कंडोम , सनी लियोन और अतुल अंजान की मर्दवादी चिंता

दरवाजे पर धीमे बदलावों की थाप                                              
                                        संजीव चंदन

यह अतुल अंजान ने नहीं कहा होता तो ज्यादा चिंताजनक कथन नहीं होता. कुछ दिनों पहले अपने सेक्सिस्ट बयानों के लिए चर्चित रहे मुलायम सिंह यादव ने गैंग रेप को असंभव बताने की दलीलें दीं तो वह मेरे लिए  अपने पितृसत्तात्मक समाज की प्रतिनिधि सोच का एक और उदाहरण भर था. नेता , सामाजिक सांस्कृतिक –धार्मिक प्रवक्ता आदि आये दिन अपनी और हमारे समाज की सोच का परिचय देते रहते हैं. लेकिन एक मार्क्सवादी राजनीतिज्ञ का यह बयान सचमुच चिंताजनक है , वह भी 2015 में जब स्त्रीवाद की एक मुक्कमल धारा है , मार्क्सवादी स्त्रीवाद. तथा स्त्रीवाद के नवीनतम बहसों को जानने वाला एक संगठन है अंजान की पार्टी से जुड़ा. 



अंजान यदि विज्ञापनों के माध्यम से बाजार के द्वारा स्त्रियों के वस्तुकरण ( कमोडिफिकेशन) का मुद्दा उठाना चाह रहे थे , तो उनका चुनाव यह बताता है कि पार्टी के भीतर उन्हें जेंडर ट्रेनिंग की जरूरत है . आप चुनते क्या हैं , यह आपकी राजनीति और राजनीतिक समझ से तय होता है . टी वी पर आने वाले कई विज्ञापन ऐसे होते हैं , जो स्त्रियों का न सिर्फ वस्तुकरण करते हैं, बल्कि उनके खिलाफ यौन हिंसा को बढ़ावा देते हैं . डियोज के विज्ञापन हों या कार –बाइक के कई विज्ञापन. स्त्रीकाल में ही हमने सलमान खान के द्वारा एक सरिया के विज्ञापन में स्त्री के खिलाफ हिंसा को बढ़ावा देने का मुदा उठाते हुए एक लेख लगाया था. 

बदलाव 90 के बाद 

सनी लिओन के द्वारा कंडोम के जिस विज्ञापन को वे रेप के लिए उकसाने वाला बता रहे हैं, वह विज्ञापन अश्लील क्यों कहा जाना चाहिए. कंडोमों के विज्ञापन हमेशा बोल्ड होते रहे हैं , फर्क सिर्फ इतना बढ़ा है कि 90 के दशक के बाद से कंडोमों के विज्ञापनों में स्त्रियों की मुखरता भी बढी है, वे अब ऑब्जेक्ट पोजीशन में नहीं हैं. पिछले कई सालों  तक तो कंडोम एड्स और अन्य बीमारियों के भय के साथ ही बेचे जा रहे थे. कंडोमों के पुराने विज्ञापन पुरुषों के यौन आनंद तक ही केन्द्रित होते थे. तब के कई आपत्ति जनक विज्ञापन दिख जायेंगे, जो पुरुषों के हिंसक यौन –स्वभाव को बढ़ाते हुए प्रस्तुत होते थे. बलात्कार/ यौन हिंसा सनी लियोन के विज्ञापनों से नहीं होते हैं , स्त्रियों के खिलाफ यौन हिंसा का वातावरण हमसब के परवरिश से ही शुरू हो जाता  है, जब बच्चे के पौरुष को पोसा जाता है और स्त्रियों की देह –अस्तित्व को ही नकारात्मक मान लिया जाता है. जाति, राष्ट्र , सैन्यकरण, मर्दाना दंभ आदि अनेक कारण हैं स्त्री के खिलाफ हिंसा का – सनी लिओन नहीं. अपने बचपन को दो उदाहरणों से अंजान साहब को समझाना चाहूंगा, जो शायद उन्हें अपने बचपन के दिनों के उदाहरण सरीखे भी दिखें. ८वें दशक में हमारे लिए ‘ निरोध’ ब्रांड के कंडोमों का मतलब था, बैलून – हम उसे पानी से धोकर , उसकी चिकनाई ख़त्म कर बैलून की तरह इस्तेमाल करते थे –बड़ा गुब्बारा बनता था –कंडोमों के विषय में हमें नकारात्मक नहीं बताया गया था.
५वें -६ठे दशक के विज्ञापन , जिनमें पुरुष की एजेंसी प्रधान थी 

