ऑब्जेक्टिव प्रश्न से आत्मबोध तक : बाबासाहेब की खोज

अम्बेडकरवादी विचारक और स्त्रीकाल के संपादक संजीव चंदन, बाबा साहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर के अपने जीवन पर पड़े गहन प्रभाव का आत्मीय और विचारोत्तेजक वर्णन करते हैं। उनका यह अनुभव ‘बोधि’ पत्रिका में प्रकाशित हो चुका है।

कल्पना करिए कि आप एक ऐसे ब्राह्मण परिवार में पैदा हुए हों, जिसके इर्द-गिर्द कोई खास राजनीतिक वातावरण नहीं हो और आपके आस-पास बौद्धिकता का अधिकतम अर्थ गीताप्रेस की पत्रिका कल्याण का पाठ हो, रामचरितमानस का पाठ और उस पर टीका हो, तो भारत की सबसे प्रभावकारी बौद्धिकता, जिसने स्थायी बदलाव के विचार और प्रयोगात्मक व्यवस्थाएँ दीं, कैसे आपके बोध का हिस्सा हो सकती है?

हाँ, बाबासाहेब समतावादी समाज का स्वप्न लिए 20वीं और अब 21वीं सदी के सबसे बड़े बौद्धिक व्यक्तित्व थे, दार्शनिक थे और समतावादी राजनीतिक दिशा के सबसे बड़े पथ-प्रदर्शक, लेकिन मेरी, या मुझ जैसे लोगों की चेतना का हिस्सा कहाँ थे? सवाल है कि हो भी कैसे सकते थे? भारत में समतावादी इतिहास का दर्ज होना और उसका व्यापक होना कभी भी आसान नहीं रहा। 20वीं सदी के आठवें-नौवें दशक तक बाबासाहेब अधिकांश उत्तर भारतीयों की चेतना का हिस्सा नहीं थे। पाठ्यक्रमों ने बस उन्हें सामान्य ज्ञान के एक ऑब्जेक्टिव सवाल में सीमित कर दिया था, महज ‘संविधान निर्माता’! सवाल सबसे बड़ा है कि जब बाबासाहेब चेतना का हिस्सा बन गए, तब क्या कुछ बदल गया मेरे जीवन में, इससे आगे बढ़कर कि संविधान निर्माता डॉ. भीमराव अम्बेडकर अब मेरे लिए भी ‘बाबासाहेब’ थे?

मेरा जन्म शाकद्वीपी (सकलदीपी) ब्राह्मण परिवार में हुआ था। दादाजी उपवैद्य थे और आठ-दस बीघे के किसान। हमारे यहाँ पुरोहिती नहीं होती थी। इस परिवार की कोई राजनीतिक पृष्ठभूमि नहीं थी। दसवीं करते हुए अंतरविद्यालयीय वाद-विवाद और भाषण के मंचों पर, अथवा साहित्यिक सक्रियता देखते हुए, सीपीआई (एमएल) के कुछ लोगों ने संपर्क जरूर किया था, जुड़ने के लिए। एक माओवादी माने जाने वाले बुद्धिजीवी ने भी साथ जुड़ने को कहा, लेकिन मैं नहीं जुड़ सका। दक्षिणपंथी तो वातावरण था ही।

दसवीं के पहले-पहले तक मैं हिंदी अनुवादों वाली वाल्मीकि रामायण, अध्यात्म रामायण, महाभारत, विष्णु पुराण, प्रेमसागर आदि पढ़ चुका था। गेयता के कारण राधेश्याम रामायण की पंक्तियाँ याद थीं। पुराण-कथाओं ने मानस बनाया था। यह सब नानीघर के वातावरण में परनाना (नाना के पिताजी) की पोथियों की उपलब्धता के कारण सहज था।

गनीमत थी कि इस चेतना को चेक-बैलेंस पाठ्यपुस्तकों के सेक्युलर कंटेंट से मिल रहा था, हालांकि भारत में स्कूली शिक्षा की पाठ्यपुस्तकें उतनी सेक्युलर तब भी नहीं थीं। एक बात और अच्छी थी कि पिता की अभिरुचियों और उनकी लेखकीय कामनाओं ने एक और सीमित वातावरण उपलब्ध कराया था। इस कारण पाठ्यपुस्तकों से इतर बहुत कुछ पढ़ पाया।

