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बाल गंगाधर‘बाग़ी’ की कविताएँ

  बाल गंगाधर‘बाग़ी’

शोधार्थी जे.एन.यू. नई दिल्ली संपर्क : 09718976402 Email. bagijnu@gmail.com

अलग आस्वाद और बिंबों के साथ कवि बाल गंगाधर  बागी अपनी कविताओं के लय से न सिर्फ श्रोताओं को झुमाते हैं, बल्कि सामजिक क्रान्ति के सन्देश भी देते हैं. बागी को नीले आकाश और आंबेडकरी आकांक्षाओं का कवि कहा जा सकता है 



गेहूँ और कान की बाली


गेंहूँ की बाली खेतों में,मन की डाली में डोल रहें
धूप छाँव के कंधों पे,हर रहस्य हैं अपना खोल रहें
बालाओं के कानों बाली,नज़रें कितनी हैं टटोल रहें
घर की बाली से खेतों तक,सवर्णों के मन डोल रहें

पैदा घर की दहलीजों में,कितने काँटों के बींधों से
वो जवां हुई नज़रों में तड़प, कितने भौरों के सीने में
चलती है वह मटक जहाँ,दरिया जिसपे मनमानी है
बेकस कश्ती भौरों में तड़पती,उसकी यही कहानी है

खाये हों थापेड़े मौसम के,बीज से बाली बनने तक
कितने ओझल दिन रैन हुए,बीज से रोटी बनने तक
कितनी दोपहर में नग्न खड़ी,सुनहरी,लाली के जैसे
क्यों? दूर हुई खलियानों से,घर जाती हुई सवर्णों के

दोनों बाली की दशा एक,न घर मेरे रह पाती हैं
अपनी हाथों से निकल,लाचार हमें कर जाती हैं
दोनों पे मेहनत खर्च मेरे,कई ख्वाब बुन जाती हैं
अनन्त प्रश्न सवर्णों के,घर जा करके बन जाती है

 दलित नारी का सौन्दर्य

झील सा निर्मल तेरा चितवन, फूलों जैसी काया है
मलय समीर तेरा चंचल मन,क्यों हसिया हाथ में आया है
सुमन की रंगत फूलों के संग,तेरे रंग पसीने हैं
लट छितराये बिखरी भौंहे, नैनों के रंग पीले हैं

सुर्ख लबों का रंग है सूखा,वीरां रेगिस्तानॊं सी
ढूँढ रही विधवा- सी वह,दुनिया रंग बहारों की
चातक जैसा धैर्य है उसका, अभिलाषा की वर्षा का
मिल जाये दो वक्त की रोटी, घर कपडा मेरे बच्चों का

मेरे आँसू हिमालय की निकलती,नदियों जैसे हैं
मेरे अहसास भी जलती चिताओं जैसे हैं रोशन
यही है सिलसिला बद से मेरी बदहाल हालत की
ढलती शाम की मानिन्द,बुझती शमाँ सी रौशन

गेंहू धान सरसो की डांठ काटती हूँ
भूँखें पेट बच्चों संग रात काटती हूँ
धूप ठंडी वर्षा की ध्यान छोड़कर के
कभी बुन के सपनों के तार काटती हूँ

क्यों और अब तक हिसाब लोगे ?
कब मुझे इसका जवाब दोगे ?
बेबस कर लूटी इज्ज्त का
कब तक उजडा शबाब दोगे ?

जब खो जाती पहचान यहाँ
अपनी धरती पर छाँव यहाँ
क्या मैं छुआछूत की जननी हूँ
ये दुनिया मुझे बताओ यहाँ

हर रोम है जलता सुलग-सुलग
जब लोग निहारें गाँव शहर
न मिले इज्जत मर्यादा से
मनुस्मृति की कटुता गाथा से !

दिन रात खटूँ मशीनों सी
पेट पीठ की बन छाया
अपशब्द अभद्र व्यवहारों की
अपमानित जाति मेरी काया !

रह-रह कर बादल सपनों का
नयनों की घटा बन जाता है
कभी तन्हाई,  संग अपनो के
कभी ज्वाला में ढल जाता है.

हम तुम्हारा बलात्कार कर देंगे: भारत माता की जय!

 संजीव चंदन 


ऐसा नहीं है कि उन्होंने पहली बार गुरमेहर कौर को और उसके दोस्तों को ही बलात्कार की धमकी दी है- ऐसा वे पहले भी करते आये हैं, क्या फर्क पड़ता है वे किस छात्र संगठन में हैं या किस समूह में- वे राष्ट्रवादी हैं, उनके राष्ट्रवाद का मतलब है ‘हाई कास्ट हिन्दू मेल’, यानी ‘सवर्ण हिन्दू पुरुष’. उनका राष्ट्रवाद लिंग केन्द्रित है- फैलससेंट्रिक.

वे स्वयंभू राष्ट्रवादी किसी अल्पसंख्यक की आवाज को पाकिस्तान भेज देना चाहते हैं, किसी दलित की आवाज पर आवाज पर उसे पीटना चाहते हैं, उसे मरने को मजबूर करते हैं, किसी स्त्री की आवाज को बलात्कार से दबा देना चाहते हैं- ऐसा करते हुए उन्हें कथित भारत माता की जय कहने में उन्माद और अतिरेक का आनंद आता है, भारत माता की जय, वन्दे मातरम या जय श्रीराम – वे ऐसा कुछ भी चीख सकते हैं, जब वे राष्ट्रवादी उन्माद में होते हैं.

वे सत्ता के संरक्षण में इतने निर्भीक होते हैं कि घटना-दर-घटना अंजाम देते जाते हैं और सत्ता का शीर्ष उनके बेशर्म बचाव में खड़ा हो जाता है, वह भी राष्टवाद की ढाल के साथ. अभी ज्यादा दिन नहीं हुए, कुछ ऐसे ही सिरफिरों ने एक लेखिका नीलिमा चौहान  के खिलाफ भाषिक बलात्कार को अंजाम दिया तो उसके भी पहले कविता कृष्णन जैसी सक्रिय एक्टिविस्ट के खिलाफ भी या दिल्ली विश्वविद्यालय की एक प्रोफ़ेसर के खिलाफ भी. सोशल मीडिया में ऐसे कई उदाहरण हैं 10वीं की छात्रा कनुप्रिया इन राष्ट्रवादियों के भाषिक हमले का शिकार हुई.  वे ऐसा हर रोज करते हैं. गुरमेहर कई और भी हैं- वे सब, जो उनके सवर्ण-पुरुष केन्द्रित, लिंग केन्द्रित राष्ट्रवाद से अलग भी किसी राष्ट्र को जानते समझते हैं.

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संकट कई और भी हैं- उनकी आक्रामकता इतनी प्रबल है कि हम सब राष्ट्रवाद-राष्ट्रवाद के शोर में शामिल हो गये हैं, जिसे 20वीं सदी में ही रवींद्रनाथ टैगोर जैसे लोगों ने नकार दिया था. ऐसा भी नहीं है कि सत्ता संरक्षित यह बलात्कारी राष्ट्रवाद एकतरफा विजयोन्माद में हो, उसे गुरमेहर जैसे कई लडकियां चुनौती दे रही हैं, कई लड़के चुनौती दे रहे हैं- उसके खिलाफ संवेदनशील लोगों की एक पूरी जमात है. दिल्ली विश्वविद्यालय में सामूहिक प्रतिरोध के लिए जुटे लोग ऐसा ही तो सन्देश दे रहे हैं. ये वे लोग हैं, जो पुणे से लेकर, हैदराबाद तक, जेनएनयू ,दिल्ली विश्वविद्यालय से लेकर जाधवपुर तक लगातार प्रतिरोध कर रहे हैं- सत्ता की निरंकुशता को इन लोगों से डरना चाहिए.

गुरमेहर कौर 

संकट यह है कि एक तार्किक बात को वे अतार्किक सेलिब्रेटी चकाचौंध से दबा देना चाहते हैं. पहले उनके पास एक अनुपम खेर होते थे, इस बार तो वीरेन्द्र सहवाग, गीता फोगट से लेकर योगेश्वर दत्त तक की फ़ौज खड़ी है. राष्ट्रवादियों की ही ‘कारगिल भावुकता’ से ‘खेल राष्ट्रवाद’ की भावुकता लड़ने को तैयार है. इस सब के बीच वह लडकी, 20 साल की लडकी गुरमेहर जो कहना चाहती थी, वह तो कहीं पीछे ही छूट गया. दरअसल बलात्कारी राष्ट्वादियों की जमात अपने बनाये दायरे से बाहर कुछ समझना नहीं चाहती, समझना उनके वश की बात नहीं है, क्योंकि उनकी समझ पर नागपुर (संघ मुख्यालय) का ब्रेनवाश हावी है.

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संकट यह भी है कि गुरमेहर कौर से मुकाबले के लिए इन बलात्कारी राष्ट्रवादियों के पक्ष में कुछ स्त्री चेहरे भी सामने आ जाते हैं- जो छात्र संगठनों से लेकर दुर्गावाहिनी तक सक्रिय रहते हुए यह सोच भी नहीं पाते कि बलात्कार की यह भाषा कैसे उनके खिलाफ भी एक स्टेटमेंट है, उनकी सक्रियता के खिलाफ भी एक चेतावनी. वे फैलससेंट्रिक राष्ट्रवाद के पक्ष में खडी एक टूल भर ही तो होती हैं अन्यथा एक स्त्री का भाषिक बलात्कार या उसे मिलने वाली बलात्कार की धमकी उनके लिए सुकून और राष्ट्रवादी स्वर्ग का विषय कैसे हो सकती है. यह समझ से परे है कि किसी की चेतना इतनी कुंद कैसे की जा सकती है कि वह अपने ही वर्ग के खिलाफ एक हथियार की तरह इस्तेमाल होने लगे. गुरमेहर के खिलाफ किसी गीता फोगट या किसी जोशी, झा को देखकर आश्चर्य और दुःख होता है.

गुरमेहर कौर का शान्ति सन्देश, जिसके सन्देश समझने की बजाय तथाकथित राष्ट्रवादी उन्हें ट्रोल करने लगे…

दुखद यह भी है कि आज जब विश्वविद्यालयों सहित पब्लिक स्पेस पर पीछे छूट गये समूहों की भागीदारी बढ़ी है, बल्कि यह सिलसिला शुरू ही हुआ है, तभी सवर्ण-पुरुष केन्द्रित विमर्श, भाव और भाषा का माहौल बन रहा है. बलात्कार की ये धमकियां इस स्पेस को पुनः छीन लेने की कवायद ही तो हैं.

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सुखद यह है कि बलात्कारी राष्ट्रवाद के खिलाफ दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रदर्शनों में लड़कियों की बहुतायत देखने को मिल रही है. ऐसा देश भर में हो रहा है. हम सब उम्मीद ही कर सकते हैं और इस उम्मीद को सफल बनाने में शामिल हो सकते हैं कि समय को पीछे की ओर ले जाने की जिद्द पर अड़े बलात्कारी राष्ट्रवादियों को एक दिन हार माननी ही पड़ेगी!

बहनों, हम तुम्हारे संघर्ष में तुम्हारे साथ हैं, लेकिन इस लड़ाई की अगुआई तुम्हें ही करनी चाहिए. और हां, थकना नहीं या पीछे नहीं हटना, इतिहास से सबक सीखो, क्योंकि लड़ाई के मोर्चे और भी हैं, जहां तुम्हें होना चाहिए ! यह लड़ाई सामूहिकता और निरंतरता की लडाई है, क्योंकि बलात्कारी राष्ट्रवादी तुम्हें शुंग काल में खीच ले जाना चाहते हैं, मनुस्मृतीय विधानों में जकड़ देना चाहते हैं.

ब्राह्मणवाद,पितृसत्ता और पुनरुत्थानवाद की चुनौतियों से निपटने की जरूरत

स्त्रीकाल और राष्ट्रीय दलित महिला आंदोलन द्वारा वर्तमान का ‘सामाजिक और सांस्कृतिक संकट तथा दलित साहित्य के समक्ष चुनौतियां’, और ‘ समता की समग्र समझ: दलित स्त्रीवाद’ विषय पर एक दिवसीय सेमिनार सत्ता विरोधी वक्तव्य के साथ आज सम्पन्न हुआ। सेमिनार के वक्ताओं ने ब्राह्मणवाद, पितृसत्ता और पुनरूत्थानवाद की चुनौतियों से निपटने की जरूरत पर जोर देते हुए कहा कि आज राष्ट्रवाद के नाम पर जिस तरह की आक्रामकता देखी जा रही है, वह एक राष्ट्र के स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं है. प्रोफ़ेसर चौथीराम यादव के इस प्रस्ताव से उपस्थितों ने सहमति जताई कि आज कमजोर राजनीतिक विपक्ष के दौर में विश्वविद्यालयों के विद्यार्थी ही वास्तविक प्रतिपक्ष हैं.
प्रथम सत्र में वर्तमान का ‘सामाजिक और सांस्कृतिक संकट तथा दलित साहित्य के समक्ष चुनौतियां’ विषय की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ आलोचक चौथीराम यादव ने कहा कि ‘कलबुर्गी, पानसारे आदि लेखकों की ह्त्या कोई नई घटना नहीं है, ब्राह्मणवादियों ने भक्तिकाल में भी विरोधी लेखकों की हत्याएं करवाई है. उन्होंने कहा कि रामराज्य को आदर्श बनाकर पेश करने वाली ब्राह्मण चेतना ने दलित संत कवि रैदास की कल्याणकारी राज्य की संकल्पना बेगमपुरा को तबज्जो तक नहीं दिया, जबकि रैदास कहते हैं: ‘ऐसा चाहूँ राज्य मैं जहां मिलै सबन को अन्न, छोट-बड़े सब सम बसै रैदास रहे प्रसन्न.” चौथीराम यादव ने वर्तमान में हिंदुत्ववादी उत्साह के खतरे और उसे संबोधित करने की दलित साहित्य की भूमिका को जरूरी बताया.
सत्र की शुरुआत में लेखिका रजनीतिलक ने दलित साहित्य की प्रवृत्तियों पर अपनी बात कहते हुए प्रतिरोध को उसकी मूल प्रवृत्ति के रूप में चिह्नित किया साथ ही इस बात पर चिंता जताई कि अभी दलित साहित्य अपनी अस्मिता की दावेदारी के साथ दर्ज ही हो रहा है कि इसके ही एक खेमे से ‘दलित शब्द’ पर ही आपत्ति दर्ज की जा रही है.”
 
आलोचक बजरंग बिहारी ने कहा कि ‘रामजस कॉलेज सहित हालिया घटनाओं को लेकर चिंतित हूँ, यह चिंता आज के विषय से भी जुड़ जाती है, जिस भाषा और भंगिमा के साथ राष्ट्रवाद को परोसा जा रहा है वह खतरनाक है. दलित साहित्य को इन सवालों को, उग्र हिंदुत्व के खतरे के सवालों पर विचार करना होगा.”
 
युवा आलोचक गंगा सहाय मीणा ने वर्तमान की स्थितियों पर चिंता व्यक्त करते हुए उससे हो रहे संघर्षों को रेखांकित किया. उन्होंने कहा कि ‘ सारे संघर्षों को वास्तविक रूप से एक साथ आना होगा. जय भीम लाल सलाम को भी और उसे विस्तार देते हुए जय भीम जोहार जयपाल तक, ऐसा कहते हुए  गंगा साही  संविधान निर्माण के दौरान जयपाल सिंह मुंडा और बाबा साहेब आंबेडकर के संवादों को ख़ास तौर पर रेखांकित कर रहे थे.
 
दूसरे सत्र में ‘समता की समग्र समझ: दलित स्त्रीवाद’ विषय पर वक्ताओं ने दलित स्त्रीवाद की सैद्धांतिकी और उसकी मुख्य स्थापनाओं पर बात की. वक्ताओं ने जेंडर, जाति और वर्ग के सवालों को दलित स्त्री के नजरिये से व्याख्यायित किया. छात्र एक्टिविस्ट और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में शोधरत अपराजिता ने दलित पैंथर के घोषणा पत्र को रेफर करते हुए दलित शब्द के भीतर महिला अस्मिता को शामिल किये जाने की ऐतिहासिकता पर बात की और साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि इस ऐतिहासिकता के बावजूद दलित स्त्रियों को अपनी बात क्यों कहानी पड़ी.
 
आलोचक कवितेंद्र ने जहां दलित स्त्रियों के दोहरे शोषण को रेखांकित करते हुए जाति और जेंडर को शोषण की कैटगरी के रूप में चिह्नित किया वहीं उन्होंने कहा कि शोषण तो त्रिस्तरीय है, यानी वर्ग भी एक कैटगरी है. साथ ही उन्होंने कहा कि सभी अस्मिताओं को, सारे संघर्षों को अनिवार्य शत्रुता से बचते हुए साझे संघर्ष की भूमिका बनानी चाहिए.’
आलोचक और रचनाकार रजनीदिसोदिया ने फिल्मों और साहित्य के माध्यम से अलग-अलग जाति-समूहों की स्त्रियों की अलग-अलग मुक्ति प्राथमिकताओं को स्पष्ट किया और दलित स्त्री के अपने संघर्ष में सामूहिकता के भाव और सवर्ण स्त्री के संघर्ष में निजता के भाव को चिह्नित किया.
 
स्त्रीवादी अधिवक्ता अरविंद जैन ने आंतरिक नेतृत्व की जरूरत पर जोर दिया. उन्होंने यह भी सपष्ट किया कि जबतक दलित स्त्री और स्त्री के निजी संपत्ति के अधिकार सुनिश्चित नहीं होंगे,  उतराधिकार को पुत्राधिकार से मुक्त कर पुत्र्याधिकार तक नहीं विस्तृत किया जाएगा तब तक उसकी यौनिकता पर नियंत्रण की व्यवस्था बनी रहेगी.
 
सत्र की अध्यक्षता करते हुए रचनाकार और आलोचक अनिता भारती ने कहा कि सत्र का विषय ‘ समता की समग्र समझ: दलित स्त्रीवाद’ ही अपने-आप में दलित स्त्रीवाद की सैद्धांतिकी सपष्ट कर देता है. उन्होंने दलित स्त्री के लेखन और सवर्ण स्त्री के लेखन में विषय और ट्रीटमेंट के भेद पर भी बात की.
 
स्त्रीकाल के संपादक संजीव चंदन ने आयोजन के उद्देश्य को लेकर बताया कि ऐसे आयोजनों के माध्यम से व्यवस्था को तत्कालीन और सर्वकालिक चुनौतियों के लिए आयोजन के महत्व पर जोर दिया. उनके अनुसार इन संवादों से वर्चस्वशाली व्यवस्था और दर्शन के खिलाफ समतामूलक दर्शन को मजबूती मिलती है. टिपण्णीकार के रूप में महेश ठोलिया और भीम प्रज्ञा के संपादक हरेश पंवार ने अपनी बात कही.
 
दोनो सत्रों का संचालन क्रमशः अरुण कुमार और धर्मवीर सिंह ने किया. इस अवसर पर कई किताबों का लोकार्पण भी किया गया. ‘द मार्जिनलाइज्ड’ के द्वारा प्रकाशित और अनिता भारती के अतिथि संपादन में संपादित ‘दलित स्त्रीवाद’, मजीद अहमद द्वारा संपादित ‘मेरा कमरा’ सहित, रजनी तिलक की किताब पत्रकारिता एवं दलित स्त्रीवाद, टेकचंद का उपन्यास दाई, सुशीला टाकभोरे का उपन्यास तुम्हें बदलना ही होगा और कावेरी की आत्मकथाम  टुकड़ा टुकड़ा जीवन आदि किताब लोकार्पित किये गये.
 कार्यक्रम का प्रायोजन जयराम यादव,  चेयरमैन संतोष देवी चैरिटेबल ट्रस्ट जखराना का था.

शूद्रा: एक समाज शास्त्रीय अध्ययन (धर्मशास्त्रीय दृष्टिकोण से)

डा .कौशल पंवार

  युवा रचनाकार, सामाजिक कार्यकर्ता ,  मोती लाल नेहरू कॉलेज , दिल्ली विश्वविद्यालय, में संस्कृत  की  असिस्टेंट प्रोफ़ेसर संपर्क : 9999439709



सांस्कृतिक अतीत के दीर्ध पटल पर दृष्टिपात कर ‘शूद्रा’ के संदर्भ में क्या अवधारणाएं मिलती हैं और उसके सामाजिक निहितार्थ क्या रहे हैं उसका अध्ययन करने का यहाँ उपक्रम है. भारतीय संस्कृति का इतिहास अत्यन्त प्राचीन माना गया है. मिथकों की मानें तो सतयुग, त्रेता, द्वापर व कलियुग के रूप में चार युगों का वर्णन है. प्रत्येक युग की अपनी ही विशेषताएँ है, अपने ही बनाए गये नियम है तथा अपने ही जनमानस के लिए विभिन्न आदर्श है. स्मृतियाँ भी इसी प्रकार विभिन्न युगों के जीवन को सुचारु रूप से चलाने के लिए निर्धारित किए गए नियमों का संकलन है. सतयुग में मनु प्रोक्त धर्मशास्त्र की प्रधानता थी, त्रेता युग में गौतम प्रणीत धर्मशास्त्र की प्रधानता रही, द्वापर में शंख के द्वारा कहे गये धर्मशास्त्र प्रधान रहे तथा कलियुग में पूर्वयुगीन पाराशर के धर्मशास्त्रों में धर्म-व्यवस्था समुचित बताई गयी. (1)


जितो धर्मो ह्यधर्मेण सत्यं वानृतेञ्च, 
जिताश्चैरेश्च राजानः स्त्रीभिश्च पुरुषा जिताः.
सीदन्ति चाग्निहोत्राणि गुरुपूजा प्रणशयति,
कुर्मायश्च प्रसूयन्ते तस्मिन्कलियुगे सदा॥ (2) 

यदि स्त्री धूर्त पति का अवदान करती है तो वह मृत्यु के अनन्तर कुतियां अथवा सूकर योनि को प्राप्त करती है. यथा:
दरिद्रं व्याधितं धूर्तं भर्तारं याऽवमन्यते.
सा शुची जायते मृत्वा सूकरी च पुनः पुनः॥ (3)

पति के जीवित रहने पर जो नारी निराहार रहकर व्रत का आचरण करती है, वह स्त्री पति की आयु का हरण करती है और नरक को प्राप्त करती है. मनु के द्वारा कहा गया है कि जो स्त्री पति की आज्ञा के बिना व्रत का आचरण करती है, वह उसका तामस व्रत कहलाता है. महर्षि पाराशर ने स्त्रियों के गर्भ ठहरने व गर्भपात के लिए उन्हें ही दोषी ठहराया है. यथा:

बान्धवानां सजातीनां दुर्वृतं कुरुते तु या,
गर्भपातं च या कुर्यान्न तां संभाषयेत्क्वचित्.
यत्पापं ब्रह्महत्या द्विगुणं गर्भपातके,
प्रायश्चिते न तस्यास्ति तस्यास्त्यागो विधीयते॥ (4) 

जो स्त्री बन्धुओं, सजातियों के साथ दुराचारिणी हो जाये अथवा जो गर्भपात कराये, उससे कभी वार्तालाप न करें. जो पाप ब्रह्महत्या करने पर लगता है, उसका कोई प्रायश्चित नहीं है. इसलिए उस स्त्री का त्याग ही उचित है. स्त्री द्वारा गर्भ का धारण किया जाना स्त्री के दुराचार का परिणाम है या पुरुष (बन्धु-बान्धव या सजातीय) द्वारा बलपूर्वक सम्बन्ध बनाना. इस बात को ऋषि ने स्पष्ट नहीं कहा है. गर्भपात के पीछे ब्रह्महत्या के पाप को जोड़कर एक स्त्री के जीवन को आस्था व विश्वास के नाम पर जंजीरों मे जकड़ा गया है. महर्षि पाराशर ने स्त्रियों के लिए सती व ब्रह्मचर्य का समर्थन करते हुए कहा हैः

मृते भर्तरि या नारि ब्रह्मचर्यवृते स्थिता.
सा मृता लभते स्वर्गं यथा ते ब्रह्मचारिणः.
तिस्रः कोटयोऽर्धंकोटी च यानि लोमानि मानवे.   
तावत्कालं वसेत्स्वर्गें भर्तारं याऽनुगच्छति॥ (5)

महर्षि पाराशर ने स्त्रियों के लिए सती व ब्रह्मचर्य का समर्थन करते हुए कहा है:

मृते भर्तरि या नारि ब्रह्मचर्यवृते स्त्रिता,
सा मृता लभते स्वर्गं यथा ते ब्रह्मचारिणः.
तिसृ कोटयोऽर्धंकोटि च यानि लोमानि मानवे,
तावत्काल वसेत्स्वर्गें भर्तारं याऽनुगच्छति॥ (6)  



पति के मर जाने पर जो स्त्री ब्रह्मचर्य व्रत से परायण होकर अपना जीवन बिताती है, वह स्त्री, जिस प्रकार अपने आचरण में स्थित हुए ब्रह्मचारी स्वर्ग में जाते हैं, उसी प्रकार स्वर्ग को प्राप्त करती है. मनुष्य के शरीर में साढे तीन करोड़ रोग बताए गए हैं, उतने ही वर्ष तक वह स्त्री स्वर्ग को प्राप्त होती है. जो स्त्री पति की मृत्यु के उपरान्त दूसरा विवाह नहीं करती तथा विधवा के रूप में जीवन व्यतीत नहीं करती तो वह पति के साथ सती हो सकती है. इसका पुण्यफल भी उसे प्राप्त होगा. यथा:

व्यालग्राही यथा व्यालं बलाद्धरते बिलात्,
एवं स्त्री पतिमुद्धृत्य तेनैव सह मोदते॥ (7)

पति के मर जाने पर सती होती है वह स्त्री, जिस प्रकार सर्प को पकड़ने वाला बलपूर्वक बिल में से सर्प को निकाल लेता है, उसी प्रकार वह स्त्री भी पति का उद्धार करके स्वर्ग में उसी के साथ आनंद प्राप्त करती है.

