उनकी
व्यस्तता’ कहानी की ओर बढ़ती हूं। देखती हूं अब वह कुछ बुढ़ा गई है. उम्र ने शरीर
को कहीं से फुला कर, कहीं से ढीला कर बालों में चांदी के तार बुनते
हुए अपनी दस्तक दे दी है. अब वह चौके में अंगीठी के सामने नहीं, छोटे
से स्टूल पर बैठी जाने क्या-क्या सोच रही है. एक नहीं, तीन-तीन बेटियों
की मां बन चुकी है. बेटा न पाने का दुख बड़ा है या बेटियों को सही भविष्य न दे पाने
की कचोट -विश्वासपूर्वक नहीं कहा जा सकता क्योंकि बोलना तो वह अब तक नहीं सीखी. भाषा के नाम पर वही एक गहरा निःछ्वास और शून्य को ताकती आंखें. या शायद बेटा न
होने के ’लाउड’ दुख को पति के मुंह से इतनी बार सुन चुकी है कि
दुख ने अनुभूति की तरह नहीं, ग्रंथि की तरह उसके भीतर घर कर लिया
है. पति के लिए वह कभी उसकी भौतिक जरूरतों को पूरा करने वाला स्वचालित रोबो है,
कभी
हड़का दिए जाने वाला ढोर-डंगर. पति की डांगरी से ग्रीस के दाग छुड़ाते हुए वह अक्सर
सोचती है, आज उनके दफ्तर, कामकाज और अफसरों-सहकर्मियों के बारे
में जरूर पूछेगी. घर रहने की मजबूरियों के बीच बाहर की बातें सुन-सुन कर बाहर घूम
आने का वर्चुअल सुख तो हासिल कर ही सकती है. लेकिन सुदामाप्रसाद हैं कि बात करने
का कोई मौका पनपने ही नहीं देते. घर में घुसते ही टी वी के रिमोट पर कब्जा करके
चारों ओर खबरों की दुनिया ऐसे फैला लेते हैं कि दुनिया-जहान की विपदाओं के बीच
अपने निजी सुख-दुख की बात करते भी शर्म आती है. शर्म तो तब भी आती है जब उसके
एकमात्र व्यसन – सास-बहू के धारावाहिक देखने का चाव को हिकारत भरी नजर से देख वे
क्रोध में भर कर बुड़बुड़ाने लगते हैं – मूढ़मती, भई, मूढ़मती.

गुस्सा करने का शऊर नहीं है उसके पास, लेकिन चाहती है कभी फुर्सत हो पति के
पास तो वह उन्हें बताए कि इन धारावाहिकों को देख-देख कर ही उसे समझ आया है क्यों
कोई भी स्वस्थ, संतुलित, कर्मठ और
लक्ष्योन्मुख व्यक्ति तिकड़मों और जालसाजियों के फंदे नहीं बुनता। जाल बिछा कर घात
लगाने की टोह में वे ही बैठते हैं जिनसे सब कुछ छीन कर अपनी मौत मरने के लिए
निहत्था छोड़ दिया जाता है या वे जिन्हें अपनी लंबाई के मुताबिक बढ़ने के अवसर नहीं
दिए जाते. जिसके हिस्से की जमीन छीन ली जाती है, वह रो कर अपने
को खत्म कर सकता है या दूसरे को खून के आंसू रुला कर अपने टीसते जख्मों पर
प्रतिशोध के गर्म-दहकते फाहे रखता है. लेकिन असंतुष्टि की बात वह कहे कैसे ?
सुनते
ही आसमान सिर पर न उठा लेंगे कि घर बैठे आराम की रोटी तोड़ने से ही ’औरतों
का दिमाग खराब हो गया’ है. बाहर जाकर इतना-इतना खटना पड़े तो अक्ल
ठिकाने आ जाए. उन्होंने नहीं पढ़ी वह कहानी, लेकिन ब्याह से
पहले शैलजा ने ही पढ़ कर सुनाई थी, किन्हीं शिवरानीदेवी प्रेमचंद की कहानी
थी शायद – ’समझौता’. उसमें भी यही सब – पति-पत्नी की
चखचख. औरतें ऐसी और मर्द वैसे. बहस के दौरान तमक कर बोली थी नायिका, हां,
ललिता
नाम ही था उसका कि बाहर की दुनिया की ज्यादा ऐंठ तो दिखाओ मत. जो मूसलों की परवाह
किए बिना घर की ओखली में चैबीसों घंटों सिर दिए रहती हैं, वे दफ्तर के
कामों से क्या डरें. बस, जरा हमारे हाथ-पैर खोल दो, मजबूती
से दोनों मोर्चे संभाल कर मर्दों को पटकनी न दे दें तो कहना

2
“कितनी तुच्छ है यह मेरी प्रतिदिन की
जीवन-यात्रा. इसके बंधे नियम, बंधे अभ्यास, बंघी हुई बोली,
बंधी
हुई मार’’ (रवीन्द्रनाथ टैगोर, ’पत्नी का पत्र’) लेकिन यह क्या ! लेखिका की पकड़ से मुक्त कर मैं
खुद ही मिसेज सुदामाप्रसाद को ग़ढ़ने बैठ गई. लेखिका ने तो तीन-चार वक्तव्य दिलवाने
के अतिरिक्त मिसेज सुदामाप्रसाद की ओर झांका भी नहीं. वे सुदामाप्रसाद में ज्यादा दिलचस्पी ले रही हैं और ऐसे दबे पांव उनके अंतर्मन में घुस गई हैं कि शब्दों को
नहीं, शब्द को जन्म देने वाले विचार या अनुभूति की कौंध को उसकी प्राथमिक
अपरिपक्व अवस्था में पकड़ सकें. शब्दों की पोशाक पहन लेने पर अनुभूतियां अपनी निजता
खो देती हैं और वाचक अपनी स्वतःस्फूर्त वास्तविकता. मैं कालिंदीचरण के किसी हमशक्ल
को कहानी में पाने की प्रत्याशा में पृष्ठ-दर-पृष्ठ आगे बढ़ रही हूं और विस्मय में
घिरती जा रही हूं. ’’यह कैसा आदमी है, स्त्रियों सरीखा
कि हमेशा द्वंद्वग्रस्त ! हमेशा अपराधबोध से पीड़ित ! हमेशा अपने को दिलासा देता हुआ !
दफ्तर की फाइलों और गप्प-गोष्ठियों को छोड़ कर घर भर की फिक्र में दुबला होते किसी
और को तो अब तक देखा नहीं कभी!’’
वर्जीनिया वुल्फ समर्थ रचनाकार से उभयलिंगी
होने की मांग करती हैं. तो क्या (प्रतिपक्षी पर) तमाम तरह के आरोप लगाती भंगिमाओं
या (प्रतिपक्षी द्वारा लगाए गए) आरोपों का उत्तर देती सफाइयों से भरे स्टीरियोटाइप
लेखन को छोड़ अल्पना मिश्र ’उनकी व्यस्तता’ तक आते-आते इतनी
परिपक्व हो गई हैं कि अभियुक्त के कठघरे से निकाल कर पुरुष के साथ सहानुभूतिपूर्वक
संवाद करने को तैयार हैं ? मेरी दिलचस्पी भी सुदामाप्रसाद में बढ़
गई है, लेकिन साथ ही आशंका और उपेक्षा से भर कर लेखिका की ओर भी देख रही
हूं.

सच कहूं तो आशंकित ज्यादा हूं कि पुरुष को सहानुभूति देते-देते यह संवाद
अर्धनारीश्वर का दर्जा देने की हड़बड़ी में स्तवन-गान में ही विघटित न हो जाए. मेरी
आशंका निराधार नहीं है क्योंकि जैसे पुरुष के लिए स्त्रियां भोग्या या देवी की दो
कोटियों में विभाजित ’जीव’ हैं, उसी प्रकार
अधिकांश स्त्री-लेखन अब तब पुरुष को ’सम्मानपूर्वक’ खलनायक का दर्जा
देता आया है, या अपनी ही कथा-रूढ़ि से अघा कर उसे स्त्री के
उद्धारक (अर्धनारीश्वर) के रूप में प्रस्तुत करता रहा है. जहां पुरुष के मन से
अचानक जेंडर बोध समाप्त हो जाता है और संबंधों की ऊबड़खबड़ जमीन समान रसधारा से
सिंचित समतल जमीन बन जाती है. मिसेज सुदामाप्रसाद के मूक गिले-शिकवों को छोड़
दूं तो सुदामाप्रसाद सुनंदा की निकटवर्ती प्रजाति के जीव जान पड़ते हैं. फर्क यह है
कि अपने मृत शिशु की याद में आंसू बहा कर सुनंदा जी हल्का कर लेती है (स्त्री होने
का सुख! ), और सुदामाप्रसाद ’जीवित’ ब्याहता बेटी की
चिंता में भरे-भरे बैठे हैं. पत्नी से देह और जरूरतों का गहरा रिश्ता है, मन
की बात का कोई मार्ग नहीं. न, मोहन राकेश जितने आत्मसंकुचित नहीं कि
मानें मन की बात कह कर आदमी छोटा हो जाता है, लेकिन इतना जरूर
जानते हैं कि ’’जो वे कहना-बताना चाहते हैं, उसे
अपने ही घर में कोई समझता क्यों नहीं?’’ पत्नी सोचती है, घर घुसते ही
खबरों की दुनिया ओढ़-बिछा कर वे उसकी उपेक्षा करते हैं, लेकिन वे ही
जानते हैं कि चारों ओर शोर का सैलाब फैला कर वे अंदर के खदबदाते सन्नाटे को चीर
देना चाहते हैं. उस सन्नाटे में शैलजा उन्हें जोर-जोर से पुकार रही है, और
वे हैं कि हर पुकार पर कन्नी काट जाते हैं. सुदामाप्रसाद के लिए शैलजा का बेटी से
क्रमशः अपराध-ग्रंथि में तब्दील होते चलना कहानी को एकाएक ऐसे मोड़ पर ले आता है
जहां पूर्ववर्ती परंपरा से हाथ छुड़ा कर उसे अपनी यात्रा आप तय करनी है.

शैलजा चाहे
और जो भी हो,
अन्नपूर्णा मंडल (सुधा अरोड़ा की कहानी ’अन्नपूर्णा
मंडल की चिट्ठी’ की हतभागी नायिका) नहीं है. शायद हो भी सकती थी,
लेकिन
लेखिका ने दृढ़तापूर्वक उसकी शहादत देने से इंकार कर दिया है. क्यों परिवार-समाज
की उपेक्षा पाकर हर बार स्त्रियां ही दम तोड़ती रहें? क्यों न अपराधी
के भीतर पलते अपराध-बोध की पड़ताल की जाए? अपराधी मनुष्य है तो मन की भीतरी
कंदराओं में आत्मसाक्षात्कार के वक्त अपनी ही आंख में आंख डालने का नैतिक साहस
नहीं जुटा पाएगा. फिर क्यों न तभी वार किया जाए जब वह निहत्था है और ईमानदार भी? अल्पना मिश्र की विशेषता है कि वे खबर की
तटस्थता को पारिवारिक परिप्रेक्ष्य देकर मानवीय बनाती हैं और इस प्रक्रिया में
कहानी को एकाधिक स्तरों पर कई चरित्रों के मार्फत घटित होते दिखाती हैं. खबर मामूली-सी
है. दिल्ली के किसी एक परिवार में सात साल से बहू को ताले में बंद रखा गया है. बेटी को ब्याह कर सुर्खरू हुए मां-बाप अपने में मग्न हैं कि ’नो
न्यूज मींस गुड न्यूज’, और ससुराल पक्ष सप्ताह में एक-दो बार खिड़की के
रास्ते खाना पहुंचाकर ’सभ्य’ ढंग से उस कंकाल की मौत की बाट जोह रहा
है. नाराजगी का कारण कुछ भी हो सकता है. बहू द्वारा ’सम्मानजनक’
दहेज
न लाने से लेकर अपमानजनक व्यवहार करने तक. खबर की विभीषिका बड़ी है या भीतर का
अपराध-बोध कि सुदामाप्रसाद बेसाख्ता कह उठते हैं . ’’ये कैसी
व्यस्तता है हमारे समाज की कि लड़की को ससुराल में छोड़ कर निश्चिंत हो गए?’’ विश्लेषण के बिंदु को यहीं फ्रीज कर मैं पहले
अपने भीतर फूटते क्रोध के लावे को बाहर निकाल लेना चाहती हूं क्योंकि जानती हूं
आवेश पूर्वाग्रहों की आंच को लहका कर विवेक को जला देगा.

