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अमृत महोत्सव वर्ष में एक आदिवासी गांव की अंतर्व्यथा

आजादी के 75 साल बाद भी मूलभूत सुविधाओं से कोसो दूर है रुंघूडेरा

सिमडेगा जिले से करीब 40 किमी दूर केरसई प्रखंड स्थित है। वहाँ से करीब 25 किमी दूर रुंघुडेरा गाँव है जो केरसई प्रखंड अंतर्गत ही आता है। चारों ओर से जंगल- पहाड़ और पथरीली भूमियों से घिरा यह गाँव प्राकृतिक दृष्टिकोण को से तो संपन्न है लेकिन मूलभूत सुविधाओं को देख लगता है मानो यह गाँव भारत के नक्शा में आता ही नहीं।

करीब 300 जनसंख्या वाले इस गाँव में पहुंचने के लिए अभी भी आपको पथरीली पगडंडियों और उबड़- खाबड़ वाले रास्ता से ही गुजरना पड़ेगा वह भी करीब 10 किमी। सरकारी जन महत्वाकांक्षी योजना कहें या नेताओं का भूलभुलैया वाला वाला भाषण दोनों यहाँ नगण्य रूप से ही पहुँच पाता है। अब तो गाँव वाले सरकारी योजनाओं को महत्व भी देना बंद कर दिये हैं और कहते हैं आश्वसन और भरोसा से तो अच्छा हमारा जंगल – पहाड़ है जो कभी झुट नहीं बोलता।सरकारी अफसर गाँव विजिट के लिए निकलते हैं तो गाँव पहुँच से 10 किमी दूर से ही मुँह मोड़ लेते हैं यह हम नहीं कह रहे गाँव वालों का कहना है।

अगर किसी महिला का प्रसव कराना हो यह बीमारी का इलाज, सब गाँव के दाई और वैध-विद्या पर ही निर्भर हैं। चाहे इसे अंधभक्ति कहें या अंधविश्वास लेकिन हकीकत यही है। शहर तक पहुँच का रास्ता खराब होने के कारण अस्पताल का ख्याल ही नहीं आता इन लोगों को। कुछ महीने पहले ही गाँव में भीषण व्रजपात हुआ था इलाज के नाम पर उन्हें गाय के गोबर में गाड़ दिया गया था जहाँ दो महिलाओं की मृत्यु हो गई थी। लोग दोष किसी को लगाने भी छोड़ दिये है पूछने पर ‘कहते हैं होनी को कौन टाल सकता है!’ लेकिन शायद कुछ मूलभूत सुविधा देश के होने के नाते मिल जाता तो कई जानें बचाई जा सकती है यह सच्चाई है।

विकास के नाम पर इस गाँव में मात्र एक प्राथमिक विद्यालय है वह भी खंडहर। छत टूट- टूट कर गिर रहा है बरसात के दिनों में पानी रिसता है। जान जोखिम में डाल बच्चे अपनी पांचवी तक की कक्षा मात्र एक पारा शिक्षक के सहारे पुरा करते हैं। 5वीं से 8वीं तक के लिए करीब 8 किमी दूर सफर कर मकरघरा आते हैं। अगर इससे भी आगे कोई आगे पढ़ना चाहे तो करीब 15 किमी पथरीले पगडंडी का सामना करना पड़ता है तब तक हिम्मत टूट जाती है और बच्चे पढ़ाई छोड़ रोजगार के लिए महानगरों की ओर पलायन कर जाते हैं। गाँव में आज तक बिजली नहीं पहुंची है।लालटेन और डिबरी से आगे बढ़कर और टॉर्च जरूर हो गए हैं। अपने पैसे से खरीदे गए सोलर पैनल और छोटे बैटरी के सहारे मुश्किल से तीन घंटा रोशनी में रहते हैं फिर वही अंधेरी रात। रात में बच्चे पढ़ाई के लिए उठें यह कल्पना भी नहीं किया जा सकता।

जंगलों के बीच होने के कारण हाथियों और जंगली जानवरों का प्रकोप अलग ही समस्या है। खेतीबारी के दिनों में आजकल गाँव के युवा- बुजुर्ग हाथियों के डर से रातजागा करने को मजबूर हैं। गाँव के ही हीराधार मांझी कहते हैं जंगल विभाग वाले कुछ दिन पहले कुछ पुलिस फोर्स के साथ आये थे पूछे और चले गए। गाँव में कुछ सुविधा नहीं है। अब तो हाथियों के डर से लोग खेती करना भी छोड़ने लगे हैं।

गाँव के ही एक बुजुर्ग महिला नाम न लिखने की शर्त पर कहते हैं पानी पीने के लिए अभी भी हमलोग डोभा और चुआँ पर ही निर्भर हैं। करीब 200 मीटर दूर से सिर और टिंग भार में पानी भर कर पानी लाना पड़ता है। गर्मी के दिनों में समस्या और गंभीर हो जाती है। जब डोभा और चुआँ सुख जाता है तो एक सार्वजनिक तालाब को श्रमदान से चुआँ खोदते है वहाँ का पानी को ओन्जरा में निकाल- निकाल पीने और खाना बनाने के लिए ले जाते हैं। गंदा पानी पीने से बिमारी होती है कहने पर कहते हैं- “नी पी के मरेक से अच्छा तो पी के मेरक बेस आहे।”

गाँव में मनोरंजन के लिए कोई सुविधा नहीं है ऐसे में गाँव के ही लोग श्रमदान कर गोंडवाना की महारानी दुर्गावती के नाम पर एक खेल मैदान का निर्माण किये हैं जहाँ गाँव के बच्चे हॉकी खेलते हैं। कुछ महीने पहले गोंडवाना वेलफेयर सोसाइटी नामक सामाजिक संस्था बच्चों के पढाई के लिए एक रात्रि पाठशाला शुरू किया था लेकिन बिजली और नेटवर्क की असुविधा के कारण वह भी बंद हो गया।

आज भले ही देश आजादी का अमृत महोत्सव मना रहा हो लेकिन इस गाँव के लिए आजादी का परिभाषा ही अलग है। गाँव के लोग अभी भी अपने घरों में धार्मिक झंडा से कहीं अधिक तिरंगा झंडा लगाए हुए हैं। जाने- अनजाने में ही सही लेकिन लेकिन देशभक्ति से प्रेरित इस गाँव के लिए पता नहीं मसीहा कौन होगा!

जगजीवनराम के बारे में कई भ्रांतियां तोड़ती है यह किताब

कर्मेन्दु शिशिर

बाबू जगजीवन राम जी की जो जीवनी इसके लेखक ई. राजेंद्र प्रसाद जी ने भेंट की है यह सातवाँ संस्करण है।जगजीवन बाबू को लेकर सामान्य वर्ग में भले ही उदासीनता हो मगर उनका एक विशाल पाठक वर्ग तो अब आ चुका है।हमने तो ऐसा समाज बनाया है कि हम दिवंगत व्यक्तित्वों को भी उसी संकीर्ण नजरिये से देखते हैं। वे सब जो सार्वजनिक थे, हम सबके पूर्वज नहीं होते, हमें अपने-अपने पूर्वजों को मौजूदा जाति से चयन करना पड़ता है। इससे हमें वर्त्तमान में स्वार्थ सिद्ध करना आसान होता है।

बहरहाल! बाबू जगजीवन राम पर संभवत: पहली बार नलिन विलोचन शर्मा ने अंग्रेजी में उनकी जीवनी लिखी।उस और कुछ अन्य, जो जीवनियाँ छपी हैं उनमें उन सवालों से कोई संवाद नहीं है जो उनको लेकर लोग राह चलते उठाते हैं। राजेन्द्र जी की यह पुस्तक इस दृष्टि से एक संपूर्ण और समग्र जीवनी है।ये भारतीय राजनीति के उस दौर के बीच रखकर उनकी भूमिका को इस तरह रखती है कि उनका महत्व समझ में आता है।हम उनके महत्व को नये परिप्रेक्ष्य में देखते हैं।

बाबा साहेब आंबेडकर और बाबू जगजीवन राम के व्यक्तित्व में भारी अंतर है। लेकिन दोनों की परिस्थितियों को लेकर हम देखें तो जातिगत उपेक्षा और प्रताड़ना जरूर दोनों को सहनी पड़ी। मगर लेखक ने यह बताया है कि बाबू जगजीवन राम के लिए परिस्थितियाँ ज्यादा विपरीत थी।

पूना पैक्ट का प्रसंग हो या कांग्रेस के लिए जरूरी कोई दलित चेहरा। बाबूजी को अपने अंदर और आचरण के अंतर्संघर्ष को किस विवशता से झेलना पड़ा या न चाहते हुए भी स्वीकार करना पडा, यह सब लेखक ने बड़ी बारीकी से लिखा है। एक तो इतनी मूल स्रोत सामग्री को जुटाने का कठिन श्रम ही देखकर आश्चर्य होता है।एक-एक कण जुटा कर यह पुस्तक तैयार की है। उन पर आयी श्रद्धांजलियाँ तक।

जो लोग बाबूजी को अवसरवादी और सत्तावादी कहकर उनके योगदान को रिड्यूस कर देते हैं उनको यह किताब जरूर पढ़नी चाहिए। गाँधी जी और बाबूजी के बीच रिश्तों को लेकर जो लेखक ने लिखा है उससे उनकी मौलिक सोच समझ में आती है। मदन मोहन मालवीय और डाक्टर राजेंद्र प्रसाद का उनके जीवन में बहुत योगदान रहा और वे इसको कभी भूले नहीं। उनकी उदारता और लोगों को मदद करने की भावना कभी मुखर नहीं हुई। उनकी दक्षता और योग्यता का भूगोल कितना विस्तृत था और कितने व्यापक स्तर पर उन्होंने क्या- क्या किया ,यह सब पहली बार इस पुस्तक से समझ में आया।

राजेंद्र जी कोई पेशेवर लेखक नहीं हैं। उनका उद्देश्य था कि बाबू जगजीवन राम को लेकर जो आम हल्की-फुल्की धारणा बनी है या बनायी गयी है,उनका कोई वांड्मय नहीं है। इसलिए उनके संपूर्ण अवदान को सामने रखना जरूरी था और मुश्किल भी। फिर उन भ्रांतियों को दूर किया जाय।यह काम लेखक ने बहुत ही सफलता से किया है। वे अपने उदेश्य में सफल हैं लेकिन जीवनी लेखन की धनंजय कीर वाली शैली राजेन्द्र जी की नहीं है। तथ्यों को अधिक से अधिक पेश करने को लेकर ही हर जगह वे यत्नशील लगे। जिसकी जीवनी लिख रहे हैं उसके प्रति तटस्थ भाव से परकीयन करना और ऐसी जीवनी लिखना जो पाठ सुख से भरपूर हो इसका प्रयास लेखक ने किया है। पर अभी भी उनके जीवन के आयामों पर बहुत कुछ किया जा सकता है। किसी अन्य दक्ष जीवनीकार इसे कर सकता है। इसलिए एक ऐसी जीवनी की गुंजाइश अब भी बनी हुई है। कोई चाहे तो उसके लिए यह किताब बहुत ही महत्वपूर्ण और पर्याप्त है।
यह पुस्तक फ्लीपकार्ट और अमेजन से प्राप्त किया जा सकता है? यह अंग्रेजी में ‘लाइफ एण्ड आइडियोलाजी आफ जगजीवन राम’ शीर्षक से प्रकाशित है।
लेखक कर्मेंदु शिशिर वरिष्ठ आलोचक हैं।

आदिवासी महिला का भाजपा नेताओं के बयान पर आक्रोश!

भाजपाईयों के नए शिगूफे कि बांग्लादेशी लोगों द्वारा आदिवासी महिला से शादी और जमीन लूट कर डेमोग्राफी चेंज किया जा रहा पर नितिशा खलखो कहती हैं :

झारखंड की कौनसी टेरिटरी इंटरनेशनल बॉर्डर को बनाती है। नक्शा देखें, और इन भाजपाइयों को करारा जवाब दीजिए।
झारखंड राज्य को क्या देना है वह बताने की जगह बेहूदगी में उतरी भाजपाई नेतृत्व उटपटांग बातें कर रही है।

निशिकांत दुबे, बाबूलाल मरांडी, अमित शाह आदि नेता जो भी बयानबाजी कर रहे वह केंद्र सत्ता की धार्मिक उन्माद से उपजी रणनीति है। यहां हिंदू मुस्लिम करने में नाकाम हुई, सरना क्रिस्तान करने में नाकाम हुई , आदिवासी पुरुष versus आदिवासी महिला करने में नाकाम रही, सरना को सनातन बताने में नाकाम रही, आदिवासी हिंदू है यह बताने में नाकाम रही तो अब आदिवासी versus मुसलमान करने में लगी है।

आदिवासी को सेंसस में आदिवासी चिन्हित करने से घबराने वाली यह “फूट डाल शासन करो” वाली सरकार आदिवासियों के लिए क्या भला सोच पाएगी ?
झारखंड की ज्योग्राफिक बाउंड्री को देखकर बातें करें। कहीं से भी वह बांग्लादेश के साथ बॉर्डर शेयर नहीं करती है। झारखंड पूरी तरह से बिहार, उत्तरप्रदेश, ओडिशा, छत्तीसगढ़ और पश्चिम बंगाल के साथ मात्र बॉर्डर शेयर करता है। वह जो कह रही की बांग्लादेशी संथाल परगना में घुसकर आदिवासी महिलाओं के साथ शादी कर यहीं रच बस जा रहे और आदिवासी आबादी को खतरा पहुंचा रहे यह झूठ है।
स्टेट बॉर्डर में एक दो किस्से को गढ़कर जो यहां के मूलवासी मुस्लिम आबादी है उसे ही जबरन बांग्लादेशी बता कर चुनावी डंका बजा रहे हैं।
राज्य की स्थिति पर बात करने का बूता तो इनमें हैं नहीं।
ऐसे तो ये नेपाल की आबादी को भी घुसपैठिए कहकर हल्ला कर सकते थे, पर उनके दीनी कौम के लिए तो शत्रु केवल मुसलमान है ना ! कैसे वो हिंदी नेपाली को घुसपैठिए कह सकते सो दूर वेस्ट बंगाल पार करके ये बांग्लादेशी मुसलमान बंगाली लड़कियों को छोड़कर संथाली महिलाओं से शादी करने आ रहे। वाह रे इनके निर्लज्ज तर्क।