इससे प्रतीत होता है कि स्त्री पर आस्था, विश्वास तथा स्वर्ग का लोभ आदि के नाम पर कर्तव्य आरोपित किए गए हैं. बालिकाओं के विवाहादि संस्कार शीघ्रातिशीघ्र सम्पन्न कर दिये जाने का विधान निर्मित कर दिया गया ताकि उनकी अपनी निर्णय शक्ति का विकास ही न हो पाए, इसके लिए अवश्य ही स्त्रियों की रक्षा का कारण बताया गया है. यथा:

अष्टवर्षा भवेद् गौरी नववर्षा तु रोहिणी,
दशवर्षा भवेत्कन्या अत ऊधर्वं रजस्वला.
प्राप्ते तु द्वादशे वर्षे यः कन्यां न प्रयच्छति,
मासि-मासि रजस्वत्याः पिबन्ति पितरोऽनिशम्.
माता चैव पिता चैव ज्येष्ठो भ्राता तथैव च,
त्रयस्ते नरकं यान्ति दृष्ट्वा कन्यां रजस्वलाम्॥ (8)  

आठ वर्ष की गौरी, नौ वर्ष की रोहिणी, दस वर्ष या उसके ऊपर की कन्या रजस्वला होती है. बारहवां वर्ष प्राप्त होने पर जो कन्यादान नहीं करता, प्रत्येक मास में होने वाले रज का सदा उसके पितर पान करते हैं. माता-पिता व बड़ा भाई तीनों रजस्वला कन्या को देखकर नरक को प्राप्त करते हैं. वस्तुतः नारी को समस्त रूपों में कठोर अनुशासन से बांधा गया है.


धर्मशास्त्रों में स्त्री  की महत्त्वपूर्ण भूमिका को स्वीकार करते हुए भी समाज में उनकी स्वतंत्रता तथा अधिकारों का हनन करके उनकी प्रगति के मार्ग को अवरुद्ध सा कर दिया था जिसमें सामाजिक विकास की प्रक्रिया में स्त्री की भूमिका काफी निर्बल हो गयी थी. उनसे तो साक्ष्य देने का देने का भी अधिकार छीन लिया गया था यथाकृ “स्त्री की बुद्धि अस्थिर होती है अतः वह गवाही के योग्य नहीं है.” (9) परन्तु स्त्रियों की साक्ष्य स्त्रियां हो जाती है “स्त्रीणां साक्ष्य स्त्रियः कुर्यः.” (10) धर्मसूत्रों और स्मृतियों का युग स्त्री सन्दर्भ की दृष्टि से बहुत उज्ज्वल नहीं था. तत्कालीन समाज में धर्म और समाज की रक्षा के नाम पर अनेकों ऐसी व्यवस्थाओं का नियमन हुआ जो स्त्री की गरिमा के विरुद्ध था.

‘ऋग्वेद’ की उपमा “अनवधा पतिणुष्टेव नारी” (11) से स्पष्ट है कि तत्कालीन समाज में पति संसर्ग में रहने वाली और पति के द्वारा सेवित पतिव्रता नारी को अनिन्धा, विशुद्ध चरित्र वाली माना जाता था. (12) ‘अथर्ववेद’ में पति के सहचर्य में रहने वाली साध्वी नारी को सुपत्नी कहा गया है. (13) ‘अथर्ववेद’ में विवाह संस्कार के एक मन्त्र में वधू को पति की अनुवर्तिनी बनने को कहा गया है. (14) वह अपने जीवन में वस्तुतः पति का अनुवर्तन करती थी. ‘ऋग्वेद’ के सायण भाष्य से विदित होता है कि देव-शाप से नपुंसक बने हुए आसंग नामक राजा को उसकी पत्नी ने अपनी तपस्या के बल पर पुंसत्व की प्राप्ति कराई थी. (15)

‘मनुस्मृति’ व ‘याज्ञवल्क्यस्मृति’ में नारी की मुक्ति सम्बन्धी अवधारणा और श्रेष्ठता को पाने का कारण बताते हुए मनु कहते हैं:
अक्षमाला वसिष्ठेन संयुताऽधमयोनिजा.
शारङ्गी मन्दकाले न जगामाश्चयर्हणीयताम्॥ (16) 

नीच योनि से उत्पन्न हुई अक्षमाला नामक स्त्री वशिष्ठ से विवाहित होने से तथा शरङ्गी नामक स्त्री मन्दपाल ऋषि से विवाहित होकर पुत्रता को प्राप्त हो गयी. आगे कहा गया है:

एताश्चान्याश्च लोकेऽस्मिन्नपकृष्ट प्रसूतयः.
उत्कर्ष योषितः प्राप्तः स्वैः स्वैः भ्रर्तृगुणैः शुचैः॥ (17)

भिन्न और नीच योनि से उत्पन्न हुई स्त्रियां इस संसार में अपने-अपने पति के शुभ गुणों के कारण श्रेष्ठता को प्राप्त हुई है.

उपर्युक्त दोनों श्लोकों में देखने योग्य बात यह है कि पति के प्रताप से ही पत्नियां मुक्त हो रही हैं तथा दूसरा शब्द आया है “नीचयोनि” इसका अर्थ क्या है? उपर्युक्त उद्धरणों में जो भावार्थ निकलता है वह स्त्री समुदाय की अस्मिता, उनके गुणों को न केवल पूरी तरह नकार देता है बल्कि पुरुष के संसर्ग में ही उसकी मुक्ति की बात करता है. पति जैसा चाहे, वैसा पत्नी करे. उसकी अपनी इच्छाएं, सपनें, धड़कनों, चाहतों का कोई मोल नहीं. वह अगर गुलाम बनकर रहे, कोई प्रतिकार न करे तो गुणवान और संस्कारित कही जायेगी. लेकिन अगर उसने जहाँ अपने सपनों को, चाहतों को स्वतन्त्र रूप से पंख लेने की कोशिश की तो सर्वप्रथम उसे चरित्रहीन, कलंकनी कहा जाएगा. एक और शब्द गढ़ा है पितृसत्तात्मक मूल्यों के निर्वहन वाले विद्वत् जनों ने “पतिता” यानि पति से इतर किसी से भी सम्बन्ध बनने पर वह पतिता कही जाती है. देह व्यापार करने पर वेश्या. इसी के समानान्तर यदि कोई पुरुष ऐसा करता है तो उनके लिए कोई ऐसा शब्द नहीं है, जो उसकी पहचान अलग बनाए? असल में प्राचीनकाल से लेकर आज तक पितृसत्तात्मक व्यवस्था ने निरन्तर ऐसे शब्दों, अर्थों और अवधारणाओं का निर्माण किया कि स्त्री के भीतर प्रतिरोध की चेतना विकसित ही न होने पाए. वह सेविका, मातृसत्ता की मूर्ति, अच्छी घरेलू पत्नी, पतिव्रता, सुगढ़ ग्रहणी, सेविका ही बनी रहे. जरा सा प्रतिवाद करने या घर की चैखट लाघंने पर चरित्रहीन होने का तमगा उस पर लगा दिया जाता है. इसलिए यहां पर कहा जाना चाहिये कि ब्राह्मणवादी वैचारिकी से निर्मित संस्कृति ने ऐसे पितृसतात्मक मूल्यों एवं जातिवादी चेतना का निर्माण किया जो आज तक भी निरन्तर समाज में स्थापित है और इसमें संस्कृत के धर्मग्रन्थों ने अनिवार्य भूमिका भी निभाई है. किसी भी तरह से इस व्यवस्था के नियमों को तोड़ने पर उनके लिए अनेक तरह से कड़े विधान और प्रायश्चित के नियम बनाये गये हैं. यथा:


१. भक्ष्याभक्ष्य का विधानरू स्त्री के वश में रहने वाले का अन्न नहीं खाना चाहिए –
अवीशस्त्री स्वर्गकारस्त्रीणित ग्रमयाणिनाम्.
शस्त्रविक्रयिकर्मारतन्तु वायश्र्ववृतिनाम्॥ (18)
२. वेश्यों के अन्न को नहीं खाना चाहिए.
३. मनु पत्नी के साथ भोजन का निषेध करते हैं यथा:
नाश्नीयाद्भार्यया सार्थं नैनामीक्षेत चाश्नतीम्.
युवतीं जृभ्भमानां व न चासीनां यथासुखम्॥ (19)

पुरुष स्त्री के साथ एक थाली में न खाये, भोजन करती हुई, छींकती हुई, जंभाई लेती हुई, मनमाने ढंग से बैठी हुई स्त्री को न देखे.
४. पुरुष पत्नी के सामने एक वस्त्र पहनकर एवं खड़ा होकर भोजन न करें.
५. याज्ञवल्क्य ने अपने से उच्च जाति की कन्या से बलात्कार करने पर मृत्यु दण्ड तथा अपनी या अपने से नीच जाति की कन्या से अनाचार पर भारी अर्थदण्ड की व्यवस्था की है.
६. पति की हत्या, गर्भपात या किसी नीच जाति के पुरुष संसर्ग से गर्भवती होने पर मृत्युदण्ड का विधान किया गया है. (20)
७. यदि कोई पुरुष किसी दासी, अपने बच्चे की दाई या नौकर की पत्नी से सम्भोग करता था तो उसे ५० पणों का दण्ड दिया जाता है. (21)

धर्मशास्त्र, जो मूलतः सूत्रों, स्मृतियों, कौटिलीय अर्थशास्त्र, महाकाव्यों, पुराणों टीकाओं एवं निबन्धकारों से मिलकर बने है, भारतीय ज्ञान-परम्परा का अकिंचन अंग माने गये है. इन सभी धर्मशास्त्रीय ग्रंथों में स्त्रियों के लिए असाम्यता का विधान ही वर्णित किया गया है स्त्री के लिए प्रयुक्त किए गए सम्बोधन लैंगिक असाम्यता के स्वर को मुखरित करते है. यथारू ओजस्वती (22), सहस्रवीर्या (23) सहीयसी (24) अत्यन्त बल वाली साम्राज्ञी (शासिका) (25) मनीषा (मन को वश में करने वाली) (26) राज्ञी (दीप्तिमान्) (27) सभा सदा (सभा के अधिकारी) (28) अषाढा (अपराजिता घोषित किया जाना) (29) यज्ञिया (यज्ञ करने वाली उपाधि से युक्त) (30) स्त्री हि ब्रह्मा बभूविथ (ब्रह्मा स्त्री से विभूषित है). (31)


किसी सभ्यता की आत्मा को समझने तथा उसकी उपलब्धियों एवं श्रेष्ठता के मूल्यांकन का सर्वोत्तम आधार उसमें महिलाओं की स्थिति का अध्ययन करना है. तदर्थ स्त्रियों की सामाजिक स्थिति को जानने का सर्वोत्तम उपाय है, उसको दिए गये अधिकारों के बारे में जानना.


* शिक्षा का अधिकार


‘ऋग्वेद’ में शिक्षा को मनुष्य की श्रेष्ठता का आधार माना गया है. (32) शिक्षा से व्यक्ति विशेष में बुद्धि, आत्मविश्वास एवं कार्य क्षमता का विकास होता है. वस्तुतः शिक्षा ही मनुष्य को सही अर्थों में मानवता से भूषित करती है. यह पिता के समान पथ-प्रदर्शक, माता के समान संरक्षिका होती है जो सदैव सच्चे मित्र की भांति मार्ग में सहायक होती है. प्राचीन काल में नगर एवं ग्राम से दूर आचार्यों के गुरुकुल के सन्दर्भ मिलते हैं.

भारतीय मनीषियों ने सम्पूर्ण जीवन को चार आश्रमों ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ एवं संन्यास में विभाजित करते हुए ब्रह्मचर्य को शिक्षा काल से जोड़ा था जिसका अर्थ था- ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए वेदाध्ययन एवं धर्म के अर्थ को समझना और सदा अस्तेयपूर्ण जीवन बिताते हुए व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त करना.

वैदिक युग में कुछ सन्दर्भ प्राप्त होते हैं. जहां पर ब्रह्मचारिणी के रूप में स्त्रियां शिक्षा प्राप्त करती थी. ऐसी कन्याओं को दो वर्गों में विभाजित किया गया था – 1. साधुवधू 2. ब्रह्मवादिनी. (33)

1. साधुवधू – जो विवाह पूर्व तक ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करती थी.
2. ब्रह्मवादिनी – जो गृहस्थ जीवन से विमुख होकर अपना जीवन तपस्या करके बिताती थी.
कुछ स्त्रियों का उल्लेख ही हमें प्राचीन साहित्य में मिलता है. केवल सन्तोषजनक कहा जा सकता है.


‘ऋग्वेद’ में मन्त्र की रचना करने वाली लगभग २० ऋषिकाओं का वर्णन मिलता है. यथा: घोषा काक्षीवती (ऋ.१०/३९/१-१४), गोधा (ऋ. ५/२८१-६), विश्ववारा (ऋ. ५/२८/१-६), अपाला (ऋ. ८/९१/१-७), निषत् बुहू (ऋ. १०/१०९/१७), अदिति (ऋ. १०/७२/ध्१-९), इन्द्राणी (ऋ. १०/८६/१-२३/१०, १४५/१-६), सरमा देवशुनी (ऋ. १०, १०८, २, ४, ६, ८, १०, ११), रोमशा (ऋ. १/१७९/१-६), उर्वशी (ऋ. १०/९५/२, ४, ७, ११, १३, १५, १६, १८), लोपामुद्रा (ऋ. १/१७९/१-६), यमीवैवस्वती ऋ.१०/१०/१, ३, ५, ६, ७, ११, १३), शाश्वती अङिरसी (ऋ. ८/१/३४), सूर्या (ऋ. १०/८५/१-४७), सावित्री (ये स्त्री ब्रह्मवादि स्त्रियां है, ऋ. १०/८५/१-४७), सिकतानिनावरी (ऋ.९/८६/११/२०), यमी वैवस्वती (ऋ. १०/१०/२, ३, ४, ६, ७, ११, १३), इन्द्रस्नुषा (ऋ. १०/२८/१), अगस्त्य स्वसा (ऋ. १०/६०/६), दक्षिणा प्रजापत्या (ऋ. १०/१०७/१-११), वागाम्भृणी (ऋ. १०/१२५/१-८), कुशिका रात्रि (ऋ. १०/१२७/१-८), ऋद्धा कामायनी (ऋ. १०/१५१/१-५), इन्द्र मातरः (ऋ. १०/१५३/१-५), शची पौलोमी (ऋ. १०/१५९/१-६), सार्दराज्ञा (ऋ. १०/१८९/१-३).

इन ऋषिकाओं से स्वतः सिद्ध होता है कि ऋग्वैदिक काल में कुछ ऋषिकाएँ अवश्य रही होंगी जिन्होने मन्त्रों और सूक्तों की रचना की थी. प्राचीन भारत में स्त्री शिक्षा निषेध के बारे में आभा मिश्रा पाठक (पृ. २६१) लिखती हैं कि उच्च वर्ग की कन्याओं का उपनयन संस्कार सम्पन्न होता था और वे विशिष्ट विषयों का अध्ययन करती थी परन्तु उच्च अध्ययन के लिए गुरुकुल में भेजने की प्रथा मान्य नहीं होने के कारण वह घर पर ही शिक्षा प्राप्त करती थी. परिवार के निकट सम्बन्धी उसे शिक्षा देते थे. उन्हें धर्म और दर्शन की विशेष शिक्षा दी जाती थी. ‘ऋग्वेद’ में अपाला द्वारा अपने पिता की कृषि कार्य में सहायता करने का वर्णन प्राप्त होता है. (34) गृह-कृषि कार्य हेतु कूपों से जल लाने वाली, (35) गाय दुहने वाली एवं मक्खन तैयार करने वाली, (36) कताई, बुनाई (37) एवं सिलाई (38) में निपुणता रखने वाली स्त्रियों के उदाहरण इस तथ्य को स्पष्ट करते हैं कि तत्कालीन स्त्रियाँ प्रतिदिन के कामों में भी पर्याप्त कुशल थी. गाय दुहने में निपुणता रखने के कारण ही उन्हें दुहिता भी कहा गया है. (39) तत्कालीन स्त्रियाँ युद्ध कला में भी निपुण थी. विश्पाल द्वारा युद्ध में घायल होना एवं अश्विनी कुमार द्वारा उसके पैरों की शल्य क्रिया किया जाना इस बात को ओर स्पष्ट करते हैं. (40) स्त्रियों के लिए गायन एवं नृत्य कला में पारंगत होने के सन्दर्भ भी प्राप्त होते हैं. (41) ‘तैत्तिरीय संहिता’ एवं ‘मैत्रायणी संहिता’ में स्त्रियों द्वारा नृत्य एवं गायन की शिक्षा प्राप्त करने का उल्लेख भी मिलता है. (42)

उपर्युक्त संदर्भ से ऐसा प्रतीत होता है कि ऋग्वैदिक काल में स्त्रियों की शिक्षा की व्यवस्था के लिए कुछ सन्दर्भ दिखते हैं लेकिन उनमें “शूद्रा” के लिए क्या व्यवस्था थी? इस सन्दर्भ में ‘ऋग्वेद’ भी मौन दिखाई देता है. द्विज वर्णा के लिए भी यह व्यवस्था सुदृढ़ रूप से दिखाई नहीं देती. कालान्तर में उसे भी सब अधिकारों से वंचित कर दिया गया.

संभवतः कहीं पर भी ऐसा उदाहरण नहीं मिलता कि शूद्र या शूद्र स्त्री भी ऋचाओं का सृजन किया करती थी. जिस प्रकार का विधान शूद्रों के लिए बना दिया गया था उसमें शूद्र स्त्री कैसे अलग रह सकती थी? उस पर भी शूद्र के लिए बनाये गये विधान पूरी तरह से लागू होते थे.

हमने पहले भी उल्लेख किया है कि धर्मशास्त्रों ने ऐसी विलगावपूर्ण सूक्तियों और मन्त्र/श्लोकों का निर्माण किया जिसमें स्त्री व पुरुष के रूप में ही समाज का विभाजन नहीं हुआ बल्कि ऊंची एवं नीची जाति के रूप में समाज बंटता चला गया. हालांकि इस बंटवारे का कोई ठोस वैज्ञानिक या प्रकृतिजन्य आधार नहीं था  बल्कि अपने वर्चस्व, प्रभुता एवं अपने वर्ग को बचाए रखना था. जिस प्रकार शिक्षा के क्षेत्र से शूद्र व अछूतों को बाहर किया गया, उसी प्रकार स्त्री को भी उससे बाहर किया गया. हालांकि कहीं-कहीं पर यह उल्लेख आता है कि प्राचीन समय में कुछ स्त्रियाँ शिक्षित थी और पिता और पति के साथ यज्ञ में शामिल हुआ करती थी. हम इस तथ्यात्मक, वास्तविकता या प्रमाणिकता का विश्लेषण करेंगें. लेकिन उससे पहले यहां शिक्षा के लिये यज्ञोपवीत संस्कार का सर्वप्रथम उल्लेख करेंगे. भारत में प्राचीन काल से ही वर्ण-व्यवस्था कायम कर दी गई थी. समाज चार वर्णों में बंटा हुआ था. ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य व शूद्र. एक अन्य वर्ग था अछूत जिसको किसी भी वर्ग में स्थान नहीं दिया गया था. अन्य जातियों की तरह स्त्रियाँ भी जातियों में बंट गई थी क्योंकि ब्रह्मा के अंगों से ये चार वर्ण प्रमुख रूप से बने थे. इसी से पुरुषों की उत्पत्ति हुई थी. स्त्री की उत्पत्ति ब्रह्मा के किस अंग से हुई? यह नहीं बताया गया और न ही यह अनिवार्यता समझी गई. पुरुषों की जातियाँ निर्धारित थी. केवल पुरुषों के कर्मों के आधार पर ही जातियाँ निर्मित की गई थी. स्त्रियों के कर्मों के आधार पर जातियाँ नहीं बनी, यह घोर आश्चर्य है. स्त्रियाँ तो किसी कर्म के लायक नहीं समझी गई थी. ब्राह्मण मुख है- क्योंकि वही वेद मन्त्रों व धार्मिक कार्यों का कर्ता व रचयिता था. उसी के आधार पर पत्नी ब्राह्मण हुई. यानि उसकी कोई पहचान नहीं थी. क्षत्रिय बाहु है – उसका गुण लड़ना, रक्षा करना इत्यादि है. वही देश, समाज, कुटुम्ब व परिवार का रक्षक है. वह शस्त्र धारण करता है इसलिए उसकी पत्नी क्षत्राणी कहलाएगी. उसकी भी कोई पहचान नहीं. तीसरे पायदान पर आता है वैश्य यानि जंघा- उसका गुण है चलना, व्यापार करना आदि. इसकी पत्नी भी वैश्य कहलाएगी. इसकी भी कोई पहचान नहीं. फिर चैथे पायदान पर खड़ा है शूद्र- यानि सेवाकार्य करने वाला. इसकी पत्नी शूद्राणी यानि सेविका. यहां पर यह ध्यान रखना चाहिये कि उपर्युक्त तीनों वर्गों की पत्नियाँ भी सेविकाएं ही हैं. पति के गुणों से ही उनकी पहचान है. वह न तो शास्त्र की शिक्षा ले सकती हैं या न ही शस्त्र की तथा वह न ही व्यापार कर सकती है और न ही स्वतन्त्र भ्रमण. इसी प्रकार तीनों वर्णों के पुरुष का ही उपनयन संस्कार होने की बात धर्मशास्त्रों में कही गई है. स्त्रियों के उपनयन संस्कार को मनु ने अलग ढंग से स्थापित किया है. शूद्र का उपनयन होता ही नहीं था क्योंकि उसकी जरुरत नहीं थी. उपनयन संस्कार को विद्यार्थी का श्रुति विहित संस्कार कहा गया है. यानि ‘उपनयनम् विद्यार्थस्य श्रुतिः संस्कारः’ इससे ऐसा प्रतीत होता है कि शिक्षा ग्रहण करने से पूर्व विद्यार्थी का उपनयन संस्कार अनिवार्य था. लेकिन स्त्रियों के लिये भी उपनयन संस्कार का विधान था, वर्णन करते हुये कहा गया है. यथा:

अमन्त्रिकास्तु कार्येयं स्त्रीणामावृदशेषतः.
संस्काराद्ये शरीरस्य यथाकालं यथाक्रमम्॥ (43)

केशान्त पर्यन्त नारी के समस्त कार्य (संस्कार) ठीक उसी प्रकार किये जाये, किन्तु वे वैदिक मन्त्रोच्चारण के बिना हो और नारियों का विवाह संस्कार ही उपनयन संस्कार के समान है. (44)



मनु की अनुसार स्त्रियों का विवाह ही यज्ञोपवीत हो, पतिसेवा ही गुरुकुल निवास हो और गृहकार्य ही यज्ञ के समान हो. इससे स्पष्ट होता है कि स्त्रियों को शिक्षा का अधिकार नहीं था क्योंकि शिक्षा के पूर्व उपनयन एक अनिवार्य धार्मिक एवं कार्मिक अनुष्ठान था. स्त्रियों के लिये पतिसेवा ही सर्वश्रेष्ठ विद्या एवं धर्म का पालन माना गया.


अब हम पुनः लौटते हैं उस कथन की प्रमाणिकता की ओर, जब यह कहा जाता है कि प्राचीन समय में बहुत सी स्त्रियां शिक्षित थी और यज्ञ अनुष्ठान आदि में बैठा करती थी. इस संदर्भ में प्राचीन धर्मग्रंथ के अध्येता मुद्राराक्षस का कहना है कि बहुत से लोग तर्क देते हैं कि, “‘ऋग्वेद’ की ऋचाओं की लेखिकायें लोपाद्रुमा जैसी स्त्रियां थी. वे वहां थी, शायद उन्हें ऋषिका का दर्जा मिलता रहा होगा पर निश्चय ही वे गिनी-चुनी स्त्रियों में रही होंगी जो मध्य एशिया से ब्रह्मणों के साथ आई होंगी” पर भारत में ‘ऋग्वेद’ गवाही देता है कि, “ब्रह्मण, ऋचाओं में इन्द्र से शत्रु को जीतकर स्त्रियां दिलाने की प्रार्थना कर रहा था.” (45) इस प्रकार के विचार अन्य धर्मग्रन्थों में तथा महाकाव्यों में भी दिखाई देते हैं जो स्त्रियों की कारुणिक दशा का वर्णन करते हैं. महाभारत में भी स्त्री के लिये द्रष्टव्य है- “क्षुरधारा विषं सर्पौ वन्हिरेत्येभेतः स्त्रियः” (46) यानी छुरे की धार, विष, सांप और आग एक तरफ और स्त्री दूसरी तरफ. किस प्रकार के धार्मिक ग्रन्थों से स्त्रियों की तुलना की जा रही है? इसी प्रकार आगे यह बताया गया है कि किस प्रकार से विधि विधान एवं क्रियाओं में स्त्री की भागीदारी नहीं थी या नहीं होनी चाहिये थी. भीष्म पितामह महाभारत में इस प्रकार से कहते हैं – ‘न स्त्रीणां क्रियाः काश्चिदिति धर्मौ व्यवस्थितः’ (47) अर्थात् स्त्री के लिये किसी भी धार्मिक कर्मों-क्रियाओं का विधान नहीं है. इसी प्रकार से ‘मैत्रायणी संहिता’ में भी स्त्रियों को झूठ से उत्पन्न होने वाली कहा गया है यानी कि उस पर विचार नहीं किया जाना चाहिये. इसी प्रकार से आपस्तम्बधर्मसूत्र में भी कहा गया है – “असतो वा एष संभूर्ता तय शूद्रः” यानी कि शूद्र भी झूठ से ही उत्पन्न हुआ है.


