इस राष्ट्रवाद की भाषा में स्त्रियाँ ‘ रंडी’, ‘रखैल’ और बलात्कार से ठीक की जाने वाली बिगडैलें हैं

संजीव चंदन

भारतीय जनता पार्टी देश भर में ‘ राष्ट्रभक्ति’ का जोश भरने के लिए आंदोलन करने जा रही है. जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (जे एन यू ) प्रकरण में दुनिया भर में अपना ही उपहास बनाने वाली सरकार अब भले ही कन्हैया कुमार की रिहाई के साथ डैमेज कंट्रोल में लगी है , लेकिन उसकी पार्टी आक्रामक हिंदुत्व से भी आगे जाकर आक्रामक राष्ट्रवाद की रणनीति को अमली जामा पहनाने वाली है . निश्चित तौर पर देश भर के उसके अभियान में उसके स्त्री कार्यकर्ताओं की बढ़ –चढ़ कर भागीदारी होगी . मानव संसाधन विकामंत्री स्मृति इरानी खुद राष्ट्रवाद के इस आक्रामक अभियान को संरक्षण और तर्क दे रही हैं .

राष्ट्रवादियों के द्वारा दी जा रही गालियाँ 

लेकिन स्त्रियों, जरा ठहरो जिस राष्ट्रवाद की ‘यज्ञ –बेदी’ बनाने में आपका सक्रिय सहयोग लिया जा रहा है, उसका लक्ष्य पूरा होने के बाद आपकी क्या हैसियत होगी उसे सोचा है आपने ! यदि नहीं तो भी और यदि यह सोचती होंगी कि आपको ‘देवी’ जैसी कोई गरिमा और सम्मान दिया जायेगा तो भी,  ज़रा ठहरकर सोचो. कुछ बानगियाँ देख लेते हैं , इस राष्ट्रवाद के भीतर तुम्हारी ‘ अवस्थिति’ की. 


राष्ट्रवादियों के द्वारा दी जा रही गालियाँ 

आज भारत माँ के इमेज को ही सारे ज्ञान, सारी संवेदनाओं पर वरीयता मिल गई है, जिसकी आड़ में कोई भी गुंडा , हुल्लड़बाज या तो हाथ में तिरंगा लिए हुए या फिर अपने फेसबुक बुक ट्विटर प्रोफाइल को तीन कलर का रंग दिये हुए सारी बौद्धिकता और सारी संवेदनशीलता पर हावी हुआ जा रहा है, ज्ञान केन्द्रों के लिए खतरा बना हुआ है , न्याय के संस्थानों और ढांचों के लिए खतरा बना हुआ है .

भारत ‘ मां’ का इमेज स्त्रियों से अनिवार्य रूप से जुड़ा है, क्योंकि वह मां है , वह स्त्री है – इसके लिए वाल्मीकि रामायण के जमाने से या उसके पहले से ही ‘ जननि जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरियसी’ की भावनाएं व्यक्त की जाती रही हैं.  श्री अरविंद की देवी ‘भारत मां’ है और बंकिम चन्द्र चटर्जी की आराध्या भी भारत माँ है , जिसके लिए वे वंदे मातरम् गीत रचते हैं . स्वंत्रता आन्दोलन के दौरान भारत मां का यह इमेज देश की आजादी की चाह रखने वालों , उपनिवेशवाद के खिलाफ लड़ने वालों के लिए उद्दीपक का काम करता था. मां चूकी स्त्री है , इसलिए उसके अपमान की भाषा उसकी इज्जत से जा जुडती है और स्त्रियों के इज्जत का सन्दर्भ उसकी यौनिकता से . यही कारण रहा है कि भारत की दुर्दशा की सबसे पावरफुल इमेजरी बनती है ‘बलात्कार की भाषा में.’ पश्चिम से पढ़े –लिखे जवाहर लाल नेहरू हों या समुद्र न लांघने वाले स्वतंत्रता आन्दोलन के दूसरे दीवाने, अपने भाषणों में ‘ भारत माँ’ के बलात्कार और इस तरह उसकी संतानों के अपमान के इमेजरी का खूब इस्तेमाल किया जाता था. आजादी के दीवानों के लिए भारत या तो मां थी या प्रेमिका – ‘मदर इंडिया’ की नरगिस (मां ) और ‘क्रान्ति’ की हेमामालिनी( प्रेमिका) भारतवासियों ,आजादी के दीवानों ( स्पष्ट है कि अधिकांश मामलों में वह पुरुष है – सुनील दत्त, राजेन्द्र कुमार या मनोज कुमार है ) के प्रिय रूपक हैं , उद्दीपक हैं देश भक्ति के लिए .
राष्ट्रवादियों के द्वारा दी जा रही गालियाँ 


यहाँ तक तो सुकून है स्त्रियों के लिए दोयम ही सही , पुरुष के बाद ही सही , उससे संरक्षित होकर ही सही, उसका अस्तित्व है – जिसका भाव देवी का भी हो सकता है , प्रेयसी का भी या धोखेबाज फितरत वाली नायिका –खलनायिका का भी. सुविधाअनुसार नार्यस्तु यत्र पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता या फिर सुविधा अनुसार पुरुषस्य भाग्यम , त्रिया चरित्रं दैवो न जानाति कुतो मनुष्यः.

