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दलित महिला कारोबारी का संघर्ष



‘स्त्री नेतृत्व की खोज’ श्रृंखला के तहत दलित महिला कारोबारी के संघर्ष और उनकी उपलब्धियों से रू-ब-रू करा रहे हैं  पत्रकार नितिन राउत.


कमानी ट्यूब्स  की चेयरपर्सन और पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित कल्पना सरोज की कहानी किसी बॉलीवुड फिल्म से कम नहीं- सफलता के शिखर तक पहुँचने के पीछे कड़े संघर्ष की कहानी है, उनकी कहानी. एक दौर था जब उन्होने जिंदगी खत्म करने के लिए जहर पी लिया था. लेकिन कहते हैं विश्वास और निरंतरता हो तो स्थितियां बदलते देर नहीं लगतीं, कल्पना सरोज की स्थितियों ने ऐसी करवट बदली कि उन्हे नयी जिंदगी के साथ बेशुमार दौलत की मालिक बना डाला. कभी जहर पीकर आत्महत्या करने की कोशिश वाली कल्पना सरोज आज 500 करोड की कारोबारी हैं.

दलित महिलाओं के संघर्ष की मशाल: मंजुला प्रदीप 

किसान आत्महत्या के लिए परिचित महाराष्ट्र में विदर्भ के एक दलित परिवार में कल्पना सरोज का जन्म हुआ. पुलिस कांस्टेबल पिता के घर के हालात काफी खराब थे. खेलने की उम्र में अपनी उम्र से 10 साल बडे एक इन्सान से उनकी शादी हो गई. जिस उम्र में हाथ में कलम और किताबें होनी थी उस उम्र में उनके हाथ घर गृहस्थी की जिम्मेवारी आ गई. पति और ससुराल के लोगो की सेवा करना ही इनकी जिंदगी का एकमात्र मकसद रह गया था. लेकिन उनके लिये यह सफर भी आसान कहाँ था? घरेलू हिंसा और असामाजिक ढंग का घाव झेलना अभी बाकी था. विदर्भ से दूर मुंबई मे उनका ससुराल था. पढाई पूरी तरह से बंद हो गई. घर गृहस्थी के काम-काज समेत घरेलू हिंसा उनके जीवन का हिस्सा बन गई थी. कल्पना की रोज पिटाई होती. कभी पति के हाथों, तो कभी ससुराल वालो के हाथो उनकी खूब पिटाई होती. पिटाई के जख्म जैसे उनके शरीर पर जम से गये थे. रोज पडती मार से उनकी जिंदगी की चाह तो जैसे खत्म हो चुकी थी. कल्पना से मुंबई मिलने पहुंचे उनके पिता उनकी इस हालत को देख उन्हें अपने घर ले आये . लेकिन एक नर्क छोड दूसरे नर्क के दरवाजे उनके स्वागत के लिये तैयार थे. वापस आने पर समाज का उनकी और देखने का रवैया बहुत बुरा था . पति के घर से वापस आयी कल्पना पर और उनके परिवार पर गाँव  ने बहिष्कार डाल दिया. शारीरिक मानसिक तौर से परेशान एक दिन कल्पना ने जहर पीकर जान देने की कोशिश की. खुदकुशी के लिए कीटनाशक की तीन बोतल उन्होने पी डाली. समय पर इलाज से उन्हे बचा लिया गया.

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आत्महत्या की कोशिश के बाद उनके जीवन में नया मोड़ आया  . 16 साल की उम्र में उन्होंने फिर जिंदगी की और रुख किया, और मुंबई चली आई. अब उनके जीवन मे नई सुबह होने वाली थी. घर में कपडे सिलने की हुनर के कारण उनको जॉब मिल गया. एक गारमेंट कंपनी में कपडे सीलने का काम किया करती . दिन में दो रुपये की मजदूरी उनको मिला करती. लेकिन मुंबई में ये कम थी. उन्हें अपनी बहन का इलाज भी कराना था और बहन का इलाज इन पैसो में संभव नहीं था. घर पर ब्लाउज सिलने शुरू किये, आय प्रति ब्लाउज 2 रुपये से प्रति ब्लाउज दस रुपये तक पहुंची. लेकिन पैसे की किल्लत ने कई दिनो से बीमार बहन की सासें छीन ली. आय बढाने के लिये 14 से 16 घंटे काम करती. दिन में तीस से चालीस ब्लाउज सिलती. धीरे धीरे बिजनस को बढावा मिल रहा था, फिर सिलाई और बुटिक का काम शुरू किया . बिजनस बढाने के लिये उन्होने महात्मा फुले महामंडळ से  50,000 रूपये लोन की अपील की . उनको 50,000 लोन मिला. इस लोन के साथ फर्निचर का बिजनस शुरू किया . उल्हास नगर से सस्ते फर्निचर खरीदकर और उन्हें बेचकर बिजनस आगे बढ रहा था. तरक्की उनके कदम चूम रही थी. कच्चा माल कहाँ से लाना और उसे लाकर कहा बेचना, इसका पूरा अभ्यास उन्हें हो गया. लिया कर्जा उन्होंने चुका दिया. पूरे दो साल लगे उनको कर्जा चुकाने मे. लेकिन नये-नये बिजनस की तलाश जारी थी. रोज पेपर में आते स्कीम वे तलाशतीं . अच्छे उद्योग की तलाश उन्हें हमेशा रहती . विवादो में फसी एक जमीन का सौदा उन्होंने किया . पैसों  की जरुरत के चलते जमीन मालिक ने उन्हें जमीन बेच दी थी. जमीन को कल्पना ने अपने कब्जे में ले लिया . विवादों में फसी जमीन के लिए उनको कोर्ट के दरवाजे खटखटाने पडे. कई साल लगे उन्हे उनकी जमीन को हासिल करने में. जमीन हासिल कर उसे विकसित करने का उन्होने फैसला किया. लेकिन रास्ता नहीं मिल राहा था . बिजनस के लिए उन्होने पार्टनर की  तलाश शुरू की . 65 फिसदी भागीदारी से उन्होंने बिजनस शुरू किया . ईटों की इमारत खडी हो गई. रियल इस्टेट का बिजनस इसी बिल्डींग से शुरू हुआ .फर्निचर और रियल इस्टेट का बिजनस काफी जोर पकड रहा था- लेकिन गोल्डन दिन अभी बाकी थे. सफलता कल्पना के कदम चूम रही थी .

:दलित महिला उद्यमिता को संगठित कर रही हैं सागरिका

मुंबई में उन्हें पहचान मिलने लगी, उन्होंने दूसरी शादी की। इसी जान- पहचान के बल पर कल्पना को पता चला कि 17 साल से बंद पड़ी कमानी ट्यूब्स को सुप्रीम कोर्ट ने उसके कामगारों से शुरू करने को कहा है। कंपनी के कामगार कल्पना से मिले और कंपनी को फिर से शुरू करने में मदद की अपील की। यह कंपनी कई विवादों के चलते 1988 से बंद पड़ी थी। कल्पना ने वर्करों के साथ मिलकर अथक मेहनत और हौसले के बल पर 17 सालों से बंद पड़ी कंपनी में जान फूंक दी. आज कमानी ट्यूब्स कंपनी 500 करोड से अधिक मूल्य की कंपनी है.

बुलंद इरादे और युवा सोच के साथ 

दलित महिला उद्योगपति कल्पना न सिर्फ आर्थिक उन्नति तक सीमित नाम है, बल्कि डा. आंबेडकर के सपनों का समाज बनाने के लिए इनका समर्पण भी जग-जाहिर है. सामाजिक रूप से प्रतिबद्ध बहुत कम उद्योगपतियों में उनका नाम शुमार है.

दलित स्त्रीवाद , मेरा कमराजाति के प्रश्न पर कबीर

अमेजन पर ऑनलाइन महिषासुर,बहुजन साहित्य,पेरियार के प्रतिनिधि विचार और चिंतन के जनसरोकार सहित अन्य सभी  किताबें  उपलब्ध हैं.

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यौन संबंध को प्यार का रूप देना जरूरी

इति शरण 

तब  मैं एक सामुदायिक रेडियो “गुडगाँव की आवाज़” में सेक्सुअल हेल्थ पर काम कर रही थी। इस दौरान सेक्सुअल हेल्थ से सम्बंधित कई विषयों पर काम करने का मौका मिला, जिसमें एक गंभीर विषय से भी हमारा सामना हुआ- मैरिटलल रेप ( वैवाहिक बलात्कार ) । महिलाओं से बात करने पर पता चला कि बड़ी संख्या में महिलाएं इस तरह के बलात्कार का शिकार हो रही हैं, जिसके खिलाफ वे आवाज़ भी नहीं उठा पाती।

इस प्रोजेक्ट के सिलसिले में मेरी कई औरतों से बातचीत हुई। मगर एक दिन एक ऐसी महिला ने मुझे अपनी कहानी बताई , जिससे मैं अक्सर मिला करती थी, लेकिन कभी पता ही नहीं चला कि वह भी मैरिटल रेप की शिकार है। उसकी शादी 18 साल की उम्र में ही कर दी गई थी। शादी की पहली रात से ही वह अपने पति की जबरदस्ती सहने को मजबूर रही थी। उस महिला ने उस दिन विस्तार से मुझे अपनी कहानी बताई।

“मुझे नहीं पता था कि शादी के बाद क्या होता हैं। कच्ची उम्र में ही मेरी शादी तो तय कर दी गई, मगर शादी के बाद की चीज़ों के बारे में मुझे कुछ नहीं बताया गया। शादी की पहली रात मेरे पति जैसे मुझपर चढ़ ही गए थे, मेरे लिए सब बहुत डरावना था। मुझे दर्द भी हो रहा था और बहुत शर्म भी आ रही थी। कभी सपने में भी नहीं सोची थी कि कोई मेरे शरीर के साथ ऐसा कुछ करेगा। मेरे पति तब तक नहीं रुके जब तक उन्हें नींद नहीं आ गई। सुबह होते ही मैंने अपनी माँ को फ़ोन लगाया और रात की बात बताते हुए रोने लगी। मेरी माँ ने कहा “पागल हैं क्या तू, वह तेरे पति हैं, इसे अपना पत्नी धर्म समझ कर निभा ले।”

उस औरत ने बताया कि धीरे-धीरे वह इसकी आदी  हो गई। अब तो मासिक धर्म के दिन भी उसका पति उसे नहीं छोड़ता। उसका पूरा बिस्तर खून से सन जाता था। कुछ दिन बाद वह गर्भवती हो गई। उसे मायके भेज दिया गया। वह खुश थी, उसके साथ ऐसा कुछ नहीं हो रहा था। बच्चा होने के बाद उसका शरीर बहुत कमजोर हो गया। इस कारण डॉक्टर ने कुछ दिनों तक उन्हें सम्बन्ध बनाने के लिए मना किया हुआ था, मगर उसका पति मानने वालो में से नहीं था यहाँ तक कि उसे प्रोटेक्शन लेना भी मंजूर नहीं था। नतीजतन एक महीने बाद ही वह दोबारा गर्भवती हो गई। शरीर से कमजोर होने के कारण 2 महीने में ही उसका बच्चा गिर गया ।अपनी कहानी बताने के बाद उस महिला ने कहा था “अपने पति से मैं भी प्यार करना चाहती थी, मगर कभी कर नहीं पाई।
इस तरह की कहानी हमारे समाज में हर दूसरे घर में मिल जाएँगी, जहाँ औरतें अपने पति द्वारा ही बलात्कार की शिकार हो रही।

वैसे इसके लिए जिम्मेदार अकेले उस एक पुरुष को नहीं ठहराया जा सकता है बल्कि इसका जिम्मेदार हमारा वह समाज है, जहाँ सेक्स को पुरुषों की मर्दानगी से जोड़कर देखा जाता है। मुझे याद हैं एक औरत ने अपनी कहानी बताते हुए कहा था, मैडम मेरे पति बहुत अच्छे हैं। कभी भी मेरी इजाज़त के बिना सम्बन्ध नहीं बनाते। यहाँ तक कि पहली रात भी मेरे मना करने के बाद वह कुछ नहीं बोले। मगर उन्होंने मुझे कहा था कि किसी और को मत बताना कि हमारे बीच कुछ भी नहीं हुआ , वरना लोग मेरी मर्दानगी पर ताना देंगे। इस घटना को हम एक ऐसे उदाहरण के रूप में देख सकते हैं, जब मर्दानगी के नाम पर एक पुरुष को जबरन सम्बन्ध बानने के लिए ज़ोर दिया जाता है।

इन सबका परिणाम स्त्रियों के मन में यौन सम्बन्ध के प्रति नफरत घर कर लेती है। प्यार का यह अनमोल रूप हिंसा में तब्दील हो जाता है। जबकि यौन सम्बन्ध पुरुष और स्त्री दोनों की इच्छा और जरुरत है।  पुरुषों की शारीरिक बनावट ऐसी होती हैं कि सम्बन्ध बानने से उनकी थकान दूर होती हैं, जबकि औरतों को इसमें कुछ हद तक थकान महसूस होती है। वैसे भी हमारे समाज में सामान्यतः घर की सारी जिम्मेदारी घर की औरतों के सर पर ही थोप दी जाती हैं, दिन भर काम से थकने के बाद हर दिन उसका सम्बन्ध बनाने का मन नहीं होता।

करीब 50 साल की एक महिला ने अपने पति के बार में बताते हुए कहा था “वो आज मुझे अगर अपने पास बैठने के लिए बुलाते भी हैं तो उनके पास जाकर बैठने का मन नहीं करता। मन भी कैसे करे, शादी होते ही घर की सारी जिम्मेदारी मेरे सर पर थोप दी गई, दिन भर काम करके शरीर बिल्कुल जवाब दे देता था। उम्र भी बहुत कम थी मेरी। मगर काम के बाद जब आराम करने का मन होता तो पति घर आते ही बिस्तर में चलने के लिए बोलते। अगर मना करो तो फिर घर में बवाल कि मेरी इससे थकान दूर होती है और वैसे भी तू तो दिन भर घर में ही रहती है, अब किस बात की पत्नी जो पति का थकान भी दूर न करे। उस औरत का कहना था कि सम्बन्ध बनाना मेरे लिए कोई प्यार नहीं रहा बल्कि सज़ा थी मेरे लिए।  उनके लिए तो मैं बस उसकी ज़रुरत पूरी करने वाली मशीन थी। उसके घर का सारा काम करने वाली और दूसरा सम्बन्ध बनाकर उसकी थकान दूर करने वाली औरत।

इस प्रोजेक्ट के अंतर्गत हम लोग एक रेडियो नाटक भी बनाया करते थे, जिसमें लाइव डॉक्टर के जुड़ने का एक सेशन हुआ करता था। डॉक्टर उस सेशन में अक्सर लोगों को यह सलाह दिया करते थे कि आप पत्नी के पास सिर्फ सम्बन्ध बनाने मत जाया करो, बल्कि अपने प्यार का इज़हार दूसरी तरह से भी करने की कोशिश करो, देखना आपकी पत्नी आपसे कितनी खुश रहा करेगी।  डॉक्टर से बात करने के लिए हमारे स्टेशन में काफी कॉल आया करते थे। कई पुरुषों का कहना था कि हमें बार-बार अपनी पत्नी के साथ सम्बन्ध बनाने का मन होता है। कुछ पुरुषों ने बताया कि मैं ऑफिस में रहता हूँ तब भी मन होता है जल्दी से घर जाकर पत्नी के साथ सम्बन्ध बनाऊं, ऐसा नहीं कर पाने पर बहुत बेचैनी होती है।

डॉक्टरों का कहना हैं कि यह एक तरह कि मानसिक स्थिति भी है, किसी चीज़ की लत लग जाना या उसके बारे में दिन रात सोचने पर हर बार आपका दिमाग उसी ओर जाता है। खासकर युवाओं के साथ ऐसा कई बार होता है। डॉक्टरों का कहना है कि पहले तो उन पुरुषों को अपना ध्यान कहीं  और लगाने की कोशिश करनी चाहिये। दूसरा कई बार पुरुषों के उत्तेजित हो जाने पर उनका वीर्य भी निकल आता है, जिसके बाद उन्हें सेक्स करने की जरुरत महसूस होती है। अगर उस वक़्त वह पुरुष अपने साथी के साथ नहीं हैं या उसकी साथी की रज़ामंदी नहीं हैं तो वह  हस्तमैथुन करके भी अपनी उत्तेजना शांत कर सकता है।

हांलाकि हमारे समाज में हस्तमैथुन को गलत नज़रिये से देखा जाता है। जबकि इसमें कोई बुराई नहीं है। यह एक सामान्य सी बात है। डॉक्टर भी इसे गलत नहीं मानते। कई लोगों का यह भी मानना होता है कि हस्तमैथुन करने से कमजोरी या अन्य कोई बीमारी होती है, मगर यह सब गलत धारणा है। यह चिंता का विषय तब बनता है जब रोजमर्रा के काम में रूकावट बनने लगे या तनाव मुक्त करने का यही एकमात्र साधन बन जाए।

जबरन सम्बन्ध बनाने का खामियाज़ा कई बार खुद पुरुषों को भी सहना पड़ता है। पुरुषों के जबरदस्ती करने पर कई बार औरतें सम्बन्ध बनाने के नाम से ही नफरत करने लगती है। वे घर के कामों में खुद को इतना व्यस्त कर लेती हैं कि पति के तरफ कभी ध्यान भी नहीं जाता। परिणामस्वरूप जल्द ही दोनों के बीच यौन सम्बन्ध बनना बंद हो जाता हैं और पुरुष चाह कर भी इससे वंचित रह जाते हैं। इसलिए इस प्यार को बरक़रार रखने के लिए यौन सम्बन्ध को हिंसा नहीं बल्कि प्यार का रूप देना जरुरी है।

लेखिका पेशे से पत्रकार है. सम्पर्क: itisharan@gmail.com
तस्वीरें गूगल से साभार 
स्त्रीकाल का संचालन ‘द मार्जिनलाइज्ड’ , ऐन इंस्टिट्यूट  फॉर  अल्टरनेटिव  रिसर्च  एंड  मीडिया  स्टडीज  के द्वारा होता  है .  इसके प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें : 
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संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com

 

सत्ता और विमर्श के अन्तर्सम्बन्धों की रवायत (चित्रा मुद्गल की कहानियों का पुनराकलन)

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शंभु गुप्त

 हिन्दी विश्वविद्यालय  में स्त्री अध्ययन विभाग में  प्रोफ़ेसर. सम्पर्क : ई  मेल- shambhugupt@gmail.com, मोबाइल:  8600552663

वरिष्ठ कथालेखिका चित्रा मुद्गल की कहानियाँ एक बार फिर चर्चा में हैं. ख़ास तौर से ‘मामला आगे बढ़ेगा अभी’, ‘भूख’, ‘जगदम्बा बाबू गाँव आ रहे हैं’, ‘प्रेतयोनि’ आदि. आज से दस साल पहले भी इन कहानियों की लगभग यही स्थिति थी. लेकिन आज जब फिर से इन पर चर्चा ज़ोरों पर है तो इस बहाने मेरे जैसे पाठक को यह मौक़ा मिलता है कि इन्हें कथित चर्चेबाज़ी, चर्चेबाज़ी की राजनीति से अलग समय के असल आईने में देखा जाए, इन कहानियों को पढ़ने के बाद एक सामान्य पाठक के बतौर मैं किस तरह, क्या सोचता हूँ, इसे बेखटके सबके सामने लाऊँ; क्योंकि हिन्दी में चर्चेबाज़ी का एक धड़ा ऐसा भी है, जो प्रश्न भी ख़ुद तैयार करता है और बहुत ही सूफ़ियाना तरीक़े से उनके उत्तर भी ख़ुद डिक्टेट करता है. हिन्दी में हिन्दी की अन्तरात्मा को ठेस पहुँचाती ‘पीआरशिप’ की यह प्रवृत्ति पिछले दिनों ख़ूब पनपी है और इसने लगभग एक परम्परा का स्वरूप अख़्तियार कर लिया है. आम पाठक के पास इस इन्द्रजाल को पहचानने/काटने का कोई ज़रिया नहीं, सिवा इसके कि वह ख़ुद मोर्चा सम्भाले और आलोचकों के तिलिस्म को तार-तार करे!

कोई आलोचक किस कृति के बारे में कैसे, क्या सोचता है, यह उसका अपना मामला है क्योंकि आलोचक भी इसी लागलपेट भरी दुनिया का हिस्सा है और यह क़तई नहीं माना जा सकता कि इस पीआरशिप की चपेट में वह बिल्कुल न आया हुआ होगा! सब धान बाईस पँसेरी हमारा मन्तव्य नहीं है. बहुत विनम्रतापूर्वक सिर्फ़ इतना कहना है कि आलोचकों को भी कभी-कभी आईने में अपना चेहरा देख लेना चाहिए. आलोचना की पहली और आख़िरी कसौटी ख़ुद रचना होती है, होनी चाहिए; न कि यह कि लेखक या लेखिका की हैसियत और पहुँच क्या और कहाँ तक है, वह कितने बड़े, फ़ायदा पहुँचा सकने वाले आहदे पर है या कहें कि किसी का कुछ बना या बिगाड़ सकने की कितनी सामथ्र्य उसमें है! अरसे से हिन्दी आलोचना के बहुत सारे ‘प्रतिमान’ इसी ‘उर्वरा’ भूमि से निकलकर आ रहे हैं, पाठक को ऐसा दरकिनार किया गया कि लगभग उसे ‘हाँका’ गया! होना तो दरअसल यह चाहिए था कि जैसा कि एक जनतान्त्रिक व्यवस्था में होता है कि देश के हर नागरिक की उसमें प्रत्यक्ष -अप्रत्यक्ष  हिस्सेदारी/भूमिका होती है; लेखक की रचना-प्रक्रिया में पाठक की भी लगभग यही हैसियत होती है, होनी चाहिए. हुआ यह है कि जैसे राजनीति आम आदमी को किनारे कर के चलती है और उसी के कन्धों पर सवार होकर उसी को चकमा देती रहती है, ठीक वैसे ही साहित्य में भी आम आदमी, शोषित -उत्पीड़ित वर्गों, निम्नवर्गीय जीवन इत्यादि का इस्तेमाल ही किया गया. यह ठीक है कि साहित्य क्रान्ति नहीं करता पर उसकी भूमिका और मानसिकता तो बनाता है. लेकिन यदि वह यह भी न कर पाए तो आप क्या कहेंगे?