 एक दूसरा उदहारण है हम सब के घरों में टंगे रहने वाले रूपा के कैलेंडरों का. उस पर तस्वीरें ‘ देवताओं’ की होती थीं,  लेकिन नीचे लिखा होता था , ‘गंजी, जांघिया, बनियान और पैन्टीज.’ एक बच्चे की सहज जिज्ञासा बस मैंने अपने किसी बड़े से पूछा था कि पैन्टीज क्या होता है. इसका सहज जवाब की जगह वे ‘ बड़े’ महोदय झेंप से गये थे , बल्कि हंस कर टाल गये थे. वह हंसी मेरी जिज्ञासा को और बढ़ा गई थी – तब हमारे घरों में अन्तःवस्त्र छिपा कर रखे जाते थे- व्यक्ति की सोच के निर्माण में कंडिशनिंग बहुत मायने रखती है.

आज बाजार ने एक तरफ स्त्री का वस्तुकरण किया है, उसके प्रति पुरुषवादी सोच का इस्तेमाल किया है , उसे नये आक्रामक तर्क दिए हैं , तो दूसरी ओर स्त्री की  एजेंसी , उसके कर्ता भाव को भी पुष्ट करने की कोशिश की है –विकल्प आपके सामने है कि आप किसे समाज के लिए घातक मानते हैं . अब कंडोमों के नाम ‘ निरोध’ के नकारात्मक सन्देश को पीछे छोड़ चुके हैं और उसकी बिक्री एवं –विज्ञापन का प्रसंग भी बदल चुका है – गर्भ –निरोध या बीमारियों से बचाव की जगह यौन आनंद के प्रसंग में , जिसमें स्त्री का यौन –आनंद भी शामिल है. आज स्त्रीकाल में हम एक आलेख इन बदलावों की पहचान और उसके मायने के साथ अतुल अंजान को समर्पित कर रहे हैं - कंडोमों के बदलते विज्ञापनों के चित्रों के साथ ( उनमें लिखे डायलोग और मेसेज पढ़ना चाहिए उन्हें) . यह आलेख मैंने सनी लियोन के ' बिग बॉस ' में आने के समय लिखा था.

दरवाजे पर धीमे बदलावों की थाप 

ठीक उसी समय जब हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में खाप पंचायतें हमें समय से पीछे खींच रही हैं, बाजार अपनी दोहरी भूमिकाओं में एक ओर तो परंपरा के नाम पर विकृत अस्मिताओं को बढ़ावा देता है तो समानांतरतः परम्परा पर धीमा प्रहार भी करता है. सुप्रसिद्द लेखिका और पत्रकार मृणाल पांडे ने लिखा था कि ‘ प्रेशर कुकर के आविष्कार ने जितना औरतों की आजादी ‘सुनिश्चित किया है , उतना किसी और कारण ने नहीं .’  बाजार के प्रमुख घटक सोप ओपेरा, फ़िल्में, रिअलिटी शोज आदि एक ओर तो परम्परा के दोहन में लगे हैं, मध्यकालीन स्त्री की छवि बना रहे हैं, तो दूसरी ओर हमारी देहली पर बदलावों की थाप भी दे रहे हैं – जेंडर आधारित सामाजिक सरचना पर क्रमिक कुठाराघात कर रहे हैं.

