वंदना वाजपेयी की कहानियाँ : नई संवेदनाओं की कथा-यात्रा

डॉ. शशि शर्मा

कहानी महज एक विधा नहीं है बल्कि हमारे संवेदनात्मक संसार का वह हिस्सा है जिसमें अबोधावस्था से ही कभी राजा-रानी के माध्यम से तो कभी स्वयं के माध्यम से हम जीवन की निरंतरता, कठोरता, परिवर्तन, सौंदर्य, चिंतन आदि को बड़ी सहजता से समझ लेते हैं | यही वजह है कि आज का जीवन जटिलताओं से भरपूर होने के बावजूद कहानियों के प्रति पाठक की रुचि बनी हुई है | कहानियों में कहानीकार जीवन की जटिलताओं को जिस आत्मीयता से पाठक से संबद्ध करता है, मानो वह कहानी नहीं पाठक के संवेदन तंतुओं को परत-दर-परत उघार रहा हो | ऐसे ही गहन रचनात्मक कहानीकारों में समकालीन दौर की कहानीकार वंदना वाजपेयी का नाम लिया जा सकता है |

वंदना वाजपेयी समकालीन दौर की लोकप्रिय कहानीकार है | इनकी कहानियों में समसामयिक यथार्थ का बहुआयामी संदर्भ मिलता है | वे समाज में आए परिवर्तनों और इनसे नि:सृत जटिलताओं और विडंबनाओं को कहानियों के केंद्र में रखकर जिस सूक्ष्मता से शब्दबद्ध करती है, उनकी कहानियाँ अपेक्षाकृत मीनिंगफुल बन जाती है | बकौल कहानीकार – “विकास के साथ बदले जीवन ने कुछ ऐसे प्रश्न उठाए हैं, जिनके उत्तर पुरानी चाबियों से नहीं पाए जा सकते |”1

वंदना वाजपेयी की कहानियाँ सामाजिक, राजनीतिक, तकनीकी, सांस्कृतिक, पारिवारिक बदलाव से उत्पन्न व्यक्ति और समाज के मानसिक उद्वेलन और संघर्ष की कहानियाँ है | ‘कथा रंग कहानी प्रतियोगिता 2023’ का प्रथम पुरस्कार पानेवाली कहानी ‘ज्योति’ में कैंसर जैसी भयावह समस्या के शारीरिक और मानसिक प्रभावों को कहानीकार ने बड़ी संजीदगी से दिखाया है | मेडिकल की तमाम सुविधाएं होने के बावजूद इसे लेकर जो भय और आतंक हमारे समाज में व्याप्त है, उसके साये में रोगी और उसका परिवार मानसिक रूप से पहले ही मर जाता है | कहानी में दो पात्र है – एक मिताली जो सामान्य कैंसर से जूझ रही है और दूसरी ज्योत्सना जो रेयरेस्ट ऑफ़ रेयर कैंसर से जूझ रही है और जिसका इलाज डॉ. भी ढूँढ रहे हैं | मिताली को लगता है कि कैंसर एक बीमारी नहीं बल्कि मौत का फरमान है | वहीं ज्योत्सना इसे जीवन के अंत का आगाज न मानकर कहती है – “कैंसर इतना भी बुरा नहीं है कि आप पॉजिटिव ही ना रहें | बस, कोशिकाओं के बेतरतीब बढ़ने का ये गलत चयन हमें हमारी जिंदगी के लिए सही चयन के महत्त्व को सीखा देता है |”2 ज्योत्सना के लिए जब तक जीवन है, वह महत्त्वपूर्ण है | भयभीत होकर उसे यूं ही नष्ट करने के बजाए सकारात्मक रहकर दूसरों के जीवन को बेहतर बनाने में लगा देना चाहिए जोकि ज्योत्सना करती भी हैं, वह रोगियों के चेहरे पर मुस्कान बिखेरती है और उन्हें जीवन के प्रति आशावादी बनाती है | ज्योत्स्ना जैसे लोगों का होना आश्चर्यजनक लगता है, फिर भी यह सच है | यह दुनिया इतनी भी नहीं बदली है | ज्योत्स्ना जैसे लोगों की उपस्थिति नगण्य भले ही हो, पर है | मिताली का चरित्र भी हमें प्रभावित करता है | आरम्भ में कैंसर को मौत मानने वाली मिताली ज्योत्स्ना के दैहिक प्रयाण के बाद उसकी सोच को ज़िंदा रखती है | वह ज्योत्स्ना के जन्मदिन पर ‘ज्योति’ कैंसर संस्थान की स्थापना कर उसके उम्मीद और जीवन को हमेशा के लिए ज्योतित कर देती है | यह कहानी जीवन की भयावहता के मध्य जीवन की महत्ता पर पुनर्विचार के लिए प्रेरित करती है | मृत्यु से पहले जीवन को मृतप्राय बना देना अनुचित है क्योंकि जीवन अनमोल है अपने और समाज, दोनों के लिए |