कोई रचनाकार जब आम आदमी,शोषित-उत्पीड़ित वर्गों, निम्नवर्गीय जीवन इत्यादि को अपना विषय बनाता है तो तय है कि वह इस तथ्य से तो सुपरिचित होगा ही कि ऐसा किए जाने के लिए तत्वतः और स्पष्टत: उसे डिक्लास/डिकास्ट होने की प्रक्रिया से गुज़रना ज़रूरी है. वह भी पूरी ईमानदारी और पारदर्शिता के साथ. राजनेताओं की तरह साहित्यकार भी यदि ऐसा करने लगेंगे कि पहले वे समस्या गढ़ेंगे और फिर उसका समाधान भी और इस चक्कर में सारा ज़मीन-आसमान एक कर देंगे तो यह तो वही बात हो जाएगी न कि यह मेरी खेती! इसे जैसे मैं बोऊँ-काटूँ! हालाँकि अपने कहानी-संग्रहों की भूमिकाओं में चित्राजी बाक़ायदा इस ‘उपभोक्तावाद’ का विरोध करती हैं और इसकी लम्बी ख़बर लेती हैं. जैसे कि ‘लपटें’ की भूमिका ‘द्वन्द्व’ में एक जगह उन्होंने लिखा है-‘‘आज लेखक के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या वह अपने समय-समाज के सच से मुठभेड़ करने का ख़तरा उठा रहा है? उन छिपे ख़तरों के भयावह और लगभग तबाह कर देनेवाले दूरगामी परिणामों को टोहने-सूँघने का उपक्रम कर रहा है? गगग वे उन्हें नहीं पहचान रहे तो क्यों? या पहचान कर भी उन्हें देखा-अनदेखा कर वादों और खेमों की छतरियों के नीचे सुरक्षित-सीमित उखाड़ पछाड़ तथा श्रेष्ठ-अश्रेष्ठ, प्रतिबद्ध-अप्रतिबद्ध की क्षुद्र  राजनीति में उलझे हुए वर्चस्ववाद के पैंतरे भाँजते एक-दूसरे को नीचा दिखाने में अपनी समूची सर्जनात्मक ऊर्जा नष्ट कर रहे हैं? उनकी चिन्ता में आम आदमी कितना और कहाँ तक रह गया है, सोचते ही बेचैनियाँ आँखों में उँगलियाँ डालने लगती हैं कि हमने उनके लिए कुछ किया है तो मात्र इतना कि उन्हें वैचारिक उल्टियों, चश्मे से बँधी-रची कृतियों, पोस्टरों, नुक्कड़ नाटकों, चौंधियाहट लदे-फँदे नारों में क़ैद कर उन्हें उनकी ज़मीन से ख़ुद बेदख़ल कर इस्तेमाल की छद्म हित-चिन्तक राजनीति का मोहरा बना डाला! कलम के इस उपभोक्तावाद को हम किस खाँचे में डालेंगे? क्या नाम देंगे इसे?’’ (लपटें, भारतीय ज्ञानपीठ, पाँचवाँ संस्करण 2004, पृष्ठ  छह). आगे इस क्रम में इसे वे ‘अभिव्यक्ति में ख़ालिस व्यक्तिवादी रवैये’ का ‘अनुगामी’ कहते हुए इससे ‘सामाजिक सरोकारों के प्रति शब्दशक्ति’ के प्रज्ज्वलन की असम्भवता का प्रतिपादन करते हुए आह्वान करती हैं कि लेखक लोग अपनी ‘कलम की दराँती को छद्म के पाश से मुक्त’ करें, ताकि ‘‘मारक दबावों की चौतरफ़ा मार से त्रस्त-ध्वस्त लगभग जड़ावस्था में पहुँच रहे जनमानस की ग़ुलामी की हदें छूती सहिष्णुता को अभिव्यक्ति की तीव्रता दरका सके, उन्हें उनका सही पाठ सौंप सके, उनमें अपेक्षित आँच-ताप जगा सके कि ऐसा होना उनकी नियति नहीं है, न निरपेक्षता उसका समाधान!’’ (वही).

इस लम्बे उद्धरण की प्रासंगिकता इसमें निहित वह अन्तर्विरोध है, जो न केवल चित्रा मुद्गल के वक्तव्यों, उनके पीछे सक्रिय विचारों, उनमें निहित उनकी कथित ’अवधारणाओं’ बल्कि आगे चलकर उनकी रचनाओं की अन्तर्वस्तु को अंतर्दृष्टिपरक संभ्रम वैचारिकता के संकट से संग्रस्त कर देता है. इस उद्धरण में एक तरफ़ वे वादों-खेमों, प्रतिबद्धता-अप्रतिबद्धता जैसे अवधारणात्मक शब्दों की एक तरह से खिल्ली उड़ाती हैं तो दूसरी तरफ़ अन्त तक पहुँचते-पहुँचते ‘निरपेक्षता ’ का भी निषेध करती चलती हैं. दो नावों पर एक साथ सवार कैसे हुआ जा सकता है? लेकिन चित्रा मुद्गल वक्तव्यों में भी और रचना में भी जब-तब इसकी चपेट में आ ही जाती हैं. उनके साथ दरअसल दिक़्क़त यह है कि यथार्थ की अन्दरूनी सतह तक पहुँचने से काफ़ी पहले ही उनकी विचारचिन्तना और सृजनात्मकता ज़बाव देने लगती है और इस स्थिति में वे अगल-बगल और आगे-पीछे और ऊपर-नीचे के घटना, पात्रों, स्थितियों के लम्बे-लम्बे ब्यौरों और भाषायी खेल का सहारा लेते हुए कहानी को एक अंज़ाम तक पहुँचाती हैं. मसलन उनकी ‘जिनावर’ कहानी को देखा जाए. विशेषतः इसके अन्तिम हिस्से को, जहाँ घोड़ी सरवरी की मौत और उसके हर्ज़ाने के बाद असलम के ठीक से सो न पाने और उसके किसी गहरे अपराध-बोध और क्षोभ की गिरफ़्त में आ फँसने की मनःस्थिति का कथांकन है. यहाँ दो दृश्य हैं. पहला यह कि उसे सोते में सरवरी का रुन-झुन हिनहिनाहट का प्रखर स्वर बार-बार बेताबी के साथ सुनाई देता है और उसकी नींद उचट जाती है. वह हड़बड़ाकर कोठरी के बाहर आता है पर वहाँ उसे बिना सरवरी के अकेले उदास खड़े ताँगे के अलावा कुछ नहीं नज़र आता. ठीक इसी क्षण उसे यह अपराध-बोध सालना शुरू होता है-‘‘सरवरी यहां हो भी कैसे सकती है? उसे तो वह वहीं सड़क पर मुर्दा छोड़ आया था-नगरपालिका की बेजान लावारिस पशुओं की लाशें ढोने वाली गाड़ी के भरोसे. कितनी तेजी से वह तांगा लेकर भागा था घटनास्थल से.’’ (आदि-अनादि -3, चित्रा मुद्गल की सम्पूर्ण कहानियां; सामयिक प्रकाशन 2009; पृ. 52). दूसरा दृश्य वह है, जिसमें वह हर्ज़ाने में मिले नोटों को लानत भेजता हुआ अपनी हरामज़दगी/बेमुरौव्वती का बखान/ऐलान करता हुआ बेतरह ख़ुद को कोसता चला जाता है-‘‘नहीं, वह जुदा नहीं हुई, उसके जुदा होने से पहले ही मैंने उसे मार दिया, मैंने उसकी मौत से सौदा कर लिया, बीबी! जान-बूझकर उसे गाड़ी से भेड़ दिया! यही सोचकर कि अपनी मौत तो वह मरेगी ही, आगे-पीछे किसी गाड़ी से भेड़ दूंगा तो वह मरते-मरते अपनी कीमत अदा कर जाएगी…ये नोट, नोट नहीं, मेरी सरवरी की बोटियां हैं…बोटियां, बीबी…’’ (वही).

इन दोनों दृश्यों का समेकन और समाकलन करने पर जो चीज हाथ लगती है, वह क्या है, पता नहीं! चित्राजी के बारे में कहा जाता है कि वे समाज के निम्नवर्गीय तबक़े की विशेषज्ञ हैं, उनके बीच वे एक सहानुभूतिशील कार्यकर्ता की तरह सक्रिय रही हैं, इस तबक़े के यथार्थ-चित्रण में वे सिद्धहस्त हैं, आदि-आदि. हमें इस कथन से कोई गुरेज़ नहीं है, बशर्ते यह कहीं एक ‘किंवदन्ती’ न बन जाए! जो हो. तो, किस तरह का निम्नवर्गीय यथार्थ यह कहानी हमारे सामने प्रस्तुत करती है? क्या लेखिका निम्नवर्गीय मानसिकता के किसी काइयांपन, टुच्चेपन, बेहयाई-बेमुरौव्वती इत्यादि का खुलासा करने के मक़सद से इस कहानी को लिखती प्रतीत होती है? क्या सचमुच इस कहानी में निहित वर्ग-दृष्टि  इतनी प्रकृष्ट  है कि इससे हमारी आँखें खुल जाती हैं! पता नहीं, सच क्या है! एक पाठक के रूप में मैं भारी सम्भ्रम/दिग्भ्रम की स्थिति में हूँ! क्योंकि अब तक निम्नवर्गीय मानसिकता के किसी काइयांपन, टुच्चेपन, बेहयाई-बेमुरौव्वती इत्यादि का खुलासा जिस तरह कहानियों में होते देखा है, उसमें लेखक का रुख़ और रवैया कहानी के एकदम प्रारम्भ से क्रिटिकल या तुर्श देखा गया है. अपने पात्र/चरित्र पर वह बराबर तीखी पैनी खरादभरी निगाह रखता चलता था; कुछ इस तरह कि देखें बच्चू, बचकर कहाँ जाता है! ठीक वैसे जैसे इस कहानी में लेखिका का असलम की बीबी जुबैदा के प्रति लगातार तीखा रवैया है. पाठक के मन में उसके प्रति अन्त तक एक तरह की वितृष्णा और अनमनापन-सा बना रहा आता है तो दरअसल इसलिए कि वह हमारे अज़ीज़ बेचारे कथानायक असलम को लगातार कोसती, परेशान करती रहती है! असलम के प्रति एक पाठक के बतौर सहानुभूति का ग्राफ़ हमारे मन में लगातार ऊपर चढ़ता चलता है. अतः जब हम उसे ऐसा काइयांपन और टुच्चापन करते देखते हैं तो यक़ायक़ यक़ीन नहीं हो पाता कि यह वही हमारा नायक है, जो एक तरफ़ ग़रीबी तो दूसरी तरफ़ बीबी के दबावों से परेशान है! जब हम उसे अपने दिलोजान से प्यारी सरवरी के साथ ऐसी ग़द्दारी करते देखते हैं तो हमारा सारा तिलिस्म तार-तार हो जाता है और कहानी नितान्त अविश्वसनीय हो उठती है कि आख़िर लेखिका हमारी पाठकीय अस्मिता के साथ यह कैसा खिलवाड़ अब तक करती रही! एक पाठक के बतौर हम तय नहीं कर पाते कि लेखिका पहले वाले असलम के साथ है या इस दूसरे वाले ग़द्दार असलम की खोचड़ी वह करना चाह रही है? इस स्पष्ट  पक्ष -ग्रहण या स्टैंड के अभाव में कहानी गुड्डे-गुड़ियों का खेल बनकर रह जाती है. भाववादी या मनभावन तरीक़े से कहानी कैसे लिखी जाती है, यह कहानी उसका उल्लेखनीय उदाहरण है.

इसी तरह उनकी एक और कथित रूप से अतिचर्चित कहानी ‘प्रेतयोनि’ को लिया जाए. इस कहानी पर कानपुर विश्वविद्यालय के प्रांगण में उपस्थित दो उदग्र श्रोताओं की प्रतिक्रियाओं का जो हवाला चित्राजी ने अपनी ‘चर्चित कहानियाँ’ (सामयिक 2006) की भूमिका ‘पाठकों की सत्ता’ में दिया है, उसमें यह चीज समझ से परे है कि डा. सुरेश अवस्थी और डा. प्रेमा रश्मि में से डा. प्रेमा रश्मि की ही प्रतिक्रिया लेखिका को क्यों पसन्द आई? क्या इसलिए कि वह लेखिका के अभिप्रायानुकूल है? फिर यह पाठक की सत्ता कहाँ हुई; यह तो अन्ततः लेखक की ही सत्ता स्थापित हुई न! हमें लेखक की सत्ता से कोई आपत्ति नहीं है, बशर्ते कि वह पाठक के जनतान्त्रिक अधिकारों के आड़े न आने लगे. डा. सुरेश अवस्थी का अभिमत, हो सकता है, थोड़ा पूर्वाग्रही हो, जिसमें उन्होंने कहा कि ‘‘कहानी को चरमोत्कर्ष की ओर ले जाने के लालच में लेखिका ने मां के भीतर अविश्वास आरोपित किया है. यथार्थ में कोई मां अपनी बेटी के प्रति इस कदर अमानवीय नहीं हो सकती.’’ (चर्चित कहानियाँ, सामयिक प्रकाशन 2006, पृ. 07). लेकिन डा. प्रेमा रश्मि का यह अभिमत और ख़ुद लेखिका द्वारा उसे उद्धृत किया जाना तो और भी ज़्यादा गड़बड़ है कि जिसमें उन्होंने कहा कि ‘‘कहानी में वर्णित सत्य में रत्ती भर भी अतिशयोक्ति नहीं. वास्तविकता यही है कि जिस समाज में बेटे के सात खून माफ कर देने की परंपरा हो उसी समाज में निर्दोश बेटी के साथ लोकापवाद की आड़ में किस सीमा तक अमानवीय हुआ जा सकता है, इसका अनुमान मां के आंचल में विशेश दर्जा पाने वाले पुत्रों को होना असंभव है…’’ (वही).

यानी कि डा. सुरेश अवस्थी के अभिमत को आप इसलिए नकार देंगी कि वह एक बेटे (पुरुष ) के मुँह से निकला है! हम, निश्चय ही, जैसा कि हमने कहा, यह आवश्यक नहीं कि डा. सुरेश अवस्थी के मत से इत्तिफ़ाक़ रखा ही जाए; लेकिन यह तो और भी अनावश्यक होगा कि आप उसे इसलिए नकारें कि वह एक पुरुष का अभिमत है! निश्चय ही हम यह मानते हैं कि हर व्यक्ति की अभिव्यक्तियों/प्रतिक्रियाओं की संरचना में उसके जेण्डर का कहीं न कहीं कुछ न कुछ हस्तक्शेप अवश्य होता है, लेकिन डिक्लास और डिकास्ट होने की तरह डिजेण्डर या कि जेण्डर न्यूट्रल होने की भी एक प्रक्रिया होती है जो डिक्लास और डिकास्ट होने की ही तरह बल्कि उससे थोड़ा ज़्यादा ही असुविधाकारी और दुरूह होती है. असम्भव होती है, ऐसा नहीं; यह बिल्कुल सम्भवनीय है, बशर्ते कि आपका मष्तिष्क अनुनादी और सूक्ष्मरन्ध्र उभयलिंगी मस्तिष्क जैसी पूर्ण विकासावस्था को प्राप्त हो चुका हो. ऐसा पूर्ण विकसित उभयलिंगी मस्तिष्क ही सृजनात्मक होता है. (वर्जीनिया वुल्फ). एकलिंगी मस्तिष्क; चाहे वह स्त्री का हो या पुरुष  का; लैंगिक विभाजन के आग्रहों से मुक्त नहीं हो सकता. अतः उक्त दोनों प्रतिक्रियाओं को हमें इसी उभयलिंगी मस्तिष्क के स्वभावानुसार ग्रहण करना होगा. खेद है कि चित्राजी ऐसा नहीं कर पातीं! ऐसा नहीं है कि वे ऐसा कर नहीं सकती थीं. बाक़ायदा वे ऐसा कर सकती थीं. अपनी कई कहानियों में उन्होंने अपने उभयलिंगी सृजनात्मक मस्तिष्क का उल्लेखनीय परिचय दिया है, जैसे कि ‘त्रिशंकु’, ‘पाली का आदमी’, ‘अपनी वापसी’ आदि; हालाँकि इन कहानियों में भी कुछ गहरी और ध्यानाकार्षी गड़बड़ियाँ हो गई हैं, जिन पर विचार आगे. ‘प्रेतयोनि’ पर डा. रश्मि के उक्त अभिमत के सामने वे विवश हैं क्योंकि दरअसल यह गड़बड़ कहानी में ख़ुद उनकी की हुई है.

पाठक विचार करें कि लोकापवाद क्या इस कहानी की अन्तर्वस्तु का अपना स्वाभाविक हिस्सा है? मेरी बात कुछ लोगों को अटपटी लग सकती है, पर कहानी की वस्तु को ज़रा ग़ौर से देखिए तो पता चलेगा कि लेखिका ने जानबूझकर कहानी में ट्विस्ट पैदा किया है. कहानी साफ़ दो विपरीत दिशाओं में एक साथ चलती दिखाई दे रही है. यह ज़रा तसल्ली से सोचने की बात है कि कुमारी अनिता गुप्ता की बहादुरी, संघर्शशीलता और संघर्शक्शमता, प्रत्युत्पन्नमति, आत्मविश्वास, आत्मबल, धैर्य, प्रतिरोध इत्यादि का मूलाधार, मूलस्रोत और उत्प्रेरणा क्या और कहाँ अवस्थित रही हैं? उसमें झाँसी की रानी और दुर्गा जैसी सक्शमताएँ कहाँ से आईं? कहीं और जाने की ज़रूरत नहीं है. ख़ुद कहानी बाक़ायदा इसका स्पश्ट ज़वाब देती दिख जाएगी. दरअसल यह उसका अपना परिवार ही था; विशेशतः उसके अम्मा-बाबूजी; सबसे ज़्यादा बाबूजी; जहाँ से यह ऊर्जा उसे मिली थी, मिलती थी. कहानी में एक नहीं अनेक जगह साफ़ इसके हवाले आए हैं. जैसे यह कि ‘‘कहां से संचित किया था आत्मबल अपने रोम-रोम में? बाबूजी से ही पाया था न?’’ (आदि-अनादि -3, पृ. 97). कहानी में इन बाबूजी के विशय में और जो कुछ कहा गया है, वह निहायत ही एक जेण्डर न्यूट्रल उभयलिंगी विकसित सृजनात्मक मस्तिष्क की उपस्थिति की सूचना देने वाला है कि बाबूजी स्त्री सम्बन्धी परम्परागत पितृसत्तावादी सोच से एकदम मुक्त हैं कि ‘‘बाबूजी ही कहते थे न-बेटियां ही मेरे बुढ़ापे की लकुटिया बनेंगी.  यही व्यक्ति है, जो अम्मा से हमेशा इस बात के लिए लड़ता-भिड़ता रहा कि मैं अपनी लड़कियों को कुछ दहेज में दूंगा तो सिर्फ शिक्षा. शिक्षा  ही उन्हें आत्मनिर्भर बनाएगी. अपनी ऊंच-नीच स्वयं निबटेंगी.’’ (वही, पृ. 96-97). शायद इसी मस्तिष्क से उपजा यह वाक्य भी था, जो अपनी बेटी के लौटने के समय उनके मुँह से फूटा था कि ‘‘भूल जा बेटी, जो कुछ तुझ पर बीती, सोच ले, दुःस्वप्न था. हमारे लिए यही बहुत है कि तू जीवित है…हमारी आंखों के सामने है. तू एक नहीं, दो-दो यमराजों को पछाड़कर आ रही है.’’ (वही, पृ. 99).

यह कहानी की एक दिशा थी.


कहानी की दूसरी दिशा वहाँ से शुरू होती है, जहाँ अख़बार में एक दिन पहले उसके साथ घटे वाक़ये की ख़बर ‘एक बहादुर लड़की की शौर्यगाथा’ बाॅक्स आइटम के रूप में उनके दृष्टि पथ  से गुज़रती है और लेखिका के सहयोग से एकदम बेतरह पलटी खाते हुए वे खाप पंचायतों के प्रवक्ताओं-प्रतिनिधियों के निम्नतम ग़लीज़ स्तर पर उतर आते हैं. इस ख़बर के बाद पूरे परिवार का जो पितृसत्तात्मक ध्रुवीकरण क़दम-दर-क़दम उभरकर सामने आता है, वह हैरतअंगेज़ है. इस ध्रुवीकरण को अपरिक्राम्य और सहज-स्वाभाविक बनाने के लिए कुछ मिर्च-मसाले भी डाले गए हैं, जैसे यह कि ‘‘नाड़ा?’’ ‘‘टूट गया? कैसे?’’ नाड़ा गठियाया हुआ नहीं था, फिर भी टूट गया; इसका मतलब? यानी कि कहीं कुछ ‘गड़बड़’/‘ग़लत’ ज़रूर हुआ! लड़की के कहने से क्या होता है कि ‘‘भागते-भागते…’’ ‘‘टूट गया’’ (वही, पृ. 102). और यह कि ‘‘हाथ आई को मर्द छोड़ता है कहीं?’’ (वही, पृ. 108). और यह भी कि ‘‘महीने को कितने दिन शेष  हैं?’’ (वही, पृ. 102). कोई लाख चाहे यह कहता रहे कि ‘‘हाथ आती तब न! तुमसे झूठ बोला है कभी?’’ (वही). और कहानी भी चाहे पाठकों को बराबर यह बताती रहे कि ‘‘अपने आत्मसंघर्ष  के बूते पर पाई मुक्ति’’ (वही, पृ. 93), ‘‘साहसी अनिता ने बड़ी बहादुरी से वहशी टैक्सी-चालक का सामना किया और किसी प्रकार उस दरिंदे के चंगुल से निकल भागने में सफल हुई.’’ (वही, पृ. 95), ‘अम्मा, तुम जिस आशंका से पीड़ित होकर यह प्रश्न पूछ रही हो, वैसा कुछ उस कामुक राक्षस  की पूरी कोशिश के बावजूद संभव नहीं हो पाया! मैं प्राणपण से लड़ी हूं…’ (वही, पृ. 102-03); आदि-आदि; पर लेखिका ने जो तय किया हुआ है, उसे उससे राई-रत्ती टस से मस नहीं होना है! आख़िर क्या तय किया हुआ है, लेखिका ने?
दरअसल यही कि उसे एक ऐसी कहानी लिख मारनी है जो लोकापवाद का सांघातिक यथार्थ उजागर कर सके. इस विनिश्चय में कोई बुराई नहीं थी. लोकापवाद एक भारी भावुकतावादी समस्या है. लेकिन इस कहानी में तो वह भी नहीं है. यहाँ दरअसल लोकापवाद नहीं, उसका ‘प्रेत’ है. यानी कि लोकापवाद नहीं, मात्र उसका आभास! आभासी लोकापवाद! सारी कहानी की ऊर्जा का कचूमर इस एक जानबूझकर लाए गए ‘लेखकीय’ वाक्य ने निकाल कर रख दिया; जो कि ख़ुद लेखिका भी जानती थी कि यह निर्मूल है-‘‘भोपाल से आ रही  अनिता गुप्ता  मथुरा के निकट शहर से दूर एक निर्जन स्थान पर कामुक टैक्सी-चालक की हवस का शिकार हुई.’’ (वही, पृ. 94). इसके अगले ही वाक्य में हालाँकि इसका स्पष्टीकरण है कि यह एक अर्धसत्य ही है. ‘हवस का शिकार हुई’ का वह अर्थ नहीं है, जो लिया जाता है. बलात्कार दरअसल हुआ ही नहीं. लेखिका बार-बार हमें याद दिलाती चलती है कि ध्यान रहे, बलात्कार हुआ नहीं! जब बलात्कार हुआ ही नहीं तो चिन्ता की बात क्या? इस कहानी की ‘तारीफ़’ यह है कि बलात्कार से ज़्यादा भयावह स्थितियाँ इसने पैदा कर दीं! क्यों आख़िर लेखिका को बार-बार यह साफ़ करना पड़ रहा कि बलात्कार नहीं हुआ? यदि हो जाता तो कहानी की संरचना में क्या फ़र्क पड़ जाता?
लेखिका का पहला दुराग्रह यह है कि बलात्कार नहीं हुआ और दूसरा दुराग्रह यह कि नहीं हुआ तो क्या हुआ, घर वाले तो मान रहे हैं कि हुआ! पाठक देखें कि माँ आख़िर उसे कौन-सा काढ़ा पिलाने पर आमादा है! ये सन्दर्भ ऊपर आ चुके हैं. माँ को लग गया है कि बेटी की माहवारी में शायद देरी हो गई है और यह भी कि क्यों? वह यह पक्के तौर पर मान कर चल रही है कि अब कुछ बचा नहीं है! इसीलिए वह कहती है-‘‘काढ़ा पी लेने से महीना किसी हालत में नहीं रुकेगा…’’ (वही, पृ. 108). यानी कि आभासी यथार्थ का ऐसा घटाटोप कि कथानायिका के साथ पाठक भी पनाह माँगने लगे! कहानी ख़ुद यहाँ अपने केन्द्रीय चरित्र के ख़िलाफ़ चली जाती है. डा. सुरेश अवस्थी ने शायद इसीलिए इस अविश्वास के मार्फ़त लेखिका के कहानी को चरमोत्कर्ष  की ओर ले जाने के लालच वाली बात उठाई थी. लेकिन डा. अवस्थाी शायद एक बात भूल गए. उन्हें दरअसल कहना चाहिए था कि कहानी को नहीं, कहानी में सायास आरोपित एक आभासी यथार्थ को चरमोत्कर्ष  की ओर ले जाने का लालच वस्तुतः लेखिका के मन में था!