भारतीय समाज की दो धार्मिक ग्रन्थों में बहुत आस्था बनी हुई है. कभी भी वे उसे स्त्री व शूद्र निन्दक ग्रन्थों के रुप में देखने का प्रयास नही कर सके. दोनों ग्रन्थों में स्त्री सम्बन्धी घोर अपमान सम्बन्धी बातें लिखी गयी हैं. महाभारत के अनुशासन पर्व के 20वें अध्याय में आया है कि,“नास्ति स्वतन्त्रता स्त्रीणां अस्वतंत्रा हि योषित” (48) यानी स्त्रियां स्वतन्त्र नहीं रह सकती हैं, क्योंकि वह तो पराधीन रहने के लिये बनी हुई है. इसी अध्याय में आगे कहा गया है कि, “प्रजापतिमतं हि एतद् स्त्री स्वतन्त्रयं अर्हति” (49) यानी कि स्त्री स्वतन्त्र नहीं होनी चाहिये. मुद्राराक्षस अपनी पुस्तक में महाभारत के अनुशासन पर्व के दान पक्ष का विश्लेषण करते हैं कि अश्वनिकुमार सुदर्शन जब घर से बाहर गया हुआ था तब एक ब्राह्मण आ जाता है और वह सुदर्शन की पत्नी से कहता है कि –


यदि प्रमाणं धर्मस्ते ग्रहस्थाश्रमसम्मतः.
प्रदानेनात्मनो राशि कर्तुमर्हसि मे प्रियम॥ (50)

यदि तुम गृहस्थ धर्म को मानती हो तो मुझे अपना शरीर देकर प्रसन्न करो. जब ब्राह्मण और सुदर्शन की पत्नी अन्दर चले जाते हैं तो उस समय सुदर्शन वापिस आ जाता है. वह ब्राह्मण की करतूत को जानकर सिर्फ इतना ही कहता है कि, “सुरतं ते अस्तु विप्राग्रय प्रीतिहि परमा मम” यानी तुम रति क्रिया करो और यह मुझे भी पसन्द है. (51) उपर्युक्त विश्लेषण एवं उदाहरणों से स्पष्ट होता है कि धार्मिक शास्त्रों के अन्तर्गत जिस प्रकार से स्त्रियों का चित्रांकन हुआ है, वह किसी भी प्रकार से एक आदर्श समाज की कल्पना को प्रस्तुत नहीं करता है. स्त्रियों के सम्बन्ध में जिस प्रकार के मन्त्रों व श्लोकों की रचना की गई है, वह निन्दनीय है. धर्मग्रन्थों से पता चलता है कि वहां पर भी स्त्री का शरीर ही महत्त्वपूर्ण है. इसलिये शरीर का वर्णन बहुत ही थोड़े व अश्लील रूप में आया है. बहुत ही कम रूप में उसकी चाहतों, इच्छाओं व सपनों का उल्लेख हुआ है. स्त्री किसी भी रूप में स्वतन्त्र नहीं होनी चाहिये. वह सारे पिण्ड की दासी बनी रहे और उसकी मुक्ति केवल पुरुष मात्र से ही संम्भव हो. वह केवल पुरुषों की सेवा के लिये, नाचने के लिये तथा पुरुषों के मनोरंजन के लिये ही पैदा हुई है. किसी भी प्रकार के अधिकार उसके हिस्से में नहीं आये. जननी के रूप में वह ब्रह्मा थी. परन्तु कल्पना करके उसकी कोख को अपमानित किया गया. जिस योनि में नये सृजन का आगमन होता है, उसे भी पितृसत्तात्मक मूल्यों के अन्वेषक मनीषियों ने नीच योनि और उच्च योनि में विभक्त कर दिया. जैसे कि समाज में निम्न समुदाय है तथा उच्च समुदाय. उसी प्रकार जनसमुदाय का भी निर्धारण कर दिया. इस काल में स्त्रियां ज्ञान, बुद्धि एवं चातुर्य में कौशल प्राप्त करने के साथ-साथ दर्शन, तर्क, मीमांसा, साहित्य आदि विषयों में पारंगत है. काशकृत्स्नी ने मीमांसा जैसे क्लिष्ट विषय पर ग्रन्थ लिखकर विशेष ख्याति प्राप्त की जो ग्रंथ उसी के नाम से विख्यात हुआ और उस पुस्तक का अध्ययन करने वाला वर्ग “काशकृत्स्नी” कहलाया. वस्तुतः धर्मग्रंथों व धर्मशास्त्रों का अध्ययन करने पर नारी के सम्बन्ध में बहुधा परस्पर विरोधी बातें मिलती है जिस कारण से किसी एक निष्कर्ष पर पहुंचने में कठिनाई होती है. यथा जहां एक तरफ वैदिक कालीन समाज में स्त्रियां ऋषिकाओं के रूप में प्राप्त होती है. लेकिन बहुत से सन्दर्भ ऐसे भी प्राप्त होते है कि स्त्रियां को वेदाध्ययन या ब्रह्मचर्य आश्रम में शिक्षा ग्रहण करने का अधिकार नहीं होता था. यथा:


वैवाहिको विधिः स्त्रीणां संस्कारो वैदिकः स्मृतः,
पतिसेवा गुरौवासो गृहार्थोऽग्नि परिक्रिया॥ (52)

विवाह संस्कार ही स्त्रियों का उपनयन संस्कार है, पति सेवा ही गुरुकुल में वास तथा घर के काम ही दोनों समय का होम रूपी अग्नि की सेवा है. इससे प्रतीत होता है कि तत्कालीन समाज में स्त्री के लिए सिर्फ विवाह संस्कार की ही मान्यता थी और उस पर भी पुरुष वर्ग का ही.  वही तय करता था कि कन्या का विवाह कब और किन परिस्थितियों में करना है? स्त्री की स्वतन्त्रता का पूर्णतः निषेध किया गया है. जन्म से लेकर मृत्यु तक स्त्रीको पुरुष के नियंत्रण में रखने का निर्देश दिया गया है.

सन्दर्भ: 


1. पाराशर स्मृति, प्रथमोऽध्याय 7 श्लोक 1.
2. पा. प्रथमोऽध्याय ३०-३१.
3. पा. ४.१७.१८.
4. पा. ४.१९.२०.
5. पा. ४.३१.३२.
6. पा. ४.३१-३२.
7. पा. ४.३३.
8. पा. ७.६-८.
9. मनु ८/७७.
10. मनु ८/६८.
11. ऋग्वेद १/७३/३.
12. अथर्ववेद ११/१/२४.
13. अथर्ववेद १४/१/४२.
14. ऋग्वेद ८/१/३४.
15. मनुस्मृति, 9.23.
16. मनुस्मृति,9.24.
17. याज्ञ. आचाराध्याय १६३.
18. मनु ४.४३.
19. वशिष्ठ धर्मसूत्र २१.१०, 
20. याज्ञ. १.७२.
21. याज्ञ. आ ८९९२/२९०,
22. नारद १५.७९.
23. यजु. १०/३.
24. यजु. २३ध्/२६.
25. अथर्व. १०/५/४३.
26. ऋ. १/८५/४६.
27. ऋ. ९६/८.
28. यजु. १४/१३.
29. अथर्व. ८/८/९.
30. यजु. १३/२६.
31. यजु. ४/१९.
32. ऋ .८/३३/१९.
33. ऋ. १०.७१.७.
34. भारत वर्ष का सामाजिक इतिहास – विमलचन्द्र पाण्डेय, इलाहबाद, १९६०, पृ ११६.
35. भारतवर्ष का सामाजिक इतिहास – विमल चन्द्र पाण्डेय, पृ. ११६.
36. ऋ. ८.९१.५-६.
37. ऋ. १.११.१४.
38. ऋ. १.१३५.७.
39. ऋ. २.३.६.
40. ऋ. २.३२.४.
41. प्राचीन भारत का सामाजिक इतिहास – जयशंकर मिश्र, पटना, १९९९, पृ ४१०.
42. ऋ १.९४.४, ९.६६.८, १०.७१.११.
43. तै. ६.१.६.५,
44. मै. ३.७.३.
45. मनुस्मृति, 2.66.
46. वैवाहिकोविधिः स्त्रीणांसंस्कारोंवैदिकः स्मृतः, मनुस्मृति 2.67.
47. धर्मग्रन्थों का पुनर्पाठ – मुद्राराक्षस इतिहास बोध प्रकाशन पृष्ठ 127.
48. महाभरत, अनुशासनपर्व, अध्याय 20.
49. वही 20.
50. धर्मग्रन्थों का पुनर्पाठ – मुद्राराक्षस इतिहास बोध प्रकाशन पृष्ठ 209-10.
51. मनु. २.३७.
52. नारद स्मृति, स्त्री, पुसं, ५/४५.

स्त्री सिर्फ देह नहीं

रजनीश आनंद


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समाज में स्त्री के अस्तित्व से जुड़े सवाल मुझे बेचैन करते हैं. जब भी इन सवालों के जवाब तलाशने बैठती हूं, पुरुषवादी सोच के बाण इस कदर चलते हैं कि ‘डिफेंस’ करते-करते सारा ‘एग्रेशन’ चूक जाता है. जी करता है दहाड़ मार कर रो लूं ताकि सारी पीड़ा हृदय से द्रव की तरह बह जाये और मैं मुस्कुरा सकूं. लेकिन अब तो अपनी मुस्कान से भी खीज होती है, क्योंकि उसका सौंदर्यबोध मुझे पुरुषवादी सोच का पोषक जान पड़ता है. जी करता है नोच दूं अपने होंठों से वो मुस्कान जो महज किसी पुरुष को रिझाने-लुभाने के लिए मेरे होंठों पर थिरकते हैं.

मैं एक औरत हूं, इस दुनिया की दूसरी जाति. संभवत:  औरत की रचना सृष्टि में पहली जाति पुरुष के सहचरी के रूप में हुई थी. दोनों को एक दूसरे का पूरक बनाया गया था, किंतु ना जानें कब मैं सिर्फ और सिर्फ उसके लिए ‘इंटरटेनमेंट’ का साधन बन गयी. जब उसका जी चाहा, सीने से लगा लिया और जब चाहा कदमों तले रौंद दिया.

आधुनिक काल में जब मनुष्य सभ्य होने का दावा करता है और स्त्री अधिकारों को सुनिश्चित करने की पुरजोर वकालत होती है, स्त्री आज भी इंसान की पहचान से महरूम है. उसे पुरुषवादी सोच सिर्फ देह के रूप में स्थापित करता है. एक स्त्री जो अपनी पहचान इंसान के रूप में बनाना चाहती है, उसके लिए बहुत मुश्किल होता है देह की पहचान को दरकिनार करना.


समाज में जब कोई स्त्री अपनी प्रतिभा के बल पर पुरुषों के समकक्ष या उससे आगे की पंक्ति में खड़ी दिखती है, तो यह कह दिया जाता है कि प्रतिभा तो है किंतु उसे ‘स्त्री होने का लाभ’ मिला है. ‘प्वाइंट टू बी नोटेडेड’ स्त्री होने का लाभ. जी हां, यही सोच तमाम फसाद की जड़ है और एक स्त्री को उसके अधिकारों के लिए जूझने पर मजबूर करती है. इसी सोच ने स्त्री को समाज में सिर्फ ‘देह’ बनाकर रख दिया है. नारी चाहे जैसी भी हो अद्‌भुत प्रतिभा की धनी, सामान्य या फिर निरक्षर उसकी क्षमता और प्रतिभा का आकलन उसकी देह की सुंदरता से किया जाता है. स्त्री के अस्तित्व पर उसका देह इस कदर हावी है कि शेष तमाम बातें सिफर मालूम होती हैं.



इसकी बानगी देखिए-उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के मद्देनजर कांग्रेस ने अपने स्टार प्रचारकों में प्रियंका गांधी का नाम भी जारी किया है. यह जगजाहिर कि प्रियंका गांधी सोनिया गांधी और राजीव गांधी की बेटी हैं और राजनीति में बहुत सक्रिय नहीं हैं. हालांकि लोगों को उनमें इंदिरा गांधी का अक्स दिखता है और कांग्रेसी कार्यकर्ताओं की उनसे उम्मीद जुड़ी है. बावजूद इसके प्रियंका गांधी का अनुभव राजनीति में नाम मात्र का है और उन्हें एक कुशल राजनेता की संज्ञा नहीं दी जा सकती. लेकिन परिवारवाद की राजनीति में उनका जादू चलता है, यह बात भी हम सब अच्छे से जानते हैं. ऐसे में जब भाजपा सांसद विनय कटियार से यह पूछा गया कि क्या प्रियंका गांधी के  प्रचार करने से भाजपा को कोई नुकसान होगा? तो जवाब में विनय कटियार ने प्रियंका गांधी की क्षमता, प्रतिभा और अनुभव पर सवाल उठाने की बजाय, एक स्त्री के अस्तित्व पर चोट किया और उन्हें सिर्फ ‘देह’ करार दिया. कटियार का मानना है कि प्रियंका से सुंदर कई प्रचारक हैं. विनय कटियार का यह बयान स्त्री जाति का अपमान है. कटियार की इसी पुरुषवादी सोच का परिणाम है कि आज लोग मुलायम परिवार की दो बहुओं की तुलना उनकी राजनीतिक समझ से नहीं बल्कि दैहिक सुंदरता से करते हैं.



जबकि हिंदुस्तान एक ऐसा देश है, जहां राजनीति में महिला नेतृत्व किसी भी अन्य देश की तुलना में ज्यादा बेहतर ढंग से उभरा है. इंदिरा गांधी, मायावती, सोनिया गांधी, जयललिता और ममता बनर्जी जैसे नाम इसके उदाहरण हैं. इन महिला नेत्रियों ने पुरुषों के नेतृत्व क्षमता को चुनौती दी और खुद को साबित किया. बावजूद इसके इतिहास से लेकर आज तक वह अपनी पहचान के लिए जूझ रही है. स्त्री-पुरुष के बीच देह का आकर्षण प्राकृतिक है, लेकिन इसे किसी की पहचान बना देना सर्वथा अनुचित है.

जायसी और पद्माकर की नायिकाओं के व्यक्तित्व के सामाजिक पक्ष का तुलनात्मक अध्ययन:अंतिम क़िस्त

आरती रानी प्रजापति

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में हिन्दी की शोधार्थी. संपर्क : ई मेल-aar.prajapati@gmail.com



पदमावत में रानी नागमती नहीं चाहती कि हीरामन उसके राजभवन में रहकर राजा से पद्मावती की कोई भी बात करे. वह सुआ की हत्या का आदेश देती है. यहाँ नागमती का डर उसे पद से वंचित होने का डर भी है. पद्मावती आयेगी तो उसका पद नागमती से उँचा होगा इसलिए नागमती नहीं चाहती कि रत्नसेन को पद्मावती के बारे में पता लगे. वह हीरामन को मरवा देती है. राजा को जब ये पता लगता है तो वह उसे कहता है कि तुम उसे किसी भी प्रकार लेकर आओ या तुम भी चली जाओ. यहाँ नागमती के माध्यम से बहुपत्नी प्रथा में पटरानी तक की अवस्था को समझा जा सकता है. वह है तो रानी के पद पर किंतु उसे कोई अधिकार प्राप्त नहीं है वह मात्र पितृसत्ता की कठपुतली है. नित्यानंद तिवारी लिखते हैं


‘अध्यात्म में तो वह बड़ी बाधा है ही, काम के क्षेत्र में भी वह केवल उपभोग की वस्तु है. उसकी अपनी कोई स्वतन्त्र सत्ता और अस्मिता नहीं है. कवि ने उस आध्यात्मिक और कामुकता के अतिरेक से भरे समाज में नागमती की ‘प्लेसिंग’ इस तरह से की है कि नारी की सामाजिक हैसियत अत्यंत त्रासद रुप में उभरती है’.
वह रानी है पर उसका जीवन एक पुरुष के अधीन है. वह पुरुष ही जिसके कारण वह रानी के पद पर है पर उसी के कारण उसे सुआ जैसे प्राणी जिसे राजभवन में आये ज्यादा समय नहीं हुआ था कि मौत पर अपनी राजभवन में सही स्थिति का पता लगता है. नागमती को राजा ये ही दर्शाता है कि उसे वह बेहद प्रेम करता है पर उसकी जरा सी गलती उसे बर्दाश्त नहीं. पदमावत की ये घटना हमारे भारतीय समाज की बहुत बड़ी सच्चाई है. जहाँ औरत को महान पद में भी पुरुष के अधीन रखा गया है. नागमती कहती है
एतनिक दोस बिरचि पिउ रूठा. जो पिउ आपन कहै सो झूठा..3॥
ऐसें गरब न भूलै कोई. जेहि डर बहुत पियारी सोई॥4॥21
अपने रुप और पति पर प्रेम का गर्व करने वाली नागमती को सुआ मरवाते ही अपनी वास्तविक स्थिति का पता लगता है. वह रानी है पर क्या वह अधिकारों में भी रानी बन पाती है? नित्यानंद तिवारी लिखते हैं

‘नागमती पटरानी है और पुराने इतिहास ग्रन्थों के अनुसार उसे विशेष प्रशासनिक और राजकीय अधिकार प्राप्त हैं. लेकिन उसकी विशेष राजकीय स्थिति के बावजूद, नारी होने के कारण, उसकी सामाजिक हैसियत नगण्य है’22.रत्नसेन ने पहले भी ऐसा किया होगा तभी तभी रानी को ऐसी चिंता सताती है. राजा रत्नसेन राज्य में ध्यान नहीं देता बस उसका ध्यान इस बात में रहता है कि कहाँ सुन्दर स्त्री है. अगर रत्नसेन अपने राज्य पर ठीक से ध्यान देता तो कभी नागमती को सती होने की आवश्यकता न होती. नागमती सभी रानियों में सुंदर और रत्नसेन की पटरानी है फिर भी उसे ये भय सताता है कि रत्नसेन उसे छोड देगा तो अन्य रानियों की क्या दशा होती होगी? वह कितनी चिंतित रहती होगी? रत्नसेन पद्मावती के रुप पर इतना मोहित हुआ कि अपने राज्य को छोडकर उसे पाने के लिए निकल पड़ा. किसी भी आलोचक को यह बात नहीं खटकती. रत्नसेन की क्या कोई जिम्मेदारी अपने राज्य के प्रति नहीं थी? क्या वह प्रेम को पाने के लिए जाता है एक स्त्री के लिए जाता है पर उसका जाना महिमा मंडित कर दिया गया है. एक स्त्री को पाने के लिए दूसरी को छोडकर जाना यहाँ उचित बन जाता है. पद्मावती में स्त्री की झलक दिखा कर जायसी ने रत्नसेन को सभी प्रकार की खुली छूट दे दी. उसका दूसरी स्त्री के पास जाना इतना मंडित हुआ है कि सभी उसमें खो जाते है. लक्ष्य था स्त्री को पाना पर उसे ईश्वर को पाने में बदल दिया गया.
तुम्ह तिरिआ मति हीन तुम्हारी. मूरुख सो जो मतै घर नारी.
राघौ जौं सीता सँग लाई. रावन हरी कवन सिधि पाई.
यहु संसार सपन कर लेखा. बिछुरि गए जानहु नहिं देखा.
राजा भरभरि सुनि रे अयानी. जेहि के घर सोरह सै रानी.
कुचन्ह लिहें तरवा सहराई. भा जोगी कोइ साथ न लाई.
जोगिहि काह भोग सों काजू. चहै न मेहरी चहै न राजू.
जूड़ कुरकुटा पै भखु चाहा. जोगिहि तात भात दहुँ काहा.
कहा न मानै राजा तजी सबाई भीर.
चला छाड़ि सब रोवत फिरि कै देइ न घीर.23
राजा स्त्री को पाने के लिए जा रहा है और कहता है कि योगी को राज्य और स्त्री से कोई मतलब नहीं होता. मतलब दूसरी स्त्री के पास सबकुछ छोडकर योगी हो कर जाना एक महान कार्य है. जायसी के समयके साहित्यकारों ने नारी के लिए अलग-अलग स्थितियों का उल्लेख किया है. वे पतिव्रता की अहमियत को बताते हैं पर स्त्री के भावों की कद्र वे नहीं जानते. वे स्त्री को त्यागने की बात करते हैं और खुद स्त्री होकर ईश्वर को समर्पित होना चाहते हैं. यहाँ जायसी ने पद्मावती में ईश्वर की झलक दिखा दी इसलिए रत्नसेन उसे पाने के लिए दौड पडता है. किंतु पद्मावती चितौड आते ही अपने साधारण रुप में आ जाती है. वह नागमती से लडती है.
समाज पुरुष को बहुपत्नी की आज़ादी अनायास ही दे देता है. हमारे समाज में ऐसे कई लोग हैं जो अपने किसी और स्त्री से संबंध रखने को अनुचित नहीं मानते. साहित्य में भी इस बात का अधिकांश चित्रण मिल जाता है. ये सम्बंध विवाहेत्तर भी हो सकते हैं. मध्यकालीन समाज में बहुपत्नी रखने का चलन था. जायसी कृत पदमावत में रत्नसेन की कई पत्नियाँ थी. वह पद्मावती के रुप सौंदर्य को सुनकर ही उसे पाने के लिए दौड़ पडता है. वह एक पल भी नहीं सोचता कि उसकी और पत्नियाँ हैं. उनकी क्या दशा होगी? इस व्यवहार से क्या उनकी मन:स्थिति को कोई ठेस पहुँचेगी? जब रत्नसेन को पद्मावती को पाने की धुन लगती है तो वह सब कुछ भूल जाता है. पद्मावती को पाने के लिए रत्नसेन घर छोड़ देता है. नागमती व अन्य रानियाँ विलाप करती रह जाती हैं.
रोवै नागमती रनिवासू. केइँ तुम्ह कंत दीन्ह बन बासू.24

राजा की अनेक रानियाँ हो सकती है इसे समाज स्वीकार करता है. राम के पिता दशरथ की तीन रानियाँ थी ये बात भी सभी जानते हैं और कोई कुछ नहीं कहता. पुरुष की अनेक पत्नियाँ हो सकती हैं पर जब भी किसी औरत ने अनेक पुरुषों से संबंध बनाए हैं उसे हीन नज़रों से ही देखा गया है. पति चाहे जैसा हो पर हमारा समाज औरत को हमेशा उसकी गुलामी सीखाता है. स्त्री किसी अन्य से संबंध बना ले तो उसे परकीया कह देते हैं और यदि वह स्त्री कई पुरुषों से संबंध रखना चाहती है तो उसे कुल्टा कह दिया जाता है. स्त्री को सामाजिक, शारीरिक संदर्भों में स्वतंत्रता देने वाले पद्माकर भी उसके अनेक पुरुषों से संबंध बनाने पर कह उठते हैं:
पुरुष अनेकन सों जु तिय राखति रति की चाह.
कुलटा ताहि बखानहीं जे कबीन के नाह॥25

ये पद्माकर अपने मन से भले ही कह रहे हो, इसमें उनका रचनाकार भले ही शामिल हो किंतु समाज में स्त्री के लिए ऐसे ही मानदंड बने हुए हैं. समाज स्त्री को प्रेम करने की स्वतंत्रता नहीं देता. जायसी के समयसे आज आधुनिक काल तक जो भी स्त्री कई पुरुषों से संबंध बनाती है उसे कुलटा, कुलनासिन जैसे शब्दों से नवाज़ा जाता है. स्त्री के मन को कोई महत्व नहीं दिया जाता. सूरदास स्त्री को प्रेम करने की आज़ादी तो देते हैं पर वह प्रेम भी कृष्ण से कर रही हैं. पति और कृष्ण इसके अलावा उनके कोई और प्रेम सम्बंध नहीं दिखाये गये. स्त्री के मन को किस तरह कुचला जाता है. इस बात को हम यहाँ देख सकते हैं. उसके मन को ही बचपन से ऐसा बनाया जाता है कि वह एक ही पुरुष की हो कर रहे और यदि वह एक से अधिक पुरुषों से संबंध बनाती है तो उसे कुलटा कहा जाता है. क्या समाज या साहित्य में कभी कुल्टा शब्द पुरुष के लिए भी प्रयुक्त हुआ है? इन दोनों रचनाओं के माध्यम से हम मध्यकालीन और आधुनिक समाज को भी मूल्यांकित कर सकते हैं.