हम आदिवासी महिलाएं आदिवासी विरोधी , मानवता विरोधी इस भाजपा, आरएसएस की इन बातों का पुरजोर खंडन वा विरोध दर्ज करती हैं।

झारखंड की डेमोग्राफी 2024 के इलेक्शन में याद आती है इन्हें ?
कहां थे वे जब देश के सबसे बड़े कल कारखाने और माइन इस एरिया में खोल कर आदिवासी को उजाड़ा गया, विकास की बलि चढ़ाया गया, नॉन स्किल बता कर पूरे देश भर से स्किल जनता को वर्षों से बैठाए रखा, उस समय उनकी डेमोग्राफी शब्द से परिचय बना था या नहीं ? बंगाली, बिहारी, उत्तरप्रदेश, ओडिशा की जनता जब यहां बस रही थी तब कहां गई थी इनकी डेमोग्राफी चेंज वाली थ्योरी!
सच तो यह है कि 5th शेड्यूल एरिया के तहत यह आदिवासी बहुल प्रदेश गैर आदिवासी बहुल प्रदेश में वर्षों पीछे ही बदला जा चुका है। बृहत झारखंड की मांग वा उसके क्षेत्र विस्तार को भी देखें तो वह क्षेत्र 2000 में झारखंड निर्माण के समय से ही छला गया है। बिहार की आरजेडी पॉलिटिक्स को कमतर करने के लिए झारखंड को बिहार से अलग कर दिया गया, बंगाल, मध्यप्रदेश, बिहार, ओडिशा, उत्तरप्रदेश के आदिवासी बहुल इलाके नहीं ही शामिल किए गए। सीएनटी एसपीटी एक्ट को हर बार भाजपाइयों ने कमजोर करने की कोशिश की। विलकिंसन रूल की अनदेखी की। PESA एक्ट (पंचायत एक्सटेंशन टू शेड्यूल एरिया) की अनदेखी की। आदिवासी जमीन पर मालिकाना हक आदिवासी समाज के पास सामूहिक तौर से रहा है। बाद में यह कमोबेश आदिवासी पुरुष के ही पास रहा है। फिर ऐसे में आदिवासी स्त्री के साथ शादी कर जमीन हड़पने का बेजा सवाल क्यों भाजपाई कर रहे ?
आदिवासी पुरषों के मन में भी आदिवासी महिला कोआपनी संपत्ति समझने का चश्मा इन पुरुषवादी, पितृस्तात्मक ब्रह्मणवादियों द्वारा।आदिवासी पुरुषों को दिया गया है। तभी कुछ हिंसाएं देखने को मिलती हैं। वीरभूम में ऐसी वारदातें।पिछले कई दशकों से जारी है।

भाजपाइयों द्वारा बेहूदगी से भरा डिबेट लाकर झारखंडी जनता के जायज सवाल गायब किए जा रहे। मानव तस्करी के सवाल, रिसोर्स में बराबरी के बंटवारे का सवाल सब गायब कर आदिवासी बनाम।मुस्लिम की लड़ाई को तेज किया जा रहा।
“आदिवासी महिलाओं के प्रति भी जो टिप्पणियां आ रही हैं वह नकाबिले बर्दाश्त है। बांग्लादेशी मुस्लिम आदिवासी महिला को शादी कर वूमेन और जमीन दोनो आदिवासियों से छीन रहे हैं। कुछ घटिया से लोग अपनी इस बहस बाजी में कुछ महिलाओं के नामों के लिस्ट जारी कर बातें कर रहे हैं। यह बिल्कुल बेतुकी और नाजायज बात है। आदिवासी महिला की निजता और उसकी अस्मिता पर हमला है। आदिवासी महिला की कोई एजेंसी ही नहीं ऐसी भी बात इन भाजपाइयों के द्वारा प्रस्तुत की जा रही है। हम विभिन्न आदिवासी संगठन इस बात पर कड़ा ऐतराज जाहिर करते हैं और इनपर कार्यवाही करने की मांग करते हैं।”
आदिवासी महिलाएं आपके लिए मोहरे नहीं बनेंगी। हम पूरे आदिवासी समाज की ओर से भाजपा को, और उनके नेताओं के इस स्टेटमेंट के लिए पब्लिकली लिखित माफी मांगने की अपील करते हैं।

नीतिशा खलखो के फेसबुक पोस्ट से साभार .नीतीशा आदवासी अधिकार पर मुखर बुद्धिजीवी हैं। वे झारखण्ड के एक कॉलेज में पढ़ाती हैं।

राहुल गांधी की जाति, अनुराग ठाकुर का लंपट सवाल


राहुल गांधी के दादा जी पारसी थे, फिरोज गांधी। दादी कश्मीरी मूल की ब्राह्मण। इंदिरा नेहरू।

राहुल गांधी की मां क्रिश्चन इटालियन हैं। पिता पारसी दादा और ब्राह्मण मां के बड़े पुत्र। अब उनकी मां भारतीय नागरिक हो गई हैं, उनका धार्मिक विश्वास अभी क्या है, पता नहीं।
भारत में पारंपरिक तौर पर और कानूनन भी जाति पिता से बेटे या बेटी को जाती है। कानूनन मां से तब बेटे को जाएगी जब मां ने ही उसे पाला है। रोहित वेमुला प्रसंग में इसपर काफी चर्चा हुई है।
जाति का पिता या दादा से निर्धारण पितृसत्ता का सबसे सटीक उदाहरण है। वरना तो इसी भारतीय संसद में कभी समाजवादी राजनारायण ने अपनी जाति ( उनकी भूमिहार थी) पूछे जाने पर कहा था कि ‘ जाति तो मां से पूछ कर बताऊंगा।’ क्योंकि वही जानती है कि पिता कौन है? (प्रसंग : प्रेम कुमार मणि जी से ज्ञात)
यह प्रसंग राजनारायण की वाकपटुता से अधिक उनके साहसी हस्तक्षेप का प्रसंग है। वरना तो अपनी कथित ऊंची जाति का गर्वोन्नत उद्गार वे संसद में कर सकते थे, जो उनके ‘ ज्ञात ‘ पिता की थी, या जो दर्ज थी।
अनुराग ठाकुर की भाषा और हमारे पी एम साहेब को पसंद आने वाला कटाक्ष दरअसल राहुल की जाति नहीं उनके पिता को लेकर लंपट भाषा और कटाक्ष है। जिसका समुचित जवाब तो राज नारायण जी के प्रसंग में है ।
तो मां से जाति तो हर किसी को पूछना पड़ेगा, संसद में जिसने जाति पूछी उसे भी अपनी जाति के लिए मां से ही कन्फर्म होना पड़ेगा।

सवाल है कि राहुल गांधी की सबसे बड़ी ताकत उनका ‘ निर्जात ‘ होना ही तो है। बाबा साहेब का मानना था कि अंतरजातीय, अंतराधार्मिक संबंधों के जरिए जाति टूटेगी। हालांकि जाति कुछ यूं टूटी नहीं। राहुल गांधी के परिवार में ऐसी शादियां कई हैं। उनके खुद के दादा और पिता की तो है ही।
व्यर्थ ही उनके सलाहकारों ने 2017 से 2022 तक उन्हें जनेऊ धारी बनवा दिया, दत्तात्रेय गोत्र वाला कौल ब्राह्मण।
एक निर्जात राहुल जाति गणना की मांग करने के लिए, उसके दवाब बनाने के लिए सहज योग्य और सर्वाधिक समर्थ। बस उन्हें इस ताकत पर धमक कर खड़ा होना होगा, गर्व करना होगा।भूलकर भी दुबारा जनेऊ की ओर न जाएं।
अखिलेश यादव इस प्रसंग में इंडिया ब्लॉक में सबसे समर्थ नेता हैं,जो जाति पूछने पर सांसद अनुराग ठाकुर की मजम्मत कर सकें। उनके साथ मंदिर के मामले में या सीएम आवास से बाहर आने के बाद के प्रसंगों में उनके साथ जाति की क्रूरता स्पष्ट है।
उन्होंने सचेत जाति तोड़ने की कोशिश भी की है। अंतरजातीय विवाह किया है। अब यह परंपरा है, पितृसत्ता का असर है कि राजपूत डिंपल जी को यादव सरनेम मिल रहा है और वे यादव कोटे में गिनी जा रही हैं। अखिलेश जी के बेटे, बेटी के साथ भी जाति व्यवस्था की यह नियति लागू होगी।
बिहार में अभी जाति और संतति की जाति का प्रसंग चुनावी चर्चा में था। मीरा कुमार (दलित ) के बेटे को अपने कुशवाहा पिता के कारण सामान्य सीट पर चुनाव लडना पड़ा।
वहीं बिहार की समस्तीपुर सीट पर अनुसूचित जाति से आने वाले अशोक चौधरी की बेटी सांभवी चौधरी की उम्मीदवारी अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सीट पर बनी। विडंबना यह कि उनके भूमिहार परिवार में ससुराल को लेकर चर्चाएं खूब रही कि यह सीट भूमिहार घर में गई।
ऐसा ही महा गठबंधन की जमुई से उम्मीदवार उम्मीदवार अर्चना दास के बारे में चर्चा में था। उनके पति यादव हैं।
इन दोनो ही मांओं की संतानों को उनकी मां की जाति नहीं मिलेगी। उनकी संतान मां की जाति लेकर आरक्षित सीट से नहीं लड़ पाएगी। वह भूमिहार होगी, या यादव।
इस देश में जाति एक जटिल विषय है। पितृसत्ता से पुष्ट।
जाति गणना की बात हो या सामाजिक न्याय की बातें राहुल गांधी लंपट ‘ ठाकुर ‘ सांसद को ठेंगा दिखाते हुए पूरे आत्मविश्वास के साथ कर सकते हैं। उन्हें करना चाहिए। दुबारा जनेऊ की शरण में न जाएं तो अच्छा।
राहुल गांधी निर्जात हैं। यही उनकी ताकत है।

‘बड़े घर की बेटी’ क्लाइमेक्स का पुनर्लेखन

बड़े घर की बेटी’ कहानी प्रेमचंद की सर्वाधिक पढ़ी जाने वाली कहनियों में है। प्राइमरी कक्षाओं से लड़के लडकियाँ इसे पढ़ लिया करतें हैं। सम्भवत: लड़कियों से उम्मीद की जाती रही, कि वे ‘बड़े घर की बेटी’-सी बहू बने और लड़के अपनी गलतियों को स्वीकार करने में सहज बने अकड़े नहीं माफ़ी माँगना और माफ़ कर देना दोनों ही मनुष्य का स्वाभाविक गुण बने। जब प्राइमरी कक्षाओं से निकलकर ये कहनीं विमर्शों के गलियारों में पहुंची तो इसके क्लाइमेक्स पर प्रश्न उठाए जाने लगे की आनंदी को माफ़ न करके अलग घर बसा ले जाना चाहिए था जबकि कहानी में एक संवाद भी है कि “उसका विचार था की यदि बहुत कुछ सहने और देने पर भी परिवार के साथ निर्वाह न हो सके, तो आये दिन की कलह से जीवन को नष्ट करने की अपेक्षा यही उत्तम है कि अपनी खिचड़ी अलग पकायी जाए” तो क्या आनंदी का उसी घर में रहने का निर्णय पितृसता की संरचना के दबाव से उपजा? अथवा लाल बिहारी के आँसू ने उसके क्रोध को पिघला दिया। स्त्री अध्ययन केंद्र, रांची में प्रेमचंद पर आयोजित कार्यशाला में संजीव चन्दन ने इसके क्लाइमेक्स के पुनर्लेखन के लिए खूबसूरत प्रयोग किया। इस कहानी के क्लाइमेक्स के पुनर्लेखन की प्रेरणा ‘हंस’ पत्रिका  के संपादक संजय सहाय द्वारा इस कहानी के विषय में की गई उनकी आलोचना थी। उस कार्यशाला कुछ बिंदु और अलग अलग क्लाइमेक्स कुछ इस प्रकार रहे कि वे समाज में जेंडर बोध और जेंडर जेस्ट को रूपायित करतें है। ये इस प्रकार रहा।

 2024 में बदल गयी 1910 में लिखी प्रेमचंद की कहानी ‘बड़े घर की बेटी’  

कहानी। इसके क्लाइमेक्स को स्त्री अध्ययन केंद्र, रांची के रचनात्मक कार्यशाला में लिखा गया है।  समूह लेखन में 20 से अधिक लोगों ने योगदान किया है।  सबने एक-एक वाक्य या कुछ ने दो-तीन वाक्य बोले, जिसे ट्रांसक्राइब (अनुलेखन करना) किया गया है। जिन्होंने कहानी पढ़ी है, वे शायद इससे जुड़ेंगे, नहीं पढ़ी है, तब भी  कहानी का मर्म समझ सकेंगे। क्या शानदार मनोविज्ञान रचा है भागीदारों ने! जेंडर का बोध भी आकर लेता हुआ और जेंडर जस्ट अंत की ओर भी। ऐसा समूह लेखन उनके लिए पहला था या अधिकांश के लिए कहानी लेखन पहली बार था। 

इस समूह लेखन के पहले दो दिन कार्यशाला आयोजित हुई थी, मेरी देख-रेख में। हुआ बस  इतना ही था। 

प्रेमचंद-

“पर भाई का यह कहना कि मैं इसकी सूरत भी नहीं देखना चाहता, लालबिहारी से सहा न गया। वह रोता हुआ घर गया, कोठरी मे जाकर कपड़े पहने, आँखें पोछी, जिसमें  कोई यह न समझे की रोता था”। 

कुमारी वर्षा रानी

आँसू छिपाने का कारण यह भी था कि लोग उसे कमजोर न समझे। 

नेहा कुमारी

आँसू पोछेते हुए वह यह सोच रहा था,अगर भाभी ने उसकी शिकायत भैया से न की होती तो यह जो भी कुछ हुआ ये हुआ ही न होता।

 सोनाली गुप्ता

यह सोचते हुए उसको यह ख्याल आया कि यह स्त्री…यह स्त्री ही है, बड़े घर की, जो हमारे घर को तोड़ रही है, क्योंकि उसे इस बात का घमंड है कि  वह ऊंचे घर से है।

साज़दा बानो 

गलती सिर्फ बड़े घर की लड़की से ही नहीं, छोटे घर की लड़की से भी हो सकती है? 

