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डाॅ. उतिमा केशरी की कविताएं

उतिमा केशरी

प्रकाशित कृतियांः चार कविता संग्रहः
‘मुहिम के स्वर’, ‘बौर की गंध’,‘तभी तो प्रेम ईश्वर के करीब है’एवं ‘उदास है गांव’ प्रकाशित.
‘जगदीशचंद्र माथुर के नाटकों में परंपरा और प्रयोग’-नामक आलोचनात्मक पुस्तक प्रकाशित.
संपर्कः9771893850

कला के अधिनायकः हुसैन

हे!
हर दिल अजीज हुसैन
हम ऋणी हैं, तुम्हारी कला-साधना के.
पीड़ा में भी आनंद उठाने का
हौसला,
तुम्हारा उत्स था.
तुम साधते रहे, अपनी कूची को
अर्जुन की तरह,
लड़ते रहे-बिलकुल अकेले,
अभिमन्यु की तरह
और
कर्ण की तरह तन्हा रहना
कभी साला नहीं तुम्हें.
भीष्म पितामह की तरह
जख्मी होकर, पी गए
दर्द के हलाहल को
शिव की तरह.
नुक्कड़ की चाय की चुस्की का आस्वाद,
भला तुम्हें छोड़, कौन ले सकता है!
समय की धारा को,
तुमने ही दिया एक नई दृष्टि.
सचमुच, तुम कला के अधिनायक हो!
विराट के, इस महा-अस्तित्व में
तुमने जिस्म छोड़ा है
पर
रूह तो,
तुम्हारा
हर कलाकार प्रेमी के पास
आज भी
प्रेरणास्रोत बन
एक विलक्षण धरोहर के रूप में है.

आठ जून दो हजार नौ

रंगमंच के,
श्लाका पुरुष
हबीब तनवीर!

छियासी वर्ष का वह योद्धा
भारत के रंगमंच की आत्मा में
उत्फुल्ल जिजीविषा से समाया हुआ.
राष्ट्रीय-अंतराष्ट्रीय पहचान
देनेवाले
हबीब तनवीर साहेब ने
बुनियाद डाली
नाट्य की एक नई परंपरा की.
उनके सपने और संघर्ष ने
कई ऐतिहासिक प्रयोग किए,
वे जानते थे-
कैसे बनाया जाता है
मिट्टी से सोना जैसा आकर्षण
देखा था मैंने-
पटना के पुस्तक मेला में
उनकी आंखों की गहराई
और उन चमक को-

वह खनकती रोबीली आवाज
आज भी गूंज रही है
मेरे मानस में
उपलब्धियों की उंचाई पर
आसीन होते हुए भी,
एक आम आदमी की तरह
सहज और आत्मीय.

सच!
हबीब साहेब!
आप हैं हर साहित्यकार के कीमत
समर्पित और निष्ठा भाव से
नाटक करनेवाले-
जगा गए मेरे मन में भी
एक गहरा रचनात्मक सम्मान!
वैचारिक प्रतिबद्धता से लबरेज
तेजोदीप्त हबीब साहेब को-
बार-बार मेरा सलाम.

 मैना 

मैना.
पाखी लोक की परी,
रोज आती है,
मेरे आंगन
छांव-कुठांव से
दाना चुगने.
उसकी मनस्विता की छटा से
मेरा मन थिरकने लगता है
और
बुनने लगता है-
प्रीतिकर संभावना
तभी तो मैं जोहती हूं बाट,
उसकी, दमकती मुद्रा का
जब उड़ती है फुर्र से
अपना गत्वाजोन दिखाकर
तब
मैं भी रचने लगती हूं,
रस निष्पति के सारे अलंकार.

कुली

रेलगाड़ी के रूकते ही
खड़े हो जाते हैं कुली
मानो! कर रहे हों अभिवादन
यात्रियों का.

सभी कुली आजमाते हैं-
अपना-अपना भाग्य.
कोई, अपना सामान उठवाते हैं
तो कोई स्वयं ही पीठ पर लाद
चल देते हैं.

कुली दूुर तक पीछा करता है,
उन यात्री का
और हर क्षण घटाता है
अपनी मजदूरी की दर
बाबू! दस के बदले पांच दे देना
पांच न सही दो दे देना!
पर, यात्री नहीं देखते मुड़कर
एक बार भी उस कुली को.

कुली कुछ दूर आगे बढ़ता है
वह मन से हारता नहीं है,
रहता है चुनौती के साथ
पुनः अगली ट्रेन की प्रतीक्षा करते हुए.

 खंडहर और बूढ़ा आदमी!

मेरे घर के सामने
उस खंडहरनुमा मकान में
न जाने कब से
वह बूढ़ा आदमी काट रहा है-
अपना बचा-खुचा जीवन!
वह खंडहर
पुराने मंदिर की तरह
सुनसान है,
सूखे तालाब की तरह
उदास है.
निस्सिम रात्रि में
कुत्ते की भौंकने की तरह
मनहूस दिखता है.
कहती है दादी-
उनका दोनों बेटा
परदेश  में जा बसा है,
बेटी, अपनी ससुराल में.

बूढ़ी के अनंत यात्रा पर
जाने के बाद
हो गया है-
बिलकुल अकेला.
वह प्राणी, अब हो गया है-
संदर्भहीन भी.
अपनी पकी दाढ़ी, मूछों
और

जटिल केश -राशि से आच्छादित
जब चलता है-तीन टांगों पर,
तब, उनकी झुकी गर्दन,
बना डालती है-समकोण
अपनी देहयष्ठि पर.
तब मैं फर्क नहीं कर पाती
खंडहर और उनमें.
एक बिना सांस का
एक दूसरा, सांस से जीता है.

कल्याणी ठाकुर चरल: बंगाल का दलित स्वर

बंगला दलित साहित्य की सशक्त हस्ताक्षर कल्याणी ठाकुर चरल  के  जीवन  और  दलित  स्त्री  की  अस्मिता  को  मजबूती  से  स्थापित  करने  में  उनकी  भूमिका  को  स्त्रीकाल  के स्त्री नेतृत्व की खोज’ श्रृंखला के तहत बता रहे हैं  मोहम्मद दिलवर हुसैन. 





अगर बंगाला दलित साहित्य की शीर्षस्थ लेखिकाओं की बात की जाये तो कल्याणी ठाकुर का नाम सबसे आगे होगा। कल्याणी ठाकुर मानती हैं कि दलित लेखन प्रमुख तौर पर दमन और घृणा के इतिहास को उजागर करने से संबंधित है। यह वह दमन और घृणा है,  जिसका सामना कुछ दलित जातियों को सदियों से करना पड़ा है। दलित साहित्य के इस समूचे परिदृश्य के अपने अर्थ, लक्ष्य और उद्देश्य हैं। परंतु उनको लगता है कि अगर दलित लेखक अपने लेखन को साहित्य जगत में स्थायित्व दिलाना चाहते हैं तो उनको धीरे-धीरे इसमें सौंदर्यबोध को शामिल करना होगा।

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कल्याणी ठाकुर का जन्म सन 1965 में पश्चिम बंगाल के नाडिया जिले में बागुला के निकट पुरबापारा गांव में हुआ था। उनका परिवार नामशूद्र जाति से ताल्लुक रखता था, जो सन 1947 में पूर्वी पाकिस्तान से आया शरणार्थी परिवार था। उनके पिता कृष्ण चंद्र ठाकुर को लोग केस्टो साधू कहकर पुकारते थे। वह मतुआ धर्म के अनुयाई होने के साथ-साथ सामाजिक कार्यकर्ता थे। वह सार्वजनिक शिक्षण के प्रतिपादक थे और सत्य और सादगी के आदर्शों में यकीन करते थे। कल्याणी पर अपने पिता का प्रभाव था और उनमें भी सत्य के प्रति टिके रहने और जूझने की भावना प्रबल है। उन्होंने बगुला श्रीकृष्ण कॉलेज से अकाउंटेंसी में स्नातक की पढ़ाई पूरी की और कलकत्ता विश्वविद्यालय से सांध्यकालीन पाठ्यक्रम में स्नातकोत्तर किया। ऐसा इसलिए क्योंकि इस दौरान वह एक सरकारी कार्यालय में लिपिकीय नौकरी करने लगी थीं।