यह भी था विज्ञापन 
मै श्लीलता और अश्लीलता के विवादों में से अलग इन माध्यमों के असरकारी प्रभावों पर बात कर रहा हूँ, क्योंकि श्लीलता और अश्लीलता एक सापेक्ष विषय है, देश-काल और संस्कृति सापेक्ष . पिछले दिनों रीलिज ‘ डर्टी पिक्चर’ और रिअलिटी शो ‘बिग बॉस’ के सन्दर्भ में मैं अपनी बात कर रहा हूँ, विजुअल मीडिया के ये दोनों आयोजन एक ओर तो बदलते सामजिक सोच और प्राथमिकताओं के उत्पाद हैं, तो दूसरी ओर एक ‘ प्रेसक्राइबिंग टेक्स्ट’ भी, बदलावों के दस्तक भी.

हालाँकि ‘बिग बॉस’ जैसे रिअलिटी शो और ‘डर्टी पिक्चर’ जैसे फिल्म दर्शकों के लिए ‘ दर्शनरति सुख ’ ( Voyeurism) के सिद्धांत पर ही बनते हैं. विद्या बालन अपनी फिल्म ‘डर्टी पिक्चर’ में घोषित करती है कि ‘ हम दिखाते वही हैं, जो लोग देखना चाहते हैं.’ यद्यपि यह फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े हर उन कलाकारों  का बचाव होता है, जो तय  सामाजिक पैमाने से अलग भूमिकाएं करते हैं, या दर्शकों के ‘ दर्शनरति सुख ’  को उकसाते हैं. लेकिन अपनी फिल्म में ‘ सिल्क’ बनी विद्या का यह डायलॉग’ सामजिक आचरण के तहखानों का सत्य उदघाटित करता डायलॉग है. जो आँखें इन कार्यक्रमों को देखती हैं, उसके सन्दर्भ में ब्रिटिश स्त्रीवादी ‘ लाउरा मलवे’ ( Laura Mulvey)  ने ‘ मेल गेज’ का स्त्रीवादी सिद्धांत प्रस्तुत किया है, जिसके अनुसार ‘ दृष्टि’ पितृसत्तात्मक संरचना में निर्मित होती है, और फिल्मो (उनका अध्ययन फिल्म पर है अथवा रिअलिटी शो भी ) में तीन स्तर पर  काम करती यह दृष्टि ‘ पुरुष दृष्टि’  ( male gaze ) होती है. एक तो कैमरे की दृष्टि, दूसरा दर्शक की दृष्टि ( पुरुष या स्त्री दर्शक ) और तीसरा इसके चरित्रों में आपस की दृष्टि, महिला पात्र की दृष्टि भी,  वह मेल गेज आत्मसात कर चुकी होती है.


‘बिग बॉस’ ‘ रिअलिटी शोज’ का दर्शक इस शो में शामिल चरित्रों का दैनंदिन देख कर ‘ दर्शनरति सुख’ का ही आनंद प्राप्त करता है. वह प्रतिभागियों के चौबीस घंटे की गतिविधियों के चुनिन्दा अंश – सुबह अलसाई आँखों से व्यस्त कपड़ों में डांस, स्विमिंग पूल में डांस , प्रतिभागियों के इंटेंस रोमांस ( जैसे बिग बॉस सीजन चार में पाकिस्तानी अदाकार ‘बीना मलिक और इश्मत पटेल का रोमांस ) में दर्शनरति का आनन्द लेता है. कैमरा, जिसकी खुद की दृष्टि ‘पुरुष- दृष्टि’ होती है, और वह अपने दर्शकों, पुरुष या स्त्री , की ‘पुरुष दृष्टि’ के लिए ही काम करता है, ‘ दर्शन रति के वैसे अवसरों को चुराता रहता है, कैद करता रहता है, जो उसके दर्शकों को ‘ दर्शनरति सुख’ दे सके.