एक तरह से कहा जाए तो दरअसल आभासी यथार्थ का चरमोत्कर्ष ही चित्रा मुद्गल की कहानी-कला का नाभि-केन्द्र है. उनकी कोई भी कहानी उठाकर देखी जाए; आभासी यथार्थ उसके केन्द्र में मिलेगा. आभासी यथार्थ अर्थात् यथार्थ का सम्भ्रम अर्थात् एक प्रकार का अयथार्थ यथार्थ अर्थात् भाववाद या भावुकतावाद; और थोड़ा आगे चलें तो, एक प्रकार का गढ़ा हुआ यथार्थ. यह गढ़ा हुआ यथार्थ उनकी अधिकांश कहानियों में अधिकांशतः देखा जा सकता है. चाहे वह उनकी प्रारम्भिक कहानी हो या परवर्ती. जिन्हें वे अपनी ‘बहुचर्चित’ कहानियाँ मानती हैं, वे दरअसल इसी गढ़े हुए यथार्थ से आक्रान्त कहानियाँ हैं. चाहे वह ‘अपनी वापसी’ हो या ‘भूख’ हो या ‘लकड़बग्घा’ हो या ‘मामला आगे बढ़ेगा अभी’ हो. ये सब की सब कहानियाँ अन्दर ही अन्दर कुछ ऐसी दरारों से भरी पड़ी हैं कि मन यक़ायक़ झुँझला उठता है कि आख़िर इतनी-सी बात लेखिका के दिमाग़ में आने से कैसे रह गई! जैसे कि ‘भूख’ कहानी को ही लिया जाए तो कहानी ख़त्म करने के बाद सबसे पहली बात दिमाग़ में यही आती है कि क्या कहानी इसी तरह गढ़ी जाती है! भूख में निहित ‘यातना, अमानवीयकरण, शोषणजन्य हत्या’ इत्यादि (चर्चित कहानियाँ, पृ. 07) से हमें कोई ऐतराज़ नहीं है. हम तो सिर्फ़ यह जानना चाहते थे कि इस कहानी की लक्ष्मा आख़िर कैसी माँ रही कि शाम से सुबह तक छोटू उसके पास होता था फिर भी वह उसकी यह असलियत नहीं समझ पाई कि दिन भर खाने को उसे कुछ नहीं मिला है, वह निपट भूखा है! क्या यह माना जा सकता है कि छोटू जितने छोटे बच्चे की भूख का पता ही न चले? यह अज़ीब है कि कांबले तायी को तो यह पता है कि भीख माँगने के लिए इस तरह किराए पर लिए बच्चों की क्या नियति होती है कि-‘‘वो छिनाल बच्चे का पेट भरती तो बच्चा आराम से गोदी में सोता, पिच्छू उसको भीक कौन देता? अरे वो बच्चे को फकत भुक्काच नईं रक्खते, रोता नईं तो चिकोटी काट-काट के रुलाते कि लोगों का दिल पिघलना…’’ (वही, पृ. 48-49) पर लक्ष्मा लगातार इसी मुग़लते में है कि ‘‘वो तो बोलती होती कि वो उसको दूध देती…बिस्किट खिलाती…’’ (वही, पृ. 48). लक्ष्मा का यह ‘भोलापन’ कितना विश्वसनीय है, पाठक ख़ुद इस पर विचार करें. हम तो सिर्फ़ इतना कहना चाहते हैं कि इतने छोटे बच्चे में रात भर में भूख का कोई लक्षण  न दिखे, यह क़तई एक अनहोनी और मनगढ़न्त बात है. क्या यक़ायक़ ऐसा हो सकता है कि रातों-रात किसी बच्चे की आँतें सूखकर चिपक जाएँ! बड़े से बड़ा रोग भी सांघातिक होने के पहले अपने कुछ लक्षण दिखाता है. जो हो.

यह सचमुच आश्चर्यजनक है कि लक्ष्मा को अपने छोटे-से बच्चे की इस स्थिति की क़तई भनक तक नहीं लगी! कहानी में सिर्फ़ इतना उल्लेख है कि ‘‘इधर छोटू बोत चीं-चीं करने लगा है.’’ (वही, पृ. 46). लेकिन लक्ष्मा इसे उसकी नखरेबाज़ी से अधिक कुछ नहीं समझती-‘‘उसे लगता है कि दिनभर जग्गूबाई की गोदी चढ़े रहने और घर से बाहर रहने के कारण छोटू को घुमक्कड़ी की बुरी लत हो गई. यही वजह है कि घर में घुसते ही वह लगातार मिमियाता रहता है और चाहता है कि कोइ-न-कोई उसे गोदी में उठाए ही रहे.’’ (वही). इसीलिए जब यह सुनकर कि बच्चा भूख से मर गया, उसकी आँतें सूखकर चिपक गईं; उसके गले से ‘आरी-सी काटती एक करुण चीख फूट पड़ी’ (वही, पृ. 48) तो एकाएक विश्वास नहीं हो पाता कि यह सचमुच एक माँ की चीख है! पता नहीं, कृष्णदत पालीवाल सचमुच में ही इससे भीतर तक हिल गए थे (द्रष्टव्य वही, पृ. 07) या शायद उन्हें भी लगा कि नहीं हिलेंगे तो उन्हें सहृदय पाठक कौन मानेगा! निश्चय ही भीतर तक तो मैं भी हिला, लेकिन इसलिए नहीं कि लक्ष्मा के दुःख, उसके तड़पते ममत्व से मुझे कोई सहानुभूति थी. दरअसल कहानी की अन्तर्वस्तु ममत्व है ही नहीं. भूख भी एक सीमा तक ही कहानी की वस्तु बनी रहती है. उससे आगे वह भी चुक जाती है. तो फिर इस कहानी की असल अन्तर्वस्तु क्या है?


मेरी दृष्टि  में इस कहानी की अन्तर्वस्तु दरअसल निम्न/सर्वहारा वर्ग का वह शर्मनाक यथार्थ है, जिसमें एक माँ अपने बच्चों को पालने के लिए अपने दुधमुँहे बच्चे को भिखमंगी औरतों को किराए पर उठाने को विवश है. लेकिन यथार्थ का यह सिर्फ़ एक व पूर्ववर्ती पहलू है. इस यथार्थ का दूसरा व उत्तरवर्ती पहलू यह है कि यह यथार्थ नहीं यथार्थवाद है और हर्गिज़ इसके चंगुल में फँसने की ज़रूरत नहीं है! यथार्थ वास्तविकता तो यह है कि भिखारिनों को भीख माँगने के लिए अपने दुधमुँहे बच्चे को किराए पर दे देना लोगों के लिए अब एक धन्धा बन चुका है. यहाँ भावुकता, रिश्तों की संवेदना इत्यादि का कोई स्थान नहीं, यह शुद्ध एक ‘धन्धा’ है. देशभर में बाक़ायदा इसका पूरा जाल बिछा है. कहानी में भी एक जगह इसे धन्धा ही कहा गया है.लक्ष्मा के मँझले बेटे किस्तू से एक जगह कहलवाया गया है,-‘‘छोटू धन्धे पर से नहीं आया? आएगा तो पिच्छू भाकरी देगी?’’ (वही, पृ. 46). गड़बड़ दरअसल यह हुई है कि लेखिका ने अपना सारा ध्यान  इस यथार्थ के पहले पक्ष  पर केन्द्रित कर दिया जो कि इस यथार्थ का सिर्फ़ एक भाववादी पहलू है. एक माँ की पीड़ा को नज़रन्दाज़ करना हमारा मक़सद नहीं है. ऐसी हिमाक़त कोई भला कर भी कैसे सकता है! लेकिन कोई भला क्या इस जघन्य वास्तविकता से भी आँख चुरा सकने की हिमाक़त कर सकता है कि अपने दुधमुँहे बच्चों को भिखमंगी औरतों को किराए पर दे देने का चलन अब एक व्यवस्थित व्यवसाय बन गया है? मेरा विनम्र ख्याल है कि चित्राजी यदि इस बिन्दु की संकेन्द्रीयता से इस कहानी को उठातीं तो कहानी कहीं ज़्यादा मौज़ूँ और ठोस यथार्थपरक हो आती. इस वस्तु को इस कोण से यदि विकसित और निरूपित किया जाता, समझा जाता तो शायद और ज़्यादा गहरी कारुणिक आरी-सी काटती चीख ख़ुद पाठक को अपने अन्दर से फूट पड़ती सुनाई पड़ती जो उसके कलेजे को चीर कर रख देती. फ़िलहाल तो यह कहानी कथित ममत्व के इकतरफ़ा भाववाद में सिमटकर रह गई है.

इसी तरह का एक इकतरफ़ापन उनकी ‘मामला आगे बढ़ेगा अभी’ कहानी में भी दिखाई देता है बल्कि कुछ डिग्री ज़्यादा ही जहाँ, एक सर्वहारा किशोर अपनी मालकिन के आभासी मातृत्व के फेर में लगभग पागलपन की स्थिति में पहुँच रहा है. इस कहानी के बारे में कहा जा सकता है कि यह एक ‘पीड़ित ममत्व’ की कहानी है. पीड़ित ममत्व किसका? तय है कि मोट्या का! आख़िर क्यों? यह मेम साहब की तरफ़ से क्यों नहीं? मोट्या की तरफ़ से ही क्यों? मोट्या की तरफ़ से इसलिए कि वह बेचारा मातृत्व-विहीन अभागा अनाथ ‘बच्चा’ है और अपनी ज़िन्दगी में पहली बार जो वह एक अधेड़ औरत के सम्पर्क में आया तो फिर जैसे न केवल उसकी नौकरी बल्कि उसकी अब तक की कमी माँ की ज़रूरत भी उससे पूरी होती दिखी. लिहाज़ा वह अपनी मेमसा’ब माँ को साधिकार अपना दिल दे बैठा. उसका दिमाग़ ठनका तब जब बीमारी के कारण ड्यूटी में हुए नागा के चलते उसकी पगार में कटौती कर ली गई, ‘खाड़ा’ काटा गया और मेमसा’ब ने उसे कटने दिया. न केवल इतना बल्कि यह भी कि सा’ब ने खाड़ा के वास्ते झगड़ने पर मोट्या को ‘‘झापड़ चढ़ा के दफा हो जाने को बोला’’ (वही, पृ. 123) और इसके साथ ‘‘धक्का मारके घर से बाहर कर दिया…’’ (वही). मोट्या को दरअसल यह पीड़ा नहीं है कि सा’ब ने उसके साथ ऐसी क्रूरता बरती, बल्कि उसकी असल पीड़ा इस पूरे मामले में मेमसा’ब की लगातार चुप्पी को लेकर है. मेमसा’ब के इस अप्रत्याशित/संदिग्ध व्यवहार से उसे असल चोट पहुँची है. वह न केवल तावड़े के सामने यह सब साफ़-साफ़ बयान कर देता है (द्रश्टव्य, वही) बल्कि ख़ुद मेमसा’ब के सामने तक यह उलाहना देने से नहीं चूकता कि ‘‘तुमने खाड़ा कटवा दिया न मेमसा’ब…अपने सामने चांटा मारने कू दिया न!…मैं…मैं…’’ (वही, पृ. 125). सा’ब ने क्रूरता बरती और मेमसा’ब का उसे मूक समर्थन मिला; लिहाज़ा अब मोट्या के पास इसके अलावा और क्या रास्ता है कि वह इस ‘अपनी’ पर उतर आए और उन सबको बता दे कि वह क्या चीज है!

इस पूरे वाक़ये को पढ़-सुनकर क्या किसी को कहीं लग सकता है कि यह वर्गचेतना से जुड़ा मामला है? मोट्या के निम्न और सक्सेना सा’ब-मेमसा’ब के उच्च वर्ग से जुड़े होने मात्र से तो यह कहानी वर्गचेतना का प्रतिपादन करने वाली कहानी हो नहीं जाएगी. वर्गदृष्टि का प्रतिनिधित्व तो यहाँ चौकीदार तावड़े कर रहा है जो बार-बार मोट्या को अपने भले-बुरे का ज्ञान कराता रहता है.

बात दरअसल अपने भले-बुरे के ज्ञान की यहाँ नहीं है. बात यह है कि मोट्या का मामला आगे कहाँ तक बढ़ेगा और कुछ बढ़ेगा भी या नहीं? लेकिन इससे पहले तो यही तय करना पड़ेगा कि मोट्या का मामला आख़िर है क्या? ऊपर हमने अपनी समझ से इस कहानी के बारे में जो कयास लगाया है, उसके हिसाब से तो मोट्या का मामला विशुद्ध रूप से एक भावनात्मक विक्षोभ  का मामला है. हिन्दी की मसाला फ़िल्मों में ऐसे भावनात्मक दृश्य आए दिन आपको देखने को मिल जाएँगे जहाँ अमीर माँ अपने नौकर को अपने बेटे जैसा समझती देखी जाती है या इसके उलट भी कि किसी ग़रीब माँ के चरणों में किसी अमीरज़ादे होनहार को ज़न्नत के दर्शन होते दिखाई देने लगते हैं. क्या सचमुच इस भावुकतावाद का कोई भविष्य होता है? क्या चित्राजी मोट्या के आक्रोश को वर्गीय आक्रोश के बतौर पेश करना चाह रही थीं? यदि ऐसा है तो हिन्दी फ़िल्मों में अमिताभ बच्चन की सारी एंग्री-यंगमैन की भूमिकाएँ तथा और भी बहुत सारे टपोरी टाइप कैरेक्टर सर्वहारा के वर्गीय आक्रोश की प्रतिमूर्ति हो उठेंगे. फिर भला क्रान्ति आने और सक्सेना सा’ब जैसे जनविरोधी लोगों और मेमसा’ब जैसी गद्दारों की अक़्ल ठिकाने आने में क्या देर लगनी! हम मानते हैं कि मोट्या के दिल को गहरी ठेस लगी है और वह चुप बैठने वाला नहीं है. चाहे इकतरफ़ा ही सही, भावुकता का कुछ न कुछ असर तो आदमी पर पड़ता ही है. तो आगे क्या करेगा मोट्या? उसका आक्रोश किस रूप में विस्फोट करेगा आगे? जो हो, जैसा भी हो, मेरा यह दृढ़ मत है कि वह नितान्त वैयक्तिक और निजी, कुछ हद तक शायद षड्यन्त्रमूलक भी; होगा. इसके अलावा कुछ नहीं. कम से कम उसका कोई वर्गीय-जैसा चरित्र तो नहीं ही होगा. पता नहीं, मोट्या में कौन-सी वर्गीय सम्भावना लोगों को दिखाई देती है?

मेरा मानना है कि जैसा कि ऊपर उनके एक संग्रह की भूमिका के एक अंश के मार्फ़त मैंने संकेत किया; चित्राजी बहुत सारी चीजों को एक साथ समेटकर चलने की कोशिश करती हैं. इन बहुत सारी चीजों में कुछ एक-दूसरे की धुर विरोधी और कुचालक भी होती हैं. दुर्भाग्यवश वे इनकी छँटनी करना भूल जाती हैं या कई बार ऐसा भी होता है कि जानते-बूझते उन्हें वे अपने साथ लगाए-लगाए फिरती हैं कि शायद इनके बिना वे सत्ता-विहीन हो जाएँगी! सत्ता और विमर्श के बीच के अन्तर्सम्बन्धों की रवायत को ध्यान में रखते हुए आज चित्रा मुद्गल ही नहीं, और भी कई रचनाकारों की रचनाओं का पुनराकलन करने का वक़्त आ गया है.

दलित स्त्रीवाद , मेरा कमराजाति के प्रश्न पर कबीर

अमेजन पर ऑनलाइन महिषासुर,बहुजन साहित्य,पेरियार के प्रतिनिधि विचार और चिंतन के जनसरोकार सहित अन्य सभी  किताबें  उपलब्ध हैं.

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दलित स्त्रीवाद किताब ‘द मार्जिनलाइज्ड’ से खरीदने पर विद्यार्थियों के लिए 200 रूपये में उपलब्ध कराई जायेगी.विद्यार्थियों को अपने शिक्षण संस्थान के आईकार्ड की कॉपी आर्डर के साथ उपलब्ध करानी होगी. अन्य किताबें भी ‘द मार्जिनलाइज्ड’ से संपर्क कर खरीदी जा सकती हैं. 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com  

बिना इजाज़त अन्दर आना मना है

अर्चना वर्मा

प्रसिद्ध कथाकार और स्त्रीवादी विचारक हैं. संपर्क: mamushu46@gmail.com 

वर्जीनिया वुल्फ की किताब  ‘ A Room of One’s Own’ का प्रकाशन 1929 में हुआ था, उसका केन्द्रीय स्वर है कि एक स्त्री का अपने लेखन के लिए अपना कमरा होना चाहिए, अपने निजी को सुरक्षित रखने के लिए भी अपना कमरा, इसके लिए उसकी आर्थिक स्वतंत्रता जरूरी है. 

आयताकार. तीन दीवारो पर किताबों के शेल्फ़. चौथी दीवार में एक खिड़की और दीवार के सहारे एक दीवान. खिड़की के बाहर कोहरा, घना, सफ़ेद, ठोस, अपारदर्शी अपारदर्शी. खिड़की पर शीशा न होता तो जंगले का लिहाज़ किये बिना कमरे मेँ घुसा चला आ रहा होता. इससे ज़्यादा तो घने अंधेरे में भी सूझ जाता है. कम से कम आभास तो होता है, कोने में ज़्यादा घने होते अँधेरे से किसी परछाईं का, किसी और वजूद का. सफ़ेद मुझे इतना प्रिय होने के बावजूद पता नहीं क्यों इस वक्त ऐसा लग रहा है कि सफ़ेद को नाहक महिमा-मण्डित किया जाता है. भोला, पवित्र, निष्पाप वगैरह. लेकिन अन्धकार भी होता है वह. सफ़ेद होने के बावजूद. बीच दिसम्बर की एक सुन्न शाम. इस एक इकलौती, कोहरे से ढकी खिड़की वाले सन्नाटे कमरे मेँ लगता है इस क्षण जैसे कुल इतनी ही दुनिया है, इसके बाहर सारे ब्रह्माण्ड में कहीँ कुछ और है ही नहीं, कोई जीव-जन्तु – चरिन्दा, परिन्दा या दरिन्दा – कोई बस्ती, कोई आवाज़ कहीं कुछ भी नहीं.खिड़की से लौट कर मैँ कमरे में देखती हूँ.


यह सृजन का एकान्त है. कमरे, दीवार और खिड़की में उसका बिम्ब मैं रचती हूँ लेकिन दीवारों में वह समाता नहीं है, वह मेरे अस्तित्व के भीतर कहीं पैठता, मेरे दिमाग के रगो-रेशे में भिनता, मेरे साथ साथ होता है, हर कहीं. और अक्सर तो जहाँ मैं नहीं होती हूँ वहाँ भी –

” बार बार लौट आने के लिये / यही एक द्वार / मेरी प्रतीक्षा में रहता है/
परिचित हर कील, हर निशान, हर दीवार / चक्करदार सीढ़ियाँ और कोनों में / गाढा होता हुअ अन्धकार
यहाँ नहीं है उधार की रोशनी और माँगा हुआ संगीत.
खिड़की पर एक परदा है रेशमी / हवा से हिल जाता है / सबकुछ उसके बाहर है – /कोई आहट, कोई आघात, कोई आसमान / बिना इजाज़त अन्दर आना मना है.
उस पार दुनिया बहुत छोटी रह जाती है / यहाँ सिर्फ़ अपने झुलसने का प्रकाश है / बीमार ज़मीन और बौना आसमान / ढो नहीं पाते उसका ताप / कृपा करुणा दान – मुझे कुछ भी नहीं स्वीकार / चाहे उसे प्यार कहो या बन्धुता /अन्दर आने की इजाज़त नहीं है.
सिर्फ़ एक परदा है, रेशमी / हवा उसे हिला सकती है / और मैं यह फ़ासला तय करने से /इंकार कर देती हूँ.
बार बार लौटकर आने के लिये वही द्वार / कभी रक्षा के लिये गढ़ है, कभी कारागार.”