पहली क़िस्त  :जायसी और पद्माकर की नायिकाओं के व्यक्तित्व के सामाजिक पक्ष का तुलनात्मक अध्ययन

समाज में पुरुष को इतनी स्वतंत्रता मिली हुई है कि वह एक पत्नी के होते हुए दूसरी के पास जाना अपना हक समझता है| यदि किसी स्त्री के अनेक पति हो तब भी वह रूप से आकर्षित होकर अन्य पुरुष के पास उससे विवाह के लिए चली जाए तो ऐसा ग्रंथ महान बन जायेगा? नहीं ऐसे साहित्य को पापाचार की कथा कहकर या तो जलाया जायेगा या प्रतिबंधित कर दिया जायेगा. वैसे हमारी मानसिकता ये सोच भी नहीं सकती कि किसी स्त्री के अनेक पति हो सकते हैं. ये अधिकार पुरुषों को ही प्राप्त हैं. पदमावत में तो राजा रत्नसेन को कवि साफ छूट देते दिखते है| कवि का उद्देश्य राजा को दूसरी स्त्री के पास भेजकर ही पूरा होना था इसलिए उन्होंने इस स्त्री में ईश्वर की झलक देखने का प्रयास किया| साहित्य समाज को राह दिखाने का काम भी करता है| क्या जायसी ने ये सोचा होगा की जिस तरह वे इस ग्रन्थ की रचना कर रहे हैं उसका समाज पर क्या असर पडेगा? समाज में प्रत्येक पुरुष स्त्री में ईश्वर की झलक देखकर विवाह करता रहेगा बिना ये सोचे की स्त्री की क्या मन:स्थिति होती है| समासोक्ति का माध्यम अपनाने वाले जायसी ने नागमती के प्रति अपने कर्तव्य की इतिश्री उसका वियोग वर्णन लिख कर पा ली| मध्यकाल में राजाओं की अनेक रानियाँ होती थी| साहित्य के माध्यम से हम उन स्त्रियों की दशा को भली-भांति समझ सकते हैं| एक स्त्री जो अपना सब कुछ छोड़कर पुरुष के परिवार को अपनाती है यदि पुरुष दूसरी स्त्री को उसका स्थान दे उसे प्रेम करे तो स्त्री की क्या दशा हो सकती है? वह अपने को ठगा हुआ महसूस करती है| राजा रत्नसेन जब रानी पद्मावती को साथ लेकर वापस चितौड़ आता है रानी नागमती अपना रोष इस प्रकार प्रकट करती है|
नागमती मुख फेरि बईठी| सौंह न करै पुरुख सौं डीठी||
ग्रीखम जरत छाडि जो जाई| पावस आव कवन मुख लाई||
जबहिं जरे परबत बन लागे| औ तेहि झार पंखि उडि भागे||
अब साखा देखिअ औ छाहाँ| कवने रहस पसारियअ बाहाँ||
कोउ नाहिं थिरकि बैठ तेहि डारा| कोउ नहि करै केलि कुरुआरा||
तूँ जोगी होइगा बैरागी| हौं जरि मई छार तोहि लागी||
काह हंससि तूँ मोसौं किए जो और सौं नेहु||
तोहि मुख चमके बीजुरी मोहि मुख बरसे मेहु||26

जगद्विनोद में एक नायिका का पति रात भर दूसरी स्त्री के पास रहकर आता है. स्त्री ने जब अपने पति के आलस्य से भरे नेत्र देखे उसने कुछ नहीं किया. न पति को अति आदर देने का कार्य वह करती है न उसपर रोष प्रकट करती है बस कुछ नहीं कहती जैसी है वैसी ही बनी रहती है. यहाँ नायिका के व्यक्तित्व में उसका समाज देखा जा सकता है. वह जानती है कि पति रात भर किसी अन्य स्त्री से साथ प्रेम में था तब भी वह कुछ नहीं कहती. ऐसी ही रहती है जैसे उसे कुछ फर्क नहीं पड रहा है.
रसिकराज आलस भरे खरे दृगन की ओर.
कछु न कोप आदर न कछु भावती भोर॥27
ऐसा नहीं हो सकता है कि उसके मन को दु:ख न हुआ है पर वह दु:ख वह चाह के भी व्यक्त नहीं कर सकती. समाज इस चीज की स्वतन्त्रता स्त्री को नहीं देता. स्त्री को इतना ही अधिकार मिला हुआ है कि बाहर गये पति का पूरी रात इंतज़ार करे या नागमती की तरह साल भर से ज्यादा विरह में बिता दे. एक ही समाज में स्त्री-पुरुष दोनों रह रहे हैं पर पुरुष को ऐसे कई अधिकार मिले हुए हैं जिनसे स्त्री के मन को पीड़ा मिलती है.

पदमावत में पुरुष का दूसरी स्त्री के पास जाना महिमा-मंडित कर दिया गया है| समाज की यही स्थिति है पर समाज स्त्री को ऐसी स्वतंत्रता नहीं देता कि वह दूसरे पुरुष से सम्बन्ध बनाए| विवाहिता के लिए परपुरुष से सम्बन्ध बनाना तो पूर्ण रूप से वर्जित ही होता है| किन्तु पद्माकर उढा नायिका के माध्यम से समाज की उन स्त्रियों का चित्रण कर देते हैं जो अपने विवाहेत्तर सम्बन्ध बना रही थी| वह ससुराल में बहुत कठिनाईयों के बाद प्रियतम से मिल पाने का मौका निकाल पाती है| ये प्रियतम रीतिकाल में कृष्ण ही थे किंतु थे तो सही. कृष्ण के माध्यम से इन कवियों ने बड़ी सहजता से स्त्रियों के सामाजिक बंधनों को दिखा दिया है. स्त्री का प्रेम भले ही किसी आमपुरुष से हो पर वह उसके लिए उसी उत्कंठा से सबकुछ छोडकर चली आती है जैसे कृष्ण के प्रेम में गोपियाँ.
गोकुल के कुल के गली के गोप गाउन के जौ लगि कछू को कछू भारत भनै नहीं.
कहै पदमाकर परोस पिछवारन के द्वारन के दौरि गुन औगुन गनैं नहीं.
तौं लौं चली चातुर सहेली याहि कोऊ कहूँ नीके कै निचोरै ताहि करत मनै नहीं.
हौं तौ स्यामरंग में चुराइ चित्त चोराबोर बोरत तौ बोरयौ पै निचोरत बनै नहीं.28


यहाँ हम यह नहीं कह सकते कि पद्माकर की स्त्री का प्रेम रत्नसेन से कमत्तर है. वह अपने प्रेम के बारे में कहती है कि उसका रंग अब उतरेगा नहीं क्योंकि वह प्रियतम के रंग में बार-बार रंगी है| जिससे उसके प्रेम का रंग गहरा और गहरा होता जाता है| क्योंकि ये समाज की पितृसत्ता के ढांचे को तोड़ने वाली स्त्री है इसलिए हम इसे गलत कह सकते हैं| यहाँ पद्माकर की नायिका समाज में स्त्री की प्रचलित छवि को बदलती है. स्त्री का भी मन होता है कि वह अपने पति के अलावा किसी अन्य पुरुष से सम्बंध बनाये वह इस काम को कर नहीं पाती क्योंकि समाज नहीं चाहता| पद्माकर की नायिका समाज से विद्रोह करती है| सबके सामने वह प्रेम को स्वीकार भी करती है.

रत्नसेन कभी पद्मावती के पास जाता है कभी नागमती| उसके अन्दर का पुरुष उसे कभी एक स्त्री से संतुष्ट नहीं रहने देता| रत्नसेन को पद्मावती अच्छी लगती है वह उसके पास चला जाता है, उसे नागमती की याद आती है तो वह चितौड़ वापस आ जाता है| जिस नागमती को रतनसेन अपशब्द ‘तुम्ह तिरिआ मति हीन तुम्हारी’ कहकर गया था अचानक उसे वह इतनी प्रिय हो जाती है कि वह चितौड़ की पहली रात उसके साथ बिताता है| कवि ने समासोक्ति के चक्कर में मानवीयता का हनन कर दिया है| मूल भारतीय कथा में कोई नागमती नहीं है| रत्नसेन को यदि आविवाहित अवस्था में पद्मावती मिलती तो किसी का किसी से दुराग्रह न होता| क्योंकि नागमती और पद्मावती सौत है इसलिए नायक एक के पास जाता है तो दूसरी जल उठती है|
कही दुख कथा रैनि बिहानी| भोर भएउ जहँ पदुमिनि रानी||
भान देख ससि बदन मलीनी| कँवल नैन राते तन खीनी||
रैनि नखत गनि कीन्ह बिहानू| बिमल भई जस देखे भानू||
सुरुज हँसा ससि रोई डफारा| टूटी आंसू नखतंह के मारा||
रहै न राखे होइ निसांसी| तंहवहि जाहि निसि बासी||
हौं के नेहु आनि कुँव मेली| सींचै लाग झुरानी बेली||
भए वै नैन रहंट की घरी| भरीं ते ढारी छूंछी भरीं||29


जायसी की नायिका पति के दूसरी औरत के पास जाने पर चुपचाप आंसू बहाती है. वह उसे कुछ कह नहीं सकती. मामूली सा विरोध कर देने पर वह पति को पुन: अपनाती है. क्या कोई सहजता से ऐसे संबंधों को अपना सकता है? जायसी की नायिका पति को परमेश्वर मानने वाली स्त्री है. पति से रोष प्रकट करने की छूट पितृसत्ता उन्हें नहीं देती इसलिए नागमती वर्ष भर रोती हुई रत्नसेन की प्रतीक्षा करती है. जब रत्नसेन उसे अपमानित करके त्याग देता है तो भी ऐसे व्यक्ति के साथ बंधे रहने का क्या अर्थ है? जायसी अपने उद्देश्य को तो पूरा होने (रत्नसेन का पद्मावती से मिलना) देते हैं पर नागमती के आत्मसम्मान की रक्षा वह नहीं करते.

पद्माकर की नायिका नागमती से थोडी अलग स्थिति की है. वह पति को अपना सब-कुछ मानती है पर पति की गलतियों को स्वीकार करना उसके व्यक्तित्व का पक्ष नहीं. वह पति को सुनाती है, उसे अपना प्रत्यक्ष रोष दिखाती है. यहाँ ये नायिका आधुनिक स्त्री की तरह बर्ताव करती है. पद्माकर की नायिका पति पर व्यग्यं करती है.
भूले से भ्रमे से काहि सोचत स्रमे से अकुलाने से बिकाने से ठगे से ठीक ठाए हौ.
कहै पद्माकरसु गोरे रंग बोरे दृग थोरे थोरे अजब कुसुंभी करि लाए हौ.
आगे कौं धरत पर पीछे कौं परत पग भोर ही तें आज कछु औरै छबि छाए हौ.
कहाँ आए तेरे धाम कौन काम घर जानि तहाँ जावो कहाँ जहाँ मन धरि आए हौ.30
भारतीय समाज पर पितृसत्ता बहुत गहरे तक हावी है. रत्नसेन नागमती के पास आता है. वह उससे बात नहीं करती रत्नसेन ने इसे अपनी अवज्ञा समझी. यहाँ रानी नागमती के व्यक्तित्व का वह पक्ष उजागर होता है जिसमें उसकी इच्छा, अस्वीकार का कोई मूल्य नहीं:
 नागमती तूँ पहिलि बियाही. कान्ह पिरीति डही जसि राही.
बहुते दिनन्ह आवै जौं पीऊ. धनि न मिलै धनि पाहन जीऊ.31

समाज की पितृसत्ता और पुरुष की मानसिकता जो स्त्री को अपनी वस्तु के रूप में देखती है, पर महादेवी वर्मा लिखती हैं-“भारतीय पुरुष जैसे अपने मनोरंजन के लिए रंग-बिरंगे पक्षी पाल लेता है; उपयोग के लिए गाय-घोड़े पाल लेता है, उसी प्रकार वह एक स्त्री को भी पालता है तथा अपने पालिक पशु-पक्षियों के समान ही उसके शरीर और मन पर अपना अधिकार समझता है.”32रत्नसेन का वापस आना और नागमती को संयोग न करने पर बुरा-भला कहना उसपर अपना अधिकार जमाना ही था. स्त्री मात्र वस्तु समझी जाती है इसलिए उसपर अपना हक हर कोई जमा लेता है. आलोचकों को नागमती का विरह-वर्णन हिंदी का सर्वश्रेष्ठ विरह वर्णन लगता है. आलोचक स्त्री के हक, अधिकार की बात नहीं करते. ये ही आलोचक रीतिकाल में खंडिता नायिका के वर्णन को ठीक मानते हैं. पुरुष की गलती इन्हें दिखाई नहीं देती. मानों ये आलोचक भी स्त्री के विरह के पक्ष में हो. आचार्य रामचंद्र शुक्ल लिखते हैं:‘जायसी के भावुक हद्य ने स्वकीया के पुनीत प्रेम के सौंदर्य को पहचाना नागमती का वियोग हिंदी साहित्य में विप्रलम्भ शृंगार का अत्यंत उत्कृष्ट निरूपण है.’33

रत्नसेन ने जब चाहा नागमती को त्याग दिया फिर मन किया तो अपनाने चला आया. पद्मावती से शादी के बाद क्या नागमती बुद्धमति हो गई थी जो रत्नसेन उसके पास चला आता है. यदि उसे इतना ही प्रेम नागमती से था तो वह गया ही क्यों? क्या विवाह इसे ही कहते है. पति चाहे कुछ भी कर ले यदि वह पत्नी के पास आता है तो पत्नी को उससे मिलना ही चाहिए. नागमती का यह व्यक्तित्व उसी राज-दरबारी परम्परा की देन है जिसमें वह और पद्मावती पैदा हुई. वह चाह कर भी अपने पति की अवज्ञा नहीं कर सकती. पर क्या समाज की औरत ऐसी ही होती है? जायसी की नायिकायें अपना दु:ख प्रकट नहीं करती उनके मन का रोष व्यक्त नहीं हो पाता पर पद्माकर की नायिका अपने पति को दूसरी के पास जाने पर आपार दु:ख का अनुभव करती है और उसे दूसरों से कहती भी है. एक स्त्री अपना सबकुछ छोड़कर पति के पास आती है पर यदि उसे वहाँ भी छल मिले तो वह बहुत दु:ख होती है. पद्माकर के समाज में भी भले ही पुरुष परस्त्री गमन कर रहा था पर उनकी नायिका बोलना सीख गयी थी पद्माकर की नायिका पति के दूसरी औरत के पास आने पर तीव्र विरोध कर कहती है:
   खान  पान  सज्जासयन  जासु  भरोसे आइ.
  करै सु छलि अलि आप सौं ताको कहा बसाइ..34
जायसी की नायिका पद्मावती यौवन में अपने अलग स्थान यानि धवलगृह में रहती है. पद्मावती का यहाँ रहना उसके व्यक्तित्व के आर्थिक पक्ष का एक रुप है. राजकुमारियों को व्यस्क होने पर ऐसी जगह रखा जाता है जो सबसे उंची होती थी. उसके साथ ऐसी सहेलियाँ रखी जाती है जो अभी तक कौमार्य धारण किये हुए हैं. पति का जिनसे संग नहीं हुआ है.
      बारह बरिस मौह भइरानी. राजैं सुना संजोग सयानी.
      सात खंड धौराहर तासू. पदुमिनी कहै सो दीन्ह नेवासू.
     औ दीन्ही संग सखी सहेली. जो संग करहिं रहस रस केली.
     सबै नवल पिय संग न सोई. कॅवल पास जनु बिगसहिं कोई॥35



यहाँ कुमारी कन्याओं को पद्मावती के संग रखना समाज की यौन शुचिता की धारणा है. पद्मावती के संग यदि ऐसी सखियों को रखा जाता जो विवाहित है तो वह अपनी सखी पद्मावती को यौन-सम्बंधों के बारे में बताती तब वह भी प्रेम करने की इच्छा व्यक्त करती जिसकी मध्यकाल इजाजत नहीं देता. पद्मावती के पास उसके उम्र की व अविवाहित स्त्रियों रखने के कारण वह पति से मिलने को इतनी व्याकुल नहीं है. इसलिए पद्मावती खेल क्रियाओं में लगी रहती है. पद्मावती का अपने यौवन काल में किसी पुरुष को साथ सम्पर्क नहीं दिखाया गया है. इसका असर उसके व्यक्तित्व पर गहरा पडता है. वह अपने जीवन में आने वाले प्रथम पुरुष रत्नसेन से ही प्रेम कर बैठती है.


पद्माकर की नायिका का समाज ऐसा नहीं है वह पुरुष से प्रेम करना चाहती है. समाज में उसे भी कई बंधनों को झेलने पड रहे थे पर फिर भी वह पद्मावती से कहीं ज्यादा स्वतन्त्र है. पद्माकर की नायिका अविवाहित होने पर भी विवाहित पुरुष से प्रेम करती है वह भले ही अज्ञातयौवना बन कर भी चित्रित हुई है पर यदि उसे प्रेम का बोध हो जाता है तो समाज के सारे बंधनों को वह तोड‌ती है. जहाँ एक ओर पद्मावती जीवन में आये प्रथम पुरुष से प्रेम करती है वहीं पद्माकर की नायिका ने जरुर चुनाव करके, भली-भांति सोच कर ही विवाहित पुरुष का संग किया होगा.
अनब्याही तिय होति जहँ सरस पुरुष रस लीन.
ताहि  अनूढ़ा कहत  हैं  कबि  पंडित परबीन॥36


राजकुमारी पद्मावती राजा के बंधनों में जकड़ी है उसका सबसे प्रिय मित्र (तोता) भी राजा मारना चाहता है. रानी जिसके पास मन बहलाने के लिए तोता या सखियाँ थी. वह अपने मन की बात किसी से नहीं कह सकती थी. तोता हीरामन पद्मावती के हृदय की बात सुनता और समझता है. राजा पद्मावती के इस मित्र को भी छीन लेना चाहता है क्योंकि वह सुआ पद्मावती के मन को समझकर उसके अनुकुल वर ढूढने की बात कह रहा था. पद्मावती राजकुमारी है उसके पास सब सुख-सुविधायें हैं पर वह अपने मन की बात किसी से नहीं कर सकती थी. पद्मावती को कवि ने भले ही ईश्वर की झलक बनाने की कोशिश की है पर उसके मन को समझा नहीं है. वह अपने दिल की बात सुआ हीरामन से करती है और राजा उसे ही मारना चाहता है. ये कैसा समाज है जिसमें स्त्री को कहीं भी अपनी बात कहने का हक नहीं है. नागमती और पद्मावती अपने प्रतीकात्मक रुप में अलग-अलग स्थान रखती है (आलोचकों के अनुसार) पर जहाँ वे स्त्री है वहाँ उनकी स्थिति एक सी है. एक बंधक जैसी स्थिति जहाँ उन्हें कोई स्वतंत्रता नहीं है.


जायसी की नायिका पति के दूर जाने पर विरह में व्याकुल हो रही है. पति दूसरी स्त्री के पास गया है तब भी वह उसी पति की चाहना करती है और चाहती है कि वह वापस आ जाये. पुरुष समाज ने स्त्री को मानसिक रुप से इस कदर जकड लिया है कि वह इससे निकलने की सोच भी नहीं पाती. पति दूसरी स्त्री के पास गया है तब भी नागमती उसके लिए मरे जाती है मानो उसका व्यक्तित्व ही रत्नसेन से हो. यहाँ नागमती की सामाजिक स्थिति को बखूबी समझा जा सकता है. वह विद्रोह नहीं करती घर से भागती नहीं है. बस रत्नसेन के लौट आने का इंतज़ार करती रहती है. जिसमें उसे ये भी नहीं पता कि वो कब आयेगा? आयेगा भी या नहीं?
नागमती चितउर पँथ हेरा. पिउ जो गए फिरि कीन्ह न फेरा.37



किंतु पद्माकर की नायिका ऐसी नहीं है उसका पति अगर दूसरी स्त्री के पास जाता है तो वह उसे अपना क्रोध प्रकट करती है. पद्माकर की स्त्री भी वियोगी होती है पर इस अवस्था में वह तब नहीं पहुँच रही जब पति किसी दूसरी स्त्री के पास गया है बल्कि वह पति के देस से बाहर जाने पर दु:ख होती है. यहाँ इन दोनों नायिकाओं के व्यक्तित्व का अंतर साफ हो जाता है. दोनों ही स्त्रियाँ विवाहित हैं. एक वो है जो जानती है कि पति किसी दूसरी के पास गया है उस स्त्री को यह तक नहीं पता कि उसका पति वापस आयेगा भी या नहीं. रत्नसेन के जाने और लौट के आने तक कोई सूचना चितौड़ में नहीं थी कि वह कब आयेगा. तब भी नागमती वियोग में जलती रहती है. ऊर्मिला के वियोग की समयावधि पहले से तय थी इसलिए वह रात-दिन गिनती है पर नागमती को तो भी अंदेशा नहीं था कि रत्नसेन कब आयेगा? फिर भी वह बेचारी इंतजार करती रहती है. इसलिए नागमती सिर्फ इसी संदर्भ में आलोचकों को अच्छी लगती है. यहां हमें हिंदी आलोचना को भी समझना चाहिए. साहित्य में अब विद्रोही स्त्री की कद्र होने लगी है, अब तक हर ऐसी स्त्री को नीची नज़र से देखा जाता था. इसलिए नागमती की उस समय आलोचना होती है जब वह रत्नसेन को जाने से रोकती है और विरह में प्रशंसा. पद्माकर की नायिका ऐसी नहीं है. उसका समाजीकरण ऐसा नहीं हुआ है. किंतु ऐसा नहीं है कि वह अपने पति को कम प्रेम करती है पर वह पति के अत्याचार को नहीं सहती.
अनत रमें पति की सु अति गहि गहि गहकि गुनाह.
 दृग सरोज  मुख मोरि तिय  छुवन देति नहि  छाँह॥38

समाज आज भी स्त्री-पुरुष के प्रेम सम्बन्ध को स्वीकार नहीं करता| प्रेम चोरी-चोरी किया जाये तब तो चल जाता है किन्तु प्रेम का पता किसी को चल गया तो समाज उस स्त्री को जीने नहीं देता| समाज में पुरुष का प्रेम करना सबको उचित लगता है पर स्त्री के प्रेम का पता लगने पर उसे विभिन्न यातनाओं से गुजरना पडता है. पदमावत में पद्मावती अपने प्रेम में व्याकुल होने की चर्चा सिर्फ तोते  और धाय करती है. प्रेम को गुप्त रखना ही उसे जीवित रखना होता है. समाज को ताक पर रख कर स्त्री प्रेम कर लेती है पर उसे हर वक्त डर रहता है कि कही उसके प्रेम का पता न चल जाए| पद्मावती को ये डर नहीं सताता. किंतु पद्माकर की नायिका प्रतिपल इस बात से डरती है कि कहीं उसके प्रेम का बोध किसी को न हो जाये. उसका ये डर तत्कालीन समाज में प्रेम करने वाली स्त्री की स्थिति को बताता है. ये नायिका उस समाज से परिचालित है जहाँ वह चोरी-छुपे प्रेम तो कर लेती हैं पर भीतर- ही-भीतर भयाकुल रहती हैं. जगद्विनोद की नायिका नायक से कहती है:
 मैं तरुनी तुम तरुन तन चुगुल चवाई गाउँ.
मुरली लै  न बजाइयौ  कबहूँ  हमारो नाउँ||39


जायसी का समाज औरत को जीने की स्वतंत्रता तो देता ही नहीं है पर उसे मरने पर मजबूर जरुर कर देता है. पदमावत में नागमती और पद्मावती रत्नसेन के मरने पर आत्महत्या कर लेती हैं ताकि वह मुस्लिम शासक के हाथों न आ पाये. समाज में स्त्री को इस सांचें में ढालना सीखा दिया जाता है कि वह कैसे अपने शील की रक्षा करे उसे लड़ना नहीं सीखाया जाता बस ये समझा दिया जाता है कि यदि कभी उसके शील पर आ बने तो उसे आत्महत्या कर लेनी चाहिए. तत्कालीन समाज में एक कुप्रथा भी प्रचलित थी जिसे सती प्रथा का नाम दिया जाता है. यानि पति मर गया तो स्त्री को भी उसके साथ मर जाना चाहिए. समाज हर समय स्त्री को यह बताना चाहता है कि पति के बिना तुम्हारा कोई अस्तित्व नहीं है. पति के साथ मरने की इस प्रथा को महिमा‌-मंडित भी किया गया ताकि स्त्रियाँ स्वयं इस कार्य को करें. पदमावत में सती प्रसंग पर रामचंद्र शुक्ल कहते हैं:‘राजा रत्नसेन के मरने पर रोना-धोना नहीं सुनाई देता. नागमती और पद्मावती दोनों शृंगार करके प्रिय से उस लोक में मिलने के लिए तैयार होती हैं. यह दृश्य हिंदू स्त्री के जीवन दीपक की अत्यंत उज्ज्वल और दिव्य प्रभा है जो निर्वाण के पूर्व दिखाई पड़ती है.’40


रामचंद्र शुक्ल जैसे आलोचक स्त्री की इस आत्महत्या में गौरव देख रहे हैं. शुक्ल जी किसी मध्ययुग के आलोचक नहीं हैं. वे उस समय के हैं जब सती प्रथा का विरोध होने लगा था. तब भी वे पदमावती और नागमती की सती घटना को गौरव मानते हैं. स्त्री का गौरव उसके मर जाने में है क्योंकि वो जिंदा रहेगी तो दूसरे की बन सकती है. इससे उसका पतिव्रता धर्म खंडित होगा. स्त्री को लड़ना, विपरीत परिस्थितियों का समना करना नहीं सीखा रहे बस पति मर गया तो वह भी मर गई. यहाँ हम मध्यकालीन समाज की स्त्री को इन दोनों नायिकाओं के माध्यम से समझ सकते हैं. पति के मरने के बाद कोई स्त्री यदि जीने की कामना करती थी तो उसे मीरां की तरह कई दु:ख झेलने पडते थे. मीरां इसलिए भी सती नहीं हो पाई क्योंकि वह राज घराने से थी और उसका मोह कृष्ण से था पर किसी भी आम स्त्री के लिए यह कर पाना सम्भव नहीं था. स्त्रियों को जबरन आग में डाल दिया जाता था. शासक अकबर ने सती प्रथा का विरोध किया था. इस कुप्रथा पर उनका मत था-
‘भारत में यह एक प्राचीन प्रथा है कि अपने पति की मृत्यु के पश्चात स्त्री, चाहे उसे अपने पति के हाथों दुर्व्यवहार ही क्यों न सहना पड़ा हो, अपने आपको आग में झोंक देती है और पूरी बहादुरी के साथ अपने बहुमूल्य जीवन का बलिदान कर देती है और इस कार्य को वह अपने पति की मुक्ति का साधन समझती है. पुरुषों का भी यह विचित्र आचरण है कि अपनी मुक्ति के लिए वे अपनी पत्नियों से इस प्रकार की सहायता की अपेक्षा रखते हैं.’41


यहाँ पद्मावती और नागमती स्वयं आग में जल रही हैं क्योंकि उनको भी उसी समाज ने ये सब बातें समझाई हैं कि पति बिना उनका कोई अस्तित्व नहीं है और ये ही एक उपाय है दूसरों से अपने शील को बचाये रखने का. किंतु पद्माकर की नायिका ऐसा नहीं करतीं. रीतिकाल में ऐसा वर्णन शायद ही मिले. रीतिकाल के कवि स्त्री के जीवन के पक्ष में हैं. वे स्त्री-जीवन के महत्व को समझते हैं इसलिये उनके काव्य की स्त्री सभी कालों से भिन्न ही दिखाई देती है. रीतिकाल की स्त्री अपनी स्वतंत्रता की बात करती है. वह समाज के कई बंधनों को तोडती है उसे कवि प्रेम करने का अधिकार देते हैं. रीतिकालीन समाज में भले ही स्त्री सती हो रही रही थी पर कवियों ने इस स्थिति को प्राय: नहीं ही दिखाया है. रीतिकाल के रचनाकारों के लेखन के इस पक्ष पर त्रिलोचन शास्त्री ने लिखा है.‘रीतिकाल में सतीप्रथा पूरे जोर पर थी, कोई गाँव शायद ही रहा हो जहाँ ‘सती चौरा’ न रहा हो. हमारे इन (रीतिकालीन) कवियों में से किसी ने इधर ध्यान नहीं दिया; अनुकूल या प्रतिकूल लिखने की बात ही अलग है.’42
दरबार में कवि लिख रहे थे. दरबार में सती प्रथा के विरोध या पक्ष में बात सुनी जा सकती है? जो शासक स्त्री-पुरुष के सन्योग के चित्रण में आनंदित थे उनके रचनाकार स्त्री के जबरन मर जाने की घटना को काव्य का विषय बनायेगे और राजा और अन्य दरबारी सुन भी लेंगे? राजमहल में कवि चाह के भी ऐसी बात नहीं कह सकता. रचनाकार की परिस्थिति को जानते हुए भी शास्त्री जी का यह कथन अनुचित सा लगता है.



