रण में सामाजिक सक्रियता की मिसाल हैं पंक्ति जोग

गुजरात के रण में नमक बनाने वाले समुदाय अगरिया को संगठित करने वाली 'पंक्ति जोग' की कहानी संघर्ष और नेतृत्व कौशल की कहानी है. पंक्ति सूचना अधिकार के क्षेत्र में भी काम करती रही हैं. 'स्त्री नेतृत्व की खोज’ श्रृंखला के तहत उनके काम और संघर्ष बता रहे हैं श्याम मारू. 




पंक्ति  जोग उत्तरी  गोवा के एक आदिवासी इलाके में बसे सोनल गाँव की रहने वाली हैं. बचपन और स्कूल के दिन काफी कठिनाईयों से गुजरे. गोवा के पहाड़ी क्षेत्र में बसे होने से स्कूल आने-जाने में काफी तकलीफ भी झेला, लेकिन पढाई जारी रखी.

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बचपन को याद करते हुए पंक्ति बताती हैं कि 8वें दशक में बिजली नहीं होती थी, रास्ते बड़े बेतरतीब होते. गोवा में 8 महीने तक बारिस का मौसम रहता था. पिता छोटे-छोटे व्यवसाय करते थे, जैसे मोटरसायकल के पायलेट का काम करने से लेकर परम्परागत व्यवसाय के तौर पर किसी और की खेती का काम तक, उससे ही परिवार का गुजारा होता था. पिता और घर की मदद के लिए पंक्ति मोमबत्ती बनाने का भी काम करती थी- काम के साथ पढाई जारी रखी उन्होंने.



आठ साल की उम्र में ही साने गुरूजी की पुस्तक ‘श्याम की माँ’ पढ़ी, जिसने उन्हें काफी प्रभावित किया. बाबा आम्टे के बारे में जानने के बाद बारह  साल की उम्र में ही उन्होंने बाबा आम्टेको पत्र लिखकर उनसे जुड़ने की इच्छा व्यक्त की.

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दसवीं तक शिक्षा छोटे शहरों से से पूरी हुई, आगे की पढाई पूरी करने के लिए बड़े शहर तक जाना हुआ और  फिजिक्स में  मास्टर डिग्री तक पढाई पूरी की.  कॉलेज की पढाई के साथ ‘साने गुरूजी’ के राष्ट्र सेवा दल के साथ जुडी,  और साथी विद्यार्थियों का एक ग्रुप बनाया. उस ग्रूप ने  स्लम इलाके के उन बच्चों को पढ़ना शुरू किया, जो पढाई नहीं कर पा रहे थे.

पंक्ति मास्टर्स इन सोशल वर्क की पढाई करना चाहती थी, दाखिला भी लिया, मगर कुछ कारणों से पढाई छोडनी पड़ी. हालांकि बताती हैं कि सामाजिक संस्था 'जनपथ’ के साथ काम करते करते हुए कॉलेज और पाठ्यक्रम से बेहतर शिक्षा उन्हें मिल गई है.



फिजिक्स में मास्टर डिग्री पूरी करने के बाद पंक्ति ने  नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ ओसियोनोग्राफी (NIO) में 1998 से 2001 तक रिसर्चर के तौर पर काम किया. यहीं से पीएच. डी  की आगे की पढाई पूरी करनी थी, मगर 2001 में आये गुजरात के भूकंप के बारे में सुनकर गुजरात जाने की इच्छा व्यक्त की,  संस्था के डायरेक्टर उन्हें मना कर दिया. भूकंप की विभीषिका को देखते हुए वे पीड़ा में थीं और जनवरी से लेकर सितंबर तक मनोमंथन में रहीं. फिर ‘जनपथ’ के उस वक्त के संचालक सुखदेव भाई से ईमेल पर संपर्क किया और गुजरात आने की और ‘जनपथ’ के साथ जुड़कर भूकंप की परिस्थितयों पर काम करने की इच्छा व्यक्त की. सुखदेव भाई के सकारात्मक जवाब से 15 दिनकी छुट्टी लेकर गुजरात आयी और फिर वहीं रह कर आगे काम करने का मन बना लिया. (NIO) से इस्तीफा दे दिया और परिवार में भी किसी को बताया नहीं, वे उसी वकत एनआईओ   से फ़्रांस जाने की स्कोलरशिप और पीएच.डी कर  कर वैज्ञानिक बनने की आशा छोड़कर  गुजरात चली आयीं और यही से गुजरात से नाता जुडा.

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जनपथ के साथ सामाजिक काम की शरुआत

2001 से गुजरात के भूकंप में जनपथ के साथ काम करने की शुरुआत हुई. पंक्ति बताती हैं कि "यहाँ मुझे शुरुआत से ही अपनी स्वतंत्रता से काम करने की आजादी रही है, साथ ही जनपथ के सभी वरिष्ठ कार्यकर्त्ताओं के अनुभव का भी लाभ मिलता रहा. पहले फेज में 4 साल तक चाइल्ड एंड प्रोग्राम में काम किया और कम्यूनिटी आधारित पुनर्वास का  काम किया, कच्छ में कुछ वक्त तक थेलेसेमिया ग्रस्त बच्चो के साथ भी काम किया और वहीं पर थेलेसेमिया ग्रस्त बच्चो के माता- पिता के साथ मिलकर संगठन बना कर उनको ही संचालक बना दिया."



