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उन्नीसवें भारत रंग महोत्सव में स्त्रियों की भागीदारी

मंजरी श्रीवास्तव

एक लम्बी कविता ‘एक बार फिर नाचो न इजाडोरा’ बहुचर्चित.नाट्य समीक्षक,कई नाट्य सम्मान की ज्यूरी में शामिल.
संपर्क : ई मेल-manj.sriv@gmail.com

पिछले 1 फरवरी से प्रारम्भ हुए भारत रंग महोत्सव का प्रथम चरण स्त्रियों को समर्पित रहा. उदघाटन समारोह में जहाँ मुख्य अतिथि भरतनाट्यम एवं ओडिसी शैलियों की विख्यात नृत्यांगना एवं गुरु डॉ. सोनल मानसिंह थीं, वही विशिष्ट अतिथि इज़रायल की प्रसिद्ध युवा निर्देशक वेरा बरज़ाक श्नाइडर थी.

महोत्सव के दूसरे दिन रंगप्रेमी दर्शकों, अध्येताओं और शोधार्थियों ने मणिपुर की वरिष्ठ अभिनेत्री और मशहूर निर्देशक स्वर्गीय एच. कन्हाईलाल की जीवन संगिनी सावित्री हेस्नाम को ‘लिविंग लीजेंड’ के तहत सुना,  जिसमें उन्होंने अपने जीवनानुभव लोगों से साझा किये. इन जीवनानुभवों में अपनी रंगयात्रा, एक अभिनेत्री के रूप में अपनी मेकिंग और अपने प्रियतम और पति कन्हाईलाल जी के साथ बिताई यादों को उन्होंने दर्शकों के साथ साझा किया. उसी शाम सावित्री जी को कन्हाईलाल निर्देशित नाटक ‘पेबेट’ में देखना एक सुखद अनुभव रहा. मंच पर सावित्री हेस्नाम जी को देखना खुद पर फ़ख्र करने जैसा है और रश्क करने जैसा है कि हमारी आने वाली पीढियां याद रखेंगी कि हमने माँ सावित्री को देखा है, गुरु माँ को देखा है. पेबेट की माँ की भूमिका निभा रही माँ सावित्री मंच पर कोई वृद्धा या वरिष्ठ नायिका नहीं लगती, बल्कि चिड़िया-सी फुदकती सोलह बरस की किशोरी या युवती लगती हैं. मंच पर कोई सेट नहीं, कोई ताम-झाम नहीं, कोई साज-सज्जा नहीं सिर्फ अपनी आवाज़, अपने सुरीले कंठ से निकलती विभिन्न प्रकार की ध्वनियों, अपने अभिनय और भाव-भंगिमाओं से वह ऐसा जादू उत्पन्न करती हैं कि मंच पर कोई और कलाकार दर्शकों को दिखता ही नहीं. दर्शक ठगे-से, मंत्रमुग्ध से सिर्फ़ उन्हीं को निहारते रह जाते हैं. एक और बात जो उनके कुशल अभिनेत्री होने का परिचायक है कि अपने रंग सहयात्री और जीवनसाथी कन्हाईलाल जी को खोने की वेदना से भरी होने के बावजूद उन्होंने अपने अभिनय पर अपनी वेदना, अपनी पीड़ा को भारी नहीं पड़ने दिया है. मंच पर उनका अभिनय ही उनकी वेदना पर भारी पड़ता है जबकि कल दिन में ही हुए अलायड इवेंट के ‘लिविंग लीजेंड’ कार्यक्रम के दौरान एक घंटे तो उन्होंने शोधार्थियों, रंगमंच के अध्येताओं और दर्शकों से अपनी भावनाओं पर काबू करते हुए बड़ी ही कुशलता से बातचीत की, लोगों से अपनी रंग और अभिनय यात्रा के महत्वपूर्ण अनुभवों को साझा किया, लेकिन अंत तक आते-आते उनकी आँखें कन्हाईलाल जी को याद करते हुए बरबस छलक पड़ी थीं.

पेबेट वह पहला नाटक है, जिसमें कन्हाईलाल ने रंगमंच से सम्बंधित अपनी विचारधारा और आदर्शों को शिल्प और कथ्य के माध्यम से प्रकट किया. यह रंगमंच की एक वैकल्पिक शैली के माध्यम से बंधी-बंधाई रंग-परंपरा में हस्तक्षेप था जो जनता से जुड़ने में सफल रहा.

पेबेट एक ‘फुंगा वारि’ है, जो मणिपुर की एक परंपरागत कथा-शैली है जिसमें बड़े-बूढ़े आग के पास बैठकर बच्चों को कहानी सुनाते हैं. कन्हाईलाल ने इस कहानी को आज की राजनीतिक और सांस्कृतिक स्थिति को रेखांकित करने और परिचित के व्यतिक्रमण से रंगमंच में चेतना प्रवाहित करने के लिए प्रयोग किया है.
पेबेट एक छोटी चिड़िया है, जिसे बहुत समय से देखा नहीं गया है. शायद उसकी प्रजाति ख़त्म हो गई है. अपने बच्चे की हिफाज़त करते हुए माँ पेबेट शिकारी बिल्ली की चापलूसी करके उसका ध्यान बंटाने की कोशिश करती है. वह तब तक उसके मन के मुताबिक़ बातें करती रहती है जबतक कि उसके बच्चे अपनी रक्षा करने में सक्षम न हो जाएँ. जैसे ही वे बड़े होते हैं, चिड़िया बिल्ली का विरोध करती है और बिल्ली उसके सबसे छोटे चूज़े को पकड़ लेती है लेकिन चिड़िया चालाकी से बिल्ली से अपने बच्चे को छुडा लेती है. सभी पेबेट चिड़ियाँ आख़िरकार संगठित होती है और बिल्ली उनके जीवन से हमेशा के लिए चली जाती है.

सावित्री हेस्नाम और अन्य

इस पूरे नाटक में पेबेट चिड़ियाओं की माँ बनी सावित्री हेस्नाम, मक्कार साधु बने अभिनेता एच. तोम्बा और पेबेट के बच्चे बने अभिनेताओं जी. गोकेन, पी. त्योसन, धनञ्जय राभा, एस. बेम्बेम और एच. लोहीना,  सबने शानदार अभिनय किया है. माँ सावित्री ने तो कमाल का अभिनय किया है. वे सचमुच चिड़िया ही लग रही हैं. उनकी वे मुद्राएँ अद्भुत हैं जब वे अपने सबसे छोटे बच्चे को उड़ना और दाना चुगना सिखा रही हैं, जब वे बिल्ली से अपने बच्चों की हिफाज़त कर रही हैं, अपने पंख फैलाकर. अपने हाथ से वे पंखों का जो दृश्य उत्पन्न करती हैं वह क़ाबिल-ए-तारीफ़ है. अपने बच्चों को लेकर, उनकी हिफाज़त को लेकर उनके चेहरे पर और उनकी आँखों में जो चिंता के भाव हैं वे लाजवाब हैं. ऐसा महसूस ही नहीं होता कि हम मनुष्यों को अभिनय करते देख रहे हैं. महसूस होता है कि मंच पर हम चिड़ियों को देख रहे हैं, किसी मक्कार बिल्ली को देख रहे हैं.
यह नाटक स्वर्गीय एच. कन्हाईलाल जी की स्मृति को समर्पित था. इस नाटक के माध्यम से पूरे रंग जगत ने एच.कन्हाईलाल को श्रद्धांजलि दी है.

‘अ स्ट्रेंजर गेस्ट’

दूसरे दिन की ही एक और महत्वपूर्ण प्रस्तुति थी युवा निर्देशक अनुरूपा रॉय की कठपुतली प्रस्तुति ‘महाभारत’. अनुरूपा बेहद प्रतिभाशाली कलाकार हैं और अभी हाल ही में हुए जश्ने बचपन में अपनी कठपुतली प्रस्तुति डायनासोर से धूम मचा चुकी हैं. महाभारत की कहानी सब जानते हैं पर अनुरूपा का कमाल यह है कि उन्होंने इसे बिलकुल समकालीन बनाकर दर्शकों के समक्ष पेश किया है. कठपुतलियों, मुखौटों, छाया-पुतलियों और अन्य सामग्रियों के साथ यह प्रस्तुति महाभारत को एक गतिशील वृत्तांत के रूप में देखती है जो तोगालु गोम्बेयट्टा के सिल्लाकेयाटा महाभारत के हजारों वर्षों के गायन के दौरान विकसित हुआ और समकालीन पुतुलकारों की नई खोजों में भी प्रासंगिक है. आज के स्वीकृत संघर्ष कालित युग में इस कहानी की प्रासंगिकता तो निःसंदेह है ही, इस तरह इसके पात्र भी हर संघर्ष में प्रतीक की हैसियत पा चुके हैं फिर चाहे वह संघर्ष विश्व की राजनीति में हो, समुदाय में हो या फिर परिवार के स्तर पर, और इसका वृत्तांत राजनीतिक, सांस्थानिक और सामाजिक स्थितियों के लिए एक बड़ा रूपक बन गया है लेकिन  अनुरूपा इस नाटक के माध्यम से केंद्रीय प्रश्न यह उठाती हैं कि क्या कुछ ऐसा हो सकता था कि महाभारत का युद्ध न हुआ होता ? वह कौन सा चुनाव था जो कोई पात्र किसी और ढंग से भी कर सकता था ? वह कौन सी भूमिका थी, जिसे किसी और द्वारा किसी और ढंग से निभाया जा सकता था ?  और हम खुद अपने किस चुनाव और किस भूमिका को बदल सकते हैं ? किन स्थापित धारणाओं और मान्यताओं पर प्रश्न करके हम भविष्य में ऐसे किसी युद्ध से बचे रह सकते हैं और क्या हम यहाँ से यह मानते हुए एक नई शुरुआत कर सकते हैं कि इस तरह के युद्ध में कोई नहीं बचता, इसलिए हमें इससे बचना चाहिए, कोशिश करना चाहिए कि इसकी पुनरावृत्ति न हो.

उन्नीसवें भारत रंग महोत्सव का उद्धाटन



इसी दिन की आख़िरी प्रस्तुति पहली विदेशी प्रस्तुति थी ‘अ स्ट्रेंजर गेस्ट’ जिसका निर्देशन किया था, इज़रायल की युवा निर्देशक वेरा बर्ज़ाक श्नाइडर ने. यह नाटक मॉरिस मैतरलिंक के नाटक ‘दि इंट्रयुडर’ से प्रेरित एक दृश्यात्मक प्रस्तुति है. यह कहानी है एक ऐसे परिवार के घर की एक शाम की जिसमें एक माँ बीमार पड़ी है और उसकी दो बेटियाँ अपने पिता के साथ चिंतामग्न हैं. डॉक्टर यह कह कर जाता है कि उसकी स्थिति अब बेहतर हो रही है फिर भी घर का वातावरण कुछ और ही संकेत करता दिखाई देता है, पूरे घर में मृत्यु के संकेत दृष्टिगोचर हो रहे हैं, घर मृत्युगंध से भर जाता है, पिता और दोनो पुत्रियों को मृत्यु की पदचाप सुनाई देती है और वहां उस माँ के और उस पूरे परिवार के भाग्य से सम्बंधित एक रहस्य का भाव भी मौजूद है. परिवार के सदस्य मौसी के आने की प्रतीक्षा कर रहे हैं. इस विशेष शाम को कुछ विचित्र और असामान्य-सा घट रहा है. हर चरित्र अलग-अलग तरीके से इसका अनुभव लेता है और शाम के दौरान एक भिन्न बिंदु पर कोई व्यक्ति या कोई चीज़ घर की ओर आ रही है और इसके पास आने का एहसास और उसकी अदृश्य उपस्थिति उनलोगों को उत्तरोत्तर बेचैनी का आभास करा रही है. दरअसल यह नाटक एक दुखप्रद सामान्य स्थिति और हमसे अभिन्नता से जुड़े व्यक्ति की बीमारी के बारे में है. नाटक परिवार के सदस्यों के भीतरी संसार में झांकता है. भावनात्मक स्थिति और अंतर्द्वंद्व जिनसे वे गुज़र रहे हैं और साथ ही साथ उनके मध्य के सम्बन्ध खोने के उस भय से हर कोई किस तरह जूझता है…कौन हठपूर्वक आशाओं से चिपका पड़ा है और कौन अधिक यथार्थवादी है, कौन-सी स्मृतियाँ उनके मस्तिष्कों में  रही हैं. मुद्राओं, गतियों, प्रकाश, ध्वनि और साथ ही साथ पाठ के माध्यम से निर्देशक ने इन भावनाओं और तीन अलग-अलग व्यक्तियों के माध्यमों से तीन प्रकार के मनोविश्लेषणों को समझने और व्याख्यायित करने का एक ईमानदार और प्रामाणिक प्रयास अभिनेताओं और निर्देशक ने किया है. इस नाटक का सेट से लेकर साइलेंस तक शानदार था. एक ऐसी चुप्पी तारी थी प्रस्तुति के दौरान कि नाटक ख़त्म होने तक पूरी दर्शक दीर्घा में मौत की सी मनहूसियत और मातमी सन्नाटा छा गया था, यहाँ तक कि दर्शक स्तब्ध थे और मृत्युगंध और उस अदृश्य उपस्थिति को महसूस करते हुए मृत्युबोध से भर गए थे और यह एहसास इतना हावी था कि नाटक ख़त्म होने पर दर्शक ताली बजाना तक भूल गए थे. मंच पर अमिचई पार्दो, शाकेद सबग और हदस वीसमैन ने शानदार अभिनय किया. अलेक्सांद्र  एल्हारर के प्रकाश-परिकल्पना और अलेक्सांद्र नोहाम के प्रकाश संचालन ने इस सायकोलोजिकल हॉरर को सस्पेंस से भर दिया था. और ध्वनि अभिकल्पना देखिये ज़रा कि रसोई के नल से पानी की एक बूँद के निरंतर टपकने से इस सस्पेंस में एक अजीब सा हॉरर भर दिया था ध्वनि अभिकल्पक ओसिफ़ उन्गेर ने.
   

सावित्री हेस्नाम की प्रस्तुति

     
महोत्सव के तीसरे दिन मास्टर क्लास ने नाट्यप्रेमी रूबरू हुए मशहूर ओडिसी नृत्यांगना माधवी मुद्गल और वेरा बरज़ाक श्नाइडर से जिसमें वेरा ने अपने नाटकों पर दर्शकों की प्रतिक्रियाओं और सवालों का संतोषजनक उत्तर देने की कोशिश के साथ-साथ इज़रायल और अंतर्राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में थिएटर और निर्देशन को देखने की कोशिश की. माधवी मुद्गल ने ओडिसी नृत्य में नाट्य तत्वों की उपस्थिति पर बातचीत की और नाटक को नृत्य से जोड़कर देखने और काम करने की कोशिश पर बल दिया.

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संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com  

 

संतोष अर्श की कविताएं : स्त्री

संतोष अर्श

शोधार्थी गुजरात केंद्रीय विश्वविद्याल
संपर्क- poetarshbbk@gmail.com



निवेदन

तुम मुझमें उतनी ही हो
जितना मैं ख़ुद में हूँ
न रत्ती भर कम
न रत्ती भर ज़्यादा.
इसीलिए नाभिनाल काटने की छूरी से
मैंने इस पृथ्वी को काटा दो फाँकों में
बराबर, बराबर !
न रत्ती भर कम
न रत्ती भर ज़्यादा.

स्त्री- 1

उसे देखने की शुरुआत वहाँ से हुई
जब वह चूते छप्पर के नीचे
गीले ईंधन से रोटियाँ पकाने की ज़िद कर रही थी.
उसकी गोद में बच्चा था
जो न जाने किस ज़िद में चिल्लाता था
रोता नहीं था अपनी माँ को चिढ़ाता था.
वह उसे चुप कराने की ज़िद में थी
और खाँस-खाँस कर
फुँकनी से चूल्हे में फूँक कर
गीले कंडो को जलाने की भी !
वह ज़िद्दी थी.
कारखाने से लौटा उसका भूखा मरद
गुस्से में अलुमिनियम की पतीली को
नंगे पाँव कुचल-कुचल कर
चपटा किए दे रहा था.
वह भुनभुना रही थी खीझ में
गोद का बच्चा सूखा स्तन चबाकर प्रसन्न था
नरदहे का मेढक उसे
उभरी हुई आँखों से घूर रहा था
वह मेढक की पीठ की पीली लकीर को.
उसे देखने की शुरुआत वहाँ से हुई
जब मैं उभरी आँखों वाला
नरदहे का मेढक था.


स्त्री- 2

वह कभी-कभी सल्फ़ास
या ऐसा ही कोई आसानी से मिल जाने वाला
ज़हर खा या पी लेती
वह नहीं जानती थी कि ज़हर कैसे बनता है.
फाँसी लगा लेती
दिल की फाँस निकालने के लिए
या कुएँ में कूद जाती
थोड़ी सी गहराई की तलाश में.

गाँव के पास नदी होती
तो उसमें बह जाती
वह नदी बनना चाहती थी.
रेलवे लाइन होती तो रेल के नीचे कटती
उस रेल में उसका कोई परिचित सवार नहीं होता
बस जनरल बोगी में उसके जैसी ही कुछ स्त्रियाँ होतीं.
नहर में बहती तो उसकी लाश
कई दिन बाद रेगुलेटर में फँसी मिलती
मृत्यु और कलंक से भीगे हुए आँचल के साथ.
कभी-कभी ही उसकी लाश का पोस्टमार्टम होता
लेकिन उसकी मृत्यु का सही कारण नहीं पता चलता.
वह विवाहित होती तो जला दी जाती
कुंवारी होती तो दफना दी जाती.
लेकिन वह मरती नहीं थी !
कभी मुँह से झाग उगलती
कभी फंदा गले में डालकर झूलती
कभी कुएँ के जगत पर बैठी
कभी नदी-नहर के किनारे खड़ी
कभी रेल की पटरी पर सिर झुकाए बैठी
देखी जाती रही.



स्त्री- 3

कारखाने की कॉलोनी के घरों में
कभी-कभी उसे जला दिया जाता
न जाने ज़िंदा या मुर्दा.
यहाँ वह खाते-पीते इज़्ज़तदार
घर की नवब्याहता होती थी.
उसे जलाने में अच्छा-ख़ासा
जीवाश्म ईंधन प्रयोग होता
सास, ननद, देवर जुटते
पति और ससुर देखते रहते.
उसे भली-भाँति जलाकर
कोयला बना दिया जाता.
जली हुई स्त्री-देह की भी एक मुद्रा होती !
कोयले की कलाई में जली हुई चूड़ियाँ
कोयले की उँगलियों में जली हुई अंगूठियाँ
कोयले के पाँवों की
कोयले की उँगलियों में, जले हुए बिछुए
जली हुई पायलें !
और जैसे हाथ जलते समय उठा ही रह गया
रोकने के भाव से, मत मारो !
उसकी जली हुई देह का पंचनामा
पुलिस का सिपाही पिये बगैर नहीं कर पाता.
उसकी जली हुई देह
वर्षों चर्चा का विषय रहती
जबकि उसका पति जेल से निकल कर
इधर-उधर सिगरेट सुलगाते हुए दिख जाता.



स्त्री- 4

ख़ुद जल कर मर गई
या जला कर मार दी गई
विवाहित औरतों को बराबर जलाया जाता रहा.
यह कह कर कि औरतें बहुत जलनशील होती हैं
बताया जाता रहा
कि जवान औरत की चिता की राख के सिरहाने
चप्पल उतार कर खड़े हो जाओ
तो वह राख झाड़ कर उठ खड़ी होती है
और नाचने लगती है.
बताया जाता रहा कि
चुड़ैल, प्रेत से अधिक डरावनी होती
और डायन कच्चा चबा जाती है.
कुएँ, नदी, तालाब में डूब गईं
रेल के नीचे कट गईं
पहनी हुई साड़ी से ही
फाँसी लगाकर झूल गई औरतों को
चुड़ैल बनाकर जिंदा रखा गया.
मरने के बाद भी उनकी पायलों
की छम-छम सुनी जाती रही
जलाने से पहले
जिनकी धड़कन तक नहीं सुनी गयी.