ज़रा डिकोड करें 
यह सच है कि ‘बिग बॉस’ जैसे कार्यक्रम विभिन्न उपलब्धियों के कारण सेलिब्रेटी बनी हस्तियों के साथ  विवादास्पद चरित्रों को अपना प्रतिभागी  बनाते  है, जिसमें डान से संबंधों के कारण चर्चा में आई , ‘ मोनिका बेदी हो,’ तडीपार ‘राजा चौधरी’ हो , ड्रग्स लेने के आरोपों में घिरा ‘ राहुल महाजन’ हो, आइटम गर्ल ‘राखी सावंत’ हो, या शिवसेना से करियर की शुरुआत के बाद ‘बिहारी अस्मिता’ हासिल करते कांग्रेसी नेता संजय निरुपम हों, लेकिन इस कार्यक्रम के माध्यम से अपने विवादों पर सफाई के मसले पर जनता उन्हें नकार देती है. खैर, यहाँ मैं  ऐसे कार्यक्रमों के माध्यम से होते बदलाव के समाजशास्त्र पर बात करना चाह रहा हूँ.

चौबीस घंटे अनेक कैमरों के सामने समय बिताते प्रतिभागी यद्यपि कैमरों की उपस्थिति को लेकर सचेत होते हैं, अपनी छवि के लिए या छवि की टी. आर.पी के लिए सचेत होते हैं, परन्तु क्या बिना टी.वी., बिना अखबार, बिना टेलीफोन के बाहरी दुनिया से कट कर ९० दिनों तक के लिए एक नितांत बंद जगह में रह रहे प्रतिभागी चौबीस घंटे एक्टिंग कर सकते हैं ! कुछ तो स्वाभाविक होता होगा उनके व्यवहार में, उनकी क्रिया-प्रतिक्रिया में, इसी आंशिक स्वाभाविकता के समाज शास्त्र की  बात मैं कर रहा हूँ में.

क्या संवाद है यह और क्या सन्देश !
ऐसे कार्यकर्मों का दर्शक माध्यम वर्ग है. क्या एक विशाल मध्यमवर्ग के दर्शकों की सोच –प्रणाली पर ऐसे कार्यक्रम दस्तक नहीं दे रहे हैं ? ‘ बिग बॉस’ में साथ- साथ रह रहे महिला और पुरुष प्रतिभागी, बिना स्त्री –पुरुष के भेद के एक ही कमरे में सार्वजनिक रूप से रहते-खाते, उठते –बैठते, जागते –सोते नहीं हैं ? क्या ‘जेंडर समाज’ के दरवाजे पर यह बदलाव का चोट करता दृश्य नहीं है ! क्या यहाँ बद्लाव के स्तर पर मृणाल जी के ‘ प्रेशर कुकर’ का प्रसंग नहीं  बनता है!! इस कार्यक्रम ने लक्ष्मी नारायण के रूप में एक ट्रांसजेंडर और सनी लिओन के रूप में पोर्न स्टार को सामान्य रूप से रहते, जीते, लड़ते -झगड़ते देखकर समाज की ‘ सेक्सुअलिटी’ संबंधी धारणाएं क्या नहीं बदलती हैं !!! यद्यपि ट्रांसजेंडर लोगों को जनता ने विभिन्न निकायों में चुन कर भेजा है, लेकिन उनकी सेक्सुअलिटी को सामान्य मानस में स्वकृति दिलाने की भूमिका ऐसे कार्यक्रम निभाते हैं- लक्ष्मी  हमारे बीच की सामान्य सदस्य सी दिखने लगती है.

पोर्न स्टार सनी लिओन की  सादगी, उसका इनोसेंट व्यवहार हमारी धारणाओं को झकझोरती है, लगता है कि अरे यह तो हमारे पड़ोस की लड़की सी है, इसे छुप कर देखने के अलावा, प्यार भी किया जा सकता है, बहन, प्रेमिका, दोस्त, कुछ भी हो सकती है. मानवशास्त्र की एक प्रोफेसर , जेनेट एंजल,जिन्होंने पश्चिमी देशों में खुद भी यौनकर्मी के रूप में तीन सालों तक काम किया, अपनी किताब ‘काल गर्ल’ में कहती हैं, ‘ और कृपया’ रंडी कहने की जल्दवाजी मत करो, हमारे अस्तित्वा को निरस्त करने या हम पर कोई निर्णय देने की तत्परता मत दिखाओ , हम तुम्हारी माँ हो सकती हैं! तुम्हारी बहन, तुम्हारी दोस्त, तुम्हारी बेटी! हां, तुम्हारी प्रोफेसर भी.’ चौबीस घंटे कैमरों के सामने सचेत होते हुए भी बिग बॉस में सनी को देखकर उसका दर्शक मध्यम वर्ग जाने –अनजाने स्त्री –यौनिकता के स्त्रीवादी नजरिये से जुड जाता है, बल्कि ‘यौनकर्म’ को काम मानने  की मुहीम का हिस्सा हो जाता है.