आज मेरे पास यह कमरा है. सचमुच का मेरा अपना कमरा. अपना साम्राज्य. यहाँ किसी का कोई दखल, कोई घुसपैठ, कोई हस्तक्षेप नहीं. कहीं कोई ऐसा आभास तक नहीं. स्वच्छन्दता का यह शब्दातीत अनुभव, स्वयं अपना मोल ; अनमोल. मेरे सृजन का एकान्त. नहीं,यह संसार से विमुखता का पर्याय नहीं है, सामाजिकता से त्रुटित एकान्त नहीं है, किसी दूसरे वजूद की असहनीयता नहीं है. लेकिन इस क्षण यह, बस, ऐसा ही है. सुन्न, निश्चील, शब्दातीत. अचेतन की तलहटी को मथ कर उठती हलचल से फूटते शब्दों और उनकी बुनावट के तन्तुओं के जाल के फैलने की प्रतीक्षा का मौन एकान्त. यह कोई हस्तक्षेप बर्दाश्त नहीं करता.

मजीद भाई की ज़िद है कि मुझसे मेरे कमरे के बारे में लिखवाये बिना अपनी किताब को छपायेंगे ही नहीं और मैँ हूँ कि अब तो कई बरस हुए, टालती ही जा रही हूँ. नहीं, मुझे न लिखने की कोई ज़िद नहीं. बस ठीक ठीक पकड़ नहीं पा रही हूँ कि मेरे इस कमरे के बारे में ऐसा क्या है जो लिखने लायक हो. क्या लिखा जा सकता है कमरे के बारे में? मजीद भाई के स्तम्भ मेँ शामिल सभी भागीदार चूँकि लेखक हैँ इसलिये नतीजा निकाला जा सकता है कि मेरे कमरे का मतलब लिखने का कमरा है. लेकिन ऐसा मैने अब तक लिखा ही क्या है; और जो कुछ भी लिखा है वह इतना थोड़ा और कभी कभार; कि बावजूद लिखने की मेज़ और किताबों की अलमारियों के, मैँ खुद को लेखक और अपने बैठने की इस जगह को खींच-तान कर भी लेखक के कमरे की तरह परिभाषित करना एक तरह की ज़्यादती या मज़ाक ही पा रही हूँ.


तो समझिये कि यह कुल मिलाकर एक स्त्री का कमरा है जिसे पढ़ने, सोचने, समझने और कभी कभार कुछ लिख लेने का भी मुगालता है. और यही फ़िलहाल इस कमरे की आबादी और उसके संसार को निश्चि त, निर्धारित और परिभाषित करने वाला तथ्य है. इस आबादी का कुछ प्रतिशत पुरुषों का भी है लेकिन फ़िलहाल बात एक स्त्री की, और उसके कमरे की है. यह स्त्री कभी कभार की लेखिका और यह कमरा उसके लिखने की जगह है इसलिये फ़ोकस फ़िलहाल स्त्री पर ही है. इस स्त्री ने तकरीबन पचास साल पहले एक किताब पढ़ी थी, जो पचासी साल पहले लिखी गयी थी – ‘ए रूम ऑफ़ वन्स ओन’. वह साहित्य-जगत का, खास तौर से स्त्री-साहित्य-जगत का मौलिक ‘मेरा कमरा’ था.

हमको भले लगता हो, एक खास उम्र में तो ज़रूर, कि मानो हम ही पहले-पहल नमूदार हुए हैँ इस अहसास से गुजरने वाले. जैसे नया शिशु देखता है नयी नकोर आँखों से, पहली बारिश. पेड़ में फूटने वाली हर नयी कोंपल को लगता है, धरती पर यह पहला वसन्त है. फिर बीतते हुए बरसों में धीरे धीरे पहचाना जाता हैँ, “हमसे पहले भी बर्दाश्तस की हद थी”. सन 1929 में छपी इस किताब मेँ वर्जीनिया वुल्फ़ ने तय पाया था कि लेखिका बनने की इच्छुक हर स्त्री के लिये ज़रूरी है कि उसके पास अपना पैसा और अपना एक कमरा हो. आमदनी का अपना एक जरिया और बिल्कुल अपनी एक जगह. यह आज़ादी की नींव है. आत्मनिर्भरता जिससे स्त्री वंचित थी. वह पहले विश्व.युद्ध के बाद का संसार था. जब वर्जीनिया वुल्फ़ ने सवाल पूछा था कि इंगलैण्ड में सर्जनात्मकता के चरम शिखर – एलिज़ाबेथ के शासन काल- में सारे के सारे एक से बढ़ कर एक रचनाकार केवल पुरुष ही क्यों हैं, कहीं भूले से भी एक स्त्री का नाम क्यों दर्ज नहीं है? और जवाब में पाया था कि औरत हमेशा वंचित और हीन रखी गयी है, अपने अस्तित्व के लिये दूसरों पर निर्भर रखी गयी है, निर्धन रखी गयी है. निर्धनता का दारुण असर दिल और दिमाग पर पड़ता है. वह सृजन की क्षमता को या तो पनपने ही नहीं देता या छीन लेता है.

आज मेरे पास यह अपना कमरा है और मैँ कोई अपवाद नहीं हूँ. मेरी पीढ़ी में मेरे जैसियों की गिनती भले कुछ कम रही हो लेकिन आज की पीढ़ी में बहुत हैं. पचासी साल बाद हालात बदले हैँ. सारी दुनिया में बदले हैँ. कहीं काफ़ी कुछ. कहीं थोड़ा बहुत. हिन्दुस्तान मेँ भी बदले हैँ.

हालाँकि यह टिप्पणी दुनिया में औरत के बदलते हालात पर तफ़सरा नहीं है लेकिन फिर भी लोभ बहुत है ये सूचनाएँ शामिल कर लेने का जिन्हें मैँ मौका मिलते ही, बल्कि अक्सर तो मौका निकाल कर भी अपने आलेखों में घसीट लाती हूँ. कि आज भी पूरी दुनिया मैँ नितान्त निर्धनता मेँ रहने वाले लोगों की संख्या कुल मिलाकर 1.3 बिलियन है. इनमेँ 70% स्त्रियों का है. यही नहीं, पूरी दुनिया में जो 774 मिलियन वयस्क पढ़ लिख नहीं सकते उनका दो तिहाई औरतों का है. विकासशील दुनिया और तीसरी दुनिया मेँ इज्ज़त के लिये औरत की हत्या आज भी एक सम्मानित प्रथा है. आज भी कानून के बावजूद स्त्री प्रायः शिक्षा और स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार से वंचित रखी जाती है. भारत मेँ किशोर वय की लड़कियों को “अस्थायी जन” कहा गया है जो एक बार ब्याह दिये जाने के बाद कम से कम अपने पिता के लिये अपना अस्तित्व खो बैठेंगी (“Temporary people who would cease to exist at least by their fathers once they are married”) क्योंकि यहाँ लड़की के विवाह का अर्थ अब भी बड़े पैमाने पर अपने मातृकुल की सदस्यता से वंचित और अस्तित्वहीन हो जाना है. घरेलू हिंसा तथा अपनी स्वतंत्रता पर अन्य सांस्कृतिक और और नैतिक प्रतिबन्ध स्वयं स्त्रियों को भी स्वीकृत हैं – कहीं स्वेच्छा से, कहीं मज़बूरी से.

ये सभी सूचनाएँ यहाँ CARE (Cooperative for Assistance and Relief Everywhere) नामक अन्तर्राष्ट्रीय संस्था की प्रोजेक्ट रिपोर्टों ( 2008–13) से संकलित की गयी हैँ.

इन सूचनाओं को संकलित करने के लिये ललचाते और इन्हें इस आलेख में शामिल करते हुए मुझे अहसास था कि यह टिप्पणी दुनिया की या हिन्दुस्तान की औरतों के हालात पर नहीं, मेरे कमरे बारे में है लेकिन इन्हें यहाँ दर्ज कर चुकने के बाद मैं महसूस कर रही हूँ कि यह विषयान्तर नहीं. कि मेरा कमरा वहाँ तक फैला है जहाँ मैँ खुद मौजूद रहती हूँ और वहाँ तक भी जहाँ मैँ नहीं भी रहती हूँ. इसका विस्तार सृजन के वायवीय, अतीन्द्रिय एकान्त से लेकर स्मृति के उस माँसल, ऐन्द्रिक संसार तक फैला है जो ज़्यादातर वक्त विस्मृति में बिलाया रहता है, लगभग गायब रहता हुआ भी अचेतन में मौजूद, मेरे समूचे अस्तित्व का अदृश्यह “आयतन”.

पैतालीस साल के अध्यापकीय जीवन में इस कमरे के बाशिन्दों में  जो शामिल होती गयी हैं वे पता नहीं किस कोने अँतरे से उठकर गाहे-बगाहे सामने आ खड़ी होती हैं. वह जिसकी पढ़ाई हर साल छुड़ा दी जाने की आशंका की सूली पर चढ़ी रहती थी ; वह जो फ़ाइनल-इयर के इम्तहान के ऐन पहले ब्याह दी गयी थी, पहले दूसरे साल में प्रथम श्रेणी लाई थी तो क्या, अब तो किताब को हाथ लगाने भर से मारी पीटी जाती है ; वह जिसे बाज़ार से आये सामान के लिफ़ाफे या पुड़िया के अखबारी काग़ज़ से पढ़ने की ललक मिटाने के लिये सबकी नज़र बचाकर बाथरूम में या छत पर छिपना पड़ता है – उन्हें सचमुच के कमरे की तो कौन कहे, अपने भीतर के एकान्त की भी तलाश का मौका मिला ही नहीं; वह भी जो ज़िद ठान कर तरह तरह की बाधाएँ पार कर भी गयी, लेकिन एक दिन किसी पत्रिका या पुस्तक पर उसके छपे हुए नाम और तस्वीर या किसी प्रशंसक के पत्र ने उसके हिस्से में घर और दाम्पत्त्य की एक नयी कहानी शुरु कर दी. वह भी जिसके पास नौकरी भी है और आमदनी का अपना एक जरिया भी लेकिन सारी योग्यताओं और संभावनाओं के बावजूद अपना कमरा यानी अपने वजूद के लिये जगह फिर भी नहीं. वह झेलती है पति के घायल अहं के साथ टकराव या फिर तनाव की परतों में लपेटी हुई कही-अनकही अपेक्षाओं का दबाव कि दाल छौंकने और बटन लगाने जैसे ज़्यादा ज़रूरी काम सँभाले जायें और हथियार (कलम, कॉपी, किताब?) डाल देती है. उसके हिस्से की नौकरी घर की आमदनी बढ़ाने का जरिया भर है, अपनी योग्यता की अभिव्यक्ति का सामान नहीं.

मैँ यहाँ स्त्री की व्यथा-वेदना के अपरम्पार सागर की थाह लेने नहीं बैठी. मानती हूँ कि जिसका उपचार सम्भव न हो वह रोग नहीं, जीवन कहलाता है. तो अपने कमरे के इन बाशिन्दों में मैँ सिर्फ़ उन्हीं की गिनती कर रही हूँ जिनके भीतर खुद अपना एक कमरा पाने की गुंजाइश थी लेकिन पूरी होने से रह गयी, और उनकी भी जो उसे पा लेने के आस-पास तक जा पहुँचने के बावजूद इन बाधाओं को कवच बनाकर अपने आपे का आमना-सामना करने से कतराती रह गयी.

भीतर की घुटन और असन्तोष के नतीजे में  खीझ और चिड़चिड़ाहट के स्थायी नशे में खौलती उबलती इस नायिका को मैं चाहे जो सुझाव दूँ, चाहे जो उपाय बताऊँ, उसके पास हर एक का तोड़ मौजूद होगा जिसकी वजह से वैसा किया नहीं जा सकता. लेकिन असल में इन मज़बूरियों और उनकी चिड़चिड़ाहट के बिना जिया भी नहीं जा सकता क्योंकि उसी मेँ उसकी अपनी अपरीक्षित विशिष्टता का अहसास भी छिपा है. परीक्षा का खतरा वह नहीं उठाती. अभी तो उसके पास बिना लड़े ही एक संघर्ष का अहसास है, असहनीय दुख की शक्ल मेँ एक सुख (?) जिसे वह जीवन-विधि की तरह अपनाती है. उनकी भी गिनती कोई कम नहीं जो मानसिक असन्तुलन के कगार पर आखिरी हद पार कर जाने से जैसे तैसे बची रह कर एक लम्बी लगातार आत्महत्या की अनवरत अवधि को जीवन की तरह जिये जाती हैँ. जो दाम्पत्त्य, मातृत्व और परिवार में ‘स्वयं’ को पूरा विलीन नही कर पाती, अपनी इच्छा, अपने वजूद के लिये लिये थोड़ा सा भी निजी अर्थ, निजी पहचान चाहती है उसकी कहानी के भी अन्य अनेक-आदि- इत्यादि संस्करण होंगे. वे भी मौजूद हैं इसी कमरे के किसी कोने में. एक दिन उठकर सामने आ खड़े होने और अपनी सुनाने की प्रतीक्षा में लेकिन उतना अथाह धीरज, उतनी ताकत, उतनी हिम्मत, उतनी सहानुभूति मैँ कभी जुटा पाउँगी या नहीं, कहना कठिन है. जिसने खुद ही अपने-आपे से इंकार कर दिया है उसकी पीड़ा की थाह लायक अथाह धीरज दूसरे किसीके पास कहाँ हो सकता है? लेकिन इसके बावजूद मेरे कमरे मेँ वे मौजूद हैं. क्यों?



क्योंकि इस बात पर मेरा बस नहीं कि कमरे में किसे दाखिला दूँ और किसे प्रवेश-निषेध की तख्ती दिखा दूँ, ‘बिना इजाज़त अन्दर आना मना है’ की घोषणा के बावजूद! इस उधेड़बुन में ज़रूर कुछ वक्त शायद व्यर्थ खर्च कर सकती हूँ कि क्या-क्या कैसे और क्यों इस कमरे में दाखिल होता और यहीं बसा रह जाता है. प्रवेश निषेध की यह तख्ती चारदीवारी वाले उस ठिकाने पर लगायी जा सकती है केवल, जो तीन तरफ़ किताबों के शेल्फ़ और एक तरफ़ खिड़की भर कोहरे और दीवान से बना है. भीतर से सिटकनी लगा ली जाये या बाहर से ताला डाल दिया जाय, भले ही गाहे-बगाहे दरवाजे का खटखटाया और भीतर के एकान्त क्रिया-कलाप का छन्द-भंग होना या उसे पूरी तरह से छिन्न-भिन्न किया जाना अपवाद की बजाय नियम की तरह ज़रूरी होता हो. एकान्त की यह चारदीवारी इसी दैनन्दिन दुनिया मेँ मौजूद है और उसकी अपनी दिनचर्या, अपनी मजबूरियाँ हैं. उधार के शब्दों में कहूँ तो “एक ढर्रा रोज़मर्रा,” या “जीवन की आपाधापी,” के हमले.

लेकिन इस चारदीवारी में न समाने वाला, हर जगह मेरे साथ चला आने वाला और वहाँ तक भी फैल जाने वाला यह भीतर का कमरा मेरे बावजूद मुझसे अलग एक दुनिया है, सम्प्रभु और स्वायत्त. 1929 के उस मौलिक कमरे की मालकिन वर्जीनिया वुल्फ़ ने कहा था, “ तुम चाहे दुनिया भर के पुस्तकालयों पर ताले डाल दो… “कोई किवाड़, कोई ताला, कोई सिटकनी नहीं जिसे तुम मेरे दिमाग़ की आ़ज़ादी पर लगा सको.”


उस वक्त उसकी दुनिया में पुस्तकालयों पर ताले थे और उसे अपने लिये एक कमरे की तलाश थी. आज मैँ नहीं जानती यह मेरे दिमाग की आजादी है या उस आजादी के सामने खुद मेरी बेबसी. अब कहीं कोई रोक नहीं. अब पूरी दुनिया इसके भीतर है, न कोई निषेध, न कोई वर्जना. रास्ते, चौराहे, पेड़, पहाड़ पंछी, पोखर से लेकर अदब-कायदा, मर्यादा, अमर्यादा, बर्दाश्तत, नाबर्दाश्‍‍त, उन्माद, आक्रोश, ध्वंस, प्यार, सृजन, ईश्वर, मृत्यु और विस्फोट.

यह एक औरत का कमरा है जिसे पढ़ने, सोचने, समझने और कभी -कभी कुछ लिख लेने का मुगालता है.

मजिद अहमद के द्वारा संपादित मेरा कमरा किताब में राजेन्द्र यादव, कन्हैया लाल नन्दन, कृष्णा सोबती, नामवर सिंह, मृदुला गर्ग, चित्रा मुद्गल, सुधा अरोड़ा सहित कई लेखिकाओं और लेखकों के आलेख शामिल हैं. यह किताब लिंक पर क्लिक कर अमेजन ऑनलाइन से खरीदी जा सकती है.

स्त्रीकाल का प्रकाशन (प्रिंट) और संचालन (ऑनलाइन) ‘द मार्जिनलाइज्ड’ सामाजिक संस्था के तहत होता है. इसके प्रकाशन विभाग के द्वारा स्त्री-दलित-बहुजन मुद्दों और विमर्शों की किताबें प्रकाशित हो रही हैं. प्रकाशन की सारी किताबें अमेजन और फ्लिपकार्ट से खरीदी जा सकती हैं. अमेज़न से खरीदने के लिए लिंक पर क्लिक करें. 

दलित स्त्रीवाद , मेरा कमराजाति के प्रश्न पर कबीर

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संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com  

उन्नीसवें भारत रंग महोत्सव में स्त्रियों की भागीदारी

मंजरी श्रीवास्तव

एक लम्बी कविता ‘एक बार फिर नाचो न इजाडोरा’ बहुचर्चित.नाट्य समीक्षक,कई नाट्य सम्मान की ज्यूरी में शामिल.
संपर्क : ई मेल-manj.sriv@gmail.com

पिछले 1 फरवरी से प्रारम्भ हुए भारत रंग महोत्सव का प्रथम चरण स्त्रियों को समर्पित रहा. उदघाटन समारोह में जहाँ मुख्य अतिथि भरतनाट्यम एवं ओडिसी शैलियों की विख्यात नृत्यांगना एवं गुरु डॉ. सोनल मानसिंह थीं, वही विशिष्ट अतिथि इज़रायल की प्रसिद्ध युवा निर्देशक वेरा बरज़ाक श्नाइडर थी.

महोत्सव के दूसरे दिन रंगप्रेमी दर्शकों, अध्येताओं और शोधार्थियों ने मणिपुर की वरिष्ठ अभिनेत्री और मशहूर निर्देशक स्वर्गीय एच. कन्हाईलाल की जीवन संगिनी सावित्री हेस्नाम को ‘लिविंग लीजेंड’ के तहत सुना,  जिसमें उन्होंने अपने जीवनानुभव लोगों से साझा किये. इन जीवनानुभवों में अपनी रंगयात्रा, एक अभिनेत्री के रूप में अपनी मेकिंग और अपने प्रियतम और पति कन्हाईलाल जी के साथ बिताई यादों को उन्होंने दर्शकों के साथ साझा किया. उसी शाम सावित्री जी को कन्हाईलाल निर्देशित नाटक ‘पेबेट’ में देखना एक सुखद अनुभव रहा. मंच पर सावित्री हेस्नाम जी को देखना खुद पर फ़ख्र करने जैसा है और रश्क करने जैसा है कि हमारी आने वाली पीढियां याद रखेंगी कि हमने माँ सावित्री को देखा है, गुरु माँ को देखा है. पेबेट की माँ की भूमिका निभा रही माँ सावित्री मंच पर कोई वृद्धा या वरिष्ठ नायिका नहीं लगती, बल्कि चिड़िया-सी फुदकती सोलह बरस की किशोरी या युवती लगती हैं. मंच पर कोई सेट नहीं, कोई ताम-झाम नहीं, कोई साज-सज्जा नहीं सिर्फ अपनी आवाज़, अपने सुरीले कंठ से निकलती विभिन्न प्रकार की ध्वनियों, अपने अभिनय और भाव-भंगिमाओं से वह ऐसा जादू उत्पन्न करती हैं कि मंच पर कोई और कलाकार दर्शकों को दिखता ही नहीं. दर्शक ठगे-से, मंत्रमुग्ध से सिर्फ़ उन्हीं को निहारते रह जाते हैं. एक और बात जो उनके कुशल अभिनेत्री होने का परिचायक है कि अपने रंग सहयात्री और जीवनसाथी कन्हाईलाल जी को खोने की वेदना से भरी होने के बावजूद उन्होंने अपने अभिनय पर अपनी वेदना, अपनी पीड़ा को भारी नहीं पड़ने दिया है. मंच पर उनका अभिनय ही उनकी वेदना पर भारी पड़ता है जबकि कल दिन में ही हुए अलायड इवेंट के ‘लिविंग लीजेंड’ कार्यक्रम के दौरान एक घंटे तो उन्होंने शोधार्थियों, रंगमंच के अध्येताओं और दर्शकों से अपनी भावनाओं पर काबू करते हुए बड़ी ही कुशलता से बातचीत की, लोगों से अपनी रंग और अभिनय यात्रा के महत्वपूर्ण अनुभवों को साझा किया, लेकिन अंत तक आते-आते उनकी आँखें कन्हाईलाल जी को याद करते हुए बरबस छलक पड़ी थीं.

पेबेट वह पहला नाटक है, जिसमें कन्हाईलाल ने रंगमंच से सम्बंधित अपनी विचारधारा और आदर्शों को शिल्प और कथ्य के माध्यम से प्रकट किया. यह रंगमंच की एक वैकल्पिक शैली के माध्यम से बंधी-बंधाई रंग-परंपरा में हस्तक्षेप था जो जनता से जुड़ने में सफल रहा.