वंदना वाजपेयी की चिकित्सा जगत पर केंद्रित एक और महत्त्वपूर्ण कहानी है – ‘विहान की आहट’ | ‘स्पर्म प्रिजर्वेशन’ जैसे नवीन विषय पर लिखी गयी इस कहानी में मेडिकल सुविधा के सकारात्मक और नकारात्मक, दोनों पहलुओं पर सामाजिक और पारिवारिक दोनों ही दृष्टियों से विचार किया गया है | कैरियर बनाने और भविष्य संवारने में नयी पीढ़ी इतनी उलझी हुई है कि शादी और संतानोपत्ति दोनों आज समस्या का रूप ले चुका है | ‘स्पर्म फ्रीजिंग’, सरोगेसी, आई.वी.एफ. जैसी तकनीकें भले ही सुविधानुसार बच्चा जनने में मदद करती हो पर गौरतलब है कि क्या सचमुच तकनीक से हमारी सभी समस्याओं का समाधान हो सकता है ? कारण की हम तकनीकी रूप से भले ही समृद्ध हो रहे हो पर सामाजिक दृष्टि से अभी भी पिछड़े हुए हैं | चारित्रिक नैतिकता का मापदंड अभी भी पुरातन आधार पर ही किया जाता है | 32 साल की सॉफ्टवेयर इंजीनियर कृति कैरियर सेटल करने की जद्दोजहद में देर से शादी करती है | शादी के कुछ समय बाद उसका पति जयंत कैंसर जैसी घातक बीमार का शिकार होकर अलविदा हो जाता है | उसके सामने एक लम्बी जिंदगी खड़ी है पर दुविधा यह है कि जिस जयंत के बच्चे की माँ वह बनना चाहती थी और दोनों ने इसके लिए ‘स्पर्म फ्रीजिंग’ की तकनीकी सुविधा ले रखी थी, वह आज जयंत के न होने पर बेमायने हो गयी थी | कृति जयंत के बच्चे की माँ तो बनना चाहती है पर अकेले इस जिम्मेवारी को निभाने से घबड़ाती है | वह बच्चे को पिता-सुख से वंचित नहीं करना चाहती, पर स्थिति उसके वश में नहीं होता है | कृति के दुविधाग्रस्त मन का कहानीकार ने मार्मिक अंकन किया है -“क्या करे वो, कहाँ जाए ? वह भी तो माँ बनना चाहती थी | जयंत के बच्चे की | पर जयंत के साथ मिलकर उसे बड़ा करना चाहती थी | यूँ इस तरह अकेले एक बच्चे को बिना पिता के दुनिया में लाना क्या उचित है ?”3

कृति की सोच हमें सोचने के लिए बाध्य करती है | हम तकनीकी सुविधा लेकर भले ही बच्चे को जन्म दे दें पर क्या यह उस बच्चे के साथ अन्याय नहीं होगा? तकनीक भावनाएं नहीं समझता और इंसान भावनाओं का पुतला है | एक तरफ कृति की सास है जो जयंत के न रहने पर ‘जयंत की निशानी’ चाहती है तो दूसरी तरफ कृति की माँ है जो इस माँग को ‘इमोशनल ब्लैकमेलिंग’ मानती है और बेटी को आगे का जीवन देखने की सलाह देती है | द्वंद्वात्मक स्थिति से गुजरती कृति की मानसिक स्थिति को लेखिका ने सूक्ष्मता के साथ शब्दबद्ध किया है – “घर-बाहर संभालती 32 साल की कृति सॉफ्टवेयर इंजीनियर को, घर वालों के हिसाब से इतनी समझ कहाँ है कि वो आगत भविष्य का सही मूल्यांकन कर सके ! शायद वे सही भी हों…क्योंकि वह कहाँ जानती थी कि मेडिकल साइंस का एक वरदान जिसे उसने अपने भविष्य की खुशी के प्रति आश्वस्त होने के लिए चाहा था, आज उसे इतने सारे प्रश्नों में उलझा देगा |”4 कहानी द्वंद्व के विभिन्न परतों को उभारती है | जिसे हम विकास मानते हैं, वह हमारी जिंदगी को किस तरह तोड़-मरोड़ देता है, इस कहानी के पठन से समझा जा सकता है |