विद्या बालन का  ‘डर्टी पिक्चर' भी  समग्रता में ' स्त्री -यौनिकता ' पर विमर्श आमंत्रित करती है. व्यक्ति के रूप में ' शील' ( विद्याबालन ) की संरचना कॉम्प्लेक्स है,वह प्रतीक के रूप में -स्त्री -यौनिकता का विस्फोट है, स्वीकृति है, उत्सव है, और जब सामाजिक दायरों में सोच-मग्न होती है , तो स्त्री-यौनिकता के भारतीय द्वैध में घुटती स्त्री हो जाती है, आत्महत्या करती है. डर्टी पिक्चर के ‘विद्या बालन’ को देखकर, सनी के बिग बॉस के चौबीस घंटे देखकर, जेनेट एंजल की किताब पढकर  डर्टी पिक्चर' का संवाद मौजू हो जाता है कि , ‘ हर कोई कमर में हाथ डालना चाहता था, किसी ने सर पर हाथ क्यों नहीं रखा?’ हालांकि तीनों चरोत्रों में एक समानता है कि उन्हें अपने व्यक्तित्व से कोई रिग्रेट नहीं है. सनी बिग बॉस में मेहमान होकर आये ‘ महेश भट्ट’ से सनी कहती है कि उसे अपने निर्णय, करिअर के चुनाव पर कोई पश्चाताप नहीं है . जीनेट एक काल  गर्ल के अनुभव से वैसे लोगों के बारे में टिपण्णी करती हैं, जो उनके प्रति दयाभाव में होते हैं, उन्हें मुक्त कराना चाहते हैं , और कहती हैं कि ऐसे लोगो को ‘प्लेग’ की तरह दूर रखना चाहिए. विद्याबालन का चरित्र भी, जो सिनेमा की दीवानगी में जीती है, अपनी यौनिकता पर गर्व करती है, उसपर अपने नियंत्रण से अपना व्यक्तित्व खड़ा करती है और जब इमरान हाशमी, जो प्रारंभ में उससे नफरत करता है, लगभग उसकी यौनिकता की सत्ता को स्वीकार कर बाद में उससे प्रेम करने लगता है, तो आत्महत्या कर लेती है. बालन के चरित्र की आत्महत्या का कारण  वह  सामाजिक दायरा भी है, जहां उसका परवरिश हुआ है , वह जब उस दायरे में  में सोच-मग्न होती है , तो स्त्री-यौनिकता के भारतीय द्वैध में घुटती स्त्री हो जाती है, आत्महत्या करती है.

और यह भी 
यही वह द्वैध है, जिसे मीडिया के ये माध्यम अपने रिअलिटी शो से या फिल्म से, समाप्त करना चाह रहे हैं, इन्होने मध्यम वर्ग को एक ऐसे सक्रमण के दौर में खड़ा किया है, जहां से उसकी संस्कृति एक नई करवट ले रही है. ‘ दर्शनरति के  सुख लेते दर्शकों के अवचेतन  पर ऐसे टेक्स्ट, कार्यक्रम उनके अनजाने में ही उनपर बदलाव के दस्तक दे रहे होते हैं, भले ही कोई अदालत अश्लीलता फ़ैलाने के नाम पर विद्याबालन को नोटिस भेज रही हो, जबकि सेंसर बोर्ड की भूमिका लेती अदालतों को द्विअर्थी संवादों और देह के भौंडे प्रदर्शनों से भरी फ़िल्में नहीं दिखती हैं.

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