मादा प्रलाप



औरतें मुझे पुकारती रहीं
कुहरे में रेल की सीटी की तरह.
औरतें मुझे पुकारती रहीं
जैसे सावित्री बाई फुले को
स्कूल पुकारता था
जैसे फूलन देवी मल्लाह को
चंबल के बीहड़ों ने पुकारा था
जैसे गौरा देवी को पेड़ पुकारते थे.
औरतें मेरी प्रतीक्षा में थी
जैसी अकेली घसियारिन रास्ता देखती है
कि कोई आए और गठरी उठवा कर
उसके सिर पर रखवा दे
जैसे दर्दमंद भोर की प्रतीक्षा में होते हैं
औरतें मेरी प्रतीक्षा में थीं.
मैं आती जाती औरतों को देखता रहा
ठूँठ सा गड़ा रहा, खड़ा रहा
अब चाहता हूँ
कि मैं स्कूल बन जाऊँ
चंबल का बीहड़
या पेड़ बन जाऊँ कि घास.


स्त्रीकाल का प्रकाशन (प्रिंट) और संचालन (ऑनलाइन) ‘द मार्जिनलाइज्ड’ सामाजिक संस्था के तहत होता है. इसके प्रकाशन विभाग के द्वारा स्त्री-दलित-बहुजन मुद्दों और विमर्शों की किताबें प्रकाशित हो रही हैं. प्रकाशन की सारी किताबें अमेजन और फ्लिपकार्ट से खरीदी जा सकती हैं. अमेज़न से खरीदने के लिए लिंक पर क्लिक करें. 
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मैं स्त्रीवादी नहीं ,मार्क्सवादी हूँ : श्रीलता स्वामीनाथन

बात 2004 की है. श्रीलता स्वामीनाथन को स्त्रीकाल के लिए हम श्रीराम सेंटर में इंटरव्यू कर रहे थे. एक युवक काफी देर से हमें सुन रहा था. उसने पास बैठने की अनुमति माँगी और श्रीलता जी से मुखातिब हुआ, ‘आपकी आँखें बहुत खूबसूरत हैं, क्या हम तस्वीर खीच सकते हैं.’ श्रीलता जी ने बड़ी सहजता से उसका स्वागत किया और हाँ कहा. आज वे नहीं रहीं. यह वाकया सहज याद आ गया. उन्हें याद करते हुए उसी बातचीत पर आधारित यह आलेख. 


संपादक




श्रीलता स्वामीनाथन “नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा”की ग्रेजुएट थीं,  तथा 1972-73 में इंग्लैंड में भी थियटर कर चुकी थीं.समृद्ध परिवार में जन्मीं श्रीलता को अपनी तमाम गतिविधियाँ बेमानी लगी,जब उन्हें लगा कि ये सारी गतिविधियाँ देश की 10 प्रतिशत जनता के लिए नहीं हैं.


तब वे 1972  में एनएसडी में स्वयं को दुबारा शिक्षित तो कर रही थीं,  परन्तु तीर तो कहीं और का लगा था, वेदना कुछ और थी.थियटर वे छोड़ भी नहीं सकती थी, उहपोह में थीं, खुद उनके शब्दों में,’थियटर तो मेरे लिए मुश्किल था, लेकिन इरादा तो बुलंद था.’ तब महरौली में फ़ार्म हाउस के मजदूरों को न्यूनतम मजदूरी भी नहीं मिलती थी,वहां इंदिरा गांधी का भी फार्म हॉउस था.श्रीलता ने वहां देहात मजदूर यूनियन बनाया .स्वयं बताया उन्होंने, ‘यहीं से मेरी असली शिक्षा प्रारम्भ हुई इसके पहले रईस तबके की बिगड़ी हुई बेटी थी. जिनके खिलाफ आन्दोलन किया वे सभी मेरे घर आते थे  और मुझे  पता था  कि वे जितना खर्च अपने स्कॉच पर करते हैं, उतना भी मजदूरों के उपर नहीं’.  ‘1974 के आपातकाल में मुझे  तिहाड़ जेल  में डाल दिया, परन्तु यह जेल यात्रा भी मेरे जीवन के लिए  माइल स्टोन साबित हुई.मुझे मिसा के तहत अन्दर डाला गया था’.  तिहाड़ में महिलाओं के लिए अलग से राजनीतिक सेल नहीं था,इसलिए उन्हें आम अपराधियों के साथ रहना पड़ता था.जेल में तो दो जून का खाना,कपड़ा और रहना ही उपलब्ध नहीं था, इसलिए उन्हें आम अपराधियों  के साथ रहना पड़ता था और बिडम्बना यह कि महिलाएं जेल जीवन को बेहतर जीवन मानती थीं, क्योंकि बाहर तो उनके लिए यह व्यवस्था भी नहीं थी “मुझे लगा इनके लिए कुछ करना हैं. तिहाड़ जेल में वहां के कर्मचारियों की पक्की नौकरी के लिए भी मैंने संगठन बनाया, पक्की नौकरी दिलाने की कोशिश की,”



छूटकर श्रीलता स्वामीनाथन मद्रास गई.वहां भी बंदरगाह में मजदूरों के  लिए कोई सुविधा नहीं थी.किसी का बाजू कट जाता था, तो किसी की टांग.संगठित करते हुए वहां पुलिस  ने उन्हें काफी तंग किया.इमरजेंसी के बाद राजस्थान के बांसवाडा इलाके में उन्होंने आदिवासियों के बीच काम शुरू किया.1977 से वहीं घंटाली गाँव में रहने लगी.वहां जाने के पहले श्रीलता ने मीडवाइफ़री तथा होमियोपैथी का काम सीखा और वही काम शुरू किया.’ 1998 तक वहीं रहकर होमियोपैथी के माध्यम से लकवा,अस्थमा आदि बीमारियां ठीक की. उनके अनुसार एलोपैथी का तो बड़ा उद्देश्य पैसा कमाना मात्र है,इसकी कोई फिलोसफी नहीं,सिर्फ मुनाफ़ा और मुनाफ़ा. मनुष्य से पहले मुनाफा. 1989 में मैं स्वंय बीमार पड़ी, दोनों किडनी फेल. मोरारजी भाई की सलाह से मैंने स्व-मूत्र चिकित्सा शुरू की’,थोड़ा हंसकर ‘और आज मैं आपके सामने हूँ’.

बीमारी के पहले महेंद्र चौधरी और श्रीलता स्वामीनाथन ने 1988 के अकाल में आदिवासियों के बीच काम किया-15 मांगो को लेकर: खासकर नसबंदी के विरोध में, हैंडपंप के लिए ,राहत कार्य के लिए आन्दोलन तीव्र किए,सरकार संपर्क करने पर हमेशा हां करती ,परन्तु वहीं ढाक के तीन पात. बाताया, ‘हमने और महेंद्र ने लोगों से मिलकर बांसवाडा के बीच का रास्ता रोक दिया.पुलिस आयी,मांगे मानने का आश्वासन दिया,  तथा सबको हटाकर हम दोनों को जेल में डाल दिया,. हमने जमानत नहीं ली. 15 दिनों तक भूख हड़ताल पर बैठे. 1991 में आइपवा  में शामिल हुई (आल इंडिया पीपुल्स वीमेन एसोसिएशन )और 1994 से मैं  वहां अध्यक्ष हूँ.’

श्रीलता स्वामीनाथन की सक्रियता निरंतर बनी रही है.रूपकंवर,भंवरी बाई आदि मामले में चले महिला आन्दोलन में इनकी भागीदारी रही. नर्मदा बाँध के विरोध में, ईराक युद्ध के खिलाफ,डब्ल्यूटीओ के खिलाफ,मंहगाई के खिलाफ-हर मोर्चे पर श्रीलता स्वामीनाथन की मौजूदगी रही.  उनका मानना रहा कि ‘हर मोर्चे पर महिला –पुरुष को अलग रखने की जरुरत नहीं हैं’.कम्युनिस्ट पार्टियों के विषय में उनका कहना था कि इन पार्टियों ने कम से कम पुरुषों को बदलने का प्रयास दिखा,परन्तु हैं  तो वे इसी पितृसत्तात्मक समाज से’
कई मोर्चे पर श्रीलता बेबाक राय रखती थीं  ‘बलात्कारी को फांसी की सजा मिलनी ही चाहिए.बलात्कार हत्या से कम नहीं है.बलात्कारी का लिंग काट दिया जाए तो अगला बलात्कारी नहीं मिलेगा.आज हर कोई दुखी है,चाहे वह अमीर हो या गरीब .मैं बहुत से ठकुरानी औरतों को जानती हूँ. जो काफी धनी हैं,  लेकिन उनके  अपना कुछ नहीं.हमें तो वर्गीय,जातीय और लैंगिक तीनों ही स्तरों पर लड़ने की जरुरत है. झुनझुन में आज भी (2004 में) औरतों को मैला उठाना पड़ रहा है,उनके साथ पूरा छूआ-छूत है,काम के बदले उन्हें एक रोटी मिलती है.
‘औरतों के मन में इतनी असुरक्षा है कि वे पुरुषों को मैनीपुलेट करने में लगी होती हैं ,एक दूसरे से लड़ती हैं, पितृसत्तात्मक समाज ‘बांटो और राज करो’की नीति पर चलता है. मेरा मानना है कि समाज में महिलाओं  की अपनी एजेंसी हो,मन में कोई डर नहीं हो.’

‘मैं फेमिनिस्ट नहीं हूँ, हां,जो औरतों के लिए बोलता है,वह फेमिनिस्ट तो है ही.वर्ग–भेद दूर हो तो 80 प्रतिशत महिलाओं की समस्या का समाधान हो जाएगा. इसलिए मैं स्वंय को मार्क्सवादी मानती हूँ, स्त्रीवाद आज भी शहरी,बुद्धिजीवी चीज है .इधर स्त्रीवादियों की भी समझ बनी है कि गाँव की औरतों को भी जोड़ना है,.परन्तु अभी प्रयास करना होगा, क्योंकि आज 80 प्रतिशत औरतों की वास्तविकता को स्त्रीवाद शामिल नहीं करता.

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दलित स्त्रीवाद , मेरा कमराजाति के प्रश्न पर कबीर

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ऑब्जेक्ट से सब्जेक्ट बनने की जद्दोजहद

सुधा उपाध्याय

जानकीदेवी मेमोरियल कॉलेज,दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाती हैं संपर्क:ईमेल:sudhaupadhyaya@gmail.com

हमने जो तर्ज़े-फुगाँ की थी कफ़स में ईजाद
फैज़ गुलशन में वही तर्ज़े-बयाँ ठहरी है….(फैज़अहमदफैज़)

क्या स्त्रियों का खुलकरअपनी बात कहना, पतनशील होना है?क्या दायरे की देहरी में रहकर अपने हक़ की माँग करना, पतनशील होना है? जब सारी उम्मीदें बंद दरवाज़े तक सीमित होकर सिर्फ अंधेरे में दाख़िल हो जाए, ऐसे में अपनी आवाज़ बुलंद करना पतनशील होना है?क्या एक स्त्री जब अपने अधिकारों के बारे में खुलकर बात करती है और ख़ुद को एक सामनासे ऊपर उठाकर पतियों के साथ बराबरी की बात करती है तो उसे पतनशील होना कहेंगे? क्या दुनिया में जो परिपाटी चल रही है स्त्रीविमर्श के नाम परअगर उससे अलग होकर अपनी बात पाठकों के सामने बड़ी बेबाकी से रखदी तो पतनशीन होना है?


अगर ये सारे सवाल उठाना पतनशील पत्नी कहलाना है तो फिर लेखिका नीलिमा चौहान को यही मंजूर है और इसलिए उन्होंने इन तमाम सवालों के जवाब ढूंढने के लिए पतनशील पत्नियों के नोट्स की रचनाकर डाली।नीलिमा साफ शब्दों में कहती हैं “एक लंबे समय तक स्त्रीवाद के नाम पर ख़ुद को दुनिया से अलहदा कर एक कड़क, दिलजली, खीजी, पकी बुझी-थकी-अकेली, नारेबाज़ नारी को झेला है आपने।ऐसा झेला कि फेमिनिज़्म के नाम से ही नाक-भौं सिकोड़कर कन्नी काटकर नौ दो ग्यारह होते रहे आप।आप ही क्या औरतें भी थक-हारकर इसबात को सच मान चली थीं कि ऐसा हायतौबा का क्या लाभ जो विकल्पहीन- लक्ष्य हीन   हो और दुनिया को हिला डालने के हवाई सपने से भरी हो।” (इसी पुस्तक से)

सदाशयता और सहानुभूति हम पतनशील पत्नियां कबतक ढोती रहेंगी।हमें अपने मोर्चे की लड़ाई अब खुद ही लड़नी होगी।हम कबतक पिता, पति, भाई को दोष  देकर उनका आसरा ढूंढती रहेंगी।हमें अब रिपेयरिंग नहीं टोटल चेंज की बात करनी ही होगी।स्वयं चेती हुई स्त्री के स्वाधिकार ही हमारे विमर्श हैं।हमारा मनोविज्ञान हमें सिखाता है हम, झुकें, डरें लजाएं आखिर कबतक? हम भी सब्जेक्ट बनना चाहती हैं।हम वस्तु नहीं व्यक्ति हैं।कबतक हमें घर परिवार में संपत्ति की तरहऔर बाहर बाज़ार में वस्तु की तरह आंका जाएगा।आत्मनिर्भर हो रही स्त्रियां, जीवन में अकेले रहने का निर्णय लेती स्त्रियां, परिवार कोख उलझते दमघोंटू सम्बन्धों को नकारती स्त्रियां, देह की कामना को न केवल पहचानने और उन्हें तृप्त संतुष्ट करने वाली स्त्रियां अब पुरुषसत्तात्मक समाज के लिए ख़तरे की घंटी साबित होंगी और हम जब बजेंगी तभी स्वानुभूति  और सहानुभूति का मुद्दा हल होगा।

तमाम स्त्रीविमर्शों, विचारों और स्त्री चर्चा से जुड़ी बातों को चाहे आप कुछ भी कहते हों उनके सामने किताब पतनशील पत्नियों  के नोट्स, एक नया आयाम खोलता है।अच्छा होगा कि अगर नीलिमा ने देहरी के दायरे में रहकर जो अधिकारों की बात को नए अंदाज में उठाया है उस पर खुलकर नए सिरे से बहस हो।देहरी के दायरे का मतलब है पत्नी रहकरअपनी आवाज़ उठाने की कोशिश।पत्नी, मां, बहू, परिवार, समाज से अलग होकर नीलिमा बात नहीं करना चाहती हैं।वो चाहती हैं कि बातें इसी दायरे में हो।क्या यह संभव नहीं कि एक पत्नी जो हमेशा से धुरी है परिवार की, उसको केंद्र में रखकर, उसे पूरी अहमियत देकर समाज का निर्माण हो? इसबात का ख़ास ध्यान रखना होगा कि यहां पर किसी एक पति की बात नहीं की गई है।बल्कि पतियों यानी पुरुष मानसिकता की बात की गई है।और  साथ ही किसी एक पत्नी नहीं बल्कि मध्यवर्गीय परिवार में सांस लेने वाली तमाम पत्नियां हैं, जो लगभग एक जैसी ही है।असल में नीलिमा उन तमाम रस्मों-रिवाज़ों पर सवाल उठाती हैं जो पत्नियों पर थोपे जा रहे हैं।“यह किसका फैलाया हुआ वहम है कि औरत का वजूद उसके माँ हुए बिना बेमक़सद हुआ करता है।वारिस की पैदाइश के लिए औज़ार होने के अलावा भी औरत का वजूद है इस बात के ख़याल तक को किस शातिराना तरीक़े से ख़तावाराना बना दिया गया है।इतना संगीन जुर्म की हर औरत के लिए ज़िंदगी का सबसे अहम सपना और चाहत माँ बनकर दिखाना हो।” (इसी पुस्तक से) 

क्या हम ऐसे समाज की कल्पना कर सकते हैं जहाँ पत्नियों को खुलकर साँस लेने की आज़ादी मिल सके? क्या ऐसा संभव है कि पत्नी अपनी इच्छानुसार माँ बने और उसके फैसले को घर के बाकी लोग स्वीकार करें।


“माँ बनने की दैहिक क़ाबिलियत भर से माँ बन जाने की मजबूरी किसी भी औरत को अपने वजूद के ख़िलाफ़ ही नहीं मानवाधिकार के ख़िलाफ़ भी लगनी चाहिए।” (इसी पुस्तक से) 

पतनशील पत्नियों के नोट्स को लेखिका ने भले ही नोट्स कहा है पर असल में यह सिर्फ नोट्स नहीं बल्कि दस्तावेज़ है उन तमाम पत्नियों के जो घर-परिवार, बाल-बच्चे, सास-ससुर की देखरेख के साथ-साथ नौकरी भी करती हैं।पुस्तक को नीलिमा चौहान ने सात हिस्सों में बाँटा है।क़ैद में ही बुलबुल, अक्स करे सवाल, ताले जज़्बातों वाले, दर्द का नाम दवा रखा है, बुनियादें पहने हैं पायल, कुछ इश्क किया कुछ सफ़र किया और अदब का दारोग़ा।इन तमाम हिस्सों मेंअलग-अलग अनुभव है।पर सारे अनुभव सिलसिलेवार तरीके से रखे गए हैं।इनका आपस में जुड़ना एक कहानी को मुकम्मल रूप देने जैसा है। इस क़िताब को पढ़ते हुए आप बार-बार अपने अनुभवों के साथ बहने लगेंगे।पतनशील पत्नियों के अनुभवों से आप एक तादात्म गांठ लेंगे।यही इस पुस्तक की खुबसूरती है।नीलिमा ने पत्नियों के अनुभवों को एक साकार रूप दिया है जो आपका अपना लगता है।तय है कि बहुत सारे लोग इस किताब पर सवाल उठा सकते हैं।जो लोग सवाल उठा रहे हैं और उनके सवालों में जो अनकहा सा रह जा रहा है, असल में वही इस किताब की सार्थकता है।वो सारे सवाल जो अबतक आपने उठाने की हिमाकत नहीं की, वैसे सारे पहलू जिसके बारे में मन ही मन खूब बातें करते हों प रखुलकर बोलने से डरते हों, वही सारे सवालों से नीलिमा बार-बार टकराती हैं और हमारे सामने बड़ी निडरता सेर खती हैं।नीलिमा का यह साहस वाकई प्रशंसनीय है। जब औरतें अपने बारें में खुलकर नहीं बोलेंगी तो फि रकुछ तो लोग कहेंगे, लोगों को काम है कहना।

अश्लीलता पुरुषवादी वर्चस्व को कायम रखने की एक साजिश है। जब-जब स्त्री नैतिकता की बनी बनाई छवियों को तोड़ने के लिए बने बनाए प्रतिमानों को तोड़ती है, उसे पारंपरिक समाज अश्लील ठहराता है।आज की स्त्री अगर अस्मिता को अस्त्र बनाकर लिख रही है तो गलत क्या है।दिक्कत तभी आती है जब आलोचकीय दृष्टि न रखते हुए भी आलोचना करने बैठते हैं।स्त्रियां बाहर आने से नहीं  घबरातीं, वे अब बोल रही हैं अच्छा संकेत हैं।लेकिन मैं मानती हूं कि स्त्री और पुरुष के सम्बन्ध अब भी कारागार में बंधे हैं।श्रेणी, वर्ग, जाति, नस्ल चाहे अलग-अलग हों किंतु जेंडर के धरातल पर दुनिया भर में स्त्री का संघर्ष एकसा ही है।उनकी भावनात्मक मनोवैज्ञानिक, नैतिक भाषित औरअस्मिता सम्बन्धी समस्याएं प्राय: एक सी हैं।स्त्री काव्यक्ति के रूप में प्रकाशित हो सकना, अपनी संपूर्णता में जी सकना, मनुष्य जाति के बचे रहने की पहली शर्त है।