एक खांटी औरत बन कर मैं
सुदामाप्रसाद को
कठघरे में खींच लाती हूं और दन्न से सवाल दाग देती हूं कि पांच
साल से ससुराल में उत्पीड़न झेल रही शैलजा की सुरक्षा के लिए उन्होंने क्या ठोस कदम
उठाया. मेरा आवेश सुदामाप्रसाद को गरिया कर ही शांत नहीं हुआ. वह शैलजा सरीखी सभी
लड़कियों की ओर मुड़ गया है कि जिंदा रहने की लालसा में लड़कियां क्यों इतना उत्पीड़न
झेलती हैं? ’मूक भाव से उत्पीड़न न झेलें तो क्या करें
लड़कियां, जबकि उनके समर्थन में समाज में एक भी आवाज नहीं है?’ आवेश
की झाग बैठने लगी तो विवेक सक्रिय होना शुरु हो गया. तब अपने ही सवालों की अनुगूंज
इतनी खोखली लगी कि दिखाई पड़ा साड़ी का पल्लू मुंह में ठूंस कर अपनी आवाज घोटते-घोंटते भी मृणाल कटाक्ष करने से नहीं चूकी है . ’’हां लड़कियों का
कपड़ों में आग लगा कर मर जाना तो अब फैशन सा हो गया है.’’ (टैगोर, ’पत्नी
का पत्र’) कायदे से मुझे सुदामाप्रसाद की पीठ ठोंकनी
चाहिए थी कि उनके अवचेतन में ससुराल में यंत्रणा भोग रही बेटी की याद है, और
चेतन में बेटी का बाप होने की हताशा. सुदामाप्रसाद ऐसा व्यक्ति है जो एक ही समय
बेटी को दुलार और दुत्कार देना चाहता है. वह देख रहा है ’पिता’ को
धकिया कर कोई एक घनघोर पितृसत्ताक पुरुष उसके भीतर आ बैठा है. जब-जब पिता शैलजा की
लड़कों-सी निर्भींकता पर खुश होता है, तब-तब पितृसत्ताक पुरुष उसे तरेर कर
चुप करा देता है कि ’’लड़का ही चाहिए था उन्हें, पर
ईश्वर की कृपा होते-होते रह गई थी.’’ पिता शैलजा के मर्दाने गुणों पर लट्टू
है, लेकिन पितृसत्ताक पुरुष मानता है कि एक उम्र के बाद ’’मैदान
में दौड़-दौड़ कर, उछल-कूद कर हल्लागुल्ला करते हुए खेलना’
लड़कियों
को नहीं सोहता.

पिता खुश है कि अन्याय के खिलाफ मोर्चा लेने के लिए रणचंडी सरीखी
पुत्री से डर कर भी वह कैसा मीठा-मीठा सा गर्वीला सुकून महसूस कर रहा है, लेकिन
पितृसत्ताक पुरुष लड़कियों की नाक में नकेल डालने का कोई भी मौका नहीं गंवाना
चाहता. उसके पास सदियों पुरानी स्त्री-सुबोधिनी है कि ’सब सह लो.’
पिता
चाहता है भारतीय विवाह अधिनियम, क्रिमिनल लाॅ, मुस्लिम पर्सनल
लाॅ जैसी तमाम बातों की जानकारी रखे, लेकिन पितृसत्ताक पुरुष एक लंबी सांस
भर कर उसे लहरों के सुपुर्द कर देता है. ’’देखो, सबकी
कैसी-कैसी किस्मत होती है. लड़कियां भी अपना भाग्य खुद लेकर आती हैं.’’

गौरतलब है कि अपने भीतर बैठे अपने ही धुर
विरोधी को देखना और उसके परंपरावादी दबंग व्यक्तित्व से घबरा कर अपने खोल में आ
दुबकना सुदामाप्रसाद को कमजोर चरित्र नहीं बनाता, बल्कि
पितृसत्तात्मक व्यवस्था की कार्यशैली को रेखांकित करता है जो स्त्री को स्त्री
बनाने के अभियान के साथ पुरुष को पुरुष बनाने का अनुष्ठान भी रच रही है. विचार के
स्तर पर बेटियों की चिंता ने उसे व्यवस्था की हृदयहीनता को समझने का विवेक दिया है,
लेकिन
व्यवहार के स्तर पर व्यवस्था से टकराने का माद्दा अपने भीतर नहीं पाता. मीडिया
जब-जब स्त्रियों के उत्पीड़न और विद्रोह की खबर देता है, वह
उत्सुकतापूर्वक उसकी परिणति को जानना चाहता है, शायद अपने भीतर
अंगड़ाई लेती प्रतिरोधी ताकत का पुनर्गठन कर बेटियों के साथ साझी लड़ाई लड़ना चाहता
हो, लेकिन पाता है कि अधबीच काल-कवलित हो गई खबर के अलावा उसके पास पैर
टिकाने को कोई जमीन नहीं. वास्तविकता यह है कि किसी भी बड़ी निर्णायक लड़ाई को लड़ने
का हौसला उसके पास नहीं है. बाकी लड़कियों को ’निबटा’ कर
पांच साल से ससुराल की कैद में जकड़ी शैलजा को लिवा लाने का इरादा आत्मप्रवंचना की
ही एक रूप है.
आश्चर्य है कि स्टीरियोटाइप को तोड़ कर नया ’अवतार’
लेने
को उत्सुक सुदामाप्रसाद को अल्पना मिश्र ने व्यंग्य की तीखी चुटकियों और सहानुभूति
की तेज बौछारा के साथ रचा है, मानो चोर-सिपाही का कोई खेल चल रहा हो
दोनों के बीच.लेखिका के साथ गहरा सख्य भाव स्थापित होते ही सुदामाप्रसाद उनके
सामने अपना अंतर उलीचने को होते ही हैं कि वहीं कहीं कोने में दुबका चोर आत्मरक्षा
के प्रयास में भाग कर  सामने आ खड़ा होता है
और चैतन्य हो सुदामाप्रसाद लेखिका के चेहरे में सिपाही का अक्स चिपका देते हैं. इस
सारे आयोजन में वे एक बात स्वीकार करते हैं कि लड़कियों को ’ठिकाने लगाने,
सहनशील
(दब्बू) बनाने और घर के आंगन में खुलने वाले आसमान तक महदूद रखने का प्रशिक्षण
उन्हें किसी ’अज्ञात शक्ति’ ने दिया है,
लेकिन
यह अज्ञात शक्ति पितृसत्तात्मक व्यवस्था है और इसे उन जैसे सुदामाप्रसादों की घुटी
चुप्पी ने बनाया संरक्षित किया है, नहीं मानते. इसलिए हर दुखद अनुभूति के
साथ आश्चर्य और असहायता का भाव उन्हें जकड़ लेता है. वे दबे-दबे ढंग से स्वीकार
करते हैं कि स्त्री को उन्होंने पत्नी और बेटियों के साथ जिए जा रहे संबंध के
मार्फत नहीं जाना; औरतों के स्वभाव के बारे में प्रचलित ’सूक्तियों’
के
जरिए पत्नी और बेटियों को ’समझने’ का प्रयास किया
है. इसलिए चकित और आहत हैं कि ’’पत्नी अपना एक विचार भी रखती थी,
और
उनकी बात के एकदम उलट भी कह सकती थी.’’ सुदामाप्रसाद ने इतना झन्नाटेदार तमाचा
शायद जिंदगी में नहीं खाया कि छाया समझ कर जिसके प्रति बेपरवाह रहे, वही
उनके कदमों तले बैठ कर अपना कद-बुत बढ़ाती रहीं.
सुदामाप्रसाद की सीमाएं उन्हें क्रूर संवेदनहीन
पुरुष के रूप में नहीं उभारतीं, संवेदनशीलता को व्यक्तित्व में रचा-बसा
कर संवाद के लिए तड़पती बेचैनी के रूप में रचती हैं. लेकिन संवाद किससे? पत्नी
से? जिस पर कभी ध्यान ही नहीं गया। बेटियों से? जो बोझ के अलावा
और कोई भाव मन में नहीं उठातीं. ’’ये कैसी दूरी रह गई उनके रिश्ते में?
कैसी
दुनिया में रह रहे हैं वे लोग? बदलना होगा यह सब।’’ जैसा
चारित्रिक गठन है सुदामाप्रसाद का, उससे लगता तो यही है कि उमड़ का विलीन
हो जाने वाली लहर की तरह वे फिर उसी ’अभ्यस्त’ ढर्रे को जीने
लगेंगे, लेकिन यह भी सच है कि रोशनी के ऐसे बिंदु ही अंधेरे की काली चादर में
सूराख बनाते हैं। शायद इसीलिए वे अपनी अंतिम परिणति में कालिंदीचरण की तरह ’आतंक’
को
हथियार बना कर आत्मरक्षा में नहीं फुंफकारते, बल्कि सुनंदा की
तरह दुर्बलताओं की धंसी जमीन में दबे भविष्य और व्यक्तित्व का लेखाजोखा करने लगते
हैं। जाहिर है तब यह स्थल स्त्री-मुक्ति की लड़ाई को लैंगिक पूर्वाग्रहों के
इर्दगिर्द बुनी गई स्त्री और पुरुष दोनों की मुक्ति की साझा लड़ाई का रूप देने की
संभावनाओं से युक्त दिखाई पड़ता है.



3
‘अन्याय, अत्याचार करने
पर किसे मारो और किसे न मारो, इतनी बारीक रेखा है कि आदमी कैसे अलगाए?’’

मेरे सामने अब दोनों कहानियों की बुनावट साफ हो
गई है. सबसे पहले दोनों लेखकों ने लैंगिक स्तर पर अपनी विशिष्ट पहचान को भुला कर ’मनुष्य’
होने
का विश्वास अर्जित किया है. फिर इतरलिंगी चरित्र के भीतर प्रवेश करते हुए लैंगिक
विषमता के कारण भीतर के द्वंद्वों और अंतर्विरोधों को पहचानने का प्रयास किया है. इस कारण दोनों सिमोन द बउवा की इस मान्यता को झुठला पाए हैं कि पुरुष (स्त्री) कभी
स्त्री (पुरुष) का विश्वसनीय चित्रण नहीं कर सकता. यही नहीं, दोनों
लेखकों की विचार-यात्रा एक ही लक्ष्य की ओर उन्मुख हुई है और वह है युग के भीतर
खदबदाती उन गोपन सच्चाइयों को सामने लाना जो स्टीरियोटाइप्स के रक्षा-कवच को तोड़े
बिना बाहर लाई ही नहीं जा सकती. बेशक जैनेंद्रकुमार अपने विपुल साहित्य, विशेषकर
’सुनीता’, ’त्यागपत्र’, ’सुखदा’ उपन्यासों
तथा ’जाह्नवी’, ’नीलम देश की राजकन्या’ कहानियों
में स्त्री के स्टीरियोटाइप्स को तोड़ने का भ्रम देते हुए बरकरार रखते हैं, लेकिन
पत्नी (स्त्री) के भीतर अपनी स्थिति (जड़ता) और संभावना (वैचारिक गत्यात्मकता पाने
की अभिलाषा) को चीन्हने का विवेक पैदा करते हैं. यह ऐसी छटपटाहट है जो क्रमिक भाव
से एक-दूसरे में गड्डमड्ड हुए सही और गलत को अलग-अलग पहचानने और पुनव्र्याख्यायित
करने की तमीज देती है. इसी कारण साहित्य में अनुकरणीय चरित्र के रूप में गढ़ी गई
भाग्यवती (श्रद्धाराम फिल्लौरी) समय बीतने के साथ-साथ समाज में ’सीमंतनी
उपदेश की रचयिता अज्ञात हिंदू महिला, शिवरानीदेवी प्रेमचंद, महादेवी
वर्मा और सुभद्राकुमारी चैहान (उल्लेखनीय है कि सुभद्राकुमारी ’झांसी
की रानी’ की गायिका के रूप में नहीं, कहानीकार के रूप में मूल्यांकन की मांग
करती हैं) के रूप में दिखाई देने लगती हैं.
आश्चर्य है कि जहां अधिकांश हिंदी कथा साहित्य
स्त्री की अस्तित्व और व्यक्तित्व संपन्न होने की क्रमिक लड़ाई का चित्रण करता है,
वहीं
पुरुष सामंतवाद की उन्हीं कंदराओं में बैठा हिंसक, आत्मकेद्रिंत,
संवेदनहीन
एवं रूढ़ रूप में दिखाई देता है. स्वयं जैनेंद्र कालिंदीचरण को पितृसत्ताक सामंत से
इतर अन्य कोई पहचान नहीं दे पाते. इसके विपरीत अल्पना ने निर्ममतापूर्वक दोनों
स्टीरियोटाइप्स को तोड़ने की कोशिश की है. इसलिए ’पत्नी’ कहानी
में कालिंदीचरण को पत्नी की भूख से ज्यादा अपनी और मित्र-मंडली की भूख की फिक्र है,
जबकि
सुदामाप्रसाद पत्नी को हड़का देने के बाद अपराध-बोध से भर उठते हैं. यह ’अभ्यास’
बार-बार
उनके मानसिक बौनेपन की ओर इशारा करते हुए अहसास कराता है कि पत्नी का स्पेस घेरकर
वे अपनी ही मर्यादा घटा रहे हैं. यही वजह है कि जैनंद्र की कहानी विचार के स्तर
पर खुलती है, और वहीं कहीं ठिठकी खड़ी रह जाती है. सारी
जद्दोजहद स्वतंत्रता का अर्थ समझे बिना ’भारतमाता’ को स्वतंत्र
कराने की परोक्ष लड़ाई में केंद्रित हो जाती है. अल्पना शब्दों के जरिए विचार का
आस्वाद नहीं करतीं, स्टूल पर बैठ कर सोचती पत्नी को एकाएक
जिम्मेदारी  के बोध और कर्मठता से भर कर एक नई चारित्रिक गढ़त देती हैं. इसलिए कहानी
आखिरी पंक्ति के साथ खत्म होकर भी खत्म नहीं होती. कहानी से बाहर समाज में निर्भीक
भाव से नागरिक दायित्व निभाती नई स्त्री को प्रकाश में लाती है तो एक बार फिर
कहानी के भीतर प्रविष्ट हो पाठक से मिसेज सुदामाप्रसाद की सोच को परिप्रेक्ष्य
देने और सोच का खाका खींचने का अनुरोध करती है. उल्लेखनीय है कि जैनेंद्र
सुनंदा-कालिंदी को अपनी-अपनी परिधि में घूमती दो इयत्ताओं की तरह चित्रित करते हैं
जहां संवाद की कोई गुंजाइश नहीं.