समाज के स्त्री समुदाय का एक सच उसमें रहने वाली वेश्यायें भी हैं. हमारे समाज में स्त्री को घर में बंद कर पुरुषों को स्वतंत्रता दी जाती है. पदमावत और जगद्विनोद दोनों में ये स्थिति हम देख सकते हैं. पुरुष दूसरी स्त्री के पास जाता है पर वह विवाहिता उसे कुछ नहीं कहती. अपना लेती है हर समय. यह हमारे समाज की पितृसत्ता ही है जो स्त्री से ये सब करवा लेती है. इसी पितृसत्ता की देन स्त्री का वेश्या होना है. वेश्या वो स्त्री होती है जो धन या किसी अन्य उद्देश्य के लिए देह को माध्यम बनाती है. आज वेश्याओं की दयनीय दशा सोची भी नहीं जा सकती क्योंकि आज ये एक देह क्रिया से जुड गया है. आदिकाल, मध्यकाल में वेश्याओं की ऐसी स्थिति नहीं थी. उपन्यास सलाम आखिरी में मध्यकालीन वेश्या की स्थिति का पता इस सम्वाद से चलता है.


‘वे विभिन्न कलाओं को जानने वाली गुणी स्त्रियों होती थी. पहले नृत्य और संगीत पर सिर्फ वेश्याओं एवं बाईजियों का ही एकाधिकार था पर आज बदलते सोच के चलते, नृत्य और संगीत की स्कूलों के चलते नृत्य और संगीत घर-घर तक पहुच गये हैं . तो उस लिहाज से भी ज्यों-ज्यों इनकी कला का स्तर गिरता गया वे हीन विलुप्त हो गई और बचा रह गया केवल शरीर… एक स्थूल शरीर कलाहीन, रुपहीन रुप की हाट में बिकता एक रुग्ण शरीर.’43

मध्यकालीन व्यवस्था में वेश्या की स्थिति भले ही एक विवाहिता जैसी नहीं थी पर उस समाज में कवि इस स्त्री को भी भरपूर मान देते थे. भक्तिकाव्य में नागमती जो एकनिष्ठ प्रेम में जी रही है, पतिव्रता है को जायसी अपशब्द कहलवाते हैं. उस काल के ठीक बाद के काल रीतिकाल में वेश्या स्त्री सम्मान से देखी गई है. रीतिकालीन कवि वेश्या का भी चित्रण अपने काव्य में करते हैं. वेश्या धन के हेतु रति करती है यहाँ वेश्या के चरित्र की एक विशेषता उभर कर आती है कि वह स्त्री विवाहिता नहीं है न ही परकीया है इन दोनों से अलग वह ऐसी स्त्री है को काम सम्बंधों में केवल धन को चुनती है. वेश्या के इस चयन में भी उसके सामाजिक व्यक्तित्व को देखा जा सकता है.
तन सुबरन सुबरन बसन सुबरन उकति उछाह.
धनि सुबरनमय ह्वै रही सुबरन की ही चाह॥44
यदि वह दरबारी वेश्या है तो वह ऐसे व्यक्ति को ही अपना संग देती है जो दरबार का हो. साधारण वेश्या के लिए चयन की ये स्थिति नहीं है.


गणिका के व्यक्तित्व में आराम नहीं है. वह रात-भर केलि करती है और सुबह भी केलि के उसे तैयार रहना पड़ता है. गणिका की स्थिति रीतिकालीन समाज में वैसी ही थी जैसी आज की वेश्याओं की है. वे भी रात-दिन देह-व्यापार करती थीं और ये भी. गणिका रात-भर केलि में रत रहकर भी आराम नहीं कर सकती क्योंकि उसे आजीविका के लिए काम करना पडेगा| गणिका आराम इसलिए नहीं करना चाहती क्योंकि उसके पेशे के दिन अधिक नहीं होते| उम्र के साथ उसकी मांग कम होती जाती है| इसलिए वो निरंतर काम करना चाहती है| रात की केलि से थकी, आलस्य से भरी वेश्या का चित्रण करते हुए पद्माकर लिखते हैं
आरस सों आरत सम्हारत न सीसपट गजब गुजारत गरीबन की धार पर.
    कहै पदमाकर सुगंध  सरसार  बेस बिथुरि बिराजैं  बार हीरन के हार पर.
 छाजत छबीले छिति छहरि छरा के छोर भोर उठि आई केलिमंदिर के द्वार पर.
  एक पग भीतर  सु एक देहरी पै धरे  एक कर कंज  एक कर है  किवार पर॥45



रीतिकाल के कवियों ने गणिका को सामान्य स्त्री की भांति ही संवेदनशील समझते हुए उसके हर मनोभावों को चित्रित किया गया है. स्वकीया के जो भेद जैसे आगतपतिका, प्रवत्स्यपतिका आदि मिलते हैं वही गणिका के लिए भी चित्रित हो रहे हैं. एक तरफ साहित्य का जायसी का समय है जिसमें स्त्री को अपशब्द कहे जा रहे थे दूसरी तरफ रीतिकाल में सर्वत्र स्त्री ही स्त्री दिखाई देती है. ये स्त्री भले ही पुरुष द्वारा चित्रित है, पर क्या समाज में ऐसी स्त्रियाँ नहीं थी? नायिका भेद सिर्फ दरबारी स्त्रियों पर लिखा गया हो ऐसा भी नहीं है. वहाँ हर तरह की स्त्री है. क्या ऐसा हमें जायसी का समय में दिखाई देता है? गणिका अपने कार्य के अनुसार व्यक्ति का चयन करके ही उससे प्रेम करती है|
बड़े साह लखि हम करी तुम सौं प्रीति बिचारि|
कहा जानि तुम करत हौ हमैं चोरि की नारि॥46
इस चयन में नायिका को कितने द्वंद से गुजरना पड़ा होगा? वह पुरुष को देख-समझ कर ही उससे प्रीति रखती होगी| जगद्विनोद में गणिका के इन मनोभावों और सामाजिक पक्ष  को कवि ने बखूबी चित्रित किया है|


निष्कर्ष- जायसी और पद्माकर के समाज में काफी अंतर है. एक के कवि हैं दूसरे रीतिकाल के लिए. जायसी का समयमें स्त्री को माया माना गया है. नागमती उसका सबसे बड़ा उदाहरण है. जायसी और पद्माकर का ये परिवेश उनकी रचनाओं में चित्रित नायिकाओं के व्यक्तित्व पर भी प्रभाव डालता है. नागमती मुह बंद करके रहती है. पति के दूसरी स्त्री के पास जाने पर भी वह कुछ नहीं करती पर जगद्विनोद की नायिका स्वतंत्र है इन सभी मामलों में. वह पिय को पास बुलाती है और यदि वह किसी और के पास से आता है तो उसे सुनाती भी है. वह रति में आनंद भी लेती है और रोष होने पर रति से विमुख भी होती है. वह समाज से निडर होकर प्रेम भी करती है पर जैसे ही लगता है कि वह पकडी जायेगी, डरती भी है.पद्माकर और जायसी ने अपने समय के अनुसार काव्य रचना की है. पदमावत और जगद्विनोद का अध्ययन करने पर कहीं-कहीं लगता है कि जायसी की नायिकायें इस लोक की नहीं है पर जगद्विनोद की नायिकायें इसी लोक की स्त्री का प्रतिनिधित्व करती नज़र आती हैं.

संदर्भ सूची


20.नित्यानंद तिवारी, मध्यकालीन साहित्य:पुनरवलोकन, पृष्ठ-80 
21. पदमावत, पद-89
22. नित्यानंद तिवारी, मध्यकालीन साहित्य:पुनरवलोकन, पृष्ठ-80
23.पदमावत, पद–132
24.  पदमावत, पद-131 (प्रथम पंक्ति) 
25. जगद्विनोद, छंद- 108
26.   पदमावत, पद -527
27. जगद्विनोद, छन्द-162
28.जगद्विनोद, छन्द-80
29.पदमावत, पद-430
30.जगद्विनोद, छंद-61
31.पदमावत, पद-428
32.महादेवी वर्मा, शृंखला की कड़ियाँ, पृष्ठ-83
33.रामचंद्र शुक्ल, त्रिवेणी, पृष्ठ-38 
34.जगद्विनोद- छन्द-131 
35. पदमावत, पद-54
36.जगद्विनोद, छंद 
37.पदमावत, पद-341
38. जगद्विनोद, छंद-74
39.वही छंद-22-
40.रामचंद्र शुक्ल, त्रिवेणी, पृ.37, 
41.अकबर की सूक्तियाँ अकबरनामा से (उल्लेखित) भारतीय इतिहास में मध्यकाल, लेखक इरफान    हबीब, पृष्ठ-38
42.त्रिलोचन शास्त्री, रीतिकाल एक क्षयी युग- (लेख), पुस्त. साहित्य इतिहास और आधुनिक बोध,        पृ.199, 
43. सलाम आखिरी
44.जगद्विनोद, छंद-125  
45.वही, छंद-124 
46.वही, छंद-170


दलित स्त्रीवाद , मेरा कमराजाति के प्रश्न पर कबीर

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गरीबी जिसके लिए बाधा नहीं : किरण ठाकरे

एक घरेलू कामगार माँ की बेटी किरण ठाकरे में नेतृत्व की व्यापक संभावनाएं हैं. वे अपने जीवन का पहला चुनाव भी नागपुर महानगरपालिका के लिए लड़ रही हैं. ओबीसी जाति से आने वाली किरण के संघर्षों और उनके राजनीतिक स्वप्न को हम सझते हैं विक्रम कुमार से  स्त्रीकाल में महिला-नेतृत्व सीरीज के तहत. 

21 तारीख को नागपुर महानगरपालिका का चुनाव होने जा रहा है, जहाँ एक तरफ आरएसएस-बीजेपी सहित सभी बड़ी पार्टियां धन-बल के साथ चुनाव में उतरेगी वहीँ दूसरी तरफ 23 वर्षीय किरण ठाकरे धन-बल और साम्प्रदायिकता की राजनीति को ख़ारिज करने के लिए नागपुर महानगरपालिका का चुनाव लड़ रहीं हैं, मतदाताओं से ही चंदा लेकर. किरण ठाकरे समाज में बदलाव के लिए संघर्षरत है और इस बदलाव में उनका परिवार भी उनके साथ है, जबकि उनकी पारिवारिक स्थिति ठीक नहीं है, एक कमरे का घर है, जिसमे मां, पिता, छोटी बहन निशा ठाकरे और खुद किरण भी रहती हैं.

किरण ठाकरे के घर उनका हौसला आफजाई करने पहुँची एनएफआईडवल्यू की राष्ट्रीय महासचिव

दलित महिलाओं के संघर्ष की मशाल: मंजुला प्रदीप 

2009 में एक दुखद घटना घटी, उनकी छोटी बहन योगिता ठाकरे (किरण ठाकरे की छोटी बहन) की संदेहास्पद मौत हो गई और इनकी लाश वर्तमान में केन्द्रीय मंत्री सह बीजेपी के बड़े नेता नितिन गडकरी के कार में मिली. योगिता ठाकरे के मृत शरीर पर 17 जख्म के निशान थे और मुंह, नाक से खून बह रहा था, तब से किरण ने आपनी बहन के साथ-साथ औरों को भी इंसाफ दिलाने की लड़ाई शुरू कर दी. किरण की मां गाँव में ही बरतन मांझने का काम करती है, जिससे इनका घर चलता है, इतनी कठिन परिस्थिति में होने के बावजूद इन्होंने हार नहीं माना और एक मोर्चा खोल दिया आरएसएस और बीजेपी के खिलाफ|.आज ये आरएसएस-बीजेपी के गढ में नितिन गडकरी को चुनौती देने के लिए तैयार हैं, उनके घर के इलाके से आम आदमी शहर विकास मंच के तरफ से नागपुर महानगरपालिका का चुनाव लड़ रही हैं|  एक तरफ धनबल दूसरी तरफ जनता से चन्दा लेकर किरण चुनाव लड़ रही हैं, अबतक अधिकांश घरों में इन्होने संपर्क पूरा कर लिया है.

पढ़ें: पूर्ण शराबबंदी के लिए प्रतिबद्ध वड़ार समाज की बेटी संगीता पवार

किरण ने अपनी पढाई नागपुर के सरकारी स्कूलों से की है- मैट्रिक, इंटर (कला) करने के बाद इन्होंने आगे की  पढ़ाई के लिए नागपुर विश्वविद्यालय में स्नातक (राजनीति विज्ञान) में दाखिला लिया और अपनी पढ़ाई को जरी रखा है|  किरण बताती हैं कि उन्के  गाँव में सरकार द्वारा संचालित स्कूलों  को बंद करा दिया गया है और जो शिक्षक थे उनको कोई दूसरा काम दे दिया गया है ताकि वे स्कूल में पढ़ा ना पायें. किरण का मानना है कि ‘शिक्षा का निजीकरण और व्यापारीकरण नहीं होना चाहिए नहीं तो गरीब, किसान-मजदूर के बच्चे पढ़ नहीं पाएंगे, शिक्षा सबको बिना किसी भेद-भाव के सामान रूप से मिलनी चाहिए. इस समाज में बदलाव लाने के लिए शिक्षा सबसे ज्यादा जरुरी है, इसीलिए इन्होंने अपनी पढ़ाई जारी रखी है.’

मतदाताओं से मिलती किरण

मार्क्सवादी विचारधारा ने किरण को सबसे ज्यादा प्रभावित किया, जिससे कि आन्दोलन तथा इसकी जमीन तैयार करने में उन्हें बहुत सहायता मिली उन्होंने नागपुर में मजदूर आंदोलनों में कई बार हिस्सा लिया और नेतृत्व भी किया. इस तरह के आंदोलनों में रहने से राजनीतिक समझ और भी प्रगाढ हो जाती है. किरण कहती हैं कि “राजनीति में अधिकांशतः जिनके पास धन और बल है या जो विशेष परिवार से ताल्लुक रखते हैं, वही लोग राजनीति कर रहे है, जिसका मकसद जनता को लूटना है और यही सब देख कर लोग कहते है कि राजनीति गन्दी होती है.”

:दलित महिला उद्यमिता को संगठित कर रही हैं सागरिका

किरण ने मार्क्स, लेनिन और भगत सिंह को पढ़ा है. आंदोलनों के अनुभव से उनकी अपनी एक समझदारी बनी, जो वे आपनी बातों में रखती भी हैं. उन्होंने कहा कि “राजनीति गन्दी नहीं होती है बल्कि कुछ लोगों कि गन्दी हरकतों के कारण ऐसालगने लगती है,” उनका मानना है कि सबको राजनीति करनी चाहिए और जबतक गरीब मजदूर महिलाएं राजनीति नहीं करेंगे, तबतक वे अपने हक़ को नहीं ले पाएंगे. ऐसे में किरण का नागपुर महानगरपालिका का चुनाव लड़ना यह दिखाता है कि अब वे  दिन नहीं रहे जब  सर्वहारा वर्ग सिर्फ नेता चुनेगा अब नेता बनने का दिन आ गया है.  इनकी लड़ाई बराबरी की लड़ाई है, जो कि पूंजीवाद और सांप्रदायिक ताकतों के खिलाफ है, जिससे न सिर्फ समाज को नुकसान है, बल्कि समाज का अस्तित्व भी खतरे में आ जाता है.
किरण जहाँ से चुनाव लड़ रही हैं,  वहां उन्होंने कई सारे मुद्दों पर काम किया है.  मुख्य रूप से महिलाओं पर जिस तरह से हमले हो रहे हैं, उनके सवाल बुलंदी के साथ उठाया है और वे खुद भी अपनी छोटी बहन के न्याय के लिए लड़ रहीं हैं, जिसकी हत्या कर दी गई थी. इन्होंने नागपुर में महिलों को एक हिम्मत देने का काम किया है और आरएसएस के खिलाफ आमने-सामने मैदान में हैं.जाति हमारे समाज की सच्चाई है जिससे होकर दलितों, आदिवासियों, पिछड़ों, अल्पसंख्यकों को गुजरना पड़ता है, किरण और इनकी मां ने भी इसका सामना किया, किरण की मां जहाँ काम करने ब्राह्मणों के घर में जाती हैं, तो उन्हें जाति के नाम पर प्रताड़ित किया जाता रहा है.  ये कोई एक घर की बात नहीं है, ऐसा सभी ब्राह्मणों के घरों में होता है. सभी लड़ाइयों के साथ-साथ यह भी एक लड़ाई है और परिवार ने हिम्मत रखा और लड़ा. किरण कहती हैं कि “ये जो अमीरी और गरीबी के मध्य जो शोषण की खाई है उसे ख़त्म होना चाहिए, नहीं तो इस पूंजीवादी व्यवस्था में अमीर और अमीर होता जा रहा है तथा गरीब और गरीब होते जा रहा है- अगर इसी तरह से चलता रहा तो शोषण का रूप और भी भयानक होगा फिर इंसानियत खतरे में आ जायेगी.” किरण के बुलंद इरादों के लिए एक अच्छी बात यह रही है कि उन्हें जनता के मुद्दों के लिए हमेशा संघर्षरत जम्मू आंनद का मार्गदर्शन मिला.  पिछले सात-आठ सालों से उनका राजनीतिक प्रशिक्षण जम्मू आनंद के साथ जनता के सवालों पर संघर्ष करते हुए हुआ. बुलंद इरादों वाली इस लडकी की हौसला आफजाई के लिए पिछले 10 फरवरी को एनएफआईडवल्यू की राष्ट्रीय महासचिव एनी राजा उनसे मिलने उनके घर पहुँचीनी और  चुनावी लड़ाई के लिए उन्हें शुभकामनायें दी.



समाज में जब भी आम लोगों का शोषण होगा शोषित अपनी आवाज बुलंद करेंगे और शोषण के कारोबार को ध्वस्त करेंगे. किरण विकास के वर्तमान मॉडल को झूठी मानती हैं, “जहाँ ऊँची ईमारत बना देना, पुल बना देना, बांध बना देना ही विकास के तौर पर दिखाया जाता है. ये सब एक छलावा है,  इस तरह के विकास का फायदा आम आदमी को नहीं होता. देश की आम जनता खुश नहीं है , उसे जिंदगी को बचने के लिए जद्दोजहद करना पड़ रहा है.” किरण के अनुसार, “विकास वह होगा, जिसमें सबको शिक्षा, आवास, रोजगार, खाना और सबको समान रूप से न्याय दिया जायेगा.”

बुलंद इरादे और युवा सोच के साथ

किरण जिस सोच के साथ आगे बढ़ रही हैं, इससे कहीं न कहीं लगता है कि बदलाव हो रहा है और जब समाज में कुछ बदलने की हलचल होती है तब लोग सचेत अवस्था में आते हैं, किरण ने यही किया है, समाज में लोगों को सचेत करने की कोशिश शुरू की है और यह जरुरी है कि आम जनता को सोच कर तय करना पड़ेगा कि क्या सही हो रहा है और क्या गलत हो रहा है, यह तय होना भी बदलाव है.


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दलित स्त्रीवाद , मेरा कमराजाति के प्रश्न पर कबीर

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बहन भी तो मेट्रो ले रही होगी इस वक्त

सिद्धार्थ प्रियदर्शी


क्रिएटिव राइटर और फिल्मों और सीरियल्स में सक्रिय लेखन।संपर्क: 9718277003

शाम 6 बजे ऑफिस छूटने के बाद की भारी भीड़ में 17 मिनट के इंतज़ार के बाद आई यह पहली मेट्रो ट्रेन थी. दरवाज़े खुलने के 6 सेकेंड बाद सारी सीटें फुल और अगले ही पल खड़े होने का ठिकाना ढूंढते लोग. ठसाठस भरी मेट्रो ट्रेन, दरवाज़े के पास वाले पैसेज में बलिष्ठ देह संरचनाओं के बीच 3 कमनीय युवतियां और अचानक मेहरबां हुई अपनी किस्मत पे इतराते वह चार लड़के !
अनाउंसमेंट हुआ – “दरवाजों से हटकर खड़े हों”

अपने शरीर को दरवाज़े से बचाने के क्रम में कमनीय काया ने खुद को थोड़ा पीछे किया. इधर उसके खुले बाल पीछे खड़े एक ‘भइया जी’ के कन्धों पे झूल गए और किसी अनोखी ‘फील’ से भइया जी का रोम रोम तृप्त हो उठा. युवती कानों में इयर प्लग लगाए किसी गीत में लीन थी और भइया जी सबसे नज़रें चुराकर युवती के बालों से लेकर नितम्बों तक उसके जिस्म को आँखों से सहलाने में तल्लीन थे. कभी ये युवती की नंगी सुराहीदार गर्दन को निहारते; कभी उसके बालों की खुशबू को 3 इंच की दूरी से अपने नथुनों में भरकर घर तक ले जाने की चेष्टा करते हैं. भइया जी तीन स्टेशन बाद यह सौभाग्यशाली यात्रा समाप्त कर ट्रेन से उतर गए.


ये तीनो युवतियां बेपरवाह और बेलौस थी. मेट्रो के इस ठेलम-ठेल के बीच सफ़र को ‘सफर’ करना उनके रोजमर्रा की दिनचर्या में था. वृहन महानगरीय संस्कृति की परिभाषा में स्त्री- पुरुष के बीच घटते सामाजिक फ़ासले की स्वीकार्यता और बढ़ती यौन कुंठाओं की जुगुप्सा ने इन लड़कियों को नफ़ा और नुक्सान दोनों पहुचाया है.

फ़िलहाल, ट्रेन चलती जा रही है. स्टेशनों के बाईं ओर स्थित प्लेटफार्म पर ट्रेन रूकती है. लोग उतरते और चढ़ते जा रहे हैं पर दाहिने दरवाजे के इस सुरक्षित कोने में दृश्य वैसा ही है जैसा कि उपर की पंक्तियों में बताया गया है.


ख़ैर; अब दूसरी रूपसी पर नज़र डालते हैं…


दिल्ली शहर के मौसम से सर्दी उतार पर है. फिर भी सुबह शाम टी-शर्ट में घूमना दिलेरी का काम है. जिम में पसीना बहाकर बनाई गई मुग्दड़ जैसी बाँहों को काली और सफ़ेद टी शर्ट में एक्सपोज़ करते दो देसी बन्दों के निहायत ही घटिया और हर बात में एक दूसरे की ‘भैंण’ को समर्पित क्रियात्मक शब्दों के बीच एक लकदक अत्याधुनिका बाला ! दिल्ली एनसीआर में भैंणें ( पढ़ें–बहनें ) बड़ी सस्ती बिकती हैं; हर बात में बिकती हैं, चाहे किसी की भी हों. ट्रेन की छत से लटकते स्टैंडिंग सपोर्ट को पकड़ने के क्रम में दोनों देसी ब्वॉयज़ ने अपने कन्धों के बीच युवती को लगभग जकड़ रखा है. इधर परेशान युवती बार-बार; इधर-उधर शिफ़्ट होकर उन्हें अपने होने के एहसास दिलाने की प्रक्रिया में उन्हें अपनी छुवन का और आनंद दे रही थी. और दोनों भाई लोग कस के आनंद ले रहे हैे. देखने वालों के नज़रिये में यहाँ गलती लड़की की ही है. ट्रेन में महिला डिब्बा होने के बावजूद वह सामान्य डिब्बे में चढ़ गई है, ज़रूर यह भी लोगों के बीच दबकर मज़े लेना चाहती होगी. कपडे भी बड़े मॉडर्न टाइप हैं, मतलब यह ********.


इतने में एक देसी ब्वॉय का हाथ नीचे की ओर गया और युवती अचानक चिहुँक उठी.
” एक्सक्यूज़ मी ! विल यू प्लीज स्टैंड प्रॉपरली !”
नम्र आवाज़ में की गई इस याचना का उत्तर उतनी ही फटी आवाज़ में आता है—-
“के घणीं तकलीफ़ हो राखी है मैडम. बाक्की लोग्ग भी तो खाडे हैं !”
युवती ने निराशा में सिर को हलके से हिलाया और वापस वैसे ही खड़ी हो गई. अब उस लड़के का हाथ बार बार नीचे जा रहा है. युवती अब मौन है क्योंकि उसे भी एहसास हो गया कि अगले दस या बीस मिनट तक ये ज़लालत उसे झेलनी ही है. दोनों लड़कों की आपसी फुसफुसाहट और मुखर हो उठती है——
“देक्ख, केसो सिकुड़ी सी खडी है”

“भैंण** ! लाग रहा प्रपोज़ल डे के दिन साड़े ब्वायफ़्रेंड ने इसे अपणां प्रपोजल थाम दिया.
“खें खें खें……”
” भैंण की ** ! बाहें तो देख, मखमल सी हो राखी हैं”
” भाई, मेने तो टाँगे लेग-इन के ऊपर से हौलू से सहला दी.”
आसपास के चार छह लोग ये जुगुप्सा जगाने वाली फुसफुसाहट सुन रहे हैं. उनकी बातों से कुछ के चेहरों पर मुस्कराहट है तो कुछ के चेहरों पर क्षोभ के भाव हैं. ये क्षोभ वाले चेहरे देखकर संतोष हुआ कि लोगों में ‘अभाव’ का ‘भाव’ भले हो; ‘भाव’ का ‘अभाव’ नहीं हैं.