पढ़ें: बुलंद इरादे और युवा सोच के साथ 

वह जिस इलाके में पलीं-बढ़ीं वहां का सामाजिक-सांस्कृतिक परिदृश्य कुछ ऐसा था कि बचपन में ही वह अपनी जातीय अस्मिता को लेकर सचेत हो गईं। वह याद करती हैं कि कैसे पुरबापारा के अधिकांश प्रवासी नामशूद्र जैसी निचली जाति से ताल्लुक रखते थे। उस क्षेत्र में रहने वाले ऊंची जाति के लोग इन्हें नीची नजर से देखते थे। ऊंची जाति वाले उनको अक्सर अपराधी, बेईमान और अपवित्र मानते थे। बहरहाल इस जातीय कटुता और पूर्वग्रह  से उनका सामना तब हुआ जब उन्होंने सरकारी कार्यालय में नौकरी शुरू की। वह भी तथाकथित आधुनिक और प्रबुद्ध लोगों के शहर कोलकाता में। उन्हें अपने कार्यालय में हर कदम पर यह याद दिलाया जाता कि उनकी जाति क्या है। उनके उच्चवर्ण वाले शिक्षित सहकर्मी उन्हें अपमानित करने का एक भी मौका गंवाते नहीं थे। चूंकि कल्याणी कभी अपनी आवाज उठाने में झिझकती नहीं थीं इसलिए उन्होंने प्रतिरोध स्वरूप अपनी जातीय पहचान को कभी शर्म का विषय नहीं माना। उल्टे वह अपने और अपने समुदाय के अधिकारों के लिए लड़ती रहीं।  मुक्त विचारों और पहचान वाली स्त्री होने के नाते उनके पहनावे, उनकी संगत और यहां तक कि उनके लेखन के लिए उनको लगातार उलाहने दिए गए।

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वह कोलकाता के गोलपार्क में महिलाओं के एक हॉस्टल में रहा करती थीं। उस समय में उन्होंने कोलकाता के तमाम हॉस्टलों में रहने वाली महिलाओं को आवाज देने के लिए नीड़ नामक एक वॉल मैगजीन प्रकाशित करनी शुरू की। इस काम में सफलता मिलने के बाद उन्होंने इस पत्रिका का मुद्रित संस्करण प्रकाशित करना शुरू किया। अपने पहले अंक से लेकर आज तक नीड़ में हाशिए के लोगों की उन चिंताओं को शामिल किया जाता है जो अब तक अनसुनी रह गईं।

सके बाद कल्याणी एक दलित प्रकाशन समूह और बौद्धिक समूह के संपर्क में आईं, जिसका नाम था ‘चौथर्य दुनिया’ (चौथी दुनिया)। इस प्रकाशन से ही ‘धोरलेई जुद्धो सुनिश्चित’  (मात्र स्पर्श से हो सकता है युद्ध का निर्धारण), ‘जे मेये अंधार गान'(अंधेरे को गिनने वाली लडक़ी) और ‘चंडालिनीर कोबिता’ (चंडालिनी का काव्य) जैसी रचनाएं प्रकाशित हुईं। इनमें से चंडालिनी की कविता ने उन्हें बंगाल के महिला दलित स्वर की पहचान दिलाई। इसके बाद उनका एक कहानी संग्रह ‘फिरे एलो उलांगो होये'(नग्न वापसी) और एक नॉन फिक्शन संग्रह ‘चंडालीनीर बिबृत्ति’ (चंडालिनी का अभिकथन) प्रकाशित हुए। बंगाल के साहित्यिक समाज में एक निचली जाति की लेखिका द्वारा इतने स्पष्ट तरीके से जातीय और वर्गीय दमन और शोषण का सुस्पष्ट चित्रण करना अप्रत्याशित था। हाल ही में उन्होंने अपनी आत्मकथा लिखी है, ‘ऐमी कानो चरल लिखी?’ (मैं चरल क्यों लिखती हूं?) इसमें उन्होंने अपने जीवन की पूरी कहानी लिखने के साथ ही यह भी स्पष्ट किया है कि आखिर क्यों उन्होंने अपने नाम में चरल के रूप में दालित  पहचान जोड़ी।
पढ़ें: पूर्ण शराबबंदी के लिए प्रतिबद्ध वड़ार समाज की बेटी संगीता पवार

वर्ष 2012 में कल्याणी को पुड्डुचेरी में स्पैरो वुमेन आकाईव द्वारा आयोजित लेखक कार्यशाला में बंगाल का प्रतिनिधित्व करने के लिए बुलाया गया था। अप्रैल 2016 में वह मेलबर्न में स्थानीय यूनेस्को कार्यालय द्वारा समर्थित और मोनाश विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित कार्यक्रम ‘लिटरेरी कॉमंस: राइटिंग ऑस्ट्रेलिया-इंडिया इन द एशियसन सेंच्युरी विद दलित, इंडीजीनस ऐंड मल्टीलिंगुअल टंग’ में सम्मानित अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया।

कल्याणी का मानना है कि प्रतिरोध भले ही छोटे पैमाने पर क्यों न किया जाए वह हर प्रकार के दमन के खिलाफ हमेशा से मौजूद रहा है। इन प्रतिरोध की आवाजों में से कई शायद मुख्यधारा के इतिहास में दर्ज नहीं किए गए हों लेकिन इससे उनका महत्त्व कम नहीं हो जाता। यही वजह है कि आवाज उठाना कभी बंद नहीं करना चाहिए। हमेशा यह कोशिश करनी चाहिए कि दुनिया को जायज ढंग से अपनी आवाज सुनाई जाए। चूंकि बंगाल में जातिवाद मौजूद है इसलिए इसके विरुद्ध संघर्ष में उन लोगों की आवाज बाहर आनी चाहिए जिनको खामोशी से दबा दिया गया। लैंगिक असमानता और निरंकुशता भी जातीय-अन्याय के दायरे से बाहर नहीं हैं।
कल्याणी ने साहित्यिक लेखन के साथ-साथ हमेशा जरूरतमंदों का साथ दिया है और उनके पक्ष में खड़ी रही हैं। चौथी दुनिया के साथ अपने जुड़ाव के दौर में उन्होंने दलित कल्याण मंच आयोजित किया। इसका उद्देश्य था बंगाल के निचली जातियों वाले समुदायों की बेहतरी के लिए काम करना। हालांकि अभी इसे वांछित रूप दिया जाना है क्योंकि खुद उनके समूह में सहयोग का अभाव है। वह अंबेडकरवादी हैं और इसलिए सोचती हैं कि जिन दलितों को कुछ हासिल हो चुका है वे समाज को कुछ वापस दें वरना हालात कभी नहीं सुधरेंगे।

घरेलू कामगार महिलाओं की दीदी: संगीता सुभाषिणी

कल्याणी का सोचना है कि पढ़े-लिखे दलितों को और अधिक सशक्त बनने के लिए पढऩे की आदत डालनी होगी। उनके मुताबिक इस वक्त पुस्तकालयों की स्थापना करना भी स्कूल बनाने जैसा ही अहम है। वंचित वर्ग द्वारा अपने समान लोगों के लिए बनाए गए पुस्तकालय उनके साहित्य और इतिहास को रसूखदार सांस्कृतिक और राजनीतिक समूहों के वर्चस्व से बचा सकते हैं।

रण में सामाजिक सक्रियता की मिसाल हैं पंक्ति जोग

मोहम्मद दिलवर हुसैन ने अंग्रेजी से एम ए करने के बाद आईसीएसएसआर के शोध प्रोजेक्ट के तहत लोकसाहित्य, धर्म और जाति के अंतर्संबंध पर काम किया है.


मूल अंग्रेजी से अनुवाद पूजा सिंह ने किया . अनुवादक पूजा सिंह पत्रकार हैं, अभी साप्ताहिक शुक्रवार के साथ काम कर रही हैं. 

मिर्चपुर के दलित आज भी कर रहे एक अदना सा घर का इन्तजार



हरियाणा में हिसार के मिर्चपुर गांव में रह रहे दलितों पर एक बार फिर हमला हुआ है. स्थानीय पुलिस के मुताबिक़, “बच्चों के बीच हुई कहासुनी से बात बढ़ गई और दोनों पक्ष भिड़ गए.”

नारनौद थाने के एसएचओ ने बीबीसी को बताया, “मेडिकल रिपोर्ट के मुताबिक़ नौ लोग घायल हैं. सभी घायल दलित समुदाय से हैं. हमने एससी एक्ट के तहत मामला दर्ज कर लिया है.”


उन्होंने बताया कि पीड़ित बड़े अधिकारियों के सामने अपनी बात रखने के लिए हिसार गए हैं.लेकिन मिर्चपुर के दलितों का पूरा मामला है क्या, जानने के लिए पढ़ें ये रिपोर्ट.

क्या दलित सिर्फ़ चुनावी मुद्दा भर हैं? क्या दलित उत्पीड़न के ख़िलाफ़ समाज की संवेदनाएं अस्थायी होती हैं और घटना दर घटना एक उबाल लेकर शांत हो जाती है?


