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जातिवादी जड़ताओं के बरक्स एक प्रेम कहानी : पीली छतरी वाली लडकी

संजीव चंदन

हिन्दी के बहुपठित कथाकार उदय प्रकाश की कहानी ‘ पीली छतरी वाली लडकी’ जब पहली बार कथा मासिक हंस में प्रकाशित हुई , तो हिन्दी कथा परिदृश्य में व्यापक हलचल हुई – प्रशंसा और हमले की बाढ़ सी आ गई थी. इस कहानी की ताकत इसपर होने वाले हमलों की पृष्ठभूमि से बनती है , क्योंकि यह एक ऐसी प्रेमकथा है , जो हिन्दी विभागों , विश्वविद्यालयों और हिन्दी पट्टी के स्वभाव में शामिल जातिवाद के खिलाफ एक कालजयी कथन की तरह घटित हुई है. निसस्न्देह जब जड़ता पर प्रहार होता है, तो वह बदले में ‘प्रतिप्रहार’ भी उतना ही तेज करती है.  जब यह धारावाहिक प्रकाशित हुई थी, तब मैंने कॉलेज की पढाई ख़त्म की थी, विश्वविद्यालय में जाने ही वाला था, बाद में जिस विश्विद्यालय का छात्र हुआ , वह हिन्दी के लिए ही स्थापित है, शायद इसीलिए वहां इस कहानी में उपस्थित जातिवाद और क्रूर, और घृणित रूप में दिखा . कहानी यथार्थ और जादुई यथार्थ के साथ हमारे समय के सच के रूप में घटित होती दिखी.

पहले पाठ के बाद कहानी में जातिविहीन नायक( कहानी में उसकी जाति का उल्लेख नहीं हैं , लेकिन उसका लोकेशन ब्राह्मणवाद विरोधी है ) राहुल के द्वारा ब्राह्मण नायिका अंजलि के साथ आक्रामक यौन संबंध स्त्रीवादी आलोचना के नजरिये से स्त्रीविरोधी दिखा . सवाल बना कि क्या नायक अपनी पीड़ा और अपमान का बदला एक जाति की स्त्री के प्रति हमलावर होकर लेने का सन्देश तो नहीं दे रहा है ! लेकिन नहीं, वह व्याप्त जातिवादी / ब्राह्मणवादी अन्याय के प्रति आक्रोश से बनी अपनी ‘ कुंठा’ से तत्क्षण बाहर आकर लडकी के प्रति प्रेम और स्नेह से भर उठता है –प्रेम ही जातिरूढ़ समाज का सफल प्रतिकार हो सकता है. तब तक नामदेव ढसाल की कविता के भीतर आक्रोश और उसके व्यक्त करने के स्टाइल से मैं परिचित नहीं हुआ था. ‘दलित –जीवन’ के दंश, जीते हुए हर पल के अपमान और उपेक्षा के खिलाफ विश्वकवि ढसाल न सिर्फ ‘ पैंथर आन्दोलन’ के रूप में आक्रामक प्रतिकार के साथ सक्रिय हुए, बल्कि आक्रोश और आक्रामकता , जिसका अंतिम लक्ष्य करुणा और समता था के साथ वे अपनी कविताओं में भी प्रकट हुए हैं . उदय प्रकाश की कहानी में यह प्रसंग मेरे सामने नामदेव ढसाल की कविता की तरह अब खुलता है – यद्यपि ढसाल और उदय प्रकाश का जातीय लोकेशन सर्वथा भिन्न है – और उदय जी का नायक भी गैरद्विज दलित नहीं , जातिहीन नायक है – अपनी प्रिय कहानी का बार –बार पाठ नए अर्थ –सन्दर्भों के साथ खुलता जाता है .


इन दिनों इस कहानी को पढ़ते हुए हालांकि एक बात खटकती है और कहानीकार के आज के लेखन और चिंतन को देखते हुए ऐसा लगता है कि शायद वे आज, जब इस कहानी को लिखें तो वे भी उन प्रतीकों से परहेज करें , जिसे उन्होंने तब अपनाया था. कहानी में बुराई और जातिवाद के प्रतीक के तौर पर मिथकीय चरित्र ‘ रावण’ को और उससे संघर्ष करते हुए मिथकीय चरित्र ‘राम’ को प्रतीक के तौर पर बार –बार पेश किया गया है . ऐसा इसलिए कि रावण की जाति ‘ ब्राह्मण’ बताई जाती रही है. हालांकि कहानीकार इस बात से जरूर वाकिफ  हैं कि रावण और राम के चरित्र का पुनर्पाठ दलित अस्मिता किस तरह करती है. बहुपठित कथाकार से रामकथा के वैकल्पिक पाठ अछूते नहीं होंगे – कहानी के शिल्प में ही मौजूद व्यापक फलक पर फ़ैली जानकारियाँ तो कम से कम कथाकार को यह छूट नहीं दे सकती कि वह दलित अस्मिता के द्वारा ‘ रावण –राम’ मिथ के पुनर्पाठ से खुद को अलगा ले.



कहानी का अंत सुखद है . विश्विद्यालय कैम्पस के युवा जातिवादी , नस्लवादी समूह से सफल लड़ाई लड़ते हैं. अपने करियर को दांव पर लगा कर , यातना सहते हुए भी एक बड़े कॉकस से वे मुठभेड़ करते हैं. नायक –नायिका अपने सफल प्रेम की यात्रा पर अपने मित्रों की मदद से निकल जाते हैं . हालांकि सुखद अंत के पूर्व एक भयावह स्वप्न दृश्य भी नायक के सपने के साथ उपस्थित होता है, जो पाठकों के को दुःख और क्षोभ से भर देता है. लेकिन अंत सफल प्रेम संघर्ष के रूप में होता है , ट्रेन की गति के साथ सारी बुराइयों, जड़ताओं और मक्कार परिवेश को पीछे छोड़ते हुए. कहानी के इस सुखद अंत से अधिक क्रूर है यथार्थ , जो अंत के पूर्व के भयावह स्वप्न दृश्य तक ही घटित होता है – उदाहरण के लिए जाति-पंचायतों के सामने निरीह जोड़ों की कहानियाँ हमारे सामने हैं . कहानी में यथार्थ स्वप्न में घटित होता है और मारे जो रहे प्रेमी युगलों के बावजूद प्रेम कहानियों की निरंतरता के सत्य की तरह स्वप्न (यूटोपिया) यथार्थ में घटित है . यही कहानी की सफलता है.

दैनिक भास्कर से साभार 

स्त्री का समाज और समाज में स्त्री‘अकेली’

अल्पना मिश्र

एसोसिएट प्रोफेसर, हिंदी विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय
संपर्क : alpana.mishra@yahoo.co.in

 वरिष्ठ लेखिका मन्नू भंडारी के जन्मदिन पर विशेष 


अलग -अलग समय की स्त्री रचनाकारों ने हमेशा मुझे यह देखने और समझने के लिए उकसाया कि किस तरह वे स्त्री की तयशुदा सामाजिक भूमिकाओं से अलग उसके अपने स्वत्व और उसकी अपनी सामाजिकता के सवाल उठा रही थी.  पितृसत्ता द्वारा की जा रही स्त्री के सामाजीकरण की प्रक्रिया को पहचानना एक मुश्किल और उतना ही बारीक समझ का काम है. इसे मन्नू भंडारी की ‘अकेली’ कहानी में उसकी पेंचदगियों और उससे बननेवाली टकराहटों के साथ अभिव्यक्त किया गया है. स्त्री के उपर थोपे गए समाज और सहज मानवीय जरूरतों से बनने वाले समाज के अंतर को यह कहानी बखूबी दिखा देती है, साथ ही यह भी दिखाने से नहीं चूकती कि स्त्री इस थोपे गए समाज के बरक्स अपना समाज रचने को लगातार उससे जूझती, टकराती और इस क्रम में अपनी दिमागी कंडिशनिंग को कुछ ढीला करती, व्यवस्था और उसकी नियमावली को प्रश्नांकित भी करती चलती है. सामाजीकरण की इस पूरी प्रक्रिया में की गई स्त्री की दिमागी कंडिशनिंग उसे इस बात के लिए तैयार करती है कि वह स्वयं ही यह मान ले कि उसके जीवन की सार्थकता मातृत्व में है और मातृत्व की महती उॅचाई प्राप्त कर लेने के बाद स्त्री का जीवन संपूर्ण और लक्ष्य समाप्त हो जाता है. इसे खो देने पर जीवन निरर्थक और समाज के लिए भविष्योन्मुखी न होने के कारण व्यर्थ हो जाता है. समाज ऐसे स्त्री जीवन को पग पग पर खारिज करता चलता है. यहाॅ यह ध्यान देना जरूरी है कि मातृत्व की पूरी अवधारणा मात्र पुत्र के संदर्भ में है, कन्या के जन्म को इसमें गिना नहीं गया है. इसलिए मातृत्व की यह अवधारणा अजीब तरह से पुंसोमुखी हो कर मनुष्यविरोधी बन जाती है.

 यह अवधारणा स्त्री के समूचे अस्तित्व को ढक कर उसे सीमित और दयनीय बना देती है. जबकि देखने की बात यह है कि भारतीय संस्कृति में इस मातृत्व का इतना गुणगान किया गया है और इसी मातृ पद के कारण उसे समाज में अत्यंत गौरवमय और काव्य में अत्यंत करूणामय, साथ ही महिमामय स्थान दे डाला गया है, परंतु व्यवहारिकता इसके उलट है. जिस मातृत्व को इतना विशिष्ट स्थान दे कर पितृसत्ता ने उसे अपने माथे पर मुकुट की धारण किया हुआ दिखाया, उसी माँ  को उसके ही बच्चों के सामने पिता किसी तरह का आदर न देकर लगातार अपमानित, लक्षित करता रहता है. ऐसे उदाहरण आप आए दिन अपने घरों में या आस पास देख सकते हैं. रोजमर्रा की जिंदगी में यह दृश्य इतना आम हो चुका है कि किसी का ध्यान भी नहीं जाता कि यही वह महिमामय पद है, जिसके बिना स्त्री जीवन ही निरर्थक बना दिया जाता है, फिर इसकी ऐसी बे-कदरी ! यह इतना बड़ा झूठ उसके सिर पर थोप दिया गया और जब उसने इसे समझना शुरू किया तो उससे बड़ा अपराधी कोई नहीं ! यहां मेरे कहने का यह अर्थ कतई नहीं है कि माएं अपने पुत्रों को प्यार न करें या देखभाल न करें, बच्चे को प्रेम करना एक सहज स्थिति है और उसे सहज ही बने रहना चाहिए। अब दूसरी स्थिति देखिए, जहां इसी हमारे पौराणिक इतिहास की तमाम कहानियां यह बताती हैं कि यदि स्त्री ने पितृसत्ता की नियमावली का किसी भी प्रकार से उल्लंघन किया तो मातृत्व के गौरव से युक्त स्त्री को उसी की संतान के हाथों दंडित करवाया जायेगा. इस तरह संतान का पद पाने वाले पुत्र को माता को सजा देने की क्रूरता के लिए भी मानसिक रूप से तैयार कर देने की स्थितियाॅ पहले ही बता दी जाती हैं।

यह नृशंसता का भयानक उदाहरण है कि पिता के आदेश पर पुत्र माता का वध करे, पिता के आदेश पर पुत्र माता की जिह्वा काट ले आदि.  शायद यह पुरूष के भीतर, मां के लिए गहरे बैठी संरक्षकत्व की भावना को जड़ से उखाड़ फेंकने और स्वयं को मां  से अधिक वर्चस्वशाली की स्थिति में मान लेने का भाव पैदा करने के लिए भी रचा गया होगा और पुत्र के भीतर की कोमल भावनाओं को सुखा कर, तोड़ कर, उसे स्त्री के प्रति क्रूर, एक निर्मित समाज का हिस्सा बनने के लिए तैयार किया जाना भी होगा. इस तरह दिया गया मातृत्व का पद भी एक टिकाउ और विश्वसनीय पद नहीं बना रह जाता. चूॅकि पुत्री को दूसरे घर कन्यादान में दिया जाना है, इसलिए बचपन से ही उसे तरह तरह से अनुकूलित करने की प्रक्रिया शुरू कर दी जाती है. स्त्री स्वत्व को कुचल देने की यह प्रक्रिया इतनी बारीक रही है और इतनी महिमा मंडित की जाती रही है कि बहुत छोटी लड़कियां  भी बिना बताए अपने जीवन को व्यवस्था के अनुरूप ढालने का श्रम शुरू कर देती हैं. उन्हें अपने जीवन का आदर्श स्वतः ही पूर्व पीढ़ियों से हस्तांतरित होता हुआ मिलता रहता है. यातना का आदर्श स्त्री के लिए जिस तरह से रचा गया है, मानसिक अनुकूलन से थोड़ा सा निकल कर देखने पर ही वह हैरान कर देने वाली अमानवीयता से भरा दिखाई पड़ेगा. ऐसे में स्त्री का अपना कोई समाज नहीं रह जाता. वह एक दिए हुए समाज में, उसी के अनुसार आचार व्यवहार करने के लिए तैयार की जाती है, ऐसा न करने पर विवश बनाई जाती है या बहिष्कृत की जाती है. ऐसी निर्मित स्त्री से उसका मनोवांछित समाज रच ले जाने की अपेक्षा करना थोड़ा ज्यादा लग सकता है. परंतु यह निर्मित स्त्री भी अपने प्रयत्नों में सहज सामाजिक संबंधों के निर्माण और निर्वाह की तरफ जाना चाहती है. जैसा कि हम उपर्युक्त कहानी की प्रमुख पात्र सोमा बुआ में देख सकते हैं.

दरअसल यह अनुकूलन प्रायः ही स्त्री को सुख और संतुष्टि की तरफ नहीं ले पाता. उसे तयशुदा जीवन के अगल बगल कुछ और चाहिए, जो उसकी आकांक्षा से जुड़ता हो, जो उसके मन के निकट हो, जिसमें उसके स्वत्व की भागीदारी हो, जिसमें मानवीय जीवन की बुनियादी गरिमा शामिल हो, उसकी बुद्धि और समझदारी की भी एक जगह बनती हो, इसी दुनिया के भीतर उसकी अपनी तरह की नितांत निजी और नितांत सामाजिक दुनिया भी हो. यह छटपटाहट तब और भी मुखर हो उठती है जब मातृत्व का पद उसके हाथ से जा चुका होता है और अब वह इस समाज के भीतर निरे खाली हाथ, समाज के गणित में शून्य साबित की गई की तरह खड़ी हो. तब नए सिरे से स्त्री अपने जीने की जद्दोजहद में राह बनाती सामाजिक संबंधों के निर्माण और निर्वाह की तरफ जाना चाहती है. वह समाज से अपने इस अतिरिक्त श्रम के एवज में अपनी पहचान और अपनी जगह की मांग करती है. यह समझते हुए भी कि यह समाज उसका बनाया नहीं है, वह इसी में अपनी जगह तलाशती, संबंधों को नए रूप में सिरजती, जीवन को अपने पक्ष में कर लेना चाहती है. यदि हम इस परिप्रेक्ष्य में सोमा बुआ को रख कर देखेंगे तो वे एक भौतिक प्राणी की प्रतिकूल बना दी गई परिस्थितियों के बीच की जा रही बेहद मानवीय कोशिशों की तरह पढ़ी जायेंगी.



मन्नू भंडारी की उपर्युक्त कहानी उनके दूसरे कहानी संग्रह ‘तीन निगाहों की एक तस्वीर’ में संकलित है. यह संग्रह सन् 1958 में प्रकाशित हुआ था. तात्पर्य यह है कि कहानी में वर्णित परिस्थितियाॅ साठवें दशक के उत्तरार्ध की अथवा उससे पहले की हैं किंतु स्त्री के लिए यह स्थिति कमोबेश आज भी ज्यों की त्यों बनी हुई है. सहज भाषा में रची गई यह कहानी पितृसत्तात्मक सामाजिक संरचना के भीतर अकेली बना दी गई स्त्री के साथ साथ समाज संरचना की बारीक पड़ताल भी एकदम चुपचाप तरीके से करती चलती है.  उपर्युक्त कहानी की प्रारम्भिक तीन पंक्तियाॅ स्त्री जीवन का पूरा समाजशास्त्र अपने में समेटे हुए हैं –
‘‘सोमा बुआ बुढिया हैं/ सोमा बुआ परित्यक्ता हैं/सोमा बुआ अकेली हैं.’’ स्त्री को अकेला बना देने के दो सबसे बड़े कारण यहाॅ दिए हुए हैं- ‘बुढ़िया और परित्यक्ता’. यदि दोनों एक साथ हैं तो यह अकेलापन कई गुना भारी है. तो क्या इन दोनों कारणों के नहीं होने पर स्त्री अकेली नहीं है? कुछ देर को यह भ्रम हो सकता है कि भरे पूरे परिवार के बीच स्त्री किसी भी प्रकार के अकेलेपन से दूर हो जायेगी, पर ऐसा है नहीं, क्योंकि पूरी संरचना स्त्री के विरूद्ध कुछ इस तरह से है कि वह कभी भी अकेली बना दी जा सकती है अथवा प्रायः ही अकेली है, असंगठित है, घर के भीतर भी और घर के बाहर भी. असंगठित होने के कारण अशक्त भी है और बेचारी भी. इसलिए यहाॅ उपर्युक्त दोनों शब्द स्त्री जीवन की समाजशास्त्रीय व्याख्या करने के लिए अपनेआप में प्र्याप्त हो जाते हैं.

पहला कारण है सोमा बुआ का बुढ़िया होना. ‘बुढ़िया’ हो जाने का अर्थ केवल शारीरिक रूप से अशक्त हो जाना भर नहीं है, क्योंकि हम पाते हैं कि सोमा बुआ लगातार सक्रिय हैं. बुढ़ापे के बावजूद वे लोगों के घरों में होने वाले बड़े बड़े आयोजनों में घरेलू कामों में उनकी मदद करने पूरे मन से पॅहुच जाती हैं. लोगों को उनकी मदद लेने में कोई गुरेज भी नहीं है, पर उनकी इस पूरे मन से की गई मदद अर्थात श्रमशीलता का कोई सम्मान नहीं दिखता. न ही स्त्री द्वारा इस किए गए अतिरिक्त श्रम से, स्त्री की कोई जगह समाज निर्धारित करता है. दरअसल ‘बुढ़ापा’ स्त्री जीवन को एक भिन्न अर्थ में भी अकेला करता है. वह स्त्री जीवन की अर्थवत्ता के लिए तय किए गए सौंदर्य के मानदंडों को ‘बुढ़ापा’ आते ही खो देती है, साथ ही संतानोतपत्ति की उपयोगिता भी. परिणामतः वह पुंसवादी समाज के लिए व्यर्थ मान ली जाती है. और उसका श्रम एक मजदूर अथवा दास के श्रम से अधिक नहीं गिना जा सकता है. इस तरह उसके श्रम का सदा ही अवमूल्यन किया गया. इसलिए अपनी तय सामाजिक भूमिका के नकार को मिटाने के लिए, वह जो अपने श्रम द्वारा संबंधों के निर्माण की तरफ जाना चाहती है, समाज उसे उचित सम्मान नहीं दे पाता. यद्धपि समाज उसके श्रम का उपयोग अपने लाभ के लिए कर लेता है परंतु मूल्यांकन करते समय उसे उसका उचित स्थान नहीं देना चाहता बल्कि श्रम की मानवीय गरिमा भी नहीं प्रदान करना चाहता है.

 सन् 1934 में ही महादेवी वर्मा ने अपने निबंध ‘हिंदू स्त्री का पत्नीत्व’ में बहुत साफ शब्दों  में भारतीय स्त्री की सामाजिक स्थिति की बात कह दी थी- ‘‘ भारतीय स्त्री की सामाजिक स्थिति का इतिहास भी उसके विकृत से विकृततर होने की कहानी मात्र है. बीती हुई शताब्दियां  उसके सामाजिक प्रासाद के लिए नींव के पत्थर नहीं बनीं, वरन् उसे ढहाने के लिए वज्रपात बनती रही हैं. फलतः उसकी स्थिति उत्तरोत्तर दृढ़ तथा सुंदर होने के बदले दुर्बल और कुत्सित होती गई.’’2. स्त्री श्रम, आज के आधुनिक समाज में भी एक जटिल स्थिति है. उसके श्रम का दोहन भी होता है और समाज उसे श्रमिक के रूप में मान्यता भी नहीं देता. यहां  तक कि उसके श्रम को अतयंत नगण्य की श्रेणी में डाल दिया जाता है. जबकि उसके हिस्से श्रम का अधिकतम भाग है. सीमान द बोउवा ने समाज के भीतर स्त्री श्रम की इस जटिलता पर गहराई से विचार किया और कामकाजी स्त्रियों की स्थिति को अधिक जटिल पाया. वे लिखली हैं कि ‘‘ फैक्ट्री में काम करने के कारण जो आर्थिक स्वतंत्रता उन्हें मिली है, उससे इनकी घरेलू जिंदगी का बोझ  कम नहीं हो जाता. उन्हें न समाज और न अपने पति से वह सहारा मिल पाता है, जिससे वे यथार्थ जीवन में पुरूष के बराबर हो सकें.’’3.

इसतरह समाज वृद्ध स्त्री के श्रम का दोहन करने के बावजूद उसे स्वीकरता नहीं है. लगातार उसका अवमूल्यन करता और उसके अपने सामाजिक संबंध निर्माण की प्रक्रिया को बाधित तथा खारिज करता चलता है. तथापि स्त्री की जीजिविषा और सामाजिक प्राणी होने का उसका प्रकृत्ति प्रदत्त दावा उसे इस विरूपता से टकराने के लिए उत्प्रेरित करता ही है. वृद्ध होने से उसका मनुष्य होना झूठा नहीं पड़ सकता. अतः बार बार लहूलुहान होकर भी वह मानवीय आकांक्षाओं से उतनी ही युक्त बनी रहती है और अपने परिश्रम से अपना समाज बनाना चाहती, जितना कोई भी सामाजिक प्राणी कहा जाने वाला मनुष्य चाहेगा. दूसरी स्थिति ‘परित्यक्ता’ की है. यह स्थिति पहली से भी भयावह है. ‘परित्यक्ता’ की स्थिति हीनतर स्थिति है. समाज द्वारा तय की गई सुरक्षा की गारंटी ऐसी स्त्री के हाथ से छिन चुकी है. वह निरूपाय और बेबस मान ली गई है, जबकि बेबस है नहीं. वह सोमा बुआ की तरह श्रमशील हो सकती है या आज की स्त्री की भाॅति आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर. यद्धपि आर्थिक आत्मनिर्भरता ने स्त्री को पहले से कुछ मजबूत स्थिति में ला खड़ा किया है और परित्यक्ता जैसी स्थिति में वह अपने जीवन को ठीक ढंग से जी सकने में सक्षम हुई है तथापि समाज में आज भी परित्यक्ता के लिए नकारात्मक सोच बनी हुई है.