विवेक सिन्हा

लालबिहारी को उस पल अपने बचपन की याद आई, जब उसकी आँखों मे आँसू देख उसका भाई उसे गले लगा लेता था। 

उदय शंकर राज

आज अगर एक स्त्री की बात न होती तो मेरे उसी भाई ने उतने ही स्नेह के साथ पूर्व की भांति मुझे गले लगा लिया होता। 

 ममता कुमारी

उसे अपने भाई मे हमेशा अपने पिता की छवि दिखती थी, आज उसे लग रहा था कि उसने अपने भाई को नहीं बल्कि पिता को खो दिया है। 

संजीव चन्दन

लालबिहारी समझ ही नहीं पा रहा था की उसके साथ हो क्या रहा है? वह गुस्से में है भाभी से…या…या उसे अपने किए पर पश्चयाताप है…या उसे अपने भैया पर  गुस्सा है, या फिर उसे अपने अपने पिता पर गुस्सा है, जिसने सारी बातें  भैया से  सुनी और उन्हे रोका नहीं टोका नहीं। 

शिवनाथ मुर्मू 

उसे अपने भाई से उम्मीद नहीं की थी कि वह उसके लिए ऐसे शब्दों का उपयोग करेगा। 

स्निग्धा डे 

पुरानी घृणा जो पहले से उसके मन मे अपने भाभी को लेकर थी वह फिर से जागृत हो रही थी। 

पियूष कुमार

अनायास ही उसे बचपन मे सुनी एक कथा की याद आई, शायद वह भगवत कथा का कोई अंश था, जिसमें यह लिखा था कि घृणा और नफरत मनुष्यता के खिलाफ है। 

आलो दास

इन सारी चीजों के बारे में सोच ही रहा था कि उसे लगा की जो हुआ उसको छोड़ कर मैं अपनी गलती मान कर सारी चीजों को ठीक कर लेता हूँ।  फिर उसे अपने पुरुष होने की मर्यादा याद आती है, और सोचता है कि अब  इस पार होगा या उस पार। 

नीति तिर्की

पर इन सब बातों मे उसे कहीं न कहीं यह भी लग रहा था कि शायद वह गलत है और उसकी भाभी सही हैं। ऐसा सोचते-सोचते उसे अपनी माँ याद आ रही थी।

अनुज बेसरा

 उसी समय उसे ख्याल आया कि  क्यों न वह अपनी दुविधा को पड़ोस में रहने वाले अपने दोस्त के साथ साझा करे ताकि दोस्त से बात कर अपनी दुविधा का कोई हल निकाल सके, और वह अपने दोस्त के पास जाने का फैसला करता है। 

राहुल कुमार गुप्ता

लालबिहारी रास्ते मे जाते-जाते अब भी यही सोच रहा था कि कहीं उसकी गलती तो नहीं थी  कि उसने भाभी पर ज़ोर से चप्पल से वार किया सिर्फ इसलिए कि  एक पाव घी एक ही बार मे खतम कर दिया था उन्होंने या फिर भाभी की गलती थी कि उन्होने भैया को अच्छे से नहीं समझाया कि वह जो पूरी परिस्थिति थी उसका कारण क्या था ?

आदित्य गौरव

 जब वह पड़ोस वाले दोस्त के घर गया तो उसके दोस्त ने उसे बताया कि उसने बहुत ही कम उम्र में अपनी माँ और अपने भाई को खोया है। परिवार क्या होता है, उसके दोस्त ने लालबिहारी को समझाया। 

विकेश कुमार

 मिलजुल कर रहने से इस तरह का कलेश और इस तरह के आपसी विवाद नहीं होते। 

मीनू मनीषा मुर्मू

अपने दोस्त से बात करने के बाद, उसे महसूस हुआ कि उसके दोस्त ने भी ऐसे दुःख का सामना किया था।  और वह इस अपराधबोध से उबरा। इससे प्रेरित होकर, उसने अपनी भाभी को माफ करने का निर्णय लिया।

रेशमा मुर्मू

 दोनों दोस्त अब लालबिहारी के आंगन मे ही बैठ कर बातें कर रहे थे। लालबिहारी को महसूस हो गया कि मेरी भी गलती थी और दोस्त के समझने पर उसे और दृढ़विश्वास हो गया कि मुझे अपनी गलती मान लेनी चाहिए। चूंकि उस समय आंगन का दरवाजा खुला हुआ था। पड़ोस की लड़की कंचना अचानक से आ जाती है और लाल बिहारी को यह पता होता है कंचना उसे बचपन से पसंद करती है। कंचना को अचानक देख और दोस्त की बातों को सुनने के बाद उसे महसूस होता है कि प्रेम भावना कितनी अच्छी होती है, मैंने भैया और भाभी के बीच इस तरह का अनबन उत्पन्न कराकर अच्छा नही किया । 

रोहिन  कुमार

इस तरह का पारिवारिक उतार चढ़ाव घर-घर की बात है अपनों से क्या गीला शिकवा ! 

पिंकी दास 

अब लालबिहारी सोच रहा था,अगर उसकी भाभी के स्थान पर उसकी बहन होती तो उसे माफ कर देता, तो भाभी को क्यों नहीं।

संजीव चंदन 

अब लालबिहारी को यह महसूस हो चुका था कि  गलती उसकी थी, आनंदी को भी लगा कि उसे इस मसले को सुलझा लेना चाहिए लालबिहारी से बात करके, और अगली बार लाल बिहारी को अच्छे से गोश्त बनाकर  खिलाऊँगी। बड़े भाई सीरी कंठ भी पश्चाताप में थे।

कहानी के सारे वाक्य लगभग 20 मिनट में एक्सटेम्पोर बोले गए और रिकॉर्ड हुए। हमने यहाँ सिर्फ भाषागत तारतम्य बनाया है, अन्यथा यह यथावत ट्रांस्क्रिप्ट हुआ है। ऊपर के नामों के अलावा वहां थे संदीप किस्कु, संदीप भंडारी, लॉरेंस मुर्मू, युमना परेया, जगन्नाथ सरदार, स्निग्धा हंसदा और बिनय ठाकुर। 

रचनात्मक लेखन की कार्यशाला के आयडिया और आयोजन  के लिए धन्यवाद ममता सिंह

बच्चों को बहुत-बहुत बधाई और शुभकामनाएँ जिन्होंने अपनी इमेजरी से वस्तु को कई नए आयाम दिये हैं। उनका अपना जीवन भी इस पुनर्लेखन में झांकता है।

उन्हें मेरा साधुवाद।

विशेष तब्बजो का आग्रह है आप लोगों से 

कमलानंद झा, शंभु गुप्त सुधांशु गुप्त, कालीचरण स्नेही सुधा सिंह, अनिता भारती नूर जहीर, रक्षा गीता, मनोरमा सिंह।

टिप्पणियाँ –

शंभू गुप्त- कहानी में ओनस शिफ्ट हो गया। यह बड़ी बात हुई सर, है न। बड़े घर की बेटी की जगह, परिवार में रिश्तों की गरिमा कहानी के केंद्र में आ गई।

मनोरमा -सभी भागीदार छात्रों को बहुत बहुत बधाई और शुभकामनाएं, उनकी सोच और इनपुट ने नए आयाम दिए हैं कहानी को,ये पढ़ना बहुत सुखद और भविष्य के प्रति सकारात्मक और उम्मीद की नज़र है! 

रक्षा  गीता उत्तर आधुनिकता जिस पाठ विश्लेषण की बात करती है जिसके केंद्र में पाठक ही होता है ‘बड़े घर की बेटी’ के विविध पाठ उसी का श्रेष्ठ उदाहरण है। कार्यशाला के आयोजकों और विद्यार्थियों को खूब बधाई किताबों के घिसे पिटे एकेडमिक ज्ञान से हटकर विद्यार्थियों को वैचारिक स्तर पर तैयार करना आज के समय में बहुत महत्वपूर्ण है यह अन्य पूर्व कथाओं के साथ भी होना चाहिए।

कहानी आप सभी ने भी पढ़ी होगी यादी आपका मन मस्तिष्क भी क्लाइमेक्स को लेकर कुछ कहने को हो रहा है तो टिप्पणियां कर सकतें हैं।  

 

हक़ और हासिल का संघर्ष अभी शेष है !

यह संपादकीय आखिरी तीन चरणों के चुनाव के पहले लिखा गया था, 16 मई को। इसे यथावत रख रहा हूं। चुनाव को जिस पृष्ठभूमि में मैं  देख रहा था, उसकी एक बानगी है यह। मैं देख रहा था कि कुछ हद तक सत्ता विरोधी माहौल है। सत्ता में बैठे लोगों के बड़बोलेपन और नफरती एजेंडों ने उसके जनाधार कमजोर किए हैं, लेकिन विपक्ष दृष्टिहीन और दिशाहीन है, इसलिए भाजपा और मोदी को हराने का यह सुनहरा अवसर जाया होने वाला है। यही हुआ। तब हम निश्चित हार के बावजूद विभिन्न माध्यमों से इंडिया गठबंधन के लिए आशावान माहौल बनाने में लगे थे। वजह साफ थी। पटना में इंडिया गठबंधन की पहली बैठक में ही सामाजिक न्याय की अनुगूंज बन गई थी। हमारी प्रतिबद्धता सामाजिक न्याय के साथ है।

अंक प्रकशित होते हुए चुनाव संपन्न हो चुका है, सरकार का गठन हो चुका है। 18वें लोकसभा में कुल 74 महिला सांसद चुनकर आयी हैं , जो 17वें से चार कम हैं । 13.3 प्रतिशत महिला सांसदों का अनुपात चुनावी शोर के बीच एक हकीकत है। भाजपा से कुल 31 महिला सांसद चुनकर आयी हैं , कुल भाजपा सांसदों का 12.92 प्रतिशत, कांग्रेस ने 13 महिला सांसदों को लोकसभा भेजा है 13.13 प्रतिशत तृणमूल कांग्रेस ने सबसे अधिक अनुपात में महिला सांसद भेजे हैं  कुल 11 यानी 37 प्रतिशत।

‘मुझे मालूम है कि आज हम, राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक दृष्टि से विभाजित हैं । हमने विरोधी छवियां बनाई हैं  और मैं  भी युद्ध की छावनी बना रही एक जमात का नेता हूं। लेकिन ऐसा होते हुए भी मेरा पूरा विश्वास है कि परिस्थिति और समय के आते ही, अपनी एकता में कोई भी बात रुकावट नहीं डाल सकेगी। मेरे मन में इस संबंध में संदेह नहीं है कि यद्यपि जातियां और पंथ अनेक हैं , फिर भी हम एक-राष्ट्र बनेंगे।’

(संविधान सभा में डॉ. अम्बेडकर, 9 दिसंबर 1946)

यह अंक जब आप पढ़ रहे होंगे तबतक देश में नई सरकार बन चुकी होगी। आवेग और आवेश का दौर थम चुका होगा। तब ठहर कर सोच सकेंगे कि सामाजिक न्याय कैसे होगा और उसमें स्त्रियां कहां होंगी?