इतिहास मेरा प्रिय विषय था, प्राचीन इतिहास और मध्यकालीन इतिहास। याद है कि मैट्रिक की परीक्षा की तैयारियों के दौरान भी इतिहास की वैसी किताबें पढ़ता था, जो तब मगध विश्वविद्यालय की पाठ्य-सामग्रियों में शामिल थीं। पिता के कारण ही शायद बचपन में सीमित अर्थों में सेक्युलर कंटेंट की पत्रिकाएँ पढ़ सका था, नंदन आदि। बाद में कुछ साहित्य की किताबें, प्रेमचंद की कहानियाँ और दिनकर की कविताएँ।

तब भी बाबासाहेब कहाँ थे? बिल्कुल नहीं थे। एक वाक्य के सामान्य ज्ञान के अलावा, भारत का संविधान किसने लिखा?

पिता के प्रभाव से साहित्यिक अभिरुचियाँ स्थायी हो गईं। पिता के प्रिय कवि दिनकर थे। उनकी पंक्तियों में जाति-विरोध की कुछ पंक्तियाँ नियमित रूप से आती थीं, जिन्हें वे गाते थे, विशेषतः कर्ण से संबंधित अंश। आस्तिक हैं वे, लेकिन बहुत पूजा-पाठी नहीं। कर्ण की उपेक्षा और दिनकर द्वारा रचित ‘जाति-जाति रटते हैं, जिनकी पूँजी केवल पाखंड’ मेरे सरोकारों को संवेदित करते थे। पिता ने परिचित कराया था इस काव्य से। उन्हें आज भी याद है।हालाँकि स्वयं दिनकर का ‘जाति-चिंतन’ कभी व्यापक और यथार्थपरक नहीं रहा है, अधिकतम भूमिहार और ब्राह्मण दायरे का रहा है।

शहर में, गया में, वामपंथी धारा के साहित्यिक संगठन थे। प्रगतिशील लेखक संघ (प्रलेस) में वाम-विचार और दक्षिण-विचार का बड़ा भेद नहीं था। बड़ी बारीक रेखा का भेद था, शायद वह भी नहीं था। जनवादी लेखक संघ (जलेस) के नाम पर चार-पाँच सौ बीघे के मालिक एक जमींदार साहित्यकार और एक-दो लोग थे, बाकी उसी जमींदार साहित्यकार के अनुयायी। जन संस्कृति मंच (जसम) तब गया के साहित्यिक-सांस्कृतिक माहौल में बेहद अपरिचित-सा संगठन था।

इन संगठनों में जाति-आधारित सामाजिक विषमता कोई विषय नहीं था। था भी तो सवर्ण स्पेस की आपसी प्रतिस्पर्धा की सीमा में। बाबासाहेब की चर्चा का तो सवाल ही नहीं था।

परवरिश एक हद तक लिबरल थी, जितनी लिबरल परवरिश संकीर्ण शाकद्वीपी समाज का वैसा परिवार दे सकता है, जो बहुत बड़े बदलाव का हामी न हो।

अपने गाँव में चतुर्दिक परिवेश ब्राह्मण-भूमिहार की सहजता वाला था। अन्य जातियों से एक सीमा तक ही मेल-मिलाप था। इस हिसाब से नानीघर में ज्यादा समरस (समतापूर्ण नहीं) स्थिति थी। रेणु के शब्दों में, ‘बारहो बरन के लोगों में एक साख्य’, निस्संदेह धोबी जाति को छोड़कर कोई दलित नहीं। नानीघर में मेरा मन अधिक रमता था।

शहर आने के बाद मित्रों में ज्यादातर गैर-ब्राह्मण थे। कायस्थों और कुछ मुसलमान दोस्तों के बीच व्यवहार की प्रगतिशीलता सीखी। पर यहाँ भी बाबासाहेब कहाँ थे, वस्तुनिष्ठ सवाल के अलावा! वही, ‘संविधान किसने लिखा?’ पता नहीं यह सवाल भी सामान्य ज्ञान का हिस्सा कब बना था, किसने बनने दिया था? क्या बिहार की कर्पूरी ठाकुर सरकार ने, या तब नई-नई आई लालू प्रसाद के नेतृत्व वाली जनता दल की सरकार ने?

