रीतिकालीन कविता और स्त्री यौनिकता विमर्श
हँसना है तो थोड़ा रो लें: मैं वापस आऊंगा’
“भक्तिकालीन हिंदी साहित्य में स्त्री-अस्मिता कीअभिव्यक्ति : एक आलोचनात्मक अध्ययन”
सूखा नशा
महिला विधायक पुरुष विधायकों से विकास करने में 21 ही साबित होती हैं!
औरत मार्च: बदलते पाकिस्तान की दास्तान
भगत सिंह: हवा में रहेगी मेरे ख़यालों की बिजली
हाय मैं हिन्दी पीएचडी, पकोड़े की दुकान भी नहीं खोल सकती
धारा 377 की मौत और पितृसत्तात्मक विमर्श पद्धति
समता की सड़क जोतीबा फुले से होकर गुजरती है.
न मार्क्सवाद, न अंबेडकरवाद, न स्त्रीवाद , बस एक्सपोजर चाहिए और मंच
तुम्हारी माँ भी छेड़छाड़ की शिकार हुई, बेटों तुम्हें जानना चाहिए औरत की देह पर उसका अपना हक़ होता है
नाच एक संवेदनशील उपन्यास