नीलिमा ने कुछ इश्क किया कुछ सफ़र किया हिस्से में दो अनुभव से पाठकों को अवगत कराया है।जिनमें पहला है रेडलाइट पर एक मिनटऔर दूसरा है अधखिंची हैंडब्रेक।इन दोनों को पढ़ने के बाद सहसा मन मेंआता है कि स्त्रियों का सड़कों पर कंधे चौड़े करके निकलना अकसर मर्दों को  रास नहीं आता।गाड़ी चलाती स्त्रियां को देखकर मर्द तो एकदम से हीनभावना का अनुभव करने लगते है-

“एक बात पक्की होती है कि वो फनफनाता हुआ कोई मर्दपने का मारा ही हो ता है। बन्दे के चेहरे के काँइयाँपन से, फोकेपन से ही पता चल जाता है कि इसे इतनी भी समझ नहीं कि जिस ओवरटेक के मौक़े को उसने हो-हुल्लड़ से, हाय-तौबा से हासिल किया वह उसे तरस खाते हुए दिया गया है।xxxxxxxxxxxxxxx बगलवाला और दबाता जाता है अगर ज़रा भी स्पेस देने की मुद्रा दिखाओ।xxxxxxxxxx अमाँ यार जो इतनी जद्दोजहद से सिखाया गया था वह ऐनवक्त पर एकदम उलट साबित होता है।इसलिए बचने के लिए कब हटना हैऔर कब अड़ना है यह तो मौक़े, माहौल, ज़रूरत, ज़िगकऔर बस अपन के मूड की बात है।”

सौ बात की एकबात कि पूरी किताब के हर खंड आपस में इतने गुत्थे हुए हैं कि इस को बिखरा कर पढ़ना, सब्जेक्ट के साथ छेड़छाड़ करना होगा।जिन्हें अबतक नोटिस नहीं किया गया उनके नोट्स छपने लगे, यह एक क्रांतिकारी कदम है।और इसका स्वागत होना चाहिए।स्वागत अपराजिता शर्मा द्वारा बनाई गई आकृतियों का भी होना चाहिए जो इस पुस्तक में मौन होकर भी बहुत मुखर है।लफ़्ज़ों के साथ कदमताल करती हुई बेहतरीन आकृतियां। बल्कि कई जगहों पर तो आकृतियां शब्दों से आगे निकल जाती हैं और अपनी भाव-भंगिमा से पूरा संसार रच जाती हैं।कुल मिलाकर पतनशील पत्नियों के नोट्स इस सदी का ऐसा दस्तावेज है जो निहायत ही बिंदास, बेबाकऔरआंखों में आंखें डालकर अपने अधिकारों के लिए आवाज़ उठाता है।तमाम स्थितियों और बातों को खुलकर साझा करना सबके बूते की बात न हीं।नीलिमा चौहान ने वाकई साहस का काम किया है।

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हिंदी साहित्य से झाँकतीं आदिवासी स्त्रियाँ

रीता दुबे

शोधर्थी, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय
, दिल्ली, संपर्क:ईमेल:rita.jnu@gmail.com

अगर अपनी बात यशपाल की  दिव्या से शुरू करू तो जो कहना चाहती हूँ उसे कहने का आसानी से एक माध्यम मिल जायेगा .दिव्या दासी धर्म और मातृत्व धर्म में से मातृत्व धर्म को प्रधान मानकर अपने मालिक के घर से भागती है तो वह एक बौद्ध विहार में पहुचती है .वहाँ वह शरण कि भीख मांगती है तो स्थविर कहतें हैं ,”तुम माँ के रूप में शरण माँग रही हो ,मोहमाया से मुक्त नहीं हो ,इसलिए शरण नहीं मिलेगी ,वह चेरी बन जाने का वचन देती है तो स्थविर पूछतें हैं ,कि क्या तुम्हारे पति ,पिता या पुत्र की आज्ञा है ?वह बताती है कि पति नहीं है ,पिता दिवंगत हैं ,और पुत्र गोद में है .स्थविर अस्वीकार में उठकर अंदर जाने लगते हैं  तो वह प्रार्थना करती है कि तथागत ने तो आम्रपाली कों शरण दी थी और मुझे आप भूखा,प्यासा,असुरक्षित छोड़ रहे हैं .स्थविर उत्तर देते हैं –“वैश्या स्वतन्त स्वतन्त्र नारी है” |यह है हमारे तथाकथित सभ्य समाज का असली  चेहरा, जहाँ स्त्री की  अपनी कोई पहचान नहीं उसकी कोई स्वतन्त्र सत्ता नहीं,वह व्यक्ति नही है ,स्वतन्त्र होने के लिए उसे वैश्या बनना होगा .यहाँ तो नारी की  झाई पड़त अंधा होत भुजंग है ,नारी नरक का द्वार है .क्या ही तर्कपूर्ण बात है कि हमारे देश की आधी आबादी या तो प्रताड़ित करने योग्य है या फिर देवी बनाकर मंदिरों में सजाने के योग्य .यह सृष्टि इसी आधी आबादी के सहारे चलती है फिर भी वो घृणित हैं अश्लील हैं .स्वयं दोयम दर्जे की  हैं ,उसे तो पितृसत्ता के पैरों में दासी बनकर रहना ही चाहिए .ये एक चीज हैं एक वस्तु हैं जिसे ख़रीदा जा सकता है ,बेचा जा सकता है .वह सम्भोग और संतान की  इच्छा पूरी करने वाली एक मादा मात्र है .सबसे आश्चर्यजनक यह है कि स्त्रियों को बचपन से ही यह पाठ पढाया जाता है कि यही तुम्हारा धर्म है तुम इसी के लिए बने हो और वो इसे सहज स्वीकार भी कर लेती है .लकिन आज स्थितियाँ सिर्फ यही नहीं है.आकडों में गिनती में सही   लेकिन स्त्रियों ने अपनी आवाज उठाई है .अपने लिए समाज में जगह बनाई है ,कई बार समाज के कदम से कदम मिलाया है तो कई बार उसके खिलाफ  बगावत भी की  है .पर यह संख्या इतनी कम है कि बदलाव के लिए अभी और संघर्ष कि जरुरत है.

 लेकिन जब भी हम आदिवासी स्त्रियों के इतिहास के पन्ने पलटेंगे हमे उनकी स्थिति इस से अलग दिखाई देगी वे न तो देवी दुर्गा हैं न ही सम्भोग के लिए मादा मात्र .उनकी पहचान इससे अलग है,पुरुष से अलग उस समाज कि महिलाओं का एक सांस्कृतिक जीवन है जहाँ घर के बाहर के दरवाजे भी उनके लिए खुले हैं जंगल अपनी बाहें फैला कर उनका स्वागत करता है .”वह धान की कटाई के काम पर मान बाजार जाया करती थी .उन दिनों वह धान काटती थी,वन जंगलों में डाव डाव घुमा करती थी “1 |”रोज मुँह अँधेरे वह जाग उठती थी .दातोन मुँह में लगाये किवाड़ की  साँकल चढाकर निकल पड़ती थी घर से ढाई  तीन कोस जमीन पैदल चलकर रोजहा व्यापारी कि तरह दिन भर गली-गली घूमकर सब्जियां बेचना पडता था 2”.  अपनी बची हुई जमीन में रोपनी कटनी से लेकर खलिहानों से अनाज निकालने और उसे बाजारों में बेचने तक का काम स्त्रियां करती हैं .वो श्रम कर सकती हैं मुक्त रूप से पुरुषों से ताल मिलाकर जीवन का उत्सव मना सकती हैं मिजो और नागा लोगों की  संस्कृति इस बात का प्रमाण है ,जहाँ शाम को युवा लड़के लड़कियां एक दूसरे से मिलते हैं ,उनका समाज इस बात को बुरा नहीं मानता,घोटुल कि प्रथा भी आम लोगों को  जो उस समाज का हिस्सा नहीं है उन्हें चौकाने वाली लग सकती है ,जिसमे विवाह योग्य युवक और युवतियाँ घोटुल जाते हैं जहाँ पर विवाहित लोगों का प्रवेश वर्जित है,लड़के,लड़कियाँ एक दूसरे से मिल सकते हैं और अगर इस दौरान कोई युगल साथ रहने का निश्चय कर लेता है तो माता पिता धूम –धाम से शादी करा देते  हैं.दिन भर की  थकान रात के गहराने  के साथ घुघुरुओं की  खनक और ढोलों की  माद में खो जाती है.

 ये  अपनी पसंद का जीवन साथी चुन सकती हैं,अंतरजातीय विवाह कर सकती हैं जिसके लिए उन्हें पंचायत द्वारा लगाये गए जुर्माने की अदायगी करनी होती है .”सुकुरमुनी संथाली है और जाम्बिरा हो ,दोनो का समाज ही एक दूसरे को विवाह की अनुमति नहीं देगा .हमारा हो समाज भी कभी इस विवाह को स्वीकार नहीं करेगा सुकुरमुनी .सुकुरमुनी ने कहा समाज के लोगों के सामने हाथ पाँव जोड़कर आरजू मिन्नत करेंगे ,माफ़ी मागेंगे फिर हर्जाना स्वरुप उन्हें अच्छी तरह से हडिया दारु मुर्गा भात खिला –पिला कर मना लेंगे,…सुकुरमुनी के स्वर में दृढ विश्वास था”3 .“हाथ धोते हुए मार्था ने गहरी सांस ली न तुम दीपक से शादी करती और न हमें यह दिन देखना पडता .कितना समझया था वह घासी है और हम लोग उरांव.समाज नहीं मानेगा  .मानेगा भी,तो भारी जुर्माना लगायेगा,और हम लोग जुर्माना नहीं चुका सकते,पर तुमने नहीं सुना .सुना क्या ?चालीस हजार रुपए बहुत होते हैं ,सो तो ठीक मे.लेकिन सोचो तो आज तक पड़हा ने किसी पर इतना बड़ा जुर्माना लगाया ?नहीं न ?पड़हा पंचो को तो बस हडिया दारु और खस्सी मिल जाए  .इतना बड़ा जुर्माना ? सब महाजन का ही किया धरा है” 4. लेकिन इसके बरक्स जब हम अपने वर्ण आधारित समाज के अंतरजातीय विवाह को रखतें हैं तो आदिवासी स्त्रियों की स्थिति और भी  ज्यादा समझ में आने लगती है  .पश्चिमी उत्तर प्रदेश में इस तरह के विवाह के लिए ’ आनर किलिंग’की प्रथा है  |जिसके तहत लड़की घर की इज्जत है और इस इज्जत को बचाने के लिए कुछ भी किया जा सकता है |.लड़के को मारा जा सकता है उसके पूरे परिवार की हत्या भी की जा सकती है,बहनों के साथ बलात्कार किया जा सकता है ,उन पर तेजाब फेका जा सकता है .आये दिन अखबार के पन्ने इस तरह की सुर्ख़ियों से भरे पड़े रहते हैं ,और आश्चर्य ये है कि ये सुर्खियाँ अब हमें चौकातीं नहीं ,क्योंकि अब हमे इनकी आदत सी हो गयी है  .आदिवासी स्त्रियाँ दहेज से भी मुक्त है वहाँ वर पक्ष, वधु पक्ष को कुछ मूल्य देता है |’हो ‘जनजाति में वधू मूल्य की प्रथा कों’ गोनांग’ कहते हैं विवाह प्रस्ताव वर पक्ष की ओर से होता है . ’ खड़िया ’  जनजाति में ‘गिनिगंतान’ की प्रथा है ,जिसमे वर पक्ष वधू पक्ष कों मवेशी देता है .इस समाज में तलाक, विधवा विवाह भी मान्य है ,गाँव की पंचायत तलाक की अनुमति देती है .पुरुषों की तरह स्त्रियों को भी तलाक मिल सकता है ,परस्त्रीगमन,नपुंसकता ,क्रूर अमानवीय व्यवहार ,घर के कामकाज में हाथ न बटाना तलाक के आधार हो सकते हैं|



लेकिन इन् सबके बावजूद आदिवासी समाज में बेटियों को  पिता की सम्पति में अधिकार नहीं है .पुरुष आदिवासी नेतृत्व के एक वर्ग  का मानना है कि पिता की सम्पति में बेटियों को अधिकार मिलने से आदिवासी समाज में गैरआदिवासियों को घुसने कों मौका मिल सकता है .गैरआदिवासी युवक आदिवासी स्त्रियों से शादी रचायेंगे और शादी के बहाने जमीन को हथीयाने की कोशिश  करेंगें .लेकिन स्त्रियों को उनके अधिकार से वंचित रखने का यह एक बहुत ही कमजोर तर्क है .क्योंकि  इन सबके बावजूद आदिवासी जमीन धड़ल्ले से बिक रही है .ये जमीन किस  तरह  से आदिवासियों से हासिल की जाती है ,कैसे सरकारी कानूनों को उखाड़ फेंका जाता है इसका अंदाजा हम सबको है .जो लोग भी ऐसा मानते है उनके लिए एक उदहारण द्रष्टव्य है –“छतीसगढ़ के कोरबा जिले में वीडीयोकान कंपनी को १२०० मेगावाट कों पावरप्लांट बैठाना है उसके लिए कुछ आदिवासी गावों की जमीन हासिल करनी है …तो उसने यह हथकंडा अपनाया .छत्तीसगढ़ के सरकार के एक मंत्री है ननकी राम उनके बेटे हैं संदीप …संदीप को पब्लिक रिलेशन आफिसर बनाया और संदीप ने खुद जाकर उन गावों में आदिवासियों की जमीने खरीद ली,क्योंकि एक आदिवासी आदिवासी की जमीन खरीद सकता है .तो वीडियोकान ने एक आदिवासी  मंत्री के बेटे को ही अपना पब्लिक रिलेशन आफिसर  बनाकर वह जमीन आसानी से हथिया ली….इस तरह के हथकंडों से आदिवासियों की ये जमीने ये बड़ी- बड़ी विदेशी कंपनियाँ हथिया रही है ”5 . इस के लिए क्या आदिवासी स्त्रियाँ जिम्मेदार हैं ?नहीं न .इसलिए  ऐसे तर्क का एक ही मतलब है स्त्रियों कों उनके हक से महरूम रखना जो किसी भी समाज के लिए हितकर नहीं है .जहाँ तक गैरआदिवासी पुरुषों द्वारा आदिवासी स्त्रियों से विवाह करके सम्पति हडपने की बात है तो उसके लिए कानून में कुछ प्रावधान किये जा सकते हैं  मसलन ऐसे विवाह में संपत्ति का अधिकार पिता को ना देकर विवाह द्वारा उत्पन होने वाली संतान को दिया जाये और उसे भी अपनी जमीन किसी गैरआदिवासी को बेचने का अधिकार ना हो  .और ऐसे कानूनों का सख्ती से पालन किया जाये |

इसके साथ ही साथ आदिवासी समाज में कुछ ऐसे क्षेत्र  भी हैं  जहाँ आदिवासी स्त्री  का प्रवेश वर्जित है..हल चलाना,खेतों को समतल करना ,छप्पर छाना ,कुल्हाड़ी चलाना ,कपड़ा बुनना वर्जित है .और तो और डायन प्रथा ने इस समाज को बहुत हानि पहुचाई है .वर्ष 1995  से 1998 के बीच सिर्फ रांची पश्चिमी सिंहभूमि और गुमला में डायन घोषित करके 141  महिलाओं की हत्या करने की घटनाएं प्रकाश में आई है ..”औरत जात खेत में हल चलाई ….ऐसा तो कभी नहीं हुआ … न इस डीह में न किसी डीह …इस डीह को कोई नहीं बचा सकता रे अब  .देवी किसी को नहीं छोड़ेगी |हैजा फैलेगा ,महामारी व्यापेगी इस डीह में अक्सर किसी बूढी या जवान स्त्री को डायन का दोष देकर कोई खाटी बाप का जना मर्द उसकी गर्दन काट कर सदर थानें कटी हुई मुंडी लेकर पहुँच जाता और शान से कबूलता की इसको मने काटा है या फिर बांस की नली से औरत को आदमी का गू घोलकर पिलाया जाता या उसकी आँखे निकल ली जाती…या उसे नंगा कर गाँव भर घुमाया जाता.डायन के आरोप और डायन के प्रति नफरत  आम बात थी”6|


  स्त्रियों की यह स्थिति दिन प्रतिदिन बिगड़ती जा रही है .विस्थापन और विकास के खेल ने इन्हें और ज्यादा प्रताड़ित किया है .अपनी व्यवस्थाओं के नष्ट होने का खामियाजा सबसे ज्यादा इन्हें भुगतना पड़ रहा है.अब वह भी अपने परिवार के अन्य सदस्यों की तरह जमीदारों के खेतों खलिहानों में उनके फैक्टरियों में मजदूरी करने को विवश है .हर साल अकेले झारखण्ड से लगभग 1200 लड़कियाँ महानगरों में काम करने के लिए आती है जिसमे कई बार उनके समाज का कोई पुरुष या स्त्रियाँ भी उन्हें  अँधेरी गलियों में धकेलते हैं “और हाँ पहचानों/..जो तुम्हारी भोली –भाली बहनों की आँखों में /सुनहरी जिंदगी का ख्वाब दिखाकर /दिल्ली की आया बनाने वाली फैक्टरियों में /कर रही है कच्चे माल की तरह सप्लाई |”7 औपनिवेशिक  व्यवस्था ने इस प्रक्रिया में आदिवासी स्त्री को  आर्थिक शोषण के साथ ही साथ शारीरिक शोषण के कटघरे में लाकर खड़ा कर दिया है .ईट भट्टों,सड़कों मकानों के निर्माण में जुटी इन् स्त्रियों को जहाँ एक ओर कम मेहनताना मिलता है वहीँ दूसरी तरफ ठेकेदारों,अधिकारियों की तरह तरह की फब्तियाँ,हँसी मजाक डाट फटकार,गालियाँ ओर यौन शोषण का शिकार होना पड़ता है .तभी निर्मला पुतुल लिखती हैं “कैसा बिकाऊ है तुम्हरी बस्ती का प्रधान/जो सिर्फ एक बोतल वेदेशी दारु में रख देता है /पूरे गाँव को गिरवी /ओर ले जाता है कोई लकडियों के गट्ठर की तरह /लादकर अपनी गाड़ियों में तुम्हरी बेटियों को हजार पांच सौ हथेली पर रखकर /पिछले साल /धनकटनी में खाली पेट बंगाल गई पड़ोस की बुधनी/किसका पेट सजाकर लौटी है गाँव?” 8 .इतना ही नहीं “बबुवानी से सटे घासी लोगों का टोला है बबुवानी के नए उम्र के लौंडों लपाड़ों से लेकर अधेड़ विधुरों तक के लिए इनके घर की बहू-बेटियों की देह मर्दानगी अजमाइश का अखाड़ा हो गयी थी…..पांडे जी को एथेनिक लुक पसंद है ,पंडित आदमी थे…जहाँ कोई अछतयौवना मिलती ,वे बड़े मानोयोग से तंत्र साधना में डूब जाते” 9 .”ऐसे ही अँधेरे और सूनेपन का लाभ उठाकर आदमी के भीतर छुपे हुए धमिनवा ने दो –दो दफे रंगेनी को छानकर गारा है ,तभी से डरती है  रंगेनी अँधेरे से,जो कुछ रंगेनी के साथ बीता था वो किसी औरत के लिए बेहयाई की बात थी .अपनी मर्जी से तो किसी के साथ सो लेती हैं आदिवासिने ,कोई खराब नहीं मानता इसे .पर कोई जोर जबर से किसी को पटककर चढ़ बैठे तो …….”10 .   आदिवासी समाज में स्त्रियों की स्वतंत्रता ओर समानता के जिन बिंदुओं की चर्चा हम कर आयें हैं वो धीरे –धीरे इतिहास में बदल रहें हैं .क्योंकि  आज बदली हुई परिस्थिति में यह समाज भी सामंती मानसिकता का शिकार हो गया है. पितृसत्ता के मुहवारें में बात करना इस समाज के पुरुषों ने भी शुरू कर दिया है ,अपनी ही जाति में विवाह  करना, विवाह में वधू पक्ष की ओर से ज्यादा से ज्यादा दहेज लेना आज आम बात हो गई है.कुछ आदिवासी परिवार जो तथाकथित इस सभ्य समाज का हिस्सा बन गए हैं उन्होंने भी इस समाज के नियमों को अपना लिया है,ऐसे में आदिवासी सामाज की स्त्रिओं की स्थिति निः संदेह समानता के खुले आसमान  से बाहर निकलकर पितृसत्ता के  घेरे में आ रही है  .अगर ऐसा ना होता तो बेटी के जन्म पे –बेटी जनम सोना /धरती सिंगार रे /नारी जनम बेटी,सुखकर सार रे …..गाने वाले आदिवासी आज बेटा पैदा होने पर जिस धाई माँ को दो मन धान देतें हैं उसी धाई माँ को बेटी पैदा होने पर एक मन धान देते हैं .स्त्री पुरुष विभेद की इस मानसिकता के लिए कौन जिम्मेदार है? इसकी पड़ताल बेहद जरुरी है.