 सोमा बुआ का समय तो साठ के दशक का पूर्वार्द्ध या उससे कुछ पहले का है जब स्त्री के लिए शिक्षा के द्वार तो खुल गए थे परंतु आजीविका के विविध साधनों में उनका प्रवेश नगण्य था। इसलिए अतिरिक्त श्रम के बावजूद सोमा बुआ की आजीविका का कोई बेहतर और नियमित प्रबंध एक समस्या ही है और सोमा बुआ की स्थिति प्रछन्न परित्यक्ता की है भी नहीं. वे अपनी आजीविका का इंतजाम जैसे तैसे करने में लगी रहती हैं परंतु उनके इस संघर्ष में एक और दुखद यर्थाथ जुड़ा है- पुत्र शोक का. उनके पति ने पुत्र के देहांत के बाद सन्यासी का जीवन अपना लिया था.हर साल एक महीने के लिए उनके पति, उनके पास आकर रहते थे. लेकिन पति के रहने पर उनका अकेलापन दूर होने की बजाय और बढ़ जाता था. कारण कि ‘‘ पति के स्नेह हीन व्यवहार का अंकुश उनके रोजमर्रा के जीवन की अबाध गति से बहती स्वच्छंद धारा को कुंठित कर देता. उस समय उनका घूमना, फिरना, मिलना जुलना बंद हो जाता और सन्यासी जी महाराज से तो यह भी नहीं होता कि दो मीठे बोल बोल कर सोमा बुआ को एक ऐसा संबल ही पकड़ा दें, जिसका आसरा ले कर वह उनके वियोग के ग्यारह महीने काट दें.’’ 4.पति के साथ दुख बाॅटना भारतीय समाज में प्रायः एक कल्पित स्थिति है. यद्धपि आज कहीं कहीं बहुत नगण्य
ही पर स्थिति कुछ बेहतर की तरफ बढ़ी है परंतु अब भी मित्रता की सुखद स्थिति में नहीं पॅहुच पाई है.

 दूसरे  बुआ के सन्यासी पति की उपस्थिति में उनकी जीवन गति का निषेध हो जाता है. उनका घूमना, फिरना, मिलना जुलना बंद हो जाता है अर्थात जिंदगी ठहर कर सन्यासी जी के इर्द गिर्द केन्द्रित हो जाती है. सामाजिकता से कट जाना और पति का संग साथ भी न मिल पाना दुखी और अकेली सोमा बुआ के लिए कितना बोझिल बन जाता है, इससे सन्यासी जी को कोई सरोकार नहीं है. बल्कि किसी न किसी बात पर ताने मार कर वे, उन्हें नियन्त्रित करने का प्रयत्न भी वे करते ही रहते हैं। पति के जाते ही सोमा बुआ की दिनचर्या का यह रूका बाॅध टूट जाता है और आस पड़ोस के सुख दुख में शामिल हो कर अपना जीवन काटने की कोशिश करने लगती हैं. पति के संग का यह दुखद यर्थाथ भारतीय दाम्पत्य के खोखले आदर्श के रेशे उधेड़ देता है। इस दुःसह पति संग और पुत्र वियोग दोनों को भुलाने का उपाय भी बुआ के पास अपने श्रम के बल पर समाज में शामिल होने के प्रयत्न में छिपा है. इसके लिए वे किसी पास पड़ोस के बुलावे का इंतजार नहीं करतीं. अपने घर के न रहने पर पूरा मोहल्ला उनका घर है. बिन बुलावे के उनकी यह उपस्थिति बड़ी मर्मभेदक है.

 यह स्त्री की, समाज के भीतर जीने की बेहद मानवीय इच्छा है. इसलिए बुलावा न भेजने पर वे पड़ोस को माफ करती रहती हैं और उपाय भी क्या है? यह माफ कर देना एक तरह से स्वयं को दिलासा देना है कि सामाजिक उपेक्षा दरअसल जानबूझ कर नहीं की गई है. इस दिलासा में वे अपना होना भी खोजती चलती हैं – ‘‘ बेचारे इतने हंगामे में बुलाना भूल गए तो मैं भी मान करके बैठ जाती ?….. मैं तो अपनेपन की बात जानती हूँ ….. आज हरखू नहीं है इसी से दूसरों को देख देख कर मन भरमाती रहती हॅू.’’ 5. और बुआ राधा भाभी के आगे फूट फूट कर रो पड़ती हैं. यह रो पड़ना बुआ के भीतर गहरे धंसे सामाजिकता के खोखले सत्य को खोल देता है. अर्थात बुआ के आगे उपेक्षा का यह यर्थाथ भ्रमात्मक नहीं है. लाख उपेक्षा के बावजूद यह पास पड़ोस ही है, जो बुआ के जीने का सहारा है न कि पति का संग साथ. पति की दुनिया एक समानान्तर संसार है, जिसमें पत्नी की जगह नहीं है. परंतु गृहिणी धर्म में उनकी जरा भी लावरवाही सन्यासी जी को बर्दाश्त नहीं है.

भारतीय दर्शन में वैराग्य एक ऐसा यूटोपिया है, जो सबसे पहले पुरूष के निकट स्त्री सत्य को वज्रय बनाता है।.इसतरह एक बड़े सामाजिक यर्थाथ के बीच बनने वाले उत्तरदायित्व से पुरूष को मुक्त कर देता है. इसी के साथ पितृसत्ता का वह आत्मविश्वास भी उन्हें प्राप्त है जो समाज के बीच बुआ के प्रयत्नों को उपहास्यास्पद और अंततः व्यर्थ मान कर चलता है. वे वैरागी जरूर हैं पर खासे दुनियादार भी हैं. समाज को अच्छी तरह समझते तो हैं पर मनुष्य के सुख दुख में शामिल नहीं होना चाहते. बल्कि संयास ले कर पुत्र शोक से उत्पन्न यथार्थ की समस्याओं से भी भागते हैं. अपने दुख को वे संयास की महिमा से मंडित कर के जी रहे हैं और सोमा बुआ का दुख ? इसके लिए उनके पास सांत्वना का कोई शब्द नहीं है.  इस तरह घर और समाज दोनों तरफ से बुआ के हिस्से में अकेलापन ही आता है. इस अकेलेपन से जूझती बुआ क्या समाज के बीच अपनी पूर्णता को खोजना चाहती हैं ? या कि समाज द्वारा प्रदत्त मातृत्व पद में स्त्री की अंतिम परिणति को खो देने के कारण अपनी अपूर्णता को ढकने की कोशिश में लगी हुई हैं ? समाज का व्यावहारिक गणित ऐसी स्त्री में कोई भविष्य नहीं देखता, जो परित्यक्त है और जिसका पुत्र नहीं रहा. क्या सोमा बुआ ऐसी ही प्रदत्त सामाजिकता की शिकार नहीं हैं ? फिर सोमा बुआ की इन कोशिशों के परिणाम क्या निकल सकेंगे ?

मुझे बार बार ऐसा लगता है कि सोमा बुआ अपनी इन कोशिशों से लगातार एक निहायत मानवीय और अपना मनचीता समाज, जिसमें स्त्री सहज, स्वाभाविक रूप से अपने व्यक्तित्व के साथ शामिल हो सके, रच डालने की जिद में लगी हैं. यह जिद उन्हें कई बार बेचारा बना डालती है पर हर बार व्यवस्था के विरूद्ध, स्त्री के लिए तय कर दी गई सामाजिकता के विरूद्ध और उसके जीवन की निर्मित की गई सामाजीकरण की प्रक्रिया के  विरूद्ध  भी उन्हें खड़ा कर देती है. उनकी इन कोशिशों में लगातार हार है, परंतु यह हार उन्हें फिर भी समाप्त कर डालने तक नहीं पहचानती बुआ, जो अपना बेटा खो चुकी हैं, अपने पति द्वारा त्याज्य जैसी स्थिति में हैं, समाज उन्हें बार बार तिरस्कृत करता है, फिर भी क्या है, जो उन्हें हर बार पिछले को भूल कर नई कोशिशों के लिए तैयार कर देता है ! वे दुख की नदी में अपने को डूब मरने के लिए नहीं छोड़तीं. लगातार अपने को सामुदायिक हलचलों से जोड़े रखती हैं. यहां  वे, आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के समाज के भीतर किए गए महत कर्म को बड़ा तप मानने जैसे तर्क के साथ बड़ा तप करती दिखती हैं. ‘‘एकांत का तप बड़ा तप नहीं है. समाज में जाओ.’’ आचार्य जी की यह बात बुआ पर खरी उतरती है. इसीलिए तो एक धक्के केे कोई सप्ताह भर बाद ही वे जीवन से फिर जुड़ जाती हैं और प्रसन्न मन से संयासी जी से कहती हैं -‘‘ सुनते हो, देवर जी के ससुरालवालों की किसी लड़की का संबंध भागीरथ जी के यहां हुआ है. वे सब लोग यहीं आ कर ब्याह कर रहे हैं. देवर जी के बाद तो उन लोगों से कोई संबंध ही नहीं रहा, फिर भी हैं तो समधी ही. वे तो तुमको भी बुलाये बिना नहीं मानेंगे. समधी को आखिर कैसे छोड़ सकते हैं?’’ और बुआ पुलकित हो कर हंस  पड़ीं.’’6.

 यह है बुआ के भीतर गहरे पड़े दुख में भी सांस लेने की इच्छा. जीवन का उत्साह, उमंग, इच्छाएं, हरा भरा सब दबा पड़ा है उनमें. वे कुछ देर को अपना दुख भूल कर, दूसरों के सुख में प्रसन्न हो जाने की सामर्थ्य रखती हैं पर संयासी जी नहीं. इन्हीं छोटे छोटे क्षणों में उनके भीतर का दबा कुचला जीवन अपनी झलक दिखला जाता है. शादी में जाने की तैयारी का हुलास बुआ में भी कम नहीं है- ‘‘ गली में बुआ ने चूड़ीवाले की आवाज सुनी तो एकाएक ही उनकी नजर अपने हाथ की भद्दी चूड़ियों पर जा कर टिक गई. कल समधियों के यहां जाना है, जेवर नहीं है तो कम से कम काॅच की चूड़ी तो अच्छी पहन ले. पर एक अव्यक्त लाज ने उनके कदमों को रोक दिया, कोई देख लेगा तो. लेकिन दूसरे ही क्षण अपनी इस कमजोरी पर विजय पाती सी पीछे के दरवाजे पर पॅहुच गईं और एक रूपया कलदार खर्च कर के लाल हरी चूड़ियों के बंद पहन लिए. पर सारे दिन हाथों को साड़ी के आंचल से ढके-ढुके फिरीं.’’ 7. स्त्रीत्व, मातृत्व और पत्नीत्व से अलग है. बुआ का लाल हरी चूड़ियों के बंद पहन कर शादी में जाने की तैयारी के लिए मन ही मन उत्साहित होना, साड़ी पीले रंग में रंगना और राधा भाभी से पूछना कि -‘‘ क्यों राधा, तू तो रंगी साड़ी पहनती है तो बड़ी आब रहती है, चमक रहती है, इसमें तो चमक आई नहीं ?’’ 8. शादी में दिए जाने वाले सामान की तैयारी करना आदि उनके भीतर की स्त्री से परिचित कराता है, जो सारे दुखों, उपेक्षाओं, तिरस्कार के बावजूद स्त्री है और विवाह में शामिल होने की अपनी बेहद सामान्य सी हुलस को ; जो कि सोमा बुआ जैसी स्त्रियों के लिए स्वीकृत नहीं है द्ध रोक नहीं पाती हैं.

यहां लेखिका ने कहानी को स्त्री के व्यक्तिगत दुख की परिधि से निकाल कर सत्रीत्व की व्यापक परिधि में खड़ा कर दिया है. किंतु यथार्थ यह है कि परित्यक्त और पुत्र शोक से ग्रस्त स्त्री के लिए जीवन की यह हरियाली समाज में छिपाने की बात है. बुआ इस छिपाने में भी कैशोर्य लज्जा का भान करा जाती हैं. बुआ को अपना मन उस समाज से छिपाना है, जिसमें शामिल होने की इच्छा के आगे समर्पित हो कर उन्होंने अपने पुत्र की एकमात्र निशानी सोने की अंगूठी को बेच दिया है. चूॅकि यह अंगूठी पुत्र की निशानी के साथ साथ उनका एकमात्र धन भी है, इसलिए समधी को रस्म के तौर पर कुछ देने का यह प्रयास, समधी को देने से ज्यादा अपने लिए कुछ पा लेना है या अपने एकांत को कुछ भर लेना अधिक है. नहीं तो राधा भाभी का सुझाया विकल्प तो था ही -‘‘ तो जाओ ही मत. चलो, छुट्टी हुई. इतने लोगों में किसे पता लगेगा कि आई या नहीं.’’ 9. पर यह विकल्प बुआ को स्वीकार्य नहीं है. फिर इस विकल्प से तो पही होना है जो स्त्री के लिए तय किया गया है. इसतरह स्त्री छूटती चली जाएगी और अपने प्राणघातक एकांत में कैद होकर रह जाएगी। बुआ को इससे इंकार है.

आखिर मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है तो स्त्री भी सामाजिक प्राणी है. परंतु पितृसत्तात्मक संरचना के भीतर उसे उनकी शर्तों पर शामिल होना है न कि मनुष्य होने के कारण. परिणामतः कदम कदम पर उसे निषेधों से जूझना है. और चूॅकि वह मनुष्य है इसलिए एक अदद अपने समाज की उसकी इच्छा अंततः नहीं मरती. सोमा बुआ की भी यह इच्छा अंततः बची रह जाती है, जो उन्हें बार बार की निराशा में भी उठा कर खड़ा कर देती है. हांलाकि इस बार हरखू की एकमात्र निशानी को नातेदारी में होने वाली शादी के उपहार पर न्यौछावर कर देने के बाद बुलावे के इंतजार में छत पर खड़ी बुआ, जो समधियों के यहां बिना बुलावे के नहीं जा सकती थीं, जिस तरह संयत बने रहने की कोशिश करती हैं और अपने निकट पसरे यथार्थ को स्वीकार कर अपनी दिनचर्या में लौटती हैं, वह विचलित करने वाला है और कोई भी सहृदय पाठक यहां  पहुंच कर बुआ से फिर उठ खड़े होने की अपील करने से अपने को शायद ही रोक पाए

संदर्भ 

1. मन्नू भंडारी की चुनी हुई कहानियाॅ, अकेली, साहित्य भंडार, इलाहाबाद, पृ. 29
2. श्रृंखला की कड़ियाॅ, महादेवी वर्मा, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, पृ. 76
3. स्त्री: उपेक्षिता, सीमोन द बोउवा, अनुवाद – प्रभा खेतान, पृ. 318
4. मन्नू भंडारी की चुनी हुई कहानियाॅ, अकेली, साहित्य भंडार, इलाहाबाद, पृ. 29
5. वही, पृ. 31
6. वही, पृ. 31
7. वही, पृ. 33
8. वही, पृ. 34
9. वही, पृ. 33

इक्कीसवीं सदी का कचरा यानी टिक टिक करता टाइम बम

गरिमा भाटिया

केमिकल इंजीनियरिंग में पी च डी. नेचर कंजर्वेशन फाउंडेशन में कार्यरत. प्रकृति से गहरा लगाव और फोटोग्राफी से भी. ई मेल- garima_bhatia@yahoo.com

पिछले कुछ वर्षों से निश्चिरूप से पर्यावरण के बारे में जागरूकता काफी बढी है और यह शुभ संकेत है – विशेषकर भारत जैसे आबादी बहुल देश के लिए , जहाँ कृषि और उद्योग के कारण धरती पर बहुत अधिक दबाव पड़ता है और इस दबाव के दुष्प्रभाव  खतरनाक होते है. ऐसी स्थिति में पर्यावरण के मुद्दे को गंभीरता से लेने की जरूरत है ताकि आने वाली पीढी के लिए हम अपने इस सबसे सुंदर ग्रह पृथ्वी को सुरक्षित रख सकें.
एक पुराना जुमला है- ‘We do not inherit the Earth from our ancestors ;
we borrow it from our children!’ धरती हमारे पुरखों की अमानत नही है बल्कि हमारे अपने बच्चों का कर्ज है हमपर. हमारा हर एक छोटा कदम हमारी धरती और इसके भविष्य को प्रभावित करता है. अगली पीढ़ी के लिए यह हमारा कर्तव्य है कि अपनी पीढ़ी के द्वारा पैदा की गई समस्यायों को सुलझाएं. आइये , इस संदर्भ में हम अपने आसपास के पर्यावरण का और धरती के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी का आकलन करे.आमतौर पर, पर्यावरण पर हमारी चर्चा शहरों के प्रदूषण और स्वच्छता को लेकर शिकायत के तहत होती है कि कैसे हर छोटी से छोटी जगह कूडे-कचरे से अंटी पडी है. हम फुटपाथ पर चल रहे हैं और वहां केले संतरे के छिलके , कागज और चॉकलेट बिस्कुटों के प्लोस्टिक रैपर हवा में उड रहे हैं, रिहायशी इलाकों में सडक के किनारे किनारे कूडे कचरे का गंधाता ढेर लगा हुआ है, सरकार और म्यूनिसिपैलिटी इसे नियंत्रित करने के लिए कितना कम प्रयास कर रही है और हम नाक पर रूमाल दबा कर आगे बढ जाते है. अगर हम एक पल रूककर इस पर सोचें तो पाएंगे कि ऐसा बहुत कुछ है जिसे एक जिम्मेदार नागरिक के रूप में हम स्वयं करके स्थिति को बेहतर बना सकते है.
आइये, हम अपने समय की गंभीर समस्याओं में से कुछ की जांच पडताल करें जिन्हें छोटे स्तर पर ही सही लेकिन गंभीरता से किये गये महत्वपूर्ण प्रयासों से हम दूर कर सकते है.

कितनी प्लास्टिक थैलियां दिन में लेते हैं हम ?

आप रोज सब्जियां या फल खरीदने जाते हैं और हर बार अपने घर से कपडे की थैली या एक झोला लाना भूल जाते हैं, सब्जीे वाला धडाधड एक एक सब्जी अलग अलग प्लास्टिक की थैलियों में बांधकर आपको पकडा देता है , घर आते ही मिनट भर में यह प्लास्टिक कचरे का हिस्सा बन जाता है. आप बडे बडे मॉल से सामान खरीदते हैं, दाल से लेकर मसालों तक सबकुछ आपको प्लास्टिक की थैलियों में सील किया हुआ मिलता है. कई मायनों में सुविधाजनक लगने वाले प्लास्टिक और प्लास्टिक की पैकेजिंग ने हमारे आधुनिक जीवन को बीमार बना दिया है. प्लास्टिक एक ऐसी चीज़ है जिसे पूरी तरह नष्ट होने में एक हजार साल लग सकते है. फिर भी हम इसका अंधाधुंध इस्तेमाल करते हैं और इधर-उधर  सड़क पर फेंक देते हैं जिसके खाने से सड़क चलती भूखी गायों की दर्दनाक मौत हो जाती है. ऐसे कई हादसों  में गायों की आंतों से पंद्रह से पैंतीस किलो प्लास्टिक निकाला गया. अगर गाय इसे नहीं खाती तो यह इधर उधर फैले रहते है. इसमें व्याप्त रसायन भूजल में रिस जाते हैं जिससे पानी जहरीला हो जाता है और कई तरह के रोग फैलने लगते है. भारी बरसात में प्लास्टिक से अक्सर नालियां जाम हो जाती है. यदि प्लास्टिक प्रबन्धन पर ध्यान दिया गया होता और मीठी नदी ,जिसमें मुंबई का बरसाती पानी प्रवाहित होता है, प्लास्टिक से जाम न हुई होती तो मुम्बई में सन् 2005 की मूसलाधार बारिश का इतना खतरनाक दुश्प्रभाव न होता. ऐसी समस्याओं की सूची बहुत लंबी है. प्लास्टिक का कचरा इतना खतरनाक है कि सुप्रीम कोर्ट को अन्ततः यह कहना पड़ा कि यह ‘टिक टिक करता हुआ टाइम बम’ है जिस पर शहरों के नागरिकों को तत्काल ध्यान देने की सख्त जरूरत है.

प्लास्टिक के बैग जिनका उपयोग हम सब्जी आदि खरीदने में करते हैं और काम पूरा होते ही उसे फेंक देते हैं, पर्यावरण के असल अपराधी है.  जिन प्लास्टिक बैग पर बायोडिग्रेडेबल प्लास्टिक का लेबल लगा हो उसे पर्यावरण फ्रेंडली मान कर भ्रमित नही होना चाहिए. यह भी आम प्लास्टिक जितना ही खतरनाक है. बिना सोचे समझे प्लास्टिक के बैग इकट्ठे करते जाने से बेहतर है कि जब भी सौदा सुलुफ खरीदने आप बाहर निकलें तो एक कपड़े का झोला साथ ले लें ताकि प्लास्टिक के भयावह उपयोग से बचा जा सके. अगर आपके पास कोई बैग नहीं है तो किसी भी दर्जी से , घर के बचे हुए कपडे से , ऐसा बैग सिलवाया जा सकता है. इसके अलावा तहा कर रखने वाले कुछ उपयोगी बैग होते हैं, जो पर्यावरण के अनुकूल और देखने में सुन्दर होते है.  ऐसे बैग उन कामगार ग्रामीण औरतों को फायदा पहुंचाते हैं जो उन्हें बनाती हैं. पांडिचेरि के एक गैर सरकारी संगठन – स्माॅल स्टेप्स द्वारा एक शुरुआत की गई है। यह संगठन ऐसा झोला बनाता है जिसे तहाकर पर्स में रखा जा सकता है. इसमें एक हुक लगा होता है जिससे इसे आसानी से बेल्ट में भी लगाया जा सकता है. ऐसा झोला मैं हमेशा अपने साथ रखती हूं , कुछ मेरी गाडी में भी पड़े रहते है. मैं बिना इस कपड़े वाले बैग के कभी बाजार नही जाती. इस संस्था ने मुझे यह नायाब सौगात दी है. मैं अपनी मित्रों को भी इन्हें उपहार में देती हूं.

कचरा – नाॅट इन माय बैकयार्ड सिंड्रोम

हममें से जो लोग शहरों में रहते हैं ,उनकी सोच कचरे को लेकर कुछ अजीब सी होती है. वे मानते हैं कि बस मेरे घर के आंगन में कचरा दूर रहे. ( अंग्रेजी में इसे NIMB सिंड्रोम कहते हैं – नॉट इन माय बैकयार्ड ) हम काले रंग की प्लास्टिक की थैली में अपना गंधाता कचरा डाल देते हैं और देख नहीं पाते कि उसके अंदर क्या है. एक बार जैसे ही यह कचरा और दुर्गंध हमारे घर से बेदखल कर दिया जाता है,  उसके बाद इस कचरे का क्या हश्र होता है, यह सोचना न हमारे सरोकार का हिस्सा है, न हमारी जिम्मेदारी में शामिल है. बेशक यह किसी और की समस्या बन जाए, उससे हमें फर्क नहीं पडता. हम यह जानना ही नहीं चाहते कि आगे इस का क्या होता है. हमारे लिये यह बडे इत्मीनान से किसी और की समस्या बन जाता है. हमारे अपने शहरों में बिखरा कचरा कितना खतरनाक हो सकता है, इस विषय पर हम कभी विचार नहीं करते जबकि हम स्वयं इस शहरी गन्दगी का एक हिस्सा है. क्या हम इस समस्या का एक हिस्सा है ? जवाब है – हां ! शत प्रतिशत ! फिर इन स्थितियों को बदला कैसे जाए ? जबकि इससे हमारे हाथ गन्दे हो रहे है. इसके समाधान के लिए सरकार या नगरपालिका का इंतजार करना गलत है. समय आ गया है कि हम अपनी नागरिक जवाबदेही को समझते हुए इसको निपटाने की जिम्मेदारी खुद ले. इसके लिये सबसे पहली जरूरत है कि हम यह जानने और समझने की कोशिश करें कि कचरा जब हमारे घर से बाहर जाता है तो इसका होता क्या है. हमें अपने घर के कचरे की जिम्मेदारी खुद लेनी चाहिए जो हमारा पैदा किया हुआ है. जो कचरा हमारे घरों से आता है – वह गांव या शहर के बाहर की खाली जमीन पर फेंका जाता है ,जिसके आसपास रहने वाले वाशिन्दों को हर तरह से नुकसान पहुंचता है.