पेबेट एक ‘फुंगा वारि’ है, जो मणिपुर की एक परंपरागत कथा-शैली है जिसमें बड़े-बूढ़े आग के पास बैठकर बच्चों को कहानी सुनाते हैं. कन्हाईलाल ने इस कहानी को आज की राजनीतिक और सांस्कृतिक स्थिति को रेखांकित करने और परिचित के व्यतिक्रमण से रंगमंच में चेतना प्रवाहित करने के लिए प्रयोग किया है.
पेबेट एक छोटी चिड़िया है, जिसे बहुत समय से देखा नहीं गया है. शायद उसकी प्रजाति ख़त्म हो गई है. अपने बच्चे की हिफाज़त करते हुए माँ पेबेट शिकारी बिल्ली की चापलूसी करके उसका ध्यान बंटाने की कोशिश करती है. वह तब तक उसके मन के मुताबिक़ बातें करती रहती है जबतक कि उसके बच्चे अपनी रक्षा करने में सक्षम न हो जाएँ. जैसे ही वे बड़े होते हैं, चिड़िया बिल्ली का विरोध करती है और बिल्ली उसके सबसे छोटे चूज़े को पकड़ लेती है लेकिन चिड़िया चालाकी से बिल्ली से अपने बच्चे को छुडा लेती है. सभी पेबेट चिड़ियाँ आख़िरकार संगठित होती है और बिल्ली उनके जीवन से हमेशा के लिए चली जाती है.

सावित्री हेस्नाम और अन्य

इस पूरे नाटक में पेबेट चिड़ियाओं की माँ बनी सावित्री हेस्नाम, मक्कार साधु बने अभिनेता एच. तोम्बा और पेबेट के बच्चे बने अभिनेताओं जी. गोकेन, पी. त्योसन, धनञ्जय राभा, एस. बेम्बेम और एच. लोहीना,  सबने शानदार अभिनय किया है. माँ सावित्री ने तो कमाल का अभिनय किया है. वे सचमुच चिड़िया ही लग रही हैं. उनकी वे मुद्राएँ अद्भुत हैं जब वे अपने सबसे छोटे बच्चे को उड़ना और दाना चुगना सिखा रही हैं, जब वे बिल्ली से अपने बच्चों की हिफाज़त कर रही हैं, अपने पंख फैलाकर. अपने हाथ से वे पंखों का जो दृश्य उत्पन्न करती हैं वह क़ाबिल-ए-तारीफ़ है. अपने बच्चों को लेकर, उनकी हिफाज़त को लेकर उनके चेहरे पर और उनकी आँखों में जो चिंता के भाव हैं वे लाजवाब हैं. ऐसा महसूस ही नहीं होता कि हम मनुष्यों को अभिनय करते देख रहे हैं. महसूस होता है कि मंच पर हम चिड़ियों को देख रहे हैं, किसी मक्कार बिल्ली को देख रहे हैं.
यह नाटक स्वर्गीय एच. कन्हाईलाल जी की स्मृति को समर्पित था. इस नाटक के माध्यम से पूरे रंग जगत ने एच.कन्हाईलाल को श्रद्धांजलि दी है.

‘अ स्ट्रेंजर गेस्ट’

दूसरे दिन की ही एक और महत्वपूर्ण प्रस्तुति थी युवा निर्देशक अनुरूपा रॉय की कठपुतली प्रस्तुति ‘महाभारत’. अनुरूपा बेहद प्रतिभाशाली कलाकार हैं और अभी हाल ही में हुए जश्ने बचपन में अपनी कठपुतली प्रस्तुति डायनासोर से धूम मचा चुकी हैं. महाभारत की कहानी सब जानते हैं पर अनुरूपा का कमाल यह है कि उन्होंने इसे बिलकुल समकालीन बनाकर दर्शकों के समक्ष पेश किया है. कठपुतलियों, मुखौटों, छाया-पुतलियों और अन्य सामग्रियों के साथ यह प्रस्तुति महाभारत को एक गतिशील वृत्तांत के रूप में देखती है जो तोगालु गोम्बेयट्टा के सिल्लाकेयाटा महाभारत के हजारों वर्षों के गायन के दौरान विकसित हुआ और समकालीन पुतुलकारों की नई खोजों में भी प्रासंगिक है. आज के स्वीकृत संघर्ष कालित युग में इस कहानी की प्रासंगिकता तो निःसंदेह है ही, इस तरह इसके पात्र भी हर संघर्ष में प्रतीक की हैसियत पा चुके हैं फिर चाहे वह संघर्ष विश्व की राजनीति में हो, समुदाय में हो या फिर परिवार के स्तर पर, और इसका वृत्तांत राजनीतिक, सांस्थानिक और सामाजिक स्थितियों के लिए एक बड़ा रूपक बन गया है लेकिन  अनुरूपा इस नाटक के माध्यम से केंद्रीय प्रश्न यह उठाती हैं कि क्या कुछ ऐसा हो सकता था कि महाभारत का युद्ध न हुआ होता ? वह कौन सा चुनाव था जो कोई पात्र किसी और ढंग से भी कर सकता था ? वह कौन सी भूमिका थी, जिसे किसी और द्वारा किसी और ढंग से निभाया जा सकता था ?  और हम खुद अपने किस चुनाव और किस भूमिका को बदल सकते हैं ? किन स्थापित धारणाओं और मान्यताओं पर प्रश्न करके हम भविष्य में ऐसे किसी युद्ध से बचे रह सकते हैं और क्या हम यहाँ से यह मानते हुए एक नई शुरुआत कर सकते हैं कि इस तरह के युद्ध में कोई नहीं बचता, इसलिए हमें इससे बचना चाहिए, कोशिश करना चाहिए कि इसकी पुनरावृत्ति न हो.

उन्नीसवें भारत रंग महोत्सव का उद्धाटन



इसी दिन की आख़िरी प्रस्तुति पहली विदेशी प्रस्तुति थी ‘अ स्ट्रेंजर गेस्ट’ जिसका निर्देशन किया था, इज़रायल की युवा निर्देशक वेरा बर्ज़ाक श्नाइडर ने. यह नाटक मॉरिस मैतरलिंक के नाटक ‘दि इंट्रयुडर’ से प्रेरित एक दृश्यात्मक प्रस्तुति है. यह कहानी है एक ऐसे परिवार के घर की एक शाम की जिसमें एक माँ बीमार पड़ी है और उसकी दो बेटियाँ अपने पिता के साथ चिंतामग्न हैं. डॉक्टर यह कह कर जाता है कि उसकी स्थिति अब बेहतर हो रही है फिर भी घर का वातावरण कुछ और ही संकेत करता दिखाई देता है, पूरे घर में मृत्यु के संकेत दृष्टिगोचर हो रहे हैं, घर मृत्युगंध से भर जाता है, पिता और दोनो पुत्रियों को मृत्यु की पदचाप सुनाई देती है और वहां उस माँ के और उस पूरे परिवार के भाग्य से सम्बंधित एक रहस्य का भाव भी मौजूद है. परिवार के सदस्य मौसी के आने की प्रतीक्षा कर रहे हैं. इस विशेष शाम को कुछ विचित्र और असामान्य-सा घट रहा है. हर चरित्र अलग-अलग तरीके से इसका अनुभव लेता है और शाम के दौरान एक भिन्न बिंदु पर कोई व्यक्ति या कोई चीज़ घर की ओर आ रही है और इसके पास आने का एहसास और उसकी अदृश्य उपस्थिति उनलोगों को उत्तरोत्तर बेचैनी का आभास करा रही है. दरअसल यह नाटक एक दुखप्रद सामान्य स्थिति और हमसे अभिन्नता से जुड़े व्यक्ति की बीमारी के बारे में है. नाटक परिवार के सदस्यों के भीतरी संसार में झांकता है. भावनात्मक स्थिति और अंतर्द्वंद्व जिनसे वे गुज़र रहे हैं और साथ ही साथ उनके मध्य के सम्बन्ध खोने के उस भय से हर कोई किस तरह जूझता है…कौन हठपूर्वक आशाओं से चिपका पड़ा है और कौन अधिक यथार्थवादी है, कौन-सी स्मृतियाँ उनके मस्तिष्कों में  रही हैं. मुद्राओं, गतियों, प्रकाश, ध्वनि और साथ ही साथ पाठ के माध्यम से निर्देशक ने इन भावनाओं और तीन अलग-अलग व्यक्तियों के माध्यमों से तीन प्रकार के मनोविश्लेषणों को समझने और व्याख्यायित करने का एक ईमानदार और प्रामाणिक प्रयास अभिनेताओं और निर्देशक ने किया है. इस नाटक का सेट से लेकर साइलेंस तक शानदार था. एक ऐसी चुप्पी तारी थी प्रस्तुति के दौरान कि नाटक ख़त्म होने तक पूरी दर्शक दीर्घा में मौत की सी मनहूसियत और मातमी सन्नाटा छा गया था, यहाँ तक कि दर्शक स्तब्ध थे और मृत्युगंध और उस अदृश्य उपस्थिति को महसूस करते हुए मृत्युबोध से भर गए थे और यह एहसास इतना हावी था कि नाटक ख़त्म होने पर दर्शक ताली बजाना तक भूल गए थे. मंच पर अमिचई पार्दो, शाकेद सबग और हदस वीसमैन ने शानदार अभिनय किया. अलेक्सांद्र  एल्हारर के प्रकाश-परिकल्पना और अलेक्सांद्र नोहाम के प्रकाश संचालन ने इस सायकोलोजिकल हॉरर को सस्पेंस से भर दिया था. और ध्वनि अभिकल्पना देखिये ज़रा कि रसोई के नल से पानी की एक बूँद के निरंतर टपकने से इस सस्पेंस में एक अजीब सा हॉरर भर दिया था ध्वनि अभिकल्पक ओसिफ़ उन्गेर ने.
   

सावित्री हेस्नाम की प्रस्तुति

     
महोत्सव के तीसरे दिन मास्टर क्लास ने नाट्यप्रेमी रूबरू हुए मशहूर ओडिसी नृत्यांगना माधवी मुद्गल और वेरा बरज़ाक श्नाइडर से जिसमें वेरा ने अपने नाटकों पर दर्शकों की प्रतिक्रियाओं और सवालों का संतोषजनक उत्तर देने की कोशिश के साथ-साथ इज़रायल और अंतर्राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में थिएटर और निर्देशन को देखने की कोशिश की. माधवी मुद्गल ने ओडिसी नृत्य में नाट्य तत्वों की उपस्थिति पर बातचीत की और नाटक को नृत्य से जोड़कर देखने और काम करने की कोशिश पर बल दिया.

स्त्रीकाल का प्रकाशन (प्रिंट) और संचालन (ऑनलाइन) ‘द मार्जिनलाइज्ड’ सामाजिक संस्था के तहत होता है. इसके प्रकाशन विभाग के द्वारा स्त्री-दलित-बहुजन मुद्दों और विमर्शों की किताबें प्रकाशित हो रही हैं. प्रकाशन की सारी किताबें अमेजन और फ्लिपकार्ट से खरीदी जा सकती हैं. अमेज़न से खरीदने के लिए लिंक पर क्लिक करें. 


दलित स्त्रीवाद , मेरा कमराजाति के प्रश्न पर कबीर

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संतोष अर्श की कविताएं : स्त्री

संतोष अर्श

शोधार्थी गुजरात केंद्रीय विश्वविद्याल
संपर्क- poetarshbbk@gmail.com



निवेदन

तुम मुझमें उतनी ही हो
जितना मैं ख़ुद में हूँ
न रत्ती भर कम
न रत्ती भर ज़्यादा.
इसीलिए नाभिनाल काटने की छूरी से
मैंने इस पृथ्वी को काटा दो फाँकों में
बराबर, बराबर !
न रत्ती भर कम
न रत्ती भर ज़्यादा.

स्त्री- 1

उसे देखने की शुरुआत वहाँ से हुई
जब वह चूते छप्पर के नीचे
गीले ईंधन से रोटियाँ पकाने की ज़िद कर रही थी.
उसकी गोद में बच्चा था
जो न जाने किस ज़िद में चिल्लाता था
रोता नहीं था अपनी माँ को चिढ़ाता था.
वह उसे चुप कराने की ज़िद में थी
और खाँस-खाँस कर
फुँकनी से चूल्हे में फूँक कर
गीले कंडो को जलाने की भी !
वह ज़िद्दी थी.
कारखाने से लौटा उसका भूखा मरद
गुस्से में अलुमिनियम की पतीली को
नंगे पाँव कुचल-कुचल कर
चपटा किए दे रहा था.
वह भुनभुना रही थी खीझ में
गोद का बच्चा सूखा स्तन चबाकर प्रसन्न था
नरदहे का मेढक उसे
उभरी हुई आँखों से घूर रहा था
वह मेढक की पीठ की पीली लकीर को.
उसे देखने की शुरुआत वहाँ से हुई
जब मैं उभरी आँखों वाला
नरदहे का मेढक था.


स्त्री- 2

वह कभी-कभी सल्फ़ास
या ऐसा ही कोई आसानी से मिल जाने वाला
ज़हर खा या पी लेती
वह नहीं जानती थी कि ज़हर कैसे बनता है.
फाँसी लगा लेती
दिल की फाँस निकालने के लिए
या कुएँ में कूद जाती
थोड़ी सी गहराई की तलाश में.

गाँव के पास नदी होती
तो उसमें बह जाती
वह नदी बनना चाहती थी.
रेलवे लाइन होती तो रेल के नीचे कटती
उस रेल में उसका कोई परिचित सवार नहीं होता
बस जनरल बोगी में उसके जैसी ही कुछ स्त्रियाँ होतीं.
नहर में बहती तो उसकी लाश
कई दिन बाद रेगुलेटर में फँसी मिलती
मृत्यु और कलंक से भीगे हुए आँचल के साथ.
कभी-कभी ही उसकी लाश का पोस्टमार्टम होता
लेकिन उसकी मृत्यु का सही कारण नहीं पता चलता.
वह विवाहित होती तो जला दी जाती
कुंवारी होती तो दफना दी जाती.
लेकिन वह मरती नहीं थी !
कभी मुँह से झाग उगलती
कभी फंदा गले में डालकर झूलती
कभी कुएँ के जगत पर बैठी
कभी नदी-नहर के किनारे खड़ी
कभी रेल की पटरी पर सिर झुकाए बैठी
देखी जाती रही.



स्त्री- 3

कारखाने की कॉलोनी के घरों में
कभी-कभी उसे जला दिया जाता
न जाने ज़िंदा या मुर्दा.
यहाँ वह खाते-पीते इज़्ज़तदार
घर की नवब्याहता होती थी.
उसे जलाने में अच्छा-ख़ासा
जीवाश्म ईंधन प्रयोग होता
सास, ननद, देवर जुटते
पति और ससुर देखते रहते.
उसे भली-भाँति जलाकर
कोयला बना दिया जाता.
जली हुई स्त्री-देह की भी एक मुद्रा होती !
कोयले की कलाई में जली हुई चूड़ियाँ
कोयले की उँगलियों में जली हुई अंगूठियाँ
कोयले के पाँवों की
कोयले की उँगलियों में, जले हुए बिछुए
जली हुई पायलें !
और जैसे हाथ जलते समय उठा ही रह गया
रोकने के भाव से, मत मारो !
उसकी जली हुई देह का पंचनामा
पुलिस का सिपाही पिये बगैर नहीं कर पाता.
उसकी जली हुई देह
वर्षों चर्चा का विषय रहती
जबकि उसका पति जेल से निकल कर
इधर-उधर सिगरेट सुलगाते हुए दिख जाता.



स्त्री- 4

ख़ुद जल कर मर गई
या जला कर मार दी गई
विवाहित औरतों को बराबर जलाया जाता रहा.
यह कह कर कि औरतें बहुत जलनशील होती हैं
बताया जाता रहा
कि जवान औरत की चिता की राख के सिरहाने
चप्पल उतार कर खड़े हो जाओ
तो वह राख झाड़ कर उठ खड़ी होती है
और नाचने लगती है.
बताया जाता रहा कि
चुड़ैल, प्रेत से अधिक डरावनी होती
और डायन कच्चा चबा जाती है.
कुएँ, नदी, तालाब में डूब गईं
रेल के नीचे कट गईं
पहनी हुई साड़ी से ही
फाँसी लगाकर झूल गई औरतों को
चुड़ैल बनाकर जिंदा रखा गया.
मरने के बाद भी उनकी पायलों
की छम-छम सुनी जाती रही
जलाने से पहले
जिनकी धड़कन तक नहीं सुनी गयी.

मादा प्रलाप



औरतें मुझे पुकारती रहीं
कुहरे में रेल की सीटी की तरह.
औरतें मुझे पुकारती रहीं
जैसे सावित्री बाई फुले को
स्कूल पुकारता था
जैसे फूलन देवी मल्लाह को
चंबल के बीहड़ों ने पुकारा था
जैसे गौरा देवी को पेड़ पुकारते थे.
औरतें मेरी प्रतीक्षा में थी
जैसी अकेली घसियारिन रास्ता देखती है
कि कोई आए और गठरी उठवा कर
उसके सिर पर रखवा दे
जैसे दर्दमंद भोर की प्रतीक्षा में होते हैं
औरतें मेरी प्रतीक्षा में थीं.
मैं आती जाती औरतों को देखता रहा
ठूँठ सा गड़ा रहा, खड़ा रहा
अब चाहता हूँ
कि मैं स्कूल बन जाऊँ
चंबल का बीहड़
या पेड़ बन जाऊँ कि घास.


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मैं स्त्रीवादी नहीं ,मार्क्सवादी हूँ : श्रीलता स्वामीनाथन

बात 2004 की है. श्रीलता स्वामीनाथन को स्त्रीकाल के लिए हम श्रीराम सेंटर में इंटरव्यू कर रहे थे. एक युवक काफी देर से हमें सुन रहा था. उसने पास बैठने की अनुमति माँगी और श्रीलता जी से मुखातिब हुआ, ‘आपकी आँखें बहुत खूबसूरत हैं, क्या हम तस्वीर खीच सकते हैं.’ श्रीलता जी ने बड़ी सहजता से उसका स्वागत किया और हाँ कहा. आज वे नहीं रहीं. यह वाकया सहज याद आ गया. उन्हें याद करते हुए उसी बातचीत पर आधारित यह आलेख. 


संपादक




श्रीलता स्वामीनाथन “नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा”की ग्रेजुएट थीं,  तथा 1972-73 में इंग्लैंड में भी थियटर कर चुकी थीं.समृद्ध परिवार में जन्मीं श्रीलता को अपनी तमाम गतिविधियाँ बेमानी लगी,जब उन्हें लगा कि ये सारी गतिविधियाँ देश की 10 प्रतिशत जनता के लिए नहीं हैं.


तब वे 1972  में एनएसडी में स्वयं को दुबारा शिक्षित तो कर रही थीं,  परन्तु तीर तो कहीं और का लगा था, वेदना कुछ और थी.थियटर वे छोड़ भी नहीं सकती थी, उहपोह में थीं, खुद उनके शब्दों में,’थियटर तो मेरे लिए मुश्किल था, लेकिन इरादा तो बुलंद था.’ तब महरौली में फ़ार्म हाउस के मजदूरों को न्यूनतम मजदूरी भी नहीं मिलती थी,वहां इंदिरा गांधी का भी फार्म हॉउस था.श्रीलता ने वहां देहात मजदूर यूनियन बनाया .स्वयं बताया उन्होंने, ‘यहीं से मेरी असली शिक्षा प्रारम्भ हुई इसके पहले रईस तबके की बिगड़ी हुई बेटी थी. जिनके खिलाफ आन्दोलन किया वे सभी मेरे घर आते थे  और मुझे  पता था  कि वे जितना खर्च अपने स्कॉच पर करते हैं, उतना भी मजदूरों के उपर नहीं’.  ‘1974 के आपातकाल में मुझे  तिहाड़ जेल  में डाल दिया, परन्तु यह जेल यात्रा भी मेरे जीवन के लिए  माइल स्टोन साबित हुई.मुझे मिसा के तहत अन्दर डाला गया था’.  तिहाड़ में महिलाओं के लिए अलग से राजनीतिक सेल नहीं था,इसलिए उन्हें आम अपराधियों के साथ रहना पड़ता था.जेल में तो दो जून का खाना,कपड़ा और रहना ही उपलब्ध नहीं था, इसलिए उन्हें आम अपराधियों  के साथ रहना पड़ता था और बिडम्बना यह कि महिलाएं जेल जीवन को बेहतर जीवन मानती थीं, क्योंकि बाहर तो उनके लिए यह व्यवस्था भी नहीं थी “मुझे लगा इनके लिए कुछ करना हैं. तिहाड़ जेल में वहां के कर्मचारियों की पक्की नौकरी के लिए भी मैंने संगठन बनाया, पक्की नौकरी दिलाने की कोशिश की,”



छूटकर श्रीलता स्वामीनाथन मद्रास गई.वहां भी बंदरगाह में मजदूरों के  लिए कोई सुविधा नहीं थी.किसी का बाजू कट जाता था, तो किसी की टांग.संगठित करते हुए वहां पुलिस  ने उन्हें काफी तंग किया.इमरजेंसी के बाद राजस्थान के बांसवाडा इलाके में उन्होंने आदिवासियों के बीच काम शुरू किया.1977 से वहीं घंटाली गाँव में रहने लगी.वहां जाने के पहले श्रीलता ने मीडवाइफ़री तथा होमियोपैथी का काम सीखा और वही काम शुरू किया.’ 1998 तक वहीं रहकर होमियोपैथी के माध्यम से लकवा,अस्थमा आदि बीमारियां ठीक की. उनके अनुसार एलोपैथी का तो बड़ा उद्देश्य पैसा कमाना मात्र है,इसकी कोई फिलोसफी नहीं,सिर्फ मुनाफ़ा और मुनाफ़ा. मनुष्य से पहले मुनाफा. 1989 में मैं स्वंय बीमार पड़ी, दोनों किडनी फेल. मोरारजी भाई की सलाह से मैंने स्व-मूत्र चिकित्सा शुरू की’,थोड़ा हंसकर ‘और आज मैं आपके सामने हूँ’.

बीमारी के पहले महेंद्र चौधरी और श्रीलता स्वामीनाथन ने 1988 के अकाल में आदिवासियों के बीच काम किया-15 मांगो को लेकर: खासकर नसबंदी के विरोध में, हैंडपंप के लिए ,राहत कार्य के लिए आन्दोलन तीव्र किए,सरकार संपर्क करने पर हमेशा हां करती ,परन्तु वहीं ढाक के तीन पात. बाताया, ‘हमने और महेंद्र ने लोगों से मिलकर बांसवाडा के बीच का रास्ता रोक दिया.पुलिस आयी,मांगे मानने का आश्वासन दिया,  तथा सबको हटाकर हम दोनों को जेल में डाल दिया,. हमने जमानत नहीं ली. 15 दिनों तक भूख हड़ताल पर बैठे. 1991 में आइपवा  में शामिल हुई (आल इंडिया पीपुल्स वीमेन एसोसिएशन )और 1994 से मैं  वहां अध्यक्ष हूँ.’