भाजपा और संघ परिवार को इस चुनाव में जनता से चुनौती मिल रही थी। एक बड़ा सत्ता विरोधी रुख था जनता के बीच। भाजपा द्वारा फैलाये जा रहे साम्प्रदायिक उन्माद के प्रति जनता में अनुत्साह था। राम मंदिर आदि को प्रधानमंत्री मोदी कोई राजनीतिक प्रतिफल में बदलने में सफल नहीं हुए थे, लेकिन सत्ता विरोधी मन को विपक्ष आक्रोश में नहीं बदल सका। सामाजिक न्याय की जो मुहिम बिहार से शुरू हुई थी उसे राहुल गांधी ने वाचिक परम्परा में ही डाल दिया, जबकि नीतीश कुमार और तेजस्वी यादव के नेतृत्व में महागठबंधन की सरकार ने जाति सर्वे करवाकर और आरक्षण का दायरा बढाकर एक सीधा मुकाबला और उत्साह पैदा किया जरूर था। उसी का असर रहा कि भाजपा द्वारा संविधान बदले जाने की संभावना और आरक्षण पर खतरा जनता के बीच बातचीत का विषय बन गया। भाजपा के नेताओं के बयानों से इस आशंका को और बल मिला है। प्रधानमंत्राी ने सैफई के अपने भाषण में इस धारणा को मजबूत ही किया कि भाजपा की सरकार संवैधानिक मूल्यों के खिलाफ है। गया में चुनाव प्रचार में उन्होंने संवैधानिक आस्था, उनके अनुसार धार्मिक आस्था की तरह, के निर्माण की बात की। यह आस्था का विचार ही संविधान की तार्किकता के खिलाफ है। 

जैसे-जैसे चुनाव प्रचार आगे बढ़ा प्रधानमंत्री मोदी, गृहमंत्री अमित शाह, यूपी के सी.एम आदित्यनाथ ने सांप्रदायिक विभाजन के भाषणों की झड़ी लगा दी। इस उन्माद के बरक्स हिंदुत्व को लेकर कोई स्पष्ट स्टैंड  विपक्षी दलों में नहीं दिखा। विपक्षी दल शरमाये, सकुचाये हिचक के साथ राजनीति करते रहे। इस या उस अस्त्रा को आजमाते रहे। जिसे आजमाने का स्वांग मुख्य विपक्षी नेता राहुल गांधी कर रहे थे, सामाजिक न्याय को आजमाने का, वह उनके जमीनी कार्यक्रमों का हिस्सा नहीं, वादों का हिस्सा था। 

सबसे बड़ा संकट है राजनीति का हिंदुत्व की ओर सरक जाना। इसी कारण से आखिरी मुस्कान तो संघ परिवार के होठों पर ही होगा। उस मुस्कान को क्षीण करने के लिए एक विजन और साहस वाले नेतृत्व की जरूरत होगी। पूरा चुनाव स्थानीय मुद्दों और नेताओं के प्रभाव में रहा, खासकर हिंदी पट्टी में। मेरे जैसे लोग इस वक्त हालांकि यह मानते हैं  कि विपक्ष में फिलहाल स्पष्ट नेतृत्व लेता कोई नेता नहीं है, लेकिन सबसे पहली जरूरत है कि संविधान का नाम लेकर संविधान की धाज्जियां उड़ाने वाले, लोकतंत्र को कमजोर करने वाले, लोगों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को नष्ट करने वाले समूह को सत्ता से हटाया जाए, फिर देश का जनादेश और राजनीतिक जमातें तय करने में सक्षम होंगी कि प्रधानमंत्री कौन होगा, नेता कौन होगा? लोकतांत्रिक और समतावादी स्पेस के सभी समूहों को अपने वैचारिक मतभेद को बरकरार रखते हुए भी ऐसा करना चाहिए, ताकि सत्ता परिवर्तन के बाद समतावादी स्पेस को मजबूत करने का संघर्ष वे कर सकें।

महिलाओं के लिए संसद में उचित भागीदारी की डगर आज भी बेहद मुश्किल है। 2024 के लोकसभा चुनाव में सभी पार्टियों ने टिकट देने के मामले में उन्हें ठगा।  ADR (ASSOCIATION FOR DEMOCRATIC REFORMS ) के अनुसार 9.5 प्रतिशत से  महिला उम्मीदवार चुनाव मैदान में हैं , जिनमें एक बड़ी संख्या निर्दलीय उम्मीदवारों की है।

राष्ट्रीय पार्टियों में 446 सीटों पर भाजपा लड़ रही है, उनमें 69 सीटों पर उसने महिला उम्मीदवार खड़े किये हैं , लगभग 15.4 प्रतिशत, वहीं  कांग्रेस ने 41 महिला उम्मीदवार दिये हैं,  लगभग 12.5 प्रतिशत ।  बसपा की 37, सी.पी.आई.एम की 7 और सी.पी.आई की 2 महिला उम्मीदवार चुनाव मैदान में हैं । सी.पी.आई.एम ने लगभग 13 प्रतिशत महिला उम्मीदवार दिये हैं ।

इलेक्शन कमीशन आफ इण्डिया के अनुसार 12 राज्यों में महिला मतदाताओं की संख्या पुरुष मतदाताओं से अधिक है। इनमें आसाम में पुरुषों की तुलना में सबसे अधिक महिला मतदाता हैं  लेकिन वहां मात्रा 12 महिला उम्मीदवार चुनाव मैदान में हैं। पार्टियों ने टिकट देने के मामले में नेताओं के रिश्तेदारों को ज्यादा तरजीह दी है। संसद में यूं तो 33 प्रतिशत महिला आरक्षण का प्रावधान पास हो गया है, लेकिन शातिर दिमाग हुक्मरानों ने उसे अगली जनगणना और डेलीमेटेशन के लिए टाल दिया है।

सवाल है कि जो पार्टियां महिलाओं के हक की बात करती हैं  वे भी उन्हें क्यों छलती हैं। बिहार में भाजपा ने एक भी महिला उम्मीदवार नहीं दिया है। कांग्रेस ने बिहार में, दिल्ली में एक भी महिला उम्मीदवार को टिकट नहीं दिया है।  महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी का संघर्ष अभी लंबा रहने वाला है।

2023 की फरवरी में हमने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे से मुलाकात की। कांग्रेस ने इसके पहले ही रायपुर कन्वेंशन में सामाजिक न्याय को अपना लक्ष्य घोषित किया था। हम कुछ लेखिकाओं, पत्रकारों के साथ उनसे मिलकर देश भर के स्त्रीवादी लेखकों, एक्टिविस्टों और पत्रकारों की मांगों का एक पत्र देने गये थे उन्हें। वे मांगें कांग्रेस के नेता राहुल गांधी के सामाजिक न्याय की घोषणा और कांग्रेस के नारे ‘लड़की हूं तो लड़ सकती हूं के अनुरूप थीं। उन मांगों की अपनी पृष्ठभूमि थी। दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब में 3 अगस्त, 2022 को इकट्ठा हुए स्त्रीवादियों और स्त्रीवादी व अम्बेडकरवादी संगठनों ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर ये मांगें भेजी थी, तथा कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकर्जुन खड़गे से मिलकर भी उन्हें मांगपत्र सौपा गया था। बिहार विधानसभा में भी इनमें से कुछ मांगें विधायक इंजीनियर ललन कुमार ने उठायी।

इस अभियान का अगला चरण आया जुलाई 2023 में। लोकतांत्रिक राज्य के निर्माण के लिए स्त्रीवादी नागरिकों द्वारा पारित राजनीतिक-सामाजिक-आर्थिक संकल्प राजनीतिक दलों को उनके अपने एजेंडे में शामिल करने व जिन दलों की सरकारें हैं, उन्हें अपने यहां लागू करने के लिए एक मेल कांग्रेस, बीजेपी, सीपीआई, सीपीएआई एम, सीपीआई-एमएल, जदयू, राजद, एनसीपी, तृणमूल कांग्रेस सहित कई दलों के अध्यक्षों को व राहुल गांधी, नीतीश कुमार, डी राजा, सीताराम येचुरी आदि नेताओं को भेजा गया। कुछ को मिलकर भी दिया गया। 10 सूत्री प्रस्ताव स्त्रीकाल के 20वें वर्ष में 23 जुलाई 2023 को देश भर के स्त्री वादी विदुषियों, लेखिकाओं, सामाजिक-राजनीतिक नेतृत्व की एक आनलाइन बैठक में पारित हुए।  प्रसिद्ध अम्बेडकरवादी साहित्यकार, चिंतक व एक्टिविस्ट उर्मिला पवार और सुशील टाकभौरे की अध्यक्षता में बैठक हुई। यह बैठक नागपुर में बाबा साहेब अम्बेडकर की उपस्थिति में हुए अखिल भारतीय शेड्यूल्ड कास्ट महिला सम्मेलन (20 जुलाई,1942) की ऐतिहासिकता में हुई।

ज्ञातव्य है कि 20 जुलाई 1942 के नागपुर सम्मेलन में सुलोचनाबाई डोंगरे की अध्यक्षता में स्त्रियों ने जो प्रस्ताव पारित किये थे उनमें से आज भी कई प्रासंगिक हैं।

पारित प्रस्ताव

1. नागपुर के अखिल भारतीय दलित महिला परिषद (20 जुलाई 1942) में पास, वे 7 प्रस्ताव थेः

‘सरकार से निवेदन है कि जिस तरह से मध्यवर्ती और प्रांतीय विधान मंडल में, स्थानीय स्वराज संस्थाओं में, स्त्री प्रतिनिधि ली जाती हैं, उसी तरह से अस्पृश्य मानी गई महिलाओं की सर्वांगीण उन्नति के लिए उनके प्रतिनिधि उक्त उल्लिखित सारे स्थानों पर आरक्षित स्थान के माध्यम से रखे जाने की व्यवस्था करे को नया सन्दर्भ देते हुए प्रस्ताव है कि महिला आरक्षण पारित हो, जिसमें ओबीसी महिलाओं के लिए भी आरक्षण कोटा तय हो। तथा ऐतिहासिक तौर पर 1942 की उक्त परिषद को ही महिला आरक्षण का प्रथम प्रस्तावक माना जाए।

2. नागपुर के अखिल भारतीय दलित महिला परिषद (20 जुलाई 1942) में पास 8वें प्रस्ताव कि

‘यह परिषद यह तय करती है कि ‘अखिल भारतीय दलित महिला फेडरेशन’की स्थापना करते हुए उसके खर्च के लिए आवश्यक कोष बनाया जाए। को अलग विस्तार और सन्दर्भ देते हुए दलित, आदिवासी, आदि महिला आयोग की स्थापना की जाए। महिला आयोगों को स्वायत्तता हो और दंडात्मक अधिकार भी मिले। आयोग में अनिवार्य रूप से आरक्षण के माध्यम से एससी, एसटी, ओबीसी, पसमांदा सदस्यों को नामित किया जाए।

3. राज्यों और केंद्र के आयोगों,अकादमियों (साहित्य-संस्कृति आदि सहित सभी अकादमियों) में दलित, आदिवासी, ओबीसी, पसमांदा महिलाओं की भागीदारी आरक्षण सिद्धांत के साथ सुनिश्चित हो।

4. केंद्र एवं सभी राज्यों में दलित साहित्य अकादमी की स्थापना की जाए।

5. स्त्री -पुरुष व अन्य वर्ग की सामाजिक इकाइयों में समानता को सुनिश्चित करते हुए पूरे देश के लिए ‘जेंडर जस्ट कॉमन सिविल कोड’ बने, जो 10 सालों तक ऐच्छिक हो। जेंडर जस्ट कॉमन सिविल कोड का ड्राफ्ट व्यापक विमर्श के लिए हितधारकों के समक्ष रखा जाए। यह  बाबा साहेब अंबेडकर और संविधान सभा की महिलाओं की राय के अनुरूप होगा।

6. सरकार के आर्थिक प्रयोजनों में दलित,आदिवासी,ओबीसी,पसमांदा महिलाओं के लिए आरक्षण सुनिश्चित हो,जैसे ठेकेदारी आदि में।

7. शिक्षा और स्वास्थ्य का सरकारीकरण तथा महिलाओं की शत-प्रतिशत शिक्षा का लक्ष्य निर्धारित किया जाए। नागपुर अधिवेशन के छठे प्रस्ताव के साथ यह प्रस्ताव पढ़ा जाए। आज भी कई वंचित समुदायों की महिलाओं का साक्षरता दर 3 से 10 प्रतिशत है।

8. भूमि का राष्ट्रीयकरण सुनिश्चित किया जाए।

9. देश भर में स्वच्छ सार्वजनिक प्रसाधन गृह का निर्माण और संचालन किया जाए, ताकि महिलाओं की सार्वजनिक जगहों पर भागीदारी बढ़े।

10. बाबा साहेब डा. अम्बेडकर के लेखन और भाषण में उनके अपने पत्रों, भाषणों, लेखों, किताबों के अलावा अखबारों की रिपोर्टिंग भी उनके वांग्मय में शामिल किए गये हैं। उन्हें वांग्मय से हटाया जाना चाहिए। अखबारों की रिपोर्टिंग संसद की पटल पर भी आथेंटिक नहीं माने जाते हैं। इसके लिए विचार करने के लिए विशेषज्ञों की एक समिति बने। 

प्रस्तावक प्रतिशत

उर्मिला पवार, मुंबई

सुशीला टाकभौरे, नागपुर 

संजीव चंदन,पटना

नूतन मालवी, वर्धा

मनोरमा, बंगलोर

अरुण कुमार, दिल्ली

विनय ठाकुर, पुडुचेरी

विजय झा, दिल्ली 

विवेक सिन्हा, रांची

गीता सहारे, दिल्ली

रश्मि रावत, दिल्ली

रक्षा गीता, दिल्ली

सुधा अरोड़ा, मुंबई

छाया खोब्रागडे, नागपुर

अनिता भारती, दिल्ली

नूर जहीर, लंदन

कल्याणी ठाकुर, कोलकाता

कुसुम त्रिापाठी, मुंबई

धम्म संगिनी, नागपुर

नीतिशा खलखो, आसनसोल

जमुना बिनी, अरुणाचल प्रदेश

मीना कोटवाल, दिल्ली

जितेंद्र बिसारिया, ग्वालियर

कविता कर्मकार, आसाम

क्विलिन काकोती, आसाम

प्रिया राणा, मुंबई

दीप्ति, दिल्ली

आफरीन, दिल्ली

सुनीता, सीवान

सरोज कुमारी, दिल्ली

कालीचरण स्नेही, लखनऊ

असंगघोष, भोपाल 

अशोक मेश्राम, वर्धा 

साकिब अशरफी, पटना

स्त्री काल के साथ देश भर की एक्टिविस्ट स्त्रिायों, साहित्यकारों की इस मांग की दिशा में सरकारों से बात की जानी चाहिए। आखिर 33 प्रतिशत आरक्षण लागू होने के बाद महिला उम्मीदवार क्या पुरुषों की प्रतिच्छाया होंगी?