अगरियों (नमक उत्पादन में काम करने वाले मजदूर) के साथ काम की शुरुआत 

पंक्ति बताती हैं, ‘1998 से गुजरात में जनपथ का वैचारिक रूप  से काम चल रहा था और व्यक्तिगत रूप से मुझे 2 बातों में रूचि रही,  अगरियों के बारे में और सूचना अधिकार आंदोलन में. इसी वजह से अगरियों  के साथ मिलकर उन्हें संगठित करने का काम शुरू किया- उनके बीच काम करते हुए पहली बात जो जरूरी लगी वह यह कि रण में जो नमक पकाने वाले अगरिया हैं, उनके बीच सबसे पहले एकता और संगठन की जरूरत है.  उस वक्त उनके बीच एक-दो संस्थायें काम कर रही थीं और सबसे बड़ी चुनौती अगरियों के अंदर से ही नेतृत्व उभारने की, ताकि वे अपने बल पर अपने प्रश्नों को हल करें, यही सबसे बड़ी चुनोती थी.

अगरिया समुदाय रणमें नमक पकाने का काम 600 साल से कर रहा है, यह काम व्यावसायिक भी है, लेकिन  आज भी उनके काम की  पहचान गैररक़ानूनी ही है,  जो उनकी लड़ाई का प्रथम मुद्दा रहा है.  सन 1972 में रण को अभ्यारण्य में परिवर्तित करते ही उनको वहां से हटाया जाने लगा.  सरकार के द्वारा व्यवसायिक पहचान पत्र न होने के कारण और सरकार के द्वारा ऐसी किसी पहचान पत्र की व्यवस्था न होने के कारण फ़ॉरेस्ट विभाग के अधिकारियों को घूस देकर करते रहे. पहचानके साथ सामाजिक जीवन की व्यवस्था भी उपलब्ध नहीं हो रही थी. आरोग्य, शिक्षा, पानी जैसी काफी मुश्किलें  आज भी उन्हें झेलनी पड़ती हैं.”

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दस साल की मेहनत के बदौलत अगरिया हित रक्षक मंच की रचना हुई, दस साल की कड़ी महेनत से पंक्ति ने अगरियों को खुद के बल पर अपने प्रश्नों को हल करने की स्थिति में खडा किया और उनमे से ही नेतृत्व भी खड़ा किया है. आज खुद अगरिया अपनी पहचान के लिये सरकार और व्यवस्था के सामने प्रश्न पूछता है. नेतृत्व के माध्यम से अपने ही संगठन के रूप में अगरिया काम करे यह ध्येय था. पंक्ति के द्वारा दस साल की महेनत में आज 400 से भी ज्यादा अगरिया संगठित स्वरुप में संघर्ष में शामिल हुए हैं. आज सभी अगरिया सूचना अधिकार,  नरेगा, फ़ॉरेस्ट राइट एक्ट और बाकि सब अपने हक़ के बारे में सक्रिय हैं. शैक्षणिक तालीम नहीं ली होने के बाद भी वे प्रक्रिया और कार्यवाही की समझ रखते है. समय के साथ वह सरकार के सामने आवाज भी उठाते  हैं और साथ ही सरकार की योजनाओं में मदद भी करते हैं.



पंक्ति का मानना है कि अगर सिर्फ उनकी सुविधाओ के लिये ही काम किया होता तो उनसे लंबी दूरी तक जाना मुश्किल होता- कुछ समय के लिये समाधान मिलता मगर वह स्थाई नहीं होता.  आज राज्य के चार जिलों में  कच्छ,पाटन,सुरेंद्र्नगर,मोरबी में अगरियों के लिये विकास समिति की स्थापना हुई है और सभी समिति में खुद अगरियाभी सदस्य के रूप में शामिल हैं.  संगठन के कार्य में महिलाओ की भूमिका के बारे में बताते हुए पंक्ति कहती हैं, ‘आज अगरियों के परिवार से महिलायें पूरी तरह भागीदार नहीं बन पाई हैं, इसकी वजह रण में परिवहन की कमी है. एक जगह से दूसरी जगह जाना और मदद के कामो में भागीदार बनना, परिवहन की असुविधा और खुद उसके लिए सक्षम न होने के कारण संभव नहीं हप पाता है, मगर धीरे - धीरे इसे भी ख़त्म करने की कोशिश की जा रही है.

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पंक्ति कहती हैं, ‘व्यक्तिगत कोई महत्वाकांक्षा नहीं है और न रहेगी. बस सूचना अधिकार के काम में ही आगे बढकर काम करना है और इसी काम को लगातार करते रहना है . सूचना अधिकार में मेरा अपना पूरा विश्वास है और गाँव के सबसे आख़िरी व्यक्ति को इसका लाभ हो यही लक्ष्य है.


श्याम मारू  सामाजिक कार्यकर्ता हैं और विकास पत्रकारिता से जुड़े हैं. संपर्क : 9512373724
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