वंदना वाजपेयी ने आभासी दुनिया को केंद्रित करके अपनी कई कहानियों में इसके दुष्प्रभाव को दिखाया है | आज करीबी रिश्तों में पनपने वाले तनाव और अलगाव की मुख्य वजह यही ‘आभासी दुनिया’ है | उनकी कहानी ‘टू माइ बिलव्ड वाइफ’ आभासी दुनिया की जमीनी हकीकत को वृहत्त स्तर पर उजागर करती है | जिंदगी की भाग-दौड़ में आज प्रत्यक्ष मुलाक़ात का स्थान सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफॉर्म ने ले लिया है | कहानीकार इसे ‘नए जमाने का चौपाल’ संबोधित करती है | इस चौपाल पर मिलने वाले लाइक, कमेंट और शेयर की संख्या से व्यक्ति के व्यक्तित्व और उपलब्धियों का निर्धारण किया जाता है | इतना ही नहीं हम दूसरों के सुख-दुख का मूल्यांकन और विश्लेषण भी इसमें पोस्ट किए गये सामग्रियों के आधार पर करते हैं | राधा की मन: स्थिति समाज के एक ऐसे बदलाव को दिखाती है जहाँ चिंतन की गंभीरता धीरे-धीरे खत्म हो रही है | ‘रिल्स’ और ‘रियल’ का भेद विवेकहीनता के आधार पर किया जा रहा है | राधा का अपनी सहेली सीमा के पोस्ट को देखकर अपने जीवन और अपने रिश्तों से असंतुष्ट हो जाना, भावनात्मक कुंठा और विवेकहीन मूल्यांकन की बढ़ती प्रवृति की ओर इंगित करता है – “पर अब…. अब तो सहन नहीं होता | मन तुलना करने लगता, एक तरफ वेद भाई साहब हैं और एक तरफ हमारे अनिल जी | कभी-कभी तो इतना गुस्सा आता है कि उसके पापा ने भी ढूँढ कर दुनिया का सबसे अन रोमांटिक नायाब हीरा निकाला है उसके लिए | जीवन में तो जैसे-तैसे चला भी लेती पर फेसबुक पर कितनी फजीहत लगती है | एक तरफ सीमा के पति उस पर न्योछावर हुए जा रहे हैं, दूसरी तरफ उसके अनिल जी |

क्या सोचती होंगी और सहेलियाँ ? यहीं ना कि ये फोटो नहीं डालती, लगता है इनके बीच प्यार जमता नहीं है | इज्जत की तो ऐसी की तैसी कर दी |”5 कहानी का अंत सोचने को विवश करता है | सीमा के जिस सुखी गृहस्थ की परिकल्पना राधा ने की होती है, वह ढह जाती है और पता चलता है कि सीमा एक नकली जिंदगी जीती है फेसबुक पर | आजकल ‘रियल’ की रियलिटी से ज्यादा ‘रील्स’ की रियलिटी का सच हमें आकर्षित करता है, पर वास्तविकता इससे अलग होती है | इंटरनेट दुनिया की एक और खतरनाक सच्चाई है – ऑनलाइन गेम्स | जिसका शिकार होते हैं निश्छल बच्चे | ऑनलाइन गेम्स का बाजार दिनोंदिन अपना वर्चस्व स्थापित कर रहा है | आनंद और उत्सुकता के नाम पर आजकल ऐसे ऑनलाइन गेम्स आ गये हैं जिससे न सिर्फ बच्चों का बचपना छिन रहा है, उनका अनमोल जीवन भी खतरे में हैं | इस संदर्भ में ‘जिंदगी की ई.एम.आई’ कहानी को देख सकते हैं | बेटा देवांश के बेहतर भविष्य के लिए ई. एम. आई. के चक्रव्यूह में फँसे रागिनी और विक्रम देवांश के भविष्य को सँवारने की जगह उसे इंटरनेट और ऑनलाइन गेम्स की एक ऐसी दुनिया में धकेल देते हैं, जो मौत के मुख में ले जाती है | एकल परिवार, बढ़ती महंगाई और बेतहाशा खर्चों के कारण आजकल ई.एम.आई. के चक्कर में बच्चों को समय दे पाना माता-पिता के लिए कठिन चुनौती बन गयी है | वे बच्चों को घर पर इंटरनेट और गेम्स के सहारे छोड़ देने के लिए बाध्य होते हैं | परिणामस्वरूप बच्चे साइबर क्राइम के गिरफ्त में फंसकर अपनी जान तक गँवा देते हैं | यह कहानी एक तरफ ई.एम.आई के चक्रव्यूह में फँसे माता-पिता की बेचैनी भरी जिंदगी का सच सामने लाती है तो दूसरी तरफ एकल परिवार में अकेले रह जाने वाले ‘ब्रेव और अंडरस्टैंडिंग’ बच्चों के अकेलेपन का फ़ायदा उठाने वाले साइबर क्रिमिनल की जमीनी हकीकत को उजागर करती है | यह कहानी हमें बच्चों की शारीरिक और मानसिक सुरक्षा को लेकर पुनर्विचार के लिए प्रेरित करती है |