बिहार से दिल्ली और दिल्ली से वर्धा पहुँचा, स्त्री अध्ययन से एमए करने। भारत में हिंदी में एमए स्तर पर इसकी पढ़ाई शायद पहली बार वर्धा के महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय में शुरू हुई थी। पहला बैच था, जिसका मैं सदस्य था। यह एक वैकल्पिक विषय था और जेंडर-आधारित विषमताओं को समझने तथा स्त्री-पुरुष समता की प्रस्तावना के लिए एक समतावादी विषय था।

लेकिन बाबासाहेब? यह खास किस्म का इरेजर था। भारत में सबसे ठोस स्त्रीवादी पहलों वाला बुद्धिजीवी और राजनेता पाठ्यक्रम या विमर्श का हिस्सा नहीं थे। यहाँ भी वे वस्तुनिष्ठ से लघु-उत्तरीय प्रश्न भर हो गए थे। तब तक भारत में उनका राजनीतिक प्रभाव बहुमत-आधारित लोकतंत्र के लिए जरूरी हो गया था। संविधान निर्माण समिति के अध्यक्ष थे वे, यह लेखक होने से एक अलग बात थी, दो-धारी!

वस्तुनिष्ठ और लघु-उत्तरीय सवालों से आगे बाबासाहेब से परिचय और बाद में उनसे एवं आंबेडकरी आंदोलन से जुड़ाव का कारण बना टाइम और स्पेस। नागपुर की दीक्षाभूमि से 80 किलोमीटर दूर वर्धा में था हमारा विश्वविद्यालय। वह विश्वविद्यालय भारत के अन्य विश्वविद्यालयों के अनुकरण में भी, और हिंदी भाषा का विश्वविद्यालय होने की वजह से भी, सवर्ण परिवेश का विश्वविद्यालय होने के लिए अभिशप्त था। हिंदी साहित्य और भाषा उसे ब्राह्मण विश्वविद्यालय होने के लिए एक अनुकूल वातावरण प्रदान करते थे।इससे भी बढ़कर बात यह थी कि अपने संस्थानों में ब्राह्मण वर्चस्व स्थापित करने के लिए ख्यात-कुख्यात अशोक वाजपेयी उसके प्रथम कुलपति थे। जाहिर है, उस वातावरण में बाबासाहेब एक अपरिचित,उपेक्षित और अलक्षित इतिहास थे। हमारा बैच विश्वविद्यालय का पहला बैच था। उस बैच में एक भी दलित विद्यार्थी नहीं था। दूसरे-तीसरे बैच से महाराष्ट्र के बौद्ध छात्रों का नामांकन हुआ। विश्वविद्यालय के विमर्श-स्पेस में बदलाव आया। मेरे लिए भी विश्वविद्यालय और विश्वविद्यालय के बाहर के आंबेडकरी वातावरण, विमर्श और आंदोलन से जुड़ने का अवसर बना।

इस बीच स्त्री अध्ययन की पढ़ाई के दौरान बाबासाहेब वस्तुनिष्ठ और लघु-उत्तरीय सवालों से बढ़कर दीर्घ-उत्तरीय सवाल हो गए थे हमारे लिए। आउटसोर्स प्राध्यापिकाओं और प्राध्यापकों ने बाबासाहेब के साथ-साथ सावित्रीबाई फुले और महात्मा फुले के योगदानों से परिचित करा दिया था, आउट ऑफ सिलेबस जाकर भी।

इस तरह बाबासाहेब, उनके विचारों और योगदानों से परिचय का एक सिलसिला शुरू हुआ। यह परिचय जल्द ही आंबेडकरवाद के प्रति प्रतिबद्धता में बदल गया। प्रतिबद्धता में बदलने का रास्ता आंदोलनों और विचारों के सम्मिश्र से होकर गया, पहले आंदोलन।