अल्पना के पात्र अपनी-अपनी परिधि में घूमने के
अभ्यास और अभिशाप दोनों से त्रस्त हैं, इसलिए संवाद के जरिए जब पल भर को
टकराते हैं, तब उस टकराहट से उनके मनोजगत में भारी उथल-पुथल
मचती है. देख रही हूं कि ’उनकी व्यस्तता’
कहानी
’पत्नी’ कहानी के इकहरे चरित्र से काफी दूर हुए जा रही
है. चरित्र-चित्रण में स्याह-सफेद रंग का इस्तेमाल तो जैनेंद्रकुमार ने किया है –
सुनंदा को भरपूर सहानुभूति देकर ही नहीं, सुनंदा के परिपाश्र्व में कालिंदीचरण
की बदनीयतियों को उघाड़ कर भी. अल्पना एक के सहरे दूसरे को उघाड़ती नहीं, कथा-परिदृश्य
से अनुपस्थित सूच्य पात्र शैलजा को रचने लगती हैं. महारत ऐसी कि शैल-पुत्री (दबंग,
निर्भीक,
ऊर्जावान
चरित्र) को अपने ही कूलों से क्षरित करके रेतीले बियाबान में खो जाती बरसाती नदी
के रूपक में बांधते-बांधते मां-बेटी दोनों को एक-से त्रास की दो हमशक्ल परिणतियां
सिद्ध कर देती हैं. हां, स्त्री के पत्नीत्व (सुहाग-गाथा) पर
भरपूर प्रकाश डाला है उन्होंने (महादेवी वर्मा के निबंध ’हिंदू स्त्री का
पत्नीत्व’ का स्मरण हो आया न!), लेकिन फिलहाल मेरे सामने सुदामाप्रसाद
का मुखर चिंतन है और उसी के समानांतर विचार-यात्रा करते हुए मिसेज सुदामाप्रसाद
द्वारा बोले गए तीन वाक्य हैं.’’कुछ चीजों के लिए थोड़ा पहले सोचना पड़ता है’’,
’’भाग्य
क्या होता है? सोचने-समझने की जरूरत होती है’’ तथा
’’जब-जब बोली, आप व्यस्त रहे’’ – ये
तीनों वाक्य संदर्भ से जुड़ कर (शैलजा की नवविवाहिता सहेली रूबीना का आगमन और
वधू-उत्पीड़न की खबरें) ससुराल में बेटी की दुर्दशा के लिए मां-बाप की परोक्ष
भूमिका को सामने लाते हैं.

शैलजा की मां की सोच में दबंग लड़की को तिलचट्टा बना दिए
जाने की स्मृतियां हैं. वह देखती है हर अनाचार-अत्याचार के खिलाफ आवाज उठाने वाली
उस लड़की ने जब बैडमिंटन के कोच को बदतमीजी के जवाब में थप्पड़ मारा, तो
वे सब कितने खुश थे कि अपनी संतान को उन्होंने देश का जिम्मेदार नागरिक बनाया है. लेकिन उसी लड़की ने, ससुरालवालों द्वारा बतौर सजा खाना-पीना बंद किए
जाने पर जब रात को रसोई के सारे बर्तन पटक कर अपना विरोध जताया तो वे जरा भी
उत्फुल्ल नहीं हुए. अपने भीतर पलती आशंकाओं को उन्होंने शैलजा के भीतर दहशत बना कर
रोप दिया कि उसकी जिंदगी उस घर से बाहर कहीं नहीं. तिल-तिल कर मरने की यातना को
बेटी के माथे पर लिखते हुए शायद मां को क्षीण-सा विश्वास रहा हो कि ’सयानी’
होकर
बेटी भी गृहस्थी की गाड़ी को खींच ले जाएगी. लेकिन यह तो सच को अनदेखा करने का
पाखंड है. मरने का संत्रास भोग कर जीने का आह्लाद कैसे पाया जा सकता है ? हो
सकता है तब मृणाल उसके पास चली आई हो और कहा हो कि बचने के लिए मरना नहीं पड़ता,
जीवन
की लगन से लौ लगा कर ही जिया जा सकता है.मृत्यु यदि दोनों तरफ है तो जीवन को पाने
के लिए क्यों न जूझा जाए? हाथ पर हाथ धर कर बैठने से तो हम
आततायी का पाला ही मजबूत करते हैं. अल्पना मिश्र ने मिसेज सुदामाप्रसाद की ’सोच’
का
चरित्र गढ़ने के लिए शैलजा को पृष्ठभूमि के तौर पर और टी वी खबर को उद्दीपक के तौर
पर प्रयुक्त किया है. मीडिया में लगातार आती खबरों ने मानो उसे चेताया है कि गले
में अपराध-बोध का पत्थर बांध कर दरिया पार नहीं किया जा सकता.


अपराधी के पक्ष में
खड़ी अपनी भागीदारी
को पहचान कर प्रायश्चित करना जरूरी है. अब वह जमाना नहीं कि
गोबर और गौ-मूत्र को मुंह में रखकर आत्मिक शुद्धि का ढिंढोरा पीटा जाए। कर्म इंसान
की चेतना के उद्घाटक हैं. इसलिए मौत की बाट जोहती तालाबंद वधू की खबर फ्लैश करने
के बाद अल्पना ’’दिल्ली की सड़कों पर पैंटी और ब्रा में भागी जा
रही’’ लड़की की खबर ठीक उस समय दिखाती हैं जब धीरे-धीरे रिस-रिस कर आता
बदलाव कहानी में एकाएक बड़ी उलट-फेर कर देने की ताकत पा लेता है. नेपथ्य में बित्ता
भर जगह लिए खड़ी पत्नी क्रमशः केंद्र में आ रही है – कत्र्ता की भूमिका के साथ,
और
सुदामाप्रसाद नेपथ्य में जा रहे हैं. चेतना और आत्मपड़ताल उसके व्यक्तित्व का
मानवीय पहलू बुनते हैं जिन पर परंपरा, संस्कार और दुनियादारी हावी है। इसलिए
सुदामाप्रसाद के पास बाकी बेटियों के लिए आनन-फानन में वर ढूंढने की दुश्चिंता है
तो पत्नी के पास सदियों की चुप्पी और निर्णयहीनता से बुनी निष्क्रियता को तोड़ने का
एकमात्र विकल्प. इसलिए आश्चर्य नहीं कि अंतिम खबर सुदामा की गैरमौजूदगी में घटती
है और पत्नी के सामने एक बड़ी दुष्कल्पना के रूप में आती है. ’नंगी
होने को देख लिए जाने के डर’ को जीत का भाग आई वह अर्धनग्न युवती
शैलजा भी हो सकती थी, यदि डर को वर्जना बना कर खुद को जिंदा दीवार
में चुनने का प्रशिक्षण उन्होंने शैलजा को न दिया होता. वह अविलंब उस बहादुर लड़की
में अपनी और शैलजा की कुचली हुई बहादुरी जोड़ देना चाहती हैं, नहीं
तो कौन जाने इन्हीं लड़कियों को कामोत्तेजना भड़काने के आरोप में समाज एक और जघन्य
दंश देकर अपनी मर्दानगी पर इठलाने लगे.

 मैं एक बार फिर कहानी की अंतिम पंक्ति को
दोहराना चाहती हूं. ’’पत्नी चुपचाप भीतर आई और अपने पुराने बक्से से
अब तक जोड़ी पूंजी निकाल कर उस सड़क की तरफ भागी, जिधर से दिल्ली
जाने वाली बस मिलती है.’’ बेशक सुनंदा से बहुत अलग है यह पत्नी, लेकिन
सुनंदा का विलोम नहीं. यदि बेड़ियों की जकड़न के बीच सुनंदा ने पोर-पोर अपने को न
महसूसा होता तो उसकी वंशज बन कर कैसे आती वह? अल्पना का
योगदान इतना है कि जैनेंद्रकुमार की वैचारिक लड़ाई को उन्होंने आगे बढ़ाया है;
पत्नी
को लक्ष्मण-मूर्छा से मुक्त किया है; और पति को उस उर्वर मनोदशा में ऊभचूभ
करते दिखाया है जिसमें तीन-चैथाई सदी पहले जैनेंद्र ने सुनंदा को रखा था. जिस गति
से समय बदल रहा है, कौन जाने कुछ दशकों में ही मीडिया और समाज
के  पितृसत्तात्मक चरित्र को पति-पत्नी
दोनों मिलकर चुनौती दें क्योंकि पितृसत्तात्म्क व्यवस्था स्त्री के स्पेस को ही
नहीं घेरती, पुरुष की अंतःशक्तियों को क्षरित कर आगे बढ़ने
के अवसरों को भी बाधित करती है.

‘पहल में प्रकाशित’ 

जीवन -अनुभवों का सफ़र कहानी तक

अनीता चौधरी

साहित्यकार अनीता चौधरी हमरंग.कॉम का संपादन करती हैं . संपर्क : ई-मेल : anitachy04@gmail.com

वर्तमान समय में जिन्दगी के व्यवहारिक धरातल पर वर्गीय संघर्ष, साम्प्रदायाकिता, धार्मिक कट्टरता, जातीय दंश और सामाजिक राजनीतिक एवं पारिवारिक सूक्ष्म ताने-बाने व स्थाई पारस्परिक प्रतिमान के साथ वैज्ञानिक दृष्टिकोण को समाहित करता हनीफ मदार का यह पहला ही कहानी संग्रह “बंद कमरे की रोशनी” पूरी तरह से परिपक्व और संभावनाओं से परिपूर्ण है. इसमें  पात्रों द्वारा मानव स्वाभाव के अंतर मन को टटोलते हुए जमीनी स्तर पर चरित्रों के माध्यम से जीवन के अनेक पहलुओं पर चर्चा की गई है. संग्रह की ज्यादातर कहानियों के दृश्य ग्रामीण अंचल द्वारा संजोये गए है जो इस संग्रह की विशेषता है. भाषा इतनी सरल सहज और मनमोहक है कि पाठक जिस तल्लीनता के साथ कहानी पढ़ते-पढ़ते कब उसके अंत पर पहुँच जाता है उसे पता ही नहीं चलता . मदार की लेखनी की यह खूबी है कि वह कहानियाँ लिखते नहीं है, लगता है जैसे कहानियाँ कह रहे हो उनका कहानी कहने का कौशल अदभुत है. लेखक का नाटय कर्म से जुड़े रहने का यह सकारात्मक अनुभव भी हो सकता है. मदार की कहानियों के पात्र अपनी क्षेत्रीय भाषा और आर्थिक स्थिति के तौर पर  समुदायिक क्षेत्र की स्वाभाविकभाव-भंगिमाएं के साथ प्रस्तुत होते हैं.

संग्रह की पहली कहानी ‘पदचाप’ को ही लें. इसमें एक छोटी जाति के गरीब किसान के पास अपना खेत जोतने के लिए पर्याप्त धन का अभाव व निचली जाति का होने के कारण उसे ट्रैक्टर नहीं मिल पाता है.  जिससे उसका बेटा उससे से सवाल करता है “चाचा भूदेव शास्त्री पे तौ हमतेऊ कम खेत ऐ फिर उनै तौ ट्रैक्टर मिल गयौ.” इस वाक्य में  पात्र के द्वारा बोली गई भाषा एक़दम स्वाभाविक है जो कि बृजभाषा में है यह कोई थोपी हुई भाषा नहीं लगती. मदार की कहानियां जीवन की वास्तविक पृष्ठभूमि से आती है .और वही पर धीरे धीरे उसी पृष्ठभूमि में समाती जाती है और उस भूमि से पोषित पल्लवित होती हुई वे लहलहाती वृक्षरुपी शाखाओं की तरह फैलकर पाठक को अपनी छाँव में समेटकर अपना बना लेती है. कहानी ‘पदचाप’ एक ऐसे जरुरतमंद किसान की कथा है जिसके पास पर्याप्त धन न होने के कारण खेत की जुताई आधुनिक उपकरण के माध्यम से नहीं कर सकता है. जिस कारण वह अपने दोनों बच्चों को भी खेत में काम पर लगा लेता है. जिससे गाँव का ज़मीदार बालश्रम क़ानून की आड़ में पुलिस का डर दिखाकर उसकी जमीन को हड़पने की मंशा रखता है.