महिला आरक्षण नारी शक्ति वंदन कानून के रूप में पारित हो गया है। वास्तव में अभी आरक्षण को लागू करने में समय लगेगा। कारण सत्ता पर काबिज हुक्मरानों में पुरुषों की बहुलता और उनकी मर्दवादी सोच है। कानून के प्रावधान में ही व्यवस्था है कि डीलिमिटेशन के बाद आरक्षण लागू होगा। इसके लिए जनगणना की जरूरत होगी। उसके बाद डीलिमिटेशन की प्रक्रिया होगी। इसको लेकर दक्षिण के राज्य बेहद आशंकित हैं ।

स्त्रीकाल के हर मोड़ पर कुछ स्त्री वादी साथियों, लेखकों और  चिंतकों का साथ रहा है, उनमें अर्चना वर्मा, रमणिका गुप्ता, रजनी तिलक, और सुजाता पारमिता का बेहद निकट साथ रहा। वे अब हमारे बीच नहीं हैं । पिछले चार-पांच सालों में इनका साथ छूटा। फुले-अम्बेडकरवादी चिंतक गेल आमवेट भी नहीं रहीं। यह अंक इन्हीं लेखिकाओं के योगदान और लेखन पर केंद्रित है।

रमणिका गुप्ता सोशल एक्टिविस्ट थीं, राजनेता थीं, साहित्यकार थीं, आदिवासी अधिकार की प्रवक्ता एवं जुझारू नेत्तृ थीं । वे खुदमुख्तार स्त्री थीं  और स्त्रियों के आत्मसम्मान के लिए किसी भी हद तक जूझ सकती थीं। अर्चना वर्मा साहित्यकार और आलोचक के रूप में एक अलग पहचान रखती थीं। स्त्री काल द्वारा आयोजित ‘सावित्रीबाई फुले सम्मान की जूरी सदस्य के रूप में उनके सुझाव और उनका नेतृत्व महत्वपूर्ण होता था। सुजाता पारमिता पुणे के एफटीआईआई की पहली दलित महिला ग्रेजुएट थीं। कला और संस्कृति पर दलित दृष्टिकोण से स्त्री काल और गुलबर्गा विश्वविद्यालय, गुलबर्गा, कर्नाटक में उनके भाषण ने सबका ध्यान खींचा था। साहित्यकार और संस्कृति विमर्शकार के रूप में उनकी अपनी पहचान थी।  उनके द्वारा संस्कृति के विभिन्न हिस्सों में हाशिये के समाजों के योगदान पर दिए गए भाषण, उनके लेख मेरी अपनी दृष्टि बनाने में महत्वपूर्ण रहे हैं।  हिंदी की पहली दलित महिला आत्मकथा कार कौशल्या बैसंत्री की वह बेटी थीं। हमें इस बात का गर्व है कि वह मुझे अपना बेटा मानती थीं ।

रजनीतिलक साहित्यकार और उससे अधिक स्त्री अधिकारों की प्रबल प्रवक्ता और जमीनी संघर्षकर्ता थीं। उनके साथ हमने कई संघर्षों में हिस्सा लिया और साझा रूप से स्त्रीकाल ने उनके संगठन अखिल भारतीय दलित महिला संगठन के साथ मिलकर कई मुद्दे उठाये। 

इस अंक के योजनाकार हैं अरुण कुमार। संपादक  के रूप में मेरा काम इस योजना को अमलीजामा पहनाने की स्थितियां बनाना भर है। अरुण कुमार स्त्रीकाल के सम्पादकीय टीम के स्थायी सदस्य हैं । उद्देश्य और लक्ष्य उनके सपनों का हिस्सा हैं ।

पिछले दिनों उषा किरण खान भी नहीं रहीं  और प्रोफेसर चौथीराम यादव ने भी हमें अलविदा कह दिया। उषा किरण खान उन लेखिकाओं में थीं, जो स्त्रीवादी कहलाने से परहेज करती रही हैं। उनका लेखन स्त्रियों की पीड़ा और उनके स्वप्न का लेखन जरूर रहा है। कई बार उन परम्पराओं के साथ भी उनके लेखन का लय दीखता है, जो स्त्री विरोधी परिवेश का तर्क निर्मित करती रही हैं। चौथीराम यादव लोकधर्मी आलोचक और चिन्तक थे। फुले-अम्बेडकरवादी परम्परा में सोचते थे। समतावादी आलोचना उनका केंद्रीय भाव था। जनकवि कवि सुरजीत पातर का भी इन्हीं  दिनों देहांत हुआ। चौथी राम यादव, सुरजीत पातर और  उषा किरण खान को स्त्री काल की ओर से हम श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं ।
स्त्रीकाल अंक 38 का संपादकीय

सावन और काँवर

बचपन की यादों में, कुछ धुंधली यादें हैं काँवड़ से संबंधित। 1 जुलाई से स्कूल खुलते। दो महीने की गर्मियों की छुट्टियों का अलसाया शरीर पन्द्रह- बीस दिन बाद ही रूटीन में आता। तब तक सावन की आहट होने लगती। कक्षा की सहेलियाँ दाहिने हाथ में एक-एक हरी चूड़ी पहन कर आती। दसवीं- बारहवीं की दीदियाँ सोमवार का व्रत करने लगती। पूछने पर कहतीं- माँ ने कहा है, सावन के सोमवार करने से अच्छा वर मिलता है। एक दिन घर जाकर मम्मी से पूछा तो मम्मी ने सख्त हिदायत दे डाली “हमनी किहाँ कुआँर लड़की संकर जी के ना पूजेला। संकरे जी जइसन अड़भंगी दूलहा मिली।” यह कैसा विरोधाभास ! उत्तराखंड और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में इतना सम्मान, और बिहार पूर्वी उत्तर प्रदेश में एकदम अड़भंगी! आज सोचती हूँ तो लगता है, ऐसा शायद इसलिए क्योंकि आज भी बिहार का लोक पार्वती के चयन से नाराज है। आज भी शिव को भोला, अड़भंगी और एक कन्या के अयोग्य वर मानता है। लड़कियों के ब्याह में आज भी गीत गाया जाता है- “ए अड़भंगी बर से गौरा नाहीं बियहब, भले गौरा रहिहें कुआँर….”। अधिकांश घरों में मांसाहार बंद हो जाता, पर सभी घरों में नहीं। हाँ, हम बच्चे लंच में अंडा वगैरह ले जाने से परहेज करते। इसी दौरान एक और हल्ला उठता काँवड़ ले जाने का। पूरी कॉलोनी के बड़े-बड़े लड़के, जो पढ़ाई छोड़कर घर बैठ गए थे, जो किसी काम धंधे में भी नहीं लगे थे, उनका बैचलर गिरोह काँवड़ लेकर जाता। इस बैचलर गिरोह के माता-पिता उनसे परेशान थे। वो चाहते थे दिनभर घूमता रहता है, कोई काम धंधा पकड़ ले, तो इसकी शादी करवा दें। घर वाले 15 दिन चैन की साँस लेते । पड़ोसन आंटी कहती- “जाने दो! जाएगा तो इतने दिन किसी से झगड़ा झंझट तो नहीं करेगा। क्या पता भोले बाबा इसे सद् बुद्धि ही दे दें।” शादीशुदा, बाल बच्चे वालों को तो काँवड़ ले जाने की ना फुर्सत थी, ना हौसला।

मोहल्लो में मेहंदी प्रतियोगिता होती। समूह में बैठकर, दूध वाली प्लास्टिक की थैलियों से बनी कीप से मेहंदी लगती। छोटे बच्चे भी जिद करने लगते, तो उनकी हथेलियों पर मेहंदी की बूंदे रख दी जाती। बैठे बैठे गीत भी होते- “नन्हीं नन्हीं बुंदिया रे सावन का मोरा झूलना….” हरे कपड़े पहने जाते। हाथों में हरी चूड़ियाँ। बसंती आंटी चूड़ी पहनते हुए मौज में गा उठती- “गोरी है कलाइयाँ, दिला दे मुझे हरी हरी चूड़ियाँ….” पेड़ों पर तो झूले नहीं लगते, परंतु पार्क में लटके झूलों पर भीड़ लग जाती। हलवाई की दुकानों पर घेवर की बहार होती। मन आश्चर्य चकित रहता, यह कैसी मिठाई है जो केवल सावन में ही बनती है। फिर एक दिन शोर होता काँवड़िये आ गए। सभी लोग उनके स्वागत के लिए तैयार रहते। महिलाएँ शिव भजन गाते हुए, काॅलोनी के गेट तक जाती। वह हरिद्वार से लाया जल, मंदिर में शिवलिंग पर चढ़ाते , फिर घर आते। हम बच्चे उनके हाथी जैसे फूले पैरों को देखकर डर जाते। फिर शुरू होती पैरों की मालिश और सिकाई। कुछ दिनों बाद रक्षाबंधन आ जाता, और सावन के उत्सव का समापन हो जाता। आँखें बंद करके पीछे मुड़कर देखने पर सावन में जरा सा काँवड़ दिखता है, पर आज आँखें खोल कर देखती हूँ तो काँवड़ में जरा सा सावन दिखता है।

आज काँवड़ यात्रियों की संख्या बढ़ने लगी है। जो हरिद्वार जाने में सक्षम नहीं, वह अपने नजदीक की नदियों से काँवड़ में जल लाकर, शिवलिंग पर चढ़ा रहे हैं। बिहार में देवघर की काँवड़ यात्रा प्रसिद्ध है। महिलाएँ भी काँवड़ लेकर जा रही हैं। इसी बहाने देवघर का मेला देखकर आ रही हैं। सावन में हरी चूड़ियाँ और काँवड़ के लिए केसरिया चूड़ियाँ। अब क्या करें? महिलाओं ने एक उपाय निकाला है। दो हरी और दो केसरिया मिलाकर डिजाइन बनाकर पहनने लगी हैं। पिछले वर्षों खबर देखने को मिली कि, पुत्र और पुत्रवधू माता-पिता को काँवड़ में बिठाकर ले जा रहे हैं। रेल यात्रा के दौरान देखा श्रावण स्पेशल केवल काँवड़ियों से भरी हुई है। पता चला सब काँवड़ लेकर जा रहे हैं। प्लास्टिक के काँवड़ ऊपर की बर्थ पर बांध कर रखे गए थे। एक सज्जन कह रहे थे- “काँवड़ यात्रा को आप लोग धर्म से ना जोड़िए। यह एक अभ्यास है, जो हर वर्ष दोहराया जाता है। मीलों पैदल चलने का अभ्यास। मशीनों के इस युग में तो, हम लोग पैदल चलना भूल ही गए हैं।” पिछले वर्ष खबर मिली कि उत्तर प्रदेश के कई जिलों ने काँवड़ यात्रियों की सुविधा के लिए विद्यालय बंद कर दिए हैं। इस वर्ष सुन रही हूँ कि, काँवड़ यात्रा के मार्ग में पड़ने वाली दुकानों, होटलों, फल की रेहड़ी वालों को अपना नाम लिखा बोर्ड लगाना होगा। कहा जा रहा है कि काँवड़ियों की शुद्धता, पवित्रता और शुचिता भंग ना हो इसलिए ऐसा आदेश दिया गया है। समझ नहीं आ रहा है कि केवल नाम जानने से, कैसे ज्ञात होगा कि अमुक व्यक्ति शुद्ध, पवित्र है और अमुक व्यक्ति अशुद्ध और अपवित्र!! सोच रही हूँ कि काँवड़ के बीच मनभावन सावन कहाँ खो गया है?

ईना, मीना के बहाने “अकिला फुआ”

प्रीति प्रकाश की कहानी “ईना, मीना और अकिला फुआ” के बहाने आज अकिला फुआ पर बात की जाए। यह कहानी प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका “हंस” में छपी थी। यूपी, बिहार में अकिला फुआ बहुत प्रसिद्ध चरित्र है। हालांकि वह कोई विशेष पात्र नहीं, बस अक्ल से अकिला बना लिया गया है। अकिला यानी जो ज्यादा बुद्धिमान हो, जिसके पास ज्यादा अक्ल हो। गौर तलब है कि यह प्रशंसा में नहीं बल्कि व्यंग्य में दी जाने वाली पदवी है। जैसे हर पुरुष अपनी पत्नी को व्यंग्य से “ज्यादा बुद्धिमान हो??” कहना अपना हक समझता है। चाहे वह चौथी फेल और पत्नी मैट्रिक ही क्यों ना हो (याद करें ‘दृश्यम्’ फिल्म) और यह भारतीय समाज में पूरी तरह स्वीकार्य है। पत्नी है तो कमअक्ल होगी ही।

हाँ तो पुनः आते हैं अकिला फुआ पर। अकिला फुआ ही क्यों है? चाची, काकी, दादी या मौसी क्यों नहीं? इसका जवाब है- जिसकी शादी नहीं हुई, होकर टूट गई, विधवा हो गई, अर्थात जो पति के साथ नहीं है, संतानहीन अकेली स्त्री! वही अकिला हो सकती है। ज्यादातर ऐसी स्त्रियां मायके में आश्रय लेती हैं। अपने भाई के यहाँ आश्रय मिले तो ठीक, वरना मायके के गाँव में ही दूसरा घर बना कर रहती हैं। इसलिए रिश्ते में गाँव भर की फुआ लगती हैं। ज्यादातर ऐसी महिलाएँ दबंग, वाचाल, निडर और सशक्त होती हैं। आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर भी। जीवन यापन के लिए खेतों में काम करना, सब्जियाँ बेचना, बकरी पालन, से लेकर सिलाई कढ़ाई कुछ भी करती हैं, पर दूसरे के भरोसे नहीं रहती। अकिला फुआ होने की दूसरी शर्त मुँहफट और निर्भीक होना है। इसी निर्भीकता से डर कर व्यंग्य से अकिला फुआ की उपाधि दी जाती है। अकिला फुआ का परिवार नहीं होता। बाकी महिलाओं की तरह दस तरह के झंझट नहीं होते। इस बात की ईर्ष्या से सामान्य महिलाएँ उन्हें ताना भी देती हैं (याद करें फणीश्वर नाथ रेणु की “लाल पान की बेगम” की मखनी फुआ) “बिरजू की माँ के आगे नाथ और पीछे पगहिया ना हो तब ना”01 कभी-कभी अकिला फुआ को भी घर परिवार की अभिलाषा होती है। किसी बच्चे की मालिश कर देना, दस्त लग रहे हैं तो अजवाइन की फंकी बना कर दे देना, किसी का आचार बनवा देना, शादी ब्याह में सारा इंतजाम देखना, गाँव भर के कार्यों पर नजर रखकर, वह अपनी इन अभिलाषाओं की पूर्ति कर लेती हैं। ऐसी अकिला फुआएँ हर गाँव में मिल जाएंगी।