श्रीलता स्वामीनाथन की सक्रियता निरंतर बनी रही है.रूपकंवर,भंवरी बाई आदि मामले में चले महिला आन्दोलन में इनकी भागीदारी रही. नर्मदा बाँध के विरोध में, ईराक युद्ध के खिलाफ,डब्ल्यूटीओ के खिलाफ,मंहगाई के खिलाफ-हर मोर्चे पर श्रीलता स्वामीनाथन की मौजूदगी रही.  उनका मानना रहा कि ‘हर मोर्चे पर महिला –पुरुष को अलग रखने की जरुरत नहीं हैं’.कम्युनिस्ट पार्टियों के विषय में उनका कहना था कि इन पार्टियों ने कम से कम पुरुषों को बदलने का प्रयास दिखा,परन्तु हैं  तो वे इसी पितृसत्तात्मक समाज से’
कई मोर्चे पर श्रीलता बेबाक राय रखती थीं  ‘बलात्कारी को फांसी की सजा मिलनी ही चाहिए.बलात्कार हत्या से कम नहीं है.बलात्कारी का लिंग काट दिया जाए तो अगला बलात्कारी नहीं मिलेगा.आज हर कोई दुखी है,चाहे वह अमीर हो या गरीब .मैं बहुत से ठकुरानी औरतों को जानती हूँ. जो काफी धनी हैं,  लेकिन उनके  अपना कुछ नहीं.हमें तो वर्गीय,जातीय और लैंगिक तीनों ही स्तरों पर लड़ने की जरुरत है. झुनझुन में आज भी (2004 में) औरतों को मैला उठाना पड़ रहा है,उनके साथ पूरा छूआ-छूत है,काम के बदले उन्हें एक रोटी मिलती है.
‘औरतों के मन में इतनी असुरक्षा है कि वे पुरुषों को मैनीपुलेट करने में लगी होती हैं ,एक दूसरे से लड़ती हैं, पितृसत्तात्मक समाज ‘बांटो और राज करो’की नीति पर चलता है. मेरा मानना है कि समाज में महिलाओं  की अपनी एजेंसी हो,मन में कोई डर नहीं हो.’

‘मैं फेमिनिस्ट नहीं हूँ, हां,जो औरतों के लिए बोलता है,वह फेमिनिस्ट तो है ही.वर्ग–भेद दूर हो तो 80 प्रतिशत महिलाओं की समस्या का समाधान हो जाएगा. इसलिए मैं स्वंय को मार्क्सवादी मानती हूँ, स्त्रीवाद आज भी शहरी,बुद्धिजीवी चीज है .इधर स्त्रीवादियों की भी समझ बनी है कि गाँव की औरतों को भी जोड़ना है,.परन्तु अभी प्रयास करना होगा, क्योंकि आज 80 प्रतिशत औरतों की वास्तविकता को स्त्रीवाद शामिल नहीं करता.

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दलित स्त्रीवाद , मेरा कमराजाति के प्रश्न पर कबीर

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फ्लिपकार्ट पर भी सारी किताबें उपलब्ध हैं.


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संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com  

ऑब्जेक्ट से सब्जेक्ट बनने की जद्दोजहद

सुधा उपाध्याय

जानकीदेवी मेमोरियल कॉलेज,दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाती हैं संपर्क:ईमेल:sudhaupadhyaya@gmail.com

हमने जो तर्ज़े-फुगाँ की थी कफ़स में ईजाद
फैज़ गुलशन में वही तर्ज़े-बयाँ ठहरी है….(फैज़अहमदफैज़)

क्या स्त्रियों का खुलकरअपनी बात कहना, पतनशील होना है?क्या दायरे की देहरी में रहकर अपने हक़ की माँग करना, पतनशील होना है? जब सारी उम्मीदें बंद दरवाज़े तक सीमित होकर सिर्फ अंधेरे में दाख़िल हो जाए, ऐसे में अपनी आवाज़ बुलंद करना पतनशील होना है?क्या एक स्त्री जब अपने अधिकारों के बारे में खुलकर बात करती है और ख़ुद को एक सामनासे ऊपर उठाकर पतियों के साथ बराबरी की बात करती है तो उसे पतनशील होना कहेंगे? क्या दुनिया में जो परिपाटी चल रही है स्त्रीविमर्श के नाम परअगर उससे अलग होकर अपनी बात पाठकों के सामने बड़ी बेबाकी से रखदी तो पतनशीन होना है?


अगर ये सारे सवाल उठाना पतनशील पत्नी कहलाना है तो फिर लेखिका नीलिमा चौहान को यही मंजूर है और इसलिए उन्होंने इन तमाम सवालों के जवाब ढूंढने के लिए पतनशील पत्नियों के नोट्स की रचनाकर डाली।नीलिमा साफ शब्दों में कहती हैं “एक लंबे समय तक स्त्रीवाद के नाम पर ख़ुद को दुनिया से अलहदा कर एक कड़क, दिलजली, खीजी, पकी बुझी-थकी-अकेली, नारेबाज़ नारी को झेला है आपने।ऐसा झेला कि फेमिनिज़्म के नाम से ही नाक-भौं सिकोड़कर कन्नी काटकर नौ दो ग्यारह होते रहे आप।आप ही क्या औरतें भी थक-हारकर इसबात को सच मान चली थीं कि ऐसा हायतौबा का क्या लाभ जो विकल्पहीन- लक्ष्य हीन   हो और दुनिया को हिला डालने के हवाई सपने से भरी हो।” (इसी पुस्तक से)

सदाशयता और सहानुभूति हम पतनशील पत्नियां कबतक ढोती रहेंगी।हमें अपने मोर्चे की लड़ाई अब खुद ही लड़नी होगी।हम कबतक पिता, पति, भाई को दोष  देकर उनका आसरा ढूंढती रहेंगी।हमें अब रिपेयरिंग नहीं टोटल चेंज की बात करनी ही होगी।स्वयं चेती हुई स्त्री के स्वाधिकार ही हमारे विमर्श हैं।हमारा मनोविज्ञान हमें सिखाता है हम, झुकें, डरें लजाएं आखिर कबतक? हम भी सब्जेक्ट बनना चाहती हैं।हम वस्तु नहीं व्यक्ति हैं।कबतक हमें घर परिवार में संपत्ति की तरहऔर बाहर बाज़ार में वस्तु की तरह आंका जाएगा।आत्मनिर्भर हो रही स्त्रियां, जीवन में अकेले रहने का निर्णय लेती स्त्रियां, परिवार कोख उलझते दमघोंटू सम्बन्धों को नकारती स्त्रियां, देह की कामना को न केवल पहचानने और उन्हें तृप्त संतुष्ट करने वाली स्त्रियां अब पुरुषसत्तात्मक समाज के लिए ख़तरे की घंटी साबित होंगी और हम जब बजेंगी तभी स्वानुभूति  और सहानुभूति का मुद्दा हल होगा।

तमाम स्त्रीविमर्शों, विचारों और स्त्री चर्चा से जुड़ी बातों को चाहे आप कुछ भी कहते हों उनके सामने किताब पतनशील पत्नियों  के नोट्स, एक नया आयाम खोलता है।अच्छा होगा कि अगर नीलिमा ने देहरी के दायरे में रहकर जो अधिकारों की बात को नए अंदाज में उठाया है उस पर खुलकर नए सिरे से बहस हो।देहरी के दायरे का मतलब है पत्नी रहकरअपनी आवाज़ उठाने की कोशिश।पत्नी, मां, बहू, परिवार, समाज से अलग होकर नीलिमा बात नहीं करना चाहती हैं।वो चाहती हैं कि बातें इसी दायरे में हो।क्या यह संभव नहीं कि एक पत्नी जो हमेशा से धुरी है परिवार की, उसको केंद्र में रखकर, उसे पूरी अहमियत देकर समाज का निर्माण हो? इसबात का ख़ास ध्यान रखना होगा कि यहां पर किसी एक पति की बात नहीं की गई है।बल्कि पतियों यानी पुरुष मानसिकता की बात की गई है।और  साथ ही किसी एक पत्नी नहीं बल्कि मध्यवर्गीय परिवार में सांस लेने वाली तमाम पत्नियां हैं, जो लगभग एक जैसी ही है।असल में नीलिमा उन तमाम रस्मों-रिवाज़ों पर सवाल उठाती हैं जो पत्नियों पर थोपे जा रहे हैं।“यह किसका फैलाया हुआ वहम है कि औरत का वजूद उसके माँ हुए बिना बेमक़सद हुआ करता है।वारिस की पैदाइश के लिए औज़ार होने के अलावा भी औरत का वजूद है इस बात के ख़याल तक को किस शातिराना तरीक़े से ख़तावाराना बना दिया गया है।इतना संगीन जुर्म की हर औरत के लिए ज़िंदगी का सबसे अहम सपना और चाहत माँ बनकर दिखाना हो।” (इसी पुस्तक से) 

क्या हम ऐसे समाज की कल्पना कर सकते हैं जहाँ पत्नियों को खुलकर साँस लेने की आज़ादी मिल सके? क्या ऐसा संभव है कि पत्नी अपनी इच्छानुसार माँ बने और उसके फैसले को घर के बाकी लोग स्वीकार करें।


“माँ बनने की दैहिक क़ाबिलियत भर से माँ बन जाने की मजबूरी किसी भी औरत को अपने वजूद के ख़िलाफ़ ही नहीं मानवाधिकार के ख़िलाफ़ भी लगनी चाहिए।” (इसी पुस्तक से) 

पतनशील पत्नियों के नोट्स को लेखिका ने भले ही नोट्स कहा है पर असल में यह सिर्फ नोट्स नहीं बल्कि दस्तावेज़ है उन तमाम पत्नियों के जो घर-परिवार, बाल-बच्चे, सास-ससुर की देखरेख के साथ-साथ नौकरी भी करती हैं।पुस्तक को नीलिमा चौहान ने सात हिस्सों में बाँटा है।क़ैद में ही बुलबुल, अक्स करे सवाल, ताले जज़्बातों वाले, दर्द का नाम दवा रखा है, बुनियादें पहने हैं पायल, कुछ इश्क किया कुछ सफ़र किया और अदब का दारोग़ा।इन तमाम हिस्सों मेंअलग-अलग अनुभव है।पर सारे अनुभव सिलसिलेवार तरीके से रखे गए हैं।इनका आपस में जुड़ना एक कहानी को मुकम्मल रूप देने जैसा है। इस क़िताब को पढ़ते हुए आप बार-बार अपने अनुभवों के साथ बहने लगेंगे।पतनशील पत्नियों के अनुभवों से आप एक तादात्म गांठ लेंगे।यही इस पुस्तक की खुबसूरती है।नीलिमा ने पत्नियों के अनुभवों को एक साकार रूप दिया है जो आपका अपना लगता है।तय है कि बहुत सारे लोग इस किताब पर सवाल उठा सकते हैं।जो लोग सवाल उठा रहे हैं और उनके सवालों में जो अनकहा सा रह जा रहा है, असल में वही इस किताब की सार्थकता है।वो सारे सवाल जो अबतक आपने उठाने की हिमाकत नहीं की, वैसे सारे पहलू जिसके बारे में मन ही मन खूब बातें करते हों प रखुलकर बोलने से डरते हों, वही सारे सवालों से नीलिमा बार-बार टकराती हैं और हमारे सामने बड़ी निडरता सेर खती हैं।नीलिमा का यह साहस वाकई प्रशंसनीय है। जब औरतें अपने बारें में खुलकर नहीं बोलेंगी तो फि रकुछ तो लोग कहेंगे, लोगों को काम है कहना।

अश्लीलता पुरुषवादी वर्चस्व को कायम रखने की एक साजिश है। जब-जब स्त्री नैतिकता की बनी बनाई छवियों को तोड़ने के लिए बने बनाए प्रतिमानों को तोड़ती है, उसे पारंपरिक समाज अश्लील ठहराता है।आज की स्त्री अगर अस्मिता को अस्त्र बनाकर लिख रही है तो गलत क्या है।दिक्कत तभी आती है जब आलोचकीय दृष्टि न रखते हुए भी आलोचना करने बैठते हैं।स्त्रियां बाहर आने से नहीं  घबरातीं, वे अब बोल रही हैं अच्छा संकेत हैं।लेकिन मैं मानती हूं कि स्त्री और पुरुष के सम्बन्ध अब भी कारागार में बंधे हैं।श्रेणी, वर्ग, जाति, नस्ल चाहे अलग-अलग हों किंतु जेंडर के धरातल पर दुनिया भर में स्त्री का संघर्ष एकसा ही है।उनकी भावनात्मक मनोवैज्ञानिक, नैतिक भाषित औरअस्मिता सम्बन्धी समस्याएं प्राय: एक सी हैं।स्त्री काव्यक्ति के रूप में प्रकाशित हो सकना, अपनी संपूर्णता में जी सकना, मनुष्य जाति के बचे रहने की पहली शर्त है।

नीलिमा ने कुछ इश्क किया कुछ सफ़र किया हिस्से में दो अनुभव से पाठकों को अवगत कराया है।जिनमें पहला है रेडलाइट पर एक मिनटऔर दूसरा है अधखिंची हैंडब्रेक।इन दोनों को पढ़ने के बाद सहसा मन मेंआता है कि स्त्रियों का सड़कों पर कंधे चौड़े करके निकलना अकसर मर्दों को  रास नहीं आता।गाड़ी चलाती स्त्रियां को देखकर मर्द तो एकदम से हीनभावना का अनुभव करने लगते है-

“एक बात पक्की होती है कि वो फनफनाता हुआ कोई मर्दपने का मारा ही हो ता है। बन्दे के चेहरे के काँइयाँपन से, फोकेपन से ही पता चल जाता है कि इसे इतनी भी समझ नहीं कि जिस ओवरटेक के मौक़े को उसने हो-हुल्लड़ से, हाय-तौबा से हासिल किया वह उसे तरस खाते हुए दिया गया है।xxxxxxxxxxxxxxx बगलवाला और दबाता जाता है अगर ज़रा भी स्पेस देने की मुद्रा दिखाओ।xxxxxxxxxx अमाँ यार जो इतनी जद्दोजहद से सिखाया गया था वह ऐनवक्त पर एकदम उलट साबित होता है।इसलिए बचने के लिए कब हटना हैऔर कब अड़ना है यह तो मौक़े, माहौल, ज़रूरत, ज़िगकऔर बस अपन के मूड की बात है।”

सौ बात की एकबात कि पूरी किताब के हर खंड आपस में इतने गुत्थे हुए हैं कि इस को बिखरा कर पढ़ना, सब्जेक्ट के साथ छेड़छाड़ करना होगा।जिन्हें अबतक नोटिस नहीं किया गया उनके नोट्स छपने लगे, यह एक क्रांतिकारी कदम है।और इसका स्वागत होना चाहिए।स्वागत अपराजिता शर्मा द्वारा बनाई गई आकृतियों का भी होना चाहिए जो इस पुस्तक में मौन होकर भी बहुत मुखर है।लफ़्ज़ों के साथ कदमताल करती हुई बेहतरीन आकृतियां। बल्कि कई जगहों पर तो आकृतियां शब्दों से आगे निकल जाती हैं और अपनी भाव-भंगिमा से पूरा संसार रच जाती हैं।कुल मिलाकर पतनशील पत्नियों के नोट्स इस सदी का ऐसा दस्तावेज है जो निहायत ही बिंदास, बेबाकऔरआंखों में आंखें डालकर अपने अधिकारों के लिए आवाज़ उठाता है।तमाम स्थितियों और बातों को खुलकर साझा करना सबके बूते की बात न हीं।नीलिमा चौहान ने वाकई साहस का काम किया है।

स्त्रीकाल का प्रकाशन (प्रिंट) और संचालन (ऑनलाइन) ‘द मार्जिनलाइज्ड’ सामाजिक संस्था के तहत होता है. इसके प्रकाशन विभाग के द्वारा स्त्री-दलित-बहुजन मुद्दों और विमर्शों की किताबें प्रकाशित हो रही हैं. प्रकाशन की सारी किताबें अमेजन और फ्लिपकार्ट से खरीदी जा सकती हैं. अमेज़न से खरीदने के लिए लिंक पर क्लिक करें. 
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हिंदी साहित्य से झाँकतीं आदिवासी स्त्रियाँ

रीता दुबे

शोधर्थी, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय
, दिल्ली, संपर्क:ईमेल:rita.jnu@gmail.com

अगर अपनी बात यशपाल की  दिव्या से शुरू करू तो जो कहना चाहती हूँ उसे कहने का आसानी से एक माध्यम मिल जायेगा .दिव्या दासी धर्म और मातृत्व धर्म में से मातृत्व धर्म को प्रधान मानकर अपने मालिक के घर से भागती है तो वह एक बौद्ध विहार में पहुचती है .वहाँ वह शरण कि भीख मांगती है तो स्थविर कहतें हैं ,”तुम माँ के रूप में शरण माँग रही हो ,मोहमाया से मुक्त नहीं हो ,इसलिए शरण नहीं मिलेगी ,वह चेरी बन जाने का वचन देती है तो स्थविर पूछतें हैं ,कि क्या तुम्हारे पति ,पिता या पुत्र की आज्ञा है ?वह बताती है कि पति नहीं है ,पिता दिवंगत हैं ,और पुत्र गोद में है .स्थविर अस्वीकार में उठकर अंदर जाने लगते हैं  तो वह प्रार्थना करती है कि तथागत ने तो आम्रपाली कों शरण दी थी और मुझे आप भूखा,प्यासा,असुरक्षित छोड़ रहे हैं .स्थविर उत्तर देते हैं –“वैश्या स्वतन्त स्वतन्त्र नारी है” |यह है हमारे तथाकथित सभ्य समाज का असली  चेहरा, जहाँ स्त्री की  अपनी कोई पहचान नहीं उसकी कोई स्वतन्त्र सत्ता नहीं,वह व्यक्ति नही है ,स्वतन्त्र होने के लिए उसे वैश्या बनना होगा .यहाँ तो नारी की  झाई पड़त अंधा होत भुजंग है ,नारी नरक का द्वार है .क्या ही तर्कपूर्ण बात है कि हमारे देश की आधी आबादी या तो प्रताड़ित करने योग्य है या फिर देवी बनाकर मंदिरों में सजाने के योग्य .यह सृष्टि इसी आधी आबादी के सहारे चलती है फिर भी वो घृणित हैं अश्लील हैं .स्वयं दोयम दर्जे की  हैं ,उसे तो पितृसत्ता के पैरों में दासी बनकर रहना ही चाहिए .ये एक चीज हैं एक वस्तु हैं जिसे ख़रीदा जा सकता है ,बेचा जा सकता है .वह सम्भोग और संतान की  इच्छा पूरी करने वाली एक मादा मात्र है .सबसे आश्चर्यजनक यह है कि स्त्रियों को बचपन से ही यह पाठ पढाया जाता है कि यही तुम्हारा धर्म है तुम इसी के लिए बने हो और वो इसे सहज स्वीकार भी कर लेती है .लकिन आज स्थितियाँ सिर्फ यही नहीं है.आकडों में गिनती में सही   लेकिन स्त्रियों ने अपनी आवाज उठाई है .अपने लिए समाज में जगह बनाई है ,कई बार समाज के कदम से कदम मिलाया है तो कई बार उसके खिलाफ  बगावत भी की  है .पर यह संख्या इतनी कम है कि बदलाव के लिए अभी और संघर्ष कि जरुरत है.

 लेकिन जब भी हम आदिवासी स्त्रियों के इतिहास के पन्ने पलटेंगे हमे उनकी स्थिति इस से अलग दिखाई देगी वे न तो देवी दुर्गा हैं न ही सम्भोग के लिए मादा मात्र .उनकी पहचान इससे अलग है,पुरुष से अलग उस समाज कि महिलाओं का एक सांस्कृतिक जीवन है जहाँ घर के बाहर के दरवाजे भी उनके लिए खुले हैं जंगल अपनी बाहें फैला कर उनका स्वागत करता है .”वह धान की कटाई के काम पर मान बाजार जाया करती थी .उन दिनों वह धान काटती थी,वन जंगलों में डाव डाव घुमा करती थी “1 |”रोज मुँह अँधेरे वह जाग उठती थी .दातोन मुँह में लगाये किवाड़ की  साँकल चढाकर निकल पड़ती थी घर से ढाई  तीन कोस जमीन पैदल चलकर रोजहा व्यापारी कि तरह दिन भर गली-गली घूमकर सब्जियां बेचना पडता था 2”.  अपनी बची हुई जमीन में रोपनी कटनी से लेकर खलिहानों से अनाज निकालने और उसे बाजारों में बेचने तक का काम स्त्रियां करती हैं .वो श्रम कर सकती हैं मुक्त रूप से पुरुषों से ताल मिलाकर जीवन का उत्सव मना सकती हैं मिजो और नागा लोगों की  संस्कृति इस बात का प्रमाण है ,जहाँ शाम को युवा लड़के लड़कियां एक दूसरे से मिलते हैं ,उनका समाज इस बात को बुरा नहीं मानता,घोटुल कि प्रथा भी आम लोगों को  जो उस समाज का हिस्सा नहीं है उन्हें चौकाने वाली लग सकती है ,जिसमे विवाह योग्य युवक और युवतियाँ घोटुल जाते हैं जहाँ पर विवाहित लोगों का प्रवेश वर्जित है,लड़के,लड़कियाँ एक दूसरे से मिल सकते हैं और अगर इस दौरान कोई युगल साथ रहने का निश्चय कर लेता है तो माता पिता धूम –धाम से शादी करा देते  हैं.दिन भर की  थकान रात के गहराने  के साथ घुघुरुओं की  खनक और ढोलों की  माद में खो जाती है.