वर्तमान समय में संविधान द्वारा समानता के अधिकार देने के बावजूद भी समाज में आज भी निचली जातियों के साथ भेदभाव कम नही है. अब भी उन्हें अनपढ़, गंवार रखने की कवायद जारी है जो कि कहानी ‘पदचाप’ में दिए गए व्यक्तव्य से जाहिर होती है “तुमसे कितनी बार कहा है कि एस जमीन को हमें बेच दे और बच्चों को स्कूल भेजने की बजाय मजदूरी में डाल. मैं तो कह रहा हूँ खेत बेचकर भी तुम तीनों बाप बेटे उसी में काम करते रहो अपना समझकर और मजदूरी भी मिलती रहेगी.” दलित शोषण का हजारों सालों का इतिहास आजादी के इन साठ वर्षों में भी बदल नहीं पाया है. इस सामाजिक त्रासदी के चित्र इन कहानियों में बखूबी चित्रित किए गए है. इसलिए के० पी० सिंह को समर्पित संग्रह की कहानियों का विचार वास्तव में डॉ० कुंवरपाल सिंह के व्यक्तित्व के करीब तक ले जाता है. संग्रह की दूसरी कहानी ‘तुम चुनाव लड़ोगे’ वर्तमान राजनैतिक़ हालातों  के एक भौडे स्वरूप को प्रदर्शित करती है. जिसमें एक ईमानदार व्याक्ति को भी सत्ता का लालच किसी भी हद तक जाने लिए विवश करता है. आज हमारे बीच मौजूद राजनैतिक और सामाजिक समीकरण, वे लम्हें, स्पंदन, व धड़कन और मानवीय रिश्ते है जो इन सब के साथ इन कहानियों मेंरूबरू होते है.

हनीफ मदार



वही कहानी ‘दूसरा पड़ाव’ कहती है कि औरत को अपने अधिकारों और अस्तित्व की लड़ाई स्वयं लड़नी होगी. वरना ये दुनिया उसे दया का पात्र बनाये रखेगी. जिससे वह उनके सामने हाथ फैलाती रहे या फिर दुत्कार कर अपनी शर्तों पर जीवन जीने के लिए मजबूर होती रहे. वह समाज द्वारा बनाए गए मापदंडों का उल्लंघन कर, स्वच्छंद जीने की सहज मानवीय लालसाओं से भरी इस कथा की नायिका शालिनी स्त्री जीवन के अनेक सहज अनुभवों के साथ तमाम वर्जनाओं की चार दीवारों को लांघकर, अपने जीवित होने के एहसास के लिए संघर्ष करती आधुनिक स्त्री है.  जो अपने कलाकर्म के लिए अपना घर व् पति को छोड़ देती है. ‘बंद कमरे की रोशनी’ , संग्रह की महत्वपूर्ण कहानी है जिसे लेखक ने अपने कहानी संग्रह के नाम के रूप में भी इस्तेमाल किया है.  एक समुदाय विशेष के द्वारा किसी भी भाषा पर अपनी बपौती समझ, समाज में साम्प्रदायिक लड़ाई- झगड़े करवाकर लोगों के अन्दर अनचाहा भय पैदाकर समाज की शान्ति भंग करके अपनी राजनैतिक रोटियां सेकते है.  इस कहानी के मास्टर अल्लादीन का घर सिर्फ इसलिए जला दिया जाता है क्योंकि वह कॉलेज में संस्कृत पढाता था . कहानी ‘एक और रिहाना नही’ में घर में शारीरिक और मानसिक हिंसा की शिकार होती महिलायें है .


जो शराबी पति द्वारा पीटी जाती हैं .पति और पिता के रूप में एक पुरूष का पारिवारिक और सामाजिक सरोकारों से मुहँ मोड़ लेना या गैर जिम्मेदार हो जाने के कारण ही एक महिला टी० वी० जैसी भयंकर बीमारी की शिकार हो जाती है और उसी परिवार की दूसरी महिला रिहाना अपना सारा बचपन अन्य बच्चों के पेट भरने के लिए खाना जुटाने में ही खो देती है. वह अपने शराबी बाप की गैर जिम्मेदाराना हरकत का गुबार बच्चों पर इस प्रकार खीझ निकालकर करती है . “दारिकेऔ एकऊ ने आवाज निकारी तौ मौह तोड़ दूंगी, कुनबा वा बाप ते नाय रोय सकतु जा नरिऐ भरिवे कूँ……….? आज भी जिस समाज में पुरषों का इधर उधर मुहँ मारना उनकी पुरुषीय काबलियत माना जाता है और औरत के इंसान होने के हक़ की बात करना भी उसके चरित्रहीन होने का प्रमाण घोषित हो जाता हो उस समाज में औरत की अस्मिता से जुड़े सवाल शायद ही कभी ख़त्म हो सके. ऐसे समय में महिलाओं को प्रेरणा देती कहानी ‘चरित्रहीन’ समाज में उस पुरुषरुपी प्रेमी की रूढीवादी मानसिकता को उजागर करती है. जो सिर्फ एक शब्द द्वारा ही उसके इंसानी स्वरूप में जीवन जीने के सारे रास्ते बंद करना चाहता है. वहीँ दूसरी तरफ पिता जैसे पुरूष भी है जो अपनी बेटी को जिन्दगी की तमाम इच्छाओं को जानते हुए भी बार बार अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा की दुहाई देते हुए सब कुछ चुपचाप सहन करने की नसीहतें देते है.

संग्रह के केंद्र में एक छोटी व् मार्मिक कहानी है.| ‘रोजा’ जो कि समाज में फ़ैली धार्मिक कट्टरता व् आडम्बरों पर तीखा प्रहार करती हुई नजर आती है. भारत जैसे धर्मनिरपेक्ष देश में अल्पसंख्यक होना किसी भी भयानक दंश से कम नहीं है .चाहे कानून या हमारा भारतीय संविधान हम सब को समान होने की इजाजत देता हो.लेकिन समाज में जहर  फ़ैलाने वाली साम्प्रादायिक ताकतें अपने पूरे सबाब पर है.  इसी साम्प्रदायिकता के दर्द को बयां करती है इस संग्रह की कहानी ‘उद्घाटन’ कहानी में चाय की दुकान का मालिक पहलवान एक लड़के को दुकान पर काम इसलिए नहीं देता है कि वह नाम से पहचान नहीं पा रहा है कि वह हिन्दू है या मुस्लिम. कहानी में असंवेदनाओं की पराकाष्ठा तो तब होती है. जब वह उस लड़के को काम देने से पहले नंगा करके देखता है कि वह मुस्लिम तो नहीं है. जो उस पहलवान के रूप में समाज ऐसे बहुतेरे लोगों की धार्मिकता व् रूढ़ीवादिता को उजागर करती है. जब डॉ० नरेन्द्र दाभोलकर जैसे लोगों को गोली मार दी जा रही है.सम्प्रदायक ताकतें अपना हमला और ज्यादा ताकतें लगाकर कर रही है .ऐसे में ये कहानी आना अपने आप में चुनौती है.

हनीफ की कहानियों के रूप में वंचित लोग है. उत्पीड़ित समाज का वर्ग है .इसीलिए आज के परिपेक्ष्य में ये कहानियाँ अपना दखल रखती है .हिन्दू मुस्लिम साम्प्रदायकता पर चोट करना आज भी उतना ही चुनौती भरा काम है जितना कि रही मासूम रजा के लिए था .और उस चुनौती को स्वीकारते हुए मदार की ये कहानियाँ समाज में एक नया उदाहरण पेश करती है . इसके साथ ही संग्रह की अन्य कहानी ‘चिंदी चिंदी ख्वाब’ गाँव के एक टेलर मास्टर आनन्दी के रूप में एक पिता की व्यथा है जो दिन रात मेहनत करके अपने इकलौते बेटे दीपक को डॉक्टर बनाता है . जिससे गाँव में कोई भी व्यक्ति बिना इलाज के दम न तोड़े .लेकिन शहर की चमक दमक और पूंजी का प्रभाव, बेटे के भीतर इस कदर भर चुका है कि वह अपने पिता से कहता है “बापू यहाँ केवल मरीज है, पैसा नहीं है . और मैं एक बड़ा डॉक्टर बनाना चाहता हूँ और बड़ा डॉक्टर आज मरीजों से नहीं, पैसों से बनता है . मुझे केवल मरीज नहीं, धन भी चाहिए……….जो कि बेटे की बाजार से प्रभावित पूंजी के प्रति गहरा लगाव व भौतिकवादी जीवन की लालसा को व्यक्त करती है. कहानी के अंत में बीमार पिता को लेकर आये गाँव के गणेसी और रामसनेही हैरान रह जाते है. तब उन्हें पता चलता है कि आनंदी मास्टर का बेटा अपने जीवित पिता की बरसी एक साल पहले मनाकर उनकी याद में तब से अपने घर पर मरीजों को सप्ताह में एक दिन फ्री  देखता है .


कहानी का अंत बहुत ही मार्मिक है. बाजारवाद के प्रभाव में मानवीय रिश्तों के पतन को बयां करती है ये कहानी कहा जाता है कि बिना प्रेम के मानव जीवन संभव नहीं होता क्योंकि प्रेम से ही जीवन को नई ऊर्जा, संघर्ष करने की क्षमता और जीवन के रंगों की पहचान होती है . ऐसा ही उदाहरण पेश करती है संग्रह की कहानी ‘अनुप्राणित’. यह एक अदभुत प्रतीकात्मक प्रेम कहानी है .जिसमें प्रेमी प्रेमिका विपरीत धर्मों के होने के बावजूद भी एक दूसरे को बेइंतहा प्रेम करते है | लेकिन वे इस समाज में व्याप्त खाप पंचायतों के फरमान व कट्टरपंथी मुल्लाओं के फतवों की परवाह किए बगैर एक दूसरे के साथ जीना चाहते है. इसके बावजूद मन के किसी कोने में साम्प्रदायक ताकतों द्वारा समाज में फैलाया गया वह डर भी है जो कहानी की नायिका आस्था के इस कथन से व्यक्त होता है. “इन हवाओं का कोई भरोसा नहीं है सुरेन्द्र, कब कौनसी हवा हमारे बीच एक और बम का धमाका कर देगी और हमारी जुडी हुई कल्पनाओं के पंख उखड़ जायेगें……….प्रेम एक खूबसूरत इंसानीय व मानवीय जीवन्तता का एहसास है .जो किसी भी जाति, धर्म, सम्प्रदाय से बढ़कर होता है जिस किसी भी तरह की बंदिशे नहीं लगाई जा सकती.आज के संदर्भ में कहे तो इनकी कहानियाँ प्रेम कहानियाँ है लेकिन यौन कहानियाँ नहीं है | इनकी कहानियों में प्रेम के साथ साम्प्रदायकता विरोध, व्यवस्था विरोध है.

कहानी लेखन का तरीका पूर्ण यथार्थवादी है. यथार्थ भी ज्यों का त्यों नहीं बल्कि संघर्ष की चेतना को शामिल करते है.  कहानी लिखना और अपने समय से मुठभेड़ करना यह बहुत आसान नहीं होता. एक निश्चित लक्ष्य के साथ लेखन करना आसान यूँ भी नहीं रहा है. समाज को पीछे ले जाने वाली समाज में हलचल पैदा करने वाली ताकतों के खिलाफ खड़े होकर लिखना बहुत ही साहस की बात होती है. और यह साहस हनीफ मदार की लेखनी में है. संग्रह की अंतिम कहानी ‘अब खतरे से बाहर है’ एक ऐसे दबंग जमींदार खां साहब के चरित्र को उजागर करती है .जो धर्म का ठेकेदार बन गाँव के हर व्यक्ति को धर्म की आड़ में अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करने की वजह से गाँव के किसी भी व्यक्ति के शिक्षित हो जाने के खिलाफ है .जो इस कथन से स्पष्ट होता है. अरे भाई इशाक मियाँ ! तुम्हारा बेटा शहर से पढ़कर वापस आ गया, लेकिन नमाज में दिखाई नहीं देता. हमने तुमसे पहले ही कहा था कि इसे पढ़ने को शहर मत भेजो, वहां अंगरेजी और विज्ञान जैसी किताबें पढेगा तो दीन से भटक जाएगा लेकिन तुमने हमारी बात कहाँ मानी….” यह कहानी समाज के उन धार्मिक ठेकेदारों की कट्टरपंथी पुरूषवादी मानसिकता को उजागर करती है.जो महिलाओं को उनके मूल अधिकारों से वंचित करना चाहते है .