इस्तेामाल कर फेंके गये अंधाधुंध प्लास्टिक, जैवप्रदूषक, मिश्रित कचरे से पैदा हुए रसायन – केमिकल्स – कई तरह की बीमारियां पैदा करते हैं और जमीन की तलहटी मे पानी के साथ मिलकर पीने के पानी तक को प्रदूषित कर देते हैं. ऐसा पानी न घरेलू इस्तेमाल  लायक रहता है, न पीने लायक. जिनके घरों के नजदीक कूड़े का विशालकाय ढेर पूरे पर्यावरण को प्रदूषित कर रहा है, वहां के वाशिंदे बताते हैं कि जहां पहले चिडियां चहचहाती थीं और साफ़ सुगंधित हवा बहती थी,  अब एक परिंदा भी उस जमीन पर नहीं दिखता. वे भी उड़कर साफ हवा और हरे भरे वातावरण में चले जाते हैं, पर वहां के इंसान कहां जाये. उन्हें तो उसी प्रदूषण में रहना पडता है. उनकी तो कहीं सुनवाई तक नहीं है. इस दुष्चक्र को बदलने के लिए हमें कचरे के प्रति अपनी मानसिकता बदलनी होगी. वस्तुतः जिसे हम खराब कहकर अपदस्थ कर देते हैं, उसमें से कचरा कुछ भी नहीं होता. फेंकी जाने वाली हर चीज का मूल्य होता है. जो खाद्य पदार्थ – केले, पपीते, फलों और सब्जियों के छिलके हम फेंक देते हैं, उन्हें पेड-पौधों के उपयोग में आने वाली बेशकीमती खाद के रूप में तब्दील किया जा सकता है. इन छिलकों को अगर हम घर के एक गमले में मिट्टी की तहों से दबाकर रखें तो तीन से चार सप्ताह के अंदर यह तथाकथित कचरा कीमती खाद में बदल जाता है जो पूरी तरह आॅर्गेनिक और पेड़ पौधों के लिये प्राणदायक है. प्लास्टिक और कागज हम यूं ही फेंक देते हैं, उसे भी रीसाइकल कर फिर से उपयोग में लाया जा सकता है, लेकिन उन्हें अगर खाने के अपशिष्ट पदार्थ से मिश्रित कर दिया गया तो आसानी से उसे रीसाइकल – पुनसंस्कारित – नही किया जा सकेगा.

कचरा हमारी संपति बन सकता है….


इसलिये अगर हमें कचरा प्रबंधन में जिम्मेददारी बरतनी है तो हमें अपने घर का कचरा इस तरह अलगा कर रखना होगा कि वह बाहर जाकर भी एक समस्यां और परेशानी का बायस न बने. हालांकि यह थोड़ा विचित्र लगता है लेकिन है बहुत ही आसान. अपनी रसोई में सिर्फ दो डस्टबिन रखें – एक जैवअपशिष्ट पदार्थों जैसे- तरकारी,छिलके,खुरचन,बचे हुए खाद्य अपशिष्ट एवं दूसरा सूखे पदार्थों जैसे- कागज,प्लास्टिक,धातु , पन्नी, खाद्य पैकेजिंग के रैपर. सूखे और गीले कचरे को अलग रख कर इस स्थिति से निपटा जा सकता है. सूखा कचरा किसी भी स्थानीय कबाड़ी वाले को दिया जा सकता है. आजकल  कई शहरों में ड्राई अपशिष्ट पदार्थों के लिए घरेलू संग्रह कार्यक्रम भी आयोजित किये जा रहे  है. आईटीसी इस तरह की एक कंपनी है जो, ‘‘बेकार से बहुमूल्य’’ या ‘‘कचरे से संपत्ति’’( Small Steps)जैसा कार्यक्रम चलाती है जिसमें रिहायशी इलाकों से सूखा सामान एकत्र किया जाता . इनको रीसाइकल कर वह अपने उपयोग के लिये इस्तेमाल करती है, और प्लास्टिक दूसरी कम्पनी को बेच देती है जो फेंके गये प्लास्टिक से कोलतार बनाते है, सोच कर देखें अगर आप के इस्तेमाल किये गये प्लास्टिक की तरह ही पूरे शहर में बिखरे हुए सारे प्लास्टिक का इतना ही उपयोगी इस्तेमाल हो पाता.

महिलाएं और सेनेटरी नैपकिन्स –

क्या आपने कभी सोचा है कि आप जो सेनेटरी पैड इस्तेमाल करती हैं और बाद में उसे फेंक देती हैं,उसका क्या होता है ? एक आंकड़े के अनुसार एक स्त्री अपने जीवन में औसतन 125 किलोग्राम सेनेटरी पैड का इस्तेमाल  कर डालती है. इसके फेंके या जलाए जाने से यह हानिकारक रसायन छोड़ता है. वास्तव में सेनेटरी पैड भी प्रमुख रूप से प्लास्टिक का बना होता है. एक पैड को पूरी तरह नष्ट होने में 500 साल या इससे अधिक साल लग जाते है. सेनेटरी पैड के अधिक स्वच्छ और इको फ्रेंडली – पर्यावरण स्नेही – विकल्प उपलब्ध है.  पांडिचेरी में इको फेम नाम का एक समूह है जो ग्रामीण स्त्रियों को धोने और दोबारा उपयोग मे लाए जाने योग्य सेनेटरी पैड बनाने का काम देकर उनको रोजगार देती है.

इलेक्ट्रॉनिक कचरे का निपटारा कैसे करें ?

प्रदूषण का एक अन्य प्रकार भी है, जो इलेक्ट्रानिक अपशिष्ट या ई-अपशिष्ट कहलाता है. जिसमें कोई भी इलेक्ट्रानिक सामान, जैसे-लैपटाप, पेनड्राइव, डीवीडी, फ्लापी डिस्क, सीएफएल बल्ब और ट्यूबलाइट आदि  शामिल है. दो कारणों से इन अपशिष्ट को अधिक महत्व देना जरूरी है – पहला , आजकल बड़ी संख्या में इलेक्ट्रानिक सामग्रियों का उपभोग हमारे द्वारा किया जाता है , दूसरा इन इलेक्ट्रानिक उत्पादों में बेहद विषाक्त रसायन होते हैं , जैसे सीसा और पारा ,जो स्वास्थ्य को जबरदस्त क्षति पहुंचाते है.  इनकी वजह से बच्चे जन्म से ही असामान्य या विकलांग पैदा होते है. इसलिए इस अपशिष्ट  का उचित निपटारा बहुत जरूरी है. कुछ शहरों में इन अपशिष्टों के पुनर्चक्रण का काम भी हो रहा है. घरेलू स्तर पर इन्हें फेंकते समय हम ध्यान रखें कि खाद्य सामग्री और ई-कचरा अलग-अलग रखा जाए. अगर आपने टूटा हुआ थर्मामीटर या फ्यूज हुआ बल्ब कचरे में मिला दिया तो उसका जहर पूरे कचरे को विषाक्त कर देगा और ऐसा कचरा कहीं भी डाला जाये वह अन्ततः प्रदूषित माहौल में जबरदस्त बढ़ोतरी करेगा.

पीने का पानी और बोतलबन्द पानी

पानी ही है जो हमारी सुंदर पृथ्वी को जीवन प्रदान करता है. प्रकृति द्वारा यह हमें बहुतायत में यह निःशुल्क प्राप्त है लेकिन इन दिनों शहरों मे पानी की किल्लत आम बात है. कुछ लोगों का मानना है कि अगला विश्व- युद्ध पानी के लिए ही होगा. कई इलाकों में पानी को लेकर राजनीति तेज हो गई है.  कई देश और राज्य पानी के वितरण को लेकर आपस में लड़ रहे है.  हम सब जानते हैं कि पृथ्वी का 70 प्रतिशत हिस्सा पानी ही है. अधिकांश भाग समुद्र होने के कारण यह पानी खारा होता है और पीने लायक नही होता. इसलिए पानी की बचत और शुद्धीकरण आवश्यक है, बोतलबंद पानी प्लास्टिक कचरे की बढ़ोतरी में इजाफा करता है और गैर जिम्मेदाराना ढंग से प्लास्टिक की बोतलों को फेंकने से अक्सर गंभीर समस्या उठ खड़ी होती है. अगर आप हिमालय की यात्रा पर निकलें तो प्लास्टिक की बोतलों का विशालकाय ढेर आसपास के प्राकृतिक सौंदर्य को बिगाड़ता हुआ दिखाई देगा. हाल ही के एक अध्ययन में मालूम हुआ कि प्रशान्त महासागर में, मानव आवास से दो हजार किलोमीटर की दूरी पर एक सुदूर द्वीप पर ढेर सारे परिन्दे मृत पाए गए और उनके पेट में प्लास्टिक की बोतलों के ढक्कन और नुकीले कांच थे. अन्य अपशिष्ट सागर में कहीं दूर बह गए होंगे. सच तो यह है कि बोतल बन्द पानी एक नया फेनॉमिना है और निश्चित रूप से एक अनावश्यक खरीद. आखिर हम इतने बडे स्तर पर बोतल बन्द पानी के आदी कैसे हो गए ! ज्यादातर रेस्तरां और होटलों में फिल्टर या एक्वागार्ड लगे होते हैं फिर भी वेटर को बोतल बन्द पानी ऑफर करने की जल्दी रहती है. कारण साफ है — आर्थिक मुनाफा. जो चीज होटलों और रेस्तरां को मुफ्त में देनी चाहिये उसकी भी वे कीमत वसूल करना चाहते है. बोतलबन्द पानी बेचने वाली कम्पनियां भी इसे प्रोत्साहित करती हैं क्योंकि उन्हें मुफ्त में पब्लिसिटी मिल जाती है.

हम शायद इस तथ्य से वाकिफ नहीं हैं कि इन कम्पनियों पर आरोप है कि वे धरती से अधिक पानी निकाल लेती हैं जिससे गांव में रहने वालों के खेतों की सिंचाई के लिये पानी कम पड जाता है.  बोतलबंद पानी की फैक्ट्रियों से बढ़ता प्रदूषण भी हमारे सरोकार का हिस्सा है. गांव वाले अपने सिंचाई के अधिकारों के लिये संघर्ष कर रहे है. इन तथ्यों की जानकारी आम आदमी को न हो इसके लिए ये कम्पनियां बड़ी रकम खर्च करती है. जनता को गुमराह करने के लिये हरित वातावरण स्रजन की छवि का छद्म परोसा जा रहा है. जितनी बार हम बोतलबन्द पानी की खरीद करते हैं, एक गलत प्रवृत्ति का समर्थन और गांव के खेतों के सिंचाई अधिकारों का हनन करते है. इसका समाधान आसान है ! जहाँ भी हम जाएं, हमारे साथ पानी की एक बोतल हो, और जब भी संभव हो हम इसे फिर से भर ले. प्लास्टिक की बेहिसाब खाली बोतलें फेंकने में इजाफ़ा न करे.

अपने बगीचे में अपनी बनाई खाद डालें – गृह खाद और पर्यावरण

हममें से सभी का यह कर्तव्य है कि थोड़े से प्रयास द्वारा हम अपनी खूबसूरत पृथ्वी को बचायें और जो कुछ भी न्यूनतम हमारे लिये संभव है , जरूर करे.  इस क्रम में पर्यावरण को तात्कालिक सुरक्षा देने के लिए सबसे जरूरी है – गृह खाद. खाद-निर्माण और कुछ और नहीं बल्कि कार्बनिक और बायोग्रेडेबल (जैवअपघटक) पदार्थों जैसे- खाद्य, सब्जी और फलों के छिलके, स्क्रैप, चिकन मछली की हड्डियों आदि को पोषक-युक्त खाद बनाना है ताकि इनका उपयोग हमारे पौधों और बागीचों में किया जा सके. खाद-निर्माण एक प्राकृतिक प्रक्रिया है. सूक्ष्म जीवों द्वारा समय के साथ , अपने आप ही होता है. घर पर कम्पोस्टिंग की प्रक्रिया किसी बड़े बर्तन में या कम्पोस्ट बनाए जाने वाले गडढे में या मिट्टी के हंडे में की जा सकती है. सबसे आसान और पापुलर गृह कम्पोस्ट यूनिट बैंगलोर का डेली डम्प यूनिट है, जो कम्पोस्ट बनाने वाले पाॅट ‘हंडे’ का निर्माण करता है और बेचता भी है. ये बड़े आकार वाले मिट्टी के बर्तन होते हैं जिनके ऊपर खूबसूरती से पेंट किया जाता है. देखने में भी ये आकर्षक होते है. इसमें असानी से कम्पोस्ट बनाया जा सकता है. इसके निर्माण में कोई दुर्गन्ध नही होती और इस तरह आप पर्यावरण सुरक्षा के एक योद्धा होने की खुशी और गर्व पा जाते है. मैंने अपने घर पर पिछले सात सालों तक खाद बनाई है और लैंडफिल में जाने वाला अढाई हजार किलो कचरा बचा लिया. एक बार आपने कम्पोस्ट बना लिया तो आप अपने घर के किचन गार्डेन या टैरेस गार्डेन को पनपा सकते है. ताकि आप अपनी ही बेशकीमती खाद से अपने गमलों या गार्डेन में स्वस्थ ऑर्गेनिक सब्जी खुद उगा सकें. पालक , मेथी , पोदीना , टमाटर , नीबू , हरी मिर्च तो आप गमलों में भी उगा सकते है. ऐसी सब्जियां आपको किसी दूकान या बाजार में नहीं मिलेंगी. कम्पोस्टिगं एवं गार्डेन के इस उपयोगी रिश्ते से और मिट्टी से सब्जियां उगाने की घर की खेती से आप अपने बच्चों को भी परिचित कराये. निश्चित रूप से इसमें उन्हें  किसी खेल सा आनंद मिलेगा.

ग्लोबल वॉर्मिंग – पृथ्वी को ताप से बचाएं

वैश्विक ताप के इस युग में, मौसम का मिजाज निरन्तर खराब होता जा रहा है. पृथ्वी दिन प्रति दिन गरम होती जा रही है. हमारे ऊर्जा के स्रोत कम होते जा रहे है. लगातार जल की कमी हो रही है. यह ग्रीन हाउस गैस – जो मानव द्वारा बनाए गए उद्योगों, एवं शहरी यातायात से उत्पन्न हुई हैं – से ओजोन स्तर लगातार क्षीण होता  जा रहा  है. नतीजा यह कि पृथ्वी लगातार गर्म होती जा रही है. यह ऐसी प्रक्रिया है जो अप्रत्याशित है. इन हालातों में हमे व्यक्तिगत वाहनों की जगह सामुदायिक परिवहन वाले साधनों का प्रयोग करना चाहिए. जहां तक हो जल और ऊर्जा की बचत करे. व्यक्तिगत एवं सामूहिक स्तर पर हमें पर्यावरण सुरक्षा पर ध्यान देना चाहिए.
तस्वीरें गूगल से साभार 

‘मध्यरात्रि के बीच’ और अन्य कविताएं ( कवयित्री इला कुमार)

इला कुमार

इला कुमार का पहला कविता संग्रह ‘जिद मछली की’ है । ‘किन्‍हीं रात्रियों में’ ‘ठहरा हुआ अहसास’ और ‘कार्तिक का पहला गुलाब’ ‘आज पूरे शहर पर’ आदि अब तक ५ संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं. संपर्क : ई -मेल : ilakumar2002@yahoo.co.in

मध्यरात्रि के बीच

एक रात
मध्यरात्रि के बीच
सूरज उग पड़ा
सुबह का सूर्य
रात में
आकाश के योजनों विस्तृत वक्ष पर
मनसर’ के खेतों, पेड़ों के बीच से लुकता-छिपता
उस मध्यरात्रि में
निकल पड़ा
अवतरित हुआ वह
खुले आसमान की क्रोड़ से
या
कि आसमान ही आकार ले रहा था
शनैः शनैः उसकी गोद से
किसे पता
सूरज के पास था उजाला
दर्प, आस्था, न्याय और प्रश्न
प्रश्न उसके पास थे अनंत
खेतों में बीजों के अंकुरने का प्रश्न
नदियों की सतह के वापिष्त होने का प्रश्न
प्रश्नों की आकांक्षाओं से भरे प्रश्न उसके पास थे
इससे-उससे सबसे पूछता रहा वह प्रश्न
उस रात मध्यरात्रि में
पानी की चक्रायित गति का प्रश्न
गूँज उठा विदर्भ की जमीं पर
चक्राकार योजना के बीच
घूमती थीअनवरत तब वाष्प की बूंदें
बूंदों से भरते तालाबों की छाती की सल्-सल्
उन्हीं तालाबों की जड़ों के बल पर
शेशनाग के फन पर सम्हाली-सहेजी गई
पृथ्वी के अंतर में स्थित ज्वाला की थर्-थर्
अनगिनत तत्वों से जुड़े अनत प्रश्न आकाश में मंडरा उठे
उस रात
सृष्टि की शुरुआत में सूर्य के अंदर पैठे देव ने
रची थी एक अद्भुत चक्राकार योजना
करोड़ों रश्मि किरणों के बल पर
खींच लिया करेगा वह वाष्पों के अदृश्य कण
वाष्प आवेशित कण-कण का महीन जोड़
बादलों की शक्ल लेगा
और
वे ही बादल कण हर बीज में, धन-धान्य में प्राण बन लहरा उठेंगे
आज भी अदृश्य वाष्प कणों को थामे
अपरिमित रश्मियाँ पसर जाती हैं
नवकलिकाओं के सद्यस्फुटित प्रस्फुटन के प्रथम अवगुंठन पर
कई विज्ञ जन प्रथम दृश्य बाल सूर्य को अध्र्य देते हुए उचारते हैं…
…ऊँ दिवाकरऽऽ…! ऊँ पूषाअन्नै…!
श्रुतियों, स्मृतियों का पोषणहार
अनगिनत चतुर्युगियों से पोषण का धर्म
निभाता है
लेकिन पृथ्वी का धर्म ?
वाश्प का, जल का, बूंदों का चक्र
किसने खंडित किया
थल के उर में समाए जल और गगन में पसरी रश्मियों के
अद्भुत समन्वय को
पूरी पृथ्वी पर स्थापित आचरण के
सही स्वरूप को तोड़ डाला
आखिर किसने ?
पृथ्वी, धरती, जल, बादल और संभावित जीवन से जुड़े अनगिनत प्रश्न थे
प्रश्न बहुत थे सूरज के पास
उसके प्रश्नों का जवाब पृथ्वीवासियों के पास न था
प्रश्न वही हैं
वे हीहैं
सूरज भी
धरती क्या नहीं रहेगी ?
और हम ?

धूसर धरती

धूसर धरती पर लम्बे पेड़ों के निकट
घूमती बलखाती सड़क के साथ है
नदी के बिम्ब
प्रतिबिम्ब सरीखे
पहाड़ों के पैरों से दूर
बीते दशकों की लम्बाई के पीछे ठिठककर
नदी ने फैलाई थीं अपनी बाँहें
पसारी थी अपनी काया
अद्भुत तरलता भरी
शहर आकर बसाया था उसके तटों पर
पनी मिट्टी स्थूल सूक्ष्म सभी कुछ देती रही नदी
सालों- साल
लगातार निर्मल मीठा पानी अपनी रगो में उतार
दुधमुहें बच्चों ने पाई उड़ान
सौदर्यित saashwit  काया के संग
हुए वे बच्चे युवा
नई सभ्यता के छल बल से पूर्ण
अक्ल के विस्तारित तहों के पार खड़े होकर
खरीदे उन्होंने धुंआ उगलने वाली भीमकाय मशीनें
नदी के किनारों पर खड़े किए
आसमान छूते ढांचे लोहे और स्टील के
तालाबों को मूंद बनवाए गए रिहायशी मकान
पुरानी संस्कृति/पृथ्वी की प्रथम संस्कृति
वर्षा  जल को थाती समक्ष सकने वाली संस्कृति को
समाज से विलग कर
हुए पूर्वाग्रहों से मुक्त आधुनिक जीव
नदी आज सूख गई है
शहर से मानों रूठ गई है
अगले दशकों में बिन पानी
शहर क्या बना रहेगा ?
शायद नहीं
शायद . . . .


अजन्में बच्चे

माताओं के गर्भों में
जल पर डोलते बच्चे
हाथ जोड़े पनाह माँगते हैं
जल को बचे रहने देने का आश्वासन
अपने लिए
संसार को बचाए रखने का विश्वास
चुप हैं ज्ञाता-विज्ञाता
प्रशासक लापरवाही का ताना-बाना लपेटे
नीतियों के संरक्षण में मशगूल
नेता वोट-नोट और गोट ढूंढते हुए
प्रार्थनारत बालक हैरान हैं
भयमुक्त्ता का दिखावा करते समाज का भय
मीलों लम्बा पसरा हुआ है
माता !
सिर्फ माता रातों के बीच कालिमामयी रात्रि देखती हुई जगती है

ध्यान में बैठ गुनती है
त्राण-परित्राण के रास्तों को गुहारती है
अक्षमता स्वयं को, अपने को तौलती है
कल शायद
भविष्य  पर छाया हाहाकार छंट जाएगा
लेकिन आज चिंता में  डूबी माता
माता की माता
नवजात शिशुओं और अजन्में बच्चों के बारे में सोचती है
किन्तु नदी अभी नही दिखती है
एक दिन बरसाती कहर बन
तट पर बसे शहर को लील जाएगी
भयमुक्त होगी एक बार फिर
नदी!