लेकिन ठहरिये ,  आज के राष्ट्रवादी अभियान में अपने लिए नियत की जा रही भूमिका को भी देखिये. तिरंगा झंडा लिए न्यायालय परिसर में हंगामा करने वाले वकीलों से लेकर सोशल मीडिया में सक्रिय राष्ट्रवादी सेनानियों पर गौर करिये. वे सब आपको ठीक करने में लगे हैं . लोकतंत्र के सामान्य उसूलों समता , बंधुत्व की बात करने वाले लोगों,  न्याय की चाहना रखने वाले लोगों के लिए ये राष्ट्रवादी सेनानी उनकी माँ, बहनों के बलात्कार से अपनी राष्ट्रभक्ति सिद्ध करना चाहते हैं.

राष्ट्रवादियों के द्वारा दी जा रही गालियाँ 
राष्ट्र के लिए उनकी परिकल्पना से अलग सोच रखने वाले लोगों, खासकर स्त्रियों के लिए उनकी भाषा के नमूने हैं , ‘ रंडी , रखैल , या बलात्कार करके ठीक कर देना, गैंग रेप का शिकार बना देना आदि. ये आक्रामक राष्ट्रवादी सेनानी क्या तालिबानियों या इस्लामिक स्टेट के वीर बांकुरों से तनिक भी अलग हैं , जो अपनी स्त्रियों को धार्मिक और राष्ट्रवादी बनाने के लिए अपने पौरुष का इस्तेमाल कर रहे हैं , उन्हें बलात्कार या सामूहिक बलात्कार का शिकार बना रहे हैं. यह भाषा और यह सोच राष्ट्रवाद के किस रूप में अनूदित होती है , उससे क्या इमेजरी बनती है . यह इमेजरी है – राष्ट्र का ‘ पितृभूमि , पुण्यभूमि में तब्दील हो जाना , जहां स्त्रियाँ शिक्षा के अधिकार से वंचित होंगी , जहां उनकी भूमिका पुरुष संरक्षित पत्नी, पुत्री , मां तक सीमित होगी, जहां उनकी भूमिका अच्छी गृहिणी, देवदासी या गणिका की होगी. और यदि वे अपने अधिकारों के लिए आवाज बनाती हैं तो उनके खिलाफ, उन्हें ठीक करने के लिए पुरुष का बंदूक और लिंग एक साथ सक्रिय होंगे . इस  तथ्य को समझने के लिए सोशल मीडिया में सक्रिय समतावादी स्त्रियों के लिए राष्ट्रवादी सेनानियों की उग्र स्त्रीविरोधी भाषा की बानगियाँ देखें या उस भाषा की बानगियाँ भी जो समतावादी पुरुषों की मां, बहनों के लिए दी जाती हैं. राष्ट्रवाद के इन सेनानियों के राष्ट्र का आदर्श होंगे – ‘चातुर्वर्ण मया सृष्टं गुण कर्म विभागशः’ , और स्त्री को यौनदासी के रूप में मिलने वाला मान सम्मान , दुलार या फटकार.

तय आपको करना है कि आप इस आक्रामक राष्ट्रवाद का हिस्सा बनेंगी , जहां आपसे ज्यादा ‘ गौ माता’ सुरक्षित है , या उस राष्ट्र का जो समता, स्वतन्त्रता में यकीन रखता है . जिन लड़के –लड़कियों को ये राष्ट्रवादी जेलों में ठूस देना चाहते हैं , वे लड़के नारे जरूर लगा रहे थे , आजादी के नारे लगा रहे थे, लेकिन वे नारे थे , पितृसत्ता से आजादी के , जातिवाद से आजादी के , सामंतवाद से आजादी के. आजादी के इन दीवानों की कब्र पर ज्ञान और सोच –विचार के संस्थानों को नालंदा विश्वविद्यालय का हस्र देकर राष्ट्रवाद के ये सेनानी जिस राष्ट्र को गढ़ना चाहते हैं , वहां आप अपने लिए थोड़ा सा भी हक़ मांगेंगी तो वे आपको ठीक करने के लिए सामूहिक बलात्कार की सजा का इजाद कर चुके है. उनके राष्ट्र में स्त्रियाँ ‘ रंडियां , रखैलें या फिर बलात्कार से ठीक की जाने वाली बिगडैलें होंगी. 

आज़ादी के नारे लगाते विद्यार्थियों और जे एन यू स्टूडेंट असोसिएशन के अध्यक्ष कन्हैया कुमार का वीडियो लिंक

नोट : ‘रंडी’ और ‘ रखैल’ शब्दावली से लेखक का कोई इत्तेफाक नहीं है. यह शब्दावली  स्त्री यौनिकता पर पुरुष नियंत्रण की शब्दावली है . इस लेख में इसका इस्तेमाल सांस्कृतिक ( आक्रामक ) राष्ट्रवादियों की मनोवृत्ति और उनकी भाषा को स्पष्ट करने के लिए उनकी ही भाषा से लेकर किया गया है, ताकि स्त्रियाँ इस राष्ट्रवाद के भीतर अपनी नियत स्थिति को देख सकें . 

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