 कोई भी समाज बहुस्तरीय होता है जिनमे विभिन्न प्रकार की संस्कृतियां,रीति –रिवाज, ,परम्परायें सांस लेती हैं आदिवासी समाज भी ऐसा ही है .आज आदिवासी समाज में स्त्रियों की स्थिति को जानने के लिए,किसी निर्णय पर पहुचने के लिए हर स्तर को जानना जरुरी है.उन्हें भी जो आज भी अपने जंगलो में अपने सभ्यता को अपने अस्तित्व को बचाने के लिए संघर्षरत है .उन्हें भी( बासी तिरिया ,मीना अनीता कुमारी ,सोभा तिर्की   ) जो अपने घर से बेघर होकर दूर दराज के खानों में अपनी मेहनत के साथ साथ इनके मालिकों के आगे अपने शरीर को जलाने के लिए भी  मजबूर है .ओर उन्हें भी जो आर्थिक स्थिति में आगे बढ़े हुए हैं जिन्होंने समाज में अपनी एक जगह बना ली है .हर स्तर पर स्त्रियों की एक भिन्न स्थिति दिखाई देगी इसका भी ध्यान रखना जरुरी है .किसी भी समाज के अंदर सब कुछ सकारात्मक या सबकुछ नकारात्मक नहीं होता है लेकिन हमारी कोशिश यह  होनी चाहिए की हम दोनों को पहचान सकें ताकि  उसके प्रगतिशील अंशो से कुछ सीखें और प्रतिगामी अंशो को दूर कर के उस समाज को और भी  और स्वस्थ बना सके .इस हमारे समाज से पितृसत्ता के पैरोकारों से एक ही बात कहनी है की अगर आप विकास करना चाहतें है तो आधी आबादी को छोड़ कर यह हर्गिज संभव नहीं.”कभी अकेले में मुक्ति नहीं मिलती /यदि वह है तो सबके ही साथ है”.

सन्दर्भ ग्रन्थ


1. पृष्ट सं०135  आदिवासी कथा ( कहानी संग्रह ) महाश्वेता देवी ,वाणी प्रकाशन संस्करण 2008
2. पृष्ट सं० ,30 पठार पर कोहरा ,राकेश कुमार सिंह ,भारतीय ज्ञानपीठ  संस्करण 2005
3. पृष्ट सं० ,78-79 मरंग गोडा नीलकंठ हुआ ,महुआ माझी ,राजकमल प्रकाशन संस्करण 2012
4. पृष्ट सं०,58-60 ,इस्पातिका आदिवासी विशेषांक जनवरी –जून 2012
5. पृष्ट सं ० 16 इस्पातिका आदिवासी विशेषांक जनवरी –जून 2012
6. पृष्ट सं ०153 ,आदिवासी कहानियाँ,संपादक –केदार प्रसाद मीणा,अलख प्रकाशन    संस्करण 2013
7. पृष्ट सं ० 20  नगाड़े  की तरह बजते शब्द ,निर्मला पुतुल भारतीय ज्ञानपीठ  संस्करण 2005
8. पृष्ट सं ० 20 नगाड़े की तरह बजते शब्द  भारतीय ज्ञानपीठ  संस्करण 2005
9. पृष्ट सं ०49 ग्लोबल गाँव का देवता ,रणेन्द्र,भारतीय ज्ञानपीठ संस्करण 2010
10- पृष्ट सं०23 ,पठार पर कोहरा ,राकेश कुमार सिंह भारतीय ज्ञानपीठ  संस्करण,2005

राजकमल चौधरी के उपन्यास और सेक्सुएलिटी

अनिरुद्ध कुमार यादव

शोधर्थी, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली, संपर्क:ईमेल:anirudhdv1@gmail.com

सेक्स मानवीय जीवन की एक जैविक जरूरत है. जैसे जीवन जीने के लिए रोटी, कपड़ा और मकान की आवश्यकता होती है. उसी प्रकार से सेक्स की भी आवश्यकता महसूस की जाती है. सेक्स एक जैविक जरूरत ही नहीं बल्कि मानवीय संतति की विकास को सतत् बनाये रखने का एक साधन भी है. बगैर सेक्स के मानवीय संतति का क्रम बरकरार नहीं रह सकता. किंतु सेक्स का इन आवश्यक रूपों से भिन्न रूपों में भी प्रयोग किया जाता रहा है. हमारे पौराणिक आख्यानों में भी ऋषि कण्व, ऋषि पराशर, आदि की तपस्या को भंग करने के लिए स्वर्ग की अप्सराओं- मेनका, उर्वशी, रम्भा इत्यादि का साधन के रूप में इस्तेमाल किया गया. इसी तरह से कालान्तर में यौनिक-क्रिया को राजनीति, सत्ता, खरीद-ब्रिकी, भोग-विलास और जीविका के साधन के रूप में भी इस्तेमाल किया जाने लगा. सेक्स के  इन तमाम रूपों का वर्णन राजकमल चौधरी के उपन्यासों में दिखाई देता है.

राजकमल चौधरी के उपन्यासों में सेक्सुएलिटी के विभिन्न संदर्भ मौजूद हैं. उन्होंने यौनिक-क्रियाओं के कारणों की व्यापक स्तर पर पड़ताल की है. राजकमल चौधरी सेक्सुएलिटी को श्लीलता या अश्लीलता के चश्मे से नहीं देखते, बल्कि उसके सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक और मनोवैज्ञानिक कारणों की तलाश करते हैं, जो उसके मूल में है. श्लीलता और अश्लीलता के चक्कर में फंसकर राजकमल चौधरी रूकना न जानते थे. वे परिस्थितियों की विसंगति, विडंबना और विद्रूपता को ही दर्शाने को लक्ष्य मानकर चले हैं. इनके सभी उपन्यासों – ‘बीस रानियों के बाइस्कोप’, ‘एक अनार: एक बीमार’, ‘मछली मरी हुई’, ‘देहगाथा’, ‘अग्निस्नान’, ‘ताश के पत्तों का शहर’, ‘आदिकथा’, ‘पाथर-फूल’ आदि में यौनिक-क्रियाओं का चित्रण किसी न किसी रूप में अवश्य हुआ है. वह दौर ही ‘अकविता’ और ‘अकहानी’ का था, जिसमें यौनिक-संदर्भों, यौनिक-बिम्बों और यौन-प्रतीकों का बहुतायत प्रयोग किया गया.

‘एक अनार: एक बीमार’ उपन्यास यौनिक-क्रियाओं के चित्रण से भरा पड़ा है. उपन्यास के शुरूआत में ही राजकमल चौधरी ने लिखा है- ‘साहित्य में अश्लीलता आरोपित करने वाले ‘पुलिस-मनोवृत्ति’ के लोग यह किताब न पढ़ें, उनकी सेहत के लिए यही अच्छा रहेगा.”1 दरअसल राजकमल चौधरी साहित्य को जीवन के गहरे यथार्थ से जोड़कर देखने के पक्षपाती थे. इसलिए इन्होंने कलकत्ता शहर के डिम्पल लेन के भिखारियों, रिक्शा चालकों, मजदूरों, वेश्याओं, ठेले वाले इत्यादि लोगों को अपने इस उपन्यास का विषय बनाया है. इस वर्ग के लोगों के लिए यौन-व्यापार या नंगापन कोई माने नहीं रखता, उन्हें तो सिर्फ दो जून की रोटी की आवश्यकता है. उन्हें यह रोटी जो भी उपलब्ध करा दे, वे उसके लिए कुछ भी करने को तैयार हैं. सीता और ईश्वर के माध्यम से राजकमल चौधरी इन गलियों की सड़ांध, जीवन-शैली, क्रिया-व्यापार आदि का यथार्थ चित्रण किया है. किसी से भागने या छुपाने का कही कोई प्रयास नहीं है. जैसे – ‘स्त्रियाँ आतंकित होकर अपने अंडरवियर और पेटीकोट उतार फेकेंगी. पुरुष आतंकित होकर अपनी सूखी हुई नीली नसें स्त्रियों के अन्दर डालने की कोशिश करेंगे. मगर स्त्री सिकुड़ी हुई रह जायेगी. पुरुष सूखा हुआ बना रहेगा. नए बच्चे पैदा नहीं होंगे. जो बच्चे दुनिया में हैं, वे सिफलिस और कैंसर में मुब्तिला होकर आत्महत्या कर लेगें या पागल हो जाएंगे या बड़े शहरों और चौराहों पर ट्रैफिक पुलिस के गोलम्बर में खड़े होकर हस्तमैथुन करते रहेंगे.”2

इस उपन्यास में एक अन्य कथा भी चलती रहती है. जिसमें भी यौन-संदर्भों का चित्रण है. किंतु दोनों में अंतर है, जहाँ पहली कथा में यौन-संदर्भ जीवन जीने के आवश्यक साधन प्राप्त करने के लिए किए गए हैं, वहीं दूसरी कथा में सुख-सुविधओं से सम्पन्न वर्ग द्वारा अपने अकेलेपन, महानगरीय टूटन एवं तनाव को कम करने के लिए, यौनिक उन्माद को शांत करने के लिए विह्स्की, रम की सोलन इत्यादि का सेवन कर अन्ततः सेक्स में शांति ढूँढ़ने का प्रयत्न दिखाई पड़ता है. जैसे – “ईश्वर ज्यादातर अकेले इधर आता है, दोपहर में. खासकर बुधवार के दिन, जब ड्राई डे होता है और इस इलाके की मेम साहब, आधी औरतें, आधे मर्द, साहब, अपने कमरों में बन्द और बेहोश पड़े शराब या जुआ, ताश या लूड़ों, हस्तमैथुन या ‘होमोसेक्सुअलिटी’ करते होते हैं.”3

यहाँ पर ध्यातव्य है कि अपने समकालीनों में ‘होमोसेक्सुएलिटी’ पर बात करने वाले राजकमल चौधरी पहले साहित्यकार हैं. हिन्दी साहित्य की कहानियों, कविताओं और उपन्यासों में ‘होमोसेक्सुएलिटी’ राजकमल चौधरी के  माध्यम से ही दाखिल होती है. राजकमल चौधरी के बहुचर्चित उपन्यास ‘मछली मरी हुई’ में भी शीरी और प्रिया ‘होमोसेक्सुअल’ हैं. दोनों लेस्बियनहैं. इस उपन्यास का केन्द्रीय विषय- ‘होमोसेक्सुएलिटी’ नहीं है,  किंतु राजकमल चौधरी ने इसे विषय प्रस्ताव के रूप में अवश्य सामने रखा है. फिर भी उपन्यास में शीरी उसकी बहन,  फिर शीरी और प्रिया जाने-अनजाने अपने व्यवहार में ‘होमोसेक्सुअल’ हैं. किंतु उन्हें इस बात का इल्म नहीं है. भारत में ‘होमोसेक्सुएलिटी’ का यही रूप दिखाई पड़ता है. जिसे राजकमल चौधरी ने बहुत ही सूक्ष्म ढंग से चित्रित किया है. जैसे पास न होकर भी, शीरी और प्रिया के मन में काले ब्रोंज की काली मूर्ति की तरह निर्मल पद्यावत खड़ा है… मुस्कराता हुआ. दो ‘लेस्बियन’ औरतें और दोनों के मन में, दिलो-दिमाग में, अंग-अंग में ब्रोंज की मूर्ति.” 4


इस तरह दोनों ही स्त्रियाँ यौनोन्माद में एक पुरुष का साथ पाना चाहती हैं. जो उन्हें संतुष्ट कर सके, किन्तु सामाजिक बंधन के कारण वे ऐसा नहीं कर पाती और एक-दूसरे में ही आश्रय ढूँढ़ने लगती है.

राजकमल चौधरी  ने ‘ताश के पत्तों का शहर’ उपन्यास में भी लेस्बियन की चर्चा की है. बोनी उर्फ़ वन्दना सिंह एक लेस्बियन है. वह कहती है मीरा  जैसी खूबसूरत लड़की पूरे कलकत्ते में और नहीं है. मुझे खूबसूरत लड़कियाँ बहुत अच्छी लगती हैं. उनसे बातें करने में, उनसे हाथापाई करने में, उनके  गले में हाथ डालकर घूमने में, उनके  साथ रजाई के  अन्दर लिपटकर सोने में मुझे मर्दों से ज्यादा मजा  आता है. एकदम लगता है, मैं मर्द बन गयी हूँ. एकदम सिर से पाँव तक मर्द. लड़कियाँ मुझे पसन्द हैं, मर्द नहीं.5 किंतु राजकमल चौधरी  ने जहाँ भी ‘लेस्बियन’ की चर्चा की है, उसे एक बीमारी के  रूप में देखा है, वह चाहे ‘मछली मरी हुई’ की प्रिया हो या फिर ‘ताश के  पत्तों का शहर’ की वन्दना. जबकि दूसरी तरफ वे स्वतंत्र यौनिक-क्रिया का समर्थन भी करते हैं. यह राजकमल चौधरी  के  विचारों में द्वन्द्व को  दर्शाता है.


इसी तरह ‘बीस रानियों के  बाइस्कोप’ नामक उपन्यास में फिल्म-उद्योग जगत में व्याप्त यौन-क्रियाओं का वर्णन किया गया है. इसमें पुखराज और कुन्दन के  माध्यम से यथार्थ को अभिव्यक्त किया गया है. पुखराज कलात्मक फिल्मों का प्रतिनिध्त्वि करती है. जबकि कुन्दन व्यवसायिक फिल्मों के  रूप को व्यक्त करती है. जहाँ फिल्म डायरेक्टर कलाकार और फिनाॅन्सर का त्रिकोणीय संबंध् बनता है. जिसमें फिनाॅन्सर  फिल्म में पैसे लगाने के  बदले हीरोइन को कुछ  भी करने के  लिए मजबूर कर सकता है. फिल्म संसार के  भीतर हो रहे मानसिक एवं दैहिक शोषण और सस्ती लोकप्रियता एवं भौतिक सुखों की प्रबल आकांक्षा से प्रेरित अभिनेत्रियों का स्थितियों के  दबाव के  तहत निर्माता-निर्देशक के  आलिंगन में अपनी देह को परोसने की नियति इस उपन्यास का केन्द्रीय विषय है. साथ ही अवान्तर रूप से पंचसितारा होटलों, क्लबों और बियर-बार के  रंगीन, मादक और अभिजात्य वातावरण में स्थापित और नवोदित लेखकों, निर्माताओं, निदेशकों, सिने कलाकारों की गुजरती शामें, इन गुजरती शामों में शराब के  पेग के  साथ पीछे छूटते सामाजिक सरोकार और व्यर्थ की कला-मूल्यों की बहसें, तन और मन में उभरती देहभोग की पिपासा, फिल्मों में जगह पाने के  लिए भोग का खुला आमंत्रण देती मादा आँखेय्  आदि.6 इस उपन्यास में अपने कटु यथार्थ के  साथ उपस्थित हैं. जैसे- फिल्म में रोल पाने के  लिए कुन्दन मिस्टर मनचन्दा को रिझाती हुई,दोनों  हाथों से टेबल का किनारा पकड़कर वह थोड़ा आगे झुकी, अपनी छातियाँ टेबल की सतह पर उतर जाने दीं. नीली ओढ़नी को हवा में थोड़ा सरका दिया. एक पल मुस्कुराई. एक पल हल्की हो गई और अपने एक-एक शब्द में हल्की सी मिठास, हल्क़ा-सा नशा घोल-कर बोली – ‘मुझे शोखी बहुत ज्यादा पसन्द है, मिस्टर मनचन्दा! मगर शोख होने का कोई मौसम भी तो हो.’7

‘नदी बहती थी’ उपन्यास में भी एक कथा के  रूप में मिसेज सविताराय चौधरी , सीता, पूरबी, सोनाली आदि स्त्रियाँ देह-व्यापार में लगी हुई हैं. किन्तु मिसेज सविताराय चौधरी  और अन्य स्त्रियों की वेश्यावृत्ति में अंतर है. जहाँ मिसेज सविताराय चौधरी  उच्चवर्गीय भोग-विलास और यौन-उत्श्रृंखलता का प्रतिनिधित्व करती हैं, जिसे अपने यौनिक-उन्माद को शांत करने के  लिए सदैव पर-पुरुष का साथ आवश्यक है. वहीं सीता, पूरबी, शेफाली आदि नारियाँ आर्थिक दंश को सहन न कर पाने की स्थिति में समाज से छुप कर देह का व्यापार करती हैं. ताकि कुछ  पैसे मिल सके  और रोटी का इंतजाम हो सके . इसलिए शाम को तैयार होकर ऐसी महिलाएँ बस स्टाॅप, गली के  मुहाने, चाय की दुकान इत्यादि स्थानों पर खड़ी होकर अश्लील इशारे करती हुई देखी जा सकती हैं. जिस दिन इनके  देह के  खरीददार इन्हें नहीं मिलते, उस दिन इनके  घर चूल्हा नहीं जलता. राजकमल चौधरी  ने इस उपन्यास में यह भी दिखाया है कि इन स्त्रियों का कर्म भले ही बुरा है, किन्तु मन से ईमानदार हैं. कृष्णा भी वेश्यावृत्ति करती है और जब वह गर्भवती हो जाती है और स्वयं नहीं जानती यह बच्चा किसका है. इसलिए कृष्णा बड़ी ईमानदारी से कहती है,मैंने कई लोगों से कह रखा है कि यह बच्चा उन्हीं का है. और, कई लोगों ने मुझसे कह रखा है, कि यह बच्चा उन्हीं का है और मैंने लोगों से कहा है और लोगों ने मुझसे कहा कि मैं किसी से नहीं बताऊँ कि यह बच्चा उन्हीं का है.8 परन्तु इस तनाव को कृष्णा सह नहीं पाती और फाँसी लगाकर आत्महत्या कर लेती है. समाज में ऐसी ही कितनी कृष्णा, शेफाली, सोनाली, सीता और पूरबी हैं. जो आत्महत्या करने के  लिए अभिशप्त हैं.