बढ़ने के क्रम में

बढ़ने के क्रम में
वह
हवाई जड़ों को तना बनने देता है
अपनी नई जड़ों के बल पर सारी जमीन पर छा जाने के लिए
जिस पृथ्वी को पूर्वज वराह कभी सात समुद्रों के बीच से
निकाल लाए थे
उसी पृथ्वी को
अपने पत्तों के बल पर वह
हरी पृथ्वी में बदल देना चाहता है
पृथ्वी
जो महाजलप्लावन के बाद
आज से एक अरब बेरानवें करोड़ वर्ष पहले जल से बाहर
निकल आई थी
अब सात मन्वन्तरों के बाद
उसे
एक बरगद
अपने पत्तों के बल पर
ढांक लेना चाहता है
बीत चुके चतुर्युगियों की याद बरगद को नहीं है
उसे इस सत्य से भी कोई सरोकार नहीं
कि
किस चतुर्युगी में शिव ने संहार किया
और ब्रह्मा ने सृष्टि
बरगद की रुचि नहीं है
बीते हुए मनवन्तरों के लेखा जोखा रखने में
सेतुबंध के राम उसकी दृष्टि की परिधि पर अभी नहीं हैं
कृष्णावतार, यशोदा और ब्रजभूमि की ओर वह नजर डालना
नहीं चाहता
वह
मदुरै की मीनाक्षी और सुरेश्वर के बारे में कुछ भी नहीं सोचता
बरगद
शेषाचल के श्रीनिवास और पद्मावती के बारे में भी
अनजान बना रहना चाहता है
उसे अपने जड़ों पत्तों और डालियों के बढ़ने की चिंता है
उसे

पृथ्वी की चिन्ता है
पृथ्वी के क्षत विक्षत मानस को वह हेरता है
उसके सफेद दूध पर
भविय में
पृथ्वी के ऊपर टिककर खड़ी
प्लास्टिक की पृथ्वी का बिम्ब उभरता है
अन्य सभी अन्यायों से वह
वेन पृथु की पृथ्वी को बचा ले जाना चाहता है
अपने पत्तों के बल पर
हरी पृथ्वी रचने के क्रम में
बरगद
डाली दर डाली, पत्ता दर पत्ता आगे बढ़ता है
नए बिम्बों को रचते हुए
एक से अनेक हो उठता है
एकोऽहं बहुस्यामि के
ब्रह्म की तरह


कहा मैंने शहर से

कहा मैंने शहर से
‘‘जगह दो नदी को
बहने दो उसकी निश्च्छल, उज्ज्वल धारा को
पूरने दो कलेजा धरती का’’
नहीं दी नगर ने जगह नदी को
अपनी ऊँची इमारतों के पांवों को धंसने दिया
नदी के सकुचाए तटों पर
कंक्रीट के चौड़े सीमेंटी पटरों से पाट दिया बहती धारा की छाती को
कहा मैंने गृहवासियों से
‘‘जगह दो नदी को
बहने दो उसकी कल कल उज्ज्वल धारा को
नम होने दो धरा को’’
नहीं दिया गृह धारकों ने जगह धारा को
धरा को घेर-घेर बना लिए एक मंजिले-दुमंजिले मकान
सिकुड़ गई नदी बंटती रही उपधाराओं में
नाली जैसा रूप धर कर
इधर से उधर डोलती रही
कहा मैंने बार-बार
बहुतों से बहुत बार
सुनी नहीं उन्होंने मेरी बात
रुचि नहीं उन्हें मेरी गुहार
उनमें से कई हुए नाराज
मेरी अन-अपेक्षित दखलअंदाजी पर उन्हें था गहरा एतराज
नाराज मैं रही लगातार

नगर, शहर और ग्रामवासियों से
उनकी निर्मम लापरवाही से
बीतते दशकों के बीच वर्शों के हुजुम आगे बढ़ गए
मनुष्य आसुरत्व के बीच ठिठके रहे
अब धरा है नाराज
नगर-डगर, धूप-छांव के बीच प्यासे डोल रहे
थलचर, नभचर, जलचर
जल चाहिए सबों को !
वाकई
जल हम सबों को चाहिए, कुछ घंटों के अंतराल पर
प्यास से कंठ सूख जाता है रह-रह कर
नाराज नहीं है अगर
तो वह है नदी
हल्की बारिश होते ही वह झिलमिला उठती है
वरना वह तो सूख गई है
जमीं के नीचे जाकर बैठ गई है
समाज, सभ्यता और संस्कृति को पोषित करने वाली धारा
लुप्त हो गई है
लोग जल खोजने निकल पड़े हैं चंद्रमा और मंगल पर
लेकिन वहाँ नहीं है नदियों के पैरों की नम्र छाप
जल को तलाशते मनुष्यों के हाथ-पैर और मन-प्राण
ब्रह्मांड में भटक रहे हैं

तो हत्यारे जीत जायेंगे….!

निवेदिता 


आज से 19 साल पहले चन्द्रशेखर मारा गया था. 19 साल बाद सीवान फिर गहरे सदमें,दुख और गुस्से में है. पत्रकार राजदेव रंजन की हत्या ने पुराने जख्मों को ताजा कर दिया. मेरी आंखों में वे दिन रिसने लगे हैं. दिल बैठ गया है. जैसे भीतर की घड़ी चलना बंद हो गयी हो.  सिर्फ लहू का शोर धमनियों में सुनाई देता रहा. 19 साल पहले हम उसे इसी तरह सुलगती हुई लकडियों के बीच सुला आये थे. सबकी आंखें नम थी और भीतर गहरा गुस्सा. धूप पुरानी बुझी हुई चिताओं की काली कतार पर चली आयी थी. हमसब सूनी आंखों से उठती हुई लपटों को देख रहे थे. चन्द्रशेखर के लिए सैलाब उमड़ा था. देश भर से लोग आए थे उसकी मिट्टी में शामिल होने. हर आदमी की आंखें सुलग रही थी. आज फिर इतिहास खुद को दोहरा रहा है. राजदेव रंजन मारे गए. वे  हत्यारे अभी भी हिंसक मदमाती ज्वार में लपलपाती हुई जीभ निकाले हमारे बीच धूम रहे हैं. हमसब न्याय की मांग कर रहे है.  इतने सालों में चन्द्रशेखर के हत्यारे पकड़े नहीं गए. उसे न्याय नहीं मिला. उस समय भी पूरे मामले की जांच सीबीआई को सौप दिया गया था. सीबीआई किसी नतीजे पर नहीं पंहुची.



आज भी राजदेव की हत्या की जांच सीबीआई को सौप दिया गया है. इतने दिनों में अभी तक ये पता नहीं चला कि इस हत्या के पीछे किसका हाथ था ? राजदेव की हत्या की खबर भी अखबारों के पन्ने से गायब हो रही है. खुद उसके अखबार में भी खबर जिस तरह से छप रही है उससे लगता है कि एक पत्रकार की मौत किसी के लिए मायने नहीं रखती. सच तो यह है कि हम  उस सत्ता से न्याय की उम्मीद कर रहे हैं जो अपराधियों को संरक्षण देती है. ये कैसी राजनीति है जो एक तरफ आश्वस्त करती है कि हत्यारे पकड़े जायेंगे और दूसरी तरफ अपराधियों को पार्टी के भीतर जगह देती है. क्या एक बार फिर ये सवाल जरुरी नहीं है कि राजनीति में जबतक अपराधियों को तरजीह मिलेगी न्याय की बात बेमानी है.दुनिया के पत्रकार खतरे झेलते रहते हैं. अपनी खबरों के लिए खतरा मोल लेते हैं. अगर पत्रकार खबर नहीं ला पाएं,लेखक लिख नहीं पाए,कलाकार अपनी कला का प्रदर्शन ना कर पाएं तो फिर इस लोकतंत्र का क्या मतलब? इनकी सुरक्षा देश की लोकतंत्र की सुरक्षा है. पिछले 30 सालों से मैं पत्रकारिता में हूं. पर इतने बुरे दिन कभी नहीं आए जब पत्रकार इसलिए मार दिया जाय कि वह खबरों को लोगों तक ला रहा है. एक निर्भीक और गंभीर पत्रकारिता की ये कीमत किसी भी देश के जनतंत्र के लिए अच्छा नहीं है. हमसब एक एक ऐसे समय में जी रहे हैं जहां लिखने-पढ़ने वालों पर सबसे ज्यादा हमले हो रहे है. पत्रकारों की हत्या के मामले में हमारा देश दसवीं सूची में शामिल है.

आंकड़े बताते हैं कि 1992 से अबतक हमारे देश के 1,189 पत्रकारों की हत्या हो चुकी है. फिर हमलोग किसका इंतजार कर रहे हैं ? किससे न्याय की आस लिए हैं ?  चन्द्रशेखर के लिए लंबी लड़ाई लड़ी गयी पर उसे न्याय नहीं मिला. चन्द्रशेखर की मां न्याय की आस में चली गयीं. लोगों के दिलों दिमाग को हिला देने वाला, जाति, धर्म,असमानता  और हत्या की संस्कृति के खिलाफ जो खड़ा हुआ उसे तो हत्यारों की आंखों में चुभना ही था. चन्द्रशेखर और राजदेव रंजन जैसे लोग हमारी चेतना हमारी स्मृतियों बसे रहेंगे. पूरे देश की नसों में बहते रहेंगे. मुझे याद है चन्द्रशेखर की प्यारी ,खूबसूरत,चमकदार हंसी. मुझे याद हैं उसकी बैचेनी भरी गहरी निगाहें  जैसे आज भी हमें देख रही हों. चन्द्रशेखर अपने विचारों में जिंदा है. राजदेव जिंदा हैं अपने लेखन में. जिसने मौत की आंखों में आंखें डाल कर देखा हो. जो लोगों के दिलों में दाखिल हो.उसे कौन मार सकता है. वह अब मनों मिट्टी के नीचे सो रहा है. मैं रुखसत नहीं लेना चाहती. उपर सर्द अथाह आसमान की गहराइयां जगमगा रहीं हैं  और तारे चकमक पत्थर की तरह चमक रहे हैं. हवा शांत और परदर्शी है. शहर का कोलाहल अभी भी लहरों की तरह लोगों के दुख से भीगा है.अगर हम अभी भी खड़े नहीं हुए तो हत्यारे जीत जायेंगे और कलम की हार होगी.

तो देख्यो है घूंघट पट खोल- मीराबाई : हिन्दी की पहली स्त्रीवादी : आख़िरी क़िस्त

रोहिणी अग्रवाल

रोहिणी अग्रवाल स्त्रीवादी आलोचक हैं , महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर हैं . ई मेल- rohini1959@gmail.com

मीरा उत्पीड़न का विरोध कर उन्मुक्त स्त्री का सपना देख सकती है, अपनी स्त्री-नियति को बदल नहीं सकती. मीरा का स्त्री विमर्श इस तथ्य को बहुत गहरे रेखांकित करता है कि व्यवस्था एक साथ अमूर्त और ठोस है, जड़ और सनातन। इसके पास न संवेदना है न भाषा. अतः संवाद की संभावना भी नहीं. अपनी मूल संरचना में यह यंत्र-मानव है. मनुष्यता का निषेध कर मनुष्यता का दिखावा करने वाला तकनीकी कौशल. मध्ययुगीन सामंती समाज की जकड़न में बंधी मीरा की बड़ी सीमा यह रही है कि उन्होंने लोकतांत्रिक व्यवस्था में शिक्षा और कानूनी अधिकारों के वरदान से सम्पन्न स्त्री को देखा नहीं. उनके युग की स्त्री सदैव दो मुट्ठी अन्न के लिए दूसरों पर आश्रित रही. योनि और गर्भ के अतिरिक्त उसकी कोई सत्ता नहीं रही. उसके पैरों को घर की ड्योढी लांघने और हाथों को अपने लिए कुंआ खोदने की स्वतंत्रता नहीं थी. मीरा अपने आप में पूर्ण ‘अकेली’ औरत का बिंब नहीं रच सकती. मुक्ति की कामना शून्य से अनंत तक पहुंच जाने की इकलौती छलांग नहीं होती, मुक्ति-छलांगों की लम्बी शृंखला की एक कड़ी मात्र होती है जो परम्परा से दिशा और ताकत लेकर उसमें अपनी एक और छलांग जोड़ती है. मीरा के पास विरासत के नाम पर पराधीनता में सुख ढूंढने का कांतासम्मत उपदेश है. इसलिए बेशक वह वर्जनाओं को तोड़ कर आत्मप्रसार का निर्णय ले, विद्वद्जन से दिशा-निर्देश पाने के बहाने  उन्हें अपनी लड़ाई में शरीक होने की दावत दे, जन-जन तक अपनी बात पहुंचा कर जनमत बनाने का प्रयास करे.
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बरजी मैं काही की नाहिं रही 
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माई मैं तो लियो है सांवरिया मोल 
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तेरा नहीं कोई रोकणहारा 


वह अपने अकेलेपन से त्रस्त है. स्त्री को लेकर परंपरा और परिवेश में पसरी अनुर्वर अनुगूंजों ने उसे चुप्पियों को सर्जनात्मक बुनावट देने का विवेक नहीं दिया है. वह आत्माभिमानिनी संवेदनशील जागरूक स्त्री की तरह उन सभी स्थितियों का विरोध अवश्य कर रही है जो समकालीन स्त्री विमर्श का केन्द्रीय स्वर है किंतु अपनी देह और जीवन-दिशा के संदर्भ में लिए गए निर्णयों को अंत तक अडिग भाव से स्वीकार नहीं कर पाती.  मीरा की इस पराजय में पितृसत्तात्मक व्यवस्था के दबाव मुखर होते हैं जो आज की उन्मुक्त स्त्री के हर स्वतंत्र निर्णय से बौखला कर उस पर अनैतिक और उच्छ्रंखल हो जाने का आरोप लगाते है. चूंकि पितृसत्तात्मक व्यवस्था के पास स्त्री और पुरुष को, सवर्ण और दलित को नापने के प्रतिमान अलग-अलग हैं, अतः नैतिकता और दायित्व, अधिकार और स्वतंत्रता की परिभाषाएं स्थित्यानुसार बदलने लगती है. मीरा का स्त्री विमर्श कृष्णा सोबती और मृदुला गर्ग के जरिए आगे बढ़ कर यदि मैत्रेयी पुष्पा तक न आया होता तो क्या स्त्री अपनी दैहिक मुक्ति की मुखर घोषणा के साथ देह को अस्त्र बना कर प्रतिद्वंद्वी पुरुष को पटकनी दे पाने का हौसला बटोर पाती? पराए मर्दों को लेकर चटखारेदार बातें करती कृष्णा सोबती की मित्रो चूंकि अंततः अपने उसी बगलोल पति सरदारी को समर्पित है और दाम्पत्येतर देह सम्बन्ध को पूरी ऊर्जा से भोगने वाली मनु (चितकोबरा) अंततः समाजसेवा में आश्रय पाती है, अतः व्यवस्था को न विवाह संस्था के टूटने का खतरा है, न नैतिकता के दोहरे मानदंडों के खिलाफ उठाए जाने वाले आंदोलन की आशंका. लेकिन मनु जैसी स्त्रियां जब ‘सिरफिरे’ आंदोलनधर्मी सरोकारों से जुड़ कर मंदा, अल्मा, सारंग बनती हैं तो न केवल सड़क-चौराहे पर नैतिकता के दोहरे मानदंडों को अभिमानपूर्वक तोड़ती पुरुष-सरीखी निर्लज्ज और नग्न स्त्री दिखाई पड़ती है, बल्कि पुरुष का ‘उपयोग’ कर राजनीति में घुसपैठ की ‘मर्दाना’ चालें भी चलती है.

 शतरंज की बिसात पर जब सामने वाला खिलाड़ी बराबर का चतुर हो तो हार के जोखिम में खेलने का मजा खत्म हो जाता है. इसलिए मर्दवादी आलोचना समकालीन स्त्री विमर्श को पितृसत्तात्मक व्यवस्था का अतिक्रमण कर अपने लिए मानवीय स्पेस की आकांक्षा करती स्त्री-मुक्ति की अवधारणा के रूप में नहीं पढ़ती, देह-विमर्श में गूंथ कर थू-थू करती है.अपनी अंतिम परिणति में आंसू, समर्पण, दीनता का प्रसार करता मीरा का स्त्री विमर्श उसे स्वीकार्य है. यहां तक वह उसके विद्रोह और वेदना को सहानुभूति भी देती है और व्यवस्था को बदलने में अपनी ‘मगरमच्छी’ तत्परता भी निवेदित करती है. जुलूस में अंधी गली तक जाने और फिर निरापद अपनी दुनिया में लौट आने में भला क्या बुराई है? मीरा के अंतर्विरोध – पितृसत्तात्मक व्यवस्था का आंतरिकीकरण करने की मानसिकता – एक इकाई के रूप में मीरा की पराजय को भले ही संकेतित करें, मीरा द्वारा उत्पन्न स्त्री-चेतना को धूमिल नहीं करते.

संदर्भ

 ”बास्या कूस्या टूकड़ा ये, भाभी और मिलेगी खाटी छाय/भैं सोवो भूखा मरो ये, भाभी नहीं मिलैगो हरि आय”, मीरां बृहत् पदावली भाग 1, राजस्थान प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान, जोधनुर,पद 395
 ”साधुन के संग बैठ बैठ के, लाज गमाई सारी / नित प्रति उठि नीच घर जावो, कुल कूं लगावो गारी.बड़ा घरां की छोरी कहावो, नांचो दे दे तारी” वही, पद 16
 ”राणांजी तें जहर दियो मैं जाणी / जैसे कंचन दहत अगिन में, निकसत बाराबांणी / लोकलाज कुलकाण जगत की, दी बहाय ज्यूं पांणी /अपने घर का परदा कर लौं, मैं अबला बौरांणी / तरकस तीर लग्यो मेरे हियरे, गरक गयो सनकांणी” वही, पद 505
 ”राणांजी म्हारे गिरधर प्रीतम प्यारो . . . जन्म जन्म रो पति परमेश्वर, राणाजी कोन बिचारो।” वही, पद 509
 ”राणांजी हूं अब न रहूंगी तोरी हटकी / साध-संग माहि प्यारा लागै, जाल गई घूंघट की  / . . . हार सिंगर सभी ल्यो अपना, चूड़ी कर की पटकी / मेरा सुहाग अब मोकूं दरसा, और न जाने घट की / महल किला राणां मोहिं न चाहिए, सारी रेशम पट की / हुई दीवानी मीरां डोलै, केस लटा सब छिटकी.” वही, पद 515
 ”जोगी आ जा आ जा, जोगी पांइ परूं मैं हौं चेरी तेरी / प्रेम-भक्ति को पैंडो न्यारो, हमकूं गैल बता जा / अगर चंदन की चिता बनाऊँ, अपने हाथ जला जा / जल बल भई भस्म की ढेरी, अपने अंग लगा जा” वही, पद 176
 ‘मन हमारा बांध्यो माई / कंवल नैन अपने गुन तीखण तीर बेध शरीर दूरि गयो माई / लाग्यो तब जान्यों नहीं, अब न सह्यो जाई री माई / तंत मंत औषद करउ, तऊ पीर न जाई / है कोऊ उपकार करे, कठिन दरद री माई / निकटि हो तुम दूरि नहीं, बेगि मिलो आई. / मीरां गिरधर स्वामी दयाल, तन की तपति बुझाई री माई” वही, पद 368
 ”ऐसी ऐसी चांदनी में पिया घर नांई / चार पहर दिन सोवत बीत्ये, तड़पत रैन बिहाई / मैं सूती पिया अपने म्हैल में, सालूड़ा में आई सरदाई” वही, पद 56 
 ”मेरा मन को वैरागी कर गयो रे / हाथ लकुटिया कांधे कमलिया, जमुना पार उतर गयो रे / बारा बरस से सेवा कीन्हीं, रमती बिरियां रम गयो रे / सुण सुण हे मेरी पाड़ पड़ोसन, जलती में पूलो दे गयो रे / मीरां के प्रभु हरि अविनासी, धूकती धूनी धर गयो रे ” वही, पद 438
 ”गोबिंद का गुण गास्यां / राणोजी रूसैला तो गांम राखैला, हरि रूठ्यां कुमलास्यां / राम नाम की जहाज चलास्यां, भवसागर तिर जास्यां.”, वही, पद 129
 ”एक बिरियां मुख बोलो रे, धुतारा जोगी / . . . पूरब जनम की मैं हूं गोपिका, अधबिच पड़ गयो झोलो रे।/ जगत बदीती तुम करो मोहन, अब क्यों बजाऊँ ढोलो रे / तेरे कारए सब जग त्याग्ये, अब मोहे कर सों लो रे” वही, पद 55
 ”माई मैं तो लियो है सांवरिया मोल./ कोई कहै सोंधो कोई कहै महंगौ, मैं तो लियो है हीरा सूं तोल।/कोई कहै हलको कोई कहै भारी, मैं तो लियो री ताखड़ियां तोल / कोई कहै छाने कोई कहै वोड़े, मैं तो लियो री बाजतां ढोल / कोई कहै घटतो कोई कहै बढ़तो, मैं तो लियो है बराबर तोल / कोई कहै कालो कोई कहै गोरो, मैं तो देख्यो है घूंघट पट खोल.” वही, पद 385
  ”पूर्ण में से पूर्ण निकल भी जाए तो भी जो बाकी रहता है, वह पूर्ण ही है.” कुंदनिका कापड़ीआ, दीवारों के पार आकाश, पृ0 276
 ”हरष शोक म्हारे मन नांही, नहिं लाभ नहिं हानी, कंचन लेर अगन में राख्यो, निकस्यो बाराबानी.”पद 153 
 गोविंद दुबे साचोरा ब्राह्यण तिनकी वार्ता: ”. . . और अेक समें गोविंद दुबे मीराबाई के घर हुते तहां मीरा बाई सों भगवद्वार्ता करत अटके. . . . ब्रजवासी ने आपके वह पत्र दीनों सो पत्र बांचे के गोविंद दुबे तत्काल उठे, तब मीरा बाई ने बहुत समाधान कियौ परि गोविंद दुबे ने फिर पाछें न देखौ.”
तथा
 अथ कृष्णदास अधिकारी तिनकी वार्ता: ” . . . कृष्णदास ने तौ आवत ही कही जो हूं तौ चलूंगौ. तब मीराबाई ने कही – जो बैठौ तब कितनेेक मोहर श्रीनाथजी को देने लागी सो कृष्णदास ने न लीनी और कह्यौ जो तूं श्री आचार्य महाप्रभून् की सेवक नाहीं होत ताते तेरी भेंट हम हाथ ते छूवेंगे नाहीं. सो ऐसे कहिकें कृष्णदास यहां ते उठि चले.” चौरासी वैष्णवन की वार्ता
”मैं मंदभागण काहे को सरजी, पिया मोसूं रहत उदासी / तुम हो हमारे अंतरजामी, मैं थारा चरणां री दासी / मीरां तो कुछ जाणत नांही, पकड़ी टेक निभासी.” वही, पद 62
  ये पद हैं – 398, 405, 568
 ”म्हारा हरिजी, चाकरी री चाह म्हारे मन राखोला सरण हजूरी / बैल बंधावो भांवे घोड़ा बंधावो, चाहै करावो मजूरी / खाबा पीबा की म्हांकी चिंता मत कीज्यौ, कंगनी दीज्यो भांवै कूरी / ओढ़न कूं कारी कामरिया दीज्यो और चटाई खजूरी / जो थे देशी, सो म्हे लेशी, याई मत म्हारे पूरी / मीरां के प्रभु गिरधर नागर, निज चरणन की धूरी” वही, पद 405
  पद 428
 ”उडि जावो री म्हारी सोनचिड़ी / काहे सूं मढ़ाऊँ थारी आंख पांखड़ी, काहे सूं मढ़ाऊँ थारी चोंचजड़ी / रूपा सूं मढ़ाऊँ थारी आंख पांखड़ी, सोना सूं मढ़ा ऊँ थारी चोंचजड़ी.” वही, पद 45
 ”श्री तुलसी सब गुण निधान दुख हरन गुसांई /. . . हमको कहा उचित करबो है सो लिखियो समझाई.” पद 571
”राणांजी म्हारे गिरधर प्रीतम प्यारो. . . जन्म जन्म रो पति परमेश्वर, राणेजी कोन बिचारो.” वही, पद 509
 ”राणांजी हूं अब न रहूंगी तोरी हटकी / साध-संग माहि प्यारा लागै, जाल गई घूंघट की / . . . हार सिंगर सभी ल्यो अपना, चूड़ी कर की पटकी / मेरा सुहाग अब मोकूं दरसा, और न जाने घट की / महल किला राणां मोहिं न चाहिए, सारी रेशम पट की / हुई दीवानी मीरां डोलै, केस लटा सब छिटकी” वही, पद 515
 ”जोगी आ जा आ जा, जोगी पांइ परूं मैं हौं चेरी तेरी / प्रेम-भक्ति को पैंडो न्यारो, हमकूं गैल बता जा / अगर चंदन की चिता बनाऊँ, अपने हाथ जला जा / जल बल भई भस्म की ढेरी, अपने अंग लगा जा” वही, पद 176
 ‘मन हमारा बांध्यो माई / कंवल नैन अपने गुन तीखण तीर बेध शरीर दूरि गयो माई / लाग्यो तब जान्यों नहीं, अब न सह्यो जाई री माई / तंत मंत औषद करउ, तऊ पीर न जाई / है कोऊ उपकार करे, कठिन दरद री माई / निकटि हो तुम दूरि नहीं, बेगि मिलो आई / मीरां गिरधर स्वामी दयाल, तन की तपति बुझाई री माई.”’ वही, पद 368
”ऐसी ऐसी चांदनी में पिया घर नांई /चार पहर दिन सोवत बीत्ये, तड़पत रैन बिहाई / मैं सूती पिया अपने म्हैल में, सालूड़ा में आई सरदाई.” वही, पद 56 
”मेरा मन को वैरागी कर गयो रे / हाथ लकुटिया कांधे कमलिया, जमुना पार उतर गयो रे / बारा बरस से सेवा कीन्हीं, रमती बिरियां रम गयो रे / सुण सुण हे मेरी पाड़ पड़ोसन, जलती में पूलो दे गयो रे / मीरां के प्रभु हरि अविनासी, धूकती धूनी धर गयो रे.” वही, पद 438
”गोबिंद का गुण गास्यां / राणोजी रूसैला तो गांम राखैला, हरि रूठ्यां कुमलास्यां / राम नाम की जहाज चलास्यां, भवसागर तिर जास्यां.”, वही, पद 129
”एक बिरियां मुख बोलो रे, धुतारा जोगी / . . . पूरब जनम की मैं हूं गोपिका, अधबिच पड़ गयो झोलो रे / जगत बदीती तुम करो मोहन, अब क्यों बजाऊँ ढोलो रे / तेरे कारए सब जग त्याग्ये, अब मोहे कर सों लो रे.” वही, पद 55
”माई मैं तो लियो है सांवरिया मोल।/ कोई कहै सोंधो कोई कहै महंगौ, मैं तो लियो है हीरा सूं तोल / कोई कहै हलको कोई कहै भारी, मैं तो लियो री ताखड़ियां तोल / कोई कहै छाने कोई कहै वोड़े, मैं तो लियो री बाजतां ढोल।/कोई कहै घटतो कोई कहै बढ़तो, मैं तो लियो है बराबर तोल।/कोई कहै कालो कोई कहै गोरो, मैं तो देख्यो है घूंघट पट खोल।” वही, पद 385
 ”पूर्ण में से पूर्ण निकल भी जाए तो भी जो बाकी रहता है, वह पूर्ण ही है.” कुंदनिका कापड़ीआ, दीवारों के पार आकाश, पृ0 276
 ”हरष शोक म्हारे मन नांही, नहिं लाभ नहिं हानी, कंचन लेर अगन में राख्यो, निकस्यो बाराबानी.”पद 153 
 गोविंद दुबे साचोरा ब्राह्यण तिनकी वार्ता: ”. . . और अेक समें गोविंद दुबे मीराबाई के घर हुते तहां मीरा बाई सों भगवद्वार्ता करत अटके . . . ब्रजवासी ने आपके वह पत्र दीनों सो पत्र बांचे के गोविंद दुबे तत्काल उठे, तब मीरा बाई ने बहुत समाधान कियौ परि गोविंद दुबे ने फिर पाछें न देखौ.”
तथा
अथ कृष्णदास अधिकारी तिनकी वार्ता: ” . . . कृष्णदास ने तौ आवत ही कही जो हूं तौ चलूंगौ. तब मीराबाई ने कही. जो बैठौ तब कितनेेक मोहर श्रीनाथजी को देने लागी सो कृष्णदास ने न लीनी और कह्यौ जो तूं श्री आचार्य महाप्रभून् की सेवक नाहीं होत ताते तेरी भेंट हम हाथ ते छूवेंगे नाहीं. सो ऐसे कहिकें कृष्णदास यहां ते उठि चले.” चौरासी वैष्णवन की वार्ता
”मैं मंदभागण काहे को सरजी, पिया मोसूं रहत उदासी / तुम हो हमारे अंतरजामी, मैं थारा चरणां री दासी / मीरां तो कुछ जाणत नांही, पकड़ी टेक निभासी. ” वही, पद 62
 ये पद हैं – 398, 405, 568
”म्हारा हरिजी, चाकरी री चाह म्हारे मन राखोला सरण हजूरी / बैल बंधावो भांवे घोड़ा बंधावो, चाहै करावो मजूरी /खाबा पीबा की म्हांकी चिंता मत कीज्यौ, कंगनी दीज्यो भांवै कूरी /ओढ़न कूं कारी कामरिया दीज्यो और चटाई खजूरी /जो थे देशी, सो म्हे लेशी, याई मत म्हारे पूरी /मीरां के प्रभु गिरधर नागर, निज चरणन की धूरी.” वही, पद 405
  पद 428
”उडि जावो री म्हारी सोनचिड़ी / काहे सूं मढ़ाऊँ थारी आंख पांखड़ी, काहे सूं मढ़ाऊँ थारी चोंचजड़ी / रूपा सूं मढ़ाऊँ थारी आंख पांखड़ी, सोना सूं मढ़ा ऊँ थारी चोंचजड़ी ” वही, पद 45
  ”श्री तुलसी सब गुण निधान दुख हरन गुसांई / हमको कहा उचित करबो है सो लिखियो समझाई ” पद 571