वे नहीं चाहते कि ये पढ़ लिखकर पंख फैलाए इस खुले आसमां में स्वंतत्र रूप में विचरणकर और अपनी इच्छानुसार प्रेम विवाह करें. यह कथा खाप जैसी समस्याओं का पूर्ण रूप से रचनात्मक विश्लेषण करती हैं.
इन कहानियों की सबसे बड़ी विशेषता यह कि आज हमारे सामने जो सबसे बड़ा ख़तरा है वह समाज को विभाजित करने वाली शक्तियां हैं,  सम्प्रदायिकता का ख़तरा है , उसको संबोधित करके कहानियाँ लिखना और उस यथार्थ के साथ जो प्रेमचंद या यशपाल या अन्य बुजुर्गों ने दिया उसे अपने समय और समाज के वर्तमान संदर्भों में संघर्षीय चेतना के साथ रखना मदार की कहानियों में मिलता है और यही उन्हें हिंदी साहित्य में एक प्रतिबद्ध साहित्यकार के रूप में स्थापित करता है. इस संग्रह कहानियों की यह भी विशेषता रही है कि सभी कहानियों में समस्या का समाधान मुखरित होती एक स्त्री द्वारा ही किया गया है. ये सारी कहानियाँ लेखकीय जीवन के अनुभव की कहानियाँ है . कहानियों में स्त्री समानताएं,जाति असमानता वर्तमान समय के संदर्भों के साथ प्रस्तुत होते है जो अति महत्वपूर्ण है. अपने इस पहले कहानी संग्रह के रूप में हनीफ मदार ने खुद को एक परिपक्व कहानीकार होने का परिचय दिया है .रचनाओं में उनकी दृष्टि एकदम साफ़ व स्पष्ट है. शब्द, भाषा व बिम्बों का चयन भी लेखकीय प्रोढ़ता को दर्शाता है.

एक स्त्री रचनाकार की यात्रा

पिछले 6 अप्रैल को वरिष्ठ साहित्यकार और आलोचक अर्चना वर्मा ने अपने जीवन के 70 साल पूरे किये. आइये सुनते हैं क्या कहते हैं उनके साथी साहित्यकार और आलोचक उनके बारे में. उनके जन्मदिन पर एक अनौपचारिक आयोजन को कवर किया स्त्रीकाल ने .

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किरण मुक्तिप्रिया की कवितायें

किरण मुक्तिप्रिया

  युवा कवयित्री. साहित्यिक पटल पर देर से लेकिन दुरुस्त उपस्थिति pkiran34@gmail.com

सामाजिक जीवन में पिछले अनेक वर्षों से सामाजिक कार्यकर्ता के तौर पर सक्रिय कवयित्री किरण मुक्तिप्रिया की कविताएँ अपने अलग तेवर लिए हुए है। वे कथ्य को अपने अनुभव की आँच पर तपाकर कविताएं रचती है। चूंकि कवयित्री कई सालों से एक महिला संगठन से जुड़ी रही है , इसलिए स्वाभाविक तौर पर उनकी कविताओं में स्त्री जीवन के संघर्षों के बहुआयामी चित्र देखने को मिलते है। किरन मुक्तिप्रिया की कविताएँ स्त्री अस्मिता की पहचान के मुख्य बिंदु को पहचानते हुए, जिसमें वे स्वयं के स्त्री होने की पहचान के साथ-साथ एक मनुष्य होने की चेतना को अपने भीतर समेटकर चलने की कविताएँ है। किरन अपनी कविताओं में पूरे स्त्री समाज के स्वाभिमान व पीड़ा, के साथ उसके वजूद को पहचाने की कशमकश और उस कशमकश को एक सधा उत्तर देते हुए उसे निकल पाने की आशा जगाती है। तमाम तरह के भाषायी छल छद्म से दूर, सीधे मन में उतर जाने वाली भावप्रवण शैली में कविता लिखने वाली किरन एक बेहद संभावनाशील कवयित्री  हैं । 
अनिता भारती  ( साहित्यकार) 


हमें तो हारना ही था

हमें तो
हारना ही था
हमेशा से हमारे
स्वाभिमान को
दम्भ का नाम दिया तुमने
और कर डाले सारे जतन
उसे तोड़ने के
अगर उससे निकल भी गयी
तो सार्वजानिक प्रहार किया मुझपर आखिर
तुम्हारे पास
हक थे
हथियार थे
सारे साधन मौजूद थे
ज़माने के
और उस पर
इस ज़माने का साथ
जो सदियों से तुम्हारे ही
पक्ष में देता रहा है
सभी निर्णय
तुम्हारे लिए ही
तुम्हारे हिसाब से
गढता रहा है
नैतिकता की नित नयी
परिभाषा
और हमेशा कटघरे
में खड़ा किया
उसने हमें
हमें तो हारना ही था।

हादसे

हादसे
अक्सर बुरे नहीं होते
ऊर्जा देते हैं
सभी संभावनाओं
को समेट एक
नई उड़ान की ।
महावर
से नहीं
खून से
रंगे हैं
पाँव मेरे
मंज़िल को
तय करना है
एक
गहरी छाप
छोड़ते हुए।।

कोख

एक नाटक
के पात्र की तरह
तुमने
बिठाया मुझे मंडप में
बांधा
एक रिश्ता अपनेपन का
साज़िश थी
वो तुम्हारी
मेरी कोख को
अपना गुलाम बनाने की।
कोख में
पनपा एक बीज
बढ़ाता
तुम्हारे ही वंशबेल को
जिसे सीचना था
मुझे अपने खून से
उस
महिमामंडित समाज के लिए
ठीक वैसे ही
जैसे
बीज बोने देने के लिए ।
जीते हुए
दोनों एहसास को
छूटते हुए
खुद से
करती रही तुम्हे पूरा
खुद की जरूरतों के
बखान में रिश्तों से
करते रहे धोखा
फिर भी
बने रहे
नामजद मुख्तार
इस कोख के।
जिसमें न पाने पर
खुद को
वंचित
किया मुझे
उस सुख से
जिसके होने पर

कुछ
बचे रह जाने
का एहसास था।
अब पर्दा
गिरने को है
खली हाथ हूँ मैं
कुछ भी नहीं
हासिल मुझे
न तुम
ना ही मेरी कोख
जिसके लिए
बिठाया था मुझे
मंडप में.

वक़्त

चुरा लो
थोड़ा सा
वक़्त खुद
के लिए भी
जिसमे
कर सको श्रृंगार
लिख सको कोई
कविता
देख सको सपने
अपनी खूबसूरती के
जी सको वो पल
जो बस
सपने बन
कर रह गए
बीते वक़्त की तरह ।
कोशिश की
ताउम्र
उसे अपनी मुट्ठी
में क़ैद करने की
भ्रम था
क़ि अपनी रफ़्तार
से काबू कर
लिया है जिसे ।
देखो तो
कबका बिखरा
हुआ है सामने
तारामंडल में
लहराते गोलपिंडो सा
तुम्हारे
वजूद की तरह ।।

एहसास

एक
एहसास
जिसके लिये
कम पड़ जाते
हैं कवि के शब्द
रंगकर्मी की
परिकल्पनाएं
औरत के आंसू
किसी बच्चे के
सपनों की उड़ान
खुद बयां
होता खामोश
जुबान से
घुलता आँखों
के भीतर
रीसता शरीर
के रोमछिद्रों से
धीरे धीरे
हो जाता है
जज़्ब
इस खोखली
विरासत में

सिहरन

आज
भी एक
सिहरन
उस
एहसास
के साथ
रूह की
गहराइयों से
गुज़रती
पहुँचती तो
होगी
तुम तक

तो
क्या
हम नदी
के
किनारे हुए

राहें

आज
मैं गुज़रती
हूँ जिन राहों से
कल तुम्हे भी
गुज़ारना होगा
क्योंकि
हमनें
कभी नहीं
बुने  नए सपने
कभी नहीं
बनाये रास्ते
उन सपनों तक
हमेशा माँगते
रहे उधार
जिंदगी से
जिंदगी के टेढ़े मेढे
रास्तों पर
देखा है
एक दूसरे की
जगहों को
बदलते हुए.

घर

घर
सिर्फ चार दिवारों
और एक छत का
ढांचा नहीं
बहुत से अनसुलझे
रिश्तों की
कहानी होती है
जहां
हर शख्स हाज़िर है
अपने अपने मुखौटे
के साथ तत्परता से
अपने हिस्से का
लेखा जोखा लेकर
और साबित
करना चाहता है
खुद को सबसे
बेहतर

पिता भी होते हैं माँ

शीला आर्या

  शोधार्थी, भारतीय भाषा केन्द्र
भाषा, साहित्य और संस्कृति अध्ययन संस्थान
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय sheelalobiyal@gmail.com

पिता भी तो होते हैं माँ’ जैसा कि इसके शीर्षक से ही स्पष्ट होता है कि यह काव्य संग्रह ममतामयी माँ के उस रूप की व्याख्या कर रहा है, जिसका स्वरूप तय है माँ के रूप में. यह रजत रानी मीनू जी का पहला औपचारिक काव्य संकलन है. जिसमे  विविध रंगी (60) साठ कविताओं  का संगम है.यह काव्य संकलन भारतीय जीवन की विविध संगतियों- विसंगतियों से रूबरू कराती है. जो कवयित्री के लम्बे समयावधि के एकान्त में किए गये चिन्तन का प्रतिफलन कहा जा सकता है, क्योंकि यह संकलन हमें कभी जीवन के अत्यन्त निजी जीवन तक खींच ले जाता है तो कभी वैचारिक धरातल के विस्तृत आयामों तक पहुँचा देता है. विचार के ऐसे धरातल तक जाती है कवयित्री, जहाँ एक स्त्री भेदभाव रहित समाज संरचना को बुनती एक स्त्री की मातृ दृष्टि, समाज दृष्टि, तथा राष्ट्र दृष्टि से परिलक्षित है. इस विचार के तह में अत्यन्त चिन्ता है एक स्त्री को एक स्त्री की उसके अस्तित्व की उसकी अस्मिता की.  स्वंय कवयित्री यह कहती हैं कि ‘‘मेरी कविताई का सबब और सिलसिला क्या है ? मैं अपने देश के उस सामाजिक हिस्से से आती हूँ जिसे सहने को समुद्र भर संताप है और कहने को बूँद भर अवसर नहीं है. स्त्री के हक में आधी आबादी की बात की जाती है, पर इस आधी में वे कौन हैं जो मेरे जैसियों  के हिस्से का बोल जाती हैं. मेरी काया में प्रवेश कर मुझसे बहनापा बनाती है ? पर क्या वे सुविधा भोगी, मेरी गैर दलित बहनें स्त्री-मुक्ति की उपलब्धियाँ मेरे साथ साँझा कर पाती हैं ? जाहिर है नहीं.’’  एक कवयित्री का यह प्रश्न क्या स्त्री मुक्ति की धारा को भी विपरीत या अलग जरूरत के नजरिये से देखता है या यह हकीकत है ?

यहाँ समझने की जरूरत है कि क्या सवर्ण स्त्री की मुक्ति की अवधारणा एक दलित स्त्री की मुक्ति की अवधारणा से अलग है ? कवयित्री की नजर में है, क्योंकि दलित स्त्री की मुक्ति की अवधारणा उसके पारिवारिक दायरे के साथ-साथ उसके सामाजिक दायरे से मुक्ति भी है. पितृसत्तात्मक अवधारणा में निश्चित दोनों बंधक हैं. पर सवर्ण स्त्री को सामाजिक दायरे में सम्मान प्राप्त है लेकिन दलित स्त्री को नहीं. इसलिए कवयित्री अपनी गैर दलित साथिन बहनों को अपने साथ समान लड़ाई में खड़ा नहीं पाती. परंतु हिंदू धर्म की पितृसत्तातमक व्यवस्था में एक स्त्री को किन पारम्परिक बेड़ियों में जकड़कर उसका शोषण व दमन होता है, किस तरह से एक स्त्री को उसके अधिकारों से वंचित रखा जाता है यह पीड़ा कवयित्री की भी है. फिर भी वे सामाजिक समानता   के मुद्दे पर गैर-दलित बहनों को अपने साथ नहीं पाती हैं, यह भी उनकी चिंता का दायरा है. एक दलित स्त्री की मुक्ति की अवधारणा में जात्याभिमान दिखाने वाली जाति व्यवस्था अधिक है. परंतु ऐसा नहीं कि कवयित्री पितृसत्तात्मक व्यवस्था के विरोध में खड़ी नहीं है. ‘गोया मैंने किया है अपराध’ कविता की ये पंक्तियाँ जो पितृसत्ता पर चोट करती है इसका ठोस उदाहरण है.
ओ मेरे पिता ! /ओ मेरे भ्राता !/ ओ मेरे सहचर !

ओ मेरे पुत्र ! /तुम किन/अपराधों का /ले रहे हो
बदला मुझसे /कदम कदम पर.