विश्वविद्यालय और विश्वविद्यालय के बाहर के सामाजिक-राजनीतिक आंदोलनों से जुड़ाव मजबूत होता गया। महाराष्ट्र के बौद्ध आंबेडकरवादियों में बाबासाहेब का दर्जा ‘ईश्वर’ का था/है। बाबासाहेब से जुड़ाव की इस हद की आंबेडकरवाद के विरोधी समूहों द्वारा खूब आलोचना की जाती है। लेकिन सबसे अलहदा और गौर करने लायक आलोचना कथित प्रगतिशीलों की ओर से आती है। वे बाबासाहेब द्वारा नायक-पूजा विरोधी कथन को ही इसकी आलोचना का आधार बनाते हैं।

ये वे लोग हैं, वैसे बुद्धिजीवी, जो प्रगतिशील स्पेस में सवर्ण समाज से आते हैं और प्रत्यक्ष-परोक्ष रूप से सवर्ण मानस से युक्त होते हैं, सवर्ण हितों के प्रति जाने-अनजाने प्रतिबद्ध भी। ये बौद्धिक रूप से उन्नत होते हैं, भाषा के धनी और देशी-विदेशी उद्धरणों से भरे हुए। विचारधारा के तौर पर सार्वभौमिकता का दावा करते हैं। जरूरी नहीं कि वह शातिर दावा ही हो; उनका सामाजिक-सांस्कृतिक मन उनमें सार्वभौमिक नेतृत्व का अहम भर देता है। वे जाति या जेंडर की विविधता और उसके कारण उत्पन्न वंचना की स्थितियों को समझने से इनकार कर देते हैं। वे धारणाओं से भरे होते हैं और धारणाओं से भर देते हैं।इस मामले में मेरी गैर-राजनीतिक पृष्ठभूमि ने मदद की। मुझे किसी खास राजनीतिक ट्रेनिंग से अनलर्न होने की जरूरत नहीं पड़ी। अन्यथा बाबासाहेब को लेकर मुझे कई मिथकों, अफवाहों और धारणाओं से मुक्त होने की जरूरत होती। हालांकि अनलर्न होना था, या अब भी है, सवर्ण परवरिश, ब्राह्मण परवरिश से आत्मसात कुछ भावनाओं और धारणाओं को। मैं ऐसी किसी भी लर्निंग से दूर था, जो मुझे आंबेडकरवादियों के बाबासाहेब के प्रति प्रेम को भक्ति के दायरे में डालने के लिए प्रेरित करती। इस दायरे के आलोचक जानबूझकर शायद उन स्थितियों को नहीं देखना चाहते, जहाँ बाबासाहेब पैदा हुए थे और काम करते थे। वे स्थितियाँ, जो उनकी महानता के मार्ग की बाधक थीं और करोड़ों दलितों के सामान्य, सहज जीवन के मार्ग की भी बाधक थीं।

एक महान व्यक्तित्व ने करोड़ों दलितों और स्त्रियों को मुक्ति का एक बड़ा सूत्र दिया, मानवता को समानता का सूत्र और मार्ग दिया। उनके प्रति कृतज्ञता का उद्वेग स्वाभाविक है, जिसे भक्ति के खाते में डालकर सीमित करने की कोशिश ब्राह्मण स्पेस से आने वाला प्रगतिशील बौद्धिक वर्ग करता है।इसी कृतज्ञ जमात ने मुझे भी बाबासाहेब से प्यार, उनके प्रति कृतज्ञता, हाँ, उनकी भक्ति, का कारण उपलब्ध कराया। सवाल करने का सलीका दिया, अपने पाठ्य-अनुशासन से। कि भारत का सबसे बड़ा स्त्रीवादी व्यक्तित्व बाबासाहेब, 20वीं सदी की सबसे बड़ी स्त्रीवादी हलचलें और भारत में स्त्रियों के लिए सबसे बड़े योगदान, जो फुले-आंबेडकरी धारा के हैं, राष्ट्रवादी, समाजवादी और मार्क्सवादी इतिहास-चिंतन में अलक्षित क्यों हो गए? दलित साहित्य, इतिहास, आंदोलन और स्मृतियाँ गायब क्यों हैं? अलक्षित क्यों रहीं? बाबासाहेब की उपेक्षा क्यों हुई? 