अब कहानी के तीसरे पटल को देखिये.


जब उपर के दोनों दृश्य फिल्माए जा रहे हैं, उस वक़्त सिद्धार्थ बाबू ट्रेन डिब्बे के इस दायें दरवाज़े से सट कर बनाये गए उस खाली स्थान का लुफ़्त उठा रहे है जो भीड़ में खड़े होने के लिहाज़ से सर्वोत्तम है. सबसे ऊपर जिस चौथे लड़के का जिक्र किया गया है, ये वही हैं. हाँ, इनके साथ किस्मत पे इतराने वाली बात ज़रा सूट नहीं करती क्योंकि ये ऐसे पेशे से तआल्लुक़ रखते हैं जहाँ लड़के और लड़कियों के बीच का अनुपात 1 : 24 का है. एक नवयौवना इनसे सटकर खड़ी है. सिद्धार्थ बाबू ने शालीनता से उसको अधिकतम संभव स्थान दे रखा है. पर भीड़ के धक्के और लोगों के जिस्म का दबाव अब उनके पैरों को अस्थिर कर रहा है. अपने आईपैड को सँभालते औए कानों से हैडफ़ोन उतारते उनका पैर यौवना के जूतों पर पड़ जाता है. उधर से एक सिसकारी निकली और इधर सिद्धार्थ बाबू के मुँह बड्डड्डा वाला सॉरी. दोनों ने एक दूसरे की मज़बूरी समझी, आखों में मुस्कुराये और वापस पहले जैसी मुद्रा में खड़े हो गए. इस बार सटकर खड़े होने में भी दोनों तरफ निश्चिन्तता के भाव हैं. उसके बाएं हाथ के करीने से कटे नाख़ून और उस पर मैजेंटा कलर का नेलपेंट सिद्धार्थ बाबू को बहुत मोहक लगा.
एक उद्घोषणा होती है—–

“यह राजीव चौक स्टेशन है, दरवाज़े बाईं तरफ खुलेंगे”
अब सबको उतरने की जल्दी है. वो तीन युवतियां और सिद्धार्थ बाबू समेत दोनों देसी ब्वॉयज़ उतरने के लिए दाहिने दरवाज़े से बाएं दरवाज़े की तरफ आते हैं. सिद्धार्थ बाबू उस तीसरी युवती को सुगम निकास देने के लिए उसके आगे आ जाते हैं और भीड़ के बीच रास्ता बनाते हुए उतरते हैं. प्लेटफार्म तक पहुँचते पहुँचते सिद्धार्थ बाबू के पीछे चल रही तीसरी युवती फुसफुसाती है—— ‘रॉस्कल’ ! वह चौंकते हैं और आगे जाकर पीछे देखने के लिए मुड़ते हैं. लड़की अब येलो लाइन की ट्रेन लेने अंडर ग्राउंड सीढ़ियों की तरफ जा रही है. दोनों देसी ब्वॉयज़ बेशर्मी से किसी बात पे हँस रहे हैं. वह तीनो गेट नं 7 की ओर से कनॉट प्लेस के लिए बाहर निकल रहे हैं. आगे आगे दांत निपोरते देसी डूडस और पीछे सिद्धार्थ बाबू .
“भैंण की ** के तरबूज़ पे हाथ फेर दिया भाई”



एक देसी ब्वॉय अपनी महानतम उपलब्धि की बेशर्म मुनादी कर रहा है. दूसरा उससे बड़ी बेशर्मी से गर्व करता है—-
” भाई मेने तो 20 मिंट जम के मज़े किये”
अचानक सिद्धार्थ बाबू को याद आता है कि उनकी बहन इस वक़्त गुड़गाँव स्थित अपने ऑफिस से निकलकर मेट्रो ले रही होगी. एकदम वह बहुत थके से महसूस करने लगे. पैरों में जैसे जान नहीं रही. ट्रेन के अंदर के सारे दृश्य उनकी आँखों पर चलचित्र बना रहे हैं. स्टेशन के चारों तरफ उठते शोर में उन्हें सिर्फ एक ही शब्द सुनाई देता है—–
” बहन…बहन…बहन….भैण..भैन

दलित स्त्रीवाद , मेरा कमराजाति के प्रश्न पर कबीर

अमेजन पर ऑनलाइन महिषासुर,बहुजन साहित्य,पेरियार के प्रतिनिधि विचार और चिंतन के जनसरोकार सहित अन्य सभी  किताबें  उपलब्ध हैं.

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संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com  

छुई-मुई

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सुशांत सुप्रिय


सुशांत सुप्रिय कथाकार, कवि और अनुवादक हैं. अब तक दो कथा-संग्रह ‘हत्यारे’ (२०१०) तथा ‘हे राम’ (२०१२) और एक काव्य-संग्रह ‘ एक बूँद यह भी ‘ ( 2014) प्रकाशित हो चुके हैं। अनुवाद की एक पुस्तक ‘ विश्व की श्रेष्ठ कहानियाँ ‘ प्रकाशनाधीन है ।संपर्क: 09868511282 / 08512070086

( अब आप बड़े आदमी हो गए हैं . कार में चलते हैं . छुरी-चम्मच से खाना खाते हैं . विमान से  देश-विदेश की यात्राएँ करते हैं . कॉन्फ़्रेंसों के दौरान पंच-सितारा होटलों में ठहरते हैं . एक पढ़ी- लिखी सम्भ्रांत स्त्री से आपका विवाह हो चुका है . लेकिन अपनी स्मृतियों का आप क्या करेंगे ? कुछ स्मृतियाँ हैं जिनकी जड़ें अन्य सभी स्मृतियों से अधिक गहरी हैं . समय और स्थान की दूरी भी उन्हें आपसे कभी अलग नहीं कर सकती . अक्सर आपका मन आपको वहीं अतीत  में लौटा ले जाना चाहता है जहाँ आपका एक अंश पीछे छूट गया है . जैसे काली रात में आकाश में बिजली कौंधने पर पल भर  के लिए उजाला हो जाता है और आपको क्षणिक ही सही , सब कुछ साफ़-साफ़ दिखाई देने लगता है … )

तो उस गाँव में एक घर है जिसमें मैं रहता हूँ . उस घर के पुरुष जनेऊ पहनते हैं . उस गाँव के बिना इमारत , बिना छत वाले स्कूल में एक मास्टरजी पढ़ाते हैं जिन्हें हम सुकुल मास्टरजी कहते हैं . मैं उस स्कूल में पढ़ता हूँ . उनके सोंटे से डरता हूँ . गाँव के कुएँ के चबूतरे पर खेलता हूँ . गाँव के मंदिर में पिताजी के साथ पूजा करता हूँ . लेकिन गाँव में ऐसे बच्चे भी हैं जो इस स्कूल में नहीं पढ़ सकते . जो कुएँ के चबूतरे पर क़दम नहीं धर सकते . जो गाँव के मंदिर की सीढ़ियाँ नहीं चढ़ सकते . जो उस मंदिर में पूजा नहीं कर सकते .

 एक दिन स्कूल के बाद मैं खेलता-खेलता मुसहर टोले की तरफ़ चला गया , हालाँकि उधर जाना मना था . वहाँ एक नौ-दस साल की लड़की तालाब के किनारे मछली पकड़ रही थी . वह लड़की मुझे अच्छी लगी .
” ऐ लड़की , तुम्हारा नाम क्या है ? हमसे दोस्ती करोगी ? हमको मछली पकड़ना सिखाओगी ? ” मैंने धड़कते दिल से पूछा .
” धनिया . ” उसने कहा . हमको अपने साथ इस्कूल ले कर जाओगे ? ”

  अच्छा है , स्कूल में इसका साथ रहेगा , यह सोचकर मैंने जल्दी से हाँ कर दी . हालाँकि मुझे माँ-पिताजी की बात याद आई कि मुसहर टोले में गंदे लोग रहते हैं , उधर नहीं जाना चाहिए . और यह सोचकर कि मैंने मुसहर टोले की एक लड़की को अपना दोस्त बना लिया है , मुझे डर भी लगा . कहीं भैया या दीदी ने देख लिया तो ? माँ-पिताजी को पता चल गया तो ? लेकिन धनिया से दोस्ती का आकर्षण उस डर से बड़ा था .


  फिर क्या था . मैं रोज़ स्कूल से लौटते समय कुछ देर के लिए मुसहर टोले के आगे गाँव के बाहर उगे जंगल में धनिया से मिलने के लिए जाने लगा . कुछ ही दिनों में मुसहर टोले के कई और लड़के भी मेरे अच्छे दोस्त बन गए . कलुआ , बिसेसरा , गनेसी , रमुआ — सब धनिया के साथ वहीं जंगल में घूमते रहते थे . उनकी नाक बह रही होती थी . उनके कपड़े फटे हुए और गंदे होते थे . फिर भी वे मुझे अच्छे लगते थे . वे शहद के छत्ते में आग लगा कर शहद निकाल लेते थे , गुलेल से निशाना लगा कर उड़ती चिड़िया गिरा लेते थे .
” हमको भी गुलेल चलाना सिखाओ न ” एक दिन मैंने ज़िद की .
” तुम्हारे बाबू को पता चला कि तुम हम लोगों के साथ घूमते हो तो तुमको बड़ी मार पड़ेगी . ” धनिया बोली .
” क्यों ? ” मैं यह जानता था लेकिन मैंने बड़ी मासूमियत से पूछा .
” हम लोगों के साथ घूमने-फिरने से , हमारा छुआ खाने-पीने से तुम्हारा धर्म ख़राब हो जाएगा . ” बिसेसर बोला .
” हम नहीं मानते . ” मैंने कहा .

 एक बारह साल के बच्चे के लिए तालाब के पानी में चपटे पत्थर से ‘ छिछली ‘ खेलना सीखना , आम के पेड़ पर चढ़ना सीखना , गुलेल चलाना सीखना और मछली पकड़ना सीखना जैसे काम ‘ धरम ‘ के बारे में सोचने से ज़्यादा ज़रूरी थे . यूँ भी मुझे उनका साथ अच्छा लगता था . इसलिए घर पर पता चल जाने पर मार पड़ने का डर होते हुए भी मैंने उन सबका साथ नहीं छोड़ा .
एक दिन मैंने उनसे पूछा — ” अच्छा , बताओ , मुझे तुम सब लोग क्यों अच्छे लगते हो ? ”
इससे पहले कि मेरे बाक़ी साथी कुछ कह पाते , धनिया तपाक से बोली — ” पिछले जन्म में तुम भी मुसहर रहे होगे , और का ! ” न जाने क्यों यह सुनकर मुझे बहुत अच्छा लगा .
” ये कौन-सा पौधा है ? ” एक दिन तालाब के किनारे घूमते हुए मैंने पूछा . पत्तियों को हाथ लगाते ही वे सिकुड़ जाती थीं , सिमट जाती थीं . जैसे शरमा कर खुद में ही बंद हो रही हों .
” इ छुई-मुई है . ” धनिया बोली .

अगले दिन शरारत में ही मैंने धनिया के पेट में उँगली से गुदगुदी कर दी . वह हँसते-हँसते ज़मीन पर गिरकर लोट-पोट होने लगी . मैं भी उसके साथ ज़मीन पर बैठकर उसकी देह में उँगलियों से गुदगुदी करता रहा . इस सब के बीच मेरा मुँह उसके मुँह के क़रीब आ गया और मैंने उसे चूम लिया . उसका चेहरा शर्म से लाल हो गया . लाज से उसकी देह ऐसे सिमट गई जैसे वह छुई-मुई की पत्ती हो .
” अरे , तुम तो बिलकुल छुई-मुई जैसा करती हो . ” मैंने कहा .
” धत् ! ” यह कहकर वह वहाँ से भाग गई .
” आज से हमने तुम्हारा नाम छुई-मुई रख दिया है . ” मैं चिल्लाया .

 इसी तरह दिन बीतते रहे . एक दिन स्कूल के बाद जब मैं छुई-मुई और दूसरे दोस्तों से मिलने गया तो उन्होंने मुझे मेरा वादा याद दिलाया कि मैं उन सबको भी अपने साथ स्कूल ले जाऊँगा . अगले दिन के लिए बात तय हो गई . अगली सुबह छुई-मुई और मेरे दूसरे साथी स्कूल के पास मेरा इंतज़ार कर रहे थे . उन्हें लेकर मैं सुकुल मास्टरजी के पास पहुँचा . उन्हें देखकर सुकुल मास्टरजी के माथे पर बल पड़ गए .
” क्या है रे ? आज देर से क्यों आया है ? ”
” मास्साब , ये सब हमारे दोस्त हैं . ये भी हमारी तरह स्कूल में पढ़ना चाहते हैं . ” उनके सवाल का जवाब दिए बग़ैर मैंने कहा .

मास्टर साहब शायद उन सब के बारे में पहले से जानते थे . उन सबको ज़ोर से डाँटकर वे बोले — ” भागो यहाँ से , ससुरो ! अब मुसहर लोग भी स्कूल में पढ़ेंगे ! ”
यह सुनकर छुई-मुई की आँखों में आँसू आ गए . मुझे बहुत बुरा लग रहा था . पर मैं मास्टर साहब के सोंटे से बहुत डरता था . कलुआ , बिसेसर वग़ैरह मास्टर साहब को गाली देते हुए वहाँ से भाग गए . छुई-मुई भी रोते-रोते वहाँ से चली गई .
” कुल का नाम खूब रोशन कर रहे हो , बबुआ ! ” उनके जाने के बाद मुझे सोंटे से मारते हुए मास्टर साहब बोले .
उसी दिन उन्होंने मेरे पिताजी को सारी बात बता दी . उस रात घर पर मेरी खूब पिटाई हुई और छुई-मुई और मुसहर टोले के दूसरे दोस्तों से मेरा मिलना-जुलना बंद करवा दिया गया .इस घटना के एक महीने के बाद पिताजी ने मेरा नाम शहर के स्कूल में लिखवा दिया और आगे की पढ़ाई के लिए मुझे चाचाजी के पास शहर भेज दिया गया .
” गाँव में रहकर यह बुरी संगत में बिगड़ रहा था . ” मुझे शहर तक छोड़ने आए पिताजी ने चाचाजी से कहा .
अब मैं साल में एकाध बार ही गाँव आ पाता . वहाँ भी मुझ पर कड़ी नज़र रखी जाती . मेरा मन छुई-मुई और दूसरे दोस्तों से मिलने के लिए छटपटाता रहता .

फिर स्कूल की पढ़ाई ख़त्म करके मैंने किसी दूसरे शहर में कॉलेज में दाख़िला ले लिया . गाँव आए हुए मुझे कई साल हो गए , लेकिन छुई-मुई की छवि मेरे भीतर अब भी सुरक्षित थी . अब मैं बड़ा हो गया था . मेरी दाढ़ी-मूँछें निकल आई थीं . मैं शेव करने लगा था . मेरे भीतर छुई-मुई से मिलने की इच्छा बलवती होती जा रही थी . किंतु फिर मेरी नौकरी लग गई . और मैं उधर व्यस्त हो गया .

कई साल बाद पिताजी की मृत्यु के मौक़े पर जब मैं गाँव लौटा तो मैंने पाया कि मेरा गाँव अब पहले वाला गाँव नहीं रह गया था . वह बहुत बदल चुका था .पिताजी के दाह-संस्कार के बाद मैं छुई-मुई और दूसरे साथियों के बारे में पता करने मुसहर टोला पहुँचा .
” धनिया के साथ बहुत बुरा हुआ , बेटा . पैसा-रुतबा वाला लोगन का लड़िका सब ऊ के साथ मुँह काला कर के ऊ का गला घोंट दिया और लास को तालाब में फेंक दिया . ” मुसहर टोले के एक बुज़ुर्ग ने दुखी मन से बताया .

यह सुनकर मेरी आँखों के आगे अँधेरा छा गया . मेरा गला सूखने लगा . और मुझे साँस लेने में तकलीफ़ होने लगी .मुझे लगा जैसे मेरी उड़ान का आकाश हमेशा के लिए खो गया हो .
” और बिसेसर , कलुआ वग़ैरह कहाँ हैं ? ” मैंने किसी तरह खुद को सम्भालते हुए पूछा .
” बेटा , ऊ लोग धनिया की मौत का बदला लेने गए . पर हत्यारा सब ने हमार सब बचवा को गोली मार दी . उहे रात ऊ सब का गुंडा लोग आय के मुसहर टोला में आग लगा दिया . ” बुज़ुर्ग की आँखों में अँधेरा भरा हुआ था .
” और धनिया के माँ-बाप का क्या हुआ ? ” मैंने डरते-डरते पूछा .
” ऊ बेचारे भी हमार टोला में लगी आग में जल के मर गए .” बुज़ुर्ग ने रुँधे गले से बताया .
” पुलिस ने कुछ नहीं किया ? ”
” पुलिस तो पैसा-रुतबा वालन की सुने है . हम ही लोगन को डरा-धमका के चली गई . ”

तो यह था मेरे देश की इक्कीसवीं सदी का कड़वा सच ! हर गाँव में खैरलाँजी और मिर्चपुर .  मैं वहाँ से ख़ाली हाथ लौट आया . मुझे लगा जैसे मेरी दुनिया लुट गई हो . हत्यारों की पहुँच ऊपर तक थी . मैं छटपटा कर रह गया .लेकिन  इस घटना से बेचैन हो कर मैंने अपनी नौकरी से इस्तीफ़ा दे दिया . मैंने गाँव के बचे हुए दलित लड़के-लड़कियों के साथ अपने पुश्तैनी धन से शहर में अपना एक एन. जी. ओ. स्थापित किया जो प्रताड़ित दलितों और आदिवासियों के बीच जा कर उनके पुनर्वास लिए काम करता है और उनके अधिकारों के लिए आवाज़ बुलंद करता है .

 मैंने गाँव में और तालाब के किनारे छुई-मुई के पौधे खोजने की बहुत कोशिश की , पर अब गाँव में छुई-मुई का पौधा कहीं नहीं बचा है . गाँव में जगह-जगह पक्के मकान बन गए हैं . बिजली के खम्भे लग गए हैं . एक पक्की सड़क अब गाँव को हाइवे से जोड़ती है . सुकुल मास्टरजी का देहांत हो चुका है . गाँव के जिस बिना इमारत , बिना छत वाले स्कूल से मैंने अपनी शुरुआती शिक्षा पाई थी , उसकी जगह एक पक्के इमारत वाला स्कूल बन गया है . मुसहर टोले के उस पार उगा सारा जंगल कट चुका है . जहाँ पहले छुई-मुई उगती थी , उस जगह अब दुकानें बन गई हैं — डिश टी. वी . और केबल टी. वी. वालों की दुकानें , कोका कोला और पेप्सी बेचने वाली दुकानें . तालाब का ज़्यादातर हिस्सा सूख गया है . जहाँ थोड़ा-बहुत पानी बचा है , वहाँ काई की एक मोटी परत जमी हुई है . वहाँ अब बीमारी फैलाने वाले मच्छर पनपते हैं .

बस एक चीज़ नहीं बदली है — वह है गाँव का मुसहर टोला . वह आज भी उतना ही उपेक्षित , उतना ही अलग-थलग पड़ा हुआ. एक दिन आठवीं कक्षा में पढ़ने वाला मेरा बारह वर्षीय बेटा अपनी’ बायोलाजी ‘ की कापी लेकर  मेरे पास आया .
” पापा , ये ‘ मुमोसिका पुडिका ‘ क्या होती है ? ” उसने पूछा .
” यह एक पौधा होता है जिसे ‘ छुई-मुई ‘ कहते हैं . इसकी पत्तियों को हाथ लगाओ तो ये जैसे शरमा कर सिकुड़ जाती हैं . ” मैंने कहा .
” कितना फ़नी नाम है , पापा ! यह दिखने में कैसी होती है ? ”
कंक्रीट-जंगल वाले इस शहर में अब मैं तुझे क्या बताऊँ बेटा कि छुई-मुई दिखने में कैसी होती है . अब तो गाँव में भी छुई-मुई नहीं बची — मैंने मन में सोचा .
मुझसे अपने सवाल का जवाब नहीं पाकर वह बोला ” कोई बात नहीं , पापा . मैं इंटरनेट पर गूगल में ढूँढ़ लूँगा .”

( यदि आप मुझसे पूछेंगे तो मैं आपको नहीं बता पाऊँगा कि बहती हुई नाक वाले बच्चे मुझे क्यों अच्छे लगते हैं . फटे हुए गंदे कपड़े पहने बच्चे मुझे आज भी क्यों अपने-से लगते हैं . ढाबों में काम करने वाले बच्चों और मुझमें क्या रिश्ता है . फ़ुटपाथ पर जूते पॉलिश करने वाले बच्चों में मैं किन्हें ढूँढ़ता हूँ . लाल बत्ती पर गाड़ियों के शीशे साफ़ करने वाले बच्चों को मैं क्यों हर बार बीस-बीस रुपयों के नोट पकड़ा देता हूँ . इन्हें देखकर मैं क्यों उदास हो जाता हूँ . क्यों मेरा मन करता है कि मैं किसी तरह इन्हें इनका खोया बचपन वापस लौटा सकूँ . यदि आप मुझसे यह सब पूछेंगे तो मैं आपको वाकई यह नहीं बता पाऊँगा कि मुखौटा लगाए , पढ़े-लिखे , तथाकथित सभ्य , साहब लोगों के बीच मैं क्यों एक मिसफ़िट हूँ . धनाढ़्य लोगों के बीच मैं क्यों एक अजनबी हूँ . तथाकथित ऊँची जाति वाले लोगों के बीच मैं क्यों खुद को एक विदेशी जासूस-सा महसूस करता हूँ . छुई-मुई के प्रदेश से . छुई-मुई के काल से . छुई-मुई की जमात से … )

दलित स्त्रीवाद , मेरा कमराजाति के प्रश्न पर कबीर

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जायसी और पद्माकर की नायिकाओं के व्यक्तित्व के सामाजिक पक्ष का तुलनात्मक अध्ययन

आरती रानी प्रजापति

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में हिन्दी की शोधार्थी. संपर्क : ई मेल-aar.prajapati@gmail.com

किसी भी व्यक्ति के चरित्र निर्माण में समाज की अहम भूमिका होती है| समाज ही हमें बचपन से लेकर मृत्यु तक के आचार, व्यवहार को सिखाता है| व्यक्ति जहां रहता है वही उसका समाज है| उस जगह के नियम-क़ानून उसे मानने ही पड़ते हैं| यही नियम-क़ानून व्यक्ति के चरित्र को बनाते बिगाड़ते हैं.

स्त्री के चरित्र निर्माण में समाज की महत्वपूर्ण भूमिका है| प्रसिद्ध लेखिका सिमोन का कथन ‘स्त्री पैदा नहीं होती बनाई जाती है’ सही ही है| समाज की व्यवस्था ही स्त्री-पुरुष को उनके अंतर बताती है| स्त्री को घर संभालना है और पुरुष को बाहर काम करना है ये समाज के द्वारा ही तय होता है| प्रत्येक व्यक्ति अपने भीतर समाज को समेटे रहता है.

नारी समाज का अभिन्न अंग है. आदिम समय में स्त्री-पुरुष दोनों समान महत्व रखते थे. वह ऐसा समय था जब मनुष्य को काम सम्बन्ध बनाने की पूरी स्वतंत्रता थी. वह जब चाहे जिससे चाहे रज़ामंदी से संबंध बना सकता था. उस समाज में स्त्रियों को भी इस क्षेत्र में आज़ादी थी. वे अपनी मर्जी से किसी से भी संबंध स्थापित कर सकती थी. एकनिष्ठता का वहाँ कोई दायरा नहीं था. किंतु जैसे-जैसे समय बदला नारी की स्थिति खराब होती गई. उसे समाज में स्थापित पितृसत्ता ने गुलाम बना दिया. समाज में नारी के विभिन्न रुप मिलते हैं जैसे बेटी, पत्नी, माँ, बहन, प्रेमिका आदि. नारी के ये विभिन्न रुप पितृसत्ता की देन हैं. पितृसत्ता स्त्री को इन सम्बंधों में कैद कर उसकी स्वतंत्रता को पूरी तरह से छीन लेती है. उसे आदर्श पत्नी, माँ, बहन, बेटी बनने पर मजबूर किया जाता है. स्त्री को बालपन से ही उसके क्रियाकलापों (स्त्रियोंचित) समझाये जाते हैं वैसा ही व्यवहार करने को उसे बाध्य किया जाता है. ये सभी कुछ स्त्री की यौनिकता पर नियंत्रण रखने के लिए किया जाता है. स्वतंत्र स्त्री अपने हक़ की मांग कर सकती है| जिसे समाज बर्दाश्त नहीं करता इससे उसकी सत्ता कमजोर पड़ने लगती है.

साहित्य में भी स्त्रियों की दशा का चित्रण होता आया है| साहित्य के आदिकाल की यदि बात करें तो उसमें भले ही स्त्री केन्द्रित साहित्य नहीं लिखा गया, राजाओं की प्रशंसा ही की गयी थी तब भी उस काव्य के माध्यम से हम उस काल की स्त्रियों की दशा को समझ सकते हैं| पृथ्वीराज रासो के माध्यम से ये जान सकते हैं कि क्यों कैमास मारा गया| जबकि उसने कोई अपराध नहीं किया था| वह अपनी प्रिया के साथ रति में लीन था| लेकिन वह स्त्री राजा को पसंद थी इसलिए वह किसी और की हो जाए ये कैसे संभव था| यानी स्त्री को संपत्ति माना जाता था| संपत्ति पर कोई हक़ कैसे कर सकता है? स्त्री केन्द्रित कोई साहित्य भले ही न हो पर यदि उसमें स्त्री पात्र आता है तो उसके व्यक्तित्व के माध्यम से हम उस समाज को समझ सकते हैं| हिंदी साहित्य के मध्यकाल में स्त्रियों की अलग ही दशा देखने को मिलती है. जायसी-युग में स्त्री का पतिव्रता रुप अधिक मिलता है और रीतिकाल में प्रेमिका का.