ये सवाल हैं मिर्चपुर के विस्थापित परिवारों में से एक व्यक्ति का, जो पीडितों में एक मात्र एमए (एजुकेशन) और एमफ़िल है.

वर्ष 2010 की 21 अप्रैल को मिर्चपुर के वाल्मीकि परिवारों पर गांव के ही जाटों ने हमला किया था, उनके कई घरों को जला दिया गया था, दो लोगों की हत्या हुई थी और कई घायल हो गए थे. उस वक्त अश्विनी कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से एमफ़िल कर रहे थे, उसके बाद से उनके बीच से अब तक कोई उच्च शिक्षा तक नहीं जा सका.

विस्थापित लोगों का दर्द


उन दिनों वाल्मीकि परिवार के ये लोग काफ़ी दहशत में थे. इनपर हमले के दोषियों की जब गिरफ़्तारी हुई तो हिसार की दर्जनों खाप पंचायतों ने सरकार को दोषियों की रिहाई की चेतावनी दी.

इसके बाद ही पीड़ितों के बहिष्कार का भी सिलसिला शुरू हुआ. अमूमन भूमिहीन और सफाई करके या खेतों में काम करके जीविका चलाने वाले इन लोगों को काम देने से भी मना किया जाने लगा.


गाँव और पास की दुकानों ने भी इन्हें सामान देने से इनकार कर दिया. मजबूरन गाँव के 150 से भी ज़्यादा वाल्मीकि परिवार गाँव छोड़ कर दिल्ली के वाल्मीकि मंदिर में रहने को मजबूर हो गए. उसके बाद हिसार के ही वेदपाल तंवर ने इन्हें अपने फ़ार्म हाउस में जगह दी, तब से वे वहीं रह रहे हैं.

सम्मानजनक जीवन के लिए संघर्ष


गाँव छोड़ने के बाद भी दबंगों ने इन्हें चैन से नहीं रहने दिया. इनपर लगातार दवाब बनाया जाता रहा कि वे मुक़दमा वापस लें, मुक़दमे की पैरवी न करें और गवाही न दें.

अदालत के आदेश से गवाहों को सुरक्षा दी गई. तंवर फ़ार्म हाउस में बमुश्किल जीवन यापन कर रहे लगभग 120 परिवारों में से कम से कम 50 को पुलिस सुरक्षा दी गई है. इनकी सुरक्षा में तैनात हरियाणा पुलिस का जवान भी इनके साथ ही रहता है, उसके खाने-पीने की ज़िम्मेदारी भी आम तौर पर इन लोगों की ही है.
झुग्गियां डालकर रह रहे इन लोगों को शौच के लिए पास के खेतों में जाना पड़ता है.


गाँव से विस्थापित हैं, इसलिए कोर्ट के आदेश के बावजूद इन्हें मनरेगा के तहत कोई काम नहीं मिलता.
बड़ी मशक्क़त से बीपीएल योजनाओं के तहत इन्हें राशन देने की ज़िम्मेदारी तंवर फ़ार्म हाउस के पास की एक सरकारी राशन दुकान को दी गई है. शुरू-शुरू में पास के सरकारी स्कूलों ने भी इनका नामांकन देने से अलिखित तौर पर मना कर दिया था-लेकिन अब कुछ बच्चे पास के सरकारी स्कूलों में पढ़ते हैं. 9वीं की पढाई छोड़कर आशीष अपनी और अपनी दादी की देखभाल के लिए मज़दूरी करने के लिए विवश है.

आज भी डराता है गाँव, चाहते हैं पुनर्वास


तंवर फ़ार्म हाउस में झुग्गियां डालकर रह रही महिलाओं का एक समूह बताता है कि अब उस गाँव में क्या रखा है, आज भी वहाँ के लोग डराते हैं. महिलाएं बताती हैं कि उस गाँव में आज भी 40-50 वाल्मीकि परिवार रहता है, लेकिन गाँव के जाटों ने उनका बहिष्कार जारी रखा है.


घटना के समय के ख़ौफ़ को याद कर सुनीता कहती हैं, “हम अब उस गाँव में नहीं जा सकते हैं, सरकार हमें हिसार में ही कोई जगह देकर बसाए.”

इन्हें अपने फ़ार्म हाउस में जगह देनेवाले वेदपाल तंवर कहते हैं, “इनके साथ अत्याचार कांग्रेस की हुड्डा सरकार के समय में हुआ था. वह जाटों के लिए जाटों की सरकार थी, इस मामले में अभियुक्त जाट थे. इसलिए सरकार ने इनसे ज़्यादा मदद जाटों की. इन्होंने वोट बीजेपी को दिया, लेकिन बीजेपी की सरकार भी इनकी समस्या पर ध्यान नहीं दे रही है. दलितों की राजनीति की दावेदारी करने वाली मायावती ने इन्हें समय देकर भी इनसे मिलना उचित नहीं समझा.”

अठावले का दौरा और हुक्मरानों की चालाकियां


उत्तरप्रदेश के चुनाव में अपनी पार्टी आरपीआई के उम्मीदवारों की पहली सूची जारी करने के पहले केंद्रीय सामाजिक अधिकारिता मंत्री (राज्य) रामदास अठावले पिछले 19 जनवरी को इन विस्थापित पीड़ितों से मिलने तंवर गेस्ट हाउस पहुंचे. मंत्री अधिकारियों को महाराष्ट्र के पीड़ित परिवारों के पुनर्वास के उदाहरण देते दिखे.

पीड़ितों ने उन्हें बताया कि मामले में दोष सिद्ध होने के बाद अनुसूचित जाति-जनजाति क़ानून के तहत पुनर्वास उनका अधिकार है तो अठावले ने मुख्यमंत्री खट्टर से मिलकर इनके पुनर्वास के लिए प्रयास का आश्वासन दिया.
वे पत्रकारों के सवालों का जवाब देते हुए मानने से इनकार कर गए कि उत्तरप्रदेश के चुनावों में दलित राजनीति पर दावेदारी के लिए वे इन दलितों की सुध ले रहे हैं, लेकिन वे यह कहने से भी नहीं चूके कि वे दलित वोटों को मायावती के क़ब्ज़े से मुक्त करेंगे.

अभिशप्त होने के लिए मज़बूर


प्रशासन की असंवेदनशीलता का आलम यह है कि जब मंत्री के सामने सुप्रीमकोर्ट के 2011 के आदेश की बात उठाई गई कि प्रत्येक पीड़ित परिवार को महीने में दो क्विंटल गेहूं देने का आदेश दिया गया था, तो मंत्री के सामने उपस्थित एसडीएम और अन्य अधिकारी एक काग़ज़ दिखाकर बताते रहे कि इन्हें लाखों रुपए का मुआवज़ा दिया गया है.



दरअसल वे काग़ज़ हमले के शुरुआती दिनों में दिए गए मुआवज़े के रिकार्ड थे. जब न्यायालय के आदेश के बारे में उनसे पूछा गया तो उन्होंने बताया कि उन्होंने वह आदेश नहीं देखा है.
न्यायालय ने पीड़ितों को नौकरी देने का भी आदेश दे रखा है, लेकिन पीड़ित बताते हैं कि कुछ महीने की कॉन्ट्रैक्ट की नौकरी के बाद उन्हें हटा दिया गया.

सवाल है कि क्या सरकारों और राजनीति की असंवेदनशीलता झेल रहे मिर्चपुर के दलितों की अगली पीढ़ी भी विस्थापन और पुनर्वास की अनिश्चितता के बीच जीने के लिए अभिशप्त है?

नीतीश जी,आपकी पुलिस बलात्कारी को बचा रही है.

मुकेश कुमार 

21 जनवरी को जिस वक्त पूरे राज्य में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व में शराबबंदी को लेकर करोड़ों लोग मानव श्रृंखला में खड़े थे उसी वक्त घर में अकेली नाबालिग मुस्लिम बच्ची के साथ भागलपुर जिले के बिहपुर प्रखण्ड के एक गांव में भूमिहार जाति के एक दबंग प्रभाष चौधरी ने दुष्कर्म कर उसकी योनी को तेज धार वाले हथियार से लहूलुहान कर दिया. न्याय मंच की एक जांच टीम ने घटना स्थल पर जाकर पूरे मामले की गहराई से छानबीन की. उक्त जांच टीम में न्याय मंच के डॉ. मुकेश कुमार, अंजनी, मोहम्मद आकिब, अमित कुमार और अन्य शामिल थे. घटना स्थल से लौटकर जांच टीम ने बताया कि घटना के 5 दिन बीत जाने के बाद भी बलात्कारी पुलिस की गिरफ्त से बाहर है. बलात्कारी के दबदबे का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इस घटना के बाद से पूरे इलाके के लोग इतने दहशत में हैं कि मामले पर कोई खुलकर बोलने तक को तैयार नहीं है. इस भयानक दहशत के बीच आज न्याय मंच की टीम ने उक्त गांव जाकर पीड़ित परिवार से मिलकर पूरे मामले की छानबीन की. पीड़िता के भाई ने बताया कि जिस वक्त यह वारदात हुई उस वक्त बहन घर में अकेली थी. अम्मी बीमार थी, जिसे डाक्टर से दिखाने के लिए अब्बू उन्हें लेकर भागलपुर गए हुए थे और हम भाई-बहन भी घर से बाहर थे. बहन को अकेली पाकर प्रभाष चौधरी ने उसे झोपड़ी के अंदर ले जाकर दुष्कर्म किया और तेज हथियार से उसके गुप्तांग घायल कर फरार हो गया. बलात्कारी ने पहले बच्ची के मुंह में कपड़ा ठूंस दिया, ताकि वह चीख-चिल्ला न पाये, और उसके बाद इस घटना को अंजाम दिया.