 ये  अपनी पसंद का जीवन साथी चुन सकती हैं,अंतरजातीय विवाह कर सकती हैं जिसके लिए उन्हें पंचायत द्वारा लगाये गए जुर्माने की अदायगी करनी होती है .”सुकुरमुनी संथाली है और जाम्बिरा हो ,दोनो का समाज ही एक दूसरे को विवाह की अनुमति नहीं देगा .हमारा हो समाज भी कभी इस विवाह को स्वीकार नहीं करेगा सुकुरमुनी .सुकुरमुनी ने कहा समाज के लोगों के सामने हाथ पाँव जोड़कर आरजू मिन्नत करेंगे ,माफ़ी मागेंगे फिर हर्जाना स्वरुप उन्हें अच्छी तरह से हडिया दारु मुर्गा भात खिला –पिला कर मना लेंगे,…सुकुरमुनी के स्वर में दृढ विश्वास था”3 .“हाथ धोते हुए मार्था ने गहरी सांस ली न तुम दीपक से शादी करती और न हमें यह दिन देखना पडता .कितना समझया था वह घासी है और हम लोग उरांव.समाज नहीं मानेगा  .मानेगा भी,तो भारी जुर्माना लगायेगा,और हम लोग जुर्माना नहीं चुका सकते,पर तुमने नहीं सुना .सुना क्या ?चालीस हजार रुपए बहुत होते हैं ,सो तो ठीक मे.लेकिन सोचो तो आज तक पड़हा ने किसी पर इतना बड़ा जुर्माना लगाया ?नहीं न ?पड़हा पंचो को तो बस हडिया दारु और खस्सी मिल जाए  .इतना बड़ा जुर्माना ? सब महाजन का ही किया धरा है” 4. लेकिन इसके बरक्स जब हम अपने वर्ण आधारित समाज के अंतरजातीय विवाह को रखतें हैं तो आदिवासी स्त्रियों की स्थिति और भी  ज्यादा समझ में आने लगती है  .पश्चिमी उत्तर प्रदेश में इस तरह के विवाह के लिए ’ आनर किलिंग’की प्रथा है  |जिसके तहत लड़की घर की इज्जत है और इस इज्जत को बचाने के लिए कुछ भी किया जा सकता है |.लड़के को मारा जा सकता है उसके पूरे परिवार की हत्या भी की जा सकती है,बहनों के साथ बलात्कार किया जा सकता है ,उन पर तेजाब फेका जा सकता है .आये दिन अखबार के पन्ने इस तरह की सुर्ख़ियों से भरे पड़े रहते हैं ,और आश्चर्य ये है कि ये सुर्खियाँ अब हमें चौकातीं नहीं ,क्योंकि अब हमे इनकी आदत सी हो गयी है  .आदिवासी स्त्रियाँ दहेज से भी मुक्त है वहाँ वर पक्ष, वधु पक्ष को कुछ मूल्य देता है |’हो ‘जनजाति में वधू मूल्य की प्रथा कों’ गोनांग’ कहते हैं विवाह प्रस्ताव वर पक्ष की ओर से होता है . ’ खड़िया ’  जनजाति में ‘गिनिगंतान’ की प्रथा है ,जिसमे वर पक्ष वधू पक्ष कों मवेशी देता है .इस समाज में तलाक, विधवा विवाह भी मान्य है ,गाँव की पंचायत तलाक की अनुमति देती है .पुरुषों की तरह स्त्रियों को भी तलाक मिल सकता है ,परस्त्रीगमन,नपुंसकता ,क्रूर अमानवीय व्यवहार ,घर के कामकाज में हाथ न बटाना तलाक के आधार हो सकते हैं|



लेकिन इन् सबके बावजूद आदिवासी समाज में बेटियों को  पिता की सम्पति में अधिकार नहीं है .पुरुष आदिवासी नेतृत्व के एक वर्ग  का मानना है कि पिता की सम्पति में बेटियों को अधिकार मिलने से आदिवासी समाज में गैरआदिवासियों को घुसने कों मौका मिल सकता है .गैरआदिवासी युवक आदिवासी स्त्रियों से शादी रचायेंगे और शादी के बहाने जमीन को हथीयाने की कोशिश  करेंगें .लेकिन स्त्रियों को उनके अधिकार से वंचित रखने का यह एक बहुत ही कमजोर तर्क है .क्योंकि  इन सबके बावजूद आदिवासी जमीन धड़ल्ले से बिक रही है .ये जमीन किस  तरह  से आदिवासियों से हासिल की जाती है ,कैसे सरकारी कानूनों को उखाड़ फेंका जाता है इसका अंदाजा हम सबको है .जो लोग भी ऐसा मानते है उनके लिए एक उदहारण द्रष्टव्य है –“छतीसगढ़ के कोरबा जिले में वीडीयोकान कंपनी को १२०० मेगावाट कों पावरप्लांट बैठाना है उसके लिए कुछ आदिवासी गावों की जमीन हासिल करनी है …तो उसने यह हथकंडा अपनाया .छत्तीसगढ़ के सरकार के एक मंत्री है ननकी राम उनके बेटे हैं संदीप …संदीप को पब्लिक रिलेशन आफिसर बनाया और संदीप ने खुद जाकर उन गावों में आदिवासियों की जमीने खरीद ली,क्योंकि एक आदिवासी आदिवासी की जमीन खरीद सकता है .तो वीडियोकान ने एक आदिवासी  मंत्री के बेटे को ही अपना पब्लिक रिलेशन आफिसर  बनाकर वह जमीन आसानी से हथिया ली….इस तरह के हथकंडों से आदिवासियों की ये जमीने ये बड़ी- बड़ी विदेशी कंपनियाँ हथिया रही है ”5 . इस के लिए क्या आदिवासी स्त्रियाँ जिम्मेदार हैं ?नहीं न .इसलिए  ऐसे तर्क का एक ही मतलब है स्त्रियों कों उनके हक से महरूम रखना जो किसी भी समाज के लिए हितकर नहीं है .जहाँ तक गैरआदिवासी पुरुषों द्वारा आदिवासी स्त्रियों से विवाह करके सम्पति हडपने की बात है तो उसके लिए कानून में कुछ प्रावधान किये जा सकते हैं  मसलन ऐसे विवाह में संपत्ति का अधिकार पिता को ना देकर विवाह द्वारा उत्पन होने वाली संतान को दिया जाये और उसे भी अपनी जमीन किसी गैरआदिवासी को बेचने का अधिकार ना हो  .और ऐसे कानूनों का सख्ती से पालन किया जाये |

इसके साथ ही साथ आदिवासी समाज में कुछ ऐसे क्षेत्र  भी हैं  जहाँ आदिवासी स्त्री  का प्रवेश वर्जित है..हल चलाना,खेतों को समतल करना ,छप्पर छाना ,कुल्हाड़ी चलाना ,कपड़ा बुनना वर्जित है .और तो और डायन प्रथा ने इस समाज को बहुत हानि पहुचाई है .वर्ष 1995  से 1998 के बीच सिर्फ रांची पश्चिमी सिंहभूमि और गुमला में डायन घोषित करके 141  महिलाओं की हत्या करने की घटनाएं प्रकाश में आई है ..”औरत जात खेत में हल चलाई ….ऐसा तो कभी नहीं हुआ … न इस डीह में न किसी डीह …इस डीह को कोई नहीं बचा सकता रे अब  .देवी किसी को नहीं छोड़ेगी |हैजा फैलेगा ,महामारी व्यापेगी इस डीह में अक्सर किसी बूढी या जवान स्त्री को डायन का दोष देकर कोई खाटी बाप का जना मर्द उसकी गर्दन काट कर सदर थानें कटी हुई मुंडी लेकर पहुँच जाता और शान से कबूलता की इसको मने काटा है या फिर बांस की नली से औरत को आदमी का गू घोलकर पिलाया जाता या उसकी आँखे निकल ली जाती…या उसे नंगा कर गाँव भर घुमाया जाता.डायन के आरोप और डायन के प्रति नफरत  आम बात थी”6|


  स्त्रियों की यह स्थिति दिन प्रतिदिन बिगड़ती जा रही है .विस्थापन और विकास के खेल ने इन्हें और ज्यादा प्रताड़ित किया है .अपनी व्यवस्थाओं के नष्ट होने का खामियाजा सबसे ज्यादा इन्हें भुगतना पड़ रहा है.अब वह भी अपने परिवार के अन्य सदस्यों की तरह जमीदारों के खेतों खलिहानों में उनके फैक्टरियों में मजदूरी करने को विवश है .हर साल अकेले झारखण्ड से लगभग 1200 लड़कियाँ महानगरों में काम करने के लिए आती है जिसमे कई बार उनके समाज का कोई पुरुष या स्त्रियाँ भी उन्हें  अँधेरी गलियों में धकेलते हैं “और हाँ पहचानों/..जो तुम्हारी भोली –भाली बहनों की आँखों में /सुनहरी जिंदगी का ख्वाब दिखाकर /दिल्ली की आया बनाने वाली फैक्टरियों में /कर रही है कच्चे माल की तरह सप्लाई |”7 औपनिवेशिक  व्यवस्था ने इस प्रक्रिया में आदिवासी स्त्री को  आर्थिक शोषण के साथ ही साथ शारीरिक शोषण के कटघरे में लाकर खड़ा कर दिया है .ईट भट्टों,सड़कों मकानों के निर्माण में जुटी इन् स्त्रियों को जहाँ एक ओर कम मेहनताना मिलता है वहीँ दूसरी तरफ ठेकेदारों,अधिकारियों की तरह तरह की फब्तियाँ,हँसी मजाक डाट फटकार,गालियाँ ओर यौन शोषण का शिकार होना पड़ता है .तभी निर्मला पुतुल लिखती हैं “कैसा बिकाऊ है तुम्हरी बस्ती का प्रधान/जो सिर्फ एक बोतल वेदेशी दारु में रख देता है /पूरे गाँव को गिरवी /ओर ले जाता है कोई लकडियों के गट्ठर की तरह /लादकर अपनी गाड़ियों में तुम्हरी बेटियों को हजार पांच सौ हथेली पर रखकर /पिछले साल /धनकटनी में खाली पेट बंगाल गई पड़ोस की बुधनी/किसका पेट सजाकर लौटी है गाँव?” 8 .इतना ही नहीं “बबुवानी से सटे घासी लोगों का टोला है बबुवानी के नए उम्र के लौंडों लपाड़ों से लेकर अधेड़ विधुरों तक के लिए इनके घर की बहू-बेटियों की देह मर्दानगी अजमाइश का अखाड़ा हो गयी थी…..पांडे जी को एथेनिक लुक पसंद है ,पंडित आदमी थे…जहाँ कोई अछतयौवना मिलती ,वे बड़े मानोयोग से तंत्र साधना में डूब जाते” 9 .”ऐसे ही अँधेरे और सूनेपन का लाभ उठाकर आदमी के भीतर छुपे हुए धमिनवा ने दो –दो दफे रंगेनी को छानकर गारा है ,तभी से डरती है  रंगेनी अँधेरे से,जो कुछ रंगेनी के साथ बीता था वो किसी औरत के लिए बेहयाई की बात थी .अपनी मर्जी से तो किसी के साथ सो लेती हैं आदिवासिने ,कोई खराब नहीं मानता इसे .पर कोई जोर जबर से किसी को पटककर चढ़ बैठे तो …….”10 .   आदिवासी समाज में स्त्रियों की स्वतंत्रता ओर समानता के जिन बिंदुओं की चर्चा हम कर आयें हैं वो धीरे –धीरे इतिहास में बदल रहें हैं .क्योंकि  आज बदली हुई परिस्थिति में यह समाज भी सामंती मानसिकता का शिकार हो गया है. पितृसत्ता के मुहवारें में बात करना इस समाज के पुरुषों ने भी शुरू कर दिया है ,अपनी ही जाति में विवाह  करना, विवाह में वधू पक्ष की ओर से ज्यादा से ज्यादा दहेज लेना आज आम बात हो गई है.कुछ आदिवासी परिवार जो तथाकथित इस सभ्य समाज का हिस्सा बन गए हैं उन्होंने भी इस समाज के नियमों को अपना लिया है,ऐसे में आदिवासी सामाज की स्त्रिओं की स्थिति निः संदेह समानता के खुले आसमान  से बाहर निकलकर पितृसत्ता के  घेरे में आ रही है  .अगर ऐसा ना होता तो बेटी के जन्म पे –बेटी जनम सोना /धरती सिंगार रे /नारी जनम बेटी,सुखकर सार रे …..गाने वाले आदिवासी आज बेटा पैदा होने पर जिस धाई माँ को दो मन धान देतें हैं उसी धाई माँ को बेटी पैदा होने पर एक मन धान देते हैं .स्त्री पुरुष विभेद की इस मानसिकता के लिए कौन जिम्मेदार है? इसकी पड़ताल बेहद जरुरी है.



 कोई भी समाज बहुस्तरीय होता है जिनमे विभिन्न प्रकार की संस्कृतियां,रीति –रिवाज, ,परम्परायें सांस लेती हैं आदिवासी समाज भी ऐसा ही है .आज आदिवासी समाज में स्त्रियों की स्थिति को जानने के लिए,किसी निर्णय पर पहुचने के लिए हर स्तर को जानना जरुरी है.उन्हें भी जो आज भी अपने जंगलो में अपने सभ्यता को अपने अस्तित्व को बचाने के लिए संघर्षरत है .उन्हें भी( बासी तिरिया ,मीना अनीता कुमारी ,सोभा तिर्की   ) जो अपने घर से बेघर होकर दूर दराज के खानों में अपनी मेहनत के साथ साथ इनके मालिकों के आगे अपने शरीर को जलाने के लिए भी  मजबूर है .ओर उन्हें भी जो आर्थिक स्थिति में आगे बढ़े हुए हैं जिन्होंने समाज में अपनी एक जगह बना ली है .हर स्तर पर स्त्रियों की एक भिन्न स्थिति दिखाई देगी इसका भी ध्यान रखना जरुरी है .किसी भी समाज के अंदर सब कुछ सकारात्मक या सबकुछ नकारात्मक नहीं होता है लेकिन हमारी कोशिश यह  होनी चाहिए की हम दोनों को पहचान सकें ताकि  उसके प्रगतिशील अंशो से कुछ सीखें और प्रतिगामी अंशो को दूर कर के उस समाज को और भी  और स्वस्थ बना सके .इस हमारे समाज से पितृसत्ता के पैरोकारों से एक ही बात कहनी है की अगर आप विकास करना चाहतें है तो आधी आबादी को छोड़ कर यह हर्गिज संभव नहीं.”कभी अकेले में मुक्ति नहीं मिलती /यदि वह है तो सबके ही साथ है”.

सन्दर्भ ग्रन्थ


1. पृष्ट सं०135  आदिवासी कथा ( कहानी संग्रह ) महाश्वेता देवी ,वाणी प्रकाशन संस्करण 2008
2. पृष्ट सं० ,30 पठार पर कोहरा ,राकेश कुमार सिंह ,भारतीय ज्ञानपीठ  संस्करण 2005
3. पृष्ट सं० ,78-79 मरंग गोडा नीलकंठ हुआ ,महुआ माझी ,राजकमल प्रकाशन संस्करण 2012
4. पृष्ट सं०,58-60 ,इस्पातिका आदिवासी विशेषांक जनवरी –जून 2012
5. पृष्ट सं ० 16 इस्पातिका आदिवासी विशेषांक जनवरी –जून 2012
6. पृष्ट सं ०153 ,आदिवासी कहानियाँ,संपादक –केदार प्रसाद मीणा,अलख प्रकाशन    संस्करण 2013
7. पृष्ट सं ० 20  नगाड़े  की तरह बजते शब्द ,निर्मला पुतुल भारतीय ज्ञानपीठ  संस्करण 2005
8. पृष्ट सं ० 20 नगाड़े की तरह बजते शब्द  भारतीय ज्ञानपीठ  संस्करण 2005
9. पृष्ट सं ०49 ग्लोबल गाँव का देवता ,रणेन्द्र,भारतीय ज्ञानपीठ संस्करण 2010
10- पृष्ट सं०23 ,पठार पर कोहरा ,राकेश कुमार सिंह भारतीय ज्ञानपीठ  संस्करण,2005

राजकमल चौधरी के उपन्यास और सेक्सुएलिटी

अनिरुद्ध कुमार यादव

शोधर्थी, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली, संपर्क:ईमेल:anirudhdv1@gmail.com

सेक्स मानवीय जीवन की एक जैविक जरूरत है. जैसे जीवन जीने के लिए रोटी, कपड़ा और मकान की आवश्यकता होती है. उसी प्रकार से सेक्स की भी आवश्यकता महसूस की जाती है. सेक्स एक जैविक जरूरत ही नहीं बल्कि मानवीय संतति की विकास को सतत् बनाये रखने का एक साधन भी है. बगैर सेक्स के मानवीय संतति का क्रम बरकरार नहीं रह सकता. किंतु सेक्स का इन आवश्यक रूपों से भिन्न रूपों में भी प्रयोग किया जाता रहा है. हमारे पौराणिक आख्यानों में भी ऋषि कण्व, ऋषि पराशर, आदि की तपस्या को भंग करने के लिए स्वर्ग की अप्सराओं- मेनका, उर्वशी, रम्भा इत्यादि का साधन के रूप में इस्तेमाल किया गया. इसी तरह से कालान्तर में यौनिक-क्रिया को राजनीति, सत्ता, खरीद-ब्रिकी, भोग-विलास और जीविका के साधन के रूप में भी इस्तेमाल किया जाने लगा. सेक्स के  इन तमाम रूपों का वर्णन राजकमल चौधरी के उपन्यासों में दिखाई देता है.

राजकमल चौधरी के उपन्यासों में सेक्सुएलिटी के विभिन्न संदर्भ मौजूद हैं. उन्होंने यौनिक-क्रियाओं के कारणों की व्यापक स्तर पर पड़ताल की है. राजकमल चौधरी सेक्सुएलिटी को श्लीलता या अश्लीलता के चश्मे से नहीं देखते, बल्कि उसके सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक और मनोवैज्ञानिक कारणों की तलाश करते हैं, जो उसके मूल में है. श्लीलता और अश्लीलता के चक्कर में फंसकर राजकमल चौधरी रूकना न जानते थे. वे परिस्थितियों की विसंगति, विडंबना और विद्रूपता को ही दर्शाने को लक्ष्य मानकर चले हैं. इनके सभी उपन्यासों – ‘बीस रानियों के बाइस्कोप’, ‘एक अनार: एक बीमार’, ‘मछली मरी हुई’, ‘देहगाथा’, ‘अग्निस्नान’, ‘ताश के पत्तों का शहर’, ‘आदिकथा’, ‘पाथर-फूल’ आदि में यौनिक-क्रियाओं का चित्रण किसी न किसी रूप में अवश्य हुआ है. वह दौर ही ‘अकविता’ और ‘अकहानी’ का था, जिसमें यौनिक-संदर्भों, यौनिक-बिम्बों और यौन-प्रतीकों का बहुतायत प्रयोग किया गया.

‘एक अनार: एक बीमार’ उपन्यास यौनिक-क्रियाओं के चित्रण से भरा पड़ा है. उपन्यास के शुरूआत में ही राजकमल चौधरी ने लिखा है- ‘साहित्य में अश्लीलता आरोपित करने वाले ‘पुलिस-मनोवृत्ति’ के लोग यह किताब न पढ़ें, उनकी सेहत के लिए यही अच्छा रहेगा.”1 दरअसल राजकमल चौधरी साहित्य को जीवन के गहरे यथार्थ से जोड़कर देखने के पक्षपाती थे. इसलिए इन्होंने कलकत्ता शहर के डिम्पल लेन के भिखारियों, रिक्शा चालकों, मजदूरों, वेश्याओं, ठेले वाले इत्यादि लोगों को अपने इस उपन्यास का विषय बनाया है. इस वर्ग के लोगों के लिए यौन-व्यापार या नंगापन कोई माने नहीं रखता, उन्हें तो सिर्फ दो जून की रोटी की आवश्यकता है. उन्हें यह रोटी जो भी उपलब्ध करा दे, वे उसके लिए कुछ भी करने को तैयार हैं. सीता और ईश्वर के माध्यम से राजकमल चौधरी इन गलियों की सड़ांध, जीवन-शैली, क्रिया-व्यापार आदि का यथार्थ चित्रण किया है. किसी से भागने या छुपाने का कही कोई प्रयास नहीं है. जैसे – ‘स्त्रियाँ आतंकित होकर अपने अंडरवियर और पेटीकोट उतार फेकेंगी. पुरुष आतंकित होकर अपनी सूखी हुई नीली नसें स्त्रियों के अन्दर डालने की कोशिश करेंगे. मगर स्त्री सिकुड़ी हुई रह जायेगी. पुरुष सूखा हुआ बना रहेगा. नए बच्चे पैदा नहीं होंगे. जो बच्चे दुनिया में हैं, वे सिफलिस और कैंसर में मुब्तिला होकर आत्महत्या कर लेगें या पागल हो जाएंगे या बड़े शहरों और चौराहों पर ट्रैफिक पुलिस के गोलम्बर में खड़े होकर हस्तमैथुन करते रहेंगे.”2

इस उपन्यास में एक अन्य कथा भी चलती रहती है. जिसमें भी यौन-संदर्भों का चित्रण है. किंतु दोनों में अंतर है, जहाँ पहली कथा में यौन-संदर्भ जीवन जीने के आवश्यक साधन प्राप्त करने के लिए किए गए हैं, वहीं दूसरी कथा में सुख-सुविधओं से सम्पन्न वर्ग द्वारा अपने अकेलेपन, महानगरीय टूटन एवं तनाव को कम करने के लिए, यौनिक उन्माद को शांत करने के लिए विह्स्की, रम की सोलन इत्यादि का सेवन कर अन्ततः सेक्स में शांति ढूँढ़ने का प्रयत्न दिखाई पड़ता है. जैसे – “ईश्वर ज्यादातर अकेले इधर आता है, दोपहर में. खासकर बुधवार के दिन, जब ड्राई डे होता है और इस इलाके की मेम साहब, आधी औरतें, आधे मर्द, साहब, अपने कमरों में बन्द और बेहोश पड़े शराब या जुआ, ताश या लूड़ों, हस्तमैथुन या ‘होमोसेक्सुअलिटी’ करते होते हैं.”3

यहाँ पर ध्यातव्य है कि अपने समकालीनों में ‘होमोसेक्सुएलिटी’ पर बात करने वाले राजकमल चौधरी पहले साहित्यकार हैं. हिन्दी साहित्य की कहानियों, कविताओं और उपन्यासों में ‘होमोसेक्सुएलिटी’ राजकमल चौधरी के  माध्यम से ही दाखिल होती है. राजकमल चौधरी के बहुचर्चित उपन्यास ‘मछली मरी हुई’ में भी शीरी और प्रिया ‘होमोसेक्सुअल’ हैं. दोनों लेस्बियनहैं. इस उपन्यास का केन्द्रीय विषय- ‘होमोसेक्सुएलिटी’ नहीं है,  किंतु राजकमल चौधरी ने इसे विषय प्रस्ताव के रूप में अवश्य सामने रखा है. फिर भी उपन्यास में शीरी उसकी बहन,  फिर शीरी और प्रिया जाने-अनजाने अपने व्यवहार में ‘होमोसेक्सुअल’ हैं. किंतु उन्हें इस बात का इल्म नहीं है. भारत में ‘होमोसेक्सुएलिटी’ का यही रूप दिखाई पड़ता है. जिसे राजकमल चौधरी ने बहुत ही सूक्ष्म ढंग से चित्रित किया है. जैसे पास न होकर भी, शीरी और प्रिया के मन में काले ब्रोंज की काली मूर्ति की तरह निर्मल पद्यावत खड़ा है… मुस्कराता हुआ. दो ‘लेस्बियन’ औरतें और दोनों के मन में, दिलो-दिमाग में, अंग-अंग में ब्रोंज की मूर्ति.” 4


इस तरह दोनों ही स्त्रियाँ यौनोन्माद में एक पुरुष का साथ पाना चाहती हैं. जो उन्हें संतुष्ट कर सके, किन्तु सामाजिक बंधन के कारण वे ऐसा नहीं कर पाती और एक-दूसरे में ही आश्रय ढूँढ़ने लगती है.