जायसी कालीन साहित्य में नारी– जायसी के युग में स्त्री के विभिन्न पक्ष देखने को मिलते हैं| इस साहित्य में स्त्री के पतिव्रता रूप की प्रशंसा की गयी है| किन्तु पत्नी की इच्छाओं को वहां कोई स्थान नहीं दिया गया| पत्नी वह जो पति के हर कार्य को पूरा करे और उसे साधना करने दे| किन्तु पत्नी को कोई अधिकार वहां नहीं दिए गए| भक्तिकालीन समाज ने स्त्री पर शंका करने का बीड़ा उठाया| वह बात-बात पर स्त्री को ताड़ना देने की भी बात करता है| भक्तिकालीन समाज एक ऐसा समाज है जिसने स्त्री पर अविश्वास किया और उसकी बार-बार परीक्षा लेता है| मीरां इस समाज में अधिकारहीन स्त्री को अधिकार देने की बात करती है| वह भक्ति का अधिकार जो पुरुषों को प्राप्त है और स्त्रियों को कुल की लाज का हवाला देकर उनसे छीन लिया जाता है| भक्तिकालीन साहित्य में पुरुष कवि स्त्री की इसलिए निंदा करते हैं कि वह उसे विषय या संसार में लगाए रखती है| उसे साधना में बाधा दिखाई देती है स्त्री| साहित्य की कृष्ण काव्य धारा ने स्त्री के अन्य पक्षों को भी सामने रखा वह स्त्री की स्वतंत्रता की बात करते हैं| वह ऐसी स्त्री की कामना करते हैं जो अपने प्रेम के लिए सब-कुछ छोड़ कर आये. राम-कृष्ण की बाल लीलाओं के माध्यम से एक माँ की भावनाओं का भी वहां चित्रण किया गया है| इसकाल में सूफी काव्य परम्परा भी मिलाती है| जिसमें स्त्री को थोडा सम्मान दिया गया है| सूफी स्त्री में ईश्वर की झलक देखते हैं| इस कारण वहां स्त्री सामान की नज़रों से देखी गयी है पर समझने की बात ये है कि वहाँ हर स्त्री ईश्वर नहीं है| हर कण में ईश्वर के सिद्धांत को सूफी नहीं मानते| उनके लिए वही स्त्री ईश्वर हो सकती है जो देखने में अद्वितीय हो| अन्य कोई गुण उसके लिय मान्य नहीं है| बस देखने में इतनी सुन्दर हो कि लगे सब सुन्दर चीज उसी की उपज है| यदि कोई और सुन्दर स्त्री उन्हें दिख जाए तो शायद वे भी प्रतीक बन जायेगी पर क्योंकि सूफी कवियों को समाज में ये स्थापित नहीं करना था इसलिए ऐसा कुछ उन्होंने नहीं दिखाया| अधिकांश सूफी काव्य में दो स्त्रियाँ नायिका होती हैं|  इन प्रेमाख्यान काव्यों में चित्रित नायक-नायिका भारतीय पारिवारिक संरचना को बताते हैं. हिंदी साहित्य के इतिहास में डॉ. नगेंद्र लिखते हैं- प्रेमाख्यान-रचयिताओं ने, चाहे वे हिंदू हों या मुस्लमान, भारतीय वातावरण एवं हिंदू समाज की मर्यादाओं के अनुरूप ही नायक-नायिका का चित्रण किया है. भारतीय समाज में पुरुष के लिए बहु-विवाह की अनुमति थी, अत: इनके नायक भी प्राय: एक से अधिक विवाह करते हैं जबकि नायिकायें, भारतीय परम्परा के अनुसार पातिव्रत्य का पालन करती हुई अंत में सती हो जाती है.1

एक वो जो किसी राजा की पत्नी है दूसरी वह जिसमें ईश्वर का रूप कवि दिखाना चाहता है| नायक जो पहली स्त्री को छोड़ कर दूसरी को पाने के लिए जाता है पर जैसे ही नायक ईश्वर की झलक मिलने वाली स्त्री को पा लेता है वह भी सामान्य रानी बन जाती है.

जायसी के समय को देखे तो यह काल स्त्री के पक्ष से काफी महत्वपूर्ण है| जिस तरह से समाज में स्त्री थी और उसी को कवि लिख रहे थे| भक्तिकालीन साहित्य, समाज में व्याप्त पितृसत्ता को मजबूत करता है| कृष्णकाव्य परम्परा इसका अपवाद लग सकती हैं पर ऐसा है नहीं| यह सच है कि कृष्ण काव्य ने स्त्री को प्रेम करने की स्वतंत्रता दी पर वहां वह भक्ति की आड़ लेकर एक पुरुष के अनेक स्त्रियों से सम्बन्ध दिखाते हैं वहां किसी भी आलोचक की नज़र नहीं जाती| भक्तिभाव रखने वाले सामान्य जन कृष्ण की इस बात की प्रशंसा करते हैं कि वह एक ही समय में रास लीला व अन्य क्रियाएं करते हैं| सूरदास की बात आते ही आलोचकों को परकीया प्रेम उचित लगता है. जबकि यही आलोचक रीतिकाल में परकीया प्रेम-चित्रण की निंदा करते हैं. सूरदास के काव्य में ज्ञान पर प्रेम की जीत दिखाई गई है. कृष्ण की बांसुरी बजते ही गोपियाँ सब-कुछ छोड़ कृष्ण के पास चली आती हैं. तब वह उचित बात हो जाती है पर रीतिकाल की इसी बात के लिए आज तक रीतिकाल आलोचकों की मार सह रहा है. भ्रमरगीत की गोपियाँ इसलिए जानी जाती हैं क्योंकि वे अपने प्रेम के लिए ज्ञान को तर्क सहित त्यागती हैं.

पद्माकर कालीन साहित्य में नारी – रीतिकाल में स्त्री को केंद्र बनाकर काव्य रचना की गई है. जायसी के समय में जो स्त्री ताड़ना की अधिकारी थी वहीं रीतिकाल में मान करती, प्रेम के लिए अपने प्रियतम को बुलाती दिखाई देती है. वहाँ स्त्री को किसी कवि ने तुच्छ साबित करने की कोशिश नहीं की. रीतिकाल में भले ही परकीया महत्वपूर्ण है पर वहाँ स्वकीया भी अपनी आदर्श स्थिति में दिखाई देती है. रीतिकाल में कवि सामंजस्य करके चलते हैं. स्वकीया और परकीया दोनों को सम्भाव से वहाँ चित्रित किया गया है. रीतिकाल में नारी पूरी तरह स्वतंत्र हैं. वह अपने मन के कामातुर होने पर प्रियतम को बुलाना भी जानती हैं और यदि उनका प्रियतम किसी दूसरी स्त्री के पास जाकर आता है तो वह उसे सुनाती भी हैं. वहाँ कवि उसे ये अधिकार देते हैं कि वह अपने पति जिसे जायसी के समयकी पितृसत्ता व्यवस्था परमेश्वर बना देती है उसे व्यग्यांत्मक, प्रत्यक्ष रुप से सुना कर, अपना रोष प्रकट कर सके. भक्तिकाव्य में कृष्ण के अन्य स्त्रियों से सम्बंध बनाने पर जो स्त्रियाँ उस पर रोष नहीं जता पाती वहीं वे इस कमी को रीतिकाल में पूरा कर देती हैं.
पलनु, पीक, अंजनु अधर, धरे महावरू भाल.
आजू, मिले, सु भली करी; भले बने हौ लाल.2

यहाँ नायिका व्यंग के माध्यम से नायक को कह रही है| उसे रोष है नायक पर वह उसे सुनाती है| जायसी के समयकी कोई भी स्त्री अपने पति को इस तरह नहीं कह पाती| कवि की मानसिकता में ही नहीं था कि स्त्री भी पुरुष पर व्यंग कर सकती है| वह तो स्त्री को मात्र ताड़ना का अधिकारी बना देते हैं बिना इस बात को सोचे के उसकी मानसिक दशा क्या होती होगी अपने भावों को कुचलते समय.

रीतिकाल में समाज में हेय दृष्टि से देखे जाने वाली गणिका भी नायिका बन जाती है. रीतिकाल के कवियों ने गाणिका को सामान्य स्त्री की भांति ही संवेदनशील समझते हुए उसके हर मनोभावों को चित्रित किया गया है. स्वकीया के जो भेद जैसे आगतपतिका, प्रवत्स्यपतिका आदि मिलते हैं वही गणिका के लिए भी चित्रित हो रहे हैं. रीतिकाल में सर्वत्र स्त्री ही स्त्री दिखाई देती है. ये स्त्री भले ही पुरुष द्वारा चित्रित है, पर क्या समाज में ऐसी स्त्रियाँ नहीं थी? नायिका भेद सिर्फ दरबारी स्त्रियों पर लिखा गया हो ऐसा भी नहीं है. वहाँ हर तरह की स्त्री है. रीतिकाल की एक अन्य शाखा रीतिमुक्त कवियों की है. इस शाखा में आलम, बोधा, घनानंद, ठाकुर जैसे कवि आते हैं. ये कवि प्रेम को अपने काव्य का विषय बनाते हैं. इन कवियों ने स्त्री के प्रेमिका रुप का चित्रण किया है. यहाँ इनके काव्य में स्त्री को प्रेयसी का मान दिया गया जो अब तक साहित्य में नहीं मिल रहा था| सूर की गोपियाँ भी प्रेमिकाएँ हैं पर घनानंद और सूरदास में रात-दिन का अंतर है| घनानंद स्त्री को इतना मान देते हैं, कि अपनी रचनाओं में स्त्रीही बन जाते हैं. वह भी इस बात को समझते हैं कि प्रेम का चित्रण पुरुष के द्वारा यदि हो भी जाए तो वह इतना स्वभाविक नहीं बन पाएगा. प्रेम में डूबे यह कवि एक अलग ही आदर्श की स्थापना करते हैं.
पदमावत की कथावस्तु- ‘सिंहल द्वीप के राजा गंधर्वसेन की कन्या पद्मावती रुप और गुण में जगत में अद्वितीय थी. उसके योग्य वर कहीं न मिलता था. उसके पास हीरामन नाम का एक सुआ था जिसका वर्ण सोने के समान था और जो पूरा वाचाल और पंडित था. एक दिन वह पद्मावती से उसके वर न मिलने के विषय में कुछ कह रहा था कि राजा ने सुन लिया और बहुत कोप किया. सूआ राजा के डर से एक दिन उड़ गया. पद्मावती ने सुनकर बहुत विलाप किया.


सूआ वन में उड़ता‌-उड़ता एक बहेलिया के हाथ पड़ गया जिसने बाज़ार में लाकर उसे चितौड़ के एक ब्राह्मण के हाथ बेच दिया. उस ब्राह्मण को एक लाख देकर चितौड़ के राजा रत्नसेन ने उसे ले लिया. धीरे-धीरे रतनसेन उसे बहुत चाहने लगा. एक दिन जब राजा शिकार को गया तब उसकी रानी नागमती ने, जिसे अपने रुप पर बड़ा गर्व था आकर सूए से पूछा कि ‘संसार में मेरे समान सुंदरी भी कहीं है?’ इस पर सूआ हँसा और उसने सिंहल की पद्मिनी का वर्णन करके कहा कि उसमें और तुममें दिन और अंधेरी रात का अंतर है. रानी ने इस भय से कि कहीं यह सूआ राजा से भी पद्मिनी के रूप की प्रशंसा न करे, उसे मारने की आज्ञा दे दी. पर चेरी ने उसे राजा के भय से मारा नहीं, अपने घर छिपा रखा. लौटने पर जब सूए के बिना राजा रतनसेन बहुत व्याकुल और क्रुद्ध हुआ तब सूआ लाया गया और उसने सारी व्यथा कह सुनाई. पद्मिनी के रूप का वर्णन सुनकर राजा मूर्च्छित हो गया और अंत में वियोग से व्याकुल होकर उसकी खोज में घर से जोगी होकर निकल पड़ा. उसके आगे-आगे राह दिखाने वाला वही हीरामन सूआ था और साथ में सोलह हजार कुँवर जोगियों के वेश में थे.

कलिंग से जोगियों का यह दल बहुत जहाजों में सवार होकर सिंहल की ओर चला और अनेक कष्ट झेलने के उपरांत सिंहल पहुँचा. वहाँ पहुँचने पर राजा तो शिव के मंदिर में जोगियों के साथ बैठकर पद्मावती का ध्यान और जप करने लगा और हीरामन सूए ने जाकर पद्मावती से यह सब हाल कहा. राजा के प्रेम की सत्यता के प्रभाव से पद्मावती प्रेम में विकल हुई. श्रीपंचमी के दिन पद्मावती शिवपूजन के लिए उस मन्दिर में गयी, पर राजा उसके रूप को देखते ही मूर्च्छित हो गया, उसका दर्शन अच्छी तरह न कर सका. जागने पर राजा बहुत अधीर हुआ. इस पर पद्मावती ने कहला भेजा कि समय पर तो तुम चूक गये; अब तो इस दुर्गम सिंहलगढ़ पर चढ़ सको तभी मुझे देख सकते हो. शिव से सिद्धि प्राप्त कर राजा रात को जोगियों सहित गढ़ में घुसने लगा, पर सवेरा हो गया और पकड़ा गया. राजा गंधर्वसेन की सारी सेना हार गयी. अंत में जोगियों के बीच शिव को पहचान कर गंधर्वसेन उनके पैरों पर गिर पड़ा और बोला कि ‘पद्मावती आपकी है जिसको चाहे दीजिए’. इस प्रकार रतनसेन के साथ पद्मावती का विवाह हो गया और दोनों चितौड़गढ़ आ गये.

रतनसेन की सभा में राघवचेतन नामक एक पंडित था जिसे यक्षिणी सिद्ध थी. और पंडितों को नीचा दिखाने के लिए उसने एक दिन प्रतिपदा को द्वितीया कहकर यक्षिणी के बल से चंद्रमा दिखा दिया. जब राजा को यह कार्रवाई मालूम हुई तब उसने राघवचेतन को देश से निकाल दिया. राघव राजा से बदला लेने और भारी पुरस्कार की आशा से दिल्ली के बादशाह अलाउद्दीन के दरबार में पहुँचा और उसने दान में पाये हुए पद्मावती के कंगन को दिखाकर उसके रूप को संसार के ऊपर बताया. अलाउद्दीन ने पद्मिनी को भेज देने के लिए राजा रतनसेन को पत्र भेजा, जिसे पढ़कर राजा अत्यंत क्रुद्ध हुआ और लड़ाई की तैयारी करने लगा. कई वर्ष तक अलाउद्दीन चितौड़ घेरे रहा, पर उसे तोड़ न सका. अंत में उसने छलपूर्वक संधि का प्रस्ताव भेजा. राजा ने उसे स्वीकार करके बादशाह की दावत की. राजा के साथ शतरंज खेलते समय अलाउद्दीन ने पद्मिनी के रूप की एक झलक सामने रखे हुए एक दर्पण में देख पायी, जिसे देखते ही वह मूर्च्छित होकर गिर पड़ा. प्रस्थान के दिन जब राजा बादशाह को बाहरी फाटक तक पहुँचाने गया तब अलाउद्दीन के छिपे हुए सैनिकों द्वारा पकड़ लिया गया और दिल्ली पहुँचाया गया.

पद्मिनी को जब यह समाचार मिला तब वह बहुत व्याकुल हुई; पर तुरन्त एक वीर क्षत्राणी के समान अपने पति के उद्धार का उपाय सोचने लगी. गोरा, बादल नामक दो वीर क्षत्रिय सरदार 700 पालकियों में सशस्त्र सैनिक छिपाकर दिल्ली पहुँचे और बादशाह के पास यह संवाद भेजा कि पद्मिनी अपने पति से थोड़ी देर मिलकर तब आपके हरम में जायेगी. आज्ञा मिलते ही एक ढँकी पालकी राजा की कोठरी के पास रखी गयी और उसमें से एक लोहार निकल आये. शाही सेना पीछे आते देखकर वृद्ध गोरा तो कुछ सिपाहियों के साथ उस सेना को रोकता रहा और बादल रतनसेन को लेकर चितौड़ पहुँच गया. चितौड़ आने पर पद्मिनी ने रतनसेन के कुभंलनेर को राजा देवपाल द्वारा दूती भेजने की बात कही जिसे सुनते ही राजा रतनसेन ने कुभंलनेर को जा घेरा. लड़ाई में देवपाल और रतनसेन दोनों मारे गये.

रतनसेन का शव चितौड़ लाया गया. उसकी दोनों रानियाँ नागमती और पद्मावती हँसते-हँसते पति के शव के साथ चिता में बैठा गयीं. पीछे जब सेना सहित अलाउद्दीन चितौड़ पहुँचा तब वहाँ राख के ढेर के सिवा कुछ न मिला.’3

पद्माकर का जगद्विनोद एक लक्षण ग्रन्थ है जिसमें कवि ने समाज में मिलने वाली विभिन्न स्त्रियों का वर्णन किया है| ये स्त्रियाँ समाज के घर-घर में व्याप्त हैं| पद्माकर ने स्त्रियों के कुछ पक्षों को ही सामने रखा है| माँ, बेटी, बहन इनके जगद्विनोद में नहीं मिलती किन्तु विवाहित नारी के जीवन के विभिन्न पक्षों को पद्माकर ने बखूबी चित्रित किया है.

जायसी और पद्माकर दोनों के समाज में काफी अंतर है. यह परिवर्तन समय के लम्बे अंतराल के कारण आया है. जायसी भक्तिकाल के रचनाकार हैं और पद्माकर रीतिकाल के जायसी दरबार में बैठ कर काव्य रचना नहीं कर रहे थे पर उनकी नायिकायें दरबार की स्त्री हैं. वह आम घर की महिलायें नहीं हैं. पद्माकर दरबार में बैठकर काव्य रचना कर रहे थे किंतु उनकी नायिकायें दरबार में रहने वाली आरामपरस्त स्त्रियाँ प्राय: नहीं हैं. पद्माकर की स्त्रियाँ दरबारी कम और घर-घर में मिलने वाली औरतें ज्यादा हैं.

समाज में वही स्त्री नैतिक रुप से उच्च मानी गई है जो अपने पति की ही होकर रहे. उसे कहीं दूसरे पुरष की तरफ देखने का अधिकार भी समाज नहीं देता. यदि स्त्री ऐसा करती है तो समाज उसे ताने दे देकर ये एहसास करवाता है कि तुमने गलती की. पुरुष को भारतीय समाज परस्त्री गामी होने पर कोई उल्हाना नहीं देता पर स्त्री के लिए हर जगह बंधन हैं| वह चाह के भी दूसरे पुरुष से सम्बन्ध नहीं बना सकती| समाज में विवाह एक ऐसी संस्था है जिसने स्त्री को पूरी तरह पितृसत्ता का गुलाम बना दिया है| स्त्री के पैदा होते ही उसे इस सामाजिक संरचना में ढलना सिखाया जाता है| उसे एक पुरुष की होकर रहना सीखाया जाता है| वही समाज उस स्त्री (पत्नी) को त्यागने की बात कर देता है यदि उसे ईश्वर की झलक दिखाई देती हुई पद्मावती दिखती है| पुरुष या नायक-भेद में स्वकीया जैसी कोई अवधारणा नहीं मिलती| मतलब एकनिष्ठता का कोई मानदण्ड़ पुरुष के लिए नहीं था. बल्कि उसे दूसरी स्त्री का मार्ग दिखाने वाले को (सूफी काव्य में) गुरु माना गया| ये समाज के कैसे नियम हैं जो पुरुष के लिए अलग और स्त्री के लिए अलग हैं.


जायसी के समयमें सूफी काव्य प्रचुर मात्रा में लिखा गया| सूफी काव्य जिस स्त्री में ईश्वर की झलक देखी जाती है उसे पाने के लिए संसार के तमाम बंधनों से मुक्त होना पड़ता है| अधिकतर सूफी काव्यों में दो स्त्रियाँ चित्रित हुई हैं एक जो पत्नी है जिसे माया कहा जाता है दूसरी स्त्री जिसको पुरुष पाने के लिए सारे काव्य में संघर्षरत रहता है इसी स्त्री में ईश्वर की झलक देखी जाती है| सूफी कवियों ने समासोक्ति के माध्यम से अपनी बात कहने का रास्ता अपनाया.

मालिक मोहम्मद जायसी कृत पदमावत हिन्दी साहित्य में अपना अलग स्थान रखता है| यह ग्रन्थ प्रतीकात्मक शैली में लिखा गया है ऐसा सभी मानते हैं| इस ग्रन्थ की नायिका पद्मावती को ईश्वर, रत्नसेन को ईश्वर प्राप्ति के लिए उत्सुक भक्त, और नागमती को माया माना गया है| पदमावत में चित्रित समाज दरबारी है| वहां दरबार की संस्कृति देखने को मिलती है| रानी नागमती और पद्मावती दरबार में रहने वाली स्त्रियाँ हैं| घर-घर में मिलने वाली कामगार, घरेलू श्रम करने वाली स्त्री का यहाँ अभाव है इसलिए इस काव्य में नारी की वास्तविक स्थिति प्राय: देखने को नहीं मिलती.


वहीँ पद्माकर के जगद्विनोद में कवि लिख तो रहे थे दरबार में बैठ कर पर उनका लेखन उन्हें उस दरबार से निकाल कर जनमानस में पहुंचा देता है| कवि पद्माकर ने जिस समाज को देखा वह वैसा ही उसे लिख देते हैं| कुछ पद जगत विनोद के भी उसकी दरबारी संस्कृति को दिखाते हैं पर ऐसे पद 5-6 से ज्यादा नहीं हैं| पद्माकर ने नायिकाओं को तीन भागों में विभाजित किया है-
१.स्वकीया
२.परकीया
३.गणिका
स्त्री के लिए स्वकीया जैसे भेद स्थापित किए गए है पर पुरुष के लिए ऐसे कोई भेद नहीं है| उसके लिए कहीं नहीं आता कि उसे ऐसा होना चाहिए| पद्माकर का समाज भले ही स्त्री के नज़रिए से कुछ स्वतंत्रता वाला दीखता हो पर एक पतिव्रता को भी वहां तुलसी की मानसिकता का युग ही झेलना पड़ रहा था.

पदमावत  में स्त्री को ईश्वर की झलक के रुप में चित्रित किया गया है. वही स्त्री इस काव्य की नायिका है. भले ही पदमावत  में स्त्री को ईश्वर माना गया है पर यह विचार करना चाहिए कि क्या सभी स्त्रियाँ वहाँ भगवान बन जाती है? ऐसी स्त्री जिसमें ईश्वर की झलक दिखाई दे कौन है? क्या कोई भी स्त्री वहाँ ईश्वर की झलक बनती है? नहीं पदमावत में कई स्त्रियाँ है पर वहाँ पद्मावती ही वह स्त्री है जिसमें कवि ईश्वर की झलक दिखाते हैं. पदमावत में कई स्त्रियाँ पद्मावती के समान ही सुंदर है. उनमें भी वैसा ही सौंदर्य है जैसा पद्मावती में पर सिर्फ पद्मावती को ईश्वर की झलक बना दिया गया है. रामचंद्र तिवारी लिखते हैं- ‘सूफियों ने अपने साध्य परमतत्व को परम सौंदर्य के रुप में देखा और नारी-सौंदर्य में उसका प्रतिबिम्ब अनुभव किया. इसलिए नारी-सौंदर्य की खान सिंहल-द्वीप जायसी के लिए खुदा के नूर को अवतरित करने की प्रेरणा-भूमि बन गया. सर्वश्रेष्ठ सुंदरी पद्मिनी के रुप में उन्होंने उस ज्योति ले अवतरण की कल्पना की. जायसी ने कुरानशरीफ की कयामत वाली कथा को भी इसी में सम्मिलित कर लिया.’4


यहाँ रामचन्द्र तिवारी नारी सौंदर्य की बात कर रहे हैं किंतु वे भूल जाते हैं कि सूफियों ने सभी नारियों के सौंदर्य में परमसत्ता की झलक नहीं देखी है. जो सौंदर्य में भी अति कर जाये लगे कि अब सभी कुछ इसी की आभा है वही स्त्री उनके लिए ईश्वर की झलक हो सकती है. ऐसा करके कवि सुंदर स्त्री का सम्मान कर रहे थे किंतु कम सुंदर का मजाक भी बना रहे थे. पदमावत में नागमती के साथ कवि ऐसा ही करते हैं.



पदमावत में एक स्त्री को ईश्वर की झलक बना के प्रस्तुत किया गया है. जगद्विनोद के कवि स्त्री को ईश्वर बनाने की कोशिश नहीं करते बल्कि उसकी दयनीय दशा को स्पष्ट करते हैं. पद्माकर के समय में भी स्त्री से अपेक्षा की जाती थी कि वह मन, वचन काया से पति में ही रत रहे जबकि उसी जगद्विनोद में परकीया नायिकाएं भी हैं जिससे पता चलता है कि समाज में पुरुष के दूसरी स्त्री से भी सम्बन्ध होते थे. स्त्रियाँ भी दूसरे पुरुषों से संबंध रखती थी किंतु आदर्श स्वकीया की मानी गई है.
निज पति ही के प्रेममय जाको मन बच काइ.
कहत सुकीया ताकि को लज्जासील सुभाइ॥5

स्त्री के विभिन्न पद और रूप पितृसत्तात्मक समाज की उपज है. जिसमें स्त्री को मात्र पितृसत्ता के बंधनों तक सीमित कर दिता जाता है. उसे इस प्रकार बना दिया जाता है मानो कोई गुलाम हो जो अपने मालिक के आदेश के पूर्व की सारी व्यस्थायें कर के दे दे. समाज में जो स्वरुप स्त्री का है वह पुरुष को वर्चस्ववादी और स्त्री को एक दास के रुप में स्थापित कर देता है. समाज की मान्यताओं के अनुसार उत्तम पत्नी वही है जो अपने पति के पहले जागे, बाद में खाए| समाज के बन्धनों को स्त्री पर लाद दिया जाता है उसे बार-बार आदर्श पत्नी बनने पर मजबूर किया जाता है.