पीड़िता के भाई ने बताया कि हमारे घर के पास लगभग 11 बीघा जमीन प्रभाष चौधरी की है. अपनी जमीन और फसल की देखभाल करने वह अक्सर यहाँ आता-जाता था और हमारे घर भी आता-जाता था. घटना के दिन भी वह इसी क्रम में आया था और बच्ची को अकेली पाकर उसने इस घटना को अंजाम दिया. इस घटना को अंजाम देकर जब वह भाग गया तो बच्ची झोपड़ी से बाहर निकलकर गिरते-पड़ते खेतों से बाहर आयी. यहाँ बता दें कि पीड़ित परिवार जहां झोपड़ी बनाकर रह रहा है, उसके चारों ओर खेत ही खेत है और उसमें अभी मकई की लहलहाती फसल लगी है. मक्के की यह फसल अब तैयार होने की तरफ बढ़ रही है. मक्के का पौधा इतना बड़ा है कि सड़क पर से आने-जाने वालों की बात तो दूर पीड़ित परिवार की झोपड़ी दिखाई तक नहीं देती है. इसी का फायदा उठाकर बलात्कारी भागने में कामयाब रहा. घटना के बाद पीड़िता सड़क पर आ गई और लोगों से उसने सारी बात बतायी, तो आस-पास के लोगों ने उसकी बिगड़ती हुई गंभीर स्थिति को देखते हुए उसे हरिओ गांव पंचायत के मुखिया के पास ले गए. उसके बाद उसे उसी गांव के एक मेडिकल प्रैक्टिस्नर के पास इलाज के लिए ले जाया गया. तब तक बलात्कारी प्रभाष चौधरी के भाई को भी घटना ककई खबर मिल गई थी और वह भी हरिओ गांव आ पहुंचा और उसने पीड़िता की बिगड़ती स्थिति को देखते हुए उसे देर शाम हरिओ से चार-पाँच किलोमीटर दूर नारायणपुर के एक निजी क्लिनिक में भर्ती कराया. 22 जनवरी की सुबह वहाँ से बच्ची को लाया गया और पीड़िता के परिजनों और बलात्कारी के भाई की मौजूदगी में दोनों पक्षों में सुलह कराने और मामले को रफा-दफा करने की नीयत से पंचायत के मुखिया ने पंचायत बुलाई. पंचायत में बलात्कारी प्रभाष चौधरी को भी बुलाया गया था, किन्तु वह नहीं आया. उसके नहीं आने पर उसका भाई पूरे मामले से पीछे हट गया और उसने कहा कि मानवता के नाते हमने इलाज करा दिया, अब मुझे इस मामले से कोई मतलब नहीं है. पंचायत की बैठक बेनतीजा देखते हुए मुखिया ने पीड़ित परिवार को पुलिस के पास भेज दिया. उसके बाद पीड़िता के माँ-बाप ने नवगछिया के महिला थाना में इस पूरे मामले की शिकायत दर्ज करते हुए छानबीन शुरु की. लेकिन पुलिस अब तक बलात्कारी को गिरफ्तार नहीं कर पायी है. उसके पिता को पुलिस ने कुछ घंटे के लिए गिरफ्तार कर थाना जरूर लाया किन्तु बाद में उसे भी छोड़ दिया.

बलात्कारी प्रभाष चौधरी और उसका परिवार पूरे इलाके में दबदबा रखता है और क्षेत्र के राजद-भाजपा के नेताओं का उसके यहाँ आना-जाना लगा रहता है. यही कारण है कि मुस्लिम नाबालिग बच्ची के साथ हुई इस शर्मनाक घटना के इतने दिन बाद भी न तो सेकुलरिज़्म की बात करने वाली पार्टी राजद के स्थानीय विधायक और सांसद ने ही मुंह खोला है और न ही राज्य की विपक्षी पार्टी बीजेपी के नेताओं का ही कोई प्रेस बयान तक आया है. पीड़ित परिवार से इन लोगों ने मिलना तो खैर जरूरी नहीं ही समझा है.

बताते चलें कि भागलपुर जिले का यह पूरा इलाका भूमिहार जाति के सामंती दबदबे वाला इलाका रहा है. क्षेत्र की अस्सी फीसदी से अधिक जमीन पर इसी जाति विशेष के लोगों का कब्जा बना हुआ है. इस इलाके के दलित-वंचित-कमजोर-अल्पसंख्यक तबके के ज़्यादातर लोग इन्हीं भूस्वामियों के खेतों में मजदूरी और उनके घरों में काम कर अपना जीवन-यापन करते हैं. इन गरीब-दलित मजदूरों के परिवार की महिलाओं की इज्जत-आबरू से खेलना इस इलाके के भूमिहार भूस्वामियों के लिए कोई नई बात नहीं रही है. इलाके में यह सब लंबे समय से होता रहा है जो किसी न किसी रूप में आज भी जारी है. यही कारण है कि नाबालिग के साथ दुष्कर्म का यह घृणित मामला स्थानीय संपन्न लोगों के लिए कोई मुद्दा नहीं है. और जिन दबे-कुचले शोषित लोगों और सामाजिक संगठनों की नजर में यह घृणित घटना मायने रखती है, वे भूमिहार जाति के वर्चस्व के आगे कुछ बोलने और पीड़ित के इंसाफ के लिए आगे आने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं.

पीड़ित परिवार निहायत ही गरीब है और खेत मजदूरी कर किसी तरह अपना जीवन-यापन करता है. परिवार में कोई पढ़ा-लिखा नहीं है. पिछले तीन पीढ़ियों से यह अल्पसंख्यक परिवार एक भूस्वामी के खेत में झोपड़ी बनाकर रह रहा है. पीड़िता के भाई ने जांच टीम को बताया कि भूमिहार जाति के एक भूस्वामी ने ही अपने खेत की देखभाल करने के लिए हमारे पूर्वजों को यहाँ बसने के लिए जमीन दी थी. तबसे हमारा परिवार यहीं रहता आ रहा है. हमलोग दूसरों के खेतों में मजदूरी करते हैं और अपना गुजर-बसर करते हैं. बसने की जमीन के एवज में हमलोग भूस्वामी की फसल की देख-रेख करते आ रहे हैं. फसल की देख-रेख के बदले हमें कोई मजदूरी-मेहनताना नहीं मिलता है. जिस दिन हम उनके खेतों में काम करते हैं, उस दिन की ही मजदूरी हमें दी जाती है. कुल मिलाकर पीड़ित परिवार ने जांच टीम को बताया कि हम गरीब-मजदूर लोग इतने ताकतवर लोगों से कैसे लड़ेंगे! पीड़ित परिवार फिलहाल पुलिस-प्रशासन से ही न्याय की उम्मीद कर रहा है. लेकिन ऐसे मामलों में, जहां बलात्कारी सवर्ण-सामंती तबके से ताल्लुकात रखता है, उसके प्रति पुलिस और सत्ता का रवैया हमेशा सवालों के घेरे में रहा है.

इस घटना के खिलाफ अब तक कोई मुस्लिम संगठन भी इस मामले में सामने नहीं आया है. घटना के बाद इस पूरे इलाके में झूठी कहानियां प्रचारित कर मामले को दबाने की कोशिशें तेज हो उठी हैं. यह झूठा प्रचार चलाया जा रहा है कि जमीन पर अवैध कब्जा करने की नियत से आरोपी को झूठे मुकदमे में फंसाया जा रहा है.