राजकमल चौधरी  ने अपने उपन्यासों में महानगरीय जीवन के  अनेक चित्रा खींचा है. किन्तु इन चित्रों में सबसे चमकदार, स्पष्ट और प्रभावी चित्रा महानगर की उन आधुनिकता का है, जो सुख-सुविधा , भोग-विलास, इच्छा-आकांक्षा की पूर्ति और लिप्सा आदि के  लिए अपनी स्त्री-देह का भरपूर इस्तेमाल करना जानती हैं. वे देह को अपनी सफलता की सीढ़ी बना लेती हैं. ऐसी ही नारियाँ- झरना शर्मा, माया, कांति और लेडी नूर मुहम्मद हैं. जो ‘शहर था शहर नहीं था’ की पूरी रूपरेखा तैयार करती हैं. जहाँ नूर मुहम्मद अपने इसी गुण के  कारण विधान-परिषद में पहुँच जाती है. वहीं झरना शर्मा ‘आदर्श महिला सिलाई-कढ़ाई’स्कूल  की आड़ में तन का व्यापार करती है. धर्म  की आड़ में सच्चिदानंद राजनीति और देह-व्यापार दोनों ही करता है. लेडी-नूर-मुहम्मद के  द्वारा राजनीति में ठसक और बंका से उनका अनैतिक यौन-संबंध है. कांति एक विधवा  स्त्री  है. किन्तु वह अभी नवयौवना है. इसलिए उसके  देह के  प्यासे पुरुषों की कमी नहीं है. वह ‘कला-भवन’ के  नाम पर रुपये बनाने के  लिए अपनी सुन्दर काया का राजनैतिक उपयोग करती है. इन सभी स्थितियों को झरना शर्मा के  पति कामेश्वर शर्मा के  पत्र के  माध्यम से बहुत ही सूक्ष्मता के  साथ उपन्यासकार ने व्यक्त किए हैं-समूचा  शहर तुम्हारा दोस्त है.  इलाके  की हर औरत तुम्हें तुम्हारे नाम से जानती है. अपने स्कूल  की बनी हुई चीजें, बेबी-फ्राक , बाबा सूट, रूमाल, तकियों के  गिलाफ, टिकोजी, टेबल-क्लाॅथ, तुम पटना मार्केट की दुकानों में बेचती हो…. तुम बादल के  साथ सिनेमा देखने जाती थी, और वापस आकर मुझे बताती थी कि आज मंगलवार है, और इसीलिए हनुमान मंदिर में औरतों की जबर्दस्त भीड़ थी. तुम मुझसे बहाना करती हो.9

पूँजीवाद के  प्रभाव से बाजारीकरण की प्रक्रिया बहुत तेजी से बढ़ गयी. जिससे मनुष्य भी वस्तु के  रूप में  तब्दील हो गया. यही कारण है कि नारियों को एक्सपोज करना, नारी-देह का व्यापार करना या फिर नारी-सौन्दर्य का शहर में लोगों को अपने प्रोडक्ट को ज्यादा से ज्यादा बेचने के  लिए इस्तेमाल किया गया. बाजारीकरण के  दुष्प्रभाव ने मानवीय संवेदना को कुंद कर दिया. समाज के  सभी क्षेत्रों में व्यापार, राजनीति, शिक्षा, सामाजिक कार्य ;एन.जी.ओ. आदि कार्यों में स्त्रियों का व्यापक स्तर पर उपयोग किया गया. राजकमल चौधरी  के  उपन्यास ‘अग्निस्नान’ और ‘देहगाथा’ इसी बाजारीकरण के  बढ़ते प्रभाव को रेखांकित करते हैं. ‘अग्निस्नान’ की पात्र श्रीमती न सिर्फ अपने सौन्दर्य और तन का व्यापार करती हैं बल्कि वे वेश्याओं की दलाली भी करती हैं. वही लुलू जो एक लड़के  से प्यार करती है, किन्तु पैसे के  अभाव में वह नाइट क्लब में रिसेप्शनिस्ट बन कर मुस्कुराती  रहती है. ‘देहगाथा’ मैं, मेरी पत्नी और वह के  बीच के  त्रिकोणात्मक संबंधें पर टिकी है. देवकांत जो पैसे के  लालच में  पार्वती से शादी कर लेता है. वह पार्वती से नहीं बल्कि उसकी दौलत से प्यार करता है. यही कारण है कि बाद में देवकांत अजनबीपन, टूटन आदि का शिकार हो जाता है और जीवन से पलायन कर जाने का इरादा बना लेता है. उपन्यासकार बाजारीकरण के  प्रभाव को उद्घाटित करते हुए लिखता है -भारतीय स्त्री  के  लिए ऐसा स्वरूप, ऐसी आकृति, इतना सौन्दर्य पाना असम्भव है. इसलिए, श्रीमती को पहली बार अहसास हुआ कि उसकी सम्पत्ति और’पूंजी, एकमात्र उसका शरीर है.स्त्री को जब यह अहसास हो जाता है तो उसकी जिन्दगी बदल जाती है, वस्तुओं को देखने-परखने का उसका तरीका बदल जाता है. क्लियोपेट्रा औ’ हेलेन को यह अहसास हुआ था. इजिप्ट और ग्रीस की तारीख के  पन्ने बदल गए थे.10

राजकमल चौधरी ने हिन्दी के  साथ-साथ मैथिली भाषा में भी तीन उपन्यास लिखें. जिसमें मैथिल समाज के  रहन-सहन, रीति-रिवाज, बोली-भाषा, मैथिली-आन्दोलन स्त्री -पुरुष के  अवैध संबंध  इत्यादि का सटीक वर्णन किया गया है. फिर भी इन सब विषयों के  चित्रण में ‘सेक्सअलिटी’ एक बड़ा मुद्दा रहा है. ‘आन्दोलन’ उपन्यास की भूमिका में राजकमल लिखते हैं – आज  के  मनुष्य में तीन प्रवृत्तियाँ मुख्यतः देखी जाती हैं – क्षुध, आत्मरक्षा और यौन-पिपासा. ऐसी तीन प्रवृत्तियों का चित्रांकन लेखन का प्रयत्न रहा है.11 ‘आदिकथा’ उपन्यास में मैथिल समाज के  परम्परागत बंधन , जो एक सहज प्रेम को लेकर रहा है, को दर्शाना ही उपन्यासकार का मुख्य ध्येय रहा है. जबकि ‘पाथरफूल’ उपन्यास ‘सेक्सुअलिटी’ के  संदर्भ में सबसे महत्त्वपूर्ण है. यह उपन्यास अश्लील समझे जाने के  कारण किसी प्रकाशक द्वारा प्रकाशित नहीं हुआ. जो कुछ  प्रतियाँ प्रकाशित हो गई थी, उसे भी अश्लील प्रकाशन करने के  जुर्म में जेल हो जाने के  भय से प्रकाशकों ने जला दी. बमुश्किल राजकमल चौधरी  रचनावली के  संपादक देवीशंकर नवीन ने यह पुस्तक खोज निकाली.


‘आन्दोलन’ उपन्यास मैथिली भाषा को लेकर कलकत्ता शहर में मैथिल लोगों द्वारा चलाये जा रहे आन्दोलन को रेखांकित करता है. निर्मला एक ऐसी महिला है, जो मैथिली आन्दोलन से जुड़ी है. इनके  विषय में उपन्यासकार ने लिखा है – निर्मला जी ? यौवन-मदोन्मता, रूप-गर्विता, बुर्जुआ, रईसी ठाठक प्रतिफल- हिनका त चाही उत्तेजना …. चाहे मैथिली-आन्दोलनसँ भेटय, चाहे कोनो एकान्त पुष्पोद्यानमे पर-पुरुखक संग बैसलासँ, सुमधुर  कण्ठे धीरसमीरे  यमुनातीरे वसति वने वनमाली’ गओलासँ.12  निर्मला का क्रमशः भुवन और फूलबाबू से आकर्षण भी निर्मला के  चरित्र को दर्शाता है. उपन्यासकार ऐसी स्त्रियों को विषकन्या कहता है. एक दूसरा प्रसंग ‘सेक्सुएलिटी’ को लेकर इस उपन्यास में  नीलू का है. जो कमल को भैया कहती है. किन्तु यौन-उन्माद में रात को साये और ब्लाउज में कमल के  कमरे में पानी पीने के  बहाने जाती है. परन्तु जब कमल बहाने को समझ जाते हैं और नीलू को बहुत समझा-बुझाकर अपने कमरे से बाहर भेजना चाहते हैं. तब नीलू कहती है – लोक  किछु कहय कमल भैया! मुदा, हमरा नहि रहल जाइए नीलू बड्ड कातर भ, बड्ड करुण शब्दमे बजलीह13. इसी तरह एक अन्य प्रसंग सुशीला नामक वेश्या का है. जिसके  माता-पिता कलकत्ता में ही रहते हैं. सुशीला की माँ भी एक वेश्या है, जो खुद अपनी बेटी से भी देह-व्यापार करवाती है, क्योंकि इनके  लिए आमदनी का कोई अन्य स्रोत नहीं है. इस प्रसंग के  माध्यम से राजकमल चौधरी  वेश्या-जीवन के  कटु-यथार्थ और उनकी मनोदशा का बहुत सटीक चित्रण किया है.

‘पाथर-फूल’ उपन्यास में जमींदारी व्यवस्था समाप्त हो जाने पर भी जमींदार का रूतबा कायम है, को चित्रित किया गया है. फूलबाबू एक जमींदार है. जो निम्न जाति की स्त्रियों को भोगना अपना अधिकार समझते हैं. वे कादम्ब, इजोरिया जैसी कितनी ही स्त्रियों के  साथ अवैध संबंध में हैं. इसके  अतिरिक्त भी गाँव में राधा, जनकपुरवाली जैसी स्त्रियाँ भी हैं. जो सामाजिक बंधन या आर्थिक विवशता के  कारण खुले आम देह-व्यापार में लगी हुई हैं. राजकमल चौधरी  जनकपुरवाली के  विषय में लिखते हैं -महानंद बाबू की जाँघों के नीचे दबी, बलिदानी बकरे की तरह, पूरी रात और उसके  बाद पूरी-पूरी रात जनकपुरवाली रोती, चिल्लाती, मरती रही थी. महानन्द बाबू और उसके  बाद पूरे गाँव के  अनेक महानन्द बाबू ने, गुलाब के फूल जैसी कोमलांगी जनकपुरवाली को कोसी नदी की टूटी घाट बना दिया – जो आए, वही नहाए,14 नदी के  घाट को क्या!  प्रस्तुत उदाहरण में जनकपुरवाली की लाचारी, बेबशी और शारीरिक और मानसिक पीड़ा को व्यक्त किया गया है.

राजकमल चौधरी  ने ‘पाथर-फूल’ उपन्यास में ग्रामीण समाज में व्याप्त सहज अनैतिक यौन-संबंधों का चित्रण भी किया है. जहाँ चोरी-छुपे विवाह पूर्व और विवाहेत्तर संबंध बनाये जाते हैं. कौन पुरुष या कौन स्त्री  किस स्त्री  या पुरुष से ‘फंसा-फंसी’ है, उसका भी बखूबी चित्रण किया गया है. जिसमें नैतिकता, पाप-पुण्य जैसे विचार उनके  दिमाग में आते ही नहीं. राजकमल चौधरी  ने लिखा है – गाँव में खेत-खलिहान, बाग-बगीचा, दलान-आँगन में… यह स्वेच्छाचार नैतिक है या अनैतिक, आचार है या अनाचार – यह समाजशास्त्र और दर्शन का विषय है. किंतु सत्य इतना ही कि यह स्वेच्छाचारिता परम अनिवार्य सत्य है. सत्तन जी की बहन, गोपाल जी की बेटी,गोवर्धन की पत्नी, वैदिक जी की पोती किसी खेत-खलिहान में बाँस के  बगान में, और किसी घर के  पिछवाड़े में किसी झाड़ी में….15

उपर्युक्त वर्णन से स्पष्ट है कि राजकमल चौधरी  के  हिन्दी और  मैथिली दोनों ही भाषाओं में रचित उपन्यासों में ‘सेक्सुएलिटी’ एक अनिवार्य अंग के  रूप में मौजूद रही है. हालाँकि दोनों का परिवेश नितान्त भिन्न रहा है. हिन्दी उपन्यासों में महानगरीय जीवन में भोग-विलास की संस्कृति देखी जा सकती है. साथ ही आर्थिक विवशता के  कारण देह-व्यापार भी. जो कि मैथिली उपन्यासों में भी दिखाई पड़ता है. किंतु यौनोन्माद मैथिली उपन्यासों में नहीं है. इसमें ग्रामीण परिवेश में सामाजिक-जीवन का अनिवार्य अंग बन गए- अनैतिक यौन-संबंधें का चित्रण ज्यादा हुआ है. जो कि यथार्थपरक भी है. इस तरह से कहा जा सकता है कि राजकमल चौधरी  के  उपन्यासों में चित्रित ‘सेक्सुएलिटी’ अपने समय और समाज के  कठोर सत्य को सामने लाता है. यही इनकी महत्ता है.


संदर्भा सूची
  1.राजकमल चौधरी  रचनावली ;(खण्ड-6,) संपा.- देवशंकर नवीन, पृष्ठ संख्या- 58
  2.वही, पृष्ठ संख्या- 68  
        3.वही, पृष्ठ संख्या- 64
  4.मछली मरी हुई – राजकमल चौधरी, पृष्ठ संख्या – 134 
  5.ताश के पत्तों का शहर – राजकमल चौधरी, पृष्ठ संख्या- 112 
  6.राजकमल चौधरी: पूँजीवादी लोकतंत्रा का प्रतिपक्षी उपन्यासकार – डाॅ. सुभाषचन्द गुप्त, 
             पृष्ठ संख्या –    209-210
  7. राजकमल चौधरी रचनावली ;(खण्ड-6)संपा.- देवशंकर नवीन, पृष्ठ संख्या- 37-38
  8.राजकमल चौधरी रचनावली ;(खण्ड-5), संपा.- देवशंकर नवीन, पृष्ठ संख्या- 207
  9. वही, पृष्ठ संख्या- 320-321
  10.राजकमल चौधरी रचनावली ;(खण्ड-6), संपा.- देवशंकर नवीन, पृष्ठ संख्या- 251
  11.राजकमल चौधरी रचनावली ;(खण्ड-5), संपा.- देवशंकर नवीन, पृष्ठ संख्या- 19
  12.कृति राजकमल, संपा.- प्रो. आनन्द मिश्र, श्री मोहन भारद्वाज पृष्ठ संख्या- 154-551
     फुटनोट – निर्मला जी? यौवन-मदोन्मत्ता, रूप-गर्विता, बुर्जुआ, रईस ठाठ का प्रतिफल… इन्हें                   तो चाहिए  उत्तेजना… चाहे वह मैथिली-आन्दोलन से मिले, चाहे किसी एकान्त पुष्पोद्यान में पराए               पुरुष के साथ  बैठने से, सुमधुर कंठ से ‘धीर समीरे यमुना तीरे वसति वने वनमाली’ गाने से.
  13.वही, पृष्ठ संख्या- 160 लोग कुछ भी कहें, कमल भैया! किन्तु मुझे नहीं रह जाता है नीलू बहुत                   कातर होकर, बड़े करुण शब्द में बोलीं.
        14.राजकमल चौधरी रचनावली ;(खण्ड-5) ,संपा.- देवशंकर नवीन, पृष्ठ संख्या- 125
  15.  वही, पृष्ठ संख्या-125 

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नागार्जुन के उपन्यासों की दलित पक्षधरता

श्याम लाल गौड़


प्राध्यापक,श्री जगदेव सिंह संस्कृत महाविद्यालय,सप्त ऋषि आश्रम हरिद्वार.



नागार्जुन ने अपने समाज में निरन्तर गिरते मानव मूल्यों को देखा है। वे बचपन से निम्न वर्गीय अभावों से ग्रसित रहे। वे ऊँच-नीच, छुआ-छूत, अस्पृश्यता, ब्राह्मण-शूद्र के भेद-भावों को देखते हुए आ रहे थे। इन विषम परिस्थितियों ने नागार्जुन को सोचने के लिए बहुत कुछ दिया है। इन समस्याओं पर लिखा जाना स्वाभाविक था क्योंकि वे समस्याएॅं आज भी जीवन्त हैं। वे  खत्म होने का नाम नहीं ले रही हैं।


नागार्जुन व्यक्गित दुःख पर न रुककर व्यापक दुःख पर प्रकाश डालते हैं। नागार्जुन सामाजिक चेतना सम्पन्न रचनाकार थे, अतः इन रूढ़ियों के विरुद्ध वे विद्रोह करते दिखाई देते हैं। उन्होंने अपने ‘इमरतिया’ उपन्यास में हरिजन वर्ग के साथ पूर्ण सहानुभूति व्यक्त की है। उनकी दृष्टि में सब समान हैं। इस उपन्यास में उपन्यासकार ऐसेे ही विचारों को अभिव्यक्ति देता हुआ कहता है कि ”इसी तरह मेहतर भी सफाई का काम कर चुकने के बाद नहा-धो ले, कपड़ा पहन ले फिर हमारे साथ बैठकर वह पूजा पाठ में क्यों नहीं शामिल होगा, आत्मा तो एक ही है, शरीर का चोला अलग-अलग हो सकता है।“


नागार्जुन जाति-पाॅंति की भावना को समाज के लिए अभिशाप मानते हैं। वरुण के बेटे उपन्यास का मोहनमाॅंझी कहता है- ”मैथिली महासभा, राजपूत सभा, दुसाध महासभा आदि जो भी साम्प्रदायिक संगठन हैं, सभी का वायकाट होना चाहिए। इन महासभाओं के नेता आम लोगों की एकता में दरार ड़ालने का ही एक मात्र काम करते हैं।“

नागार्जुन ने अपने आंचलिक उपन्यास ‘बलचनमा’ में भी सर्वहारा वर्ग के जीवन्त उदाहरण प्रस्तुत किये हैं। वे इतने सजीव और वास्तविक हैं कि शब्दचित्र की भाॅंति हमारे समक्ष घटित हो रहा हो ऐसा प्रतीत होता है।
एक निम्नवर्गीय किसान परिवार जो सदियों से शोषण और दमन का शिकार होता चला आ रहा है। बंधुआ मजदूर होकर गाॅंव के जमींदारों के यहाॅं काम करना और बदले में मुश्किल से दो वक्त की रोटी कमा पाना। आकस्मिक घटनाओं जैसे बीमारी, शादी-व्याह आदि के लिए जमींदारों से कर्जा लेना। यदि एक बार कर्ज की चपेट में आये तो पीढ़ी-दर-पीढ़ी उसी कर्ज भॅंवर में फॅंसकर रह जाते हैं। कभी भी उससे उऋण नहीं हो पाते। इस तरह जमींदारों के शिकजें में उन गरीबों के घर, खेत, बैल, भैंस, सब आ जाते हंै। और इस तरह वे उनके इशारों के गुलाम बने घूमते हैं। जरा सी भूल-चूक उनके लिए मौत का बुलावा हो जाता। ऐसा ही एक उदाहरण जब ‘बलचनमा’ का बाप जमींदार के बाग से एक आम चुरा लेता है। मालिक को पता चलने पर उसके साथ जो सलूक किया जाता है वह दृश्य अत्यन्त मार्मिक बन पड़ा है।
‘‘मेरी दादी कांपते हाथों मालिक के पैर छुए है। उसके मुॅंह से बेचैनी में यही एक बात निकलती रही है कि दुहाई सरकार की मर जाएगा ललुआ। छोड़ दीजिए सरकार। अब कभी ऐसा ना करेगा। दुहाई मालिक की। दुहाई माॅं-बाप की और माॅं रास्ते पर बैठी हाय-हाय करके रो रही है और में भी रो रहा हूँ। मेरी छोटी बहन की तो डर के मारे हिचकी बॅंध गयी है।’’