समाप्त 

कोठागोई : किस्सों का अपना चुनाव

संजीव चंदन


सबलोग के स्त्रीकाल कॉलम में प्रकाशित 


भारत में गणिकाओं, नगरवधुओं, वेश्याओं का पुराना इतिहास है. राम ने अपने भाई भरत को संबोधित करते हुए कहा कि वेश्याओं का साथ मनोरंजन का एक महत्वपूर्ण साधन है. ( रामायण. अयोध्याकाण्ड) महाभारत के युद्ध के वक्त युद्ध शिविरों में वेश्याओं की उपस्थिति का उल्लेख महाभारत में मिलता है.
अश्वघोष ने लिखा है : 
द्वैपायनो धर्मपरायानाश्च रेने समंकशिषु –वेश्यवहवा 
ययाहतो, मुच्चलननू पुरेण पादेन विद्युल्लतयेव मेद्यः 
( धर्मात्मा व्यास ने काशी में वेश्यागमन किया. जैसे विफुल्लता मेद्य पर प्रहार करती है, उसी तरह उन्होंने उन वेश्याओं के नूपुर वाले चंचल पैरों का प्रहार झेला –अश्वघोष सौंदरानंद, 7-30)  रामायण, वर्तिका सूत्र और कामसूत्र आदि में वेश्याओं के संगठन के भी उल्लेख हैं.  प्राचीन भारत को समझने के ‘स्रोत- ग्रंथों’ में वेश्याओं के कई प्रकार बताये गये हैं, उनमें एक प्रकार रूपजीवाओं का है. रूपजीवाओं के तहत नटी वेश्याएं थीं, जो गीत –नृत्य से अपना जीवन यापन करती थीं. एक प्रकार गणिकाओं का था, जिनमें दो तरह की स्त्रियाँ होती थीं, कोठे पर रहने वाली, निजी घरों में रहने वाली. गणिकाओं को उच्चवर्गीय शिक्षित तथा गुणी वेश्याओं के तौर पर समझा जाता था. गणिकाओं का यद्यपि सामंत –जमींदारों , बाद में नवाबों उच्चवर्गीय कुलीनों के बीच सम्मान जरूर था, लेकिन ‘घर-बाहर’ के दायरे में वे बाहर की प्रतिनिधि थीं, जो स्त्रियों के लिए सम्मानजनक नहीं माना जाता था. सतीत्व, पत्नीत्व को आदर देने की सामाजिक –सांस्कृतिक व्यवस्था रूढ़ थी. इस तरह इनका एक अलग संसार बनता गया, जो सामान्य लोगों के बीच यथार्थ से ज्यादा किस्से –कहानियों की तरह उपस्थित थीं. कोठों की यह परंपरा हाल के दिनों तक आबाद रही है, बिहार के मुजफ्फरपुर के कोठे उनमें से एक हैं- कोठे हकीकत हैं, तो कोठे किस्से और कहानियां भी हैं . कहानियों में लोकप्रियता के तत्व भी हैं- रससिद्धी के तत्व. जबकि इन्हीं कहानियों से समाजशास्त्रीय अनुसंधान भी किये जा सकते हैं – समाज में जेंडर और जाति विभाजन को समझने के लिए.

चतुर्भुज स्थान , मुजफ्फरपुर की एक नर्तकी

 पिछले साल वाणी प्रकाशन से प्रकाशित प्रभात रंजन की ‘ कोठागोई’ मुजफफरपुर के कोठों के किस्सों  की रोचक प्रस्तुति है, जिसका इरादा तय है कि कोई समाजशास्त्रीय अनुसंधान नहीं है. किस्से हैं , तो किस्सागोई होगी, कोठों के किस्से हैं तो उन्हें ‘कोठागोई’ कहा जाना अर्थ –चमत्कार के लिहाज से भी और ‘रससिद्धी’ के उद्देश्य से लोकप्रिय लेखन के लिहाज से भी उचित ही है. साहित्य में इन दिनों लोकप्रिय साहित्य का अपना दवाब है, सोशल मीडिया से इस लोकप्रिय लेखन को मदद भी मिलती है- बल्कि दोनो के आपसी सामंजस्य से साहित्य की कुछ विधाओं ने जन्म भी लिया है – मसलन ‘लप्रेक’- ( लघु प्रेम कथा).  पिछले दिनों फेसबुक, ट्वीटर, से लेकर साहित्य के मेलों –महोत्सवों में ‘लप्रेक’ की जितनी धूम रही,  वह नये समय की पाठकीयता के अनुरूप भी थी और साहित्य के बाजार के अनुरूप भी. इस धूम के बीच प्रभात रंजन की ‘कोठागोई’ ने अपनी अलग ही जगह बनाई. लगभग साल भर तक इस किताब की भी चर्चा रही, लोगों ने, साहित्यिक संस्थाओं ने , साहित्य –महोत्सवों ने किताब और प्रभात जी,  दोनो को हाथो –हाथ लिया. मुझे लगता है कि अब एक साल बीत जाने के बाद, चर्चाओं से अलग इस किताब को देखा जा सकता है-प्रभावमुक्त होकर.

किताब के लेखक की योजना में और उसके प्रयासों में एक ख़ास बात दिखती है कि वह जिनके किस्से कह रहा है, उनके प्रति दूसरेपन के भाव ( अदरनेस) से मुक्त हो, या उनका पवित्र उद्धारक या उनके काम और व्यक्तित्व के प्रति भद्रजन का भाव लिए उन्हें ‘ विक्टिम’ ( पीड़ित)  की तरह न देखे. इस मायने में मुझे यह किताब अच्छी लगी. जबकि कोठों के जीवन को लेकर हिन्दी की बहुचर्चित किताब, अमृतलाल नागर की ‘ ये कोठेवालियां’ को लेकर मेरी यही शिकायत रही है कि वह जबरदस्त अदरनेस के भाव में लिखा गया है. कोठे के जीवन जी रही स्त्रियों को अनिवार्य ‘विक्टिम’ मानते हुए.  ‘ये कोठेवालियां’ के विपरीत ‘ कोठागोई’ में न तो विक्टिमहुड की कोई नजर है और न ही इस किताब की योजना के लिए यह अनुकूल होता. बल्कि किस्सों से जो तस्वीर बनती है,  वह यह कि कोठों पर उनका होना जितना उन्हें विक्टिम नहीं बनाता है, उससे ज्यादा कोठों की संस्कृति के ख़त्म होने और कोठों के उजड जाने से वे विक्टिम होती हैं- लेखक का उद्देश्य रुदन से ज्यादा रससिद्धि है – जो समाज के द्वारा स्त्री के लिए नियत ‘गृहिणी’ और सतीत्व संपन्न पत्नी की भूमिकाओं से अलग जीवन जीती स्त्रियों की कहानियों में स्वतः पाई जाती हैं –कहानियां बनती ही ऐसे हैं – ये नियत ढर्रे पर चलने वाले लोगों के लिए ‘अजनबी-परिचितों’ की कहानियां हैं- आबाद और बर्बाद होने की कहानियां.

कोठागोई को पढ़ते हुए मुजफ्फरपुर के लोग ‘ चतुर्भुज स्थान की इन गायिकाओं’ की पहचान तलाश सकते हैं, या उन ‘रसिकों’ की जो इनके महफ़िलों के नियमित शान थे, कुछ क्रेता और कुछ मुहब्बत कर बैठे गंभीर किस्म के आशिक लोग- जमींदार से लेकर लेखक –गीतकार-कवियों तक की पहचान इनमें शामिल है. चतुर्भुज स्थान का जिक्र हो और किम्वदंती बन गये ‘महाकवि’ जानकीबल्लभ शास्त्री की चर्चा न हो, तो बात पूरी नहीं हो सकती है. इसलिए किताब में उनका होना लाजिमी था, उसी अंदाज में जिस अंदाज में वे किम्वदंती बनते गये- हिन्दी साहित्य के इतिहास से जितना अनुपस्थित, उतना ही उपस्थित –उतने ही जोर –शोर से स्वीकृति प्राप्त ‘महाकवि !’  यह सच है कि लेखक कोठों के इन किस्सों का समाजशास्त्रीय अध्ययन करने नहीं बैठा था, बल्कि ऐसे अध्ययन के लिए ये किस्से आधार हो सकते हैं, लेकिन क्या यह किताब किस्सों का सयोंजन (कम्पाइलेशन) मात्र है – नहीं इसकी एक योजना है, एक अंतरदृष्टि काम कर रही है इसमें –चुनाव की अन्तरदृष्टि और इसी से इस किताब और लेखक की ‘राजनीति’ भी तय होगी –या हम पाठकों की रुचि –अरूचि के कारण भी तय होंगे.

पिछले दिनों एन एस डी के रंगमहोत्सव के दौरान एक मराठी मंचन देखा. यह मंचन महाराष्ट्र के प्रसिद्द ‘लावणी नृत्य’ पर लिखी गई एक शोधपूर्ण किताब पर आधारित था. लावणी के नर्तकियों का जीवन इन मुजफ्फरपुर की कोठेवालियों से अलग नहीं होता था. इसके दर्शक और मुरीद भी समाज का कुलीन तबका होता रहा है. किस्सागोई की शैली में हुए इस मंचन में लावणी की अनिवार्य मांसलता और गीतों और नृत्य में यौनिकता के स्पष्ट सन्देश और इशारे दर्शकों को सीटियाँ बजाने के लिए आतुर कर रहे थे – रस्ससिद्धि का भरपूर आयोजन! इसके बावजूद लेखक की अपनी दृष्टि लावणी की नर्तकियों की सामाजिक अवस्थिति को स्पष्ट कर देती है. लेकिन ‘कोठागोई’ वहीं असफल होता दिखता है. एक लम्बे कालखंड के किस्सों में बदलते समाज –समय और संस्कृति की सारी झलकियाँ मिल जाती हैं, झलक नहीं मिलती है तो गायिकाओं, नर्तकियों की सामाजिक अवस्थिति की , कि किस जाति-समाज से ये आती हैं और उनके होने में उनके जाति- समाज की क्या भूमिका है.

 लेखक अपनी किताब की भूमिका में लिखता है, “ आप ‘कोठागोई’ के किस्सों का आनन्द लें. अच्छी लगे तो उन गुमनाम गायिकाओं के गुण गायें, न जमे तो दोष इस लेखक का.’ कोठों के इर्द –गिर्द बदलते समय के साथ लेखक ने बदलती संस्कृति को जरूर दर्ज किया है, ‘ समय बदल रहा था. पुराने जमींदार, सेठ, दरबार सब एक –एक कर खत्म हो रहे थे. शहराती लोगों का मिजाज बदल रहा था. गाना –नाचना उनके लिए कला का कोई रूप नहीं रह गया था. वह तो उनके लिए खालिस मनोरंजन भर था. पैसा फेको तमाशा देखो. अगर नाच –गान एक साथ ही हो तो – मुजरा का जोर बढ़ता जा रहा था. नवदौलातियों की नई खेप शहर में आ गई थी. पथ निर्माण विभाग, सिचाई विभाग का बजट बढ़ रहा था….थोक में माल कमाने वालों का एकदम नया तबका सामने आ रहा था, इस तबके को न अपनी परम्परा से मतलब था, न संस्कृति की उस जीती-जागती धरोहर पर उनको नाज था.’

ग्राहकों की प्रतीक्षा

संस्कृति  मुजफ्फरपुर में क्या सिर्फ नवदौलतिये शुक्ला, शर्मा नामधारियों के कारण बदल रही थी ? या लेखक जिस नाज पर अपना ईमान लेकर आ रहा है, उसे नकारने वाले हाशिये के लोगों की दखल से भी बदल रही थी ? क्या मजदूरों – दलितों के संघर्ष इन दिनों दर्ज नहीं हुए थे, या नाच –गान के ‘ जमींदार या साहबी ठाठ’ को निम्नवर्ग से चुनौती और धमकियां मिलनी शुरू नहीं हुई थीं? किस्से और भी होंगे, जो इस किताब की योजना के अनुकूल नहीं होंगे. इसलिए शेष पाठकों और शोधार्थियों के लिए, जिनका उद्देश्य ‘ रससिद्धि’ के अतिरिक्त भी होगा-उनके लिए यह किताब भी शोध सामग्री है और इसमें छूट गये अवांतर प्रसंग भी शोध सामग्री होंगे. इस किताब पर ज्यादा बोझ डालना भी अनुचित होगा क्योंकि इसके फ्लैप पर ही फिल्म निर्देशक इम्तियाज़ अली का साफ़ संकेत अंकित है , ‘ बदनाम कहे जाने वाली गायिकाओं की विरासत को एक सलाम है कोठागोई. प्रभात रंजन की कोठागोई इस संस्कृति से प्रेरित किस्सों का एक मजेदार संग्रह है. पढ़िए और सुनाइये, क्योंकि दोनो में बराबर मजा है.’

सभी फोटो गूगल से साभार 

‘तेरा कोई नहीं रोकणहारा, मगन होय मीरा चली’-मीराबाई : हिंदी की पहली स्त्रीवादी : तीसरी क़िस्त

रोहिणी अग्रवाल

रोहिणी अग्रवाल स्त्रीवादी आलोचक हैं , महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर हैं . ई मेल- rohini1959@gmail.com

 मीरा परमुखापेक्षी स्त्री का मिथक तोड़ कर स्वतंत्र निर्णय लेती नई स्त्री छवि को गढ़ती है. जब जीवन मीरा का है तो उसे परिचालित करने के लिए दूसरे को निर्णय लेने का क्या अधिकार ? अपने नारीत्व और बौद्धिक क्षमताओं का पूर्ण स्वीकार मीरा को पारंपरिक समाज-व्यवस्था की आचार-संहिता के प्रति सशंकित बनाता है. रूढ़ियां और वर्जनाएं क्या जीवनानुभवों को निरस्त कर सकती हैं ? घर की बंद व्यवस्था के समानांतर मीरा ने साधुओं की सत्संगति में ज्ञान के गवाक्ष खुलते देखे हैं. देशाटन कर लौटे संतों के अनुभव भी विस्तृत हैं और ज्ञान भी. स्वयं मीरा लोक-परलोक की गुत्थियां न समझना चाहे, लेकिन आत्मप्रसार करके जगत के साथ एक प्रत्यक्ष नाता तो जोड़ना ही चाहती है. पत्नीत्व और कुलकानि को तिलांजलि देकर उसे अपनी राहों का अन्वेषण स्वयं करना है. बेशक एक राह ‘जोगी’ की तलाश में ‘पूर्ण पुरुष’ को पाने की लालसा और आह्लाद तक जाती है, लेकिन ज्ञानार्जन की अभिलाषा में दूसरी राह साधुओं तक ही जाती है. साधु-संगति उसके लिए एक बृहत्तर और सार्थक दुनिया का प्रवेशद्वार है. वह उसके भौतिक/गार्हस्थिक बंधनों की निस्सारता का बोध कराती है. साधु-संगति ने उसे राणा के दिए गहरे घावों केा समझने, सहने और बिसारने का औदात्य दिया है . फिर क्यों न वह ”भाग खुल गए म्हारे साध संगत सूं’ की प्रतीति में अपने को समृद्धतर करे? पारिवारिक उत्पीड़न ने उसकी दसों दिशाओं को बाधित किया है, साधु-संगति उसी में से उसे हरि के बहाने अपने को पाने की युक्ति बताती है. अपने वजूद को हवा के झोंके की तरह अमूर्त और हल्का बना कर कहीं भी आने-जाने की मानसिक स्वतंत्रता का गुरु-मंत्र पाकर मीरा क्यों न साधु-संगति की भूरि-भूरि प्रशंसा करे. ”धन आज की घरी, सत्संग में परी / श्रीमद्भागोत श्रवण सुनी, रसना रटत हरी।/मन डूबत लीलासागर में, देही प्रीति धरी / गुरु संतन की सोहनि सूरत, उर बिच आइ अरी।”

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बरजी मैं काही की नाहिं रहूँ 

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माई मैं तो लियो सांवरिया मोल  

साधु-सेवा मीरा का सहज प्राप्य है, साधु-संगति नहीं. यह उसका सोचा-समझा निर्णय है – अपने मनुष्यत्व को पूर्णता में चिन्हें का उपक्रम.