पितृसत्तात्मक पुरुषवादी व सामंती शोषण से अनुकूलित इस पिछड़े इलाके में इस किस्म का प्रचार अत्यंत ही आसान हो जाता है. बलात्कारी को बचाने में लगे लोग आम जनता की इस पिछड़ी हुई चेतना का फायदा उठाते हुए बलात्कारी को बचाने में जुट गए हैं. जबकि सच्चाई यह है कि पीड़ित परिवार जिनकी जमीन पर कई पीढ़ियों से रह रहा है, वह जमीन बलात्कारी की न होकर उसी जाति के दूसरे भूस्वामी की है और उन्होंने इससे पूर्व पीड़ित परिवार को जमीन खाली करने के लिए भी नहीं कहा था. लेकिन अब इस बात की आशंका तेज हो गई है कि मामले को ठंढा करने और पीड़ित परिवार को दबाने हेतु उस भूस्वामी से भी दबाव बनवाया जा सकता है, जिसकी जमीन पर पीड़ित परिवार कई पीढ़ियों से रह रहा है. इस मामले में ‘सेफ़्टिक वल्व’ के तौर पर इस भूस्वामी का इस्तेमाल किया जा सकता है.

न्याय मंच ने पुलिस के तौर-तरीकों पर सवाल उठाते हुए कहा है कि पुलिस केवल कार्रवाई का दिखावा कर रही है. जिस झोपड़ी में बच्ची के साथ दुष्कर्म की घटना हुई, वहाँ मिट्टी पर गिरे हुए खून को घटना के छह दिन के बाद भी अब तक जांच के लिए नहीं लाया गया है. इससे साफ जाहिर होता है कि पुलिस बलात्कारी को गिरफ्तार कर सजा दिलाने के प्रति गंभीर नहीं है. न्याय मंच ने बलात्कारी की गिरफ्तारी और पीड़िता के बेहतर इलाज की गारंटी और पीड़ित परिवार के सुरक्षित पुनर्वास की गारंटी की मांग की है. जांच टीम ने कहा है कि इस जघन्य घटना के बाद पीड़ित परिवार का वहाँ अकेले रहना खतरे से खाली नहीं है. इसलिए दूसरे स्थान पर पीड़ित परिवार के सुरक्षित पुनर्वास कराते हुए न्याय की गारंटी मिलनी चाहिए. न्याय मंच ने कहा है कि इस घटना ने नीतीश सरकार के महिला सशक्तिकरण और न्याय के साथ विकास के दावों की पोल खोलकर रख दी है और भूमि सुधार की जरूरत को नये सिरे से सामने ला दिया है.

पितृसत्ता के बदलते स्वरूप

डिम्पल

महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय , वर्धा,रिसर्चर ( स्त्री अध्ययन ) M.phil,संपर्क: dimpledu1988@gmail.com

लैंगिक वर्चववादी समाज में स्त्री-पुरूष के अधिकारों को लेकर द्वंद्व घर और बाहर दोनों क्षेत्रों में बना हुआ है . आधुनिक कहलाने व बनने की होड़ में वे केवल उन्हीं बातों को अपना रहे हैं, जिनसे उनके हित जुड़े हुए, बाकि को नजरअंदाज करते जाते हैं.   वे  ठीक से न तो आधुनिकता को ही ग्रहण कर पाते हैं और न ही परम्परा का दामन ही पूर्णत: छोड़ पाते हैं,  ऐसे में द्वन्द्ता का प्रश्न बना हुआ है- जिसका प्रभाव स्त्री – पुरूष के संबंधों पर भी देखा जा सकता हैं. यही कारण है कि आज भी महिलाओं के संबंध में घर व बाहर काम करने को लेकर बंधी भूमिकाओं में ज्यादा बदलाव नहीं आए हैं . इस पितृसत्तात्मक समाज में पुरूष अपने जीवन में समय व स्थिति के अनुसार बदलावों के नाम पर लीपापोती करने का प्रयास बखूबी कर रहा है, लेकिन महिलाओं को समान अधिकार तथा हक़ देने से अभी भी बच रहा है, जिसके विभिन्न पहलुओं पर चर्चा करना अनिवार्य हो जाता है .


पुरुष समाज की जेंडरगत अवधारणा में व्यवस्थित व्यवस्था के अंतर्गत अधिकारों की समानता को लेकर भयाक्रांत भी हैं,  जिसे कही न कही वह अपने एकाधिकारों को छिनने के रूप में भी देखता है, जिससे महिलाओं की यौनिकता , प्रजनन तथा कार्य क्षमता पर नियंत्रण के नए रूप इस व्यवस्था में सामने आ रहे हैं, जैसे सुपर मॉम, सुपर पत्नी आदि के कॉन्सेप्ट . अत: हम कह सकते हैं कि इस बदलते परिवेश व भूमिकाओं में महिलाओं पर स्त्रियोचित आदर्श के लबादे को इस कदर थोपा जा रहा. जिस पर समय समय पर विभिन्न प्रतिरोधी अभिव्यक्तियां भी सामने आयी हैं , अत: इस स्थापित पितृवत व्यवस्था में स्त्री –पुरूष संबंधों में द्वन्द्ता के प्रश्न दोनों के बीच मौजूद हैं, क्योंकि वह खुद को निर्धारित भूमिकाओं से इतर नहीं देख व समझ पा रहे हैं,  कारण घर – परिवार में स्त्री को स्त्री व पुरूष को पुरूष बनाने की प्रक्रिया उनकी संस्कार रुपी परवरिशों में शामिल की जाती हैं.   ऐसे में यदि कोई इस स्थापित व्यवस्था की व्यवहारिकी से इतर व्यवहार या अधिकारों की मांग करता है तो ऐसे में उसके प्रति समाज की हेय  दृष्टि काम करती हैं . महिलाओं के संदर्भ में अक्सर कहा जाता हैं कि पानी सर से ऊपर उठ चुका हैं इनमें शर्म लिहाज नहीं बची और तो और उन्हें  चरित्रहीन ,पथभ्रष्ट , घर तोडू कहा जाता है. कई बार उन्हें पुरूषों की होड़ करने वाली औरत या ज्यादा हो तो मर्दाना महिला तक की संज्ञा दे दी जाती है, ऐसे में महिलाओं की खुद की पहचान कहां ?

समाज में मनुवाद की ब्राह्मणवादी पितृसत्तात्मक जड़े घुन की तरह इस तरह से रच बस गयी हैं कि इस बदले हुए परिवेश में वह नए रूप में हमारे समक्ष आ रही हैं, जिसे हम जाति , वर्ग , लिंग , क्षेत्र , भाषा , धर्म आदि के आधार पर भी समझ सकते हैं. महिलाओं पर महिलाओं द्वारा पैट्रिआर्की  के तहत नियंत्रण आदि को समझते हुए भी इसके विभन्न पहलुओं पर प्रकाश डाला जा सकता है.

आज का पुरूष अपने लिए पढी -लिखी स्त्री की चाह तो रखता है, परंतु अपने हितों और शर्तों के अनुसार. ऐसे में महिलायें भी खुद को पुरूषों से कमतर देखने व समझने के अनुकूलन में ढल जाती हैं. समाज में जेंडर के आधार पर स्त्री व पुरूष के मन व मस्तिष्क को संरचनागत ढाँचे के अनुसार उनकी मनोवैज्ञानिकी तैयार करने की पूरी प्रक्रिया चलती है. यही कारण है कि इस बदलते परिवेश में पुरूष आज भी महिलाओं के प्रति बंधी बंधाई पारम्परिक रूढ़िवादी परिपाटियों से खुद को मुक्त नहीं कर पाता है,  न ही महिलायें ही खुद को पूर्णत: मुक्त कर पायी हैं . ऐसे में यदि कोई महिला या पुरूष इस स्थापित व्यवस्था से इतर जाने का प्रयास करता है तो उन्हें अन्य उदाहरणों द्वारा सचेत किया जाता हैं .ऐसे में समाज में व्याप्त विभिन्न ठेकेदार इस व्यवस्था को यथावत् बनाए रखने हेतु कई हथकंडो का सहारा लिया करते हैं, जैसे खाप पंचायत आदि .

पुरुष समाज की जेंडरगत अवधारणा में व्यवस्थित व्यवस्था के अंतर्गत अधिकारों की समानता को लेकर भयाक्रांत भी हैं,  जिसे कहीं न कहीं  वह अपने एकाधिकारों को छिनने के रूप में भी देख रहा है, जिससे महिलाओं की यौनिकता , प्रजनन तथा कार्य क्षमता पर नियंत्रण के नए रूप इस व्यवस्था में सामने आ रहे हैं, जैसे सुपर मॉम, सुपर पत्नी आदि के कॉन्सेप्ट . अत: हम कह सकते हैं कि इस बदलते परिवेश व भूमिकाओं में महिलाओं पर स्त्रियोचित आदर्श के लबादे को इस कदर थोपा जा रहा. जिस पर समय समय पर विभिन्न प्रतिरोधी अभिव्यक्तियां भी सामने आयी हैं  अत: हम कह सकते हैं कि ऊपर से नीचे तक व्यवस्था के अंतर्गत रची -गढ़ी साजिशों व रणनीति के तहत यह सब किया गया है. यही कारण हैं कि आज इतिहास में His Story से Her Story की बात सामने आती हैं

घर से  राज्य तक महिलाओं के अधिकारों के संबंध में लैंगिक हेजेमनी की स्थिति को विभिन्न तरह की संस्थाओं के संस्थानीकरण (विद्यालय ,कानून, विवाह, रीति-रिवाज़ तथा धार्मिक संस्थायें आदि व्यवस्थायें) द्वारा इसे बनाए रखने के उपक्रम के रूप में भी समझा जा सकता हैं .