बाल्यावस्था से ही जीवन संघर्ष जीवन को और अधिक तपाते हैं। इसी तपन में तपता बलचनमा पेट की आग की खातिर वह सब कुछ उस उम्र में करता है, जो उम्र उसकी खाने खेलने की है। पिता के मृत्यु के पश्चात बलचनमा अल्पायु से ही काम में जुट जाता है। यही नियति बन चुकी है उन परिवारों की जहाॅं अभावों ही अभावों का जाल फैला है। सुबह की फिक्र में शाम गुजरती है। और शाम की फिक्र में सुबह ऐसा ही एक दृश्य बलचनमा की जिन्दगी का-”दादी ने मना किया था, अभी खाने-खेलने के दिन है, इसी समय जोत देगी जो कलेजा सूख जायेगा, इस पर माॅं बोली थी कि अभी से पेट की फिक्र नहीं करेगा तो बेहतरा हो जाएगा।“

परवशता को भाग्य मान लेना और जीवन यापन के लिए जमादारा­ पर पूरी तरह निर्भर रहना तथा उनकी ही दया दयालुता पर जिंदा रहना ही सम्भव है, ऐसा विश्वास इस वर्ग के दिमाग म­ घर कर गया है। ऐसा ही एक उदाहरण जब बलचनमा 14 वर्ष की आयु म­ अपने मालिकों के यहाॅं काम पर जाता है, इसके बदले में उनकी मालिकाइन क्या देना चाहती है। और उसकी दादी किस प्रकार अपनी हीनता का प्रदर्शन कर काम के बदले म­ रोटी-कपड़ा माॅंगती है।

मेरी कमर म­ फटी-सी मैली-सी बिस्ठी झूल रही थी। बिस्ठी न तो लंगोटी है न कच्छा, कपड़े के लीरे अगर तुम कोपीन की भाॅंति पहन लो वही हमारे यहाॅं बिस्ठी कहलाएगी। मालिकाइन ने बिस्ठी की ओर इशारा करके कहा कपड़ा हमसे पार नहीं लगेगा। यह सुनकर दादी ने दाॅंत निपोड़ दिये चेहरे पर झुर्रिया­ और लकीरा­ में ­ बल पड़ गया। दोना­ हाथ जोड़कर वह गिड़-गिड़ाई ‘‘क्या कमी है मालिकाइन आप लोगा­ के यहाॅं? आप ही का तो आसरा है, नह° तो हम गरीब जनमते ही बच्चा­ को नमक न चटा द­। अरे, अपना जूठन खिलाकर अपना फेरन-फारन पहनाकर ही तो हमारा पर्तपाल करतीं हैं।“2


बलचनमा जब जमादार के यहाॅं काम करने लगता है, और काम करने म­ उससे भूल-चूक या देर सबेर होती, तो उसे डाॅंट-डपट तथा मार-पीट का तो सामना करना पड़ता था इतना ही नही कभी-कभी उसे भूखे पेट भी रहना पड़ता था। गाली गलाॅज का सामना तो उसे बात-बात पर करना पड़ता था। उसने यह सब पेट की खातिर सहने-सुनने की आदत सी डाल ली थी अन्यथा थोड़ा बहुत मिलता था वह भी नहीं मिलता। इस प्रकार कितना लाचार और असहाय होकर जबरन यह सब सहना पड़ता है, जोकि नहीं सहना चाहिए।


”गालियाॅं सुनकर दो-चार दिन तो मुझे थोड़ी बहुत तकलीफ हुई, पर बाद में कान खूब पक्के हो गये। गद्धा, सूअर, कुत्ता, उल्लू…. क्या नहीं कहती थी वह मुझे? उनका गुस्सा चुपचाप सह जाना मुझे सीखना पड़ा। एक बार दोपहर को घास लाने में जरा देर हो गयी, बैशाख-जैठ की जलती धरती, तो घास छीलने म­ बड़ी कठिनाई होती है। पच्चीसा­ जगह खुरपी चला चलाकर तंग आ जाओगे फिर भी टोकरी भर घास नहीं होगी, लेकिन जो देवी कई-कई देवड़िया­ वाली हवेली के भीतर छाॅंह म­ आराम से बैठी हुई हो। उन्ह­ अपनी यह दिक्कत तुम समझा पाओगे भइया, उनके लिए सारी धरती रही नरम-नरम दूबा­ से भरी। सो उस रोज घास लेकर जब मैं  जरा देर से पहुॅंचा, तो मालिकाइन हु-हुआ उठी, मर क्यों न गया? बड़े नवाब के नाती हुए हो। कहीं बैठकर बाप के साथ कोड़ी खेल रहा होगा, और देर हो गयी घास नहींमिलती है। खुरपी भोथी है, बेंट ढीला पड़ गया था।……………… पचास बहाने बनाता है। मुॅंहझौसा इतना कहकर जब उन्ह­ संतोष न हुआ तो झाडू उठा लाई और मेरी पीठ पर सात बार झटाझट बरसा दिए। मैं ए­चकर वहीं बैठ गया ईह-ईह कर उठा।“

जब जमादारा­ के यहाॅं कोई नौकर होकर था, तो उसे वह जानवरा­ से भी बदतर निगाहा­ से देखते थे। घर का जो भी गन्दा खराब और बेकार खाना होता था, उसे वह नौकरा­ को दे देते थे। ऐसा ही एक दृश्य बलचनमा का जब उसे इसी प्रकार बचा झूठा बेकार खाना मालिकाइन देती, वह भी बड़े एहसान के साथ। वह जब बहुत खुश होती तो सूखा या बासी पकवान, सड़ा-आम, फटे दूध का बदबूदार छैना या जूठन की बची हुई कड़वी तरकारी देती हुई मुझे कहती- बलचनमा ऐसी अच्छी चीज तेरे बाप-दादा ने भी नहीं खाई होगी। दही जब बहुत खट्टा हो जाता था, उससे बदबू आने लगती थी और वह उनके अपने या किसी पड़ोसी के खाने लायक न रह जाता तब मुझे मिलता। मैं  उस दही को कुत्ते की भाॅंति खा लेता। याद आता है कि एक बार जास्ती खट्टा और दुर्गन्ध रहने से उस दही को नहीं खा पाया तो मालिकाइन ने सजा दी थी- अगले दिन खाना नहीं मिला था।’’


बेबस और निस्सहाय बचलनमा की जमींदारा­ के व्यवहार और नीयत के प्रति एक अजीब सी आह भरी टीस निकलती है। उस भाग्य निर्माता के लिए जो भाग्य के नाम पर कितना कुछ इन्सान को सहने पर मजबूर और लाचार कर देता है। बेबसी म­ वह सब कुछ सहता अवश्य है, किन्तु उसम­ इतनी चेतना जागृत अवश्य होती है कि भाग्य का खेल एक वर्ग विशेष को ही क्या­ नचाता है। क्या अर्थहीनता के कारण या शक्ति सामथ्र्य साम, दाम, दण्ड, भेद आदि नीतिया­ के कुचक्र से परे होने के कारण? आखिर विभेद क्या­?

”अच्छा तो भगवान करते ही हैं। चार परानी का परिवार छोड़कर मेरा बाप मर गया, यह भी भगवान नेे ठीक ही किया। भूख के मारे दादी और माॅं आम की गुठलिया­ का गूदा चूर-चूर कर फाॅंकती  हैं, यह भी भगवान ठीक ही करते हैं। और सरकार आप कनकजीर और तुलसीफूल के खुशबूदार भात, अरहर की दाल, परवल की तरकारी, घी, दही, चटनी खाते है , सो यह भी भगवान की ही लीला है। चौकोर कलम बाग के लिए आपको हमारा दो कट्टा खेत चाहिए और हम­ चाहिए अपने चैकोर पेट के लिए मुट्ठी भर दाना।“

बलचनमा के इस कथन म­ नागार्जुन ने भेदभाव की कशक को उभारा है और यह दर्शाया है, भगवान के नाम पर अन्धी श्रद्धा को। बलचनमा उपन्यास म­ अनेक ऐसे स्थल हैं, जहाॅं सर्वहारा का सजीव प्रतिबिम्ब झलकता है।
‘कुम्भीपाक’ उपन्यास भी नागार्जुन का ‘आम वर्ग’ का प्रतिनिधित्व करने वाला उपन्यास है। इसम­ भी एक ऐसा स्थल है जहाॅं इस वर्ग का यथार्थ चित्र मिलता है। जहाँ  इस वर्ग के प्रतिनिधि रिक्शा चालक की भावनाआ­ और मजबूरी से खिलवाड़ होता हुआ दर्शाया है। अपनी मेहनत की भी मजदूरी न मिलने पर आक्रोश व्यक्त करता हुआ सफेद पोश डाकू रिक्शावाले ने थूककर कहा- ”कसाई कहीं का किस सफाई से गरीबा­ का गला काटता है! और अन्दर कुर्सी पर बैठकर नानी को फोन कर रहा होगा……..।“

सम्पादक महोदय जो पहनावे से सम्पन्न नजर आते हैं  और एक रिक्शा चालक से दुअन्नी के लिए झगड़ा करते हैं। वह भी एक मिनिस्टर के बंगले पर। रिक्शा चालक पहले तो बड़ा तैंस म­ आता है और सम्पादक के पीछे-पीछे कमरे तक चला जाता है, किन्तु चपरासी के कहे शब्दा­ म­ धनाढ्य वर्ग और आज की व्यवस्था पर जो व्यंग्य और कसिस थी, वह आज का वास्तविक यथार्थ है



”चपरासी मुस्कराया अरे इन्हीं कोठिया­ के अन्दर तो अन्याय पनाह लेता है आकर। सरकार अभी इन्ह° कोठिया­ और बंगला­ म­ कैद है, उसे तुम तक पहुॅंचने म­ दस-बीस वर्ष लग जाएॅंगे अभी।“
यही सर्वहारा वर्ग का यथार्थ चित्र है। वह अपने हक के लिए आवाज भी नहीं उठा सकता। उसकी आवाज दबा दी जाती है।

‘गरीबदास’ उपन्यास का प्रमुख पात्र गरीबदास नामक एक नाटे कद का सांवली सूरत का एक अधेड़ साधु वेश वाला व्यक्ति है। जिसम­ हरिजन वर्ग के प्रति विशेष लगाव और हमदर्दी है। वास्तव म­ तो गरीबदास के स्वर म­ स्वयं नागार्जुन का ही प्रतिरूप झलकता है। उन्हा­ने अपने स्वर को गरीबदास का स्वर और कार्य बनाकर उपन्यास म­ अवतरित किया है। यह सब नागार्जुन का सर्वहारा वर्ग के प्रति असीम सहानुभूति का प्रतिफलन है। अपने बच्चा­ को बाराखड़ी का अभ्यास करवाने के लिए हरिजना­ ने अपनी उस छोटी बस्ती के अन्दर ही एक ‘शाला’ खोली थी। इस शाला की निगरानी का भार भगत लछमनदास ने अपने ऊपर खुशी-खुशी ले लिया था। गरीबदास इस शाला के लिए हर महीना तीस रुपए का इंतजाम करते थे। बीस रुपए शिक्षिका को मिलते थे, दस रुपए और कामा­ के लिए रखे रहते थे। लेकिन यहाॅं तो गरीबदास ने मजदूरी करते हुए ही इस शाला का इंतजाम किया था।


क्या मजबूरी थी? मजबूरी यह थी कि गाॅंव के प्राइमरी स्कूल म­ हरिजन बच्चा­ के प्रति सवर्ण परिवारा­ के बच्चा­ का सलूक तिरस्कारपूर्ण तो था ही, आतंकजनक भी था। पिटाई के डर से हरिजन बच्चे अक्सर वहाॅं से भाग जाते थे। बार-बार की शिकायता­ के बाद भी जब स्थिति म­ सुधार नह° हुआ तो गरीबदास ने इधर के बच्चा­ की पढ़ाई के लिए अलग इंतजाम किया। चार्टा­ के ऊपर एक फोटो दीवार म­ चिपका दिया गया था।“


गरीबदास की निम्न वर्ग के प्रति निष्ठा और कार्यशैली का अनूठा उदाहरण है कि किस प्रकार उनमें गरीब बच्चा­ के भविष्य के प्रति जागरुकता है। और इसी कारण वे सवर्णों के दुव्र्यवहार वश निम्न शोषित वर्ग के बच्चा­ के लिए उनकी ही बस्ती म­ एक पाठशाला खोलते हैं। जिसका भार वे स्वयं उठाते हैं। खुद मजदूरी कर पाठशाला चलाना और पूरी व्यवस्था करना गरीबदास का ही कार्य था। स्कूल की अध्यापिका भी उन्हा­ने अपनी ही बस्ती की एक विधवा स्त्री को बनाया। जिससे उनको तो सहायता मिलती थी, साथ ही एक बेसहारा स्त्री को इज्जत का काम कर जीविका  चलाने का अवसर मिलता है।

उनकी पाठशाला की यह खास बात थी कि उसम­ आम छुट्टी रविवार को भी उनका स्कूल बन्द  नह° रहता था, बल्कि उनकी पाठशाला म­ छुट्टी उन दिना­ रखी जाती थी। जब उसकी खास जरूरत होती। जैसे जिन दिना­ खेता­ म­ अधिक काम रहता तब पाठशाला बन्द रहती, या फिर तीज त्यौहारा­ पर, जिससे सामाजिक उत्तदायित्व भी पूरा होता रहता। गरीबदास बच्चा­ के मनोविज्ञान को बखूबी समझते हैं , कि बच्चा­ को यदि कोई अच्छी बात मनवाना हो तो किस तरह उन्ह­ आकर्षित करना चाहिए, इसीलिए उन्हा­ने अपने बच्चा­ की पाठशाला म­ राष्ट्रीय त्योहारा­ पर बच्चा­ को भरपेट जलेबी पूड़ी खिलाने का काम शुरू किया था। इससे बच्चे खुश तो होते ही थे, साथ ही यह उनम­ पढ़ाई के प्रति आकर्षण पैदा करने का जरिया भी था।


इतना ही नहीं वे समूचे गाॅंव बस्ती के शुभ चिंतक थे, गाॅंव म­ कहाॅं क्या हो रहा है, और क्या करना है? कौन सी बात लोगा­ के लिए हितकर रहेगी कौन सी नह° आदि बाता­ का भी गरीबदास ध्यान रखते थे। वे अपने वर्ग के लोगा­ की भावनाआ­ और समस्याआ­ के प्रति सचेत होकर उस ओर अग्रसर रहते थे। एक बार भजन-कीर्तन के लिए एकत्रित मण्डली के कुछ लोगा­ म­ से भगत को गरीबदास गाॅंव का हाल समाचार सुनाने को कहते ह®। और भगत द्वारा गाॅंव के प्रत्येक निम्न वर्ग के व्यक्तिया­ म­ डर और दहशत समाज की बात जानकर गरीबदास मन ही मन बहुत व्याकुल होते हैं। और आई हुई समस्या के समाधान के लिए रात-रात भर जाग कर घूम-घूम कर उपाय निदान सोचते रहते हैं । वे दूसरा­ के लिए इतने व्याकुल हो जाते हैं , कि अपना खाना-पीना तक भूल जाते और चिन्तन कर कोई न कोई हल निकालने म­ जब सफल हो जाते तब ही कुछ अन्न जल ग्रहण करते। इस तरह की बैचेनी वाले पात्र गरीबदास पर ‘‘परहित सरिस धर्म नहिं भाई, पर पीड़ा सम नहिंअधमाई’ वाली पंक्ति चरितार्थ होती है। उनके स्वयं से ही चल रहे द्वन्द्वात्मक युद्ध का एक उदाहरण ‘‘बाबा गरीबदास की चहल-पहल थमी नहीं  थी अपनी परछाई से ही बातें करने का जी कर रहा था।’’



गरीबदास ठमककर खड़े रह गये हाथ उठाकर अपनी परछाई से बोले, ‘तू उसका क्या कर लेगा?’ मालिक लोग चमारा­ की बस्ती को फूंक द­गे सौ पचास इन्साना­ को जलाकर खाक कर द­गे, तो भी मालिक लोगा­ का तू क्या बिगाड़ लेगा? थाने का दरोगा उन्हीं  की बिरादरी का है, यह खुले आम उनकी तरफदारी करता चलेगा। एस0पी0 कमजोर दिलवाला हरिजन है, उसके ऊपर-नीचे ज्यादातर बड़े अधिकारी ऊँची जातिया­ के ही लोग जमे हुए हैं । यह बेचारा तेरे लिए क्या हलाक होगा! तू ठहरा बापू जी का प्यारा हरिजन बालक, तेरे लिए स्वर्ग का फाटक खुला हुआ है। नियम-निष्ठा से रहेगा तो तेरे को इसी जनम म­ संत रैदास की तरह लोग पूज­गे, तब यही मालिक लोग तेरी तारीफ अखबारा­ म­ छपवाया कर­गे। तब तेरी कुटिया छता­ वाली, कई मंजिला­ की विल्डिंग की तरह अंधेरी रात म­ भी दूर से दमका करेगी। तेरे महर्षि की यह प्रतिमा तब संगमरमर वाले चबूतरे को बाॅंस के छोटे बाड़े म­ घेर-घारकर महर्षि को नह° रखा जाएगा, तब हरिजन मन्त्री कारा­ पर लद कर तुमसे परामर्श करने आय­गे बेटा।“


जब गरीबदास परहित के ध्यान समुद्र म­ गोते लगाते तो उन्ह­ स्वयं के मन का होश नह° रहता। यदि  बैठे हुए सोच रहे ह®, तो घण्टा­ बैठे ही रहते। यहाॅं तक सोच म­ डूब जाते कि अपने को भी दूसरा­ के लिए न्योछावर कर देते। ऐसे ही सोच का एक उत्कृष्ट उदाहरण, ”गरीबदास पालथी मारकर दीवार के सहारे बैठ गये। तटस्थ भाव से मन के पंछी की उड़ान देखने लगे, अपने आपको सम्बोधित करके गरीबदास ने बोलना शुरू किया- बेटा, हिम्मत से काम लो। बेधड़क आगे की तरफ कदम बढ़ा। ऐसा नहीं करेगा तो दुनिया तेरा कचमूर निकाल देगी। धनिये की तरह पीसकर लोग तुझे चट कर जायेंगे।

सौ पचास जीवा­ का भला करने से तुझे थोड़े बहुत उल्टे सीधे काम करने पड़­गे सिर्फ फासला तय करना, सिर्फ चलते जाना काफी नहीं होगा, नये सिरे से तुझे पगडंडियाॅं बनानी हा­गी, नई राहा­ के निर्माण की कोशिश म­ हो सकता है, तेरे पंख बार-बार झुलस जाय­ तू बुरी तरह घायल हो जाय, नई राह­ बनाने के सिलसिले म­ यह सब झेलना होगा तुझे।“

अन्ततः नागार्जुन का चिन्तन गरीबदास के समाज की उस व्यवस्था पर किया गया है, जहाॅं समाज का प्रतिष्ठित धनाढ्य वर्ग, आम जनता के लिए यदि कुछ करता है, तो उसका अंकुश उसको उस लाभ के प्रतिरूप म­ झेलना पड़ता है। संस्था, समिति तथा आश्रम के रूप म­ चलने वाली सामाजिक व्यवस्थाएॅं जो आप शोषित या सामाजिक विक्षिप्तता प्राप्त लोगा­ के लिए कार्य करती है। इन्हीं  वर्ग की मुहताज होकर उनके इशारे पर चलती है। वहाॅं भी उन्ह­ स्वतन्त्रता प्राप्ति नहीं ऐसा ही एक चिन्तन गरीबदास के माध्यम से आम जनता के हितार्थ किया गया।