राजकमल चौधरी  ने ‘ताश के पत्तों का शहर’ उपन्यास में भी लेस्बियन की चर्चा की है. बोनी उर्फ़ वन्दना सिंह एक लेस्बियन है. वह कहती है मीरा  जैसी खूबसूरत लड़की पूरे कलकत्ते में और नहीं है. मुझे खूबसूरत लड़कियाँ बहुत अच्छी लगती हैं. उनसे बातें करने में, उनसे हाथापाई करने में, उनके  गले में हाथ डालकर घूमने में, उनके  साथ रजाई के  अन्दर लिपटकर सोने में मुझे मर्दों से ज्यादा मजा  आता है. एकदम लगता है, मैं मर्द बन गयी हूँ. एकदम सिर से पाँव तक मर्द. लड़कियाँ मुझे पसन्द हैं, मर्द नहीं.5 किंतु राजकमल चौधरी  ने जहाँ भी ‘लेस्बियन’ की चर्चा की है, उसे एक बीमारी के  रूप में देखा है, वह चाहे ‘मछली मरी हुई’ की प्रिया हो या फिर ‘ताश के  पत्तों का शहर’ की वन्दना. जबकि दूसरी तरफ वे स्वतंत्र यौनिक-क्रिया का समर्थन भी करते हैं. यह राजकमल चौधरी  के  विचारों में द्वन्द्व को  दर्शाता है.


इसी तरह ‘बीस रानियों के  बाइस्कोप’ नामक उपन्यास में फिल्म-उद्योग जगत में व्याप्त यौन-क्रियाओं का वर्णन किया गया है. इसमें पुखराज और कुन्दन के  माध्यम से यथार्थ को अभिव्यक्त किया गया है. पुखराज कलात्मक फिल्मों का प्रतिनिध्त्वि करती है. जबकि कुन्दन व्यवसायिक फिल्मों के  रूप को व्यक्त करती है. जहाँ फिल्म डायरेक्टर कलाकार और फिनाॅन्सर का त्रिकोणीय संबंध् बनता है. जिसमें फिनाॅन्सर  फिल्म में पैसे लगाने के  बदले हीरोइन को कुछ  भी करने के  लिए मजबूर कर सकता है. फिल्म संसार के  भीतर हो रहे मानसिक एवं दैहिक शोषण और सस्ती लोकप्रियता एवं भौतिक सुखों की प्रबल आकांक्षा से प्रेरित अभिनेत्रियों का स्थितियों के  दबाव के  तहत निर्माता-निर्देशक के  आलिंगन में अपनी देह को परोसने की नियति इस उपन्यास का केन्द्रीय विषय है. साथ ही अवान्तर रूप से पंचसितारा होटलों, क्लबों और बियर-बार के  रंगीन, मादक और अभिजात्य वातावरण में स्थापित और नवोदित लेखकों, निर्माताओं, निदेशकों, सिने कलाकारों की गुजरती शामें, इन गुजरती शामों में शराब के  पेग के  साथ पीछे छूटते सामाजिक सरोकार और व्यर्थ की कला-मूल्यों की बहसें, तन और मन में उभरती देहभोग की पिपासा, फिल्मों में जगह पाने के  लिए भोग का खुला आमंत्रण देती मादा आँखेय्  आदि.6 इस उपन्यास में अपने कटु यथार्थ के  साथ उपस्थित हैं. जैसे- फिल्म में रोल पाने के  लिए कुन्दन मिस्टर मनचन्दा को रिझाती हुई,दोनों  हाथों से टेबल का किनारा पकड़कर वह थोड़ा आगे झुकी, अपनी छातियाँ टेबल की सतह पर उतर जाने दीं. नीली ओढ़नी को हवा में थोड़ा सरका दिया. एक पल मुस्कुराई. एक पल हल्की हो गई और अपने एक-एक शब्द में हल्की सी मिठास, हल्क़ा-सा नशा घोल-कर बोली – ‘मुझे शोखी बहुत ज्यादा पसन्द है, मिस्टर मनचन्दा! मगर शोख होने का कोई मौसम भी तो हो.’7

‘नदी बहती थी’ उपन्यास में भी एक कथा के  रूप में मिसेज सविताराय चौधरी , सीता, पूरबी, सोनाली आदि स्त्रियाँ देह-व्यापार में लगी हुई हैं. किन्तु मिसेज सविताराय चौधरी  और अन्य स्त्रियों की वेश्यावृत्ति में अंतर है. जहाँ मिसेज सविताराय चौधरी  उच्चवर्गीय भोग-विलास और यौन-उत्श्रृंखलता का प्रतिनिधित्व करती हैं, जिसे अपने यौनिक-उन्माद को शांत करने के  लिए सदैव पर-पुरुष का साथ आवश्यक है. वहीं सीता, पूरबी, शेफाली आदि नारियाँ आर्थिक दंश को सहन न कर पाने की स्थिति में समाज से छुप कर देह का व्यापार करती हैं. ताकि कुछ  पैसे मिल सके  और रोटी का इंतजाम हो सके . इसलिए शाम को तैयार होकर ऐसी महिलाएँ बस स्टाॅप, गली के  मुहाने, चाय की दुकान इत्यादि स्थानों पर खड़ी होकर अश्लील इशारे करती हुई देखी जा सकती हैं. जिस दिन इनके  देह के  खरीददार इन्हें नहीं मिलते, उस दिन इनके  घर चूल्हा नहीं जलता. राजकमल चौधरी  ने इस उपन्यास में यह भी दिखाया है कि इन स्त्रियों का कर्म भले ही बुरा है, किन्तु मन से ईमानदार हैं. कृष्णा भी वेश्यावृत्ति करती है और जब वह गर्भवती हो जाती है और स्वयं नहीं जानती यह बच्चा किसका है. इसलिए कृष्णा बड़ी ईमानदारी से कहती है,मैंने कई लोगों से कह रखा है कि यह बच्चा उन्हीं का है. और, कई लोगों ने मुझसे कह रखा है, कि यह बच्चा उन्हीं का है और मैंने लोगों से कहा है और लोगों ने मुझसे कहा कि मैं किसी से नहीं बताऊँ कि यह बच्चा उन्हीं का है.8 परन्तु इस तनाव को कृष्णा सह नहीं पाती और फाँसी लगाकर आत्महत्या कर लेती है. समाज में ऐसी ही कितनी कृष्णा, शेफाली, सोनाली, सीता और पूरबी हैं. जो आत्महत्या करने के  लिए अभिशप्त हैं.

राजकमल चौधरी  ने अपने उपन्यासों में महानगरीय जीवन के  अनेक चित्रा खींचा है. किन्तु इन चित्रों में सबसे चमकदार, स्पष्ट और प्रभावी चित्रा महानगर की उन आधुनिकता का है, जो सुख-सुविधा , भोग-विलास, इच्छा-आकांक्षा की पूर्ति और लिप्सा आदि के  लिए अपनी स्त्री-देह का भरपूर इस्तेमाल करना जानती हैं. वे देह को अपनी सफलता की सीढ़ी बना लेती हैं. ऐसी ही नारियाँ- झरना शर्मा, माया, कांति और लेडी नूर मुहम्मद हैं. जो ‘शहर था शहर नहीं था’ की पूरी रूपरेखा तैयार करती हैं. जहाँ नूर मुहम्मद अपने इसी गुण के  कारण विधान-परिषद में पहुँच जाती है. वहीं झरना शर्मा ‘आदर्श महिला सिलाई-कढ़ाई’स्कूल  की आड़ में तन का व्यापार करती है. धर्म  की आड़ में सच्चिदानंद राजनीति और देह-व्यापार दोनों ही करता है. लेडी-नूर-मुहम्मद के  द्वारा राजनीति में ठसक और बंका से उनका अनैतिक यौन-संबंध है. कांति एक विधवा  स्त्री  है. किन्तु वह अभी नवयौवना है. इसलिए उसके  देह के  प्यासे पुरुषों की कमी नहीं है. वह ‘कला-भवन’ के  नाम पर रुपये बनाने के  लिए अपनी सुन्दर काया का राजनैतिक उपयोग करती है. इन सभी स्थितियों को झरना शर्मा के  पति कामेश्वर शर्मा के  पत्र के  माध्यम से बहुत ही सूक्ष्मता के  साथ उपन्यासकार ने व्यक्त किए हैं-समूचा  शहर तुम्हारा दोस्त है.  इलाके  की हर औरत तुम्हें तुम्हारे नाम से जानती है. अपने स्कूल  की बनी हुई चीजें, बेबी-फ्राक , बाबा सूट, रूमाल, तकियों के  गिलाफ, टिकोजी, टेबल-क्लाॅथ, तुम पटना मार्केट की दुकानों में बेचती हो…. तुम बादल के  साथ सिनेमा देखने जाती थी, और वापस आकर मुझे बताती थी कि आज मंगलवार है, और इसीलिए हनुमान मंदिर में औरतों की जबर्दस्त भीड़ थी. तुम मुझसे बहाना करती हो.9

पूँजीवाद के  प्रभाव से बाजारीकरण की प्रक्रिया बहुत तेजी से बढ़ गयी. जिससे मनुष्य भी वस्तु के  रूप में  तब्दील हो गया. यही कारण है कि नारियों को एक्सपोज करना, नारी-देह का व्यापार करना या फिर नारी-सौन्दर्य का शहर में लोगों को अपने प्रोडक्ट को ज्यादा से ज्यादा बेचने के  लिए इस्तेमाल किया गया. बाजारीकरण के  दुष्प्रभाव ने मानवीय संवेदना को कुंद कर दिया. समाज के  सभी क्षेत्रों में व्यापार, राजनीति, शिक्षा, सामाजिक कार्य ;एन.जी.ओ. आदि कार्यों में स्त्रियों का व्यापक स्तर पर उपयोग किया गया. राजकमल चौधरी  के  उपन्यास ‘अग्निस्नान’ और ‘देहगाथा’ इसी बाजारीकरण के  बढ़ते प्रभाव को रेखांकित करते हैं. ‘अग्निस्नान’ की पात्र श्रीमती न सिर्फ अपने सौन्दर्य और तन का व्यापार करती हैं बल्कि वे वेश्याओं की दलाली भी करती हैं. वही लुलू जो एक लड़के  से प्यार करती है, किन्तु पैसे के  अभाव में वह नाइट क्लब में रिसेप्शनिस्ट बन कर मुस्कुराती  रहती है. ‘देहगाथा’ मैं, मेरी पत्नी और वह के  बीच के  त्रिकोणात्मक संबंधें पर टिकी है. देवकांत जो पैसे के  लालच में  पार्वती से शादी कर लेता है. वह पार्वती से नहीं बल्कि उसकी दौलत से प्यार करता है. यही कारण है कि बाद में देवकांत अजनबीपन, टूटन आदि का शिकार हो जाता है और जीवन से पलायन कर जाने का इरादा बना लेता है. उपन्यासकार बाजारीकरण के  प्रभाव को उद्घाटित करते हुए लिखता है -भारतीय स्त्री  के  लिए ऐसा स्वरूप, ऐसी आकृति, इतना सौन्दर्य पाना असम्भव है. इसलिए, श्रीमती को पहली बार अहसास हुआ कि उसकी सम्पत्ति और’पूंजी, एकमात्र उसका शरीर है.स्त्री को जब यह अहसास हो जाता है तो उसकी जिन्दगी बदल जाती है, वस्तुओं को देखने-परखने का उसका तरीका बदल जाता है. क्लियोपेट्रा औ’ हेलेन को यह अहसास हुआ था. इजिप्ट और ग्रीस की तारीख के  पन्ने बदल गए थे.10

राजकमल चौधरी ने हिन्दी के  साथ-साथ मैथिली भाषा में भी तीन उपन्यास लिखें. जिसमें मैथिल समाज के  रहन-सहन, रीति-रिवाज, बोली-भाषा, मैथिली-आन्दोलन स्त्री -पुरुष के  अवैध संबंध  इत्यादि का सटीक वर्णन किया गया है. फिर भी इन सब विषयों के  चित्रण में ‘सेक्सअलिटी’ एक बड़ा मुद्दा रहा है. ‘आन्दोलन’ उपन्यास की भूमिका में राजकमल लिखते हैं – आज  के  मनुष्य में तीन प्रवृत्तियाँ मुख्यतः देखी जाती हैं – क्षुध, आत्मरक्षा और यौन-पिपासा. ऐसी तीन प्रवृत्तियों का चित्रांकन लेखन का प्रयत्न रहा है.11 ‘आदिकथा’ उपन्यास में मैथिल समाज के  परम्परागत बंधन , जो एक सहज प्रेम को लेकर रहा है, को दर्शाना ही उपन्यासकार का मुख्य ध्येय रहा है. जबकि ‘पाथरफूल’ उपन्यास ‘सेक्सुअलिटी’ के  संदर्भ में सबसे महत्त्वपूर्ण है. यह उपन्यास अश्लील समझे जाने के  कारण किसी प्रकाशक द्वारा प्रकाशित नहीं हुआ. जो कुछ  प्रतियाँ प्रकाशित हो गई थी, उसे भी अश्लील प्रकाशन करने के  जुर्म में जेल हो जाने के  भय से प्रकाशकों ने जला दी. बमुश्किल राजकमल चौधरी  रचनावली के  संपादक देवीशंकर नवीन ने यह पुस्तक खोज निकाली.


‘आन्दोलन’ उपन्यास मैथिली भाषा को लेकर कलकत्ता शहर में मैथिल लोगों द्वारा चलाये जा रहे आन्दोलन को रेखांकित करता है. निर्मला एक ऐसी महिला है, जो मैथिली आन्दोलन से जुड़ी है. इनके  विषय में उपन्यासकार ने लिखा है – निर्मला जी ? यौवन-मदोन्मता, रूप-गर्विता, बुर्जुआ, रईसी ठाठक प्रतिफल- हिनका त चाही उत्तेजना …. चाहे मैथिली-आन्दोलनसँ भेटय, चाहे कोनो एकान्त पुष्पोद्यानमे पर-पुरुखक संग बैसलासँ, सुमधुर  कण्ठे धीरसमीरे  यमुनातीरे वसति वने वनमाली’ गओलासँ.12  निर्मला का क्रमशः भुवन और फूलबाबू से आकर्षण भी निर्मला के  चरित्र को दर्शाता है. उपन्यासकार ऐसी स्त्रियों को विषकन्या कहता है. एक दूसरा प्रसंग ‘सेक्सुएलिटी’ को लेकर इस उपन्यास में  नीलू का है. जो कमल को भैया कहती है. किन्तु यौन-उन्माद में रात को साये और ब्लाउज में कमल के  कमरे में पानी पीने के  बहाने जाती है. परन्तु जब कमल बहाने को समझ जाते हैं और नीलू को बहुत समझा-बुझाकर अपने कमरे से बाहर भेजना चाहते हैं. तब नीलू कहती है – लोक  किछु कहय कमल भैया! मुदा, हमरा नहि रहल जाइए नीलू बड्ड कातर भ, बड्ड करुण शब्दमे बजलीह13. इसी तरह एक अन्य प्रसंग सुशीला नामक वेश्या का है. जिसके  माता-पिता कलकत्ता में ही रहते हैं. सुशीला की माँ भी एक वेश्या है, जो खुद अपनी बेटी से भी देह-व्यापार करवाती है, क्योंकि इनके  लिए आमदनी का कोई अन्य स्रोत नहीं है. इस प्रसंग के  माध्यम से राजकमल चौधरी  वेश्या-जीवन के  कटु-यथार्थ और उनकी मनोदशा का बहुत सटीक चित्रण किया है.

‘पाथर-फूल’ उपन्यास में जमींदारी व्यवस्था समाप्त हो जाने पर भी जमींदार का रूतबा कायम है, को चित्रित किया गया है. फूलबाबू एक जमींदार है. जो निम्न जाति की स्त्रियों को भोगना अपना अधिकार समझते हैं. वे कादम्ब, इजोरिया जैसी कितनी ही स्त्रियों के  साथ अवैध संबंध में हैं. इसके  अतिरिक्त भी गाँव में राधा, जनकपुरवाली जैसी स्त्रियाँ भी हैं. जो सामाजिक बंधन या आर्थिक विवशता के  कारण खुले आम देह-व्यापार में लगी हुई हैं. राजकमल चौधरी  जनकपुरवाली के  विषय में लिखते हैं -महानंद बाबू की जाँघों के नीचे दबी, बलिदानी बकरे की तरह, पूरी रात और उसके  बाद पूरी-पूरी रात जनकपुरवाली रोती, चिल्लाती, मरती रही थी. महानन्द बाबू और उसके  बाद पूरे गाँव के  अनेक महानन्द बाबू ने, गुलाब के फूल जैसी कोमलांगी जनकपुरवाली को कोसी नदी की टूटी घाट बना दिया – जो आए, वही नहाए,14 नदी के  घाट को क्या!  प्रस्तुत उदाहरण में जनकपुरवाली की लाचारी, बेबशी और शारीरिक और मानसिक पीड़ा को व्यक्त किया गया है.

राजकमल चौधरी  ने ‘पाथर-फूल’ उपन्यास में ग्रामीण समाज में व्याप्त सहज अनैतिक यौन-संबंधों का चित्रण भी किया है. जहाँ चोरी-छुपे विवाह पूर्व और विवाहेत्तर संबंध बनाये जाते हैं. कौन पुरुष या कौन स्त्री  किस स्त्री  या पुरुष से ‘फंसा-फंसी’ है, उसका भी बखूबी चित्रण किया गया है. जिसमें नैतिकता, पाप-पुण्य जैसे विचार उनके  दिमाग में आते ही नहीं. राजकमल चौधरी  ने लिखा है – गाँव में खेत-खलिहान, बाग-बगीचा, दलान-आँगन में… यह स्वेच्छाचार नैतिक है या अनैतिक, आचार है या अनाचार – यह समाजशास्त्र और दर्शन का विषय है. किंतु सत्य इतना ही कि यह स्वेच्छाचारिता परम अनिवार्य सत्य है. सत्तन जी की बहन, गोपाल जी की बेटी,गोवर्धन की पत्नी, वैदिक जी की पोती किसी खेत-खलिहान में बाँस के  बगान में, और किसी घर के  पिछवाड़े में किसी झाड़ी में….15

उपर्युक्त वर्णन से स्पष्ट है कि राजकमल चौधरी  के  हिन्दी और  मैथिली दोनों ही भाषाओं में रचित उपन्यासों में ‘सेक्सुएलिटी’ एक अनिवार्य अंग के  रूप में मौजूद रही है. हालाँकि दोनों का परिवेश नितान्त भिन्न रहा है. हिन्दी उपन्यासों में महानगरीय जीवन में भोग-विलास की संस्कृति देखी जा सकती है. साथ ही आर्थिक विवशता के  कारण देह-व्यापार भी. जो कि मैथिली उपन्यासों में भी दिखाई पड़ता है. किंतु यौनोन्माद मैथिली उपन्यासों में नहीं है. इसमें ग्रामीण परिवेश में सामाजिक-जीवन का अनिवार्य अंग बन गए- अनैतिक यौन-संबंधें का चित्रण ज्यादा हुआ है. जो कि यथार्थपरक भी है. इस तरह से कहा जा सकता है कि राजकमल चौधरी  के  उपन्यासों में चित्रित ‘सेक्सुएलिटी’ अपने समय और समाज के  कठोर सत्य को सामने लाता है. यही इनकी महत्ता है.


संदर्भा सूची
  1.राजकमल चौधरी  रचनावली ;(खण्ड-6,) संपा.- देवशंकर नवीन, पृष्ठ संख्या- 58
  2.वही, पृष्ठ संख्या- 68  
        3.वही, पृष्ठ संख्या- 64
  4.मछली मरी हुई – राजकमल चौधरी, पृष्ठ संख्या – 134 
  5.ताश के पत्तों का शहर – राजकमल चौधरी, पृष्ठ संख्या- 112 
  6.राजकमल चौधरी: पूँजीवादी लोकतंत्रा का प्रतिपक्षी उपन्यासकार – डाॅ. सुभाषचन्द गुप्त, 
             पृष्ठ संख्या –    209-210
  7. राजकमल चौधरी रचनावली ;(खण्ड-6)संपा.- देवशंकर नवीन, पृष्ठ संख्या- 37-38
  8.राजकमल चौधरी रचनावली ;(खण्ड-5), संपा.- देवशंकर नवीन, पृष्ठ संख्या- 207
  9. वही, पृष्ठ संख्या- 320-321
  10.राजकमल चौधरी रचनावली ;(खण्ड-6), संपा.- देवशंकर नवीन, पृष्ठ संख्या- 251
  11.राजकमल चौधरी रचनावली ;(खण्ड-5), संपा.- देवशंकर नवीन, पृष्ठ संख्या- 19
  12.कृति राजकमल, संपा.- प्रो. आनन्द मिश्र, श्री मोहन भारद्वाज पृष्ठ संख्या- 154-551
     फुटनोट – निर्मला जी? यौवन-मदोन्मत्ता, रूप-गर्विता, बुर्जुआ, रईस ठाठ का प्रतिफल… इन्हें                   तो चाहिए  उत्तेजना… चाहे वह मैथिली-आन्दोलन से मिले, चाहे किसी एकान्त पुष्पोद्यान में पराए               पुरुष के साथ  बैठने से, सुमधुर कंठ से ‘धीर समीरे यमुना तीरे वसति वने वनमाली’ गाने से.
  13.वही, पृष्ठ संख्या- 160 लोग कुछ भी कहें, कमल भैया! किन्तु मुझे नहीं रह जाता है नीलू बहुत                   कातर होकर, बड़े करुण शब्द में बोलीं.
        14.राजकमल चौधरी रचनावली ;(खण्ड-5) ,संपा.- देवशंकर नवीन, पृष्ठ संख्या- 125
  15.  वही, पृष्ठ संख्या-125 

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