अनारकली आरावाली 24 मार्च से

अनारकली आॅफ आरा देश भर में 24 मार्च को रीलीज़ हो रही है. नील बटे सन्नाटा के बाद स्वरा भास्कर की यह महत्वाकांक्षी सोलो फिल्म है. प्रोमोडोम कम्युनिकेशन्स के बैनर तले बनी इस फिल्म में उसने एक सड़कछाप गायिका का किरदार निभाया है. फिल्म का निर्देशन किया है अविनाश दास ने. अनारकली की कहानी भी उन्होंने ही लिखी है. इससे पहले अविनाश दास प्रिंट और टीवी के पत्रकार रहे हैं. उन्होंने आमिर ख़ान की सत्यमेव जयते के लिए भी रिपोर्टिंग की है. अनारकली में स्वरा भास्कर के अलावा संजय मिश्रा, पंकज त्रिपाठी और इश्तियाक़ ख़ान महत्वपूर्ण भूमिकाओं में हैं. फिल्म का अनोखा संगीत रचा है रोहित शर्मा ने, जिन्होंने शिप आॅफ थिसियस में भी संगीत दिया था.

अनारकली आॅफ आरा एक सोशल म्‍यूजिकल ड्रामा है. अनारकली बिहार की राजधानी पटना से चालीस किलोमीटर दूर आरा शहर की एक देसी गायिका है, जो मेलो-ठेलों, शादी-ब्‍याह और स्‍थानीय आयोजनों में गाती है. यह फिल्‍म एक ऐसी घटना से जुड़ी है, जिसके बाद अनारकली का जीवन एक उजाड़, डर और विस्‍थापन के कोलाज में बदल जाता है.

अनारकली के गीत लोगों के मन के दबे हुए तार छेड़ते हैं. उसे सुनने वाले उस पर फिदा हो जाना चाहते हैं और अनारकली अपने प्रति लोगों की दीवानगी को अपनी संगीत यात्रा में भड़काती चलती है. उसके प्रेम का अपना अतीत है और सेक्‍स पर समझदारी के मामले में रूढ़ीवादी भी नहीं है. इतनी खुली शख्‍सीयत के बावजूद उसके पास एक आत्‍मसम्‍मान है, जिसका एहसास वह कई मौकों पर सामने वाले को कराती भी रहती है. वह एक तेवर रखती है, जिसमें जमाने की परवाह नहीं है, लेकिन रिश्‍तों के मामले में संवेदनशील भी है. फिल्‍म में उसके इर्दगिर्द पांच लोग हैं – जो उसके प्रेम के एक ही धागे में बंधे हैं. सब अपनी अपनी तरह से अनारकली को प्रेम करते हैं. लेकिन आखिर में अनारकली को अकेले ही अपने रास्‍ते पर जाना है और वही होता है. पूरी कहानी में कठिन से कठिन मौकों पर उसकी आंखें आंसू नहीं बहाती और बाहर की उदासी को वह अपनी हिम्‍मत से खत्‍म करने की कोशिश करती है. अनारकली एक ऐसा किरदार है, जो हिंदी सिनेमा में अब तक नहीं आया है.

रण में सामाजिक सक्रियता की मिसाल हैं पंक्ति जोग

गुजरात के रण में नमक बनाने वाले समुदाय अगरिया को संगठित करने वाली ‘पंक्ति जोग’ की कहानी संघर्ष और नेतृत्व कौशल की कहानी है. पंक्ति सूचना अधिकार के क्षेत्र में भी काम करती रही हैं. ‘स्त्री नेतृत्व की खोज’ श्रृंखला के तहत उनके काम और संघर्ष बता रहे हैं श्याम मारू. 





पंक्ति  जोग उत्तरी  गोवा के एक आदिवासी इलाके में बसे सोनल गाँव की रहने वाली हैं. बचपन और स्कूल के दिन काफी कठिनाईयों से गुजरे. गोवा के पहाड़ी क्षेत्र में बसे होने से स्कूल आने-जाने में काफी तकलीफ भी झेला, लेकिन पढाई जारी रखी.

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बचपन को याद करते हुए पंक्ति बताती हैं कि 8वें दशक में बिजली नहीं होती थी, रास्ते बड़े बेतरतीब होते. गोवा में 8 महीने तक बारिस का मौसम रहता था. पिता छोटे-छोटे व्यवसाय करते थे, जैसे मोटरसायकल के पायलेट का काम करने से लेकर परम्परागत व्यवसाय के तौर पर किसी और की खेती का काम तक, उससे ही परिवार का गुजारा होता था. पिता और घर की मदद के लिए पंक्ति मोमबत्ती बनाने का भी काम करती थी- काम के साथ पढाई जारी रखी उन्होंने.

आठ साल की उम्र में ही साने गुरूजी की पुस्तक ‘श्याम की माँ’ पढ़ी, जिसने उन्हें काफी प्रभावित किया. बाबा आम्टे के बारे में जानने के बाद बारह  साल की उम्र में ही उन्होंने बाबा आम्टेको पत्र लिखकर उनसे जुड़ने की इच्छा व्यक्त की.

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दसवीं तक शिक्षा छोटे शहरों से से पूरी हुई, आगे की पढाई पूरी करने के लिए बड़े शहर तक जाना हुआ और  फिजिक्स में  मास्टर डिग्री तक पढाई पूरी की.  कॉलेज की पढाई के साथ ‘साने गुरूजी’ के राष्ट्र सेवा दल के साथ जुडी,  और साथी विद्यार्थियों का एक ग्रुप बनाया. उस ग्रूप ने  स्लम इलाके के उन बच्चों को पढ़ना शुरू किया, जो पढाई नहीं कर पा रहे थे.

पंक्ति मास्टर्स इन सोशल वर्क की पढाई करना चाहती थी, दाखिला भी लिया, मगर कुछ कारणों से पढाई छोडनी पड़ी. हालांकि बताती हैं कि सामाजिक संस्था ‘जनपथ’ के साथ काम करते करते हुए कॉलेज और पाठ्यक्रम से बेहतर शिक्षा उन्हें मिल गई है.

फिजिक्स में मास्टर डिग्री पूरी करने के बाद पंक्ति ने  नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ ओसियोनोग्राफी (NIO) में 1998 से 2001 तक रिसर्चर के तौर पर काम किया. यहीं से पीएच. डी  की आगे की पढाई पूरी करनी थी, मगर 2001 में आये गुजरात के भूकंप के बारे में सुनकर गुजरात जाने की इच्छा व्यक्त की,  संस्था के डायरेक्टर उन्हें मना कर दिया. भूकंप की विभीषिका को देखते हुए वे पीड़ा में थीं और जनवरी से लेकर सितंबर तक मनोमंथन में रहीं. फिर ‘जनपथ’ के उस वक्त के संचालक सुखदेव भाई से ईमेल पर संपर्क किया और गुजरात आने की और ‘जनपथ’ के साथ जुड़कर भूकंप की परिस्थितयों पर काम करने की इच्छा व्यक्त की. सुखदेव भाई के सकारात्मक जवाब से 15 दिनकी छुट्टी लेकर गुजरात आयी और फिर वहीं रह कर आगे काम करने का मन बना लिया. (NIO) से इस्तीफा दे दिया और परिवार में भी किसी को बताया नहीं, वे उसी वकत एनआईओ   से फ़्रांस जाने की स्कोलरशिप और पीएच.डी कर  कर वैज्ञानिक बनने की आशा छोड़कर  गुजरात चली आयीं और यही से गुजरात से नाता जुडा.

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जनपथ के साथ सामाजिक काम की शरुआत


2001 से गुजरात के भूकंप में जनपथ के साथ काम करने की शुरुआत हुई. पंक्ति बताती हैं कि “यहाँ मुझे शुरुआत से ही अपनी स्वतंत्रता से काम करने की आजादी रही है, साथ ही जनपथ के सभी वरिष्ठ कार्यकर्त्ताओं के अनुभव का भी लाभ मिलता रहा. पहले फेज में 4 साल तक चाइल्ड एंड प्रोग्राम में काम किया और कम्यूनिटी आधारित पुनर्वास का  काम किया, कच्छ में कुछ वक्त तक थेलेसेमिया ग्रस्त बच्चो के साथ भी काम किया और वहीं पर थेलेसेमिया ग्रस्त बच्चो के माता- पिता के साथ मिलकर संगठन बना कर उनको ही संचालक बना दिया.”