यह भी गौर करने लायक है कि बाबासाहेब का, आंबेडकरवादी चिंतन का, जिस ब्राह्मणवादी, हिंदुत्ववादी, सनातनी चिंतन से सबसे बड़ा विरोध है, बल्कि जिसे समता के मार्ग की सबसे बड़ी बाधा मानते हैं बाबासाहेब, वह धारा और उसका राजनीतिक नेतृत्व करोड़ों कृतज्ञ लोगों के सालाना कृतज्ञता-ज्ञापन का उपहास ‘भक्ति’ कहकर नहीं करते। बल्कि उनकी कोशिश होती है कि वे उन्हें अपने भीतर समाहित कर लें। उन्होंने बाबासाहेब के नाम पर पंचतीर्थ बना दिया है।

इसके बावजूद आंबेडकरवादी आंदोलन, विमर्श और बुद्धिजीवी इस बात पर स्पष्ट हैं कि उन्हें समता हासिल करने के लिए ब्राह्मणवादी हिंदुत्व से लड़ना है, वही लक्ष्य है।इस तरह बाबासाहेब कृतज्ञ समूहों, मित्रों के प्रेम और उनके साथ साझा संघर्ष के बीच मुझे समझने को मिले। कृतज्ञता हमारी भी है, पूरे देश की है। समतावादी समाज और लोकतांत्रिक भारत सबके हित में हैं।

संविधान सभा के पहले भाषण में बाबासाहेब ने विभिन्न समूहों और हितों में बँटे लोगों को एक साथ मिलकर राष्ट्र-निर्माण का लक्ष्य दिया है। राष्ट्रवाद का यही सूत्र है। कृतज्ञ समूह के साथ एकाकार होकर बाबासाहेब को और समझने की प्रेरणा मिली मुझे। उन्हें पढ़ने लगा। उनके लेखनों, भाषणों और जीवन-पर्यंत के कार्यों का समग्र अध्ययन आंबेडकरवाद का पूरा पाठ मेरे सामने खोलने वाला था। यह ‘अत्त दीप’ का मार्ग है।

हासिल क्या हुआ फिर?

मेरे लिए सबसे बड़ा हासिल रही वैचारिक दृढ़ता और स्तरीकृत समाज की राजनीतिक गति को समझने का दृष्टिकोण। यही सबसे बड़ा हासिल है। प्रचलित नैरेटिव से अलग देख-समझ पाने की सलाहियत और दृढ़ता, बाबासाहेब के विचारों से जुड़ने का सबसे बड़ा प्रतिफल है।

बाबासाहेब की वैचारिक दृढ़ता का सबसे बड़ा उदाहरण गोलमेज सम्मेलन है, पुणे पैक्ट है। महात्मा गांधी व्यक्ति के तौर पर और तत्कालीन प्रचलित राष्ट्रवादी नैरेटिव के केंद्रबिंदु होने के कारण देश की बहुसंख्य चेतना पर हावी थे। उस समय गांधी की धारणाओं, इच्छाओं और उनके राजनीतिक कार्यक्रमों को चुनौती देना असाधारण था। द्वतीय गोलमेज सम्मेलन में गांधी अपना महात्मापन खो देते हैं। आक्रोशित महात्मा संयम और धैर्य का अपना हासिल खो देते हैं। बाद में पृथक निर्वाचन के खिलाफ अनशन पर बैठकर अहिंसा के अपने ही सिद्धांत का उल्लंघन करते हैं। उस समय देश का वर्चस्वशाली नैरेटिव बाबासाहेब के खिलाफ हो जाता है, लेकिन वे डिगते नहीं।