‘‘नये सिरे से दस-बीस बालका­-बालिकाआ­ की भर्ती करके एक आश्रम भी चालू किया जा सकता है, बाबा ने सोचा लेकिन, आश्रम चलाने के लिए शुरू म­ ही दस-बीस हजार रुपये चाहिए, दस-बीस एकड़ जमीन चाहिए, आश्रम की बुनियाद तभी पक्की होगी जब मालिक लोगा­ म­ से दो एक प्रभुआ­ का जमकर सहारा लिया जायेगा। गरीबदास तू जिस मालिक का सहारा लेगा, उसी  के हुक्म चल­गे न तेरे आश्रम म­। जो मिनिस्टर, जो बड़ा हाकिम तेरे आश्रम को दस-बीस हजार की सरकारी मदद दिवायेगा, वह क्या या­ ही तेरे को खुला छोड़ देगा? फिर एक दूसरा झंझट भी तो लगा रहेगा, वह झंझट वह झमेला ऐसा होता है कि बड़े-बड़े आश्रमा­ का मटियामेट हो जाता है, जिन बालका­ और बालिकाआ­ को तू उनके बचपन म­ ही अपने आश्रम म­ घेर-घारकर रखना शुरु करेगा। उनके माँ-बाप, उनके रिश्तेदार, उनके पुराने मालिक बीच-बीच म­ उन्ह­ आश्रम से खिसकाते रह­गे, तब तू क्या करेगा? तेरे आश्रम का भट्टा नहीं बैठ जाएगा? धीरे-धीरे सिखाया-पढ़ाया हुआ तोता जब पिंजड़े से उड़ जाता है, तो दिल को भारी कचोट नह° पहुॅंचेगी? गाॅंधी जी को जिन्दगी म­ चार बार अपने आश्रमा­ का अन्त देखना पड़ा था। अंग्रेज सरकार भी बापू के पीछे पड़ी रहती थी। कभी जेला­ ठुका लेती थी, कभी बड़े लाट की कोठी म­ उनके फलाहार का इन्तजाम करती थी। अपने समाज के दकियानूस लोग बापू जी को पसन्द नहीं करते थे- सेठा­ म­ से कुछ तो जरूर ऐसे थे जो कि आश्रम को नये सिरे से स्थापित करने म­ उनकी मदद के लिए हमेशा आगे-आगे रहे……………।“



अन्ततः यही कहा जा सकता है कि गरीबदास आम जनता के हितैषी और शुभचिंतक के रूप म­ उपन्यास के अन्दर अवतरित हुए हैं। उनका सम्पूर्ण जीवन परहित के लिए समर्पित रहा। उन्हा­ने तन, मन तथा धन से असहाय जनता के दर्द को समझा और दूर किया, उनके साथ ही साथ उपन्यास के अन्य पात्र कपिल बाबू, माया, भगत-आदि भी स्वयं म­ एक अनूठा व्यक्तित्व लिए उभरे हैं, किन्तु नागार्जुन ने सबसे अधिक गरीबदास पात्र को ही दलित चेतना के हित के लिए कार्यरत दिखाया है।

नागार्जुन के उपन्यासों में स्त्री

श्याम लाल गौड़


प्राध्यापक,श्री जगदेव सिंह संस्कृत महाविद्यालय,सप्त ऋषि आश्रम हरिद्वार.

उपन्यासकार नागार्जुन बहुमुखी प्रतिभा के व्यक्ति थे। उन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन साहित्य सर्जन में लगाया। उन्होंने कविता, उपन्यास, कहानी, संस्मरण, यात्रा वृत्त, निबंध साहित्य आदि साहित्यिक विधाओं को अपनी लेखनी का विषय बनाया। हिन्दी, मैथिली और संस्कृत तीनों ही भाषाओं में उन्होंने साहित्य रचना की। उनके जीवन काल में ही उनकी काफी पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी थी।


नागार्जुन की सर्वप्रथम प्रकाशित रचना 1929 ई0 की है। यह रचना एक मैथिली कविता ‘मिथिला’, (लहेरिया सराय दरभंगा) नामक पत्रिका में छपी थी। उनकी पहली हिन्दी कविता जो 1934 ई0 में लाहौर से निकलने वाली साप्ताहिक पत्रिका ‘विश्वबन्धु’ में छपी। इसके बाद बुकलेट ‘बूढ़वर’ और ‘विलाप’ 1942 ई0 में छपी वह भी मैथिली में महात्मा गांधी की हत्या पर हिन्दी कविताओं का एक बुकलेट ‘शपथ’ नाम से प्रकाशित हुआ और कुछ समय पश्चात् 1948 ई0 में उनका पहला उपन्यास ‘पारो’ ‘मैथिली’ में प्रकाशित हुआ तथा दो वर्षपश्चात् सन् 1948 में उनका पहला हिन्दी उपन्यास ‘रतिनाथ की चाची’ प्रकाशित हुआ। सन् 1949 ई0 में अट्ठाईस मैथिली कविताओं का संग्रह प्रकाशित हुआ जो ‘चित्रा’ नाम से है। ‘युगधारा’ जो सैंतीस हिन्दी कविताओं का पहला व्यवस्थित संग्रह है जो 1953 में छपकर प्रकाशित हुआ। इसके बाद उपन्यासेत्तर गद्य की पहली पुस्तक निराला पर आधारित ‘एक व्यक्ति एक युग’ सन् 1963 की कृति है। स्फुट गद्य तो नागार्जुन रचना काल के शुरुआती दौर से ही लिखते आ रहे थे।

सन् 1936 ई0 में ‘असमर्थदाता’ नामक कहानी छपी थी। उसी समय से कथेत्तर भी लिखते रहे और साथ ही बाल साहित्य लेखन का कार्य भी करते रहे। बच्चों के लिए पहली पुस्तक ‘वीर विक्रम’ सन् 1956 में प्रकाशित हुई इसके साथ-साथ 1944 से 1954 ई0 के बीच नागार्जुन ने अनुवाद का काम भी किया। बंगला उपन्यासकार ‘शरत चन्द्र’ के कई उपन्यासों का हिन्दी अनुवाद कर प्रकाशित किया। ‘कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी’ के उपन्यास ‘पृथ्वी वल्लभ’ का गुजराती से हिन्दी में सन् 1945 ई0 में अनुवाद किया था। ‘मेघदूत’ का मुक्त छन्द से अनुवाद 1953 ई0 का है। ‘अपने खेत में’ हिन्दी कविता 1947 के अन्त में प्रकाशित हुई।


नागार्जुन द्वारा रचित उपन्यास जिनकी कुल संख्या ग्यारह है। नौ उपन्यास हिन्दी में और दो मैथिली में हैं। जिनका प्रकाशन काल इस प्रकार हैः
उपन्यास रचना काल प्रकाशक
1. रतिनाथ की चाची 1948 किताब महल, इलाहाबाद
2. बलचनमा  1952 किताब महल, इलाहाबाद
3. नई पौध    1953 किताब महल, इलाहाबाद
4. बाबा बटेसरनाथ 1954 राजकमल प्रकाशन, दिल्ली।
5. वरुण के बेटे 1957 राजपाल एण्ड संस, दिल्ली।
6. दुःखमोचन 1957 राजकमल प्रकाशन, दिल्ली।
7. कुंभीपाक 1960 राजपाल एण्ड संस, दिल्ली।
8. हीरक जयंती 1962 आत्माराम एण्ड संस, दिल्ली।
9. उग्रतारा 1963 राजपाल एण्ड संस, दिल्ली।
10. जमनिया का बाबा 1968 राजपाल एण्ड संस, दिल्ली।
12 पारो 1968 किताब महल, इलाहबाद।
13. गरीबदास        1975 संभावना प्रकाशन, हापुड़।


इस प्रकार अध्ययन से प्राप्त ज्ञान के आधार पर नागार्जुन के उपन्यासों का यहाँ पर क्रमिक परिचय दिया हुआ है। इसके अलावा नागार्जुन के दो खण्ड काव्य भी प्रकाशित हैं। उपन्यासेत्तर गद्य और बाल साहित्य की रचना भी उन्होंने की। विद्यापति की कृति ‘पुरुष परीक्षा’ की कुछ कहानियों का भाव रूपान्तर विद्यापति की कहानियां नामक शीर्षक से प्रकाशित है।

नागार्जुन ऐसे पहले कथाकार थे, जिन्होंने ने साहित्यिक कृतियोंको सामाजिक सोद्देश्यता से जोड़ा है, और कथा साहित्य की सामाजिक परम्परा का सूत्रपात किया। उनमेंसामाजिक दायित्व की भावना सर्वोपरि थी। यह सही है कि हिन्दी मेंकथा साहित्य की जनवादी परम्परा की शुरुआत भारतेन्दु युग से हुई थी, परन्तु उसे वास्तविक रूप से नागार्जुन ने ही अपने कथा साहित्य द्वारा पुष्ट और संवर्धित किया था। जिसका विकास बाद मेंप्रगतिशील कथाकारा­यशपाल, भैरव प्रसाद गुप्त, राहुल सांकृत्यायन, रांगेय राघव, आदि मेंस्पष्ट दिखायी देता है।

वस्तुतः नागार्जुन ने प्रेमचन्द की ही यथार्थवादी-जनवादी कथा परम्परा को आत्मसात करके उसके विकास मेंमहत्वपूर्ण भूमिका निभायी है। यह कहा जा सकता है कि नागार्जुन के साहित्य मेंविचारधारात्मक विसंगतियों और अन्तर्विरोध है। यह भी कहा जा सकता है कि उनके साहित्य मेंअनेक वैचारिक राजनैतिक भटकाव आये हैं। वे सभी 1962 के चीनी आक्रमण तथा प्रखर रूप मेंसन् 1968 के राजनीतिक सामाजिक बदलाव के बाद आये हैं। इसके विपरीत उनका कथा-साहित्य इन वैचारिक राजनीतिक भटकावोंसे अछूता है। कारण स्पष्ट है कि वे कविता क्षेत्र मेंराजनीतिक, सामाजिक आंदोलनोंके तात्कालिक प्रभावोंसे अपने आपको सर्वथा मुक्त नहींरख पाते हैं, और उनसे शीघ्र प्रभावित होकर कवि-कर्म मेंप्रवृत्त होते हैं। जबकि कविता मेंतात्कालिकता का अतिक्रमण अत्यन्त जरूरी है, इसके विपरीत कथा-साहित्य मेंतात्कालिकता का अतिक्रमण उनके यहाँ आसानी से देखा जा सकता है। उनके कथा साहित्य मेंवैचारिक भटकावनहींके बराबर है।

नागार्जुन के उपन्यासों का अध्ययन करने से स्पष्ट होता है कि वे अपने युग के प्रति अत्यधिक जागरूक रहे हैं। उन्होंने तत्कालीन युग की प्रत्येक समस्याओं सामाजिक,धार्मिकआर्थिक एवं राजनीतिक आदि की गहराई से अनुभूत कर अपनी रचनाओं में प्रस्तुत किया है। उन्होंने उच्च वर्ग के प्रति निम्न वर्ग के विद्रोह को जगाकर एक नयी अलख जगायी है। साथ ही अत्याचारउत्पीड़न और शोषण का यथार्थ स्वरूप भी प्रस्तुत किया है। उनकी स्त्री समाज से गहरी सहानुभूति रही है। वे नारी को हर क्षेत्र में आगे लाना चाहते हैं। उन्होंने सामाजिक कुरीतियों एवं धार्मिक अंधविश्वासों का खण्डन किया है। इस प्रकार उन्होंने निम्न वर्ग की दयनीय स्थिति एवं इसके कारणों को स्पष्ट करने का प्रयास किया है।



नागार्जुन रूस की समाजवादी आर्थिक विचारधारा से अत्यधिक प्रभावित रहे हैं। उनके पात्र कर्म को ही अपना धर्म मानने वाले हैं। वे मुंशी पे्रमचन्द के पात्रों की तरह परिस्थितियों के आगे घुटने नहीं टेकते अपितु इसके विपरीत परिस्थितियों से जूझने एवं संघर्ष के लिए सदैव तत्पर रहते हैं। स्त्री समस्त मानवीय सौंदर्य एवं चेतना की सर्वोंत्तम अभिव्यक्ति है। साथ ही सृष्टि सृजन का मूल कारण भीसाहित्य की प्रत्येक विधा के सृजन में नारी-हृदय की पुलक एवं उसकी अनुरक्ति जीवन-प्रदायिनी शक्ति की मुख्य भूमिका रही है। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने सृष्टि एवं सर्जन में नारी की महत्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित करते हुए कहा है-
‘’पुरुष स्वभावतः निःसंग व तटस्थ रहा हैनारी ही उसमें आसक्ति की भावना उत्पन्न कर उसे निर्माण की ओर उन्मुख करती है। पुरुष अपनी पुरुष प्रकृति के कारण द्वन्द्व-रहित हो सकता हैलेकिन नारी अतिशय भावुकता के कारण हमेशा द्वंद्वोन्मुखी रहती है। इसीलिए पुरुष मुक्त है और नारी बद्ध है.’’

 ऐसा ही उदात्त दृष्टिकोण जयशंकरप्रसाद की ‘कामायनी’ में ‘नारी केवल तुम श्रद्धा हो’का स्वरूप हैंतो गुप्त जी उसे ‘आंचल में दूध और आंखों में पानी’ को त्याग की मूर्ति के समान स्वीकार करते हैं. जबकि महोदवी वर्मा का कथन है कि ‘नारी का मानसिक विकास पुरुष के मानसिक विकास से अधिक द्रुत गति से विकसित होता है। उसका स्वभाव कोमल और प्रेम,घृणा आदि भाव अधिक तीव्र और स्थाई होते हैं। इन दोनों प्रकृतियों में उतना ही अन्तर हैजितना विद्युत और झड़ी में एक से शक्ति उत्पन्न की जा सकती हैपरन्तु दूसरी से शान्ति मिलती है।
नागार्जुन का उपन्यास-लेखन भारत की आजादी के बाद आरम्भ हुआ है। प्रेमचन्द के बाद भारतीय ग्राम्य जीवन के भाष्यकार के रूप में नागार्जुन का नाम पहले आता है। उनके उपन्यासों का परिवेश मिथिलांचल से सम्बन्धित है। नागार्जुन के नारी-पात्र समाज द्वारा त्रस्त होने पर भी सदैव कर्तव्यरत रहते हैं। पुरुष द्वारा प्रताड़ित ये नारी पात्र अपने हृदय की उदात्तता के कारण भविष्य में स्वयं के उद्धार का मार्ग प्रशस्त कर लेती हैं। ये सभी अपने कर्तव्य निर्वाह करते हुए क्षण भर के लिए भी विचलित नहीं होतींऐसे पात्रों के अन्तर्गत गौरी (रतिनाथ की चाची) शशीकला की मामी (दुःखमोचन) मधुरी (वरुण के बेटे) निर्मला (कुम्भीपाक) और नर्मदेश्वर की भाभी (उग्रतारा) प्रमुख हैं।

‘रतिनाथ की चाची’नागार्जुन का प्रतिष्ठित उपन्यास है. गौरी रतिनाथ की चाची है। गौरी इस उपन्यास की नायिका है। रूप सुन्दरी गौरी दरिद्र और रोगी बैद्यनाथ झा से व्याही गई है। बेटे उमानाथ और बेटी प्रतिभामा को जन्म देकर गौरी विधवा हो गई। विदुर जयनाथ गौरी का देवर है। रतिनाथ जयनाथ का बेटा है। गौरी की इच्छा के विरुद्ध गौरी को देवर से गर्भ रह जाता है। उसकी सहासी माँ गर्भपात से गौरी को मुक्त कराती है। उमानाथ को माँ के पापी कृत्य का पता चलता है। और वह माँ का तिरस्कार करने लगता है। चाची के लिए रतिनाथ ही जीने का सहारा बना। व्रतीसयंमीआत्मनिर्भर चाची ने अपना जीवन तापसी की तरह बिताया। बेटे उमानाथ से तो इतना तिरस्कार पाया कि वह माँ के अंतिम संस्कार के लिए भी नहीं आता।


‘रतिनाथ की चाची’की गौरी का चरित्र भावुकतापूर्ण होते हुए भी संजीदगी से भरा हुआ है। उपन्यास के अंत तक आते-आते चाची के सारे दोषों एवं कलंक का परिमार्जन हो जाता हैअंततः वह दयाकरुणा और पे्रम की मूर्ति ही परिलक्षित होती हैजयनाथरतिनाथ और उमानाथ के प्रति उसका व्यवहार उसकी इन चारित्रिक विशेषताओं का परिचायक है। गौरी के चरित्र में मातृत्व सहिष्णुता का चित्रण अत्यन्त स्वाभाविक रूप में हुआ है। उसकी आखों में छलकते वात्सल्य के तरल रूप को देखकर रतिनाथ का चेहरा खिल उठता है। रतिनाथ द्वारा चाची के प्रति कहे गये ये शब्द- ‘ऐसा लगता है कि दिन व दिन तुम देवता होती चली जा रही हो’ चाची के चरित्र में निहित उदात्तता की ही अभिव्यक्ति है।

‘दुःखमोचन’की शशिकला की मामी की सेवा भावना और त्याग प्रत्येक भारतीय नारी के लिए अनुकरणीय है। वह परिवार के सदस्यों की छोटी सी छोटी आवश्यकताओं का ध्यान रखती है। एवं दुःखमोचन को एक आदर्श माँ का प्यार देती है। गाँव की कन्या-पाठशाला के लिए उसके द्वारा दो हजार रुपये दान देना उसके चरित्र की गरिमा प्रदान करता हैतथा यह उसके चरित्र की उदारता का ही परिचायक है। वरुण के बेटे की माधुरी एक समाज-सेवी नारी के रूप में हमारे समक्ष उपस्थित होती है। जब ग्रामांचल में बाढ़ आती हैतो उस समय उस बाढ़ के कारण वहां का जन-जीवन त्रस्त हो जाता है। इस बाढ़ के कारण जो व्यथित लोग थेउनके लिए वहां शिविर लगाया गया। जिसमें वह मोहन माझी की सहायता कर शिविर का संचालन करती हैइस सम्पूर्ण परिवेश में माधुरी सेवात्याग और परोपकार की साकार प्रतिमा ही दृष्टिगत होती है|

‘नई पौध’की वाचस्पति की माँ की उदात्त भावनाओं को भी नहीं भुलाया जा सकता क्योंकि उसके हृदय में न केवल अपने पुत्र के लिए वरन् उसके सभी मित्रों के लिए अजस्र वात्सल्य का स्रोत बहता रहता है। इसलिए उसका उल्लेख भी यहाँ पर अत्यन्त आवश्यक हो जाता है।

‘उग्रतारा’की नर्मदेश्वर की भाभी तेज ओज की प्रतिमा है। इस नारी के अन्तरंग हृदय में सामाजिक व्यभिचार की शिकार हुई उगनी के प्रति उनका कितना सद्भाव है। यह उसके इस कथन से स्पष्ट हो जाता है- ‘लुच्चे-लफंगे अपना ही मुंह काला करते हैं। हमारा-तुम्हारा मुंह तो शीशे से भी ज्यादा साफ रहेगा। नागार्जुन के ये नारी पात्र उदात्त एवं एक उच्च भावनाओं से ओत-प्रोत हैं। और नागार्जुन की इन नारी पात्रों के प्रति असीम करुणा दिखाई देती है।