 कविताओं में कई ऐसे अवसर आये हैं जहाँ उसे शिकायत है पितृसत्ता से, अपनों से, समाज व्यवस्था से, कुछ कविताएँ लम्बी अवश्य हैं पर उनके शब्दों का संयोजन ऐसा है कि कविता का एक-एक शब्द नए अर्थ से गुंजायमान है. एक स्त्री की दुनिया कितनी विशाल है, उसके अनुभव पुरूष से कितने अलग हैं उसकी संवेदना कितनी अप्रतिम है. शायद इसीलिये वह एक पिता (पुरूष) को माँ के रूप में देखने-परखने में सफल रही है. सचमुच यह अद्धभुत  है. एक पिता के प्रति एक बेटी की इससे बड़ी श्रृद्धा क्या हो सकती है कि वह अपने काव्य संकलन का शीर्षक ”पिता भी तो होते हैं माँ” रखकर उन्हें श्रद्धा अर्पित कर याद करती हैं, क्योंकि एक पिता का अभिमान है यह बेटी.  यह पूरा काव्य संकलन बेजोड़ है. इस संग्रह की सभी कविताएँ कुछ न कुछ कह जाती हैं. रूलाती हैं, सिखाती हैं और जगाती भी हैं. ये सभी कविताएँ बिना किसी छंद, अलंकार व शब्दों की बनावट-सजावट के बावजूद इसमें वह काव्यात्मक सौंदर्य भरा है जिसे आप सीधी-सपाट भाषा में अनगढ़ शिल्प कह सकते हैं. इन कविताओं का सौंदर्य यदि है तो उसकी संवेदना में है, अभिव्यक्ति में है. उसकी पीड़ा में है, उसकी शिकायत में है, उसकी विपन्नता में है और उसकी आशा-निराशा में है. किसकी ? एक स्त्री की, कवयित्री की. और जो कविता रुला सकती है उसे सजावट की आवश्यकता नहीं है, और इस संकलन में सभी कविताएँ ऐसी ही हैं. कुछ कविताएँ सीधे व्यवस्था पर चोट करती हैं. कुछ समाज नियोक्ताओं पर चोट करती हैं, और कुछ पिता के रूप में पुरुष के उस ममतामयी रूप की याद दिलाती हैं.

 जहाँ शायद माँ का स्नेह भी कम पड़ जाता है, फीका पड़ जाता है. यह काव्य संकलन कवयित्री की विचारारात्मक उड़ान का प्रतिफलन है, उसके जीवनानुभवों की काव्यात्मक अभिव्यक्ति है. स्त्री का दर्द है जिसे एक स्त्री से बेहतर कोई नहीं समझ सकता. इस संकलन की कुछ कविताएँ इतनी हृदय स्पर्शी हैं कि दलित आत्मकथाओं की याद भी दिलाती हैं. जैसे-‘मुर्दहिया’, ‘जूठन’, ‘मेरा बचपन मेरे कंधों पर’ जैसी आत्मकथाओं की. ‘मरघट से गुजरकर’ कविता सोचने को विवश करती हैं कि जहाँ सिर्फ मुर्दों को जलाया जाता है और जहाँ जीवन की कोई संभावना नहीं, वहाँ भी जीवन है. जीते जागते लोग हैं. यह कविता पोल खोलती है उस व्यवस्था की जो दंभ भरते हैं कि उन्होंने वह लक्ष्य प्राप्त कर लिया है कि जहाँ कोई भूखा नहीं है, नंगा नहीं है, बेघर नहीं है और अंततः अपने स्कूल की यादों के साथ-साथ एक बार फिर आतीत में जाने का प्रयास करती हैं. इन कविताओं में किस तरह एक स्त्री, दलित स्त्री का दर्द अभिव्यक्त हुआ है वह स्पष्ट करता है कि एक स्त्री का दर्द सिर्फ स्त्री ही समझ सकती है लिख सकती है. लेकिन हर स्त्री क्या इतनी सक्षम है कि वह स्वयं को अभिव्यक्त कर सके. परिवार, समाज व व्यवस्था को उस परिवर्तनकारी नजरों से देख सके जैसे कवयित्री ने देखा है. उसके लिये धैर्य व साहस जरुरी है . यह कविता देखिये ‘अर्थयुग’ जो दलित स्त्री के उन संघर्षों को बताती है जिसकी चिंता आज भी सिर्फ दो वक्त की रोटी है. तन ढकने को कपड़े की है. उसका श्रम बेअर्थ है धन और महत्व दोनों दृष्टियों से



 वहीं ‘आज की सैर’ के नायक की चिंता अपने ही अनपढ़ भाई को शिक्षा का महत्व समझाने की है।.जो पढ़ा-लिखा लेखक है और अपनी जाति सुधारने की चिंता करता है. परंतु अपने ही परिवार के अपने उस भाई को कैसे समझाये जो शिक्षा के महत्व को आज भी नहीं समझ पाया है. उसे कैसे सुधारें ? उसके माध्यम से यह चिंता कवयित्री की भी है जाति सुधारने की. लेखिका व्यथित होती है उस ‘बचपन’ को देखकर जो झाड़ू- पोछा करता दिखता है. कभी हमें दिल्ली के उन चैराहों में  रेड लाईट पर ले जाती हैं जहाँ  आज भी बचपन पुस्तकें (जिनका उनके लिए कोई महत्व नहीं ) या कोई भी सामान बेचता दिखता है. आॅफिसों में चाय पिलाता है. स्कूल के गेट के बाहर से अन्दर झाँकता है. यह बचपन किसका है ? इस बचपन में वे कौन थे जो कवयित्री की स्मृति में झाँक रहे थे ? यह कवयित्री की चिन्ता है. रजत रानी ‘मीनू’ का यह काव्य संकलन जीवन की जिस जद्दोजहद पर आधारित है, वह इसलिये सम्भव हो पाया कि यह एक सक्षम स्त्री दलित स्त्री के जीवनानुभवों की काव्यमय दास्तान है.
ऐसी ही ‘रविवार का दिन’ कविता है जहाँ परिवार में सभी के लिए छुट्टी का महत्व समझाती है वहीं एक नौकरी पेशा स्त्री (पत्नी व माँ ) भी इस आराम की हकदार है. और हक से कहीं ज्यादा उसे इसकी जरूरत है. क्योंकि सप्ताह के सातों दिन परिवार, बच्चों व आॅफिस की जरूरतों को पूरा करते-करते निकल जाता है. और ऐसे में रविवार का दिन भी उसके लिए कामों की लम्बी लिस्ट लेकर आता है. उसकी पीड़ा को कोई क्यों नहीं समझता है ? क्या वह मशीन है ? इस पीड़ा को कोई नौकरी पेशा स्त्री ही समझ सकती है. जबकि परिवार में और भी लोग हैं जो उसकी मदद कर सकते हैं.

अनुभवजन्य पीड़ा व बेचैनी से रुबरु कराती है यह कविता. लेकिन सवाल यह है कि क्या हर नौकरी पेशा स्त्री ऐसा सोच सकती है ? लिख सकती है ? ‘आज की लड़की’ कविता को देख लीजिए एक तरफ कवयित्री दो-तीन पीढ़ियों के अन्तराल में आए परिवर्तन को स्पष्ट करती हैं. दूसरी तरफ इन पीढ़ियों की जरूरतों को भी बता देती हैं. चाहे वह वेश-भूषा के मामले में हो और जरूरतों के मामले में हो. तीसरी महत्वपूर्ण बात यह कि इस जनरेशन गैप में आज की लड़की की बेपरवाही (अपने समय, समाज और समय के हालातों से) उसे कहाँ ले जा रही है यह भी कवयित्री इशारों में कह देती हैं.  ऐसी ही हृदय विदारक रंगभेद की परत खोलती कविता ‘रंग’ है. जो एहसास कराती है रंग की मर्मान्तक पीड़ा का. और खासकर उन साधनों की पोल खोलती है जो गोरा बनाने का दावा कर काले लड़के या लड़कियों को और एहसास कराते हैं. इस पीड़ा को वही समझ सकता है  जो इस पीड़ा से गुजरता है और रंग का बाजार कितना चकाचैंध कर देने वाला है. यह कविता सवाल खड़ा करती है कि क्या आज भी जब श्वेत-अश्वेत का फासला मिट चुका है, गोरे-काले की कोई अहमियत नहीं है. ‘ग्लोबलाईजेशन’ के इस दौर में जब ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ की तर्ज पर दुनिया सिमट रही है. रिश्ते व्यापक स्तर पर बदल रहे हैं. जहाँ मानव मात्र की अस्मिता के सवाल को उसके अस्तित्व से जोड़कर देखा जाने लगा है, वहाँ सांवलापन आज भी अभिशाप है . उसके सम्पूर्ण व्यक्तित्व को उसके रंग से तोला जाता है. उसका मुकाम जो उसने मेहनत से बनाया है उसके कोई मायने नहीं हैं ? ऐसा भेदभाव निन्दनीय है.

मैं दुख का कारण हूँ’ कविता उस बिन माँ की बच्ची का दर्द है. यह उस माँ से परिचय कराती है जो उसकी जन्मदात्री तो नहीं पर पालनहार तो है. पर बार-बार परायेपन का एहसास कराती है. दूसरी तरफ पिता हैं जो ढाल बनकर हरदम तैनात है माँ के रूप में. इस पारिवारिक कलह में जो  एक बच्ची की मानसिक पीड़ा है उसे स्वयं कवयित्री ने जीया है. एक स्त्री एक स्त्री से माँ से प्रश्न करती है ‘ओ माँ’ तेरे अन्दर मेरे लिए वह स्नेह वह प्यार क्यों नहीं जो अपने जाये बच्चों के लिए है ?  यह प्रश्न चिह्न है उस माँ पर जिसका प्यार भेदभावपूर्ण है. इसके बावजूद इस कलह से बाहर निकलने व पति के स्नेह व सहयोग से और स्मृति से बनती कविताएँ लेखिका के आगे बढ़ते व्यक्तित्व निर्माण की कविताएँ हैं. ‘सफर’ कविता में उभरा कवयित्री का यह दर्द जो कभी अपनी दोस्त में उन्होंने नहीं देखा परंतु जाति पता चलते ही उसके बदलते व्यवहार से व्यथित हुई हैं. ये कविता पोल खोलती है उस व्यवस्था की जहाँ जाति दोस्ती पर भारी पड़ती है. कवयित्री को ‘अच्छी लगती हैं लड़कियाँ’ उनका हंसना, बोलना, बढ़ना, पढ़ना अपने अधिकारों के लिए लड़तीं लड़कियाँ. लेकिन चिन्ता भी है उन्हें उन लड़कियों की, जिनके लिए स्कूल के दरवाजे आज भी बन्द हैं और जहाँ दरवाजे खुले हैं वहाँ भी उन दलित लड़कियों का भविष्य आज भी स्कूलों में तय कर दिया जाता है. इसी प्रकार ‘दो पैमाने’ व ‘संतान’ कविताएँ हैं जहाँ बेटी संतान बनने की कोशिश करती है पर उसे एहसास कराया जाता है कि क्या फर्क है, उसमें व उसके भाई में. एक बेटा और एक बेटी में. ये कविताएँ स्पष्ट कराती हैं उन खोखले दावों को जहाँ ‘बेटा-बेटी एक समान’ जैसे शब्द कोरे सरकारी शब्द बनकर रह गए हैं।

सात बहनों के बाद भी बेटे की प्रतिक्षा की जाती है. और एहसास कराती है जहाँ पत्नी आज भी पति की दीर्घायु के लिए व्रत उपवास, बेटे की लम्बी उम्र की सलामती के लिए व्रत रखती है माँ, और भाई की सलामती के लिए बहन. ‘कैसे विश्वास करूँ’ कविता एक बेटी को उसके जन्म के साथ ही उसे परायेपन का एहसास कराती है. क्योंकि वह एक बेटा नहीं बेटी है. सिर्फ इसीलिए कि वह (उस घर की बजाय जहाँ उसने जन्म लिया है) उस पराये घर की शोभा है जिसका उसे एहसास तक नहीं है, पता तक नहीं है. ये ‘परायापन’ ऐसा शब्द है जिससे हर स्त्री हर लड़की गुजरती है. क्यों है बेटी पराई यही दर्द लेखिका ने महसूस किया है. एक स्त्री के प्रति उसके अधिकारों के प्रति लेखिका सजग है. उन्हें वहाँ बेटी बरबस याद आती है, जहाँ उसे ‘अवांछित’ कहकर धिक्कारा जाता है. क्यों उसे ‘अवांछित’ कहकर धिक्कारा जाता है ? वह चिंतित है उस ‘झाडू वाली’ के लिए भी जिसकी तकदीर नहीं बदली, नियति नहीं बदली. एक सवाल कवयित्री ‘क्या करूँ’ कविता के माध्यम से  उन अपनों से करती है, जिनके द्वारा एक स्त्री पर एक लड़की पर नजर रखी जाती हैं. जो उस पर अविश्वास जताते हैं संदेह करते हैं. उस पर निगरानी रखते हैं, उसे समझाया जाता है कि किससे बात करनी है और किससे नहीं करनी है. क्यों दे वह अपनी दिनचर्या का हिसाब-किताब किसी को ? उसका अपना अस्तित्व है. अपना व्यक्तित्व है.अपनी अस्मिता है.