अब बात करते हैं प्रीति प्रकाश की अकिला फुआ के बारे में। प्रीति ने पहले भी अकिला फुआ से संबंधित छोटे-छोटे प्रसंग अपने फेसबुक वाल पर पोस्ट किए हैं। यह प्रसंग तत्कालीन समस्याओं से संबंधित होते थे। 3 जुलाई 2023 की फेसबुक पोस्ट देखिए- “सर्वधर्म सर्वजाती यूपी बिहार एकीकृत पति सम्मेलन का आज आयोजन हुआ। जिसमें बहुमत से सभी पतियों ने यह निर्णय लिया कि बजाय अपनी पत्नियों को पढ़ाने के वह खुद पढ़कर एसडीएम बनेंगे। अकिला फुआ- ई मरकी लगौना सन के त बुझाता कि एसडीएम बनल दूल्हा बने खानी आसान बा।”02 “ईना मीना और अकिला फुआ” कहानी में अकिला फुआ न सिर्फ दो युवा लड़कियों को मानसिक शोषण से मुक्त करवाती हैं, बल्कि उनकी पढ़ाई भी नहीं छूटने देती। जैसा कि अकिला फुआ होती हैं, वह भी बहुत सख्त हैं। मोहल्ले वाले उन पर व्यंग्य करते हैं “अपना सुख चैन प्यारा हो, और अगर शहर में कोई भी दूसरा घर खाली हो, तो उस महिला के आसपास से गुजरो भी मत।”03 ईना और मीना द्वारा छेड़खानी की शिकायत करने पर, एक और ईना की माँ ने वापस घर आ जाने के हिदायत दी, तो वहीं दूसरी ओर अकिला फुआ संघर्ष करने की प्रेरणा देती हैं। ईना और मीना अनुसूचित जाति से आती हैं, इसलिए उनकी राह और कठिन है। उनके सपने, उनकी माँ के सपने रौंद दिए जाते, अगर अकिला फुआ नहीं होती। मोहल्ले में, घर में, बल्कि हर महिला में अकिला फुआ का होना आवश्यक है। रिश्तो में बंधी महिलाओं को भी अन्याय के खिलाफ संघर्ष करने की हिम्मत होनी चाहिए। परिवार और बाल-बच्चों वाली महिलाएँ भी अन्याय के खिलाफ बोलें। अपनी बेटियों को चुप रहना और सहना नही बल्कि बोलना और गलत का विरोध करना सिखाएँ। आज के समय में भी अकेली औरत को अपने निर्णय स्वयं लेते देखकर, उसे दबाने के लिए समाज निकल पड़ता है। अकिला फुआ जैसी दबंग महिला को देखकर, चढ़बाक, झगड़ालू, घमंडी कह कर उसे हतोत्साहित करता है। ऐसे समय में हम सबको अकिला फुआ बनने की आवश्यकता है। छोटे या बड़े अन्याय का सामना करना है। संघर्ष करना है ।प्रीति प्रकाश की कहानी यही संदेश देती नजर आती है।

संदर्भ सूची

1. “लालपान की बेगम”, फणीश्वरनाथ रेणु https://hindwi.org

2. प्रीति प्रकाश की फेसबुक वाल 03-07-2023

3. “ईना मीना और अकिला फुआ” हंस पत्रिका, अंक- दिसम्बर 2023

सुनीता मंजू

उम्मीदों के आतिशदाने

विभा रानी के कहानी संग्रह ‘आतिशदाने’ में मुस्लिम विमर्श की कहानियाँ है। अन्य विमर्शों से भिन्न मुस्लिम विमर्श वास्तव में मुसलमानों विशेषकर भारतीय मुसलामानों को जानने समझने का विमर्श है। अन्य विमर्श जहां शोषण के  विरोध, विद्रोह और सहानुभूति अथवा अधिकारों के साथ शुरू होते हैं आगे बढ़ते हैं मुस्लिम विमर्श के अंतर्गत हम यह जानने का प्रयास करते हैं कि हमारे भारत में उनका धर्म, आचार विचार त्योहार आदि का संबंध भारतीय परिवेश से किस तरह से संबंधित है, उनका इतिहास उनका विकास और भारत में उनकी स्थिति का अध्ययन मुस्लिम विमर्श के प्रमुख बिंदु है । मुस्लिम विमर्श मुस्लिम तथा गैर मुस्लिम चिंतक या लेखक द्वारा किया जाता है ।  गैर मुस्लिम उनकी स्थिति किस रूप में जानते समझते और व्यक्त करते हैं जबकि मुसलमान के लिए उनके सोचने  समझने का मनोवैज्ञानिक तरीका क्या है। वास्तव में यह मुस्लिम समाज का मनोवैज्ञानिक अध्यन भी है । कुल मिलाकर भारतीय संदर्भ में मुस्लिम विमर्श की वैचारिकी उनकी पहचान और अस्तित्व पर आए संकट पर चिंता व्यक्त करती है जिसके अंतर्गत माना जाता है कि उन्हें मुख्य धारा से जानबूझकर काटा जाता है जबकि देश के विकास में भी बराबर के सहभागी रहे हैं।जो मुसलमान भारत में जन्मे हैं शतकों से यहां रह रहे हैं वे भारतीय क्यों नहीं माने जा सकतें, उनके देश-प्रेम पर चिह्न क्यों उठाए जाते हैं और विशेषकर विभाजन के बाद उन्हें अपनी  भारतीयता बार-बार प्रमाणित क्यों करना पड़ती है। इन सभी प्रश्नों आलोक में यदि हम इन कहानियों का अध्ययन करते हैं तो पाते हैं कि ये कहानियाँ भारतीय मुसलमान को जानने समझने का एक महत्वपूर्ण जरिया बन सकती  है क्योंकि जैसा कि खुद विभा रानी भूमिका में लिखती है कि वे  बचपन से ही मुस्लिम समाज और संस्कृति से  जुड़ी रही है इसलिए उन्होंने कभी अपने भीतर इनके प्रति किसी तरह का अलगाव अनुभव नहीं किया कि यह हमसे कहीं अलग है। खानपान में बर्तन अलग रखना जैसे कुछ भेदभाव को यदि अलग कर भी दिया जाए, तो भी इनके साथ हमेशा एक मजबूत रिश्ता रहा है। खान साहेब कहानी हिन्दू चरना और अन्य गाँव वालों के साथ इस मुस्लिम परिपार के साथ पनपते विकसित होते संबंधों को बेहद खूबसूरती के साथ प्रस्तुत करती है कि भारत के लोग साझी संस्कृति, अनेकता में एकता में विश्वास रखते रहे हैं लेकिन विभाजन ने लोगों के मन मस्तिष्क के साथ साथ साहित्य में भी विभाजन कर दिया।

जबकि आरंभ से ही हमारे हिंदी साहित्य में मुस्लिम लेखक (अब्दुल रहमान, जायसी, ख़ुसरो) तथा कथा साहित्य में मुस्लिम पात्र नजर आते रहे हैं लेकिन धीरे-धीरे हिंदी साहित्य में उनकी स्थिति समाप्त होने लगी ऐसे मैं गैर-मुस्लिम द्वारा एक पूरा कथा संग्रह मुस्लिम विमर्श को समर्पित करना  हिंदी साहित्य के लिए महत्वपूर्ण देन है । मुस्लिम समाज की इन इन कहानियों के अध्ययन से हमें है समझ आता है कि सभ्यता और संस्कृति का संबंध कभी भी धर्म के साथ बांधकर नहीं देखा जा सकता बल्कि संस्कृति राष्ट्र की धरोहर है जो इतिहास के साथ बनती, बिगड़ती और विकसित होती रहती है उस पर किसी एक किसी धर्म जाति और संप्रदाय का आधिपत्य नहीं है हमारे देश में अब फ्रेंच, तुर्क, मुगल, अंग्रेज अनेक जातियां धर्म संप्रदाय के लोग आए और यही की मिट्टी में रच-बस गए देश में वे अपनी इच्छा अनुसार रहे तो हमारे देश ने भी उन्हें अपनाया और धीरे-धीरे साझा संस्कृति का विकास होने लगा पर अंग्रेजों ने भाषा के आधार पर  फूट डालो शासन करो से विभाजन की नीव बनाई । आज उस पर विभाजन की बहुत बड़ी बिल्डिंग खड़ी हो चुकी है और इस बिल्डिंग की दीवारों को तोड़ना आसान नहीं लग रहा इसलिए भी आज मुस्लिम विमर्श की जरूरत है ताकि इन दीवारों को तोड़कर पुन: एक  साझा संस्कृति विकसित हो जिसमें सभी का समान विकास हो । पर साम्प्रदायिकता और अलगाववादी विचारधाराओं ने दंगो की आग ने विकास की गति को अवरुद्ध कर दिया “लौटेगी सबीहा ?” कहानी हो या ‘इसी देश के इसी शहर में’ वर्ष 92,9/11 या 13 दिसम्बर के कुपरिणामों के बाद इनकी स्थितियों को मार्मिकता से उभरने का प्रयास करती है । मुस्लिम होने के कारण सईद साहब को घर नहीं मिल पा रहा तो आबिद मियां और सबीहा जैसे परिवार मुंबई शहर के विकसित परिवेश को छोड़ गाँव के पिछड़ेपन की और लौटने को विवश है

जब मुस्लिम स्त्री की बात आती है तो हमारे सामने बुर्के में कैद स्त्री का बिंब आता है जहाँ हम उसका चेहरा भी नही देख पा रहे उसे समझेगे कैसे ? इसी देश के इसी शहर में की टीचर नबीला को यह सुनना पड़ता है कि नजर रखो इस पर जाने हमारे बच्चों को क्या क्या पढ़ाने लग जाए या तुम ये बुर्का उतार क्यों नहीं देती ताकि उनकी औरतों जैसी लगो !  ऐसी स्थिति में मुस्लिम स्त्री को जानना समझना और भी कठिन काम है तो लेकिन विभा रानी के स्त्री पात्र अपनी मूल प्रकृति के साथ ही आते हैं जो जहां वे पितृसत्ता के साथ साथ से धार्मिक कट्टरता से भी संघर्ष कर रही हैं। उनके स्त्री पात्र अपनी सादियों की खामोशी को तोड़ रही है अब और अत्याचार सहने को तैयार नहीं बल्कि जा ज़रीना की पति के साथ हाथा-पाई होती है तो वह बराबरी का मुकाबला करती है और पुलिस में खबर करती है । बेमुद्दत कहानी की बड़ी बी अपनी बहू शब्बो को इन रूढ़ियों के खिलाफ लड़ने के लिए मानसिक रोप से तैयार कर रही है जबकि पितृसत्ता को बनाए रखने में  सास का महत्वपूर्ण योगदान रहता है     औरतें, अक्से वज़ूद, कठपुतली, रोल में परवीन अजब शीला की गज़ब कहानी स्त्रियां भी अपनी अस्मिता, आत्म चेतना और अस्तित्व दिशा के प्रति जागृत हो रहे हैं अपने साथ होने वाले भेदभाव शोषण अत्याचार के प्रति कहीं  विद्रोह करतीहैं कही बच्चों की खातिर समझौता लेकिन अपनी आवाज़ उठने की पुरज़ोर कोशिश में लगी हैं ।इन कहानियों में पिता तो बदल रहें हैं लेकिन पति का स्वरूप अभी भी कट्टरता लिए हुए है लेकिन ये औरतें पितृसत्ता विशेष कर धार्मिक कुरीतियों से रूढ़ियों से सीधे टक्कर ले रहीं हैं धर्म के नाम पर होने वाले अपने साथ अनाचारों पाखंडों के के खिलाफ संघर्ष कर रही है

किसी को जानने के लिए जब  तक आपके भीतर जिज्ञासा नहीं होगी आप जोखिम नहीं ले सकते क्योंकि जिज्ञासाएं आपको उत्तर खोजने के लिए विवश करती है, आपको साहसी बनती है अगर दूसरे को जानने समझने से पहले ही यदि आपकी आंखों पर पूर्वाग्रह के चश्मा चढ़ा दिया जाएं तो असुरक्षा, संदेह, भय और विश्वास ही पनपता है जो आपको आगे नहीं बढ़ने देता। खान साहेब के चरना नामक कपड़े देखकर समझ जाता है और मुस्लिम को अपने तांगे में नहीं बैठाता लेकिन अनजाने खान साहेब को जा लेकर जाता है तो उनसे जुड़कर उसके तमाम पूर्वाग्रह टूट जाते है विभा रानी के इस कहानी संग्रह का मकसद भी यही है कि हिन्दू मुस्लिम एक दुसरे के प्रति पूराव्ग्र्हों की दीवार को ढहा दें । यह समझना बहुत जरूरी है कि किसी भी समाज विशेष में रहने वाले लोगों का मनोविज्ञान उसके सामाजिक परिवेश के आधार पर बनता है इसके लिए आपको उनके भीतर झांकना होता है उनके व्यक्तित्व से जुड़ना होता है जब तक आप उनसे बात नहीं करेंगे उनके साथ नहीं रहेंगे आप नहीं जान पाएंगे जब आपको पहले ही समाज बता दिया जाता है कि इसे दूर रहना है फल से दूर रहो उससे दोस्ती मत करो उनका खाना नहीं खाना है तो बात कैसे आगे पड़ेगी विमर्श तो बहुत दूर की बात है। लेकिन अगर जैनेंद्र त्यागपत्र लिख सकते हैं विष्णु प्रभाकर आवारा मसीहा लिख सकते हैं प्रेमचंद ठाकुर का कुआं लिख सकते हैं तो विभा रानी आतिशदाने    लिख सकती है परदे के पीछे छिपी औरत के मन में झाँक सकती है,यह वास्तव में लेखक की प्रतिबद्धता से जुड़ा प्रश्न है क्योंकि लेखक का कोई धर्म नहीं होता