बॉम्बे टेक्सटाइल मिल हड़ताल का साथ न देने के अपने निर्णय के कारण वे पहले भी लोगों के, यहाँ तक कि अपने लोगों के भी, गुस्से का शिकार हो चुके थे, लेकिन डटे रहे। 1941-42 में भी वे ब्रिटिश सरकार का हिस्सा रहते हुए कांग्रेस के निर्णय के खिलाफ अपनी अलग लकीर खींचते हैं। ब्रिटिश सरकार में रहते हुए ब्रिटिश सरकार की आलोचना से भी नहीं चूकते।

बोधि पत्रिका जिसमें यह वैचारिक लेख अनुभव प्रकाशित हुआ

तत्कालीन राष्ट्रवादी धारा और उसके केंद्र कांग्रेस एवं उसके अनु-संगी संगठनों से अलग जाना साधारण नहीं था, लेकिन मानवता के पक्ष में बाबासाहेब दृढ़ वैचारिक स्टैंड पर बने रहते थे। यही प्रेरणा, उनके प्रभाव के साथ, मेरे लिए अमूल्य निधि बन जाती है।वैचारिक मतों और निर्णयों में बाबासाहेब बेहद स्पष्ट थे। उन्होंने ब्राह्मण और ब्राह्मणवाद का फर्क अत्यंत स्पष्टता से बताया था। संदर्भ मायने रखता है। जिन सत्यशोधक नेताओं को उन्होंने दो-टूक राय दी थी, उनके ऐतिहासिक अभियान के नायक, महात्मा फुले, को वे अपना आदर्श मानते थे।

सत्यशोधक नेताओं जेधे और जावलकर ने उन्हें प्रस्तावित किया था कि महाड़ आंदोलन में वे साथ देना चाहते हैं, बशर्ते एक भी ब्राह्मण उसमें न हो। बाबासाहेब ने अपने पत्र बहिष्कृत भारत में दो-टूक जवाब दिया था, ‘ब्राह्मण और ब्राह्मणवाद में फर्क है। ब्राह्मणवाद से मुक्त ब्राह्मण हमारा दोस्त है और ब्राह्मणवाद से युक्त गैर-ब्राह्मण हमारा शत्रु।’

ये वही बाबासाहेब थे, जिन्होंने जावलकर की किताब देशाचे दुश्मन पर प्रतिबंध के खिलाफ हाईकोर्ट में सफल मुकदमा लड़ा था। वह किताब ब्राह्मणों के खिलाफ बेहद आक्रामक प्रस्तावनाओं से भरी थी, जिसे आधार बनाकर जिला अदालत ने उस पर रोक लगा दी थी। उस रोक के खिलाफ बाबासाहेब जावलकर के वकील थे, लेकिन जब बात सैद्धांतिक स्टैंड की आई, तो उन्होंने ब्राह्मण और ब्राह्मणवाद का फर्क स्पष्ट कर दिया। महाड़ आंदोलन में अच्छी संख्या में ब्राह्मण और सीकेपी भी थे।

इन दिनों मैं 1947 से 1956 के बीच के बाबासाहेब के नायकत्व को एक उपन्यास में लाने की कोशिश कर रहा हूँ। धारा के विपरीत खड़ा होकर मानवता के पक्ष में संघर्ष करने वाले नायक का वह सर्वाधिक उन्नत समय है। मेरे लिए एक और बड़ा हासिल है, नारियल की तरह का उनका व्यक्तित्व। बाहर से कठोर, दर्प से भरा, और भीतर से कोमल, स्नेह से ओत-प्रोत।इस दौर के बाबासाहेब की ताकत संवैधानिक मूल्यों वाला भारत है, उन मूल्यों की ओर अग्रसर भारत है। क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि क्रांतिसूर्य डॉ. भीमराव अम्बेडकर के प्रभाव ने बौद्ध धर्म को भी एक अलग लय दे दी?मैं गया से आता हूँ, जहाँ भगवान बुद्ध को ज्ञान मिला, लेकिन गया के बुद्ध ‘दशावतार’ बना दिए गए। मैंने शिक्षा और आंबेडकरवादी संस्कार नागपुर में पाया, जहाँ बुद्ध का ‘समता संदेश’ प्रज्ज्वलित हो उठा।

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ISSN 2394-093X
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