 क्या वह किसी की संपत्ति है ? क्यों उससे पूछा जाता है दिनभर का हिसाब ? देर से आने का कारण ? क्या सिर्फ इसलिए कि वह एक स्त्री है ? कवयित्री ने इन मूल्यवान और जरूरी सवालों को अपनी कविताओं के माध्यम से उठाया है. आखिर क्यों विवश है स्त्री आज भी यह कहने को कि-
मैं कैसे कहूँ/ किससे कहूँ/ अपनी बात/लज्जा आती है….
रखी जाती है/ मुझ पर निगरानी…
‘मैं कौन हूँ’…/कौन मेरा अपना है ?/माँ-बाप/भाई-बहन
सास-ससुर/पति ?किसे कहूँ अपना ?…
नहीं पसंद/किसी को मेरी /आजाद अभिव्यक्ति.
ये सवाल कितने अविश्वसनीय लगते हैं आज के समय में पर सच हैं. ये शब्द कवयित्री की हृदयानुभूति से निकले हैं. ये कविताएँ भारतीय समाज व्यवस्था की पितृसत्तात्मक व्यवस्था पर तमाचा है. जो आज भी स्त्री को अधीन समझते हैं, बेबस समझते हैं. इन कविताओं को पढ़ने से यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि जिस प्रकार दलित साहित्य कोई गैरदलित साहित्यकार नहीं लिख सकता उसी प्रकार स्त्री साहित्य व उसकी मन की पीड़ा भी कोई पुरूष साहित्यकार नहीं लिख सकता.


स्त्री मन की पीड़ा को साहित्य में लाने का श्रेय सबसे अधिक हिन्दी  के महान साहित्यकार प्रेमचन्द को जाता है. परन्तु इन कविताओं को पढ़ने के बाद  यह दावा किया जा सकता है कि एक स्त्री की जिस पीड़ा को कवयित्री समझ पायी है, और अभिव्यक्त कर पाई हैं, वह प्रेमचन्द से कहीं आगे की चिन्ता है. क्योंकि यह एक स्त्री की चिन्ता है, उसका निजी अनुभव है. प्रेमचन्द ही क्यों कोई भी पुरूष साहित्यकार स्त्री मन के भीतर झाँकने में असमर्थ रहा है.रीतिकालीन सभी कवि स्त्री की कमनीय काया को ही व्यक्त कर पाए. एक स्त्री के मनोजगत में चलने वाला अंतर्दुन्द  जो उसके बाहर और भीतर की दुनिया का अंतर्दुन्दऔर सामजस्य भी है, उसे समझने में पुरूष साहित्यकार असमर्थ रहे हैं। उसे एक स्त्री ही व्यक्त कर सकती है.एक अंतर्दुन्द कवयित्री के मन में तब भी चल रहा होगा जब वे ‘मैं दुख का कारण हूँ’ और ‘वर का चुनाव’ जैसी कविता लिखती हैं. कोई भी पुरूष ऐसी कविता शायद ही लिख पाए. ‘गीदड़ी से शेरनी बनती स्त्री’ में वही अंतर्दुन्द दिखाई देता है. ‘एहसान फरामोश’ उस स्त्री की व्यथा है जो एक माँ है, पत्नी है, घर की मालकिन है, पर एक स्त्री है. कवयित्री अपने वजूद को लेकर भी चिंतित है जब एक साधारण स्त्री सवाल करे कि उसका वजूद क्या है ? तो कोई ध्यान नहीं देता है. पर पीड़ा तो उसकी भी है. लेकिन यहाँ तो कवयित्री एक प्रतिष्ठित केंद्रीय विश्वविद्यालय के एक काॅलेज में प्रतिष्ठित प्राध्यापिका है.उनके सामने भी वही प्रश्न है कि मेरा वजूद क्या है? किससे शिकायत है उसे और क्यों ? कि मैं क्या हूँ ? क्यों वह प्रश्न करती है.

‘मैं क्या हूँ/मेरी क्या जगह है/घर में, परिवार में ?…
 किसी ने कभी सोचा-/ मैं भी सदस्य हूँ इस घर की ?
और किस तरह से घर, परिवार, नौकरी को संभालने के साथ-साथ तीनों पहर का नाश्ता भोजन, बनाते-बनाते भी कविता रच देती है कवयित्री. यह है एक स्त्री, एक कवयित्री, एक लेखिका का समय का रचनात्मक उपयोग, जो ‘आत्मबोध’ कविता के माध्यम से भी व्यक्त हुआ है. निश्चित रूप से इन कविताओं में स्त्री दृष्टि मुखर हुई है. ये कविताएँ एक व्यक्ति को ( स्त्री पुरूष व बच्चों ) को एक बेहतर जीवन के बृहत्तर उद्देश्यों के लिए तैयार करती है. जहाँ भेदभाव रहित नए समाज संरचना का सपना है. जहाँ पितृसत्तात्मक व्यवस्था और जातीय पूर्वाग्रहों से मुक्ति की तलाश दिखाई देती है. तभी तो कवयित्री यह मानने को तैयार नहीं है कि जिस घर में उसने जन्म लिया वह घर उसका नहीं.जिस घर में उसने जन्म लिया वह धर उसका क्यों नहीं ? वह क्यों पराया धन है ? ‘कैसे विश्वास करूँ’ कविता का द्वन्द्व यही कहता है.‘क्रांति के भ्रम’ कविता उस स्त्री के संघर्ष का अंतर है जो निराला की ‘वह तोड़ती पत्थर इलाहाबाद के पथ पर’ की नायिका है और दूसरी तरफ आज की वह तोड़ती पत्थर की नायिकाएँ हैं. वे वैसी श्याम वर्णा शान्त तो नहीं बल्कि थकी-हारी, उपेक्षित, तिरस्कृत, बहिष्कृत स्त्रिीयाँ हैं. वहाँ एक यहाँ अनेक हैं. ये कविताएँ निश्चित रूप से निराला व नागार्जुन की याद दिलाती हैं. लेकिन वे कविताएँ देश की दुर्दशा का एहसास कराती थी ये आदमी-औरत की दुर्दशा का एहसास कराती हैं और आदमी व औरत से समाज बनता है समाज से देश बनता है तथा देश की पहचान बनती है. वे कविताएँ चिंता व्यक्त करती थीं ये कविताएँ प्रश्न करती हैं आज भी

 यह कविता संग्रह एक सफर है पिता के माँ बनकर बेटी को ऊँचाइयों की उस सीढ़ी तक पहुँचाने तक का जहाँ वह यह सोच सकती है कि उसके देश की व्यवस्था कैसी है ? जहाँ आज भी समाज का एक वर्ण एक वर्ग मरघट में रहता है. जिसने मरघट में भी जीवन की उम्मीद जगा दी है. जहाँ आज भी बेटी का और दलित बेटी का संघर्ष अपनी आबरु बचाने का ही है.जहाँ देश के अधिकांश स्कूल आज भी उसका भविष्य तय करते हैं. जहाँं आज भी ज्योतिबा फूले, सावित्री बाई फुले, स्वामी अछूतानन्द की चीख नहीं पहुँचती.पढ़ो, बढ़ो, अपना हक छीनो.  ये ऐसे सवाल हैं जो आज भी जस के तस खड़े हैं. यह कवयित्री की सूक्ष्म दृष्टि है. ‘पिता भी तो होते हैं माँ’ जो कि इस काव्य संग्रह का शीर्षक भी है. क्या परिभाषित करना चाहता है यह काव्य संग्रह ? क्या पिता भी माँ के समान ममतामयी होते हैं ? क्या सबके पिता ऐसे ही होते हैं? यदि हाँ तो आज स्त्री अपने अधिकारों के लिए क्यों लड़ रही है पुरुष से ? क्या वे पुरुष अलग होते हैं ? पिता पुरुष भी तो होते हैं. क्या सिखाती है यह कविता ? एक उदाहरण-
‘‘मैंने पापा की आंखों में देखा/अपनी माँ का चेहरा/ पापा माँ ही तो होते हैं. 
 ऐसा महसूसा/ माँ गुजर जाती है /अक्षर सिखाते-सिखाते,
 और पापा ले लेते हैं/ माँ की जगह…./माँ की तरह,
 पापा ने सिखाया /उठना-बैठना/ पढ़ना-लिखना
 सिलना-बुनना/ खाना पकाना/रहना-सहना,
 वे सुलाते थे मुझे /अपने सीने से लगाकर, मम्मी की तरह.’’

पिता का यह ममतामयी रूप भी उस भारतीय सामाजिक संरचना में देखने को मिलता है जहाँ आज भी कन्या भ्रूण हत्या में अधिकांशतः पुरुष तथाकथित पिता ही शामिल होते हैं, वहाँ एक पिता ऐसे भी हैं. पिता की यह ममता और उनका वात्सल्य प्रेम पिता में पुत्री की आस्था का प्रतीक है.‘मम्मी बनते पापा’ इतनी संवेदनशील व मार्मिक कविता है जो कवयित्री के स्त्री मन की अथाह गहराइयों से उपजी है. पिता व पुत्री के मजबूत व स्नेह भरे रिश्तों को भी स्पष्ट करती है. किस तरह से कवयित्री उस स्नेह को परखती है.
वे हर समय /रखते हैं मेरा खास ध्यान। /पापा ने चिंता की थी/
उस वक्त भी मेरी /जब मम्मी हुई थीं निष्प्राण /उनकी लाश रखी थी/
विद्युत संस्थान के/ उस घर में /पड़ोसिन को दूध का/
भगोना पकड़ाते हुए/ भरी आवाज में कहा था- /‘भाभी, जरा दूध गर्म कर के
/बच्ची को पिला दो’। /पापा मम्मी नहीं हैं’ /मम्मी से बढ़कर हैं।…

कवयित्री एक स्त्री वह भी दलित स्त्री होने के नाते स्त्री के साथ होने वाली ज्यादतियों से विचलित हैं. वे यहाँ भी भेदभाव को महसूस करती हैं इसलिए वे शिकायत करते हुए कहती है कि तब ‘क्यों नहीं हिलता पत्ता एक भी’ जब ‘हमारे साथ होता है बलात्कार /सामूहिक बलात्कार -/ तब क्यों हिलता नहीं पत्ता एक भी ? /और जब तुम्हारे साथ हुआ बलात्कार / तब क्यों हिल गई संसद भी ?/ चीख उठी महिला सांसद बलात्कार के खिलाफ /क्यों उड़ गयी ‘महिला आयोग’ की चैन की नींद ?/आज क्यों उठी बलात्कारियों को/सजा-ए-मौत की माँग.’ कल क्यों मौन थी तुम ? ऐसी चोट सिर्फ स्त्री कर सकती है क्योंकि एक स्त्री का दर्द स्त्री ही समझ सकती है. लेकिन एक दलित स्त्री का दर्द एक सवर्ण स्त्री उसकी सहेलियाँ क्यों नहीं समझती. क्या दोनों की संवेदनाएँ अलग हैं ? दोनों की देह अलग है ? फिर भेदभाव क्यों है ? यह भेद जातीय श्रेष्ठता का है कवयित्री उन आदर्शों को ठोकर मारती है. वे चिंतित हैं और अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस की सार्थकता और उसकी निरर्थकता को जानती हैं वह उसके उद्देश्यों कोे भी बखूबी जानती हैं इसलिए वे स्वयं से सवाल करने को विवश हैं. कि

‘क्या वे जानती हैं?’ /आज है /अंतर्राष्ट्रीय दिवस
स्त्री के संघर्ष /और एकता का प्रतीक /
स्त्रियों के अधिकारों और /चेतना का प्रतीक
सम्पन्न हो जाएँगे /नगरों महानगरों में जश्न /
हर वर्षों की भाँति /इस वर्ष भी’  

क्या मायने हैं ऐसे सम्मान के जहाँ बहुसंख्य स्त्रियाँ नहीं जानती हैं कि क्या हैं अधिकार, व स्त्री मुक्ति, कहाँ किसके पास हैं उनके अधिकार? पाये नहीं, देखे नहीं. जायज है ये सवाल कवयित्री के.क्या मायने हैं एक संघर्ष करती स्त्री के लिए और अपनी आजीविका के लिए संघर्षरत जुझारू मजदूर स्त्री के लिए अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के ? क्या जानती है ‘वह स्त्री’ जो आती-जाती सवारियों से बेखबर, निश्चिन्त होकर उस फटी-पुरानी बोरी में रखे कागदी कूड़े को संभाल रही है. और मैले-कुचैले कपड़ों में सूखे गांलों वाली वह बेहाल स्त्री क्या सचमुच निश्चिन्त थी ?
‘क्या वह शिक्षित थी ?/वह किस जाति से सम्बद्ध थी
वह किस कुल खानदान की थी ?किस संस्कृति की जान थी।’
चिंता है कवयित्री को उसकी उसके बेहाली की, वह मजबूर करती है और झंकझोरती है कवयित्री को, उसकी चेतना को, यह प्रश्न करने को कि यदि वह सवर्ण होती तो क्या अपढ़ होती ? यदि वह पढ़ी-लिखी होती तो यही होता उसका हाल ? यह चिंता है उस कवयित्री की जिस पर जिम्मेदारी है दूसरी दलित स्त्रिीयों की. वह अपनी प्रतिबद्धता समझती है दूसरी दलित स्त्री के प्रति कि वह पढ़े-बढ़े और हक के लिए लड़े.एक स्त्री की चिंता दूसरी स्त्री के लिए. वह शिक्षा का महत्व भी समझा देती है.आंखें भी खोल देती है, और व्यवस्था पर करारी चोट भी करती हैं. ये ऐसी कविताएँ हैं जो मन को विचलित और अशान्त कर देती हैं. व्यथित कर आंदोलन को प्रेरित करती है. ये कविताएँ प्रश्न करती चलती हैं.