संस्कृति का संबंध मात्र ईद या होली दीवाली से नहीं होता । आज़ाद भारत में अगर हम देखे तो पायेंगे कि किस तरह से धीरे-धीरे हर राज्य, शहर मोहल्ले में हिंदू और मुस्लिमों के मोहल्ले अलग होने लगे अब जब मोहल्ले अलग होंगे तो ये दोनों एक दूसरे की संस्कृतियों को जानेंगे समझेंगे कैसे? और फिर उनके बारे में कैसे लिखा जायेगा ।    विभाजन की त्रासदी पर हमने खूब कहानी पढ़ी है और उनके भीतर के दर्द को महसूस किया है लेकिन वर्तमान समय में जिस तरह सांप्रदायिकता का रंग मनुष्यता पर हावी हो चुका है, ऐसे में मुस्लिम विमर्श की कहानी लेकर आना और यथा स्थिति को हमारे सामने रख देना आसान काम नहीं था लौटेगी सबीहा? कहानी विभाजन के दृश्यों की पुनरुक्ति लगता है जबकि वह आज़ाद भारत के बड़े शहर मुबई की कहानी है इसी तरह खान साहेब कहानी पढ़ते हुए आपको यदि रामवृक्ष बेनीपुरी का संस्मरण सुभान खान याद आ जाए आपकी संवेदनाएं आंदोलित होने लगे  तो मान लीजिये विभा रानी का प्रयास सफल है दोनों ही कहानियों में धर्म से ऊपर एक सांस्कृतिक पक्ष सामने लाती है ।    

कहानी “लौटेगी सबीहा?’ शीर्षक में भले ही प्रश्न चिह्न है लेकिन कहानी का अंत उस आशा के साथ होता है जो हमें जीने की, संघर्ष की, ताकत देता है कहानी पढ़ते हुए एक बार को लग सकता है कि विभाजन के दौरान की कहानी है वही भय के दृश्य वही असुरक्षा का माहौल, अविश्वास, भविष्य का संशय ? यह कैसा विभाजन हुआ जो आज तक सभी के मनों को विभाजित किए हुए हैं ?  सबीहा के परिवार ने इस मुंबई में और मुंबई ने सबीहा को पनाह दी, तरक्की दी, जीवन जीने का हौसला दिया लेकिन धर्म और राजनीति का ऐसा चक्रव्यूह भी रचा गया जिसमें मानवीयता पिस रही है, आज हर आम और खास इसमें फँसते चले जा रहे हैं। गाँव में  जहां सबीहा की ननदें तीसरी जमात में घर पर बैठा दी गई थी शर आकर तरक्की पसंद आबिद मियां ने उन्हें पढ़ाया लिखाया इस काबिल बनाया कि आज वे अपने पैरों पर खड़ी है , एक सामान्य सा परिवार स्वाभाविक गति से विकास कर रहा था लेकिन अचानक इस गति में ब्रेक लग गया ‘सांप्रदायिकता’ ने एक तरक्की पसंद शहर को भी नहीं बख्शा। मुंबई के दंगों ने सारा परिदृश्य बदल दिया। वे सपरिवार वापस गांव की ओर लौट रहे हैं । वापस लौटने की कोई उम्मीद है? हां है! यह उम्मीद लेखक ने उस टैक्सी वाले के रूप में दिखाई है जिसकी हँसी में पहले पूर्वाग्रह के चलते कांइयापन झलक रहा था लेकिन जब उसने गणपति बप्पा मोरया कहते हुए “उनलोगों” से कहा कि यह अपनी ही फैमिली है और वह आगे बढ़ गए ! आज सबीहा यह सोच रही है कभी तो हम वापस लौटेंगे, फिर विकास का मंजर देखेंगे । कहानी में ‘लौटना’ वस्तुतः हिंदू मुस्लिम के पहले- से संबंधों की खोज है , जिज्ञासा जरूर है जिस पर प्रश्न चिन्ह है लेकिन अंत में एक आशा भी है।”

संग्रह की प्रमुख कहानी ‘आतिशदाने’ पढ़ते हुए लगेगा ज़रीना इकबाल की प्रेम कहानी है, जिसमें इकबाल और ज़रीना विवाह के दायितों से भटक गये लेकिन भटक कर जाएंगे कहाँ? रहना तो इसी समाज में है! यह कहानी विवाह से थके-पके,संबंधों से ऊबे हुए दो लोगों के संबंधों की कहानी है जिसमें इकबाल की पत्नी या बेगम के रूप में तमाम पत्नियों के बेचारगी को भी हमारे सामने रखा है तो उनके स्वाभिमान की भी रक्षा की गई है। इनमें ख़ास यही है कि ये विभा रानी की क़लम से निकले पात्र हैं। एक टेनिस कोर्ट में बॉल से अकेले खेलते हुए खिलाड़ी की तरह विभा रानी संवादों से खेलती हैं, पात्रों के सूक्ष्म से सूक्ष्म भाव, मनोभाव और उनकी संवेदना को उजागर करतीं हैं इसलिए हर बार ‘पति-पत्नी और वो’ सभी अपनी-अपनी जगह सही लगते हैं क्योंकि ‘चोट’ बिल्कुल सही जगह लग रही है। लेखनी का बल्ला हर संवाद को चरित्र की कसौटी पर खरा उतरा प्रतीत होता है और तब आप ‘व्यक्ति’ से होते हुए पितृसत्तात्मक समाज की संरचना पर पुनः विचार करने लगते हैं जहाँ शौहर या बेगम/ पति-पत्नी एक ही साँचे में कैद कर दिए जाते हैं जिसमें पड़े-पड़े व्यक्तित्व सड़ जाते हैं, ताजी हवा के झोंके के लिए वे तरस जाते हैं, कोई नन्हा सा रोशनदान भी नहीं होता जिसकी धूप से उनका कोई चारित्रिक विकास ही हो पाए लेकिन जहाँ कहीं थोड़ी भी खुली हवा का झोंका दिखाई पड़ता है, मर्द अंगड़ाई लेने लगता है लेकिन ‘घर’ नहीं छोड़ना चाहता दोनों हाथों में लड्डू लेना चाहता है और औरत की बात करें तो अनामिका के शब्दों में वह एक ‘दरवाजा’ होती है जिसे जितना पीटा जाए वह उतना खुलती जाती है ‘ज़रीना’ एक दरवाजा है वह खुलती तो है, लेकिन अपनी शर्त पर! और यही उसके चरित्र की खूबी भी है, अब वापस उसी दरवाज़े के भीतर क़ैद नहीं होना चाहती, प्रेम की स्वच्छंद उड़ान और विवाह की कैद दोनों पक्षों को अपने-अपने ढंग से समझता है।यह एक बहुत ही दिलचस्प रोचक और विचारोत्तेजक कहानी है  आप ज़रीना की मोहब्बत और नफरत दोनों की दिलेरी पर हैरान हो सकते हैं इकबाल की तरह इकबाल से मोहब्बत की तो वह भी उतनी ही शान से और शहर को हवालात भेजा वह भी इतनी हिम्मत से।

रोल में परवीन रोल मतलब भूमिका में विभा बताना चाहती है आपकी पहचान आपके कर्मों से होती है इसलिए जब परवीन तमाम कटाक्षों को सुनकर भी अन्य लड़कियों को अपनी समझदारी और बहादुरी से गुंडों से बचा लाती है तो सभी का नजरिया बदल जाता है आज वह हीरो बन चुकी थी। ये दो साल कहानी के मिस्टर शौकत को जब नौकरी के दो साल और मिल जातें हैं तो वे खुश होने के बजाये चिंता में पड़ जाते हैं उन्हें याद आतें है अपने दोनों बेरोजगार बेटों के उदास चेहरों के साथ-साथ लाखों युवकों की बेरोजगारी। कहानी सिक्के का दूसरा पहलू हमारे सामने रखती है। हालांकि खान साहेब की ही तरह शौकत बाबू का किरदार आपको आदर्शवादी या फिल्मी लग सकता है जो जरूरत से ज्यादा नेक बेहद अच्छा नजर आता है लेकिन क्या इन पर सिर्फ इसलिए विश्वास न किया जाए क्योंकि ये मुस्लिम हैं? शौकत साहब के दोनों बेटे भी नेकमंद दानिशमंद है। यह कहानी भी इस यकीन और आशा के साथ खत्म होती है यह हमारे मुल्क के ये आफताब मेहताब और सितारे हैं उनके वजूद के चिराग को आबाद कर, इनके आसमान में आबाद रहे । खान साहब की नजरों में भी धर्म का इतना ही है कि लोग अपने काम में पूरा करें ईश्वर पर यकीन करें।

बेमुद्दत कहानी मुस्लिम समाज में इद्दत जैसी रूढ़ परम्परा का विरोध कराती है मुस्लिम औरतों की विधवा होने पर 4 महीने 10 दिन का अंधेरे कमरे में बिताने होते हैं जिस दौरान वे किसी पुरुष के संपर्क में नहीं आती लेकिन बड़ी बी को उनका 8 महीने का पोता जो की देख लेता है और उसे नए सिरे से इद्दत शुरू करनी पड़ती है। बड़ी बी बेटी जाहिदा माँ के प्रति सहानुभूति नहीं रखती लेकिन बहू शब्बो सास के लिए ननद के आगे लगभग गिड़गिड़ा रही है । ‘अमी की उम्र देखो उनके सेहत देखो यह दोहरी इद्दत उनके लिए क्या जायज है। पर बेटी अम्मी की तकलीफ को समझने की बजाय  दुगना कर रही है तुम औरत औरत के दर्द को बेहतर समझ सकती हो पर नहीं समझ रही हो। शब्बो कहती है ‘हम औरतें ही औरतों की दुश्मन है’ यह कैसा महा वाक्य है जो भाईचारे के सामने बहनापा सखियापा या सिस्टर हुड के महत्व को सामने लाना चाहता है कठपुतली कहानी की निलोफर विवाह की डोरी से बंधी नाज़ुक लड़की के दर्द को बयां कराती है। निलोफर तरह-तरह के डोरियों में फँसी हैं, यह डोरियां संबंधों की, रूढ़ियों की, जिम्मेदारियां की हैं ।

बेवजह कहानी लिखने की बहुत वजह हमारे सामने आती हैं जैसे यह कहानी लेखन की प्रतिबद्धता पर प्रश्न उठाती है  इसीलिए विभा रानी कहती है कि मैं जो यह कहानी कह रही हूं उससे आपको हँसी  आए तो हँस लेना है रोना आए तो रो लेना यदि मूड ऑफ हो तो होने दीजिए लेकिन यह मेरी मेहरबानी है विनती है प्रार्थना है गुजारिश है कि इन आफसानो को सुनकर अपना आपा मत खोइये क्योंकि यह तो एक दास्तान गोई है। बेवजह कहानी लिखने का मकसद अगर हम समझने की कोशिश करें तो सबसे पहले तो लेखक और लेखन की प्रतिबद्धता पर प्रश्न चिह्न  उठाती हैं जनता से अपील करती हैं कि अफसाना या अफवाह पर यकीन ना करो अपनी विवेक का इस्तेमाल करो क्योंकि  कल्पना की उड़ान पर आप तो हकीकत के दंगे फोड़ देंगे अपना आपा खो बैठेंगे  कहानी बेवजह लिखने की दूसरी वजह है कि जब तक आपकी जरूरत है आप एक हैं यानी संगी-साथी की जरूरत बनी रहने तक आप धर्म, जाति, संप्रदाय के झंझट में नहीं पड़ते लेकिन जैसे ही ज़रूरतें पूरी हो जाती हैं आपको धर्म, जाति, संप्रदाय सब नजर आने लगते हैं जैसे कहानी में  दो राहगीर एक ही रास्ते चलते जा रहे हैं ये राहगीर इस धरती संसार के प्राणी है जिनकी मंजिल एक है यानी मृत्यु ही सबका अंतिम लक्ष्य यदि सबका एक काशी है तो रास्ते में टकराहट क्यों? कहानी का तीसरा मकसद जो प्रत्यक्ष नजर नहीं आता लेकिन देश के विकास पर अपनी नजर गढ़ाते हुए सरकार की योजनाओं पर व्यंग करना क्योंकि गांव में भी आज विकास के नाम पर कुरूपता,अभाव, गंदगी और साम्प्रदायिक दंगे बढ़ते चले जा रहे हैं जैसे ‘गांव है क्या बाबा आदम जमाने का है जिसमें बिजली के तार है बिजली नहीं नलकूप दिखते हैं नाल में पानी नहीं और चौथा और सबसे महत्वपूर्ण मकसद है कि भगवान ईश्वर अल्लाह परम शक्ति जो भी है वह मनुष्य मनुष्यता मानव या मानवता में भेदभाव नहीं करता यह तो मनुष्य ही है जिसे ईश्वर का बटवारा कर दिया वह कहता है मेरी मर्जी क्या कहीं तुम्हारे शास्त्र में लिखा है कि हम तुम्हारे भगवान का नाम नहीं ले सकते? कहानी काल्पनिक थी मगर दंगा सचमुच का हो गया ।

अपने लोग  कहानी बस को देश के प्रतीक के रूप में हमारे सामने रखती है यह बस जिसमें सब सफर कर रहे हैं लेकिन सभी एक दूसरे को अविश्वास की नजर से देख रहे हैं। एक धर्म विशेष के बच्चे बड़े होकर क्या बनेंगे और दूसरे धर्म के बच्चे बड़े होकर क्या बनेंगे यह पहले से ही सब निर्धारित कर दिया गया जैसे माँ बाप कहते है मेरा बेटा डॉक्टर बनेगा बेटे से कोई नही पूछता कौन आतंकवादी बन जाएगा कौन देश भक्त ये कपड़ों से बिंदी सीधे पल्ले की साड़ी और सिंदूर से तय कर दिया जाता है ।  घटना प्रधान इस कहानी के दृश्य हमारे मस्तिष्क में उतरते चले जाते हैं और हृदय को आंदोलित  करते हैं। कहानी बताती है कि हम कितने असहिष्णुता और असंवेदनशील होते जा रहे हैं ।  इस कहानी में विभा रानी शाहरुख खान का उदाहरण देता है डॉक्टर कलाम का उदाहरण देकर सप्शत करना चाहती हैं कि लोकप्रिय हस्तियों के साथ है कि हम ऐसे दौर में जी रहे हैं कि यह हिंदी ह्यूमुलेशनसे गुजरना पड़ता है तो आम मुसलमान के मानसिक आघातों का क्या जिनसे वे पल पल गुजरतें है!