यह ज्ञानार्जन की संश्लिष्ट प्रक्रिया है जिसमें सामने दीखती सच्चाइयां अनायास ओझल हो जाती हैं और अपनी परतों के बीच किन्हीं भिन्न अर्थों की व्यंजना करने लगती हैं. यह जगत से, अपने परिवेश से, अपने ‘आत्म’ से नया परिचय है. आत्मज्ञान नशा बन कर मीरा को भरमा रहा है. ”राणा कहे सौं एक न माना, साधु दुआरे नित आली हे माय.” मीरा नशे की मादकता को संकल्प बना कर अपनी दिशाएं और प्राथमिकताएं तय करने लगती है. मीरा समझने लगती है कि ताल की सीमाबद्धता में बंध कर ज्ञान सड़ने लगता है. अनंत राशि का विस्तार अनंत हो तो अपने पूरे वैभव, सौन्दर्य और गहनता के साथ पिपासु को आलोड़ित करेगा. ज्ञान गतिशीलता का पोषक है. एक संकुचित दायरे में पग घुघरू बांध कर नाचने और ताली बजाने से वह कितना ज्ञान पा सकेगी ? प्रश्न नहीं, ललक स्वप्न बन कर उसे बाहर निकलने को उकसाती है . ”चलां वाही देस प्रीतम पावां, चलां वाही देस” मीरा का गृहत्याग बुद्ध और महावीर की तरह जगत का परित्याग कर दार्शनिक प्रश्नों को सुलझाने और निर्वाण को पाने की ऊर्ध्वमुखी चेष्टा नहीं, जीवन के उल्लास को जीवन-प्रवाह के बीचोंबीच धंस कर भोगने की शिशुसुलभ उत्सुकता है. वह जीवन का नकार नहीं, जीवन का अभिषेक करना चाहती है, भले ही जिन साधुओं के सहारे वह अपनी बेड़ियां काट कर आई है, वे जीवन से विमुख हो समाज को अमूर्त ईश्वर की आराधना का पाठ पढ़ाते हैं. मीरा अपनी मुक्ति की सामाजिक स्वीकृति के लिए अपनी भावाभिव्यक्ति पर ईश-भक्ति का आरोपण करती है, उनकी तरह कहीं-कहीं निरगुनिया भाषा-प्रतीकों का प्रयोग भी करती है, लेकिन संसार को मिथ्या मानने का भाव उसमें नहीं पनपा है. वैराग्य मीरा को लोक और जगत दोनों से जोड़ता है. उसे सामाजिक पदानुक्रम में सबसे छोटे व्यक्ति के साथ संवाद की स्वतंत्रता देता है, और वह पाती है कि दोनों के सुख और दुख, आशाएं और स्वप्न कितनी समानधर्मा हैं. उस अकेली ने तो जहर का प्याला नहीं पिया. यहां तो सभी ‘घायल’ हैं और ‘घायल की गति’ जानने, उसका उपचार करने को आतुर भी.


 राजसत्ता एवं परिवार संस्था के विरुद्ध मीरा-काव्य के प्रतिरोध (कमपिंदबम) के स्वर उसकी अपनी मनोकांक्षा बन जाते हैं और मीरा को मिलता है एक बृहद् परिवार. बेशक वैराग्य ने मीरा के काव्य की प्रखरता को मंद किया है, किंतु उसके विद्रोह को एक नया आयाम देकर घर से बाहर स्त्री की अस्मिता और प्रतिष्ठा को स्वीकृति दी है. मीरा के काल तक स्त्रियों के लिए धर्मपरायणता का अर्थ था पति/पुरुष की सेवा, गार्हस्थिक-सामाजिक दायित्वों की पूर्ति, धार्मिक उत्सवों/अनुष्ठानों में यथानिर्दिष्ट भागीदारी, भक्ति की नित्यक्रमिक चर्या की पालना और साधु-सेवा. धर्म, धर्मग्रंथों के मर्म, ईश्वर के स्वरूप पर विचार करने या माया एवं अध्यात्म से जुड़े दार्शनिक प्रश्नों पर विचार करने की आज्ञा उसे नहीं थी क्योंकि वेदपाठ शूद्रों के साथ-साथ स्त्रियों के लिए भी वर्जित था और गार्गी आदि स्त्रियों की तरह तर्क करना स्त्रियोचित धर्म के प्रतिकूल. स्त्री न संन्यास लेने के लिए स्वतंत्र थी, न तीर्थाटन करने के लिए. पहली बार मीरा इस वर्जना को तोड़ती है. संन्यास उसके लिए जीविकोपार्जन का जरिया ही नहीं (आज के संदर्भ में यह नौकरीपेशा स्त्री के आर्थिक स्वावलम्बन की समतुल्यता में ठहरता है जहां दो जून भोजन के लिए उसे परिवार के अनुग्रह पर आश्रित नहीं रहना पड़ता), ईश्वर पर ध्यान केन्द्रित करने के बहाने आत्मस्थ होने का, साधु-संगति के बहाने ज्ञानार्जन करने तथा तीर्थाटन के बहाने गतिशील होने और अपना सामाजिक दायरा बनाने का महत्वपूर्ण माध्यम भी था. दरअसल देह में अवस्थित कामनाओं के ज्वार को पहचान कर ही मीरा अपनी निजता पाने के लिए महत्तर लक्ष्य की ओर उन्मुख हो सकी है. वैराग्य और भक्ति चूंकि मीरा का ध्येय नहीं रहा, इसलिए अपनी भावनाओं का उदात्तीकरण करने की बौद्धिक कवायद भी उनमें दिखाई नहीं देती. अंत तक दाम्पत्य जीवन की कटु स्मृतियां उन्हें सालती रहीं और भीतर की तपन बुझाने के लिए वे राणा को गरियाती रहीं हैं.

आज की स्त्रीविमर्शकारों की तरह मीरा भी जानती हैं कि स्त्री की मुक्ति का रहस्य उसकी स्वतंत्र निर्णय क्षमता में निहित है. निर्णय लेना जोखिम का काम है क्योंकि भविष्य के गर्भ में छिपे उसके दूरगामी प्रभाव सकारात्मक होंगे या नकारात्मक – पूर्वानुमान हमेशा सही नहीं होता. अतः निर्णय लेना जितना महत्वपूर्ण है, उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण है उसकी जवाबदेही के प्रति स्वयं को तैयार करना. मीरा अपने हर निर्णय के लिए जवाबदेह है. इसलिए गलत साबित होने पर किसी दूसरे को लांछित-धिक्कारती नहीं, स्वयं उस स्थिति से मुठभेड़ करने के लिए अपने को मानसिक-नैतिक रूप से तैयार करती है. साधु-संगति के लिए बेहद ललकती मीरा ने कभी सोचा भी न होगा कि जिस विषमतामूलक दमनकारी व्यवस्था को महल के भीतर छोड़ कर वह गलियों में आई है, वह अपने उसी दंभी, निर्लज्ज, नग्न रूप में साधुओं की जमात में मिलेगी. साधु-संगति की लालसा में वृंदावन और काशी की गलियों में घूमती मीरा को ‘पुरुष’ मिले हैं, ‘साधु’ नहीं. यह मीरा का मोहभंग है. तीर्थाटन उसे उद्देश्यहीन लगता है और ज्ञान-चर्चा पाखंड. आरम्भिक उत्साह के बाद मीरा अपने काव्य में साधुओं को लेकर अचानक मौन हो जाती है. बस, इतनी सी टिप्पणी करती है कि ”कासी को लोग बड़ो बिसवासी, मुख मैं राम बगल मैं फांसी”.उसकी पूरक कथा ‘वैष्णवन की वार्ता’ में लिपिबद्ध है जहां मीरा मनुष्य नहीं, मादा देह है; पुरुषों की दुनिया में बलात् घुस कर उनका चरिरत्र स्खलन करने वाली मायास्वरूप कामिनी.  इतना भीषण स्त्रीद्वेष ! क्या इसलिए कि उसने न किसी के दबाव में आकर किसी पंथ विशेष की दीक्षा ली और न अपनी साधना-पद्धति बदली ? काव्य-रचना उसके लिए न पांडित्य प्रदर्शन का माध्यम रही, न भक्ति की दार्शनिक मीमांसा या परलोक प्राप्ति का सुलभ जरिया. वह तो उसके भीतर बहती भावनाओं का स्फोट है, आत्मालाप-आत्माभिव्यक्ति और आत्मप्रसार का जरिया जिसमें उसकी दमित वासनाएं और अमूर्त सपने दोनों अपनी सम्पूर्ण सत्ता के साथ विद्यमान हैं . अपने मनोजगत् का प्रत्यक्षीकरण ! पारदर्शी मीरा की दमघोंटू चुप्पी चरित्र-हनन के मर्मांतक घाव की टीस को अंत तक सहन न कर पाने की वेदना से जन्मी है.

संसार से विरत योगियों की दुनिया में भी स्त्री-पुरुष का लौकिक पदानुक्रम कहीं अधिक घृणा और वासना के साथ मौजूद है. तो क्या ज्ञान व्यक्ति को मुक्त नहीं करता ? उसकी क्षुद्रताओं और संकीर्णताओं पर शील और उदारता का मुलम्मा चढ़ाता है ? मीरा की पीड़ा आज के स्त्री विमर्श की भी पीड़ा है. स्त्री को पत्नी/स्त्री से इतर कुछ भी ‘होने’ के लिए आग के दरिया से गुजरना ही होगा. ‘नारि पुरुष के सम्बन्ध झूठे’ – यह बोध मीरा को विरक्त बनाता है और उसकी असहायता को तीव्रतर करता है – ”सगो सनेही मेरो और न कोई, बैरी सकल जहान.” वास्तव में यहां इस अनुभव से गुजर कर मीरा को पहली बार सही मायनों में ‘गली तो चारों बंद हुई’ की प्रतीति होती है. जाहिर है इसके बाद ‘रण’ छोड़ कर द्वारिका के रणछोड़ कृष्ण में समर्पण और दैन्य से भरी निष्क्रिय भक्ति करना जीवित मीरा की लौकिक मजबूरी बन जाती है. विश्वासभंग की इस चोट ने मीरा से जीवन की महक, उल्लास, संघर्ष और आशा की खनकती गूंज को छीन लिया है. मीरा की जीवन-यात्रा का यह हश्र पितृसत्तात्मक व्यवस्था  के पुनरीक्षण की मांग को वैध और न्यायोचित बनाता है. आखिर कब तक मनुष्य बन कर जीना खारिज करते रहेंगे हम?’ओ जी महाराज छोड़ मत जाओ, मैं अबला बल नाहीं’  ‘आधी राणा की फौज, आधी मीरा एकली रे’ का उद्घोष करने वाली मीरा की तेजोमयता मलिन होते-होते जब आत्मदया में तब्दील होने लगती है,  तब पितृसत्तात्मक व्यवस्था की कार्य-शैली की पड़ताल करना अनिवार्य हो जाता है. आखिर ‘मनुष्य’ को तोड़ कर ‘छवि’ बनाना इतना सरल नहीं होता. सीमोन द बउवा ने बहुत ठीक कहा है कि पुरुष कभी स्त्री का साथी, मित्र, हितैषी नहीं रहा. जज, ज्यूरी, अभियुक्त आदि सभी भूमिकाओं में अदालत में वह खुद बैठा है, अतः स्त्री की फरियाद पर कान न देना और उल्टे उसे ही सींखचों के पीछे धकेल देना उसका ‘धर्म’ है. यह शासन-तंत्र की कूटनीति है और आत्मरक्षा का नुस्खा भी.

पुरुष का ‘आत्म’ अपन पूरे वर्ग के अहं की रक्षा के साथ जुड़ा है, इसलिए स्त्री के दमन के लिए स्त्रीद्वेषी युक्तियों को अपनाने, स्त्री को लेकर कुत्सित कुटिल यथार्थ को गढ़ कर उसी में ‘स्त्री-सत्य’ को कैद करने, उस आरोपित ‘स्त्री सत्य’ के सहारे ‘बुद्धिहीना’, ‘कामिनी’ स्त्री को फटकारने-धिक्कारने का विवेकशील ‘पुरुष-धर्म’ और हाशिए पर फेंकी गई स्त्री को रोटी- कपड़ा-मकान जैसी भौतिक सुविधाएं देकर गृहस्वामिनी/देवी बनाने जैसा ‘बड़प्पन’ जताने के पीछे अपनी स्थिति को निरापद बनाने की साजिशें हैं. स्त्री उसकी ‘सहयोगिनी’ है और उसी के जरिए वह स्त्री को अपनी सत्ता पर समग्रता और निस्संगता से विचार न करने का संस्कार देता है. इसलिए यह व्यवस्था सबसे पहले मां के रूप में ही बेटी (स्त्री) पर वर्जनाओं के अंकुश लगा उसे ‘बधिया’ करती है और उसे ‘मनुष्य’ नहीं, ‘स्त्री’ बनने का प्रशिक्षण देती है. इस प्रशिक्षण में लाज, संकोच, शील जैसे अमूर्त मानवीय मूल्यों को आभूषण की तरह शोभित करने के साथ-साथ नख से शिख तक भौतिक आभूषणों को धारण करने, उसे ‘भर्त्ता’ पुरुष की सामाजिक हैसियत से जोड़ कर देखने और सुहाग-चिन्ह का रूप देने का संस्कार विद्यमान है. शिवरानी देवी के लाख प्रतिवाद के बावजूद प्रेमचंद जैसा प्रगतिशील लेखक तक यह स्वीकार नहीं कर पाया कि स्त्रियों की आभूषण-प्रियता की बात सच्चाई नहीं, गढंत है तथा आज की इक्कीसवीं सदी का मीडिया धारावाहिकों के जरिए पढ़ी-लिखी विद्रोही स्त्री को भारी भरकम जड़ाऊ जेवरों के मोह से मुक्त नहीं कर पाया तो सोलहवीं शताब्दी के सामंती परिवेश की राजरानी मीरा की स्त्री चेतना आभूषण-चेतना से कैसे मुक्त हो सकती थी? आभूषण को सौन्दर्य और सौन्दर्य को ‘स्त्रीत्व’ के साथ जोड़ कर आभूषण को स्त्री के लिए अपरिहार्य बना देना असल में पुरुष-प्रधानता के लिए स्त्री की चेतना को कंडीशन करना है. मीरा सजग-सचेत अवस्था में विद्रोह की टंकार करते हुए आभूषणों के परित्याग की गर्वभरी घोषणा करती हैं किंतु आक्रांत कर लेने वाले यथार्थ का सामना न कर पाने की अवशता में जब अपनी स्त्री-नियति का स्वीकार करती हैं तो हरि को रिझाने के लिए व्यवस्था की वाणी ही बोलने लगती हैं.’म्हे तो नखसिख गहणों पहरियो, म्हे तो जास्यां सांवलड़ा री सेज.”

यह व्यवस्था स्त्री के अहं और व्यक्तित्व दोनों को ही बचपन से विकसित नहीं होने देती. अबला और परनिर्भर होने का बोध उसकी सीमाओं को सुपरिभाषित करता चलता है और इस प्रक्रिया में न उड़ने को आसमान देता है, न पैर टिकाने को जमीन. वह ‘अंकशायिनी’ है, इसलिए ‘अंक’ की अधिकारिणी बनने के लिए रोज अपनी सुपात्रता और उपादेयता सिद्ध करनी पड़ती है. जाहिर है मान और स्वाभिमान की बात उसके लिए बेमानी हो जाती है. प्रमुख रहती है अनुकंपा की याचना – ”हा हा करत हूं, पैयां परत हूं, मत करो मान गुमान.” पति के दंभ की धज्ज्यिां उड़ा देने वाली स्त्री की यह कातरता उसकी शक्ति के चुक जाने से ज्यादा शक्ति को सही दिशा में निवेशित न कर पाने की दृष्टिहीनता से उपजी है. यह दृष्टिहीनता अंततः पितृसत्तात्मक व्यवस्था के आंतरिकीकरण की अलक्षित प्रक्रिया को त्वरित करती है जहां नकारी जाने वाली शक्ति (पुरुष वर्चस्व) ही उपास्य, लक्ष्य और स्वप्न बन जाती है. यहीं से आत्मदया और आत्मविघटन की प्रक्रिया शुरु होती है. ”म्हे तो जनम जनम की दासी, थे म्हारां सिरताज” तथा ”तुम तो स्वामी गुण रा सागर, म्हारा औगण चित्त मत ल्याज्यो.” यदि यह स्वीकारा जाए कि जागरुक मीरा स्त्री को पराधीन बनाने वाली व्यवस्था की साजिशों को समझती थी और इसीलिए बेहद चौकन्ने भाव से अपनी जीवन-यात्रा के पहले चरण में उनका विरोध करती रही तो क्या इसका अर्थ यह हुआ कि अब वह अपनी दीनता और पराजय का स्पष्ट स्वीकार कर रही है ? क्या इस स्वीकृति में अपने ‘किए’ पर प्रायश्चित भी है ? यदि नहीं, तो ‘म्हाने चाकर राखो जी’ शृंखला के अनेक पदों  में वे भौतिक जरूरतों को ही नहीं, बल्कि आत्मसम्मान को न्यूनतम करते हुए ‘जो थे देशी, सो म्हे लेशी, याई मत म्हारे पूरी’ की रिरियाती याचना क्यों करती हैं ? दरअसल स्वयं मीरा अपनी लैंगिक पहचान से मुक्त नहीं हो पाई है. बेशक सजग तौर पर वह जानती है कि मानवीय मूल्यों का दंभ भरने वाली पितृसत्तात्मक व्यवस्था में ‘मनुष्य’ का निषेध है. यहां उसके स्थानापन्न रूप में हैं लिंग, वर्ण, वर्ग. आम स्त्री की तरह मीरा की भी यह त्रासदी है कि अवचेतन में व्यवस्था के इसी दबाव को उसने संस्कार रूप में ग्रहण किया है.

यह संस्कार उसके मांस-मज्जा तक धंसा हुआ है, शायद इसलिए कि उसे इतना एक्सपोजर नहीं मिला कि कल्पना करके अपनी मुक्ति की राहों का अन्वेषण कर सके, विचार-विश्लेषण कर व्यवस्था का कोई नया प्रारूप तैयार कर सके या अकेले अपनी समानांतर सत्ता स्थापित कर पितृसत्ता की दीर्घायु को चुनौती दे सके. मीरा की ‘स्वप्न-पुरुष’ की अवधारणा पुरुष से चोट खाकर पुरुष में ही अपने स्त्रीत्व की सार्थकता ढूंढती है. चूंकि वह स्वयं ‘स्त्री’ है (विशिष्ट लैंगिक पहचान से युक्त सामाजिक निर्मिति), अतः सहचर की कामना में पुरुष हमेशा ‘पति’ रूप में आ विराजता है और वह दासी रूप में. अपनी तमाम मासूमियत में मीरा नहीं जान पाती कि समर्पण की इस दैन्य अवस्था में उसने कृष्ण/स्वप्न पुरुष को पति की ही तरह अलभ्य, कठोर, छलिया और श्रेष्ठ बना दिया है जिसके संग सम्बन्ध निभाने की इकतरफा कोशिश उसी के हिस्से आन पड़ी है. ”थे तो पलक उघाड़ो दीनानाथ, मैं हाजिर नाजिर कब की खड़ी.”यहीं इस बिंदु पर अनायास वह स्त्री की परंपरापोषित निष्क्रिय और अनुत्पादक छवि की प्रतिष्ठा करने लगती है जहां स्त्री प्रतीक्षारत है (”कान्हा तोरी रे जोवत रह गई बाट”); अकेली और असुरक्षित है (”हो जी महाराज छोड़ तम जाओ, मैं अबना बल नाहिं गुसाईं, तुम्हीं मेरे सिरताज. मैं गुणहीन गुण नाहिं गुसाईं, तुम समरथ महाराज”); विरह-विदग्ध है (”हो जी हरि कित गए नेह लगाए . . . मेरे मन में ऐसी आवे, मरूं जहर विष खाय”) और अपनी निष्ठा का मुखर प्रदर्शन कर अनुकंपा पाना चाहती है (”म्हारा जनम मरण का साथी, थांने नाहिं बिसरूं दिन राती।”) मीरा स्त्री-सुबोधिनी से भी खूब परिचित है. अतः आदर्श स्त्री की आचार-संहिता की परिपालना में हरि की आंख की पुतली बनी रहना चाहती है. इस आचार-संहिता में नित्यप्रति धर्मोपदेश का श्रवण है, साधु-सेवा का व्रत है, सुमिरन-ध्यान का नेम है, नेकी-बदी के प्रति जवाबदेही है और ‘मन हस्ती अंकुस दै मार्यौ’ की कठिन साधना है. दरअसल यह साधना अपने को न्यूनतम करते-करते अमूर्त कर देने का षड्यंत्रकारी प्रशिक्षण है. ऐसा नहीं कि मीरा इन षड्यंत्रों को न समझती हो.

तीसरे चरण में रचे इन पदों में अवसाद, हताशा, टूटन, थकान, पस्ती, विश्रांति, दुचित्तापन, आत्मधिक्कार आदि इसीलिए है कि अपनी मूल वृत्ति से दूर मीरा केा सामाजिक स्वीकृति के लिए वही सब करना पड़ा जिनका वह जीवन भर विरोध करती रही है. चिंतक के रूप में यह मीरा की असफलता है. वह साधक भी नहीं बन सकी क्योंकि साधना की मौलिक उद्भावना के लिए जिस बौद्धिक सम्पन्नता, कल्पनाशीलता, अंतर्दृष्टि और अतिक्रमण कर जाने की अनिवार्यता है, वह मीरा में नहीं. इसलिए भक्ति सदा आवृत्ति एवं दैन्य, पराजय एवं विश्रांति का पर्याय बन कर यथास्थितिवाद का पोषण करती चलती है, नई आकांक्षाओं को रचने का अनुष्ठान नहीं बन पाती. मीरा के निजी अनुभव विवाह के इर्दगिर्द बुने है. दाम्पत्य सम्बन्धों में कामना और स्वाभिमान से परिपूर्ण पत्नी की अस्मिता के बरक्स वह पुरुष का दंभ स्वीकार नहीं कर सकती, किंतु भक्ति उसके लिए निजी अनुभव नहीं है.
वह जीवन-संघर्ष से पलायन न भी हो तो भी शरणागति की अवस्था तो है ही. सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञ, सर्वव्यापक, अलौकिक ईश्वर की अवधारणा भक्त को ‘लो प्रोफाइल’ में रहने का संस्कार देती है जहां अपनी ऐहिक ऐषणाओं को मार कर ‘विदेह’ होने का ‘अहंकार’ है. यह ‘अहंकार’ एक ओर भक्त को दैन्य अवस्था में घिघियाते रहने की कुंठा से मुक्त करता है तो दूसरी ओर उसकी सत्ता को ‘संत’ का नाम देकर लौकिक व्यवस्था की परिधि से मुक्त करता है. अब उसका आचरण धर्म, राजसत्ता और अर्थशक्ति के गठबंधन से बनी पितृसत्तात्मक समाज व्यवस्था के नियम-अनुशासनों को बाधित-प्रभावित नहीं करेगा. ईश्वर की सत्ता में राजा एवं पति की शक्ति एवं श्रेष्ठता का नियोजन कर मीरा भक्ति के माध्यम से इन्हीं लौकिक संस्थाओं को पुष्ट करती है. इसलिए मीरा सहित निर्गुण संत कवियों का विद्रोह अपनी पारिवारिक-सामाजिक अवस्था से शुरु होकर अभाव में जीने वाले (अपरिग्रही, संयमी, विवेकशील) व्यक्ति के अहंकार में तब्दील होता है और फिर ईश प्राप्ति हेतु स्वयं पर स्त्री की हीन भूमिका का आरोपण कर ‘समर्थ’ की आराधना में जुट जाता है. यह संघर्ष-यात्रा ऊर्ध्वमुखी न होकर उसी दलदली जमीन पर लौट आती है जहां की पकड़ से मानसिक-नैतिक रूप से मुक्त होकर उसने लड़ाई का बिगुल बजाया था.लिजलिजी भावुकता और इंसानी दुर्बलताओं को नष्ट किए बिना अपने भीतर विद्रोह की ज्वाला सुलगाना व्यक्ति के लिए संभव नही.