 आशा और निराशा के साथ उत्तेजित व उद्वेलित भी करती चलती हैं. ये कविताएँ स्त्री की अपनी स्वायत्तता और अपनी अस्मिता को तलाशते चलती हैं. ये शुद्ध गद्यात्मकता के साथ आत्मकथा का भी बोध कराती हैं. जब पितृसत्तात्मक व्यवस्था के दुश्चक्र  में पिस रही स्त्री व दलित स्त्री चीखकर कर कह रही हो-‘गोया मैंने किया है अपराध’ कविता में कि..
ओ मेरे पिता! /ओ मेरे भ्राता! /ओ मेरे सहचर !
ओ मेरे पुत्र! /तुम किन /अपराधों का
 ले रहो हो /बदला मुझसे /कदम-कदम पर
 क्यों करते हो मेरे साथ /परायों जैसा व्यवहार
 क्या बिगाड़ा है मैंने  /तुम्हारा?  
इसी कविता की कुछ पक्तियाँ जो सीधे पितृसत्ता पर चोट करती हैं. व्यवस्था के वजूद को ललकारती है और सीधे आरोप लगाती है कि –
 मेरे जज्बातों का/संज्ञान तुमने लिया नहीं
गुलामी मैंने चुनी नहीं /आजाद तुमने किया नहीं
पंख उगने दिये नहीं /फिर व्यंग्य करते हो मुझ पर
कि अपने पंखों में /उड़ा ले चलो
आसमान में /मुझे यदि तुम -‘नर से बड़ी नारीवादी हो.’

 सच में क्या यही अपराध है एक स्त्री का कि उसने कभी पिता, भाई, पति और अब पुत्र के रूप में उस पुरुषवाद को पनपने में अपना सम्पूर्ण जीवन लगा दिया और अंत में उसे समझ कौन पाया ? हमारे बड़े-बड़े उपन्यासकार भी स्त्री की आभूषण प्रियता और उसके शृंगारिक रूप की ही कल्पना कर पाये परंतु इतने महत्वपूर्ण प्रश्न क्या उसके मनोजगत में उठ पाये ? शायद नहीं, स्त्री पीड़ा को समझने का दावा करने वाले प्रेमचंद भी शायद स्त्री मन की इतनी अथाह बेचैनी को समझने में असमर्थ रहे, क्योंकि उनका इन वास्तविकताओं से कोई सरोकार नहीं था. स्त्री की उस देह के अंदर भी एक संसार है. जो उसके विचारों को हवा देता है, जिसे पुरुष समझने में असमर्थ रहा है. वह कितना सोच सकती है, उसके सोच की, विचार की सीमा क्या हो सकती है, इसका अंदाजा शायद ही कोई पुरुष लगा सकता है. ‘बूँद और समुद्र’ कविता उसी स्त्री मन की अथाह गहराइयों की बात करती है. कुछ पक्तियाँ देखिए..
क बूँद चली/ इतरा कर/इठलाकर/सदियों पुरानी
 परिपाटी तोड़कर/किनारों को पार कर/ समुद्र को ललकार कर
 बूँदको गरजता देख /समुद्र भड़का /हिल गया उसका मन-मस्तिष्क
 कोन है जो मुझे /चुनौती दे रहा खुले आम? /कभी समुद्र भी झुका है?
कभी उसने अपनी सीमाओं को छोड़ा है? 2यह उसकी फितरत नहीं
अथाह गहराई ही उसका /वजूद है.
  
जब हम समान अधिकारों की बात करते हैं तो सभी को समान भोजन, कपड़ा, मकान और सबसे महत्वपूर्ण समान शिक्षा की बात की जाती है.परंतु हमारी व्यवस्था में जो असमानता मूलभूत आवश्यकताओं के वितरण में देखी जाती है, शिक्षा भी उसमें एक है. कवयित्री को शिक्षा में यह असमानता स्वीकार्य नहीं हैं. उनके विचारों की उड़ान वहाँ तक जाती है जहाँ एक स्त्री समाज बदलने का माद्दा रख सकती है. और अपनी पीड़ा के साथ-साथ दूसरी स्त्रियों की दलित स्त्रियों की पीड़ा को काव्यात्मक अभिव्यक्ति देकर इसे जगजाहिर करती है, यह प्रश्न करते हुये कि ‘क्या यही बराबरी है ?’ सवाल है कि, क्या यह हर स्त्री की पीड़ा है ? शायद हाँ इसलिए कवयित्री को भाती हैं ‘वे लड़कियाँ’ जो लड़ती हैं अपने स्वाभिमान के लिए.अपनी पहचान के लिए. अपने हक के लिए, जो करती हैं रक्षा अपने पिता के स्वाभिमान की. भाई-बहनों के अभिमान की. जो उन्हें ताकत देती हैं अपने समाज के उत्थान के लिए. अपनी कमजोर कौम के कल्याण के लिए. अपने राष्ट्र की उन्नति के लिए. राष्ट्र की उन्नति का विजन लेकर चलती है कवयित्री. सोच निश्चित रूप से व्यापक फलक लिए है. जहाँ स्त्री सिर्फ घर परिवार तक सीमित है वहाँ कवयित्री की चिंता राष्ट्र उन्नति की है. और यह राष्ट्र की उन्नति तभी सम्भव है जब समान व्यवहार से समान वितरण से समान शिक्षा, भोजन, मकान और कपड़ा और अवसर प्राप्त होंगे. यही उसकी चिंता है जो कविता के माध्यम से अभिव्यक्ति पाती है . ‘आज की लड़की’ कविता जिसमें लेखिका उस समयान्तराल में आये परिवर्तन को भी देख रही है जो आज और आज से 20-25 वर्ष पहले था.  चाहे वह वेश-भूषा के मामले में हो और जरूरतों के मामले में हो सुख सुवधाएँ.

दूसरी तरफ आज की दीन-दुनिया से बेखबर लड़की का परिचय भी कराती हैं जो सिर्फ अपने मोबाइल में व्यस्त है  और मोबाइल पर जो गाने वह सुनती है जो स्वप्निल दुनिया में जीती है, यह आज की लड़की है.एक तरफ अजन्ता एलोरा की नग्न मूर्तियाँ हैं जो खामोश रहकर भी अपनी व्यथा कहती हैं, और लेखिका से प्रश्न करती हैं, ‘एक स्वप्न में’ भी. इसी तरह ‘अच्छी लगती है लड़कियाँ’ में लेखिका लड़की के चुलबुलेपन की बात करती है उन्हें पसन्द है जो हंसती है पढ़ती है, बढ़ती है, बतियाती है. कुल मिलाकर उनकी स्त्री दृष्टि मुखर हुई है इन कविताओं में.‘तुम प्रतिनिधि हो’ कविता स्त्री के उस रूप की बात करती है जो पत्नी, प्रेमिका के रूप में सुंदरता सौम्यता की मूरत है. एक नृत्याँगना जो देश की पहचान बन सकती है.वह नृत्याँगना देवदासी बनने को विवश है. ईश्वर की अर्धांगिनी के बहाने वह किस-किस की अर्धांगिनी बनती है उसे स्वयं नहीं पता. क्या उसे भी नृत्याँगना की पहचान मिलेगी ? इन अस्मिताओं की बात करना, और स्त्री को, एक देवदासी, नृत्यांगना को भारत की पहचान के रूप में देखना बड़ी बात है. ‘आदिवासी’ कविता विचार के उस धरातल तक भी ले जाती है जहाँ जंगल बचाओ, जल (नर्मदा) बचाओ और जमीन बचाओ के नारे लगाकर वाहवाही लूटी जाती है और आदिवासी उसी यथास्थिति में रहने को विवश हैं. कोई उनसे तो पूछे कि वे इंसान बनना चाहते हैं या जंगली बनकर रहना चाहते हैं. उन्हें मुख्यधारा से जोड़ने की बात कब शुरू होगी ? एक दलित कवयित्री इन कविताओं में जिस चुनौति को स्वीकारती हैं, वहाँ वे बुद्ध की करूणा को त्यागकर अम्बेडकर की राह चलती हैं.


जहाँ न्याय की माँग पहले है करूणा बाद में आती है.यह अस्मिता विमर्श की मनोवैज्ञानिक चुनौति है जहाँ वह डटी है आईना दिखाकर शर्मिन्दा करने के लिए. इस लड़ाई को वे इस भरोसे के साथ लड़ती हैं कि कोशिश करते जाइए हालात बदलेगें, फिजा बदलेगी जरूर. यहाँ बिखरने का डर नहीं है, वह सम्बल बनकर खड़ी हैं, नैतिक साहस लिए बेहतर समाज बनाने के सपने के साथ. अधिकांश कविताओं में अतीत की स्मृतियाँ ही मुख्य विषय हैं. इनमें एक दलित कवयित्री अर्थगौरव जोड़ती है तो वह सीधा मर्म पर प्रहार करती है. ‘स्कूल के वे दिन’ कविता की ये पंक्तियाँ जो कहती हैं…
मुझे याद हैं /स्कूल के वे दिन/…वे सहेलियाँ/
  जो कहती थीं/ तू चमार तो/ लगती नहीं है।…
मैं सोच में हूँ कि यह लगना कैसा मनावैज्ञानिक र्दुव्यवहार है, जिसका एहसास कराया जाता हैं. क्या दो शरीरों में जातीय भिन्नता के लक्षण दिखाई देते हैं ? यह लगना कैसा हो सकता है. क्या सचमुच फर्क है दो विपरीत जातीय लोगों में, दो विपरीत लिंगों में ? यह सच न होते हुए भी ऐसा सत्य है जो कड़वी वास्तविकता के ठोस धरातल पर ले जाकर उस सत्य का आभास कराता है जहाँ कहा कुछ और जाता है होता कुछ और है. जहाँ व्यावहारिकता और सैद्धांतिकता में धरती और आसमान का अंतर है. ठीक वैसे ही जैसे हाथी के दांत दिखाने के कुछ और खाने के कुछ और होते हैं. और चुनौतियों का मुँह तोड़ जवाब देने की ताकत कवयित्री को देवदार के वृक्षों से मिलती  हैं.

निश्चित रूप से उनको ताकत यही देते हैं. ‘देवदार’ के वृक्ष जो सीधे खड़े हैं वर्षों से अटल हैं और दूसरों को छाँव देने के साथ-साथ शालीनता से अपनी उस ऊँचाई का एहसास कराते हैं जहाँ घमंड नहीं है. और प्रेरित करते हैं आगे बढ़ने को. उबड़-खाबड़  रास्तों के बावजूद अपना व्यक्तित्व निर्माण को, सारे विश्व में अपनी पहचान बनाने व दमकने को. इस काव्य संकलन की सभी कविताएँ मानवीय गरिमा के साथ स्त्री-विमर्श का बेजोड़ खजाना है. जहाँ कवयित्री के होश संभालने से उसका सफर शुरू होता है और स्त्री बनने, घर गृहस्थी संभालने, विद्यार्थी जीवन से अध्यापकीय संभालने तक का और उससे भी कहीं आगे अपनी पहचान व जगह बनाने तक का, एक दलित  स्त्री के हाशिया उलांघते हुए देश-दुनिया की तमाम उपेक्षित-वंचित दलित स्त्री के उत्थान उसके स्वाभिमान की रक्षा के लिए एक मुकम्मल जगह बनाती कवयित्री तक और उससे भी आगे…..तक चलता है. इस सफर में कुछ कविताएँ इतनी मार्मिक बन पड़ी हैं कि मन को छू जाती हैं जो व्यापक फलक लिए विश्वबोध की कविताएँ हैं।
(‘मैं दुःख का कारण हूँ ’, ‘मदर्स डे’,  ‘उड़ने की चाह’, ‘स्त्री’, ‘वह स्त्री‘, ’महिला सशक्तिकरण’, ‘गीदड़ी से शेरनी बनती स्त्री’, ‘मरघट से गुजर कर’, ‘क्यों नहीं हिलता पत्ता एक भी’, ‘वह स्त्री’, ‘स्त्री’, गोया मैंने किया है अपराध’, ‘क्या यही बराबरी है ?’, ‘पूत के पाँव’,‘ अवांछित’, ‘एहसास’, ‘ओ माँ’, ‘अच्छी लगती हैं लड़कियाँ’, ‘स्कूल के वे दिन’, ‘तुम प्रतिनिधी हो’, ‘बचपन’ ) इत्यादि.

यह आलेख भारतीय भाषा केंद्र, जवाहर लाल नेहरू विश्विद्यालय,  में महात्मा फुले जयंती, 2016,  के अवसर पर प्रो. रामचन्द्र के द्वारा आयोजित कार्यक्रम में पढ़ा गया था.