कहानीकार वंदना वाजपेयी की एक खास विशेषता यह है कि वह नवीन अनछुए विषयों को कहानी का विषय बनाती है और हमें सोचने को विवश करती है | ‘प्रेम की नयी वैराइटी’ कहानी का जिक्र करना जरूरी है | इस कहानी में बच्चों के शारीरिक और मानसिक विकास को खाद्य-मिलावट के संदर्भ में देखने-समझने का प्रयास किया गया है | रिसर्च की आड़ में ‘जिनैटिकली इंजीनियरिंग’ का सहारा लेकर पैदावार बढ़ाने के नाम पर अनर्गल प्रयोग हो रहे हैं जिसका दुष्प्रभाव बच्चों पर सबसे अधिक पड़ रहा है | हार्मोनल असंतुलन के कारण बच्चे कम उम्र में शरीर से बड़े होते जा रहे हैं लेकिन विचारों में परिपक्वता और सहनशीलता की घोर कमी दिखाई पड़ रही है | जिसका दुष्परिणाम यह है कि प्रेम जैसी पवित्र और निजी भावना एक दिखावे और शारीरिक सुख का खेल बन गया है | इस कहानी में हम देखते हैं कि स्कूल के लड़के किस तरह कोका कोला में वोडका मिलाकर क्लास में बैठे हैं क्योंकि ‘लड़की को प्रपोज करना है | लिक्विड करेज की जरूरत है |”6 आजकल प्रेम की कई नई वैराइटी आ गयी है जिसमें समर्पण और भावनात्मक जुड़ाव की जगह सिर्फ देह को प्रमुखता दी जा रही हैं | कपड़े बदलने की तरह बॉयफ्रेंड और गर्लफ्रेंड बदले जा रहे हैं, लिव-इन में रहना और भोग-विलास में डूबे रहना प्रेम का मूल मंत्र बनता जा रहा है | प्रेम की गहनता और सात्विकता आज सवालों के घेरे में हैं | लेखिका के शब्दों में – “नहीं यह केमिकल का धोखा है प्रेम नहीं |” वो बुदबुदाई | तभी तो प्रेम को केवल शारीरिक स्तर पर ढूँढते, एक साथी से साथी तक भटकते युवा ज्यादा अतृप्त हैं, ज्यादा भावनात्मक समस्याओं से जूझ रहे हैं, ज्यादा मानसिक ग्रंथियों के शिकार हैं |”7

कहानी नैतिक मूल्यों में आई गिरावट को बताती है जो चीजों के पैदावार से लेकर संबंधों तक को प्रभावित कर रही है और एक ऐसी पीढ़ी तैयार कर रही है जिसमें अनैतिकता, मूल्यहीनता और निजी सुखों को सर्वोपरि समझने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है | वंदना वाजपेयी जहाँ एक तरफ गंभीर विषयों को लेकर कहानी लिखती है, वहीं दूसरी ओर रिश्तों की दुनिया को कहानी के केंद्र में रखती है | ‘जिंदगी की ई.एम.आई’ कहानी में माता-पिता और बच्चों के संबंध की पड़ताल करती है | वहीं रिश्तों में सबसे खट्टा-मीठा रिश्ता – सास-बहू का रिश्ता की अनकही आत्मीयता और लगाव को ‘खुड़पैची अम्मा’ में दर्शाती है | सास-बहू के रिश्तों पर लिखी गई यह एक बेहतरीन मार्मिक कहानी है | यह रिश्ता अमूमन खटास से भरा हुआ होता है | इस कहानी में हम इस खटास को कई बार महसूस करते हैं बावजूद इसके मिठास बनाए रखने के लिए जो चेष्टा सास और बहू में दिखाई पड़ती है, वह अद्भूत है | अम्मा का यह कथन कि “लली! सबको ले के चले वाले को दिल बड़ा राखे के पड़त है |”8 मेघना के जीवन का सूत्र वाक्य बन जाता है | सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि मतभेद के बावजूद मनभेद नहीं पनपता और दोनों एक-दूसरे के प्रेम, विचारधारा और त्याग को समझते हैं, महत्त्व देते हैं | जिस नि:स्वार्थ भाव से मेघना अम्मा के वचनों और परंपराओं का निर्वाह करती है, वह कहानी को अलग स्तर पर ले जाती है | कहानीकार ने कई स्थानों पर मौन हृदयस्थ संवादों का प्रयोग कर इस रिश्ते को पूर्वाग्रहों से मुक्त करने का सुन्दर प्रयास किया है |