अगरियों (नमक उत्पादन में काम करने वाले मजदूर) के साथ काम की शुरुआत 

पंक्ति बताती हैं, ‘1998 से गुजरात में जनपथ का वैचारिक रूप  से काम चल रहा था और व्यक्तिगत रूप से मुझे 2 बातों में रूचि रही,  अगरियों के बारे में और सूचना अधिकार आंदोलन में. इसी वजह से अगरियों  के साथ मिलकर उन्हें संगठित करने का काम शुरू किया- उनके बीच काम करते हुए पहली बात जो जरूरी लगी वह यह कि रण में जो नमक पकाने वाले अगरिया हैं, उनके बीच सबसे पहले एकता और संगठन की जरूरत है.  उस वक्त उनके बीच एक-दो संस्थायें काम कर रही थीं और सबसे बड़ी चुनौती अगरियों के अंदर से ही नेतृत्व उभारने की, ताकि वे अपने बल पर अपने प्रश्नों को हल करें, यही सबसे बड़ी चुनोती थी.

अगरिया समुदाय रणमें नमक पकाने का काम 600 साल से कर रहा है, यह काम व्यावसायिक भी है, लेकिन  आज भी उनके काम की  पहचान गैररक़ानूनी ही है,  जो उनकी लड़ाई का प्रथम मुद्दा रहा है.  सन 1972 में रण को अभ्यारण्य में परिवर्तित करते ही उनको वहां से हटाया जाने लगा.  सरकार के द्वारा व्यवसायिक पहचान पत्र न होने के कारण और सरकार के द्वारा ऐसी किसी पहचान पत्र की व्यवस्था न होने के कारण फ़ॉरेस्ट विभाग के अधिकारियों को घूस देकर करते रहे. पहचानके साथ सामाजिक जीवन की व्यवस्था भी उपलब्ध नहीं हो रही थी. आरोग्य, शिक्षा, पानी जैसी काफी मुश्किलें  आज भी उन्हें झेलनी पड़ती हैं.”

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दस साल की मेहनत के बदौलत अगरिया हित रक्षक मंच की रचना हुई, दस साल की कड़ी महेनत से पंक्ति ने अगरियों को खुद के बल पर अपने प्रश्नों को हल करने की स्थिति में खडा किया और उनमे से ही नेतृत्व भी खड़ा किया है. आज खुद अगरिया अपनी पहचान के लिये सरकार और व्यवस्था के सामने प्रश्न पूछता है. नेतृत्व के माध्यम से अपने ही संगठन के रूप में अगरिया काम करे यह ध्येय था. पंक्ति के द्वारा दस साल की महेनत में आज 400 से भी ज्यादा अगरिया संगठित स्वरुप में संघर्ष में शामिल हुए हैं. आज सभी अगरिया सूचना अधिकार,  नरेगा, फ़ॉरेस्ट राइट एक्ट और बाकि सब अपने हक़ के बारे में सक्रिय हैं. शैक्षणिक तालीम नहीं ली होने के बाद भी वे प्रक्रिया और कार्यवाही की समझ रखते है. समय के साथ वह सरकार के सामने आवाज भी उठाते  हैं और साथ ही सरकार की योजनाओं में मदद भी करते हैं.

पंक्ति का मानना है कि अगर सिर्फ उनकी सुविधाओ के लिये ही काम किया होता तो उनसे लंबी दूरी तक जाना मुश्किल होता- कुछ समय के लिये समाधान मिलता मगर वह स्थाई नहीं होता.  आज राज्य के चार जिलों में  कच्छ,पाटन,सुरेंद्र्नगर,मोरबी में अगरियों के लिये विकास समिति की स्थापना हुई है और सभी समिति में खुद अगरियाभी सदस्य के रूप में शामिल हैं.  संगठन के कार्य में महिलाओ की भूमिका के बारे में बताते हुए पंक्ति कहती हैं, ‘आज अगरियों के परिवार से महिलायें पूरी तरह भागीदार नहीं बन पाई हैं, इसकी वजह रण में परिवहन की कमी है. एक जगह से दूसरी जगह जाना और मदद के कामो में भागीदार बनना, परिवहन की असुविधा और खुद उसके लिए सक्षम न होने के कारण संभव नहीं हप पाता है, मगर धीरे – धीरे इसे भी ख़त्म करने की कोशिश की जा रही है.

घरेलू कामगार महिलाओं की दीदी: संगीता सुभाषिणी

पंक्ति कहती हैं, ‘व्यक्तिगत कोई महत्वाकांक्षा नहीं है और न रहेगी. बस सूचना अधिकार के काम में ही आगे बढकर काम करना है और इसी काम को लगातार करते रहना है . सूचना अधिकार में मेरा अपना पूरा विश्वास है और गाँव के सबसे आख़िरी व्यक्ति को इसका लाभ हो यही लक्ष्य है.

श्याम मारू  सामाजिक कार्यकर्ता हैं और विकास पत्रकारिता से जुड़े हैं. संपर्क : 9512373724

बलात्कार के विरोध में आवाज बनी बेला भाटिया को मिली घर छोड़ने की धमकी

बस्तर के आदिवासियों के बीच काम कर रही सामाजिक कार्यकर्ता बेला भाटिया को कुछ अज्ञात लोगों ने बस्तर छोड़ देने की धमकी दी थी. भाटिया के अनुसार सोमवार सुबह लगभग 30 लोग कई गाड़ियों में उनके घर पहुंचे और उनसे तुरंत बस्तर छोड़ चले जाने के लिए कहा था और 24 घंटे में ऐसा नहीं करने पर अंजाम भुगतने की चेतावनी दी.छत्तीसगढ़ में काम कर रहे मानवाधिकार संगठन पीयूसीएल के अध्यक्ष डॉक्टर लाखन सिंह के अनुसार बेला भाटिया के मकान मालिक को कुछ दिन पहले ही धमकी दी गई थी.बस्तर में फ़र्जी मुठभेड़ और आदिवासी महिलाओं के यौन उत्पीड़न को उजागर करने में बेला भाटिया की मुख्य भूमिका रही है. राष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन और दूसरे संगठनों ने बस्तर पुलिस पर लगे आरोपों को सही पाया

रेप पीड़िता की मदद करने पर मिली धमकी


इंडियन एक्सप्रेस की खबर के मुताबिक बस्तर जिला मुख्यालय से दस किलोमीटर दूर ग्राम पंचायत पंडरीपानी में अक्टूबर 2015 से जनवरी 2016 के बीच एक स्थानीय महिला का कई बार रेप किया गया. इसी मामले में बेला भाटिया मानवाधिकार आयोग के साथ पीड़िता का बयान दर्ज कराने पहुंची थी. यही बात कुछ लोगों को नागंवार गुजरी और उनपर नक्सल गतिविधियों में शामिल होने का आरोप लगा दिया.

बेला की सुरक्षा में पुलिसबल तैनात


सहायक पुलिस महानिरीक्षक पीएचक्यू अभिषेक पाठक ने बताया कि कुछ लोग बेला भाटिया पर नक्सल गतिविधियों में शामिल होने का आरोप लगा रहे थे. इसी के विरोध में वे उनके घर के बाहर प्रदर्शन करने पहुंचे थे. मौके पर पुलिस बल के पहुंचते ही वे वहां से चले गए. बेला भाटिया की सुरक्षा में उपनिरीक्षक कृपाल सिंह गौतम के नेतृत्व में 4 महिला पुलिस कर्मचारियों सहित 15 पुलिस कर्मचारियों का बल तैनात किया गया है.
प्रदर्शन करने वाले लोगों का आरोप है कि बेला के पति जॉन द्रेज विदेशी मूल के हैं और वे देश विरोधी गतिविधियों में शामिल हैं.

धमकियों पर बेला ने कहा ”मैं किसी धमकी से नहीं डरती हूं, मैं बस्तर में ही रहूंगी और बस्तर छोड़कर कहीं नहीं जाऊंगी।” पूरे मामले पर पुलिस का कहना है कि धमकी मिलने के बाद बेला को सुरक्षा मुहैया कराई गई है। इधर इस घटना के बाद मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के छत्तीसगढ़ के राज्य सचिव संजय पराते ने कहा कि “बेला भाटिया पर यह हमला इसलिये किया गया है कि विगत दिनों बस्तर में आदिवासी महिलाओं के मानवाधिकारों और उनके साथ बलात्कार किये जाने की घटनाओं की जांच के लिये आये मानवाधिकार आयोग की टीम की उन्होंने मदद की थी. अब यह एक चलन ही बन गया है कि मानवाधिकार हनन की जांच में जो कोई भी मदद करेगा, उन पर ऐसे ही हमले किये जायेंगे. नंदिनी सुन्दर के प्रकरण में भी ऐसा ही देखने को मिला है. मानवाधिकार आयोग द्वारा सरकार और पुलिस की पेशी किये जाने का भी उन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा है.”
जा रहा था. हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया है कि वे बस्तर इलाके से बाहर नहीं जाएंगी.