 मीरा जानती हैं कि आंसू व्यक्ति को कमजोर बनाते है. वे कुछ दुर्बल क्षणों का परिणाम होने के अतिरिक्त उसकी अपनी शक्तियों के निरंतर छीजते चले जाने की ईमानदार स्वीकृति भी होते है. यह ठीक है कि एक के आंसू दूसरे व्यक्ति में करुणा का उद्रेक करते है लेकिन साथ ही उसके भीतर विशिष्ट होने का आश्वस्तिपरक बोध भी विकसित करते है. यह बोध उसे अपने सामर्थ्य, ताकत और उद्धारक की अहम्मन्यता देता है. रोता हुआ व्यक्ति जितना हीन होगा, उतना ही दूसरे का बल और अहंकार बढ़ता जाएगा. हीन को दीन-हीन बनाए रखने में ‘उद्धारक’ की परदुखकातर छवि पोषित होती है. चूंकि स्त्री अबला और हीन है, इसलिए आंसुओं का सम्बन्ध समाज ने उसी के साथ जोड़ा है, पुरुष के साथ नहीं. उल्लेखनीय है कि मीरा ने आंसुओं के सैलाब में अपनी सत्ता को बहने नहीं दिया है. विद्रोह का निनाद करते हुए पारिवारिक उत्पीड़न और राजसत्ता के दमन दोनों को उसने डंके की चोट पर हंस कर झेला है. जोगी के विरह में वह अवश्य रोती है, लेकिन इस रुदन में असहायता नहीं, अपनी उद्दाम कामनाओं की अतृप्ति का स्वीकार है, अर्थात् वहां आत्मविस्मरण एवं आत्मदया की स्थिति नही. लेकिन जोगी के प्रेम से विरत होकर मीरा जब ‘गिरधारी’ को समर्पित होती है, तब अन्य भक्त कवियों की तरह विरहिणी आत्मा का चोला पहन वह अपने को आंसुओं से गलाने लगती है. किस तर्क से क्यों परमात्मा पुरुष है और आत्मा स्त्री – इस पर कभी शंका नहीं, न विवाद। आत्मा स्त्री है भी तो उस पर स्त्री-नियति का आरोपण क्यों ? मीरा जीवन भर जिस स्त्री-नियति से बचती रही, वह हर मोड़ पर उन्हें धर दबोचने को आगे आती रही. एक दीर्घ परम्परा का सहज स्वीकार मीरा की अवश इच्छा बन जाता है और शुरु हो जाता है उन्हीं-उन्हीं उपमानों-बिंबों-प्रतीकों में विरह-व्यंजना का खेल  – यह परंपरा-पालन की लीकबद्धता है अथवा विरह की अपेक्षा अकेलेपन और असुरक्षा से उपजी वेदना. हार्दिकता एवं कामनाओं की खनक नहीं जो व्यक्ति की निजता की गूंज बन कर दसों दिशाओं में फैल जाती है. भक्ति की अर्हता के रूप में स्वीकृत रुदन एक बार फिर समाज-व्यवस्था द्वारा अपनी पकड़ से बाहर जाते संतों/भक्तों पर अपने वर्चस्व की मुहर लगाने और सांसारिक छवियों का पोषण करवाते चलने का षड्यंत्र बन जाता है.
क्रमशः 

अकेली कुहुक को जवाब मिले


गुंजन भाटिया

वीगन, एनीमल राइट्स कार्यकर्ता। ‘Living by loving ब्लॉग लिखती हैं। शिकागो में रहती हैं।. संपर्क :gunjan.bhatia@gmail.com

विश्व पर्यावरण दिवस पर विशेष 


20 अप्रैल 2016 – सुबह के चार बजे . 


यूकी – मेरी झबरैली डॉगी – की मनुहार भरी हुंकार ने मुझे नींद से उठा दिया. उसे अपना कंबल ओढ़ाकर, अपने पास बुलाकर, पानी देकर बहलाने-फुसलाने की सारी तरकीबें मैंने आजमा लीं  पर वह नहीं ही मानी . आखिर मैं उठकर बैठ गई – क्या चाहिए तुम्हें … ? उसने दरवाज़े का रुख किया. उसे जाना ही था. इस मुंह अंधेरे के वक्त, बेमतलब वह कभी उठाती नहीं ….. मैंने स्वेटर पहना और दरवाज़े के बाहर निकली. वह पूंछ हिलाकर कृतज्ञता ज़ाहिर कर रही थी. सड़क आते ही उसने अपना सुबह का काम निबटाया और हम आगे बढ़ने लगे. साथ लगे पार्क में हमारी रूटीन सैर आम तौर पर सुबह सात से नौ के बीच और रात की सैर देर 12 बजे तक होती है. आज इतनी सुबह सड़क पर अलग सा सन्नाटा था. रात की चुप्पी कितनी अलग होती है, सुबह के इस सुकूनदेह सन्नाटे से. अजब किस्म की भयावहता होती है रात के सन्नाटे में. तब मैं सड़क के हर मोड़ पर मानसिक रूप से पूरी तरह चौकस घर लौटने की जल्दी में रहती हूं. आज सुबह के चार बजे, भव्य किस्म की शांति , एक नए जादुई संसार में ले जा रही थी. सड़क के दोनों किनारों के पेड़ों पर चहचहाती चिडि़यों की संगीत लहरी सड़क पर पसरी निस्तब्धता को तोड़ रही थी .

यूकी और मैं उन सुरों का पीछा करते हुए आगे बढ़ रहे थे . एक सुरलहरी से अगली सुरलहरी तक. अचानक महसूस हुआ, इस मोहक सुरलहरी का जवाब दूसरी ओर के पेड़ों की हरियाली से आ रहा है. पूरा माहौल जैसे एक संगीतमय शो था जिसमें स्टेज के एक ओर से चिडि़यों की कुहुक गूंजती और जुगलबंदी में बिलकुल वैसा ही जवाब दूसरी ओर के पेड़ों की शाखों से आता. इस जुगलबंदी में एक अलग किस्म की कुहुक बीच-बीच में सुनाई दे रही थी . इसका अंदाज़ अलग था. लंबा खिंचने के बाद एक प्रश्नचिह्न पर ख़त्म होता सा ! हर बार यह पुकार किसी दूसरे कोने से नहीं लौटती. एक कसक सी मन में उठी. इस जवाब ढूंढती कुहुक को सुनकर एक डाॅक्यूमंट्री ‘Racing Extinction’ का पहला दृश्य याद आया जहां कुआई प्रजाति की आखिरी बची नर चिडि़या की अकेली कुहुक से फिल्म की शुरुआत होती है जिसका जवाब नहीं आता…..मैं फुटपाथ के किनारे खड़ी हो गई – पेड़ों की शाखाओं को निरखती, संगीत की स्वरलहरियों के जादू को पहचानती जो अब हर दस मिनट में धड़धड़ाती आवाज़ से टूट रहा था जैसे पत्थर पर सख्त रबर के चक्के रगड़ खा रहे हों.

इंसानों के नींद से उठने के आसार दिखने लगे थे. हर गाड़ी के पास से गुज़रने के साथ साथ हवा में गूंजती संगीत लहरी धीमी होती चली गई. धीरे धीरे गाड़ी की घरघराहट और मशीनों के शोर के बीच पक्षियों के गाने की आवाज़ शांत हो गई. अपने घर लौट आई हूं. जब मैं यह लिख रही हूं, यूकी अपने बिस्तर पर गहरी नींद सो रही है और मैं उन लोगों का शुक्रिया अदा करना चाहती हूं जिन्होंने सड़कों के किनारे इन घने पेड़ों को बचाए रखा. शायद वे जानते थे कि एक दिन ये पेड़ प्रकृति का एक विराट रंगमंच बनेंगे जहां धरती की सबसे ख़ूबसूरत सिम्फ़नी का मंचन होगा और हम इस संगीतलहरी को हर सुबह सुनेंगे. कैसे भूल सकती हूँ कि दो दिन बाद ही पृथ्वी दिवस (World Earth Day ) है और मैं अपने सभी मित्रों से यह पोस्ट पढ़ने का अनुरोध कर सकती हूं. हम इंसानों की बहुत बड़ी दुनिया में रह रहे हैं – अपनी मशीनों और यंत्रों के साथ, अपनी इच्छाओं और ज़रूरतों के साथ, अपनी परेशानियों और आकांक्षाओं के साथ. लेकिन पशु-पक्षियों की दुनिया आज भी हमारे बीच जि़ंदा है – चुपचाप, छिपी हुई, लगभग अदृश्य क्योंकि हम खुद अपनी आंखें खोलकर इन्हें देखना और इसका संज्ञान लेना नहीं चाहते.

मेरी गुज़ारिश है आपसे कि अगले दो दिन, आप अपने इर्द गिर्द ग़ैर इंसानों के जीवन को देखें.  देखें कि वे आपस में कैसे रहते हैं, कैसे लड़ते हैं, कैसे गीत गाते हैं, कैसे प्यार का इज़हार करते है. पेड़ों को देखें और उनपर चहकती चिडि़याओं को देखें, कुत्ते और बिल्लियों को देखें, गाय-बकरी , मुर्गियों, कीड़ों को देखें – वे सब हमारी खूबसूरत धरती का हिस्सा है. अगले कुछ दिन आप अपनी धरती पर अपनी स्पेस और अपने मुकाम को देखें कि इस ज़िंदा प्रजाति को हम अपनी इंसानी दुनिया में कितनी जगह दे पाए है और कितनी जगह दी जानी चाहिए थी. खुद उन्हें देखें और अपने बच्चों को भी देखने दें. उन्हें हम पहचानेंगे तभी उस खूबसूरत खजाने को संभालकर रख पाएंगे और उनके साथ अपने दरकते रिश्तों को सुधार पाएंगे. उन्हें हम पहचानेंगे, तभी यह भी समझ पाएंगे कि कहां हमारी ज़रूरतें और इच्छाएं खत्म होती हैं और उनकी शुरू होती हैं. शायद तभी हम उनके संगीत को लौटाना भी सीख पाएंगे.तब कोई अकेली पुकार जवाब का इंतज़ार करती नहीं रह जाएगी.

और एक कविता 
इस धरती पर बहुत आहिस्ता चलो

इस धरती पर आहिस्ता
बहुत आहिस्ता चलो
बहुत संभाल के साथ
ताकि हमारी सांसों की आवाज़
दब न जाए हमारी इच्छाओं के बोझ से
बची रहे हमारे लिए जगह
और बचे रहें हम ।

इस धरती पर बहुत आहिस्ता चलो
बहुत प्यार के साथ
कि हमारी रूह महसूस कर सके
घर का सुकून
हमारी हथेलियां याद रखें
ज़ख़्मों को सहलाना
और दिल उमग कर गा सके
उड़ते परिंदों का गाना

इस धरती पर बहुत आहिस्ता चलो
क्योंकि इसी से बने हैं हम
नदियां हमारी शिराओं में बहता रक्त है,
शाखों वाले पेड़ हमारी हड्डियां
जीव जंतु इस धरती के
हमारी मासूम परछाइयां

इस धरती पर बहुत आहिस्ता चलो
बहुत एहतियात के साथ
ताकि तब भी हमारे लिये
आराम करने को जगह हो यहां
जब हम रह जाएं सिर्फ़ एक कतरा हवा …….

माई मैं तो लियो है सांवरिया मोल’ — मीराबाई : हिंदी की पहली स्त्रीवादी : दूसरी क़िस्त

रोहिणी अग्रवाल

रोहिणी अग्रवाल स्त्रीवादी आलोचक हैं , महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर हैं . ई मेल- rohini1959@gmail.com

हिंदी आलोचना प्रायः राणा को मीरा के देवर विक्रमजीत सिंह के रूप में चिन्हित करती रही है और मीरा के सुखी दाम्पत्य जीवन की परिकल्पना कर ससुराल द्वारा वैधव्य के उपरांत मीरा के उत्पीड़न-दमन के तथ्य को रेखांकित करती रही है. संभवतया इसका कारण मीरा के जीवन से सम्बद्ध कुछ इतिहाससम्मत तथ्यों-तिथियों एवं घटनाओं की खोज कर ऐतिहासिक वातावरण की निर्मिति का विचार रहा हो लेकिन यह भी सत्य है कि मीरा को लेकर निर्विवाद रूप से कुछ भी नहीं कहा जा सकता. अतः बाह्य-साक्ष्य को मीरा के काव्य पर आरोपित करने की अपेक्षा क्यों न अंतःसाक्ष्य के आधार पर मीरा के स्वर को सुना एवं गुना जाए ? मीरा अपने एक पद में हार-सिंगार, रेशम की साड़ी और हाथ की चूड़ियां त्यागने की बात करती है. उल्लेखनीय है कि विधवा मीरा देवर राणा से उन सभी सुहाग-चिन्हों को अभिमानपूर्वक त्यागने की बात नहीं कर सकती थी जो समाज व्यवस्था ने पति राणा की मृत्यु के उपरांत उससे जबरन छीन लिए हैं.  ठीक इसी प्रकार अपने एक पद में मीरा आत्मपरिचय देते हुए ”जैमल के घरि जनम लियो है, राणा नैं परणाई’ कहती जरूर हैं, लेकिन साथ ही बदली परिस्थितियों और विद्रोही मानसिकता में इस सम्बन्ध की आंतरिकता और नैतिकता का निषेध भी कर देती हैं कि ”जनम जनम की मैं दासी राम की, थारी नाहीं लुगाई.” मीरा का काव्य एक सामान्य स्त्री के हृदय का हाहाकार हैं. वह मनस्ताप का मुखर आर्त्तनाद है जहां किसी भी शिक्षित-अशिक्षित आधुनिका स्त्री की तरह वह सास-ननद और पति को बार-बार जी भर कर गालियां दे रही है.मन को टूक-टूक कर देने वाली कटु स्मृतियों की कसक एक लम्बे अंतराल के बाद भी क्षीण नहीं हुई.
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‘बरजी मैं काही की नाहिं रहूं’ — मीराबाई : हिंदी की पहली स्त्रीवादी 

 राजसत्ता के प्रतीक रूप में ‘राणा’ सम्बोधन किसी को भी निवेदित हो सकता है, किंतु पारिवारिक सम्बन्ध में यदि मीरा देवर को दोष देना चाहती है तो वह पदवी विशेष की आड़ क्यों लेती है जबकि लोकजीवन में स्त्री ‘राणा’, ‘स्वामी’ आदि सम्बोधनों का प्रयोग पति के लिए करती है. यानी इस स्थिति से अस्वीकार नहीं किया जा सकता कि राणा/पति को क्लीन चिट देने के पीछे हिंदी आलोचना का पुरुष श्रेष्ठता का दंभ सक्रिय रहा होगा. चूंकि पति परिवार में परमेश्वर का समरूप है, अतः उसकी सत्ता और वर्चस्व को निष्कलंक और स्वयंसिद्ध बनाए रखने के लिए उसकी छवि को निर्मल और उदात्त बनाना अनिवार्य है। वह पोषक है, कर्त्तव्यपरायण निःसंग पुरुष और न्यायशील प्रशासक. गृह-क्लेश और दमन-उत्पीड़न जैसी क्षुद्रताओं में संलग्नता उसकी इस उदात्त ‘अलौकिक’ छवि को क्षरित करती है. अतः पति के रूप में वह सदा काम्य और वरेण्य है, क्रूर और अमानुषिक नहीं, हालांकि आज भी दहेज-उत्पीड़न, वधू-दहन एवं घरेलू हिंसा से सम्बद्ध आंकड़े सास-ननद के साथ पति की सक्रिय भागीदारी की बात रेखांकित करते है.

 ‘आणै आणै जी रंगभीना म्हारै महल/प्यालो तो लियां हाजर खड़ी’

मीरा का समूचा काव्य उत्पीड़ित स्त्री के आर्त्तनाद और विरहिणी प्रिया के करुण हाहाकार का प्रामाणिक दस्तावेज है. निजी जीवन की अनुभूतियां और गोपन मन की रहस्यात्मकता जिस सूक्ष्म भाव से मीरा-काव्य में व्यंजित हुई है, वह उसे अन्य भक्त कवियों से अलगाता है. मीरा के पद अपनी मूल संरचना में उत्कट भावोच्छ्वास में लिखी गई डायरी की प्रविष्टियां है. मन का निजी कोना जहां न अपने को बेहतर रूप में प्रस्तुत करने की सामाजिकता है, न विकारों को छुपाने की व्यावहारिकता. है तो अपनी भौतिक सच्चाई को अकुंठ निर्भीक भाव से स्वीकारने की ईमानदारी  अपने को अतीत, वर्तमान और भविष्य की एक सीधी रेखा में रख का जांचने की निःसंगता. मीरा के सरोकार किसी स्त्रीविमर्शकार की तरह सजग-सचेतन रूप से न स्त्री जाति के कल्याण से जुड़े हैं, न पितृसत्तात्मक व्यवस्था के पुनरीक्षण की मांग से. अपने से बाहर ‘मनुष्य’ की सत्ता को जानने का बोध मध्ययुगीन व्यवस्था में विकसित हुआ ही नहीं था. निर्गुण संत कवियों की बानी में गूंजने वाला सकारात्मक विद्रोही स्वर दरअसल वैयक्तिक स्तर पर अपनी पीड़ा और दमित आकांक्षाओं की मुखर एवं सामूहिक अभिव्यक्ति रही है. मीरा-काव्य में स्त्री मुक्ति के स्वर भी अपनी वैयक्तिकता की अभिव्यक्ति की उत्कट इच्छा का परिणाम है.
कृत्रिमता एव छद्म छल-छंद से सर्वथा मुक्त मीरा स्त्री-मानस को उसकी उद्दाम कामनाओं के साथ चित्रित करती हैं. इस प्रक्रिया  में लौकिक मर्यादाएं और वर्जनाएं बार-बार टूटने की कगार पर आती हैं, टूट भी जाती है.

अनेक बार मीरा अपने भीतर की प्रचंडता से आतंकित हो पुनः अपनी सुरक्षित चारदीवारी में बंध जाना चाहती है किंतु चारदीवारी के भीतर पलती नृशंसताओं एवं असुरक्षा को वह पहले ही प्राणों के मोल पर झेल चुकी है, अतः प्रत्यावर्तन का विकल्प भी नहीं. तब उसके सामने एक ही विकल्प है – युगीन प्रवाह में बह कर लौकिक पर आध्यात्मिक का आरोपण. यह विकल्प एक ओर यदि मीरा के भीतर की स्त्री की द्वंद्वग्रस्तता, निरीहता एवं विवशता का संकेतक है तो दूसरी ओर अपनी दैहिक कामनाओं को पूरी ऐन्द्रिकता के साथ प्रकट करती एक नई स्त्री-छवि को सम्पुष्ट भी करता है. ”अपणा गिरधर कै कारणै मीरा वैरागण हो गई रे” – मीरा की यह आरोपित भक्त-छवि विकल प्रेयसी के रूप में मीरा के अध्यात्म की प्रक्रिया को बाधित करती है किंतु जोगी के लिए ‘सरप डसी’ मीरा की टेरती टीस क्या अनसुनी की जा सकती है ?   इस जोगी की ‘माधुरी मूरत सुंदरी सूरत’ ‘नैनन’ में बसने वाले नंदलाल से भिन्न है. इस जोगी के अधरों पर न मुरली है, न ‘उर’ पर वैजयंती माल; न कटितट पर क्षुद्र घंटिका सुशोभित हैं, न नूपुर शब्द का मधुर रस, बल्कि यह ‘जोगी’ राजस्थानी वेशभूषा में घर-घर अलख लगाता संन्यासी भर है –
”कुसुमल पाग केसरियां जामा, ऊपर फूल हजारी / मुकुट ऊपरे छत्र बिराजे, कुंडल की छबि न्यारी.”
अथवा
”पाग कसूमल केसरया जामूं, सोहै कुंडल कांन.”