स्त्री सशक्तीकरण पर लिखी गई कहानी ‘की बोर्ड पर नायिका’ पुरूषवर्चस्ववादी समाज की चालाकियों को जाहिर करती है | पुरूषवर्चस्ववादी समाज बौद्धिक स्त्रियों की प्रतिभा को महत्त्व देने में आज भी कतराता और बड़ी चालाकी से उनके साथ दोयम दर्जे का व्यवहार करता है | कहानी की नायिका आरती को स्वतंत्रता दिवस के दिन एक बड़े मंच पर स्त्री सशक्तिकरण से संबंधित वक्तव्य प्रस्तुत करने का आग्रह कार्यक्रम के प्रबंधक आशीष जी से मिलता है | आरती इसे एक बड़ा मौका समझ बड़ी मेहनत से एक लेख तैयार करती है किंतु अंतिम समय में वक्तव्य के लिए निर्धारित समय में कटौती कर इसे एक औपचारिक वक्तव्य बना दिया जाता कारण कि कार्यक्रम में पधारे नेताजी और अन्य वक्ताओं के लिए भरपूर समय चाहिए | कहानी की यह पंक्ति उल्लेखनीय है – “कॉन्टेक्ट की इस दुनिया में एक नई लेखिका को सुनने से कहीं अधिक जरूरी उनके लिए मंत्री जी से परिचय बढ़ाना था |”9 यह पंक्ति पुरूषतांत्रिक समाज की उस सोच को दिखाती है जो स्त्री को मौक़ा तो देता है पर संकीर्ण मानसिकता के साथ |

ट्रांसजेंडरों पर लिखी गई कहानी ‘वो फोन कॉल’ की चर्चा जरूरी है | मिस XYZ के माध्यम से ट्रांसजेंडरों के मानसिक द्वंद्व को कहानीकार ने बारीकी से रचा है | अपने करीबी रिश्तों की अवहेलना से आहत होकर, न चाहते हुए भी मौत को गले लगाने की ओर उन्मुख मिस XYZ की चिंता और घबराहट स्वाभाविक है क्योंकि ‘एक स्त्री देह में कैद एक पुरूष देह’10 समाज द्वारा निर्धारित लैंगिक मापदंडों पर घोर अपराध है | भले ही इसमें उसकी कोई गलती न हो | इस कहानी में वैभव से वैभवी बनी साइंस टीचर की आपबीती ट्रांसजेंडरों की जिंदगी का बयान है – “खुद को स्वीकार करना आसान नहीं होता पर खुद से झूठ बोलना उससे भी कठिन | ऐसा भी नहीं है कि इसके बाद लोगों की सोच बदल जाएगी या वो तंज कसना बंद कर देंगे | अगर पास के चार लोग मान भी जाएंगे तो हर दिन चार नए लोग टकराएंगे जिन्हें समझ नहीं आएगा कि हम भी उन्हीं की तरह हैं … मनुष्य, सामान्य मनुष्य | और हमें भी अपनी पहचान के साथ जीने का अधिकार है | देश हो या विदेश ऐसे लोग भी हैं जो महज इसी बात पर ह्त्या तक कर देते हैं | आखिर गुनाह क्या है हमारा ….बस सामने आना, अपने आप से झूठ बोलना बंद कर देना, झूठे रिश्तों की जगह सच को तरजीह देना |”11 यह कहानी ट्रांसजेंडर के जीवन के ऊहापोह को दर्शाती है | बिना गुनाह के वे समाज के बहुत बड़े गुनाहगार बन जाते हैं |