 संदर्भ सूची

 1.नागार्जुन: रतिनाथ की चाची, पृष्ठ 150
 2.नागार्जुन: रतिनाथ की चाची, पृष्ठ 96
 3.नागार्जुन: उग्रतारा, पृष्ठ42

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हिंदी साहित्य में आदिवासी स्त्री का सवाल

अ‍जय कुमार यादव

पीएच.डी. हिंदी (शोधरत )
जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय
दिल्ली
संपर्कःajjujnu@gmail.com

जब आदिवासी समाज में स्त्रियों की बात होती है तो ऐसा माना जाता है कि आदिवासी स्त्रियाँ अन्य समाज की तुलना में अधिक स्वतंत्र होती हैं लेकिन बिटिया मुर्मू ने लिखा है कि- “भारत की संस्कृति में महिलाओं की जो स्थिति है, आदिवासी संस्कृति में महिलाओं की स्थिति उससे बहुत भिन्न नहीं है। आम धारणा है कि आदिवासी महिलाएँ अधिकार संपन्न तथा बराबर की हकदार हैं, किन्तु ऐसी बात नहीं है।”1 अर्थात् वस्तु स्थिति कुछ और ही है। दरअसल आदिवासी समाज सामूहिकता और समानता में विश्वास रखता है। अंग्रेजों  के आगमन से पूर्व आदिवासी समाज में स्त्रियाँ सभ्य और सुसंस्कृत कहे जाने वाले समाज से ज्यादा स्वतंत्र होती थीं । लेकिन अंग्रेजों के आने के पश्चात् धीरे-धीरे उस सामूहिकता का टूटन हुआ। उस सामूहिकता के टूटन में पितृसत्तात्मक व्यवस्था मजबूत हुई। पितृसत्तात्मक व्यवस्था को और भी मजबूत करने का वैधानीकरण अंग्रेजों  ने राजस्व की नीति लागू कर के कर दिया। अंग्रेजों के पहले आदिवासी समाज में सम्पत्ति नाम की कोई अवधारणा नहीं थी। लेकिन “कालान्तर में जब अंग्रेजों  ने राजस्व की नई नीति बनाई और जमीन के पट्टे जमींदारों के नाम लिखे, समस्या तब पैदा हुई। अब चूँकि जमीन पुरुषों के नाम से लिखी गई,  तो उसमें किसी भी आदिवासी मुखिया या मांझी-हाड़ाम या प्रधान ने औरतों के नाम खाते में यह कहकर नहीं चढ़ने दिए कि ये तो दूसरे के घर चली जाएगी।”2 पितृसत्तात्मक व्यवस्था के ठेकेदारों ने अपने इस तर्क को मजबूत बनाने के लिए इसका मिथकीकरण किया और अब संताल आदिवासी समाज की मान्यता है कि “उनके पूर्वजों की प्रेतात्माओं को अपने उत्तराधिकारियों से अन्न जल मिलता है, लड़की पराया धन है, वह जब शादी के बाद चली जाएगी तो उन्हें अन्न-जल कौन देगा? इसलिए पुरुषों को ही उत्तराधिकारी बनाया गया ताकि उन प्रेतात्माओं को हमेशा अन्न-जल मिलता रहे।”3

रमणिका गुप्ता ने लिखा है कि- “जब गैर आदिवासी समाज आदिवासी क्षेत्र में जमीनों के पट्टे लिखाकर और सूदखोर बनकर प्रवेश करने लगा तब से जमीनें और जंगल गैर आदिवासियों के पास हस्तांतरित होने शुरू हुए, विशेषतया झारखंड, छत्तीसगढ़ क्षेत्रों में। तब से दूसरे समाज की सारी विकृतियाँ इस समाज में प्रवेश करने लगीं और सामूहिक प्रवृत्ति की जगह वर्चस्ववादी प्रवृत्ति की शुरूआत।”4

भूमंडलीकरण और उपभोक्तावादी संस्कृति से गहरे स्तर पर प्रभावित होते आदिवासी समाज में भी उन विकृतियों को जगह मिली और अन्य समाजों की तरह वहाँ भी स्त्री एक ‘वस्तु’ के रूप में परिवर्तित होने लगी। पितृसत्ता ने वहाँ भी अपनी कद काठी मजबूत कर ली। कुछ जगहों पर आज भी मातृसत्तात्मक व्यवस्थाएँ हैं लेकिन वह भी ‘रबर स्टाम्प’ की ही तरह काम करती हैं। “ऐसे में कई जनजातियों में आज भी मातृसत्ता जारी है लेकिन अधिकांशतः जनजातियाँ पितृप्रधान समाज को ही मानती हैं,  जहाँ मातृप्रधान सत्ता है, वहाँ भी गोत्र भले माँ के नाम से चलता है और कहीं कहीं सम्पत्ति की अधिकारी भी पुत्री होती है, इसके बावजूद उस समाज में भी पिता या मामा ही अधिक महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। बात पुरुष की ही चलती है।”5 इस पितृसत्तात्मक व्यवस्था को बनाए रखने के लिए संविधान ने भी अपनी संतुष्टि दे दी है। अंग्रेजों  ने संथाली प्रधागत कानून को वैध ठहराते हुए संताली औरतों को जमीन पर अधिकार से वंचित कर दिया, आज जबकि आजादी के इतने साल बाद भी भारतीय संविधान में कितने संशोधन हुए, संथाली प्रथागत कानून में कोई बदलाव नहीं हुआ। इस वैज्ञानिक और तर्कसंगत समय में जब कई समुदाय विकास की नई ऊँचाइयाँ छू रहे हैं, संथाली समाज पूरी तरह से इस प्रथागत कानून में बँधा हुआ है जिसका सर्वाधिक नुकसान आदिवासी औरतों को हो रहा है।

आदिवासी समाज में भी स्त्रियों का शोषण करने के लिए विभिन्न तरह के तर्क पितृसत्तात्मक व्यवस्था ने बनाए हैं । समाज ने स्त्रियों को कुछ काम करने से मना किया, उसके लिए पुरुष समाज ने यह तर्क दिया है कि शारीरिक बनावट के आधार पर यह विभाजन किया गया है। लेकिन ऐसा नहीं की आदिवासी समाज में पितृसत्ता को बनाए रखने के लिए यह तर्क दिया गया है। यह एक तरह से स्त्रियों के ऊपर अधिकार जताने जैसा ही है। आदिवासी समाज में स्त्रियों को हल चलाना, घर का छप्पर छाना और धनुष चलाना वर्जित है। इन चीजों पर अगर हम गौर करेंगे तो पाएँगे कि यह चीजें जमीन और सम्पत्ति की प्रतीक है और यह वर्जनाएँ इस बात का द्योतक हैं कि सम्पत्ति पर पुरुषों का ही अधिकार रहे। निर्मला पुतुल ने ‘सजोनी किस्कू’ नामक एक आदिवासी महिला को लेकर एक कविता लिखा है-
“बस! बस!! रहने दो।
कुछ मत कहो सजोनी किस्कू
मैं जानती हूँ सब
जानती हूँ कि अपने गाँव बागजोरी की धरती पर
जब तुमने चलाया था हल
तब डोल उठा था
बस्ती के माँझी-थान में बैठ देवता का सिंहासन
गिर गई थी पुश्तैनी प्रधानी कुर्सी पर बैठ
मगजहीन माँझी ‘हाड़ाम’ की पगड़ी
पता है बस्ती की नाक बचाने खातिर
तब बैल बनाकर हल में जोता था
जालिमों ने तुम्हें
खूँटे में बाँधकर खिलाया था भूसा।”6

निर्मला पुतुल की इस कविता में एक आदिवासी स्त्री की नियति का अंदाजा हमें आसानी से लग जाता है। संताली समाज ने सजोनी किस्कू को हल चलाने की सजा उसे खूँटे में बाँधकर भूसा खाने की दी थी, लेकिन वहीं संताली पुरुष यह भूल गए कि संताली विद्रोह के समय स्त्रियों ने ही हल जोतने से लेकर फसल काटने तक के सारे काम किए थे। इससे यही निष्कर्ष निकलता है कि पितृसत्तात्मक समाज ने सारे नियम अपने हितों के लिए बनाए हैं, जब मन करता है तो तोड़ देता है, जब मन करता है तो उसे लागू कर देता है। बिटिया मुर्मू इस प्रथागत कानून के विरूद्ध आवाज उठाती हैं
“आदिवासी समाज की स्त्रियों को उनके प्रथागत कानूनों के आधार पर संपत्ति के अधिकार से वंचित रहने देना सरासर अन्याय है। हो सकता है कि कानून परिवर्तन से सम्बन्धों में कुछ खटास पैदा हो या विरोध हो लेकिन यह भी सत्य है कि जब भी बुनियादी ढाँचे में परिवर्तन हुआ या दबे कुचले लोगों को अधिकार मिला तो समकालीन जड़ समाज अपना आतंक फैलाता है पर सकारात्मक परिवर्तन के लिए समाज व कल्याणकारी सरकार को डटकर मुकाबला करना ही होगा।”7

संपत्ति के अधिकार से वंचित रखने का एक और तर्क जो आदिवासी पुरुष सत्ता द्वारा दिया गया कि स्त्रियों का विवाह गैर-आदिवासी से हो जाएगा तो वह जमीन गैर-आदिवासी की हो जाएगी। लेकिन यह तर्क मजबूत तर्क नहीं है। रमणिका गुप्ता ने इस तर्क के बारे में लिखा है कि- “आदिवासियों की जमीन दारू के बदले पुरुष समाज ही गैर आदिवासियों को हस्तान्तरित कर देते आया है। इसलिए उनका यह तर्क कि स्त्री को सम्पत्ति में हक मिल जाने से स्त्रियों द्वारा गैर-आदिवासियों के साथ विवाह करने पर जमीन का हस्तांतरण हो जाएगा गलत है। इस तर्क की काट तो कानून में छोटा सा संशोधन- कि स्त्री द्वारा गैर-आदिवासी से शादी करने के बाद जमीन की हकदार आदिवासी स्त्री और उसके बच्चे ही होंगे उसका पति नहीं, ला कर की जा सकती है।”30 रमणिका गुप्ता का यह सुझाव सही लगता है, पर पितृसत्तात्मक व्यवस्था को यह हजम नहीं होगा, इसलिए यह बात पूर्णतया सिद्ध हो जाती है कि आदिवासी समाज में भी पितृसत्ता का बोलबाला है।

आदिवासी समाज ने स्त्रियों को उतने ही अधिकार दिए हैं जितने से उसके हितों का हनन न हो। पूर्वोत्तर राज्यों में आदिवासी समुदाय की स्त्री की हालत थोड़ी ठीक है। मेघालय का राज्य मातृ प्रधान सत्ता को मानता है। वहाँ खासी समाज में सम्पत्ति पर बेटियों का अधिकार होता है। बोडो  समाज में बेटियों को अधिकार मिले हुए हैं। इसी तरह से मिजो समाज में भी वंश माँ के गोत्र से ही चलता है, इतना ही नहीं “मिजोरम में स्त्री भी हल चलाती है।”8“असम के कार्बी समाज में स्त्रियों के श्राद्ध का रस्म का पूरा संचालन औरतों के हाथ में ही होता है।”9
झारखंड में आदिवासी समाज में ‘पौन प्रथा’ प्रचलन में है जिसमें पुरुष को ही वधू के लिए कन्या शुल्क देना पड़ता है, तभी उसकी शादी हो सकती है। उपरोक्त तथ्यों से यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि आदिवासियों ने अपनी स्त्रियों को कुछ अधिकार तो दिए हैं जो सामान्यतः तथाकथित मुख्यधारा वाले समाज ने अपनी स्त्रियों को नहीं दिए हैं लेकिन इससे यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि आदिवासी समाज में स्त्रियों का शोषण नहीं होता। यहाँ शोषण के स्तर भिन्न हो सकते हैं।

आदिवासी महिलाएँ बहुत मेहनती और संघर्षशील होती हैं जिसका फायदा अन्य समाज के लोग उठाते हैं। आदिवासी समाज एनजीओ संस्थाओं के लिए वरदान की तरह है। आदिवासी इलाकों में एनजीओ सामाजिक विकास के नाम पर कुकुरमुत्ते की तरह फैले हैं। वहाँ उन केंद्रों पर आदिवासी महिलाओं को काम पर रखते हैं और उनका शोषण करते हैं। “आदिवासी बहुल इलाकों में फील्डवर्कर के रूप में लगभग 70 प्रतिशत कार्यकर्ता आदिवासी महिलाओं को बनाते हैं, बाकी 30 प्रतिशत गैर-आदिवासी स्त्री-पुरुष कार्यकर्ता है।”10 जो एनजीओ समाज को शोषण से मुक्ति दिलाने की बात करते हैं,  वहीं दूसरी तरफ खुद अपने कार्यकर्ताओं का शोषण करते हैं और यह शोषण केवल मानसिक स्तर पर नहीं होता बल्कि शारीरिक स्तर पर भी होता है। विडम्बनापूर्ण स्थिति यह है कि उन महिलाओं की कहीं सुनवाई भी नहीं होती। आदिवासी स्त्रियों को उनके पति ग्राम-प्रधानों से पैसे लेकर बेच देते हैं और ग्राम प्रधान इन्हें शहरों में भेज देता है। निर्मला पुतुल ने इस प्रकार की एक स्त्री की नियति पर एक कविता लिखी है-
“कैसा बिकाऊ है तुम्हारी बस्ती का प्रधान
जो सिर्फ एक बोतल विदेशी दारू में रख देता है
पूरे गाँव को गिरवी
और ले जाता है कोई लकड़ियों का गट्ठर की तरह
लादकर अपनी गाड़ियों में तुम्हारी बेटियों को
हजार पाँच सौ हथेलियों पर रखकर
पिछले साल
धनकटनी में खाली पेट बंगाल गयी पड़ोस की बुधनी
किसका पेट सजाकर लौटी है गाँव?”10
इसी तरह गैर-आदिवासी पुरुष भी भोली-भाली आदिवासी स्त्रियों को शादी का झाँसा देकर देह शोषण करते हैं। फिर भाग जाते हैं।  आदिवासी स्त्रियों की यह हालत उनके अशिक्षित होने के नाते भी होता है। 2011 की जनगणना के अनुसार झारखंड में पुरुषों के मुकाबले स्त्रियों की साक्षरता दर लगभग 22% से कम है, जो अत्यन्त निराशाजनक है। आदिवासी स्त्रियों की इस हालत को शिक्षा के माध्यम से उनके अन्दर चेतना जगा कर सुधारा जा सकता है। हालाँकि आदिवासी स्त्री अन्याय के प्रति सदियों से जूझती आ रही है और आज भी लड़ रही है। आदिवासी स्त्रियाँ अपनी व्यथा अब खुद बयान करने लगी हैं। अब तक जो अनकहा था वह अब कहा जा रहा है। जरूरत है एक संगठित आवाज की जो समाज में क्रान्तिकारी बदलाव की पृष्ठभूमि तैयार करे और इसमें सरकार और विकास कार्यों की भूमिका भी महती होगी।

सन्दर्भ
1     पृ. 90, संपा. रमणिका गुप्ता: ‘युद्धरत आम आदमी’, पूर्णांक 80, दिसम्बर-2005
2. पृ. 94, वही
3. पृ. 57, सपा. सुधीर सुमन: ‘समकालीन जनमत’, अंक 2-3, वर्ष 22, सितंबर-2003
4 पृ. 64, श्याम चरण दुबे: ‘समय और संस्कृति’
5 पृ. 94, सपा. रमणिका गुप्ता- ‘युद्धरत आम आदमी’, पूर्णांक 80, दिसंबर-2005
6 पृ. 72, सपा. रमणिका गुप्ता- ‘युद्धरत आम आदमी’, पूर्णांक 55, 2001
7 पृ. 95, वही
8. पृ. 96, वही
9. पृ. 95, वही
10 पृ. 96, वही
11 पृ. 80, सपा. सुधीर सुमन: ‘समकालीन जनमत’, अंक 2-3, वर्ष 22, सितंबर-2003
12. संपादकीय से, संपा. रमणिका गुप्ता: ‘युद्धरत आम आदमी पूर्णांक 55, 2001

मिस यूनिवर्स बनेगी डा.अंबेडकर को आदर्श मानने वाली रोशमिता

29 जनवरी को फिलीपिंस के मनीला में आयोजित मिस यूनिवर्स कॉन्टेस्ट में भारत का प्रतिनधित्व करने वाली रोशमिता हरिमूर्ती बाबासाहेब डा.भीमराव आंबेडकर को अपना रोल माडल मानती हैं. 22 साल की रोशमिता बाबा साहब को इन शब्दों में अपना रोल मॉडल बताती हैं, ‘ मेरे रोल मॉडल सामाजिक न्याय के नेता और भारत के संविधान के प्रणेता डा. बी आर अंबेडकर हैं. यह वे हैं, जिनके कारण पिछड़ा समुदाय, जिससे मैं भी आती हूँ, राष्ट्रीय आख्यानों में अपनी जगह बना रही है. उन्होंने कहा था कि आप किसी भी समुदाय की उन्नति को उसकी महिलाओं  की प्रगति के पैमाने से माप सकते हैं.’

बेंगलुरु की रोशमिता ने 15 लड़कियों के बीच इस प्रतिस्पर्धा में हिस्सा लेने के लिए जीत हासिल की। रोशमिता अभी इंटरनेशनल बिजनेस की पढ़ाई कर रही हैं। उन्हें भरोसा है कि आपका वोट उन्हें इस प्रतियोगिता में भारत का परचम लहराने का मौका उपलब्ध कराएगा।

रोशमिता बताती हैं, ‘मैं  अपने दादा दादी के साथ ज्वाइंट परिवार में रहती हूं।  क्योंकि मैं अपने परिवार में पहली संतान थी इसलिए मेरी परवरिश मेरे परिवारवालों ने बहुत ही अच्छे तरीके से की है। तब तक सबकुछ ठीक था जब मैने अपने दादाजी को डायबिटीज से खो नहीं दिया। अगर उन्हें सही समय पर चिकित्सा मिल जाती तो शायद वह ठीक हो जाते। उनके गुजरने के बाद मैंने और मेरे डॉक्टर पिता ने डिसाइड किया कि हम एक ऐसे अस्पताल का निर्माण करेंगे जिसमें लोगों को तुरंत और आसानी से चिकित्सा उपलब्ध हो सके।’

इन्हें जीत के लिए आपके वोट की जरूरत है। फिलीपींस में चल रहे इस मुकाबले में जीत के लिए आप अपना वोट इस लिंक पर जाकर कर सकते हैं। वोटिंग के लिए दो दिन का समय बाकी है। जल्दी कीजिए और विदेश में भारत का परचम लहराने का मौका मत गंवाइये।

वर्ष 2000 में लारा दत्‍ता को मिस यूनिवर्स का ताज मिला था। इसके बाद भारत के किसी प्रतिभागी को यह ताज नहीं मिला है। 2016 का मिस इंडिया खिताब जीतने के बाद  रोशमिताने इस बार भारत की ओर से उम्मीद जगा दी है.  वह बेंगलुरू के माउंट कार्मेल कॉलेज की छात्रा रही हैं।

रोशमिता को वोट करने के लिए आपको  इस लिंक पर जाकर रोशमिता हरिमूर्ति को सर्च करना है। इसके बाद उनके नाम के आगे मानइन 0 प्लस लिखा नजर आएगा। आपको प्लस पर क्लिक करना है। आप दस बार तक प्लस पर क्लिक कर सकते हैं। इसके बाद ऊपर जाकर आपको Cast Your Vote पर क्लिक करना है। आपका वोट रोशमिता को मिल जायेगा।