इस जोगी के संग वैवाहिक जीवन से अतृप्त स्त्री का मन जुड़ जाए तो अन्यथा क्या. पति से उसकी सामान्य अपेक्षाएं ही तो रहीं. वह कृपा-दृष्टि नहीं, प्रेम-दृष्टि चाहती है. पति की ‘रिसाई’ दृष्टि में कोप है जहां अपने को दग्ध होने से बचाने की सतर्कता है लेकिन जोगी की दृष्टि ‘मानो प्रेम की कटारी है’ जहां बिंध-बिंध कर अपने को सम्पूर्णता में चिन्ह  लेने की खुमारी है.  पति के ‘कूड़ा बचन’ उसके स्त्रीत्व की लानत-मलामत करते हैं, तो जोगी की मीठी बातें दिल और देह की तार-तार झंकृत कर उसके भीतर यौवन की दहकती कामनाएं उत्पन्न कर देती हैं. दाम्पत्य एवं देह मिलन के संदर्भ नए अर्थों में उसके समक्ष खुलते हैं तो वह अपने पत्नीत्व की सार्थक परिणति में आह्लाद से भर कर सेज सजाने की सभी तैयारियां पूर्ण कर लेना चाहती है –
”अतर सुगंध मिलायके जी, घी भर दिवला बार /जाई जूही केतकी जी, चंपाकली सुधार
पलकां सूं करां पांवड़ा जी, अंचलां सूं मग झार /गिरधर म्हारो परम सनेही, मीरां उनकी नार।”
‘आद अंत तन मन धन मेरे, आनंद करां कलोले’ – रोम-रोम में संचारित कामनाओं का उत्ताप उसे विह्वल बना देता है –
”करके सिंगार पलंग पर बैठी, रोम रोम रस भीना /चोली के मेरे बंद तरक गए, श्याम भए परबीना.”
प्रेम-दीवानी मीरा अपनी मनोभावनाओं को किसी से छुपाना भी नहीं चाहती –
”ज्यूं अमली से अमल अघारा, यूं रमैया प्राण हमारा /कोई निंदै बंदै दुख पावै, मोकूं तो रमैयां भावै.”
तथा
”अब कोऊ कछु कहो, दिल लागा रै / हंसा की प्रकृत हंसा जाणे, का जाणैं नर कागा रैं
तन भी लागा, मन भी लागा, ज्यों बामण गल धागा रैं.”
कामनाएं मानस में रस का उद्रेक भले ही कर दें, बौराई देह को तृप्त नहीं करतीं, विक्षिप्त अवश्य कर देती हैं।

काल्पनिक सुख मीरा – स्त्री – को दांपत्य जीवन की कटुता से पल भर को मुक्त करा सकता है, शारीरिक उत्ताप को शीतल नहीं कर सकता. ‘कबहुं मिलैगो मोहिं आई रे तू जोगिया . . मिलि का तपत बुझाई” – अपनी सेक्सुएलिटी का अकुंठ स्वीकार करती है मीरा और अतृप्ति की पीड़ा का भी – ”नींद नहिं आवै जी सारी रात. करवट लेकर सेज टटोलूं रूं पिया नहीं मेरे साथ” तथा ”सूनी सेज जहर ज्यूं लागे, सिसक-सिसक जिय जावे निद्रा नहिं आवे.” लौकिक जीवन का यथार्थ मीरा को पुनः एकाकी और पराजित कर देता है. ”मैं तो जाणूं जोगी संग चलेगा” – बारह वर्ष के सान्निध्य को धता बता कर अन्यत्र चले जाने वाला जोगी क्या विश्वासघाती नहीं ? मीरा ‘जोगी’ के इस पुरुष-चरित्र को खूब पहचानती है जिसका ‘मर्म’ पाना स्त्री के लिए संभव नहीं. लेकिन प्रेमजन्य विश्वास और संवाद के कारण हार्दिकता के तंतुओं को इतनी जल्दी झटकना नहीं चाहती. स्त्री बहुत जल्द विश्वास नहीं करती. कर ले तो उसकी सूक्ष्म व्यूह-रचना से स्वयं को मुक्त नहीं कर पाती. मीरा का द्वंद्व और हताशा, भटकन और विरह स्त्री की इसी मानसिकता की स्वाभाविक परिणति है. आत्मछलना से दूर तक अपने को बींध कर क्षरित करती चलती है स्त्री. विकल्पों और संभावनाओं के महल खड़े कर अपने छिलते वजूद को आधार देना चाहती है. शायद भगवा भेष धारण कर के जोगी मिल जाए उसे –
”जोगिया ने कहियो रे आदेस /
आऊँगी मैं, नांहि रहूंगी कर जोगन को भेस। चीर को फाड़ूं कंथा पहरूं, लेऊँगी उपदेस.
गिणत गिणत घिस गई रे मेरी उंगलियां की रेख। मुद्रा माला भेष लूं रे, खप्पड़ लेऊँ हाथ.
जोगिन होय जग ढूंढसूं रे, रावलिया के साथ.”
या प्रेम पगे उलाहने में अपने ‘त्याग’ की कातरता पिरोने से पिघल जाए वह –
”इतनूं काई छैं मिजाज, म्हारै मिंदर आता, थांने इतनूं काई छैं मिजाज..
तन मन धन सब अरपन कीनूं, छाड़ी छै कुल की लाज
दो कुल त्याग भई बैरागण, आप मिलण की लाग.”
या शायद पूर्ण समर्पण से उसका अहं तुष्ट हो जाए –
”जोगी आ जा आ जा, जोगी पाई परूं मैं हौं चेरी तेरी.”

इस स्त्री का एकमात्र जीवन-सत्य है – ‘रमइया बिन रह्यो ही नजाई.’ तन-मन को बांध जाती ठीक वही कामातुरता जो मित्रो (मित्रो मरजानी, कृष्णा सोबती) को डिप्टी के साहचर्य के लिए उन्मत्त बनाती है और अपनी कामनाओं की ‘वाचाल’ अभिव्यक्ति कर भीतर ही भीतर वर्जना-भंग के ‘सुख’ से आनंद पाती है. उल्लेखनीय है कि हिंदी कथा साहित्य में स्त्री की दैहिकता को पहली बार खुली-स्पष्ट शब्दाभिव्यक्ति देने वाली कृष्णा सोबती स्त्री को मिलन के सुख से वंचित करती हैं (मित्रो मरजानी) या सुखानुभूति के जरिए सार्थकता की परितृप्ति करने के बाद मिलन एवं साहचर्य को किसी क्षीण सी नैतिक रेखा के अधीन स्थगित कर देती हैं (सूरजमुखी अंधेरे के)। यह परम्परा का स्वीकार है ? अंततः नैतिक मर्यादाओं का अतिक्रमण न कर पाने की कातरता ? अथवा स्त्री सम्बन्धी पुरुष-निर्मित मान्यताओं एवं पूर्वाग्रहों को धता बता कर स्त्री मानस का सही परिचय देने की व्याकुलता ताकि स्त्री-पुरुष सम्बन्ध एवं सामाजिक व्यवस्था की पुनर्संरचना नई आधारभूमि पर संभव हो सके ? मीरा के पदों को यदि आध्यात्मिकता के कुहासे से मुक्त किया जाए तो वे जीवन के राग, उल्लास, उत्सव और ठाठ-बाट के साथ ऐन्द्रिकता के उद्दाम का भी संस्पर्श करते हैं. घनघोर लौकितता के बीच घोर शृंगारिक बाना.मनोवृत्तियों का प्रकाशन भी ठीक नैसर्गिक रूप में है – व्यंग्य, आवेश, आक्रोश, पीड़ा, हठ, अहंकार. मीरा अपनी इच्छाओं के उच्छ्ल आवेग को जानती है, उन्हें पूरा करने की विधि नहीं जानती. यह उसका ‘दरद’ है क्योंकि लौकिक प्रिय के लौकिक स्वरूप को समाज स्वीकृति नहीं दे सकता. प्रेमदीवानी स्त्री की समाज में तभी स्वीकृति है जब उसका प्रेम पति को निवेदित हो गृहस्थ धर्म का पर्याय बन जाए या ईश्वर को निवेदित होकर अध्यात्म का उदात्त भाव जो अपनी लौकिक व्यंजना में पति में ईश्वरत्व का आरोपण कर उसकी सत्ता को स्वयंसिद्ध एवं अ-चुनौतीपूर्ण बनाए रखने का उपक्रम मात्र है.

 जब-जब स्त्री ने अपने प्रेम की उत्कटता को मजनूं, रांझा या फरहाद का नाम देकर किसी जीवित पुरुष को सामने रख कर राग भरे संयुक्त जीवन का स्वप्न देखा है, समाज ने लैला, हीर और शीरीं के रूप में अंकुराती स्त्री-स्वच्छंदता को जड़ से उखाड़ फेंका है. प्रेमोन्मादिनी स्त्री गृहस्थी के लिए, पुरुष के वर्चस्व के लिए, सम्बन्धों के विषमतामूलक ढांचे की दीर्घायु के लिए, धर्म एवं राजसत्ता के लिए चुनौती है जो अपनी निरीहता में समूची व्यवस्था की मजबूत आधारशिला को हिलाने का सामर्थ्य रखती है. स्त्री के परकीय प्रेम की स्वीकृति का अर्थ है स्त्री की स्वतंत्र सत्ता, योनिकता और महत्वाकांक्षा की स्वीकृति जो अपने लिए क्रमशः आधी जमीन और आधा असमान मांगने के उपरांत षड्यंत्रकारी समाज व्यवस्था को छिन्न-भिन्न करने का साहस जुटाएगी. मीरा के पद प्रेमाकुल मीरा के जीवनोल्लास, मोहभंग और समर्पण के तीन महत्वपूर्ण बिंदुओं के जरिए व्यवस्था के समक्ष स्त्री की असफल संघर्ष-यात्रा का आरेखन करते है. मीरा लौकिक प्रिय (जोगी) से नहीं मिल सकती. अपनी संस्कारग्रस्तता (जिसे स्त्री के शील और संकोच के रूप में महिमामंडित किया जाता है), प्रिय की कायरता (जो पुरुष की भ्रमरवृत्ति के रूप में उसके पौरुष का शृंगार कही जाती है, किंतु स्त्री की दृष्टि में यह उसकी लम्पटता है) अथवा पारिवारिक नियंत्रण के कारण यह प्रेम सिरे नहीं चढ़ता. मीरा शील और संकोच को अंगूठा दिखा कर अपनी कामनाओं को अभिव्यक्त कर चुकी है.  परिवार के अंकुश बेमानी हैं. रमते जोगी से संवाद और ‘दरस’ पाने के लिए साधु-संगति शुरु कर दी है. ”गिरधर गास्यां, सती न होस्यां, मन मोह्यो घण नामी. जेठ बहू को नहिं राणाजी, थे सेवक म्हे स्वामी.’  बस, मात खाई है तो प्रेमी की भ्रमरवृत्ति से जो अभिज्ञान बन कर उसे विकल्पहीन सान्त्वना तो देती है, किंतु सब कुछ खो देने के उपरांत –
”जो मैं ऐसो जानती रै, प्रीत किए दुख होय/ नगर ढिंढोरा फेरती रै, प्रीत करो मत कोय।”

इस प्रेम-प्रवंचिता ने घर खोया है, अंतरंग सम्बन्ध की हार्दिकता के प्रति विश्वास को खोया है, यथार्थ जगत की विभीषिका के साथ-साथ पग-पग पर अपनी (स्त्री जाति की) सीमाबद्धता का साक्षात्कार किया है. घर-बाहर लीक से हट कर कुछ करने को स्वतंत्र नहीं. वर्तुलाकार परिधि में इन्द्रियों को नकार कर जीने वाली जीवन यात्रा – यही है कुल स्त्री जीवन. मीरा की स्त्री फैल-फूट कर अपना वजूद पाना चाहती है, किंतु अंकुराने के लिए बित्ता भर जगह और बूंद भर नमी भी नहीं पाती. सपनों का नष्ट हो जाना मनुष्यता का नष्ट हो जाना है. मीरा के भीतर जीवन ठाठें मार रहा है. वह अपने को बचाना चाहती है. इसलिए प्रेम पर भक्ति का अरोपण कर प्रिय की स्मृतियों के साथ अपने अनुभव संसार – प्रीत – को अमर कर देना चाहती है –
”जोगिया सों प्रीत कियां दुख होय।प्रीत कियां सुख नहिं मोरी सजनी, जोगी मीत न कोई
रात दिवस कल नाहिं परत है, तुम मिलियां बिन मोई / ऐसी सूरत या जग माहीं, फेरि न देखी सोई . . .
मिलिया आनंद होई।’
अब जोगी गिरधर है और मीरा गोपिका।  प्रेम पर दार्शनिकता के आवरण का खेल मजे से चल सकता है-
”आज्यो आज्यो गोविंदा म्हारै म्हैल/ निहारां थारी बाटड़ली खड़ी जी
साधु हमारी आतमा जी, हम साधुन की देह /रोम रोम में रम रही जी,ज्यूं बादल में मेह /सुरत हरि नाम से लागी जी.”
तथा
”आवो आवो जी रंगभीना म्हारै म्हैल, प्यालो तो लियां हाजर खड़ी। सतजुग में सूती रही, त्रेता लई जगाय.
द्वापर में समझी नहीं, कलजुग पोंहच्यो आय। सतगुरु शब्द उचारिया जी, बिनती करों सुनाय.
मीरां नैं गिरधर मिल्या जी, निरभै मंगल गाय.

मीरा के विरह पदों में मूर्त का अमूर्तीकरण व्यवस्था के प्रति मीरा के निरुपाय समर्थन की दमघोंटू व्यथा है. यही कारण है कि मीरा के इन तथाकथित भक्ति पदों की उत्कटता, हार्दिकता एवं भास्वरता क्षीणतर होते-होते भक्ति के लयबद्ध सुमिरन में घुट कर रह गई है. तुलनात्मक अध्ययन हेतु दो पद उद्धृत हैं:
”ए दोई नैण कह्यो नहिं मानैं, नदियां बहै जैसे सावन की /कहा करूं कछु नहिं बस मेरो, पांख नहिं उड़ जावन की
मीरा कहै प्रभु कब रै मिलैगो, चेरी भई हूं तेरे दावन की”
तथा
”पिया म्हारै नैनां आगै रहज्यो जी।नैनां आगे रहजो म्हाने, भूल मत जाज्यो जी.
भोसागर में बही जात हूं, बेग म्हारी सुध लीज्यो जी। मीरां के प्रभु गिरधर नागर, मिल बिछुरन मत कीज्यो जी.”
भक्ति के आरोपण के कारण मीरा अपनी ही कही बात उलटाने को विवश हुई है. जोगी को ढूंढने के लिए मीरा को ‘चारूं देस में’ घर-घर अलख जगाना पड़ा है. संभवतया तीर्थाटन जैसे स्त्री-निषिद्ध कर्म में लीन होने की तत्परता के पीछे संकल्पदृढ़ प्रेम विरहिणी स्त्री की प्रिय (शरीरी पुरुष) अथवा स्वप्न पुरुष (अशरीरी) को पाने की क्षीण आकांक्षा रही हो, किंतु अब जब से प्रिय गिरधर या सांवरिया हो गया है, निर्गुण संत कवियों की तरह वह उसके हृदय में बसने लगा है . ”जिनके पिया परदेस बसत हैं, लिख लिख भेजैं पाती।/मेरे पिया मेरे मांहि बसत हैं, कहूं न आती जाती।” संभवतया यह वही स्टेज है जब मीरा वृंदावन-काशी आदि में घूमने, साधु-संतों की संगति करने के उपरांत स्थायी तौर पर द्वारिका में बसी थीं – द्वारिका जो जीवन-राग से आपूरित रसिया कृष्ण की नहीं, रणछोड़ कृष्ण की नगरी है। तो क्या रणछोड़ की शरण में आना मीरा द्वारा अपने ‘रण’ को छोड़ने का सार्वजनिक ऐलान है? क्या यह समर्पण और विश्रांति की अवस्था है जहां जीवन की निस्सारता और अपने संघर्ष की व्यर्थता देख कर मृत्यु की प्रतीक्षा जीवन का अंतिम विकल्प बनती है?क्या यह सचमुच मीरा के संघर्ष की व्यर्थता है?
मीरा के विद्रोह की निस्सारता





 ‘माई मैं तो लियो है सांवरिया मोल’

मीरा के भीतर की नारी वैषम्य एवं दमन पर आश्रित विवाह संस्था की जड़ता के कारण आहत है. प्रेम उसे परिपूर्णता नहीं दे पाता क्योंकि लोकापवाद का भय स्त्री के लिए सारे दरवाजे बंद रखता है. अलबत्ता पुरुष चाहे तो प्रेम के नाम पर कितनी ही स्त्रियों का आखेट करने को स्वतंत्र है. मीरा सहअस्तित्वपरक समाज की परिकल्पना करना चाहती है, लेकिन चाह कर भी अपने लिए मनमीत नहीं जुटा पाती. उसकी ‘बात’ समझने के लिए उसकी ‘भाषा’ और ‘विचार’ से कोई साझा तक नहीं करना चाहता. वह अकेली है लेकिन पराजित नहीं. स्वप्न-पुरुष की तलाश में बेशक असफल रही है, किंतु स्त्री की दृष्टि से स्वप्न-पुरुष की आधारभूत विशिष्टताओं को गिनाना नहीं भूलती. पुरुष ही सदा सर्वदा आदर्श स्त्री-छवि की सैद्धांतिकी क्यों गढ़े ? वह सबसे पहले स्त्री-पुरुष सम्बन्धों में परस्पर समानता, सद्भाव और हार्दिकता की मांग करती है जहां किसी एक का व्यक्तित्व दूसरे का विलयन न करे, बल्कि साथ-साथ विकास और परिष्कार की संभावनाओं को फलीभूत करे. ऐसी अवस्था में कोई एक श्रेष्ठ और दूसरा हीन, कोई एक उपास्य और दूसरा उपासक नहीं होगा बल्कि एक-दूसरे से निरपेक्ष अपने आप में पूर्ण होंगे. पितृसत्तात्मक व्यवस्था स्त्री के पुरुष निरपेक्ष रूप पर विचार करने की स्वतंत्रता ही नहीं देती. मीरा इस व्यवस्था का अतिक्रमण करने के लिए स्वप्न-लोक रचती है जहां की सामाजिकता विवाह-सूत्र में बंधी स्त्री के समक्ष न पातिव्रत्य की कठोर एकांगी साधना का आदर्श प्रस्तुत करती है, न वैधव्य का अभिशाप.
‘अचल सुहाग’ का वरदान देने वाला ‘वर’ मीरा की दृष्टि में ‘जगदीस’ से कम नहीं क्योंकि पुरुष वर्चस्व को कोई अलौकिक सत्ता ही मात कर सकती है, अकेली स्त्री या स्त्रियों का समवेत स्वर नहीं. ‘ऐसे वर को क्या वरूं जो जन्मे और मर जाए’ – मीरा अभिधात्मक अर्थ में अविनाशी पुरुष की कामना नहीं कर रही, वह सम्बन्ध को जन्म और मृत्यु के आदि-अंत से मुक्त कर नित्य और नवीन कर देना चाहती है.

ऐसा पूर्ण पुरुष निश्चय ही पत्नी से बौद्धिक-मानसिक-भावनात्मक ऐक्य की अपेक्षा करेगा, उसकी देह पर अपनी सत्ता की दंभी घोषणा करते सुहाग-चिन्हों की अनिवार्यता की नहीं. ”मांग और पाटी उतार धरूंगी, ना पहिरूं कर चूड़ो/ मीरा हठीली कहे संतन सों, बर पाया छै मैं पूरो”  – मीरा इन सुहाग-चिन्हों में अपने स्त्रीत्व और निजता की पराजय अनुभव कर रही है. मीरा आरोपित विवाह सम्बन्ध को अस्वीकार कर स्त्री द्वारा स्वयं पति रूप में पुरुष का वरण करने की स्वतंत्रता की पक्षधर है. विवाह संस्था स्त्री की देह पर की जाने वाली द्विपक्षीय संधि नहीं, न ही प्रतिशोध और प्रतिकार की अमानुषिकता. विवाह सम्बन्ध देह का कामुक खेल या कुलवृद्धि का शुष्क दायित्व नहीं, जीवन सहचर पाने की अनुराग भरी प्रक्रिया है. फलतः सम्बन्ध न आनन फानन में तय हों, न बाहरी दबाव से. ठगे जाने की प्रतीति ही न रहे, इसलिए ठोक बजा कर साथी ढूंढने का अवसर और अधिकार पाना चाहती है मीरा.  यहां न नारीसुलभ लज्जा की स्वीकृति है (मैं तो देख्यो है घूंघट के पट खोल), न अज्ञानी और अव्यावहारिक स्त्री की स्तुति (मैं तो लियो है बराबर तोल). मीरा की पूर्ण-पुरुष की प्रत्याशा वस्तुतः विवाह संस्था की जड़ताओं का नकार है. यह एक ऐसे समन्वित स्त्रीवाद (प्दजमहतंजमक थ्मउपदपेउ) का स्वप्न है जहां स्त्री ‘मनुष्य’ है. पत्नी, परित्यक्ता, विधवा या वेश्या नहीं और पुरुष भी ‘मनुष्य’ है, पति और रसिया नहीं. यह वही समन्वित स्त्रीवाद है जो मिथकों में अर्धनारीश्वर की परिकल्पना के जरिए और समकालीन हिंदी साहित्य में मृदुला गर्ग के उपन्यास ‘कठगुलाब’ के विपिन और गुजराती साहित्य में कुंदनिका कापड़िया के उपन्यास ‘दीवारों के पार आकाश’ के आनंदग्राम के पुरुष पात्रों के जरिए उभर कर आता है.

मीरा का स्वप्न-पुरुष रसिया कृष्ण के रूपक में उपस्थित होकर दाम्पत्येतर प्रेम का पैरोकार भी है. प्रेम को समय व समाज की संकुलता से मुक्त कर वह दिक्काल से जोड़ता है जहां ‘स्व’ से ‘समाज’ और ‘आनंद’ से ‘आत्मोपलब्धि’ की बीहड़ अंतर्यात्राएं हैं. पूर्वजन्म की गोपिका के रूप में रसिया कृष्ण के संग चीरहरण सरीखी लीला का आनंद उठाने की कसमसाहट मीरा के पदों में एकाधिक बार व्यक्त हुई है. दरअसल यह आकांक्षा वर्जनाहीन प्रेम सम्बन्ध को छक कर जीने की मानवीय कामना है जो स्त्री के लिए निषिद्ध है. मीरा निषिद्ध को अपना अधिकार मानना चाहती है किंतु साथ ही जानती है कि उसकी स्त्री मुक्ति की अवधारणा ‘स्वप्न-पुरुष’ की विवेकशील अवधारणा के बिना संभव नहीं. क्या इस ‘स्वप्न-पुरुष’ को वह जीवन में पा सकेगी ? नहीं, ‘अड़सठ तीरथों’ का भ्रमण करके और ‘वृंदावन कासी’ की खाक छान कर भी उसकी उपलब्धि शून्य है – ”वै न मिले जिनकी हम दासी.” मीरा को कहीं विश्वास था कि साधुओं की नगरी वृंदावन-काशी में शायद उसे मनवांछित पुरुष मिल जाए लेकिन वहां या तो सभी ब्राह्यण-बनिए (क्षुद्र लौकिकताओं में लीन आत्मकामी पुरुष) थे या संन्यासी (आध्यात्मिक आनंद की तलाश में भटकते वीतरागी पुरुष). इनमें भी मनुष्यत्व का नाम नहीं. अमूमन सभी ‘बगल में छुरी, मुंह में राम राम’ के बिंब हो साकार करते हुए विश्वासघाती. इसलिए मीरा भौतिक जगत में स्वप्न-पुरुष की तलाश छोड़ कर रसिया कृष्ण की अमूर्त छवि में ही अपनी आशाओं, आकांक्षाओं और सपनों को केन्द्रित करने लगती है. उसका स्वप्न-पुरुष समानता, स्वतंत्रता, बंधुत्व और राग का प्रसार करता एक अमूर्त विचार है जिसकी ठोस लौकिक उपस्थिति हर काल के स्त्री विमर्श का वरेण्य बिंदु है.

मीरा अंत तक आशा का संबल नहीं छोड़ना चाहती – ”म्हारा गिरधर रसिया छैल, मैं तो चालूं थारी गैल” किंतु लगता है कि अब ‘स्वप्न-पुरुष’ को आदर्शीकृत करते-करते वह स्वयं ही थक गई है. या शायद भीतर निहित अवश स्त्री भटकते-टूटते पूरी आक्रामकता के साथ उनके स्वप्नों को छिन्न-भिन्न करने में लगी है. यह स्त्री मूलतः दासी है अपने ही हाथों अपनी स्वतंत्रता का हनन करने को तत्पर! इसलिए नया जोखिम उठाने की अपेक्षा ‘स्वप्न-पुरुष’ में लौकिक पति की विशिष्टताएं रख देती है. अब उसे सहचर नहीं, उद्धारक की तलाश है – ”वेग पधारो सांवरा कठिन बनी है, आप बिन म्हारो कुण धनी है.” विद्रोह और दीनता के दो कूलों में प्रवाहित मीरा के स्त्री विमर्श का यह अंतर्विरोध समकालीन स्त्री विमर्श में भी कमोबेश इसी रूप में उपस्थित है जो स्त्री मुक्ति आंदोलन को ‘मानवीय पहचान’ का आंदोलन न बना कर पुरुष की स्वीकृति और अनुकंपा पाने का उपहासास्पद अनुष्ठान बना देता है.
क्रमशः