वंदना वाजपेयी की कहानियों का संसार विराट है | यहाँ मनुष्य ही नहीं मनुष्येतर प्राणियों की व्यथा-कथा भी वर्णित हुई है | ‘सिम्मोमय’ उनके कहानी जगत का अनमोल रत्न है | पशु और मनुष्य के आतंरिक लगाव को इस कहानी में इतनी खूबसूरती से पिरोया गया है कि प्रेमचंद की कहानियों की याद सहसा आ जाती है | पशु ईश्वर की वह रचना है जिससे निश्छल प्रेम का पाठ सीखा जा सकता है किंतु वही पशु आज हमारी संवेदनहीनता का शिकार हो रहे हैं | एक तरफ तो हम अपने ग्रह-नक्षत्रों को ठीक करने के लिए उन्हें रोटी देते हैं, गौ-सेवा करते हैं | वहीं दूसरी तरफ हम उन्हें मरने के लिए छोड़ देते हैं | आज ज्यादातर जानवरों की मृत्यु पेट में पोलेथिन जाने से होती है या मनुष्य की असंवेदनशीलता की वजह से हो रही है | हम जानवरों को जख्मी कर बेधड़क निकल जाते हैं | सिम्मो जब तक घर में रहती है, सुरक्षित रहती है | जब बाहर निकलती है, उसकी दुर्दशा हो जाती है – “पूरी मरहम-पट्टी के दौरान अम्मा जी जमाने भर को कोसती रहीं, “नास हो जमाने का, कैसे लोग-बाग़ हैं, रास्ते में इधर-उधर कील छोड़ देते हैं, काँच छोड़ देते हैं | कोई जनावर निकले तो बेचारे के गड़ ही जाए | सबका जल्दी-जल्दी में अपना घर नोटों की गड्डी से भरे का पड़ी है | बेजुबान प्राणियों की चिंता किसी मानुष को नाही है…|”12
इतने असंवेदनशील कि जख्मी पशुओं को चिकित्सा उपलब्ध कराने के बजाए रील्स बनाकर वाचिक संवेदना प्रकट कर देते हैं | यह कहानी पशुओं के वर्तमान हालात पर बड़ी बारीकी से विचार करने के लिए प्रेरित करती है |

अंतत: वंदना वाजपेयी की कहानियाँ समाज के उन दरवाजों को खोलती है जो बंद है या जिन्हें खोलने का साहस नहीं है | उनकी कहानियों में विज्ञान की उपस्थिति वृहत्तर रूप में देखी जा सकती है | भावनाओं के साथ विज्ञान का मेल अनूठा प्रयास है | कहानियों में विस्तार भले ही हो पर उसमें उठाए गये मुद्दों को अनदेखा नहीं किया जा सकता | उनकी कहानियाँ मन-मानस को झकझोरती हुई ठहरकर सोचने को विवश करती है |

संदर्भ सूची :
वंदना वाजपेयी, विहान की आहट, भावना प्रकाशन, दिल्ली, प्रथम सं. 2025, पृ.8
वही, पृ. 63
वही, पृ. 19
वही, पृ. 12
वही, पृ. 159
वही, पृ. 105
वंदना वाजपेयी, वो फोन कॉल, भावना प्रकाशन, दिल्ली, दूसरा सं. 2023, पृ. 107
वंदना वाजपेयी, विहान की आहट, भावना प्रकाशन, दिल्ली, प्रथम सं. 2025, पृ 130
वही, पृ. 82
वंदना वाजपेयी, वो फोन कॉल, भावना प्रकाशन, दिल्ली, दूसरा सं. 2023, पृ. 31
वही, पृ. 33
वंदना वाजपेयी, विहान की आहट, भावना प्रकाशन, दिल्ली, प्रथम सं. 2025, पृ. 37

परिचय – डॉ. शशि शर्मा
विभिन्न पत्र- पत्रिकाओं यथा लमही, समीचीन, भाषा, समावर्तन, सत्राची आदि में लेख, अनुवाद प्रकाशित,
सामाजिक यथार्थ और दुष्यंत कुमार की कविता और
यथार्थ, प्रतिरोध और सौंदर्यबोध : दुष्यंत कुमार की कविता नामक दो पुस्तक प्रकाशित
पता- गौर आवासन, फ्लैट न. 4 , रविन्द्रपल्ली, माटीगारा, जिला- दार्जीलिंग, पश्चिम बंगाल – 734010
ईमेल – anantshashi.sharma43@gmail.com

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