आतिशदाने कहानी संग्रह आपको सिर्फ इसलिए नहीं पढ़ना चाहिए कि यह मुस्लिम विमर्श की पृष्ठभूमि तैयार करती है बल्कि ये कहानियां आपको चेतना के स्तर पर संवेदनशील बनाती हैं मानवीयता का सबक सिखाती है, वर्तमान परिदृश्य में सोचने समझने के लिए भी तैयार करतीं हैं जिसे हमने नज़रन्दाज़ किया हुआ है। भाषा के स्तर पर भी देखे तो उर्दू को थोपा नहीं गया पात्र स्वाभाविक ढंग से हिन्दुस्तानी का प्रयोग कर रहें पात्रों की संकल्पना भी स्टीरियोटाइप नही अपने स्वाभाविक स्वरुप में विकसित किये गयें है जिन्हें अलग से मुस्लिम जामा पहनाने की कोशिश नज़र नहीं आती । पात्र आदर्शवादी और यथार्थवादी दोनों ही तरह के है लेकिन मंतव्य को सिद्ध करतें है । आतिशदाने की भी विचारोत्तेजक कहानियाँ बहुत सूक्ष्मता से हमें समझाती हैं हमें मुस्लिम विमर्श की क्यों आवश्यकता है!    

जनादेश की दिशा को कब समझेगा विपक्ष

पिछले 20 दिनों में दर्ज़नो इलाकों में मुसलमानों पर भीड़ द्वारा बर्बर हमले किए गए हैं.इन हमलों का दायरा अखिल भारतीय है,क्या दक्षिण क्या उत्तर,हर तरफ़ ये आग फैलती ही जा रही है.हिमांचल,तेलंगाना, मध्यप्रदेश,छत्तीसगढ़, गुजरात,उत्तर प्रदेश,हर जगह एक ही तरह का पैटर्न हैं मुसलमानों को सबक़ सिखाना,हत्या कर देना,घर गिरा देना या दूकान लूट लेना.
अगर आप ध्यान से देखें,तो क्या इस मसले पर भारतीय महादेश के किसी कोने से कोई आवाज उठ रही है-बिल्कुल नही-इतने गंभीर मसले पर नये जनादेश के बावजूद,नयी संसद में भी पुराने तरह का ही सन्नाटा पसरा हुआ दिख रहा है,सदन के अंदर संविधान तो लहराया जा रहा है,संविधान को बचा लेने की कसमें तो खायी जा रही हैं.पर सड़क पर मुसलमानों की हत्या भी, आराम से होने दिया जा रहा है,सहजता से दुकाने लूटने दी जा रही है,और उनके घरों को बुल्डोज कर दिया जा रहा है.यह सब ऐसे हो रहा है,जैसे हिंदुत्व की ताकतों को यह संवैधानिक अधिकार मिल चुका है कि वे मुसलमानों को उनकी हद में रख सकें,उन्हें उनकी हैसियत बता सके.
यह सब उन राज्यों में भी,उतनी ही बर्बरता से होने होने दिया जा रहा है,जहां पर विपक्ष की सरकारें हैं, हिमाचल में कांग्रेस की सरकार है और नाहन में संगठित भीड़ ने पीड़ित की दुकान लूट ली,बहुत सारे लोगों को नाहन छोड़कर भागना पड़ा,पर हिमाचल के मुख्यमंत्री ने अभी तक अपना मुंह नही खोला है,मोहब्बत की बंद पड़ी है.
तेलंगाना में भी,संगठित भीड़ नारे लगाती हुई,तैयारी के साथ आती है और कुर्बानी की तैयारी कर कर रहे मुसलमानों के एक समूह पर हमला कर देती है,दर्जनों लोग बुरी तरह घायल होते हैं,उन्हें अस्पताल ले जाया जाता है,अस्पताल के बाहर भी,नफ़रती भीड़ को हिंसक नारे लगाने दिया जाता है, दहशत पैदा करने दिया जाता है,इस मसले पर भी संविधान की कसमें खाने वाले लोकप्रिय कांग्रेसी मुख्यमंत्री, बोलना जरूरी नही समझते हैं,यहां भी मोहब्बत,नफ़रत का जबाब देती हुई नही दिखती है.
उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ में एक मुस्लिम नौजवान पर चोरी का इल्ज़ाम लगाया जाता है,एक संगठित भीड़ द्वारा उसे पीट-पीटकर मार दिया जाता है,पूर्वांचल में जहां चुनाव में जनता ने भाजपा को इस बार जोर का झटका दिया है वहां पीछले 15 दिनो के अंदर,दर्जन भर मसीही समुदाय के लोगों को धर्मांतरण का फर्जी आरोप लगा जेल भेज दिया गया है. वही सारा पैटर्न यहां भी दोहराया जाता है,यह सच है कि यहां पर योगी की सरकार है,जहां पर इस तरह के हमले लगातार होते ही रहते हैं..
पर यह भी तो एक नया सच है,कि अभी-अभी इस राज्य में इंडिया गठबंधन,ताकतवर होकर उभरा है,खासकर समाजवादी पार्टी को उत्तर प्रदेश की सेकुलर जनता ने खासकर अल्पसंख्यकों ने,नफ़रती राजनीति को शिकस्त देने के मकसद से,लगातार अलगाव झेलते हुए भी,भारी समर्थन दिया है,और कांग्रेस को भी मजबूत किया है..
ऐसे में लोग यह मानकर चल रहे थे,कि अब उत्तर प्रदेश में भी सपा व कांग्रेस की देह भाषा बदलेगी,वे अपने कोर्स का करेक्शन करेंगे,अपनी प्राथमिकताओं में परिवर्तन लाएंगे,पर यह भी होता हुआ नही दिखा है.
जनता का जनादेश,बेहद स्पष्ट था,भारतीय मतदाताओं ने कोई द्वंद नही रहने दिया.
संविधान,सामाजिक न्याय और सेकुलरिज्म के पक्ष में, जनता ने 18वीं लोकसभा चुनाव को एक जनमत संग्रह में तब्दील कर दिया था,हर तरह की विभाजनकारी और नफ़रती राजनीति को जोर का झटका देते हुए सामाजिक न्याय के बुनियादी प्रश्नों को संभवतः पहली बार चुनाव के केंद्र में ला दिया था.
आप इस जनादेश को इस तरह से भी समझ सकते हैं कि नफ़रत,घृणा व विभाजन की राजनीति को कमजोर किए बगैर संविधान,सामाजिक न्याय, आरक्षण व रोजगार के प्रश्न को केंद्र में लाया ही नही जा सकता था,और फिर इस चुनाव में यही हुआ भी,चरण दर चरण नफ़रती तापमान कम होता गया और सामाजिक-आर्थिक-धार्मिक असमानता से पीड़ित समुदायों की एकता बढ़ती ही गई,जिसके चलते हिंदुत्व के गढ़,अयोध्या सहित आस-पास की सभी सीटें भाजपा हार गई,वाराणसी के आस-पास की ज्यादातर सीटों को भी भाजपा ने खो दिया,और खुद ब्रांड मोदी भी हारते-हारते बचे,
इस चुनाव के जरिए जनता ने स्पष्ट इशारा कर दिया कि भारत की जो, बहुसांस्कृतिक,बहुधार्मिक, बहुजातीय या बहुभाषी विविधता है,वो उसकी कमज़ोरी नही उसकी ताकत है,यानि भारतीय गणतंत्र की केंद्रियता,बहुसंख्यकवाद में नही बल्कि बहुलतावाद में है,और सामाजिक न्याय व धर्मनिरपेक्षता असल में वो दो बुनियादी खंबे हैं,जिन्हें कमजोर करने की कोशिश, भाजपा लंबे समय से कर रही थी,जिसके चलते ही भारतीय मतदाताओं ने उसे दंडित कर, एक नया एक संदेश दिया है.
पर इस संदेश को विपक्ष कैसे ग्रहग कर रहा है,जब हम इसकी पड़ताल करने की तरफ बढ़ते हैं,तो यहां भी उत्साह के बिंदु कम मिलते हैं
लंबे समय से मुख्यधारा के विपक्ष का एक हिस्सा बहुसंख्यक सवर्ण हिंदू दायरे के अंदर ही राजनीति करता रहा है,और इस लिए सामाजिक न्याय और सेकुलरिज्म के सवाल को केंद्रिय प्रश्न मानते-समझते हुए भी,बार-बार सतही रुख़ लेता रहा है,इन बेहद गंभीर मसलों के गहराई में जाने से बचता रहा है,द्विज जातियों को नाराज़ करने का साहस नही जुटा पाता है,इसी लिए आप देखेंगे कि उन्हें A To Z का नारा देना पड़ता है, इडब्ल्यूएस का समर्थन करना पड़ता है और पसमांदा व समग्र अल्पसंख्यकों के सवालों पर चुप रहना पड़ता है.हालांकि इस विचार का असर विपक्ष के दूसरे हिस्से पर भी है,पर विपक्ष के इस दूसरे हिस्से का एक वैचारिक संकट भी है.
विपक्ष का यह दूसरा हिस्सा,मजदूर-किसान आंदोलन के ताकतवर विस्तार के जरिए,जाति और सांप्रदायिकता के प्रश्न को हल कर लेने मंसूबा पाले रहता है, बुनियादी बिंदु के बतौर इन मुद्दों को देखता ही नही है,सो अलग से इन प्रश्नों पर उसके पास कोई कार्यक्रम ही नही होता है.इसी लिए यह हिस्सा भी भारतीय गणतंत्र के इन दो बुनियादी मुद्दों के समर्थन में तो रहता है,पर इन्हें सड़कों का केंद्रीय मुद्दा बनाने या जनता के बीच ले जाने बचता रहता है.
18 लोकसभा चुनाव को भी अगर ध्यान से देखने की कोशिश करें तो पाएंगे कि भारतीय मतदाताओं ने तो जरूर अपने सामुहिक प्रयासों के जरिए,सामाजिक न्याय और धर्मनिरपेक्षता के सवालों को,चुनाव के केंद्र में ला दिया था,पर विपक्ष अपने वैचारिक-राजनीतिक संकटों के चलते,जनता के इस मूड को,ठीक-ठीक समझने में असफल रहा.विपक्ष यह बिल्कुल ही नही समझ पाया कि जिस समय सामाजिक अस्मिता का प्रश्न चुनाव के केंद्र में आ रहा था,ठीक उसी समय धार्मिक अस्मिता का प्रश्न उसी अनुपात में हाशिए पर जा रहा था.विपक्षी नजरिए में इस असंतुलन के चलते ही,कई चरण बीत जाने के बाद,सामाजिक अस्मिता के प्रश्न को तो जरूर एक स्तर पर संबोधित करने की कोशिश की गई,पर अंततः यह चुनाव भी विपक्ष द्वारा हिंदू दायरे में रह कर ही लड़ा गया.
ज्यादातर विपक्ष के घोषणापत्रों में,भाषणों में मुसलमानों-ईसाइयो का नाम तक लेने से परहेज़ किया गया.उन्हे सार्वजनिक दायरे से लगभग ओझल कर दिया गया.
चुनाव के बाद भी समूचा विपक्ष अपनी पुरानी रणनीति पर ही क़ायम है जब कि भारतीय मतदाताओं ने अपना पाठ्यक्रम बदल लिया है,जनता अपने मूल व बुनियादी प्रश्नों की ओर लौट रही है.उसे इतंजार है और उम्मीद भी है कि भारत का विपक्ष भी अपने पुराने पाठ्यक्रम को बदलेगा,एक नया कोर्स तैयार करेगा,पर ऐसा दिख नही रहा है.
ये अनायास नही है कि ठीक चुनाव के बाद लिंचिंग की घटनाएं बढ़ गई है और पटना हाईकोर्ट ने अतिरिक्त आरक्षण को रद्द कर दिया है.
असल में दोनो ही मसलों पर विपक्ष को चेक किया जा रहा है,कि क्या उनकी सड़कों पर उतरने की या जनता के बीच जाने की कोई तैयारी है,पर ऐसा कुछ भी नही दिख रहा है, विपक्ष की ऐसी कोई तैयारी नही दिख रही है.
यह तय है कि आने वाले समय में भाजपा,विपक्ष के सामने इस तरह की चुनौती बार-बार पेश करती रहेगी,क्यों कि उसे ये अंदाजा है कि बदली हुई परिस्थितियों के बावजूद,विपक्ष,इन चुनौतियां का सामने आकर,आगे भी जबाब देने से बचता रहेगा.
और वास्तव में अगर आने वाले समय में भी विपक्ष अपनी इसी पुरानी रणनीति पर ही चलता रहा,जनादेश के साथ चलने की हिम्मत नही जुटा पाया,तो निश्चित तौर पर संघ-भाजपा के लिए ताकतवर पुनर्वापसी की संभावना बराबर बनी रहेगी,जो कि भारतीय गणतंत्र के लिए बेहद चिंता का विषय होना चाहिए.