दोहरी सियासत का शिकार फ़िलिस्तीन
“श्वेत पर्दे पर श्याम और उनकी ‘सुसमन ’ (The Essence)
पोस्ट ट्रुथ के दौर में युवाओं (जेन Z) के आंदोलन : कुछ सवाल, कुछ जवाब
सतीश सरदाना का कहानी-संग्रह ‘चोखा दाम’ मनुष्य, बाज़ार और स्मृति
फैंड्री : एक पत्थर जो हमारे सवर्ण जातिवादी दिलों में धंस गया है
प्रेम अब भी एक सम्भावना है, ‘सैराट’
‘महिषासुर और दुर्गा’ प्रसंग: लोकशायर संभाजी से बातचीत
नादिया अली का सेक्सुअल क्रूसेड
कंगना, गैंगस्टर और गुलशन की भाषा बनाम फिल्म जगत का मर्दवाद
आधा चाँद : खंडित व्यक्तित्व की पीड़ा
क्या बिहारी फिल्मों की खोई प्रतिष्ठा वापस लायेगी ‘मिथिला मखान’ ?
रील और रीयल ज़िदगी: एक इनसाइड अकाउंट
‘प्रगतिशील सिनेमा’ प्रेमचंद का अधूरा सपना