बस्तर में सक्रिय रही हैं बेला 


बेला नक्सल प्रभावित इलाकों में लंबे समय से काम रही हैं। बीजापुर सहित अन्य इलाकों में वे कई बार फोर्स की ज्यादतियों की खबर उठाती रही हैं और लीगल एड की शालिनी गेरा के साथ भी काम कर चुकी हैं। कुछ ही समय पहले शालिनी गेरा और उसके साथियों ने भी बस्तर छोड़ दिया था और इसके लिए उन्होंने सुरक्षागत कारणों का हवाला देते हुए बस्तर पुलिस को जिम्मेदार ठहाराया था। बेला नक्सल प्रभावित इलाकों में लंबे समय से काम रही हैं। बीजापुर सहित अन्य इलाकों में वे कई बार फोर्स की ज्यादतियों की खबर उठाती रही हैं और लीगल एड की शालिनी गेरा के साथ भी काम कर चुकी हैं। कुछ ही समय पहले शालिनी गेरा और उसके साथियों ने भी बस्तर छोड़ दिया था और इसके लिए उन्होंने सुरक्षागत कारणों का हवाला देते हुए बस्तर पुलिस को जिम्मेदार ठहाराया था। हालांकि सोमवार को पंडरीपानी के ग्रामीणों ने ही बेला के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था।

उत्पलकान्त अनीस मीडिया शोधार्थी हैं और सूचना तकनीक का आदिवासी महिलाओं पर प्रभाव पर शोध कर रहे हैं।

बस्तर- आईजी ने महिला सामाजिक कार्यकर्ताओं को दी गाली

 बेला भाटिया के घर पर सोमवार को क़रीब 30 अज्ञात लोगों ने हमला कर उन्हें बस्तर छोड़ देने की धमकी दी थी. इसके बाद बेला भाटिया की मदद की अपील में देश के विभिन्न भागों से सामाजिक कार्यकर्त्ताओं ने छत्तीसगढ़ में बस्तर के पुलिस महानिरीक्षक (आईजी) एसआरपी कल्लूरी को मदद की अपील के संदेश भेजे थे. इसके जवाब में आईजी एसआरपी कल्लूरी ने सुप्रीम कोर्ट के वकील प्योली स्वातिजा सहित कई  सामाजिक कार्यकर्ताओं को भेजे गये संदेश में अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया .

प्योली ने आईजी एसआरपी कल्लूरी को संदेश भेजा कि “कृपया सुनिश्चित करें कि बेला भाटिया को अपने आवासीय परिसर छोड़ने के लिये मजबूर नहीं किया जाय. इस देश का कानून छत्तीसगढ़ पर भी लागू होता है. प्योली स्वातिजा के मुताबिक़ उनके इस संदेश के जवाब में आईजी कल्लूरी ने लिखा, “नक्सलियों को बस्तर से निकाल बाहर किया जाएगा.”

प्योली का कहना है कि इसके जवाब में जब उन्होंने पूछा, “आपके जवाब का मेरे सवाल से क्या लेना-देना है. कृपया आदिवासियों, एक्टिविस्ट्स, शिक्षाविदों और पत्रकारों का उत्पीड़न बंद कीजिए”, तो जवाब आया “एफ़ यू”.

बीबीसी हिन्दी  रिपोर्ट के अनुसार जब बीबीसी ने जब इस संबंध में आईजी कल्लूरी से बातचीत की  तो उनहोंने ये संदेश भेजने से साफ़ तौर पर इनकार तो नहीं किया पर कहा, “कोई अफ़सर ऐसा करता है क्या, और हमारे फ़ोन में भी कई संदेश हैं, हम भी रिपोर्ट कर रहे हैं, उन्हें भी रिपोर्ट करने दीजिए, हम साइबर एक्सपर्ट से पूरी जांच करवा रहे हैं.”

देखें : बलात्कार के खिलाफ लड़ने वाली बेला को मिली घर छोड़ने की धमकी 


बीबीसी से बातचीत में प्योली ने कहा, “मैं सुप्रीम कोर्ट में वकील हूं और दिल्ली में अपने सुरक्षित कमरे में बैठकर ये संदेश भेज रही थी, अगर वो मुझसे इतनी अभद्र भाषा का इस्तेमाल कर सकते हैं तो ये बेहद ख़तरनाक है.” प्योली ने कहा कि वो फ़ोन से लिए स्क्रीन-ग्रैब के बल पर फ़ौजदारी मुक़दमा करेंगी और विभागीय जांच की भी मांग करेंगी.

गुनीत कौर और ईशा खंडेलवाल को अपने जवाबी संदेश में भी कल्लूरी ने अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया है.

 खबर स्रोत बीबीसी हिन्दी

रूपा सिंह की कविताएँ

रूपा सिंह

एसोसिएट प्रोफ़ेसर, अलवर, राजस्थान ‘ संपर्क : rupasinghanhadpreet@gmail.com.

1.

सबसे खतरनाक समय शुरू हो रहा है
जब मैं कर लूंगी खुलेआम प्यार।
निकल पडूँगी  अर्धरात्रि दरवाजे से
नदियों में औंटती, भीगती, अघाती
लौट आउंगी अदृश्य  दरवाजे से
घनघोर भीतर।
अब तक देखे थे जितने सपने
सबको बुहार कर करूंगी बाहर।
सीझने दूंगी चूल्हे पर सारे तकाजों को
पकड़ से छूट गये पलों को
सजा लूंगी नई हांडी मैं
और कह दूंगी अपनी
कौंधती इंद्रियों से
रहें वे हमेशा  तैयार मासूम आहटों के लिये।
आज दिग्विजय पर निकली हूं मैं
स्त्रीत्व के सारे हथियार साथ लिये
सबसे खतरनाक समय शुरू हो रहा है
जब  करने लगी हूं मैं खुद से ही प्यार।

2

तुम्हें मैं नहीं जानती-ऐसा नहीं।
खूब पहचानती हूं तुम्हे।
तुम्हारे सांसों की गमक, होंठों की तड़पन
छाती की धमक, सब खूब पहचानती हूं।
उतरी नहीं अभी तो मैं चमड़ी में
दौड़ी नहीं रगों में
खुबी नहीं तुम्हारे चेहरे के तिलों में
चुभन भरी दहकन साथ लिये
भटकी नहीं उबचुभी डाढ़ियों में।

सदियों  पहले आदम की चमड़ियों में
उतर गई थी ऐसे ही
दौड़ पड़ी थी रगों में
भटक गई थी दहकती गुफाओं में।
वहीं की वहीं हूं अब तलक।
मैं खूब पहचानती हूं, तुम्हारी हर चुभन को
गमक को …… धमक को …. एक-एक करतूतों को
तिलों की विरासत को
ऐसा कैसे है कि, तुम नहीं जानते मुझे?

3
रूको …… ठहरो ….।
इत्मीनान से बातें करना चाहती हूं तुमसे।
अपने अंदर जितने अंधेरे थे
सबको दरेर कर बना ली है एक मोमबत्ती।
धागा डाला जिसमें बचे-खुचे स्नेह का।
तुम्हारी मांगें  है मानो दियासलाई का झब्बा
या तो बन जाउं धीमी लौ
या हो जाऊं एकदम स्वाहा
मुझे तय करना है बहुत-कुछ।

रूको …… ठहरो ……।
बहुत चली हूं मैं।
जरा जांच लूं अपने सलामत बचे पैरों को
धन्यवाद करूं उन हाथों को, जिनके सामने फैले तुम।
चेहरे की लुनाई में छुपा होगा दुख का पीलापन
होंठों की खुश्की  ने ही किया होगा उन्हें रक्ताभ रक्तिम।

ठहरो….. रूको…….।
सोचने दो मुझे मेरे बारे में
मेरे अंग कैसे और कब हुए तुम्हारे?
टूटती पीड़ा आज फूटने को तैयार है
अपने फूल चुनने हैं मुझे
अपनी  ही लाश  से

ठहरो …… रूको …….
बातें करुंगी तुमसे
पहले जरा बतिया लूं
अपने आप से..
इत्मीनान  से।