स्त्री का यह रुप विवाहिता या कहे स्वकीया के लिये दिया गया उत्तम उदाहरण है. परकीया स्त्री स्त्री के लिये ये स्थिति नहीं है. पद्माकर समाज में प्रचलित स्वकीया के रुप का चित्रण करते हुए लिखते हैं:
खान पान पीछू करति सोवति पिछले छोर .
प्रान पियारे तें प्रथम जगत भावती भोर॥6
वहीं पदमावत में रानी पद्मावती रत्नसेन के बाद जागती है
बिहँसि जगावहिं सखी सयानी| सूर उठा उठु पदुमिनि रानी.7

दोनों ही नायिकाये मध्यकालीन समाज में चित्रित की गयी हैं पर एक नायिका वो है जो पति के आगे-पीछे चाकर की तरह घुमती है जिसपर घर की पूरी जिम्मेदारी है| पद्माकर की नायिका जो पत्नी होने के कारण श्रेष्ठ है उसकी स्थिति भी अच्छी नहीं है. उसको समाज में कोई स्वतंत्रता नहीं है. उसे पूरे दिन काम करने हैं और रात में भी पति के सोने के बाद सोना है. हमारे समाज में देर से जागती हुई स्त्री को सहन नहीं किया जाता इसलिए समाज स्त्री को बचपन से ही इस तरह के जीवन की आदत डलवाता है ताकि वह अच्छी पत्नी बन सके. दूसरी नायिका वो है जो आराम से जीवन व्यतीत कर रही है| पद्मावती जैसी नायिकायें हमें अपने समाज में नहीं मिलाती क्योंकि ये दरबारी स्त्रियाँ है पर पद्माकर की नायिकाए हमें अपने समाज में रोज देखने को मिलाती है| पद्मावती का व्यक्तित्व यहाँ एक साधारण स्त्री की तरह नहीं दीखता क्योंकि वह राजमहल की स्त्री है.

पदमावत में रानी पद्मावती को बहुत कोमल दिखया गया है. ये भी उसके समाज का एक हिस्सा है. दरबार में रहने वाली स्त्री खासकर रानी मेहनतकश नहीं हो सकती. उसके व्यक्तित्व में मेहनत है ही नहीं. उसे दूसरों पर आश्रित होना पडता है. वह हर काम दूसरों से करवाती है. वह नायिका इतनी कोमल है कि उसे गुलाब के फूल भी तकलीफ देते हैं. जायसी की नायिका न आम जीवन से सम्बंधित है और न ही उससे है साधारण स्त्री की स्थिति का बोध होता है. जायसी ने इस कोमलपन का वर्णन पद्मावती के रुप को और बढ़ाने के लिए किया है.
का धनि कहौं जैसि सुकुवारा. फूल के छुएँ जाइ बिकरार.
पँखुरी लीजहि फूलन्ह सेंती. सो नित डासिह सेज सुपेती.
फूल समूच रहै जो पावा. ब्याकुलि होइ नींद नहिं आवा.
सहै न खीर खाँड औ घीऊ. पान अधार रहै तन जीऊ.
नसि पानन्ह कै काढ़िअ हेरी. अधरन्ह गड़ै फाँस ओहि केरी.
मकरी क तार ताहि कर चीरू. सो पहिरें छिलि जाइ सरीरू.
पालक पाँव कि आछहिं पाटा. नेत बिछाइअ जौं चल बाटा.8

पद्माकर ने भी ऐसी नायिका का वर्णन किया है जो काफी नज़ाकत भरी हैं पर पूरे जगदविनोद में ऐसी स्त्रियों की छवि कम ही देखने को मिलती है. क्योंकि जगद्विनोद के रचनाकार का उद्देश्य ऐसी स्त्रियों को चित्रित करना नहीं था जो दरबार की ही हो. क्योंकि पद्माकर दरबार में बैठ कर ही लिख रहे थे. उनके पाठक के दरबारी लोग होते थे जो इस तरह की दिनचर्या से भली-भांति परिचित थे. यदि पद्माकर या अन्य कवि कोमलांगी, नज़ाकत से भरी स्त्रियों का वर्णन करते तो राजाओं व अन्य दरबारियों को उसमें कोई रस नहीं मिलता. पद्माकर ने जगद्विनोद में कुछ छंद ही दरबार की स्त्रियों की दशा और उनकी सामाजिक स्थिति को चित्रित करने के लिये रखे हैं. पद्माकर की नायिका मखमल के बिछोने पर भी असहज महसूस करती है.
सुन्दर सुरंग नैन सोभित अनंगरंग अंग अंग फैलत तरंग परिमल के.
बारन के भार सुकुमार को लचत लंक राजै परजंक पर भीतर महल के.
कहै पदमाकर बिलोकि जन रीझै जाहि अंबर अमल के सकल जल थल के.
कोमल कमल के गुलाबन के दल के सु जात गड़ि पाइन बिछोना मखमल के.9

पद्माकर और जायसी की नायिकाओं के इस पक्ष को देखे तो हम पायेंगे कि ये नायिकायें आम घर की नहीं है, दरबारी है. यह ऐसी स्त्री हैं जो पूरी तरह से काल्पनिक हैं| समाज में दरबार की स्त्रियों के लिए ऐसी ही कल्पना प्रचलित है| ऐसी स्त्री कैसी जीवित रह सकती है जो खाना ही न खाती हो| ऐसा मनुष्य क्या तो काम करेगा? सभी प्रकार के कार्यों के लिए ऊर्जा चाहिए वह ऐसे मनुष्य में कैसे आयेगी जो कुछ भी न खाता हो और पान-फूल पर ज़िंदा हो| पद्मावती इतनी कोमल है कि गुलाब का फूल अगर उसकी शैय्या पर रह जाए यो वह व्याकुल हो जाती है. उसे नींद नहीं आती. पद्माकर की नायिका इतनी कोमल है कि उससे बालों का ही भार सहन नहीं होता. तिस पर सभी कवियों के सौंदर्यबोध में लम्बे बालों वाली स्त्रियाँ ही शामिल थी. सौंदर्य का प्रतिमान माने जाने वाले ये लम्बे बाल नायिकाओं से सहन ही नहीं होते तो भी कवि का सौंदर्य-बोध नहीं बदलता.

समाज की एक प्रबल संस्था विवाह की है जिसमें स्त्री को पुरुष के घर विवाह के उपरांत जाना पड़ता है| इस संस्था में स्त्री का सब कुछ पीछे रह जाता है. वह अपने माँ-पिता के घर में बड़े चाव से पलती है और एक दिन उसे कोई पुरुष अपने घर ले जाता है जहां उसे उस परिवार की मर्यादा को निभाना होता है| शादी सिर्फ स्त्री की ही होती है ऐसा नहीं है पर विवाह में सब कुछ स्त्री ही त्यागती है| विवाह-संस्था से स्त्री के स्वभाव पर भी काफी असर पड़ता है| एक लड़की जो जब-तब खेल सकती थी, कहीं भी जा-आ सकती थी विवाह के बाद उसे संयम और मर्यादापूर्ण जीवन में रहना पड़ता है| ऐसा नहीं है कि शादी होते ही कोई महिला अपने आप बदल जाती है पर समाज उसे शुरू से ही इस तरह बनाता है कि वह बदलने को मजबूर हो जाती है| विवाह की परम्परा को अक्सर साहित्य में दिखाया जाता है| किस तरह से स्त्री अपने को बदल लेती है सब सहने की आदि हो जाती है, साहित्य इस सच से हमें रु-ब-रु करवाता है.

पद्मावती अपनी सखियों के साथ सरोवर पर नहाने जाती है| वह प्रसन्नचित्त है पर एकाएक उसे ध्यान आता है कि ये सुख अब ज्यादा दिन का नहीं है| पति के घर जाना है फिर जाने पिता के घर कब आना हो| आज ही सब खेल खेल लो| पद्मावती की सखियाँ उससे यह सब कहती हैं| पद्मावती को पदमावत में राजकुमारी दिखाया गया है पर यह सब राज-ठाठ धरे के धरे रह जाते हैं| कोई भी कितना ही राजा क्यों न हो पर स्त्री को विवाह करके दूसरे घर जाना ही पड़ता है| पद्मावती राजकुमारी है| वह चाहे तो अपने मर्जी चला सकती है पर क्योंकि वह स्त्री है इसलिए वह यह जानती है कि उसे अपने होने वाले पुरुष के अधीन ही रहना होगा| वास्तव में स्त्री हर जगह परतन्त्र है. स्त्री जिस जगह होती है उसकी परतंत्रता वैसे ही तय होती जाती है. पितृसत्ता का वह रुप नहीं मिलेगा जो दरबार में है. आज की बात करूँ तो निम्न, मध्य और उच्च वर्ग में स्त्री की अलग-अलग तरह की पराधीनता देखने को मिलती है. निम्न वर्ग में वह मार भी सहती है, घर-बाहर के काम भी करती है. उच्च वर्ग में वह अलग-अलग नियम कायदों से संचालित होती है. मध्यम वर्ग में वह तमाम नैतिकताओं को झेलती है. स्त्री की इसी स्थिति पर उमा चक्रवती कहती हैं-
‘विश्व के अधिकत्तर हिस्सों के दर्ज इतिहास की अधिकांश अवस्थाओं में स्त्री पराधीनता का वजूद रहा है. लेकिन इस पराधीनता की हद और स्वरुप का निर्धारण सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक कारक करते रहे हैं. दूसरे शब्दों में, स्त्री का परिवेश उसकी पराधीनता की प्रकृति को तय करता है’.10

पितृसत्ता में घिरी पद्मावती रानी से साधारण स्त्री के रूप में आ जाती है| समाज में हर स्त्री विवाह के बाद किस तरह से अपने परिवार से बिछुड़ जाती है पद्मावती के इस पक्ष का इससे पता लगता है|
ऐ रानी मन देखु बिचारी| एहि नैहर रहना दिन चारी||३||
जौ लहि अहै पिता कर राजू| खेलि लेहु जौ खेलहु आजू||४||
पुनि सासुर हम गौनब काली| कित हम कित एह सरवर पाली||५||
कित आवन पुनि अपने हाथां| कित मिलिकै खेलब एक साथा||६||11


मानो विवाह न हुआ कोई बंधन हो गया| बचपन से स्त्री किसी न किसी के आश्रय में रहती है| उसे कहाँ आना-जाना है ये घरवाले ही तय करके है| पद्मावती अपने मायके में हर जगह जा आ सकती है पर ससुराल में उसे इतनी स्वतंत्रता नहीं मिलेगी उसे डर है इस बात का| अपने खेल छूट जायेंगे ये सोच के वे दुखी है| पद्मावती जो कि इस ग्रंथ की नायिका है और एक उच्च घराने की स्त्री है वह इतना चिंतित है तो आम स्त्री की दशा का अंदाजा लगया जा सकता है. पद्माकर की नायिका इसलिए चिंतित है कि पति चाहता तो उसे बहुत है पर उसे मायके नहीं जाने देता| एक स्त्री जो अपने परिवार को छोड कर आती है विवाह के बाद उसका अपने संबंधियों से कोई नाता नहीं रह जाता. उसे हर काम अपने पति से पूछ कर उसकी इच्छा अनुसार करने पडते हैं. पद्माकर की नायिका का व्यक्तित्व सिर्फ जगद्विनोद में ही नहीं बल्कि समाज में नारी की दशा को भी बताता है. पद्मावती और उसकी सखियाँ अपने खेल और न भविष्य में मिल पाने की चिंता से दुखी है पर पद्माकर की नायिका अपने घरवालों के चिंता से परेशान है| उसे दुःख है कि वह अपने घर नहीं जा पाती|
मो बिन माइ न खाइ कछु पद्माकरत्यों भई भाबी अचेत है|
बीरन आए लिवाइबे कौं तिनकी मृदु बानिहूँ मानि न लेत है|
प्रीतम कों समुझावति क्यों नहीं ए सखी तूँ जु पै राखति हेत है|
और तौं मोहि सबै सुख री दुख री यहै माइकै जान न देत है||12

शादी के पहले और बाद स्त्री मन में कई डर होते हैं| ससुराल कैसा होगा? पति कैसे स्वभाव का होगा? सबसे ज्यादा डर उसे शादी के बाद स्थापित होने वाले शारीरिक संबंधों से होता है|  स्त्री का यह डर एक स्वाभाविक स्थिति है हर स्त्री के मन में ये डर होता है| स्त्री के मन का यह डर समाज में काम सम्बंधों की वर्जना का परिणाम है. समाज में स्त्री को काम सम्बंधों के बारे में कोई जानकारी नहीं दी जाती. उसे काम क्रिया से पूर्व कोई ज्ञान इस विषय में नहीं होता. स्त्री का काम सम्बंधों की बात करना भी अपराध माना जाता है. उसे बचपन से ही इस तरह से पोषित किया जाता है मानो काम संबंध कोई अपराध हो पर उसी काम संबंध को जब स्त्री विवाह करती है तो अनिवार्य बना दिया जाता है. स्त्री को अनेक वर्जनाओं का पालन समाज में करना पडता है. जिस कारण उसे पति से शादी के समय काफी डर लगता है. ये स्त्री का ही सामाजिककरण है क्योंकि इस क्रिया को लेकर पुरुष में कोई डर नहीं होता. बल्कि पुरुषों में इस अवसर पर उत्साह देखने को मिलता है. यदि पुरुष की तरह स्त्री समुदाय भी इस सब बातों से अवगत हो तो उसमें भय-लाज न हो और यह सम्बंध मधुर बन सके. जायसी की नायिका पद्मावती राजदरबार में रहती थी पर फिर भी उसे समाज की नैतिकताओं से बाँधा गया. काम की बातों के बारे में वह अनजान थी. संयोग के लिए जाते समय पद्मावती चिंतित हो उठती है.
सँवरि सेज धनि मन भौ संका. ठाढ़ि तिवानि टेकि कै लंका.
अनचिन्ह पिउ काँपै मन माहाँ. का मैं कहब गहब जब बाँहाँ.
बारि बएस गौं प्रीति न जानी. तरुनी भइ मैमंत भुलानी.
जोबन गरब कछु मैं नहिं चेता. नेहु न जानिउँ स्याम कि सेता.
अब जौं कंत पूँछिहि सेइ बाता. कस मुँह होइहि पीत कि राता.
हौं सो बारि औ दुलहिनि पिउ सो तरुन औ तेज.
नहिं जानौं कस होइहि चढ़त कंत की सेज.13

जायसी के समयसे रीतिकाल तक आते-आते नारी की ये स्थिति नहीं बदली थी. आज भी नहीं बदली है. आज भी हम शादी से पूर्व लड़कियों को ऐसी उहा-पोह में देख सकते हैं. किंतु पद्माकर की नायिका रति से बहुत ही ज्यादा डरती है. इस डर में वह रति भी नहीं चाहती.
अति डर तें अति लाज तें जो न चहै रति बाम.
त्यों मुग्धा को कहत हैं सुकबि नवोढ़ा नाम॥14
स्त्री-पुरुष का वह सम्बंध जो उनके बीच प्रेम को स्थापित करने वाला होता है उसमें स्त्री का इस तरह से भयभीत होना उसे हमेशा के लिए पुरुष के प्रथम स्पर्श के सुख से वंचित कर देता है. स्त्री के काम संबंधों की जानकारी जरुरी है कामसूत्र में वात्स्यायन कहते हैं-‘वात्स्यायन का कहना है कि सम्भोग के लिए कामशास्त्र का ज्ञान परम आवश्यक है क्योंकि यदि स्त्री अथवा पुरुष दोंनो में से कोई भी भयभीत, लज्जांवित अथवा पराधीन होता है तो ऐसे समय जिन उपायों की आवश्यकता पड़ती है उन्हें कामशास्त्र ही बतलाता है.’15

उच्च वर्गों में पुरुषों को वेश्याओं के पास काम संबंधों को समझने के लिए भेजा जाता था. उनकी इस विषय में शिक्षा होती थी. वही समाज में नारी के लिए ऐसा कहीं प्रावधान नहीं था. तभी वह हर वक्त काम सम्बंधों से डरी हुई रहती है. स्त्री को यदि सही तरह से इन संबंधों के बारे में बताया जाए तो उसे भी इन सभी में रुचि लगे पर समाज की नैतिकताओं ने सदियों से स्त्री को इस सुख से वंचित कर रखा है. जिसके कारण वह रति के पहले अनुभव से डरती हैं. मध्यकालीन नायिकायें चाहे वह जायसी के समयकी हों या रीतिकाल की अपनी सामाजिक पितृसत्तात्मक संरचना के कारण रति से डरती थी. ये ठीक है किंतु उनके इस व्यक्तित्व का एक अन्य समाजिक पहलू भी है. आदिकाल से ही समाज में बाल-विवाह की कुप्रथा जोर पकड़ने लगी थी. बाल-विवाह, अनमेल विवाह दोनों स्त्री के रति के प्रति डर के अहम कारण हैं. यौवन से युक्त लड़का अपनी अज्ञातयौवना को काम की नज़रों से देखता है जिससे वह हमेशा घबराती है. इसका कारण उसका अबोध न कम उम्र का होना है. ऐसे में पद्माकर व जायसी की नायिकाओं का डर उनकी कम उम्र के कारण भी अधिक जान पड़ता है.

नागमती रानी है पर उसे इस बात का हर समय खतरा रहता था कि रत्नसेन कहीं दूसरी स्त्री के मोह में आकर उसे छोड न दे. नागमती और अन्य स्त्रियाँ अपने पिता के घर को छोडकर रत्नसेन के पास आई हैं. वे अच्छे से जानती हैं कि रत्नसेन किसी स्त्री के मोह में पड़ गया तो वह उन्हें छोड देगा. नागमती को ये चिंता हर वक्त सताती है क्योंकि हीरामन तोता अब चितौड में था. वह पद्मावती के रुप की चर्चा यदि रत्नसेन से कर देता तो वह उसे पाने के लिए भी दौड पडता. जायसी के प्रबल समर्थक भी कवि की इन नासमझी को समझते हैं. प्रेम इस तरह पैदा नहीं होता इस पर शुक्ल जी कहते हैं-
‘किसी के रुपगुण की प्रशंसा सुनते ही एक बारगी प्रेम उत्पन्न हो जाना स्वाभाविक नहीं जान पड़ता. प्रेम दूसरों की आँखों नहीं देखता अपनी आँख देखता है. अत: राजा रत्नसेन तोते के मुहँ से पद्मावती का अलौकिक रूपवर्णन सुन जिस भाव की प्रेरणा से निकल पड़ता है वह पहले रूपलोभ ही कहा जा सकता है. इस दृष्टि से देखने पर कवि जो उसके प्रयत्न को तप का स्वरूप देता हुआ आत्मत्याग और विरह विह्वलता का विस्तृत वर्णन करता है वह एक नकल सी मालूम होती है’.16

यानि रानी नागमती रत्नसेन की मानसिकता को जानती है. इसलिए वह हर वक्त डरी रहती है. यहाँ नागमती की इस स्थिति को भली प्रकार समझा जा सकता है कि वह किस तरह असुरक्षा में जीती है. कहीं कोई उसकी जगह न आ जाए. कोई उसकी पटरानी की जगह न ग्रहण कर ले. यहाँ उसकी सामाजिक स्थिति को साफ समझा जा सकता. वह विद्रोह नहीं कर रही बस चाहती है कि किसी तरह सुआ रत्नसेन से पद्मावती के रुप की चर्चा न कर दे.
जौं यह सुआ मँदिर महँ रहई. कबहुँ कि होइ राजा सौं कहई.
सुनि राजा पुनि होइ बियोगी. छाँड़ै राज चलै होइ जोगी||17

पुनि होइ बियोगी मतलब पहले भी ऐसा हुआ होगा. शायद नागमती को पाने के लिए उसके प्रेम में बेसुध होकर वह दौड़ पड़ा हो. तब नागमती सुंदर लगती थी अब कोई और सुंदर लग सकती है. पद्मावती से नागमती को डर उसकी सुंदरता के ही कारण है. पद्मावती के अन्य गुणों को जायसी ने आकर्षण का कारण नहीं बनाया है. इससे तत्कालीन समाज और उसमें स्त्री की दशा का पता लगता है. स्त्री के गुण को बड़े से बड़ा कवि नकार रहा है. बस आकर्षण है तो सौंदर्य के कारण. इस सौंदर्य की सार्थकता भी तब तक है जब तक उससे अधिक सौंदर्यवान नहीं मिल जाती.

जहाँ पदमावत  में स्त्री इस बात से चिंतित है कि उसका पति दूसरी के पास चला जायेगा वहीं पद्माकर की नायिका को पता है कि उसका पति किसी अन्य स्त्री के पास गया है वह दु:खी होती है पर वह एक कदम भी उठाती है. जिससे वह मध्यकाल की अन्य स्त्रियों से आगे दिखाई देती है. वह स्त्री पडोस में गये अपने पति को वहीं जा कर पकड़ कर लाती है. स्त्री को ऐसा करने की कहीं अनुमति नहीं है. जायसी होते तो वह इस स्त्री को फिर माया कहलवा देते पर पद्माकर ऐसा नहीं करते. नागमती वर्ष भर से ज्यादा अपने विरह में निकाल देती है. अपमान को सहते हुए. पद्माकर की नायिका अपने पति से नहीं डरती है. ये नायिका दब कर बैठने वाली स्त्री नहीं है वह मौके पर कदम उठाने वाली स्त्री है. इस स्त्री ने किन मानसिक तनावों को झेला होगा. सामजिक रुप से अपनी वास्तविक स्थिति को कितना आंका होगा तब जाकर उसने ये कदम उठाया.
रोस करि पकरि परोस तें लियाई घरै पी कों प्रानप्यारी भुजलतनि भरै भरै.
कहै पदमाकर न ऐसो दोस कीज्यो फिरि सखिन समीप यों सुनावति खरै खरै.
प्यौ छ्ल छ्पावै बात हँसि बहरावै तिय गद्गद कंठ दृग आँसुन झरै झरै.
ऐसी धनि धन्य धनी धन्य है सु वैसो जाहि फूल की छरी सों खरी हनति हरै हरै.18

नायिका –भेद के इस अंग के कारण हम ये समझ पाते हैं कि उस समय जिसे हम मध्य्काल कहते हैं ऐसी भी स्त्रियाँ थी जो कोई भी कदम उठा लेती थी. ये स्त्रियाँ अपने अपमान को सहने वाली आम महिलाओं में से नहीं है अपितु वे जाकर पति का सामना करती है ये सोचे बिना के उसका परिणाम क्या होगा. नायिका-भेद को आलोचक बहुत बुरी निगाह से देखते हैं. वे इस भेद से स्त्रियों की दशा को नहीं समझना चाहते बस आलोचना करते हैं. हिंदी के परिष्कारक माने जाने वाले महावीर प्रसाद द्विवेदी नायिका-भेद के बारे में कहते हैं-
‘जहाँ तक हम देखते हैं स्त्रियों के भेद-वर्णन से कोई लाभ नहीं, हानि अवश्य है; और बहुत भारी हानि है. फिर हम नहीं जानते, क्या समझकर लोग इस विषय के इतना पीछे पड़े हुए हैं. आश्चर्य की बात है कि इस भेद-शक्ति के प्रतिकूल आज तक किसी ने चकार तक मुख से नहीं निकाला.’19


द्विवेदी जी नायिका-भेद को बुरा-भला कहते हैं. मान लेते हैं कि उनकी बात ठीक भी है पर क्या उस 200 साल के साहित्य में ऐसा कुछ नहीं जिसके कारण उसे पढ़ा जाना चाहिये? नायिका-भेद हमें उस समाज में स्त्रियों की जो दशा थी उसे बताता है. स्त्री का मनोविज्ञान पेश करता है. यह बात हम तभी समझ सकते हैं जब हम स्त्री की दशा को उसके उत्पीड़न को समझने की जरूरत महसूस करेंगे. जिन स्वतंत्र स्त्रियों की रीतिकाल में कल्पना है वह पितृसत्तात्मक सोच वाले समाज को पसंद आनी मुश्किल है. हमारे प्रिय आलोचकों को खंडिता नायिका पसन्द आती है. जो अपने पति के दूसरी जगह जाने पर चित्रित की गई है. रोती-मन मार कर बैठने वाली. विद्रोह करने वाली या अपने मन के अनुसार प्रेमी का चयन करने वाली स्त्रियाँ इन्हें पसंद नहीं आती. इन्हें पितृसत्तात्मक ढ़ांचे में ढली हुई औरत ही श्रेयस्कर लगती है.
क्रमशः

संदर्भ सूची 


1. डॉ. नगेंद्र, हिन्दी साहित्य का इतिहास, पृ.152 
2.  जगन्नाथदास रत्नाकर, बिहारी-रत्नाकर, दोहा-22
3.  रामचन्द्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, पृ.101-103
4.  डॉ.रामचंद्र तिवारी, मध्ययुगीन काव्य-साधना, पृष्ठ-68
 5. पद्माकर कृत जगद्विनोद, छंद 17
 6.  वही, छंद 18
 7. मलिक मुहम्मद जायसी कृत पदमावत  
 8. पदमावत-485 
 9. जगद्विनोद-12   
 10. उमा चक्रवर्ती, जाति समाज में पितृसत्ता, अनुवादक- विजय कुमार झा, 
  11.पदमावत, पद-60
 12. जगद्विनोद-137
 13. पदमावत, पद- 300 
  14.जगद्विनोद, छंद 38
  15.श्री देवदत्त शास्त्री, , कामसूत्रम्- वात्स्यायन, आमुख, पृष्ठ-11
  16.रामचंद्र शुक्ल, त्रिवेणी, सम्पादक कृष्णानंद, पृष्ठ-34 
  17.पदमावत, पद-85
  18.जगद्विनोद, छंद-70
  19.महावीर प्रसाद द्वेदी, रचना संचयन, पृ.-179

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